हम जी रहे हैं इतना मात्र पर्याप्त नहीं। अपने कुटुंबियों के लिये आजीविका भी कमा रहे हैं- यह भी काफी नहीं है। जहाँ काम करते हैं पूरी लगन और परिश्रम के साथ करते हैं, हम अच्छे पिता, उत्तरदायित्व निबाहने वाले पति हैं, और परमात्मा का ध्यान भी नित्य नियम से करते हैं, इतना कहने पर भी हम तो यही कहेंगे कि अभी भी आप जो कर रहे हैं, वह अपूर्ण है, न काफी है, यह तो जीवन की अनिवार्यतायें हैं, विशेषता या परिपूर्णतायें नहीं। इतना तो हममें से प्रत्येक को करना ही चाहिये।
जीवन का अर्थ है-एक ऐसी तत्परता जो निरन्तर यह खोजती रहे कि कहाँ पर कुछ भलाई की जा सकती है। प्रतिक्षण और अधिक उद्दात्त व्यक्ति बनने और अपनी आत्मा की पवित्रता विकसित करने के लिये यदि प्रयत्नशील हैं, तब यह कहा जा सकता है कि आपके जीवन की दिशा सही है। अपने परमात्मा को केवल हृदय से ही प्रेम नहीं करना वरन् सारी आत्मा, सारी बुद्धि और हाथों से भी करना चाहिये, तभी जीवन को परिपूर्ण बना सकते हैं।
हर पिछड़े हुए साथी की प्रतिदिन मदद किया कीजिये; जो सेवा सहायता के पात्र हैं, उन्हें ढूंढ़िये और उनके लिये कुछ काम कीजिये। यह काम कितना ही छोटा हो पर यदि आपने उसी को पूरा करने में अपना गौरव समझ लिया है और यह मान लिया है कि हमें उसके बदले में कुछ मिलने वाला नहीं है तो भी उस काम को पूरा करना ही है, ऐसी निष्ठा यदि जम गई तब यह मान लिया जायेगा कि आपने जीवन का अर्थ ठीक समझ लिया। संसार में हम अकेले नहीं दूसरे भी बहुत से भाई हैं, उनकी भलाई का विचार भी करते रहना है, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिये।
-श्वाइत्जर,
बुद्ध भगवान तब कुण्डिया नगर के कुण्डियाधान वन में विहार कर रहे थे। कोलिय पुत्री सुप्पवासा को आज सात वर्ष गर्भ धारण किये हो गये थे, किन्तु प्रसव हो ही नहीं रहा था। उदर में बच्चे का विकास बराबर हो रहा था, इसलिये सुप्पवासा के कष्ट की कोई सीमा न थी।
सुप्पवासा कुण्डिया नगर में ही थी। भगवान बुद्ध को नगर में आया सुनकर उसने अपने पति कोलिय पुत्र को बुलाकर कहा- “आर्य पुत्र! आप देख रहे हैं गर्भधारण किये सात वर्ष हो जाने के कारण मेरे कष्ट असह्य हो गये हैं। तथागत ने यहाँ पधारकर हम पर कृपा की है, आप उनके पास जाइये। वहाँ जाकर मेरा प्रणाम निवेदन कर कहना, सुप्पवासा ने आपकी कुशल मंगल पूछी है। स्वामी! महापुरुषों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने से क्षुद्र जीव भी करुणा और दया के अधिकारी हो जाते हैं। जब भगवान दयावश पूछें कि- “सुप्पवासा कैसी है? तो आप बताना कि उसके कष्टों का आप ही निवारण कर सकते हैं, सात वर्षों से गर्भ धारण करने के कारण वह बहुत थक गई और अशक्त हो चुकी है, उसकी रक्षा करिये।”
कोलिय पुत्र अपनी धर्मपत्नी के लिए बहुत दुःखी था। पत्नी की बात मानकर वह वहाँ पहुँचा, जहाँ अनेक आयुष्मान् श्रीमन्त सज्जन भगवान बुद्ध से वार्तालाप कर रहे थे। कोलिय पुत्र था तो निम्न वर्ग का, पर अनुशासन जानता था। सो एक ओर चुपचाप खड़ा रहा।
महाभिक्षु ने उसकी ओर देखा और करुणापूर्वक पास बुलाकर पूछा- “कहो आर्यपुत्र! अच्छे तो हो न?” प्रभु को प्रसन्न जानकर कोलिय पुत्र ने कहा- “भगवन्! सुप्पवासा ने आपको प्रणाम कहा है। आपकी कुशल मंगल पूछी है। उसे सात वर्ष गर्भ धारण किये हो गये, इस कारण बहुत दुख में है। आपकी कृपा हो जाये तो उसका कष्ट दूर हो जाये।”
भगवान बुद्ध की आँखें भर आई। उन्होंने कहा- “वत्स! जाओ सुप्पवासा को हमारा आशीर्वाद कहना। जब तुम वहाँ पहुँचोगे तो पाओगे कि उसने एक बच्चे को जन्म दिया है। अब उसे कोई कष्ट नहीं है।”
भगवान बुद्ध की दया और ऋद्धि का स्मरण कर सभी उपस्थित लोग श्रद्धा से भर गये।
कोलिय पुत्र लौटा तो सुप्पवासा गर्भधारण से मुक्त हो चुकी थी। कोलिय पुत्र की प्रसन्नता और आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तभी सुप्पवासा ने उसे बुलाया और कहा- “स्वामी! यह कष्ट तथागत की कृपा से ही निवृत्त हुआ है। आप उनके पास पुनः जायें और कहें- “महाराज! सुप्पवासा ने आपको सम्पूर्ण बौद्ध भिक्षुओं के साथ सात दिन के लिये भोज दिया है। कल से आप भोजन सुप्पवासा के यहाँ ही करना।”
कोलिय पुत्र पुनः तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ और सुप्पवासा ने जो कुछ कहा था-वह उसी के सीधे-सादे शब्दों में निवेदन कर दिया। सब लोग असमंजस में पड़ गये, क्योंकि दूसरे दिन के लिये महामौदगलायन के शिष्य आबुस का निमन्त्रण पहले ही मिल चुका था। सुप्पवासा एक हरिजन कन्या थी। भगवान इनकार करते तो उसका अर्थ होता कि वह भी ऊँच-नीच का भेद-भाव करते हैं।
महामौदगलायन की ओर देखकर भगवान बुद्ध ने कहा- “आयुष्मान्! आप आबुस को कहें कि वह अपना निमन्त्रण आगे को बढ़ा दें। आबुस विचारशील व्यक्ति हैं, उन्हें समझाया जा सकता है पर सुप्पवासा की श्रद्धा को ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती। वह दुखी हो जायेगी, इसलिए हम उनका निमन्त्रण पहले स्वीकार करते हैं।
अगले दिन से सात दिन तक भगवान बुद्ध ने सुप्पवासा के यहाँ ही भोजन किया और यह दिखा दिया-महान आत्मायें ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेद-भाव नहीं करतीं।
“किंग मेरे बच्चे! तुम्हारी वह शक्ति कहाँ चली गई, जो हजारों व्यक्तियों की आत्मा को झकझोर दिया करती थी। लगता है कुछ अंग्रेज साथियों का साथ छोड़ देने के कारण तुम निराश हो गये।”
डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग का उस दिन एक अजायब घर में भाषण था, ऊपर कहे हुए मदर पोलार्ड के शब्द कोई अनुमान नहीं थे, सचमुच उस दिन डॉ. किंग की आवाज में जो निराशा थी, वह पहले कभी नहीं देखी गई थी। मदर पोलार्ड किंग से पुत्रवत् स्नेह करती थीं, उन्हें अपने हृदय से लगाते हुए मदर पोलार्ड ने कहा- “वत्स! कुछ लोग साथ छोड़ देते हैं तो क्या, हम भी तुम्हें सहयोग न दे- तो भी क्या, ईश्वर तो निश्चित रूप से तुम्हारे साथ है ही। जब तक भगवान है, तब तक साहस हारने की क्या बात है?”
किंग लिखते हैं- “मदर पोलार्ड के यह शब्द सम्पूर्ण जीवन मेरे कानों में गूँजते और शक्ति देते रहे। मैं अनुभव करता हूँ, यदि सारा संसार साथ छोड़ दे तो भी ईश्वर की आस्था मनुष्य को अनुप्राणित किए रह सकती है। उस शक्ति से बढ़कर भरोसे की शक्ति संसार में दूसरी नहीं, वही सच्चा पिता, सच्चा प्रेमी और मित्र है। उसके सहारे में हजार हाथियों का बल है।”
नब्ज़ देखकर डॉक्टर यह बता सकता है कि आपकी अमुक बीमारी है। आचरण देखकर व्यक्ति की सफलता-असफलता के पूर्व अनुमान भी किए जा सकते हैं, वर्तमान परिस्थितियों से भविष्य की परिस्थितियों का पता भी किया जा सकता है, किन्तु भगवान ने यह सृष्टि ऐसी अनोखी बनाई है कि इसमें किसी की भावनाओं की गहराई नहीं परखी जा सकती, कदाचित् कोई उसे जान भी ले तो उसकी आकाँक्षाओं के अनुरूप साथ भी दे जाए ऐसा सर्वथा सम्भव नहीं । यहाँ तो भगवान् भी एकाँकी छूट गया, ईसा को भी क्रूस लग गया। अपने लिए जिन्होंने जीवन भर कुछ सोचा ही नहीं, उन महात्मा गाँधी को गोली का शिकार होना पड़ा। संसार का तो अर्थ ही है- “जहाँ व्यवहार में साँसारिकता, स्थूलता और जड़ता का बाहुल्य हो।” ऐसी अवस्था में सब कोई मन की समझ लें, मान लें, ऐसा नितान्त सम्भव नहीं। जीवन में मृत्युपर्यन्त ऐसे क्षण आते ही रहते हैं, जब व्यक्ति अकेला छूट जाता है। जब सहारे के लिए और कोई शेष नहीं रह जाता, तब भगवान का ही एकमात्र सहारा रह जाता है।
उस सहारे में बड़ी शक्ति है। जब सब ओर से निराश आत्मा भगवान् से प्रार्थना करती है तो ऐसा लगता है कि अन्तःकरण शक्ति के आदि स्रोत से सम्बन्धित हो गया है। फिर दूसरे सहारे न मिलें तो मनुष्य एकाकी भी उतना कर सकता है, जितना करोड़ों मनुष्य मिलकर भी नहीं कर सकते।
महात्मा गाँधी से एक बार एक महिला ने पूछा- “बापू! आपका शरीर तो इतना कमजोर है कि सौ-दो-सौ मील की यात्रा का भार भी सहन करना कठिन हो जाये, फिर आप सारे भारतवर्ष को किस तरह जगाते घूमते हैं, आप तो जिधर निकल जाते हैं, वहीं लाखों लोग आँधी-तूफान की तरह जाग पड़ते हैं, क्या आपको इतना परिश्रम करने और फिर भी कोई फल न मिलने पर थकावट और निराशा नहीं होती?”
इस पर बापू ने जो उत्तर दिया वह लाखों व्यक्तियों के जीवन में उत्साह, साहस और शक्ति भर देने की कुँजी के समान है। उन्होंने बताया- “मैं जब सब ओर से थक कर निराश हो जाता हूँ, तब भगवान को पुकारता हूँ, उसकी ओर हाथ फैला देता हूँ, प्रार्थना मेरी आत्मा का भोजन है उसी से मुझे इतनी शक्ति मिलती है कि मैं अकेला रहकर भी कभी थकावट अनुभव नहीं करता।”
सच पूछा जाये तो मनुष्य स्वास्थ्य न होने, रुपया, पैसा, धन और सम्पत्ति न होने से भी कभी निराशा या थकावट अनुभव नहीं करता ऊब और बेचैनी तो तब होती है, जब यह अनुभव करता है कि उसे बहुत समीप से प्रेम करने वाला कोई रिश्तेदार नहीं रहा। “भावनाओं के समर्थन और प्रेम की भूख” यदि अतृप्त रहे तो वही मनुष्य को तोड़कर रख देती है। उन्मुख प्रेम की आकाँक्षा ही मनुष्य जाति को जीवित किए हुये है किसी व्यक्ति को जब साँसारिक प्रेम भी नहीं मिलता तो स्वाभाविक ही है कि उसे संसार फीका लगे। ऐसे समय में हम अपने जीवन के आविर्भाव की ओर एक प्रश्न भरी दृष्टि से ताकते हैं और अपने आपसे पूछते हैं कि यदि स्वार्थ और दूसरों को न परख सकना ही संसार है तो भगवान तूने ऐसी सृष्टि क्यों बनाई?
इस प्रश्न के साथ एक उत्तर भी अन्तःकरण से आता है-सबसे समीपवर्ती रिश्तेदार का जिससे हम ओत-प्रोत हैं, जिसने हमें बनाया है, वह साकार है तो क्या-निराकार है तो क्या-कहता है “और कोई हो न हो पर मैं तुम्हारा हूँ।” तुम्हारी हर इच्छा पूर्ण करने के लिये माता के समान तुम्हारे समीप ही तो खड़ा हूँ। अन्तःकरण की यह आवाज कितनी शक्ति देती है, यह तो कोई ईश्वर का भक्त ही समझता है।
कष्ट की अनुभूति में भगवान की अनुभूति का ऐसा ही चित्रण वाल्टेयर के इन शब्दों में टपकता है-”कोई नास्तिक व्यक्ति दुख की अवस्था में भी इसीलिये लटका रह जाता है, क्योंकि उसे अन्तर्भूत सत्ता पर विश्वास नहीं पर भीतर झाँकते हुए आस्तिक को वहीं से आत्म-बल मिल जाता है। इसलिये मुझे तो विश्वास है कि भगवान कहीं न कहीं है और यदि नहीं है तो भी उसकी सृष्टि करना बहुत आवश्यक है। मैंने प्रयोग करके देख लिया, जब भगवान भी मेरी रक्षा नहीं करता, तब उसका विश्वास मेरी रक्षा करता और साहस बढ़ाता है, इसीलिये मैं जब जब जीवन धारण करूंगा, पहले ईश्वर पर आस्था रखने वाला बनना चाहूँगा पीछे और कुछ।”
परमात्मा यदि साकार नहीं, कोई वैज्ञानिक शक्ति है। तो भी हमारा उसके साथ सबसे समीपवर्ती रिश्ता होना चाहिये। समीपवर्ती रिश्ते से प्रेम इसलिये होता है कि हम उससे अपना वह सब कुछ भी प्रकट कर सकते हैं, जिसके प्रकट न करने से मन में क्षोभ की गाठें पड़ जाती, बोझ बढ़ जाता। तब जबकि भगवान आत्म-चेतना का सबसे समीपवर्ती प्रेमास्पद है, हम उससे वह भी नहीं कह सकते? यदि नहीं कह सकते तब हम उससे दूर हैं और इसी से कमजोर हैं, परमात्मा के बहुत समीप आ जाने पर मनुष्य अशक्त और निराश नहीं रह सकता। उसके प्रति प्रेम जितना बढ़ता जायगा, जीवन में आनन्द और उल्लास का स्रोत उतना ही उमड़ता चला जायेगा। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे-
वादए-वस्ल चूँ शवद नजदीक, आतिशे-शौक तेजतर गर्दद।
उस परमात्मा से मिलने, उसमें एक हो जाने की आकाँक्षा जितनी तीव्र होती जायेगी। शौक अर्थात् आनन्द की अग्नि उतनी ही उद्दीप्त होती चलेगी।
प्रातःकाल की पवन लहरायी आई और गुलाब को स्पर्श कर चली गई। पत्ते ने हँसते गुलाब को देखा तो आग-बबूला हो गया। बोला-यह भी कोई जीवन है, माली आता है और असमय में ही तुम्हारी जीवन लीला समाप्त कर देता है। इतने अल्प जीवन में भी क्या आनन्द? मैं रोज देखता हूँ कितने ही फूल खिलते हैं और मुरझा जाते हैं।
गुलाब ने बड़े शान्त स्वर में उत्तर दिया-भाई! जीवन का अर्थ है सच्ची सुगन्ध। इस प्रकार चारों ओर सुगन्धि को फैलाते हुए आमन्त्रित मृत्यु ही जीवन और अमरता है।
आत्मा का पन्ना जितना जटिल है, रहस्यपूर्ण है, उतना ही रुचिकर भी है। वह एक कला, एक विद्वान, एक शक्ति और पूर्णता का अध्याय है, उसे जान लेने और प्राप्त कर लेने के बाद साधारण मनुष्य भी असाधारण क्षमताओं से सम्पन्न हो जाता है।
विज्ञान यह बताता है कि शब्द को, आकार ही नहीं भावनाओं और स्वप्नों को भी विद्युत-चुम्बकीय शक्ति प्रवाह में हजारों-लाखों मील दूर तक दौड़ाया जा सकता है। टेलीफोन, टेलीग्राफ, टेलीविजन, रेडियो, टेलस्टार, लेजर आदि यंत्र उसी की पुष्टि करते हैं। अब प्रकाश के बारे में यह जाना गया है कि वह इस शक्ति प्रवाह में भी हस्तक्षेप करके उसे घटा-बढ़ा सकता है। फोटो इलेक्ट्रिक सेल एक प्रकार का वाल्व जैसा यंत्र होता है, जिसमें प्रकाश की किरणें डालने से विद्युत-धारा का मान घटाया या बढ़ाया जा सकता है। ऑटोमेटिक (स्वचालित) पंखे, रेडियो, घड़ियाँ और दरवाजों के खुलने तथा बन्द होने में इसका उपयोग इन दिनों हो रहा है, चोर घंटी (बरगलर अलार्म) भी इसी आधार पर बनी है। एक ऐसा यंत्र जो प्रकाश किरणों के बीच में पड़ने को अनुभव करता है। और घंटी बजाने लगता है, उसी को बरगलर अलार्म कहते हैं, इससे चोर के आने का पता चल जाता है।
एक्स किरणें प्रकाश कणों की भेदन शक्ति का परिचय देती हैं। प्रकाश की अत्यन्त सूक्ष्म और दिव्य सत्ता में यह गुण और भी विलक्षण पाये जाते हैं, इनमें विश्व के किसी भी भाग में होने वाली हलचल के रेखा-चित्र और आकार बनते-बिगड़ते रहते हैं, यदि हम उनका नियंत्रण आत्मा के प्रकाश के रूप में कर सकने की स्थिति में हों तो जो कुछ भी यन्त्रों के द्वारा आश्चर्यजनक देखा, सुना और प्राप्त किया जा सकता है, वह सब आत्म-चेतना द्वारा बिना किसी यन्त्र के प्राप्त किया जा सकता है।
स्वामी रामतीर्थ ने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है-भारत में राम का एक मित्र था जो कि बड़ा धर्मनिष्ठ था। एक बार उसकी आँख बन्द करके उसे एक स्थान पर ले जाया गया। उसके सामने गणित की एक पुस्तक रखी गई। इस पुस्तक को उसने पहले कभी नहीं देखा था, फिर भी वह आँख बन्द किये ही उसे पढ़ता चला गया। इस पुस्तक में कुछ ऐसे नाम और गणित के चिन्ह थे, जिन्हें वह व्यक्ति नहीं जानता था तो भी उन सबको उसने एक कागज पर लिखकर बता दिया कि इस स्थान पर ऐसा अंकित है। उस व्यक्ति में विचारों को पढ़ने की भी क्षमता थी। सच बात तो यह है कि वैज्ञानिक कोई नई वस्तु बनाता ही नहीं, वह तो जो कुछ भी मस्तिष्क में है उसे उतार भर देता है, ज्ञान की स्वामी आत्मा स्वयं ही भूत, भविष्यत् सब का ज्ञाता है। क्या दूर क्या पास उसे जानने के लिये किसी भी बाह्य उपकरण की आवश्यकता नहीं। पर सामान्य स्थिति में हम उस पवित्रता को निखार नहीं पाते, जिसमें यह सिद्धियाँ सन्निहित हैं। आत्मा के ऊपर चढ़ा अज्ञानान्धकार हमें भटकाता रहता है और हम मानवेत्तर प्राणियों जैसा निकृष्ट जीवन जीते रहते हैं।
भारतीय दर्शन की तीसरी मान्यता यह है कि आत्मा सम्पूर्ण शक्तियों की स्वामी है। स्थूल रूप से इन्द्रियों की जितनी क्षमता है, वह सारी सूक्ष्म रूप से लाखों गुना अधिक आत्मा की शक्ति के रूप में विद्यमान है।
आज तक पदार्थ को ही शक्ति का मूल-स्रोत माना जाता रहा है, पर अब जो तथ्य प्रकाश में आये, उनसे यह पता चलता है कि चेतना पदार्थ को भी नियंत्रित और हस्तान्तरित कर सकती है। 7 दिसम्बर 1969 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान (रहस्य रोमाँच) अंक में महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज का एक लेख “विपुल प्रकृति और सृष्टि-प्रक्रिया का रहस्य” छपा है उसमें विद्वान लेखक ने बताया है कि आत्मा प्रत्येक समय प्रत्येक वस्तु से परिपूर्ण है, वह अवश्य वस्तुओं को भी किसी भी समय कहीं भी प्रकट कर सकती है। परमहंस स्वामी विशुद्धानन्द जी का उदाहरण देते हुए आप लिखते हैं- वह बोले देखो यह मेज पर किस वस्तु का फूल रखा है। मैंने कहा गन्ष फूल (मेरी गोल्ड)। इसके बाद वे उस फूल को हाथ में लेकर हिलाने लगे। उन्होंने बताया अब मैं आत्म-शक्ति से इस फूल में गुलाब के फूल के परमाणु आकर्षित करता हूँ। थोड़ा ही देर में उन्होंने हाथ खोलकर दिखाया तो वस्तुतः फूल गुलाब के रूप और गन्ध में बदल चुका था। फिर इसी फूल को उन्होंने जवापुष्प में बदल दिया। उन्होंने बताया इस प्रकार सृष्टि के किसी भी स्थान के कैसे भी परमाणुओं को मनोमय शक्ति द्वारा आकर्षित कर लेने की क्षमता आत्मा में है। हम अज्ञानवश अपनी ही क्षमताओं का उपयोग नहीं कर पाते अन्यथा कोई भी व्यक्ति अभावपूर्ण स्थिति में नहीं जन्मा अज्ञान ही शक्ति और अभाव है, यदि हम अपने आत्म-प्रकाश को जागृत कर लें तो हमारे लिये संसार में सब कुछ आनन्द ही आनन्द, मंगल ही मंगल है।
अभी तक इन बातों पर विश्वास करने वाला अन्धश्रद्धालु कहा जाता था पर विज्ञान ने कहा-वस्तुतः यह अन्ध श्रद्धा नहीं, सृष्टि का एक विलक्षण सत्य है। रूस के ‘रसायन संश्लेषण संस्थान’ ने प्लाज्मोट्रान’ नामक एक ऐसी युक्ति का अविष्कार किया है, जिसकी सहायता से अनेक रसायन पदार्थ का निर्माण एक सेकेंड के दस हजारवें हिस्से से भी कम समय में किया जा सकेगा। प्लाज्मा रसायन उद्योग पर तीव्र प्रभाव पड़ने का अनुमान है। उससे चौबीस घन्टे में इतना पदार्थ तैयार किया जा सकेगा, जो कई वर्षों तक भी खाने से न चुकेगा। भारत-वर्ष में कई अलौकिक और रहस्यमय भोजों की कथायें प्रचलित हैं, वह उसी विज्ञान पर आधारित हैं।
यह घटनायें भारतीय दर्शन के आत्म-विज्ञान को सत्य सिद्ध करती हैं, वहाँ लोगों की आत्मा जैसी अलभ्य वस्तु को प्राप्त करने की प्रेरणा भी देती हैं। यों यह विद्यायें योग से उपलब्ध होती हैं पर इन्हें गृहस्थ के कर्तव्यों का पालन करते हुए भी सीखा और समझा जा सकता है। स्वामी विशुद्धानन्द स्वयं गृहस्थ थे। उनका जन्म 14 मार्च 1856 को हुआ, 11 जुलाई 1937 को अपने मृत्यु दिवस तक का उनका सारा ही जीवन आत्म-तत्व की शोध में लगा। श्री पं. गोपीनाथ जी को उन्हीं की कृपा से आत्म-ज्ञान हुआ।
आत्मा के अस्तित्व को मानने के बाद तीसरी मान्यता हिन्दू-दर्शन की यही है कि मनुष्य अपनी भौतिक इच्छायें और महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति करता हुआ भी आत्मकल्याण की आवश्यकता को सर्वोपरि माने और उसके लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहे। इस प्रयत्न में लगाया हुआ समय और साधन उसे भौतिक लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण लाभ दे सकते हैं, यह ऊपर के कथानकों से साफ अभिव्यक्त है। व्यक्ति-पदार्थ पर स्वाधीन नियन्त्रण प्राप्त कर लें, सर्वदृष्टा और सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त कर लें, इसकी तुलना में कोई भी बड़े से बड़ा पद, यश और वैभव भी नगण्य एवं तुच्छ ही कहा जा सकता है।
पदार्थ की तरह काल भी आत्मा में ही समाहित है। समय कोई वस्तु नहीं वरन् वह आत्मा का विस्तार मात्र है, इसलिये यदि कोई आत्मा का मूलोच्छेद कर लेता है तो वह समय की सीमाओं और प्रतिबन्धों को तोड़ लेता है। उसके लिये भूत भी वर्तमान है और भविष्यत् भी। वह आगे-पीछे का सब कुछ देख सकता है। सन 1924 में एक महान गृहस्थ योगी श्री रामचन्द्र ने अतीन्द्रिय स्थिति में एक पुस्तक ‘सत्य का उदय- (रियेलिटी एट डान) लिखी थी, उसमें उन्होंने लिखा था कि- इंग्लैंड का भाग्य दुर्भाग्यपूर्ण रहेगा, इसका दक्षिणी भाग समुद्र में धँस जायेगा। लन्दन के बीचों-बीच एक ज्वालामुखी छिपे तौर से काम कर रही है, वह थोड़े समय में ज्वालामुखी के रूप में फूट पड़ेगी।
यह बात तब हँसी की समझी गई, किन्तु जब पिछले दिनों जून 29 को साइन्स जनरल में भूगर्भ शोधों के हवालों से यही सूचना दी गई तो लोग आश्चर्यचकित रह गये। साइन्स जनरल में लिखा है- उत्तरी वेल्स के दक्षिण में यार्कशायर तक पूरा ब्रिटेन धीरे-धीरे इंग्लिश चैनल और उत्तरी सागर में डूबता जा रहा है, जबकि देश के उत्तरी क्षेत्र का आधा भाग और स्काटलैंड धीरे-धीरे समुद्र से उठते जा रहे हैं। पत्र ने यह भी दावा किया है कि 1500 वर्षों के अन्दर लन्दन के कुछ जिले तो समुद्र के गर्भ में विलीन हो जायेंगे।
यह जानकारियाँ कई बार इससे भी अधिक सामयिक और रोमाँचकारी होती हैं, तब पता चलता है कि अवश्य ही जीवन प्रवाह के रूप में कोई ऐसी सत्ता काम कर रही है, जो भूत, भविष्य के पल-पल को जानती है। उदाहरण के लिये कुछ दिन पहले रायबरेली की एक बालिका और एक राहगीर में कुछ कहा-सुनी हो गई। राहगीर एक धार्मिक व्यक्ति था। बालिका ने उसे गालियाँ दीं और कहा- “तू मर जा” वह सज्जन हँसे और बोले बेटी- “मेरी मृत्यु को तो अभी समय है पर मुझे दुख है, आज का दिन तेरे जीवन का अन्तिम दिन है। इसे विधि की विडम्बना कहें या आत्मा की विलक्षण क्षमता बालिका शाम को कुएँ पर पानी भरने गई वहाँ उसका पाँव फिसल गया और कुएँ में गिरकर उसकी मृत्यु हो गई।
यह अनेक घटनायें और प्रमाण यह बताते हैं कि हम कोई नगण्य शरीर और इन्द्रियों के परकोटे मात्र नहीं हैं, यह शरीर तो एक दुर्ग है, जिसमें महान वैभवशाली आत्मा निवास करती है, जो उसकी सान्निध्यता प्राप्त करता है, यह आत्मा उसे महामंत्री, सेनापति, प्रजापति और अलौकिक शक्तियों का स्वामी बना देती है।
शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा
यस्तु क्रियावान्पुरुषः स विद्वान।
सुचिन्तितं चौषधमातुराणाँ
न नाममात्रेण करोत्यरोगम्॥
शास्त्र पढ़कर भी मूर्ख होते हैं, परन्तु जो क्रिया में चतुर हैं वही पण्डित हैं, जैसे अच्छे प्रकार से निर्णय करी औषध भी रोगियों को केवल नाम-मात्र से अच्छा नहीं कर देती है॥171॥
एक राजा थे। प्रजा वत्सल, नेक और बड़े परिश्रमी। उनके राज्य की प्रजा बड़ी खुशहाल थी।
एक दिन वे अपने महामन्त्री के साथ बैठे अपने यश का आप चढ़-बढ़कर बखान करने लगे तो मन्त्री ने कह दिया-महाराज! आप चले तो पर आँख खोलकर नहीं चले? महाराज को यह आलोचना बहुत अखरी?
वे उसका निराकरण चाहते थे, तभी सामने से एक भिखारी निकला। उसे देखते ही महामन्त्री ने सोने-चाँदी के असंख्य टुकड़े उसके सामने फेंके। भिखारी उन्हें रौंदता हुआ आगे बढ़ गया।
मन्त्री ने एक सिपाही को भेज कर उसे वापिस बुलाया और पूछा-तुम जब जा रहे थे तो तुम्हें मार्ग में कोई कीमती वस्तुयें नहीं मिलीं?
भिखारी सकपका कर बोला-नहीं महाराज! मुझे तो कुछ भी नहीं मिला। मैं तो यह सोचकर आँख मूँद कर चल रहा था कि मेरी भी आँखें खराब हो जायें तो मार्ग चल भी पाऊँगा या नहीं, इसलिये मुझे कुछ दिखा तो नहीं, हाँ मार्ग में किसी मूर्ख ने कंकड़-पत्थर बिखेर दिये थे, वह चुभे अवश्य।
मन्त्री ने राजा की ओर देखकर कहा-महाराज! इसी तरह जो आँख मूँद कर चलते हैं और यह मानते हैं कि यह जो कुछ कर रहा हूँ, मैं कर रहा हूँ वे अप्रिय प्रसंगों से ऐसे ही दुखी होते हैं, जैसे यह साधु, इसलिये जो कुछ करे निसुआर्थ ही करे।
‘नोवोत्सी’ न्यूज एजेन्सी ने- सोते समय अँग्रेजी पढ़ाने का परीक्षण’ शीर्षक से समाचार छापा है। समाचार पीछे पहले शीर्षक पढ़कर ही पाठक चौंक पड़ेंगे। जागृत अवस्था में कई बार पुस्तकें पढ़ते हैं, अध्यापक पाठ याद कराते हैं तो भी विद्यार्थियों को एक ही रोना बना रहता है, पाठ याद नहीं होता। फिर सोते हुए व्यक्ति को पढ़ाना तो एकदम असम्भव बात है।
इसी बात को हम यह कहते हैं कि आत्मा इतनी सम्वेदनशील है कि अपने सूक्ष्म प्रकाश-शरीर से वह सोते-जागते किसी भी अवस्था में पढ़ती और ज्ञान सम्पादन करती रह सकती है। कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति अपने विचार, ज्ञान, प्रज्ञायें और सन्देश कैसी भी अवस्था में किसी और को भी दे सकता है। तब तो लोग यह बात न मानते पर मास्को के पास दूबना स्थान पर विज्ञान इस बात को प्रत्यक्ष सत्य सिद्ध करने में लगा हुआ है, लगभग एक हजार लोगों को सोते समय गहरी निद्रा में अंग्रेजी सिखाई जा रही है। प्रयोगकर्त्ताओं का कहना है कि ये लोग 40 दिन में सोते-सोते ही अंग्रेजी सीख जायेंगे।
इस प्रणाली के अंतर्गत गहरी नींद में सोने वाले लोग ही भाषा शिक्षण के लिये छाँटे जाते हैं, उन्हें सोते समय भाषा के टेप-रिकार्ड सुनाये जाते हैं। वे नींद में ही व्याकरण के नियम और शब्द और उनका प्रयोग सीख लेते हैं। अब तक छपे परीक्षण बहुत सफल हुये हैं।
एक ओर यह प्रयोग और दूसरी ओर वैज्ञानिकों की निरन्तर की शोध दोनों प्रक्रियाओं ने यह सिद्ध करना प्रारम्भ कर दिया है कि स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व और उस सूक्ष्म शरीर में मन आदि सम्पूर्ण इन्द्रियों व चेष्टाओं का पाया जाना असम्भव नहीं, असंदिग्ध तथ्य है। अभी यह विज्ञान अपनी भ्रूण अवस्था में है, अभी तो उसे कारण शरीर तक पहुँचने में वर्षों लगेंगे पर अब तक की उपलब्धियाँ ही भारतीय तत्व-दर्शन का जिस तेजी से समर्थन कर रही हैं, उसे देखकर सारा पाश्चात्य जगत भारतीय दर्शन की ओर मुड़ने लगा है।
अणुओं में ज्ञान के अस्तित्व की यह खोजें वैज्ञानिकों की दृष्टि में अभी अन्तिम नहीं हैं तथापि यह सिद्ध हो गया है कि ज्ञान विचार या चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व है और वह प्रकाश अणुओं के भीतर है। अमेरिका के जीव-वैज्ञानिक डॉ. इर्वन केमरान ने कुछ चूहे लेकर उन्हें एक विशेष बाक्स में संकेत पाने पर भोजन के लिये प्रशिक्षित किया। चूहे कुछ ही दिन के अभ्यास से प्रशिक्षित हो गये। जब भी उन्हें टार्च का प्रकाश दिखाया जाता, वे तुरन्त भागते हुए आते और बाक्स में रखे भोजन को प्राप्त कर लेते। इसके बाद इन प्रशिक्षित चूहों को मारकर उनके मस्तिष्क का ‘न्यूक्लिक एसिड’ निकाल लिया गया और फिर उसका इन्जेक्शन बनाकर कुछ ऐसे चूहों को दिया गया, जिन्हें इस तरह का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। उस समय डॉ. केमरान के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब यह चूहे भी टार्च का प्रकाश देखते ही भोजन के लिए उस विशेष बाक्स में बिना बताये ही प्रवेश कर गये। यही प्रयोग चूहों के अतिरिक्त दूसरे जन्तुओं जैसे छछूंदर, गिलहरी आदि पर भी किया गया और वहाँ भी यही आश्चर्यजनक सत्य देखने को मिला। इससे यह तो निश्चित ही साबित हो गया कि जैसी कोई चेतन शक्ति प्रकाश के अणुओं में ही है।
डॉ. केमरान ने यह प्रयोग कुछ मनुष्यों पर भी ‘मैग्नीशियम पैमुलीन’ नाम दवा का प्रयोग करके देखा कि एक व्यक्ति जो ताश के पत्ते नहीं पहचान पाता था, इस तरह की औषधि का सेवन करने के बाद फिर पत्ते पहचानने लगा। एक मैकेनिक वृद्धावस्था के कारण मशीनों के पुर्जे भूल जाने लगा-इस तरह की औषधि से उसकी ज्ञान क्षमता में विकास हुआ।
यह न्यूक्लिक एसिड क्या है, यह समझ लें तो बात स्पष्ट हो जायेगी। हमें पता है कि जिस प्रकार कोई भी पदार्थ का टुकड़ा छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है, उसी तरह मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है, उन्हें कोश (सेल) कहते हैं। एक कोश में जीवन के सारे लक्षण अमीबा की तरह विद्यमान रहते हैं। अमीबा एक कोशीय जीव है, उसमें आहार, निद्रा, भय आदि वह सब गुण पाये जाते हैं, जिनसे किसी पिण्ड में चेतना के अस्तित्व की जानकारी होती है। इसी तरह ‘कोश’ में मनुष्य जीवन के सारे लक्षण विद्यमान रहते हैं।
यह कोश मुख्यतया दो भागों में विभक्त है- (1) नाभिक या केन्द्रक (न्यूक्लियस), (2) साइटोप्लाज्म। नाभिक एक तरह का तारा या प्रकाशकण होता है और जीवन की यही अन्तिम इकाई है, दूसरे साइटोप्लाज्म में तो सभी प्रोटीन तत्व हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, फास्फोरस आदि तत्व पाये जाते हैं, यह तभी तक क्रियाशील रहते हैं जब तक नाभिक (न्यूक्लियस) बना रहता है। न्यूक्लियस के निकलते ही यह पदार्थ वाला अंश मृत हो जाता है, निष्क्रिय हो जाता है। यद्यपि इस केन्द्रक (न्यूक्लियस) को वैज्ञानिक स्वतन्त्र स्थिति में प्रकट नहीं कर सके तथापि ऊपर जिस ‘न्यूक्लियस एसिड’ की चर्चा की गई है, वह इसी में पाया जाता है, इससे स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि ज्ञान, विचार या अन्तर्चेतना प्रकाश कणों का गुण है और यदि वह मनुष्य के स्थूल से भिन्न पदार्थ है तो शरीर से विलग होने के बाद भी उसमें यह गुण विद्यमान् बने रहने ही चाहिये।
एक स्वस्थ मानव शरीर में लगभग 600 खरब कोशिकायें होती हैं। 600 खरब कोशिकाओं में 600 खरब नाभिक होते हैं। प्रत्येक नाभिक में गुण-सूत्र (क्रोमोसोम) और प्रत्येक गुण सूत्र के भीतर एक बटी हुई रस्सी की सीढ़ी के समान संस्कार कोश (जीन्स) विद्यमान होते हैं, यह संस्कार कोश जो प्रकाश की भी सूक्ष्म अवस्था है, न्यूक्लियस एसिड कहलाते हैं। यह एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय शक्ति है और कोश के भीतर सारे स्थूल द्रव्य में, तिल में तेल के समान व्याप्त है, इसीलिये वैज्ञानिकों को उसके स्वतन्त्र होने पर भी एसिड होने का भ्रम हो रहा है। वस्तुतः मृत्यु के उपरान्त यह संस्कार कोश ही प्रकाश-कणों का एक स्वतन्त्र शरीर बनाये हुए निकल जाते हैं, उनमें वह सारी याददाश्त बनी रहती हैं, जो जीवित अवस्था में ज्ञान में आई थीं। इतना ही नहीं इस अवस्था में भी वह ज्ञान-सम्पादन की क्षमता से परिपूर्ण होता है, केवल स्थूल क्रियायें जैसे बोलना, पकड़ना, उठाना-बैठाना आदि उससे नहीं हो सकता, यह किसी विशेष अवस्था में ही सम्भव है।
उपरोक्त प्रयोग इस बात का साक्षी है कि हमारी मानसिक चेष्टायें विचार इच्छायें या ज्ञान कुछ भी कहें मनुष्य शरीर की रासायनिक प्रक्रिया मात्र नहीं, प्रकाश मानव कणों या सूक्ष्म शरीर के कारण है, यह एक ऐसा सिद्धाँत है, जो यदि सिद्ध हो जाता है तो न केवल पुनर्जन्म, भूत-प्रेत, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, विचार सम्प्रेषण, परकाया प्रवेश, परलोक आदि की भारतीय मान्यताओं की ही पुष्टि नहीं होगी वरन् योगाभ्यास की उन क्रियाओं का भी समर्थन होगा, जो शरीर-धारी आत्म-चेतना के विराट विकास के लिये बड़ी तपस्या और कष्ट साध्य प्रयोगों के द्वारा भारतीय तत्वदर्शियों ने आविष्कृत की है। केन्द्रक स्थित यह तत्व जो स्मृतियाँ अर्जित करता है, मनुष्य शरीर की समस्त 600 खरब कोशिकाओं में पाया जाता है, यदि उसे खींचकर लम्बाई में बढ़ाया जाये तो वह सम्पूर्ण ब्रह्माँड को अर्थात् अब तक की खोज के अनुसार 186000×60× 60×24×3651/4×500000000 मील लम्बा होगा। इतने लम्बे फीते में प्रत्येक कोश में 1000000000 अक्षरों के हिसाब से उपरोक्त संख्या में इसका गुणा करने से जो संख्या बनेगी, उतने अक्षरों की और उन अक्षरों से बने शब्दों की स्मृति मनुष्य रख सकता है। ऐसा मनुष्य लगभग सर्वज्ञ ही हो सकता है। भारतीय योग-दर्शन में यह बताया जाता है कि योग सिद्ध व्यक्ति संसार में जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ होगा और जो हो गया है, वह सब कुछ जानते हैं। इस तथ्य को स्थूल घटनाओं के आधार पर भले ही सिद्ध न किया जा सके पर अनेक प्रमाण अब इन तथ्यों की निरन्तर पुष्टि कर रहे हैं।
लार्ड मैकाले 19वीं शताब्दी के विश्व-विख्यात ब्रिटिश इतिहास लेखक ने इंग्लैंड का इतिहास आठ जिल्दों में लिखा। उसके लिये उन्होंने दूसरी पुस्तक उठाकर नहीं देखी सैकड़ों घटनाओं की तिथियों और घटना से सम्बन्धित व्यक्तियों के नाम उन्हें जबानी याद थे। यही नहीं स्थानों के परिचय, दूसरे विषय और अब तक जितने भी व्यक्ति उनके जीवन में उनके संपर्क में आ चुके थे, उन सब के नाम उन्हें बाकायदा कंठस्थ थे। लोग उन्हें चलता-फिरता पुस्तकालय कहते थे।
पोर्सन ग्रीक भाषा का अद्वितीय पण्डित था, उसने ग्रीक भाषा की सभी पुस्तकें और शेक्सपियर के नाटक मुंह जबानी याद कर लिये थे। ब्रिटिश संग्रहालय के सहायक अधीक्षक रिचर्ड गार्नेट बारह वर्ष तक एक संग्रहालय के मुद्रित पुस्तक विभाग के अध्यक्ष थे, इस संग्रहालय में पुस्तकों की हजारों अलमारियाँ और उनमें करोड़ों की संख्या में पुस्तकें थीं। श्री गार्नेट अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे न केवल प्रत्येक पुस्तक का ठिकाना बता देते थे वरन् पुस्तक की भीतरी जानकारी भी दे देते थे।
अभी तक वैज्ञानिकों की यह धारणा थी कि हम जो कुछ पढ़ते और सुनते हैं, मस्तिष्क में पाये जाने वाले राख की तरह के भूरे पदार्थ में उसकी ऐसी रेखायें (साइनेप्सेस) बन जाती हैं, जैसी राख में या समतल धूलि में किसी कीड़े के रेंग जाने से आड़ी-टेढ़ी रेखायें खिंच जाती हैं। किन्तु वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि मस्तिष्क के तीव्र आवेग जैसे क्रोध, प्रतिशोध, ईर्ष्या आदि के कारण यह रेखायें मिटती भी रहती हैं। कई बार मस्तिष्क में धक्के और चोटें भी आती हैं, उससे भी यह रेखायें मिट जाती हैं, फिर वर्षों पहले का ज्ञान ज्यों का त्यों सुरक्षित रखना तब तक असम्भव है, जब तक ज्ञान को संग्रहित करने वाला कोई बीज न हो, जो न तो कभी नष्ट होता हो और न जिस पर बाहरी आघातों का प्रभाव ही पड़ता हो।
आत्म-चेतना स्वयं ही वह शक्ति वह बीज वह केन्द्र है, जिसमें सम्पूर्ण संसार का ज्ञान अति सूक्ष्म रूप से भरा हुआ है, उस पन्ने को खोलें और साफ करें तो हम न केवल ज्ञान-सम्पदा का अक्षय संचय कर सकते हैं वरन् परलोक, पुनर्जन्म, कर्मफल आदि सिद्धांतों को भी अच्छी तरह समझ और उसका निराकरण कर सकते हैं। ज्ञान की इस सूक्ष्म अवस्था पर पहुँचकर ही अतींद्रिय अनुभूतियाँ, विचार-संचालन और आकाश में व्याप्त सूक्ष्म विचार तरंगों का ग्रहण करना आदि सम्भव होता है। ऊपर के उदाहरण इसी बात की पुष्टि करते हैं।
मूढैः प्रकल्पितं दैवं तत्परास्ते क्षयं गताः।
प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमंताँ गताः ॥
-योग वसिष्ठ 2।8।16,
दैव (भाग्य) की कल्पना मूढ़ लोग ही करते हैं और दैव पर आश्रित होकर वे अपना नाश कर लेते हैं। बुद्धिमान लोग तो पुरुषार्थ द्वारा ही उत्कृष्ट पद को प्राप्त करते हैं।
दिन भर आपको धूप दी, आपके पुत्र-पौत्रों को प्रकाश और गर्मी प्रदान की और आप हैं कि मुझे थोड़ी ही देर में विदा कर रहे हैं, कुछ अधिक देर ठहरने देते तो आपका क्या बिगड़ जाता? ढलते हुये सूरज ने मुस्कराते हुए क्षितिज के पास लिखित उलाहना भेजा।
गम्भीर क्षितिज स्याही लेकर उत्तर लिखने बैठा तो कुल एक पंक्ति से वह आगे नहीं बढ़ सके, प्रातः के प्रकाश में सूर्य ने उसे पढ़ा-लिखा था- “इसलिये कि तुम हर बार एक नई चमक, नई रोशनी लेकर आओ और पहले से भी अधिक प्रकाश फैलाओ।“
सूर्य का सिर श्रद्धा से नीचे झुक गया।
अपनी उंगलियों के नापने पर 96 अंगुल के इस मनुष्य शरीर का वैसे तो प्रत्येक अवयव गणितीय आधार पर बना और अनुशासित है पर जितना रहस्यपूर्ण यन्त्र इसका मस्तिष्क है, संसार का कोई भी यन्त्र न तो इतना जटिल, रहस्यपूर्ण है और न समर्थ। यों साधारणतया देखने में उसके मुख्य कार्य- 1. ज्ञानात्मक, 2. क्रियात्मक और 3. संयोजनात्मक हैं पर जब मस्तिष्क के रहस्यों की सूक्ष्मतम जानकारी प्राप्त करते हैं तो पता चलता है कि इन तीनों क्रियाओं को मस्तिष्क में इतना अधिक विकसित किया जा सकता है कि (1) संसार के किसी भी एक स्थान में बैठे-बैठे सम्पूर्ण ब्रह्माँड के किसी भी स्थान की चींटी से भी छोटी वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। (2) कहीं भी बैठे हुए किसी को कोई सन्देश भेज सकते हैं, कोई भार वाली वस्तु को उठाकर ला सकते हैं, किसी को मूर्छित कर सकते हैं, उस पर स्वामित्व और वशीकरण भी कर सकते हैं। अष्ट सिद्धियाँ और नव-निद्धियाँ वस्तुतः मस्तिष्क के ही चमत्कार हैं, जिन्हें मानसिक एकाग्रता और ध्यान द्वारा भारतीय योगियों ने प्राप्त किया था।
ईसा मसीह अपने शिष्यों के साथ यात्रा पर जा रहे थे। मार्ग में वे थक गये, एक स्थान पर उन्होंने अपने एक शिष्य से कहा- “तुम जाओ सामने जो गाँव दिखाई देता है, उसके अमुक स्थान पर एक गधा चरता मिलेगा तुम उसे सवारी के लिये ले आना।” शिष्य गया और उसे ले आया। लोग आश्चर्यचकित थे कि ईसा मसीह की इस दिव्य दृष्टि का रहस्य क्या है? पर यह रहस्य प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में विद्यमान है, बशर्ते कि हम भी उसे जागृत कर पायें।
जिन शक्तियों और सामर्थ्यों का ज्ञान हमारे भारतीय ऋषियों ने आज से करोड़ों वर्ष पूर्व बिना किसी यंत्र के प्राप्त किया था, आज विज्ञान और शरीर रचना शास्त्र (बायोलॉजी) द्वारा उसे प्रमाणित किया जाना यह बताता है कि हमारी योग-साधनायें, जप और ध्यान की प्रणालियाँ समय का अपव्यय नहीं वरन् विश्व के यथार्थ को जानने की एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रणाली है।
मस्तिष्क नियंत्रण प्रयोगों द्वारा डॉ. जोजे डेलगाडो ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि मस्तिष्क के दस अरब न्यूरॉन्स के विस्तृत अध्ययन और नियंत्रण से न केवल प्राणधारी की भूख-प्यास, काम-वासना आदि पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है वरन् किसी के मन की बात जान लेना, अज्ञात रूप से कोई बिना तार के तार की तरह संदेश और प्रेरणायें भेजकर कोई भी कार्य करा लेना भी सम्भव है। न्यूरोन मस्तिष्क के शरीर और शरीर से मस्तिष्क में सन्देश लाने, ले जाने वाले बहुत सूक्ष्म कोषों (सेल्स) को कहते हैं, इनमें से बहुत पतले श्वेत धागे से निकले होते हैं, इन धागों से ही इन कोषों का परस्पर सम्बन्ध और मस्तिष्क में जाल-सा बिछा हुआ है। यह कोष जहाँ शरीर के अंगों से सम्बन्ध रखते हैं, वहाँ उन्हें ऊर्ध्वमुखी बना लेने से प्रत्येक कोषाणु सृष्टि के दस अरब नक्षत्रों के प्रतिनिधि का काम कर सकते हैं, इस प्रकार मस्तिष्क को ग्रह-नक्षत्रों का एक जगमगाता हुआ यंत्र कह सकते हैं।
डॉ. डेलगाडो ने अपने कथन को प्रमाणित करने के लिये कई सार्वजनिक प्रयोग करके भी दिखाये। अली नामक एक बन्दर को केला खाने के लिए दिया गया। जब वह केला खा रहा था, तब डॉ. डेलगाडो ने ‘इलेक्ट्रोएसी फैलोग्राफ’ के द्वारा बन्दर के मस्तिष्क को सन्देश दिया कि केला खाने की अपेक्षा भूखा रहना चाहिये तो बन्दर ने भूखा होते हुये भी केला फेंक दिया। ‘इलेक्ट्रोएंसी फैलोग्राफ’ एक ऐसा यंत्र है, जिसमें विभिन्न क्रियाओं के समय मस्तिष्क में उठने वाली भाव-तरंगों को अंकित कर लिया गया है। किसी भी प्रकार की भाव-तरंग को विद्युत शक्ति द्वारा तीव्र कर देते हैं तो मस्तिष्क के शेष सब भाव दब जाते हैं और वह ही भाव तीव्र हो उठने से मस्तिष्क केवल वही काम करने लगता है।
डॉ. डेलगाडो ने इस बात को एक अत्यन्त खतरनाक प्रयोग द्वारा भी सिद्ध करके दिखाया। एक दिन उन्होंने इस प्रयोग की सार्वजनिक घोषणा कर दी। हजारों लोग एकत्रित हुए। सिर पर इलेक्ट्राड जड़े हुए दो खूँखार साँड़ लाये गये। इलेक्ट्राड एक प्रकार का एरियल है, जो रेडियो ट्रान्समीटर द्वारा छोड़ी गई तरंगों को पकड़ लेता है। जब दोनों साँड़ मैदान में आये तो उस समय की भयंकरता देखते ही बनती थी, लगता था दोनों साँड़ डेलगाडो का कचूमर निकाल देंगे पर वे जैसे ही डेलगाडो के पास पहुँचे उन्होंने अपने यंत्र से सन्देश भेजा कि युद्ध करने की अपेक्षा शान्त रहना अच्छा है तो बस फुँसकारते हुए दोनों साँड़ ऐसे प्रेम से खड़े हो गये, जैसे दो बकरियाँ खड़ी हों। उन्होंने कई ऐसे प्रयोग करके रोगियों को भी अच्छा किया।
सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में 20 वॉट विद्युत शक्ति सदैव संचालित होती रहती है पर यदि किसी प्रविधि (प्रोसेस) से प्रत्येक न्यूरोन को सजग किया जा सके तो दस अरब न्यूरोन, दस अरब डायनमो का काम कर सकते हैं, उस गर्मी, उस प्रकाश, उस विद्युत क्षमता का पाठक अनुमान लगायें कितनी अधिक हो सकती होगी!
विज्ञान की यह जानकारियाँ बहुत ही सीमित हैं। मस्तिष्क सम्बन्धी भारतीय ऋषियों की शोधें इससे कहीं अधिक विकसित और आधुनिक हैं। हमारे यहाँ मस्तिष्क को देव-भूमि कहा जाता है। और बताया है कि मस्तिष्क में जो सहस्रदल कमल है, वहाँ इन्द्र और सविता विद्यमान हैं। सिर के पीछे के हिस्से में रुद्र और पूषण देवता बताये हैं। इनके कार्यों का विवरण देते हुये शास्त्राकार ने इन्द्र और सविता को चेतन शक्ति कहा है और रुद्र एवं पूषण को अचेतन। दरअसल वृहत मस्तिष्क (सेरेब्रम) ही वह स्थान है, जहाँ शरीर के सब भागों से हजारों नस-नाड़ियाँ आकर मिली हैं। यही स्थान शरीर पर नियंत्रण रखता है, जबकि पिछला मस्तिष्क स्मृति-शक्ति का केन्द्र है। अचेतन कार्यों के लिए यहीं से एक प्रकार के विद्युत प्रवाह आते रहते हैं।
जब तक मस्तिष्क का यह चेतन भाग क्रियाशील रहता है। जन्म के समय भी शरीर रचना का विकास यहीं से होता है और इसके क्षतिग्रस्त होने पर ही सम्पूर्ण मृत्यु होती है। शारीरिक मृत्यु (क्लिनिकल डेथ) हो जाने पर भी जब तक यह भाग जीवित रहता है, तब तक व्यक्ति मुर्दा नहीं होता। इसके अनेक उदाहरण भी पाये गये हैं।
सन 1896 में कलकत्ता में फ्रैंक लेसनी नामक एक अंग्रेज का हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया। उसके परिवार में कई औरों की भी हृदयगति रुकने से मृत्यु हुई थी, इसलिये उसकी मृत्यु निश्चित मानकर उसे ताबूत में बन्द कर कब्रिस्तान में गाढ़ दिया गया। उसके परिवार वाले उसे उटकमंड के सेंट जान चर्च के कब्रिस्तान में उसे गाढ़ना चाहते थे। किन्तु इसके लिये आवश्यक आज्ञा 6 माह बाद मिली।
जब ताबूत को बाहर निकला गया और रस्म के अनुसार उसे खोलकर देखा गया तो लोग घबड़ाकर पीछे हट गये, 6 माह पूर्व लाश जिस स्थिति में रखी थी, अब उससे बिलकुल भिन्न थी। लेसली की लाश चित्त और दोनों हाथों का क्रास बनाते हुए लिटाई गई थी, किन्तु अब वह औंधी पड़ी थी, पेन्ट और कमीज फाड़े हुए थे, मुख के पास खून गिरा था, कई जगह से उंगलियां चबाई हुई थीं।
मृत्यु के पूर्व डाक्टरों ने सारी परीक्षा ठीक-ठीक कर ली थी, कब्र और ताबूत के अन्दर कोई कीड़ा भी न जा सकता था, फिर यह स्थिति कैसे हुई। निःसंदेह उसकी अन्तिम चेतना जब मस्तिष्क के अदृश्य भाग में थी, तभी उसे दफना दिया गया पर जब चेतना लौटी होगी तो उस समय शरीर साँस लेने की स्थिति में न था। भय और क्रोध में ही उसने निकलने का प्रयत्न किया होगा, तभी कपड़े फटे होंगे और अन्त में रक्त-वमन के साथ उसकी मृत्यु हुई होगी।
एडिनबरा में लड़कियों के होस्टल में एक बार एक लड़की बीमार पड़ी। डाक्टरी उपचार के बावजूद उसके शरीर के जीवन के सब लक्षण लुप्त हो गये। नाड़ी चलना बन्द हो गई, श्वांस की गति रुक गई डाक्टरों ने लड़की को मृत घोषित कर दिया और उसकी अन्त्येष्टि की आज्ञा भी दे दी गई।
किन्तु सुप्रसिद्ध डाक्टरों की घोषणा के बाद भी होस्टल संरक्षिका (वार्डन) ने लड़की की अन्त्येष्टि क्रिया करने से इनकार कर दिया। उसने कहा- “इसके शरीर से जब तक दुर्गन्ध नहीं आती मैं इसे मृतक नहीं मानती, भले ही डॉक्टर कुछ कहें।” इस दिन तक लड़की उसी अवस्था में पड़ी रही। शरीर में सड़ने या दुर्गन्ध के कोई लक्षण नहीं थे। डॉक्टर इस घटना से स्वयं भी आश्चर्य-चकित थे। आश्चर्य उस समय और बढ़ गया, जब तेरहवें दिन लड़की जीवित हो गई और कुछ ही दिन में स्वस्थ भी हो गई।
सन्त हरिदास ने सिख राजा रणजीतसिंह के आग्रह पर अँग्रेज जनरल बेन्दुरा को 10 दिन और 40 दिन की योग समाधि जमीन में जीवित गड़कर दिखाई थी। जब वे मिट्टी से निकले थे, तब उनका चोटी के पास वाला स्थान अग्नि की तरह गर्म था।
यह स्थान सप्तधार सोम ‘रोदसी’ कहलाता है। रोदसी का अर्थ होता है दो खण्डों वाला-दोनों खण्ड इन्द्र और सविता, मध्य भाग को अन्तरिक्ष और अनुपमस्तिष्क को पृथ्वी कहा है। इनमें क्रमशः अग्नि, स्वर्गद्वार, अत्रि, द्रोणकलश और अश्विनी आदि सात प्रमुख शक्तियाँ काम करती हैं। इन सात शक्तियों को पैरासेल्सस ने भी अपोलो और डेविड दो भागों में विभक्त किया है। और स्वीकार किया है कि यह सात पुष्प मस्तिष्क की सूक्ष्म आध्यात्मिक भावनाओं से सम्बन्ध रखते हैं। इन सात भागों को शरीर रचना शास्त्र अब सात शून्य स्थानों (वेन्ट्रिकिल्स) के रूप में जानने लगा है। पहला, दूसरा और चौथा खाली स्थान मस्तिष्क के दायें और बायें। तीसरा उसके नीचे पीनियल और पिचुट्री ग्रन्थि से जुड़ा होता है। पाँचवाँ तीसरे के नीचे सेरीबेलम के स्थान पर है, छठवाँ मस्तिष्क से निकलता है एवं नीचे रीढ़ में होता हुआ सैक्रोकोक्सिजियल गैग्लियन अर्थात् रीढ़ के निचले भाग में पहुँचता है। सातवाँ खोपड़ी के दायें भाग में बादल की तरह छाया रहता है।
वरुण देवता को तीनों लोकों में व्याप्त बताया गया है-
यस्य श्वेता विचक्षणा विस्रो भूमीरधिक्षितः थिरुत्तराणि पप्रतुः वरुणस्य ध्रुवंसदः। स सप्तानाभिरज्यति॥
अर्थात्- वरुण देव की रहस्यमयी इस धारणा किये हुये शिरायें तीनों लोकों में व्याप्त हैं तीनों उत्तर दिशा के स्नायु-केन्द्रों से बँधी हैं, यहीं वरुणदेव का मूल निवास है और यहीं से निकले हुए सात स्नायु केन्द्र सारे शरीर और मानसिक चेतना का नियंत्रण करते हैं। शरीर रचना शास्त्रियों ने भी इसे सेरीब्रो स्पाइनल फ्लूइड के नाम से स्वीकार किया है और यह माना है कि इसमें 99 प्रतिशत जल ही होता है, एक प्रतिशत विभिन्न लवण होते हैं।
विज्ञान और अध्यात्म की यह तुलनात्मक जानकारियाँ यद्यपि अपूर्ण हैं पर वे एक ऐसे दर्शन के द्वार अवश्य खोलती हैं, जिसमें वैज्ञानिक भी यह स्वीकार कर सकते हैं कि मनुष्य मस्तिष्क से नितान्त शरीर ही नहीं वरन् एक विचार विज्ञान भी है और उस दिशा में शोध के लिये अभी विज्ञान का सारा क्षेत्र अधूरा पड़ा है। लोग चाहें तो उसे आध्यात्मिक और योगिक क्रियाओं द्वारा खोजकर एक महत्तम शक्ति के स्वामी होने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं। देवताओं के नाम से विख्यात इन खाली स्थानों (केन्द्रिकिल्स) में शक्ति के अज्ञात स्रोत छुपे हुये हैं, उन्हें खोज कर मनुष्य वह शक्तियाँ अर्जित कर सकता है, जिनका वर्णन इस लेख की प्रारम्भिक पंक्तियों में किया गया है।
न शरीर तट है, न मन तट है, उन दानों के पीछे जो चैतन्य है, साक्षी है, दृष्टा है, वह अपरिवर्तित नित्य बोध मात्र ही वास्तविक तट है, जो अपनी नौका को उस तट से बाँधते हैं, वे ही अमृत प्राप्त करते हैं।
-स्वामी विवेकानन्द
मछलियों और बकरियों को मारकर जिगर (लिवर) अलग निकाल कर उसे इस तरह छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है, जैसे किसान कुट्टी काटते हैं। फिर इन नन्हें-नन्हें टुकड़ों को मशीनों से इस तरह मिलाया जाता है कि वह बिलकुल मिल (होमोजेनाइज) जाये। इसके बाद एक निश्चित प्रणाली द्वारा उसका सत निकाल लिया जाता है, यही ‘लिवर एक्स्ट्रेक्ट’ कहा जाता है, जो बाद में चमकते डिब्बों में भर कर दवा के रूप में प्रयोग के लिये भेज दिया जाता है।
काँड लिवर ऑयल काँड नामक मछली और शार्क लिवर ऑयल शार्क मछली को मार कर निकाले जाते हैं। इन्हें वाष्प-आसव पद्धति (स्टीम डिस्टिलेशन प्रोसेस) से निकालते हैं। चेचक के कीटाणु लेकर पहले बन्दर के गुर्दे (किडनी) में घुसेड़ (इनाकुलेट) देते हैं। यह 14 से 21 दिन में पककर तैयार हो जाता है, उसे चेचक के टीके के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। एण्टीटिटैनिक सीरप के लिये भी बन्दर के गुर्दे (किडनी) काम में लाये जाते हैं। घोड़ों के पट्टों पर भी यह प्रयोग किया जाता है। भारतीय बन्दर आज बड़ी मात्रा में अमेरिकी देशों को निर्यात किये जाते हैं। इस प्रकार अपने देश से बन्दर की नस्ल कुछ दिन में ही समाप्त हो सकती है, जबकि अमेरिका में भी वे पलते नहीं। मार कर उनके शरीर का एक-एक अंग काट कर काम में ले लिया जाता है। यह बन्दर यहाँ से 15-20 रुपये में जाते हैं और उन्हीं को मार कर जो औषधियाँ बनती हैं, उनके लिये हमसे लाखों रुपये वसूल किये जाते हैं।
औषधि के लिये यदि कदाचित कभी कोई हिंसा करनी पड़े तो कुछ लोग उसे क्षम्य मान सकते हैं प्रकृत के इन निरीह प्राणियों को एक बार अच्छे उद्देश्य के लिये बलि के रूप में स्वीकार कर भी लिया जाय पर इस भयंकर हिंसा को जो संसार में निर्दयता, अपराध-वृत्ति और दुराचरण को प्रोत्साहित करती है, कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
चिकित्सा के रूप में भी उसके भले परिणाम निकलते तो भी कोई बात थी। एक कुत्ते की पूँछ टेढ़ी थी, उसकी पूँछ को एक बाँस की नली में घुसेड़ दिया गया। आशा थी कि साल, छः महीने में पूँछ सीधी पड़ जायेगी पर जब उसे बाँस में पोंगे से बाहर किया गया तो पूँछ वही टेढ़ी की टेढ़ी निकली। आज चिकित्सा और वैज्ञानिक प्रयोगों की स्थिति भी ऐसी ही है। आज सारे विश्व में स्वास्थ्य शोधकर्ताओं की संख्या 30 लाख है। संसार की 60 भाषाओं में स्वास्थ्य चिकित्सा सम्बन्धी लगभग 55 हजार पत्रिकायें छपती हैं, वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की संख्या में इतनी वृद्धि के बाद भी आज संसार के 87 प्रतिशत लोग किसी न किसी रोग से पीड़ित हैं। सन 1958 में अकेले भारतवर्ष में 50 लाख व्यक्ति टी. बी. से बीमार थे। कोढ़, कैन्सर, एन्फ्लुएंजा आदि के रोगियों की संख्या भी उतनी ही होगी, इससे कम नहीं । दाँतों की दृष्टि से भारत के 65 प्रतिशत लोग पायरिया ग्रस्त हैं। यह आँकड़े जहाँ हमारे त्रुटिपूर्ण जीवन की ओर संकेत करते हैं, वहाँ वह विज्ञान और आधुनिक पद्धति की असफलता को भी प्रमाणित करते हैं।
भारत जैसे अहिंसावादी देश के लिये तो हिंसा, वह भी औषधि के लिए, महान कलंक की बात है, जबकि आयुर्वेद जैसी शुद्ध चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता सरकार भी स्वीकार करती है। जब हमें हिंसा द्वारा प्राप्त औषधियों के मुकाबले प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति उपलब्ध हो तो जान-बूझ कर माँसाहार क्यों करें। कैप्सूल के ऊपर चढ़ा हुआ आवरण जिलेटिन हड्डियों से बनता है। अधिकाँश सभी साबुनों में विशेष कर चिकने साबुनों में गाय और सूअर की चर्बी पड़ती है। लोकसभा में इस बात को स्वीकार किया गया और सभी समाचार-पत्रों ने उसे छापा, फिर भी हम इन औषधियों को समर्थन देते रहें तो यही कहना पड़ेगा कि गाँधीजी के देशवासी हम अहिंसा के उपासक भी हिंसक से कम नहीं हैं।
कवि ‘दण्डी’ की साहित्य साधना चल रही थी। मार्गदर्शक थे उन्हीं के पिता। किसी भी दिशा में बढ़ना हो, श्रेष्ठ स्तर तक पहुँचने के लिए विशेष प्रयास, विशेष श्रम करना ही पड़ता है। खिलाड़ी बनना चाहें या पहलवान, वाणी का उपयोग हो या लेखनी का, ज्ञान-मार्गी बने या कर्ममार्गी-सभी के लिए एक ही सिद्धान्त है। जितना तपेगा उतना ही निखरेगा। जितना रगड़ खायेगा, उतनी ही चमक पायेगा। कवि दण्डी अपने समकालीन कवि कालिदास की प्रतिभा से अपनी उपलब्धियों को आगे ले जाना चाहते थे। वह स्वयं पूरी लगन से श्रम कर रहे थे और उनके पिता पूरी तत्परता से निर्देशन।
श्रेष्ठ साधक अपनी साधना में अपने मार्गदर्शक को प्रधानता देकर चलते हैं। मार्ग-दर्शक सन्तोष को ही अपनी प्रगति का चिन्ह मानते हैं। एक बार लक्ष्य निर्धारण करके फिर कितनी सीढ़ियाँ किस प्रकार चढ़ना है, यह मार्ग-दर्शक के ऊपर छोड़कर साधक लग जाते हैं, अपनी पूरी शक्ति के साथ निर्देश पूरा करने में। इस स्थिति में हर कदम पर उन्हें निर्देशक के सन्तोष का ही ध्यान रहता है। मानो वही मूल लक्ष्य हो।
कवि दण्डी इसी निष्ठा से लग गये अपनी साधना में। उनकी प्रतिभा निखरने लगी। हर प्रयास पर उन्हें प्रशंसा भी मिलती और आलोचना भी। प्रशंसा से उत्साह बढ़ाकर आलोचना से आत्म-शोधन करते हुए वह बढ़ रहे थे। परिचितों की दृष्टि में उनका स्तर बहुत उच्चकोटि का हो गया था। यह जानकर कवि दण्डी को प्रसन्नता हुई और वे आशा करने लगे, अपने मार्गदर्शक से अधिक साधुवाद की। किन्तु वहाँ कुछ उल्टी ही प्रतिक्रिया मिली। प्रशस्ति के स्थान पर आलोचना बढ़ गई। मन को बुरा लगा, परन्तु विनयी शिष्य की तरह निर्देशों का पालन करते रहे।
मोम जब नर्म रहता है तो किसी भी आकार में सहज ही मुड़ जाता है, न चटकता है और न बेडौल होता है। साधक की जब तक अपने स्वरूप के बारे में कोई मान्यता नहीं बनती-तब तक उसका अन्तःकरण भी नर्म मोम की तरह होता है। उसे कैसा भी मोड़ा-ढाला जावे-कोई कष्ट या प्रतिक्रिया अनुभव नहीं होती। किन्तु अपने स्वरूप की, प्रतिष्ठा की, कोई मान्यता-स्पष्ट या अस्पष्ट बनते ही वह अन्तःकरण अपनी लोच खो बैठता है। फिर परिवर्तन से अपनी मान्यता का स्वरूप हिलता-बिगड़ता सा लगता है और अनेक प्रतिक्रियायें उठने लगती हैं कवि दण्डी की स्थिति भी अब कुछ इसी प्रकार की हो गई थी। पिता के निर्देश, उनकी मीनमेख उन्हें अरुचिकर लगने लगी। कभी-कभी अन्दर रोष भी उत्पन्न होने लगा।
उनके पिता सब समझते हुए भी उस ओर ध्यान नहीं दे रहे थे। कुशल शिल्पी की तरह उनका ध्यान अपनी सुगढ़ मूर्ति की छोटी से छोटी त्रुटि पर पहुँचता था। पत्थर में मनुष्याकृति थोड़े प्रयास से ही उभर आती है। जनसाधारण तो नाक-नक्श देखकर संतुष्ट होने लगते हैं। किन्तु शिल्पी अपनी कल्पना का भाव उसमें भरने के लिए उन सुन्दर अंगों को भी बार-बार काटता छाँटता व घिसता रहता है। कवि दण्डी के पिता अपना कर्तव्य भली प्रकार समझते थे। शिष्य के पथ्य-कुपथ्य का उन्हें ध्यान था। इसी कारण वह अधिक तत्परता से, अधिक बारीकी से अपने कार्य में लगे थे।
उधर शिष्य अधीर हो उठा। उसे लग रहा था-”कब मेरी श्रेष्ठता, पूर्णता प्रमाणित करके अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर दिया जावे। कब लोगों की प्रशंसा और श्रद्धा का भाजन बनूँ?” किन्तु उनके हर प्रयास पर पिता द्वारा श्रेष्ठता स्वीकार करने के स्थान पर दोषों की सूची बढ़ा दी जाती, बहिर्मुखी होने देने के स्थान पर और अधिक एकान्त सेवन के लिए दबाव दिया जाता।
दण्डी का रोष बढ़ने लगा। विकृत अहंकार सिद्धाँत और लक्ष्य दोनों पर हावी हो गया। सामने तो मर्यादावश कुछ न कहते, किन्तु इधर-उधर अपना असंतोष व्यक्त करने लगे। किन्तु पिता पर किसी बात का मानो कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता था। अन्य व्यक्तियों से प्रशंसा एवं सद्भावना मिलती, किन्तु पिता ‘कठोर के कठोर!” दण्डी को अपने अहंकार तुष्टि में एकमात्र बाधक अब वही दिखने लगे। उन्हें यहाँ तक लगने लगा कि “इनके रहते मेरा सन्तोष सम्भव नहीं।”
व्यक्ति जब ज्ञान सम्मोह स्थिति में भ्रमित होता है, तब ऐसी ही स्थिति हो जाती है। विवेक कुण्ठित हो जाता है- तथा हित-अहित भूल जाता है। एकमात्र अपना अहंकार एवं उसकी तुष्टि ही सर्वोपरि दीखने लगती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति भयंकर से भयंकर निर्णय भी ले डालता है। अपनी सारी साधना को निरर्थक करने वाले कदम उठाने को तत्पर हो जाता है। कवि दण्डी भी उसी प्रवाह में बह उठे। उन्होंने निर्णय कर लिया अपनी राह के काँटे को उखाड़ फेंकने का। पिता मार्ग-दर्शक गुरु की हत्या...। भयंकर अविवेकपूर्ण कुकृत्य। किन्तु उस समय विचार कहाँ था, नशा था- जो सोचने नहीं देता।
रात्रि के पूर्व ही वे छिप गये पिता के शयन-कक्ष में ‘सशस्त्र’। घड़ी भर में भयंकर घटना हो सकती थी। किन्तु नियति को कुछ और ही करना था। शयन के पूर्व दण्डी की माता पति को प्रणाम करने पहुँची। संयोग से उन्होंने दण्डी का प्रसंग ही छेड़ दिया। माँ ने पुत्र का पक्ष लेते हुए उसके प्रति कड़ाई की शिकायत की, पुत्र की बढ़ती हुई प्रतिभा की सराहना की और पति से उनके कठोर व्यवहार का कारण पूछा। दण्डी श्वाँस रोककर सब सुनने लगे।
दण्डी की छद्म उपस्थिति से अनभिज्ञ पिता का स्नेह उबल पड़ा। मार्गदर्शक की कठोरता हट गई। भरे नेत्रों एवं गदगद वाणी से वे अपने पुत्र की प्रशंसा करने लगे। प्रशस्ति करते हुए बोले- “भद्रे! सच पूछा जाये तो दण्डी मेरी सीमा से भी आगे जा चुका है। कोई भी पिता अपने ऐसे पुत्र पर गर्व कर सकता है...।” दण्डी के कान इससे अधिक न सुन सके। वह स्तब्ध, आश्चर्यचकित सोच रहे थे- “इतना स्नेह इतनी श्रेष्ठ मान्यता... फिर इतनी कठोरता क्यों?”
पुनः कानों ने सुनना प्रारम्भ किया...। अब पिता नहीं गुरु बोल रहे थे- “किन्तु देवि! मेरा कर्तव्य कठोर है। दण्डी की असाधारण क्षमता को यों ही नहीं छोड़ा जा सकता। उसका लक्ष्य भी कालिदास की प्रतिभा से आगे जाने का है। इस अवसर पर मेरी थोड़ी-सी भी ढील सदा के लिए उसकी प्रगति की सम्भावना समाप्त कर सकती है। पिता की तरलता पुत्र का अहित न कर दे-इस कारण गुरु भाव से अधिक कठोर बनना ही पड़ता है। दण्डी इस कठोर साधना के योग्य नहीं है, ऐसा मेरा पित्र हृदय स्वीकार नहीं करता। यदि वह सह सका, तो लक्ष्य पा लेगा। अन्यथा मेरा तिरस्कार करेगा तो भी उसका जो स्तर है, वह तो बना ही रहेगा। मैं क्यों उसके बारे में हीन कल्पना लाकर अपना कर्त्तव्य छोड़ूँ?”
दण्डी की मानो समाधि लग गई। सारा शरीर रोमाँचित हो रहा था-नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। कब माता चली गई, कब पिता सो गये, उन्हें कुछ भान न हो सका। सारी रात वह एकटक अपने पिता को- अपने मार्गदर्शक को देखते रहे-मनुष्य है या देवता! क्या देवता भी इतने उज्ज्वल हो सकते हैं...? आँसू झरते रहे कलुष धुलता रहा।
प्रातःकाल से दण्डी अद्वितीय निष्ठावान साधक था। पिता के स्वकर्तव्य-निष्ठ-स्वरूप ने शिष्य की भ्रान्ति मिटा दी-और शिष्य जो निष्ठापूर्वक स्वकर्तव्य साधना में लगा तो गुरु की कठोरता गलकर बह गई। और दण्डी वह समर्थ कवि ‘दण्डी’ बन सके कि स्वयं माँ सरस्वती ने उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की। हर उत्कृष्टता की प्राप्ति के पीछे कठोर साधना का इतिहास छिपा रहता है।
कलना सर्वजन्तूनाँ विज्ञानेन शमेन च।
प्रबुद्वा ब्रह्मनामेति भ्रमतीरथा जगत॥
ज्ञान और शम के द्वारा ही प्राणी ब्रह्म स्वरूप पिता को प्राप्त हो जाता है। इनके अभाव में वह इस संसार में भटकता रहता है।
विचित्र प्रकार के जीव-जन्तुओं के लिये न्यूयार्क (अमेरिका) का चिड़ियाघर विश्व-प्रसिद्ध है। कई वर्ष पूर्व यहाँ एक ऐसा सर्प लाया गया, जिसके दो सिर थे। भारतवर्ष में एक ‘दुमुहा’ नामक सर्प पाया जाता है, इसके दोनों तरफ मुख होते हैं। किंवदन्ती है कि यह सर्प 6 माह एक तरफ के मुख से चलता है, 6 माह दूसरी ओर से। पर न्यूयार्क का सर्प था, जिसके एक ही तरफ दो मुख थे। दोनों मुख लगभग 3-3 इंच के थे। दोनों में दो दो आँखें, नाक, कान और जीभें भी थीं। श्वाँस और भोजन ग्रहण करने की नली भी दो थीं, जो आगे चलकर मिलतीं और एक हो जाती थी।
जीवित प्राणी की सूक्ष्मतम इकाई संस्कार कोष (जीन्स) के गहन अध्ययन के बाद जीव शास्त्रियों ने एक सिद्धान्त निश्चित किया है कि बच्चा जैसा कुछ बनता है, चाहे वह शरीर की बनावट, रंग-रूप हो अथवा उसके गुण स्वभाव सभी इन संस्कार कोषों पर निर्भर है। काले माता-पिता की सन्तान काली, श्वेत की श्वेत, दुर्गुणी की दुर्गुणी और सभ्य, सज्जन माता-पिता की सन्तान सुशील और सदाचारी। रासायनिक प्रतिक्रिया की भाँति जैसा कुछ ऊपर से मिलता है, आगे का प्राणि जगत वैसा ही बनता चला जाता है। लाल गुलाब के फूल को दूसरे वर्ण के गुलाब के फूल में तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक उससे भिन्न जाति के गुलाब से संकरण न कराया जाये।
एक ओर जीव-शास्त्रियों का यह मत दूसरी ओर यह अपवाद हमें यह सोचने के लिये बाध्य करता है कि प्रकृति जहाँ नियमितता पसन्द करती है, वहाँ उसमें एक विचार शक्ति भी काम करती है। अपनी इस स्वाधीनता को ही वह जब-तब ऐसे अनोखे निर्माणों के रूप में प्रकट करती रहती है। ऐसे अपवाद हमें यह सोचने को विवश करते हैं कि पदार्थ में भी एक मस्तिष्क काम करता है, जो रासायनिक चेतना से कहीं अधिक सशक्त और सम्वेदनशील है, वह जीव-शास्त्रियों के बनाये नियमों तक सीमित रहने के लिये बाध्य नहीं। उसकी क्रिया-पद्धति अपनी तरह की अनोखी और मनोविनोद से परिपूर्ण है।
साँप के कहीं दो सिर नहीं होते, इसलिये क्रमागत सन्तानों में भी अनन्त काल तक ऐसी विशेषता नहीं पाई जानी चाहिये थी, फिर सर्प के दो मुख क्यों हो गये। मजेदार बात तो यह थी कि दोनों मुखों के दो मस्तिष्क दो व्यक्तित्व भी थे। जब कभी एक मुख कोई शिकार पकड़ता लोभी व्यक्ति की तरह दूसरा भी उस पर झपट पड़ता। स्वार्थी व्यक्ति की भाँति प्रेम, समता, आत्मीयता और सहिष्णुता के सारे गुणों को भुलाकर पहला मुख दूसरे मुख से जूझ पड़ता और जब ‘जुआरी’ जिस तरह अपनी ही छाया से लड़ पड़ता है, दोनों सिरों में भयंकर युद्ध छिड़ जाता। कभी-कभी तो दोनों लहू-लुहान हो जाते। इस बीच शिकार भी हाथ से निकल जाता। साँसारिक समस्याओं में उलझा हुआ मनुष्य जिस प्रकार अन्तकाल में अपने पाप और भूलों के लिये पछताया करता है, दोनों सिर भी पछताते रहते। जबकि दोनों के पेट एक ही था, उन दोनों का लड़ना लोगों की दृष्टि में भारी मूर्खता थी पर मनुष्य भी तो वैसी ही भूल सदैव करता रहता है, एक ही आत्मा के अनेक अंश होकर एक दूसरे के प्रति सहयोग और सहानुभूति न रखकर मनुष्य जाति का निजी स्वार्थों के लिये परस्पर लड़ना भिड़ना इस सर्प की मूर्खता से कम नहीं। भले ही सर्प को जैसे ‘किंगस्नेक’ नाम दिया गया, मनुष्य को भी ‘बुद्धिशील प्राणी’ क्यों न कहा जाता हो, अपनी इस धूर्तता के लिये वह अन्ततः मूर्ख ही है। इस तरह की स्वार्थपरता के कारण मनुष्य जाति अन्ततः अपना अहित इस सर्प की तरह ही करती है।
एक दिन किसी बात पर दोनों सिर झगड़ बैठे। एक ने आवेश में आकर दूसरे को मुख में भर लिया। मनुष्य जाति जिस तरह धन से नहीं अघाती और अधिक, और अधिक की तृष्णा में सामाजिक विषमता उत्पन्न करती है, साँप ने उसी तृष्णा में दूसरे मुख को अन्त तक निगल लिया। चिड़ियाघर के अधिकारी दौड़े। किसी तरह दोनों को छुड़ाया पर दुर्गति ऐसी हो गई थी कि अन्ततः वह सर्प मर ही गया। लगता है प्रकृति ने मनुष्य जाति की दोरंगी स्थिति को समझने के लिये ही यह एक मनोविनोद पूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया था पर लोगों ने उससे कोई शिक्षा कहाँ ग्रहण की।
मनुष्य न समझे न सही पर प्रकृति तो उसे अपना समझदार बेटा मानती है, इसलिये दण्ड कम देती है, हँस-हँसकर समझाती ही अधिक है। ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण प्रस्तुत करती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मिट्टी और पदार्थों से बने इस संसार को मृतक नहीं समझना चाहिये, यहाँ के प्रत्येक कण में एक मन है, मस्तिष्क है, जो मनुष्य के समान ही स्वाधीनता पूर्वक काम कर सकने में समर्थ है, नियमबद्ध तो वह केवल इसलिये है कि उसी से संसार का अस्तित्व बना हुआ है, यदि मनुष्य की भाँति प्रकृति भी उद्दण्ड और अनुशासन भंग कर स्वेच्छाचारिणी हो गई होती तो एक ही दिन में चन्द्रमा पृथ्वी से, पृथ्वी सूर्य से टकरा जाते। सब नक्षत्रों में विस्फोट हो जाता। पृथ्वी जल हो जाती, जल हवा में उड़ जाता। समूची प्रलय उमड़ पड़ती और सृष्टि का अन्त ही हो जाता। एक प्रकार से सृष्टि अनुशासन पर टिकी है और पंच-तत्व भी उसका नेक और ईमानदार बालक की भाँति पालन करते हैं।
बच्चा बुरा काम करता है, बुरा बोलता है, माँ उसे हँसकर समझाती है, इसमें वह अपने क्रोध से भी बच जाती है और बच्चे का मन भी भारी नहीं होता। यह उदाहरण प्रकृति के ऐसे विनोद को प्रकट करते हैं और संसार में सर्वत्र देखने को मिलते हैं।
बहुत दिन पहले जापान में एक मुर्गा उत्पन्न हुआ था। जैसे सब मुर्गे होते हैं, ऐसा ही यह भी था, किन्तु इस मुर्गे की पूँछ असामान्य रूप से लम्बी अर्थात् पूरे 30 फुट की लम्बी थी। जैसे किसी पेटू आलसी और मुफ्त का माल मारने वाले का पेट इतना मोटा हो जाता है कि उसका चलना-फिरना भी कठिन हो जाता है, अपनी इस अनावश्यक लम्बी पूँछ के कारण ‘याकोहामा काक’ नामक यह मुर्गा भी चल-फिर नहीं पाता था। एक पिंजरा बनाया गया था। उसमें बैठने के लिये एक ऊँची डाल जैसी बनाई गई थी, बेचारा दिन भर उसी में बैठा अपने पूर्वजन्मों की तृष्णा और संग्रह वृत्ति की याद करके दुखी होता रहता था। हिन्दू-जाति जिस तरह अनावश्यक रूढ़िवादी परम्पराओं की पूँछ लगाये सारे संसार को अपने पर हँसा रही है। इस मुर्गे को जो भी देखता हँसे बिना नहीं रहता था। कभी-कभी वह बाहर निकाला जाता था तो दो-तीन नौकर उसकी पूँछ ऊपर उठाकर चलते थे। तब थोड़ा बहुत घूम भी पाता था, नहीं तो बहुत पाकर भी वह गुमसुम बैठा ही रहता था। संसार में आने और आनन्द लूटने के कोई भी प्रयोजन यह मुर्गा लूट नहीं पाया। वह अपनी सम्पदा पर क्षुब्ध बना रहा और प्रकृति इस माध्यम से दूसरों को समझाती रही- “अनावश्यक भंडार भरने का यही फल होता है।
मनुष्य जाति यों शरीरों से भिन्न प्रतीत होती है पर इच्छायें, आकाँक्षायें, आवश्यकतायें सब की एक तरह की हैं। संसार में व्यवस्था बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि इच्छाओं और आवश्यकताओं के औचित्य पर विचार किया जाये। और सबको आवश्यकता के अनुसार जीवनदायी सुविधायें मिलती रहें। इसकी एक शर्त है, वह यह कि लोग अपने लिये कम से कम चाहें समाज के लिये अधिकतम देने की भावना रखें। देने वाला घाटे में नहीं रहता पर जिसे केवल अपनी ही सूझती है, वह अफ्रीका में कुछ दिन पूर्व मिले एक कछुये के समान जहाँ होता है, वहीं चक्कर काटता रहता है, वह न तो पैसे भर की प्रगति कर पाता है और न ही संसार में आने का कोई उपयोग कर पाता है।
इस कछुए के साथ भी प्रकृति ने गहरी मजाक की थी। गोल आकृति वाले इस कछुये के भी दो सिर थे। दोनों के लिये दो-दो पैरों का विभाजन प्रकृति ने कर दिया था। पर उनमें कभी समझौता नहीं हो सका। एक सिर पूर्व की ओर तैरना चाहता तो दूसरा पश्चिम को। परिणाम यह होता कि वह जहाँ का तहाँ चक्कर काटता रह जाता। भारतवर्ष को स्वतंत्रता प्राप्त किये आज 22 वर्ष हो गये पर अपनी खींचा-तानी प्रवृत्ति के कारण यहाँ के निवासी जितने दुःखी, पराधीनता में थे, स्वाधीनता में उस कछुये के समान ही हैं-उससे भी अधिक। स्वतंत्रता दूसरे मुख की तरह सिद्ध हो रही है, जो उसे वहीं की वहीं घुमा रही है, जबकि होना चाहिये था कि यहाँ के लोग प्राप्त अवसर, सुविधा और साधनों का बहुमुखी उपयोग करते स्वयं भी चलते औरों को भी चलने देते तो आज सर्वतोन्मुखी उन्नति के दर्शन होते। प्रकृति हँसकर रह गई पर मनुष्य का दुर्भाग्य कि वह कछुये के समान इधर जाऊँ या उधर इसी उधेड़-बुन में पड़ा है।
प्रकृति केवल इन जीवों से ही मनोविनोद नहीं करती वरन् वह मनुष्यों के साथ भी ऐसे खिलवाड़ करती और यह समझती है कि मनुष्य की प्रकृतियाँ निम्नगामी हों तो वह एक प्रकार से पशु ही है। सामान्य रूप से वह भले ही मनुष्य लगता हो।
दण्डकारण्य क्षेत्र (जगदलपुर) के एक कबायली परिवार में नर सैया नामक गोंड के एक पुत्र हुआ, जिसकी छोटी-पूँछ भी थी। यह लड़का जिसका नाम हनमैया रखा गया, जब 14 वर्ष की आयु का हुआ, तो उसकी पूँछ काफी बढ़ गई। बस्तर में महारानी अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. ए. सी. गौड ने लड़के की परीक्षा करके बताया कि लड़के के सामान्य रूप से हाथ पैर बढ़ने के साथ-साथ पूँछ भी बढ़ रही है। पूँछ गोलाकार है और रीढ़ की सबसे नीचे तिकोनी हड्डी के एक इंच ऊपर है, लड़का जब चलता है, तब वह पेण्डुलम की तरह हिलती है।
लम्बर्च (द. अफ्रीका) में एक स्त्री ने असमय प्रसव में एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका मुख भैंस के बच्चे की तरह था उसके शरीर में बाल भी थे और काफी बड़े मालूम पड़ते थे।
इसी प्रकार सहपऊ (मथुरा) से दो मील दूर गाँव कौकना खुर्द के श्री नेत्रपाल के यहाँ एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया, जिसके सर पर तीन सींग थे तथा दो आँख थीं, सर पर गड्ढा था। जन्म से थोड़ी देर बाद ही मर गया। पशु जैसी त्वचा, लम्बे नाक, कान और दीर्घाकार मुख वाली एक कन्या ने मद्रास के बाल-कल्याण केन्द्र में जन्म लिया। इसे देखने के लिये इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई कि पुलिस बुलानी पड़ी।
यह उदाहरण जहाँ प्राणि-शास्त्रियों द्वारा नियत सिद्धान्तों का खंडन करते हैं, वहीं यह बताते हैं कि प्रकृति का मस्तिष्क निरन्तर हँसता हुआ लोगों को सिखाता, समझाता रहता है। जब वह यह समझती है कि उसकी परावाणी समझना मनुष्य के वश की बात नहीं, तब वह ऐसे विचित्र खेल भी दिखाती है पर तो भी यदि मनुष्य अपनी भूलें नहीं सुधारता, अपने मनुष्य शरीर में आने का उद्देश्य पूरा नहीं करता तो वह अन्त में प्रकृति के कोप का भाजन भी बनता है। तब वह अपने दूसरे समर्थ हथियार प्राकृतिक प्रकोप, युद्ध, महामारी और प्रलय के दृश्य उपस्थित कर मनुष्य को सीधी तरह सोचने और करने को बाध्य करती है। अब यह हमारे अपने वश की बात है कि हम उसके वात्सल्य का लाभ अपने आचरण सुधार कर लें या अपना मार्ग न सुधार कर उसे दण्ड ही देने को बाध्य करें।
महाप्राज्ञ शरीर छोड़ने लगे तो अपने पुत्र सौमनस् को बुलाया और एक मणि देते हुये कहा- तात्! यह लो ‘सुर्यकान्त मणि’ इसमें जीवन के सम्पूर्ण अभाव दूर करने की क्षमता है। यह कहकर उन्होंने पंच-भौतिक शरीर का परित्याग कर दिया।
सौमनस् ने कुछ दिन तो उस मणि का प्रयोग दीपक के रूप में किया, फिर अपनी प्रेमिका एक वेश्या को दे दिया। वेश्या का शृंगार प्रसाधनों की आवश्यकता पड़ी तो उसे एक जौहरी को बेच दिया। जौहरी ने मणि की महत्ता को परखा और उससे बहुत-सा सोना बनाकर धनपति बन गया।
संगीत भी सुर्यकान्त मणि के समान है, जो अपात्रों के हाथ महत्वहीन और पारखियों के पास अमूल्य निधि के रूप में सुरक्षित रहती है।
हालैंड पर जर्मनी का अधिकार था तो भी हालैंड-वासियों का गुप्त संगठन जर्मनों को उखाड़ फेंकने के लिये प्रयत्नशील था। पीटर हरकौस की प्रसिद्धि इस संगठन के लोगों तक भी पहुँची पर चूँकि उन लोगों को सिद्धि के इस दर्शन का बिल्कुल ज्ञान नहीं था, इसलिये कोई सही निष्कर्ष निकाल पाने की उनमें क्षमता भी न थी। उन्होंने हरकौस को जर्मनों का गुप्तचर समझा और उसे मार डालने का अवसर ढूंढ़ने लगे।
हमारे देश के ऋषियों और योगियों ने अतीन्द्रिय तत्वों की प्राप्ति कर ली, तब उनके सामने भी यह प्रश्न आया था कि वे स्वयं ही समर्थ और प्रभुता सम्पन्न बने रहें अथवा उसकी वैज्ञानिक जानकारी जनसाधारण को भी दें। तब उन्होंने स्पष्ट विचार कर लिया था कि यदि सर्वसाधारण को यह ज्ञान न दिया गया तो अज्ञानी वर्ग इसी तरह का संकट उत्पन्न कर सकता है। मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता और लोकसेवा के भाव की पूर्ति के लिये भी यह आवश्यक था, तभी तत्व-दर्शन का प्राकट्य हुआ। हालैंड वासी ही क्या, सारे पश्चिम के लिये यह एक अनहोनी बात थी। कुछ लोग तो पीटर हरकौस से लाभ भी लेते थे पर चूंकि अपनी इस शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन वह स्वयं ही नहीं कर सकता था, इसलिये उसकी आकस्मिक योग्यता उसके संकट का ही कारण बनी।
एक दिन जब पीटर हरकौस अस्पताल में ही था, उक्त संगठन का एक व्यक्ति उससे मिलने आया। उसने आते ही सन्देह भरी दृष्टि से पूछा- “महाशय! क्या आप बता सकते हैं, आपके पास यह शक्ति कैसे आई थी पर इतने से उस व्यक्ति को संतोष न हुआ। उसने गला घोंटकर पीटर हरकौस को मार डालने का निश्चय किया। हाथ बढ़ाकर उसने गला घोंटना प्रारम्भ भी कर दिया पर तभी उसकी इस शक्ति ने साथ दिया। उसने स्पेनिश भाषा में एक वाक्य कहा। यह वाक्य सुनते ही वह व्यक्ति स्तब्ध रह गया क्योंकि उस समय वह भी अपने मन में ठीक वही सोच रहा था, जो हरकौस ने स्पेनिश में कहा था। उसे विश्वास भी हो गया कि पीटर हरकौस के पास अतीन्द्रिय बोध की क्षमता है पर पीटर हरकौस स्वयं अपने लिये उसी तरह चिन्तित हो गया, जिस तरह भ्रष्ट तरीके से प्राप्त धन के पा जाने पर भी लोग चिन्तित और भयभीत बने रहते है। यदि यह सब कुछ एक क्रमबद्ध यौगिक पद्धति और किसी के मार्गदर्शन में मिला होता तो सम्भव है हरकौस सैकड़ों औरों को भी जीवन लक्ष्य की राह दिखाता पर स्वयं अपनी व्याख्या कर पाने में असमर्थ था, दूसरे को बेचारा क्या समझाता?
अन्तर्दृष्टि का एक लाभ यह तो हुआ कि पीटर हरकौस जब अपने घर लौटा तो उसे अपने सभी पड़ौसी, सगे-सम्बन्धी नग्न सत्य के रूप में परिलक्षित हुये। उसके सामने कोई झूठ बोलता तो भले ही कुछ कहता नहीं पर वह साफ समझ लेता । अतीन्द्रिय क्षमता किसी की भी गुप्त से गुप्त बात प्रकट कर देती, फलस्वरूप लोगों को देखने की उनकी दृष्टि में एकदम परिवर्तन आ गया। अब वह अपने को एक विराट संसार के सत्य-प्रतिनिधि के रूप में देखता और लोगों को नेकी और भलमनसाहत पर चलने की ही प्रेरणा देता, क्योंकि वह स्पष्ट देख रहा था कि अपने स्वार्थों के लिये अपनाया हुआ मिथ्या और बनावटी जीवन ही लोगों की विपत्ति और दुर्गति का कारण होता है। कुछ उसकी बातें सुनते, कुछ नहीं भी सुनते थे। पीटर हरकौस स्वयं उससे दुःखी था, क्योंकि निष्काम कर्म का उपदेश पढ़े बिना ही तो उसे सिद्धि मिली थी। वह अन्ततः उसे भार ही प्रतीत हुई। अपनी क्षमता का वह अपने भविष्य को जानने में उपयोग भी नहीं कर सकता था, इसलिये इतनी शक्तिशाली सामर्थ्य होते हुये भी ईश्वरीय घटक के रूप में वह अपने आप को छोटा ही पाता।
पीटर हरकौस तब आत्मा-शान्ति के लिये अपने देशवासियों के संगठन में सम्मिलित हो गया। समाज सेवा से उसे शाँति भी मिली पर एक दिन वह जर्मनों द्वारा कैद कर लिया गया। बन्दी शिविर में उसे बहुत कष्ट दिया गया। पर वहाँ भी लोगों को धैर्य बँधाता और कहता सब लोग 4 जून 1940 को मुक्त हो जायेंगे। मुक्त भी हुये पर 6 जून को। गलती थोड़ी ही थी पर उसने अनुभव किया कि अन्धा-धुन्ध प्रयोग से यह शक्ति चूक भी सकती है। फिर भी उसने सीमित प्रयोग बन्द नहीं किया।
1945 में उसने हालैंड के एक ‘अभिनय दल’ में नौकरी कर ली। पर यहाँ भी उसने वही कठिनाई अनुभव की। 5 ही सप्ताह में उसने यह नौकरी छोड़ दी और पुनः दुःखी देशवासियों की सेवा में लग गया। उसे सबसे अधिक शाँति देशवासियों की सेवा में ही मिलती। इस बीच उनके कई प्रख्यात चमत्कारिक प्रयोग हुये। राटरडम के कैप्टन फाल्कन का लड़का समुद्र में गिर गया था। उसका शव नहीं, मिल रहा था। अपनी अंतर्दृष्टि से पीटर हरकौस ने जिस स्थान में बताया वहीं शव मिल गया। बेल्जियम के जार्ज कार्नेलिस के हत्यारों का पता भी उसी ने बताया। इस मामले में हरकौस की कड़ी परीक्षा हुई थी। ऐसे अनेक मामलों में उसकी पत्नी मारिया उसे बहुत साथ देती आई थी, इसलिये हरकौस यह भी अनुभव करने लगा था कि वह इन चमत्कारों में पड़कर पारिवारिक कर्तव्यों की उपेक्षा कर रहा है, इसलिये वह अपनी इस क्षमता को समेटना भी चाहता था पर जब उसने अपने आपको चारों ओर से घिरा पाया तो उसने इस योग्यता से ही पारिवारिक भरण-पोषण का मार्ग चुन लिया। बेल्जियम के एक होटल में अपना आफिस खोलकर पीटर हरकौस शुल्क लेकर लोगों की सेवायें करने लगा। वह कभी-कभी सार्वजनिक स्थानों में जाकर धार्मिक उपदेश भी करने लगा। इस बीच उसने अपनी योग्यता भी खूब बढ़ाई। हरकौस पहले तीन भाषायें जानते थे अब वे सात भाषायें बोल समझ सकते थे।
एक भारतीय स्त्री ने भी हरकौस को हेग स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से सहायता के लिये लिखा। उसका लड़का खो गया था। हरकौस ने पत्र लिखकर बताया लड़का बम्बई में किसी सर्कस में काम कर रहा है और कुछ ही दिन में घर आ जायेगा, जबकि अब तक जो जानकारियाँ मिली थीं, उनसे उसके डूब जाने की आशंका हो रही थी। कुछ ही दिन में लड़का घर पहुँच गया। सचमुच उन दिनों वह सर्कस में ही काम करता था।
तस्कर व्यापार में सहायता के लिये एक फ्राँसीसी से हरकौस को बहुत-सा धन भी मिला पर उससे उसे बड़ी अशाँति मिली, फलस्वरूप उसने यह निश्चय कर लिया कि वह किसी अनैतिक कार्य में कभी भी सहयोग नहीं करेगा। उसकी बड़ी इच्छा थी कि इस अतीन्द्रिय सत्ता का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाये ताकि वह सर्वसाधारण के लिये भी उपलब्ध हो सके। एण्टवर्प के मनोवैज्ञानिक डॉ. रैने डेलार्ट ने काफी अध्ययन भी किया, किन्तु वे भी कोई अन्तिम हल नहीं निकाल सके।
इसी बीच अमेरिका के वैज्ञानिक डॉ. अन्द्रीचा पुरिचा का पत्र मिला उन्होंने हरकौस को अमेरिका आमंत्रित किया। 6 माह तक प्रयोग की उनकी इच्छा थी। हरकौस प्रसन्नता पूर्वक अमेरिका गये। वहाँ उन्हें कई-कई घण्टे एक बन्द कमरे में बैठना पड़ता। उनके चारों ओर 250000 वोल्ट शक्ति की विद्युत-धारा प्रवाहित करके डॉ. पुरिच ने सोचा कि यदि कोई विद्युत शक्ति बाहर से आती होगी तो न आ सकेगी पर हुआ उल्टा। उस कमरे में पहुँचते ही उनका अतीन्द्रिय बोध और भी बढ़ जाता, इससे उन्होंने स्वीकार किया यह शक्ति 250000 वोल्ट विद्युत-शक्ति से भी अधिक प्रखर होती है। दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों डॉ. पुरिच की संरक्षिका का स्वर्गवास हो गया और वह प्रयोग जहाँ का तहाँ ही रुक गया। पर उन्होंने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि हरकौस में अतींद्रिय ज्ञान की क्षमता बहुत अधिक मात्रा में विद्यमान है।
पीटर हरकौस का जीवन इस विद्या में व्यवसाय भर का हो गया था। वे अनेकों लोगों की सहायता तो करते वे पर यह नहीं बता सकते थे, यह सत्ता क्या है। सम्भव है उन्होंने जो जिज्ञासायें सूक्ष्म एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रति उत्पन्न की हैं, वह लोगों को भारतीय तत्वदर्शन से कुछ सीखने की प्रेरणा दे। अतीन्द्रिय सत्ता के प्रति विश्वास उत्पन्न करने में इस दुर्घटना या घटना ने जो सहायता दी है, वह अपने आपमें ही एक चमत्कार है।
पीटर हरकौस ने अपने यह सम्पूर्ण संस्मरण- ‘साइक’ नामक पुस्तक में छापे हैं। यह पुस्तक ‘आर्थर बार्कर लिमिटेड लन्दन’ ने प्रकाशित की है। हरकौस के संस्मरण संसार के सभी समाचार-पत्रों ने छापे हैं। जून 1963 में कादम्बिनी, 7 दिसम्बर 1969 रहस्य रोमांच अंक साप्ताहिक हिन्दुस्तान और नवम्बर 1964 नवनीत में भी यह संस्मरण विस्तार से छपे हैं।
अपने बारे में औरों से पूछो, अपनी आत्मा से विश्वस्त और दृढ़तापूर्वक जानकारी दूसरा नहीं दे सकता। साँसारिक दृश्य पर देवता मोहित नहीं होते, क्योंकि वे निरन्तर अंतर्दृष्टि रखने के कारण अपने भीतर ही वह सब प्राप्त कर लेते हैं, जिनके लिये मनुष्य बाहर भटकता रहता है।
एक व्यक्ति के पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे ही सके। घर में अपने धन को इसलिये नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकु न चुरा ले। अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।
एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-छिपे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला आया तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।
दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आस-पास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका। माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा- “हाय मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गये।”
रोना-चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गये। उन्होंने पूछकर सारी स्थिति जानी। एक आदमी ने समझाते हुये कहा- “सेठ जी! धन तो आपके काम पहले भी न आया था, और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा था। अब यदि यहाँ से कहीं और जगह चला गया तो आपको कौन-सी हानि हो गई, क्योंकि आपके लिए तो वह बेकार ही था। ऐसी स्थिति में दुःखी होने की क्या आवश्यकता है।”
संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे संशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।
तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।
संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।
आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।
आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भंडार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही आते हैं। अस्तु अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतिक्षा किया करती हैं।
किन्तु आत्मा का शक्ति-कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता। उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि- “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ।” मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मेरा पुरुषार्थ से अनुराग है, उत्साह है और उद्योग करना मेरा प्रियतम व्यसन है। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूं। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता की प्राप्ति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमत्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा।”
इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने अक्षय, उत्साह साहस और आशा का अनुभव करने लगती हैं। और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्बुद्ध आत्म-विश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फैल जाता है।
इसके विपरीत आत्मनिषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेधी आसुरी वृत्ति है और आत्म विश्वास, देव वृत्ति आत्मा की शिव शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ देता है। जिसे परमात्मा ने छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक-परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है। ऐसे नास्तिकवादी और आत्मनिषेधी की नाव भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।
आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही हाथ-पैर मारता, थकता और अन्त में अविज्ञात अतल के गहन अन्धकार में डूब जाता है।
आत्मनिषेधी का दुर्भाग्य उसके अन्दर अशुभ एवं नकारात्मक संकेत बनकर किसी प्रेत-पुकार की तरह गूँजता रहता है। उसके मलिन मानस से ध्वनि उठती रहती है कि- ‘मैं यह काम नहीं कर सकता मुझमें उसे करने की शक्ति नहीं है। मेरे पास साधनों का अभाव है। समय मेरे अनुकूल नहीं है। मेरी योग्यता कम है। मेरे भाग्य में सफलता का श्रेय नहीं लिखा गया है। इस प्रकार के नकारात्मक संकेत सुन-सुनकर निर्जीव निर्बलतायें जीवित हो उठती हैं। निराशा, निरुत्साह और भय की भावनायें मानस में खेलने-कूदने और द्वन्द्व मचाने लगेंगी। तन-मन और मस्तिष्क की सारी शक्ति शिथिल पड़ जाती है। अन्तःकरण अवसन्न होकर निष्क्रिय हो जाता है। शरीर ढीला और मन मुरदार हो जाता है। इस प्रकार से भार आनत मनुष्य संसार में कुछ भी तो नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह हारा, पिछड़ा और हताश-सा आगे बढ़ते हुए लोगों को ईर्ष्या से देखे और मन ही मन दहता-सहता हुआ जिन्दगी के दिन पूरे करे।
तीसरे प्रकार के जो संशयी व्यक्ति होते हैं, उनकी दशा तो और भी खराब होती है। आत्म-विश्वासी जहाँ सराहनीय, आत्मनिषेधी दयनीय होता है, वहाँ आत्म संशयी उपहासास्पद होता है। वह किसी भी पुरुषार्थ के सम्बन्ध में ‘हाँ-न’ के झूले में झूलता रहता है। अभी उसे यह उत्साह होता है कि वह अमुक कार्य कर सकता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका संशय बोल उठता है- हो सकता है यह काम मुझसे पूरा न हो। शायद मेरी क्षमतायें और योग्यतायें इस काम के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन वह अपने इस विचार पर भी देर तक टिका नहीं रह पाता। सोचता है काम करके तो देखा जाए शायद कर लूँ। काम हाथ में लेता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, अपने अन्दर एक रिक्तता और अयोग्यता अनुभव करने लगता है। भयभीत होकर काम छोड़ देता है। फिर बलात् उसमें लगता, थोड़ा-बहुत करता और इस भाव से उसे अधूरा छोड़ देता है कि हो नहीं पा रहा है बेकार समय नष्ट करने से क्या लाभ।
इस प्रकार संशयी व्यक्ति जीवन भर यही करता रहता है। कामों का साहस नहीं करता और यदि उनमें हाथ डालता है तो कभी पूरा नहीं कर पाता। इसी प्रकार के तर्क-वितर्क और ऊहापोह में उसका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। शेखचिल्लियों की तरह अस्थिर मन, मस्तिष्क और विश्वास वाले संसार में न तो आज तक कुछ कर पाए हैं और न आगे कुछ कर सकते हैं। उपहासास्पद स्थिति में ही संसार से विदा हो जाते है।
आत्म-निषेध एक भयंकर अभिशाप है। इस वृति का कुप्रभाव मन, मस्तिष्क पर ही नहीं, सम्पूर्ण जीवन संस्थान पर पड़ता है। “मैं यह नहीं कर सकता’- ऐसा भाव आते ही मनुष्य का मन और मस्तिष्क तो असहयोगी हो ही जाता है, शरीर पर भी बड़ा कुप्रभाव पड़ता है। रक्त का सहज प्रवाह अवरोधित होने लगता है। उसमें पोषण शक्ति क्षीण हो जाती है। रोग तक उठ खड़े होते हैं, और तब बेचारा मनुष्य किसी काम का नहीं रह जाता। आत्म निषेध मानव-जीवन के लिए विष विधान के समान है। इससे अपनी रक्षा करनी ही चाहिये।
आत्म-विश्वास जीवन के लिए संजीवनी शक्ति के समान है। “मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ” -ऐसा विश्वास आते ही मानव मन में आशा और उत्साह उत्पन्न हो जाता है। सारा जीवन-संस्थान संगठित होकर पुरुषार्थ के लिए अपनी शक्ति और सेवायें समर्पित कर देता है। रक्त प्रवाह में एक स्वस्थ उल्लास और शिरा जालों में स्निग्धता आ जाती है। जीवनी शक्ति को सहायता मिलती है और वह सारी कर्मेंद्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता में सहयोग करने लगती है। मन, मस्तिष्क और शरीर के सारे दोष दूर हो जाते हैं और मनुष्य एक प्रसन्न पुरुषार्थी की तरह अपने लक्ष्य-पथ पर अभय-भाव से बढ़ता चला जाता है।
इस विवेचना के प्रकाश में अपने आपको देखिये कि आप किस वर्ग में चल रहे हैं। आत्म-विश्वासी, आत्मनिषेधी अथवा आत्मसंशयी। यदि आप अपने आपको आत्म-विश्वासी पाते हैं- बड़ा शुभ है। अपने इस विश्वास को और विकसित कीजिए। नये-नये और ऊंचे काम हाथ में लीजिए और अपने जीवन को सम्पूर्ण सफलता की ओर बढ़ाते चले जाइये।
घोंसले में बैठे नन्हें से परिन्दे ने पर फड़फड़ाये और सहम कर जहाँ था, चिपककर बैठ गया। बच्चे को भयभीत देख माँ ने उसे घोंसले से धकेलते हुए कहा-”जब तक तू भय नहीं छोड़ेगा उड़ना कहाँ से आयेगा।” दूसरे क्षण परिन्दा हवा में उड़ रहा था।
यदि आप अपने को आत्मनिषेधी अथवा आत्म-संशयी के वर्ग में पाते हैं तो तुरन्त ठहर जाइये और सम्पूर्ण शक्ति लगाकर अपनी विचार-धारा को मोड़ देने का प्रयत्न करिये। आत्मा में परमात्मा का विश्वास करिये। अपने मन और मस्तिष्क को शुभ संकेत और संकल्प दीजिये अपनी दिव्य पैतृकता का वास्ता लीजिये। परमपिता का स्मरण करिये और साहसपूर्वक श्रेय-पथ पर बढ़ चलिये आत्मा आपका साथ देगी, परमात्मा आपकी सहायता करेगा।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।
ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छान्ति ये के चात्महनो जनाः॥
-यजु. 40।3,
आत्मत्व या आत्मचेतना की विस्मृति-रूप आत्महत्या (अर्थात् जीवन में आत्म-विश्वास की भावना का अभाव ) न केवल व्यक्तियों के लिए, किन्तु जातियों और राष्ट्रों के लिए भी, किसी भी प्रकार की प्रेरणा से विहीन अज्ञान के अन्धकार में गिराकर सर्वनाश का हेतु होती है।
लता-विज्ञान और मोतियों की झालरों से सजाई गई यज्ञशाला की सौंदर्य छटा देखते ही बनती थी। सम्राट् रथवीति दाल्भ्य स्वयं जो यज्ञ के संरक्षक और यजमान थे। सम्पूर्ण नगर की प्रजा इस यज्ञ की सफलता के लिये प्राण-पण से जुटी थी। नगर की गली-गली स्वच्छता और सजावट के मारे दमक रही थी, प्रजा का उत्साह देखते ही बनता था।
जल-यात्रा का विशाल जुलूस मंडप पर आ रुका। यज्ञ-कलश प्रतिष्ठित कर दिये गये। ऋत्विज् गणों ने अपने-अपने आसन सम्भाल लिये। तभी इस यज्ञ के आचार्य और ब्रह्मा महर्षि के साथ वहाँ जा पहुँचे। कोलाहल निस्तब्ध नीरवता में परिणत हो गया। महाराज रथवीति दाल्भ्य और राजमहिषी ने आगे बढ़कर उन्हें साष्टाँग प्रणिपात किया और प्रधान यज्ञ मंडप तक ले आये। महर्षि का तेज सूर्य के समान तो पुत्र श्यावाश्व चन्द्रमा की तरह शीतल और तेजस्वी। उनके पाँडित्य का तो कहना ही क्या। सम्पूर्ण राष्ट्र में उस समय अर्चनाना का यश पूर्णमासी की धवल चन्द्रिका की भाँति फैल रहा था।
यज्ञ सकुशल सम्पन्न हुआ। स्विष्टकृत होम और देवों को वसोधारा समर्पित कर दी गई। पुष्पाँजलि और विसर्जन तक की सम्पूर्ण क्रियायें बड़े आनन्द और उल्लास के साथ सम्पन्न हुई। प्रजा प्रसाद पाकर चलने लगी। उधर एक विशिष्ट आसन पर बैठे महर्षि अर्चनाना राज्य-प्रमुखों सहित महाराज रथवीति से विचार विमर्श कर रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक ओर हठात् खिंच गई। क्षोम परिधान (रेशमी साड़ी) धारण किये नवयुवती के अद्वितीय सौंदर्य पर दृष्टि पड़ते ही महर्षि अर्चनाना की दृष्टि एक क्षण के लिये रुक सी गई। देखने से ऐसा लगता था, उसे देखकर महर्षि के मस्तिष्क में कोई विचार उठ पड़ा हो।
देव! यह मेरी पुत्री मनोरमा है-महाराज रथवीति ने परिचय कराते हुये कहा- “यही हमारी एकमात्र संतान है देव! इसे हमने कला निष्णात बनाने का हर सम्भव प्रयत्न किया है। व्याकरण और साहित्य में यह आचार्य है।”
“अतीव प्रसन्नता की बात है राजन्!” बालिकाओं का शिक्षित होना तो आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। उसी से तो राष्ट्र में श्रेष्ठ संतति का निर्माण होता है। महर्षि ने उधर से मुख फेरते हुये एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर सारी बात ऐसे कही मानों उनके हृदय में कोई पीड़ा उमड़ उठी है।
गुरुदेव! कुछ बेचैनी अनुभव करते हैं, अंतर्मन में। असम्भव न हो तो कृपया हमें बतायें, हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं, रथवीति ने बड़ी विनम्रता से पूछा। उपस्थित श्रीमंत यद्यपि अभी कुछ विषाद में थे। उन्हें आश्चर्य था कि महर्षि के मन में यह अटपटा प्रसंग कैसे उठ पड़ा।
महर्षि ने एक बार सभी उपस्थितों की ओर ऐसे देखा मानों वे एकान्त चाहते हों। धर्म-परायण महाराज रथवीति ने सबको सादर विदा कर दिया। तब महर्षि अर्चनाना ने कहा-रथवीति मेरे जीवन में आज तक कभी कोई इच्छा नहीं उत्पन्न हुई पर इस बालिका को देखते ही मेरे हृदय में वात्सल्य उमड़ पड़ा है, समझ में नहीं आता ऐसा क्योंकर सोचता हूँ, यह कन्या मेरी पुत्र वधू हो सकी होती तो श्यावाश्व को एक उपयुक्त जीवन साथी मिल जाता और मुझे अपने वात्सल्य भाव को तृप्त करने का आधार।
रथवीति महर्षि का यह कथन सुनकर बड़े प्रसन्न हुये। उन्होंने कहा- देव! मेरी पुत्री का सम्बन्ध तेजस्वी अत्रिकुल में और श्यावाश्व जैसे होनहार युवक के साथ हो इससे बढ़कर कन्या और हम सबके लिये गौरव की क्या बात हो सकती है। मनोरमा भी धन को नहीं, योग्यता, प्रतिभा और सदाचरण को महत्व देती है, यह तो उसकी इच्छा की पूर्ति ही हुई, किन्तु। कहते-कहते एक क्षण के लिये रथवीति दाल्भ्य रुक गये और कुछ सोच में पड़ गये।
किन्तु क्या राजन! स्पष्ट कहो न। हमने अपनी आकाँक्षा व्यक्त की है, बाध्य तो नहीं किया। सम्पूर्ण परिस्थितियों पर विचार करके उत्तर दे सकते हो। अपने पुत्र के लिये योग्य वधू की खोज मेरा धर्म था। मुझे ऐसा लगा श्यावाश्व के लिये मनोरम सर्वथा उपयुक्त है।
“आपका कथन सत्य है भगवन्! किन्तु मुझसे अधिक मनोरमा पर राजमहिषी का अधिकार है। माँ होने के कारण उसके हित की बात वे मुझसे अधिक सोच सकती हैं। आप ठहरें हम अभी उनसे पूछकर आते हैं।” यह कहकर रथवीति अन्तःपुर की ओर चल पड़े।
साम्राज्ञी ने महाराज रथवीति की सारी बातें ध्यान से सुनी। एक बार वह मुस्कराई, फिर थोड़ा गम्भीर होकर बोली- “महाराज! यों तो यह सम्बन्ध बहुत ही उपयुक्त है, किन्तु श्यावाश्व की योग्यता पर मुझे सन्देह है। मनोरमा की योग्यता ऋषि-पत्नी बनने की है, कदाचित महर्षि अर्चनाना ने श्यावाश्व को मनोरमा के सौंदर्य से ही न तोला होता, उसकी योग्यता से श्यावाश्व की योग्यता से तुलना भी कर ली होती तो मुझे यह प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होती। पर अब मैं क्या कर सकती हूँ।
स्पष्ट असहमति। रथवीति उदास लौटे। राजमहिषी ने जो कुछ कहा था, ज्यों का त्यों कह दिया। श्यावाश्व, जो अब तक मनोरमा को अन्तरात्मा से अपनी सहचरी मान चुका था, की स्थिति ऐसे हो गई, जैसे किसी मछली को समुद्र से निकाल कर किसी मरुस्थल में डाल दिया गया हो। जैसे किसी को आकाश में चढ़ाकर नीचे धकेल दिया गया हो।
अर्चनाना उदास होकर आश्रम लौटे। श्यावाश्व की तो स्थिति ही कुछ और थी। प्रेम जीवन की चरम-उपलब्धि। एक बार जब कभी हृदय में प्रेम की पीड़ा उमड़ती है तो मनुष्य की स्थिति न जाने क्या हो जाती है। उसे प्रेमास्पद के अतिरिक्त कोई सूझता भी तो नहीं। श्यावाश्व की भावनाओं में मनोरमा के प्रेम की छाया साधना बनकर उतर चुकी थी। और वह उसका मूल्य भी चुकाना अच्छी तरह जानते थे।
सवेरा हुआ, महर्षि अर्चनाना अपने स्वाध्याय शिक्षण और आश्रम व्यवस्था में व्यस्त हो गये पर श्यावाश्व अपने योगाभ्यास में अभी भी संलग्न थे। एक समय का आहार-मिताहार, यम, नियम, ध्यान-धारणा का अभ्यास करते-करते श्यावाश्व ने अपने जीवन की रही-सही महत्वाकाँक्षाओं का भी हवन कर दिया। साधना-साधना-साधना-शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिये वे अविराम तप करने लगे।
श्यावाश्व अपने आश्रम से चलकर सर्वप्रथम पितामह अत्रि के पास पहुँचे। पौत्र श्यावाश्व को देखते ही अत्रि ने कण्ठ में पहनाई हुई मरुद्गणों की रुक्म (माला) को पहचान लिया। पुत्र के साथ पौत्र के भी ऋषि हो जाने का यह हर्ष उनसे सम्भाला नहीं गया। उन्होंने कहा-श्यावाश्व! अब तुम रथवीति के पास जाओ और उनकी कन्या मनोरमा को वधू बनाकर साथ ले आओ।
पर श्यावाश्व के लिये तो यह कठिन बात थी। उनके हृदय में मनोरमा के प्रति अपार प्रेम था, किन्तु स्वाभिमान आज्ञा नहीं दे रहा था, वहाँ जाने के लिये। तब अत्रि ने भगवती सन्ध्या को दूत बनाकर भेजा पर उनके वहाँ पहुँचने से पूर्व ही रथवीति और राजमहिषी को श्यावाश्व के ऋषि हो जाने की बात पहुँच गई थी। वहाँ मनोरमा के विवाह की तैयारियाँ भी हो रही थी।
समय पर श्यावाश्व के लिये अत्रि के आश्रम में ही रथ पहुँच गया। श्यावाश्व उस पर चढ़कर राजधानी पहुँचे। उनके स्वागत के लिये राजमहिषी सबसे आगे उपस्थित थीं। श्यावाश्व को देखते ही उन्होंने कहा-क्षमा करो वत्स! उस दिन पहचानने में भूल हुई थी। तुम्हें पाकर हम अतीव गौरव अनुभव करते हैं।
श्यावाश्व ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा-माँ! क्षमा का पात्र तो मैं हूँ, आपने उस दिन सही मूल्याँकन न किया होता और उसके लिये साहस न दिखाया होता तो आज मुझे यह स्थिति कहाँ मिलती।
यथा चतुर्भिः कनक परीक्ष्यते निघर्षणच्छेन ताप ताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते श्रुतेन शीलेन कुलेन कर्मणा॥
जिस प्रकार घिसने, काटने, तपाने और पीटने इन चार विधियों से सुवर्ण के अच्छे-बुरे होने की परीक्षा होती है, उसी प्रकार विद्या, कुल, शील और कर्म- इन चार प्रकारों से पुरुष की परीक्षा होती है।
उस समय भगवान् बुद्ध श्रावस्ती की मृगारमाता के पूर्णाराम प्रासाद में विश्राम कर रहे थे। प्रवास और परिव्राजन के नैरन्तर्य के कारण उन्हें थकावट अनुभव हो रही थी। मृगारमाता ने उनकी देख-रेख और सेवा का पूरा प्रबन्ध कर दिया था।
मृगारमाता विशाखा का किसी उद्योग से सम्बन्धित कोई काम कौशलराज प्रसेनजित के यहाँ अटका हुआ था। उसके कारण उन्हें चैन नहीं मिल रहा था। सोचा यह था कि तथागत की उपस्थिति में वह कुछ धर्म-चर्चा लाभ लेगी। पर वह तो बना नहीं, वह दूसरे ही दिन प्रसेनजित के पास जा पहुँची।
प्रसेनजित ने इस बार भी टालमटोल कर दी। विशाखा वहाँ से निराश लौटीं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में वैसे ही विशाखा सीधे भगवान् बुद्ध के पास पहुँची और उन्हें प्रणाम कर खिन्न वदन एक ओर बैठ गई।
अन्तर्यामी तथागत हँसे और बोले- “विशाखा! इसीलिये कहता हूँ कि अपनी इच्छायें बढ़ानी नहीं, कम करनी चाहिये। इच्छाओं की पूर्ति में जो पराधीनता है, वही दुःख है।”
विशाखा ने कहा- तो फिर भगवन्! ऐसा भी कोई उपाय है, जिससे अपनी इच्छायें कम की जा सकें।
बुद्ध ने उत्तर दिया- हाँ भन्ते! अवश्य है, यदि हम सुख की खोज अपने भीतर करने लगें तो इच्छाओं की निस्सारता प्रकट होने लगती है।
सन् 1636 की घटना है एक दिन परिश्रमी कमान के सैनिक कमाण्डेन्ट श्री एल. पी. फैरेल अपने सहायक अधिकारियों के साथ एक युद्ध सम्बन्धी योजना तैयार कर रहे थे। यह स्थान जहाँ पर उनका कैम्प लगा हुआ था, आसाम-बर्मा की सीमा पर था। वहीं पास में एक नदी बहती थी। नदी के पास ही यह मंत्रणा चल रही थी।
एकाएक कुछ अधिकारियों का ध्यान नदी की ओर चला गया। श्री फैरेल ने भी उधर देखा तो उनकी भी दृष्टि अटक कर रह गई। टेलिस्कोप उठाकर देखा एक महा जीर्ण-क्षीण शरीर का वृद्ध संन्यासी पानी में घुसा एक शव को बाहर खींच रहा है। कमजोर शरीर होने से शव ढोने में अड़चन हो रही थी। हाँफता जाता था और खींचता भी। बड़ी कठिनाई से शव किनारे आ पाया।
श्री एल. पी. फैरेल यद्यपि अँग्रेज थे पर अपनी बाल्यावस्था से ही आध्यात्मिक विषयों में रुचि उन्होंने प्रगाढ़ कर ली थी। भारतवर्ष में एक उच्च सैनिक अफसर नियुक्त होने के बाद तो उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। भारतीय तत्व-दर्शन का उन्होंने गहरा अध्ययन ही नहीं किया, जिसकी भी जानकारी मिली, वह सिद्ध महात्माओं के पास जा-जाकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी करते रहे। धीर-धीरे उनका परलोक, पुनर्जन्म, कर्मफल और आत्मा की अमरता पर विश्वास हो चला था। यह घटना तो उनके जीवन में अप्रत्याशित ही थी और उसने उनके उक्त विश्वास को निष्ठा में बदल दिया। श्री फैरेल एक अंग्रेज ऑफिसर के रूप में भारत आये थे पर जब वे यहाँ से लौटे तब उनकी आत्मा में शुद्ध हिन्दू संस्कार स्थान ले चुके थे।
एक वृद्ध शव क्यों खींच रहा है? इस रहस्य को जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक ही थी। योजना तो वहीं रखी रह गईं, सब लोग एकटक देखने लगे कि वृद्ध संन्यासी इस शव का क्या करता है?
वृद्ध शव को खींचकर एक वृक्ष की आड़ में ले गया। फिर थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा, कुछ पता नहीं चला कि वह क्या कर रहा है। कोई 15-20 मिनट पीछे ही दिखाई दिया कि वह युवक जो अभी शव के रूप में नदी में बहता चला आ रहा था, उन्हीं गीले कपड़ों को पहने बाहर निकल आया और कपड़े उतारने लगा। सम्भवतः वह उन्हें सुखाना चाहता होगा।
मृत व्यक्ति का एकाएक जीवित हो जाना एक महान आश्चर्यजनक घटना थी और वह बड़ा भारी रहस्य भी जो श्री फैरेल के मन में कौतूहल भी उत्पन्न कर रहा था, आशंका भी। उन्होंने कुछ सैनिकों को आदेश दिया- सशस्त्र सिपाहियों ने जाकर युवक को घेर लिया और उसे बन्दी बनाकर श्री फैरेल के पास ले आये।
युवक के वहाँ आते ही श्री फैरेल ने प्रश्न किया- “वह वृद्ध कहाँ है?” इस पर युवक हँसा जैसे इस गिरफ्तारी आदि का उसके मन पर कोई प्रभाव ही न पड़ा हो और फिर बोला- “वह वृद्ध मैं ही हूँ।”
लेकिन अभी कुछ देर पहले तो तुम शव थे, पानी में बह रहे थे, एक बुड्ढा तुम्हें पानी में से खींचकर किनारे पर ले गया था फिर तुम प्रकट हो गये, यह रहस्य क्या है, यदि तुम्हीं वह वृद्ध हो तो वह वृद्ध का शरीर कहाँ है?” आश्चर्यचकित फैरेल ने एक साथ ही इतने प्रश्न पूछ डाले, जिनका एकाएक उत्तर देना असम्भव-सा था।
युवक ने संतोष के साथ बताया- “हम योगी हैं, हमारा स्थूल शरीर वृद्ध हो गया था, काम नहीं देता था, अभी इस पृथ्वी पर रहने की हमारी आकाँक्षा तृप्त नहीं हुई थी। किसी को मारकर बलात् शरीर में प्रवेश करना तो पाप होता, इसलिये बहुत दिन से इस प्रतीक्षा में था कि कोई अच्छा शव मिले तो उसमें अपना यह पुराना चोला बदल लें। सौभाग्य से यह इच्छा आज पुरी हुई। मैं ही वह वृद्ध हूँ, यह शरीर उस युवक का था, अब मेरा है।”
इस पर फैरेल ने प्रश्न किया- तब फिर तुम्हारा पहला शरीर कहाँ है?
संकेत से उस युवक शरीर में प्रवेशधारी संन्यासी ने बताया-वह वहाँ पेड़ के पीछे अब मृत अवस्था में पड़ा है। अपना प्राण शरीर खींच कर उसे इस शरीर में धारण कर लेने के बाद उसकी कोई उपयोगिता नहीं रही। थोड़ी देर में उसका अग्नि संस्कार कर देते, पर अभी तो इस शरीर के कपड़े भी नहीं सुखा पाये थे कि आपके इन सैनिकों ने हमें बन्दी बना लिया।
श्री फैरेल ने इसके बाद उन संन्यासी से बहुत सारी बातें हिन्दू-दर्शन के बारे में पूछीं और बहुत प्रभावित हुए। वह यह भी जानना चाहतें थे कि स्थूल शरीर के अणु-अणु में व्याप्त प्रकाश शरीर के अणुओं को किस प्रकार समेटा जा सकता है, किस प्रकार शरीर से बाहर निकाला और दूसरे शरीर में अथवा मुक्त आकाश में रखा जा सकता है? पर यह सब कष्ट साध्य योग साधनाओं से पूरी होने वाली योजनायें थी, उसके लिये श्री फैरेल के पास न तो पर्याप्त साहस ही था और न ही समय। पर उन्होंने यह अवश्य स्वीकार कर लिया कि सूक्ष्म अन्तर्चेतना से सम्बन्धित भारतीय तत्व-दर्शन कोई गल्प या कल्पना मात्र नहीं, वह वैज्ञानिक तथ्य है, जिनकी ओर आज यूरोपीय वैज्ञानिक बढ़ रहे हैं।
कोश ( सेल ) स्थिति नाभिक ( न्यूक्लियस) में, जिसमें जीवित चेतना के सूक्ष्मतम संस्कार माला के मनकों की तरह पिरोये हैं, स्वतंत्र कोश में शरीर निर्माण की क्षमता है, अमीबा के अध्ययन से यह स्पष्ट प्रकट हो गया है। पर वैज्ञानिक अभी यह स्वीकार नहीं करते कि न्यूक्लियस स्वतन्त्र अवस्था में भी रह सकता है। उस सिद्धान्त की पुष्टि भारतीय दर्शन का यह परकाया प्रवेश सिद्धान्त करेगा। भूत-प्रेत की कल्पना को भले ही लोग एकाएक स्वीकार न करें पर श्री फैरेल के उक्त संस्मरण को धोखा नहीं कहा जा सकता। वे एक जिम्मेदार व्यक्ति थे और यह घटना उन्होंने स्वयं ही 17 मई 1657 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में उद्धृत की थी।
आम यद्यपि पक चुका था, भला इसी में था कि किसी को तृप्ति बनता पर वृक्ष में लगे रहने का मोह छूटा नहीं। पेड़ का मालिक पके आमों की खान-बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी पर आम पत्तों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं।
दूसरे दिने उसने देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था और अब मित्रों की विरह व्यथा और सताने लगी।
आम कभी तो सोचता नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों में जा मिलूँ फिर उसे मोह अपनी ओर खींचता, आम उसी उधेड़-बुन में पड़ा रहा।
संशय का यही कीड़ा धीरे-धीरे फल को खाने लगा। एक दिन उसका सारा रस चूस लिया सूखी बोड़ी नर-कंकाल के समान पेड़ में लगी रह गई।
आम की आत्मा यह देखकर बहुत पछताई कुछ संसार की सेवा भी न बन पड़ी और अन्त भी हुआ तो ऐसा दुःखद।
इतनी कथा सुनाने के बाद वशिष्ठ ने अजामिल से कहा- वत्स! समझदार होकर भी जो साँसारिकता के मोह में फँसे- “अब निकलें, अब निकलें” सोचते रहते हैं, उनका भी अन्त ऐसे ही होता है।
आपको ढूँढ़ने में तप-साधना की प्रणालियाँ बहुत कष्ट साध्य हैं भगवन् ! नारद ने एक बार विष्णु भगवान से प्रश्न किया- ऐसा कोई सरल उपाय बताइये, जिससे भक्तगण सहज ही में आपकी अनुभूति कर लिया करें?
इस पर विष्णु भगवान ने उत्तर दिया-
नाहं वसामि वैकुण्ठे ये गिनाँ हृदये न वा।
मद भक्ताः यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारदा॥ -नारद संहिता,
हे नारद! न तो मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ और न योगियों के हृदय में, मैं तो वहाँ निवास करता हूँ, जहाँ मेरे भक्तजन कीर्तन करते हैं। अर्थात् संगीतमय भजनों के द्वारा ईश्वर को सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।
इन पंक्तियों को पढ़ने से संगीत की महत्ता और भारतीय इतिहास का वह समय याद आ जाता है, जब यहाँ गाँव-गाँव प्रेरक मनोरंजन के रूप में संगीत का प्रयोग बहुलता में होता था। संगीत में केवल गाना या बजाना ही सम्मिलित नहीं था, नृत्य भी इसी का अंग था। कथा, कीर्तन, लोक-गायन और विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक पर्व-त्यौहार एवं उत्सवों पर अन्य कार्यक्रमों के साथ संगीत अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता था। उससे व्यक्ति और समाज दोनों के जीवन में शाँति और प्रसन्नता, उल्लास और क्रियाशीलता का अभाव नहीं होने पाता था।
गायन से फेफड़ों की जो हलकी-हलकी मालिश होती है, वह किसी भी परिश्रम वाले काम की अपेक्षा बहुत कोमल और लाभदायक होती है। दौड़-कुश्ती और कृषि आदि के कामों में भी फेफड़ों का व्यायाम होता है, पर उनमें थकावट होती है, प्रसन्नता नहीं।
डॉ. बर्नर मैकडेफेन ने लिखा है- “गाने से शरीर में जो हलचल उत्पन्न होती है, उससे रक्त-संचार में वृद्धि होती है, पाचन क्रिया में सुधार, उदर और वक्षस्थल की माँस-पेशियों का प्रसार होता है। गाने में कंठ-नलिकायें और फेफड़े को अनिवार्य रूप से फैलना-सिकुड़ना पड़ता है, इसलिये उस समय उन अंगों की नियमित कसरत अवश्य होगी। कसरत कोई भी हो उस स्थान की गन्दगी ही निकालती और उस स्थान की सक्रियता ही बढ़ाती है, इसलिये गायन को बहुत अच्छा व्यायाम कहना चाहिये। गाना प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये, उससे वस्ति प्रदेश के सभी अंगों, अवयवों को स्फूर्ति प्रोत्साहन एवं मालिश का लाभ मिलता है।”
“संगीत आत्मा की उन्नति का सबसे अच्छा उपाय है, इसलिये हमेशा वाद्य यन्त्र के साथ गाना चाहिये।” यह पाइथागोरस की मान्यता थी पर डॉ. मैकफेडेन ने वाद्य की अपेक्षा गायन को ज्यादा लाभकारी बताया है। मानसिक प्रसन्नता की दृष्टि से पाइथागोरस की बात अधिक सही लगती है। मैकफेडेन ने लगता है, केवल शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ऐसा लिखा है। इससे भी आगे की कक्षा आत्मिक है, उस सम्बन्ध में कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन उल्लेखनीय है, श्री टैगोर के शब्दों में- “स्वर्गीय सौंदर्य का कोई साकार रूप और सजीव प्रदर्शन है तो उसे संगीत ही होना चाहिये।” रस्किन ने संगीत को आत्मा के उत्थान, चरित्र की दृढ़ता कला और सुरुचि के विकास का महत्त्वपूर्ण साधन माना है।
विभिन्न प्रकार की सम्मतियाँ वस्तुतः अपनी-अपनी तरह की विशेष अनुभूतियाँ हैं, अन्यथा संगीत में शरीर, मन और आत्मा तीनों को बलवान बनाने वाले तत्त्व परिपूर्ण मात्रा में विद्यमान हैं, इसी कारण भारतीय आचार्यों और मनीषियों ने संगीत शास्त्र पर सर्वाधिक जोर दिया। ‘साम’ वेद की स्वतन्त्र रचना उसका प्रमाण है। समस्त स्वर-ताल, लय, छन्द, गति, मन्त्र, स्वर-चिकित्सा, राग, नृत्य, मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकले हैं, किसी समय इस दिशा में भी भारतीयों ने योग-सिद्धि प्राप्त करके यह दिखा दिया था कि स्वर-साधना के समकक्ष संसार की और कोई दूसरी शक्ति नहीं। उसके चमत्कारिक प्रयोग भी सैकड़ों बार हुये हैं।
अकबर की राज्य-सभा में संगीत प्रतियोगिता रखी गई। प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी थे तानसेन और बैजूबावरा। यह आयोजन आगरे के पास वन में किया गया। तानसेन ने ‘टोड़ी’ राग गाया और कहा जाता है कि उसकी स्वर लहरियाँ जैसे ही वन-खण्ड में गुँजित हुई मृगों का एक झुण्ड वहाँ दौड़ता हुआ चला आया। भाव-विभोर तानसेन ने अपने गले पड़ी माला एक हिरण के गले में डाल दी। इस क्रिया से संगीत-प्रवाह रुक गया और तभी सब-के-सब सम्मोहित हिरण जंगल भाग गये।
टोड़ी राग गाकर तानसेन ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत मनुष्यों की ही नहीं प्राणिमात्र की आत्मिक-प्यास है, उसे सभी लोग पसन्द करते हैं। इसके बाद बैजूबावरा ने ‘मृग-रंजनी टोड़ी’ राग का अलाप किया। तब केवल एक वह मृग दौड़ता हुआ राज्य-सभा में आ गया, जिसे तानसेन ने माला पहनाई थी। इस प्रयोग से बेजूबावरा ने यह सिद्ध कर दिया कि शब्द के सूक्ष्मतम कम्पनों में कुछ ऐसी शक्ति और सम्मोहन भरा पड़ा है कि उससे किसी भी दिशा के कितनी ही दूरस्थ किसी भी प्राणी तक अपना सन्देश भेजा जा सकता है।
इसी बैजूबावरा ने अपने गुरु हरिदास की आज्ञा से चन्देरी (गुना (म. प्र.) जिले स्थित) के निवासी नरवर के कछवाह राजा राजसिंह को ‘राग पूरिया’ सुनाया था और उन्हें अनिद्रा रोग से बचाया था। दीपक राग का उपयोग बुझे हुये दीपक जला देने ‘श्री राग’ का क्षय रोग निवारण में, ‘भैरवी राग’ प्रजा की सुख-शाँति वृद्धि में, ‘शकरा राग’ द्वारा युद्ध के लिये प्रस्थान करने वाले सैनिकों में अजस्र शौर्य भर देने में आदिकाल से उपयोग होता रहा है। वर्षा ऋतु में गाँव-गाँव मेघ व मल्हार राग गाया जाता था, उससे दुष्ट से दुष्ट लोगों में भी प्रेम उल्लास और आनन्द का झरना प्रवाहित होने लगता था। स्वर और लय की गति में बँधे भारतीय जीवन की सामंजस्यता जो तब थी, अब वह कल्पना मात्र रह गई है। सस्ते सिनेमा संगीत ने उन महान शास्त्रीय उपलब्धियों को एक तरह से नष्ट करके रख दिया है।
संगीत एक प्रकार की योग साधना है उससे ध्वनि-कम्पन नाभि-प्रदेश से निकालकर ब्रह्म-रन्ध्र में लाये जाते हैं। यहाँ तालु से उन्हें पकड़कर मनोमय विद्युत का संयोग दिया जाता है, तब वह मुख द्वारा बाहर निकलता है। इस तरह नियन्त्रित स्वर पानी में भ्रमर अथवा गोलाकार चक्र रूप में निकलता है, फिर उसका प्रयोग इच्छानुसार किसी भी प्रयोजन में हो सकता है। हर प्रयोजन के लिये अलग-अलग राग खोजे गये हैं, जो मंत्रवत् काम करते हैं। तंत्र में तो एक बुराई यह होती है कि यदि उसकी प्रतिक्रिया जो एक तेज झटके की तरह होती हैं, सहन न हो तो प्रयोगकर्त्ता का अनिष्ट भी कर सकती है, पर इन प्रयोगों में गायत्री उपासना, गीता के पाठ, गाय के दूध और गायत्री मंत्र के जप के समान किसी भी अवस्था में हानि की कोई भी आशंका नहीं रहती। संगीत के अभ्यास से इसीलिये कभी किसी को हानि नहीं होती, किसी भी अवस्था में लाभ ही होता है।
ऊपर दी हुई घटनायें तो बहुत दिनों पूर्व की हैं, अभी कुछ दिन पूर्व ही होशियारपुर (पंजाब) जिले के प्रसिद्ध संगीतज्ञ श्री पं. गुज्जरराम वासुदेव जी रागी ने चिन्तपूर्णी देवी की भक्ति में विलीन होकर श्री रागी जी ने मेघ राग का आलाप किया। इस समय उस आकाश में बादलों की चित्ती तक न थी। कड़ाके की धूप पड़ रही थी, पर जैसे ही उन्होंने ‘मेघ राग’ गाना प्रारम्भ किया, आकाश में बादल छाने लगे। थोड़ी ही देर में सूर्य बादलों से ढक गया और घन गरज के साथ वृष्टि प्रारम्भ हो गई। लोगों ने अनुभव किया कि शास्त्रीय संगीत स्वर-विज्ञान के उन रहस्यों में ओत-प्रोत है, जो प्राकृतिक परमाणुओं में भयंकर हलचल उत्पन्न करके उनसे इच्छित कार्य करा सकते हैं।
रामपुर के नवाब साहब लकवे से ग्रस्त थे। उस्ताद सूरज खाँ के कहने से उन्हें भारतीय संगीत पर श्रद्धा जम गई। सूरज खाँ सिद्ध वीणा वादक थे। उन्होंने राग ‘जैजैवन्ती’ के प्रयोग से लकवे से पीड़ित नवाब साहब को कुछ ही दिन में अच्छा कर दिया।
अपनी ही संस्कृति की यह महान उपलब्धियाँ आज हमारे ही लिये किंवदन्तियाँ बन गई। हम उन पर विश्वास नहीं करते या हमारी उन पर श्रद्धा नहीं रही। ऐसा न होता तो सिनेमाओं में प्रयुक्त सस्ते संगीत की अपेक्षा शास्त्रीय संगीत को महत्व दिया जाता। कुछ ऐसे प्रभावशील और साधन सम्पन्न व्यक्ति भी निकलते जो संगीतकला को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये अपने साधनों एवं प्रभाव का उपयोग स्थान-स्थान पर शास्त्रीय-संगीत विद्यालय खोलने बालक-बालिकाओं को उनमें प्रशिक्षण लेने के लिये प्रोत्साहित करने में करते। और नहीं तो कम से कम कीर्तन और भजन-मंडलियाँ और सर्वसुलभ, गुण प्रेरक नौटंकियाँ तो गाँव-गाँव स्थापित होनी ही चाहियें, ताकि हमारा लोक-जीवन नीरस और आत्मिक सौंदर्य से रहित न होने पाये।
किसी समय नृत्य भारतीय जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग था। भगवान शंकर ‘नटराज’ कहे जाते हैं वे स्वयं नृत्य विशेषज्ञ थे। नृत्य रास, मणिपूरा, कत्थककली, भारत-नाटयम आदि नृत्य और नृत्य-नाटिकाओं का आज भी अपना विशिष्ट महत्त्व है पर गाँव-गाँव रचे जाने वाले लोक-नृत्यों का अपना महत्व था। पं. जवाहरलाल नेहरू ऐसे नृत्य देखकर थिरक उठते थे। वह कहते थे- ‘लोक-नृत्यों से हमें उल्लास मिलता है और यह शिक्षा मिलती है कि जीवन का आनन्द केवल भौतिक पदार्थों की उपलब्धि में ही नहीं हैं।” तो भी यह कलायें हमारे लोक-जीवन से हटती जा रही हैं। हमें इन्हें फिर से अपनाना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ गाना, कुछ न कुछ बजाना और नृत्य करना सीखना चाहिये, उससे लोक-जीवन में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, आनन्द और उल्लास का ही विकास होगा।
खेद की बात है कि जो भारतवर्ष कभी संगीत-कला विशेषज्ञ माना जाता था, आज वह तो अपनी इस विशेषता से रिक्त होता जा रहा है, जबकि दूसरे देशों में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ रही है। लोग उससे बहुमूल्य लाभ ले रहे हैं।
संसार मुझ से चित्रों में बात करता है, मेरी आत्मा संगीत में उत्तर देती है, मनुष्य के पास संगीत से अच्छी कोई भाषा नहीं।
-रवीन्द्रनाथ टैगोर,
एक साधु द्वार पर बैठे तीन भाइयों को उपदेश कर रहे थे-वत्स! संसार में सन्तोष ही सुख है। जो कछुये की तरह अपने हाथ-पाँव सब ओर से समेट कर आत्म-लीन हो जाता है, ऐसे निरुद्योगी पुरुष के लिये संसार में किसी प्रकार का दुःख नहीं रहता।
घर के भीतर बुहारी लगा रही माँ के कानों में साधु की यह वाणी पड़ी तो वह चौकन्ना हो उठी। बाहर आई और तीनों लड़कों को खड़ा करके छोटे से बोली ले यह घड़ा पानी भर कर ला, मझले से कहा- उठा यह झाड़ू और घर-बाहर की बुहारी कर, अन्तिम तीसरे को टोकरी देते हुये उसके कहा-तू चल और सब कूड़ा उठाकर बाहर फेंक।
और अन्त में साधु की ओर देखकर उस कर्मावती ने उपदेश दिया-महात्मन्! निरुद्योगी मैंने बहुत देखे हैं, कई पड़ौस में ही बीमारी से ग्रस्त ऋण भार से दबे शैतान की दुकान खोले पड़े हैं, अब मेरे बच्चों को भी वह विष वारुण पिलाने की अपेक्षा आप ही निरुद्योगी बने रहिये और इन्हें कुछ उद्योग करने दीजिये।
गाँव वालो ने कहा-महात्मन् आपका उपदेश झूठा और इस माँ का उपदेश सच्चा। साधु उदास मन जंगल की ओर चल पड़े और अपने निरुद्योगी सिद्धान्त पर देर तक पश्चाताप करते रहे।
डायनामाइट एक तरह का बारूद ही है, जो बमों में बिल्डिंगें, पुल, सड़कें और सैनिक-वाहन तोड़ने के लिए प्रयुक्त होता है। आज अमेरिका के पास इतना अधिक डायनामाइट भण्डार है कि वह उससे विश्व को 30 बार नष्ट कर सकता है, रूस के पास इतना डायनामाइट है कि वह सारे संसार को 7 बार नष्ट कर सकता है। अभी तो फ्राँस, ब्रिटेन, चीन जैसे बड़े देश भी हैं फिर हर देश अपनी सेना रखता है, यदि उन सब के पास कुल मिलाकर भी इतना ही डायनामाइट हो तो समझना चाहिये कि आज पृथ्वी पर जितने लोग हैं, यदि ऐसा कोई उपाय हो कि वे मरते ही नया शरीर धारण कर लें तो 74 बार तो उन्हें निश्चित रूप से मारा जा सकता है, जबकि संसार के अधिकाँश देश खाने के लिये बड़े देशों पर ही आश्रित हैं।
सैन्य-संगठन संसार के सभी देशों में हैं और इस तरह दस प्रतिशत तक श्रम शक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सैनिक कार्यक्रमों से सम्बद्ध है देखने में यह शक्ति अति महत्वपूर्ण है पर, यदि मानवता की दृष्टि से देखा जाय तो पता चलेगा कि जिस तरह भिक्षा-वृत्ति समाज पर भार है सेनाओं पर होने वाला व्यय भी एक प्रकार से बोझ ही है, जिससे कोई रचनात्मक या उत्पादन का कार्य नहीं होता, जबकि इतनी सारी संगठित शक्ति का कहीं भी उपयोग करके उल्लेखनीय कार्य किये जा सकते थे। पिछले दिनों अम्बाला डिवीजन के सैनिकों ने अपनी श्रम से अम्बाला में 1600 कमरे तैयार किये यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
अधिकाँश देश अर्जित आय का दसवाँ भाग आभूषणों पर खर्च करते हैं, सम्पत्ति का यह कारावास उद्योगों के विस्तार और संसार में गरीबी मिटाने की एक बड़ी भारी बाधा है पर यह शक्ति चौथे, पाँचवें कभी न कभी तो उपयोग में आती ही है, पर इसी तरह जो युद्ध पर दस प्रतिशत खर्च होता है, वह अपने साथ उतनी ही क्षति भी करता है, अर्थात् दस प्रतिशत खर्च और दस प्रतिशत क्षति बीस प्रतिशत यह धन व्यर्थ ही जाता है, आज सारा विश्व सैन्य तैयारियों पर 40 करोड़ डालर लगभग ढाई अरब रुपया सैन्य तैयारियों पर व्यय करता है, कहीं यह धन कृषि विकास साधनों पर प्रयुक्त हुई होती, तो संसार में आज अच्छी-अच्छी नस्लों वाले बीज, खेती और पैदावारें होतीं।
पिछले अंक में अमेरिका और रूस की मिसाइल शक्ति को जो आँकड़े दिये गये, वह सन् 1963 तक के थे। ‘गार्जियन’ पत्र में प्रकाशित एक सर्वेक्षण के अनुसार अन्तः महाद्वीपीय मिसाइल शक्ति के सम्बन्ध में अब अमेरिका व रूस दोनों की टक्कर बराबर की है। रूस के पास 900 से 1000 तक और अमेरिका के पास 1054 हैं। पोलारिस पनडुब्बियों की तरह की मिसाइल लगी पनडुब्बियों की संख्या उससे अलग है अमेरिका के पास ऐसी 656 और रूस के पास 120। इसी प्रकार हाइड्रोजन बमों को ले जाने के लिये अमेरिका के पास 500 बमवर्षक और रूस के पास 150 बमवर्षक हैं। फ्राँस और इंग्लैण्ड इनसे अलग हैं। अपनी तुलना में इन दोनों में इंग्लैण्ड फ्राँस से भी आगे है।
मिसाइल शक्ति के रूप में चीन का अभ्युदय एक और चिन्ताजनक प्रश्न है। ब्रिटिश समर विशेषज्ञ नोविल ब्राउन ने अपनी ताजी पुस्तक ‘आर्म्स विदाउट एम्पायर’ में लिखा हैं कि चीन के पास अब तक 30 हाइड्रोजन बम तैयार हो गये हैं। चीन उनके कई सफल प्रयोग कर चुका है। प्रयोगों की शृंखला फ्राँस में भी छाई है। इन परीक्षणों से ही इतनी अधिक रेडियो एक्टिव धूल उत्पन्न हो गई है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति 2 से 12 रोएन्टजन धूल से प्रभावित हो रहा है। थोड़ी मात्रा में तो इस अणुधूल का मानव शरीर पर कोई ज्यादा घातक प्रभाव नहीं होता पर उसकी अधिक मात्रा जीवित कोषों को मार डालने की शक्ति रखती है। वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि यह प्रभाव मनुष्य शरीर के अति सूक्ष्म तत्व-जीन्स पर अधिक घातक होता है, उसके फलस्वरूप अब तक ही जितने विस्फोट हो चुके हैं, उनके दुष्प्रभाव स्वरूप नई-नई बीमारियाँ, जिनमें प्रमुख रूप से कैन्सर, रक्त-चाप, हृदय रोग, मधुमेह और चर्मरोग होंगे-उत्पन्न होंगी और यदि मारा नहीं तो भी मनुष्य जाति को तड़पा-तड़पा कर जिलायेंगी। भूखे और कष्ट पीड़ित संसार को अस्त्र-शस्त्रों का यह उपहार देकर आधुनिक विज्ञान ने कोई अच्छा काम नहीं किया। संसार में मानव का अस्तित्व बनाये रखने के लिए इस संहारक वृत्ति का मूलोच्छेद करना ही पड़ेगा। संसार को प्रेम, दया, करुणा, न्याय-नीति, उदारता का दृष्टिकोण प्रदान करना ही पड़ेगा।
विश्व-जनमत यदि अब इसके लिये तैयार नहीं होता और संहारक शस्त्रों की यह होड़ बढ़ती ही जाती है तो भविष्य की परिस्थितियाँ कितनी वीभत्स हो सकती हैं, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। युद्धों के अब नये-नये तरीके निकल रहे हैं। अगले युद्ध रोगाणुओं से लड़े जायेंगे, इन युद्धों को ‘जर्म्स वार फेयर’ कहा जायेगा। इस सम्बन्ध में आज से कई वर्ष पूर्व विख्यात अमेरिकी भविष्यवक्ता श्रीमती जीन डिक्शन ने भविष्य-वाणी की थी कि चीन ‘जर्म्सवार’ प्रारम्भ करेगा, इस आशंका को निर्मूल नहीं कहा जा सकता।
युद्ध की इस पद्धति के शस्त्र का काम रोगाणु करता है। किसी भी हैजा, चेचक, टी0बी0, कैन्सर, फ्लू आदि रोग के कीटाणु किसी देश में हवा के द्वारा फैला दिये जायेंगे तो एक ही दिन में करोड़ों लोग इन बीमारियों से तेजी से पीड़ित हो उठेंगे और कुछ ही दिनों में विशाल जनसंख्या को मारकर रख दिया करेंगे। इस तरह अब युद्ध की सीमा में सैनिक ही नहीं रहे, विश्व का एक-एक बच्चा उस सीमा में आ गया है। जो युद्ध के मोर्चे पर नहीं जायेंगे, वे भी उतने ही पीड़ित होंगे, जितने युद्धरत सैनिक, इसलिये बच्चे-बच्चे का यह कर्त्तव्य है कि संसार को हिंसा से मोड़कर अहिंसक समाज के निर्माण में सभी लोग जुट जायें। इस विभीषिका में जहाँ एक भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं, वहाँ प्रयत्न सामूहिक ही करने पड़ेंगे अर्थात् इन परिस्थितियों के निवारण के लिये बहुमत को साथ देना ही पड़ेगा।
इन शस्त्रों का प्रहार न होगा, यह सोचना कोरी मूर्खता है। एक बार एक बन्दर डाल पर बैठा एक राहगीर को दाढ़ी बनाते देख रहा था। किसी कार्यवश वह व्यक्ति 1 मिनट के लिये इधर-उधर हुआ ही था कि बन्दर उसका साबुन उस्तरा उठा लाया और स्वयं भी दाढ़ी बनाने की नकल करने लगा। बेचारे से दाढ़ी तो नहीं बनी हाँ उसने अपनी गर्दन अवश्य घायल कर डाली। शस्त्रास्त्रों के इस अन्धानुकरण से भी मनुष्य जाति की ऐसी ही स्थिति बने तो उसमें किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
कहा जाता है कि पिछले दिनों वियतनाम युद्ध में लड़ रहे अमेरिकनों को जब लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ा तो उसने प्रयोगात्मक “रसायन-युद्ध” प्रारम्भ कर दिया। 2-4 डी, 2-4-5 टी (2, 4, 5, ट्रीक्लो रोफिनाक्सि ऐसटिक एसिड) यह दो रसायन तो मुख्य रूप से मनुष्यों, जमीन और वनस्पतियों को नष्ट करने के लिये छिड़के गये जबकि धान को बरबाद करने के लिये “कोको-डिलिक ऐसिड” छिड़का गया। इस एसिड में 54 प्रतिशत संखिया होता है। संखिया की थोड़ी सी मात्रा से ही जिगर में तरह-तरह की बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं आंतों में गड़बड़ी मिलती और वमन की शिकायतें बढ़ जाती है। इसके बाद की दूषित प्रतिक्रिया से यद्यपि अमरीकी वैज्ञानिक इनकार करते हैं पर प्रो. गाल्स्टन आदि ने भी इस कथन को धोखा कहा है। विश्वास है कि यह रसायन भी बहुत लम्बे समय तक अपने विषैले प्रभाव से मनुष्य को पीड़ित करते रहेंगे।
पहले दोनों रसायन बड़े सबेरे जब हवा की गति मन्द होती है छिड़के जाते हैं। इनसे एथिलीन फैलती है जो मनुष्यों के लिये तो खतरनाक है ही वृक्ष-वनस्पतियों के पत्ते भी नष्ट हो जाते हैं। उससे सूर्य के प्रकाश से शक्ति लेने वाली फोटो-सिन्थेसिस क्रिया अवरुद्ध हो जाती है मिट्टी को हम जड़ वस्तु समझते हैं पर विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि मिट्टी में सक्रिय जीव समाए हैं उसका फोटोसिन्थेसिस रुक जाने से जीवन मिलना बन्द हो जाता है फलस्वरूप मिट्टी खराब हो जाती है। देखा गया है कि क्ले-लोम मिट्टी जो बड़ी उपजाऊ और नरम होती है। पिछले दिनों वियतनाम में “पिक्लोरैम” नामक रसायन का छिड़काव हुआ उसे अमरीका ने भी स्वीकार किया उससे वियतनाम की भूमि की उर्वरा शक्ति को व्यापक हानि हुई है। यह हवा केवल वियतनाम में ही नहीं पड़ोसी देश और विश्व से भी गई होगी और इस तरह सारा संसार उससे प्रभावित हुआ होगा इसमें सन्देह नहीं है। शोध की दिशायें बुरी हो सकती हैं तो अच्छी भी हो सकती हैं। आज लोगों को मारने नष्ट करने में इतने साधन लगे हैं यदि इतने ही साधन भावनात्मक संसार के परिशोधन में लगा दिये गये होते तो आज यह पृथ्वी ही स्वर्ग होती। यहाँ अमन-चैन के सब साधन हैं यदि मानव-मन उज्ज्वल, शुद्ध और कल्याणकारी हो जाये तो फिर अन्य लोकों में स्वर्ग ढूँढ़ने की आवश्यकता न रहे। इसके लिये भी कुछ किया जा सकता है वही करने की आज आवश्यकता भी है अब पृथ्वी को मारने से नहीं उसे जीवन देने से ही काम चलेगा।
चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सानों की तरह पृथ्वी पर चलना सीखना है।
-राधाकृष्णन
कमल सरोवर के निकट बैठ तथागत शान्त मुद्रा में-विभोर से गन्धपान कर रहे थे।
तभी एक देव कन्या ने कहा “तुम बिना कुछ दिये ही गन्ध का पान कर रहे हो। तुम गन्ध चोर हो।”
तथागत ने देखा, और शिर झुका लिया। तभी एक ग्राम्य बालिका आई और निर्दयता पूर्वक कमल पुष्प तोड़ने लगी। तालाब का पानी भी अस्वच्छ कर दिया। देव कन्या अभी भी खड़ी थी।
उसे मौन देखकर तथागत ने कहा ‘देवि-मैंने तो केवल गन्धपान ही किया था। तब भी तुमने मुझे चोर कहा। और यह तो कमल पुष्प तोड़ रही है- सरोवर को अस्वच्छ भी कर रही है। तब भी तुम इसे कुछ नहीं कह रहीं?
देव कन्या मुस्कराई। सहज स्मिति में से स्नेह भरा स्वर फूटा “यह अबोध है-अज्ञानी है। क्या उचित है, क्या अनुचित? यह वह नहीं जानती। उसके कार्य कलाप सहज संचालित हैं। पर आप ज्ञानी हैं। नीति मर्मज्ञ हैं। धर्म के ज्ञाता हैं। क्या श्रेय है और क्या प्रेय यह आप भली प्रकार जानते हैं। आपकी लघु से लघु क्रिया भी औचित्य एवं अनौचित्य की कसौटी पर कस कर ही क्रियान्वित होनी चाहिये।” पुनः तथागत का शीश अवनत हो गया। इस बार शीश ही नहीं-हृदय भी लज्जित हो आया था। उन्होंने अनुभव किया शिक्षित और विचार-शील लोग जब तक नैतिक आचरण नहीं करते सामान्य प्रजा तब तक सुधरती नहीं।
आस्ट्रेलियाई समुद्र में दूर तक एक मूँगों की चट्टान पाई जाती है। इस भीमकाय चट्टान की जानकारी रखना प्रत्येक नाविक के लिये आवश्यक है क्योंकि यदि अनजाने कोई जहाज उधर भटक जाये तो वह उससे टकरा कर चूर-चूर हुये बिना नहीं रह पाता।
इस “मूँगों की चट्टान” का इतिहास भी प्रकृति का एक चमत्कार ही है। मूँगे के असंख्यात कीड़े अपना घर बनाते हैं, कालान्तर में एक पीढ़ी नष्ट हो जाती हैं पुराना घर खाली पड़ा रह जाता है। इसी तरह विकसित होते-होते एक मूँगे के परिवार ने इतनी बड़ी चट्टान का सुदृढ़ और भीमकाय रूप ले लिया। देखने-सुनने में यह आश्चर्य जैसा लगता है किन्तु इसकी सत्यता में तनिक भी सन्देह नहीं है।
भारतीय संस्कृति भी ऐसे ही एक आदि उद्गम से प्रारम्भ होती है। ईश्वरीय इच्छा से सनातन सत्ता में क्षोभ पैदा होना, रजोगुणी आपः सृष्टि का निर्माण अनेक ब्रह्माण्डों की रचना, पृथ्वी का अस्तित्व में आना, उसका आग्नेय रूप धीरे-धीरे ठण्डा पड़ना, हिरण्य गर्भ ब्रह्मा का आविर्भाव आदि पुरुष मनु का जन्म और फिर समाज विकास की प्रक्रिया धीरे-धीरे आज के विविधता पूर्ण पार्थिव जीवन में परिवर्तित हो गई। भारतवर्ष में उदित इस दर्शन और तत्वज्ञान के प्रकाश में मानव मात्र के कल्याण के लिये जो आदर्श और आचार संहितायें तैयार की गई उन्हें ही भारतीय संस्कृति कहते हैं यह संस्कृति ही आदि काल से विश्व संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित हुई है।
यह एक आश्चर्य ही है कि ब्रह्माण्ड के विकास के वैज्ञानिक सिद्धान्तों और भारतीय तत्वज्ञान में जबर्दस्त सामंजस्य है इसीलिये यह कहा जा सकता है कि न केवल समाज को सुव्यवस्थित रखने वाले जो तत्व अर्थात् अहिंसा प्रेम, दया, अस्तेय, सहयोग, सहिष्णुता, उदारता आदि वैज्ञानिक कसौटी पर खरे सिद्ध होते हैं वरन् आत्मा-परमात्मा, परलोक-पुनर्जन्म, कर्मफल, जीवन लक्ष्य, स्वर्ग मुक्ति और अमरत्व की प्राप्ति का सम्पूर्ण तत्व-दर्शन भी विज्ञान से पृथक नहीं है। जब हम इनकी वैज्ञानिक प्रतिदानों से, प्रमाण और मीमाँसाओं से तुलना करने लगते हैं तो यह विश्वास प्रगाढ़ हो उठता है कि भारतीय धर्म और संस्कृति का जन्म अपौरुषेय अर्थात् ईश्वरीय इच्छा से परिपूर्णता लिये हुये हुआ इसीलिये उसे शाश्वत, सनातन और विश्व संस्कृति भी कहते हैं। भारतीय संस्कृति अपने इस रूप में हिंदुओं की ही निधि नहीं वरन् सारे विश्व के लिये एक ऐसी आचार संहिता है, जिसके अनुरूप अपने जीवन को ढालकर देश काल और विभिन्न परिस्थितियों में बँटी जातियों, समाज और व्यक्ति इस पार्थिव जीवन को भी सफल बना सकते हैं और मरणोत्तर जीवन के प्रति भी पूर्ण निर्भय और निश्चिंत होकर इस पंच भौतिक शरीर का परित्याग कर सकते हैं।
इतना बढ़िया समन्वय संसार की किसी भी संस्कृति में नहीं हुआ। विभिन्न स्थानों पर रहते हुए अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के सामाजिक वातावरण, संस्थाओं-प्रथाओं, व्यवस्थाओं, धर्म दर्शन लिपि, भाषा तथा कला का विकास कर तरह-तरह के धर्म और संस्कृतियाँ विकसित कीं वह पानी के बुलबुले की तरह बनती बिगड़ती रही; पर भारतीय संस्कृति आज भी चट्टान की तरह सुदृढ़ बनी हुई है जबकि पाश्चात्य संस्कृति के पैर लड़खड़ा उठे और उसने हिप्पीवाद जैसी विद्रूप सन्तति को जन्म देना प्रारम्भ कर दिया। तब भी भारतीय समाज अपनी वैयक्तिक, सामाजिक, पारिवारिक और यथाशक्य राजनैतिक परिस्थितियों पर भी शान्ति और व्यवस्थायें बनाये रखने में समर्थ दिखाई दे रही है।
मिस्र और बेबीलोन की संस्कृतियाँ कभी भारतीय संस्कृति की समता करती थीं, वे आज नष्ट प्रायः हो चुकीं। फिनिशयन, चाल्डियन, सिथियन संस्कृतियाँ अब पुराण काल के पन्नों में रह गई हैं? सरमेशिया, रुशमे आदि जातियाँ जो कभी अपनी-अपनी अलग संस्कृति बनाये हुये थीं वह अब दिखाई भी नहीं देती। ईसाई धर्म, इस्लाम, परसियन धर्म और संस्कृतियों का इतिहास बहुत थोड़े दिनों का है इतने दिनों में ही उनमें अन्तर्विरोध की भीषण ज्वालायें भड़की हैं वहाँ पर भारतीय संस्कृति ने इस युग में भी अपने गौरव को सुरक्षित किया हुआ है और अब तो वह पुनः विश्व-संस्कृति के रूप में विकसित होने जा रही है।
भारतीय संस्कृति किसी जातीय तथ्य पर आधारित नहीं है। जिस तरह आज का राष्ट्र-संघ अमेरिका से संचालित होता है उसी प्रकार धर्म और संस्कृति के सभी परिवर्तन व अपरिवर्तनशील अंग अर्थात् रहन-सहन, आहार-विहार, वेष-भूषा, शिक्षा-दीक्षा, गृहस्थ-दाम्पत्य, पूजा, उपासना, सामाजिक नियमोपनियम, जातीय संगठन और राज्य संचालन आदि का निर्धारण भारतवर्ष से होता रहा है। भारत में जन्म होने के कारण उसे भारतीय संस्कृति कहते हैं किन्तु वह सारे विश्व की संस्कृति रही है दुनिया भर की जातियाँ यहाँ के मार्गदर्शन पर काम करती थीं, संस्कृति का अपरिवर्तनीय पहलू जिसे धर्म या तत्वदर्शन कहना चाहिये वह तो मूल रूप से यहीं से विकसित हुआ है सामाजिक व्यवस्थायें और आचार संहिताओं में परिवर्तन कर लेने के कारण वे पृथक से दिखाई देने लगे हों यह एक अलग बात हैं अन्यथा भारतीय वाङ्मय में आये नाम-शक, आन्ध्र, चंदन, असुर राक्षस, कपि, महिष दैत्य, दानव नाग, कैवर्त्त, निषाद, किरात, पुलिंद पारद, पल्लव, दस्यु, खस, द्रविड़ पौण्ड्र, औण्ड्र, कम्भोज दरद, शबर आदि नाम इस बात के प्रमाण हैं कि उनका सम्बन्ध यहाँ से सदैव जुड़ा रहा है वे या तो साधनों की खोज में बाहर गई और बस गई या बाहर बसी हुई जातियों से विकसित होती रहीं पर उन्होंने धार्मिक दृष्टि से अपना सम्बन्ध भारतीय संस्कृति से सदैव जोड़ कर रखा था और जब भी उनमें से कोई विदेश से चलकर भारत आ जाता था तो यहाँ उन्हें पहले की ही तरह सम्मानित किया जाता था। थोड़े दिन उनके आचार-विचार आदि की-परीक्षा की जाती थी और तब फिर उन्हें गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्यों के रूप में स्वीकार कर लिया जाता था। धीरे-धीर वे हिन्दुओं में ही पूरी तरह घुल मिल जाते थे। उन्हीं में अनेक विवाह आदि सम्बन्ध भी होने लगते थे। इस तरह भारतीय संस्कृति उस समुद्र की तरह रही है जिससे संसार की सभी जातियाँ सैकड़ों नदियों की तरह आकर मिलीं पर समुद्र अपनी गम्भीरता, विशालता, एकता, अविच्छिन्नता, शान्ति कान्ति और समृद्धि में अपनी सत्ता को अलग ही बनाये रहा। अनेक साँस्कृतिक क्रान्तियों के बाद भी भारतीय संस्कृति स्थिर बनी रही। सामाजिक रीति-रिवाज बदलते जरूर रहे, बदलना आवश्यक भी था और है भी पर उसके सिद्धान्त जो मानव मात्र की एकता और कल्याण की दृष्टि से बनाये गये वह अन्त तक- अब तक स्थिर और अपरिवर्तनीय रहे और रहेंगे।
भारतीय संस्कृति का विदेशों में विकास उसकी अपनी महिमा और उदारता के कारण हुआ है तथापि कई बार ऐसा शस्त्र और शौर्य से भी किया गया है। “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” ‘हम संसार को सभ्य बनायेंगे” ऐसा इस देश का लक्ष्य रहा है। उसके लिये भारतीय संस्कृति द्वारा प्रवाहित ज्ञान-धारायें जब काम नहीं कर सकीं तो अस्त्र भी उठाये गये हैं और उसके लिये सारे विश्व ने साथ भी दिया है। महाभारत का युद्ध हुआ था उसमें काबुल, कन्धार, जावा, सुमात्रा, मलय, सिंहल, आर्यदेश (आयरलैण्ड), पाताल (अमेरिका) आदि देशों के सम्मिलित होने का वर्णन है यह विश्व युद्ध था।
भारतीय संस्कृति माता है और विश्व के तमाम देश, अनेक संस्कृतियाँ और जातियाँ उसके पुत्र-पुत्री, पोता-पोती की तरह हैं। घर सबका यही था, भाषा सबकी यहीं की- संस्कृत थी, और संस्कृति भी यहीं की थी जो कालान्तर में बदलते-बदलते और बढ़ते-बढ़ते अनेक रूप और प्रकारों में उसकी तरह हो गई जैसे आस्ट्रेलियाई मूँगों की दूर-दूर तक फैली हुई चट्टान।
आज जब सारा संसार भेद-भाव, स्वार्थ-पाखण्ड, छल-कपट, हिंसा और जोर-जबर्दस्ती की विद्रूप सभ्यता में उतर आया है तब भारतीय संस्कृति ही एक और अन्तिम समर्थ संस्कृति है जिसकी छाया में बैठकर हम विश्व की सम्पूर्ण जातियाँ अपने आपको एक ही ईश्वर के पुत्र भाई-भाई मानेंगी और मानवतावादी सिद्धान्तों के परिपालन के लिये विवश होंगी।
चमत्कार प्रदर्शन से आपकी अरुचि हो गई है और आप यह मानते हैं कि अतीन्द्रिय शक्तियों एवं सिद्धियों का उपयोग विश्व कल्याण के लिये है तो आप इतना तो बता ही सकते हैं- कि संसार में भीषण रूप से पनप रही भौतिक वृत्तियों में भी क्या कभी परिवर्तन आयेगा? क्या यह राजनैतिक चालें कभी बन्द होंगी, क्या निशस्त्रीकरण भी सम्भव है? क्या सारा संसार कभी एक सूत्र में फैल जायेगा और यह सब परिवर्तन क्या अभी कुछ दिन में ही होने वाले हैं?
यह प्रश्न हालैण्ड के एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने वहाँ के ख्याति प्राप्त भविष्य दृष्टा गेरार्ड क्राइसे से पूछा। भारतवर्ष में तो भविष्य कथन पर विश्वास एक सामान्य बात है पर हालैण्ड शायद संसार का पहला देश है जहाँ पर थानों, कचहरियों, संसद तथा अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिये भी मान्य भविष्य दृष्टाओं की मदद ली जाती है। अतीन्द्रिय क्षमता हमारे देश में उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं के अभ्यास और तपश्चर्या से कोई भी प्राप्त कर सकता है ऐसा विधान दुनिया के किसी और देश में नहीं किन्तु ईश्वरीय देन के रूप में ऐसी आत्मायें सर्वत्र जन्म लेती रहती हैं जिनके भविष्य कथन बहुत अंशों में सच निकलते रहते हैं। इस शताब्दी में हालैण्ड में ही नहीं सम्भवतः सारे योरोप में गेरार्ड क्राइसे सबसे अधिक प्रभावशाली भविष्य दृष्टा हुआ है उसकी बताई हुई बातें असत्य निकली हों ऐसा बहुत ही कम हुआ है। गेरार्ड क्राइसे हालैण्ड में एक यहूदी परिवार से सम्बन्ध रखते हैं।
एक बार अमरीका से एक प्रोफेसर ने फोन पर क्राइसे से पूछा- मेरी पुत्री एकाएक कहीं खो गई है, आप जानते हैं बच्चे तो माँ-बाप की आँखों के तारे होते हैं, उसके बिना मेरा मन बहुत बेचैन है, पढ़ाई का हर्जा भी हो रहा है क्या आप उसका कुछ अता-पता बता सकेंगे?
“कई बार मन अस्त-व्यस्त, उलझन और परेशानी में होता है तब सामान्य बातों के निष्कर्ष निकाल पाना ही कठिन हो जाता है यह तो ऐसी बात है जिसमें अपनी भावनाओं को एकाग्र करके अन्तःकरण में प्रवेश करना पड़ता है तब कहीं सूक्ष्म स्पन्दन आत्मा की पकड़ में आते हैं इस समय मैं कुछ उधेड़-बुन में हूँ आपको कल इसी समय उत्तर दूँगा” यह कहकर क्राइसे ने टेलीफोन रख दिया।
अगले दिन ठीक उसी समय प्रोफेसर, जो हालैण्ड से 5000 मील की दूरी पर अमेरिका में बैठे थे, टेलीफोन की घण्टी बजी, रिसीवर कान से लगाया तो पता चला क्राइसे बोल रहे हैं उन्होंने बताया- आपकी लड़की अस्पताल में थी वहाँ से वह नहर के किनारे आई, नहर अस्पताल के पास ही होनी चाहिए। नाव में बैठकर वह दूसरे किनारे पर पहुँची। वहाँ एक बड़े कद की लाल कार खड़ी मिली। आपकी लड़की उसी में सवार होकर कहीं चली गई है। आप चिन्ता न करें आपकी बेटी सकुशल है छठवें दिन अपने आप आ जायेगी।
6 दिन बीत गये तब तक उसका कोई पता न चला। प्रोफेसर साहब फोन के कमरे में गये, सोचा क्राइसे को फोन करके पूछें पर जैसे ही चोंगा हाथ में लेकर सिर ऊपर उठाया देखते हैं कि लड़की सामने सोफे पर बैठी है। उन्होंने लड़की से पूछा वह कैसे गायब हुई। लड़की ने जो कुछ बताया वह क्राइसे के कथन से शत प्रतिशत मिलता जुलता पाकर प्रोफेसर आश्चर्य में रह गये कि ऐसा भी संसार में क्या रहस्य है जो मनुष्य बिना किसी यन्त्र के भी सर्वदर्शी और सर्वव्यापी बन सकता है। उन्हें भारतीय दर्शन का ज्ञान होता तो सम्भवतः कुछ सोचते कि वह शक्ति तो आत्म-चेतना के रूप में मनुष्य में अपने आप समाई है। हमें शरीर के रूप में परमात्मा ने एक ऐसा सर्वांग पूर्ण यन्त्र प्रदान किया है जिसका सही उपयोग किया जा सके तो भविष्य दर्शन, दूर और अपरोक्ष दर्शन तो साधारण बातें हैं मनुष्य ब्रह्म ही हो सकता है।
क्राइसे इस बात का प्रमाण है। अपने जीवन में उसने सैकड़ों लोगों को सैकड़ों बातें बताई और वे नितान्त सच निकलीं। एक बार किसी सज्जन का एक लड़का खो गया। वह बच्चे का फोटो लेकर क्राइसे के पास गये। क्राइसे ने फोटो देखते ही कहा- ‘बच्चे के आगे पीछे ऊपर नीचे सब ओर जल ही जल दिखाई दे रहा है- बच्चा पानी में डूब गया लगता है। दूसरे दिन यह बात तब सच निकली जब पास ही एक नदी के पुल से थोड़ी दूर पर लड़के का शव पानी में बहता हुआ मिला।
एक बार एक स्त्री क्राइसे से पूछ बैठी आप मेरे जीवन की कोई इतनी पुरानी घटना बताइये जब आप भी बच्चे रहे हों। इस पर क्राइसे ने बताया एक बार तुम अपनी सहेलियों के साथ खेत घूमने जा रही थीं। तुम कँटीले तारों से सटी चल रही थीं, तुम्हारी एक मित्र ने तुम्हें धक्का दे दिया और तुम तारों में जा गिरीं एक तार तुम्हारे पेडू में घुस गया उसके घाव का निशान अभी तक तुम्हारे पेडू में है।”
महिला ने स्वीकार किया कि सचमुच यह घटना 27 वर्ष से पूर्व तब की है जब वह स्वयं भी एक 12 वर्षीय बालिका ही थी। इससे भी महत्वपूर्ण घटना क्राइसे के जीवन में 13 सितम्बर 1960 को घटी जब एक पादरी क्राइसे से भेंट करने आये। पादरी ने भी एक खोये हुए लड़के के बारे में ही पूछा था उसमें नवीनता जैसी कोई बात नहीं थी पर क्राइसे बताने लगे कि- यह लड़का, इस जंगल में एक साइकिल पर सवार तेजी से जा रहा है और इतना कहकर वे एकाएक चुप से हो गये। वे किसी गम्भीर विचार में डूब गये लगते थे- इस पर पादरी ने पूछा- आप चुप क्यों हो गये? कुछ और बताइये?
क्राइसे ने एक ठण्डी साँस ली और बोले- अब बताने को कुछ रहा नहीं। एक लम्बा तगड़ा व्यक्ति उसका पीछा कर रहा है, उसके बाल बिलकुल काले हैं थोड़ी दूर जाकर वह इस लड़के की हत्या करके उसे वहीं दफना देता है। उस दफनाये हुये स्थान की पूरी-पूरी जानकारी क्राइसे ने दी। उसके बाद लोग वहाँ गये तो पाया कि ठीक उसी समय उसकी हत्या करके उसी स्थान पर उसे दफना दिया गया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और क्राइसे की रिपोर्ट में कोई अन्तर नहीं था।
परामनोविज्ञान के शोधकर्ता डॉ. तनहैफ जो इन दिनों इस तरह की अतीन्द्रिय क्षमताओं के कारणों की शोध कर रहे हैं एक बार क्राइसे को एक ऐसे स्थान पर ले गये जहाँ दूसरे दिन सभा आयोजित होने वाली थी। मंच तैयार हो गया था, दर्शकों के लिये कुर्सियाँ डाल दी गई डॉ. तनहैफ एक कुर्सी के पास जाकर खड़े हो गये और पूछा क्या आप बता सकते हैं इस कुर्सी पर कल बैठने वाला कौन व्यक्ति होगा?
इस पर क्राइसे ने बताया-इसमें एक महिला बैठेगी फिर उस स्त्री से सम्बन्धित अनेकों बातें क्राइसे ने बतलाई वह सब की सब टेप-रिकार्ड कर ली गई। संयोग कि दूसरे दिन उस सीट पर एक महिला ही बैठी और आश्चर्य कि उसके सम्बन्ध में जितनी बातें बताई गई थी, महिला से पूछने पर उसने यह स्वीकार किया कि वह सारी बातें सच हैं? डॉ. तनहैफ इस घटना से बहुत प्रभावित हुये। दरअसल क्राइसे की विश्व ख्याति का माध्यम भी डॉ. तनहैफ ही हैं।
अब तो क्राइसे अनेक महत्वपूर्ण जटिल राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक समस्यायें भी सुलझाने में मदद देते हैं। यहाँ तक कि पुरातत्व विभाग वाले भी उनकी पूरी मदद ले रहे हैं। जोहान्सबर्ग विश्व-विद्यालय के भूगर्भ शास्त्री डॉ. वालकौफ यूट्रेच को दक्षिणी अफ्रीका की कैनीबाल नामक गुफा से एक हड्डी का टुकड़ा मिला था। टुकड़ा बहुत पुराना लगता था पर किसी भी सूत्र से उस सम्बन्ध में यह निर्णय नहीं हो पा रहा था कि यह किस युग से सम्बन्ध रखता है। डॉ. तनहैफ की सिफारिश पर उन्होंने भी क्राइसे की मदद ली। क्राइसे ने वह हड्डी का टुकड़ा छूकर एक ऐसे युग की और दक्षिण अफ्रीका के एक कबाइली संगठन की बातें बताई जिनमें बलि प्रथा प्रचलित थी। यह टुकड़ा भी नर बलि का ही था। उन्होंने जिस जाति का नाम बताया पुरातत्व गवेषणा के अनुसार वह कथन बिलकुल सच थे।
जहाँ क्राइसे ने ऐसी अनेक सफलतायें प्राप्त कीं वहाँ उन्हें अनुभव हुआ कि इस तरह चाहे जिसे भूत भविष्य की बातें बता देने से उनका महत्व तो बढ़ता है पर उनकी यह अतीन्द्रिय क्षमता कम होने लगी है, उन्हें एक घटना का विवरण दे चुकने के बाद भारी असन्तोष होता है इन सबका कारण क्या है सम्भवतः यह उन्हें ठीक समझ में न आया हो पर वे मानते हैं कि अतीन्द्रिय ज्ञान का उपयोग केवल लोक कल्याण के लिये ही होना चाहिये स्वार्थ सिद्धि के लिये नहीं।’
इस सम्बन्ध में उक्त राजनीतिज्ञ के प्रश्न करने पर क्राइसे ने बताया कि- मैं देख रहा हूँ कि पूर्व के एक अति प्राचीन देश(भारत) जहाँ साधु और सर्पों की पूजा होती है वहाँ के लोग माँस नहीं खाते, ईश्वर भक्त और श्रद्धालु होते हैं उनकी स्त्रियाँ पतिव्रता और कभी भी पतियों को तलाक न देने वाली होती हैं वहाँ के लोग सीधे सच्चे और ईमानदार होते हैं- से एक प्रकाश उठता आ रहा है, वहाँ किसी ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ है जो सारे विश्व के कल्याण की योजनायें बनायेगा इस बीच संसार में भारी उथल-पुथल होगी, भयंकर युद्ध होंगे जिसमें कुछ देशों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा, वायु दुर्घटनायें इतनी अधिक होंगी कि लोग हवाई जहाजों पर बहुत सीमित संख्या में चला करेंगे। उस व्यक्ति के पीछे सैकड़ों लोग, जिनमें स्त्रियाँ बहुत अधिक संख्या में होंगी, चल रहे होंगे। वह सब लोग एक स्थान के न होकर सारे देश से इकठ्ठा होंगे और आग जलाकर (यज्ञ) उसमें कोई सुगन्धित वस्तुयें डालकर खुश होंगे उसके धुयें से वायुमंडल शुद्ध होगा तमाम संसार के लोग उधर देखेंगे और उसकी बातें मानेंगे। सब राजनैतिक नेता एक मंच पर इकट्ठे होने को विवश होंगे। इन बातों का प्रमाण इसी शताब्दी के अन्त तक मिलने लगेगा और फिर सारा संसार एक सूत्र में बँधता चला जायेगा उसमें सर्वत्र अमन-चैन होगी। कोई हिंसा न होगी, दमन झूठ फरेब के लिए कोई स्थान न रहेगा। दुष्ट दुराचारियों और नारियों पर कुदृष्टि डालने वालों को सबसे अधिक दण्ड मिलेगा। लोग दूध अधिक पिया करेंगे, फूल पौधों की संख्या बढ़ेगी और संसार बड़ा सुन्दर लगने लगेगा।
गुण सुट्ठिस्य वयणं धयपरिसित्तुव्व पावओ भाई। गुण हीणस्य न सोहइ नेहविहूणो जह पईवो॥
-बृहत्कल्प भाष्य 245
गुणवान् व्यक्ति के वचनों का अनुसरण करो क्योंकि गुणवान् व्यक्ति का वचन अग्नि की तरह तेजस्वी होता है जबकि गुणहीन व्यक्ति का वचन तेल शून्य दीपक की तरह तेज और प्रकाश रहित होता है।
एक धनवान था। वह नित्य ही एक घी का दीप जलाकर मन्दिर में रख आता था!
एक निर्धन व्यक्ति था। वह सरसों के तेल का एक दीपक जलाकर नित्य अपनी गली में रख देता था। वह अँधेरी गली थी।
दोनों मरकर जब यमलोक पहुँचे तो धनकुबेर को निम्न स्थिति की सुविधायें दी गई और निर्धन व्यक्ति को उच्च श्रेणी की।
यह व्यवस्था देखी-तो धनकुबेर ने धर्मराज से पूछा “यह भेद क्यों जबकि मैं भगवान के मन्दिर में दीपक जलाता था। और वह भी घी का।”
धर्मराज मुस्कराये। बोले “पुण्य की महत्ता मूल्य के आधार पर नहीं कार्य की उपयोगिता के आधार पर होती है। मन्दिर तो पहले से ही प्रकाशमान था। उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया जिससे हजारों व्यक्तियों ने लाभ उठाया। उसके दीपक की उपयोगिता अधिक थी।”
एक दो नहीं सम्पूर्ण 6 वर्ष तक उसने पार्कों, थियेटरों, हवि ग्रहों और दूसरे-दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काटे। एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस-जिस के फोटोग्राफ लिये उन-उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया। सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गँवाने वाला फक्कड़ पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक-श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष-भूषा का मनुष्य के चरित्र, स्वभाव, शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है।
पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं-ऐसी युवतियों की चाल-ढाल बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”
श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।
आज पाश्चात्य देशों में अमेरिका में सर्वाधिक भारतीय पोशाक-साड़ी का तो विशेष रूप से तेजी से आकर्षण और प्रचलन बढ़ रहा है दूसरी ओर अपने देश के नवयुवक और नवयुवतियाँ विदेशी और सिनेमा टाइप वेष-भूषा अपनाती चली जा रही हैं यह न केवल अन्धानुकरण की मूढ़ता है वरन् अपनी बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक कमजोरी का ही परिचायक है।
यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट, कोट, शूट, बूट, हैट, स्कर्ट, चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है। श्री हेराल्ड लिखते हैं- कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा।
भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं, वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं, उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हाँ काले अँगरेज और काली मेम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।
बार-बार रंग बदलने की अपनी पटुता का प्रदर्शन करते हुए गिरगिट ने कछुये से कहा- महाशय! देखा मैं संसार का कितना योग्य व्यक्ति हूँ? कछुये ने धीरे से कहा- “महाशय! दूसरों को धोखा देने की इस योग्यता से तो तुम अयोग्य बने रहते तो अच्छा था कम से कम लोग भ्रम में तो न पड़ते।”
टेलीफोन की घंटी बजी, वकील साहब ने उसे उठाकर कान से लगाया और कहा-हलो! हलो! कौन बोल रहा है? पर उधर से कुछ आवाज न आई, चोंगा नीचे रख दिया। लेकिन अभी वे उठने को ही थे कि घंटी फिर टनटनाई फिर रिसीवर उठाकर कान से लगाया तो कोई भद्दी गाली बकने लगा। कई दिन तक ऐसे ही कभी गालियाँ, कभी धोखा खाने के बाद भी उन्हें पता न चल पाया कौन तंग कर रहा है?
फिर-स्विच दबाया नहीं ट्यूब लाइट तेजी से चमकने लगी। बल्ब जला और फटाक से फूट पड़ा। कमरे में उनके अतिरिक्त एक चिड़िया भी नहीं तो भी यहाँ ऊधम मच रहा है। वकील साहब बड़े तंग हुए अन्त में हारकर बिजली विभाग को लिखा- कहीं कोई बिजली की गड़बड़ी है उसे ठीक किया जाये। बिजली विभाग के इंजीनियर तक आये, सारे सर्किट की ओवर हालिंग कर गये- पर न तो कोई गड़बड़ी मिली और न बन्द ही हुआ ऊधम। एडवोकेट साहब का बुरा हाल था।
यह प्रसंग कोई काल्पनिक नहीं वरन् एक सत्य घटना है जो रोजेनहीम के एक वकील के साथ जून 1968 में घटी। इस समाचार का विवरण नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) के सितम्बर 1969 अंक में पेज 127, 128 में भी छपा है। लगभग 8-9 महीने की लगातार जाँच के बाद बिजली विशेषज्ञों ने जवाब दे दिया और स्थिति नियन्त्रण में नहीं आई। इसके बाद परा-मनोविज्ञान वेत्ता प्रो. हाँस बेन्डर, जो कि “फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट आफ पैरासाइकोलॉजी” के अध्यक्ष हैं, ने इन परिस्थितियों की जाँच की और बताया कि-सब कुछ देखने के बाद में इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि यह मामला मनोगति क्रम (साइको काइनेसिस ) का है। मनोगति क्रम का अर्थ ही है कि सूक्ष्म मानसिक शक्तियाँ हैं जो भौतिक पदार्थों पर नियन्त्रण और हस्तक्षेप कर सकती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मानसिक अवस्था किसी तरह भूत-प्रेत के रूप में स्थित रह सकती है।
चेतना के पण्डित होने के कारण भारतीय योगी इस विज्ञान को बहुत प्राचीन काल से जानते और लोगों को सावधान करते रहे हैं कि लोग हिंसा, छल-कपट और अत्याचार न करें अन्यथा उन्हें मरणोत्तर काल में एक ऐसी अशाँत स्थिति में रहना पड़ सकता है जिसमें आत्मिक-चेतना को इन्द्रियों की आसक्ति, भय और पाप पीड़ित कर रहे हों। भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व आदि गुण क्रम से ऐसी ही अवस्थाओं के नाम हैं। इस अवस्था के प्रमाण संसार में सैकड़ों शिक्षित और लब्ध प्रतिष्ठ व्यक्तियों को भी मिल चुके हैं।
राजा हो या रंक मजदूर हो या नेता कर्मफल और ईश्वरीय न्याय से बचकर कोई नहीं जा सकता। स्काटलैण्ड के राज घराने संसार भर में प्रसिद्ध हुए हैं पर अपने किये कर्मों से वे भी बच नहीं सके। चौथे जेम्स से पहले कोई राजा अधोगति का शिकार हुआ। वह भूत हो गया जेम्स चतुर्थ को उसने कई बार दर्शन दिये। जेम्स चतुर्थ कई बार इंग्लैण्ड पर आक्रमण कर चुका था। प्रेत हर बार रक्तपात न करने की चेतावनी देता पर जेम्स ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। एक बार जब वह युद्ध के लिए चलने लगा प्रेत ने आकर कहा- इस युद्ध से तुम जीवित वापस नहीं लौटोगे किन्तु जेम्स नहीं माना। युद्ध में गया और वहीं उसकी शस्त्र-प्रहार के कारण मृत्यु हो गई।
जगत विख्यात सन्त सुकरात के बारे में कहा जाता है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में धर्म-कर्म और अदृश्य जीवन में उनका कोई विश्वास नहीं था। एक दिन उन्हें एक भूत ने ही भगवान का भजन करने की सलाह दी उससे उनकी अतीन्द्रिय दर्शन की क्षमता विकसित हो गई। उस दिन से उन्हें भूत स्पष्ट दिखाई देने लगा। वे कई गूढ मामलों में उस प्रेत की मदद लिया करते थे। प्रेत उन्हें हर सम्भव जानकारी जो स्थूल और साँसारिक मामलों में ग्रस्त व्यक्ति नहीं पा सकता, देता रहता और इस तरह सुकरात हजारों का भला करते रहे। उन्होंने अपने साथियों को भी यह बात बताई पर चूँकि दूसरे लोग उसे देख नहीं सकते थे इसलिये उन्होंने यह बात कभी नहीं मानी पर जब सुकरात भविष्य की अनेक बातें पहले ही बता देते तो लोग उन्हें ही चमत्कारिक व्यक्ति मानने लगे कोई यह नहीं मानता था कि उनके पास कोई प्रेत आता है।
सुकरात को उस प्रेत ने ही बताया था कि प्रेत योनि में पड़ी हुई आत्मायें स्वयं भी अपने उद्धार के लिए प्रयत्नशील रहती हैं और अपने परिवार वालों से भी उसकी आशा रखती हैं पर स्वयं का कोई अभ्यास न होने से वे अधिकाँश अपनी इन्द्रियों की अशान्ति में ही पड़ी रहती हैं। पीर पूजन का महत्व सन्त सुकरात ने इसी उद्देश्य से प्रतिपादित किया था कि उससे भटकती आत्माओं को कुछ शान्ति मिले।
19 जुलाई 1969 के बम्बई के ‘ब्लिट्ज’ अखबार ने बम्बई का एक समाचार छापा है। फोर्ट इलाके की एक महिला को कुछ दिन पूर्व एक बिना नाम का पत्र मिला जिसमें उसे कई तरह की धमकियाँ दी गई थी। यह समझा गया कि यह काम किसी बुरे व्यक्ति का है महिला की सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत कर दी गई। पुलिस का भी प्रबन्ध कर दिया गया।
एक दिन महिला कुछ खरीदने के लिए सहकारी भंडार पहुँची। उसका नौकर साथ था उसने पूरी सतर्कता बरती तो भी उस महिला की पीठ पर ब्लेड के निशान पाये गये। पुलिस ने समझा यह काम किसी जेबकतरे का है जो उसके कन्धे पर लटके हुए बैग को काटना चाहता होगा। उन्होंने खुफिया तौर पर निगरानी रखी पर कोई भी नहीं दीखा। दूसरे दिन भी यह स्थिति बनी रही। उक्त महिला अपने पति के साथ भ्रमण के लिए निकली तो बाँह, पैरों और शरीर के दूसरे हिस्सों में ब्लेड की खरोंच पाई गई। कपड़े कई जगह से कट गये। पुलिस घर में भी निगरानी रख रही है पर यह पहेली अन्ततः पहेली ही रही। लोगों ने अनुभव किया यह मामला भी स्पष्ट ही “मनोगति” अर्थात् प्रेत से सम्बन्धित है।
एलन कारडेक ने इस तरह की सैकड़ों घटनाओं के अध्ययन के बाद “दि मीडियम्स” नामक पुस्तक लिखी है इस पुस्तक में उन्होंने स्वीकार किया है कि संसार में किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत का अस्तित्व है। कुछ अच्छे लोग भी परिस्थितिवश कई बार दुष्कर्म कर बैठते हैं वह तो इस अवस्था को जल्दी ही पार करके मृत्यु की गहरी निद्रा में चले जाते हैं पर जो आजीवन बुरे कार्यों में ही फँसे रहे होते हैं अधोगति में पहुँचे ऐसे प्रेत आदि बहुत काल तक अन्धकारपूर्ण दुर्गन्धित और सुनसान स्थानों में भ्रमण करते रहते हैं। कोई-कोई ऐसे प्रकट भी होते रहते हैं, अधिकाँश पुण्यार्जन के भी प्रयत्न में रहते हैं पर जो सुविधायें मनुष्य में पुण्य और परमार्थ के लिए हैं वह सुविधायें वहाँ न होने पर उनके पल्ले अधिकाँश किये हुए पापों का प्रायश्चित ही रहता है।
आचार्य रामानुज मंत्र पाठ करते हुये मन्दिर की प्रदक्षिणा कर रहे थे। उस परिक्रमा में ही उन्हें एक चाण्डाल स्त्री दिखाई दी। अब उनका मन्त्रोच्चारण बन्द हो गया और क्रोध में तमतमाते हुये बोले ‘रास्ते में से हट चाण्डालिन। जानती है तूने आज की मेरी उपासना खण्डित कर दी।’
‘क्षमा करें भगवन्! मेरे चारों ओर पवित्रता व्याप्त है अब आप ही बताइये कि मैं अपनी पवित्रता को लेकर किधर चली जाऊँ।’ हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुये उस चाण्डालिन ने कहा। अब मानों रामानुज के ज्ञान नेत्र खुल चुके थे बोले- ‘क्षमा करना देवी! मुझसे भूल हो गई तुम सचमुच पवित्रात्मा हो।’
प्रकाश की लम्बी रेखा, बुहारी की तरह पूँछ वाला एक तारा कभी आकाश में दिखाई दे जाता है तो भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व में बेचैनी फैल जाती है। यह तारा जिसे धूमकेतु या पुच्छल तारा कहते हैं, अशुभ और अनिष्ट का सूचक समझा जाता है। जब भी यह निकलता है, लोग युद्ध, अकाल, महामारी जैसी आशंकाओं से भयभीत हो उठते हैं। पुच्छल तारा मानव जाति के लिए व्याधि और विनाश का ही प्रतीक माना जाता है।
इस विश्वास के पीछे कितना कुछ सत्य है, यह तो बहुत दिन बाद पता चलेगा, किन्तु यह तारा सृष्टि का एक विलक्षण आश्चर्य अवश्य है। कहते हैं प्राचीनकाल में योगियों और सिद्ध महात्माओं के शरीर से ‘ब्रह्मकीट’ नामक एक कीड़ा निकला करता था, वह चाहे जहाँ जाकर किसी को भी नष्ट कर दिया करता था। महासती गौरी एक बार अपने पिता दक्ष प्रजापति के घर यज्ञ देखने गई थीं। वहाँ उन्होंने अपने पति शंकर का अपमान देखा था, यज्ञकुण्डों में ही जल मरी थीं। यह समाचार जब शंकर भगवान को मिला तो उन्होंने भी ऐसे ही ‘वीरभद्र’ नामक एक जन्तु अपनी जटाओं से निकालकर भेजा था, जिसने दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर उसका सिर काट लिया था।
सम्भव है तब मानसिक शक्तियों के संहारक उपयोग का योगियों को ज्ञान रहा हो और इस तरह का कोई ज्योति-पुरुष उत्पन्न करना सम्भव रहा हो जिस तरह यह पुच्छल तारा या धूमकेतु सूर्य भगवान के शरीर से अचानक प्रकट होता है और पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को डरा-धमका देता है।
यह पुच्छल तारा साधारण मनुष्यों के लिये ही भय और आश्चर्य का विषय नहीं रहा, वैज्ञानिकों ने भी उसे बड़े कौतूहल की दृष्टि से देखा है। अनेक वैज्ञानिक उसकी विशद जानकारी करने के लिये प्रयत्नशील रहे हैं। प्रसिद्ध खगोलविद् न्यूटन, जिनका मस्तिष्क पिण्डीय जगत में सदैव भ्रमण किया करता था- गुरुत्वाकर्षण जैसा सिद्धाँत उन्होंने ही बनाया था- ने धूमकेतुओं के अनेक आश्चर्यों की खोज की। टाइकाब्राहे और डॉ. हेली ने धूमकेतु ताराओं का विशेष अध्ययन किया और कहा-प्रकृति के अनेक रहस्यपूर्ण करतबों में से एक यह धूमकेतु भी है। इसकी आकृति, प्रकृति, गुण, कर्म और निवास-विश्राम का उसी प्रकार कुछ ठिकाना नहीं, जिस प्रकार आज के भारतीय साधुओं का। चाहे जब, चाहे जहाँ निकल पड़ते हैं और निरुद्देश्य इधर-उधर लोगों से टकराते रहते हैं।
कभी-कभी दिखाई देने वाले इन धूमकेतुओं की संख्या कम नहीं हजारों की संख्या में है तथा सूर्य के आस-पास और सौरमण्डल के बाहर भी चक्कर काटते रहते हैं। हमें जो धूमकेतु दिखाई देते हैं वह सब शंकर की जटाओं से एकाएक प्रादुर्भूत पुत्रों की तरह सूर्य की सन्तानें हैं। वह किस तरह पैदा हो जाते हैं, इस सम्बन्ध में कोई निश्चित जानकारी नहीं है पर अब तक सूर्य के ऐसे 32 प्रकाश पुत्रों का पता चला है। आज्ञाकारी पुत्र की तरह यह भी सूर्य की ही परिक्रमा लम्बे वृत्त में किया करते हैं। हेली, फाये, ओल्वेरस, ब्रोरसेन, इन्के, टुटल आदि धूमकेतु 3 वर्ष से लेकर 100 वर्ष की अवधि में सूर्य की परिक्रमा कर लेते हैं। कुछ धूमकेतु 150 वर्ष तक में सूर्य की परिक्रमा पूरी करते हैं। जब कभी ये पृथ्वी के वायुमण्डल में आ जाते हैं- हमें दिखाई देने लगते हैं। हैले, धूमकेतु तो हर 76 वर्ष बाद आता रहता है। अनुमान है कि 17 वर्ष बाद 1986 में फिर उदित होगा। इससे पहले वह 1910 में आया था। द्वितीय विश्वयुद्ध की तैयारियाँ तभी हुई थीं। इसी से लोग अनुमान लगाते हैं कि अगले दिनों तृतीय विश्वयुद्ध की तैयारियाँ हों तो कुछ आश्चर्य नहीं। सम्भव है तब मानव जाति पर बड़े संकट आयें, पर यदि ऐसा हुआ ही तो आगे का संसार एक नये अध्याय से ही प्रारम्भ होगा, जिसमें सब लोग प्रेम, मैत्री, सहयोग और सहानुभूति का व्यवहार करते हुए सुखी रहेंगे। अनैतिकता और अनाचार का कूड़ा-करकट इस दाह-क्रिया में ही जल-वल जायेगा, विनाश की आशंका के साथ यह शुभ भी निश्चित रूप से जुड़ा अनुभव किया जाना चाहिए।
यों धूमकेतु कोई ऐसा दानव नहीं, जो मनुष्यों की तरह मारकाट मचाता हो। यह भी गैस, खनिज, चट्टानों तथा हिमकणों में बने विचित्र प्रकार का तारा ही है। सबसे आश्चर्यजनक इसकी पूँछ है, जिसकी लम्बाई लाखों-करोड़ों मील तक नापी गई है। 1811 में धूमकेतु दिखाई दिया था, उसकी पूंछ 10 करोड़ मील लम्बी थी जबकि 1843 में जो धूमकेतु दिखाई दिया था खगोल शास्त्रियों के अनुसार उसकी पूँछ की लम्बाई 15 करोड़ मील से भी बड़ी थी।
कई धूमकेतु कई पूँछ वाले भी होते हैं। आकाश में इतनी दूर तक फैली हुई पूँछ के बीच से फाड़कर पृथ्वी और दूसरे ग्रह अपनी परिक्रमायें करते रहते हैं। सम्भव है पूँछ में पाई जाने वाली गैसें अदृश्य रूप से लोगों के मस्तिष्क और शरीर में ऐसी प्रतिक्रियायें उत्पन्न करती हों, जिनसे शरीर और सामाजिक जीवन में दूषित तत्वों की अभिवृद्धि होती हो और इसी से यह अनिष्टकारक समझे जाते हों, पर ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता जो बलात् मनुष्य की इच्छाशक्ति को मोड़ सकता हो या विध्वंस उपस्थित कर सकता हो। इसकी आकृति ही भयंकर होती है। भार तो बहुत ही कम होता है इसलिए इनसे टकराने का कोई डर नहीं रहता। दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसे जन्तु पाये जाते हैं जो दुश्मन को देखकर ऐसी भयंकर आकृति बना लेते हैं कि दुश्मन उसे देखते ही भयभीत हो जाता है और वहाँ से भाग जाता है। अपनी इस डराने वाली कला के द्वारा वह अपनी जीवन रक्षा कर लेता है, सम्भव है प्रकृति ने धूमकेतु नामक इस ब्रह्मकीट को इसीलिए उत्पन्न किया हो कि उसकी दानवी आकृति से लोग डरें और सनातन नियमों की-यथा दया, क्षमा, उदारता आदि-की रक्षा करें, वैसे इसका भार पृथ्वी के भार से करोड़ों गुना कम अर्थात् नगण्य जैसा ही होता है जबकि लम्बाई के अनुपात में उन्हें कई अरब टन का होना चाहिए था।
खगोलशास्त्रियों ने अनुमान लगाकर बताया है कि एक कमरे की एक घन इंच हवा में जितना पदार्थ होता है। धूमकेतु की पूँछ में उतना पदार्थ एक घन मील में होता है। चमक तो गैसों की होती है। इसका सिर भी उतने भार का नहीं होता, जितना दिखाई पड़ता है। यह छोटी-छोटी गोली के आकार जैसे धूल-कणों से बना होता है और यह टुकड़े भी एक घन मील में कोई सौ-पचास की ही संख्या में होते हैं।
सिरा सूर्य की ओर और पूँछ विपरीत दिशा में ऐसा लगता है जैसे सूर्य अपनी इच्छा-शक्ति से उसे धकेल रहा हो। सूर्य से वह बहुत दूर रहकर चक्कर काटता है। यह दूरी 40 करोड़ मील तक होती है, सन् 1843 में जो धूमकेतु दिखाई दिया था वह सूर्य के 43 हजार मील पास तक चला गया था। इससे पहले 3 करोड़ मील की दूरी तक ही वह आ पाया था। धूमकेतु जब सूर्य के पास आता है तभी उसकी पूँछ चमकती और लम्बी होती दिखाई देती है। सूर्य का प्रकाश पड़ने के कारण ही ऐसा होता है। जैसे-जैसे वह दूर हटता है पूँछ छोटी होती हुई बाजीगर के खेल की तरह सिर में ही लुप्त हो जाती है। कई बार यह पूँछ दूसरे ग्रह-पिण्डों के संपर्क में आकर उधर ही आकर्षित होकर नष्ट हो जाती है इससे यदि यह कहा जाये कि धूमकेतुओं के विकिरण का अदृश्य प्रभाव प्राणीय जीवन पर पड़ सकता है तो उसे नितान्त असत्य नहीं मानना चाहिए।
धूमकेतु केवल सूर्य की सन्तान हों, ऐसी बात नहीं नवग्रहों में कई के पास यह सन्तानें हैं। शनि धूमकेतुओं की संख्या 6, नेपच्यून की 8 है। इसी प्रकार बृहस्पति के घर में अनुमानतः 18 पुच्छल तारे चक्कर काटते रहते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार इनमें किसी प्रकार के जीवन की सम्भावना नहीं है, क्योंकि इनका घनत्व इतना विरल है कि उसमें प्राणियों का रहना सम्भव नहीं है।
यहाँ गुरुत्वाकर्षण वायु-मण्डल की सुरक्षा नहीं रख सकता, प्राणी और पौधे वहीं रह सकते हैं जहाँ ऑक्सीजन और कार्बनडाई-ऑक्साइड पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, यह दोनों गैसें वहीं रह सकती हैं जहाँ गुरुत्वाकर्षण कम न हो। इसलिये यह एक प्रकार की प्राणी विहीन आकाश की सन्तरणडडडडडडडड नौकाएँ भर हैं जो इधर-उधर चक्कर काटती रहती हैं।
कुछ भी हो यह प्रकृति का आश्चर्य ही है। प्रकृति ने इन्हें यदि किसी उद्देश्य से बनाया होगा तो वह उद्देश्य सचमुच कम आश्चर्यजनक न होगा। सम्भव है आगे का विज्ञान इस सम्बन्ध में कुछ अधिक जानकारी दे सके।
यह पंक्तियाँ कम्पोज होने तक ‘बैनेट’ नामक पुच्छल तारे का प्राकट्य भी हो गया। इसे सारे विश्व में अशुभ माना जा रहा है। ऐसा विश्वास है कि यह विश्व में एक नये महाभारत का अग्र घोषक है। भीषण रक्तपात, भूकम्प, तूफान, वायु-दुर्घटनायें बढ़ेंगी, राजनैतिक विवाद बढ़ेंगे, पर भारतवर्ष के लिये यह शुभ है। भारतवर्ष का सम्मान बहुत बढ़ जायेगा और उन्नति की परिस्थितियाँ विकसित होंगी।
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
इस संसार में परिश्रमी को छोड़कर देवगण अन्य किसी की सहायता नहीं किया करते हैं।
शनि की कोप-दृष्टि-
कहते हैं शनि महाराज जिस पर कुपित हो जाते हैं उसे ऐसा कष्ट देते हैं कि बेचारे को नानी याद आ जाती है। कहावत कहाँ तक सच है, कह नहीं सकते- पर शनिदेव असाधारण सुन्दर हैं, यह बात वैज्ञानिकों ने सत्य साबित कर दी है।
किसी दूरबीन से देखें तो पता चलता है कि शनि का आकाश हमेशा 9 चन्द्रमाओं से जगमगाता रहता है। इससे भी जब उन्हें सन्तोष न हुआ तो उन्होंने अरबों चन्द्रमाओं की कंठी पहन ली। यह असंख्य चन्द्रमा अधिक-से-अधिक बच्चों के खेलने की गोली जितने बड़े हैं और लाखों मील मोटी एक पट्टी बनाये हुए हैं- यही पट्टी अरबों मील दूर से देखने पर शनि के किनारे पर वलय (छल्ले) जैसी दिखाई देती है। एक चन्द्रमा सम्पूर्ण कला के साथ निकलता है, तो पृथ्वी कितनी अच्छी लगती है, जहाँ अरबों चन्द्रमा जगमगा रहे होंगे वहाँ के सौंदर्य का तो कहना ही क्या?
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पहले शनि के पास 10 चन्द्रमा थे। एक चन्द्रमा घूमते-घूमते शनिदेव के पास तक चला आया, कुछ शनि से टकराकर उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। अनुमान है कि यह चन्द्र-कंठी उसी चन्द्रमा के टूटे हुए कण हैं। सम्भवतः इसी घटना को लेकर उनकी कोप-दृष्टि प्रसिद्ध हुई होगी। वैसे वे बेचारे इतने हलके हैं कि यदि उन्हें पकड़ कर समुद्र में लाना सम्भव हो, तो वे उसमें डूबेंगे नहीं, अपने हलकेपन के कारण उसी में तैरने लगेंगे। इतने सुन्दर शनि को लोग कोप-ग्रह समझ कर उनसे डरें तो यह उनकी नासमझी और बालकपन ही कहना चाहिए।
संसार में समस्याओं की कमी नहीं। आये दिन पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, राजनीतिक, आर्थिक एवं औद्योगिक समस्यायें सामने आती ही रहती हैं। कभी-कभी अकाल, आधि-व्याधि, महामारी की भयानक समस्या मनुष्य का मस्तिष्क मथित कर डालती है। नित्य नई समस्याओं का समाधान खोजते रहने वाला मनुष्य यदि आज अपने जीवन की सफलता, असफलता, स्वार्थता अथवा व्यर्थता के विषय में सोच-समझ नहीं पा रहा है तो इसे कम दुर्भाग्य की बात नहीं कहा जा सकता। संसार का आश्चर्यजनक काया-कल्प कर देने वाला यह त्वष्टा यदि आज स्वयं का निर्माता नहीं बन पा रहा है तो यह न केवल आश्चर्य, अपितु खेद एवं चिन्ता का महत्वपूर्ण विषय है। धरती पर प्रकृति-प्रदत्त साधनों के साथ मनुष्य ने और न जाने कितनी सुविधायें तथा सुखदायक उपादान स्वयं उत्पन्न कर लिये हैं और उनका एक छत्र अधिपति भी बना हुआ है, तथापि वह दुःखी, असन्तुष्ट तथा संत्रस्त ही बना रहे तो इस विपर्य के लिये क्या कहा जाये? इस प्रकार की विपरीत स्थिति को देखकर यही सोचना पड़ता है कि अवश्य ही मनुष्य कोई ऐसी गतिविधि अपना रहा है जिससे वह सर्व-सम्पन्न होते हुए भी विपन्नावस्था की यातना भोग रहा है। निश्चय ही वह वाँछित मार्ग और अपेक्षित गतिविधियों को त्याग कर विपरीत-पथ तथा अवाँछित गतिविधियाँ अपना रहा है जिनका परिणाम इसके सिवाय और कुछ होना ही नहीं। अन्यथा जो मार्ग सुख-स्वर्ग की ओर जाता हो, जिसका विस्तार शान्ति एवं सम्पन्नता की दिशा में हो उस पर कुश-कंटक, कंकड़-पत्थर और झाड़-झंखाड़ों का क्या मतलब? इस समस्या, इस प्रश्न और इस अनहोनी का कारण-निवारण खोजना ही होगा। मनुष्य को इस अशोभनीय स्थिति से निकल कर अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही स्वरूप प्राप्त करना ही होगा।
जब कोई अपने पद, व्यक्तित्व, स्वरूप, शक्ति एवं उत्तरदायित्व की अनुरूपता से च्युत हो जाता अथवा उसको विस्मरण कर बैठता है तब अवश्य ही उसकी गति-विधि अस्त-व्यस्त एवं अव्यवस्थित होकर इसी प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देती है। इसीलिए ही तो अपनी अनुरूपता को स्मरण रखना एक आवश्यक कर्तव्य बतलाया गया है।
किसी की शक्ति एवं स्वरूप का मूल्याँकन उसके कर्तव्य से और उन्हीं कर्तव्यों से ही उसका पद एवं उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाता है। आवश्यक है कि मनुष्य अपनी शक्ति एवं स्वरूप का स्मरण करे जिससे अपनी वर्तमान स्थिति के प्रति उसकी आँखें खुलें, उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हो, और यह देख समझ कर, उस आत्मग्लानि का उदय हो जो हर निकृष्टता, मलीनता, एवं विरूपताओं को जल्दी ही बदल डालने का क्रियात्मक संकल्प अस्वप्निल कर देती है, कि मुझे किस उन्नत एवं उदात्त स्थिति में होना चाहिये किन्तु मैं किस अधोगति में पड़ा सड़ रहा हूँ!
कल्पना कीजिये संसार के उस आदिम स्वरूप की-जब यह धरती ऊबड़-खाबड़, सर्वत्र नहर, नालों, खड्ड-खंदकों, पर्वतों-गुफाओं, बीहड़ों-जंगलों तथा असमतलताओं से भरी रही होगी। कहीं दलदल, कहीं ज्वालामुखियाँ, कहीं उत्स तो कहीं दावाग्नि अपनी भयंकरता का प्रतिपादन कर रही होगी। संत्रस्त जीव-जन्तु न जाने किस प्रकार और कहाँ शरण लेकर जीवन यात्रा चलाते होंगे! चारों ओर सुनसान, साँय-साँय तथा भय एवं भयानकता का अटल राज्य रहता होगा। इस अनादि विश्व के आदि काल में क्या कभी कहीं पर सुन्दरता अथवा अनुकूलता के दर्शन होते होंगे और यदि अकलात्मक, अपरिमार्जित अथवा अनबूझ आकर्षण की सम्भावना भी रही होगी तो भय एवं सबलों के आतंक के कारण क्या मनुष्य और क्या मनुष्येत्तर प्राणी, कोई भी उसका रस-स्वाद न कर पाते होंगे। नहीं, कदापि नहीं, उस समय प्रत्येक प्राणी भय एवं भूख की भयंकरता से भरे जीवन में मृत्यु की अनुभूति करता रहता होगा।
उस आदिम संसार को आज जैसी स्थिति में लाने का सारा श्रेय मनुष्य को ही है। आज जो हम विशाल भूक्षेत्र पर खेती, बड़े-बड़े उद्योग, पशुशालायें, स्थापत्य, भोजन-वस्त्र, धन, परिवार, समाज, शासन धर्म, कर्त्तव्य, नीति, सदाचार, न्याय, वाणी, विद्या, कला-कौशल, साहित्य, प्रकाशन, मुद्रण आदि की सुविधायें तथा व्यवस्था देख रहे हैं, ये सब मनुष्य की ही बुद्धि तथा प्रयत्न का परिणाम हैं! यदि ब्रह्माण्ड के किसी कोने से आज उस आदिम युग का कोई मनुष्य आ सकता तो वह अपने वंशजों का यह चमत्कारी विकास देखकर चकित हो जाता, और सड़क, सवारियाँ, जहाज आदि को देखकर यह सोचने लगता कि एक दिन जिस धरातल पर खाई-खड्डा, रेत, बालू, लावा आदि के कारण चलना और पैर रखना तक असम्भव सा रहता था, उसी धरातल का ऐसा सुधार, संशोधन तथा परिष्कार!
निस्सन्देह आज के विज्ञान-भूत एवं ज्ञान-जन्य चिकित्सा, रसायन, संगीत, शिल्प, तार, टेलीफोन, रेडियो आदि के आविष्कार सिद्ध करते हैं कि मनुष्य एक अद्भुत, महान एवं चमत्कारी प्राणी है और उसकी बुद्धि विलक्षण वस्तु! किन्तु यह सब विशेषतायें केवल मनुष्य को ही प्राप्त हैं। सृष्टि के अन्य सारे जीव इससे सर्वथा वंचित हैं। सृष्टि के इस आश्चर्यजनक शृंगार में केवल मनुष्य को ही श्रेय है, अन्य प्राणियों तथा जीव-जन्तुओं का कोई हाथ नहीं रहा है। केवल वे ही पशु सामान्य रूप से कुछ सहायक रहे हैं जिन्हें मनुष्य ने चाहा और जिनका उपयोग किया है। उन पशुओं को उपयोगी बनाने में भी मनुष्य का बुद्धि-कौशल ही प्रमुख रहा है।
इस उन्नत स्थिति में होते हुए भी यदि मनुष्य असंतुष्ट, अशान्त एवं विपन्न रहे तो इससे ज्यादा आश्चर्य की क्या बात हो सकती है? जिस प्रकार मनुष्य अपने आगे देवताओं तथा उनके संसार-स्वर्ग की कल्पना करके यह सोचा करता है कि स्वर्ग में कल्प वृक्ष है जो देवताओं को मनोरथ मात्र से ही मनोवाँछित सुख एवं सुविधायें दे देता है। जबकि हम परिश्रम एवं प्रयत्न करने पर भी उन सभी सुखों को नहीं पा पाते जिनकी वाँछा रहती है। कोई न कोई अभाव खटकता ही रहता है। किन्तु वास्तविक बात यह है कि मनुष्य का यह अभाव-अनुभव और कुछ नहीं, या तो अतिलिप्सा अथवा नये-नये सुख साधनों तथा सम्पन्नताओं की वैचारिक-भूमिका है, और अधिक प्रगति एवं विकास की जिज्ञासा का एक रूप है। यदि यह और आगे बढ़ने की कल्पना की कसक है तब तो ठीक है, और जिनके लिये स्वर्ग की कल्पना संसार को और अधिक समुन्नत एवं सुन्दर बनाने के आदर्श का प्रारूप है वे मनुष्य आदर्श मनुष्य हैं जो कभी भी असन्तुष्ट अथवा अभाव-भाव से ग्रस्त नहीं होते। किन्तु जिनकी कल्पना सुख लिप्सा से जन्म लेती है उनका असंतुष्ट तथा अभावानुभव होना स्वाभाविक है। वैसे संसार में न कोई अभाव है और न असम्पन्नता।
दूसरे जीव-जन्तु यदि देख, समझ और अनुभव कर पाते होंगे तो मनुष्य की स्थिति देखकर यही सोचते होंगे कि मनुष्य वास्तव में बड़ा भाग्यवान है। जहाँ उसे जीवन की असंख्य सुख-सामग्रियाँ उपलब्ध हैं, वहाँ हमें एक भी नहीं। यदि किसी प्रकार हम मनुष्य की स्थिति पा सकते तो आनन्द का पारावार नहीं रहता। आज यदि मनुष्य को देवताओं का स्वर्ग उपलब्ध हो जाये तो उसे जितना सुख-सन्तोष प्राप्त हो, उससे लाखों करोड़ों गुना सुख अन्य जीव-जन्तुओं को प्राप्त हो जो मनुष्य की स्थिति प्राप्त करने की वाँछा कर सकते होंगे। मनुष्य की समुन्नत स्थिति और उसके कल्पना के देवताओं की स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं है जबकि मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं की स्थिति में आकाश-पाताल का अन्तर है! तब दुःखी असन्तुष्ट तथा दुःख-दारिद्रय से घिरे रहने में मनुष्य की अपनी भूल तथा त्रुटि होने के सिवाय अन्य क्या कारण हो सकता है? जरूर ही मनुष्य अपनी गतिविधि में कहीं पर भूल करता जा रहा है, और उसी के कारण कोई कारण न होते हुए भी यातना पा रहा है!
बाह्य संसार ही नहीं, मनुष्य ने एक आन्तरिक लोक की रचना भी की है। वह है भावना-लोक। प्रेम, सेवा, करुणा, मैत्री, त्याग संयम, धर्म, उपासना जैसी पारमार्थिक तथा क्रीड़ा, मनोरंजन, विलास, एवं भोग जैसी राजस भावनाओं का भी विकास कर लिया है। निश्चय ही उसने वैचारिक लोक की इन पारमार्थिक प्रवृत्तियों के बल पर ही संसार संज्ञा का महत कार्य सम्पादन किया है। पारमार्थिक विचार ही वे सृजनात्मक विचार हैं जिनकी सक्रियता की पहुँच स्वर्गोपम संसार तक हो सकती है।
किन्तु इसी रचना क्रम में किन्हीं आसुरी छलनाओं से प्रवंचित होकर मनुष्य ने लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, भय, शोक, प्रतिशोध, संघर्ष आदि की तामसी प्रवृत्तियों का भी विकास कर डाला। बस, यहीं पर मनुष्य से भूल हो गई और वह अच्छाई के साथ बुराइयों का भी केन्द्र बन गया। बुराई, अच्छाइयों की अपेक्षा अधिक संक्रामक तथा पल्लविनी होती है। उसने जल्दी-जल्दी मनुष्य के भावना लोक में अपना स्थान बनाकर अपनी प्रतिद्वन्द्विनी पारमार्थिक भावनाओं को दबाना शुरू कर दिया और मनुष्य गुण-अवगुण के द्विविधि चक्र के फेर में पड़ गया।
संसार संज्ञा का महनीय कार्य मनुष्य के सच्चे स्वरूप को स्पष्ट करता है और उसके अनुरूप उससे आशा की जा सकती है कि वह स्वयं भी शान्ति, सुविधा तथा आनंदपूर्वक रहे, और दूसरों को न केवल उस प्रकार रहने दे बल्कि उनसे सहयोग करे। मनुष्य अपने इस कर्तव्य को पूरी तरह समझता तथा करता भी रहा है। यह सहयोग एवं सहकारिता का ही तो पुण्य फल रहा है जो मनुष्य प्रकृति संसार को सुन्दर एवं संस्कृत बना सकता है!
जब तक मनुष्य सर्वश्रेष्ठता के पद पर आसीन है, उसका उत्तरदायित्व कम नहीं हो सकता। उसे संसार को दिन-दिन लाभान्वित करने का यह दायित्व निभाना ही होगा! अपने बड़प्पन, स्वाभिमान तथा प्रतिष्ठा के अनुरूप उसे अपना स्वरूप स्मरण करना ही चाहिए। वह जो कुछ आज करने लगा है उसे छोड़कर उन पारमार्थिक गतिविधियों को जल्दी से जल्दी अपना लेना ही चाहिए जो सृजनात्मक तथा सुख-शान्ति दायक हैं जिनके पुण्य से उसने संसार का कायाकल्प कर डाला है।
कोई निम्न एवं निकृष्ट कोटि का जीवन अवाँछनीय गतिविधि अपना ले, गलत रास्ते पर चल पड़े तो उस पर अधिक खेद नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी अप्रगति से संसार की कोई विशेष हानि नहीं होती। साथ ही उस उपद्रव को रोकने के लिए उसका शासक मनुष्य मौजूद है किन्तु जब यह सर्वसत्तामान मनुष्य ही गलत रास्ते पर चल पड़े उपद्रवी गतिविधि अपना ले तो संसार की अपार क्षति निश्चित है और किन्हीं दूसरे जीव-जन्तुओं में व क्षमता भी नहीं हैं कि वे उसे उसकी अवाँछनीयता से रोक सकें। एक साधारण बकरा यदि उपद्रवी गति अपनाकर बिगाड़ शुरू कर दे तो वह कौन सी अधिक हानि कर सकता है? और वह जल्दी ही कान पकड़कर ठीक कर दिया जायेगा। किन्तु यदि कोई हाथी उन्मत्त हो जाता है और उपद्रव करना प्रारम्भ कर देता है तो वह जरा सी ही देर में न जाने कितने वृक्ष तोड़ सकता है, मकान गिरा सकता है और अनेकों को कुचल सकता है। शक्तिवान की गलत गतिविधियाँ निर्बल की अपेक्षा बहुत हानिकारक तथा भयानक होती हैं। फिर मनुष्य तो संसार का सर्वशक्तिमान प्राणी है। उसकी गलत गतिविधियों की क्षति का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता!
मनुष्य की विशेष शक्तियाँ बुद्धि तथा विचारशीलता ही हैं। ईश्वर ने बुद्धि-शक्ति की कोई सीमा निश्चित नहीं की है। मनुष्य की बुद्धि शक्ति के सम्मुख कुछ भी असाधारण नहीं। जिस बुद्धि बल के सदुपयोग से मनुष्य ने संसार सजा दिया है उससे क्या वह ध्वंस नहीं कर सकता? और आज वह यह सब कर ही तो रहा है। बुद्धि की शक्ति अपार है। बुद्धि दुधारी तलवार के समान होती है वह यदि ठीक से प्रयोग की जाये तो शत्रु को काट सकती है और यदि उसका गलत प्रयोग किया जाये तो अपने को भी घायल कर सकती है। मनुष्य ने आज अपनी बुद्धि शक्ति को गलत दिशा में लगाकर अपने लिये विनाश एवं अशाँति, असंतोष की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर ली हैं। उनसे छुटकारे का एकमात्र मार्ग बुद्धि के दुरुपयोग को रोकना और उसे सन्मार्ग की ओर मोड़ना ही संसार की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
तुम जो चाहो वही अपने को बना सकते हो। श्रेष्ठ या नीच, पवित्र या पापी, चतुर या मूर्ख, अपने आपको बनाने वाले तुम स्वयं ही हो। अपनी जीवन-रेखा को स्वयं ही लिखते हो।
-डॉ. एनी. बिसेन्ट
‘एक था राजा हिरण्यकश्यपु वह बड़ा दम्भी, अहंकारी और अनीश्वरवादी कहा जाता था। उसके राज्य में सर्वत्र हिंसा, लूटपाट, भ्रष्टाचार, सैनिक-सत्ता अन्य अत्याचार का ही जोर था। यज्ञ, जप, तप, स्वाध्याय, सत्संग, परलोक, कर्मफल आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी सारी आस्थाओं का अन्त हो चुका था तब।”
“उसका पुत्र प्रहलाद, जन्म से ही धार्मिक संस्कार लेकर आया, उसके जीवन की सरलता, निष्कपटता, धर्मपरायणता भी हिरण्यकश्यपु को सह्य नहीं हुई सो उसने न केवल धार्मिक प्रजा को वरन् प्रहलाद को भी प्राणघातक यातनायें दीं। कुटिलता के इस कुहासे में धर्म और अध्यात्म का प्रकाश नष्ट हो जाने को ही था कि एक प्रखर सूर्य की भाँति नृसिंह अवतार हुआ और उन्होंने हिरण्यकश्यपु के सारे कपट जाल को कुछ ही दिनों में नष्ट करके रख दिया। प्रहलाद की रक्षा के साथ-साथ धर्म, अध्यात्म, सामाजिक अनुशासन और व्यवस्था की प्रतिष्ठापना करनी थी, सो परमात्मा ने एक अवतार नृसिंह के रूप में लिया।”
“एक बार फिर वैसी ही विद्रूप स्थिति पृथ्वी के राजाओं ने कर दी थी। राजनीति की जो दुर्दशा अब है, ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ तब भी थी जब भगवान परशुराम ने जन्म लिया और सत्ताधारियों के रूप में पनप रहे धर्माडम्बर, पाप और अत्याचार को उन्होंने घूम-घूम कर अपने कराल फरसे की धार से काट गिराया।”
तदनन्तर भगवान राम का जन्म हुआ। दम्भी, पाखण्डी और आसुरी वृत्तियों के प्रतीक रावण को परास्त कर सर्वत्र धर्म-संस्थापन की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया की पूर्ति उन्होंने की, सम्पूर्ण रामायण उसी का अर्थ-इतिहास है।”
“ऐसी ही एक आवश्यकता द्वापर युग में तब प्रतीत हुई थी जबकि एक बार फिर दुर्भावनाओं का जाल कुछ ऐसा बिछा कि भाई ही भाई का गला काटने को तत्पर हो गया। एक ओर छल, कपट, पाप, अत्याचार की 18 अक्षौहिणी जनराशि और दूसरी ओर सत्य, शील, धर्मपरायण कुल पाँच पाँडव। तब उनकी रक्षार्थ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। उन्होंने न केवल कौरवों का विनाश कर दिया वरन् पाप-वृत्ति में डूबे अपने ही यादव कुल में मुशल-पर्व रच दिया था।”
“भगवान किसी व्यक्ति के लिए-वृत्ति के लिये जन्म लिया करता है। महाभाग शौनको! भगवान् ने स्वयं कहा था-
यदायदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थान धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यऽहं॥
हे अर्जुन! जब-जब पृथ्वी पर धर्म का नाश और अत्याचार की बाढ़ आती है, तब-तब मैं मानवीय रूप में अवतरित होकर सृष्टि में व्यवस्था स्थापित करता हूँ, अधर्म का अन्त करके धर्म-संस्कृति सदाचरण की स्वर्गीय वृत्तियों का अवतरण और जनमानस में आच्छादन करता हूँ।”
इतनी कथा सुनने के उपरान्त ज्ञान की अन्यतम जिज्ञासा वाले शौनक मुनियों ने महर्षि लोमहर्षण के पुत्र श्री सूतजी से प्रश्न किया-भगवान! द्वापर तक की कथा हो चुकी, अब आप कृपया यह बताइये कि कलियुग में भगवान का जन्म किस रूप में होगा, उस समय ऐसा कौन सा दुष्ट और अत्याचारी राजा होगा जिसे मारने के लिये लिये भगवान अवतरित होंगे। वह सब कथा भी हमें विस्तारपूर्वक सुनाइये, जिससे हमारा कल्याण हो।”
शौनकों के प्रश्न करने पर श्री सूतजी बोले- “मुनीश्वरों! ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया। उसका नाम रखा गया, अधर्म। अधर्म जब युवक हुआ तक उसका मिथ्या से विवाह कर दिया गया। अधर्म व मिथ्या के संयोग से महाक्रोधी पुत्र दम्भ का जन्म हुआ, उनके माया नाम की एक कन्या भी उत्पन्न हुई। फिर दम्भ और माया के संयोग से लोभ नामक पुत्र और निकृति नामक कन्या हुई। लोभ और निकृति ने क्रोध को जन्म दिया। क्रोध की संयोगिनी हिंसा हुई। इन दोनों के संयोग से काली देह वाले महा भयंकर कलि का जन्म हुआ। काकोदर, कराल, चंचल, भयानक, दुर्गन्धयुक्त शरीर, द्यूत, मद्य, स्वर्ग और वेश्या में निवास करने वाले इस कलि की बहिन दुरुस्ति हुई। इन दोनों ने परस्पर विवाह कर लिया जिससे भयानक नामक पुत्र और मृत्यु नामक कन्या हुई। भयानक और मृत्यु के निरथ और यातना नाम पुत्र-पुत्री उत्पन्न हुए। इन दोनों के संयोग से हजारों अधर्मी पुत्र पैदा हुए जो आधि, व्याधि, बुढ़ापा, दुःख, शोक आदि में रहकर यज्ञ, स्वाध्याय, दान, उपासना, आदि का नाश करने लगे।”
-(कल्कि-पुराण 1-22 श्लोक तक)
सारी पृथ्वी में आई अधर्म व दुःखों की बाढ़ और उसकी बौछारें स्वर्ग लोक तक पहुँचती देखकर देवगण बड़े चिन्तित हुए। वे पृथ्वी को आगे करके प्रजापति ब्रह्मा के पास गये ओर बोले-भगवान कलियुग के अधर्मों के कारण पृथ्वी बुरी तरह भयभीत हो रही है। वहाँ सीधे सज्जन व भावनाशील लोगों को बुरी तरह कष्ट मिल रहा है। अब कुछ ऐसा कीजिए कि पृथ्वी सर्वनाश से बच जाये। तब प्रजापति विधाता पृथ्वी और देवताओं को लेकर विष्णुलोक गये और भगवान श्रीहरि से देवताओं की सारी विनती कह सुनाई तब भगवान ने प्रसन्न होकर पृथ्वी पर आने और अवतार लेने का अवतार लेने का वचन दिया।
- (कल्कि पुराण 2/1/7)
ऊपर की पंक्तियों में चल रहा आख्यान वस्तुतः कोई नामधारी राजा के वंश का वर्णन न होकर कलियुग के आविर्भाव का भाव-चित्रण मात्र है। उसे इतनी कुशलता से और सूक्ष्म बुद्धि से उपस्थित किया गया है कि वर्तमान युग की व्याख्या में किसी को सन्देह न रह जाये।
यह कलियुग है सही, पर न तो आजकल भी किसी के क्रोध हिंसा, यातना, दम्भ, लोभ, निकृति आदि नाम होते हैं और न ही अभी सामाजिक परम्पराएँ इतनी विकृत हुई कि सगे भाई-बहनों में सम्बन्ध होने लगें। आख्यान पूरा-का-पूरा भाववाचक है और दुर्गुणों की क्रमिक वंशावली का कलात्मक प्रतीक है। यह एक प्रकट तथ्य है कि मनुष्य कोई पाप करता है तो उसे तुरन्त छिपाने की आवश्यकता पड़ती है, तब वह झूठ बोलता है। पाप और झूठ के संयोग से ही दम्भ बनता है। मायाचार उसका दूसरा रूप है। यदि दम्भ व माया जहाँ मिलते हैं वही लोभ की उत्पत्ति होती है। इस तरह यह वंशावली बढ़ते-बढ़ते हजारों प्रकार की पाप-वासनाओं, बुराइयों, विकृतियों के रूप में फैल जाने का नाम ही युग की विकृति या कलियुग है। कलियुग का नाम लेते ही एक ऐसे युग का बोध होता है जिसमें पाप, अधर्म, अत्याचार, हिंसा, सर्वनाश की विभीषिकाएं, यातनाएं रोग, वृद्धावस्था, दैन्य, दारिद्रय का सर्वत्र बाहुल्य हो उठे। यह सब परिस्थितियोंवश हुआ इसके लिये किसी एक व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता। ब्रह्माजी का एक नाम विधि भी हैं। उसका अर्थ है कि काल-क्रम में इस तरह की परिस्थितियों का आविर्भाव भी होता ही रहता है।
ज्ञान-सम्पादन, यज्ञ आदि परमार्थी वृत्तियाँ नष्ट हो जाने के कारण सारी पृथ्वी के लोग दुःख पाने लगते हैं तब कुछ विचारशील लोग पीछे लौटते हैं और सृष्टि-प्रक्रिया पर ध्यान देकर देखते हैं कि यदि धरती पर कभी सुख-समृद्धि रही है तो वे परिस्थितियाँ कौन-सी थीं। उनसे निष्कर्ष निकल सकना सम्भव नहीं होता तो वे किन्हीं समर्थ व्यक्तियों की संरक्षता में एकत्रित होकर उन परिस्थितियों की छानबीन करते हैं और फिर उनको अवतरित करने की दिशा में कार्यरत भी होते हैं। अवतार का काम इन भावनाशील आत्माओं को जोड़ना और उनके द्वारा एक नये युग के निर्माण की सशक्त विचार-प्रक्रिया को क्रिया-पद्धति में ढालना होता है।
कल्कि अवतार की भाव-भूमिका पर प्रकाश डालते हुए श्री सूतजी अगले श्लोकों में लिखते हैं कि- देवता धरती को आगे करके ब्रह्माजी के पास गये और उनके समक्ष धरती से अपने दुःखों का वर्णन करवाया। ब्रह्माजी देवताओं को लेकर विष्णुलोक गये। भगवान विष्णु ने पृथ्वी की विरद सुनी और आश्वासन दिया कि हम तुम्हारे कष्ट दूर करने के लिये अवतार लेने आ रहे हैं। फिर देवताओं से कहा-तुम लोग मेरी सहायतार्थ जाकर पृथ्वी में स्थान-स्थान पर जन्म लो।
उपयुक्त आख्यान से भी यही बात स्पष्ट है। पृथ्वी स्थूल पदार्थों का जड़ पिंड हैं, वह न तो अपनी कक्षा को छोड़कर किसी लोक में जा सकती है और न किसी से कुछ निवेदन कर सकती है। सम्पूर्ण कथानक का आशय यही है कि जब पृथ्वी अज्ञान, अधर्म और पाप-वासनाओं के अन्धकार में बुरी तरह घिर गई तो प्रजापति अर्थात् विधि-व्यवस्था ने एक अति सार्वभौमिक मानवीय सामर्थ्यों से सम्पन्न सत्ता को प्रकट किया। वह सत्ता जन्मी अकेले पर उसको साथ देने वाले भावनाशील देवपुरुषों की पंक्तियाँ-की-पंक्तियाँ उठ खड़ी हुई और देखते-ही-देखते अधर्म का विनाश करने वाली प्रक्रिया प्रचण्ड रूप से सुदर्शन चक्र की भाँति सारे संसार में घूमने लगी। इस तमाम घटना-चक्र के संचालन का श्रेय किसी भी व्यक्ति को मिले, यह अलग बात है पर सम्पूर्ण अवतारों की कथाएँ और श्री सूतजी द्वारा वर्णित कल्कि अवतार का कथानक इसी बात का संकेत करता है कि अब पाप और अधर्म, द्वेष और दुष्प्रवृत्तियाँ जन-जन में मन-मन में घुस गई हैं, उनको काटने के लिए एक तीक्ष्ण विचार-प्रणाली और संघ शक्ति के रूप में ही कल्कि का अवतरण होना चाहिए। जो लोग इस पुनीत उद्देश्य में सहायक होंगे वही देवताओं के अंशावतार व भगवान कल्कि के साथी, सहयोगी, शिष्य, भक्त, देवात्माएँ होंगी।
युग निर्माण योजना का जन्म ऐसी ही भावनाशील आत्माओं का गठबन्धन और कर्तृत्व है। कुछ ही दिन में इन्हीं देवात्माओं के कर्त्तव्य-कन्धों पर विराजमान कल्कि के दर्शन करने को मिल जायें तो उसे अतिशयोक्ति न माना जाये। कल्कि पुराण इस बात का प्रत्यक्ष साक्षी है कि युग-निर्माण योजना विशुद्ध रूप से ईश्वरीय प्रेरणा उन्हीं की इच्छा की पूर्ति है। हम जो कर रहे हैं उसमें उन्हीं की प्रेरणा एवं इच्छा प्रमुख रूप से काम कर रही प्रतीत होती है।
कल्कि पुराण में प्रतिपादित विश्व-व्यवस्था के दो प्रमुख आधार (1) उपासना और (2) यज्ञ, यही दो आधार युग-निर्माण योजना के भी हैं। उपासना के दो भाग हैं- (1) धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्व-दर्शन (धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल, परमात्मा, जगत-नियन्ता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (2) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की और अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती है जो अपनी प्रसन्नता के लिये हम औरों से चाहते हैं।
यज्ञ भी उसी प्रकार स्थूल व सूक्ष्म दो भागों में बँटा है (1) स्थूल यज्ञ आकाश जो पृथ्वी को परिमण्डलाकार घेरे हुए है उसकी शुद्धि विषैले तत्वों को मारने के लिये अग्निकुण्ड में शुद्ध वस्तुओं का हवन, (2) सूक्ष्म यज्ञ या ज्ञान यज्ञ जिसे व्यक्तिगत एवं समाज की दूषित चिन्तन प्रणाली को विचार मन्थन की अग्नि में जलाकर उसमें सद्विचारों और सत्कर्मों की निरन्तर आहुतियाँ जिससे विचार और कर्म में सत्प्रवृत्तियों का समावेश हो जाये। कल्कि पुराण के अनुसार भगवान कल्कि की कार्यप्रणाली ऐसी ही है।
सूतजी बोले- हे शौनकों! जब कल्कि भगवान कुछ बड़े हुए तब उनके पिता विष्णुयश शर्मा ने कहा-
तात ते ब्रह्मसंस्कारं यज्ञसूत्र मनुत्तमम्।
सावित्रीं वाचयिष्यामि ततो वेदान्पठिष्यसि॥ -कल्कि पुराण 2/35
वत्स! अब तुम्हारा ब्रह्म संस्कार उपनयन और सावित्री का श्रवण कराऊँगा फिर तुम वेदाध्ययन करना।
इस पर कल्कि पूछते हैं-
को वेदः का च सावित्री केन सूत्रेण संस्कृताः।
ब्राह्मणा विदिता लोके तत्वत्वं वद तात माम्॥ -कल्कि पुराण 2/36
“हे तात्! यह वेद क्या है? सावित्री क्या है? किस सूत्र से संस्कारित पुरुष ब्राह्मण कहलाता है?” इतना पूछने पर विष्णु शर्मा ने इसी अध्याय के 37 से 40 श्लोकों में बताया- वेद भगवान विष्णु की वाणी और सावित्री ही प्रतिष्ठा अथवा वेदमाता है। त्रिगुण-सूत्र को त्रिवृत्ताकार करके धारण करने पर मनुष्य पवित्र ब्राह्मण होता है। ब्राह्मण ही ब्रह्मवर्चस के अधिकारी होते हैं, उन्हें दस संस्कार, दस यज्ञ शुद्ध करते हैं तब वे यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, स्वाध्याय, संयम और भक्ति करते हुए ब्रह्मा-विभूति करते हैं।
तत्पश्चात् वे कल्कि का उपनयन संस्कार कराकर गायत्री उपासना की शिक्षा देते हैं। कल्कि भगवान् इसी गायत्री तत्व और संस्कारों द्वारा जनमानस को संशोधित करते और उन्हें यथार्थ में ईश्वर-बोध कराने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसलिये यह कहा जा सकता है कि गायत्री-उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायक गण वह देवात्मायें ही होती हैं, जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती हैं।
कोई भी नई प्रतिष्ठा संघर्ष में जन्म लेती है। नन्हा-सा अंकुर भी पृथ्वी की छाती चीरता है तभी बाहर आ पाता है। पुत्र-प्रसव में नारी को कितना कष्ट उठाना पड़ता है, यह सब जानते हैं। समाज में फैली हुई अन्ध तमिस्रा को दूर करने वाले अतीत के महापुरुषों में से किसी का भी वृत्त उठाकर देख लिया जाये उन्हें संघर्ष और परिस्थितियों को, चुनौती को अनिवार्य रूप से स्वीकार करना पड़ा है, यह सिद्धाँत सभी युगों में एक समान रहा है।
कल्कि की युग-निर्माण प्रक्रिया भी इसी तरह सम्पन्न होने को है। कल्कि पुराण के षष्टम अध्याय में 41 से 45 श्लोकों तक कथा आती है-अत्यन्त विस्तार वाला बौद्धों का निवास स्थान कीकटपुर था। बौद्ध लोग न देवताओं को मानते हैं, न पितरों और परलोक को। देहात्मवादी, कुलधर्म, जातिधर्म न मानने वाले धन, स्त्री और भोजनादि में अभेद अर्थात् कोई भेदभाव न करने वाले-खाने-पीने में ही जो जुटे रहते हैं, उन्होंने भगवान कल्कि का आगमन सुना तो वे अति क्रुद्ध होकर सम्पूर्ण दल-बल के साथ उन पर आक्रमण करने लगे।
इस बौद्ध से बौद्ध धर्मानुयायियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। वस्तुतः यह बौद्ध न तो कोई विशेष धर्म-सम्प्रदायक व्यक्ति है और न कीकटपुर नाम की उनकी कोई राजधानी है। बौद्ध का अर्थ आधुनिक सभ्यता से प्रभावित वह लोग हैं जो आज अपने को बुद्धिमान् मानते हुए थकते नहीं। उनमें आज अक्षरशः वह गुण देखे जा सकते हैं जो ऊपर बौद्धों के कहे गये हैं। आज विज्ञान इतना बढ़ गया है तथापि उपासना देवार्चन, यज्ञ, ध्यान, परलोक, पुनर्जन्म आदि को कोई नहीं मानता। खाना, पीना, प्रजनन और पैसा जुटाना यही लोगों के लक्ष्य रह गये हैं। शील, सच्चरित्रता नष्ट होते जा रहे हैं। इन बुद्धिवादियों को ठिकाने लगाने का एक महत्वपूर्ण कार्य युग-निर्माण प्रक्रिया का अंग है और वह धर्म के प्रबुद्ध स्वरूप के विस्तार द्वारा ही सम्भव है। लोहे को लोहा काटता है, विष को विष मारता है। विज्ञान की जिस मान्यता ने लोगों को कुमार्गगामी बनाया है वही दिशायें यदि आध्यात्म की ओर मोड़ दी जायें तो उससे आज के लोगों की इस देह को ही सबकुछ मानने वाली धारणा को उसी प्रकार काटा जा सकता है जैसे कल्कि बौद्धों की सेना को काटते हैं।
कल्कि पुराण के 16 वें अध्याय में यज्ञानुष्ठानों की विस्तृत प्रक्रिया का वर्णन है। वे कृपाचार्य, परशुराम, वसिष्ठ, व्यास, धौम्य आदि ऋषियों के साथ राजसूय एवं वाजपेय यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे। यज्ञ धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि देने वाले कहे गये हैं, पर यह अकेले राजसूय यज्ञों से सम्भव नहीं, वाजपेय अर्थात् ज्ञानयज्ञ और अश्वमेध अर्थात् बुराइयों को काटने का अभियान-यज्ञ भी साथ-साथ चलेगा। उसी से आकाश की शुद्धि के साथ जन-मानस का भी परिहार सम्भव है।
सच बोलने के लिये भी दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है- बोलने वाले और सुनने वाले की।
समाज-सुधार और धर्म-प्रतिष्ठा के यह महत्वपूर्ण कर्म कलाप कल्कि भगवान् पूर्ण करेंगे, वही यह युग-निर्माण मिशन कर रहा है। यह ईश्वरीय प्रेरणा ही है, जो उसे समझकर जितना सहयोग देगा, वह अवतार की उतनी ही समीपता और आशीर्वाद का अधिकारी होगा। कल्कि पुराण में इसी तथ्य का प्रतिपादन अलंकारिक किन्तु प्रखरता पूर्वक भली प्रकार देखा जा सकता है।
युग निर्माण के लिये इस वर्ष ‘ज्ञान यज्ञ’ की ज्योति, इस सीमा तक प्रज्वलित की जा रही है कि उसे हवा का कोई झोंका बुझाने में समर्थ न हो वरन् विपरीत परिस्थिति भी उसे अधिक प्रदीप्त होने की प्रतिक्रिया ही उत्पन्न कर पायें। इसलिये आगामी मई मास तक बिना चित्त को अस्त-व्यस्त किये हम एकनिष्ठ भाव से विदाई वर्ष के रूप में ज्ञान यज्ञ की दस सूत्री योजना पूरी करते रहें यही उचित है। अब तो कुछ महीने ही शेष बचे हैं। इस छोटी सी अवधि में हमें नींव में मजबूत पत्थर भरने की चेष्टा में तत्परतापूर्वक निरत हो जाना चाहिए। आलस्य में समय बिता देने पर हम अपना पवित्र कर्तव्य पालन भी न कर सकेंगे यदि हमारे थोड़े-थोड़े योगदान से विश्व मानव की जो महान अभ्यर्थना हो सकती थी तो वह भी न हो सकेगी। जिनका यह क्रम अनियमित है उन्हें संकल्पपूर्वक दिनचर्या के अनिवार्य अंश में उपासना और स्वाध्याय को सम्मिलित करने के लिये कहा गया है। अपने परिवार के सभी लोग यदि इस प्रक्रिया को दृढ़ता पूर्वक अपना लें तो उनके आत्म-बल में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि होगी और उस निष्ठा का दूसरों पर भी प्रभाव पड़ेगा। ज्ञान यज्ञ वर्ष में इस साधनात्मक अनुक्रम को नियमितता पूर्वक चलाया जाने लगे तो यह बहुत बड़ी बात होगी और अपने परिजनों का व्यक्तित्व बहुत निखरेगा। जो उच्च स्तर की साधनायें करना चाहेंगे उनके लिये साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
इस थोड़ी सी अवधि में परिजन कुछ विशेष उत्साह और पुरुषार्थ प्रकट कर सकें तो नव निर्माण के महान अभियान में आशाजनक प्रगति दृष्टिगोचर हो सकती है। गत अंक में कुछ विशेष उद्बोधन इस संदर्भ में किया गया है। व्यक्तिगत उपासना की नियमितता, व्यवस्थित स्वाध्याय का क्रम व्यक्ति निर्माण के लिए एक अमोघ साधन सिद्ध हो सकता है। छुट-पुट एवं अस्त-व्यस्त क्रम से कभी बहुत, कभी कुछ नहीं वाली बात चलाते रहने से कोई आशाजनक परिणाम नहीं निकलता पर यदि निरन्तर नियमित और क्रमबद्ध रूप से उसी प्रक्रिया को चलाया जाय तो थोड़ा सा प्रयत्न भी कहने लायक सफलता उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जो नियमित रूप से दोनों साधनायें चलाते हैं उन्हें अधिक गहरी निष्ठा का समावेश करने और घरेलू ज्ञान मन्दिर और चल पुस्तकालयों की स्थापना के लिये व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्नों को इस वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य माना जाना चाहिए। एक घंटा समय और दस पैसा रोज देने वाली प्रक्रिया अपने परिवार की सदस्यता की एक अनिवार्य शर्त बना दी गई है। जिनके द्वारा युग-निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में भूमिका सम्पादन करने की आशा की जाय उनका कर्तव्य न्यूनतम इतना तो होना ही चाहिए, जो भावी कार्यक्रम की रूप-रेखा नियोजित करेंगे।
जो दस पैसे रोज देंगे उनके घर में घरेलू पुस्तकालय ‘ज्ञान मन्दिर’ की स्थापना हो जाय। यह ज्ञान मन्दिर अखण्ड-दीपक की तरह अपने क्षेत्र में नव-निर्माण का- विचार क्रान्ति का- प्रकाश फैलाते रहेंगे। कार्तिकी अमावस्या की इस सघन तमिस्रा में जबकि सूर्य और चन्द्रमा ने असहयोग ठान रखा है इन दीपकों को जलाकर दिवाली मनाई जायगी और वह दीप पर्व अपना अनुपम आदर्श प्रस्तुत करेगा। युग निर्माण के लिये अब किसी अवतार-महात्मा-देवता या स्वर्ग दूत की प्रतीक्षा में देर तक न बैठा रहना पड़ेगा। हम छोटे-छोटे अणु कण ही संघबद्ध होकर एक विशिष्ट शक्ति प्रवाह का आविर्भाव करेंगे और प्रस्तुत विडम्बनाओं एवं विभीषिकाओं से उसी स्वल्प सामर्थ्य के बल पर लोहा लेंगे।
इस वर्ष हमें पूरी तत्परता के साथ अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने में लग जाना चाहिए। यों कितने ही सज्जन यह प्रयत्न थोड़ा-थोड़ा करके सदा ही करते रहते हैं पर इस वर्ष इस दिशा में कुछ अधिक काम होना चाहिए। अपने क्षेत्र के सभी सुसंस्कारी शिक्षितों की लिस्ट बनानी चाहिए और एक-एक करके कुछ अंक उन्हें इस पत्रिकाओं के नमूने के तौर पर पढ़ाने चाहिएं। गत डेढ़ वर्ष के अंक इसके लिये अपने तथा दूसरों के इकट्ठे कर लेने चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि जितने अधिक लोगों को वे पुराने अंक जितनी अधिक संख्या में पढ़ाये जा सकें एक महीने में पढ़ा लिये जायें। मुफ्त में ऐसे सुरुचिपूर्ण अंक पढ़ने से शायद ही कोई इनकार करे। यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाने के उपरान्त अकेले ही अथवा टोली बनाकर उन सब सज्जनों के पास इन पत्रिकाओं के सदस्य बनने का अनुरोध करने जाना चाहिए इस प्रक्रिया के अनुसार यह आशा की जा सकती है कि जिनने इन अंकों को पढ़ा होगा उनमें से आधे चौथाई अवश्य सदस्यता स्वीकार कर लेंगे। यह कार्य योजना इस रूप में एक क्षेत्र में यदि लगातार एक महीने भी चला लिया जाय और जब मिला जाय-मिशन का विस्तृत परिचय थोड़ा-थोड़ा करके कराया जाय-तो निश्चय ही अपने मिशन की वाणी-इन पत्रिकाओं का क्षेत्र निश्चित रूप से दूना चौगुना हो सकता है और उसके साथ ही अपने मिशन की गतिविधियाँ उसी अनुपात में दूनी चौगुनी बढ़ सकती हैं। अपना कार्यक्षेत्र, प्रभावक्षेत्र जितना बढ़ाना हो उसके लिये उसी अनुपात में पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील होना चाहिए।
इस वर्ष हममें से प्रत्येक को कम से कम दस व्यक्तियों से संपर्क तो साध ही लेना चाहिए। स्वयं स्वाध्याय करने और घर परिवार के लोगों की युग-निर्माण साहित्य में विचारधारा से लगातार सम्बद्ध करते रहने के अतिरिक्त बाहर के ऐसे दस व्यक्तियों से अपना संपर्क बन जाना चाहिए जो इस विचार धारा में पूरा-पूरा रस लेने लगें और अपनी ही तरह नव-निर्माण के लिए कुछ करने के लिये उत्सुकता प्रकट करने लगें।
जब तक ‘अपना एक घंटा समय और दस पैसा’ अपने तथा परिवार की सीमा तक ही प्रकाश उत्पन्न करता है तब तक समझना चाहिए कि शिक्षा-दीक्षा पूरी नहीं हुई। अपने घर मुहल्ले-गाँव, प्रान्त में बंटकर कही भी ‘एक से दस’ वाली शृंखला पूरी करनी ही चाहिए। उस बीज की क्या सार्थकता जो नये दस दाने भी उत्पन्न न कर सके। यह नये सदस्य-नये दाने-नये पुष्प भी विकसित होकर इस महान अभियान को अग्रगामी बनाने के लिये तब तक काम करेंगे जब तक कि वे भी नये दस सदस्य न बना लें। हम लोगों की तरह उन्हें भी अपनी प्रथम कक्षा में तभी आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा जब वे भी दस साथियों का-दस उत्तराधिकारियों का-उत्तरदायित्व पूरा कर लें। यह एक से दस की शृंखला अपने ढंग से चलती रहेगी। परिपक्व और प्रशिक्षित वर्ग अगला मोर्चा सँभालता चलेगा।
‘चल पुस्तकालय’ विचार क्रान्ति की दृष्टि से अनुपम परामर्श केन्द्र कहे जा सकते हैं। स्पष्ट है कि मानव जाति की दुर्गति उसका विचार स्तर गिर जाने से हुई है। प्रगति का एकमात्र आधार सोचने और चाहने की दिशा बदल देना ही है। इसके अतिरिक्त पतन को रोकने और उत्थान को गतिशील करने का और कोई मार्ग नहीं। इस परिवर्तन के लिए जिस विचार क्रान्ति की जरूरत है वह युग-निर्माण साहित्य जैसे ज्वलन्त उपकरणों से ही सम्भव है। इस दृष्टि से चल पुस्तकालय की योजना अद्वितीय है। स्थायी पुस्तकालय स्थापित करके भी देख लिये, वहाँ भी केवल घटिया चीजें पढ़ने वाले पहुँचते हैं। उत्कृष्टता की अभिरुचि है ही नहीं तो बेचारा पुस्तकालय भी क्या करे। इस अभिरुचि को जगाना हमारा आरम्भिक कर्म है। चल पुस्तकालय से ही यह प्रयोजन पूरा हो सकता है।
योजना यह है कि एक गाड़ी और साहित्य मँगाने के लिए लगभग एक हजार रुपये की पूँजी जुटाई जाय। प्रबुद्ध व्यक्ति अवकाश के दिन या अवकाश के समय इस गाड़ी को लेकर बाजारों और गली मुहल्लों में जाया करें। पहले विज्ञप्तियाँ पढ़ाने और लौटाने का क्रम चले। पीछे जिनमें रुचि जगती दीखे उन्हें ट्रैक्ट पढ़ने को दिये जायें और जो अधिक आकर्षित हों उन्हें अपना प्रिय साहित्य खरीदने- घर में पढ़ाने और पड़ोसियों को देने का अनुरोध किया जाय। इस प्रकार यह ‘चल-पुस्तकालय’ प्रचार और विक्रय दोनों की ही व्यवस्था बनाये रह सकते हैं। कोई उपयुक्त व्यक्ति मिल जाय तो पूरे समय के लिये उसकी नियुक्ति भी हो सकती है, वह स्वयं भी यह कार्य अपनी ओर से करता रह सकता है। ऐसा सम्भव न हो तो मिल-जुल कर यह चल पुस्तकालय गतिशील रखने का प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। युग-निर्माण शाखाओं का यह अति महत्वपूर्ण संस्थापन है। जो भावना को प्राथमिकता देते हों- उनके लिये भी विदाई वर्ष का हमारा अति महत्वपूर्ण स्मारक बनाने की दृष्टि से भी यह सस्ती किन्तु महंगे मन्दिर, धर्मशालाओं से लाख गुनी अधिक उपयोगी यह चल पुस्तकालयों की योजना है।
सर्वविदित है कि प्राचीन काल में राजसूय यज्ञ अश्वमेध जैसे होमात्मक कर्मकाण्ड के साथ-साथ अस्त-व्यस्त राजनैतिक परिस्थिति को नियंत्रित व्यवस्थित एवं सुसंचालित करने की प्रक्रिया के साथ-साथ सम्पन्न होते थे। उनमें देव पूजन के साथ-साथ संगतीकरण का प्रयोजन भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता था। इसी प्रकार गायत्री यज्ञ जैसे वाजपेय यज्ञों में आहुतियों मात्र का अग्निहोत्र ही न होता था वरन् तत्कालीन भावनात्मक अस्त-व्यस्तता का निरूपण, नियंत्रण एवं परिष्कार करना भी प्रमुख प्रयोजन रहता था। अपनी कार्य पद्धति में वे दोनों तत्व जुड़े हुए हैं जिनके मिलने से वाजपेय यज्ञों की उपयोगिता सिद्ध होती है।
अपने अभियान को यज्ञ आन्दोलन कहा जाता है। उसमें वायु शुद्धि, तत्वों का निवारण, मनो-विकारों का शमन, प्राण वर्षाएं (जल वर्षा मात्र नहीं), देव पूजन, मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन सूक्ष्म जगत में दिव्य चेतना का प्रवाह विश्व शान्ति आदि अनेक प्रत्यक्ष प्रयोजन जुड़े हुए हैं, साथ ही यज्ञीय जीवन जीने की प्रेरणा, दुष्प्रवृत्तियों का हवन और सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन भी जुड़ा हुआ है। यज्ञ संपर्क में आने वाले अपनी असुरता का एक अंश छोड़ें और देवत्व का एक अंश बढ़ायें यह प्रक्रिया भी पूर्ण करनी पड़ती है। मात्र आहुतियाँ देकर पुण्य फल का भागी हो जाना अपनी स्थिति के अनुसार सम्भव नहीं माना जाता। हर याज्ञिक को अपने जीवन में यज्ञीय आदर्श तत्वों को जितनी अधिक मात्रा में समाविष्ट कर सकना सम्भव हो उसके लिए भली प्रकार समझाया और दबाया जाता है। इस प्रकार दो पहियों से चलने वाला अपना रथ भले ही मन्दी गति से चल रहा हो पर अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए सुसंगत ढंग से गतिशील हो रहा है।
इस वर्ष पाँच-पाँच कुण्ड के 200 गायत्री यज्ञों की विशाल शृंखला के अंतर्गत एक अखण्ड सहस्र कुण्डी महायज्ञ किया जाना है, जिनके साथ युग-निर्माण सम्मेलन भी जुड़े हुए होंगे। अग्निहोत्रों की दिव्य धर्म प्रक्रिया के साथ इनमें उस रीति को भी कुशलतापूर्वक मिलाया जाना चाहिए जिससे व्यक्ति का जीवन यज्ञमय बनें और सामाजिक जीवन में प्रेम परमार्थ की यज्ञ परम्परायें चल पड़ें।
यों अक्टूबर 70 में शिविर समाप्त होते ही मई 71 तक छह महीने तक सहस्र कुण्डी, शत कुण्डी यज्ञ करने के लिये जन उत्साह का बाँध टूटा पड़ रहा है। लगता है पाँच प्रान्तों में सहस्र कुण्डी प्रान्तीय गायत्री सम्मेलन होंगे और शत कुण्डी यज्ञों की एक बहुत बड़ी शृंखला चलेगी। फिर भी इन पाँच कुण्डी यज्ञों का अपना महत्व है। इनके माध्यम से ही छोटी देहातों तक में अपने महान आन्दोलन का प्रकाश पहुँचाया जा सकेगा। जिन लोगों ने कुछ महीने का समय देने की उदारता दिखाई है उस समय को इन यज्ञों को उत्पन्न करने व्यवस्थित करने तथा सफल बनाने के लिये योगदान देना है। हमें इन सभी छोटे-बड़े यज्ञों को मात्र अग्निहोत्र न रहने देकर समान जन चेतना जगाने का आधार बनाया जाना चाहिए।
अपने इस गायत्री यज्ञों के साथ-साथ ज्ञान यज्ञ की प्रक्रिया प्रधान रूप से जुड़ी रहेगी। इन यज्ञों के यजमानों को सक्रिय कार्यकर्ता की शर्त-1 घण्टा समय तथा दस पैसा की पूरी करने के लिये प्रोत्साहित किया जाय। इस माध्यम से हम अगणित नए सक्रिय कार्यकर्ता उत्पन्न कर सकते हैं। विज्ञप्तियों का वितरण, मिशन से संबद्ध प्रवचनों की सुव्यवस्थित तैयारी, गाँव की दीवारों को सद्वाक्यों से लिखना, एक घण्टा समय और दस पैसा देने वाले सदस्यों की संख्या-वृद्धि तथा ज्ञानयज्ञ के सच्चे प्रतीक ‘चल-पुस्तकालय’ की स्थापना जैसे कई प्रयोजन उनके साथ सम्मिलित हैं इसके लिये उनकी व्यवस्था में उपरोक्त तथ्यों का कुशलतापूर्वक समावेश करना होगा।
इन सम्मेलनों में ऐसे प्रवचनकर्ता ही आमन्त्रित किये जाने चाहिए, जिनको अपने मिशन का परिपूर्ण ज्ञान हो और योजना के संदर्भ में व्यवस्थित रीति से बोल सकें। अजनबी, अपने मिशन से अपरिचित लोगों को चाहे वे विद्वान या बाबाजी ही क्यों न समझे जाते हों, अपनी व्यास पीठों पर नहीं आने देना चाहिये। अजनबी लोग कई बार ऊट-पटाँग और अव्यवस्थित बकवाद करके सुनने वालों का समय खराब करते और निर्धारित विचारधारा से प्रतिकूल प्रतिपादन करते हैं। हमें इस संदर्भ में बहुत ही सावधान रहना चाहिए कि इतने प्रयत्नपूर्वक बुलाई गई जनता का बहूमूल्य समय केवल अपने प्रतिपादन के अतिरिक्त बेकार की बातें सुनने में नष्ट न होने पावे। अपने वक्ता हमें आप तैयार करने चाहिएं और जिससे प्रवचन कराना हो, उसे बहुत पहले से अपने विषयों की तैयारी करने के लिये कहना चाहिये।
उपरोक्त चार संस्कारों को अपने यज्ञ आयोजनों के साथ जोड़कर हम इन धर्मानुष्ठानों को विश्व की एक महती आवश्यकता पूरी करने में लगा सकते हैं। (1) शिखा रक्षण (मुँडन संस्कार) की व्याख्या में विचार क्रान्ति, (2) यज्ञोपवीत के माध्यम से नैतिक क्रान्ति, (3) आदर्श विवाह संस्कारों के माध्यम से सामाजिक क्रान्ति और (4) वानप्रस्थ संस्कार का प्रचलन करके आध्यात्मिक एवं धार्मिक क्रान्ति का बीजारोपण कर सकते हैं। यह प्रतीक देखने में छोटे लगते हैं पर गाँधीजी के नमक सत्याग्रह की तरह अन्ततः परतन्त्रता का आमूलचूल उन्मूलन करने में सफल हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि यज्ञ-व्यवस्था बनाने के साथ-साथ उपरोक्त चार संस्कार कराने वाले भी तैयार किये जाते रहें और यदि चार दिन के आयोजन हैं तो हर दिन उपरोक्त चार सम्मेलनों का क्रम चलाते हुए- उनके आदर्श-प्रदर्शन तथा मार्मिक प्रवचन जुटाने का प्रबन्ध कर सकते हैं। यहाँ यह भी ध्यान रखना है कि उपरोक्त प्रयोजन पर अपने मिशन के अनुरूप व्याख्या करने वाले प्रवचनकर्ता विशेष रूप से तैयार किये जायं। ऐसे ही उट-पटाँग कुछ भी बकते रहने वाले तथाकथित विद्वानों और बाबाजियों को जनता का समय बर्बाद करने के लिये बोलने को खड़ा न कर दिया जाय। चतुर्मुखी महाक्रान्ति के लिये आग फूँक सकने वाला समर्थ वक्ता ही अपने यज्ञों के मूल प्रयोजन की ओर जनता की मनोदशा मोड़ने में समर्थ हो सकते हैं। सो विशेष सतर्कतापूर्वक उनके लिये भी पहले से ही प्रबन्ध किया जाय। गायन, भजन और संगीत की व्यवस्था यदि की जानी है तो कुछ भी रेंकने लगने के बजाय उनका पहले से ही प्रशिक्षण कर रखना चाहिए।
हम कुछ ही महीनों बाद उग्र तपश्चर्या के लिये एकाँतवास के लिये चले जायेंगे। इससे कोई यह न समझ ले कि हम पलायनवादी बनकर सामने पड़े हुए कर्तव्यों से विमुख हो रहे हैं और व्यक्तिगत स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि की लिप्सा में संलग्न दूसरे स्वार्थी वैरागियों की तरह संसार को माया-मिथ्या बताकर कर्तव्यों से भाग खड़े होने की बात सोच रहे हैं। जिस रीति−नीति को हमने जीवन भर गालियाँ दी हैं और पानी पी-पीकर कोसा है, उसी को हम स्वयं अपना लें और पुरानी सारी मान्यताओं को पलट दें- यह नहीं हो सकता। हम अपनी शक्ति को अति प्रचण्ड करने भर की तैयारी में जा रहे हैं। स्थूल शरीर और स्थूल कार्यक्रमों की शक्ति स्वल्प एवं क्षणिक है। इतने बड़े अभियान के लिये एक भारी बिजली घर की जरूरत है, जो संबद्ध हजारों यन्त्रों को गति देता रहे। अब हम यन्त्र भर न रहकर लोगों की निगाह से दूर रहें, यह हो सकता है पर हर जागृत और जीवित आत्मा यह अनुभव करेगी कि हम उसकी अन्तरात्मा में बैठकर कुहराम मचा रहे हैं नर कीटक एवं नरपशु की जिन्दगी को नर-नारायण के रूप में परिणत होने की शक्ति देंगे। जो लड़खड़ा रहे होगे उन्हें संभालेंगे और जो संभल गये हैं उन्हें आगे बढ़ने के लिये आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित करेंगे। हम जा जरूर रहे हैं पर अगले ही दिनों एक अत्यन्त प्रबल और अदृश्य शक्ति के रूप में वापिस लौट रहे हैं। सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक अभियानों का नेतृत्व दूसरे लोग करेंगे पर बाजीगर की उँगलियों की तरह अगणित नर पुतलियों को नचाने में हमारी भूमिका भली प्रकार सम्पादित होती रहेगी, भले ही उसे कोई जाने या न जाने। हमारी तपश्चर्या भी वस्तुतः नव निर्माण के महा अभियान की तैयारी के लिये अभीष्ट शक्ति जुटाने की प्रक्रिया भर है। हमें जिस प्रयोजन के लिए भेजा गया है उसे पूरा किये बिना एक कदम भी पीछे हटने वाले नहीं है। युग-परिवर्तन की महान प्रक्रिया अधूरी नहीं रहने दी जा सकती। उसको नियोजित करने के लिये प्रतिभाओं को आगे लाया ही जायेगा। उन्हें इच्छा या अनिच्छा से- देर या सवेर से आगे आना ही पड़ेगा।
हर यज्ञ की स्मृति में एक चल पुस्तकालय की स्थापना का कार्यक्रम पूर्व नियोजित रहना चाहिये। यज्ञ के अन्य खर्चों के साथ एक हजार रुपये में बन सकने वाले चल पुस्तकालय को भी जोड़े रखना चाहिए। प्रयत्न अधिक संग्रह का किया जाय और खर्च बहुत किफायत के साथ। ऐसा करने पर कुछ बचत हो सकती है और उसे स्थानीय आवश्यकताओं के लिये रोकने की अपेक्षा गायत्री तपोभूमि की महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों को सुदृढ़ बनाने के लिये दे देना चाहिए। केन्द्र दुर्बल रहा तो शाखाओं में भी प्रखरता न आयेगी। इस वर्ष हमें अपनी सारी मनोभावनाएं संग्रहित कर केन्द्र को समर्थ और स्वावलम्बी बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए और यज्ञ-आयोजनों से कुछ बचाना हो तो उसे पूरे का पूरा ही मथुरा भेज देना चाहिए।
कहना न होगा कि इस युग की अति महत्वपूर्ण विचारधाराओं में से युग निर्माण की विचारधारा को प्रमुख स्थान मिलना है। रूसो के प्रजातन्त्र सिद्धान्त, मार्क्स के साम्यवाद सिद्धान्त से कुछ बढ़ा-चढ़ा ही अपना ‘व्यावहारिक अध्यात्मवाद’ है। यदि इसका प्रकाश व्यापक हो सका होता तो आज करोड़ों इस प्रक्रिया का अनुसरण कर रहे होते। साधनों के अभाव में विचारधारा केवल हिन्दी भाषी जनता तक सीमित रही है। और उसी छोटे क्षेत्र में जो कुछ बन पड़ा है, किया गया है। अब उसे व्यापक बनाया जाना है तो संसार की सभी प्रमुख भाषाओं में इस ज्ञान गंगा की धारा बहानी होगी, फिलहाल भारतीय जनता को तो इसकी पूरी जानकारी होनी ही चाहिए। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए अंग्रेजी, गुजराती, तेलगू, कन्नड़, मलयालम और सिन्धी भाषा में इसका अनुवाद-प्रकाशन आवश्यक है। तैयारी सब है, केवल पैसे के अभाव में प्रगति रुकी पड़ी है। एक भाषा का टाइप मँगाने, प्रेस लगाने में ही न्यूनतम 4-5 हजार रुपया लग जाता है। उपरोक्त सब भाषाओं के लिये तो बहुत पूँजी चाहिए। इसे हम कहाँ से लायें? कहाँ से पायें? तथाकथित दानी लोग अपनी विज्ञापनबाजी, वाहवाही में तथा सस्ते स्वर्ग-टिकट खरीदने में ही कुछ दे सकते हैं अथवा राजनैतिक दलों से कुछ सीधा स्वार्थ साधन हो जाये वहाँ उनका पैसा जा सकता है। अपने केवल विवेक के आधार पर ही ऊँचा समझे जाने वाले प्रदर्शन रहित के लिये, आज का ‘धनी’ कुछ देने वाला नहीं हैं इसलिए हम छोटे लोग मिलकर ही इस अभाव की पूर्ति करेंगे और बूँद-बूँद से घट भरेंगे। यज्ञों की बचत इस प्रयोजन की पूर्ति में बहुत सहायक हो सकती है। जहाँ पहले बचे पैसे पड़े हों, उन्हें भी इस कार्य के लिये दिया जाना चाहिए।
जिनके पास थोड़ा समय बच सके वे इस साल विशेष रूप से नव निर्माण की नींव चलाने वाले इस महान वर्ष की सफलता के लिए लगा दें। साथियों को कुछ दिन के लिये काम सौंपा जा सकता है, छुट्टियां ली जा सकती हैं। बीमारी या दूसरी मुसीबत आ जाने पर भी ढेरों समय यों ही चला जाता है, इस बार उदारतापूर्वक वैसा करना चाहिए। हमने अपने गुरु को भगवान के रूप में देखा है और उससे कुछ माँगने की अपेक्षा ऊँचे से ऊँचा समर्पण प्रस्तुत करने का ही साहस किया है। अब तक की जीवन-अवधि तथा यदि कुछ भौतिक सम्पदा थी तो उन्हीं के चरणों पर चढ़ाई है। ईश्वर भक्ति या गुरुभक्ति में पाने का नहीं, देने का ही तत्वज्ञान सन्निहित है। जिनकी समझ में यह बात आ जाय, वे इस परीक्षा जैसे समय में- आपत्ति धर्म जैसी आवश्यकता अनुभव करते हुए कुछ समय निकालें।
काम कितने ही करने को पड़े हैं। संस्था का नया संगठन होना है। अब एक घण्टा समय और दस पैसे देने वाले सक्रिय व्यक्ति ही संगठन के सदस्य रहेंगे। इसलिए सदस्यों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है। पुराने लोगों में से कुछ तो निकल ही सकते हैं। शेष प्रबुद्ध वर्ग में से नये लाने पड़ेंगे, यह संगठन कार्य अपने क्षेत्र में यह समयदानी ही जन-संपर्क स्थापित कर सकते हैं। ‘चल पुस्तकालय’ की स्थापना का इस वर्ष एक बड़ा लक्ष्य है। किन्हीं माध्यमों से इसके लिये पूँजी जुटाना और उन्हें सुचारु रूप से चलाने का क्रम बिठाना एक बहुत बड़ा काम है, जिन्हें समयदानी ही करेंगे। शिविरों में आने के लिये अन्तिम मिलन के लिये प्रतिभाशाली व्यक्तियों को प्रेरित करना और उन्हें घसीटकर लाना भी छोटा नहीं, बड़ा काम है जिसके लिये काफी समय लगाया जायगा। इस वर्ष 5 कुण्डी 200 यज्ञ होने वाले हैं। इसके अतिरिक्त शतकुण्डी 40 और सहस्रकुंडी 5 यज्ञ भी होने जा रहें हैं। इनके लिये काम करना भी समयदान से ही सम्भव है। सुयोग्य प्रतिभाएँ अन्य भाषाओं में अनुवाद करने का कार्य कर सकती हैं और केन्द्रीय कार्यक्रमों में इस वर्ष अति विशालता आ जाने से उन्हें भी संभालने की जरूरत है। ऐसे अनेक कार्यों में सहयोग कर सकने वाले समयदानी नव निर्माण की नींव में अपनी उदारता को अर्पण कर उसे इतनी मजबूत बना सकते हैं, जिस पर युग परिवर्तनकारी महान प्रक्रिया का दुर्ग खड़ा किया जा सके।
समय की तरह ही मिशन को पैसे की भी जरूरत है। जहाँ वह क्षुद्र प्रयोजनों में लगा है, वहाँ से उठाकर उसे महान प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त किया जाना चाहिए। (1) अगले दिनों हमें एक महान क्रान्तिकारी शिक्षा-योजना का शिलान्यास, संगठन और प्रसारण करना है, उसके लिये विश्व-विद्यालय स्तर का एक समर्थ तन्त्र खड़ा करना है। (2) हिन्दु समाज में जिस प्रकार धर्म मंच के माध्यम से हम क्रान्तिकारी परिवर्तन कर रहे हैं, उसी प्रकार अन्य धर्मों की परम्पराओं को साथ लेते हुए उसी वर्ग के लोगों द्वारा वैसा ही प्रयोग करना है जैसा हम अपने समाज के लिये कर रहे हैं। ईसाई, मुसलमान, बौद्ध, यहूदी, पारसी आदि संसार के विभिन्न धर्मों के लिये ‘उद्देश्य एक स्वरूप अनेक’ का प्रयोग करना है। (3) कला की कामुक एवं विनाशोन्मुख प्रवृत्तियों को मोड़कर उसे एक नई दिशा देनी है। साहित्य, संगीत, काव्य, चित्र, अभिनय आदि कला के सभी पक्षों का परिष्कार कर उसे विनाश के चंगुल से विमुक्त कर विकास में नियोजित करना है। फिल्म उद्योग को भी नई दिशा दी जानी है। (4) अनीति और अनाचार, मूढ़ता और मूर्खता-कुरीतियों और कुनीतियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष मोर्चे खोलने हैं, जिनमें विवाहोत्सव से लेकर अपराधी मनोवृत्ति तक हर मोर्चे पर शाँति सैनिकों द्वारा जूझना है। इसलिये विरोध असहयोग, सत्याग्रह से लेकर घिराव तक के हर शस्त्र को काम में लाया जाना है।
अगले वर्ष इन चार मोर्चों पर अपनी चतुरंगिणी सेना लड़ेगी। राजनीतिज्ञों और सैनिकों ने इतिहास के आरम्भ से ही अस्त्र-शस्त्रों से लड़ी जाने वाली बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। दो महायुद्ध तो गत पचास वर्षों में ही हो चुके हैं। उसके परिणाम देखे जा चुके। तीसरे अणु युद्ध की तैयारी है। कहा जाता है कि इसके बाद चौथा युद्ध लड़ा गया तो वह ईंट-पत्थरों से लड़ा जायगा क्योंकि जब मनुष्य जाति अपनी अब तक की समस्त उपलब्धियाँ इस तीसरे युद्ध में समाप्त कर चुकी होगी।
एक नया युद्ध हम लड़ेंगे। परशुराम की तरह लोक मानस में जमी हुई अवाँछनीयता को विचार अस्त्रों से हम काटेंगे। सिर काटने का मतलब विचार बदलना भी है। परशुराम की पुनरावृत्ति हम करेंगे। जन-जन के मन-मन पर गहराई तक मढ़े हुए अज्ञान और अनाचार के आसुरी झण्डे हम उखाड़ फेकेंगे। इस युग का सबसे बड़ा और सबसे अन्तिम युद्ध हमारा ही होगा, जिसमें भारत- एक देश न होगा महाभारत बनेगा और उसका दार्शनिक साम्राज्य विश्व के कोने-कोने में पहुंचेगा। निष्कलंक अवतार यही है। सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युग अवतारी निष्कलंक भगवान द्वारा होने वाला है वह और कोई नहीं विशुद्ध रूप में अपना युग-निर्माण आन्दोलन ही है।
महान सम्भावनाएँ हम उत्पन्न करेंगे। उसके लिये सचाई और सद्भावना भरे उत्कृष्ट तपनिष्ठों की जरूरत है। इसी को इन दिनों विरजा और बीना जा रहा है। विदाई वर्ष का प्रयोजन यह है कि प्रतिभाओं और विभूतियों को आमन्त्रित, प्रशिक्षित एवं परिवर्तित कर उस प्रयोजन में लगा दिया जाय जिससे संस्कृति की रात्रि लंका को असुरता के चंगुल से छुड़ाने के लिये चतुर मनुष्य न मिल सकने पर रीछ वानरों को एकत्रित एवं प्रेरित किया गया था।
इस ऐतिहासिक घड़ी, में हमारे सुसंस्कारी परिजन अपने अवतरण को सार्थक बनाने के लिये कुछ महान भूमिका सम्पादित कर सकें, इसीलिये विदाई वर्ष हर किसी को बार-बार विविध विधि उद्बोधन प्रस्तुत करने में संलग्न है। आशा है यह प्रयास निरर्थक न जायेगा। कुछ आत्माएँ अपनी निद्रा छोड़कर सक्रियता की ओर अवश्य बढ़ेंगी। कौन क्यों करता है, इसी की प्रतीक्षा और कसौटी इस विशेष वर्ष के रूप में सामने आ खड़ी हुई है।
विधाता ने अपने सेवकों को बुलाकर धरती से एक-एक उपहार लाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा- “जिसका उपहार सर्वश्रेष्ठ होगा, उसी को प्रधान सेवक के पद पर नियुक्त किया जायेगा।”
आज्ञा मिलने की देर थी। सभी सेवक अच्छे उपहारों की तलाश में पृथ्वी की ओर दौड़ने लगे। सब इस प्रयत्न में थे कि ऐसा उपहार ले जाया जाये जो मेरी पदोन्नति शीघ्र ही हो जाये। एक-से-एक बहुमूल्य उपहार सेवकों ने लाकर सामने रखे, पर विधाता के चेहरे पर कहीं प्रसन्नता और सन्तोष की रेखा तक न थी। हिसाब लगाया गया, तो एक सेवक आना शेष था। उसकी प्रतीक्षा बड़ी आतुरता से की जा रही थी।
आखिर प्रतीक्षा की घड़ियाँ पूरी हुई और वह सेवक भी आ गया। वह कागज की एक पुड़िया विधाता को देकर नीचे डरते-डरते बैठ गया। वह सोच रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि देर से आने के कारण डाँट पड़े। उस सेवक की पुड़िया देखकर अन्य कितने ही सेवक मन में हँसने लगे, कोई उसकी मूर्खता पर प्रसन्न हो रहे थे। विधाता ने पुड़िया खोली- ‘अरे, यह क्या इस पुड़िया में मिट्टी बाँध लाये?’
“हाँ भगवन्! मैंने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा छान मारा। शायद ही कोई स्थान रह गया हो, जहाँ मैं नहीं गया। मैंने इस बात की बड़ी कोशिश की कि ऐसा उपहार ले चलूँ जो आपके पसन्द आ जाये, पर कुछ समझ ही नहीं पड़ा। प्रभु! है तो यह मिट्टी ही, पर किसी साधारण स्थान की नहीं है। यह वह मिट्टी है जहाँ के लोगों ने धर्म और मानवता की रक्षा के लिये खुशी-खुशी अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।” सेवक ने हाथ जोड़कर कहा।
विधाता ने वह मिट्टी बड़ी श्रद्धा से अपने मस्तक पर लगा ली और कहा- “सेवकों! जब तक पृथ्वी पर ऐसे सन्त और सज्जन पुरुष बने रहेंगे तब तक धरती पर सुख-शान्ति की सम्भावनाएँ भी कम न होंगी।”
साथी जब तक आघातों का आदान-प्रदान नहीं होता।
भय का अवसान नहीं होता॥
स्वागत-सुमनावलियाँ न जहाँ झरती जलते आह्वानों पर,
इतिहास विभोर नहीं होता पग-पग चलते गतिवानों पर,
धुल-धुल कर शूल जहाँ होते परिणत फूलों की टोली में,
वरदान अगर जीवन पाते तप-तप शापों की होली में,
साधों के विजय स्तम्भ वहाँ उन्मुक्त स्वरों में कहते हैं-
शोषित से सींचा जाये तो निष्फल बलिदान नहीं होता।
आसन अमंगल की छाया छू सके न जिसके अन्तःपट,
हो जाते जिस दृष्टि-तुला में तुलकर एक महल मरघट;
चर्वण करता हो लोह-चणक चलता जीवन पर्यन्त अथक;
संकेत-शृंखला में बाँधे प्रलयकार के प्रज्ज्वलित पलक;
स्वर्णिम इतिहासों के जलते उद्धरण जहाँ मुखरित होते-
उन वह्नि विभूषित पृष्ठों का युग-युग मुख म्लान नहीं होता।
आशीष परिधियों में पलते शीशों का गतिमय उन्नति क्रम;
रसधार बहाया करते हैं उन पर असि-धारों के उद्गम;
उत्सर्ग-स्फूर्तियाँ भरती हैं नव कम्प दधीची हाडों में;
सीता है कोई भीष्म-व्रती अर्जुन के तीखे बाणों में;
तब सत्य सनातन की रेखा नभ में बन व्यास उभरती है;
उस स्वर्णिम रेखा का जग में कोई उपमान नहीं होता।
बुझ चुके दीप की स्मृतियों को आँसू से व्यर्थ भिगोना है;
वन-रोदन की आसक्ति सखे! ऊसर में खेती बोना है;
नव दीप रचो, तब ज्योति भरो अपने अन्तर की ज्वाला में;
संस्कृति के सपने मुक्त करो घिरती आती तम-माला से;
युग दर्पण में परिवर्तन के पावन प्रतिबिम्ब निखर पुलकें;
ध्रुव सत्य उसी परिवर्तन का मैला परिधान नहीं होता।
-झलकन लाल वर्मा ‘छैल’
*समाप्त*