हम 2 अक्टूबर से 3 मई तक लगातार देशव्यापी कार्यक्रमों से बाहर रहेंगे। इस बीच साधनात्मक एवं व्यक्तिगत कार्यवाहियों के संबंध में परामर्श का कार्य माता भगवती देवी करेगी। अखण्ड-ज्योति का सम्पादन संचालन भी उन्हीं के जिम्मे छोड़ा गया है।
गायत्री तपोभूमि युग-निर्माण योजना, विद्यालय, कला भारती, ट्रैक्ट पुस्तकें, विज्ञप्तियाँ संगठन, यज्ञ आयोजन, दान-दक्षिणा आदि के सारे कार्य गायत्री तपोभूमि से संचालित होंगे और वहाँ के कार्यकर्ता अपने-अपने विभागों को संभालेंगे। अस्तु उपरोक्त विभाजन का ध्यान रखते हुए पत्र और मनीआर्डर आदि अलग-अलग पते पर ही भेजने चाहिए। किसी व्यक्ति के नाम पर कोई पैसा पत्र न भेजा जाय, क्योंकि उस व्यक्ति के छुट्टी या दौरे पर चले जाने के समय व्यक्तिगत नाम पर भेजी चीजें वापिस लौट जाती हैं।
संसार को विष वृक्ष कहा है उसमें आपत्तियाँ भी कम नहीं हैं। यहाँ यंत्रवत सब कुछ चलता है, दूर रहते और न चाहते हुए भी कठिनाईयाँ आती हैं, कष्ट घेर लेते हैं। फिर सारे जीवन भर का क्रम हो जाता है उन कठिनाइयों से लड़कर अपने लिये सुख-सुविधा की स्थिति तैयार करना। इसी प्रयत्न में सारा जीवन बीत जाता है जब पीछे मुड़कर देखते हैं तब पश्चाताप होता है कि यह जीवन कठिनाइयों में ही बीत गया। न मिला सुख, न पाई शाँति, मस्तिष्क में सुखों की तृष्णा का अम्बार लाद लिया।
दुःख का कारण क्या था? यह एक विचारणीय बात है। सारे जीवन के क्रिया-कलापों को जब हम प्रकृति की माया के साथ तौलते हैं तब पता चलता है कि संसार समष्टि रूप में जैसा था हमने उसे अज्ञानवश वैसा ही नहीं लिया वरन् उसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते रहे। संसार इतना बड़ा है कि हम उसे अपने अनुकूल बना ही नहीं सकते थे अपने इस अज्ञान का फल दुःख रूप में मिला। यह ज्ञान का रास्ता ही उपयुक्त था। भीगी हुई लकड़ियों को आग नहीं जला पाती उसी प्रकार ज्ञान से भीगे मनुष्य को मानसिक दुःख वेदना नहीं दे सकते हैं। संसार समुद्र है ज्ञान-युक्ति उसकी नौका जो इस नाव पर चढ़ लेता है उसके साँसारिक दुःख भी मिट जाते हैं। संसार की यथार्थ स्थिति जानने के कारण जन्म-मरण के बंधन से भी मुक्त हो जाता है।
-योग वशिष्ठ
जीवन अविभक्त है, देखने में लगता है-जीवों के शरीर उनकी आकृतियाँ भिन्न हैं पर वे सब एक ही प्रकृति मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश के पंचीकृत रूप है। देखने में लगता है सबकी लालसायें, आकाँक्षायें, कामनायें और आवश्यकतायें अलग-अलग हैं पर वह सब एक ही इच्छा शक्ति, विचार संकल्प शक्ति के नाना-रूप हैं। इस भिन्नता को स्थूल दृष्टि से सत्य मान लेने के कारण ही शाश्वत सौंदर्य चेतना एक ही शक्ति का अंश है तो वह परस्पर प्रेम का आदान-प्रदान क्यों नहीं कर सकती है। प्रेम का अभाव ही क्या हमारे दुःख का कारण नहीं है?
प्रेम से उन्नत कोई सम्पत्ति नहीं, प्रेम से उन्नत कोई सद्गुण नहीं। प्रेम ही सत्य रूप में प्रकट हुआ धर्म और परमेश्वर का व्यक्त प्रकाश है। जिसने प्रेम का रसास्वादन न किया उसका सारा जीवन बेकार है।
ईश्वर को प्राप्त करने के प्रत्येक जिज्ञासु को प्रेम की उपासना करनी पड़ेगी। उसे अपने आपसे परिवार, पत्नी और बच्चों से पड़ोसी देश और विश्व से सृष्टि के प्राणिमात्र से उतना ही घनिष्ठ प्रेम करना पड़ेगा जितना वह परमात्मा को प्रेमास्पद मानता है। भगवान प्रेम में जीवित हैं और प्रेम में ही विराजते हैं प्रेम की साधना किये बिना कोई उन्हें पा नहीं सकता।
प्रेम की शक्ति अनन्त और उसकी गहराई अपरिमेय है। वन्य पशु बड़े खूँखार होते हैं शस्त्र से भी वे भयभीत नहीं होते पर प्रेम की चाह उन्हें इतना निर्बल कर देती है कि एक छोटा सा व्यक्ति भी हिंसक सिंह को साध लेता है। प्रेम की प्यास कब बुझे सारा संसार इस एक ही आकाँक्षा के लिये जीवित है। बार-बार मरता है, वह और इस आशा से फिर-फिर जन्म लेता है कि उसे कोई प्यार दे, निश्छल अन्तःकरण से प्रेम देकर अपना दास बना ले। शत्रु भी प्रेम करने लगे तो वह उसके लिये भी हृदय के द्वारा खोल देता है। प्रेम जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि है जो सुख और शाँति के लिये साधनों में भटकते हैं वह भी अन्त में प्रेम में ही दिव्य-आनन्द की अनुभूति करते हैं। एक बार प्रेम का प्याला पी लिया जिसने उसके लिये भौतिक सम्पदाओं का क्या मोह, प्रेम जीवन का सार है, सबसे बड़ी शक्ति है। आत्मा उसे ही प्राप्त और विकसित करने के लिए मनुष्य शरीर में जन्मा है। धिक्कार है कि फिर भी मनुष्य वासनाओं और कामनाओं की भूल में प्रेम जैसे दिव्य तत्व से संबंध विच्छेद कर अनन्त सुख प्राप्ति के पथ से भ्रष्ट हो जाता है।
पदार्थ में जो सुख है वह अपना अन्तःकरण उसमें प्रतिरोपित हो जाने, उससे प्रेम हो जाने के कारण है। प्रेम ही सुखद और प्रेम ही लक्ष्य है। फिर वस्तुओं को क्यों ढूँढ़ा जाये? क्यों न प्रेम का दीपक जलाकर अन्तःकरण आलोकित किया जाये।
एक दिन, दो दिन और लगातार कई दिन तक भी रात-रात भर तारों की गिनती करते देखकर आखिर एक दिन माँ ने अपने बच्चे से पूछ ही लिया- बेटे! तुम रात भर आकाश की ओर मुँह किये क्या गिना करते हो?
आकाश के सितारे माँ! बहुत प्रयत्न करता हूँ किन्तु आकाश इतना विराट् और नक्षत्र इतने अधिक हैं कि वे गिनने में ही नहीं आते।
माँ ने थपकी दी और बोली, बेटा! देर हुई सो जा, यह सितारे गिनने के लिये नहीं वरन् इसलिये बनाये गये हैं कि लोग उन्हें देखकर स्वयं भी प्रकाश पूर्ण जीवन जीना सीखें।
अलबर्ट श्वाइत्जर जहाँ रहते थे, उनके समीप ही बन्दरों का एक दल रहता था। दल के एक बन्दर और बन्दरिया में गहरी मित्रता हो गई। दोनों जहाँ जाते साथ-साथ जाते, एक कुछ खाने को पाता तो यही प्रयत्न करता कि उसका अधिकाँश उसका साथी खाये। कोई भी वस्तु उनमें से एक ने भी कभी अकेले न खाई। उनकी इस प्रेम भावना ने अलबर्ट श्वाइत्जर को बहुत प्रभावित किया। वे प्रायः प्रतिदिन इन मित्रों की प्रणय-लीला देखने जाते और एकाँत स्थान में बैठकर घंटों उनके दृश्य देखा करते। कैसे भी संकट में उनमें से एक ने भी स्वार्थ का परिचय न दिया। अपने मित्र के लिये वे प्राणोत्सर्ग तक के लिये तैयार रहते, ऐसी थी उनकी अविचल प्रेम-निष्ठा।
विधि की विडम्बना-बन्दरिया कुछ दिन पीछे बीमार पड़ी, बन्दर ने उसकी दिन-दिन भर भूखे-प्यासे रहकर सेवा-सुश्रूषा की पर बन्दरिया बच न सकी, मर गई। बन्दर के जीवन में मानो वज्राघात हो गया। वह गुमसुम जीवन बिताने लगा।
इतर प्राणियों में विधुर विवाह पर प्रायः किसी में भी प्रतिबंध नहीं है। एक साथी के रहने पर नर हो या मादा अपने दूसरे साथी का चुनाव खुशी-खुशी कर लेते हैं इस बन्दर दल में एक से एक अच्छी बन्दरियाँयें थीं, बन्दर हृष्ट-पुष्ट था किसी भी नई बन्दरिया को मित्र चुन सकता था, पर उसके अन्तःकरण का प्रेम तथाकथित मानवीय प्रेम की तरह स्वार्थ और कपटपूर्ण नहीं था, पता नहीं उसे आत्मा के अमरत्व परलोक और पुनर्जन्म पर विश्वास था इसलिये उसने फिर किसी बन्दरिया से विवाह नहीं किया।
पर आत्मा जिस धातु का बना है वह प्रेम के प्रकाश से ही जीवित रहता है, प्रेमविहीन जीवन तो जीवित नरक समान लगता है, बन्दर ने अपनी निष्ठा पर आँच न आने देने का संकल्प कर लिया होगा तभी तो उसने दूसरा विवाह नहीं किया, पर प्रेम की प्यास कैसे बुझे? यह प्रश्न उसके अन्तःकरण में उठा अवश्य होगा तभी तो उसने कुछ दिन पीछे ही अपने जीवन की दिशा दूसरी ओर मोड़ दी। प्रेम को सेवा का रूप दे दिया उसने, अभी तक उसने अपनी प्रेयसी बन्दरिया को आत्म-समर्पण किया था अब उसने हर दीन-दुःखी में आत्मा के दर्शन करने और सबको प्यार करने का सिद्धाँत बना लिया, उससे ही उसे शाँति मिली।
बन्दर एक स्थान पर बैठा रहता। अपने कबीले या दूसरे कबीले का कोई अनाथ बन्दर मिल जाता तो वह उसे प्यार करता रहता खाना खिलाता, भटक गये बच्चे को ठीक उसकी माँ तक पहुँचा कर आता, लड़ने वाले बन्दरों को अलग-अलग कर देता, इसमें तो वह कई बार अति उग्र पक्ष को मार भी देता था पर तब तक चैन न लेता जब तक उनमें मेल-होल नहीं करा देता। उसने कितने ही वृद्ध, अपाहिज बन्दरों को पाला, कितनों ही का बोझ उठाया। बन्दर की इस निष्ठा ने ही अल्बर्ट श्वाइत्जर को एकान्तवादी जीवन से हटाकर सेवा भावी जीवन बिताने के लिये अफ्रीका जाने की प्रेरणा दी। श्वाइत्जर बन्दर की इस आत्म-निष्ठा को जीवन भर नहीं भूले।
सेन्टियागो की धनाढ्य महिला श्रीमती एनन ने पारिवारिक कलह से ऊबकर जी बहलाने के लिये एक भारतीय मैना पाल ली। मैना जब से आई तभी से उदास रहती थी। एनन की बुद्धि ने प्रेरणा दी संभव है उसे भी अकेलापन कष्ट दे रहा हो। सो दूसरे दिन एक और तोता मोल ले लिया। तोता और मैना भिन्न जाति के दो पक्षी भी पास आ जाने पर परस्पर ऐसे घुल-मिल गये कि एक के बिना दूसरे को चैन ही न पड़ता।
प्रातःकाल बिना चूके मैना तोता को ‘नमस्ते’ कहती। तोता बड़ी ही मीठी वाणी में उसके अभिवादन का कुछ कहकर उत्तर देता। पिंजड़े पास-पास कर दिये जाते फिर दोनों में वार्ताएं छिड़ती, न जाने क्या मैना कहती न जाने क्या तोता कहता पर उनको देखकर लगता यह दोनों बहुत खुश हैं। दोनों का प्रेम प्रतिदिन प्रगाढ़ होता चला गया, चोंच से दबाकर अपनी चीजें बाँटकर खाते।
कुछ ऐसा हुआ कि श्रीमती एनन की एक रिश्तेदार को तोता भा गया, वे जिद करके उसे माँग ले गई ठीक उसी दिन मैना बीमार पड़ गई और चौथे दिन सायंकाल 5 बजे उसने अपनी नश्वर देह त्याग दी। तोता कृतघ्न नहीं था। वह बन्दी था चला तो गया पर आत्मा को बन्दी बनाना किसके लिए संभव है। वह भी मैना की याद में बीमार पड़ गया और ठीक चौथे दिन सायंकाल 5 बजे उसने अपने प्राण त्याग दिये। पता नहीं दोनों की आत्मायें परलोक में कहीं मिली या नहीं, पर इस घटना ने श्रीमती एनन का स्वभाव ही बदल दिया। अब उनके स्वभाव में सेवा और मधुरता का ऐसा प्रवाह फूटा कि वर्षों से पारिवारिक कलह में जलता हुआ दाम्पत्य सुख फिर खिल उठा। पति-पत्नी में कुछ ऐसी घनिष्ठता हुई कि मानो उनके अन्तःकरण में तोता और मैना की आत्मा ही साक्षात उतर आई हो। उनकी मृत्यु भी वियोगजन्य परिस्थितियों में एक ही दिन एक ही समय हुई।
तोता, मैना, बन्दर छोटे-छोटे सौम्य स्वभाव जीवों की कौन कहे प्रेम की प्यास तो भयंकर खूंखार जानवरों के हृदय में भी होती है। एफ. कुवियर के एक मित्र को भेड़िया पालने की सूझी। कहीं से एक बच्चा भेड़िया मिल गया। उसे वह अपने साथ रखने लगे। भेड़िया कुछ ही दिनों में उनसे ऐसा घुल-मिल गया मानो उनकी मैत्री इस जन्म की नहीं कई जन्मों की हो।
कुछ ऐसा हुआ कि एक बार उन सज्जन को किसी काम से बाहर जाना पड़ गया। वह भेड़िया एक चिड़ियाघर को दे गये। भेड़िया चिड़ियाघर तो आ गया पर अपने मित्र की याद में दुःखी रहने लगा। मनुष्य का जन्म-जात बैरी मनुष्य के प्रेम के लिये पीड़ित हो यह देखकर चिड़ियाघर के कर्मचारी बड़े विस्मित हुये। कोई भारतीय दार्शनिक उनके पास होता और आत्मा की सार्वभौमिक एकता का तत्वदर्शन उन्हें समझाता तो संभव था ये भी जीवन को एक नई आध्यात्मिक दिशा में मोड़ने में समर्थ होते, उनका विस्मय चर्चा का विषय भर बनकर रह गया।
भेड़िये ने अपनी प्रेम की पीड़ा शाँत करने के लिए दूसरे जीवों की ओर दृष्टि डाली। कुत्ता-भेड़िये का नम्बर एक का शत्रु होता है पर आत्मा किसका मित्र किसका शत्रु क्या तो वह कुत्ता क्या भेड़िया-कर्मवश भ्रमित अग-जग आत्मा से एक है। यदि यह तथ्य संसार जान जाये तो फिर क्यों लोगों में झगड़े हों, क्यों मन-मुटाव, दंगे-फसाद, भेदभाव, उत्पीड़न और एक-दूसरे से घृणा हो। विपरीत परिस्थितियों में भी प्रेम जैसी स्वर्गीय सुख की अनुभूति आत्मदर्शी के लिये ही संभव है, इस घटना का सार-संक्षेप भी यही है। भेड़िया अब कुत्ते का प्रेमी बन गया उसके बीमार जीवन में भी एक नयी चेतना आ गई। प्रेम की शक्ति कितनी वरदायक है कि वह निर्बल और अशक्तों में भी प्राण की गंगोत्री पैदा कर देती है।
दो वर्ष पीछे मालिक लौटा। घर आकर वह चिड़ियाघर गया अभी वह वहाँ के अधिकारी से बातचीत कर ही रहा था कि उसका स्वर सुनकर भेड़िया भगा चला आया और उसके शरीर से शरीर जोड़कर खूब प्यार जताता रहा। कुछ दिन फिर ऐसे ही मैत्रीपूर्ण जीवन बीता।
कुछ दिन बाद उसे फिर जाना पड़ा। भेड़िये के जीवन में लगता है भटकाव ही लिखा था फिर उस कुत्ते के पास जाकर उसने अपनी पीड़ा शाँत की। इस बार मालिक थोड़ा जल्दी आ गया। भेड़िया इस बार उससे दूने उत्साह से मिला पर उसका स्वर शिकायत भरा था बेचारे को क्या पता था कि मनुष्य ने अपनी जिन्दगी ऐसी व्यस्त जटिल साँसारिकता से जकड़ दी है कि उसे आत्मीय-भावनाओं की ओर दृष्टिपात और हृदयंगम करने की कभी सूझती ही नहीं। मनुष्य की यह कमजोरी दूर हो गई होती तो आज संसार कितना सुखी और स्वर्गीय परिस्थितियों से आच्छादित दिखाई देता।
प्रेम एक नैसर्गिक शक्ति है जो राक्षस को देवता और मनुष्य को भगवान बना देता है।
-इंगर सोल
कुछ दिनों दोनों बहुत प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहे। एक दूसरे को चाटते, थपथपाते, हिलते-मिलते, खाते-पीते रहे और इसी बीच एक दिन उसके मालिक को फिर बाहर जाना पड़ा। इस बार भेड़िये ने किसी से न दोस्ती की न कुछ खाया-पीया। उसी दिन से बीमार पड़ गया और प्रेम के लिये तड़प-तड़प कर अपनी इहलीला समाप्त कर दी। उसके समीपवर्ती लोगों के लिये भेड़िया उदाहरण बन गया। वे जब कभी अमानवीय कार्य करते भेड़िये की याद आती और उनके सिर लाज से झुक जाते।
बर्लिन की एक सर्कस कंपनी में एक बाघ था। नीरो उसका नाम था। इस बाघ को लीरिजग के एक चिड़िया घर से खरीदा गया था। जिन दिनों बाघ चिड़ियाघर में था उसकी मैत्री चिड़ियाघर के एक नौकर से हो गई। बाघ उस मैत्री के कारण अपने हिंसक स्वभाव तक को भूल गया।
पीछे वह क्लारा हलिपट नामक एक हिंसक जीवों की प्रशिक्षिका को सौंप दिया गया। एक दिन बाघ प्रदर्शन से लौट रहा था तभी एक व्यक्ति निहत्था आगे बढ़ा-बाघ ने उसे देखा और घेरा तोड़कर बाघ निकला। भयभीत दर्शक और सर्कस वाले इधर-उधर भागने लगे पर स्वयं क्लारा हलिपट तक यह देख कर दंग रह गई कि बाघ अपने पुराने मित्र के पास पहुँचकर उसे चाट रहा है और प्रेम जता रहा है। उस मानव-मित्र ने उसकी पीठ खूब थपथपायी, प्यार किया और कहा अब जाओ समय हो गया। बाघ चाहता तो, उसे खा जाता, भाग निकलता पर प्रेम के बंधनों में जकड़ा हुआ बेचारा बाघ अपने मित्र की बात मानने को बाध्य हो गया। लोग कहने लगे सचमुच प्रेम की ही शक्ति ऐसी है जो हिंसक को भी मृदु, शत्रु को भी मित्र और संताप से जलते हुये संसार सागर को हिमखण्ड की तरह शीतल और पवित्र कर सकती है।
बतखों का झुण्ड प्रतिदिन आता और रात्रि में उसी तलैया में विश्राम करता। सवेरा होने पर वे सब बत्तखें उसमें स्नान करती और दिनभर के लिये दाने-चारे की खोज में उड़कर वहाँ से चल देती। तालाब की सारी हलचल समाप्त हो जाती, वह दिन भर सूना पड़ा रहता।
पास में ही एक बगीचा था। उसमें रहता था एक माली। फूल-पौधों की कतर-व्यौंत करते-करते काटना जैसे उसका स्वभाव बन गया था। उसने एक दिन एक बत्तख को पकड़ लिया और उसके पंख काट डाले। उड़ान का समय आया तो उस बत्तख ने बहुतेरा प्रयत्न किया कि और सब बत्तखों के साथ वह भी उड़ चले किन्तु वह बेचारी उड़ न सकी। उड़ा हुआ शेष बत्तखों का झुँड कुछ देर तक तो वहीं मंडराता रहा पीछे पूरा झुण्ड नीचे उतर आया। वे जख्मी बत्तख के आस-पास उड़ती और उसे उड़ने को प्रेरित करती रही पर बेचारी का एक पंख ही नहीं था, क्या करती उड़ नहीं सकी।
पूरा झुण्ड तालाब में उतर आया। वे कई दिन तक भूखे-प्यासे वहीं बने रहे उनका उड़ने का बार-बार मन भी करता रहा किन्तु नन्हें जीव भला अपने साथी को छोड़कर कैसे चले जाते। यह तो मनुष्य ही इतना स्वार्थी और छली है कि अपने सुख अपने हित के लिये न तो जीव-जन्तुओं को छोड़ता है और नहीं ही अपनी जाति को। फिर भी दम्भ कि वह अपने आपको सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझता है।
बत्तखें उड़ीं पर उस दिन जिस दिन बत्तख को नये पंख आ गये तब तक वे बेचारी वहीं चक्कर काटती रहीं।
-अल्बर्ट श्वाइत्जर के ‘हूम वी से एनिमल्स’ से
प्रातःकाल अखबार वाले ने आवाज लगाई और आप भागे। अखबार हाथ में आते ही सबसे पहली निगाह प्रथम पृष्ठ की ‘थ्री लाइन’, ‘टू लाइन’ और ‘वन्निक’ टाइप की मोटी हेडिंगों पर जाती है और आप यह जानने के लिये उतावले हो जाते हैं कि मंत्रिमण्डल में क्या परिवर्तन हुये, किस देश में सैनिक क्राँति हुई, इलेक्शन में कौन जीता, अपोलो-14 चन्द्रमा तक पहुँचा या कहीं और खो गया आदि-आदि। लन्दन में एक ऐसी महिला भी है जो अखबार के इन प्रसंगों को उपेक्षा से देखती है। पहले यह ढूंढ़ती है संसार में कहीं सूखा पड़ने का तो समाचार नहीं छपा। यदि ऐसा कोई समाचार हुआ तो वह आगे अखबार पड़ना बन्द करके अपने साधना कक्ष की ओर चल पड़ेंगी। यह उनका निजी कमरा है जहाँ वे भगवान के भजन से लेकर मानव जाति के सेवा के काम-काज किया करती हैं।
नाम है श्रीमती डोरिस मुँडे। पचास वर्ष की वृद्धा शरीर से सामान्य व्यक्तियों की तरह साधारण किन्तु असाधारण भावनाओं वाली श्रीमती एटलस निकाल कर देखती है वह स्थान किस देश, किस महाद्वीप में है। फिर ध्यान लगाकर बैठ जायेंगी और कुछ ही क्षणों में उनकी स्थिति समाधिस्थ योगी कि सी हो जायेगी। शरीर कमरे में रखा हुआ होगा और भाव-शरीर उस सूखे वाले इलाके में। वह अपने हृदय की सम्पूर्ण एकाग्रता और तल्लीनता के साथ भावना करती है कि मेरी अजस्र प्राण शक्ति बादलों में घुल रही है। अब इन बादलों को लेकर मैं उस सूखे वाले क्षेत्र की ओर चल पड़ी। बादलों की क्या बिसात, जो मेरी आज्ञा न मानें, आगे-आगे मैं पीछे-पीछे बादल, लो आ गया यह सूखाग्रस्त क्षेत्र। बादलों! यह देखो, प्यासी धरती, प्यासे लोग, प्यासे जीव-जन्तु कितने दुःखी हो रहे हैं संसार का सुख और शाँति करुणा पर टिका है। हर सम्पन्न व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि अभावग्रस्त प्राणियों के उत्थान और उद्धार के लिये कुछ दे तुम स्वार्थ क्यों बरतते हो, देने की कंजूसी मत करो अब बरसो! बरसो। बादलों अब तो तुम्हें बरसना ही पड़ेगा।
पानी बरसने लगता है। लोग खुशी से नाचने लगते हैं और उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता घुलाकर श्रीमती डोरिस की आत्म-चेतना वापस लौट आती है। दूसरे दिन अखबार में समाचार आता है उस स्थान में इतनी जलवृष्टि हुई कि सूखा समाप्त हो गया। वह समाचार पढ़कर श्रीमती डोरिस की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता।
श्रीमती डोरिस का कहना है कि सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना के आगे बादल तो क्या भगवान को भी झुकना पड़ता है। उन्होंने ‘नाफिन’ को बताया कि अपनी इस भावना-शक्ति के द्वारा हमने लालचीन, पेरु, अमरीका तथा भारत का सूखा दूर कराया है। कुछ दिन पूर्व बिहार और पाँच वर्ष पहले आस्ट्रेलिया में पड़े जबर्दस्त अकाल को दूर करने में उन्होंने अपनी इस शक्ति का प्रयोग किया था और उन्हें सफलता मिली थी। यह समाचार 28 जुलाई की ‘नई दुनिया’ और संसार के अन्य समाचार पत्रों में भी छपा था। उससे लोगों को भावनाओं की शक्ति का पता चला।
हमारे देश में जो भावनाओं की शक्ति से पत्थर से भगवान को पैदा करने, विष को अमृत बना देने तक के प्रयोग हो चुके हैं, यह उदाहरण उसका ही एक संक्षिप्त प्रमाण है। भाव विज्ञान की शक्तियाँ तो इससे भी हजारों गुना बड़ी और आश्चर्यजनक हैं।
केषाँ न स्यादभिमतफला प्रार्थना- ह्यत्तमेषु।
कालिदास (मेघदूत)
श्रेष्ठ पुरुषों से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती फिर ईश्वर से की गई प्रार्थना का तो कहना ही क्या?
परमाणु इतना छोटा होता है कि उसके आकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि एक मनुष्य-परमाणु जितना छोटा होता तो सारे भारतवर्ष की 53 करोड़ आबादी सुई की नोंक में बैठकर विश्राम कर लेती। इसी दृष्टान्त से परमाणु की सूक्ष्मता का पता लगाया जा सकता है।
पानी की एक बूँद में 6000000000000000000000 परमाणु होते हैं वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाकर देखा तो पाया कि यदि इतनी संख्या में कहीं अंगूर मिल जाते और उन्हें कहीं रखने के लिये स्थान की आवश्यकता पड़ती तो वह स्थान गोलाई की ओर से 24902 मील और ध्रुवों की ओर से 24860 मील वाली पृथ्वी से 75 गुना बड़ा तब होता जब तक एक स्थान में 1 फुट ऊंचा अंगूर भर दिया गया होता।
परमाणु अपने आप में अन्तिम लघुता नहीं है। उससे भी सूक्ष्म तत्व उसके अन्दर बैठे हैं और वह परमाणु की तुलना में इतने छोटे हैं जितनी सौर मण्डल की तुलना में पृथ्वी। सन 1911 की बात है अर्नेस्अर रदर फोर्ड नामक एक अंग्रेज वैज्ञानिक एक प्रयोग कर रहे थे। सीसे से बनी हुई एक प्रकार की बन्दूक की नली में उन्होंने थोड़ी सी रेडियम धातु रखी। सामने एक पर्दा लगाकर उन्होंने बीच में शुद्ध सोने का एक पत्तर लगा दिया। यह ‘पत्तर’ बहुत पतला था तो परमाणुओं की सघनता तो थी ही उस पर रेडियम के परमाणुओं ने गोलियों की तरह बौछार की। ध्यान से देखने पर पता चला कि कुछ परमाणु उस पत्तरे को भी पार कर गये हैं और उनकी आभा सामने पर्दे पर पड़ रही है यह सीधे मार्ग से कुछ हटी हुई थी।
विचार करने से मनुष्य समुद्र के रहस्य को भी ढूंढ़ लेता है, रदर फोर्ड ने सोचा यदि सोने के परमाणु ठोस होते तो रेडियम के परमाणु उसे बेधकर पार नहीं जा सकते थे। स्पष्ट था कि परमाणु के भीतर भी रिक्ता थी, पीलापन था उस पीलापन ने ही रेडियम परमाणुओं को आगे बढ़ने दिया पर उसका सम्पूर्ण भाग ही पीला नहीं था क्योंकि कई बार रेडियम के परमाणु इस तरह छितर जाते थे मानो सोने के परमाणुओं के भीतर कोई और भी सूक्ष्मतम वस्तु बैठी हुई हो और वह बन्दूक से आने वाले रेडियम परमाणुओं को भी तोड़-फोड़ डालती है। उसे रदर फोर्ड ने पहली बार परमाणु का मध्य नाभिक या केंद्रक (न्यूक्लियस) नाम दिया। उसके बाद से आज तक नाभिक पर खोजें पर खोजें होती जा रही हैं पर इस सूक्ष्मतम तत्व के बारे में आज तक पूर्ण रूप से जानकारी नहीं प्राप्त की जा सकी। पर जो कुछ समझ में आया उसने भारतीय तत्वदर्शन की इस मान्यता को बड़ा बल दिया कि आत्मा एक सर्वव्यापी चेतन तत्व है संसार में जो कुछ भी है वह सब आत्मा में ही है।
परमाणु जितना छोटा होता है उससे भी 1000000000000वाँ भाग छोटा नाभिक होता है। परमाणु जितना रहस्यपूर्ण है नाभिक उससे भी अधिक रहस्यपूर्ण है। अनुमान है कि परमाणु एक सौर मण्डल की तरह है तो नाभिक एक सूर्य की तरह जिसमें परमाणु की क्रियाशील रखने वाली ऊर्जा भी है और प्रकाश भी। नियंत्रण भी है और जीवन की सम्पूर्ण चेतना भी। नाभिक ही सच पूछा जाये तो परमाणु की प्रत्येक गतिविधि का अधिष्ठाता है। उसी प्रकार जीव का अधिष्ठाता आत्मा है जब तक जीव उसे प्राप्त नहीं कर लेता तब तक उसे शाँति नहीं मिलती।
यह तथ्य पढ़ते समय भारतीय तत्वदर्शन के यह विवेचन याद आ जाते हैं-
वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाहापरा श्रुति॥
-पञ्चदशी चित्रदीप प्रकाश।81
अर्थात् एक बाल के अग्र भाग के जो सौ भाग करें उनमें से एक भाग के सौवें भाग की कल्पना करो तो उतना अणु एक जीव का स्वरूप है ऐसा श्रुति कहती है।
किन्तु आत्मा-
तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः।
आकाश वत्ससर्वगतो निरंशः श्रुति संमतः॥
-पञ्चदशी। चित्र।86
अर्थात्- न अणु है न मध्यम है आत्मा विराट और आकाश के समान 1. सर्वव्यापी 2. क्रिया रहित 3. सर्वगत 4. नित्य कला युक्त है।
परमाणु विज्ञान ने भारतीय दर्शन की इन संपूर्ण मान्यताओं को सिद्ध कर दिया है। भले ही आज के वैज्ञानिक अभी तक जड़ चेतन के अन्तर को न समझ पाये हों। परमाणुओं की चेतना, जड़ पदार्थों से भिन्न गुणों वाली है। उपनिषद्कार लिखते हैं-
एष हि द्रष्टा, स्प्रष्टा श्रोता घ्राता।
रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता-
विज्ञानात्मा पुरुषः॥
अर्थात्- देखने वाला, छूने वाला, सुनने वाला, सूँघने वाला, स्वाद चखने वाला, मनन करने वाला और कार्य करने वाला ही विज्ञानमय आत्मा है।
नाभिक तत्व को आत्मा की प्रतिकृति जीवन का सूक्ष्मकण-कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी। नाभिक ‘प्रोटान’ और ‘न्यूट्रॉन’ दो प्रकार के कणों से बना हुआ होता है। उसके किनारे इलेक्ट्रान चक्कर काटते हैं। प्रोटान एक प्रकार की धन विद्युत आवेश, न्यूट्रॉन विद्युत आवेश रहित और इलेक्ट्रान जो इन दोनों की तुलना में 1800 गुना हलका होता है ऋण विद्युत आवेश होता। इसे आत्मा से भटका हुआ जीव कहते हैं। ‘वैशेषिक दर्शन’ में आत्मा को शाँत, धीर और पूर्ण शक्ति के रूप में भी माना है और पदार्थ के रूप में भी। दोनों विसंगतियाँ नाभिक में मूर्तिमान हैं। नाभिक के प्रोटान कण शक्ति है इनमें भार नहीं होता पर न्यूट्रोन में भार होता है वही सारे परमाणु के भार के बराबर होता है। नाभिक में दोनों का ही अस्तित्व समान है। ‘इलेक्ट्रान’ जीव है और वे तब तक चैन से नहीं बैठ पाते जब तक अक्रियाशील गैसों की अर्थात् मानसिक या आत्मिक द्वन्द्व की स्थिति से मुक्ति नहीं पा लेते।
नाभिक के किनारे इलेक्ट्रान कई कक्षाओं में घूमते हैं। प्रत्येक कक्षा (ऑर्बिट) में 2 एन 2 इलेक्ट्रान हो सकते हैं। एन=कक्षा की संख्या अर्थात् प्रथम कक्षा में 4 दूसरे में 8 तीसरे में 18 इलेक्ट्रान होंगे। यह कहना चाहिये जो जितना अधिक उलझ गया है वह उतना ही दुःखी है। पर अन्तिम कक्षा में प्रत्येक अवस्था में किसी भी द्रव्य में अधिक से अधिक 8 ही इलेक्ट्रान होंगे। यह इस बात के परिचायक हैं कि प्रत्येक जीव का अन्तिम लक्ष्य एक ही है सिद्धाँत से बंधा हुआ है कि उसे आत्म तत्व को खोज करनी चाहिये। परमाणु की सारी हलचल अपने आपको अक्रियाशील बनाने की है। अक्रियाशील गैसें अर्थात् हीलियम, नियोन, अगनि, क्रिष्टन, जीनान, रैडन आदि। जीव की सारी हलचल पूर्णता प्राप्त करने की है पर जब तक हम त्याग करना नहीं सीखते वह लक्ष्य मिलता नहीं। यह तथ्य भी हमें परमाणु से ही सीखने को मिलता है। उदाहरण के लिये नमक सोडियम और क्लोरीन से मिलकर बनता है। सोडियम की बा हरी कक्षा में 1 इलेक्ट्रान घूमता है वह अपना एक इलेक्ट्रान क्लोरीन को नियोन की स्थिति में पहुँच जाता है ‘क्लोरीन’ की बाहरी कक्षा में 7 इलेक्ट्रान थे। एक की आवश्यकता थी वह सोडियम ने पूरी कर दी तो जैसे ही उसके इलेक्ट्रान 8 हो गये वह भी अगनि नामक अक्रियाशील गैस की स्थिति में पहुँच जाता है। आपसी क्षमताओं का आदान-प्रदान कर आत्म-विस्तार की यह प्रक्रिया ही आत्म-कल्याण का सच्चा राजमार्ग है।
तमेव विद्वान विभाग मृत्योः।
-ऋग्वेद
उस आत्मा को जान लेने वाला मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है।
आत्मा बड़ी विराट है यह ऊपर कहा गया है। उसे जानने के लिये परमाणु की तुलना और मण्डल से करनी पड़ेगी। वस्तुतः परमाणु में सूर्य और उसका विस्तार ही प्रतिभासित है। सूर्य अक्रियाशील गैसों का पुँज है। नाभिक के रूप में परमाणु में वही प्राण भरता है। इलेक्ट्रोन्स और कुछ नहीं हर तत्व में नवग्रहों का प्रभाव है। पदार्थ की रासायनिक रचना के अनुरूप वे मनुष्य को भी प्रभावित करते रहते हैं पर यह तभी तक जब तक हमारी मानसिक और बौद्धिक चेतना आत्मा की खोज नहीं करती, उसमें विलीन नहीं हो जाती। जीव रूपी इलेक्ट्रान जिस दिन नाभिक रूप आत्मा में विलीन हो जाता है उस दिन उसकी क्षमता सूर्य के समान प्रत्येक अणु में व्याप्त तेजस्वी और प्रखर हो जाती है नाभिक और सूर्य दोनों में ही 1. सर्वव्यापकता 2. अक्रियाशीलता 3. सर्वगता 4. न समाप्त होने वाला प्रकाश भरा है। उपनिषद्कार का कथन है कि यह सूर्य ही आत्मा है।
देवायं भगवान्भानुरन्तर्यामी सनातनः।
-सूर्य पुराण 1।11
अर्थात्- यह सूर्य ही अन्तर्यामी और सनातन देव है।
यन्मण्डलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा-
परंधाम विशुद्ध तत्वम्॥
-गायत्री तंत्र भास्कर
यह सूर्य ही सर्व वस्तुओं में व्यापक आत्मा रूप विशुद्ध तेज और तत्त्वरूप है।
परमाणु में नाभिक की उपस्थिति आत्मा के अस्तित्व और गुणों का बोधक है, जो इस विज्ञानमय स्वरूप को समझकर आत्मा को प्राप्त करने का प्रयास करता है, वह प्रकृति के प्रभाव से मुक्त होकर पूर्णता, शाँति और सनातन सत्य की उपलब्धि करता है।
‘मन्दिर के जिस प्रकोष्ठ में भगवान सुब्रह्मण्यम् की मूर्ति थी, उसी के सामने वाले भाग में एक सुन्दर वीणा रखी हुई थी। मन्दिर में कई लोग आते कुछ तो वीणा के दर्शन कर लेते और चले जाते, कुछ उसे बजाने की इच्छा करते, पर वहाँ बैठा हुआ मन्दिर का रक्षक उनसे मना करता और वे वहाँ से चल देते। इस प्रकार सुन्दर स्वरों वाली वह वीणा जहाँ थी वहीं रखी रहती थी, उसका कभी कोई उपयोग न होता था।’
‘एक दिन एक व्यक्ति आया उसने वीणा बजाने की इच्छा व्यक्त की, पर उस व्यक्ति ने उसे भी मना कर दिया। वह व्यक्ति वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब लोग मन्दिर से निकलकर बाहर चले गये तो उस व्यक्ति ने वीणा उठा ली और उसका लयपूर्वक वादन करने लगा। वीणा का मधुर स्वर लोगों के कानों तक पहुँचा तो लोग पीछे लौटने लगे और मधुर संगीत का रसास्वादन करने लगे। वाद्य घंटों चला और लोग मंत्र सुनते रहे। जब वह बन्द हुआ तब भी लोग ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति करते रहे। लोगों ने कहा आज वीणा सार्थक हो गई।’
इतनी कथा सुनाने के बाद गुरु ने शिष्य से कहा- तात! इस कथा का भावार्थ यह है कि भगवान मनुष्य शरीर सब को देता है पर कुछ लोगों को तो अज्ञान और कुछ लोगों को अहंकार उस महत्वपूर्ण यंत्र का उपयोग करने नहीं देता। पर यदि कोई इन दोनों की उपेक्षा करके शरीर रूपी वीणा से मधुर स्वर लहरियाँ निकालने लगता है, यह शरीर इतना परिपूर्ण है कि न केवल उसे वरन् उसके संपर्क के सैंकड़ों दूसरे लोग भी उसमें ईश्वरीय आनन्द की झलक पाने लगते हैं।
पदार्थ विद्या विलुप्त न हो जाये इस उद्देश्य से बोधिसत्व ने जहाँ आत्म-साक्षात्कार कराने वाला योगाभ्यास किया वहाँ उन्होंने तंत्र विद्या की कठोर साधनायें भी कीं और उसके अनेक गूढ़ रहस्यों का पता लगाया।
वे चाहते थे लोक मंगल में इस विद्या का आगे भी उपयोग होता रहे, इसलिये उन्होंने लंबे समय तक किसी योग्य व्यक्ति की प्रतीक्षा की। एक बार एक ब्राह्मण युवक आया और उसने तंत्र सीखने की तीव्र जिज्ञासा प्रकट की। बोधिसत्व ने उसे तंत्र विद्या के सारे गोपनीय रहस्यों का ज्ञान करा दिया। एक विशेष नक्षत्र के उदय होने पर आकाश से रत्न वर्षा कराने वाला वैदर्भ मंत्र भी उन्होंने सिखा दिया पर उन्हें इस बात का पश्चाताप भी कम न था कि सिखाने से पूर्व युवक की पात्र-परीक्षा नहीं की गई।
एक बार बोधिसत्व अपने इस ब्राह्मण शिष्य के साथ चेदि प्राँत का भ्रमण करने गये। मार्ग में एक धनी जंगल पड़ता था उसमें कुछ प्रेषणक चोर रहा करते थे। प्रेषणक चोर उन्हें इसलिये कहा जाता था क्योंकि वे उन लोगों को पकड़ते थे जो दो या दो से अधिक होते थे। उनमें से वे किसी एक या अधिक को रखकर कुछ लोगों को यह कहकर छोड़ देते थे कि इतने दिनों में इतनी धनराशि पहुँचा न दी तो इसको जान से मार दिया जायेगा।
चेदि जा रहे बोधिसत्व और ब्राह्मण को भी चोरों ने पकड़ लिया। चोरों ने इसके बाद बोधिसत्व को छोड़ दिया और कहा तीन दिन के अन्दर एक हजार स्वर्ण मुद्रायें लाकर दो तभी इस ब्राह्मण को छोड़ेंगे।
बोधिसत्व चलने लगे तो उन्हें एकाएक याद आया कल वह नक्षत्र आ रहा है जिसके उदय होने पर यदि वैदर्भ मंत्र का प्रयोग किया जाये तो आकाश से रत्नों की वर्षा हो सकती है। उन्होंने ब्राह्मण के कान में कहा-’वत्स! मैं स्वर्ण मुद्राओं का प्रबंध करके शीघ्र लौटूँगा देखना तुम तंत्र विद्या का प्रयोग मत करना अन्यथा अपना भी नाश कर लोगे और चोरों के भी विनाश का कारण बनोगे।’ यह कहकर वे वहाँ से लौट पड़े।
रस्सियों से जकड़े पड़े युवक ने दूसरे दिन आकाश की ओर देखा तो वह नक्षत्र दिखाई पड़ गया। उस समय उसने गुरु की बात भी ठुकरा दी और चोरों से पूछा- बंधुओं! तुम लोगों ने मुझे धन के लिये पकड़ा है न! यह देखो, धन का नक्षत्र उदय हो गया। तुम लोग मुझे छोड़ दो मैं अभी वैदर्भ मंत्र का प्रयोग कर रत्नों का ढेर लगा देता हूँ। तुम भी धन ले जाना और हम भी अभीष्ट धन प्राप्त कर सुख और वैभव का जीवन यापन करेंगे।
चोर बड़े प्रसन्न हुये। उन्होंने युवक को छोड़ दिया। युवक ने मंत्र का प्रयोग कर दो घंटे तक रत्नों की वर्षा कराई। रत्नों के अम्बार लग गये। चोर धन बाँध-बाँध कर वहाँ से भाग खड़े हुये किन्तु अभी वे कुछ ही दूर जा पाये थे कि उन्हें दूसरे चोरों ने पकड़ लिया। चोरों ने युवक की ओर संकेत करते हुये कहा- यह सब इनकी कृपा का फल है। इसे पकड़ लो यह आकाश से रत्नों की वर्षा करा सकता है।
चोरों ने युवक को पकड़ लिया पर उसने कहा- अब तो वह नक्षत्र एक वर्ष के लिये चला गया। इस पर चोर बड़े कुपित हुये और उन्होंने युवक को वहीं मार कर फेंक दिया। फिर चोरों में द्वन्द्व युद्ध हुआ और इस तरह दो को छोड़कर शेष सभी परस्पर वार करते हुये यमपुरी सिधार गये। उन दोनों ने आधा-आधा धन बाँट लेने का समझौता कर लड़ाई बन्द कर दी और भूख-प्यास मिटाने का उपाय करने लगे। एक चोर गाँव की ओर भोजन लेने गया, दूसरा धन की रखवाली में बैठा। उस समय दोनों को ही लोभ आ गया और वे एक दूसरे को छल से मार देने का उपाय ढूंढ़ने लगे। पहला चोर भोजन में विष मिला लाया। पर जैसे ही वह दूसरे चोर के पास पहुँचा उसने तलवार से उसका सिर काट डाला। फिर उसने सोचा चलने से पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। जैसे ही उसने एक कौर खाया कि विष के प्रभाव से उसकी भी वहीं मृत्यु हो गई। इसी बीच बोधिसत्व वहाँ आ पहुँचे। सारा दृश्य देखकर उनके मुँह से इतना ही निकला जो पात्र नहीं है उनको ज्ञान देने का यही परिणाम होता है।
मनुष्य की वे सारी क्रियायें और प्रतिक्रियायें जो उसे अंधकार, ध्वंस अथवा पतन की ओर ले जाती हैं आसुरी वृत्तियाँ होती हैं और जो क्रियायें प्रतिक्रियायें प्रकाश, सृजन और उत्थान की ओर प्रेरित करती हैं वे दैवी वृत्तियाँ मानी गई हैं। मानव-जीवन की दो गतियाँ हैं- एक बंधन, दूसरी मुक्ति। बन्धन दुःख का हेतु और मुक्ति सुख का। आसुरी वृत्तियों से बंधन और दैवी वृत्तियों से मुक्ति प्राप्त होती है। दैवी और आसुरी दोनों वृत्तियाँ परस्पर विपरीत तथा विरोधिनी होती हैं। मानव जीवन में इन दोनों का अस्तित्व है। दोनों अपना-अपना अवसर पाकर काम करती हैं और मनुष्य को बंधन अथवा मुक्ति की ओर बढ़ाती रहती हैं। कभी मनुष्य की आसुरी वृत्ति प्रबल हो जाती है और कभी दैवी। क्रिया प्रतिक्रियाओं के रूप में इन वृत्तियों का संघर्ष ही मानव-जीवन की गति है। जिस मानवीय प्रक्रिया को जीवन यापन कहा जाता है वह वास्तव में इन दो वृत्तियों का ही खेल है।
मनुष्य में यह दोनों वृत्तियाँ समान रूप से निवास करती हैं। क्योंकि मनुष्य आसुरी और दैवी दोनों स्थितियों का समन्वित रूप है। वह न तो पूरी तरह देवता है और न पूरी तरह असुर। किन्तु ये दोनों संभावनायें उसके लिए उपलक्षित हैं। वह चाहे तो देवता बन सकता है और चाहे तो असुर बन सकता है। इन्हीं दो दिशाओं के मिलन बिन्दु पर खड़ा मनुष्य इस बात के लिये सर्वथा स्वतंत्र है कि वह किसी भी एक दिशा में प्रस्थान कर सकता है। मनुष्य की गति अगति पर किसी प्रकार का नैसर्गिक प्रतिबंध नहीं है।
मनुष्य बंधन और मुक्ति की ओर जाने वाले मार्ग मिलन पर ही खड़ा है। वहाँ से वह अपनी रुचि के अनुसार शुभ अथवा अशुभ दिशा में चला जाता है। पुण्यवान, परमार्थों, समाज देवी, सज्जन, महापुरुष, ऋषि-मुनि आदि सारे सत्पुरुष शुभ और पापी, अघी, अपराधी, अपघाती आदि सब अशुभ दिशागामी होते हैं। शुभ दिशा की ओर जाने वाले मुक्ति के अधिकारी होते हैं और अशुभ दिशा की ओर जाने वाले बंधन में पड़ते हैं।
मुक्ति ही मनुष्य का जीवन लक्ष्य है। उसका जन्म इसी उद्देश्य से हुआ है। जो बन्धनों की ओर अग्रसित है उन्हें लक्ष्य भ्रष्ट ही कहा जायेगा। इस सत्य के साथ यह प्रश्न उठ सकता है कि जब मनुष्य का लक्ष्य मुक्ति है तो उसके लिए बंधन के कारण क्यों उत्पन्न किये गये हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि बंधन के कारण उत्पन्न न किये गये होते तो मनुष्य के पुरुषार्थ का प्रदर्शन अथवा परीक्षा किस प्रकार होती और किस प्रकार यह संसार चक्र चलता। सभी आत्मायें सहज ही मुक्त हो होकर चली जाती और यह संसार एक दिन विजन हो जाता। परमात्मा द्वारा प्रेरित इस नाटक में रोचकता नहीं रहती और जल्दी ही इसका अन्त हो जाता।
यदि परमात्मा को मनुष्य की सहज मुक्ति ही वाँछित होती तो वह उसे संसार चक्र में डालता ही क्यों? उसकी असंसारी स्थिति मुक्ति की तो स्थिति होती है। अपने अंश जीवात्मा को संसार चक्र में संयोजित कर परमात्मा उसके पुरुषार्थ, पुण्य परमार्थ तथा निष्क्रियता, पापों तथा स्वार्थपरक खेलों को देखता और उनका आनन्द लिया करता है। दैवी और आसुरी वृत्तियाँ देकर उसने मनुष्य को मुक्ति तथा बंधन के संघर्ष में लगाया है।
सोने, जागने, खाने, पीने, कमाने से लेकर, पुण्य, परमार्थ, तप, त्याग और साधना तक ही मनुष्य की सारी क्रियायें प्रतिक्रियायें एकमात्र बंधन अथवा मुक्ति का प्रयत्न ही है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। यह मानना है कि मनुष्य के बंधन अथवा मुक्ति की विधायिका क्रियायें, प्रतिक्रियायें भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं भूल ही होगी। मानव जीवन की सम्पूर्ण गतिविधि इन्हीं दो में से एक गति की सम्पादिका होती है। बंधन अथवा मुक्ति दायिनी गतिविधियों का अलग-अलग कोई बंटवारा नहीं है। जो एक काम मनुष्य के लिए मुक्ति का कारण हो सकता है वही बन्धन का भी कारण हो सकता है। मनुष्य की हर क्रिया एवं कर्म में मुक्ति अथवा बंधन का परिणाम निरन्तर छिपा रहता है।
जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि मनुष्य की वे सारी क्रियायें तथा प्रतिक्रियायें जो अंधकार, ध्वंस अथवा पतन की ओर ले जाने वाली होती हैं आसुरी- अर्थात् बंधन का कारण होती हैं, और जो क्रिया प्रतिक्रियायें प्रकाश, सृजन अथवा उत्थान की ओर ले जाने वाली होती हैं, वे दैवी अर्थात् मुक्ति का हेतु होती हैं। इस तथ्य को सम्मुख रखकर अपनी गतिविधि का सम्पादन करने वाले शुभ अथवा अशुभ दिशा में बढ़ते चले जा सकते हैं।
उक्त दो में से किसी एक दिशा में जाने के लिये किन्हीं भिन्न-भिन्न गतिविधियों का विधान नहीं है। मनुष्य के जीवन यापन की सामान्य क्रियायें ही उसका यह उद्देश्य पूरा करती चलती हैं। प्रसंग को समझने के लिये मनुष्य की कोई भी गतिविधि लेकर उसकी विवेचना की जा सकती है। जीवन यापन की सबसे सामान्य गतिविधि है कमाना और खाना। यह एक सामान्यतम गतिविधि भी बंधन अथवा मुक्ति में सहायक हो सकती है।
जीवन धारण करने के लिये भोजन परमावश्यक शर्त है और भोजन पाने के लिए कमाना अर्थात् परिश्रम तथा पुरुषार्थ करना अनिवार्य है। भोजन परिश्रम का ही फल है। अर्थात् पहले परिश्रम करना होगा तब भोजन प्राप्त होगा। भोजन के लिये जो मनुष्य मजबूरी समझकर परिश्रम में प्रवृत्त होता है वह अपनी उस गतिविधि को अशुभ मुखी बना लेता है। काम को भार समझकर बेगार की तरह टालना, बेमन अथवा अदक्षता पूर्वक करना, काम में चोरी, आलस्य अथवा प्रमाद करना आदि, इस प्रकार की जो भी वृत्ति है वह मनुष्य के इस सामान्य कर्त्तव्य को भी बंधन का कारण बना देती है। इसी प्रकार काम में असफल होने पर निराश, निरुत्साह अथवा विरक्त हो जाना भी आसुरी वृत्ति है जिसका फल बंधन के रूप में ही सामने आता है।
इसके विपरीत जो मनुष्य इसी काम को अपना पावन कर्त्तव्य समझकर पूरे उत्साह, दक्षता तथा संपूर्ण तन-मन से करता है, साथ ही सफलता असफलता की स्थिति में तटस्थ रहकर समान रूप से प्रसन्न और प्रफुल्लित रहता है उसकी यह छोटी सी प्रक्रिया भी उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
प्रायः जप-तप, पूजा-पाठ उपासना साधना आदि की धार्मिक अथवा आध्यात्मिक स्वभाव की क्रियाओं को शुभ और मुक्ति प्रदायिका माना जाता है। निश्चय ही यह है भी। किन्तु कब? जब इनको इन्हीं की स्थिति में रखा जाए। इनको निःस्वार्थ, निष्काम तथा निर्लोभ भाव से किया जाय। यदि इन पवित्र क्रियाओं को कामनाओं और वासनाओं द्वारा अपवित्र कर डाला जाएगा तो यह मुक्ति के स्थान पर बंधन की ही विधायिका बन जायेगी। तथापि इनमें कामनाओं का समावेश किया जा सकता है, किन्तु इन्हीं के अनुरूप कामनाओं का समावेश। जैसे इस उपासना अथवा धार्मिक गतिविधि से हमें तन-मन की पवित्रता मिले। हमारी आत्मा में दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हो। हमारी विषय वासनायें शाँत हों। हम अहंकार से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ें। इस प्रकार की पवित्र एवं निष्कलुष कामनायें आध्यात्मिक अथवा धर्माचार की क्रियाओं के अनुरूप हैं। इनको जोड़ लेने से उसका स्वरूप विकृत नहीं होता और उनकी प्रगति प्रकाश की ओर ही होती है।
देवत्व की रक्षा से बढ़कर धर्म नहीं और देवत्व अपनाने से बड़ा कोई कर्त्तव्य नहीं।
-सन्त तिरुवल्लुवर
वे भौतिक कामनायें जिनका आधार परिश्रम अथवा पुरुषार्थ है, उन्हें आध्यात्मिक गतिविधि के साथ जोड़ने का निषेध है। तथापि उनको इस रूप में किसी हद तक जोड़ा जा सकता है कि हमें इस पुण्य से शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक शक्ति प्रचुर रूप में मिले जिससे मैं परोपकार, पुण्य तथा परमार्थ के लिए अधिकाधिक धन कमा सकूँ। अपने परिवार का इस प्रकार पालन कर सकूँ जिससे उसके सारे सदस्य उन्नत और उदात्त बनें। मैं जिससे भोजन, वस्त्र और आवास की अपने उपयुक्त व्यवस्था करने के साथ दूसरे दुःखी और निराश्रितों की सहायता कर सकूँ। यद्यपि धर्माचार में भौतिक कामनाओं के समावेश का निषेध किया गया है तथापि परमार्थ के उद्देश्य से स्वार्थ पूर्ण कामनायें भी जोड़ी जा सकती हैं। इस प्रकार की स्वार्थ अथवा सकाम उपासना-साधना आदि की आध्यात्मिक गतिविधि बंधन की हेतु नहीं बनती।
धन, वैभव, शक्ति, सामर्थ्य, परिवार, परिजन, स्त्री, बच्चों की वह भौतिक कामना जिसका उद्देश्य प्रदर्शन, अथवा भोग-विलास हो, पुण्य प्रक्रिया में जोड़ देने से वह पुण्य क्रिया भी दूषित हो जाती है, उसकी प्रेरणा अंधकार की ओर ही ले जाती है। इस प्रकार क्या सामान्य और क्या असामान्य कोई भी गतिविधि यदि उसका लक्ष्य आदर्श एवं उदात्त नहीं है बंधन का कारण बनेगी और यदि उसका उद्देश्य पवित्र एवं पुण्य पूर्ण है तो निश्चय ही वह मुक्ति की सम्पादिकता होगी।
मानव-जीवन दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का एक मिला जुला रूप है। जीवन में दोनों वृत्तियाँ सक्रिय रहने का प्रयत्न करती रहती हैं। मुक्तिकाँक्षी व्यक्ति को चाहिये कि वह अपना सारा सहयोग दैवी प्रवृत्तियों को बढ़ाने, प्रोत्साहित करने तथा पालने में लगाये। दैवी वृत्ति के लक्षण हैं- परिश्रम, पुरुषार्थ, त्याग, प्रसन्नता, उदारता, उत्साह, आशा तथा मर्यादा आदि जिनको ग्रहण करने से मनुष्य की आत्मा में हर्ष तथा आनन्द का प्रकाश आता है और संसार समर में एक साहसी योद्धा की तरह अविरत संघर्ष करते रहने का बल प्राप्त होता है। आसुरी प्रवृत्तियों के लक्षण हैं आलस्य, प्रमाद, स्वार्थ, लिप्सा, निरुत्साह, निराशा, आवेश, उत्तेजना अथवा अदक्षता आदि जिनके दोष से मनुष्य अंधकार, ध्वंस तथा पतन की ओर अग्रसर होता है।
अस्तु, मनुष्य दैवी तथा आसुरी वृत्तियों का एक समन्वित रूप है जिसकी बंधन अथवा मुक्ति दो ही गतियाँ हो सकती हैं। यद्यपि वह शुद्ध-बुद्ध और स्वभावतः मुक्त परमात्मा का अंश है, तथापि उसे मुक्ति के साथ बंधन की संभावनायें देकर संसार में इसलिये भेजा गया है कि वह अपने गुणों तथा दैवत्व को विकसित करने के लिये प्रतिकूलताओं से संघर्ष करता हुआ पुरुषार्थ का परिचय दे और इस प्रकार इस संसार लीला को रोचक तथा सक्रिय बनाता हुआ अपने उस परमपिता परमात्मा का मनोरंजन करे जिसने अपना एकाकीपन बदलने के लिये इस वैचित्र्य पूर्ण संसार-नाटक की रचना की है। हार-जीत के इस खेल में बंधन, मुक्ति के इस संघर्ष में सफलता तभी संभव है जब मनुष्य जीवन में सामान्य अथवा असामान्य, भौतिक अथवा आध्यात्मिक जिनकी गतिविधियों तथा क्रिया प्रक्रियाओं को आधार बनाए उनको सत्य, शिव और सुन्दरता पूर्वक अपने परम लक्ष्य को ही लक्षित करके सम्पादित करता हुआ इस प्रकार चलता रहे जिससे उसके मार्ग का अन्धकार हटता और प्रकाश बढ़ता जाए।
एक आदमी सन्त तुकाराम का कीर्तन सुनने तो नित्य ही आता- पर उनसे बहुत द्वेष रखता। वह मन ही मन किसी अवसर का संत तुकाराम को नीचा दिखाने की ताक में रहा करता था।
एक दिन तुकाराम की भैंस उसके बाग के कुछ पौधे चर आई। बस वह आकर लगा गालियाँ सुनाने। इस पर भी जब सन्त उत्तेजित न हुए तो उसे और भी गुस्सा आया और एक काँटों वाली छड़ी लेकर तुकाराम को इतना पीटा, कि रक्त बहने लगा। फिर भी तुकाराम को न क्रोध आया- न प्रतिरोध ही किया।
सन्ध्या समय जब वह व्यक्ति नित्य की भाँति कीर्तन में नहीं आया- तो संत तुकाराम स्वयं उसके घर गये और स्नेहपूर्वक भैंस की गलती की क्षमा माँगते हुए उसे कीर्तन में ले आये।
अब वह व्यक्ति तुकाराम के चरणों में पड़ा था और क्षमा-याचना कर रहा था।
मनुष्य जो कुछ खाता-पीता है उससे जीवन शक्ति को उसकी सहायता के लिये कार्बोहाइड्रेट, (कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन), चर्बी, प्रोटीन, विटामिन्स और खनिज द्रव्य मिलते हैं। भोजन में से यह आवश्यक तत्व ग्रहण करने के लिये गले की नली से लेकर आमाशय की छोटी आँतों तक की पूरी मशीन दिन-रात काम करती रहती है। उससे भी अधिक ध्यान और मशीनरी का निर्माण शरीर में इसके लिये किया गया है कि शरीर द्वारा उत्पन्न होने वाली गंदगी शरीर से अलग होती रहे। भोजन और शक्ति के अभाव में मनुष्य कुछ दिन जी भी सकता है पर स्वच्छता और सफाई के अभाव में मनुष्य शरीर अधिक दिन तक टिक नहीं सकता।
शरीर के वृक्क प्रतिदिन डेढ़ सेर मूत्र निकालते हैं। इसके द्वारा यूरिया, यूरिक एसिड, क्रीटीनाइन, एमोनिया, सोडियम क्लोराइड, फास्फोरिक अम्ल, मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटैशियम की बहुत सी गंदगी शरीर से बाहर निकल जाती है। बड़ी आँत प्रतिदिन ढेरों मल निकालती रहती है। शरीर की त्वचा में लाखों की संख्या में ग्रंथियाँ होती हैं जो रक्त से पसीने को छान कर बाहर निकालती रहती है। हथेली के एक वर्ग इंच में ही ऐसी कम से कम 3600 ग्रंथियाँ होती हैं इससे पता चलता है कि प्रकृति ने शरीर में सफाई की व्यवस्था को सबसे अधिक ध्यान देकर सावधानी से जमाया है यदि शुद्धिकरण की यह क्रिया एक दिन को भी बन्द हो जाये तो शरीर सड़ने लगे और मस्तिष्क पागल हो जाये।
शरीर ही नहीं प्रकृति का हर कण और प्रत्येक क्षण दोष दूषणों के प्रति सजग और सावधान रहता है। जहाँ भी कहीं गंदगी दिखाई दी प्रकृति उस पर टूट पड़ती है और देखते-देखते गंदगी को साफ करके उस स्थान को शुद्ध और उपयोगी बना देती है।
जिसे हम नगण्य समझते हैं- उस मिट्टी में भी फफूँद (फंगाई) एक्टीनो माइसिटीज तथा दूसरे कई महत्वपूर्ण जीवाणु (बैक्टीरिया) पाये जाते हैं यह नंगी आँखों से दिखाई नहीं देते, उन्हें शक्तिशाली दूरबीनों माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है। पर उनकी इस लघुता में वह महानता छिपी है जो सारे मनुष्य समाज के हितों की रक्षा करती है। यदि यह जीवाणु न होते यह सारी पृथ्वी 7 दिन के अन्दर पूरी तरह से मल से आच्छादित हो जाती और तब मनुष्य का जीवित रहना भी असंभव हो जाता।
जैसे ही कोई सड़ी-गली वस्तु, मल या कोई गन्दगी जमीन में गिरी यह जीवाणु दौड़ पड़ते हैं और इन गंदगी के अणुओं की तोड़-फोड़ प्रारंभ कर देते हैं। दूसरे दिन हम उधर जाते हैं तो मल के ढेर के स्थान पर मिट्टी का सा ढेर दिखाई देता है। लोग उपेक्षा से देखकर निकल जाते हैं पर वहाँ प्रकृति का एक बड़ा उपयोगी सिद्धाँत काम करता रहता है। यह जीवाणु इस गंदगी के एक-एक अणु को तब तक तोड़ते फोड़ते रहते हैं जब तक वह सारी की सारी मिट्टी में बदल नहीं जाती।
मनुष्य ने इस सिद्धाँत को समझा होता और मानवीय स्वभाव के दोष व दुर्गुणों की गंदगी को सुधारने के लिये इन नन्हें-नन्हें जीवों की तरह भी प्रयत्न किया होता तो संसार में एक भी बुराई का नाम निशान तक न होता।
दो किरण चली एक जा पड़ी कीचड़ में दूसरी एक पुष्प में। पुष्प वाली किरण ने दूसरी किरण से कहा- देखो! जरा दूर रहना छूकर मुझे भी अपवित्र मत करना।
ऐसा न कहो बहिन दूसरी किरण बोली- हम इस कीचड़ को सुखायें और साफ न करें तो इस फूल की रक्षा कैसे हो। दूसरी किरण अपने दंभ पर बड़ी लज्जित हुई और शर्म के मारे गड़ कर रह गई।
आत्म जिज्ञासु नचिकेता यमाचार्य से आग्रह करता है-
येयं प्रते विचिकित्सा मनुष्ये,
अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं
वराणामेष वर स्तृतीयः॥
-कठोपनिषद् ।1।20
भगवन्! कुछ लोग कहते हैं आत्मा है, कुछ कहते हैं यह शरीर ही आत्मा है। मृत्यु के पश्चात आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। सही तत्व क्या है सो आप मुझे बतायें यह मेरा तीसरा वर है।
नचिकेता की तरह संसार का प्रायः हर व्यक्ति जिसने गहन तप, साधना, योगाभ्यास, स्वाध्याय और दीर्घकालीन मनन चिन्तन के बाद आत्मतत्व की स्पष्ट अनुभूति नहीं कर ली, इस विषय में दुविधा पूर्ण स्थिति में रहता आया है। आत्मा का कोई अस्तित्व है भी अथवा नहीं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे सुलझा न पाने वाले जीवन भर उलटी और अंधकार पूर्ण दिशाओं में भटकते रहते हैं पर जो इस स्थिति के बारे में निश्चिन्त होकर आत्मानुभूति कर लेते हैं, वे अपना जीवन धन्य मानते हैं।
इस संबंध में हिन्दू दर्शन की मान्यतायें बिलकुल स्पष्ट हैं। महर्षि चरक और इसी तरह के थोड़े ही विचारक हुये हैं जिन्होंने आत्मा को शरीर या द्रव्य की चेतना के अतिरिक्त कुछ नहीं माना जबकि अधिकाँश तत्त्ववेत्ता उसे शरीर से भिन्न एक शाश्वत और स्वतंत्र तत्व मानते रहे हैं। योगाभ्यास की ऐसी जटिल विधियाँ खोज निकाली गई हैं जो जीवित अवस्था में ही आत्म-चेतना को शरीर से बाहर कर लेने से स्वेच्छा से किसी भी शरीर में प्रविष्ट होने के प्रमाण प्रस्तुत कर चुकी हैं। इस कथन की पुष्टि में 1. जगद्गुरु शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी भगवती भारती से शास्त्रार्थ करने के लिये काम-शास्त्र का अध्ययन आवश्यक होने पर महिष्मती नगर के राजा के शरीर में ‘परकाया प्रवेश’ किया था। वे प्रतिदिन अपनी आत्म-चेतना को शरीर से निकाल लेते थे। शव जंगल में पड़ा रहता था और उनकी आत्म चेतना राजा के शरीर में बनी रहती थी। रात्रि के समय वे अपने निजी शरीर में आ जाते थे तब राजा का शरीर शव हो जाता था। एक ही आत्मा द्वारा दो शरीरों के उपयोग के इस उदाहरण से आत्मा का पृथक अस्तित्व प्रतिपादित होता है।
2. सन 1939 में पश्चिमी कमान के सैनिक कमाण्डेन्ट श्री एल.पी. फैरेल ने आसाम बर्मा सीमा पर एक योगी को अपनी आँखों अपने वृद्ध शरीर से निकलकर एक स्वस्थ के शव में प्रविष्ट होकर जीवित देखा था। यह घटना अखण्ड-ज्योति मई, 1970 के अंक पेज 29-30 में छपी है।
3. सामान्यतः शरीर का जीवन श्वाँस क्रिया पर आधारित माना जाता है पर सन्त हरदास ने महाराज रणजीत सिंह तत्कालीन अंग्रेज जनरल वेन्टुरा और अनेक अंग्रेज पदाधिकारियों की उपस्थिति में एक माह की समाधि लगाकर दिखा दिया कि आत्मा का शरीर से उतना ही संबंध है जितना किसी मशीन से विद्युत शक्ति का। आत्मा के न रहने पर शरीर मृत हो जाता है।
यह सैंकड़ों में एकाध उदाहरण है जब कि भारतीय धर्म शास्त्र और तत्व दर्शन के पन्ने-पन्ने ऐसी घटनाओं से भरे पड़े हैं। भारतीय आचार्य इस संबंध में पूर्णतया आश्वस्त हैं और बताते हैं-
व्यतिरेकस्तद् भावाभावित्वान्न तूपलधिवत्।
वेदान्त 3।3।54
अर्थात्- ‘शरीर और आत्मा एक नहीं है शरीर में रहते हुये भी आत्मा का अभाव हो जाने से शरीर को किसी बात का ज्ञान नहीं हो सकता।’
आत्मा की सत्ता और स्वतंत्रता के संबंध में करोड़ों वर्ष पूर्व स्थापित ऋषियों की मान्यतायें अब विज्ञान की कसौटी पर भी सत्य सिद्ध होती जा रही हैं। इस संबंध में शरीर का निर्माण करने वाले जीव-कोषों को बड़ा महत्व दिया जा रहा है। जीवित शरीर और मृत शरीर में क्या अन्तर है, इस संबंध में अमरीका की रायफेर संस्था के डॉ. बेकाफ और डॉ. स्टेनली ने बहुत परिश्रम और खोजें की हैं। यद्यपि उन्होंने अपना अन्तिम मत प्रतिपादित नहीं किया पर यदि भारतीय तत्वदर्शन को सामने रखकर उन खोजों पर विचार किया जाये तो इन वैज्ञानिक उपलब्धियों से भी वही तथ्य प्रतिध्वनित होंगे जो भारतीय दर्शन से ध्वनित होते हैं।
इन वैज्ञानिकों का कथन है कि जीवित अणु रासायनिक प्रक्रिया के प्रभाव से स्वयं ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् आत्मा शरीर की रासायनिक चेतना है पर वे अणु तभी तक उत्पन्न होते हैं जब तक कि वे जीवित पदार्थ (प्रोटोप्लाज्मा जिससे कि शरीर का निर्माण होता है) से संबंधित रहते हैं। अर्थात् चेतना का संबंध चेतना से ही है इस कथन के अनुसार आत्मा शरीर से भिन्न है।
यह एक स्वयं सिद्ध सत्य है कि मृत्यु के अनन्तर शरीर की सारी तन्मात्रायें समाप्त हो जाती हैं जो प्राणी अभी तक चलता, फिरता, खाता, पीता, सूँघता, मल-उत्सर्जन करता, खाँसता, छींकता जम्हाई लेता सोचता, बोलता, परामर्श करता, प्रेम, दया, करुणा या घृणा द्वेष और क्रोध व्यक्त कर रहा था मृत्यु होने के बाद शरीर ज्यों का त्यों होने पर अब वैसी क्रियायें क्यों नहीं करता।
वैज्ञानिक के समक्ष प्रश्न यह था कि प्रत्येक अस्तित्व का भार होना चाहिए। यदि प्रकाश कणों के इलेक्ट्रान अत्यधिक तीव्र गति से गतिशील न रहे होते और इस कारण उन्होंने अपने आप को गुरुत्वाकर्षण से मुक्त न कर लिया होता तो प्रकाश की मात्रा को भी तोलना संभव हो जाता। शक्तियों चाहे वह विद्युत हो, प्रकाश, ध्वनि, ताप या चुम्बक हो की परिभाषा यह है कि उनमें भार नहीं होता, वे वस्तुएं प्रभाव से ही जानी जा सकती हैं। केवल प्रभाव से ही किसी वस्तु के विश्लेषण को मानने के लिये वैज्ञानिक तैयार नहीं होते इसी कारण विज्ञान और मनोविज्ञान दोनों में मेल नहीं हो पाता और एक सनातन प्रश्न इस बौद्धिक प्रखरता के युग में भी अधूरे का अधूरा छूट जाता है।
फिर भी कुछ वैज्ञानिकों का ध्यान प्रसंगवश इधर गया और उन्होंने कुछ ऐसे कारण पाये जो आत्मा के अस्तित्व के प्रमाणीकरण में बड़े सहायक सिद्ध हुये। इंग्लैण्ड के डॉ. किलनर एक बार अस्पताल में रोगियों का परीक्षण कर रहे थे। एक मरणासन्न रोगी की जाँच करते समय उन्होंने देखा कि उनकी खुर्दबीन (माइक्रोस्कोप) के शीशे पर एक विचित्र प्रकार के रंगीन प्रकाश जम गये हैं जो आज तक कभी भी देखें नहीं गये थे। दूसरे दिन उसी रोगी के कपड़े उतरवाकर जाँच करते समय डॉ. किलनर फिर चौंके उन्होंने देखा जो रंगीन प्रकाश कल दिखाई दिया था आज वह लहरों के रूप में माइक्रोस्कोप के शीशे के सामने उड़ रहा है। रोगी के शरीर के चारों ओर छः, सात इंच परिधि में यह प्रकाश फैला था। उसमें कई दुर्लभ रासायनिक तत्वों के प्रकाश कण भी थे। उन्होंने देखा जब-जब वह प्रकाश मंद पड़ता है तब-तब उसके शरीर और नाड़ी की गति में शिथिलता आ जाती है। थोड़ी देर में एकाएक प्रकाश-पुँज विलुप्त हो गया। अब की बार जब उन्होंने नाड़ी पर हाथ रखा तो पाया कि उसकी मृत्यु हो गई है। डॉ. किलनर अनुमान करते रहे कि आत्म-चेतना कोई प्रकाश जैसा द्रव्य है और वह शरीर से पृथक द्रव्य और गुणों वाला है इसमें कुछ सन्देह नहीं।
एगो में सासओ अप्पा नाण दंसण संजुओ।
सेसा में वाहिरा भावासब्बे सजोग लक्खणा।
एगस्स चैव मरणं सिज्जई नीरओ॥
-षड्दर्शन समुच्यय
अपनी ज्ञान, दर्शन संयुक्त शाश्वत आत्मा ही धर्मात्मा है, शेष सारे संयोग तो ब्रह्म भाव हैं एक आत्मा का ही मरण है और एक आत्मा की ही सिद्धि है।
पीछे डॉ. किलनर ने यह घटना कई पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपाई। वैज्ञानिक की बात कोई अंधविश्वास नहीं हो सकती इसलिये दूसरे वैज्ञानिकों का भी ध्यान उधर गया। इस घटना को अमरीका के वैज्ञानिक डॉ. विलियम मैग्डूगल ने बहुत महत्व दिया। उन्होंने एक ऐसे तराजू का निर्माण किया जिसमें पलंग के साथ एक आदमी का भार भी तोला जा सकता हो और बाल जितनी सूक्ष्म वस्तु का भी भार तोला जा सकता हो। एक बार एक मरणासन्न रोगी पहुँचा। उन्होंने उसे उसी तराजू के एक पलड़े पर बिस्तर सहित लिटा दिया और प्रत्येक स्थिति में उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म भार के अन्तर को भी अलग कागज पर अंकित करते रहे। जैसे ही रोगी के प्राण निकले यंत्र की सुई एक औंस (आधी छटाँक) कम वाले चिह्न पर आकर स्थिर हो गई। इससे यह सिद्ध हो गया कि चेतना चाहे किसी भी द्रव्य से बनी हो पर उसके सूक्ष्म शरीर का भी भार हो सकता है। अन्य रोगियों की परीक्षा करने पर यह भार डॉ. मैग्डूगल ने 1।4 औंस से लेकर डेढ़ औंस तक पाया। जितना वजन कम मिला यह पाया गया कि वह व्यक्ति उतना ही बुद्धिमान, विद्वान और गुण सम्पन्न रहा है जबकि भार की अधिकता वाले गुणों की दृष्टि से निम्न स्तर के व्यक्ति थे। ऐसे प्रयोग लास ऐन्गिल्स के डॉ. टवाइनिंग और कार्नल विश्व विद्यालय के डॉ- ओटोरान ने भी किये, उनकी मान्यतायें भी ऐसी ही हैं।
प्रकाश कणों या दिव्य-ज्योति के रूप में प्रवाहमान आत्मा के बारे में भारतीय तत्वदर्शियों के यह कथन हैं कि आत्मा 1. सनातन है 2. आत्मा सर्वव्यापी है 3. आत्मा स्वाधीन है। पर कर्म बन्धनों में बंधा होने के कारण वह शरीरों में आया जाया करता है अब विज्ञान के भी प्रतिपाद्य विषय बन गये हैं। अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. जेम्स वाटसन और इंग्लैण्ड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के डॉ. फ्रांसिस क्रिक ने जीवित कोश (सेल- अर्थात् जीवित द्रव्य का छोटे से छोटा टुकड़ा जिससे शरीर बनता है) के नाभिक (न्यूक्लियस) में ही ज्ञान व संस्कार-गुणसूत्र (क्रोमोसोम) पाये जाते हैं यह पैड़ीदार और बीच-बीच डोरी में लगी गाँठों की तरह होते हैं। इन गाँठों को जीन्स (संस्कार सूत्र) कहते हैं। नाभिक प्रकाश तत्व है और उसी में जीवन तत्व होना, उसका प्रकाश पुँज होना प्रमाणित करता है यही निकल जाने से शरीर निष्प्राण हो जाता है। इससे सिद्ध है कि वह पदार्थ से पृथक अस्तित्व वाला है।
मनुष्य शरीर में 600 खरब जीवित कोश पाये जाते हैं, इन कोशों में जितने जीन्स होते हैं उनकी लम्बाई एक ‘कोश’ में 5 फुट तक हो सकती है। 600 खरब कोशों में जीन्स की- लंबाई 3000 खरब फुट होगी यह एक अनुमानित लंबाई है वास्तविक तो अनन्त है यदि अपना ज्ञान इस चेतना के सूक्ष्म में स्थिर कर दिया जाये तो मनुष्य अपने आपको विश्व-व्यापी चेतना के रूप में ही पायेगा इसी का नाम आत्मानुभूति या आत्म-साक्षात्कार है, यह स्थिति कठिन अभ्यास से ही बन पाती है जब तक मनुष्य अपने इस विराट स्वरूप को नहीं पहचानता और भौतिक पदार्थों के सुख की इच्छा किया करता है तब तक वह जीव है, बंधन में पड़ा हुआ मानवेत्तर योनियों में भ्रमण करता रहता है, आत्मा में स्थिर हो जाने का कदाचित अवसर मिल जाता है तो यही जीव युग-युगान्तरों के कल्मष-काषाय धोकर इसी शरीर से स्वर्ग और मुक्ति का रसास्वादन करता हुआ अपना पारमार्थिक लक्ष्य पूरा करता है।
ब्राह्मण देवदत्त जनक के पास जाकर बोला-महाराज आप आत्मदर्शी हैं मुझे कोई उपाय बतायें। मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आत्मा को प्राप्त करूं पर यह मन है कि लौकिक सुख, भोग, तृष्णा और वासना से विरत होता ही नहीं। जनक बिना कुछ बोले उठे और एक खंभे को पकड़कर खड़े हो गये। ब्राह्मण बड़ी देर तक देखता रहा ‘फिर बोला’ महाराज यह क्या कर रहे हैं मेरे प्रश्न का उत्तर? जनक बोले, भाई क्या करूं इस खंभे ने मुझे पकड़ लिया है। छोड़ता नहीं, छोड़ें तो कुछ बात करूं।
ब्राह्मण हंसा-बोला- ‘जड़ खंभा कहीं पकड़ सकता है?’ इस पर जनक ने उत्तर दिया- भाई मन भी तो जड़ है, उसकी क्या औकात कि तुम्हें पकड़ ले।
आर्गेनन सूत्र 269, 270 में होम्योपैथी चिकित्सा के आविष्कारक डॉ. हैनीमैन ने बताया है कि होम्योपैथी औषधियों के निर्माण का सिद्धाँत यह है कि उनके अन्दर जो अदृश्य सूक्ष्म महाशक्ति है उसे जगाया जाये ताकि वह अदृश्य रोग शक्ति से ग्रसित जीवनी शक्ति (वायटैलिटी) को रोग मुक्त करने में सहायक हो सके।
पदार्थों के अन्दर यह जो अदृश्य सूक्ष्म शक्ति है वह उसकी चेतना और संस्कार है हम नहीं जानते पर यह सत्य है कि आज का रोग हमारे कल के मानसिक विकार का ही परिणाम होता है। रोग को औषधियाँ तब तक ठीक नहीं कर सकती, जब तक उन विकारों को नष्ट न किया जाये। औषधियाँ तेजी से तात्कालिक आराम पहुँचा सकती हैं पर उनके स्थूल गुण स्थूल रोग को ही दबा सकते हैं। दबे हुये दोष फिर नये रोगों के रूप में फूट पड़ते हैं और जब तक रोग शारीरिक कष्ट के रूप में ऊपर उभरकर न आयें तब तक मनुष्य के मन में अशाँति उत्पन्न किया करते हैं।
होम्योपैथी के डाक्टरों ने विभिन्न पदार्थों के गुणों का विभिन्न देश, जाति, वर्ण और आयु के लोगों में प्रयोग किया और उनके गुणों का अध्ययन कर उन्हें औषधि के रूप में प्रस्तुत किया। यह एक जटिल प्रणाली है तो भी उन औषधियों के निर्माण की जो विधि और प्रभाव है उससे सूक्ष्म संस्कारों की महत्ता ही प्रतिपादित होती है।
‘औरम मिटैलिकम’ एनाकार्डियम प्लैटिना, इग्नोशिया आदि औषधियाँ कई तरह के मानसिक लक्षण भेद का प्रतीक हैं उसकी सूक्ष्म और नाभिकीय शक्तियों को जागृत करने के लिये होम्योपैथी औषधि निर्माताओं को दीर्घकालीन परिश्रम करना पड़ता है।
उदाहरण के लिये ‘औरम मिटैलिकम’ बनाते समय सोने का एक टुकड़ा लेते हैं उसे अच्छी तरह सरल करके बहुत बारीक चूर्ण बना लेते हैं। चूर्ण बनाते समय उसमें दूध और शक्कर मिलाकर उसकी अच्छी तरह घोटाई की जाती है। उस विचूर्णित स्वर्ण की एक रत्ती मात्रा को 400 बूँद परिश्रत जल (डिस्टिल्ड वाटर) तथा 100 बूंदें रेक्टीमाइड अल्कोहल के साथ डालकर मिला लेते हैं यह एक शक्ति ‘पोटैंसी’ की औषधि हुई।
तीनों वस्तुओं के घोल में 1 रत्ती सोना था तब उस पूरे घोल का कुल 1 बूँद लिया उसमें स्वर्ण की मात्रा 1 रत्ती के सौ गुने से भी कम होगी उस एक बूँद में 100 बूँद अल्कोहल मिलाकर फिर हिलाते हैं। यह 2 शक्ति पोटैंसी की औषधि हुई। इसमें से एक बूँद औषधि 100 बूँद अल्कोहल लेकर फिर मिलाया यह तीन पोटैंसी हुई। इसी प्रकार औषधि की सूक्ष्म शक्ति को कई लाख पोटैंसी तक ले जाते हैं और जब वह औषधि किसी रोगी व्यक्ति को दी जाती है तो उसमें तीव्र हलचल उत्पन्न कर देती है। पिछले दोषों को उभार देती है जैसे-जैसे रोग के लक्षण उभरते रहते हैं तब तक अनुभूत औषधियाँ दी जाती रहती हैं समय तो लगता है पर उससे जीवनी शक्ति पर लगे जन्म-जन्मान्तरों के दोषों का शमन हो जाता है ऐसा हर होम्योपैथी चिकित्सा का विश्वास है।
यह चिकित्सा पद्धति हमारा ध्यान पदार्थों की सूक्ष्म सत्ता के अस्तित्व और उसकी महान महत्ता की ओर खींचती है। यदि पदार्थों और जीवनी शक्ति के सूक्ष्म अस्तित्व की बात का ज्ञान हो जाये तो मनुष्य न केवल अपने शरीर बल्कि अपने जीवन और अपनी आत्मा का भी उद्धार कर सकता है।
छोटे को छोटा मत समझो क्योंकि उसमें भी विराट भरा हुआ है। हाँ! विराट को अनुभव करना चाहते हो तो स्वयं को इतना छोटा बना लो कि तुमसे छोटा और कोई रह न जाये।
-महाप्रभु ईसा
चौगुना मूल्य बढ़ जाने पर भी रासायनिक दृष्टि से मनुष्य के शरीर का मूल्य अब तक 27 रुपये हो पाया है। नार्थ वेस्टर्न मेडिकल स्कूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. डोनाल्ड फोरमैन ने 18 सितम्बर, 1969 को अपने एक बयान में बताया कि जब वस्तुओं की महंगाई बढ़ी नहीं थी तब मनुष्य शरीर में पाये जाने वाले सभी तत्वों का कुल मूल्य केवल 7 रुपये 35 पैसे था, पर अब चूँकि महंगाई बढ़ गई है इसलिए उसमें पाये जाने वाले तत्वों अर्थात् शरीर का रासायनिक मूल्य 27 रु. हो गया है।
जिन रासायनिक तत्वों से शरीर बना है, उनमें से सबसे बड़ा भाग ऑक्सीजन का है ऑक्सीजन शरीर में 65 प्रतिशत होता है यह जल और वायु से मिलता है। ‘शरमन्स के मिस्ट्री आफ माटिरियलस’ पुस्तक में शेष तत्वों की जो तालिका दी है, उसमें बताया है, कि ऑक्सीजन के अतिरिक्त शरीर में 18 प्रतिशत कार्बन 10 प्रतिशत हाइड्रोजन, 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2 प्रतिशत कैल्शियम 1 प्रतिशत फास्फोरस, .35 प्रतिशत पोटैशियम, .25 प्रतिशत सल्फर, .15 प्रतिशत सोडियम, .15 प्रतिशत क्लोरीन, .50 प्रतिशत मैग्नीशियम, 0.04 प्रतिशत लोहा और शेष .046 प्रतिशत भाग में आयोडीन, फ्लोरीन तथा सिलिकन पाया जाता है।
हैलीपटन और मैगडोवल की फिजियोलॉजी पुस्तक में वल्कमैन व विसचाँफ ने उपरोक्त रासायनिक मात्रा को और भी छोटे से घेरे में सीमित कर दिया है। उनके अनुसार शरीर में 64 प्रतिशत जल, 16 प्रतिशत प्रोटीन, 14 प्रतिशत चर्बी, 5 प्रतिशत लवण और 1 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है। इन सबका मूल्य आज के इस महंगाई वाले युग में जब कि टेरेलीन और टेरेकोट जैसे कपड़ों के एक ‘शूट’ का मूल्य ही 100 तक जा पहुँचा है मनुष्य शरीर का मूल्य पहने जाने वाले कपड़ों से भी बदतर होना, यह बताता है कि स्थूल और रासायनिक दृष्टि से शरीर का सचमुच कोई भी मूल्य और महत्व नहीं है। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने विषयासक्त लोगों को बार-बार चेतावनी दी है कि हे मनुष्यों! इस स्थूल शरीर का कोई मूल्य नहीं है इसी के सुखों में आसक्त मत रहो। इसमें संव्याप्त आत्म चेतना की भी शोध और उपलब्धि करो। तभी दुःखों से निवृत्ति हो सकती है।
राजा ब्रहद्रथ को एक बार शरीर की अनित्यता का ज्ञान होने पर वैराग्य हो गया। आत्म-साक्षात्कार के लिये उनके अन्तःकरण में व्याकुलता उत्पन्न हो उठी। पूछने पर गुरु ने समझाया, तात! आत्म साक्षात्कार के लिये तपश्चर्या आवश्यक है। पर तप का भी एक विज्ञान है और जो उसे जानता है, उसी के मार्गदर्शन व संरक्षण में किया हुआ तप ही सार्थक होता है। चाहे जब, चाहे जो, क्रिया तप नहीं कहलाती वरन् एक क्रमबद्ध साधना पद्धति द्वारा आत्मा के ऊपर चढ़े हुये मलावरण को परिमार्जित करना पड़ता है। आप आत्म-वेत्ता महामुनि शाकायन्य के पास जायें वे ही आपको आत्म-ज्ञान की दीक्षा देने में समर्थ हैं।
इक्ष्वाकुवंशी ब्रहद्रथ महामुनि शाकायन्य के पास जाकर बोले-भगवन्! ‘अथातो आत्म जिज्ञासा’ मुझे आत्मा के दर्शनों की अभिलाषा है, सो आप मुझे आत्म ज्ञान का उपदेश करे। महामुनि शाकायन्य ने उसकी निष्ठा की परख करते हुए कहा- तात! तलवार की धार पर नंगे पाँव चल लेना कठिन है, पर आत्म-दर्शन की साधनायें उससे भी कठिन है, तुम उन्हें पूरा नहीं कर सकोगे। चाहिये तो कोई शारीरिक सुख का वरदान माँग लो। मैं तुम्हें वृद्ध से युवा बना देने में भी समर्थ हूँ। सुखों की इच्छा त्यागकर कठिनाइयों भरा जीवन से मत जियो?
ब्रहद्रथ ने जो उत्तर दिया है उसका स्वर भिन्न है पर भावार्थ वही है जो अब वैज्ञानिक बताते हैं। उन्होंने कहा-
भगवन्नसस्थि चर्मस्नायुमज्जामाँस शुक्र शोणित श्लेष्माश्रु दूषिकाविण्मूत्र वात=पित्त कफ संघाते दुर्गन्धे निःसारेड- स्मिन् शरीरे कीं कामोपभोगैः॥
-मैत्रायण्युपनिषत् 1।2
हे भगवन्! यह शरीर हड्डी, चमड़ा, स्नायु, माँस, वीर्य, रक्त, आँसू, विष्ठा, मूत्र, वायु, पित्त, कफ आदि से युक्त, दुर्गन्ध से भरा निस्सार है, फिर मैं विषय भोग लेकर क्या करूंगा?’ मुझे तो आप शाश्वत एवं सनातन आत्मा के ही दर्शन कराने का मार्गदर्शन करें।
महाराज की निष्ठा अडिग है यह जान लेने पर महामुनि शाकायन्य ने उन्हें योग दीक्षा दी। जिससे ब्रहद्रथ का मनुष्य शरीर भी धन्य हो गया।
उपर्युक्त आख्यान पढ़कर क्या सचमुच ही यह मान लिया जाये कि मनुष्य शरीर बहुत दुर्गन्धित और घृणित है। स्थूल दृष्टि से तो उसका मूल्य और महत्व दरअसल ऊपर कहे जैसा ही है पर यदि ज्ञान की दृष्टि से उसके आध्यात्मिक मूल्य और महत्व का चिन्तन किया जाये तो पता चलेगा कि मनुष्य ने यह एक ऐसी जटिल किन्तु सर्व समर्थ मशीन बनाई है कि उसका मूल्य रुपयों में कभी मापा ही नहीं जा सकता। टूटे-फूटे छप्पर और कटी-फटी दीवारों वाले घर के मकान साज, सज्जा और कलाकारिता ही नहीं सीमेंट पत्थर चूने और उसमें पायी जाने वाली सुख सुविधाओं की सामग्री से परिपूर्ण होते हैं। मनुष्य शरीर जैसे यंत्र पर अन्य दृष्टि से विचार करते हैं, तो पता चलता है कि सम्पन्न व्यक्ति के भव्य भवन के समान मनुष्य को भी यह, परमात्मा की असाधारण देन और वरदान है, यदि उसका सच्चा उपयोग किया जा सके तो मनुष्य इसी शरीर से देवता और भगवान हो सकता है।
1 बालिश्त के छोटे से मस्तिष्क को ही लें-उस जैसा 1. टेपरिकॉर्डर 2. मुवी कैमरा और 3. कंप्यूटर न आज तक संसार में कोई बना और न बन सकना संभव है। टेपरिकॉर्डर में एक छोटी सी मोटर काम करती है। यही टेप को 1. सीधी (प्ले फार्वर्ड) 2. सीधी तेज (फास्ट फार्वर्ड) और 3. उल्टी तेज (रिवाइन्ड) जैसा कुछ चलाना होता है, चलाती है। उसका एक यंत्र, ध्वनि ग्रहण करता है, दूसरा यंत्र उसे विद्युत कम्पनों में बदलकर टेप में टंकन करता है। इसकी क्षमता इतनी न्यून होती है कि जीवन भर के सुने को टेप करने की आवश्यकता पड़े, उसके लिये पूरी लंबाई का टेप खरीद सकना टाटा और डालमियाँ को भी कठिन पड़ जाये। सामान्यतः एक टेप रिकॉर्डर डेढ़ घंटे में 600 फीट टेप करता है। 24 घंटे के लिए 9600 फीट टेप की आवश्यकता होगी। मनुष्य की औसत उम्र 60 वर्ष मानें तो इस अवधि के लिये केवल बाहर के शब्द और शोर को अधिक करने के लिये 9600&60&365 1।4 = 210384000 फीट लंबे टेप की आवश्यकता होगी। 600 फीट लंबे टेप का औसत मूल्य 50 रुपया होता है उपरोक्त टेप का मूल्य तब 17532000 रुपये होगा।
यह तब है जब कि मानव निर्मित ‘टेप रिकॉर्डर’ चारों तरफ की आवाज नहीं ले सकता। उसकी मशीन अपनी इच्छा से नहीं चल सकती। शब्दों के साथ दृश्य का स्मरण नहीं करा सकती। इसके विपरीत मनुष्य के मस्तिष्क में पाये जाने वाले ईश्वर प्रदत्त टेप रिकॉर्डर की क्षमता और उसके मूल्य को कूतना तो संभव भी नहीं है।
संत और सज्जनों के लिये यह शरीर ही तीर्थ हैं जबकि दुराचारियों के लिये यही एक नर्क भी है।
-महात्मा गाँधी
कोई आवाज होती है, वह कान की झिल्ली जिसे ‘टैम्पैनिक मेम्ब्रेन’ कहते हैं, से टकराती है। टकराने से उसमें कम्पन (वाइब्रेशन्स) पैदा होते हैं। वह कम्पन झिल्ली के पीछे भरे तरल पदार्थ को जोकि ‘शाक आब्जर्व’ (धक्के से बरसने वाला) का काम करता है, को पार कर कान की छोटी-छोटी हड्डियों, अंकस, मेलियस, स्टेपिस को प्रभावित करता है। यहाँ से यह मस्तिष्क से निकलने वाली आठवीं नस जिसे ‘आडिटरी नर्व’ कहते हैं के द्वारा मस्तिष्क के पिछले भाग में स्थित सुनने वाले केन्द्र को समाचार पहुँचाती है। यहाँ से कम्पन ‘कारटेम्स’ पहुँचाये जाते हैं जहाँ वे याददाश्त (साइनेफेस) के रूप में परिणत हो जाते हैं। ऊपर से नीचे की दिशा में हुआ मस्तिष्क का यह टेप गायरस की पर्त में अंकित रहता है और उसे कभी भी याददाश्त के द्वारा उभारा जा सकता है।
एक साधारण ग्रामीण व्यक्ति के मस्तिष्क की याददाश्त को लिपिबद्ध किया जाये तो 10 रामायणों के बराबर पुस्तक बन जायेगी। इसमें उसकी कृषि जीव जन्तु घर परिवार आदि की ही सामान्य जानकारियाँ होंगी पर एक शहरी व्यक्ति जिसे इतिहास भूगोल नागरिक शास्त्र साइंस फिजिक्स आदि न जाने कितने विषयों का ज्ञान होता है, उसकी याददाश्त 100 रामायणों से कम न होगी। लिथूयानिया निवासी रैवी के बारे में कहा जाता है कि उसने 2000 तो पुस्तकें रटकर कंठस्थ कर ली थीं। अमरीका के हैरी नेल्सन को ‘शतरंज का जादूगर’ कहा जाता था उसकी स्मरण शक्ति इतनी प्रखर थी कि एक बार में वह 20 खिलाड़ियों से अकेले ही शतरंज खेलता रहता और विजय पाता रहता था। प्रसा (जर्मनी) के राजा का लाइब्रेरियन मैथुरिन बेसिरे की स्मरण शक्ति ऐसी अद्भुत थी कि वह एक बार सुने हुए शब्द को कभी भी कहीं भी ज्यों का त्यों दोहरा देता था। यह उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि मस्तिष्क जैसा टेप रिकॉर्डर न तो आज तक मनुष्य बना पाया न आगे बना पायेगा। उसकी लंबाई 600 खरब शरीर के कोशों में स्थित ‘जीन्स’ की लंबाई के बराबर अर्थात् इतनी लंबी हो सकती है जिससे सारे ब्रह्माण्ड को नापा जा सके। ऐसा टेपरिकॉर्डर और इतना टेप जो भगवान ने मनुष्य को कुदरती दिया है एक अरब रुपये में भी नहीं बन सकता।
कोई मनुष्य साधारण खाने-पीने और इन्द्रिय सुखों में ही फंसे रहकर रोग शोक का जीवन जीने तक इस शरीर का मूल्य समझे तो उसके इस आराम को क्या कहा जा सकता है, अन्यथा शरीर का एक-एक पुर्जा बताता है कि मनुष्य सामान्य और साधारण नहीं ज्ञान बुद्धि, विवेक और अनुभूति की दृष्टि से साकार ब्रह्म ही है। आज औषधि, भाषा, लिपि, ईजीनिपीग आदि के क्षेत्र में कई तरह के संगणक (कंप्यूटर) बने हैं,जो एक क्षण में ही यहाँ से लेकर चन्द्रमा, बुध, शुक्र, दर्शन, प्लूटो, नेपच्यून तक की दिशा ‘दूरी’, गति आदि का .0000000001 तक सही और प्रामाणिक उत्तर दे देते हैं पर मनुष्य जैसी भूत और भविष्य की बातों का ज्ञान रखने वाली सामर्थ्य का संगणक आज तक नहीं बन पाया। भारतवर्ष की शकुन्तला और वरमाँट बात, कजेरा कोलावर्न उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। कोलावर्न जब आठ साल का था तभी उसने लंदन में 268, 336 और 125 के क्यूब रूट गुणनफल 1 सेकेंड से भी कम समय में बना दिये। एक मूवी कैमरा 1।156 सेकेंड में 1 फोटो ले सकता है। इतनी तीव्र गति का ही चमत्कार है कि फोटो भी परदे में नाचने कूदने और सूक्ष्म से सूक्ष्म हावभाव प्रदर्शित करने लगती है। मूवी कैमरे में एक लेन्स होता है जिसके छेद में से ही दृश्य जा सकता है। लेंस के पीछे लगी ‘फोटो सेन्सिटिव प्लेट में पड़ने से रासायनिक क्रिया द्वारा वस्तु का प्रतिबिंब झलक जाता है। यदि मनुष्य की आयु 50 वर्ष मानी जाये और यह माना जाये कि वह मूवी कैमरा की गति से ही कुल दिन के बारह घंटे देखता है तो भी उसके मस्तिष्क में 2॥ सेंटीमीटर लंबी घिल की 5।2&156&60&60&12&365 1।3&50=307686600000 सेंटीमीटर लंबी फिल्म होनी ही चाहिए। उसका यथार्थ मूल्य तो निकाल सकना मनुष्य के लिये कठिन ही नहीं असंभव सा लगता है।
ऋण शक्ति केवल मनुष्य शरीर के लिये ही संभव है यदि इसका भी मशीनी उपयोग हो सका होता तो एक सी
शरीर माघं खतु धर्म साधनम्!
“पुण्य परमार्थ के लिये शरीर ही सबसे पहला साधन है” ऐसा मानकर शरीर का सदुपयोग करना चाहिये। आई डी कुत्ते पर प्रशिक्षण में जो 10 हजार रुपया खर्च करना पड़ता है वह न करना पड़ता।
योगियों के हिसाब से शरीर में 72000 नाड़ियाँ हैं। डाक्टरी हिसाब से इनकी लंबाई 5 हजार फीट है। संदेश लाने (अफरेस्ट नर्वन) संदेश ले जाने (इफरेन्ट नर्वस) को दोहरी व्यवस्था के लिये शरीर में 10 हजार फुट तो केवल नसों का जाल बिछा है। एक फीट बिजली का साधारण तार 25 पैसे में आता है। आगे हिसाब से देखें तो केवल बिजली के तार बिछाने का मूल्य ढाई हजार होता है अभी शरीर जैसा जल-से यंत्र (वाटर वर्क्स), शाक आब्जर्बर, शरीर में ही औषधि निर्माण फिल्ट्रेशन, मोटर पावर्स की क्रेन जैसी मास पेशियों की शक्ति वातानुकूलित और प्रकाश दायक (एयर कंडीशन और वेन्टीलेटेड) त्वचा का मूल्य शरीर से काम करने वाले इंजीनियर, डॉक्टर और मजदूर उन सब का वेतन यह कुल जोड़ मिलाया जाये तो हर शरीर अरबों अरब रुपयों का बैठेगा। पर उस सब का मूल्य और महत्व तभी है जब मनुष्य उन क्षमताओं का यथार्थ उपयोग कर पाये। परमात्मा से इतना मूल्य और महत्व का शरीर पाकर भी यदि कोई मनुष्य मानवता को ले जाने वाले घृणित कर्म या स्वार्थ, लोभ, मोह और इंद्रियां शक्ति में डूबे हुए कर्म करके अपनी आत्मा को पतित करता है तो उसका मूल्य 27 रुपये ही मानना पड़ेगा। यह मनुष्य के अपने वश की बात है कि वह सत्ताईस रुपये वाला बेकार का जीवन जिये या अरबों रुपयों मूल्य वाला ऋषि-मनीषियों और महापुरुषों जैसा भव्य जीवन जीना ईश्वरीय देन को सार्थक करे।
सन्त पुरन्दर गृहस्थ थे तो भी क्या लोभ, क्या काम और क्रोध उन्हें छू भी नहीं गये थे। दो-तीन घरों में भिक्षाटन करते, उससे जो दो मुट्ठी चावल और आटा मिल जाता उससे वे अपना और अपनी धर्मपत्नी सरस्वती देवी का उदर पोषण कर लेते और दिन भर लोक कार्यों में जुटे रहते।
एक दिन विजय नगर के राजपुरोहित व्यासराय ने महाराज कृष्ण देवराय ने कहा- राजन! सन्त पुरन्दर गृहस्थ होकर भी राजा जनक की तरह विकार मुक्त है दिनभर बेचारे पिछड़ों को ज्ञान देने, कष्ट पीड़ितों की सेवा करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ की बात तो उनके मन में ही नहीं आती। महाराज कृष्णदेव राय-हंसे और बोले गृहस्थ में रहकर कौन तो निर्लोभ रहा, कौन काम-वासना से बचा? यदि गृहस्थ में ऐसा संभव हो जाये तो संसार के सभी लोग अपना मनुष्य शरीर सार्थक न कर लें?
कर सकते हैं व्यासराय बोले- यदि लोग संत पुरन्दर और देवी सरस्वती की भाँति निर्लोभ, सेवा परायण व सरल जीवन जीना सीख लें।’ महाराज कुछ खिन्न से हो गये। बोले- ऐसा ही है तो आप उनसे कुछ दिन यहीं हमारे यहाँ भिक्षाटन के लिये कह दें। व्यासराय ने संत पुरन्दर से जाकर आग्रह किया- ‘आप आगे से राजभवन से भिक्षा ले आया करें।’ सन्त पुरन्दर ने कहा- मैं जिन लोगों के बीच रहता, जिनकी सेवा करता हूँ उन अपने कुटुम्बीजनों से मिल गई भिक्षा ही पर्याप्त है। दो ही पेट तो हैं उसके लिये राजभवन जाकर क्या करूंगा? पर व्यावसराय तब तक बराबर जोर डालते रहे जब तक संत ने उनका आग्रह स्वीकार नहीं कर लिया।
संत पुरन्दर राजभवन जाने लगे। वहाँ से मिले चावल ही उनके उदर पोषण के लिये पर्याप्त होते। सन्त अपनी सहज प्रसन्नता लिये हुये जाते, उसका अर्थ महाराज कुछ और ही लगाते। एक दिन तो उन्होंने व्यासराय से कह भी दिया देख ली आपके सन्त की निस्पृहता। आजकल देखते नहीं कितने प्रसन्न रहते हैं। व्यासराय बोले आपका तात्पर्य समझे नहीं। इस पर महाराज ने कहा- आप मेरे साथ चलिये अभी बात स्पष्ट हो जायेगी। महाराज राजपुरोहित के साथ सन्त पुरन्दर के घर पहुँचे देखा उनकी धर्मपत्नी चावल साफ कर रही है। महाराज ने पूछा- बहन! यह क्या कर रही है? इस पर वे बोली- आजकल न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं, इन चावलों में कंकड़ भरे पड़े हैं। यह कहकर उन्होंने अब तक बीने कंकड़ उठाये और बाहर की तरफ उन्हें फेंकने चल पड़ी। महाराज बोले- भद्रे यह तो हीरे-मोती हैं जिन्हें आप कंकड़-पत्थर कहती हैं। सरस्वती देवी हंसी और बोली पहले हम भी यही सोचते थे पर अब जब से भक्ति और सेवा की सम्पत्ति मिल गई इनका मूल्य कंकड़-पत्थर के ही बराबर रह गया-महाराज यह उत्तर सुनकर अवाक् रह गये, वे आगे और कुछ न बोल सके।
प्रजापति ने एक बार यह घोषणा की कि, ‘आत्मा अजन्मा, अमर-तथा अविनाशी है। वह ही सत्य एवं नित्य है। वही एकमात्र लक्ष्य है प्राणी का! उसका संपूर्ण ज्ञान पा लेना ही सच्ची वास्तविकता है। उसे जान लेने पर मनुष्य के लिये तीनों लोकों की सम्पदायें सहज ही संभाव्य हो जाती हैं।’
घोषणा सुनाकर देवता तथा असुर दोनों ही इस आत्म ज्ञान को पाने के लिये लालायित हो उठे। तब सभी ने मिलकर यह तय किया कि दोनों वर्ग अपना-अपना एक-एक प्रतिनिधि भेजें-जो प्रजापति से आत्म-ज्ञान सीखकर आये और वह अपने-अपने वर्ग में सबको सिखाए।
देवताओं ने इन्द्र को तथा असुरों ने विरोचन को इस शुभ कार्य के लिये चुना। दोनों साथ-साथ ही चल पड़े।
प्रजापति ने देखा-इन्द्र तथा विरोचन दोनों ही समिधायें हाथ में लिये चले आ रहे हैं। विहंग कर उन्होंने प्रश्न किया कहिए मित्र! आज इधर कैसे आना हुआ?’
इन्द्र विनत वपु होकर बोले। ‘आज आप हमें मित्र कहकर संबोधित न करें। आज तो हम आपके शिष्य बनकर आत्म ज्ञान पाने की अभिलाषा से आये हैं। ‘प्रजापति ने दोनों को अपने यहाँ ठहराया और बत्तीस वर्ष ब्रह्मचारी की तरह रहने को कहा। दोनों यम-नियमों का पालन करते हुए वहीं रहने लगे।
अवधि पूर्ण होने पर एक दिन प्रजापति ने दोनों को बुलाया और कहा ‘आँख की पुतली में अपना प्रतिबिंब देखो। जल में अथवा दर्पण में देखो। यह जो आत्मा है-सर्वत्र व्याप्त है तुम्हारे इस शरीर में भी।
दोनों ने अपने-अपने शरीर को खूब सजाया और चल पड़े-विरोचन अपने दल में पहुँचे। सभी ने स्वागत किया। सब उत्सुक हो उठे। विरोचन आत्मा का ज्ञान लेकर आये हैं। हमें भी बतायेंगे। विरोचन ने उसी दिन से सबको कहना प्रारंभ कर दिया। ‘यह शरीर ही आत्मा है। इसे खुद सुन्दर बनाओ। सुन्दर वस्त्र, आभूषण पहनो।
सुख, चैन का जीवन व्यतीत करो। इसी की प्रशंसा करो और इसी के आराधना।
और उसी दिन से असुर शरीर सुख में ही डूब गये। आज भी असुरों को सच्चा ज्ञान नहीं है, कि आत्मा क्या है? और कैसे उसके स्वरूप को जाना जा सकता है? वे शरीर सुख को ही चरम आनन्द माने हुए हैं। भौतिकता में डूबे हुए हैं, स्वार्थ सिद्धि में ही संलग्न हैं।
किन्तु इन्द्र की आत्मा की इस उत्तर से संतोष न हुआ। वे उस समय तो चले गये किन्तु कुछ काल में ही वापस आये और पुनः प्रजापति के समक्ष आ उपस्थित हुए। बोले ‘मेरी जिज्ञासा शाँत नहीं हुई देव! देव यदि शरीर ही आत्मा है, तो फिर वह अनश्वर तथा अविनाशी कैसे हो सकता है? शरीर तो मरणधर्मा है।’
प्रजापति बोले ‘तुम्हारी वह जिज्ञासा ही तुम्हें तुम्हारी लक्ष्य तक पहुँचा देगी। तुम बत्तीस वर्ष और यहाँ निवास करो।’
इन्द्र पुनः बत्तीस वर्ष वहीं रहे। अवधि के अन्त में प्रजापति ने बताया ‘स्वप्न चेतना में जो कुछ प्रभु की तरह भ्रमण करता है- वही आत्मा है।’
सुनकर इन्द्र चले तो गये पर पूर्ण संतुष्टि अब भी नहीं हुई थी। आधे रास्ते से ही लौट आये और अपनी शंका व्यक्त की। ‘भला स्वप्न में की गई अनुभूति आत्मा कैसे हो सकती है। स्वप्न में तो दुःख भी होता है- पीड़ा भी होती है। अन्य भी कई इन्द्रिय जन्य अनुभूतियाँ होती हैं। जबकि आत्मा तो सुख−दुःख से परे इन्द्रियातीत है?’
प्रजापति इस बार भी अति प्रसन्न हुए और बोले- ‘तुम्हारी शंकायें बिल्कुल ठीक हैं। तुम सत्य कहते हो। बत्तीस वर्ष और निवास करो यहाँ तब आगे का ज्ञान भी दूँगा।’
इन्द्र पुनः बत्तीस वर्ष प्रजापति के पास ब्रह्मचर्य पूर्वक रहे और अन्त में प्रजापति ने बताया ‘अत्यन्त प्रगाढ़ निद्रा में जो स्वात्मा अखण्ड आनन्द की अनुभूति करता है- वही आत्मा है।’
इन्द्र पुनः सुरलोक को चले गये। पर मन अभी भी अशान्त था। जिज्ञासा तृप्ति नहीं पा सकी थी। चेतना उद्वेलित थी।
सब कुछ मिलकर उन्हें फिर घसीट लाया और प्रजापति के सम्मुख ला खड़ा किया। इन्द्र ने पुनः प्रजापति के समक्ष अपनी शंका व्यक्त की। ‘मुझे अभी भी संतोष नहीं हुआ, हे भगवन्! स्वप्न विहीन गहरी निद्रा में जीव को निज का कोई अनुभव नहीं होता। अपने बारे में उसे कोई चेतना नहीं रहती। तो फिर यह चेतना विहीन प्राणी जिसे सदा प्रकाशमय स्वात्म कहा जाता है-आत्मा कैसे हो सकती है।’
इस बार इन्द्र की निरन्तर की जिज्ञासा से प्रजापति बहुत प्रभावित हुए उन्होंने उन्हें केवल पाँच वर्ष रहने को कहा। पाँच वर्ष भी पूर्ण हुए और निश्चित समय पर प्रजापति इन्द्र को लेकर ज्ञान देने बैठे। बोले, ‘इन्द्र! तुम्हारी ये अत्यन्त उत्कण्ठा तथा प्रबल जिज्ञासा ही तुम्हारे पात्रत्व की कसौटी है। जिस प्रकार बिना सच्ची श्रद्धा के पूर्ण विश्वास नहीं होता उसी प्रकार बिना सच्ची जिज्ञासा के पूर्ण ज्ञान भी नहीं होता। तुमने अपनी पात्रता सिद्ध कर दी है। यह शरीर तो आत्मा का क्षणिक निवास स्थान है। जब तक आत्मा शरीर में आबद्ध रहता है-तब तक इसका संबंध वाँछनीय, अवाँछनीय, सुख, दुःख तथा अच्छाई बुराई से जुड़ा प्रतीत होता है। जिस प्रकार अनन्त आकाश में कुछ क्षणों के लिये बिजली, बादल तथा वायु अपना प्रभाव दिखाते और चले जाते हैं। इसी प्रकार विभिन्न शरीर भी कुछ काल को आत्मा को धारण करते और नष्ट हो जाते हैं। मुक्त होने पर आत्मा ज्यों का त्यों बना रहता है और असीम लोकों में उन्मुक्त भ्रमण करता रहता है। अन्त में वह उस परम तत्व में, अनन्त आत्मा में ही विलीन हो जाता है। जैसे विभिन्न नदियाँ समुद्र में लय होकर अपना नाम-रूप खो देती हैं समुद्र ही हो जाती हैं- यही गति तथा स्वरूप इस आत्मा का है। इस सृष्टि का अन्तिम सत्य यह आत्मा ही है। जीव तथा ब्रह्म में केवल लघु और विराट का ही भेद है- तत्व की दृष्टि से कोई भेद नहीं।’
अब इन्द्र को संतोष तथा तृप्ति हुई। वे सुरलोक आये और समस्त देवताओं को अपना संचित ज्ञान जो कि उन्होंने एक सौ एक वर्ष के कठिन परिश्रम से अर्जित कर पाया था-प्रदान किया।
सच्चे मन से परमार्थ में रत देवताओं ने अपनी स्वच्छ मनोभूमियों में उसे ऐसे ही ग्रहण किया जैसे सीप ने स्वाति बूँद को और आज भी सच्चे ज्ञान के बल पर ही देवता-देवता बने हुए हैं। असुरों तथा सुरों के भेद की यह एक सुन्दर कसौटी है।
छतरी ने मस्तक से शिकायत करते हुए कहा ‘स्वार्थ की भी हद होती है तुम ऐसे स्वार्थी निकालोगे, मैं नहीं जानती थी। तुम्हारी सुरक्षा के लिए मुझे तेज धूप और वर्षा सहन करनी पड़ती है और तुम हो कि मेरी तनिक भी चिन्ता न करते हुए सुखपूर्वक सर्वत्र घूमते रहते हो। अब इस प्रकार की संकीर्णता मुझ पर सहन नहीं की जाती। यदि तुम्हीं मेरे स्थान पर होते तो क्या करते?
मस्तक कुछ कहे इससे पूर्व ही दाहिना हाथ बोला- बहन धैर्य रखो, उत्तेजित मत हो। इस तरह सोचने की अपेक्षा यह क्यों नहीं सोचती कि मस्तिष्क की सुरक्षा से ही हम सबकी सुरक्षा है। तुम्हें भी तो उसी ने बनाया है।
छतरी को अपनी भूल पर बड़ा पश्चाताप हुआ। सच्ची स्थिति का ज्ञान हो जाने पर उसने मस्तक से भी ऊंचा होने का सम्मान पाया।
बहुधा हम सब यह अभियोग करते हैं कि संसार बहुत खराब हो गया है। जिसे देखो वह ऐसे ही कार्य करने में लगा हुआ है, जो संसार की दुःख-वृद्धि करते हैं। पर क्या कभी हम यह भी सोच पाते हैं कि संसार में दुःख और कष्ट बढ़ाने में हमारा भी कुछ हाथ है या नहीं?
सच्ची बात यह है कि हमारी यह शिकायत ही इस बात का प्रमाण है कि हम स्वयं ही अपने में पूरी तरह से अच्छे नहीं है। यदि हमारी मनोभूमि स्वच्छ और उच्च स्तर की हो तो हमें संसार न तो बुरा ही दीख पड़े और न उससे प्रभावित होकर हम दुःखी हों।
जिस मनुष्य का स्वभाव जैसा होता है उसी प्रकार की प्रतिक्रियाएं ही उसे प्रभावित करती हैं और उसी प्रकार के तत्व वह ग्रहण करता है। किसी दूसरे के क्रोध का प्रभाव उसी पर होगा, जो स्वयं भी क्रोधी होगा। शाँत चित्त और सन्तुलित मस्तिष्क वाले मनस्वी व्यक्तियों पर उसका न तो कोई प्रभाव पड़ता है और न उस पर तदनुरूप प्रतिक्रिया होती है। जिसने अपने तामस पर विजय कर ली होती है, वह अपने प्रति दूसरे की बुराई देखकर भी शाँत बना रहता है, दूसरे की क्रोधाग्नि को अपनी शीतल वाणी और मधुर व्यवहार से बुझाने का प्रयत्न किया करता है।
महात्मा गाँधी ने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली थी। उन्होंने अपनी मनोभूमि को आवेशरहित बना लिया था। उन पर अफ्रीका में बड़े-बड़े अत्याचार किये गये। उन्हें मारा धकेला गया, उनके लिये गाली और अपशब्दों का प्रयोग किया गया। उन्हें रेल और जहाज पर से बलपूर्वक नीचे उतारकर अपमान किया गया, पर उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया। यदि वे अपने आवेगों को वश में न कर चुके होते, तो उन्हें भी क्रोध की अग्नि जलाती और तब उस पीड़ा से परेशान होकर वे भी संसार को बुरा कहकर दोष लगाते रहते। इसके विपरीत संसार तो दूर, उन्होंने अपने ऊपर जुल्म करने वालों को भी कभी बुरा नहीं कहा। बल्कि वे उन विरोधियों की प्रशंसा ही करते रहे।
यह एक निर्विवाद सत्य है कि जो जैसा होता है, संसार का स्वरूप उसे वैसा ही दिखाई देता है। यह संसार एक दर्पण के समान है। इसको जो देखता है, उसे अपना स्वरूप ही दिखाई देता है। सज्जन व्यक्ति को यही संसार सज्जन और दुर्जन व्यक्ति को दुर्जनों से भरा दीखता है। इसलिये शिकायत करने से पूर्व हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम पूरी तरह भले हैं या नहीं। निश्चय ही हम में बुराइयाँ हैं, तभी यह संसार हमें बुरा दीखता है। यदि हमारी मनोभूमि उसकी बुराइयाँ ग्रहण करने योग्य न हो तो हमें यह संसार कदापि बुरा दिखलाई न पड़े।
संसार को बुरा-भला कहने और उसकी आलोचना करने में हम जितना समय और शक्ति खराब करते हैं यदि वही समय और शक्ति अपना सुधार करने में लगाने लगें, तो संसार आप से आप ही अच्छा हो जाये। उदाहरण के लिये यदि लड़ाई-झगड़ो की बात ले ली जाय और उस पर प्रयोग किया जाये, तो जल्दी ही हम यह जान लेंगे कि बुराई बाहर कम है बल्कि अपने अन्दर ज्यादा है। एक आदमी हमारा कुछ अहित करता है और हम भी बदले में उसका अहित करने पर तुल जाते हैं तो अहित की यह क्रिया-प्रतिक्रिया आगे बढ़ती जायेगी और एक दिन किसी बड़े संघर्ष की स्थिति खड़ी हो जायेगी और हम एक दूसरे को मारने-मरने पर तुल जायेंगे। इसके विपरीत यदि हम अहित करने वाले का हित करके अपने उत्कृष्ट स्वभाव का परिचय देने का प्रयत्न करें तो निश्चय ही विपक्षी की प्रवृत्ति बदल जायेगी और वह हमारा अहित आगे तो नहीं ही करेगा, किये अहित के लिये भी लज्जित होकर माफी माँगेगा। झगड़े में एक पक्ष शाँत तथा विनम्र बना रहे, तो दूसरे को भी शाँत हो ही जाना पड़ेगा और सच्ची बात तो यह है कि जो मन-वचन, कर्म से किसी का अहित वाहक नहीं होता, किसी के प्रति द्वेष-दुर्भाव नहीं रखता-उससे न तो कोई झगड़ा करेगा और न उसका अहित चाहेगा। अपने भीतर की बुराई ही दूसरे को हमारे लिये बुरा बनाती है। वैसे किसी को क्या पड़ी है कि वह अकारण ही हमारे साथ बुराई करने पर उतर आयेगा।
जीवन की प्रगति और सुख-शाँति के लिए आध्यात्मिक आदर्शों का प्रतिपादन संसार के सभी विद्वानों ने एक मत से किया। आध्यात्मिक विचारधारा वाले व्यक्तियों का जीवन सब प्रकार से सुख तथा शाँति पूर्ण रहता है। संसार में न तो उनका कोई शत्रु होता है और न विद्वेषी। उनके सामने कदाचित ही ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं कि उन्हें किन्हीं लोगों की ओर से आशंका अथवा अहित की संभावना रहे। यदि कभी संयोगवश कोई अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों के कारण उनका बुरा चाहता या करता भी है तो भी आध्यात्मिक व्यक्ति अपनी उत्कृष्टता का प्रमाण देकर उसे यथा स्थान ही रोक देता है। वह फिर आगे बुराई नहीं करने पाता। आध्यात्मिक व्यक्ति न तो किसी के प्रति द्वेष रखता है और न प्रतिशोध की भावना। इसी कारण उसके सम्मुख पीड़ादायक परिस्थितियाँ बहुत कम आती हैं।
किन्तु यह होता तभी है, जब व्यक्ति अध्यात्म के आदर्शों के प्रति मन, वचन, कर्म से ईमानदार रहे। आध्यात्मिक जीवन में विश्वास रखने वाला व्यक्ति, सबसे पहले बुराइयों की खोज अपने अन्दर किया करता है। यदि कभी कोई उसके साथ बुराई करता है तो आध्यात्मिक व्यक्ति उसका दोष बुराई करने वाले को तो शायद ही देता है, वह उसका कारण अपने अन्दर, यह सोचता हुआ खोजता है कि जरूर ही हमारे अन्दर कोई बुराई, कोई कमी अथवा कोई त्रुटि अवश्य है, हम अवश्य ही किसी दुर्बलता अथवा निर्बलता के बन्दी हैं तभी अमुक व्यक्ति का साहस अथवा प्रवृत्ति हमारे साथ ऐसा व्यवहार करने की हुई। अपनी खोज के फलस्वरूप वह कारण खोज निकालता है और उसका निवारण करके निष्कंटक हो जाता है। मनुष्य के अन्दर कौन सी क्या दुर्बल प्रवृत्तियां छिपी हैं यह बहुधा कम लोग ही जान पाते है। इसलिए हृदय मार्जन के लिए हम सबको निरन्तर अपना निरीक्षण करते ही रहना चाहिए।
यदि हमें संसार के खराब होने की शिकायत है, और हम यह चाहते हैं कि संसार का सुधार हो, उसकी गतिविधि ठीक हो, चारों ओर सुख-शाँति के वातावरण का निर्माण हो तो उसके उपायों में पहला उपाय यह है कि हम आज से ही अपना सुधार प्रारंभ कर दें। जितने अंशों में हम अपना सुधार करते जायेंगे, संसार उतने ही अंगों में अपने आप सुधरता जायेगा। संसार का एक अंश हम भी हैं। अपना सुधार करना संसार का सुधार करने का प्रथम चरण है। समाज या संसार और कुछ नहीं हम सब लोगों का ही समूह है। हम सब मिलकर संसार को बनाते हैं। हमारी अपनी अच्छाइयों से ही संसार अच्छा बनता है और हमारी बुराइयाँ ही उसे बुरा बना देती हैं।
यदि वास्तव में हम संसार की विकृतियों से ऊब गये हैं, उसमें व्याप्त शोक-संतापों के कारणों के प्रति हममें अरुचि का भाव है और हम चाहते हैं कि संसार की यह रचना उसके रचियता के अनुरूप ही सुखद और सुन्दर बने, मनुष्यों के रहने योग्य इसका स्वरूप बने तो हमें आत्मसुधार से संसार सुधार का कार्य जल्दी से जल्दी प्रारंभ कर देना चाहिए।
मनुष्य का जीवन क्षणिक है पर आत्म-सुधार उसे अनन्त तक फैला देता है।
-इमर्सन
दूसरों की अपेक्षा अपना सुधार अधिक सरल तथा अधिकार सम्मत होता है। दूसरे को तो हम सुधार के लिए समझा ही सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं, अधिक से अधिक उपदेश दे सकते हैं। लेकिन अपने को हठपूर्वक भी सुधार सकते हैं। जहाँ दूसरों पर हमारा कोई वश नहीं होता, वे हमारी बात मानें ही, इसके लिये उन्हें विवश नहीं किया जा सकता। किन्तु अपने पर तो हमें पूरा अधिकार हो सकता है। अपना सुधार करने के लिए हम सब अपने घर सख्ती भी कर सकते हैं और जिधर चाहें, बलपूर्वक मोड़ सकते हैं। दूसरों के विषय में हमें न तो यह अधिकार होता है और न स्वतंत्रता। इसलिये संसार कल्याण का सबसे सरल तथा संभव तरीका यही है कि दूसरों से पहले हमें अपना स्वयं का सुधार प्रारंभ कर देना चाहिए।
अपना सुधार करने से तो केवल हमारा ही सुधार हो सकता है। इससे इतने बड़े संसार का सुधार किस प्रकार संभव हो सकता है? ऐसी निराशापूर्ण शंका करना विचार-संकीर्णता है। कोई भी आदर्श अथवा सिद्धाँत सार्वभौमिक होता है। जब हम सब अलग-अलग एक-एक करके सुधरने लगेंगे तो सारा संसार स्वतः ही एक साथ सुधरने लगेगा। संसार का सुधार का इतना बड़ा काम कुछ थोड़े से सुधारकों के लिए संभव नहीं है, बल्कि सबसे सरल तरीका यही है कि हम सुधारकों से प्रेरणा एवं प्रकाश लेकर अपना सुधार आप ही करें। इससे यह विशाल कार्य छोटे-छोटे भागों में वितरित होकर सरल हो जायेगा। थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी सब पर चली जायेगी और एक तरह से सभी लोग संसार सुधार के काम में लग जायेंगे। विशाल कार्य विशाल जन-समूह द्वारा किये जाने पर जल्दी तथा पूर्ण रूप से सम्पादित हो जायेगा।
आत्म-शोधन में निरत होना, संसार शोधन में लगने का एक प्रकार है। एक व्यक्ति अपनी अच्छाई से केवल अपने आप ही लाभान्वित नहीं होता बल्कि अन्य लोगों की सुख-शाँति बढ़ाने में भी सहायक होता है। जिस प्रकार एक बुरा आदमी अपनी बुराई का प्रभाव दूसरों तक पहुँचाता है और इस प्रकार उनके दुःखों में वृद्धि करता है उसी प्रकार एक उपयुक्त आदमी भी अपनी अच्छाई का प्रभाव दूसरों पर डालता है और उसके व्यवहार से लाभान्वित ही नहीं प्रेरित भी होते हैं। उनके शोक-संतापों की संख्या घटती और सुख-शाँति की वृद्धि होती हैं। इसलिए विश्व कल्याण का सबसे सरल और सही तरीका आत्म-कल्याण ही मानना चाहिए।
आत्म-सुधार अथवा आत्म-कल्याण की भावना को किसी प्रकार भी स्वार्थ मानना भारी भूल होगी। अपने चरित्र को ऊपर उठाना अथवा आत्मा की उन्नति करना स्वार्थ नहीं माना जा सकता, वह विशुद्ध परमार्थ है और परमार्थ के कार्यों से न केवल अपना ही मंगल होता है बल्कि सारे संसार, सारे मनुष्यों और सारे जीव, प्राणी मात्र को मिलता है।
संसार का सुधार करने के लिए हमें जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिकोण को विकसित और आध्यात्मिक गतिविधि को अपनाकर चलना चाहिए। प्रत्येक अच्छी बुरी परिस्थिति का उत्तरदायी हम स्वयं अपने को मानें। बाह्य प्रवृत्तियों का कारण अपने अन्दर खोजें और उनका निवारण करें। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उन्नत एवं उदात्त बनायें। तब न तो हमें संसार से शिकायत रहेगी और इस प्रकार सारा संसार ही सुधार की ओर चल पड़ेगा।
मैं तो इतने दिनों से भगवान की भक्ति कर रही हूँ- एक स्त्री ने संत को बताया- पर मुझे तो आज तक उन्होंने कभी स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिये, आप कहते हैं कि वे आप से कभी अलग नहीं होते? बात यह थी कि वह स्त्री भक्ति तो करती थी पर अपने परिवार, पड़ोसी और संबंधियों सबके साथ उसका व्यवहार बहुत रूखा और अहंकार पूर्ण था। घर वाले भी उसके आचरण से दुःखी थे।
सन्त बोले- ‘आज भगवान से पूछकर बतायेंगे आपसे क्यों नहीं मिलते।’ दूसरे दिन स्त्री मिली तो वह बोले-भाई भगवान तुम पर नाराज हैं कह रहे थे वह हमारे बच्चों से लड़ती-मारती-पीटती और द्वेष रखती है उससे मिलने का मन नहीं करता।
स्त्री समझ गई। उस दिन से उसने अपना व्यवहार मीठा बना लिया, फलस्वरूप दूसरे लोग उसे इतना प्यार और आदर देने लगे कि वह उस शाँति में ही भगवान की उपस्थिति अनुभव करने लगी।
न्यूगिनी के लोगों का भोजन बहुत सामान्य होता है। ऐसा नहीं कि अच्छे स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक आहार, अण्डा, मछली, विटामिन्स, फल, मेवे आदि जुटाते हों, वे साधारण प्रोटीन वाला ही भोजन लेते हैं। तो भी उनका स्वास्थ्य इतना अच्छा और देह इतनी सबल होती है कि अच्छे और सन्तुलित भोजन वाले लोग भी उनका मुकाबला न कर सकें।
यह विसंगति बहुत दिन तक वैज्ञानिकों और डाक्टरों को चक्कर में डाले रही। महीनों कुछ न खाने वाले ‘पवहारी बाबा’ और बंगाल की गिरिबाला की बात होती तो संभवतः वैज्ञानिक कोई कारण ढूंढ़ निकालने में असमर्थ रहते पर यह लोग तो योगी भी नहीं थे इसलिये कारण ढूंढ़ने में दिक्कत न हुई।
अभी 3 वर्ष पूर्व आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक तथा आस्ट्रेलिया सरकार के स्वास्थ्य विभाग में शरीर रचना संस्था में प्रेरणा विज्ञान शास्त्री डॉ. एबेन हिपस्ले ने न्यूगिनी वासियों के आहार, रक्त, मल-मूत्र आदि की निरन्तर जाँच के बाद पाया कि सामान्य भोजन में प्राप्त प्रोटीन से अतिरिक्त प्रोटीन की मात्रा वे सीधे हवा से ग्रहण करते हैं उन्होंने वायु से आहार का भंडार प्राप्त कर लेने का एक तरीका भी निकाल लिया है। संभव है उनकी शोध बढ़ती हुई जनसंख्या को भूख की पीड़ा से बचा ले और उन्हें मरने न दे पर इससे भी बड़ी उपलब्धि यह है कि मनुष्य जीवन परमात्मा ने केवल उदर पोषण की समस्या में पड़े रहने के लिये नहीं बनाया। शरीर के लिये आवश्यक सामग्री तो उसने वायु में पहले से ही जुटा दी है उसका उद्देश्य तो कुछ और ही है जिसे शास्त्रकार यों स्पष्ट करते हैं-
ऊँ आपो ह यहृहत वश्वमायन् गर्भ दधाना जनयन्तीरग्निम् ततो देवानाँ समर्क्ततासुरेकः कस्मैदेवाय हविषा विधेम॥
-यजुर्वेद 27।25
अर्थात्-हे मनुष्यों! जो स्थूल पञ्च तत्व दीख पड़ रहे हैं वह प्रकृति की सूक्ष्म तन्मात्राओं से उत्पन्न हुये हैं यह जो वायु है उसने सूत्र रूप से उन सबको अपने भीतर धारण किया है। योगाभ्यास द्वारा इस वायु को धारण करो, और अपनी वृद्धि करते हुये परमात्मा को जानो।
अभी तक योगाभ्यास और प्राणायाम के उन विधानों को जो वायु से शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के विकास के लिये सूक्ष्म शक्तियाँ खींचते हैं, केवल उपेक्षणीय कर्मकाण्ड माना जाता रहा है पर डॉ. हिस्पले की शोध ने उन्हें वैज्ञानिक उपलब्धियों के समकक्ष ही नहीं श्रेष्ठतर स्थिति में लाकर प्रतिष्ठित कर दिया है। उनका कथन है-वायु में ऐसे सूक्ष्मतम जीवाणु हैं जो लंबी साँसें खींचने के समय शरीर में रह जाते हैं और हवा से नाइट्रोजन खींचकर उसे शरीर के अन्दर ही प्रोटीन में बदल देते हैं। न्यूगिनी में उन्होंने ऐसे जीवाणुओं की शोध की है। उनका कहना है कि हम बड़ी मात्रा में वायु खींचते और बेकार बाहर निकालते रहते हैं वह खनिज का भण्डार है उससे जितने चाहें पौष्टिक तत्व ले सकते हैं।
पता नहीं वह मशीन कब बनेगी जो हवा में हल चलाकर आहार उपलब्ध करायेगी पर अब वह निश्चित अवश्य हो गया है कि प्राणायाम जैसी भारतीय योगाभ्यास की क्रिया शक्ति संचय का अद्भुत साधन है। इस शक्ति से आत्मा में उन सूक्ष्म तत्वों का अभिवर्धन किया जा सकता है जो ईश्वरीय अनुभूति में सहायक होते हैं।
एक राजा को अभिमान हो गया कि मैं ही सारे जग का पालन करता हूं। यह बात एक साधु को अखरी। एक दिन स्वयं उपस्थित होकर उसने पूछा- महाराज आँकड़े बतायेंगे क्या? आपके राज्य में चिड़ियों, कीड़ों-मकोड़ों, जंगली पशुओं की क्या संख्या है? सबको कितना राशन भेजते हैं? राजा से कोई उत्तर देते न बना। साथ ही जगत पालक होने का उनका अभिमान भी नष्ट हो गया।
सन 1966 तक वैज्ञानिकों ने देखने के विज्ञान को अधिक महत्व नहीं दिया। अब तक यह समझा जाता था कि कोई वस्तु देखने के लिये आँखें और रोशनी मात्र पर्याप्त है। साधारण मनुष्य जिस प्रकार अपने थोड़े से ज्ञान के आधार पर ही वस्तुओं का मूल्याँकन करते हैं और सृष्टि के कण-कण में भरी हुई रहस्यपूर्ण जानकारियों से वंचित रह जाते हैं उसी प्रकार अब तक वैज्ञानिकों ने भी दृश्य-विज्ञान की सामान्य सी जानकारियाँ तो प्राप्त कर ली थीं पर उनकी पहुँच भारतीय योगियों और तत्ववेत्ताओं की पहुँच से करोड़ों मील पीछे थी।
1967 में अपने-अपने ज्ञान का अहंकार और सीमा बंधन तोड़ कर संसार के तीन बड़े वैज्ञानिक सर्वश्री 1. डॉ- जार्ज वाल्ड (हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्राणि विज्ञान के प्रोफेसर) 2. डॉ. हाल्डेन केफेर हार्टलाइन (जैव भौतिक प्रोफेसर राक फेलर यूनिवर्सिटी) तथा 3. ‘नोबेल कन्सटीट्यूट फॉर ब्यूरो फिजियोलॉजी’ के अध्यक्ष डॉ. रैग्नर ग्रैनिट ने अपने अध्ययन और शोधों को एकत्रित किया तो पता चला कि किसी वस्तु को देखने के लिये केवल मात्र प्रकाश और आँखें ही पर्याप्त नहीं वरन् आँखों से लेकर मस्तिष्क के उस स्रोत तक की सारी जानकारी भी आवश्यक है जो दृश्य और प्रकाश की अनुभूति में सहायक और कर्त्ता का काम करती है। यह एक महत्वपूर्ण क्षण था जब इन तीन वैज्ञानिकों को 1967 में नोबेल पुरस्कार देकर संसार को बताया गया कि सत्य और तथ्य एक विषय की विशेषता मात्र से समझ में नहीं आते, जब संसार का सब तरह का ज्ञान एक स्थान पर एकत्रित किया जाता है तब कहीं यथार्थ का प्रतिपादन हो पाता है।
देखने का विज्ञान यह है-आँख की पुतली के पीछे एक गोल ताल (लेन्स) लगा होता है जिसमें से होकर प्रकाश किरणें अन्दर गुजर जाती हैं। इस ताल से गुजरने के बाद बिंब उल्टा हो जाता है अर्थात् ऊपर का भाग नीचे और नीचे का ऊपर हो जाता है। इसके बाद प्रकाश ताल के पीछे के नेत्र गोलक नामक खोखले को पार करती है। इस गोलक में भीतरी सतह पर चारों ओर एक विशेष प्रकार की नाडियों की तह होती है इसे दृष्टि पटल या ‘रेटिना’ कहते है। यह रेटिना जिन अत्यन्त सूक्ष्म कोशों (प्रत्येक जीवित पदार्थ प्रोटोप्लाज्मा नामक तत्व से बना होता है उसके सूक्ष्मतम कण को कोश या ‘सेल’ कहते हैं) से बना होता है उन्हें ‘राड’ कहते हैं। प्राणि विज्ञान वेत्ता डॉ. वाल्ड ने बताया कि इन कोशों (राड्स) में ‘रोडोप्सिन’ नामक एक अत्यन्त जटिल रसायन पाया जाता है। इसी को ‘विजुअल पर्पिल’ कहते हैं और वह प्रोटीन एप्सिन तथा ‘विटामिन ए’ को मिलाकर बना होता है। इसी तत्व के परमाणुओं में पदार्थ से टकराकर आने वाले प्रकाश कण विद्युत आवेग (इलेक्ट्रिक करेंट उत्पन्न करते हैं) यह आवेग अपने अन्दर धारण किये बिंब की लहरों को मस्तिष्क में पहुँचाते रहते हैं। मस्तिष्क के कोश उसे ग्रहण किये रहते हैं। मन में यह शक्ति होती है कि वह जब भी मस्तिष्क में छाये इन पिछले कभी के भी दृश्यों पर जोर लगाता है तो वह दृश्य एक-एक कर सिनेमा के पर्दे की भाँति याद आते चले जाते हैं।
यथार्थ में ज्ञान और विज्ञान के सब रहस्य मस्तिष्क के प्रकाश कणों में भरे हैं। पर अभी विज्ञान की जानकारियाँ इतनी व्यापक नहीं हो पाईं कि मस्तिष्क के किन्हीं कोशों के रासायनिक विश्लेषण द्वारा मनुष्य के बताये बिना किसी मशीन से उन सब चित्रों और दृश्य को टेलीविजन पर्दे की तरह साफ किया जा सके जिसे मस्तिष्क ने पहले कभी देखा है। पर वैज्ञानिक इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि प्रकाश कणों की सूक्ष्म अवस्थाओं में ज्ञान-विज्ञान के वह अक्षर विधाता की कुण्डली के समान अंकित अवश्य रहते हैं।
पतंजलि कृत योग दर्शन के सूत्र 3 के 30वें निरुक्त में बताया है- ‘मूर्द्ध ज्योतिषि सिद्ध दर्शनम्’ अर्थात् कपाल के भ्रू-मध्य स्थित छिद्र में झाँकने से प्रकाश के दर्शन होते हैं। यह प्रकाश ही ज्ञात की अनुभूति करता है। उसमें संयम करने से योगी न केवल नेत्र बंद करके भी सब संसार को देख सकने में समर्थ हो जाता है वरन् वह भूत और भविष्य को भी जानने लगता है।
संयम का अर्थ है धारणा, ध्यान और समाधि-त्रयमेकत्र संयमः (योग दर्शन 3।4)। अर्थात् जब किसी वस्तु में ध्यान इस तरह विलीन हो जाये कि ‘मनुष्य शरीर हूँ ऐसी कल्पना ही शेष न रहे’ वरन् ऐसी अनुभूति होने लगे कि ‘वह वस्तु में स्वयं हूँ’-तो उस वस्तु के सम्पूर्ण गुणों का विकास अपनी आत्मा में हो जाता है। अर्थात् यदि सूर्य-मण्डल में संयम किया जाये और ध्यान पूर्ण परिपक्व हो जाये तो सूर्य की जो भी दिव्य शक्तियाँ हैं, वह सब मानवीय अन्तःकरण में उतरी हुई देखी जा सकती हैं।
इन तथ्यों को शाण्डिल्य उपनिषद् में भी विस्तार से बताया गया है कि मस्तिष्क में चित्र का संयम करने और धर्म अधर्म दोनों से निरासक्त हो जाने अर्थात् न तो किसी से राग हो, न द्वेष, न प्रेम हो, न घृणा, न लगाव हो न दुराव आदि की स्थिति में सत्यलोक का ज्ञान होता है और भूतकाल में क्या हुआ, आने वाले भविष्य में क्या होगा, उसका एक-एक क्षण का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
अब तक भारतीय योग की इन बातों को अतिरंजित, काल्पनिक, मिथ्या और भ्रमोत्पादक कहा जाता रहा है पर प्रकाश और उसके विभिन्न स्रोतों की नई-नई जानकारियों के आधार पर अब जो तथ्य सामने आये हैं वह यह बताते हैं कि भूत और आगत भविष्य की होनहार को एक क्षण में जान सकना कोई असंभव बात नहीं है। पर यह सब ज्ञान से ही संभव है वैज्ञानिक यंत्रों से भी भूत और भविष्य का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वैज्ञानिक इसके लिये परिश्रम के साथ किसी ऐसी मशीन के निर्माण के लिये प्रयत्नशील भी हैं, मशीनें जटिल, कठिन और धनसाध्य साधन हैं मनुष्य शरीर एक परिपूर्ण यंत्र है हमें केवल उस यंत्र के प्रयोग की यौगिक प्रणाली पर विश्वास करने और उसे निष्ठापूर्वक सीखने भर की आवश्यकता है। योग और विज्ञान- सिद्धाँत दोनों के एक समान हैं उनके वर्णन और अनुभूति की शैली मात्र भिन्न है।
भूत क्या था और भविष्य क्या होगा इसे जानने के लिये आकाश स्थित ग्रह-नक्षत्रों, प्रकाश पिण्डों, मन्दाकिनियों और नीहारिकाओं का तात्विक विवेचना, ग्रह-पथ, ग्रह-गति और उसकी पृथ्वी से दूरी के आधार पर किया जाता है। ज्योतिष के इस ग्रह-गणित वाले भाग पर किसी समय भारतीय आचार्यों ने महत्वपूर्ण शोधें की थीं। आज उस गणित को भुलाकर ज्योतिष के नाम पर फलित और अधूरे कूड़े-कचरे जैसे भाग्यवाद को प्रोत्साहन देने वाली दुकानें तो हैं पर उस आर्ष-गणित को समझने और विकसित करने की कठिनाई कोई मोल नहीं लेना चाहता। यदि ऐसा किया गया होता तो भूत, भविष्य की जानकारियाँ ही न मिलती लोग मनुष्य-जीवन के लक्ष्य, अनिवार्य कर्मफल, प्रायश्चित आदि के द्वारा आत्म-शुद्धि के विज्ञान को भी अच्छी तरह समझते। ग्रह-गणित की यथार्थ उपयोगिता यही थी। भविष्य को जानने के पीछे आत्म-शुद्धि के विधान प्राचीन ग्रंथों में स्थान-स्थान पर लिखे हैं वह इस बात के प्रमाण हैं कि जहाँ मनुष्य पूर्वकृत कार्यों के फल भोगने के लिये अनिवार्य रूप से बाध्य है वहाँ वह अपने भविष्य को अच्छा बनाने और जीवन को ऊंचा उठाने में भी आप ही समर्थ है।
‘अपने पुरुषार्थ से अर्जित ऐश्वर्य का ही दूसरा नाम भाग्य है।’
-डिजरायली
मूल विषय के संबंध में अब विज्ञान भी सहमत हो गया है। आकाश में दो तरह के पिण्ड पाये जाते हैं 1. जीवित 2. मृत। जीवित ग्रह वह है जो प्रकाश का उत्पादन स्वयं करते हैं। दूसरे वह जो प्रकाश के लिये दूसरों पर अवलंबित रहते हैं। पर पाये हुये प्रकाश अपनी प्रकृति को मिलाकर विकिरण का कार्य वे भी करते रहते हैं, मृत ग्रह कहलाते हैं। जीवित ग्रह-व्यक्ति की अन्तःचेतना और स्थूल प्रकृति दोनों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं जबकि मृत ग्रह शरीर और प्रकृति को प्रभावित करते हुये भी यदि अन्तःचेतना बलवान है तो उसे अपने सिद्धाँतों से हटा नहीं पाते हैं। ज्योतिष का यही अंश समझने योग्य है।
अपना या पृथ्वी का भूत किस प्रकार देखा जा सकता है उसकी गणना एक सेकेंड में 186200 मील की गति से पृथ्वी तक पहुँचता है। सूर्य यहाँ से 93000000 मील दूर है अर्थात् पृथ्वी पर पहली किरण का पहला कण पृथ्वी को चूमता है उसके साढ़े आठ मिनट पहले ही सूर्य हमारी पृथ्वी को देखने लगता है। अर्थात् आठ मिनट पहले के सारे दृश्य सूर्य के प्रकाश कणों को छाँटकर जाने जा सकते हैं। वैज्ञानिक इस दिशा में कोई मशीन बनाने का तेजी से परिश्रम कर रहे हैं।
चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, राहु, केतु, तथा प्लूटो पृथ्वी से क्रमशः 253000 मील, 136900000 मील, 160900000 मील, 247000000 मील, 597000000 मील, 1023000000 मील, 1946000000 मील, 2891000000 मील, तथा 4506000000 मील दूर हैं। इनसे होकर आने वाली प्रकाश किरणें सवा सेकेंड से लेकर कुछ मिनटों या घंटों पूर्व तक के ही भूत का ज्ञान करा सकती हैं। पर सौरमण्डल के बाहर अनेक सूर्य, प्रकाश, स्रोत, और आकाश गंगायें इतनी दूर हैं कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में इतना समय लग सकता है जितनी कि पृथ्वी की आयु भी न हो। ऐसा भी है कि किसी तारे की किरण उस दिन चली हो जिस दिन पृथ्वी चूर-चूर होकर इस अनन्त आकाश में ऐसे समा जाये जैसे समुद्र के जल में पानी की एक बूँद।
जितनी अधिक दूरी होती है, भूत और भविष्य की जानकारियाँ भी उतनी ही अधिक स्पष्ट होती हैं। उदाहरण के लिये हम जमीन में बैठे हों और आस-पास देख रहे हों तो कुल 4-6-10 व्यक्ति अधिक से अधिक 4 फर्लांग तक आते जाते लोग, थोड़े से पेड़-पौधे, चिड़िया, तारागण ही दिखाई देंगे तो यह दूरियाँ और अधिक बढ़ी हुई प्रतीत होंगी। इसी प्रकार यदि आकाश से वायुयान से गुजर रहे हों तो काल और स्थान की दूरियाँ और भी सिमटी हुई प्रतीत होंगी। यही स्थिति इन दूर के ग्रह-नक्षत्रों के बारे में है। जो जितना अधिक दूर है वह उतने ही अधिक भूत का ज्ञान लिये है ऐसा मानना चाहिये। हमारे सौरमण्डल के आगे के सौरमण्डल का सबसे समीपवर्ती तारा ‘प्राक्सिमा सेन्टारी’ पृथ्वी से 25 करोड़ खरब मील की दूरी पर है। उसका प्रकाश यहाँ 4.2 वर्ष में पहुँचता है यदि दूरबीन से देखें तो यह तारा हमें पृथ्वी के 4.2 वर्ष का इतिहास बता रहा होगा। ‘बैटलगैज’ नामक तारे का प्रकाश 520 और डेनेब का प्रकाश 1000 वर्ष में पृथ्वी तक पहुँचता है। यदि 1085 वर्ष पहले का इतिहास पढ़ना हो तो एक ऐसी मशीन बनानी पड़ेगी जो ‘पोलारिस’ तारे को देख सके और उसके प्रकाश कणों में से दृश्यों को छाँटकर उन्हें चित्र पट दिखा सके। इसी के आस-पास कोई ऐसा तारा होगा जो 2000 वर्ष पूर्व हुये महाभारत युद्ध और कृष्णार्जुन संवाद की सारी गीता को अपने में छिपाये बैठा होगा। अपना सूर्य ‘स्पाइरल’ नामक आकाश गंगा से प्रकाश लेता है उनके पास की दूरी आकाश गंगा ‘एड्रोमीडा’ पृथ्वी से इतनी दूर है कि उसका प्रकाश पृथ्वी तक आने में ‘बीस करोड़’ वर्ष ले लेगा अर्थात् 200000000 वर्ष पहले की सारी जानकारियाँ ‘एड्रोमीडा’ दे सकती है।
भविष्य जानने की इच्छा हो तो अपना भूत देखो और उसके अनुभवों को उपयोग में लाओ, तुम जैसा चाहोगे भविष्य वैसा ही बन जायेगा।
-वर्जिल
हर ग्रह की एक स्थायी गति होती है जो किसी स्रोत की परिक्रमा के कारण होती है। पृथ्वी सूर्य की 365 1।4 दिन में एक पूर्ण परिक्रमा करती है। इस अवधि में वह न केवल सूर्य के दैनिक ताप से प्रभावित होती है वरन् सूर्य के स्थायी प्रभाव वाली 1000 किरणों से भी प्रभावित होती है। सूर्य की 10000 रश्मियों को तीन भागों में बाँटा गया है 1. अमृता या वृद्धि सर्जना की 400 (इनके भी चार खण्ड चन्दना, साध्या, कूतना, आकूतना हैं) यह किरण वर्षाकाल की हैं। 2. हिम सर्जना या चन्द्रा की 300 (इनके भी दृश्या, मेघ्या, बाह्या, ह्रादिन्यः यह चार भाग हैं)। यह शीत पैदा करती हैं 3. तीसरी प्रकार की धर्म सर्जना या शुक्ला की 300 हैं) इसके भी शुक्ला, कुहका, गावः विश्वभृतः चार भाग हैं। यह ग्रीष्मोत्पादक किरणें हैं। इस तरह सूर्य की सब किरण बारह महीनों में बंटी हुई 1 वर्ष में ऋतुओं और जलवायु को बदलती हुई पृथ्वी और उसके निवासियों को प्रभावित करती हैं। इनके साथ ग्रह की परिस्थितियाँ भी मिलकर अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। उन सबकी प्रकृति की एक क्रमबद्ध शृंखला चलती और पुनरावृत्ति होती रहती है। उसे ही भविष्य फल कह सकते हैं। संभव सब कुछ है पर वह सब कठिनाई से ही मिलने वाला है। विज्ञान जटिल मशीनें बनाने के प्रयत्न में है, उससे किसे कितना लाभ मिलेगा कहा नहीं जा सकता पर आत्मानुभूति की साधना तो सबके अपने वश की बात है। हम ज्ञान के केन्द्रबिन्दु मन और मस्तिष्क को जीत पायें तो क्या विज्ञान क्या ग्रह-गणित सबसे विजय पाकर अपने आप में ही भूत और भविष्य के न केवल ज्ञान वरन् नियंत्रण की क्षमता भी प्राप्त कर सकते हैं।
सोमदत्त नामक एक ब्राह्मण राजा भोज के पास गया और बोला महाराज! आपकी आज्ञा हो तो उज्जयिनी के नागरिकों को भागवत कथा सुनाऊं। प्रजा का हित होगा और मुझ ब्राह्मण को यज्ञ के लिये दक्षिणा का लाभ भी मिल जायेगा।
भोज ने अपने नवरत्नों और सभासदों की ओर देखा और फिर सोमदत्त की ओर मुख करके बोले- आप अभी जाइये कुछ दिन भागवत का और पाठ कीजिये?
पहला अवसर था जब महाराज भोज ने किसी ब्राह्मण को यों निराश किया था। लोगों को शंका हुई कि महाराज की धर्म-बुद्धि नष्ट तो नहीं हो गई, उन्होंने विद्या का आदर करना तो नहीं छोड़ दिया? कई सभासदों ने अपनी आशंका महाराज से प्रकट भी की पर उन्होंने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया।
ब्राह्मण निराश तो हुआ पर उसने प्रयत्न नहीं छोड़ा। उसने सारी भागवत कण्ठस्थ कर डाली और फिर राज-दरबार में उपस्थित हुआ। किन्तु इस बार भी वही उपेक्षापूर्ण शब्द सुनने को मिले। भोज ने कहा- ब्राह्मणदेव! अभी आप अच्छी तरह अध्ययन नहीं कर सके। जाकर अभी और अध्ययन कीजिये। इसी प्रकार सोमदत्त कई बार राज-दरबार में उपस्थित हुआ पर उसे उपेक्षा ही मिली।
ब्राह्मण ने इस बार भागवत के प्रत्येक श्लोक को पढ़ा ही नहीं एक-एक भाव का मनन भी किया जिससे उसकी भगवन् के प्रति निष्ठा जाग गई। उसने आदर, सत्कार, सम्पत्ति और सम्मान की सारी भावनायें छोड़ दी और सामान्य लोगों में ही धर्म भावनायें जागृत करने लगे।
बहुत समय तक भी जब वे दुबारा उज्जैन न गये तो भोज ने उनका पता लगाया। सारी स्थिति का पता लगाकर उन्होंने एक दिन सोमदत्त को बुलाकर प्रणाम किया और विनयपूर्वक निवेदन किया। महाराज! आप उज्जयिनी के नागरिकों को भागवत सुनायें तो इनका कल्याण हो।
भागवत हुई और सोमदत्त को इतनी दक्षिणा मिली फिर कभी यज्ञ के लिये धनाभाव नहीं हुआ। एक दिन एक सभासद ने पूछा-महाराज एक दिन यहाँ ब्राह्मण जब अपनी ओर से आया था तब आपने उपेक्षा बरती थी आज आपने उन्हें उसे प्रणाम भी किया और आग्रह भी सो क्यों?
भोज ने कहा- तब यह धन के लिये भागवत-कथा सुनाना चाहते थे पर अब इनकी भागवत-कथा धन के लिये नहीं लोक-मंगल के लिये हो गई है।
1931 तक वैज्ञानिक इतना ही जान सके थे कि एक अणु के नाभिक (न्यूक्लियस) में प्रोटोन और न्यूट्रोन परमाणु होते हैं और उसके किनारे कई कक्षाओं में इलेक्ट्रान चक्कर काटते रहते हैं। ‘प्रोटोन’ धन विद्युत कण और ‘इलेक्ट्रान’ ऋण विद्युत कण होते हैं। न्यूट्रोन में भार होता है आवेश नहीं होता।
लेकिन अगले वर्ष 1932 में ही डॉ. सी.डी. एण्डरसन नामक वैज्ञानिक ने लोगों को यह कहकर चौंका दिया कि ‘इलेक्ट्रान’ ऋण आवेश कण ही नहीं होता, धन विद्युत आवेश वाले ‘इलेक्ट्रान’ भी होते हैं। इनका नाम उसने ‘पाजिस्ट्रान’ रखा। अभी तक पाजिट्रान के स्वरूप की कोई व्याख्या नहीं की गई उसका अस्तित्व केवल मात्र ‘ज्ञान’ है।
पाजिट्रान की खोज के ठीक 23 वर्ष के बाद सन 1955 में एमिलियो सीगर नामक वैज्ञानिक ने एक ऐसे ‘प्रोटान’ की खोज की जो ऋण विद्युत आवेश मुक्त था इसका नाम ‘एण्ट्री, प्रोटान’ रखा गया। पर इसका आकार-प्रकार क्या है? इस प्रश्न पर पुनः वही उत्तर एक-मात्र ‘ज्ञान’। इस खोज से एक वर्ष पीछे ‘सीगर’ ने ही ‘एण्टी न्यूट्रॉन’ की भी खोज कर ली। वह भी केवल प्रभाव से जाना जा सका, यदि प्रभाव में वह ‘न्यूट्रॉन’ से ठीक विपरीत नहीं होता, शायद समझ में भी नहीं आता। इस प्रकार पहली बार पता चला कि प्रत्येक अणु में पदार्थ ही नहीं अपदार्थ भी विद्यमान है। हर वस्तु के साथ प्रेत की तरह उसकी कोई एक सूक्ष्मतम छाया भी रहती है। जिसका अस्तित्व है, पर आकार नहीं। जब पदार्थ उसके संसर्ग में आता है तो उससे तत्काल ‘गामा’ किरण निकलतीं और उसकी उपस्थिति की सूचना देती हैं पर अ-पदार्थ का आज तक कोई भी अस्तित्व पृथ्वी में नहीं पाया गया भले ही वह कहीं आकाश में ही क्यों न रहता हो।
यह उपलब्धि अपना ध्यान बरबस ही योग वशिष्ठ के उक्त कथन की ओर खींच ले जाती है जिसमें बताया है कि-
एतिच्चत्तशरीरत्वं विद्धि सर्वगतोदयम्।
3।40।20
हे राम! संसार की प्रत्येक वस्तु में चेतना (मन) ऐसे विद्यमान है जैसे-
यथा बीजेषु पुष्पादि मृदो राशौघटो यथा। 6।1।10।19
बीज के भीतर पुष्प और मिट्टी में घड़ा।
द्रव्येषु द्रव्यभावेन काठिन्येनेतरेषु च। 6।1।10।24
पदार्थ में पदार्थ भाव और कड़ी वस्तुओं में कठोरता के रूप में यह मन ही व्याप्त है।
उसके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है-
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मन सीलिंगम्॥
-न्याय दर्शन 1।1।16
अर्थात् जिससे एक काल में दो पदार्थों का ग्रहण ज्ञान नहीं होता केवल एक ही वस्तु ज्ञान में आती है वह ‘मन’ है। पदार्थ में चेतना ही मन है ऐसा कह सकते हैं।
मन ही स्थूल होकर स्थूल पदार्थों के रूप में और वही सूक्ष्म हो जाता है तो सूक्ष्मतम तत्वों का वेधन करता हुआ आत्मा और परमात्मा को जान लेता है। इसीलिये मन को स्थूल पदार्थों से हटाकर प्रकाश रूप में ध्यान करने का शास्त्रीय आदेश है, क्योंकि प्रकाश में सर्वगमन, सर्वव्यापकता, शक्ति और तेजस्विता के सब गुण हैं। ईश्वरीय प्रकाश इन सबसे सूक्ष्म और शक्तिशाली हैं इसलिये ईश्वर तत्व के ध्यान की महत्ता सबसे अधिक बताई गई है।
उपरोक्त तथ्य भी अब विज्ञान की कसौटी पर सत्य उतरते जा रहे हैं। हीरा, पन्ना, पुखराज आदि ठोस पदार्थ हैं। इसके अणुओं के गति 960 मील प्रति घंटा ही है, जबकि इलेक्ट्रान अपनी कक्षा में 1300 मील प्रति सेकेण्ड की गति से चक्कर काटते हैं। गैसों तथा कुछ अन्य सूक्ष्म अणुओं वाले पदार्थों के अणुओं का कंपन इतना तीव्र होता है, कि दो अणुओं के बीच की दूरी 1।3000000 इंच होने पर भी वह एक सेकेंड में 6 अरब बार टक्कर खा जाते हैं। प्रकाश एक सेकेण्ड में 186200 मील की गति से छिटकता है यह सब इस बात के प्रतीक हैं कि जो जितना सूक्ष्म और हल्का है, वह उतना ही चेतन और गतिशील है।
पदार्थों का यह गतिशील भाग ही अपदार्थ, मन या चेतना है, वह जितना स्थूल होगा उतना ही छोटी सीमा में प्रभावशील होगा, जबकि अधिक सूक्ष्म तत्व की चेतना या गति इतनी तक हो सकती है कि वह समय, ब्रह्माण्ड, गति और कारण नियमों (टाइम, स्पेस, मोशन एण्ड काजेशन) को भी पीछे छोड़कर प्रति फल सारे ब्रह्माण्ड का परिभ्रमण कर सकने में समर्थ हो, ऐसे तत्व की ही कल्पना ईश्वर के रूप में की गई है। विज्ञान अभी उस तक पहुँचने में देर कर रहा है, क्योंकि वह भावना और ज्ञान का विषय होने के कारण, मशीनों की पकड़ में नहीं आ पाता।
ज्ञान शास्त्रार्थ से नहीं सेवा से सार्थक होता है-
काश्मीर में एक बड़े विद्वान रहते- नाम था केश्व भट्ट। धर्म के गूढ़ रहस्यों का भी वे इतना प्रतिपादन करते थे कि सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे। लोगों की बड़ी इच्छा थी कि केवल भट्ट वहीं रहकर लोगों का आध्यात्मिक, धार्मिक शिक्षण और मार्गदर्शन करें पर केशव भट्ट को अपनी विद्या का अहंकार हो गया। अतएव वे सब धर्म छोड़कर शास्त्रार्थ दिग्विजय के लिये निकल पड़े।
केशव भट्ट को जहाँ कहीं पता चलता कि अमुक नगर में कोई विद्वान है वे उधर ही चल देते और वहाँ पहुँचते ही शास्त्रार्थ की ताल ठोक देते। कई लोगों ने सुझाया भी कि शास्त्रार्थ करने से अहंकार बढ़ता है, विद्वानों में व्यर्थ विवाद होते हैं, झगड़े और षड़यंत्र बढ़ते हैं। आपके ज्ञान की सार्थकता इस बात में है कि आप सभी विद्वानों को संगठित कर समाज सुधार और धर्म प्रसार का कार्य करें तो उससे कितने लोगों को प्रकाश मिले और अपनी जाति का गौरव भी बड़े पर अहंकार तो उस विषधर की तरह होता है जिसे न तो सीधी सच्ची बातें अच्छी लगती हैं, और न सीधे सरल लोग। उनकी शास्त्रार्थ वृत्ति गई नहीं।
इस तरह भ्रमण करते-करते एक बार वे बंगाल के नदिया जिले में पहुँचे। उन्होंने सुना कोई सात साल का गौराँग प्रभु नामक लड़का बड़ा ईश्वरभक्त है। लोगों ने बताया कि भक्त ही नहीं ईश्वर उपासना में गहन तल्लीनता के कारण उसमें इसी उम्र में आत्मिक और बौद्धिक प्रतिभा का विलक्षण विकास भी हो गया है। केवल भट्ट भला दूसरे की प्रशंसा कैसे सुनते, वे सीधे गौराँग के पास जाकर बोले-मुझसे शास्त्रार्थ करो।
विनीत शब्दों में चैतन्य महाप्रभु बोले- मान्यवर! मुझे आत्म-कल्याण की चिन्ता है शास्त्रार्थ मैं क्या जानूँ? हाँ यदि आप भगवान की कोई स्मृति सुना सकते हैं तो सुनाइये। केवल भट्ट ने एक स्तुति सुनाई जो उन्हीं की रची हुई थी। चैतन्य महाप्रभु ने उसमें कई अशुद्धियाँ निकाल दी तो केशव भट्ट अवाक् रह गये। उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और फिर कभी शास्त्रार्थ न करने का परामर्श भी मान लिया।
दक्षिणी ट्रिनीडाड द्वीप पर पहली बार पर्यटक ‘नवीन’ की खोज में गये तो उन्हें पहले से ही स्वागत के लिये तैयार ‘टर्न’ और अल्बेट्रास’ नाम के दो पक्षी मिले उनकी प्रारंभिक भेंट से ही यात्रियों को पता चल गया कि विकसित चेतना मनुष्य के भाग्य में ही नहीं है। सृष्टि के दूसरे जीव-जन्तुओं में भी आत्म चेतना की वह विलक्षणतायें विद्यमान हैं जिन्हें मनुष्य अपने लिये लाखों करोड़ों वर्ष का बौद्धिक विकास मान्यता है।
बत्तख की सी आकृति वाले इन पक्षियों की विशेषता यह थी कि वह बिना हिचकिचाहट यात्रियों के पास चले आये, एक बार भगवान राम के सहयोगी सहचर रीछ-वानर समुद्र के किनारे बैठे कुछ परामर्श भर कर रहे थे तब कहीं से संपाती नामक भयानक गिद्ध वहाँ जा पहुँचा, उसे देखते ही उन सबके प्राण सूख गये थे, वैसे ही इन यात्रियों के हृदय किसी अनिष्ट की आशंका से धड़क उठे थे, पर इनके कंधों तक पर आ बैठने वाले इन पक्षियों ने मानो उनको लज्जित करते हुए कहा हो- ‘हम तुम्हारे जैसे किसी भी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिये पीड़ित-प्रताड़ित और मारकर खा जाने वाले नहीं, आत्मा की आकांक्षायें क्या हैं, हम उसे जानते और आचरण करते हैं।
यह बातें बेचारे पक्षियों ने मुख से नहीं कहीं पर उनके व्यवहार से यही भावार्थ निकलता था। इन पक्षियों ने इनका स्वागत किया। कुछ उन्हें अपने घोंसलों तक ले गये, उनका मनुष्य की तरह अभिवादन किया और यात्रियों के अभिवादन का उत्तर भी दिया।
सारी पृथ्वी में यह जो प्रकृति दिखाई दे रही है वह हमारी दृष्टि में भले ही तुच्छ जान पड़े पर अध्ययन यह बताता है कि वह सब एक ही आत्म-चेतना की विलक्षण और रहस्यपूर्ण परिणति है। एक ही चेतना अपनी इच्छा आकाँक्षाओं के रूप में अनेक शरीर धारण करती रहती है। प्रकृति निर्जीव नहीं, जीवित क्रिया शक्ति है गुण और जीवन पद्धति उतनी ही विलक्षण है जितनी इच्छा और वासनाओं वाला यह संसार रहस्य पूर्ण है।
अर्विन के मन में विकासवाद सिद्ध करने का एक भूत सवार था इसी कारण उन्होंने यद्यपि सैकड़ों विलक्षण जीव−जंतुओं का अध्ययन किया पर, उन सबकी शारीरिक रचना का वह अंश ही चुनने में लगाया जो विकासवाद का सिद्धाँत सिद्ध करने में सहायक मिला। आज का जीवशास्त्र का विद्यार्थी कदाचित प्रश्न कर देता है कि यदि प्राकृतिक परिवर्तनों और इच्छा शक्ति के कारण ही जीव एक कोशीय अवस्था से विकसित होकर बहुकोशिय क्षुद्र जन्तुओं की श्रेणी में आये और क्रमशः हाइड्रो, मछली, घोड़ा, बन्दर आदि बनते-बनते मनुष्य बन गया तो फिर जीवों के स्वभाव और बनावट की इस विलक्षणता का क्या रहस्य है? वह किस बात के विकसित परिणाम हैं जो आज भी अनेक जीवों में दिखाई देते हैं।
उत्तरी अमेरिका में अलास्का से बाजा कैलीफोर्निया तक समुद्र में 60 फुट से 1800 फुट तक की गहराई में ‘लेम्प्रे’ जाति की एक मछली पाई जाती है इसका नाम है ‘हैगफिश’। कोई कल्पना नहीं कर सकता कि कई इंजनों वाले जेट विमान के समान इस मछली के 4 हृदय होते हैं, पेट होता ही नहीं और नथुना भी केवल एक ही होता है, दाँत जीभ में होते हैं। अपने शरीर को रस्सी की सी गाँठ लगाकर यह किसी मरे हुये जीव के शरीर में घुस जाती है और उसका सारा शरीर चट कर जाती है पर आश्चर्य है कि भोजन न मिले तो भी वह वर्षों तक जीवित बनी रह सकती है।
हैगफिश किस जीव का विकास है यह सोचना पड़ता तो डार्विन अपना सिद्धाँत अपने हाथों काट देते। स्वयं आज का विज्ञान जगत भी प्रकृति के इस रहस्य को सुलझा सकने में असहाय अनुभव कर रहा है। सन 1864 में कोपन हेगन की साइन्स एकेडमी ने घोषित किया कि जो वैज्ञानिक यह खोज कर लेगा कि हैगफिश की प्रजनन विधि क्या है उसे भारी पुरस्कार दिया जायेगा पर आज तक भी यह पुरस्कार कोई वैज्ञानिक प्राप्त नहीं कर सका।
जिस प्रकार ‘हैगफिश’ की प्रजनन विधि ज्ञात नहीं हो सकी उसी प्रकार वैज्ञानिक सर्वत्र पाये जाने वाले तिल चट्टे (काक्रोच) की आयु निर्धारित करने में असफल रहे हैं। अनुमान है कि करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी में देनोसारस श्रेणी के जीवों का आविर्भाव हुआ तब तिलचट्टा पृथ्वी में विद्यमान था। इसकी संभावित आयु 35 करोड़ वर्ष बताई जाती है, इतनी अवधि पार कर लेने पर भी कठोर से कठोर और भयंकर से भयंकर प्राकृतिक परिवर्तन झेल लेने पर भी इसकी शारीरिक रचना में न तो कोई अन्तर आया, न विकास हुआ तब फिर जीव-जगत को नियमित और प्राकृतिक परिवर्तनों के अनुरूप विकास की संज्ञा कैसे दी जा सकती है।
तेज से तेज गर्मी, वर्ष भर बर्फ जमी रहने वाले ग्लेशियर, पहाड़ और मैदान सब जगह वह तिलचट्टे पाये जाते हैं महीने भर तक भोजन पानी नहीं मिले तो भी उसका काम चल सकता है। दो महीने तक केवल पानी पर उपवास करके दिखा सकता है कि भोजन शरीर की आवश्यकता नहीं तो 5 महीने तक वह सूखा भोजन ही लेता रहकर यह सिद्ध कर देता है कि मनुष्य पानी के बिना भी शरीर धारण करने में समर्थ हो सकता है। यह सब चेतना के अन्तरिक्ष गुणों पर आधारित रहस्य है, जिन्हें केवल शारीरिक अध्ययन द्वारा नहीं जाना जा सकता। उसे समझने के लिए आत्म-चेतना के विज्ञान का एक नया अध्याय खोलना आवश्यक है। यह व्यवसाय जीव के शरीर धारण की प्रक्रिया से संबंधित और आध्यात्मिक तथ्यों व तत्व दर्शन का अध्याय होगा जिसके लिये पूर्वजों ने कठोर से कठोर तप किया था और उन सनातन सत्यों का प्रतिपादन किया था जो धार्मिक विरासत के रूप में अभी भी हमारे पास विद्यमान हैं।
तिलचट्टे की भूख भी भयंकर होती है, आहार प्रारंभ कर देता है तो अपने अण्डे बच्चे भी नहीं छोड़ता। मादा अपने बच्चों से बड़ा स्नेह रखती है प्रायः हर दो दिन में यह 1 अण्डा दे देती है। एक रूसी जीव-शास्त्री ने एक बार पौने पाँच लाख तिलचट्टों के ऐसे शव ढूंढ़ निकाले जो एक ही तिलचट्टे दम्पत्ति की संतान थे। नर काक्रोच बड़ा सफाई व सौंदर्य पसंद जीव है। वह घंटों अपने शरीर और मूँछों की सफाई में लगाता है और उन्हें सुन्दर ढंग से संवारता है। इसकी मूंछें लंबी होती हैं और एरियल का काम देती हैं। मूँछों की मदद से वह अंधेरे में भी अपना रास्ता आसानी से तय कर लेता है। विज्ञान के लिये यह खुली चुनौतियाँ हैं, आज जो खोजें मनुष्य ने कर ली हैं प्रकृति उनका ज्ञान आदि काल से अपने गर्भ में छिपाये हुये है। सृष्टि के यह विलक्षण जीव प्रकृति की चेतना के ही प्रमाण हैं। वह इस बात के साक्षी भी हैं, कि प्रकृति एक ‘परिणत वैज्ञानिक’ है, विज्ञान की पूर्ण शोध और जानकारी का लाभ किसी प्रकृतिस्थ को ही उपलब्ध हो सकता है।
तिलचट्टे की विलक्षणतायें और भी हैं। उसके बच्चे सप्ताहों भूखे रह सकते हैं। वह स्वयं बर्फ की चट्टान में दब जाता है बर्फ पिघलकर उधर निकलती है और यह इधर उठकर चल देता है इसका बाहरी आवरण इतना कठोर होता है कि पाँव से दब जाने पर भी यह मरता नहीं है। दौड़ने में यह किसी सुन्दर विमान से कम नहीं यह सब गुण हैं जिन्होंने वैज्ञानिकों का ध्यान इसकी शोध के लिये आकर्षित किया। पर बेचारे जीव शास्त्री उसकी इस शारीरिक विलक्षणता पर ही उलझे रहे मानसिक रहस्यमयता का एक भी पर्दा वे उघाड़ न सके।
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्-नान्यत्किञ्चन मिषत्।
स ऐक्षत लोकान्नु सृजा इति।
-एतरेय ब्राह्मण
पूर्व में एक आत्मा ही था अन्य कोई तत्व न था। उसी ने अपनी इच्छा से लोक रचे। सब प्राणियों में व्याप्त यही जानने योग्य है।
अनेक अस्त्र-शस्त्र बनाकर मनुष्य ने अपनी बौद्धिक चतुरता और दक्षता का परिचय दिया पर हम नहीं जानते प्रकृति इस संबंध में कितनी धनवान है। उष्ण कटिबंधीय समुद्र में एक ट्रिगर फिश (वह मछली जिनके शरीर में काँटे होते हैं) पाई जाती है इसका नाम है ‘हुमुहुमु-नुकुनुकु’ जैसा विलक्षण नाम वैसा ही विलक्षण स्वयं भी। इसकी पूँछ, पीठ और सिर पर कुछ काँटे होते हैं जिन्हें यह अपनी इच्छा और नाड़ियों के द्वारा जब चाहती है तरेर कर सीधा और तीक्ष्ण कर देती है, फलस्वरूप किसी भी दुश्मन की इन पर घात नहीं लग पाती। इसके दाँतों की बनावट विचित्र होती है। दोनों जबड़ों में बाहर आठ-आठ दाँतों के अतिरिक्त ऊपर के जबड़े में एक प्लेट की शक्ल में 6 दाँतों की भीतरी पंक्ति भी होती है ऐसा किस सुविधा के लिये है यह वही जानती है क्योंकि प्रकृति की कोई भी रचना निरर्थक नहीं। भले ही मनुष्य सारगर्भित कल्पनाओं के स्थान पर वह क्रिया-कलाप और रचनायें गढ़ता रहे जो उसे लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानिकारक होती हों।
जीवों की यह तरह-तरह की आकृति और प्रकृति देखते-देखते शास्त्रकार की जैविक व्याख्या अनायास ही याद आ जाती है-
अनारतं प्रतिदिशं देशे देशे जले स्थले।
जायन्ते वा म्रियन्ते वा बुदबुदा इव वारिणी॥
योग वसिष्ठि 4।45।1-2
एवं जीवाश्रितो भावा भव भावन योहिता।
ब्रह्मणः कल्पिताकाराल्लक्षशोऽप्यथ कोटिशः॥
असंख्याताः पुरा जाता जायन्ते चापि वाद्यभोः।
उत्पत्तिष्यन्ति चैवाम्बुकणौधा इव निर्झरात्॥
-योग वसिष्ठ 4।43।1-2
हे राम! जिस प्रकार जल में अनेक बुलबुले बनते और बिगड़ते रहते हैं उसी प्रकार सब देश सभी कालों में यह चेतना ही अनेक जीवों के रूप में उत्पन्न और नष्ट होती रहती है। यह सब चित के रूपांतर का फल है। जीव अपनी इच्छा और कल्पना के द्वारा लाखों और करोड़ों की संख्या में तीनों कालों में उत्पन्न होते रहते हैं जैसे झरने के जल कण।
भारतीय दर्शन की यह मान्यतायें कितनी सत्य और स्पष्ट हैं उसे समझने के लिये भगवान ने मनुष्य शरीर जैसा एक परिपूर्ण यंत्र बनाया है। इसमें भरी चेतना भी एक क्षुद्र जीव ही है जो बौद्धिक विकास के कारण इस स्थिति में है कि अपनी यथार्थ अवस्था का ज्ञान, अनुभव और साक्षात्कार कर सकता है और 84 लाख योनियों में भ्रमण कराने वाली इच्छाओं, वासनाओं को जीत कर विराट आत्मा, ब्रह्म और परम पद तक की प्राप्ति कर सकता है।
विनोबा उन दिनों बड़ौदा में रहते थे। उनके निवास स्थान से कोई दो फर्लांग पर एक मन्दिर था। विनोबा प्रतिदिन मन्दिर जाते और उसमें कुछ देर बैठकर भजन गाकर लौटते। मन्दिर के समीप ही एक रईस रहा करते थे सम्पतराव गायकवाड़। उनके पास एक हाथी था। विनोबा जब भजन गाते हाथी बड़े ध्यान से उनका भजन सुनता। विनोबा भावे के मन्दिर में नियमपूर्वक जाने की तरह प्रतिदिन भजन सुनना हाथी का नियम बन गया।
एक दिन किसी काम की जल्दी थी। विनोबा मन्दिर गये, भगवान के दर्शन भी किये किन्तु रुके नहीं एक मिनट में ही बाहर आ गये। उन्हें बाहर आते देखकर हाथी चिल्लाने लगा। विनोबा को फिर मन्दिर जाना पड़ा। कुछ क्षणों के लिये वे भीतर जाकर बैठ तो गये पर फिर शीघ्र ही बिना भजन गाये लौट पड़े। हाथी फिर जोर-जोर से चिल्लाने और दुःख प्रकट करने लगा। इस बार विनोबा मन्दिर में फिर गये और पहले की तरह भजन गाया तब लौटे।
अबकी बार हाथी प्रसन्न था, विनोबा को लगा जैसे उसके अन्तःकरण से आवाज आ रही है- ‘भगवान का भजन किये बिना कोई काम शुरू नहीं करना चाहिये।’ उस दिन से वह हाथी विनोबा का गुरु हो गया।
राइजोबियम जाति के जीवाणु बैक्टीरिया और दलहन जाति के पौधों ने परस्पर समझौता कर लिया है। दलहन पौधों की जड़ें इन जीवाणुओं को रहने के लिये स्थान और शरण देती हैं यह जीवाणु वायुमण्डल से नेत्रजन (नाइट्रोजन) खींचकर पौधों को देते हैं जिनसे पौधों को पोषण मिलता है। दोनों बढ़ते और विकसित होते रहते हैं। प्रकृति की इस परोपकारी वृत्ति को 1. ‘सिम्बायोसिस’ कहते हैं।
किसी गाँव में आग लग गई। सब लोग सकुशल निकल गये पर एक अंधा, एक लंगड़ा व्यक्ति दो ही रह गये। वे भाग नहीं सकते थे। अन्धा देख नहीं सकता था, लंगड़ा चल नहीं सकता था। दोनों ने ऊपर के सिद्धाँत को अपनाया। अंधे ने लंगड़े को कंधे पर बैठा लिया। लंगड़ा अंधे को रास्ता बताने लगा और परस्पर सहयोग के आधार पर वह दोनों भी सकुशल बाहर निकल आये। एक दूसरे के हित में परस्पर सहयोगी होने के इस सिद्धाँत को मनुष्य ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू कर लिया होता तो छोटी-छोटी क्षमताओं के लोग भी संतोष और सुविधा का जीवन जीते हुये अंधे और लंगड़े की तरह साँसारिक कठिनाइयों से पार हो जाते।
सेलूलाइटिक फफूँद की दो जातियों में एक जाति बलवान होती है दूसरी निर्बल। जो निर्बल होते हैं वह अपने आहार ‘सेलूलोज’ को तोड़-फोड़ नहीं सकते। अब शक्तिशाली फफूँद ‘सेलूलोज’ को तोड़ना प्रारंभ करते हैं और उसमें कार्बनिक-अम्ल पैदा कर देते हैं। यह कमजोर सेलूलाइटिक फफूँद के लिये आहार का काम देता है। यदि बलवान फफूँद इन निर्बलों को सहारा न देते तो उनकी एक जाति कभी भी नष्ट हो गई होती।
परिवार में बच्चे, बूढ़े, विधवायें और कई लोग बीमार तथा अपाहिज भी होते हैं, समाज में कई निर्धन, रोगी, अभावग्रस्त लोग होते हैं। उनके प्रति साधन सम्पन्न और शक्तिशाली लोगों का कर्त्तव्य भी ऐसा ही होता है यदि सम्पन्न और सशक्त लोग कमजोर और निर्बलों की असुविधायें और अभाव दूर करने में थोड़ी सी भी शक्ति खर्च कर सके होते तो आज समाज में कहीं भी विषमता न होती। प्रकृति का यह 2. ‘प्रोटो को आपरेशन’ सिद्धांत ही विश्व शाँति का आधार बन सकता है।
जीव जगत में 3. कमेन्सलिज्म का एक सिद्धाँत भी ‘जियो और जीने दो’ की समाजवादी व्यवस्था का आदर्श उदाहरण है। कुछ खास किस्म के सूक्ष्म जीवाणुओं में अपने विकास के साधनों का ज्ञान नहीं होता। उन्हें अपनी आजीविका और विकास के लिये साधनों की वैसे ही आवश्यकता पड़ती है जैसे समाज के अनेक पिछड़े, पद दलित, अपंग, आदिवासी, स्त्रियों व हरिजनों को शिक्षा, ज्ञान संवर्द्धन, स्वास्थ्य, उद्यम-उद्योग आदि के साधनों की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को दूसरे महत्वपूर्ण जीवाणु ‘विटामिन’ और ‘एमीनो एसिड’ बनाकर पूरा कर देते हैं। शिक्षित, सम्पन्न और प्रतिभावान लोगों ने पिछड़े समाज को ऊपर उठाने के लिये इस सिद्धाँत के आधार पर अपने साधनों का एक अंश भी जुटा दिया होता तो आज संसार में कोई भी पिछड़ा और पद दलित नहीं होता। सब लोग सुखी होते। ‘एरोब्ज’ और ‘एनारोब्ज’ जीवाणु इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि मनुष्य को अपने ही नहीं दूसरों के विकास का भी सदैव ध्यान रखना चाहिये।
मस्तिष्क ने कहा- उदर महोदय! आप भी मूर्ख ही ठहरे! यह जो अन्न तुम्हारे पास पहुँचा है उसे रस और रक्त बनाकर दूसरे अंगों को बाँट देने से खाली हो जाओगे? पेट बोला- महाशय- ऐसा न करूं तो इस शरीर के साथ ही मेरा भी अस्तित्व नष्ट न हो जाये। नित्य नया पाने का सौभाग्य भी तो हमें देते रहने से ही मिलता है।
माँ नहीं जानती थी कि उसका पुत्र इतनी शीघ्र इसके सम्मुख वह प्रश्न लेकर आ खड़ा होगा-जिसके विषय में, पुत्र के जन्म से ही वह सोचती रही है कि अवसर आने पर पुत्र के सम्मुख किस रूप में उसका उत्तर देगी वह?
किन्तु वह कायर नहीं थी। कटु से कटु सत्य को कहने की तथा सुनने की सामर्थ्य थी उसमें। पुत्र कह रहा था- ‘अब मैं आश्रम में जाकर गुरु से विद्या प्राप्त करूंगा। मुझे मेरा गोत्र बता दे माँ। वे पूछेंगे तो मैं क्या बताऊंगा?’
और जो उत्तर माँ ने दिया वह ज्यों का त्यों ले जाकर उसने आपने भावी गुरु के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया।
जब वह ऋषि हारीद्रु मात गौतम के पास पहुँचा तो आशा ही के अनुकूल उन्होंने सर्वप्रथम यही प्रश्न पूछा ‘वत्स! तुम्हारा नाम तथा गौत्र क्या है?’
सत्यकाम न झिझका और न घबराया। मृदुल वाणी में उसने करबद्ध होकर कहा- ‘आचार्य प्रवर! यही प्रश्न मैंने घर से चलते समय अपनी माँ से किया था। उन्होंने बताया कि वे स्वयं भी नहीं जानती कि मेरा गौत्र क्या है। कुछ वर्षों पूर्व, जब वे ग्रह-ग्रह जाकर परिचारिका का कार्य करती थीं- तभी उन्होंने मुझे जन्म दिया था। किन्तु उन्होंने कहा है कि एब बात तो निश्चित है कि मेरा नाम सत्यकाम है और उनका जावाला। अतः आप मुझे केवल जवाला पुत्र समझकर ही दीक्षा देने की कृपा करें।’
गुरु ने देखा- बालक में अपूर्व तेज, अदम्य उत्साह तथा सत्य के प्रति अडिग निष्ठा है। उनका हृदय गदगद हो गया। बोले- ‘तुम्हारा गोत्र कुछ भी हो, गुण महान व्यक्तियों जैसे हैं। कोयले की खान में से कोयला निकलता है- हीरे की खान से हीरा। निश्चय ही तुम्हारी माता सत्य की उपासिका तथा साहसी महिला होंगी। मैं तुम्हारी इस स्पष्टवादिता से बहुत प्रसन्न हूँ। कोई भी निम्न वंश का बालक कटु सत्य को इतने के साथ कहने में अवश्य ही झिझकता। मैं तुम्हारी इस सत्यवादिता से बहुत प्रसन्न हूँ। जाओ समिधायें ले आओ। मैं तुम्हारा ब्रह्मचर्य प्रवेश कराऊंगा।’
संस्कार होने के पश्चात वह अन्य बालकों के साथ उसी आश्रम में रहने लगा। ऋषि ने देखा इस बालक में सत्य के प्रति गहन आस्था है। उसके प्रश्नों में सदा यही जिज्ञासा झलकती सृष्टि का अन्तिम सत्य क्या है?
उन्होंने कुछ सोचकर उसे प्रकृति के सान्निध्य में भेजा। सत्यकाम को बुलाकर ऋषि ने आदेश दिया ‘वत्स! इन गायों को लेकर जाओ। इनकी संख्या चार सौ है। जब तक इनकी संख्या एक हजार न हो जाय आश्रम मत लौटना। वनस्थली में आशा है तुम्हें कोई कष्ट न होगा।’
यह एक परीक्षा थी। किन्तु वैसी ही जैसे कंचन को तपते समय देनी पड़ती है पर परिणाम भी वैसा ही सुखद होता है। मलिनता गलकर दूर हो जाती है और शुद्ध खरा कंचन देदीप्यमान हो उठता है।
सत्यकाम के लिये गुरुवचन वेद वाक्य से कम न थे। तत्काल ही वह चल पड़ा। एक सुन्दर रम्य वनस्थली में उसने स्थान बनाया। एक छोटी पर्णकुटी का निर्माण किया अपने लिये। पशुओं के लिये भी रहने की समुचित व्यवस्था की।
भोजन की समस्या कन्दमूलों से, सुन्दर फलों से तथा दुग्ध से हल हो जाती थी। दिनभर गौओं को चराता रहता। सन्ध्या समय बछड़ों से प्यार करता गौओं की सेवा करता- दूध निकालकर आस-पास के ग्रामों में जाकर असहायों तथा साधनहीनों में वितरित कर देता। एक-एक दिन बीतता और वह यही लेखा-जोखा लेता रहता कि मेरे पशु हृष्ट-पुष्ट हो रहे हैं या नहीं- उन्हें कोई कष्ट तो नहीं। गुरुदेव का यह भी आदेश था कि पशु दुर्बल हो गये हैं- तनिक हृष्ट-पुष्ट हो जाने चाहिये।
गुरु के प्रति असीम श्रद्धा तथा कर्त्तव्य निष्ठा दोनों मिलकर उसके कार्य को अत्यधिक प्राणपूर्ण बना देते। जब कार्यों से अवकाश मिलता तभी वह निर्जन स्थान में बैठा कभी उगते सूर्य को देखा करता उसे लगता ये प्रकाश- ये जीवनदायी किरणें निश्चय ही परमात्मा का प्रतिबिम्ब हैं। रात का गहन अन्धकार और उसमें चमकते चाँद तारे सत्यकाम के मस्तिष्क में अजीब द्वन्द्व उठा देते और वह सोचता ईश्वर रात्रि की इस शीतलता से भरे अपने क्रोड में मानव को भरकर उसके समस्त ताप-शाप को धो देता है।
रात को जब वह आग जलाता- तो विचार करता रहता- यही तत्व मनुष्य को उसके आवरण को भेदकर असीम सत्ता से एकाकार कर देता है। इस भूलोक में अग्नि ही आधार है मानव-जीवन का।
कभी पहाड़ी की चोटियों पर जा बैठता और विचार करता रहता ये विस्तृत आकाश, ये विशाल सागर, लहराती नदियाँ, गौरव से मस्तक ऊंचा किये हुए ये पर्वत ये सनसनाती पवन, अन्न-जल, प्रदान करने वाली, रत्नों की देवी, ये पृथ्वी पर्वतों की छाती भेदकर वनों को जीवन देने वाले ये निर्झर ये सभी क्या उस परमपिता का विराट स्वरूप नहीं?
और हाँ ये शरीर इसकी अद्भुत शक्तियाँ। सब उसी की सत्ता द्वारा संचालित हैं। जल की शीतलता धूप की ऊष्मा, शीतल पवन की माँ के प्यार जैसी थपक भरी स्पर्श की अनुभूति सब में उसे उस अनादि, अनन्त ब्रह्म की छाया तथा शक्ति प्रतिभासित होती हुई दृष्टिगोचर होती।
गायों की संख्या अब एक सहस्र हो चुकी थी। सत्यकाम का कर्त्तव्य पूरा हो चुका था। जब वह उन्हें लेकर गुरु के सम्मुख पहुँचा तो उसे देखते ही ऋषि का हृदय स्नेहावेग से भर आया। सूखे बैल तथा निर्बल गायें संख्या में बढ़ने के साथ-साथ पर्याप्त परिपुष्ट हो गये थे। सत्यकाम की आभा में भी लालिमा भर उठी थी। मुख मण्डल तेज से दीप्त हो उठा था।
ऋषि ने कहा- ‘मेरी आशा के अनुरूप ही तुम वास्तविक ज्ञान लेकर लौटे हो’ तब सत्यकाम ने कहा ‘यह तो मेरी परीक्षा थी, कसौटी थी- ज्ञान तो अभी आपसे प्राप्त करना है।’
तब ऋषि गदगद हृदय से बोले ‘प्रकृति के सान्निध्य में तुम्हें इसीलिये भेजा था। सृष्टि के अन्तिम सत्य को तुमने जानने की जिज्ञासा व्यक्त की थी। एक बड़ी सीमा तक तुम उसे पा भी चुके हो। कुछ सैद्धाँतिक रहस्य शेष हैं। वे भी तुम्हें बता दूँगा। तुम्हें पाकर मेरा आचार्यत्व धन्य हुआ है और तुमने तो अपना शिष्यत्व प्रमाणित कर ही दिया है।’
सत्यकाम- हारीद्रु मात का सर्वाधिक प्रिय शिष्य था। केवल सत्य के प्रति निष्ठा ने ही उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्रदान की थी। अन्तिम सत्य को खोजने अथवा पाने से पूर्व, सत्य का आचरण जीवन में पग-पग पर किया जाना अनिवार्य होता है- तभी उस अन्तिम सत्य को जानने का अधिकार अथवा पात्रता होती है।
ऋषि ने सत्यकाम को पूर्ण ब्रह्मज्ञान देकर उसकी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण की। (पिता का सही ज्ञान न होने के कारण सत्यकाम, उपनिषदों में अपनी माता के नाम पर ही सत्यकाम जावाल के नाम से सुविख्यात है)।
खड़ाऊं पहनकर पंडित जी मन्दिर की ओर चले। कदम बढ़ने के साथ खड़ाऊं से भी खट्-खट् का स्वर निकल रहा था। पंडित जी को यह आवाज पसंद न आई। वह एक स्थान पर खड़े होकर खड़ाऊं से पूछने लगे- ‘अच्छा यह तो बताओ कि पैरों के नीचे इतना दबी रहने पर भी तुम्हारे स्वर में कोई अन्तर क्यों नहीं आया?’
खड़ाऊं ने पैरों के नीचे दबे-दबे ही पण्डित जी की जिज्ञासा शाँत करते हुए कहा- ‘मैं तो जीने की इच्छुक हूँ, पण्डित जी! इस संसार में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो दूसरों के दबाव में आकर अपना स्वर मन्द कर देते हैं। उन्हें तो जीवित अवस्था में भी मैं मरा हुआ मानती हूँ।’
‘पाप मूल अभिमान’- पाप से बचना है तो अहंकार का परित्याग करिये। वे सारी गति-विधियाँ पाप ही हैं जो पतन की ओर ले जायें अथवा जो शारीरिक, मानसिक अथवा आत्मिक प्रगति में बाधक हों। अहंकार से दूषित मनुष्य की हर गतिविधि कुछ इसी प्रकार की होती है। श्रेय का भागी निरहंकारी व्यक्ति ही हो सकता है, अहंकारी नहीं।
अहंकार से प्रेरित गति तीव्र हो सकती है, पर कल्याणकारी नहीं। अहंकार से प्रेरित होकर आर्थिक क्षेत्र में उतरने वाले व्यक्ति प्रायः शोषक स्वभाव के होते हैं। वे लोगों का हित-अहित नहीं देखते। भ्रष्टाचार, कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी का मार्ग अपनाते हैं। निर्धन जल्दी-जल्दी धनवान बनते जाते हैं। पर ज्यों ही उनका यह पाप पराकाष्ठा पर पहुँचता है कि पतन प्रारंभ हो जाता है। उसी गति से जिस गति से उसका शोषण चला था, गति तीव्र होने से पाप की पराकाष्ठा आते ही विलम्ब नहीं लगता। पाप के पराकाष्ठा तक पहुँचने की अवधि में भले ही कोई अहंकारी अपने किये को चतुरता समझता रहे, अपनी उन्नति पर संतोष और हर्ष मनाता रहे किन्तु पराकाष्ठा पर पहुँचते ही सारा समाज उसका सच्चा रूप पहचान लेता है और एक साथ ही उसका साथ छोड़ देता है। समाज का असंग होते ही पतन का क्रम प्रारंभ हो जाता है। उसकी गति भी उतनी ही तेज होती है जितनी कि पाप की रही होती है। संयोग अथवा परिस्थितिवश आई अवनति से तो पुरुषार्थ द्वारा पुनः ऊपर उठा जा सकता है किन्तु पापजन्य पतन से उठ सकना असाध्य हो जाता है।
इस असाध्यता का कारण स्पष्ट है। एक तो मनुष्य अपने संस्कार खराब कर चुका होता है जिनका सुधार सहज नहीं होता। दूसरे अपने समय तथा शक्ति को उपक्रमों में व्यय कर चुका होता है, खोई शक्ति और गया समय वापस मिलना संभव नहीं। तीसरे समाज में उसका विश्वास उठ चुका होता है, समान के अविश्वस्त व्यक्ति का उद्धार बड़ा कठिन होता है। गिरा हुआ व्यक्ति जो कि अपनी सामान्य स्थिति में भी नहीं होता इतने-इतने भारी अवरोधों को हटाकर फिर ऊपर उठ सकता है, ऐसा विश्वास नहीं किया जा सकता।
यह बात सही है कि अपना सुधार करके पुनः उचित दिशा में पुरुषार्थ करने पर पुनरुत्थान संभव हो सकता है, किन्तु इस पतन से उत्थान में कितने गुना पुरुषार्थ करना होगा- यह विचारणीय विषय है। नीति भी यही कहती है और बुद्धिमानी भी इसी में है कि ऐसे कामों से पहले ही सावधान रहा जाए जो पतन के हेतु हो सकते हैं। पहले गिर लिया जाए और फिर उठने के लिये पुरुषार्थ करने की वीरता दिखलाई जाए-यह बात बुद्धि संगत नहीं मानी जा सकती? किन्तु खेद है कि अहंकार को आश्रय देने वाला व्यक्ति ऐसी ही उल्टी गतिविधि अपना लिया करता है। पाप और पतन से बचना है तो अहंकार का परित्याग करना ही होगा।
अहंकार का उपचार, उदारता और विनम्रता को माना गया है। इस विषय में मनुष्य परमात्मा को अपना आदर्श बना सकता है। परमात्मा से बढ़कर कोई शक्तिमान नहीं, उससे बढ़कर कोई ज्ञानवान और साधन संपन्न नहीं। उसके ऊपर न कोई अंकुश होता है और न प्रभु। उसे कोई पातक भी नहीं लगता। यह सर्वदा पुण्य एवं पावित्र्य समरूप है। उसका पतन भी नहीं होता है क्योंकि यह निर्विकारी भी है और अच्युत भी। उसे न उन्नति करने की आवश्यकता है और न बंधन मुक्त होने की क्योंकि वह सर्वोपरि है, सदा मुक्ति और बंधन रहित है। ऐसा सर्वसमर्थ और वे सर्वस्व पूर्ण परमात्मा जब रंच मात्र अहंकार वही करना तब उसका एक बिन्दु उसका मात्र प्रतिबिम्ब अहंकार करे, यह बात हर प्रकार से शोचनीय है। मनुष्य कुछ भी तो नहीं है। उस महाचेतन परमात्मा का एक स्पन्दन मात्र ही तो है।
ऐसा शक्तिवान और सर्वस्ववान परमात्मा कितना उदार है। वह अपने लिए कुछ भी तो संग्रह नहीं करता। यद्यपि उसके पास प्रकृति के भण्डार के भण्डार भरे हैं तथापि उसका एक अंश भी वह अपने लिए खर्च नहीं करता। उसके पास जो कुछ है वह सब लोक हित के लिये है। वह अपनी विभूतियों को सदा दूसरों के लिए वितरित करता रहता है। इसी से वह पूर्ण काल और सच्चिदानन्द बना हुआ है। आनन्द अपने लिए रखने में नहीं, दूसरों के हित में वितरित करते रहने में है, सच्चा संतोष संग्रह करने में नहीं बल्कि त्याग करने में मिलता है।
माना मनुष्य परमात्मा की तरह पूर्ण काम नहीं है, और न वह स्वतः सन्तुष्ट ही है। उसे अपने लिए भी कुछ चाहिए ही। किन्तु जब वह इस कुछ से सब कुछ पर पहुँच जाता है तभी विघ्न पैदा होने लगते हैं। मनुष्य संग्रह करता है किन्तु अहं को नष्ट करने के लिये केवल अपनी सम्पन्नता के लिए। यदि यही संग्रह वृत्ति ‘परोपकाराय’ भाव से पवित्र और महान बना ली जाए तो इसमें परमात्मा भाव का समावेश हो जाए। किन्तु खेद है कि मनुष्य का अहंकार उसे इस हद तक संकीर्ण बना देता है कि वह आदान-प्रदान के सहज सामान्य नियम को भी भुला देता है और अपने भण्डार भरता चला जाता है या ऐसी कामना पाल लेता है। मनुष्य की यही संकीर्णता उसे पतन के गर्त में गिरा देती है। यदि संग्रह में त्याग का भी भाव जुड़ा रहे और दोनों वृत्तियाँ एक सन्तुलित स्थिति में सक्रिय होती चलें तो मनुष्य का न तो लोक बिगड़े और न परलोक। वह दोनों जगह सुखी और सन्तुष्ट रहे। संकीर्णता का जन्म अहंकार से ही होता है। इसका त्याग सारे श्रेयों की संभावना निश्चित कर सकता है।
कहा गया है- ‘परोपकाराय सताँ विभूतयः’ सज्जन व्यक्तियों की धन सम्पदा परोपकार के लिए होती है। किन्तु इस नीति वाक्य को चरितार्थ तभी किया जा सकता है जब संग्रह और त्याग साथ-साथ चलते रहें। पुरुषार्थ और दान को एक साथ जोड़ दिया जाए। जो पुरुषार्थी न होगा, जो संग्रह न करेगा, वह विभूतिवान हो ही कैसे सकता है और जो संग्रह में त्याग का भाव न रखेगा वह अपनी विभूति को सार्थक किस प्रकार कर सकता है? मनुष्य पुरुषार्थ द्वारा धन संग्रह भी करे और उसे परोपकार, परमार्थ तथा लोक कल्याणार्थ त्याग भी करे तभी सज्जनता की उस परिधि में आ सकता है, उपर्युक्त वाक्य में इसी की ओर संकेत किया गया है। किन्तु अहंकार से दूषित व्यक्ति इस ‘सताँ’ का श्रेय नहीं पा सकता।
संग्रह एक गुण है, यदि वह लोक हित में व्यय करने के लिये किया गया है। संग्रह एक अवगुण है यदि वह अहंकार भाव से किया गया है। परमात्मा की इस लीला स्थली संसार में जो कुछ है, वह सबके लिए समान रूप से है। इसमें सबका अधिकार है। ऐसी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति देवता के समान होता है। इसके विपरीत जो अहंकारवश संसार की सारी विभूति, सारी सम्पदाएं केवल अपने और अपनों के लिये चाहता है वह मनुष्य की कोटि से भी नीचे का प्राणी होता है। जैव स्थिति से पूर्ण मनुष्यता और मनुष्यता के देवत्व पर पहुँचने के लिये त्यागपूर्ण उदारता की बड़ी आवश्यकता है। और यह पवित्र वृत्ति तभी प्राप्त हो सकती है जब अहंभाव का परित्याग कर दिया जाए।
दुनिया की प्रत्येक भूल प्रत्येक अपराध की तह में खोजा तो उनका कारण सर्वत्र अहंकार ही मिला।
-रस्किन
इस अहंकार से पीछा छुड़ाने का एक सहज सा उपाय यह है कि मनुष्य अपना कर्त्तापन का भाव छोड़ दें। वह जो कुछ करता है परमात्मा की इच्छा से, उसी के लिए, उसकी सृष्टि के लिए ही करता है-मन में ऐसी दृढ़ प्रतीति धारण कर ले। मनुष्य कर्ता है भी कब? यह उसके अहंकार भाव का ही दोष है जो वह अपने को कर्ता मानता है और ऐसा मानकर अपने को भव बंधनों और आवागमन के चक्र में फैलाता है। अनाधिकार भाव रखने वाले को दण्ड तो मिलना ही चाहिए। यह जड़ जंगम-सारी सृष्टि उस एक परमात्मा, उस एक महाचेतन से ही अनुप्राणित है। संसार की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सारी गतिविधियाँ एवं कार्यकलापों में उसी की प्रेरणा काम करती है। इस सम्पूर्ण संसार का कर्ता-धर्ता एक वही सर्वाधार परमात्मा ही है। उसी की शक्ति, संकल्प और प्रेरणा से यह सारा प्रपंच अवस्थित भी है और संचालित भी। मनुष्य तो उसकी क्रियाओं का एक माध्यम मात्र है। उसके सृष्टि यंत्र का एक छोटा सा पुर्जा है। अपने को कर्ता मानकर चलने वाले अहंकारी व्यक्ति लोक-परलोक कहीं भी सुखी और सन्तुष्ट नहीं रहते।
विनम्रता का भाव भी अहंभाव से छुटकारा पाने का एक अच्छा उपाय है। इसकी प्रेरणा भी उस परमपिता परमात्मा से पाई जा सकती है। संसार का स्वामी, पालक, संचालक तथा आधारक होने पर भी क्या कभी वह अपना अहंकार किसी रूप में प्रगट करता है। उसने अपनी सारी शक्तियों को संसार की सेवा के लिये नियुक्त कर दिया है, अग्नि, वायु, जल, प्रकाश आदि उसकी सारी दिव्य शक्तियाँ संसार की सेवा में ही नियुक्त रहती हैं। अग्नि ऊष्मा देकर मनुष्य को सक्रिय बनाए रखती है, वायु श्वाँस द्वारा प्राण देती है। जीवनदाता जल के उपकार का तो आभार ही प्रकट नहीं किया जा सकता। प्रकाश सारे संसार को आलोकित करता है। भय और अनर्थ के हेतु अन्धकार को दूर भगाता है। प्रकाश ही आदमी को जगाता और कर्त्तव्यपथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। इतना बड़ा दाता होने पर भी परम पिता परमात्मा कितना दयालु और विनम्र है, इसका अनुमान कर हृदय श्रद्धा से भरे बिना नहीं रहता।
इतनी बड़ी कृपा करने और इतना बड़ा उपकार करने के बाद भी वह हमसे कोई प्रतिपादन नहीं चाहता, चाहता है तो इतना कि सारे जीव ऐसे कर्म करें जिससे सबको सुख और शाँति मिले। सभी अपने-अपने ध्येयपथ पर बढ़ते चलें। संसार में बहुत से ऐसे अभागे भी हैं जो ऐसे उपकारी को भी भला-बुरा कह उठते हैं। उसकी कृपाओं को अपनी विशेषता मान बैठते हैं। उसका आभार मानने के स्थान पर अपने अहंकार का प्रकाशन करते हैं। किन्तु वह विनम्र प्रभु कभी किसी का अहित नहीं करता। अपने पापों से अपना अमंगल कर देने वाले न जाने कितने अबोध उस निर्विकार प्रभु को दोष देते रहते हैं किन्तु वह दया और करुणा का सागर सब कुछ मौन भाव से सुनता और सहन करता रहता है। अहंकार के वशीभूत होकर कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाता। धन्य है वह परमपिता परमात्मा और धन्य है उसकी उदारता एवं विनम्रता।
एक हम मनुष्य हैं जो कुछ भी न होते हुए भी अहंकार वश अपने को सब कुछ समझा करते हैं। और इसी अहंकार के कारण अपने एक जन्म में ही नहीं जन्म-जन्म में हानि करते रहते हैं। अहंकार सारे पापों की जड़ है। इसके त्याग से ही मनुष्य पाप से बच सकता है और श्रेय को प्राप्त कर सकता है। परमपिता परमात्मा को अपना आदर्श बनाकर यदि मनुष्य उसी की तरह उदार तथा विनम्र बन सके तो निरहंकार होकर उसी के पूर्ण नाम स्वरूप को प्राप्त कर सकता है- इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं।
स्वराज्य आन्दोलन के दिनों की बात है। राजकोट में काठियावाड़ राज्य प्रजा परिषद का अधिवेशन हो रहा था। बापू अन्य नेताओं के साथ मंच पर बैठे थे। तब ही उनकी दृष्टि दूरी पर बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वे गाँधी जी को कुछ जाने-पहचाने से लगे। स्मरण शक्ति पर जरा जोर देने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि ये तो मेरे बचपन के अध्यापक हैं।
बापू शीघ्र ही मंच से उतरकर उनके पास गये और प्रणाम करके उनके चरणों के समीप बैठ गये। गुरुजी ने उनसे परिवार की कुशल-क्षेम पूछी। जब काफी समय हो गया तो गुरुजी ने बापू से कहा- ‘अब आप मंच पर पधारिये। नेतागण आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’ बापू बोले- ‘नहीं, नहीं, मैं यहीं पर ठीक हूँ। अब मैं मंच पर नहीं जाना चाहता। यहीं बैठकर सारा कार्य देखूँगा। आप चिंता न कीजिये।’ सभा समाप्त होने पर वे चलने लगे तो अध्यापक ने गदगद होकर आशीर्वाद दिया- ‘जो व्यक्ति तुम जैसा अहंकार रहित हो, महान कहलाने का अधिकारी वही हो सकता है।’
साइन्स डाइजेस्ट के पिछले एक लेख में अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ. लिंडा एलेन लिखते हैं- मुझे बड़ा कौतूहल उत्पन्न हुआ जब मैंने त्वचा रोग की चिकित्सा के आँकड़ों पर दृष्टि दौड़ाते हुये पाया कि वह अधिकाँश किशोरों तथा युवा-युवतियों को ही अधिक मात्रा में हो रहे हैं। यह बिलकुल उल्टी बात थी। इस विस्मय ने मुझे इस पर गंभीरता से जाँच करने की प्रेरणा दी।
डॉ. एलेन की जाँच के निष्कर्ष फैशन की अन्धी दौड़-दौड़ाने वालों को चौंका देने वाले हैं। उनका कहना है कि शरीर को छूती तंग पोशाकें पहनने के कारण किशोरों तथा युवक युवतियों के शरीर में रक्त त्वचा, पपड़ीदार- त्वचा शोथ, विन्टर इच तथा खुजली जैसे त्वचा रोग तेजी से बढ़ रहे हैं उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि युवक-युवतियों ने तंग पोशाकें पहननी न छोड़ी तो आगे त्वचा रोग एक भीषण समस्या बन सकता है, कुछ रोग तो असाध्य और वंशानुगत तक हो सकते हैं।
वस्त्र पहनने में स्वच्छता सफाई और कला का ध्यान रखा जाये, इसमें कुछ हानि नहीं, वरन् यह एक प्रकार से आवश्यक है पर उसके साथ ही स्वास्थ्य सामाजिकता के विवेकपूर्ण पहलू भी उपेक्षित नहीं किये जाने चाहियें। वस्त्र पहनने का उद्देश्य जहाँ शरीर के उन अंगों को ढकना है जो लोगों की मनोवृत्ति दूषित कर सकते हैं वहाँ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिये कि स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन न हो अर्थात् मौसम का प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता रहना चाहिये। जिन शरीरों में ताजी हवा का स्पर्श नहीं बना रहता वे मौसम के थोड़े से भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते। थोड़े से ही परिवर्तन से शरीर गड़बड़ करने लगता है। भारतीय वेश-भूषा का निर्धारण इन बातों को ध्यान में रखने के साथ-साथ कला की दृष्टि से भी उच्चकोटि का है किन्तु आज का फैशन उसे नष्ट कर देने पर तुल गया है। जब जो तंग कपड़े पहने जाते हैं वह शरीर में इस तरह मढ़े होते हैं कि उनसे काम अंगों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ता है लोगों में मनोविकार उत्पन्न होते हैं साथ ही उनसे स्वास्थ्य में भी बुरा असर पड़ता है। डॉ. एलेन का कहना है कि इन तंग कपड़ों के यान्त्रिक दबाव और शरीर की रगड़ से ही त्वचा रोग पैदा होते हैं। यह पहलू ही कम चिन्ताजनक नहीं है।
इन दिनों आस्ट्रेलिया में प्रैक्टिस कर रहे अंग्रेज डॉ. लैंडन कोर्टिने ने भी फैशन शास्त्र पर खोज की और बताया कि मिनी र्स्कट तथा दूसरे अस्वाभाविक वस्त्र पहनना न केवल शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है वरन् उसके कारण मस्तिष्क में घबराहट और स्नायुविक तनाव बढ़ता है, जो उभरती पीढ़ी के लिये एक प्रकार का अभिशाप है। इससे किशोरों का बौद्धिक तथा भाव विकास रुकता है।
किसी ने प्रशंसा न की तो तितली झींगुरी से बोली-महोदय! जानते नहीं मैं अद्वितीय सुन्दरी हूँ। दार्शनिक मुद्रा में झींगुर ने उत्तर दिया-सौभाग्य आपका। किन्तु देवी जी! जब तक अन्तःकरण का सौंदर्य जागृत न हो, बाह्य शृंगार किस काम का।
उन्होंने बताया है कि मिनी स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों को सार्वजनिक स्थानों, ट्रेनों, बसों में एक टाँग के ऊपर दूसरी टाँग चढ़ाकर बैठना पड़ता है अधिक क्रासिंग के कारण एबडक्टर पेशियाँ सिकुड़ जाती हैं जिससे कद छोटा हो जाने की संभावनायें बढ़ जाती हैं, साथ ही इस तरह की अस्वाभाविक पोशाक पहनने वालों का अपने ही ऊपर ध्यान बना रहता है। हर आगंतुक के प्रति उनमें घबराहट सी होती है जो उनमें स्नायुविक दुर्बलता पैदा करती है। यदि नई पीढ़ी को इन दोषों से बचाना है तो फैशन की बाढ़ को रोकना ही पड़ेगा। उसकी आज्ञा, संस्कृति ही नहीं विज्ञान भी नहीं देता।
‘किसी देश में कोई एकाध मुकदमा हुआ करेगा तो लोग आश्चर्य किया करेंगे कि पृथ्वी में ऐसा कौन आदमी है, जिसके मन में द्वेष, छल या वैमनस्य है। तब न तो कोई जाति भेद रहेगा, न लिंग और वर्णभेद। सारी पृथ्वी पर एक धर्म-मानव धर्म स्थापित होगा। आज जिस तरह सारी पृथ्वी के देशों ने मिलकर अमेरिका में ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूनाइटेड नेशन्स ऑर्गनाइजेशन) की स्थापना की है, तब समस्त ब्रह्माण्ड के निवासियों के एक ‘संयुक्त ग्रह-राज्य’ (यूनाइटेड प्लैनेट्स) की स्थापना हो जायेगी उसकी राजधानी पृथ्वी भी हो सकती है मंगल, गुरु, बुध, या बृहस्पति भी। बहुत संभव है संयुक्त ग्रह राज्य की राजधानी इस सौरमण्डल के बाहर भी कहीं पर हो पर यह निश्चित है कि मानवीयता के दायरे अब जैसे सीमित हैं वैसे आगे न रहेंगे। वह दिन समीप है जबकि ब्रह्माण्ड के सारे ग्रह-नक्षत्र एक जिले के गाँव, एक राज्य के जिले, एक देश के राज्य और सारी पृथ्वी के अनेक देशों के समान पास-पास बसे पड़ौसियों की सी रिश्तेदारी में आ जायेंगे।’
यह शब्द ‘पंचतंत्र या गुलावरी’ की किसी कथा अथवा पायावर की मात्रा के किसी काल्पनिक प्रसंग से नहीं उद्धृत किये जा रहे। यह विश्वविख्यात अमरीकी भविष्य वक्ता ‘श्री आर्थर चार्ल्स क्लार्क के हैं जो ‘कलिंग पुरस्कार जैसा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करते समय उन्होंने उन सैकड़ों भविष्यवाणियों की तरह दृढ़तापूर्वक कहे जो वह पहले कर चुके थे और जो कई बार तो अक्षरतः ज्यों की त्यों सत्य सिद्ध हो चुकी हैं।
चार्ल्स क्लार्क की भविष्यवाणियाँ अन्य भविष्य वक्ताओं से भिन्न कोटि की हैं। स्वयं एक वैज्ञानिक और साहित्यकार होने के कारण उनकी भविष्य संबंधी पूर्वोक्तियाँ विज्ञान और मनुष्य के अन्तःकरण को छूने वाली भावनाओं को साथ-साथ लेकर हुईं हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ इतनी स्पष्ट और सत्य सिद्ध हुईं कि पीछे वैज्ञानिकों ने उनके भविष्य-कथन को आधार मानकर प्रयोग भी करने प्रारंभ कर दिये।
1959 की एक शाम एक दावत में उन्होंने अपने मित्रों को बताया कि 1969 की 30 जून पृथ्वी के इतिहास का सर्वाधिक रोमाँचक दिन होगा। मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि पृथ्वी का कोई निवासी उस दिन चन्द्रमा पर उतर जायेगा।’
उन्होंने जिस दिन यह भविष्यवाणी की थी तब तक समान व अन्तर्ग्रही प्रक्षेपण की एक भी घटना घटित नहीं हुई थी। इसके ठीक दो वर्ष पीछे 1961 में पहली बार रूसी वैज्ञानिकों ने यूरी गागरिन को अन्तरिक्ष में भेजकर पृथ्वी की प्रदक्षिणा कराई थी इसलिये मित्रों को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ पर सारे संसार ने देखा कि पिछले वर्ष उनकी 10 वर्ष पूर्व की गई भविष्यवाणी कुल 20 दिन के अन्तर से सत्य हो गई। 1966 में अमेरिका का एक अपोलो केप-कैनेडी में ही जलकर नष्ट न हो गया होता तो संभवतः यह 20 दिन का भी अन्तर नहीं पड़ता।
चार्ल्स क्लार्क छोटे थे तभी से उनमें अतीन्द्रिय ज्ञान और पूर्वाभास की विचित्र क्षमता उत्पन्न हो गई थी। वह कहा करते थे-मनुष्य शरीर नहीं एक शक्ति है, उस शक्ति में प्रकाश है, तेजस्विता है, और वह सब क्षमतायें हैं जो मनुष्य भगवान में अपेक्षा किया करता है। मानव-अन्तःकरण की यह शक्ति यद्यपि अभी सोई पड़ी है पर मैं देख रहा हूँ कि एशिया के किसी देश (भारतवर्ष की ओर संकेत) से कुछ ही दिनों में एक प्रचण्ड विचार क्राँति उठने वाली है। वह 1971 तक उस देश और उसके 10 वर्ष बाद सारे विश्व में इस तरह गूँज जायेगी कि मानव का सोया अन्तःकरण जागने को विवश हो जायेगा। आज जिन शक्तियों की ओर लोगों का ध्यान भी नहीं जाता तब वह शक्तियाँ जन-जन की शोध और अनुभूति का विषय बन जायेंगी। विज्ञान एक नई मोड़ लेगा जिससे आध्यात्मिक तत्वों की प्रचुरता होगी। सारे ब्रह्माण्ड को एक सूत्र में बाँधने का आधार यह आध्यात्मिक सिद्धियाँ और सामर्थ्य ही होंगी।
लोगों ने तर्क प्रस्तुत किया जीवन का अस्तित्व तो केवल पृथ्वी में है। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि अन्य ग्रह जीवन रहित हैं- ‘इस पर उन्होंने कहा-मैंने 1945 में कहा था कि सारी पृथ्वी और समुद्र को तारों से पाटने की जरूरत नहीं यदि कोई कृत्रिम उपग्रह 17000 मील की गति से अन्तरिक्ष में उड़ा दिया जाये जो पृथ्वी की परिक्रमा करता रहे तो वह बेतार के तार वाले संदेश पहुँचाने की आवश्यकता को पूरी कर देगा। तब लोगों को मेरी बात हंसी जैसी लगी किन्तु 1962 में बेल कंपनी ने ‘टेलस्टार’ नामक उपग्रह छोड़कर मेरे कथन की सत्यता सिद्ध कर दी। अब तो अलीवर्ड और टालरास जैसे संचार उपग्रह भी बन गये हैं जो एक स्थान से पृथ्वी के दूसरे स्थान तक 1 मिनट में 17॥ अखबारी पेजों के बराबर संदेश भेज सकते हैं।’
एक बार मैंने कहा था-मनुष्य छोटी से छोटी वस्तु (अणु) से भी इतनी शक्ति उत्पन्न करने में सक्षम हो जायेगा जो किसी भी मुल्क को कुछ ही मिनट में नष्ट-भ्रष्ट कर डालने की क्षमता से ओत-प्रोत होगी। तब लोगों ने मेरी बात का विश्वास नहीं किया पर जब नागासाकी और हिरोशिमा काण्ड हो गये तब लोग मेरी बात मान गये। यह भविष्यवाणियाँ मैंने जिस दृढ़ता और आत्म विश्वास के साथ की हैं उसी आत्म विश्वास के साथ मैं आज भी कहता हूँ कि यह सृष्टिकर्ता रहित नहीं। एक रहस्यमय चेतन शक्ति है जिसके आगे मानवीय बुद्धि मानवीय योग्यतायें नगण्य हैं। विराट सृष्टि का निर्माण उसी की इच्छा से होता है। यदि उसने पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न किया है तो कोई कारण नहीं कि अन्य ग्रह भी आबाद न हों। यदि अन्य ग्रहों में जीवन हुआ तो इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं कि वे सब पास-पास आयें और अपनी समस्याओं के समाधान के सार्वभौमिक नियम तय करें।’
चार्ल्स क्लार्क की जैसी दूसरी भविष्यवाणियाँ सत्य हुईं वैसे ही अब उनकी यह भविष्यवाणी भी अभिव्यक्ति के द्वार तक आ पहुँची है। ‘पल्सर’ और क्वासार’ किरणों के माध्यम से आने वाले रेडियो संकेतों से वैज्ञानिक भी अब यह निष्कर्ष निकालने लगे कि अन्य ग्रहों में न केवल जीवन है वरन् विकसित सभ्यतायें भी हैं और वे पृथ्वी निवासियों से संपर्क भी बनाना चाहती हैं। लाल रंग ग्रहों और अन्तरिक्ष ने भी उनकी भविष्यवाणी की सत्यता को बल दिया है और धीरे-धीरे वाम विचार धारा के वैज्ञानिक भी मानते जा रहे हैं कि अन्य ग्रहों में जीवन के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता।
आर्थर चार्ल्स क्लार्क ने बहुत पहले कहा था कि मैं कुछ दिन के लिये अपनी छुट्टियाँ बिताने चन्द्रमा में अवश्य जाऊंगा। तब लोग उनके इस कथन पर हंसे थे पर आज लगता है वह दिन दूर नहीं जब अन्तर्ग्रहीय यात्राओं का टिकट दर कुछ नये पैसे प्रति करोड़ मील के हिसाब से होगा। फ्राँस की ‘इन्स्टीट्यूट आफ हायर डिफेन्स स्टडीज’ संस्था के निर्देशक डॉ. फर्नेंड गैंबीज का कथन है कि अब आगे जो हाइड्रोजन बम बनेंगे वह लेजर द्वारा चालित होंगे। उन्हें ‘लेजर मिनी एच बम’ कहा जायेगा उनकी शक्ति तो इस परमाणु बम से सैंकड़ों गुनी अधिक होगी पर मूल्य कुछ रुपयों से अधिक नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि परमाणु शक्ति के इस सस्तेपन का प्रभाव अन्तर्ग्रहीय यात्राओं पर कम खर्च के रूप में होगा और तब लोग बिना किसी आर्थिक दबाव के और सौरमण्डल और उसके बाहर की भी यात्रा करने वालों में कितने तो इस लेख के पाठक भी होंगे।
इन दिनों पत्नी डाट के साथ कोलम्बो (श्रीलंका) में जीवन बिता रहे श्री क्लार्क की भविष्य वाणियों में भी भारतवर्ष की उन्नति की वह सब बातें आती हैं जो श्रीमती डिक्सन कोरो, एण्डरसन आदि ने की हैं। उनका कथन है कि- भारतवर्ष ने अतीत में अपनी आध्यात्मिक उन्नति के रूप में ही नहीं एक महान वैज्ञानिक देश के रूप में भी गौरव अर्जित किया है। मैंने सुना है कि यहाँ कई तरह के आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र और अनेक गगनगामी विमानों के भी अनुसंधान हो चुके हैं आगे भी यह देश इस तरह की उन्नति करेगा और इस दौड़ में दुनिया के तमाम देशों को पछाड़ देगा। पर मूलतः इसकी ख्याति और विश्व प्रतिष्ठा का आधार यहाँ का धर्म और दर्शन होगा। विश्व धर्म के रूप में भारतीय धर्म और संस्कृति को ही स्थान मिलेगा।
श्री क्लार्क मनुष्य की प्रगति में बड़ा विश्वास रखते हैं उन्होंने फिल्में भी बनाई हैं। उनकी ‘2001 स्पेश ओडेसी’ फिल्म ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाई है, उसमें श्री क्लार्क ने यही दिखाया है कि आज का मनुष्य पहले के बर्बर और अज्ञान ग्रस्त मनुष्य की तुलना में बहुत अच्छा है, उसने साधारण बौद्धिक विकास किया है उसके सहारे वह एक दिन न केवल ब्रह्माण्ड वरन् जीवन के अन्तराल में भी प्रवेश करेगा और सारी पृथ्वी में ‘विश्व-बन्धुत्व’ एकात्मा, परस्पर प्रेम और आत्मीयता पूर्ण जीवन का विकास करेगा।
उसकी भारतवर्ष की स्वतंत्रता, चीन और पाकिस्तान की मैत्री, रूस और चीन के युद्ध संबंधी भविष्यवाणियाँ नितान्त सत्य हो गईं हैं, थोड़े दिनों का कभी हेर-फेर हुआ हो वह अलग बात है फिर यदि सन 2000 से पहले सारी पृथ्वी में एक अनोखी विचार क्राँति और युग परिवर्तन जैसी उनकी यह भविष्यवाणी भी सत्य हो इसमें संदेह नहीं है क्योंकि आज की परिस्थितियों का झुकाव भी कुछ वैसा ही है।
‘चिड़िया एका कर लें तो शेर की खाल खींच लें, मनुष्य जाति एक हो जाये तो देवता भी उसका कुछ न बिगाड़ पायें।’
-शेखशादी
मानव जाति-एकात्मा
चीन में उन दिनों कुछ थोड़े से शहरों को छोड़कर शेष स्थानों में विदेशियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। कभी भूल से कोई विदेशी वहाँ पहुँच जाता तो चीनी मरने मारने को उतारू हो जाते, उसकी जान संकट में पड़ जाती।
एक बार स्वामी विवेकानन्द चीन भ्रमण पर गये। उनकी किसी गाँव के भ्रमण की इच्छा हुई। दो जर्मन पर्यटकों की भी इच्छा वहाँ का ग्राम्य जीवन देखने की थी, पर साहस के अभाव में उनकी प्रवेश की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्होंने यह बात स्वामी जी से कही तो स्वामी जी ने कहा-सारी मनुष्य जाति एक है हमें विश्वास है कि यदि हम सच्चे हृदय से वहाँ के लोगों से मिलने चलें तो वे लोग हमें मारने की अपेक्षा प्रेम से ही मिलेंगे।
वे जर्मन पर्यटकों को लेकर गाँव की ओर चल पड़े। दुभाषिया उसके लिये तैयार नहीं हो रहा था पर जब स्वामी जी नहीं रुके तो वह भी साथ चला तो गया पर अन्त तक उसे यही भय बना रहा कि कहीं वे लोग उन्हें मारे नहीं।
गाँव वाले विदेशियों को देखकर लाठी लेकर मारने दौड़े। स्वामी विवेकानन्द ने उनकी ओर स्नेह पूर्ण दृष्टि डालते हुए कहा- क्या आप लोग अपने भाइयों से प्रेम नहीं करते? दुभाषियों ने यही प्रश्न उनकी भाषा में ग्रामीणों से पूछा- तो वे बेचारे बड़े लज्जित हुये और लाठी फेंककर स्वामी जी के स्वागत सत्कार में जुट गये। यह देखकर जर्मन बोले-सच है यदि आप जैसा निश्चल प्रेम सारे संसार के लोगों में हो जाये तो धरती पर कहीं भी कष्ट और कलह न रह जाये।
वाराणसी नरेश ब्रह्मदत्त सिंहल द्वीप से आर्यावर्त्त लौट रहे थे। जलयान एक छोटे से द्वीप के समीप से गुजरा तभी उन्हें एक नारी की चीत्कार सुनाई पड़ी। जलपोत के लंगर वहीं डाल दिये गये जहाँ एक नौका पहले से ही रुकी खड़ी थी। सब लोग दौड़कर उधर पहुँचे जिधर से किसी स्त्री के रोने की आवाज आ रही थी।
उन्होंने आगे बढ़कर देखा कुछ दस्यु एक स्त्री को पकड़कर पीट रहे हैं- ‘स्त्री कह रही थी दुष्टों में भारतीय नारी हूँ, शील मेरा धर्म और स्वजनों के प्रति निष्ठा मेरी साधना है, मैं तुम्हारी दुष्टता के आगे झुकूँगी नहीं चाहे मेरे प्राण ही क्यों न ले लो।’
ब्रह्मदत्त के ललकारने पर दस्यु भयभीत हो भाग खड़े हुये। समीप जाकर सम्राट ने कहा-भद्रे! तुम्हारा परिचय तो मैं अभी तुम्हारे शब्दों से पा चुका तुमने भारतीय नारी के आदर्शों में अपनी निष्ठा व्यक्त कर न केवल अपना वरन् सारी हिन्दू जाति का मुख उज्ज्वल किया है इसलिये तुम सर्वोच्च सम्मान की अधिकारिणी हो। तुम मेरे साथ चलो और अपने देश में अपने पति, बच्चों के साथ सुखी जीवन यापन करो।
स्त्री बोली- राजन! दस्युओं ने मेरे पति को मार दिया है, मेरे पुत्र मुझे छोड़कर पहले ही अलग हो चुके हैं, अब मैं किसके आश्रय में जीवन यापन करूंगी?
‘इसका प्रबंध देश लौटकर करेंगे’ यह कहकर सम्राट ब्रह्मदत्त ने उस स्त्री को साथ लिया और स्वदेश की ओर लौट पड़े।
जलयान भारतीय समुद्र तट पर रुका। महाराज के स्वागत के लिये विशाल जन समुदाय जिसमें महारानी, मंत्रीगण और सामन्त सभासद भी थे आगे बढ़े उनकी ओर संकेत करते हुये महाराज ने उस स्त्री से कहा- भद्रे! इन आगंतुकों में तुम जिसे अपने पति पुत्र के रूप में चुनना चाहो चुन सकती हो। तुम्हारे सुखी जीवन के लिये मैं सारी व्यवस्थायें जुटा सकता हूँ।
स्त्री की आँखें छलक उठीं उसने कहा-राजन! मेरा पति था, जिसने मुझे अपनी वासना से जकड़ा, मुझे घर की चहारदीवारी में बंद कर मेरा स्वास्थ्य लूटा। मुझे ऐसा भी नहीं रहने दिया कि मैं आतताइयों का मुकाबला कर सकती। अशिक्षा, अज्ञान में जकड़ी रह गई मैं, पति की प्रवंचना ने मुझे दासी बनाकर छोड़ दिया। इसलिये अब मुझे पति नहीं चाहिये।
‘और पुत्र’ उसने आगे कहा-पुत्रों को मैंने अपनी देह का सारा रस रक्त पिला दिया, स्वयं कष्ट झेले, पर उनकी सेवा शिक्षा और पालन-पोषण में कमी न आने दी, वही पुत्र जब बड़े हुये तो उनसे इतना भी नहीं बन पड़ा, कि गाढ़े संकट में मेरी रक्षा करते, ऐसे कृतघ्न पुत्र लेकर भी अब मैं क्या करूंगी।
हाँ जो मेरे शील, मेरे धर्म की रक्षा कर सके मुझे साहसी और चरित्रवान भाई की आवश्यकता अवश्य है, यदि आप उसे पूरा कर सकते हैं तो मुझे एक भाई की ही व्यवस्था कर दें।
ब्रह्मदत्त ने उपस्थित जनसमूह पर आँखें दौड़ाकर देखा सबकी आँखें झुकी हुई थीं- उन्होंने कहा-बहन आओ। तुम मेरे साथ चलो-इनमें से ऐसा कोई भाई दिखाई नहीं देता जो तुम्हारा उद्धार कर सके।
उस स्त्री और सम्राट ब्रह्मदत्त की आँखें अब भी ढूंढ़ रही हैं कुछ ऐसे भाई मिलें जो अपने देश की नारी को अंधविश्वास, रूढ़िवाद और अत्याचारियों के बंधन से छुड़ा सके, पर पति और पुत्र बनने के लिये तो यहाँ सब तैयार हैं, भाई का भार संभालने के लिये आज भी एक भी व्यक्ति तैयार नहीं होता।
जोहान्सबर्ग (अफ्रीका) का एक गड़रिया बकरियाँ चराकर लौट रहा था। उसने एक झाड़ी के पास खो-खों कर रही बबून-बन्दरिया देखी। लगता था वह बच्चा अपने माँ-बाप से बिछुड़ गया है। गड़रिया उसे अपने साथ ले आया और जोहान्सबर्ग के एक औद्योगिक फार्म के मालिक को उपहार में दे दिया।
सामान्यतः सृष्टि का विज्ञान सम्मत नियम यह है कि कोई भी जीव अपने माता-पिता के गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) से प्रभावित होता है। शरीर के आकार-प्रकार से लेकर आहार-विहार और रहन-सहन की सारी क्रियायें मनुष्य ही नहीं जीव-जन्तुओं में भी पैतृक होती हैं। इस नियम में थोड़ा बहुत अन्तर तो उपेक्षणीय हो सकता है पर असाधारण अपवाद उपेक्षणीय नहीं हो सकते। जो संस्कार सैकड़ों पीढ़ी पूर्व में भी संभव न हो, ऐसे संस्कार और जीव जन्तुओं के विलक्षण कारनामे भारतीय दर्शन के पुनर्जन्म और जीव द्वारा कर्मवश चौरासी लाख योनियों में भ्रमण के सिद्धाँत को ही पुष्ट करते हैं।
अफ्रीका की जिस बबून बंदरिया की घटना प्रस्तुत की जा रही है उसमें असाधारण मानवीय गुणों का उभार उस औद्योगिक फार्म में पहुँचते ही उसकी आयु के विकास के साथ प्रारंभ हो गया। उसे किसी से कोई प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर उसमें, उस विलक्षण प्रतिभा का जागरण कहाँ से हुआ जिसके कारण वह इस परिवार की अन्तरंग सदस्या बन गई? आज के विचारशील मनुष्य के सामने यह एक जटिल और सुलझाने के लिये बहुत आवश्यक प्रश्न है।
बंदरिया का नाम आहला रखा गया। फर्म मालिक एस्टन को पशुओं से बड़ा लगाव है उनकी उपयोगिता समझने के कारण ही उन्होंने फार्म के भीतर ही एक पशुशाला भी स्थापित की है। उसमें गायें, बछड़े, बछड़ियाँ, कुत्ते, बकरियाँ आदि दूध देने वाले पशु भी पाले हैं, उनसे उनकी अच्छी आय भी होती है और बचे समय के उपयोग का साधन भी। पशुओं को चराने और उनकी देख-रेख के लिये एक नौकर रखा गया था। वह बंदरिया भी उसे ही देख-रेख के लिये दे दी गई।
नौकर उसे साथ लेकर गौ-चारण के लिये जाता था धीरे-धीरे उसको अभ्यास हो गया। एक दिन किसी कारण से नौकर अपने गाँव चला गया। उस दिन बिना किसी से कुछ कहे ठीक समय पर बंदरिया भेड़-बकरियों को बाड़े के बाहर निकाल ले गई और दोनों कुत्तों की सहायता से उन्हें दिन भर चराती रही। उसने चरवाहे का नहीं कुशल चरवाहे का काम किया। भटके हुये मेमनों को उनके माता-पिता तक बगल में दबाकर पहुँचाकर, जिनके पेट आधे भरे रह गये उन्हें हरी घास वाले भूभाग की ओर घेरकर पहुँचाकर उसने अपनी कुशलता का परिचय दिया। शाम को कुछ ऐसा हुआ कि एक बकरी का एक बच्चा तो जाकर स्तनों में लगाकर दूध पीने लगा, दूसरा कहीं खेल रहा था। आहला ने देखा कि वह अकेला ही सारा दूध चट किये दे रहा है, उसने उसे पकड़कर वहाँ से अलग किया। दूसरे बच्चे को भी लाई तब फिर दोनों को एक-एक स्तन से लगाकर दूध पिलाया। मालिक यह देखकर बड़ा खुश हुआ। उसने चरवाहे को दूसरा काम दे दिया, तब से आहला लगातार 16 वर्ष तक चरवाहे का काम करती आ रही है। इस अवधि में उसने पशुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, रख-रखाव में ऐसे परिवर्तन और नये प्रबंध किये हैं जिन्हें देखकर लगता है मानो वह पूर्व जन्म में कोई गड़रिया रही हो और उसने भेड़-बकरियाँ चराने से लेकर उनकी व्यवस्था तक का सारा काम स्वयं किया हो।
वह शिकारी जन्तुओं से मेमनों की रक्षा करती है। शाम को हर एक पशु की गणना करती है। कोई पशु बिछुड़ गया हो कोई मेमना कहीं पीछे रह गया हो तो वह स्वयं जाकर उसे ढूंढ़कर लाती है। फुरसत के समय उनके शरीर के जुएं मारने से लेकर छोटे-छोटे मेमनों के साथ क्रीड़ा करने की सारी देख-रेख आहला स्वयं करती है। उसे देखकर जोहान्सबर्ग के बड़े-बड़े वकील और डॉक्टर भी कहते हैं-इस बंदरिया के शरीर में यह कोई मनुष्य आत्मा है। कदाचित उन्हें पता होता कि जीवनी शक्ति के रूप में आत्मा एक है दो नहीं, वह शक्ति इच्छा रूप में इधर-उधर विचरण करती और कभी मनुष्य तो कभी पशु-पक्षी और अन्य जीव के रूप में जन्म लेती रहती है।
योग वशिष्ठ में इस तथ्य को बड़ी सरलता से प्रतिपादित किया गया है। लिखा है-
ऐहिकं प्राक्तनं वापि कर्म यद्चितं स्फुरत्।
पौरषोडसो परो यत्नो न कदाचन निष्फलः॥
3।95।34
अर्थात्-पूर्व जन्म और इस जन्म में किये हुये कर्म, फल-रूप में अवश्य प्रकट होते हैं। मनुष्य का किया हुआ यत्न, फल लाये बिना नहीं रहता है।’
कर्म की प्रेरणा मन की इच्छा और आवेगों से होती है इसलिये इच्छाओं को ही कर्मफल का रूप देते हुए शास्त्रकार ने आगे लिखा है-
कर्म बीजं मनः स्पन्दः कथ्यतेऽथानुभूयते।
क्रियास्तु विविधास्तस्य शखाश्चित्र फलास्तरोः॥
-योग वसिष्ठ 3।96।11
अर्थात्- मन का स्पन्दन ही कर्मों का बीज है, कर्म और अनुभव में भी यही आता है। विविध क्रियायें ही तरह-तरह के फल लाती हैं।
नये शरीर में आने के पश्चात अपने पूर्व अनुभवों का विवरण लिखते हुए एक जागृत आत्मा की अनुभूति का वर्णन वेद में इस प्रकार आता है-
पुनर्मनः पुनरायुर्म आगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा म आगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं म आगन्। वैश्वानरोऽदब्ध स्तनूपा अग्निर्नः पातुः दुरितादवधात्॥
-यजुर्वेद 4।15
अर्थात्- शरीर में जो प्राण शक्ति (आग्नेश्य परमाणुओं के रूप में) काम कर रही थी मैंने जाना नहीं कि मेरे संस्कार उसमें किस प्रकार अंकित होते रहे। मृत्यु के समय मेरी पूर्व जन्म की इच्छायें, सोने के समय मन आदि सब इन्द्रियों के विलीन हो जाने की तरह मेरे प्राण में विलीन हो गई थीं, वह मेरे प्राणों का (इस दूसरे शरीर में) पुनर्जागरण होने पर ऐसे जागृत हो गये है जैसे सोने के बाद जागने पर मनुष्य सोने के पहले के संकल्प विकल्प के आधार पर काम प्रारंभ कर देता है। अब मैं पुनः आँख, कान आदि इन्द्रियों को प्राप्त कर जागृत हुआ हूँ और अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भुगतने को बाध्य हुआ हूँ।
इस कथन से आधुनिक विज्ञान का ‘जीन्स-सिद्धाँत’ पूरी तरह मेल खाता है। कोश के आग्नेय या प्रकाश भाग को ही प्राण कह सकते हैं पैतृक या पूर्व जन्मों के संस्कार इन्हीं में होते हैं। यदि प्राणों की सत्ता को शरीर से अलग रखकर उसके अध्ययन की क्षमता विज्ञान ने प्राप्त कर ली तो पुनर्जन्म और विभिन्न योनियों में भ्रमण का रहस्य भी वैज्ञानिक आसानी से जान लेंगे।
तथापि तब तक यह उदाहरण भी इस परिकल्पना की पुष्टि में कम सहायक नहीं। आहला बंदरिया उसका एक उदाहरण है। बन्दरों में मनुष्य से मिलती-जुलती बौद्धिक क्षमता तो होती है। पर यह कुशलता और सूक्ष्म विवेचन की क्षमता उनमें नहीं होती। यह संस्कार पूर्व जन्मों के ही हो सकते हैं। आहला की यह घटना दैनिक हिन्दुस्तान और दुनिया के अन्य प्रमुख अखबारों में भी छप चुकी है। दिलचस्प बात तो यह है कि आहला एक बार कुछ दिन के लिये कहीं गायब हो गई। फिर अपने आप आ गई। इसके कुछ दिन पीछे उसके बच्चा हुआ। बच्चे के प्रति उसका मोह असाधारण मानवीय जैसा था। दैवयोग बच्चा मर गया पर आहला उसे तब तक छाती से लगाये रही जब तक वह सूखकर अपने आप ही टुकड़े-टुकड़े नहीं हो गया। कुछ दिनों पूर्व पुनः गर्भवती हुई और उसकी खोई हुई प्रसन्नता फिर से वापस लौट आई।
बंदरिया ही क्यों अपने असाधारण कारनामों के लिये कैरेकस का एक तोता पिछले वर्ष ही विश्व विख्यात हो चुका है। इस तोते के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें किसी कम्युनिस्ट नेता के गुण विद्यमान हैं। तोते को तोड़-फोड़ की कार्यवाही में सहयोग देने के अपराध में कैरेकस से 287 मील दूर फाल्कन राज्य के सैन फ्रांसिस्को स्थान पर बंदी बनाया गया।
यह तोता क्यूबा के ‘फिडल कास्ट्रो’ विचारधारा के साम्यवादी गुरिल्लों को ‘हुर्रा’ कहकर उत्साहित किया करता और उन्हें क्यूबाई भाषा से मिलते-जुलते उच्चारण और ध्वनि में मार्गदर्शन किया करता, गुरिल्ले उसके संकेत बहुत स्पष्ट समझने लगे थे, उन्हें इस तोते से बड़ी मदद मिलती थी। उन्होंने इसका नाम ‘चुचो’ रखा था। अब इस तोते की जीभ साफ की जा रही है और उसे नई विचारधारा में ढालने का प्रयास किया जा रहा है, किन्तु उसके संस्कारों में साम्यवाद की जड़े इतनी गहरी जम गईं हैं मानो उसने साम्यवाद साहित्य का वर्षों अध्ययन और मनन किया हो। तोते की वह असाधारण क्षमता इस बात का संकेत है कि अच्छे या बुरे कोई भी कर्म अपने सूक्ष्म संस्कारों के रूप में जीव का कभी भी पीछा नहीं छोड़ते चाहे वह बन्दर हो या तोता।
यह दो उदाहरण व्यक्तिगत हैं, एक और उदाहरण ऐसा है जो यह बताता है कि व्यक्ति ही नहीं यदि सामाजिक परम्परायें विकृत हो जावें और किसी समाज के अधिकाँश लोग एक से विचार के अभ्यस्त हो जायें तो उन्हें उन कर्मों का फल सामूहिक रूप से भोगना पड़ता है। सन् 1910 के लगभग की बात है दक्षिण पश्चिमी अमरीका सामाजिक अपराधों का गढ़ हो चुका था। माँसाहारी होने के कारण वहाँ के लोग उग्र स्वभाव के तो होते ही हैं। हत्या, डकैतियों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही थी। ऐसे कई कुख्यात अपराधी मर भी चुके थे। उन्हीं दिनों वहाँ पाई जाने वाली भेड़ियों की ‘लीबो’ जाति में कई ऐसे खूँखार भेड़िये पैदा हुये जिनके आगे लोग हत्या और लूट-पाट करने वालों का भी भय भूल गये।
कोलोरेडो का एक भेड़िया इतना दुष्ट निकला कि उसने अपने थोड़े से ही जीवन काल में इतने पशु-मारे कि उनकी क्षति का यथार्थ अनुमान लगाने के लिये सरकारी सर्वेक्षण किया गया और यह पाया गया कि इस एक भेड़िये ने 100000 डालर के मूल्य के पशुओं को केवल शौक-शौक में मार डाला। इसे लोग ‘कोलोरेडो का कसाई’ कहते थे और उसके असाधारण बुद्धि कौशल को देखकर मानते थे कि ऐसी चतुरता तो मनुष्यों में ही हो सकती है। प्रश्न यह है कि कोई खूँखार मनुष्य ही था जिसने कर्मफल या पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण भेड़िये के रूप में जन्म लिया।
1915 में ऐसे कई भेड़ियों का आतंक छा गया और तब सरकार को उन्हें मरवाने के लिये काफी धन भी खर्च करना पड़ा। ‘जैक द रिपर’ भेड़िये को सरकार ने इनाम देकर मरवाया। एक तीन टाँग का भेड़िया, उसने केवल अपना शौक अदा करने के लिये लगभग 1 हजार पशुओं का वध किया, वह भी ऐसे ही मारा गया। इसकी वृद्धि बताते हैं मनुष्यों से कम नहीं थी। धोखा देने संगठित रूप से आक्रमण करने, चकमा देने में वह आश्चर्यजनक चतुरता करता। एक बार टेडी रुवबेल्ट नामक एक व्यक्ति ने शिकारी कुत्तों के साथ इस कसाई का पीछा किया। भेड़िया भागता ही गया रुका नहीं, रात होने को आई कुत्ते रोक लिये गये। बस भेड़िया भी वहीं रुक गया। रात को कैम्प लगाकर टेडी रुक गया और उस कैम्प में घुसकर एक-एक करके भेड़िये ने नौवों कुत्तों को मार दिया और किसी को पता भी नहीं चल सका।
बंदरिया से लेकर तोते और भेड़िये तक के यह असाधारण संस्कार विश्व चिन्ह हैं और वे यह बात सोचने के लिये विवश करते हैं कि क्या सचमुच ही कर्मफल जैसी कोई ईश्वरीय व्यवस्था भी है जो इच्छाशक्ति (जीव) को सैंकड़ों योनियों में भ्रमण कराती है, घूमती रहती है?
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥
-चाणक्य
जीव आप ही कर्म करता, आप ही फल भोगता है, आप ही संसार से भ्रमता, आप ही उससे मुक्त होता है।
जो कर्त्तव्य कल करना है, उसे आज ही कर लेना अच्छा है। मृत्यु बड़ी निर्दयी है, वह कब आ जायेगी उसका कुछ पता नहीं
-वृहत्कल्प भाष्य 4674
बूढ़े विण्डाल के लिये वह दिन सबसे खुशी का था, जिस दिन सम्राट अश्वजित ने उसके स्थान पर उसके युवा पुत्र किरात को ‘बधिक’ नियुक्त कर दिया था। उसने तीस वर्ष तक लगातार चामुण्डा मन्दिर में बलि कार्य किया था। अनेक पुरस्कार जीते थे। उसकी कलाई में वह दम-खम था कि एक ही बार से बलिष्ठ महिषों के भी सिर धड़ से अलग कर देता था। उसके द्वारा सम्पन्न होने वाले बलि कर्म देखने के लिये राज-दरबार तक उपस्थित होता था।
पर अब वह वृद्ध हो चुका था और किरात युवक, इसलिये वह भी चाहता था कि किरात को उसका उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया जाये। भगवान ने उसकी भी सुनी पर कुछ इस तरह कि होनी अनहोनी बन गई जो न हो सकता था वह हो गया।
किरात ने कई बार पशु-वध के समय कटते हुये जीवों का करुण क्रन्दन सुना था। उनकी मार्मिक चीत्कारें वह भूल न पाता था, कटी हुई लोथों की छटपटाहट उसे चैन न लेने देती थी। बाल्यकाल से ही उसके अन्तःकरण में इस अनात्म कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न हो चुकी थी।
आज नियुक्ति-पत्र आया था और अभी कल ही वह लिच्छवियों द्वारा आयोजित एक धर्म सभा में महाश्रमण नगसमाल के प्रवचन सुनकर आया था। अभी भी नगसमाल के शब्द- ‘संसार एक है प्राणिमात्र सत्ता ही विभिन्न रूपों में खेल कर रही है। इस मर्म को समझकर किसी के प्रति घृणा और दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिये। जीव मात्र के प्रति दया, करुणा और उदारता का व्यवहार करना चाहिये।’ अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे। आज पहली बार उसे एक बधिक का पुत्र होने पर घृणा उत्पन्न हुई थी। आत्मा कहती थी कुल पर लगे इस कलंक को धोना ही चाहिये। देवताओं के नाम पर होने वाली इस हिंसा को रोका ही जाना चाहिये, पर वह सब यह कैसे करे यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
तभी हंसता हुआ विण्डाल आया और बोला-वत्स, तुम आ गये यह लो खड़ग, इसे शान पर स्वयं मैंने चढ़ाया है इसकी धार इतनी तीक्ष्ण है कि तुम्हारी यह प्रथम परीक्षा शत प्रतिशत सफल होगी। आज दुर्गा-अष्टमी है। सम्पूर्ण राज-दरबार उपस्थित होगा तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय देना है कुल की शान और परम्परा अब तुम्हारे हाथ है।
किरात चामुण्डा के मन्दिर की ओर चल पड़ा। बोला कुछ नहीं, संकल्प विकल्प लिये वह वध-स्थल पर पहुँच तो गया पर वहाँ बलि के लिये लाये गये निरीह पशुओं को देखते ही उसकी आत्मा काँप उठी। उसने एक बार सम्राट अश्वजित से लेकर छोटे से छोटे नागरिक तक सबकी आँखों में आँखें डालकर देखा। सब पत्थर की सी मूर्तियाँ लगी जिनमें शारीरिक कलाकारिता तो थी पर भावनाओं के स्थान पर उनका विद्रूप अट्टहास कर रहा था। उसे इन मांसाहारियों पर घृणा हो आई पर अब कुछ कहने के लिये समय रहा नहीं था।
पुजारी पूजा समाप्त कर चुका था। बलि का समय हो चुका था। किरात के सामने महिष प्रस्तुत किया गया, खड़ग ऊपर आकाश की ओर लपका तो विण्डाल सहित संपूर्ण परिवार उपस्थित जनसमूह की आँखें चमक उठीं गजब की स्फूर्ति पर दूसरे ही क्षण सारी चमक करुणा में बदल गई। जब- किरात को “हिंसको! घात करना है तो अपना करो। ईश्वर के बनाये जीवों को मारने और मरवाने का तुम्हें क्या अधिकार” कहकर खड़ग का अपने ऊपर प्रहार करते देखा। एक क्षण में ही किरात का सिर धड़ से अलग हुआ पड़ा था। विण्डाल परिवार फूट-फूट कर रोने लगा। आगन्तुकों की आँखें झरने लगीं। स्वयं अश्वजित भी यह दृश्य देखकर विचलित हो उठे। अश्रु पोंछते हुये वे वहाँ से उठकर चले गये और घोषणा करा दी फिर कभी राज्य के किसी भी भाग में पशु-बलि न दी जाये।
एक समय था जब फ्रायड ने काम-वासना संबंधी सिद्धाँत का प्रतिपादन करते हुये लिखा था- ‘मनुष्य शरीर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष कामुकता की भाप वाला इंजन है। इंजन से जब तक भाप निकलती रहती है तब तक उसे कोई खतरा नहीं रहता पर यदि भाप का निकलना रोक दिया जाये तो इंजन में विस्फोट हो सकता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो सकता है।
इस सिद्धाँत की पुष्टि में फ्रायड ने कई चिड़चिड़े, उद्विग्न, अपराध भावना वाले लोगों की चर्चा की और बताया कि उनकी कामेच्छा को फलीभूत होने का अवसर नहीं मिला, उसी के फलस्वरूप उनमें यह मानसिक विकार उत्पन्न हुये। उन्होंने इस सिद्धाँत को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और यहाँ तक दलील दे डाली यदि मनुष्य को अपनी काम-वासना की तृप्ति के लिये अवसर नहीं दिया गया तो उसकी प्रवृत्ति हिंसक और समाज विरोधी तक हो सकती है, उससे युद्धों तक की नौबत आ सकती है।’
फ्रायड के अनुयाइयों के प्रचार का परिणाम यह हुआ कि जीवनी शक्ति से संबंधित ‘काम भावना’ को पाश्चात्य देशों में नग्न रूप दे दिया गया। आज की सामाजिक विच्छृंखलतायें, विषमतायें, पश्चिमी देशों में बढ़ रहे रोग-शोक और अपराधी मनोवृत्ति उसी का परिणाम हैं। संघर्षपूर्ण सामाजिक परिस्थितियों ने एक बार फिर से मनोवैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का ध्यान इस ओर खींचा और तब एक नई परिकल्पना को जन्म मिला कि काम-वासना इंजन में भाप जैसी शक्ति तो है पर उसे व्यर्थ नष्ट करने से तो जीवन के मूल स्रोतों के पतन होने की संभावनायें बढ़ जाती है। यदि उस शक्ति को ऊर्ध्वगामी या नियंत्रित उपयोग की दिशा में लगा दिया जाता है तो उससे इंजन से हजारों टन ढोने की क्षमता आ जाती है। भाप निकाला हुआ इंजन तो बेचारा अपना भी भार नहीं ढो सकता।
फ्रायड की दलील का जितना समर्थन हुआ उससे अधिक विरोध और अब लंदन के एक अन्य मनोविज्ञान शास्त्री ने तो इस सिद्धाँत की नींव ही हिला कर रख दी। लिसैस्टर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक श्री डेविड राइट ने अनेक बन्दी-शिविरों, फौजी संस्थानों, खेल-कूद और पर्वतारोहण जैसी सामाजिक सामुदायिक और राष्ट्रीय संधि के कार्यों में भाग लेने वालों के जीवन का विस्तृत अध्ययन करने के बाद पाया कि उनमें से अधिकाँश सामान्य परिस्थितियों में ही संभोग का आनन्द लेते रहे। उन्हें अपने अभियान अथवा उसके बाद विषय-भोग की कभी भी इच्छा नहीं होती जब तक कि वे या तो स्वयं भूतकालीन संभोग का स्मरण नहीं करते या उनके सामने इस तरह की चर्चा के विषय नहीं आते। यदि वे इच्छा न करें अथवा उनके सामने कामुकता भड़काने वाली प्रवृत्तियाँ न आयें तो वे काम वासना के लिये कभी परेशान नहीं होंगे वरन् उनमें मनोविनोद और आह्लाद के स्वभाव का विकास ही होने लगता है।
श्री डैविड राइट ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान बन्दी बनाये गये जापानियों, साइबेरिया शिविर में बंदी लोगों तथा अस्पतालों के उन लोगों से जाकर भेंट की जो लंबे समय से किसी बीमारी से आक्राँत पड़े थे। उनसे बातचीत करते समय उन्होंने पाया कि उनमें काम-वासना की कोई इच्छा नहीं रह गई थी तो भी वे तो अशाँत थे, न उद्विग्न वरन् उनके अन्तःकरण से एक प्रकार की शाँति और आत्म-विश्वास की झलक देखने को मिलती थी। यह आत्म-विश्वास अच्छे अर्थों में था- कि यदि इन परिस्थितियों से मुक्ति मिले तो अमुक-अमुक अच्छे काम करे।’
श्री डैविड राइट के इस कथन की और भी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मिल जाती है और इस तरह फ्राइड के सिद्धाँत का लगभग अन्त ही हो जाता है। आने वाले समय में लोग फ्रायड के सिद्धाँत को तूल देकर अपना न तो मस्तिष्क खराब करेंगे और न शरीर की शक्तियाँ बरबाद करेंगे वरन् शक्तियों के संचय से जीवन की अनेक ऐसी धाराओं का विकास करने में समर्थ हों, जिनका संबंध आध्यात्मिक तत्वों से है और जो यथार्थ में मनुष्य के लक्ष्य हैं। ईश्वर, आत्मा, परलोक, पुनर्जन्म जैसे आध्यात्मिक सत्यों की शोध में ब्रह्मचर्य सबसे अधिक सहायक है। आगे की पीढ़ी का ध्यान ब्रह्मचर्य द्वारा शक्ति संयम और उससे जीवन की प्रसन्नता के लिये नई-नई विधाओं की खोज की ओर कहीं अधिक होगा।
मेरीलैण्ड (अमरीका) के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ चाइल्ड हेल्थ एण्ड ह्यूमन डेवलपमेंट (अमरीका की एक राष्ट्रीय संस्था जो बच्चों के स्वास्थ्य और मानव-विकास की आवश्यकताओं की शोध और शिक्षण करती है) ने एक खोज में बताया कि मनुष्य शरीर की कोशिकाओं में गुणसूत्रों (क्रोमोसोम्स-अर्थात् व्यक्ति के शरीर स्वभाव आदि का निर्धारण करने वाले तत्व) के तेईस जोड़े रहते हैं। प्रत्येक जोड़े में 1 गुण सूत्र पिता का एक माता का होता है। 22 जोड़े ऐसे होते हैं जिनका काम-वासना संबंधी गुणों व विकास से कोई संबंध नहीं होता। अधिकतम 1 ही जोड़ा काम-वासना का रहता है इसी से काम-वासना की प्रवृत्ति का व्यक्ति में निर्धारण होता है किन्तु कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि उस एक जोड़े में भी एक गुणसूत्र या तो माता की ओर का या पिता की ओर का था ही नहीं सारे 23 समूहों में केवल एक ही गुणसूत्र था। ऐसे व्यक्तियों में सेक्स अंगों का विकास तो असामान्य होता है किन्तु उनके स्वभाव में काम-वासना संबंधी कोई विशेष रुचि नहीं होती वरन् कई बातों में असाधारण प्रतिभा वाले सिद्ध हुये। बेशक! कुछ एक ऐसे भी उदाहरण आये जबकि बाईस जोड़े अलिंगी गुणसूत्रों (आटोसपल क्रोमोसोम) की जगह 21 जोड़े ही रह गये शेष दो में से 1 तो पूरा ही जोड़ा काम संबंधी गुणसूत्र का था जबकि दूसरे में भी एक गुणसूत्र काम-वासना वाला था। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अतिरिक्त काम वासना के गुणसूत्र वाले सभी व्यक्ति लम्पट, क्रोधी, असामाजिक और खूँखार थे। तात्पर्य यह कि काम-वासना पर नियंत्रण न होना व्यक्ति के लिये सुविधा का नहीं पतन का ही कारण हो सकता है।
फ्रायड के कामशास्त्र को काटने के लिये इतनी उपलब्धि काफी है पर संभवतः आगे के प्रयोग इस दिशा में और भी प्रभाव डालेंगे और ब्रह्मचर्य की महत्ता के वैज्ञानिक प्रमाण ढूंढ़ निकालेंगे।
नैपोलियन बोनापार्ट तब विद्यार्थी था। उसने रहने के लिये एक नाई का मकान किराये पर ले रखा था। नाई की एक सुन्दर युवती कन्या भी थी। वह किसी प्रकार नैपोलियन को अपने जाल में फाँसना चाहती थी अतएव उसके सामने सदैव कामुक चेष्टायें करती रहती। नैपोलियन यह सब देखता तो पर उन बातों की उपेक्षा करके चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगा रहता।
बात जहाँ की तहाँ समाप्त हो गई। कुछ दिन पीछे नैपोलियन सेना में चला गया। बाल्यकाल में संयमित जीवन बिताने के कारण शारीरिक शक्ति और बुद्धि कौशल का उसमें अभाव नहीं था इसलिये वह 25 वर्ष की अल्पायु में ही सेनापति बना दिया गया।
एक बार वह किसी काम से अपने उसी विद्यालय में गया जहाँ उसने शिक्षा पाई थी। प्रसंगवश वह उस युवती से भी मिला और पूछा इस मकान में कभी एक विद्यार्थी रहता था, तुम उसे छेड़ती रहती थीं,है याद उसकी। युवती ने रूखेपन से कहा- ‘था एक नीरस किताबी कीड़ा’।
नैपोलियन ने कहा-सचमुच बहन! पर यदि वह वासना के आकर्षण में फंस जाता तो आज सेनापति के रूप में तुम्हारे सामने उपस्थित न होता?
(इन आयोजनों में आचार्य जी पहुँच रहे हैं। समीपवर्ती सभी परिजनों को इनमें सम्मिलित होना चाहिए। संपर्क स्थापित करने एवं पत्र व्यवहार करने के पते कार्यक्रमों के साथ दिये गये है। )
3 से 6 नवम्बर 70 नवसारी (गुजरात)
पता-श्री मगनलाल पी. गाँधी
आशा बाग सोसायटी 66 गायत्री सदन
पो. नवसारी, जि. बलसाड़ (गुजरात)
9 से 13 नवम्बर 70 झाँसी (उ.प्र.)
पता- श्री बालकृष्ण अग्रवाल
खजाँची बिल्डिंग मिनर्वा टाकीज के पास झाँसी (उ.प्र.)
16 से 20 नवम्बर 70 टाटानगर (हजार कुण्डी यज्ञ)
पता-गणेशदत्त शर्मा
केबुल ओल्ड टाउन मी. टाइप
क्वार्टर नं. 15 पो. गोलमुरी, जमशेदपुर (बिहार)
22 से 25 नवम्बर 70-भिलाई
पता-श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी
क्वा. नं. 5, सड़क नं- 33, सेक्टर-4
पो. भिलाई नगर, जि. दुर्ग (म.प्र.)
3 से 5 दिसम्बर 70 जोरा (म.प्र.)
पता-डॉ. श्री रामजीलाल गुप्ता
पुलिस स्टेशन के सामने, एचबीघा
पो. जौरा अलापुर, जि. मुरैना (म.प्र.)
8 से 12 दिसम्बर 70-1001 (हजार) कुण्डी यज्ञ
-बहराइच
पता-श्री कन्हैयालाल श्रीवास्तव
प्राचार्य सर्वोदय इंटर कालेज मिहीपुरवा
जि- बहराइच (उ.प्र.)
यज्ञ-स्थान बहराइच
18 से 21 दिसम्बर 70 राजा का रामपुर (उ.प्र.)
पता-श्री जे.के. निगम प्राचार्य
बी.डी.आर.एस. इंटर कॉलेज
पो. राजा का रामपुर, जि. एटा (उ.प्र.)
25 से 29 दिसम्बर 70-आणंद
पता-अ.भा. गायत्री परिवार शाखा
नवा रामजी मन्दिर, स्टेशन रोड
पो. आणंद, जिला खेड़ा (गुजरात)
5 व 6 जनवरी 71 (मध्याह्न तक) तुलसीपुर (गोंडा)
पता-श्री गुलजारीलाल गोयल
पो. तुलसीपुर, जि. गोंडा (उ.प्र.)
6 (अपराह्न) से 8 (मध्याह्न) जनवरी 71 गोंडा
पता-श्री रामसेवक त्रिपाठी
गायत्री तपोभूमि संस्था, बड़गाँव गोंडा (उ.प्र.)
9 व 10 (मध्याह्न तक) जनवरी 71 सुल्तानपुर
पता-श्री आद्याप्रसाद विद्यार्थी
विद्यार्थी प्रेस, स्टेशन रोड, सुल्तानपुर (उ.प्र.)
जनवरी 71 वसन्त पंचमी मथुरा में
3 से 7 फरवरी 71-1001 (हजार) कुण्डी यज्ञ
-महासमुन्द
पता-श्री ज्वालाप्रसाद शर्मा
राम मन्दिर के पास
पो- महासमुन्द, जि- रायपुर (म-प्र.)
9 से 12 फरवरी 71-101 कुण्डीयज्ञ राउरकेला (उड़ीसा)
पता-डॉ. श्री नन्दकिशोर प्रसाद
शान्ति होमियो हॉल पंचतीर्थ मन्दिर विसरा रोड
राउरकेला-1 (उड़ीसा)
फोन नं. 3059
14 से 17 फरवरी 71-बालाघाट (म.प्र.)
पता-श्री रतनलाल कश्यप
विभूति बागीश बन्धु
गोंदिया रोड, बालाघाट (म.प्र.)
22 फरवरी से 25 फरवरी 71 बिलासपुर (म.प्र.)
पता-श्री उमाशंकर चतुर्वेदी
द्वारा जर्म्स किला हाउस
दयालबंद, विलासपुर (म.प्र.)
नोट-युग-निर्माण सितम्बर अंग में छपी तिथियाँ बदल दी गई हैं। कृपया परिवर्तन नोट कर लें।
27 व 28 फरवरी 71-भोपाल (म.प्र.)
पता-श्री डॉ. कृष्णवल्लभ पंड्या
रेजीडेन्ट मेडिकल ऑफिसर
एन. 5।22 एच.ई.एल.
भोपाल-24 (म.प्र.)
1 व 2 मार्च 71- अशोक नगर (म.प्र.)
पता-श्री डॉ. घनश्याम पाराशर
चन्द्रशेखर आजाद वार्ड
पो. अशोक नगर, जि. गना (म.प्र.)
7 से 9 मार्च 71- जयपुर (राज.)
पता-श्रीमती चन्द्रमुखी रस्तोगी
2-विचून बाग, संसारचन्द्र रोड
जयपुर (राजस्थान)
18 से 20 मार्च 71- अहमदाबाद (गुजरात)
पता-1. श्री चन्दू भाई बी. जोशी
हर्षदीप, वकील वाडी
एल.जी. अस्पताल के सामने
अहमदाबाद (गुजरात)
2. श्री प्रहलाद-पुराणी, 2232।2
होली चकला भण्डेरी पोल कालूपुर
अमदाबाद (गुजरात)
21 से 23 मार्च-71 बड़ौदा (गुजरात)
पता-श्री अखण्ड ज्योति अ.भा. गायत्री परिवार
शाखा-श्रेयम विद्यालय
पोलो ग्राउंड के सामने
बड़ौदा (गुजरात)
25 से 28 मार्च 71-बम्बई (महाराष्ट्र)
पता-1. अखण्ड-ज्योति गायत्री परिवार शाखा 5-विट्ठलबाड़ी, झवेरी बाजार
दूसरी मंजिल बम्बई-2 फोन नं. 299672
2. श्री विश्वनाथ सी. त्रिवेदी
परमानन्द चाल, ठाकुरद्वारा रोड
पहली मंजिल, बम्बई-2 (महा.)
फोन नं. 314187
1 अप्रैल 71 महिदपुर (उज्जैन)
पता-श्री शरचन्द्र उपाध्याय एडवोकेट
पो. महिदपुर, जि. उज्जैन (म.प्र.)
2 से 4 अप्रैल 71-उज्जैन (म.प्र.)
पता-श्री एम.सी. शर्मा गार्ड
18 टावर रोड
वाराह मिहिर मार्ग नं. 1 उज्जैन (म.प्र.)
7 से 9 अप्रैल 71 मन्दसौर (म.प्र.)
पता-श्री गोवर्धन लाल विजयवर्गीय
जनकूपुरा बड़ा चौक, मन्दसौर (म.प्र.)
28 अप्रैल से 2 मई 71 पोरबन्दर (गुजरात)
पता-अ.भा. अखण्ड-ज्योति गायत्री परिवार शाखा
द्वारा- श्री राम भाई चश्मा वाला
मॉडर्न आप्टिकल्स, गाँधी रोड, पोरबन्दर (सौराष्ट्र)
अपनों से अपनी बात-
अगले वर्ष गायत्री जयन्ती 3 जून, 71 को पड़ती है। गायत्री तपोभूमि में 20 गायत्री जयन्ती मना लेने की बात उस दिन पूरी हो जायेगी। इसके बाद हम जल्दी से जल्दी अपने जीवन का तीसरा अध्याय प्रारंभ करने के लिये हिमालय यात्रा पर चल पड़ेंगे। इस बीच लगभग 200 दिन शेष रह जाते हैं। प्रत्यक्ष जन संपर्क के लिए और प्रत्यक्ष प्रवृत्तियों को गतिशील करने के लिए अब केवल इतने ही दिन शेष हैं। इस अवधि में हम अपने जीवन लक्ष्य नव-निर्माण अभियान को इतनी गति देकर जाना चाहते हैं जिससे उसकी प्रगति परिपूर्ण गतिशीलता के साथ अग्रगामी बनती जाय।
किसी के मन में यह आशंका नहीं रहनी चाहिये कि आचार्य जी के चले जाने के बाद अपना आन्दोलन शिथिल या बन्द हो जायेगा। ऐसी आशंका करने वाले यह भूल जाते हैं कि यह किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा आरंभ की हुई प्रवृत्ति नहीं है। इसके पीछे विशुद्ध रूप से ईश्वरीय इच्छा और प्रेरणा काम कर रही है। जिसके पीछे यह शक्ति काम कर रही हो उसके संबंध में किसी को आशंका नहीं करनी चाहिए। व्यक्ति असफल हो सकते हैं, भगवान के असफल होने का कोई कारण नहीं। व्यक्ति की इच्छायें अधूरी रह सकती हैं, भगवान की इच्छा पूरी क्यों न होगी। अब तक के आन्दोलन की प्रगति को जिन लोगों ने बारीकी से देखा समझा है उन्हें यह विश्वास करना ही चाहिए कि उपलब्ध सफलतायें हमारे जैसे नगण्य व्यक्ति के माध्यम से किसी भी प्रकार संभव न थी, हमें निमित्त बनाकर कोई महाशक्ति अदृश्य रूप से काम कर रही है- केवल आँखों के सामने कठपुतली नाचने से लोग प्रशंसा उस लकड़ी के टुकड़े की करते हैं जो नाचता दीखता है। वस्तुतः श्रेय उस बाजीगर को है जिसकी उंगलियाँ अपनी अदृश्य संचालन कला के द्वारा उस खेल का सारा सरंजाम जुटा रही हैं।
जीवन के पिछले दो चरणों में जो सफलतायें मिली हैं, उनके पीछे व्यक्ति पुरुषार्थ राई भर और परमेश्वर का अनुदान पहाड़ भर है। 15 वर्ष तक की आयु ही खेलकूद, पढ़ने-लिखने की बाल क्रीड़ा में गंवा पाये। बाकी 45 वर्ष तो किसी महाशक्ति के इशारे पर कठपुतली की तरह ही चले हैं, इतना ही श्रेय हमें मिल सकता है कि निष्ठापूर्वक अपने आराध्य का हर संदेश बिना ननुनच के शिरोधार्य करते रहे। उससे अपनी अनिच्छा और असुविधा की बात कभी नहीं जोड़ी। फौजी सिपाही का गुण आदेश अनुशासन को प्राण देकर भी निवाहना होता है। अधिक से अधिक हमें एक निष्ठावान सैनिक कहा जा सकता है जिसने कि लंबी जिन्दगी के असंख्य क्षणों में से प्रत्येक को अपने सूत्र संचालक की इच्छानुसार बिताया।
16 से लेकर 40 वर्ष तक की आयु के 24 वर्ष गायत्री पुरश्चरणों की कठोर तपश्चर्या में लग गये। काम रूखा और मन में ऊब लाने वाला था, पर मन और शरीर को समझा लिया गया। बिके हुए सामान पर अपना अधिकार क्या? जब शरीर और मन बेच दिया तो खरीदने वाले की आज्ञा पर चलने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं। राजा हरिश्चन्द्र भंगी के हाथी बिके। उनने अपना शरीर और मन उसी तरह का बना लिया जैसा खरीदने वाले ने चाहा। आत्म-समर्पण का मतलब अपने शरीर और मन को दूसरे के हवाले कर देना है। बात समझ की थी, मन मान गया, शरीर ने भी अधिक अड़चन उत्पन्न नहीं की। ढर्रा शाँतिपूर्वक चल पड़ा और देखते-देखते वे कठिन नीरस, रूखे लोगों की दृष्टि में सनक और मूर्खता से भरे हुए 24 वर्ष एक एक करके सहज ही गुजर गये। इस तपश्चर्या ने हमें बहुत शक्ति दी। शरीर को निरोगता के रूप में मन को सन्तुलन के रूप में और आत्मा को मनस्विता तेजस्विता के रूप में बहुत कुछ मिला। इन उपलब्धियों के बिना जीवन का दूसरा अध्याय ठीक तरह पूरा नहीं हो सकता था।
41 से लेकर 60 वर्ष तक के बीस वर्ष हमारी सार्वजनिक सेवा के हैं। इसमें ज्ञान यज्ञ को जन्म देने ओर गतिशील बनाने का प्रमुख कार्य हमें सौंपा गया था। विभिन्न स्तर की दिखाई पड़ने वाली प्रवृत्तियाँ वस्तुतः उस एक ही क्रियाकलाप के अंतर्गत आती हैं। पत्रिकाओं का सम्पादन, जीवन साहित्यिक प्रवृत्तियाँ विशुद्ध रूप से ज्ञान-यज्ञ के लिए थीं। देश भर के सुसंस्कारी भावना शील लोगों को खोज, उन्हें एक परिवार के रूप में एक सूत्र में पिरोना, 4 हजार शाखाओं और 10 लाख व्यक्तियों का संगठन विशुद्ध रूप से जन जागरण के लिए था। गायत्री यज्ञों और युग-निर्माण सम्मेलनों के विशालकाय आयोजनों द्वारा कोटि-कोटी जनता से संपर्क और उन्हें युग परिवर्तन के ढाँचे में ढलने की प्रेरणा देते फिरना यह प्रचारात्मक कार्य भी ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत आता है। गायत्री तपोभूमि, युग निर्माण योजना का केन्द्रीय कार्यालय उसी प्रक्रिया को सुसंचालित रखने के लिये था। कष्ट पीड़ितों और दुःखियों को अपनी तपश्चर्या का अंश देकर उनके कष्टों को घटाने की सेवा साधना भी वस्तुतः इस सूक्ष्म आकाँक्षा के लिये ही रही कि ये लाभान्वित दीन-दुःखी नव निर्माण मिशन की ओर भी उन्मुख होंगे। वे न हुए बात दूसरी है। आज की दुनिया कुछ है ही इस ढंग की कि अपने मतलब से मतलब रखना बुद्धिमानी मानी जाती है। प्रणाम, दर्शन करने की कीमत पर आशीर्वाद अनुदान प्राप्त करना लोगों को सस्ता लगता है। सेवा साधना के झंझट में कोई क्यों पड़े? उसमें तो समय, पैसा, मन सभी बिना स्वार्थ के काम में खर्च करने पड़ते हैं। इस झंझट को कौन मोल ले। लोगों का यही दृष्टिकोण रहा और उस वर्ग में से चन्द लोग ही अपने जीवन लक्ष्य में सहायक हो सके। जो हो हमारा प्रयोजन वही था। सफलता कम मिली यह बात दूसरी है। किन्तु दूसरे विचारशील वर्गों में अपने प्रयत्नों को सराहा भी गया, अपनाया भी गया। सजीव भावना स्तर वाले विवेकशील लोगों के सहयोग समर्थन का ही फल है कि युग-निर्माण आन्दोलन अब आकाश छूने जैसे दुस्साहस करने लगा है।
हमारे बीस वर्ष इसी नव निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार करने में लग गये। अब 60 वर्ष से आगे की आयु का तीसरा अध्याय आरंभ होता है। उसमें काम वह पूरा ही होगा केवल ढंग बदल जायेगा। हमारी स्थूल शक्तियाँ, स्थूल प्रवृत्तियाँ, स्थूल गति-विधियाँ रूपांतरित होकर सूक्ष्म बन जायेंगे। प्रत्यक्ष परोक्ष में बदल जायेगा। करना आगे भी वही है, जिसके लिये हमें यह जन्म धारण करना पड़ा है। स्थूल प्रयत्नों का परिणाम सीमित होता है। सूक्ष्म प्रयत्न बहुत व्यापक और शक्तिशाली होते हैं। जिस क्षेत्र में सूक्ष्म प्रयत्न सफल नहीं होते उनमें सूक्ष्म तत्वों द्वारा हेर-फेर अधिक आसानी से हो सकता है। हम उग्र तपश्चर्या केवल इसलिये करने जा रहे हैं कि अपनी उन सूक्ष्म शक्तियों को विकसित करें जो जन मानस को प्रभावित करने और प्रखर बनाने में अधिक समर्थ हो सकती है।
इस देश के निवासियों में महानता अभी भी कम नहीं है। ऋषियों के रक्त की पूँजी अभी भी पूर्णतया समाप्त नहीं हुई है। वह सब केवल सो भर गया है। मोह निद्रा इतनी गाढ़ी हो गई है कि नर-पशुओं की तो बात ही क्या, जिनमें नर-नारायण की क्षमता भरी पड़ी है वे भी लोभ और मोह की जंजीरों से इस बुरी तरह कस गये हैं कि परमार्थ की, युग निर्माण की, ईश्वरीय पुकार तक को समझ सकना उनके लिये संभव नहीं हो रहा। जैसे-जैसे धक्का-मुक्की करने भर को थोड़ा बहुत कुसमुसाते हैं और जैसे ही दबाव कम हुआ कि पूर्वस्थिति में फिर मूर्छा ग्रस्त हो जाते हैं। युग परिवर्तन के लिये उत्कृष्ट प्रतिभाओं की प्रचण्ड जनशक्ति नियोजित होनी चाहिए। वह मिल नहीं रही है। गत बीस वर्षों के प्रयास से हम जो जुटा सके हैं वह बहुत कम है। विश्व का कायाकल्प करने के लिये हल्के स्तर के थोड़े से लोगों से काम नहीं चल सकता। हमें प्रखर प्रतिभाएं चाहिए। वे मिलती नहीं, इस अभाव या असफलता ने हमें क्षुब्ध कर दिया है। अगले दिनों उग्र तपश्चर्या के द्वारा वैसी सूक्ष्म शक्ति हम उपलब्ध करेंगे जिससे लोक मंगल में लग सकने की प्रखर प्रेरणा हम अपने साथी, स्वजनों में भर सकें और उन्हें मोह की कीचड़ में से उबारकर ईश्वरीय प्रयोजनों में लग सकने का साहस उत्पन्न कर सकें।
हमारे जीवन के तीसरे अध्याय का प्रयोजन यही है। भागीरथ की तरह हम लोक मंगल के महत्वपूर्ण योगदान दे सकने वाली ज्ञान गंगा को लाने के लिये उसी महानता के पद चिन्हों पर चलने जा रहे हैं और वहीं रहेंगे जहाँ उस महामानव के ‘करने या मरने’ का संकल्प लेकर डेरा जमाया था। कह नहीं सकते कब तक जीना पड़ेगा, पर जब तक साँस चलेगी हर क्षण उस जन जागरण के ज्ञान यज्ञ को पूरा करने में लगे रहेंगे जिसके लिए हमें यह शरीर कलेवर दिया गया है।
अध्यात्म की विज्ञानपरक शक्तियों की शोध करना भी भावी कार्यक्रम के साथ जुड़ा हुआ है और उसका भी अपना महत्व है। आज अध्यात्म केवल चर्चा का, दर्शन का विषय रह गया है, उसके माध्यम से प्रचण्ड शक्ति कैसे उत्पन्न की जा सकती है और उससे कैसे उत्पन्न की जा सकती है और उससे कैसे समर्थन बढ़ाने का लाभ पाया जा सकता है, यह विद्या एक प्रकार से लुप्त हो गई। अब हम अध्यात्म वादियों को विचारक भर देखते थे। उनमें शक्ति मात्र समर्थता नहीं रही। शक्तिरहित विचारणा से कुछ काम चलने वाला नहीं। भारत की भावी समर्थता-अध्यात्म के आधार पर उत्पन्न होती है। उसका ज्ञान और प्रयोग एक प्रकार से लुप्त हो गया। उसकी शोध करना और उस उपलब्धि को सर्व सुलभ बनाना अपना एक कार्य यह भी है जिसे हम उस भावी तप साधना की अवधि में पूरा करेंगे। जनमानस में जागृति उत्पन्न करना और उसे शक्ति सज्जा से सुसज्जित करना यह दोनों कार्य एक ही है, इन्हें एक भी कहा जा सकता है, दो भी। जो भी कहा जाय हम अपने जीवन का तीसरा अध्याय इसी प्रयोजन के लिए पूरा करेंगे। हमारी कार्य पद्धति अपने द्वारा निर्धारित नहीं होती न अपनी व्यक्तिगत इच्छा और समझ का उपयोग उसमें होता है। तीसरे अध्याय का कार्यक्रम भी ऊपर से आया है तो उसमें ननुनच कैसे करें? अभी इधर ही रहने का परिजनों का आग्रह उचित हो सकता है। पर हम तो उचित अनुचित की कसौटी भी खोजेंगे। समर्पित पुष्प की तरह हमने अपना शरीर, मन ही नहीं-भाव केन्द्र भी इष्ट सत्ता को बहुत पहले सौंप दिया है। सो उसके आदर्श की अवहेलना कैसे बन पड़े। तीसरा अध्याय शुरू करने की कठिन प्रक्रिया सामने रख दी गई तो उस पर पुनर्विचार करने या संशोधन प्रस्तुत करने का कोई आधार नहीं रह गया। हम अब चलने की तैयारी में ही लगे हैं और बोरिया बिस्तर बाँधकर मन को समेट कर उसी ऊहापोह की व्यवस्था बना रहे हैं।
चलने के दिन अब एक-एक करके रेलगाड़ी की दौड़ दौड़ते चले आ रहे हैं। केवल 200 दिन के करीब बाकी रह गये हैं। एक-एक दो-दो करके यह भी अब गये तब गये ही समझने चाहिये। पटाक्षेप की घंटी बज चुकी, अब पर्दा गिरने ही वाला है और यह मनोरंजक नाटक जो गत 45 वर्ष से जनसाधारण द्वारा कौतूहल पूर्वक देखा जा रहा है अब अपनी अन्तिम सीमा पर पहुँचकर सदा के लिये बंद हो जायेगा। केवल एक कथानक मात्र कहने सुनने के लिये शायद बचा रहे। इस नाटक से चित्त चुराने वाले और रोमाँच खड़े करने वाले दृश्य अब पाठकों की आंखों से ओझल ही समझे जाने चाहिये। अब दिन तो उंगलियों पर गिनने लायक रह गये। इन्हें भी आँधी में उड़ते हुए पेड़ से टूटे पत्ते की तरह आँखों से ओझल होने में अब क्या देर लगने वाली है।
हम चाहते थे कि इन थोड़े से दिनों का श्रेष्ठतम उपयोग इस संदर्भ में करते रहें हमारे जीवन का अवतरण और उत्सर्ग जिन प्रयोजन के लिये हुआ-उसकी जड़ मजबूत बनाने के लिये जो साधन संभव हों उन्हें अधिक तत्परता पूर्वक पूरा कर लें। काम बहुत पड़े हैं- योजनायें सामने बहुत हैं। वे समय माँगती थी और सहयोग तथा साधन की अपेक्षा करती थी। सो अभीष्ट मात्रा में जुट न सका। उपलब्ध परिस्थितियों में जितना संभव था उसे पूरा करने में राई भर भी उपेक्षा या आलस्य और प्रमाद हमने नहीं बरता। फिर भी जरूरी काम बहुत से निपटाने को रह गये हैं और उनमें से कई तो ऐसे हैं जो समय रहते पूरे न किये जा सके तो पीछे वालों पर इतना अधिक बोझा बढ़ जाएगा जिसे वहन करने में वे अनासक्त होने के कारण बहुत अड़चन अनुभव करेंगे। हम इस तरह के कामों को इन्हीं दिनों इस रूप में प्रस्तुत कर जाना चाहते हैं कि पीछे वाले उस गाड़ी के पहिये को ठीक तरह घुमाते रह सकें तो जो काम हमें अत्यधिक अड़चनों के बीच करना पड़ा उसे वे सफलता पूर्वक आगे बढ़ाते चले जायेंगे। हम ऐसी ही स्थिति पैदा करके जाना चाहते हैं। इसलिये इन 200 दिनों में उतना काम करना चाहते हैं जितना पिछले 20 वर्षों में कर सके।
हम इन दिनों क्या कर रहे हैं और जिन पर हमारा प्रभाव अधिकार है- उनसे क्या करा रहे हैं, इसकी विस्तृत चर्चा इसी अक्टूबर की युग-निर्माण पत्रिका में पढ़ लेना चाहिए। केवल अक्टूबर का ही क्यों नवम्बर, दिसम्बर के भी युग-निर्माण अंक हर अखण्ड-ज्योति के पाठक को पढ़ लेने चाहिए जो उसे मंगाते न हों या माँगकर पढ़ने की सुविधा न प्राप्त कर सकें वे 3 अंकों का चन्दा 1)50 भेज दें और उन्हें प्राप्त करलें। हम चाहते हैं कि उन तीनों अंकों को हर पाठक पढ़लें। ताकि हमारी तथा आन्दोलन की वर्तमान तथा भावी गति-विधियों की जानकारी ठीक तरह सभी को मिल जाय। अक्टूबर अंक में इन छह महीनों में किये जाने वाले प्रयत्नों का उल्लेख है। यह नवम्बर, दिसम्बर में बताया जायगा कि योजना को आगे क्या करना होगा और उसके लिये क्या करना पड़ेगा। इन अंकों के आधार पर युग परिवर्तन अभियान की रूप-रेखा आदि से अन्त तक समझी जा सकेगी और सोचा जा सकेगा कि उन प्रयत्नों में अपने को कौन कितना कहाँ फिट कर सकता है। इन तीनों अंकों को प्रेरणा और सूचना की तरह इन दिनों लिखकर तैयार किया जा रहा है।
बूढ़ा शरीर अधिक से अधिक श्रम इस बीच कर सके इसमें हम कुछ भी न उठा रखेंगे। मेहनत करने की आदत भी जीवन भर की है पर अगले दिनों उसकी अति कर देने में भी हमें आपत्ति नहीं। 200 दिनों में 20 वर्ष का काम निपटाना हो तो अति ही करनी पड़ेगी। हम करेंगे। पर अपने साधियों में यह चाहिये कि वे भी इन दिनों हमारा हाथ बँटाने, कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का कुछ अधिक उत्साह दिखा सकें तो यह उनके लिये और हमारे लिये एक चिर स्मरणीय घटना बनी रहेगी, घरेलू काम-काज जिन्दगी भर लगे रहे हैं, ममता जैसे-जैसे बढ़ेगी काम का दबाव भी बढ़ता जायगा, उससे फुरसत भी मिल सकती है जब व्यक्ति भावी प्रयोजनों को प्राथमिकता देने लगे और उनका महत्व समझे। अन्यथा फुरसत न मिलने का चिर परिचित बहाना कोई भी कर सकता है और किसी दूसरे का नहीं तो कम से कम अपना मन तो इसी आड़ में समझा सकता है। जरूरी जो काम समझे जाते हैं उनके लिए पर्याप्त समय मिलता है, अन्य काम पीछे के लिए छोड़ दिये जाते हैं और जरूरी पहले किया जाता है। बीमार पड़ जाने पर सबको फुरसत मिल जाती है। ऐसी ही कुछ मनोभूमि बना ली जाय तो किसी को भी हमारी थोड़ा सहयोग करने की फुरसत मिल सकती है और अगले छह महीने में पूरे या आरम्भ किये जाने वाले कार्यों की एक सन्तोष जनक व्यवस्था बन सकती है।
सक्रिय सदस्यों की संख्या वृद्धि, जो सदस्य बन चुके हैं, उनका व्यवस्थित संगठन, कार्य वाहकों की नियुक्ति, झोला पुस्तकालयों की सक्रियता, चल पुस्तकालय, (धकेल गाड़ियाँ) का प्रचलन, इतना क्रम चल पड़े तो समझना चाहिए कि सुदृढ़ संगठन बन गया और इसका ढर्रा ठीक तरह चलने लगा, समय देने वाले- अपने यहाँ अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में भावनाशील परिजनों से मिलकर इस व्यवस्था को पूरा कराने में योगदान दे सकते हों दें, हमारी प्रबल इच्छा सक्रिय कार्यकर्त्ताओं का संगठन देखकर जाने की है क्योंकि हमारे सामने की साकारता प्रधानतया इन संगठनों पर ही निर्भर रहेगी।
जनवरी 71 से हर शाखा में, हर गाँव, मुहल्ले में अभिनव शिक्षा पद्धति के माध्यम से व्यक्ति-निर्माण तथा समाज-निर्माण की पाठशालायें चलाई जानी चाहिए पुरुषों के लिये रात्रि की महिलाओं के लिए तीसरे पहर की। अभी से अध्यापकों की नियुक्तियाँ तथा स्थान की व्यवस्था, पाठ्य पुस्तकों की खरीद का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। कोई स्थान स्थान न रहे जहाँ इन पाठशालाओं का क्रम- चल पड़ा है। कला भारती भी 1 जनवरी 71 से आरम्भ होने जा रही हैं उसके लिये मधुर कण्ठ वाले, कला प्रेमी अथवा प्रचार अभियान में रुचि लेने वाले केवल 20 छात्रों की प्रथम वर्ष में भर्ती होगी। यह छात्र उप क्षेत्र में प्रचारक का काम कर सकें ऐसी आवश्यक शिक्षा 6 महीने में दे दी जायेगी। प्रथम सत्र में अधिक उपयुक्त अधिक भावना संपन्न छात्र आ सके होते तो अधिक अच्छा होता। इसके लिये भी अपने क्षेत्रों में प्रयत्न किया जा सकता है। इस वर्ष नवम्बर 70 से लेकर अप्रैल 71 तक प्रायः छह महीने देशव्यापी प्रचार के लिये गायत्री यज्ञों से मिले हुए युग-निर्माण सम्मेलनों की व्यवस्था की गई है। उनमें से अधिकाँश में हम स्वयं पहुंचेंगे, जो लोग शिविरों में मथुरा नहीं आ सके हैं, वे उधर ही अन्तिम भेंट कर लें तो अच्छा रहेगा। समीपवर्ती आयोजनों में आने का आमंत्रण इन पंक्तियों का ही समझ लिया जाय।
अन्य भाषाओं में प्रकाश की बात इन दिनों कुछ अधिक उत्साह से की जा रही है, जिससे अन्य भाषाओं में भी मिशन का प्रचार क्षेत्र और प्रभाव क्षेत्र बढ़ सके। गुजराती की पत्रिका 1 जनवरी में प्रकाशन हो जायेगी। उसके साधन खड़े कर दिये गये हैं। मराठी और अंग्रेजी की भी पत्रिकायें इस वर्ष निकल सकीं होती तो अच्छा होता। इसके लिये उन भाषाओं से प्रेम रखने वाले सज्जनों को कहा गया है कि अपने-अपने जिम्मे कुछ ग्राहक बना देने के आश्वासन भेजें। उपर्युक्त संख्या बनती दीखी तो तुरन्त इन दो भाषाओं में भी प्रकाशन आरंभ कर दिया जायेगा। हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी में अच्छा अनुवाद कर सकने वाले व्यक्ति भी चाहिए जो मथुरा रहकर अथवा अपने घर में वह काम कर सकें।
तात्कालिक कार्य इसी प्रकार के हैं। भविष्य में युग-निर्माण योजना को व्यापक कैसे बनाया जा सकेगा इसके रूपरेखा नवम्बर, दिसम्बर के युग-निर्माण अंकों में भी बताई गई है। ऊपर तो केवल उन बातों की चर्चा है जो इन्हीं दिनों पूरी करने में, तत्काल सहयोग इन्हीं कामों में देने के लिये विशेष रूप से कहा गया है। हम अभिनव शिखा पद्धति की पाठ्य-पुस्तकें तैयार करने से लेकर अन्य भाषाओं में प्रकाशन, प्रेस, कला भारती का ढांचा खड़ा करना, देशव्यापी भ्रमण, तथा दूसरी पचासों व्यवस्थायें बनाने में जुटे रहते हैं जिनकी चर्चा छपने के रूप में आवश्यक नहीं। अपने कार्यों को हम ठीक तरह जन सहयोग से ही निपटा सकें सो उसकी चर्चा की गई है।
माता भगवती देवी जो जून से ही सप्त सरोवर हरिद्वार चली जायेंगी और वहाँ अपनी साधना में लग जायेंगी। वहाँ से वे अखण्ड-ज्योति का सम्पादन करेंगी तथा परिजनों को मार्गदर्शन एवं स्नेह प्रदान करती रहेंगी। बाप मर जाता है तो माँ बच्चों को पाल लेती है। माँ न रहे तो बाप के लिये कठिन पड़ता है। सो परिजनों को हमारे स्नेह सहयोग की आवश्यकता की पूर्ति माता जी द्वारा होती रहेगी वे अपने को एकाकी अनुभव न करेंगे।
हम 200 दिन बाद चले जायेंगे। इस बीच मिशन को मजबूत करने वाले पाये काफी गहरे जम जायेंगे। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे परिजन हमारा स्नेह, सद्भाव प्रकाश, सहयोग बराबर अपने ऊपर बरसता अनुभव करेंगे। जो हमारी भावनाओं के समीप हैं उन्हें सान्निध्य संपर्क की कमी भी अखरेगी नहीं।
जिसने मन को जीत लिया है,
उससे है सारा जग हारा!
उसका क्रोध शान्ति का स्वामी,
उसका बल जन-हित अनुगामी,
उसका हास सर्व मंगल है,
उसकी गति है जय-पथ गामी,
उसे न बन्दी कर सकती है,
स्वार्थ, अहं, वैभव की कारा!
उसके हित कुछ नहीं पराया,
उसने सबको ही अपनाया,
उस पर वरद हस्त रखती है,
कल्पवृक्ष की मोहक छाया,
उसने अपना प्रेम विश्व के,
कण-कण जन-जन में विस्तारा!
गीता उसके सुयश सुनाती,
रामायण उस पर मुसकाती,
कर देती आलोक विश्व में,
है उसके प्राणों की बाती,
ऐसा नर मेरी मञ्जिल है,
मेरा पथ मेरा ध्रुव तारा!
-विद्यावती मिश्र
*समाप्त*