अष्ट सिद्धियाँ तो उन छोटे-छोटे कीड़ों में भी वर्तमान है, जो चलते समय पैरों के नीचे दबकर मर जाते हैं। मनुष्य यदि सिद्धियाँ प्राप्त करने की बात सोचे तो असामान्य नहीं मानेंगे। वास्तव में सिद्धियाँ प्राप्त करने की नहीं, वह तो स्वभाविक गुण के रूप में आत्मा में सदैव ही विद्यमान हैं। परमात्मा ने हमें शरीर रूपी यंत्र दिया है, वह उसी की अनुभूति में प्रयुक्त होना चाहिए था पर आधार के अनुपयुक्त प्रयोग के कारण हम आत्मा के उन दिव्य गुणों के प्रकाश से वंचित रह जाते हैं। सिद्धियों की खोज में उचित साधन को भूल जाने के कारण न तो सिद्धियाँ मिल पाती हैं और न शाँति। मनुष्य बीच में ही लड़खड़ाता रहता है।
पातंजल योगसूत्र में एक जगह कहा है- ‘निमित्तमप्रयोजंक प्रकृतीनाँ वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्।’ अर्थात् जिस प्रकार खेत में पानी लाने के लिये केवल मात्र मेंड़ काट कर उसका जल-स्रोत से संबंध जोड़ देने से खेत में पानी प्रवाहित होने लगता है, उसी प्रकार जीवात्मा में पूर्णता, पवित्रता और सारी शक्तियाँ पहले से ही विद्यमान हैं। हमें शरीर और मन के भौतिक बंधनों की मेंड़ काटकर उसका संबंध भर आत्मा से जोड़ने की आवश्यकता है। एक बार यदि शरीर और मन के सुखों की ओर से ध्यान हटकर आत्मा में केन्द्रित हो जाये, तो आत्मा की संपूर्ण शक्तियाँ और विभूतियाँ जीव को एक स्वाभाविक धर्म की तरह उपलब्ध हो जाती हैं। ऐसा न करने तक उसके और सामान्य कीड़े-मकोड़ों के जीवन में किसी प्रकार का भी अन्तर नहीं।
-स्वामी विवेकानन्द
श्रीकृष्ण स्वयं भी महाभारत रोक न सके। इस बात पर महामुनि उत्तंक को बड़ा क्रोध आ रहा था। दैवयोग से भगवान श्रीकृष्ण उसी दिन द्वारिका जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम में आ पहुँचे। मुनि ने उन्हें देखते ही कटु शब्द कहना प्रारंभ किया- आप इतने महाज्ञानी और सामर्थ्यवान होकर भी युद्ध नहीं रोक सके। आपको उसके लिये शाप दे दूँ तो क्या यह उचित न होगा?
भगवान कृष्ण हंसे और बोले- महामुनि! किसी को ज्ञान दिया जाये, समझाया-बुझाया और रास्ता दिखाया जाये तो भी वह विपरीत आचरण करे, तो इसमें ज्ञान देने वाले का क्या दोष? यदि मैं स्वयं ही सब कुछ कर लेता, तो संसार के इतने सारे लोगों की क्या आवश्यकता थी?
मुनि का क्रोध शाँत न हुआ। लगता था वे मानेंगे नहीं- शाप दे ही देंगे। तब भगवान कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाकर कहा-महामुनि! मैंने आज तक किसी का अहित नहीं किया। निष्पाप व्यक्ति चट्टान की तरह सुदृढ़ होता है। आप शाप देकर देख लें, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। हाँ, आपको किसी वरदान की आवश्यकता हो तो हमसे अवश्य माँग लें।
उत्तंक ने कहा- तो फिर आप ऐसा करें कि इस मरुस्थल में भी जल-वृष्टि हो और यहाँ भी सर्वत्र हरा-भरा हो जाये। कृष्ण ने कहा ‘तथास्तु’ और वहाँ से आगे बढ़ गये।
महामुनि उत्तंक एक दिन प्रातःकालीन भ्रमण में कुछ दूर तक निकल गये। दिन चढ़ते ही धूल भरी आँधी आ गई और मुनि मरुस्थल में भटक गये। जब मरुद्गणों का कोप शाँत हुआ, तब उत्तंक ने अपने आपको निर्जन मरुस्थल में पड़ा पाया। धूप तप रही थी, प्यास के मारे उत्तंक के प्राण निकलने लगे।
तभी महामुनि उत्तंक ने देखा-चमड़े के पात्र में जल लिये एक चाँडाल सामने खड़ा है और पानी पीने के लिए कह रहा है। उत्तंक उत्तेजित हो उठे और बिगड़ कर बोले-शूद्र! मेरे सामने से हट जा, नहीं तो अभी शाप देकर भस्म कर दूँगा। चाँडाल होकर तू मुझे पानी पिलाने आया है।
उन्हें साथ-साथ कृष्ण पर भी क्रोध आ गया। मुझे उस दिन मूर्ख बनाकर चले गये। पर आज उत्तंक के क्रोध से बचना कठिन है।
जैसे ही शाप देने के लिए उन्होंने मुख खोला कि सामने भगवान श्रीकृष्ण दिखाई दिये। कृष्ण ने पूछा- नाराज न हों महामुनि! आप तो कहा करते हैं कि आत्मा ही आत्मा है, आत्मा ही इन्द्र और आत्मा ही साक्षात परमात्मा है। फिर आप ही बताइये कि इस चाँडाल की आत्मा में क्या इन्द्र नहीं थे? यह इन्द्र ही थे, जो आपको अमृत पिलाने आये थे, पर आपने उसे ठुकरा दिया। बताइये, अब मैं आपकी कैसे सहायता कर सकता हूँ। यह कहकर भगवान कृष्ण भी वहाँ से अदृश्य हो गये और वह चाण्डाल भी।
मुनि को बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि जाति, कुल और योग्यता के अभिमान में डूबे हुए मेरे जैसे व्यक्ति ने शास्त्र-ज्ञान को व्यावहारिक नहीं बनाया, तो फिर यदि कौरवों-पाँडवों ने श्रीकृष्ण की बात को नहीं माना तो इसमें उनका क्या दोष? महापुरुष केवल मार्ग दर्शन कर सकते हैं। यदि कोई उस प्राप्त ज्ञान को आचरण में न लाये और यथार्थ लाभ से वंचित रहे, तो इसमें उनका क्या दोष?
धर्म मनुष्यों को एक-दूसरे से अलग करने के लिये नहीं, बल्कि उनको बाँधने के लिये होता है। जो धर्म भेदभाव सिखाता है, वह असली नहीं हो सकता।
-डे बुक आफ थाट्स
संभव है संसार के किसी और भाग में भी अब ऐसे गुलाब के पौधे हों जिनमें काँटे न हों, बेर हों पर उनमें भी काँटे न हों, कुमुदिनी हो पर दिन में भी खिलती हो, अखरोट के वृक्ष हों जो 32 वर्ष की अपेक्षा 16 वर्ष में ही अपनी सामान्य ऊँचाई से भी बड़े होकर अच्छे फल देने लगते हों। पर वे होंगे अमेरिका के कैलिफोर्निया में विशेष रूप से तैयार किये गये पौधों की ही सन्तान। कैलिफोर्निया में यह पौधे किसी वनस्पति शास्त्री या किसी ऐसे शोध-संस्थान द्वारा तैयार नहीं किये गये। उसका श्रेय एक अमेरिकन सन्त लूथर बरबैंक को है, जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में प्रेम योग का अभ्यास किया और यह सिद्ध कर दिया कि प्रेम से प्रकृति के अटल सिद्धाँतों को भी परिवर्तित किया जा सकता है। यह पौधे और कैलिफोर्निया का लूथर बरबैंक का यह बगीचा उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
एक बार एक सज्जन इस बाग से एक बिना काँटों वाला ‘सेहुँड़’ लेने गये ताकि उसे अपने खेत के किनारे-किनारे थूहड़ के रूप में रोप सकें। अमेरिका क्या सारी दुनिया भर में संभवतः यही वह स्थान था जहाँ सेहुँड़ बिना काँटों के थे। बाग का माली खुरपी लेकर डाल काटने चला तो दूर से ही लूथर बरबैंक ने मना किया, बोले- आपसे काटते नहीं बनेगा। लाओ, मैं काट देता हूँ। यह कहकर खुरपी उन्होंने अपने हाथ में ले ली और बोले-माना कि यह पौधे हैं, इनमें जीवन के लक्षण प्रतीत नहीं होते तथापि यह भी आत्मा हैं और प्रत्येक आत्मा प्रेम की प्यासी भावनाओं की भूखी होती है। हम संसार को कुछ नहीं दे सकते, तो प्रेम और करुणाशील भावनाएं तो प्रदान कर ही सकते हैं। कदाचित मनुष्य इतना सीख जाये तो संसार में सुख-शाँति का पारावार न रहे।
बरबैंक सेहुँड़ के पास बैठकर खुरपी से सेहुँड़ की डाल काटते जाते थे, पर उनकी उस क्रिया में भी कितनी आत्मीयता और ममत्व झलकता था यह देखते ही बनता था, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को कई बार दण्ड भी देती है पर परोक्ष में उसका हित और मंगल भाव ही उसके हृदय में भरा रहता है, वैसे ही बरबैंक सेहुँड़ को काटते जाते थे और भावनाओं का एक सशक्त स्पंदन भी प्रवाहित करते जाते थे- ऐ पौधे! तुम यह न समझना कि हम तुम्हें काट कर अलग कर रहे हैं। हम तो तुम्हारे और अधिक विस्तार की कामना से विदा कर रहे हैं। यहाँ से चले जाने के बाद भी तुम मुझसे अलग नहीं होगे। तुम मेरे नाम के साथ जुड़े हो, तुम मेरी आत्मा के अंग हो। माना लोक-कल्याण के लिये तुम्हें यहाँ से दूर जाना पड़ रहा है, पर तुम मेरे जीवन का अभिन्न अंग हो। जहाँ भी रहोगे हम तुम्हें अपने समीप ही अनुभव करेंगे-ऐसी भावनाओं के साथ बरबैंक ने सेहुँड़ की दो-तीन डालें काट दीं और आगन्तुक को दे दीं, आगन्तुक उन्हें ले गया। इस तरह से बाग की सैंकड़ों पौध सारी दुनिया में फैली और बरबैंक के नाम से विख्यात होती गईं।
यह कोई गल्प-कथा नहीं वरन् एक ऐसा तथ्य है जिसने सारे योरोप के वैज्ञानिकों को यह सोचने के लिये विवश कर दिया कि क्या सचमुच ही भावनाओं के द्वारा पदार्थ के वैज्ञानिक नियम भी परिवर्तित हो सकते हैं?
जिस तरह भारतवर्ष में इन दिनों नेहरू गुलाब, शास्त्री गेहूँ आदि नामों से पौधों अन्नों की विशेष नस्लें कृषि विशेषज्ञ वैज्ञानिक अनुसंधान से तैयार कर रहे हैं उसी प्रकार बरबैंक पोटेटो (आलू), बरबैंक स्क्वैश, बरबैंक चेरी, बरबैंक रोज, बरबैंक वालनट (अखरोट) आदि सैंकड़ों पौधों, फलों, सब्जियों तथा अन्नों की नस्लें बरबैंक के नाम से प्रचलित हैं। इन्हें बरबैंक ने तैयार किया यह सत्य है पर किसी वैज्ञानिक पद्धति से नहीं, यह उससे भी अधिक सत्य है। यह सब किस तरह संभव हुआ उसका वर्णन स्वयं लूथर ने अपने शब्दों में ‘दि ट्रेनिंग आफ ह्यूमन प्लान्ट’ नामक पुस्तक में निम्न प्रकार लिखा है। यह पुस्तक न्यूयार्क की सेंचुरी कं. से 1922 में प्रकाशित हुई है। लूथर लिखते हैं-
‘आत्म-चेतना के विकास के साथ मैंने अनुभव किया कि संसार का प्रत्येक परमाणु आत्मामय है। जीव जन्तु ही नहीं वृक्ष-वनस्पतियों में भी वही एक आत्मा प्रभासित हो रहा है-यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। मैं वृक्षों की प्रकृति पर विचार करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इनमें जो काँटे हैं वह इनके क्रोध और रुक्षता के संस्कार हैं। संभव है लोगों ने इन्हें सताया, कष्ट दिया, इनकी आकाँक्षाओं की ओर ध्यान नहीं दिया। इसीलिये ये इतने सुन्दर फूल-फल देने के साथ ही काँटे वाले भी हो गये।
यदि ऐसा है तो क्या इन्हें प्रेम और दुलार देकर सुधारा भी जा सकता है? ऐसा एक कौतूहल मेरे मन में जागृत हुआ। मैं देखता हूँ कि सारा संसार ही प्रेम का प्यासा है। प्रेम के माध्यम से किसी के भी जीवन में परिवर्तन और अच्छाइयां उत्पन्न की जा सकती हैं, तो यह प्रयोग मैंने पौधों पर करना प्रारंभ किया।
गुलाब का एक छोटा पौधा लगाया तब उसमें एक भी काँटा नहीं था। मैं उसके पास जा बैठता, मेरे अन्तःकरण से भावनाओं की शक्त तरंगें उठतीं और पास के वातावरण में विचरण करने लगतीं। मैं कहता मेरे प्यारे बच्चे, मेरे गुलाब, लोग फूल लेने इस दृष्टि से नहीं आते कि तुम्हें कष्ट दें। वैसे भी तो तुम्हारा सौंदर्य, तुम्हारी सुवास विश्वकल्याण के लिये ही है। जब दान और संसार की प्रसन्नता के लिये उत्सर्ग ही तुम्हारा ध्येय है तो फिर यह काँटे तुम क्यों उगाते हो। तुम अपने काँटे निकालना और लोगों को अकारण कष्ट देना भी छोड़ दो, तो फिर देखना कि संसार तुम्हारा कितना सम्मान करता है। अपने स्वभाव की इस मलिनता और कठोरता को निकाल कर एक बार देखो तो सही कि यह सारा संसार ही तुम्हें हाथों ही हाथों उठाने के लिये तैयार है या नहीं।
गुलाब से मेरी ऐसी बातचीत प्रतिदिन होती। भावनायें अन्तःकरण से निकलें और वह खाली चली जायें, तो फिर संसार में ईश्वरीय अस्तित्व को मानता ही कौन? गुलाब धीरे-धीरे बढ़ने लगा। उसमें सुडौल डालियाँ फूटीं, चौड़े-चौड़े पत्ते निकले और पाव-पाव भर के हंसते-इठलाते फूल भी निकलने लगे, पर उसमें क्या मजाल कि एक भी काँटा आया हो। आत्मा को आत्मा प्यार से कुछ कहे और वह उसे ठुकरा दे- ऐसा संसार में कहीं हुआ नहीं, फिर भला बेचारा नन्हा-सा पौधा ही अपवाद क्यों बनता। उसने मेरी बात सहर्ष मान ली और मुझे सन्तोष हुआ कि मेरे बाग का गुलाब बिना काँटों का था।
अखरोट का धीरे-धीरे बढ़ना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने उसे पानी उतना ही दिया, खाद उतनी ही दी निकाई और गुड़ाई में भी कोई अन्तर नहीं आने दिया, फिर ऐसी क्या भूल हो गई, जो अखरोट 32 वर्ष में ही बढ़ने की हठ ठान बैठा। मैंने समझा इसे भी किसी ने प्यार नहीं दिया।
मैंने उसे सम्बोधित कर कहा-मेरे बच्चे! तुम्हारे लिये हमने सब जुटाया, क्या उस कर्त्तव्यपरायणता में जो तुम्हारे प्रति असीम प्यार भरा था, उसे तुम समझ नहीं सकते। तुम मेरे बच्चे के समान हो, तुम्हें मैं अलग अस्तित्व दूँ ही कैसे? हम तुम एक ही तो हैं। आज माना कि दो रूपों में खड़े हैं, पर एक दिन तो यह अन्तर मिटेगा ही। क्या हम उस आत्मीयता को अभी भी स्थायित्व प्रदान नहीं कर सकते? तुम उगो और जल्दी उगो, ताकि संसार में अपने ही तरह की और जो आत्मायें हैं, उनकी कुछ सेवा कर सकें।
जीवन का नियम यदि प्रेम न होता, तो मृत्यु के बीच में जीवन कभी टिक नहीं सकता था।
-महात्मा गाँधी
अखरोट बढ़ने लगा और 16 वर्ष की आधी आयु में ही अच्छे-अच्छे फल देने लगा। इसी तरह कद्दू, आलू, नेक्टारीनेस, बेरीज, पापीज आदि सैंकड़ों पौधों पर प्रयोग कर श्री बरबैंक ने उन्हें प्रकृति के समान गुणों से पृथक गुणों वाले पौधों के रूप में विकसित कर यह दिखा दिया कि प्रेम ही आत्मा की सच्ची प्यास है। जिस प्रकार हम स्वयं और से प्रेम चाहते हैं वैसे ही बिना किसी आकाँक्षा के दूसरों को प्रेम लुटाने का अभ्यास कर सके होते, तो आज सारा संसार ही सुधरा हुआ दिखाई देता। प्रेम का सिद्धाँत ही एकमात्र वह साधन है जिससे छोटे-छोटे बच्चों से लेकर पारिवारिक जीवन और पास-पड़ोस के लोगों से लेकर सारे समाज, राष्ट्र और विश्व को भी वैसे ही सुधारा और संवारा जा सकता है जैसे बरबैंक ने पेड़-पौधों को विलक्षण रूप से संवारकर दिखा दिया।
श्री बरबैंक ने श्री योगानन्द नामक भारतीय योगी से क्रिया योग की दीक्षा ली थी। उसका निधन 1926 में हुआ, तब लोगों के मुख से एक ही शब्द निकला था- प्रेम-प्रयोगी का निधन सारे विश्व की क्षति है, वह कभी पूरी नहीं हो सकती।
श्री बरबैंक तत्वदृष्टा थे। प्रेम का अभ्यास उन्होंने पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तक से करके ही आत्मानुभूति प्राप्त की थी। उसी से वे सिद्ध हो गये थे। उनकी भविष्यवाणियाँ बहुत महत्वपूर्ण होती थीं। लन्दन से प्रकाशित होने वाली ‘ईस्ट और वेस्ट’ पत्रिका में उन्होंने ‘साइंस एण्ड सिविलाइजेशन’ नाम से लेख प्रकाशित किया। उसमें लिखा था-
संसार को सुधारने की शक्ति पूर्व में केवल भारतवर्ष के पास है। पश्चिमी देशों को वहाँ की योग-क्रिया और प्राणायाम की विधियाँ सीखने के साथ प्रेम, दया, करुणा, उदारता, क्षमा, मैत्री के भाव भी सीखने और आत्मसात करने चाहिएं। मैं देख रहा हूँ कि भारतवर्ष उसके लिये अपने आपको तैयार कर रहा है और एक दिन सारे संसार को ही उसके कदमों में झुककर जीवन जीने की शुद्ध पद्धति और आत्म विज्ञान सीखना पड़ेगा, इससे ही संसार का कुछ वास्तविक भला होगा।
1948 में लन्दन के एसोसियेटेड प्रेस में एक सामुख्य में भी उन्होंने भावना योग की महत्ता पर प्रकाश डाला था और कहा था-शीघ्र ही भारतवर्ष में कुछ ऐसे लोगों का उदय होगा जो फिर से सारे संसार को मानवता का पाठ सिखायेंगे। उसमें परस्पर प्रेम और आत्मीयता की भावना प्रमुख होगी। उसी से संसार का सुधार होगा, उसी से सुख समृद्धि की वृद्धि भी होगी।
कुछ व्यक्ति एक वट वृक्ष के नीचे बैठे वार्तालाप कर रहे थे। सभी दुनिया के झंझटों से परेशान होकर भाग आये थे और साधु होने जा रहे थे। तब एक ने कहा- ‘अपन सब मिलकर जंगल में रहेंगे और तपस्या करेंगे। लेकिन यह सोचो कि जब ईश्वर वरदान माँगने को कहेगा तो माँगेंगे क्या?’
दूसरे ने कहा- ‘अन्न मांगेंगे। उसके बिना जीवित रहना संभव नहीं।’
तीसरे ने कहा- ‘बल माँगेंगे। बल के बिना सभी कुछ निरर्थक है।’
चौथे ने कहा- ‘बुद्धि माँगना ज्यादा उचित है। बुद्धि की आवश्यकता प्रत्येक कार्य को करने से पूर्व होती है।’
तब पाँचवाँ बोला- ‘ये सब वस्तुएं तो साँसारिक हैं। आत्म-शाँति माँगेंगे, जो अन्तिम लक्ष्य है मनुष्य का।’
तब पहले व्यक्ति ने कहा- ‘तुम सब मूर्ख हो। क्यों न हम स्वर्ग ही माँग लें। वहाँ समस्त उपलब्धियाँ एक साथ ही हो जायेंगी।’
तब विशाल वट वृक्ष ठहाका लगाता हुआ बोला- ‘मेरी बात मानो, तुम लोगों से न तपस्या होगी न उपलब्धियाँ प्राप्त होंगी। क्योंकि यदि इतना ही मनोबल होता तो संसार से घबरा कर न भागते। बिना माँगे ही मैं एक वरदान देता हूँ तुम्हें। उसका नाम है प्रेम- प्राणिमात्र से प्रेम करो। फिर देखो, जो वस्तु चाहोगे वही प्राप्त करने की क्षमता आ जायेगी। यह सुनकर वे उठकर अपने-अपने घर चले गये और विश्व-मानव की सेवा में जुट गये।
एम्सटरडम (हालैण्ड) के एक स्कूल में वहाँ के प्रिंसिपल की लड़की मितगोल के साथ हाला नाम की एक ग्रामीण कन्या की बड़ी मित्रता थी। हाला देखने में बड़ी सुन्दर थी, मितगोल विद्वान। दोनों में समीपी संबंध था और परस्पर स्नेह भी। इसलिये वे प्रायः एक दूसरे से मिलतीं और पिकनिक पार्टियाँ मनाया करतीं।
एक बार की बात है कि दोनों सहेलियाँ कार से कहीं जा रही थीं। सामने से आ रहे किसी भार-वाहक से बचाव करते समय कार एक विशालकाय वृक्ष के तने से जा टकराई। भीतर बैठी दोनों सहेलियों में से मितगोल को तो भयंकर चोटें आयीं, उसका सम्पूर्ण शरीर क्षत-विक्षत हो गया और कार से निकालते-निकालते उसका प्राणाँत हो गया। हाला के शरीर में यद्यपि बाहर कोई घाव नहीं थे तथापि अन्दर कहीं ऐसी चोट लगी कि उसका भी प्राणाँत वहीं हो गया। दोनों शव बाहर निकाल कर रखे गये। तभी एकाएक एक विलक्षण घटना घटित हुई। जैसे किसी ने शक्ति लगाकर हाला के शरीर में प्राण प्रविष्ट करा दिये हों, वह एकाएक उठ बैठी और प्रिंसिपल को पिताजी कह कर लिपटकर रोने लगी। सब लोगों ने उसे धैर्य दिलाया, पर सब आश्चर्यचकित थे कि यह किसान की कन्या प्रिंसिपल साहब को अपना पिता कैसे कहती है। उनकी पुत्री मितगोल का शरीर तो अभी भी क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा हुआ था।
उसका नाम-हाला कहकर जब उसे सम्बोधित किया गया तो उसने बताया-पिताजी! मैं हाला नहीं, मैं तो आपकी कन्या मितगोल हूँ। मैं अभी तक (शव की ओर इशारा करते हुए) इस शरीर में थी। अभी-अभी किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे हाला के शरीर में डाल दिया है।
अनदेखी, अनहोनी इस घटना का जितना विस्तार होता गया, लोगों का कौतूहल उतना ही बढ़ता गया। लोग तरह-तरह के प्रश्न पूछते और कन्या उनका ठीक वही उत्तर देती जिनकी मितगोल को ही जानकारी हो सकती मितगोल की कई सहेलियाँ, संबंधी आये आये और उससे बातचीत की। उन सब वार्ताओं में हाला के शरीर में प्रविष्ट चेतना ने ऐसी-ऐसी एकान्त की और गुप्त बातें तक बता दीं, जो केवल मितगोल ही जानती थी।
एक अन्तिम रूप से यह निश्चित करने के लिए कि हाला के शरीर में विद्यमान आत्म-चेतना क्या वस्तुतः मितगोल ही है- वहाँ के वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों, अध्यापकों और प्रिंसिपल सहित सैंकड़ों छात्रों के बीच खड़ा कर उस कन्या से ‘स्पिनोजा के दर्शन शास्त्र’ पर व्याख्यान देने को कहा गया। उल्लेखनीय है कि वह मितगोल ही थी जिसे ‘स्पिनोजा के दर्शनों’ जैसे गूढ़ विषय पर अधिकार प्राप्त था। गाँव की सरल कन्या बेचारी हाला स्पिनोजा तो क्या अच्छी कविता भी बोलना नहीं जानती थी। किन्तु जब यह बालिका स्टेज पर खड़ी हुई तो उसने ‘स्पिनोजा के तत्वज्ञान’ पर भाषण देकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। प्रिंसिपल साहब ने स्वीकार किया कि उसके शब्द, बोलने का ढंग हाव-भाव ज्यों-के-त्यों मितगोल के जैसे ही हैं, इसलिए वह मितगोल ही हैं, भले ही इस घटना का अद्भुत रहस्य हम लोगों की समझ में न आता हो।
पुनर्जन्म, मृत्यु और उसके कुछ ही समय बाद जीवित होकर कई-कई वर्ष तक जीवित रहने की सैंकड़ों घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं और उनसे यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि आत्म-चेतना पदार्थ से कोई भिन्न अस्तित्व है, फिर भी मनुष्य साँसारिक मोह-वासनाओं और तरह-तरह की महत्वाकाँक्षाओं में इतना लिप्त हो चुका है कि उसे इस ओर ध्यान देने और एक अति महत्वपूर्ण तथ्य को समझ कर आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने की भी प्रेरणा नहीं मिलती। महाराज युधिष्ठिर के शब्दों में इसे संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य ही कहना चाहिए।
कुछ समय पूर्व जब वैज्ञानिक यह मानते थे कि जीवन या चेतना शरीर बनाने वाले कोशों (सेल्स-शरीर का वह छोटे-से-छोटा टुकड़ा जिसमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद हों) की रासायनिक चेतना के अतिरिक्त कुछ नहीं है, पर सजीव और निर्जीव कोशों (सेल्स के विस्तृत अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों की उक्त धारणा भी नष्ट हो चुकी है और अब जो सिद्धाँत सामने आये हैं वह इस बात के साक्षी हैं कि मनुष्य के शरीर में भरी हुई चेतनता को स्थिर रखने में कोशों की रासायनिक प्रक्रिया सहायक तो हो सकती है पर वही आत्म-चेतना हो, यह नितान्त भ्रममूलक है।
जीवित कोश जिस रासायनिक पदार्थ से बने होते हैं उसे ‘प्रोटोप्लाज्मा’ कहते हैं। पर कोश का संपूर्ण भाग प्रोटोप्लाज्म ही नहीं होता। प्रोटोप्लाज्म एक प्रकार का तरल द्रव होता है, वह एक स्थान पर कुछ गाढ़ा और कुछ कड़ा-सा हो जाता है। इस स्थान से ही ‘प्रोटोप्लाज्म’ में रासायनिक हलचल के लिये स्पन्दन निकलते रहते हैं। यह कहना चाहिए कि प्रोटोप्लाज्म का जीवन इस केन्द्रक पर आधारित है। इस केन्द्रक (न्यूक्लियस) के बीच में एक और गोला होता है, उसे केन्द्रिका (न्यूक्लियस) कहते हैं। इसके अतिरिक्त कोश में आकर्षण मण्डल, आकर्षण बिन्दु, कोशिका आवरण और शून्य स्थान (वैक्युओल) भी होते हैं। पर मुख्य रूप से सम्पूर्ण कोश में यह केन्द्रक ही चेतना का मूल बिन्दु है। एक कोशीय जीव अमीबा के विस्तृत अध्ययन से पता चल गया है कि 1. गति (मूवमेंट)2. उत्तेजनशीलता (इरिटबिलिटी) 3. पोषण (न्यूट्रिशन) और स्वाँगीकरण (एस्सिमिलेशन) 4. वृद्धि(ग्रोथ) 5. उत्सर्जन (एक्स्क्रेशन) तथा 6. जनन (रिप्रोडक्शन) यह 6 क्रियाएं केन्द्रक की इच्छा और स्पन्दन के ही परिणाम हैं। सामान्यतः इन 6 क्रियाओं के आधार पर ही मनुष्य को भी जीवित माना जाता है। केन्द्रीय रूप से शरीर की यह क्रियायें समाप्त हो जाती हैं तो मनुष्य की मृत्यु हो गई मान ली जाती है।
इन 6 क्रियाओं को समझ लेना आवश्यक है।
(1) गति-अमीबा को देखने से पता चलता है (सूक्ष्मदर्शी से यह सब देख पाना संभव है) कि अमीबा (जीव के रूप में एक जीवित और स्वतंत्र कोश) अपने प्रोटोप्लाज्म की थैली में से उंगली की तरह का कुछ हिस्सा बाहर निकलता रहता है और जिधर यह भाग निकल पड़ता है उधर ही अमीबा चल पड़ता है। मनुष्य शरीर-रचना जिस पुरुष बीज कोश (स्पर्म) और नारी के रज (ओवम) से मिलकर होती है वह कोश अपना विस्तार यद्यपि एक निश्चित सिद्धाँत पर करता हुआ शरीर के निश्चित बनावट वाले अंग-प्रत्यंग बनाता है पर उनकी विकास गति भी ठीक इसी सिद्धाँत पर काम करती है।
(2) उत्तेजनशीलता का अर्थ है अनुभूति या तन्मात्रा। मनुष्य-शरीर में यह काम नाड़ियाँ (अफरेन्ट एण्ड इफरेन्ट नर्व्स) करती हैं। पर यह नाड़ी मण्डल शरीर के सम्पूर्ण कोशों में छाया हुआ है अर्थात् प्रत्येक कोश में अमीबा के समान ही उत्तेजनशीलता होती है। अमीबा के शरीर के निकट गर्म आग, ठण्डी बर्फ, विद्युत, अम्ल, कोई वस्तु लाई जाये तो वह तुरन्त पीछे भागता है। इसी गुण का नाम उत्तेजनशीलता है। शरीर में यह क्रिया झटके से उस संकट से हाथ हटाने जैसी होती है। हमारे शरीर के किसी अंग में काँटा चुभ जाये तो इसी गुण के आधार पर मस्तिष्क को सूचना पहुँचती है। देखने में यह दर्द उंगली या शरीर के किसी भी हिस्से में होगा पर उसका अनुभव मस्तिष्क कर रहा होगा अर्थात् मस्तिष्क वाली चेतना सारे शरीर में प्रत्येक कोश के केन्द्रक की तरह स्थित होकर काम करती है।
मैं तो शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप सदाकाल अमूर्त एक शुद्ध शाश्वत तत्व हूँ। परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा नहीं है। आत्मदृष्टा ऐसे ही विचार करता है।
-आचार्य कुन्दकुन्द (समयसार 38)
(3) पोषण और स्वाँगीकरण का अर्थ है भोज्य पदार्थ को ग्रहण करना और उसे आत्मसात करके शरीर को शक्ति देना। अमीबा प्रोटोप्लाज्म से दो चोंचें सी निकाल कर करता है। शरीर में भी पाचन क्रिया यद्यपि पेट में होती सी प्रतीत होती है पर जिस तरह अमीबा ऑक्सीजन के सहयोग से भोजन किये हुए को प्रोटोप्लाज्म में बदलता है उसी प्रकार पाचन संस्थान की सहायता से वह अन्न ही क्रमशः रस, रक्त, वीर्य, ओज में परिवर्तित होकर सारे शरीर में आत्मसात होता रहता है।
(4) उत्सर्जन-पाचन की तरह मल-विसर्जन की क्रिया का नाम है। यह क्रिया अमीबा भी करता है और मल-मूत्र, थूक, पेशाब, पसीने के रूप में मनुष्य का शरीर भी।
(5) वृद्धि का गुण भी शरीर के कोशों में ठीक अमीबा की तरह ही होता है। जिस प्रकार भोजन से अमीबा का प्रोटोप्लाज्म बढ़ता है उसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी। और अन्तिम-
(6) जनन की क्रिया भी एक अमीबा से केन्द्रक (न्यूक्लियस) सहित प्रोटोप्लाज्म के दो हिस्सों में बंट जाने के रूप में 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8 इस क्रम में होती रहती है। मनुष्य शरीर में भी कोश (सेल्स) ऐसे ही बढ़ते हैं और निश्चित आकार-प्रकार वाले अंग बनाते हैं।
जब तक कोशों में यह क्रिया चलती रहती है तब तक शरीर जीवित माना जाता है। किन्तु मृत्यु घोषित हो जाने के बाद भी यह क्रियाएं कुछ देर तक चलती रहती हैं। शरीर की सड़न, दुर्गन्ध, बालों का बढ़ना जैसे लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि शरीर की रासायनिक प्रक्रिया मृत्यु के बाद तब तक चलती रहती है, जब तक शरीर पूर्णतया सड़-गल कर नष्ट नहीं हो जाता। इसलिये चेतना को रासायनिक प्रक्रिया न मानकर एक स्वतंत्र सत्ता ही माना जा सकता है।
इसका प्रमाण जीवित और निर्जीव कोशिका में स्पष्ट अन्तर से व्यक्त होता है। जब तक मनुष्य जिन्दा रहता है, तब तक प्रोटोप्लाज्म अत्यन्त कोमल, लसदार और निरन्तर अपना रूप बदलता रहता है-कभी फेन की तरह दिखाई देता है कभी मरुस्थल की चमक के समान। किन्तु मृत अवस्था में उसकी वह चमक समाप्त हो जाती है और वह उबले हुए अण्डे की सफेदी के समान हो जाता है। इस अन्तर के कारण ही वैज्ञानिक भी असमंजस में है और वह भी पूर्णतया यह मानने को तैयार नहीं होते कि शरीर की रासायनिक क्रिया ही जीवन है।
इसके विपरीत सन्त हरदास जैसे योगियों ने समाधि लगाकर यह सिद्ध कर दिया है कि चेतना एक स्वतंत्र अस्तित्व है और उसे ऐच्छिक ढंग से शरीर से निकाला और प्रविष्ट कराया जा सकता है। इसका एक और उदाहरण है- इंग्लैंड के कर्नल टाउनशेंड। उन्होंने अपनी इच्छा-शक्ति पर इतना तीव्र नियंत्रण प्राप्त किया था कि वे जब भी चाहते थे, अपने प्राण शरीर से निकाल लेते थे और कुछ देर बाहर रहकर फिर उसमें प्रवेश कर जाते थे। इसी आधार पर उन्होंने जीवन को शरीर की रासायनिक प्रक्रिया से भिन्न अस्तित्व प्रतिपादित किया था।
एक बार तीन सरकारी सर्जनों के सम्मुख उन्होंने प्रयोग किया। अपने शरीर से उन्होंने सारी चेतना को समेट लिया। इसके बाद डाक्टरों ने सारी परीक्षाएं कर लीं और शरीर को पूर्ण मृत पाया। हृदय, नाड़ी, रक्त-संचालन की सारी क्रियायें बंद हो गईं। शरीर बिलकुल ठण्डा पड़ गया। थोड़ी देर बाद वे फिर अपने शरीर में आ गये और फिर शरीर अपनी सामान्य गति में आ गया। यह डाक्टरों के सामने एक चुनौती थी। उन्हें मानना ही पड़ा कि जीवात्मा सचमुच ही शरीर से पृथक कोई अन्य तत्व है। जिस बात को योगवसिष्ठ इस तरह कहता है-
मरणं सर्वनाशात्म न कदाचन विद्यते।
(6।2।1।81)
मृतो नष्ट इति प्रोक्तो मन्ये तच्च मृषा ह्यसत्।
(5।71।64)
स देशे कालान्तरितो भूत्वा भूत्वानुभूपते।
(5।71।67)
अर्थात् ऐसा मानना कि मरा हुआ प्राणी नष्ट हो गया-बिलकुल झूठ है। मृत्यु से सर्वनाश नहीं होता, केवल शरीर मरता है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे देश, काल और सृष्टि के अनुभव में चला जाता है।
भारतीय दर्शन और शास्त्रों के इस महत्वपूर्ण सिद्धाँत का प्रतिपादन उपरोक्त घटनायें और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ भी करती हैं। इतना समझकर भी यदि कोई आत्म-कल्याण जैसी महत्वपूर्ण जीवन की आवश्यकता की उपेक्षा करे तो उसे क्या कहा जा सकता है?
‘संसार में जो कुछ भी है वह सापेक्ष है। 1. समय या काल (टाइम) 2. ब्रह्माँड (स्पेश) 3. गति (मोशन) और 4. कारण (काजेशन)- नाम की कोई मूल वस्तुयें नहीं हैं वरन् यह परस्पर तुलनायें हैं, जो ज्ञान,भावना, विचार या अनुभूति में सन्निहित हैं।’
समय क्या है?- कोई घटना प्रारंभ होती है, फिर वह कहीं-न-कहीं जाकर समाप्त होती है। इन दोनों की अनुभूति के अन्तर का नाम समय है। 2. चन्द्रमा कोई स्वतंत्र ब्रह्माँड नहीं । जिस तरह अनेक प्रकार के तत्वों से पृथ्वी बनी है, वैसे ही तारामण्डल के समस्त तारागण पदार्थ से बने हैं। इन सब के बीच समान वस्तुओं में आकर्षण का सिद्धाँत काम करता है। इसलिये प्रत्येक ब्रह्माँड में दूसरे की तुलना में कुछ तत्व अधिक, कुछ कम होते हैं। पृथ्वी में धूलि के कण अधिक हैं, सूर्य में हीलियम अथवा अग्नि के। परमाणुओं की तुलना में ब्रह्माँडों की स्थिति का पता चलता है। यदि परमाणुओं में समान-जातीय गठबंधन न होता तो ब्रह्माँड ही नहीं पदार्थों की भी अनुभूति नहीं होती। 3. इसी प्रकार गति भी सापेक्ष है। कलकत्ते से हवाई जहाज उड़ता है और लन्दन तक पहुँचने में 36 घण्टे लेता है। यह हमारी पार्थिव माप है। यदि हम सूर्य में बैठे हुए हों, तो चूँकि सूर्य भी अपने सौर मण्डल को लेकर चल रहा है, इसलिये वहाँ की गति भी हमें प्रभावित करेगी। तब यह 36 घण्टे का समय हमें आँच मिचकने जितना कम लगेगा।
ऐसे 4 कारण सिद्धाँत भी हैं। अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि संसार में जो भी पदार्थ हैं वह सब शक्ति हैं और संगठित होकर पदार्थ बनाने वाले प्रोटानों एवं इलेक्ट्रानों की संख्या यदि कम या अधिक की जा सके, जो कि प्रकृति में अपने आप होता रहता है, तो एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में भौतिक रूप से भी बदलकर दिखाया जा सकता है। उदाहरण के लिये आवर्ती सारणी (पीरियाडिक टेबल) में इरीडियम, प्लैटिनम, गोल्ड (सोना) और मरकरी (पारा) का परमाणु क्रमाँक या प्रोटानों की संख्या क्रमशः 77, 78, 79 और 80 होती है। यदि 80 प्रोटानों वाले मरकरी (पारा) परमाणु से एक प्रोटोन कम कर दें तो वही परमाणु सोने का परमाणु हो जायेगा। अब यदि उसमें से भी एक प्रोटान निकाल बाहर करें तो वही सोना प्लैटिनम में, प्लेटिनम इरीडियम में, इरीडियम क्रमशः ओस्मियम, रीनियम, टंगस्टन आदि में बदलते-बदलते हाइड्रोजन तक अर्थात् कुल एक प्रोटोन वाले सबसे हल्के तत्व में बदल जायेगा।
हाइड्रोजन से भी हल्का कोई तत्व संसार में है, यह वैज्ञानिकों को ज्ञात नहीं। इन तत्वों की मूल स्थिति ही सर्वोच्च कारण होनी चाहिए जैसा कि ऊपर के विश्लेषण से पता चलता है। पर वैज्ञानिक उसे अन्तिम रूप से स्थिर नहीं कर सके।
यहाँ तक जो कुछ लिखा गया वह आइन्स्टीन के सापेक्ष सिद्धाँत का खुलासा मात्र है। इससे सृष्टि की विकास प्रक्रिया की गहराई में प्रवेश करने का बहुत-सा मसाला मिल जाता है। सच कहा जाये तो महावैज्ञानिक आइन्स्टीन ने भारतीय तत्व दर्शन की भौतिक सीमायें पार कर ली थीं, पर भाव-दर्शन की उन्हें जानकारी थी नहीं अन्यथा लोग देखते कि संपूर्ण विज्ञान भारतीय अध्यात्मवाद पर ही उतर आया है।
1922 में सोवियत वैज्ञानिक अलेक्सान्देर फ्रीडमैन ने आइन्स्टीन के उपरोक्त सिद्धाँत का गहन अध्ययन कर यह बताया कि इस सिद्धाँत का अर्थ यह हुआ कि ब्रह्माण्ड फैल रहा है अर्थात् पहले कभी सारा संसार किसी छोटे-से-छोटे व्यास वाले बिन्दु में समाया था- इतने दिनों बाद वह फैलता-फैलता 10 करोड़ नीहारिकाओं (नोबुला) और 50 करोड़ प्रकाश वर्ष के घेरे में आ पहुँचा और वह अभी भी तब तक बढ़ता जायेगा जब तक कि पुनः प्रलय नहीं हो जायेगी।
रूस के ही दूसरे भौतिक शास्त्री क्रुत्सोव ने फ्रीडमैन का लिखा हुआ यह परिपत्र आइन्स्टीन को दिखाया तो वही आइन्स्टीन, जिन्होंने इतने बड़े सिद्धाँत को जन्म दिया था, उक्त धारणा से इन्कार कर बैठे। किन्तु उसके एक वर्ष बाद ही आइन्स्टीन को अपनी भूल मालूम पड़ गई। उन्होंने गणितीय व्याख्या के आधार पर यह सिद्ध कर दिखाया कि सचमुच ब्रह्माँड फैल रहा है। प्रारंभ में वह एक बहुत सघन पीटे हुए वजनदार गोले की तरह था- और अब जो संसार है, वह भी अनन्त नहीं है अर्थात् ब्रह्माँड (स्पेश) की कहीं पर सीमा है।
संसार सीमित है, संसार असीम है। संसार एक है, संसार अनेक हैं, संसार प्रकाश है, संसार सघन अन्धकार है- इस तरह के परस्पर विरोधाभास कथन भ्रमोत्पादक अवश्य हैं, पर हैं सत्य। वस्तुतः संसार ऐसा ही है। विद्युत न गर्म है न सर्द और गर्म व शीत दोनों धाराएं उसमें है।
इन चक्कर में डालने वाले सिद्धाँतों ने वैज्ञानिकों को ब्रह्माँड-विकास की सही जानकारी प्राप्त करने के लिये उकसाया। तब से अब तक लगातार असंख्य खोजें हुई हैं और वे फ्रीडमेन की उक्त कल्पना की ही पुष्टि नहीं करतीं वरन् अब उससे भी आगे निकलकर भारतीय अध्यात्म के प्रतिपादनों को छूने लगी हैं यह पाठक अगली पंक्तियों में स्पष्ट देखेंगे
ब्रह्माँड के विकास की जानकारी के लिये आजकल अनेक विशालकाय और साधन सम्पन्न वेधशालाएं अध्ययन और प्रयोगरत हैं। अनजाने ‘क्वासार’ प्रकाश तरंगों से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में अनेक तत्व गैस की स्थिति में बहती हुई नीहारिकाएं (नोबुला) किसी न चुकने वाले ऐसे प्रकाश स्रोत से आ रही हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि का केन्द्र बिन्दु है, उसके वर्तमान स्वरूप का अभी पता नहीं है। पर वैज्ञानिक उसकी पूर्व स्थिति का पता लगाने में अवश्य जुटे हैं।
अभी इस क्षेत्र में अधिकाँश परिकल्पनाएं ही काम कर रही हैं। कोई तो कहता है कि जिन प्रारंभिक कणों से ब्रह्माँड की रचना हुई वह इतने गर्म थे कि ब्रह्माँड का जब विस्तार प्रारंभ हुआ तब उसके कुल दस मिनट बाद तापमान एक अरब डिग्री सेन्टीग्रेड था। उसमें स्थूल कण न होकर केवल न्यूट्रॉन थे। रूस के वैज्ञानिक डॉ. चाकोब जेल्डोविच का विचार इससे भिन्न है। उनका कहना है कि सृष्टि के मूल विकास की प्रक्रिया हाइड्रोजन से प्रारंभ होती है। उसमें भाग लेने वाले अणुओं में अकेले न्यूट्रॉन ही नहीं थे वरन् प्रोटोन, इलेक्ट्रान भी थे। अत्यधिक शीत के कारण हाइड्रोजन एक जमे हुए पदार्थ के रूप में था। वही टूट-टूट कर बूँद और परमाणुओं के रूप में फैलता चला गया और तापमान तथा वायु दाब (प्रेशर) आदि की विभिन्न परिस्थितियों में आवर्ती सारिणी के अनेक पदार्थों में बदलता चला गया। आज जो अनेक तारागण, पृथ्वी आदि दिखाई देते हैं वह सब इस जमे हुए हाइड्रोजन के ही परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप हैं।
ब्रह्माँड-विकास की इस वैज्ञानिक जानकारी को जब सृष्टि-उत्पत्ति विषयक ऋषि प्रणीत वेद से तुलना करते हैं तो पता चलता है कि हमारी जानकारियाँ कितनी अत्याधुनिक तथा दर्शन कितना विज्ञानसम्मत रहा है। विज्ञान की दिनों दिन बढ़ती प्रगति निरन्तर भारतीय सिद्धाँतों की ही पुष्टि करती चली जा रही हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि भारतीयों ने केवल भावनाओं की ही महत्ता प्रतिपादित की, उन्हें अब यह भी जानना चाहिए कि हमारा प्रत्येक प्रतिपादन भौतिक विज्ञान की ही आधारशिला पर रहा है।
ऋग्वेद के (10।90) पुरुष सूक्त और दशवें मण्डल में प्रयुक्त कई सूक्त, मंत्र या ऋचाओं में सृष्टि विकास विषयक जो भी निर्देशन है वह न केवल उपरोक्त वैज्ञानिक अनुसंधानों से मेल खाता है वरन् उससे भी परिमार्जित शुद्ध ज्ञान है। साथ ही उसमें आत्मा के उत्थान और विकास का विज्ञान भी संयुक्त होने के कारण वह मनुष्य मात्र के लिए लाभदायक भी है।
भौतिक शास्त्रियों ने हाइड्रोजन सरीखे किसी पदार्थ को ब्रह्माँड विकास का मूल माना है। इस संबंध में सभी वैज्ञानिकों में मतभेद है जबकि हमारे सभी प्राचीन ग्रंथकार इस संबंध में एकमत रहे हैं कि यह संपूर्ण जगत एक ही पुरुष या परमात्मा की इच्छा या आदि तत्व में क्षोभ के कारण उत्पन्न हुआ। पुरुष शब्द का अर्थ मनुष्य से जान पड़ता है। पर वस्तुतः पुरुष का अर्थ ‘सम्पूर्ण जीव जगत में व्याप्त चेतना’ से है, जो अव्यक्त, अक्षर, अविनाशी और अनादि है। उसे ही परब्रह्म कहा है। श्वेताश्वतर उपनिषद् के ऋषि से एक जिज्ञासु प्रश्न करता है-
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम् 1।2
महात्मन्! काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, पंचभूत, प्रकृति तथा पुरुष में प्रधान कौन है?
इस पर उपनिषद्कार उत्तर देता है- ‘स तं परं पुरुषं उपैति दिव्यम्’- वह दिव्य पुरुष ही प्रधान है।
आइन्स्टीन ने सृष्टि के मुख्य मानक (फैक्ट्स) चार ही माने थे। पर सच बात यह है कि- ‘मनुष्य के स्वभाव और विराट चेतना की कार्य-प्रणाली प्रकृति के स्वभाव और क्रिया की जानकारी’ भी उसमें पाँचवीं संयुक्त होनी चाहिए। संसार जितना दृश्य है उतना ही मानसिक और आत्मिक भी। आत्मा और मन के विज्ञान को छोड़ा नहीं जा सकता।
चेतना जो पुरुष रूप में भी थी वह ‘हरिण्यगर्म’ तथा ‘प्रजापति’ रूप में थी। हिरण्यगर्भ का अर्थ ‘प्रकाश व अग्नि स्वरूप’ और प्रजापति का अर्थ ‘उसमें भरी हुई चेतना, इच्छा व विचार शक्ति’ से ही है। फिर जब उस पुरुष में क्षोभ उत्पन्न हुआ, तो उसने अपने तेजस कणों से शीत कणों की उत्पत्ति की (पुरुष भी तत्व है) उन्हें आपःकण कहा गया। इन आपः, जिनका अर्थ सलिल होता है, को हाइड्रोजन ही मानना चाहिए। क्योंकि आपः का अर्थ स्थूल जल से नहीं, सूक्ष्म जल से है और हाइड्रोजन भी जल बनाने वाला ही तत्व है।
यहाँ से भारतीय विज्ञान व पाश्चात्य विज्ञान में तुलना प्रारंभ हो जाती है- अपाँ सघातो विलयनंच तेजः संयोगात्’ वैशेषिक दर्शन 5।2।8। इन आपः कणों में संपीड़न (प्रेशर) उत्पन्न होने से क्रमशः एक परमाणु एक अणु (हाइड्रोजन) द्वयणुक अर्थात् दो प्रोटोन या इलेक्ट्रान वाला [होलियम] त्रसरेणु अर्थात् तीन इलेक्ट्रान वाला (लीथियम) आदि अनेक गैसों, धातुओं, खनिजों आदि प्रकृति की उत्पत्ति होती चली गई।
यह क्रम आवर्ती सारिणी के अनुसार ही है। पर हमारे यहाँ आपः (जल), अग्नि और वायु की स्थिति को मुख्य माना है। धातुओं और खनिजों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से रहती है। इसलिये यह सब तत्व नहीं माने गये, जो ठीक भी है। तत्व तो वह हैं जो रासायनिक क्रिया में भाग लेते हैं। रासायनिक क्रिया में मूल रूप से अग्नि, जल, वायु (एअर प्रेशर और टेम्परेचर) ही भाग लेते हैं, इसलिये उन्हीं को तत्व कहा जाना ठीक है। यदि अग्नि, आपः और दबाव आदि न हो तो रासायनिक क्रिया कभी हो ही नहीं सकती।
इस तरह सृष्टि-विकास की मूल प्रक्रिया अग्नि और जल-कणों से ही गैस रूप में होती है। नीहारिका एक प्रकार की गैस ही है जो वायु के संसर्ग में आते ही दूसरे-दूसरे भौतिक तत्वों की उत्पत्ति और अनेक ब्रह्माँडों का सृजन करती है। शतपथ ब्राह्मण के छठवें काँड में लिखा है-
सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत्---ब्रह्मैव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्याम्---॥8॥ सोऽपोऽसृजत। वाच एव लोकात् वागेवास्य सासृज्यत्। सेदं सर्वम् आप्नोद यदिदं किं च यदाप्नोत् तस्मादायः यदवृणोत् तस्माद्वा॥9॥
अर्थात् प्रारंभ अग्नि रूप-पुरुष-प्रजापति ने अपने आप को एक से बहुत होने की इच्छा की। तब उससे आपः उत्पन्न हुए, उसने ही सर्वप्रथम शब्द उत्पन्न कर इन आपः कणों को उससे आच्छादित किया।
यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत तस्य रसो द्रत्वापः प्रविवेश तेनैवैतद् रसेन आपः स्यन्दन्ते।
अर्थात् प्रजापति का शिर छिन्न हुआ, उसका रस बहकर आपों में प्रविष्ट हुआ। वह रस ही आता है-जो आपः बहते हैं।
यह आपः ही गैस अवस्था में जल परमाणुओं वाली नीहारिकाएं हैं, जो ब्रह्म से बहती हुई अनेक ब्रह्माँडों की रचना करती हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि जहाँ विज्ञान वाला भाग वेद और भौतिक विज्ञान दोनों में मिलता-जुलता है, वहाँ पुरुष का अर्थात् ईश्वर का सिद्धाँत गलत नहीं होना चाहिए।
भारतीय तत्व-दर्शन की पुष्टि में साइन्स का सिद्धाँत बड़ा सहायक सिद्ध हुआ है कि आपः में शब्द को आच्छादित किया। अन्तरिक्षे दुन्दुभयो वितना बदन्ति-अधिकुम्भाः पर्यायन्ति। (जैमिनि 2।404)। अर्थात् अन्तरिक्ष में दुन्दुभि के समान विस्तृत और सर्वव्यापी परम वाक्-ध्वनि होती रहती है। अब तक यह बात समझ में आने न वाली थी पर जब सूर्य की खोज करते-करते सन 1942 में मक्क्रिय ने इस तरह की ध्वनि सचमुच सुनी तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने अपनी ‘फिजिक्स आफ दि सन एण्ड स्टार्स’ पुस्तक के 83 पेज पर लिखा है कि- ‘श्री जे.एस. दे द्वारा वर्णित सूर्य से आने वाली ध्वनि (सोलर न्वाइज) गलत नहीं है वरन् सूर्य की ध्वनि की तरह ही और भी तारा-मण्डलों (ग्लैक्सीज) से ध्वनि तरंगें आ रही हैं। वह सौर-घोष सोलर न्वाइज के समान ही हैं। उनका अनुसंधान किया जाना बहुत आवश्यक है।’
इस कथन से यह सिद्ध होता है कि आकाश कहीं भी शून्य नहीं है। यदि ऐसा होता तो ध्वनियाँ नहीं आतीं। शब्द-कम्पन किसी-न-किसी माध्यम से ही चलते हैं। वैज्ञानिकों की यह खोजें जब उस आदि केन्द्र तक पहुँचेंगी, जहाँ से ब्रह्म प्रकीर्ण होता है, तब न केवल समय व ब्रह्माँड सीमित हो जायेंगे वरन् समस्त वाक् भी ‘ऊँ’ जैसी किसी विराट ध्वनि में समाये दिखाई देंगे। वहाँ सापेक्ष कुछ भी नहीं होता, सब कुछ अमर, आनन्दमय और परिपूर्ण होता है। उसे प्राप्त करने का भाव विज्ञान भी आइन्स्टीन और दूसरे वैज्ञानिक प्रकट कर सकें-संसार का दिग्भ्रम तभी दूर हो सकता है।
उस मूल निरपेक्ष, अव्यक्त और अक्षर, चेतना तक आत्मचेतना की गति का वैज्ञानिक विश्लेषण अन्यत्र करेंगे। उसके लिये यह जानकारी बहुत सहायक होगी।
आकाश की ओर देखकर मैंने अनुभव किया- यह संसार विशालतम है और अपनी ओर देखकर सोचा-मनुष्य लघुतम है। अपनी लघुता को तब से सृष्टि की विशालता में घुलाये जा रहा हूँ, क्योंकि तब मैं स्वयं भी लघु न रहकर विराट बन जाता हूँ।
-स्वामी रामकृष्ण परमहंस
एक युवक ने स्वप्न में देखा कि वह किसी बड़े राज्य का राजा हो गया है। स्वप्न में मिली इस आकस्मिक विभूति के कारण उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।
प्रातःकाल पिता ने काम पर चलने को कहा, माँ ने लड़कियाँ काट लाने की आज्ञा दी, धर्मपत्नी ने बाजार से सौदा लाने का आग्रह किया। पर युवक ने कोई भी काम न कर एक ही उत्तर दिया- ‘मैं राजा हूँ, मैं कोई काम कैसे कर सकता हूँ?’
घर वाले बड़े हैरान थे आखिर क्या किया जाये? तब कमान संभाली उसकी छोटी बहिन ने। एक-एक कर उसने सबको बुलाकर चौके में भोजन करा दिया अकेले खयाली महाराज ही बैठे-के-बैठे रह गये।
शाम हो गई, भूख से आँतें कुलबुलाने लगीं। आखिर जब रहा नहीं गया तो उसने बहन से कहा- क्यों री! मुझे खाना नहीं देगी क्या?
बालिका ने मुँह बनाते हुए कहा- ‘राजाधिराज! रात आने दीजिये, परियाँ आकाश से उतरेंगी, वही आपके उपयुक्त भोजन प्रस्तुत करेंगी। हमारे रूखे-सूखे भोजन से आपको सन्तोष कहाँ होता?’
व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने वाले युवक ने हार मानी और मान लिया कि धरती पर रहने वाले मनुष्य को निरर्थक लौकिक एवं भौतिक कल्पनाओं में ही न डूबे रहना चाहिए वरन् जीवन का जो शाश्वत और सनातन सत्य है उसे प्राप्त और धारण करने का प्रयत्न भी करना चाहिए’- इतना मान लेने पर ही उसे भोजन मिल सका।
दिन ढल रहा था। रात तथा दिन फिर से बिछुड़ जाने को कुछ क्षणों के लिये एक दूसरे में विलीन हो गये थे। रम्य वनस्थली में एक पर्णकुटी में से कुछ धुआँ सा उठ रहा था।
कुटीर में निवास करने वाले दो ऋषि- शनक तथा अभिप्रतारी अपना भोजन तैयार कर रहे थे। वनवासियों का भोजन ही क्या? कुछ फल तोड़ लाये-कुछ दूध से काम चल गया-हाँ, कन्द-मूलों को अवश्य आँच में पकाना होता था। भोजन लगभग तैयार हो चुका था और उसे कदलीपत्रों पर परोसा जा रहा था।
तभी बाहर किसी आगन्तुक के आने का शब्द हुआ। दोनों ने जानने का प्रयत्न किया। बाहर एक युवा ब्रह्मचारी खड़ा था।
ऋषि ने प्रश्न किया- ‘कहो वत्स! क्या चाहिए?’ युवक विनम्र वाणी में बोला- ‘आज प्रातः से अभी तक मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं हो सका है। मैं क्षुधा से व्याकुल हो रहा हूँ। यदि कुछ भोजन मिल जाता, तो बड़ी दया होती।’
कुटीर निवासी कहने को वनवासी थे, हृदय उनका सामान्य गृहस्थों से भी कहीं अधिक संकीर्ण था। मात्र सिद्धान्तवादी थे वे- व्यावहारिक वेदाँती नहीं थे। सो रूखे स्वर में कहा- ‘भाई तुम किसी गृहस्थ का घर देखो। हम तो वनवासी हैं। अपने उपयोग भर का ही भोजन जुटाते हैं नित्य।’
ब्रह्मचारी को बड़ी ही निराशा हुई। यद्यपि वह अभी ज्ञानार्जन कर ही रहा था-तथापि कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का व्यावहारिक बोध था उसे। निराश इस बात से नहीं था वह कि उसे भोजन प्राप्त नहीं हो सका था। उसकी मानसिक पीड़ा का कारण यह था कि यदि कोई साँसारिक मनुष्य इस प्रकार का उत्तर देता तो फिर भी उचित था। वह उसके भौतिकतावादी-मोह से भरे दृष्टिकोण का परिचायक होता। किन्तु ये वनवासी जो अपने आपको ब्रह्मज्ञान का अधिकारी अनुभव करते हैं- उनके द्वारा इस प्रकार का उत्तर पाकर यह क्षुब्ध हो उठा।
तब चुपचाप चले जाने की अपेक्षा उस युवक ने यही उचित समझा कि इन अज्ञान में डूबे ज्ञानियों को इनकी भूल का बोध करा ही देना चाहिए।
उसने पुनः उनको पुकारा। बाहर से भीतर का सब कुछ स्पष्ट दीख रहा था। झुँझलाते हुए शनक तथा अभिप्रतारी दोनों बाहर आये। तब युवक बोला- ‘क्या मैं यह जान सकता हूँ कि आप किस देवता की उपासना करते हैं?’
उपनिषद् काल में-जिस समय की यह घटना है-विभिन्न ऋषि-मुनि विभिन्न देवता विशेष की साधना करते थे।
उन ऋषियों को तनिक क्रोध आ गया। व्यर्थ ही भोजन को विलम्ब हो रहा था। पेट की जठराग्नि भी उधर को ही मन की रास मोड़ रही थी।
झुँझलाहट में कहा- ‘तुम बड़े असभ्य मालूम होते हो। समय-कुसमय कुछ नहीं देखते। अस्तु! हमारा इष्टदेव वायु है, जिसे प्राण भी कहते हैं।’
अब वह ब्रह्मचारी बोला- ‘तब तो आप अवश्य ही यह जानते होंगे कि यह प्राण समस्त सृष्टि में व्यापक है। जड़-चेतन सभी में।’
ऋषि बोले- ‘क्यों नहीं! यह तो हम भली-भाँति जानते हैं।’
अब युवक ने प्रश्न किया- ‘क्या मैं यह जान सकता हूँ कि यह भोजन आपने किसके निमित्त तैयार किया है?’
ऋषि अब बड़े गर्व से बोले- ‘हमारा प्रत्येक कार्य अपने उपास्य को समर्पित होता है।’
ब्रह्मचारी ने मन्द स्मिति के साथ पुनः कहा- ‘यदि प्राण तत्व इस समस्त संसार में व्याप्त है, तो वह मुझमें भी है। आप यह मानते हैं?’
ऋषि को अब ऐसा बोध हो रहा था कि अनजाने ही वे इस युवा के समक्ष हारते चले जा रहे हैं। तली में जैसे छेद हो जाने पर नाव पल-पल अतल गहराई में डूबती ही जाती है युवक की सारगर्भित वाणी में उनका अहं तथा अज्ञान वैसे ही धंसता चला जा रहा था। आवेश का स्थान अब विनम्रता लेती जा रही थी।
शनक धीमे स्वर में बोले- ‘तुम सत्य कहते हो ब्रह्मचारी! निश्चय ही तुम्हारे अन्दर वही प्राण, वही वायु संव्याप्त है, जो इस संसार का आधार है।’
ब्रह्मचारी संयत स्वर में अब भी कह रहा था-’तो हे महामुनि ज्ञानियों! आपने मुझे भोजन देने से मना करके अपने उस इष्टदेव का ही अपमान किया है जो कण-कण में परिव्याप्त है। चाहे विशाल पुँज लगा हो, चाहे एक दाना हो- परिणाम में अन्तर हो सकता है- किन्तु उससे तत्व की एकता में कोई अन्तर नहीं आता। आशा है मेरी बात का आप कुछ अन्यथा अर्थ न लगायेंगे।’ ब्रह्मचारी का उत्तर हृदय में चला गया था। सत्य में यही शक्ति होती है। दोनों ऋषि अत्यन्त ही लज्जित हुए खड़े थे। किन्तु साधारण मनोभूमि के व्यक्तियों में तथा ज्ञानियों में यही तो अन्तर होता है। ये अपनी त्रुटियों को भी अपनी हठधर्मी के समक्ष स्वीकार नहीं करते और ये अपनी भूल का बोध होते ही, उसे सच्चे हृदय से स्वीकार कर लेते हैं तथा तत्क्षण उसके सुधार में संलग्न हो जाते हैं।
अभिप्रतारी ने अत्यन्त ही विनम्र वाणी में कहा- ‘हम से बड़ी भूल हो गई ब्रह्मचारी! लगता है तुम किसी बहुत ही योग्य गुरु के पास शिक्षा ग्रहण कर रहे हो। धन्य हैं वे। तुम उम्र में हमसे कहीं छोटे होते हुए भी तत्वज्ञानी हो। अब कृपा करके हमारी कुटी में आओ और भोजन ग्रहण करके हमें हमारी भूल का प्रायश्चित्त करने का अवसर दो।’
और दोनों सादर उस ब्रह्मचारी युवक को ले गये। उसे पग पाद प्रक्षालन हेतु शीतल जल दिया तथा अपने साथ बैठकर सम्मानपूर्वक भोजन कराया।
उस दिन से वे अपनी कुटी में ऐसी व्यवस्था रखते कि कोई भी अतिथि अथवा राहगीर कभी भी आये, वे उसे बिना भोजन किये न जाने देते। इष्ट की उपासना का मर्म-सच्चा स्वरूप अब उनकी समझ में आ गया था।
रविवार का दिन था। मुहम्मद साहब जब से बीमार पड़े थे। निरन्तर उपास करते जा रहे थे, इसलिये कमजोरी बेहद बढ़ गई थी। उन्होंने अपनी पत्नी आयशा को अपने पास बुला कर कहा, ‘अपने पास बिलकुल भी पैसा न रखो। यदि कहीं तुमने कुछ बचाकर रख छोड़ा हो, तो उसे निर्धन व्यक्तियों में बाँट दो।’
आयशा मुहम्मद साहब की बात पर काफी देर सोचती रही। उसने सोने के छः दीनार आपत्ति के समय के लिए बचाकर रख छोड़े थे। तब तक मुहम्मद साहब ने फिर कहा, ‘तुम्हारे पास जो कुछ हो मेरे पास ले आओ।’ आयशा ने छिपाकर रखे हुए छः दीनार उनके हाथ पर लाकर रख दिये। उन्होंने तुरन्त ही निर्धन परिवारों में सहायता हेतु वह धन बाँटने को कहा।
उनकी इच्छा की पूर्ति जब हो गई, तब उन्हें शाँति मिली। वह बड़ी प्रसन्नता से सन्तोष की साँस लेते हुए बोले- ‘वास्तव में यह अच्छा नहीं था कि मैं अपने अल्लाह से मिलने जाऊं और यह सोना मेरी सम्पत्ति के रूप में यहाँ रखा रहे।’
मनुष्य अपना शिल्पी आप है। प्रारंभ में वह एक चेतन-पिण्ड के रूप में ही उत्पन्न होता है। अपने जन्म के साथ न तो वह गुणी होता है, न बुद्धिमान, न विद्वान और न किसी विशेषता का अधिकारी। परमात्मा उसे मानवमूर्ति के रूप में जन्म देता है और बीज रूप में उपयोगी शक्तियों को उसके साथ कर देता है। इसके बाद का सारा काम स्वयं मनुष्य को करना होता है। अपने इस उत्तरदायित्व के अनुसार वह स्वतंत्र है कि अपनी रचना योग्यतापूर्वक करे अथवा अयोग्यतापूर्वक। जो अपनी रचना योग्यतापूर्वक करते हैं पुरस्कार रूप में वे परम पद पाकर चिदानन्द के अधिकारी होते हैं। और जो अपनी रचना में असफल होते हैं वे जन्म-मरण के चक्र में चौरासी लाख योनियों की यातना सहते हैं।
मानव-पिण्ड के रूप में आया प्रारंभिक मनुष्य अपने वंश के अनुसार विकसित होता हुआ अपना निर्माण प्रारंभ कर देता है। अपनी सूझ-बूझ और निर्णय के अनुसार कोई धनवान बनता है, कोई विद्वान बनता है, कोई व्यापारी बनता है तो कोई श्रमिक। कोई पापी बनता है तो कोई पुण्यात्मा। मानव-निर्माण का कोई एक स्वरूप नहीं, असंख्य स्वरूप एवं प्रकार हैं। किन्तु उन सबको बाँटकर दो प्रकारों में किया जा सकता है। एक उत्कृष्ट निर्माण दूसरा निकृष्ट निर्माण। मनुष्य कुछ भी बने, किसी क्षेत्र अथवा किसी दिशा में बढ़े, विकास करे, यदि उसमें उसने श्रेष्ठता का समावेश किया हुआ है तो उसका उत्कृष्ट निर्माण ही कहा जायेगा और यदि वह उसमें अधमता का समावेश करता है तो उसका निर्माण निकृष्ट ही माना जायेगा। उदाहरणार्थ यदि वह धन के क्षेत्र में बढ़कर अपना निर्माण धनाढ्य के रूप में करता है किन्तु इसकी सिद्धि में दुष्ट साधनों तथा उपायों का प्रयोग करता है, तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण निकृष्ट कोटि का कर रहा है। यदि वह उसकी सिद्धि में सत्य, शिव, और सुन्दर से सुशोभित साधनों तथा उपायों का अवलम्बन करता है तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण उत्कृष्ट कोटि का कर रहा है। इस प्रकार मनुष्य का कोई भी आत्मनिर्माण, या तो उत्कृष्ट कोटि का होता है अथवा निकृष्ट कोटि का।
निर्माण निर्माण है। वह कैसा भी हो-आखिर वह निर्माण ही है-इस उक्ति को मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि निकृष्ट निर्माण को भी मान्यता दी जाने लगेगी, तो संसार में उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का कोई मूल्य-महत्व ही न रह जायेगा। निर्माण संज्ञा का वास्तविक अधिकारी उत्कृष्ट निर्माण ही हो सकता है, निकृष्ट निर्माण नहीं। अपने को धनवान अथवा विद्वान निर्माण करने में जिसने अयोग्य तथा अनुचित उपायों का प्रयोग किया है उसे यदि धनवान और विद्वान मान लिया जायेगा तो फिर चोर, धूर्त अथवा ठग किसे कहा जायेगा और इस तथाकथित धनवान तथा विद्वान में क्या अन्तर रह जायेगा जिसने परिश्रम, पुरुषार्थ, अध्यवसाय एवं तपस्या के आधार पर अपना निर्माण किया है। शिव और अशिव के दो विरोधी उपायों से अर्जित उपलब्धियों को समान श्रेय नहीं दिया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता अथवा मानता है तो वह या तो अज्ञानी है अथवा अधम प्रकृति का व्यक्ति। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है और निकृष्ट निर्माण मिथ्या क्रियाकलाप। अस्तु, उचित यही है कि वह जिस क्षेत्र में अपना निर्माण करे तो उत्कृष्ट रीति से ही करे, नहीं तो कंचन के रूप में पापों की गठरी बाँधने से कहीं अच्छा है कि वह निर्धन और गरीब बना रहे।
उत्कृष्ट निर्माण का आधार धर्म है। धर्म का अर्थ अधिकतर लोग पूजा-पाठ, जप, उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़ कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते है। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रमों के साथ जीवनक्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है। केवल मात्र पूजा-पाठ, जप-तप, तक ही सीमित रहकर यदि कोई चाहे कि वह अपना उत्कृष्ट निर्माण कर लेगा, तो उसे निराश ही रहना होगा। उत्कृष्ट निर्माण तभी संभव होगा जब जीवन की प्रत्येक गतिविधि का धर्मनिर्वाह किया जायेगा। कोई पूजा-पाठ तो करता रहे, साथ ही कार-रोजगार, आचार-व्यवहार में असत्य, मिथ्या और बेईमान बना रहे तो उसका निर्माण निकृष्ट कोटि का ही हो सकेगा। जीवन क्रम में पग-पग पर ईमानदार, सत्परायण और आदर्शवान् बने रहने पर यदि कोई पूजा-पाठ वाले धर्म के लिये समय नहीं दे पाता तो भी उसका निर्माण उत्कृष्ट ही होगा। उस छोटी-सी कमी के कारण उसकी जीवन तपस्या असफल नहीं हो सकती।
जीवन निर्माता धर्म का आधार है सत्य और ईमानदारी। मनुष्य जो कुछ कहे, करे और सोचे उसका आधार सत्य ही होना चाहिए। जिसने आत्म-निर्माण के लिये धनाढ्यता को आदर्श बनाया है उसे चाहिये कि वह धन के लिये जिस व्यवस्था को अपनाया है उसमें पूरी तरह ईमानदार रहे। यदि दुकानदारी करता है तो पूरा तोले, उचित मूल्य ले। खरा माल दे, ठीक पैसे बतलाये। वस्तु, मूल्य तथा उसके गुण बतलाते समय सच बोले। जिस कीमत में किसी एक ग्राहक को वस्तु दे उसी कीमत में दूसरे को। मुनाफा कमाने के लिये वस्तुएं छिपाकर न रखे। होते हुए भी किसी से इन्कार न करे। आबाल वृद्ध सभी के साथ उसकी इसी प्रकार की एक जैसी ही नीति रहनी चाहिए। किसी अनजान, अबोध अथवा निर्बल से चीज होते हुए भी इनकार कर देना अथवा ज्यादा दाम लेकर देना और किसी जानकार, बुद्धिमान अथवा बलवान व्यक्ति को अलभ्य वस्तुएं भी ठीक दामों पर दे देना, व्यापार जैसे पवित्र काम में एक बड़ा कलंक है।
व्यापारियों और कारखानेदारों को चाहिए कि वे खरा माल बेचें-बनायें, नकली अथवा निकृष्ट माल बाजार में न भेजें, अधिक मुनाफाखोरी से बचें। लागत के अनुसार कीमत लें। मजदूरों तथा कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक दें। शोषण, मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की नीति से बचें। इन सब आदर्शों के साथ धनाढ्यता का लक्ष्य पाने वाले ही उस दिशा में अपने निर्माता माने जाएंगे।
जिसका लक्ष्य एक अच्छा श्रमिक बनना हो वह किसी भी काम काम को पूरे तन-मन के साथ पूरे समय भर करे। पारिश्रमिक की मात्रा के अनुसार अपने श्रम की मात्रा घटाने बढ़ाने के बजाय हर स्थिति में पूरी ईमानदारी बरते अर्थात् पारिश्रमिक भले ही कम हो लेकिन अपने श्रमदान की मात्रा पूरी रखे। कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करें। उनके काम पर आने का जो नियत समय हो, अकारण ही उससे देर न करें। पूरे समय पर एकनिष्ठ भाव से काम करें। समय पूरा होने से पहले काम न छोड़ें। कामचोरी, रहस्योद्घाटन, चुगली, पिशुनता आदि से बचे रहें। इस प्रकार अपने साधारण कामों में भी पूरी ईमानदारी और सत्य का निर्वाह करके आत्म-निर्माण किया जा सकता है।
जीयन्ताँ दुर्जया देहे रिपवश्चक्षुरादयः।
जितेषु ननु लोकोऽयं तेषु कृत्स्नस्त्वया जितः॥
अपने ही शरीर में रहने वाले चक्षु आदि दुर्जय शत्रुओं को पहले जीतना चाहिए। उनके जीत लेने पर ऐसा समझो कि मानो सारा संसार तुमने जीत लिया।
उपर्युक्त कतिपय बातें तो अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व निर्वाह के संबंध में हैं। अब सबसे विस्तृत क्षेत्र आता है व्यवहार जगत। इस क्षेत्र में तो मनुष्य को अधिकाधिक सावधान तथा संयमित रहना चाहिए। यही वह क्षेत्र है जिसमें मनुष्य के असभ्य व्यवहारी होने की सबसे अधिक संभावना रहती है। आजकल विश्वासघात, दगाबाजी और वचनाघात अर्थात् कुछ कहना कुछ करना, जो कुछ कहना उसे पूरा न करना एक सामान्य-सा चलन बन गया है। विश्वासघात अथवा वचनाघात को पाप के स्थान पर चतुरता मानी जाने लगी है। लोग दूसरे के साथ विश्वासघात कर अपने को होशियार समझने लगे हैं। सोचते हैं कि काम बनाने को लोगों को इसी प्रकार बेवकूफ बनाया जाता है, जबकि अपने दिये वचन का पालन न करना, विश्वास देकर पूरा न करना बहुत ही भयानक पाप है। सभी धर्मों और सभी शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। आचार्यों ने धर्म का मूल सत्य को ही माना है। विश्वास की रक्षा और वचन का पालन न करने वाले चाहे सौ जन्मों तक धर्म करते रहें तब भी वे उन्नति अथवा विकास की ओर एक पद भी आगे नहीं बढ़ सकते। सत्यनिष्ठा ही वह प्रथम सोपान है, जिस पर, चढ़कर ही कोई व्यक्ति धर्म की ओर उच्चता और श्रेष्ठता की ओर, अध्यात्म तथा ईश्वर की ओर बढ़ सकता है। सत्य, लोक से लेकर परलोक तक के सारे धर्मों का मूल है। हर विषय, हर बात और हर व्यवहार में वास्तविक रूप में सच्चे रहने वाले व्यक्ति ही किसी दिशा में अपना यथार्थ आत्म-निर्माण कर सकते हैं।
सत्य और ईमानदारी जीवन की सर्वोपरि उत्तम नीति है। इसकी सर्वोपरिता का कारण यह है कि इसमें निष्ठा रखने वाले लोगों के लिये न तो भय होता है और न शंका। सत्यनिष्ठ पुरुषों के चरित्र में दीनता, दयनीयता और हीनता जैसे दुर्गुण नहीं आते। जो सच बोलता है, सत्य व्यवहार करता है, यथार्थ सोचता और सबसे प्रति ईमानदार रहता है, उसके लिये किसी प्रकार का डर हो भी कैसे सकता है? सत्यनिष्ठ पुरुष संसार में निर्भयतापूर्वक विचरण करता और सबसे असंदिग्ध व्यवहार करता हुआ आनन्द मनाया करता है। उसे न किसी से डरने की आवश्यकता होती है और न दबने की। जो न किसी को धोखा देता है न किसी प्रकार की चोरी करता है, जितना जो कुछ कहता है उसे पूरा करता है। विश्वासघात और दगाबाजी जैसे जघन्य पापों से जिनकी आत्मा मुक्त है, जो न तो किसी के लिये दुर्भाव रखता है और न किसी को वंचित करने का प्रयत्न करता है। ऐसे सत्पुरुष को संसार में किसी भी देव, दानव अथवा मनुष्य से डरने का कारण भी क्या हो सकता है। डर का निवास तो असत्य और मिथ्यात्व में होता है। सत्यनिष्ठ सिंह पुरुष सदैव निर्भय और निर्भीक ही रहा करते हैं।
भय और मलीनता से मुक्त रहने वालों की आत्मा तेजोपूत और उज्ज्वल रहा करती है। उसकी शक्ति बढ़ती और प्रभावपूर्ण बनती जाती है। उज्ज्वल और सत्यपूत आत्मा वाला व्यक्ति हजार दुष्टों तथा धूर्तों में भी ठीक उसी प्रकार प्रचण्ड और निर्भय बना रहता है जिस प्रकार एक अकेला केसरी शृंगालों और शूकरों के झुँड में। निर्भयता में अनन्त व अनिवर्चनीय आनन्द है। इसकी प्राप्ति सत्याचरण, सत्य वचन और सत्य व्यवहार द्वारा ही होती है। सत्य जीवन की सर्वोत्तम नीति है। इसका पालन करने वाला निश्चय ही किसी भी क्षेत्र में अपना श्रेष्ठतम निर्माण कर सकने में सफल हो जाता है।
मनुष्य की आत्मा ही सर्वोत्तम तत्व और उसका सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व है। आत्मा की रक्षा करना मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया गया है। जिसने परमात्मा के प्रधान अंश आत्मा की रक्षा कर ली उसे अपने आचरण, व्यवहार और क्रियाओं की सत्यता द्वारा पुष्ट और बलिष्ठ बना लिया और उसे मल विक्षेप अथवा कुटिलता के कलुष से मुक्त कर उसके मूल तत्व परमात्मा की ओर उत्सुक कर दिया। उसने मानो अपना ठीक-ठाक निर्माण कर लिया। वह अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व में पूरी तरह उत्तीर्ण माना जाता है, जिसके पुरस्कार स्वरूप उसे भव सागर से पार उतार कर सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा की गोद में पहुँचा दिया जाता है।
साधक के लिए सबसे बड़ा प्रतिबंध कीर्ति है-
-अज्ञात
मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है। आत्मत्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिये मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिए। सत्य मानव-जीवन की सफलता के लिये सर्वोत्तम नीति है। इसको अपना कर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अन्त में परम पद के अधिकारी बनते हैं।
न्यू हैम्पशायर का इक्सेटर पुलिस स्टेशन-बात 3 सितम्बर, सन 1965 की है, में नारमैन मसकेरीलो नामक व्यक्ति ने प्रवेश किया। पुलिस स्टेशनों में यो घबराहट से भरे अनेक व्यक्ति पहुँचते और रिपोर्ट दर्ज कराते हैं, पर मसकेरीलो की मुखमुद्रा में व्याप्त भय बहुत गहरा था। आप बीती सुनाते समय उसका मुँह पूरी तरह सूख रहा था। कई बार तो घबराहट के मारे आवाज भी रुंध जाती।
काँपते स्वर में उसने बताया-वह वस्तु गोल थाली की तरह चमकती हुई थी। उसका रंग सफेद था, पर किरणें सी फूट रही थीं, वह लाल या नारंगी थी। प्रकाश का वह गोला काँप रहा था। उससे मक्खी के भिनभिनाने की सी आवाज थी---।
पर वह कौन था? पुलिस इन्सपेक्टर ने प्रश्न किया और साथ-ही साथ सान्त्वना भी दिलाई, तब मसकैरीलो ने आगे बताना शुरू किया-मैं अपने घर जा रहा था, समय पता न चलने के कारण जल्दी ही चल पड़ा था। कोई सवारी नहीं मिली सो पैदल ही आ रहा था। जब मैं केसिंग्टन के एक-खुले स्थान से गुजर रहा था तभी आकाश में वह गोल-सी वस्तु जिसका व्यास 80 से 90 फीट तक रहा होगा, काँपती हुई मेरी ओर झपटी। सड़क छोड़कर मैं नीचे की ओर भागा तब वह पीछे लौट गई और हवा में उड़ती हुई मकानों की छतों पर घूमी। इसके आगे मुझे पता नहीं। मैं सीधा पुलिस स्टेशन भागकर आया हूँ। मुझे डर लग रहा है, घर तक पहुँचने का प्रबंध कर दें।
इन्सपेक्टर के लिये यह सर्वथा अनहोनी घटना थी। कहते हैं साइबेरिया में कोई एक व्यक्ति ऐसा है जो शुक्र ग्रह से उतरा है। कहते हैं बेल्जियम में कोई एक ऐसा स्थान है जहाँ आकाश से प्रायः उड़न तश्तरियाँ आती रहती हैं। भूत-प्रेतों की कहानी-अनकहानी तो घर-घर सुनी जा सकती है पर जो कुछ मसकेरीलो बता रहा था, वह सत्य तो वैज्ञानिक कहानियों से भी आश्चर्यजनक था। उस पर सहसा विश्वास करना कठिन था। इन्सपेक्टर ने हंसकर कहा भी-महोदय! आपको, लगता है, धोखा हो गया।
किन्तु अभी वह कुछ व्यवस्था करे, इससे पूर्व ही रात्रि में गश्त (पेट्रोल) के लिये गई पुलिस की गाड़ी वापिस लौटी। उसके इंचार्ज वेरट्रेन्ड ने भी बताया कि थाने से 2 मील दूर कार में आ रहे एक दम्पत्ति ने भी ठीक ऐसी ही घटना सुनाई जैसी मसकेरीलो ने। उन्हें तो उस वस्तु ने 9 मील तक- ईपिंग से न्यूहेम्पशायर के उस स्थान तक पीछा किया जहाँ वह वस्तु मसकेरीलो को मिली थी।
आखिर सत्यता की जाँच के लिए वरट्रेन्ड तैयार हो गया। उसने मसकेरीलो को भी साथ लिया और उसी स्थान पर जा पहुँचा। टार्च से बड़ी देर तक इधर-उधर देखते रहे पर वहाँ कुछ दिखाई न दिया। वरट्रेन्ड ने व्यंग्य से कहा-आपने कोई पास से गुजरता हैलिकॉप्टर देखा होगा। ‘पर मुझे हवाई जहाजों की पूर्ण पहचान है’- मसकेरीलो ने उत्तर दिया। और तभी वह घटना फिर घटी। वहाँ से कुल 100 गज की दूरी पर ही एक ‘कृषिभवन’ था। उसके ऊपर वह प्रकाश-पुँज फिर प्रकट हुआ। वहाँ की प्रत्येक वस्तु, पेड़-पौधे और जमीन तक उसी रंग से नहा गये। कृषिभवन तो रक्त के रंग में रंगा लगने लगा। वरट्रेण्ड सहित सभी पेट्रोल-कार की ओर भागे।
उस प्रकाश पुँज की कहानी यहीं से समाप्त हो गई। दूसरे दिन वह घटना अखबारों में छपी। तब जान फुलर नामक लेखक ने अनेक व्यक्तियों से पूछताछ कर लिखा कि यह घटना विलक्षण सत्य थी और विज्ञान के लिये चुनौती भी। 73 लोगों ने उसे देखा और सबके बयान एक ही थे जो 200 पृष्ठों में टाइप किये गये थे। इस तरह की घटनाओं का संकलन करने वाली संस्था ‘नेशनल इन्वेस्टीगेशन कमेटी’ एयरियल फेनामेना वाशिंगटन ने भी उसकी पुष्टि की। श्रीमती विरजिनिआ, जो हैम्पटन में पत्रकार हैं, ने भी उसे देखा था और उसकी पुष्टि भी को। पर क्या यह प्रकाश पुँज कोई आत्मा थी, भूत या कोई सूक्ष्म शरीर? यह अब तक निश्चित नहीं हो सका।
लन्दन में एक ऐसी हत्या हुई, जिसका पता लगाने के लिये पुलिस सी.आई.डी., कुत्ते सब नियुक्त किये गये पर अपराधी का कोई पता न चला। अपराधी उसी मुहल्ले का एक संभ्रांत व्यक्ति था। उसके बारे में कोई कल्पना तक भी नहीं कर सकता था कि वह कभी अपराध कर सकता है।
अन्त में प्रसिद्ध भविष्य वक्ता ‘क्लेयर वाएन्ट’ की मदद ली गई। क्लेयर वायेन्ट जो भी भविष्य वाणियाँ करता है, वह अधिकाँश सत्य निकलती हैं। वहाँ के बड़े-बड़े व्यापारी, पुलिस और म्यूनिसपेलिटी तक उसकी मदद लेते हैं। क्लेयर वायेन्ट ने अपराधी का पूरा हुलिया और नाम बता दिया। उसके आधार पर अपराधी पकड़ा गया और उसने सारी घटना बड़े रोमाँचक ढंग से स्वीकार की। इस घटना से पता चलता है कि संसार में अतिरिक्त सहानुभूति (एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन) मनुष्य जीवन का एक महान सत्य है और वह मनोविज्ञान का ही विषय नहीं वरन् उसे वैज्ञानिक यंत्रों के विकास द्वारा भी उपलब्ध किया जा सकता है।
ऐसी सैंकड़ों घटनाएं होती रहती हैं जो इस तथ्य के सैद्धाँतिक पहलू का समर्थन करती हैं। यह घटनाएं देखकर यह विश्वास होता है कि संसार में कोई ऐसी भी सत्ता या तत्व है जहाँ भूत और भविष्य वर्तमान के दृश्य-पटल की भाँति मिलते हैं। कभी-कभी अनायास दिख जाने वाली घटनाओं की शक्ति को यदि विकसित या यंत्रित किया जा सके तो सचमुच मनुष्य त्रिकालदर्शी हो सकता है।
16 अगस्त सन 1964 के धर्मयुग के पेज 50 पर दिनकर सोनवलकर का एक संस्मरण छपा है। शीर्षक है- ‘वह स्वप्न और नेहरू अस्थि-विसर्जन दिवस पर बच्चियों की जल-समाधि’। इस लेख में भी ऐसी ही एक आश्चर्यजनक घटना का वर्णन है जिसमें कल होने वाली घटना का पूर्वाभास एक साथ कई लोगों को हुआ। और उसके बाद यह घटना सचमुच होकर भी रही।
मण्डला मध्यप्रदेश का जिला है। यहाँ के शासकीय बहुउद्देशीय शाला के प्रिंसिपल श्री रामनारायण जी खरे की धर्मपत्नी ने 7 जून 1964 की रात एक विचित्र स्वप्न देखा। स्वप्न अस्पष्ट-सा था। तीन बच्चों के डूबने की सी घटना दिखाई दी थी। उससे उनका हृदय काँपने लगा, नींद खुल गई। रात के एक बजे होंगे, उन्होंने अपने पति को जगाया और कहा- मैंने एक भयानक स्वप्न देखा है तब से मेरा हृदय काँप रहा है। मुझे कुछ अनहोनी सी होती जान पड़ती है। खरे जी ने कहा- वैसे ही स्वप्न की घबराहट है, कोई बात नहीं है, सो जाइये। उन्हें फिर कठिनाई से नींद आई।
उसी रात को प्रातःकाल 4 बजे उनकी 9 वर्षीया पुत्री वीणा की नींद टूटी। उसने कहा- पापाजी! मैंने एक स्वप्न देखा कि मैं और मीना (वीणा की छोटी बहिन) और निर्मला (उसी विद्यालय के चपरासी की लड़की) तीनों नर्मदाजी स्नान करने गये और वहाँ डूब गये हैं। इसके बाद आप, मम्मीजी और दादाजी सबको रोते हुए भी मैंने देखा।
खरेजी ने बात टाल दी, पर रात की धर्मपत्नी की घटना और इस घटना दोनों से तालमेल बैठने की याद करते ही उनका भी हृदय धड़कने लगा। विलक्षण बेचैनी थी। खरे साहब का प्रतिदिन नर्मदाजी स्नान करने के लिए जाने का नियम था। विचित्र बात तो यह थी कि ये तीनों बच्चियाँ भी प्रतिदिन उनके साथ स्नान करने जाती थीं। सावधानी के तौर पर आज उन्होंने बच्चियों से बहाना बना दिया- ‘आज मुझे जल्दी लौटना है। तुम लोगों को स्नान करने नहीं ले जायेंगे।’ यह कहकर वह अकेले ही स्नान करने चले गये। वह प्रतिदिन वाले घाट पर भी नहीं गये, ताकि यदि लड़कियाँ पीछे से आ भी जायें, तो उन्हें वहाँ न पाकर चुपचाप लौट जायें।
खरेजी के स्नान करने चले जाने के बाद लड़कियों ने माँ से स्नान करने चलने को कहा, पर उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। तब वे अपनी दादी से स्नान के लिये चलने को मचलने लगीं। दादी मान गयीं और उन्हें लेकर नर्मदा की ओर चल पड़ीं।
उस दिन नेहरूजी की अस्थियाँ नर्मदा में प्रवाहित की जानी थीं, इसलिए घाट पर थोड़ी भीड़ थी। सो वृद्धा उन्हें लेकर एक ऐसे स्थान पर चली गई, जहाँ कोई घाट नहीं था। थोड़े पत्थर पड़े थे, उन्हीं पर बैठकर स्नान किया जा सकता था।
दुर्दैव कि जैसे ही बड़ी लड़की वीणा आगे बढ़ी, उसका पाँव फिसल गया। ऊपर केवल चोटी दिखाई दे रही थी। लड़की बचाव के लिये छटपटाती रही। बुढ़िया ने सोचा- वह फुदक रही है। छोटी बहन मीना चिल्लाई-दादाजी! दीदी डूब रही है। और यह कहते हुए वह स्वयं भी आगे बढ़ी। आगे बढ़ना था कि पाँव फिसला और वह स्वयं भी जल में समा गई। मीना के पीछे निर्मला भी चली गई और उन दोनों के साथ ही वह भी पानी में समा गई। पुल पर से चपरासी यह सब देख रहा था। वह चिल्लाता हुआ भागा, पर एक मिनट में ही सब काम हो गया। वीणा और मीना के अर्द्धमृत शरीर मिल तो गये पर अस्पताल पहुँचते-पहुँचते उनकी मृत्यु हो गई। निर्मला की तो लाश ही पानी से निकाली गई। बाद में तीनों लड़कियों की एक साथ शव-यात्रा निकाली गई। हजारों लोगों ने उसमें भाग लिया। हर व्यक्ति यही सोचता रहा कि आखिर वह रहस्य क्या है, जिससे भविष्य की घटनाएं वर्तमान जीवन की भाँति दिखाई दे जाती हैं?
धर्मयुग में ही 19 जनवरी, 1964 के अंक में एक और ऐसी ही घटना छपी है, जो इस विश्वास की पुष्टि करती है कि संसार में एक कोई ऐसा तत्व अवश्य है जिसके अनेक रहस्यमय गुणों में सहजानुभूति का गुण भी है। वह तत्व भूत-भविष्य सबको जानता है।
तमिल भाषी हिन्दी लेखक श्री टी. एस. कन्नन लिखते हैं- मेरे भाई विजयकुमार विश्व-यात्रा पर गये थे। एक रात मेरे पिताजी ने स्वप्न में देखा, एक जहाज ऊपर उड़ने को है, उसमें विजयकुमार भी है। जहाज जैसे ही उड़ा, उसमें आग लग गई और वह ध्वस्त होकर भूमिसात् हो गया। यह स्वप्न देखने के साथ ही पिताजी के मन में घबराहट बढ़ी और नींद टूट गई। उन्होंने स्वप्न मुझे बताया और बोले-कोई बात अवश्य है। हमने बहुत समझाया कि ऐसे स्वप्न तो आते ही रहते हैं। पर उनकी बेचैनी दूर न हुई। शेष सारी रात प्रार्थना करते रहे-मेरे विजयकुमार का कोई अहित न हो। हे प्रभु! उसका ध्यान रखना।
दूसरे दिन के समाचार पत्र में एक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का समाचार छपा था। पर उसमें विजयकुमार रहा हो, ऐसी कोई सूचना नहीं थी। चौथे दिन विजयकुमार का पत्र भी आ गया। हमने पिताजी की हंसी उड़ाई, देखो न, आपका स्वप्न झूठा ही था। पिताजी कुछ न बोले। बात आई-गई हो गई।
विजयकुमार यात्रा से वापस लौटे। मद्रास हवाई अड्डे पर हम उन्हें लेने गये। उनके आते ही यात्रा की कुशलमंगल पूछी तो उन्होंने कहा, और तो सब ठीक रहा पर एक दिन तो सचमुच मुझे भगवान ने ही बचाया। हम लोग घर आ गये तब उन्होंने सारी घटना विस्तार से बताई।
भाई साहब को ट्रूवान्टी (कनाडा) से न्यूयार्क जाना था। हवाई जहाज बुक हो चुका था। अपने निवास स्थान से वे हवाई अड्डे के लिये निकले तब कुल आधा घण्टा समय शेष था। उसी बीच एक कनाडियन उन्हें जबर्दस्ती पकड़ ले गया और उन्हें एक होटल में उनकी अनिच्छा के बावजूद काफी पिलाई। लगता था वह जान-बूझकर देर करना चाहता है। किसी तरह जल्दी-जल्दी हवाई अड्डे उसने पहुँचाया तो, पर तब तक जहाज छूट चुका था। विजय कनाडियन पर क्रुद्ध हो रहा था तभी लोगों ने देखा कि उस जहाज में एकाएक आग लग गई और एक धड़ाके के साथ वह पृथ्वी पर गिरा। उसमें बैठी सभी सवारियाँ जल मरीं। यह घटना सुनकर हम आश्चर्यचकित सोचते रह गये कि पिताजी के स्वप्न में सचमुच सत्य था। भाई साहब को किसी अज्ञात शक्ति ने ही बचाया।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. केन गार्डनर की सहजानुभूति के रहस्य पर बड़ी जिज्ञासा है। उन्होंने ऐसी सैंकड़ों घटनाएं एकत्रित की हैं, जो भूत या भविष्य की जानकारी देती हैं और बाद में उनके सत्य होने का प्रमाण मिलता है। इन घटनाओं को उन्होंने दुनिया के अनेक अखबारों में छपाया है। फरवरी 1965 में लंदन में रोनाल्ड आर्थर नामक एक व्यक्ति ट्रोव ब्रिज के जार्ज होटल में नाश्ते के लिये गया जहाँ जाने का एक आकर्षण यह भी था कि उस होटल में एक ऐसी लड़की रहती थी, जो लोगों का भविष्य बता सकती थी।
रोनाल्ड आर्थर को उसने बहुत-सी बातें बतायीं, जो भविष्य से संबंधित थीं। वह जितनी ही सत्य थीं, रोनाल्ड की जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती गई। लड़की एकाएक रुक गई तो उन्होंने पूछा- आगे मेरा भविष्य में क्या होगा? तो लड़की बोली- दुर्भाग्य कि नवम्बर के बाद आपका कोई भविष्य ही नहीं है। यह कहकर वह वहाँ से चली गई। सचमुच उसी वर्ष नवम्बर में रोनाल्ड की मृत्यु हो गई।
ड्यूक यूनिवर्सिटी कैरोलाइना (अमेरिका) के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. जे. बी. राइन ने भी इस तथ्य को माना है कि कोई एक महान सत्ता (सुपर पावर) है, जो मानवीय चेतना की तरह ही है और यदि मनुष्य उसका विकास कर ले तो वह आगत-अनागत की इन सब बातों को सहज ही जान सकता है, जो साधारण अवस्था में कभी कल्पना में भी नहीं आतीं।
महत्व इन थोड़ी-सी प्रकाश में आने वाली घटनाओं का उतना नहीं, जितना इस तथ्य की प्रामाणिकता का कि संसार में एक ऐसी सत्ता है जो इस तरह की विलक्षण क्षमताओं से परिपूर्ण है। ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्य में इस तरह की अनुभूतियों का माध्यम जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी ‘आत्मा’ को ही माना है और लिखा है कि यह आभास 1. सन्ध्यादिकरण अर्थात् जीवन की अनन्तता 2. आत्मा की विद्यमानता 3. आत्मा का प्रकाश शरीर 4. आत्मा की सर्वव्यापकता 5. इच्छा संसार 6. आत्मा की परिपूर्णता 7. उभय लिंगाधिकरण अर्थात् आत्मा, स्त्री-पुरुष आदि लिंगभेद से परे है। 8. आत्मा दृष्टा या साक्षी मात्र तत्व रूप है। 9. जीव का लक्ष्य इन्द्रिय सुख नहीं, शुद्ध आनन्द की प्राप्ति है। 10. कर्मफल और पुनर्जन्म की सत्यता को ही प्रमाणित करते हैं। उपरोक्त घटनाओं में यह सारी बात स्पष्ट अनुभव की जा सकती है।
सहजानुभूति आत्मा के अस्तित्व का प्रकट प्रमाण है। यदि हम उसे स्वीकार करें तो हमें निःसंदेह एक ऐसे जीवन की तैयारी के लिये बल मिल सकता है जिसके लिये ही हम मनुष्य शरीर में आये हैं। लेकिन भौतिक आकर्षणों में फंसे उस सौभाग्य को गंवा रहे हैं। यह हमारे वर्तमान पर निर्भर है कि हम इस तरह का विवेक जागृत कर अपने भूत-भविष्य को अपनी मुट्ठी में लायें और यह मनुष्य शरीर सार्थक करें।
शरीर ने कहा- ‘मैं कितना सुन्दर हूँ, कितना आकर्षक, कितना बलवान।’
आत्मा बोली- ‘तुम अपनी अपेक्षा मुझे अधिक सुन्दर, अधिक आकर्षक और अधिक बलवान बना दो। तुम्हारी ये विशेषतायें तो क्षणिक हैं। ये ही गुण मेरे पास आकर शाश्वत हो जायेंगे।’ किन्तु शरीर की समझ में कुछ न आया। वह अपनी इन रंगीनियों पर खुश होता और झूठा अभिमान करता रहा। कुछ दिन पश्चात जीवन काल समाप्त हुआ शरीर से आत्मा के विच्छेद का समय आ पहुँचा। अब शरीर रोगी, दुर्बल तथा कृश हो गया था। चलते समय आत्मा बोली- ‘तुमने मुझे कुरूप तथा निर्बल रहने दिया। वह सुन्दरता तथा शक्ति दी होती तो मेरा स्वरूप निखर गया होता और वे विशेषताएं भी बनी रहतीं। अब तुम्हारे साथ ही वे समस्त विशेषतायें समाप्त हो गयीं। अच्छा जाती हूँ।’
शरीर अपने अज्ञान पर पछताता और सिर धुनता इस संसार से विदा हो गया। आत्मा भी किसी ऐसे शरीर की तलाश में चल पड़ी, जो उसका विकास और परिमार्जन कर परम तत्व में लय होने योग्य बना दे।
अहंकार और अत्याचार संसार में आज तक किसी को बुरे कर्मफल से बचा न पाये। रावण का असुरत्व यों मिटा कि उसके सवा दो लाख सदस्यों के परिवार में दीपक जलाने वाला भी कोई न बचा। कंस, दुर्योधन, हिरण्यकशिपु की कहानियाँ पुरानी पड़ गयीं। हिटलर, सालाजार, चंगेज और सिकन्दर, नैपोलियन जैसे नर-संहारकों को किस प्रकार दुर्दिन देखने पड़े, उनके अन्त कितने भयंकर हुए, यह भी अब अतीत की गाथाओं में जा मिले हैं। नागासाकी पर बम गिराने वाले अमेरिकन वैमानिक फ्रेड ओलीपी और हिरोशिमा के विलेन (खलनायक) मेजर ईथरली का अन्त कितना बुरा हुआ, यह देखकर सुनकर सैंकड़ों लोगों ने अनुभव कर लिया कि संसार संरक्षक के बिना नहीं है। शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने वाला न रहता होता, तो संसार में आज जो भी कुछ चहल-पहल, हंसी खुशी दिखाई दे रही है, वह कभी की नष्ट हो चुकी होती।
इन पंक्तियों में लिखी जा रही कहानी एक ऐसे खलनायक की है जिसने अपने दुष्कर्मों का बुरा अन्त अभी-अभी कुछ दिन पहले ही भोगा है। जलियावाला हत्याकाँड की जब तक याद रहेगी तब तक जनरल डायर का डरावना चेहरा भारतीय प्रजा के मस्तिष्क से न उतरेगा। पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि डायर को भी अपनी करनी का फल वैसे ही मिला जैसे सहस्रबाहु, खर-दूषण, वृत्रासुर आदि को।
पंजाब में जन्मे, वहीं के अन्न और जल से पोषण पा कर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सिख धर्म में दीक्षित होकर भी जनरल डायर ने हजारों आत्माओं को निर्दोष पिसवा दिया था, उसे कौन नहीं जानता। इंग्लैंड उसकी कितनी ही प्रशंसा करता पर वह भगवान के दण्ड-विधान से उसी प्रकार नहीं बच सकता था, जैसे संसार का कोई भी व्यक्ति अपने किये हुए का फल भोगने से वंचित नहीं रहता। भगवान की हजार आँखें, हजार हाथ और कराल दाढ़ से छिपकर बचकर कोई जा नहीं सकता। जो जैसा करेगा, उसे वैसा भरना ही पड़ेगा। यह सनातन ईश्वरीय नीति कभी परिवर्तित न होगी।
हंटर कमेटी ने उसके कार्यों की सार्वजनिक निन्दा की, उससे उसका मन अशान्त हो उठा। तत्कालीन भारतीय सेनापति ने उसके किये हुए काम को बुरा ठहराकर त्यागपत्र देने का आदेश दिया। फलतः अच्छी खासी नौकरी हाथ से गई, पर इतने भर को नियति की विधि-व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आगे जो हुआ, प्रमाण तो वह है, जो यह बताता है कि करने के फल विलक्षण और रहस्यपूर्ण ढंग से मिलते हैं।
सन 1921 में जनरल डायर को पक्षाघात हो गया, उससे उसका आधा शरीर बेकार हो गया। प्रकृति इतने से ही सन्तुष्ट न हुई फिर उसे गठिया हो गया। उसके मित्र उसका साथ छोड़ गये। उसके संरक्षक माइकेल ओडायर की हत्या कर दी गई। उसे तो चलना-फिरना तक दूभर हो गया। ऐसी ही स्थिति में एक दिन उसके दिमाग की नस फट गई और लाख कोशिशों के बावजूद वह ठीक नहीं हुई। डायर सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर मर गया। अन्तिम शब्द उसके यह थे-
‘मनुष्य को परमात्मा ने यह जो जीवन दिया है, उसे बहुत सोच-समझ कर बिताने वाले ही व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, पर जो अपने को मुझ जैसा चतुर और अहंकारी मानते हैं, जो कुछ भी करते न डरते हैं न लजाते हैं, उनका क्या अन्त हो सकता है? यह किसी को जानना हो तो इन प्रस्तुत क्षणों में मुझसे जान ले।’
‘बाटल ट्री’ (बोतल वृक्ष) आस्ट्रेलिया में पाये जाने वाले इस वृक्ष में बोतलें पैदा होती हों, यह बात नहीं। पर जो बात है वह इससे भी अद्भुत है। बात यह है कि इसके तने की बनावट बोतल की सी होती है और उसमें पानी की बहुत अधिक मात्रा भरी होती है। अपने इस गुण के कारण यह बहुत लंबे अर्से तक भी बिना पानी के बना रह सकता है। यही नहीं जल का अकाल पड़ जाये तो कोई भी मनुष्य उससे जल निकाल कर बहुत दिन तक अपना काम चला सकता है। एडीनम वृक्ष के तनों में भी पानी बहुतायत से पाया जाता है। इनकी तरह से संकट के लिये कुछ सुरक्षित रखने की बात अपव्ययी लोग सीख जायें तो उसमें उनका भी भला हो, देश, जाति और समाज का भी।
ऐसे ही कैलीफोर्निया के 500 मील लम्बे और 30 मील चौड़े क्षेत्र, आस्ट्रेलिया व तस्मानिया आदि देशों में कुछ पौधों को आकाश नापने का शौक है। यूकेलिप्टस नेगनान्स नामक वृक्ष 325 फुट तथा सेक्युआ वृक्ष 290 फुट तक ऊँचे पाये जाते हैं। इसी प्रकार अफ्रीका में पाये जाने वाले वाओबाब नामक वृक्षों का तना इतना मोटा होता है कि उसके किनारे वट सावित्री के दिन कोई भारतीय महिला सूत के सात फेरे लपेटे तो उसके लिये उसे 630 फीट लम्बे सूत की आवश्यकता पड़ेगी। अनैतिक कमाई खा-खा कर अपना पेट बढ़ा लेने वाले मनुष्यों के समान यह वृक्ष भी किसी काम के नहीं होते, सिवाय इसके कि उन्हें जलाकर ईंधन का काम ले लिया जाये।
सभी तेल जड़ या फलों से प्राप्त किये जाते हैं। पर वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि तुलसी वृक्ष की पत्तियों में तेल ग्रंथियाँ पाई जाती है। उन्हीं का परिणाम है कि तुलसी का पौधा दूर तक अपनी सुगंध फैलाता और कृमियों को नष्ट करता है। अपनी इस उपकार प्रियता के कारण ही तुलसी एक वन्दनीय पौधा है।
और विश्वास कीजिए कुछ ऐसे वृक्षों पर, जो लोगों को आवाज देकर बुलाते और आतिथ्य करते हैं। अमरीका के उष्ण प्रदेश में जमइका में सीकेलिस नारियल जैसा एक वृक्ष होता है, उसके फल का वजन 20 किलो होता है। जब ये पककर तैयार होते और फूटते हैं तो उससे पटाखे की सी धड़ाम की आवाज होती है। गोली की आवाज हो तो लोग डरें और भागें, किन्तु इस धमाके की आवाज सुनते ही बन्दरों के झुण्ड के झुण्ड उधर लपकते और जहाँ वह वृक्ष था, पहुँच कर उसकी गिरी खाने का आनन्द लेते हैं।
आस्ट्रेलिया के उत्तर में इमली का एक इतना विशालकाय वृक्ष है कि उसके तने में पाये जाने वाले खोखले किसी समय जेल की आवश्यकता पूरी करते थे। लंबी कैद वाले अपराधियों को लाकर उसमें बन्द कर दिया जाता था। कहा जाता है कि यह वृक्ष दो हजार वर्ष पुराना है। विशेषज्ञों का कथन है कि इस वृक्ष की जड़ें बहुत गहरी हैं, उसी से वह अपनी सामर्थ्य इतनी अधिक बढ़ा सकने योग्य हुआ। जिस समाज में इस वृक्ष की तरह अपनी साँस्कृतिक और जातीय संगठन की आस्थायें ऐसी गहरी होती हैं, उनकी सामर्थ्य भी इस वृक्ष जैसी ही होती है। हजारों वर्षों के प्रतिकूल आघात भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते।
ग्रीक में लाल लकड़ी (रेडवुड) नामक वृक्षों की ऊंचाई 370 फीट तक पाई गई है। वृक्षों की ऊपर उठने की यह प्रवृत्ति मानो मनुष्य को यह प्रेरणा देती हो कि मनुष्य पार्थिव समस्याओं में ही उलझा मत रह। ऊपर देख संसार कितना विराट है। ऊर्ध्वमुखी बनो और उसका ज्ञान भी प्राप्त करो।
इसी प्रकार अफ्रीका में पाये जाने वाले बालसा वृक्ष मनुष्य को इस संसार में हल्का-फुलका जीवन यापन करने की प्रेरणा देते हैं। 20 इंच व्यास वाले किसी 15 फुट लम्बे रेडवुड के टुकड़े को तोलें तो उसका वजन लगभग 14 टन बंटेगा। पर यदि इतनी ही लम्बाई के बालसा वृक्ष के तने को लें तो वह कुछ पंसेरियों में ही तौला जायेगा। कोई भी व्यक्ति उसे आसानी से कंधे पर उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जा सकता है।
अफ्रीका के जंगलों में एक ऐसा वृक्ष भी पाया जाता है, जिसका तना प्रतिदिन उतना दूध दे सकता है, जितना 5 गायें मिलकर। यह दूध अन्य दूध के समान ही पाचक, गुणकारी तथा स्वास्थ्य वर्धक होता है। वहाँ के लोग इस वृक्ष की उसी प्रकार पूजा करते हैं जिस प्रकार भारतवर्ष में गोपाष्टमी के दिन गौ की पूजा की जाती है। मनुष्य कैसा भी हो यदि उसे अपनी आन्तरिक क्षमताओं का उपयोग करना शक्ति, प्रकाश और पोषण प्रदान करने में आ गया तो वह इस वृक्ष की तरह ही क्यों न हो। संसार उसका आदर किये बिना रहेगा नहीं।
भयंकर तूफान आये, वर्षा हुई, आँधी चलीं और आसपास के बहुत से पेड़ जो अकेले का दंभ लिये खड़े थे उजड़ कर नष्ट हो गये। किन्तु इंग्लैंड के दो ऐलम वृक्ष आघातों के बावजूद भी हरे-भरे खड़े हैं। कोई भी तूफान उन्हें धराशायी न कर सका। उसका कारण यह है कि पति-पत्नी की तरह यह दोनों वृक्ष एक दूसरे में जुड़कर एक हो गये हैं। कहते है इन वृक्षों को देखने बहुत से लोग जाते हैं और वहाँ से एक प्रेरणा और जागृति लेकर लौटते हैं कि जिन मनुष्यों के दाम्पत्य जीवन आत्मीयता की ऐसी प्रगाढ़ स्थिति में होते हैं, उन्हें संसार की कैसी भी परिस्थितियाँ परास्त नहीं कर सकतीं।
कोई भी व्यक्ति चाहे वह आकृति में कितना ही छोटा हो, शक्ति में किसी से कम नहीं- इस बात का रहस्य जानना हो तो घास के किसी मैदान का आणविक विश्लेषण करना चाहिए। अपने आप उगने और कुछ दिन में ही सूख जाने वाली साधारण-सी घास-700 बीघे मैदान से काट ली जाये और उसकी सारी आणविक ऊर्जा एकत्र कर ली जाये। उसकी शक्ति 20 हजार टी.एन.टी. के बराबर अर्थात् पूरे एक हाइड्रोजन बम के बराबर होगी। इसी तरह छोटी-छोटी शक्ति वाले साधारण मनुष्यों में भी यदि कहीं से घास जैसा आत्म-विश्वास जागृत हो जाये, तो वही सारे संसार की ऐसी काया-पलट कर सकते हैं, जैसी कोई हाइड्रोजन बम।
फ्लोरिडा अमेरिका में एक अति प्राचीन वट वृक्ष अतीव सजीव प्रेरणाओं के साथ आज भी खड़ा है। इसके तने कई-कई सौ गज की दूरी में फैले हैं, फिर भी वे कहीं से इसलिए नहीं टूटते क्योंकि उनमें से निकल-निकल कर जड़ें पृथ्वी में इस तरह मजबूत होती गई हैं, जैसे 84 खंभों वाली दालान की छत को खंभे साधते हैं। जिस देश के निवासी अपने धर्म, अपनी संस्कृति, मान-मर्यादा, सामर्थ्य और दर्शन को इन जड़ स्तंभों की भाँति अपने कंधों का सहारा दिये रहते हैं। वह संस्कृतियाँ, वह सभ्यतायें इस वृक्ष के तनों की तरह दूर-दूर तक फैलती चली जाती है, फिर भी न उन्हें कहीं से टूटने का डर रहता है न फटने का।
एक अन्धा भीख माँगा करता था। जो पाई-पैसे मिल जाते, उसी से अपना गुजर करता, एक दिन एक धनी उधर से निकला। उसे अन्धे के फटे हाल पर बहुत दया आई और उसने पाँच रुपये का नोट उसके हाथ पर रखकर आगे की राह ली।
उसने कागज को टटोलकर देखा और समझा कि किसी ने ठिठोली की है। और उस नोट को खिन्न मन से जमीन पर फेंक दिया। एक सज्जन ने नोट को उठाकर अंधे को दिया और बताया-यह तो पाँच रुपये का नोट है। तब वह प्रसन्न हुआ और उससे अपनी आवश्यकताएं पूरी कीं। ज्ञान-चक्षुओं के अभाव में हम भी परमात्मा के अपार दान की देख और समझ नहीं पाते, और सदा यही कहते रहते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं हमें कुछ नहीं मिला है, हम साधन-हीन हैं। पर यदि हमें जो नहीं मिला है उसकी शिकायत करना छोड़कर जो मिला है, उसी की महत्ता को समझें तो मालूम पड़ेगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह कम नहीं, अद्भुत है।
‘आचार्य प्रवर इस नवयुवक का पाणिग्रहण अभी इसी मास सम्पन्न हुआ, इसकी विदुषी पत्नी किसी बात पर अप्रसन्न होकर इसे छोड़ गई, अब इसे साँसारिकता से वैराग्य हो गया है अतएव ये आपसे संन्यास दीक्षा लेने आये हैं?’ युवक सोम की ओर इंगित करते हुए उसके एक साथी युवक ने आचार्य चण्डरुद्र से यह शब्द प्रहसन में ही कहे थे किन्तु वह असमय का उपहास ही एक अप्रत्याशित दुर्घटना का कारण बन बैठा।
सोम ने चाहा कि वह इस बात से इन्कार करे और आचार्य चण्डरुद्र को बताये कि महाराज यह सब मेरा यों ही उपहास कर रहे हैं- पर जब-जब उसने कुछ कहने के लिये मुख खोला तब-तब किसी साथी ने आगे बढ़कर पहली बात को ही पुष्ट किया। बहुमत सत्य को भी झूठ बना देता है वाली कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। युवकों की चख-चख से चण्डरुद्र का क्रोधी स्वभाव एकाएक उग्र हो उठा। उन्होंने कहा-अच्छा तो तू तैयार हो, मैं अभी तुझे दीक्षा देता हूँ। यदि इस पर कुछ भी मीनमेख की तो शाप देकर तुझे यहीं नष्ट कर दूँगा।’
बात हंसी की थी पर अनियंत्रित कुसमय और अति होने के कारण तूल पकड़ गई। शेष सभी मित्रों ने चण्डरुद्र का प्रचण्ड रूप देखा तो सबके सब वहाँ से चुपचाप खिसक लिये संकट तो बेचारे सोम शर्मा पर आ धमका। भयवश अब न तो वह इन्कार ही कर सकता था और न ही प्रतिवाद। एक व्यक्ति के क्रोध का दुष्परिणाम दूसरे व्यक्ति को इस तरह भुगतना पड़ा कि न चाहते हुए भी उसे संन्यास दीक्षा लेनी ही पड़ी। चण्डरुद्र का कोप तभी शाँत हुआ जब युवक सोम शर्मा ने विधिवत चीवर धारण कर कमण्डल हाथ में ले लिया और आचार्य प्रवर से विधिवत मंत्र दीक्षा ग्रहण कर ली।
सोम अब सोममुनि बन चुके थे। श्रमण धर्म के सिद्धाँत उनने पहले ही पढ़ लिये थे अब तो उनका पालन करना था, सो सोम बिना किसी राग-द्वेष के उसी क्षण से उन्हें जीवन में धारण करने की साधना में संलग्न हो गया।
गुरु को सादर प्रणाम कर सोम ने कहा-भगवन्! यहाँ तक जो कुछ हुआ, वह सब हठात् किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा के समान हो गया। किन्तु ऐसा सदैव नहीं होता रहता। संसार कोटानिकोटि घटनाओं का एक शृंखलाबद्ध प्रवाह है। अब जो कुछ हो रहा है वही आगे की घटनाओं का आधार होगा। इसीलिये विज्ञ जन आज का कदम बहुत सोच समझ कर उठाते हैं। आप यह निश्चित समझें कि जब यह समाचार मेरे परिवार के लोगों तक पहुँचेगा तब वे क्रुद्ध होंगे, संभव है वे प्रतिकार के लिये यहाँ आयें और आपको भी दण्ड देने से न चूकें। आप मेरे गुरु हैं आपकी रक्षा मेरा परम कर्त्तव्य है। इसलिए अब यह स्थान बदल लेने में ही अपना हित है?
‘सो सो तो सत्य है अवुस! किन्तु तुम्हीं सोचो-सन्ध्या बीत चुकी रात्रि का अन्धकार बढ़ता जा रहा है, मेरा वृद्ध शरीर है चलने की सामर्थ्य से मैं वैसे ही रहित हूँ फिर रात्रि के अंधकार में चलना तो मेरे लिये भी मरण तुल्य है।’ चण्डरुद्र ने स्थिति की गंभीरता अनुभव करते हुए उत्तर दिया।
‘आप उसकी चिन्ता न करें देव। हम आपको कंधे पर बिठा लेंगे। अभी तो मैं युवक हूँ आपको कंधे पर लेकर कहीं भी जा सकता हूँ’ यह कहकर सोममुनि ने एक बार अपनी सुडौल देहयष्टि पर दृष्टि डाली और गुरु के आदेश की प्रतीक्षा करने लगा। चण्डरुद्र क्रोधी थे तो क्या वे विचारशील व्यक्ति थे उन्हें सोम मुनि के कथन की सत्यता अनुभव करते देर न लगी। वे तुरन्त वहाँ से चलने के लिये तैयार हो गये।
घना अन्धकार हाथ को हाथ नहीं सूझता था ऐसे समय अपने एक दिन के गुरु चण्डरुद्र को कंधे पर बैठाये सोममुनि आगे बढ़ चले। गहन गह्वर वन, नदियाँ, टीले, पहाड़ पार करते सोममुनि आगे बढ़ते जा रहे थे पर अर्द्धरात्रि बीतने तक उसका शरीर पूर्णतया कथकि हो गया। उधर नींद के झोंके आलोड़ित करने लगे, फिर ऊबड़-खाबड़ रास्तों में चलने से पैरों में चोटें आई थीं वह कष्ट भी कम दुःखद नहीं था।
इन सबसे कष्टप्रद तो चण्डरुद्र का क्रोधी स्वभाव था। सोम का पैर किसी गड्ढे में पढ़ जाता तो आचार्य चण्डरुद्र का वृद्ध शरीर कचकचा जाता फलतः वे शिष्य को गालियाँ देते कटु कहते और कई बार तो क्रोध के आवेग को रोक न सकने के कारण सोम मुनि की पीठ पर प्रहार भी कर देते थे। रजोहरण दण्ड चण्डरुद्र के हाथ में था। सोम मुनि जब आगे बढ़ रहे थे तो अंधेरे में दिखाई नहीं दिया और उनका अगला पैर एक बिवर में जा गिरा। सारी शक्ति लगाकर सम्हले भी पर कहाँ तक संभालते आचार्य चण्डरुद्र गिरते-गिरते बचे। इस बार उनका क्रोध सीमा पार कर गया। अपने रजोहरण दण्ड से सोम के सिर पर तीव्र प्रहार करते हुये चिल्लाये दुष्ट तुझे दिखाई भी नहीं देता, मार दिया होता अभी मुझे।
सोम मुनि तो मानो साक्षात सहनशीलता और नम्रता के अवतार थे। सिर फट गया। रुधिर बह कर सारे शरीर को भिगोने लगा तो भी उन्होंने उसकी किंचित चिन्ता नहीं की। उन्हें एक ही दुःख था कि संभल न सकने के कारण उनके गुरु को अकारण ही कष्ट हुआ। सोम बड़े करुणाशील शब्दों में बोले-गुरुदेव! आपने ठीक ही दण्ड दिया, कैसा दुर्भाग्य है मेरा कि आपको सुविधा पूर्वक ले भी नहीं जा सकता। यह कहकर सोम मुनि और भी संभल-संभल कर चलने लगे।
इधर भगवती ऊषा आसमान में वेग से अपना रथ दौड़ाये आ रही थीं। उधर थकावट के कारण सोम मुनि का घाव भी गहरा हो चला था। रक्त निकलने की मात्रा बढ़ती ही जाती थी। गर्म रक्त एकाएक आचार्य चण्डरुद्र के पैरों का स्पर्श करने लगा तब उन्हें पता चला कि आघात तीव्र लग चुका है। उन्होंने सोम मुनि के सिर पर हाथ फिरा कर देखा तो उनके दुःख की सीमा न रही, संपूर्ण हथेली रक्त से भीग गई चण्डरुद्र को वस्तु स्थिति समझते देर न लगी। सोम मुनि को वहीं रोककर उसके कंधे से उतर पड़े और बड़े-दुःख एवं करुणा भरे स्वर में फूट-फूट कर रोने लगे- वत्स सोम!!! उन्होंने कहा- मैं कितना पातकी हूँ कि तुझ जैसे महान सहनशील और विनम्र शिष्य को भी कष्ट देने से नहीं चूका। यह सब मेरे क्रोध के कारण हुआ तात! मुझे क्षमा करें जो पाठ मैं आचार्य होकर भी आज तक नहीं सीख सका था वह आज तू ने सिखा दिया। अब मैं जीवन भर कभी क्रोध न करूंगा।
आचार्य चण्डरुद्र इतने विद्वान और साधक होकर भी आज तक क्रोधी स्वभाव के कारण समाधि सुख नहीं प्राप्त कर सके थे। आज शिष्य के अक्रोध ने उनका यह दूषण दूर कर दिया तो वे समाधि की स्थिति में सहज ही पहुँच गये। अपने शिष्य की इस कृपा को चण्डरुद्र जीवन भर नहीं भूले। उन्होंने बड़े परिश्रम और तन-मन से अपनी सारी विद्यायें सोम मुनि को दान कर दीं।
महाराष्ट्र की पत्र पत्रिकाएं गाँधी जी पर आलोचनात्मक लेख प्रकाशित करने लगीं तो उन पर श्रद्धा रखने वाले स्त्री-पुरुषों को बड़ा बुरा लगा, एक भद्र महिला ने गाँधी जी को पत्र लिखा ‘मराठी पत्र पत्रिकायें आपके विरुद्ध झूठा प्रचार कर रही हैं, विष उगल रही हैं। जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर पा रहा है, पर आप ऐसे समय भी मौन हैं इसलिये मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।’ गाँधी जी ने उत्तर दिया, ‘महाराष्ट्र के अनेक मित्रों द्वारा मेरे विरोध में जो प्रचार किया जा रहा है, उससे मैं अनभिज्ञ नहीं हूँ, नित्य ही देखता रहता हूँ और यहाँ भी अनेक साथी उन समाचारों की ओर मेरा ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। पर मैं क्या करूं? यह मेरी समझ में ही नहीं आ रहा है, क्योंकि इस देश में मेरे अनेक ऐसे भी मित्र हैं जो मेरी प्रशंसा ही करते रहते हैं। फिर निंदा और प्रशंसा में अच्छा-बुरा मानने की बात ही क्या। विश्वास रखो, आलोचना से न तो मैं घट जाता हूँ और न प्रशंसा से बढ़ जाता हूँ। जैसा हूँ वैसा ही रहता हूँ। वास्तविक बात तो यह है कि यदि व्यक्ति अपने सृजनहार की दृष्टि में सच्चा बना रहे तो उसे अन्य किसी व्यक्ति की तनिक भी चिन्ता नहीं रहती।’
संसार में आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं सबका ध्येय जन सेवा रहा है। यह बात दूसरी है किसी ने तन से सेवा की हो किसी ने वचन या धन से। अधिकतर महापुरुष निर्धन ही रहे हैं, जनता की सेवा लायक धन उनके पास रहा ही नहीं। उनकी सेवा अधिकतर तन-मन एवं वचन द्वारा ही सम्पादित हुई है। यही सेवा उच्च तथा समीचीन भी है। धन की सेवा से प्रायः अहंकार का दोष आ सकता है। ऐसे हरिश्चन्द्र जैसे कम दानी ही होते हैं जो सर्वस्व देकर भी विनम्र तथा निरहंकारी बने रहते हों।
सेवा करने से कोई प्रत्यक्ष लाभ तो होता नहीं। ऐसा लाभ-भौतिक लोग जिन लाभों को पदार्थों के रूप में देखते मानते हैं। फिर ऐसी क्या बात हो सकती है कि महापुरुष कहे जाने वाले जैसे बुद्धिमान लोगों ने अपना पूरा का पूरा जीवन जन सेवा के लिये समर्पित कर दिया। इतना ही नहीं वे दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते रहे और आज भी देते हैं। अवश्य ही जन सेवा से ऐसा कोई लाभ होना ही चाहिये। जिसने संसार के श्रेष्ठ लोगों को सेवा ध्येयी बना दिया। निश्चय ही वह अनिर्वचनीय लाभ आत्मसन्तोष है। जन सेवा का पुण्य परमार्थ अथवा स्वर्ग मोक्ष का लाभ परोक्ष हो सकता है जो कि जीवन के बाद मिल सकता है, किन्तु आत्म संतोष का लाभ प्रत्यक्ष है। वह इसी जन्म से पग-पग तथा क्षण-क्षण पर मिलता रहता है। यह लाभ कितना बड़ा कितना विशाल और कितना अनिर्वचनीय हो सकता है इसका अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि महापुरुष अपना बहुमूल्य जीवन व समय इसके लिये जन सेवा को समर्पित कर दिया करते हैं। इतना ही क्यों? न जाने ईसा और गाँधी जैसे कितने महापुरुष ऐसे हुये हैं जिन्होंने जनता जनार्दन के हित में, उसकी सेवा करने में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
निःसंदेह आत्म-संतोष का सुख ऐसा ही महान तथा अनुपम है। इस सुख के सम्मुख मोक्ष सुख को भी महत्ता नहीं दी गई है। जहाँ मोक्ष का सुख अपने में कर्त्तव्यों तथा गतिशीलता का अभाव रहता है वहाँ आत्म-संतोष के सुख के पीछे निरन्तर कर्मशीलता की शोभा विद्यमान है। कर्म एवं कर्मयोगी जन निष्क्रिय सुख की अपेक्षा सक्रिय सुख को ही अधिक महत्व दिया करते हैं।
आत्म-संतोष की विशेषता बतलाते हुए कहा गया है कि यह मनुष्य जीवन के कर्त्तव्यों पर दृढ़ भाव लाता है। सामान्य परिस्थितियों में भी मनुष्य के अन्तःकरण को भगवान ऐसा बना देता है। संसार के लोगों की सेवा का सुख महापुरुषों ने उठाया। उनका मुख्य लक्ष्य आत्मा-सन्तोष जहाँ रहा वहीं महानता निखरी और संसार का कल्याण हुआ।
भगवान राम पिता की आज्ञा पालन रूप राज्य का उत्तराधिकार छोड़कर वनवास में चले गये। जहाँ पर उन्होंने आत्म-संतोष के बल पर जंगल के सारे अभाव तथा कष्ट हंसते-हंसते झेल लिये। सीता तथा लक्ष्मण का अनुगमन भी आत्म-संतोष से ही प्रेरित था और इसी आधार पर उन्होंने भी सारे कष्ट और सारी यातनाओं को पुष्पवत् सुखद तथा शीतल माना। भगवान परशुराम को अपने के द्वेषी कीर्त्तवीर्य को मारकर भी जब संतोष नहीं हुआ तो इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्र कर देने पर भी जब उसकी प्राप्ति न हुई तब उन्होंने कठोर तपश्चर्या का व्रत धारण किया और जब तक आत्म-संतोष प्राप्त नहीं कर लिया उसमें लगे ही रहे। निश्चय ही आत्म संतोष ऐसी ही मूल्यवान सम्पदा है। इसके प्राप्त हो जाने पर फिर किसी धन किसी सुख अथवा किसी वैभव की आकाँक्षा नहीं रहती।
भौतिक क्षेत्र में भी तो जन साधारण की सारी क्रियाओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष लक्ष्य आत्म-संतोष ही होता है। यह भिन्न बात है कि अपनी न्यूनताओं तथा त्रुटियों के कारण वे उसे पाते न हों। जीविका कमाने खाने और परिवार का पालन करने में संतोष की संभावना न हो तो उसे कोई क्यों करने लगे। व्यवसायों, व्यापारों, सेवाओं अथवा अन्य कष्टकर कर्त्तव्यों के पालन करने में आत्म-संतोष की आशा न रहे तो शीघ्र ही लोग छोड़-छाड़ कर बैठ जायें। आत्मसंतोष की झलक तथा उसको अधिकाधिक पाने की आशा ही तो मनुष्य को जीवन पथ पर अनेकानेक कठिन परिस्थितियों के बीच भी उत्साह पूर्वक सक्रिय रखती है। जिन जिनको इसमें असफलता मिलती है अथवा जिनकी आशा टूट जाती है उनका मन ही संसार से उचट जाता है। वे अपने मानवीय कर्त्तव्यों से विमुख हो या तो साधु वैरागी हो जाते हैं अथवा आत्मघात जैसा पाप कर बैठते हैं। आत्म-संतोष ही वह धुरी है जिस पर संसार का चक्र घूम रहा है। यदि परिवार, संतान, समाज तथा राज्य व्यवस्था से सन्तोष लाभ न हो तो कोई भी इसके लिए सहम न हो और जहाँ-जहाँ इनसे लोग आत्म-संतोष के विषय में निराश हो जाते हैं वहाँ-वहाँ यह व्यवस्थायें भंग हो जाती हैं। बड़ी क्राँतियाँ घटित हो उठती हैं। आत्म-संतोष संसार का सार तत्व है। इसे सभी को प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही चाहिए और लोग प्रयत्न कर भी रहे हैं।
किन्तु किसी भी लक्ष्य को पाने के लिये एक समुचित पथ निर्धारित होता है, जिस पर चलकर ही गन्तव्य तक पहुँचा जा सकता है। जो भ्रम भूल अथवा किसी अन्य कारणवश अन्यथा पथ ग्रहण कर लेते हैं वे असफल ही हो जाया करते हैं। आत्म-संतोष करने के लिये भी पथ निर्धारित है और वह है निस्पृह एवं निःस्वार्थ रूप से संसार की सेवा का पथ। लोग सेवा करते भी हैं। उनकी सारी क्रियाएं तथा सारे कार्य कलाप एक प्रकार की सेवा के ही तो रूप हैं। फिर चाहे वह अपनी सेवा हो परिवार अथवा समाज की सेवा हो। इसके लिये वे धन, श्रम तथा समय भी व्यय करते हैं। किन्तु आत्म-संतोष का वाँछित लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते। इस असफलता के मूल में उनकी अपनी कोई न कोई भूल अवश्य ही रहा करती है।
कितने ही लोग असंख्यों धन कमाते हैं और उनमें से कितने ही विभिन्न मार्गों द्वारा जन सेवा में भी लगाते हैं। कोई दान देता है। भूखे, नंगों को भोजन वस्त्र बाँटता है, सदावर्त खुलवा देता है। अनेक धर्मशाला, मन्दिर तथा चिकित्सालयों की व्यवस्था कर देते हैं। बहुत से विद्यार्थियों के लिये छात्र वृत्तियाँ तथा शिक्षा के लिये विद्यालयों का प्रबंध करते रहते हैं। बहुत से लोगों की रोटी-रोजी के लिये उद्योग भी खड़े कर देते हैं। गौशाला, पाठशाला, धर्मशाला, कुआँ, तालाब, बाग, बगीचे आदि छोटे-मोटे काम भी जन सेवा के ही रूप हैं। अनेक लोग जन संस्थाओं, जन सेवकों को तथा महात्माओं की सहायता के रूप में जन सेवा का प्रयत्न किया करते हैं। अनेक व्यक्तिगत रूप अथवा जन सेवी संस्थाओं के सदस्य अथवा कार्यकर्ता बनकर समाज की सक्रिय सेवा भी करते हैं। अनेक लोग निःशुल्क शिक्षा देकर निरक्षरता को दूर करने को जनसेवा मान लेते हैं। इस प्रकार की न जाने कितनी जन सेवाएं हैं जिन्हें लोग करते और आत्म-संतोष पाने के लिए लालायित रहा करते हैं। किन्तु स्पष्ट देखने में आता है कि वे अपने इस लक्ष्य में कृतकृत्य नहीं हो पाते। अधिकतर लोग असफल एवं असन्तुष्ट ही दिखाई देते हैं। जन सेवा के फलस्वरूप जो तेज, जो ओज और जो प्रसन्नता उनके चेहरों पर दिखलाई देनी चाहिये वह नहीं दिखलाई देती। इसका एक मुख्य कारण है। ‘लोक-लिप्सा की दुर्बलता।’ लोक-लिप्सा की भावना मनुष्य की सारी सेवाओं को व्यापार में बदल कर रख देती है। जन सेवा के कार्यों से जो पुण्य परमार्थ और उसके फलस्वरूप जो अनिर्वचनीय आत्म-संतोष का सुख प्राप्त होना चाहिए, लोग, लोक-लिप्सा के कारण उससे वंचित हो जाते हैं।
आदानं हि विसर्गाय सताँ वारिमुचामिव।
-कालीदास
बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी को लौटा देते हैं उसी प्रकार सज्जन पुरुषों को चाहिए कि वे समाज से जो कुछ पायें उसका दान भी करें।
लोग सार्वजनिक संस्थाओं में दान देते हैं। पर साथ ही यह भी प्रयत्न करते हैं कि उनका नाम प्रसिद्ध हो। उनको संस्था में कोई पद मिले जिससे लोग उन्हें जानें और उनका सम्मान करें। ऐसे ही लोक लिप्सालुओं के कारण सार्वजनिक संस्थाओं की मिट्टी खराब हो जाती है, जिनका ध्येय लोक सेवा होता है वे आपसी ईर्ष्या-कलह तथा दुरभिसन्धियों के अखाड़े बन जाते हैं। जिनको सब नहीं मिल पाता वे संस्था को हानि पहुँचाने की कोशिश करने लगते हैं और पद पा सकते हैं वे किन्हीं भी कारणों से उन्हें छोड़ना नहीं चाहते फिर चाहे उसके लिये उन्हें कितनी ही उखाड़-पछाड़ क्यों न करनी पड़े। सदस्य एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए संस्था तक को नष्ट कर देने पर तुले रहते हैं। यह तो जनसेवा नहीं हुई। थोड़ा सा दान देकर इतना बड़ा पाप मोल लेकर यदि कोई आत्म-संतोष का सुख चाहता है तो वह बालू से तेल पाने जैसी आशा रखता है।
लोग किसी देवता का मन्दिर बनवाते हैं उसमें पैसा लगाते हैं और उसका प्रबंध करते हैं, किन्तु खेद है कि वे मन्दिर की प्रसिद्ध देवता के नाम पर न कराकर अपने नाम पर कराते हैं। स्थापक का पत्थर देवता के नाम से कहीं विशाल तथा मोटे अक्षरों का जड़ा जाता है। अपने इस कार्य के लिये प्रशंसा पाने के हेतु पैसा खर्च कर प्रचार कराते हैं। भला इस प्रकार की व्यापारिक जनसेवा आत्म-संतोष का सुख कहाँ से लाकर दे पायेगी। बड़े-बड़े काम तो छोड़ दीजिए यदि कोई कुछ दिनों के लिये एक छोटी-सी प्याऊ बिठाल देता है तो उस स्थान पर अपने नाम का बोर्ड टंगवा देता है। किसी को भी पानी पिलाने पर उससे यह आशा करता है कि वह उनकी इस उदारता का परिचय लोगों को दे और उनके नाम का प्रचार करे।
इसी प्रकार यदि कोई अभावग्रस्त अथवा आपत्तिग्रस्त लोगों की कुछ सेवा करते हैं और यदि वहाँ पर नामपद जड़ाने का कोई अवसर न हुआ तो अपने कृत्य का स्वयं प्रचार करते हैं। जहाँ किसी से बात करने का मौका मिला कि घुमा-घुमा कर अपने सुकृत्य की चर्चा करने लगे। बहुत बार देखा गया है कि यदि कोई शिक्षित किन्हीं बच्चों को निःशुल्क पढ़ा देते हैं तो चाहते हैं कि उनके अभिभावक उनका अभिनन्दन करें और बच्चे अपने गुरु की स्थान-स्थान पर चर्चा करते रहें।
अधिकाँश लोक लिप्सा से प्रेरित होकर ही थोड़ा सा जनसेवा का कार्य करके सौ मुखों से उसका प्रचार करते हैं। लंबे-लंबे लेक्चर झाड़ कर लोगों को प्रभावित करते, चुनावों में खड़े होते और दाँव-पेंच चलाकर सफल हो जाते हैं और तब अपना लोक परिचय बढ़ाने के लिए नेताओं तथा मंत्रियों के साथ खुशामद अथवा करामात से फोटो खिंचाने का प्रयत्न करते और इच्छुक रहते हैं कि उनका नाम भी अखबार में जाता। एक सेवा से इतना लाभ उठाने वाले लोक लिप्सु यदि आत्म-संतोष जैसा अलौकिक सुख पाना चाहते हैं तो वे भूल करते हैं। उन्हें अपनी यह इच्छा छोड़ ही देनी चाहिए।
बहुत बार देखा जाता है कि लोक लिप्सु नेता तथा मंत्री लोग यदि अकाल अथवा बाढ़-पीड़ित लोगों की दशा का दिग्दर्शन करने जाते हैं तो उनके साथ उसका प्रचार करने वाले पत्रकार व फोटोग्राफर भी जाते हैं और सेवा कार्यक्रम, पर तरह-तरह के फोटो और तरह-तरह के जनसंपर्क का ही कार्यक्रम अधिक रहता है। वे उन दुर्दशाग्रस्त लोगों के प्रति अपनी तथाकथित सहानुभूति एवं संवेदना को लोक प्रियता के मूल्य में भुना लेने का प्रयत्न किया करते हैं। भला इस प्रकार की लोक लिप्सा से दूषित सेवा कार्य आत्म-संतोष देने लगे तो लोगों को उसके लिये तप त्याग तथा निस्पृह जन-सेवा का जीवन अपनाने की क्या जरूरत है।
मूक जन सेवा ही आत्म-संतोष की वाहिका होती है। इसके लिये जिज्ञासु को शिखरस्थ कलश नहीं नींव की आधारशिला बनने की भावना रखनी चाहिए। प्रशंसा, नामवरी, प्रसिद्धि आदि की लोक लिप्सा को छोड़कर जन सेवा का व्रत लेने वालों और दान-पुण्य करने वालों को ही आत्म सन्तोष मिला करता है। जो भी इस विषय में जरा भी व्यापार बुद्धि रखता है उसे सर्वथा, सर्वदा निराश ही होना पड़ता है सच्चे आत्म-संतोष के लिये लोक लिप्सा का त्याग आवश्यक है।
मराठी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री हरिनारायण आप्टे अपनी मिश्रायन (रोटी बनाने वाली) की छह वर्षीय कन्या के साथ ही नित्य भोजन करते थे। एक दिन भोजन करते समय ही उनके एक मित्र आये। बच्ची को देखकर बोले ‘शायद यह अपनी प्रथम पत्नी की कन्या है?’ श्री आप्टे मन्द मुस्कुराए और धीरता के साथ बोले ‘नहीं भाई, यह तो मेरी भानजी (बहन की कन्या) है।’
इधर मूर्ख नेताओं वाले देश भारतवर्ष में तृतीय पंचवर्षीय योजना देश भर में मुर्गी पालन और अण्डा उत्पादन का अभियान चला रही थी उधर फ्लोरिडा अमेरिका का कृषि विभाग ‘अण्डों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है’ उसकी शोध और परीक्षण कर रहा है। अट्ठारह महीनों के परीक्षण के बाद 1967 की हेल्थ बुलेटिन ने बताया- अण्डों में डी.डी.टी. विष पाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक है।
कैलीफोर्निया के विश्व विख्यात डॉ. कैथेराइन निम्मो डी.सी.आर.एन. तथा डॉ. जे. एमन विल्किन्ज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में बताया-एक अण्डे में लगभग 4 ग्रेन ‘केले स्टरोल’ नामक अत्यन्त विषैला तत्व पाया जाता है। यह विष हृदय रोगों का मुख्य कारण है। इतनी सी मात्रा से ही हाई ब्लडप्रेशर, पित्ताशय में पथरी, गुर्दों की बीमारी तथा रक्त में जाने वाली धमनियों में घाव हो जाते हैं ‘इस स्थिति में अण्डों से स्वास्थ्य की बात सोचना मूर्खता ही है।’
इन डाक्टरों की यह रिपोर्ट पढ़कर विश्वभर के डॉक्टर चौंके और तब सारे संसार की प्रयोगशालाओं में परीक्षण होने लगे। उन परीक्षणों में न केवल उपरोक्त तथ्य पुष्ट हुये वरन् कुछ नई जानकारियाँ मिलीं जो इनसे भी भयंकर थीं।
उदाहरण के लिये इंग्लैंड के डॉ. राबर्ट ग्रास, इविंग डैविडसन तथा प्रोफेसर ओकड़ा ने कुछ पेट के बीमारों का- अण्डे खाने और अण्डे खाना छोड़ देने इन, दोनों परिस्थितियों में परीक्षण किया और पाया कि जब तक वे मरीज अण्डे खाते रहे तब तक उनका पाचन बिगड़ा रहा, पेचिश हुआ और ट्यूबर कुलैसिस बैक्टीरिया (टी.बी.) जन्म लेता दिखाई दिया।’
अमेरिका के डॉ. ई.वी.एम.सी. कालम ने तो इन तथ्यों का विधिवत प्रचार किया उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यूअर नॉलेज आफ न्यूट्रिन पेज 171 में लिखा है’ अण्डों में कार्बोहाइड्रेट्स तथा कैल्शियम की कमी होती है। अतः यह पेट में सड़ाँद उत्पन्न करते हैं, यह सड़न ही अपच, मन्दाग्नि और अनेक रोगों के रूप में फूटती है साथ ही स्वभाव में चिड़चिड़ापन- थोड़े में क्रुद्ध हो जाना जैसी बुराइयाँ उत्पन्न करता है।
‘दि नेचर ऑफ डिसीज’ पत्रिका के द्वितीय वाल्यूम पेज 194 में चेतावनी देते हुए डॉ. जे.ई.आर.एम.सी. डोनाह एफ.आर.सी.पी. (इंग्लैंड) लिखते हैं- ‘कैसा पागलपन है कि जो अंडा आँतों में विष और घाव उत्पन्न करता है आज उन्हीं अण्डों की उपज में वृद्धि करने की व्यावसायिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं।’
धार्मिक आध्यात्मिक और जीव दया जैसी अत्यधिक आवश्यक बातें उपेक्षित भी की जा सकती हैं पर क्या इन डाक्टरी निष्कर्षों को भी ठुकराया जा सकता है। अण्डा किसी भी अर्थ में स्वास्थ्य वर्धक नहीं। इंग्लैण्ड के डॉ. आर. जे. विलियम्स का कथन है आज जो लोग अण्डे खाकर स्वस्थ होने की कल्पना करते हैं वहीं कल जब एक्जिमा और लकवे जैसे भयंकर रोग से शिकार होंगे- तब पश्चाताप करेंगे कि घास की रोटी खा लेती तो अच्छा था अण्डा खाकर आत्मघात जैसा दुर्भाग्य तो सिर पर न पड़ता।
‘ऐ मौत के जाल में फंसे इंसान! अपनी तश्तरियों को माँस से सजाने के लिये जीवों की हत्या करना छोड़ दे। जो भोले-भाले पशुओं की गरदन पर छुरी चलवाता है, उनका करुण क्रन्दन सुनता है, अपने हाथों पाले हुए पशु-पक्षियों की हत्या करके अपनी मौज मनाता है। उसे अत्यन्त तुच्छ स्तर का व्यक्ति समझना चाहिए। जो मनुष्य पशुओं का माँस खा सकता है वह किसी दिन मनुष्यों का खून भी पी सकता है।’
-दार्शनिक पैथागोरस
कह नहीं सकता किस जीवन के कौन से संस्कार थे कि शरीर तो दुबला-पतला ही था किन्तु बाल्यावस्था से ही मन किया करता है कि कोई शेर या चीता मिले तो उससे कुश्ती लडूँ? यह कमजोर शरीर ही था जो निराश करता था वरना राजकुमार भरत की तरह छोटे में ही कई बार बाघ के दाँत तोड़ चुका होता।
जो इच्छा-शक्ति कुछ दिन पहले जंगली जानवरों से लड़ने की ओर मुड़ी थी अब वह अन्तर्मुखी हो उठी। मैं दिन-रात यही सोचा करता कि मैं बहुत शक्तिशाली हो जाऊं, मेरा शरीर बलवान हो जाये, मेरे रग-पुट्ठे सुदृढ़ और सुडौल हो जायें, मुट्ठी भीचूँ तो गदेलियों से पसीना छूट जाये। मुझे तब पता नहीं था कि इच्छा शक्ति में भी कुछ जादू होता है, पर मैंने उसे अपने आप में सचमुच जादू पाया। मेरा स्वास्थ्य दिनों दिन अच्छा होता गया और मैं एक हट्टा-कट्टा युवक बन गया।
अब मन चीती करने का समय आ गया तो मेरी प्रसन्नता का पाराव नहीं रहा। मैं विचार करता कि जंगल के यह बड़े जन्तु छोटे जीव-जंतुओं को पकड़ कर, खा जाते हैं तो गुस्से से मेरी आँखें लाल हो जाती थीं। बड़े जीवों द्वारा छोटों को सताया जाना मुझे कतई पसंद नहीं था। इसलिये मैंने निश्चय किया जंगल के इन हिंसक जंतुओं को सबक सिखाना चाहिए। इसी निश्चय के साथ मैं जंगल जाने लगा।
अब तक मेरी इच्छाशक्ति पूर्ण प्रौढ़ और प्रखर हो चुकी थी। भय नाम की भी कोई वस्तु होती है, यह मैंने पूरी तरह भुला दिया। एक बार जब जंगल में प्रविष्ट हो जाता तो वहाँ के हिंसक से हिंसक बाघ, शेर, चीते भी मुझे मूषकों और भेड़-बकरियों की तरह लगते। एक बार जब निश्चित कर लिया तो यह मेरे प्रतिदिन के जीवन का अंग बन गया। मैं प्रतिदिन जंगल जाता, हिंसक जीव मुझे साक्षात काल के समान देखते और दूर से ही भाग जाते। वह बड़ा दुर्भाग्यशाली होता जो एक बार भी मेरी दृष्टि में पड़ जाता। आँख से आँख मिलाते ही मेरी प्रखर इच्छा शक्ति उसके मन पर बुरी तरह आघात करती और वह जन्तु भले ही शेर ही क्यों न रहा हो। शरीर से कितना ही पुष्ट क्यों न रहा हो बिल्ली बन जाता, पूँछ दबाकर दया की भीख माँगता, पर मुझ निष्ठुर ‘सोहंग स्वामी’ से बचकर जाना उसके लिए कठिन होता। जी भर पीटता पटकता और जिस पर दया न आती मार कर ही छोड़ता। स्मरण नहीं ऐसे कितने बाघ, चीते, लकड़बग्घे मारे होंगे। मेरी इन वारदातों का ही परिणाम था कि लोग मेरा ‘सोहंग स्वामी’ नाम तो भूल गये पर मैं एक नये ‘टाइगर-योगी’ के नाम से सारे बंगाल प्रान्त में विख्यात हो गया। मेरे पास इससे संबंधित जानकारी के लिए प्रतिदिन देश-विदेश से सैंकड़ों पत्र आते पर मुझे इस व्यवसाय से ही फुरसत कहाँ थी? जो उनके उत्तर देता।
एक दिन की बात है एक साधु मेरे घर आये। मैं तब जंगल में ही था। उन्होंने मेरे पिताजी को बुलाकर कहा- आपका लड़का जंगली जीवों को सताता है, यह अच्छी बात नहीं है। उसे रोको अन्यथा कभी कोई भयंकर परिणाम भी निकल सकते हैं।
पिताजी ने साधु को प्रणाम करते हुए कहा- महात्मन्! मेरा लड़का छोटे कमजोर जीवों को नहीं सताता। वह तो हिंसक जीवों को मारता है, वह भी निहत्थे तब फिर इसमें दोष क्या है?
दोष! साधु बोले- किसको कब दण्ड देना है कैसे देना है? यह ईश्वर का काम है, मनुष्य का नहीं? तुच्छ जीवों की उत्पत्ति संभवतः इच्छाशक्ति का निम्नगामी रूप है। परमात्मा नहीं चाहता कि मेरी सृष्टि में कायर कमजोर और अमंगल इच्छायें रहें। निर्बलता तो प्रकृति को भी कतई पसंद नहीं। तभी तो शेरनी अपने चोट खाये या उस जख्मी बच्चे को भी खा सकती है जो दौड़ने चलने फिरने में उसका साथ नहीं दे सकता। ‘जीव जीवस्य भक्षणं’ छोटा जीव बड़े जीव का आहार प्रकृति के किसी उपयोगी सिद्धाँत के आधार पर ही करता है यह काम पूर्णतया प्रकृति का है। मनुष्य को अपने कल्याण का मार्ग बनाना और उस पर चलना ही कौन-सा कम कठिन है जो वह प्रकृति के सिद्धाँतों से व्यर्थ टक्कर ले।
साधु की सारी बातें पिताजी ने ध्यान से सुनीं और फिर जब मैं जंगल से लौटा तो मुझसे भी कहीं। एक बार तो मुझे उन बातों में कुछ सार सा प्रतीत हुआ। किन्तु मैंने दूसरे ही क्षण उन उपदेश की भी उपेक्षा कर दी। अब मुझे हिंसक जन्तुओं से भिड़ने और उन्हें मारने में आनंद आने लगा था। उसे छोड़ना कठिन बात थी, तो भी मुझे ऐसा लगा कि मेरे सामने कोई ईश्वरीय सत्ता भी अवश्य है और उसके क्रियाकलापों में हस्तक्षेप का पाप मुझे नहीं करना चाहिये। इसलिये अब कई बार मैं अपने आप को कुछ कमजोर और भयभीत भी अनुभव करता। मुझे इसके लिये उस साधु पर कभी-कभी गुस्सा भी आ जाया करता।
संकल्प विकल्प के इन दिनों में मेरी ख्याति कम से कम बंगाल में तो घर-घर थी ही। कूच बिहार के राज्याध्यक्ष ने भी यह खबर सुनी। उन्हें जंगली जानवर पालने का बड़ा शौक था। इसलिये जंगली जन्तुओं के हिंसक स्वभाव से भी अच्छी तरह परिचित थे। मेरे करतब उन्हें अद्भुत आश्चर्यजनक और तान्त्रिक से लगे। फलतः उन्होंने अपनी जिज्ञासा शाँत करने के लिए मुझे कूच बिहार आने और उक्त प्रदर्शन करने का निमंत्रण दिया। वहाँ की प्रजा भी मेरी बाघ से कुश्ती देखने को बहुत लालायित थी। कई चुनौती भरे पत्र मेरे पास आते थे। इसलिये न चाहते हुए भी मुझे यह निमंत्रण स्वीकार करना ही पड़ा।
ईश्वर के विधान बड़े विलक्षण हैं, उन्हें मानवीय बुद्धि समझ सके ऐसा संभव नहीं है। जिन दिनों यह पत्राचार चल रहा था उन दिनों कूच बिहार में कहीं से एक बहुत खूँखार बाघिन आ गई। उसका इतना आतंक होने पर भी पता नहीं कैसे वह जीवित कैद में आ गई, वह भी स्वयं वहाँ के राजकुमार द्वारा। शाही कटघरे में रहने वाली इस बाघिन का नाम ‘राज बेगम’ था और मुझे उसी से लड़ाये जाने का वहाँ के राजा साहब ने निश्चय कर लिया था।
उन्होंने कुछ छल किया हो सो बात नहीं थी। उनने तो सारी बातें वहाँ पहुँचने पर मुझे स्पष्ट बता दी थीं। पर यदि मैं अपने वचन से हटता तो यह मेरे आत्माभिमान पर आघात होता, अतएव मैंने राजबेगम से लड़ने का निश्चय कर लिया। पर न जाने क्यों उस दिन मुझे साधु के वह शब्द जो उन्होंने पिताजी से कहे थे, एक चेतावनी की तरह बार-बार याद आते थे, तो भी मैं यों ही एकाएक भयभीत होने वाला न था। मेरा निश्चय आखिर तक अटल रहा।
यह दृश्य देखने के लिये अखबारों में पहले से ही समाचार छापे गये। भीड़ बरसात के पानी की तरह उमड़ पड़ी। जिस मैदान में यह प्रदर्शन होना था कंटीले तारों से सुरक्षित कर पिंजड़ा जिसमें बाघिन बंद थी मैदान में रख दिया गया। हजारों लोगों के सामने मैं लंगोट पहनकर निहत्था ही पिंजड़े की ओर बढ़ा।
बाघिन मुझे देखकर गुर्राई किन्तु मुझे उससे कुछ भी भय लगा। पिंजड़ा खोलकर उसमें प्रविष्ट हो गया चाभी मैंने वहीं फेंक दी, केवल एक चैन मेरे हाथ में थी, जिससे बाघिन को बाँधने के लिये कहा गया था।
मन में दृढ़ इच्छा कर लें और सारी मानसिक शक्तियों को, उस ओर मोड़ दें तो ऐसा कोई कार्य नहीं, जो असफल रह जाये।
-स्वेट मार्डेन
मेरे पिंजड़े में प्रवेश करते ही बाघिन टूटकर मेरे ऊपर आ झपटी और मेरी पीठ के दाहिने पुट्ठे पर घाव करती हुई मुट्ठीभर माँस नोंच ले गई। मैं हक्का-बक्का रह गया। एक बार दर्द से सारा शरीर ही काँप गया। खून दाढ़ में लग जाने से बाघिन और भी उत्तेजित हो उठी। उसने देर किये बिना दूसरा झपट्टा लगाया पर अब मैं संभल चुका था मैंने अपना वही इच्छाशक्ति वाला दाँव लगाया। बाघिन की आँखों में आँखें डालकर मैंने उसके मन में दुर्दान्त प्रहार किया और ऐसा करना भर था कि बाघिन कटे वृक्ष की तरह अपने आप धराशायी हो गई। अब पूरे गुस्से के साथ मैं उस पर टूटा और लात घूँसों की बौछार से उसे बेदम कर दिया। मेरी इच्छा शक्ति बराबर काम कर रही थी इतनी खूँखार बाघिन उसी का परिणाम था कि बाघिन की तरह मरी-सी सिमटी सी पड़ी थी अब उसमें आक्रमण करने की शक्ति नहीं थी। तथापि वह गुर्राकर अपना क्रोध अवश्य प्रकट कर रही थी। ऐसे में ही आगे बढ़कर मैंने उसको चैन बाँध दी और विजयी योद्धा की भाँति चारों ओर खड़ी भीड़ की ओर देखा। सब लोग आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता से उछल पड़े। मेरा हार्दिक स्वागत किया गया। उपस्थित लोगों ने मुझे फूल और हारों से लाद दिया बहुत सा पुरस्कार भी मुझे मिला।
किन्तु घर लौटा तब पता चला कि साधु का कथन असत्य नहीं था। घाव होने के कारण शरीर में विष हो गया और उसे ठीक होने में लगभग 6 महीने लगे।
इसी बीच एक दिन वह साधु प्रकट हुए, उन्होंने मुझे समझाया बेटा अब ऐसा नहीं करना। उन्होंने योगाभ्यास की कुछ क्रियाएं भी बतलाईं और कहा इच्छा शक्ति का बल तुम्हारे पास है। चाहते तो आत्म-कल्याण और ईश्वर दर्शन जैसी महान उपलब्धि प्राप्त करते पर व्यर्थ ही खेल खिलौनों में लगे रहे। योगी लोग ईश्वर-प्राप्ति और आत्म-दर्शन का पुरुषार्थ साधते हैं, चमत्कारों के चक्कर में नहीं पड़ते। उन्होंने मुझे दवा भी दी उसी से मेरा घाव ठीक हुआ। साथ ही उनकी बात भी अच्छी तरह समझ में आ गई और मैंने आत्म-कल्याण के लिये उच्च स्तरीय योग साधनायें करने का निश्चय कर लिया।’
अपने जीवन में इच्छाशक्ति के प्रयोग का यह महत्वपूर्ण वर्णन सुनाने वाले यह शोहंग स्वामी कलकत्ता में जन्मे एक महान योगी हो गये हैं उन्हें बंगाल में टाइगर स्वामी के नाम से आज भी लोग याद करते हैं। एक बार उनकी ख्याति सुनकर श्री स्वामी योगानन्द जी उनसे मिलने गये, उन्होंने पूछा- आप खूँख्वार जानवरों से कैसे लड़ते हैं? तो उन्होंने उत्तर दिया- ‘शारीरिक शक्ति से मानसिक शक्ति कहीं अधिक प्रखर होती है। यदि हम दृढ़ विश्वास कर लें कि बाघ नहीं बिल्ली है तो वह बिल्ली ही हो जायेगा। जरूरत पड़े तो मैं अभी भी चीतों के दाँत-यह कहते हुये वे उठे और सामने सीमेंट लगी दीवाल में धंसे साबित ईंट को पकड़ कर निकालते हुए बोले- इस तरह पकड़ कर निकाल सकता हूँ।’ स्वामीजी को उनकी क्षमता पर बड़ा आश्चर्य हुआ।
किन्तु बताया- इसमें आश्चर्य जैसी कुछ भी बात नहीं है। अब तो विज्ञान भी सिद्ध करता है कि मस्तिष्क ही है जो माँस-पेशियों को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क जितना बलवान होगा उतना ही सूक्ष्म शरीर काम करेगा। जितनी शक्ति से हथौड़े का प्रहार किया जाता है उतनी ही गहरी चोट लगती है। उसी प्रकार शरीर हथौड़ा है उसे शक्ति देने वाली मशीन तो मन या इच्छाशक्ति है। शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन इस बात पर है कि इच्छाशक्ति में कितना बल है। शरीर एक यंत्र है। उसका उपयोग चाहे जैसे कर सकते हैं इसके विपरीत यदि मन, शरीर और इन्द्रियों को दास होगा तो वह कुछ भी नहीं कर सकेगा।
श्री योगानन्द ने प्रश्न किया- क्या मैं भी बाघ से लड़ सकता हूँ- इस पर उन्होंने हंसते हुये कहा-भाई बाघ से कोई भी लड़ सकता है। पर अपनी लालसाओं, कामनाओं, वासनाओं से लड़ कर उन पर विजय पाना अति दुस्तर कार्य है। जो वह कर ले, समझ लो वह सैंकड़ों बाघों को जीत चुका। अब मैं भी उसी दिशा में आ रहा हूँ, जो मुझे पहले ही करना चाहिये था, वह अब कर रहा हूँ, शक्ति प्रदर्शन में तो मैंने व्यर्थ ही इतना जीवन बिता दिया।
स्व. श्री रफी अहमद किदवई की एक मित्र की पुत्री का विवाह था। उनसे श्री किदवई साहब का राजनैतिक विरोध था। बोल-चाल तक न थी। यहाँ तक कि उन्होंने किदवई साहब को विवाह में आमंत्रित तक न किया। किन्तु वे स्वयं ही वहाँ पहुँचे और कन्या को आशीर्वाद दे दिया।
उन सज्जन ने जब रफी साहब को वहाँ देखा, तो पश्चाताप आत्म-ग्लानि तथा स्नेह का ऐसा स्रोत उमड़ा, कि वे रफी साहब के गले से लिपट गये और क्षमा-याचना की। रफी साहब विनम्र स्वर में इतना ही बोले ‘हमारा आपका राजनैतिक मतभेद हो सकता है। किन्तु यह तो घर का मामला है। आपकी बेटी मेरी बेटी है।’ इस घटना से आपस का वह मनमुटाव भी समाप्त हो गया।
पैट्रिस मूर जीवन से तंग आ चुकी थी। 7-8 वर्ष हो गये। उनका जीवन नारकीय यंत्रणाओं में जल रहा था। पहले गले में एक्जिमा हो गया। वह किसी प्रकार ठीक हुआ तो उदर शूल उठ खड़ा हुआ। औषधियाँ लेने का परिणाम यह हुआ कि बदहजमी रहने लगी और धीरे-धीरे उसने पेट में अपना स्थायी डेरा डाल दिया। गरिष्ठ भोजन तो दूर साधारण भोजन भी पचा सकना उनके लिये कठिन हो गया। बीमारियों की तरह संकट भी संक्रामक होते हैं। अभी अपच का कष्ट ही दूर नहीं हो पाया था कि सिर दर्द चक्कर और बेहोशी के लक्षण उभरने लगे। कोई काम कर सकना कठिन हो गया। वे एक सम्पन्न महिला थीं किसी तरह औषधियों की गर्मी से चल-फिर, उठ-बैठ तो लेती थीं पर उनका अधिकाँश जीवन बिस्तर पर बीत रहा था। वे पूरी तरह निराश हो चुकी थीं।
मूर एक दिन एकान्त में बैठी विचार कर रही थी- जीवन की इस अशाँति से छुटकारा कैसे मिले। वे समझ नहीं पा रही थीं कि इन शारीरिक कष्टों व रोगों का मूल कारण क्या है? पर एक बात उनके सामने निर्विवाद थी वह यह कि जीवन में हंसी और प्रसन्नता का नितान्त अभाव था। उनकी बुद्धि और विवेक ने निर्णय दिया चलो रोग और शारीरिक कष्ट दूर नहीं कर सकते तो न सही पर प्रसन्नता के क्षण तो ढूंढ़े ही जा सकते हैं। उन्होंने संकल्प लिया चाहे जितने भारी कष्ट हों, वह दिन में तीन बार जी खोलकर हंसा अवश्य करेंगी।
विश्व-विख्यात अंग्रेज लेखक श्री स्वेट मार्डेन का मूर से परिचय था। इस अप्रत्याशित परिवर्तन से वे बहुत आकर्षित हुए। जो फलितार्थ उनके सामने आये, उनका वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है- यह एक अनोखी बात थी कि निरन्तर अब- उत्तेजना, निराशा, भय, ईर्ष्या-विद्वेष में डूबी रहने वाली मूर ने जैसे ही उक्त संकल्प लिया, उनके स्वभाव में अनायास ही न जाने कहाँ से विनोदप्रियता आ टपकी। अब तक अपने पति, अपने बच्चों नौकर और पड़ोसियों से वे बात-बात पर झगड़ बैठती थीं, अपने लिये ही नहीं पति और बच्चों के लिये भी वे भार सी हो गई थीं पर अब वे पति और बच्चों से छोटी-छोटी बातें भी विनोद पूर्वक करतीं और हंसी के उपयुक्त एक भी अवसर को हाथ से न जाने देतीं। जब भी ऐसी कोई बात आती, वे खूब जोर से खिलखिलाकर हंसतीं। पहले तो घर वाले असमंजस में पड़े पर पीछे यह स्वभाव इन सबको ऐसा भाया कि घर हंसी का फौवारा बन गया। सब लोग हंसी का वातावरण उत्पन्न करने का प्रयत्न करते। कोई न कोई फुलझड़ी छूटती रहती और घर में खूब कहकहे लगते। मूर का घर ‘हंसी का घर’ कहा जाने लगा।
‘हंसी खुशी है जहाँ-तन्दुरुस्ती है वहाँ’ ‘हंसिये जी खोलकर स्वस्थ रहिये जीवन भर’ की कहावतें सत्य सिद्ध हुई। मूर का एक्जिमा, बदहजमी दाद-खाज, चक्कर, सिर दर्द, कमजोरी एक-एक कर दूर हटने लगे और उनका स्थान उत्तम स्वास्थ्य लेने लगा। कुछ ही दिनों में रोग न जाने कहाँ अन्तर्धान हो गये। लगातार 6 वर्ष तक उन्हें एक फुन्सी भी नहीं हुई। चिकित्सकों ने फिर से शरीर का परीक्षण किया और असाध्य समझे जाने वाले कई रोगों का नाम निशान भी नहीं पाया तो वे आश्चर्य में डूब गये। जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि संदेशवाहक नलिकायें (इफरेन्ट एण्ड अफरेन्ट नर्व्स) मस्तिष्क का संबंध पेट और शरीर के महत्वपूर्ण अवयवों से जोड़ती हैं यह कोशिकायें बहुत संवेदनशील और एक-दूसरे से संबद्ध होती हैं, जब मस्तिष्क में दुःख और भार पैदा करने वाले ईर्ष्या, द्वेष, भय आदि मनोविकार पैदा होते हैं तो उससे पाचन संस्थान व अन्य कोमल अंगों पर भार पड़ता और बीमारियाँ उत्पन्न करता है इसके विपरीत हंसी खुशी से उनमें स्वास्थ्यप्रद प्राकृतिक ‘हारमोन्स’ का स्राव तथा कोशों से रोग के अंश मल-मूत्र, थूक, पसीने आदि के साथ बिना औषधि के निकल जाते हैं। प्रसन्न रहने से स्वास्थ्य ठीक रहता है इसका यही रहस्य है।
मेरी सोचने की शक्ति समाप्त हो गई। यह क्या हो रहा है। इस पर चकित होने तक के लिये बुद्धि शेष नहीं थी। कार चलाना कठिन हो गया, किसी तरह कार से उतरा तो लगा कि सीने पर कोई दैत्य चढ़ बैठा है और उसने भीतर से जकड़ लिया है। खाँसी आने लगी मुश्किल से कार्यालय मिला, टेलीफोन की घंटियाँ बज रही थीं और मुर्दे की नाईं पास में कूड़े के ढेर की तरह पड़ा रहा उस दिन एक भी टेलीफोन का उत्तर नहीं दे सका।’
यह बयान एक डॉक्टर के हैं जो स्वयं भी 26 अक्टूबर 1948 को अमरीका के डोनोरा नगर में एकाएक वायु में धुयें और विषैले तत्वों के अधिक बढ़ जाने के परिणाम स्वरूप उसके साथ घटित हुआ। उस दिन दस बजे तक भी सूर्य के दर्शन न हुये तब लोग घरों से बाहर निकले, उनकी साँसें घुटने लगीं थीं बाहर आकर देखा तो धुयें का कुहरा (स्माग) बुरी तरह छाया हुआ था। 28 अक्टूबर तक धुँध सारे नगर में छा गई और यह स्थिति 31 अक्टूबर तक बनी रही। इस बीच भी कल-कारखाने, कारें-मोटरें भट्टियाँ 1000 टन प्रति घंटे के औसत से धुआँ बराबर उड़ेलती रहीं। सारा शहर लगभग मृत्यु की अवस्था में पहुँच गया। लोगों की ऐसी दशायें हो गईं जैसी ऊपर के डॉक्टर के निजी बयान से व्यक्त हैं। वे बेचारे स्वयं भी मरीज थे। प्रकृति आगे आज वे भी विवश थे और सोच रहे थे कि मानवीय सुख-शाँति का आधार याँत्रिक सभ्यता नहीं हो सकती। नैसर्गिक तत्वों के प्रति श्रद्धा और सान्निध्यता स्थापित किये बिना मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता। भौतिक विज्ञान की प्रगति तो वैसी ही गले की फाँसी बन सकती है जैसी आज हमारे नगर की हो रही है।
इन 5-6 दिनों में डोनोरा नगर की 18 हजार की आबादी में 6 हजार अर्थात् एक तिहाई व्यक्ति बीमार पड़ गये थे, सैंकड़ों की मृत्यु हो गई। भगवान कृपा न करते और 31 को भारी वर्षा न होती तो कौन जाने डोनोरा शहर पूरी तरह लाशों से पट जाता।
1966 में ‘थैंक्स गिविंग‘ दिवस पर न्यूयार्क में आसपास के देहाती क्षेत्रों से भी सैंकड़ों लोग आ पहुँचे। उस दिन भी यही दशा हुई। कुछ घण्टों के धुयें के दबाव से ही 170 व्यक्तियों की मृत्यु तत्काल हो गई। हजारों लोगों को पार्टियाँ, नृत्य और सिनेमा घरों की मौज छोड़कर अस्पतालों के बिस्तर पकड़ने पड़े।’ ऐसी दुर्घटना वहाँ 1952 में भी हो चुकी थी उसमें 200 से भी अधिक मृत्युएं हुई थीं।
सन 1956 में यही स्थिति एक बार लन्दन की हुई थी उसमें 1000 व्यक्ति मरे थे। सरकार ने करोड़ों रुपयों की लागत से रोक-थाम के प्रयत्न किये थे, तो भी 1962 में दुबारा फिर वैसी ही स्थिति बनी और 400 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु कुछ ही घण्टों में दम घुट कर हो गई। कुछ लोगों ने तो इसे प्राकृतिक आत्म-हत्या कहा और चेतावनी दी कि यदि धुयें की समस्या को हल न किया गया तो एक दिन सारा वायुमण्डल विष से भर जायेगा। जिस दिन यह स्थिति होगी उस दिन पृथ्वी की सामूहिक हत्या होगी। उस दिन पृथ्वी पर मनुष्य तो क्या कोई छोटा सा जीव और वनस्पति के नाम पर एक पौधा भी न बचेगा। पृथ्वी की स्थिति शुक्र ग्रह जैसी विषैली हो जायेगी।
संसार के विचारशील लोगों का इधर ध्यान न हो ऐसा तो नहीं हैं किन्तु परिस्थितियों के मुकाबले प्रयत्न नगण्य जैसे हैं। एक ओर जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है उसी अनुपात से कल-कारखाने और शहरों की संख्या भी बढ़ेगी। अनुमान है कि सन् 2000 तक अमेरिका की 320 बिलियन जनसंख्या होगी। इस आबादी का 85 प्रतिशत शहरों में रहेगा। इस अवधि में कारों और मोटरों की संख्या इतनी अधिक हो जायेगी कि उनको रखने की जगह न मिलेगी। अमेरिका में 1 बच्चा पैदा होता है तब तक कारें 2 जन्म ले चुकी होती हैं।
यूनिवर्सिटी स्टेटवाइड एयर पॉल्यूशन रिसर्च सेन्टर (यह संस्था अमेरिका में वायु प्रदूषण से होने वाली हानियों और उनसे बचने की उपायों की शोध करती है) के डाइरेक्टर श्री जी.टी. मिडिल्टन के अनुसार एक कार सामान्य रूप से 900 मील प्रतिवर्ष चलती है। एक दिन में 25 मील तो वह अनिवार्य रूप से चलती ही है उससे 61/2 पौण्ड वायु दूषण होता है। 1960 में इस राज्य में अकेले कारों से 37 मिलियन पौण्ड (अर्थात् 462500 मन से भी अधिक) वायु-प्रदूषण निकला 1963 में 56 मिलियन पौंड, यदि इस पर नियंत्रण न किया गया तो 1970 में 81 मि. पौण्ड तथा 1980 में 112 मिलियन पौण्ड्स से भी अधिक वायु दूषण अकेली कार मोटरों से बढ़ जायेगा।
कल-कारखानों से निकल रहे धुयें की हानियों और भविष्य में हो सकने वाली भयंकरता का चित्रण करते हुये कैलिफोर्निया के टेक्नोलॉजी संस्थान के भू रसायन शास्त्री डॉ. क्लेअर-सी-पैटरसन और जन-स्वास्थ्य सेवा के निर्देशक डॉ. राबर्ट ई. कैरोल ने लिखा है कि टेक्नोलॉजी के विस्तार से वायु में कार्बन और सीसे के कणों की मात्रा इतनी अधिक बढ़ जायेगी कि अमेरिका का हर व्यक्ति हृदय तंत्रिका संस्थान (नर्वस सिरि सिस्टम) के रोग से पीड़ित अर्थात् लोग लगभग पागलों जैसी स्थिति में पहुँच जायेंगे।
2000 तक विद्युत का उपयोग 5 गुना बढ़ जायेगा जिसके कारण वायु प्रदूषण 5 गुना बढ़ जायेगा। जनसंख्या वृद्धि का अर्थ रहन-सहन की वस्तुओं में वृद्धि होगी और उससे कूड़े की मात्रा भी निःसंदेह बढ़ेगी। उस बढ़ोत्तरी को न तो ऑक्सीजन का उत्पादन रोक सकेगा न पेड़-पौधे, क्योंकि यह स्वयं भी तो विषैले तत्वों के संपर्क में आकर विषैले होंगे और दूसरे नये-नये विष पैदा करने में मदद करेंगे। ऐसी स्थिति में याँत्रिक सभ्यता को रोकने और वायु शुद्ध करने के लिये सारे विश्व में यज्ञ-परम्परा डालने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता। यज्ञों में ही वह सामर्थ्य है जो वायु प्रदूषण को समानान्तर गति से रोक सकती है।
अभी इस गंदगी को दूर करने के लिये अमेरिका प्रति वर्ष 1200000000 डॉलर्स (एक डालर का मूल्य सात रुपये से कुछ अधिक होता है) खर्च करता है। ओजान, सल्फर फ्लोराइड से शाक-सब्जी तथा फूल फसलों की क्षति रोकने के लिए 500 मिलियन डॉलर्स, धातुओं पर जंग लगने, रंग उड़ने, से सफाई व घर खर्च आदि बढ़ जाने, जानवरों के मरने, खाने की वस्तुयें क्षतिग्रस्त होती हैं नाइलॉन, टायर और ईंधन नष्ट होता हैं इन सबको रोकने और रख-रखाव में 300 मिलियन डॉलर्स तथा सूर्य प्रकाश के मंद पड़ जाने के कारण जो अतिरिक्त प्रकाश की व्यवस्था करनी पड़ती है उसमें 40 मिलियन डॉलर्स का खर्च वहन करना पड़ता है।
वायु प्रदूषण बढ़ने के अनुपात से सुरक्षात्मक प्रयत्नों में खर्च की वृद्धि भी होगी तो भी उसे रोक सकना संभव नहीं होगा। कैलीफोर्निया के कृषि-विभाग, सेवा योजन विभाग के प्रोग्राम लीडर डॉ. पो. ओस्टरली ने भविष्य वाणी की है कि अमेरिका में वायु गंदगी के कारण जो नुकसान होने वाला है वह बहुत भयंकर है और उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है। अगले कुछ दिनों में धुआँ इतना अधिक हो जायेगा कि प्रातःकाल चिड़ियों का चहचहाना तक बंद हो जायेगा क्योंकि उन्हें सबेरे-सबेरे सामान्य साँस लेने में कठिनाई होने लगेगी, चहचहाने में तो श्वाँस-प्रश्वाँस की क्रिया बढ़ जाती है। इस स्थिति में उन्हें चुप रहने में ही सुविधा होगी।
विज्ञान को ‘विज्ञान’ तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की ताकत रखता हो न कि इन्हीं को मिटाने की।
-महात्मा गाँधी
न्यूयार्क का हिल्टन होटल औद्योगिक बस्ती के बीच बना हुआ है इस होटल की दीवारों शीशों और फर्नीचर आदि पर धुयें और कार्बन कणों का 3।1।2 वर्ष की अवधि में ही इतना बुरा प्रभाव पड़ा कि उसका सारा रंग उड़ गया दीवारें खस्ता पड़ गईं उसकी दुबारा होवरहालिंग करानी पड़ी जिसमें पचास हजार डॉलर्स (लगभग 4 लाख रुपए) का खर्च आया। यही तो रही एक सामान्य बिल्डिंग की बात। सारे विश्व के- जन स्वास्थ्य, कृषि और कृषि में सहयोगी पशुओं, धातुओं, भवनों आदि पर हुये इसके दुष्प्रभाव की हानि की कुल लागत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। न्यूयार्क के सेंट ल्यूकस अस्पताल का गुम्बद संगमरमर और टेरोकोटा का बना हुआ है। सल्फर डाई ऑक्साइड युक्त विषैले धुयें ने उसे इस तरह कमजोर किया कि कोई भी लड़का वहाँ पहुँच कर उसे चुटकियों से ऐसे खोद लेता है जैसे मिट्टी, उसकी तहें हाथ से मसल दी जातीं तो आटे की तरह चूर-चूर हो जातीं। गुम्बद इतना खस्ता हो गया कि उसे बदलना पड़ा और उस पर सीधी छत डालनी पड़ी। पत्थर और कंक्रीट की बिल्डिंगों का यह हाल हो तो मनुष्य और प्रकृति के कोमल भागों पर उसके दुष्प्रभाव की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।
यह हानियाँ तभी सुधार और नियंत्रण में आ सकती हैं जब धुयें को आकाश में नष्ट करने वाली प्रणाली का विस्तार हो। आज की स्थिति में यह कल कारखाने रुकें, ऐसा नितान्त संभव नहीं दिखाई देता, कल कारखाने रुकेंगे नहीं तो धुआँ पैदा होने से बंद नहीं होगा, धुआँ होगा तो मानव-जाति पर संकट की छाया घिरी ही रहेगी। यह धुआँ कभी भी मनुष्य जाति को गंभीर संकट में डाल सकता है अतएव एक बार फिर से आकाश की शुद्धता के लिये भारतीय प्रयत्न व शोध-यज्ञों का अध्ययन अनुसंधान व तीव्र प्रसार करना होगा।
‘लोहे को लोहा काटता है’, शरीर में चेचक के कीटाणु बढ़ने की संभावना हो तो इन्जेक्शन द्वारा चेचक के ही कीटाणु शरीर में प्रविष्ट कराये जाते हैं, यह कीटाणु रक्त के श्वेत कीटाणुओं के साथ मिल जाते हैं। श्वेत-कणों में चेचक के कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति नहीं होती। बंदूकधारी को बंदूकधारी ही मार सकता है । डाकू को पकड़ना हो तो बन्दूक चलाने से लेकर खेंदक में छुपकर बचाव आदि का समानान्तर ज्ञान रखने वाला सिपाही ही लगाया जा सकता है। उसमें गाँव का निहत्था किसान सफल नहीं हो सकता इंजेक्शन में दिये चेचक के कीटाणु अच्छे कीटाणुओं के साथ आगे बढ़कर अपने ही तरह के ट्रोही कीटाणुओं को मार डालते हैं। उसी तरह हवन में जलाई गई औषधियाँ भी धुयें के रूप में, प्रकाश-वर्षा के रूप में उठती हैं और धुयें के विषैले प्रभाव को नष्ट करती हुई मनुष्य शरीर, पशु-पक्षियों वनस्पति सबको जीवन देती चली जाती हैं।
फ्राँस के विज्ञान वेत्ता प्रो. टिलवर्ट का कथन है कि खाँड के धुयें में वायु को शुद्ध करने की विलक्षण शक्ति है। चेचक के टीके के आविष्कारक डॉ. हेफकिन (फ्राँस) ने घी जलाकर परीक्षण किया और बताया कि उससे रोग के कीटाणु नष्ट होते हैं। डॉ. टाइलिट ने किशमिश, मुनक्के इत्यादि सूखे मेवों के धुयें के परीक्षण के बाद बताया कि उस धुयें में टाइफ़ाइड के कीटाणु नष्ट करने की क्षमता होती है। जायफल जलाने से उसके तेल परमाणु 1।10000 से 1।100000000 सेमी. के व्यास तक के सूक्ष्म पाये गये इनमें कार्बन के धुयें के कणों में घुसकर उन्हें शुद्ध तत्वों में बदलने की क्षमता पाई गई। 6 अप्रैल 1955 के अंग्रेजी पत्र लीडर में ‘न्यू क्योर फार टी.बी., शीर्षक से हवन के धुयें को बहुमूल्य औषधोपचार के रूप में मानकर अमरीकी वैज्ञानिकों को उस पर अनुसंधान करने का आह्वान किया गया है।
यज्ञ के लाभ अनन्त हैं। उसके द्वारा मन और आत्मा पर पड़ने वाले प्रभाव को न भी मानें तो भी अनुसंधान से यह तथ्य तो प्रकाश में लाये ही जा सकते हैं कि यज्ञीय धूम्र में वायु के विषैले तत्वों को नष्ट करने की विलक्षण क्षमता है। इस विज्ञान की अब उपेक्षा नहीं की जा सकती। धुआँ जो मारता है उससे यह धुआँ ही मनुष्य जाति को बचा सकता है।
शिकागो (अमेरिका) के ऐसे क्षेत्र में जहाँ तेल शोधक कारखाने, इस्पात कारखाने, रंग-रोगन बनाने के कारखाने बहुतायत से हैं, वहाँ से गुजरने वाले लोगों में अनेकों को एकाएक अधीरता, चिड़चिड़ापन, थकावट, सिर का चक्कर, बहक जैसी एलर्जिक प्रतिक्रिया हो जाती, समझ में नहीं आ रहा था, कारण क्या है?
स्वीडिश कावेनैंट हास्पिटल के डॉ. थेरान जी रैन्डाल्फ ने ऐसे लोगों की श्लेष्मा-झिल्ली की जाँच करते हुए पाया कि यह सब उस क्षेत्र में व्याप्त दूषित वायु का प्रतिफल है फलस्वरूप उन सड़कों को आम प्रयोग के लिये बन्द कर दिया गया।
अहंकार के दंश से सदा बचे रहिए। यह एक विषैले सर्प की तरह आपके अन्तःकरण में ही छिपा बैठा रहता है और अवसर पाते ही आघात कर देता है। इसके दंश से मनुष्य की सद्बुद्धि मूर्छित हो जाती है और तब वह न करने योग्य काम करता हुआ अपने को आपत्तियों में डाल लेता है। अहंकार एक नहीं हजारों आपत्तियों की मूल है।
इस सर्प का जागरण तब होता है जब मनुष्य यह भुला देता है कि वह भी दूसरे मनुष्यों की तरह एक सामान्य मनुष्य है और यह मानने लगता है कि वह किन्हीं विशेष क्षमताओं वाला एक असाधारण व्यक्ति है। दूसरों की तुलना में अपने को बड़ा मानकर चलना बड़ी भारी नादानी है। संसार में न कोई छोटा है और न बड़ा। परमात्मा ने सृष्टि को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए किसी को किन्हीं अधिकारों और क्षमताओं के साथ किन्हीं स्थानों एवं स्थितियों में नियुक्त किया है किन्हीं को किन्हीं स्थितियों और स्थानों पर। सब अपनी-अपनी स्थिति में अपने-अपने स्थानों पर काम करते हैं। इस अवस्था में न तो अभिमान को अवसर है और न हीनता को। अब यदि कोई इस ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन अपनी स्थिति पर गर्व करता है, इतराता अथवा अपने को दूसरों से बड़ा और विशेष मानता है तो गलती करता है, जिसके लिए उसे दण्ड भोगना पड़ता है। मनुष्य क्या है? वह एक इस विशाल सृष्टि का एक साधारण उपादान है। इसमें जो किसी एक का महत्व और उपयोग है वही किसी दूसरे का। तब कोई भी तो ऐसा कारण समझ में नहीं आता जिसके कारण कोई गर्व से फूल जाए और अहंकार के मद से मतवाला बना फिरे!
यदि आप अपनी स्थिति को असाधारण मानने की भूल करेंगे तो निश्चय ही अन्तःकरण में प्रस्तुत अहंकार को जगा लेंगे। धोखे से भी जगा हुआ अहंकार फिर जल्दी शमन नहीं होता। विषबेलि की तरह आप से आप बढ़ता जाता है। फिर इस विषबेलि में जहरीले फल लगने लगते हैं। इन फलों का प्रभाव आप पर क्या हो सकता है यह बात तो आप स्वयं ही समझ सकते हैं।
अहंकार जागने पर आप प्रशंसा प्रिय हो जायेंगे। प्रशंसा प्रिय व्यक्ति अपनी बड़ी घनी हानि किया करता है। ऐसा व्यक्ति सदैव चाटुकारों, निन्दकों, पिशुनों और मिथ्यावादियों से घिरा रहता है। जो जरा सी प्रशंसा कर देता है उसी की ओर झुक जाता है। उसी पर विश्वास करने लगता है। उसकी बुद्धि चाटुकार की गुलाम बन जाती है, तब वह अपना भला-बुरा हित-अहित नहीं देख पाता। प्रशंसा, पिशुनता एवं चाटुप्रिय व्यक्ति में एक और भी हानिकारक दोष होता है। वह है असहिष्णुता एवं असहनशीलता का। जहाँ अपनी उक्त झूठी प्रशंसा से प्रसन्न हो जाता है वहाँ सच्चा दोष कथन सहन नहीं कर पाता। वह अपना दोष, दुर्गुण अथवा भूल बतलाने वाले को अपना शत्रु समझा है और उससे अकारण ही बैर ठान लेता है। उसको हानि पहुँचाने का प्रयत्न करता रहता है। इस प्रकार वह अपनी साधारण मनुष्यता से भी गिर जाता है। इसको मूर्खता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति चाटुकार को नापसंद और निन्दक अथवा आलोचक को अधिक पसंद किया करता है। वह जानता है कि जहाँ चाटुकार उसकी झूठी प्रशंसा करके उसे भुला और बहकाकर गलत मार्ग पर डाल सकता है वहाँ आलोचक उसे उसके दोषों, कमियों और त्रुटियों के प्रति सावधान होने में सहायक होता है। इस प्रकार चाटुकार शत्रु और आलोचक वास्तविक मित्र होता है। किन्तु अहंकार के विष से हत्चेत व्यक्ति इन दोनों के लिए विपरीत दृष्टिकोण रखता है। यह दोष वास्तव में मनुष्य का नहीं उसके अहंकार का ही होता है जो थोड़ा सा भी प्रश्रय मिल जाने पर मनुष्य पर हावी हो जाता है। इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति विनम्रता एवं सामान्यता के भाव से इस सर्प का दमन ही किये रहते हैं।
मनुष्य को जीवन में अनेक प्रकार के कर्त्तव्य करने पड़ते हैं। उसे उन्नति और विकास के लिये प्रयत्न भी करने पड़ते हैं बहुत बार उसे इसमें कृतकृत्यता भी प्राप्त होती है, वह सफल भी होता है। सफल हो भी क्यों न? मनुष्य जो भी प्रयत्न करता है, सफलता के लिए ही करता है। यदि वह अपने कर्त्तव्यों में पूरी तरह सावधान और ईमानदार है तो उसका सफल होना स्वाभाविक ही है। सफलता तो पुरुषार्थ का अनिवार्य फल है वह तो मिलती ही है। इसमें न तो कोई असामान्यता होती है और न विलक्षणता। तथापि बहुत से लोग कर्तृत्व की सफलता को एक असाधारण उपलब्धि समझकर बड़ा गर्व करने लगते हैं। किन्तु उनका यह गर्व उनके ओछेपन के सिवाय और किसी बात का द्योतक नहीं होता है। जिस गंभीर व्यक्ति में अपने पुरुषार्थ के प्रति विश्वास होता है, जो सफलता को जीवन की एक सामान्य स्थिति मानता है उस पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह स्वभावतया एक सफलता से दूसरी सफलता की ओर बढ़ चलता है। किन्तु तुच्छ और ओछा आदमी उथले ताल की तरह ही थोड़ा सा पानी पाते ही सीमाओं के बाहर चलता है।
जो स्वयं को किसी सफलता का पात्र मानता है वह उसकी प्राप्ति में कभी गर्व नहीं करता। सफलता पर गर्व उसे ही होता है जो उसके अनुरूप अपनी पात्रता में विश्वास नहीं करता और उसे अपने लिए एक असाधारण उपलब्धि मानता है। ऐसे व्यक्ति जब किसी सफलता पर अभिमान करने लगते हैं तब उनके आगे का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
सफलता मिलने पर अभिमानी व्यक्ति अपने को दूसरों से कुछ बड़ा, ऊंचा और भिन्न मानने लगता है और चाहता है कि लोग उसकी सराहना करें, उसे शाबाशी दें और उसका सम्मान करें। जब उसकी यह वाँछा किन्हीं चाटुकारों द्वारा पूरी होने लगती है तब तो वह संतुष्ट और प्रसन्न होकर बैठा रहता है, आगे कदम बढ़ाने की कोशिश नहीं करता। किन्तु जब उसकी यह वाँछा पूरी नहीं होती तो वह पुरुषार्थियों की तरह और बड़ी सफलता पाने का प्रयत्न तो करता नहीं अपितु अन्य उपायों से प्रशंसा तथा प्रतिष्ठा पाने का प्रयत्न करने लगता है। अहंकारवश उसे ऐसा आभास होने लगता है कि समाज जान-बूझकर उसे वह पद, वह प्रतिष्ठा और वह प्रशंसा नहीं देता जो उसे मिलनी चाहिए और जिसका वह अधिकारी है। इन उपायों के रूप में वह अनाचार, मक्कारी, धूर्तता, झूठ, कृत्रिमता, छल-कपट आदिकों में से किस किस का अवलम्ब ले सकता है, कुछ नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार सफलता पर अहंकार करने वाले की जीवनधारा ही दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। अस्तु, सफलता के समय मनुष्य को बहुत सावधान तथा गंभीर रहना चाहिए। क्योंकि असावधान रहने पर सफलता प्रायः अन्तःकरण में प्रसुप्त अहंकार के सर्प को जगा दिया करती है।
अहंकार के साथ मनुष्य के पतन की संभावनायें सदैव जुड़ी रहती हैं। किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में क्यों न हो अभिमान मनुष्य के पतन का ही कारण बनता है। बल ने क्षेत्र में बलि ने विकास किया और वह अपने युग का अद्वितीय बलधारी बना। बल के क्षेत्र में रावण ने विकास किया और वह अपने युग का अप्रतिम अजेय योद्धा बना। किन्तु अभिमान आते ही साधनहीन वनवासी राम ने उसे कुछ ही समय में धूल में मिला कर रख दिया। सहस्रबाहु अपने समय का प्रचण्ड बलधारी योद्धा था। युद्ध में हजार हाथों से लड़ता था। उसे अपने बल का अभिमान हुआ और उसने निर्बल जमदग्नि पर अन्याय किया, अपने बल के अभिमान में उनकी गऊ अपहरण करलीं और अवरोध करने पर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। यह अभिमान की पराकाष्ठा थी। सहस्रबाहु के ग्रह-नक्षत्र बदल गए। बालक परशुराम ने अपना तेज संभाला और एकाकी ही एक साधारण कुल्हाड़ी से सहस्रबाहु को दलबल के साथ धूल में मिला दिया।
बल, बुद्धि, विद्या, जन, बन, रूप-रंग किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, अभिमान मनुष्य को मिटा देता है। विद्या की अभिमानी विद्योतमा को मूर्ख पति पाकर पश्चाताप करना पड़ा। विशेषताओं के साथ जो बुद्धिमान व्यक्ति विनम्रता, नगण्यता का समन्वय बनाए रहते हैं उनका कभी पतन नहीं होता और वे दिन-दिन उन्नति के शिखर पर चढ़ते चले जाते हैं। न्यूटन अपने समय का महान विद्वान एवं वैज्ञानिक था। उसकी प्रसिद्धि देश-देशान्तरों में फैली थी। किन्तु उसकी विद्या के साथ विनय का समन्वय था इसी नीति के कारण वह दिन-दिन और भी अधिक उन्नति करता हुआ सफलता के चरम शिखर पर पहुँचा और आज तक संसार में सम्मान के साथ याद किया जाता है। एक बार कुछ मित्रों ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा- ‘आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है।’ निरभिमानी न्यूटन इससे फूल नहीं उठा और न उसने गर्वपूर्वक इस उक्ति को स्वीकार किया। बल्कि उसने कहा- ‘मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ रज कण ही मैं उठा पाया हूँ।’ इसे कहते हैं विद्या के साथ विनय का समन्वय। यही तो वह गुण है, जिसको ग्रहण कर मनुष्य क्रम-क्रम से उन्नति करता हुआ देवत्व तक प्राप्त कर लेता है। उन्नति का अधिकारी निरभिमान व्यक्ति ही होता है, अभिमानी नहीं।
अहंकार का एक नाम मद भी है। मद का अर्थ है नशा। अहंकार का नशा चढ़ते ही मनुष्य मद्यपों की भाँति मतवाला हो जाता है। उसकी विभिन्न क्रियायें, चेष्टाएं और भावनाएं असंयत एवं असंतुलित हो जाती हैं। उसकी बुद्धि पर अज्ञान का अन्धकार छा जाता है और तब वह न करने योग्य कामों में प्रवृत्त होने लगता है। ऐसी मदहोशी में यदि वह अपने सम्मान को सुरक्षित रखना चाहता है तो उसकी यह चाह सफल नहीं हो सकती। अभिमान उसे अपकृत्य करने के लिए प्रेरित करेगा ही। उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा ही। कोई एक दो, चार-छः लोग उसे क्षमा कर देंगे, किन्तु अन्ततः कोई न कोई माई का लाल मिल ही जायेगा जो उसका सारा अहंकार और सारा नाश उतार ही देगा। यह एक ईश्वरीय विधान है इसमें व्यवधान नहीं पड़ सकता। संसार में आज तक किसी घमण्डी का सिर ऊंचा नहीं रहा, उसे नीचा होना ही पड़ता है। इसलिए इसी में बुद्धिमानी है और इसी में कल्याण है कि मनुष्य शक्ति, सम्पत्ति, साधन, समर्थन, सहायक अथवा विद्या, बुद्धि, रूप-रंग, सफलता एवं उपलब्धि आदि किसी भी बात पर घमण्ड न करे। सब कुछ पाकर भी उसे सच्चा, शालीन, सभ्य, सुशील तथा विनम्र बना रहना चाहिये। अहंकार मनुष्य जीवन के लिए विषैला सर्प है। प्रश्रय पाते ही यह दंश करता है और फिर मनुष्य की कैसी दशा हो सकती है। इसके सैंकड़ों उदाहरणों से संसार का इतिहास भरा पड़ा है? इसलिए इस जल बुद्बुद् की तरह क्षण भंगुर जीवन की परछाइयों की तरह बनने बिगड़ने वाली विभूतियों पर न तो कभी अभिमान करिए और न बेहोश ही होइए।
=कोटेशन=
समस्त मानवीय गलतियाँ अहंकार से उत्पन्न होती हैं, अहंकार न रहे तो संसार स्वर्ग बन जाय।
-रस्किन
गन्धमादन पर्वत पर आत्म-कल्याण की इच्छा से तप कर रहे महाराज अरिष्टनेमि के पास जाकर देवदूत ने कहा- महाराज! मुझे सुरपति इन्द्र ने भेजा है उनका आग्रह है कि आप अभी मेरे साथ स्वर्ग चलें और वहीं निवास करें?
‘स्वर्ग!’ महाराज ने आत्म-कल्याण की बात सुनी, स्वर्ग बीच में आ टपका तो उनको पूछना ही पड़ा-भाई-स्वर्ग की विशेषता क्या है, क्या उसमें कुछ दोष भी है?
देवदूत बोला- विशेषता यह है कि वहाँ सुख भोग-साधन सुविधायें हर घड़ी उपलब्ध होती हैं। दोष यह है कि वहाँ का हर व्यक्ति अहंकार में डूबा हुआ होता है अतएव जैसे ही पुण्य समाप्त हुआ वह फिर मृत्यु लोक लौटा दिया जाता है।
‘तब फिर मैं यही ठीक हूँ यहाँ लोगों की सेवा करता हूँ, अपने को भी उन्हीं जैसा छोटा व्यक्ति अनुभव करता हूँ। इससे आत्मा को जो शाँति मिलती है स्वर्ग उसके आगे फीका है’ कह कर महाराज ने दूत को वापिस लौटा दिया।
एक राजा था- पराक्रम और अभिमान का पुतला। विजय-लालसा सदा उसके सिर पर सवार रहती थी। शत्रुओं को जीतने मात्र से उसे तृप्ति नहीं होती थी। अपने शौर्य के प्रदर्शन के लिये सदा आतुर रहता था वह।
एक बार उसने एक शत्रु-राज्य को जीता। पूरे ठाट-बाट के साथ शत्रु की राजधानी में उसने प्रवेश करने की ठानी। बड़ा शानदार जुलूस निकला। उसे देखने के लिये हजारों लोग एकत्रित हुए। जब रथ नगर-द्वार पर पहुँचा, राजा की नजर पत्थर की एक प्रतिमा पर पड़ी, वह स्तब्ध रह गया उसे देखकर। ऐसा अनुपम कला-कौशल उसने आज तक नहीं देखा था। रथ रुक गया-जुलूस भी रुक गया।
वह प्रस्तर-निर्मित मानव मानो पराक्रम का प्रतीक था। आकाश की ओर उठी हुईं वे पैनी आँखें, स्वर्ग से अमृत को लाने वाले गरुड़ की दृष्टि थी वह। पैरों में लिपटे हुए नागों को वह हाथों से मसल कर नष्ट कर रहा था- मानो पक्षीराज गरुड़ ही हो।
मन्त्रमुग्ध राजा ने पूछा- ‘इसका शिल्पी कौन है? सामने आये।’ उसे आशा थी कि जन-समूह में से कोई आगे आयेगा और झुककर अभिवादन करते हुए कहेगा- महाराज! मैं इसका निर्माता हूँ। परन्तु जब यह आशापूर्ण नहीं हुई तब राजा ने तनिक ऊंचे और रूखे स्वर में फिर वही आदेश दोहराया, तब भी सन्नाटा छाया रहा। क्षुब्ध होकर राजा ने पूछा- ‘किसकी प्रतिमा है यह?’
‘महाप्रतापी महाराज ने अभी जिसे पराजित कर भगा दिया, उसी कायर राजा का पुतला है यह।’ किसी ने बहुत डरते-डरते निवेदन किया। अब विजयी राजा को प्रतिभा में पहले जैसा सौंदर्य दिखाई नहीं दिया। उसने पूछा- ‘क्या इस मूर्ति का शिल्पी इसी नगर में रहता है?’
‘जी’ किसी ने सहमते हुए संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
‘वह हमारे स्वागत के लिये क्यों नहीं आया? तुरन्त उसे यहाँ हाजिर किया जाये, तभी सवारी आगे बढ़ेगी।’ राजा ने दृढ़ स्वर में आदेश दिया। तुरन्त शिल्पी को तलाश करके राजा के सामने उपस्थित किया गया।
राजा ने उसे तीव्र दृष्टि से घूरते हुए प्रश्न किया- ‘तुम्हीं ने बनाई है यह मूर्ति?’
‘जी हाँ!’ शाँत स्वर में शिल्पी बोला।
‘कैसे?’ राजा ने फिर प्रश्न किया लेकिन कुछ अटपटा सा।
‘कैसे? यह कैसे बताऊं? लताओं पर कलियाँ कैसे उगती हैं, क्या यह महाराज बता सकेंगे?’ शिल्पी ने प्रश्न को प्रश्न में ही लपेट दिया।
राजा निरुत्तर! वह भीतर ही भीतर जल उठा। फिर भी संयत स्वर में बोला- ‘यह मूर्ति किसकी है?’
‘भूतपूर्व महाराज की।’ शिल्पी ने पूर्ववत निर्भीकता से कहा।
‘आज वह महाराज तो क्या राजा भी नहीं है।’ विजेता ने उपहास करते हुए कहा- ‘क्या ऐसे कायर को पराक्रमी बताना दुनिया को धोखा देना नहीं है?’
‘यदि मैं आज आपकी प्रतिमा बनाऊं तो कल उसके संबंध में भी यही होगा।’ शिल्प ने निर्भीकता पूर्वक कहा।
‘क्या मतलब?’ राजा के मस्तक पर प्रश्नात्मक रेखायें खिंच गयीं।
‘आज आप वीर-विजेता के रूप में नगर-प्रवेश कर रहे हैं, एक दिन भूतपूर्व महाराज ने भी इसी प्रकार प्रवेश किया था और उसी की स्मृति में मैंने यह प्रतिमा गढ़ी थी। यदि आज मैं आपका पुतला बनाऊं तो कल आने वाला विजयी राजा उसका अधिक्षेप करेगा।’
राजा ने लाल-लाल आँखों से शिल्पी को देखा और दृढ़ संयत स्वर में कहा- ‘कलाकार तुम्हारा हाथ पत्थर से स्वर्ग का निर्माण भले करे, किन्तु तुम्हारी जीभ तुम्हें रसातल की ओर ले जा सकती है।’
‘राजन्! कलाकार की जीभ और हाथ अलग-अलग नहीं होते। उसका मस्तिष्क और हृदय भी अलग-अलग नहीं होता। राजनीति भले ही वाराँगना हो, कलाकार की नीति तो पतिव्रता है। वह मानती है कि जीवन में एक ही सत्य है और वह है परम सत्ता के आलोक में विकसित होना।’
जैसे कोई ज्वालामुखी धीरे-धीरे सुलगने लगे, उसी तरह शिल्पी के एक-एक शब्द से राजा का क्रोध प्रज्ज्वलित हो रहा था। अब वह सहसा फूट पड़ा। वह चिल्ला उठा- ‘किसी और ने यह बात कही होती तो उसे शिरच्छेद का दण्ड दे देता। परन्तु---’ फिर वह मुस्करा पड़ा और बोला- ‘मैं तुम्हें बिलकुल मामूली दण्ड दूँगा। सारी जनता के समक्ष तुम्हें इस मूर्ति को तोड़कर चूर-चूर करना होगा।’
भीड़ में तहलका-सा मच गया। कानाफूसी होने लगी। केवल तीन ही स्थिर और शाँत थे- राजा, शिल्पी और मूर्ति। एक-एक क्षण एक युग जान पड़ता था। कई क्षण बीत गये, लेकिन शिल्पी का मौन न टूटा। वह अविचलित भाव से खड़ा रहा। अन्त में राजा ने ही चुप्पी भंग की- ‘मेरी आज्ञा स्वीकार है?’
‘नहीं’ दृढ़ स्वर में शिल्पी का संक्षिप्त उत्तर था।
‘तो शिरच्छेद के लिये तैयार हो जाओ।’
‘हृदय गवाने से सिर गंवाना कहीं अच्छा है।’
‘क्या आज तक तुमने अपने हाथ से अपनी कोई रचना नष्ट नहीं की?’ राजा ने शिल्पकार को उलझने में डालने के इरादे से प्रश्न किया।
‘एक नहीं अनेक प्रतिमायें मैंने अपने हाथों से बनायी और नष्ट की हैं।’
‘किस कारण?’ राजा ने विस्मित होकर पूछा।
‘क्योंकि उनमें मेरी कला पूर्णतया अवतीर्ण नहीं हुई थी। मेरे हृदय का प्रतिबिम्ब उनमें नहीं प्रकट हुआ था। परन्तु इस प्रतिमा की बात दूसरी है। यह मेरी सबसे सुन्दर कृति है और मेरा काम सौंदर्य का निर्माण करना है, उसका विध्वंस नहीं। उस कार्य के लिये तो ईश्वर ने राजा-महाराजा पैदा किये हैं।’
जनता थर-थर काँप उठी। उसने समझ लिया-राजा का इस तरह अपमान करने वाला उद्धत कलाकार अब कुछ ही क्षणों में परलोक का मेहमान बनने वाला है।
परन्तु वह चकित रह गई। राजा सिर झुकाकर खड़ा था। बड़ी देर बाद उसने गर्दन ऊपर उठायी और कहा- ‘कलाकार! मैंने तुम्हारे इस राजा को परास्त किया था परन्तु इस पत्थर की प्रतिमा ने मुझे परास्त कर दिया है। शस्त्र की जीत अन्तिम जीत होती है यही मेरा आज तक विश्वास था। परन्तु आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। शस्त्र- की जीत अन्तिम जीत नहीं होती, सत्य की ही अन्तिम विजय होती है। यह ज्ञान आज मुझे मिल गया।’
-श्री वि.स. खाँडेकर की मराठी कहानी का अनुवाद
लुकमान जिस नगर में रहते थे वहीं एक सेठ भी रहता था जो अपने नौकरों पर सख्ती करने के लिये मशहूर था। उसका एक नौकर जो हकीम लुकमान के ही रूप रंग का था एक दिन भाग खड़ा हुआ। उसकी खोज करते हुए सेठ की भेंट लुकमान से हो गई। उसने लुकमान को ही नौकर समझ कर पकड़ लिया और घर लाकर काम में लगा दिया। लुकमान ने कोई प्रतिरोध नहीं किया मेहनत से काम में जुट गये।
एक वर्ष में मकान बन गया। तब एकाएक वह पुराना नौकर भी आ उपस्थित हुआ और अपनी भूल के लिये सेठ से क्षमा-याचना करने लगा। सेठ को यह बात तो भूल गई और यह चिंता छा गई कि धोखे से किसे पकड़ लिया। वह लुकमान के पास गया और बोला- सच-सच कहें आप कौन हैं, मुझसे बड़ी गलती हो गई।
‘हकीम लुकमान’- लुकमान ने हंसकर कहा- जो हुआ उसका दुःख न करो तुम्हें अपने किये का फल मिल गया और मुझे मकान बनाने की विद्या मालूम हो गई।
एक डबल सेट पम्प एक दिन में 3250 गैलन पानी फेंकता है, किन्तु यदि उसे दिन भर बिना एक-आध घण्टा विश्राम दिये चलाये रखा जाये तो मशीन इतनी गर्म हो जायेगी कि उसके जल उठने या फट जाने का संकट उत्पन्न हो उठेगा। इसीलिये मशीन वाले लोग उसे दिन में एक दो बार विश्राम दे लेते हैं। तेल और ग्रीस की नियमित व्यवस्था के बाद भी विश्राम मशीन के लिये आवश्यक है, उसके बिना उसका थोड़े दिन भी अच्छी तरह चल लेना संभव नहीं।
उदाहरण यह बताता है कि विश्राम भी जीवन की एक आवश्यकता है, उससे एक नई ताजगी मिलती है। किन्तु भगवान ने मनुष्य शरीर को जो क्षमताएं दी हैं, वह बताती हैं कि यदि मनुष्य संपूर्ण जीवन अविराम काम करता रहे तो, भी उसे शक्ति की कमी न रहेगी, विश्राम केवल स्थूल पदार्थों के लिये ही आवश्यक है अर्थात् शरीर यदि आराम करना चाहता है, तो उसे कुछ विश्राम दिया भी जा सकता है। पर मानसिक व आत्मिक शक्तियों से तो मनुष्य निद्रा में भी काम करता रह सकता है।
हमारे शरीर में हृदय एक ऐसा ही शक्ति स्रोत है, जो जीवन भर एक पल को भी विश्राम किये बिना काम करता रहता है। भगवान राम के सामने एक ही उद्देश्य था, आसुरी शक्तियों का दमन। तो वह आजीवन उसी में लगे रहे। बुद्ध का निश्चय था, दलित समाज को हिंसा और भाग्यवाद के कुत्सित जाल से निकालना, उसके लिये वह एक क्षण विश्राम किये बिना काम करते रहे तभी उन्हें एक आदर्श लोक-सेवक होने का यश मिला। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द ने भारतीय धर्म और संस्कृति को नया जीवन देने का ही काम किया। पर आजीवन उसी में जुटे रहे तब कोई उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त कर सके। हृदय भी ऐसा ही एक उदाहरण है, जो सारे जीवन भर 6 लीटर रक्त सारे शरीर में दौड़ाता रहता है। अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिये वह 1 सेकेंड की नींद तक नहीं लेता। विश्राम तो उसके लिये मृत्यु ही है। अपनी इस सक्रियता के कारण ही वह शरीर, मस्तिष्क और मनुष्य रूप में आत्मा के विकास में सहायक होता है।
जल संचालन (वाटर वर्क्स) यों सारे शहर को पानी देता है पर किसे, कब, कितना पानी दिया जाये, उसमें इस तरह की विवेक बुद्धि नहीं, ऐसा भी प्रबंध नहीं कि वह अशुद्ध हुए जल को फिर शुद्ध बनाकर जल संकट को बचाये रख सकने में समर्थ हो। हृदय दिन-रात काम करता है और सबकी आवश्यकतायें पूरी करता हुआ अशुद्ध रक्त को स्वयं शुद्ध भी करता है। यह चार भागों में विभक्त होता है, ऊपर के दो कोष्ठ ‘आरिकल्स’ और नीचे के ‘वेन्ट्रिकल्स’ कहलाते हैं। दाहिने हाथ का एक आरिकल और एक वेन्ट्रिकल में अशुद्ध रक्त का विभाग है, तो बायीं ओर के दोनों कोष्ठों में शुद्ध रक्त का विभाग। दोनों एक पिता-माता की संतान की तरह अच्छे-बुरे का ख्याल किये बिना काम करते रहते हैं। मनुष्यों की तरह सवर्ण और अछूत का भेद-भाव वहाँ नहीं रहता।
ऐसा भी नहीं कि किसी के पास असीमित रक्त हो, किसी की आवश्यकता ही पूर्ण न हो। हृदय एक धार्मिक साम्यवाद का प्रतीक है, जहाँ से वितरण असमान तो होता है पर वह आवश्यकता के अनुसार वितरण- जिसका जैसा काम उसके अनुसार इनाम का प्रबंध रहता है। अपने वाल्व सिस्टम और दबाव नियंत्रण (प्रेशर कन्ट्रोल) के द्वारा उचित मात्रा में सबको रक्त पहुँचाता है। यह दोनों यंत्र बताते रहते हैं कि कितने रक्त की आवश्यकता है, फिर उतना ही रक्त वहाँ पहुँचता है।
आपातकालीन व्यवस्था भी रहती है, कभी कहीं कोई स्थान कट जाता है या चोट लग जाती है, तो हृदय अपनी कुछ विशेष धमनियों को चलाकर उस स्थान में पहले से बहुत अधिक मात्रा में तब तक रक्त पहुँचाता रहेगा जब तक उतने रक्त की आवश्यकता बनी रहेगी। पूँजी एकत्रित करने का प्रयत्न करने वाला शरीर का प्रत्येक अंग दूषित हो जाता है इसलिये हृदय अधिकार से अधिक रक्त किसी को भी नहीं देता।
मस्तिष्क-सारे जीवन का केन्द्र बिन्दु, प्राण और उसे, शुद्धतम रक्त की आवश्यकता होती है, हृदय उसे शुद्ध से शुद्ध रक्त देता है। हाथ दिनभर काम करते हैं उन्हें गर्म और ताजा रक्त, जिसे कम से कम जरूरत उसे कम और अन्त में सबके गंदे किये हुए रक्त को स्वयं ले लेने की महानता। खराब रक्त को पुनः शुद्ध कर शरीर को लौटा देने की तपश्चर्या हृदय ही कर सका। इसीलिये भगवान ने उसे निरन्तर काम करने और लंबे आयुष्य के उपभोग की आयुष्य दी है।
हृदय प्रति मिनट में 72 बार धड़कता है। 1 वर्ष के बच्चे में वह 120 बार धड़कता है। हम कभी कोई भयानक दृश्य देखते हैं तो हृदय अपनी धड़कन बढ़ाकर ऐसी व्यवस्था करता है कि भय के कारण उत्पन्न स्थिति विस्फोटक न होने पाये। यह एक विचित्र यंत्र है, जहाँ पर हजारों नस-नाड़ियाँ शुद्ध रक्त शरीर के प्रत्येक भाग को ले जाती है और अशुद्ध खून दिल में ले आती हैं, यही अशुद्ध रक्त हृदय फेफड़ों में भेजकर शुद्ध करा लेता है और फिर शरीर को बाँट देता है। साढ़े चार इंच लंबे साढ़े तीन इंच चौड़े और ढाई इंच मोटे इस रुधिर परिवाहक को कारोनरी आर्ट्री नामक बारीक धमनी खून देती है। ‘कारोनरी’ ‘वासा वासोरम’ नस पर वासा वासोराम को कहाँ से जीवन मिलता है, यह शरीर शास्त्रियों को ज्ञात नहीं। लोक सेवा का उत्तरदायित्व जो हृदय के समान निष्ठापूर्वक निबाहते हैं। उन्हें भी ऐसी ही अदृश्य सहायतायें मिलती हैं।
विश्राम और स्थूल साधनों की अपेक्षा स्थूल पदार्थ और योजनायें करती होंगी। विचारशील चेतन प्राणी उससे भिन्न है, उसे तो हृदय की तरह अविराम काम ही करते रहना चाहिये। ताकि समाज-व्यवस्था बिगड़ने न पाये। जो लोग अपने आपकी चिन्ता किये बिना ऐसी लोक-सेवा में उत्सर्ग होते हैं, उन्हें शक्ति और साधनों का हृदय के समान कभी अभाव नहीं रहता।
एक बार एक कलाकार ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उसे देखने के लिये नगर के सैंकड़ों धनी-मानी व्यक्ति भी पहुँचे। एक लड़की भी उस प्रदर्शनी को देखने आई। उसने देखा सब चित्रों के अन्त में एक ऐसे मनुष्य का भी चित्र टंगा है जिसके मुँह को बालों से ढक दिया गया है और जिसके पैरों पर पंख लगे थे। चित्र के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था ‘अवसर’। चित्र कुछ भद्दा सा था इसलिये लोग उस पर उपेक्षित दृष्टि डालते और आगे बढ़ जाते।
लड़की का ध्यान प्रारंभ से ही इस चित्र की ओर था। जब वह उसके पास पहुँची तो चुपचाप बैठे कलाकार से पूछ ही लिया- श्रीमान जी यह चित्र किसका है? ‘अवसर का’ कलाकार ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। आपने इसका मुँह क्यों ढक दिया है? लड़की ने दुबारा प्रश्न किया। इस बार कलाकार ने विस्तार से बताया- बच्ची! प्रदर्शनी की तरह अवसर हर मनुष्य के जीवन में आता है और उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है किन्तु साधारण मनुष्य उसे पहचानते तक नहीं इसलिये ये जहाँ थे वहीं पड़े रह जाते हैं पर जो अवसर को पहचान लेता है वही जीवन में कुछ काम कर जाता है।
‘और इसके पैरों में पंखों का क्या रहस्य है? लड़की ने उत्सुकता से पूछा। कलाकार बोला- कि यह जो अवसर आज चला गया वह फिर कल कभी नहीं आता।’
लड़की इस मर्म को समझ गई और उसी क्षण से अपनी उन्नति के लिये जुट गई।
श्मशान घाट पर पड़ा एक शव- दूसरे शव को लेकर मुस्कराने लगा। इस पर दूसरे शव ने कहा- बन्धु! ऐसी क्या बात हो गई जो हंसना आ रहा है, हम दोनों तो एक ही स्थिति में हैं।
पहला शव उसी मुस्कराहट के साथ बोला- बन्धु! तुम्हें याद नहीं हम दोनों कभी सहपाठी थे, विद्याध्ययन के बाद से तुम वणिक वृत्ति में उलझ गये, दिन-रात पैसा और भौतिक सुख की कामना करते-करते अब तुम्हारी स्थिति यह है कि श्मशान घाट में भी पैसों का ही हिसाब लगा रहे हो।
‘और आप’- दूसरे शव ने पूछा- ‘जब तक जीवित रहा, थोड़ा कमाया पर मस्त रहा और अब जबकि मर गया हूँ तब भी वहीं निर्द्वन्द्वता वही प्रसन्नता अच्छा तो नमस्कार, लो अब चला’ यह कहकर पहला शव चिता की ओर चल पड़ा और दूसरा शव फिर अपने हिसाब-किताब की बातों में उलझ गया।
‘संगीत कला विहीन मनुष्य पुच्छहीन पशु की तरह है।’ उपर्युक्त श्लोक में एक तरह से संगीत के प्रति श्रद्धा और प्रेम न रखने वाले व्यक्ति की निन्दा की गई है, पर ऐसा लगता है श्लोककार ने यह पंक्तियाँ लिखते हुए यह ध्यान नहीं दिया कि संगीत एक ऐसी वस्तु है, पशु-पक्षी भी जिसके प्रति अपार आदर और प्रेम रखते हैं।
फ्राँसीसी लेखक ऐलीसन को एक बार किसी अपराध में पकड़कर जेल भेज दिया गया। अपने जेल-जीवन का एक रोमाँचकारी संस्मरण प्रस्तुत करते हुए श्री ऐलीसन ने लिखा है-एक दिन जब मैं अपनी बाँसुरी बजाने में मग्न था तब मैंने देखा जाले के भीतर से एक मकड़ी निकली और बाँसुरी के स्वर-तालों के साथ ऐसे घूमने लगी मानो वह नृत्य करना चाहती हो। मैंने उस दिन से अनुभव किया कि संगीत कोई एक ऐसी शक्ति है जो प्रधानतया शरीर में रहने वाली चेतना से संसर्ग करती है, तभी तो सृष्टि का इतना तुच्छ जीव भी उसे सुनकर फड़क उठता है।
संगीत एक पराशक्ति है और उसे प्रयोग करने के विविध उपायों का नाम है ‘शास्त्रीय संगीत’। संगीत से मनुष्य की किसी भी भावना को उत्तेजित किया जा सकता है और समाज में व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
मियामी विश्व विद्यालय अमेरिका के वैज्ञानिक डॉ. जे.डी. रिचार्डचन ने समुद्री मछलियों को पकड़ने के लिये एक विशेष संगीत ध्वनि का आविष्कार किया है। उनका कहना है कि समुद्र के किनारे चारा लगी वंशियाँ डाल दी जायें और फिर वह स्वर बजाया जाये तो उसे सुनने के लिये सैंकड़ों की संख्या में मछलियाँ दौड़ी चली आती हैं। उससे इस सिद्धाँत की पुष्टि अवश्य होती है कि संगीत विश्व की एक आध्यात्मिक सत्ता है। संसार का प्रत्येक जीवधारी उसे पसंद करता है। मनुष्य को तो मानवीय सद्भावनाओं के उत्प्रेरण में उसका सदुपयोग करना ही चाहिये।
समुद्र में पाया जाने वाला शेरो जन्तु तो संगीत की स्वर लहरियों पर इतना आसक्त हो जाता है कि यदि उसे कहीं मधुर स्वर सुनाई दे जाय तो वह अपने जीवन की चिन्ता किये बिना प्राकृतिक प्रकोप और अवरोधों को भी पार करता हुआ वहाँ पहुँचेगा अवश्य। पाश्चात्य देशों में विद्युत से बजने वाला एक ऐसा यंत्र बनाया गया है, जिसकी स्वर-तरंगें सुनकर मच्छर दौड़े चले आते हैं और उस यंत्र से टकरा-टकरा कर ऐसे प्राण होम देते हैं जैसे दीपक की ज्योति पर पतंगे प्राण अर्पण कर देते हैं।
अभी कुछ दिन पूर्व न्यूयार्क मेट्रोपोलिटन (म्युनिस्पैलिटी की तरह नगर प्रशासक संस्था को मेट्रोपोलिटन कहते हैं, यह बड़े-बड़े नगरों में जैसे दिल्ली आदि में होती है) के संग्रहालय ने अफगानिस्तान के डॉ. एम फरीदी से 18 हजार पौण्ड में एक पुस्तक खरीदी है। यह पुस्तक एक भारतीय सूफी संत ख्वाजा फरीदुद्दीन खट्टर द्वारा लिखी गई है उसका नाम है ‘संत कुबेर’। इस पुस्तक में लिखा है कि संसार के सैंकड़ों जीव विधिवत गाते भी हैं। उनके द्वारा गाये जाने वाले गीत भी 362 पृष्ठों वाली इस पुस्तक में दिये हैं। इस पुस्तक की दो प्रतियाँ- एक काश्मीर में दूसरी वाराणसी में उपलब्ध बताई जाती है।
जापान में कई सम्पन्न व्यक्तियों के पास विभिन्न जीव जन्तुओं का रिकार्ड किया हुआ संगीत उपलब्ध है, जब किसी सार्वजनिक उत्सव या किसी विदेशी अभ्यागत का स्वागत होता है तो उसे सुनाया भी जाता है। मादा मेढ़क जब प्रसवकाल में होती है तो वह बड़े मधुर स्वर में गाती है। कहते हैं कि गर्भिणी मेढ़क का विश्वास होता है कि गाने से उसका प्रसव बिना कष्ट के होगा साथ ही पैदा होने वाला नया मेढ़क भी स्वस्थ और बलवान होगा। इस किंवदन्ती में कितना अंश सच है, यह तो निश्चित नहीं कहा जा सकता किन्तु मनुष्य के बारे में यह निर्विवाद सत्य है कि गर्भावस्था में माता के हाव-भाव और विचारों का गर्भस्थ बालक पर प्रभाव पड़ता है। यदि गर्भवती स्त्री को नियमित रूप से संगीत सुनने को मिले तो उससे न केवल प्रसवकाल का कष्ट कम किया जा सकता है वरन् आने वाली सन्तति को भी शारीरिक मानसिक तथा आत्मिक दृष्टि से दृढ़ और बलवान बनाया जा सकता है।
प्रसव के तत्काल बाद ‘सोहर’ संगीत गाने की भारतीय लोक जीवन में अभी भी व्यवस्था है, वह इस बात की प्रतीक है कि यदि बच्चा बुरे संस्कार भी लेकर आया है तो यदि उसे संगीत के प्रभाव में रखा जाये तो पूर्व जन्मों के असत् और दूषित संस्कारों का पूर्ण प्रक्षालन किया जा सकता है।
कहते हैं तानसेन जिन दिनों अपने गुरु सन्त हरिदास के पास संगीत विद्या का अभ्यास कर रहे थे, एक दिन वह जंगल गये। उन्होंने देखा एक वृक्ष पर अग्नि जलती है और फिर बुझ जाती है। अग्नि के जलने और बुझने की यह घटना तानसेन ने आश्रम में आकर गुरुदेव को सुनाई और उसका रहस्य पूछा। स्वामी हरिदास ने बताया उस वृक्ष पर एक ऐसा पक्षी रहता है। जिसके कण्ठ से निकले हुये, स्वर-कंपन दीपक राग के स्वर कंपनों के समान हैं। जिस तरह कोयल एक विशेष लय में ‘कुहू-कुहू’ गाती है, जिस तरह पपीहा एक आहत ध्वनि प्रसारित करता है, उसी प्रकार जब वह चिड़िया सहज बोलती है तो वह स्वर लहरियाँ फूटती हैं, उसी से अग्नि जलती और बुझती है। इस विशेष घटना से ही प्रेरित होकर तानसेन ने ‘दीपक राग‘ का मनोयोग पूर्वक अभ्यास कर उसमें सिद्धि प्राप्त की।
देखने सुनने में यह घटनायें अतिरंजित होती हैं, पर जो लोग शब्द और स्वर विज्ञान को जानते हैं उन्हें पता है कि प्राकृतिक परमाणुओं में अग्नि आदि तत्व नैसर्गिक रूप में विद्यमान हैं, उन्हें शब्द तरंगों के आघात द्वारा प्रज्ज्वलित भी किया जा सकता है। आज पाश्चात्य देशों में शब्द शक्ति के द्वारा जो आश्चर्यजनक कार्य हो रहे हैं वह सब स्वर कंपनों पर ही आधारित हैं और उनसे वहाँ कई प्रकार की औद्योगिक क्रान्तियाँ उठ खड़ी हुई हैं। हम उधर ध्यान न दें तो भी इन आख्यानों को पढ़कर यह तो पता लगा ही सकते हैं, कि जीव मात्र में फैली हुई आत्म-चेतना आनन्द प्राप्ति के एक सर्वमान्य लक्ष्य से बंधी हुई है। उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये योग-साधनायें कठिन हो सकती हैं, पर स्वरों की कोमलता और लयबद्धता में कुछ ऐसी शक्ति है कि वह सहज ही में आत्मा को ऊर्ध्वमुखी बना देती है। उससे शारीरिक, मानसिक लाभ भी है, पर आत्मोत्थान का लाभ सबसे बड़ा है। संगीत कला का उपयोग उसी में किया भी जाना चाहिये।
एक दिन तानसेन के एक गाने से प्रसन्न होकर बादशाह अकबर ने पूछा- इतना सुन्दर गीत तुमने किससे सीखा? तानसेन ने जवाब दिया- ‘अपने गुरु हरिदास जी से।’ अकबर ने कहा- ‘चलो उनके पास चलें। ‘ इसके बाद अकबर तानसेन को लेकर अपनी सारी मंडली के साथ हरिदास जी के घर गया। हरिदास जी नित्य ईश्वर भक्ति में मस्त रहते थे। वे ईश्वर भजन के सिवाय और कोई गाना नहीं गाते थे। बादशाह ने हरिदास जी से कोई गाना सुनाने की प्रार्थना की। बादशाह की विनती से उन्होंने एक सुन्दर भजन गाया। बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और उनका यथोचित सत्कार करके लौट आया। एक रोज कचहरी में अकबर ने तानसेन से उस दिन वाला भजन गाने को कहा। तानसेन ने गाया जरूर, पर बादशाह को उस दिन जैसा आनन्द नहीं मिला।
अकबर ने उनसे पूछा- ‘उस दिन जैसा आनन्द आज क्यों नहीं मिला?’ तानसेन ने जवाब दिया कि ‘मैं आपको प्रसन्न करने के लिए गाता हूँ। किन्तु हमारे गुरुजी ने आपको राजी करने के लिये नहीं गाया था, बल्कि बादशाहों के बादशाह को प्रसन्न करने के लिये गाया था। इसी कारण यह अन्तर मालूम देता है अन्यथा भजन तो वही है।
धर्म और विज्ञान में क्या संबंध है? अथवा क्या विरोध है? इस विषय पर जब भी कुछ सोचते हैं तो ऐसा लगता है कि शताब्दी के प्रारंभ से ही विज्ञान के परिणाम और धार्मिक विश्वासों में परस्पर स्पष्ट असहमति रही है। तुलना में, परिणामों में पूर्णतया विरोधाभास पाया गया। हम इस बात को सोचने के लिये विवश हैं कि या तो विज्ञान का पढ़ना पढ़ाना छोड़ा जाये अथवा धार्मिक विश्वासों को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाये?
यह दोनों ही क्षेत्र अपने आप में बड़े जबर्दस्त हैं। इसलिये गंभीरता पूर्वक विचार किये बिना, इस प्रश्न को अधूरा छोड़ा जाना, मानव जाति के लिए अहितकारक हो सकता है। धर्म और विज्ञान में क्या संबंध हो इस विषय में अन्तिम निर्णय ढूंढ़ना आवश्यक हो गया है।
धर्म और विज्ञान के पारस्परिक संबंध जानने के लिये यह आवश्यक है कि हम दोनों का ही सही-सही वास्तविक और पर्याप्त अर्थ जानें। दोनों के क्षेत्र जानना आवश्यक है। उनमें संबंध क्या है यह भी जानना आवश्यक है तभी धर्म और विज्ञान के संबंध का निर्णय दिया जाना संभव होगा।
सबसे पहले धर्म को लेते हैं। मनुष्य जीवन के आधारभूत अनुभवों का वर्णन ही संभवतः धर्म है। धार्मिक विचार हमें अपने जीवन की शुद्धता बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं। यह निर्णय अतीत के लंबे इतिहास का निष्कर्ष होता है। इसलिये उसमें कुछ भी सत्य न हो यह कहना भारी मूर्खता ही होगी।
‘धर्म मानव प्रकृति की वह क्रिया है जो ईश्वर की निरन्तर खोज करती है। जीवन को सुव्यवस्थित रूप देने के लिये भी धर्म आवश्यक है। व्यवहार कुशलता भी धर्म है’ यह शब्द प्रसिद्ध दार्शनिक श्री प्रो. हृाहट हेड के हैं। भारतीय धर्म−दर्शन के अनुसार भी- ‘वह संपूर्ण ज्ञान विज्ञान जो मानवीय आत्मा को धारण करता अर्थात् ऊपर उठाता है’ इसमें अपने व्यावहारिक जीवन को शुद्ध सत्य और नैतिक बनाने से लेकर ईश्वर प्राप्ति तक की सब विधायें आ जाती हैं। मानव जीवन के लिए इनके उपयोग और आवश्यकता की बात हम अलग से विचार करेंगे।
अब विज्ञान आता है। विज्ञान पदार्थों के क्रमबद्ध ज्ञान को कहते हैं। हमारी मूल चेतना के बाद शरीर से लेकर आकाश और विराट ग्रह-पिण्डों तक यह जो प्रकृति दिखाई दे रही है वह क्या है और उसकी विविधता में परस्पर क्या संबंध हैं इस सब ज्ञान और प्रयोग का नाम ही विज्ञान है। मानव जीवन के लिये इसके उपयोग और आवश्यकता की बात पर हम अलग से विचार करेंगे।
धर्म और विज्ञान में मतभेद इसलिये दिखाई दे रहा है कि परिष्कृत ज्ञान को चाहे वह किसी भी क्षेत्र का रहा हो दोनों के संबंध ज्ञात करने के लिये उपयोग नहीं किया गया। दोनों अपने-अपने क्षेत्र बढ़ाने के इच्छुक अवश्य रहे हैं। बहुत समय पहले ईसाइयों में यह भावना घर कर गई थी कि उनके इस जीवन काल में ही संसार का नाश हो जायेगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ इस तरह उनका विश्वास गलत हो गया। इसके बाद ईसाई धर्म ने अपनी इस धारणा को सुधार लिया। ईसाई धर्म पृथ्वी को चपटी बताया था, सूर्य को स्थिर और नक्षत्रों को गतिमान बताता था किन्तु यह दोनों ही बातें गलत सिद्ध हुईं। पृथ्वी गोल सिद्ध हुई और सूर्य भी घूमता है यह भी सिद्ध हो गया। फिर भी बाईबल की उपयोगिता और दृढ़ता अभी भी वैसी ही बनी हुई है, क्योंकि धर्म के नैतिक और आध्यात्मिक पहलू तो मनुष्य जीवन को हर घड़ी छूते रहते हैं? उनकी आवश्यकता और उपयोग को जब तक लोग मानते और ग्रहण करते रहेंगे तब तक धर्म के कुछ प्रतिपादन गलत सिद्ध हो जाने पर उसकी उपयोगिता नष्ट थोड़े ही हो जायेगी।
विज्ञान तो धर्म से भी अधिक परिवर्तनशील है। उसमें भी विचारों में परिवर्तन और नये तथ्यों का प्रवेश होता रहा है। दोनों ही परिवर्तनशील हैं। तर्कवादियों के अनुसार कोई भी विश्वास या तो बिलकुल सत्य होगा या झूठ।
बीच की कोई बात संभव नहीं। किन्तु दैनिक जीवन के व्यवहार में यह सच है। क्योंकि विशाल ब्रह्माण्ड में फैले हुये ज्ञान की तुलना में हमारी योग्यता अभी बहुत कम है। यदि ऋषियों की तरह हम भी असामान्य स्थिति में होते तो किसी बात के सत्य या असत्य का सीधे निर्णय ले सकते थे, किन्तु आज की स्थिति में यह संभव नहीं है, इसलिए जब तक हम मानव जीवन के उद्देश्य, यथार्थ तत्वदर्शन को नहीं जान लेते तब तक दोनों में समझौता रखना ही पड़ेगा। यह भी संभव है कि जिस प्रकार प्रकृति और परमेश्वर की सत्ता से इन शरीरों का निर्माण सदैव से ही रहा है, उसी प्रकार आत्मा के उभयपक्षीय विकास के लिये भी धर्म और विज्ञान हमेशा के लिये हमारे लिये उपयोगी और आवश्यक बने रहें।
कम ज्ञान का दोष यदि धर्म पर लगाया जा सकता है, तो विज्ञान भी उसके लिये समान दोषी है। एक समय था जब गैलीलियो ने यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य स्थिर है। तब लोग इसी बात को सत्य मानते थे। इसके बाद लैविंग्स्टन ने बताया कि पृथ्वी स्थिर है, सूर्य चलता है और बहुत काल तक इस बात को ही संसार मानता रहा। फिर एक समय न्यूटन का आया, जब खगोल शास्त्रियों ने बताया सूर्य और पृथ्वी दोनों घूमते हैं, अपने-अपने समय में सत्य समझे जाने वाले सिद्धाँत जब दूसरे क्षण असत्य सिद्ध हुये तो विज्ञान को पूर्ण सत्य कैसे कहा जा सकता है। 17वीं शताब्दी में न्यूटन और हाइजन ने प्रकाश की प्रकृति पर अलग-अलग दो नियम बनाये, न्यूटन का कथन का प्रकाश किरणों में छोटे-छोटे कण होते हैं, जो सीधी रेखाओं में चलते है। यह कण ही जब आँखों की पुतलियों (रेटिना) से टकराते हैं तो हमें प्रकाश का ज्ञान होता है। हाइजन का कथन था, प्रकाश छोटी-छोटी लहरों (वैव्स) में चलता है। दोनों सिद्धाँत परस्पर विपरीत हैं, किन्तु 18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धाँत को सत्य माना जाता रहा। अब एक नये क्वांटम सिद्धाँत (क्वांटम थ्योरी आफ लाइट) की बात सुनने में आ रही है, उस पर भी वैज्ञानिक आने वाली शताब्दियों में नये सिद्धाँतों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
धर्म की नैतिक मान्यतायें सदैव एक सी रहती हैं, पर रीति-रिवाज या आध्यात्मिक मान्यताओं के प्रति कभी नये सिद्धाँत सामने आयें तो उनको भी कसौटी पर कसा जा सकता है, किन्तु धर्म ने यह बात नहीं मानी। उदाहरण के लिये हिन्दुओं में मृतक भोज, दहेज, बलि प्रथा, नेग प्रथा, बाल-विवाह आदि अनेक बातें धर्म से जुड़ी हुई हैं, इनका व्यावहारिक औचित्य आज अस्वीकार कर दिया गया है। फिर यदि धर्म इनको हठ के साथ मान्यता दिलाना चाहे तो स्वाभाविक ही है कि यह लोगों की दृष्टि में अनुपयुक्त सिद्ध थे। जिस प्रकार विज्ञान के नियम बदल कर परिस्थितियों के अनुसार नई शुद्ध मान्यताओं को जन्म मिलता रहता है, उसी प्रकार धर्म को भी अपनी अनेक मान्यताओं को बदलते रहना आवश्यक हो जाता है।
जब तक हम धर्म अथवा विज्ञान में से किसी एक को सत्य की प्राप्ति के लिये पूर्णतया सक्षम एवं समर्थ नहीं बना लेते, तब तक परिवर्तनों का सामना करने के साथ ही दोनों में सामंजस्य रखना भी अनिवार्य होगा। दोनों का ही उद्देश्य संसार के अन्तिम सत्य को ढूंढ़ना और उसका मानव-जीवन के लिये उपयोग करना है। कुछ सिद्धाँत धर्म के अच्छे हैं, कुछ विज्ञान के। दोनों ओर की अच्छाइयों को एक स्थान पर मोड़ कर धर्म को वैज्ञानिक या विज्ञान को धार्मिक बनाया और सदियों से चले आ रहे विरोधाभास को समाप्त किया जा सकता है।
धूप और छाँव का विवाद हल न हुआ तो दोनों विधाता के पास पहुँचीं और बोली महाराज! पृथ्वी में हम में से एक को ही रहने का अधिकार दीजिये- दूसरे को वहाँ से अलग कर दीजिये।
विधाता बड़ी देर तक चुप रहे फिर पीड़ा भरे स्वर में बोले मुझे दुःख है कि तुम दोनों का अस्तित्व तो एक दूसरे पर ही आश्रित है। ईर्ष्या छोड़ कर प्रेम से रहो और अपनी उन्नति करो।
‘कृति’ जो ‘संस्कार’-सम्पन्न हो- संस्कृति कहलाती है। इसका अर्थ भारतीय जीवन प्रणाली में प्रचलित षोडश संस्कारों मात्र से नहीं हैं। वह तो 16 अध्याय मात्र हैं, जो मनुष्य को थोड़ा ठहर कर यह सोचने की प्रेरणा देते हैं कि उसका अंतरंग जीवन क्यों, कैसे और किसलिए आविर्भूत हुआ। एक बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह अपने उस उद्देश्य को बाह्य जीवन में पूरा भी कर पा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो उसे अब निश्चित ही आगे सोच−समझ कर पग बढ़ाना चाहिये।
इस तरह 16 संस्कार जीवन के 16 मोड़ थे, हैं जो प्रत्येक मुमुक्षु अर्थात् आत्म-कल्याण की इच्छा रखने वाले को पिछले जीवन में हुये आलस्य, प्रमाद और पाप से सावधान-सचेत करते हैं और आगे के लिये दिशा निर्देशन भी। पर संस्कृति इन षोडश संस्कारों से भी बड़ी- जीवन के प्रत्येक क्षेत्र प्रत्येक घड़ी, प्रत्येक कर्म में नीति बनकर समाई रहती है। प्रत्येक आचरण जो आत्मा को प्रिय लगता है-आत्म कल्याण की आवश्यकता को पूरी करता है-वहाँ तक संस्कृति का विस्तार है।
सभ्यता और संस्कृति दोनों शब्द साथ-साथ चलते हैं, पर दोनों के अर्थ में भारी भिन्नता है। इसी प्रकार धर्म और संस्कृति भी पर्याय से लगते हैं, किन्तु इनमें भी अन्तर है। सभ्यता किसी भी देश की हो सकती है और उसका संबंध, रहन-सहन, भाषा-वेश, पारिवारिक जीवन, शिखा-दीक्षा आदि बहुर्मुखी व्यावहारिक पहलुओं से है। और धर्म इससे ठीक विपरीत अर्थात् अन्तर्मुखी विकास के जितने भी साधन और अभ्यास हैं, वह सब धर्म के अंतर्गत आते हैं। ‘यतोऽभ्युदय-निश्रेयस सिद्धिः स धर्मः। जो निःश्रेयस और अभ्युदय की प्राप्ति कराये, वही धर्म है। धर्म के 10 अंगों-धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध में से कई ऐसे लगते हैं जो बहिर्मुखी जीवन से संबंधित जान पड़ते हैं किन्तु यह सब भावनायें हैं जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार के लिये तैयार करती हैं, भले ही उससे बहिर्मुखी जीवन में कुछ कठिनाइयाँ ही क्यों न आती हों।
सभ्यता और धर्म के समन्वय का नाम संस्कृति है। जिस तरह इड़ा और पिंगला के योग से सुषुम्ना का, गंगा और यमुना के योग से त्रिवेणी का आविर्भाव होता है, उसी प्रकार संस्कृति धार्मिक परिप्रेक्ष्य में तो अन्तर्मुखी जीवन के विकास की प्रेरणा देती है और सभ्यता के रूप में बाह्य जीवन को भी शुद्ध और ऐसा बनाती है जिसमें एक मनुष्य किसी भी दूसरे प्राणी के हित का अतिक्रमण न करता हुआ धार्मिक लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे।
इस तरह जो आचार-विचार, रहन-सहन साधना उपासना, इष्ट-ध्यान, बोली-भाषा, उपरोक्त दोनों आवश्यकताओं को पूर्ण करें वही सच्ची संस्कृति का निर्माण करते हैं, जब इस परिभाषा में रखकर देखते हैं तो हम पाते हैं कि भारतीय संस्कृति ने इस संतुलन को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की है। उसमें जाति-आयु लिंग और वर्ण का कोई भेद-भाव नहीं है। सब देशों के लिये संपूर्ण प्राणियों के लिये हितकारक होने के कारण ही वह विश्व-संस्कृति कही जाती है। भारत में जन्म लेने के कारण उसे भारतीय संस्कृति या हिन्दू-संस्कृति भी कहते हैं। पर उसमें किसी एक समुदाय, सम्प्रदाय या देशवासियों के ही कल्याण की सीमा संकीर्णता नहीं है।
संस्कृति का सीधा संबंध आत्मा से, मोक्ष, अमरत्व और ईश्वर की प्राप्ति से है। इसलिये उसमें जोड़े गये साधन, पूजन और योगाभ्यास को भी अनिवार्य स्थान दिया गया है। कुछ लोग उसे हिन्दुओं की ही निधि मानते हैं। पर ऐसा सोचना, चाहे कोई अन्य देश का व्यक्ति हो या इसी देश का, गलत है। हमारा दर्शन जिस पर संस्कृति आधारित है, उसमें ऐसी कोई अनिवार्यतायें नहीं हैं। कोई भी इष्ट रखकर कैसी भी उपासना पद्धति से मनुष्य आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा करे, संस्कृति इस मामले में तो व्यक्ति को स्वतंत्र कर देती है। किन्तु साथ ही वह यह भी देखती है कि ऐसी किसी भी साधना या अभ्यास से पराये का हित नष्ट नहीं होना चाहिये, भले ही उससे आत्म-कल्याण की आवश्यकता पूरी न हो। तंत्र भाग में ऐसी क्रियाएं हैं। इसीलिये भारतीय आचार्यों ने उसे गोपनीय रखा। उनका उद्देश्य प्रत्येक कर्म को चाहे वह उपासना रही हो अथवा वणिक-विपणन उसमें ब्राह्मी भाव, परमार्थ शुद्धता और पवित्रता बनाये रखना रहा है। इसीलिये भारतीय संस्कृति सदैव ही निरालोच्य रही है। उसने दूसरे धर्मों के आदर्शों को भी अपने में मिलाया पर तो भी उसने अपने तत्वदर्शन की वैज्ञानिकता को आँच नहीं आने दी।
मानवीय प्रकृति अधोगामी है इसलिये व्यवहार में मनुष्य पूर्ण शुद्ध और ब्रह्मपरायण नहीं रह सकता इस तरह की आलोचना कोई पाश्चात्य विद्वानों ने की है किन्तु भारतीय संस्कृति में ऐसी व्यवस्था, निष्ठा और संकल्प जागृत किया गया है जो प्रत्येक व्यक्ति को कम के कम किसी भी क्षेत्र में ब्रह्म-आविर्भूत बनाये रख सकती है।
भारतीय संस्कृति उसके मनोनिग्रह पर जोर देती है, वह बताती है कि मनुष्य यदि काम क्रोध लोभ, मोह, अभिमान और बनावटीपन से अपने आपको बचा ले तो किसी भी क्षेत्र में रखकर अपनी ब्रह्मनिष्ठा बनाये रख सकता है। यह तभी संभव है, जब उसका ज्ञान भी समृद्ध रहे और क्षात्र तेज भी। यजुर्वेद में कहा है-
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च संम्यचौ चरतः सह।
तं लोक पुण्यं प्रज्ञेष यत्र देवाः सहाऽग्निना॥
अर्थात्- हे वत्स! तुम अपने विचार उच्च रखना, पर साथ-साथ अपने क्षत्रियत्व को भी जागृत किये रखना। ऐसा विज्ञानी व्यक्ति ही अपनी अग्नि (तेजस्विता) को बनाये रखते हैं और जहाँ ऐसे लोग बने रहते हैं, वहाँ यज्ञ का फल उन्हें सदैव मिलता रहता है।
ब्रह्म और क्षत्रियत्व के पास-पास रहने का अर्थ ज्ञान की तेजस्विता और संयम से है अर्थात् यदि ज्ञान से अपनी निष्ठा और आदर्श को स्थिर नहीं रख सकते तो उसके लिये विध्वंस का भी मार्ग अपनाया जा सकता है। भले ही अपनी इच्छाओं का ही ध्वंस क्यों न हो। यही ब्रह्म के साथ क्षत्रियत्व है। इस नियम का पालन करने वाले ब्राह्मण समाज के शीर्ष होते हुए भी पक्षपात और पराश्रय रहित रहे। उन्होंने जो कुछ लिखा, पढ़ा-पढ़ाया, प्रसारित किया वह शुद्ध ज्ञान था। ब्राह्मी मार्गदर्शन से ओत-प्रोत था। यदि ऐसा करते हुए वे अपने मोह, काम, क्रोध, लोभ को मारते नहीं, तो अपनी तेजस्विता बनाये नहीं रख सकते थे।
क्षत्रिय जब मनु के समक्ष आये तो उन्होंने कहा- भगवन्! आपने हमें जो कर्म दिया है उसमें तो हत्या, लूटपाट, मारकाट ही है। हम अपने ब्राह्मी संस्कार कैसे सुरक्षित रख सकेंगे। मनु ने कहा-
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि।
सर्वस्याऽस्य यथान्यायं कर्त्तव्य परिक्षणम्॥
क्षत्रियों! तुम्हें आदेश है कि शत्रु की सेना और सैन्य सामग्री का ही विनाश करना, प्रजा पर हाथ न उठाना, यही तुम्हारे ब्रह्म-संस्कार की रक्षा करेगा।
कोई संस्कृति विश्व को प्रकाश दे सकती है, तो वह भारतीय संस्कृति ही है। वह किसी एक वर्ग जाति या देश के लिये नहीं।
-रोम्याँ रोलाँ
इसी प्रकार वैश्य को भी अपने कर्म में लोभ से तनिक भी चित्त न डुलाने और लाभ का एक निश्चित अंश लेने को ही कहा गया। जिससे समाज में किसी को भी उन्हें पाप-कर्मी कहने का अवसर नहीं आये। इस तरह जीवन के सभी कर्मों को तीन भागों में बाँटकर उनको ब्रह्मनिष्ठा से जोड़ने का जो अध्याय भारतीय संस्कृति ने रचा वह अद्वितीय और बेजोड़ है। उसमें मनुष्य ज्ञान से भी और कर्म से भी भक्ति की आवश्यकता को पूरा करता हुआ अपना लौकिक और पारलौकिक जीवन सुखी बना सकता है।
कर्म से इन्हीं तीनों क्षेत्रों को जब अनेक विधाओं में बाँटा गया तब 1. धर्म 2. राजनीति 3. वास्तु चित्र एवं ललित कलायें 4. व्यक्ति और परिवार-व्यक्ति और समाज के संबंध 5. शिक्षा-दीक्षा आदि अनेक क्षेत्र दिखाई दिये। किसी भी क्षेत्र में केवल श्रेष्ठता को ही मुख्य मानने और उसका निष्ठापूर्वक पालन करने से उस कृति में ब्राह्मी भाव बना रहता है। धर्म स्वार्थ सिद्धि में न पड़े उसका संबंध सदैव ही परलोक, स्वर्गमुक्ति और आत्म-साक्षात्कार से बना रहे तो वह धर्म ही मनुष्य का लोक-परलोक का साथी हो सकता है। राजनीति में साम-दाम, दण्ड, भेद को अधिकार रूप में प्रदान किया गया है, पर यदि नेता मरणपर्यन्त उनका प्रयोग अपने हित में न कर न्याय और समाज व्यवस्था के लिये करता रहता है तो वह संस्कार सम्पन्न बना रह सकता है। कला का जो स्वरूप आज दिखाई दे रहा है, वह अश्लीलता और कामुकता का उत्तेजन करता है। उसकी आवश्यकता कलाकारों के स्वार्थ के कारण है, अन्यथा परमार्थ और ईश्वर भावना का परित्याग न किया गया होता तो यह कला लोक-रंजन की आवश्यकता को भी पूरी कर रही होती और मनुष्य के पारलौकिक जीवन को भी सुदृढ़ बना रही होती। साहित्य के क्षेत्र में यही बात है। साहित्यकार भी अब स्वार्थ और आत्म-प्रवंचना में ही ग्रस्त हैं। समाज व्यवस्था में न तो बच्चों को संस्कार वान बनाने की कोई पद्धति है न शिक्षा में- ब्राह्मी संस्कार की फल जो होना चाहिये वही हो रहा है। चारों ओर छात्र असंतोष, असन्तुलन उद्दण्डता और चरित्रहीनता के ही दृश्य दिखाई दे रहे हैं। अब व्यक्ति का सामाजिक जीवन सभ्य तो हो रहा है, पर सुसंस्कृत नहीं। उसके लिये सभ्यता के साथ धर्म का समभाव आवश्यक है। तभी व्यक्ति समाज और संसार सुखी रह सकता है। यह तत्व केवल भारतीय संस्कृति में ही है। इसीलिये वह विश्व संस्कृति है। जो संस्कृति हमारे अन्तर्बाह्य जीवन में सामंजस्य नहीं रख सकती, वह कभी हितकर नहीं हो सकती। ग्राह्य तो वही हो सकती है जो मनुष्य जीवन के दोनों ही प्रयोजन साधे। क्योंकि मनुष्य न पूर्णतया पदार्थ ही है, न पूर्णतया आत्मा। दोनों का मिला-जुला रूप मनुष्य जीवन के रूप में सामने आता है। दोनों को शुद्ध बनाकर ही पूर्णता प्राप्त कराना संस्कृति का उद्देश्य है। इस रूप में भारतीय संस्कृति ही एक मात्र सफल जीवन नीति हो सकती है।
जब बाबर ने अमीनाबाद को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया तो गुरु नानक और उनके शिष्य मरदाना को भी जेल की हवा खानी पड़ी। कुछ दिनों बाद बाबर के राज्य अधिकारियों ने गुरुनानक की आध्यात्मिक शक्ति के संबंध में चर्चा की। बाबर बहुत ही प्रभावित हुआ, वह जेल में नानक से मिलने आया।
नानक ने बादशाह को देखकर कहा ‘मनुष्य का धर्म तो लोगों की सेवा करना है और आप अपने राज्य की प्रजा पर शासन कर रहे हैं।’ थोड़े शब्दों में ही बाबर नानक की बात को समझ गये, उन्होंने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा ‘बाबा! यदि आप कुछ माँगना चाहते हैं तो निःसंकोच माँग लीजिये।’
‘राजा से तो मूर्ख मनुष्य ही माँगते हैं। मुझे यदि किसी वस्तु की आवश्यकता भी होगी तो ईश्वर से माँगूँगा। आपसे माँगने में लाभ भी क्या है? देने वाला तो एक दाताराम है जो मनुष्यों को तो क्या राजाओं तक को देता है।’
इतना सुनकर बाबर ने कहा ‘तो आप ही मुझे कुछ प्रदान कीजिए।’
नानक ने एक धार्मिक उपदेश दिया- ‘बाबर! इस संसार में किसी भी वस्तु का स्थायित्व नहीं है। ध्यान रखो! आपका शासन या आपके पुत्रों का शासन भी तब तक चलेगा जब तक उसका आधार प्रेम और न्याय बना रहेगा।’ पर धर्म का स्वामित्व तो हर क्षण हर घड़ी है इसलिए तू जीवन में धार्मिकता का भी समावेश कर।’ इस उपदेश से बाबर के जीवन की दिशा ही बदल गई।
यह केवल हठ की बात नहीं है काका सा! आप यह क्यों नहीं सोचते हम भारतीयों के घरों में नारी की स्थिति पहले ही कैसी दयनीय है? राजकुमारी मंगलमुखी का वैधव्य यदि मेरे लिये अमंगल हो सकता है तो यह सारे भारतीयों के मस्तक पर ही कलंक क्यों न होना चाहिये? विधवाओं की सर्वाधिक संख्या इसी देश में है और उसके उत्तरदायी सामाजिक कारण भी पुरुषों द्वारा ही तैयार किये गये हैं। क्या अपने किये का प्रायश्चित पुरुषों को करना नहीं चाहिये?’
हम्मीर इतना कहते कुछ आवेश में आ गये थे पर अपने काका सा- अजय सिंह और अन्य सभासदों का वे पूर्ण सम्मान करते थे इसलिये फिर अपनी वाणी को संयत और विनीत बनाते हुए बोले-काका सा! राजकुमारी के कोई सन्तान नहीं है, वे छोटी आयु में ही विधवा हो गईं। राज परिवार संन्यासी का सा जीवन जी नहीं सकता फिर क्या यह राजकुमारी की कोमल भावनाओं पर आघात न होगा कि उन्हें इस खेलने-कूदने की आयु में रीति-रिवाजों के बन्दी गृह में डाल दिया जाये? संबंध मुझे करना है और मैं उसके लिये तैयार हूँ, आप लोग किसी अमंगल की बात अपने मन से निकाल दें?
किन्तु हम्मीर! तुम नहीं जानते चित्तौड़ नरेश मालदेव ने हमारे साथ छल किया है। उसने जान-बूझ कर विधवा कन्या का संबंध भेजा? तुम्हारे जैसे वीर और प्रतिष्ठित राजकुमार के लिये विधवा से संबंध करना शोभा नहीं देता- हम्मीर! युद्ध ही करना है तो हम तैयार हैं पर हम इस पक्ष में कभी नहीं कि आपका संबंध एक ऐसी कन्या से हो जो पहले भी किसी को वरण कर अपवित्र हो चुकी हो? अजय सिंह ने दृढ़ शब्दों में कहा और सामन्तों ने उनका अनुमोदन किया।
पर हम्मीर उस धातु के बने नहीं थे जो किसी भी समय कैसे भी मोड़े और झुकाये जा सकते? हम्मीर किसी सिद्धाँत को देर से स्वीकार करते थे और एक बार उसमें सत्य और आदर्श की रक्षा देख लेते तो उसके लिये ऐसा हठ करते कि फिर सारा संसार एक तरफ हो जाता तो भी वचन से पीछे न हटते। ‘हम्मीर हठ’ उन दिनों जन साधारण के दैनिक बोल बन गये थे।
हम्मीर देव ने कहा- काका सा! पुरुष जब चार-चार रानियाँ लाकर राजमहलों में डाल देता है तब भी अपवित्र नहीं होता फिर नारी एक ऐसी अवस्था में जबकि उसे सहारे की आवश्यकता होती है और दूसरा विवाह कर दिया जाता है तो वही अपवित्र क्यों हो जायेगी। मान्यतायें मनुष्य ने बनाई हैं पर उनमें केवल वही बातें मान्य हो सकती हैं जिनका कुछ विवेक जन्य औचित्य भी हो? विधवा अपवित्र और अमंगल होती है यह कोई तर्क नहीं, सत्य बात तो यह है- यदि वह निःसन्तान है तो सबसे पहले सहारे की अधिकारिणी भी वही है।
हम्मीर के हठ के आगे किसी की एक न चली। वह लगन मण्डप पर जा पहुँचे और संबंध कर ही लिया। सैनिक जो मेवाड़ से युद्ध करने गये थे, वह बराती बनकर लौटे।
मंगलमुखी ने उस दिन पूर्ण शृंगार किया पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे महाराणा हम्मीर उसके साथ छल तो नहीं कर रहे। समाज ने विधवा के जीवन में जो आत्महीनता लाद दी है मंगलमुखी उससे वंचित नहीं थी। पर उसे शीघ्र ही मालूम हो गया कि हम्मीर ने यह संबंध हठ वश नहीं मानवीय करुणा और कृतज्ञता के रूप में ही किया था। उसने हम्मीर देव को शासन-व्यवस्था में वह सहयोग प्रदान किया कि एक दिन बिना किसी द्वन्द्व और रक्तपात के ही राजा हम्मीर देव मेवाड़ के शासक बन बैठे- पहले जो लोग कहा करते थे कि विधवा का विवाह हम्मीर के अमंगल का सूचक है वही पीछे कहने लगे विधवा कभी अमंगल नहीं होती उसे मानवीय सम्मान मिले तो वह किसी भी योग्य जीवन-साथी के कर्तव्यों का पालन कर सकती है।
अपनों से अपनी बात-
ज्ञान यज्ञ द्वारा सर्वतोमुखी जन जागरण का अपना महान अभियान अगले दिनों कुछ चमत्कारी उपलब्धियाँ उत्पन्न करके हिंसा मानवीय आस्थाओं और अभिरुचियों को परिवर्तित करने का काम कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं। पिछली शताब्दियों में रूसो ने प्रजातंत्र के तथा मार्क्स ने साम्यवाद के सिद्धाँतों की उपयोगिता को जिस प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया और इस विचारणा से प्रभावित लोगों से जिस उत्साह एवं पुरुषार्थ के साथ आगे कदम बढ़ाया उसका परिणाम अद्भुत निकला। आज इन दो मनीषियों द्वारा प्रतिपादित आदर्शों के आधार पर संसार के तीन चौथाई भाग पर शासन चल रहा है। विचारों की शक्ति अति प्रबल है। यदि वे बुद्धि संगत एवं उपयोगिता की कसौटी पर खरे सिद्ध हो सके तो निश्चय ही उनका स्वागत होगा। फिर यदि उस विचारणा को सुव्यवस्थित संगठन द्वारा व्यवस्थित कार्य पद्धति द्वारा व्यापक बनाने का सुदृढ़ कार्य किया जाय तो कोई कारण नहीं कि वे अपने प्रकाश से विश्व के बड़े भाग को प्रकाशित न करें।
युग-निर्माण योजना द्वारा प्रतिपादित जन मानस में उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की प्रतिष्ठापना के लिये जो सशक्त अभियान चलाया जा रहा है, उसने पिछले दिनों मजबूती के साथ जड़ जमाई है। अपने परिवार की 4 हजार शाखाओं से संबद्ध लाखों सदस्य जिस उत्साह के साथ विचार क्राँति का पथ प्रशस्त करने में लग गये हैं और सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक शत-सूत्री योजना की जो प्रवृत्तियाँ चल पड़ी हैं उन्हें देखते हुए हर कोई विश्वास कर सकता है कि अगले दिनों अपना परिवार जन जागरण एवं भावनात्मक नव-निर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेगा। धरती पर स्वर्ग अवतरण के अपने स्वप्न साकार होकर रहेंगे।
हम लोग जिस तत्परता के साथ नव युग-निर्माण की दिशा में आँधी-तूफान की तरह गतिशील हो रहे हैं उसके संभावित परिणाम की प्रकाशवान् आशा सर्वत्र बंध चली है। इसलिए जिनका हमारी ही तरह विश्व शाँति एवं मानवीय प्रगति के प्रति विश्वास है वे अनेक प्रश्न पूछते और अनेक परामर्श देते रहते हैं। उचित भी है। उत्तरदायित्व संभालने वालों से अधिक सही और अधिक ठोस काम किये जाने की आशा की ही जानी चाहिए। इस दृष्टि से अपने उद्देश्यों का परिपूर्ण समर्थन करते हुए भी कार्य-क्रमों में सुधार एवं परिवर्तन करने के अनेक परामर्श दिये जाते रहते हैं और उनको अति कृतज्ञता एवं आदर के साथ संपन्न भी करते हैं और उन पर विचार भी।
ऐसे ही सुझावों में एक महत्वपूर्ण एवं वजनदार सुझाव यह भी है कि ‘हम राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश क्यों नहीं करते? और राजतंत्र को अपने अनुकूल बनाकर सरकारी स्तर पर वह सब सहज ही क्यों नहीं करा लेते जिसके लिए इन दिनों इतनी अधिक माथा पच्ची कर रहे हैं। “इस सुझाव के पीछे अपनी और अपने संगठन की वह क्षमता और व्यापकता है जिसका सही मूल्याँकन कर सकने वाले लोग अनुभव करते हैं कि इन दिनों अपना तंत्र- किसी भी राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक तंत्र से कम प्रखर एवं कम सशक्त नहीं है।
वर्तमान युग में राजनीति की सर्वोपरि सत्ता और महत्ता स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। यह स्वीकार करने में भी हमें कोई अड़चन नहीं है कि सरकारें यदि सही कदम उठा सके , सूझ-बूझ से काम लें और अपने क्रियातंत्र को सुव्यवस्थित रख सकने में समर्थ हों तो वे अपने क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकती हैं। जापान, चीन, रूस, जर्मनी, अरब, इजराइल आदि ने चंद दिनों के भीतर अपने ढंग से- अपनी योजनानुसार- अभीष्ट परिवर्तन के प्रकार प्रस्तुत कर लिये। इसके आश्चर्यजनक उदाहरण सामने हैं। हम उन लोगों में से नहीं हैं जो वास्तविकता की ओर से जान-बूझकर आँखें बंद किये रहें। धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं यह दूसरों ने भले कहा हो हमने यह शब्द कभी भी नहीं कहे हैं। इतिहास ने हमें सिखाया है कि धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं वरन् घनिष्ठता एवं परिपोषण का साधन तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।
इतिहास साक्षी है कि जनता के सुख सौभाग्य में अभिवृद्धि का आधार दोनों के बीच साधन सहयोग ही प्रमुख तथ्य रहा है। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन और रघुवंशियों के शासन क्रम ने द्वापर में उस सतयुग की स्थापना की थी जिसे हम रामराज्य के नाम से आदर के साथ याद करते हैं। चाणक्य के मार्गदर्शन से गुप्त साम्राज्य पनपा, फैला और परिपुष्ट हुआ था। पाण्डवों का मार्ग-दर्शन कृष्ण ने किया था और दुशासन का उन्मूलन कर सुशासन की स्थापना की थी। राजा मान्धाता का सहयोग शंकराचार्य की दिग्विजय का महत्वपूर्ण आधार था। भगवान बुद्ध के प्रभाव से सम्राट अशोक का बदलना और अशोक की सत्ता के सहयोग से बुद्ध धर्म का समस्त एशिया में फैल जाना एक ऐसी सच्चाई है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। समर्थ गुरु रामदास जानते थे कि धर्म प्रवचनों से ही काम चलने वाला नहीं है सुशासन की स्थापना भी आवश्यक है। अस्तु उन्होंने शिवाजी जैसे अपने प्रधान शिष्य को इस मार्ग पर अग्रसर किया। अग्रसर ही नहीं किया, अपने स्थापित 700 महावीर देवालयों के माध्यम से आवश्यक रसद पैसा तथा सैनिक जुटाने की भी व्यवस्था की, शिवाजी उसी सहयोग के बल पर स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत कर सके। गुरु नानक का पंथ एक प्रकार से स्वाधीनता के सैनिकों में ही बदल गया। उसने ‘एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला’ का आदर्श प्रस्तुत करके यह बता दिया कि राजतंत्र और धर्मतंत्र को विरुद्ध दिशाओं में नहीं चलने देना चाहिए वरन् उनके कदम एक ही दिशा में उठने की आवश्यकता हर कीमत पर पूरी की जानी चाहिए। बन्दा-वैरागी ने सच्चे अध्यात्मवादी का उदाहरण प्रस्तुत किया और समाधि साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति को सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में उत्सर्ग कर दिया।
भावना का धर्म से ही सीधा संबंध जुड़ता है, पर अधर्म के अभिवर्धन के प्रधान कारण दुशासन को बदलने के लिए वे समय-समय पर अवतार धारण करते हैं। कच्छ, मच्छ, वराह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध आदि अवतारों ने कुशासन के विरुद्ध सीधी कमान संभाली। उनकी लीलाओं में इस प्रकार के उन्मूलन एवं परिवर्तन का घटनात्मक क्रम ही प्रधान है। अवतारों ने अन्य चरित्र भी दिखाये होंगे, पर उन्हें जिस प्रमुख प्रयोजन के लिए आना पड़ा वह अधर्म की सत्ता को धर्म स्थापना के उपयुक्त बनाना ही प्रधान कार्य था। अगला निष्कलंक अवतार जो होने जा रहा है उसकी दृष्टि भी सुशासन की स्थापना पर ही होगी।
द्रोणाचार्य ने इस सचाई को दो टूक स्पष्ट कर दिया है वे कहते थे-
अग्रतः चतुरो वेदा पृष्ठतः सशरं धनु।
इदं ब्राह्मंइदं क्षात्र शास्त्रादपि शरादपि॥
-महाभारत
हम वेदों को आगे रखकर लोगों को समझाने और सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते हैं। साथ ही पीठ पर धनुष बाण भी रखते हैं। यह धर्म शिक्षा ‘ब्राह्म’ है। और यह शस्त्र धारण ‘क्षात्रं’ है। दोनों शक्तियों के समन्वय से ही समस्यायें सुलझती हैं।
उपरोक्त सत्य का प्रतिपादन करने वाले तथ्यों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। अभी कल परसों महात्मा गाँधी जिन्हें इस युग का धर्म पुरुष कह सकते हैं। अपनी जीवन साधना से राजनीति का प्रधान समन्वय करके यह आदर्श प्रस्तुत करते रहे हैं कि धर्म और राजनीति एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं। लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे धर्मवेत्ता मनीषियों ने अपनी धर्म साधना के साथ राजनीति को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखा। इससे उनकी धार्मिकता घटी नहीं वरन् प्रखर एवं समुज्ज्वल ही होती चली गई।
शासन आज जिस तरह जीवन के हर पक्ष में प्रवेश करता चला जाता है और धीरे-धीरे व्यक्ति जिस तरह राज्य की कठपुतली बनने जा रहा है, उस बारीकी को समझने वाला कोई सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति राजनीति से सर्वदा पृथक धर्म की कल्पना भी नहीं कर सकता। जो धर्म को राजनीति से अलग होने की बात कहते या समझते हैं उन्हें नितान्त भोला ही कहा जा सकता है। प्रतिकूल राजनीति में धर्म को जीवित रहना भी संभव नहीं। रूस, चीन आदि साम्यवादी देशों की धार्मिकता की कैसी दुर्गति हुई यह सबके सामने है। तिब्बत का धर्म शासन करने वाले नागाओं को राजनैतिक प्रतिकूलता ने कहाँ से लाकर कहाँ पटक दिया। राज्याश्रय पाकर ईसाई चर्च कितनी प्रगति कर रहा है और मध्य युग में राज्याश्रय ने इस्लाम धर्म के विकसित होने में कितनी सहायता की। इन तथ्यों से कोई मूर्ख ही आँखें मींच सकता है।
इन तथ्यों को जानते हुए भी हम और हमारा संगठन राजनीति में क्यों प्रवेश नहीं करते, इसके संबंध में लोग हमें उलाहना देते और भूल सुधारने के लिये आग्रह करते हैं। वे जानते हैं कि हम लोग शासन तंत्र में प्रवेश करने में बहुत दूर तक सफल हो सकते हैं। इसलिए उनकी आतुरता आदि भी अधिक रहती है। कितनी ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपनी ओर आकर्षित करने और प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में सम्मिलित होने के लिए डोरे डाले जाते रहते हैं और इसके बदले वे हमें किस प्रकार संतुष्ट कर सकते हैं, इसकी पूछ-ताछ करते रहते हैं। यह सिलसिला मुद्दों से चलता रहा है और जब तक हम विदाई नहीं ले लेते तब तक चलता ही रहा और हो सकता है कि यह परिवार वर्तमान क्रम से आगे बढ़ता रहा और सशक्त बनता रहा तो इस प्रकार के दबाव उस पर आगे भी पड़ते रहें।
इस संदर्भ में हमारा मस्तिष्क बहुत ही साफ है। शीशे की तरह उसमें पूर्ण स्वच्छता है। बहुत चिन्तन और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे हैं और बिना लाग−लपेट छिपाव व दुराव के अपनी स्वतंत्र नीति निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं। हम सीधे राजनीति में प्रवेश नहीं करेंगे वरन् राजनीति को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।
भारत की वर्तमान राजनैतिक रीति नीतियों- शासन की गतिविधियों और तंत्र की कार्य प्रणाली पर आमतौर से सभी को असंतोष है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 22 वर्षों की लंबी अवधि में जो हो सकता था वह नहीं हुआ। तथाकथित आर्थिक प्रगति की बात भी विदेशी ऋण और युद्ध स्थिति तथा बढ़ती हुई बेकारी गरीबी को देखते हुए खोखली है। नैतिक स्तर ऊपर से नीचे तक बुरी तरह गिरा है। विद्वेष और अपराधों की प्रवृत्ति बहुत पनपी है। गरीब अधिक गरीब बने हैं और अमीर अधिक अमीर। शिक्षा की वृद्धि के साथ-साथ जो सत्प्रवृत्तियाँ बढ़नी चाहिए थीं इस दिशा में घोर निराशा ही उत्पन्न हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में देश की शाख बढ़ी नहीं घटी है। मित्रों की संख्या घटती और शत्रुओं की बढ़ती जा रही है। शासन में कामचोरी और रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति बहुत आगे बढ़ गई है। और भी बहुत कुछ ऐसा ही हुआ है जो आँखों के आगे प्रकाश नहीं अंधेरा ही उत्पन्न करता है। अपनी इस राजनैतिक एवं प्रशासकीय असफलता पर हम में से हर कोई चिन्तित और दुःखी है। स्वयं शासक वर्ग भी समय-समय पर अपनी इन असफलताओं को स्वीकार करते रहते हैं। जिन्हें अधिक क्षोभ है वे उदाहरण प्रस्तुत करके शासन कर्त्ताओं की कटु शब्दों में भर्त्सना करते सुने जाते हैं और अमुक पार्टी को हटाकर अमुक पार्टी के हाथ में शासन सौंपने की बात का प्रतिपादन करते हैं।
हमारे चिन्तन की दिशा अलग है, हम अधिक बारीकी से सोचते हैं। शासन की असफलता से हम दुःखी हैं। हमें बहुत खेद है कि विगत 22 वर्षों में जितना बढ़ा जा सकता था उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो सो बात नहीं पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि कम से हजार वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से भी बड़े न हो सकेंगे। गाँधी जी के धर्म राज्य, रामराज्य और विश्व मंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।
इन परिस्थितियों के लिए किसी राजनेता या पार्टी को दोष देकर अपना जी हलका नहीं कर सकते वरन् गंभीरता से उन कारणों को तलाश करते हैं जिनके कारण यह विकृतियाँ उत्पन्न हुई हैं। रोग का कारण प्रतीत होने पर ही उसका उपचार संभव है। दूसरों की तरह उथला नहीं अधिक गंभीर और दूरदर्शी होने की ही किसी दार्शनिक से आशा की जानी चाहिए। देखना यह होगा कि यह सब क्यों हो रहा है? अपना एक हजार वर्ष का इतिहास देशी और विदेशी सामन्तवाद द्वारा प्रजा के उत्पीड़न का है। इस उत्पीड़न को सरल बनाये रखने के लिए जनता का मनोबल गिरा और बिखरा जाना जरूरी था सो तत्कालीन दार्शनिकों द्वारा ऐसी विचारधाराओं का प्रचलन किया गया जो उपरोक्त प्रयोजन पूरा कर सकें। शासन की दृष्टि से प्रजा ने नृशंसता पाई। और दर्शन की दृष्टि से भ्राँति ‘ब्राह्म’ और ‘क्षात्र’ दोनों ही अवाँछनीय स्वार्थों की सिद्धि में लगे थे। प्रजा इस चक्की में भौतिक और आत्मिक दृष्टि से निरन्तर पद दलित होती रही। यही एक तथ्य है जिसने भारत जैसी उत्कृष्ट परम्पराओं वाली प्रजा पर हजार वर्ष कितनी लंबी अवधि तक पद दलित रहने का कलंक लगाया।
इन विभिन्न परिस्थितियों से देश को उबारने के लिए छुट-पुट प्रयत्न बहुत पहले से चल रहे थे पर उन्हें सुसंगठित और सुसंचालित होने का श्रेय गाँधी जी के नेतृत्व को मिला। वे असली कारण जानते थे और प्रयत्नशील थे कि रचनात्मक कार्यों और बौद्धिक जागरण स्वतंत्र चिन्तन के माध्यम से प्रजा के मनोबल, चरित्र स्तर, स्वाभिमान एवं शौर्य को जमाया बढ़ाया जाय। स्वतंत्रता संग्राम वे धीरे-धीरे चला रहे थे। क्राँतिकारियों से उनके मतभेद का मूल कारण यह था कि वे चाहते थे स्वराज्य धीरे-धीरे उस क्रम से आये जिस क्रम से देश उसे संभालने योग्य प्रतिभा अपने में पैदा कर ले। स्वतंत्रता संग्राम के साथ चर्खा, खादी, हरिजन सेवा, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, सफाई जैसी प्रवृत्तियों को जोड़ देना यों बहुत अटपटा लगता है। असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह की दार्शनिकता कितनी ही ऊंची क्यों न हो पर उसका व्यावहारिक पक्ष यह था कि इन सरलतम उपायों द्वारा जनता अपनी मूल चेतना विकसित करे और स्वराज्य धारण कर सकने में समर्थ हो जाय। वे जानते थे कि विभूति प्राप्त करने से अधिक कठिन उसे पचाना होता है। शक्ति की असली परीक्षा कोई सफलता प्राप्त कर लेना भर नहीं है वरन् उसके सदुपयोग से ही प्राप्ति कर्ता का गौरव आँका जाता है। भागीरथी गंगा अवतरण की पृष्ठभूमि बनाने में सफल हो गये थे पर उस धारा को सुव्यवस्थित रूप में प्रवाहित करने के लिए शंकर जी को अपनी जटायें फैलानी पड़ीं। यही सर्वत्र होता है। गाँधी जी के मन में स्वराज्य प्राप्त करने की जल्दी नहीं थी वे जनता को उस आन्दोलन महायज्ञ से प्रबुद्ध, सतर्क और सक्षम बना रहे थे।
क्राँतिकारी कहते थे कि बिना शस्त्र धारण किये और मजबूरी प्रस्तुत किये बिना अंगरेज जाने वाले नहीं हैं। बात उन्हीं की सच निकली। सन 42 में क्राँतिकारी तोड़-फोड़ ने सिद्ध कर दिया कि असहयोग सत्याग्रह नहीं शस्त्र धारण ही वर्तमान स्थिति में राज क्राँतियों की अनिवार्य आवश्यकता है। इस तथ्य को गाँधी जी भी जानते थे। वे स्वराज्य की उतावली में न थे जनता की उन दुर्बलताओं को हटाने में लगे थे जो पिछले हजार वर्ष के अज्ञानान्धकार युग में पीढ़ी दर पीढ़ी के हिसाब से चलते रहने पर उसके स्वभाव में सम्मिलित हो गई थी। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने जब भारत को स्वराज्य दिला ही दिया था तो वे इस असामयिक उपलब्धियों से जितने प्रसन्न थे उतने ही चिन्तित भी। जन जागरण का प्रयोजन पूरा नहीं हो सका था इसलिए उन्हें चिन्ता थी कि इस गंगावतरण का सुसंचालन कैसे होगा? उन दिनों उन्होंने एक अति महत्वपूर्ण सुझाव रखा था कि काँग्रेस लोक संस्था का रूप धारण करे और जन जागरण के नितान्त आवश्यक कार्य में ही जुटी रहे। राज तंत्र चलाने के लिये एक उस स्तर के लोगों की पिछली पंक्ति बना दी जाय। प्रजा पर प्रभाव रख कर काँग्रेस, राजनेताओं की नियुक्ति एवं उनकी रीति-नीति पर नियंत्रण करे, पर स्वयं उससे पृथक रहकर वह जनमानस के परिष्कार का मूल प्रयोजन पूरा करे जो किसी राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति का यहाँ तक कि सुशासन का भी मूल आधार है।
उन दिनों परिस्थितियों विचित्र थीं। काँग्रेस नेता गाँधी जी से सहमत न हो सके। सारी शक्ति राजतंत्र को संभालने में लग गई। रचनात्मक कार्यों में विश्वास करने वाले लोक सेवी भी उसी तंत्र में खप गये। सबका ध्यान सत्ता की ओर चला गया। सत्ता एक नशा है उसका चस्का जिसे लगा कि फिर वह उसी घाट का हो लिया। काँग्रेस और उसका परिवार उसी दिशा में चल पड़ा। जन जागरण के लिए जिन रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य-क्रमों की जरूरत थी वे या तो विस्मृत हो गये या उनकी लकीर पिटती रही। अन्य छोटी बड़ी राजनैतिक एवं सामाजिक स्तर की संस्थाओं का भी यही हुआ। उनने भी अपनी बड़ी बहिन का अनुकरण किया। अपना बाहरी जामा वे कुछ भी बनाये रही हों भीतर ही भीतर सत्ता संघर्ष के लिए चल रही विभिन्न पार्टियों की प्रतिद्वन्द्विता में ही वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शामिल थीं। ध्यान बंटा सो बंटा। पिछले 22 वर्षों में जिस बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक क्राँति की जरूरत थी, शिक्षा और कला के महान माध्यमों को सृजनात्मक दिशा में लगाने के लिए उन्हें हथियाया या अपनाया जाना चाहिए था। उस दिशा में किसी ने कुछ नहीं किया। इस भूल को हम ईमानदारी से स्वीकार कर लें तो कुछ हर्ज नहीं है।
दिशा भूलने का-जनमानस में हजार वर्ष की गुलामी की कुसंस्कारी प्रक्रिया हटाने की उपेक्षा करने का- जो परिणाम होना चाहिए था वह सामने है। उन परिस्थितियों से उत्कृष्ट राज नेतृत्व एवं आदर्श शासन तंत्र की आशा रखना व्यर्थ है। राजनेताओं का चुनाव होता है। चुनावों द्वारा प्रतिनिधि चुने जाते हैं और उनके चुनाव से सरकारें बनती हैं। जनता का जो स्तर है उसमें चुनाव जीतने के लिए पैसे को पानी की तरह बहाने की- जाति-पाँति के नाम पर लोगों को बरगलाने की- व्यक्तिगत या स्थानीय लाभ दिलाने के सब्जबाग दिखाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। जो यह सब तिकड़म में भिड़ाने में समर्थ न हों उसका चुनाव जितना कठिन है। जनता का स्तर ही ऐसा है कि वह वोट का मूल्य और उसके दूरगामी परिणामों को अभी समझ ही नहीं पाई। झाँसे पट्टी और वास्तविकता का अन्तर करना उसे आया नहीं। इसलिए चुनाव में वे लोग जीत न सके जो रामराज्य स्थापित कर सकने में सचमुच समर्थ हो सकते थे। जनता ने अपने स्तर के विधायक चुने। उन विधायकों ने अपने स्तर की सरकारें बनाईं उन सरकारों के संचालक ने वही किया जो जनता कर रही है या कर सकती है। जड़ के आधार पर पत्ते बनते हैं। धतूरे के बीज से उगे पौधे पर शहतूत कहाँ से लगें?
राज्य शासन के संचालन में जो व्यक्ति काम करते हैं उनकी मनोभूमि एवं कार्यशैली ही शासन तंत्र के संचालन का स्वरूप निखारती है। कानून कितने ही अच्छे क्यों न हों, नीतियाँ कितनी ही निर्दोष क्यों न हों, योजनायें कितनी ही बढ़िया क्यों न हों, उनके संचालन का भार जिस मशीनरी पर है उसके पुर्जे यदि घटिया होंगे तो सारा गुड़ गोबर होता रहेगा। सरकार कई योजनायें बनाती और चलाती है पर उसका स्वरूप जनता तक पहुँचते पहुँचते विकृत हो जाता है। क्योंकि जिनके हाथ में उस प्रक्रिया के संचालन का भार है वे उतने शुद्ध नहीं होंगे जितने होने चाहिएं। अपराधों के रोकने और अपराधियों को पकड़ने की जिम्मेदारी जिस मशीन पर है यदि वह ऊंचे स्तर की हो और भावनापूर्वक काम करे तो निःसंदेह अपराधों का उन्मूलन हो सकता है। उपयोगी कार्यों के लिये ऋण का अनुदान बाँटने वाली मशीन यदि स्वच्छ हो तो वह धन खुर्द-बुर्द न होकर सचमुच सम्पत्ति और सुविधा बढ़ाने में समर्थ हो सकता है। शिक्षा देने वाली मशीन यदि भावनाओं से ओत-प्रोत हो तो छात्रों को ढालने में उन व्यक्तियों का जादू आश्चर्यजनक ढलाई का प्रतिफल प्रस्तुत कर सकता है। सरकारी कानूनों या योजनाओं में उतना दोष नहीं है जितना कि प्रस्तुत प्रक्रिया का संचालन करने वाली मशीनरी की आदर्शवादी भावनाओं का न्यूनतम रूप है।
प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह शासन संचालन करने वाली मशीन कैसे उत्कृष्ट बने? तो फिर बात लौटकर वहीं आ गई। सरकारी कर्मचारी आकाश से नहीं उतरते। वे जनता के ही बालक होते हैं। उनने अपने घर परिवार से संबद्ध समाज में जो कुछ देखा, सुना, समझा, अनुभव किया है उसी के आधार पर उनका मानसिक स्तर एवं चरित्र ढला है। नौकरी पाते ही वे उन सारे संस्कारों को भुलाकर देवता बन जावें यह आशा करना व्यर्थ है। उसी प्रकार पैसे लेकर वोट बेचने वाली, जाति-पाँति का पक्षपात करने वाली, व्यक्तिगत या क्षेत्रीय लाभ के प्रलोभनों से आकर्षित होने वाली अदूरदर्शी जनता से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह उन्हें चुनेगी जो सुयोग्य एवं आदर्शवादी तो हैं पर पैसा लुटाने या बहकने वाले हथकंडे अपनाने में समर्थ नहीं। यह एक सच्चाई है कि प्रजातंत्र में जनता के स्तर की ही सरकार बनती है और उसी स्तर की सरकारी मशीन चलती है।
पार्टियों की सत्ता बदले, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। पिछले तीन चार वर्षों में काँग्रेस का एकाधिकार नहीं रहा। कई पार्टियों की अलग या सम्मिलित सरकारें बनीं उनने भी अलग आदर्श प्रस्तुत नहीं किया, जिस कीचड़ में काँग्रेस का छकड़ घिसट रहा था उसी में वे खड़खड़ियाँ भी धंस गईं। सच्चाई यह है कि इन परिस्थितियों में कुछ हो ही नहीं सकता। प्रबुद्ध लोकमत जागृत हुए बिना- आया राम गया राम- की हथकेरी रुक ही नहीं सकती। अल्पमत को बहुमत में और बहुमत को अल्पमत में बदलने के लिए प्रलोभन और आतंक का वर्तमान दौर अनन्त काल तक चलता रहेगा यदि विधायकों को अपनी जनता के रोष एवं अवरोध का भय उत्पन्न न हुआ तो। इसी प्रकार जो भी सरकार सत्ता में आयेगी उसके मंत्री यदि अपने समर्थकों के, अपने क्षेत्र के लिये सरकारी मशीन से काम लेंगे तो उन पुर्जों से अपने स्वार्थ साधने की भी छूट देनी होगी। फिर प्रशासन शुद्ध कैसे होगा?
मूल समस्या यही है। किस पार्टी की सरकार बने, वह किन योजनाओं को कार्यान्वित करे, यह प्रश्न कम महत्व के हैं। अधिक महत्व के प्रश्न यह हैं कि चुनाव बिना खर्च कराये, उपयुक्त व्यक्तियों को चुनने का जन स्तर कैसे बने? और सरकारी मशीन में पुर्जे बनने वाले कर्मचारी घर से ही आदर्शवादी एवं भावना सम्पन्न बन कर वहाँ तक कैसे पहुँचें? यह समस्या पर्दे के पीछे दीखती है पर यही सबसे महत्वपूर्ण। इसे हल किये बिना तथाकथित प्रगति में खोखलापन ही बना रहेगा। प्रजातंत्र की जड़ जनता है। जहाँ जनता का स्तर ऊंचा होगा वहीं प्रजातंत्र सफल हो सकेगा। हमें यदि प्रजा तंत्र पसंद है तो उसकी सफलता की अनिवार्य शर्त जनता का भावनात्मक एवं चारित्रिक स्तर भी ऊंचा उठाना ही पड़ेगा। अन्यथा शिकायतें करते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा। स्वराज्य प्राप्ति के समय गाँधी जी इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये चिंतित थे और जोर दे रहे थे कि काँग्रेस, शासन में न जाया जाय वरन् लोक मानस का निर्माण करने के अधूरे किन्तु अति महत्वपूर्ण कार्य को संभालने में ही दत्त चित होकर जुटी रहे।
तथ्य- तथ्य ही रहेगा। आवश्यकता- आवश्यकता ही रहेगी। एक उसे पूरा नहीं करता तो दूसरे को अपना कंधा लगाना चाहिए। यही रचनात्मक तरीका है। स्वतंत्रता संग्राम में 12 वर्ष तक निरन्तर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में अड़े रहने के उपरान्त उस संग्राम की पूरक परिधियों के महत्व को हम समझते रहेंगे। हमारा विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति, सामाजिक क्राँति एवं नैतिक क्राँति की त्रिवेणी बहाये बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किये बिना हमारे पाप-ताप न कटेंगे। राजनैतिक स्वतंत्रता का लाभ तभी प्राप्त किया जा सकेगा जब उसके साथ ही बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक क्षेत्रों के कालनेमि की तरह भ्रमे हुए पराधीनता पाश से मुक्त कराया जा सके। स्वतंत्रता का एक चरण अभी प्राप्त हुआ तीन मोर्चों पर लड़ा जाना अभी भी शेष है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम उसी प्रयत्न में निरन्तर प्रयत्नशील रहे हैं। दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राज मुकुट पहन लिये पर अपने लिए आजीवन उस चिन्तन लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। राष्ट्र की बात ही क्यों सोचें, विश्व कल्याण का मार्ग भी यही है। जन-जागरण और लोक मानस में उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का बीजाँकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग है। हम इसी दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ रहे हैं और जहाँ तक हमारा प्रभाव क्षेत्र है उसे उसी दिशा में घसीटते लिये चल रहे हैं।
हम जानते हैं कि जन मानस के अंतरंग का स्पर्श करने और कोमल भावनाओं को सम्वेदनशील बनाने की क्षमता राजतंत्र में नहीं है। उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति दूसरी है। कूटनीति राजनीति का पर्यायवाची बन गया है। उस स्तर में जो कुछ होगा लोग उसमें अकारण ही किसी कूटनीति या दुरभिसन्धि की गंध सूंघेंगे। इसलिये राजतंत्र के द्वारा इस प्रकार के प्रयत्न या प्रयोग जब कभी हुए हैं उन्हें असफलता ही हाथ लगी है। यह क्षेत्र वस्तुतः धर्म एवं दर्शन का है। बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक क्राँति के लिए विचारणा का स्तर बहुत गहराई से बदलना होगा। उथला बदलाव कोई स्थिर परिणाम उत्पन्न न करेगा। इस प्रयोजन की पूर्ति से केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता है। राजनैतिक स्तर पर बाल-विवाह, छुआ-छूत निवारण, दहेज उन्मूलन, व्यभिचार विरोधी कानून बने हुए हैं। पर उनको कितना मान मिला और कितना परिणाम निकला यह सबके सामने है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र है। भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता है। प्रजातंत्र हटाकर अधिनायकवाद आना है तो आतंक के आधार पर विचार परिवर्तन भी संभव है पर वह प्रयोग महंगा है। व्यक्ति की विचार स्वतंत्रता अपहृत हो जाने पर वह एक मशीन मात्र रह जाता है और साँस्कृतिक प्रगति की जिस महान प्रक्रिया ने मानव जाति को यहाँ तक पहुँचाया उसका द्वार ही बन्द हो जाता है। हम प्रजातंत्र पसंद करते हैं। उसमें बहुत खूबियाँ और संभावनायें सन्निहित हैं। फिर प्रजातंत्र की परिधि में जन मानस का निर्माण करना धर्म एवं अध्यात्म का ही क्षेत्र रहता है।
हम यही कर रहे हैं। धर्म और अध्यात्म को हमने मानव जाति को समग्र प्रगति के लिये नियोजित किया है। पिछले दिनों उसमें जो अवाँछनीयता घुस पड़ी थी उसे सुधारा है। धर्म-मंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता है हमने उसे नई दिशा दी है और उसकी मूल प्रवृत्ति प्रगतिशीलता को उभारा है। धार्मिक प्रथा परम्पराओं, रीति−रिवाजों, कर्मकाण्डों और मान्यताओं के बाह्य स्वरूप को यथावत रखते हुए उनकी दिशा और प्रवृत्ति में क्राँतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किया है यही कारण है कि जिस क्षेत्र की ओर से नाक-भौं सिकोड़ी जाती थी और निराशाजनक माना जाता था अब उसे मानवीय प्रगति की निर्णायक भूमिका संपादन करने में समर्थ माना जाने लगा है। पिछले दिनों कुछ क्षुब्ध वर्ग तोड़-फोड़ में लग गये थे। वे दीर्घकालीन परम्पराओं को उखाड़ कर आमूल चूल परिवर्तन लाना चाहते थे। वे भूल जाते थे कि 80 प्रतिशत देहातों में बसे हुए और 77 फीसदी अशिक्षित देश के लिये धर्म परम्पराओं में क्राँतिकारी तोड़-फोड़ सरल नहीं है। वे प्रयत्न भी लगभग असफल हो गये। अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी-तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्म-प्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर-फेर किये बिना उनके मूल प्रयोजन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया है।
इस प्रकार परोक्ष रीति से हम राजनीति में भाग ले रहे हैं और राजनैतिक शुद्धता एवं प्रखरता की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं प्रत्यक्ष राजनीति में बहुत लोग घुसे पड़े हैं वहाँ इतनी भीड़ है जिसे बढ़ाया नहीं घटाया जाना चाहिए। प्रजातंत्र की मूल शक्ति जनता में निर्धारित रहती है। जनता अपना बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक स्तर ऊंचा उठाये बिना ऊंचे स्तर का शासन एवं राज नेतृत्व प्राप्त कर नहीं सकेगी।
हम राजनीति से अलग नहीं हैं, न उसका मूल्य कम कर रहे हैं बात इतनी भर है कि हम जड़ में खाद, पानी लगाने वाले माली बने रहना चाहते हैं। फूल और फल का व्यापार दूसरे लोग करें इसमें न हमें कोई आपत्ति है और न ईर्ष्या। हम अनुभव करते हैं उथले राजनीतिज्ञों की अपेक्षा हम अधिक ठोस और अधिक महत्वपूर्ण राजनीति अपना रहे हैं और हमारे प्रयत्नों का फल किसी भी राजनैतिक पार्टी या उसकी सरकार की अपेक्षा सत्परिणाम उत्पन्न करेगा। गाँधी जी का जन मानस निर्माण का काम अधूरा रह गया, हमें उनके शेष काम को पूरा करने वाले कुली, मजदूर की तरह जुटे रहना मंजूर है। दूसरे लोग उनके तप का प्रतिफल चखे-चखते रहें। अपने मुँह से उसके लिए लार टपकने वाली नहीं है। हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की संभावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव संपर्क में आवेगा उसे इसी दिशा में प्रेरित, आकर्षित करते रहेंगे।
ज्ञान यज्ञ करना है।
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समिधा के सम्बल से, सत्य सिद्धि संज्ञा से,
हिल-मिल बुहारना है, पंथ के बबूल को।
सत्पथ में बढ़ना है,
तम-गिरि से लड़ना है,
आत्म-शक्ति मंत्र जगा-
शाँति-मूर्ति गढ़ना है।
जन हित में जीना है, जन हित में मरना है,
माथे पर मलना है, सेवा की धूल को।
दर्द भरे जंगल में,
दुनिया की हल-चल में,
ज्ञान-यज्ञ करना है-
जीवन की मंजिल में।
आँधी में, पानी में, युग के तूफानों में,
मुखरित नित करना है, श्रद्धा के फल को।
मत-दर्पण मैला है,
अंधियारा फैला है,
माया की नगरी में-
प्राण-पिक अकेला है।
संभल-संभल चलना है, गिर-गिर के उठना है,
पहले सुधारना है, अपनी ही भूल को।
निष्ठा के बागी को,
कुँठा के रागी को,
मुट्ठी में बाँधो तुम-
तम के अनुरागी को।
सोने को, चाँदी को, युग-युग की आँधी को,
करना निर्मूल तुम्हें, पंथ के बबूल को
बाबूलाल जैन ‘जलज’
*समाप्त*