मनुष्य-जीवन एक खेत है, जिसमें कर्म बोये जाते है और उन्हीं के अच्छे-बुरे फल काटे जाते हैं। जो अच्छे कर्म करता है वह अच्छे फल पाता है, बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है। कहावत है- ‘आम बोयेगा वह आम खायेगा, बबूल बोयेगा वह काँटे पायेगा।’ बबूल बोकर जिस तरह आम प्राप्त करना प्रकृति का सत्य नहीं, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई पा लेने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मनुष्य-जीवन में भी इस सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भलाई का फल सुख, शाँति और प्रगति के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता, वैसे ही बुराई का प्रतिफल बुराई न हो-ऐसा आज तक न कभी हुआ, न आगे होगा। इतिहास साक्षी है- कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और उसी तरह कोई भी क्रिया परिणाम रहित नहीं होती। स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टि से सृष्टि का यह मौलिक नियम है कि भाग्य कभी अपने आप नहीं बनते वरन् वह व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखे जाते हैं। अच्छा या बुरा भाग्य सदैव अपने ही कर्म का फल होता है।
व्यक्ति हो, समाज या राष्ट्र हो-वह बुराई से पनपा, यह एक भ्रम है। जीवन हर क्षण का लेखा-जोखा रखता है। यदि कोई यह समझता है कि जाली नोट की तरह नकली सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं और वे चाहे जब बदली जा सकती हैं, तो यह मिथ्या कल्पना है। जल कीचड़ से बहेगा, वह दुर्गन्धरहित नहीं होगा-जल होने का भ्रम उत्पन्न करके भी वह पेय नहीं बन सकता। उसी तरह धोखे की असफलतायें अन्ततः पतन और अपयश का ही कारण बनती हैं। अन्त तक साथ देने वाली सफलता भलाई की है। उसी से मनुष्य का इहलोक और परलोक सुधरता है। कर्मफल तो अकाट्य है।
-स्वामी विवेकानन्द
‘देव-सेना का सञ्चालन एक मनुष्य को सौंपकर हमें अपयश का पात्र न बनायें देवराज ! क्या सम्पूर्ण देवलोक में एक भी देवता ऐसा नहीं रहा, जो देव-सेना का सेनापतित्व कर सके ? क्या वस्तुतः हमें एक मनुष्य की अधीनता स्वीकार करनी ही पड़ेगी ?, देवराज इन्द्र के सामने खड़े सहस्रों देवताओं ने एक स्वर से प्रश्न किया और लज्जावश अपने शीश नीचे झुका लिये।
‘हम विवश हैं देवताओं !’ इन्द्र आहत वाणी में बोले-प्रजापति ब्रह्मा की ऐसी ही इच्छा है। उनका कथन है कि असंयम में डूबे देवगण अपनी सामर्थ्य जब नष्ट कर डालते हैं तब उनकी रक्षा भी कोई मनुष्य ही करता है। महाराज मुचकुंद यद्यपि मनुष्य हैं, पर संयम और पराक्रम में उन्होंने देवताओं को भी पीछे छोड़ दिया है। इसलिये आज सम्पूर्ण पृथ्वी और देवलोक में उनके समान प्रतापी एवं बलशाली और कोई दूसरा नहीं रहा। प्रजापति का कथन है कि संयमी और सदाचारी व्यक्ति मनुष्य तो क्या, देव-दनुज सभी को परास्त कर सकता है। अतएव हम विवश हैं, उनकी आज्ञा शिरोधार्य करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी तो नहीं रहा।’
दूसरे दिन युद्ध के लिये देव-वाहिनियाँ चलीं, तब उनका संचालन महाराज मुचुकुन्द कर रहे थे। संयम और तपश्चर्या का अपूर्व तेज उनके मुख-मण्डल पर चमक रहा था। मनुष्य-शरीर होते हुए भी वे साक्षात् देव-प्रतिमा से लग रहे थे। आह्लाद चित्त मुचुकुन्द ने युद्ध की इच्छा से शंख-ध्वनि की, तो सम्पूर्ण दिशायें प्रकम्पित हो उठीं। असुरों के हृदय विदीर्ण करने वाला यह नाद सुनकर देवगण पुलकित हो उठे- उन्हें अपनी विजय का विश्वास हो गया।
एक मास तक घनघोर युद्ध हुआ। असुरों की सेना सम्राट मुचुकुन्द ने ऐसी बिगाड़ डाली जैसे जंगली शूकर हरी-भरी खेती को। बीसियों सेनापति बदल डाले, पर मुचुकुन्द के पराक्रम के आगे असुरों की एक न चली। सारे संसार में तब एक ही स्वर गूँज रहा था-धन्य हो मुचुकुन्द का संयम, इन्द्रिय-विजय और धन्य हो उनका शौर्य, जिसने देव-दनुज दोनों को ही लज्जित करके रख दिया।
इधर अपनी प्रशंसा सुनते-सुनते मुचुकुन्द के मन में अहंकार बढ़ने लगा। प्रजापति ब्रह्मा ने मुचुकुन्द के हृदय में पनप रहे विष-बीज को देखा, तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने पुनः इन्द्र को बुलाया और कहा- ‘तात ! मुचुकुन्द की साधना अधूरी रह गई लगती है। संयमी और पराक्रमी होने के साथ उसे निरहंकारी भी होना चाहिये था। संयम से स्वर्ग जीत जाते हैं, सो अब तुम अविलम्ब स्वामी कार्तिकेय के पास जाओ और उन्हें सैन्य संचालन के लिये राजी कर लो।’
इन्द्र द्वारा उक्त कथन से असहमति होने पर ब्रह्माजी ने मनुष्य में अहंकार से ही उसके पतन होने की बात समझाई। तब देवराज इन्द्र ने विधाता की आज्ञा को स्वीकार किया और वहाँ से चल पड़े। लौटने पर ज्ञात हुआ कि वस्तुतः प्रजापति का अनुमान गलत नहीं था। कल तक केवल युद्ध में ही ध्यान लगाने वाला मुचुकुन्द आज अहंकारवश सुरा और सुन्दरियों की लपेट में आ गया है और अपनी सारी शक्ति उसी में नष्ट कर रहा है। देवराज तत्काल लौटे और भगवान् कार्तिकेय को सैन्य-संचालन के लिये राजी किया। देवताओं की जागरुकता ने उन्हें बचा लिया अन्यथा मुचुकुन्द ने नाव बीच में ही डुबो दी होती।
मुचुकुन्द को असुरों ने बन्दी बनाकर पुनः पृथ्वी पर जा पटका, तब उन्हें अपनी भूल का पता चला। किन्तु अब पश्चाताप से भी तो कुछ नहीं हो सकता था। निराश मुचुकुन्द के पास प्रजापति ब्रह्मा स्वयं पहुँचे और बोले- ‘तात ! तुम्हारी साधना अधूरी रह गई थी, उसी का यह फल है। अब फिर से शक्ति की साधना प्रारम्भ करो, पर देखना इस बार अहंकार भूलकर भी न करना।
“यह संसार नश्वर है महात्मन् ! मुझे तो इसमें कुछ भी सार नहीं दिखाई देता। अब तो बस ईश्वर को पाने की इच्छा है। आप मुझे दीक्षा देकर ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखायें।” यह कहते हुए एक नवयुवक ने आचार्य रामानुज को प्रणाम किया और उनके समीप ही एक ओर बैठ गया।
आचार्य रामानुज ने सीधा-सा प्रश्न किया- ‘तुमने किसी को प्रेम किया है?’ युवक ने उत्तर दिया-’मेरा तो किसी से भी प्रेम नहीं है, मेरा तो संसार से कोई राग ही नहीं है। किससे प्रेम करूं, मैं तो भगवान को पाना चाहता हूँ।’
‘लेकिन तात !’ आचार्य रामानुज बड़ी मीठी वाणी में बोले- ‘भगवान को पाने की तो एक ही कसौटी है- प्रेम। जिसके हृदय में प्रेम नहीं, वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। प्रेम यदि सांसारिक है, तो भी उसे शुद्ध किया जा सकता है। पर जिसने प्रेम की कसक अनुभव नहीं की, वह भला परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकता है ? सो मैं विवश हूँ, तुम्हें दीक्षा कैसे दे सकता हूँ ?’
आचार्य रामानुज जैसे महान् अध्यात्मवादी के मुख से प्रेम को परमेश्वर के समकक्ष ले जाना कोई आश्चर्य नहीं है। वस्तुतः संसार में यदि कुछ अपार्थिव है, तो वह ‘प्रेम’ ही है। यदि प्रेम काम में परिणत नहीं किया जाता, तो मनुष्य धरती पर रहते हुए भी अलौकिक सुख और ईश्वरत्व की अनुभूति कर सकता है, क्योंकि शुद्ध प्रेम ही तो परमेश्वर है।
‘मैं तो प्रेम दीवानी’-कहकर मीरा नाचती थी। वहाँ कोई शरीरधारी तो होता नहीं था, पर उस प्रेम की प्राण-सत्ता में ही उसे परमेश्वर की झाँकी मिलती थी। मीरा की सखियाँ पूछतीं- ‘मीरा ! तू बावरी हुई है। अपना सब कुछ छोड़कर भटक रही है। ऐसा निष्ठुर है तेरा भगवान कि वह तो कभी तेरे पास भी नहीं आता।’ सखी के इतना कहने पर मीरा नाराज होकर कहती- ‘सखी री मेरे संग-संग नाचै गोपाल।’ सखियाँ नहीं जानती थीं, पर मीरा जानती थी कि उस दिव्य प्रेम की डोर से ही वह उस अविनाशी सत्ता को बाँधे हुए है। भगवान उसके प्रेम में ही ओत-प्रोत उसके आस-पास चक्कर काटता था। मीरा जैसे नाचती थी, वह वैसे ही नाचता था।
संसार में प्रेम ही सच्चा अध्यात्म है। प्रेम ही अविनाशी है और प्रेम ही परमार्थ है। धन की आवश्यकता सांसारिक होती है, तो भी स्त्री, पुरुष, मित्र भी स्वार्थ, सहयोग और सेवा-प्राप्ति की अनेक कामनाओं से प्रेरित होकर बनाये जाते हैं। पर प्रेम में तो इन सब प्रतिबन्धों की अवहेलना है। संसार में एक ही तत्व है प्रेम, जिसकी पुष्टि और विकास के लिये मनुष्य देना सीखता है और कितना भी दे डालकर देते रहने की कामना रहता है। अपने लिये न चाह कर किसी और के लिये निरन्तर देते रहने में कितना सुख है, यह तो वही जानता है जो एक प्रेम की परितृप्ति के लिये स्वयं भिखारी और अनाथ तक हो जाने के लिये तैयार रहता है। भगवान को भी ऐसे ही पाया जाता है। सही बात तो यह है कि परमात्मा को प्राप्त करने की आकाङ्क्षा प्रेम सरोवर में सरावोर हो जाने की आकाङ्क्षा का पर्याय भर है।
प्रेम, प्रकृति को जीतने का एक वैज्ञानिक विधान है। महात्मा गाँधी कहा करते थे-जिस प्रकार एक वैज्ञानिक प्राकृतिक नियमों का विभिन्न प्रकार से उपयोग करके अनेक चमत्कार प्रस्तुत कर देता है। उसी प्रकार व्यक्ति प्रेम के सिद्धान्त की भी वैज्ञानिक विधि से प्रयोग की प्रणाली जान ले, तो वह वैज्ञानिक से भी अधिक चमत्कार पैदा कर सकता है। मेरी अपनी अहिंसा की शक्ति प्राकृतिक शक्तियों से कहीं बढ़-चढ़कर सूक्ष्म और कोमल है। प्रेम की भावना ही का तो विकास है। मैं इस सिद्धान्त की गहराई में जितना अधिक प्रवेश करता चला जाता हूँ, मुझे लगता है कि मेरे अन्दर उतनी शक्ति बढ़ती चली जाती है। मैं जीवन और सारे संसार की योजनाओं में उतना ही आह्लाद अनुभव करता हूँ। प्रेम के सिद्धान्त ने मुझे प्राकृतिक रहस्यों को समझने की शक्ति दी है, उससे मुझे अथक और अवर्णनीय शान्ति मिलती है।”
यह एक नया उदाहरण नहीं है। प्रेम के लिये तो प्रकृति का पत्ता-पत्ता प्यासा है। एक ओर अपूर्णता में अशान्ति, तो दूसरी ओर पूर्णता में शान्ति और स्वर्गीय सुख की अनुभूति-यह बताते हैं कि प्रेम में ही स्वर्ग और ईश्वर विराजते हैं। किसी को ईश्वर-प्राप्ति का उपाय खोजना हो, तो उसे एक बार अन्तःकरण में शुद्ध प्रेम जागृत करके देख लेना चाहिए।
भारतीय धर्म और संस्कृति या वेदान्त जिस अद्वैत धर्म का प्रतिपादन करता है, उसको समझने के लिये प्रेम से बढ़कर दूसरा साधन नहीं है। प्रेम अद्वैत का बोध कराता है। यह एक बलिदानी भाव है, उसमें आत्मोत्सर्ग का ही सुख है। किसी से प्रेम है- ऐसा मान लेने भर से तुष्टि तो नहीं हो जाती। उसे देखने से और बार-बार पास आने से सुख तो अपार मिलता है, पर कोई ऐसा सदैव तो नहीं कर सकता। भगवान के प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये भी चन्दन, रोली, पुष्प, अर्घ्य, आचमन का दान देते हैं, तो अपने प्रेमास्पद के लिये भी तो उपहार जुटाने पड़ते हैं। बहुत करके भौतिक वस्तुएँ ही देने जाते हैं, तो उससे इस रस की अनुभूति होने लगती है। देने वाला यह नहीं देखता कि मेरा कुछ गया और पाने वाले को भी यह नहीं हुआ कि वह वस्तु उसे मिल ही जाती। आदान-प्रदान तो अभिव्यक्ति मात्र थे। सच बात तो यह है कि दोनों ही को अपने भीतर के उस रस के पोषण की चिन्ता थी, जो प्रेम के रूप में उदय हुआ। इसी का नाम तो अद्वैत है कि हम सब एक ही अनुभव करें। प्रेमी की सन्तुष्टि भी यही मिलन है, जो वस्तुओं का नहीं, शरीर का भी नहीं- प्रेम-प्रेम की भावना का एकाकार मात्र होना है।
मनुष्य-जीवन की महानतम कसौटी है-प्रेम। बुद्धि की सूक्ष्मता और हृदय की विशालता का परिचय प्राप्त करना हो, तो यह देखना पड़ता है कि व्यक्ति के हृदय में प्रेम की अकुलाहट के लिये भी कोई स्थान है। जिस हृदय में प्रेम का प्रकाश जगमगाता है, वह मनुष्य उत्कृष्ट होता है और उसे ही देवत्व की प्राप्ति का सौभाग्य मिलता है। प्रेम मनुष्य-जीवन की सर्वोदय प्रेरणा है, शेष सब आश्रित और स्वार्थ-प्रेरित भाव हैं। स्वाधीनता और सद्गति दिलाने वाली आन्तरिक प्रेरणा तो प्रेम ही है। इसी से व्यक्तियों के जीवन समृद्ध होते हैं। आत्म-भावना और परमार्थ का विकास होता है। कला-कौशल का वर्तमान विकसित रूप और संसार की रचना प्रेम के वरदान हैं। मानव-जीवन के लक्ष्य-ईश्वर प्राप्ति-की पूर्ति भी प्रेम से ही होती है।
प्रातःकाल होता, तो तालाब अपने पास बह रहे झरने को डराकर कहता- बन्धु! इधर आने की भूल मत करना अन्यथा मुझमें डूबकर मर जाओगे।
बकवास करने की अपेक्षा काम करने में विश्वास रखने वाला झरना कुछ उत्तर देने की अपेक्षा थोड़ा मुस्करा देता और अपनी राह पकड़ता।
तालाब जहाँ था, वहीं सड़ता रहा। पर झरना किनारा काटता हुआ एक दिन तालाब के समीप तक जा पहुँचा। उस दिन रात में भीषण वर्षा हुई और वह छोटी-सी सीमा भी टूट गई। तालाब झरने के पेट में समा गया। झरना और तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा।
तालाब झरने में डूबने लगा, तब किनारे खड़े शाल्मलि वृक्ष ने ठिठोली की- बन्धु! जो स्वयं कुछ नहीं कर सकते और दूसरों को भी कुछ करते नहीं देख सकते, उनकी अन्त गति यही होती है।
बेबीलोन के सम्राट् के मन में इच्छा हुई कि आकाश में एक ऐसा अद्भुत बाग बनाया जाये, जिसमें संसार भर में उपलब्ध सभी फूल, फल और सौंदर्य बढ़ाने वाले पौधे हों, तरह-तरह के पक्षी हों, उसे देखने संसार भर के लोग आयें।
अपनी इस कल्पना को उसने साकार भी किया। ऊँचे ऊँचे आधार-स्तम्भ और सीढ़ियाँ बनाकर उसने छत पर खेत तैयार कराये और आकाश में बाग का अपना स्वप्न पूरा कर दिखाया। लटकता बाग (हैंगिग गार्डन) नाम से विख्यात यह बाग विश्व के आठ आश्चर्यों में गिना जाता है। यद्यपि अब वह ध्वस्तप्राय हो चुका है, तो भी वह अब भी सारे विश्व के लिये कौतूहल का विषय बना हुआ है। उसकी अनुकृति भारतवर्ष में ‘मालाबार गार्डन’ नाम से बम्बई में भी तैयार की गई है। उस बाग की शोभा और रमणीयता देखते ही बनती है।
संभव है बेबीलोन के राजा के मस्तिष्क में यह कल्पना हरी-भरी पृथ्वी के निराधार आकाश में विचरण कर रहे होने की कल्पना से जन्मी हो और तब उसने उस महान् सौंदर्य को प्रतिक्षण आँखों के सामने रखने के लिये यह बाग बनवाया हो, पर सामान्यतः ऐसे रमणीक दर्शन हर किसी के लिये संभव नहीं होते। गुलमुल, नियाग्रा, डलहौजी, कोडीकोनाल, श्रीनगर घाटी और अमरनाथ जैसे प्राकृतिक सौंदर्य वाले स्थानों में वही लोग जा सकते हैं, जिनके पास धन-संपत्ति का अभाव न हो। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि भगवान ने अपनी सुन्दर सृष्टि की दिव्यानुभूति का सौभाग्य कुछ इने-गिने लोगों को देकर अन्याय किया है। पर बात ऐसी नहीं हैं, मनुष्य-शरीर जैसा दिव्य शरीर देने के बाद परमात्मा के पास और कुछ शेष नहीं बचा जो वह मनुष्य को देता। हमारी भूल है जो जानते नहीं, अन्यथा ब्रह्माण्ड की ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो मनुष्य शरीर में न हो।
भारतीय योगियों ने भ्रू-मध्य की प्रयोगशाला से जाँच करके बताया कि मनुष्य-शरीर में संपूर्ण लोक, लोकपाल, देव-शक्तियाँ, दिव्य श्रवण, दर्शन और स्वयं परमात्मा तक विद्यमान है। महर्षि वशिष्ठ भगवान राम से तत्व-दर्शन का उपदेश करते हुए कहते हैं-
रम्येय देहनगरी राम सर्व गुणान्विता।
अज्ञस्येयमनन्तानाँ दुःखाना कोशमालिका।
ज्ञस्यत्वियमनन्तानाँ सुखानाँ कोशमालिका॥ -योग वशिष्ठ 4/23/4 और 18
हे राम! यह देह नगरी बड़ी सुरम्य और गुण सम्पन्न है। यह ज्ञानियों के लिये सुखद और अज्ञानियोँ के लिये दुःख देने वाली है।
योगियों का कथन है कि शरीर के पोले मेरुदण्ड में संपूर्ण विश्व, ब्रह्माँड, संपूर्ण देव-शक्तियाँ समाई हुई है। इसलिये शरीर (पिंड) भी एक ब्रह्माँड है- किन्तु यह बात मानने में विज्ञान को अभी संकोच है। अभी कोई ऐसा यन्त्र नहीं बन सका, जो शरीर के सूक्ष्म शक्ति प्रवाहों और लोकों की अनुभूति करा सके। पर स्थूल रूप से जो जानकारियाँ मिली हैं, वह भी उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करती है। यदि मनुष्य को खड़ा करके उसकी देह को सूक्ष्म वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो कोई भी आश्चर्यचकित हुए बिना न रहेगा कि सचमुच ही शरीर एक वैसा ही लटकता या चलता-फिरता उद्यान है। उसकी त्वचा पर हिमालय, विन्ध्याचल, अरावली, आल्पस की तरह के सुरम्य वन लहलहा रहे हैं। साधारणतः अहर्निश दुर्गन्ध उत्सर्जित करती रहने वाली देह के बारे में रमणीकता की ये कल्पना विस्मय हो सकती है, असत्य नहीं।
हैंगिंग गार्डन में पौधे रोपने के लिये मिट्टी जमीन से ऊपर ले जाई गई है। शरीर में यह मिट्टी अन्न के स्थूल भाग के रूप में पहुँचती है। त्वचा का अधिकाँश भाग मिट्टी है और वह कोश प्रतिक्षण बदलते और नये होते रहते हैं। इस स्थूल भाग में आत्मा अन्नमय रूप में हैं। उसके बाद शरीर के भीतरी भागों में क्रमशः सूक्ष्म होती चली गई है। शास्त्रकार का कथन है-
“स वा एष आत्मा। अन्न रसमयः तस्माद्वा एतस्मादन्न रसमयादन्योंतर आत्मा प्राणमयः अन्योतर आत्मा मनोमयः।”
अर्थात् यह आत्मा अन्न रूप में स्थूल तथा क्रमशः रस, प्राण एवं मन के रूप में सूक्ष्म होती हुई विज्ञानमय एवं आनन्दमय हो गई हैं।
शरीर उसका अन्नमय स्थूल रूप हैं। खाल जो दिखाई देती है, वह कुल शरीर के भार का 5.5 वाँ भाग होती है, अर्थात् यदि तमाम शरीर का भार 110 पौण्ड हो, तो त्वचा का भार 20 पौण्ड होगा। इस त्वचा में जल और चर्बी का भी कुछ अंश होता है, पर अधिकाँश हिस्सा मिट्टी का होता है। यों यह पार्थिव अंश भीतरी हिस्सों में भी होता है, पर उसके दृष्टि में न होने के कारण व्याख्या करना यहाँ अभीष्ट नहीं है।
वह स्थूल अणु भी दरअसल स्थूल न होकर आत्मामय अर्थात् चेतन है। प्राकृतिक परमाणुओं से आत्मा को अलग नहीं किया जा सकता- यह विज्ञान भी मानता है। हमारे यहाँ इसलिये आत्मा का एक रूप अन्नमय भी माना गया है उसे तो एक उद्यान लगाने के लिये कुछ मोटा भर कर दिया गया है अन्यथा विज्ञान के विद्यार्थी जानते होंगे कि जिसे हम मिट्टी कहकर उठा लेते हैं, हाथ साफ कर लेते हैं, बर्तन धो डालते हैं- वह मिट्टी नहीं, जीवाणु है। एक ग्राम मिट्टी लेकर इलेक्ट्रॉनिक सूक्ष्मदर्शी (यह माइक्रोस्कोप इलेक्ट्रान के द्वारा अति शक्तिशाली विस्तार क्षमता (मैगनीफाइंग पावर) द्वारा निर्मित होते हैं) यन्त्र से देखा जाये, तो पता चलेगा कि उसमें एक करोड़ से लेकर नौ अरब तक सूक्ष्म जीवाणु क्रीड़ा कर रहे हैं। ठीक यही बात त्वचा के संबंध में भी है। शरीर का जो भाग बाहरी अवयवों और खाल के रूप में दिखाई देता है, उसका एक मिलीग्राम हिस्सा (एक ग्राम का हजारवाँ हिस्सा) किसी प्रकार छीलकर निकाल लें और फिर उसे सूक्ष्मदर्शी से देखें, तो पता चलेगा कि इतने कम भाग में ही 5 लाख 30 हजार जीवाणु विद्यमान हैं। 55 किलो वाले शरीर की त्वचा में तो यह संख्या 10 X 1000 X 1000 X 5,30,000 = 5300000000000 होगी अर्थात् त्वचा का स्थूल भाग में चेतनता का एक लहराता हुआ सागर होगा।
इस शरीर नगर में सब कुछ समतल नहीं। इसमें पीठ के पठार, हाथ और पैरों की खाड़ियाँ, नाक की गुफाएँ, बगलों के गड्ढे, कानों के खन्दक, मुँह जैसी खान, दाँत जैसी चट्टानें और वह सब कुछ है, जो बाहरी दुनिया में दिखाई देता है। स्थान-स्थान की परिस्थितियों के अनुरूप यह जीवाणु कहीं अधिक सूक्ष्म, कहीं स्थूल, कहीं सुन्दर प्रकाश-किरणें उत्सर्जित करने वाले, कहीं मल और मूत्र फेंकने वाले बन गये हैं। एक वर्ग सेन्टीमीटर शरीर का हिस्सा 24 लाख 10 हजार जीवाणुओं से बना मिलेगा। हाथों में इनकी संख्या प्रति सेन्टीमीटर 100 से लेकर 4500 तक होती है, तो पीठ में 314, सामने वाले मस्तक (ललाट) पर इनकी संख्या 200000 प्रति वर्ग सेन्टीमीटर तक होती है। शरीर का जो भाग जितना अधिक संवेदनशील होता है, वहाँ जीवाणुओं की संख्या उतनी ही अधिक और सूक्ष्म मिलेगी। उन स्थानों पर मानसिक आवेग तीव्रता से बदलते दिखाई देते हैं, जबकि स्थूल वाले हिस्सों में यह परिवर्तन जीवाणुओं में हलचल होने पर भी दिखाई नहीं देते।
इस सारी खोज का श्रेय पेन्सिलवेनिया विश्व-विद्यालय के वैज्ञानिक श्री पीटर विलियम्सन को है। उनका कहना है कि ये जीवाणु माइक्रोस्कोप से देखे जायें, तो सारा शरीर वनस्पति का लहलहाता हुआ बगीचा-सा दिखाई देगा- ठीक ऐसा ही जैसा पृथ्वी में, कहीं घाम कम है कहीं सघन, कहीं वृक्ष दूर-दूर तक फैले हैं कहीं बहुत घने हो गये हैं। लन्दन के सेन्ट जोन्स अस्पताल के त्वचा रोग विशेषज्ञ डब्लू. सी. नोवल और आर. आर. डेवीज ने तो इन वनों को उनके वृक्ष-वनस्पतियों के आधार पर उसी तरह खण्डों में विभक्त कर दिया, जैसे 6 महाद्वीपों से बनी पृथ्वी। यह जीवाणु जो वृक्षों-वनस्पतियों के रूप में लहलहाते प्रतीत होते हैं, स्टेफाइलोकोंकस, ईस्ट, फफूँद, स्टेफाइलोकोकस औरियस, डीमेडेक्स, फालिकुलोरम, कोरिनी बैक्टीरियम एक्नीस जाति की वनस्पतियाँ हैं। सूक्ष्मदर्शी से उनकी शोभा देखते ही बनती है। जिस प्रकार एक वर्ष में सम्पूर्ण प्रकृति अपने विभिन्न रूप-रंग बदलती रहती है, यह वन भी उसी प्रकार आकार बदलता हुआ बड़ा रमणीक लगता है।
एक बार आक्सफोर्ड विश्व-विद्यालय के वनस्पति शास्त्री श्री किटी पाविओर ने न्यूजीलैंड के उस चरागाह वाले इलाके का भ्रमण और निरीक्षण किया, जो वहाँ का सबसे अधिक उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है। विस्तृत अध्ययन के बाद उन्होंने बताया कि यदि इस नमक वाले क्षेत्र की मिट्टी में से ‘प्रोटोजोआ’ नामक अति सूक्ष्म जीवाणुओं को छोड़ दें, तो शेष जीवाणुओं की संख्या ही एक वर्ग मीटर क्षेत्र में 75 लाख के लगभग होगी। इधर श्री विलियम्सन को पता था कि मनुष्य के शरीर में हाथ के कुछ भागों में लवण की मात्रा बहुत अधिक होती है। यह शरीर के अत्यधिक कोमल अंग होते हैं। उनकी वैज्ञानिक जाँच करने पर पता चला कि वहाँ सचमुच जीवाणुओं की संख्या प्रति वर्ग सेन्टीमीटर लगभग 11 लाख उपस्थित है। कहने का तात्पर्य यह है कि न्यूजीलैण्ड जैसा हरा-भरा इलाका तो मनुष्य के हाथों में ही है। पता लगायें, तो हिमालय जैसी सुरम्य पर्वत-श्रृंखलाएँ और प्रकृति के समृद्ध स्थान अपने शरीर में ही प्राप्त कर सकते हैं। कोई आवश्यकता नहीं कि इन स्थानों में भ्रमण के लिये भारी समय और खर्च की दिक्कत उठायें। आवश्यकता बस वैज्ञानिकों के समान अपनी योग-दृष्टि विकसित करने भर की है।
यह जीवाणु अथवा वनस्पति के वन इस बात के भी प्रमाण हैं कि उन्हें जीवन देने वाली कोई अति सबल और सूक्ष्म सत्ता शरीर में ऐसे ही होनी चाहिये जैसे कि बाह्य प्रकृति के पौधे और वनस्पतियाँ सूर्य से शक्ति पाते रहते हैं। वनस्पतियाँ सूर्य-प्रकाश से सीधे शक्ति ग्रहण करती हैं। उनमें संग्रहीत शक्ति ही जब मनुष्य आहार-रूप में ग्रहण करता है, तो उसे कर्म करने की शक्ति प्राप्त होती है। साधारणतया 200 ग्राम घास से उतनी शक्ति मिलती है, जिससे किसान आधा घण्टा फावड़ा चला सकता है, यात्री डेढ़ घण्टे चल सकता है, लोहार आधा घण्टा कुल्हाड़ी और स्त्री तीन घण्टे कोई भी काम कर सकती है। प्रयोग से देखा गया है कि 770 बीघे जमीन की घास सूर्य से एक दिन में जो शक्ति निकलती है, वह 20000 टन टी.एन.टी. अर्थात् पूरे एक परमाणु बम के बराबर होती है। फिर शरीर रूपी पिंड में यह जो जीवन प्रकाशित कर रहा है, वनस्पतियों को पोषण दे रहा है उसकी शक्ति की तो कल्पना करना ही कठिन है। सच पूछा जाये, तो आत्मा समष्टि सूर्य का ही रूप है-
य इह वा वस्थिरचरनिकराणाँ निज निकेनानाँ मन इन्द्रिय सुरगणाननात्मनः स्वयमात्माऽन्तर्यामी प्रचोदयात्। -ब्रह्मोपनिषद्
‘हे सूर्यदेव। आप ही सबके आत्मा और अन्तर्यामी हो। संसार में जो भी जड़-चेतन है, उसके प्रेरक आप ही हो।’
योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम्। -मैत्रेयी उपनिषद् 6/35
‘जो सूर्य है, सो मैं हूँ’ आदि।
बाह्य सूर्य अपनी जड़-प्रकृति को रस-प्लावित करता है। अतः सूर्य-आत्मा अपनी अन्नमय प्रकृति का पोषण करती है। दोनों एक जैसे सुरम्य हैं। बाहरी सौंदर्य को तो हम देख लेते हैं, पर सांसारिक माया, मोह और आसक्ति के बंधनों में बंधे हम बुद्धिशील प्राणी भी अन्तः सौंदर्य को नहीं देख पाते। महर्षि वशिष्ठ ने ऐसे ही व्यक्तियों को अज्ञानी बताया है और उन्हें ज्ञानवान् जो सांसारिक सौंदर्य को बाहर न देखकर अन्दर ही ढूंढ़ते हैं। बेबीलोन का लटकता बाग संसार के आठ आश्चर्यों में से है। वह संसार के थोड़े-से ही लोगों को देखने को मिलता है, पर उससे भी बढ़कर आश्चर्य यह है कि हम सब बेबीलोन के लटकते बाग होकर भी अपने आप को नहीं जान पाते।
पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्य छिद्रं चेदेकमिन्द्रयम्।
ततोऽस्य स्त्रवति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥
पाँच इन्द्रिय वाले मनुष्य की यदि एक भी इन्द्रिय में दोष आ जाये, तो उससे इसकी बुद्धि टपकने लगती है। जैसे मशक से पानी अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों द्वारा भूल करना ही मूर्खता है।
-विदुर-नीति
प्राग (चैकोस्लोवाकिया) में एक ऐसी मशीन तैयार की गई है, जो धातु की पतली चादरों और जल्दी पिघलने वाली धातुओं को काटने या छेद करने के काम आती है। यह मशीन एक मिलीमीटर के सौवें भाग तक सही कटाई कर सकती है। इतनी सूक्ष्म और सही (एक्युरेट) किसी तेज अस्त्र, चाकू या आरी से नहीं की जाती। यह कार्य इलेक्ट्रॉनों की किरण फेंककर किया जाता है। इलेक्ट्रान की एक किरण की विद्युत क्षमता 60000 वोल्ट होती है। फिर यदि कई किरणों का समूह (बीम) प्रयुक्त किया जाये, तो उससे कितनी शक्ति प्रवाहित हो सकती है?- इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।
इलेक्ट्रान परमाणु का ऋण विद्युत आवेश मात्र है। वह 0.00000001 मिलीमीटर व्यास के अति सूक्ष्म परमाणु का एक अंश मात्र है। लेकिन परमाणु का स्वयं भी कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप से केवल इसका प्रभाव देखा जा सकता है। परमाणु का सबसे आश्चर्यजनक जगत तो उसकी चेतना, केन्द्रक या नाभिक (न्यूक्लियस) में विद्यमान है। इस सम्बन्ध में हुई खोजे बड़ी महत्वपूर्ण हैं और नाभिकीय विद्या (न्यूक्लियर साइन्स) के नाम से जानी जाती हैं। उसका प्रारम्भ 1895 में प्रो. हेनरी बेक्वेरल ने किया और जेम्स चैडविक ने उसे विकसित किया। नाभिक में प्रसुप्त शक्ति को खोजा प्रो. एनारेको फर्मी ने। उन्होंने न्यूट्रॉन के अनेक रहस्यों का पता लगाकर सारे विज्ञान जगत में तहलका मचा कर रख दिया।
नाभिकीय शक्ति का पता लगाकर प्रो. फर्मी को भी कहना पड़ा था- ‘हम छोटी-छोटी वस्तुओं में उलझे पड़े हैं। वस्तुतः संसार में महान शक्तियाँ भी हैं, जिनसे सम्बन्ध बनाकर हम अपने आप को और अधिक शक्तिशाली तथा प्रसन्न बना सकते हैं।’
यह शक्तियाँ, जिनका पता लगाया गया है, परमाणुओं की हैं और यह बताती हैं कि छोटी-से-छोटी वस्तु भी इतनी शक्तिशाली हो सकती है, तो यदि विश्व-विराट के केन्द्रक (न्यूक्लियस) का पता लगाया जा सके, तब तो मनुष्य की क्षमता का वारापार ही न रहे।
परमाणु के नाभिक व्यास 0.0000000000001 मिलीमीटर होता है, उसके भीतर केले के पत्तों की तरह मूल रूप से तीन कण विद्यमान रहते हैं- (1) प्रोट्रॉन, (2) न्यूट्रॉन और नाभिक की कक्षा में चक्कर लगाने वाले (3) इलेक्ट्रान। प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन की संख्या लगभग समान होती है, पर प्रोट्रॉन में धन विद्युत होती है जबकि न्यूट्रॉन में कोई आवेश नहीं होता। परमाणु का सारा भार इसी पर आश्रित है। यह तत्त्व विश्व में शक्ति और पदार्थ या प्रकृति और परमात्मा की तरह हैं। इलेक्ट्रान तो उस जीव की तरह है, जो अपने मूल बिन्दु से भटक जाने के कारण अशान्त घूमता रहता है। जब तक वह ईश्वरीय स्वरूप को प्राप्त नहीं कर लेता, कई कक्षाओं में अशान्त इधर-से-उधर घूमता रहता है। पर उसे शान्त चित्त बैठकर अपनी क्षमता पर वैसे ही विचार करने का मन नहीं आता, जिस तरह मनुष्य अपने शरीर, अपनी इन्द्रियों के चक्कर में ऐसा पड़ा रहता है कि वह शरीर के अणु-अणु में भरी आत्म-चेतना की ओर ध्यान ही नहीं कर पाता।
इलेक्ट्रान की मात्रा तो एक प्रोट्रॉन के लगभग 1845 वें हिस्से के ही बराबर होती है, तब उसमें इतनी शक्ति होती है कि प्राग में बनी मशीन चलाई जा सकती है, यदि उसके नाभिक की शक्ति का अनुमान करना पड़े, तो बुद्धि ही काम न दे।
पानी में जिस तरह भँवर उठा करते हैं, उसी प्रकार नाभिक (न्यूक्लियस) एक प्रकार की ‘ऊर्जा भँवर’ ही होती है। नाभिक कोई स्थूल पदार्थ नहीं, वरन् एक प्रकार की चेतन सत्ता है, जिसमें शक्ति भी है और भार भी। यदि हम उसे धारण कर सकें, तो योगियों के समान पदार्थ पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकते हैं।
बनारस जिले में गुजी नामक स्थान के निकट जन्मे पवाहारी बाबा के बारे में प्रचलित है कि वे स्थूल अन्न ग्रहण नहीं करते थे। पव अर्थात् वायु, आहारी अर्थात् ग्रहण करने वाला पवाहारी अर्थात् जो केवल वायु का ही आहार ग्रहण करता था। वे काठियावाड़ के गिरनार पर्वत पर रहकर साधना करते थे। महीनों गुफा के अन्दर बन्द रहते थे। कई बार तो लोगों को सन्देह होता था कि वे मर गये। पर जब वे निकाले जाते थे, तो उनके शरीर-स्वास्थ्य में कोई अन्तर नहीं आता था। अमेरिकी डाक्टरों के एक दल ने एक बार उनकी जाँच करके बताया था- ‘आहार द्वारा जो तत्त्व शरीर ग्रहण करता है वह सब तत्त्व उनके शरीर में हैं।’ जबकि वे खाना खाते ही नहीं थे। श्री पवाहारी बाबा अपनी विचार व भावनाओं के चेतना-प्रवाह द्वारा हवा में पाये जाने वाले अन्न और खनिज के सभी तत्त्व खींच लेते थे और इसी का परिणाम था कि वे बिना खाये जीवित बने रहते थे। मानसिक चेतना द्वारा पदार्थों के हस्तान्तरण के ऐसे सैकड़ों उदाहरण और चमत्कार हिमालय में रहने वाले कई योगियों में आज भी देखे जा सकते हैं। यह सब अन्तःचेतना की शक्ति के विकास से ही सम्भव होता है। पदार्थ के नाभिक की शक्ति का साधारण अनुमान उसकी इलेक्ट्रानिक शक्ति से लगाते हैं, तो आत्म-चेतना की शक्ति का तो अनुमान ही नहीं किया जा सकता।
ऊर्जा कोई स्थूल पदार्थ नहीं है। ताप, विद्युत और प्रकाश के सम्मिलित रूप को ही ऊर्जा कहते हैं। प्रकृति का प्रत्येक कण इस तरह एक शक्ति है, जबकि आत्मा उससे भी सूक्ष्म और उस पर नियन्त्रण करने वाला है। इसलिये उसे ताप, विद्युत या प्रकाश के लिये बाह्य साधन भी अपेक्षित नहीं। यदि हम आत्मा को प्राप्त कर सकें, तो इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति हम अपने भीतर से ही कर सकते हैं। घोर अन्धकार में भी आत्मदर्शी निर्भय चला जाता है, क्योंकि उसका प्रकाश उसे साथ देता है। जिस तरह हम दिन के प्रकाश में चलते हैं। योगी घने अन्धकार में भी वैसे ही चलता है। विद्युत एक ऐसी शक्ति है, जिससे शेर-चीते भी बस में किये जा सकते हैं। वह मनुष्य के पास हो, तो वह हथियारों से लैस सेना से भी क्यों डरेगा ? स्वामी रामतीर्थ हिमालय की तराइयों में घूमा करते थे, तब शेर-चीते भी उनके पास ऐसे आ जाते थे जैसे छोटे-छोटे बच्चे अपने पास खेला करते हैं। उनके शरीर में उतनी शक्ति होती है, जिससे प्रकृति के किसी भी परिवर्तन को आसानी से सहन किया जा सके। सूर्य के मध्य भाग में 50000000 डिग्री ताप होता है, पर वह इस शक्ति का 200000 वाँ हिस्सा ही उपयोग में लेता है। हमारी सामान्य दीखने वाली शक्तियाँ भी संचित सूर्य की ताप-शक्ति के समान हैं। पर उन्हें न जानने के कारण हम दीन-हीन स्थिति में पड़े रहते हैं।
एक पौण्ड यूरेनियम 235 को तोड़ा जाता है, तो उससे उतनी ऊर्जा प्राप्त होती है, जितनी 20000 टन टी.एन.टी. के विस्फोट से। यह शक्ति इतनी अधिक होती है कि उससे 100 वॉट पावर के दस हजार बल्ब पूरे वर्ष दिन-रात जलाये रखे जा सकते हैं। स्ट्रासमान ने सर्वप्रथम इसी शक्ति का उपयोग नागासाकी और हिरोशिमा को फूँकने में किया था। यह सब शक्ति तो आत्मिक चेतना या नाभिक के आश्रित कणों की शक्ति है। यदि नाभिक को तोड़ना किसी प्रकार सम्भव हो जाये, तो विश्व-प्रलय जैसी शक्ति उत्पन्न की जा सकती है- इसे आत्मदर्शी योगी जानते हैं।
परमाणु का भार अचिन्त्य है और उसकी शक्ति अकूत। वैज्ञानिक बताते हैं कि यदि सारी पृथ्वी को पीटकर नाभिकीय घनत्व के बराबर लाया जाये, तो वह कुछ घन फुट में ही समा जायेगी। इसी से नाभिक की लघुता का अनुमान किया जा सकता है। किन्तु इस घनीभूत की गई पृथ्वी का एक अंगूर के बराबर टुकड़ा काटें, तो उसका भार साढ़े सात करोड़ टन होगा। ऐसी मजबूत चादरों के ऊपर यदि इस टुकड़े को रख दिया जाये, जिन्हें छेदना सम्भव न हो, तो यही टुकड़ा पृथ्वी को भगाकर अन्तरिक्ष में कहीं और लेकर भाग जायेगा। यदि उसे खुली मिट्टी पर रख दिया जाये, तो वह पृथ्वी को फाड़ता हुआ चला जायेगा और सम्भव है पृथ्वी को छेदकर वह स्वयं भी कहीं अन्तरिक्ष में जाकर भटक जाये। परमाणु के अन्दर इस नाभिक की शक्ति से वैज्ञानिक आश्चर्यचकित है।
यह सूक्त बताते हैं कि भारतीय योगियों की सूक्ष्म दृष्टि भी वैज्ञानिकों की तरह ही रही है और उन्होंने चेतन सत्ता के नाभिक की जानकारी कर ली है। पदार्थ का परमाणु हमें सूक्ष्म-से-सूक्ष्म सत्ता की शक्ति की अनुभूति तो कराता है, पर वह चेतन सत्ता की जानकारी नहीं देता। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने भी ऐसे ही चेतन परमाणु और उसके विभु नाभिक का पता लगाया। उसे चेतन सत्ता आत्मा या ईश्वरीय प्रकाश के रूप में माना है और उसकी विस्तृत खोज की है। उपलब्धियाँ दोनों की एक तरह की हैं। उपनिषद् उसे- ‘अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा’ (आत्मोपनिषद् 15।1) अणु से अणु और महान से महान बताती है। योग-वशिष्ठ में उसे इस प्रकार व्यक्त किया है-
अतीतः सर्वभावेभ्यो बालाग्रादप्यहं तनुः।
इति तृतीयो मोक्षाय निश्चययो जायते सताम्॥ -5।17।15
परोऽणु सकलातीत रुपोऽहं चेत्यहं कृतिः। -5।73।10
सर्वस्माद्वयतिरिक्तोऽहं बालाग्र शतकल्पितः। -5।33।51
मुक्ति दिलाने वाला यह आत्मा बाल की नोंक के सौवें भाग से भी सूक्ष्म परमाणु और दृश्य पदार्थों से विलग रहने वाला है। उसे जानने वाला सब कुछ जानता है।
देवी भागवत में आत्म-सत्ता की प्रार्थना - या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण तिष्ठति। ‘हे भगवती सम्पूर्ण भूत प्राणियों में शक्ति रूप से आप ही निवास करती हैं’ - की गई है। उस शक्ति और आत्म-चेतना के विज्ञान को भारतीय आचार्यों ने इतना अधिक विकसित किया कि भौतिक उपलब्धियों से जब उसकी तुलना करने लगते हैं, तो लगता है कि आज के वैज्ञानिकों ने जो कुछ पाया है, वह उस अथाह ज्ञान-सागर का जल-बिन्दु मात्र है।
प्रतिज्ञाहीन जीवन बिना नींव का घर है, या यों कहिये कि कागज का जहाज है। प्रतिज्ञा न लेने का अर्थ है- अनिश्चित या डांवाडोल रहना।
-महात्मा गाँधी
खलीफा हारुन अल रशीद की यह इच्छा हुई कि राज्य में घूमकर यह देखा जाये कि जनता सुखी है कि नहीं? राज्य-कर्मचारी कानूनों के पालन में किसी प्रकार से बाधक तो सिद्ध नहीं हो रहे हैं। एक दिन खलीफा घोड़े पर सवार होकर अपने मन्त्री को साथ ले बगदाद शहर का निरीक्षण करने निकले। एक विशाल भवन पर ‘मदरसा अब्बासिया’ का बोर्ड देखकर खलीफा ने मन्त्री से पूछा- ‘क्या हमारे शहजादे अमीन व मामून इसी मदरसे में तालीम लेने आते हैं?’ मन्त्री के हाँ करने पर खलीफा घोड़े से उतरकर उस मदरसे में घुस गये। अन्दर जाकर उन्होंने देखा कि सफेद दाढ़ी वाला एक वृद्ध अपने हाथ से पानी लेकर हाथ-मुँह धो रहा है।
उस वृद्ध ने खलीफा को सलाम किया। यह वृद्ध उन दोनों शहजादों के उस्ताद थे। उस्ताद के सलाम का उत्तर देते हुए खलीफा ने कहा- ‘मैं आपके मदरसे का मुआयना करने आया था, पर दुःख है कि आपके मदरसे की तालीम ही अधूरी है। मैंने अभी देखा कि आप नमाज पढ़ने के लिये हाथ-मुँह धो रहे थे, उस समय शागिर्दों का यह फर्ज था कि वे आपके लिये पानी लाते और स्वयं आपके पैर धोते। उस्ताद का स्थान सबसे ऊँचा होता है, उसकी सेवा करना प्रत्येक शागिर्द का फर्ज है। मुझे दुःख है कि इतनी वर्षों में भी मेरे शहजादों को सेवा का यह छोटा-सा पाठ भी आप न पढ़ा सके।’
नारद को स्वास्थ्य बहुत प्रिय था, सो वह सदैव टहलते रहते थे। क्रियाशील जीवन जीने का उनका स्वभाव ही बन गया था। एक बार वे पितामह ब्रह्मा के राज्य में विचरण कर रहे थे। पीयूष पावन पर्वत की तलहटी में भ्रमण कर रहे नारद ने एक विचित्र वृक्ष के दर्शन किये। इस वृक्ष में तना था, डालियाँ थीं, पर वह सब ठूँठ-से लगते थे। हरियाली तो दूर, वृक्ष में एक भी पत्ती नहीं थी। हाँ, फल अवश्य थे, पर वे काले थे। उस वृक्ष के नीचे सैकड़ों जीव-जन्तु और पक्षी मरे पड़े थे। विचारशील नारद ने पहले ही अनुमान कर लिया कि यह फल विषैले होंगे। इन जीवों ने इनको खाने का प्रयास किया होगा और इस प्रयत्न में ही वे अपनी जान गँवा बैठे होंगे।
नारद ने सोचा- जीव तो मरणधर्मा है ही, उसके लिये दुःख करने से क्या लाभ? किन्तु उस वृक्ष के पत्र विहीन होने और फलों के विषैले होने का उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। जब उनकी विचार-शक्ति ने काम नहीं दिया, तो अपनी जिज्ञासा शाँत करने के लिये वे पीछे लौट पड़े और वहाँ से चलकर सीधे पुराण पुरुष ब्रह्माजी के पास जाकर पूछने लगे- भगवन्! आपकी सृष्टि में विष-फल! ऐसा तो अनन्त सृष्टियों में कहीं भी नहीं देखा। यह वृक्ष कहाँ से आया भगवन्, जिसमें एक भी पत्ता नहीं? मृत्यु-मुख में पहुँचाने वाले यह फल क्या कभी शीतल और सुमधुर नहीं हो सकते हैं?
दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए विधाता बोले- तात! बहुत दिन हुए यहाँ एक युवक आया। वह जिससे मिलता, भक्ति और वैराग्य की बातें करता। लोगों ने कहा, पागल हो गया है यह। तुम जानते ही हो- मनुष्य की स्थूल बुद्धि तो केवल स्थूल और स्वार्थपूर्ण बातें ही सोच सकती है। पारमार्थिक तत्वों की अनुभूति तो साधनाशील और धार्मिक व्यक्तियों को होती है। घर वालों ने भी उसे निकाल दिया। युवक का एक हाथ खराब हो चुका था, तो भी प्रत्येक आध्यात्मिक-धार्मिक पुरुष में श्रम और स्वाभिमान के जो लक्षण होने चाहिये, वह उसमें पर्याप्त मात्रा में थे। उसने अपनी आजीविका आप कमाने का निश्चय कर लिया।
उसने विचारपूर्वक देखा- कुछ आवश्यक नहीं कि दूसरे लोग कृषि या राज्याश्रय से आजीविका प्राप्त करते हैं, तो वह भी वैसा ही करे। अपंग था वह, इसलिये अपने लिये उसे प्राकृतिक जीवन ही उपयुक्त लगा। उसने देखा, जिस तरह सृष्टि के अन्य जीवों की आहार सम्बन्धी आवश्यकताएँ सीमित हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी थोड़े में अपना काम चला सकता है। शेष समय परमार्थ साधन में लगाया जा सकता है, सो उसने अपने लिये कुछ फलों वाले पौधे लगाने और उनसे अपना आहार प्राप्त करने का निश्चय कर लिया।
बिना किसी आयुध के धरती खोदना कठिन था नारद! तो भी स्वावलम्बी व्यक्ति साधनों की परवाह नहीं करते। उस युवक ने अपना काम प्रारम्भ किया। वह बड़ी कठिनाई से कभी एक ढेला खोद पाता, कभी दो। पर उसमें आशा और उत्साह की कमी दिखाई न देती थी। ईश्वरीय सत्ता पर उसे बड़ा भरोसा था, वह कई दिन तक ऐसे ही खुदाई करता रहा। उसकी बहन आई और हँसती हुई निकल गई। उसकी दृष्टि में भाई जैसा मूर्ख इस सृष्टि में दूसरा नहीं था। कुछ देर में पत्नी आई- उसके हाथ में शीतल जल से भरा हुआ घड़ा था। युवक ने बड़ी आशा से हाथ उठाया और इस आशय से मुँह से लगाया कि वह थोड़ा-सा पानी पिला देगी। किन्तु हाय री आसक्ति! पत्नी से जल पिलाना तो दूर- दो मीठे शब्द भी नहीं बोले गये। उपहास के स्वर में उसने कहा- ‘भागीरथ जी! और थोड़ा खोदिये, गंगाजी शीघ्र निकलने वाली हैं।’
मुँह से लगा हाथ निराश नीचे लौट आया- युवक धीरे-धीरे फिर मिट्टी खोदने लगा। तभी उधर से पिता आया सिर पर फलों का टोकरा था। भूखे युवक ने इंगित कर एक नन्हा-सा टुकड़ा खाने को माँगा। फल तो नहीं, भर्त्सना अवश्य मिल गई- मूर्ख, दिन भर निठल्ला बैठा रहता है। खाना आकाश से टपकता है क्या? उठ, कुछ काम कर। अपना भोजन आप कमा। युवक की आँखें भर आईं, बेचारा कुछ बोल नहीं सकता था। भूखा-प्यासा धरती खोदने में लगा रहा। पर मन सोच रहा था- संसार में प्रेम और दया के स्रोत न सूखे तो मनुष्य कितना खुशहाल हो सकता है। साधनों के अभाव से नहीं, संसार के दुख का प्रमुख कारण भावनाओं के अभाव की सत्यता आज स्पष्ट हुई।
ज्येष्ठ की दशमी, प्रातःकाल जैसे ही उसने मिट्टी का एक ढेला हटाया कि उसकी आँखें चौंधिया गई। कोई बहुमूल्य मणि का टुकड़ा उसके हाथ आ गया। उस मणि को लेकर खड़ा हुआ, तो लोग भ्रम में पड़ गये कि आज समय से पहले ही सूर्योदय कैसे हो गया। जहाँ तक प्रकाश पहुँचा, लोग भागते चले आये और युवक के भाग्य की प्रशंसा करने लगे। बहन आई और भाई को नहलाने लगी। पत्नी आई और उसके शरीर पर चन्दन का लेप कर उसे बहुमूल्य वस्त्र पहना गई। पिता मधुर मिष्ठान्न व पकवान से सजा थाल लेकर आया और बोला- वत्स! बहुत भूखे दिखाई देते हो, लो पहले भोजन कर लो। युवक को इस मिथ्या मोह और जग-प्रपंच पर हंसी आ गई। उसने वह सारे वस्त्राभूषण उतार फेंके, भोजन भी नहीं लिया। उस स्थान पर सुमधुर फलों का पौधा लगाकर वह अपनी मणि लिये हुये एक ओर न जाने कहाँ चला गया। उस दिन से आकृति तो क्या, उसकी छाया के भी दर्शन नहीं हुये। हाँ, उसका रोपा हुआ वृक्ष कुछ दिन में बड़ा होकर मीठे फल अवश्य देने लगा।
धीरे-धीरे युवक का यश सारे विश्व में गूँजने लगा। जो भी पर्वत से मणि निकालने की बात सुनता, उधर ही दौड़ा चला आता। देखते-देखते सैंकड़ों ही लोग इस पर्वत की खुदाई करने लगे। उन सबके मन में एक ही कामना थी-हमें भी मणि मिले। सच है, संसार में मोहग्रस्त और स्वार्थी व्यक्ति ही अन्धानुकरण करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। मणि तो मिली नहीं, एक दिन खोदते-खोदते एक भारी-भरकम पत्थर का टुकड़ा निकल आया। उसे हटाने के लिये सब लोग एकजुट होकर प्रयत्न करने लगे। सामूहिकता की शक्ति का क्या कहना? सो हे नारद! पत्थर हट गया, पर उसके पीछे एक भयंकर नाग छिपा बैठा था। वह फुँकार मारकर दौड़ा- लोग भागे, पर उनमें से अधिकाँश को उसने वहीं डस लिया। भागते समय यही लोग उस वृक्ष से टकराये, फलस्वरूप विषधर का विष उसे भी व्याप गया। उस दिन से इस वृक्ष के सब पत्ते झड़ गये और फल भी विषैले लगने लगे। नारद! इसके बाद से आज तक किसी ने भी इस वृक्ष के नीचे बैठकर शीतल छाया प्राप्त करने का सुयोग नहीं पाया।
नारद ने बड़े विस्मय के साथ पूछा- भगवन् क्या यह वृक्ष फिर हरा नहीं हो सकता? विधाता गंभीर हो गये पर आज तो सारी धरती के लोगों को ही स्वार्थ और प्रपंच के नाग ने डस लिया है। जितना लोग इस शान्ति रूपी वृक्ष से टकराते हैं, उतना ही फल और अधिक विषैले हो जाते हैं। उस युवक की तरह कोई और निःस्वार्थ, प्रेमी सन्त आये और उस वृक्ष का स्पर्श करे, तो यह फिर से शीतल, सुखद और सुमधुर फलों वाला वृक्ष क्यों नहीं बन सकता?
पास के कुएं को देखकर तालाब को अपने विस्तार पर बड़ा गर्व हो गया। एक दिन डींग मारते हुए बोला- ‘इस जैसे एक-दो नहीं, बीसियों कुएं मुझमें समाकर अपना अस्तित्व खो सकते हैं।’
“भाई! केवल विस्तार ही पर्याप्त नहीं होता, उसमें गहराई भी तो होनी चाहिये।” कुएँ ने संक्षिप्त में अपना उत्तर दे दिया।
लज्जित तालाब को मुँह छिपाने की जगह न रही।
संसार में ऐसे बहुत-से व्यक्ति होंगे, जो जीवन में बहुत दूर चलकर भी वापिस लौट आये होगे। उनकी बड़ी-बड़ी आशायें, आकाँक्षायें और अभिलाषायें रही होंगी। पर वे जीवन में कुछ ऐसे हताश और निरुत्साह हो गये कि ऊँचाई की ओर दूर तक यात्रा करके नीचे उतर आये। उनके इस पुनरावर्तन के दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि जीवन-पथ पर आने वाली प्रतिकूलताओं से वे परास्त हो गये अथवा उनके कर्तृत्व की असफलता ने उन्हें निराश कर दिया।,
जीवन-पथ पर, कोई ऊँचा ध्येय लेकर चलने वालों को प्रायः बहुत बार ही असफलताओं का सामना करना होता है। जीवन में असफलताओं का आगमन कोई अप्रत्याशित घटना नहीं होती। सफलता-असफलताओं के आलोक अन्धकार से होकर ही मनुष्य को अपने ध्येय तक जाने का अवसर मिलते हैं। यदि जीवन में असफलताओं से संघर्ष न करना पड़े और प्रारम्भ किया हुआ अभियान अव्यवधानित रूप से लक्ष्य तक चला जाये, तो कोई भी सामान्य से सामान्यतम व्यक्ति भी लक्ष्यजयी बनने का श्रेय प्राप्त कर सकता है और तब उस लक्ष्य अथवा जीवन परिधि का कोई मूल्य-महत्व ही न रह जाये। वह एक सामान्य यात्रा बनकर ही रह जाये।
जीवन में बाधाओं और असफलताओं को पार करते हुए लक्ष्य की ओर साहसपूर्वक बढ़ते जाना ही मनुष्य की महानता है। जिनको ऊँचाई पर पहुँचने के लिये कोई संघर्ष न करना पड़ा हो, असफलताजन्य निराशा पर विजय पाने के लिये और अधिक उत्साह और साहस की कुमुक न बढ़ानी पड़ी हो, उसे लक्ष्य-प्राप्ति का कोई विशेष श्रेय नहीं मिल सकता है। श्रेय का महत्व कंटकाकीर्ण मार्ग को पार करके आगे बढ़ते रहने में ही मिलता है। जो पथ की बाधाओं और व्यवधानों से भयभीत होकर पीछे लौट आता है, उसे विद्वानों ने कापुरुष की संज्ञा दी है। असफलता और व्यवधान जीवन-पथ की सहज संभावनायें हैं। इनसे कोई भी लक्ष्यवान व्यक्ति अछूता नहीं रह सकता। जीवन में लक्ष्य निर्धारित न करना तो केवल एक अश्रेयष्कर सामान्यता ही है। पर लक्ष्य निर्धारित करने के बाद, बाधाओं और व्यवधानों के भय से उसे छोड़ देना कायरता है। इस कायरता का कलंक किसी भी सत्पुरुष को नहीं लेना चाहिये।
बीच रास्ते से लौट आने वाले निःसन्देह बड़े दयनीय व्यक्ति होते हैं तथापि असफलता का आघात होता बड़ा कठोर है। जल्दी ही लोग इसे सहन नहीं कर पाते और निराश होकर हतगति हो जाते हैं। जीवन में कुछ करना भी है और उससे निराशा एवं निरुत्साह का भय भी सदा सम्भाव्य ही है, तब आखिर ऐसा कौन-सा उपाय ग्रहण किया जाये, जिससे निराशा एवं निरुत्साह का भय जाता रहे और असफलताओं से टक्कर लेते हुए सफलताओं की ओर बढ़ते रहा जा सके। यह शक्ति और साहस आखिर किस प्रकार प्राप्त हो सकती है।
इसका उपाय है, और बड़ा ही अमोघ उपाय है, वह है- ‘अनासक्त कर्मयोग’। यह अनासक्त कर्मयोग का जीवन दर्शन स्वयं भगवान वासुदेव का अनुमोदित दर्शन हैं। गीता में इसकी बड़ी ही विशद तथा विस्तृत व्याख्या की गई है। भगवान ने स्वयं इसका उपदेश करके कर्म-विमुख होकर बैठ रहने वाले अर्जुन की क्लीवता दूर की थी। अनासक्त कर्मयोग जीवन का एक बहुत बड़ा समाधान है। जीवन-पथ पर इसका अनुसरण करने वाला कर्मयोगी असफलताओं एवं प्रतिकूलताओं से प्रभावित होकर निराश अथवा हतोत्साह नहीं होता। वे सफलताओं-असफलताओं के बीच हँसते-खेलते समभाव पूर्वक आगे बढ़ते जाते हैं। न तो उन्हें सफलता प्रभावित कर पाती है और न असफलता। दोनों स्थितियों में उनका मानसिक संतुलन एक जैसा बना रहता है। कर्म और कर्मफल में अपना अधिकार न मानना ही अनासक्ति कही गई है। कर्म में कर्तापन का भाव रखना और उसके फल में अपना अधिकार मानना ही आसक्ति है। आसक्तिवान व्यक्ति जल्दी ही परिस्थितियों तथा परिणामों से प्रभावित हो उठता है। किन्तु कर्म और उसके अच्छे-बुरे, अनुकूल-प्रतिकूल परिणामों का बोझ अपने ऊपर न लेने वाला किन्हीं विषमताओं से प्रभावित नहीं होता-फलतः उसका सुख, चैन, शाँति और संतोष अक्षुण्य बना रहता है। न तो वह कभी निराश होता है और न हतोत्साह। वह जीवन-पथ पर निर्द्वन्द्व भाव और अप्रतिहत गति से बढ़ता चला जाता है। इसके विपरीत जो कर्म और कर्मफल को आत्माधारित करता है, वह अच्छे-बुरे परिणामों एवं परिस्थितियों से क्षण-क्षण प्रभावित होता हुआ लहराधीन व्यक्ति की तरह इतस्ततः आन्दोलित होता रहता है। इससे उसकी शक्तियाँ जल्दी ही शिथिल हो जाती हैं। और वह एक निष्क्रिय निराशा से घिरकर हतोत्साह हो जाता है।
शास्त्रों तथा मनीषी चिन्तकों ने गहरे अनुसंधान के बाद घोषित किया है कि कर्मों एवं कर्मफल में आसक्ति ही भव-बंधन का कारण है और बंधनों के कारण ही मनुष्य को अशाँति, असंतोष, शोक, संताप और आवागमन की यातना भोगनी पड़ती है। जिस दिन मनुष्य कर्म-बंधन से छूट जाता है, उसी दिन भव सागर से भी मुक्त हो जाता है। सूक्ष्म अथवा तात्विक विचार से अलग रहकर भी यदि साधारण तौर पर भी विचार किया जाये, तब भी पता चल जायेगा कि कर्मासक्ति निश्चय ही बंधनों का हेतु होती है। जिन कर्मों को हम अपना मानकर करेंगे और उसमें कर्तापन का अभिमान रखेंगे, तो उनका सारा दायित्व अपने ऊपर ही तो आ जायेगा और तब हमें उनके फलों से बंधना होगा, उनका भोग करना होगा। जिन कर्मों को हम करने जा रहे हैं, उनके विषय में अधिकारपूर्वक यह नहीं जान सकते कि आदि से लेकर अन्त तक हमारी कर्मगति निष्कलंक एवं निष्पाप है अथवा रहेगी। उनके आदि, मध्य अथवा अवसान तक कहाँ पर कौन-सा सूक्ष्म पाप उसकी लपेट में आ सकता है- इस बात को स्पष्ट अथवा प्रामाणिक रूप से नहीं जाना जा सकता। कर्मगति को, इसलिये बड़ा सूक्ष्म कहा गया है। कार्य के कारण उसकी प्रेरणा अथवा प्रवाह में कहाँ पर कौन सा स्खलन विनिहित हो सकता है। इसका आधिकारिक ज्ञान कार्यव्यस्त व्यक्ति के लिये संभव नहीं। यद्यपि यह अज्ञान क्षमा नहीं किया जा सकता। कर्मों में कर्तापन का भाव अथवा आसक्ति रखने पर उसका दायित्व अपने पर आयेगा ही। फलतः उसके बंधन में बंधना ही होगा।
यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि हमारी कर्म-शृंखला आदि से अन्त तक निष्कलंक एवं निष्पाप रहती है, तब भी उसमें आसक्ति रखने पर बन्धनों का अधिकारी बनना होगा। पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म दोनों ही, यदि वे आसक्ति से प्रेरित हैं, निश्चय ही बंधनों के कारण बताये गये हैं। बंधनों से रक्षा का केवल एक ही उपाय है कि कर्मों अथवा उनके फलों में कर्तापन का भाव अथवा आसक्ति न रखी जाये।
जब हम कर्म कर रहे हैं और स्पष्ट देख और समझ रहे हैं कि स्वयं ही इनको कर रहे हैं, तब भी उनमें कर्तापन का भाव न आये, यह बात भी कुछ कम कठिन नहीं है। तथापि तत्व-वेत्ताओं ने इसका भी बड़ा सरल उपाय बताया है- और वह इस एक उपनिषद् वाक्य में निहित है-
यद्यत् कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रह्मण समर्पयेत्।
‘जो-जो कर्म करें वह सब ब्रह्म को समर्पित कर दें।’
अपने समस्त कर्म, तदनुसार कर्मफल यदि परमात्मा को समर्पित कर दिये जायें, तो उनका कोई दायित्व अपने पर न रहे। ऐसी निरपेक्ष स्थिति द्वारा ही बंधनों से बचे रहा जा सकता है अन्यथा नहीं। समर्पण की इस भावना से सारे कर्मों का भार परमात्मा अपने ऊपर उसी प्रकार ले लेता है, जिस प्रकार तत्कृते कार्य करने वाले कर्मचारी के काम का दायित्व बड़ा अधिकारी अपने ऊपर ले लेता है। कर्म और कर्मफल में आसक्ति रखने पर मनुष्य को जिन अनुकूल-प्रतिकूल परिणामों के बीच से गुजरना पड़ता है और जिसके फलस्वरूप आशा-निराशा के झटके खाने पड़ते हैं, समर्पण की दशा में उसकी संभावना शेष नहीं रह जाती। मनुष्य सफलता-असफलता से प्रभावित हुए बिना निर्द्वन्द्व भाव से कर्तव्य-पथ पर अग्रसर होता रह सकता है। अपने कर्म और कर्मफल परमात्मा को समर्पित कर देने पर मनुष्य सफलता में हर्षातिरेक के कारण स्थगन और असफलता में निराशा के कारण प्रत्यावर्तन, इन दोनों अयोग्यताओं से बच जाता है।
किसी के काम से सफलता-असफलता दोनों ही सम्भाव्य हैं। दोनों का प्रभाव निष्क्रियता का कारण बन सकता है। तथापि सफलता की अपेक्षा असफलता का आघात अधिक गहरा होता है। इसको न सहन करने वाले बहुधा निराश ही हो जाते हैं। इस घातक स्थिति से बचे रहने के लिये कर्म और कर्मफलों को ब्रह्मार्पण कर देना एक पवित्र तथा अप्रतिहत उपाय है। ऐसा समर्पणशील व्यक्ति न कभी चिन्तित होता है और न निराश। अपने लक्ष्य के प्रति उसका आशावाद अजर-अमर बना रहता है, जिसके आधार पर वह निरन्तर बाधा-व्यवधानों की उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है-उसे पीछे लौटने की प्रवृत्ति नहीं होती। आशावाद ही जीवन और उसकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य है। इसका महत्व बतलाते हुए तत्ववेत्ता अरस्तू ने कहा है- ‘अपने कर्मों और उसके फल को ईश्वर पर छोड़ देने से आशावाद अजर-अमर बनता है। ईश्वर सभी तरह आशावाद का केन्द्र है। आशावाद और ईश्वरवाद एक ही रहस्य के दो नाम हैं।’
अपने कर्म और उनका परिणाम ईश्वर पर छोड़ देने से, कर्तव्यों का अपार भार सिर पर होने और लाख सफलता, असफलता आने पर भी मनुष्य तटस्थ बना रहता है। उसे आशा-निराशा, चिन्ता, दुष्चिन्ता कुछ भी नहीं होती। वह सदैव एक-सा प्रसन्न तथा स्वस्थ बना रहता है। संसार के महान उद्योग संचालक हेनरी फोर्ड ने एक प्रश्न के उत्तर में अपने व्यस्त तथापि स्वस्थ जीवन का रहस्य बतलाते हुए एक स्थान पर कहा हैं- ‘मैं ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबंधक मानता हूँ तथा स्वामी मानता हूँ और अपने आपको काम करने वाला श्रमिक। ईश्वर को अपने काया का प्रबंधक और स्वामी माँगने से फिर मुझे कोई चिन्ता नहीं रहती और इसी निश्चिन्तता के कारण मैं अधिक स्वस्थ और संतुष्ट रहता हूँ।’
इस प्रकार, कहना न होगा कि अनासक्ति कर्मयोग जीवन का एक बहुत बड़ा समाधान है। यदि आप चाहते हैं कि जीवन के उन्नत लक्ष्य तक पहुँच सकें, हारकर बीच रास्ते से न लौटना पड़े, तो अपने सारे कर्म और कर्मफल ब्रह्मार्पण करके अनासक्त कर्मयोग का आश्रय लीजिये और जीवन में लक्ष्य की सफलता के साथ कर्म-बंधन से मुक्त रह कर संसार-सागर से पार हो जाइये।
अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः।
स्क्कार्य मुद्धरेत्प्राज्ञः कार्यध्वंशो हि मूर्खता॥
अपमान को आगे कर, सम्मान की ओर कोई भी दृष्टि न रखकर बुद्धिमान पुरुष को अपना कार्य-साधन करना चाहिये, क्योंकि मानापमान के ध्यान में कार्य बिगाड़ लेना महान् मूर्खता है।
एक फ्राँसीसी पर्यटक जापान का भ्रमण कर रहा था। एक दिन उसकी भेंट सड़क पर बैठकर जूता गाँठने वाले एक बच्चे से हो गई। बच्चा उस छोटे से काम को बड़ी मुस्तैदी से कर रहा था- यह देखकर उस फ्राँसीसी को बड़ी दया आई। उसने अपना चमड़े का बैग ठीक कराया और बदले में एक रुपये का सिक्का दिया।
बालक रोजगारी निकालकर वापस करने वाले पैसे गिनने लगा, तो बड़ी उदारता दिखाते हुए फ्राँसीसी महोदय ने कहा- बच्चे! पैसे वापस करने की आवश्यकता नहीं, मैंने तुम्हें पूरा रुपया दिया है।’
‘किन्तु, श्रीमान् जी! मुझे रुपया नहीं, जितना काम किया है उतने पैसे चाहिए।’ कह कर बच्चे ने शेष पैसे वापस कर दिये और फ्राँसीसी के लाख कहने पर भी 10 पैसे से अधिक एक पैसा भी नहीं लिया।
आपरेशन थियेटर (आपरेशन का कमरा) डाक्टरों और नर्सों से खचाखच भरा था। असाधारण आपरेशन होने को था। मस्तिष्क का आपरेशन यों इन दिनों एक सामान्य बात हो चली है। पर इस आपरेशन का सम्बन्ध मनुष्य जीवन के एक असाधारण सत्य के रहस्योद्घाटन में था, उसी को देखने के लिये डाक्टरों की टीम जमा हुई थी।
रहस्य यह था कि यह जीवन मन की जिन अज्ञात (अनकान्शस) प्रेरणाओं से प्रभावित और क्रियाशील होता है वह पूर्व-जन्मों में मस्तिष्क में टेप किये हुए संस्कार होते हैं और अब विज्ञान उस दिशा में तेजी से अग्रसर हो रहा है। जब मस्तिष्क रूपी टेप रिकॉर्डर और टेलीविजन सेट के आधार पर यह विश्लेषण करना सम्भव हो जायेगा कि इस मनुष्य ने पिछले जन्मों में क्या कर्म किये हैं। इसके अदृश्य विचार और भावनाएं किस तरह रही हैं और उनके फलस्वरूप आगे वह किस प्रकार के अपराध या भलाई के कार्य करेगा। अमुक बीमारी, अमुक दिन, अमुक प्रकार की दुर्घटना होगी और उसके परिणाम यह तक हो सकते हैं। विज्ञान ऐसी भी जानकारियाँ प्रस्तुत कर सकता है। क्योंकि वह सब मस्तिष्क में पहले से तैयार रहता है।
यह आपरेशन अमरीका के विश्व-प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डॉ. विल्डर पेनफील्ड द्वारा किया जाने वाला था। डॉ. पेनफील्ड ने मस्तिष्क के अग्र भाग में 25 वर्ग इंच के लगभग और 1/10 इंच मोटे एक ऐसे क्षेत्र का पता लगाया है, जो काले रंग की दो अन्धकारपूर्ण पट्टियों के रूप में विद्यमान है। यह पट्टियों ‘टेम्पोरल कार्टेक्स’ कही जाती हैं और कनपटी के नीचे मस्तिष्क के चारों ओर से छल्लानुमा घेरे हुए हैं। यही वह पट्टी है, जिसमें मानसिक विद्युत का प्रवेश होते ही अच्छी-बुरी स्मृतियाँ उभरती हैं। डॉ. पेनफील्ड का कथन है कि इस पट्टी में विलक्षण स्मृतियों के टेप रिकार्ड भरे हुए हैं। उनमें यदि विद्युत आवेश प्रवाहित किया जाये, तो इतनी-सी पट्टी ही उस व्यक्ति के ज्ञात अज्ञात सारे रहस्यों को उगल सकती है, जिसे भयवश, लोक-लाज या संकोचवश भी मनुष्य व्यक्त नहीं कर पाता या जो कई जन्मों से संस्कार रूप से उसमें विद्यमान रहता है।
यह पट्टियाँ किसी केन्द्रक तत्व (न्यूक्लिक एलेमेन्ट) से बनी हैं और जब इनमें नहरें उठती हैं, तो उनसे प्रभावित नलिका विहीन नसों (डक्टलैस ग्लैंड्स) से एक तरह के हारमोन्स निकलते हैं (हारमोन्स एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ है) जो भिन्न-भिन्न आवेश अर्थात् क्रोध, घृणा, कामवासना, भय, ईर्ष्या, द्वेष, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहिष्णुता आदि भावों के समय विष या अमृत की तरह स्रवित होता और सम्पूर्ण शरीर की मशीनरी को प्रभावित करता है। अब मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक सभी यह मानने लगे हैं कि इन ‘हारमोन्स’ के कारण ही मनुष्य स्वस्थ या रोगी बनता है। यदि व्यक्ति में अच्छे गुण होते हैं, तो उससे अमृतपूर्ण हारमोन्स स्रवित होकर शरीर में हलकापन, स्निग्धता शक्ति और प्रसन्नता उत्पन्न करते हैं, जबकि बुरे विचारों का प्रभाव ठीक इससे विपरीत होता। आयुर्वेद का ‘पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधिरूपेण पीडतिः’ इसी सिद्धान्त का शास्त्रीय रूप है। उत्तरकाँड में तुलसीदासजी द्वारा वर्णित मानस रोग इसी तथ्य की पुष्टि और यह बताते हैं कि मनुष्य को इस जीवन में प्राप्त दुःख या सुख सब मनोभावों के परिणाम होते हैं। अच्छे भावों अर्थात् श्रद्धा, विश्वास, मैत्री, दया, क्षमा, सन्तोष आदि से जीवन-शक्ति बढ़ती है, तो दम्भ, पाखण्ड, अश्लीलता, विश्वासघात, हिंसा, विद्वेष आदि से वात, पित्त कफ, सन्निपात, दाद, कंडु, कुष्ठ, उदर-वृद्धि, डमरुआ, नेहरुआ ज्वर आदि पैदा करते हैं।
यह संस्कार इस जीवन के हों सभी मनुष्य रोगी बनें, यह आवश्यक नहीं। शास्त्रकार कहते हैं कि संस्कार जन्म-जन्मान्तरों तक मनुष्य का पीछा करते हैं-
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
-गीता 15।8
अर्थात् जिस प्रकार वायु जहाँ से गुजरती है, वहाँ की गन्ध भी साथ ले जाती है वैसे ही देह का स्वामी जीवात्मा भी पहले जिस शरीर को त्यागता है, उसके इन मन सहित सभी इन्द्रियों के संस्कारों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।
फिर यह विभिन्न संस्कारों वाला मन ही अच्छे-बुरे शरीर रोगी निरोग शरीर की रचना करता है-
मानसेदं शरीरं हि वासनार्थं प्रकल्पितम्।
क्रमिकोश प्रकारेण स्वात्मकोश इव स्वयम्॥
-योगवशिष्ठ 4।11।19
करोति देहं संकल्पात्कुम्भकारो घंट यथा॥
-योगवशिष्ठ 4।15।7
जिस प्रकार रेशम का कीड़ा अपने रहने के लिये अपने आप ही कोश तैयार कर लेता है वैसे ही मन ने भी अपने संकल्प से शरीर को इस प्रकार बनाया है जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाता है।
समस्या थी कि संस्कार जन्म-जन्मान्तरों से संग्रहीत कर्मफल हो सकते हैं इसका कोई प्रमाण शास्त्रों में नहीं था। पदार्थ को गौण मानने वाले ऋषियों ने उसका अध्ययन और ज्ञान प्राप्त न किया हो, यह बात नहीं। सम्पूर्ण सावित्री विद्या पदार्थ विज्ञान ही के नाम और वर्गीकरण का भेद भर है। चेतना को अति समर्थ और मुख्य मानने के कारण इस विज्ञान को भी आध्यात्मिक बना दिया गया, उसे प्रमाणित करने के लिये यन्त्र निर्माण की आवश्यकता नहीं समझी गई। वस्तुतः करना चाहते तो वह कुछ कर सकते थे, जो आज अमरीका और रूस भी नहीं कर सके। भौतिक विज्ञान की आज की उपलब्धियाँ इन तथ्यों को अक्षरशः सत्य सिद्ध करती हैं।
अमरीका में गिरिजाघरों के सलाहकार डॉ. पीले की तरह डॉ. सी. डब्ल्यू. लेब ने अपने अधिकाँश रोगियों का औषधोपचार आत्म-विश्लेषण पद्धति पर करने का नियम बनाया। वे रोगी के अन्तरंग में प्रवेश कर उसका भूत जानने का प्रयास करते। उसके कर्मों का अच्छी तरह पता चल जाने के बाद वे औषधि से उतना काम नहीं लेते थे, जितना आँतरिक सुधार की ओर ध्यान देते। एक बार उनके पास एक मृगी का ऐसा मरीज आया, जो बहुत उपचार करने पर भी अच्छा न हो सका। नियमानुसार श्री लेब ने उसे अपने घर बुलाया। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि आप अपने पिछले जीवन का पूरा इतिहास बता सकते हैं क्या? उस व्यक्ति ने बताया कि उसे नन्हे जीवों के शिकार का शौक रहा हैं। उसने केवल माँसाहार के लिये ही नहीं, शौकिया सैंकड़ों जीव-जन्तु मारे हैं। अब तो यह सब छोड़ चुका था, पर मरे हुए जीवों की तड़पन का दृश्य उसके मस्तिष्क में घूमता रहता और वही धीरे-धीरे मृगी के रूप में बदल गया।
डॉ. लेब ने उस रोगी को बताया कि अब वह प्रतिदिन अपनी कमाई का आधा भाग छोटे-छोटे जीवों को खिलाया करे। आधे का आधा निर्धनों, विधवाओं, छोटे बच्चों के स्कूलों को दान कर दिया करे। एक चौथाई अपने लिये रखकर अपना भरण-पोषण किया करे। उन्होंने प्रायश्चित के कुछ तरीके भी बताये और खान-पान में सुधार करने को भी कहा। इस तरह उस रोगी के स्वास्थ्य में बिना किसी उपचार के कुछ ही दिन में सुधार हो चला। जिसे बड़े-बड़े डॉक्टर असाध्य घोषित कर चुके हों, उसका इस तरह आध्यात्मिक पद्धति से तन्दुरुस्त हो जाना सचमुच एक आश्चर्य था, जिसने डॉ. पेनफील्ड जैसे विज्ञान, बुद्धि एवं तर्कशील व्यक्ति को भी उस दिशा में सोचने व प्रयोग करने को प्रेरित किया। डॉ. पेनफील्ड की उपलब्धियाँ अपना विशिष्ट महत्व रखती हैं और यह प्रमाणित करती हैं कि मनुष्य के मस्तिष्क में ऐसे अज्ञात खजाने हैं, जहाँ पूर्व जन्मों के असंख्य संस्कार माइक्रो प्रिन्ट की तरह टेप किये हुए हैं। समय पड़ने पर उन्हें खोला और पढ़ा भी जा सकता है। हमारे यहाँ के योगी केवल यह पहचान आकृति देखकर व्यक्ति के मुख-मण्डल से निकलने वाली अणु-आत्मा देखकर कर लिया करते हैं, जिस प्रकार अमरीका की महान् अणु-आभा वैज्ञानिक श्रीमती जे. सी. ट्रस्ट।
मस्तिष्क एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे पीड़ा का अनुभव नहीं होता। इसलिये उसका आपरेशन करते समय बेहोशी आवश्यक नहीं, श्री पेनफील्ड ने रोगी का टेम्पोरल कार्टेक्स खोल दिया। उसके एक हिस्से में हल्के करेंट वाला विद्युत तार स्पर्श कराया, और फिर क्या था- रोगी एक बढ़िया गीत गाने लगा। गीत किसी ऐसी भाषा का था, जो रोगी नहीं जानता था। बाद में पता चला कि वह जर्मन के किसी प्रान्त में बोली जाने वाली आदिवासी भाषा का क्रमबद्ध गीत था। तार वहाँ से हटाते ही उसने गीत गुनगुनाना बन्द दिया।
डॉ. पेनफील्ड ने एक अन्य प्रयोग से यह भी दिखा दिया कि मनुष्य साधारणतया जो देख या सुन लेता है, भले ही उधर उसका ध्यान न रहा हो, पर उसका भी मस्तिष्क में टेप हो जाता है और जब कभी वह व्यक्ति उस दिशा की बात सोचता है, तो वह दृश्य और शब्द भी अनायास ही मस्तिष्क में गूँज उठते हैं। ईश्वराभ्यासी आध्यात्मिक उपासक और योगी आत्माओं को स्वप्न में भूत, भविष्य के स्पष्ट दृश्य दीख जाते हैं। वह आत्म-चेतना की मानसिक एकाग्रता और इस अज्ञात पट्टी द्वारा उभार के फलस्वरूप होते हैं। आज के युग में जीन्स (गुण सूत्रों) को छाँटना सरल हो गया है पर कर्मफल की रेखाओं का मनुष्य जीवन के आदिकाल से समय जोड़ना, उसके अनेक जन्मों का विश्लेषण करना, यह उससे बहुत कठिन काम है तथापि वह दिन दूर नहीं, जब लोग डाक्टरों और वैज्ञानिकों से अपने कोई भी पाप न छिपा पाया करेंगे। तब चिकित्सा की पद्धतियाँ भी आजकल की तरह दवा-दारु की न होकर मानसिक और आध्यात्मिक हुआ करेंगी। जो अपने मानसिक और आत्मिक स्तर को सुधार सकता है, वही रोग-शोक उत्पन्न करने वाले पूर्वजन्मों के कुसंस्कारों का प्रक्षालन कर स्वस्थ और नीरोग रह सकता है। बेचारी दवाइयाँ न कभी रोग का निदान रहीं और न रहेंगी। अन्ततः आध्यात्मिक उपचार ही मनुष्य का साथ देंगे। डॉ. पेनफील्ड की शोधों का यही सार है।
मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि पापेन लोकद्वयविरोधिना॥
मनुष्य यदि श्रेष्ठ पुण्य कर्म करता हुआ मुहूर्त के लिये भी जीता है, तो वह श्रेष्ठ है। किन्तु यदि पाप-कर्म करता हुआ (जो कि दोनों लोकों के विरोधी हैं) एक कल्प तक भी जीवित रहता है, तो वह अच्छा नहीं। क्योंकि पाप-कर्म करके जीने से मरना भला है।
गरुड़ ने अपने बच्चे को पीठ पर बैठाया और उसे अपने साथ दूसरे सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। दिन भर दोनों दाना चुगते रहे, सायंकाल घर लौटे, तब भी गरुड़ ने अपने बच्चे का यातायात प्रयोजन साध दिया।
यह क्रम बहुत दिन चला। गरुड़ ने बहुतेरा कहा, पर बच्चे ने उड़ना न सीखा। उसकी धारणा थी- जब तक निःशुल्क साधन उपलब्ध हो, तब तक स्वयं श्रम क्यों किया जाये। गरुड़ बच्चे की इस दुर्बलता को बड़ी सतर्कता से देखता रहा।
एक दिन जब वह आकाश में उड़ रहा था, तब धीरे-से अपने पंख खींच लिये। बच्चा गिरने लगा, तब चेत आया-पंख फड़फड़ाये। गिरते-गिरते बचा। पर अब उसने उड़ना सीखने की आवश्यकता अनुभव कर ली।
सायंकाल बालक-गरुड़ ने माँ से कहा-माँ! आज पंख न फड़फड़ाये होते, तो पिताजी ने बीच में ही मार दिया होता।
मादा गरुड़ हंसी और बोली-बेटे! जो अपने आप नहीं सीखते, स्वावलम्बी नहीं बनते उन्हें सिखाने-समझाने का यही नियम है।
सन् 1939 में न्यूयार्क (अमेरिका) में विश्व मेला आयोजित किया गया। उसमें देश-देशान्तर के दर्शनीय सामान प्रदर्शित और विक्रय किए गये। मेले का सबसे बड़ा आकर्षण थी-एक पिटारी, जो लंबाई में तो कुल साढ़े सात फीट, भार में कुल 800 पौंड ही थी। पर उसमें ज्ञान-विज्ञान की इतनी सामग्री रख दी गई थी, जितने को यदि केवल एक लंबे पेज की पुस्तक का आकार दिया जाता तो वह पाँच हजार मीटर से कम नहीं होती। इतनी लंबी दूरी में तो फायलिब्रा लाइब्रेरी की सारी पुस्तकें आ सकती हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि संसार की ऐसी कोई पुस्तक नहीं, जो उसमें न हो।
यह पिटारी पृथ्वी में इस दृष्टि से गाड़ी गई थी कि बीच के समय में कभी कोई ऐसा भूकम्प, युद्ध या प्रलय हो जाये, जिसमें वर्तमान सभ्यता ही नष्ट हो जाये, तो आज से कई हजार वर्ष बाद भी यदि उस पिटारी को बाहर निकाल लें तो इस युग की सामान्यतः सभी प्रमुख बातों का पता चल जाये। उस समय की सभ्यता का आकार-प्रकार निश्चित करने वाले सभी साज-सामान इस नन्हीं सी पिटारी में बन्द कर दिये गये।
‘टाइम-कैप्सूल’ नामक इस डिब्बे में क्या रख जाये? उसके लिये संसार भर के विद्वान्-वैज्ञानिकों, पुरातत्ववेत्ताओं, लेखकों, सम्पादकों, लाइब्रेरियनों, इतिहासज्ञों की बैठक बुलाई गई थी। उन्होंने जो सामग्री चयन की, वह सब इस ढंग से इस युग-मंजूषा में रखी गयी कि इस नन्हीं-सी पिटारी में एक अरब शब्द, 1000 चित्र, अंग्रेजी में परिचय सहित ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ की सभी जिल्दें, एक पूरा वृत्तचित्र जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति रुजवैल्ट का भाषण भी, ‘गौन विद दि विण्ड’ नामक उपन्यास के साथ सैंकड़ों अन्य पुस्तकें भी थीं। इसके अतिरिक्त दाढ़ी बनाने की सामग्री, सौंदर्य-प्रसाधन, साबुन, मंजन आदि स्थूल वस्तुएँ भी रखी गई थीं।
इसके बाद 16 अक्टूबर 1965 को एक दूसरा ‘टाइम कैप्सूल’ भी भूमि में दबाया गया। इसमें पहले से भी अधिक जानकारी तथा वस्तुयें संग्रहीत की गईं। उसका वजन तो अवश्य बढ़ाकर 600 पौंड कर दिया गया था, पर लंबाई पहले की अपेक्षा कुछ कम ही थी। ‘क्रोमार्क स्टेनलैस स्टील’ द्वारा निर्मित इस पिटारी को रासायनिक पदार्थों द्वारा इस तरह तैयार किया गया है कि 5 हजार वर्ष तक भी पृथ्वी में गड़ा रहे तो भी उसमें जंग न लगे, कोई भीतरी खराबी पैदा न हो। इन कैप्सूलों की जानकारी देने के लिये संसार भर के तीन हजार पुस्तकालयों में उस तरह के शिलालेख तैयार किये गये हैं, जिस तरह आज लाखों वर्ष पूर्व के शिलालेख मिल जाते हैं, तो उनसे उस समय की परिस्थितियों की जानकारी मिलती है और संस्कृति के विकास में सहयोग। उसी प्रकार टाइम कैप्सूलों में बंद यह अथाह जानकारियाँ उस समय आज के युग की तमाम सारी जानकारियाँ सीमित स्थान में ही दे डालेंगी।
पूरे एक युग को अति सूक्ष्म करके 5000 मीटर लंबे ज्ञान के भाण्डागार को कुल साढ़े सात फीट के बक्से में बन्द कर दिया जाना सचमुच आश्चर्यजनक है। पर यह आश्चर्य केवल भौतिक विज्ञान के विद्यार्थियों को ही हो सकता है, किन्तु ‘अणोरणीयान् महतोमहीयान्’ महान् से महान् आत्मा अणु से भी अणुरूप है। तथा- ‘बालाग्र शतभागस्य शतधा कल्पितस्य च, भागो जीवः स विज्ञेयः स चान्त्याय कल्पते॥’ (श्वेताश्वेतरोपनिषद् 5/9, अर्थात् बाल के अग्रभाग के सौवें अंश के भी सौवें अंश के परिमाण वाला भाग ही प्राणी का स्वरूप जानना चाहिये। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिमाण वाला आत्मा असीम गुण वाला हो गया है।’ के जानने वाले अध्यात्म-विद्या विशारद हम भारतीयों के लिये इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं है। हमारी मान्यता तो विज्ञान की इन उपलब्धियों से भी सूक्ष्म और यह है कि अणुरूप आत्मा में एक सौर मण्डल में विद्यमान जो कुछ भी है, सब कुछ है। संसार भर में जो कुछ भी स्थूल सूक्ष्म है वह परमात्मा नाम के किसी अति सूक्ष्मतम ‘क्रिस्टल’ में विद्यमान है।
एकाक्षरोपनिषद् में इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है-
स एष देवोऽम्बरयान चक्रे अन्येऽभ्य तिष्ठेत् तमो निरुन्ध्यः।
(पूर्वार्द्ध श्लोक 8)
अर्थात् उस ब्रह्म के गर्भ में सारा ही ब्रह्माँड समाया हुआ है जबकि वह स्वयं ‘अंगुष्ट मात्रो रवितुल्य रूपः संकल्प अहंकार समन्वितो यः’ अर्थात् अंगुष्ठ मात्र स्वरूप में भी वह सूर्य के समान है। उसी में उसका संकल्प और अहंकार (अर्थात् सारा ज्ञान-विज्ञान) भरा पड़ा है।
अणु से अणु में महत् से महत् की कल्पना बड़ी विचित्र है। किन्तु इस सत्यता में कोई संदेह नहीं है। यह पिटारी उसका बहुत ही मोटा उदाहरण है। होता यह है कि कैसी भी मोटी और लंबे पन्नों वाली पुस्तक हो, उसकी माइक्रोफिल्म प्रतियाँ उतार ली जाती हैं। जिस प्रकार शीशे के ताल (लेन्स) की मदद से छोटी-से-छोटी वस्तु को बड़ा-से-बड़ा बनाकर दिखाया जा सकता है (पालिमोर आदि वेधशालाओं में ऐसे शक्तिशाली दूरबीन यंत्र हैं, जो करोड़ों मील दूर के ग्रह-नक्षत्रों को भी बड़ा करके दिखा देते हैं) उसी प्रकार बड़ी-से-बड़ी वस्तुओं को छोटा-से-छोटा किया जा सकता है। माइक्रोफिल्म में अधिकतम विस्तार वाली पुस्तकों को इतने नन्हें-नन्हें अक्षरों में अंकित कर दिया जाता है कि 1000 पृष्ठ की पुस्तक भी सिगरेट के पैकेट जितनी मोटाई में आ जाये। अलादीन के चिराग में बन्द भीमकाय असुर की कल्पना को कभी मिथ्या माना जाता था, पर आज का अणु विज्ञान उससे भी अधिक सूक्ष्म में विराट् की कल्पना तक उतर आया है। मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे कोशों (सेल्स अर्थात् मनुष्य शरीर जिस प्रोटोप्लाज्म नामक जीवित पदार्थ से बना है, उसका सबसे छोटा टुकड़ा) से बना है। उसकी लघुता की कल्पना नहीं की जा सकती। उसके भीतर उससे भी सूक्ष्म कण विद्यमान् हैं। उदाहरण के लिये परमाणु का व्यास .0000001 मि. मी. है, तो उसके केन्द्रक का व्यास .00000000001 मि. मी. होगा। अब इस केन्द्रक में भी एक विशेष प्रकार की रासायनिक बनावट होती है, जिसे क्रोमोसोम या गुणसूत्र कहते हैं। रासायनिक भाषा में इसे ही डी.एन.ए. कहते हैं। उसकी आकृति मरोड़ी हुई सीढ़ी के समान होती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस ‘डी.एन.ए.’ में सारे संसार भर का दृश्य, श्रव्य और ज्ञान भरा हुआ है। एक केन्द्रक की डी.एन.ए. में जो भाषा अंकित होती है उसमें 1000000000 अक्षर होते हैं, जबकि सम्पूर्ण शरीर में ऐसे 600 खरब कोशिकायें होती हैं। यदि 600 खरब कोशों में अक्षर खोदे जायें तो अकेले मनुष्य शरीर में ही 60000000000000+1000000000 अर्थात् 6000000000000000000000 अक्षर आ जायेंगे। फ्लशिंग मेडो (न्यूयार्क का वह स्थान जहाँ दोनों टाइम कैप्सूल जमीन में गाड़े गये हैं) में गाड़ी गई इस पिटारी में जबकि कुल 10000000 अक्षर ही थे। तब यह मानना चाहिये कि मनुष्य शरीर में तो ऐसी 60000000000000 पिटारियों का ज्ञान भरा होना चाहिये।
ब्रह्माँड की तुलना में मनुष्य का स्वत्व नितान्त अस्तित्वहीन है, पर उसकी लघुता ही विराट को माप सकती है, इसलिये हमें सदैव छोटा बनकर जीना चाहिए।
-होरेस ग्रिले
कोश (सेल) जिस प्रकार ज्ञान, गुण और संस्कारों से मुक्त नहीं उसी प्रकार वह पदार्थ से रहित भी नहीं रह सकता जबकि पदार्थ कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं, ब्रह्माँड का गुण मात्र है। इसलिये यह समझने में कोई दिक्कत नहीं कि शरीर रूपी पिटारी में ज्ञान-विज्ञान के अनादि स्रोत ही नहीं, पदार्थ की स्थूल संस्कृतियाँ भी निश्चित रूप से बन्द हैं। जमीन में गाड़े गये टाइम कैप्सूल तो कभी खराब भी हो सकते हैं, मनुष्य शरीर जैसा कैप्सूल तो हर किसी के लिये हर समय उपलब्ध है। विज्ञान जहाँ आज ब्रह्माँड में पहुँच के अनेक रहस्य खोल रहा हैं, वहाँ उसकी उपलब्धियाँ और इस तरह के प्रमाण इस बात के साक्षी हैं कि मनुष्य पदार्थमय जगत् के विस्तार में जो कुछ पाना चाहता है वह सब बीज रूप में उसके भीतर ही बन्द हैं, इसके लिये अन्यत्र भटकने की आवश्यकता नहीं। यह सब एक सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में क्यों नहीं आता, विज्ञान अथवा योगियों की दृष्टि में ही यह सब क्यों हैं? यह एक प्रश्न है, इसका उत्तर विज्ञान और योग दोनों का एक ही है। वह यह कि सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचने के लिये अपनी इन्द्रियों को भी सूक्ष्म बनाना होगा। टाइम कैप्सूल में वह सब यन्त्र रखे गये हैं, जिनकी मदद से पिटारी में बन्द सभी वस्तुओं को कभी भी खोलकर जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं, उसी प्रकार अपनी चेतना को सूक्ष्मावस्था में प्रवेश कराकर हम भी समय, गति और ब्रह्माँड से परे उन सभी वस्तुओं को समझने, जानने और प्राप्त करने में समर्थ हैं-जो स्थूल दृष्टि से देखने में लाखों-करोड़ों मील दूर, अब नहीं भविष्य में होने वाली हैं या पहले कभी हो चुकी हैं।
मनुष्य की नसें प्रति सेकेण्ड कुल 700 कम्पनों की अनुभूति ग्रहण कर सकती हैं। कान 15000 साइकिल प्रति सेकेण्ड की ही ध्वनि सुन सकते हैं, आँखें बैंगनी रंग से ऊँची फ्रीक्वेन्सी वाले रंग नहीं देख सकती। पर विद्युत विशेषज्ञ श्री निकोला टैसला ने सिद्ध कर दिया कि यदि विद्युत क्षमता बढ़ाकर इन फ्रीक्वेन्सियों को बढ़ाया जा सके, तो मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियाँ और भी सूक्ष्म अवस्थाओं की अनुभूति कर सकती हैं। ध्यान द्वारा आत्म-चेतना को एक सूक्ष्मतम् बिन्दु में एकाग्र करना इसी सिद्धान्त पर आधारित एक महान योग-प्रक्रिया है, जिससे शरीर रूपी टाइम कैप्सूल में बन्द विराट को भी सूक्ष्म रूप में अध्ययन और अनुभूति कर हम वह सब प्राप्त कर सकते हैं, जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माँड में पहले से विद्यमान है।
बड़ा कौन-
एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मानव-शरीर में वे पाँचों तत्व ही आपस में उलझ बैठे, जिनसे इस शरीर का निर्माण हुआ है।
वायु कहता था- ‘मैं सबसे बड़ा हूँ। मैं न आऊँ, तो श्वास हीन होकर एक क्षण में ही जीवन-लीला समाप्त हो जाये।’
तब पृथ्वी-तत्व बोला- ‘अरे, मुझसे तो ये शरीर खड़ा हुआ दीखता है। इन्द्रियों का आकार न हो, तो तुम सब अपनी अभिव्यक्ति कैसे कर सकोगे?’
जल-तत्व भी चुप न बैठा। उसने कहा- ‘जीवन का आधार तो मैं हूँ। रस न हो, तो सब कुछ पलक मारते समाप्त।’
अग्नि ने अब ठहाका लगाया और कहने लगा- ‘अरे, मेरी क्षमता तथा महत्व का अनुमान तो तुम लगा ही नहीं सकते। मैं न रहूँ, तो ये शरीर क्षण मात्र में बर्फ हो जाये।’
आकाश-तत्व ने बड़ी हेकड़ी से कहा- ‘मेरी उपयोगिता का मूल्याँकन तुम सबकी पहुँच से परे है। समस्त सूक्ष्म शक्तियों का संचालन तो मैं ही करता हूँ। शब्द मेरी तन्मात्रा है, मैं न रहूँ तो संसार खामोशी में डूबा समुद्र लगने लगे।’
आत्मा बैठा-बैठा यह संवाद सुन रहा था। उसने धीरे-से शरीर में से प्रयाण कर दिया। पाँचों तत्व उसके पीछे-पीछे ऐसे चल दिये, जैसे मधु-मक्खियों के छत्ते से उनकी रानी चल देती है, तो सारी मक्खियाँ उसके पीछे-पीछे चल देती हैं।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. ए. वाचमैन और डॉ. डी. एस. बर्नस्टीन को आश्चर्य था कि माँस से स्वास्थ्य में सुधार की मान्यता के बावजूद माँसाहारियों की हड्डियाँ कमजोर क्यों होती हैं? इस बात का निश्चित पता लगाने के लिये दोनों वैज्ञानिकों ने माँसाहारियों तथा शाकाहारियों की शारीरिक गतिविधियों का लंबे समय तक अध्ययन किया।
जो निष्कर्ष सामने आये, वह माँसाहारियों को चौंका देने वाले थे। इन वैज्ञानिकों ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में बताया-माँसाहारियों के मूत्र की जाँच से पता चला है कि उसमें अधिकाँश मात्रा तेजाब और क्षार की होती है। यह तेजाब और क्षार शरीर के शुद्ध रक्त से माँस पचाने के लिये तेज हुई शारीरिक मशीन की गर्मी के कारण उसी तरह स्खलित होता है जिस तरह कामुक चिन्तन से वीर्य। बड़ी मात्रा में पेशाब के साथ रक्त का जो क्षार और तेजाब बाहर निकल आता है। उसे पूरा करने के लिये शरीर में हड्डियों के अतिरिक्त और कोई दूसरा स्रोत मिलता नहीं। फलस्वरूप रक्त अपना संतुलन बनाये रखने के लिये क्षार और तेजाब हड्डियों से चूसने लगता है। इस प्रकार माँसाहारी व्यक्ति की हड्डियाँ कमजोर होती चली जाती हैं।
यह तो शरीर प्रणाली में उत्पन्न हुई पहली अवस्था हुई। सच बात यह है कि इस अनपेक्षित प्रतिक्रिया का दूषित प्रभाव शरीर और मन सब पर पड़ता हैं। यह नहीं मानना चाहिये कि रक्त हड्डियों से आवश्यक सामग्री ले लेता है, तो उसकी अपनी तेजस्विता स्थिर हो जाती हैं। लन्दन के सुप्रसिद्ध डॉक्टर अलेक्जेण्डर हेग एम. ए. एम-डी., एफ. आर. सी. पी. (लन्दन) ने एक पौंड माँस के यूरिक एसिड विष का अध्ययन करने के बाद पाया कि-
काड मछली में 4 ग्रेन, पलीस मछली में 5 ग्रेन, सुअर के माँस में 6 ग्रेन, भेड़-बकरी में 6.5 ग्रेन, बछड़े के माँस में 8 ग्रेन, सुअर की कमर और रान के हिस्से वाले माँस में 8.5 ग्रेन, चूजे में 9 ग्रेन, गाय की पीठ और पुट्ठे वाले अंगों के माँस में 9 ग्रेन, बोटी जो भूनकर खाई जाती है उसमें 14 ग्रेन, जिगर में 19 ग्रेन और शोरबे में 50 ग्रेन विष पाया जाता है।
‘यह विष जब सामान्य स्थिति में रहता है, तब तक उसके दुष्परिणाम दिखाई नहीं देते। पर कुछ ही दिन के माँसाहार के बाद जब यह विष रक्त में अच्छी तरह मिल जाता है तब दिल की जलन, जिगर की खराबी, साँस रोग, रक्त-अल्पता, टी.बी., गठिया, हिस्टीरिया, आलस्य, निद्रा का अधिक आना, अजीर्ण, शरीर में दर्द, मौसम के हल्के परिवर्तन से जुकाम व एन्फ्लुएंजा हो जाना, निमोनिया व मलेरिया आदि सैंकड़ों बीमारियाँ हो जाती हैं।
इन दुष्परिणामों को देखकर ही ‘लैं ऐण्ट’ पुस्तक के 1962 के संस्करण में वाल्यूम 1 पृष्ठ 958 में अमेरिका के उक्त दोनों डाक्टरों ने लोगों से अपील की है कि कमजोर हड्डियों वाले लोगों तथा माँसाहार द्वारा रक्त-दूषण से बचने के लिये अधिकतर फल, सब्जियाँ, सब्जियों के प्रोटीन और दूध का सेवन करना चाहिये। शाकाहार से माँसाहार की अपेक्षा शक्ति और पोषक तत्व भारी मात्रा में मिलते हैं। यह लाभ देखकर आज अमेरिका में लाखों लोग माँसाहार त्यागकर शाकाहारी बन रहे हैं। अब वहाँ शाकाहारियों की संख्या 5 करोड़ तक जा पहुँची है। फिर भारत जैसे जीव-दया, अहिंसक तथा शाकाहारी देश में लोग माँस खायें, तो यह निरा पागलपन ही होगा।
माँस खाने में कोई आपत्ति नहीं, पर ऐसा करते हुए मनुष्य को यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि सृष्टि में मानवीय सभ्यता नाम की कोई वस्तु शेष नहीं। माँस मानवता को त्याग कर ही खाया जा सकता है।
-स्पेन्सर
‘हे तात्! मरकत मणि, सुवर्णनिस्क, मुक्तामाल यह सब बहुमूल्य आभूषण यदा-कदा धारण किये जाते हैं। अधिकांश समय तो उनकी सुरक्षा-व्यवस्था में ही जाता है। इसलिये इन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपने पास नहीं रख सकते। किन्हीं सम्राट-सम्राज्ञियों, श्री-सामन्तों के पास ही वे सुरक्षित रह पाते हैं। सिद्धि भी ऐसी ही एक बहुमूल्य संपदा है, जिसे सुरक्षित रख सकना सबके लिये संभव नहीं। साँसारिक सुखोपभोग के आकर्षण में अधिकाँश योगी उसका विनिमय कर डालते हैं। उनकी अन्तगति तो राज्य से निष्कासित चक्रवर्ती सम्राट और मणिहीन फणि की सी दयनीय हो जाती है। इसलिये विधान यह है कि जो उपयुक्त पात्र हो, जिसे तितिक्षा की कसौटी पर भली प्रकार कस लिया गया है उसे ही सिद्धि का अधिकार प्रदान किया जाये।’
यह कहकर महामुनि क्रौष्टक चुप हो गये। उनकी मुख-मुद्रा देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे अब उनकी चेतना विचारों के अगाध सागर में विलीन हो गई हो। वे कुछ गंभीर चिन्तन में निमग्न हो गये हैं-ऐसा समझकर कुछ आगे की बात न करके शिष्य सौभरि भी चुप हो गये और वहाँ से उठकर आचार्य देव के लिये सन्ध्यादि के प्रबन्ध में जुट गये।
देर तक विचार करने के बाद भी क्रौष्टक अन्तिम निर्णय न कर सके कि सौभरि को सिद्धि प्रदान करने वाली उच्चस्तरीय साधनाओं का अधिकार प्रदान किया जाय अथवा नहीं। उनकी करुणा, उनका सहज स्नेह उमड़ता और कहता सौभरि ने तुम्हारी बड़ी सेवायें की हैं, उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिये। किन्तु शास्त्र-अनुभव आड़े आ खड़े होते और पूछते-क्रौष्टक! सिद्धि पान के बाद भी क्या तुझे विचलित करने वाली परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा? क्या तुझे इन्द्रिय लालसाओं के दमन में अत्यधिक कठोरता बरतनी नहीं पड़ी? क्या यह संभव है कि सिद्धि पाने के बाद सौभरि को ऐसे सामाजिक जीवन के अनिवार्य सन्दर्भों का सामना नहीं करना पड़ेगा? मान लो, यदि सौभरि तब अपने को न संभाल पाया, तो होगा न सिद्धि का दुरुपयोग? क्या यह ठीक नहीं, कि पहले उसे अग्नि-दीक्षा में कसकर देख लिया जाये? पीछे पंचाग्नि साधना में प्रवेश दिया जाये?
क्रौष्टक का अन्तिम निर्णय यही रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही शिष्य सौभरि को उन्होंने अपने समीप बुलाया और बड़े स्नेह के साथ कहा-वत्स! आश्रम जीवन की कठोरता के कारण तुम थक गये होगे। आओ, मैं तुम्हारे पैरों में एक अभिमन्त्रित औषधि का लेप करता हूँ। उससे तुम जहाँ भी पहुँचने की इच्छा करोगे, वायु-वेग से वहीं जा पहुँचोगे और जब तक चाहोगे वहाँ पर विचरण करते रह सकोगे। इससे तुम्हारा श्रम, तुम्हारी उद्विग्नता दूर हो जायेगी।
गुरुदेव के वचन और इस अप्रत्याशित परिस्थिति पर सौभरि को आश्चर्य अवश्य हुआ किन्तु देश-भ्रमण की लालसा वेगवती हो उठी, सो उसने गुरुदेव की योजना का कोई विरोध नहीं किया।
क्रौष्टक ने सौभरि के पाँवों में अभिमन्त्रित औषधि का लेप कर दिया। ‘अब मुझे महेन्द्र पर्वत (हिमालय) चलना चाहिए’-ऐसी इच्छा करते ही सौभरि क्षण-भर में उत्तर दिशा की ओर उड़ चले। उस रमणीय हिम और पुष्पलताओं से आच्छादित सुरम्य शिखरावली तक पहुँचने से उन्हें कुछ ही क्षण लगे। यहाँ की श्री, वन-सौरभ स्वर्ग से भी बढ़कर अतुलित सौंदर्य वाले देखकर सौभरि का मन बड़ा प्रसन्न हुआ। वे भूमि पर उतर कर बहुत देर तक वहाँ विचरण करते रहे।
सुख की अभीप्सा है ही कुछ ऐसी कि व्यक्ति के विवेक को, चातुर्य और जागरुकता को थोड़ी ही देर में नष्ट कर डालती है। ध्यान रहा नहीं। सौभरि के पैर शीतल तुषार में चलते रहे और धीरे-धीरे पैर में लगा सारा अनुलेप धुल गया। जब उनके मन में वापस लौटने की इच्छा हुई, तब पता चला कि वहाँ से वापस लौटा ले चलने वाली शक्ति तो नष्ट हो चुकी। सौभरि बड़े दुःखी हुए और पश्चाताप करने लगे। आज पहली बार उन्हें किसी सिद्धि के प्रति घृणा और मानवीय पुरुषार्थ के प्रति विराट आस्था का बोध हुआ। उन्होंने अनुभव किया-यह सामर्थ्य आत्म पराक्रम में ही है, जो व्यक्ति को चरम सीमा तक पहुँचा कर वहाँ से उद्धार भी कर सकता है।
सौभरि अभी इस तरह के विचारों में खोये ही थे कि उन्हें उस पर्वतीय उपत्यिका में शनैः-शनैः समीप आती हुई सी पायलों की मधुर झंकार सुनाई दी। सौभरि सोचने लगे-यहाँ और कौन हो सकता है? तभी तिलोत्तमा के समान अप्रतिम सौंदर्य वाली मौलेया अप्सरा वरुथिनी वहाँ आ उपस्थित हुई। सौभरि को उसने दूर से ही देख लिया था। वह सौभरि की सुगठित देहयष्टि और उनके दीप्तिमान सौंदर्य के प्रति आसक्त हो उठी था। सौभरि को आकर्षित कर प्रणय-जाल में बाँध लेने की इच्छा से वह जितना शृंगार कर सकती थी, किए थी। स्वर्णथाल में लाये वस्त्राभूषण, सुगन्धित अनुलेप और मधुर भोज्य प्रस्तुत करते हुए वरुथ ने एक लुभावनी दृष्टि सौभरि पर डाली और बोली-महाभाग! मैंने पूर्व जन्म में कोई श्रेष्ठ पुण्य किया है, तभी आप जैसे प्रतापी सिंह पुरुष को पाने का सौभाग्य मिला है।
‘ओह भद्रे!’ बहुत देर बाद सौभरि का कण्ठ फूटा- ‘मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ? तुम्हें किसी ने बन्दी बनाया हो तो शीघ्र बताओ, मैं अभी उसे मारकर तुम्हें मुक्त कर सकता हूँ। तुम पर किसी ने ओछी दृष्टि डाली हो तो बताओ- आर्ये! तुम निश्चय जानो मैं उसका मान-मर्दन करने में किंचित भी डरूंगा नहीं।’
यह सब होता तो वरुथिनी कहती भी। वह तो उस योग-माया की तरह आई थी, जो संसार को क्षणिक सुख के आकर्षण में बाँधकर पारलौकिक सुख, संयम, शक्ति और जीवन में विच्युत किया करती है। एक क्षीण किन्तु मर्माहत कामुक दृष्टि से निक्षेप करते हुए वरुथ ने कहा- देव पुरुष! आपको पाकर मुझे अब एक ही वस्तु प्राप्त करने की इच्छा रह गई है। आप जानते होंगे- स्त्री पत्नी बनने के बाद एकमात्र मातृत्व की इच्छा रखती है। सो मैं भी उसी लालसा से आपकी सेवा में प्रस्तुत हुई हूँ। महान पुरुष किसी की इच्छा ठुकराते नहीं। -यह कहती हुई वरुथ सौभरि के बिल्कुल समीप तक जा पहुँची।
यह तो कहो आध्यात्मिक संस्कार बड़े बलवान थे कि वरुथ का आकर्षण-जाल सौभरि को बाँध नहीं पाया। उन्होंने कहा-भद्रे! मैंने जिस क्षण तुम्हें देखा उसी समय मुझे अपनी कनिष्ठ सहोदरा का ध्यान आया था। तुम मेरी बहिन के समान हो। मैं तुम्हारे साथ समागम कैसे कर सकता हूँ?
कुचली हुई नागिन की तरह वरुथ की वासना भीतर-ही-भीतर फुँकार उठो। पर उसे दबाते हुए वरुथ ने एक तीर और छोड़ा- आर्य श्रेष्ठ! किसी की इच्छा पूर्ण करने से बड़ा पुण्य और याचक को खाली हाथ लौटाने से बड़ा पातक नहीं। सोच लो, तुम्हें पुण्य और पाप में से किसे वरण करना है?
सौभरि ने कहा- भद्रे! अनैतिक आचरण से पुण्य प्राप्त होता हो, तो मुझे ऐसा पुण्य नहीं चाहिए। समाज की व्यवस्था का मूल आधार नैतिकता है। उसे नष्ट, करके मैं स्वर्ग की भी इच्छा नहीं कर सकता।
यह कहकर सौभरि ने जैसे ही आगे पग बढ़ाया कि उनके इष्ट ‘आह्वानीय अग्निदेव’ अपनी सौम्य मुद्रा में खड़े दिखाई दिये। उनके मध्य गुरु क्रौष्टक की मनोहारी छवि परिलक्षित हो रही थी। वे कह रहे थे- तात! तुम सिद्धि के सच्चे अधिकारी हो।
गुरु के चरणों में प्रणिपात करते हुए सौभरि ने कहा- देव! अब मुझे सिद्धि की कामना नहीं रही। आप तो ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि अपने शील की रक्षा करते हुए संसार में जीऊँ और जीवन का अन्त हो, तब तक निष्कलुष ही बना रहूँ।
कठिनाइयों का मानव-जीवन में बड़ा महत्व है। यह बात सुनने में बड़ी अजीब सी लगती है, लेकिन है सत्य। कोई सोच सकता है कि जिन कठिनाइयों से कष्ट होता है, प्रगति में बाधा पड़ती है वे किसी के जीवन के लिये महत्वपूर्ण किस प्रकार हो सकती है? जीवन में महत्व तो सुविधा का होता है जिससे आराम मिलता है और प्रगति का लक्ष्य आसान होता है। यह विचार किसी हद तक सही होने पर भी अपूर्ण है। यदि कठिनाइयों के महत्व पर गहराई से विचार किया जाय तो पता चलेगा कि कठिनाइयाँ मानव जीवन की सार्थकता के लिये जरूरी हैं।
सोने के लिये आग का जो महत्व है, वही महत्व, मानव-जीवन के लिये कठिनाइयों का है। सोना जब आग में अच्छी तरह तप लेता है तभी वह पूरी तरह निखरता है और हर प्रकार से इस संसार में अपना उचित मूल्य पाता है। इसी प्रकार जब मनुष्य कठिनाइयों के बीच से गुजरता है तो उसकी बहुत सी कमियाँ और विकृतियाँ दूर हो जाती हैं। वह शुद्ध सोने जैसा खरा और मूल्यवान हो जाता है। जब तक मनुष्य पूरी तरह सुख-सुविधा में रहता है, तब तक एक प्रकार से उसकी आँख बन्द रहती हैं। अपनी मौज में वह जो चाहता है करता रहता है। इस प्रकार के अल्हड़ जीवन-यापन में मनुष्य में अनजान में ही अनेक दोष और विकार आ जाते हैं किन्तु उस सुख-सुविधा की स्थिति में उसे उनका पता नहीं चलता। अपने उन विकारों तथा दोषों का पता उसे तभी चलता है जब किसी कठिनाई के आने पर उसकी आँखें खुलती हैं।
यह मानव-स्वभाव की विचित्रता ही है कि वह सुख-सुविधा के समय तो असावधानी बरतता है किन्तु मुसीबत आने पर अधिक से अधिक सावधान शुभ तथा शुद्ध रहने का प्रयत्न करता है। बड़े-बड़े आस्तिक लोग भी संपत्ति की स्थिति में ईश्वर को भूले रहते हैं, उन्हें सुख के नशे में उसकी याद तक नहीं आती। पर जब कोई विपत्ति सिर पर आ जाती है तो वे बड़ी तत्परता से परमात्मा का स्मरण ही नहीं उसकी उपासना तक करने लगते हैं। इस विरोधी प्रतिक्रिया को देखते हुए यही मानना होगा कि वे कठिनाइयाँ वास्तव में बड़ी महत्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं जो मनुष्य को शुद्ध-बुद्ध और आस्तिक बनने में सहायक होती हैं। पावनता मानवता की विशेष शोभा है, जिसकी प्राप्ति कठिनाइयों की प्रेरणा से ही होती है। यह बात मानव-जीवन में कठिनाइयों के महत्व का ही प्रतिपादन करती है।
किसी शास्त्र के लिये ‘शाण’ का जो महत्व है वही महत्व मानव-जीवन में कठिनाइयों का है। रक्खे अथवा पड़े रहने से हथियारों में जंग लग जाती है। उनकी धार उतर जाती है और वे कुन्द होकर बेकार हो जाते है। किन्तु जब वे शाण पर चढ़ा कर तराश दिये जाते हैं तो पुनः तीव्र, प्रखर, तथा शानदार होकर चमकने लगते हैं। उनका विकार दूर हो जाता है और वे शुद्ध तथा नए होकर उपयोगी बन जाते हैं। तब उनसे उनका काम बखूबी लिया जा सकता हैं। इसी प्रकार कठिनाइयों के चक्र पर चढ़कर उनसे रगड़ कर मनुष्य को सारी शक्तियाँ और सारे गुण प्रखर हो उठते हैं। उनमें नई धज और नई योग्यता आ जाती है। आराम का जीवन बिताते रहने पर शक्तियों में कुण्ठा आ जाती है । अप्रयुक्त होने से वे बेकार लगती हैं। पर जैसे ही कोई कठिनाई अथवा मुसीबत सामने आती है मनुष्य उससे बचने और छूटने के लिये सक्रिय हो उठता है, साथ ही उसकी शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक शक्तियाँ भी संघर्ष में पड़कर अपना योगदान करने लगती हैं। इस संघर्ष से उनकी सारी कुण्ठा और निरुपयोगिता समाप्त हो जाती है। मनुष्य हर ओर से नया और तरोताजा हो जाता है। कठिनाइयों के अवसर पर ही उसे अपनी शक्ति और गुणों का ठीक-ठीक पता चलता है। मानव-जीवन में शक्ति तथा गुणों की सक्रियता की जो महती आवश्यकता है उसकी पूर्ति कठिनाइयों द्वारा ही होती है।
मानव-मस्तिष्क की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि इससे ज्यों-ज्यों काम लिया जाता है यह त्यों-त्यों अधिक प्रौढ़, प्रबुद्ध तथा शक्तिशाली होता जाता है। इसके विपरीत ज्यों-ज्यों इसे आराम दिया जाता है त्यों-त्यों सुस्त और चेतनाहीन होता जाता है। सुख-सुविधा के समय तो मनुष्य निष्क्रिय होकर आलस्य में पड़ा रहता है। उसे प्रायः न किसी बात पर सोचने की जरूरत होती है और न मगज मारने की। ऐसी दशा में मस्तिष्क का सुस्त और कुण्ठित होना स्वाभाविक ही है। किन्तु कठिनाई तथा विपत्ति के अवसर पर स्थिति बिल्कुल भिन्न होती है। उस दशा में मुसीबत से बचने और कठिनाई को हल करने के लिये उसे बहुत कुछ सोचना, विचारना, योजना और कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। मस्तिष्क को हर समय सक्रिय तथा कार्यरत रखना पड़ता है। इस बौद्धिक परिश्रम से उसका मस्तिष्क बड़ा ही विचारक, निर्णायक तथा विवेकवान बन जाता है। मानव-जाति के लिये जिस विवेकशील, विचारशीलता और निर्णय शक्ति की आवश्यकता होती है वह कठिनाइयों की कृपा से सहज ही पूरी होती रहती है।
किन्तु कठिनाइयों से यह सब लाभ होता उन्हीं लोगों को है जो उनका सहर्ष स्वागत करता है, डटकर उनसे लोहा लेता है जो और उन्हें परास्त करने में गौरव और पुरुषार्थ की सार्थकता समझता है। ऐसे धीर तथा बुद्धिमान व्यक्ति के लिये कठिनाइयाँ उसी प्रकार हितैषिनी होती हैं जिस प्रकार अखाड़े का वह गुरु जो अपने शिष्यों को रगड़-रगड़ कर मजबूत तथा पकड़ लड़ने में दक्ष बनाता है। कायर और भीरु व्यक्ति के लिये मुसीबत वास्तव में मुसीबत ही होती है। जो कठिनाई अथवा आपत्ति को देखकर भयभीत हो जाते हैं, जिनका मन मस्तिष्क निराशा से अंधेरा हो जाता है, कर्तव्य मूढ़ता से जिनके हाथ-पैर रुक जाते हैं, साहस और शक्ति जवाब दे जाती हैं, वे निश्चय ही उसके शिकार बनकर बरबाद हो जाते हैं। कायर मनुष्य को कठिनाइयाँ नहीं बल्कि उनके प्रति उसका भय ही उसे खा जाता है। जो कठिनाइयों से हार मान लेते हैं वे निश्चय ही जीवन का दाँव हार जाते हैं और जो उनकी चुनौती स्वीकार कर खम ठोंककर उद्यत हो जाते हैं वे उन्हें निश्चय ही परास्त कर देते हैं।
कठिनाइयों का वास्तविक स्वरूप क्या है इसकी व्याख्या दार्शनिक ‘चुर्निग तो हांग’ ने ठीक ही की है। वे लिखते हैं- ‘कठिनाई एक विशालकाय, भयंकर, आकृति के, किन्तु कागज के बने हुए शेर के समान होती है। जिसे दूर से देखने पर बड़ा डर लगता है, पर एक बार जो साहस करके उसके पास पहुँच जाता है, वह उसकी इस असलियत को जान लेता है कि वह केवल एक कागज का खिलौना मात्र ही है।”
कठिनाइयाँ वास्तव में कागज के शेर के समान ही होती हैं। वे दूर से देखने पर बड़ी ही डरावनी लगती हैं। उस भ्रम जन्य डर के कारण ही मनुष्य उन्हें देखकर भाग पड़ता है। पर जो एक बार साहस कर उनको उठाने के लिए तैयार हो जाता है वह इस सत्य को जान जाता है कि कठिनाइयाँ जीवन की सहज प्रक्रिया का अंग होने के सिवाय और कुछ नहीं होतीं। संसार में सम्पत्ति-विपत्ति, लाभ-हानि सुख-दुःख का जोड़ा दिन-रात की तरह एक दूसरे से बँधे घूमते रहते हैं। इस द्वन्द्व चक्र से संसार में कोई नहीं बच सकता। हम साधारण लोगों की बात ही क्या बड़े-बड़े महापुरुष भी कठिनाइयों और विपत्तियों से न बच सके! सर्व साधन सम्पन्न राम, कृष्ण, हरिश्चन्द्र, नल, पाण्डव, प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह जैसे लोग तक विपत्ति के चक्र से नहीं बच सके, कठिनाइयाँ मानव-जीवन की सामान्य प्रक्रिया का ही एक अंग है। जो संसार में जन्मा है उसे कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ेगा। ऐसी अनिवार्य स्थिति से घबराना अथवा भयभीत होना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमानी है विपत्तियों तथा कठिनाइयों से लड़ने और उन पर विजय पाने में।
जो चेतन है विवेकवान और जीवन पूर्ण है वह मनुष्य जीवन और उन्नति करने के लिये अवश्य ही जिज्ञासा करता है। प्रायः सभी मनुष्य अपने को चेतन तथा जीवन्त मानते हैं और सभी जीवन में कुछ न कुछ उन्नति करने के लिए उत्सुक रहते हैं। लेकिन संसार में ऐसे मनुष्यों की संख्या अधिक नहीं होती जो किसी उल्लेखनीय शिखर पर पहुँचते हैं। ऐसा केवल इसलिए होता है कि सब मनुष्य समान रूप से न तो पुरुषार्थ करते हैं और न कठिनाइयों से टक्कर लेने का साहस रखते हैं। उन्नति का पथ सरल अथवा सुगम नहीं होता। उसमें पग-पग पर विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। श्रेय की प्राप्ति परिश्रम तथा संघर्ष द्वारा होती है। संसार का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं जो कठिनाई उठाए बिना ही पूर्ण हो जाए। जिसमें कठिनाई सहने और विपत्ति से लड़ने का साहस होता है वह ही सफलता के उन्नत शिखर पर पहुँच जाता है। जिन-जिन ने अपने जीवन में आपत्तियों का सामना किया है कठिनाइयों के बीच से अपना अभियान आगे बढ़ाया है वे ही महान बन सके और महापुरुष कहला सके!
महापुरुषत्व का प्रमाण इस बात में नहीं कि कोई किस ऊँचे स्थान पर पहुँच सका है। महापुरुषत्व का प्रमाण इस बात में है कि उस पर पहुँचने में किसने कितनी कठिनाई उठाई। कितनी आपत्तियों और प्रतिकूलताओं से संग्राम किया और उनको परास्त किया। जो पद अथवा प्रतिष्ठा जितनी आसानी से मिल जाती है वह उतनी ही सस्ती और कम महत्व की होती है। आज अमेरिका का प्रेसीडेण्ट कोई न कोई व्यक्ति हर पाँच साल बाद होता रहता है किन्तु उस सर्वोच्च पद पर हर व्यक्ति उतना महान नहीं समझा जा सकता जितने कि जार्ज वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन माने जायेंगे। आज सामान्यतः राष्ट्र के उस सर्वोच्च पद पर पहुँचने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण तो हो सकता है लेकिन महापुरुष नहीं। उस श्रेणी में महापुरुष जार्ज वाशिंगटन अथवा अब्राहम लिंकन ही माने जा सकते हैं। इस अन्तर का कारण केवल यही है कि जार्ज वाशिंगटन ने अपने पूरे जीवन को लगाकर और अपार संघर्ष करने के बाद अमेरिका का निर्माण तथा संचालन किया था। अब्राहम लिंकन और उस पद में जमीन आसमान का अन्तर था। तथापि सब साधन हीन एक लकड़हारे के बेटे लिंकन ने अपने पुरुषार्थ, अध्यवसाय तथा लगन के साथ ही असंख्य बाधाओं, विपत्तियों, असफलताओं, विरोधों, संकटों, और कठिनाइयों के बावजूद भी न हिम्मत हारी, न भय माना और न निराशा को पास आने दिया वे निरन्तर श्रेय पथ पर विरोध-बाधाओं से लड़ते हुए आगे बढ़ते गए और राष्ट्र के उस सर्वोच्च पद पर पहुँचे जो उनकी स्थिति को देखते हुए असम्भव कहा जा सकता था। महापुरुषत्व का मानदण्ड पद अथवा स्थिति नहीं है उसका मान दण्ड वह कठिनाई तथा विपत्ति है जो वहाँ तक पहुँचने में आई होती है। अपने श्रेय पथ पर जो जितना ही कष्ट-सहिष्णु और साहसी रहता है, जितनी अधिक कठिनाइयों सहन कर, सफलता पाता है वह उसी अनुपात से महापुरुष माना जाता है।
श्रेय पथ पर कठिनाइयों का आना बहुत जरूरी है। यदि उन्नति और प्रगति का पथ सरल हो श्रेय और लक्ष्य यों ही आसानी से मिल जाया करें तो उसका कोई महत्व ही न रह जाये। वह तो पकी पकाई रोटी खा लेने के समान ही सस्ता और सामान्य काम हो जाए। ऐसी सरल सफलता पान पर उसमें न तो आनन्द का लेना रह जाएगा और न वह आत्म-गौरव जो उस स्थिति में अपेक्षित हो जाता है। लक्ष्य का महत्व कठिनाइयों से और पुरुष का गौरव उनको पार कर लक्ष्य पाने में ही होता है।
कठिनाइयों का मानव-जीवन में बड़ा महत्व तथा उपयोग है। किसी को उनसे घबराना नहीं चाहिए! उन्हें कागज का शेर समझकर, टक्कर लेनी और विजय पाने के लिये प्रस्तुत रहना चाहिए। कठिनाइयाँ ही मानव को महामानव और पुरुष को महापुरुष बनाती हैं।
मनुष्य कठिनाइयों से लड़ने के लिये बनाया गया है जिस दिन उसने विपत्ति से लड़ना छोड़ दिया उस दिन वह मानवीय गरिमा से गिर गया समझा जाना चाहिये।
-डिजरायली
सम्राट कीशूट को मुसलमानों ने कैद कर लिया। बन्दी अवस्था में मुसलमान शासक उन पर दबाव डालने लगे कि आप यदि इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें तो न केवल आपको राज्य लौटाया जा सकता है वरन् कई सुविधायें भी दी जा सकती हैं।
मुझे आपकी सुविधायें नहीं चाहियें “कीशूट ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया- ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति के लिये मैं कैसी भी कठिनाई का सामना करने को तैयार हूँ।”
उत्तरी योरोप में 125064 वर्गमील क्षेत्र और कुल 3540000 की जनसंख्या का एक छोटा सा देश है उसका नाम है “नार्वे” । नोर्डकिन अन्तरीप इसी देश के उत्तरी तट पर स्थित है। इस अन्तरीप में 6 माह तक तो दिन-रात दिन ही दिन बना रहता है अर्थात् सूरज चमकता है शेष 6 माह दोपहर में भी सूरज दिखाई नहीं पड़ता।
नार्वे प्रकृति के उक्त विलक्षण दृश्य से भी बढ़कर एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन दिन-रात करता रहता है जिसके लिये आज दुनिया भर के सभी देशों में पृथक मन्त्रालय खुले हुये हैं तो भी समस्या नियन्त्रण में नहीं आती। वह विश्वव्यापी समस्या है “जनसंख्या की असीमित वृद्धि” संख्या शास्त्रियों का अनुमान है कि प्रति वर्ष संसार की आबादी एक करोड़ बीस लाख बढ़ रही है। प्रोफेसर हीजवान फास्टर का कथन है कि 13 नवम्बर 2026 दिन शुक्रवार को मनुष्य जाति का इसलिये अन्त हो जायेगा कि उस दिन जनसंख्या इतनी अधिक हो जायेगी कि लोगों को खड़े होने तक की जगह न रह जायेगी। डॉ. जेम्स बर्नर के आँकड़े इससे भी भयंकर हैं। लन्दन की स्वास्थ्य काँग्रेस का भी कथन है कि अब से 80 वर्ष बाद संसार, जनसंख्या वृद्धि के कारण महाप्रलय के गर्भ में चला जायेगा और मनुष्य अपने आप लड़ झगड़ कर, प्राकृतिक प्रकोपों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट होकर नेस्त नाबूद हो जायगा।
यह आँकड़े जितने सत्य हैं, जितने भयानक हैं शुतुरमुर्ग की भाँति उतना ही मनुष्य उससे मुँह छुपाना चाहता है। कहते हैं रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग जब अपने शिकारी को देखता है तो भयग्रस्त होकर अपना मुँह बालू में घुसेड़ कर सुरक्षित हो जाने की कल्पना करता है इस बीच शिकारी वहाँ पहुँच जाता है और उसकी अपनी भूल के कारण ही बड़ी आसानी से उसका आखेट कर लेता है। प्रकृति मनुष्य की मूर्खता पर प्रहार करने के लिये कितनी निर्दयता पूर्वक तैयारी कर रही है उसका दर्शन करना हो तो नार्वे जाना चाहिये और वहाँ पाये जाने वाले चूहे की सी आकृति वाले विचित्र जन्तु “लेमिंग” की जीवन पद्धति और उसके परिणाम का अध्ययन करना चाहिये।
“लेमिंग” ठीक चूहों जैसे ही होते हैं किन्तु इनकी दुम छोटी है। इनके दो ही काम मुख्य हैं एक खाते रहना दूसरा बच्चे पैदा करते रहना। लगता है पूर्व जन्म में अधिक संतान पैदा करने वाले ही भाग-भाग कर नार्वे जाते हैं और इस जन्म में “लेमिंग” के रूप में शरीर धारण कर अपनी विभुक्षित वासना पूरी करने का प्रयत्न करते हैं। पर उनकी यह मूर्खता ही उनके महानाश का कारण बनती है। महाप्रलय के जो संकेत प्रो. हीजवान, माल्थस, डॉ. जेम्स बर्नर आदि ने दिये हैं उनका जीता-जागता दृश्य नार्वे में देखा जा सकता है।
मादा लेमिंग दिन-रात बच्चे पैदा करती रहती है फलस्वरूप कुछ ही दिनों में पहाड़ियों की पहाड़ियाँ “लेमिंगों” से ऐसे भर जाती हैं जैसे बरसात में पानी। रहने के लिये, शरीर छुपाने के स्थान नहीं रहते तो बिलबिलाते हुये इधर-उधर भागते हैं। दाँव लगता है भेड़ियों, भालू और लोमड़ियों का। वे इन्हें खा पीकर बराबर कर देते हैं।
कई बार शत्रु भी इनकी संख्या घटा नहीं पाते तब वे चींटी की तरह तीन-तीन चार-चार की कतार बनाकर समुद्र की ओर चल पड़ते हैं। बेचारे इतने कायर और कमजोर होते हैं कि दिन में चल भी नहीं सकते कमजोर के लिये हर जगह, दुश्मन तैयार रहते हैं इसी भय से वे रात में चलते हैं और किसी तरह समुद्र तक पहुँच जाते हैं पर वहाँ भी उन्हें सिवाय “आत्म-हत्या” के कुछ हाथ नहीं आता। समुद्र में कूद-कूद कर अपनी जान गंवा देते हैं थोड़े बहुत बच जाते हैं वह लौटकर आते हैं और फिर से प्रजनन और विनाश का यही क्रम प्रारम्भ हो जाता है।
मनुष्य, प्रकृति के इस निर्दय सत्य से कुछ सीखता व संभलता तो दुर्गति की जो स्थिति सामने दौड़ती आ रही है वह कम न हो जाती?
पैस्फिक सागर में गोता लगाकर मोती ढूंढ़ने वालों को पता चला कि “स्टारफिश” (यह तारे की तरह चमकने वाली छोटी सी मछली होती हैं) ही अधिकाँश सीपियों को नष्ट कर डालती हैं अतएव वे मोती ढूंढ़ने से पहले इन स्टारफिशों को ही समूल नष्ट कर डालने के लिये जुट पड़े। उन्होंने इन्हें पकड़ पकड़ कर काटना शुरू कर दिया।
एक, दो, दस, पचास, सैंकड़ा, हजार-कितनी ही स्टारफिशें काट डाली गईं पर रावण के मायावी सिरों की भाँति वे कम न हुईं उलटे उनकी संख्या बढ़ती ही गई। अभी तक तो उनकी उपस्थिति ही चिन्ताजनक थी अब तो उनकी आश्चर्यजनक वृद्धि और भी कष्टदायक हो गई अन्त में यह जानने का फैसला किया गया कि आखिर यह, स्टारफिशों की वृद्धि का रहस्य क्या है?
सावधानी से देखने पर पता चला कि जो स्टारफिश काट डाले गये थे उनका प्रत्येक टुकड़ा स्टारफिश बन चुका था। अभी तक अमीबा, हाइड्रा जैसे एक कोशीय जीवों के बारे में ही यह था कि ये अपना “प्रोटोप्लाज्म” दो हिस्सों, दो से चार हिस्सों, चार से आठ हिस्सों में बाँटकर वंश वृद्धि करते जाते हैं पर अब इस बहुकोशीय जीव को काट देने पर भी जब एक स्वतन्त्र अस्तित्व पकड़ते देखा गया तो जीव शास्त्रियों का प्रकृति के इस विलक्षण रहस्य की ओर ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक ही था।
तब से निरन्तर शोध-कार्य चलता रहा। और देखा गया कि नेस सलामैसीना, आइस्टर, स्नेल (घोंघा) फ्रेश वाटर मसल (शम्बूक) साइलिस, चैटोगैस्टर, स्लग (मन्थर) पाइनोगोनाइड (समुद्री लकड़ी) आदि कृमियों में भी यह गुण होता है कि उनके शरीर का कोई अंग टूट जाने पर ही नहीं वरन् मार दिये जाने पर भी वह अंग या पूरा शरीर उसी प्रोटोप्लाज्म से फिर नया तैयार कर लेते हैं। केकड़ा तो इन सबमें विचित्र है। टैंक की सी आकृति वाले इस जीव की विशेषता यह है कि अपने किसी भी टूटे हुए अंग को तुरन्त तैयार कर लेने की प्रकृति दत्त सामर्थ्य रखता है।
यह तथ्य जहाँ इस बात का प्रतिपादन करते हैं कि इच्छा शक्ति पदार्थ का बन्धन रहित उपयोग कर सकने में समर्थ है वहाँ इस बात को भी प्रमाणित कर रहे हैं कि आत्मचेतना एक शक्ति है और वह भौतिक शक्तियों से बिल्कुल भिन्न मरण-धर्म से विपरीत हैं। उस पर जरा मृत्यु आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आत्म तत्व भले ही वह किसी भी घृणित और तुच्छ से तुच्छ वासना एवं इच्छा शक्ति के रूप में क्यों न हो, इतना सशक्त है कि स्वेच्छा से न केवल अपने भीतर से उत्पादन की क्रिया आप ही करता रहता है वरन् अपने पूर्णतया मुर्दा शरीर को भी बार-बार जीवित और नया कर सकता है। इन महान् आश्चर्यों को देखकर ही लगता है भारतीय तत्व-दर्शियों ने सृष्टि विकास क्रम को ईश्वर इच्छा शक्ति पर आधारित माना। इसी आधार पर विकासवाद जैसा सिद्धान्त विखण्डित हो जाता है। जब प्रकृति के नन्हें-नन्हें जीवन, उत्पादन, उत्पत्ति और विकास की क्रिया में समर्थ होते हैं तो कोई एक ऐसा विज्ञान भी हो सकता है जब कोई एक स्वतन्त्र इच्छा शक्ति अपने आप पंच महाभूतों (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) के संयोग से अपने आपको प्रकट कर दे यों देखने में यह क्रिया बीज और वंशानुगत होती प्रतीत होती है।
हाइड्रा देखने में ऐसा लगता है जैसे एक स्थान पर फूल-पत्ते इकट्ठा हों। उनके अंग की कोई एक पंखुड़ी एक ओर बढ़ना प्रारम्भ होती है और स्वाभाविक वृद्धि से भी ज्यादा बढ़ जाती है। यह अधिक बढ़ा अंग अपने आपको मूल भाग से अलग कर लेता है और वह एक स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता है। पैरामीशियम, यूग्लीना आदि एक कोशीय जीवों में प्रजनन का यही नियम है जो यह बताता है कि आत्म-सत्ता को एक सर्वांगपूर्ण शरीर यन्त्र के निर्माण के लिये करोड़ों वर्षों के विकास क्रम की आवश्यकता या प्रतिबन्ध नहीं है यदि उसे अपने लघुतम या परमाणविक स्वरूप का पूर्ण अन्तःज्ञान हो जाये तो वह कहीं भी कैसा भी रूप धारण करने में समर्थ हो सकता है। संभवतः अणिमा, लघिमा, गरिमा, महिमा यह सिद्धियाँ इसी तथ्य पर आधारित हैं। एक दिन, विज्ञान भी इस दिशा में सफल हो सकता है, वह स्थिति आ सकती है, जब सम्मोहन शक्ति के द्वारा रासायनिक ढंग से उत्पादित प्रोटोप्लाज्म में जीवन उत्पन्न किया जा सके। कैसा भी हो इस महान् उपलब्धि के लिये विज्ञान को पदार्थ तक ही सीमित न रहकर “भाव” को भी संयुक्त करना ही पड़ेगा जैसा कि भारतीय तत्व वेत्ताओं ने अब से हजारों वर्ष पूर्व कर लिया था।
स्टेन्टर अपने प्रोटोप्लाज्मा का 1/60 अंश बाहर कर देता है और उसी से एक नया स्टेन्टर तैयार कर देता हैं। प्लेनेरिया और हाइड्रा को नयी संतान पैदा करने के लिये अपने शरीर का कुल 1/300वाँ हिस्सा पर्याप्त है। इन सबसे आश्चर्य जनक तो रहा स्पंज-उसे काटा गया, पीसा गया और बारीक टुकड़ों में करके उसे छान भी लिया गया किन्तु जब उस छने हुये “बुरक” को पानी में डाला गया तो छोटे-छोटे कण इकट्ठे हुये और आपस में मिलने लगे। कुछ ही दिन में उसी चूरन का नया जीवित स्पंज तैयार मिल जायेगा। ऐसा क्यों होता है यह वैज्ञानिक नहीं जानते यह जानना तो भारतीय योगियों और तत्वदर्शियों के वश की ही बात थी। चेतना पर नियन्त्रण करके उन्होंने जाना था कि यह मन ही है जो अत्यधिक आसक्ति और मोह बंधनों के कारण शरीरों से बंधा रहता है।
योग वशिष्ठ में बताया हैं-
दुराशा क्षीर पानेन भोगानिलबलेन च।
आस्थादानेन चारेण चित्तहिर्याति प्रीनताम॥
आगमापायवपुषा विषवैषम्य शंसिना।
भोगाभोगेन भीमेन चेतोगच्छति पीनताम्॥
-5/50/62-63
अर्थात्- इच्छायें जब विकृत हो जाती हैं (दुराशा) तब भोग रूपी वायु के बल से आस्था रूपी आहार ग्रहण करने से चित्त मोटा होकर स्थूल रूप धारण कर लेता है। उत्पत्ति और नाश वाले शरीर से विष के समान दुःखद भोगों में आसक्ति हो जाने से चित्त स्थूल हो जाता है। भारतीय योगी कुछ चमत्कार दिखाते हैं वह मन की यही कारीगरी है जो छोटे-छोटे तुच्छ जीवों में मन में आसक्ति के रूप में प्रकट होती है और वे उस शरीर को छोड़ने की अपेक्षा उसी को नया कर बार-बार उसी में लिपटे रहते हैं। भारतीय योगियों ने यह कर्तव्य सिर्फ इसी सत्य के प्रतिपादन के लिये दिखाया वस्तुतः उनका लक्ष्य इससे भी ऊँचा पारमार्थिक-आत्मा या ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करना रहा है। हम उन यौगिक चमत्कारों की बात इन नन्हें-नन्हें जीवों पर अध्ययन करके ही मान सकते हैं पर जो आवश्यक और कठिन है वह है ब्रह्म प्राप्ति। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने चमत्कार को सदैव हेय और आत्मानुभूति को जीवन का लक्ष्य बताया है।
नीचे झाँक कर देखा तो जड़ों के पास खाद का ढेर लगा देख गुलाब का फूल बहुत झल्लाया और गुस्से में भर कर बोला- ओरे गंदगी के ढेर तुझे और कहीं जगह नहीं मिली जो तू यहीं मेरी शोभा नष्ट करने चला आया?
ढेर बेचारा कुछ नहीं बोला- गुलाब गालियाँ बकता रहा और वह चुपचाप बैठा सुनता रहा।
सायंकाल माली पानी देने आया तो गुलाब ने उससे भी वही शिकायत की। माली हंसा और बोला- गुलाब! नाराज मत हो, यह गंदगी का ढेर ही तो तुम्हारी जीवन शक्ति है यह न रहे तो तुम्हें पोषण कहाँ से मिले।
रात्रि का प्रथम प्रहर- जब मैं प्रगाढ़ निद्रा में होता हूँ स्वप्न में एक दिव्य पुरुष के दर्शन करता हूँ। किसी जलाशय के निकट बैठे हुये योगी के मस्तक में जहाँ दोनों भौंहें मिलती हैं मुझे अर्द्ध चन्द्र के दर्शन होते हैं। उसके बाल श्वेत, शुभ वेष-भूषा, वर्ण गौर तथा पैरों में चर्म-विहीन पाहन या पादुकायें होती हैं। उसके आस-पास अनेक सन्त सज्जन व्यक्तियों की भीड़ दिखाई देती है। उनके मध्य, मैं जलती हुई छोटी-बड़ी ज्वालायें देखता हूँ यह लोग कुछ बोलते हुये अग्नि में कुछ वस्तुयें छोड़ते हैं। उसके धुयें से आकाश छा रहा है। सारी दुनिया के लोग उधर ही दौड़े आ रहे हैं। उनमें से कितने ही कष्ट-पीड़ित, अपंग और अभावग्रस्त भी होते हैं वह दिव्य देहधारी पुरुष उन सबका उपदेश कर रहा है। उससे सबके मन में प्रसन्नता भर रही है लोगों के कष्ट दूर हो रहे हैं। लोग आपस के राग-द्वेष भूलकर परस्पर मिल-जुल रहे है। स्वर्गीय सुख की वृष्टि हो रही है। धीरे-धीरे यह प्रकाश उत्तर की ओर बढ़ रहा है और किसी पर्वत के ऊपर दिव्य सूर्य की तरह चमकने लगता है। वहाँ से प्रकाश की किरणें वर्षा के जल की भाँति उठतीं और सारे पृथ्वी मंडल को आच्छादित कर लेती हैं। बस यहीं आकर स्वप्न का अन्त हो जाता है।”
यह शब्द विश्व-विख्यात् भविष्यवक्ता प्रो. हरार के हैं जो उन्होंने “नव-युग आयेगा” सम्बन्धी एक विचार गोष्ठी में कहे थे और उसका विस्तृत ब्योरा “वेस्ट मिरर” पत्रिका में छापा गया था। प्रो. हरार का जन्म इसराइल के एक धर्म निष्ठ यहूदी परिवार में हुआ था। अपनी अचूक और शत प्रतिशत सत्य भविष्य वाणियों के लिये योरोप और उत्तरी अफ्रीका में उसी प्रकार विख्यात हुये हैं जिस तरह एण्डरसन और जीन डिक्सन अमरीका में प्रो. कीरो इंग्लैंड और आचार्य वाराह मिहिर भारतवर्ष में। एक बार अरब के शाह मुहम्मद किसी यात्रा पर जाने वाले थे। उसकी घोषणा काफी समय पहले कर दी गई थी किन्तु प्रो. हरार ने घोषित कर दिया कि उनकी यह यात्रा हो ही नहीं सकती। इस कथन पर तब तक लोगों को विश्वास नहीं हुआ जब तक यात्रा के ठीक एक दिन पूर्व शाह मुहम्मद घोड़े से गिर नहीं गये उनके पैर में गम्भीर चोटें आईं चल फिर सकने में असमर्थ हो जाने के कारण यात्रा रद्द कर देनी पड़ी। ठीक एक माह बाद पुनः यात्रा का कार्यक्रम बनाया गया। प्रो. हरार ने फिर घोषणा की कि इस बार भी शाह मुहम्मद की यात्रा नहीं हो पायेगी। संयोग से उस दिन भूकम्प आ गया और उसके फलस्वरूप मार्ग क्षतिग्रस्त हो गया, वह यात्रा भी स्थगित कर 1 वर्ष पीछे पुनः यात्रा के सरंजाम जुटाये गये। इस बार भी पहले की तरह ही प्रो. हरार ने भविष्यवाणी की कि यात्रा अधूरी ही रहेगी। शाह मुहम्मद ने यात्रा प्रारम्भ तो कर दी पर अभी उनका काफिला कुछ ही दूर गया था कि गुप्तचरों ने आकर बताया कि पड़ोसी देश में आक्रमण की तैयारी हो रही है। यह समाचार पाते ही शाह ने कूच का मुँह पीछे की ओर मोड़ दिया। यात्रा अधूरी रद्द कर दी गई। इन भविष्य कथनों की सत्यता से शाह मोहम्मद बहुत प्रभावित हुये। उन्होंने प्रोफेसर हरार को बुलाकर उनका बड़ा सम्मान किया और अपने प्रधान माँगलिक सलाहकार के रूप में नियुक्त कर लिया।
लोगों के प्रश्न करने पर प्रो. हरार ने अपने उक्त स्वप्न के संदर्भ में बताया कि मैं जो स्वप्न प्रातःकाल देखता हूँ वह अधिकाँश कुछ ही दिनों में सत्य होने वाले होते हैं। रात्रि के मध्य में देखे गये स्वप्नों में मुझे 1 वर्ष के अन्दर घटित होने वाली घटनाओं का आभास होता है पर जो स्वप्न मुझे प्रथम प्रहर में दिखाई देते हैं वह कुछ वर्षों में पूर्ण होने वाले होते है उक्त स्वप्न के सम्बन्ध में मेरे मस्तिष्क में जो विचार आते हैं वह यह कि- “ऐसे किसी दिव्य पुरुष का जन्म भारतवर्ष में हुआ है वह 1970 तक आध्यात्मिक क्रान्ति की जड़ें बिना किसी लोक-यश के भीतर ही भीतर जमाता रहेगा पर उसके बाद उसका प्रभुत्व सारे एशिया और विश्व में छा जायेगा उसके विचार इतने मानवतावादी और दूरदर्शी होंगे कि सारा विश्व उसके कथन सुनने और मानने को बाध्य होगा। जबकि विज्ञान सारे विश्व में से धर्म और संस्कृति को नष्ट करके चौपट कर देगा तब वह धार्मिक क्रान्ति का सूत्रपात करेगा और लोग ईसा के जन्म से पूर्व की तरह अग्नि, जल, वायु, आकाश, सूर्य और अन्य नैसर्गिक तत्वों की उपासना के महत्व को समझने लगेंगे।”
उनकी यह भविष्यशाली जीन डिक्सन, टेनीसन और एण्डरसन के भविष्य कथनों से मेल खाती हुई भी कहीं अधिक स्पष्ट है। उन्होंने गाँधी जी की हत्या की घोषणा 1 सप्ताह पूर्व कर दी थी। सुकर्ण का सितारा बुलन्दी पर था तब उन्होंने कहा था- आज लोग धब्बे को नहीं देखते पर कुछ ही दिन पीछे देखेंगे कि सुकर्ण की कैसी दुर्गति होती है। सचमुच 1 वर्ष पीछे ही सुकर्ण अपदस्थ कर दिये गये। अरब और इजराइल युद्ध की घोषणा उन्होंने काफी समय पूर्व कर दी थी। उनका कहना था- प्रारम्भ की टक्कर बहुत जोरदार होगी। शनि की कोप दृष्टि होने के कारण अरबों का बहुत सा भाग छिन जायेगा, फिर जोर्डन, सीरिया, मिश्र आदि मिलकर भी उसे वापस नहीं ले सकेंगे। पहली टक्कर में इजराइल की जोरदार जीत होगी फिर छिटपुट युद्ध चलता रहेगा सन् 1979 में दोनों में एक बार फिर जोरदार टक्कर होगी। इस युद्ध में धर्म के नाम पर अरब शेष विश्व के अधिकाँश इस्लामी देशों को संगठित कर लेगा, पहले तो रूस अरबों के साथ रहेगा पर धीरे-धीरे वह चुप पड़ जायेगा और इजरायल अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि की मदद से अरबों पर बुरी तरह टूट पड़ेगा। इस युद्ध में मुसलमानों की जन शक्ति घट कर संसार की सभी जातियों से कम हो जायेगी। इजरायल को युद्ध के साथ साथ प्रकृति भी सहयोग करेगी अर्थात् तुर्की, सीरिया, लेबनान आदि देशों में भूकम्प, ज्वालामुखी तेल के कुँओं में विस्फोट आदि होंगे। वहाँ के लोगों में पारस्परिक दुर्भावनायें इस सीमा तक बढ़ेंगी कि कोई एक दूसरे को साथ तक नहीं देगा और इस तरह इस्लाम संस्कृति का लगभग पूरी तरह अन्त हो जायेगा।
सन् 1970 से 2000 तक संसार में तीव्र राजनैतिक परिवर्तन होंगे। ब्रिटेन, श्रीलंका, रूस, फ्रान्स और भारतवर्ष में अप्रत्याशित रूप से सरकारें बदलेंगी॥ इजराइल और अरब देशों के समानान्तर अक्षाँश पर होने के कारण भारतवर्ष की स्थिति भी ठीक वैसी ही होगी। यहाँ भी युद्ध होंगे। मित्र जैसे दिखाई देने वाले पड़ौसी देश या तो आक्रमण करेंगे या आक्रमण के समय मौन रहेंगे। अधिकाँश प्रतिपक्ष का समर्थन करेंगे। प्रजातन्त्र होते हुए भी अधिकाँश राज्यों में राष्ट्रपति का शासन रहेगा सन् 1972 के पीछे नेतृत्व उन लोगों के हाथ में होगा जिनकी उससे पहले तक लोगों ने कल्पना भी न की होगी। यह लोग वीर होने के साथ-साथ धर्म निष्ठ भी होंगे। इस बीच देश आर्थिक औद्योगिक और वैज्ञानिक दृष्टि से अपने आपको समृद्ध और शीर्षस्थ सिद्ध करेगा।
प्रो. हरार की उपरोक्त भविष्य वाणियों में अब तक अधिकाँश सत्य सिद्ध हो चुकी हैं अब जो परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं उनसे साबित होता है कि आने वाले दिनों के लिये की गई भविष्यवाणियाँ भी अक्षरशः सत्य सिद्ध हों तो कुछ आश्चर्य नहीं।
सदैव दिन ही दिन नहीं रह सकता उसी प्रकार अंधेरे का अस्तित्व भी सनातन नहीं। उसे मिटाना ही है, अन्धकार को चीर कर प्रकाश को तो खिलना ही है चाहे वह आज खिले या कल।
-स्पिनोजा
प्रो. हरार के अनुसार मंगोलिया या साइबेरिया के प्रश्न को लेकर रूस और चीन में जबर्दस्त टक्कर होगी। दोहरी मार से बचने के लिये चीन भारतवर्ष से मैत्री का ढोंग रचायेगा और रूस के साथ आणविक अस्त्र-शस्त्रों के अतिरिक्त एक नयी युद्ध प्रणाली जर्म्सवार (इस युद्ध में दुश्मन देशों में बीमारियाँ फैलती हैं और लोग बिना युद्ध मरने लगते हैं) की शुरुआत करेगा। रूस चीन का मुँह तोड़ जवाब देगा और उसकी अब तक की समस्त वैज्ञानिक प्रगति को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देगा। इस बीच तिब्बत उसके जबड़े से निकल आयेगा और अपने को स्वेच्छा से भारतवर्ष से संबन्धित कर लेगा।
सन् 1980 तक सारे संसार की स्थिति विश्व युद्ध जैसी हो जायेगी। उसमें अधिकाँश छोटे-छोटे देश टूटकर बड़े देशों में विलीन हो जायेंगे। भारतवर्ष इन सबका अगुआ होगा। यू. एन. ओ. अमेरिका से टूट का भारतवर्ष चली जायेगी। वहाँ उसका नये सिरे से संगठन होगा। भारतवर्ष चिरकाल तक उसका अगुआ और अध्यक्ष बना रहेगा। साम्प्रदायिक तनाव बिल्कुल समाप्त हो जायेंगे। यद्यपि शासन सूत्र कुछ अन्य व्यक्तियों के हाथ होगा, पर वे एक धार्मिक संगठन के आश्रित होंगे।
भारतवर्ष कई विलक्षण आयुधों का निर्माण करेगा। हिमालय में किसी गुप्त खजाने और बहुमूल्य साँस्कृतिक उपादानों का गुप्त भण्डार मिलेगा। हिमालय के अधिकाँश भाग में आबादी हो जायेगी। वह देश और दुनिया का सबसे बड़ा पर्यटन स्थल होगा। इजराइल और भारतवर्ष के मैत्री संबंध बहुत प्रगाढ़ होंगे। रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस व जर्मनी जैसे देश मिलकर भी आज जो वैज्ञानिक खगोलीय सफलतायें अर्जित नहीं कर सके, वह भारतवर्ष अकेले ही कर लेगा। सन् 1980 से 2000 तक का समय भारतवर्ष की तीव्र प्रगति का है। इस अवधि में उसकी उन्नति के लिये लोग दाँतों तले उंगली दबायेंगे। सबसे आश्चर्य की बात यह होगी कि यह सब धार्मिक विचार वाले लोगों के द्वारा होगा। सारी दुनिया के लोग भारतीयों के समान शाकाहारी होंगे। दुनिया में एक ऐसी भाषा का विस्तार होगा, जो आज सबसे कम बोली व पढ़ी जाती है।
प्रो. हरार को एक महान् धार्मिक सन्त के रूप में ख्याति मिली है। उनकी भविष्य वाणियाँ कभी असत्य नहीं निकलीं। अगले 30 वर्षों के लिये उन्होंने जो कुछ कहा और लिखा है, वह पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण है और चूँकि उसका अधिकाँश संबंध अपने देश से है, अतएव हमें उस कथन को बड़े ध्यान से पढ़ना चाहिये और भावी परिवर्तनों के संदर्भ में आवश्यक सतर्कता से काम लेना चाहिये।
“ज्ञान, विवेक, वैराग्य, शक्ति और भक्ति परमात्मा सत्पात्र को देता है- अज्ञ और अन्धकार में डूबे हुओं को नहीं” रब्बी जोसे बेन के इतना कहने पर एक महिला बड़ी नाराज हुई और बोली- ‘तो इसमें भगवान की क्या विशेषता रही- होना तो यह चाहिए था कि वह असभ्य व्यक्तियों को यह सब देता, उससे संसार में अच्छाई का विकास तो होता।’
रब्बी हलाफता उस समय मौन हो गये और बात जहाँ थी, वहीं समाप्त कर दी।
बड़े सवेरे उन्होंने मुहल्ले के एक मूर्ख व्यक्ति को बुलाकर कहा कि अमुक स्त्री से जा कर आभूषण माँग लाओ। मूर्ख वहाँ गया और आभूषण माँगे, तो उसने न केवल अपने आभूषण देने से इन्कार कर दिया वरन् उसे झिड़क कर वहाँ से भगा भी दिया।
थोड़ी देर पीछे रब्बी जोसे स्वयं महिला के घर उपस्थित हुए और बोले- ‘आप एक दिन के लिये अपने आभूषण दे दें, आवश्यक काम करके लौटा देंगे।’ महिला ने संदूक खोली और खुशी-खुशी उतने मूल्यवान आभूषण जोसे बेन को सौंप दिये।
आभूषण हाथ में लिये बेन ने पूछा अभी- ‘अभी एक दूसरा व्यक्ति आया था, आपने उसे आभूषण क्यों नहीं दिये थे?’
महिला अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर पाकर बड़ी प्रसन्न हुई।
ऋषि याज्ञवलक्य जब वृद्ध हो चले- तो उन्हें इस जनकोलाहल भरे वातावरण में रहना असुविधा जनक प्रतीत होने लगा। उन्होंने इच्छा व्यक्त को, कि मैं निर्जन वन में कुटीर बनाकर रहना रहता हूँ, जिससे अधिक-से-अधिक समय ईश्वर चिन्तन में लग सके तथा मनन-चिन्तन में कोई अवरोध उपस्थित न हो।
याज्ञवलक्य मुनि के दो पत्नियाँ थीं। बड़ी मैत्रेयी- जो पूर्णतः आध्यात्मिक ज्ञान की जिज्ञासु तथा परम सात्विक प्रवृत्ति की नारी थी। ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने की उसे प्रबल जिज्ञासा थी।
दूसरी थी कल्याणी। वह सामान्य मनोभूमि की साँसारिक महिला थी। चलते समय याज्ञवलक्य ने दोनों को बुलाकर कहा- ‘जाने से पूर्व मैं अपनी संपत्ति तुम दोनों के बीच बराबर बाँट देना चाहता हूँ।’
यह सुनकर मैत्रेयी के नेत्र भर आये। उसने कहा- ‘क्या ये सुख-साधन, ये संपत्ति मुझे वह सब कुछ दे सकेंगे जिसकी मुझे वांछा है? मैं सृष्टि का अन्तिम सत्य जान लेना चाहती हूँ। आत्मा का स्वरूप क्या है? वह किस मार्ग पर चल कर परम गति प्राप्त कर सकती हैं? कृपया आप मुझे ज्ञान दें। ये भौतिक के नश्वर पदार्थ मेरे किस काम के?’
ऋषि का हृदय यह सुनकर गदगद हो गया। फिर भी उन्होंने कहा- ‘तुम्हारा कहना बिल्कुल उचित है। फिर भी प्रिये! संपत्ति भी रख लो। जीवन में सभी वस्तुओं की आवश्यकता होती है।’
किन्तु मैत्रेयी को द्रव्य की आकर्षण शक्ति भी विचलित न कर सकी। उसने इतना ही कहा- ‘जीवित रहने भर को कुछ कन्द-मूल फल तथा कुछ मोटे वस्त्र पर्याप्त हैं। वह इस शरीर के रहते जुटा लेना कोई कठिन बात नहीं। अधिक का परिग्रह तो आत्म-ज्ञान की उपलब्धि में बाधक ही सिद्ध होगा। क्या करूंगी मैं ये धातुओं के टुकड़े लेकर? मुझे तो आप सच्चा ब्रह्म-ज्ञान ही प्रदान करें, जो मेरा लक्ष्य तक पहुँचने का पाथेय है।’
याज्ञवलक्य अपनी प्रिय पत्नी के उक्त कथन से बहुत ही अधिक प्रसन्न हुए। उसी दिन से उन्होंने अर्थ संबंधी समस्त व्यवस्थायें अपनी दूसरी पत्नी कल्याणी को सौंप दीं तथा मैत्रेयी को नित्य नियमित रूप से आत्मज्ञान तथा ब्रह्मविद्या का प्रशिक्षण देने लगे।
उन्होंने बताया- ‘सृष्टि के कण-कण में आत्म-तत्व ही समाविष्ट है। चेतना के रूप में हम उसका अनुभव करते हैं। आत्मा का गुण आनन्द है, ऐसा आनन्द जो अखण्ड है- अविभाज्य है। किन्तु जिस प्रकार वीणा से निकली स्वर-लहरी पर अधिकार नहीं किया जा सकता लेकिन वीणा अपने हाथ में ले लेने पर मनचाही स्वर-लहरी निकाली जा सकती है, उसी प्रकार वास्तविक ज्ञान होने पर आत्मा की गति को भी जाना जा सकता है। आत्म-ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। उसे जान लेने पर कुछ भी अगम्य तथा अभेद्य नहीं रह जाता और यह आत्म-तत्व ही विभिन्न रूपों में सर्वत्र व्याप्त है। कण-कण में प्रभासित है।’
इस प्रकार नित्य ही ऋषि अपनी योग्यतम-विवेकशील तथा ब्रह्मवादिनी पत्नी को ज्ञान देते तथा दोनों असीम तृप्ति का अनुभव करते। लौकिक तथा भौतिक सुखों की निःसारता को समझने वाली विदुषी मैत्रेयी ने अपने पति से संपूर्ण आत्म-विद्या सीख ली तथा अनन्त अखण्ड परम तत्व का ज्ञान भी प्राप्त किया। वह तन से ही नहीं- मन तथा आत्मा से भी सच्चे अर्थों में ऋषि की अर्द्धांगिनी थी। मैत्रेयी याज्ञवलक्य जैसा पति पाकर अपने आपको धन्य समझती थी और ऋषि भी ऐसी विचारशील, सात्विकी तथा विशुद्ध परमार्थ भावना से आप्लावित मनोभूमि वाली पत्नी पाकर जीवन को सफल मानते थे। दोनों लौकिक तथा पारलौकिक दिशा में एक दूसरे के पूरक थे।
भारतीय तत्व-दर्शन में सूर्य को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। सृष्टि के आदि में सबसे पहले सूर्य ही उत्पन्न हुआ इसीलिये उन्हें ‘आदित्य’ भी कहते हैं। उनसे ही सर्वप्रथम ‘मनु’ अर्थात् मानवीय चेतना की उत्पत्ति हुई और दृश्य-प्रकृति भी। संसार में आत्मा रूप से, जो कुछ भी विद्यमान है, उसमें सूर्य का ही प्राण और प्रकाश काम करता है। मन, प्राण और वाक् नाम से विख्यात वेदों की ‘त्रयी विद्या’ और कुछ नहीं-सूर्य शक्ति का ही सूक्ष्म और स्थूल विवेचन है-
सर्वकारण भूताय निष्ठायैज्ञानचेतसाम्।
नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणौ।
भास्करायनमस्तुभ्यं तथा दिनकृतेनमः॥
-मार्कंडेय पुराण 70/5-6
अर्थात् हे सूर्य भगवान! आप ही ज्ञान चित्त वाले पुरुषों के लिये निष्ठा स्वरूप तथा सर्वभूतों के कारण स्वरूप हैं। आप ही सूर्यरूपी प्रकाश और आत्मरूपी भास्कर हैं। आप दिनकर को नमस्कार है।
इन पंक्तियों में सूर्य का जो वर्णन किया है, उससे दो बातें ज्ञात होती हैं- (1) सृष्टि में जो चेतना है, वह सूर्य का ही प्राण और प्रकाश है तथा (2) सम्पूर्ण दृश्य प्रकृति अर्थात् वृक्ष, वनस्पति, समुद्र, नदियों और सौर-मण्डल के दूसरे ग्रह-नक्षत्र वह सब सूर्य के द्वारा ही उपजे और गतिमान हैं। सूर्य ही संपूर्ण दृश्य प्रकृति की आत्मा है।
गायत्री महाविज्ञान वस्तुतः सूर्य का ही विवेचन है। उसमें आधिदैहिक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होने की जो बातें कही गई हैं, वह वस्तुतः सूर्य की दृश्य-अदृश्य शक्तियों की वैज्ञानिक शोध ही है। प्रयोगों का तरीका भिन्न है। मानसिक-ध्यान का है, पर उसकी वैज्ञानिकता में बिल्कुल सन्देह नहीं है। आज के वैज्ञानिकों ने जो खोजें की हैं वह इन बातों को अक्षरशः पुष्ट कर सकती हैं।
वनस्पति शास्त्र (बाटनी) और कृषि शास्त्र (एग्रीकल्चर) के जानने वाले लोगों को मालूम है कि पृथ्वी पर जितने भी पेड़-पौधे दिखाई दे रहे हैं, वह सब सूर्य के अस्तित्व में होने के कारण ही हैं। सूर्य न होता, तो वृक्ष-वनस्पति का नाम भी न होता और शायद जीवन नाम की कोई वस्तु भी न होती। जिस प्रकार मकड़ी अपने पेट से धागे निकालती और अपना जाल बुनती रहती है, उसी प्रकार सूर्य-गर्भ से निकला हुआ प्रकाश ही सृष्टि का ताना-बाना बुनता रहता है। जब तक सूर्य है तब तक सृष्टि है। जिस दिन उन्होंने अपनी माया समेटी, उसी दिन सृष्टि का अन्त हुआ।
वनस्पति का 95 प्रतिशत भाग सूर्य से विकसित होता है। प्रकाश शक्ति का जिस क्रिया से रासायनिक शक्ति (केमिकल एनर्जी) में रूपांतर होता है, उसे विज्ञान में बड़ा महत्व दिया गया है। इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण (फोटो सिन्थेसिस) कहते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि वृक्ष-वनस्पतियाँ पृथ्वी से पोषण और जीवन तत्व प्राप्त करती हैं, पर यथार्थ यह नहीं। पृथ्वी से तो कुल 5 प्रतिशत विकास सामग्री ही उन्हें प्राप्त होती है।
हाइड्रला प्लान्ट परीक्षण से यह बात पूरी तौर पर सिद्ध हो गई है। हाइड्रला पानी में पाई जाने वाली एक प्रकार की घास-सेवार-को कहते हैं। उसे एक प्रकार के बर्तन में रखते हैं। ऊपर से जल से भरी हुई परीक्षण-नली (टेस्ट्यूब) लगाकर रखते हैं। इस यन्त्र को यदि विद्युत् के प्रकाश में रखें, तो कोई रासायनिक क्रिया नहीं होती। किन्तु जैसे ही उसे सूर्य के प्रकाश में लाते हैं, प्रतिक्रिया आरम्भ हो जाती है। सेवार जल ग्रहण करने लगता है और परीक्षण नली के ऊपरी सिरे पर बुलबुले उठने लगते हैं। इससे सिद्ध होता है कि प्रकाश न हो, तो वृक्ष-वनस्पति का थोड़ा भी विकास नहीं हो सकता। किसी पौधे को डिब्बे में बंद करके इस तरह रख दिया जाये कि उसमें सूर्य के प्रकाश की किरणें बिल्कुल न पड़ें तो वह पौधा बढ़ेगा नहीं, पीला पड़ कर मुरझा जायेगा। पर यदि उसे फिर धूप में ले आयें, तो उसमें फिर से हरियाली आ जायेगी।
प्रकाश-संश्लेषण की यह क्रिया न केवल पौधों के विकास में सहायक होती है वरन् उससे सृष्टि में एक ऐसी प्रक्रिया का निर्माण हो रहा है, जिससे मनुष्य और दूसरे जीवधारी भी प्राण धारण किये रहने में समर्थ हैं। यदि प्रकाश संश्लेषण न हो रहा होता, तो मनुष्य का जीवित बना रहना संभव न होता। सूर्य से वृक्ष-वनस्पतियों और वनस्पतियों से मनुष्य जाति के सहयोग की यह पद्धति सचमुच बड़ी महत्वपूर्ण है। यदि उसे विराट् रूप से देखें या अनुभव करें तो पता चलता है कि संपूर्ण सृष्टि में जीवन के अनेक रूप होते हुए भी एक ही-प्रकाश की-यह प्रक्रिया काम कर रही है। यदि वह ठप्प पड़ जाये, तो संपूर्ण जीवन-प्रवाह रुक जाये।
पेड़ों की पत्तियों के निचले खुरदरे भाग में अति सूक्ष्म छिद्र जिन्हें ‘रन्ध्र छिद्र’ (स्टोमेटा) कहते हैं, एक प्रकार से श्वास नलिका या रसोई घर का काम करते हैं। यह रन्ध्र छिद्र सूर्य-प्रकाश में हवा की कार्बन डाइ ऑक्साइड (यह एक प्रकार की दूषित गैस है, जो मनुष्य की साँस, मल-मूत्र और धुआँ आदि से निकलती रहती हैं) खींचते हैं। जड़ें पानी लेकर पत्तियों में पहुँचाती हैं। सूर्य-प्रकाश कणों की उपस्थिति क्लोरोफिल (यह पेड़-पौधों का हरा वाला भाग है) के साथ पानी और कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बोहाइड्रेट बनाते है। यह प्रक्रिया पत्तियों के ‘मेजोफील’ नामक स्थान में होती है। कुछ अंश पानी का बच जाता हैं, वह इस पकाये हुए भोजन को सारे शरीर में पहुँचाता है। इस तरह इस पके हुए अन्न में मिले सूर्य द्वारा प्रकीर्ण (रेडिएन्ट) प्रकाश के कण ही पौधे में जीवन, गति और विकास की प्रक्रिया को चलाते रहते हैं। इस रासायनिक क्रिया में ऑक्सीजन (यह गैस मनुष्य को जिन्दा रहने के लिये आवश्यक है) गैस बच रहती है। पत्तियाँ उसे उसी तरह निकाल देती है, जिस तरह हम गन्दी साँस निकालते हैं। इस तरह प्रकाश के द्वारा ही हमारी गंदी साँस पौधे खाते हैं और हमारे लिये शुद्ध वायु तैयार करते रहते हैं। परस्पर सहयोग का, त्याग और सेवा का इससे अच्छा दूसरा उदाहरण संसार में न मिलेगा।
हम अनुभव नहीं करते अन्यथा हमारे शरीर में जो प्राण और चेतना विकसित होती है वह सूर्य की इस अदृश्य प्रकाश शक्ति का ही प्रतिफल है। यह प्रकाश-कण चाहे सीधे मिलते हों अथवा अन्न के द्वारा, बात एक ही है। अन्न, फल, फूल, पत्ते जो कुछ भी खाते हैं उनमें यह प्रकाश-कण ही सोखे हुए रहते हैं। वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि कोयला आग पकड़ते ही धधकने लगता है-इसका कारण भी कोयले में सूर्य-प्रकाश कणों की उपस्थिति होती है। सूर्य द्वारा प्रकीर्ण प्रकाश प्राण विद्युत् में किस प्रकार परिवर्तित होकर मनुष्य शरीर में पहुँचता है। इसका विस्तृत विवेचन वायु तत्व की व्याख्या में करेंगे।
वैज्ञानिक सूर्य प्रकाश की स्थूल गतिविधि को ही अब तक जान सके हैं। हमारा मानसिक संबंध भी सूर्य से है और उसे शब्दों (मन्त्र) के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। अभी इस बात को वैज्ञानिक नहीं जान पाये, पर भारतीय योग द्वारा मिलने वाले अनेक चमत्कारिक लाभों का रहस्य यही है कि हम अपनी आत्मा अर्थात् सूर्य की अक्षय शक्ति से संबंध स्थापित कर लेते हैं और उस शक्ति का मनमाना उपयोग कर सकने की स्थिति में हो जाते हैं। गायत्री सिद्ध इसी रहस्य का उद्घाटन और प्राप्ति ही है। प्राणी शब्द ‘प्राण’ से बना है। जिसमें प्राण है वही प्राणी है चाहे वह मनुष्य हो, पशु या पक्षी हो। प्राण इस प्रकार से एक स्वतन्त्र सत्ता है जो इन्द्रिय आदि शारीरिक अवयवों से भिन्न होती है। सृष्टि में जो कुछ भी दिखाई देता है वह प्राण की उत्पत्ति है। इसलिये प्रश्नोपनिषद् में कहा है-
स प्राणमसृजत प्राणच्छ्रद्धाँ खं वायु ज्योतिरूपः पृथिविन्द्रियः मनोऽन्नम्।
-प्रश्नोपनिषद् 6/4
अर्थात्- परमात्मा ने प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, बुद्धि, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रियाँ, मन और अन्न सब बने।
सूर्य प्रतिदिन निकलता है और डूबते हुए, आयु का एक दिन छीन ले जाता है। पर माया-मोह में डूबे मनुष्य समझते नहीं कि उन्हें यह बहुमूल्य जीवन आखिर क्यों मिला?
-महाभारत
शास्त्राकार की इन बातों को समझने और अवगाहन करने के लिये यद्यपि यौगिक साधना पद्धतियाँ विकसित हुई हैं। प्राण की अनुभूति के लिये ही अनेक प्रकार के योगों का आविर्भाव हुआ। प्राचीन काल में इस देश के निवासियों ने प्राण तत्व पर एक प्रकार से अधिकार ही कर लिया था। इसलिये हम भारतीय विश्व की सर्वसमर्थ जाति बन सके थे। ज्ञान-विज्ञान हमारी मुट्ठी में था-वह इस शक्ति का ही चमत्कार था।
प्राण को ही विवेकानन्द ने ‘लेटेन्ट हीट’ या ‘साइकिफोर्स’ कहा है। अर्थात् चेतना को धारण करने वाली शक्ति ही प्राण है। प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से है। ‘अन्’ धातु जीवन शक्ति एवं चेतना वाचक है। इसलिये प्राण शब्द का अर्थ चेतन शक्ति के लिये किया गया है।
यह प्राण सूर्य की ही देन है अर्थात् विश्व में जितने भी प्राणी हैं, वह सूर्य का ही तेज धारण किये हुए हैं-समस्त चेतना सूर्य की ही है, क्योंकि यह प्राण सूर्य से ही आता है। उपनिषद् कहती है-
यथाग्नेः क्षद्रास्फुल्लिंग व्युच्चरन्त्येव मेवास्पाद्वात्मनः सर्व प्राणाः।
-वृहदारण्यक 2/1,2,20
अर्थात् जैसे अग्नि से छोटी-छोटी चिंगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से समस्त प्राण निकलते हैं।
आत्मा की व्याख्या में शास्त्राकार ने बताया-
यौ असौ आदित्य पुरुषः सो असौअहम्।
-यजुर्वेद 40/17
अर्थात्- उस सूर्य मण्डल में जो पुरुष है, वही मैं हूँ। स
सूर्य आत्मा जगतः तस्थुष च।
-ऋग्वेद 1/125/1
इस समस्त विश्व की आत्मा सूर्य है। इस सब का तात्पर्य यह हुआ कि अग्नि की चिंगारी के समान प्राण सूर्यलोक से स्फुरित होता हैं और वही वृक्ष, वनस्पति, नदी, नद और वायुमण्डल के माध्यम से गमन करता हुआ सृष्टि के अनेकों जीवों के रूप में दिखाई पड़ने लगता है। इसी से कहते हैं-यह जो कुछ चेतना है वह सब एक ही आत्मा-सूर्य या सविता है। प्रकाश के रूप में आने वाली उसी की प्राणशक्ति (सूर्य के प्रकाश में विद्युत, ऊष्मा और गति तीनों ही होते हैं यही प्राण के भी गुण हैं इसलिये प्राण और सूर्य के प्रकाश में कोई अन्तर नहीं हैं) से पृथ्वी पर जीवन का आविर्भाव हुआ। हम स्थूल क्रियाओं, इन्द्रिय भोगों और पदार्थों तक ही सीमित न रहकर इस प्राण स्फुल्लिंग की शोध करते, तो निश्चय ही सूर्य की विराट आत्मा की वैसे ही प्राप्ति और अनुभूति करते जैसे हमारे यहाँ योगी-यती और भक्तगण गायत्री आदि उपासनाओं से प्राप्त करते रहे हैं।
राजा का एक स्वामि-भक्त नौकर की आवश्यकता थी। अनेक प्रार्थना-पत्र मन्त्री के पास आये। उन्होंने साक्षात्कार हेतु राजा के सम्मुख केवल तीन प्रत्याशी उपस्थित किये।
राजा ने पूछा- ‘यदि मेरी और तुम्हारी दाढ़ी में साथ-साथ आग लग जाये, तो तुम पहले किसकी आग बुझाओगे?’
एक ने कहा- ‘पहले आपकी बुझाऊंगा।’
दूसरा बोला- ‘पहले अपनी बुझाऊंगा।’
तीसरे ने कहा- ‘एक हाथ से आपकी और दूसरे से अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा।’
राजा के पास में ही मन्त्री बैठे थे। उन्होंने कहा- ‘यह तीसरा व्यक्ति ही नौकर रखने योग्य है, क्योंकि अपनी उपेक्षा कर दूसरे की भलाई करना अव्यावहारिक है।’
जिस दिन मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर लेगा कि संसार के भोग-विलासों का सुख मिथ्या है और यह अन्ततः अधःपतन के कारण होते हैं, उसी दिन से वह देवत्व की ओर अग्रसर हो उठेगा।
मूर्खता की परिभाषा इन शब्दों में की गई है कि किसी काम की प्रत्यक्ष हानि को देखते हुए भी उसे न छोड़ना और करते रहना मूर्खता है। विषय-लिप्सा ऐसी ही एक मूर्खता है। सभी जानते हैं कि विषय का विष न केवल ओज, तेज और बल पौरुष को ही नष्ट करता है, बल्कि आयु को भी कम कर देता है। जो कुछ आयु बचती भी है वह भी अशक्तता तथा व्याधियों के कारण बोझ बन जाती है।
इसी संदर्भ में लोग एक मूर्खता और भी करते हैं वह यह-वासनाओं की पूर्ति द्वारा वासना-तृप्ति का प्रयत्न, यह सोचकर कि इस समय का विकार संतुष्ट कर लिया जाये, आगे फिर इसका अवसर न आयेगा। किन्तु होता यह है कि तात्कालिक वासना की पूर्ति तत्काल ही खत्म हो जाती है और फिर वही वासना नई होकर उठ पड़ती है। भूत काल की क्षणिक तृप्ति न वर्तमान में काम आती है और न भविष्य में। यह क्रम यों ही चलता रहता है और मनुष्य ‘केवल इस बार और’ के भ्रम में आजीवन इसी में फंसा रहता है। वासनाओं से दूषित मृत्यु मरने से, उसे परलोक से भी वंचित होना पड़ता है।
ऐसे एक नहीं अनेक पुरुष हुये हैं, जिन्होंने प्रारम्भ में वासना के दोष से बच कर बड़े-बड़े तप तथा सराहनीय साधनायें की हैं। उल्लेखनीय सिद्धियाँ प्राप्त कीं और कथनीय कार्यों को कर दिखाया। फिर वही तपस्वी तथा तेजस्वी व्यक्ति वासनाओं के दलदल में फंसे और शोचनीय अन्त को प्राप्त हुए। इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग हुए जिनका प्रारम्भिक जीवन वासनापूर्ण रहा। पर जब उन्होंने उसकी निःसारता को समझा और उसका त्याग किया तो उनका वही निकृष्ट जीवन उत्कृष्ट हो गया। वे संसार के महान् पुरुष बन गये।
विषय-वासनाओं की तृष्णा एक ऐसी प्यास के समान होती है, जिसकी पूर्ति उसके बढ़ने में सहायक होती है। लोग यह सोचकर बड़ी भूल करते हैं कि अभी तो जवानी है। शरीर में रक्त और शक्ति है- जी भर कर भोग-विलास और विषय-वासनाओं का आनन्द क्यों न ले लिया जाये। जब बुढ़ापा आने लगेगा तब संयम कर लेंगे, जबकि सोचना यह चाहिये कि अभी से इस प्रबल शत्रु काम को विजित करने का प्रयत्न किया जाये। शरीर सक्षम होने से अभी कोई भी साधन तथा संयम बन सकता है। आगे चलकर जब बुढ़ापा आ जायेगा, शरीर निर्बल हो जायेगा, जीवन की आशा धुँधली पड़ जायेगी तब यह अजर-अमर शत्रु मारे न मरेगा।
गलत ढंग से सोचने वाले सत्य से अनभिज्ञ बने भोग-विलासों के सेवन में लगे रहते हैं। जिसका फल यह होता है कि उनकी वासनायें तो बलवती होती जाती हैं और आयु तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। जल्दी ही वह समय आ जाता है कि अब तो कोई काम करने योग्य ही न रह जाये। शरीर और इन्द्रियाँ जर और जर्जर हो गई हैं, पर वासनाओं तथा विषय भोगों की तृष्णा और भी अतृप्त हो गई है। अब तो इस अशक्तता की स्थिति में न तो इन्हें तृप्त किया जा सकता है और न जीता जा सकता है। निःसंदेह यह विवशता कितनी कष्ट तथा पश्चातापदायिनी होती होगी, इसे भुक्तभोगी ही जान सकते हैं। इसी अनुताप में अन्त होता है और तब राजा ययाति की तरह गिरगिट या राजा साहसिक की तरह गधे की योनि भोगनी पड़ती है।
राजा ययाति कुछ कम प्रतापी और धर्मात्मा राजा नहीं थे। चक्रवर्ती राज्य था, पतिव्रता पत्नी थी। तेजस्वी शरीर और इन्द्र जैसे देवताओं से मित्रता थी। उनके प्रतापी तथा योग्य होने का एक प्रमाण तो यही है कि असुर-गुरु शुक्राचार्य ने अपनी प्राणप्रिय बेटी देवयानी का इनके साथ विवाह कर दिया था और असुर राज वृषपर्वा ने अपनी बेटी शर्मिष्ठा को सेविका के रूप में भेंट कर दिया था।
इस प्रकार प्रतापी राजा ययाति बहुत समय तक कुशलतापूर्वक राज्य और जीवन संचालित करते रहे। किन्तु संयोगवश एक बार उन्होंने संयम की डोर ढीली कर दी। वासनात्मक विचार को प्रश्रय दे दिया और बस तभी से उनकी दुर्दशा के दिन प्रारम्भ हो गये।
एक बार अपनी सेविका शर्मिष्ठा को वासनात्मक दृष्टि से देख लिया। मनुष्यता के प्रबल शत्रु काम को अवसर मिल गया। वह तुरन्त राजा ययाति के ढीले मन में घुस बैठा और लगा अपना जाल बिछाने। संयम की उपेक्षा करने वाला ययाति उसमें एक बार फंसा तो फंसता ही चला गया। जप-तप, पूजा-पाठ तो छूट गया और भोग-विलास शुरू हो गया। राजा ययाति ने इस परिवर्तन को आँका जरूर, पर सोचने में वही गलती कर गया- अभी तो यौवन काल है, क्यों न थोड़ा भोगों का भी सुख ले लिया जाये। जब वय-वार्धक्य होगा, विषयों को तिलाँजलि दे दूँगा और फिर परमात्म-चिन्तन में लग जाऊंगा।
एक दिन इस विषय-सुख को छोड़ ही देना है- इस अहंकार में बेचारा ययाति एक गलती और कर गया। वह यह कि वह कुछ असामान्य गति से भोग-विलास में निमग्न हो गया। यदि वह सामान्य रूप से भोगों को भी भोगता रहता और कुछ भजन-पूजन भी करता रहता तो शायद उसकी वह दुर्दशा न होती, जो हुई और कुछ सत् संस्कार बने रहते, जो बुढ़ापे में संबल बनकर सहायक होते। लेकिन वह भोगों के फन्दे को साधारण ग्रन्थि मानकर भूल कर गया।
विषयानुविषय का क्रम तेजी से चल पड़ा, जिसकी वेदी पर पुण्य, संस्कार, शक्ति, आयु और भविष्य बलि होते चले गये। ययाति ज्यों-ज्यों तृप्ति की तृष्णा से विषयों में गहरा उतरता चला गया त्यों-त्यों निम्न से निम्नतर डूबता चला गया।
उसकी वासना की पहली शिकार शर्मिष्ठा बनी। उस असुर कुमारी ने भी वह अवसर पाकर राजा को होश में नहीं आने दिया और उसकी वृत्तियाँ यहाँ तक दूषित कर दीं कि वह राजा ययाति व्यभिचारी बन गया और बहुनारी गमन में प्रवृत्त होने लगा। परिणाम यह हुआ कि उसका तेज, तप और शरीर जल्दी-जल्दी क्षीण हो गया, बुढ़ापे ने घेर लिया। उस बुढ़ापे ने नहीं, जिसे सम्माननीय आयु कहा जाता है बल्कि जरठता ने-जिसमें शरीर झुलस जाता है, त्वचा लटक जाती हैं आँखें धंस जाती हैं, वात-पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है, दाँत गिर जाते हैं, आँखें मर जाती हैं, कान जवाब दे जाते हैं और देह में कम्प रहने लगता है। बाल उखड़ने लगते हैं और रीढ़ झुक जाती है। अत्यधिक वीर्य नाश के कारण तेजस्वी राजा ययाति इसी प्रकार के घृणित बुढ़ापे का बंदी बन गया। तिस पर अनुताप यह कि जिन भोगों को कभी भी छोड़ देने का दम भरता था वे उसे और भी अधिक सताने लगे। अशक्त शरीर की प्रबल वासनायें जो यातना देती हैं वह राजा ययाति को मिलने लगीं उनका मन-मस्तिष्क दिन और रात जलने गलने लगा। उसकी बुद्धि पराकाष्ठा तक नष्ट हो गई। विवेक उस व्यभिचारी का साथ छोड़कर चला गया। ययाति इस सीमा तक हतबुद्धि हो गया कि अपने बेटों से जवानी उधार माँगने लगा। तेजस्वी बेटों में क्षमता थी कि यदि वे चाहते तो अपना यौवन उसे दे सकते थे। किन्तु एक को छोड़कर सभी बेटों ने इन्कार कर दिया। पर सबसे छोटे लड़के पुरु को पिता की दयनीय याचना पर दया आ गई उसने अपना यौवन उसे दे दिया।
यतो निर्विषयस्यास्य मनसो मुक्तिरिष्यते।
अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्यं मुमुक्षुणा॥
मन का निर्विषय होना ही मुक्ति है। अतएव इस भव-बंधन से मुक्त होने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को अपना मन निर्विषय अर्थात् विषयासक्ति शून्य करना चाहिये।
पुनः यौवन पाकर योग्य तो यह था कि ययाति कभी तृप्त न होने वाले विषय-सुख की वास्तविकता समझता और उसे जीतने में अपनी नव-शक्ति का सदुपयोग करता। किन्तु उसकी तो बुद्धि ही वासनाओं ने मूर्ख बना दी थी। वह फिर विषय-भोगों में लग गया और तब तक लगा रहा, जब तक बेटे की दी हुई जवानी खत्म न हो गई। फिर बुढ़ापा आ गया, पर वासनाओं का वेग-उनकी इच्छा यथावत् बनी रही। निदान शारीरिक अशक्तता के कारण वह मानसिक विषयी हो गया, जिससे आत्मा तक का पतन हो गया। अन्त में उसका सारा शरीर ही गलने लगा और वह एक अयोग्य मृत्यु मर कर गिरगिट की योनि में चला गया।
इसी प्रकार एक राजा साहसिक, जो पहले बड़े ही धर्मात्मा और धन्य पुरुष थे, काम-वासना से दूषित होकर गधे की योनि में पहुँचे।
एक बार राजा साहसिक महर्षि दुर्वासा के दर्शन करने उनके आश्रम में गये। महर्षि उसी समय समाधि में बैठे थे। राजा ने सोचा कि जब तक महर्षि समाधि में स्थित हैं तब तक यहीं उपस्थित रहना चाहिये और ज्यों ही उनकी समाधि उतरे त्यों ही प्रणाम कर तेजान्वित वाणी से आशीर्वाद लेना चाहिये। राजा वहीं एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।
तभी आकाश मार्ग से जाती तिलोत्तमा की दृष्टि राजा साहसिक पर पड़ी और राजा साहसिक की दृष्टि उस पर। राजा की दृष्टि में झाँकती विकृति अप्सरा ने पहचान ली और राजा साहसिक के मूर्तिमान पतन की तरह आकाश से उतर कर उनके पास आ गई। वासनातप्त राजा को मानो मनोवाँछा मिल गई। वह देश-काल का विचार किये बिना उस वीरांगना से क्रीड़ासक्त हो गया। महर्षि को प्रणाम करने का पुण्य भूलकर पापरत हो गया। उन दोनों द्वारा दूषित किये गये वातावरण के अन्यथा अनुभव और उद्दीपक वार्तालाप ने दुर्वासा की समाधि खोल दी। उन्होंने देखा-राजा साहसिक और तिलोत्तमा।
तिलोत्तमा तो नरक की कीड़ी वीरांगना थी ही, वह महर्षि के क्रोध के सदा अयोग्य थी। किन्तु राजा साहसिक तो उत्तरदायी तथा मर्यादाबद्ध आर्य पुरुष था। महर्षि उसकी अनुशासन तथा मर्यादाहीनता को क्षमा न कर सके और शाप देते हुए बोले- ‘साहसिक तूने देश-काल का विचार किये बिना कामवश होकर गधे की तरह निर्बुद्धि एवं निर्लज्ज आचरण किया है। इसलिये तू धेनुक नामक वन में गधा बनकर जीवन-यापन करेगा।’ चक्रवर्ती राजा साहसिक काम-वासना के दोष से अनन्त काल के लिये गधा बन गया।
किन्तु इतिहास में ऐसे भी धीर पुरुषों के उदाहरण मिलते हैं, जो वासना के दास थे पर जल्दी ही उन्होंने उसकी निःसारता को स्वीकार किया। उसे छोड़ा और अपना आगामी जीवन उज्ज्वल तथा सफल बना लिया। ऐसे पुरुषों में सूरदास और तुलसीदास की गणना की जा सकती है।
सूर न केवल विषयासक्त व्यक्ति थे बल्कि वेश्यागामी तक थे। एक वेश्या पर यह इतने आसक्त थे कि उसकी दुत्कार पाकर भी उसके द्वार पर पड़े रहते थे। किन्तु जब इन्हें चेत आया, तब उन्होंने तुरन्त ही उसको तथा अपने अन्तर की विषयासक्ति को त्याग दिया। बतलाते हैं कि कुछ दिन तब भी उनकी आँखें उस कुलटा को देखने के लिये तरसती तथा तड़पती रहीं। कहते हैं तब उन्होंने परेशान होकर अपनी उन दोनों आँखों को फोड़ लिया। यह बात कहाँ तक सही है- नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह सत्य है कि उन्होंने आन्तरिक वासना की आँखें जरूर फोड़ डाली थीं। उन्होंने अपनी आसक्ति कृष्ण की भक्ति में बदली और अन्त में महाकवि सूर हो कर सदा को अजर-अमर हो गये।
कामुक रामबोला मायके गई हुई अपनी पत्नी का दो दिन भी विरह न सह सका और आँधी-पानी में मुरदे के सहारे नदी पार कर और साँप के सहारे कोठे पर चढ़कर अपनी पत्नी के पास चोरी-चोरी पहुँच गया। पत्नी को अपने पति की इस अनियन्त्रित कामुकता पर बड़ा खेद हुआ। उसने उसे उसके लिये धिक्कारा। रामबोला को चेत हुआ। उसने ज्ञान का सहारा लिया और संसार प्रसिद्ध तुलसीदास के नाम से राम का अनन्य भक्त हुआ।
प्रस्तुत घटनायें सिद्ध करती हैं कि विषय-वासनायें मनुष्य के अधःपतन का प्रबल हेतु हैं और उनका त्याग उन्नति की एक आवश्यक शर्त है। वासनाओं की संतुष्टि उनकी तृप्ति नहीं बल्कि त्याग से होती है, जिसका प्रतिपादन समय रहते तब तक ही किया जा सकता है, जब तक शरीर में शक्ति और विवेक में बल होता है। समय चूक जाने पर तो यह और भी आततायी होकर तन, मन और आत्मा का हनन किया, करती हैं।
सामने एक व्यक्ति हाथ में बंदूक लिये खड़ा है, सम्भव था वह गोली मार देता पर यह कोई कायर और कमजोर व्यक्ति नहीं था जो भय से काँपने लगता, या धैर्य सन्तुलन खोकर वहाँ से भाग खड़ा होता, वह वनराज सिंह का परिवार था जो किसी भी भय या आशंका के होते हुये अपना भोजन मस्ती से कर रहा था। उस परिवार के छोटे-छोटे बच्चों को भी कोई डर नहीं था कि यहाँ कोई शत्रु उपस्थित है और वह किसी भी क्षण गोली दाग सकता है।
यह कोई बोस्ताँ, गुलिस्ताँ अथवा पंचतंत्र की काल्पनिक कथा नहीं वरन् “द पिटीलेस जंगल” के विश्व विख्यात लेखक और महान् अन्वेषी सिने-निर्माता डॉ. ब्रोम के जीवन की एक सत्य घटना है। ब्रोम सिने-निर्माता के रूप में इसलिये प्रख्यात हुये कि उन्होंने घिसी-पिटी कहानियाँ दोहराने का भारतीय निर्माताओं का सा अन्धानुकरण नहीं किया। उनका प्रत्येक चित्र नई-नई जानकारियों और प्रेरणाओं से ओत-प्रोत हुआ करता था। उसके लिये डॉ. ब्रोम अपने जीवन को संकट में डालकर भी प्रकृति के अनेक रहस्य सप्रमाण एकत्रित करते और उन्हें दर्शकों को प्रस्तुत किया करते थे।
प्रस्तुत घटना भी इसी तारतम्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो प्रकृति के इस निर्मम सत्य “वीर भोग्या वसुन्धरा” का प्रतिपादन करती है। काँगोली डॉ. ब्रोम ने एक बार सिंह के पारिवारिक जीवन का चित्रण करने का निश्चय किया। यह एक महान दुस्साहसिक कार्य था इसमें उनके प्राण जा सकते थे पर उन्होंने परवा नहीं की और यह दिखा दिया कि सफलता, सत्य और समृद्धि के हीरे-मोती तो अपने आपको जान-बूझ कर कठिनाइयों के हवाले करके ही उपलब्ध होते हैं।
प्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री लिविंरस्टन और मा. स्टेनले ने अफ्रीका की खोज जिस रास्ते से की वह एक अति दुर्गम और भयानक क्षेत्र है। वहाँ का जंगल इतना बीहड़ है कि किन्हीं-किन्हीं स्थानों में झाड़ियों और वृक्षों के कारण दिन में भी प्रकाश नहीं जाता। शेर, बाघ, चीते, जिराफ, हाथी, गैंडे, लकड़बग्घे, वनमानुष, गोरिल्ले वहाँ उन्मुक्त विचरण करते हैं। वहाँ पहुँचने वाला कोई भी रास्तागीर इनसे भेंट किये बिना आगे नहीं बढ़ सकता। डॉ. ब्रोम का साहस ही था जो उन्हें वहाँ तक खींच कर ले गया।
डॉ. ब्रोम अभी कार से आगे बढ़ रहे थे तभी उन्हें कुछ आहट सुनाई दी। उन्हें लगा यहाँ कोई जानवर है। कार में बैठे-बैठे ही उन्होंने दृष्टि इधर-उधर दौड़ाई तो सामने से एक भूरी खाल और चमकदार बालों वाला सिंह आता दिखाई दिया। अपनी झाड़ी से निकल कर वह अपनी बैठक की ओर मस्त चाल से बढ़ रहा था। थोड़ी ही देर में पास की एक दूसरी झाड़ी से दूसरा सिंह निकला यह बूढ़ा शेर था पर उसके शरीर की मस्ती और चुस्ती अभी तक नहीं गई थी। उसकी चाल-ढाल कहती थी कि हमने जीवन भर प्राकृतिक जीवन जिया है, संयम बरता और स्वास्थ्य को बनाये रखा है। उसी का प्रतिफल है कि बूढ़ा हो गया हूँ तो क्या घिसट नहीं रहा, अब भी जीवन में भरपूर मस्ती है।
जहाँ ऐसी समर्थता है कायदे कानून सेवा और अनुशासन भी सचमुच वहीं पनपते हैं। एक बार डॉ. ब्रोम ने भी प्रकृति के इस कठोर सत्य को तब स्वीकार किया जब उन्होंने देखा कि दोनों सिंहों के पीछे दो सिंहनियाँ आज्ञाकारिणी सेवक की भाँति कुछ ही समय पहले किये मृगों के दो शिकार मुँह में दाबे निकल पड़ी और वे भी उधर ही चल पड़ीं जिधर दोनों सिंह अपना-अपना आसन जमा चुके थे। शिकार उनके सामने जा रक्खा और स्वयं भी अपने-अपने स्थानों में बैठ गईं।
जिस परिवार में बच्चे न हों, वहाँ हंसी-खुशी कैसी? पर बच्चे भी दर्जनों की संख्या में नहीं दो या तीन बस सिंहों जैसे। दो शेर दो शेरनियाँ और तब तक वहाँ फुदकते हुए तीन बच्चे भी जा पहुँचे। पूरा परिवार इकट्ठा हो गया। आज संगठन की महत्ता को हम भूल रहे हैं पर जंगल में वह सब कुछ यथावत् चलता रहता है जो कुछ सीखकर हम भारतीयों ने कभी अपना जीवन प्रकृति के ढाँचे में ऐसा बढ़िया ढाला था कि हमारी शक्ति, सामर्थ्य शौर्य, समृद्धि और स्वाभिमान के सामने संसार का कोई भी देश टिक नहीं पाता था आज का जीवन भगवती प्रकृति के आचरण की अनुकृति न होकर विपरीत सा हो गया है तभी तो हम असहाय, असमर्थ, रोग-शोक में डूबे हुये, सब ओर से कायर कमजोर दिखाई दे रहे हैं।
डॉ. ब्रोम का मूवी कैमरा बराबर चित्र ले रहा था सिंह परिवार यह सब देख रहा था। उन्हें यह भी पता था कि इस अजनबी के पास बंदूक भी है। पर जिसके पास शक्ति होती है, मृत्यु उसके पास खड़ी हो तो भी वह डरता नहीं। भय तो कायर और दुर्बलों के लिये बना है।
इस दिलचस्प घटना का वर्णन हुए ब्रोम लिखते हैं कि-चारों शेर, शेरनियाँ तो अनुशासित ढंग से बैठे शिकार खा रहे थे पर बच्चों का तो स्वभाव ही है चंचलता वे बीच-बीच में उछल-कूद भी करते जाते थे। जब वे स्थान बदलते तो पूरे सिंह-परिवार को अपने-अपने स्थान बदलने पड़ते, बच्चों का ऐसा बढ़िया सम्मान देखकर हम दंग रह गये, उससे भी अधिक आश्चर्य इस बात का था कि यह परिवार बच्चों के प्रति कोरी भावुकता ही नहीं बरत रहा था वरन् उनकी उद्दण्डता और उच्छृंखलता रोकने के लिये बीच-बीच में शेरनियाँ उनको घुड़क भी देती थीं।”
भोजन करके पूरा परिवार जंगल में चला गया। डॉ. ब्रोम को यह स्थान लाभदायक लगा सो वहीं अपने खेमे लगा दिये। उनने कई दिन तक वहाँ रहकर जंगली सशक्त जीवों के सम्बन्ध में अनेक महत्वपूर्ण खोज कीं। उन्होंने देखा अपनी सामर्थ्य को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाये रखने के लिये सिंह बहुत कम प्रजनन करते हैं। सिंह स्वभाव का बड़ा ही क्रूर और कठोर जीव है पर अपनी मादा के प्रति वह जितना उदार होता है उतना कोई-कोई ही मनुष्य होता होगा। एक सिंहनी के लिये दो सिंह लड़े हों ऐसा कभी नहीं होता। लगता है स्त्री के प्रति कामुक आकर्षणहीन और दरिद्र जातियों का स्वभाव है। हम भारतीयों ने नारी को जो सम्मान और श्रेयस प्रदान किया है वह प्रकृति के परम सत्य की प्रतिकृति ही है। इसीलिये हमारी मातृशक्ति ने भी हमारी समर्थता और गौरव को बढ़ाया है आज हम उस प्राकृतिक कायदे-कानून से विमुख न हों तो पुनः वही स्थिति प्राप्त कर सकते हैं।
शरीर से बड़ी सामर्थ्य-बौद्धिक सामर्थ्य-
स्वास्थ्य की गठन देखकर यही लगता युवक किसी अखाड़े का मजा हुआ पहलवान है। उसे अपनी सामर्थ्य का बड़ा घमंड था।
एक दिन कोई कचहरी का कार्य आ गया। युवक को एक अर्जी लिखवानी थी सो वह मुंशी के पास जाकर बोला-बन्धु मेरी अर्जी लिख दो थोड़ा जल्दी है। मुंशीजी ने ऐनक उतार कर चेहरे पर दृष्टि डाली और कहा-”लाइन से लग जाओ, नम्बर आने पर तुम्हारी अर्जी भी लिख देंगे।”
शाम के दो बजे तब कहीं युवक का नम्बर आया। इतनी देर में जो बात उसकी समझ में आई वह यह थी, कि शारीरिक सामर्थ्य से बौद्धिक सामर्थ्य का मूल्य और महत्व अधिक है उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया।
उस दिन से उसने स्वास्थ्य के साथ पढ़ाई पर भी ध्यान दिया। दिन-रात एक करके उसने अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ाई। उसी का फल था कि वह युवक एक दिन बिहार प्रान्त का स्वायत्त मन्त्री बना। उन्हें लोग गणेशदत्त सिंह के नाम से जानते हैं।
सन 1942 की बात है कुमायूँ के राजा साहब ने पश्चिमी कमाँड के तत्कालीन सेनापति (जी. ओ. सी. एन. सी.) श्री एल. पी. फेरेल को वन-विहार के लिये आमन्त्रित किया। श्री फैरेल को ही आमन्त्रित करने का विशेष कारण यह भी था कि वह अँग्रेज होते हुये भी भारतीय धर्म दर्शन एवं संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित थे। कई योगियों के चमत्कार देखने का जब से उन्हें अवसर मिला था तब से तो वे पूर्ण शाकाहारी भी बन गये थे। आत्मा, परमात्मा की शोध और प्राप्ति की उनमें प्रबल जिज्ञासा जाग पड़ी थी यही कारण था कि उन्हें जब भी कभी हिमालय की ओर जाने का अवसर मिलता वे उससे चूकते नहीं वरन् बड़ी प्रसन्नता के साथ इस आशा से जाते थे कि कहीं किसी ओर ऐसे योग्य साधु के दर्शन हो जायें जो आत्मा के रहस्य खोल सके और उसकी प्राप्ति की कुंजी प्रदान कर सके तो अपना जीवन ही सार्थक हो जाये।
कुमायूँ की पहाड़ियों पर कई दिन घूमते, वन-श्री का अवलोकन करते हुये एक दिन श्री फैरेल राजा साहब और रानी साहब के साथ नैनीताल के पास एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ की फूलों की छटा देखते ही बनती थी। समय काफी हो चुका था यह स्थान भी बहुत रमणीक था सो उस दिन पड़ाव के लिये उसे ही चुन लिया गया। आज्ञा होते ही खेमे गाड़ दिये गये। थोड़ी देर पहले जो स्थान निविड़ एकान्त था अब उसी में सैंकड़ों तम्बू लग गये, सेवक, सेविकाओं की चहल-पहल और व्यस्तता दिखाई देने लगी।
रात के बारह बजे तक गपशप भोजन-पान चलता रहा। और इसके बाद फिर सन्नाटा छाने लगा। सब लोग अपने-अपने बिस्तरों पर चले गये और दिन भर के थके होने के कारण थोड़ी देर में सो गये।
नींद का पहला चरण पूरा ही हुआ था कि श्री फैरेल ने अनुभव किया कि उनकी चारपाई पर कोई है। नींद टूट गई। उन्होंने स्पष्ट सुना कोई उनका नाम लेकर कह रहा है- “मिस्टर फैरेल-जिस स्थान पर आपका यह तम्बू लगा है इसकी हमें पहले से ही आवश्यकता है तुम इस स्थान को खाली कर दो, मेरी बात तुम्हारी समझ में न आये तो सामने उत्तर-पश्चिम में जो पहाड़ी दिखाई दे रही है वहाँ आओ मैं तुम्हें सब समझा दूँगा।”
“पर आप हैं कौन-” यह कहते हुये फैरेल ने चारपाई से उठकर टार्च जलाया। सारा तम्बू प्रकाश से भर गया पर वहाँ कोई भी तो नहीं आया था। फैरेल महोदय बाहर आये पर वहाँ कोई भी तो नहीं आया था। किसी के पैरों के निशान भी तो नहीं थे जिससे पता चलता कि कोई वहाँ आया है। एक बार तो उन्हें कुछ भय सा लगा किन्तु दूसरे ही क्षण वे चुपचाप तम्बू में चले गये और पुनः सोने के लिये लेट गये। लेटते समय उन्होंने घड़ी देखी-रात के साढ़े तीन बजे थे।
बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्हें नींद नहीं आ रही थी किसी तरह आँख मूँद लेते थे तभी फिर किसी के आने की सी आहट हुई। लेटे ही लेटे उन्होंने आँखें खोलीं और देखा कोई छाया-पुरुष सामने खड़ा है इस बार भी उसने वही शब्द कहे। फैरेल ने पहचान के लिये जैसे ही टार्च जलाई कि वहाँ न तो कोई छाया थी न आदमी वही एकान्त। सारे शरीर से पसीना फूट पड़ा। कई बार युद्ध में भयंकर रक्तपात देखकर भी न डरने वाला यह सेनाधिकारी भी एक बार अतीन्द्रिय सत्ता की कल्पना मात्र से सहम उठा। देह काँपने लगी, मुँह से एक शब्द फूटना भी आफत थी। चुपचाप आँखें ही मूँदते बनीं। फिर सवेरे तक न उनने आँखें खोली और न कुछ देखा या सुना पर एक विलक्षण आकर्षण उठ रहा था कि क्यों न उस पहाड़ी पर चलकर देखें बात क्या है? जूते, कपड़े पहनकर बाहर निकले देर से सोने के कारण अभी तक भी सब लोग सोये पड़े थे। श्री फैरेल बाहर निकले और चुपचाप उस पहाड़ी की ओर चल पड़े।
श्री फैरेल महोदय ने इस घटना का वृत्तांत बताते हुये स्वयं लिखा है- “जिस स्थान पर पहुँचने के लिये मुझे निर्देश दिया गया था वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत दुर्गम, संकरा और भयावह था, मैं ऊपर चढ़ने के लिये बिलकुल समर्थ न था पर मैं निरन्तर अनुभव कर रहा था कि कोई व्यक्ति मेरे साथ-साथ रास्ता दिखाता चल रहा है। वही मुझे ऊपर चढ़ने की शक्ति दे रहा है। साढ़े तीन घण्टे के कड़े परिश्रम के बाद मैं ऊपर चढ़ पाया। हंफहंफी और पसीने के कारण दम फूल रहा था, आगे चलना कठिन दिखाई दे रहा था सो वहीं पड़े एक चौकोर पत्थर पर थोड़ा आराम करने की इच्छा से बैठ गया।”
अभी दो क्षण भी नहीं बीते थे कि ठीक उसी आवाज ने चौंकाया-मिस्टर फैरेल! अब तुम अपने जूते वहीं उतार दो और धीरे-धीरे उतर कर यहाँ मेरे पास आओ! इन शब्दों के साथ ही श्री फैरेल की दृष्टि उठी उन्होंने देखा एक अति जर्जर शरीर किन्तु मस्तिष्क से झर रही अपूर्व तेज राशि वाले साधु सामने खड़े हैं। मैं इनको जानता तो क्या इससे पहले कभी देखा भी नहीं यह मेरा नाम कैसे जान गये? वह यहीं थे तब बिलकुल इन्हीं के शरीर जैसी छाया रात मेरे तम्बू तक कैसे पहुँची? न कोई बेतार का तार न रेडियो माइक्रोफोन फिर इनकी हूबहू आवाज मेरे पास तक कैसे पहुँची? आदि कई प्रश्नों पर एक और प्रश्न चिन्ह लगाते हुये साधु ने कहा-तुम जो सोच रहे हो वह एकाएक समझने वाली बातें नहीं हैं, समझ सकते भी नहीं क्योंकि उसके लिये लम्बे समय तक साधना और योगाभ्यास करना पड़ता है, जीवन के सुख और इन्द्रियों के आकर्षण त्याग कर लम्बे समय तक तप करना पड़ता है वह न आपके लिये सम्भव है न आप जान सकते हैं आपको तो जिस काम के लिये बुलाया है उसी के लिये यहाँ आ जाइये।
फैरेल आश्चर्यचकित रह गये कि वह व्यक्ति मनुष्य है या देवता बातें मेरे मन में उठ रही हैं और जान यह रहे हैं मनुष्य भी क्या कोई पुस्तक हैं? इस तरह के विचित्र प्रश्न और चिन्तन करते हुए श्री फैरेल चलचित्र की छाया की तरह नीचे उतरने लगे और थोड़ी देर में ही वहाँ पर जा पहुँचे जहाँ साधु बैठे थे। वहाँ एक व्यक्ति के आराम करने भर की जगह और धूनी में जल रही आग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था वहाँ।
आगे की घटना श्री फैरेल लिखते हैं- “साधु ने अपने जर्जर हाथ मेरी पीठ पर फेरे और मैं चौंका-वृद्ध शरीर में यह क्या विद्युत की सी शक्ति-मेरा शरीर जो अभी-अभी थकान के मारे टूट रहा था फूल की तरह हलका जान पड़ा। श्रद्धावश मैं झुका और उनके चरण स्पर्श किये। साधु सैंकड़ों देखे थे पर अनुभव करता हूँ जिन साधु-सन्तों ने भारतीय दर्शन को प्रभावित किया और उसका सम्मान बढ़ाया है वे गली-गलियारों में घूमने और भीख माँगने वाले बाबा नहीं ऐसे एकान्त सेवी साधना निष्ठ साधु ही हैं। जो शरीर से 80-90 पौण्ड होकर भी शक्ति और सामर्थ्य में हजारों बमों की क्षमता से भी शक्तिशाली और ज्ञान-विज्ञान के भंडार होते हैं।”
साधु ने बताया- ‘वह’ स्थान जहाँ आपका तम्बू लगा है वहाँ पहुँचने के लिये मैंने एक युवक को प्रेरित किया है।
संसार धूल को अपने पैरों के नीचे रौंदता है पर सत्य ढूंढ़ने वाले को इतना नम्र होना चाहिये कि वह धूल भी उसे रौंद सके।
-”माइण्ड आफ महात्मा गाँधी से”
वह मेरा पूर्व जन्म में शिष्य था, साधना अधूरी रह गई है अब मैं फिर उसे लोक-मंगल के लिये साधना और तप कराना चाहता हूँ पर उसकी पूर्व जन्मों की स्मृतियों सो गई हैं इस जनम के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं इसलिये वह साधना में आरुढ़ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ वह न हो पायेगा इसलिये आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
श्री फैरेल ने कहा- भगवन् आप मुझे भी अपने पूर्व जन्मों की कुछ बातें बतायें? इस पर साधु बोले-बेटा! यह सिद्धियाँ तमाशे के लिये नहीं होतीं, इनका एक प्रयोजन है उसी में खर्च किया जाना उचित है, हाँ यदि तुम चाहो तो उस लड़के के पूर्व जन्म का विवरण दिखाते समय उपस्थित रह सकते हो। बस अब जाओ? खेमे में तुम्हारे लिये हलचल मच रही है मुझे भी जल्दी है। श्री फैरेल जहाँ-जहाँ गये थे वापस लौट आया। यहाँ सचमुच उनकी तीव्रता से खोज हो रही थी। श्री एल.पी. फैरेल ने सारी बातें राजा साहब को बताई और वह स्थान छोड़कर खेमे को 200 गज दूर कर लिया।
सायंकाल होने तक एक युवक सचमुच इधर-उधर कुछ देखता हुआ सा उस स्थान में आ पहुँचा। सब ओर से तसल्ली कर वह युवक वहाँ बैठ गया तब तक श्री फैरेल भी वहाँ पहुँच गये, उनकी जिज्ञासायें तीव्र हो रही थीं, साधु भी थोड़ी ही देर में वहाँ आ पहुँचे। श्री फैरेल और युवक दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। और आदेश की प्रतीक्षा में खड़े हो गये।
वह स्थान पेड़ों की झुरमुट में था। उसकी सफाई की गई। अग्नि जलाकर साधु ने कुछ पूजा की, मन्त्र पढ़े और एक स्थान में हमको बैठा लिया। अब तक चारों ओर पूरी तरह अँधेरा छा चुका था।
साधु ध्यानावस्थित होकर बैठ गये। उनके मस्तिष्क से प्रकाश की रेखा फूटीं और एक वृक्ष के मोटे तने पर गोलाकार बिम्ब उभर उठा-फिर उसमें जो कुछ देखा वह बिलकुल ठीक सिनेमा की तरह व्यवस्थित चलता फिरता बोलता नाटक सा था। जिसमें उस युवक के पूर्व जीवन की अनेक घटनायें ठीक चलचित्र जैसी ही प्रत्यक्ष आँखों से दिख रही थीं। बीच-बीच में वह युवक कुछ उत्तेजित सा हो उठता था, हाँ-हाँ यह सब मैंने ही किया है ऐसा बोल पड़ता था। उसकी मृत्यु तक की सारी घटनायें श्री फैरेल ने भी देखीं तो वे भारतीय दर्शन की इस महानतम उपलब्धि से इतने प्रभावित हुये कि अपना सारा जीवन और अपने संस्कार ही बदल कर उन्होंने अपने को पूरा भारतीय बना लिया।
युवक ने अन्त में साधु को प्रणाम कर कहा-”भगवन्! अब मेरा मोह टूट चुका है, मैं अपनी छोड़ी हुई साधना और कठिन तपश्चर्या के लिये पुनः तैयार हूँ आप मुझे रास्ता दिखाइये ताकि मैं उस छोड़े हुये अधूरे कार्य को पूरा कर सकूँ।”
साधु ने कहा-बच्चे, आज तुम यहीं विश्राम करो प्रातःकाल घर लौट जाना। फिर उचित समय पर मैं अपने आप तुम्हें बुला लूँगा। श्री फैरेल के जीवन में यह दूसरी घटना बड़ी भारी घटना थी, जिसने उन्हें भारतीय तत्वज्ञान की प्रामाणिकता का बोध कराया। वे इसके बाद यह नहीं जान सके कि वह युवक कब साधना के लिये बुलाया गया। बाद में वह कौन हुआ, किस नाम से विख्यात हुआ क्या काम किया पर उन्होंने जो कुछ देखा उसको लेकर वे हिन्दुस्तान से इंग्लैंड तक भारतीय धर्म और अध्यात्म के गीत गाते रहे। इस घटना की पुष्टि अपने एक लेख में स्वयं श्री फैरेल ने 17 मई 1959 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में भी की थी।
एक बालक बहुत ही जिद्दी स्वभाव का था। वह प्रायः घर से बाहर जाने को मचल उठता और जब तक उसे बाहर नहीं ले जाया जाता तब तक उसे चैन न आता! यह तुतला कर बोलने वाला बालक घर के अन्य बालकों की पुस्तकें छीन लेता। कागज फाड़ डालता और चीजें बखेरता तथा नष्ट कर देता!
पर यही हठी बालक अत्यन्त नम्र स्वभाव का बन गया। तुतला कर बोलना-धारा प्रवाह भाषण देने में बदल गया। यह मधुर भाषी कुशल वक्ता अब दूसरों को परेशान करने के बजाय मित्रों का परम सहायक बन गया। उसके अभिभावकों और गुरुजनों ने बाल मनोवृत्ति को समझने और सुधारने का प्रयत्न किया तो बालक का मानसिक कायाकल्प ही हो गया। स्वार्थपूर्ण भावनायें-उत्कृष्ट देश भक्ति में बदल गईं। इस बालक का पूरा नाम था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक!
महर्षि शाल्विन की प्रथम पत्नी श्लेषा ब्राह्मण कन्या थी तो द्वितीय पत्नी इतरा शूद्र कन्या। एक ही भवन में, एक ही मूल शाखा से सम्बद्ध अवर्ण-सवर्ण का यह समन्वय भी अभूतपूर्व था। महर्षि के गृहस्थ में पूर्ण सुख-शान्ति विराजती थी। दोनों पत्नियाँ दो सगी बहनों के समान परस्पर प्रेमपूर्वक रहती थीं, इसे ऋषि का प्रताप ही कहा जाता था।
समय पाकर श्लेषा और इतरा दोनों के गर्भ से एक एक पुत्र का जन्म हुआ। दोनों बालक अपूर्व तेजस्वी और सुन्दर थे कोई भेद नहीं कर सकता था कि इनमें कौन ब्राह्मणी का पुत्र है और कौन है शूद्रा-पुत्र। इस पहचान की तब किसी को आवश्यकता भी न थी। आत्मा को शिरोमणि मानने वाला, ऋषि कुल चर्म भेद, जाति भेद करना जानता ही न था यह तो मध्य युग की बात है जब शूद्रों को अस्पृश्य भी कहा जाने लगा।
पर यह क्या हुआ? एक दिन दोनों ही किशोर ऋषि कुमार जब पहली बार महर्षि के यज्ञ स्थल पर प्रविष्ट हुए तो महर्षि शाल्विन ने श्लेषा के पुत्र को तो यज्ञ वेदी पर यजमान की तरह बिठा लिया किन्तु मानो शूद्रा पुत्र के वहाँ उपस्थित हो जाने से देवार्चना मलीन होने की आशंका पैदा हो गई थी या और कोई भय। महर्षि ने इतरा के पुत्र को वहाँ बैठने की अनुमति ही नहीं दी वरन् उसे डपट कर वहाँ से भगा भी दिया। बालक के लिए यह अपमान असह्य था। घर लौटकर माँ के आँचल में मुख छुपाकर वह जितना रो सकता था रोया, माँ के पास भी तो धैर्य बँधाने के लिए कुछ नहीं था। वह भी सहानुभूति में केवल रोती रही।
श्लेषा ने महर्षि के इस व्यवहार को अनुचित ही नहीं निन्दनीय भी ठहराया, पर महर्षि ने उनसे न जाने कान में क्या कहा कि श्लेषा ने फिर कोई प्रतिवाद नहीं किया।
अब तक हृदय की संपूर्ण वेदना आँसुओं के रूप में घुलकर धुल चुकी थी। मन पर्वतीय उपत्यिका से उतरी हुई उस सरिता की भाँति निर्मल हो गया था जो समतल क्षेत्र में आकर अपना विस्तार ही नहीं कर लेती वरन् प्रवाह भी शान्त और मन्द कर लेती है। बालक ने प्रश्न किया- माँ अब तू ही बता। मैं अपने कल्याण के लिए किसे गुरु वरण करूं भारी हृदय से इतरा ने उत्तर दिया- तात! जब महर्षि ने ही तुझे दीक्षा के योग्य नहीं समझा, तब और किसके पास तुझे भेजूँ, तू तो अपनी आत्मा को ही गुरु मान और जिस धरती ने तुझे जन्म दिया है उसकी गोद को ही यज्ञ स्थल मानकर अपनी उपासना प्रारम्भ कर। मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है। भगवान सब मंगल करेंगे। बालक वहाँ से चल पड़ा। भगवती प्रकृति का अध्ययन और आत्मदेव की उपासना करते-करते, उसकी गति योगियों की सी हो चली। माँ के दिए अक्षर ज्ञान को साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देख कर उसने ज्ञान का अद्वितीय भाण्डागार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
महर्षि शाल्विन स्वयं चिन्तित हो उठे उस दिन इतरा से अधिक शोक में श्लेषा डूबी हुई थी और सोच रही थी कि कहीं महर्षि का प्रयोग, तितिक्षा की कसौटी, असफल तो सिद्ध न हो जायेगी। किन्तु सायंकाल इतरा के पुत्र का प्राकट्य ऐसा हुआ जैसे घिरे बादलों को चीरकर सूर्य प्रकट होता है। बालक जो अब युवावस्था पार कर चुका था अपूर्व तेज से प्रकाशित हो रहा था। उसके हाथ में पाण्डुलिपि थी। दोनों माताएं तो पुत्र के स्वागत और कुशल मंगल पूछने में तल्लीन हो गईं पर महर्षि ने उस पाण्डुलिपि को उठाकर देखा तो स्नेह और ममत्व से उनकी आँखें छलक उठीं। यह पाण्डुलिपि और कुछ नहीं वेदों की विशुद्धतम व्याख्या थी जिसे आज ऐतरेय ब्राह्मण के नाम से जाना जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण पढ़े बिना वेद का ज्ञान मिलना दुर्लभ होता है। अपने पुत्र की इस उपलब्धि पर महर्षि फूले नहीं समाये। अपनी श्रेष्ठ साधना द्वारा ऐतरेय ने अपनी माँ का ही मुख उज्ज्वल नहीं कर दिया वरन् इस बात का प्रमाण भी दे दिया कि शूद्र हो तो क्या संस्कारों से ही मनुष्य ब्राह्मण हुआ करते हैं।
एक सामान्य व्यक्ति एक दिन में लगभग 35 पौण्ड वायु का सेवन करता है यह मात्रा सारे दिन में ग्रहण किए गये अन्न और जल की मात्रा से 6 गुनी अधिक होती है। इससे प्रतीत होता है कि मनुष्य के जीवन में खाद्य से भी अधिक महत्व वायु का है। वायु न मिले तो मनुष्य कुछ क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, अन्न के अभाव में तो वह महीनों जीवित बना रह सकता है।
मनुष्य ही नहीं, वायु संसार के सभी जीवित प्राणियों वृक्ष वनस्पतियों के लिए भी आवश्यक तत्व है। संभवतः इसी लिए प्रकृति ने समस्त पृथ्वी मंडल को वायु से आच्छादित कर रखा है।
गन्दा और सड़ा भोजन कर लेने से जी मिचलाने लगता है और तत्काल मृत्यु हो जाती है कुछ विषैले खाद्यान्न शरीर में धीरे-धीरे घुलते रहते हैं और अपनी दूषित प्रतिक्रिया कुछ समय बाद किसी शारीरिक व्याधि- रोग शोक और भयंकर बीमारी के रूप में प्रकट करते हैं। 6 गुनी कम मात्रा वाले अन्न के प्रदूषण से मनुष्य जब इतना प्रभावित हो सकता है,तब दूषित वायु उसके स्वास्थ्य पर कितना घातक दुष्प्रभाव डालती होगी उसकी कल्पना करना भी कठिन है। इसे मानवीय बुद्धि का विद्रूप और विडम्बना ही कहेंगे कि इतना सब जानते और समझते हुए भी आज का प्रबुद्ध कहलाने वाला मनुष्य यान्त्रिक सभ्यता के पीछे बुरी तरह पड़ा हुआ है वह यह देख नहीं पा रहा है कि इससे जो वायुप्रदूषण हो रहा है, उसके परिणाम कितने घातक हो सकते हैं।
अमेरिका में प्रत्येक वर्ष लगभग 200,000000 टन दूषित तत्व वायु में मिलते रहते हैं। जर्मनी, फ्राँस, इटली, रूस, ब्रिटेन आदि भी अमेरिका से पीछे नहीं। इन देशों में बढ़ रहे वायु में विषैले तत्वों की मात्रा इतनी अधिक बढ़ रही है कि उससे सारी पृथ्वी के भयंकर रूप से गर्म होकर जल जाने अथवा धुएं से घुटकर नष्ट हो जाने का संकट पैदा हो गया है।
वायु कई गैसों का सम्मिश्रण है (1) नाइट्रोजन (2) ऑक्सीजन इनमें प्रमुख हैं। यह अदृश्य, स्वाद और गन्ध रहित होती है, और मनुष्य एवं पशु वनस्पति सबके लिए बहुत आवश्यक है। पर जब अप्राकृतिक रूप से मनुष्य उसमें गन्दगी मिलाने लगता है तो यही वायु मनुष्य के अस्तित्व के लिए कष्टदायक हो जाती है।
आज अकेले अमेरिका में 90000000 (नौ करोड़) से भी अधिक कारें और मोटरें है इनमें से 99 प्रतिशत गैस आइल जलाते हैं इनका धुआँ निरन्तर वायु को दूषित करता रहता है। इसके अतिरिक्त वहाँ फैक्ट्रियों, पावर प्लान्ट्स, लुगदी व कागज की मिलें, आयरन व इस्पात की मिलें, तेल, मिल्स, भट्टियाँ आदि भी करोड़ की संख्या में हैं। 1969 में 90 प्रतिशत से अधिक कारखानों ने सल्फर युक्त कोयला तथा तेल जलाया। उसका धुआँ प्रतिदिन बीस हजार टन के लगभग वायुमंडल में घुलता रहता है। इसके अतिरिक्त अमेरिका का हर व्यक्ति प्रतिवर्ष औसतन 1800 पौण्ड कूड़ा तैयार करता है उसकी गन्दगी भी धुएं से कम हानिकारक नहीं। यह समस्त स्रोत मिलकर जो गन्दगी पैदा करते हैं उसका प्रारूप और मात्रा दोनों ही हृदय को कँपा देने वाले हैं।
धुएं के रूप में वायु को गन्दा करने वाला सबसे पहला विषैला तत्व 1 - कार्बन मानो ऑक्साइड है यह अकेले अमेरिका में मोटरों से 65000000 टन, कल-कारखानों से 12000000 टन तथा कूड़े से 170000 टन मात्रा में पैदा होकर हवा में घुलता रहता है। इससे ऑक्सीजन दूषित हो जाती है। खून के प्रवाह में मिल जाने के कारण यह सिर दर्द, थकावट आदि पैदा करता है। यह विशेष रूप से हृदय रोग, अस्थमा, एनीमिया रोग वालों को प्रभावित कर उनका रोग तथा संकट और बढ़ाने में मदद करता है।
वायु-प्रदूषण में भाग लेने वाली दूसरी गैस, सल्फर ऑक्साइड सल्फर युक्त कोयले और तेल के जलाने से उत्पन्न होती है इसके विष से आँखें, नाक, गला, फेफड़े आदि प्रभावित होते हैं। पेड़ पौधों को नष्ट करने में भी इसी का हाथ रहता है। अमेरिका के कई नगरों के सभी इस्पात कारखाने और पेट्रोल उद्योग सल्फर युक्त ईंधन प्रयुक्त करते हैं इससे उत्पन्न सल्फर डाई ऑक्साइड वर्षा के पानी में धुल कर गन्धक के तेजाब के रूप में बरसता है। इससे वहाँ प्रत्येक बरसात के बाद अनेक पक्षियों के पंख जल जाते हैं और सारी वनस्पति झुलस जाती है। इसी से धातुओं में जंग लगती है और वायु मंडल में अंधेरापन छा जाता है जिससे सूर्य की रोशनी की मात्रा बहुत कम आ पाती है।
3- फ्लुओराइड भी ऐसा ही विषैला तत्व है जो वृक्षों को नष्ट करता है। फ्राँस में आल्पस पर्वत में पाये जाने वाले सदाबहार वृक्ष दिनों दिन मरते और नष्ट होते जा रहे हैं। विशेषज्ञ चिन्तित हुए और खोज की तो पाया कि यह उस क्षेत्र में पाये जाने वाले कारखानों द्वारा वमित फ्लुओराइड तत्वों का दुष्प्रभाव है। इस बात की आशंका की जा रही है कि स्थिति ऐसी ही रही तो उस क्षेत्र में एक भी वृक्ष जिन्दा न बचेगा।
सबसे घातक गैस 4 - नाइट्रोजन ऑक्साइड है जो अकेले अमेरिका में विभिन्न स्रोतों से 48000000 टन वायु में घुलती रहती है। यह आँखों को प्रभावित करती है और सूर्य प्रकाश को पृथ्वी में नहीं आने देती इससे और भी हानि होती है। इसकी घातक शक्ति का सही अनुमान उस समय हुआ जब अमेरिका में सन् 1965 में क्लीवलैण्ड नगर के एक अस्पताल में एक दिन दुर्घटनावश एक्स-किरणों की फिल्म में आग लग गई। फिल्मों के जलने से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड का धुआँ अस्पताल के वायु मण्डल में छा गया इसकी घुटन से कुछ ही घन्टों में 125 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि 48 मिलियन टन नाइट्रोजन गैसें मनुष्य के स्वास्थ्य को अन्दर ही अन्दर किस कदर खोखला बनाती होंगी?
वायु प्रदूषण में भाग लेने वाला अन्य 5वाँ तत्व हाइड्रोकार्बन है। यह मोटर कारों से 18000000 टन, फैक्ट्रियों कारखानों से 5000000 टन तथा विभिन्न कूड़ों से 4000000 टन कुल 27000000 टन प्रतिवर्ष केवल अमेरिका में पैदा होता है। यह सिगरेट के धुएं के साथ शरीर में पहुँचकर कैंसर और पशुओं में कैंसर रोग उत्पन्न करता है। इसके लगभग 200 प्रकार के यौगिक विभिन्न तरह से मानव जाति को नुकसान पहुँचाते हैं उसकी अभी तक वैज्ञानिकों को भी पूरी तरह जानकारी नहीं हो पाई है।
इन गैसों के अतिरिक्त विषैले तत्वों के छोटे-छोटे कण धुआँ, उड़ती राख, धूलि के कण हाइड्रोकार्बन के साथ मिलकर गैसों का कुहरा सा छा देते हैं इससे वातावरण में सदैव धुन्ध सी छाई रहती हैं। आँखें अच्छी तरह देख नहीं सकतीं। सूर्य का प्रकाश अच्छी तरह पृथ्वी तक आ नहीं सकता। उसके जो दुष्परिणाम हो सकते हैं यथा फेफड़ों का खराब होना, कपड़े व खिड़कियों की गंदगी बढ़ना आँखें कमजोर होना आदि रोग और कष्ट बढ़ते हैं। फोटो केमिकल्स गैसों का कुहरा, नाक और गले में भी उत्तेजना पैदा करता है। साँस लेने में कठिनाई आती है। फसलें तथा जानवर जिनमें दूध देने वाले पशु विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। इस कुहरे के कारण लन्दन में 1952 में 4 दिन के अन्दर 4000 व्यक्ति घुटकर मर गये तब सरकार का ध्यान इधर गया। विशेष प्रबन्ध किए गये तो 1962 में एक दिन फिर अचानक वही स्थिति उत्पन्न हो गई और उसके फलस्वरूप 700 व्यक्ति मर गये। डोनोरा में 1942 में धुन्ध के कारण 20 व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा 5900 व्यक्ति बीमार हुए जिनमें कई को असाध्य तक घोषित किया गया। न्यूयार्क में सामान्य मृत्यु दर की तुलना में 1953, 1963 और 1966 में 700 व्यक्तियों की अधिक मृत्यु हुई।
वायु में बढ़ते हुए धुएं और विषैले तत्वों की जानकारी सारे योरोपीय देशों को है वे अपनी तरह के प्रयत्न भी कर रहे हैं। इस गन्दगी को दूर करने के लिए अकेला अमेरिका प्रतिवर्ष 12 मिलियन डॉलर्स (आठ अरब चालीस करोड़ रुपये से भी अधिक) धन खर्च करता है तो भी वहाँ अब तक व्याप्त गन्दगी के कारण उत्पन्न अकेले इम्पैसिमा रोग, जो इन दिनों वहाँ बहुत तेजी से बढ़ रहा है से 50000 व्यक्ति प्रति वर्ष मर रहे हैं। जीवनी शक्ति में निरन्तर ह्रास हो रहा है। 40 से 60 वर्ष की आयु के प्रत्येक पाँच व्यक्तियों में से एक व्यक्ति ब्रान्चटिस (श्वास नली का रोग) से पीड़ित है। गाँव के वातावरण में यदि कैंसर का एक रोगी है, तो शहर में दो हैं। कफ-अस्थमा के बीमार अलग हैं। सिर दर्द, जम्हाई आना, शीत, साँस लेने में कठिनाई, गले में सूजन, रक्त में विष, फेफड़ों को हानि, नाक व आँखों में उत्तेजना, उल्टी, सीने में दर्द आदि व्याधियाँ वहाँ सामान्य बातें हैं। भारी खर्च के बाद भी स्थिति नियन्त्रण में न आने का अर्थ ही उनकी दोषपूर्ण व्यवस्था की ओर संकेत करता है। वायुमण्डल को दूषित होने से बचाने और जीवधारियों एवं वृक्ष वनस्पतियों की जीवन रक्षा के लिए यज्ञ ही एक-मात्र साधन है। उन्हीं से मानव संस्कृति की रक्षा हो सकती है। इसलिए मानव प्रेम के प्रत्येक अनुयायी को अगले दिनों यज्ञों के तीव्र प्रयत्न करने होंगे। ऋषि इस बात को अच्छी तरह जानते थे। वेदों में प्रयुक्त ‘वायुर्यजुर्वेदः’ अर्थात् ‘वायु ज्ञान से सम्बन्धित विज्ञान, ही यजुर्वेद है।’ अथर्ववेद 5।24।8 में ‘वायुः अन्तरिक्ष-स्याधिपतिः’ वायु अन्तरिक्ष का राजा है- कहकर उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि वायु को शुद्ध रखने के लिए यज्ञ आवश्यक है। यज्ञ में जलाई गई सुगन्धित औषधियाँ और खाद्यान्न केवल दूषित तत्वों कीट कृमियों को ही नहीं मार भगाते वरन् वायु में पौष्टिक तत्वों का अभिवर्द्धन भी करते हैं।
अग्नि अपने में जलाई गई वस्तु को करोड़ों गुना अधिक सूक्ष्म और शक्तिशाली बनाकर फैला देती है। इस तथ्य को फ्राँस के डॉक्टर हैफकिन और मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डॉ. कर्नल किंग आई. एम. एस. ने भी माना है। उनका कहना है कि आग में घी जलाने से कोसों दूर तक के कीटाणु मर जाते हैं। घी, चावल, केसर आदि से धुएँ के विष का नाश हो जाता है और वायु में घुले जहर वर्षा के साथ जमीन में चले जाते हैं और खाद बनकर उपयोगी बनते हैं।
अथर्ववेद 9।2।6 ‘अग्नि होमिणे प्रणुदे सपत्नाम्’ यज्ञ से वायु के शत्रु नष्ट हो जाते हैं- लिखा है।
शिवों नामासि स्वधिनिस्ते पिता नमस्तेऽअस्तु मा माहिं सीः। निवर्त्तयाभ्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रामस्योषाय सु प्रजास्त्वाय सुवीर्याय।
-यजुर्वेद 3।63
अर्थात्- हे यज्ञ! आप बड़े कल्याणकारी हैं आपको नमस्कार। आप हमारी रक्षा करो। दीर्घ आयु, उत्तम अन्न, प्रजनन शक्ति, ऐश्वर्य समृद्धि श्रेष्ठ सन्तान, बल और पराक्रम के लिए हम आपका सेवन करते हैं।
आगे इस बात को निश्चय करके, व्यक्त करते हुए लिखा है-
शर्मास्यवधूँत रक्षोऽबधूताऽयत मोऽदित्यास्त्वगसि प्रतित्वादितिर्वेत्तु अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुदन प्रतित्वादित्यासत्ववेत्तु॥
-यजुर्वेद 1।14
हे यज्ञ! आप सुखकारक और आश्रय लेने योग्य हैं। आप रोगों को नष्ट करते हैं- रोग के कीटाणु ध्वस्त करते हैं। आप पृथ्वी के लिए त्वचा के समान रक्षक हैं। आप ही वनस्पतियों से आच्छादित पर्वतों के समान सुखद हैं और आकाश के जल को हमारी ओर भेजते हैं।
यह उद्धरण प्रमाण है कि अगले दिनों वायु की गन्दगी से प्राणिमात्र के लिए जो संकट उत्पन्न हो रहा है, उससे एकमात्र यज्ञ ही रक्षा करेंगे।
जब तक पूर्णतया विवेक से मार्गदर्शन नहीं होता, मनुष्य पशु से कुछ ही अच्छा रहता है। मानवीय आवश्यकताओं की वृद्धि और परिष्कार के लिए जब अतीत के अनुभवों का भी उपयोग होगा मनुष्य तभी पूर्ण बनेगा।
-थियोडोर ड्राईसर
24 नवम्बर 50 को रोजारिका (मैक्सिको) के एक कारखाने में आग लग गई, जिसमें गैसें बनती हैं। आग लगने से हाइड्रोजन सल्फाइड विशाल मात्रा में छा गई। उस पर तुरन्त काबू पाने के प्रयत्न में भी लगभग आधा घण्टा लग गया और उतनी ही देर में 22 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और 350 लोगों को अस्पताल जाना पड़ा।
विज्ञान की एक शाखा रसायनशास्त्र ने लाखों-करोड़ों कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थों की खोज कर ली। इतनी औषधियाँ बन चुकी हैं कि एक डॉक्टर उन सबको याद भी नहीं रख सकता। जीव विज्ञान ने यहाँ तक पहल की सूक्ष्मतम जीवाणु (बैक्टीरिया) और विषाणु (वायरस) की सैंकड़ों जातियों तक का पता लगा लिया। एनाटॉमी और फिजियोलॉजी ने मनुष्य शरीर की एक एक हड्डी एक एक नस की बनावट और उनके कार्यों का पता लगाने में सफलता प्राप्त की। वनस्पति विज्ञान ने वृक्ष वनस्पतियों में भी जीवन के अंश की शोध कर ली। भौतिक विज्ञान का तो कहना क्या? चन्द्रमा, मंगल, शुक्र और बृहस्पति की दूरियाँ अब पृथ्वी में बसे पड़ौसी देशों की तरह होने जा रही हैं। वैज्ञानिक प्रगति के पीछे मानवीय पुरुषार्थ और पराक्रम की जो गाथाएं छिपी पड़ी हैं, उन्हें जितना सराहा जाये कम है।
किन्तु एक प्रश्न पीछे से उठ रहा है, वह भी वैज्ञानिक प्रगति के समान ही तीव्र और विस्मयबोधक है। प्रश्न है- ‘क्या विज्ञान मनुष्य के व्यवहार को समझा सकता है?’
क्या विज्ञान मानवीय चेतना की अथ-इति के दार्शनिक और तात्विक पहलू को भी समझा कर मानव मात्र को सन्तोष और भयमुक्ति प्रदान कर सकता है? अरबों रुपये खर्च करके एक अन्तरिक्ष यान (सेटेलाइट) की सफलता के पीछे हजारों-लाखों आदमियों को भूखा-नंगा बना देने की वैज्ञानिक कुत्सा को क्या हर व्यक्ति समर्थन प्रदान करेगा। जब तक विज्ञान मानव के व्यवहार की समस्या को हल नहीं करता, तब तक विश्वात्मा की शान्ति कहाँ संसार के प्राणी शान्ति और सन्तोष से न रह सकें तो विज्ञान की क्या सार्थकता?
आधी शताब्दी में दो महायुद्ध हो चुके। उनमें करोड़ों व्यक्तियों की निर्मम हत्याएं की गईं। मारे गयों के पीछे उनके असहाय बच्चों, धर्मपत्नियों और आश्रितों के करुण क्रन्दन को क्या विज्ञान ने सुना और समझा? युद्धोन्माद के साथ प्रारम्भ हुए मानवता के विनाश के साथ अन्त होने वाली चरित्र भ्रष्टता को समझाएं और निराकरण किए बिना क्या विज्ञान हमें ऊँची और उन्नत सभ्यता का विश्वास दिला सकता है।
विज्ञान की प्रगति अनियमित प्रगति है। समाज में हमें युद्ध, हिंसा, भ्रष्टाचार, भूख और प्यास से बचाओ? विज्ञान उत्तर देता है- ‘पृथ्वी में 108 तत्व हैं, इतने लवण हैं, अम्ल हैं, इतने कार्बनिक पदार्थ हैं, इतने अकार्बनिक पदार्थ हैं इतने वायरस इतनी बीमारियाँ उनके इतने इलाज हैं। और आगे की बातों का हम इलाज कर रहे हैं?’ इस उत्तर में कोई तुक है क्या? संगत प्रश्नों के असंगत उत्तर देने वाले विज्ञान की फिर कितनी उपयोगिता?
विज्ञान निर्जीव प्रकृति को नियन्त्रित करने में लगा है और सजीव प्रकृति भूख-प्यास की पीड़ा से अपनी आँतरिक आवश्यकताओं की आपूर्ति के कारण छटपटाहट से बेचैन है। हम अपनी कठिन सामाजिक समस्याओं के बारे में, जब भी प्रश्न करते हैं, वह मौन हो जाता है। ऐसी विडम्बना मानव इतिहास में उसी प्रकार कभी नहीं देखी गई जैसे चन्द्रमा पर मानव के चरण इससे पूर्व कभी नहीं देखे गये।
एक ओर औषधियाँ बनाने का पुण्य दर्शाता है विज्ञान, दूसरी ओर परमाणविक विस्फोटों के द्वारा यंत्रीकरण से उत्पन्न आलस्य द्वारा- अधिक इन्द्रिय भोग और असंयम के द्वारा- नित्य नई बीमारियाँ फैलाने का पाप भी वही करता है। पुण्य एक तोला और पाप एक मन - कैसे बैठेगा बैलेंस? मानवता बेचारी आधी छटाँक अन्न खाकर एक मन वजन पत्थर के नीचे दबी जा रही है। संसार के कुछ लोग अभाव ग्रस्त जीवन से ही ऊपर नहीं उठ पाते हैं।
जनसंख्या मानव ने नहीं बढ़ाई, विज्ञान ने बढ़ाई है। उसने मानव को सैकड़ों हजारों दिशाएं देकर मूल उद्देश्य से दिग्भ्रांत कर दिया है। भ्रमित मनुष्य को सुख का एक मात्र साधन कर्मेन्द्रियाँ रह गई हैं। पिता से उसे प्रेम नहीं मिलता, माँ से वात्सल्य नहीं, भाई अपना विश्वास और स्नेह प्रदान करने के लिए तैयार नहीं, पड़ौसी उसके साथ हँसने - बोलने और सदाशयता का व्यवहार करने के लिए तैयार नहीं। नौकर को मालिक से दिक्कत, मालिक को नौकर से शिकायत। मानव को तो आनन्द चाहिए। आखिर वह कहाँ से मिले। काम वासना काम वासना- जनसंख्या जनसंख्या। जनसंख्या बढ़ाने का दोष मानव को नहीं- आलस्य अकर्मण्यता, अहंवाद की शिक्षा देने वाले विज्ञान को है। अपने दोष को स्वीकार कर उसे 3 अरब पृथ्वी की जनता को अन्न देना चाहिए था, पर मिल रही है चन्द्रमा की मिट्टी जिसे न खाया जा सकता है न पकाया। मानव के अस्तित्व को और भी संकट बढ़ा है।
अकाल, महामारी और आर्थिक विषमता का कारण है- विज्ञान। मानव की आवश्यकताएं खाना, कपड़ा पहनने, स्वस्थ रहने और शिक्षित रहने भर की थी, उसके लिए इतने व्यापक बखेड़ों की क्या आवश्यकता थी? आज की पृथ्वी के कितने लोग हैं जो अन्तरिक्ष यात्राएं कर सकेंगे? आने वाली पीढ़ी में कितने होंगे जो विश्व को अकाल, महामारी और आर्थिक विषमता से बचा सकेंगे?
सफलता पाना विज्ञान का अटल सिद्धान्त है और प्रत्येक सफलता के साथ मानवीय व्यवहार (ह्यूमन बिहेवियर) के लिए एक नई जटिलता तैयार कर देना भी उसी का नियम है। जब तब पूर्ण सत्य की खोज हो पाये, तब तक यह पृथ्वी या तो नारकीय यन्त्रणाओं से भर जायेगी या पूरी तरह नष्ट हो जायेगी क्योंकि विज्ञान की प्रगति के साथ उसके खर्चों की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी ही होती है। पृथ्वी बढ़ेगी तो है नहीं, उसमें जितना अन्न पैदा होता है उतने ही खर्चे पर या तो मानवीय समस्याओं (भोजन, वस्त्र, आवास, युद्ध, व्यापार) को सुलझाया जा सकता है या वैज्ञानिक अनुसन्धान किए जा सकते हैं। शक्ति के बल पर यदि विज्ञान एकाधिकार करता है- इन साधनों पर तो स्पष्ट है मनुष्य को उससे वंचित रहना पड़ेगा ही - भूखों, बीमारियों, अकाल और युद्ध में मरना पड़ेगा ही।
विज्ञान भविष्य की बात करता है, क्यों उसे तो सिद्धाँतों और घटनाओं की वैधता सिद्ध करनी है। दर्शन कहता है कि मनुष्य की इच्छा को तो समझो और उसके लिए अपने अतीत को भी तो देखो। जब तक भूतकाल के अनुभवों से काम नहीं लिया जाता, हम कठिनाइयों से कैसे बच सकते हैं। हमारी इच्छा शक्ति जब तक विद्यमान है, तब तक हम यह कैसे कह सकते हैं कि हमारा भविष्य यह होगा। हमारी इच्छाएं भी प्राथमिकता चाहती हैं, जबकि विज्ञान अपनी प्राथमिकताओं द्वारा उन्हें कुचल देता है। मनुष्य विक्षुब्ध होता चला जा रहा है और अपने प्रत्येक क्षोभ को वह औरों पर उतारता है। फलस्वरूप आत्मा आत्मा के सम्बन्ध विकृत होते जा रहे हैं। प्रेम, दया, करुणा, उदारता, निर्मलता, पवित्रता, त्याग, क्षमा, सहिष्णुता, धैर्य, निर्भयता, आदि सद्गुणों का अन्त होता जा रहा है और परस्पर भेदभाव, आर्थिक शोषण, अन्याय, बेईमानी झूठ फरेब व्यभिचार आदि बढ़ते जा रहे हैं। इनके रहते मनुष्य क्या कभी चैन से रह सकता है और सुखी होने की अपनी इच्छा पूर्ण कर सकता है?
मनुष्य को न तो अपने जीवन से ही प्रेम करना चाहिए और न सुखों से। अन्तःकरण की वाणी का आज्ञा पालन करना ही मनुष्य के लिए प्रेम करने की चीज है।
-लाला हरदयाल
विज्ञान कुछ सीमा तक ही मानव जाति के लिए उपयोगी हो सकता है। उससे आगे उसे तब तक नहीं बढ़ना चाहिए, जब तक आत्म-चेतना की प्रगति भी उसके समानान्तर नहीं हो जाती। विज्ञान आँशिक सत्य है- एक सीमा निर्धारित है उसके आगे विज्ञान की नहीं, विश्वास और श्रद्धा की आवश्यकता हो जाती है। पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। परमाणु इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रॉन पॉजीट्रान और नाभि पिण्ड (न्यूक्लियस) से बने हैं- विज्ञान ने इतना बता दिया। उसने यह भी बता दिया कि परमाणु में अकूत शक्ति भण्डार छिपा है। इलेक्ट्रॉन चक्कर काटते हैं? शक्ति कहाँ से आई परमाणु में गति क्यों है? -विज्ञान इस सम्बन्ध में क्यों नहीं बताता? वह परमाणु का मानव जीवन से सम्बन्ध जोड़कर हमारे लिए कभी न समाप्त होने वाले आनन्द का दिग्दर्शन क्यों नहीं करता? जबकि हम जानते हैं कि आनन्द ही हमारे लिए अन्तिम सत्य है। वह क्यों नहीं मानवीय स्वभाव को भावनात्मक विकास की दिशा देता। उसे समझना चाहिए कि मनुष्य जब तक अपनी भावनाओं की गहराई में नहीं उतरता, तब तक वह वस्तुतः आनन्द की प्राप्ति नहीं कर सकता, क्योंकि आनन्द भी तो एक भावना ही है। इस दर्शन से विमुख होने वाला मनुष्य केवल विज्ञान से उसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं हो सकता, जिस प्रकार भरपेट भोजन मिल जाने पर पानी न मिलने से सन्तोष नहीं मिलता, वरन् मृत्यु की विभीषिका और उठ खड़ी होती है।
विज्ञान जब तक हमें सही अर्थों में जीना नहीं सिखाता, तब तक उसकी अतुल प्रगति भी हमारे लिए व्यर्थ है। क्योंकि हम शरीर छोड़ सकते हैं पर इच्छाएं और आत्माभिमान नहीं छोड़ सकते।
व्यक्तिगत प्रेरणाएं (इन्डिविजुअल इनीशिएटिव) शिक्षा, न्याय या आदर्शवादी (आयडियोलोजीकल वारफेयर), आर्थिक दृढ़ता आदि का सम्बन्ध मानवीय व्यवहार की मूलभूत प्रकृति से है। इन समस्याओं को हम तब तक हल नहीं कर सकेंगे जब तक अपना लक्ष्य और दृष्टिकोण हमारे भीतर हमारी चेतना में है। विज्ञान की खोजें इसी दिशा में सार्थक और सफल हो सकती हैं। बाह्य प्रकृति की विस्तृत गवेषणा में तो वह आप ही आप भटकेगा और मानव जाति को भी भटकाता रहेगा।
यदि विज्ञान की वर्तमान यात्रा ऐसे ही चलती रही तो हमारे सोचने, बातचीत करने, विचार करने की, दिशां भी इतनी बाह्यमुखी हो जाएंगी कि हमें अपने व्यक्तिगत व्यवहार परिवार, बच्चे, समाज और संसार की आन्तरिक आवश्यकताओं का ध्यान ही नहीं रहेगा। चन्द्रमा पर पहुँच कर उतर जाने के बाद भी नील आर्मस्ट्राँग और एडविन ऐल्ड्रिन की मृत्यु होगी ही पर वे यह नहीं निश्चित कर पायेंगे कि हमें क्यों मरना चाहिए। मर जाने के लिए क्या हम पूरी तरह तैयार हैं। अथवा हमने जन्म और मृत्यु के रहस्य को भली प्रकार जान लिया है। यदि इतना और जान लेते, तब हमारी प्रगति की यह दिशां भी सार्थक हो जातीं और अपना जीवन भी। मानवीय स्वभाव की परितृप्ति हुए बिना कोई भी भौतिक प्रगति कल्याणकारक नहीं हो सकती।
अन्तिम सन्देश
मुहम्मद साहब का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। अतः जुमे के दिन मस्जिद में नमाज पढ़ाने के लिए उन्होंने अबुबक्र को भेज दिया। अबुबक्र को नमाज पढ़ाते देख लोगों में सनसनी फैल गई और कितने ही लोगों को यह विश्वास हो गया कि पैगम्बर अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके पास खबर पहुँची, तो वे अली और फजल के कन्धों पर हाथ रखे मस्जिद आये और लोगों से कहा- ‘मुझे अभी पता चला कि अपने पैगम्बर की मृत्यु का समाचार सुनकर आप लोग घबरा गये। मृत्यु तो निश्चित है, उसका समय टाला नहीं जा सकता। जिसने मुझे इस संसार में भेजा था, मैं उसी के पास फिर जा रहा हूँ। मेरी अन्तिम प्रार्थना आप सब से यही है कि प्रेम से रहना, एक दूसरे का सम्मान करना और अच्छे कार्यों में अवश्य सहायता देते रहना। अच्छे कार्य करने में यदि किसी के पैर डगमगाते हों, तो अवश्य हिम्मत दिलाकर आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते रहना, यही मार्ग सच्चा धर्म है- अन्य रास्तों पर चलकर तो व्यक्ति अपनी बरबादी स्वयं करता है।’
जैसा कि पिछले अंक में बताया-लोकों के अध्ययन के साथ-साथ भारतीय तत्वदर्शियों और योगियों ने उनमें पाये जाने वाले तत्वों और उनकी मानसिक संरचना का भी विस्तृत अध्ययन किया और जब उसे मनुष्य के मनोविज्ञान से मिलाया, तो उसमें अद्भुत सामंजस्य मिला। सातों लोकों में प्राप्त चेतना यद्यपि अपने मूल परिवेश में एक ही है तथापि उसके गुण और सामर्थ्य अलग-अलग क्रमशः ऊपर से नीचे की ओर विघटित या नीचे से ऊपर की ओर विकसित हैं। विकसित अवस्था को जीव का लक्ष्य बताया, क्योंकि उससे आनन्द, सुख सौंदर्य, श्री और शाँति मिलती है, जबकि पतन की स्थिति में जीवात्मा अपनी सूक्ष्म शक्तियाँ साँप की केंचुल की तरह छोड़ती चली जाती हैं। निकृष्ट योनियों में पड़ने से वह दुख, कष्ट और क्लेशपूर्ण जीवन में ही फँसती चली जाती हैं। इसलिए शास्त्रकार सदैव ऊर्ध्व मुखी जीवन की प्रेरणा देते रहे और भोगवादी प्रवृत्तियों से सावधान करते रहे हैं।
सातों लोकों में निवास करने वाली चेतना का विस्तार जब परमात्मा से प्रकृति की ओर होता है तब प्रथम अवस्था बीज जागृत कहलाती है। विज्ञान बताता है कि संसार स्थूल कुछ है ही नहीं। सब कुछ शक्तिमय, चिन्मय है। यह सारा संसार परमाणुओं से बना है और परमाणु अपने आप में कोई स्थूल पदार्थ न होकर धन विद्युत आवेश (प्रोटोन) ऋण विद्युत आवेश (इलेक्ट्रान) नाभिक (न्यूक्लियस) न्यूट्रॉन पाजिट्रान आदि शक्तियों की सम्मिलित इकाई है। भारतीय योग ग्रन्थों में उसे ही -’या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता’ कहा है। अर्थात्- सृष्टि के परमाणुओं को पृथक नहीं किया जा सकता जबकि सभी में नाभिक, धन विद्युत, ऋण विद्युत आदि तो उन्हें भी अलग नहीं किया जा सकता। एक ही वस्तु में या विराट ब्रह्माँड में उन-उन सभी चेतनाओं के स्वरूप को अलग -अलग अनुभव भर किया जा सकता है। इन शक्तियों में जो मूल चेतना है वही खोज बीज जागृत अवस्था है। इस अवस्था में चेतना नितान्त शुद्ध निर्विकार और नाम आदि से मुक्त होती है। पर उसे भविष्य में नामों से पुकारा जा सकता है।
उदाहरण के लिए हमारा जब जन्म नहीं हुआ था, तब हम केवल चेतन रूप में थे। उसका कोई नाम नहीं था, पर जब शरीर से संयोग हुआ, तो लोगों की पहचान के लिए नाम रखा जाने लगा। इस अवस्था में ‘मैं हूँ’, ‘यह मेरा है’ आदि अनुभव होने लगते हैं। इस अवस्था को (2) जागृत अवस्था कहते हैं। इस स्थिति में अपने पूर्व स्वरूप का कोई ज्ञान नहीं होता। मन्त्रों के द्वारा, पुनर्जन्म हवा भूतप्रेत और आत्मा के आह्वान आदि की, घटनाओं से मरणोत्तर जीवन की पुष्टि तो कर सकते हैं पर हमारी चेतना का मूल स्वरूप क्या है- यह एकाएक अनुभव नहीं कर सकते, जब तक कि तप और साधनाओं के द्वारा इन अवस्थाओं का विकास बीज जागृत अवस्था में न कर लें।
तीसरी अवस्था के बारे में योग-वशिष्ठ के 3।117।16-17 मन्त्रों में कहा है-
अयं सोहमिदं तन्म इति जन्मान्तरोदितः।
पीवरः प्रत्यय प्रोक्तों महाजाग्रदिति स्फुरन॥
अर्थात्- जब कई जन्म हो चुकते हैं तो अहंभाव अर्थात् मेरे-तेरे का स्वार्थ दृढ़ हो जाता है। यही महाजागृत अवस्था है।
इस अवस्था से छूटने के लिए वैराग्य और अहंकार भावना के परित्याग का अभ्यास करना पड़ता है। इस अवस्था में मनुष्य अपने अनादि जीवन का चिन्तन करें, तो भी वह मेरे-तेरे के भाव से छूट नहीं पाता। पर जब वह साँसारिक जीवन में इतना घुल जाता है कि उसे अनन्त जीवन का भान ही नहीं होता, तब वह चौथी जागृत स्वप्न अवस्था में होता है-
यज्जाग्रतो मनोराज्यं जागृत्स्वप्नः स उच्यते।
द्विचन्द्रशुक्ति कारुप्य मृगतृष्णदिभेदतः॥
-3।117।18
आरुढ़मथ वा रुढं सर्वथा तन्मयात्मकम्।
-3।117।17
अर्थात्- हमारा जो जीवन चल रहा है, वह इतना दृढ़ हो गया है कि वह कल्पित नहीं, उसी प्रकार सत्य प्रतीत होने लगा है जैसे एक चन्द्रमा पानी में दो, सीप को चाँदी और रेगिस्तान को देखकर नदी का भ्रम होता है। इस अवस्था में जीव अपनी मृत्यु का भी ध्यान नहीं करता। उसे प्रकट ही सत्य भासता है, भले ही उसे कितना ही दुख क्यों न मिल रहा हो।
पाँचवीं अवस्था ‘स्वप्नावस्था’ कहलाती है। उस समय व्यक्ति को जागृत अवस्था का सा अनुभव होता। पर जागने पर वह असत्य सा अनुभव होने लगता है। इस अवस्था में कई देखी हुई घटनाएं भविष्य में इतनी सत्य होती हैं कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, तो भी जाग जाने पर मनुष्य अपने यथार्थ चेतन स्वरूप की याद न करके वही न करने योग्य पाप कर्म करता और स्थूल इन्द्रिय भोगों में फँसा रहता है।
छठवीं स्वप्न जाग्रत अवस्था के सम्बन्ध में योग-वसिष्ठ कहती है-
चिरसंर्शनाभावाद प्रफुल्लबृहदवपुः।
स्वप्नों जागृत्तया रुढो महाजागृत्पदं गतः॥
अक्षते वा क्षते देहे स्वप्नजागृन्मते हि तत्॥
-3।117।20।21,22
अर्थात्-अधिक समय तक जागृत अवस्था के स्थूल विषयों और इन्द्रिय सुखों का अनुभव नहीं होता। पर स्वप्न में ही अपने द्वारा किए जाने वाले क्रिया-कलाप महाजागृत अवस्था के से जान पड़ने लगते हैं। उस समय यह आवश्यक नहीं, कि यह स्थूल शरीर रहे ही अर्थात् मरणोपरान्त भी ऐसे अनुभव होते हैं। यह अवस्था स्वप्न जागृत कहलाती है।
कुछ दिनों तक विविध साधनाएं और योगाभ्यास आदि करने से इस स्थिति का स्पष्ट आभास शरीर रहते हुए भी हो जाता है। इस अवस्था में साधक के अधिकाँश स्वप्न सच्चे भी होने लगते हैं।
अन्तिम अवस्था सुषुप्ति की है। यह जीव की सर्वथा जड़ स्थिति है। वह केवल वही कल्पनाएं करता है, जिसमें भविष्य में दुख ही दुख होता है। योग वसिष्ठ 3।117।24 में लिखा है-
‘पदार्थाः संस्थिताः सर्वे परमाणु प्रमाणिनः।
अर्थात्- संसार के मिट्टी, कंकड़, तृण, पत्थर आदि सभी पदार्थ इसी अवस्था में स्थित रहते हैं। अर्थात् इन सबमें भी चेतना तो होती है, पर वह ऐसे सद्यः सुख प्राप्ति के भाव से ग्रसित होती है कि उसे अपनी चेतना का भी ध्यान नहीं होता। इसलिए जो कुन्द बुद्धि लोग होते हैं, जिन्हें आत्मा और परमात्मा आदि सूक्ष्म सत्ताओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता, प्रायः जड़ कहा जाता है। यह अवस्था बीज जागृत अवस्था की ठीक उल्टी होती है। एक में सारा संसार चेतन ही चेतन होता है, दूसरे में जड़ ही जड़। जो जिस अवस्था में होता है- उसे वही सत्य दिखाई देता है। जब तक चेतना की धारा और दिशा एकाएक परिवर्तित न हो या परिवर्तित न की जाये, हर स्थिति का व्यक्ति अपने को ही
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है वैसे ही इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच लेने पर मनुष्य की बुद्धि आत्मा में स्थिर हो जाती है।
-गीता
सत्य माने बैठा रहता है जबकि यह सारी ही अवस्थाएं माया और दुखपूर्ण होती हैं। जितनी ऊपर की अवस्थाएं हैं उतनी ही सुखद, शक्तिशाली और सिद्धियों से ओत-प्रोत हैं जबकि निम्नगामी अवस्थाएं तो उनके लिए दास, शोषण आदि की वस्तुएं ही रहती हैं। प्रकृति का यह सिद्धान्त भी अपने आप में अटल काम करता रहता है।
इन सातों अवस्थाओं में विद्यमान चेतना को ही स्वप्न जागर, संकट जागर, केवल जागर, चिर जागर, धन जागर, जागृत्स्वप्न और क्षीण जागर नाम से पुकारा जाता है। शरीर में यही अवस्थाएं सप्तधातुओं के रूप में विकसित होती हुईं शरीर में ही सम्पूर्ण लोक और ब्रह्माँड को अवस्थित करती है। इस सूक्ष्म विज्ञान को जो जान लेता है, वह कैसी भी स्थूल स्थिति में पड़ा हो, अपनी चेतना का ऊर्ध्व मुखी विकास करके श्रेष्ठ लोगों की सिद्धियाँ और आनन्द प्राप्त करता है।
अपनों से अपनी बात-
अति प्राचीन काल में जब जन-मानस की स्थिति बहुत ऊँची थी-ज्ञान को शक्ति माना जाता था। लोग विचारों को महत्व देते थे और तर्क, प्रमाण, विवेक, न्याय एवं औचित्य के आधार पर जो बात सही सिद्ध कर दी जाती थी, उसे लोग बिना ननुनच स्वीकार कर लेते थे। जिसके पास ऊँचे विचार थे, प्रबल तर्क थे, औचित्य सिद्ध करने के प्रमाण थे वही नेतृत्व करता था और विचारशील जनता उसी को मानने के लिए तत्पर रहती थी। दुराग्रह किसी को न था। उसे ज्ञान का युग कहते हैं- भले ही उसे सतयुग कहें। तब ब्राह्मणों, ऋषियों, विचारकों, मनीषियों और विद्वानों को हर दृष्टि से प्राथमिकता दी जाती थी। उन्हें समुचित मान मिलता था, क्योंकि शक्ति का स्रोत उन दिनों ज्ञान माना जाता था और ज्ञान की पूँजी उपरोक्त ज्ञानवानों के पास थी इस युग को ब्राह्मण युग कहें, तो भी अत्युक्ति न होगी।
इसके बाद का युग क्षत्रिय युग आया-इसे त्रेता कहें तो कोई हर्ज नहीं इसमें शक्ति को प्रधानता मिली। बाहुबल और शस्त्र बल ही बढ़ती हुई पशु प्रवृत्ति पर अंकुश कर सकता था। सो, जैसे-जैसे मनुष्य ज्ञान का मार्ग छोड़ कर पराक्रम का आतंक अपनाने लगा, बड़ी मछली छोटी मछली को खाने लगी तो जरूरत पड़ी कि काँटे से काँटे को निकाला जाये और दुर्दान्त शक्ति को उसी आधार पर कुचला जाये। देवासुर संग्राम उसी जमाने में हुए। भगवान को जो अवतार लेने पड़े, उनमें असुरता से संघर्ष करना ही प्रधान था। वाराह, नृसिंह, राम, कृष्ण, परशुराम जैसे प्रमुख अवतारों को यही प्रक्रिया अपनानी पड़ी। द्रौणाचार्य ने शास्त्र के साथ शस्त्र को भी जोड़ दिया। लंका काँड और महाभारत जैसे महायुद्ध इसी संदर्भ में हुए।
मानवीय इतिहास ने और भी अवनति के चरण बढ़ाये। शक्तिसत्ता, शक्ति चालन, शौर्य, साहस, संघर्ष के साथ जुड़े हुए कष्टों और खतरों को समझने लगे- वह प्रसंग महंगा और कष्टकारक लगा। सशक्त और शस्त्र संचालकों को ही उनमें प्रधानता मिलती थी। दुर्बलों की तो कहीं गिनती ही न थी। अस्तु बुद्धि ने नया मोड़ लिया और धन को प्रधानता मिल गई-पैसे की शक्ति सबसे बड़ी हो गई। उपार्जन के विभिन्न स्रोत खुले और धन कमाने और जोड़ने की सुविधाएँ हो गईं। धन के द्वारा सब कुछ मिल सकता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जैसी सभी सम्पदाएँ उपलब्ध हो सकती हैं- जब यह दिखाई देने लगा तो धन की ओर सभी की लालसा जग गई-यह तीसरा युग था, इसे वैश्य युग कहा जा सकता है व्यापारियों ने एक-शासन-तन्त्र सँभाले। अंग्रेजों ने देर तक भारत पर शासन किया अमेरिका जैसे धनी देश पैसे के बल पर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ाते हैं। अब लड़ाई करके किसी देश या व्यक्ति को जीतने की आवश्यकता नहीं रही। प्रलोभन के बल पर चाहे जो, लगभग चाहे जिससे कराया जा सकता है। यह लालच का युग-लक्ष्मी का युग-वैश्य युग-अब तक चला ही आ रहा है और यों कहना चाहिए कि अपनी प्रौढ़ावस्था को जा पहुँचा है।
अब चौथा चरण अति समीप है। उसकी किरणें उग पड़ीं और देर नहीं कि वह अपना विस्तार कुछ ही समय में विश्व-व्यापी बना दे- यह शूद्र युग होगा। इसमें- श्रम को, पसीने को, पुरुषार्थ को सम्मान मिलेगा। हरामखोरों के हिस्से में जो सारे स्रोत चले गये हैं, वे सभी छिन जाएंगे। अमीरी, महन्त पदवी, जागीरों, बादशाही के नाम पर जिन्हें अधिक सुविधाएं मिली हैं, वे देर तक उपलब्ध न रहेंगी। जिसने जितना पसीना बहाया, श्रम किया और अपने पुरुषार्थ से समाज की स्थिति ऊंची उठाई, लोक मंगल के लिये अपना बड़े से बड़ा अनुदान प्रस्तुत किया- आगे उन्हें ही सम्मान, नेतृत्व, वर्चस्व और प्राधान्य मिलेगा। इसे मजूरी का युग कहना चाहिए। साम्यवाद के मंच से इसका उद्घोष हुआ था, अब हर दिशा से इसी स्वर में दूसरे सभी मिलते चले आ रहे हैं। अब पूँजीवाद के गुण नहीं गाये जाते वरन् श्रमशीलता को, श्रमिक को उभारने की बात कही जाती है। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ेगी और ‘आराम हराम है’ का नारा लगाते हुए श्रमशीलता हर दिशा में अपनी विजय-ध्वजा फहरायेगी। चाहे विनोबा हो चाहे लेनिन, ध्वनि सबकी एक है। पगडण्डियाँ अलग हों पर दिशा सभी विचारकों की एक है। श्रम का-शूद्र का-वर्चस्व बढ़ने ही वाला है। इसे चौथा युग-कलियुग कहें तो पुरानी मान्यता का आँशिक समर्थन भी हो जाता है।
शास्त्र में कलियुग की प्रधान शक्ति संगठन बताई गई है। ‘संघ शक्ति कलियुगे’ के सूत्र में इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि अनेक दुर्बल मिलकर ही एक समर्थ से बड़े सिद्ध हो सकते हैं। यह उदाहरण जन समाज के लिये ठीक नहीं, जैसे कि एक सिंह असंख्य मृगों को हरा और भगा सकता है। अब शासन बदलने जैसी महान प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये महाभारत रचने की जरूरत नहीं पड़ती वरन् वोट देने भर से राज्य पलट जाते और शासन बदल जाते हैं। प्रजातंत्र की परिपाटी ने पिछड़े समझे जाने वाले लोगों की इच्छानुसार राज्य मुकुटों को धराशायी बना देना सम्भव कर दिया है। अब वे उन पौराणिक घटनाओं को साकार करते हैं जिनमें असुरों का सामना करने में असमर्थ ऋषियों ने बूँद-बूँद रक्त इकट्ठा करके जमा किया और जमीन में गाड़ा और उसमें से सीता उत्पन्न हुई, जिसके कारण समस्त असुरों का नाश हो गया। दूसरी घटना वह भी याद आती है जब असुरों से परास्त और निराश देवताओं की थोड़ी-सी शक्ति इकट्ठी करके ब्रह्माजी ने दुर्गा का सृजन किया और उस देवी ने दुर्दान्त असुरों को निरस्त कर दिया। इस प्रकार के अगणित उपाख्यान पुराणों में मिलते हैं, उनसे संगठन की महत्ता का समर्थन होता है। अब उस तथ्य की ओर भी अधिक स्पष्टता और प्रखरता के साथ प्रयुक्त होते एवं अनुभव में आते देखा जा सकेगा। अगले दिनों संघ शक्ति ही सबसे बड़ी होगी। उसके बल पर बड़े से बड़े प्रयोजन पूरे किये जा सकेंगे। राजतन्त्र पहले से ही जन सहमति से चल रहा है। अब अर्थ तन्त्र, समाज तन्त्र भी लोक रुचि के अनुरूप ही चलने लगेंगे। रीछ वानरों का सहयोग लेकर भगवान राम ने और गोवर्धन उठाने में ग्वाल बालों का सहयोग लेकर भगवान कृष्ण ने जन-संगठन की महत्ता का ही प्रतिपादन किया था। अभी अपना स्वराज्य संग्राम जन सहमति के रुझान से ही जीता गया। जन शक्ति अगले दिनों सबसे बड़ी शक्ति होगी, अन्य सारी शक्तियाँ उसके सामने फीकी पड़ जायेंगी और बौनी रह जायेंगी। विज्ञान, शास्त्र और सत्ता की प्रबलता को भी उसके आगे झुकना पड़ेगा। संघ शक्तियाँ सदा ही प्रबल थीं, पर इस युग में उनका चरम विकास होगा और ‘संघ शक्ति कलियुगे’ का चमत्कार हर किसी को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा।
इस युग के महानतम अभियान के रूप में अगले दिनों अपने ‘युग-निर्माण आन्दोलन’ की ही गणना होगी। समय की आवश्यकता, युग की पुकार और ईश्वरीय इच्छा का सम्मिश्रण इस भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करके रहेगा कि निकट भविष्य में ही सड़ी-गली और अवाँछनीय मान्यताएँ एवं गतिविधियाँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी और विवेक, न्याय एवं औचित्य के आधार पर नये सिरे से जन-समाज की मनोवृत्तियों, चिन्तन की दिशाओं, कार्य पद्धतियों एवं आचार संहिताओं का निर्धारण होगा। अब सारी दुनिया वैज्ञानिक विकास के कारण दिन-दिन अधिक छोटी होती जाती है। सुदूरवर्ती प्रदेश गली-मुहल्ले की तरह एक दूसरे के समीप होते चले जा रहे हैं। एक स्थान की घटनाओं का प्रभाव व्यापक क्षेत्र पर पड़ता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श अब जाने या अनजाने में, चाहने या न चाहने पर भी एक प्रत्यक्ष तथ्य बनता चला जा रहा है। एक विश्व, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक जाति, एक संस्कृति, एक आचार और एक विचार की आवश्यकता लोग तेजी से अनुभव कर रहे हैं और पूरी सम्भावना इस बात की है कि इसी आधार पर नये संसार का, नये समाज का और नये व्यक्ति का बनने बदलने के अतिरिक्त जीवन रहने का और कोई उपाय ही शेष न रह जाये।
अपना नव युग-निर्माण आन्दोलन किसी व्यक्ति विशेष की सनक या ऐसी ही कुछ हलचल पैदा करने वाला शगुल नहीं है। इसके पीछे अत्यन्त महत्व पूर्ण तथ्य एवं प्रचण्ड शक्ति-प्रवाह सन्निहित है और परिस्थितियों के ऐसे जटिल तकाजे जुड़े हुए हैं कि इसी दिशा में चलने के लिये विवश होना पड़ेगा, जिसकी ओर अपने प्रयत्न बढ़ रहे हैं। परिवर्तन और नव निर्माण की बात बहुत लोग करते हैं पर उनके सामने कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है यदि है तो वह इतनी संदिग्ध और धूमिल है कि वर्तमान जन-मानस शायद ही उसे स्वीकार कर हृदयंगम करे। समय बतायेगा कि इस शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण और सही दिशा देने वाला अभियान कौन सा था। उस मूल्याँकन में युग-निर्माण आन्दोलन अपनी विशेषता और दूरदर्शिता से निःसंदेह बहुत सही और खरा सिद्ध होगा।
इस समर्थ आन्दोलन को अपने हिमालय जाने से पूर्व हम सुसंगठित और सुव्यवस्थित बनाकर जाना चाहते हैं। इसलिये गत अंक में इस बात पर जोर दिया गया है कि हमारे परिजन अब केवल पाठक, दर्शक, समर्थक या सहानुभूति प्रदर्शनकर्त्ता मात्र न रहें वरन् एक कदम बढ़ाकर सक्रियता का उत्तरदायित्व संभालने के लिये आगे आयें। यह हमारी अपनी जीवन रीति-नीति के सर्वथा अनुरूप है। हमने अपनी साधना, तपश्चर्या से लेकर लोगों के साथ सद्भावना जोड़ने तक के सारे प्रयास इसी दृष्टि से किये हैं कि लोक-निर्माण के लिये अपने तथा दूसरों के साधनों को अधिक मात्रा में, अधिक अच्छाई के साथ, अधिक भावपूर्ण रीति से नियोजित कर सकें। व्यक्ति का भावनात्मक परिवर्तन और समाज-क्रम की दशा सुधार आज की सबसे महती आवश्यकता है। उसे ईश्वरीय इच्छा भी कहा जा सकता है। इसके लिए हमें जन्म लेना पड़ा और आदि से अन्त तक अपनी समस्त गतिविधियों को इसी प्रयोजन के लिए संलग्न समर्पित करना पड़ा। संस्कारवान आत्माओं को ढूंढ़-ढूँढ़ कर अपना परिवार बनाया। इस सारे प्रयास को सुव्यवस्थित सुसंचालित और लक्ष्य की दिशा में अधिक तत्परता पूर्वक बढ़ते देखने की यदि अभिलाषा रहती है, तो उसे अनुचित नहीं कहा जाना चाहिए। अपने महाप्रयाण से पूर्व इस प्रयास तन्त्र को सुनिश्चित गति और दिशा में चलते देख लें तो उससे सन्तोष की साँस लेने का अवसर मिलेगा और भावी तपश्चर्या में भी वह सन्तोष हमें शाँति एकाग्रता एवं प्रसन्नता ही देता रहेगा।
समय कम रह जाने से हमें, सामने प्रस्तुत कार्यों को संभाल देने की इच्छा यदि जल्दी पूरी करनी पड़ती है, तो वह हमारी उतावली नहीं, मजबूरी ही समझी जानी चाहिए। अखण्ड ज्योति के परिजन भी जागरुक, सुशिक्षित और भावनाशील हैं। उन्हें कुछ करने न करने - बात के पक्ष या विपक्ष में फैसला करना कुछ अधिक कष्टसाध्य या समय साध्य नहीं लगना चाहिए। बात जरा सी है-उसके सम्बन्ध में फैसला करने के लिए एक दो दिन भी काफी हैं। हम चाहते यह थे कि हमारे प्रत्येक प्रेमी परिजन के मन में यह उत्साह और उमंग उत्पन्न हो कि इस युग के महानतम अभियान युग निर्माण में भागीदार-सहयोगी बनकर रहेगा। हम चाहते थे कि हमारे प्रत्येक परिजन के अन्तःकरण में लोक सेवा को मानव जीवन का एक अनिवार्य कर्तव्य मानने की निष्ठा जम जाये। हम चाहते थे कि हमारे प्रत्येक परिजन के मन में इतना सत्साहस जाग पड़े कि वह थोड़ा श्रम और थोड़ा धन नियमित रूप से उस प्रयोजन के लिए लगाने का निश्चय करे और उस निश्चय को दृढ़ता एवं भावनापूर्वक निबाहें। यदि इतना हो जाता तो परिवार के गठन के पीछे हमारे श्रम, त्याग और उमड़ते हुए भावों की सार्थकता प्रमाणित हो जाती। अन्यथा ‘बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का- जो चीरा तो एक कतर-ए-खूँ न निकला’ वाली विडम्बना ही उसे कहा जाता। भीड़ बहुत और काम का एक भी नहीं- जैसे निष्कर्ष पर पहुँचना किसी भावनाशील को कष्टकर ही हो सकता है। सहानुभूति में कुछ दम तभी है जब इसका प्रभाव क्रियाशीलता तक पहुँचे। हम चाहते थे अपने विशाल परिवार में अधिकाँश परिजन ऐसे निकलें जो परमार्थ के सही स्वरूप को समझें और आज के सर्वोत्तम प्रयोजन मन-निर्माण में अपने भाव भरे योगदान की श्रद्धाँजलि लेकर आगे आयें।
परिजनों की सक्रियता की न्यूनतम कसौटी- दस पैसा और एक घण्टे रोज का अनुदान घोषित कर दी गयी है। जिसके अन्तःकरण में मिशन की उपयोगिता और उसके प्रति अपने कर्तव्य की थोड़ी सी झाँकी हुई होगी, वह न तो व्यस्तता का बहाना बनायेगा और न आर्थिक कमी का, न उसे लोगों की उदासीनता उपेक्षा का रोना रोने की ही आवश्यकता पड़ेगी। कर्मनिष्ठ अपनी श्रद्धा और निष्ठा की प्रबलता को लेकर आगे बढ़ते हैं और मन्द या तीव्र गति से निःसन्देह अपने प्रयोजनों में सफल होते चले जाते हैं। विदेशों से आने वाले ईसाई पादरी भारत के अजनबी अशिक्षित और पिछड़े हुए प्रदेशों में सफलता के आश्चर्यजनक चमत्कार दिखा सकते हैं, तो हम अपने ही देश में अपनी सनातन अभिव्यक्ति को क्यों व्यक्त नहीं करा सकते? और उनमें से कितनों को भी क्यों प्रभावित नहीं कर सकते?
थोड़ा श्रम और थोड़ा धन निश्चित और नियमित रूप से दिया जाता रहे तो अपना चिन्तन और मनोयोग उस दिशा में बढ़ेगा ही तथा जन संपर्क के द्वारा लोक मानस को प्रभावित करने की उपयोगिता समझ ली गई तो उसके लिए जो सच्चे मन से प्रयत्न होंगे, उनका सत्परिणाम सामने आयेगा ही। इतने बड़े विशाल परिवार के इस मनोवृत्ति के लोगों की संख्या नगण्य नहीं होनी चाहिए, वरन् नगण्य वह वर्ष रहे जिसे लोक मंगल और आत्मिक कर्तव्यों का बोध नहीं हो पाया। थोड़ा कूड़ा कबाड़ा तो अनाज की छाँट फटक में भी निकल जाता है, इतने बड़े परिवार में थोड़े लोग अन्यमनस्क रहें, तो उनकी उपेक्षा की जा सकती है। पर अधिकाँश को इस कसौटी पर खरा ही उतरना चाहिए कि मिशन की विचारधारा इतने लम्बे समय से पढ़ते रहने पर थोड़ा बहुत रंग चढ़ा या नहीं- अथवा इस कान से सुन उस कान निकाल देने वाली उपहासास्पद विडम्बना ही अब तक चलती रही।
हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति के परिजनों में से अधिकाँश यह स्वीकार करेंगे कि वे अपने अनुदान से और सहयोग से नव-निर्माण अभियान के संचालन में सक्रिय रहेंगे। ऐसे लोगों को बिना विलम्ब लगाये दस पैसा रोज जमा करने वाले ज्ञान घट (गुल्लकें) मथुरा से मंगवानी चाहिएं और उनमें जमा होने वाले पैसों से घरेलू ज्ञान मन्दिर की नियमित व्यवस्था जुटा लेनी चाहिए। इतना साहित्य अपने स्वाध्याय के लिए, परिवार के साँस्कृतिक निर्माण के लिए और पड़ौसी परिचितों में भावनात्मक निर्माण करने के लिए कुछ समय नियमित रूप से लगाना चाहिए। इतनी आरम्भिक क्रिया नियमित रूप से चल पड़े, तो समझना चाहिए कि आगे और भी महत्वपूर्ण कदम उठा सकने का साहस उत्पन्न होगा। उस साहस के बल पर जो जनशक्ति उदित होगी उसके द्वारा नये समाज का नया निर्माण तनिक भी कठिन न रह जायेगा।
15 अक्टूबर, 70 तक वर्तमान परिजनों का शाखा संगठन पूरा हो जाना चाहिए। इतने ही दिन हमारा मथुरा रहना है। इसके बाद नवम्बर से अप्रैल तक इस वर्ष हजार कुण्डी और शत कुण्डी यज्ञों के लिए जो अद्भुत उल्लास उमड़ पड़ा है, उसमें सम्मिलित होने के लिये अधिकतर बाहर ही रहना पड़ेगा। मई में अपनी लड़की का विवाह करना चाहते हैं। उसकी आयु 17 वर्ष की हो गई, बी. ए. पास करने के समीप है। संस्कारवान और रोटी कमाता हुआ लड़का ढूंढ़ रहे हैं। हम सनाढ्य ब्राह्मण हैं, पर उपजातियों से हमें कोई लगाव नहीं, ब्राह्मण मात्र से विवाह कर देंगे। यह ढूंढ़ खोज इन्हीं दिनों पूरी हो गई तो मई में विवाह कर देंगे। वह महीना इस विवाह के लिए, तपोभूमि के अपने सारे अधिकार हस्तान्तरित करने के लिए तथा दूसरी व्यवस्थाएं निपटा जाने के लिए सुरक्षित रखा है। जून में हम चले ही जायेंगे। इस प्रकार इस वर्ष का कार्यक्रम पूरा हुआ। 15 अक्टूबर तक हमें मथुरा रहना है। इस बीच परिजनों का संगठन, एक बड़ा काम हमारे सामने है, सो इन्हीं दिनों उसे निपट जाना चाहिए। यही अनुरोध गत अंक में किया गया है और कहा गया है कि नियमितता बनाये रहने के लिए ज्ञान घटों (गुल्लकों) की स्थापना आवश्यक है। इस कार्य को बिना विलम्ब कर ही लेना चाहिए। दस पैसे जमा होने लगे, तो समझना चाहिए कि घरेलू ज्ञान मन्दिर चल पड़ा और कम से कम दस व्यक्तियों को इसका लाभ देते रहने का जो नियम बनाया गया है, उसके माध्यम से अपना आज का प्रभाव क्षेत्र दस गुना बढ़ने की प्रक्रिया देखते-देखते बन गई। एक घण्टा जो समय माँगा गया है, वह इसी प्रयोजन के लिये है कि घरेलू पुस्तकालय में निरन्तर आते रहने वाले साहित्य को घर तथा बाहर पढ़ाने के लिये जन-संपर्क बनाने की गतिविधि चालू की जा सके। सो ‘एक से दस’ का नारा इसीलिये है कि अपना प्रभाव-क्षेत्र और प्रचार दस गुना तो बढ़ा ही दिया जाये।
जिनने दस पैसे और एक घण्टा समय नित्य देने का अनुदान देते रहना स्वीकार कर लिया है, अब ये ही अपने परिवार के सदस्य रह जायेंगे। शेष सहायक या सहानुभूति कर्त्ता मात्र रहेंगे। इस छाँट से ही हर परिजन की श्रेणी और मनःस्थिति का पता चल जायेगा और संगठन में जो गेहूँ, कीरी मिला-जुला चल रहा था, उसकी सफाई हो जाने से प्रखरता आयेगी। संख्या घट जाये तो हर्ज नहीं- स्तर ऊंचा बना रहे तो काफी है। सक्रिय सदस्यों का संगठन बनाये रखने के लिये एक कार्यवाहक-भारवाहक-नियुक्त कर दिया जायेगा। सिर फुटौअल न कराना हो, तो चुनाव का जंजाल दूर रखना ही उचित होगा। यह निखरे हुए शाखा संगठन अगले ही दिनों नव-निर्माण के कार्यक्रमों को आकाश-पाताल ले उड़ेंगे-ऐसी आशा सहज ही की जा सकती है।
ज्ञान-यज्ञ अभियान के द्वारा प्रचार और प्रभाव-क्षेत्र दिन-दिन बढ़ता रहेगा- ‘एक से दस’ का क्रम चलता रहा, तो विश्वास है 4-5 छलाँगों में ही समस्त विश्व में इस विचारणा, प्रेरणा और प्रकाश को फैलाये जा सकने में सफलता मिल जायेगी। ज्ञान-यज्ञ ने जिन लोगों में साहस और उत्साह भरा होगा, उन्हें अगले चार सूत्रों के अनुसार ढेरों काम करने के लिये सामने रखे दिखाई देंगे- 1. सत् शिक्षा का विचार, 2. कला मंच, 3. रचनात्मक कार्यक्रम और 4. संघर्षात्मक मोर्चे के लिये हर जगह कार्यक्रम पड़ा है। उन्हें आरम्भ करने और चलाने का सिलसिला जब अपना सुसंगठित संगठन आरम्भ करेगा और समान क्राँति की महती आवश्यकताएँ पूरी होने पर हर कोई विश्वास करने लगेगा। राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद- 1. नैतिक क्रान्ति 2. बौद्धिक क्रान्ति और 3. सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता अभी अधूरी ही पड़ी है। सब लोग आर्थिक उन्नति की ओर मुड़ गये हैं। यों केवल बढ़ोत्तरी कुछ हो जाये, तो भी काम चलने वाला नहीं है। दुर्बुद्धि व्यक्ति और कुपथगामी समाज, बढ़े हुए धन से केवल विग्रह ही उत्पन्न करते है। हमें आर्थिक उन्नति के साथ उन आवश्यकताओं को भी पूरा करना चाहिए, जो व्यक्ति और समाज का स्तर ऊँचा उठा सकें, हमें अगले दिनों इसी अभाव की पूर्ति करनी है।
प्रस्तुत परिजनों का संगठन 15 अक्टूबर शरद पूर्णिमा तक पूरा हो जायेगा। यों उसका विकास आगे भी चलता रहेगा, पर आज के सम्बन्ध स्वजनों का विभाजन तो इसी बीच आसानी से हो सकता है। सक्रिय कार्यकर्ताओं द्वारा गठित हुए सक्रिय शाखा संगठनों की गतिविधियाँ इतनी होंगी, जितनी कि इन दिनों देश के सारे सामाजिक, धार्मिक एवं रचनात्मक संगठनों की कुल मिलकर भी नहीं हो रही हैं। अब तक इन कार्यों की कार्य पद्धतियों की जानकारी सर्वसाधारण को तथा परस्पर संगठनों को बहुत ही कम हो पाती थी, क्योंकि युग-निर्माण योजना में ही थोड़े पृष्ठ अति संक्षेप में इसके लिए निर्धारित रहते थे। अधिक छापे, तो पत्रिका का साहित्य स्तर गिरता था। अब बड़े साइज का पत्र निकालने की बात तय हो चुकी है। पिछले अंक में ‘युग निर्माण आन्दोलन’ नामक अलग पत्र निकालने की सूचना थी, उस सूचना के संदर्भ में अधिकाँश पाठकों के सुझाव यह आये हैं कि वर्तमान युग निर्माण योजना को ही बड़े साइज का कर दिया जाये। उसमें से पौराणिक अथवा अति प्राचीन ऐतिहासिक जीवन चरित्रों को कम कर दिया जाये। संस्था की गतिविधियों, योजनाओं एवं प्रयोगात्मक विवरणों की जानकारियाँ उसी में विस्तारपूर्वक दी जाया करें। नया पत्र निकालने की जरूरत नहीं है। पाठकों का सुझाव स्वीकार कर लिया गया है और अब युग निर्माण योजना का साइज तथा आन्दोलन का आधार बढ़ाकर उसी को अब तक के प्रयोजन को जारी रखने और आगामी आवश्यकता को पूरा करने का समन्वयात्मक माध्यम बना दिया जायेगा। हम चाहते हैं कि अब तक की सम्भावित शाखाओं का उनके संचालकों का विवरण 15 अक्टूबर के नये कलेवर वाले अंक में विस्तारपूर्वक रहे। इस वर्ष जो विशेष कार्य किए हों या जिनकी तैयारी हो, वे बातें भी इसमें सूचनार्थ भेजी जा सकती हैं। आगे हर महीने ऐसी रिपोर्ट केन्द्र में आती रहेंगी तो उनके आधार पर समाचारों का गठन करने में सम्पादकों को सुविधा होगी। महत्वपूर्ण घटनाओं एवं व्यक्तियों के चित्र भी उसी में छपते रहेंगे।
यह 1 सितम्बर का अंक है। पूरा सितम्बर उस संगठन कार्य को पूरा करने के लिए पड़ा है। प्रत्येक परिजन को इस संदर्भ में पिछले अंक में छपे ‘अपनों से अपनी बात’ वाले पृष्ठ फिर पढ़ लेने चाहिए और अपने संपर्क क्षेत्र में ज्ञान-घटों (गुल्लकों) की सम्भावना को तलाश कर उतनी गुल्लकें मंगा लेनी चाहिए। सदस्यता की प्रामाणिकता उन्हीं पर टिकी है क्योंकि मन-मर्जी पर नियमितता का अंकुश लगे बिना उसके निरन्तर चलते रहने की सम्भावना कम ही रहती है। 15 अक्टूबर से बड़े साइज में निकलने वाली युग-निर्माण योजना भावी आन्दोलन क्रम को बहुत प्रोत्साहन देगी और इन दिनों जितना काम हो रहा है,उससे कई गुना अगले ही दिनों होने लगेगा। कहाँ क्या हो रहा है, उसकी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत शाखाओं को भी उठ खड़े होने और जमकर काम करने की प्रेरणा देगी।
हमारे जाने से पूर्व कितने ही महत्वपूर्ण कार्यों के संचालन की व्यवस्था जुटाने में आँधी-तूफान जैसी तेजी आ रही है। जगह की कमी बहुत पड़ रही थी, सो तपोभूमि की वर्तमान इमारत को दुमंजिली से तिमंजिली करने का कार्य आरम्भ हो चुका है और इस वर्ष चलता ही रहेगा। अन्य भाषाओं में अनुवाद तथा प्रकाश में तेजी आ गई है। 15 अक्टूबर के बाद आरम्भ होने वाली शिक्षा क्रान्ति के पाठ्यक्रम बनाने और बढ़ाने का कार्य दो महीने में निपटा देने के लिए पूरी सक्रियता बरती जा रही है। विद्यालय में कई ऐसे नवीन कार्य जोड़े जा रहे हैं, जिनकी आवश्यकता और खपत हर जगह रहती हो। कलाभारती के कई चरण इन्हीं दिनों आरम्भ हुए हैं। युग निर्माण के अत्यन्त प्रेरणाप्रद गीतों के ग्रामोफोन रिकार्ड बनने दे दिए हैं- जयपुर की बेबी बीना एम. ए. जिसे हम सब युग-कोकिला के नाम से पुकारते और दुलारते हैं। बहुत ही मधुर कण्ठ से लोक प्रेरणा में प्राण भरने वाले गीतों को गीत-ध्वनि सर्वत्र सुनाई पड़ेगी। कई चित्रावलियाँ प्रकाशित हो रही हैं और उन्हें बहुत बड़े साइज में प्रदर्शनीय कार्य लायक बनाकर छापे जाने की तैयारी हो रही हैं, जिससे हर शाखा में प्रदर्शिनी लगाने की व्यवस्थाएं जम सकें। ऐसे यन्त्र खरीदे और बनाये जा रहे हैं, जो स्लाइडों के माध्यम से सिनेमा जैसे रंगीन तथा सादे चित्र दिखा सकें और उनके माध्यम से प्रचार का क्षेत्र मनोरंजन युक्त तथा प्रभावशाली बनाया जा सके। आधुनिक कला और विज्ञान की संगति मिलाकर ऐसे धार्मिक नाटकों की शृंखला तैयार की जा रही है, जिससे विचार क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं समाज क्रान्ति के प्रयोजनों को भली प्रकार पूरा किया जा सके। प्रचार एवं संगठन की दृष्टि से नवम्बर से अप्रैल तक लगभग 6 महीने हमें हजार कुण्डी और सौ कुण्डी अत्यन्त विशालकाय धर्म-सम्मेलनों में ही फिरना है ताकि बुझते समय प्रबल वेग के साथ जलने वाले दीपक की तरह हम इस थोड़ी सी अवधि में अधिक से अधिक चेतना उत्पन्न करने में बचे हुए दिन लगा सकें।
भावी कार्यक्रम बहुत बढ़ने वाले हैं। नव-निर्माण के स्वप्न साकार होकर सामने आने वाले हैं। इस महान् प्रयोजन में-इस सन्धि वेला में अपना एक भी परिजन यदि सक्रिय योगदान से वंचित रहा, तो हमें दुःख ही होगा। हम चाहते हैं कि अपने परिवार की समस्त, श्रद्धा इकट्ठी होकर इस वर्ष सक्रियता के रूप में परिणत हो जाये और ऐसा समर्थ संगठन इन्हीं दिनों खड़ा हो जाये, जो विश्व-मानव के भाग्य-निर्माण के अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन करने में समर्थ सिद्ध हो सके।
श्रावस्ती के महाअभिमानी शासनाध्यक्ष विडूडभ ने कपिलवस्तु पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। सैनिक तैयारियाँ पूर्ण हो गईं। यह समाचार सन्त महानाम ने सुना तो उनका कोमल अन्तःकरण मानव-जाति पर सम्भावित अत्याचार की आशंका से काँप उठा। वे मात्र श्रोता और दर्शक बनकर चुप रह जाने वाले व्यक्ति नहीं थे वरन् कैसी भी परिस्थितियों के विरुद्ध मोर्चा संभालने वाले शूरवीर योद्धा की तरह थे। समाचार पाते ही वे श्रावस्ती की ओर चल पड़े।
सम्राट को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- स्वार्थ और राज्य-लिप्सा के कारण एक देश का दूसरे देश पर आक्रमण करना अन्याय और पाप है विडूडभ! तुम मेरे शिष्य हो, सो मैं तुम्हें आगाह करने आया हूँ। तुम इस जघन्य कर्म की इच्छा को त्याग दो। युद्ध से मानव जाति का कभी भी हित नहीं हुआ।
अभिमान उस चिकने घड़े के समान होता है, जिस पर उपदेश रूपी जल की एक बूँद भी तो नहीं टिक पाती। विडूडभ की दृष्टि में युद्ध, विजय, लूट-पाट के दृश्य घूम रहे थे, वह भला सन्त की सीधी, सच्ची, सरल वाणी से क्यों प्रभावित हो जाता। उसने महानाम की एक न सुनी और कपिलवस्तु पर चढ़ाई कर दी।
विचारों में डूबे सन्त महानाम अभी कुछ विचार कर ही रहे थे कि उन्हें एक ग्रामीण ने आकर सूचना दी- महात्मन्! विडूडभ ने कपिलवस्तु पर रक्त-रंजित आक्रमण कर दिया है। इधर कपिलवस्तु नरेश का पता नहीं है। सुना है वह अपनी रानियों समेत भाग गये हैं। सेनापति रहित सेना ने भी, सुना है आत्म-समर्पण कर दिया है। क्रूर विडूडभ ने सैनिकों को खुली छूट दे दी है- वे नगरवासियों को बुरी तरह लूट रहे हैं और निरीह स्त्री-बच्चों को भी काट-काटकर मौत के घाट उतार रहे हैं।
धिक्कार! सन्त के मुँह से यह शब्द पहली बार सुनने को मिल रहे थे- विडूडभ तो पापी है ही, जो उसने निरपराध कपिलवस्तु पर आक्रमण कर दिया। पर उससे भी भयानक पापी रहा इस देश का राजा, जिसने अत्याचार का सामना शक्ति से न कर, मृत्यु के भय से भाग जाना अच्छा समझा। युद्ध बुरा है, पर आततायी से युद्ध न करना उससे भी बुरा है। अब मैं जाता हूँ, देखता हूँ विडूडभ मेरी प्रजा पर कैसे अत्याचार करता है?
महानाम अगले क्षण विडूडभ के सैनिक शिविर में थे। उन्होंने विडूडभ से कहा- ‘राजन्, आपको स्मरण होगा, एक दिन गुरुकुल से विदा होते समय आपने मुझ से गुरुदक्षिणा माँगने को कहा था- और मैंने तब न माँग कर किसी उचित अवसर पर माँगने को कहा था। वह अवसर आज आ गया- मुझे तुमसे गुरु-दक्षिणा चाहिए और वह यह कि अब तुम निरीह प्रजा पर अत्याचार नहीं करोगे। अपने सैनिकों को आज्ञा देकर यह लूट-पाट बन्द करा दो। यही मेरी गुरु-दक्षिणा है।’
विडूडभ सोच में पड़ गया- फिर उसकी क्रूर निगाहों में एक नई चमक दिखाई दी। उसने कहा- ‘गुरुवर! मैं अपनी शर्त पालन करूंगा, पर सीधे नहीं। आप इस सरोवर में डुबकी लगायें- जितनी देर आप पानी के अन्दर रहेंगे, उतनी देर लूट-पाट और रक्तपात बन्द रहेगा तथा कपिलवस्तु की प्रजा के लिये यह छूट रहेगी कि वह उतनी देर में प्राण-रक्षा के लिये कहीं भी चली जाये।’
गहरे सन्तोष की मुद्रा में उन्होंने विडूडभ की आँखों में आँखें डालीं और बोले- ‘स्वीकार है।’ समाचार पाकर सारा नगर भागने की अपेक्षा तालाब के किनारे जुटने लगा। सन्त ने डुबकी लगाई- एक-दो-चार-आठ-सोलह पल, क्षण, घण्टे बीतते गये पर सन्त का शरीर बाहर नहीं आया। इस महान् त्याग के आगे विडूडभ का विद्रूप गलकर पानी-पानी हो गया। उसने रक्तपात बन्द करा दिया। तालाब खाली कराया गया तो विडूडभ ने पाया कि उन्होंने अपने आपको जल-स्तम्भ में लगी जंजीर से कसकर बाँध लिया और जल के भीतर ही अपने प्राण त्याग दिये।
खेल-खेल में अनजाने ही, तुम क्यों रूठ गये,
तुमको तो अपनी मंजिल तक, आजीवन चलना।
जीवन की बीहड़ घाटी में, फैला सूनापन,
मन-मृग छौना भटक गया है, सुनकर जग-क्रंदन।
जीत एक है, हार हजारों, तुम क्यों भटक गये,
तुमको तो मानव-देहरी पर, स्नेह-दीप धरना।
हार-जीत के कच्चे धागे, कितने कब टूटे,
हर पनघट पर जाने कितने, कीर्ति-कलश फूटे।
युग के चटके यश दर्पण पर, तुम क्यों रूठ गये,
अभी तुम्हें है मानवता का मुख उज्ज्वल करना।
कितने बनते और बिगड़ते, माटी के पुतले,
कितने मधुर स्वप्न जीवन के, पड़ जाते धुँधले।
मरण-वरण करने कितने ही, आये और गये,
छोड़ी नहीं किंतु सृष्टा ने, नई सृष्टि रचना।
पुरस्कार तृण, किंतु खड़े हैं, लाखों प्रतियोगी,
कुण्ठाओं के कफ़न ओढ़कर, भटक रहे जोगी।
निष्ठाओं की चोटों से पर, तुम क्यों सहम गये,
तुमको तो आग्नेय कुण्ड में, कुन्दन-सा तपना।
तुम्हें बनाना है जीवन भर अपनी ही राहें,
काँटों को भी गले लगाना, फैलाकर बांहें।
नीलकण्ठ बनकर विष पीना, तुम क्यों भूल गये,
तूफानों के बीच सिन्धु की, लहरों को गिनना।
सागर-मन्थन के पहले ही, विषधारा मोड़ो,
धरती से अम्बर तक नाता, किरणों सा जोड़ो।
चन्द्र-खिलौना लेने शिशु से, क्यों तुम मचल गये,
तुम्हें रात-दिन मलयानिल-सा, अग-जग में बहना।
तुम्हें साधना के हाथों में, कंगन पहिनाना,
तुम्हें भगीरथ बनकर, गंगा पृथ्वी पर लाना।
मंजिल स्वयं पास आयेगी, तुम क्यों ठहर गये,
संघर्षों के बीच तुम्हें तो, हिम-गिरी सा अड़ना।
-बाबूलाल जैन ‘जलज’
*समाप्त*