निरन्तर देता है, वह निर्बाध पाता है

धरती बोली वृक्षों मैं तुम्हें खाद देती हूँ, पानी देती हूँ, उससे अपने आपको तृप्त करो, किसी को दो मत, पर वृक्ष ने कहा नहीं माँ मुझे देने दो। उसने फूल दिये, फल दिये, पत्ते दिये, सूख रहा था वृक्ष तब भी उसे यही कामना थी कोई आये मेरी सुखी लकड़ियाँ ले जाकर अपना काम चलाये।

समुद्र ने अपना जल प्रकाश को दे दिया, बादलों ने कहा-परिग्रह पाप हैं, संग्रह असामाजिकता है उसने अपना सारा जल धरती की गोद में बरसा दिया, वही जल फिर नदियों के रास्ते समुद्र तक जा पहुंचा समुद्र में पूर्व में जितना जल था उससे बूँदभर भी कम न हुआ, उसने कभी जाना ही नहीं अभाव क्या होता है।

गंगा हिमालय से चली तो हिमालय ने उसे बहुतेरा रोका, गंगा ने कहा मुझे लोक कल्याण के लिये जाना ही पड़ेगा, वह बह निकली प्यासी धरती, सूखी खेती और व्याकुल जीव-जन्तुओं को शीतल जल लुटाती, गंगा बढ़ी तो हिमालय का हृदय  स्वतः द्रवित हो उठा उसने जल उड़ेलना शुरू किया और गंगा गंगोत्री में जितनी थी गंगा सागर में उससे सौगुनी बड़ी हो गई।

निसर्ग का अर्थ  है जो निरन्तर दान करता है वही निर्बाध प्राप्त भी करता है। आज का दिया हुआ कल हजार गुणा होकर लौटता है। तिथि न गिनो, समय की प्रतीक्षा न करो, विश्वास रखो आज दोगे ता कल तुम्हें कई गुना फल मिलेगा। आज हम लोक मंगल के लिये अपनी क्षमतायें, अपनी सम्पदायें दान करदें तो कल हमारी क्षमतायें, हमारी योग्यताएं वैभव और विभूतियाँ हजार गुनी अधिक होंगी समय लगता हो तो लगे पर त्याग ही, दान ही, परोपकारार्थ उत्सर्ग ही जीवन को परिपूर्ण बनाता है।

-स्वामी रामतीर्थ


पूर्णता-प्राप्ति

मधु ऋतु की शीतलता थी किन्तु सिद्धार्थ का अन्तस्तल तवे की भाँति संतप्त हो रहा था। नेंरजरा का जल प्रवाह जितना अवपल था, योगी की मनःस्थिति उतनी ही चंचल। शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा कृष्ण पक्ष में प्रवेश कर गया किन्तु तथागत के शरीर में अन्न का एक कण भी नहीं गया था, शरीर सूख कर काँटा हो गया था। वासनायें शान्त थी तथापि अंतःकरण जिस परिपूर्णता को प्राप्त करना चाहता था वह प्रयत्न करने पर भी प्राप्त न हुई।

उरुवेला के नगर श्रेष्ठि की पुत्र-वधु सुजाता ने बहुत पहले निश्चय किया था जिस दिन वह प्रथम बार मातृत्व का सुख प्राप्त करेगी उस दिन वह वट-सावित्री का पूजन सम्पन्न कर परम संस्कारित भोजन से साधुजनों को भोज देगी। सुजाता ने पहली बार अनुभव किया उसकी पावन कोख में कोई आत्मा आई है, वह माँ बनेगी। कितनी प्रसन्नता हुई थी उस दिन उसे, उमड़ती भावनाओं के साथ आज वह स्वयं ही लत्यि मधुवन गई। गोठ में एक सहस्र गौओं को सुजाता ने अपने हाथ से हरित तृण परोसा। एक-एक गाय के पास जाकर उसने मातृ सुलभ स्नेह से उनको चूमा चाटा गले लगाया। गौओं ने सुजाता का स्नेह पाकर अपने रोयें फाड़ दिये। उनमें मातृत्व को स्नेह दुग्ध बन कर स्तनों में उतर आया। सुजाता ने आज्ञा दी एक सहस्र गौओं का दूध काढ़ लिया गया और वह सारा दूध पाँच सौ सर्वस्व, सीधी गायों को पिला दिया गया। फिर उन पाँच सौ गायों का दूध निकाल कर ढाई सौ गायों को पिलाया गया। ढाई सौ गायों से निकाला गया दूध सौ गायों ने पिया। दूध की मधुरता के साथ ही उसमें मातृत्व के संस्कारों की अभिवृद्धि होती गई। उसमें सुसंस्कार भी घुलते और प्रखर होते चले गये। सौ गायों का दूध पचास ने पिया, पचास का दूध पच्चीस ने पच्चीस गौओं का दूध पाँच ने पिया। पाँच गौओं का दूध कामधेनु को पिलाते हुए सुजाता ने भारतीय बच्चों में श्रेष्ठ संस्कारों की कामना की। फिर उसने स्वयं हो कामधेनु का दुग्ध शुद्ध स्वर्ण पात्र में निकाला, सुजाता की भावनायें भी उस दुग्ध को परम पवित्र बना रही थीं, मातृत्व की पवित्रता से बढ़कर शुचिता संसार में है कहाँ आज तो माताओं के संस्कार एकाकार हुये थे।

वह दूध लेकर सुजाता घर आई। उसे स्वर्ण-कड़ाही पर चढ़ाया गया। सम्मुख घृत, दीप रखकर आम के ईंधन से सुजाता से खीर पकाई। दूध का एक कण भी नीचे नहीं गिरने दिया। अग्नि देव की स्तुति करते हुये सुजाता ने खीर उतारी और उसका प्रथम नैवेद्य भगवान् जातवेद को ही समर्पित किया। गंगाजल से अर्घ्य देकर उसने पीत-वस्त्र धारण किये। स्वर्ण थाल में वह खीर और पूजन की सामग्री लेकर सुजाता नेरंजरा के तट की ओर चल पड़ी।

योगी सिद्धार्थ अब भी समाधि अवस्था में जाने के प्रयास में संलग्न थे पर उन्हें सफलता नहीं ही मिल पाई थी। सुजाता उधर से ही निकली उसने देखा योगी की देह सूख गई। आकृति पहचानी-सी लगी उसे याद आया यशोधरा का पाणिग्रहण। सिद्धार्थ के साथ यशोधरा ब्याही गई तब सुजाता उसी के पास थी। सिद्धार्थ को सामने देखकर सुजाता के हृदय में यशोधरा की स्मृति और उसके प्रति अनन्य करुणा के भाव एक साथ उमड़ पड़े। थाल वही रखकर उसने सिद्धार्थ को विनत प्रणाम किया और कहा तात! शरीर वीणा के समान है वीणा के तार इतना ढीला न करो कि वह स्वर ही न दे और इतना कसो भी मत कि तार ही टूट जायें। शरीर परमात्मा का मंदिर है इसे पवित्र रखना चाहिये अन्त नहीं करना चाहिये। यह कह कर सुजाता ने वह खीर तथागत के आगे बढ़ा दी। योगी ने मातृत्व भरी सुजाता की आँखों की और दृष्टि डाली निश्छल करुणा देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नेरंजरा के तट पर जाकर खीर खाई, जल पिया, क्लान्ति मिट गई, वे पुनः समाधि के लिये बैठे, अस्थिरता न जाने कहाँ चली गई। समाधि लगी तो फिर उनचासवें दिन तब टूटी जब सिद्धार्थ बुद्ध हो गये, बुद्ध भगवान् हो गये।


गर न हुई दिल में मए इश्क की मस्ती

पत्नी का मन ही मान रहा था, वह कहने लगी मुझे धन रुपया पैसा कुछ नहीं चाहिये तुम बने रहो तो मुझे सब कुछ है, चलो भावुकता ही सही पर मेरा मन आज न जाने क्यों विचलित हो रहा है, किसी अज्ञात अनिष्ट के से भाव उछल रहे हैं, आज तुम काम पर मत जाओ पति ने- प्रेयसी पत्नी के कोमल बालों को हाथ का मधुर स्पर्श देकर कहा-लिली! प्रेम जीवन की अमूल्य सम्पत्ति, अन्तिम आनन्द तो है पर उसे स्थायी सौंदर्य प्रदान करने के लिये सक्रियता भी आवश्यक है तुम मेरे लिये दिन भर कितना परिश्रम करती हो, तुम्हारे श्रम के साथ जुड़े प्यार-भाव को क्या मैं भुलाता हूँ पर मुझे भी तो अपना कर्त्तव्य पालन करना चाहिये, मुझे भी तो अपने अन्तःकरण के प्रेमभाव को विकसित करने का अधिकार मिलना चाहिये। तुम किसी बात की आशंका न करो हम दमिश्क होकर पन्द्रह दिन में ही लौट आयेंगे। कप्तान हबेर्ट ने इतना कहकर दाहिना हाथ ऊपर उठाया, अलविदा की और वहाँ से चल पड़ा लिली दरवाजे पर खड़ी हबेर्ट को जाते हुये तब तक देखती रही जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया।

नाविक हबेर्ट के जीवन की यह प्रेम गाथा काल्पनिक नहीं उसके जीवन की महान् साधना थी जिसे इन पति पत्नी ने सत्तर वर्ष की आयु तक सम्पूर्ण अन्तः कारण से निबाहा। हबेर्ट लिखते हैं- हम दोनों ने जीवन में काम-भावना या यौन आकर्षण को कभी भी महत्त्व नहीं दिया। जिस तरह दो प्रेमी रहते हैं विवाह के बाद से हम दोनों ठीक वैसी ही रहे और इस संसार में आने का भरपूर आनन्द लेते रहे। मेरी दृष्टि में प्रेम से बड़ी निधि व सम्पत्ति इस संसार में दूसरी नहीं, हम दोनों की एक ही इच्छा थी कि हम एक ही दिन मरें (ऐसा ही हुआ भी) और जब भी कभी संसार में आयें कभी एक दूसरे से अलग न हों।

ईश्वरीय विधान भी प्रेम के आगे नतमस्तक है। हबेर्ट वहाँ से चलकर सीधे आफिस पहुँचा, आवश्यक कागज-पत्र लेकर जहाज पर चढ़ा। जहाज दमिश्क के लिये चल पड़ा। अभी यात्रा एक दिन की भी पूरी नहीं हो सकी थी, रात का समय, नीख स्तब्धता, घोर अन्धकार- सब मिलकर यह बता रहे थे कुछ अनहोनी होने वाली है। सचमुच आधा घण्टा बीते समुद्री तूफान आ गया, एक घण्टे के इस तूफान ने जहाज को चरमरा कर रख दिया। हबेर्ट को आज्ञा मिली जहाज के ऊपर जाकर उसके पाल को तूफान की दिशा में मोड़ने की। ताकि उसे तूफान के विपरीत आघात से बचाया जा सके किन्तु ऊपर जाने का अर्थ- मृत्यु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था-हबेर्ट सतह पर चढ़ना ही चाहता था कि कोई आकृति सामने आकर रास्ता रोक कर खड़ी हो गई, हबेर्ट आगे नहीं बढ़ सका एक काली छाया इस छाया से ही निकली और ऊपर चढ़ गई, पाल की दिशा बदल गई, जहाज विपरीत दिशा में चल पड़ा, वह आकृति फिर हबेर्ट के पास आकर बोली मैं तुम्हारी लिली हूँ, हबेर्ट तुम मुझसे झूठ ही कह रहे थे क्योंकि मैं सकुशल लौट आऊँगा-हबेर्ट विमोहित सा लिली के स्पर्श के आगे बढ़ता तब तक वह आकृति अदृश्य हो गई। जहाज का आफीसर हैरान था यह देखकर कि पाल की दिशा बदल गई, और हबेर्ट भीगा भी नहीं। उसे कौन समझाता कि प्रेम रूप आता और सिद्धि एक ही वस्तु के दो नाम है। लिली उस समय निद्रा में थी, पर अन्तः करण अपने प्रिय पति के पास था और वह अदृश्य, अस्पर्श होकर भी इतना शक्तिशाली था कि उतने भयंकर तूफान से भी हँसकर टक्कर ले सकता था। हबेर्ट लौटा तो बोला- लिली तुम मुझे फिर लोटा आई।

अपंग भिखारी दिन भर भूखा-प्यासा गाँव की ओर बढ़ रहा था तो वर्षा प्रारम्भ हो गई। बात गोरखपुर जिले सिसवाँ बाजार के समीप एक गाँव की है। पास में ही एक मन्दिर था वर्षा के कारण दूर तक पहुँचना सम्भव न था, अपंग भिखारी का घर तो वहाँ से दूर चम्पारन जिले के नरईपुर गाँव में हैं। किसी तरह घिसटता हुआ मन्दिर तक पहुँचा। रात वहीं बिताने के अतिरिक्त कोई उपाय न था।

मनुष्य अकेला हो तो भावनायें भावनाओं से बात करती है। सामने खड़ी देव-प्रतिमा की ओर देखा आँखों ने, तर्क मन ने किया- भगवान् कैसी है तुम्हारी सृष्टि किसी के पास अच्छे स्वस्थ पाँव भी होते हैं और ऊपर से घोड़ागाड़ी मोटर, हाथी आदि वाहन भी और किसी को वाहन तो दूर पाँव भी नहीं देते, तुम्हारे माया बड़ी विलक्षण है।

अन्तः करण की श्रद्धा बोली- इसमें भगवान् क्या दोष- बावले यह तो सब कर्मफल है, जिसने किया तप, सम्पन्न की साधना, किया जिसने पुरुषार्थ, वैभव तो उसे मिलना ही था पर जो पड़ा रहा पाप-पंक में दूसरों को कष्ट देकर अहंकार की आत्म-प्रवंचना में वह दीन-दरिद्र रह गया तो इसमें भगवान् का क्या दोष?

दुःखी मन में विचार उठा-प्रभु-आखिर हम भी तो आपकी ही सन्तान है, अज्ञानवश आपको छोड़ दें तो क्या आपको भी छोड़ देना चाहियें, आप तो संसार का पालन करने वाले सबके रक्षक हैं आप तो सर्व समर्थ हैं प्रभु! पाप के बोझ से बचाकर सत्मार्ग की दिशा आप ही तो देते हैं?

ऐसे-ऐसे सोचते हुए अपंग के अन्तःकरण में भगवान के प्रति अनन्य भक्ति अपूर्व प्रेमी की स्फुरण आलोकित हो उठी हृदय विह्वल हो उठा, आँखें झर-भर झरने लगीं वाह्य चेतना शून्य सी हो चली लगता था चिरकाल से दिग्भ्रमित आत्मा को अपना परमधाम मिल गया है अपंग को नींद आ गई उसे लगा जैसे वह अगाध ज्योति सागर में खो गया है, अब वह प्रकाश के अतिरिक्त कुछ शेष ही नहीं रहा। भोर की ऊषा ने अपंग को आकर जगाया तो वह विस्मय विस्फारित नेत्रों से देखता रह गया कि उसकी अपंगता एक स्वस्थ, सुदृढ़ शरीर में परिवर्तित हो गई है।

दो घटनायें एक लौकिक प्रेम की एक आध्यात्मिक प्रेम-की प्रेम एक ही है रूप भिन्न है भिन्नता में भी एक जैसा सुख एक जैसी तृप्ति एक जैसी सिद्धि देखकर ही किसी शायर ने लिखा है।

गर न हुई दिल में मये इश्क की मस्ती। फिर क्या दुनियादारी, क्या खुदा परस्ती॥

अगर हृदय में प्रेम की मस्ती न हो तो चाहे साँसारिक जीवन हो अथवा ईश्वर प्राप्ति का आध्यात्मिक मार्ग- कोई आनन्द नहीं आता। ‘आनन्द का मूल स्रोत प्रेम है। प्रेम के बिना सारा संसार ही नीरस हो जाता है। निष्क्रिय हो जाता है प्रकृति की रचना प्रेम का आनन्द लेने के लिये ही हुई है। यदि संसार में एक ही तत्व बना रहता तो तालाब में भरे जल, और चन्द्रमा की मिट्टी की तरह संसार में न तो कोई सक्रियता होती और न चेष्टायें, विविधा सृष्टि रचकर परमात्मा ने प्रेम को ही प्रवाहित किया है। मनुष्य जीवन का तो यह सबसे बड़ा सौभाग्य है वह अपनी प्रेम भावनाओं का विकास करके अत्यन्त उल्लास उत्साह, उमंग, क्रियाशीलता, आल्हाद, मैत्री सेवा, सहयोग का जीवन जीता है। ईश्वर की आत्मा की प्राप्ति कोई नई बात नहीं है वह अहर्निश प्रेम भावनाओं में डूबी अन्तर्दशा का ही दूसरा नाम है।


भगवान को भूलने की गलती

एक बार गाँधी जी इतने थक  गये कि उन्हें चारपाई पर ही नींद आ गई। रात्रि को दो बजे जब आंखें खुली तो उन्हें स्मरण हुआ कि वे रात्रि को सोने से पूर्व प्रार्थना करना भूल गये। उन्हें इसका बड़ा पश्चाताप हुआ और उनका शरीर थर-थर काँपने लगा तथा पसीने से लथपथ हो गया। प्रातःकाल लोगों के पूछने पर उन्होंने सारी बात बताते हुए कहा-जिस भगवान् की कृपा से मैं जीवित हूँ उस भगवान् को ही भूल गया, इससे बड़ी और क्या गलती होगी?


पदार्थ से शक्ति की ओर, अणु से विराट् की ओर

परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है। उसकी लघुता अन्तिम है अनुमान है यदि मनुष्य एक परमाणु के बराबर हो जाये तो भारतवर्ष के 58 करोड़ लोग पिन की नोक में आसानी से बैठाये जा सकते हैं। परमाणु की लघुता की कोई भी सीमा नहीं है।

लेकिन यदि इस संसार में किसी एक स्थान पर अपवाद रहित सत्य मिल जाता है तो चिड़ियों के चहकने से लेकर सूर्य के गतिशील होने तक की एक व्यापक हलचल विश्व में दिखाई दे रही है न होती, सृष्टि में सब ओर जड़ता ही जड़ता होती। सृष्टि के खेल को चलाये रखने के लिये हर परमाणु के भीतर एक चेतना काम कर रही है। वही चेतन सत्ता जीव है, आत्मा है, उसी का विराट् रूप ब्रह्म है।

वालाग्रश्त भागस्य कल्पिस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते॥ श्वेताश्वतरोपनिषद् 5/6

अर्थात् बाल के अग्रभाग के सौवें भाग से भी सौवें अंश जितना सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिमाण वाला आत्मा ही असीम गुणों वाला हो जाता है।

परमाणु की लघुता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पानी की एक बूँद में 60 लाख शंख (सा के आगे बीस शून्य) परमाणु होते हैं। पानी के एक घटक हाइड्रोजन परमाणु का व्यास एक इंच के बीस करोड़वें भाग जितना होता है। उसका भार 164 ग्राम के 10 अरब शंख अर्थात् 1 के आगे 24 शून्य होती है।

इतना छोटा परमाणु भी अपने आप में न तो अन्तिम सत्य है और न ही स्थिर। उसकी स्थिरता परमाणु में न्यूट्रान कणों की उपस्थित के कारण भ्रम जैसी जान पड़ती है मुख्य रूप से उसमें दो भौतिक शक्तियाँ इलेक्ट्रान (ऋण विद्युत) और प्रोट्रान (धन विद्युत) गतिशील हैं। यदि दोनों शक्तिगण होने पर भी भौतिक माने जाते हैं। अर्थात् वह विभक्त तत्व हैं और परमाणु से छोटे हैं। ऋण आवेश (इलेक्ट्रान का व्यास एक इंच के पचास नीलवें भाग एक बटा 5 के आगे बारह शून्य) के बराबर और भार में हाइड्रोजन के परमाणु भार से भी एक बटा 2 हजारवें भाग जितना। यह इलेक्ट्रान परमाणु की कक्षा में 1300 मील प्रति सेकेंड की गति से चक्कर काट रहे हैं। इसी प्रकार धन अणु (प्रोट्रान) इलेक्ट्रान से दस गुणा अधिक बड़ा स्थिर तथा भार में हाइड्रोजन परमाणु के बराबर होता है।

अभी तक न तो यह इलेक्ट्रान लघुता की अन्तिम सीमा में आ पाये और नहीं प्रोट्रान तब तक इनको बाँध रखने वाली केन्द्रीय शक्ति भी आ धमकी इसे नाभिक या केन्द्रक (न्यूक्लियस) कहते हैं एक परमाणु में नाभिक का स्थान उसके दस नीलवें भाग जितना ही होता है।

अब इलेक्ट्रान के भीतर इलेक्ट्रान और नाभिक (न्यूक्लियस) के भीतर अनेक नाभिकों (न्यूक्लिआई) की संख्या भी निकलती चली आ रही है। हमारे ऋषि ग्रन्थों में इन्हें “सर्गाणु” तथा “कर्पाणु” शब्द से सम्बोधित किया गया है। विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की इस सूक्ष्म शक्ति को देवियों की शक्ति कहा गया है। यों सामान्य तौर से तत्व पाँच ही माने गये हैं किन्तु “वेद निदर्शन विद्या” में यह स्पष्ट उल्लेख है कि सोना, चाँदी, लोहा, अभ्रक आदि ठोस पृथ्वी के ही विभिन्न रूपांतर हैं। इसी प्रकार के वायु के 46 भेद मिलते हैं अग्नियों और प्रकाश के भी भिन्न-भिन्न रूपों का वर्णन मिलता है शाक्त साहित्य में पदार्थ शक्तियों के सैकड़ों नाम मिलते हैं हर शक्ति का एक स्वामी देवता माना गया है और उसे शक्तिमान शब्द से संबोधित किया गया है। अब पदार्थ के साथ जिस प्रति पदार्थ की कल्पना की गई है वह प्रत्येक अणु में प्रकृति के साथ पुरुष की उपस्थिति का ही बोधक है।

1630 में इसी विषय पर प्रसिद्ध फ्राँसीसी वैज्ञानिक पाल एट्रियेन माँरिस डीराक ने इस तरह के कणों की उपस्थिति का उल्लेख किया और उन्हें प्रति-व्यय (एण्टीएलेमेन्ट) का नाम दिया गया। डीराक को 1633 में इसी विषय पर नोबुल पुरस्कार दिया गया। उसके बाद एण्टो इलेक्ट्रान एण्टो प्रोटोन सामने आये। सबसे हलचल वाली खोज मार्च 1665 में अमेरिका की ब्रुक हेवेन राष्ट्रीय प्रयोगशाला में हुई जिसमें प्रत्येक तत्व का उल्टा अतत्व होना चाहिए। कोलम्बिया विश्व विद्यालय के वैज्ञानिकों ने ‘एण्टी डयूटिरियम; की खोज की जो सामान्य हाइड्रोजन के गुणों से विपरित था और यह निश्चय हो गया कि संसार में प्रोटानों से भी भारी नाभिक विद्यमान हैं। और यहीं से एक नई कल्पना का उदय हुआ कि संसार में प्रति ब्रह्माण्ड नाम की भी कोई सत्ता होनी चाहिये।

ब्रह्म कहते हैं कि ईश्वर को अण्ड कहते हैं जिसमें निवास हो सके, लोक आदि। सारे संसार को ही ब्रह्माण्ड कहते हैं और भारतीय दर्शन में एक ही ईश्वर की कल्पना की गई हैं-

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। से बाहुभ्या धमति सं पतमैर्द्यावा भूमी जनयन देव एकः॥ ऋग्वेद 10/81/3

एक ही देव (परमात्मा) सब विश्व को उत्पन्न करता, देखता, चलाता है। उसकी शक्ति सर्वत्र समाई हुई हैं। वही परम शक्तिमान् और सबको कर्मानुसार फल देने वाला है।

अंग्रेजी का ‘यूनीवर्स; शब्द भी सारे विश्व की एकता का प्रतीक है दृष्टि का कोई भी स्थान पदार्थ रहित नहीं है आकाश में भी गैस है जहाँ बिल्कुल हवा नहीं है वहाँ विकिरण या प्रकाश के कण और ऊर्जा विद्यमान हैं। प्रकाश भी एक विद्युत चुम्बकीय तत्व है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि वह एक वर्ग मील क्षेत्र पर प्रति मिनट आधी छटाँक मात्रा में सूर्य से गिरता रहता है। अर्थात् एक वर्ग मील स्थान में जो भी प्राकृतिक हलचल हो रही है उसका मूल कारण यह आधी छटा विद्युत चुम्बकीय तत्व ही होता।

जिस प्रकार कोई स्थान पदार्थ रहित नहीं है और प्रति कण को उपस्थिति भी सिद्ध हो गई जो कि स्थूल कण की चेतना से विपरीत गुण वाली होता है यह एक मानने वाले बात हुई कि सारी-सारी में व्यापक प्रति ब्रह्मांड तत्व वही ईश्वर होना चाहिये जिसे कण-कण में विद्यमान कर्माध्यक्ष विचार ज्ञान, मनन आदि गुणों वाला तथा गुणों से भी अतीत कहा गया है।

मनुष्य शरीर जिन जीवित कोशों (सेल्स) से बना है उसमें आधा भाग ऊपर बताये भौतिक तत्व होते हैं। उनकी अपनी विविधता कैसी भी हो पर यह निश्चित है कि कोश में नाभिक को छोड़कर हर स्थूल पदार्थ कण कोई न कोई तत्व होता है। उनके अपने-अपने परमाणु अपने-अपने इलेक्ट्रान प्रोट्रान, न्यूट्रान, पाजिट्रान प्रति इलेक्ट्रान तथा नाभिक भी होगे। पदार्थ ही ब्रह्मांड की रचना करता है इस प्रकार योग वशिष्ठ का यह कहना कि प्रत्येक लोक के अन्दर अनेक लोक और उनके ब्रह्मा (शासन कर्त्ता) विद्यमान हैं गलत नहीं है। जीव अपनी वासना के अनुसार जिस पदार्थ की कल्पना करता है उसी प्रकार वे तत्व या गुण वाले लोक में चला जाता है। पर जिस प्रकार से मनुष्य के कोश का मूल ‘नाभिक’ ही अपनी चेतना का विस्तार साइटोप्लाज्म के हर तत्व के नाभिक में करता है उसी प्रकार इस सारी सृष्टि में हो रही हलचल का एक केन्द्रक या नाभिक होना चाहिये। चेतन गुणों के कारण उसे ईश्वर नाम दिया गया हो तो इस भारतीय तत्वदर्शियों की अति-कल्पना न मान कर आज के स्थूल और भौतिक विज्ञान जैसा चेतना का विज्ञान ही मानना चाहिये और जिस प्रकार आज भौतिक विज्ञान की मानना चाहिये और जिस प्रकार आज भौतिक विज्ञान की उपलब्धियाँ जीवन के सीमित क्षेत्र को लाभान्वित कर रही हैं जीवन के अनन्त क्षेत्र के लाभ इस महान् अध्यात्म विज्ञान द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिये।

परमाणु एक सजीव ब्रह्माण्ड है उसमें झाँक कर देखा गया तो सूर्य सी दमक सितारों सा परिभ्रमण और आकाश जैसा शून्य स्थान मिला। परमाणु की सारी गति का केन्द्र बिन्दु उसका तेजस्वी नाभिक ही होता है। सन् 1833 की बात है एक दिन फ्राँसीसी भौतिक विज्ञानी हेनरी बेकरल यूरेनियम पर प्रयोग कर रहे थे तब उन्हें पता चला कि यह यौगिक अपने भीतर आप ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। यह ऊर्जा पदार्थ से फूटती गलते और नष्ट होते रहते हैं यह मैडसक्यूरी ने इसी का नाम रेडियो सक्रियता बताया था। इसी गुण के कारण पदार्थ टूटते-फूटते गलते और नष्ट होते रहते हैं यह अवधि बहुत लम्बी होती है इसलिये स्पष्ट दिखाई नहीं देती पर प्रकृति में इस तरह की सक्रियता सर्वत्र है। थोरियम का अर्द्ध-जीवन 14000,000,000 वर्ष है अर्थात् इतने वर्षों में उसकी मात्रा आधी रह जाती है आधी विकिरण से नष्ट हो जाती है। पृथ्वी के लोग इस तरह का विकिरण किया करते हैं। प्रतिवर्ष मनुष्य जाति 80000000000000000000 फुट पौण्ड ऊर्जा आकाश में भेजती रहती है जबकि हमारे जीवन को अपने समस्त ब्रह्मांड को गतिशील रखने के लिए सूर्य प्रति सेकेंड चार सौ सेक्टीलियन अर्थात् दस अरब इक्कीस करोड़ किलोवाट शक्ति अपने सार मंडल को बिखेरता और उसे गतिशील रखता है। इस आदान-प्रदान क्रिया पर ही सारा संसार चल रहा है। यदि सूर्य यह शक्ति देना बन्द करदे तो सौर मंडल का हर कण, हर शरीर निश्चेष्ट होकर नष्ट हो जायेगा। सौर मंडलों की रचना व विध्वंस ऐसे ही हुआ करता है।

थोरियम के परमाणु से यदि नाभिक को उसी के इलेक्ट्रान से चोट कराई जाये तो जो रेडियो-ऊर्जा 14000,000000म2 (उसकी पूरी मात्रा समाप्त होने तक) वर्ष में समाप्त होती होगी वह एक क्षण में समाप्त हो जायेगा। यह शक्ति इतनी बड़ी होगी कि वह लन्दन जैसे तीन महानगरों को एक सेकेण्ड में नष्ट करदे। परमाणु की इस महाशक्ति की सूर्य की महाशक्ति से उसी प्रकार तुलना की जा सकती है जिस प्रकार परमाणु की रचना से सौर- मंडल की रचना की तुलना की जाती है। वस्तुतः परमाणु सूर्य और समस्त ब्रह्माण्ड के समान त्रिक हैं। जो परमाणु में है वही सौर मंडल में है जिस प्रकार परमाणु अपने नाभिक के बिना नहीं रह सकता, सौर मण्डल सूर्य के बिना ब्रह्माण्ड भी एक अनन्त सर्वव्यापी शक्ति के बिना रह नहीं सकता। प्रकृति और ब्रह्म की एकता का रहस्य भी यही है। जब तक नाभिक, न्यूट्रान एक हैं, तब तक दोनों में संघात नहीं होता सृष्टि परम्परा परमाणु की तरह स्थिर रहेगी जिस दिन संघात हुआ उसी दिन सारी सृष्टि शक्ति रूप में ‘बहुस्याय एकोभव; की स्थिति में चली जायेगी।

शरीर एक परिपूर्ण ब्रह्माण्ड है। प्राकृतिक परमाणु (जो साइटोप्लाजमा निर्माण करते हैं) उसके लोक की रचना करते हैं और नाभिक मिलकर एक चेतना के रूप में उसे गतिशील रखते हैं। सूर्य, परमाणु प्रक्रिया का विराट् रूप है इसलिए वही दृश्य जगत की आत्मा है, चेतना है, नियामक है, सृष्टि है। उसी प्रकार सारी सृष्टि का एक अद्वितीय स्रष्टा और नियामक भी है पर वह इतना विराट है कि उसे एक दृष्टि में नहीं देखा जा सकता। उसे देखने समझने और पाने के लिये हमें परमाणु की चेतना में प्रवेश करना पड़ेगा बिन्दु साधना का सहारा लेना पड़ेगा अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म बनाना पड़ेगा कि आवश्यकता पड़े तो वह काल ब्रह्मांड तथा गति रहित परमाणु की नाभि सत्ता में ध्यानस्थ व केन्द्रित हो सके। उसी अवस्था पर पहुँचने से आत्मा की परमात्मा को स्पष्ट अनुभूति होती है। नियामक शक्तियों के जानने का और कोई उपाय नहीं है। शरीर में वह सारी क्षमतायें एकाकार हैं चाहें तो इस यन्त्र का उपयोग कर परमाणु की सत्ता से ब्रह्म तक को प्राप्ति इसी में कर लें।


जीवन प्रवाह-अनादि से अनन्त तक

दिसम्बर 1604 का एक दिन। एक फ्रांसीसी इंजीनियर के घर खचाखच भीड़ से भरे वातावरण में अधेड़ आयु के व्यक्ति कर्नल डिरोचाज ने प्रवेश किया। कर्नल को देखते ही लोगों में खामोशी छा गई। एक सर्वथा विचित्र प्रयोग था यह, लोग पुनर्जन्म के प्रमाण देखने उपस्थित हुये थे। कर्नल ने इंजीनियर की लड़की मेरी मेव को स्वच्छ आसन पर बैठाया, उसकी दृष्टि में अपनी दृष्टि डालकर वे कुछ क्षणों तक एकटक देखते रहे, थोड़ी ही देर में लड़की की बाह्य चेतना शून्य हो चली, कर्नल ने उसे आहिस्ता से लिटा दिया और उसकी देह को हलकी काली चादर से ढक दिया।

पश्चिमी देश पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते नहीं, इस्लाम धर्म की मान्यता भी ऐसी ही है। उसका कहना है कि मृत्यु के बाद कयामत तक जीव कब्र में गड़ा रहता है। भारतीय मान्यतायें इन सबसे भिन्न और कहीं अधिक स्पष्ट व बुद्धि संगत है। पंचदशी के तृतीय अव्यय में आचार्य मिहिरचन्द्र ने पंचकोश विवेक प्रकरण में मनुष्य चेतना को अनादि व अनंत आत्मा का प्रवाह बताते हुए 43 श्लोकों में उसके क्रमशः आनन्द प्राप्ति हेतु विज्ञान स्वरूप धारण करने, मन के रूप में व्यक्त होने और प्राण रूप में गतिशील होकर माता-पिता के रज-वीर्य से बने मनुष्य शरीर में आने का वर्णन किया हैं वहाँ यह भी बताया है कि यह चेतना अपनी वासनाओं के कारण साँसारिक सुखों के आकर्षण में पड़ी बार-बार जन्म और मृत्यु वाले शरीरों में आता रहता है जब तक वह ज्ञान तप साधना द्वारा उस अविरल प्रवाह को पहचान नहीं लेता तब तक वह इस प्रकार मरता और नये शरीर धारण करता रहता है।

योग वशिष्ठ इसी बात को यों कहती है-

न जायते म्रियते चेतनः पुरुषः क्वचित्। स्वप्न संभ्रमवद्भ्रान्तते तत्पश्यति केवलम्॥ पुरुषश्चेतनामात्र, स कदा क्वेव नश्यति। चेतनव्यतिरिक्तत्वे वदान्यतिक पुमान्मवेत॥ कोऽद्य यावन्मृतं ब्रूहि चेतनं कस्य किं कथम्। म्रियन्ते देहलक्षणि चेतनं स्थित मक्षयत्॥ -योग वशिष्ठ 3/5/7

हे राम! मनुष्य के भीतर जो चेतना है। (आत्मा) वह न जन्म लेता है, न मरता है, भ्रम वश संसार की परिस्थितियों का स्वप्न की भाँति अनुभव मात्र करता है। मनुष्य में चेतना के अतिरिक्त है ही क्या वह नष्ट कहाँ होता है? यह तो शरीर हैं जो मरते-जीते रहते हैं आत्मा तो अक्षय स्थित रहता है।

दैवयोग से कर्नल डिरोचाज ने भारतीय दर्शन की इस मीमाँसा की अनुभूति करली थी। वे मैस्मरेजम के सिद्ध थे और इस विद्या द्वारा जीवन के गूढ़ रहस्यों का पता लगाने में सफल हुए थे। उन्होंने न केवल फ्राँस वरन् सारे योरोप को यह बताया था कि जीवन के बारे में पाश्चात्य मान्यता भ्रामक और त्रुटि पूर्ण है हमें इस सम्बन्ध में अन्ततः भारतीय दर्शन की ही शरण लेनी पड़ेगी। अपने इस कथन को प्रमाणित करने के लिए ही वे यह प्रयोग कर रहे थे। उन प्रयोग को देखने के लिये फ्राँस के बड़े शिक्षाविद् और वैज्ञानिक भी उपस्थित थे।

मेरी मेव के पिता सीरिया में इंजीनियर थे। मेरी स्वयं भी प्रतिभाशाली लड़की थी मैस्मरेजम द्वारा उसे अचेत कर लिटा देने के बाद कर्नल साहब ने उपस्थित लोगों की ओर देखकर कहा- अब मेरा इस लड़की के सूक्ष्म शरीर पर अधिकार है मैं इसे काल और ब्रह्माण्ड की गहराइयों तक ले जाने और वहाँ के सूक्ष्म रहस्यों का ज्ञान करा लाने में समर्थ हूँ।

किसी जमाने में यह प्राण विद्या भारतीयों के लिये आम-प्रचलित विद्या थी और उनके द्वारा अनेक योगी मृत्यु से पूर्व ही अपने शरीर मृतकों के शरीरों से बदल लिया करते थे और एक ही अवस्था में हजारों वर्ष तक जीवित बने रहते थे। प्राण विद्या के यह प्रयोग विज्ञान के प्रयोगों से कहीं अधिक रोचक और तथ्य पूर्ण हैं इसी विद्या के आधार पर प्राणों द्वारा आरोग्य प्रदान करते, गुप्त रहस्यों का पता लगाने तथा जीवन के प्रामाणिक रहस्य ढूंढ़ने के प्रयोग हुआ करते थे। कर्नल डिरोचाज का यह प्रयोग भारतीय सिद्धान्तों का प्रत्यक्ष प्रमाण है यह अनेक विलायती पत्रों में छपा था। पीछे इसे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मासिक ‘सरस्वती’ में छपाया था। उसी से यह घटना ‘आध्यात्मिकी’ पुस्तक के लिए उद्धृत की गई। यह पुस्तक इण्डियन प्रेम लि. प्रयोग से प्रकाशित हुई।

कर्नल डिरोचाज अब प्रयोग के लिए तैयार थे। उन्होंने मेरी मेव को सम्बोधित कर पहला प्रश्न किया- अब तुम्हें कैसा अनुभव हो रहा है, क्या दिख रहा है- प्राण पाश में बद्ध अचेतन कन्या उत्तर दिया- मैं नीले और लाल रंग की छाया देख रही हूँ यह प्रकाश मेरे भौतिक शरीर से अलग हो रहा है और मैं अनुभव कर रही हूँ कि मैं शरीर नहीं प्रकाश जैसी कोई वस्तु हूँ यह प्रकाश मेरे भौतिक शरीर से अलग हो रहा है और मैं अनुभव कर रही हूँ कि मैं शरीर नहीं प्रकाश जैसी कोई वस्तु हूँ, अब मैं अपने शरीर से एक गज के फासले पर स्थित हूँ। पर जिस तरह विद्युत कण एक रेडियो को रेडियो स्टेशन से सम्बद्ध किये रहते हैं उसी प्रकार मेरा यह शरीर एक रस्सी की तरह पार्थिव शरीर से बंधा हुआ है। मेरी इस रंगीन प्रकाश शरीर के भीतर दिव्य ज्योति परिलक्षित हो रही है मैं यही तो आत्मा हूँ।”

कर्नल के प्रश्न बड़े विचित्र लग रहे थे पर उनमें एक अदृश्य सत्य झाँक रहा था। उपस्थित जन समुदाय स्तब्ध बैठा सारी गतिविधियों को देख सुन रहा था। जब यह प्रयोग हो रहा था मेरी मेव 18 वर्ष की थी। अब वह बोली मैं 16 वर्ष की आयु के दृश्य देख रही हूँ अब 14, अब 12 अब 10 की आयु के चित्र मेरे सामने हैं इस समय मैं सारसैल में हूँ अपने पिता के साथ, एक विस्तृत जीवन के दृश्य मेरे सामने हैं। अब मैं क्रमशः छोटी हुई जा रही हूँ। फिर वह कुछ देर तक चुप रही। ................. फिर बताना प्रारम्भ किया अभी मैं 1 वर्ष थी बोल नहीं पाई अब मैं अपने पूर्व जन्म के शरीर में हूँ इस शरीर से निकलने के बाद मुझे किसी अज्ञात प्रेरणा ने ‘मेरी मेव’ के शरीर में पहुँचा दिया था- अब मैं पहले जन्म के शरीर में छोटी हो रही हूँ और देख रही हूँ कि यह ग्रेट ब्रिटेन का समुद्री तट है मैं एक मछुए की लड़की हूँ। मेरा नाम ‘लोना’ था। 20 वर्ष की आयु में मेरी शादी हुई। मेरी एक कन्या हुई वह दो वर्ष की आयु में मर गई। मेरा पति मछलियाँ मारता है। उसके पास एक छोटा सा जहाज है। वह समुद्री तूफान में नष्ट हो गया उसी में मेरे पति की मृत्यु हो गई। मैं बहुत दुःखी हूँ, मैं भी समुद्र में डूबकर मर गई हूँ मछलियों ने मेरा शरीर खाया मैं वह सब देख रही हूँ इस सूक्ष्म शरीर में मैंने वैसी ही अनेकों आत्मायें देखी मैंने कुछ बात भी करनी चाही पर मेरा बात ही किसी ने नहीं सुनी, मैं भटकती फिरी पति और बच्चे की याद में वे मुझे मिले नहीं। हाँ एक नया शरीर अवश्य मिल गया।

यहाँ तक जो कुछ मेरी मेव ने बताया पीछे जाँच करने पर वह सारा घटना क्रम सत्य पाया गया। उससे भी गहन सत्य जीवन के अदृश्य भाग में छिपा हुआ है जिसे आज लोग भूले हुए हैं वासनाओं से बँधे जीव बार-बार शरीरों के बंधन में आते और स्थूल से स्थूल तर होते जाते, कष्ट भुगतते और संसार की नारकीय बनाकर स्वयं नरक तुल्य यन्त्रणायें सहते रहते हैं। इन्द्रियों के आकर्षण हमें छोड़ पाते तो हम अनुभव करते कि मनुष्य जीवन परमात्मा की अलभ्य देन है हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए और सच्चे सुख की प्राप्ति करनी चाहिए यह सुख आत्म-चेतना के स्थिर प्रवाह को ढूँढ़ते और उसे प्राप्त करने में ही सन्निहित है।

कर्नल डिरोचाज ने कहा- अब तुम लोना के जन्म से पहले वाले शरीर में प्रवेश करो और वहाँ के सब दृश्य बतलाओ? मेरी मेव एक क्षण चुप रही फिर बोली- सघन अन्धकार हैं, मुझे तकलीफ हो रही है, उसका वर्णन नहीं कर सकती पर लगता है कि ये सब मेरी अपनी भूल के ही परिणाम है। जब मैं लुई अट्ठारहवें के समय में हूँ। पर मैं तो आदमी हूँ मेरा नाम ‘मावील’ है। पेरिस के एक दफ्तर में कर्मचारी हूँ, लोग गलियों में युद्ध कर रहे हैं, चारों तरफ रक्त-रंजित क्रान्ति, मैं भी उसी सम्मिलित हूँ, मैंने कई आदमियों को मार डाला है। मैं बुरा आदमी हूँ, मारने में मुझे अच्छा लगता है। अब मैंने नौकरी छोड़ दी। मेरी आयु 50 की है, बीमारी ने घेरा ओह कितनी यंत्रणा है, कैसी पीड़ा में यह शरीर छूटा, सोचा मनुष्य शरीर की अपेक्षा स्त्री होती तो अच्छा। इसी इच्छा के साथ मृत्यु होती है और मैं मर जाती हूँ। मृतक संस्कार को सारी बाते मुझे याद हैं फिर वही घना अन्धकार।

उतने प्राचीन रिकार्ड ढूंढ़ना कठिन था पर मेरी मेव ने इस समय जो बातें बताईं वह एक-एक कर सभी लुई अठारहवें के समय से मिलती-जुलती थीं। लोग सारा घटना चक्र चलचित्र की भाँति सुन रहे थे। यह कथन भारतीय मान्यताओं के कितने समीप है, यह देखकर अपने पूर्वजों के गहन अध्ययन, शोध और उपलब्धि पर आश्चर्य भी होता है, गर्व भी, पर इन्हें संसार तो क्या अपने देशवासियों ने ही किस तरह भुला दिया यह बात मन में आती है तो उससे भी अधिक दुःख और चिन्ता होती है कि यदि यह स्थिति ऐसी ही रही आने दी गई हम भारतीयों ने ही अपने आध्यात्म को सँवारा व सुधारा नहीं तो लोक-मंगल और विश्व के कल्याण का क्या होगा? हमारे ब्रह्म वचेस का क्या होगा जिसके द्वारा हम कभी संसार के शिरोमणि थे। मेरी मेव की घटना से क्या यह कथन प्रमाणित नहीं होते?

सनातन मेन माहुरताद्य स्यात पुनर्णावः। अहोरात्रे अजायेते अन्यो अन्यस्थ रुपयोः॥

स्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उस वा कुमारी। त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि- विश्वतोमुखं॥ अथर्ववेद 10/8/23 से 27

अर्थात्- जीव जिसके भीतर स्वयं परमात्मा समाया हुआ है। वही सत्य रूप में अत्यन्त प्रतापी और ऐश्वर्यवान है पर भ्रम में असत्य में पड़ने के कारण वही निम्न गामी योनियों में क्षुद्र जीव-सा परिलक्षित होता है। हे जीव! तू कभी स्त्री, कभी पुरुष, कभी कुमार, कभी कुमारी होता कभी वृद्ध होकर लाठी के सहारे चलता। इसीलिये तू जन्म लेने वाला सर्वतोमुखी है नहीं तो तू तो साक्षात् परमात्मा स्वरूप है।

कर्नल डिरोचाज ने मेरी मेव को पिछले दो और जन्मों का बोध इसी प्रकार कराया। लोग उनके इस प्रयोग से बहुत प्रभावित हुए। पर प्रयोग प्रयोग है, उपलब्धि है। प्रयोग की सार्थकता तब है, जब हम स्वयं भी आत्म-चेतना के उस सूक्ष्म प्रवाह को समझने का प्रयास करें परिष्कार और प्राप्त करने का साहस जो अविरल रूप से अनादि काल से बहता आ रहा है और अनंत काल तक जब तक कि हम ईश्वरी भूत नहीं हो जाते चलता ही रहेगा।


मदद की स्थिति में हूँ

कोयल और चींटी उद्यान में एक साथ रहकर आनन्द पूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थीं। कोयल आम के वृक्ष पर बैठ सुमधुर गीत गाकर पथिकों को अपनी  ओर आकर्षित करती रहती थी, तो चींटी वृक्ष की जड़ के पास एक छोटे छिद्र में रहकर दिन रात अपनी भोजन व्यवस्था में जुटी रहती थी। एक दिन चींटी ने कोयल को बसंत में अठखेलियाँ करते देखा तो मन-ही मन सोचने लगी, सदैव दिन एक से तो रहते नहीं। थोड़े दिन बाद ही पतझड़ आया, पत्ते गिरने लगे। फूल मुरझाने लगे, अब कोयल की सहायता करने वाला कोई मित्र न था। उसने दूर-दूर तक सहायता के लिए दृष्टि डाली, अन्त में वह चींटी के पास गई और बड़ी नम्रता से सहायता के लिये याचना की।

चींटी बोली- ‘जब तुम झूम-झूमकर गाती और अठखेलियाँ करती थी तब शायद तुम भूल गई थी कि प्रत्येक बसंत के बाद पतझड़ भी आता है। प्रत्येक मार्ग का अन्त तो कहीं होता ही हैं। मैंने पतझड़ का ध्यान रखा। श्रम को समझा और अब मैं तुम्हारी मदद की स्थिति में हूँ।


अद्वैत आत्मा की अद्वैत अनुभूतियाँ

सन् 1643 को रात, द्वितीय महायुद्ध, पैसिफिक सागर में तेरहवीं एयर फोर्स बटालियन के कमाण्डर जनरल नेथान एफ र्ट्वनिंग दुर्भाग्यवश युद्ध के दौरान अपने बेड़े से अलग पड़ गये। वे एस्पेराइट सन्तों एयरवेज के लिए अपने चौदह साथियों के साथ रवाना हुये थे। युद्ध के दिन थे ही बहुत खोज की गई पर उनका व उनके साथियों का कुछ भी पता नहीं चला।

जनरल नेथान की पत्नी उस समय अमेरिका में अपने घर में सा रही थी। प्रगाढ़ निद्रा के समय उन्हें लगा उसके पति उनके पास खड़े हैं और बेचैनी पूर्वक उसे जगा रहे हैं। श्रीमती ट्वीनिंग ने अपने पति का मुँह और हाथ स्पष्ट देखा उन्होंने पति के हाथ पकड़ने चाहे तभी उनकी एकाएक नींद टूट गई। स्वप्न उन्होंने पहले भी देखे थे किन्तु यह स्वप्न उनसे विचित्र था जग जाने पर भी वह ट्वीनिंग को इस प्रकार रोमाँचित कर रहा था कि उनकी गर्दन के बाल सिहर कर खड़े हो गये थे।

उसके बाद उन्हें नींद नहीं आई। रात पूरी जागकर बिताई। सवेरा हो चला था। तभी एकाएक टेलीफोन की घण्टी बजी। उनकी एक सहेली का फोन था। उसके पति भी दक्षिणी पैसिफिक सागर पर सैनिक अफसर थे इसलिये श्रीमती के हृदय में रात को रोमाँचकारी घटना ने फिर एक बार उत्तेजना उत्पन्न की। उन्होंने जल्दी-जल्दी में पूछा-कहो सब ठीक तो है ना! उधर से आवाज आई सब ठीक है पर मेरा मन न जाने क्यों बड़ी देर से बार-बार तुम्हें ही याद कर रहा है मैंने तुम्हारे पास आने का निश्चय किया है कहीं जाना मत, मैं दो तीन दिन में ही तुम्हारे पास आ रही हूँ।

श्रीमती ट्वीनिंग को अब भी आशंका थी कि उसे कोई बात कहनी है जो अभी छिपाई जा रही है किन्तु जब वे घर आई तब भी ऐसी कोई बात उन्होंने नहीं बताई। इतने पर भी श्रीमती ट्वीनिंग की उस स्वप्न के प्रति आशंका गई नहीं। दो दिन रहकर जब उनकी सहेली वापस लौट गई तब श्रीमती ट्वीनिंग को सरकारी तौर पर जानकारी दी गई कि उनके पति अपने बेड़े के साथ लापता है उनकी खोज की जा रही है। खोज करने वाले अधिकारी नियुक्त कर दिये गये हैं। इस समाचार से उनका मन बड़ा व्यग्र हो रहा था। थोड़ी ही देर बाद दूसरी सूचना मिली जिसमें यह बताया गया था कि जहाज मिल गया है। और श्री ट्वीनिंग शीघ्र ही उनसे मिलने घर आ रहे हैं।

भेंट होने पर श्रीमती ट्वीनिंग ने उस रात के स्वप्न वाली बात बताई इस पर श्री ट्वीनिंग ने बताया कि कि सचमुच उस दिन ठीक उसी समय के संकट में पड़े थे जिस समय उन्होंने स्वप्न देखा। उन्होंने यह भी बताया कि कितने आश्चर्य की बात है कि ठीक उसी समय मुझे-तुम्हारी (उनकी पत्नी) तीव्र याद आई थी इस पारस्परिक अनुभूति का कारण क्या हो सकता है? इसके अतिरिक्त जिस आफीसर ने खोज की वह उनको सहेली का ही पति था उसे किसने वहाँ आने के लिये प्रेरित किया यह सब ऐसे रहस्य है जो मनुष्य को बताते हैं जीवन में जो कुछ प्रकट है वही सत्य नहीं वरन् सत्य का सागर तो अदृश्य में छुपा हुआ है। और वह विचित्र संयोगों के मध्य प्रकट हुआ करता है।

सत्य की खोज में “इन सर्च ऑफ दि ट्रुथ” पुस्तक में इस घटना का हवाला देते हुये- श्रीमती रुथ मान्टगुमरी लिखती है कि युद्धों के समय पाशविक वृत्तियाँ एकाएक आत्म-मुखी हो उठती है तब कैसे भी व्यक्तियों का अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ स्पष्ट रूप से होने लगती है। युद्ध के मैदानों में लड़ने वाले सैनिक और उनके सम्बन्धी रिश्तेदारों के बीच एक प्रगाढ़ भावुक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है वही इन अति मानसिक अनुभूतियों की सत्यता का कारण होता है। ध्यान की गहन अवस्था में होने वाले भविष्य की घटनाओं के पूर्वाभास भी इसी कारण होते हैं कि उस समय एक ओर से मानसिक विद्युत दूसरी ओर से पूरी क्षमता के साथ सम्बन्ध जोड़ देती है और जिस प्रकार लेजर यन्त्र, दूरदर्शी (टेलीविजन) यन्त्र हमें दूर के दृश्य व समाचार बताने दिखाने लगते हैं उसी प्रकार यह भाव सम्बन्ध हमें दूरवर्ती स्थानों की घटनाओं के सत्य आभास कराने लगते हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध की ही एक अन्य घटना का उल्लेख अपने इसी अध्याय में करते हुये श्रीमती रुथ मान्टगुमरी ने लिखा है कि चैकोस्लोवाकिया तथा थाईलैण्ड के भूतपूर्व राजदूत जो उसके बाद ही जापान के राजदूत नियुक्त हुये श्री जानपन तब मुकड़ेन नगर में थे। युद्ध की आशंका से बच्चों को अलग कर दिया गया। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पैट्रोपिया जान न कैलीफोर्निया के लैगुना बीच में एक मकान ले लिया और वही रहने लगी।

इसी बीच श्रीमती जॉनसन ने कई बार जापान के समाचार जानने के लिये अपना रेडियो मिलाया पर रेडियो ने वहाँ का मीटर पकड़ा ही नहीं। एक दिन पड़ोस की एक स्त्री ने बताया कि उनका रेडियो जापानी प्रसारणों को (रेडियो ब्राडकास्टिंग) खूब अच्छी तरह पकड़ लेता है। तीन महीने तक श्रीमती जॉनसन ने इस तरफ कुछ ध्यान ही नहीं दिया। एक दिन उन्हें एकाएक रेडियो सुनने की इच्छा हुई। वे तुरन्त पड़ोसिन के घर गई। रेडियो का स्विच घुमाया ही था कि आवाज आई-हम रेडियो स्टेशन मुकड़ेन से बोल रहे हैं अब आप एक अमेरिकन ऑफिसर बी. जॉनसन को सुनेंगे।’

विस्मय विस्फारित श्रीमती जानसन एकाग्र चित्त बैठ गई- अगले ही क्षण जो आवाज आई वह उनके पति की ही आवाज थी। वे बोल रहे थे - मैं बी.एलेक्सिन जान्सन मुकड़ेन बोल रहा हूँ जो भी कैलीफोर्निया अमेरिका का नागरिक इसे सुने कृपया मेरा सन्देश मेरी पत्नी पैट्रोसिया जान्सन या मेरे माता-पिता श्री व श्रीमती कार्ल टी जान्सन तक पहुँचाये और बतायें कि मैं यहाँ कैद में हूँ स्वस्थ हूँ, खाना अच्छा मिलता है और छूट जाऊँगा, अपनी पत्नी और बच्चों को प्यार भेजता हूँ।”

दो माह पीछे जान्सन कैदियों की बदली में छुट कर आ गये। पैट्रोसिया पति से मिलने गई तो वहाँ उस पति से क्षणिक भेंट होने दी क्योंकि कुछ समय के लिये श्री एलेक्सिस जान्सन को तुरन्त जहाज पर जाना था। पैट्रोसिया को थोड़ी ही देर में घर लौटना पड़ा। उसकी सहेलियाँ उसे घुमाने ले गई पर अभी वे एक सिनेमा में बैठी ही थीं कि पैट्रोसिया एकाएक उठकर बाहर निकल आई और अपने घर को फोन मिलाया तो दूसरी ओर से अलेक्सिस जान्सन बोले और बताया कि मैं यहाँ हूँ मुझे जहाज में जाना पड़ा। पैट्रोसिया सिनेमा छोड़कर घर चली आई।

3 माह तक कभी भी रेडियो सुनने की आवश्यकता अनुभव न करना और ठीक उसी समय जबकि पति संदेशा देने वाले हों रेडियो सुनने की अन्तःकरण की तीव्र प्रेरणा का रहस्य क्या हो सकता है? कौन सी शक्ति थी जिसने पैट्रोसिया को सिनेमा के समय फोन पर पहुँचने की प्रेरणा दी जब इन बातों पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि कोई एक अदृश्य शक्ति है अवश्य जिसने मात्र को एक भावनात्मक सम्बन्ध में बाँध अवश्य रखा है। हज जब तक उसे नहीं जानते तब तक मनुष्य शरीर की सार्थकता कहाँ?


पेड़ पर एक बन्दर बैठा

पेड़ पर एक बन्दर बैठा जाड़े से सिकुड़ रहा था। उसके पास ही एक टहनी पर वया नामक पक्षी का घोंसला था। वया ने बन्दर की दुर्दशा देखकर उससे कहा- ‘ऐ बन्दर! तेरे हाथ-पाँव मनुष्य के समान हैं, फिर भी तू इस प्रकार क्यों कष्ट पाता है अपने लिये एक घोंसला क्यों नहीं बना लेता? देख, मैं तो एक छोटा सा पक्षी हूँ, फिर भी मैंने अपने लिये एक घोंसला बना लिया है और सुख से रहता हूँ” बन्दर को इसका कहना बहुत बुरा लगा और हाथ मार कर वये का घोंसला तोड़ डाला।


छुरे की धार पर नचिकेता चलेगा

आर्य श्रेष्ठ! आचार्य मही ने यम से विनीत निवेदन किया- नचिकेता कुमार ही तो है, उसके साथ इतनी कठोरता मुझसे देखी नहीं जाती। दस माह बीत गये नचिकेता ने गौ-दधि और जौ की सूखी रोटियों के अतिरिक्त कुछ खाया नहीं, अन्य स्नातक और स्वयं मेरे बच्चे भी रस युक्त, स्वाद युक्त भोजन करते हैं फिर नचिकेता के साथ ही यह कठोरता क्यों?

यमाचार्य ने हंसकर कहा- देवी! तुम नहीं जानती आत्मा को, ब्रह्म को प्राप्त करने का उपाय ही यही हैं साधना को ‘समर’ कहते हैं युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो न चकेता का अन्न संस्कार ही कराया गया है। ब्रह्म विराट् है, अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर समर्थ न होगा तो नचिकेता उसे धारणा कैसे करेगा। छोटी सी लकड़ी दस मन बोझ नहीं उठा सकती टूट जाती है पर तपाई दबाई और पिटी हुई उतनी बड़ी लोहे की छड़ पचास मन भार उठा लेती है। नचिकेता का यह अन्न संस्कार उसके अन्नमय कोश के दूषित मलखरण, रोग और विजातीय द्रव्य निकाल कर उसे आत्मा केक साक्षात्कार योग्य शुद्ध और उपयुक्त बना देगा। छुरे की धार पर चलने के समान कठिन है पर नचिकेता साहसी और प्रबल आत्म जिज्ञासु है ऐसा व्यक्ति ही यह साधना कर सकता है।

गुरु माता के विरोध की अपेक्षा भी नचिकेता का अन्न संस्कार यमाचार्य ने एक वर्ष चलाया। और उसके बाद उन्होंने नचिकेता को प्राणायाम के अभ्यास प्रारम्भ कराये। प्राणाकर्षण, लोम-विलोम सूर्य वेधन उज्जयी और नाड़ी शोधन आदि प्राणायाम के अभ्यास कराते हुए कुछ दिन बीते उसके प्रभाव से नचिकेता के मुख मंडल पर कांति तो बढ़ी पर उसका आहार निरन्तर घटता ही चला गया। गुरुमाता यह देखकर पुनः दुःखी हुई और बोली-स्वामी ऐसा न करो- नचिकेता किसी और का पुत्र है कठोरता अपने बच्चों के साथ बरती जा सकती है औरों के साथ नहीं।

यमाचार्य फिर हँसे और बोले-भद्रे! शिष्य अपने पुत्र से बढ़कर होता है, नचिकेता के हृदय में तीव्र आत्मा जिज्ञासायें हैं वह वीर और साहसी बालक आत्म-कल्याण की, साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है इसीलिये हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो जायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा-अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान् हैं, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है, इसी से उसे हर पौष्टिक आहार मिलते हैं मनोमय कोश के नियन्त्रण के लिये ‘प्राणायाम” कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

एक वर्ष प्राण-साधन में बीता। नचिकेता को अब यमाचार्य ने मन के हर संकल्प को पूरा करने का अभ्यास कराया। नचिकेता सोता तब अचेतन मन की पूर्व जन्मों की स्मृति स्वप्न पटल पर उमड़ती उसमें कई ऐसे पापों की क्रियायें भी होती जिन्हें प्रकट करने में आत्मा-ग्लानि होती है, नचिकेता को वह सारी बातें बतानी पड़ती, गुरुमाता ने उससे भी नचिकेता को बचाने का यत्न किया पर यमाचार्य ने कहा- आत्मा-ग्लानि और कुछ नहीं पूर्व जन्मों के पापों के संस्कार मात्र हैं जब तक मन नितान्त शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आत्म-बेधन का मनोबल कहाँ से आयेगा। मन की गांठें खोलने का इससे अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं है कि साधक अपनी इस जन्म की सारी की सारी गुप्त से गुप्त बातों को प्रकट कर अपने कुसंस्कार धोये स्वप्नों में परिलक्षित होने वालों में पूर्व जन्मों के पापों को भी उसी प्रकार बताये और उनकी शुद्धि का प्रायश्चित करे।

मनोमय कोश की शुद्धि के लिये नचिकेता को कृच्छ चान्द्रायण से लेकर गोमय, गौमूत्र सेवन करने तक की सारी प्रायश्चित साधनायें करनी पड़ीं। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।

तीन वर्ष बीत गये, नचिकेता ने जीवन का कोई भी सुख नहीं जाना शरीर को उसने शुद्ध कर लिया पर शरीर क्षीण हो गया, प्राणों पर नियन्त्रण की विद्या उसने सीख ली, पर उससे मन क्षीण हो गया, मनोमय कोश को उसने जीत लिया पर उससे यश-क्षीण होता जान पड़ा। संकल्प विकल्प मुक्त नचिकेता अब इस स्थिति में था कि अपने मन को ब्रह्मरंध्र में प्रवेश कराकर सूक्ष्म जगत के विज्ञानमय रहस्यों की खोज करे और आत्मा तक पहुँचकर उसे सुभित करे, जगाये और प्राप्त करे। मन को दबाकर क्रमशः आज्ञा चक्र का भेदन करते हुए विद्या रूपिणी महाकाली की हलकी झाँकी होती तो उस विराट् रूप को देखकर नचिकेता का मन काँप जाता। पर दूसरे ही क्षण एक पुकार अन्तः करण से आती, मन और यह भौतिक सुख नचिकेता! यदि मिल भी गये तो इन्द्रियाँ उनका रसास्वादन कितने दिन तक कर सकती हैं तू तो उस अक्षर, अनादि आत्मा का वरण कर। पूर्णमासी का दिन, बसन्त-ऋतु-चार वर्ष से निरन्तर उग्र तप कर रहे नचिकेता का शरीर बिलकुल क्षीण पड़ गया था आज का दिन उसके जीवन में विशेष महत्व रखता है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी को जागृत करने की तिथि आज ही है। एक प्राण को दूसरे प्राण में समेटता हुआ नचिकेता मूलाधार तक जा पहुँचा उसने अपने संकल्प की चोट की उस आद्य शक्ति पर, चिर निद्रा में विलीन कुण्डलिनी पर उसका कुछ असर न हुआ इस पर नचिकेता ने तीव्र पर तीव्र प्रहार किये। चोट खाई हुई काल-रूपिणी महा सर्पिणी फुंसकार मारकर उठीं और उसने नचिकेता के मन को, स्थूल भाव को चबा डाला, जला डाला। नचिकेता आज मन न रहकर आत्मा हो गया, उसकी लौकिक-भौतिक वासनायें पूरी तरह जल गई वह ऋषि हो गया यह संवाद सारे संसार में छा गया। नचिकेता के यश की विमल पताका सारे संसार में लहराने लगी।

अब वह ब्रह्मा प्राप्ति के समीप था, ब्रह्म से वह किसी भी क्षण मिल सकता था तथापि अपने देश, अपने धर्म, अपनी महान् संस्कृति के उत्थान का संकल्प लेकर नचिकेता वहाँ से चल पड़ा और नव निर्माण के महान् कार्य में जुट गया। उसने इन पंचाग्नि विद्या का सारे संसार में प्रसार कर अमर साधक का श्रेय प्राप्त किया।


कवि इकबाल

कवि इकबाल को अरबी, फारसी का विद्वान बनाने का श्रेय उनके गुरु मौलवी मीरहसन को था। इकबाल में शायरी के प्रति रुचि जागृत करने वाले भी यही मौलवी साहब थे। अतः अपने गुरु के प्रति इकबाल जीवन भर श्रद्धा व्यक्त करते रहे।

एकबार अंग्रेजी सरकार ने प्रसन्न होकर इकबाल को ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। इकबाल ने वह उपाधि लेने से इन्कार करते हुए कहा- ‘जब तक मेरे गुरु का सम्मान नहीं किया जाता जब तक मैं किसी भी उपाधि को ग्रहण काने का अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि आज की स्थिति तक पहुँचाने वाले तो मेरे गुरु ही हैं।

इकबाल की शर्त मंजूर कर ली गई। पहले उनके उस्ताद मीरहसन को ‘शम्म-उल-उलेमा’ का खिताब दिया गया और बाद को इकबाल ने उपाधि ग्रहण की।

आज जब शिष्यों द्वारा गुरुओं का घेराव किया जा रहा हो और उनकी बात को उपहास के रूप में माना जा रहा हो तो उस समय यह घटना प्रकाश की एक किरण के समान दोनों को ही अपने सम्बन्ध सुधारने के लिए प्रेरणा प्रदान कर रही है।


कर्म-योग संबंधी भ्रान्तियाँ और उनका निराकरण

लोक-परलोक में कल्याण के लिए शास्त्रों और मुख्यतः गीता में, मनुष्य मात्र को अनासक्त कर्मयोग का उपदेश किया गया है। निःसन्देह अनासक्त कर्मयोग कल्याण का बहुत बड़ा रहस्य है। यह एक ऐसा जीवन दर्शन है, कर्म करने की ऐसी पद्धति है जिसका अनुसरण करने से मनुष्य के लिये लोक अथवा परलोक में कोई भय नहीं रहता। किन्तु इस अनासक्त योग के विषय में बहुत-सी भ्राँतियाँ और शंकायें सामने आती है। इनका समाधान किये बिना इस योग को न ठीक से समझा जा सकता है और न उचित रीति से उनका अनुसरण ही किया जा सकता है। अस्तु, इस महत्वपूर्ण योग को ठीक-ठीक समझ लेना नितान्त आवश्यक है।

प्रायः लोग इस अनासक्ति कर्मयोग का आशय यह समझते है- “चूँकि मनुष्य की अपनी शक्ति सामर्थ्य कुछ भी नहीं है वह विश्व-ब्रह्माण्ड की एक सामान्य इकाई मात्र है। मनुष्य के व्यक्त अथवा अव्यक्त किसी कर्म का हेतु, प्रेरक और संचालक भी वही एक परमात्मा ही है। मनुष्य की न तो अपनी कोई प्रेरणा है और न कर्म’ उसके सारे कर्म और सारी क्रियाएं उसकी इच्छा, प्रेरणा और शक्ति द्वारा सम्पादित होती है।

अनेक लोग कर्मों के साथ अनासक्ति का अर्थ यह लगाते हैं कि ‘जो भी काम किये जायें असम्बन्ध एवं निरपेक्ष भाव से किये जाये। वे किये तो जाये पर उनसे और उनके परिणाम से कोई सम्बन्ध न रखा जाये। यन्त्र प्रवृत्ति से उनका प्रतिपादन कर दिया जाये। कुछ लोग इससे थोड़ा आगे बढ़ कर इस प्रकार मान लेते हैं कि अपना कर्तव्य तो करते रहा जाये लेकिन उसके परिणाम की चिन्ता न की जाये।

बहुत से अतिवादी लोग तो यहाँ तक बढ़ जाते हैं कि हम जो भी काम करते हैं वह वास्तव में हम नहीं करते। हमसे कराये जाते हैं और वह कराने वाला परमात्मा है। हमारे द्वारा होने वाला अच्छा है। या बुरा इसकी न तो हमें चिन्ता करनी चाहिए और न अपने ऊपर उत्तरदायित्व ही लेना चाहिये। उन सबका उत्तरदायी वह कराने वाला ईश्वर ही है।

इस प्रकार अनासक्त कर्मयोग के सम्बन्ध में न जाने कितनी भ्राँतियाँ लोगों के मस्तिष्कों में चला करती हैं। अनासक्त कर्मयोग के सम्बन्ध में सारी धारणायें भ्राँतिपूर्ण है।

यह बात सही है मनुष्य इस विश्व ब्रह्माण्ड की एक इकाई है और उस परमात्मा रूप चेतन सत्ता से संचालित होता है फिर यह मानना कि मनुष्य का हर काम उसी की प्रेरणा से होता है, उसको कराने वाला वही है। मनुष्य तो एक यन्त्र मात्र है, जैसा संचालित कर दिया जाता है वैसा चल पड़ता है, जिधर चला दिया जाता है चल पड़ता है। इस मान्यता में सामान्य रूप से दो बाधायें हैं- एक तो यह कि वह सत्य शिव और सुन्दर परमात्मा किसी मनुष्य से कोई गलत काम नहीं करा सकता और यदि वह कराता है तो उसका दण्ड मनुष्य को नहीं मिलना चाहिए। लेकिन तथ्य इसके विपरीत दृष्टिगोचर होता है। जो भी मनुष्य कोई गलत या बुरा काम करता है तो देर सवेर उसे उसका दण्ड मिलता है। यह बात किसी प्रकार भी समझ में आने योग्य नहीं है कि एक ओर तो वह परमात्मा गलत काम कराता है और दूसरी ओर दण्ड देता या दिलाता है। परमात्मा, जो कि इस समस्त जड़ चेतन संसार का पालक संचालक और स्वामी है, ऐसा अन्याय परायण नहीं हो सकता।

दूसरी धारणा है- कर्म तो किये जायें पर असम्बन्ध अथवा निरपेक्ष भाव से। यह धारणा भी आयुक्त एवं भ्राँतिपूर्ण है। जो कार्य असम्बन्ध भाव से किया जायेगा उसमें किसी प्रकार की अभिरुचि अथवा तत्परता न रह सकेगी। जिस काम में अभिरुचि तथा तत्परता न रहेगी, जो ऊपरी मन से यों ही असंलग्न प्रवृत्ति से किया जायेगा वह न तो ठीक से किया जा सकता है और न उसका परिणाम ही उपयुक्त होगा। ऊपरी मन से अस्त−व्यस्त ढंग से किये गये काम का परिणाम असफलता के रूप में ही सामने आयेगा, जबकि संसार में न तो कोई कार्य असफलता के लिए किया जाता है और न संसार का काम असफलताओं से चल सकता है। सारे कार्य सफलताओं के लिए हो किये जाते हैं और कार्यों की सफलता पर ही व्यक्ति तथा संसार की प्रगति तथा उन्नति निर्भर है। कार्यों तथा संसार को प्रगति तथा उन्नति निर्भर है। कार्यों में सफलता तभी मिलती है जब वे संलग्नता तथा तत्परता पूर्वक किये जाते हैं। इसलिए अनासक्त कर्म-योग का यह अर्थ लगाना कि सारे कार्य असम्बन्ध भाव से परिणाम की चिन्ता किये बिना किये जाये सर्वथा असंगत तथा अनुपयुक्त है।

कर्मा कर्म का दायित्व अपने ऊपर न मानकर परमात्मा पर मानना भी अनासक्त कर्म-योग का गलत अर्थ लगाना है। इससे मनुष्य का दुःसाहस बढ़ेगा और वह पाप-पुण्य की मान्यता के प्रति धृष्ट हो उठेगा। अपनी पतनोन्मुख प्रवृत्तियों के कारण अपकर्मों में ही लग सकता है जिससे संसार में भयानक अव्यवस्था तथा अनैतिकता फैल सकती है! किसी भी उत्तरदायित्व हीन व्यक्ति से सत्कर्म की आशा नहीं की जा सकी! इस आशय के साथ भगवान् कृष्ण तथा अन्य ऋषि मुनियों ने अनासक्त कर्म-योग का उपदेश किया होगा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कर्तव्य में तत्परता और फल की ओर से उदासीनता-अनासक्त कर्म-योग का ऐसा अर्थ लगाने वाले भी गलती पर माने जायेंगे। सफलता, असफलता और लाभ-हानि का दृष्टिकोण रखे बिना कार्यों में तत्परता की बात कहना मनोवैज्ञानिक विरोध है। सुफल को लक्ष्य करके ही कोई कार्य किया जाता है और तभी उसमें तत्परता भी आती है! जिन कार्यों के फलों से कोई प्रयोजन न होगा, वे कुशलता पूर्वक किये ही नहीं जा सकते! कार्य में सफलता तो मनुष्य का ध्येय होता ही है, असफलता से भी निष्प्रयोजन नहीं रह जा सकता। यदि ऐसा होगा तो असफलता के कारणों और उनको दूर करने के उपायों को खोजने की प्रवृत्ति ही न होगी, जिससे बार-बार असफलता ही हाथ आयेगी जो किसी प्रकार भी वाँछनीय नहीं हो सकती।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब अनासक्त कर्म-योग का आशय यह भी नहीं है वह भी नहीं है तब आखिर उसका वास्तविक आशय है क्या? अनासक्त कर्म-योग का वास्तविक आशय इस प्रकार समझना होगा-

कर्म सम्बन्धी यह उपदेश दो शब्दों, द्वारा बहन कराया गया है- एक ‘अनासक्त’ और दूसरा ‘कर्म-योग’। अनासक्ति का आशय है राम न रखना। आप कोई कितना ही बड़ा अथवा छोटा काम क्यों न करें उसके प्रति अपनेपन की भावना न जोड़िये। ऐसा करने से उस कर्त्तृत्व में अहंकार का समावेश होगा। बार-बार यह विचार आये कि अमुक कार्य मैंने सम्पादित किया है, मैं एक कुशलकर्त्ता अथवा कर्तृत्ववान व्यक्ति हूँ। अहंकार की भावना क्या व्यक्ति और क्या समाज दोनों के लिये हानिकारक है। “पाप मूल अभिमान”- अहंकार को सभी पापों की जड़ बतलाया गया है। जब किसी कार्य में आसक्ति नहीं होगी तब उसके प्रति अहंकार भी नहीं होगा। अहंकार की उत्पत्ति आसक्ति से ही होती है और आशक्ति वहीं होती है जहाँ अपनेपन का भाव होता है अस्तु कर्मों में अकर्तापन का भाव रखता ही अनासक्ति है। यह एक अध्यात्मिक अनुशासन तथा नम्रता है।

निखिल ब्रह्माण्ड की चेतन सत्ता के अधीन होने से हम सब को सारी शक्ति, जिसके आधार पर कर्म करने में समर्थ हैं, उसी की है। अस्तु, अपने कर्मों का कर्त्ता अपने को मानकर उस मूल सत्ता परमात्मा को मान लेने में जहाँ एक ओर अपना कल्याण है वहाँ दूसरी ओर सत्य को स्वीकार करने की नैतिकता भी है।

दूसरा शब्द है “कर्मयोग”-इसका स्पष्ट अर्थ स्वयं भगवान् ने गीता में दे दिया है- “योगःकुर्मसु कौशलम्”- कर्म में कुशलता ही योग है। कार्य कुशल वही हो सकता है। जो अच्छी तरह से जानता हो कि कौन-सा काम करने योग्य है और कौनसा करने योग्य नहीं हैं। जो कार्य की प्रकृति ही नहीं समझ सकता वह कार्यकुशल कैसा? कार्य कुशलता की पहली शर्त है कार्य प्रकृति उसकी जाति जानना, दूसरी शर्त है उसके निष्कर्ष अथवा परिणाम का अनुमान कर सकना साथ ही कुशल शब्द के अंतर्गत शिव, शुभ तथा सुन्दर का भी भाव प्रवाहित होता है। अस्तु कार्य कुशलता के क्षेत्र में अशुभ कर्मों के आने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके अंतर्गत शुभ तथा कल्याणकारी काम ही आते हैं।

अब कुशलता का अर्थ निपुणता भी है। कर्म-योग का तात्पर्य तभी पूरा हो सकता है जब कोई भी कार्य निपुणता पूर्वक किया जाये, निपुणता तब तक नहीं आ सकती जब तक वह पूरी तन्मयता, शक्ति और एकाग्रता से नहीं किया जायेगा। इस प्रकार सम्पूर्ण योग्यताओं के साथ किये गये कार्य में सफलता की आशा की जा सकती है। असफलता की नहीं। तथापि पूर्ण प्रयत्नों तथा प्रतिभाओं के बावजूद भी प्रारब्ध, संयोग अथवा किसी परिस्थितिवश असफलता भी मिल सकती है उसके लिए पुनः अनासक्ति का निर्देश प्रस्तुत है।

अनासक्त कर्म-योग का वास्तविक तात्पर्य यह है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्तापन का अभिमान छोड़ कर दिया जाये और उसके फल से निर्लिप्त, निस्पृह अथवा अनासक्त रहा जाये, जिससे न तो सफलता का अभिमान हो और न असफलता में निराशा अथवा निरुत्साह और शायद अनासक्त कर्म-योग का यही तात्पर्य अधिक से अधिक निभ्रांत एवं समीचीन है।


कर्त्तव्य-पालन की दृढ़ता

उस समय संयुक्त प्रान्त के राज्यपाल सर हारकोर्ट बटलर थे। जो आराम-पसंदगी के कारण नवाब साहब के नाम से जाने जाते थे। वह आवश्यकता पड़ने पर राजधानी लखनऊ से प्रयाग भी आते और राजभवन में ठहरते। उनके स्नान के लिये एक बड़े कुण्ड की व्यवस्था थी, जिसमें पानी भरा रहता था।

उन दिनों प्रयाग में पानी की बहुत कमी थी। नलों में बहुत थोड़े समय के लिए पानी आता था। जब लोगो  के लिए पानी मिलना कठिन हो रहा था उस समय राजभवन के कुण्ड के लिए पानी कहाँ से मिलता। राज्यपाल के अंगरक्षक दौड़े-दौड़े नगरपालिका अध्यक्ष के घर गये।

उस समय अध्यक्ष पद पर टंडन जी कार्यरत थे। वह जान्सटन गंज के एक छोटे से मकान में रहते थे। अंगरक्षकों ने टंडनजी के घर जाकर देखा कि वे जमीन पर एक टाट बिछाये काम कर रहे हैं चारों और कागज फैले हुये हैं। अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित उन अंगरक्षकों को भी वहीं जमीन पर बैठकर अपनी बात कहनी पड़ी फर्नीचर की व्यवस्था तो उनके उस छोटे मकान में थी नहीं।

अध्यक्ष महोदय ने उसकी बात बड़ी गम्भीरता से सुनी और यह जानते हुये भी जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में निर्णय दिया जा रहा है उसकी नाराजी कुछ से कुछ कर सकती है, बिना डर उन्होंने उत्तर दिया ‘जब मैं नगर निवासियों के पीने के लिए पर्याप्त जल की व्यवस्था नहीं कर पा रहा हूँ तब फिर नवाब साहब के नहाने के लिए व्यवस्था कहाँ से करूं?


शाक भाजी खाइये-अपनी बढ़ाइये

आज लोगों में एक मिथ्या विश्वास जम गया है कि चाहे वह माँस हो अथवा खोये से बनी हुई मिठाइयाँ जितना अधिक चर्बी वाला आहार ग्रहण किया जायेगा मनुष्य उतना ही शक्तिशाली और दीर्घजीवी बनेगा जब कि हमारे ऋषि चरक का कहना है दूध, शाक, छाछ, फल और हलके से हलका आहार लेने से शक्ति तेज और आयु की वृद्धि होती है।

गाँधी जी इंग्लैण्ड गये तब अंग्रेजों ने उनसे माँस लेने को कहा। गाँधी जी ने कहा- इतना गरिष्ठ भोजन करके मैं अपने पेट को नरक नहीं बनाऊँगा इस पर अंग्रेज एक कविता बनाकर गाँधी जी को चिढ़ाया करते थे- ‘बिहोल्ड माइटी इंग्लिश हूँ गवर्न्स इण्डियन स्माल, विकाज आफ बीईग मीट ईटर ही इज फाइव कबिट्स टाल” अंग्रेजों को देखो कितना ताकतवर है वह छोटे-छोटे भारतीयों पर शासन करता है और माँस खाने के कारण ही पाँच कबिट लम्बा है।”

गाँधी जी थे विनम्र स्वभाव के व्यक्ति बहस करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था चुप रह गये पर कुछ दिन बाद ही अमेरिका के कारनेल विश्व विद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एम. मैकके ने एक परीक्षण किया उन्होंने कुछ चूहे के बच्चों को बहुत गरिष्ठ ढंग का चर्बी वाला भोजन खिलाया। इन के शरीरों का विकास तो अत्यन्त तीव्र हुआ पर वे बेचारे 730 दिन में ही मृत्यु के घाट भी उत्तर गये। मरते मरते वह डॉ. मैकके को यह बता गये कि जीवन की सरपट दौड़ मनुष्य को जल्दी ही मार देती है थोड़ा चलो, आराम से चलो देश और दुनिया का बहुत समय तक आनन्द लेते हुये चलो। जो लोग इस नीत को कम से कम आहार के मामले में धारण करेंगे वे दीर्घजीवी अवश्य होंगे यह बात अगले प्रयोग से सिद्ध हो गई।

उन्होंने अन्य चूहों को कम कैलोरी वाला किन्तु अधिक विटामिन और खनिज अम्ल वाला भोजन दिया तो वे 1400 दिन से भी अधिक जीवित रहे। इस प्रकार उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य को जीवन वर्द्धक आहार की आवश्यकता है उसी में अधिक शक्ति भी होती है भले ही मनुष्य देखने में ज्यादा मोटा लम्बा और पहलवान टाइप का न हो उन्होंने हिसाब लगातार बताया कि यदि मनुष्य शाक भाजी फल आदि पर ही रहना प्रारम्भ करे तो उसकी आयु 250 वर्ष तक हो सकती है। यदि पर्याप्त संयम भी रख लिया जाये तो यह आयु और भी बढ़ाई जा सकती है।

इसी सिद्धाँत की पुष्टि अमेरिका के ही अन्य वैज्ञानिक डॉ. जान व्योरकस्तेन ने की है। उन्होंने जीवित कोशिकीय द्रव्य (जिससे मनुष्य का शरीर बना है जिसे प्रोटोप्लाज्म करते हैं) का रासायनिक विश्लेषण करते समय पाया कि उसके प्रोटीन के अणु एक प्रकार के रासायनिक पदार्थ द्वारा जुड़े रहते हैं। मनुष्य का शरीर- एन्जाइमों की सहायता से इस पदार्थ को घुलाकर सुपाच्य बनाता और नये कोशों की वृद्धि व शरीर का विकास करता है- यदि हमारा आहार गरिष्ठ और माँस जैसे भारी खाद्यों वाला है तो इसका मतलब यह है कि प्रोटीन को जोड़ने वाले रसायन अत्यन्त कड़े हैं। वृद्धावस्था तक यह इतने कड़े हो जाते हैं कि नये कोशों का बनाना ही बन्द करा देते हैं यही भीतर ही भीतर सड़ने लगते हैं जिससे विष पैदा होता है मनुष्य के शरीर व हड्डियों की लचक नष्ट हो जाती है इसलिये वृद्धावस्था में तो विशेष रूप से हलका आहार ही लेना चाहिये पर यदि मनुष्य सारे ही जीवन हलका आहार रखे तो वह शरीर की क्षमतायें बनाये रखने में समर्थ होता है और अपना जीवन कई सौ वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है। इसी बात को यों कहा जा सकता है-

मदिरा माँस छोड़कर जो भी शाक दूध फल खाता है। जीता है सौ वर्ष शत्रुओं को भी मार भगाता है॥


शरीर में एक और शरीर-प्राण-शरीर

भारतीय योगियों द्वारा परकाया प्रवेश के विज्ञान को तर्कवादी व्यक्ति अतिरंजित कल्पना कहकर टाल देते हैं वस्तुतः मनुष्य के स्थूल शरीर की अपेक्षा उसके प्राण शरीर की महत्ता असंख्य गुनी अधिक है। जीवन के सत्य, शरीर और ब्रह्माँड की अंतर्वर्ती रचना, विज्ञान और क्रिया का ज्ञान जिस शरीर और माध्यम द्वारा सम्भव है वह प्राण शरीर ही है। स्थूल शरीर की अपेक्षा प्राण शरीर कहीं अधिक सशक्त और आश्चर्यजनक काम कर सकने की सामर्थ्य से ओत-प्रोत होता है।

प्रशान्त महासागर में समाए द्वीप के निकट एक जीव पाया जाता है उसे पैलोलो कहते हैं। यह जल में छिपी चट्टानों में घर बनाकर रहता है और वर्ष में दो बार अक्टूबर तथा नवम्बर के उन दिनों में, जब चन्द्रमा आधा होता है और ज्वार अपनी छोटी अवस्था में होता है, यह बाहर निकल कर पानी की सतह पर आता है और सतह पर आकर अण्डे देकर फिर वापस चला जाता है।

अण्डा देने आने और वापस चले जाने में कोई विचित्र बात नहीं है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि पैलोलो जब अपने घर से चलता है तो अपना आधे से अधिक शरीर वह घर में ही सुरक्षित छोड़ आता है। अण्डा देने और तैरने के लिये जितना शरीर आवश्यक होता है उतने से ही वह अपना सतह में आने का अभिप्राय पूर कर जाता है। इस बीच उसका शरीर मृत ढेले मिट्टी की तरह निष्क्रिय पड़ा रहता है। घर लौटकर पैलोलो फिर से अपने उस छोड़े हुये अंग को फिट कर लेता है। उसके बाद उस शरीर में भी रक्त संचार, प्राण संचार की गतिविधियों प्रारम्भ हो जाती है। यह एक उदाहरण है जो यह बताता है कि मनुष्य अपनी अध्यात्मिक उन्नति शरीर के बिना भी चला सकता है शरीर से तो उसका सम्बन्ध कुछ वर्षों का अधिक से अधिक एक शताब्दी का ही होता है पर प्राण शरीर उसकी जीवन धारणा करने की प्रक्रिया से लेकर मुक्ति पर्यन्त साथ-साथ रहता है।

बालक गर्भ में आता है तब वह किसी प्रकार की श्वाँस नहीं लेता फिर भी उसके शरीर में आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा पहुँचती और शरीर के विकास की गति चलती रहती है। उस समय बच्चे की नाभि का सम्बन्ध माँ की नाभि से बना रहता है नाभि सूर्य का प्रतीक है। प्राणायाम द्वारा वस्तुतः सूर्य चक्र का ही जागरण किया जाता है जिससे आत्मा अपना सम्बन्ध सीधे सूर्य से जोड़कर प्राणाग्नि का विकास करती रहती है। प्रारम्भ प्राणायाम की क्रियाओं से होता है और चरम विकास ध्यान धारणा और समाधि अवस्था में मुक्ति और कुछ नहीं प्राणमय शरीर को सूर्य के वृहद् प्राण में घुलाकर स्वयं आद्य शक्ति के रूप में परिणत हो जाना होता है जिस प्रकार नदी से एक लोटा जल लेने से लोटे के जल की सत्ता अलग हो जाती है पर नहीं में उड़ेल देने के बाद वह जल फिर नदी हो जाता है वैसी ही गति प्राणों की भी होती है।

शरीर के न रहने पर भी प्राणों में गति बनी रहती है। प्रसिद्ध तिब्बती योगी लामा श्री टी. लाबसाँग रम्पा ने अपनी पुस्तक ‘यू फॉर एवर’ (आप अमर हैं) पुस्तक में मनुष्य का तेजोवलय (चतुर्थ अध्यात्म) में एक घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि- फ्राँस क्रान्ति के समय एक देशद्रोही का सिर काट दिया गया। धड़ से शीश अलग हो जाने पर भी उसके मुँह से स्फुट बुदबुदाहट की क्रिया होती रही ऐसा जान पड़ा कि वह कुछ कहना चाहता है। इस घटना को फ्राँसीसी शासन ने सरकारी पुस्तकों में रिकार्ड करवाया जो अभी तक विद्यमान है।”

कर्नल टाउन सेंड ने प्राणायाम के अभ्यास से प्राणमय शरीर के नियन्त्रण में सफलता प्राप्त की थी। सुप्रसिद्ध अमरीकी अणु-वैज्ञानिक श्रीमती जे.सी. ट्रस्ट की भाँति उन्होंने ने भी प्राण सत्ता के अद्भुत प्रयोगों का प्रदर्शन किया था। एक बार सैकड़ों वैज्ञानिकों व साहित्यकारों से खचाखच भरे हाल में उन्होंने प्रदर्शन किया। स्वयं एक स्थान पर बैठ गये। ब्लेकबोर्ड के साथ खड़िया बाँध दी गई। इसके बाद उन्होंने अपना प्राण शरीर से बाहर निकाल कर अदृश्य शरीर से ब्लैकबोर्ड पर बोले हुये अक्षर लिखे सवाल हल किये। बीच-बीच में वे अपने शरीर में आ जाते और वस्तु स्थिति भी समझाते जाते। इस प्रदर्शन ने लोगों को यह सोचने के लिये विवश किया कि मनुष्य शरीर जितना दिखाई देता है वहीं तक सीमित नहीं वरन् वह जो अदृश्य है इस शरीर से कहीं अधिक उपयोगी व मार्सिक है।

डॉ. वानडेन फ्रेंक ने इस सम्बन्ध में व्यापक खोज की थी और यह पाया गया था कि सिर के उस स्थान का जहाँ हिंदू लोग चोटी रखते हैं प्राण शरीर से सम्बन्ध रहता है यहीं से हृदय और रक्ताभिषरण की क्रियायें भी सम्पन्न होती है उन्होंने शरीर के विकास में इन्हीं खोजों के आधार पर मानसिक क्रियाओं का बहुत अधिक महत्व माना था।

वायु मिश्रित आक्सीजन, प्राण अग्नि स्फुल्लिंग सब एक तत्व के नाम है इस पर नियन्त्रण करके योगीजन शरीर न रहने पर भी हजारों वर्ष तक संसार में बने रहते हैं उसे न जानने वाले संसारी लोग अपने इस महत्वपूर्ण शरीर को भी उसी तरह नष्ट करते रहते हैं जिस तरह इन्द्रियों द्वारा शरीर की क्षमताओं को। प्राण शरीर का विकास किये बिना जीवन के रहस्यों में गति असम्भव है। आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन नामुमकिन है।


साधन की कसौटी

एक शिष्य ने अपने आचार्य से आत्म साक्षात्कार का उपाय पूछा। पहले तो उन्होंने समझाया बेटा यह कठिन मार्ग है, कष्ट साध्य क्रियायें करनी पड़ती है। तू कठिन साधनायें नहीं कर सकेगा पर जब उन्होंने देखा कि शिष्य मानता नहीं तो उन्होंने एक वर्ष तक एकान्त में गायत्री मन्त्र का निष्काम जाप करके अन्तिम दिन आने का आदेश दिया। शिष्य ने वही किया। वर्ष पूरा होने के दिन आचार्य ने झाडू देने वाली मेहतरानी से कहा कि अमुक शिष्य आवे तब उस पर झाडू से धुल उड़ा देना। मेहतरानी ने वैसा ही किया। साधक क्रोध में उसे मारने दौड़ा पर वह भाग गई। वह पुनः स्नान करके आचार्य-सेवा में उपस्थित हुआ। आचार्य ने कहा- ‘अभी तो तुम साँप की तरह काटने दौड़ते हो, अतः एक वर्ष और साधना करो।’ साधक को क्रोध तो आया परन्तु उसके मन में किसी न किस प्रकार आत्मा के दर्शन की तीव्र लगन थी अतएव गुरु की आज्ञा समझ कर चला गया।

दूसरा वर्ष पूरा करने पर आचार्य ने मेहतरानी से उस व्यक्ति के आने पर झाडू छुआ देने को कहा। जब वह आया तो मेहतरानी ने वैसा ही किया। परन्तु इस बार वह कुछ गालियाँ देकर ही स्नान करने चला गया और फिर आचार्य जी के समक्ष उपस्थित हुआ। आचार्य ने कहा- ‘अब तुम काटने तो नहीं दौड़ते पर फुफकारते अवश्य हो। अतः एक वर्ष और साधना करो।’

तीसरा वर्ष समाप्त होने के दिन आचार्य जी ने मेहतरानी को कूड़े की टोकरी उड़ेल देने को कहा। मेहतरानी के वैसा करने पर शिष्य को क्रोध नहीं आया बल्कि उसने हाथ जोड़कर कहा- ‘हे माता तुम धन्य हो।’ तीन वर्ष से मेरे दोष को निकालने के प्रयत्न में तत्पर हो’ वह पुनः स्नान कर आचार्य सेवा में उपस्थित हो उनके चरणों में गिर पड़ा।


शक्ति, प्रकाश और ब्रह्म ज्ञानदाता-अग्निदेवता

हम भारतीय अग्नि को देवता मानते हैं उनकी पूजा करते हैं, आहुतियाँ भेंट करते हैं और चूँकि उन्हें ‘अग्निमीले पुरोहित’ देवताओं तक आहुतियाँ पहुँचाने वाले पुरोहित मानते हैं इसलिये यह विश्वास करते हैं कि अग्नि देव हमारी भावनाओं एवं कामनाओं से युक्त आहुतियाँ देवताओं तक पहुँचाते हैं, जिससे देवता हम पर आयु, प्राण, बल, बुद्धि, ज्ञान और सुखों की वृष्टि करेंगे।

कोई भी पदार्थ जलकर गैर रूप में असंख्य गुना व्यापक हो जाता है यह बात अब वैज्ञानिक भी मानते हैं। 1666 में आयोजित कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी की एक अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक गोष्ठी में वैज्ञानिकों ने माना कि अग्नि में किसी भी हव्य को “आक्सीकृत” कर अनन्त आकाश में पहुँचा देने की क्षमता है। यही नहीं अग्नि को आश्चर्यों का आश्चर्य कहा गया और उस पर विस्तृत खोज की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

हवा का झोंका आये तो आग बुझ जायेगी फिर अग्नि हवा में ही क्यों जलती है? वायु- शून्य में क्यों नहीं जलती? अग्नि ज्वाला के मध्य भाग का तापमान कम रहता है जब कि बाहरी भाग सबसे गर्म होता है? बाहरी भाग में भी ऊपर जिस तरफ लौ उठती है उधर का तापमान सर्वाधिक क्यों रहता है? लौ सदा ऊपर को ही क्यों उठती है? आदि वह प्रश्न हैं जिन पर वैज्ञानिकों को भी कुछ नहीं मालूम जो जाना जा सका है वह अत्यन्त न्यून है।

मामूली मोमबत्ती जलाई जाये तो उसकी गर्मी 1500 से. के लगभग होती है। कोल-गैस और वायु के मिश्रण से जलाई गई अग्नि 2000 डिग्री सेन्टीग्रेड तक गर्म होती है जबकि परमाणवीय हाइड्रो-आक्सीजन की उपस्थिति में यही तापमान 3800 तक या 5000 सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है, इस गुत्थी का कोई सुलझाव वैज्ञानिकों के पास नहीं है। इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रान की तरह अब प्रकाश के अणु ‘फोटोन्स’ के सम्बन्ध में काफी कुछ ज्ञात हुआ है पर अग्नि-स्फुल्लिंग की कोई भौतिक या रासायनिक व्याख्या अब तक नहीं हुई। एक नया खुला विस्तृत क्षेत्र है। इसलिये संसार के अनेक शोध संस्थानों विशेषकर इंग्लैंड के विश्व-विद्यालयों में इन दिनों अग्नि ज्वाला पर तेजी से अनुसंधान चल रहे हैं।

वैदिक ऋचायें जिन ‘देवताओं’ के लिये प्रयुक्त होती हैं उन पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि भारतीय तत्व दर्शियों ने “अग्नि-तत्व” पर जितनी गवेषणाएं की है उतनी अन्य किसी पर शायद ही की हों। उन्होंने अग्नि का रासायनिक और भौतिक ही नहीं, उसकी आध्यात्मिक शक्तियों का विस्तार से विश्लेषण किया है। पृथ्वी पर सामान्य स्थिति में पाई जाने वाले अग्नि को उन्होंने इतना ‘असामान्य’ पाया कि एक स्वतंत्र वेद “यजुर्वेद” की ही रचना करनी पड़ी। यह अग्नि ही है जिसके कारण प्राणिमात्र जीवन धारणा किये हैं। प्रजा की उत्पत्ति, बल और वीर्य की उत्पत्ति अग्नि के ही कारण हैं। मनुष्य के मुख मंडल पर विद्यमान चमक, तेजस् और आकर्षण, अग्नि की ही उपस्थिति का परिणाम होता है। “अग्नि” का शरीर से समाप्त हो जाना- शरीर का ठण्डा पड़ जाना ही मृत्यु मानी जाती है। यह गवेषणाएं प्रमाण हैं कि ऋषियों ने अग्नि तत्व की सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवस्था तक का ज्ञान प्राप्त किया था। अग्नि-पूजा को आज कई भौतिकवादी व्यक्ति एक बेकार का काम समझ कर भारतीयों को अल्प-बुद्धि मानते हैं पर उनने यह नहीं जाना कि अग्नि का ही बल था जो भारतवर्ष ने सारे विश्व को प्रभाव में ले डाला था ऐसा कोई देश इस पृथ्वी में न था जो इसके चक्रवर्ती साम्राज्य में सम्मिलित न हुआ हो, भविष्य में भी हमारा गौरव, शौर्य और संसार के पथ-प्रदर्शन की क्षमता का विकास इन-देवता की कृपा और तत्व-ज्ञान पर ही निर्भर होगा।

“आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी” इन पंच महाभूतों में अग्नि का स्थान तीसरा है। शतपथ ब्राह्मण में आता है- दिवस्परि प्रथम अज्ञेऽअग्निः इति प्राणों वे दिवः। प्रणदु व एष प्रथमजायत। अस्तद् द्वितीयं परिजातवेदा। यदेन मदो द्वितीयं पुरुष विश्वोऽजनयत्। तृतीयम् पेस्वति। यदेन मदस् तृतीयम् अद्भ्योऽजनयत्।

अर्थात्- अग्नि का प्रथम जन्म प्राण अथवा वायु से आ (वायु न होने से अग्नि जल नहीं सकती) अग्नि में जो ज्योति है वह प्राण का ही प्रकट रूप है। दूसरा जन्म अब अण्ड हिरण्य गर्भ या गर्भ बना तब हुआ (वीर्य के जनन कोष स्पर्म- जो स्त्री के ओवम् से मिलते हैं वह अग्नि के रूप ही हैं) पृथ्वी की उत्पत्ति के समय वह अग्नि दहकता हुआ गोला थी ऐसा इतिहासकार भी मानते हैं हिरण्य गर्भ या गर्भ में अग्नि रूप प्रतिष्ठित जीवकोष को पुरुष होता है। (पुरुष का अर्थ का ऐसे अस्तित्व से है जो ज्ञाता अर्थात् सब कुछ जानता, अनुभव करता, बोलता, गुनता आदि क्रियायें करता हैं) इस दृष्टि से अग्नि ही पुरुष रूप में मनुष्य शरीर में अवतरित होता है। अग्नि की लौ में मध्य भाग ‘जातवेद अग्नि’ कहलाता है वही सब वस्तुओं का ज्ञाता होता है (वेदों का गहन अनुसंधान करने वाले विद्वान् एलिंग्न ने भी जातवेद का अर्थ ‘दि नोअर आफ बईग्’ माना है।) तीसरा जन्म अग्नि का ‘अपो’ में हुआ अर्थात् अग्नि से ही जी की उत्पत्ति हुई और जिस तरह प्रत्येक भूत दूसरे भूत तत्व में समाया रहता है अग्नि भी जल में समाविष्ट हो गये।

ऋग्वेद का ‘अपाँ नपात् परितस्थुरापः” 2/35/3 कथन इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है। अर्थात् अपाँ नपात् (अग्नि) को चारों ओर से आप ने घेर लिया। आपः की परिभाषा महाभारत में इस तरह की है-

अपाँ शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेह सौम्यता। जिह्ना विस्यन्दनं चापि भौमानाँ श्रवणं तथा॥

अर्थात्- भूमिगत अपों (जल) का गुण, शैत्य, रस, गोलापन द्रवत्व स्नेह, सौम्यता, जिह्वा, विस्यन्दन एवं उबलना भी है।

आप का दूसरा रूप गैस या सूक्ष्म तत्व प्राण के रूप में है। आप को विधा (यजु 14/7) अर्थात् वह जो सब कुछ बनाता है। प्राण रूप में गैस (नोबुला) ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है यह अब खगोल शास्त्री भी मानते हैं। दिव्या आपः (जैमिनी ब्राह्मण 1/45) अर्थात् उनका रूप दिव्य था। प्राण वस्तुतः एक चमकदार तत्व है जिसमें अग्नि के सभी गुण होते हैं।

उपरोक्त कथन में अग्नि के दिव्य गैस रूप (प्राण) से जी में उपस्थित होने तक का सारा विज्ञान दिया हुआ है इससे भी सूक्ष्म विज्ञान वैदिक ऋचाओं में है उसी की जानकारी और अनुभूति के फलस्वरूप भारतीय तत्वदर्शियों ने प्राण संचालन, इच्छा मृत्यु, अपने प्राणों से औरों का भला करना, अग्नेयास्त्र, परकाया प्रवेश औरों के मन की बात जान लेना आदि दिव्य शक्तियाँ प्राप्त की थीं। पंचाग्नि विद्या के नाम से शरीर में अग्नि-तत्व या प्राण के विकास का ही ज्ञान कठोपनिषद् में यमाचार्य ने नचिकेता और भृगु ने वरुण को कराया था। प्राण-विद्या वस्तुतः गूढ़ साइन्स है जो किसी भी परमाणविक क्षमता से अधिक महत्वपूर्ण है।

जैमिनी ब्राह्मण में अग्नि की तीन संज्ञायें दी गई है भूपति, भुवनपति, भूताना पतिः। विष्णु पुराण में इन तीनों के 25-25 भेद करके 45 अग्नियाँ बताई हैं। महाभारत में अग्नि के दस गुणा गिनाते हुए बताया गया है कि अग्नि तत्व के विकास से ही मनुष्य ऊर्ध्वमुखी शक्तियों से सम्बन्ध जोड़ता है-

अग्ने दुर्धर्षता ज्योतिस्पातः पाकः प्रकाशनम्। शौचं रागो लघुस्तैक्ष्ण्यं सततं चोर्ध्वगामिता॥ -शान्ति पर्व (महाभारत)

अर्थात्- अग्नि के (1) दुर्धर्षता, (2) ज्योति, (3) तापः, (4) पाकः, (5) प्रकाश, (6) शौच, (7) राग, (8) लघु, (9) तैक्षराय, (10) ऊर्ध्वगमन यह अग्नि के दस गुणा शरीर में प्रकट होते हैं अर्थात् शरीर में बल का संचार, चमक, गर्मी अग्नि के गुणा हैं वही अन्न पचाता है, वही ज्ञान करता है, शरीर की अशुद्धता को वही जलाता या दूर कराता है। उसी में आकर्षण का गुणा है, शरीर को हलका और शक्तिशाली रखता है। मानसिक शक्तियों को वही ऊपर उठाकर ले जाता है और देव शक्तियों से मेल कराकर आत्मा का विकास करता है।

यह दस गुणा पाँच प्राण और पाँच उपप्राणों की अलग-अलग क्रियायें तथा गुणा हैं। इनके विकास का अपना अलग विज्ञान है जो यज्ञ, प्राणायाम, ध्यान, वैदिक मन्त्रों के उच्चारण आदि के रूप में व्यवहृत हुआ है। आज यह सब बातें लोग भूलते जा रहे हैं इसीलिए आयु, शक्ति, बल, तेजस् और दिव्य शक्तियों के संपर्क से प्राप्त होने वाले लाभ नष्ट होते चले जा रहे हैं। संयमित जीवन से अपने आप शरीर में अग्नि तत्व के विकास का एक नैसर्गिक उपाय था वह भी नष्ट हो चला। इस तरह अग्नि देवता को कुपित कर संसार स्वतः दुःख की अग्नि में जलता जा रहा है। यदि शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक और आध्यात्मिक, धार्मिक उन्नति के द्वार खोलते हैं तो हमें फिर से अग्नि तत्व जैसे महाभूत की नये सिरे से खोज करनी होगी, प्रतिष्ठा देनी होगी और ऋषियों के दिये ज्ञान को धारण करना होगा।

विज्ञान की अब तक की थोड़ी-सी जानकारियाँ इन्हीं तथ्यों की पुष्टि करती है। अग्नि-ज्वाला को आज एक रासायनिक क्रिया माना जाता है और विज्ञान यह मानता है कि उसमें वायु मंडलीय आक्सीजन की उपस्थिति मुख्य है। जो पदार्थ जलता है वही आक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया उत्पन्न करके ऊष्मा पैदा करता है यदि आक्सीजन के साथ रासायनिक क्रिया अपूर्ण और जटिल हुई और पूरी तरह आक्सीकरण नहीं हो जाया तो गर्मी कम होगी यदि आक्सीकरण पूरा हो जाता है तो कार्बन डाई-आक्साइड गैस जो धुंये के रूप में निकलती है प्राप्त होती है। “शुचि अग्नि जलाशी” है जब हमारे तत्वदर्शी यह कहते थे तब लोग उपहास करते थे कि अग्नि से जल का क्या सम्बन्ध पर आज का विज्ञान भी इस बात को मानता है कि लौ से लगातार पानी निकलता है पर यह पानी गैस रूप में होता है हिन्दी डाइजेस्ट सन् 1968 के एक अंक में भी इस सत्य को स्वीकार किया गया। काठक सं. पृष्ठ 46 में “आपोवा इदं सर्वमाप्न वन” अर्थात् वह आपः सर्वव्यापी है ऐसा कहा है। तैत्तिरीय सं. 5/2/1 अग्नि का प्रियतनू छन्दं अर्थात् प्रवाह या “वैव्स” बताया है उसे इस बात के सन्देह नहीं रह जाता कि आकाश में जो सूक्ष्म अग्नि तत्व है या आपके संवाहक ‘नोबुलाज’ है उनमें मन रूपी प्राण स्फुल्लिंग को प्रवाहित कर सूक्ष्म लोकों की गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

अग्नि की व्याख्या थोड़े शब्दों में नहीं की जा सकती। जीवन और शब्द को धारण करने की सामर्थ्य अग्नि में ही है। आने वाले युग में वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में जो जानकारी प्राप्त करेंगे वह जीवन तत्व के रहस्योद्घाटन में बहुत मददगार होगा इसमें सन्देह नहीं है। पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण अग्नि का वेद विज्ञान है उससे जीवनी शक्ति के विकास में अलौकिक सुविधायें और सहायतायें प्राप्त की जा सकती हैं।


कर्मण गहनोगतिः

ब्रह्म सन्ध्या सम्पन्न कर आचार्य ज्योतिपाद उठे ही थे कि आत्मदेव ने उनके चरण पकड़ लिये। ब्राह्मण अत्यन्त अनन्त शब्दों में बोला- आचार्य प्रवर- एक सन्तान की इच्छा से आपके पास आया हूँ आप सर्व समर्थ हैं मुझे एक सन्तान हो जाती है तो आपका जीवन भर ऋणी रहूँगा।

ज्योतिपाद ने एक क्षण के लिए दृष्टि ऊपर उठाई, उनकी आत्मा कोई सत्य पाना चाहती हो- दूसरे ही क्षण वे बोले आत्मदेव! सन्तान से सुख की कामना करना व्यर्थ है, मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख पाता है, सन्तान तो अपने आप में ही एक कर्त्तव्य भार है उसके हो जाने से दाम्पत्य प्रेम कम हो जाने से लेकर संसार के निर्द्वंद्व विचरण का सारा आनन्द हो समाप्त हो जाता है। तुम व्यर्थ ही इस झंझट में मत पड़ो।

कहते हैं आसक्त के लिये संसार में कोई उपदेश नहीं आत्मदेव को कोई बात समझ में नहीं आई वह मात्र सन्तान की ही कामना करता रहा। तब आचार्य ज्योतिपाद ने दूसरे ढंग से समझाया-तात! तुम्हारे भाग्य में सन्तान है नहीं। जिसने पूर्व जन्म में गुरु-वरण नहीं किया, जिसने अपनी सम्पत्ति लोक सेवा और दीन दुखियों की सहायतार्थ दान नहीं की वह इस जीवन में सन्तान हीन होता है। तात! पूर्व जन्म की कृपणता का पाप ही आज तुम्हारे लिये सौभाग्य विमुख बना। नीति कहती है जाओ और अपनी शक्तियों, सम्पत्ति और सामर्थ्यं लोक सेवा में नियोजित करो, अब तुम्हारी अवस्था बहुत अधिक हो गई है सन्तान का कोई औचित्य भी नहीं रहा यह आयु पुनर्जन्म की तैयारी की है सो अब तुम अपना समय आत्म कल्याण में लगाओ।

आत्मदेव की समझ में फिर भी न आया। उसने कहा- महात्मन्! आज या तो आपसे पुत्र लेकर लौटूँगा अन्यथा यहीं आपके ही सम्मुख आत्मदाह कर दूंगा। उसके इस प्रकार कहने पर आचार्य ज्योतिपाद ने हँसकर कहा-ब्राह्मण! तुम्हें जो नहीं सोचना चाहिए वहाँ तक सोच गये तात! तुम्हारे लिये किसी और का पुण्य छीनना पड़ेगा श्रेष्ठ आत्मा का दान कोई करेगा क्यों, ऐसे में तो केवल अपवित्र आत्मायें ही हाथ लगती हैं चलो विधाता की इच्छा ऐसी ही है तो लो यह फल अपनी भार्या को खिलाना, पुत्र तो तुम्हारे भाग्य में है नहीं फिर भी तुम्हारी इच्छा भगवान् पूर्ण करेंगे। अपनी धर्म पत्नी से कहना वह एक वर्ष तक नितान्त पवित्र रहकर कुछ दान करे।

आत्मदेव, महर्षि के रहस्यमय वचन सुनकर भी कुछ समझ न सका, खुशी-खुशी घर आया, फल उसने अपनी पत्नी धुन्धली को दे दिया। सारी बातें समझा दीं। धुन्धुली ने सोचा- पवित्रता मुझसे बन नहीं पड़ेगी, अपनी सम्पत्ति औरों को क्यों दान करूं उसने वह फल अपनी गाय को खिला दिया और समय पर अपनी बहन का पुत्र गोद लेकर घोषणा करदी मुझे पुत्र हुआ है। ब्राह्मण समाचार पाकर फूला न समाया। पुत्र का नमा धुन्धुकारी रखा गया। यथा नाम तथा गुण। धुन्धुकारी बाल्यावस्था से ही दुराचारी निकला, उसने पिता को सारी सम्पत्ति, माँस, मद्यपान, जुआ, और वेश्यावृत्ति में नष्ट करदी। माता-पिता कुढ़ कर मर गये। धुन्धकारी भी अकाल ही काल−कलवित हो गया।

फल जिस गाय को दिया था उससे एक सुन्दर आत्मज्ञानी पुत्र पैदा हुआ- गोकर्ण। गोकर्ण पशुयोनि से जन्मे होने पर भी अध्यात्म विद्या के प्रभाव से महान् ज्ञानी और धर्मात्मा हुये। एक रात वे सो रहे थे- तब धुन्धकारी जो प्रेतयोनि में पड़ा हुआ था- बोला- भैया आप ही मेरा उद्धार करें। गोकर्ण ने कहा-तात! मैंने तुम्हारी गयाश्राद्ध करदी फिर भी तुम मुक्त न हुये। धुन्धुकारी बोला-बन्धुवर! मनुष्य को स्वर्ग या मुक्ति अपने ही कर्म से मिलती है जब तक मुझे अपने दुष्कर्मों का दण्ड नहीं मिल जाता मुक्ति सम्भव नहीं। आप तो मुझे अध्यात्म ज्ञान दीजिये जिससे मैं अपना अगला जीवन सुधार सकूँ। गोकर्ण ने तब उसे भागवत् कथा के माध्यम से आत्म तत्व का ज्ञान कराया अन्त में यह ज्ञान ही धुन्धुकारी के आत्म कल्याण का मार्गदर्शक बना।


भावातिरेकता बढ़ने न दें

भावुकता जहाँ एक गुणा है वहाँ भावातिरेकता एक कमजोरी है। यदि आप अपने को भावुक अथवा संवेदनशील समझते हैं, वहाँ पर यह अवश्य देख समझ लें कि जिसे आप अपनी भावुकता मान रहे हैं वह भावातिरेकता का दोष तो नहीं है। यह दोष आपको बड़ा सूक्ष्म निरीक्षण करने पर ही पता चल पायेगा, क्योंकि अपना दोष अपने को जल्दी दृष्टिगोचर नहीं होता, और अपनी वह कमी तो एक प्रकार से पता ही नहीं चल पाती जो गुण के घाट नहाती हुई अपना मिश्रित अस्तित्व स्थापित करती है।

भावुकता एक विशेषता है। यह मनुष्य को लेखक, चित्रकार, विचारक, कवि, दूरदर्शी, कल्पनाशील, सहानुभूति प्रदान करती है। जो लेखक अथवा कवि जितना अधिक भावुक होता है उसके लेख अथवा कवितायें उतनी ही अधिक मार्मिक तथा प्रेरक होती हैं। इस गुण से सम्पन्न चित्रकार का आलेखन अधिक आकर्षक तथा लोक प्रिय होता है। भावुक भक्त ही भगवान् का दर्शन जल्दी पाता है। भावुक व्यक्ति की सहानुभूति जल्दी ही दूसरों को अभिभूत कर लेती है। भावुक वक्ता तो अपने श्रोताओं को अपने शब्दों के साथ रुलाता भी चलता है। सच्ची भावुकता भगवान का प्रसाद ही है जोकि मनुष्य को देवत्व को ओर बहुत दूर तक बढ़ देता है। किन्तु जब यह गुण अपनी वाँछित सीमा पर पार निकल कर भावातिरेकता में बदल जाता है तब दोष बन जाता है।

भावातिरेकी जल्दी ही किसी बात व्यक्ति अथवा घटना से प्रभावित हो जाता है। एक साधारण सी भी मनोनुकूल बात से इतनी प्रभावित हो जाता है मानो वह सुनी हुई बात उसके हृदय से ही निकली हो। जल्दी ही किसी व्यक्ति की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर अनायास ही विश्वास कर लेता है। उसके सामने हृदय खोल कर रख देता है और आत्मीयता का सम्बन्ध स्थापित करते देर नहीं लगाता है।

आत्मीयता अच्छी बात है, विश्वास बुरी चीज नहीं है। तथापि यह दोनों वस्तुयें काफी मूल्यवान् है और यों ही गली कूँचे लुटाने बरसाने वाली चीजें नहीं है। यह मानवीय रत्न उन्हीं सत्पात्रों को सौंपना चाहिये जो वास्तव में इसके योग्य हों। यह संसार सदैव से बड़ा विचित्र रहा है, और आज तो और भी विचित्र हो गया है। इसमें विश्वास तथा आत्मीयता का शोषण करने की कला बहुत बढ़ गई है। लोग विश्वास पाकर ही धोखा देते हैं, आत्मीयता जगाकर ही उल्लू सीधा करते हैं। कमजोरी पकड़ कर ही लाभ उठाते हैं। भावातिरेकी पात्र कुपात्र देखे बिना ही, उनको जाँचे और परखे बिना अपनी दुर्बलता के कारण ही अपने यह बहुमूल्य रत्न किसी को भी सौंप देते हैं। जिसके फलस्वरूप कटु अनुभव के बाद खिन्नता तथा पश्चाताप के भागी बनते हैं।

इसके विपरीत भी भावातिरेकी जिसके प्रति घृणा अथवा द्वेष की भावना बना लेता है फिर उसे जल्दी बदलता ही नहीं। उसके लिये वह भाव किसी भ्रम अथवा भूल से ही क्यों न बन गया हो। अपने उस द्वेष अथवा घृणा पात्र के प्रति उसका विरोध इस सीमा तक बढ़ जाता है कि उसकी चर्चा, उसका नाम तक विष की तरह अखरने लगता है, और यहाँ तक कि जहाँ उसकी चर्चा होती है वहाँ या तो ठहरता ही नहीं अथवा चर्चा करने वाले से भी घृणा करने लगता है।

भावातिरेकी हर बात को बहुत बढ़ा चढ़ाकर देखता है। तनिक सी कठिनाई, जरा सी अप्रियता अथवा साधारण सी प्रतिकूलता आने पर वह इतना वेदना विभोर हो उठता है मानों संसार का सारा कष्ट, क्लेश उन्हीं पर आ टूटा हो। दिन रात चिन्ता तथा कुण्ठा में गला करता है। अभाव की एक अभिव्यक्ति पर ही इतना तड़प उठता है कि संसार का निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी उसे अपने से सुखी तथा सम्पन्न दिखता है। आपत्ति का एक झोंक उन्हें सूखे पत्ते की तरह उड़ा देता है और वे निराशा के अन्धकार में आकण्ड मग्न हो जाते हैं। सारा संसार उन्हें सूना और जिन्दगी नीरस तथा निःसार दिखने लगती है।

भावातिरेक के वशीभूत होकर कोई विद्यार्थी परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या तक कर लेता है। अपनी इस अनुचित भाव प्रखरता के कारण वह इतना कल्पक बन जाता है कि उसे अपने साथी हँसते और उपहास उड़ाते दिखते हैं, दुनिया का धिक्कार उसके कानों में प्रतिध्वनित होने लगता है। अभिभावकों का आक्रोश तथा घृणा उसकी कल्पना में साकार हो उठती है। उसे ऐसा लगता है मानों उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है और वह लाँछन तथा तिरस्कार का केन्द्र बन गया है। इसी अपनी अशिव तथा भयावह कल्पना से प्रेरित होकर वह धैर्य तथा विवेक को तिलाँजलि देकर आत्महत्या कर लेता है अथवा दर-दर की ठोकरें खाने के लिए भाग जाता है। जो कि एक मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

इसी प्रकार के भावातिरेकी न जाने कितने कर्मचारी जरा सी प्रतिकूलता अथवा अधिकारी की साधारण सी भर्त्सना से विचलित होकर और आगा-पीछा सोचे बिना ही त्याग पत्र दे दिया करते हैं। और जब वह आवेग उतरता है तब फिर प्रार्थना पत्र लिये हुए दफ्तरों कार्यालयों में दौड़ने लगते हैं। समाचारों के आवश्यकता स्तम्भों पर लालच भरी दृष्टि डालने लगते हैं। न जाने कितने भावातिरेकी व्यापारी अपने सौदे बिगाड़ते और व्यापार को हानि पहुँचाते रहते हैं। और जब उन्हें अपनी दुर्बलता के कारण मैदान से असफल होकर हटना पड़ता है तब या तो आत्महत्या की सोचने लगते हैं अथवा साधू संन्यासी हो जाने की।

भावातिरेकी व्यक्ति न केवल आत्महत्या ही बल्कि हत्यायें तक करते देखे जाते हैं। मौलिक रूप से हिंसक अथवा अपराधी न होने पर भी भावावेश में वे यन्त्र की तरह वैसा अनुचित कार्य कर डालते हैं।

भावातिरेकी व्यक्ति कभी-कभी अपनी स्थिति बड़ी ही दयनीय तथा उपहासास्पद बना लिया करते हैं। जहाँ पर भी उसके सम्मुख कोई कारुणिक दृश्य आ जाता है तो वे वहीं पर खड़े-खड़े आँसू बहाते रहते हैं। उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि आँसुओं के माध्यम से उनकी भावातिरेकता प्रकट होकर उन्हें विचित्रता में बदल रही है। लोगों की दृष्टि प्रधान कारण से हटकर उन पर टिक जाती है और लोग जल्दी यह समझ नहीं पाते हैं कि आखिर यह व्यक्ति, यह अच्छा खासा सभ्य दिखने वाला प्रौढ़ आदमी इस प्रकार सार्वजनिक रूप से रो क्यों रहा है। कौन सी ऐसी विपत्ति इस पर आ पड़ी है जिसके कारण इसके एक के बाद एक आँसू बहते चले आ रहे हैं। इस प्रकार का व्यक्ति अपने साथ अन्यों को भी एक अजीब सी मानसिक परेशानी में डाल देता है।

सिनेमा अथवा कोई नाटक देखते समय तो भाव प्रवण व्यक्ति स्वयं एक कौतुक बन जाता है। ज्यों ही नायक अथवा नायिका पर कोई विपत्ति आई अथवा कोई ऐसा पात्र किसी मार्मिक स्थल पर पहुँचा, जिसके साथ उनकी सहानुभूति चल रही हो कि टपापट उनके आँसू बहने लगते हैं। लोग खेल देखने के स्थान पर उसकी और उपहास अथवा दयनीयतापूर्ण दृष्टि से देखने लगते हैं। इतनी संवेदना सहानुभूति तथा भावुकता होने पर भी यथार्थ रूप में भावावेशी व्यक्ति न तो किसी को सहायता कर सकता है और न सेवा सुश्रूषा। उसकी यह क्षणिक अतिरेकता अथवा आवेश कुछ आँसू बहाकर अथवा पीड़ा अनुभव कर सन्तुष्ट हो जाती है जिससे वे सक्रिय होकर अपनी इस प्रवणता को न तो सार्थक कर पाते हैं और न चरितार्थ। इस प्रकार की निष्क्रिय भाव प्रवणता एक दोष अथवा दुर्गुणी ही मानी गई है।

भावातिरेकी व्यक्ति की शिप्र कल्पनायें एक क्षण में आकाश पाताल एक कर देती हैं। अपनी कामनाओं की पूर्ति वह पुरुषार्थ में भी कल्पना में देखा करता है। शेखचिल्ली की तरह एक अण्डे से घर-बार तक बना बसा लेने में उसे देर नहीं लगती जिस समय उसकी भाव प्रवणता साहस तथा हौंसले को जागती है तब उसे पहाड़ उखाड़ डालना, समुद्र मय डालना, तारे तोड़ डालना तक सरल काम मालूम होता है। और इसके विपरीत जब वह कठिनता के सूड में आता है तब तिनके जैसी कठिनता उसे पहाड़ जैसी दुरुहता अनुभव होती है।

भावातिरेकी व्यक्ति इतना सुकुमार कल्पनाशील होता है कि यथार्थ के कठोर धरातल पर पैर रखते उसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अपनी कोमल कल्पनाओं तथा यथार्थ की कठिनता में इतना अन्तर अनुभव होता है कि यदि उसे कभी मजबूरन उतरना भी पड़े तो वह अपने को बड़ा असहाय, अपरिचित, अयोग्य तथा विदेशी जैसे अनुभव करता है और जल्दी अपने प्यारे कल्पना लोक में भाग जाने का प्रयत्न करने लगता है। यथार्थ का धरातल कठोर है और उन्नति तथा सफलता के स्वप्न इसी कठोर भूमि पर ही पूरे होते हैं। संघर्ष, सन्तुलन तथा सहिष्णुता का अभाव होने से भावप्रवण कोई भी व्यक्ति आज तक कोई बड़ी उन्नति करते नहीं देखा गया है।

भावातिरेकी व्यक्ति इतना भोला होता है कि उसकी भावुकता में गति जाग्रत कर जल्दी ही ठगा जा सकता है। करुणा तथा दया के मार्मिक स्थल पर जल्दी ही द्रवित किया जा सकता है। साथ ही उसके आँसू, उसकी करुणा और उसकी सम्वेदना इतनी क्षणिक तथा अनुर्वर होती है कि वह किसी के लिये वास्तविक एवं स्थायी सेवा सहायता के फल नहीं ला सकती। भावातिरेकी व्यक्ति दानी अथवा उदार हो सकता है किन्तु यह गुण भी उसकी भाव तरंग के साथ ही आते और चले जाते हैं। उस समय, जब उसकी अतिरेकता ज्वाराधीन हो उससे उसका सर्वस्व लिया जा सकता है किन्तु ज्वार उतर जाने के बाद वह नीरस एवं शुष्क हो जाता है। भावातिरेकी व्यक्ति जहाँ काम करता है अथवा जिस क्षेत्र में बरतता है वहाँ या तो अपने विरोधी बना लेगा किन्हीं से दूध पानी जैसी घनिष्ठता स्थापित कर लेगा। तटस्थ रहना अथवा तटस्थ व्यक्तियों से कोई सरोकार रखना उसके व्यवहार शास्त्र में होता ही नहीं। यह अन्तिमित्थम् की स्थिति इस बड़ी चढ़ी तथा अभाव पूर्ण दुनिया में कोई सत्फल लाने के स्थान पर कटुता, कुण्ठा तथा विरोध ही अधिक उत्पन्न करती है। भावातिरेक व्यक्ति एक छोटी सी बात को ही लेकर यदि उसकी उधेड़ बुन में लग जाता है तो समझिये हफ्ते, महीने दो महीने यहाँ तक कभी-कभी वर्षों तक की फुरसत कर लेता है। दिन रात खाते-पीते, उठते बैठते अथवा काम करते समय तक उसके मस्तिष्क को उक्त उधेड़ बुन से फुरसत नहीं मिलती इन्हीं सब अतिरेकताओं के कारण भावप्रवण व्यक्ति अधिकतर करुणा, उदास, खिन्न अथवा अप्रसन्न ही देखे जाते हैं।

अपनी भावुकता, सम्वेदना, सहानुभूति तथा मार्मिकता की अच्छी तरह परीक्षा कर देखिये और समझ लीजिए कि वह आपकी भावातिरेकता का ही तो प्रच्छन्न स्वरूप नहीं है। यदि ऐसा हो तो तुरन्त अपना सुधार कर डालिए। अन्यथा इसके बढ़ जाने अथवा स्थायी हो जाने से आप मानसिक रोगी बनकर रह जायेंगे। इस बात की मोटी सी पहचान यह है कि यदि आपको जगी हुई भावुकता, करुणा अथवा सहानुभूति कारण का परिमार्जन करने के लिये भी सक्रिय हो उठती है तो वह वास्तविक गुण है और यदि यह आह भर कर, आँसू बहाकर अथवा अपने को त्रस्त खिन्न, अथवा करुणा बनाकर ही रह जाती है तो निश्चय ही मानसिक दुर्बलता ही है जो किसी प्रकार वाँछनीय अथवा सराहनीय नहीं है।


धरती माता को पागलों से केवल यज्ञ बचायेंगे

17 जनवरी 1965 की बात है अमेरिका का एक विमान स्पेन के एक छोटे से गाँव पालामरेस के ऊपर उड़ रहा था। अचानक विमान एक अन्य विमान से टकराया और दोनों विमानों के टुकड़े-टुकड़े हो गये। सात चालक मारे गये। सौभाग्य से गाँव का एक भी व्यक्ति नहीं मरा। उस अमेरिकी विमान में चार हाइड्रोजन बम रखे थे दो तो गाँव के आस-पास की धरती में फुट गये एक फूटा नहीं। अमेरिका की अणु-शक्ति आयोग ने उस विस्फोट से होने वाले प्लूटोनियम के जहरीले विकिरण के दुष्प्रभाव से उस क्षेत्र को बचाने के लिए 385 एकड़ भूमि का साफ करा दिया। उस क्षेत्र के हर व्यक्ति को डाक्टरी परीक्षा की गई, दवायें दी गई। वहाँ को 1900 टन मिट्टी खोदकर अमेरिका लाई गई और उसे जहाँ अणु अस्त्रों को नष्ट किया जाता है वहाँ नष्ट कर दिया गया।

इतनी सुरक्षा के बावजूद गाँव के लोग 80 दिन तक इसलिये बेचैन रहे कि चौथा बम अभी तक नहीं मिला था और उसके किसी भी क्षण विस्फोट हो जाने से उपद्रव खड़े होने की आशंका थी बड़ी कठिनाई से वह बम समुद्र के अन्दर 2500 फुट की गहराई पर मिला तब लोगों ने राहत की साँस ली। यह बम छोटी ताकत के थे जबकि बड़े बमों की मारक क्षमता तो बड़ी ही भयंकर होती है। उनके विकिरण से कितनी विषैली गैस उत्पन्न होती है उसका अनुमान इसी बात से किया जा सकता है कि एक छोटा कहे जाने वाले 10 फुट गहरा विकराल कुंआ खुद जाता है। विस्फोट क्षेत्र के तीन मील के घेरे में कुछ भी नहीं बचेगा नौ मील तक जीवों के शरीर पूरी तरह जल या झुलस जायेंगे। 6 अगस्त 1985 को हिरोशिमा में फेंके गये अणुबम से पाँच मील का विस्तृत क्षेत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया था दोनों स्थानों के क्रमशः 98000 तथा 74000 व्यक्ति मारे और 56000 तथा 77000 व्यक्ति घायल हुए। यह बम भी छोटे थे इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1654 में बिकनी प्रवाल द्वीप में जो हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया था वह हिरोशिमा पर फेंके गये अणुबम की अपेक्षा 600 गुणा शक्तिशाली था अर्थात् उसे यदि किसी युद्ध क्षेत्र में फेंका जाता तो हिरोशिमा के हिसाब से 4680000 (छियालीस लाख अस्सी हजार) व्यक्ति मरते और 3360000 (तैंतीस लाख साठ हजार) व्यक्ति घायल हो जाते। अणुबमों की दुनिया बड़ी भयंकर है। उस अध्याय को ढका रखना ही श्रेयस्कर है।

पर इससे भी भयंकर और उनके पीढ़ियों तक मानव जाति को पीड़ित व प्रताड़ित रखने वाले उसके विकिरण प्रभाव से जन-साधारण को अवगत न कराना एवं उसकी रोकथाम के प्रभावी कदम न उठाना एक प्रकार की बौद्धिक हिंसा होगी।

विकिरण सीधे अर्थ में उस चमक को कहते हैं। जो तारागणों या नक्षत्रों से प्रस्फुटित होता रहता है। कुछ विकिरण शरीर के लिए अच्छे होते हैं कुछ विषैले व हानिकारक यह विकिरण वाले तत्वों की रासायनिक स्थिति पर निर्भर करते हैं। यदि वह रसायन अच्छे हैं तो उससे मनुष्य को शक्ति मिलती है यदि वह दूषित हैं तो उससे मनुष्य का शरीर रोगी बनता है।

विकिरण पदार्थ की चौथी अवस्था या “प्लाज्मा” है। एक पत्थर घनत्व के कारण कठोर होने पर भी सीमित स्थान घेरता है उससे इतना ही नुकसान है कि वह जिस स्थान पर लगेगा चोट पैदा करेगा। पर उसी का द्रव रूप ज्यादा आयतन ले लेता है। सल्फ्यूरिक एसिड नाइट्रिक एसिड जैसे द्रव शरीर में फेंक दिये जाये तो व ऊपर की चमड़ी की जलाकर छेदते हुए भीतर तक चले जाते हैं, ठोस से द्रव की शक्ति अधिक होती है, गैस उससे भी आयतन घेरती है इसलिये उसकी क्षमता भी सैकड़ों गुनी अधिक हो जाती है। बम की धमक से 6 मील के घेरे को सारी वस्तुयें पूरी तरह नष्ट हो जायेगी और 25 मील तक आँशिक पर उसके ताप के प्रभाव से 10 मील के घेरे के 65 प्रतिशत व्यक्ति तुरन्त मर जायेंगे जबकि 17 मील के घेरे में जख्मी और झुलसने वालों की संख्या बेशुमार होगी। विषैली धातुओं का धुंआ 600 मील तक फैलकर लोगों को मारता है पर विकिरण दूषित तत्वों को और भी सूक्ष्म करके सारी पृथ्वी के वायु मंडल में फैला देता है। सोजियम 167 तथा स्ट्रान्शियम 60 आदि प्रमुख रेडियो सक्रिय तत्व हवा और पृथ्वी में लेन्थेनम, यूरेनियम, निओडिमियम, बेरियम, स्थेनियम आदि के परमाणु आइसोटोप सर्वत्र फैला देते हैं जिनका प्रभाव हजारों वर्ष तक बना रहता है। और यह दुष्प्रभाव खून तथा हड्डी के कैंसर गले के रोग पैदा करता रहता है।

विकिरण का सबसे बुरा प्रभाव प्रजनन और भावी पीढ़ी के अनुवाँशिकी गुणों पर पड़ता है। सन् 1627 में प्रसिद्ध जीव शास्त्री मुलर ने ‘एक्स किरणों की बौछार डोसोफिला मक्खियों पर की और यह पाया कि उससे उन मक्खियों के ‘जीन्स’ ही बदल जाते हैं। ‘जीन्स’ शरीर बनाने वाले कोशों के ‘अमर संस्कारों’ को कहते हैं। शरीर कैसा बनेगा, रंग गोरा होगा या काला, आंखें नीली होंगी काली या भूरी, हाथ में पाँच उँगलियाँ होंगी या छः। हड्डी पतली होगी या मोटी यह सब ‘जीन्स’ पर आधारित होता है। माता-पिता के ‘जीन्स’ ही बच्चे के शरीर का निर्माण करते हैं। सामान्यतः किसी तीखी दबा से भी इन्हें परिवर्तित करना सम्भव नहीं होता पर मुलर ने यह सिद्ध कर दिया कि रेडियो विकिरण (किसी तत्व को जब अत्यधिक गति से किसी माध्यम से प्रवेश कराया जाता है तो उससे तीव्र चौंध पैदा होती है इसे गैस की आगे की अवस्था या प्लाज्मा या विकिरण ही है।) जीन्स तक को प्रभावित कर सकते हैं उसने विविध प्रयोगों द्वारा इच्छानुसार एक ही ड्रोसोफिला को सन्तानों की कमी नीली आँखों वाला तो उसी को भूरी आँखों वाला करके दिखा दिया। किसी हड्डी मोटी करदी किसी की पतली किसी को सीधा बनाया तो किसी को अष्टावक्र करके 1646 में नोबुल पुरस्कार प्राप्त किया। अब अनुवांशिक विज्ञानी (जेनेटीसिस्ट) पूरी तरह सहमत हैं कि विकिरण की थोड़ी-सी मात्रा भी प्रजनन कोशिकाओं (स्त्री के अण्डाणु या शोणित तथा पुरुष के शुक्राणु) पर बुरा प्रभाव डालती है और उससे भावी पीढ़ियां खतरे में पड़ सकती हैं। आगे होने वाले अधिकाँश मृत प्रसव, गर्भपात, जन्मजात अपंगताएं इसी दूषित विकिरण के ही परिणाम होंगे। और वह बड़े भयंकर रूप से सामने आयेंगे। यदि आज की सभ्यता, आज के विज्ञान को इसी तरह चलते फलते व फूलते रहने दिया जाता है तो एक दिन वह आयेगा जब संसार अन्धे, बहरे, लंगड़े- लूले, गूँगे, कुरूप, टेढ़े-मेढ़े हकले, विक्षिप्त तथा पागलों से भर जायेगा।

प्लेन ट्रथ पत्रिका के सन् 66 के एक अंक में पेज 41 पर लिखा है- अमेरिका में प्रति वर्ष 550000 बच्चे अनुवाँशिक विकार के कारण मर जाते हैं 25000 मरते नहीं पर मृत्यु से अधिक त्रासदायक परिस्थिति में जीवनयापन करते हैं। हर दस बच्चों में एक विकलाँग या मानसिक दृष्टि से विक्षिप्त पैदा होता है। अमेरिका में प्रतिदिन 700 बच्चे ऐसे पैदा होते हैं जिनके शरीर या दिमाग में कोई न कोई खराबी अवश्य होती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट है कि 4 प्रतिशत मानव बच्चे नियमित रूप से जनम जा त्रुटियाँ लेकर जन्म ले रहे है निकट भविष्य में यह प्रतिशत दुगुना हो सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में संसार के 24 बड़े शहरों के आधार पर एकत्रित आंकड़े बताते हैं कि जोहानीज, वगै (अफ्रीका) में प्रति 44 बच्चे एक बच्चा विकलाँग पैदा होता है मेलबोर्न (आस्ट्रेलिया) में 53 में से एक, ब्राजील में 62 में एक, मैड्रिड (स्पेन) में 65 में एक, जाग्रेव (यूगोस्लाविया) में 78 में एक, सिकंदरिया मिश्र में 86 में एक म्वालाम्पुर (मलेशिया) में 65 में से एक बच्चा विकलाँग पैदा होता है। इसे अपने ऋषियों की कृपा और आशीर्वाद ही मानना चाहिए कि पौष्टिक आहार, सुरक्षा से साधन तथा शिक्षा आदि सभी दृष्टि से पीछे होने पर भी दुनिया भर के सभी देशों के अनुपात से अपने देश भारतवर्ष का अनुपात कम है यहाँ 116 में एक बच्चा इस तरह की शारीरिक त्रुटि के साथ जन्म लेता है। इस बात पर लोगों को भारी विस्मय है और दुनिया भर के वैज्ञानिक भारतीय वायु मंडल की विशेषताओं का अध्ययन भी करना चाहते हैं सम्भव है उससे नये तथ्य सामने आयें पर प्रकट सत्य है कि जिस तरह दूषित तत्वों के विकिरण द्वारा आज दुनिया के देशों ने भावी पीढ़ी की हिंसा का पाप किया इस देश की यज्ञ-परम्परा ने उनकी रक्षा की अन्यथा ये दर और भी बढ़ती और जो परिस्थिति आज से पचास वर्ष बाद होने वाली है वह आज ही हो गई होती। अर्थात् वायु मंडल में जो विषैला विकिरण छाया हुआ है उसके प्रभाव से अब तक ही सारे संसार के बच्चे अन्धे, बहरे, लूले-लँगड़े और पागल हो गये होते।

बमों से उत्पन्न विकिरण, उसमें प्रयुक्त दूषित तत्वों का प्लाज्मा या ऊर्जा द्वारा वायुभूत तत्वों का दुष्प्रभाव ही है। यज्ञों में जलाई गई औषधियाँ भी विकिरण पैदा करती है पर यह पौष्टिक एवं स्वास्थ्य वर्धक पदार्थों का विकिरण होता है उसमें ‘जीन्स’ की शुद्ध संस्कारवान् और स्वस्थ बनाने की उतनी ही प्रबल क्षमता होती है जितने विषैले तत्वों में प्रदूषण उत्पन्न करने की क्षमता। मन्त्रों की ध्वनियाँ उस वायुभूत शुद्धता को तरंगित करके सारे आकाश में फैला देती है इसलिये यज्ञ का लाभ कम या अधिक सारे संसार को उसी प्रकार मिलता है जिस प्रकार बमों का विकिरण सारे संसार को पीड़ा और पागलपन की और धकेलता है।

यज्ञ एक महान् विज्ञान है, महान् तन्त्र है, महान् औषधि प्रक्रिया और जीवन शक्ति का प्रकाश है हमें अपनी भावी सन्तानों को स्वस्थ संस्कारवान् और सद्गुणी बनाना है तो इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं कि शुद्ध व सात्विक यज्ञ परम्परा का सारे देश और विश्व में तेजी से विकास किया जाये? मानवीय सभ्यता को जिन्दा रखना है तो यज्ञ को, यज्ञीय परम्पराओं को प्रतिष्ठा देनी ही पड़ेगी।


आत्मा की खेती

तथागत एकबार काशी में एक किसान के घर भिक्षा माँगने चले गये। भिक्षा पात्र आगे बढ़ाया। किसान ने एकबार उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। शरीर पूर्णाग था। वह किसान कम पूजक था। गहरी आँखों से देखता हुआ बोला- “मैं तो किसान हूँ। अपना परिश्रम करके अपना पेट भरता हूँ। साथ में और भी कई व्यक्तियों का। तुम क्यों बिना परिश्रम किये भोजन प्राप्त करना चाहते हो?”

बुद्ध ने अत्यन्त ही शान्त स्वर में उत्तर दिया- “ मैं भी तो किसान हूँ। मैं भी खेती करता हूँ। किसान ने आश्चर्य में भरकर प्रश्न किया- ‘फिर आप क्यों भिक्षा माँग रहे हैं?

भगवान् बुद्ध ने किसान की शंका का समाधान करते हुए कहा- “हाँ वत्स! मैं भी खेती करता हूँ। पर वह खेती आत्मा की है। मैं ज्ञान के हल श्रद्धा के बीज बोता हूँ। तपस्या के जल से सींचता हूँ। विनय मेरे हल की हरिस, विचारशीलता फाल और मन नरैली है। सतत् अभ्यास का यान मुझे उस गन्तव्य की और ले जा रहा है। जहाँ न दुख है - न सन्ताप मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है। तब यदि तुम मुझे अपनी खेती का कुछ भाग दो- और मैं तुम्हें अपनी खेती का कुछ भा दूँ- तो सौदा अच्छा न रहेगा?”

किसान की समझ में बात आ गई और व तथागत के चरणों में अनवरत हो गया।


मन्त्र विद्या का वैज्ञानिक आधार

सुप्रसिद्ध अंग्रेज गायिका श्रीमती वाट्स हग्स एक बार अपने दरवाजे पर बैठी एक राग गा रही थीं जब जब वे राग गाते गाते तन्द्रित अवस्था (निमग्नता) की स्थिति अनुभव करतीं उन्हें एक सर्प की आकृति प्रगट होती दिखाई देती। वे समझ न पाती थीं कि वस्तुतः वहाँ कोई सर्प आ जाता है अथवा वक केवल काल्पनिक अनुभूति भर है। परीक्षा के लिये उन्होंने उस स्थान में बहुत बारीक कणों वाली रेत बिछा दी और फिर से वही राग गाने लगीं। राग गाते उन्हें फिर वैसी ही अनुभूति हुई अब उन्होंने राग बन्द किया और रेत के निकट जाकर देखा कि उसमें एक सर्प की आकृति सचमुच बनी हुई है।

इस आर्श्चय ने उन्हें विविध प्रकार के राग सीखने और उनका विकास करने के प्रेरणा दी। राग में यद्यपि स्वर का आनन्द नहीं मिलता तथापि उसमें भावनाओं को दिशा- विशेष में निक्षेपित करने की प्रबल शक्ति होती है। उससे रस मिलता है। यह भाव तरंगें सूक्ष्म आकाश के परमाणुओं में उपस्थित विद्युत में कम्पन उत्पन्न करती हैं यह कम्पन अपनी अपनी तरह से परिणाम उपस्थित कर सकते हैं प्राचीन काल में सिद्ध गायक मल्हार राग गाते थे तो वर्षा होने लगती थी, दीपक राग गाने से बुझे हुये दीपक जल उठते थे, मृग रंजनी गाने से जंगल के हिरण और मृग जीवन की मृत्यु का भय त्यागकर विमोहित हुये चले आते थे संगीत स्वरों से आबद्ध सृष्टि अन्तराल में जबर्दस्त क्रान्ति उत्पन्न करने की एक महान् उपलब्धि भारतीय आचार्यों ने प्राप्त की थी। वाट्स हग्स का यह नन्हा सा प्रयोग उस उपलब्धि की एक क्षीण झाँकी मात्र कही जा सकती है।

गायत्री उपनिषद् की तृतीय कांडिका में महर्षि मैत्रेयी ने आचार्य मौद्गल्स से पूछा-देव! मन और वाक् (ध्वनि) में क्या सम्बन्ध है इन दोनों का प्रकृति से क्या सम्बन्ध है इस पर महर्षि उत्तर देते है-

मन एक सविता वाक् सावित्री, यत्र ह्मवे मनस्तद्वाक्। यत्र वैवाक् तन्मन इति एते द्वे योनी एक मिथुनम्॥1॥

मन सविता है वाक् सावित्री जहाँ मन है वहाँ वाक् है जहाँ वाक् है वहाँ मन है ये दोनों दो योनि और एक मिथुन हैं।

दृश्य जगत वस्तुतः सूर्य का ही व्यक्त रूप है। सूर्य न हो तो सारी सृष्टि निष्प्राण हो जाये। प्रकृति की रचना सूर्य ही करता है यह रचना शब्द द्वारा ही सम्पन्न करने का अभिलेख शास्त्रकार ने किया है। अर्थात् मन को शब्द में लय, गति या मन्त्र में बाँधकर स्थूल अणुओं को उसी प्रकार स्थिर किया जा सकता है जिस प्रकार से सूर्य अपनी प्रकृति को स्थिर करता है।

श्रीमती वाट्स हग्स के इस प्रयोग में स्वर को मन से बाँधकर स्थूल परिणाम उपस्थित करना इस शास्त्रीय सत्यता का प्रमाण था। लार्ड लिटन ने इस प्रयोग की बात सुनी तो उन्होंने श्रीमती हग्स को अपने पास बुलाया और उन्हें अपनी सभा का माननीय सदस्य बनाकर वैज्ञानिकों के समक्ष इस प्रकार का प्रयोग करने का आग्रह किया। श्रीवाट्स हग्स ने तब रागों के द्वारा विभिन्न आकृति प्रकृति के फूलों फलों से लदे वृक्ष, सर्पाकार त्रिकोण, षट्कोण तारे समुद्र, पक्षी आदि अनेकों प्रकार की आकृतियाँ बनाकर सबको आश्चर्य चकित कर दिया।

आज ऐसे यन्त्रों का विकास हो चुका है जिसमें शब्द को सूक्ष्म विद्युत तरंगों में बदल कर मोटर गाड़ियाँ चलाने के काम लिये जाते हैं पर बिना किसी यन्त्र के प्रकृति में परिवर्तन उत्पन्न करने का यह संगीत-विज्ञान अपने आप में अनोखा था और यह बताता था कि देव शक्तियाँ मन्त्र द्वारा, शब्द विज्ञान द्वारा ही सूक्ष्म स्थूल जगत का नियमन करती है। उन विद्याओं के ज्ञाता भी वैसे ही चमत्कार कर सकने में समर्थ हों तो इसे अतिशयोक्ति नहीं मानना चाहिये। मन्त्र स्वर या शब्द एक ही सत्य के भिन्न रूप हैं।

इटली की एक युवती ने सामवेद की एक ऋचा पर- सितार द्वारा अभ्यास किया और उसने हजारों दर्शकों के बीच उसका प्रदर्शन करके दिखाया, कल्याण के “साधना विशेषाँक” में पं. भगवान्दास जी अवस्थी ने इसका वर्णन किया है। फ्राँस की मैडम लेंग ने विभिन्न राग गाकर देवी मेरी और जीसस क्राइस्ट के चित्र बनाकर दिखाये। और भारतीय मन्त्र शास्त्र के इस सिद्धान्त की पुष्टि की कि प्रकृति के हर स्थूल अणु को मानसिक एकाग्रता और ध्वनि के द्वारा किसी भी क्रम में सजाकर कैसा भी आग, पानी आकाश, धरती, प्रकाश, पहाड़, नदी, पक्षी, जीव-जन्तुओं का रूप दिया जा सकता है।

मन्त्र द्वारा शाप और वरदान, रोगों से मुक्ति, मारणा मोहन उच्चाटन अभिचार कृत्याघात आदि प्रयोग विराट् चेतन शक्तियों द्वारा ध्वनि के माध्यम से उत्पन्न गति जैसे ही क्रिया-कलाप है। मन्त्र शक्ति के भण्डार होते हैं यदि मन की एकाग्रता द्वारा शब्द शक्ति प्रयोग को बात मनुष्य सीख ले तो वह साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा हजारों गुणा अधिक शक्तिशाली हो सकता है। संगीत उसका सबसे सीधा सरस व सरल प्रयोग है मन्त्र विद्या की मूल शक्तियों तक उतरना और पहुँचना हो तो संगीत साधना का प्रयोग करना चाहिए।


दस अक्षरों ने महाभारत रचाया

राजसूय यज्ञ समाप्त हो चुका था किन्तु साँस्कृतिक समारोहों की अब तक हस्तिनापुर में धूम मची हुई थी।

ऐसी ही एक रात दुर्योधन नाट्य-शाला से वापस लौट रहा था। मार्ग में स्फटिक का बना हुआ जल कुण्ड था चन्द्रमा के प्रकाश से उसका रंग इस तरह खिला था कि पर्याप्त प्रकाश होने पर भी किसी को यह भ्रम नहीं हो सकता था कि यहाँ पर जल है। दुर्योधन को भी भ्रम हुआ और वह सीधा चलता चला गया और जल से भरे उस हौज में जा गिरा।

पाँडवों का अन्तःपुर समीप ही था। राजरानी द्रौपदी मरकत-मणि के प्रकाश में बृहदारण्यक का अध्ययन कर रही थी। हौज में किसी के गिरने की आवाज से उनका ध्यान उधर आकर्षित हुआ तो देखा दुर्योधन गिर पड़ा है। इतने दिनों की घृणा अचानक हृदय से वाणी में उत्तर आई और निकल ही तो गया उनके मुख से “अन्धों के अन्धे ही होते हैं।”

शब्द दुर्योधन के कान तक पहुँचे। उसने इसे जातीय अपमान समझा। उसका सारा शरीर प्रतिशोध की आग में जल उठा। दुर्योधन ने वहीं प्रतिज्ञा की- “द्रौपदी को नग्न करके अपनी जाँघ पर न बैठाया तो मेरा भी नाम दुर्योधन नहीं।

इतिहास की प्रसिद्ध घटना है कि इन 3 शब्दों- दस अक्षरों की प्रतिक्रिया ही थी कि जब पांडव द्यूत-क्रीड़ा में द्रौपदी को भी हार गये तो दुर्योधन ने अपनी वह प्रतिज्ञा पूरी की और उसी के कारण इतना बड़ा महाभारत रचा गया।


मृत्यु के बाद भी मनुष्य जीवित रहता है।

हिन्दी साहित्य में सुमित्रानन्दन पंत का विशिष्ट स्थान है। यों तो कोई भी विश्वास अपनी-अपनी श्रद्धा, कल्पना, विचार और बौद्धिक शक्ति से ही प्रगाढ़ होता है पर जीवन सम्बन्धी मान्यतायें ऐसी जटिल हैं कि उनमें दृश्य और अदृश्य दोनों में तार्किक सम्बन्ध जोड़े बिना हमारे विश्वास का प्रयोजन हल नहीं होता। श्री पंत जी ने जो विश्वास का प्रयोजन हल नहीं होता। श्री पंत जी ने जो विश्वास किया था व उनकी कल्पना मात्र नहीं थी उन्होंने जीवन की एक गहन दर्शन मानकर ही उस पर विचार किया था पर कई बार उन्हें भी मृत्यु के उपरान्त जीव के अस्तित्व पर अविश्वास-सा होने लगता था। एक घटना जिसने इस मान्यता को उलट दिया वह इनके परिवार से ही सम्बन्धित है।

एकबार श्री पंत जी के चाचाजी पहाड़ी के एक बहुत सुन्दर स्थान में एक साधु का प्रवचन सुनने गये। प्रवचन देर तक चला। जब वह समाप्त हुआ तो शाम हो गई। सब लोग तो चले गये पर वह साधु के पास ही बैठे रहे। साधु ने उन्हें बैठे देखकर पूछा- आप यहाँ अभी तक किस लिये रुके हैं? पंतजी के चाचाजी ने धीरे से बताया महाराज मेरा घर यहाँ से दूर है। रास्ते में कई डरावने स्थान पड़ते हैं मुझे भूत का भय लगता है, इसलिये जाने में ठिठक हो रही है।

साधु ने उन्हें भभूत दी और हथेली में मलते हुये कहा लो अब जाओ यदि रास्ते में कोई भूत मिले तो यह हाथ जोर से मारना, भूत तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा पायेगा। चाचाजी घर के लिये चल पड़े। रास्ते में जैसी कि आशंका थी उन्हें एक आकृति सी दिखाई दी। वह उनकी ओर ही बढ़ रही थी। चाचाजी के अनुसार- “मैंने हिम्मत की और वह जो से वही हाथ दे मारा। इसके बाद वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया।” चाचाजी घर आये तो श्री पंत जी के बड़े भाई ने उनको देखते ही पूछा चाचाजी आपके गाल में यह तमाचे की निशान किसका है। घर के सब लोगों और चाचाजी ने भी शीशे में देखा। गाल में पाँचों उँगलियों के साफ निशान थे यह निशान चाचाजी की उँगलियों से बहुत मोटे थे। वह निशान कहाँ से आया अब तक भी लोग नहीं समझ पाये और अन्त में इसे भी भूत काण्ड की ही संज्ञा दी गई।

‘मृत्यु के पश्चात् मनुष्य जिन्दा रहता है” मैन्स सखाइवल आफ्टर डेथ में एस.पी.आर. की रिपोर्ट्स से उद्धृत एक घटना पादरी-सी. एल. ट्वीडेल ने दी है।

आइओवा नगर में रहने वाले एक किसान श्री मिकाइल कोन ले की मृत्यु हो गई। मिकाइल बड़ा सम्पन्न व्यक्ति था पर वह हमेशा गन्दे कपड़े पहनता था। उसकी मृत्यु भी गन्दे कपड़ों में ही हुई। एक कमीज, जो महीनों से नहीं धोई गई थी पहने उसकी संदिग्ध अवस्था में मृत्यु हो गई। इस मृत्यु की जाँच करने वाले अफसर ने शव को देखकर कहा इसके पुराने कपड़े पहनाकर मेरे घर भेज दिया जाये। किसान के बेटे ने ऐसा ही किया। सफेद कपड़े पहनाकर लाश अफसर के घर भेज दी गई। लड़का जैसे ही अपने घर लौटा कि अपनी बहन बेहोश पाई। काफी देर बाद होश में आने पर उसने बताया मैंने अभी-अभी पिताजी को साफ कपड़ों में देखा। वैसे कपड़े वे कभी नहीं पहनते थे। वे मुझसे कह रहे थे मेरी पुरानी कमीज मुर्दाघर में पड़ी है उसमें कुछ बिल और रुपये हैं।”

लकड़ी के इस बयान को घर और पड़ौस वालों ने भी तब तो बकवास कहा पर जब लड़के ने बताया कि हाँ सचमुच ही उनके पुराने कपड़े उतरवा कर मुदविर में फिंकवा दिये गये हैं तो लोगों की आतुरता भी बढ़ी। लोग मुर्दाघर गये। कमीज उठाकर देखी गई उसमें भीतर बड़ी सावधानी से एक थैली से हुई थी उसमें बिल भी थे और रुपये भी। इस घटना से सभी आश्चर्यचकित रह गये और वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने माना कि मृत्यु के पश्चात् भी चेतना अपनी बौद्धिक क्षमता के साथ जीवित रहती है।

सन् 1945 की बात है तब द्वितीय महायुद्ध चल रहा था। केंटोर नामक एक व्यक्ति को अमेरिका से लन्दन जाना पड़ा। केंटोर एक रात केसिंगटन में रुके बोर्डिग हाउस का एक कमरा सोने के लिये दिया गया। केंटोर ने स्वयं इसके बाद का अनुभूत वर्णन इन शब्दों में लिखा है-

“भोजन करने के बाद मैं सो गया। पहली नींद तीन बजे टूटी। मैं उठा और लघुशंका के लिये कमरे से बाहर गया और फिर लौटकर आया और विस्तार पर लेट गया। लेटते देर नहीं हुई थी कि ऐसा लगा कि नीचे से कोई मेरे कम्बल को घसीट रहा है। पहले तो मैंने सोचा कपड़े अपने आप खिसक रहे होंगे इसलिये उन्हें ऊपर को खींच लिया किन्तु वही क्रिया फिर दुबारा हुई। मेरा मुँह फिर खुल गया। इस बार थोड़ी ताकत लगाकर कपड़े फिर ऊपर उठाये। जितनी देर कपड़े ऊपर उठाये रहा कपड़े ठीक रहते पर छोड़ते ही उन्हें फिर कोई खींच लेता। बाहर उठकर देखा कोई नहीं था। कमरे की बत्ती जलाकर कोना कोना देखा कोई नहीं था। दरवाजे बन्द करके कपड़े चारों ओर से लपेट कर फिर लेट गया। लेटना था कि कमरे में एक विचित्र प्रकाश दिखाई दिया। उसमें अजीब-अजीब तरह की हलचलें हो रही थी हँसने ओर रोने की विचित्र आवाजें भी आती रहीं। मैंने शेष रात बड़ी बेचैनी से काटी।

इस घटना का नायक केंटोर कोई साधारण और अविश्वस्त आदमी नहीं अमेरिका का प्रसिद्ध लेखक हैं जिन्हें कुछ दिन पहले ही “पुलित्जर पुरुकार” प्रदान किया गया है।

यह घटनायें हमें जीवन के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने के लिये प्रेरित करती है। वर्तमान जीवन ही जीवन का अन्त नहीं, वरन् मृत्यु के बाद भी मनुष्य जिन्दा रहता है। यदि यह सच है तो क्या हम उस अनन्त जीवन की शोध और सार्थकता के लिये कुछ कर रहे हैं हमें आपने आपसे यह प्रश्न करना और उसका समाधान भी ढूंढ़ना चाहिये।


पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ

एक सन्त के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया और उसे पिंजरे में रख लिया। सन्त ने कई बार शिष्य से कहा कि “इसे यों कैद न करो। परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।”

किन्तु शिष्य अपने बालसुलभ कौतूहल को न रोक सका और उसे अर्थात् पिंजरे में बन्द किये रहा।

तब सन्त ने सोचा कि “तोता को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए”

उन्होंने पिंजरा अपनी कुटी में मँगवा लिया और तोते को नित्य ही सिखाने लगे- ‘पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।’

कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भाँति रट गया। तब एक दिन सफाई करते समय भूल से पिंजरा खुला रह गया। सन्त कुटी में आये तो देखा कि तोता बाहर निकल आया है और बड़े आराम से घूम रहा है साथ ही ऊँचे स्वर में कह भी रहा है- “पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।”

सन्त को आता देख वह पुनः पिंजरे के अन्दर चला गया और अपना पाठ बड़े जोर-जोर से दुहराने लगा। सन्त को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ। साथ ही दुःख भी।

वे सोचते रहे “इसने केवल शब्द को ही रटा। यदि यह इसका अर्थ भी जानता होता- तो यह इस समय स्वतंत्र हो गया होता, इस कारा से।

ऐसे ही- कितने ही मनुष्य ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं किन्तु उनका मर्म नहीं जानते के भी समय तथा अवसर प्राप्त होने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।


बन्धन-मुक्ति

वर्षा ऋतु अभी समाप्त होकर ही चुकी थी, इसलिये गाँव-गोठ को जाने वाले मार्ग स्पष्ट नहीं हो पाये थे, रास्तों में पड़ने वाली चौगान घास से ढके थे, तो वन्य प्रदेश में अनेक नये वृक्ष आने से मार्ग के चिह्न नष्ट हो गये थे। ‘नौ दिन चल अढ़ाई कोस’ आचार्य उपकौशल आधी यात्रा भी पूरी न कर सके थे कि साँझ हो गई। पीछे का गाँव पीछे रह गया आगे का कुछ ठिकाना नहीं था, निदान रात बन-प्रदेश में ही एक पीपल वृक्ष के नीचे काटनी पड़ी। आचार्य उपकौशल लकड़ियाँ एकत्र कर आग जलाने के उपक्रम में जुट गये।

कंदमूल भूनकर उपकौशलाचार्य ने भूख मिटाई, थकावट दूर करने के लिये आग के समीप ही दोनों घुटने छाती से लगाकर लेट गये। दिन भर के हारे थके उपकौशल नींद आ गई, पर अभी रात्रि का प्रथम प्रहर ही बीता था कि एक रौद्र आवाज ने उन्हें जगाकर बैठा दिया। उपकौशल को ऐसा लगा कोई हिंसक जन्तु आ गया है। आग में थोड़ी लकड़ियाँ और डाली, थोड़ा प्रकाश तेज हुआ। आचार्य प्रवर ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, कहीं कुछ दिखाई दे किन्तु सर्वत्र घनघोर नीरवता, कहीं कहीं कोटरों में छिप पक्षियों की चीं-चीं सुनाई दे जाती थी तो यदाकदा दूर के किसी गाँव से कुत्तों के भौंकने का स्वर ऐसा लगता था जिस तरह प्रलय काल में सारा विश्व आकाश-भूत हो जाता है उसी प्रकार आज सारी सृष्टि अन्धकार भूत हो गई।

आवाज किसी की थी? कहाँ से आई? उपकौशल इसी उधेड़-बुन में थे कि उन्हें ऐसा लगा मानों उनके पीछे कोई खड़ा कराह रहा है, उसकी पीड़ा के स्वर में भी कर्कशता थी आचार्य प्रवर ने प्रश्न किया- आप कौन है? प्रगट क्यों नहीं होते?

आर्य श्रेष्ठ! आप तो गूढ़ विद्याओं के ज्ञाता है, आप सब कुछ जानते हैं, प्रेत-योनि में पड़ा मैं घूमस आपके समक्ष कैसे प्रकट हो सकता हूँ, आपके ब्रह्म तेज के समक्ष तो बैताल राज भैरव भी नहीं आ सकते मैं कैसे आ सकता हूँ? क्षमा करें मैंने आपको नींद से जगा दिया, देव! क्या करूं इस अधम योनि में रहते बहुत समय बीत गया, इस मार्ग से कोई लोग आये मैंने अनेक लोगों से मुक्ति का उपाय पूछना चाहा पर यहाँ जो भी आया मेरी आवाज से ही भयभीत हो गया। मैं जानता हूँ आपके लिये संसार में आत्मा के अतिरिक्त कुछ है कि नहीं मैंने सुना है आत्मा-साक्षात्कार के लिये योगी के लिये मनुष्य किंवातिर्यक योनियों में कुछ भी भेदभाव नहीं दिखता, सुना है उन्हें शेर हो या सर्प, चिड़िया हो या मछली सबसे आत्मवत् प्रेम करते हैं यदि यह सत्य है तो कल्याण की इच्छा से शरणागत हुये मुक्त धूमस को भी प्रेत-योनि से छूटने का मार्ग बताइये?

गुरु-गम्भीर वाणी में आचार्य उपकौशल बोले- अवुस! जीव स्वकर्म वश नाना योनियों में पड़ता और दुःख भोगता है छुटकारा कोई और नहीं दिला सकता मनुष्य का पश्चाताप, पापों से निवृत्ति और सत्कर्मों में सद्गति ही उसे बन्धन मुक्त कर सकती है मैं तुम्हें आत्म कल्याण का रहस्य समझा सकता हूँ। क्या तुम बताओगे तुम्हारी इस प्रेत योनि में आने का कारण क्या है?

आर्य श्रेष्ठ! घूमस ने बताना प्रारम्भ किया मेरे पिता संग्रह वृत्ति के व्यक्ति थे जिन्होंने अपना सारा ध्यान उचित अनुचित तरीके से धन कमाने में लगाया, लोक-सेवा के किसी काम में तो क्या परिवार के किसी व्यक्ति के दुःख कष्ट में भी वे पैसा कंजूसी से खर्च करते, मैं उनका इकलौता पुत्र था। मुझसे उनकी प्रबल आसक्ति थी, सारा धन कुझे छोड़कर वे काल-कवलित हुये। युवावस्था में बिना परिश्रम अपार धन पाकर मेरी इन्द्रिय- दुर्बलताएं जाग पड़ीं। अपनी पत्नि से कामवासना तृप्त न हुई तो वेश्यावृत्ति में पड़ गया। शराब और मांसाहार जैसी बुराइयां मेरे पीछे पड़ गई। इन्द्रिय भोग ही मेरी जीवन का साध्य बन गया। वासनाओं के कारण शरीर जितना क्षीण होता गया मन की वासना उतना ही तीव्र होती गई। मृत्यु के क्षण भी मुझे निद्रा न आई वह तृष्णायें, वासनायें अब तक पीड़ित किये है, शरीर न होने से न तो मैं इच्छायें तृप्त कर सकता हूँ और न ही मन चैन लेने देता है इसी दुर्गति में पड़ा घोर कष्ट के दिन बिना बिता रहा हूँ।”

तुम ठीक कहते हो घूमस! उपकौशलाचार्य ने बताया मानव-मन की दुर्बलता ही पतन का कारण होती है किन्तु तात! यह मन ही मुक्ति दाता भी है। मनुष्य समझ नहीं पाता प्रारम्भ में उसे जिह्वा इन्द्रिय आकर्षित करती है तब वह प्राकृतिक आहार लेना छोड़कर केवल स्वाद के लिये अन्न खाने लगता है। मनुष्य प्रकृति द्वारा दिये गये आहार से ही अपने शरीर रथ को गतिशील बनाये रखने में समर्थ हो सकता है पर जिह्वा का अभ्यास उसे अप्राकृतिक भोजन के लिए ललचाता है। तात! पक्षी फल-फूल खाकर जिन्दा रहते हैं, नीरोग जीवन जीते हैं, वन्य पशु घास खाकर जिन्दा रहते हैं मन का अभ्यास है जो रस लेने लगे तो मिट्टी में भी मधुरता आ जाये, जब उसे अप्राकृतिक आहार मिलने लगता है तो वासनायें उस जीवन तत्व को और भी नष्ट करती है। वासनाओं से तृप्ति तो होती नहीं इन्द्रियों के समीपवर्ती परमाणु गतिशील हो उठते हैं फलस्वरूप भोगे हुए विषय बार-बार याद आते हैं मनुष्य उन्हें बार-बार भोगने से मन की गति को दूषित कर लेता है। दूषित मनोगति आत्मा को साँसारिक सुखों में ही चक्कर काटने को विवश करती है तुम्हारे साथ यही हुआ। तुमने अपनी आत्मा की आग को वासनाओं की तुषार से ठण्डा कर दिया। यह विज्ञानमय शरीर इसलिये मिला था कि विराट् विश्व को वास्तविकता की अनुभूति करते और अपने सीमित अहंभाव को विराट् में प्रतिरोपित करते हैं और अपने सीमित अहंभाव को विराट् में प्रतिरोपित कर ऐश्वर्य का आनन्द लेते पर मन की दुर्गति ने जीवन लक्ष्य से भ्रष्ट कर दिया तात! पतन के गर्त में पड़ी आत्मा के सुधार का एक ही उपाय है कि वह अपने जीवन की गति विपरीत दिशा में मोड़े अर्थात् आहार संयम करे, अपने प्राणों को प्राणवान् द्वारा प्रखर बनाये अमूल्य मनुष्य शरीर परमात्मा किस लिये देता है। उस उद्देश्य को समझ कर अपनी क्षमताओं को आनन्द प्राप्ति की साधनाओं में नियोजित करे तभी आत्मा का पुनरुद्धार हो सकता है तात! किसी की कृपा हो सकती है तो इतनी ही कि वह मार्ग-दर्शन करदे। अन्ततः प्रायश्चित और आत्म-कल्याण का पता तो स्वयं ही करना पड़ता है।

आचार्य प्रवर की ज्ञान युक्त बातें सुनते सुनते घूसम को नींद आ गई। प्रातः काल ही चली थी, भगवती उषा का आगमन हो चुका था आचार्य प्रवर अपनी अगली यात्रा की तैयारी में चल पड़े घूमस भी अगली जीवन यात्रा में निकल पड़ा प्रेत योनि में नींद आना पुनर्जन्म की तैयारी होती है। घूमस ने अब एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया, उपकौशल के उपदेश उसके हृदय में बस चुके थे उसने बाल्यावस्था से अपना मन आत्म-कल्याण की साधनाओं में लगाया पाँचों कोशों का अनावरण करते हुए उसने आत्म-साक्षात्कार किया और लौकिक बन्धनों से मुक्ति पाई।


ईश्वर ही है मुक्ति दाता

एक सन्त निश्चित दिन अपनी गुफा से बाहर निकलते और जिससे उनका स्पर्श हो जाता वही रोग मुक्त हो जाता था। एक भक्त यह सुनकर वहाँ पहुँचा और जिस समय महात्मा गुफा से निकल कर आरोग्यता दान करते हुए गुफा में घुसने को थे तभी भक्त ने उनकी चादर का कोना पकड़ लिया और बोला कि आपने सबका रोग दूर किया, मेरे भी मन का रोग दूर कीजिये।

महात्मा हड़बड़ा कर कहने लगे- मुझे जल्दी छोड़ो। वह ईश्वर देख रहा है कि तुम उसका पल्ला छोड़कर दूसरे का पल्ला पकड़ना चाहते हो।’ मुक्ति दाता वही है उसी का पल्ला पकड़ महात्मा चादर छुड़ाकर गुफा में घुस गये और ईश्वर भक्ति में लीन हो गये।


सत्य बनाम तथ्य

सत्य का अर्थात् है यथार्थता। जो बात जैसे ही उसे उसी रूप में समझना, मानना और प्रयुक्त करना सत्य की साधना है। दुर्भाग्य से हम इन दिनों बनावट, विडम्बना, भ्रान्ति, दुर्बुद्धि से भरे युग में रह रहे हैं। अज्ञान भरे अन्धकार युग ने कुछ ऐसा कृत्रिम वातावरण बना रखा है जिससे बरसात की काली घटाओं में छिपे हुए सूर्य की तरह सत्य की एक प्रकार से छिपा सा ही दिया। छल और कृत्रिमता का दूसरा नाम ही सभ्यता पड़ गया है, जो जितनी कृत्रिमता बरता सकता है वह उतना ही बड़ा सभ्य और कलाकार माना जाता है। पिछली शताब्दियों और सहस्राब्दियों से असत्य एवं कृत्रिमता की आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे हैं और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय, इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है। आज सामान्य बुद्धि के लिए यह ढूंढ़ निकालना अति कठिन है कि प्रचलित मान्यताओं, प्रथा परिपाटियों, विश्वासों रीति-नीतियों एवं विचारणाओं में सत्य का कितना अंश है।

जिस कसौटी पर यथार्थता को फला जा सकता है वह विवेक। विवेक उस साहस का नाम है जिसके आधार पर बहु प्रचलित मान्यताओं की उपेक्षा करके भी सच्चाई को ढूंढ़ निकालने की भावना उत्पन्न होती है। यही भावना है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति सत्य का दर्शन कर सकता है। जो यह सोचता है कि समाज का वर्तमान प्रचलन ही ठीक है और उसी का समर्थन ठीक है तो फिर उसके लिए सोचने और ढूंढ़ने के सारे रास्ते ही बन्द हो जाते हैं। ग्रचलन के ढर्रे से लुढ़कते लुढ़कते अभ्यास परिपाटी के प्रति मनुष्य को मोह उत्पन्न हो जाता है, उसी के साथ पक्षपात जुड़ जाता है। अपनी यह दुर्बलता समझ में भी नहीं आती। लगता है हम जो सोचते हैं वही सत्य है, जो करते हैं वही सत्य है, जिस रास्ते पर चल रहे हैं वही सत्य है। विभिन्न व्यक्ति अपनी प्रचलित परिपाटियों और रीति-नीतियों को सत्य मानने लगते हैं। चूँकि सत्य का निरूपण तो किसी ने किया नहीं अपनी-अपनी परिपाटियों को ही सत्य मान लिया है, इसलिए उनकी मान्यताएं स्वभावतः एक दूसरे से भिन्न अथवा विपरीत होती है। इस भिन्नता एवं विपरीतता को स्वभावतः वे वर्ग नापसन्द करते हैं, कई बार घृणा भी करते हैं और यदि असहिष्णुता की मात्रा अधिक हुई तो परस्पर संघर्ष भी खड़ा हो जाता है। एक दूसरे को असत्यवादी मानते हैं और अपने को सत्य निष्ठ समझते हैं। उनकी लड़ाई का आधार तो सत्य का समर्थन और असत्य का निवारण होती है पर वस्तुतः दोनों ही असत्य का समर्थन और सत्य की हत्या कर रहे होते हैं क्योंकि वास्तविक सत्य को ढूंढ़ने की किसी ने चेष्टा ही नहीं की। अपने चारों ओर घिरे मानसिक अथवा सामाजिक वातावरण को ही सही माना, जबकि वस्तुतः वह एक पक्षपात मात्र था। इतिहास के अगणित पृष्ठ इसी सत्य के आवरण में पिछे पक्षपात से लाखों करोड़ों मनुष्यों के श्रोणित तर्पण की करुणा कथा से कलंकित हो रहे हैं। हमारे देशवासियों को ऐसे नर संहार की स्मृति अभी भी भूली नहीं है। गौरी, गजनवी, नादिरशाह, औरंगजेब, चंगेजखान आदि ने धर्म की सेवा के नाम पर क्या नहीं किया था ईसाई और गैर ईसाई, मुसलिम और गैर मुसलिम, आर्य और अनार्य आदि की भिन्नताओं ने कितनी नृशंसताएं उपस्थित की इसका लम्बा इतिहास पढ़ने पर लगता है कि मनुष्य सत्य के अवलम्बन की डींग मात्र हाँकता है वस्तुतः सत्य से अत्यधिक दूर है।

आज के इस तससापन्न युग में यह नितान्त आवश्यक है कि सत्य और असत्य का नये सिरे से विश्लेषण किया जाये और उसका आधार विवेक, न्याय एवं औचित्य को माना जाय। दूसरों के प्रति जो व्यवस्था लागू की जा रही है वही यदि अपने लिए भी लागू हो तो कैसी लगे? इस कसौटी पर न्याय अन्याय का निरूपण आसानी से हो सकता है। उसी प्रकार यदि यह मानकर चला जाय कि संसार के बहुसंख्यक व्यक्ति अनुपयुक्त विवरण और क्रिया पद्धति के अभ्यस्त हैं उनकी गतिविधियों में अनौचित्य की मात्रा ही अधिक है तो फिर तथाकथित लोग भय से मुक्ति पाई जा सकती है और स्वतन्त्र चिन्तन के लिए उपयुक्त दिशा मिल सकती है। अपनी मनोभूमि के पक्षपात को भी समझना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस परम्परा में जन्में पले और बड़े हुए हैं स्वभावतः उसी के समर्थन में बुद्धि काम करेगी। इसलिए स्वतन्त्र चिन्तन सत्य का अन्वेषण करने के लिए इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्व-व्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप से अपना काम कर सकने में समर्थ हो सके।

“हमारा सो सही आपका सो गलत” आज सही गलत की यही मात्र परख है। अपनी जाति, भाषा, देश, वंश, परिवार, सम्प्रदाय, रहन-सहन, रीति-रिवाज एवं विचार पद्धति का जो अनावश्यक पक्षपात है उसे हटाया जाना चाहिए और निष्पक्ष विश्व के निष्पक्ष नागरिक की तरह एक न्याय निष्ठ जज की तरह हमें हर प्रचलित रीति नीतियों और विचारणाओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। न तो प्राचीन के प्रति मोह रहे और न नवीन के प्रति द्वेष। प्राचीन हो या नवीन इससे यथार्थता में कोई अन्तर नहीं आता। किसी सड़ी गली मृत प्रायः वस्तु को इसलिए सँजोकर नहीं रखा जा सकता कि वह पुरानी है।

जिस प्रकार दूसरे लोगों के बारे में गलत राह अपनाने वाला सोचा जा सकता है उसी प्रकार बहुत सम्भव है कि विवेक की कसौटी पर अपनी मान्यताएं अथवा गतिविधियाँ जब परखी जायें तो वे असत्य निकलें। ऐसे दशा में हमें इतनी निष्पक्षता तो अपने भीतर उत्पन्न कर ही लेनी चाहिए कि जो सत्य होगा उसे ही स्वीकार करेंगे। अपने और पराये का प्राचीन और नवीन का कोई भेद-भाव एवं पक्षपात पैदा न होने देंगे। इतना आधार यदि तैयार हो जाये तो ही आशा की जा सकती है कि सत्य का अवतरण सम्भव हो सकेगा। अन्यथा हर व्यक्ति अपनी मान्यताओं और रीति-नीतियों को सही मानकर दूसरों के प्रति घृणा, तिरस्कार, द्वेष और दुर्भावों की धारणा बनाये बैठा रहेगा। इससे अशान्ति ही बढ़ेंगी।

हमें सत्य की शोध करनी चाहिए, सत्य का आश्रय लेना चाहिए, सत्य पर आरुढ़ होना चाहिए और सत्य के ही समीपवर्ती वातावरण में प्रतिष्ठापना करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। किन्तु ध्यान यह भी रखा जाय कि हमारा सत्य तथ्य पर आधारित है। केवल पूर्व मान्यताओं तथा परम्पराओं के आधार पर ही किसी बात को सत्य न मान बैठे।


खलीफा उमर

खलीफा उमर का सार जीवन धार्मिक सेवा में बीता था। अन्त में तो उन्हें धर्म के लिए तलवार भी उठानी पड़ी। एक दिन उनका अपने प्रतिद्वंद्वी से सामना हो गया। दोनों में गुत्थमगुत्था हो गई। उमर ने उसे पछाड़ दिया और छाती पर चढ़ बैठे। जैसे ही उसका सिर काट डालने के लिए उन्होंने अपनी तलवार निकाली कि प्रतिद्वंद्वी ने उन्हें गाली देदी। गाली सुनते ही खलीफा उमर उठकर खड़े हो गये और अपनी तलवार म्यान में बन्द कर ली।

जो सैनिक उनके साथ थे उन्हें इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कुछ रुष्ट स्वर में कहा- श्रीमान् जी आपने यह क्या किया आपको तो इसे मार ही देना चाहिए था। खलीफा उमर गम्भीर हो गये और बोले भाई मैंने युद्ध न्याय के लिए बिना क्रोध के किया था, किन्तु जब इसने मुझे गाली दी तो मुझे क्रोध आ गया। इस स्थिति में इसे मारने से पहले अपने क्रोध को मारना आवश्यक हो गया। अब मेरा क्रोध शान्त हो गया हैं इसलिए दुबारा युद्ध करूंगा।

खलीफा उमर यह निष्काम शब्द सुनकर प्रतिद्वंद्वी आप प्रादुर्भूत होकर उनके पैरों पर गिर गया और सदैव के लिए उनका भक्त बन गया।


ऊपर जाने की जल्दी हो तो सिगरेट पियें

इलिनाँस (अमेरिका) का नेशनल लैबोरेटरी के रेडियो ताजिकल भौतिक (फिजिक्स) विभाग के डॉ. रिचर्ड वी. होल्जमान और डॉ. फ्रेंक एच. इल्सविज ने धूम्रपान के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए 13 उन लोगों को चुना जो कम से कम 10 सिगरेट प्रतिवासर पीते थे। 6 ऐसे व्यक्ति चुने गये जो सिगरेट नहीं पीते थे रक्त, फेफड़े और हड्डियों की विस्तृत जाँच के उपरान्त ही निष्कर्ष सामने आये उन्हें 1966 की ‘साइंस’ पत्रिका के अंक 153 पेज 1256 में लिखते हुए उन्होंने बताया-

‘सिगरेट पीने बालों के शरीर में रेडियो धर्मी सीसे और पोलोनियम की मात्रा न पीने वालों के शरीर की मात्रा से दुगुनी थी। यह दोनों ही ल्यूकोग्या तथा हड्डी का कैंसर पैदा करने वाले मुख्य विष है। अब तक हुए बम विस्फोट आदि से जो रेडियो धर्मी धूल आकाश में छा गई है वह अन्न, जल, वायु में माध्यम से यद्यपि आज सभी जीवधारियों को प्रभावित कर रही है पर सिगरेट पीने वालों में किसी कारण से मामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा यह दुगुने मात्रा में चला जाता है इसलिए अधिक सिगरेट पीने वाले शीघ्र ही रोग और मृत्यु के शिकार होते हैं।”

जनरल आफ अमेरिका ऐसोसिएशन के अनुसार मसूड़ों और जबान पर हो जाने वाले सफेद दाग ल्यूकोप्लेकिया भी धूम्रपान का ही परिणाम होता है जिसे अब डाक्टर सीधे-सीध स्मोकर्स पैच कहने लगे हैं। पहले यह गालों और मसूड़ों में होता है पीछे इसके रोगियों में से ही 20 प्रतिशत को मुंह का कैन्सर हो जाता है।

जार्जिया के छात्रों में बढ़ती हुई धूम्रपान की आदत को रोकने के लिए वहाँ के शिक्षकों और समाज सेवियों ने एक अभियान प्रारम्भ किया पर उसका कोई अनुकूल प्रभाव पड़ता न दिखा। जार्जिया विश्व विद्यालय के डॉ. ए.एस. एडवर्ड का कहना था कि आधी सिगरेट का धुआँ ही पूरी तरह कोई पी जाये तो उतने से उसकी उँगलियाँ काँपने लगेंगी। छात्रों ने पहले तो इस कथन की हँसी उड़ाई इस पर एडवर्ड ने एक प्रयोग किया- उन्होंने 100 छात्रों को खड़ा कर 1 मिनट में 8 बार धुआँ खींचने को कहा उससे कम्पन की मात्रा 126 प्रतिशत बढ़ गई। सात मिनट में यह औसत 232.3 प्रतिशत तक बढ़ गया धुआँ फेफड़ों से जाने के लिए बच लेने पर कम्पन 9.9 प्रतिशत तक हुआ इस प्रयोग से वहाँ के छात्रों में इसके दुष्परिणाम समझ में आये और उनमें सिगरेट पीना छोड़ना भी शुरू कर दिया। यह विवरण ‘जनरल आफ अप्लाइड साइकोलॉजी’ के एक अंक में छपा भी था।

लोगों की ऐसी मान्यता है कि सिगरेट पीना छोड़ देने से पेट को नुकसान होता है और थकावट बढ़ती है। अभ्यास के कारण सम्भव है प्रारम्भ में ऐसा कुछ लगता हो पर यदि छोड़ने का दृढ़ संकल्प ले लिया जाये और सिगरेट पीना छोड़ दिया जाये तो एक सप्ताह के अन्दर ही इतने सुखद परिणाम दिखाई देते हैं कि फिर सिगरेट पीने की इच्छा अपने आप ही मर जाती है अमेरिका के कोर्टनी रिले कूपर लगातार 40 वर्ष तक सिगरेट पीते रहे। पीछे विभिन्न डाक्टरों और अनुसंधानकर्त्ताओं से उन्हें पता चला कि धूम्रपान रोग और शीघ्र मृत्यु के लिये आमंत्रण की तरह है तो उनके मस्तिष्क ने एका-एक पलटा खाया। उन्होंने कहा-

‘हमें जिन्दा रहना है और वह भी नीरोग’- इस दृढ़ इच्छा के साथ उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया। कई एक मित्रों ने कहा धीर-धीरे छोड़ने से ठीक रहेगा पर उनके मस्तिष्क में धूम्रपान के दुष्परिणामों की बात सीधे जम गई थी इसलिए इन्होंने दो तीन दिन की गड़बड़ी के बावजूद मित्रों की सम्पत्ति स्वीकार नहीं की। सिगरेट का अभ्यास छूट गया तब उन्होंने बताया जब सिगरेट पीता था मुझे नासूर हो गया था। कोई भी चीज सूँघने में नहीं आती थी, सिर दर्द रहा करता था, धूम्रपान छोड़ने के कुछ दिन बाद ही यह सारे रोग दूर हो गये, पहले हलकी शीत का असर भी बर्दाश्त नहीं होता था पर अब सवेरे स्नान करना अच्छा लगता है। गले की खुजली और खाँसी कम हो गई सूँघने की शक्ति और सुनने की शक्ति में फर्क पड़ गया था वह ठीक हो गया। प्रारम्भ में तो ऐसा लगता था कि सिगरेट छोड़ कर पेट की गड़बड़ क्यों पाल ली, पर एक सप्ताह में ही यह सब निर्मल सिद्ध हुआ। असलियत यह है कि अब तीव्र हो गई है और पहले की तरह अपच नहीं रही। मुझसे कोई सिगरेट पीने का नाम लेता है तो गुस्सा आ जाता है सोचता हूँ ऐसी घृणित वस्तु लोग कैसे दूसरों को सिखा देते हैं कैसे खुद पीने लगते हैं।

सिर चकराना, झपकी लगना, घबराहट और चिड़चिड़ेपन जैसी बीमारियों और मनोविकारों का धूम्रपान से स्पष्ट सम्बन्ध है यह देख कर ही सम्भवतः मनोवैज्ञानिक मैक्वेथ का कथन है जिस घर में कोई सिगरेट जलाकर पीता है वह उसके साथ ही घर की सुख-शान्ति कभी जलाता है अधिकाँश सिगरेट पीने से उसकी 8 प्रतिशत तक का रक्त में बढ़ जाती है। पेरिस के मोटर चालकों का पूर्ण करके देखा गया उनमें से 50 प्रतिशत के शरीर में 100 शीशी रक्त में 1 शीशी मात्रा कार्बन मोनाआइड की थी, सिगरेट ही उसका कारण पाया गया। अमेरिका में धूम्रपान के विरोध में इतने कुछ अनुसंधान हुए उनका प्रचार किया गया कि वहाँ के सैकड़ों लोग ने सिगरेट छोड़ना प्रारम्भ कर दिया। तमाखू और सिगरेट बनाने वाली कम्पनियाँ ने यह देखा तो व्यापार ठप्प पड़ जाने की आशंका से उन्होंने अपने रुपये के बल पर कई वैज्ञानिक और डाक्टरों से सिगरेट के पक्ष में प्रचार कराया पर तथ्य अंततः तथ्य ही है। सच्चाई कभी छुपाई नहीं जा सकती, हर सिगरेट पीने वाला उसके दोष अच्छी तरह अनुभव करता है भले ही मनोबल के अभाव में छोड़ न सकने के कारण वह उसका समर्थन करता दिखता है।

कोई भी वैज्ञानिक सत्यतः तमाखू और धूम्रपान के पक्ष में नहीं है, दुबैको एण्ड लिप कैंसर’ शीर्षक से पाँडविले अस्पताल के डाक्टर जेक्स.ई. फ्राँस ने लिखा है कि तमाखू और धूम्रपान का समर्थन जनता के साथ स्पष्ट धोखा है। हमने देखा है कि इस अस्पताल में 356 रोगी होंठ के कैंसर के आये उनमें से 335 सिगरेट पीने के आदी थे, और उनका कैंसर उसी का परिणाम था।

सिगरेट सभ्य जगत केक लिये न केवल एक रोग वरन् कलंक भी है उनके वंशानुगत-दुष्परिणामों के बारे में तो लोगों को कल्पना ही नहीं है। हमारी जानकारियाँ अत्यन्त स्थूल हैं सूक्ष्म विवेचन करें तो पता चलेगा कि आज लोगों की विचार- शक्ति लड़खड़ा रही है, लोग सही दिशा में सोच सकने में समर्थ नहीं हो रहे, उसका भी कारण सिगरेट आदि के धुएं से हुई मानसिक, विकृति ही है। इस दोष से जितनी जल्दी मुक्त हुआ जाये, धूम्रपान करने वाले समाज को मुक्त किया जाए उतना ही अच्छा-


काश हम सहयोग व सहकारिता का महत्व समझते

बेहरिंग के काफिले ध्रुव प्रदेश में चला करते। प्राकृतिक जीवन के अभ्यस्त यह काफिले वहाँ की सारी कठिनाइयों का मुकाबला बड़ी आसानी से कर लेते हैं किन्तु जो सबसे बड़े आश्चर्य की बात है वह यह कि यह काफिले वहाँ की छोटी-छोटी लोमड़ियों से मात खा जाते हैं। उनकी इस आप-बीती की सुप्रसिद्ध लेखक स्टेलर ने बेहरिंग के काफिलों का युद्ध कहा है और बताया है कि प्रारम्भ में यह काफिले जिस स्थान पर डेरा डालते वहाँ की लोमड़ियाँ आतीं और उनका खाना चुरा ले जातीं निदान खाने को पत्थरों से ढक कर रखा जाने लगा। पत्थर भी इतने वजनदार रखे जाते हैं कि बड़ी लोमड़ी भी उन्हें उठा कर अलग न कर सकती। काफिले वाले बड़े असमंजस में थे कि तब भी उनका खाना चोरी गया मिलता और पत्थर उस स्थान से दूर फेंका मिलता।

ऐसे लगा कि कोई बड़ा जानवर आता है अतएव ताक की गई। बात बड़ी विचित्र निकली, एक साथ कई लोमड़ियों का झुण्ड आया उनमें से एक ऊँची टेकरी पर खड़ी हो गई, एक दूसरी तरफ। यह थीं चौकीदार उनका काम किसी भी सम्भावित हमले की सूचना अपने साथियों को देना होता है। शेष लोमड़ियां आगे बढ़ीं और एक साथ शक्ति लगाकर वजनदार पत्थर को उठाकर अलग कर दिया और खाना चुरा ले गई।

अब काफिले वालों ने एक ऊपर एक पत्थर रखकर ऊंचा खम्भा उठाया और उसके ऊपर खाना रखा पर लोमड़ियां से वह तब भी नहीं बचा सका। अब लोमड़ियों ने अपनी पीठ पर चढ़ाकर किसी चुस्त लोमड़ी को ऊपर चढ़ा दिया उसने ऊपर से खाना गिराया। गिरे हुये खाने को सबने उठाया और फिर ऊपर चढ़ी लोमड़ी को उतारा और दूर एकाँत में जाकर सारा खाना बाँटकर खा लिया।

इस घटना की समीक्षा करते हुए स्टेलर ने लिखा है कि आश्चर्य की बात है कि लोमड़ी जैसे छोटे जीव ने सहयोग और सहकारिता के महत्व को समझा और उसका लाभ उठाया जब कि मनुष्य बुद्धिशील प्राणी परस्पर स्पर्द्धा रखता ईर्ष्या, द्वेष और मनोमालिन्य रखता है यह वृत्तियाँ उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं सुख और शाँति समृद्धि और सम्पन्नता का राजमार्ग यह है कि मनुष्य भी मिल जुलकर रहना सीखें अपने हित को दूसरे के हित से जुड़ा हुआ मानकर एक दूसरे के साथ सहयोग करना सीखें यही वृत्ति सामाजिक जीवन को व्यवस्थित बना सकती है।

अमेरिका के पश्चिमी इलाके लावा, प्रेग्यु लावा, सवान्नाह चिड़ियों का सामाजिक जीवन मनुष्य को पारस्परिक सहयोग की महत्वपूर्ण प्रेरणा देता है। यह पक्षी अपने भोजन के लिए एकान्त में घूमते हैं पर उदर पोषण की आवश्यकता पूरी हुई कि सामाजिक जीवन का आनन्द लेने के लिए इकट्ठे हो जाते हैं और फिर उनमें तरह-तरह के खेल-कूद होते हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि मनुष्य को क्लबों की प्रेरणा शायद इन पक्षियों ने ही दी हो। सच पूछा जाये तो सारा मनुष्य समाज एक क्लब है यदि लोगों ने पेट और प्रजनन को एक साधारण कर्त्तव्य मानकर उसी के लिये लड़ाई-झगड़े बढ़ाये न होते जीवन को इन पक्षियों की तरह क्रीड़ा समझा होता और हिल-मिलकर खेला होता तो आज जो असंख्य सामाजिक समस्याएं शाँति और व्यवस्था में संकट उत्पन्न कर रही हैं न होतीं, मनुष्य हँसी खुशी का जीवन जी रहा होता।

मनुष्य में सहयोग की भावना ही परस्पर श्रद्धा अनुशासन, प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के भाव भरती है। सहानुभूति विहीन जीवन कष्ट और उलझन का ही नहीं हिंसा और बर्बरता का भी जीवन बन जाता है। ऐसा तो असभ्य जंगली जानवर तक नहीं पसन्द करते मनुष्य को क्यों पसन्द करना चाहिये? रूसी प्राणी विशेषज्ञ श्री साइबर्ट सोफ मैदानी क्षेत्र में रहने वाले जानवरों का अध्ययन कर रहे थे- तब उनके सामने एक विचित्र घटना घटित हुई उन्होंने देखा एक सफेद पूँछ वाला उकाब पक्षी आकाश में मंडरा रहा है। आधा घण्टे तक वैसे ही मंडराते रहने के बाद उसने एक प्रकार की ध्वनि की। यह आवाज तेज थी लगता था उसने किसी को दौड़कर आने के लिए पुकार हो। वह आवाज सुनते ही दूसरे उकाब ने आवाज की और दौड़कर उसके पास आ गया। इस तरह दस बारह उकाब वहाँ एकत्रित हो गये। फिर जाने क्या बात हुई वे सब गायब हो गये। दोपहर के लगभग उकाबों का पूरा झुण्ड उसी थान पर उतरा। साइबर्टसोफ ने ऐसी पोजीशन ली जहाँ से उनकी सारी हरकत देखी जा सके। सभी उकाब एक घोड़े की लाश के पास पहुँचे। सबसे पहले बूढ़े उकाबों ने उसका माँस खाया फिर वे हटकर निगरानी करने लगे और तब सारे उकाबों ने माँस खाया। उकाबों की - इस सामाजिक भावना ने साइबर्ट सोफ को बहुत प्रभावित किया।

यह घटना एक बार फिर से भारतीय परिवारों की आदर्श परम्पराओं की ओर ध्यान ले जाती है आज की तथाकथित पाश्चात्य सभ्यता ने युवकों में वृद्धों के प्रति प्राण सी भर दी है फलस्वरूप वृद्धों को कष्टपूर्ण जीवन जीना पड़ता है कितनों को तो आखिरी समय भीख तक माँगनी पड़ती है। इसे शाप कहें या मनुष्य की नासमझी का फल युवा वर्ग बुजुर्गों के दीर्घकालीन अनुभवों का लाभ नहीं पाता और वह स्वतः भी संघर्ष पूर्ण, कलह पूर्ण विवादों और चिन्ताओं से भरा हुआ जीवन जीता है। मनुष्य ने सहयोग के महत्व को समझा होता तो पारस्परिक सुख शान्ति का खाँचा बैठाने वाले श्रद्धा प्रेम अनुशासन जैसे प्रवृत्तियों के लाभ से वंचित न हो जाता। आज के यही विभाव मनुष्य की दुःखी बना रहे हैं।

प्रिंस क्रोंपाटिन ने अपना सारा जीवन प्रकृति के अध्ययन में लगाया। उन्होंने जीव-जन्तुओं के व्यवहार से निष्कर्ष निकाले हैं उन्हें ‘संघर्ष नहीं सहयोग’ पुस्तक में कृत्रित कर बताया है कि मनुष्य जाति की सुख समुन्नति पर्द्धा में नहीं भावनाओं के विकास में है भावनाओं के विकास से वह अभावपूर्ण जीवन में आनन्द और उल्लास सी और खुशी प्राप्त कर सकता है। उन्होंने लिखा है- ध्रुव प्रदेश के राजहंस परस्पर कितने प्रेम और विश्वास के साथ रहते हैं उसे देखकर मानवीय बुद्धि पर तरस आता है और लगता है कि मनुष्य ने बुद्धिमान होकर भी जीवन की गहराइयाँ पहचानी नहीं। कई बार कोई राजहंसिनी अपने बच्चों को घमण्ड में या आवेश में ठुकरा देती है, तो उन पिता रहित बच्चों को बगल की मादा अपने साथ मिला लेती है, उसके अपने भी बच्चे होते हैं पर वे सब बच्चे इस तरह घुल-मिल जाते हैं मानों वे दो पेट से पैदा हुये न होकर एक ही नर और मादा की सन्तान हों। मादा उन सबको समान दृष्टि से प्यार देती है और उनकी साज सम्हाल तब तक रखती है जब तक वे बड़े नहीं हो जाते। बड़ी बतखें घर बनाने की अभ्यस्त नहीं होती इसलिये उन्हें अपने अण्डे रखने की दिक्कत आती है। संसार में अभाव न हो तो गति कहाँ से आये? प्रगति के लिये तो कठिनाइयाँ आवश्यक भी हैं मनुष्य उसे नहीं समझता जब कि मनुष्येत्तर प्राणी उसे समझकर अपने जीवन को हास उल्लासमय तथा निर्द्वंद्व बनाये रखते हैं। बड़ी बतखें अपने अण्डे इकट्ठा एक ही स्थान पर रख देती हैं। और क्रम-क्रम से बैठ कर उन्हें सेती रहती है। इससे कई बतखों का परिश्रम बचता है। परेशानी बचती है। संगठित परिवारों की परस्पर भारतीय जीवन पद्धति का ऐसा ही आदर्श है पर आज तो हमीं लोग उसे भूलते जा रहे और एकाँतवाद की पीड़ाओं से जकड़ते चल जा रहे हैं।

परस्पर सहयोग की महत्ता समझने वाले लोग देश और जातियां अपराजित होती है वे कहीं भी चले जायें वही अपना प्रभाव स्थापित कर लेती हैं। एक बार फोरल नामक प्राणी विशेषज्ञ ने एक स्थान की चींटियों के झुण्ड को एक थैले में भरा और उसे एक ऐसे स्थान पर लाकर छोड़ दिया जहाँ बहुत से चींटी भक्षी- ग्राम हापर्स तथा पतिंगे रहते थे, बर्र, मकड़ियां और गुबरैलों की जहाँ जमाते लगी थीं। इनमें से एक भी जीव ऐसा न था जो चींटियों से कई गुना बलवान न रहा हो। चींटियों के वहाँ पहुँचते ही बर्रों ने युद्ध ठान दिया पर संगठित चींटियां घबराई नहीं। उनमें से कितनी ही शहीद हो गई पर उनके संगठित हमले के आगे बर्रे न टिक सकीं। गुबरैले यह देख कर बिना प्रतिरोध वहाँ से खिसक गये पतिंगों और ग्राम हापर्स ने अपने बने बनाये किले चींटियों के लिये खाली कर दिये। निर्वासित चींटियों ने संगठित शक्ति के बल पर वहाँ भी पहले जैसा ही साम्राज्य स्थापित कर लिया।

यह उदाहरण मनुष्य जाति के, देश और समाज की सुख समुन्नति के आधार है। जो भी इस समझ पाया निहाल हो गया, सर्व समर्थ हो गया जिसने सहयोग के महत्व को भुलाया वह टूट गया, बिखर गया और जीवन के मोर्चे पर हार गया समझना चाहिये।


गाँधी जी की रक्षा का दायित्व

गाँधीजी उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में थे। उनके साथ जर्मनी के निवासी कैनल बैक रहते थे। दोनों में अच्छी मित्रता थे। वहाँ के पठानों को गाँधीजी की नीति पसन्द न आई तो वह नाराज हो गये। कुछ व्यक्तियों ने पठानों के कान और भर दिये।

कैनल बैंक को ऐसा अनुभव हुआ कि यह पठान कभी भी गाँधीजी पर आक्रमण कर सकते हैं अतः उन्होंने गांधीजी की सुरक्षा हेतु एक रिवाल्वर की व्यवस्था करली। गाँधीजी जी के साथ कैनल बैक को जहाँ कहीं जाना होता वह अपने कोट की जेब में रिवाल्वर छिपाकर ले जाते। गाँधी जी को इस सम्बन्ध में तनिक भी जानकारी न थी। कैनल बैक तो आदर्श मित्र की भूमिका प्रस्तुत कर रहे थे। अपने साथी की पूरी-पूरी सहायता करना प्रत्येक मित्र का कर्त्तव्य होता है यह उनकी दृष्टि में था।

एक दिन अचानक गाँधीजी की दृष्टि कैनल बैंक के कोट पर पड़ी जिसकी जेब बड़ी भारी-भारी थी और वजन के कारण एक और लटक गई थी। उन्होंने उस कोट की जेब में हाथ डाला तो रिवाल्वर। कैनल बैंक के आते ही उन्होंने पूछा इतना तो बताइये कि यह रिवाल्वर आप अपनी जेब में क्यों रखते हैं?

कुछ नहीं ऐसे ही सही बात बताने से संकोच हो रहा था।

गाँधीजी ने हँसते हुए कहा ‘रस्किन और टॉलस्टाय की पुस्तकों का तो अध्ययन मैंने भी किया है, क्या उसमें कहा कहीं लिखा है कि अकारण रिवाल्वर जेब में रखा जाये।

मुझे ज्ञात हुआ है कि कुछ पठान आपसे रुष्ट हो गये हैं। पता नहीं कब आप पर आक्रमण करदे।

अच्छा! तो आप मेरी रक्षा  करना चाहते हैं।

इरादा तो यही है’

फिर तो मैं निश्चित हो गया कि मेरी रक्षा का दायित्व अब तक ईश्वर के हाथ में था और अब आप उसे अपने हाथ में ले रहे हैं। जब तक आप जीवित हैं तब तक मेरा बाल बाँका नहीं हो सकता। यह भी खूब रही। आपने मेरे प्रति मैत्री और आत्मीयता का भाव रखने के कारण ईश्वर के अधिकार को छीनने का साहस किया।

कैनल बैंक अब क्या कहते। उन्होंने रिवाल्वर निकाल कर बाहर फेंक दिया।


अविवेक के कारण दुर्गति

अवस्ती में एक वणिक रहता था। उसके एक रूपवती कन्या थी। उसका नाम था पट्टाचारा। पट्टाचारा बड़ी हुई तो माता-पिता विवाह की चिन्ता करने लगे। किन्तु पट्टाचारा स्वास्थ्य और सौंदर्य के आकर्षण में पड़कर अपने पड़ोसी युवक से प्रेम करने लगे। उसने अपना विवाह उसी से करने को कहा तो पिता ने समझाया-बेटा! यौवन और सौंदर्य के आकर्षण को प्रेम नहीं कहते। प्रेम तो कर्त्तव्य-पालन को त्याग और सेवा की साधना है। ऐसी साधना समझ से की जाती है आवेश से नहीं।

पिता ने सब तरह समझाया, वह अच्छे सम्बन्ध की तलाश में भी निकल पड़ा पर वासना के आकर्षण के आगे विवेक की टिकती कहाँ है। जहाँ विवेक नहीं वहाँ आस्था नहीं-जहाँ आस्था नहीं वहाँ धैर्य न रहना स्वाभाविक ही था। पट्टाचारा ने अपने प्रेमी से सलाह की और एक रात दोनों घर से भाग निकले जब तक उसका पिता घर पहुँचे तब तक तो वह कही और जा बसी।

जहाँ केवल सौंदर्य ही आकर्षण हो, जहाँ युवक अपने माता-पिता पर आस्था न रखते हों, जिन उठती उम्रों में विवेक न हो उनका पथ-भ्रष्ट होना और वासना का शिकार बनना मनुष्य जीवन का स्वाभाविक सत्य है। कुटुम्ब के अनुशासन से मुक्त हो जाने और किसी प्रकार का बन्धन न रह जाने पर एक दूसरे के यौवन के प्रति ही कर्त्तव्य शेष रह गया। पट्टाचारा के जीवन में एकबार वासना ने प्रवेश किया तो उसे उसी में स्वर्गीय सुखों की अनुभूति हुई, उस अभागिन को क्या पता था कि वासना का सुख यौवन और स्वास्थ्य तक ही सीमित है। निचोड़े हुये आम की तरह शरीर के ओज नष्ट हो चला तो प्रेम की वह मस्ती, वह उमंग जो कभी पहले थी वह समाप्त हो गई पति-पत्नी एक दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे।

पट्टाचारा गर्भवती हुई उसने एक पुत्र को जन्म दिया। शरीर का सौंदर्य पहले ही कम हो गया था अब जबकि उसके एक और आत्मा आ गई तो उसका भी ध्यान पति की ओर से हटाना स्वाभाविक था, मिलने वे अब भी थे पर कामवासना की तृप्ति के लिये। निदान पट्टाचार शीघ्र ही पुनः गर्भवती हो गई। उसका शरीर भारी रहने लगा। आलस्य सताने लगा। आलस्य और शिथिलता की जो बातें संयुक्त परिवार में छिपी रहती हैं पति-पत्नी एक दूसरे के साथ कर्त्तव्य बन्धन में बँधे रहते हैं वह यहाँ कहाँ सम्भव था। चित्त की बेचैनी ने माँ-बाप और कुटुम्बियों को याद किया। पट्टाचारा घर चलने का आग्रह करने लगी, प्रेमी पति उसके लिये राजी न हो रहा था, उसको चरित्र भ्रष्टता का भय सता रहा था पर जब पट्टाचारा ने बहुत जोर दिया तो वह उसने बात मान ली। और श्रावस्ती की ओर चल पड़ा।

अभी कुछ ही दूर चले थे कि पट्टाचारा के पेट में प्रसव पीड़ा उठ खड़ी हुई। पति ने किसी तरह एक पर्ण कुटिया बनाली, वह जैसे ही जली के लिये बाहर निकला उसे सर्प ने डस लिया। पट्टाचारा इधर पुत्र को जन्म दे रही थी उधर पति मर रहा था। बहुत रोई पर हो क्या सकता था। अपने दोनों बच्चों को लेकर वह घर की ओर चल पड़ी। रास्ते में नदी पड़ती थी उसे पार करना कठिन था। आखिर पट्टाचारा ने एक-एक बच्चे को पार उतारने का निश्चय किया। एक बच्चे को उस पार छोड़कर जैसे ही वह लौटी उसने देखा उसके दूसरे नवजात बच्चे को भेड़िया दबोचकर लिये जा रहा है। वह चिल्लाई- उसके रुदन की आवाज सुनकर इधर खड़े बच्चे ने समझा माँ उसे बुला रही है सो वह भी नदी में कूद पड़ा और नदी की तीव्र धारा में बह गया। पट्टाचारा यह सब आघात सहन न कर सकी और खुद भी पागल हो गई।

यह समाचार भगवान् बुद्ध को एक ग्रामीण ने दिया तो वह कुछ क्षण, मौन रहकर भिक्षुओं! की ओर देखकर बोले जीवन में जो लोग विवेक का आश्रय छोड़ देते हैं, उनकी यही गति होती है।


आध्यात्मिक काम विज्ञान- 5

नर-नारी को सामान्य सामाजिक स्तर पर अलग रहने की जरूरत नहीं है। जरूरत यौन संपर्क के सम्बन्ध में अति सतर्कता बरतने की है। मस्तिष्क के बाद जननेन्द्रिय का दूसरा स्थान है। इन दोनों केन्द्रों को शक्ति संस्थान कहना चाहिये। पृथ्वी के दो सिरे दो ध्रुव कहलाते हैं, इन ध्रुवों में अति रहस्यमय प्रकृति की शक्ति धाराओं के स्रोत बीज दबे पड़े हैं। इन्हीं के कारण यह धरती अपनी धुरी पर घूमने, सूर्य की परिक्रमा करने, लहराती चाल से चलने, महा सूर्य को अपने सौर मण्डल के साथ भ्रमण कराने में समर्थ है। ऋतु परिवर्तन से लेकर, वनस्पति उत्पादन और खनिज द्रव्यों के निर्माण तथा सारी प्रक्रियाएं उन्हीं उभय ध्रुवों में सन्निहित शक्ति बीजों के कारण सम्भव होती है। मनुष्य पिण्ड में भी पृथ्वी की ही तरह मस्तिष्क उत्तरी ध्रुव और मूलाधार दक्षिणी ध्रुव है। जीवन की चेतनात्मक बौद्धिक एवं भावनात्मक हलचलों का केन्द्र मस्तिष्क है। और शरीर में जो कुछ उत्तम, आकर्षक दिखता है उसका केन्द्र जननेंद्रिय के अन्तराल में दबा पड़ा है। यदि मस्तिष्क में विकृति आ जाये तो बुद्धिहीन व्यक्ति पागल की तरह अपने और दूसरे के लिए निरर्थक हो जायेगा। इसी प्रकार यदि मूलाधार के कामबीज विकृत हो जायें तो स्नायु मंडल से लेकर पाचन तन्त्र तक सारा कार्य-कलाप लड़खड़ा जायेगा। इसलिए इन दोनों शक्ति संस्थानों का बहुत ही समझ-बुझ कर अति दूरदर्शिता पूर्वक उपयोग किया जाता है। इस उपयोग में बरती गई भूलें बहुत ही विघातक सिद्ध होती हैं।

प्रकृति ने मस्तिष्क का बाह्य कलेवर हड्डियों के मजबूत किले के भीतर सुरक्षित रखा है। ताकि बाहरी कोई विघातक तत्व-शीत, ग्रीष्म का प्रभाव उसे प्रभावित न कर सके, भीतरी प्रभावों को ग्रहण करने और छोड़ने की गुंजाइश ही रखी गई। मनुष्य अपने चिन्तन मनन स्वाध्याय सत्संग से उसे प्रभावित कर सकता है और दिशा दे सकता है। मस्तिष्क की दिशा जिधर चल पड़ती है जीवन स्वरूप वैसा ही बना जाता है और उसी आधार पर मनुष्य उन्नति अवनति सुख-दुख के परिणाम उपलब्ध करता है। मस्तिष्क मर्म स्थल कहा गया है- उसके ब्रह्म रन्ध्र में क्षीर सागर निवासी विष्णु भगवान् विराजमान हैं इस पौराणिक अलंकार में यही रहस्य छिपा पड़ा है कि समस्त दिव्य शक्तियों, सिद्धियों और विभूतियों का केन्द्र इस मस्तिष्क को ही कहा जाता है। इसे स्वस्थ एवं समुन्नत रखने के लिए विद्याध्ययन से लेकर विचार विनियम तक हमें बहुत कुछ करना होता है। तभी इस मस्तिष्क से समुचित लाभ मिल पाता है। यदि उसे कुसंग, दुर्बुद्धि, अशुभ-चिंतन आदि से विकृत कर लिया जाये तो समझना चाहिए कि उत्कर्ष की संभावनाएं समाप्त हो गई और भविष्य को अन्धकार मय बना लिया गया।

ठीक इसी प्रकार जननेन्द्रिय का महत्व है। उसे मात्र मूल त्याग अथवा घिनौने मनोरंजन के लिये नहीं बनाया गया उसमें स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर दीर्घ जीवन तक के सारे सूत्र बीज रूप में विद्यमान है। इसलिए इसे भी ऐसी जंघाओं की माँसल किन्तु अति कोमल परिधि के दायरे में प्रकृति ने प्रतिष्ठापित किया है। इस सुरक्षात्मक व्यवस्था के पीछे प्रकृति का यही निर्देश सन्निहित है कि इस मर्म स्थल का उपयोग अति सतर्कता और दूर-दर्शिता के साथ ही किया जाना चाहिए। उसे निम्न स्तर के क्रीड़ा-कलाप का खिलौना बना कर अपनी शारीरिक क्षमताओं पर कुठाराघात नहीं किया जाना चाहिए।

नर-नारी का सामान्य मिलन जितना ही उपयोग है उतना ही वासनात्मक संपर्क से खतरा भी है। दोनों का स्वरूप और महत्व अलग-अलग है। प्रतिबंधित, व्यक्ति सान्निध्य नहीं, यौन मिलन किया जाना चाहिए। यह ध्यान रखा जाय वासनाओं का उभार एक अलग चीज है जिसका सामाजिक नर-नारी संपर्क से कोई विशेष संबंध नहीं। पुरुष दुकानदारों के यहाँ सामान खरीदने दिन भर औरतें जाती है बात करती है। कोई विकार उत्पन्न नहीं होता न कोई किसी ओर आकर्षित होता है आकर्षण उस विशेष मनः स्थिति में उत्पन्न होता है जिसमें यौन-संपर्क की अभिलाषा भी रहती है। यदि इस भाव स्थल को पहले से ही निर्मल बना लिया जाय तो वह भले ही नवयौवन की हो, सामने वाले रूपवान पक्ष के लिए भी आकर्षण पैदा न होगा।

यह बचाव इसलिए आवश्यक है कि यौन संस्थानों में अद्भुत विद्युत धाराएं प्रवाहित करने वाला शक्ति केन्द्र विराजमान है जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। वस्तुतः यह नाम करण बहुत ही समझ-बुझकर किया गया है। यही शरीर के अंतर्गत काम करने वाले सारे क्रिया कलाप उत्साह, स्फूर्ति, कोमलता, आकर्षण, आरोग्य, दीर्घ-जीवन आदि का मूलभूत आधार है। इसकी अवाँछनीय छेड़खानी करने से हम काम क्षमता को एक प्रकार से नष्ट-भ्रष्ट ही कर डालते हैं।

नर में प्राणी और नारी में रयि शक्ति की प्रधानता है। उन्हें आध्यात्मिक भाषा में अग्नि और सोम कहते हैं। विज्ञान के शब्दों में इन्हें धन और ऋण विद्युत धारा पुकारते हैं। इनमें स्वभावतः आकर्षण है। एक दूसरे के समीप आकर अपनी अपूर्णता पूर्ण करना चाहते हैं। जहां तक सामान्य संपर्क का संबंध है वहाँ तक यह विनियम उपयोगी है। सभी जानते हैं कि बिना बाप या भाई की लड़की और बिना मां या बहिन का लड़का मानसिक दृष्टि से अपूर्ण अविकसित पाये जाते हैं। प्रतिपक्षी वर्ग का संपर्क व्यक्तित्व के विकास के अनेक द्वार खोलता है। एकाँकी अलग-थलग पड़ा जीवन क्रम कुँठित और मूर्छित होता चला जाता है। विधवा और विधुरों की मृत्यु संख्या रोग ग्रस्तता एवं शारीरिक दुर्बलता-विवाहितों की अपेक्षा कहीं अधिक पाई जाती है। पर्दे में रहने वाली महिलाएं हर दृष्टि से पिछड़ती चली जाती है। यह सामान्य प्रतिपक्षी संपर्क से वंचित होने का ही दुष्परिणाम है। यदि जन-संपर्क में नर-नारी जैसी बाधा उपस्थित न की जाये तो इससे व्यक्तित्वों के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं होगी वरन् सहायता ही मिलेगी।

यदि मन में काम-विकार जाग पड़े तो प्रतिपक्षी वर्ग के साथ सामान्य संपर्क की मर्यादा तोड़कर यौन संबंध स्थापित करने की अभिलाषा होती है। दोनों विद्युत-धारायें समीप आने के लिए मचल उठती हैं और उससे सामाजिक काम-विकृति तो प्रत्यक्ष ही फैलती है। शारीरिक मानसिक गड़बड़ी भी कम नहीं उभरती। व्यभिचार के पीछे एक तथ्य तो स्पष्ट है कि सामान्य स्तर के व्यक्ति अपने दांपत्य जीवन तथा परिवार के प्रति निष्ठावान् नहीं रहते दूसरी जगह आकर्षण चला जाने से अपना परिवार उस स्नेह सौजन्य के लाभ से वंचित होने लगता है जो सामान्य तथा किसी सद्गृहस्थ के लिए आवश्यक है। परिवार व्यवस्थाएं गड़बड़ाने न लगें। गृहस्थ अपनी-अपनी धुरी पर टिके रहें, इस दृष्टि से व्यभिचार को हेय माना गया पर यह कोई अविच्छिन्न मर्यादा नहीं है। आवश्यकतानुसार इसमें हेर-फेर भी होते रहते हैं। जर्मनी में जब पिछले महायुद्ध के समय पुरुष बहुत मारे गये और नारियाँ की संख्या अधिक रह गई तो तत्कालीन स्थिति को देखते हुए एक पुरुष कई पत्नियाँ रख सके, कानून में ऐसे सुधार किये गये। सामान्यतया ईसाई देशों में एक पत्नी एक पति का ही कानून रहता है। इसी प्रकार देहरादून जिले के जौनसार वावर क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में यह आम रिवाज है कि भाइयों में से एक बड़े भाई का विवाह होता है जो पत्नी आती है वह सब छोटे भाइयों की भी उपपत्नी होती है। बच्चे उन जन्म दाताओं को बड़े पिताजी, मझले पिताजी, छोटे पिताजी आदि कह कर संबोधित करते हैं। वहाँ इस विवाह पद्धति को कोई न व्यभिचार कहता है न बुरा मानता है। उसका कहना है कि हम उन पाण्डवों की सन्तान हैं, जिनने एक द्रौपदी से ही पाँचों ने अपना दाम्पत्य जीवन निभा लिया था। जहाँ तक उथले स्तर पर बहुपतियों बहुपत्नियों का संबंध है वहाँ तक उसे सामाजिक स्तर का परिवार जीवन में विकृति उत्पन्न करने वाला पाप ही कहा जा सकता है। यदि कहीं ऐसी गड़बड़ न होती हो और गृहस्थ सद्भाव यथावत् बना रहता हो तो उस दोष का परिमार्जन हो जाता है जिसके कारण एक से अनेक का दांपत्य जीवन गर्हित या वर्जित घोषित किया गया है। कृष्ण ने बहुपत्नि और द्रौपदी ने बहुपति का सफल प्रयोग करके यह सिद्ध किया था कि पारिवारिक जीवन में विकृति उत्पन्न किये बिना यौन-संपर्क को विस्तृत किया जा सकता है। पर यह किसी के बस की बात नहीं। इस प्रयोग में बहुत ऊंचे या बहुत नीचे व्यक्ति ही सफल हो सकते हैं अस्तु सामान्य समाज व्यवस्था में एक पत्नी या एक पति प्रथा का ही प्रचलन है जो उचित भी है और आवश्यक है।

प्राचीन काल में नियोग प्रथा प्रचलित थी। सुयोग्य सन्तान उत्पन्न कर सकने की क्षमता से सम्पन्न न होने पर पति अपनी पत्नी के लिए अन्य उपयुक्त व्यक्ति से यौन संपर्क करने की आज्ञा देते थे और उस आधार पर जो बच्चे होते थे उन्हें सम्मानित नागरिक ही माना जाता था विचित्र वीर्य ने अपनी पत्नियों की व्यास जी द्वारा ऐसे ही नियोग की व्यवस्था की थी और उत्पन्न हुए तीनों बालक पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुर वैद्य सन्तान के सम्मान से वंचित नहीं हुए थे। आज के लोगों की मनःस्थिति दूसरी है। इसलिए प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत पड़ी, उन दिनों व्यक्ति अधिक उदार और उत्तरदायी होते थे, नियोग की प्रथा रहने पर भी कोई अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों में गड़बड़ाता न था, उन दिनों व्यक्ति अधिक उदार और उत्तरदायी होते थे, नियोग की प्रथा रहने पर भी कोई अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों में गड़बड़ाता न था, उन दिनों की बात दूसरी थी, पर अब जब कि छोटी तबियत के लोग तनिक से आकर्षण में अपने घर बिगाड़ने लगे तो एक पत्नी या एक पति की मर्यादा ही उचित है।

नर-नारी संपर्क की अभिवृद्धि में जो खतरा है उसे समझने के लिये हमें अधिक गहराई तक विचार करना होगा। सामाजिक मान के रूप में जहाँ तक परिवार विग्रह के कारण उत्पन्न अव्यवस्था का सवाल है वहाँ यदि उच्च स्तरीय संपर्क हो तो उस संबंध में थोड़ी उपेक्षा की जा सकती है। पर इस संदर्भ में अधिक कड़ाई बरतने का अधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि यौन संपर्क नर-नारी की अति महत्वपूर्ण विद्युत शक्ति की एक दूसरी में अति तीव्रता पूर्वक प्रवाहित होती है। यदि वह प्रवाह उपयुक्त न हुआ तो आन्तरिक क्षमता का भयानक ह्रास और विद्रूप प्रस्तुत होता है। शक्ति का नियम यह है कि अधिक स्वल्प समर्थता की ओर भागती है, दो तालाबों को यदि एक नाली खोद कर परस्पर मिला दिया जाये तो ऊंचे लेवल का पानी नीचे लेवल के तालाब की ओर बहना आरम्भ कर देगा और वह प्रवाह तब तक चलता रहेगा जब तक कि दोनों का पानी एक लेवल पर नहीं आ जाता। एक रोगी और दूसरा निरोग व्यक्ति यदि यौन-संपर्क करेंगे तो प्रत्यक्षतः रोगी को लाभ और निरोगी को हानि होगी। एक की सामर्थ्य दूसरे में प्रवाहित होगी और नर या नारी जो भी दुर्बल होगा लाभ में रहेगा और सबल को घाटा उठाना पड़ेगा। यह बात शरीर संबंधी स्थिति पर जितनी लागू होती है। ओछे स्तर के दुष्ट, दुराचारी, व्यसनी और अनाचारी व्यक्तियों से यौन संपर्क बनाने वाला दूसरा पक्ष अपनी आत्मिक विशेषताओं को खोता चला जायगा इसी प्रकार मंदबुद्धि और प्रतिभा सम्पन्नों के बीच इस प्रकार का प्रत्यावर्तन निश्चित रूप से समर्थ पक्ष के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।

उच्च स्तरीय प्रतिभाओं में सम्पन्न व्यक्तियों में स्वभावतः कितने ही महत्वपूर्ण चेतन तत्व भरे पड़े होते हैं उन्हीं के आधार पर उन्हें आश्चर्य जनक सफलताएं मिलती हैं। यदि उस शक्ति स्रोत को वे काम क्रीडा में खर्च करने लगे तो धीरे-धीरे अपना कोष समाप्त करते चले जायेंगे। इसलिए प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों को उच्चस्तरीय बौद्धिक अथवा मार्मिक गुण सम्पन्नों को ऐसे विनियोग करने से रोका गया ब्रह्मचर्य ऐसे लोगों के लिए अधिक आवश्यक है। घटिया शरीर स्थिति और मनः स्थिति का व्यभिचार करे तो उसे उतना घाटा नहीं है जितना मनोबल और आत्मबल सम्पन्न लोगों को इस शरीर बल की तुलना में मनोबल का मूल्य अत्यधिक है। पुष्ट शरीर और दुर्बल शरीर का यौन संपर्क स्वस्थ पक्ष को थोड़ी-सी ही शारीरिक क्षति पहुँचाता है। पर मनोबल और बुद्धिबल तो प्रत्यक्ष प्राण है वह तनिक सा अवसर पाते ही प्रचण्ड प्रवाह की तरह विद्युत गति से दौड़ पड़ता है और निम्न स्तर के पक्ष में स्थिर कर अपनी भारी हानि कर लेता है। दुर्बल मनोबल वाला पक्ष थोड़ा लाभ उठालें यह ठीक है पर उससे प्राण शक्ति सम्पन्न पक्ष अपनी प्रतिभा खोकर उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में असमर्थ हो जाता है जो अनेक दृष्टियों से अति महत्व पूर्ण होते हैं।

विवाह वस्तुतः व्यक्ति विनियोग की दृष्टि से अतीव सतर्कता के साथ ही किये जाने चाहिये। जोड़ा ठीक हो तो ही उसकी सार्थकता है अन्यथा उससे लाभ से भी अधिक हानि की सम्भावना रहती है। भोजन पका देने या बच्चे पैदा करने का लाभ उतना महत्व का नहीं जितना कि प्राणों के प्रत्यावर्तन का। जिसका व्यक्तित्व जितना घटिया होगा, गुणा कर्म स्वभाव की दृष्टि से जिसका स्तर जितना नीचा है उसमें आन्तरिक क्षमता उतनी ही स्वल्प होगी। कई व्यक्ति शरीर से सुन्दर और पुष्ट दिखते हुए भी आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण बहुत ही दीन-हीन होते हैं। इसके विपरीत शरीर से क्षीण दिखने वालों का प्राणबल भी आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण बहुत प्रबल रहता है। यौन संपर्क से प्रत्यावर्तन शरीरों का नहीं प्राण का होता है। शक्ति का सूक्ष्म स्वरूप बहुत प्रबल रहता है। यौन संपर्क से प्रत्यावर्तन शरीरों का नहीं प्राण का होता है। शक्ति का सूक्ष्म स्वरूप प्राण है, शरीर या कलेवर नहीं। प्राण की पुष्टि परिपक्वता केवल उत्कृष्ट व्यक्तित्वों और श्रेष्ठ प्रतिभा सम्पन्नों में ही सम्भव है, ऐसे व्यक्ति अपनी उस विभूति को क्रीड़ा कल्लोल में खर्च करके छूंछ न बन जायें और विश्व की महती सेवा कर सकने के पुण्य में वंचित न हो आयें इसलिए उन्हें अधिक सतर्कता और कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य पालन, करने के लिए प्रतिबन्धित किया गया है।

काम-विकार आँधी, तूफान की तरह आते हैं और बिना पात्र कुपात्र का भेद किये बादलों की तरह चाहे जहाँ बरस पड़ते हैं। यदि यह संपर्क वैद्य अथवा उपयुक्त नहीं है तो इससे बहुत प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। विवाह हो या व्यभिचार प्राण शक्ति का विनियोग समान रूप से अपना वैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करेगा। घटिया, स्तर हीन प्राण और ओछे व्यक्तियों के साथ संपर्क बनाकर न पत्नी को लाभ मिलेगा न प्रेयसी को। न पति का कल्याण है न प्रेमी का। यौन संपर्क एक प्रकार से अपनी शारीरिक मानसिक और आत्मिक पूँजी का आत्म समर्पण है। अविवेक पूर्वक, चाहे जहाँ, चाहे जिसके साथ बिना उसकी आन्तरिक स्थिति को परखे, यदि शरीर आकर्षण अथवा इंद्रिय प्रेरणा से प्रेरित होकर किये जायेंगे तो उसमें समर्थ पक्ष को बहुत तरह की बहुत गहरी क्षति उठानी पड़ेगी तनिक भी क्रीडा उसे बहुत महंगी पड़ेगी।

नर-नारी का समाज संपर्क यदि व्यभिचार तक बढ़ चले तो निस्संदेह वह बहुत हानिकारक है, इससे मनोबल उन्नत न होगा बहुत घाटे में रहेंगे, प्रतिभाएँ कुंठित होती चली जायेगी और उच्च व्यक्तियों के दुर्बल होने से समाज की भारी क्षति होगी। यों शरीर संपर्क की मर्यादा का व्यक्ति क्रम भी कम हानिकारक नहीं है। सामान्य व्यक्तियों को भी बहुत दिन बाद- यदा कदा ही काम सेवन की बात सोचनी चाहिए यदि वे आये दिन इसी मखौल में उलझे रहे और अपने ओजस् को गन्दी नालियों में बहाते रहे तो उन्हें शारीरिक रुग्णता और दुर्बलता का शिकार ही नहीं बनना पड़ेगा, बल्कि मनोबल, आत्मबल, और प्राण शक्ति की पूँजी से भी हाथ धोना पड़ेगा। काम-सेवन में जिनकी अति प्रवृत्ति है वे अपनी ही पूँजी नहीं चुकाते वरन् साथी का भी सर्वनाश करते हैं। अपने समाज में नारी की शारीरिक और मानसिक दुर्गति का एक बहुत बड़ा कारण उनके पतियों द्वारा बरती जा रही अत्याचारी रीति-नीति है जिसके कारण उन्हें विवश होकर अपने अच्छे खासे स्वास्थ्य की बर्बादी सहन करनी पड़ी, यदि संयम से गृहस्थ जीवन चलाया गया होता तो न कोई नारी बन्ध्या होती न किसी को प्रदर जैसे रोगों का शिकार बनाना पड़ता। जितनी संतान भली प्रकार पालित नहीं की जा सकती उतनी पैदा करके गृहस्थ जीवन का उद्देश्य और आनन्द नष्ट कर लेना भी यौन संपर्क की मर्यादाओं का अतिक्रमण ही है। ऐसे अविवेकी साथी को पाकर किस गृहस्थ को विवाह का आनन्द मिलेगा। यौन संपर्क की जिसमें खुली छुट है उस विवाह के करने से पूर्व ही हजार बार सोचना चाहिये, कि साथी का प्राण तत्व किस स्तर का है, उसकी विचरण भावना, गुणा, कर्म-स्वभाव, चरित्र, मनोबल, आत्मबल जैसे उच्च तत्वों की स्थिति क्या है। यदि ऐसा नहीं ढूंढ़ा गया और यों ही किसी नर तनुधारी से विवाह कर लिया गया तो उससे शरीर को क्षीण करने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।

जननेन्द्रियों का संपर्क ही काम उल्लास नहीं। वरन् उच्च भावना सम्पन्न व्यक्तित्वों का परस्पर आन्तरिक आदान-प्रदान ही वह आनन्द-प्रदान कर सकता है जिसे भौतिक जगत का सर्वोपरि सुख माना गया है और जिसकी तुलना ब्रह्मानन्द से की गई है। प्रकृति और पुरुष का संयोग ही इस सृष्टि में आनन्द और उल्लास की तरंगें प्रवाहित कर रहा है केवल उच्च स्तरीय भावनाओं से सम्पन्न नर-नारी ही एकान्त-मित्तल का वह आनन्द ले सकते हैं जो शक्ति को किसी तरह नष्ट नहीं करता वरन् आनन्द ले सकते हैं जो शक्ति को किसी तरह नष्ट नहीं करता वरन् असंख्य गुनी बढ़ा देता है, काम सेवन आमतौर से हानिकारक ही माना गया है पर उन अपवादों से लाभदायक शक्ति संवर्धक और उत्कर्ष में सहायक भी सिद्ध हो सकता है। नहीं तो उन आत्माओं का शारीरिक ही नहीं आत्मिक मिलन भी संभव होता है। पर ऐसा होता कहाँ है? ऐसे जोड़े मिलते कहाँ है? जब तब वैसी स्थिति प्राप्त ने हो केवल इन्द्रिय सुख के लिये काम-सेवन एक क्षणिक आवेश और हानिकारक कार्य ही सिद्ध होता है। इसलिए यौन संपर्क में बहुत ही सावधानी बरतने और जहाँ तक सम्भव हो ब्रह्मचर्य पालन करने की मर्यादा नियन्त्रित की गई है। वही सर्वोपयोगी भी है।


सफलता का श्रेय

सफलता का श्रेय

सफलता का श्रेय किसे मिले इस प्रश्न पर एक दिन विवाद उठ खड़ा हुआ। संकल्प ने अपने को, ‘बल’ ने अपने को और ‘बुद्धि’ ने अपने को अधिक महत्वपूर्ण बताया। तीनों अपनी अपनी बात पर अड़े हुए थे। अन्त में तय हुआ कि ‘विवेक’ को पंच बना इस झगड़े का फैसला कराया जाय।

तीनों को साथ लेकर विवेक चल पड़ा। उसने एक हाथ में लोहे की टेड़ी कील ली और दूसरे में हथौड़ा। चलते-चलते वे लोग ऐसे स्थान में पहुँचे जहाँ एक सुन्दर बालक खेल रहा था। विवेक ने बालक से कहा कि- बेटा इस टेड़ी कील को अगर तुम हथौड़ा से ठोक सीधी कर दो तो मैं तुमको भर पेट मिठाई खिलाऊँ और खिलौने से भरी एक पिटारी भी दूँ।

बालक की आँखें चमक उठी। वह बड़ी आशा और उत्साह से प्रयत्न करने लगा। पर कील को सीधा कर सकना तो दूर उससे हथौड़ा उठा तक नहीं। भारी औजार उठाने के लायक उसके हाथों में बल नहीं था। बहुत प्रयत्न करने पर सफलता न मिली तो बालक खिन्न होकर चला गया। इससे उन लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सफलता कि सफलता प्राप्त करने को अकेला संकल्प अपर्याप्त है।

चारों आगे बढ़े तो थोड़ी दूर जाने पर एक श्रमिक दिखाई दिया। वह खर्राटे लेता हुआ सो रहा था। विवेक ने उसे झकझोर कर जगाया और कहा कि इस कील को हथौड़ा मार कर सीधा कर दो मैं तुम्हें दस रुपया दूंगा। उनींदी आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह नींद की खुमारी में बना रहा। उसने हथौड़ा एक ओर रख दिया और वहीं लेट कर खर्राटे भरने लगा।

निष्कर्ष निकला कि अकेला ‘बल’ भी काफी नहीं है। सामर्थ्य रखते हुए भी संकल्प न होने से श्रमिक जब कील को सीधा न कर सका तो इसके सिवाये और क्या कहा जा सकता था।

विवेक ने कहा कि हमें लौट चलना चाहियें, क्योंकि जिस बात को हम जानना चाहते थे वह मालूम पड़ गई। संकल्प, बल और बुद्धि का सम्मिलित रूप ही सफलता का श्रेय प्राप्त कर सकता है। एकाकी रूप में आप लोग तीनों अधूरे अपूर्ण हैं।


विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य

भले ही पदार्थ के रूप में पर विज्ञान भी आन्तरिक सत्ता का ही उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्व व्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण है। सच तो यह है कि शक्ति के अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। धर्म उसे अंतःचेतना के रूप में देखता है। वह उदाहरण देता है कि गाँधी जी का आत्मबल ही था जिसने ब्रिटिश सत्त को बिना लड़े निकाल दिया और विज्ञान कहता है एक छोटे से शस्त्र ने जो हिरोशिमा के 70 हजार नागरिक पल भर में भून डाले वह क्या कम जबर्दस्त शक्ति थी। भले ही एक का स्वरूप रचनात्मक हो और दूसरे का स्वभाव ध्वंस, पर विज्ञान और धर्म दोनों ने ही शक्ति के एक ही स्वरूप की जानकारी दी है। दोनों में कोई विरोध नहीं है।

यह झगड़ तो राम और विश्व की तरह का है। राम शिव के उपासक है और शिव राम के। पर शिवजी के भक्त भूत-प्रेतों का स्वभाव, राम के भक्त रीछ-जानवरों के स्वभाव से नहीं मिलता। इसीलिये वे परस्पर लड़ते हैं। आज विज्ञान धर्मावलम्बियों को हीन मानता है। तो धर्म को मानने वाले भौतिकतावादी या पदार्थ की शक्ति पर विश्वास करने वालों भौतिकवादी या पदार्थ की शक्ति पर विश्वास करने वालों को ओछा मानते हैं। दरअसल दोनों को यह समझना चाहिए कि धर्म और विज्ञान के मूलभूत उद्देश्य एक ही सत्य को प्राप्त करना है।

रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में मंगल का उपवास लड़की भी रखती है और माँ भी दोनों के लिये मंगल एक ही है पर मान्यतायें अलग-अलग हैं। वह कहती है कि मैं मंगल का व्रत हूँ उद्देश्य दोनों के एक हैं केवल मैं- मैं का झगड़ा है।

धार्मिकता अनिवार्य होनी चाहिए पर उसका यह अर्थ नहीं कि विज्ञान को छोड़ दिया जाय। विज्ञान का परित्याग ही विश्वास को अन्ध विश्वास और श्रद्धा को अन्ध-श्रद्धा बनाता है। जबकि धर्म का उद्देश्य सत्य को विज्ञान विशिष्ट तरीके से ज्ञान प्राप्त कराता है और धर्म की अनुभूति भिन्न प्रकार की होती है। विज्ञान की दिशायें पदार्थ के ज्ञान की और बढ़ती हुई चली जाती हैं, और एक दिन वहाँ पहुंचेगी जहाँ से ईश्वरीय शक्तियों ने स्वेच्छा या अन्य किसी कारण से पदार्थ में परिवर्तन होना प्रारम्भ किया। इसी प्रकार आत्मा का प्रकाश तथा आत्मा की विशालता की अनुभूति भी एक दिन उसी सर्व व्यापी एवं चैतन्य तत्व तक पहुँचा देती है। दोनों एक ही स्थान से उठते हैं और दोनों के गन्तव्य भी एक हैं इसलिए उनको यहाँ भी साथ साथ ही रहना चाहिए। मनुष्य को इस जीवन में भौतिक सुखी की अनुभूति भी रहनी चाहिए और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील भी, इसलिए दोनों का समन्वय आवश्यक हो जाता है।

अकेले विज्ञान को ही महत्व देना दो अंधों की कहानी की तरह होगा। एक बार एक अंधा अपने घर से निकल पड़ा और उन दरवाजे पर जाकर सहायता के लिए पुकारने लगा जिस घर में एक दूसरा अंधा रहता था। वह अन्धा बाहर तो आया पर कोई रास्ता बताने के पहले उसे यही पता लगाना कठिन हो गया कि यह अन्धा किधर से आया और वह किधर जाना चाहता है, वह दिशा किस तरह है। बेचारे से असमर्थता ही प्रकट करते बनी। यदि विज्ञान केवल पदार्थ से ही उलझा रहा तो मनुष्य शरीर में भावनाओं के ईश्वरत्व के विकास का क्या बनेगा? यदि सबकुछ पदार्थ को ही मान लिया गया तो प्रेम, मैत्री सेवा संतोष और शान्ति को भावनाओं का क्या होगा? क्या इनकी उपेक्षा करके मनुष्य सुखी रह सकता है?

भौतिकवादी दर्शन शास्त्र (मैटेलिस्टिक फिलास्फी) मृत्यु के बाद जीवन के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता लेकिन विज्ञान अब भौतिकता से आगे बढ़ गया है। अब यह माना जाने लगा है कि शरीर और विश्व में कुछ वस्तुओं जैसे संस्कार-कोष (जीन्स) अमर तत्व हैं उनका कभी नाश नहीं होता? उसी प्रकार अब भौतिकतावाद का यह सिद्धान्त पदार्थ का विद्युत आवेश है ऊर्जा केन्द्र (सेर्न्टस आफ एनर्जी) में वाष्पीकृत हो जाता है तब पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और वह ऊर्जा (एनर्जी) में बदल जाता है। पदार्थ में भार होता है पर ऊर्जा (एनर्जी) में कोई भार नहीं रह जाता।

परा मनोविज्ञान अब मानस-विज्ञान के उप अध्याय में प्रवेश कर रहा है जिसे हम पुनर्जन्म कहते हैं और इस प्रकार विज्ञान धर्म की मान्यताओं पर आ रहा है यह कहा जा सकता है। भारत वर्ष के प्रायः सभी धर्म पुनर्जन्म को मानते हैं। मनोविज्ञान के अनुसंधान कर्त्ताओं को ऐसे लड़के लड़कियाँ मिली हैं जो अपने पूर्व जन्मों का हाल बताती हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. स्टीवेन्सन कुछ दिन पूर्व नई दिल्ली आये उन्होंने बताया कि मैंने विश्व के लगभग 500 मामलों का अध्ययन किया है उससे मुझे विश्वास हो गया है। कि पुनर्जन्म की कल्पना कपोल कल्पित नहीं। उनकी इस सम्मति को वैज्ञानिकों में बहुत महत्व दिया जा रहा है। यह बताता है कि वैज्ञानिक धार्मिक सत्यों से आँख नहीं मीचते वरन् वे अब उस स्थान पर हैं जहाँ से धर्म के सत्यों को सरलता से प्रतिपादित किया जा सकता है।

वैज्ञानिक रावर्ट ब्लेचफोड़ ने माना कि आज भौतिक पदार्थ और भोगवाद के पग उखाड़ दिये हैं और अब वह समय आ गया है जब विज्ञान खाओ पीओ मौज करो (ईटड्रिंग एण्ड बी मैरी) के भौतिकतावादी सिद्धान्त को फोड़ देगा और आध्यात्मिक क्षेत्र में जा प्रवेश करेगा।

डॉ. ब्लेचफोर्ड का यह सिद्धान्त अब पश्चिम (वेर्स्टन कन्ट्रीज) में फिलास्फी आफ ब्लेचफोर्ड (ब्लेचफोर्ड के सिद्धान्त) के नाम से तीव्रता से प्रसिद्धि पा रहा है। वहाँ का पाप और दुर्भाग्य से संतप्त जीवन अब अध्यात्म की शीतल छाया में बैठने के लिए भाग चला आ रहा है। जबकि धार्मिक जीवन का अन्ध विश्वास भी चरमरा कर टूट रहा है और वह विज्ञान से अपने प्रमाणित तथ्यों की खोज कराने के लिए निकल पड़ा है। दोनों समन्वय चाहते हैं और इस प्रकार मनुष्य की एक सच्चा मार्ग देना चाहते हैं जिसमें इस संसार की उपस्थिति को भी न त्यागा जाए और अपनी अदृश्य सत्ता को भी भुलाया न जाए। सत्य के अनुसंधान का यही समन्वय युक्त मार्ग सच्चा और व्यावहारिक होगा।

वैज्ञानिक तरीकों से प्राप्त ज्ञान में अन्तर ज्ञान तत्व अंतर्हित है जब कि आत्मा चेतना का प्रकाश भी सत्य को प्रकाशित करता है। दोनों ही रहस्य पूर्ण हैं और जैसा कि लयम जेम्स ने कहा-जीवन का सत्य भी रहस्य की में ही है। रहस्य में वास्तविकता भी हो सकती है। निरर्थकता एवं पथभ्रष्टता भी। इसलिए जब सत्य और रहस्यों की दिशा में बढ़े तब मनोवैज्ञानिक सत्य छुपे नहीं के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि धर्म और विज्ञान दोनों ही साथ साथ पथ प्रदर्शन करें जहाँ तक विज्ञान की पहुँच है वहाँ तक का अन्तर्ज्ञान ही देकर वह धर्म का रास्ता साफ करे और धर्म का कर्त्तव्य है कि वह वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ अपनी उपलब्धियों की संगतियाँ बैठाकर पास अपूर्णता को दूर करे जो विज्ञान के लिए आगे बढ़ने में आकस्मिक अवरोध के कारण उत्पन्न होती है। विज्ञान पदार्थ की स्थूलता का विश्लेषण कर सकता है, ज्ञान और अनुभूति का प्रसंग में वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। ज्ञान और अनुभूति के लिए विचार और भावनाओं की शक्तियाँ काम देती हैं और इनका विकास धार्मिकता के अंतर्गत आता है। मनुष्य पदार्थ और भावनाओं का मिला जुला स्वरूप है इसलिए सम्पूर्ण सत्य की खोज के लिए दोनों का विश्लेषण आवश्यक है अकेला विज्ञान भावनाओं की परिधि तक पहुँच कर रुक जाता है जब कि धर्म भी पदार्थ की जानकारी न दे सकने के कारण मनुष्य को उसके भौतिक आकर्षण से नहीं बचा पाता। इसलिये विकास और अन्तिम सत्य की खोज तभी संभव जब इनमें से किसी को भी छोड़ न जाये।


आज के पुण्य से कल की प्राप्ति

एक बार एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्व परोपकार में लगातार संन्यास ग्रहण किया। वह सभी प्रकार से ईश्वर में शरणागत हो गया इसके कारण उसके योग क्षेम का भार स्वयं उठाने के लिए भगवान को सहर्ष बाध्य होना पड़ा। उसके लिए एक देवदूत एक थाली में बड़े सुस्वादु भोजन लाता था। और उसे कराकर लौट जाता था। यह देख एक अन्य व्यक्ति भी अपना सब कारोबार लड़कों को सौंपकर, गेरुए वस्त्र पहनकर उसी के निकट तप करने लगा।

अब देवदूत दो थाली लाने लगा, एक में सूखी रोटी तथा दूसरी में वही सुस्वाद भोजन। दूसरे व्यक्ति ने लगातार सूखी रोटी आते देख कहा- मुझे ही क्यों सूखी रोटी मिल रही हैं। देवदूत ने उत्तर दिया-भगवान्! यह फल तो संचित पुण्य के अनुसार मिल रहा है। उसने पुण्य में सर्वस्व लगा दिया और अपने जीवन भर में केवल एक बार बड़े अहंकार से एक व्यक्ति को सूखी रोटी दी थी। उसी के ब्याज स्वरूप यह रोटियाँ मिल रही हैं। अब आपकी सूखी रोटी भी समाप्त होने को हैं, फिर कुछ न मिलेगा।

अब इस व्यक्ति को चेतना हुई और उसने अपनी बाकी बची रोटी देवदूत से मँगाकर दान कर दी और आप भूखा रहा। दूसरे दिन जब देवदूत भोजन लेकर आया तो दोनों थाली सुस्वादु पकवानों से भरी थीं।


अपनों से अपनी बात

हमारा भावी हिमालय प्रवास एक ऐसी विधि व्यवस्था है जिसे टाला नहीं जा सकता। यह कोई सनक, मनोरंजन, जिद या उद्धतपन नहीं है कि हम मिशन के इतने गतिशील कार्य को अधूरा छोड़कर ऐसे ही हिमि पर्वतों में घर दौड़े। हम सदा के कर्म को प्रधानता देते रहे हैं और अपना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह बताते रहे हैं कि कर्म के माध्यम से ही व्यक्ति और समाज का लोक-और परलोक का हित साधन ही हो सकता है। उपासना को कम और जीवन साधना को अधिक महत्व देने की प्रेरणा ही हमने सर्वे साधारण को दी है। फिर अगले दिनों हमें जो कदम उठाने पड़ रहे हैं, हिमालय में अज्ञात एकान्त साधना के लिए जाना पड़ रहा है- उससे किसी को ऐसा लग सकता है कि अपनी पिछले मान्यताओं और शिक्षाओं के विपरीत हम आचरण करने जा रहे है। नव-निर्वाण के महान् अभियान की गतिशीलता में हमारा कर्तव्य इतना घुल मिल गया है कि लोगों को यह लग सकता है कि यह व्यक्तित्व एवं मार्ग-दर्शन हट जाने से मिशन को क्षति पहुँचेगी और शिथिलता आ जायगी। ऐसी दशा में नव निर्माण की अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को हमारा यह महा प्रयाण दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण लग सकता है। और अधिक जोर देकर कहा जा सकता है कि यह विचार हम छोड़ दें और जिस तरह अब तक काम करते रहे उसी तरह आगे भी करते रहें।

परिजनों की चिन्तन प्रक्रिया का मूल और महत्व हम समझते हैं। यदि जीवन का शेष समय इसी अभ्यस्त क्रियाकलाप में लग जाता तो हमें सुविधा ही रहती और सरलता भी पड़ती। अपनी कमजोरी को छिपाते नहीं हमारा अन्त करण अति भावुक और मो, ममता से भरा पड़ है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वही जा पहुँचता है। स्नेह, सद्भाव की प्रेम और ममता की मधुरिमा हमें इतनी अधिक भाती है कि शहद में परसनी मक्खी की तरह उस स्थिति को छोड़ने की रत्ती भर भी इच्छा नहीं होती। जिन लक्ष-लक्ष परिजनों का स्नेह, सद्भाव हमें मिला है जी चाहता है कि उस मिठास का आनन्द हजार जन्म लेकर हजार शरीर धारणा कर हजार कल्प तक लेते रहें। प्रेमी के लिए मिलन का आनन्द बड़ा सुखद होता है पर बिछुड़ने का दर्द उसे मनहित करके ही रख देता है। जिसे प्रेम करने और पाने का अवसर मिला है वह जान सकता है कि प्रिय जनों के बिछुड़न की घड़ी कितनी मर्मान्तक और हतप्रभ कर देने वाली होती है। लगता है कोई उसका कलेजा ही चीरकर निकाल लिये जाता है। भगवान ने हमें न जाने क्यों स्नेहसिक्त अन्तःकरण देकर भेजा जिसके कारण हमें जहाँ प्रिय पात्रों के मिलन की थोड़ी सी हर्षोल्लास भरी घड़ियाँ उपलब्ध होती है वहाँ उससे अधिक वियोग बिछुड़न के बारम्बार निकलने वाले आँसू बहाने पड़ते हैं। इन दिनों भी हमारी मनोभूमि इसी दयनीय स्थिति में पहुँच गई है। मिशन के भविष्य की बात एक ओर उठाकर भी रखदें तो भी प्रियजनों से सदा के लिए बिछुड़ने वाली बात हमें बहुत ही कष्टकर बनकर शूल रही है। अच्छा होता बीमारी में पड़े रहते और मस्तिष्क रुण मूर्च्छित होकर पड़े रहने की स्थिति में जीव इस काया को छोड़कर चला जाता। तब उसी अर्धमूर्छित स्थिति में प्राण प्रिय परिजनों से बिछुड़ने का यह कष्ट न सहना पड़ता जो विदाई की घड़ी निकट आते जाने पर निरन्तर घर नहीं बढ़ ही रहा है।

हमारे मोह ममता की इसे अति ही समझा जाना चाहिए कि चलते समय किसी से न मिलने और चुपचाप प्रयाण कर जाने के अपने पूर्व निश्चय को बदलना पड़ा। जो मानता ही नहीं। बेतरह मचलता है और चाहता है कि एक बार आँख भरकर प्रियजनों को देख लेने का अवसर यदि मिलता है तो उस लाभ को क्यों छोड़ा जाय? यों हम यह भी जानते हैं कि चलते समय अधिक मोह ममता बढ़ने पर फोड़ा और अधिक दर्द करेगा और अगले दिनों हमें अपने को सँभालने में बहुत अधिक अड़चन पड़ेगी। फिर भी भीतरी मचलन को देखिये न कि हमें इसके लिए मजबूर कर दिया कि चलते समय विदाई सम्मेलन और बुला लें। और जी भरकर उन स्वजनों को देख लें जिनके साथ चिर अतीत से हमारे अति मधुर सम्बन्ध जुड़े चले आ रहे हैं और निर्बाध गति से आगे भी चलते रहेंगे।

जिस स्तर की अपनी मनोभूमि है उसमें भक्ति साधना की बात जमती थी कर्म का ढर्रा भी चलता रह सकता था, पर योग साधना तपश्चर्या सो भी निविड़ एकाकी वातावरण में हमारे उपयुक्त न थी। 60 वर्ष का जन संपर्क और लोक मंगल के क्रिया कलाप चलाते रहने वाला ढर्रा अब इतना आप-पास में आ गया है और अनुकूल पड़ने लगा है कि उसे छोड़ते बदलते अब काफी अड़चन मालूम पड़ती है। शरीर भी ढीला हो चला और वह तपश्चर्या की कठोर परिस्थितियों से अकचकाता है। इतना सब होते हुए भी हम रुक न सकेंगे जाने की विवशता को टाला न जा सकेगा। 20 जून को हम निश्चित रूप से चले जायेंगे।

कारण स्पष्ट है। हमने 45 वर्ष पूर्व अपना शरीर, मन, मस्तिष्क, धन और अस्तित्व अहंकार सब कुछ मार्ग-दर्शक के हाथों बेच दिया है। हमारा शरीर ही नहीं अन्तरंग भी उसका खरीदा है। अपनी कोई इच्छा शेष नहीं रही। भावनाओं का समस्त उभार उसी अज्ञात शक्ति के नियन्त्रण में सौंप दिया है। आरम्भ में यह समर्पण हमें बहुत महंगा और कष्ट कारक लगा। दिखा उसमें घाटा ही घाटा है। और जैसे ही वस्तु स्थिति समझ में आई वैसे ही लगने लगा यह घाटे का नहीं असंख्य गुने लाभ का व्यापार है। जिसके हाथों हमने अपने को- शरीर और मन को बेचा बदले में अपने को हमारे हाथ बेच या सौंप दिया। हमारी तुच्छता जिसके चरणों में समर्पित हुई उसने अपनी सारी महानता हमारे ऊपर उड़ेल दी। बाँस की टुकड़ी ने अपने को पूरी तरह खोखला करके वंशी के रूप में प्रियतम के अधरों का स्पर्श किया तो उसमें से मनमोहक राग रागनियाँ निकलने लगीं। हमने यही किया-बेचा सो बेचा-सौंपा सो सौंपा आगा-पीछा सोचने का फिर कोई प्रश्न ही नहीं रहा। अपनी इच्छा का तब अस्तित्व ही नहीं रहा। उसी की हर इच्छा जब बन गई तो वह अद्वैत स्थिति ब्रह्म और जीवन के मिलन में आने वाले ब्रह्मानन्द की तरह सुरति क्रिया में निमग्न पति-पत्नि की तरह अति सुखद लगने लगी। जिसे सच्चे मन से बिना किसी प्रतिदान की आशा के गहरा आत्म-समर्पण किया गया उसने भी अपनी महानता में उदारता में प्रतिदान में कमी नहीं रहने दी। हमारे पास जो प्रत्यक्ष दिखता है उससे हजार लाख गुना अप्रत्यक्ष छिपा पड़ा है। यह हमारा उपार्जन नहीं है। विशुद्ध रूप से उसे हमारी मार्ग दर्शन सत्ता का ही अनुमान है, जिसके साथ हमारी मार्ग-दर्शक सत्ता का ही अनुदान है, जिसके साथ हमारी आत्मा ने विवाद कर लिया और अपना आपा सौंपने के फलस्वरूप उसका सारा वैभव करतल गत कर लिया। इस प्रकार यह समर्पण हमारे लिये घाटे का नहीं नफे का ही सौदा सिद्ध हुआ। यद्यपि आरम्भ से इसे विशुद्ध घाटा ही समझ कर स्वीकार किया गया था।

हमारे घनिष्ठ स्वजनों को यह जान ही लेना चाहिए कि गत 45 वर्षों में हमारा प्रत्येक क्रिया कलाप हमारे मार्ग-दर्शक के संकेतों पर ही चला है। समाज के सम्बन्ध में दूसरों के सम्बन्ध में हम बहुत बातें ढंग से सोचते हैं पर अपने बारे में सिर्फ उतना ही सोचते हैं कि हमारा मास्टर हमें जिधर ले चलेगा उधर ही चलेंगे भले ही वह मार्ग हमारी रुचि या सुविधा के सर्वथा विपरीत ही क्यों न हो। तो जबकि उसने भावी तपश्चर्या का कार्य-क्रम हमारे सामने रख दिया है तो उसके सम्बन्ध में आगा पीछा सोचने का कोई प्रश्न ही नहीं रहा। समर्पण इससे कम में सम्पन्न ही कहाँ होता है। प्रेमिका ने प्रियतम पर अपनी इच्छा थोपी तब तो वह व्यापार व्यभिचार बन जायगा हमारी आत्मा इतनी उथली नहीं जो समर्पण करने के बाद अपने मास्टर पर अपनी अभिरुचि का प्रस्ताव लेकर पहुँचें।

हमारे मार्ग दर्शक हमारे विवेक को संतुष्ट कर चुका है। नव निर्माण की युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिए मात्र स्थूल क्रिया कलाप पर्याप्त न होंगे। इसके लिए सूक्ष्म जगत को प्रभावित करना पड़ेगा। उग्र तपश्चर्या द्वारा नियति की भाव तरंगों को इतना परिष्कृत बनाना पड़ेगा कि प्रसुप्त उच्च आत्मायें, जग पड़ने और उठ चलने की आवश्यकता अनुभव करें। ऊषा की ध्वजा उड़ाता हुआ चन्द्रचूड़ जब अरुणोदय के रूप में धावमान होता है तो सोये हुए सभी प्राणी जाग पड़ते हैं। और अपने नित्य कर्मों में निरत ही जाते हैं। नव जागरण की वेला में प्रातः कालीन ऊषा के अग्रगामी अरुण चन्द्रचूड़ की तरह हमें अग्रगामी बनने के लिए शक्ति का उपार्जन करना होगा। 15 से 40 वर्ष तक की 24 वर्ष की आयु को इस प्रकार की शक्ति संचय में हमें लगाना पड़ा है। उस उपार्जित पूँजी के बलबूते पर ही वह सब कर सकना संभव हो सका जो 40 से 60 वर्ष तक के 20 वर्षों में हुआ दिखाई पड़ता है। यदि गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला में शक्ति संचय का वह क्रिया कलाप न चला होता तो जो कुछ अनुपम, अद्भुत और आश्चर्यजनक वन पड़ा है वह कदापि सम्भव न रहा होता। शरीर, मन और धन की शक्ति नगण्य है। हजार लाख व्यक्ति मिलकर भी स्थूल उपकरणों से भावनात्मक नव-निर्माण एवं युग परिवर्तन जैसी महान प्रक्रिया सम्पन्न नहीं कर सकते। उसके लिए आत्मबल की अनिवार्य रूप से आवश्यकता रहती है। पीछे जो किया जा चुका हमें उससे हजार लाख गुणा काम अभी और करना है। उच्च आत्माओं को मोह निद्रा में से जगाकर ईश्वरीय इच्छा को पूर्ति के लिए लोक मंगल क्रिया कलापों में नियोजित करना है। मामूली समझने बुझाने से उन्होंने करवट मात्र बदली, उठकर खड़े न हो सके। झकझोर कर जगाने उठाकर खड़ा कर देने और उनको उपयुक्त कार्य में नियोजित करने के लिए वाणी में कड़क और कलाइयों में शक्ति चाहिए। इसके लिए शक्ति संग्रह की तपश्चर्या फिर आवश्यक हो गई। अगले दिनों हमें यही करना होगा। तोप ढालने के लिए असली अष्ट धातु चाहिए। मास्टर ने हमें अष्ट धातु समझा और तोप ढालने के लिए भट्टी में गलने के लिए बुलाया तो किस मुँह से इनकार करें। इनकारी हमारी समर्पण को ही कलंकित कर देगी। इतना जोखिम हम किसी भी मूल्य पर उठाने को तैयार नहीं। सो मास्टर की मर्जी पूरी करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई चारा शेष नहीं रहा।

अध्यात्म विद्या के शक्ति-तन्त्र को धारण करने के लिए परशुराम भागीरथ जैसी आत्माओं की जरूरत पड़ती हैं। घटिया लोग कुण्डलिनी जागरण से लेकर सिद्धि सामर्थ्यों की उपलब्धि के स्वप्न भर देख सकते हैं उन्हें धारण करने के लिए शंकर जैसी जटाएं चाहिए सो कोई अपनी सर्वतोमुखी पात्रता विकसित करता नहीं, मात्र मन्त्र मन्त्र तन्त्र के छुटपुट कर्मकाण्डों से लम्बे चौड़े स्वप्न देखते और विफल मनोरथ निराश असफल बने रहते हैं। युग परिवर्तन के लिए आत्मशक्ति का प्रयोग प्रधान रूप से होता है। इसके लिए विद्युत उत्पादन के केन्द्र खड़े करने होंगे। अब इसके बिना मात्र प्रचार या उछल कूद से काम न चलेगा। परिवर्तन के लिए अभीष्ट आत्म शक्ति का केन्द्र खड़ा कर उससे अगणित यन्त्रों का संचालन किया जाना है। यदि अपनी हड्डियाँ इस प्रकार की अणु भट्टी बनाने में नींव के पत्थर की तरह प्रयोग की जानी हैं तो हमें इससे असहमति क्यों प्रकट करने चाहिए? कष्ट के पीछे सदा हानि ही नहीं होती उसके पीछे सौभाग्य भी झाँकता रहता है। लुप्त आत्म विद्या का पुनरुत्थान करके अनेकों को मनस्वी, महामानव, सिद्ध और समर्थ बनाने का सौभाग्य हमें दिया जा रहा है तो उसे शिरोधार्य करने से इनकार क्यों करें?

विदाई का वियोग हमारी भावुक दुर्बलता हो सकती है। या स्नेह सिक्त अंतःकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया। जो भी हो हम उसे इन दिनों लुप्त करने का यथा सम्भव प्रयत्न कर रहे हैं। मन की मचलन का समाधान कर रहे हैं। गत एक वर्ष से देश व्यापी दौरे करके परिजनों से भेंट करने की अपनी आन्तरिक इच्छा को एक हद तक पूरा किया। अब विदाई सम्मेलन बुलाकर एक बार अन्तिम बार जी भरकर अपने परिवार को फिर देखेंगे। अपने स्मृति पटल पर आँखों के कैमरे से प्रियजनों की तसवीरें फिर खींच ले जाना चाहते हैं, जिससे जब एकान्त में मन मचले तो उन मधुर चित्रों को देख कर अपनी छाती ठण्डी कर लिया करें। कहना ना होगा कि प्रेम के साथ अनुदान की स्वाभाविक वृत्ति जुड़ी है। स्नेह सेवा सहायता के रूप में विकसित होता है। हमें अपनी आत्मीयता की गहराई और सचाई सिद्ध करने के लिए स्वजनों द्वारा समय-समय पर दिये गये आत्मिक और भौतिक अनुदानों का ब्याज समेत ऋण भार चुकाने के लिए अगले दिनों बहुत कुछ करना है। इन दिनों स्वल्प सामर्थ्य से हम इच्छित सेवा सहायता कर सकने में सफल नहीं हो रहे हैं। इस कमी और लज्जा को अगले दिनों पूरा कर देंगे। हम ऐसे वैरागी, त्यागी, लाख जन्मों में भी न हो सकेंगे जब अपने प्रति सद्भावना आत्मीयता रखने वालों के सौजन्य को भुला दें उन्हें स्मरण न करें, संचित आत्मीयता खोदे, और सेवा सहायता करने की, स्नेह वात्सल्य वरत सकने की मनोवृत्ति को बदल दें। देखेंगे यदि ऐसी सूखी योग-साधना ही करनी पड़ी तो कहेंगे यह अपने वर्तमान ढाँचे को बदलने जोड़ने और नष्ट किये बिना सम्भव नहीं। सो हे, गुरुदेव, आदि हमें ऐसी ही नीरस तपश्चर्या करनी है और रूखी मनोभूमि बनानी है तो वर्तमान आस्तित्व को पूरी तरह चूर-चूर करके फिर कोई नई चीज उससे बनाइये। तब वह लिवर शायद उस तरह की शुष्क साधना कर सके। इस वतरण का तो रोम-रोम स्नेह ममता से सराबोर हो है, उसे सर्वथा उल्टा किया गया तो फिर टूट या बिखर जायगा। न अपने काम का रहेगा न किसी दूसरे का। सारा समर्पण स्वीकार करने वाला इस हमारी दुर्बलता को जानता है और विश्वास है कि अपनी सहज सहृदयता इस गधे पर इतना वजन न लादेगा जिससे उसकी कमर टूट जाय। स्नेहसिक्तता हमसे छिनी तो रहेंगे तो उसी मार्ग पर। अपनी मौलिक विशेषता खोकर निर्जीव जैसे जायेंगे। फिर शायद अपना अस्तित्व ही स्थिर रखना भारी पड़ जायगा।

विश्वास है कि हमें अपनी भावी तपश्चर्या की अति उग्रता और कठोरता के बीच भी इतनी छुट रहेगी कि स्वजनों से स्नेह सद्भावों का आदान प्रदान करते रह सकें। हमारे लिए इतना बहुत हैं। इतनी सरसता बनी रही तो हम वन पर्वत हिम कंदराओं की नीरवता सहन कर लेंगे और शरीर तथा मन को जितना भी अधिक तपाना पड़े उन उष्णता को धैर्य पूर्वक पचा लेंगे। हमारी विस्मृति किसी घनिष्ठ को भुला न दे इसलिये विदाई सम्मेलन में प्रायः सभी स्वजनों को आग्रह पूर्वक अन्तिम भेंट के लिए आमंत्रित किया है। उन दिनों गर्मी अधिक रहेगी। आगन्तुकों को तम्बुओं में ठहराना पड़ेगा और कष्ट रहेगा पर, उनके न आने से हमें जो तपन सहनी पड़ेगी सो अपेक्षाकृत हमें अधिक भारी पड़ेगी और हमारा वह भारी मन लेकर प्रयाण करना उन परिजनों को भी निरन्तर पश्चाताप जैसा कष्ट देता रहेगा। इसलिये उपयुक्त यही समझा गया कि ऋतु कष्ट का जोखिम उठाने और उस अवसर की उपेक्षा न करने के लिये अनुरोध कर ही दिया जाय।

17, 18, 19, 20 जून का यह विदाई सम्मेलन है। 16 की शाम तक सब लोग मथुरा पहुँच जायें ताकि 17 के प्रातःकाल से आरम्भ होने वाले हमारे स्नेह सान्निध्य का आत्मिक उद्गारों को सुनने का जीवन क्रम की रहस्य पूर्ण घटनाओं के जानने समझने का अवसर पूरी तरह मिल जाय। बीच-बीच में आने-जाने वाले वह लाभ न उठा सकेंगे। 20 की मध्याह्नोत्तर हम चले जायेंगे। माताजी भगवती देवी भी उसी दिन मथुरा छोड़ देंगी। हम दोनों का भी साथ टूट जायगा। आगन्तुक 20 को दो पहर बाद जा सकेंगे। इन पंक्तियों में अखण्ड ज्योति परिजन अपने लिए विशेष निमंत्रण नोट करले और यदि बिलकुल ही असंभव न हो तो प्रयत्न करें कि उस अवसर पर किसी तरह मथुरा पहुँच ही जायें।

यह सम्मेलन हमारी अनुभूतियों का विकेन्द्रीकरण है। हमें कहना बहुत है- बताना बहुत है- और देना बहुत है। वाणी से शायद उतने उफान को उड़ेलना सम्भव न हो सके। वाणी से शायद उतने उफान को उड़ेलना सम्भव न हो सकें पर हम अंतरंग की प्राण शक्ति को उभार कर हर आगन्तुक के अन्तस्तल तक प्रदेश करेंगे और जहाँ जितना जिस स्तर पर बीजारोपण कर सकना सम्भव होगा, पूरी सावधानी के साथ करेंगे। इस वे चार दिन निस्संदेह बहुत महत्व के होंगे। जहाँ हम अन्तिम वार अपनी आत्माएं तृप्त करने और छाती ठण्डी करते हुए हलका करेंगे वहाँ आगन्तुक भी कुछ ऐसा अनुभव प्राप्त करके जायेंगे जो उनके लिए एक अमिट और सुखद स्मृति बन कर चिरकाल तक विद्यमान बना रहेगा। हो सकता है किसी को उप प्रकाश से अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकने की दिशा भी मिल जाये। फिर कभी वैसा अवसर न आने के कारण निस्संदेह यह सम्मेलन असाधारण और अनुपम ही होगा।


परिजन इन सात प्रयत्नों में आज से ही जुट जाये

विदाई सम्मेलन में आने वाले परिजनों को सात काम सौंपे जा रहे है, सो उनके लिए प्रयत्न भी अभी से आरम्भ कर देना चाहिए।

अपने क्षेत्र में भ्रमण करके अखण्ड-ज्योति युग-निर्माण योजना के सभी ग्राहकों तथा पाठकों से संपर्क स्थापित करना चाहिए और उन्हें 17, 18, 19, 20 जून के सम्मेलन में मथुरा चलने के लिए आग्रह पूर्वक आमन्त्रित करना चाहिए, साथ ही तीर्थ यात्रा, दर्शन झाँकी करने के उद्देश्य से आने वाले स्त्री बच्चे तथा ऐसे लोगों को जिनका मिशन से कोई सम्बन्ध नहीं है केवल मनोकामना पूर्ण करने के प्रयोजन से आना चाहते हैं उन्हें निरुत्साहित करना चाहिए। मिशन से परिचित, सुशिक्षित और सक्रिय महिलाओं पर यह रोक नहीं है वस्तुतः यह आयोजन हमारे अनेक उत्तराधिकारी उत्तरदायित्वों का हस्तान्तरण आयोजन है। इससे हमारे शरीर से नहीं अन्तः करण से परिचित लोगों का आना ही उचित है। ऐसे लोगों की छाँट का प्रयत्न अभी से आरम्भ कर देना चाहिए और उपयुक्त व्यक्ति अधिकाधिक संख्या में आ सकें, इसके लिए अभी से हमारे हर सहयोगी को प्रयत्नशील होना चाहिए। आगन्तुकों की स्वीकृतियाँ समय रहते मंगाली जायें ताकि ठहरने आदि की व्यवस्था की जा सकें।

इसी अवसर पर तारीख 17 जून को सामूहिक आदर्श विवाहों का आयोजन भी रखा गया है। विवाहोन्माद का उन्मूलन और आदर्श विवाहों का प्रचलन सामाजिक शान्ति की दृष्टि से अति आवश्यक और प्रमुख आन्दोलन है। इसमें हमारी गहरी दिलचस्पी है। सो चलते समय अपने हाथों बड़ी संख्या में ऐसे विवाह सम्पन्न कराना चाहते हैं। जहाँ इस वर्ष विवाह होने वाला हो उन्हें मथुरा आकर इस अवसर पर विवाह कराने के लिए तैयार करना चाहिए। इन विवाहों का मथुरा में विशाल जुलूस निकालने पत्र-पत्रिकाओं में फोटो छपाने तथा फिल्म बना कर सर्वत्र दिखाने की विशेष प्रचारात्मक तैयारी की गई है। (1) इस अति पवित्र अवसर पर हमारे हाथों विवाह सम्पन्न कराने से वर-कन्या के भावी जीवन पर पड़ने वाला सुन्दर प्रभाव। (2) सामाजिक क्रान्ति के महान् अभियान के लिए इस उत्साह वर्धक कदम द्वारा असंख्यों को अनुकरण की प्रेरणा (3) फिल्म, फोटो, जुलूस आदि अनेक माध्यमों से इस विवाहों का देश-व्यापी प्रचार तथा उपस्थित 50 हजार प्रबुद्ध एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का आशीर्वाद यह तीनों ही लाभ ऐसे ही जो किन्हीं से अवगत कराके अपने क्षेत्र से अधिक संख्या में ऐसे विवाह तैयार करने और उन्हें मथुरा लाने की प्रतिस्पर्धा सभी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं में अभी से आरम्भ हो जानी चाहिए। बाल-विवाह, अनमेल विवाह तथा कानून झंझट वाले विवाहों की स्वीकृति न माँगी जाय।

अगले वर्ष, 250 ऐसे युग-निर्माण सम्मेलन किये जाने हैं जिनमें 6 कुण्डी गायत्री यज्ञ भी शामिल है। अब अधिक कुण्डी यज्ञों को गौण और युग निर्माण सम्मेलनों की प्रधान माने जाने की प्रथा चलेगी। इन आयोजनों के माध्यम से हर क्षेत्र में नई जागृति और नई प्रेरणा उत्पन्न की जानी है। हम शरीर से तो न जाने कहाँ होगे पर सूक्ष्म शरीर से इन आयोजनों में उपस्थित रहेंगे। इनकी सफलता निश्चित है। हमारे जाने के बाद जनता का आकर्षण कम न हो जाये इसलिए इनमें मथुरा में (1) अति आकर्षण संगीत मंडली (2) स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से प्रकाश चित्रों का प्रदर्शन (3) चित्र प्रदर्शनी के तीन आकर्षण ऐसे भेजे जायेंगे जिनमें खिंच कर अपार जन समूह इन आयोजनों में उपस्थित हो सके। साथ ही यह भी योजना है कि इन आयोजनों को किफायत से सम्पन्न करके कुछ पैसा बचाया जाय और उन शाखाओं के साधनों को मजबूत बनाने के लिए (1) चल पुस्तकालय की धकेल, (2) लाउडस्पीकर, टेप रिकार्डर, रिकार्ड, (3) चित्र-प्रदर्शनी, (4) स्लाइड प्रोजेक्टर-प्रकाश चित्र, (5) सभी पवित्र यज्ञों में काम आ सकने योग्य सारा सामान तथा गीत संधान आदि जो उधार या किराये पर दिया जाता है अन्ततः एक ज्ञान मन्दिर के भवन का निर्माण जहाँ संगठन की सारी गति-विधियाँ संचालित होती रहें लगाना। इन छह प्रयोजनों के लिए कुल मिलाकर 10 हजार का बजट है। जो एक ही वर्ष में या धीरे-धीरे बचाकर हर रखा को अपने यहाँ व्यवस्था करनी चाहिए। उपरोक्त निर्माण सम्मेलनों की बचत में यह व्यवस्था एक ही वर्ष में या दो-तीन वर्षों में बन सकती है। और ऐसे आयोजन करने वाली शाखा को अपने क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण काश उत्पन्न कर सकने वाली बनाया जा सकता है। पूरी मथुरा से प्राप्त की जा सकती है।

ऐसे युग-निर्माण सम्मेलन के लिए निमन्त्रण लेकर अनेकों उत्साही कर्मठ सदस्य आपसे तैयारी करें ताकि उन अवसर पर उनकी तिथियाँ भी निर्धारित की जा सकें।

अब सभी शाखाओं का नवीनीकरण किया जा सकता है। पुरानी शाखायें रद्द कर दी गई है। चलते समय स्थिर और कर्मठ शाखायें, वर्तमान संगठन और प्रामाणित करता हमारी दृष्टि से होगी उनकी जड़े सीखने के लिए ही हम स्वयं भेजते रहेंगे। संगठन का स्वरूप और हम अपने साथ ही प्रमाणित करके कार्यवाहकों को मुक्त करके जान चाहते हैं ताकि हम अब तक के अपने नकारात्मक प्रयत्नों का स्पष्ट स्वरूप अपनी आँखों से देखते रह सके।

अब केवल वे ही शाखा एवं अन्तरंग परिजन माने जायेंगे जिनने एक घंटा समय और दस पैसा रोज ज्ञान दान के लिये निकालने का निश्चय किया है और इन प्रयोजन के लिए निर्धारित ज्ञान घट स्थापित कर लिये हैं। सहायक वे लोग माने जायेंगे जिनने ज्ञान घट तो नहीं रखे है। पत्र पत्रिकायें तथा साहित्य रुचि पूर्वक नियमित रूप से अपना माँग कर अथवा दूसरों से माँगकर पढ़ते हैं। जिन तक अपने विचार ही नहीं पहुँचते जो मिशन से परिचित नहीं हो सके उन्हें सम्बद्ध कैसे मान जाये?

सम्मेलन में आने से पूर्व अपने क्षेत्र के सदस्यों एवं सहायकों की लिस्ट बना लेनी चाहिए और हर स्थान पर एक कर्मठ सेवा-भावी एवं लोकेषणा से बचने वाला कार्यकर्ता ‘कार्यवाहक’ निर्धारित कर लेना चाहिए। जो लोग आगे अपने यहाँ ज्ञान घट रखने को सहमत हों उनकी सूचना भी बना लेना चाहिए। इस प्रकार सर्वत्र संगठनों का नवीनीकरण करने के लिए सभी सज्जन आधार बनाकर लंबे और इस स्थापना तथा नियुक्ति का प्रमाण पत्र हमारे हाथों लेते जावे। इस युग निर्माण शाखा संगठन अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक बन सकें इसके लिए भ्रमण करने एवं संपर्क बनाने के प्रयत्न तुरन्त आरम्भ कर देने चाहिए।

युग निर्माण विद्यालय में इस वर्ष कई महत्वपूर्ण सुधार किये गये हैं। अब (1) व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण को आगामी वर्ष देश व्यापी शिक्षण व्यवस्था चलाने का जो प्रबन्ध किया जा रहा है। उसका परिपूर्ण अध्यापन, शिक्षण, छात्रगणों की सम्पन्न करा दिया जायेगा। (2) व्यायाम, खेलकूद, शास्त्र विद्या, भाषण, संगठन एवं साँस्कृतिक कार्यक्रम नियोजित कर सकने की योग्यता उन में उत्पन्न कर दी जायेगी। (3) स्वावलम्बन की दृष्टि से (अ) बिजली का फिटिंग यन्त्रों की मरम्मत रेडियो ट्राँजिस्टर (ब) प्रेस व्यवसाय का समुचित शिक्षण, कम्पोज, छपाई, बाइंडिंग, रबड़ की मुहरें आदि की प्रेस सम्पादन एवं संचालन योग्यता (स) कला भारती के अंतर्गत संगीत, गायन, अभिनय, प्रकाश चित्र प्रदर्शन आदि की शिक्षा, इन तीनों का कार्य नियमित रूप से चलेगा। सप्ताह में एक दिन गृह उद्योग तथा लघु उद्योग विशेष रूप से सिखाये जाया करेंगे। इस प्रकार अब यह प्रशिक्षण गत वर्षों की अपेक्षा भी अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है। प्रयत्न यह कना चाहिए कि ऐसे प्रतिभाशाली छात्र अपने क्षेत्र से भेजे जाये जो इस शिक्षा का उस क्षेत्र में भी प्रसार करके नव-निर्माण एवं जन जागरण की पृष्ठभूमि बना कसें। उनके गुण, कर्म, स्वभाव का जितना आशाजनक परिष्कार होता है उस दृष्टि से किसी छात्र को एक वर्ष फेल होने जैसा जोखिम उठाकर भी उसे इस शिक्षा में भेजा सा सकता है। ऐसे छात्र अभी से तैयार करने चाहिए और उनके लिए नियम एवं आवेदन फार्म मथुरा से मँगाकर दाखिला जल्दी ही करा देना चाहिए ताकि 1 जुलाई से आरम्भ होने वाले शिक्षण में अड़चन न पड़े। हर साल स्थान की कमी के कारण आधे से अधिक छात्रों को निराश रहना पड़ता है। जल्दी चले आने वाले ही लाभ में रहते हैं।

इस वर्ष स्वीकृति प्राप्त छात्रों की समारोह में भी लाया जा सकता है। ताकि वे 15 दिन पूर्व आकर इस अनुपम आयोजन से सम्मिलित रहने, स्वयंसेवक का काम करने तथा दाखिल एवं आशीर्वाद हमारी उपस्थिति में उपलब्ध करने का भाव ले सकें।

6.अगले वर्ष हर शाखा में दो घन्टे को रात्रि पाठशालाएं चलनी है जिनमें 6-6 महीने के प्राथमिक एवं उच्च स्तरीय पाठ्य-क्रम चला सकेंगे। परीक्षा लेने एवं प्रमाण पत्र देने का भी क्रम रहा करेगा। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्राँति के व्यक्ति और समाज निर्माण के सारे तत्व इस शिक्षा पद्धति में मौजूद हैं। दो पुस्तकें प्राथमिक कोर्स की और दो पुस्तकें उच्च स्तरीय कोर्स की हैं जो बनकर तैयार हैं। मूल्य प्रत्येक पुस्तक का पृष्ठ संख्या की दृष्टि से अति सस्ता- दो-दो रुपया मात्र है। अपने यहाँ हर शाखा को इन पाठशालाओं को आरम्भ करने की योजना बनाकर आना चाहिये। स्थान, अध्यापक सम्भावित छात्र आदि की रूपरेखा बनाकर आयें तो न पाठशालाओं की स्थापना की उद्घाटन मथुरा में उस आयोजन के समय पर को देखते हुये हर शाखा को उसका प्रबन्ध करने के लिये आग्रह पूर्वक निर्देश किया गया है।

7.अपना देश 76 प्रतिशत अशिक्षित एवं 78 प्रतिशत देहातों में रहने वाला है। उस तक नव जागृति का सन्देश मात्र साहित्य के आधार पर नहीं पहुँच सकता इसके लिए दृश्य और श्रवण के ऐसे आकर्षण अभीष्ट होगे जो आकर्षण हो और श्रवण के ऐसे आकर्षण अभीष्ट होगे जो आकर्षण हों और यहाँ के बौद्धिक स्तर के लिए समझे जा सकने योग्य हों। इस दृष्टि से संगीत गायन को महत्व दिया गया है और उसे पूरी शक्ति के साथ उभारने के लिये कदम बढ़ाया गया है। अगले वर्ष 4 स्टेशन बेगनें (बड़ी जीप गाड़ियां) इस स्तर की आवश्यक साज-सज्जा के साथ देश व्यापी कार्यक्रमों पर भेजे जाने की व्यवस्था बना ली गई है। इन दोनों में काम करने के लिए तीखे और मधुर गले वाले गायकों एवं हारमोनियम, तबला, क्लारनेट, वंशी, बैंजो, प्रभृति साज बना सकने वाले कला प्रेमियों का आमन्त्रित किया गया है। उनको थोड़े शिक्षण प्राप्त करके प्रचार मंडलियों में भेजा जायेगा और उनके वेतन की तो नहीं पर निर्वाह की व्यवस्था भी की जायगी। इस संदर्भ में रुचि एवं योग्यता रखने वाले को मथुरा से संपर्क बनाने के लिये कहा जाना चाहिए।

इस संदर्भ में अभी-अभी कई संगीत नाटिकाएँ तथा कविता पुस्तकें साहित्यिक हिन्दी में छापी गई है। आगे इस क्रम को और भी तेजी से बढ़ाया जायेगा और अनेक काव्य पुस्तकें लिखी और छापी जायेंगी। प्रारम्भ हिन्दी भाषा से किया गया है। पर चूँकि हमारा लक्ष्य अशिक्षित और देहात में रहने वाला वर्ग ही है, तो उसके लिए प्रान्तीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं में भी इन कविताओं के अनुवाद कराये जायेंगे। इन संदर्भ में हिन्दी तथा प्रान्तीय क्षेत्रीय भाषाओं में अच्छी कविताएं लिख सकने वाले प्रतिभावान व्यक्तियों को आमन्त्रित किया जा रहा है। उनके लिये 5 से 14 जून तक 10 दिन का परामर्श शिविर लगाया जा रहा है। कुछ उपन्यास भी लिखाने हैं सो उस स्तर के साहित्यिकों को भी इसमें सम्मिलित किया जायगा। गायकों और वादकों का चुनाव भी इन्हीं दिनों कर लिया जायेगा। सो उपरोक्त प्रयोजन पूरा कर सकने की क्षमता रखने वाला अपने परिवार के परिजन 5 से 15 जून के शिविर में आने की तैयारी करें। ऐसे लोगों तक सूचना सन्देह पहुँचाने का कार्य अपने कार्यकर्तागण पहुँचाना आरम्भ कर दें। उपरोक्त सात कार्यक्रम अपने सभी कर्मठ कार्यकर्ताओं के सम्मुख अभी से प्रस्तुत कर दिये गये हैं ताकि जो दो मास का समय शेष हैं उसमें इन्हें अधिक से अधिक समय देकर तथा पूरी तत्परता केंद्रीय करके अधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकें। समारोह के अवसर पर हर सक्रिय कार्यकर्ता से पूछा जायगा कि उसने इस सात संदर्भों में क्या किया और कितनी सफलता पाई, सो उनको उत्तर समय पर उत्साह वर्धक बन पड़े इसकी रूपरेखा अभी से मस्तिष्क में समाना चाहिए। सम्भव हो सके तो इन दो महीने में हर सप्ताह अपने प्रयत्नों की सूचना रिपोर्ट मथुरा भेजते रहे सकते हैं ताकि कहाँ क्या हो रहा है? कौन क्या कर रहा है? यह जानने की हमारी उत्सुकता को थोड़ा समाधान मिलता रहे।

आशा है इन सोचे हुए कार्यों का महत्व समझा जायेगा और इन्हें पूरा करने के लिए अधिक गम्भीरता एवं तत्परता पूर्वक हर परिजन द्वारा परिपूर्ण प्रयत्न किया जायगा। यह तत्परता इन विदाई के भाव भरे क्षणों में हमें उत्साह एवं सन्तोष प्रदान कर सकने का एक महत्वपूर्ण आधार बनेगी।


सारी दुनिया नासमझ है।

एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ से आतिथ्य मिला जो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा- हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुख नगर का चन्दन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनन्दनमय बीतेगा।

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चन्दन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अन्तिम पेड़ बचा। वर्षा के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गठ्ठा जब बाजार में पहुँचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा- यह चन्दन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान् है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो। वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसे इतना बड़ा बहुमूल्य चन्दन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा-मित्र, पछताओ मत, यह सारी दुनिया, तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदलें कौड़ी मोल में गँवाते रहते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी कोई मनुष्य अन्त में सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।


दायें बायें हाथ

जिस काम के लिए दाहिना हाथ आगे बढ़ता बाँया उससे पीछे हट जाता। बायें का काम होता तो दाहिना पीछे लौट आता दोनों में अनबन हो गई थी। मिलना तो दूर कभी बात भी नहीं करते थे।

एक दिन दोनों कहीं जा रहे थे। रास्ता पहाड़ी के समीप से गुजरता था रात तूफान आ गया था सो रास्ते भर में टूटे पेड़ों के तने और भारी-भारी पत्थर लुढ़क पड़े थे उन्हें साफ किये बिना आगे बढ़ना कठिन था।

छोटे-छोटे पत्थर तो चुनकर फेंक दिये। छोटे-छोटे डाले थीं उन्हें भी मार्ग से हटा दिया पर आगे पड़ी थी भारी भरकम पत्थरों की शृंखला। दाहिना हाथ आगे बढ़ा उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी पर पत्थर टस से मस न हुआ। बायां हाथ चुपचाप यह दृश्य देखता खड़ा मुस्कराता रहा। पर उससे इतना भी न हुआ कि अपने भाई को थोड़ा सहयोग तो देता। भाई थककर चकनाचूर हो गया।

जब दाहिने हाथ के बस की बात न रही तब बायाँ हाथ आगे बढ़ा। झपट देखने योग्य थी। बायें हाथ महोदय ने सारा जोर पहली बार ही झोंक दिया पत्थर तो अपने स्थान से नहीं हटा, हाँ बायाँ हाथ फिसल और गया बच गया नहीं तो हड्डी टूट जाती।

मस्तिष्क अब तक खड़ा चुपचाप तमाशा देख रहा था अब उससे रहा न गया उसने कहा-मूर्खों तुम भी लगता है मनुष्य जाति की तरह हिम-मिलकर काम करना भूल गये तभी तो यह जरा-सा-पत्थर का टुकड़ा भी उठा पाने में समर्थ नहीं हो रहे।

हाथों को अपने अज्ञान पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उस दिन से मनोमालिन्य त्याग कर दिनों साथ-साथ काम करने लगे।

अपने पैरों पर खड़े हो किसी चिड़िया ने चोंच में दबाकर पीपल का एक बीज नीम के तने में डाल दिया। वहाँ थोड़ी मिट्टी, थोड़ी नमी थी बीज उग आया और धीरे-धीरे उस वृक्ष में ही आश्रय लेकर बढ़ने लगा।

प्रारम्भ में तो लगा कि यह पौधा प्रगति कर रहा है पर शीघ्र ही पता चल गया कि उसका आविर्भाव तो परावलंबी है दूसरों की कृपा सीमित ही हो सकती है। सो सीमित साधनों में पेड़ भी थोड़ा ही बढ़ पाया। न जड़ों को विकास के लिये स्थान मिला न डालों को फैलने के लिए सो वह छाती का पीपल थोड़ा ही बढ़कर रह गया।

एक दिन उसने बड़े वृक्ष को डाँटते हुए कहा- दृष्ट तू स्वयत् तो आकाश छूने जा रहे है और मुझे थोड़ा भी बढ़ने नहीं देता। अब तूने शीघ्र ही मुझे विकास के और साधन न दिये तो तेरा सत्यानाश कर दूँगा।

नीम के वृक्ष ने समझाया-मित्र औरों की दया पर पलने वाले इतना ही विकास कर सकते हैं, जितना तुमने किया है। उससे अधिक करना हो तो नीचे उतरो और अपनी नींव आप बनाओ, अपने पैरों पर आप खड़े हो।

पौधे से वह तो नहीं बना हाँ वह वृक्ष को कोसने से बाज नहीं आया। नीम वृक्ष को इतनी फुरसत कहाँ थी जो पीपल के पौधे-की गली गलौज सुनता।

एक दिन हलकी-सी आँधी आई। नीम का वृक्ष थोड़ा ही हिला था पर जब नींव ही कमजोर थी तो रोकता कौन पीपल का पौधा धराशायी होकर मिट्टी चाटने लगा।

उधर से एक राहगीर निकला- उसने एकबार नीम के वृक्ष की और देखा दूसरी बार पीपल की ओर-धीरे से उसने कहा जो औरों के आश्रय में बढ़ने की आशा करते हैं उनकी अन्त गति यही होती है।


विदाई की घड़ी

(माया वर्मा)


विदाई की घड़ी (Kavita)

जनम भर न बैठा कभी चैन से जो, लिये साथ बेचैनियाँ जा रहा हैं!

खुली आँख, देखा जगत की व्यथा को, पढ़ा वेदना से कसकती कथा को,

पिघल तब गया वह हृदय मोम वाला, छलक ही गया नेत्र का अश्रु प्याला,

हँसा जो हमारे लिये-साथ रोया, वही दूर हम से चला जा रहा है।

पुकारा हमें यों कहा-साथ आओ, प्रभाती प्रहर में सृजन गीत गाओ,

उठो साथ मेरे चलो युग बदलने, हवा की तरह आँधियाँ वन मचलने,

मगर हम न जागे रहे आँख मींचे, अरे! क्षण विदाई भरा आ रहा है।

जनम भर नई ज्योति जग में जगाई, न मन में कभी भी शिकन झाँक पाई,

मिटाने सघन तम स्वयं जो जला है, हृदय कंटकों बीच जिसका खिला है।,

हुआ दूर है पथ प्रदर्शक सितारा, हृदय तल हमारा हिला जा रहा है।

नयन में भरे आस कण देखता है, सुनो! चिरप्रवासी तुम्हें टेरता है,

अगर दे सको एक विश्वास दे दो, उसे प्राण का आज उल्लास दे दो,

चला जायगा बाँध आशा हृदय में, सदा के लिये जो चला जा रहा है।

जनम भर बैठा कभी चैन से जो, लिये साथ बेचैनियाँ जा रहा है।

*समाप्त*