दुर्भाग्य कभी हाथ धोकर पीछे पड़ जाये, ऐसा लगे कि एक भी उपाय प्रगति पथ पर स्थिर रखने में समर्थ नहीं, सभी ओर असफलता ही असफलता, अंधकार ही अंधकार प्रतीत हो रहा हो तब तुम महापुरुषों के ग्रंथ पढ़ना, विचारों का सत्संग तुम्हारे जीवन में फिर से प्रकाश लायेगा, तुम्हारे दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की शक्ति उत्तम ज्ञान में सन्निहित है उसे जब कभी ऐसा अवसर आये ज्ञान-देवता की ही शरण ग्रहण करना।
समस्त जातियाँ साथ छोड़ दें, मित्र, पड़ोसी और कुटुम्बी भी अपने स्वार्थ के लिए संघर्ष कर दें अथवा तुम्हें जीवन पथ पर चलने के लिए असहाय एकाकी छोड़ दें तब तुम उत्तम पुस्तकों को मित्र बनाकर आगे बढ़ना एकाकी और असह्यपन के बीच तुम्हें मौन मैत्री और प्रकाश की वह किरण मिल जायेगी जो तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँचा देगी।
मन्दिर, गिरजे, मस्जिद गुरुद्वारे टूटकर खंडहर बन जाते हैं, गिरकर नष्ट हो जाते हैं। लेकिन उत्तम ज्ञान और सच्चे विचार कभी नष्ट नहीं होते। ज्ञान देवता का वरदान पाकर मनुष्य निहाल हो जाता है। ज्ञान वह सीपी है जिसमें प्रवेश कर मनुष्य का जीवन मोती बन जाता है।
-सैम्युअल स्माइल
उत्पलवरर्गा, श्रावस्ती के कोषाध्यक्ष की अनुपम सुन्दरी कन्या शेडशवर्ष पर चुकी है। यौवन का निखार अपने आप ही आकर्षक होता है फिर उत्पलवरर्गा तो अनुपम काँति वाली अद्वितीय सौंदर्यवती भी थी। राग उसके अंग-प्रत्यंग से फूट रहा था। अधरों में गुलाब का परिमल, रतनारे नयन, सुन्दर ग्रीवा, कल-कंठ ऐसा लगता था उसके सौंदर्य के साथ स्वयं ब्रह्म ही व्यक्त हो उठा है।
यही कारण था कि अनेक श्रेष्ठी- सामन्तों तथा राजकुमारों की ओर से स्वयं ही विवाह के लिए प्रार्थनाएं आने लगी। शर्मा प्रकाश के लिए जलाई जाती है, किन्तु शुलभ उसे बुझाने लग जायें तो जलाने वाले का क्या दोष। सौंदर्य सत्य का राजदूत है पर यदि उसे वासना का माध्यम मान लिया जाये तो रचनाकार का क्या दोष ? कोषाध्यक्ष के समक्ष उत्पलवरर्गा का सौंदर्य आज समस्या बन गया था। उसका हाथ किसे तो दे किसे न दे इसका निर्णय करना भी कठिन हो रहा था।
इसी चिन्ता में डूबे हुए पिता को देखकर उत्पलवर्णा का स्वयं पिता के पास जाकर बोली-तात! आपसे एक बात पूछूं-? पिता ने दृष्टि उठाई और पुत्र के शीश पर हाथ फेरते हुए कहा-कहो क्या कहना चाहती है उत्पल!
उसी गम्भीरता से उत्पलवर्णा ने कहना प्रारम्भ किया तात! आपने नहीं सुना क्या गंगातीर वासी ने पहले विवाह किया। अपनी तृष्णायें शान्त करने के लिए उसने भार्या के जीवन तत्व को निचोड़ा फिर उसने एक अन्य स्त्री को रख लिया, उसके गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई उसे भी उसने सहगामिनी बनाया-जिस काल में सामाजिक व्यवस्थायें और मर्यादायें इस तरह तिनके का ढेर हो जावें। नीति कहती है उस समय विचारशील लोगों को अपने लौकिक हितों का परित्याग कर देना चाहिए और व्यक्ति तथा समाज के जीवन में नया प्रकाश लाने का प्रयास करना चाहिए। आपकी चिन्ता एक योग्य बर तलाश करने की है और मेरे सौंदर्य के झूठे आकर्षण से बचने की। विवाह का प्रस्ताव लेकर आये किसी भी कुमार में मुझे आदर्श जीवन का स्थायित्व नहीं दिखता यह सब तो रूप के प्यासे कीट-पतंगे है इनसे दूर ही रहना अच्छा। आप आज्ञा दें तो मैं आजीवन अविवाहित रह जाऊँ और अपने पथ भ्रष्ट समाज को अपनी शक्ति व साधना द्वारा सीधे सच्चे मार्ग पर लाने का प्रयास करूं।
आर्य पिता ने अपनी कन्या से संस्कार व स्वाभिमान से दमकते मुख-मण्डल की ओर देखा उसमें पूर्ण निश्रिवत दृढ़ता झलक रही थी मारे स्नेह के उसे हृदय से लगाते हुए कहा-उत्पल! तुम धन्य हो। अपने सुख का ध्यान न देकर तुमने साधना व समाज सेवा को महत्व दिया तुम्हारा यह आदर्श युगों-युगों तक भारतीय नारी और उसके पुत्रों को अंतर्वर्ती जीवन की प्रेरणायें और प्रकाश देता रहेगा।
उत्पलवर्णा ने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली। भगवान् बुद्ध ने अपना पितृ तुल्य स्नेह, अपनी साधना की शक्ति, अपना ज्ञान देकर उसे आत्म- दर्शन की-स्थिति तक पहुँचाया। सिद्धावस्था प्राप्त उत्पलवर्णा ने धर्मोद्धार के कार्य में तथागत का हाथ बंटाया और कुँठा ग्रस्त भारतीय समाज को ऊँचा उठाने का महान् यज्ञ अर्जित किया।
जिस देश अथवा राष्ट्र में नारी-पूजा नहीं- उसका यथोचित सम्मान नहीं, वह देश या राष्ट्र कभी महान या उन्नत नहीं हो सकता। नारी रूपी शक्ति की अवमानना करने से ही, आज हमारा अधःपतन हुआ है, स्त्रियाँ माता की प्रतिमा है-शक्ति स्वरूपा है, जब तक उनका उद्धार न होगा, तब तक हमारे देश का उद्धार होना असम्भव है। देशोत्थान के लिए नारी उत्थान अनिवार्य है। -स्वामी विवेकानन्द
भक्त का मार्ग परमात्मा प्रकाशित करता है
आ-जानय द्रुहणों पार्थिवानि। दिव्यानि दीपयोउन्तरिक्षा॥ ऋग्वेद 6।22।8
करुणा -जय और अनुग्रह प्राप्ति समर्पण की सहजात क्रियायें है। भोला-भाला बालक यद्यपि साँसारिकता से नितान्त अनभिज्ञ होता है, किसी बच्चे का वन में अकेला छोड़ दिया जाये तो उसका जीवन तक संकट में पड़ सकता है पर वह अपनी माँ के प्रति पूर्ण समर्पित होने के कारण इस बात की कभी कल्पना भी नहीं करता। माँ भी बच्चे के विश्वास की रक्षा हर प्रकार से भूखी, प्यासी निरालस करती है, कभी आवश्यकता पड़ जाये तो वह सप्ताहों बिना निद्रा रह लेगी पर बच्चे के विश्वास को कभी धोखा नहीं देगी।
अपनी शक्तियों को तुच्छ मानकर शिष्य गुरु वन्दना करता है। शिक्षा, कला, उद्योग कोई भी क्षेत्र क्यों न हो मार्ग-दर्शक की आवश्यकता सभी को पड़ती है मार्ग-दर्शन प्राप्त सभी को करना पड़ता है पर गुरुजन अपनी समस्त विद्यायें और क्षमतायें उड़ेलते हैं केवल श्रद्धा और निष्ठा में सुदृढ़ और अपने आपको उनके प्रति समर्पित शिष्यों पर। समर्पण-सरलता मनमोहक गुरु है वे जिस किसी के प्रति उन्मुख होते हैं उसके अन्तःकरण में करुणा और वात्सल्य उभारे बिना नहीं रहते।
पंच तत्वों को समर्पित प्रकृति का हर करा सौंदर्य सुषमा से ओतप्रोत मिलेगा उसमें उनका असीम अनुग्रह ही वृक्षों में हरियाली रंग-बिरंगे फूलों, और सुन्दर सुगन्ध के रूप में फूटता है। निसर्ग सौंदर्य का अनन्त और अदृश्य भाण्डागार है पर वह हर किसी को नहीं मिलता यह विशेषतायें सिद्धियाँ और सामर्थ्य तो उन्हीं को मिलती हैं जो अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर पंच महाभूतों के आँचल में समर्पित कर देते हैं प्रकृति देवी को समर्पित जीवन शुद्ध, स्वस्थ, सौंदर्य शील और सुवासित हो उठता है। समर्पण की महिमा को जितना गाया जाये कम है।
अपराध किये लोग कई बार यह अनुभव करते हैं कि जान या अनजान में उनसे भूल हुई तो वह अपने को जान या अनजान में उनसे भूल हुई तो वह अपने को कानून के न्यायाधीश के हवाले कर देते हैं। न्यायाधीश यद्यपि विधान के अनुसार दण्ड देने के लिए विवश होता है, सजा न दे तो विधान नष्ट होता है अतएव सजा तो कुछ न कुछ भोगनी ही पड़ती है पर न्यायाधीश का अन्तः स्नेह अपराधी के पक्ष में हुये बिना रहता नहीं तब वह कुछ सजा भी कम कर देता है। कुछ उसकी दया अपराधी को शक्ति देती है तो शेष दण्ड भी सहनीय बन जाता है।
जघन्य अपराधी तक जब समर्पण के फलस्वरूप न्यायाधीश की दया के पात्र बन सकते हैं तो सारे विश्व की नियामक-दयासागर सत्ता भला अपने भक्त, के प्रति अनन्य वत्सल न बने ऐसा कैसे हो सकता है। लवाई गाय का बछड़ा अपनी माँ के लिए केवल टेर करता है और माँ उससे दुगुने वेग से रम्भाती भी है और आतुरता पूर्वक हाँफती हुई बच्चे को प्यार पय पान कराने के लिए भागती भी है। सामान्य पशु में यह भाव हो तो जो विशुद्ध भावों से ही बने भगवान् के अन्तःकरण से कितना वात्सल्य छलक सकता है इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, हम जितने वेग से आत्मार्पण करते हैं भगवान् इससे हजार गुना अधिक शक्तिशाली प्रेम और अनुग्रह प्रदान करता है।
विश्वास-पात्र और संरक्षक संसार में बहुत है पर उन सब में कोई न कोई स्वार्थ हो भी सकता है किन्तु परमात्मा जो कि सृष्टि मात्र का पिता है, उससे सुदृढ़ संरक्षक और विश्वासपात्र दूसरा कोई हो नहीं सकता। जो अपने अन्तःकरण के द्वार खोलकर परमात्मा को अपने भीतर प्रवाहित होने देना चाहता है परमात्मा उसे अपनी समस्त शक्तियों और प्रतिभाओं से ओत प्रोत कर देता है। यही नहीं अपने भक्त के जीवन मंगल का समस्त उत्तरदायित्व भी पूरा करने का उसने संकल्प लिया हुआ है गीता में अपने इसी वचन को दोहराते हुए भगवान् कृष्णा ने कहा है-
“तेषाँ सतत् युक्तानाँ योग क्षेमं वहाम्यहम्”।
अर्थात्-हे अर्जुन! अनन्य भाव से समर्पित अपने भक्त की कुशल क्षेम का वहन मं स्वयं करता हूँ।
संसार बड़ा विविध और विराट् है उसमें कुछ ऐसी जटिलता उत्पन्न हो गई है कि कई बार तो हित और अनहित की पहचान भी नहीं हो पाती, पदार्थों के आकर्षण इन्द्रियों की वासनायें, अपनों के स्वार्थ औरों से संघर्ष सभी मिलकर सुख सुविधाओं का, प्रतिरोध करते हैं मनुष्य अपने आपको ऐसी परिस्थितियों में बड़ा अशान्त और असहाय अनुभव करता है कई बार तो परिस्थितियाँ इतनी विषम हो जाती है कि मन चिन्ताओं से क्षोभ और शोक संवेदना से पूरी तरह घिर जाता है ऐसे अवसरों पर मानवीय प्रयत्न काम नहीं देते तब अदृश्य सहयोग की हर किसी को अपेक्षा होने लगती है। ऐसा लगने लगता है बिना ईश्वरीय अनुग्रह के जीवन रथ आगे बढ़ नहीं पायेगा।
तब परमात्मा ही से प्रेरणा देता है और अपनी शक्तियों से उसके टूटे हुये जीवन में नय चेतना का संचार करता है, हारे, थके जीवन यात्री की गाड़ी फिर आगे की ओर बढ़ चलती है और मनुष्य अपने अशान्त, असहाय जीवन में भी परमशान्ति और शक्ति अनुभव करता हुआ आगे बढ़ चलता है। इसी सत्य को ऊपर दिये गये मन्त्र में पिरोते हुए मन्त्रदृष्टा लिखते है-परमेश्वर अपने भक्तों का मार्ग हमेशा प्रकाशित करता है और उनकी सब प्रकार से सहायता करता है।
मानव-जीवन का अनुपम सौभाग्य
मानव-जीवन भगवान् की दी हुई सर्वोत्तम विभूति है। इससे बड़ा वरदान और कुछ हो नहीं सकता। सृष्टि के समस्त प्राणियों को जैसे शरीर मिले है, जैसे सुविधा साधन प्राप्त है, उनकी तुलना में मनुष्य की स्थिति असंख्यों गुनी श्रेष्ठ है। दूसरे जीवों का सारा समय और श्रम केवल शरीर रक्षा में ही लग जाता है, फिर भी वे ठीक तरह उस समस्या को हल नहीं कर पाते। इसके विपरीत मनुष्य को ऐसा अद्भुत शरीर मिला है जिसकी प्रत्येक इन्द्रिय आनन्द और उल्लास से भरी पूरी है, उसे ऐसा मन मिला है जो पग-पग पर हर्षोल्लास का लाभ ले सकता है, उसे ऐसी बुद्धि मिली है जो साधारण पदार्थों से अपनी सुख सुविधा के साधन विनिर्मित कर सकती है। मानव-प्राणी को जैसा परिवार, समाज, साहित्य तथा सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा वातावरण मिला है वैसा और किसी जीव को प्राप्त नहीं हो सकता।
इतना बड़ा सौभाग्य उसे अकारण ही नहीं मिला है। भगवान् की इच्छा है कि मनुष्य उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी अधिक समृद्ध और समुचित बनने में उसका हाथ बटाये। अपनी बुद्धि क्षमता और विशेषताओं से अन्य पिछड़े हुए जीवों की सुविधा का सृजन करें और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरते जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।
-सन्त तिरुवल्लुवर
2 फरवरी 1647 के नेशनल हेराल्ड में एक लेख छपा था-वैज्ञानिक भगवान में विश्वास क्यों करते हैं (व्हाई साइंटिस्ट्स बिलीव इन गॉड)। विद्वान लेखक ने उसमें यह बताने का प्रयत्न किया है कि संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम पर काम करता है यदि उनमें व्यवस्था और अनुशासन न होता तो इतना विराट ब्रह्मांड एक क्षण को भी टिक न सकता। एक किरण कि विस्फोट से ही अनन्त प्रकृति में आग लग जाती और अब संसार अग्नि ज्वालाओं के अतिरिक्त ओर कुछ भी न होता।
नियामत विधान किसी मस्तिष्कीय सत्ता का अस्तित्व में हो प्रमाणित करते हैं। हमारे जीवन का आधार सूर्य है। 1 करोड़ तीस लाख मील दूरी पर बसा सूर्य अपनी प्रकाश किरणें भेजता है वह प्रकाश आठ मिनट में पृथ्वी पर आ जाता है जिससे यहाँ का जीवन चलता है। दिनभर में यहाँ के वातावरण में ऐसी सुविधायें एकत्र हो जाती है कि रात आराम से कट जाती है तब तक सूर्य अपनी सेवा के लिए फिर आ जाता है। सूर्य के लिए पृथ्वी समुद्र में एक बिन्दु के समान है फिर पृथ्वी में रूस के साइबेरिया प्रान्त के एक गड़रिये के घर में रहने वाली चींटी का उसकी तुलना में क्या अस्तित्व हो सकता है पर वह भी जिन्दा रहती है इतनी बढ़िया व्यवस्था संसार के किस मनुष्य के पास है ?
इस सूर्य के अनन्त अन्तरिक्ष का एक नन्हा-सा तारा, इससे तो 15 हजार गुना बड़ा रीजल तारा ही हैं उससे भी बड़ा “अन्टेयर्स” नामक लाल सूर्य जो अपने भीतर 3 करोड़ साठ लाख गोलों को बैठाकर भोजन दे सकता है। जबकि उससे भी बड़े तारे ब्रह्मांड में है। जून 1967 के ‘साइंस टुडे’ 8 अंक में “ग्राह्म बेरी” ने लिखा है कि पृथ्वी से छोटे गृह भी इस संसार में है और 5 खरब मील की परिधि वाले भीमकाय नक्षत्र भी हैं। यह बड़े तारे तो 3 लाख वर्ष ही जीवित रहते हैं जबकि ऐसे छोटे नक्षत्र भी है मृत्यु जिनका 3 पद्य वर्ष तक भी कुछ बिगाड़ न सकेगी। इतना विराट् ब्रह्मांड भी गणित के नियम पर कितनी सुन्दरता के साथ चल रहा है उसे देखकर यही प्रतीत होता है कि जिस तरह सूर्य अपने गुरुत्वाकर्षण और अपनी प्राण शक्ति से सौर मण्डल को नियम पूर्वक चला रहा है उसी प्रकार अनन्त ब्रह्मांड का भी कोई नायक होना अवश्य चाहिए जो सारे विश्व को एक क्रम व्यवस्था में चला रहा है।
सूर्य अपने केन्द्र पर 1 करोड़ साठ लाख डिग्री गर्म है यदि पृथ्वी के ऊपर “आयनो स्फियर” की पट्टियाँ न चढ़ाई गई होती तो पृथ्वी न जाने कब जल गई होती। उल्कापात से रक्षा, विकिरण से रक्षा भी यह अयन मंडल करता है। फिर सूरज अपने स्थान से थोड़ा सा ही नीचे आ जाये तो दानों ध्रुवों की बर्फ पिघल जाये और सारी पृथ्वी एक हवा में उड़ती हुई झील बन जायें। जिसमें जलचर जन्तु भले ही रह जायें थल और वायुचरों का तो पता भी नहीं चले। यह भी सम्भव है कि वह पानी भी खोल उठें और खोलकर खुद तो भाप बनकर उड़ जायें पर पृथ्वी जलकर राख हो जाये। यदि सूर्य थोड़ा सा ऊपर चला जाये तो ऐसी भयंकर शीत लहर पृथ्वी पर आ जायें कि यहाँ की प्रत्येक वस्तु जमकर बर्फ बन जायें। ऐसी कोई परिस्थिति एकाएक बन जाती यदि सौर मंडल एक क्रम विधान पर न होता और यह बताते है कि संसार ऊटपटाँग नहीं वरन् एक असामान्य बुद्धि द्वारा संचालित हो रहा है।
इसी प्रकार पृथ्वी प्रति घण्टे 1 मील की गति से घूमती है कहीं यह गति 5å मील प्रति घण्टे की हो जाती तो रात और दिन 240-240 घण्टे के होते। 120 घण्टे में आकाश में चढ़कर आये सूर्य की प्रचण्ड गर्मी और आधी रात की प्रचण्ड शीत पृथ्वी में छोड़ पद-चिन्ह अपने झण्डे छोड़ जाते और कहते कि पृथ्वी में छोड़ आये ये उपकरण 1 लाख वर्ष तक अमिट बने रहेंगे। चन्द्रमा भी इसी प्रकार थोड़ा नीचा हो जाता तो समुद्री ज्वार भाटे हिन्द महासागर से चलते और गौरीशंकर शिखर तक की प्रत्येक वस्तु को समेट ले जाकर समुद्री खजाने में जमा कर देते।
सूर्य चन्द्रमा की बातें छोड़ दीजिये हम परमाणुओं के जिस तालाब में जलचरों की तरह जीते और साँस लेते हैं उसके एक परमाणु में ही 27 लाख किलो कैलोरी ताप है यदि इस विद्युत शक्ति को परमाणु की प्रकृति ने शोषित और प्रसुप्त करके न रखा होता तो जीवन का अस्तित्व एक क्षण भी टिकना संभव न रहा होता। इन परमाणुओं की गति का तो कहना ही क्या। परमाणु नामक के समीप वाला इलेक्ट्रान 135ååå किलो मीटर प्रति सेकेंड की प्रचण्ड गति से चलता है यदि प्रकृति में यह चार्ज क्रियाशील रहा होता तो हम कुल 16 सेकेंड में पृथ्वी से उड़कर सूर्य तक जा पहुँचे होते। ऐसी विद्युत चुम्बकीय आँधी चलती जो समस्त ब्रह्मांड को झकझोर कर सेकेंडों में पीस देती।
प्रकट पदार्थों और जीवों में ही विलक्षण वैषम्य है। एक बार आस्ट्रेलिया का एक जीवनशास्त्री भारतवर्ष से नागफनी का पौधा ले गया और उसने सुरक्षा के लिये खेतों की मेड़ों पर लगा दिया। नागफनी बढ़ने लगी और इस तरह बढ़ी कि हजारों एकड़ जमीन इन्हीं से पट गई तब एक छोटा-सा कीड़ा ले जाया गया जिसने कुछ ही दिनों में नागफनी को खा-पीकर बराबर कर दिया। पोलियो खतरनाक बीमारी है। पिन की एक नोक पर पोलियो के विषाणु (वायरस) करोड़ों की संख्या में आ सकते हैं ऐसे सूक्ष्म विषाणु हजारों की संख्या में मुक्त भ्रमण कर रहें हैं फिर भी जगत में जीवन क्रम सानन्द चल रहा है और यह बता रहा है कि संसार में जन्म देने वाला बड़ा बुद्धिमान है वह निर्माण और विनाश के झूले में झूलते संसार के पालन और पोषण का उत्तरदायित्व बड़ी ही सूझ-बूझ से निभाता चला जा रहा है।
संसार में कोई न कोई विधायक सत्ता है अवश्य यदि वह न होती तो संसार की भीषण विपरीत परिस्थितियाँ यहाँ कुछ भी रहने न देतीं। या तो सर्वत्र दहकती हुई आग होती या चमकता हुआ सूरज और नाचते हुए इलेक्ट्रान नियम व्यवस्थायें ईश्वर के विधान है वैज्ञानिक भूल भटक कर उसी भगवान् तक पहुँचें तो आश्चर्य नहीं, आज की प्रगति उसी दिशा में है भले ही वह ध्वंस और संघर्ष प्रधान हों, कदाचित भाव को, भावनाओं के द्वारा जाना जाता तो मनुष्य की सामर्थ्य का कुछ ठिकाना न होता क्योंकि वह भी तो उसी महत् संकल्प और परा-तत्व का अंश है।
याद रक्खो कि सम्पूर्ण जगत एक शरीर है, तुम्हारा शरीर हाथ की तरह एक अवयव है, केवल उंगली या नख के तुल्य है यदि तुम सफल होना चाहते हो तो तुम्हें अपने आत्मा को अखिल विश्व के आत्मा से भिन्न और पृथक न समझना चाहिए हाथ के फलने-फूलने के लिए यह आवश्यक है कि वह समग्र शरीर के हितों से अपने हितों की संवेदना का अनुभव करे। दूसरे शब्दों में हाथ को यह समझना और अनुभव करना होगा कि उसका आत्मा केवल कलाई तक की सीमा से स्थिर नहीं है बल्कि उसे व्यावहारिक रूप से समग्र शरीर के आत्मा से अपने को एक और अभिन्न समझना पड़ेगा। समग्र शरीर के आत्मा को खिलाना हाथ के आत्मा को खिलाना है। जब तक तुम इस तथ्य का अनुभव और इस सत्य का आचरण न करोगे कि तुम और विश्व एक हो, कि मैं और ईश्वर एक हूँ, तब तक तुम्हें सफलता नहीं मिल सकती है। वियोग और वेदना के कीचड़ में जब तुम फंसते हो तब तुम सुख-विहीन और पीड़ा में लीन रहते हो। तु अपने आपको समग्र और सर्व अनुभव करते हो तो वास्तव में पूर्ण और सर्व हो जाते हो।
ऊष्मा (हीट) ऊर्जा, प्लाज्मा तथा विद्युत ऐसे हैं जिनका कोई स्वरूप नहीं है फिर भी वैज्ञानिक उनके प्रभाव के कारण उनका अस्तित्व स्वीकार करते हैं यही नहीं यह शक्तियाँ हमारे जीवन के हर क्षेत्र में क्रियाशील भी हो गई हैं। हमारे लिये ताप, ऊर्जा, प्लाज्मा और विद्युत साधारण सी वस्तुयें हो गई हैं उनकी उपस्थिति सभी अनुभव करते हैं पर उन्हें आज तक कोई खुली आँखों देख नहीं सका।
अब जैसे जैसे प्रकाश के अन्य विलक्षण स्रोतों की जानकारी होती जाती है वैसे-वैसे जीवन तत्व और प्रकाश में विद्यमान विद्युत चुम्बकीय गुणों की एकता का पता चलता जाता है। “क्वासार” प्रकाश ने इस दिशा में गजब की हलचल पैदा की है। वैज्ञानिक जहाँ विभ्रमिक हो रहे हैं वहाँ अब जीवन तत्व के बारे में नई धारणाएं भी बन रहीं हैं “एवप्लाजन इन एस्ट्रानामी के लेखक ग्राहम बेरी ने “साइंस टूडे” के 1967 के अंग में द्वितीय पैराग्राफ में स्पष्ट लिखा है-सुन्दर शरीर वास्तव में क्वासार है 40 वर्ष पूर्व आकाश गंगा की खोज होने पर इन “क्वासार किरणों” ने ज्योतिर्विदों में सबसे बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। आकाश में नीला तारा पदार्थ वैतन्तुक तारा पुँज तथा एक्सरे स्रोत भी पाये जाते हैं जो संसार में एक सर्वभेदी और सर्वशक्तिमान तत्व की उपस्थिति प्रमाणित करते हैं। साथ ही क्वासार तथा नील तारा पदार्थ एक ऐसे दीर्घ इच्छित पदार्थ माने जाते हैं, जो संसार के सुदूर भागों को भी प्रकाशित कर दें (सर्वव्यापकता का गुण) और जिससे हम देख सकें कि वहाँ क्या हो रहा है यहाँ तक कि बहुत पहले वहाँ क्या हो रहा था वह भी देख सकते हैं” यह त्रिकालज्ञता तथा अनादि होने के गुण हैं और वह भारतीय दर्शन के ईश्वरवाद के नियम की बड़ी समीपता से पुष्टि करते हैं।
ऐतरेयोपनिषद में देवताओं की अन्न और शरीर की उत्पत्ति सम्बन्धी बड़ी ही महत्वपूर्ण आख्यायिका आती है। इसमें बताया गया है कि जब शरीर में सभी देवताओं के निवास की व्यवस्था हो गई तब परमात्मा ने विचार किया कि-पूर्ति में व्यस्त मनुष्य शरीर कहीं देवताओं की इच्छाओं में द्वंद्व का अखाड़ा न बन जो अतः उसने शरीर में अपनी उपस्थिति अनिवार्य समझी तब स एतमेव सीमानं विदार्येतया द्वारा प्रापद्यत’ उसने मूर्धा को चीरकर स्वयं प्रवेश किया इस तरह उसने ब्रह्मांड में उपस्थित रहकर भी मूर्धा में वास किया।
अभी तक सहस्रार में ब्रह्म को प्राप्त करने की विद्या योगीजन ही जानते थे पर अब विज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है।
मनुष्य की मृत्यु तब तक क्लि निकल मृत्यु मानी जाती है पूर्ण नहीं जब तक कि मस्तिष्क के ग्रे मैटर (भूरी राख की शक्ल का पदार्थ) वाले कोश नष्ट नहीं होते। यह पदार्थ एक विलक्षण आश्चर्य है मस्तिष्क में उनमें सर्वव्यापकता भरी हुई है यह विज्ञान भी जान गया है। यदि भारतीय दर्शन के अनुसार यहाँ ईश्वरीय प्रकाश की उपस्थिति है तो भूरी राख की उपस्थिति जीवन के साम्य प्रकाश-स्रोतों में भी होनी चाहिए। यह बात भी अब प्रकाश में आ गई थी। उपरोक्त लेख के लेखक ने उसी लेख में लिखा है कि सभी नक्षत्र हाइड्रोजन बादल से भरे हुए है जो आकर्षण शक्ति से गैस को थोड़े-थोड़े घेरे में गाढ़ा कर जाते हैं जब गैस के परमाणु निकट आते हैं टकराते और उनके टुकड़े गर्मी पैदा करते हैं तब इन बादलों के भीतरी भाग का तापमान 5 लाख डिग्री फारेनहाइट तक हो जाता है। समाधि अवस्था के परीक्षण इस बात के साक्षी है कि उस समय मस्तिष्क का शिखा वाला भाग बहुत अधिक गर्म हो उठता है क्योंकि उस समय विचार क्षेत्र में अत्यधिक क्रियाशीलता से वहाँ के कोशों में असाधारण गर्मी उत्पन्न हो जाती है। जब व्यष्टि अग्नि भीतरी भाग में सुलग जाती है तब हाइड्रोजन ईंधन राख के रूप में बदल जाता है। मस्तिष्क में शून्य स्थान (वेन्ट्रिकल्स) के द्रव्यमान के फलस्वरूप यह क्रिया संपन्न होती है और उससे असाधारण शक्ति का विस्तार होता है। योगी सिद्धान्त इस शक्ति को पाकर ही ईश्वरीय क्षमताओं से ओत-प्रोत हो जाते हैं। हाइड्रोजन का राख में बदलना नक्षत्रों को अधिकाँश जीवन देना है। हाइड्रोजन समाप्त हो जाने पर नक्षत्र फैलने लगते हैं और वे लाल शैतान की तरह हो जाते हैं। सूर्य की 55 खरब वर्ष की आयु का अनुमान इसी बात से किया जाता है। योगीजन भी इसी प्रकार मस्तिष्कीय द्रव्य और बौद्धिक क्षमता के आधार पर किसी भी व्यक्ति के जीवन मरण का हाल किताब में लिखें अक्षरों की भाँति पढ़ लेते हैं यह एक ईश्वरीय गुण है जो सृष्टि में सर्वत्र प्रकाश के रूप में व्याप्त हैं।
वैज्ञानिक गवेषणा के लिए अभी प्रकाश तत्व का विशाल क्षेत्र वैज्ञानिकों के सामने परीक्षण के लिए पड़ा है। आये दिन नये-नये ज्योति, स्रोतों का पता चलता जा रहा हैं। कौन जाने किसी दिन किसी ऐसे तारे की, प्रकाश स्त्रोत की खोज हो जाये तो पूरी तरह ईश्वरीय गुणों से ओत-प्रोत हों, भारतीय तत्वदर्शियों ने अपनी योग दृष्टि से उसका पता बहुत पहले ही लगा दिया है और लिखा है-
ऋतञच सत्यच्चाभीद्धस्तपसोडध्य जायत। ततोवात्य जायत। ततः समुद्रोअर्गाव समुद्रोदर्रावदिधि संवत्सरो आजयत अहो-रात्राणी विद्धविश्वस्यमिषतो वशी सूर्या चन्द्रमसो धाता यथा पूर्वम कल्पयत्। दिवच्च पृथिवीच्चन्त रिक्षमथोस्वः।
अर्थात् सर्वत्र प्रदीप्त तपस् शक्ति के अनंत स्रोत) से ऋत (क्वान्त क्षेत्रों का स्पन्दन) और सत्य (धन व ऋण आवेश) उत्पन्न हुआ उसे समूचे विश्व को बचाने वाला द्रव्य उत्पन्न हुआ। यह प्रदीप्त तत्व बहकर तोर, अहोरात्र और संवत्सर का निर्माण हुआ उसी से विधाता ने सूर्य चन्द्रमा अन्तरिक्ष, आकाश और पृथ्वी की रचना की।
इस तरह यह स्पष्ट है कि भारतीयों ने परमात्मा की जो कल्पना की है वह कोई कल्पना नहीं वरन् एक दर्शन है आज नहीं तो कल विज्ञान उसी मूल बिन्दु पर पहुँचेगा भले ही उसके लिए कुछ देर क्यों न लगे।
अमरीका का मिसूरी राज्य। वहाँ के गवर्नर स्टुअर्ट के सम्मुख एक अपराधी व्यापारी ने क्षमा-याचना हेतु प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। गवर्नर ने उस व्यापारी को अपने सामने खड़ा देखा तो उन्हें अपनी पुरानी बातें याद आ गई। उन्हें अपने मन में एक पल को प्रतिशोध का भाव आता हुआ अनुभव हुआ और दूसरे ही पल उस भाव को विदा करते हुए उन्होंने कहा ‘तुम मुझे आश्वासन दो कि कभी भी किसी बीमार लड़के को कितना कष्ट हुआ होगा, इसका अनुमान तुम्हारा कठोर हृदय कर सकता है या नहीं फिर एक बात और कि वह लड़का अपनी परिश्रमशीलता और लगन के कारण यदि किसी राज्य का गवर्नर बन जाये और तुम्हें अन्य किसी अपराध के कारण उसके सम्मुख क्षमा-याचना के लिए उपस्थित होना पड़े, तब तुम्हारा मन अपनी इस भूल के लिए ही नहीं वरन् पुरानी भूलों के लिए भी ग्लानि अनुभव करेगा तथा पश्चाताप के कारण सिहार उठेगा।
मैं वही लड़का हूँ जो तुम्हारे स्टीमर में एक दिन कविन बॉय’ के रूप में काम करता था’ एक साधारण-सी भूल पर मेरे साथ तुमने अत्यन्त निष्ठुरता का व्यवहार किया था और बेंत मारकर बाहर निकाल दिया था मैं तुम्हारे उस निर्दय और असह्य व्यवहार को भुलाकर खैर इस बार मैं तुम्हारे अपराध पर कोई कार्यवाही न कर क्षमा कर रहा हूँ।’ साथ ही तुम से आशा भी करता हूँ कि भविष्य में तुम प्राणिमात्र के प्रति सदा सहृदयता का व्यवहार करोगे।
और वह व्यापारी मन ही मन उस गवर्नर की सहृदयता और उदारता की प्रशंसा करता हुआ अपने घर लौट गया।
साँचे और छापे की तरह बनने और ढलकर व्यक्त रूप धारण करने के प्राकृतिक नियम पर संसार बना है। इसी नियम पर उसमें अन्यान्य परिवर्तन होते रहते हैं। भौतिक विज्ञान की प्रगति इस तरह के सिद्धान्तों की शोध के फलस्वरूप ही होती है। यदि सब कुछ छापे खाने की भाँति ही छप और बन रहा होता तब तो यह माना जा सकता था कि संसार में प्रकृति या पदार्थ की ही सत्ता सर्वोपरि सत्ता है पर जब ऐसी घटनायें भी घटित होती देखने में आती हैं जो साँचे के सिद्धान्त से भिन्न होती हैं तथा उनमें किसी न किसी प्रकार की मस्तिष्कीय व्यवस्था होती है तो यही मानना पड़ता है कि संसार में पदार्थ ही विचार की भी एक सार्वभौमिक सत्ता है जो अपनी इच्छा से विलक्षण कौतुक भौतिक आधार नहीं होता इसलिए उन्हें आध्यात्मिक ही कहना उपयुक्त लगता है। निम्न पंक्तियों में अनेक ऐसे ही उदाहरण प्रस्तुत हैं जिनका कोई भौतिक आधार नहीं वे मात्र किसी इच्छा शक्ति के ही चमत्कार प्रतीत होते हैं जो स्वतन्त्र बुद्धि के रूप में विराट विश्व में क्रियाशील होती है-उसे ही परमात्मा कह सकते हैं।
इटली के एक 43 वर्षीय गिवनी गैलेन्ट की आँखें उल्लू की आँखों जैसी हैं सन् 1928 में उसने अपने माता-पिता से मिलने हर मिन पा जाने के लिए वीसा के लिए आवेदन किया उसे अस्वीकार करते हुए पब्लिक हैल्थ इन्सपेक्टर ने कहा-आपको दिन के अन्धेपन का रोग है इसलिए यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती। सचमुच ही वह केवल रात में ही देख सकता था दिन में उसे कुछ दिखाई नहीं देता था। इस प्रकार उसने यह अमान्य कर दिया कि देखने के लिए प्रकाश आवश्यक होता है उसने एक प्रकार से सिद्ध किया कि जीवन के सारे गुण उसकी सूक्ष्म चेतना में विद्यमान है इसलिये उसे ही जानना और समझना चाहिए।
फ्राँस के टूरकुइंग नगर में मशहूर क्लेमेन्ट नाम की एक लड़की 1793 में पैदा हुई उसने शरीर विज्ञान के सारे नियमों को तोड़ दिया उसके केवल एक ही आँख थी वह भी दोनों आँखों के बीच में ठीक दोनों भौहों के मध्य। वह उससे बहुत अच्छा देख सकती थी। वैज्ञानिकों ने परीक्षण करके बताया कि जिस स्थान पर उसकी आँख है वह एक बहुत ही महत्व का स्थान है जिसके बारे में विज्ञान कुछ नहीं जानता। इस आँख को परमात्मा ने योग-दृष्टि और भारतीय योग विद्या के आज्ञा-चक्र के प्रमाण स्वरूप उपस्थिति किया हो तो कुछ आश्चर्य नहीं।
यह विचित्रतायें किसी भी अनुवाँशिक गुण (हेरेडिटी करेक्टा) पर आधारित नहीं होने से अधिक विस्मय पूर्ण हैं। जन्मान्ध हुआ, जन्म से एक आँख न रही हो पर बिना आँखों के जन्म हुआ तो ऐसा एक भी उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता। लेकिन फ्राँस में सबेलनासी आक्स में एक ऐसा लड़का भी जन्मा जिसके एक भी आँख नहीं थी। आँखों का स्थान सपाट था और विज्ञान को चुनौती दे रहा था कि यह किस अनुवांशिक गुणों का प्रभाव है। उस लड़के के 6 और भी भाई-बहनें है जिनमें से किसी में भी इस तरह का कोई चिन्ह नहीं।
इससे भी विलक्षण था मोमिन्स का डब्लू जे. ब्रासर्ड। अभी तक विज्ञान का यही तर्क है कि स्त्री व पुरुष के गुण सूत्र (क्रोमोसोम) मिलकर ही शरीर की विविधता का निर्माण करते हैं। यह तो सम्भव है कि माता और पिता के वंशजों में किसी में नीली या भूरी आँखें रही हों और उसके फलस्वरूप भी नीली आंखों वाली तो कभी भूरी आंखों वाली सन्तानें पैदा होती रही हों पर ब्रासर्ड इन सभी वैज्ञानिक मान्यताओं का अपवाद था अर्थात् उसकी एक आँख तो नीली थी और एक भूरी ऐसा किस कारण हुआ? पता नहीं चल पाय पर इतना स्पष्ट हो गया कि जिस प्रकार कोई आदमी कापी पर अपनी इच्छा से चित्र बनाया करता है कोई एक सार्वभौमिक विचार शक्ति है जो संसार की विचित्रताओं का नियमन और सृजन करती है।
आँख वालों की दुनिया के कुछ और आश्चर्य- भौंरे की आँखों का लेन्स ऐसा होता है कि वह पहले एक आकृति की हजार आकृतियाँ बनाकर भेजती हैं पर दिखाई देती हैं अन्त में वही एक की एक वस्तु। मक्खियों ओर तितलियों की आँखें भी ऐसी ही होती है। इस विचित्रता में संभवतः एक शिक्षा यह है कि पंच-भौतिक पदार्थों से बनने वाले करोड़ों दृश्यों वाले इस संसार में मनुष्य को भूलना नहीं चाहिए वरन् एक और अनादि तत्व को ही पकड़ना और प्राप्त करना चाहिएं। यह तभी सम्भव है जब कुछ चार आँखों वाली समुद्री मछलियों के समान अपनी दृष्टि चौमुखी बनायें और आठ-आठ हाथों पावों वाली स्क्वीड मछली की तरह अपने चारों तरफ के वातावरण के अध्ययन की सक्रियता दर्शाये। आँखों की इस अनोखी दुनिया में भेड़िया मकड़ी को भुलाया नहीं जा सकता जिसके कि आठ आँखें होती हैं इन आठों आँखों का उपयोग वह अपने चारों तरफ के क्षेत्र की जाँच और अपने शिकार की टोह में करती है। शिकार को देखते ही उस पर टूट पड़ती है और खा जाती है। विवेकशील मनुष्य भी अपनी बुद्धि की आँखों से चारों तरफ देखकर निर्णय करते हैं कि तभी वह संसार के दैन्य और दुर्भाग्य को जीतकर सफल और समर्थ कहलाते हैं।
आँख या शारीरिक अंगों का मिलना न मिलना कोई बड़े महत्व की बात नहीं। प्रसंग बताते हैं कि उसने संसार के हर करण को परिपूर्ण बनाया है हमें उस मूल बिन्दु को खोजने भर की आवश्यकता है। स्काटलैंड के इनवर्नेस स्थान में 5 फरवरी 1866 में एक लड़का पैदा हुआ नाम था विलियम मैकफर्सन वह जन्मान्ध था, उसके हाथ भी नहीं थे फिर भी वह मून टाइप के उभरे हुए अक्षरों को अपनी जीभ की नोंक से पढ़ लेता था अपने इस दुर्भाग्य के बावजूद भी वह अपने आपको दुनिया का सबसे अधिक सुखी व्यक्ति कहा करता था।
फ्रैंक फोर्ट में ग्रेटेल मेयर नामक ऐसी महिला थी जिनके दो जीभें थी। लगता है वे पूर्व जन्मों में बहुत बोलने वाली थी तभी उन्हें भगवान ने दो जीभें दीं पर बोल सकना उनके लिये पूँजी के धन की भाँति दो जीभों से भी सम्भव नहीं हुआ। कुमार फैनी माइल्स अमेरिका के ओहियो प्राँत के विख्यात नगर सिनसिनाटी में 188å में जन्मी उनके पैर के पंजे 2-2 फीट लम्बे थे जबकि शरीर सामान्य था। यह विचित्रता यह संकेत देती थी कि मनुष्य कोई स्वतन्त्र इकाई न होकर इतर प्राणियों का सजातीय है। ऐसा न होता तो यह अनुवाँशिक गुण मनुष्य में कहाँ आ जाते। ऐसी घटनायें ही जीवन के अन्य योनियों में भ्रमण और पुनर्जन्म का भी प्रमाण हैं उनको ठुकराया जाना सम्भव नहीं है।
कई बार की विचित्रतायें तो और भी आश्चर्यजनक होती हैं और वह बताती हैं कि यह संसार किसी बहुत ही ए.एफ.डा.डी नामक एक स्.ी को प्रसव के समय अण्डा देते समय लोग चौंके। कुछ दिन तक यह प्रतीक्षा की जाती रही कि अण्ड फूटेगा और बच्चा निकलेगा किन्तु जब अण्डा न हिला न डुला तो उसे फोड़ा गया, भीतर से निकला एक मूँगफली का दाना। कुछ लोग इस घटना पर हंसे पर अधिकाँश यह सोचते रह गये कि यह किस विकासवाद की बला है।
शिकागो (अमेरिका) में जान.टी0 बोवर्स के वायु नली नहीं थी, स्वर तन्त्री तथा कण्ठ पिटक आदि कुछ भी नहीं थे फिर भी वह सामान्य व्यक्तियों की भाँति ही अपनी जीभ से बोलता और उच्चारण करता था। वह सारी घटनायें यदा-कदा और कहीं एक आध व्यक्तियों के साथ घटित होती है स्पेन में करवेरा ही ब्रुट्रेगा नामक एक गाँव में सभी व्यक्तियों के हाथ तथा पैरों में कई-कई अंगुलियों हैं। 6 अंगुलियां तो सभी के हैं केवल एक बुड्ढा ही ऐसा है जिसके 1å-1å अंगुलियाँ हाथ-पैरों में हैं। यह लोग संसार के सामान्य लोगों को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते हैं।
यह विचित्रतायें मनुष्य शरीरों तक ही सीमित नहीं अन्य जीवों में भी अपवाद भरे पड़े हैं। डेनवर (कोलम्बिया) में एक किसान केपास हरफोर्ड नामक गाय है जिसके दो स्थानों पर थन हैं सामान्य स्थान में भी और पीठ में भी। दोनों थनों से दूध निकलता है। दो जीभों वाली गायें बहुत मिलती हैं पर थनों वाली नहीं। फिर थनों में दूध पियूष ग्रन्थि (पिचुट्ररी ग्रन्थि) की क्रिया से बनता है इसलिये दोनों स्थानों से पीयूष ग्रन्थि का सम्बन्ध निर्विवाद हैं और वह यह बताता है कि भीतर ही भीतर शरीरों की गुप्त रचना करने वाली सत्ता कुछ भी कर सकने में समर्थ है। आँख फोड़वा (ग्रास हापर्स) को दो आँखें होती है वह एक नियम है पर एक ग्रास हापर्स वह भी होते है जिनके पाँच-पाँव आँखें होती हैं और पाँचों आँखें देखती भी हैं। कैलीफोर्निया के हिटियर में लैरी स्टोन नामक व्यक्ति ने एक बतख पाली। डैफी नामक यह बतख आधे-ओध अण्डे देती है और उन आधे अण्डों से ही पूरे और स्वस्थ बच्चे पैदा होते हैं। डैफी बतख दुनिया में अपनी तरह की अकेली बतख है और इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण भी कि संसार में एक ऐसी सत्ता अवश्य है जो संसार के सभी नियमों और व्यवस्थाओं का अपवाद है जो संसार के सभी नियमों और व्यवस्थाओं का अपवाद तथा अपवादों से भी बढ़कर पर शक्तिशाली है। हम यदि उससे संपर्क स्थापित कर सकें तो वैसी ही विलक्षण सामर्थ्यों से अपने आपको भी परिपूर्ण बना सकते हैं।
इस वक्त लोगों की इच्छा हो रही है कि भगवान अवतार लें, जिसे मैं पुरानी भाषा में ‘अवतार प्रेरणा कहता हूँ। तुलसीदास जी ने वर्णन किया है कि पृथ्वी संत्रस्त होकर गो रूप धारण कर भगवान से प्रार्थना करती है कि हे भगवान् आइये, हमें बचाइये। भारत को आज मैं उस मनःस्थिति में देख रहा हूँ जिस मनःस्थिति में अवतार की आकाँक्षा होती है, यह जरूरी नहीं है कि मनुष्य का अवतार होगा विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है। लोग समझते है कि रामचन्द्र एक अवतार थे, कृष्णा, बुद्ध अवतार थे। लेकिन उन्हें हमने अवतार बनाया है। वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य ही थे। लेकिन उन्होंने एक विचार का संचार सृष्टि में किया और वे उस विचार के मूर्ति रूप बन गये, इसलिए लोगों ने उन्हें अवतार माना। हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य, प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं। भारत की तरफ ऐतिहासिक दृष्टि से देखे तो जहाँ ‘सत्य’ शब्द का उच्चारण होता है, वहाँ असंख्य लोगों को कृष्णा भगवान को याद आती है और जहां ‘करुणा’ शब्द का उच्चारण होता है, वहाँ गौतम बुद्ध का स्मरण होता है, राम, कृष्ण और बुद्ध ये ही तीन अवतार हिन्दुस्तान में माने गये है। लेकिन वे तो निमित्त मात्र हैं। दरअसल भगवान ने सत्य, प्रेम, करुणा के रूप में अवतार लिया था।
भगवान किसी न किसी युग या विचार के रूप में अवतार लेता है और उस गुण या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है, उन्हें जनता अवतार मान लेती है, यह अवतार-मीमाँसा है। वास्तव में अवतार व्यक्ति का नहीं, विचार का होता है और विचार के वाहन के तौर पर मनुष्य काम करते हैं। किसी युग में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में प्रेम की किसी में करुणा की तो किसी में व्यवस्था की, इस तरह भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न गुणों की महिमा प्रकट हुई हैं।
सन्त फ्राँसिस का कथन है-’दुःखी रहना शैतान का काम है।” इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःख ही दिखलाई पड़ते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब दुःख रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःख क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?
इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती है, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई वाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःख नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियाँ ही है जो सुख दुःख के रूप में आभासित होती है।
अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।
दुःख का एक स्थूल-सा करना है वाँछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती हैं। मनुष्य को समझना चाहिए कि किसी की सभी वांछाएं कभी पूरी नहीं होती। वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञान व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछाएं बढ़ाते चले जाते हैं, और चाहते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें। ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी है। उनकी भी अपनी कुछ वांछाएं होती है, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी हैं। यदि किसी एक की ही सारी वांछाएं पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वाँछा पूर्ति के अधिकार से वंचित न रहे जायेंगे? किसी एक की सारी वांछाएं पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।
किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीरामना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्णा होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।
ऐसे संकीर्णता, स्वार्थी, लिप्सा और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है ? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि चह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती है। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्राँसिस ने कहा है-’दुःखी रहना शैतान का काम है।”
दुःख के कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी है। उनमें से एक संवेदनशील भी है। यों तो सामान्य रूप में संवेदनशीलता एक गुण है। किन्तु जब यह औचित्य की सीमा से परे निकल जाती है तब दुर्गुणा बन जाती है जिसका परिणाम दुःख ही होता है। अति संवेदनशील व्यक्ति का हृदय भावुकता के कारण बड़ा निर्बल हो जाता है। वह यथार्थ दुःख तो दूर काल्पनिक दुःखों से भी व्यग्र एवं व्याकुल होता रहता है। इस क्षण-क्षण बदलते रहने वाले संसार का एक साधारण-सा थपेड़ा ही उन्हें व्याकुल कर देने के लिए बहुत होता है। क्षण-क्षण परिवर्तित और बनने बिगड़ने वाले पदार्थ, परिस्थितियों और संयोगों के प्रभाव से सुरक्षित रह सकना उनके वश की बात नहीं होती। उन्हें संसार की एक नगण्य सी परिस्थिति झकझोर कर रख देती हैं और वे क्षुब्ध होकर दुःख अनुभव करने लगते हैं।
इस प्रकार के संवेदनशील व्यक्ति भावुकता के कारण अग्नि ही एक काल्पनिक दुनिया इस यथार्थ संसार से सर्वथा भिन्न होती है! होना भी चाहिए यदि उनका संसार इस संसार से भिन्न न हो तो उसके बनाने का प्रयोजन ही क्या रह जाता है ? इस भिन्नता के कारण इस यथार्थ संसार और उनकी काल्पनिक दुनिया में टकराव पैदा होता रहता है, जिसके शोक में वे दुःखी और व्यग्र होते रहते रहते हैं, यदि मनुष्य भावुकता का परित्याग कर, यथार्थ के कठोर धरातल पर ही रहे उसी के अनुसार व्यवहार करे, हर तरह की आने वाली परिस्थिति को संसार का स्वाभाविक क्रम समझकर खुशी-खुशी स्वागत करने को तत्पर रहे तो वह बहुत कुछ दुःख के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकता है।
अज्ञान को तो सारे दुःखों का मूल ही माना गया है। मनुष्य को अधिकांश दुःख तो उसके अज्ञान के कारण ही होते हैं। सुख-दुखों के विषय में यदि मनुष्य का अज्ञान दूर हो जायें तो वह एक बड़ी सीमा तक दुःखों से छुटकारा पा सकता है। सुख-दुःख का अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। उनका अनुभव भ्रम अथवा अज्ञान के कारण ही होता है। यदि मनुष्य एक बार यह समझ सके और विश्वास कर सके कि सुख-दुःखों का सम्बन्ध किन्हीं बाह्य परिस्थितियों से नहीं है, यह मनुष्य की अपनी अनुभूति विशेष के ही परिणाम होते हैं तो शायद वह उनसे उतना प्रभावित न हो जितना कि होता रहता है। मनुष्य की मान्यता, कल्पना, अनुभूति विशेष और उसकी अपनी मानसिक अवस्था से ही सुख-दुःख का जन्म होता है। यदि इन अवस्थाओं में अनुकूल परिवर्तन लाया जा सके तो दुःख से छूटने की सम्भावना कोई काल्पनिक बात नहीं है। यदि मनुष्य के दुःखों का सम्बन्ध वाह्य परिस्थितियों में कोई एक दुःख और शोक का अनुभव करता है, उन्हीं परिस्थितियों में दूसरा हर्षित और प्रसन्न होता है।
दुःख का आधार अपनी अनुभूति विशेष को न मानकर किन्हीं वाह्य परिस्थितियों को मानना अज्ञान है। इस अज्ञान को दूर सिए बिना यदि कोई चाहे कि दुःख से छुटकारा हो जाये तो यह सम्भव न होगा। अनुकूल परिस्थितियों में हर्षातिरेक के वशीभूत हो जाना और प्रतिकूलताओं में रोने-झोंकने का स्वभाव स्वयं एक अज्ञान है। इससे मनुष्य का मस्तिष्क असन्तुलित सा हो जाता है। वह यथार्थ से हटकर अधिकतर भ्रम में ही भटकता और ठोकरें खाता रहता है। उसके ठीक-ठीक समझने और मूल्याँकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। वह किसी बात में ठीक-ठीक यह नहीं समझ पाता कि जिन बातों में मैं दुःख मना रहा हूँ वह दुःख के योग्य हैं भी या नहीं। असन्तुलित स्थिति में मनुष्य गलत-सलत सोचता और वैसा ही व्यवहार करता है, जिससे दुःख का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।
दुःख के कारणों में आसक्ति भी एक बड़ा कारण है। यहाँ पर आसक्ति का एक मोटा-सा अर्थ यह लिया जा सकता है-अत्यधिक अपने पन का लगाव। जिन बातों में अत्यधिक लगाव होता है, उनको सर्वथा अपने अनुकूल रखने की कामना रहती है। किन्तु किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति को हर स्थिति में सर्वथा अपने अनुकूल रख सकना सम्भव नहीं होता। वे अपनी गति में कभी किसी समय भी विपरीत दिशा में घूम सकती है। ऐसी दशा में उनके प्रति अत्यधिक अपनत्व के कारण दुःख की अनुभूति से बचा नहीं जा सकता। यदि वस्तुओं और व्यक्तियों का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया जा सकें और उन्हें सर्वथा अपने अनुकूल देखने की इच्छा का त्याग किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि व्यर्थ में अनुभव होने वाले बहुत से दुःखों का सामना करना पड़े।
ऐसे लोग जो संसार नाटक के पट परिवर्तन से जल्दी प्रभावित नहीं होते दुःखों के आक्रमण से बचे रहते हैं। कामनाओं की पूर्ति के समय उल्लसित हो उठने और आपूर्ति के समय मलीन मन हो जाने का यदि अपना स्वभाव बदला जा सके तो दुःखों के बहुत से कारण आप से आप ही नष्ट हो जायें। यदि संसार में उदार गम्भीर ओर यथार्थ जीवन लेकर चला जा सके और आसक्ति के साथ अत्यधिक संवेदना को संक्षेप किया जा सके तो हमारी मनोभूमि निश्चय ही इतनी दृढ़ और परिपक्व हो सकती है कि उस पर सुख-दुःख की कोई प्रतिक्रिया ही न हो।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः, सर्वै भडारिक पश्यन्तु या कश्रिद्5ख भाग्ीवेत्” का ऋषि सिद्धान्त लेकर चलने वालों को संसार में किसी प्रकार दुःख शेष नहीं रह जाता। इस सार्वभौमिक भाव से मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णता विस्तृत एवं व्यापक हो जाती है। वह अपने को पीछे रख कर दूसरों के हित के लिए सोचता है, दूसरों के लाभ के लिए काम करता है और दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। हृदय में जब अपनत्व का स्थान सर्वत्व ले लेता है तो मनुष्य की अनुभूतियाँ भी उसकी नहीं रह जाती। वह दूसरे के दुःख से दुःखी और दूसरे के सुख से सुखी होने लगता है। ऐसी दशा में पर-दुःख से कातर मनुष्य को उस कष्ट उस क्लेश में भी एक आध्यात्मिक सुख आध्यात्मिक सन्तोष मिला करता है। अपने को समष्टि में मिला देने पर तो दुःख का सर्वथा अभाव ही हो जाता है।
तथापि बहुत से लोगों को यह प्रक्रिया कठिन तथा दुरूह दिखलाई दे सकती है। उनकी मनोभूमि इस योग्य न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा हो सकता है। अस्तु मध्यम मनोभूमि वाले व्यक्तियों को मध्यम मार्ग का अवलम्बन ले ही लेना चाहिए। वह मध्यम मार्ग इस प्रकार का हो सकता है। अपनी स्थिति, शक्ति और अधिकार सीमा में रहकर वांछाएं की जायें। उन्हें पूरा करने का प्रयत्न किये जायें। फिर भी यदि उनमें से कोई अपूर्ण रह जाये तो इसे संसार की एक साधारण प्रक्रिया मानकर सन्तोष किया जाये। अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में तटस्थ रहकर अपना कर्तव्य किया जाये और किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आसक्ति रखकर कोई अपेक्षा न की जाये। दुःख से बचने का यह मध्यम उपाय ऐसा नहीं है जो साधारण मनोभूमि वालों के लिए कठिन हो।
सामान्य मध्यम अथवा उच्च जो भी उपाय किया जा सके दुःख से बचने के लिए करना ही चाहिए-क्योंकि दुःख रहना शैतान का काम है, मनुष्य का नहीं। हमारे लिए मानवोचित रीति-नीति अपना कर ही चलना बुद्धिमानी भी है और कल्याणकारी भी।
दुःख-निवृत्ति का केवल एक ही मार्ग है, दुःख का अनुभव सब करते हैं, पर उसका वास्तविक कारण जाने की इच्छा किसी -किसी को ही होती है। दुःखी होने से चिन्तित और निराश रहने से दुःख की निवृत्ति नहीं हो सकती। वह तो तभी सम्भव है जब उसके मूल कारण को जानकर उसके निवारण का प्रयत्न किया जाय। यह संसार दुःख रूप ही है। इसमें जितनी भी वस्तुयें है वे सब क्षणिक और अस्थिर हैं क्षण-क्षण में उनका रूप बदलता है। जो वस्तु अभी प्रिय दीखती है, कुछ कारण उत्पन्न होने पर थोड़ी ही देर में वह अप्रिय बन जाती है। कामनाओं और वासनाओं का भी यही हाल है। एक तृप्त नहीं हो पाई कि दूसरी नई उपज पड़ी। तृष्णाओं का कहीं अन्त नहीं। वासनाओं की कोई सीमा नहीं। भोग से संग्रह से उन्हें किसने शान्त कर पाया है। घी डालकर किसने आग बुझाई है ? बहिर्मुखी जीवन से मुख मोड़कर अन्तर्मुखी दृष्टि अपनाये बिना आज तक किसी को शान्ति नहीं मिली। हमारे लिए भी इसके अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं है। -भगवान बुद्ध
बहेलिये ने तीर छोड़ दिया-समग्र तीक्ष्णता के साथ वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता राजकुमार सुकर्णव के मस्तक पर जा लगा। सकुर्णव वहीं धराशायी हो गये। जब तक व्याघ्र और अन्य अंग-रक्षक सैनिक उनके पास तक पहुँचे, राजकुमार के प्राण-पखेरू काया का पिंजड़ परित्याग कर आकाश भूत हो गये।
समस्त अन्तःपुर रो पड़ा, अपने राजकुमार की याद विसूरती प्रजा के अन्तःकरण उमड़ उठे। ऐसा कोई भी हतभाग्य राज्य में नहीं था जिसने सुकर्णव की अर्थी देख कर आँसू न बहाये हों।
दाह-संस्कार सम्पन्न हुआ पुत्र-शोक अब प्रतिशोध की ज्वाला में भड़क उठा। महाराज वेनु-विकर्ण ने कारागृह में बन्दी बहेलिये को सम्मुख उपस्थिति करने का आदेश दिया। सैनिक गण व्याध को बाँधकर ले आये। सिंहासन के सम्मुख पहुँचकर उसने महाराज सहित समस्त सभासदों को शीश झुकाया और मौन मुद्रा में खड़ा हो गया।
महाराज विकर्ण की कड़कती हुई आवाज गूँजी-दुष्ट बहेलिये तूने राजकुमार का वध किया है, बोल! तुझे मृत्युदण्ड क्यों न दिया जाये ? बहेलिये ने एक बार सभा भवन में बैठे हर व्यक्ति पर दृष्टि दौड़ाई फिर राजपुरोहित पर एक क्षण को उसकी दृष्टि टिकी। उसे कुछ याद आया-उत्तर दिया बहेलिये ने-महाराज! मेरा इसमें क्या दोष मृत्यु ने राजकुमार को मारने का निश्चय किया था उसने ही मुझे माध्यम बनाया, मेरी बुद्धि भ्रमित की और मैंने राजकुमार को कस्तूरी मृग समझ कर तीर छोड़ दिया। जो दण्ड आप मुझे देना चाहते हैं वह मृत्यु को दें। चाहें तो राजपुरोहित से पूँछ लें यह भी तो कहते है कि विधाता ने जितनी आयुष्य लिख दी, उसे कोई घटा-बढ़ा नहीं सकता, घटनायें तो मृत्यु के लिए मात्र माध्यम होती है।
विकर्ण का क्रोध विस्मय में बदल गया। उन्होंने राज पुरोहित की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि सचमुच ही वे भी बहेलिये का मूक समर्थन कर रहे हों। उन्होंने मृत्यु का आवाहन किया-मृत्यु उपस्थित हुई महाराज ने उनसे पूछा आपने राजकुमार को मारने का विधान क्यों रचा- “उनका काल आ गया था” मृत्यु बोली। तो फिर काल को बुलाया गया-काल ने कहा-मैं क्या कर सकता था महामहिम! राजकुमार के कर्मों का दोष था। कर्म-फल से कोई बच नहीं सकता। राजकुमार ही उसके अपवाद कैसे हो सकते थे।
कर्म की पुकार की गई-उसने उपस्थित होकर कहा-’आर्यश्रेष्ठ! अच्छा है या बुरा, मैं तो जड़ है, मुझे तो आत्म-चेतना चलाती है उसकी इच्छा ही मेरा अस्तित्व है, आप राजकुमार की आत्मा को ही बुलाकर पूँछ लें उन्होंने मुझे क्रियान्वित ही क्यों किया।
और अन्त में बुलाई गई राजकुमार की आत्मा-दण्डनावक ने प्रश्न किया-भन्ते! तुम कर्त्ता की स्थिति में थे क्या यह सच है कि तुमने कोई ऐसा कार्य किया जिसके फलस्वरूप तुम्हें अकाल काल कवलित होना पड़ा। शरीर के बन्धन से मुक्त आकाश में स्थिर राजकुमार की आत्मा थोड़ा मुस्कराई फिर गम्भीर होकर बोली-राजन्! पूर्व जनम में मैंने इसी स्थान पर माँस-भक्षण की इच्छा से एक मृग का वध किया था। मरते समय मृग को प्रतिशोध का भाव था, उसी भाव ने व्याध को भ्रमित किया। इसलिए व्याध का कोई दोष नहीं, न मुझे काल ने मारा मनुष्य ने, चिन्ता छोड़ा कर्म की गति बड़ी गहन है अपने कर्मों से हिसाब करो, भावी जीवन की प्रगति और स्वर्ग मुक्ति से कर्म की गति पर ही आधारित हैं सो तात तुम भी अपराध कर्म सुधारो।
महर्षि चित्र ने यज्ञ-आयोजित किया। ऋत्विक् के लिये उन्होंने महर्षि उदालक को आमंत्रित किया था किन्तु उदालक कुछ समय के लिये समाधि लेकर अन्तरिक्ष के कुछ रहस्यों का अध्ययन करना चाहते थे इसलिये उन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतु को यज्ञ के ऋत्विक् के रूप में भेज दिया, योग्यता की परख किये बिना महर्षि चित्र उन्हें यज्ञ का आचार्य वरण करने में हिचकिचाये सो उन्होंने श्वेतकेतु से प्रश्न किया-
‘सवृत लोके यस्मित्राधास्य हो बोचदध्वा लोके वास्यसीति’।
अर्थात्-क्या इस लोक में कोई आवरण वाला ऐसा स्थान है जहाँ तुम मेरे प्राणों को स्थिर कर सकोगे अथवा कोई ऐसा आवरण रहित अद्भुत स्थान है जहाँ पहुँचा कर मुझे यज्ञ के फलस्वरूप स्वर्ग का भागी बनाओगे।
श्वेतकेतु ने इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थता प्रकट की। वे लौटकर अपने पिता के पास गये और उनसे वही प्रश्न पूछा जो उनसे (श्वेतकेतु से) महर्षि चित्र ने पूछा था। महर्षि उद्दालक बड़े सूक्ष्मदर्शी थे उन्होंने सारी स्थिति जानली कि चित्र ने ऐसा प्रश्न क्यों पूछा-वे स्वयं इसी रहस्य को जानने के लिए अविकल्प समाधि (जिस समाधि में चिन्तन, मनन, भावानुभूति चलती रहती है उसे सविकल्प समाधि कहते हैं) लेना चाहते थे। उन्होंने अनुभव किया कि महर्षि चित्र यह रहस्य पहले से ही जानते हैं सो पिता पुत्र दोनों महर्षि चित्र के पास गये और उनके प्रश्न का उत्तर सविनय उन्हीं से बताने का आग्रह करने लगे। उनकी जिज्ञासा को समझकर महर्षि चित्र ने उन्हें मृत्यु की अवस्था और देवयान मार्ग द्वारा स्वर्ग प्राप्ति का जो ज्ञान दिया है कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् का वह सारा का सारा ही आख्यान महान् वैज्ञानिक सत्यों ओर आश्चर्यों से ओत-प्रोत है। उससे यह पता चलता है कि भारतीय तत्व-दृष्टा न केवल प्राण और जीवन के रहस्यों से विज्ञ थे वरन् उन्हें सूक्ष्म से सूक्ष्म भौगोलिक ओर खगोल विद्या के रहस्यों का भी ज्ञान था। आज जब उस ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं तो मानना पड़ता है कि भारतीय साधनायें किसी भी भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हैं और जीवन से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं और समस्याओं का वही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।
महर्षि चित्र उद्दालक और श्वेतकेतु को बताते हैं- आर्य! यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करने वाले लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति जिस तरह होती है वह मैं बताता हूँ, प्राणों के योग से चन्द्रमा को बल मिलता है। पर कृष्णा पक्ष में तथा दक्षिणायन सूर्यगति के समय स्वर्ग का द्वार अवरुद्ध रहता है इसलिये योगीजन उस समय अपने प्राणों को अपने ध्यान में ही स्थिर कर लेते हैं। अपनी निष्काम भावना को दृढ़ करके वे देवयान मार्ग में पर्दापण करते हैं, और प्रथम अग्नि लोक को प्राप्त होते हैं, फिर वायुलोक और वहाँ से सूर्य लोक को गमन करते हैं। सूर्य लोक से वरुण लोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक में पहुँचते हुए वे स्वर्ग लोक के अधिकारी बनते है-
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् की इस आख्यायिका में आगे के वर्णन में बड़े विस्तार पूर्वक देवयान मार्ग की अनुभूतियों का वर्ण हैं जीवात्मा को वहाँ से जैसे चित्र दिखाई देते हैं जैसी-जैसी ध्वनियाँ और गन्ध की अनुभूति होती है उस सब का बड़ा ही अलंकारिक और मनोरम वर्णन किया गया है। पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे कोई सम्बन्ध न हो पर जब दर्शन और आज के विज्ञान की तुला पर उसे तौलते और विश्लेषण करते हैं तब आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि इतनी विराट् अनुभूति ऋषियों को कैसे सम्भव हो सकी। विज्ञान अब उनकी अनुभूतियों को शतप्रतिशत सत्य प्रमाणित कर रहा है। यद्यपि अभी विज्ञान अपूर्णावस्था में है तथापि अभी तक उसने जो भी निष्कर्ष निकाले हैं वह भारतीय तत्वदर्शन से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ पाते।
वैज्ञानिकों ने यह मान लिया है कि पृथ्वी स्वयं की चुम्बक है, उत्तरी ध्रुव, उत्तरी सिरा और दक्षिणी ध्रुव, दक्षिणी सिरा दोनों उसके दो शक्तिशाली साँद्रित स्थान है। पृथ्वी ही नहीं सूर्य भी चुम्बक की तरह व्यवहृत होता है, और यदि यहाँ पर कहा जाये कि मनुष्य या उसकी जीवन-शक्ति भी एक प्रकार का विद्युत चुम्बकीय पदार्थ ही है। सूर्य के 11 वर्षीय चक्र में जब सूर्य कलेको (सन-स्पाट्स) की तीव्रता होती है और पृथ्वी पर चुम्बकीय औषधियां आ जाती हैं तो मनुष्य जीवन उससे बुरी तरह प्रभावित होता है। डॉ. क्रिट्ज आदि वैज्ञानिकों ने अनेक परीक्षणों से यह सिद्ध किया है कि विद्युत-चुम्बकीय औषधियों के समय जन्तु-जगत अपना सारा मानसिक सन्तुलन खो देता है जो इस बात का प्रतीक है कि सूर्य के जीवन या विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र में हलचल के साथ पृथ्वी के जीवन या विद्या-चुम्बकीय क्षेत्र में हलचल होना अवश्यम्भावी है।
कुण्डलिनी विज्ञान के अंतर्गत सुषुम्ना शीर्षक को अत्यधिक प्रचण्ड क्षमता वाला चुम्बक माना गया है जिसका उत्तरी सिरा मस्तिष्क स्थित “सहस्रार” है और दक्षिणी गुदा स्थित मूलाधार चक्र है नाभि को सूर्य-चक्र स्थान माना है मूलाधार पृथ्वी का प्रतिनिधि, जो स्थिति ब्रह्मांड में सूर्य के साथ पृथ्वी की अर्थात् 23 डिग्री झुकी हुई है वही नाभि के साथ मूलाधार चक्र की। मूलाधार चक्र स्थित त्रिकोण परमाणु ही “नाभि” से प्राप्त ऊर्जा को विद्युत चुम्बकीय रूप “प्रेरणा” या जीवन शक्ति के रूप में बदलता रहता है। यह ठीक सूर्य द्वारा पृथ्वी में जीवन-विकास की अवस्था के समान ही है। जब तक मूलाधार स्थित काम या इच्छा शक्ति से प्रेम बना रहता है मनुष्य अधोगामी स्थिति में रहता है पर यदि उसी प्राण-शक्ति को विभिन्न योग साधनाओं द्वारा ऊर्ध्वमुखी प्रक्षालित कर लिया जाता है तो सुषुम्ना प्रवाह के अन्दर के आग्नेय कर उत्तेजित और क्रियाशील हो उठते हैं, जिससे सहस्रार के जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है। यह अवस्था ईश्वरीय दिव्य शक्तियों से संपर्क और अनुभूति एवं बौद्धिक एवं आत्मिक प्रतिभा के विकास की होती है साथ ही ऊर्ध्वमुखी लोकों की प्राप्ति का साधन भी।
मानवीय प्राण-शक्ति जो कि एक विद्युत-चुम्बकीय शक्ति होती है उसे यदि प्राणायाम ओर योग साधनाओं द्वारा नियन्त्रित कर लिया जाये तो सूर्य की उत्तरायण अवस्था में जबकि पृथ्वी का उत्तरी, ध्रुव सक्रिय होता है वहाँ से जाने वाली एक तीव्र-विद्युतीय-चुंबक रेखा द्वारा उसे ऊर्ध्व लोकों में बहाया जा सकता है। उत्तरी ध्रुव से खगोल के किन्हीं विशेष ग्रह वा ज्योति पिण्डों का सम्बन्ध होता है इस बात से अब विज्ञान भी सहमत है। यह कथा वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असंदिग्ध सत्व है इस बात की पुष्टि के लिए दि ग्रीलियर-न्यूयार्क टोरोंटो द्वारा प्रकाशित पुस्तक दि बुक ऑफ पापुलर साइंस का 7 वाँ भाग पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक में चुम्बकीय क्षेत्र और सूर्य के आग्नेय कारणों द्वारा ध्रुवों में एक ध्रुव-प्रभा के निर्माण का रोमाँचकारी वर्णन दिया हुआ है। इन ध्रुव प्रभाओं (अरोरल-लाइट) के बारे में आज तक विज्ञान जितना जान सका है वहां कौषतकि ब्राह्मणोपनिषद् के महान् ज्ञान की पुष्टि करता है।
इस पुस्तक में बताया गया है कि चुम्बकीय विक्षोभ पृथ्वी के दोनों ध्रुवों पर प्रचण्ड होने के कारण पृथ्वी के उस क्षेत्र में न केवल आकस्मिक परिवर्तन उत्पन्न करते हैं वरन् आविष्ट कारणों की उपस्थिति में विचित्र-विचित्र प्रकार के चकाचौंध उत्पन्न करने वाले प्रकाश भी उत्पन्न करते हैं। इस प्रकाश प्रभा को उत्तर में “अरोरा बोरीयेलिस” तथा दक्षिण में “अरोरा आस्ट्रेलिया” कहते हैं। इसका उद्गम ठीक ध्रुव प्रदेश में होता है और उत्पत्ति का स्रोत भी, सूर्य व चन्द्रमा माना गया है। मन को भारतीय दर्शन में-”चन्द्रमा मनोसाउजायत “मन चन्द्रमा है और प्राण को सूर्य का आग्नेय स्फुल्लिंग कहा है इससे प्रतीत होता है कि जीवन शक्ति और ध्रुव-प्रभा की रासायनिक बनावट में कोई बड़ा अन्तर नहीं है।
ध्रुव प्रभा आकृति और चमक में एक दूसरे से अत्यन्त भिन्न देखी गई है। अचानक ही वे स्वर्ग में-सुदूर अन्तरिक्ष में चमकदार प्रकाश फैला देती है। इनकी गति आश्चर्यजनक और शीघ्र चलित होती हैं जिससे आकृति और सघनता में अद्भुत परिवर्तन देखे गये हैं यदि इस प्राण प्रवाह में बहते हुए किसी जीव को कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में वर्णित विराट् आकाश गंगाओं के नदी रूप में, निहारिका के बादल रूप में तथा अनेक ग्रह-नक्षत्रों के दृश्य विलक्षण रूप से दिखाई दिये हों तो आश्चर्य क्या ? उत्तरायण मार्ग को स्वर्गारोहण और दक्षिणायन को अम्ध लोकों में ले जाने वाला कहा है उसकी पुष्टि इस बात से हो जाती है कि दक्षिणी ध्रुव की प्रभायें कुछ ही दूर जाकर अन्धकार मय हो गई देखी गई है। जबकि उत्तरी-ध्रुव की प्रभायें जितनी ऊपर बढ़ती है। और भी दिव्य होती गई हैं।
गहन अध्ययन और अन्वेषणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ध्रुव प्रभा की उत्पत्ति का कारण सूर्य पर घटित हलचल ही हैं। यह ध्रुव प्रभायें यद्यपि कभी-कभी दिखाई देती हैं। स्पेन में 1å वर्ष में एक बार, उत्तरी फ्राँस में 1 वर्ष में 5 बार, लन्दन में 1 वर्ष में 6 बार, उत्तरी आयरलैण्ड में 1 वर्ष में 3å बार और उत्तरी संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कैनेडा तथा फेरो आयलैण्ड्रा में क्रमशः 6å, 8å और 1åå बार दिखाई देती है। यह ध्रुव प्रीयें वह होती है जो खुली आँख से देखी जा सकती हैं पर पीछे डॉ. बी.एम. स्लीफर ने लावेल वेधशाला में लगे स्पेक्ट्रम परीक्षण द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि ध्रुव प्रभायें मन्द रूप में हमेशा पर तो यह सतत् अविच्छिन्न रूप से पाई जाती है। साँप की तरह से लहराती हुई चलने वाली इन प्रकाश लहरियों के बारे में विज्ञान जितना ही खोज करता जा रहा है। उतने ही आश्चर्य जनक परिणाम सामने आ रहें हैं। कदाचित इन खोजों में भारतीय तत्व दर्शन भी सम्मिलित कर लिया जाता तो न केवल आध्यात्मिक मान्यताओं को बल मिलता वरन् मनुष्य-जीवन के अनेक अप्रकट रहस्यों का भी पता लगाना सम्भव हो जाता।
मन्द प्रकाश पुंज यद्यपि विस्तार में कम होते हैं पर ठीक ध्रुव पर उनमें स्थायित्व के साथ-साथ चमक और चौंध भी बहुत तीव्र होती है। उसकी शक्ति के आगे सामान्य यन्त्र भी काम नहीं कर पाते एक बार उस क्षेत्र में एक जहाज जा रहा था उस चुम्बकीय शक्ति की प्रचण्डता के कारण जहान में लगी लोहे की कीलें निकल-निकल कर भागी और जहाज वहीं चूर-चूर हो गया तब से उधर जाने वाले जहाजों में लकड़ी की कीलें ठोंकी जाती है। इसी प्रकार इस विद्युत चुम्बकीय शक्ति में “प्राणा-तत्व” को प्रवाहित कर जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने स्वर्ग पहुँचाने की बात सत्य है। उसके लिए तो पितामह भीष्म को शैय्या पर लेटे रहना पड़ा था। बाणों में लेटने का अर्थ उनकी इस निष्ठा से था कि कहीं सूर्य की गति उत्तरायण होने से पूर्व ही उनका मन किन्हीं इच्छाओं में भ्रमित न हो जायें। इच्छायें जीवनी-शक्ति का विक्षोभ होती हैं इसलिये जब तक मन निष्काम न हो वह प्राणों को संकल्प किसी विशेष दिशा में नहीं ले जा सकता इसलिए मृत्यु के समय प्राणों को शुद्ध करने की क्रियायें पहले से ही निर्धारित कर दी गई हैं गीता में उनका उल्लेख भी है।
ध्रुव-प्रभा श्वेत दूधिया रंग की होती है। बादलों के समान दीखने वाले प्रकाश को “सीरस” नाम दिया गया है। बादलों में और इनमें उन्तर ज्ञान करना कठिन है कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में भी इन्हें बादल ही कहा गया है।
ध्रुव-प्रभा फैलती और सिकुड़ती रहती है जो कि इलेक्ट्रानिक प्रवाह होती है। प्रकाश इसमें चापों के रूप में बहता है। और उसका वेग बहुत अधिक होता है। इसमें तीव्र गतिमान परिवर्तन भी वैज्ञानिकों ने नोट किये हैं। शेट लैण्ड आइसल्स वैज्ञानिक इन्हें मेरी डासरस कहते हैं कैनेडा वाले मेरीयोनेट। उनका विश्वास है कि इन प्रकाश-पुंजों के प्रवाह में अद्भुत ईश्वरीय नियम आसीन हो सकते हैं। इनमें श्वेत, पीत और गुलाबी रंग की प्रभाओं के अतिरिक्त “शब्दों” के कम्पन भी अंकित किये गये हैं यह रंगीन किरणों कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में वर्णित विभिन्न प्रकार के दृश्य और श्रव्य की अनुभूति की समानार्थी उपलब्धियाँ हैं। हाइड्रोजन कणों की उपस्थिति से अनिवार्य सूर्य-हस्तक्षेप का पता चलता है।
समाधिवस्था में सहस्रार का विद्युत-चुम्बकीय सम्बन्ध इस सूक्ष्म प्रकाश प्रभा व प्रवाह से जोड़कर विभिन्न ध्वनियों की विभिन्न लोक-लोकान्तरों की अनुभूतियाँ होती है यह ठीक आधुनिक रेडियो विज्ञान के समान ही है कालान्तर में वैज्ञानिक इन्हीं तथ्यों पर आने वाले और मनुष्य जीवन के विकास और खगोल सम्बन्धी जानकारियां में इसका वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे तो यह निश्चित हैं कि जीवन से सम्बन्धित विज्ञान में तीव्र परिवर्तन करने पड़ सकते हैं।
शिष्य ने गुरु के पास जाकर कहा- ‘गुरुदेव! मुझे ज्ञान का उपदेश दीजिए ताकि मैं उसे आचरण में लाकर अपने जीवन को सार्थक कर सकूँ।
गुरु ने शिष्य की ओर देखा और मुस्करा दिये। उत्तर कुछ भी न दिया। इस प्रकार कई दिन तक आता रहा ज्ञान-प्राप्ति के लिये जिज्ञासा प्रकट करता रहा और उत्तर में गुरु मुस्कराते रहे।
यह क्रम बहुत दिनों तक चला। शिष्य की उद्विग्नता बढ़ने लगी। एक दिन गुरु उस शिष्य को नदी के किनारे ले गये और उसमें डुबकी लगाने के लिये कहा-शिष्य ने ज्यों−ही डुबकी लगाई त्यों−ही गुरु ने उसकी गरदन दबा दी। प्रयत्न करने के बाद भी पानी में से वह अपना सिर न निकाल सका। उसकी दम घुटने लगी। हाथ, पैर ढीले हो गये।
अन्त में गुरु ने से छोड़ दिया। शिष्य पानी में खड़ा हो गया और दम लेने लगा। जान में जान आई। गुरु ने पूछा ‘अभी तुम पानी के भीत थे तब तुम्हारी सबसे तीव्र इच्छा क्या थी?
‘गुरुदेव! तब मैं केवल हवा चाहता था। पानी से बाहर आकर साँस लेने की मेरी इच्छा थी। उसके लिए यदि मुझसे कोई कुछ माँगता तो मैं बदले में सब कुछ समर्पित कर सकता था। पर यह सब पूछने का कारण क्या है ? मेरे प्रश्न से तो इसका कोई सम्बन्ध जान नहीं पड़ता।’ शिष्य के सकपकाते हुये कहा-
गुरु ने प्रश्न का उत्तर प्रश्न में ही देते हुये कहा-’वत्स! जिस तरह से साँस लेने के लिये तुम में उतावली थी क्या तुम्हारे हृदय में ईश्वर प्राप्ति के लिये भी ऐसी उतावली है। यदि नहीं तो धर्म के बाजार में तुम में और किसी नास्तिक की कीमत में कोई अन्तर नहीं है। मेरा तो यह विश्वास है कि असली नास्तिक अपनी मान्यता के प्रति तुमसे कहीं अधिक ईमानदार दिखाई देगा। जब तक तुमने ईश्वर प्राप्ति की दृढ़ भावना उत्पन्न नहीं होती तब तक ज्ञान का उपदेश भी तुम्हें किसी प्रकार का लाभ नहीं पहुँचा सकता। और न उससे क्रियात्मक प्रतिफल निकलने की ही आशा की जा सकती है।’
घर की दादी और पिता-दादा का काम छोटे बच्चों को खिलाना होता है। इस बंटवारे का कारण उनकी बेकारी नहीं वात्सल्य भाव की प्रबलता मानी जाती है। अपने बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं। पर बच्चे का बच्चा तो और भी प्रियतर होता है यदि यह बात मनुष्य जाति की एक विशेषता है तो जंगल में पाये जाने वाले खरगोश भी मनुष्य से कम नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वह भी अपने बच्चों को मनुष्य से अधिक ही प्यार करता है।
प्रसिद्ध जीव-विशेषज्ञ डॉ. डी अरिच. डी. विकेल ने लम्बे समय तक खरगोशों के सामाजिक जीवन का अध्ययन किया और लिखा है कि खरगोशों में बहुत अधिक मानवीय गुण होते हैं उनमें कुछ तो थोड़ी सी बात पर नारा हो जाने वाले दम्भी प्रकृति के होते हैं तो कुछ शान्त और सहनशील। उनमें परस्पर मैत्री का आधार गुणों की समानता होती है और इसका परिचय वे कुछ ही समय साथ-साथ रहने में पा लेते हैं। बूढ़े खरगोश बच्चों को बड़े प्यार से रखते हैं उनकी देखभाल से लेकर खेल में प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती हैं। खेलना खरगोशों के लिये अनिवार्य होता है। वे कई बार खेलते समय इतने मस्त हो जाते हैं कि लोमड़ियों को भी सजातीय खरगोश मानकर उन्हीं के साथ क्रीड़ा करने लगते हैं। सम्भवतः उनकी इसी प्रकृति का वरदान उन्हें आजीवन आरोग्य के रूप में मिला हैं। खरगोशों के इस नैसर्गिक गुण से मनुष्य जाति भी शिक्षा ले सकती हैं क्रियाशील और क्रिड़ाशील जीवन का। आज जो धन रोगों की रोकथाम चिकित्सा में फूँका जा रहा है उसका आधा भाग भी देश में गाँव-गाँव खेल की अनिवार्य व्यवस्था में लगा दिया जाता तो वह सौ अस्पतालों से बढ़कर काम करता।
मनुष्य को अपनी बुद्धिमता का बड़ा अहंकार हैं पर सच बात यह है कि उसने इसी अहंकार वश अपने को अप्राकृतिक बनाया और रोग-शोक में जकड़ता चला आय स्वस्थ और सन्तुलित जीवन की शिक्षायें वह आज भी प्रकृति से, अपनी इन छोटे-छोटे जीवनधारियों से प्राप्त कर सकता है। कौवे जैसे उपेक्षित पक्षी में भी जातीय हित और स्वाधीनता के भाव पाये जाते हैं। एकबार उसके स्वभाव का विस्तृत अध्ययन करने के लिये कौवे का अण्डा सेया। कौवों की साहसिकता और निर्भय आक्रमण के फलस्वरूप सामान्यतः उसका बच्चा पकड़ में नहीं आता इसीलिये ऐसा करना पड़ा। अण्डे से बच्चा निकला। बच्चा बड़ा हुआ। मानवीय संसर्ग पाकर उस मनुष्य से स्नेह हो गया यह बात अलग है पर यह बात अन्य कौवों को कदापि पसन्द न आई और अध्ययन करने से पता चलता था कि वह कौवे का बच्चा भी अपनी भूल स्वीकारता है निश्चित। वह खिड़की के समीप बैठा रहता अपने मालिक के साथ खेलता भी पर जब एक विशेष प्रकार की ध्वनि से अन्य कौवे उसे धिक्कारते और उसे अपनी भाषा में मनुष्य जाति की बुराइयों से सावधान कर उसे भागने का संकेत करते तो वह बच्चा मालिक की भी परवाह न करके उड़ जाता। अपने साथी भाइयों के साथ देर तक खेलता रहता पर जिस तरह पाप अन्याय और हीन भावनाओं के कारण एक मनुष्य अन्य मनुष्यों से मेल-जोल रखने में आत्म हीनता अनुभव करता है उसी प्रकार यह कौवा भी उन्मुक्त प्रकृति में जन्मे अपने जाति भाइयों के बीच कुछ छोटापन सा अनुभव करता इसलिये वह बार बार लौटकर घर आ जाता।
कौवा बड़ा बुद्धिमान पक्षी है। मनुष्य समझता है बुद्धि मेरी विरासत है पर सच बात यह है कि अपने सीमित क्षेत्र और क्षमताओं में ही सृष्टि के अन्यान्य जीवों में भी विलक्षण बौद्धिक और आत्मिक क्षमतायें होती हैं। जब सब कौवे उपाय कर हार गये तब उनके एक मुख ने एक चाल चली। उन्होंने एक भोज आयोजित किया और ठीक ऐसे स्थान पर जहाँ से उस पालतू कौवे को उनकी हरकतें दिखाई देती रहें। कौवे को ललचा कर अपने पास बुलाने का यह उपाय कितना बुद्धि प्रेरित हो सकता है।
इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। इस प्रकार वे इस पराधीन कौवे को भी बन्धन मुक्त करने में सफल हो गये।
कौवों की ही जाति का रैवेन (एक प्रकार का काला कौवा) की बुद्धिमत्ता और सामाजिकता को देखकर तो यही लगता है इस जन्म के कुछ मनुष्य ही अपनी किन्हीं बुराइयों के कारण इस योनि में जाने को विवश होते हैं क्योंकि उनमें और मनुष्यों के रहन-सहन, विचार-व्यवहार में असाधारण समानतायें पाई जाती हैं।
भारतवर्ष, साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप में पाये जाने वाले इस 2 फुट की लम्बाई वाले पक्षी की विलक्षणतायें जितनी अध्ययन की गई नई विलक्षणताओं के अन्यान्य रहस्य उतने ही गम्भीर होते जा रहे हैं। बहुत संभव है कि एक दिन वह आये जबकि दुनिया में पुनर्जन्म सिद्धान्त को सार्वभौमिक मान्यता मिल जाये, विज्ञान उसकी पुष्टि कर दे ओर फिर नई खोजें हों तो पता चले कि यह रैवेन नटों की जाति के मनुष्य हैं जो मरने के बाद अपने स्वभाव और संस्कारवश इस कौवे की योनि में आ पड़ते हैं।
जर्मनी के “मैक्सप्लोंक इन्स्टीट्यूट फॉर दि फिजियोलॉजी ऑफ बिहेवियर इन सी विजन” स्थान में, जो कि जीव-जन्तुओं की प्रकृति के अध्ययन का बहुत ही उपयुक्त स्थान है, जर्मन वैज्ञानिक डॉ. एवरहार्ड ग्विनर ने “रैवेन” पक्षी का विस्तृत अध्ययन किया और यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि उसके रक्त में ऐसे लक्षण (ट्रेट्स) पाये जाते हैं जो मनुष्य से बहुत अधिक मिलते-जुलते हैं। इनके स्वभाव की विचित्रतायें, नट जाति की मानवीय विशेषताओं से ओत-प्रोत होती हैं।
विवाह से पूर्व नर और मादा रैवेन एक वर्ष तक लगातार साथ-साथ रहते हैं। मादा अपने लिये ऐसे नर का चुनाव करती है जिसमें नेतृत्व के गुण हों, जो साहसी हो, निर्भय हो, आलसी, दुर्बल, मूर्ख आदमियों की कौन पूछ करें, प्रकृति उद्योगी, साहसी और हिम्मत वालों का वरण करती है मादा रैवेन इस मामले में पूरी छान-बीन करके अपना फैसला देती है। आजकल का युवक समुदाय बड़ा चालक हो गया है वह यह समझते हैं कि नारी में बुद्धि नहीं होती, उसे गुणी होने का धोखा देकर फुसलाया जा सकता है, लड़कियाँ युवकों की इस धोखेबाजी में आ सकती है। रैवेन मादा जानती है कि एकाएक विश्वास करना धोखा हो सकता है इसलिये वह एक वर्ष तक नर के साथ रहकर उसका समीप से अध्ययन करती है। वह नर का कामुकता को अच्छी तरह पहचानती है इसलिये एक वर्षीय परीक्षक काल में उसकी इस दुर्बलता को धमका कर रखती है। यदि वह देखती है कि नर में नरोचित गुणों का अभाव तो वह उसे छोड़कर किसी अन्य का वरण करती हैं। दहेज और कृत्रिम गुणों पर जिस तरह लड़कियाँ ठग ली जाती है। रैवेन का ठगा जाना नितान्त असम्भव होता है।
बेशक परीक्षण काल में भी वे एक दूसरे के सहाय होने का प्रमाण दे सकते हैं। कई बार नर और मादा भटक जाते हैं। इन परिस्थितियों के लिये वे पहले से कुछ खास ध्वनियाँ निर्धारित कर लेते हैं जो उनकी जाति के किसी भी अन्य रैवेन को मालूम नहीं होती। उन्हीं के सहारे वे एक दूसरे को ढूँढ़ लेते हैं। एकबार परीक्षण दौरान डॉ. ग्विनर एक कुत्ते की आवाज सुनकर चौंका। उन्होंने देखा पास में कोई कुत्ता नहीं हैं फिर भौंकने की आवाज कहाँ से आ रही हैं। थोड़ी ही देर में पता चल गया कि एक रैवेन जिसका कि “सगाई काल” चल रहा था संकेत देकर अपने बिछड़े मंगेतर को बुला रहा था। थोड़ी ही देर में दोनों फिर मिल गये।
विवाह के बाद भी मादा अपने दांपत्य अधिकार अपने स्वाभिमान के भाव को सुरक्षित रखती है। नारी होने का कारण अपना वर्चस्व खो दिया जाये यह बात कोई महिला स्वीकार भले ही करले रैवेन को स्वीकार नहीं। सम्भव निश्चित कर लेने के बाद वह अपने रहने के उपयुक्त स्थान ढूँढ़ती है नर मकान बनाता है यदि इस बीच मादा वहाँ की परिस्थितियाँ अनुकूल न जान पड़ी तो वह अन्य स्थान ढूंढ़ेगी। कई बार इस खोज में नर को कई अधूरे बने मकान छोड़कर बार-बार नये मकान बनाने पड़ते हैं। यह मादा की इच्छा पर है कि वह इनमें से किसी भी स्थान को चुने और उसमें रहने का अन्तिम फैसला करे।
गिवनर लिखते हैं-कि पति और पत्नी के सम्बन्ध कैसे है, पारिवारिक जीवन में प्रेम, शान्ति, सुख, और व्यवस्था है या नहीं इस बात का पता लगाना हो तो घर की, बच्चों की स्थिति देखकर पता लगाया जा सकता है। जिन घरों में प्रेम, मैत्री एवं सद्भाव होता है वे घर साफ, सुथरे सजे हुये। उसके बच्चे और सदस्य हँसते खेलते हुए होते हैं यही बात रैवेन के बारे में भी है उसका घोंसला देखकर बताया जा सकता है कि उनका पारिवारिक जीवन में प्रेम और सौहार्द है अथवा नहीं।
पति रैवेन अपनी मादा के प्रति समर्पित और “एक नारी व्रत का पालन करके मनुष्य जाति को शिक्षा देता है और एक प्रकार से उसकी कामुकता को धिक्कार कर कर्तव्य भाव की प्रेरणा देता है। अण्डे सेने के 18-16 दिन मादा लगातार घोंसले में बैठी रहती है उस अवधि में दाना लाकर पत्नी की चोंच में डालकर खिलाने का काम नर बड़ी भावना के साथ पूरा करता है। एक डच प्लाजिस्ट ने लिखा है कि एक बार-अण्डा सेने की अवधि में एक मादा रैवेन मर गई उस समय पति ने लगातार भूखे रहकर सन्तति पालन का बोझ उठाया और बच्चों को पालकर बड़ा करने से लेकर उन्हें सिखाने तक का पूरा उत्तरदायित्व अकेले निभाया।
खेलना इनमें अनिवार्य होता है। अपने गाँवों में पहले पहलवानों के गुरु हुआ करते थे। गाँव के बच्चों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती थी, वे सवेरे-शाम उन्हें अखाड़े पर ले जाकर उन्हें दाँव-पेंच मल्ल-विद्या और शस्त्र संचालन सिखाकर शक्तिशाली, स्वस्थ और समर्थ बनाते थे अपने देश में जब से यह प्रथा टूट चली स्वास्थ्य और समर्थता का स्थान रोग-शोक, बीमारी और निर्बलता ने ले लिया पर इन पक्षियों में यह अनुकरणीय परम्परा इस कलियुग में भी दृढ़ता पूर्वक चल रही है और वह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य मानवोचित गुणों से गिरकर चाहे किसी युग को सतयुग को कभी नहीं खोते इसी लिये वे चिरन्तर काल से अपने अस्तित्व को बचाते चले आ रहें है।
हर रैवेन-उपनिवेदा में कुछ रिंगलीडर होते हैं उनका काम होता है बच्चों को खेल-रत रखना। कोई आलसी बच्चा होगा तो उसे चोंच मार-मार कर खेलने को विवश करेंगे। इनके खेल पूरी नट-विद्या होती हैं उसमें इनको इतना अधिक परिश्रम करना पड़ता है कि शरीर का सारा विजातीय द्रव्य निकल जाता है।
इनके नेता इंसाफ पसन्द और नैतिक गुणों वाले होते हैं। एक दूसरे के प्रति सहयोग का भाव रखते हैं। उन्हें देखकर तो ऐसा लगता है कि आज के मनुष्य ने बुद्धिमान न होकर इन्हीं के गुणों के धारण कर लिया होता तो वह कहीं अधिक स्वस्थ सुख और समुन्नत हो सकता था।
प्रेम थकान को मिटाता है, दुःख को सुख बनाता है, जीवन की वाटिका में प्रेम का गुलाब खिलकर अपने चारों ओर सुगन्ध बिखेर देता है, प्रेम भगवान का श्रेष्ठ वरदान है। -वाल्टेयर
इस हलचल और कोलाहल से भरे संसार में जो व्यक्ति उदास, मौन ओर उखड़ा-उखड़ा सा दिखाई दे, उससे बिना पूछे ही समझ लेना चाहिए कि यह जीवन-संग्राम से भागा हुआ सिपाही है। वह भी ऐसा सिपाही जो बिना लड़े ही अपनी शक्ति में अविश्वास की दुर्बलता के कारण, समझ बैठा है कि मैदान में उतरने पर वह पराजित होकर चकना-चूर हो जायेगा। निःसन्देह ऐसे वे दिल और बुज़दिल उयनीयता के ही पात्र है। जो इस जीवन संघर्ष के सौंदर्य को अनुभव करने से बचते हैं। उनका जीवन श्मशान की भाँति ही सूना और भयानक हो जाता है, जिसमें हर्ष, उल्लास, आनन्द और अधीरता की तरंगें उठने के बजाय चिता की धूल उठा करती है।
लोकमान्यतिक
रस सिद्ध महर्षि मंकणा ने गति दी, साज बजे और सभा मण्डल में रस धारा प्रवाहित हो उठी। सम्राट, साम्राज्ञी तथा राष्ट्र के सम्भ्रान्त नागरिकों से भरे कला-कक्ष में वाद्य-यन्त्रों के साथ महर्षि के ताल और लय एक ऐसी सभा प्रस्तुत करने लगे मानो स्वर्ग से उतर कर आत्मानुभूति की रस गंगा ही धरती पर प्रवाहमान हो उठी हो।
मंगलाचरण, देवपूजन, आरती अभिषेक नृत्य-क्रमशः ताल-निबद्ध करते हुए महर्षि “शिवाडहं” सिद्धि की अनुभूति तक पहुँचने की एक-एक कला को बड़ी कुशलता के साथ निखारते चल रहे थे। दर्शक समाज ही आज महर्षि की स्वातमानुभूति की गंगा में बह जाने को तत्पर हुआ बैठा है।
साधना के प्रथम चरण-नृत्य-योग के प्रारम्भिक प्रयोग-बुझे हुये दीपक जल उठे, मरकत माणियों से जटित स्फटिक स्तम्भों पर खचित वाराँगनायें भी नृत्य करने लगी, सम्मोहित-मयूर और कस्तूरी मृग कांतर के स्वच्छन्द विचारणा त्याग त्याग कर नगर की ओर दौड़ पड़े जहाँ महर्षि का नृत्य-समारोह चल रहा था वहाँ जा जाकर भाव-विभोर हो उनके गति-निस्पंद का आनन्द, पीयूष पान करने लगे, प्रकृति के समस्त नियमों का उल्लंघन कर मेघ मालायें नगर में झुक-झुक जाने लगी, ऐसा लगता था सात स्वरों में सम्मोहित होकर सारी वसुधा ही नृत्य कर उठेगी-रस-सिद्ध महर्षि मंकणा की साधना के प्रताप की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा होने लगी।
ज्यों-ज्यों सिद्धियों का उद्भास मिलता महर्षि के नृत्य में नई गति उभरती चली जा रही थी। तभी एक देवमूर्ति सम्मुख उपस्थित हुई। उसने एक कुश-तृण आगे बढ़ाया महर्षि ने छाया का संकेत समझा और वह तृणा हाथ में लेकर एक-एक कर दोनों हाथों की दसों उँगलियों में उसे चुभोया दर्शक समाज स्तब्ध और आश्चर्य चकित देख रहा था कि जहाँ उँगली-उच्छेद से रक्त-स्रवित हो उठना चाहिए था वहाँ महर्षि की उँगलियों से क्रमशः केशर, केवड़ा, गुलाब, लौंग, मोगरे और खश आदि का सुवासित तेल निकल रहा है। ऐसा लगता था उन उँगलियों में गन्ध मादन पर्वत में प्रवाहित सुगन्ध-मलय, निर्भर स्त्रोत बनकर फूट पड़ा हों। महर्षि की जय जयकार हो उठी इस जय ध्वनि ने महर्षि की आँखों में मदिरा की सी मस्ती उड़ेल दी-अभिमान की मस्ती। उनके हृदय में एक भर जागृत हुआ-अब मेरे समान संसार में अन्य कोई कलाविद नहीं रहा। और इसी अभियान ने उनकी भाव सिद्धि पर पानी फेर दिया। नृत्य करते-करते संध्या हो चलने पर महर्षि समाधि-लय प्राप्त नहीं कर सकें।
अभिमान और सिद्धि, साधना की दो विपरीत स्थायें है। मूर्ति महर्षि के मन को झाँक रही थी। कुश तृणा अपने हाथ में लिया और उसका हलका प्रहर उँगलियों पर किया। यह क्या? महर्षि चौंके-उँगलियों से भस्म गिर रही है, उन्हें अपने इष्ट का ध्यान हो अभिमान का दर्प चूर-चूर हो गया। उन्हें याद आया कि नटराज ने अपनी एक ही कला से अनेक नृत्य-विधाओं सृजन किया है उनकी तुलना में मैं तो समुद्र की एक जैसा भी नहीं अभिमान गल गया। अब उन्होंने रुद्र उठाया आशुतोष की मंगल मूर्ति उनकी भावनाओं को छाने लगी त्वरित थिरकन के साथ डमरू की डिम-डिम का नाद सुनाई दिया और एक ही क्षण में महर्षि समाधि हो गये और उनकी समाधिवस्था का प्रभाव यह था कि सारा दर्शक आज उनके स्वरूप में भगवान् शिव के दर्शन कर रहा था। अभिमान की मूर्ति के हटते ही सिद्ध महर्षि ने अपना स्थान पा लिया।
नवागत सैनिकों को दिन भर कठोरता पूर्वक अभ्यास कराने वाला प्रशिक्षक सायंकाल घर लौटता है तो उसे अपनी पत्नी, पुत्री और बेटों से मधुर मुस्कान सौम्य सम्भाषण एवं मृदुल व्यवहार की अपेक्षा होती है, मधुरता की सौम्यता की आकाँक्षा नैसर्गिक होती है, पशुओं का निर्दयता पूर्वक वध करने वाला बधिक भी दयापेक्षी होता है, दया और करुणा हमारे अन्तःकरण की सनातन आकांक्षायें है बेईमानी और दलाली करने वाले वर्णिक भी अपने लिये ईमानदारी और निष्कपट व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं, नैतिकता हमारे जीवन की प्रधान आवश्यकता है। इसी प्रकार संसार का कोई भी व्यक्ति अपने प्रति यह नहीं चाहता कि कोई उससे झूठ बोले भले ही उसने जीवन में एक बार भी सत्य नहीं बोला हो। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति करने वाला कोई न कोई तो होता ही है। निरन्तर असत्य के संसर्ग में रहकर संतुलित मस्तिष्क, तथा जीवित रह पाना कठिन था इसलिये संसार का हर जीवित प्राणी मैत्री सम्बन्ध स्थापित करता है, परिवार और दूसरी सार्वजनिक संस्थाओं का निर्माण करता है जहाँ वह विश्वास पूर्वक एक दूसरे से व्यक्त होकर अपने आपको बोझिल होने से बचा लेता है।
किसी न किसी अंश में सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा जमी होने पर ही यह पृथ्वी यह संसार स्थिर है ऐसा शास्त्रकार का कथन है। और अपनी इसी उक्ति में उसने एक महत्वपूर्ण जीवन दर्शन-सत्य की आवश्यकता भी प्रतिपादित कर दी है-सत्य हर व्यक्ति के जीवन का मूल-मन्त्र होना चाहिए। हरिश्चन्द्र सत्यकाम जबाला ओर गाँधी जैसी पूर्ण सत्यनिष्ठा न हो तो भी उसे सत्य-के परिपालन में इतना तो दृढ़ होना ही चाहिए कि अपने द्वारा किसी अन्य प्राणी का किंचित मात्र अहित न हो।
मनीषा का कथन है-
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप॥
अर्थात्-सत्य सभी तपों का तप है, झूठ से बढ़कर दूसरा पाप नहीं, जिसके हृदय में सत्य है उसके हृदय में परमात्मा विराजता है। शून्य आकाश में अनन्त अन्तरिक्ष के अनादि नक्षत्रों का प्रकाश एक बिन्दु पर टकराता है बाहर खड़ा व्यक्ति प्रकाश-किरणों के द्वंद्व को देखकर यह पता नहीं लगा सकता कि कौन प्रकाश किस नक्षत्र से आ रहा है। किन्तु यदि वह इन प्रकाश कणों की बौछार के मध्य उस बिन्दु को प्राप्त करले जहाँ हर आगन्तुक कण टकराता हो तो उस मूल बिन्दु से चारों ओर देखते रह सकना तथा प्रकाश के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों की अंतर्दशा का पता लगाना भी सम्भव हो जाता है जिसे पकड़ने और धारण करने वाला व्यक्ति संसार की प्रत्येक वस्तु स्थिति का परिपूर्ण एवं आशंका रहित ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
सत्य जीवन की एक ऐसी अवस्था है जहाँ स्थित होकर अपने आस-पास के सम्पूर्ण वातावरण का सम्यक् और यथार्थ अध्ययन किया जा सकता है। क्यों जब कोई व्यक्ति सत्य बोलने सत्य व्यवहार करने का व्रत लेता है तो दुनियाभर की अहंतायें उससे टकराती है। कीचड़ में फँसा हुआ बीज अपने आपको कीचड़ से अधिक नहीं सोच सकता पर जब वही अंकुरित और पल्लवित होकर अपने आपको अपनी चेतना के दायरे में समेट लेता है तो न केवल उस कीचड़ के प्रभाव से बच जाता है वरन् उस कीचड़ में ही फँसी बहुमूल्य विभूतियों का अपने लिये अर्जन करने लगता है और उसकी वही अन्तः उपार्जित उपलब्धियाँ ही सौरभ सुवास के रूप में फूट पड़ती है। कीचड़ की जहाँ निन्दा हो रही थी वहाँ उसमें से जन्में कमल की प्रशंसा होने लगती है।
संसार माया, मोह, काम और क्रोध, मद और मत्सर का कीचड़ जैसा है जहाँ हर व्यक्ति अपना स्वार्थ अपनी अहंता की पूर्ति चाहता है। ऐसी परिस्थितियों में जीवन और विश्व के यथार्थ को समझ सकना कठिन हो जाता है। पर यदि कोई सत्य का आश्रय ले लेता है तो कमल के समान वह अपनी आत्मा के मूल बिन्दु पर स्थिर होकर विश्व के यथार्थ को देख लेता है। भली प्रकार समझा हुआ यह सत्य ही स्वर्ग और बन्धन मुक्ति का आधार बनता है।
सत्य-केवल सम्भाषण तक सीमित नहीं उसका क्षेत्र बड़ा व्यापक और विश्वास है। बोलें सत्य, साथ ही दूसरों को भी झूठ बोलने न दें। व्यवहार में सत्यता को पर यह भी ध्यान रहे कि उस सत्य में अप्रियता न हो, जहाँ दूसरों के प्रति सत्य की अभिव्यक्ति में साहस और दृढ़ता हो वहाँ अपने सत्य को प्रस्तुत करते समय भी चित्त डाँवाडोल ही सार्वभौमिक सत्य है केवल ऐसा सत्य ही हमें विश्व के यथार्थ की अनुभूति करा सकता है।
उदाहरणार्थ गाँधीजी ने सत्य को अपना जीवन मन्त्र बनाया था उन्होंने कुछ प्रतिज्ञा की थी-अहिंसा का व्रत पालन करूंगा, निर्धन देश की सेवा करते समय निर्धन बन कर रहूँगा। दोनों प्रतिज्ञायें कदम-कदम पर परीक्षा लेती। एक बार गाँधीजी खेड़ा से एक गाँव जा रहे थे। यात्रा बैलगाड़ी में हो रही थी। जिस गाड़ी में गाँधीजी बैठे थे उसे एक किसान हाँक रहा था किसान ने डण्डे में लोहे की कील चुभा रखी थी, वह बार-बर कील बैलों के पीड पर चुभा देता था जिससे बैल थोड़ा तेज चलने लगा था। गाँधीजी की दृष्टि एकाएक उधर पड़ गई। बैलों के पीठ पर रक्त वह भी उनके निमित्त उनकी प्रतिज्ञा सत्यता की कसौटी गाँधीजी तुरन्त बैलगाड़ी से उतर कर और फिर खेड़ा तक पैदल ही गये।
उन्हें 1å3.5 डिग्री बुखार था। इलाज के लिए साराभाई की कोठी पर ले जाया गया। बेहोशी टूटी उन्होंने देखा मैं सत्याग्रह आश्रम में नहीं हूँ। उन्होंने इस बीमारी में भी जीवन की परवाह न करें साराभाई की कोठी छोड़ दी और अपने आश्रम में आ गये। वाणी के व्यवहार के इस सत्य ने ही गाँधीजी को विश्व प्रतिष्ठा अधिकारी बनाया। आज सारी दुनिया गाँधीजी नहीं उन्हें इस सत्यनिष्ठा को नमन करती है सत्यवादी व्यक्ति भी और बाहर एक समान होता है इसीलिये उसकी शक्ति थाह पा सकना किसी के लिये भी सम्भव नहीं होता। तक इस सत्य का एक भी कण जिन्दा है यह पृथ्वी तक स्थिर है मनुष्य जाति ने यदि सत्य का पल्ला छोड़ दिया तो वह अपने आप ही सत्यानाश की विभीषिका जलकर अपना अन्त कर लेगा। हमें दम्भ और कपट नहीं सत्य का आचरण करना चाहिए इसी में संसार शोभा है।
जिस प्रकार सिंह-शावक सिंह की क्रोधाग्नि, भयंकरता अथवा हिस्सा से नहीं डरता सके साथ खेलता है और दौड़-दौड़ कर उसके गले में लिपटता है, उसी प्रकार सत्य का प्रेमी सत्य की भयंकरता से भयभीत नहीं होता ओर उसी के पास दौड़ जाता है।
सत्य का व्यवहार शत्रु को भी मित्र बना देता है। संसार में अजातशत्रु होने की इच्छा रखने वाले को सत्य का अनुयायी होना चाहिए। सत्य एक ऐसा तेजस्वी साथी है जो हर आपत्ति में मनुष्य की रक्षा किया करता है। कभी धोखा नहीं देता और न कभी कुछ चाहता है।
जहाँ हम सच्चा व्यवहार करते हैं। वहीं जीवित रहते हैं। असत्य का सहारा लेने की भावना आते ही मर चुकते हैं। सत्य को जानते हुए भी असत्य को प्रश्रय देते समय हमारे हृदय में जो एक ग्लानि होती है वह एक ऐसा विष है जो हमारे हाड़-माँस में ही नहीं मन बुद्धि ओर आत्मा तक में विंध जाता है और इस प्रकार हम अपने सर्वनाश के बीज बो लेते हैं।
-महात्मा गाँधी
अखण्ड-ज्योति के पिछले एक अंक में ध्यान की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए शिकागो के “टेड सेरियस” और उनके मित्र जोहन्स का उदाहरण दिया गया था। यह दोनों मित्र मिलकर इच्छा-शक्ति द्वारा हजारों मील दूर की फोटो कैमरे पर उतार देते हैं यही नहीं वे मानसिक एकाग्रता द्वारा युगों पूर्व घटित छोटी-सी छोटी घटना के कैमरा फोटो खींच देते हैं। कादम्बिनी के एक अंक में उनकी कल्पना द्वारा खींचा गया लाल किले का और फतेहपुर सीकरी के बुलन्द दरवाजे के चित्र छपे है जो लगभग हूबहू हैं। यहाँ एक ऐसा उदाहरण दिया जा रहा है जो भारतीय धर्म और दर्शन के नाम स्मरण, ध्यान और रूप-स्मरण द्वारा आन्तरिक क्षमताओं के विकास का प्रमाण प्रस्तुत करता है यदि मनुष्य तदाकार साधना में मन को इतना एकाग्र कर ले कि मन के एक बिन्दु पर इष्ट का कोई रूप ज्यों उतार दे तो भले ही वह चित्र, देवी देवता या काल्पनिक ही क्यों न हो मन में वह सामर्थ्य हैं कि वह शरीर रक्त, प्राण, बुद्धि और प्रज्ञा शक्तियों को ठीक उसी तरह का बना देता है जिस प्रकार का इष्ट होता है।
साधना काल में शिष्य गुरु का ध्यान करा है, साकार और सगुण उपासक भगवान् राम, भगवान् कृष्णा, नृसिंह, परशुराम, हनुमान, भैरव आदि की उपासना करते समय उनके रूप का ध्यान करते हुए जप और नाम संकीर्तन करते हैं देखने में समय गंवाने जैसी इस क्रिया में भी वैज्ञानिकता हो सकती है केवल मात्र ध्यान और स्मरण से जिसका ध्यान किया जा रहा है उसकी समस्त क्षमताओं का अपने अन्दर विकास किया जा सकता है किन्तु वैज्ञानिकों द्वारा पूर्ण परीक्षित निम्न उदाहरण यह बताता है कि ध्यान एक पूर्ण विज्ञान सम्मत विधान हैं जो सामान्य पंक्ति में भी इच्छित असामान्य गुणों और शक्तियों का विकास कर सकता है।
कोनेर सेरिथ (बेबेरिया) की थेरेसी न्यूमेन का जन्म 1998 में गुड फ्राइडे के दिन हुआ। 20 वर्ष की आयु में एकाएक एक दुर्घटना हुई जिसमें उनकी दोनों आँखें और दोनों हाथ-पाँव जाते रहे। मनुष्य जब तक साँसारिक सुखों के भोग की क्षमता रखता है तब तक कम ही लोग आध्यात्मिक सत्यों की शोध की ओर तत्पर होते हैं पर यह कैसे विडम्बना है कि कष्ट पड़ते ही मनुष्य भगवान् की, आध्यात्मिकता की शरण लेता है। यदि मनुष्य अशक्त होने से पहले ही अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित करले तो उसे मनुष्य शरीर सार्थक करने में असुविधा न हो समय की चूक अन्ततः पश्चाताप का ही कारण बनती हैं और जो जीव भगवान् के घर से असीम क्षमतायें लेकर जन्मता है वह सब कुछ यहाँ खोकर हाथ मलता हुआ चला जाता है।
अन्धी और अपंग हो जाने पर थेरेसी न्यूमेन को याद आया कि बेबेरिया में कोर्ठ थेरेसी नाम के महान् सन्त है उन्होंने सन्त थेरेसी से संपर्क स्थापित किया और उन्हें आध्यात्मिक मार्ग-दर्शक के रूप में याद करने लगी। 1923 में पहली बार उनके जीवन में एक विलक्षण घटना घटी वह था उनका अन्धापन और अपंगता का दूर हो जाना। अब थेरेसी न्यूमैन को साँसारिकता से पूर्ण अरुचि हो गई और वे भगवान् ईसामसीह का ध्यान और जप करने लगी, उन्हें धीरे-धीरे स्वादयुक्त भोजन और पेय से भी अरुचि हो गई क्योंकि मन की चंचलता के वही सब से बड़े कारण थे। भगवान् में मन एकाग्र करने के लिये शुद्ध और सात्विक आहार की आवश्यकता थी। थेरेसी ने वही लिया। पूजा में चढ़ाई गई एक छोटी सा केक ही वह लेती और उठते बैठते महाप्रभु ईसा का ही ध्यान करती।
महाप्रभु ईसा की आत्मा से तदाकार के सूक्ष्म आत्मिक गुणों को समझना सम्भवतः शक्य न होता पर 1926 में ही जब उनके मस्तक छाती, हाथ, और पैरों में ईसा के से घाव पैदा होने शुरू हो गये तो लोग यहाँ तक कि वैज्ञानिक भी आर्श्चय चकित हुये बिना रह सके। भावनाओं का अस्तित्व विज्ञान सिद्ध हो जोन पर भी उसकी महत्ता और विज्ञान न जानने के कारण जो वैज्ञानिक भावनाओं की उपेक्षा करते रहते हैं ; उन्हीं वैज्ञानिकों ने इसकी पुष्टि की। 16 जुलाई 1627 को प्रोटेस्टेंट जर्मन समाचार पत्र के सम्पादक डॉ. फ्रिट्ज गैरलिक कोनेर सेरुथ जाकर थेरेसी से मिले। वे लम्बे अर्से से थेरेसी की-आलोचना करते आ रहे थे। उन्होंने थेरेसी के पास कई दिन रहकर बिताये। उन्होंने देखा कि वे कुल एक छोटी सी केक पर दिनभर बिताती है-पूछने पर उन्होंने बताया-मैं अपने लिये प्रकाश से सारे जीवनःतत्व ग्रहण कर लेती हूँ। उन्होंने बताया मैं हर शुक्रवार को ईसा के कथित स्वरूप का ध्यान करती हूँ, उस समय उनकी अनुभूतियाँ एकाकार हो उठती है। डॉ. फ्रिट्ज गैरलिक लिखते है-”मैंने देखा कि उन्हें शुक्रवार के दिन प्रातःकाल से ही अचेतनता बढ़ने लगी, उसी अवस्था में उनके हाथ, मस्तक और पाँवों के घावों से अनायास बिना किसी दबाव के रक्त रिसने लगा सामान्यतः वे 121 पौण्ड वजन की थीं पर उस दिन उनका भार 10 पौण्ड कम हो गया। गुरुवार की रात बारह बजे से दर्द बढ़ना शुरू होता है और शुक्रवार के अपराह्न एक बजे तक बड़ी ही व्यथापूर्ण स्थिति रहती है। उस कष्ट के बीच थेरेसी के मुख मण्डल पर अपूर्व कान्ति दिखाई देती थी। कई बार तो मुझे यह भ्रम हो जाता था कि थेरेसी की मुखाकृति में ईसा की मुखाकृति प्रतिबिंबित हो उठी है। इसके बाद स्थिति सुधरने लगती है। और दूसरे दिन तक घाव ठीक हो जाता है। उस दिन उनकी मानसिक चेता विक्षुब्ध हो जाती और एक दिव्य जगत में प्रवेश कर जाती। तब वे हिब्रू भाषा में प्रवचन प्रारम्भ करती और यह प्रवचन कई बार तो अक्षर ब अक्षर ईसा मसीह के प्रवचन होते। आत्मिक साहचर्य और सायुज्य द्वारा कोई व्यक्ति किसी दैवी शक्ति या महान् आत्मा के गुणों से परिपूर्ण हो सकता है यह देखकर मैं दंग रह गया और आज भी उसका कारण जानने के लिये लालायित हूँ पर लगता है कि उसका उत्तर देने में विज्ञान नितान्त असहाय और असमर्थ है।”
यह विवरण उन्होंने अपने अखबार में छापा था। स्वामी योगानन्द ने भी थेरेसी से भेंट की थी और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “आटोबाईग्राफी ऑफ ए योगी” में इस घटना का ऐसा ही उल्लेख किया है।
विषय को जीतने का स्वर्ण-नियम राम-नाम अथवा ऐसा ही कोई अन्य मन्त्र होता है। अपनी-अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है।
मुझे लड़कपन से राम-नाम, सिखाया गया और मुझे बराबर उसका सहारा मिलता रहा, पर जिस किसी मन्त्र को हम जपें, उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिए। निश्चित समय पर ही इष्ट मन्त्र का जप अधिक प्रभावकारी होता है, जप करते समय कण्ठ से ध्वनि हो किन्तु पास बैठा व्यक्ति भी ध्वनि सुन न सकें, आवाज कण्ठगत ही होती रहे। मन को एकाग्र करने की चेष्टा की जाये, ताकि एकाग्र भाव से जप चलता रहे, किन्तु फिर भी मन्त्र का जपे समय दूसरे विचार आवें, तो परवाह नहीं, यदि हम श्रद्धा रखकर मन्त्र का जप करते रहेंगे तो अन्त में सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे, मुझे इसमें रत्तीभर भी शक नहीं। यह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमको तमाम संकटों से बचायेगा। ऐसे पवित्र मन्त्र का उपयोग किसी आर्थिक लाभ के लिये हरगिज न करना चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि तोते की तरह इस मन्त्र को न पढ़ें। इसमें अपनी आत्मा पूरी तरह से लगा देनी चाहिए। तोता यन्त्र की तरह मन्त्र को पढ़ते हैं, हमको उसे ज्ञान पूर्वक पढ़ना चाहिए।
-महात्मा गाँधी
फ्राँस के क्रान्तिकारी विचारक और सन्त लुइस की मृत्यु के बाद लगा जैसे एक महान् विचार शक्ति संसार से खो गई। 5 शताब्दियों से भी अधिक तक एक खामोशी छाई रही। 539 वर्ष बाद फिर से एक ताजी घटना की पुनरावृत्ति हुई जिसने न केवल फ्रांस वरन् दुनिया के करोड़ों विचारशील लोगों को यह मानने के लिये विवश कर दिया कि-संसार में जहाँ सब कुछ मृत्यु और परिवर्तनीय है वहाँ जीवन एक ऐसा अविरल और सतत् प्रवाह है जो अनादि से अनन्त तक चलता है, कभी नष्ट नहीं होता।
लहर के दो रूप एक बार पानी ऊपर को उठता है- उठाव दिखाई देता है फिर पानी गिर जाता है गिरते-गिरते उठने की एक नई शक्ति मिल जाती है और वही लहर फिर ऊपर आ जाती है जीवन का प्रवाह भी ऐसी ही लहर मानी गई है। भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन उस स्पन्दन का व्यक्त, ऊपर उठा हुआ रूप है मृत्यु अव्यक्त और अदृश्य न दिखाई देने पर भी उसका अस्तित्व काल के प्रवाह के रूप में बना रहता है। इस भारतीय सिद्धान्त का फ्रांस में सामान्यतः ड्रइड लोग ही समर्थन करते ओर मानते हैं पर सन्त लुइस की मृत्यु के ठीक 539 वर्ष बाद घटित इस घटना के प्रकाश ने समस्त बुद्धिवादियों के मस्तिष्क के एक प्रश्न वाचक चिन्ह लगा दिया जो वैज्ञानिकों के लिये अब भी एक पहेली बना हुआ है।
“रिसर्च इन टू दि इफीसियेन्सी ऑफ डेट्स एण्ड नेक्स इन दि एनालस ऑफ दि नेशन्स” से उद्धृत इस घटना और एक महान् दर्शन का उदय तब हुआ जब फ्रांस में सम्राट लुइस 16वें का जन्म हुआ। जीवन काल और शरीर स्वरुप की साधारण-सी भिन्नता के अतिरिक्त सन्त लुईस और सम्राट लुईस 16वें के जीवन में विलक्षण समानता थी सन्त लुईस के जीवन-काल में घटित सभी घटनाओं की हूबहू पुनरावृत्ति सम्राट लुईस 16वें के जीवन काल में हुई वह भी समय के स्थिर समानुपात में। यदि सेंट लुईस के जीवन की घटनाओं में 539 वर्ष जोड़ते चले जाये तो घटनाओं की समानता तो क्या नामों तथा स्थानों तक की समानता सम्राट लुईस की जीवन घटनाओं में देखी जा सकती है और यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि संत लुईस ने ही 539 वर्ष बाद सम्राट लुईस के रूप में जीवन धारण किया। नीचे उन दोनों के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।
क्रमाँक सन्त लुईस के जीवन की घटना सम्राट लुईस 16वें के जीवन की घटना सन्
1. जन्म 1215 +539
जन्म 1754
2. बहिन इसाबेल का जन्म हुआ 1225 बहिन एलिजाबेथ का जन्म हुआ 1225
+539 = 1764
3. पिता लुईस आइवें की मृत्यु 1226 पिता डाफिन की मृत्यु 1226
+539 = 1765
4. बीमार पडे 1229 उसी बीमारी से बीमार 1229
+539 = 1768
5. विवाह 1231 विवाह 1231
+539 = 1770
6. बालिग घोषित 1235 बालिग अधिकार प्राप्त 1235
+536 = 1774
7. हेनरी तीसरे के साथ शान्ति 1243 आज तीसरे के साथ शान्ति वार्ता 1243
+539 = 1782
8. पूर्व के एक राजकुमार ने ईसाई 1249 सम्राट लुईस 16वें के पास भी पर्व 1249
बनने की इच्छा से ही राजकुमार का राजदूत आया +539 = 1788
राजपूत भेजा उसका उद्देश्य भी ईसाई धर्म 1788 ग्रहण करने का इच्छा ही थी
9. क्रान्तिकारी विचारों के कारण 1250 सत्ता अधिकरण ने सम्राट लुईस से भी 1250
नजरबन्द किये गये सारे शासन के अधिकार छीन लिये
+539 = 1789
10. पद से हटा लिया गया “सिंहासन से उतार दिया गया 11. ट्रिस्टन की स्थापना और क्रान्ति “बैस्टीन का पतन तथा क्रान्ति का “का श्रीगणेश शुभारम्भ
12. जैकब की स्थापना “जैको बिनस का सूत्रपात “
13. इसावेल ऐन्गुलेम की मृत्यु “इसाबेल्ड ऐन्गुलेम का फ्रांस में जन्म “
14. माँ रानी ब्लैक की मृत्यु 1253 माँ हाइट लीली की मृत्यु 1553
+539 = 1792
15. अवकाश ग्रहण कर 1254 जेकोबिन को जीवन 1254
जेकोबिन बनना अर्पण करना
+539 = 1793
16. मैडेलियन प्रान्त में वापसी “पेरिस में मैडेलिन के अन्तिम संस्कार में सम्मिलित हुये
उपरोक्त सारिणी को देखने से पता चलता है कि (1) सन्त लुइस और सम्राट लुईस 16वें के जीवन में एक समान घटनायें घटित हुई। (2) जन्म से मृत्यु तक साम्य था। इससे सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य जीवन मात्र रासायनिक संयोग न होकर गणितीय सत्य और दर्शन है उसको ठीक तरह समझे बिना जीवन के सम्बन्ध में लिये गये कोई भी निष्कर्ष अधूरे ही रहते हैं।
अद्भुत सी दीखने वाली यह घटना भारतीय धर्म और दर्शन के लिये कोई नई बात नहीं। शास्त्रकार का कथन है-
चिरकाल प्रत्ययतः कल्पना परिपीवरः । आधिभौतिकबोधमाधते चैषबालवत् ॥
ततौ दिक्कलाकलनास्तदा धारतया स्थिताः। उद्यन्त्यनुदिता एववायों स्पन्दन क्रियाइद ॥ योगवशिष्ठ 3।4॰।42-43
अर्थात्-(मृत्यु के बाद) कुछ समय तक जीव सूक्ष्म शरीर से अदृश्य जगत में बना रहता है उस समय भी उसका कल्पना के द्वारा विकास होता रहता है अर्थात् सूक्ष्म शरीर में स्थूल शरीर की सी विचारणा निरंतर चलती रहती है। उसमें शरीर को पोषण भी मिलता है। उसके बाद वह जीव किसी बालक के शरीर में आता है। उसकी कल्पना में दिशा और समय के रहस्य संस्कार रूप में हुये रहते हैं मनुष्य किसी अज्ञात प्रेरणा से काम करता दिखाई देता है पर वह पूर्व कल्पनायें ही संस्कार ही उसे नये जीवन में मार्गदर्शन करते रहते हैं। हवा की लहरियोँ के समान जीवन के प्रवाह में अनन्त रहस्य छिपे रहते हैं।
विज्ञान और मनोविज्ञान की आगे वाली खोजें इस भारतीय दर्शन को और भी अनेक घटनाओं के आधार पर प्रमाणित कर सकती है। पुनर्जन्म जीवन का अकाट्य नियम है इस बात को मानकर हर व्यक्ति को आत्म-कल्याण की ओर प्रवृत्त होना चाहिए अन्यथा युगों बाद कठिन तपश्चर्या के बाद कठिन तपश्चर्या के बाद मिला मनुष्य जीवन निरर्थक ही गया मानना चाहिए।
शिष्य की अशान्ति बढ़ी और बढ़ती ही चली गई। जब चित्त वृत्तियाँ अनियन्त्रित हो उठीं तो वह अपने गुरुदेव के चरणों में जा गिरा। प्रार्थना करते हुये उसने निवेदन किया-भगवन् आज मन बड़ा अस्थिर है लगता है इतने दिनों की साधना और तप सब आज हो भंग हो जायेगा।
आचार्य प्रवर कुछ देर तक निश्चित बैठे विचार करते रहे फिर बोले मन का सीधा सम्बन्ध अन्न से है-कहीं तुमने कुछ चुरा कर तो नहीं खा लिया।
नहीं नहीं देव! ऐसा तो नहीं हैं किंतु आज मैं एक नगर भोज में अवश्य सम्मिलित हुआ था। कहते हैं जिस सेठ भोज दिया वह बहुत धर्मात्मा पुरुष है।
आचार्य हँसे और बोले ठीक है अब समझ में आया कि आज जो तुमने खाया वह बिन परिश्रम का ही नहीं था वरन् अनीति का भी था। जिस सेठ ने यह भोज दिया है उसने वृद्धावस्था में भी एक गरीब घर की लड़की से विवाह किया और वह भी धन लेकर यह भोज उसने उस पाप से बचने के लिये ही किया है।
अब जब तुमने खाया ही पाप का है तो उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा। इसलिये कहते हैं आत्म-कल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम आदि ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिए।
शक्ति तत्वों के बारे में वैज्ञानिक जानकारियाँ जितनी बढ़ती जा रही है जीवन और प्राण से सम्बन्धित पाश्चात्य मान्यतायें उतनी ही तेजी से गलती और बदलती जा रही हैं, भारतीय तत्वदर्शन की सत्यता की सम्भावनाओं में उतनी ही तीव्र वृद्धि होती जा रही है। साधनाओं की-योगाभ्यास की कठिन प्रक्रियाओं को पार कर भारतीय तत्वदर्शियों ने जो खोजें की है पाश्चात्य विज्ञान उधर ही बढ़ रहा है प्रस्तुत लेख में पाश्चात्य विज्ञान द्वारा प्रमाणित मानव जीवन के विद्युत चुम्बकीय स्वरूप का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे पाठकों को जीवन-शक्ति, प्राणतत्व की कल्पना का एक नया रूप मिलेगा।
एक बार डॉ. रेगनाल्ट एक रोगी की परिचर्या कर रहे थे, मानसिक तनाव के उस बीमार को वे जब जब पूर्व पश्चिम दिशा की ओर सुलाते “ओसिलोट मीटर” की सहायता से पता चलता है कि कष्ट बढ़ गया है जब कि चारपाई की दिशा उत्तर-दक्षिण करते तत्काल लाभ मिलता। उन्होंने बताया यह घटना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य का पृथ्वी की चुम्बकीय धाराओं से सम्बन्ध है डॉ. रेगनाल्ट की यह खोज एक दिन विकास बाद और मनुष्य के अीवा जैसे एक कोषीय जीव से उत्पत्ति की बात को खण्डित कर दे तो कुछ आश्चर्य नहीं प्राण या जीवन शक्ति एक सनातन तत्व हैं जो विस्फोट के कारण ब्रह्मांड के किसी केन्द्र-पिण्ड से बहता हुआ सारे विश्व में नाना प्रकार की रचनाओं के रूप में व्यक्त हो रहा हैं।
कुत्ते, बिल्लियाँ, बैल एक बार जिस रास्ते को देख लेते हैं दुबारा उधर कभी जाना हो तो वे उधर से आसानी से लौट आते हैं। इनके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि वे प्राकृतिक चिन्हों की मदद से यात्रायें कर लेते होंगे पर कुछ पक्षी, मछलियाँ हजारों मील लम्बी यात्रायें करती है, रात में करती हैं, विभिन्न ऋतुओं में करती हैं तो भी नियत स्थानों में ही पहुँचती हैं यह एक आश्चर्य हैं कि वे बिना किसी दिशा निर्देश के अंतःवृत्ति द्वारा किस प्रकार इस तरह की लम्बी यात्रायें सम्पन्न कर लेते हैं।
योरोपीय सारस ठंडक के दिनों में योरोप से उड़ती हैं और अफ्रीका जा पहुँचती हैं। काले सिर वाले कौवे (हूडेड क्रो) अबाबीले 6000 मील यात्रायें करके एक स्थान से दूसरे स्थानों तक पहुँच जाती हैं। उन्हें कोई दिशा ज्ञान न होने पर भी वे नियत स्थानों में कैसे पहुँच जाते हैं यह आश्चर्य का विषय था। यात्रायें अधिकाँश रात में होती है, तारों का कोई ज्ञान हो पक्षियों के बारे में ऐसे भी कोई तथ्य प्रकट नहीं अतएव आश्चर्य होना स्वाभाविक ही हैं। जीव-शास्त्रियों ने खोज की और पाया कि रहस्य कुछ भी हो पर एक बात निश्चित रूप से साफ हो जाती हैं वह यह कि सभी पक्षी पृथ्वी की चुम्बकीय रेखाओं के समानान्तरण प्रवास करते हैं प्रयोगों से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है।
एक बार कुछ कौवों को पकड़ कर उनके शरीर में कुछ चिन्द बाँध दिये गये। यह कौवे उत्तर पूर्व दिशा में प्रवास के आदी थे। इस बार उन्हें प्रशा (जर्मनी) में पकड़ा गया और वहाँ से 500 मील पश्चिम ले जाकर कील नहर के किनारे छोड़ गया। इस बार उन्होंने उड़ान भरी और स्कैंडेनेविया में जाकर उतरे। पहली उड़ान वाले मार्ग से इस मार्ग की तुलना की गई तो स्पष्ट ज्ञान हो गाय कि यह यात्रा-पथ पहले प्रवास पथ से ठीक समानान्तर था। ह्वेल और सालोमन मछलियों के प्रयोग से भी यही बात सामने आई और उससे एक बात पूर्ण स्पष्ट हो गई कि जीव-जन्तुओं का जीवन चुम्बक-शक्ति से प्रभावित और प्रेरित होता है। इन प्रयोगों में शियर-वाटर (जल में तैरने वाले पक्षी) का उदाहरण सर्वाधिक आश्चर्य जनक था इसे अटलाँटिक महासागर के एक किनारे पर छोड़ा गया वहाँ से वे 3050 मील लम्बी यात्रा सम्पन्न कर स्कोरवोम द्वीप के अपने निवास स्थान पर जा पहुँचे।
जीव-जगत चुम्बकीय शक्ति से बहुत अधिक प्रभावित पाया जाता है। टरमाइट कीड़ा अपना घर ठीक पृथ्वी की चुम्बकीय रेखाओं के समानान्तरण बनाता है। पृथ्वी पर कभी चुम्बकीय आँधियाँ आती है तो दीमक चींटियाँ तक विक्षुब्ध हो उठती हैं। यहाँ तक कि जीव कोशों (लाइफ सेल्स) का सूत्र विभाजन भी अपनी प्रारम्भिक होता है। फ्रोमोजोम हमेशा सेलों के ध्रुवों की ओर ही चलते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जीवनी-शक्ति विद्युत चुम्बकीय क्षमता से ओत-प्रोत अथवा वैसी ही कोई शक्ति है।
जीव जन्तु ही नहीं मनुष्यों के जीवन भी चुम्बकीय शक्ति से प्रभावित होते हैं। 1845 में डॉ. रीचेनबैक ने अनेक लोगों पर उनके स्वप्नों का अध्ययन कर बताया कि पूर्व की ओर सिर ओर पश्चिम की ओर पैर करके सोने में बड़ी बेचैनी होती है। जबकि उत्तर-दक्षिण सोने में सुखद अनुभूतियाँ होती है। डॉ. क्लैरिक तथा डूरविले के प्रयोग भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं ओर बताते हैं कि स्वप्नों में दिखाई देने वाले दृश्यों का सम्बन्ध कैसे भी हो चुम्बकीय शक्ति से ही हैं। डॉ. रेगमाल्ट, अम्बाँस भुलर, लैंप्रिस आदि ने भी उक्त मान्यताओं की पुष्टि की है।
पृथ्वी की चुम्बक शक्ति के बारे में यद्यपि वैज्ञानिक अभी कल्पनायें हो करते हैं और अनुमान लगाते हैं कि पृथ्वी के गर्भ में मैगनेटाइट या फेरस आक्साइड की विशाल राशि संग्रहित है उसी के फलस्वरूप पृथ्वी एक विशाल चुम्बक की तरह काम करती है मानवीय जीवन या जीव जन्तुओं का चुम्बकीय धाराओं से प्रभावित होने का कारण उसके शरीर में लौह युक्त होमोग्लोबिन का होना बताते हैं पर वस्तुतः यह दोनों ही कारण सूर्य के प्रकाश किरणों की विद्युत चुंबकीयता के कारण है। पृथ्वी को चुम्बक बनाने का काम सूर्य करता है। पिछले एक लेख में ध्रुव प्रभा के निर्माण की व्याख्या करते समय यह बात प्रकट हुई है। अखंड-ज्योति के पिछले एक अंक में “पत्थर में भगवान्” शीर्षक में यह बताया गया है कि सूर्य के प्रकाश कण (फोटोन्स) ही जीवन का आधार भूत तथ्य है। पुरुष के शरीर में पाया जाने वाला “होमोग्लोबिन” यह प्राण ही हैं जो सूर्य से निःसृत होता है और वायु द्वारा, इच्छा शक्ति द्वारा अन्न द्वारा हमारे शरीरों में पहुँचता रहता है स्त्री के शरीर में इसे ही “रयि” कहते हैं विपरीत ध्रुव संचय होने के कारण ही स्त्री-पुरुषों में परस्पर आकर्षण का स्वभाव पाया जाता है।
डॉ. मैरिनेस्को ने तो कई प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि चुम्बकत्व हमारे मानसिक संस्थान को भी प्रभावित करते हैं वे मस्तिष्क की तीसरी वेन्ट्रिकल में धन विद्युत प्रविष्रुट कर निद्रा ला देते थे। विद्युत और चुम्बक लगभग एक जैसी ही शक्तियाँ और परस्पर परिवर्तनीय है। उन्होंने यह भी दिखाया कि स्वप्न की अनुभूतियाँ भी चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित होती हैं। हम ऐसे सैकड़ों उदाहरण दे चुके हैं कि कई बार मनुष्य के स्वप्न नितान्त सत्य पाये जाते हैं इससे प्रतीत होता है कि चुम्बक शक्ति में विचार, सर्वज्ञता, सर्व व्यापकता के सारे लक्षण विद्यमान है यदि ऐसा ही हैं ध्रुव प्रभाओं (अरोरल लाइट) द्वारा जीवात्मा के ऊर्ध्व या अधोगामी लोकों में प्रस्थान की भारतीय मान्यतायें भी गलत नहीं होनी चाहिए। पुराणों में वर्णन आता है-
नाथवीथ्युतरं यच्चं सप्त्तर्षिभ्यश्र दक्षिणम् । उत्तर सवितुः पन्था देवयान इति स्मृतः ॥
उत्तरं यद गस्तस्य अजवीथ्याश्च दक्षिणम् । पितृयनः सर्वै पन्था वैश्वानर पथाद् बहिः॥
अर्थात्-नाथ वीथी के उत्तर और सप्तर्षि से दक्षिण सूर्य का जो उत्तर की तरफ का मार्ग है उसे देवयान कहते हैं। अगस्त के तारे से जो उत्तर और अजवीयी दक्षिण है वह वैश्वानर मार्ग से बाहर पितृयान का मार्ग है।
यह मार्ग पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति सूर्य के प्रकाश कणों के सम्मिलित रूप से बनते हैं उनका स्वरूप विद्युत चुम्बकीय ही होता है जैसा कि पिछले ध्रुव प्रभा वाले लेख में दिया है। धन और ऋण विद्युत कणों का एक दूसरी ओर आना-जाना ही विद्युतीय चुम्बक शक्ति का क्रम है वैदिक भाषा में इसे ही “एति च प्रेति च” कहा है इसे ऋग्वेद में-
अन्तश्ररति रोचनास्य प्राणाद पानती, व्यख्यनमहिषो दिवम् (ऋग्वेद 10।189।2
अर्थात्-प्राण अपान रूप में स्पन्दित यह शक्ति ही जीवन का आधार हैं। यों उसका मूल आधार सूर्य हैं-
आकृष्णोन रजसा वर्त्तमानो निवेशयत्रमृतं मर्त्यच। हिरण्य येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन॥
अर्थात्-काले वर्ण के लोकों से विचरता हुआ मृत्य ओर अमृत अर्थात् प्रकृति और प्राण (धन और ऋण या उत्तरी ध्रुव चुम्बकत्व व दक्षिणी ध्रुव चुम्बकत्व) दोनों सुव्यवस्थित करता हुआ सुवर्णमय रथ से सविता (आदित्य प्राण) समस्त लोकों को देखता हुआ, दर्शन देता हुआ आ रहा है।
जहाँ अब यह प्रसिद्ध होता जा रहा है कि जीवनी शक्ति विद्युत चुम्बकीय तत्व है वहाँ उसके सूर्य लोक से निसृत होने का प्रमाण भी वैज्ञानिकों को मिल रहे हैं सूर्य में काले धब्बों का वैज्ञानिकोँ द्वारा अंकन इस बात की पुष्टि करता है कि सूर्य लोक का सम्बन्ध किसी और भी सुविशाल बीज ग्रह से अथवा ब्रह्मांड से है। इस सम्बन्ध में आगे की खोजें स्वर्ग मुक्ति और एक विश्व-व्यापी सत्ता के अस्तित्व ओर उसकी प्राप्ति की आवश्यकता का ही बोध करायेगी।
भिशक अनगपाल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वे जिस जल से स्नान करते थे, उसमें तो प्रत्येक ही दिन कोई न कोई इत्र, चन्दन, अगरु, केवड़ा गुलाब की सुबास मिलाई जाती थी पर जो मादकता और मधुरता आज के जल में थी, वह कभी भी नहीं मिली थी।
विस्मित महाराज भिशक अनंगपाल ने परिचारिका को बुलाया और पूछा-आज जल-कलश में कौन-सी सुवास मिलाई गई है। परिचारिका किसी अज्ञात भय से स्तब्ध हो गई। उसने कहा-क्षमा करें, महाराज! आज एक नई परिचारिका, जो कल ही नियुक्त की गई है, ने स्नान का प्रबन्ध किया था, आज्ञा हो तो सेवा में उसे ही उपस्थित करूं।
महाराज भिशक अनंगाल ने उस दूसरी परिचारिका को बुलाकर पूछा तो वह साहस बोली-महाराज! उस जल में तो कुछ भी नहीं मिलाया गया। हाँ वह जल मैं स्वयं ही अपने साथ अपने मायके से लाई थी।
मायके से। महाराज की उत्सुकता और भी बढ़ी, उन्होंने पूछा-बताओ परिचारि के तुम्हारा पितृगृह कहाँ है, क्या यह जल किसी कुएं का है या पद्य-पुप्ति कसी सरोवर का ?
नहीं, नहीं महाराज! ऐसे किसी स्थान का जल नहीं था वह। मेरा घर गन्धमादान पर्वत की तलहटी पर है मेरे ग्राम के समीप एक आश्रम हैं वहाँ एक योगी रहते हैं। आश्रम के समीप ही एक कुण्ड है, यह जल उसी कुण्ड का है। मैं उसे विशेष रूप से आपके लिये ही लाई थी।
भिशक अनंगपाल की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। नव-परिचारिका को पर्याप्त पारितोषिक दे वे उस आश्रम की ओर चल पड़े। दो दिन की अनवरत यात्रा के बाद सब लोकग उस आश्रम में जा पहुँचें। महाराज ने वहाँ पहुँचते ही अनुभव किया कि यहाँ की तो प्रत्येक वस्तु उसी सुगन्ध से परिपूर्ण दिखाई देती है महाराज बड़े आश्चर्यचकित हुये। सत्वर ही योगी को प्रणाम कर उन्होंने पूछा-महात्मन्! आपके आश्रम में यह भीनी-भीनी सुगन्ध कहाँ से आ रही है।
योगी ने हँसकर कहा-महाराज! एक वृक्ष यहाँ से सौ योजन दूरी पर इसी पर्वत पर है, मैं सदैव उसका ध्यान करता रहता हूँ, आश्रम उसी की सुगन्ध से अहर्निश गूँजा करता है।
“केवल स्मरण मात्र से ऐसा होना बड़ी कठिन बात है महात्मन्!” आप समझ भी नहीं सकते, यह सब संकल्प का चमत्कार है। संकल्प-बल से व्यक्ति अपने जीवन को ही नहीं, प्रत्युत अपने वातावरण को भी जैसा चाहें, वैसा ही बना सकते हैं, महाराज!” महाराज को वह पुष्प तो नहीं मिल सका पर तत्व-ज्ञान लेकर लौटे वह उससे भी महत्वपूर्ण था।
उलझी केश राशि समेटी और उन्हें वेणी से गूँथते हुये परिचारिका बोली-भन्ते तुमने सुना नहीं गौतमी ने प्रव्रज्या ली है, उन्होंने अर्हव्स भी प्राप्त कर लिया और अब उन्होंने भिक्षुणी संघ स्थापित किया है। उनका विचार है कि पुरुषों के समान ही महिलायें भी साधनायें करें और स्वर्ग तथा मुक्ति का अधिकार प्राप्त करें। पूर्णा, धीरा उपशया, मुक्ता, तिष्या तथा भद्रा आदि ने तो प्रव्रज्यायें ग्रहण भी कर ली अब वे योग-साधनायें कर रही हैं।”
फिर एक क्षण मौन रहकर परिचारिका ने पुनः कहना प्रारम्भ किया-भन्ते ! आपके भ्रातर कौशल राज प्रेसन जित् स्वयं भी गौतमी की योग-साधना से बहुत प्रभावित हैं वे कई बार वेलुवन में उनके दर्शन कर चुके हैं। मैंने उन्हें देव माता से कई बार गम्भीर एकान्त-वार्ता करते देखा है और यह भी सुना है कि गौतमी चाहती है कि राज घरानों की कन्यायें आगे आयें और धर्म को जीवन की मूल आवश्यकता प्रदर्शित करने का नेतृत्व करें। कहीं उनका संकेत आपकी ओर तो नहीं है।
वेणी बँध चुकी थी। सुमना ने खड़े होते हुये कहा-विद्या! आत्मोद्धार मनुष्य जीवन का प्रधान लक्ष्य और मूल आवश्यकता है फिर इन दिनों जब कि धर्म-तन्त्र विकृत हो चुका है, सामाजिक मर्यादायें टूट रही हैं, लोगों के जीवनों में कल्मष काषाय बढ़ते जा रहें हैं महिलायें भी इस महान् अभियान में हाथ बंटाती है तो यह अच्छी बात होगी किन्तु मैं यह नहीं चाहती कि कोई साँसारिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा करके मुक्ति की प्राप्ति हो। ऐसी मुक्ति मेरी दृष्टि में बंधन से बढ़कर है। बौद्ध धर्म और भगवान् बुद्ध के प्रति मेरे अन्तःकरण में अपार आदर है। आवेश में ग्रहण की गर्ठ प्रव्रज्यायें किसी दिन भोग वृत्ति का दूषण न फैलाने लगें ऐसी मुझे पूरी आशंका है, इसलिये मैं चाहती हूँ कि साधना तो सभी करें पर ब्रह्मचर्य गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ के चरण पूरे करते हुए ही मुक्ति की ओर बढ़ा जाये। जो शक्ति प्रारम्भिक अवस्था की साधनाओं में मनोनिग्रह में खर्च होती है वह परिपक्व अवस्था में नहीं, उस समय इन्द्रियाँ भी अशक्त हो उठती है इसलिये मुक्ति के लिये वही उपयुक्त समय होता है।
सुमना यह कह ही रही थी कि वहाँ आ पहुँचे प्रसेनजित। उन्होंने कहा-तू ठीक कहती है सुमना! मैंने तेरी बातें सुनली हैं और उनकी यथार्थता भी समझ ली मेरी ओर से निश्चिन्त रह मैं तुझे अभी प्रव्रज्या के लिये प्रेरित नहीं करूंगा।
सुमनो अपने माता-पिता की सेवा में लग गई। कौटुम्बिक उत्तरदायित्वों को ही साधना मानकर उसने अपने कर्तव्यों का पालन किया वृद्धावस्था आने पर उसने प्रव्रज्या ग्रहण की और दीर्घकालीन तप के बाद भी जो लाभ अन्य भिक्षु-भिक्षुणियाँ नहीं ले पाई थी वह उन्होंने थोड़े ही समय में प्राप्त कर लिया।
जब बाढ़ आती है तो वह तालाब, पोखर आदि को भर कर सबको समुद्र का-सा रूप दे देती है, पर वर्षा का जल सामान्य नालों के द्वारा ही वह जाता है। इसी प्रकार महापुरुषों का आश्रय पाकर अनेकों भव-सागर के पार हो जाते हैं। साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त करें एक व्यक्ति बड़ी कठिनाई से अपना ही उद्धार करने में समर्थ होता है, नहीं या समुद्र में लकड़ी के बड़े लट्ठे का आश्रय लेकर अनेकों मनुष्य किनारे लग जाते हैं, पर जल में बहने वाली छोटी डाली पर एक कौआ भी बैठ जाय तो डूब जाता है। इसी प्रकार अवतार या महापुरुषों का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य संसार-सागर के पर पहुँच जाते हैं, पर भजन साधन करने वाले स्वयं ही बड़ा उद्योग करके मुक्ति तक पहुँचते हैं।
-रामकृष्ण परम हंस
मनुष्य के चारों ओर ज्ञान का भण्डार बिखरा पड़ा है। संसार की प्रत्येक छोटी बड़ी वस्तु अथवा बात मनुष्य से अपनी जानकारी की अपेक्षा रखती है। संसार की कोई भी चीज अथवा बात ऐसी नहीं जो अपने में जानने योग्य कुछ भी न रखती हो। जब किसी वस्तु की ठीक से जानकारी की जाती है तो छोटी से छोटी वस्तु में भी बड़े-बड़े जानने योग्य रहस्य निकल पड़ते हैं जो कि मनुष्य के बड़े काम के सिद्ध होते हैं।
मनुष्य ने मिट्टी की जानकारी की, फसलें प्राप्त करलीं। पानी की जानकारी की, जीवन तत्व के साथ विद्युत का पता लगा लिया। चीजों के अन्दर छिपी आग जानकार जीवन की गतिविधि ही बदल दी। यह सब सीखने और जानने का ही परिणाम है कि आज मनुष्य अपने उपयोग की असंख्यों वस्तुओं को पहचान सका। जंगल में उत्पन्न होने वाली अगणित वनस्पतियों में से वह लाभ कर तथा हानिकर औषधियों को जानकारी के बल पर ही प्रथक-प्रथक कर सका और पहचानने की क्षमता प्राप्त कर सका। यदि मनुष्य अपनी जानकारी न बढ़ता तो वह आज इतनी अधिक चीजों का जीवन की सुख-सुविधा के लिये उपयोग न कर सकता। संसार की प्रत्येक वस्तु एवं बात मनुष्य के जानने योग्य हैं और उसे अपने संसार के विषय में अधिक से अधिक जानने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। जिस अनुपात से मनुष्य का ज्ञान बढ़ेगा उसी अनुपात से वह सुखी एवं सम्पन्न होगा।
सामान्य एवं असामान्य, नेता तथा अनुयायी में जो अन्तर हैं वह जानकारी का ही हैं संसार में जितने भी बड़े आदमी अथवा जन-नायक हुये है न तो वे यों ही उस पद पर पहुँचे हैं और न किसी ने यों ही वह पद प्रदान किया है। वे सब अपने ज्ञान का प्रमाण देकर ही उस प्रतिष्ठा के अधिकारी बने हैं। जब सामान्य लोग खा पीकर मौज में लगे होते हैं तब असामान्य बनने वाले व्यक्ति जीवन की सुख सुविधा को त्याग कर ज्ञान प्राप्त करने में लगे होते हैं। जब आदमी चैन से सोते हैं तो ज्ञान के इच्छुक व्यक्ति चिन्तन मनन किया करते हैं। जो संसार की बातें एवं घटनायें अन्य व्यक्तियों के लिये नगण्य एवं सार शून्य होती है। ज्ञानार्थी के लिए वे बड़े-बड़े रहस्य रखती है। ज्ञान पाने का जिज्ञासु व्यक्ति हर घटना के पीछे छिपे, कारण कारक अथवा किसी मानव मनोविज्ञान का रहस्य खोजकर अपने ज्ञान की श्रीवृद्धि किया करते हैं। सामान्य जन जिन अपनी अनेक समस्याओं का कारण एवं निवारण स्वयं नहीं जानते, जानकार ज्ञानी लोग उनका हेतु एवं समाधान बतला देते हैं। अपनी इन्हीं अध्यवसाय-जन्य विशेषताओं के कारण ही ज्ञानवान व्यक्ति नेतृत्व प्रतिष्ठा पाया करते हैं। पूजा-प्रतिष्ठा अथवा आदर सम्मान किसी के पंच-भौतिक शरीर का नहीं होता वह उस ज्ञान का ही होता है जो उनके मस्तिष्क के निवास किया करता है। संसार की जो जितनी अधिक जानकारी रखेगा वह उतना ही अधिक आगे रहेगा।
अजानकारी अथवा अज्ञान मनुष्य के लिये बहुत बड़ा अभिशाप हैं। यही वह दोष है जिसके कारण लोग नित्य-प्रति ठेगे जाया करते हैं। न जानकारी के कारण लोगों को दूसरे की कही बातों पर विश्वास करना पड़ता है और वंचक लोग इसी विवश विश्वास का लाभ उठा कर लोगों को प्रताड़ित करते रहते हैं। जानकारी के अभाव में लोग जीवन की छोटी-छोटी बातों के लिये दूसरों के पास दौड़ते और अपनी जेब कटवाते रहते हैं।
अन्य लम्बे-चौड़े ज्ञान को तो छोड़ दीजिये लोग अपनी साधारण-सी दैनिक बातों का भी तो ज्ञान नहीं रखते। जो भोजन मनुष्य करता है बहुसंख्यक लोग उसके विषय में तो अनभिज्ञ रहते हैं। वे नहीं जानते कि वे क्या खा रहे है? यह उन्हें खाना भी चाहिये या नहीं। कौन-सी चीज उनके लिये स्वास्थ्य कर और कौन−सी हानिकारक है, भोजन के सम्बन्ध में विरले भाग्यवान ही इस बात की जानकारी रखते हैं।
वस्त्रों के ठीक-ठीक भाव, उनकी किस्म तथा स्तर का ज्ञान अथवा उसके मिल अथवा निर्माणशाला का ज्ञान कितने लोग रखते होंगे? अपनी इसी ना जानकारी के कारण ही लोग अच्छे दाम देकर खराब चीज और भाव से अधिक मूल्य देकर ही बाजार से आया करते हैं। इस अनजानकारी के कारण वे बजाज के लिये तो अच्छे खासे लाभदायक सिद्ध होते सो तो होते ही हैं दर्जी के लिये तो और भी। कमीज, कुरता, कोट, पतलून अथवा जम्पर, ब्लाउज में ठीक-ठीक कितना कपड़ा लगना चाहिये इस बात की जानकारी यदि लोगों को आमतौर से हो तो दर्जी कपड़ा काटने में लापरवाही करने के स्थान पर किफायत करने पर मजबूर हों और तब कम जरूरत पर भी ज्यादा कपड़ा लेने का आम रिवाज ही उठ जाये।
हमारे रहने का मकान कैसा हो अथवा जहाँ जिस प्रकार हम रह रहे हैं यदि लोगों को इसका समुचित ज्ञान रहे तो तंग, बन्द और गंदे मकानों में रहे और न स्वयं गन्दगी करे। मजबूरन किसी गलत स्थान अथवा मकान में फंस जाने पर बड़ी जल्दी उसे छोड़ने और दूसरे प्रबन्ध करने की कोशिश की जाये। यदि वास्तव में लोगों को रहने की ठीक विधि की जानकारी रहे तो लोग मकान बनवाना सीख लें। मालिक मकान ही नहीं किरायेदार तक ऐसे मकान पसन्द न करें जो वास्तव में रहने योग्य न हों और तब ऐसी हालत में खराब माल की तरह मालिकों के मकान खाली पड़े रहें या वे उन्हें ठीक से बनवाने का प्रयत्न करें। किन्तु खेद है कि निवास स्थान के महत्व को न जानने के कारण लोग चार दीवारों एक छत और एक दरवाजे भर को ही मकान मान लेते हैं और जब एक बार उसमें डट जाते है तो फिर स्वास्थ्य कर वायुमण्डल के अभाव में गोरे से काले या पीले ही क्यों न हो जायें। सामान्य जीवन की इन दैनिक आवश्यकताओं की इतनी अजानकारी वास्तव में मनुष्य के लिये बड़ी लज्जा की बात हैं।
हम लोगों में ऐसे लोग तो कदाचित नगण्य ही होंगे जो नागरिक नियमों तथा नागरिक शाँति व्यवस्था के कानूनों की जानकारी रखते हों। हम जो कर रहे है या करने की सोच रहे हैं यह नियम सम्मत है या नहीं यह पता करने के लिये हमें अनेक वर्गों पर निर्भर रहना पड़ता है। अपने नागरिक कर्तव्यों तथा अधिकारों का ज्ञान तो हम लोगों के लिये बड़े ज्ञान का विषय बना हुआ है। अनेक क्या बहुसंख्यक लोग ऐसे मिलेंगे जिनको, कोई काम कर डालने के बाद पता चलता है कि उन्होंने नागरिक नियम अथवा कानून का उल्लंघन किया है। इस नागरिक अजानकारी की पराकाष्ठा के कारण ही हम नागरिकों को पुलिस तथा नागरिकों सेवा अधिकारियों से भयभीत रहा पड़ता है।
देशान्तरों के विषय में जानना तो दूर हममें से बहुसंख्यक लोग अपने देश की योजनाओं, गतिविधियों तथा आवश्यकताओं तक की जानकारी नहीं रखते। शासन कैसे चलता है, सरकार किस प्रकार बनती है, देश के प्रजातन्त्र में हमारा क्या मूल्य महत्व अथवा स्थान है, हमारे देश के संविधान में मौलिक अधिकारों की क्या व्याख्या है-इन सब बातों की जानकारी तो बड़ी बात है हम अपने उस मत के मूल्य एवं उसके दान के विधि विधान तक से अनभिज्ञ रहते हैं जो आज के युग में देश का भाग्य विधाता होता है। आज तक हर बार, हर निर्वाचन में हम लोगों को उसके प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। हमारा नागरिक जीवन वास्तव में अनुमानों अभ्यासों तथा एक दूसरे, तीसरे से पूछ-पूछ कर चल रहा है।
अपने शरीर के विषय में तो क्या हममें से कितने ऐसे होंगे जो अपने तथा अपने परिवार के स्वास्थ्य एवं आरोग्य रक्षा के नियम जानते होंगे। यदि ऐसा होता तो हमारे चारों ओर बढ़ते हुये हकीम डाक्टरों की आमदनी सीमित एवं नियन्त्रित होती। हर घर में हर दिन कोई न कोई बीमार न बना रहता। हम अच्छी तरह यह भी तो नहीं जानते कि आजकल हमारा स्वास्थ्य कैसा चल रहा है और उसका कारण क्या हो सकता है? हमारे शरीर में कितने प्रकार के अवयव हैं और उनका क्या काम है। हमारी हड्डियों, माँस एवं मज्जा की मजबूती किन तत्वों से होती है, हम दुबले अथवा मोटे क्यों होते जा रहें है इसका ज्ञान तो हम लोगों के लिए एक विशेषज्ञता ही है।
आज हम लोगों की अजानकारी इस सीमा तक पहुँच गई है कि जितना ज्ञान हर छोटे-बड़े नागरिक को साधारण रूप से होना चाहिए उतने ज्ञान में लोग हमारे नेता बन जाते हैं। कतिपय दवाओं के नाम दाम तथा हानि-लाभ जानने वाले हमारे डॉक्टर ओर चार छः कानून एवं कानूनी घटनाओं की ऊंच-नीच समझा सकने वाले हमारे कानूनी सलाहकार बन जाते हैं।
आज अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग जब कोई बड़ी महत्वपूर्ण अथवा कीमती चीज खरीदने जाते हैं तो सहायता के लिए एक−आध साथी साथ ले लेते हैं। एक दूसरे के परामर्श से चीजें खरीदना ठीक है किन्तु इसमें परस्पर परामर्श की अपेक्षा अजानकारी की मात्रा अधिक होती है। अपने अज्ञान के कारण एक अकेले को विश्वास ही नहीं होता कि वह ठीक चीज ठीक दाम पर बिना ठगे खरीद सकेगा। इसलिये दो अनजान मिलकर कुछ न कुछ जानकारी की आशा से बाजार करने जाया करते हैं। और कुछ नहीं तो कम से कम खरीददार को ठगे जाने पर यह संतोष तो रहेगा ही कि केवल वह ही नहीं उसका साथी भी उसी की तरह अजानकार है और एक अकेला मैं ही बेवकूफ नहीं बना साथ में एक और भी बेवकूफ बना है।
यदि राजनीति, अर्थनीति, विदेश नीति, शासन नीति, शरीर शास्त्र, मनोविज्ञान शास्त्र, वाणिज्य विद्या का ज्ञान न भी हो, देश के सम्पूर्ण विधि विधान एवं राज नियम संहिताओं का पांडित्य न भी हो तो कम से कम दैनिक जीवन की सामान्य आवश्यकताओं तथा साधारण जानकारियों के साथ खान पान एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तो होना ही चाहिए। पशुओं की तरह अनुमान से चलने और कतिपय जानकार द्वारा हाँके जाना आज के मनुष्य को शोभा नहीं देता। हम सब को अपनी इस सामान्य ज्ञान की कमी को दूर करें जीवन में धक्के खाने और ठगे जाने से भी अपने मान सम्मान की रक्षा करनी चाहिये।
धन्य हैं वे लोग जिनको इस पवित्र और लोक-प्रेम से पूर्ण धर्म का उपदेश प्राप्त हुआ है। मेरी यह प्रार्थना है कि इस ब्रह्म-ज्योति की सहायता से सब धर्म शील जन अपने ज्ञान को विशुद्ध और अविचल कर और अपने उत्साह को नूतन और प्रबल कर सारे संसार में इस धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करें और समस्त जगत को यह विश्वास करादें कि सबका ईश्वर एक ही है और वह अंश रूप से न केवल सब मनुष्यों में किन्तु समस्त जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्धिज्ज अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष और विटप सब में समान रूप से अवस्थिति है और उसकी सबसे उत्तम पूजा यही है कि हम प्राणी मात्र में ईश्वर का भाव देखें, सबसे मित्रता का भाव रक्खें और सबका हित चाहें। सार्वजनीन प्रेम से इस सत्य ज्ञान के प्रचार से ईश्वरीय शक्ति का संगठन और विस्तार करें। जगत से अज्ञान को दूर करें अन्याय और अत्याचार को रोक और सत्य, न्याय और दया का प्रचार कर मनुष्यों में परस्पर प्रीति सुख और शान्ति बढ़ायें।
-पं. मदनमोहन मालवीय
इक्ष्वाकु वंश की परम्परा के अनुसार ही सम्राट रथ प्रोष्ट असमाति भी धर्म परायण, गुण एवं विद्वता का सम्मान करने वाले थे। गोपायन उन दिनों महान् विद्वान् पण्डित और मन्त्र दृष्टा थे उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महाराज असमाति ने उनके छोटे भाई सुवन्धु को अपना राज पुरोहित बनाया। किन्तु शीघ्र ही यह बात मालूम पड़ गई कि सुवन्धु भाई होने पर भी गोपायन के समान विद्वान् नहीं है।
प्रजा के सुख-समुन्नति की कोई योजना बनानी होती तो, सुरक्षा और समृद्धि की कोई बात आती तो, न्याय के मामले में भी पुरोहित की जो क्षमतायें होनी चाहिये थी, सुबन्धु में नहीं थी फलतः उनका सम्राट से सदैव मनोमालिन्य बना रहता। असमाति सोचते सम्भव है स्वाध्याय, तप और अनुभव सुवन्धु में यथार्थ योग्यता लादें किन्तु वैसा कुछ देखने में नहीं आया तब उन्होंने सुवन्धु को कुद्ध होकर अपने पद से हटा दिया और उनके स्थान पर किरात तथा आकुली नामक दो असुर तान्त्रिकों को अपना पुरोहित नियुक्त कर दिया।
किरात और आकुल बड़े समझदार और मायावी थे वे जानते थे कि गोपायन अपने भाई का यह अपमान सहन नहीं करेंगे और एक न एक दिन निश्चित ही उसमें जिस योग्यता और सिद्धि का अभाव है उसे पूर्ण कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो सुवन्धु पुनः पुरोहित बनाया जा सकता है। वे इस अनायास प्राप्त सौभाग्य को हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो एक दिन दोनों ने तान्त्रिक अभिचार किया। योगासीन होकर उन्होंने मरण तन्त्र का प्रयोग किया। विद्युत की सी तेज लपलपाती हुई शक्ति धारा निकली और सुबन्धु पर जा टूटी। देखते ही देखते सुबन्धु के प्राण शरीर छोड़ गये।
तपस्वी गोपायन को भाई की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने अपने प्रज्ञा-चक्षुओं द्वारा यह समझ लिया कि यह सारा कृत्य सिवाय किरात और आकुली के किसी और का हो नहीं सकता। भाई के अपमान से वे पहले ही दुःखी थे, षड़यन्त्र पूर्वक वध से उनका अन्तःकरण और भी मर्माहत हो उठा।
गोपायन स्वयं कुत्याघात कर सकते थे पर आसुरी शक्तियों पर उनका विश्वास नहीं था। सम्राट असमाति भी उनकी शक्ति उनकी सिद्धियों का भय मानते थे पर स्वयं गोपायन इस पक्ष में नहीं थे कि शक्ति पाकर अहंकार प्रदर्शन किया जाये और लोगों को उसका भय दिलाया जाये संसार का कर्माध्यक्ष भगवान् है। अच्छे बुरे कर्म का फल जब स्वतः देता है तब मनुष्य उसमें बाधक क्यों बने? गोपायन दक्षिण मार्गी सिद्ध और सन्त थे सो प्रतिशोध की तो कल्पना भी उनके मस्तिष्क में नहीं आई। तो भी पुरोहित वंश की गरिमा को तो अक्षुण्ण रखना ही था, इसलिये उन्होंने निश्चय किया अपने मृत भाई के प्राणों को वापस लाने का और वे इसी प्रयोग में संलग्न हो गये।
अपने सूक्ष्म शरीर और मन्त्र बल से उन्होंने अभिचार मृत देह के टूटे अंगों को ठीक किया और फिर वरुण देवता की उपासना करने लगे-हे वरुण देव! तुम एक ही दृष्टि में समस्त सृष्टि को देखने वाले हो, मुझे वहाँ तक पहुंचाओ जहाँ मेरे भाई का मन है। यदि उसका मन आकाश के छोर में है, भूत या भविष्य में है तो भी वहाँ तक मेरे मन को पहुंचाओ। वरुण देव प्रसन्न हुये। महर्षि गोपयन के मन का उन्होंने सुबन्धु के मन से मिलाप करा दिया। गोपायन भगवान् इन्द्र की कृपा और प्रेरणा से मृत भाई के प्राणों को वापस ले आये और मृतक देह में उन्हें स्थिर कर दिया। सुबन्धु जी उठे। गोपायन की सर्वत्र जय जयकार होने लगी। सुबन्धु ने अब अपना ध्यान तप ओर ज्ञान साधना में लगाया इससे उन्हें गोपायन जैसी ही सामर्थ्य प्राप्त हुई। पौरोहित्य की शक्तियों का विकास हो जाने पर राजा असमाति नतमस्तक हुये और उन्होंने पुनः सुबन्धु को लेकर अपना राज पुरोहित नियुक्त किया।
न्यूयार्क का माउण्ड सिनाई हॉस्पिटल। एक जख्मी युवक आता है, दुर्भाग्य से उसकी अत्यधिक तेज वोल्टेज वाले तार का स्पर्श कर लिया था। औषधि से कोई हिस्सा नियंत्रण में आ गया किंतु हाथ की कुछ उंगलियाँ इतनी भयंकरता से जली थी कि उनको काट देने के अतिरिक्त कोई उपाय सम्भव नहीं दीख रहा था तब कुछ डाक्टरों ने मन्त्र शक्ति (?) का सहारा लिया। मन्त्र से भयंकर जली हुई उंगलियां भी ठीक हो गई।
“एचीब्स ऑफ फिजीकल मेडिसिन एण्डरि हैबिलेशन” पत्रिका में ही छपी एक अन्य घटना-एक महिला स्नायु की गड़बड़ी से हाथ की उंगलियों की जख्मी हो गई थी। वह उंगलियों से हाथ की हथेली भी नहीं छू सकती थी। उसका मन्त्र (?) से इलाज किया गया और वह महिला कुछ ही दिन में सामान्य काम-काज तथा उंगलियों से जूतों के फीते तक बांधने में समर्थ हो गई। “नर्व्स” के ऐसे 90 प्रतिशत रोगी इस प्रकार ठीक हुये हैं।
मस्से के लाइलाज रोगियों पर जर्मन के एक डॉक्टर ने मन्त्र शक्ति (?) का प्रयोग किया और पाया कि 15 दिन के प्रयोग से मस्से का नाम निशान तक ऐसे गायब हो गया जैसे “गधे के सिर से सींग”।
पेरिस के सालपेट्र-पेट्री हॉस्पिटल में पहली बार कटे हुये शरीर के 27 रोगियों पर मन्त्र शक्ति (?) का प्रयोग किया गया और उनमें से 19 पूर्ण रूप से अच्छे हो गये शेष 8 आर्थिक। जर्मनी के ही कुछ डॉक्टरों ने कान के 16 रोगियों पर प्रयोग किया मन्त्र शक्ति (?) का, यह वह रोगी थे जिन्हें न तो शल्य चिकित्सा ठीक कर सकती थी और न ही औषधियाँ। इस नई चिकित्सा पद्धति से इन रोगियों में से 6 तो तुरन्त अच्छे हो गये 6 आँशिक ठीक हुये, कुल 4 ही ऐसे थे जिन पर उसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा जबकि डॉक्टर यह मान रहे थे कि एक दिन हम अवश्य ही कान के कठिन से कठिन रोगों का 80 प्रतिशत सफल इलाज कर लेंगे 20 प्रतिशत के लिये ही कुछ अधिक समय लग सकता है।
एक बार अमरीका के राष्ट्रपति कैनेडी कनाडा गये। एक वृक्षारोपण समारोह में वृक्ष लगाने के तुरन्त बाद उन्हें अकड़न और दर्द अनुभव हुआ। उनके डॉक्टर जानेट ट्रावेल ने जब देखा कि सामान्य औषधियों से उपचार सम्भव नहीं तो आधुनिक विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि शब्द शक्ति (?) की ओर उनका ध्यान गया। उसी के प्रयोग से राष्ट्रपति कैनेडी अच्छे भी हुए। आज जर्मनी स्केनडीनवीया, फ्राँस, ब्रिटेन और अमरीका में इस शक्ति का प्रयोग हो रहा है, और उनके आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ रहें है।
ऊपर जिस मन्त्र शक्ति का उल्लेख किया गया है वह वास्तव में भारतीय पद्धति से प्रयोग की गई मन्त्र शक्ति नहीं है। उसे मशीनों द्वारा उत्पादित पराध्वनि (अल्ट्रासाउंड) चिकित्सा कहते हैं तथापि उसमें जो सिद्धान्त प्रयुक्त होता है उसमें और भारतीय मन्त्र विद्या के सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं है अन्तर कुल इतना है कि भारतीय योगी और तत्वदर्शी मनुष्य-शरीर को ही एक परिपूर्ण यन्त्र और भावनाओं को उच्च शक्ति वाली विद्युत शक्ति मानते हैं जबकि भौतिक विज्ञान शब्दों के अति सूक्ष्म कम्पन मशीनों द्वारा पैदा करता है और विद्युत-स्त्रोत के लिये विद्युत-उत्पादी-डायनेमो का प्रयोग करता है।
मन्त्र शक्ति भारतवर्ष की एक चिर-परिचित पराशक्ति है और आज भी उसका प्रयोग अनेक रोगों के उपचार और सिद्धियों सामर्थ्यों की प्राप्ति में किया जाता है। सर्प के काटने जैसे भयंकर विष को गाँवों के तान्त्रिक ठीक कर लेते हैं, बिच्छू, गोह और कुत्तों के काटने का, पाण्डु रोग, मूर्छा, मिर्गी टाइफ़ाइड का इलाज भी मन्त्र शक्ति से होता है। दिसम्बर 1967 की कादम्बिनी में पेज 18 में “शब्द ब्रह्म का प्रतीक मन्त्र” शीर्षक से लेखक श्री गोविन्द शास्त्री ने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक पाण्डु रोगी को एक मंत्रज्ञ द्वारा ठीक करते मैंने अपनी आँखों से देखा। मंत्रज्ञ ने काँसे की थाली में हाथ रखवा कर मन्त्र बोलना शुरू किया। थाली में पानी भरा था। जैसे-जैसे वह मन्त्र फूँकता था थाली का पानी पीला होता गया और रोगी अच्छा होता गया। कुल दो दिन के उपचार से रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ और चंगा होकर घर लौट गया।
योग वशिष्ठ में मन्त्र की चिकित्सा शक्ति पर प्रकाश डालते हुये लिखा है-
यथा विरेक कुर्वन्ति हरीतक्यः स्वभावतः। भवनावशतः कार्य तथा परलवादयः॥ 6।1।81।39
अर्थात्-जैसे हर्र खाने से पाचन संस्थान में तीव्र गति होती है और दस्त लग जाते हैं उसी प्रकार दृढ़ भावना से यरलव आदि मन्त्रों के अक्षर शरीर पर असर करते हैं।
शब्द शक्ति और भारतीय योगियों द्वारा उसके अद्भुत ज्ञान का उल्लेख करते हुये लिखा है कि वेद में मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण का निषेध किया गया है और उनमें अनिष्ट की संभावना व्यक्त की गई हैं यह बात इस बात का प्रमाण है कि भारतीय शब्द शक्ति की महान महत्ता से अतीत काल से ही परिचित रहे हैं। जर्मन विद्वान बेवर ने भी इसी प्रकार का मंतव्य प्रकट किया है।
कहने की आवश्यक नहीं कि “शब्द” या ‘ध्वनियाँ हर व्यक्ति को प्रभावित करती है। किसी बच्चे ने कभी शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ना न सुनी हो और उसे एकाएक सुनने को मिल जाये तो वह घबरा जायेगा हालाँकि उसे यह पता नहीं होगा कि शेर कोई हिंसक जीव है। कोयल की कूक से प्रसन्नता और कौवे की काँव-काँव से कर्कशता का स्वतः भान होता है। शब्द एक प्रकार का आलोड़न है जैसे कोई पानी को मथे और कोई को दूर कर दे उसी प्रकार शब्दों के कम्पन न केवल विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करते हैं वरन् वह कम्पन “संवहन” की शक्ति भी रखते हैं और काई के समान ही विजातीय द्रव्य को खींच कर बाहर भी निकाल सकते हैं। शरीर में कुछ ऐसे चक्र ग्रन्थियाँ, गुच्छक और उपत्यिकाएं होती है जो शब्दों की ध्वनियों को अपने-अपने ढंग से प्रभावित और प्रसारित करती हैं भाव विज्ञान के ज्ञाता मंत्रज्ञ इन स्वर लहरियों को ही रोग निवारक शक्ति के रूप में प्रयोग करते रहें हैं यद्यपि आज इस विद्या के जानने वाले लुप्तप्राय हो चले तथापि मन्त्र विज्ञान अपने आप में सुदृढ़ स्तम्भ की भाँति जीवित है। आधुनिक विज्ञान ने उसे प्रमाणित कर फिर से इस महाशक्ति के प्रयोग की सम्भावनाओं का क्षेत्र खोल दिया है।
पराध्वनि का प्रयोग विज्ञान जगत का एक सूक्ष्म सिद्धान्त है। घंटा एकबार बजने के बाद बड़ी देर तक झनझनाता रहता है उसका कारण है घन्टे के परमाणुओं में तीव्र कम्पन। ध्वनि सुनाई देना बंद हो जाती है तो भी कम्पन चलते रहते हैं। हमारे कानों की बनावट ऐसी है कि हम उनसे 20000 साइकिल प्रति सेकेंड की ध्वनि सुन सकते हैं उससे अधिक की नहीं। इस लेख के प्रारम्भ में कुछ बीमारों के अच्छे होने के उदाहरण दिये गये हैं वह एक विशेष प्रकार के यन्त्र द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त सूक्ष्म पराध्वनि (अल्ट्रा साउण्ड) से ठीक हुये हैं यह ध्वनि 800000 से 1000000 साइकिल प्रति सेकेंड तक सूक्ष्म और तीव्र होती है। उस समय वह इतनी सशक्त होती है कि शरीर की ही नहीं रत्नों तक की भी चीर-फाड़ कर सकती है। रूसी तो इन दिनों कपड़ों की धुलाई से लेकर भारी उद्योगों तक में इस पराध्वनि शक्ति का उपयोग कर रहे हैं यह सब शब्द शक्ति के चमत्कार ही है। अत्यन्त गतिशील (सुपरफास्ट) ध्वनि तरंगें शरीर की कोशिकाओं को अंग सन्देश देकर रक्त तथा तरल रक्त की पूर्ति करती है और उसे गति देती है जिससे रोग कीट या तो बाहर छन जाते हैं या मर जाते हैं। कई बार इनके नियन्त्रित प्रयोग से बड़े ही विस्मय बोधक परिणाम दिखाई देते हैं। अमरीका में एक बार 90 बच्चे पोलियो और संधिवात के शिकार हो गये उन पर पराध्वनि का प्रयोग किया गया और वह अच्छे हो गये पेरिस के एक वकील को कमर का बहुत दर्द था। वह खड़ा भी नहीं हो सकता था। पराध्वनि के इलाज ने कुल पाँच मिनट में ही उसे अच्छा कर दिया। भारतीय योगी मन्त्र शक्ति से दूरवर्ती वस्तुयें किसी भी स्थान में किसी भी समय प्राप्त कर लेने की क्षमता रखते हैं लास ऐन्जिल्स (अमरीका) और जर्मनी के डाक्टरों ने इन ध्वनियों के साथ प्रयुक्त करके इस बात की सम्भावनाओं को भी सत्य सिद्ध कर दिया है। हमें अपने शरीर की क्षमता और भावों की प्रबलता को अनुभव करने भर की बात है यदि उसे सीख पायें तो मन्त्र शक्ति का लाभ हर व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
यह सारा संसार अति सूक्ष्म शब्द कम्पनों का विराट समुद्र है। पृथ्वी के चलने की ध्वनि से लेकर सोर घोष (सोलर न्वायज) तक और उल्कापात से लेकर अनेक निहारिकाओं में विस्फोट तक के हजारों, लाखों कम्पन विराट अन्तरिक्ष को कम्पायमान करते रहते हैं। इन सब शब्दों की एक सम्मिलित शब्द शक्ति उत्पन्न होती है उसे ही महा प्रणाव या “ॐ” कहते हैं कानों की अतीन्द्रिय क्षमता या सूक्ष्म श्रवण शक्ति जागृत कर इस शब्द की ब्राह्मी शक्ति से सम्बन्ध जोड़ा और उसका प्रयोग न केवल आत्म-कल्याण वरन् हजारों अन्य लोगों के उपहार के रूप में भी किया जा सकता है। विज्ञान द्वारा उत्पादित पराशक्ति तो “ब्राजीलियन क्वार्ट्ज” के आधा इंच टुकड़े और बिजली के तारों की क्षमता पर आधारित होती है उसके प्रयोग से ही जब असाध्य बीमारियाँ दूर हो सकती हैं तब शब्द के अथाह शक्ति सागर से सम्बन्ध स्थापित करने के लाभ का तो कहना ही क्या? उसके प्रयोग से भारतीय योगी आश्चर्यजनक चमत्कार दिखाते रहे हों तो आश्चर्य क्या? शब्द तो ब्रह्म है उससे ब्रह्म की सी सृजन शक्ति का प्रदर्शन किया जाये तो उसमें कोई रहस्य वाली बात नहीं वरन् उसे एक वैज्ञानिक तथ्य ही मानना चाहिए।
मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है किन्तु उसकी शक्ति महान होती है। स्वयं ब्रह्माजी, विष्णु भगवान् तथा शिवजी भी उसके वशीभूत है, जैसे कि महान शक्तिशाली गजराज भी अंकुश के वश में रहता है।
-तुलसीदास
जीवन का लक्ष्य है ज्ञान और द्वितीय सुख। ज्ञान और सुख के समन्वय का ही नाम मुक्ति है। आत्म-चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वश्यता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।
जब तुम किसी को क्षति पहुँचाते हो तो तुम अपने आपको क्षति पहुँचाते हो। तुम में और तुम्हारे भाई में कोई अन्तर नहीं है। जिस तरह छोटे-छोटे अवयवों से मिलकर शरीर बना है उसी प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों से मिलकर संसार बना है। कान को दुःख होता है तो आँख रोती है, उसी तरह समाज के किसी भी व्यक्ति का दुःख तुम्हारे पास पहुँचता है, इसलिए केवल अपने सुख से मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है।
इस कसौटी पर जब लोगों को अपने लिए बढ़-चढ़कर अधिकार माँगते देखता हूँ तो ऐसे आदमी से मुझे घृणा होती है। अधिकार व्यक्ति को स्वार्थी और संकीर्ण बनाते हैं। विश्व में जो कुछ अशुभ है, उसका उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति पर है। अपने भाई से अपने को कोई पृथक नहीं कर सकता। सब अनंत के अंश है। सब एक दूसरे के रक्षक और सहयोगी है। वास्तव में वही सच्चा योगी है जो अपने में सम्पूर्ण विश्व को और सम्पूर्ण विश्व में अपने को देखता है। अपने लिये अधिकारों की माँग करना पुण्य नहीं है, पुण्य तो यह है कि हम छोटे से छोटे जीव के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकते हैं या नहीं। इसके लिए अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं। इस लोक में यही सबसे बड़ा पुण्य है। आत्म-त्याग ही इस संसार का सर्वोच्च धर्म है।
-स्वामी विवेकानन्द
फ्रांस के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता पियरी मिसी में जहाँ अभिनय सम्बन्धी अनेक विशेषतायें थी वहाँ उसमें कई अभूतपूर्व चमत्कारिक विशेषतायें भी थी। वह अपनी इच्छानुसार ही शरीर के किसी भी हिस्से को कोई भी बाल हिला सकता था। बाल की नोक को खड़ा कर सकता था उन्हें पानी और आँधी के कारण गिरी हुई फसल की तरह लिटा सकता था, इतना ही नहीं कोमल सपाट बालों को वह जब चाहे अपनी इच्छा शक्ति द्वारा ही घुँघराले बना सकता था।
उसकी इन विशेषताओं ने अनेक विद्वान विचारकों, वैज्ञानिकों को कौतूहल में डाला और सोचने को विवश किया ऐसे कौन सी शक्ति है जो इस तरह की नियन्त्रणा है अनेक लोगों ने परीक्षण किये पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया इसी बीच डॉ. आगस्ट कैबेनीज को पियरी मिसी की इन विशेषताओं का पता चला तो उन्होंने भी जाकर परीक्षण किये। उन्होंने अपने जीवन-संस्मरण में उक्त घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि-इस तरह की विशेषता का कारण मिसी की कोई शारीरिक विलक्षणता नहीं अपितु उसका मानसिक संकल्प मात्र है उसने अपनी सुदृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा बाल की पेशियों को इतना असाधारण रूप से विकसित कर लिया है कि उनसे कोई भी मनमाना काम ले सकता है। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति द्वारा संकल्प द्वारा इससे भी अद्भुत कार्य कर सकता है उदाहरण के लिए सूक्ष्म दृश्य संस्थानों को विकसित कर दूर दर्शन, कर्णेंद्रिय को विकसित कर दूर श्रवण, घ्राणेंद्रिय को विकसित कर इच्छानुसार घ्राणा का सुख ले सकता है।
उपनिषद्कार मन की अपार शक्ति से परिचित थे तभी उन्होंने लिखा है-
यज्जाग्रतो दूर मुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरगंम ज्योतिषाँ ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ शिव संकल्पोपनिषत्॥
अर्थात्-जो मन जागता हुआ तथा सोता हुआ भी बहुत दूर तक जाया करता है तथा जो सभी इन्द्रियों में इस प्रकार चमकता है जैसे आकाश में स्थिति तारों के मध्य सूर्य। हमारा वह मन, हे परमेश्वर! शुभ संकल्प वाला हो।
ऊपर दिये गये उदाहरण की तरह ही मन की सुदृढ़ इच्छा शक्ति-संकल्प शक्ति का दूसरा प्रमाण थी-अब्बेविले (फ्राँस) की इक 12 वर्षीय लड़की एन्नेट फ्रेलान। इस अद्भुत लड़की ने भारतीय योगियों जैसी अद्भुत पराशक्ति प्राप्त की थी। उसने अधिकांश मौन रहने का नियम बनाया था, कभी बोलती भी तो अत्यन्त सारगर्भित संक्षिप्त और आवश्यकता से अधिक नहीं। वह कहा करती थी कि मनुष्य के बोलने का जितना प्रभाव होता है उससे अधिक प्रभाव उसके गहरे विचारों का होता है। वह इस कथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाणित भी करती थी।
कभी कोई व्यक्ति प्रश्न पूछता तो वह एकाग्र चित्त हो जाती फिर जो पूछा जाता उसका उत्तर उभरे लाल बड़े-बड़े अक्षरों में उसकी बाहों में, पैरों में तथा कन्धों में लिख जाता। इच्छा शक्ति से उत्पन्न यह लेखन कुछ देर द्रष्टव्य रहते धीरे-धीरे बिना कोई छाप छोड़े ही गायब हो जाते।
मानसिक संकल्प की ऐसी अद्भुत क्षमताओं का ज्ञान था तथा सृष्टिकार ने लिखा है-”मनोहात्मा मनो हि ब्रह्म मन उपास्वेति” (छान्दोग्य)
अर्थात्-यह मन ही आत्मा है, मन ही लोक और मन ही ब्रह्म है। इसलिये तुम मन की ही उपासना करो।
विहार प्रान्त के सहर्षो शहर में एक छोटी आयु के बच्चे ने एक दिन माँ को हैरत में डाल दिया। माँ ने बच्चे के लिये गिलास में दूध तैयार किया गिलास हाथ में दिया तो बच्चे ने गिलास फेंक दिया और कहा-मुझे तो दूध नहीं शराब चाहिए। जिस घर में कभी शराब की बूँद भी नहीं आई थी बच्चे द्वारा उसकी माँग किया जाना आश्चर्यजनक था। जब वह गुत्थी नहीं सुलझा पा रहे थे बच्चे ने खुद बताया मैं तो पिछले जन्म से ही पियक्कड़ हूँ एक दिन मैंने और मेरे एक मित्र ने खूब शराब पी थी तब मेरे मित्र ने नशे में मुझ पर वार किया और छुरे से 17 स्थानों को छेद डाला। यह कह कर उसने अपने शरीर में 17 दाग भी दिखाये मानो वह इसी जन्म के दाग हों।
यह घटना जहाँ पुनर्जन्म का प्रतिपादन करती थी वहाँ यह भी बताती थी कि शराब मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो कई जन्मों तक भी पीछा नहीं छोड़ती। ऋषि कहते हैं कि प्राण का आधार प्रत्यक्ष रूप से सूर्य है तो अप्रत्यक्ष रूप से दूषित होना चाहिए। यह दूषित संस्कार ही अन्य जन्मों में जन्मजात बुराई के रूप में परिलक्षित होते हैं जैसा कि इस लड़के के स्वभाव में देखने को मिलता है। लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। लोगों ने पुलिस का अपराध रजिस्टर देखा तो सचमुच पता चला कि कुछ दिन पूर्व एक ऐसी घटना घटी थी जिसमें शराब के नशे में एक व्यक्ति ने अपने मित्र को छुरे से 17 बार वार कर मार डाला था।
बुद्धि पर पड़ने वाला शराब का दुष्प्रभाव, संस्कारों पर होने वाली उसकी दूषित प्रतिक्रिया सर्वाधिक चिन्तनीय है किंतु मनुष्य की अक्ल उतना दूरदर्शी विवेचन कर सकने की स्थिति में न हो तो उसे इतना तो जाना ही पड़ेगा कि शराब स्वास्थ्य के लिये प्रत्यक्ष विष है। मनुष्य का हृदय बहुत छोटा और कोमल होता है पर शरीर के स्वास्थ्य और जीवन की स्थिरता का केन्द्र बिन्दु वही हैं भगवान् ने उसे उपयोगिता के आधार पर ही इतना सुरक्षित बनाया है उसके लिये हड्डी का बक्स ही तैयार करना पड़ा है। कोई भी दुश्मन साधारणतः हृदय को हानि नहीं पहुँचा सकता पर मदिरा उस मित्र की तरह वार करती है जो देखने में विश्वास पात्र लगता है पर मौका पाते ही जेब उड़ा देता है। शराब दिल को बरबाद करने वाली चामुण्डा है उससे बचने में ही मनुष्य जाति का कल्याण है।
एक मिनट में औसत 70 बार धड़कने वाला संवेदनशील हृदय हर धड़कन के साथ 2 ओंस रक्त निकाल कर शरीर को सींचता है इसे अधिक रक्त निकालने के लिये पम्पिंग क्रिया का बहुत तेज होना आवश्यक है पर उस स्थिति में शुद्ध और अशुद्ध रक्त वाले कोठों को पृथक रखने वाली झिल्ली (क्यूकस मैम्ब्रेन) में सूजन आ जाती है शराब पीने की स्थिति में हृदय के लिये शक्ति भर चेष्टा करते हैं इसलिये शरीर की क्रियायें अस्त-व्यस्त हो जाती है और यदि हृदय कमजोर हुआ तो झिल्ली भी संभल नहीं पाती हार्ट फेल हो जाता है और मनुष्य मर जाता है। जो लोग पहली बार शराब पीने से मरते नहीं उनका हृदय कमजोर होता चला जाता है और वे भी एक दिन अकाल में ही काल कवलित हो जाते हैं।
हृदय शरीर का सर्वाधिक संवेदन शील भाग है इसलिये उसकी रक्षा पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है वैसे उसका असर शरीर के प्रत्येक अंग पर दूषित ही पड़ता है। पेट को ही लिया जाये जहाँ शराब का सबसे सीधा और पहला आक्रमण होता है। अन्न जहाँ पहुँचता है पेट के उस भीतरी भाग पर आँतों में कुछ ग्रन्थियाँ होती है जिनसे एक प्रकार का रस निकलता है इसे “गैस्टिक जूस” कहते हैं यही रस पाचन क्रिया में सहायक होता है। शराब इन ग्रन्थियों में सूजन पैदा कर देती है फलस्वरूप पेट की पाचन शक्ति जाती रहती है और पेट हमेशा के लिये खराब हो जाता है। कई बार तो आँतों में बार-बार धक्के लगने के कारण घाव (गैस्टिक अर्ल्सस) भी हो जाते हैं जिनका ठीक होना कठिन होता है नशेबाज प्रायः सभी पेट के बीमार होते हैं वह आंतों की अग्नि मन्द पड़ जाने के कारण ही होती है।
शराब पीने वाले लोगों के फेफड़े यदि कुछ बोल पायें तो यह कहने से न चूकें-भगवन्! हमें दूसरा जन्म इस शराबी के पेट में मत देना। फेफड़ों का शरीर में महत्व-पूर्ण स्थान है इनमें करोड़ों की संख्या में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं इनमें रक्त भरता है ताकि जब श्वाँस ली जाये तो वह इस अशुद्ध रक्त का कार्बन डायऑक्साइड बाहर निकल जाये और आक्सीजन भीतर आ जाये शरीर में समस्त शक्ति, प्राण ओज का आधार यह आक्सीजन ही होता है। सामान्यतः 1 मिनट में 17 बार फेफड़े श्वाँस खींचते और आक्सीजन शरीर में पहुँचाते हैं किन्तु शराब पीने से आधा घण्टे तक श्वाँस-प्रवास क्रिया बहुत अधिक तेज हो उठती है ओर नशा कम होते ही वह गति सामान्य से भी नीचे चली जाती है। उस समय फेफड़ों का काम शरीर को आक्सीजन देना नहीं रह जाता वरन् जिस प्रकार किसी आग लग गये मकान के सदस्य खाने-पीने का काम छोड़कर जले हुये टुकड़ों को निकालने मलबा समेटने आदि अनावश्यक कार्यों में लग जाते हैं उसी प्रकार शराब की स्थिति में फेफड़े उल्टी क्रिया शुरू कर देते हैं लेना चाहिये था उन्हें आक्सीजन और देना चाहिये था कार्बन डाई आक्साइड पर लेने लगते हैं कार्बन डाई आक्साइड (जिसके कारण मूर्छा आती है, और छोड़ने लगते हैं आक्सीजन प्रवास क्रिया (रेस्पिरेटरी को मोटे) नीचा हो जाने पर फेफड़ों शराब और कार्बन डाई आक्साइड की सफाई में लगना पड़ता है इस प्रकार शराबी व्यक्ति के फेफड़ों का अधिकाँश काम सुरक्षात्मक हो जाता है पोषक नहीं शराबी के मुख और देह का पीलापन उसी के परिणाम होता है ।
इसी प्रकार शराबी के गुर्दों में भी खराबी आ जाती है जिसके कारण शराबी लोगों को पुरुषत्व से वंचित होते तक पाया गया है। गुर्दों (किडनी) का काम है शरीर की रासायनिक प्रक्रिया को सन्तुलित रखना। शरीर के सभी कोश जहाँ आवश्यक पोषण तत्व ग्रहण करते रहते हैं वहाँ उनसे नष्ट हुये पदार्थ भी निकलते हैं जिन्हें गुर्दे यूरिया तथा यूरिक एसिड बनाकर पेशाब के रूप में निकालते रहते हैं। आहर-बिहार में असन्तुलन के कारण कई बार शरीर में फास्फेट, सल्फेट तथा पोटैशियम क्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है उस बढ़े हुये अनावश्यक द्रव्य को मूत्र बनाकर निकाल न दिया जाये तो शरीर में अनेक प्रकार की विकृतियाँ और बीमारियाँ उठ खड़ी हो सकती हैं सामान्य अवस्था में गुर्दे यह काम करते रहते हैं और मूत्र के द्वारा शरीर की गन्दगी बाहर निकालते रहते हैं इससे शरीर स्वस्थ बना रहता है। गुर्दे के पास एक गुच्छे (ग्लोमेरुलस) के रूप में छोटी-छोटी रक्त कोशिकायें (कैपिलरीज) पाई जाती हैं यहाँ गुर्दे रक्त में आई गन्दगी को भी रोकते हैं पर जब शराब पी जाती है तो रक्त के साथ शराब भी यहाँ आ धमकती है फलस्वरूप गुर्दे स्वाभाविक गति से अधिक काम करने लगते हैं उसका एक दुष्परिणाम तो यौन उत्तेजना के रूप में आता है। नशेबाज प्रायः सभी कामुक होते हैं वह इसी कारण है) दूसरा गुर्दे पूरी तरह मूत्र छान नहीं पाते जिससे रक्त की सारी अशुद्धियाँ फिर से लौट जाती हैं और अपने साथ में मूत्राशय की गन्दगी भी ले जाती हैं जिससे बुद्धि में दूषण उत्पन्न हो जाता है। शराबी आदमी की बुद्धि कुण्ठित होने लगती है उनकी विवेक शक्ति उस गंदगी के कारण ही जाती रहती है।
यह सारी बातें बताती हैं शराब कोई अच्छा पेय नहीं वरन् वह स्वास्थ्य की दुश्मन है जो भी उससे बच जाये वह बुद्धिमान और जो उसमें फँस जाये उसे अभागा ही कहा जा सकता है।
जीवन की सफलता के लिये मनुष्य को कम से कम इच्छाओं के साथ अनुशासित संयमित एवं कटी-छटी जिन्दगी को लेकर प्रसन्नता पूर्वक कार्यरत रहना चाहिये।
इस प्रकार की अबोझिल जिन्दगी में न संतोष होता है और न क्षोभ उसकी जिन्दगी हर ओर सुन्दर बनकर कलापूर्ण बन जाती है। -श्रीराम शर्मा आचार्य
“आज की दुनिया का अच्छा से अच्छा स्वादयुक्त भोजन मैंने किया। सर्वोत्तम भोग भोगे। उस समय मैंने किसी भी प्राकृतिक नियम का विचार नहीं किया। उसी का प्रतिफल है कि मेरा पेट अपनी जीवनी शक्ति खो बैठा, निष्क्रिय, निकम्मा और बेकार हो गया। मुझे ऐसा लगता है कि पेट में पत्थर भरे पड़े हैं। एक छोटी सी चपाती भी हजम करना मेरे लिये पहाड़ उठाने के बराबर कठिन है यदि कोई मेरा पेट ठीक कर दे तो उसे चिकित्सा के अतिरिक्त 10 लाख डालर का पुरस्कार दूँगा।
यह था विज्ञापन अमरीका के प्रसिद्ध करोड़पति “जान राक फेलकर” का। भोग-विलास के असीम अनियन्त्रित साधन मनुष्य की जो भी दुर्गति कर सकते हैं राक फेलर उन सबसे ग्रस्त थे उसी का परिणाम था कि वे चाय और सिगरेट के अतिरिक्त जीवन धारणा रखने के लिये मात्र कुछ दवायें और इंजेक्शन ही ले सकते थे। उनका विज्ञापन पढ़कर डाक्टरों की कतारें लग गई। जितना झटका जा सकता था उन्होंने पैसा झटका पर क्या तो राक फेलर क्या डाक्टर उन बेचारों को कौन बताता कि रोग-शोक अपनी भूल अपने पाप के परिणाम होते हैं। उनसे सुरक्षा का एक ही उपाय होता है पश्चाताप और प्राकृतिक जीवन की ओर वापसी। शार्टकट रास्ते से चलकर कोई प्राकृतिक दण्ड से बचना चाहे तो यह नितान्त असम्भव है।
अन्त में एक प्राकृतिक चिकित्सक की सलाह पर राक फेलर ने दुग्ध चिकित्सा कराई और तब वह फिर से एक नई जीवनी शक्ति प्राप्त कर सकने में सफल हुये।
दूध वास्तव में ऐसा ही पेय है जो जर्जर शरीर को भी नई जीवनी शक्ति प्रदान कर सकता है । चरक का कथन है-”पयः पथ्यं यथामृतम्” अर्थात्-दूध तो अमृत के समान पथ्य है। दूध से आयु, बल, तेज,नेत्र ज्योति सौंदर्य, गालों की ओठों की लालिमा, हृदय और फेफड़ों में शक्ति की वृद्धि ही नहीं होती उसके नियमित सेवन और कल्प से रक्तचाप, कब्ज, एनीमिया,फोड़े फुन्सी, स्त्रियों के रोग, अनिद्रा, अग्नि मन्दता, पथरी, गठिया, दमा, श्वेत प्रदर, नपुँसकता, डायबिटीज, अतिसार, बवासीर आदि अनेकों रोगों में अमृत-औषधि के समान लाभ होता है। दूध के दस गुणों का वर्णन करते हुये प्रसिद्ध भेषज चरक ने लिखा है-
स्वादु शीतं मृदु स्निग्ध बहलं श्लेक्ष्णी पच्छिलम् । गुरु मन्द प्रसन्नं च गव्य दश गुणं पयः ॥
अर्थात्-दूध में स्वादिष्ट ठण्डा, कोमल, चिकना, गाढ़ा, सौम्य सात्विक लसदार भरी वाह्य प्रभाव से देरी से ग्रहण करने वाला तथा मन को प्रसन्न करने वाला-यह दश गुणा होते हैं। “धारोश्णा दूध की तो आयुर्वेद में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है और उससे असाध्य रोग ठीक होने की बात विश्वासपूर्वक कही गई है। धारोश्णा दूध तुरन्त निकाले गये दूध को कहते हैं उसे ज्यों का त्यों छान कर पीना चाहिये।
डॉ0 श्रीमती एलाव्हीलर विलौक्स ने दूध को हृदय रोगों और कैंसर तक में लाभदायक माना है। डॉ0 फ्रेडरिक हाफमैन दूध को पूर्ण आहार और स्वास्थ्य का जनक कहा करते थे।
इन पौष्टिक और औशधीय गुणों का कारण वह तत्व हैं जो दूध में प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहते हैं। प्रोटीन जो शरीर में माँस बनाते हैं, टूट फूट ठीक करते हैं, बल प्रदान करते हैं, केसिन, लैकोट-ग्लोव्यूमेन, एल्व्यूमिन, एमिनो एसिड स्टार्च आदि 101 रासायनिक तत्वों का सम्मिश्रण दूध में पाया जाता है। इसकी चर्बी सुपाच्य ओर तेज वर्धक होती है गाय के दूध में तो मल की मात्रा बिलकुल ही न्यून होती है। यदि एक माह तक लगातार गौ-दुग्ध का सेवन किया जाये तो मनुष्य उससे एक वर्ष के बराबर शक्ति अर्जित कर सकता है। नियमित रूप से दूध पीने वाले लोगों को कभी बीमारियाँ नहीं होतीं, कमजोरी नहीं सताती। यही कारण था कि प्राचीनकाल में हमारे बच्चों को युवावस्था तक अधिक खुराक दूध की ही मिलती थी। अन्न लोग काफी बड़ी आयु में खाना प्रारम्भ करते थे इससे उन्हें न केवल सौ वर्ष तक विविध भोगों का रसास्वाद करते हुये सशक्त और निरोग जीवन जीने का लाभ मिलता था वरन् लोग वृद्धावस्था तक तेजस्विता बनाये रखने में समर्थन होते थे। आज लोगों ने दूध छोड़कर अप्राकृतिक पेय पीने शुरू कर दिये हैं उनकी हानियाँ अनेक रोगों के रूप में स्पष्ट देखी जा सकती हैं आज का मनुष्य जितना सभ्य है उससे अधिक रोगी है उसका कारण बाल्यावस्था में पर्याप्त दूध का न मिलना भी शामिल है।
दूध में विटामिन की मात्रा पर्याप्त परिमाण में होती है। “ए” और “डी” विटामिन्स तो बहुतायत से पाये जाते हैं। खनिज लवण जो कि बच्चे के विकास के लिये बहुत आवश्यक होते हैं दूध में पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। सौ ग्राम दूध में फास्फोरस .93 ग्राम, लोहा .002 ग्राम, कैल्शियम 1.20 ग्राम पाया जाता है इसके अतिरिक्त वैनेडियन, क्रोमियन, टिन, अन्म्यूनियम, अभ्रक, सीसा आदि पाये जाते हैं। माँ के दूध में रजत की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है यह तत्व शरीर को बलवान बनाते हैं यही कारण है कि पहलवान लोग सबसे ज्यादा आहार दूध का ही करते हैं।
दूध यों भेड़, बकरियों, ऊँट और गधों का भी गुण-कारी होता है और कई तरह की बीमारियों में इनका उपयोग करते हैं पर ओज, गुण और सौंदर्यवर्धक तत्व अधिकाँश माँ और गाय के दूध में ही पाये जाते हैं। सम्भवतः भारतवर्ष दुनिया का पहला देश है जहाँ आदि काल से ही माताएं बच्चों को स्तन-पान कराती रही हैं आधुनिक सभ्यता के प्रभाव के कारण आजकल पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ इस परम्परा से मुख मोड़ रही हैं यह उचित नहीं है माँ के दूध में माँ के संस्कार भी घुले हुये होते हैं वह बच्चे के निर्माण में बड़े सहायक होते हैं अतएव इसे पवित्र कर्तव्य मानकर बच्चे को दूध हर माँ को पिलाना चाहिये।
आयुर्वेद में अनेक प्रकार के कल्प बताये गये हैं और जीर्ण शीर्ण शरीर के पुनर्निर्माण में उन सबका प्रयोग चिकित्सा शास्त्री करते रहे हैं। दीर्घकालीन अनुभवों के बाद दूध कल्प को सर्वाधिक लाभदायक पाया गया। उससे शरीर में बल वीर्य की वृद्धि और अंग-अंग में नया तेज फूट पड़ता है। पावन प्रणाली में एक नई शक्ति आती है। कब्ज यदि स्थायी रूप से कभी ठीक हो सकता है तो वह एक मात्र दुग्ध कल्प से ही सकता है और कोई उपाय इससे अच्छा नहीं। दुग्ध कल्प का सबसे अच्छा प्रभाव गुर्दों पर वीर्य और मूत्र रोगों पर होता है। उससे गुर्दे के विष धुल कर साफ हो जाते हैं। पेट की सफाई तथा आँखों में नई चमक त्वचा की मन निवारक शक्ति में वृद्धि होती है तथा अनेक रोग जड़ से दूर हो जाते हैं। दूध में आयु संवर्धन की आश्चर्यजनक शक्ति है।
दूध हमारी शक्ति और समर्थता का आधार है उसके प्राकृतिक गुणों को पहचान सकें तो हम न केवल शक्ति संचय कर सकते हैं वरन् खाद्य समस्या और स्वास्थ्य संरक्षण की आवश्यकता को भी पूरा कर सकते हैं।
दूध का सेवन मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है, और दूध के द्वारा अनेक प्रकार की व्याधियाँ दूर हो सकती है, इस तथ्य को हमारा यहाँ के साधारण मनुष्य भी जानते हैं। बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ दूध पीने पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लोगों का विश्वास है कि इस आयु में दूध का नियम पूर्वक सेवन करने से स्वास्थ्य से दृढ़ता और स्थिरता आती है वह जन्म भर मनुष्य की सहायक रहती है। इस दोष के चिकित्सा ग्रंथों में तो दूध को ‘भूलोक का अमृत’ बतलाया गया है। और प्रत्येक पशु के दूध के गुण विस्तार पूर्वक बतलाये गये हैं। जिनके आधार पर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अपने अनुकूल इसका उपयोग हो सके।
प्राणों की जिस प्रतिभा का लाभ मनुष्य को सृष्टि का सर्व श्रेष्ठ प्राणी होने के रूप में मिला, सृष्टि के अन्य प्राणी भी उस प्राण की महत्ता कि सृष्टि के नन्हें-नन्हें जीव भी अनभिज्ञ नहीं। बेशक वे प्राणों के स्वरूप की व्याख्या नहीं कर सकते, प्राणों का असीमित विकास और उसके फल स्वरूप प्राप्त होने वाली तेजस्विता, दीर्घजीवन प्रज्ञा बुद्धि का लाभ नहीं ले सकते पर उनमें भी इच्छा शक्ति इतनी दृढ़ होती हैं कि वे अपने मृत शरीर का बार-बार इस्तेमाल कर सकते हैं। परकाया प्रवेश की क्षमता भारतीय योगी ही अर्जित कर सके हैं पर प्रकृति में ऐसे अनेकों योगी हैं जो अपने ही मरे, कुचले टूटे-फूटे शरीर का अपने प्राणों के बल पर पुनः उपयोग कर लेते हैं।
जीवित स्पंज को लेकर टुकड़े-टुकड़े कर डालिये, उससे भी मन न भरे तो उन्हें पीसकर कपड़े से छान लीजिये। जिसे और कूट कपड़छन किये शारीरिक द्रव्य को पानी में डाल दीजिये शरीर के सभी कोष धीरे-धीरे फिर एक स्थान पर मिल जायेंगे और कुछ दिन बाद पूरा नया स्पंज फिर से अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देगा। चुनौती है स्पंज की जब तक प्राण हैं तब तक मुझे शरीर के अवसान की कोई चिन्ता नहीं मरना जीना तो मात्र प्राणों का ही खेल है।
हाइड्रा, स्टेन्टर तथा प्लेनेरिया आदि जीवों में यह गुण होता है कि वे अपने शरीर के एक छोटे से अंश को (300 वे भाग तक छोटे टुकड़े को) ही तोड़कर नया शरीर बना देते हैं उन्हें गर्भ धारण, भ्रूण विकास और प्रजनन जैसी परेशानियाँ उठानी नहीं पड़तीं। लगता है प्राण तत्व की जानकारी होने के कारण ही प्राचीन भारत के तत्वदर्शी एक भ्रूण से 100 कौरव, घड़े से कुंभक और जघा सरस्वती पैदा कर दिया करते थे। अन्य एक कोषीय जीवों, में पैरामीशियम तथा यूग्लीना में भी एक कोष से विभक्त होकर दूसरा स्वस्थ कोष अर्थात् नया जीव पैदा कर देने की क्षमता होती है। यह घटनायें इस बात की साक्षी भी हैं कि ऐसी क्षमतायें अणु जैसी सूक्ष्म मनःस्थिति तक पहुँचने वाली क्षमता से ही प्रादुर्भूत हो सकती हैं।
टूटे हुये शारीरिक अंगों के स्थान पर नये अंग पैदा कर लेने की क्षमता ही कुछ कम विलक्षण नहीं ट्रइटन, सलामाण्डर, गोह अपने कटे हुए शरीर की क्षति पूर्ति तुरन्त नये अंग के विकास रूप में कर लेते हैं। अमेरिका, अफ्रीका में पाये जाने वाला शीशे का साँप जरा-सा छूने से टूट जाता है पर उसमें यह भी विशेषता होती है कि अपने टूटे हुये अंग को पुनः जोड़ लेता है। आइस्टर, शम्बूक घोंघा, समुद्री मकड़ी, मन्थर आदि जीवों में भी यह गुण होते हैं। स्टारफिश के पेट में कोई जहरीला कीड़ा चला जाये तो वह अपना पूरा पेट ही बाहर निकाल कर फेंक देती है ओर नया पाचन संस्थान तैयार कर लेती है पर सलामेंसिनानेस, साहलिस तथा काटो गास्टर जीव तो स्पंज की तरह होते हैं उन्हें कितनी ही मार डालिये, मरना उनके लिये जबर्दस्ती प्राण निकाल देने के समान होता है जहाँ दबाव समाप्त हुआ यह अपने प्राणों को फिर मरे मराये शरीर पर प्रवेश करके जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं इतना सब देखने पर भी वैज्ञानिकों की वृद्धि को क्या कहा जाये जो यह कहते हैं कि प्राण कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं मात्र एक रासायनिक चेतना है।
जीवन की सफलता के लिए मनुष्य को कम से कम इच्छाओं के साथ अनुशासित संयमित एवं कटी छटी जिन्दगी को लेकर प्रसन्नता पूर्वक कार्यरत रहना चाहिए।
इस प्रकार अबोझिल जिन्दगी में न असंतोष होता है और न क्षोभ। उसकी जिन्दगी हर और सुन्दर बनकर कलापूर्ण बन जाती है।
-श्रीराम शर्मा आचार्य
आत्म-हीनता का भाव मनुष्य की उन्नति में बहुत बाधक होती हैं जो भी व्यक्ति दीन हीन और प्रगतिहीन स्थिति में पड़े दिखलाई देते हैं, वे सब किसी न किसी प्रकार की आत्महीनता से ग्रसित होते हैं। कोई अपने को निर्बल समझ रहा होगा कोई विद्या-बुद्धि से रहित, कोई साधन हीनता का रोना रो रहा होगा तो कोई परिस्थितियों और भाग्य को कोस रहा होगा। उस प्रकार की सारी निराशा आत्महीनता का ही लक्षण होता है।
आत्महीनों के विचार बड़े प्रतिगामी होते हैं। वे अपने अन्तः करण में नाना प्रकार के भ्रम, न्यूनताएं, निर्बलतायें, कुकल्पनाएं, आशंकायें और भीतियाँ पाले रहते हैं।उन्हें संसार का हर आदमी अपने से अधिक सक्षम और योग्य मालूम होता है। हर काम अपनी शक्ति से बाहर का विदित होता है। उनके विचार सदैव विपरीत दिशा में ही दौड़ते हैं उनके सोचने का ढंग इस प्रकार का होता है कि मानो परमात्मा ने उन्हें इस योग्य ही नहीं बनाया कि वे संसार में आगे बढ़कर संघर्ष कर सकें और अपने लिए सम्मान पूर्ण स्थान अर्जित कर सकें। उनको यदि उन्नति और प्रगति के लिए उत्साहित किया जाता है तब भी वे भयभीत हो उठते हैं। सोचते हैं यदि हमने अमुक साहस पूर्ण कोई काम हाथ में लिया तो हो सकता है कि कोई नई आपत्ति खड़ी हो जाये और हम किसी संकट में पड़ जायें। अमुक काम हमारे बलबूते का नहीं है, भला हम उसे किस प्रकार कर सकते हैं। आत्महीन व्यक्ति किसी साहस पूर्ण प्रगति पथ पर चलने से बुरी तरह डरता रहता है। ऐसा कायर और शंकालु व्यक्ति निश्चय ही कोई उन्नति नहीं कर सकता। उसे गई बीती स्थिति में ही जीवन काटने को विवश होना पड़ता है।
आशा आकाँक्षा, आत्म-विश्वास और आत्मबल, जिनको उन्नति और प्रगति का आधार माना गया है, आत्महीन व्यक्ति में उनका सर्वथा अभाव रहता है। उन्नति की आशा और आकाँक्षा करने का अधिकार तो उसी को हो सकता है जो अपने को किसी भी कार्य भी कार्य करने और कोई भी संकट उठा सकने के योग्य समझता है। जिसे यह विश्वास होता है कि वह जिस काम में हाथ डालेगा उसे जरा करके रहेगा। उसमें आ पड़ने वाले किसी भी संकट को उठा लेने के योग्य साहस धैर्य और क्षमता है। इस विश्वास के अतिरिक्त जो कार्य करने में रुचि रखता है, साहस और उत्साह रखता है, अपनी कमियाँ दूर करने और योग्यताएं बढ़ाने के लिए प्रयत्नशीलता रखता है उन्नति और प्रगति की आशा आकाँक्षा करने का वही अधिकारी होता है। जिसने योग्यताओं, अनुभवों तथा शिक्षाओं से आत्म-विश्वास और सदाचरण द्वारा आत्मबल संचित नहीं किया है वह उन्नति और प्रगति की आशा आकाँक्षा करने का अधिकारी किस प्रकार हो सकता है। आत्महीन व्यक्ति में इन सारे गुणों का अभाव होता है अस्तु उसका उन्नति और प्रगति की आशा आकाँक्षा से वंचित रहना स्वाभाविक ही है।
आशा और आकाँक्षा उन्नति का मूल आधार हैं। जिसमें यह आकाँक्षा ही न होगी कि मुझे भी आगे बढ़ना चाहिए, उन्नति और प्रगति करनी चाहिए, उसे न तो उसकी प्रेरणा होगी और न वह उस दिशा में सक्रिय होगा। उन्नति और प्रगति भी संसार में कोई आवश्यक बात है-यह उसे याद ही न आयेगा। आकाँक्षा ही मनुष्य की क्रियाशीलता को प्रेरित तथा उत्साहित करती है। तथापि यदि उन्नति और प्रगति की आकाँक्षा तो हो किन्तु उसे प्राप्त कर सकने की आश्वासन हो तब भी मनुष्य की क्रियाशीलता गतिमान नहीं होने पाती। वह सोचता है जब वाँछित स्थिति पा सकने की आशा नहीं है, कोई सम्भावना नहीं है तो उसके लिए प्रयत्न करना ही बेकार है। बात भी ठीक है कि जिसे यह आशा न हो कि वह परीक्षा में पास हो जायेगा-वह उसमें बैठेगा ही क्यों। आशा का आधार पाकर ही मनुष्य सारे काम करता है। आशा से रहित अकेली आकाँक्षा मनुष्य को उन्नति तथा प्रगति के लिए प्रेरित तथा सक्रिय नहीं बना सकती, आत्महीन व्यक्ति में न तो आकाँक्षा का ही उदय होता है और न उसे सफलता में आशा होती है। निदान उन्नति और प्रगति के सहनीय शब्द उसके नाम के साथ जुड़ना सम्भव नहीं हो सकता।
आत्महीनता कोई प्रकृति-प्रदत्त दोष नहीं होता। यह वास्तव में एक मानसिक रोग होता है जो मनुष्य की अनेक असावधानियों से पैदा हो जाता है। उनमें से एक असावधानी तो अयोग्यता होती है। यह अयोग्यता कार्य कुशलता, कार्य क्षमता, विद्या-बुद्धि, आचार-विचार आहार-विहार अथवा व्यवहार-बर्ताव को क्यों न हो आत्म-हीनता का भाव पैदा कर देती हैं। जिस आदमी ने अभ्यास और लगन पूर्वक अपने कार्य में कुशलता, दक्षता और योग्यता प्राप्त करने की सावधानी नहीं वर्ती है उसे उस विशय में न तो आत्मविश्वास प्राप्त होगा और न वह दक्ष और कुशल व्यक्तियों के साथ समक्षता अनुभव कर सकता है। उसका उस दिशा में आत्महीनता अनुभव करना स्वाभाविक ही है। वह कितने ही दम्भ अथवा अहंकार का सहारा क्यों न ले आत्महीनता के भाव से बच नहीं सकता।
जिसमें विद्या बुद्धि की कमी है। किसी बात को सोच सकने समझ सकने और ठीक से व्यक्त कर सकने की योग्यता नहीं है, वह जहाँ भी जायेगा उचित स्थान तथा आदर न पा सकेगा। लोग स्वभावतः उसे निम्न दृष्टि से देखेंगे जिसकी प्रतिक्रिया उस पर आत्महीनता के भाव के रूप में ही होगी! जिसके विचार दूषित होंगे, आचरण निम्नकोटि का होगा वह दूसरों की दृष्टि में ही नहीं स्वयं अपनी दृष्टि में गिरा रहेगा। वह सभ्य और शालीन समाज में आता जाता भी यही अनुभव करता रहेगा कि वह इसमें आने जाने योग्य नहीं है। उसके अन्दर का चोर निश्चय ही उसे आत्महीन बना देगा।
आहार-बिहार का भी मनुष्य की आत्मा पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। यदि एक बार दूसरे लोग किसी के आहार-बिहार पर दृष्टि न भी डालें तो भी उसकी अपनी दृष्टि से तो वह बच ही नहीं सकता। वह किस प्रकार रहता है, क्या खाता पीता और पहनता है। इस विशय में उसका स्तर क्या है-आदि बातें भी मनुष्य में आत्म-गौरव आत्म-हीनता का भाव पैदा कर देती हैं। जिसका रहन-सहन निकृष्ट और अपने अनुरूप न होगा उसमें आत्महीनता का भाव रहना ही है। आलस्य के कारण जो गन्दगी से रहता है, अपने स्तर से ऊँचा-नीचा खाता पहनता है तो उसे निम्न स्तर में लज्जा ओर ऊँचे स्तर पर दम्भ की आत्म-हीनता पैदा हो जायेगी। अयोग्य आहार-बिहार ओर अयोग्य रहन-सहन की असावधानी आत्महीनता का बहुत बड़ा कारण है।
मनुष्य के आत्म-गौरव और आत्म-हीनता के सम्बन्ध में व्यवहार-बर्ताव का बहुत हाथ रहता है। जो अशिष्ट, असभ्य ओर अशालीन व्यवहार का अभ्यस्त है। व्यवहार करने में यथायोग्य की सावधानी नहीं बरतता तो निश्चय ही उसे अपमानित, लाँछित, तथा तिरस्कृत होना पड़ता है। तिरस्कार अथवा अपमान का सगा संबंध है। जो समाज अथवा परिवार आदि में तिरस्कृत अथवा अनादरित होता रहता है उसे आत्महीनता का शिकार बनने से कोई नहीं बचा सकता निश्चय ही उसकी आत्मा मलीन हो जायेगी उसका आत्म तेज नष्ट हो जायेगा और वह आत्महीनता का रोगी बन जायेगा। व्यवहार बर्ताव की असावधानी आत्महीनता का बड़ा कारण है। आत्म-हीनता उत्पन्न होने का एक कारण होता है दूसरों से तुलना करना। बहुत से लोगों का स्वभाव होता है कि वे दूसरे लोगों के धन-वैभव, कारबार, मान−सम्मान और पद प्रतिष्ठा पर बहुत दृष्टि रखते हैं ओर अनजान में ही प्रभावित होकर उन्हें बड़ा आदमी मान लेते हैं। यहाँ तक तो गनीमत होती है। किन्तु जब इससे आगे बढ़कर उनकी स्थिति से अपनी तुलना करके ऊहापोह में पड़ जाते हैं तभी उनमें आत्महीनता का के अंकुर उगने लगते हैं। उनके इस प्रकार सोचने का ढंग कि-देखो अमुक आदमी के पास कितनी धन दौलत है, उसका कारबार कितनी जोर से चन रहा है। समाज में उसे कितनी पद प्रतिष्ठा मिली है। कैसे शान-शौकत से रह रहा है। संसार के सारे सूख उसके पास हैं। भगवान की कृपा है॥ बड़ा भाग्यवान आदमी है। एक मैं हूँ न धन न दौलत, न मान न सम्मान, न कार न रोजगार। थोड़ी सी आमदनी है। पेट भर रोटी खा लो और सन्तोश करो। अपने-अपने भाग्य की बात है। हमारे भाग्य में जब गरीबी लिखी है तो हो भी क्या कर सकते है?-उसमें संभवतः आत्महीनता को भावना पैदा कर देता है। किसी की उच्च स्थिति से अपनी साधारण स्थिति की स्पृहा के साथ तुलना करने का अर्थ है अपने लिए आत्महीनता की भूमिका बनाना।
यदि किसी से तुलना न करके भी केवल अपने अभावों, कमियों और कष्टों का भी चिन्तन किया जाता रहे तब भी आत्महीनता का भाव उत्पन्न हो जाता है, मैं गरीब हूँ। मेरे घर का खर्च ही पूरा नहीं पड़ता है। मैं ज्यादा कमा ही नहीं पाता अपने पर कोई आपत्ति और उलझन आती ही रहती है- आदि-विचार मनुष्य को आत्महीन बना देते हैं। मनुष्य अपने प्रति जितने हीन और ओछे विचार रखेगा वह उतना ही आत्महीन बन जायेगा। विचारों का स्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई मनुष्य यथार्थ रूप में गरीब न हो अच्छा खासा खाता-पीता हो किन्तु लोभ, लालच अथवा भय दुराव आदि के कारण अपने को निरन्तर गरीब समझता अथवा कहता रहे तो निश्चय ही एक दिन परिस्थितियाँ इस प्रकार से घूम जायेंगी कि वह गरीब हो जायेगा। यदि परिस्थितियाँ न भी घूमे तो भी पैसा होते हुए भी अपने को गरीब और दीन हीन मानने व कहने वाला यों ही दीन ही होता है। जो अपनी स्थिति और विभव का अनुभव न कर सके और दूसरों को उसको समझने से वंचित रक्खे वह दीन−हीन ही तो होता है। ऐसे निम्न और निकृष्ट वाले अवश्य ही आत्महीनता के रोगी बन जाते हैं।
यह और इस प्रकार की अनेक न्यूनताओं और असावधानियों के कारण लोगों में आत्महीनता का भाव आ जाता है। यदि उसे तत्परता पूर्वक जल्दी ही दूर न कर दिया जाये तो वह प्रौढ़ होकर एक मानसिक रोग में बदल जाता है। आत्महीनता का भाव नैसर्गिक न होकर मनुष्य का अपना पैदा किया हुआ होता है। यह भाव उन्नति और प्रगति में बहुत बाधक होता है। अस्तु इसे अपने पास न तो आने देना और न रखना चाहिए।
आत्महीनता से बचकर रहना कोई कठिन बात नहीं है। थोड़ी-सी सावधानी बरतने से इससे आसानी से बचा जा सकता है। उसमें से एक तो यह है कि अपने कार्य और क्षेत्र में दक्षता तथा कुशलता प्राप्त करली जाये ! सब के साथ यथायोग्य व्यवहार किया जाए। इसके अतिरिक्त दो विशेष बातें यह हैं कि न तो कभी किसी किसी की उच्च स्थिति से अपनी सामान्य स्थिति की तुलना की जाये और न अपना न अपने कार्यों तथा भाग्य की अवमानना करने के साथ अपनी क्षमताओं में अविश्वास ओर अपनी स्थिति का अवमूल्यन ही किया जाये। अपने को महत्वहीन और अभागा समझने वाले लोग अवश्य ही आत्महीनता के शिकार बन जाते हैं। इन दुष्प्रवृत्तियों से सावधान रह कर जीवन में विश्वास और आदर भाव से अपना कर्तव्य किया और अपनी स्थिति में प्रसन्न रहकर चला जाए तो आत्महीनता का कोई प्रश्न ही न रह जाये।
मनुष्य अपने आपको पहचानने से भगवान को पहचान सकता है मैं कौन हूँ ? भली-भाँति विचार करने पर मालूम होता है कि मैं नाम की कोई वस्तु है ही नहीं। हाथ, पैर, खून, माँस इत्यादि इनमेँ से मैं कौन है जिस प्रकार प्याज का छिलका अलग करते-करते छिलका ही निकलता जाता है, होश कुछ बचता ही नहीं, उसी तरह विचार करने पर “अपनत्व” के नाम से कुछ बचता नहीं, अन्त में जो कुछ रहता है वही आत्मा या चैतन्य है। अहम्भाव दूर हो जाने पर भगवान् के दर्शन होते हैं।
मैं दो तरह का होता है। एक है पक्का “मैं”। मेरा मकान मेरा घर, मेरा लड़का-यह सब कच्चा “मैं” है और पक्का “मैं” है-मैं उनका दास मैं उनकी सन्तान और मैं वही नित्य-मुक्त-ज्ञान स्वरूप हूँ।
-रामकृष्ण परमहंस
नैतिक गुणों में निर्भयता एक महान सद्गुण है। यह भी वह गुण है जिसके आधार पर मनुष्य कठिन काम करके दिखला देता है। संसार में जहाँ जो भी महान पुरुष हुए हैं उन सब में निर्भयता का सद्गुण अवश्य रहा है। साथ ही जो जितना अधिक निर्भय रहा है उसने उतना ही अधिक महान कार्य कर दिखाया है। महान पथ पर अग्रसर होने पर अथवा समाज की हानिकारक परम्पराओं को मिटने का बीड़ा उठाने वालों को आपत्तियों और जन-विरोधों का सामना करना ही पड़ता है। एक सच्चा सुधारक होता है और दूसरी ओर विरोधियों का बड़ा जन समुह जो कि उस सत्य पुरुष के प्राणों का ग्राहक बना होता है। तब भी वह व्यक्ति अपनी सच्ची बात कहता हुआ अन्ध परंपराओं पर कुठाराघात करता रहता है। इस प्रकार का प्रचण्ड साहस उसे किस बात से मिलता है। यह साहस उस निर्भयता का ही प्रसाई होता है जो कि उस महापुरुष की आत्मा में निवास करती है।
जहाँ एक भीरु व्यक्ति सत्य का पक्ष होने पर भी किसी एक विरोधी के सम्मुख नहीं ठहर पाता, वहाँ एक निर्भय पुरुष हजारों में सिंह की तरह दहाड़ता है। निर्भयता एक महान दैवी गुण है-जो मनुष्य को सिंह पुरुष बना देता है। भगवान बुद्ध, महावीर, दयानन्द, लूथर और महात्मा गाँधी प्रभृति महापुरुष निर्भयता के जीते जागते उदाहरण थे। इन्होंने अपने विरोध में लाख-लाख व्यक्तियों के होते हुए भी अपने सदुद्देश्यों को निर्भयता के बल पर पूरा कर दिखाया।
निर्भयता का भाव बड़ा प्रभावशाली होता है। एक निर्भय पुरुष अपने आस-पास के सारे लोगों को निर्भय बना देता है। जिस आबादी में एक भी निर्भय तथा साहसी व्यक्ति रहता है उस आबादी में गुण्डे लफंगों की गति विधियाँ नहीं चलने पातीं। उस एक सत्य पुरुष के प्रभाव से आबादी में साहस तथा निर्भयता का वातावरण छाया रहता है। लोग उसके आधार पर किसी भी बुराई से टक्कर लेने को तैयार रहते हैं। जिसे देश और समाज के नेता जितने निर्भय और साहसी होते हैं उसके जनगणना भी उसी अनुपात से निर्भय और साहसी बनते हैं। सेनापति का साहस और निर्भयता अपनी सेना को भी अपनी ही तरह निर्भय और साहसी बना देती है। कायर सेनापति बना देती है। कायर सेनापति के सैनिक भी भीरु और डरपोक होते हैं। सेनापति नेपोलियन जिस समय अपनी सेना के बीच आ जाता था, उस समय उसकी निर्भयता और साहस के प्रभाव से हर सैनिक अपने में नेपोलियन का ही आदर्श। अनुभव करने लगता था। निर्भय पुरुष सत्य के पक्ष में मौत के सम्मुख भी वक्ष तान कर बढ़ते चने जाते हैं।
निर्भयता मनुष्य की जीवन्त आत्मा का प्रमाण है। जिसकी आत्मा मर चुकी होती है, उसका तेज समाप्त हो गया होता है वह मनुष्य कायर बन जाता है। आत्मा की तेजस्विता सदाचार से बढ़ती और बनी रहती है। जब मनुष्य सदा सत्य ही बोलता है, सत्य व्यवहार करता है और सत्य विचार ही करता है तो उसकी आत्मा का तेज प्रखर होता है और उसी के अनुसार ही उसकी निर्भयता का भाव भी विकसित हो जाता है। जो झूठा, छली और दम्भी होता है वह ऊपर से एक बार निर्भयता का नाटक भले ही कर दिखाए पर वास्तव में वह होता बड़ा कायर है। अपराध वृत्ति के लोग निर्भय रह ही नहीं सकते यह असम्भव है।
जहाँ दुराचार कायरता का दोष पैदा करता है, वहाँ कायरता मनुष्य को अपराधी बना देती है। जो व्यक्ति कायर और साहसहीन होता है वह विरोध और विपत्ति के भय से खुलकर पुरुषार्थ के क्षेत्र में नहीं उतरता। निर्भय और साहसी व्यक्ति को कपट का सहारा नहीं लेना पड़ता। वह अपनी उन्नति के लिए खुलकर पुरुषार्थ करता है और खेम ठोककर मैदान में असत्य तथा अनाचार का विरोध करता है।
निर्भय और साहसी व्यक्तियों का ही यह काम है कि समाज में दुष्टताएं तथा दुष्प्रवृत्तियाँ छाने नहीं पातीं अन्यथा समाज के दुष्ट व्यक्ति सारे समाज को ही नरक निवास बना डालें। वास्तव में जब कायर और कुचालियों की संख्या समाज में बढ़ जाती है तब समाज बड़ी गहरी विपत्ति में फंस जाता है। वह न केवल निर्बल और संत्रस्त ही बन जाता है बल्कि उसके नष्ट हो जाने तक की आशंका पैदा हो जाती है। किन्तु धन्यभाव साहसी पुरुषों को शतशः धन्यवाद है कि वे समाज के किसी कोने से उठकर आते हैं और फैली हुई बुराइयों को न केवल ललकारते ही हैं बल्कि उनको जड़मूल से उखाड़कर फेंक देते हैं। यह निर्भय और साहसी व्यक्तियों तक ही सौभाग्य होता है कि वे सदुद्देश्यों के लिये न केवल कष्ट ही सह लेने की शक्ति रखते हैं कि बल्कि उसके लिये हँसते-खेलते हुए बलिदान भी हो जाते हैं।
भय अथवा कायरता बहुत बड़ा दोष है। जिसे यह घेर लेता है उसका जीवन बेकार कर देता है। भीरु तथा कायर पुरुष संसार में कोई महान कार्य तो नहीं ही कर सकते वे व्यक्तिगत सामान्य जीवन भी सुख-शान्ति से नहीं बिता पाते। कायर और डरपोक लोग संसार में सबसे ज्यादा सताये जाते हैं। जरा-जरा सी बात में हर कोई उन्हें आँख दिखला और डरा धमका सकता है। कायर और क्लीव व्यक्तियों के ही अधिकारों का हरण किया जाता है। कायर स्वभाव के व्यक्ति संसार में पग-पग पर डरते-मरते रहते हैं। उन्हें रास्ता चलते गुण्डों लफंगों का भय सताता है। रात में अकारण ही चोर डाकुओं की आशंका उनकी नींद का हरण कर लेती है। किसी से यदि कुछ कहा सुनी हो गई है तब तो उनका सारा समय डरते-डरते ही बीता रहता है। कायर व्यक्ति स्वभाव से ही अपने को सबसे निर्बल और असहाय समझ लेता है। कायरता और भीरुता बड़ा भयानक दोष है। यह आत्मवान् व्यक्ति के लिए एक कलंक है। भीरुता को मनीषियों ने मनुष्य की जीवित मृत्यु बतलाया है। कहा है कि जो कायर होता है जिससे वह जीवन का कोई आनन्द नहीं उठा पाता।
कायरता की उत्पत्ति निर्बलता तथा चरित्रहीनता से होती है। जो मनुष्य असंयम तथा असावधानी द्वारा अपना स्वास्थ्य नष्ट कर डालता है, शरीर की शक्ति समाप्त कर डालता है वह तो स्वभावतः सबसे भयभीत ही रहेगा। जिसके शरीर में शक्ति नहीं बल और सामर्थ्य नहीं वह कदम-कदम पर हर व्यक्ति से डरता बचता ही चलेगा। यदि कोई उसे अकारण भी दबाएगा तो भी सहन कर लेगा। निर्बलता के कारण अपने स्वत्वों को भी मजबूर होकर छोड़ देता है। संसार में निर्भय होकर रहने के लिये शक्ति की नितान्त आवश्यकता है।
इसके साथ ही बहुत बार ऐसे लोगों को भी कायर तथा भीरु पाया जाता है जो देखने सुनने में बड़े ही स्वस्थ बलिष्ठ विदित होते हैं। ऐसे लोगों की भीरुता का कारण मानसिक दौर्बल्य होता है। जिसकी उत्पत्ति चरित्रहीनता से होती है। जो चोर, व्यभिचारी अथवा असत्यनिष्ठ है, उसका हृदय बहुत कमजोर और आत्मा बड़ी मलिन होती है। उसका पाप उसे भीतर ही भीतर दमित करके खोखला बना देता है। जब तक मनुष्य का पाप खुलता नहीं उसकी आत्मा ही उसे त्रस्त तथा भयभीत बनाए रखती है और जब समय आने पर भंडा फूटता है तब तो उसके भय का पारावार नहीं रहता। समाज की कोप दृष्टि उसके प्राण सोख लेती है और वह जड़वत् किंकर्तव्य विमूढ़ होकर पूरी तरह से निस्सहाय तथा निरुपाय हो जाता है। उस पर चारों ओर से निन्दा, लाँछन और अपमान की बौछार होने लगती है।
भीरु स्वभाव के व्यक्तियों के जीवन की सारी प्रगति रुक जाती है। उन्हें पग-पग पर बाधायें और विरोध घेरते रहते हैं। कायर व्यक्ति प्रायः परावलंबी बन कर दूसरे की आड़ में जीवन चलाने की कोशिश करते हैं कायर व्यक्तियों को स्वाधीनता में नहीं पराधीनता में ही अपनी सुरक्षा तथा सुख-शान्ति मालूम होती है। कारण यह है कि स्वावलम्बन के लिए जिस शक्ति, साहस और दृढ़ता की आवश्यकता होती है कायर व्यक्ति में उसका अभाव रहता है। इस प्रकार का पराधीन तथा परावलम्बी व्यक्ति संसार में उन्नति ही क्या कर सकता है। कायर व्यक्ति स्वभावतः निराश तथा निरुत्साह बना रहता है। प्रथम तो वह किसी प्रगति के लिए कदम उठाते डरता है, और यदि उठाता भी है तो असफलता का भय उसे पहले ही सताने लगता है। जरा सा विरोध अथवा असहयोग देखकर ऐसे कायर तथा साहसहीन व्यक्ति से उन्नति अथवा प्रगति की आशा नहीं की जा सकी।
यश, सम्मान, प्रतिष्ठा तथा समृद्धि के उन्नत शिखर पर वे ही चढ़ सकते हैं जो अन्दर बाहर दोनों ओर से निर्भय तथा साहसी होते हैं। निर्भयता एक तेजस्वी गुण है। जिसकी प्राप्ति सत्य तथा सदाचार से होती है। सदाचारी व्यक्ति पवित्र जीवनयापन के कारण शरीर तथा मन दोनों से स्वस्थ रहता है। सत्य उसकी आत्मा को प्रकाशित बनाए रहता है जिससे उसे निराशा तथा निरुत्साह का अन्धकार नहीं घेर पाता। सदाचारी के लिए संसार में कहीं भी भय उसे छूने तक नहीं पाता। सत्यनिष्ठ सदाचारी की आत्मा में निर्भयता, साहस तथा उत्साह की हिलोरें उठनी और उसके व्यक्तित्व की प्रभावशाली बनाती रहती है। मानव जीवन की सार्थकता इसी बात में है कि उसको हर प्रकार से निर्भयतापूर्वक यापन किया जाय। कायरता जीवित मृत्यु के समान होती है। वह मनुष्य का सारा सुख सारा चैन और सारा अधिकार अपहृत करा देती है।
यज्ञ सम्मेलनों की सूचनाएं
विदाई, सम्मेलन में एवं डाक से, यज्ञ सम्मेलनों के प्रस्ताव बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। उन्हें देखने के बाद यह आवश्यकता अनुभव हुई कि उन पर नये सिरे से विचार करके निम्नलिखित सूचनाओं सहित पुनः भेजा जावे सभी शाखायें एवं सक्रिय सदस्य परस्पर परामर्श करके इस सूचना के अनुसार अपने प्रस्ताव भेजें। यह मानकर चलें कि अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं भेजा गया है। प्रस्ताव अलग कागज पर लिखकर भेजें जावें, एक ही पत्र पर कई सूचनाओं के बीच उन्हें न लिखा जावे। एक ही लिफाफे में अलग कागज पर लिखकर भेजने में कोई हानि नहीं। एक से अधिक यज्ञो के लिए प्रस्ताव हो तो सभी अलग-अलग कागजों पर निम्न जानकारियाँ सहित लिखें जावें। शीघ्रता करें।
1.भेजने वाली शाखा (पूरा पता मयपोस्ट, जिला, व प्रान्त)
2.सम्मेलन का स्थान (ग्राम या शहर का नाम) एवं प्रस्तावित समय।
3.सम्मेलनों में यज्ञ कुण्डों की संख्या।
4.सम्मेलन से कितने क्षेत्र का प्रभावित करेंगे।
5.शाखाओं की सामर्थ्य बढ़ाने वाली कितने उपकरणों की व्यवस्था हो गयी है और सम्मेलन तक कितने साधन बढ़ा लेने का संकल्प है।
6.वर्तमान में कितने नैष्ठिक कार्यकर्ता एवं सहयोगी यज्ञ सम्मेलन की तैयारी के लिये सन्नद्ध हैं। उनके नाम पते एवं विशेषतायें संक्षेप में लिखें।
7.क्या पाँच या नौ कुण्डीय यज्ञशालाओं के उपकरण मय पूरी साज सज्जा के आपकी शाखा तैयार करने की स्थिति में है ताकि उसका उपयोग आस-पास के यज्ञों में किया जा सकें। यदि हाँ; तो कब तक वह तैयार हो सकेंगे।
8.केन्द्र से क्या-क्या सहयोग कब-कब आवश्यक होगा।
9.अन्य आवश्यक ज्ञातव्य।-लीलापत शर्मा
गुरुदेव का अवतरण और कार्यक्षेत्र
परम पूज्य गुरुदेव की विदाई हम सबको शूल की तरह चुभ रही है। जब तक वे साथ थे गहराई से देखने समझने का अवसर ही नहीं मिला। निकटवर्ती वस्तु सदा कम महत्व की लगती है और उसका सही मूल्याँकन करना सम्भव नहीं होता। जिस पृथ्वी पर हम निवास करते हैं वह कितनी द्रुतगति से चलती घूमती है इसका पता ही नहीं चलता। अन्तरिक्ष यात्रियों ने जब दूर से उदय होती हुई, अस्त होती हुई नीलाभ पृथ्वी के सौंदर्य को देखा तो आश्चर्यचकित और भाव-विभोर हो गये। पर हम रोज उसी रूप राशि पृथ्वी पर रहते हुए भी न उसकी गति समझ पाते हैं और न प्रकाशवान् आभा देख पाते हैं। अपनी काया को ही देखें उसके अंग-प्रत्यंगों में जो अद्भुत यन्त्र लगे हुये है उनका न तो स्वरूप दीखता है और न कृत्य हाथ सीप घोंघे ही लगते हैं मोती तो वे ही ढूँढ़ पाते हैं जो गहराई तक प्रवेश करने का पुरुषार्थ कर सकने की क्षमता रख सकें। गाँधी जी को जिनने बाहर से देखा वे दर्शन करने मात्र का लाभ प्राप्त कर सके पर जिनने उनके अन्तरंग को परखा और प्रकाश ग्रहण किया वे नेहरू, पटेल, लाल बहादुर, राजेन्द्र बाबू, राधाकृष्णन जैसे इतिहास प्रसिद्ध महामानव बनने में सफल हो गये। हम में से बहुत कम ऐसे है जिन्होंने पू. आचार्य जी की हिमालय जैसी ऊंचाई और समुद्र जैसी गहराई को बारीकी से समझने का प्रयत्न किया हो।
आमतौर से उन्हें उतना ही समझा जाता रहा जितना कि उनके स्थूल क्रिया-कलाप चमड़े की आँखों से दीख पड़ते थे। उनकी एक लोक प्रसिद्ध आदत यह थी कि वे जो कुछ समझ में आता है पर विश्लेषण कर्ता जब उसका प्रत्यक्षीकरण विश्लेषण करते हैं तब पता चलता है कि यह देह जो मोटी दृष्टि से देखने पर तुच्छ और देय लगती है वस्तुतः कितने भारी आश्चर्य भाण्डागार के रूप में विनिर्मित हुई है।
धरती और काया की तरह ही परम पूज्य गुरुदेव का महान् अस्तित्व हम लोगों के बीच लम्बे अर्से से विद्यमान था। वे कितने अद्भुत और कितने महान् थे इसकी जानकारी का एक अंश ही हम अति निकटवर्ती सहचरों को मिल सका फिर जो थोड़ा दूर के फासले में रह रहे थे उनकी जानकारी और स्वल्प रही हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। चमड़े की आँख से वही देखा जा सकता है जो स्थूल या प्रत्यक्ष है जो समुद्र के किनारे खड़े रहते हैं उनके निज की पूजा, उपासना, साधना, तपश्चर्या करते थे उसका फल बालकों को मिठाई बाँटने में खर्च करने का आनन्द लेते रहते थे। फलस्वरूप उनके इर्द-गिर्द बालकों की भारी भीड़ लगी रहती थी। बालकों से मतलब भौतिक प्रगति के लिए लालायित और उलझनों से उद्विग्न उन व्यक्तियों से है जो अपने पुरुषार्थ से अपनी गुत्थी सुलझा सकने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे और किसी दूसरे की समर्थ सहायता की अपेक्षा करते थे। आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से अपनी मंजिल आप पूरी करते हैं और प्रारब्ध की जटिलता को साहस और धैर्य पूर्वक सहन करते हैं। बालकों की मनःस्थिति उससे भिन्न होती है। वे अभिलाषा बहुत करते हैं पर उस उपलब्धि की क्षमता नहीं रखते। मिठाई देने का मतलब इस वर्ग की छोटी छोटी आवश्यकताओं को उपहार स्वरूप पूरी करके उन्हें प्रमुदित और उत्साहित देखना है। गुरुदेव को इसमें बड़ा आनन्द आता था। वे स्वभावतः खाने में बहुत उदासीन और खिलाने में बहुत रस लेने वाले ही थे। अपने भोजन को सस्ते से सस्ता और कम से कम रखने में उनकी जितनी अखरने वाली कंजूसी देखी जाति थी उतनी ही सराहनीय उदारता दूसरों को खिलाने में मिलती थी। उनके चौके में सदा दर्जनों अतिथि उपस्थित रहते थे। अकेले तो शायद ही उन्होंने कभी खाया हो। जब कभी बिना अतिथि का दिन आ जाता तो दुःख होकर उस श्रुति वचन की याद करते जिसमें कहा गया है कि -”जो अकेला खाता है सो पाप खाता है।”
उपासना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो यह आदत दूसरे रूप में परिणत हो गई। अभाव ग्रस्त, शोक संतप्त उलझनों में जकड़ा हुआ कि कर्तव्य विमूढ़ जो भी सामने आया, उसकी मनोव्यथा समझने में देर न लगी। करुणा से भरा हुआ हृदय देखते देखते पिघल गया। नवनीत और हिम खण्ड तब गलते और पिघलते हैं जब धूप उन्हें सताती और तपाती हैं। सन्त पराई व्यथा को अपनी व्यथा मानकर अपनी सहज सम्वेदना से व्यथित होकर गलते पिघलते रहते हैं। गुरुदेव का रहन-सहन सम्वेदना से व्यथित होकर गलते पिघलते रहते हैं। गुरुदेव का रहन-सहन और वेष-भूषा देखकर उन्हें एक अति सामान्य व्यक्तित्व समझा जा सकता था पर वे वस्तुतः बहुत ऊँचे थे। उस ऊँचाई के आधार उनकी बालकों जैसी निर्मलता और बादलों जैसी उदारता मुख्य थे। यों न जाने कितने दैवी गुण लेकर वे जन्में और कितने साधु स्वभाव बढ़ाते संजोते चले गये पर उनकी माता जैसी ममता इतनी विस्तृत थी कि जो भी संपर्क में आया उनके सहज स्नेह में सराबोर होता चला गया। प्रथम बार अपरिचित के रूप में आने वाले ने भी यही समझा हम आचार्य जी के चिर–परिचितों और सघन आत्मीयजनों में हैं।
पवन को हर कोई यह समझता है कि वह हमारे ऊपर ही पंखा डुला रहा है, सूर्य को हर कोई यह पाता है कि उसी के घर रोशनी, गर्मी बखेरने आता है पर वस्तुतः पवन और सूर्य इतने विशाल और महान है कि एक नहीं असंख्यों को उनकी सहायता का लाभ समान रूप से मिलता रहता है। बाधित और प्रतिबन्धित तो वे होते हैं जो स्वार्थी और संकीर्ण हैं जिन्हें न मोह है न लोभ, उनके लिये राग−द्वेष का अपने पराये का प्रश्न ही नहीं उठता। करुणा और ममता से भरा स्नेह सिक्त अन्तःकरण हिंस्र पशुओं पर भी आत्मीयता बरसाता रहता है, फिर नर तनु धारियों की तो बात ही क्या? उनमें भी वे जो उनकी सहायता प्राप्त करने की आशा में सामने आये, ऐसे लोगों को अपनी सामर्थ्य रहते, निराश लौटना उनके जन्मजात स्वभाव के विपरीत ही पड़ता। वे ऐसा कभी कर भी न सके। और अमिट प्रारब्धों से ग्रस्त कुछेक चन्द लोगों को छोड़कर प्रायः उन सभी की उन्होंने भरपूर सहायता की जो तनिक भी सहयोग पाने की इच्छा से उनके संपर्क में आयें थे।
अपनी उपासना तपश्चर्या का जो पुण्य फल हो सकता था उसका एक कण भी उन्होंने अपने लिये किसी भौतिक एवं आत्मिक प्रतिफल के लिये बचाकर नहीं रखा। जितना वे कमा सके उसका राई रत्ती उन्हें मिलता रहा जो आशा लेकर उनके सामने आये। कभी सम्भव हुआ तो उनके द्वारा की हुई सहायता के कारण लाभान्वित हुये व्यक्तियों की कहानी उन्हीं की जवानी प्रकाश में लाई जायेगी इससे विदित होगा कि कितनों के अन्धकारमय वर्तमान को प्रकाश पूर्ण भविष्य में उन्होंने बदल दिया और कितने उनका साहाय्य सहयोग पाकर धन्य हो गये। गुरुदेव ने अपनी इस उदारता और समर्थता को सर्व साधारण के सामने प्रकट न होने देन में सदा कठोरता बरती। वे नहीं चाहते थे कि उनकी कोई प्रशंसा करे या अहसान माने अथवा उन्हें चमत्कारी, उदार दानी, तपस्वी एवं सेवाभावी माना जाय। वे इतने में ही संतुष्ट और प्रसन्न थे कि उन्हें सामान्य, सरल और सज्जन भर माना जाता रहे। सो उन्होंने कठोर प्रतिबन्ध लगाये थे कि कोई उनकी अलौकिक अनुभूतियों एवं सेवा सहायताओं की चर्चा न करें। करना ही हो तो उन घटनाओं को भगवान् की कृपा भर कहे, उनकी व्यक्तित्व को कोई श्रेय न दे। सो उस प्रतिबन्ध के कारण असंख्यों प्रसंग अभी अविज्ञात ही बने हुये हैं जिनको सुनने जानने पर कोई भी व्यक्ति आश्चर्यचकित रह सकता है।
अब जबकि गुरुदेव चले गये तब उनकी प्रशंसा के लिये नहीं वरन् इसलिये इन प्रसंगों की चर्चा आवश्यक अनुभव होती है कि सर्व साधारण को यह विदित हो सके कि आध्यात्मिक जीवन कितना समर्थ और उपयोगी सिद्ध हो सकता है और उसका अवलम्बन लेकर कोई व्यक्ति अपना और दूसरों का कितना भला कर सकता है। उन प्रसंगों के प्रकाश में आने से एक बड़ा लाभ यह होगा कि आत्म-साधना का प्रतिफल समझा ला सकेगा और उस मार्ग को अपनाने के लिये सर्व साधारण में उत्साह उत्पन्न किया जा सकेगा। कहना न होगा कि गुरुदेव की उपासना पद्धति में जप, तप का जितना स्थान था उससे हजार गुना महत्व वे जीवन साधना को देते थे और अपनी आत्मिक उपलब्धियों का श्रेय वे आन्तरिक काषाय कल्मषों के उन्मूलन और वाह्य जीवन की आदर्शवादिता को देते थे। उन्होंने जब भी कहा-यही कहा-मेरी उपासना को फलित करने का श्रेय उस जीवन साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे। पर अब जबकि उनकी प्रशंसा निन्दा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है और इस परिधि से वे बहुत आगे निकल गये तो उसमें हर्ज नहीं दीखता कि वे प्रसंग इस उद्देश्य से प्रकाशित कर दिये जाय कि आत्म-साधना की समर्थता और सार्थकता क्या है और उसे प्राप्त करने के लिये साधक को किस प्रकार की गतिविधियाँ अपनानी होती हैं। इस प्रकाशवान से यदि गुरुदेव के चरण चिन्हों पर चलते हुए महामानव बनने की प्रेरणा कुछेक व्यक्तियों को भी मिल सके तो यह उपलब्धि निस्सन्देह एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना होगी। इन दिनों इस संदर्भ में जितना अधिक विचार किया है उतना ही यह लगा है कि उसमें अनुसूचित कुछ भी नहीं-उचित ही उचित है कि गुरुदेव के संपर्क में आने वालों की उत्साहवर्धक अनुभूतियों-भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियों का संग्रह करने एवं प्रकाशित करने के लिये कदम बढ़ाया जाय। अस्तु यह कार्य हाथ में लिया ही जा रहा है। इस प्रकार के प्रसंग चित्रों सहित मेरे पास हरिद्वार के पते पर भेजे जा सकते हैं। उनका सम्पादन करे यथा समय प्रकाशन की व्यवस्था की जायेगी।
गुरुदेव का जीवन आध्यात्मिकता और मानवता का एक समग्र एवं व्यावहारिक दर्शन है, जिसे उनकी गरिमा व्यक्त करने के लिये नहीं मानव तत्व की महानतम उपलब्धि “दिव्यता” को लोक रुचि का विषय बनाने के लिये प्रकाश में लाया जाना चाहिए। आज तो उसकी उपयोगिता इस दृष्टि से भी अत्यधिक है कि धर्म और अध्यात्म का विकृत ओर अवाँछनीय स्वरूप ही सर्वत्र फैला पड़ा हैं और उस विडम्बना के फलस्वरूप उस मार्ग पर चलने वाले दम्भ एवं छद्म के शिकार होते चले जाते हैं। कोल्हू के बैल की तरह चिरकाल तक चक्कर काटते रहने और कठोर श्रम करने एवं कष्ट सहने पर भी किसी के हाथ कुछ लगता नहीं। असफलता की लज्जा छिपाने के लिये लोग कपोल कल्पित कुछ मिलने की चर्चा तो करते रहते हैं पर वस्तुतः यदि उनका अन्तरंग पढ़ा जाय तो खाली हाथ ही पाये जायेंगे। वास्तविकता छिपी कहाँ रहती है, वह मनुष्य के रोम-रोम से फूटती है और अन्ततः पकड़ में आ ही जाती है। असफल अध्यात्मवादी दूसरों पर बुरा असर छोड़ते हैं। इस दिशा में निराशा और उपेक्षा की छाप छोड़ते हैं शिक्षित और समझदार लोगों में जब इस प्रसंग की चर्चा होती है तो उपहास और व्यंग ही व्यक्त होता है। अशिक्षित और अविकसित लोगों तक यदि यह आत्मवाद सीमित रहे, केवल अन्ध विश्वास ही यदि मात्र श्रद्धा का आधार रह जाय और परीक्षा की कसौटी पर खरा साबित न हो तो ऐसे दुर्बल आधार को कब तक जीवित रखा जा सकेगा ठहरती वही चीज है जिसमें वास्तविकता हो और जिसे परीक्षा की हर कसौटी पर खरा सिद्ध किया जा सकता हो। आज सर्वत्र आत्म विद्या का उपहास उड़ाते देखा जा सकता है, इसका प्रधान कारण यह है कि उसकी उपयोगिता और यथार्थता सिद्ध नहीं की जा सकी। यों तर्क ओर प्रमाण को सदैव मान्यता मिलती रही है पर यह तो विशेष रूप से बुद्धिवाद का युग है इसमें उन्हीं तथ्यों को मान्यता मिल सकती है जिन्हें प्रामाणिक सिद्ध किया जा सके। विज्ञान, शिल्प, शिक्षा, कृषि, व्यवसाय, कला, चिकित्सा आदि तथ्यों का कोई मजाक नहीं उड़ाता क्योंकि उनकी यथार्थता प्रत्यक्ष है। यदि अध्यात्म भी अपनी प्रामाणिकता और उपयोगिता प्राचीन काल की तरह आज भी सिद्ध कर सका होता तो कोई कारण नहीं कि इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य को अपनाने के लिये लोग लालायित न होते और उसे प्राप्त करने के लिये समुचित पुरुषार्थ न करते।
आज आत्म-विद्या एक प्रकार से अप्रमाणिक, उपेक्षित और उपहासास्पद बनी हुई है और इस अवसाद के कारण व्यक्ति तथा समाज को महती क्षति उठानी पड़ रही है। ऐसी परिस्थिति में यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि आत्म विज्ञान को उसकी उपयोगिता और प्रामाणिकता के साथ सर्व साधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया जाय और साथ ही यह भी बताया जाय कि अध्यात्मवाद का जो ढाँचा इन दिनों खड़ा दीखता है वह अवास्तविक, भ्रान्त एवं विकृत है। इसमें प्राचीन काल के आत्मवेत्ताओं के स्थूल क्रिया-कलाप की भोंड़ी मकल मात्र है, वास्तविकता उसमें नहीं के बराबर शेष रह गई है। अस्तु उसका कोई प्रतिफल परिलक्षित न हो रहा हो तो इसमें अचरज की बात ही क्या है ?
गुरुदेव एक व्यक्ति के रूप में नहीं एक दर्शन के रूप में जिये। उन्हें चर्म चक्षुओं से जिन्होंने देखा उन्होंने उन्हें देहधारी मानव प्राणी समझा पर जिसने उन्हें बारीकी से परखा और गहराई तक प्रवेश करके जाँचा उसने उन्हें युग प्रवाह की मूर्तिमान प्रेरणा के रूप में पाया। आत्म-विद्या इस संसार की सबसे बड़ी विद्या और विश्व मानव की सुख-शान्ति के साथ प्रगति पथ पर अग्रसर होते रहने की सर्वश्रेष्ठ विधि व्यवस्था है; किन्तु दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस संसार के प्राण-दर्शन की ऐसी दुर्गति हो रही है और इस विडम्बना के कारण समस्त मानव जाति को कितनी क्षति उठानी पड़ी रही है इस अवाँछनीय परिस्थिति को वाँछनीयता में परिणत करने के लिये-अवास्तविक के स्थान पर वास्तविकता को प्रतिष्ठापित करने के लिये यदि गुरुदेव आये या भेजें हों तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। यह कहना अत्युक्ति न होगी कि वे एक आदर्श मानव का-एक सच्चे अध्यात्मवादी का क्या स्वरूप हो सकता है और क्या होना चाहिये इसका उदाहरण प्रस्तुत करने के लिये अवतरित हुये। वाणी और लेखनी से बहुत कुछ कहा और लिखा जाता रहा है। एक दूसरे को उपदेश देने का ढर्रा मुद्दतों से चल रहा है पर उसका तब तक कोई स्थिर प्रभाव नहीं पड़ सकता जब तक कि उन आदर्शों उपदेशों पर चलकर यह न बताया जाय कि इस आधार को अपनाने में किस प्रकार लाभान्वित हुआ जा सकता है। प्रत्यक्ष से ही प्रेरणा मिलती है। आदर्श सम्मुख होने पर ही उसके अनुकरण या अनुगमन की इच्छा उत्पन्न होती है। जीभ से कुछ भी कहा जा सकता है और कान से कुछ भी सुना जा सकता है पर जब तक प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत न किया जाय तब तक उस मार्ग पर चलने का साहस सर्वसाधारण को नहीं हो सकता। इस आवश्यकता की पूर्ति करने के लिये वे आये और उनकी समस्त गतिविधियाँ लोक मंगल के लिये अध्यात्मवाद की उपयोगिता एवं आवश्यकता सिद्ध करने के इर्द-गिर्द घूमती रहीं।
सौभाग्य से मुझे उनके अति समीपवर्ती साथी के रूप में रहने का अवसर लम्बे समय तक मिला है। यों सारा संसार उनका घर था और सभी प्राणी उनके आत्मीय थे। चूँकि वे सबके थे इसलिये कोई एक उन पर अपना अधिकार जमाने की धृष्टता नहीं कर सकता। सूरज पर, समुद्र पर, पवन पर, आकाश पर कोई अपना अधिकार नहीं जताता, पर लाभ सभी उठाते हैं। मैं उनकी धर्म पत्नी हूँ, इसलिये कुछ अधिकार तो नहीं जताती पर अपने इस सौभाग्य को, पुण्य प्रारब्ध को भरपूर सराहती हूँ कि मुझे दूसरोँ की अपेक्षा उनके साथ अधिक समय और अधिक निकट रहने का अवसर मिला। वे चले गये इसका दुख कितना है और उसे अपने दुर्बल नारी हृदय में कितनी कठिनाई से छिपाने का असफल प्रयत्न कर रही हूँ इसकी यहाँ चर्चा न करना ही उचित होगा। उनके लिये मेरी ही तरह न जाने कितनों की आँखें बरसी है, और कितनों के कलेजे फटे हैं। उनके चले जाने से कितनों ने अपने को अनाथ असहाय समझा है उन्हीं में से एक मैं भी हूँ अधिक समीप रहने का अधिक सौभाग्य मिलने से विछोह की अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही अन्तर्व्यथा मुझे सहनी पड़ रही है। उस कसक को छिपाना इसलिये पड़ रहा है कि 50 लाख अपनी धर्म सन्तानों की देखभाल रखने और स्नेह से सींचते रहने की जिम्मेदारी मेरे दुर्बल कन्धों पर छोड़ कर गये हैं उसमें त्रुटि न आने पावे। इन दिनों उनकी याद जब आती है तो पेट बुरी तरह इठता है और लगता है इतनी तड़पन सह सकना इस शरीर में रहते शक्य न होगा। फिर भी चूँकि कर्तव्य ही है उस महा मानव के आरोपित उद्यान के 50 लाख पेड़ पौधों को जिनमें अभी समर्थता नहीं आई हैं उन्हें स्नेह सिंचित रखने को अभी जीना भी पड़ेगा और कुछ करते रहना भी पड़ेगा। इसलिये शरीर और मन को संभाले भी रहना है। आत्म नियन्त्रण की यह परीक्षा मुझे सीता की अग्नि-परीक्षा सी इन दिनों भारी पड़ रही है। शरीर को आग में झोंकना उतना कठिन नहीं जितना हर घड़ी अन्तर की जलन में गलना। समीपता का जितना अमृत पिया उसका बदला इस बिछोह विष के रूप में पीना पड़ रहा है। अति के इन दानों सिरों का ताल-मेल बिठा सकना और संतुलन कायम रख सकना इन दिनों बहुत भारी पड़ रहा है फिर भी इतना धैर्य ओर विवेक तो मिल ही रहा है जिसके आधार पर कन्धों पर लदे हुये उत्तरदायित्वों का वहन करने के लिये गिर पड़ने की स्थिति से अपने को बचाये रख सकूँ।
गुरुदेव की यों मैं धर्मपत्नी समझी जाती हूँ पर वस्तुतः उनकी एक सौभाग्यशालिनी शिष्या ही हूँ उन्हें पति के रूप में नहीं देवता के रूप में ही देखा वस्तुतः वे थे भी इसी योग्य। उन्हें इसके अतिरिक्त और कुछ समझा भी नहीं जा सकता। कोई अपनी गन्दी आँखों से उन पर भी गन्दगी थोपे यह बात दूसरी है पर जब भी कोई निष्पक्ष समीक्षक की दृष्टि से उनका अन्वेषण विश्लेषण करेगा तब उन्हें मनुष्य शरीर में विचरण करने वाला एक देवता ही पायेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय करना यही तो अध्यात्म है इस तत्वज्ञान का व्यावहारिक दर्शन क्या हो सकता है इसका प्रत्यक्ष स्वरूप सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिये ही वे आये और जिये-इसी के लिये उनकी हर साँस हर विचारणा, हर क्रिया और हर उपलब्धि नियोजित रहीं। उन्हें समझना वस्तुतः आत्म दर्शन को समझने के बराबर ही है। उनका जीवन एक खुली पुस्तक है जिसे यदि युग गीता का नाम दिया जाय तो उचित ही होगा। आज के तमसाच्छन्न वातावरण को हटाने घटाने के लिये क्या किया जाना चाहिए उसका उद्घोष उद्बोधन करना ही उनके क्रिया कलाप का एक महत्वपूर्ण पक्ष था। उन्हीं पृष्ठों का आवरण उनकी अनुपस्थिति में-अपनों में अपनी बात-स्तम्भ के अंतर्गत करते रहने का मैंने निश्चय किया है।
इस अंक में उनके उस प्रत्यक्ष स्वरूप की थोड़ी सी चर्चा की गई है जिससे सर्व साधारण का मोटे तौर पर परिचय रहा है। उन्हें एक सहृदय, सज्जन और तप साधना संलग्न ब्रह्मवेत्ता समझा जाता रहा और लोग यह समझते रहे कि उनकी तप साधना का लाभ कोई भी बिना हिचक उठा सकता है, सो उठाया भी गया। अभावों, संकटों, उलझनों, अवरोधों से निबटने में सहायता प्राप्त करने के लिये अनेकों उनके पास आये। सो न कोई खाली हाथ गया न निराश। जटिल प्रारब्धों को पूर्णतया समाप्त कर देना तो एक मात्र ईश्वर के हाथ में ही हो सकता है। मनुष्य तो अपनी सामर्थ्य भर दूसरों की सहायता ही कर सकता है। सो उनने इस संदर्भ में सदा असीम सहृदयता और उदारता का ही परिचय दिया। हर किसी ने पूरा अधूरा कुछ न कुछ सहयोग अवश्य पाया। जिनकी आवश्यकता पहाड़ जितनी थी पर टीले जैसी सहायता मिलने से सन्तुष्ट हुये-पर जिसने यह देखा कि उपलब्ध अनुदान भी कितना बड़ा था पर टीले जैसी सहायता मिलने से सन्तुष्ट हुये-पर जिसने वह देखा था कि उपलब्ध अनुदान भी कितना बड़ा था और उतना भी मिलने पर कितनी विपत्ति का सामना करना पड़ता-वे उतने से सन्तुष्ट रहें। चर्चा न करने का प्रतिबन्ध था पर मन की बात सदा छिपाये रहना मानसिक दुर्बलता को देखते हुये सब अंशों में सम्भव नहीं सो उपलब्ध अनुदानों की चर्चा एक से दूसरे के कानों में पहुँचती रही और इस आकर्षण में उनसे अधिक व्यक्ति उनके पास आते रहे जिनकी संख्या का लेखा-जोखा रखा जाय तो उसे अनुपम एवं अद्भुत ही कहा जा सकता है। 50 लाख तो उनके दीक्षित शिष्य हैं। संपर्क साधने वालों और लाभान्वित होने वालों की संख्या करोड़ों में गिनी जा सकती है उदार अनुदानी और सन्त तपस्वी के रूप में उन्हें मोटे तौर पर समझा जाता रहा है।
कई बार कुपात्रों को सहायता न करने के लिये मैंने कहा तो उनने इतना ही कहा-बार-बार काटने वाले बिच्छू को भी पानी में बहने डूबने से बचाना सन्त का धर्म है। अनुचित लाभ उठाने के इच्छुक अग्नि आदत से पीछे नहीं हटते तो हमीं क्यों अपनी-सहायता को सीमाबद्ध करें। तर्क की दृष्टि से उनसे बहस की जा सकती थी पर जिसके मन में करुणा, ममता और आत्मीयता के अतिरिक्त और कुछ हो ही न, जो सबमें अपनी ही आत्म समायी देखता हो ऐसे अवधूत की भाव गरिमा को चुनौती देने में न तर्क समर्थ हो सकता था न गुण अवगुण का विश्लेषण। वस्तुतः वे इन परिधियों से बहुत आगे निकल चुके थे सो किसी ने पात्र कुपात्र की चर्चा की भी और समझाने रोकने का प्रयत्न भी किया तो कुछ परिणाम न निकला।
परिणाम स्पष्ट है उनकी महानता में तपश्चर्या जितनी सहायक हुई उससे हजार गुनी प्रभावी थी-आन्तरिक निर्मलता और निर्बाध उदारता। जीवन साधना के इन दो पक्षों के आधार पर ही वे गरुड़ की तरह ऊँचे आकाश में उड़ चलने में सफल हो सके। विश्लेषण करने वाले देखते हैं उनकी अधिकतम उपासना 6 घण्टे नित्य थी इतने असंख्य अभाव ग्रस्तों का साहित्य सम्भव हो सके। दूसरे उनसे भी अधिक कर्मकाण्डी एवं जप-तप करने वाले मौजूद हैं पर उनकी उपलब्धियाँ नगण्य ही रहती है फिर गुरुदेव के लिये इतना उपार्जन कैसे सम्भव हुआ? इस पर उनकी अति निकटवर्ती एवं निम्र अनुगामिनी होने के नाते इतना ही कह सकती हूँ कि उनने निर्मलता और उदारता की प्रवृत्तियों को विकसित करने में अत्यधिक ध्यान दिया और पुरुषार्थ किया। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो सम्भवतः उनके 24 वर्षों के 24 गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो से होते जितने कि देखे और पाये गये।
गुरुदेव चले गये। दूर जाने पर उनका अधिक अन्वेषण विश्लेषण हम सबके लिये अधिक सम्भव हो सकेगा। उन्हें गहराई तक समझने का जितना प्रयत्न किया जायगा उतना ही अधिक हम अध्यात्म तत्वज्ञान का वास्तविक स्वरूप समझ सकने और उसके महान् परिणामों का उपलब्ध कर सकने का पथ प्रशस्त कर सकेंगे।
-भवगती देवी शर्मा
यज्ञ सम्मेलनों के लिये केन्द्र को सहयोग कैसे दें?
(1) सक्रिय शाखायें, एवं प्रभावशाली परिजन अपने प्रभाव क्षेत्र में कार्यक्रम निर्धारण के लिये अन्य शाखाओं का सहयोग करें।
(2) अपने-अपने जिलों की सड़कों के नक्शे (रोड मैप) पी. उब्लू. डी, जिला परिषद, ब्लॉक अथवा अन्य उपयुक्त सूत्रों से प्राप्त करके भेजे।
(3) जो परिजन कम से कम दो माह का अवकाश निकाल सकते हैं और नीचे लिखे कार्य कर सकते हैं वह पत्र व्यवहार करें। अपने परिचितों में भी कोई उपयुक्त व्यक्ति हो तो उनके लिये भी लिखें।
(1) यज्ञ एवं संस्कार आदि कर्मकाण्ड तथा प्रशिक्षण दिये जाने पर छाया मित्रों और प्रदर्शनी चित्रों का व्याख्या सहित प्रदर्शन।
(2) कोई साज बजाने और गाने की क्षमता सम्पन्न परिजन।
(3) ड्राइवर जो थोड़ा दखल मिस्त्रीगीरी में भी रखते हों।
पत्र व्यवहार में अलग कागज पर विवरण लिखें। छुट्टी लेकर आने वाले परिजन यह सूचना दें कि वह किन-किन महीनों में अवकाश लें सकेंगे तथा उन्हें सूचना कितने दिन पहले मिलनी चाहिए।
-लीलापत शर्मा
(1) “अखण्ड-ज्योति” का चन्दा, गायत्री और आर्ष साहित्य का पैसा मनीआर्डर, चेक, ड्राफ्ट, “अखण्ड-ज्योति संस्थान” के नाम से भेजना चाहिए।
(2) अन्य सभी साहित्य, ज्ञान घट (गुल्लक), धकेल युग-निर्माण योजना हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, उड़िया और मराठी युग- निर्माण योजना का चन्दा मनीआर्डर, चेक अथवा ड्राफ्ट युग-निर्माण योजना के नाम से भेजें जायें। इनसे सम्बन्धित पत्र व्यवहार भी इसी पते से करना चाहिए।
पत्र व्यवहार किसी के व्यक्तित्व नाम से न करना चाहिये अन्यथा उसमें अनावश्यक विलम्ब होता है और संस्थान पर भी कोई उत्तरदायित्व नहीं रहता।
(3) यज्ञ, प्रकाशन, विद्यालय के लिए दान, अनुष्ठान का पैसा, धर्मघट मासिक दान यह सब “गायत्री मन्दिर ट्रस्ट” के नाम से भेजने में सुविधा रहती है।
(4) मनीआर्डर, ड्राफ्ट या चेक यहाँ के किसी कार्यकर्ता के व्यक्तित्व नाम से नहीं भेजना चाहिए। व्यक्तिगत नामों से भेजने से वे खाते में जमा नहीं हो पाते साथ ही-अनावश्यक विलम्ब होता है व व्यर्थ की उलझनें बढ़ती है। जहाँ तक सम्भव हो ड्राफ्ट भेजे जायें, चेक में असुविधा होती है।
(5) चन्दा भेजने के साथ ग्राहकों के नाम पतों की लिस्ट भेजी जाती है उसके साथ व्यक्तिगत बातें नहीं लिखनी चाहिए। इसी प्रकार शाखाओं के समाचार भी अलग पृष्ठ पर लिखें जायें। एक लिफाफे में कई तरह के पत्र तो हो सकते हैं पर उन्हें अलग-अलग कागज पर लिखने से उन्हें निबटाने में सुविधा रहती है।
(6) पत्रों की लिखावट साफ हो, विशेषकर ग्राहकों के नाम पते पूरे और साफ लिखे जाने चाहिये। पता साफ न होने और गलत होने से पत्रिकायें भटकती और शिकायतें बढ़ती है।
(7) पत्रिकायें न मिलने की शिकायत अखण्ड-ज्योति के लिये 15 तारीख के बाद और युग-निर्माण योजना के लिये 30 तारीख के बाद करनी चाहिये। साथ में ग्राहक नम्बर लिखना न भूलें कानूनी प्रतिबन्ध के कारण अब शिकायत पर भेजे जाने वाली पत्रिकायें 15 दिन बाद यहाँ से भेजी जाती है अतएव दुबारा पत्रिका के लिए 15 दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
यहाँ पर मनीआर्डर चेक से आने से लगभग 1 मास तक लग जाता है अतः उपयुक्त समय तक पत्रिका की प्रतीक्षा करें ही पत्र व्यवहार करना चाहिए।
(8) चन्दा भेजा गया हो और पत्रिका न मिल रही हो तब उसकी शिकायत के साथ अपना पिछला ग्राहक नम्बर नये सदस्य होने की स्थिति में “नया ग्राहक” मनी आर्डर भेजने का विवरण यदि मनीआर्डर किसी ओर के द्वारा भेजा गया हो तो उसका पूरा हवाला भी देना आवश्यक होता है।
(9) व्यक्तिगत दुःख-कष्ट और साधनायें सम्बन्धी परामर्श वाले पत्र माताजी के नाम निम्न पते पर भेजे जाने चाहिए।
माता भगवती देवी शर्मा शान्ति कुंज (वेदमाता गायत्री ट्रस्ट) प्रा. सप्त सरोवर (हरिद्वार) उ.प्र.
धरा से गगन तक हृदय से नयन तक, निरे शून्य में भी लगा एक फेरा- कि संस्कृति के दीपों। जगो तुम जलाओ॥
नसों में तुम्हारी, धरा का रुधिर है, जगत् के लिये वह बहाना पड़ेगा। अंधेरा नहीं मिट सकता इन्दु से जो, सदा के लिये वह मिटाना पड़ेगा॥
नये चाव से तुम, नये भाव से तुम, लगाते हुए ज्योति का मन्जु मेला, अमा को प्रदीपों! प्रभाती सुनाओ कि संस्कृति के दीपों! जगो तुम जलाओ॥
जली है जहाँ जिन्दगी सर्वदा से, उमंगे कफ़न में समा सो रही हैं। विवश कामनायें, लजाती स्वयं को, गहन कालिमा में जहाँ खो रही है।
सबल प्राण से तुम, अभय दान दे तुम, दुःखों की कठिन-बीथिका में विहँसते, खुशी का खजाना निरन्तर लुटाओ। कि संस्कृति के दीपों! जगो तुम जलाओ॥
प्रलय की घटायें, कहीं अणुबमों में, निशाचर पलते लगाने न पायें। रजत चोटियों, खाइयों-खन्दकों में, पली सृष्टि सुन्दर नसने न पायें॥
सजग प्रहरियों! तुम, अथक राहियो! तुम, निखिल विश्व को शाँति का पथ दिखाते, चतुर्दिक बड़े जोर से जगमगाओ। कि संस्कृति के दीपों! जगो तुम जलाओ॥
*समाप्त*