व्यर्थ का उलाहना

हे प्रभु ! हे जगत्-पिता, जगन्नियन्ता कैसे आप मौन, मन्दिर में बैठे हैं। क्या आप देख नहीं रहे हैं कि बाहर संसार में अन्याय और अनीति फैली हुई है। अत्याचारियों के आतंक और त्रास से संसार त्राहि-त्राहि कर रहा है। आप उठिये और बाहर आकर अत्याचारियों का विनाश करिये, संसार को त्रास और उत्पीड़न से बचाइये। देखिये, मैं कब से आपको पुकार रहा हूँ, विनय और प्रार्थना कर रहा हूँ। किन्तु आप अनसुनी करते जा रहे हैं। हे प्रभु, हे जगन्नियन्ता न जाने आप जल्दी क्यों नहीं सुनते। पुकारते-पुकारते मेरी वाणी शिथिल हो रही है किन्तु अभी तक आपने मेरी पुकार नहीं, सुनी कहते-कहते, प्रार्थी करुणा से रो पड़ा !

तभी मूर्ति ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘मनुष्य मुझे संसार में आने के लिये न कहे- मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ। प्रार्थी ने विस्मय पूर्वक पूछा- भगवान् ! आप मनुष्य से डरते हैं- यह क्यों !

मूर्ति पुनः बोली- इसलिये कि यदि मैं संसार में सशरीर ईश्वर के रूप में आ जाऊँ तो मनुष्य मेरी दुर्गति बना डालें। क्योंकि हर मनुष्य को मुझ से कुछ न कुछ शिकायत है, हर मनुष्य मुझ से कुछ न कुछ सेवा चाहता है। अपनी शिकायतों को ढूँढ़ने और उन्हें दूर करने की अपेक्षा वह दोष मुझे देता है। पुरुष अपनी समस्यायें आप हल करने की अपेक्षा मुझे से सारे काम कराना चाहता है और मूल्य चुकाये बिना वैभव पाने की याचना करता है।

अब तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में मैं सशरीर ईश्वर के रूप में कैसे आ सकता हूँ ? मूर्ति मौन हो गई !


VigyapanSuchana

चन्दे में एक रुपया बढ़ाने की विवशता


प्रस्तुत कठिनाइयों में इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं

इस अंक के साथ अपने जीवन का 33 वाँ वर्ष पूरा करके 34 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए अखण्ड-ज्योति अपने प्रिय परिजनों का हार्दिक अभिनन्दन करती है। अनेक कठिनाइयों के बीच अब तक यह प्रकाश दीप जलता ही चला आ रहा है। इसका श्रेय स्वजनों की श्रद्धा, सद्भावना को ही दिया जा सकता है।

इस बार-इन दिनों अखण्ड-ज्योति के सामने एक ऐसा असमंजस भरा अवरोध आकर उपस्थित हो गया है जिसमें हम सबका चिंतित हो उठना स्वाभाविक है। सन् 71 में कागज की महँगाई बेहतर बढ़ी, स्याही के दामों में भी भारी वृद्धि हुई और छपाई कर्मचारियों के वेतन प्रायः 25 प्रतिशत बढ़ गये। इन परिस्थितियों में उसकी लागत प्रायः सवाई हो गई। पहले भी चन्दा लागत मात्र रखा जाता था। इस बढ़ी हुई महँगाई ने लागत बढ़ाकर और भी संकट उत्पन्न कर दिया। “कोढ़ में खोज” वाली कहावत की तरह अब सरकारी अध्यादेश के अनुसार दो पैसा प्रति कॉपी नया टैक्स और लग गया है। साल में चौदह पैसे हर ग्राहक के पीछे अब देना पड़ेगा। इससे लागत और भी बढ़ गई।

इन परिस्थितियों में दो ही उपाय हैं (1) पत्रिका के पृष्ठ कम कर दिये जायें (2) चंदा बढ़ाया जाय। इन दो में से एक रास्ता चुनना ही पड़ेगा। तीसरा कोई रास्ता शेष नहीं रहा। घाटे को पुरा करने के कोई अन्य अतिरिक्त साधन अपने पास नहीं हैं। अगले वर्ष अखण्ड-ज्योति में एक नया स्तम्भ आरम्भ होने जा रहा है-”गुरुदेव और उनकी दिव्य अनुभूतियाँ” इसमें उनकी अब तक की अविज्ञात और रहस्यमय अनुभूतियों की चर्चा रहेगी। जो अब तक प्रकाश में नहीं आई और जिन्हें जानने के लिए आमतौर से सभी परिजन लालायित रहते थे। दूसरे कुँडलिनी योग साधना जगत् की एक अद्भुत उपलब्धि है। इन दिनों की उनकी तपश्चर्या भी इसी शोध पर केन्द्रित है। यह प्रशिक्षण साधकों को कुछ अद्भुत उपलब्ध करा सकता है सो यह लेखमाला भी चलती ही रहनी है। विज्ञान और अध्यात्म का जो अद्भुत समन्वय अखण्ड-ज्योति ने प्रस्तुत किया है उससे विश्व भर के बुद्धिजीवी वर्ग में हलचल उत्पन्न हो गई और नास्तिकता का प्रवाह उस अद्भुत प्रतिपादन के कारण उलटकर आस्तिकता की ओर बहने लगा है। लोग इस सम्बन्ध में और भी अधिक पढ़ना-जानना चाहते हैं।

इन परिस्थितियों में पृष्ठ कम कर दिये जाने से पाठकों को अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारियों से वंचित रहना पड़ेगा। अस्तु दूसरा ही मार्ग अपनाया जा रहा है। एक रुपया चन्दा बढ़ाना पड़ रहा है ? अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा 6 रुपये के स्थान पर सात रुपया होगा। विवशता को देखते हुये प्रेमी परिजन इसे स्वीकार करेंगे ऐसा विश्वास है। इस चन्दा वृद्धि के साथ-साथ आगे कुछ पृष्ठ भी बढ़ाये जा रहे हैं और टाइटिल पृष्ठ भी अधिक मजबूत लगाने का सुधार किया जा रहा है।

इस स्थिति में घाटे की पूर्ति तभी सम्भव है जब ग्राहक संख्या बढ़े। परिजनों को बसन्त पंचमी पर्व के उपलक्ष्य में भी और पत्रिका के सामने उपस्थित संकट को ध्यान में रखते हुये भी नये ग्राहक बढ़ाने और पुराने से चन्दा संग्रह करके इसी माह भिजवाने का अनुरोध है। नये अध्यादेश के अनुसार बची हुई कापियों पर टैक्स लगेगा इसलिये अंक उतने ही छपाये जाया करेंगे जितने ग्राहक होंगे। इसलिये चन्दा भिजवाने में जल्दी करने का अनुरोध विशेष रूप से करना पड़ रहा है। मनीआर्डर की अपेक्षा बैंक ड्राफ्ट या पोस्टल आर्डर की जगह पोस्टल आर्डर या ड्राफ्ट भेजना अधिक सुविधाजनक रहेगा। आशा है प्रिय परिजनों का इस विशेष परिस्थिति में उत्साहवर्धक सहयोग प्राप्त होगा।


VigyapanSuchana

वसन्त पर्व पूरे उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाय।


प्रेरणा और प्रकाश भरे इस पुण्य अवसर पर हमारी भावनायें उभरें

अखण्ड -ज्योति और युग निर्माण परिवार द्वारा इस वर्ष वसन्त पंचमी का पर्व उत्साहपूर्ण और भाव भरे वातावरण में मनाये जाने का निश्चय किया गया है। यों भगवती सरस्वती का जन्म दिन ज्ञान-पर्व और कला-पर्व के रूप में चिरकाल से मनाया जाता है और उससे सद्ज्ञान के अभिवर्धन एवं कलात्मक जीवन जीने की प्रेरणा हर वर्ष ग्रहण की जाती है। यह परम्परा तो चलती ही है, चलनी भी चाहिए। पर हम लोगों के लिए इस पर्व का महत्त्व कई दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

अखण्ड-ज्योति का जन्म दिन वसन्त पंचमी है। युग-निर्माण पत्रिका का शुभारम्भ वसन्त पंचमी को हुआ। युग परिवर्तन का जन जागरण अभियान आन्दोलन इसी दिन से आरम्भ हुआ। आर्ष साहित्य का प्रकाश परिचय समस्त विश्व को कराने के लिये कदम इसी दिन उठाया गया। गायत्री तपोभूमि के शिलान्यास का यही दिन है। युग-निर्माण विद्यालय इसी पर्व से शुरू किया गया। परिवार की प्रायः समस्त महत्वपूर्ण गति विधियों का जन्म दिन वसन्त पंचमी ही है। गुरुदेव को आत्मबोध का प्रकाश इसी शुभ मुहूर्त में मिला था। उन्होंने अपनी 24 वर्षीय गायत्री पुरश्चरण साधना अखण्ड दीपक पर उसी दिन आरम्भ की थी। इतना ही नहीं वे हर वसन्त पंचमी पर एक अभिनव दिव्य प्रकाश प्राप्त करते रहे और इस आधार पर अगले एक वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करते रहे। एक-एक कदम हर वसन्त पंचमी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इतनी लम्बी यात्रा की और लक्ष्य के समीप तक पहुँचे।

हम लोग गुरुदेव से- उनके मिशन से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। मात्र पत्रिकाओं के पाठक ही हम लोग नहीं है, उससे कही आगे हैं। जैसे कि वे हमें अपना घनिष्ठ कुटुम्बी और आत्मा के साथ लिपटे हुए प्राण प्रिय परिजन मानते हैं- बहुत अंशों में वैसे हैं भी। मिशन के भी अंग बन गये या बनते जा रहे हैं। दर्शक या प्रशंसक की आरम्भिक स्थिति से हम लोग काफी आगे बढ़ गये हैं। मिशन हमारे मस्तिष्क और हृदय में समा चुका है- अब वह रोम-रोम में ओत-प्रोत होता चला जा रहा है, कर्तव्य के रूप में फूट ही पड़ना चाहता है।

ऐसी दशा में हम सब लोग अपने प्रकाश और प्रवाह के मूल स्त्रोत वसन्त पंचमी पर्व को भावनापूर्वक मनायें तो यह उचित और आवश्यक ही नहीं वरन् कर्तव्य की पूर्ति भी है। हम अपनी श्रद्धा भावना उस उपलब्ध प्रकाश के प्रति यदि इस अवसर पर प्रकट करें तो उसे कृतज्ञता की सराहनीय अभिव्यंजना ही कहा जायगा। इस प्रयत्न में हम शालीनता और महानता को एक कदम आगे ही बढ़ाते हैं।

तपश्चर्या के लिए जाते समय व विदाई सम्मेलन में गुरुदेव ने कहा था- वसन्त पंचमी पर्व पर चेतना एवं प्रेरणा के रूप में वे प्रत्येक परिजन के समीप पहुंचेंगे। और उनकी कुछ उपलब्धियाँ होंगी तो उसका अंश आभास उन्हें प्रदान करेंगे। उनके वचन और आश्वासन सदा तथ्यपूर्ण होते रहे हैं। कौन जाने हम में से किसे किस स्तर का अनुदान उस अवसर पर मिले ? वे स्वयं महान थे, उनकी महानता की एक किरण भी यदि हमें मिल सके तो निस्संदेह यह जीवन तो सफल बना सकने योग्य एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। उस अवसर पर हमारे अन्तःकरण उस प्रकाश को ग्रहण करने योग्य पात्रता भरी कोमल भाव स्थिति में रह सके, इस दृष्टि से भी वसन्त पंचमी पर्व मनाये जाने और उसमें सम्मिलित रहने की आवश्यकता है। गुरुदेव का जीवन क्रम- वस्तुतः एक तत्व दर्शन था जिसे जीवन विधा का समग्र शास्त्र भी कह सकते हैं। उसको जितनी निकटता और गहराई के साथ देखा पढ़ा जा सके, उतना ही सर्वांगीण प्रगति के पथ पर बढ़ चलने का प्रकाश और मार्ग दर्शन मिल सकता है। इस प्रयोजन के लिए वसन्त पर्व से बढ़कर और कौन सा शुभ अवसर होगा ?

जहाँ युग निर्माण परिवार के संगठन है। वहाँ सामूहिक रूप से, जहाँ नहीं है वहाँ व्यक्तिगत रूप से वसन्त पर्व आगामी 20 जनवरी को मनाने की तैयारी करनी चाहिए। भावनाभिव्यक्ति के प्रत्यक्ष क्रिया कलाप के रूप में शाखायें प्रभात फेरी, सामूहिक जप, हवन, ज्ञान-घटों का पूजन, श्रद्धा सुमन समर्पण , दीप दान, संगीत, प्रवचन जैसे कार्यक्रम रखें। व्यक्तिगत रूप से इसका छोटा रूप देखा जा सकता है। घर, परिवार, पड़ौस के लोग को इकट्ठे करके यही कार्यक्रम चल सकते हैं। प्रभात फेरी को छोड़ा जा सकता है।

मिशन को समर्थ और सक्रिय बनाने के लिए परिजन टोलियाँ बनाकर जन संपर्क साधने के लिये प्रचार-प्रसार पर निकलें। पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाना, वर्तमान ग्राहकों को संगठन के सक्रिय सदस्य बनने की प्रेरणा देना, जहाँ सम्भव हो वहाँ गायत्री यज्ञ सहित युग-निर्माण सम्मेलन होने वाले थे, वे लोग इसी अवसर पर अपना कार्यक्रम रखे तो अधिक अच्छा हो। इसके लिये उन्हें प्रवचनकर्ता भर अपने समीप ढूंढ़ने पड़ेंगे बाकी सारा कार्य पूर्ववत् अधिक सुविधा और अधिक उत्साह भरे वातावरण में सम्पन्न हो सकता है। जहाँ सुविधा हो वहाँ यह आयोजन दो या तीन दिन के भी रखे जा सकते हैं। शाखायें हर हालत में वसन्त पर्व तो मनायें ही। यदि इसके बाद भी दुबारा कोई बड़ा आयोजन सम्भव हो तो ही उसकी अन्य व्यवस्था सोची जाये। यदि एक बार ही सम्भावना हो तो उसे वसन्त पर्व पर ही कर लिया जाय। शाखा को समर्थ बनाने के लिये चल पुस्तकालय जैसे उपकरण इसी अवसर पर बढ़ाने का प्रयत्न किया जाय। युग-निर्माण शाखाओं की स्थापना, चल पुस्तकालय, दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने का अभियान, दुष्प्रवृत्ति विरोधी आन्दोलन आदि गतिविधियों का उद्घाटन इसी अवसर पर किया जा सकता है। ज्ञान-घटों की स्थापना करे प्रतिदिन एक घण्टा समय और दस पैसा देने का नियम नियमित बनाकर घरेलू ज्ञान मन्दिर चलाने का सक्रिय सदस्यता की शर्त- का पालन इस अवसर पर अधिकाधिक लोगों से आरम्भ कराया जाय। हममें से प्रत्येक परिजन युग-निर्माण योजना की सक्रिय सदस्यता आरम्भ करे। श्रद्धा भी व्यक्ति की यथार्थता और गम्भीरता का प्रत्यक्ष परिचय होगा।

युग निर्माण आन्दोलन की गतिविधियों में इन दिनों आशाजनक वृद्धि हुई है। उसके समाचार, सूचनायें, तैयारियाँ आदि का विवरण सभी को ज्ञात होता रहना आवश्यक है। इससे परस्पर उत्साह बढ़ता और कार्यशैली की जानकारी तथा दिशा मिलती है। इस प्रयोजन के लिये युग-निर्माण योजना कई महीने से अनेक रूप में निकलने लगी है। आन्दोलन की समस्त गति विधियाँ और प्रेरणायें अब उसी में छपती हैं अपनों से अपनी बात का स्तम्भ भी अब पाक्षिक में ही चला जायगा। मासिक पत्रिकाओं में “गुरुदेव और उनकी अनुभूतियाँ” नये सिरे से आरम्भ होगा।

वसन्त पर्व जहाँ जिस प्रकार मनाया जाय ता0 21 को ही उसका समाचार भेज देना चाहिए ताकि ........ में उसे छापा जा सके।

आशा है वसन्त पर्व मनाने की तैयारी हर जगह तुरन्त आरम्भ कर दी जायगी और उसे मिशन गुरुदेव के और अपने गौरव को ध्यान में रखते हुए पूरे उत्साह और मनोयोग के साथ मनाने का प्रयत्न किया जायेगा।


सत्य में ही सर्वस्व सन्निहित

महाराज ! शान्तनु, मृगया से लौटकर अभी अपने राज महल में प्रवेश कर ही रहे थे कि उन्होंने एक दिव्याभूषण जटित सुन्दरी को प्रवेश द्वारा से बाहर निकलते देखा। महाराज ने सौम्य वाणी में प्रश्न किया भद्रे ! राज प्रसाद का परित्याग कर जाने वाली दिव्य लोचन तुम कौन हो ?

“लक्ष्मी” - दिव्याकृति बोली - महाराज आज तक मैं आपके पास रही। किन्तु मैं देखती हूँ कि आप दिनोंदिन जीव हिंसा का पाप कमाकर अधर्म को प्रश्रय दे रहे हैं। जहाँ अधर्म रहता है वहाँ मैं नहीं रह सकती - इसी लिए आज तुम्हारा यह भव्य प्रसाद छोड़कर जा रही हूँ।

महाराज कुछ चिन्तित मुद्रा में आगे बढ़े किन्तु अभी वह प्रवेश द्वार पार ही कर पाये थे कि एक और दिव्याकृति बाहर आती दिखाई दी। समीप आने पर सम्राट श्री ने प्रश्न किया - प्रदीप्त मुख मंडल वाले आप श्रीमन्त को देखकर मेरा हृदय प्रफुल्लित हो रहा है किन्तु इस बात का कौतूहल भी हो रहा है कि आप कौन हैं और यहाँ से क्यों जा रहे है।

‘मै दान हूँ ! राजन !’ देव पुरुष ने बताया - महाराज ! जहाँ लक्ष्मीजी का निवास होता है मैं वहीं रहता हूँ आपके राज्य में अधर्म ने आश्रय पा लिया है अस्तु लक्ष्मीजी ने विदा ले ली है, लक्ष्मीजी के न रहने पर मेरा रहना भी सम्भव नहीं है।

महाराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे अभी कुछ विचार कर रहे थे तभी उन्हें एक और भद्र पुरुष की दिव्य छाया बाहर द्वार की ओर जाती दिखाई दी। उन्होंने उससे भी वही प्रश्न किया आप कौन है ? और इस राजमहल का परित्याग क्यों कर रह है ? आकृति बोली - राजन् ! मेरा नाम सदाचार। जहाँ दान होता है मेरा निवास भी वहीं रहता है। दान के न रहने से परमार्थ और परोपकार वृत्ति के नष्ट हो जाने से स्वाभाविक ही है कि मेरा जीवन आधार नष्ट हो जाये अतएव अब मेरा भी यहाँ रहना सम्भव नहीं है।

सदाचार को विदा हुये अभी दो क्षण ही बीते थे कि एक और परम तेजस्वी देवा पुरुष वहाँ आ उपस्थित हुये। महाराज ने उनसे भी परिचय पूछा! उन देव पुरुष ने बताया-महाराज मैं तुम्हारा सत्य हूं आज तक आपके समीप रहा पर अब जब कि यहाँ लक्ष्मी नहीं रहीं, दान ने भी स्थान-परिवर्तन कर लिया, सदाचार भी यहाँ से चला गया तब मेरा भी यहाँ रह सकना सम्भव नहीं।

महाराज के मुख-मण्डल पर उस समय उदासी और चिन्ता के लक्षण स्पष्ट देखे जा सकते थे। उन्होंने विनीत शब्दों में प्रार्थना की देव! लक्ष्मीजी के जाने का मुझे उतना दुःख नहीं हुआ-प्रतिभावान् पुरुष आध्यात्मिकता को सर्वोपरि महत्व देते हैं उसके लिए धन की आवश्यकता है तो पर ऐसा नहीं कि उसके बिना काम न चले। ‘दान’ रहित होने का भी मुझे दुःख नहीं क्योंकि जिस व्यक्ति के पास ज्ञान की सम्पत्ति हो वह कुछ न होने पर अपने ज्ञान दान से ही अक्षय पुण्य कमा सकता है। सदाचार चला गया इसमें भी मुझे दुःख नहीं क्योंकि उससे लोगों को ईश्वरीय व्यवस्था की सच्चाई और कठोरता का पता तो चलता है। किन्तु आप ‘सत्य’ को त्याग कर तो मैं एक क्षण भी रह सकता। बन्धु-बान्धवों से प्रेम-व्यवहार, प्रजा का पालन, साधना और उपासना इन सब में तो सत्य ही आधार है सो मैं आपको नहीं जाने दे सकता।

सत्य रुक गये और कुछ ही देर में सदाचार, दान और लक्ष्मी भी लौट आये। राजन् फिर धर्मपूर्वक आनन्द से रहने लगे।


Quotation

अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो उसका असर अपने आप लोगों पर पड़ेगा

-गाँधी


मनुष्य महान है और उससे भी महान उसका भगवान

सच कहा जाय तो इस संसार में दो वस्तु बड़ी अद्भुत और महत्वपूर्ण हैं। एक हमारा परमेश्वर और एक हम स्वयं। इन दो से बढ़कर और कुछ आश्चर्यजनक और सामर्थ्य सम्पन्न तत्व इस दुनिया में हमारे लिये हो ही नहीं सकते। यदि अपनी महिमा, महत्ता और क्षमता को समझ लिया जाय और उसका बुद्धिमत्ता एवं व्यवस्था के साथ उपयोग किया जाय तो उसका परिणाम इतना बड़ा हो सकता है कि संसार के साथ ही वह स्वयं उसे देखकर दंग रह जायँ मनुष्य देखने में जितना तुच्छ और हेय लगता है वस्तुतः वैसा है नहीं। उसकी सम्भावनाएं अनन्त हैं। गड़बड़ इतनी भर पड़ जाती है कि वह अपने स्वरूप को समझ नहीं पाता और जितना कुछ समझा है उसका सदुपयोग करने के लिये जो प्रचलित ढर्रा बदलना चाहिए उसके लिये मनोबल और भावनात्मक साहस एकत्रित नहीं कर पाता। यदि इस छोटी सी त्रुटि को सँभाल सुधार लिया जाय तो उसके अद्भुत विकास की सारी सम्भावनायें खुल जाती हैं। जिस भी दिशा में उसे बढ़ना हो-उस पथ के समस्त अवरोध हट जाते हैं।

देवताओं की चर्चा कही सुनी बहुत जाती है पर किसी ने उन्हें देखा नहीं हैं। यदि देव दर्शन करने हों तो अपने परिष्कृत स्वरूप में अपने आप का दर्शन करना चाहिये। इस छोटे से कलेवर में समस्त देव शक्तियाँ एक ही स्थान पर केन्द्रीभूत मिल सकती हैं। स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में भूः भुवः स्वः, पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोक सन्निहित हैं। ब्रह्म, विष्णु, रुद्र की तीनों शक्तियाँ इसी में भरी पड़ी हैं। दसों इन्द्रियों में दस दिग्पाल बसते हैं। मनुष्य जीवन एक समुद्र है जिसके आस-पास शेष सर्प, सुमेरु पर्वत, देव, असुर और कच्छा भगवान चिरकाल से विराजमान हैं और यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई आत्मबल का धनी उनका सदुपयोग करे और इस समुद्र में से रत्न निकाले। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा पुरानी हो गई। इस कथन की पुनरावृत्ति हममें से कोई भी कर सकता है यदि जीवन संघर्ष और जीवन के सदुपयोग की विधि व्यवस्था और पद्धति समझ में आ जाय। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे हमारे लिये सिद्धियाँ और विभूतियाँ 1400 उपहार लेकर सामने प्रस्तुत हो सकती हैं। सचमुच हम स्वयं एक आश्चर्य हैं काश, हमने अपने को समझ पाया होता और उसका श्रेष्ठतम उपयोग क्या हो सकता है इसका विनियोग समझ पाया होता तो इन परिस्थितियों में कदापि न पड़े होते जिनमें आज पड़े हुए है।

अपने आपे से भी बड़ा आश्चर्य है अपना भगवान। उसके एक दिन विनोद कल्लोल भर का प्रयोजन पूरा करने के लिये यह इतना बड़ा विश्व बनकर खड़ा हो गया है जिसकी विशालता की कल्पना तक कर सकना कठिन है। वह अकेला था, उसकी इच्छा अपना विस्तार देखने की - अपने आप में मण करने की हुई सो इस इच्छा मात्र ने इतने विशाल विश्व का सृजन खड़ा कर दिया। यह तो उसकी इच्छा का चमत्कार हुआ। उसकी सामर्थ्य और क्रिया का परिचय तो प्राप्त करना अभी शेष ही रह गया। मनुष्य मुद्दतों से प्रकृति के रहस्य जानने और उसकी ईथर, विद्युत, आणविक आदि शक्तियों के उपयोग का मर्म समझने के लिये चिरकाल से प्रयत्न कर रहा है। इस पुरुषार्थ से उसे कुछ मिला भी है। उसका परिणाम इतना भी है कि छोटा बच्चा इस गुब्बारे को पाकर उछल-कूद भी सके। पर प्रकृति के जितने रहस्य अभी जानने को शेष हैं उसकी तुलना में प्राप्त उपलब्धियाँ उतनी ही कम हैं जितनी कि पर्वत की तुलना में धूलि का एक कण। भगवान की अगणित कृतियों से अति तुच्छ इच्छा और कल्पना से असंख्य गुना वैभव उसमें भरा पड़ा है। फिर समस्त ब्रह्मांडों से मिलकर बने हुये इस महान सृजन में भरी विभूतियों की बात सोची ही कैसे जाय ?

इतने विशाल वैभव से भरे हुए विश्व को एक विनोद उल्लास की तरह बनाने और चलाने वाला परमेश्वर यदि समग्र रूप से मनुष्य की कल्पना में आ सका होता तो कितना सुखद होता। पर कहाँ मनुष्य कहाँ उसकी कल्पना इनकी तुच्छता और भगवान की - विशालता की आपस में कोई संगति नहीं बैठती। उसका समग्र स्वरूप तो सत् चित आनन्द से - सत्यं शिवं सुन्दरम् में इतना ओत-प्रोत है कि उसकी एक बूँद पाकर भी मनुष्य कृतकृत्य हो सकता है।

निस्सन्देह हमारा ‘आपा महान है। और निश्चय ही हमारा परमेश्वर अत्यन्त ही महान है। इन दोनों के अतिरिक्त एक तीसरा आश्चर्य और शेष रह जाता है वह है इन दोनों के मिलन से उत्पन्न होने वाली वह धारा जिसमें सन्तोष और शान्ति की- आनन्द और उल्लास की- सुख और साधनों की असीम तरंगें निरन्तर उद्भूत होती रहती है। यों जब भी श्रेष्ठताएं मिलती हैं तब उनके सुखद परिणाम ही होते हैं। ऋण और धन विद्युत धाराएं मिलकर रोमाँचकारी शक्ति प्रवाह में परिणत हो जाती हैं और उनके द्वारा अनोखे काम सम्पन्न होते हैं। स्त्री और पुरुष का मिलन न केवल हृदय की - कली को खिला देता है वरन् एक नये परिवार, नये समाज, का सृजन ही आरंभ कर देता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना सुखद, कितना समक्ष और कितना अद्भुत हो सकता है, इसकी कल्पना भी कर सकना यदि हमारे लिये सम्भव रहा होता तो तृष्णा वासना की जिस फूहड़ परितृप्ति के लिये मृग मरीचिका में भटकते फिर रहे है उसे छोड़कर अपनी गतिविधियाँ इस दिशा में बदलते जिसमें उस परम मिलन से उत्पन्न होने वाली अजस्र शांति की सम्भावना प्रत्यक्ष प्रस्तुत है।

आत्मा और परमात्मा की दो परम सत्ताओं के परस्पर मिलन के प्रयत्न को ही योग कहते हैं। योग शब्द का अर्थ ही जोड़ना या मिलना है। किसका जोड़- किससे जोड़ - इसका एक ही उत्तर है आत्मा से परमात्मा का मिलन। यह प्रक्रिया सम्पन्न की जा सके तो उसके परिणाम और फलितार्थ भी उतने ही अद्भुत हो सकते हैं जितने कि ये दोनों तत्व स्वयं में अद्भुत में अद्भुत है। बूँद समुद्र में चल जाये तो वह खोती कुछ नहीं अपनी व्यापकता बढ़ाकर स्वयं समुद्र बन जाती है। पानी दूध में मिलकर कुछ खोता नहीं, अपना मूल्य ही बढ़ा लेता है। लोहा पारस को छूकर घाटे में थोड़े ही रहता है। यह स्पर्श उसके सम्मान की वृद्धि ही करता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन निस्संदेह आत्मा के लिये बहुत ही श्रेयस्कर है पर इसके योगदान से परमात्मा भी कम प्रसन्न नहीं होता, इस व्यक्त विश्व में उसकी - अव्यक्त सत्ता रहस्यमय ही बनी रहती है, जो हो रहा है वह पर्दे के पीछे अदृश्य ही तो है। उसे मूर्ति मान दृश्य बनाने के लिये ही तो यह विश्व सृजा गया था। जड़ पदार्थों से वह प्रयोजन पूरा कहाँ होता है। चैतन्य जीवधारी के बिना इस धरती का समस्त वैभव सूना अनजाना ही पड़ा रहेगा। पदार्थों का मूल्य तभी है जब उनका उपयोग संभव हो। और उपयोग चेतन आत्मा ही कर सकती है। इस विश्व में चेतन समाया हुआ है उसका प्रतीक प्रतिनिधि मनुष्य है। मनुष्य के सहयोग के बिना परमात्मा का वह प्रयोजन पूरा नहीं होता जिसके निमित्त इस सृष्टि को सृजा गया था, परमेश्वर अकेला था, उसने बहुत होने की इच्छा की। बहुत बने तो जरूर पर यदि उसके अनुरूप, उस जैसे न हुए तो उस सृजन का उद्देश्य कहाँ पूरा हुआ ? आनन्द तो समान स्तर की उपलब्धि में होता है। बन्दर और सुअर का साथ कहाँ जमेगा। आदमी की शादी कुतिया से कैसे होगी। पानी में लोहा कैसे घुलेगा। बच्चों का खेल बच्चों में और विद्वानों की गोष्ठी विद्वानों में जमती है। हलवाई और पहलवान का संग कब चलेगा। कसाई और पंडित की दिशा अलग है। मनुष्यों में ऐसे भी कम नहीं है जो परमेश्वर की इच्छा और दिशा से बिलकुल विमुख होकर चलते हैं। असुरता को पसन्द और वरण करने वाले लोगों की कमी कहाँ है ? सच पूछा जाय तो माया ने सभी की बुद्धि को तमसाच्छन्न बनाकर अज्ञानान्धकार में भटका दिया है और वे सुख की तलाश आत्म तत्व में करने की अपेक्षा उन जड़ पदार्थों में करते हैं जहाँ उनके मिलन की कोई सद्भावना नहीं है। मृग तृष्णा में भटकने को दोष बेचारे नासमझ हिरन पर ही लगाया जाता है। वस्तुतः हम सब समझदार कहलाने पर भी नासमझ की भूमिका ही प्रस्तुत कर रहे है और आत्मानुभूतियों का द्वार खोलने की अपेक्षा जड़ पदार्थों में सुख पाने की - बालू में से तेल निकालने जैसी विडंबना में उलझ पड़े है। जिस उपहासास्पद स्थिति में हमारा चेतन उलझ गया है उसमें न उसे सुख मिलता है न शान्ति उलटी शोक-सन्ताप भरी उलझनें ही सामने आकर खिन्नता उत्पन्न करती है।

इन परिस्थितियों में उलझे हुए ईश्वर की अभीप्सित दिशा में चलने और उसके विनोद में सहचर बनने वाले व्यक्ति बनते ही कहाँ है ? अन्धी भेड़ों की तरह हम सब तो शैतान के बाड़े में जा धँसे। ईश्वर का विनोद प्रयोजन पूरा कहाँ हुआ ? उसे साथी सहचर कहाँ मिले ? सृष्टि बनी तो सही जड़ चेतन भी उपजे पर भगवान का खेल जिसमें विनोद और उल्लास का निर्झर निरंतर करना चाहिए था अवरुद्ध और शुष्क ही हो गया। शैतान ने भगवान का खेल ही बिगाड़ दिया। यों यह भी एक खेल है पर वैसा नहीं जैसा कि चाहा गया था। इस व्यवधान को हटा सकने में समर्थ जो आत्माएं परमात्मा की विनोद मंडली में सम्मिलित हो जाती है वे उसकी प्रसन्नता का कारण भी बनती है। अपने को जो परमेश्वर के समीप ले पहुँचते हैं इस विश्व को अधिक सुन्दर बनाने के भगवान प्रयोजन में साथी बनते हैं निस्सन्देह वे परमात्मा की प्रसन्नता बढ़ाते हैं और उसके इस संसार की गरिमा को प्रखर बनाते हैं। ऐसी आत्माओं का मिलना परमात्मा को भी प्रिय एवं सन्तोषजनक ही लगता है।

भक्त भगवान को तलाशता है और भगवान भक्त को ढूंढ़ते हैं। कैसी आँख मिचौली है कि कोई किसी को मिल नहीं पाता। तथाकथित भक्तों की कमी नहीं वे तलाशते भी हैं पर मिल नहीं पाते। इसलिये कि उन्हें न तो भगवान का स्वरूप मालूम है न प्रयोजन, न मिलने का मार्ग। खुशामद और रिश्वत का मनुष्यों को आकर्षित करने वाला फूहड़ तरीका ही लोगों के अभ्यास में रहता है सो वे उसे भी भगवान वर भी प्रयुक्त करते हैं। लम्बी-चौड़ी शब्दावली का उच्चारण करके भगवान को इस प्रकार बहकाने का प्रयत्न करते हैं मानो वह उच्चारण को ही यथार्थ समझता हो और मानो अन्तरंग की स्थिति का उसका पता ही नहीं। स्तोत्र, पाठ और कीर्तनों की बवडम्बर हमें सुनाई पड़ता है यदि उसके मूल में मिलन की भावना भी सन्निहित रही होती ता कितना अच्छा होता। पर मिलन का तो अर्थ ही नहीं समझा जा सका। मिलन का अर्थ होता है समर्पण - समर्पण का अर्थ है विलीन होना। बूँद जब समुद्र में मिलती है तो अपना स्वरूप, स्वभाव, स्वभाव सभी खे देती है और समुद्र की तरह ही लहराने लगती है। चूँकि समुद्र खारा है इसलिये बूँद अपने में भी खारापन ही भर लेती है। कोई ऐसा चिन्ह शेष नहीं रहने देती, जिससे उसका अस्तित्व अलग से पहचाना जा सके। ईश्वर से मिलन का अर्थ अपने आप को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से ईश्वर जैसा बना लेना और अपनी आकाँक्षाओं तथा गतिविधियों को वैसा बना लेना जैसा कि ईश्वर की है अथवा उसे हमसे अभीष्ट हैं। मिलन का इतना दायरा जो समझ सकता है उसी की चेष्टाएं तद्नुरूप हो सकती है। जिसने वस्तु स्थिति को समझा नहीं, वह चापलूसी का खुशामद खोरी का धन्धा अपनाकर वैसे ही ईश्वर को भी अपने वाक् जाल में बाँधना चाहता है जैसे कि अहंकारी और मूर्ख लोगों को चापलूस अपने जाल में फँसा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं।

दूसरा तरीका ओछे लोगों का कुछ प्रलोभन या रिश्वत देकर किसी को अपने पक्ष में करने का रहता है। वे इस हथियार से ही लोगों से अपना मतलब निकालते हैं। थोड़ी देकर बड़ा फायदा उठाने की कला उन्हें मालूम रहती हैं। ऐसे ही ईश्वर को भी थोड़ा प्रसाद, वरुत्र, छत्र, मन्दिर आदि के प्रलोभन देकर उससे अपनी भौतिक आकांक्षाएं उनके पुरुषार्थ के अनुरूप हैं या नहीं, उन्हें सँभालने सदुपयोग कर सकते की क्षमता भी है या नहीं, इतना सोचने की किसे फुरसत। ईश्वर हमारी कामनाएं पूरी करे और बदले में थोड़ा सा उपहार रिश्वत के रूप में ले लें। इतनी ही बात बुद्धि इस तथाकथित भक्तों के काम करती है और वे शब्दाडम्बर तथा उपहार प्रलोभन के तुच्छ आधारों से ऊँची बात सोच ही नहीं पाते। फलस्वरूप उन्हें खाली हाथ ही रखना पड़ता है। इन तथाकथित भक्तों में से किसी को भी भगवान नहीं मिलता और उनके सारे क्रिया कृत्य निष्फल चले जाते हैं।

भगवान को भी भक्त नहीं मिलते और उसे भी इस उपलब्धि के आनन्द से वंचित रहना पड़ता है। माता बच्चे को गोद में तब उठाती है जब उसकी टट्टी से सनी हुई देह की सफाई हो जाती है। बच्चा भले ही रोता रहे पर जब तक वह गन्दगी से सना है गोदी में नहीं ही उठाया जायगा। उसे माता की निष्ठुरता कहा जाय- कहते रहें पर बात तो उसी तरह बनेगी जो उचित हैं। सफाई आवश्यक हैं। उसके बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। मनुष्य को अपने काषाय कल्मषों की मलीनता धोनी ही पड़ेगी। अंतःकरण को निर्मल और निश्चल बनाना ही पड़ेगा इसके बिना उसकी गणना उन भक्तों में न हो सकेगी जो प्रभु से मिलन का लाभ उठा सकने के अधिकारी होते हैं।

दूसरा कदम है ईश्वर की इच्छानुरूप अपने को ढाल लेने का साहस। पतिव्रता स्त्री अपने स्वभाव आचरण एवं क्रिया-कलाप को पति की इच्छानुरूप ढाल लेती हैं। इसके बिना दाम्पत्य जीवन कैसा ? मिलन का आनन्द कहाँ ? समर्पण के आधार पर ही द्वैत को अद्वैत के रूप में परिणत किया जाता है। ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर-उसके संकेत और निर्देशों को ही अपनी आकांक्षा और क्रिया में जोड़ देना, इसी का नाम समर्पण है, मिलन की साधना इसी से पूरी होती है। अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाना और नाक रगड़ना, भला यह भी कोई भक्ति हैं। लोभ और मोह की पूर्ति के लिए दाँत निपोरना भला यह भी कोई प्रार्थना हैं ? इस प्रकार की भक्ति को वेश्यावृत्ति ही कहा जा सकता है। भौतिक स्वार्थ के लिये किए गए क्रिया-कलापों को ईश्वर के दरबार में भक्ति संज्ञा में नहीं गिना जा सकता। वहाँ तो भक्त की कसौटी यह है कि किसने अपनी कामनाओं और वासनाओं को तिलाँजलि देकर ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाया और उसकी मर्जी के अनुरूप चलने के लिए कठपुतली की तरह कौन तैयार हो गया ? जो इस कसौटी पर खरा उतरता है- वही भक्त हैं। भक्त भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने के लिए विवश नहीं करता वरन् उसकी इच्छा से अपनी इच्छा मिलाकर अपनी विचार प्रणाली एवं कार्य पद्धति का पुनर्निर्माण करता है। तब उसके सामने इस विश्व को अधिक सुन्दर, अधिक समुन्नत और अधिक श्रेष्ठ बनाने की ही एकमात्र इच्छा शेष रह जाती है। अपने आपको काया के तथा परिवार की तुच्छता में आबद्ध नहीं करता वरन् सबसे अपनी आत्मा को अपनी आत्मा में सबको समाया हुआ समझ कर लोक-मंडल के लिए जीता है और वसुधैव कुटुम्बकम् के अनुरूप अपनेपन की परिधि अति व्यापक बना लेता है। तब उसे अपनी काया ईश्वर के देव मन्दिर जैसी दीखता है और अपनी सम्पदा ईश्वर की पवित्र अमानत जैसी। जिसका उपयोग ईश्वरीय प्रयोजन के लिए ही किया जाना है।

इन मान्यताओं को अन्तःकरण में गहन श्रद्धा की तरह प्रतिष्ठापित कर लेने वाला व्यक्ति भक्त है। उसे ईश्वर दर्शन के रूप में किसी अवतार या देवता की काल्पनिक छवि की आँख से दीख पड़ने की बाल बुद्धि उठती ही नहीं। वह इसे दिवास्वप्न मात्र मानता और निरर्थक समझता है। उसका ईश्वर दर्शन अधिक वास्तविक और बुद्धि संगत होता है। जो अपनी विचारणा और प्रक्रिया में ईश्वर की प्रेरणा को चरितार्थ होते देखता है जिसकी आत्मा ईश्वर की सत्पथ पर चलने की पुकार सुनाई पड़ती है समझना चाहिए उसमें ईश्वर बोलता है-बात करता है- साथ रहता है और अपनी गोदी में उठाने का उपक्रम करता है। भक्ति की सार्थकता इसी स्थिति में है।

हमारा आपा महान है। निस्सन्देह परमेश्वर भी महान है। पर इन दोनों सत्ताओं का मिलन और भी महान है। यदि यह सम्भव हो सके तो उसे व्यक्ति का महान सौभाग्य और ईश्वर का महान सन्तोष ही कहा जायगा। इस मिलन के कितने महान परिणाम होते हैं उसकी झाँकी इस प्रयोजन को पूरा कर सकने वाला अपने निजी जीवन में अनुभव करते हैं और समीपवर्ती संसार में भी।


Quotation

जिसके चित्त में तरंगें उठती ही रहती हैं वह सत्य के दर्शन कैसे कर सकता है। चित्त में तरंग का उठना, समुद्र के तूफान जैसा है, तूफान में जो उस पर काबू रख सकता है, वह सलामत रहता है। ऐसे ही चित्त की अशान्ति में जो रामनाम का आश्रय लेता है वह जीत जाता है।

-महात्मा गाँधी


कर्त्ता बिना कर्म कैसे हो सकता है ?

ऋषियों जैसी जिज्ञासा एक बार अमेरिकन काँग्रेस के रिपब्लिनि सीनेटर एवरेट डीर्कसन के भी मन में उत्पन्न हुई थी। डीर्कसेन ने रूहों का आवाहन करने लाले क्रिस्टेन डोम से लेकर बड़े दार्शनिकों तक से जो भी मिला एक ही प्रश्न-पूछा- क्या मृत्यु के बाद जीवन है ? क्या जीवन का नियमन करने वाली कोई सत्ता-सृष्टा भी संसार में है ? या यह केवल श्रद्धा भूत विषय मात्र है।

अपनी-अपनी तरह से सभी ने उन्हें बताया, समझाया और कई लोगों ने चमत्कारिक प्रयोग भी करके दिखाया किन्तु उन सबसे एवरेट डीर्कसेन का अन्तःकरण सन्तुष्ट न हुआ।

रात के घने अन्धकार में जब डीर्कसेन अकेले होते तब भी यही प्रश्न उनके मस्तिष्क में बार-बार उतरता और वे उसका समाधान खोजने का प्रयत्न करते किन्तु किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव न हुआ। उन्होंने इस प्रश्न का हल अपने अन्दर से ढूंढ़ निकालने का निश्चय किया। पहला प्रश्न उन्होंने अपने आप से ही किया-”क्या कर्म बिना कर्त्ता के हो सकता है ?” अंतःकरण से आवाज आई हम जिस संसार में रहते हैं वह एक व्यवस्थित रचना है तो उसका रचनाकार भी अवश्य होना चाहिये। संसार के अवर्णनीय आश्चर्यों को बिना यह विश्वास किये कि “सारी कला-बौद्धिक निमार्ण या गणित की तरह है और उसका कलाकार भी अवश्य हैं,” उसे कौन देख सकता है।

(If there be a design in this. Universe and in this world in which we live, there must be a designer. Who can behold the in explicable mysteries of universe without be living that there in design and a designer)

आगरे का ताज महल संसार आश्चर्यों में से एक है जिसके निमार्ण में प्रतिदिन 20 हजार मजदूर काम करते थे इतिहासकारों का अनुमान हैं कि ताज महल के निमार्ण में लगभग 6 करोड़ रुपये लगे उसमें बनी मुमताज महल समाधि पर 30 गाँवों की आमदनी निश्चित थी जो प्रतिवर्ष 30 लाख रुपये से कम न थी जबकि सम्पूर्ण ताज महल का निर्माण साढ़े अठारह वर्ष में हुआ। ताज महल बाहर से एक बिल्डिंग भर दिखाई देता है किन्तु उसमें राजस्थान से आया संगमरमर, तिब्बत की नीलम मणि, सिंहल की सिपास्लाजूली मणि, पंजाब के हीरे, बगदाद के पथराग रत्न लगे हैं यह सब कृति एक व्यक्ति की इच्छा और भावना भर थी पीछे तो हजारों व्यक्तियों का योगदान उसमें हुआ किन्तु सारे निर्माण की रूपरेखा, व्यवस्था आदि का श्रेय शाहजहां को है जिसने अपनी प्रेयसी पत्नी की यादगार को अमरत्व प्रदान करने भर के लिए इतना सारा बखेड़ा खड़ा किया।

(हैलीकारनेसस) - कोरिया का “ मैलोलियम” संसार का दूसरा आश्चर्य। 62 हाथ लम्बी 62 हाथ चौड़ी चहारदीवारी के मध्य 40-40 हाथ ऊँचे 36 स्तम्भ वे भी नीचे से मोटे और ऊपर जाकर पतले हो गये हैं। सीढ़ियों पर नीचे से ऊपर तक संगमरमर की बहुमूल्य मूर्तियों से सजावट इसमें केवल संगमरमर में लाखों रुपये लगे। प्रसिद्ध कलाकार पाइथिस और माटीराम द्वारा बनाये गये इस समाधि मन्दिर का निर्माण भी एक व्यक्ति वहाँ रानी - “आर्टीमिसिया” की इच्छा पर हुआ।

ओलम्पिया की जुपिटर प्रतिमा बनवाने के लिए सुप्रसिद्ध कलाकार फिडियास की सहायता ली गई थी 20 लाख रुपये से बनी और 25 हाथ ऊँची जुपिटर की यह प्रतिमा भी एक व्यक्ति एथेन्स के सम्राट पैराक्लीज की हार्दिक इच्छा का अभिव्यक्त रूप थी।

इतिहासकार अभी तक यह निश्चय नहीं कर सके कि आया कुतुबमीनार पृथ्वीराज चौहान का विजय स्तम्भ थी अथवा कुतुबुदीन ऐबक निशान; पर यह निश्चित है कि 233 फुट 8 इंच लम्बे इस गगनचुम्बी टावर का निर्माण एक व्यक्ति की इच्छा का ही परिणाम है।

डायना देवी का मन्दिर (इफिसास में बना हुआ) चाँदफिन की कल्पना थी। अजन्ता के गुफा मन्दिर जिनमें 29 गुफायें, 5 मन्दिर, 24 बौद्ध विहार सम्मिलित हैं। यह गुफायें हैदराबाद में स्थित है और सारे संसार के लोग उसे देखने आते हैं इसमें पैसा भले ही कुछ न लगा हो पर यह भी सम्राट प्रवरसेन युग के कुलपति आचार्य सुनन्द की कलाकृति है जिसे देखने के लिए सारे संसार के लोग प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में भारत आते हैं इन गुफाओं में मानव-मन के अध्यात्मिक संस्कारों को जिस ढंग से व्यक्त किया गया है उसे देखकर कोई भी व्यक्ति रोमाँचित हुये बिना नहीं रहता।

सिकन्दरिया का विशाल काय प्रकाश स्तम्भ समुद्र में आने-जाने वाले सैकड़ों नाविकों को मार्ग दिखाता है वह सिकन्दर महान् के ही एक संकल्प का मूर्तिमान प्रतीक है। बैबिलोन में बने हुए लटकते बाग देखकर तो ऐसा लगता है कि मनुष्य को पर्याप्त सुविधायें मिल जायें तो वह चाँद सितारों तक पक्की सड़कें बनवाकर सारे संसार को एक सूत्र में जोड़ सकता है। लटकता हुआ बाग 263 हाथ के घेरे में और 22 फुट ऊँचे एक ठोस फर्श के ऊपर खड़ा किया गया है। बड़े-बड़े खम्भों के ऊपर दुनिया भर के विशाल काम और छोटे से छोटे वृक्ष और फूल-पौधों से लेकर दुनिया भर की चिड़ियां तक उसमें है, हवा में लटक रहे इस बगीचे को देखकर अधर शून्य में लटक रही पृथ्वी का अनुमान होता है वह भी वहाँ रानी की इच्छा का निर्माण है।

रोम का कोलोसियम पीसा की मीनार, रोडस की पीतल की मूर्ति और मिश्र के पिरामिड किसी न किसी व्यक्ति की इच्छा के परिणाम हैं भले ही उनके निर्माण में हजारों सहायक शक्तियों का योगदान दीखता हो। चार्टेज गिरजाघर, डेकवड, मोजेज, सिस्टाइन चैपिल पियेटा की प्रतिमायें भी किन्हीं कलाकारों की कृतियाँ हैं। एफिल टावर (पेरिस), व्हाइट हाउस (अमेरिका) लाल किला (दिल्ली) सब किसी न किसी रचनाकार के निर्माण हैं जो देखने में अलौकिक आश्चर्य जैसे लगते हैं यह सब वस्तुतः व्यक्ति के नहीं बुद्धि के व्यापार हैं। इसलिए यहाँ से आगे यह कहना चाहिये कि कला मनुष्य शरीर का नहीं बौद्धिक चेतना का गुण है यदि शरीर में रचना की शक्ति रही होती तो मृत्यु के बाद भी लाश काम करती।

परमाणु की ताकत के आगे दुनिया थर्राती है किन्तु क्या वह अपनी इच्छा से संसार का विनाश, क्रोध या दया के भाव प्रकट कर सकती है यह बुद्धि के वरदान है और वह केवल आत्मिक चेतना को ही प्राप्त है। इस चेतना का वास्तविक स्वरूप क्या है - हवा - मनुष्य साँस लेना बन्द करदे तो वह क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। इसी प्रकार (2) जन भी उसकी एक प्रधान आवश्यकता है (3) गर्मी - (भारतीय दर्शन में इसे प्राण कहते है) इसी के अभाव में शरीर की गतिशीलता समाप्त हो जाती है। (4) प्रकाश - गर्मी का स्त्रोत और प्रभाव प्रकाश ही है। प्रकाश रूप में स्फुरित ऊर्जा ही जड़ जगत में चेतन का निर्माण कर रही है। स्पष्ट है कि बुद्धि या ज्ञान शरीर में रहते हुये भी वायु तत्व, जल तत्व, अग्नि तत्व और आकाश तत्व का सूक्ष्म- सार है पृथ्वी तत्व शरीर इनको धारण करने में मदद भर दे रहा है। इन्हीं पाँचों तत्वों से विनिर्मित संसार की एक सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) चेतना (मनुष्य शरीर की चेतना के समान है) न होती तो पृथ्वी आश्चर्यों की तरह आश्चर्यजनक सृष्टि की उत्पत्ति कौन करता ?

हमें धरती पर जो सृष्टि दिखाई देती है वह सूर्य का उपादान है देखने में लगता है कि वृक्ष धरती से जीवन प्राप्त कर रहा है, देखने में लगता है कि भाप समुद्र से बनती है, हवायें उड़ाकर उसे आकाश में फैलाती है, जंगल बरसात कराते हैं, ऊँचाई की शीतलता उसे बर्फ में बदल देती है। यह सारी की सारी रचना, सारा का सारा क्रिया व्यापार एक मात्र सूर्य के अस्तित्व पर निर्भर है यदि सूर्य भस्म (फ्यूज) हो जाये तो सृष्टि का अस्तित्व नष्ट हो जायेगा सूर्य भी जा जल, (हाइड्रोजन या वैदिक भाषा में आपः) वायु, अग्नि और प्रकाश का सम्मिश्रण है तभी तो उसकी रचना ठीक पृथ्वी के आश्चर्यों जैसी आश्चर्यजनक किन्तु गणित जैसे बुद्धि कौशल पर आधारित है।

किन्तु सूर्य अपने आप में पूर्ण नहीं। वह शक्ति संस्थान हो सकता है, आत्मा हो सकता है, परमात्मा तो उससे भी विराट होना चाहिये क्योंकि रचना का अन्त सौर मंडल नहीं अनन्त आकाश है। यह सूर्य जिस आकाश गंगा से प्रकाश और शक्ति प्राप्त करता है केवल मात्र उसी से सम्बद्ध 30000000000 सितारों की खोज हो चुकी है अनुमान है इनकी कुल संख्या 200000000000 है। यह आकाश गंगा 600000000000000000000000 मील से लेकर 1200000000000000000000000 मील तक लम्बी हो सकती है।

हमारी आकाश गंगा भी अन्तिम नहीं और भी आकाश गंगायें है हमारे पास की आकाश गंगा देवयानी (एँड्रोमेडा) है उसमें भी इतने ही सितारे हो सकते हैं पता नहीं ऐसे कितने ब्रह्मांड मिलकर अखिल ब्रह्मांड अन्योन्याश्रित है अर्थात् उसका कहीं न कहीं एक ऐसा बिन्दु अवश्य है जहाँ से मस्तिष्क की तरह से विचार और योजनायें संचालित होकर काल और ब्रह्मांड की शक्तियों का नियमन करती अवश्य होनी चाहिये।

इस विश्वास ने एवरेट डीर्कसेन को ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास करा दिया उन्होंने अनुभव किया कि आत्मिक चेतना न नष्ट होकर अदृश्य होती रहती है जिस प्रकार अदृश्य आकाश में प्रकाश और ऊर्जा के कारण उन्हीं की अंतःभूमिका बुद्धि व्यापार की तरह काम करती है इस बुद्धि का सार्वभौमिक रूप - परमात्मा का ही होना


शरणागत वत्सलता और कर्मवीरता

एक बार राजा शकुन्त महर्षि तपोवन में गये। वहाँ उन्होंने सभी मुनियों के पैर छुए, संयोग से महर्षि विश्वामित्र रह गये विश्वामित्र इसे अपमान जानकर बड़े ही क्रुद्ध हुए। विश्वामित्र ने अपने शिष्य महाराज से सारी बात कही, तो राम को भी यह बात ठीक नहीं जँची। राम ने उनको प्रण दिया कि आज सायंकाल तब या तो शकुन्त को आपके चरणों में झुका दूँगा अन्यथा अपना शीश काटकर आपके चरणों में चढ़ा दूँगा। राजा शकुन्त को जब यह समाचार मिला तो भागकर माता अन्जना के यहाँ शरण ली। माता अन्जना ने उन्हें अभय दान दिया और अपने पुत्र हनुमान जी को कुटिया की रक्षा पर नियुक्त किया। श्री राम वहाँ भी पता लगाने आये। उन्होंने भक्त हनुमान जी को अन्दर जाने देने को समझाया, परन्तु हनुमानजी तो माता की आज्ञा और शरणागत की रक्षा में बद्ध थे। दोनों में घमासान युद्ध हुआ। सूर्य डूबने को जा रहा था कि हनुमान जी की गदा से आहत होकर भगवान रामचन्द्र भूमि पर गिर पड़े।

महावीर के पौरुष बल की सराहना करते हुए रामचन्द्र जी ने अपनी हार मान ली। हनुमान जी तत्काल ही उनके चरणों में गिर पड़े और अपनी धर्म रक्षा की विवशता बताते हुए क्षमा याचना करने लगे। तुरन्त ही उन्होंने शकुन्त को भी बुलाया और उनके चरणों में झुकाकर उसे भी धन्य किया।

इतने में ही विश्वमित्र जी आ पहुँचे, सबने उनको प्रणाम किया तथा शकुन्त ने अपराध के लिए क्षमा याचना की। सभी ने हनुमान जी की भरसक प्रशंसा की।

मनुष्य के जीवन की तीन बड़ी घटनायें विवाद से पूर्णतः परे होती है- प्रथम जन्म, द्वितीय विवाह, और तृतीय मृत्यु।

- आस्नि औमिले


मन एक सूक्ष्म प्राकृतिक शक्ति

इंग्लैंड के एक रसायन शास्त्री आहार सम्बन्धी परीक्षण कर रहे थे। चूहों के एक पिंजरे में से एक चूहे को निकाला गया और उसे सामान्य भोजन न देकर असामान्य मिर्च मसाले और माँस व शराब से बना आहार दिया गया। चूहा जिसकी प्रकृति अब तक शान्त और शीतल थी इस आहार को ग्रहण करने के बास से ही उद्दंड और आक्रामक बन गया। पिंजरे के दूसरे चूहों को उस अकेले ने बुरी तरह सताया और यह सिद्ध कर दिया कि लाग जैसा अन्न खाते हैं उनका मन सचमुच वैसा ही बनता है।

इसके बाद उस चूहे को फिर से सरल शुद्ध और सात्विक भोजन दिया गया अब वह फिर से दैनिक जीवन में विनीत और शाँत हो गया। इससे यह पता चलता है कि आज जो मानसिक जटिलता देखने में आ रही है, वह सब अन्न के दूषित होने, आहार के अप्राकृतिक और अपवित्र होने का ही परिणाम है। शास्त्रकार का कथन है सृष्टि के कण-कण में “मन” (चेतन विद्युत) विद्यमान है आहार ग्रहण करते समय तक तो यह निश्चित रूप से ध्यान रखना चाहिये कि कोई ऐसा पदार्थ न लिया जाये जिससे “मन” कलुषित और क्रूर हो। माँस जीवों को निर्दयता पूर्वक काट कर बनाया जाता है उसके अणुओं में उस जीव के प्रतिशोध और अभिशाप के भाव अवश्य भरे होंगे उस प्रकार का आहार ग्रहण करने वाला न तो उस प्रतिशोध की ज्वाला से बच सकेगा और न ही अभिशाप से। धीरे-धीरे यह बातें वैज्ञानिक ढंग से स्पष्ट होती जा रही हैं।

आत्म चेतना या ब्राह्मी चेतना मन से कहीं बहुत अधिक सूक्ष्म और पवित्र स्तर की चेतना है उसे पाने के लिए मन का भी वैसा ही सूक्ष्म और पवित्र होना आवश्यक है जिस “किलो साइकिल” पर रेडियो स्टेशन बोल रहा है रेडियो को उसी “किलो साइकिल” पर -उसी बेंड में लगाकर ही उसका प्रसारण सुना जा सकता है। मानसिक चेतना द्वारा ब्राह्मी चेतना की अनुभूति और उसके क्रिया कलापों के ज्ञान के लिए भी ठीक उसी प्रकार मन का पूर्ण पवित्र और प्राकृत होना आवश्यक हैं। यह तभी सम्भव है जब वैसा ही शुद्ध और सात्विक आहार भी लिया जाये। इसीलिये योग के दश लक्षणों में ध्यान धारण समाधि आदि के साथ “प्रत्याहार” को भी आवश्यक माना गया हैं।

आमतौर से लोग सांसारिकता में पड़े लड़ते झगड़ते रहते हैं उसका वैज्ञानिक कारण आहार का दूषण ही है। इस संबन्ध में फ्रांस के एक वैज्ञानिक द्वारा किये गये परीक्षण को मनुष्यों पर प्रयोग किया और पाया कि चिड़चिड़े और मानसिक दृष्टि से विक्षिप्त लोगों को विशेष प्रकार के आहार से ठीक किया जा सकता है। 10 सितम्बर 1970 के नवभारत टाइम्स में इन डाक्टर का हवाला देते हुये लिखा है कि एक चिड़चिड़े व्यक्ति को कार्बोहाइड्रेट पथ्य के साथ गाय का दूध ही पीने को दिया गया और उन्हें गहरी साँस लेने को कहा गया उससे उनका चिड़चिड़ापन ठीक हो गया। ईर्ष्या, द्वेष वृति वाले लोगों को हलका गरम पानी बार-बार पिलाया गया और खुले मैदान में घूमने और व्यायाम करने को कहा गया उससे वह ठीक हो गया। इसी प्रकार सोवियत वैज्ञानिक और एम.एम. अरब व ए. डव्लयू.अयूब नामक दो अरब वैज्ञानिक उपवास पर प्रयोग कर यह पा रहे हैं कि उपवास और एक खास प्रकार के आहार से जटिल से जटिल मानसिक रागों का इलाज हो सकता है। लगता है विश्व शाँति के वैज्ञानिक उपाय की कभी खोज हुई तो लोग उसका उपाय शुद्ध शाकाहार ही पायेंगे यह भारतीय आहार पद्धति की एक और विजय है, सफलता है।


पुनर्जन्म की मान्यता-प्रामाणिकता की कसौटी पर

ईसाई तथा मुसलमान धर्म में पुनर्जन्म को मान्यता नहीं हैं। उनके यहाँ ऐसा माना जाता है कि महाप्रलय के समय परमेश्वर के यहाँ पड़ी रहेंगी। नया जन्म तो तब होगा जब नई सृष्टि बनेगी।

वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि पंच तत्वों के अमुक सम्मिश्रण से जीव बनते हैं और शरीर विघटन के बाद उनकी सत्ता समाप्त हो जाती हैं। जैसे पेड़ पौधे उगते मरते रहते हैं। उसी तरह मनुष्य भी प्राकृतिक उद्भिजों की तरह जन्मते मरते हैं। आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं मानते ऐसी दशा में पुनर्जन्म की बात ही कहाँ उठती हैं।

भारतवर्ष में भी किसी समय एक ऐसा ही नास्तिक सम्प्रदाय किया था कि-”यह जीवन तभी तक है जब तक जीवन हैं। फिर इस संसार में किसी को आना नहीं हैं। इसलिए जब तक जिन्दगी हैं, सुखपूर्वक जीना चाहिए। भले ही कर्ज करना पड़े पर घी पीकर मौज मनानी चाहिए।”

इस जन्म में कर्मों का फल न मिला तो अगले जन्म में पुण्य फल मिलने की आशा से शुभ कर्म करते हैं। और पुलिस, कचहरी आदि से बच गये मो भी अगले जन्म में बुरे कर्मों का फल मिलेगा। जिसका कर्ज लिया हैं उसका अगले जन्म में चुकाना पड़ेगा। इस विश्वास के आधार पर लोग सत्कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और दुष्कर्म से बचते हैं। अतएव पुनर्जन्म को अध्यात्म का बहुत बड़ा आधार माना गया हैं। पर आधुनिक धर्म सम्प्रदायों ने, तथा विज्ञान वेत्ताओं ने इस मान्यता पर जो प्रहार किया हैं उससे नैतिकता और धर्म निष्ठा की नींव कमजोर ही हुई है।

किन्तु पुनर्जन्म का सिद्धाँत काल्पनिक नहीं हैं। उसकी जड़ें काफी गहरी हैं और उसका प्रतिपादन तत्व दर्शी ऋषियों ने सूक्ष्म अनुभूतियों एवं प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर किया हैं। अपने धर्म पुराणों में ऐसे अनेक प्रमाण एवं इतिहास मिलते हैं जिनमें पग-पग पर पुनर्जन्म की सिद्धि होती हैं।

कई बार ऐसी घटनायें भी सामने आती हैं जिनमें किसी बालक को पूर्व जन्म की स्मृति आई उसने अपने उस स्मरण की चर्चा की। पता लगाया गया तो बालक का कथन सत्य को भी सिद्ध करने वाले प्रमाण मिले और अविश्वासियों को सिद्ध करती हैं। ऐसी घटनायें भारतवर्ष तथा हिंदू धर्मावलम्बियों में ही नहीं अन्य देशों तथा अन्य धर्मों में भी घटित हुई हैं। उनके बारे में तो यह संदेह भी नहीं किया जा सकता कि ऐसा पूर्व मान्यताओं के आधार पर कहा जा रहा होगा, ऐसे कुछ प्रमाण नीचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

अमेरिका के कोलोराडी प्यूएली नामक में रुथ सीमेंन्स नामक लड़की ने अपने पूर्वजन्म का सही हाल बता कर ईसाई धर्म उन अनुयायियों को आश्चर्य में डाल दिया हैं जो पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानते। उपरोक्त लड़की को मोरे वनस्टाइन नामक विद्या विशारद ने अपने प्रयोग से अर्धमूर्छित करके उसके पर्व जन्म की बहुत सी जानकारियाँ प्राप्त कीं। उसने बताया कि 100 वर्ष पूर्व आयरलैण्ड के कार्क नामक नगर में पहले उसका जन्म हुआ था, तब उसका नाम ब्राइडी मर्फी और उसके पति का नाम मेकार्थी था। जो बात लड़की ने बताई थीं उनकी जाँच करने अमेरिका के कुछ पत्रकार आयरलैण्ड गये और लड़की के बताये विवरणों को सही पाया।

इस्तम्बूल(तुर्की) की विज्ञान अनुसन्धान परिषद ने पुनर्जन्म की एक घटना को स्वयं जाँच कर कहा है- निस्संदेह यह पुनर्जन्म की घटना हैं। इसे एक शरीर में दो आत्माओं के प्रवेश जैसी भूत-प्रेत स्थिति में नहीं गिना जा सकता।

चार वर्ष के बालक इस्माइल अतलिंट्रलिक पूर्व जन्म दक्षिण पूर्वी के अदना नामक गाँव का निवासी-विद सुजुलयुस था। इसकी हत्या की गई थी। वह अपने पीछे 3 बच्चे छोड़ गया था-नाम थे गुलशराँ, लकी और हिकमत। चार साल का इस्माईल सोते-सोते वो बच्चों को पुकारने लगता और उनकी याद में रोने लगता। घर वाले इस अजीब बात से परेशान थे।

एक दिन इस्माइल ने एक फेरी वाले को आइसक्रीम बेचते देखा। उसने अजनबी का नाम लेकर पुकारा-महमूद तो साग-सब्जी बेचते थे, अब आइसक्रीम बेचने लगे। फेरी वाला दंग रह गया। यह बच्चा कैसे उसका नाम जानता है और कैसे उस पिछले व्यापार की चर्चा करता जब कि उसका जन्म भी नहीं हुआ था, बच्चे ने कहा तुम भूल गये मैं तुम्हारा चिर परिचित आविद हूं उसका कई साल पहले कत्ल हो गया था।

पत्र प्रतिनिधि बच्चे को अदना नगर ले गये। वहाँ वह अपनी पूर्व जन्म की बेटी गुलशराँ को देखते हुए पहचान गया और मेरी बेटी-प्यारी बेटी गुलशराँ कहकर आँसू बहाने लगा। उसने अपने हत्या के स्थान अस्तबल को दिखाया और बताया कि रमजान ने मुझ पर कुल्हाड़ी से हमला किया और मार डाला। इसके बाद वह अपनी कब्र पर पत्रकारों को ले गया जहाँ उसे दफनाया गया था। पुलिस ने भी इस कत्ल की ठीक वैसी ही जाँच की थी जैसी कि बच्चे ने बताई। हत्यारे को उससे पहले ही फाँसी लग चुकी थी। बालक इस्माइल का चाचा उससे एक दिन क्रूर व्यवहार करने लगा तो उसने चिल्ला कर कहा भूल गये मेरे ही बाग में काम करते थे और मैंने ही तुम्हें मुद्दतों रोटी खिलाई थी सचमुच आविद के इस जन्म के चाचा पर भारी अहसान थे।

लेवनान के कारनाइल नगर से 67 किलोमीटर दूर खेरवी गाँव के एक अहमद नामक लड़के ने कुछ बड़ा होते ही अपने पूर्व जन्म के अनेक विवरण बताये जिसमें ट्रक दुर्घटना, पैरो का खराब होना, प्रेमिका से विफलता, भाई का चित्र, बहिन का नाम आदि के वे संदर्भ प्रकाश में आये जिनसे बालक का पूर्व परिचित होना सम्भव न था। बालक ड्रज वंश का -इसलाम धर्मावलम्बी हैं। आमतौर से उस वातावरण में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं हैं तो भी इस घटना ने उन्हें पुनर्विचार के लिए विवश कर दिया।

तिब्बत के शासक और धर्म गुरु दलाई लामा की मान्यता है कि मृत्यु के बाद दिवंगत लामा की आत्मा किसी बालक के रूप में जन्म लेती है और उसे ही उत्तराधिकारी बनाया जाता है। वे अपने को भगवान् बुद्ध के अवतार कहते हैं और हर लामा में वह आत्मा क्रमशः अवतरित होती चली आती हैं।

वर्तमान चौदहवें दलाई लामा जो अब भारतवर्ष में हैं। दो वर्ष की आयु में खोज निकाले गये। तेरहवें दलाई लामा चुँगत्येकु-ग्यात्सो के स्वर्गवास के उपरान्त यह खोज हुई कि उन्होंने कहाँ जन्म लिया हैं। रीजेन्ट ने एक तिमंजिले मठ के पास किसी चीनी किसान का घर है उसी में स्वर्गीय आत्मा ने जन्म लिया है। खोज के बाद वह स्थान ढूंढ़ निकाला गया। बालक दो वर्ष का था तो भी उसने तेरा लामा, मेरा लामा कहकर ‘सेरा मठ के लामा को पहचान लिया और उससे वह माला लेने को मचल पड़ा जो तेरहवें लामा की थी। बालक के शरीर पर भी स्वर्गीय लामा जैसे चिन्ह पाये गये और उन्हें लाकर तिब्बत के मठ में अभिषेक किया गया।

मिदनापुर (बंगाल) के कालीचरण घोषाल एम.ए. पास करने के बाद एकाउन्टेंट जनरल के दफ्तर में नौकर हो गये। पीछे उनका तबादला मद्रास हो गया। एक दिन एक.के.वी नायर नामक मद्रासी युवक उनसे मिलने आया और बोला मैंने देखते ही यह अनुभव किया कि आप पहले जन्म के मेरे छोटे भाई हैं। घोषल जी को इस पर विश्वास न हुआ। अन्ततः यह निश्चय हुआ कि वस्तुस्थिति जानने के लिए बनारस चला जाय जहाँ कि उनके पिताजी रहते थे। दोनों गये। युवक ने पिताजी को ऐसी अनेक बातें बताईं जो उनके निजी परिवार के अतिरिक्त और किसी को मालूम न थी। युवक की यह बात भी सच निकली कि उसे 12 वर्ष की आयु में डाकुओं द्वारा मारा गया था।

गोपी गंज (मिर्जापुर) निवासी पं. मधुसूदन त्रिवेदी अपना नगर छोड़ कर मुगलसराय चले गये और वहाँ अध्यापन का काम करने लगे। उनका लड़का विवाह योग्य हुआ और कानपुर से उसका विवाह सम्बन्ध पक्का हुआ। लड़की की जब गोद भरने की रस्म हो रही थी तो उसने अपने भावी ससुर त्रिवेदी जी को पूर्व जन्म की स्मृति के अनुसार पहचान लिया उनका पूर्व जन्म का नाम गोपाल था। प्लेग से उनकी मृत्यु हुई। लड़की ने अनेक रहस्यमय बातें प्रकट की तथा उनके साथी अन्य लोगों के नाम बताये जो जाँच करने पर अक्षरशः सही निकले। लड़की ने पंडित जी द्वारा पूर्व जन्म में समय-समय पर उच्चारण किये जाते रहे श्लोकों के भी कुछ पद सुनाये।जबकि वह पढ़ना-लिखना बिलकुल भी नहीं जानती थी ।

बंगाल के प्रोफेसर प्रणवेन्द्रपाल ने पुनर्जन्म सम्बन्धी घटनाओं का विस्तृत विवरण प्राप्त करने के लिये व्यापक दौरा किया था। उनकी संग्रहित घटनाओं में से कुछ इस प्रकार हैं-

1. बदायूँ जिले के 21 वर्षीय प्रमोद कुमार ने अपने पूर्व जन्म के मुरादाबाद निवासी मात-पिता, पत्नी आदि को पहचाना। अपनी मृत्यु का कारण पेट दर्द बताया। सम्बन्धियों को पहचाना, जेवर आदि की चर्चा की तथा अनेक घटनायें बताई।

2. बदायूँ कचहरी के चपरासी, रमेश नाई के चार वर्षीय पुत्र अनिल ने अपने को पूर्व जन्म में तेजपाल मुख्तार का पुत्र बताया। अपनी मृत्यु के सम्बन्ध में उसका कहना है कि अब से चार वर्ष पूर्व जब वह 16 वर्ष का था तब अपने बड़े भाई की पत्नी को लिवाने के लिए रिक्शे में जा रहा था कि रास्ते में 337 नम्बर की मोटर से रिक्शा टकरा गया और उसकी मृत्यु हो गई। सहसवान ले जाने पर उसने पूर्व जन्म के चचेरे भाइयों तथा उनकी पत्नियों को पहचाना। बड़े भाई की जूते की दुकान पर बिना रास्ता पूछे वह चला गया और बताया कि वह स्वयं भी इस दुकान पर बैठा करता था।

3. रिसौली गाँव के सुन्दरलाल नामक एक डाक कर्मचारी की 7 वर्षीय पुत्री मीरा ने अपने को बदायूँ के सराफ सीताराम की पत्नी बताया जिसका स्वर्गवास 23 वर्ष पूर्व हुआ था। तीन वर्ष की आयु में ही लड़की ने पूर्व जन्म की घटनाएं बतानी शुरू की थी। जब लड़की को बदायूँ ले जाया गया तो वह उस मकान पर अड़ गई जहाँ उसकी मृत्यु हुई थी। यह मकान बेच दिया गया है और सीताराम जी दूसरे मकान में रहने लगे हैं, यह बताने पर ही लड़की आगे बढ़ी। उसने अपने बेटे और पोते को भी पहचाना तथा कृषि में घाटा आना, घोड़ा ताँगा रहने आदि का अनेक बातें बताई जो सही थीं।

4. सुनील दत्त नामक ने अपने को पूर्व जन्म का स्वर्गीय सेठ श्रीकृष्ण बताया, उसके अनेक प्रमाण दिये तथा यह भी बताया कि उसने धर्मशाला इंटर कालेज तथा रामलीला मैदान के फाटक निर्माण कराने में कितना दान स्वयं दिया और कितना दूसरों से दिलाया। उसने ग्रुप फोटो पहचान कर बताया।

राजस्थान के विश्व विद्यालय की परा मनोविज्ञान शाखा ने इस संदर्भ में कितनी घटनाएं संकलित की हैं जिनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है--

जयपुर के एक सरकारी कर्मचारी के 7 वर्षीय बालक मुकुल ने अपनी पूर्व जन्म की घटनायें बता कर लखनऊ मेडिकल कालेज का विद्यार्थी था। अपने भाई के साथ कार में जा रहा था तो कार के ट्रक से टकरा जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसने यह भी बताया कि उसकी बहिन का नाम आशा-ग्वाले का गोविन्द और कुत्ते का टाँमी था, बच्चा छोटी आयु में ही कितनी ही बीमारियों के सम्बन्ध में जानकारी तथा दवाएं बताता था।

इस प्रकार अनेक घटनायें आये दिन देखने और सुनने में आती रहती हैं जिनसे पुनर्जन्म के सिद्धाँत की पुष्टि होती हैं। इस आत्मवादी मान्यता को बल इसलिए मिलना चाहिए कि इस जन्मों के किसी कारणवश कर्मों का फल न मिल पाये तो अगले जन्मों में फल की मान्यता के कारण दुष्कर्मों से भय और सत्कर्मों में उत्साह बना रहे।

पानी जैसी चंचलता से मनुष्य महान नहीं बनता ।

- बर्क


सच्ची साधना

पति का अकाल निधन साध्वी रोहिणी पर वज्राघात था, जिसे सहन कर सकना असम्भव था किन्तु पुत्र देव शर्मा के प्रति कर्त्तव्य और ममता ने उसे जीने के लिए विवश कर दिया। अभ्यास नहीं था तो भी उसने घोर परिश्रम किया और बेटे का न केवल पालन पोषण ही वरन् उसे वेदाँग के अध्ययन जैसी उच्च शिक्षा भी दिलाई। देवशर्मा माँ के प्रताप से अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में गिना जाने लगा।

माँ वृद्धा हो गई थी नीति कहती थी अब बेटे को प्रत्युपकार-करना चाहिये पर दुष्ट कृतघ्नता को क्या कहा जाये-जहाँ भी उसका जन्म हुआ मर्यादायें, नीति और कर्त्तव्य भाव वहीं विश्रृंखलित हुये। संसार में यह जो कलह और अशाँति है कृतघ्नता ही उसका एक मात्र कारण है। बेटे के मन में यह समझ नहीं आई। अपनी मुक्ति, अपना स्वर्ग उसे अधिक आवश्यक लगा सो माँ और छोटी बहन को बिलखता छोड़कर देवशर्मा घर से भाग निकला और तीर्थाटन करते हुये नन्दिग्राम के एक मठ में जाकर तप करने लगा।

एक दिन देवशर्मा प्रातःकाल नदी के किनारे पहुँचे। स्नान कर अपना चीवर सूखने के लिये जमीन पर डाल दिया और स्वयं वहीं पर आसन डालकर ध्यान मग्न हो गये। प्रातःकालीन सन्ध्या समाप्त कर जैसे ही देवशर्मा उठे उन्होंने देखा एक कौवा और एक बकुल चीवर को चोंच में दबाकर उड़े जा रहे हैं। देवशर्मा के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने बड़ी-बड़ी तान्त्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। शक्ति का मद बड़ा बुरा होता है। उन्होंने क्रोधपूर्ण दृष्टि से पक्षियों की ओर देखा। आँखों से अग्नि ज्वाला फूटी और दोनों पक्षी जलकर वहीं खाक हो गये। देवशर्मा अपनी सिद्धि देखकर फूले नहीं समाये। उन्हें लगा समस्त भूमंडल पर उन जैसा कोई दूसरा सिद्ध नहीं है।

अहंकार से भरे देवशर्मा मठ की ओर चल पड़े। मार्ग में नंदिग्राम पड़ता था सोचा आज की भिक्षा भी लेते चलें सो देवशर्मा ने एक सद् गृहस्थ के द्वार पर “भवति भिक्षाँ देहि” की पुकार लगाई और भिक्षा की प्रतीक्षा में वहीं खड़े हो गये।

भीतर से आवाज आ रही थी इससे पता चलता था कि गृह स्वामिनी अन्दर ही है पर कोई बाहर नहीं आ रहा यह देखकर देवशर्मा को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने दुबारा तिबारा और चौथी बार भी पुकारा पर हर बार भीतर से एक ही आवाज आई स्वामी जी ठहरिये! मैं अभी साधना कर रही हूँ साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।

संयत और गम्भीर स्वर भीतर से बाहर आया- महात्मन् जानती हूँ आप शाप देना चाहेंगे किन्तु मैं कोई कौवा और बलाका नहीं, संत ! जो तुम्हारी कोप दृष्टि से जलकर नष्ट हो जाऊँगी। जिसने तुम्हें जीवन भर पाला उस माँ को त्यागकर अपनी मुक्ति चाहने वाले साधु ! आप मेरा कुछ भी तो बिगाड़ नहीं सकते ?

देवशर्मा का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया। कुछ देर बाद गृह स्वामिनी घर से बाहर आई और भिक्षा देने लगी। देवशर्मा ने साश्चर्य पूछा-भद्रे ! आप मुझे यह बतादे कि आप कौन सी साधना करती हैं जिससे बिना देखे ही कौए के जलाने और माँ को असहाय छोड़ आने की घटना जान गई।

गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया---कर्त्तव्य की साधना” महात्मन् ! म् अपने पति, अपने बच्चे, अपने परिवार, समाज और देश के प्रति कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। उसी की सिद्धि है यह। देवशर्मा का सिर लज्जा से नीचे झुक गया। भीख नहीं ली उन्होंने -चुपचाप जिस घर को छोड़कर आये थे चल पड़े उसी ओर छोड़ी हुई कर्त्तव्य की साधना पूरी करने।


प्रेम की सृजनात्मक शक्ति

सृजन प्यार से प्रारम्भ होता है। जिस वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से हम प्यार करते हैं उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है और जिसकी इच्छा होती है उसके लिए प्रयत्न किया जाता है। यह प्रयत्न ही सफलता का जनक है। मोटे तौर से किसी सफलता का श्रेय उसके लिये किये गये प्रयत्न या पुरुषार्थ को दिया जाता है पर यह स्थूल निरूपण है। गहराई तक जाने पर पता चलेगा कि प्रयत्न और पुरुषार्थ जैसे कष्टकर भार को कोई अनायास ही उठाने को तैयार नहीं हो जाता। उसके मूल में तीव्र इच्छा अभीष्ट को प्राप्त करने की होनी चाहिए तभी शरीर और मन का सुव्यवस्थित पुरुषार्थ बन पड़ता है। इच्छा में जितनी शिथिलता होगी, पुरुषार्थ उतना ही अधूरा रहेगा और उस अधूरे पुरुषार्थ से सफलता भी आँशिक, अस्त व्यस्त या संदिग्ध ही रहेगी।

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे को जब तक विद्या का महत्व मालूम नहीं होता, उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं जगती और स्कूली वातावरण में कोई तात्कालिक आकर्षण नहीं दीखता तो वह पढ़ने जाने में अरुचि दिखाता है और हीलाहुज्जत करता है। पर जब उसे विद्या का महत्व मालूम हो जाता है और विद्वान बनने, उपाधि प्राप्त करने की आकाँक्षा प्रबल होती है तो बिना किसी के कहे स्वयं रात को देर तक जगता है। पूछने जहाँ तहाँ जाता है और उसके लिये पूरी मेहनत करता है। इसी बालक को यदि कोई ऐसा काम करने के लिए कहा जाये जिसमें उसकी रुचि न हो तो इस प्रकार की दौड़−धूप उससे बन ही न पड़ेगी। तब सफलता की तो आशा ही कैसे की जायेगी। तात्पर्य यह हुआ कि सफलता के मूल में प्रत्यक्ष आँखों से जो पुरुषार्थ कारण मालूम पड़ता है वह स्वतन्त्र नहीं हुआ वरन् इच्छा का फलितार्थ मात्र है। इसलिये श्रेय भी इच्छा को ही मिलना चाहिए भले ही वह प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ती हो।

अब थोड़ा और गहराई तक प्रवेश करें तो पता चलेगा कि इच्छा भी अनायास ही नहीं उठ पड़ती। वह उसी दिशा में चलती है जिसमें अपना प्यार होता है। इसमें लाभ हानि का आकर्षण मुख नहीं है। अन्तरंग में वह आकर्षण का प्रधान है, जिसे प्यार कहा जा सकता है। प्यार के कारण जो उत्कट आकांक्षाएं उठती हैं वे सदा साँसारिक दृष्टि से लाभकर ही नहीं होती, वरन् कई बार तो पूरी तरह हानिकारक ही होती हैं तो भी उस हानि को उठाने में प्रेमी प्रत्यक्ष लाभों की अपेक्षा भी बहुत अधिक महत्व देता है और उस जोखिम को उठाने के लिए सहर्ष तैयार रहता है। मीरा ने प्रभु प्रेम को प्रत्यक्षतः क्या पाया। घर-द्वार, राज-पाठ, सुख साधन छोड़कर बावली की तरह बाहर वालों की उपहासास्पद और घर वालों की कोपभाजन बनी रही और कष्ट तथा अभाव भरा जीवन जीती रही। ईश्वर भक्ति में प्रत्यक्षतः घाटा ही रहता है। जितना परिश्रम और मनोयोग भक्ति के लिए लगता है उतने में तो ढेरों पैसा और सुख साधन कमाये जा सकते हैं। पर भक्ति भावना से प्रेरित मनुष्य उस लाभ को छोड़कर अपनी भावना में निमग्न रहने को ही सर्वोपरि मानता है। साँसारिक प्रेमियों को ही देखें, तो लगता है वे भी कम कष्ट नहीं उठाते। इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड ने अपनी प्रेमिका सिम्पसन के लिए इतने बड़े साम्राज्य का सिंहासन खुशी-खुशी त्याग दिया। लैला-मजनू, शीरी फरिहाद की पुरानी गाथाओं के नये संस्करण भी जहाँ तहाँ देखने सुनने को मिलते ही रहते हैं। यह तथ्य बताते हैं कि प्यार भरी भावनाएं मूर्तिमान करने की इच्छा से प्रेरित होकर व्यक्ति ऐसे पुरुषार्थ भी कर सकता है जिसमें साँसारिक दृष्टि से हानि ही हानि दीखती है, लाभ की तो वहाँ कोई सम्भावना ही नहीं रहती।

सफलता-पुरुषार्थ पर पुरुषार्थ इच्छा की तीव्रता पर निर्भर रहता है। और यह इच्छा जहाँ से उठती है उस मूल उद्गम का नाम है प्यार। प्यार अन्तरात्मा की एक स्वाभाविक वृत्ति है। क्योंकि आनन्द नाम का तत्व मात्र उसी में सन्निहित है। सुख साधन तो पदार्थों के द्वारा मिल सकते हैं। अथवा लोगों के शरीर खराद कर उनके द्वारा उपलब्ध किये जा सकते हैं पर आनन्द दूसरी ही चीज है। उसे आत्मा की छाया कह सकते हैं। अन्तःकरण जिस पर अपनी आत्मीयता का आरोपण कर देता है उसमें उससे अपनी प्रतिच्छाया प्रतिध्वनि का दर्शन होता है यही प्यार है। आत्मा अपने आप अपने को देख नहीं सकता अपने रस को स्वयं चख नहीं सकता, इसके लिए उसे किसी दूसरे माध्यम की जरूरत पड़ती है। अपना मुख अपने आप देख सकना कठिन है इसके लिये दर्पण की जरूरत पड़ती है। उसी प्रकार आत्म रस को निचोड़ने और उसका आस्वादन करने के लिए किसी दूसरे निर्जीव या सजीव माध्यम की जाय जरूरत पड़ती है इस संदर्भ में जिसका भी चुनाव हो जाय वही प्रिय लगने लगता है और उसकी समीपता, प्राप्ति एवं एकाकरित के लिए अन्तःकरण में उत्कट उमंग उठने लगती है। वस्तुतः इस उमंग का नाम ही प्यार है। वह पदार्थ या व्यक्ति जिससे प्यार किया गया है वह तो गौण निमित्त-अथवा माध्यम मात्र हैं वस्तुतः प्रेम आत्मा का रस है और वह अपने आप अपने अन्तरंग में उठता उमड़ता है। अपने आप ही अपने को आनन्द और उल्लास से पूर्ण करता है। इस दिव्य तत्व की कुछ बूंदें जिस पर पड़ जायें वह तो उस अमृत का तनिक सा रसास्वादन करने मात्र से धन्य हो जाता है।

सृजन मात्र प्रतिक्रिया है। क्रिया के अन्तरंग में तो प्यार को ही देखा जायेगा। जिस प्रयोजन से गहरा प्यार हो जाता है भले ही वह विवेक की कसौटी पर हानिकारक ही क्यों न हो उसे उपलब्ध करने के लिए व्यक्ति इतनी शक्ति लगा देता है जितनी उसमें दिखाई भी नहीं पड़ती थी। फरहाद ने शरी को प्राप्त करने के लिए ऊँचे पहाड़ को काटकर उस नगर तक नहर खोद लाने का असम्भव दीखने वाला काम पूरा किया था। वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, महामानवों, दुस्साहसियों और अद्भुत सफलताएं प्राप्त करने वालों-आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाने वालों की गतिविधियों और परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाये कि साधन उनके पास बहुत नहीं थे, परिस्थितियाँ भी अनुकूल नहीं थी। पर उनकी लगन उफन पड़ती थी। वे अभीष्ट प्रयोजन से अत्यधिक प्यार करते थे और उसे प्राप्त करने के लिए पूरे भावावेश के साथ लालायित थे। उस उत्कंठा ने मन्द बुद्धि मस्तिष्क में नई नई सूझ बूझें उत्पन्न की, जो लोग उपहास उड़ाते थे उन्हें तत्परता ने प्रभावित किया और जो साधन सम्भव दिखाई नहीं पड़ते थे वे न जाने कहाँ से दौड़ते चले आये और उस प्रयोक्ता के सामने उपस्थित हो गये। इसे कोई दैवी वरदान कहना चाहे तो कहे वास्तव में देवत्व का एकत्रीकरण मानवीय अन्तःकरण में प्यार के रूप में ही हुआ है और वह जिस दिशा में पूरी तरह नियोजित हो जाता है वहाँ चमत्कार ही चमत्कार उत्पन्न करता है। दैवी वरदान को दूसरे शब्दों में प्रेम की शक्ति का चमत्कार भी कह सकते हैं।

प्यार में सृजन की अद्भुत शक्ति भरी पड़ी है। शक्ति शक्तियों का पुंज है। ईश्वर का युवराज होने के कारण उसे वह सब संपदाएं तथा विभूतियाँ सहज ही उपलब्ध हैं जो इस संसार में प्रकट या अप्रकट रूप में विद्यमान है। पर यह सब प्रायः सुषुप्त अवस्था में पड़ी रहती है। समुद्र मंथन की तरह प्रबल प्रयास करने पर ही इन्हें सजग, सक्रिय और समर्थ बनाया जा सकता है। अन्तःकरण के समुद्र को मथ डालने का प्रयोजन केवल प्रेम ही पूरा कर सकता है। प्रेमी की समस्त जागृत और सुषुप्त सामर्थ्य सजग होकर अभीष्ट दिशा में संलग्न हो जाती है। नीरस मनोभूमि वाली स्थिति में जितना मनोबल था उसकी तुलना में प्रेमी बनने के बाद हजार गुना मनोबल जाग पड़ता है। और उस आधार पर इतने बड़े काम कर डालना सम्भव हो जाता है जिनका उस व्यक्ति की पूर्व स्थिति को देखते हुए तारतम्य मिलाना कठिन हो जात है।

प्रेम स्वयं सृजन है। वह जहाँ उत्पन्न होता है वहाँ देवत्व उत्पन्न करता है और जिस पर उसे प्रयुक्त किया जाता है वह समर्थ बनता है। शर्त इतनी ही है कि प्रेम सच्चे अर्थों में प्रेम होना चाहिए।


Quotation

अपार जलराशि से भी प्रेम की पिपासा शान्त नहीं हो सकती, और नहीं भयानक बाढ़ इसे डुबा सकती है।

-सालोमन


जलवायु के आधार पर भी जीवित रहा जा सकता है।

जापान के मूर्धन्य दैनिक पत्र “जापान टाइम्स” के 20 अप्रैल अंक में एक समाचार प्रकाशित हुआ कि भारतवर्ष में पटना शहर के समीप एक ऐसे सज्जन निवास करते हैं जो पिछले दो वर्ष से सर्वथा निराहार रहते हैं। उनका जीवन निर्वाह जल और वायु पर ही हो जाता है।

समाचार अद्भुत और आश्चर्यजनक ही नहीं अविश्वसनीय भी था। क्योंकि इन दिनों जबकि आहार को ही जीवन का आधार माना जा रहा है और स्वास्थ्य के लिये विभिन्न प्रकार के खनिज, लवण, प्रोटीन, चिकनाई, कार्बन आदि की तालिकाएं प्रकाशित करके आहार को ही सब कुछ बताया जा रहा है, तब यह कैसे सम्भव है कि कोई व्यक्ति बिना आहार के जीवित रह सके और दो वर्ष जैसी लम्बी अवधि तक जीवित भी रहे तो स्वस्थ भी बना रहे ? आहार के बिना अनशन करने वाले कई व्यक्ति मृत्यु के मुख में जा चुके हैं फिर बिना भोजन किये कोई व्यक्ति इतने समय तक जी ले, जीवित ही नहीं स्वस्थ भी बना रहे और स्वस्थ ही नहीं, इसी बिना आहार वाली पद्धति को अपना कर भविष्य में लम्बा जीवन जी सकने की घोषणा करे तो यह बात साधारणतया न तो समझ में आती है और न उस पर भरोसा करने को जी करता है।

इस समाचार ने अनेकों को आश्चर्यचकित किया। उन्हीं दिनों कनाडा के एक पाल स्टट वैक नाम सज्जन विश्व भ्रमण के लिए निकले हुए थे। वे जिन दिनों यह समाचार छपा तब तक अमेरिका, मैक्सिको, हनोई, जापान, कोरिया, ताइवान, बेंकोक आदि की यात्रा कर चुके थे। उन्होंने अपना कार्यक्रम रद्द करके इन निराहार जीवनयापन करने वाले सज्जन से भेंट करने और तथ्यों का पता लगाने का निश्चय किया और वे भारतवर्ष आकर सीधे पटना जा पहुँचे स्थान का पता लगाया और उन सज्जन के समीप जा पहुँचे जिनके बारे में समाचार छपा था।

पाया गया कि पटना जंक्शन से कुछ आगे चिड़िया रोड़ पर ओवर ब्रज के दक्षिण में कंकड़ बाग की तरफ जाने वाले रास्ते पर एक प्राकृतिक चिकित्सालय बना हुआ है वहाँ श्री भगवान आर्य नामक एक सज्जन निवास करते हैं, वे प्राकृतिक चिकित्सा प्रेमी है। केवल वे स्वयं ही प्राकृतिक जीवन पर विश्वास नहीं करते वरन् अपने परिवार को भी वैसी ही जीवन पद्धति अपनाने पर सहमत किये हुए है। वे रोगियों की प्राकृतिक विधि से चिकित्सा भी करते हैं और स्वस्थ रहने के लिए किस प्रकार का जीवनयापन करना चाहिए यह भी समझाते हैं।

कनाडा के विश्व यात्री श्री स्टट वैक को तब और भी आश्चर्य हुआ जब उन्हें पता लगा कि न केवल उपरोक्त सज्जन दो वर्ष से स्वयं ही निराहार रहते हैं वरन् उनके परिवार के सभी लोग-जिसमें उनकी पत्नी, दो लड़कियाँ और एक लड़का है। यह सब भी करीब एक वर्ष से इसी प्रकार बिना आहार का जीवनयापन कर रहे हैं और सभी सकुशल है।

इस संदर्भ में दिल्ली के साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 25 जुलाई 71 के अंक में श्री कृष्ण नन्दन ठाकुर की उपरोक्त सज्जन से एक भेंट वार्ता छपी है जिसमें प्रश्नों के उत्तर देते हुए डॉ. भगवान आर्य ने बताया कि-

“हर मनुष्य चाहे वह कुर्सी पर बैठकर काम करने वाला हो, चाहे कृषक हो, चाहे पहलवान हो, सभी को पूरा पूरा पोषण मिलता है-हवा और पानी से न कि अन्य खाद्य पदार्थों से। हवा पानी के अलावा सभी खाद्य पदार्थ ताकत पैदा करने में रुकावट डालते हैं। रोग पैदा करते हैं। बुढ़ापा लाते हैं, स्वास्थ्य खराब करते हैं। मन को विकारमय बनाते हैं।”

“निराहार जीवन पर्यन्त रहा जा सकता है। इससे मनुष्य कभी बुढ़ापा महसूस भी नहीं करेगा। जितनी लम्बी अवधि तक मनुष्य हवा पानी पर रहेगा उसके शरीर में सभी तरह की ताकत और अच्छाइयाँ आने लगेंगी। बुढ़ापा ऐसे व्यक्ति के दरवाजे पर आवेगा ही नहीं। मानव प्राणी को प्रथम श्रेणी का इंजन मिला है। जिसमें खाने की कोई आवश्यकता नहीं पशु-पक्षियों को द्वितीय श्रेणी की मशीन मिली है इसलिये उन्हें खाने की आवश्यकता पड़ती है।”

श्री भगवान जी का प्रयोग अधिक गहराई तक समझा जाने योग्य है। इस संदर्भ में अधिक खोज होने चाहिए। यह कोई सिद्धि चमत्कार जैसी बात नहीं वरन् मनुष्य शरीर का निर्वाह किन मूल भूत आधारों पर अवलम्बित है उसकी जड़ तक पहुँचने वाली बात है। यदि आहार को गौण और जलवायु को जीवन निर्वाह का प्रधान आधार सिद्ध किया जा सके तो इस प्रतिपादन के दूरगामी परिणाम होंगे। फिर आहार से स्वास्थ्य संरक्षण के नाम पर इन दिनों जो भक्ष्य अभक्ष्य, ईंट पत्थर, आग अंगार सब कुछ खाया जा रहा है। और खाद्य उत्पादन के लिए इतना कुहराम मच रहा है उस संदर्भ में नई दिशा मिलती है। यह पूर्ण निराहार सर्व साधारण के लिए सम्भव न हो तो भी यदि स्वल्पाहार से काम चल सकता हो और उसके लिए शाकाहार जैसी सरल सात्विक वस्तुओं को पर्याप्त माना जा सकता हो तो उस प्रतिपादन का मानव जीवन की एक मुख्य समस्या ‘आहार’ का आशाजनक समाधान निकल सकता है। विशेषतया प्रोटीन के नाम पर जिन करोड़ों निरीह पशु पक्षियों के माँस के नाम पर वध किया जाता है उनकी निरर्थकता समझने में सुविधा मिल सकती है।

स्वामी विवेकानन्द ने “पौहारी बाबा” नामक ऐ योगी का ऐसा ही वर्णन किया था कि वे बिना आहार रहते थे। वह विवरण उनकी एक “पौहरी बाब” नामक पुस्तक में भी है पर तब उसका कारण योगाभ्यास बताया गया था। तब लोगों को उस कठिन कार्य का अनुकरण करने का साहस नहीं हुआ। पर श्री भगवान जी का प्रयोग तो प्राकृतिक विज्ञान के अनुरूप होने से सभी के लिए सरल एवं उपयोगी हो सकता है। आवश्यकता इस संदर्भ में अधिक गहरे अन्वेषण और विस्तृत प्रयोग किये जाने की है। ताकि सर्व साधारण के लिए किन्हीं सर्व मान्य निष्कर्षों पर पहुंचा जा सके।

योग विद्या के अंतर्गत ऐसे विधान है जिनमें अन्न की आवश्यकता प्राण वायु से पूरी हो सकती है। जल पर भी निर्वाह हो सकता है। तपस्वियों की कितनी ही तपश्चर्या इस आधार पर संपन्न हुई है। पार्वती जी की शिव विवाह के लिये की गई तपश्चर्या की बात तो देवताओं के वर्ग में चली जाती है। ऋषियों की बातें भी पुरानी हो गई पर अभी भी ऐसे उदाहरण विद्यमान है जो प्राण तत्व के माध्यम से इस निखिल जगत में संव्याप्त शक्ति को खींचने और उससे शारीरिक, मानसिक स्तर की व्यक्तिगत सशक्तता उत्पन्न करने से लेकर-दूसरों की सहायताएं करने तथा लोक मंगल के अगणित प्रयोजन पूरे करने की व्यवस्था है। वह मार्ग कठिन है और सबके लिए सम्भव नहीं। पर उपरोक्त प्रयोग तो सर्व साधारण के लिए एक नई दिशा प्रस्तुत करता है इसलिए उसका महत्व विशेष है।


अपने पापों के लिए पछतावा हुआ

एक पापी मनुष्य को एकबार अपने पापों के लिए पछतावा हुआ। उससे किसी ने कहा- ‘तू कबीरदास के पास जा। वे तेरे मन को शान्ति प्रदान करेंगे।’ वह मनुष्य जैसे रोगी अस्पताल में जल्दी जाये, उसी तरह कबीर के यहाँ गया। कबीर घर पर नहीं थे। इसलिये उनकी पत्नी ने दृढ़ता पूर्वक तीन बर भगवान का नाम लेने को कहा। पापी ने सच्चे भाव से वैसा ही किया। इससे उसका मन शान्त हो गया और वह नाचता-कूदता हुआ ईश्वर स्मरण में मस्त हो गया। इसी समय कबीर घर आ गये। ऐसे प्रेमी मनुष्य को देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी ने उस भक्त का सब हाल बताया। कबीर ने खिन्न होकर अपनी पत्नी से कहा-’केवल एकबार प्रभु का नाम ले लेने से सब कुछ सिद्ध हो जाता है। तब तुमने तीन बार हरिनाम लेने को क्यों कहा ? इससे मालूम होता है कि तुमको ईश्वर पर विश्वास नहीं है।’ स्त्री बोली- ‘तीन बार नाम लेने का आशय यह था कि जिससे उप पापी का कायिक, वाचिक और मानसिक मैल दूर हो जाये।’ कबीर अपनी पत्नी की इस सूझा पर बहुत प्रसन्न हुए।


जीव जन्तुओं से भी कुछ सीखें

बन्दर के जीवन में स्नेह और सहानुभूति का वर्णन करते हुए सुप्रसिद्ध जीव शास्त्री बेट्स एक घटना का उदाहरण देते हुए लिखते हैं- एक बार बन्दरों के एक उपनिवेश में एक शिशु बन्दर बीमार पड़ गया। दिन भ दूसरे बन्दर तो इधर उधर उछलते कूदते रहे किन्तु एक बन्दरिया अपने बच्चे को छोड़कर कहीं नहीं गई। सम्भवतः अन्य बन्दरों के साथ अपने दल में उसे न पाकर किसी बन्दर का ध्यान उधर गया होगा। वह खोजता हुआ बंदरिया के पास पहुँचा। हाथ पकड़ कर और सूँघकर उसने वास्तविकता का पता लगाया। अपने दल में लौटकर उसने न जाने कैसी विचित्र खीं-खीं की आवाज में सभी सदस्यों को बात बताई उनका राजा तुरन्त उठकर बन्दरिया के पास गया। कई बन्दर इधर उधर से फल तोड़कर लाए। सभी बन्दर उस बन्दरिया के किनारे उसे घेर कर बैठ गये। इसके बाद बच्चा जब तक स्वस्थ नहीं हो गया उसके पास कुछ न कुछ बन्दर बैठे ही रहे। परस्पर आत्मीयता का यह उत्कृष्ट उदाहरण था जो सृष्टि के अबुद्धिमान मानवेत्तर प्राणियों में तो पाया जाता है किन्तु एक है विचारशील मनुष्य जो अपने ही पिता-माता, भाई भावज, बहनों, चाचा-ताऊ और अन्य कुटुंबियों के साथ प्रेम पूर्वक नहीं रह सकता। पारिवारिक कलह तो अब गृहस्थों में सामान्य बात हो गई है स्थिति अब परस्पर मारपीट, हत्या और मुकदमे बाजी तक पहुँच गई है। मनुष्य जाति को इस कलंक से बचना चाहिये और इन छोटे छोटे प्राणियों से ही मानवता का आदर्श सीखना चाहिए।

कृतज्ञता मनुष्य जाति का एक ऐसा गुण है कि यदि लोग दूसरे लोगों के उपकार उनकी सेवाओं के प्रति थोड़ा सा भी श्रद्धा और सम्मान का भाव रखें तो संसार से कलह और झगड़ों की 90 प्रतिशत जड़ तुरन्त नष्ट हो जाये। कृतज्ञता आत्मा की प्यास और उसकी चिरंतन आवश्यकता है लगता है यह आदर्श भी मनुष्य को अन्य जन्तुओं से ही सीखना पड़ेगा। मासिक कल्याण के एक अंक में कृतज्ञता की एक बहुत ही मार्मिक घटना छपी थी। एक डाकिया प्रतिदिन डाक लेकर जंगल से गुजरता था और दूसरे गाँव डाक बाँटने जाया करता था। एक दिन उसने पेड़ की एक डाल में छोटे से छेद में निकलने के प्रयास में एक बन्दर फंस गया है। दूसरे बन्दर कें-कें तो कर रहे थे आपत्ति ग्रस्त बन्दर भी बुरी तरह चिल्ला तो रहा था किन्तु उस संकट से छूटना उसके लिए संभव नहीं हो पा रहा था। इसी बीच डाकिया उधर से निकला उसे बन्दर की यह दशा देखकर दया आ गयी। उसके पास कुल्हाड़ी थी। पहले तो वह कुछ भयभीत हुआ पर पीछे ‘हित-अनहित पशु पच्छिम जाना’ वाली उक्ति उसे याद आई उसने अनुभव किया जब मैं भलाई करना चाहता हूँ तो बन्दर बुराई क्यों करेंगे। जन्तु योनि में पड़ी हुई चेतना आखिर आत्मा ही तो है- आत्म भावना का स्मरण कर वह वृक्ष पर चढ़ गया और सावधानी से छेद बड़ा कर उसने फंसे हुए बन्दर को बाहर निकाल लिया। बन्दर बड़ी खुशी खुशी वहाँ से चले गये उन्होंने डाकिये को न डराया न काटा। डाकिया अपनी राह चला गया।

एक सप्ताह भी न बीता था कि एक दिन उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ठीक उसके आने के समय वहाँ बीसियों बन्दर रास्ते इधर उधर बैठे हैं पहले तो पोस्टमैन डरा पर चूँकि कुल्हाड़ी हाथ में थी इसलिए वह निश्शंक चला ही गया। जैसे जैसे वह आगे बढ़ा बन्दर इकट्ठे होते गये और डाकिया डरता गया किन्तु पास पहुँच कर उसे आश्चर्य हुआ कि यह सभी बन्दर अपने अपने एक एक हाथ में जंगली प्रदेश में पाया जाने वाला एक एक लाल रंग का दुर्लभ फल लिये हुए है। डाकिये के पास आते ही उन सब ने उसे घेर लिया और अपने अपने फल उसके हाथ में देकर पल भर में इधर उधर तितर बितर हो गये। डाकिये की आँखों में आँसू आ गये उसने अनुभव किया कि आखिर यह जीव भी तो आत्मा ही है यदि मनुष्य जीव मात्र के प्रति दया का व्यवहार करें तो संसार स्वर्ग बन जाये और नहीं तो कृतज्ञ तो एक दूसरे के प्रति होना ही चाहिए।

श्री सुरेश सिंह लिखित पुस्तक ‘जीव-जगत’ में मगर के गुणों का वर्णन करते हुए लिखा है कि उदारता के गुणों से तो यह धोखेबाज और मक्कार जीव भी रिक्त नहीं। जलाशय में घूमते, शिकार आदि खाने के बाद कई बार जब वह बाहर निकलता है तो अपना मुँह खोलकर लेट जाता है। पास पड़ोस के पक्षी उसके दाँतों और मुँह में लगे चारे को देख कर दौड़ पड़ते हैं और मुँह में घुस कर दाँत कुरेद कुरेद का आहार ग्रहण करने लगते हैं मगर चाहे तो मुँह बन्द करके उन्हें एक बार में गड़प कर सकता है किन्तु ऐसा पाप उसे भी पसन्द नहीं। शरणागत पक्षियों की सेवा वह तब तक करता है जब तक कि पक्षी अपने आप न उड़ जाएं इस बीच मगर धोखे से भी मुँह बन्द नहीं करता।

बाघ बड़ा उत्पाती जीव है, भूख लगने पर प्राकृतिक प्रेरणा से उसे आक्रमण भी करना पड़ता है किन्तु उस जैसा एकनिष्ठ पतिव्रत और पत्नीव्रत देखते ही बनता है। अपना अधिकाँश जीवन जंगलों में व्यतीत करने वाले जंगली जानवरों की प्रवृत्तियों का समीप रह कर अध्ययन करने वाले डॉ. स्टेफर्ड ने एक बहुत ही रोचक घटना दी है। दक्षिण अफ्रीका के जंगल के एक बाघ ने अभी कुछ ही दिन पूर्व अपना जोड़ा चुना था। बाघिन-वधु बीमार पड़ गई और उसी अवस्था में एक दिन उसकी मृत्यु भी हो गई। उस जंगल में और भी अनेक बाघ-कुमारियाँ उसे मिल सकती थीं किन्तु उस बाघ ने फिर किसी को अपना साथी नहीं चुना। बहुत दिन पीछे उसे एक ऐसी मादा मिली जो स्वयं भी एकाकी जी रही थी उसके पति का संभवतः देहावसान हो गया था। दोनों विधुरों ने अपना युगल फिर से स्थापित कर लिया पर सामान्य स्थिति में वे सदैव एक निष्ठ ही रहते हैं कोई भी जोड़ा दूसरे को बुरी दृष्टि से नहीं देखता। होगा बाघ बुरा हिंसक दृष्टि से किन्तु अपनी सच्चरित्रता के कारण वह सशक्त और समर्थ भी इतना होता है कि जंगल के दूसरे जीव उसको दूर से ही नमस्कार करते हैं।

आज रिश्वत और हराम की कमाई खाने वाले कायरों की बाढ़ आ रही है तब शेर का उदाहरण यह बताता है कि जंगल का राजा-समाज का सच्चा नेता-मुफ्तखोर नहीं नीति और परिश्रम से उपार्जित धन खाने वाला ही हो सकता है शेर कभी भी दूसरे का मारा शिकार नहीं करता भले ही वह बूढ़ा क्यों न हो गया हो। मनुष्य को भी आजीविका नीति-उपार्जित खानी चाहिए और उसे इस प्रकार अपने को शेर जैसा खरा सिद्ध करना चाहिए।

स्वास्थ्य के लिये दुआ भर की औषधियाँ, टानिक और तरह तरह के सन्तुलित अहार खोजने वाले मनुष्य चाहें तो घोड़े को देख कर जान सकते हैं कि शक्ति अधिक संख्या के व्यंजनों में नहीं रूखे सूखे भोजन में है। घास खाने वाले एक जर्मनी के घोड़े को 10 वर्ष तक केवल सूखी हरी घास दी गई और उसे किसी भी प्रकार सहवास से अलग रखा गया। अरबी नस्ल के इस घोड़े को परीक्षण के तौर पर एक एक कर ऊपर तक पत्थर के कोयले से भरे पाँच वैगनों के साथ जोड़ दिया गया उसे घोड़े ने एक मील तक खींच कर अपनी अद्वितीय सामर्थ्य का परिचय दिया।

मनुष्य विश्वास घात करता है तो यह देखकर लज्जा आती है कि जीवन भर दूसरों का बोझा ढोने वाले बैल जिनमें बुद्धि और विवेक के नाम पर कुछ भी तो नहीं होता, वे परस्पर ऐसी प्रगाढ़ मैत्री का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। डॉ. मूर ने हैंबर्ग के एक जोड़ी बैलों का हृदय स्पर्शी वर्णन ‘दो बैलों की कहानी’ नाम सत्य घटना में दिया है और लिखा है कि एक किसान के यह दोनों बैल काम तो साथ करते ही थे। खाने पीने से लेकर यात्रा करने तक सदैव साथ रहते थे। कभी कभी उन्हें अलग होना पड़ता तो दोनों तब तक भोजन नहीं करते थे। जब तक कि दूसरा नहीं आ जाता। एक दिन अचानक एक बैल एक खंदक में गिर गया। निकल तो आया वह पर उसके चारों पैर टूट गये। उनकी मरहम पट्टी की गई बुखार हो आया उसे। चिकित्सा के इन दिनों में दूसरे ने एक भी तिनका मुँह में नहीं दिया। हजारों लोग यह दृश्य देखने आते और कहते न जाने क्या है आत्मा की गहराई में और चेतना के विज्ञान में जो मनुष्य समझ नहीं पाता लगता था दोनों दो सहोदर भाई रहे हों। बीमारी 10 दिन चली दस दिन पीछे लूला बैल संसार से चल बसा, इतने दिन तक कुछ न खाने पीने के कारण दूसरा भी बिलकुल दुर्बल हो गया था, आटा-चून, दलिया सब कुछ देकर आकर्षित करने का प्रयास किया किसान ने, किन्तु उस बैल ने खाना तो दूर जिस दिन पहला बैल मरा जल भी छोड़ दिया और तीन दिन पीछे उसने भी इस संसार से विदा लेली। बैल चला गया पर वह एक पाठ छोड़ गया कि मैत्री हो तो ऐसी हो।

लोगों को असीमित साधन जुटाते देख कर लगता है कि मनुष्य कृत्रिम साधनों की बदौलत ही जी रहा है कदाचित यह साधन न मिलें तो उसका जीवित रहना दूभर हो जाये, किन्तु जीव जन्तु अपवाद है और उनकी जीवन शैली यह बताती है कि यदि प्राकृतिक जीवन जिया जाये तो ऐसी क्षमताएं अपने आप अन्दर से उपज पड़ती हैं जो कठिन से कठिन विपरीत परिस्थिति में भी मनुष्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ऊँट एक अच्छा उदाहरण है वह एक बार में 70 लीटर तक पानी पी जाता है पर फिर कई कई दिनों तक पानी न भी मिले तो भी उसे कोई कष्ट नहीं होता उसकी घ्राणेन्द्रिय इतनी सूक्ष्म होती है कि वह केवल सूँघ कर ही पानी का पता लगा लेता है सिद्धियों की ओर संभवतः भारतीय यह अलौकिकताएं देखकर ही आकर्षित हुए और हठ योग तथा तितीक्षा द्वारा अपने शरीर के अन्दर की वह क्षमतायें जगा डाली जो सामान्य लगती है।

छोटे-छोटे अभावों का रोना रोने वाले आदमियों के लिये दीमक ही योग्य शिक्षक है जन्म से ही अंधे यह छोटे छोटे जीव जीवन भर अविराम काम करते हैं और ऐसे विलक्षण काम करते हैं कि देखकर आश्चर्य होता है। 10 से 13 फुट तक ऊँचे मकान उठाना इन्हीं का काम है उन पर वर्षा आँधी तूफान और ऊपर से वृक्ष कट कर गिर पड़ें तो भी इनका कुछ बिगड़ेगा नहीं। पुलों के निर्माण से लेकर सड़कें बनाने और सारे दीमक राज्य को अनुशासन एवं नियम व्यवस्था में रखने के उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य वे पूरा करके मनुष्य को बताती हैं कि अनुशासन, नियमबद्धता और तत्परता पूर्वक काम किया जाये तो संसार का छोटा से छोटा भी असाधारण कार्य सम्पादित कर सकता है।

कितना अच्छा होता मनुष्य इन छोटे भाइयों से कुछ सीखता और अपना समस्त जीवन सुखी बनाता।


मानवता की दृष्टि

फ्राँस के महावीर शासक नेपोलियन ने आस्ट्रिया पर आक्रमण किया और जगह-जगह उसकी सेनाओं को हराता हुआ राजधानी विएना नगर पर जा पहुँचा। उसने सन्धि का झण्डा देकर दूत को नगर में भेजा, पर नागरिकों ने जोश में आकर उसे मार डाला। इससे नेपोलियन बड़ा क्रोधित हुआ और उसने अपनी तोपों को नगर पर गोलाबारी करने की आज्ञा दी।

वहाँ के अनगिनत विशाल भवन तोपों से टूट-फूट गये। एकाएक नगर का द्वार खुला और उसमें से दूत सन्धि का झंडा लिये बाहर निकला। नेपोलियन ने दूत का सम्मान करके सन्देश पूछा। दूत ने कहा कि नगर में आपकी तोपों के गोले जहाँ गिर रहे हैं, वहाँ से समीप ही सम्राट की प्यारी पुत्री बीमार पड़ी है। अगर तोपें इसी प्रकार चलती रहीं तो विवश होकर सम्राट को अपनी पुत्री को अकेली छोड़कर चला आना पड़ेगा।

नेपोलियन के सेनापतियों के मत से तोपों से गोला वारी करना आवश्यक था, पर नेपोलियन ने कहा कि युद्ध नीति की निगाह से तो आपकी बात ठीक है, पर मानवता की दृष्टि से एक रोगी राजकुमारी पर दया करना उससे भी अधिक महत्व की बात है तोप वहाँ से हटाली गई।


मात्र संयोग ही नहीं - अदृश्य सहयोग भी

बिहार में एकबार जोरदार भूकम्प आया। कई दिन तक रह रहकर पृथ्वी कॉपी और जब स्थिर हुई तब पता चला कि नगर में नगर ध्वस्त हो चुके है। हजारों व्यक्तियों की जाने गई इस दुर्घटना में। मुँगेर नगर में उस दिन बाजार थी। दोपहर का समय था हजारों व्यक्ति क्रय-विक्रय करने में तल्लीन थे तभी आया भूचाल और उन हजारों दुकानदारों तथा खरीददारों को मकानों के मलबे में दाब कर चला गया।

पीछे आये सहायता दल सिपाही-सैनिक और समाज सेवी संस्थाएं। मलबे की खुदाई प्रारम्भ हुई। एक दो दिन तक तो कुछ लोग जीवित कुछ चोट खाये निकलते रहे पर तीसरे दिन से जो लाशें निकलनी शुरू हुई तो फिर पन्द्रह दिन तक लाशें ही निकलती रही ढेर लग गया मृतकों का।

गिरे हुये मकानों का मलबा निकालने का काम अभी तक बराबर चल रहा था। एक स्थान पर काम चल रहा था, एकाएक कुछ लोग चौंके क्योंकि नीचे से आवाज आ रही थी-’थोड़ा धीरे से खोदना। 15 दिन तक जमीन में दबे रहने पर भी यह कौन जीवित पड़ा है इस आश्चर्य से मिट्टी हटाई जाने लगी।

कई बड़ी-बड़ी धन्नियाँ तथा शहतीरें निकालने के बाद निकला एक अधेड़ आयु का व्यक्ति केले के छिलकों में पड़ा हुआ, एक भी चोट या खरोंच नहीं थी उसे सबसे आश्चर्य भरी बात तो यह थी ढेर सारी मिट्टी और तख्तों के नीचे दबे उस आदमी ने बिना खाये पिये साँस लिए 15 दिन कैसे काट दिये।

उसी से पूछा गया- भाई तुम कैसे बच निकले तो उसने आप बीती घटना इस प्रकार सुनाई-

“मैं आया था-केले बेचने , इस मकान की दालान के नीचे सिर पर टोकरी रखे खड़ा था कि भूचाल आ गया। छत टूट कर ऊपर गिरी मैं दब गया टोकरी कुछ इस प्रकार उल्टी की सारे केले उसके नीचे आ गये और इस तरह वे पिचकने या सड़ने गलने से बच गये। इसी में से निकाल-निकाल कर केले खाता रहा।”

‘पेट के नीचे का भाग कुछ इस तरह मिट्टी से पट गया कि सिरोभाग से कमर भाग का सम्बन्ध ही टूट गया। टट्टी पेशाब की बदबू से इस प्रकार बचाव हो गया।’

“एकबार पृथ्वी फिर हिली और उसके साथ ही हिला यह मलबा, न जाने कैसे एक सूराख हो गया वह हलकी सी धूप की गर्मी भी देता रहा और शुद्ध हवा भी। अब जीते रहने के लिए एक ही वस्तु आवश्यक रह गई थी वह थी पानी। दैवयोग से पृथ्वी तिबारा कांपी तब इस दुकान का फर्श टूटा और उसके साथ ही पानी की एक लहर इधर आ गई और इस गड्ढे को पानी से ऊपर तक भर गई। हवा और धूप यों छेद से मिल गया। केले पास थे ही, पानी भी परमात्मा ने भेज दिया। यह सब व्यवस्थायें भगवान् ने जुटा दी तो मुझे विश्वास हो गया कि मुझे अभी नहीं मरना।

“इसी विश्वास के सहारे आज तक जीवित रहा। आज का दिन आखिरी दिन है जबकि सब केले समाप्त हो गये है, पानी नहीं बचा है, रोशनी भी नहीं आ रही थी पर आप सब लोग आ गये सो मैं आप लोगों को भगवान् की मदद ही मानता हूँ।” इतना कहकर उसने कृतज्ञता की दो बूँद आँखों से लुढ़का दी।

इस घटना का वर्णन महात्मा आनन्द स्वामी ने एक ही रास्ता पुस्तक में किया है और लिखा है कि इस तरह की घटनायें बताती है कि संसार अपने कर्त्ता और स्वामी से रिक्त नहीं है।


Quotation

हृदय उन पुष्पों की भाँति है जो कोमलता से गिरती हुई ओस के लिए तो खिले रहते हैं, किन्तु मूसलाधार वर्षा में बन्द हो जाते हैं।

-अज्ञात


पाँच प्रेत - प्रकार

नगर अभी दूर था। वन हिंसक जन्तुओं से भरा पड़ा था। सो विशाल वटवृक्ष, सरोवर और शिव मंदिर देखकर आचार्य महीधर वहीं रुक गये। शेष यात्रा अगले दिन पूरी करने का निश्चय कर थके हुए आचार्य महीधर शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में चले गये।

आधा रात, सघन अन्धकार, जीव-जन्तुओं की रह-रहकर आ रहीं भयंकर आवाजें- आचार्य प्रवर की नींद टूट गई। मन किसी बात पर विचार करे इससे पूर्व ही उन्हें कुछ सिसकियाँ सुनाई दीं उन्हें लगा पास में कोई अन्ध-कूप है उनमें कोई पड़ा हुआ रुदन कर रहा है अब तक सप्तमी का चन्द्रमा आकाश में ऊपर आ गया था, हल्का-हल्का प्रकाश फैल रहा था, आचार्य महीधर कूप के पास आये और झाँककर देखा तो उसमें पाँच प्रेत किलबिला रहे थे।

यों दुःखी अवस्था में पड़े प्रेतों को देखकर महीधर को दया आ गई उन्होंने पूछा-तात ! आप लोग कौन हैं यह दुर्दशा आप लोग क्यों भुगत रहे हैं ? इस पर सबसे बड़े प्रेत ने बताया हम लोग प्रेत है मनुष्य शरीर में किये गये पापों के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं आप संसार में जाइये और लोगों को बताइये जो पाप कर हम लोग प्रेत योनि में आ पड़े है वह पाप और कोई न करें। आचार्य ने पूछा- आप लोग यह भी तो बताइये कौन कौन से पाप आप सबने किये हैं तभी तो लोगों को उससे बचने के लिए कहा जा सकता है।

“मेरा नाम पर्युषित है आर्य” पहले प्रेत ने बताना प्रारम्भ किया- मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मण था, विद्या भी खूब पढ़ी थी किन्तु अपनी योग्यता का लाभ समाज को देने की बात को तो छुपा लिया हाँ अपने पाँडित्य से लोगों में अन्ध-श्रद्धा, अन्धविश्वास जितना फैला सकता था फैलाया और हर उचित अनुचित तरीके से केवल यजमानों से द्रव्य-दोहन किया उसी का प्रतिफल आज इस रूप में भुगत रहा हूँ ब्राह्मण होकर भी जो ब्रह्म नहीं रखता, समाज को धोखा देता है वह मेरी ही तरह प्रेत होता है।

“मैं क्षत्रिय था पूर्व जन्म में” अब सूचीमुख नामक दूसरे प्रेत ने आत्म कथा कहनी प्रारम्भ की। मेरे शरीर में शक्ति की कमी नहीं थी मुझे लोगों की रक्षा के लिये नियुक्त किया गया। रक्षा करना तो दूर प्रमोद वश मैं प्रजा का भक्षक ही बन बैठा। चाहे किसी को दण्ड देना, चाहे जिसको लूट लेना ही मेरा काम था एक दिन मैंने एक अबला को देखा जो जंगल में अपने बेटे के साथ जा रही थी मैंने उसे भी नहीं छोड़ा उसका सारा धन छीन लिया, यहाँ तक उनका पानी तक लेकर पी लिया। दोनों प्यास से तड़प कर वहीं मय गये उसी पाप का प्रतिफल प्रेतयोनि में पड़ा भुगत रहा हूँ।

तीसरे शीघ्राग ने बताया- मैं था वैश्य। मिलावट, कम तौल, ऊँचे भाव तक ही सीमित रहता तब भी कोई बात थी, व्यापार में अपने साझीदारों तक का गला काटा। एक बार दूर देश वाणिज्य के लिए अपने एक मित्र के साथ गया। वहाँ से प्रचुर धन लेकर लौट रहा था रास्ते में लालच आ गया मैंने अपने मित्र की हत्या करदी और उसकी स्त्री, बच्चों को भी धोखा दिया व झूठ बोला उसकी स्त्री ने इसी दुःख में अपने प्राण त्याग दिये उस समय तो किसी की पकड़ में नहीं आ सका पर मृत्यु से आखिर कौन बचा है तात ! मेरे पाप ज्यों ज्यों मरणकाल समीप आता गया मुझे संताप की भट्टी में झोंकते गये और आज जो मेरी स्थिति है वह आप देख ही रहे है। पाप का प्रतिफल ही है जो इस प्रेतयोनि में पड़ा मल-मूत्र पर जीवन निर्वाह करने को विवश हूँ अंग-अंग से व्रण फूट रहे हैं दुःखों का कहीं अन्त नहीं दिखाई दे रहा।

अब चौथे की बारी थी- उसने अपने घावों पर बैठी मक्खियों को हाँकते और सिसकते हुये कहा- तात! मैं पूर्व जन्म में “रोधक” नाम का शूद्र था। तरुणाई में मैंने व्याद्द किया कामुकता मेरे मस्तिष्क पर बुरी तरह सवार हुई। पत्नी मेरे लिये भगवान् हो गई उसकी हर सुख सुविधा का ध्यान दिया पर अपने पिता-माता, भाई बहनों का कुछ भी ध्यान नहीं दिया। ध्यान देना तो दूर उन्हें श्रद्धा और सम्मान भी नहीं दिया। अपने बड़ों के कभी पैर छुये हों मुझे ऐसा एक भी क्षण स्मरण नहीं। आदर करना तो दूर जब तब उन्हें धमकाया और मारा-पिटा भी। माता-पिता बड़े दुःख और असह्यपूर्ण स्थिति में मरे। एक स्त्री से तृप्ति नहीं हुई तो और विवाह किये। पहली पत्नियों को सताया घर से बाहर निकाला। उन्हीं सब कर्मों का प्रतिफल भुगत रहा हूँ मेरे तात् और अब छुटकारे का कोई मार्ग दीख नहीं रहा।

चार प्रेत अपनी बात कह चुके किन्तु पांचवां प्रेत तो आचार्य महीधर की ओर मुख भी नहीं कर रहा था पूछने पर अन्य प्रेतों ने बताया-यह तो हम लोगों को भी मुँह नहीं दिखाते-बोलते बातचीत तो करते हैं पर अपना मुँह इन्होंने आज तक नहीं दिखाया।

“आप भी तो कुछ बताइये”- आचार्य प्रवर ने प्रश्न किया-इस पर घिंघियाते स्वर में मुँह पीछे ही फेरे-फेरे पांचों प्रेत ने बताया-मेरा नाम “कलाकार” है मैं पूर्व जन्म में एक अच्छा लेखक था पर मेरी कलम से कभी नीति, धर्म और सदाचार नहीं लिखा गया। कामुकता, अश्लीलता और फूहड़पन बढ़ाने वाला साहित्य ही लिखा मैंने, ऐसे ही संगीत, नृत्य और अभिनय का सृजन किया जो फूहड़ से फूहड़ और कुत्सायें जगाने वाला रहा हो। मैं मूर्तियाँ और चित्र एक से एक भावपूर्ण बना सकता था, किन्तु उनमें भी कुरुचि वर्द्धक वासनायें और अश्लीलतायें गढ़ी। सारे समाज को भ्रष्ट करने का अपराध लगाकर मुझे यमराज ने प्रेत बना दिया। किन्तु मैं यहाँ भी इतना लज्जित हूँ कि अपना मुंह इन प्रेत भाइयों को भी नहीं दिखा सकता।

आचार्य महीधर ने अनुमान लगाया अपने अपने कर्त्तव्यों से गिरे हुये यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और कलाकार कुल पाँच ही थे इन्हें प्रेतयोनि का कष्ट भुगतना पड़ रहा है और आज जबकि सृष्टि का हर ब्राह्मण, हर क्षत्रिय, वैश्य और प्रत्येक शूद्र कर्त्तव्यच्युत हो रहा है, हर कलाकार अपनी कलम और तूलिका से हित-अनहित की परवाह किये बिना वासना की गन्दी कीचड़ उछाल रहा है तब आने वाले कल में प्रेतों की संख्या कितनी भयंकर होगी। कुल मिलाकर सारी धरती नरक में ही बदल जायेगी। सो लोगों को कर्त्तव्य जागृत करना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब तक प्रातःकाल हो चुका था आचार्य महीधर यह संकल्प लेकर चल पड़े पाँचों प्रेतों की कहानी सुनकर मार्ग भ्रष्ट लोगों को सही पथ प्रदर्शन करने लगे।


स्वामी रामानुजाचार्य

स्वामी रामानुजाचार्य को उनके गुरु शटकोप स्वामी ने जीव के कल्याण के रहस्यमय मन्त्र बताये और उन्हें किसी को बताने की सख्त मना ही करदी। जीव कल्याण और ईश्वर-प्राप्ति के गूढ़ रहस्यों को जानकर स्वामी रामानुजाचार्य ने उन्हें जनता को बताना शुरू कर दिया अपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया। इस तरह के अमूल्य धन से वे स्वयं ही लाभ नहीं उठाना चाहते थे। जब शटकोप स्वामी को पता चला तो वे बड़े रुष्ट हुए और एक दिन रामानुज को बुलाकर कहा, “क्यों रे, मैंने तुझे इस ज्ञान को गुप्त रखने का आदेश दिया था फिर तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया। इसका बुरा परिणाम तुझे भोगना पड़ेगा।” “गुरुदेव जैसी आपकी आज्ञा। इस अमूल्य धन को प्राप्तकर मुझे केवल अपना कल्याण ही अच्छा नहीं लगा। मैंने अपने अन्य मानव भाइयों को भी बाँटना शुरू कर दिया। मुझसे रहा नहीं गया। इसको मैं अपने लिये ही रखकर क्या करता, इसलिए बाँट दिया। मेरे अन्य भाई अज्ञान में पड़े नारकीय यातनायें सहते रहें और मैं अपना ही कल्याण ईश्वर-लाभ प्राप्त करलूँ यह भी बहुत बड़ा स्वार्थ है।

शटकोप स्वामी अपने शिष्य की वाणी सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने रामानुजाचार्य को सीने से लगा लिया और संसार में ज्ञान, धर्म का प्रचार करने की आज्ञा दे दी।


स्थूल शरीर की रह ही सूक्ष्म शरीर का भी ध्यान रखें

शरीर केवल वह एक ही नहीं है जिसे हम धारण किये हुये है और जो दीखता अनुभव होता है, उसके भीतर दो और शरीर हैं जिन्हें सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं। इनमें सूक्ष्म शरीर अधिक सक्रिय और प्रभावशाली है। मरण के उपरान्त उसी का अस्तित्व रह जाता है और उसी के सहारे नया जन्म होने तक की समस्त गतिविधियाँ चलती रहती है।

मरने के उपरान्त इन्द्रियाँ, मन, संस्कार तथा पाप पुण्य साथ जाते हैं। मरण से पूर्व वाले जन्म का स्मरण भी इसी शरीर में बना रहता है इसलिए अपने परिवार वालों को पहचानता और याद भी करता है। अगले जन्म में इस पिछले जन्म के संस्कारों को ढोकर ले जाने में भी यह सूक्ष्म शरीर ही काम करता है। वस्तुतः मरण के पश्चात एक विश्राम जैसी स्थिति आती है उसमें लम्बे जीवन में जो दिन रात काम करना पड़ता है उसकी थकान दूर होती है। जैसे रात को सो लेने के पश्चात् सवेरे ताजगी आती है उसी तरह नये जन्म के लिए इस मध्य काल के विश्राम से फिर कार्यक्षमता प्राप्त हो जाती है। जिनका मृत्यु के उपरान्त तुरन्त पुनर्जन्म हो जाता है उन्हें पूरा विश्राम न मिल पाने से थकान बनी रहती है और शरीर तथा मन में अस्वस्थता देखी जाती है।

सूक्ष्म शरीर इस जन् में भी स्थूल शरीर के साथ ही सक्रिय रहता है। रात्रि को सो जाने के उपरान्त जो स्वप्न दीखते हैं वह अनुभूतियाँ सूक्ष्म शरीर की ही है। दिव्य दृष्टि, दूरश्रवण, दूरदर्शन विचार संचालन, भविष्य ज्ञान, देव दर्शन आदि उपलब्धियाँ भी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ही होती है। प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि की उच्च स्तरीय योग साधना द्वारा इसी शरीर को समर्थ बनाया जाता है। ऋषियों और सिद्धियों का स्त्रोत इस सूक्ष्म शरीर को माना जाता है।

भारतीय योग शास्त्रों में सूक्ष्म शरीर को भी स्थूल शरीर की तरह ही प्रत्यक्ष और प्रमाणित माना गया है और उसका स्वरूप तथा कार्य क्षत्र विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। वह दुर्बल कैसे हो जाता है और उसे सशक्त कैसे बनाया जा सकता है इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। कहा गया है सूक्ष्म शरीर में विकार उत्पन्न हो जाने से स्थूल शरीर भी अस्वस्थ और खिन्न रहने लगता है। इसलिये समग्र समर्थता के लिये स्थूल शरीर की ही तरह सूक्ष्म शरीर का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

यदि आत्मा को अमर माना जाये, मरणोत्तर जीवन को मान्यता दी जाये तो सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व भी मानना पड़ेगा। स्थूल शरीर तो मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है। नया शरीर तुरन्त ही नहीं मिलता, उसमें देर लग जाती है। इस मरण और जन्म के बीच की अवधि में प्राणी को सूक्ष्म शरीर का सहारा लेकर ही रहना पड़ता है। शरीर धारण कर लेने के बाद भी उसके अंतर्गत सूक्ष्म शरीर और कारण शरीरों का अस्तित्व बना रहता है। अतीन्द्रिय ज्ञान उन्हीं के द्वारा होता है और उपासना साधना द्वारा इन्हीं दो अप्रत्यक्ष शरीरों को परिपुष्ट बनाया जाता है। यह अन्तर शरीर यदि बलवान हो तो बाह्य शरीर में तेज, शौर्य, प्रकाश, बल और ज्ञान की आभा सहज ही प्रस्फुटित दीखती है। उत्साह और उल्लास भी सूक्ष्म शरीर की निरोगता का ही परिणाम है।

स्वर्ग और नरक का जैसा कि वर्णन है उसका उपभोग सूक्ष्म शरीर द्वारा ही सम्भव है। पिछले जन्म के ज्ञान, संस्कार, गुण, रुचि आदि का अगले जन्म में उपलब्ध होने का आधार भी यह सूक्ष्म शरीर है। भूत प्रेतों का अस्तित्व भी इसी परोक्ष शरीर पर निर्भर है और दिव्य अनुभूतियाँ, योग की सिद्धियाँ, स्वप्नों पर परिलक्षित सच्चाइयां आदि प्रक्रियाएँ सूक्ष्म शरीर से ही सम्भव हो सकती है। यदि स्थूल शरीर से ही सम्भव हो सकती है। यदि स्थूल शरीर मात्र का अस्तित्व माना जाये तो फिर नास्तिकों का वही मत प्रतिपादित होगा जिसमें कहा गया है कि - मृत्यु के बाद फिर आना कहाँ होगा, जब तक जीना है सुख से जियो और ऋण लेकर मद्य पियो।

इतिहास, पुराणों में सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व सिद्ध करने वाली अनेक घटनाओं का वर्णन मिलता है। भगवान शंकराचार्य ने राजा अमरुक के मृत शरीर में अपना सूक्ष्म शरीर प्रबुद्ध करके गृहस्थ जीवन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त किया था। रामकृष्ण परमहंस ने महा प्रयाण के उपरान्त भी विवेकानन्द को कई बार दर्शन तथा परामर्श दिये थे। पुराणों में तो पग-पग पर ऐसे कथानकों का उल्लेख है।

पियोसोफिल सोसाइटी की जन्मदात्री मैडम व्लावटस्की के बारे में कहा जात है कि वे अपने को कमरे में बन्द करने के उपरान्त भी जनता को सूक्ष्म शरीर से दर्शन और उपदेश देती थी। कर्नल टाउन शेंड के बारे में भी ऐसे ही प्रसंग कहे जाते हैं। पाश्चात्य योग साधकों में से हैर्वटलमान, लिण्डार्स, एन्ड्र जैक्शन, डॉ. माल्थ, जेल्ट, कांगिटन, डुरावेल मुलडोन, अलिवर लाज, पावर्स डॉ. मेस्मर, ऐलेक्जेन्ड्रा, डेविडनीत, ब्रण्टन आदि के अनुभवों और प्रयोगों में सूक्ष्म शरीर की प्रमाणिकता सिद्ध करने वाले अनेक प्रमाण उपस्थित किये गये हैं। जे. मुलडोन अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को पृथक करने के कितने प्रदर्शन भी कर चुके थे। इनमें इस सबकी चर्चा अपनी पुस्तक ‘दी प्रोजेक्शन आफ आस्टल काँडी’ में विस्तार पूर्वक की है।

भारतवर्ष में स्वामी विशुद्धानन्द तथा स्वामी निमानन्द जी भी अपनी ऐसी अनुभूतियों को प्रमाणित कर चुके है ‘कहा जाता है कि तैलंग स्वामी को नंगे फिरने के अपराध में काशी के एक अंग्रेज अधिकारी ने जेल में बन्द करा दिया। दूसरे दिन वे जेल से बाहर टहलते हुए पाये गये। नाथ संप्रदाय के महीन्द्रनाथ, गोरखनाथ, जालन्धरनाथ, कणप्पा आदि के बारे में भी ऐसे ही वर्णनों का उल्लेख है।

आत्मा के अस्तित्व और शरीर न रहने पर भी उसका अस्तित्व बने रहने के बारे में पाश्चात्य दार्शनिकों और तत्व वेत्ताओं में से जिनने इस सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट समर्थन किया है उनमें राल्फ वाल्डो ट्राइन, मिडनी फ्लोवर, एलाह्वीलर, बिलकाक्स, वियमवाकर, एटकिंसन, जेम्स, केनी आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। पुराने दार्शनिकों में से कार्लाइल इमर्सन, काण्ट, हेगल, धामस, हिलमीन डासन आदि का मत भी इसी प्रकार का था।

जो कार्य हम स्थूल जीवन में करते हैं या मस्तिष्क में जैसे विचार भरे रहते हैं उनकी छप सूक्ष्म शरीर पर पड़ती रहती है और वह छाप ही संस्कार बन जाती है। मनुष्य का चिन्तन और कर्म जिस दिशा में चलता रहता है कालान्तर में वही स्वभाव को अभ्यास में लाया जात रहता है उसी तरह के संस्कार बन जाते हैं। यह संस्कार ही परिपक्व होकर शुभ अशुभ प्रारब्ध एवं कर्मफल का रूप धारण करते रहते हैं। इस प्रकार कर्मफल प्रदान करने की स्व-संचालित प्रक्रिया भी इसी सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न होती रहती है।

जिस प्रकार अखाद्य खाने दूषित जलवायु में रहने और असंयम बरतने से बाह्य शरीर दुर्बल एवं रुग्ण हो जाता है उसी प्रकार बुरे कर्म और बुरे चिन्तन से सूक्ष्म शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वह अपनी समर्थता खो बैठता है। कुमार्गगामी का अन्तःकरण सदा दुर्बल और कायर बना रहता है, फलस्वरूप अनेक मानसिक रोग उठ खड़े होते हैं। यों तो सूक्ष्म शरीर दूध में मक्खन की तरह समस्त शरीर में व्याप्त है। पर उसका मुख्य स्थान मस्तिष्क माना गया है। बुरे विचारों से मन मस्तिष्क और सूक्ष्म शरीर का सामान्य स्वास्थ्य सन्तुलन नष्ट हो जात है फलस्वरूप मनुष्य का व्यक्तित्व ही लड़खड़ाने लगता है और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। सात्विक जीवन शुद्ध आहार और शुभ विचार का क्रम ठीक बनाये रहने से ही आन्तरिक बलिष्ठता स्थिर रहती है। और उसी के आधार पर स्थूल शरीर को परिपुष्ट तथा दीर्घजीवी रखा जा सकता है।

सद्भावना सम्पन्न व्यक्ति जिन्होंने उक्त आदर्शों के अनुरूप अपनी निष्ठा परिपक्व की है उनका कारण शरीर परिपुष्ट होता है। स्वर्ग, मुक्ति शान्ति से लेकर आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन तक की दिव्य विभूतियां इस कारण शरीर की समर्थता पर ही निर्भर है। जिस प्रकार हम स्थूल शरीर की स्वस्थता का लाभ समझते हुए उसे सुस्थिर बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म और कारण शरीर की सुरक्षा एवं समर्थता के लिए सदैव सचेष्ट रहना चाहिए।


मुट्ठी में मौत और जेब में जीवन

विन्डसर स्टेट (अमेरिका) की विधान सभा के सम्मानित सम्माननीय सदस्य क्लेरेंस एडम, राजकीय पुस्तकालय के निर्देशक भी थे। यह पद उन्होंने बड़े यत्न से प्राप्त किया था सो भी केवल स्वाध्याय का शौक पूरा करने के लिये एडम की दिनचर्या में सर्वाधिक घण्टे पढ़ाई के थे-स्वाध्याय से हर विभूति खरीदी जा कसती है यह उनकी मान्यता थी और कहते हैं अपने इस विश्वास से उसने एक दिन अपनी मृत्यु को भी वश में करके दिखा दिया।

दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य एक दिन क्लेरेंस एडम के हाथ आस्टाइन एडम की पुस्तक मैस्मरेजम पर पच्चीस रहस्यमय पाठ (ट्वेन्टीफाइव सीक्रेट लेसंस इन मैस्मरेजम) और डाक्टर बर्नहम की हिप्नोटिज्म का इतिहास (हिस्ट्री आफ हिप्नोटिज्म) हाथ लग गई। पुस्तकें अभी तक पूरी नहीं पढ़ी जा सकी थी कि एडम के मन में इस विद्या के प्रयोग की तीव्र इच्छा उठ खड़ी हुई। एडम मानवीय चेतना की अद्भुत शक्तियों के प्रमाण थे यद्यपि उन्होंने अपराधी जीवन प्रारम्भ कर दिया किन्तु इस बात के प्रमाणीकरण में कोई त्रुटि नहीं आई कि मनुष्य की प्राण-चेतना सचमुच ही एक आश्चर्यजनक शक्ति है प्राण शक्ति के प्रयोग से व्यक्ति अद्भुत कार्य कर सकता है। सिद्धियाँ प्राण शक्ति के ही नियन्त्रण का अद्भुत परिणाम होती है।

एडम ने पहला प्रयोग वाटरमैन फ्लावरा मिल में किया। एक दिन घनी रात के अन्धकार में एडम उस मील के फाटक में जा घुसे। न तो सेंध काटी और न ही संतरी को जबरन क्लोरोफार्म सुँघाया। जड़ चेतन किसी को भी प्रभावित कर मन मर्जी काम ले लेना तो अब मात्र उनकी दृष्टि का काम था; हिप्नोटिज्म और मैस्मरेजम का उन्होंने कुछ इस तरह अभ्यास किया। फ्लावरा मील खजाने का चौकीदार हाथ में रायफल लिये खड़ा था। एडम ने कोई मार-पीट नहीं की। भरपूर दृष्टि डाली चौकीदार के चेहरे पर। नजरें चार हुई न जाने कौन सा मन्त्र फूँका एडम ने कि चौकीदार जहाँ था वहीं खड़े का खड़ा रह गया। मानो उसे खड़े खड़े सोने की बीमारी हो गई हो। एडम अब तिजोरी के पास पहुंचा ताला खोला बिना किसी चाभी के जड़ पदार्थ भी अब उनकी दृष्टि प्रखरता के दास बन गये थे। तिजोरी से 15 हजार डालर निकाले। ताला उसी तरह बन्द कर दिया और बड़े मजे से वहाँ से चले आये मानो डालर चुराये नहीं हों वरन् अपनी ही सम्पत्ति लेकर निकले हों। चौकीदार अभी तक यन्त्रवत् खड़ा था। एडम के जाने के बाद उसे पता चला कि कोई आया था और तिजोरी की चोरी हो गई। प्रातःकाल पुलिस के सामने उसने बयान दिया-एक आदमी आया उसने मेरी ओर देखा तो मैं संज्ञाहीन सा खड़ा रह गया उसने सारा काम किया पर मुझे पता नहीं कौन था क्यों मैं न तो बोल सका और न ही हिल डुल सका। चोरी उसने मेरे देखते की पर मुझे ऐसा लगता था कि मेरे ऊपर हल्का सा धुयें का पर्दा पड़ा हुआ है और मैं उसमें बन्दी हूँ कुछ कर नहीं सकता था मैं, जब तक वह व्यक्ति यहाँ रहा।

इस घटना के कुछ ही दिन बाद बिन्डसर के एक जौहरी की दुकान में एक आदमी आया, उसने अपनी विलक्षण दृष्टि से जौहरी को देखा। जौहरी इस तरह निस्तब्ध रह गया मानो वह काष्ठ विनिर्मित हो उस आगन्तुक ने अच्छे अच्छे जवाहरात, जौहारी और बाजार की भारी भीड़ के बीच अपनी जेब में भरे और वहाँ से चला गया देखा सबने पर किसी ने न पहचाना, न प्रतिरोध किया, कौन आया, कहाँ गया यह भी किसी को पता नहीं था पीछे जौहरी से पुलिस ने बयान लिये तो उसने भी वही शब्द दोहराये जो पहले चौकीदार ने कहे थे।

एक दिन समुद्र की हवा खाने के लिये बिन्डसर के एक करोड़पति अपनी धर्मपत्नी के साथ कार पर आ रहे थे उनकी भेंट अनायास ही इस जादूगर से हो गई। उसे उनके सारे जेवर और घड़ियाँ उतरवा लीं और उन्होंने ऐसे दे दिया मानो उपहार दे रहे हों पीछे जो बयान दिये उन्होंने, वह पहले वाले पीड़ितों के बयानों से अक्षरशः मिलते जुलते थे।

इन खबरों ने एकबार तो बिन्डसर राज्य में तहलका मचा दिया। कुबेरों की नींद हराम हो गई। एक मिल मालिक ने तो अपने बंगले के सभी निकासों पर स्वचालित बन्दूकें लगवा दी। इन्हीं बन्दूकों के बल पर क्लेरेंस एडम पकड़े जा सके। एक रात वे जब इस बंगले के दरवाजे पर पहुँचे और अन्दर प्रवेश करने का प्रयत्न करने लगे तो बन्दूक ने उन्हें घायल कर दिया। धड़ाके की आवाज सुनकर लोग दौड़-दौड़ आये। एडम को पहचानकर लोग आश्चर्यचकित रह गये। अदालत में एडम ने अपने ऊपर लगाये गये वह सारे अभियोग स्वीकार कर लिये और यह भी मान लिया कि यह सब उन्होंने सम्मोहन विद्या (हिप्नोटिज्म) के द्वारा किया है।

यद्यपि उन्होंने अपराध जगत में शौकिया प्रवेश किया था किन्तु अपराध तो अपराध ही ठहरा-उन्हें दस वर्ष सश्रम कारावास का दण्ड दिया गया और वे शहर की अपेक्षा बिन्डसर की पहाड़ी जेल में भेज दिये गये। जेलर उनकी भद्र वेष भूषा और साँस्कृतिक रहन-सहन से बहुत अधिक प्रभावित हुआ से वह एडम के लिये अनायास ही उदार बन गया। इस उदारता का लाभ एकबार फिर एडम को मिला। उसने जेलर की सहायता से अपने लिये कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिये प्राप्त करलीं इन्हीं पुस्तकों में उसकी वह दोनों मनचाही पुस्तकें भी थी। दरअसल अन्य पुस्तकें तो साथ में एडम ने केवल इसलिये मंगवाई थी कि किसी को उस पर शक न हो जाये। यह पुस्तकें उसने अपनी विद्या को आगे बढ़ाने के लिये मंगाई थी सो एकबार फिर से जेल में ही उसका साधना-अनुष्ठान चल पड़ा और दूसरे लोगों को इस बात की कानों-कान खबर न हुई।

एक दिन दैवयोग से जब एडम अपने कमरे की चीजों पर हिप्नोटिज्म का अभ्यास कर रहे थे तब उन्हें जेल के एक अन्य डाक्टर कैदी ने देख लिया, उसका भी हिप्नोटिज्म सीखने का मन था। धीरे-धीरे दोनों में बातचीत होने लगी और यही बातचीत एक दिन प्रगाढ़ मैत्री में बदल गई।

किन्तु इन्हीं दिनों एडम बीमार पड़ गये उनका इलाज हुआ पर वे अच्छे हुए ही नहीं। एक दिन अपने डाक्टर मित्र के कमरे में प्राण त्याग दिये। जेल के डाक्टर ब्राउस्टर ने उनकी अत्यन्त परीक्षा की और उन्हें मृत घोषित कर मृत्यु का प्रमाण पत्र भी दे दिया। एडम के भतीजे विलियम डान को वह शव भी सौंप दिया गया। शव ले जाकर विलियम डान ने बिन्डसर के कब्रगाह के संरक्षक को सौंप दिया ताकि अगले दिन उसे एक सुरक्षित कब्र में दफनाया जा सके। एडम का शव एक संदूक में कफ़न लपेट कर रख दिया गया।

जाड़े के दिन थे, उस दिन तो और भी भयंकर शीत थी, हिमपात हो रहा था ऐसे समय तीन चार व्यक्ति उस कब्रिस्तान में प्रविष्ट हुये और जिस पेटी में एडम का शव था उसके पास गये। सन्दूक खोलकर उनका शव निकाला और उसके स्थान पर उन्होंने अपने साथ लाये शव को लिटा दिया। ताला जैसे का तैसा बन्द कर वह लोग बाहर आ गये और घनघोर अन्धकार में न जाने कहाँ खो गये। इस बार कब्रिस्तान के संरक्षक के साथ भी वही सम्मोहन हुआ वह सब कुछ देखते हुये भी कुछ कर न सका पर उसने जो रिपोर्ट दी-उससे यह पता चल गया कि लाश बदली गई और जिसने यह सारा काम किया उसका हुलिया डॉ. मार्टिन जैसा था। दूसरे दिन एलियास से खबर मिली कि वहाँ से एक शत की चोरी गई है। लोगों ने जाकर बदले हुये शव को खुलवा कर देखा पर उसका चेहरा कुछ इस तरह विकृत था कि पहचान में ही नहीं आया जबकि एडम का शव में किसी प्रकार के दाग धब्बे नहीं थे। तो भी यह रहस्य रहस्य ही बना रह गया।

कुछ दिन बीते बिन्डसर का एक नागरिक कनाडा आया। वहाँ वह एक होटल में खाना खाने पहुँचा तो यह देखकर अवाक् रह गया कि वहाँ एडम और डॉ. मार्टिन दोनों साथ-साथ बैठे भोजन कर रहे है। वह बहुत घबराया, जब तक सम्मल कर पुलिस को सूचना दे तब तक वह दोनों व्यक्ति वहाँ से जा चुके थे। घटना अखबारों में छपी तो एकबार फिर से बिन्डसर के धन कुबेर काँप गये। इस बीच कई स्थानों पर उसके देखे जाने की खबरें मिली। सभी खबरें विश्वस्त व्यक्तियों द्वारा दी गई थी फलस्वरूप एकबार फिर से पुलिस और सी.आई.डी. विभाग सतर्क किया गया। पर एडम पकड़ा नहीं जा सका। कहते हैं उसने ओझल और अन्तर्धान होने की विद्या जान ली थी यही नहीं उसने अपने शरीर की हर अनैच्छिक क्रिया पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया था। एक क्षण में मर जाना और दूसरे ही क्षण जीकर काम में लग जाना उसके लिये बाँये हाथ का खेल था।

आखिरी भेंट एक सी.आई.डी. ऑफिसर से अमेरिका के ही टोरन्टो नगर में हुई। एडम ने अधिकारी से काफी देर तक बातचीत की। जैसे ही पुलिस के सिपाही गिरफ्तार करने के लिये सी.आई.डी. ऑफिसर का संकेत पाकर आगे बढ़े और उसे चारों ओर से घेरे में ले लिया, एडम एकाएक अन्तर्धान हो गया। सी.आई.डी. अधिकारी तथा सिपाही एक दूसरे का मुँह ताकते खड़े रह गये। इसके बाद एडवर्ड स्मिथ ने उसका विस्तृत परिचय छापा और स्वीकार किया कि उसके पास कोई अद्भुत योग शक्ति थी जो किसी भी भौतिक शक्ति से कहीं अधिक समर्थ थी किन्तु उसके बाद से आज तक एडम के बारे में कुछ भी पता नहीं चल पाया कि वह कहाँ गया है, भी या नहीं और है तो लोगों को दीखता क्यों नहीं ?

यह घटना भारतीय योगियों की सी सिद्धि और प्राण नियन्त्रण की जैसी घटना है उससे जीवनी शक्ति की विलक्षणता, विलगता और समर्थता का ही प्रतिपादन होता है।

" यदि मनुष्य केवल यही समझ पाते कि भलाई करने के अतिरिक्त सुरक्षा का एनी कोई उपाय नहीं,तो वे कितने प्रसन्न होते।"

-जॉन फाउंटेन


बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला

बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से उनकी माँ पूछ रही थी- ‘बेटा ! यदि तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर मेरी ही गरदन काटने आ जाये तो तुम क्या करोगे ?’

‘माँ आज ऐसी अनहोनी बात क्यों पूछ रही हो। भले ही मेरा अंग्रेजों से युद्ध चल रहा हो। पर आपने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है। आप पर हाथ उठाने का यदि किसी ने भी प्रयास किया तो उसका हाथ कलाई से तोड़ दिया जायेगा और मौत के घाट उतारा जायेगा।’ सिराज ने जोश में भरकर उत्तर दिया।

‘पर यह भी तो सम्भव है कि वह संख्या और शक्ति में तुम से अधिक हों, तब तो मेरा जीना हराम कर देंगे वह।’

‘नहीं माँ ! ऐसी बात नहीं। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आज आपको मेरी शक्ति पर अविश्वास क्यों हो रहा है। मुझे आपत्ति ग्रस्त देखकर मीर जाफर ने अवश्य मेरे विरुद्ध षडयन्त्र कर दिया है। और मुझे परास्त करना चाहता है पर मैं पारिवारिक जीवन के कर्त्तव्यों से उदासीन नहीं हूँ। विश्वास रखो माँ ! मुझसे कितना ही शक्तिशाली शत्रु क्यों न हो। पर मैं अन्तिम समय तक मौत के घाट उतारने में लगा रहूँगा। यह मेरा दृढ़ संकल्प है।’

सिराज की बात सुनकर माँ को सन्तोष हुआ। उसे अपना काम बनता दिखाई दिया। उसने कहा-’बेटा सिराज ! मैं तुमसे कई दिन से निराशा की भावना देखती आ रही हूँ। मीर जाफर के षडयन्त्र से तुम्हारे हौसले पस्त हो गये हैं और आत्म-समर्पण की बात सोच बैठे हो। तुम्हारी मातृभूमि पर शत्रु हथियार उठाये खड़ा है। वह मातृभूमि अकेले तुम्हारी ही नहीं मुझ जैसी सैंकड़ों माताओं की भी है।’ माँ की बात बेटे को चुभ गई। वह माँ का आशय समझ चुका था। शत्रुओं को पछाड़ने के लिए वह आतुर हो उठा।

अब एक क्षण की भी वह देर न करना चाहता था। वह उठा और तुरन्त बाहर चला गया। एक दिन उसका कवच ही उसके शव का आवरण बना।


कौन है वह प्रेरक शक्ति ?

घटना इंग्लैंड के चेशायर नगर की है। यहाँ रहने वाली जिना ब्यूचम्प जो एक सेक्रेटरी का काम करती थी एक दिन विक्टोरिया स्टेशन पर बैठी अपनी माँ से बातचीत कर रहीं थी। स्टेशन वे इसलिए गई थी कि उन्हें ट्रेन द्वारा मेन्स्टन सिटी जाना था और वहाँ से हवाई जहाज द्वारा ‘कारेटा ब्रेवा’।

ट्रेन आने में अभी थोड़ी देर थी इसीलिये माँ-बेटी एकान्त में बैठी बातचीत कर रही थी। अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि एका-एका ‘जिना’ बोली- माँ मुझे बार बार डर लग रहा है और ऐसा लगता है कि मरे अवचेतन मन में कोई कह रहा है कि यह यात्रा खतरे से खाली नहीं है। मैं यह यात्रा नहीं करूंगी।

माँ बोली- ‘बेटी ! यह तेरा वहम है। तू तो व्यर्थ ही डर रही है इस तरह का अन्ध-विश्वास एक प्रकार का पिछड़ापन है तुझे ना करते देखकर बड़ा असमंजस हो रहा है। इस पर जिना बोली- माँ तुम कुछ भी कहो पर मुझे तो यह विश्वास है कि संसार अपनी प्रेरक सत्ता से रिक्त नहीं मेरे अन्तःकरण में उठ रही दैवी स्फुरणा झूठ नहीं हो सकती।’

माँ ने बहुतेरा समझाया पर जिना ने एक न सुनी वह फिर जाने के लिए तैयार ही नहीं हुई। माँ ने यात्रा अकेले ही की। यात्रा क्या थी मौत का बुलावा था। कहते हैं संसार के प्राणियों की जन्म मृत्यु का हिसाब रखने वाली कोई सत्ता है जिसे यमराज कहते हैं वे हर व्यक्ति को निश्चित समय पर मृत्यु के लिए प्रेरित कर देते हैं और संसार के पालक पोषक संरक्षक भगवान जिसे बचाना चाहते हैं मौत के मुँह से झपट कर बचा लेते हैं कोई अनुभव करे या न करे कि संसार सचमुच सूक्ष्म शक्तियों के विधान पर चल रहा है-यहाँ प्रस्तुत की जा रही घटनायें इस बात की पुष्टि करती है।

जिना को स्टेशन से घर लौटे 4-5 घण्टे ही हुये थे तभी-’अरजैन्ट’ (द्रुतगामी) तार आया। अब तक जो मात्र प्रेरणा और आशंका थी वह सच निकली। तार में सूचना थी- आपकी माँ श्रीमती व्यूचैम्प जिस जहाज से कोरटा ब्रेवा जा रही थी वह परपिगनान (फ्राँस) के पास गिर कर नष्ट हो गया और आपकी माँ की मृत्यु हो गई।

इस विमान दुर्घटना में विमान में सवार एक भी व्यक्ति नहीं मरा। जिना को अन्तिम समय प्रेरणा और कार्यक्रम का परिवर्तन क्या किसी भूत और भविष्य को जानने वाली मनुष्य से उच्च सत्ता का काम नहीं है ?


शास्त्री का मंगलवार

शास्त्री का मंगलवार

भारत के भू.पू. प्रधान मन्त्री स्व. श्री लालबहादुर शास्त्री के जीवन में मंगलवार का महत्व उनके जीवन की एक उल्लेखनीय घटना है-1. उनका जन्म मंगलवार के दिन हुआ। 2. एकबार गंगा स्नान करते समय वे अपनी माँ की गोद से छूटकर गिर गये। भीड़ अधिक थी अतएव पता नहीं चल सका पर वह एक किसान की टोकरी में गिरकर बच गये-वह दिन भी मंगलवार था। 3. 1940 में गिरफ्तार हुये वह दिन भी मंगलवार था। 4. यू.पी. पार्लियामेन्टरी बोर्ड के मन्त्री वे मंगलवार को बनाये गये। 5. 1947 में पुलिस एवं यातायात मन्त्री। 6. 1951 में काँग्रेस के महा सचिव। 7. 1952 में रेलमन्त्री, 8. 1956 में परिवहन मन्त्री वे मंगलवार के दिन ही बने। 9. प्रधान मन्त्री भी वे मंगलवार को ही बने। 10. मंगलवार को ही उन्हें भारत रत्न की उपाधि मिली यह उपाधि उन्हें राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने दी। 11. मंगलवार का ही दिन था जब उन्होंने ऐतिहासिक ताशकंद वार्ता प्रारम्भ की। 12. उनका निधन भी मंगलवार के ही दिन हुआ।


प्रेम तत्व-वैज्ञानिक विश्लेषण और उसका महान महत्व

कई छोटे बच्चे ऐसे मिले जिनमें बाल्यकाल से ही विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का विकास आयु के अनुपात से कई गुना अधिक था। न्यूयार्क (अमेरिका) के डाक्टर रेनी स्पिट्ज ने उनकी पारिवारिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त की तो मालूम हुआ कि उनमें से 99 प्रतिशत ऐसे थे जिन्हें अपनी माँ का प्रेम नहीं मिला था। या तो उनकी माँ का देहावसान हो चुका था या सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें माँ से अलग कर दिया था- स्थिति कुछ भी रही हो परिणाम एक ही था कि वे बच्चे आत्मिक दृष्टि से बड़े क्रूर और उत्पाती थे।

इस प्रारम्भिक अन्वेषण ने डॉ. रेनी स्पिट्ज को प्रेम भावना के वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रेरणा भर दी। उन्होंने दो भिन्न सुविधाओं वाले संस्थानों की स्थापना की एक में वह बच्चे रखे गये जिन्हें थोड़ी थोड़ी देर में माँ का वात्सल्य और दुलार प्राप्त होता था। वे जब भी चाहें, जब भी माँ को पुकारें उन्हें अविलम्ब वह स्नेह सुलभ किया जाता था और दूसरी ओर वह बच्चे रखे गये जिनके लिये बढ़िया से बढ़िया भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, क्रीड़ा के बहुमूल्य साधन उपस्थित किये गये पर मातृ प्रेम के स्थान पर इन्हें एक संरक्षिका भर मिली थी जो दस-दस बारह-बारह बालकों का नियन्त्रण करती थी। प्रेम और दुलार इतने बच्चों को वह भी कृत्रिम वहाँ अकेली नर्स कहा से दे पाती ? हाँ कभी-कभी झिड़कियाँ उन बच्चों को अवश्य पिला देती। उन बच्चों का यही था जीवन क्रम।

एक वर्ष बाद दोनों स्थानों के बच्चों का परीक्षण किया गया। उनकी कल्पना शक्ति की मनोवैज्ञानिक जाँच, शारीरिक विकास की माप, सामाजिकता के संस्कार, बुद्धि चातुर्य और स्मरण शक्ति का परीक्षण किया गया। जिस प्रकार दोनों संस्थानों की परिस्थितियों में पूर्ण विपरीतता थी परिणाम भी एक दूसरे से ठीक उलटे थे, जिन बच्चों को साधारण आहार दिया गया था- जिनके लिए खेलकूद, रहन-सहन के साधन भी उतने अच्छे नहीं दिये गये थे किन्तु माँ का प्रेम प्रचुर मात्रा में मिला था पाया गया कि उन बच्चों की कल्पना शक्ति, स्मृति सामाजिक सम्बन्धों के संस्कार शरीर और बौद्धिक क्षमता का विकास 101.5 से बढ़कर एक वर्ष में 105 विकास दर तक बढ़ गया था। दूसरे संस्थान के बच्चों की, जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाओं की तो भरमार थी पर प्यार के स्थान पर गहन शून्यता, विकास दर 124 से घटकर 72 रह गयी थी। इन बच्चों को उसी अवस्था में एक वर्ष तक और रखा गया तो पाया कि वह औसत 72 से भी घटकर बहुत ही आश्चर्यजनक बिन्दु 42 तक उतर आया है। पहली संस्था के बच्चों के शारीरिक विकास के साथ दीर्घ जीवन में भी वृद्धि हुई क्योंकि देखा गया कि उस संस्थान में जो 236 बच्चे रखे गये थे उनमें से इस दो वर्ष की अवधि में एक भी शिशु की मृत्यु नहीं हुई जबकि प्यार-विहीन बच्चों वाले संस्थान के 37 प्रतिशत शिशु काल के मुख में अकाल समा गये।

प्रेम की विधायक शक्ति संसार की समस्त शक्तियों से सर्वोपरि है आज का संसार प्रेम के लिए तड़प रहा हैं किन्तु परिस्थितियाँ मनुष्य ने अपनी ही भूल से ऐसी विकृत करलीं कि घर-बार--धन-सम्पत्ति--मकान परिवार सब कुछ होते हुये भी किसी को निस्वार्थ प्रेम उपलब्ध नहीं। इन्द्रिय सुखों की हुड़क और ललक का तो सर्वत्र बोलबाला है किन्तु आत्मा को असीम शक्ति और शान्ति प्रदान करने वाला प्रेम कहीं नाम मात्र को भी दिखाई नहीं देता। डा0 एड्रीन वान्डेर के अनुसार आज जो सर्वत्र पागलपन (न्युरासिस) की स्थिति दिखाई दे रही है वह मातृवत् प्रेम के अभाव के कारण ही हैं।

मनुष्य सर्वोपरि आत्मा है शेष सब पीछे की बातें हैं। शरीर गौण है आत्मा प्रधान-सो आत्मा की तृप्ति का स्थान प्रथम और शारीरिक सुविधाओं का गौण है। जड़ को खुराक, पानी मिलता रहे तो वृक्ष अपने विकास की सुविधायें कहीं से भी अपने आप जुटा लेता है पर बाहर से उसकी पत्तियों में पानी छिड़का जाता रहें, धूप दी जाती रहें खाद और कीटाणु नाशक बुरके जाते रहें पर जड़ को न तो दिया जाये पानी और न खुराक ऐसी स्थिति में पेड़ जी सकेगा ? प्रेम आत्मा की प्यास और हर हृदय की एकमात्र चाहना है यदि प्रेम न मिलेगा तो जीवन हरा-भरा न रह सकेगा। वह मुरझायेगा और अवश्य मुरझायेगा चाहे बाहर से उसे धन-सम्पत्ति यश और वैभव के भाण्डागार में ही क्यों न गाड़ दिया जाये।

डा0 फ्रीट्स टालबोट एकबार जर्मनी गये। वहाँ उन्होंने ड्यूशेल्डोर्फ नगर का बच्चों का अस्पताल देखा। इस अस्पताल में उन्होंने एक वृद्ध स्त्री देखी जो देखने में आकर्षक भी नहीं थी किन्तु जितनी भी बार डा0 टालबोट ने इसे देखा उसकी मुखाकृति में एक विलक्षण शांतिप्रद सौम्यता और मुस्कान उन्होंने देखी। हर समय उसकी बगल में कोई न कोई बच्चा दबा हुआ होता। टालबोट के मन में उस स्त्री को देखकर उसे जानने की अनायास जिज्ञासा उत्पन्न हो गई उन्होंने अस्पताल के डाइरेक्टर ने उस स्त्री का परिचय पूछा तो-डाइरेक्टर ने बताया - वह तो अन्ना है श्रीमान जी ! डाक्टरों की डाक्टर ! एक ही औषधि है उसके पास-’प्रेम’ जिन बच्चों को हम असाध्य रोगी घोषित कर देते हैं अन्ना उन्हें भी अच्छा कर देती है।

यह घटना उन दिनों की है जब अमेरिका - इंग्लैंड आदि विकसित देशों में भी अस्पतालों में भरती होने वाले अधिकांश बच्चे मृत्यु के ग्रास बन जाते थे क्योंकि वे अपनी बीमारी बता नहीं पाते थे और डाक्टर रोगों को पहचान नहीं कर पाते थे किन्तु अन्ना ने यह दिखा दिया कि बच्चे ही नहीं प्रेम तो हर मनुष्य की औषधि है संजीवनी है, अमृत है प्रेम पाकर कोई व्यक्ति मर नहीं सकता। अन्ना इसे प्रयोग करके दिखाती थी। अस्पताल के असाध्य रोगी बच्चों को छाती से चिपकाये वह अस्पताल के अहाते रोगी घूमती, काम करती और अपने इस सामान्य जैसे जीवन क्रम में ही केवल बच्चों को चूम-चूमकर उन्हें हार्दिक स्नेह दुलार के साथ कभी नहला कर, कभी चोटी गुह कर, कभी खेल खिलाकर यह विश्वास करा देती कि अन्ना के अन्तःकरण में प्रेम का सागर लहराता है और वह समस्त समुद्र उसी के लिये है रोगी अपना कष्ट भूल जाता अच्छा होने लगता पथरी जो आपरेशन से निकालना कठिन होता अन्ना का प्यार उसे गला कर नष्ट कर देता जो कीटाणु वर्षों औषधि खाने पर भी नहीं मरते अन्ना का प्रेम उन्हें दो दिन में नष्ट कर देता और अन्ना ही वह प्रकाश थी जिसने योरोप को पहली बार शिशु सदनों में बाल विकास अस्पतालों में रोगियों की चिकित्सा में प्रेम-माधुर्य को सर्वोपरि स्थान देने की व्यवस्था बनाईं।

प्रेम की “सृजन शक्ति” दुनिया की हर ताकत से बड़ी है। प्रेम की तुलना तो भगवान से ही हो सकती है प्राणियों का जीवन आधार यह प्रेम ही है प्रेम सुधा पीकर मरणासन्न भी जी उठते हैं फिर यदि जीवितों को प्रेम पयपान का अवसर मिल जाये तो वसुन्धरा स्वर्ग बन जाये न कोई रोगी रहे न दुःख यदि संसार में एकबार निस्वार्थ प्रेम का सागर लहरा जाये।


भगवान ही सबका पालक है

एक राजा को यह अभिमान था “मैं ही राजा हूँ और सब जगत् का पालक हूँ, मनु आदि शास्त्रकारों के व्यर्थ विष्णु को गत् पालक कहकर शास्त्रों में घुसेड़ दिया है।’ एकबार एक संन्यासी शहर के बाहर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। लोग उनकी शान्तिप्रद मीठी-मीठी बातें सुनने के लिए वहाँ जाने लगे। एक दिन राजा भी वहाँ गया और कहने लगा कि मैं ही सब लोगों का पालक हूँ।’ यह सुनकर सन्त ने पूछा-’तेरे राज्य में कितने कौए, कुत्ते और कीड़े हैं ?’ राजा चुप हो गया। सन्त ने कहा-’जब तू यही नहीं जानता तो उनको भोजन कैसे भेजता होगा ? राजा ने लज्जित होकर कहा-’तो क्या तेरे भगवान कीड़े-मकोड़े को भी भोजन देते हैं ? यदि ऐसा है तो मैं एक कीड़े को डिबिया में बंद करके रखता हूं, कल देखूँगा भगवान इसे कैसे भोजन देते हैं ? दूसरे दिन राजा ने सन्त के पास आकर डिबिया खोली तो वह कीड़ा चावल का एक टुकड़ा बड़े प्रेम से खा रहा था। यह चावल डिबिया बन्द करते समय राजा के मस्तक से गिर पड़ा था। तब उस अभिमानी ने माना कि भगवान ही सबका पालक है।


अवांछनीय बन्धनों से मुक्त होने की आवश्यकता

‘बन्धनों से मुक्ति’ मानव जीवन का चरम लक्ष्य है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर के आन्तरिक षडरिपु हमें आन्तरिक अदृश्य बन्धनों में बाँधते हैं। ईर्ष्या, अहंता, घृणा, निष्ठुरता, कृपणता, संकीर्णता की षड् विधि माया दानवी ने हमारे अन्तः वर्चस्व रूपी स्वातंत्र्य का अपहरण कर लिया हैं। फलतः हम सर्व समर्थ होते हुए भी दुःख दारिद्रय और शोक-सन्ताप की व्यथा वेदनाएं सहते हुए पतित जीवन जी रहें हैं। यदि अपने स्वरूप, वर्चस्व और तद्नुरूप जीवन की रीति-नीति एवं विधि व्यवस्था का निर्धारण किया गया होता तो हेय और पतित परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य किसी और ही उच्च भूमिका का सम्पादन कर रहा होता। तब वह न तो नर पशु होता न नर पिशाच बनता। सम्पादन रहा होता है। तब वह न तो पन पशु होता न नच पिशाच बनता। तब उसे नर-नारायण और पुरुष पुरुषोत्तम के रूप में महा मानव के रूप में ही देखा समझा जा रहा होता।

आन्तरिक शत्रुओं ने हमें निविड़ नागपाश में बाँधा है और सारे स्वत्व वर्चस्व का अपहरण करता रहता है। जी आता है तो उसका प्राण भी हरण कर लेता है और माँस खाल को बेचकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। जीव की भी यही स्थिति है वह जिन आन्तरिक दुर्बलताओं के नागपाशों से जकड़ कर असहाय बना दिया गया है उनके रहते रोने कलपने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। आनन्द और उल्लास केवल स्वतन्त्र परिस्थितियों में सम्भव है। प्रगति और वर्चस्व की संभावनाएं बन्धन मुक्ति की स्थिति प्राप्त किये बिना सम्भव नहीं। इस तथ्य को समझते हुए अध्यात्म के क्षेत्र में मुक्ति को सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्तियोग का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है कि मनुष्य भव-बन्धनों के नागपाश को काट कर अपनी स्वतन्त्र चेतना एवं प्रतिभा को विकसित होते देखकर आनन्द और उल्लास भरी चेतना के साथ पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अग्रसर हो सके। बन्धन बंधे रहने पर यह अवसर सर्वथा असम्भव है।

भौतिक जीवन में भी बन्धनों के विरुद्ध संघर्ष का क्रम चलता रहा है और चल रहा है। राजनैतिक पराधीनता भौतिक जीवन में सबसे बुरे और सबसे फूहड़ किस्म की है। कोई देश या वर्ग किसी दूसरे देश या वर्ग पर अपना आधिपत्य जमा कर उसे किस प्रकार शोषित और पतित करता है इसके रक्त रंजित और हृदय द्रावक इतिहास से विश्व के राजनैतिक इतिहास का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। अभी का ताजा उदाहरण अपने पड़ोसी बंगला देश को ही देखिये। पंजाबियों ने बंगालियों को राजनैतिक गुलामी में जकड़ कर उन्हें किस प्रकार चूसा और सताया है इसे खुली आँखों से प्रत्यक्ष देखा जा रहा है। भूतकाल के इतिहास की कौन कहे। डाकुओं के गिरोह राजा और सामन्तों के रूप में बड़ी और सामूहिक डकैतियों के रूप में एक दूसरे के किले तो तोड़ते-एक दूसरे के राज्य को लूटते रहते थे। युवा नर-नारियों को पकड़ ले जाते थे और भेड़ बकरियों जैसा उनका उपयोग उपभोग करते थे। दास दासी प्रथा का ऐसा ही घिनौना इतिहास मध्य कालीन युग की कलंक कालिमा का अभी भी स्मरण दिलाता रहता है।

राजनैतिक चेतना की अभिवृद्धि के साथ-साथ राजनैतिक स्वतन्त्रता की भी लहरें आईं और पिछली दो तीन शताब्दियों में इस सम्बन्ध में बहुत कुछ प्रगति भी हुई है। जहाँ उपनिवेशवादी प्रत्यक्ष पराधीनता के अवशेष विद्यमान हैं वहाँ संघर्ष भी चल रहे है। बन्धनों के विरुद्ध चेतना उत्पन्न हो जाने पर वे टूट कर रहते हैं। लगता है राजनैतिक पराधीनता के अवशेषों का भी उन्मूलन देर सवेर में होकर ही रहेगा।

बाँधने वाली पराधीनताओं में से एक राजनैतिक भी है। जो अधिक स्पष्ट और अधिक प्रत्यक्ष होने से सहज ही समझ में आ जाती है और उसका सम्बन्ध विदेशियों विजातियों को भगाने से होता है इसलिए प्रत्यक्ष संघर्ष के द्वारा प्रयोजन पूरा भी आसानी से हो जाता है पर इसके अतिरिक्त अनेक वे बन्धन शेष रह जाते हैं जो परोक्ष हैं और सहज ही समझ में नहीं आते। इनमें सामाजिक और मानसिक पराधीनताएं विलक्षण है। वे राजनैतिक पराधीनता से भी बुरी किस्म की हैं अपेक्षाकृत अधिक हानिकारक है। पर जीवन क्रम में घुल मिल जाने और स्वभाव का अंग बन जाने से उनकी बुराई समझ में भी नहीं आती और अभ्यस्त हो जाने के कारण उन्हें छोड़ने को जी भी नहीं करता।

अपनी सामाजिक पराधीनता को ही लें उसमें जाति-पाँति, ऊँच-नीच, लिंग भेद की मान्यताएं ऐसी हैं जिनने अपने किसी समय के अति गौरवशाली समाज को आज छिन्न-भिन्न अस्त-व्यस्त और दीन-हीन बनाकर रख दिया हैं हिन्दू समाज तथ्यतः एक होते हुए भी 1700 जातियों और हजारों उप जातियों में बंटा पड़ा है। एक समाज के भीतर यह हजारों समाज ऐसे हैं जो प्रथकता और भिन्नता की दीवारें दिन-दिन मजबूत करते जाते हैं और हम दिन-दिन विश्रृंखलित एवं दुर्बल होते जा रहे है। ऊँच-नीच की प्रवृत्ति ने करोड़ों उपेक्षित लोगों को विधर्मी बना दिया और वे प्रथक राष्ट्र के रूप में विभाजित हो गये शेष आगे प्रथक होने की तैयारी में लग रहे हैं। सवर्ण सवर्णों के बीच भी जो प्रथकता की दीवारें हैं उनने संगठन, प्रेम और एक्य की सम्भावनाओं को बुरी तरह खोखली कर दिया है। एक सीमित वर्ग में ही विवाह शादी हो सकने की मान्यता ने दहेज जैसी बुराइयों को पैदा किया और इस विवाहोन्माद के कुचक्र ने आर्थिक प्रगति की सारी सम्भावनाओं को नष्ट करके रख दिया विवाह शादियों के नाम पर उन्मादियों की तरह अपव्यय करने की जो प्रथा इन दिनों अपने समाज में प्रचलित है उनने हमें व्यापक रूप से बेईमान और दरिद्र रहने के लिए विवश कर दिया है। अनेकों सुयोग्य लड़कियों को उसी कुचक्र से लगभग वैधव्य जैसा जीवन जीना पड़ रहा है। कितनों के तो प्राणों पर ही बन आती है।

स्त्री जाति के रूप में मनुष्य समाज का आधा अंग लुंज-पुंज, अपाहिज, कैदी और पद-दलित बना पड़ा है। घूँघट और पर्दे के बन्धनों में जकड़ी हुई भारतीय नारी एक छोटे से घर पिंजड़े में आगे की बात न सोच सकती है न व्यापक क्षेत्र की देहरी पर एक कदम धर सकती है। उसे दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। अविश्वस्त ओर संदिग्ध बनी हुई वह एक प्रकार से उस कैदी का ही जीवन जीती है जो बिना सिपाही के संरक्षण के कहीं एक कदम भी नहीं धर सकता। उसके मन और तन के स्वामी दूसरे लोग होते हैं और वे ही उसे सोचने तथा करने के लिए विवश करते हैं। प्रतिभा नाम की वस्तु पैदा ही नहीं होने दी जाती यदि हो भी जाये तो उसका उपयोग अपने मालिक को रिझाने के अतिरिक्त और किसी काम में नहीं कर सकती। इस पराधीनता ने नारी को मात्र कठपुतली बना कर रख दिया है और वह मात्र उपभोग्य बनकर रह गई है। इस सामाजिक पराधीनता को क्या कहा जाये जिसने आधे स्त्री समाज और एक चौथाई हरिजन इस तीन चौथाई जनसंख्या को एक चौथाई सवर्ण पुरुषों की इच्छानुसार जीवनयापन करने के निविड़ बन्धनों में जकड़ दिया है।

इसके अतिरिक्त न जाने कितने रीति-रिवाज, प्रथा परम्परा, भूत पलीत, देवी-देवता, साधु बाबा, कितना समय और धन बर्बाद करते हैं। धूर्तों का एक बड़ा वर्ग भोली जनता को मानसिक पराधीनता के जाल जंजाल में जकड़ कर उसे भ्रमित और शोषित करता रहता है। इसका लेखा-जोखा लिया जाये तो प्रतीत होगा कि देश की शासन व्यवस्था चलाने में जितनी धन शक्ति, जन शक्ति और विचार शक्ति लगती है उससे ज्यादा जन स्तर पर इस बौद्धिक गुलामी की बलिवेदी पर चढ़ाई जाती रहती है। सामाजिक गुलामी अपने ढंग की अनोखी है। राजनैतिक गुलामी की बुराई और हानि समझना समझाना आसार है उसके विरुद्ध असहयोग और संघर्ष करने के लिए भी लोग आसानी से तैयार हो जाते हैं। पर सामाजिक गुलामी को तो समझना और समझाना भी कठिन है। जो लोग निरन्तर उससे उत्पीड़ित हो रहे हैं यह आश्चर्य की ही बात है। सवर्ण जिस तरह हरिजनों को अछूत समझते हैं उसी तरह हरिजनों हरिजनों के बीच भी जाति बिरादरी के नाम पर यह ऊँच-नीच उतनी ही गहराई तक जमी बैठी है। एक चमार एक महतर से छूतछात न मानने के लिए राजी नहीं होता इसी प्रकार ब्राह्मण ब्राह्मण के बीच भी उपजातियों के कारण रोटी बेटी व्यवहार कहाँ हो पाता है ? दहेज और विवाह शादियों में मृत्यु भोजों में तथा दूसरे रीति-रिवाजों में जो धन की बर्बादी होती है उसे उचित न समझने वाले लोग भी समाज के दबाव या भय से स्वयं कार्यान्वित करते हैं और उसे छोड़ने का साहस नहीं करते इस सामाजिक गुलामी को क्या कहा जाये ?

मानसिक गुलामी ने जातिवाद, भाषावाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद के संकुचित दायरों में आदमी के मस्तिष्क को बुरी तरह जकड़ कर एक संकीर्णता के बन्दीगृह में सीमित कर दिया है। लोग विशाल और उदात्त दृष्टि से सोच ही नहीं पाते। समग्र विश्व की दृष्टि से कोई बात सोच सकना बन ही नहीं पड़ता। समान सत्य को समझने और उसके प्रकाश में अपने पूर्वाग्रहों को निरस्त करने का साहस कर सकना शूर-वीर और योद्धाओं के वश की भी बात नहीं दीखती। विद्वान, तार्किक, दार्शनिक भी इस चट्टान से टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं। उसकी बौद्धिक प्रतिभा अपने संकीर्ण पूर्वाग्रही का समर्थन करने में ही आकाश पाताल के कुलावे मिलाती रहती है। यह देखकर बड़ी निराशा होती है कि आदमी तथाकथित विद्या, समझदारी, सूझ-बूझ, तार्किकता का धनी होते हुए भी अपनी सारी बौद्धिक प्रतिभा को अपने संकीर्ण पूर्वाग्रहों के समर्थन में ही नियोजित कर रहा है। शाश्वत सार्वभौम सत्य को समझने, समर्थन देने और अपनाने की उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ रही है। गुलामी निस्सन्देह एक अभिशाप है। राजनैतिक ही नहीं-सामाजिक और मानसिक गुलामी की विभीषिकाएं और भी अधिक भयंकर हैं वे मानव जाति की शान्ति और प्रगति पर ग्रहण बनकर छाई हुई है।

आत्मिक गुलामी का रोना तो ऋषि मुनियों से लेकर आज के धर्म और अध्यात्म क्षेत्र के प्रवक्ताओं तक समान रूप से रोया जाता रहा है। व्यक्ति अपनी कुत्साओं और कुण्ठाओं के-वासनाओं और तृष्णाओं के-अविद्या और माया के-जंजाल में बुरी तरह जकड़ा हुआ अपनी उज्ज्वल सम्भावनाओं को नष्ट कर रहा है यही तो रोज-रोज कथा, सत्संगों में हमें सुनने को मिलता है। बन्ध मुक्ति के लिए विविध विध ज्ञान कर्म के प्रस्ताव सामने प्रस्तुत किये जाते रहते हैं। बताया जाता है भव-बन्धनों में बंधे रहने तक जीवन को शोक सन्तप्त एवं व्यथा व्यथित ही रहना पड़ेगा इसलिए उसे मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। इस बन्धन और मुक्ति का जो स्वरूप और निवारण बताया जाता है उसमें भारी मतभेद और सन्देह की गुंजाइश है पर यह तथ्य सही और सर्वमान्य है कि मनुष्य की अपनी बौद्धिक भावनात्मक और चारित्रिक दुर्बलताएं ही उसकी सुख शान्ति, सर्वांगीण प्रगति और महानता की उपलब्धि में सबसे बड़ी बाधाएं है; उन्हें दूर किया जा सके तो निस्सन्देह तुच्छ स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति महानता के चरम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। पर इस अभागी आत्मिक गुलामी को क्या कहा जाये जिसने प्रगति के सारे ही द्वार अवरुद्ध कर रखे है।

‘समग्र मुक्ति का युग-निर्माण आन्दोलन’ बन्धनों के प्रति विद्रोह का पांचजन्य बजाते हुए अग्रगामी हो रहा है। उसकी लाल मशाल उस स्तर का प्रकाश उत्पन्न कर रही है से पग-पग पर बाधित करने वाले अज्ञानान्धकार को हर कोने में से हटाया और मिटाया जा सके। आत्मिक दुर्बलताओं से संघर्ष करने के लिए संघर्ष करने के लिए साधन समर की चर्चा देवासुर संग्राम से लेकर लंका काण्ड और महाभारत तक के प्रत्यक्ष युद्धों के माध्यम से यही सिखाया जाता रहा है कि अन्तरंग में भी ऐसी ही परिस्थितियाँ हैं और उन्हें विद्रोह एवं संघर्ष से ही मिटाया जा सकता है। सामाजिक क्षेत्र में फैले हुए नागपाश काटने के लिए दश अवतारों और देवदूतों का समय-समय सृजन हुआ है। किसी विशेष व्यक्ति या विशेष परिस्थिति को अपने संघर्ष का निमित्त उन्होंने बनाया हो यह प्रत्यक्ष बात दूसरी है पर बारीकी से देखा जाये तो पता चलेगा कि उस समय की सामाजिक और मानसिक पराधीनता का निवारण करने के लिए ही उनका जीवन-क्रम नियोजित रहा है। तत्वदर्शी विद्वानों और मनीषियों ने भी इसी स्तर का जन नेतृत्व किया उन्होंने तत्कालीन बुद्धि भ्रम और लोक विग्रह को अपने ढंग से अपनी सुविधा और परिस्थिति के अनुसार सुधारने का प्रयत्न किया, यह प्रयत्न जन आन्दोलन के रूप में ही सफल और सम्भव हुआ है तथा होता रहेगा।


क्षात्र बल की पराजय

विन्घ्य प्रदेश को जीतकर हैहृय वंशी सम्राट कीर्तवीर्य अर्जुन वापस लौट रहे थे। विजय का अहंकार उनके अंग प्रत्यंग से फूट रहा था। आज उन्हें अपने सम्मुख प्रत्येक व्यक्ति तुच्छ और नगण्य लग रहा था - अहंकार जो सवार था उनके सिर पर।

विजय-वाहिनी नर्मदा तट पर रुकी। उल्लास पूर्वक सभी ने स्नान किया। नव-वस्त्र धारण कर सभी ने भोजन ग्रहण किया। इस बीच परिचारकों ने आम्र कुंज से घिरा हुआ पास ही एक आश्रम देखा। आश्रम महर्षि जमदग्ति का था। बहुत ही सुन्दर शुद्ध और संस्कार पूत स्थान पाकर महाराज ने वहीं मध्याह्न विश्राम का निश्चय किया।

कीर्तवीर्य अर्जुन ने जैसे ही आश्रम में प्रवेश किया महर्षि जमदग्नि ने उनका सादर स्वागत किया। स्वागत ग्रहण करते हुए भी कार्तवीर्य की वाणी और व्यवहार से उसका अहंकार स्पष्ट झलकता था। महर्षि को यह बात बुरी लगी। उसके मस्तिष्क में यह भाव भी आया कि देश, शासक और प्रजा के मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व ब्राह्मण पर होता है। पुरोहित होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि अहंकार के गर्त में डूबते हुए सम्राट को बचाया और उन्हें कल्याण का सुपथ दिखाया जाय।

कार्तवीर्य के विश्राम की सारी व्यवस्था उनके निजी परिचारकों ने ही जुटाई थी। मध्याह्न वेला सानन्द बिताई उन्होंने। अपराह्न वे राजधानी प्रस्थान की तैयारी कर रहे थे, तभी महर्षि आकर बोले - राजन् ! आज आप यहीं रह कर हमारा आतिथ्य ग्रहण करें तो यह हमारे और समस्त आश्रम के लिए बड़ी प्रसन्नता की बात होगी ?

कार्तवीर्य ऋद्धि सिद्धि की बातें तो बहुत सुना करते थे किन्तु उन पर उनका कोई विश्वास नहीं था। अहंकार पहले से ही था, महर्षि की बात कुछ उपहासास्पद सी लगी। कार्तवीर्य ने उत्तर दिया - आर्य श्रेष्ठ ! आप जानते हैं मेरे साथ मेरे मित्र अन्य देशों के शासनाध्यक्ष भी है सभासद और विशाल वाहिनी भी। आप ठहरे तपस्वी रूखे सूखे आहार पर जीवनयापन करने वाले। मेरी केवल अपनी बात होती तो आपका आतिथ्य ग्रहण कर कृतार्थ होता पर इतनी विशाल सेना और इन मित्रों को देखते हुए असमंजस होता है अतएव अभी तो आप क्षमा करें फिर कभी आयेंगे।

महर्षि कार्तवीर्य का अहंकार ताड़ गये। क्षात्र-शक्ति की ब्रह्म तेज से स्पष्ट प्रतिद्वंद्विता थी यह और उसमें ब्रह्म वर्चस्व को पराजित नहीं देख सकते थे महर्षि। कहीं ऐसा न हो कि क्षात्र-बल ब्राह्मी शक्ति से ऊपर उठ जाये अतएव उन्होंने अपनी सिद्धियों को भी प्रयोग में लाने का निश्चय कर लिया। और तभी जिस उदासीनता से महाराज ने निमन्त्रण ठुकराया था उससे अधिक आत्म-विश्वास के साथ उन्होंने कहा- राजन् ! आप इसकी चिन्ता न करें। हम आपके साथ समस्त सेना, सभासद और मित्रों का भी स्वागत करेंगे आप आज की रात्रि यहीं विश्राम करें।

कार्तवीर्य ठहर गये। दृश्य बदला। दूसरे ही क्षण आश्रम ने अपना रूप बदला। मंदार, करवीर, यूथिका, लौध्र, कुन्द, चंपक आदि नाना प्रकार के फूलों से सुसज्जित हो गया आश्रम। भोज्य, भक्ष्य, पेय, लेह्म तथा चोष्य सभी प्रकार के सुस्वाद युक्त व्यंजन, हर अतिथि के लिए राज महलों को भी कान्तिहत करने वाले सुन्दर भवन और राजसी वेष धारण किये परिचारक। यह सब देखकर कार्तवीर्य स्तब्ध रह गये। उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ कि यह सब कोई सम्मोहन है अथवा स्वप्न या सचमुच ही महर्षि की योग सिद्धि।

विशाल चमू आतिथ्य पाकर कृतकृत्य हुई। कल तक कार्तवीर्य की प्रशंसा के स्वर गूँज रहे थे पर आज हर व्यक्ति के मुख में गुणानुवाद था, महर्षि की ब्राह्मी शक्ति का। स्वयं महाराज कह रहे थे - भगवान् आज क्षात्र - बल ब्रह्म-बल के सम्मुख हार मानता है और श्रद्धा विनत शीश झुकाता है।


सत्तर लाख मौतें बच सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संघ के डाक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार संसार के रोगियों की मृत्यु में अन्य रोगियों तथा फेफड़ों के रोगियों का अनुपात पाँच और एक का है, हर पाँच रोगियों में एक क्षय या फेफड़े के कैंसर से मरता है 15 वर्ष की आयु के ऊपर की गणना करें तब तो फेफड़े के रोगों से मरने वालों की संख्या एक तिहाई हो जाती है।

फेफड़ों का स्वास्थ्य सीधे-सीधे वायु से सम्बन्ध रखता है। निसर्ग ने प्राणियों को वायु का अकूत भाण्डागार दिया है और पग पग पर उसको स्वच्छ रखने की व्यवस्था की है इतना होने पर भी यदि फेफड़े का रोग मानव जाति को इतना संत्रस्त कर रहा है तो समझना चाहिए मनुष्य कहीं कोई भयंकर भूल कर रहा है।

भारत वर्ष में प्रति मिनट एक रोगी क्षयरोग (फेफड़ा के रोग) से मरता है अर्थात् एक दिन में 1440 और प्रति वर्ष 231490 लोगों की मृत्यु टी.बी से होती है। यह आंकड़े कोई 26 वर्ष पुराने है जब कि इन दिनों अपराध, भ्रष्टाचार और महँगाई के साथ रोगों में भी असाधारण वृद्धि हुई है यों तो आज का मनुष्य बड़ा चालाक और सभ्य बनता है किन्तु जब इस दृष्टि से देखते हैं तो लगता है कि मनुष्य आज भौतिकता की चकाचौंध में अपने आपको बुरी तरह छल रहा है।

अनुमान है कि इस समय देश में 70-80 लाख व्यक्ति क्षय रोग से पीड़ित है 1965 में टी.बी की जाँच करने वाला बी.सी.जी टीका 86.3 लाख व्यक्तियों को लगाया गया। जाँच से 54.34 लाख व्यक्ति अर्थात् कुल आबादी का दो तिहाई भाग किसी न किसी रूप में क्षय ग्रस्त था। उस समय तक देश में 34517 रोग शैयाओं से युक्त 427 क्षय रोग अस्पताल थे अब उनकी संख्या तिगुनी चौगुनी बढ़ गई है। अस्पताल बढ़ने से रोगियों की संख्या कम होनी चाहिए थी किन्तु बात हुई उल्टी अर्थात् अस्पतालों की खपत के लिए रोगियों की संख्या भी बढ़ी जो इस बात का प्रमाण है कि संकट अत्यधिक गम्भीर है उसकी जड़ को ठीक किए बिना रोग पर नियन्त्रण पा सकना संभव नहीं।

फेफड़े के रोगों का क्षय रोग का सीधा सम्बन्ध प्राण वायु से है। वायु प्रदूषण भी उसका कारण हो सकता है पर यह बात अन्य देशों पर जहाँ मशीनी करण बहुत तेजी से हुआ लागू होती है भारतवर्ष जैसे देश में जहाँ कि आज भी प्रतिवर्ष यज्ञ हवन होते ही रहते हैं और मशीनीकरण भी अभी प्रारम्भिक अवस्था में है वायु प्रदूषण इतनी बड़ी क्षति का कारण नहीं हो सकता। यदि कुछ हो भी तो आकाश शुद्धि के लिए यज्ञीय कार्यक्रमों का जा प्रसार हो रहा है वह उसे पूरी तरह निरस्त कर देगा यह भी संभावना है कि यज्ञों का विस्तार इसी शताब्दी के अंत तक अन्य देशों में भी हो जायगा उससे वायु अशुद्धि का काफी हद तक निराकरण होना संभव है।

क्षय रोग फेफड़े के रोगों का मूल कारण श्वासोच्छवास क्रिया की वैज्ञानिक अनभिज्ञता और उसका सही ढंग से उपयोग न किया जाना ही है। मृत्यु के आँकड़ों से भी यह बात निर्विवाद सत्य सिद्ध हो जाती है। यह रोग 15 वर्ष की आयु से अधिक की आयु वालों को ही होता है। उससे कम आयु के किशोर और बच्चों में खेल, कूद, उछलने दौड़ने तेजी से चलते रहने पर भी सक्रिय होने गुणों के कारण श्वास भरी पूरी फेफड़ों में पहुँचती रहती है और फेफड़ों को भर पूर हवा मिलती रहे तो फिर उनके खराब होने का प्रश्न ही नहीं उठेगा।

स्पंज की तरह बने हुए फेफड़े प्रकृति की सूक्ष्मतम और गूढ़तम रचना हैं। उनमें 7 करोड़ 30 लाख के लगभग छोटी-छोटी छिद्रनुमा कोठरियाँ होती हैं शुद्ध रक्त शरीर में घूमते-घूमते अपना आक्सीजन अपनी तेजस्विता शरीर के अन्य अंगों को दे आता है और एक परोपकारी व्यक्ति के समान उन सब की बुराइयाँ लेकर स्वयं नीलवर्ण का होकर इन कोठरियों में आत्म-शुद्धि के लिए आ जमा होता है श्वाँस खींची जाती है तब वायु नासिका के रास्ते से होती हुई स्वर यंत्र में जाती और वहाँ से अपने अत्यन्त पतली श्वाँस नालियों में विभक्त होकर फेफड़े के हर छिद्र तक हर कोठरी तक जाती है। रक्त के साथ वायु का स्पर्श होने पर ज्वलन क्रिया होती है और रक्त का सारा दूषण कार्बनिक अम्ल वायु के साथ बाहर निकल आता है और रक्त वायु में से आक्सीजन चूस कर फिर सशक्त बन जाता है और शरीर को पुष्टि प्रदान करने के लिये वहाँ से प्रवास पर निकल पड़ता है।

15 वर्ष की आयु को अधिक आयु वालों से क्षयरोग क्यों होता है इसकी शोध करते समय डाक्टरों में पाया कि इस आयु और उससे आगे के वह लोग क्षय से पीड़ित होते हैं जिनके फेफड़ों को भर पेट वायु नहीं मिलती। 7 करोड़ 30 लाख कोठरियों में से कुल 2 करोड़ कोठरियों में वायु पहुँच पाता है शेष 5 करोड़ 30 लाख छिद्रों का अशुद्ध रक्त ज्यों का त्यों लौट जाता है और आलस्य, रक्तविकार तथा अन्य बिमारियों का कारण बनता है। जिन कोठरियों में वायु नहीं पहुँच पाता उनके गन्दगी और रोग के कीटाणु पैदा होकर बढ़ने लगते हैं। खाली पड़े मकान में जिस तरह मकड़ियां और तरह तरह के कीड़े अड्डा जमा लेते हैं उसी प्रकार वायु रिक्त फेफड़ों के इन छिद्रों में भी रोग कृमि और गन्दगी बढ़ने लगती है यदि उपचार नहीं होता तो यह कोमल फेफड़े सड़ने लगते हैं टी.बी. इसी अवस्था का नाम है।

स्पष्ट है कि फेफड़े के रोगों से मुक्त रहना हो तो श्वाँस-प्रश्वाँस क्रिया को गहरा होना चाहिये। डाक्टरों और वैज्ञानिकों का कथन है कि लोग एक मिनट में 12-20 बार साँस लेते हैं यदि एक मिनट में श्वाँस की संख्या इससे भी कम होने लगे तो हवा उतनी ही गहरी होगी और उतनी ही अधिक शक्ति फेफड़ों को मिलेगी। इससे स्पष्ट है फेफड़ों का स्वास्थ्य श्वांस क्रिया के नियन्त्रण पर आधारित है और उसका एक मात्र उपाय “प्राणायाम” ही है।

“प्राणायाम” यद्यपि एक महत्वपूर्ण विज्ञान है तथापि एक दृष्टि में वह स्वास्थ्य का भी प्रमुख आधार है। पात अंजली योग के अनुसार - “तस्मिन सति श्वास-प्रश्वास-योर्गति विच्छेछःप्राणायामः” (2149) अर्थात् आसन का अभ्यास हो जाने का श्वाँस और प्रश्वाँस की गति के विच्छेद का नाम ही प्राणायाम है। “प्रा” कहते हैं जीवनी-शक्ति को और “आयम” अर्थात् “फैलना” या “वैशवर्ती करना”। प्राणायाम का अर्थ हुआ श्वाँस प्रश्वाँस की वह क्रिया जो सारे शरीर में जीवनी-शक्ति का संचार करती है और प्राणों का नियन्त्रण करना सिखाती है। किसी समय इस विधा से न केवल लोग दीर्घजीवी हुआ करते थे अपितु प्राण-सत्ता पर नियन्त्रण कर ऐसी ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ प्राप्त करते थे जो आज के व्यक्तियों की कल्पना में भी नहीं आ सकते।

प्राणायाम की क्रिया द्वारा एक मिनट में 18 या 20 श्वाँस की गति को 1 मिनट में 1 श्वाँस की सामान्य गति तक लाया जा सकता है। इतनी गहरी साँस ली जायेगी जो स्पष्ट है कि फेफड़ों के जो 5 करोड़ 30 लाख छिद्र वायु संपर्क से रहित रह जाते हैं उन्हें भी, शुद्ध वायु मिल जायेगी जिससे रक्त की भी सफाई होगी और छिद्रों की भी तब फिर न तो शरीर में जीवनी शक्ति का अभाव रहेगा और न फेफड़ों के रोगी होने का कोई कारण शेष रहेगा।

प्राणायाम एक प्रकार का अन्तर व्यायाम है उसके द्वारा और लाभ चाहे लिये जायें या नहीं पर शरीर को शुद्ध और सशक्त रखने का लाभ तो लिया ही जा सकता है। फेफड़ों के रोगों से बचने के लिये तो हर किसी को आधे घण्टे प्राणायाम अवश्य करना चाहिये।


शशिभूषण बैनर्जी की नोकरो के प्रति भावनाए

जेठ की जलती दोपहरी में किराये की गाड़ी से हुगली के नामी श्री शशिभूषण बैनर्जी अपने समधी के घर पहुँचे। जिस काम से वे गये थे, वह इतना जरूरी नहीं था। वे किसी नौकर को भी पत्र देकर भेज सकते थे। वहाँ किसी ने उनसे पूछा कि इतने से काम के लिए इस भीषण गर्मी में आपने क्यों कष्ट किया ? उन्होंने कहा- “पहले तो सोचा था कि किसी नौकर को ही भेज दूँ, लेकिन जब देखा कि धूप कड़ी है, तब नौकर को पैदल भेजने के बजाय मैं स्वयं गाड़ी करके चला आया।


औषधियों का अन्धाधुन्ध प्रयोग और उसका दुष्परिणाम

स्वास्थ्य संरक्षण का सीधा और सरल उपाय यह है कि आहार विहार को संयत रखा जाय। मस्तिष्क को संतुलित रखा जाय और पाप कर्मों से बचा जाय। सौम्य सरल और हँसी खुशी का निर्मम निश्चल जीवन निरोग भी रहता है और लम्बी आयुष्य भी प्राप्त करता है। इसके विपरीत आचरण करने पर प्रकृति समुचित दण्ड देती और प्रतिशोध लेती है। उसके कानूनों का - मर्यादाओं का उल्लंघन करके कोई चैन से नहीं बैठ सकता, वेदाग नहीं छूट सकता। दुर्बलता और अस्वस्थता वे दण्ड हैं जो प्रकृति के नियमों को तोड़कर उच्छृंखलता की रीति नीति अपनाने के कारण हमें बरबस भुगतने पड़ते हैं।

जिन्हें रोगों का भय है उन्हें चाहिए कि पहले से ही सावधानी बरतें और ऐसी रीति नीति न अपनायें जिससे बीमार होना पड़े। यह सुरक्षा बहुत ही सरल है। प्रकृति के संपर्क में रहने वाले पशु पक्षी कहाँ बीमार पड़ते हैं। बीमारी तो उद्धत आचरण करने वाले और तरह तरह की कृत्रिमता अपनाने वाले मनुष्य के हिस्से में आई हैं। अथवा उन निरीह पशु पक्षियों को यह रुग्णता का उपहार मिला है जो मनुष्य के पालतू बन गये है और जिन्हें अपनी स्वाभाविक जीवन परम्परा छोड़कर उसकी मर्जी पर निर्वाह करना पड़ रहा है।

रोग होने पर प्रकृति की सहायता के लिए उपवास, विश्राम, अधिक जल सेवन, स्वच्छता जैसी व्यवस्था बनानी चाहिए और औषधियों की जरूरत पड़े तो वनस्पतियों से विनिर्मित इस स्तर की लेनी चाहिए जिनमें शामक गुण तो हो पर मारक तत्व न हो। पर विज्ञान की उपलब्धियों के आवेश में प्रकृति को चुनौती देकर चिकित्सा की ऐसी अद्भुत प्रणाली अपनाई जा रही है जो ‘मर्ज को मारने के साथ साथ मरीज को भी मारने’ की उक्ति चरितार्थ कर रही है। ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में रोगाणुओं को मारने के लिए ऐसी मारक एवं विषाक्त औषधियों का आविष्कार किया जा रहा है जो तत्काल तो थोड़ा चमत्कार दिखा हैं और रोगों को लगता है तुरन्त फायदा हुआ। पर उस थोड़ी देर के थोड़े लाभ के फलस्वरूप पीछे कितनी हानि उठानी पड़ती है और जीवनी शक्ति का कितना ह्रास होता है इसकी हानि का कुछ अनुमान नहीं लगाया जाता। कुनैन जैसी औषधियाँ तुरन्त बुखार भगाने का चमत्कार दिखती है पर पीछे कान बहरे हो जाने जैसे अनेक ऐसे उपद्रव उठ खड़े होते हैं जिनसे छुटकारा पाने में वर्षों लगते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान चिकित्सा पद्धतियों के गुण दोषों का गहराई तक विवेचन किया जाय और रोग के सामयिक समाधान के साथ साथ इस बात का भी ध्यान रखा जाय कि उस जल्दबाजी में ऐसा तरीका न अपनाया जाय जो रोगी को आजीवन संकट ग्रस्त बनादे। इस संदर्भ में ऐलोपैथिक चिकित्सा की उपयोगिता संदिग्ध होती चली जा रही है और उसी वर्ग के प्रख्यात चिकित्सक चौका देने वाली आलोचना कर रहे है।

रसायन शास्त्र की शोध पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले डाक्टर लुई पोंलिग ने कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में एक भाषण देते हुए कहा था - “मनुष्य के निरोधक और विधायक जीवाणु अपनी क्षति और आवश्यकता की पूर्ति स्वयं करते रहते हैं। यदि मनुष्य व्यसन और असंयम से बचते हुए प्राकृतिक जीवन जिये तो निस्सन्देह लम्बी और निरोग जिन्दगी जी सकता है। तब न उसे रोगी बनना पड़ेगा न चिकित्सा की जरूरत रहेगी।”

कर्निल युनिवर्सिटी आफ अमेरिका में दीर्घ जीवन सम्बन्धी प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि यदि व्यक्ति अपने आहार की मात्रा घटा दे और सीधा सादा सुपाच्य भोजन करे तथा संयमित दिनचर्या के साथ हँसी खुशी की जिन्दगी बिताये तो वह बिना अधिक प्रयत्न के लम्बा और निरोग जीवन जी सकता है।

एकैडमी आफ मेडीशन के वैज्ञानिकों का एक संयुक्त वक्तव्य कुछ दिन पूर्व न्यूयार्क टाइम्स में छापा था जिसमें कहा गया था कि कम भोजन से नहीं वरन् अधिकाँश लोग अधिक भोजन करने के कारण बीमार पड़ते हैं। उत्तेजक पदार्थों का सेवन अस्वस्थता का सबसे बड़ा कारण है। यदि लोग सादा और सरल जीवन बितायें तो उन्हें तीन चौथाई बीमारियों से स्वयमेव छुटकारा मिल जाय। साठ वर्ष से अधिक आयु के लोगों को बुढ़ापे के कारण जिन शारीरिक कष्टों से पीड़ित रहना पड़ता है उसका कारण वृद्धावस्था नहीं वरन् पिछले दिनों का अनियमित एवं अव्यवस्थित जीवन ही मुख्य कारण होता है। स्विटजर लैण्ड के प्रसिद्ध डॉ. कोरेन्जेस्की का कथन है ढलती आयु का कष्ट कर होना युवावस्था के असंयम का परिणाम है अन्यथा पके हुए फल की तरह वृद्धावस्था अधिक मधुर और सरस होनी चाहिए। आक्सफोर्ड और डवलिन में स्वास्थ्य के रहस्य बताते हुए भी उन्होंने यही कहा - आवेश ग्रस्त अशांत मनोभूमि और उत्तेजक आहार ही हमारी आयु घटते जाने का एकमात्र कारण है।

लन्दन टाइम्स के मतानुसार उस देश में पुरानी खाँसी, फेफड़े का केन्सर हृदय रोग और मस्तिष्कीय तनाव की बीमारियाँ बहुत तेजी से बढ़ रही है इसका कारण पौष्टिक पदार्थों का अभाव नहीं वरन् कृत्रिम जीवन और दवाओं की बढ़ती हुई निर्भरता ही पाया गया है।

अमेरिका की फिशर सांइटिफिक कम्पनी द्वारा प्रकाशित ‘लैबोरेटरी’ पत्रिका के लेख में विस्तार से बताया गया है कि बीमारों के शरीर में हानिकारक कीटाणु मात्र एक प्रतिशत होते हैं। उन्हें ही सब कुछ मानकर 99 प्रतिशत स्वस्थ कीटाणुओं का लाभ लेने से इन मारक दवाओं के कारण वंचित हो जाना कहाँ की बुद्धिमानी हैं।

विश्व विख्यात सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डाक्टर जोशिया ओलफील्ड ने अपने ग्रन्थ दुःख दर्द पर चिकित्सा और विजय (हैलिंग एण्ड कान्कउ आफ पेन) में लिखा है - ऐलोपैथिक पद्धति की अपेक्षा पुरानी चिकित्सा पद्धतियों का दृष्टिकोण तथा आधार अधिक स्पष्ट है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति से रोगों के लक्षण दबते, बदलते, पुराने होते और असाध्य बनते जाते हैं। इससे मात्र नई शोधों, नई दवाओं और नये सिद्धान्तों के गढ़ने में माथापच्ची करके मात्र का द्वार खुलता है। रोग निरोध के नाम पर रक्त में नकली बीमारी पैदा करदी जाती है, जिसे देखकर असली बीमारी चले जाने का धोखा भर हो जाय।

अनेक रोगों के अनेक रोग कीटाणु प्रथक प्रथक होते हैं और उनके निवारण के लिए प्रथक प्रथक दवाएं होनी चाहिए आज के चिकित्सा शास्त्री यह मानकर चलते हैं पर यदि गहराई से शोध की जाय तो पता चलेगा कि अपच एक ही रोग है और उसी की विकृतियाँ प्रकारान्तर से भिन्न भिन्न आकार प्रकार के रोग कीटाणुओं के रूप में दिखाई देती तथा बदलती रहती है। जीवाणु विशेषज्ञ डाक्टर जे.ई.मेकडोनाफ ने बताया है - रोगों का मूल स्त्रोत आँतों में है। बिना पचा और विकृत आहार वहाँ पड़ा सड़ता रहता है और उस सड़न से उत्पन्न हुए कृमि अनेक प्रकार के रंग रूप आकार प्रकार बदलते रहते हैं। वस्तुतः वे सब एक ही पेड़ के प्रथक दीखने वाले पत्ते मात्र हैं।

इन रोग कीटाणुओं से कैसे बचा जाय यह किसी की समझ में नहीं आता। आपरेशन करने वाले डाक्टरों तक के शरीर में यह कीटाणु होते हैं और उनकी साँस आदि से हवा में उड़ते रहते हैं एक–सी दशा में आपरेशन के समय वे उड़कर रोगी को लग सकते हैं। अमेरिका के ‘टाइम’ पत्रिका में बोस्टन षहर के ‘व्रिगन हास्पिटल’ की शोध का परिणाम प्रकाशित हुआ है - जिसमें बताया गया है कि एक पेट के आपरेशन के समय कमरे को पूर्ण कीटाणु रहित कर दिया गया था, पर थोड़ी ही देर में वहाँ असंख्य खतरनाक कीटाणु उड़ते पाये गये। तलाश करने पर मालूम हुआ कि वे असिस्टेण्ट सर्जन की साँस से निकल रहे थे। यह तो तब हुआ जब कि वे मुँह पर आपरेशन के समय लगाया जाने वाला नकाब नाक और मुँह पर भली प्रकार बाँधे हुए थे।

फिलडेल्फिया के डाक्टर राबर्ट वाइज का कथन है कि रोगियों की तरह डाक्टरों और नर्सों में भी रोग कीटाणु पाये जाते हैं और उनसे भी रोगियों को छूत लग सकती है जो इलाज करने का जिम्मा शिर पर उठाये हुए है। पर उनका कथन है कि कई बार तो कीटाणुओं का अनुपात मरीजों से भी ज्यादा उन चिकित्सकों में होता है।

डेली रिकार्ड में एक समाचार छपा है - जिसमें लन्दन के विशेषज्ञ डाक्टर ऐवरी जोन्स द्वारा ब्रिटिश मेडिकल ऐसोसिएशन नारविच में दिये गये एक भाषण की चर्चा है - डाक्टर जोन्स ने बताया कि अस्पतालों में सफाई का उचित प्रबन्ध न होने से लोगों में बीमारियों के कीटाणुओं का आपसी परिवर्तन होता है और बीमारियाँ फैलती है।

रोग कीटाणुओं को बाघ या अजगर मानकर चलने से और उनके पीछे बन्दूक लिए फिरने से काम न चलेगा। वे इतने अधिक हैं कि उनसे बचाव कर सकना सम्भव नहीं सम्भव यही है कि हम अपने रक्त को शुद्ध और जीवनी शक्ति को इतना समर्थ बनाये जिससे कोई हानिकारक जीवाणु शरीर में प्रवेश पाने पर जीवित ही न रह सके। सामान्य स्वास्थ्य और समर्थता की वृद्धि के लिए उपयुक्त जीवन-क्रम अपनाने के स्थान पर तीक्ष्ण औषधियों के सेवन का और फाड़ चीर का जो फैशन चल पड़ा है। उससे जन-साधारण का हित नहीं हो रहा है और स्वास्थ्य की समस्या सुलझ नहीं रही है। लोगों कर औषधि श्रद्धा को देखते हुए डाक्टर लोग अति उत्साह से काम लेने लगे है और मानव शरीर जैसे बहुमूल्य माध्यम के प्रति उतनी सावधानी नहीं बरत रहे है जितनी बरती जानी चाहिए। अन्धाधुन्ध चिकित्सा का परिणाम और भी अधिक भयानक हो रहा है और कई बार तो लोग यहाँ तक सोचने लगते हैं कि इस इलाज की अपेक्षा यदि बिना इलाज कराये, रहते तो आदि वासियों की तरह अपेक्षाकृत कम समय, कम खर्च और कम कष्ट में अच्छे हो जाते।

मेडिकल सोसाइटी आफ इण्डिविजुअल साइकोलॉजी के एक एक अवेशन में प्लेस आफ साइकोलॉजी इन मेडिकल पैरिकुलम शीर्षक अपना लेख सुनाते हुए कैंब्रिज विश्व विद्यालय के प्रोफेसर सर वाल्टर लेग्डन ब्राडन ने बताया कि - ‘अपने निष्कर्ष के अनुसार मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह सकता हूँ कि हम डाक्टर लोग जनता के लिए सबसे अधिक खतरनाक है जो काल्पनिक आधारों पर ऐसी चिकित्सा करने लग पड़ते हैं जो काल्पनिक आधारों पर ऐसी चिकित्सा करने लग पड़ते हैं जो अन्ततः रोगी के लिए लाभ दायक नहीं हानिकारक ही सिद्ध होती है। इसी से मिलता जुलता समर्थन मेडिकल वर्ल्ड पत्रिका में ‘पारटिंग आफ दी वे’ शीर्षक में छपा है। वेल्स युनिवर्सिटी को मटीरिया मेडिका के प्रोफेसर डाक्टर स्टीवन्स ने भी वर्तमान अपूर्ण चिकित्सा पद्धति और उसके अनाड़ी चिकित्सकों की ऐसी ही खबर ली है। और रोष भरी खरी खोटी सुनाई है।

गाई हास्पिटल के चिकित्साधिकारी ने अपने कटु अनुभवों का निष्कर्ष बताते हुए लिखा है - “रोगियों में से 67 प्रतिशत का निदान गलत होता है और उनकी चिकित्सा ऐसे ही अनुमान के आधार पर चलती रहती है। मरे हुए रोगियों का शवच्छेद करने से जो पता चलता है उससे विदित होता है कि कितने ही ऐसे है जिनके रोग तथा कारण को ठीक तरह समझा ही नहीं जा सका और वे बेचारे गलत इलाज के शिकार बन गये।

लन्दन के सन्डे पिक्टोरियल में ‘दूरी सक मुखी’ शीर्षक से संसार प्रसिद्ध सर्जन के दुःख पूर्ण अनुभव छपे है कि उसने नासमझी में कितने गलत आपरेशन किये और उनसे कितनों को कितनी हानि उठानी पड़ी।

अमेरिका की चिकित्सा पत्रिका ‘जनरल आफ अमेरिकन आष्टियोपैथिक ऐसोसिएशन’ में छपे एक विवरण में कहा गया है कि - सर्जनों के द्वारा बेकार या रुग्ण समझ कर काटकर निकाल दिये गये अंगों में से 20 हजार के टुकड़ों को विशेषज्ञों द्वारा जाँचा गया तो पता चला कि उनमें से अधिकाँश अंग निरोग थे और उन्हें काटने की जरूरत नहीं थी।

‘अमेरिका कालेज आफ सर्जन’ के डायरेक्टर डॉ. पाल हाली का कथन है कि आजकल जितने आपरेशन होते हैं उनमें से अधिकाँश अकुशल द्वारा अनुमान मात्र आधार पर किये हुए होते हैं। उससे रोगियों के हित की अपेक्षा अहित ही अधिक होता है।

‘लासेन्ट’ पत्रिका में एकबार मरने वाले डाक्टरों की आयु के सम्बन्ध में एक शोध का निष्कर्ष लम्बी तालिका के रूप में छपा है, उससे पता चलता है कि डाक्टरों की औसत उम्र पचास से भी नीचे रह जाती है जबकि अन्य धन्धे करने वाले लोग इससे कहीं अधिक जीवित रहते हैं। जो स्वयं अपना इलाज नहीं कर पा रहे, जिनकी चिकित्सा पद्धति एवं दवायें स्वयं के लिए उपयोगी सिद्ध न हो सकी वे भला दूसरों का क्या लाभ कर सकेंगे। इस तथ्य के देखते हुए यही उचित है कि हम दवाओं के अन्ध भक्त न बनें और डाक्टरों की केवल आवश्यक सहायता ही उपलब्ध करे।


हिमालय के अमर आदम

जीव शास्त्री कहते हैं कि वह रीछ भालू की किस्म का एक जंगली जन्तु है ? विकास शास्त्री उसे नियंडरथल मनुष्य कहते हैं और जीव जन्तुओं से विकसित हुये मनुष्य की एक खोई हुई कड़ी (मिसिग लिंक) मानते हैं। भारतीय उन्हें भटकी हुई प्रेतात्मायें यक्ष व किन्नर कहते हैं उनके भारतीय और नेपाल की तराई क्षेत्र के निवासियों की मान्यता है कि रामायण और महाभारत काल से भी पूर्व काल के सिद्ध योगी - जिन्होंने शरीर से भी अमरत्व प्राप्त कर लिया है वह योगी ही हिमालय की अतुल ऊँचाइयों में बर्फ के सागर में सानन्द निवास करते हैं ?

अनेक प्रकार की कल्पना और मान्यता का यह जीवन केवल भारत वरन् सारे संसार के लिये ज्ञान-विज्ञान की एक नई पहेली के रूप में उभरा। उसके अस्तित्व के बारे में किसी को शंका नहीं है पर बर्फ में रहने वाला यह हिम मानव कौन है ? क्या करता है ? और उस क्षेत्र में जहाँ जीवन के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती किस प्रकार नग्न शरीर विचरण करता है ? यह प्रश्न आज तक भी कोई हल नहीं कर पाया।

पहले तो लोग उसके अस्तित्व पर भी शंका करते थे और उसे भारतीयों का अन्ध विश्वास कहा करते थे। पर वह वर्णन जो किंवदंतियों के रूप में चिरकाल से चले आ रहं थे पहली बार उस समय सत्य प्रमाणित हुये जब सुप्रसिद्ध पर्वतारोही तेनसिंह और एडमंड हिलेरी ने 1954 में हिमालय की चढ़ाई की। एडमंड हिलेरी ने 19 हजार फुट की ऊँची चोयाँग घाटी पर अपना खेमा गाड़ रखा था उस समय की बात है एक दिन जब वे उस क्षेत्र के निरीक्षण के लिए बाहर निकले और बर्फ पर चलते हुये काफी दूर निकल गये तब एकाएक उन्हें बर्फ पर बने हाल ही के पदचिह्नों ने चौका दिया। हिम मानव की लोक कथायें उनने सुनी अवश्य थी यह भी सुना था कि यह प्राणी उस दुर्गम क्षेत्र में रहता है जहाँ मनुष्य पहुँच भी नहीं सकता था पर जहाँ पहुँचने के लिये उन्हें स्वयं अपने जीवन रक्षार्थ करोड़ों रुपयों की लागत के उपकरण ले जाने पड़ते थे फिर भी मौत हर क्षण छाया की तरह घूमती रहती है उस बीहड़ हिमस्थली में मनुष्य के निवास की तो बात वे सोच भी नहीं सकते थे। पद चिन्हों का पीछा करते हुये वे काफी दूर तक गये पर कहीं न कुछ दिखा न कुछ मिला। अपनी यात्रा के संस्मरणों में पहली बार उन्होंने इस हिम मानव का विस्तार से उल्लेख किया तब विज्ञान को अनेक नई धारणायें मिली कि जीवन के अस्तित्व के लिये अति शीत और उच्चतम ताप भी बाधक नहीं हैं। मनुष्य शरीर संसार की हर परिस्थिति में रखने योग्य बनाया जा सकता है। भले ही भारतीय योग दर्शन और सिद्धियों जैसे वे आधार आज लोगों की समझ में न आये पर यह निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य उन अभूतपूर्व शक्तियों और सिद्धियों का समन्वय है जिन्हें विकसित कर वह शरीर से ही परमात्मा की कल्पना को सार्थक कर सकता है।

पीछे हिम मानवों की खोज का सिलसिला चल पड़ा। हर पर्वतारोही उनकी टोह लेने लगा। उससे उनके बारे में नई नई विस्मय बोधक जानकारियाँ मिलीं। हिम मानव एक नहीं अनेक हैं। उन्हें देखा भी गया है पर अब तक उनका फोटो शायद ही कोई ले पाया हो क्योंकि वह शरीर से असाधारण क्षमता वाले होते हैं कुछ लोगों का तो कहना है किसी भी स्थान में अन्तर्धान भी हो सकते हैं और जिस तरह कोई मनुष्य पानी में डुबकी लगाकर दूसरे किसी स्थान पर जा निकलता है उसी प्रकार कहीं भी लुप्त हो जाने के बाद वे कही भी जाकर प्रकट भी हो सकते हैं यदि ऐसा नहीं होता तो हिमालय की निचली ताराइयों में जहाँ आबादी रहती है वहाँ वे कैसे उतर आते और एक रात के अन्तर से ही जो यात्रा कई महीनों में सम्पन्न हो सकती है उसे पूरा करके तुरन्त ही 20 हजार से अधिक ऊँचाई पर कैसे भाग जाते ?

चेहरा लम्बा और पतला होता है, आंखें लाल और दाँत बड़े बड़े 7 से 8 इंच लम्बी जीभ और बीसियों आदमियों के बराबर की ताकत तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति नितान्त ब्रह्मचारी और प्राकृतिक जीवन जीता हो या फिर योग सिद्ध हो। डॉ. इंजार्ड का कहना है कि वे मांसाहारी होते हैं उसके प्रमाण में वे बताते हैं कि मैंने उसके मल (यतीज ड्रापिंग्स) का रासायनिक विश्लेषण कर लिया है पर अन्य लोगों का कथन है कि वे पूर्ण शाकाहारी होने का प्रमाण तराई क्षेत्रों में प्रचलित लोक गीत और कथाओं में भी मिलता है। रात को जब स्त्रियां सोने की तैयारी करती हैं तो बड़ी बूढ़ी माताएं वधुओं को हिदायत देती है कि देखो बहू चक्की में आटा या गेहूँ पड़ा न रह जाये नहीं तो हिम मानव आयेगा और उसे खा जायेगा।

सोचने वाली बात है कि केवल आटा और चक्की में बचे हुये दानों के लालच में हिम मानव 20 फुट की दुर्गम पहाड़ियां क्यों उतरेगा। इससे पूर्व उसे हजारों किस्म के जंगली जानवर मिल सकते हैं, आदमखोर हो तो वह गाँव के बच्चों को उठाकर ले जा सकता है दाने ही क्यों चुराने लगा ? उसके स्वभाव से पता चलता है कि वह शाकाहारी है उसके व्यवहार और क्रिया कलापों से पता चलता है कि वह कोई अति मानवीय शक्तियों का पुंज कोई सिद्ध योगी ही होना चाहिये। कुछ तो उस क्षेत्र का जलवायु ही सहायक होता है कुछ योगाभ्यास द्वारा विकसित शक्तियाँ हो सकती हैं जिनके कारण वह उस एक क्षण में बर्फ कर देने वाले दुर्गम क्षेत्र में भी सानन्द जीवन जीता है।

काठमाण्डू के लामा श्री पुण्य वज्र ने बहुत समय तक हिमालय के इस प्रदेश में बिताये है एक यती योगी सन्त संन्यासी के ढंग पर उन्होंने हिम मानव की खोज की उनका कहना है कि मैं बहुत समय तक उनके साथ रहा और पाया कि उनकी क्षमतायें बहुत ही विलक्षण हैं। यद्यपि उनकी बातों को पाश्चात्य लोग प्रामाणित नहीं मानते तो भी यह बात तो अमरीका के सुप्रसिद्ध जीव विशेषज्ञ श्री कैरोल वायमैन ने भी स्वीकार की है कि हिम मानव की सामर्थ्य विलक्षण है उदाहरणार्थ वह बहुत दूर की गन्ध से ही पहचान सकता है कि इस क्षेत्र में किधर से मनुष्य या कोई दूसरा जीव जा रहा है। वे मुख को देखकर ही भावों को भाँप जाते हैं उसकी ताकत 15 व्यक्तियों की ताकत से बढ़कर होती है। वह अधिकाँश बच्चों को ही दिखता है उससे यह भी तय है कि वह मनुष्यों के स्वभाव से परिचित होता है और उसके विश्वासघात का उसे भय अवश्य रहता है तभी तो वह उसकी परछाई भी देखना नहीं चाहता। एक बार काठमाण्डू के एक बहन भाई ने उसे देखा। डॉ. सिल्कि जानसन ने उन दोनों बच्चों को मनुष्य से मिलती आकृतियों वाले कुछ बन्दरों और गुरिल्लाओं के चित्र दिखाकर पूछा तुमने जिस आकृति को देखा वह इनमें से किससे मिलता जुलता है। अलग अलग ले जाकर चित्र दिखाने और पूछे जाने पर दोनों ही बालकों ने गुरिल्लों और औराँग ओटान के चित्र चुनकर कहा - वह इसी शक्ल से मिलता जुलता था पर यह नहीं इससे भिन्न था।

अनेक बार दिखा है हिम मानव और हर बार उसने वैज्ञानिकों की बुद्धि को चमकाया- चौंधाया है। अनेक प्रकार की कल्पनाओं और मान्यताओं के बावजूद यह निश्चित नहीं हो सका कि यह हिम मानव है अथवा कोई जंगली जीव है। जो भी हो उसके व्यवहार से जो बातें प्रकाश में आई हैं यदि वे यह पुष्टि करें कि हिमवासी यह आत्मायें यदि अति पुरातन अमर पुरुष हो तो कोई आश्चर्य नहीं।


वन्देमातरम

‘वन्देमातरम’ गीत के रचयिता श्री बंकिम नाथ अंग्रेजी सरकार की सेवा में थे फिर अंग्रेजी के अन्धाधुन्ध प्रयोग से उन्हें अत्यन्त चिढ़ थी। एक बार एक भारतीय साहित्यकार ने उन्हें अंग्रेजी में पत्र लिखा। बंगला में उत्तर देते हुए बंकिमबाबू ने लिखा -”अंग्रेजी आपकी मातृ भाषा नहीं है और मेरी भी नहीं है। इसलिए अंग्रेजी में पत्र लिखने में क्या तुक है। मेरी समझ में नहीं आता ।”


सिद्धे बिन्दु महायत्ने, किंन सिद्धयति भूतले

अपने पिता आशुतोष शिवाजी को प्रसन्न चित जानकर कुमार सम्भव ने उनके पास जाकर पूछा - तात ! आपने जिस प्रकार दुर्लभ साधनायें की वैसा साहस किसी में न हो और वह सिद्धियों का स्वामित्व तथा ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता हो तो उसे क्या करना चाहिए वह सरल उपाय आप हमें बताने की कृपा करें। लोक कल्याण की इच्छा रखने वाले भगवान शंकर ने बताया-

सिद्धे विन्दु महायत्ने किं न सिद्धयति भूतले।

यस्य प्रसादान्महिमा, ममाप्येतादृशो भवेत॥

वत्स ! उसका उपाय है अखण्ड ब्रह्मचर्य अर्थात् “जिसने यत्न पूर्वक अपने वीर्य को सिद्ध कर लिया है उसके लिये इस पृथ्वी में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता सिद्ध वीर्य पुरुष तो मेरे समान समर्थ हो सकता है।

वीर्य तत्व के बारे में इन पंक्तियों में जो कुछ कहा गया है उसकी यथार्थता का अनुमान तो ब्रह्मचर्य व्रती जीवन बिताकर ही किया जा सकता है पर अब उसकी यथार्थता वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं और कहते हैं कि वीर्य कीट जिस सुरक्षित घोल में रखे जाते हैं उसी से अनुमान किया जा सकता है कि सृष्टि का कितना महत्वपूर्ण तत्व है। वीर्य एक प्रकार का रसायन है। वीर्य कीट उसमें रहने वाले जीवाणु होते हैं। वीर्य कीट उसमें रहने वाले जीवाणु होते हैं। तरल पदार्थ 75 प्रतिशत जल 5 प्रतिशत फास्फेट आफ लाइम, 4 प्रतिशत चिकनाई, 3 प्रतिशत प्रोटीन - आक्साइड शेष भाग फास्फेट, फास्फोरस, सोडियम क्लोराइड आदि पदार्थ होते हैं। पुरुष के शुक्र कीट स्पर्श तथा स्त्री के डिम्ब आवम का उत्पादन पुरुष के अण्ड तथा स्त्री के अण्डाशय में होता है। यहाँ से एक प्रकार का रस जो कि वीर्य रसायन का एक प्रकार का “प्लाज्मा” होता है जो सारे शरीर में ओज और तेजस की भाँति छाया रहता है। यह तेजस ही परसार आकर्षण का कारण होता है। जिस शरीर में वीर्य की प्रचुर मात्रा होती है वह काले - कुबड़े होने पर भी आकर्षक लगते हैं। कहते हैं - अष्टावक्र जो शरीर में आठ स्थानों से टेढ़ा होता था ने अपनी संयम शक्ति द्वारा मुख मंडल पर वह तेजस्विता अर्जित करली थी कि महाराज जनक भी उसकी ओर देखकर हतप्रभ हो उठते थे।

पुरुषों के शरीर में पौरुष और स्त्रियों के शरीर में स्त्रीत्व के लक्षणों का कारण यह वीर्य ही होता है जिसे आयुर्वेद की भाषा में अन्तवीर्य की संज्ञा दी है।

आधुनिक विज्ञान इतना विकसित हो जाने पर भी वीर्य की उत्पत्ति का कोई सिद्धान्त निश्चित नहीं कर पाया सामान्य रासायनिक रचना के अतिरिक्त उन्हें इतना ही पता है कि वीर्य का एक कोश स्पर्श स्त्री के डिम्ब ओवम से मिल जाता है। यह वीर्य कोश पुनउत्पादन प्रारम्भ कर देता है और अपनी तरह के तमाम कोश माँ के आहार से प्राप्त आहार द्वारा कोश विभाजन प्रक्रिया एक से दो, दो से चार, चार से आठ के अनुसार विभक्त होता चला जाता है। कहना न होगा कि विन्द वीर्य का परमाणु चेतना का सर्वाधिक सूक्ष्म अंश है उनकी लम्बाई 1/1600 में 1/1700 इंच तक होती है जिसमें न केवल मनुष्य शरीर वरन् विराट् विश्व के शक्ति बीज छिपे होते हैं। सृष्टि की परम्परा की क्षमता भी इन्हीं बीजों में होती है उसकी शक्ति का अनुमान किया जाना कठिन है।

प्राचीन काल के योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से बिना किसी वैज्ञानिक यन्त्र के महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की थी आज वह विज्ञान द्वारा सही सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए वही वीर्य-कोश जो स्त्री के अण्ड में पहुँचा था गर्भ धारण के बाद जब विकसित होना प्रारम्भ करता है तब वह बीज कोश मस्तिष्क में ही संचय होते हैं क्योंकि गर्भ में सन्तान का सिर नीचे की ओर होता है। जन्म के समय 10 रत्ती वीर्य बालक के ललाट में होता है ऐसा भारतीय तत्व दर्शियों का मत है। यही कारण है कि बच्चा विशुद्ध परमहंस जैसी प्रकृति का विशुद्ध आनन्दवादी, निश्चिन्त और केवलोन्हं होता है। यह वीर्य शक्ति और दृढ़ता प्राप्त करे इसके लिए बालक को नितान्त शुद्ध, सात्विक और भाव भरे आहार की आवश्यकता होती है ऐसा दूध माता के दूध के अतिरिक्त दूसरा नहीं होता पर कदाचित आयु बढ़ने के साथ माँ उतना दूध न पिला सके तो दूध की आवश्यकता गौ दुग्ध, बकरी अथवा भैंस के दूध को हलका करके पूरा करना चाहिये। इसके बाद जैसे जैसे शरीर में शक्ति का संचार होता है क्रमशः आहार पद्धति में सावधानी बरतने की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है 10 वर्ष की आयु तक वीर्य दोनों भौहों के बीच वाले स्थान में आ जाता है इस समय बच्चे को अधिकाँश अलोना आहार फल फूल दूध आदि ही देना चाहिये। गुरुकुल में 5 वर्ष में ही बालक पहुँचा देने का प्राचीन उद्देश्य बच्चे को गृहस्थों के अनुचित आहार से बचाये रखना ही होता था। इस आयु में बच्चे में अनुकरण की प्रवृत्ति रहती है तीखा, कड़ुवा भोजन वह यह समझते हुए भी इसलिए करने का इच्छुक रहने लगता है क्योंकि घर के सदस्य उसका उपभोग करते हैं।

नौ से 12 वर्ष तक वीर्य शक्ति भौहों से उतर कर कण्ठ में आ जाती है प्रायः इसी समय बच्चे के स्वर में भारीपन और कन्याओं के स्वर में सुरीलापन आता है अभी तक लगभग दोनों की ही ध्वनि एक जैसी होती है थी अब बच्चे  के स्वर में पुरुषोचित लक्षण झलकने लगते हैं। इस आयु में वीर्य में विपरीत लिंग का आकर्षण पैदा होने लगता है अतएव बालक बालिकाओं का संपर्क अलग अलग कर दिया जाना चाहिये। आज की सहशिक्षा तो इस दृष्टि से बच्चों के जीवन में कुठाराघात जैसा है। परस्पर समीपता से कच्चा वीर्य मंथन प्रारम्भ कर सकता है जिसके कारण युवकों को जीवन भर स्वप्न दोष, वीर्यपात और शीघ्र-स्खलन की बीमारियाँ लद जाती है जो न केवल उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से वरन् मानसिक दृष्टि से भी हीन बना देती है। ऐसे बच्चे बौद्धिक दृष्टि से बिलकुल कमजोर होते हैं। नास्तिकता कोई सिद्धान्त नहीं एक प्रकार का रोग है जो मानसिक कमजोरी के कारण होता है। प्राचीन काल में बालक की वीर्य रक्षा पर ध्यान रखा जाता था इससे उसकी विचार क्षमता ऊर्ध्वमुखी बनी रहती थी। ऊर्ध्वमुखी चिन्तन ही जीवन के यथार्थ लक्ष्य और ब्रह्म की विराटता की अनुभूति कर सकता है।

11 से 16 वर्ष तक की आयु में वीर्य मेरुदण्ड से होता उपस्थ की ओर बढ़ता है और धीरे धीरे मूलाधार चक्र में अपना स्थान बना लेता है। काम विकार पहले मन में आता है उसके बाद तुरन्त ही मूलाधार चक्र उत्तेजित हो उठता है उसके उत्तेजित होने से वह सारा ही क्षेत्र जिसमें कि कामेन्द्रिय भी सम्मिलित होती है उत्तेजित हो उठती है ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य को सम्भालना कठिन हो जाता है 24 वर्ष तक की आयु में यह वीर्य मूलाधार चक्र में से सारे शरीर में इस प्रकार व्याप्त हो जाता है जैसे -

यथा पयसि सर्पिस्तु, गूढश्चेक्षौ रसो यथा।

एवं हि सकले काले शुक्र तिष्ठति देहिनाम॥

अर्थात् जिस प्रकार दुग्ध में घी, तिल में तेल ईख में मीठापन तथा काष्ठ में अग्नि तत्व सर्वत्र विद्यमान रहता है उसी प्रकार वीर्य सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है।

यदि 25 वर्ष की आयु तक आहार विहार को दूषित नहीं होने दिया गया और ब्रह्मचर्य खंडित न हुआ तो इस आयु में शक्ति की मस्ती और विचारों की प्रफुल्लता देखते ही बनती है। ऐसे बच्चे प्रायः जीवन भर स्वस्थ रहते हैं। काम विकार से घिरे बच्चों को दमित वासना का संकट हो सकता है जिस बालक के मस्तिष्क में मातृ भाव रहा काम वासना प्रदीप्त नहीं होने पाई उसे दमित वासना की तो कल्पना भी नहीं आयेगी वरन् ऐसा सोचने वाले उसके सम्मुख कीट तत्व जैसे हीन बुद्धि लगेंगे। विनोद अपने आप में उतना आनन्द है जितना संभोग में। सम्भोग का आनन्द तो थोड़ी देर का है पर यदि वीर्य अच्छी तरह शरीर में पच गया है तो चह आनन्द जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और सफलता के रूप में सर्वत्र लिया जा सकता है।

उपस्थ में आये स्थूल वीर्य को ऊर्ध्वरेता बनाकर पुनः उसी ललाट में लाना जहाँ से मूलाधार तक आया था ले जाना योग विधा का काम है। कुण्डलिनी साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को व्रज्वलित का ईंधन बनाकर इस वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है तब यह फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरुदण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहचार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति के लिये ही भगवान् शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।

कठिन योग साधनायें न करने पर भी जो लोग वीर्य को अखंड रख लेते हैं वे अपने अन्दर शक्ति का अक्षय भंडार अनुभव करते हैं और कुछ भी कर सकने की क्षमता रखते है। प्रज्ञावान् आत्मायें उसके लिए गर्भ धारण के समय से ही सचेष्ट रहती हैं और वीर्य को अधोमुखी नहीं होने देकर उसे ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रयत्न करती रहती है। सामाजिक कर्तव्यों के पालन द्वारा भी ऐसा सम्भव है पर उसके लिए आज की पारिवारिक परिस्थितियों से लेकर शिक्षा पद्धति तक में परिवर्तन करना पड़ेगा। वीर्य सृष्टि का मूल उपादान है उसकी सामर्थ्य को समझा जाना चाहिए, उसकी रक्षा की जानी चाहिये तथा ऊर्ध्वरेता के लाभों से लाभान्वित होकर मनुष्य जीवन की यथार्थता को समझना और पाना चाहिये। जो अपने वीर्य की रक्षा कर लेते हैं एक बूँद बरबाद नहीं होने देते वे कोई भी इच्छा करे कभी अधूरी नहीं रह सकती भले ही उसे लोग योग सिद्धि समझें पर है यह सब सिद्धु विन्दु का ही चमत्कार। यह शक्ति और सिद्धी ही हमें समर्थ और अपराजेय बना सकती है और कोई दूसरी शक्ति नहीं।


आचार्य हेमचन्द्र



आचार्य हेमचन्द्र सौराष्ट्र की यात्रा करते हुए एक गाँव में ठहरे। शाम के समय उस गाँव का एक किसान मोटे सूत की बनी चादर लेकर आया। उसने आचार्य श्री के चरणों में वह चादर समर्पित करदी और निवेदन करने लगा ‘मेरी पत्नी ने अपने हाथ से ही सूत कात कर इस चादर को बुना है और आपकी सेवा में भेजी है। आशा है आप अवश्य स्वीकार करेंगे।

आचार्य ने राजा द्वारा प्रदत्त मूल्यवान कौशेय उतार दिया और उस किसान द्वारा दी गई खादी की मोटी चादर ओढ़ ली। कुछ दिनों बाद आचार्य को राजधानी पाटन आना था। वहाँ के महाराज कुमार पाल को उनके आने की सूचना मिली तो गाजे बाजे के साथ राज्य की सीमा पर गये और उनकी अगवानी की। मोटे वस्त्रों की ओर राजा की दृष्टि गई तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्हें बहुमूल्य कौशेय भेट किये दीर्घकाल हो चुका है सम्भवतः उनके जीर्ण−शीर्ण हो जाने पर किसी कुषक की भेट स्वीकार करनी पड़ी होगी। राजा ने दुःखी स्वर में कहा ‘आचार्य ! इस तरह के साधारण वस्त्र पहनना तो गुर्जर देश का अपमान है।’ ‘राजन् ! अपमान की इसमें कोई बात नहीं। आपके राज्य की अधिकतर जनता ऐसे ही वस्त्र तो पहनती है। फिर क्या उन्हें देखकर आपको दुःख नहीं होता ? मैं तो राजसी वस्त्रों और खादी के वस्त्रों में कोई अन्तर नहीं समझता। मेरे लिये तो यही वस्त्र ठीक हैं।

दुःख का मूल नाश करने के लिये ब्रह्मचर्य का व्रत पालन अत्यन्त आवश्यक है।

-बुद्ध


युग परिवर्तनकारी सत्ता का प्राकव्य

अक्टूबर 1970 में ही मासिक ‘राष्ट्र धर्म’ के नाम ‘संसार के भविष्य का एक पूर्व संकेत’ नामक लेख भेजा था। जिसमें अन्य महत्वपूर्ण भविष्य वाणियों के साथ एक भविष्य वाणी-पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश ) में खण्ड प्रलय की बात भी कही गई थी ( यह लेख राष्ट्र धर्म के जनवरी 1972 अंक में छपा था ) इसी लेख में विहार प्रदेश के व्यापक रूप से जलमग्न और क्षति ग्रस्त होने की भी भविष्य वाणी थी। उस समय तक ऐसा कोई लक्षण नहीं था जिससे तत्काल यह मान लिया जाता कि वस्तुतः ऐसा होगा किन्तु सचमुच दो माह बाद ही समुद्री तूफान आया और पूर्वी पाकिस्तान के 10 लाख लोगों को नष्ट करके रख गया। आज भी वहाँ की प्रलय विभीषिका समाप्त नहीं हुई और सुसंस्कृत नव्य समाज वाले देश के रूप में दिखाई देगा। बिहार के सम्बन्ध में की गई भविष्य वाणी की सत्यता भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं। यह पंक्तियाँ जिस समय लिखी जा रही हैं अधिकाँश बिहार बाढ़ की चपेट में फँसा हुआ है जब कि उसकी भविष्य वाणी 10 से 11 महीने पहले कर दी गई थी।

यह भविष्य वाणी शाहजहाँपुर के एक सुप्रसिद्ध योगी और सन्त महात्मा रामचन्द्र ने की योगाभ्यास द्वारा अन्तश्चेतना में पच्चीस-पचास वर्ष बाद भविष्य के गर्भ में पक रही घटनाओं को भी आज घटित-घटनाओं की तरह स्पष्ट देखा जा सकता है। मौसम-विज्ञान के विशेषज्ञ यह जानते हैं कि जो बादल आज बरस रहे हैं वे आकाश में 4-5 दिन पूर्व ही चक्कर काट रहे थे और वे जिस भाप से बने हैं वह महीनों पहले समुद्र में खौलाई जा रही थी उसे खौलने वाला बड़वानल उससे भी पहले से काम कर रहा होगा। तात्पर्य यह कि आज की घटना काफी समय पूर्व से प्रारम्भ हलचलों का परिणाम होती है चाहे वह घटना योजना और विचार मंथन के रूप में प्रारम्भ में मन तक ही सीमित क्यों न रही हो।

यही बात भविष्य के सम्बन्ध में भी हैं। ईश्वरीय सत्ता को जो कुछ कल करना है उसकी योजनायें वह काफी पहले ही बना चुकी होती है फिर अपनी सहायक शक्तियों से परामर्श कर उन्हें परिवर्तन के कार्यों में नियोजित करती है महीनों वर्षों तक चलने वाली मंत्रणाएं और योजनायें कार्यान्वित होने और फलित होने से काफी समय पहले अस्तित्व में आ चुकी होती हैं पर जिस तरह युद्ध या किसी बड़ी झाटना की रूप-रेखायें कुछ जिम्मेदार लोगों की ही जानकारी में अति गोपनीय (टाय सीक्रेट) रखी जाता है ईश्वरीय विधान भी दिव्य निर्मल योगात्मायें ही जान सकती हैं। सिद्धान्त में यह बात बिलकुल सच है कि योगी के लिये भविष्य को वर्तमान की तरह देख सकना कोई बड़ी असम्भव बात नहीं हैं।

‘संसार में जब भी कोई देवदूत आया, अवतार हुआ तब तब प्रकृति ने उसके निमार्ण के पूर्व की अवस्था का ध्वंस करने में सहयोग अवश्य दिया है वह महा संघर्ष की भूमिका इसी शताब्दी के अन्त तक निश्चित रूप से घटित हो जानी चाहिए। परिवर्तन का समय आ गया है जो अब टल नहीं सकता। ईश्वरीय सत्ता मानवीय रूप में अपनी परम प्रिय ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ धरती पर भारतवर्ष में जन्म ले चुकी है और अपना काम करने में लगी हुई है जब उसकी तमाम योजनायें और क्रिया-कलापों सामने आवेंगे तब लोगों को पता चलेगा और पश्चात्ताप भी होगा कि भगवान् राम, श्रीकृष्ण भगवान, बुद्ध और परशुराम की तरह का अवतार हमारे समय में आया और हम उन्हें पहचान भी न सके सहयोग देना तो दूर की बात रही।’

यह शब्द भी उन्हीं महात्मा रामचन्द्रजी के हैं जिनकी भविष्य वाणियों का इन पंक्तियों में उल्लेख किया जा रहा हैं। ये किसी प्रकार के यश लोकेषणा की कामना के बिना सच्चे योगी के समान आत्म-कल्याण और लोक-मंगल में रत रहते हैं यह भविष्य वाणी तो उनकी इस प्रेरणा का प्रतीक समझी जानी चाहिए कि जागृत आत्मायें यदि उनका विवेक साथ देता हो तो, विद्यमान देवदूत को पहचानें और उसके इस नव-निर्माण के महा संघर्ष में हनुमान नल, नील अंगद की तरह मुक्ति-वाहिनी का सेनापतित्व करने के लिये आगे आयें।

कुछ शंकालु और आर्य समाज जैसे तर्क वाले व्यक्तियों ने महात्मा रामचन्द्र से प्रश्न किया परमात्मा तो सर्वव्यापी सत्ता है, तत्व रूप में है वह अवतार कैसे ले सकता है ? इस पर उन्होंने समझाया कर्म-कलाप के लिए मन भी मिला हैं अचेतन मन अतीन्द्रिय जगत का अधिष्ठाता है मन प्रत्यक्ष जगतकारः मन से ही योजनायें बनती और फिर क्रियान्वित होतीं हैं परमात्मा में ‘मनस’ शक्ति नहीं होती पर मनुष्य जाति के उद्बोधन और मार्ग-दर्शन के लिये तो यह शक्ति ही आवश्यक है इसीलिये अदृश्य चेतना के रूप में काम करने वाली सत्ता को मन से परिपूर्ण होने के लिए किसी शरीर में व्यक्त होना पड़ता है। शरीर में होने पर भी उसकी शरीर से कोई आसक्ति नहीं होती अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, आदि मनोविकार उसका कुछ नहीं कर पाते। वह भूत भविष्य सब कुछ जानने वाला होने पर भी अन्य मनुष्यों की तरह ही काम करने वाला होता है किन्तु उसका अतीन्द्रिय ज्ञान और बल एवं मनोबल इतना प्रचण्ड और प्रखर होता है कि संसार का कोई भी दुस्तर से दुस्तर कार्य उसके लिये असम्भव अशक्य नहीं होता। ऐसी ही दिव्य सत्ता भारतवर्ष में अपना काम कर रही हैं बहुत शीघ्र उसे लोग पहचानेंगे।

अपनी इस भविष्य वाणी में ही महात्मा रामचन्द्र ने जहाँ इस दिव्यं सत्ता की प्रचण्ड सामर्थ्य का दिग्दर्शन करा दिया वहाँ लोगों की पहचान के लिये मानो संकेत भी दे दिया हैं-उनकी भविष्य वाणी का यह अंश बार-बार पढ़ने और मनन करने योग्य है-सूर्य की गर्मी पिछले कुछ समय से कम हो रही है वैज्ञानिक हैरान है कि सूर्य के इस हाश्र का कारण क्या हो है वे इस कारण भी चिन्तित है कि सूर्य की ऊर्जा व गर्मी समाप्त हो जाने से सारे भौतिक साधन होने पर भी मनुष्य जाति का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है और उससे बचने का कोई उपाय उनकी समझ में नहीं आ रहा।

सूर्य की शक्ति के इस असाधारण हास पर प्रकाश डालते हुए योगाचार्य लिखते हैं कि यह हास मनुष्य के रूप में इस महान् ईश्वरीय सत्ता द्वारा उसका उपयोग है प्रकृति जो परिवर्तन करती है वह सूर्य के परिवर्तन से ही प्रारम्भ होता है क्योंकि दृश्य जगत का आत्मा सूर्य ही है तीव्र हास का तात्पर्य यह है कि जो कुछ परिवर्तन होना है वह जल्दी ही हो जाये इस शक्ति का उपयोग भगवान् द्वारा नियुक्त यह अवतार ही कर रहा है। जैसे ही कार्य पूरा हुआ प्रकृति ने अपनी नई व्यवस्था का क्रम जमा लिया सूर्य फिर से अपनी पूर्व-प्रखर पर आ जायेगा। (अखण्ड-ज्योति के पाठकों को यह स्मरण दिलाना समयोचित ही होगा कि गायत्री उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है अखंड-ज्योति में कई बार छप चुका है कि गायत्री सिद्ध हुये आत्मदर्शी पुरुष और सूर्य में कोई अन्तर नहीं होता दोनों तदाकार हो जाते हैं अतएव यह निर्विवाद सिद्ध है कि यह नया अवतार महान् सावित्री शक्ति (गायत्री तत्व या सूर्य शक्ति) का सिद्ध होगा। यह स्पष्ट संकेत है नये निर्माता की पहचान का)।

योगिराज की कई महत्वपूर्ण भविष्य वाणियाँ भी हैं जो आगे समय पर सत्य सिद्ध होने के लिये प्रतीक्षित हैं उनका कथन है-मैंने अपनी अतीन्द्रिय योग दृष्टि से देखा है कि लन्दन के बीच एक भयंकर ज्वालामुखी फूटेगा, इंग्लैंड का दक्षिणी भाग समुद्र में धंस जावेगा इंग्लैंड बहुत अधिक ठण्डा हो जायेगा। रूस अमेरिका और योरोप के वह देश जो आज अत्यन्त वैभव सम्पन्न दीख रहे हैं और विश्व नीति की शतरंज मनमाने ढंग से खेल रहे हैं उनका भविष्य अत्यन्त अन्धकार पूर्ण है। जो मार्क्सवाद आज रूस में विस्तार पूर्वक फैला है वह रूस में ही दफन हो जायेगा। अमेरिका की सारी सम्पन्नता ढेर हो जायेगी। गल्फ स्टीम अपने बहाव की दिशा बदल देगी और इस बीच भारतवर्ष अपनी आध्यात्मिक धार्मिक साँस्कृतिक, आर्थिक, औद्योगिक, राजनैतिक उन्नति करता हुआ शीर्ष स्थान की ओर बढ़ता जायेगा और फिर से सारी दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति में पहुँच जायेगा। फिर एक लम्बे समय तक विश्व का नेतृत्व भारतवर्ष के हाथ में रहेगा।’

प्रसिद्ध वक्ता श्री रामचन्द्र इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि आज का बुद्धिवाद और नास्तिकता धर्म और आध्यात्म के प्रति उत्कट आस्था में बदल जायेंगे। उसके लिये जो ईश्वरीय सत्ता उदित हुई और काम कर रही है वह अहंभाव से पूर्णतया मुक्त होगी-शरीर में होने पर भी वह नितान्त भावनाओं से बनी एक प्रकार की भाव प्रतिमा होगी-अर्थात् वह मानवीय मन न होकर ईश्वरीय मन होगी जो सैंकड़ों लोगों की सहायता करती हुई युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को पूरा कर रही है।

उसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा महा संघर्ष का संचालन जिसमें कि उसकी विचार शक्ति भी कार्य करेगी और अदृश्य आत्म शक्ति भी। एक ओर वह सारे विश्व में आन्तरिक विचार क्रान्ति करेगा तो दूसरी प्रकृति को आलोड़ित करके भयंकर स्थिति उत्पन्न कर देगा। महामारी, युद्ध, अति वृष्टि यह सब इसी मनुष्य के रूप में ईश्वरीय सत्ता की ही रुद्र प्रक्रिया होगी जो इस समय तो देखने में बहुत भयानक लगेगी पर वस्तुतः आज जो संसार में सड़ी गली विकृति फैली हुई है घाव साफ करने की तरह वह इस पीड़ाजनक परिस्थितियों में ही साफ होगी उसके बाद जो संसार बचेगा वह एक नया युग-स्वर्गीय सतयुग होगा। तब भारतीय अध्यात्म फिर से सारे विश्व में फैल जायेगा और संसार के सारे लोग वर्ण भेद, जाति भेद, भाषा और संस्कृति भेद, लिंग भेद से मुक्त होकर मानवता के आदर्श सिद्धान्तों का जीवन जीने लगेंगे। ईश्वरीय प्रक्रिया उसी कार्य में जुटी हुई है।

यह भविष्य वाणी केवल कौतूहल के लिये नहीं है। अतीन्द्रिय दृष्टा की प्रेरणा को समझा जाना चाहिए और यदि मन किसी ईश्वरीय दिव्य सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करता हो तो उसकी सहायता का साहस भी प्रदर्शित किया ही जाना चाहिए।


निःस्वार्थ पद्मनाभ

पद्मनाभ बहुत गरीब ब्राह्मण थे किन्तु ब्राह्मण होने के नाते हर समय यह बातें उनके मस्तिष्क में रहा करती थी कि उनका कर्त्तव्य जन-जन को ज्ञान प्रदान करना है। बिना स्वयं ज्ञान प्राप्त किये अन्य को ज्ञान किस प्रकार दिया जा सकता है। यही सोचकर भूखे नंगे रहकर किसी प्रकार संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

पद्मनाभ जब अपना अध्ययन पूरा कर चुके तो जनता को ज्ञान देने का माध्यम कथा बाँचना बनाया। वे जन-स्थानों पर जाते और स्वयं कथा बाँचना प्रारम्भ कर दिया करते थे। वे निरन्तर निष्काम भाव से भगवान् की भक्ति जन-मानस में जागृत करने के लिए सुन्दर से सुन्दर अर्थ और विवेचना किया करते थे। लोग उनकी ओर आकर्षित होकर कथा सुनने लगे। कथा में जो कुछ थोड़ा बहुत चढ़ावा आता उसी से वे अपना और अपने परिवार का पोषण करते हुए ज्ञान का प्रसार करते रहे। एकबार उन्होंने यह सिद्धान्त वाक्य कि “ज्ञान-दान का प्रतिफल धन के रूप में नहीं ग्रहण करना चाहिये।” एक पुस्तक में देख लिया। वे बड़े दुःखी होने लगे। उन्होंने सोचा कि अब तक जो कथा कह कर उसमें प्राप्त धन को ग्रहण करता रहा हूँ वह एक तरह से ज्ञान का प्रतिदान ही लेता रहा हूँ अतएव गुरुकुल आदि जन-संस्थाओं को देना शुरू कर दिया और अपने व अपने परिवार के जीवन निर्वाह के लिये जंगल से लकड़ी काट कर बेचना शुरू कर दिया। इस प्रकार निःस्वार्थ होकर पद्यनाभ आजीवन ज्ञान प्रसार का अपना कर्त्तव्य पूरा करते रहे।


चेतना की प्रचण्ड ज्योति ज्वाला-कुण्डलिनी

कुण्डलिनी शक्ति का एक नाम ‘जीवन अग्नि’ (फायर आफ लाइफ) भी है। जो कुछ भी चमक, तेजस्विता, आशा, उत्साह, उमंग, उल्लास दिखाई पड़ता है, उसे उस अग्नि का ही प्रभव कहा जा सकता है। शरीरों में बलिष्ठता, निरोगता, स्फूर्ति, क्रियाशीलता के रूप में और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता, स्मरण शक्ति, सूझ-बूझ कल्पना आदि विशेषताओं के रूप में यही परिलक्षित होती है। आत्म-विश्वास और उत्कर्ष की अभिलाषा के रूप में धैर्य और साहस के रूप में इसी शक्ति का चमत्कार झाँकते हुए देखा जा सकता है। रोगों से लड़कर उन्हें परास्त करने और मृत्यु की सम्भावनाओं को हटाकर दीर्घजीवन का अवसर उत्पन्न करने वाली एक विशेष विद्युत्-धारा जो मन में प्रवाहित होकर समस्त शरीर को सुरक्षा की अमित सामर्थ्य प्रदान करती है उसे कुण्डलिनी ही समझा जाना चाहिए।

यह जीवन अग्नि इस समस्त विश्व ब्रह्मांड में संव्याप्त हैं। जड़ पदार्थों में जब यह काम करती है तब उसे विद्युत कहते हैं अध्यात्म भाषा में इसे अपरा प्रकृति कहा गया है। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन एवं परिवर्तन इसी की प्रक्रिया से होता है। पदार्थ निर्जीव है पर उसमें यह त्रिविधि हलचल होती रहती है। हलचल न हो तो जड़ पदार्थ कही जानी वस्तुएं भी स्थिर निश्चल हो जाये और सर्वत्र शून्यता नीरवता ही दिखाई पड़ने लगे। अपरा प्रकृति विश्व विद्युत अणु संचालन से लेकर विविध विधि दृश्य जगत की गतिविधियों का संचार करती है। इस प्रकार वे जड़ कहे जाने वाले पदार्थ भी एक तरह की चेतना ज्ञान बुद्धि अनुभूति से रहित जीवन तत्व से भरे हुए ही है। अपने ढंग का जीवन उनमें भी विद्यमान है।

जीवन अग्नि का दूसरा रूप है-परा प्रकृति। इसे प्राणियों की अनुभूति कह सकते हैं। बुद्धि विवेक, इच्छा, ज्ञान, भावना आदि इसी के अंग है। अचेतन मस्तिष्क को केन्द्र बनाकर यही परा प्रकृति उनकी शारीरिक, मानसिक, स्वाभाविक गतिविधियों का अविज्ञात रूप से संचालन करती रहती है। श्वाँस-प्रश्वाँस, रक्ताभिषरण निद्रा जागरण, क्षुधा, मल त्याग एवं देह के भीतरी अंग-प्रत्यंगों का संचालन उसी के द्वारा होता है। उसकी दूसरी क्रिया चेतन विज्ञात मस्तिष्क के द्वारा-अन्तःकरण बनकर दृश्यमान होती है। इसे व्यक्तिगत क्रिया-कलाप में जीवन अग्नि का ही कर्तृत्व कहना चाहिए।

यह परा और अपरा और परा प्रकृति में प्रत्यक्ष अनुभव में आने वो परखे जाने वाले स्थूल क्रिया-कलाप है। इसी क्रिया का पदार्थ गत-व्यक्तिगत एवं विभाजित भी कह सकते हैं। व्यष्टि इसी का नाम है। इससे उच्च स्तर की सूक्ष्म चेतना और है जिसे विश्व व्यापी सामूहिक एवं समष्टि कह सकते हैं। यह यन्त्रों और उपकरणों से इन्द्रियों से-मनः चेतना से भी प्रकट, स्पष्ट और सिद्ध नहीं होती। पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है। इस जड़ चेतन जगत के संचालन में जो व्यवस्था, क्रम-बद्धता और नियमितता दीख पड़ती है उसके आधार पर उसे ज्ञान दृष्टि से देखा जा सकता है। वह चेतना सत्ता अनुभूति एवं सम्वेदनाओं से भी समझ में आ सकती है। इसे भाव दृष्टि कहते हैं। ज्ञान दृष्टि और भाव दृष्टि से ही मनुष्य उसे समझ सकता है और उसकी निकटता तक पहुँच सकता है। इस चेतन-सूक्ष्म-जीवन अग्नि को ब्रह्म, ईश्वर परमात्मा आदि नामों से जाना जाता है।

अध्यात्म और साधन विज्ञान का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति की भावनात्मक ‘जीवन अग्नि’- आत्मा उस विश्व व्यापी भाव चेतना के साथ अपना सम्बन्ध जोड़े और समीपता से उत्पन्न होने वाले लाभों से लाभान्वित हो। विश्व बिजली के उत्पादन केन्द्र से अपना तार जोड़कर ही छोटे यन्त्र अपने को सामर्थ्यवान बनाते हैं। अग्नि के समीप जाकर ही तो गीली और ठण्डी लकड़ी ज्वलन्त अग्नि का रूप धारण करती है। नर-नारी समीपता की स्थिति बना कर हो तो दाम्पत्य सुख और सन्तान लाभ से लाभान्वित होते हैं। अलग-अलग रहने से तो निष्क्रियता ही रहेगी। धन और ऋण विद्युत के दोनों घटक अलग-अलग रहने पर-निष्क्रिय ही पड़े रहते हैं। मिलन होते ही शक्ति प्रवाह-करेंट चल पड़ता है। यही जड़ अग्नि का नियम -चेतन अग्नि पर भी लागू होता है। यही स्थूल व्यवस्था क्रम चेतन जगत में भी लागू होता है।

व्यक्तिगत जीवन अग्नि-आत्मा का परमात्मा के साथ समन्वय सम्बन्ध स्थापित करने की प्रक्रिया जितनी अग्रगामी होती है उतना ही मनुष्य में देवत्व का उदय अवतरण दीखता है। उसकी इस जन-साधारण का सामान्य जीवन क्रम से अतिरिक्त जो विशेषताएं इस ब्रह्म वर्चस् अथवा आत्म बल कहते हैं। यह आत्म बल व्यक्तित्व की प्रखरता-समर्थता और महानता के रूप में देखा जा सकता है। लौकिक कर्तृत्व में यह ब्रह्म वर्चस जब समन्वित रहता है तो मनुष्य तत्व वेत्ता, दृष्टा, ऋषि, मनीषी, महा मानव के रूप में दीखता है। लौकिक कर्तृत्व भी कई बार उसका ऐसा होता है जो साधारणतया घटित न होते रहने के कारण चमत्कार जैसा कौतूहल वर्धक और आश्चर्यजनक लगता है। जो सफलताएं साधारण शरीर क्रम से बहुत समय में और बहुत स्वल्प मात्रा में मिलती हैं वे यदि स्वल्प समय, स्वल्प श्रम और प्रचुर परिमाण में उपलब्ध हो सकें तो उन्हें अध्यात्म भाषा में सिद्धियाँ या विभूतियाँ कहा जायेगा। व्यक्तिगत जीवन अग्नि-आत्मा का -सर्वव्यापी समष्टि अग्नि के साथ संयोग सम्बन्ध हो जाने पर उपरोक्त दोनों ही लाभ होते हैं। 1. व्यक्तित्व की सर्वांगीण प्रखरता। 2. कर्तृत्व में सफलताओं का आना ऐसा असाधारण समावेश है जिसे सिद्धि या चमत्कार नाम से पुकारा जा सके। आवश्यक नहीं कि कोई ब्रह्म वर्चस् सम्पन्न व्यक्ति दूसरे लोगों पर अपनी इन विशेषताओं को प्रकट करें पर उनमें होती वे दोनों ही है।

स्वभावतः इन दोनों उपलब्धियों को पाकर व्यक्ति का अन्तरात्मा अधिक प्रफुल्ल और सन्तुष्ट रहेगा। संसार में भी दो आनन्द है। 1. इन्द्रिय तृप्ति (वासना) 2. अहंकार की तृप्ति-तृष्णा। लोभ और मोह तृष्णा के अंतर्गत आते हैं। इन्द्रियों के सुख के अपने-अपने रसास्वादन अनोखे ही है। सामान्य चेतना वाला व्यक्ति इन्हीं दो माध्यमों से सन्तोष और सुख प्राप्त करने के फेर में लगे रहते हैं। पर वे उन्हें एक हलकी सी झलक दिखाकर तिरोहित होते रहते हैं। ठहरते नहीं। वासना और तृष्णा की तृप्ति का अवसर जब तक नहीं आता है तब तक उनके लिए ललक उत्सुकता से बेचैनी रहती है। जैसे ही वे मिले कि क्षण भर में आनन्द समाप्त। जिह्वा स्वाद पेट भरते ही समाप्त, मैथुन सुख का स्खलन होते ही अन्त-धन लाभ होते ही उसकी सुरक्षा की चिन्ता-स्त्री पुत्र मिलते ही उनके साथ जुड़े हुए भारी उत्तरदायित्वों का निर्वाह चिन्ता बन कर सामने खड़े हो जाते हैं। यश और पद पर दूसरे लोग घात लगाते हैं और अकारण ईर्ष्या द्वेष भरी शत्रुता की बात आ जाती है। इन परिस्थितियों में सामान्य स्तर के मनुष्य सुख सन्तोष के लिए वासना, तृष्णा की परिधि में घनघोर प्रयत्न करने पर भी खाली हाथ रहते हैं जबकि आत्मा के साथ परमात्मा को जोड़कर ब्रह्म वर्चस् की मात्रा बढ़ा लेने वाला-व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व में प्रफुल्ल और सन्तुष्ट रहने लगता है। अध्यात्म और साधना विज्ञान का प्रयोजन व्यक्ति को इन्हीं लाभों से लाभान्वित करता है।

कहा जा चुका है कि इस विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त जीवन अग्नि-ब्रह्म चेतना के दो स्वरूप हैं एक परा एक अपरा। अपरा प्रकृति पदार्थों में गतिशीलता हलचल उत्पन्न करती है और परा प्रकृति प्राणधारियों में इच्छाओं और अनुभूतियों का संचार करती है।

यह विभाजन सर्वांश में सत्य नहीं है। बहुमत और बाहुल्य को ध्यान में रखते ही यह प्रतिपादित है। जड़ पदार्थों में मात्र क्रियाशीलता ही नहीं होती एक अत्यंत स्वल्प अंश, भावना भी विद्यमान रहता है। भारत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जगदीशचन्द बोस ने यह प्रमाणित किया था कि पेड़ पौधे जड़ समझे जाने पर भी उनमें गतिशीलता ही नहीं एक अत्यन्त स्वल्प मात्रा में चेतनात्मक भावना विद्यमान है और वे भी भली बुरी परिस्थितियों में सुख-दुःख अनुभव करते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतन कहे जाने वाले प्राणियों को भी पूर्ण चेतना -पूर्ण परा प्रकृति आनन्दित नहीं मान लेना चाहिए। उनका जीव अंश भावनाओं से तरंगित होता है और उनका शरीर जड़ जगत के नियमों से बंधा है। इस प्रकार चेतन प्राणियों का भी शरीर भाग जड़ सृष्टि के नियमों से प्रभावित है। इसलिए उतने अंश में प्राणधारी को भी जड़ कहा जा सकता है। यहाँ बाहुल्य की दृष्टि से ही जड़ चेतन का विभाजन है। वस्तुतः इस विश्व में कोई भी पदार्थ या प्राणी न तो पूर्ण तया जड़ है और न चेतन। दोनों शक्तियों का न्यूनाधिक मात्रा में समावेश रहता है यदि इनका पूर्ण विच्छेद हो जायेगा तो भी शून्यता और नीरवता के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहेगा।

जीवन अग्नि के समष्टि रूप को अध्यात्म भाषा में ब्रह्माग्नि-परमात्मा और व्यष्टि रूप में उसे जीवाग्नि आत्मा-कहा गया है। ब्रह्म तत्व का विवेचन ब्रह्म विद्या के रूप में और जीव विद्या का विवेचन आत्म विद्या के रूप में किया गया है। यह दोनों शक्तियाँ मूलतः एक ही प्रवाह के अविच्छिन्न अंग है, पर उनका स्वरूप समझने के लिए-विश्लेषण और अनुभव की दृष्टि से दो हिस्सों में बाँटना पड़ता है। विद्युत एक ही तत्व है। उसका शक्ति संचार संयोग और वियोग के विश्व नियम के आधार पर होना ही चाहिए से उसे ऋण और धन निगेटिव ओर पॉजिटिव कहकर समझा-समझाया जा सकता है। इसी प्रकार जीवन अग्नि को समष्टि रूप से परा और अपरा तथा व्यष्टि रूप में परमात्मा और आत्मा कहा जा सकता है । जो कुछ यहाँ हो रहा है, हो चुका या होने वाला है वह सब उसी परिधि के अंतर्गत आता है।

अध्यात्म विद्या में इस गूढ़ और वैज्ञानिक रहस्य को सर्व साधारण को समझाने के लिए आलंकारिक शैली का उपयोग किया है। इसी उभय पक्षीय तत्व का शिव और शक्ति-ब्रह्म और माया कृष्ण और राधा-राम और सीता आदि अनेक दिव्य युग्मों के रूप में विवेचन विस्तार किया है। यह शैली सर्व साधारण को अति गम्भीर विषयों को सरलता पूर्वक समझने की दृष्टि से उपयोगी भी है। साधना में श्रद्धा और भक्ति का समावेश आवश्यक है। उसके बिना विश्वास परिपक्व नहीं होता है और विश्वास के बिना मनोबल या आत्म-बल का प्रकटीकरण नहीं होता। शारीरिक बल वर्धन के लिए व्यायाम आवश्यक है और व्यायाम के लिए-गेंद, डम्बल मुद्गर आदि उपकरण चाहिए।

अदृश्य जीवन अग्नि-परमात्मा चेतना के साथ सम्बन्ध बनाने और बढ़ाने के लिए जिस मनोवैज्ञानिक ढांचे को खड़ा करना पड़ता है उसके लिए भी वह आलंकारिक प्रतिष्ठापना बहुत काम आती है। साकार सगुण ईश्वर का सृजन इसीलिए हुआ है। उमा महेश, राम सीता, आदम हव्वा आदि की मान्यताएं इसी आधार पर हैं। विश्वा की परिपक्वता में आध्यात्मिक प्रयोजन में उस प्रकार की साकार मान्यताएं अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है। ईश्वर को व्यक्ति माने बिना हमारी अन्तःचेतना उससे भावनात्मक सम्बन्ध न तो बना सकती है और न बढ़ा सकती है। मानवीय चेतना का निर्माण ही इस ढंग से हुआ है कि उसका घनिष्ठ भाव दृश्य पदार्थों से ही सम्भव है।

हवा, सर्दी या गर्मी, बिजली ईथर आदि के अस्तित्व और बल से हम भली प्रकार से परिचित हैं, पर उन्हें प्यार नहीं कर सकते-उनके साथ भावनात्मक संपर्क नहीं बना सकते। इस स्तर का संपर्क बने बिना भाव संचार का उपासनात्मक प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता और आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाला भाव संचार साधन बन ही नहीं पाता। ज्ञान से इतना भर समझा समझाया जा सकता है कि ईश्वर है और उसका विधा-कर्तृत्व यह है। उससे प्रेम करने की भार वासध्ना निराकार के साथ सम्भव है ही नहीं। इसलिए आत्म विद्या को दो भागों में बाँटा गया एक ज्ञानयोग जिसमें वस्तुस्थिति को समझना भर सीमित है। दूसरा भक्ति योग जिसमें भावनात्मक उभार आवेश का चुम्बकत्व पैदा करके उस परब्रह्म के साथ सघनता स्थापित करना सम्भव होता है।

निराकार और साकार का क्षेत्र यही है। निर्गुण और सगुण का सारा ढाँचा इन्हीं दो आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खड़ा किया है। सो इन दोनों को अलग-अलग नहीं वरन् एक दूसरे का अविच्छिन्न अंग-पूरक मानकर चलना चाहिए। निराकार और साकार-निर्गुण और सगुण ब्रह्म दो अलग-अलग तत्व नहीं है और न उन्हें दो अलग-अलग विज्ञान धारा ही मानना चाहिए। वरन् ऋण और धन विद्युत की तरह-परा और अपरा प्रकृति की तरह समझने समझाने पर विभिन्न परिस्थितियों में उनके विभिन्न प्रयोजन के लिए ही यह उभयपक्षीय विवेचना है। वस्तुतः सब कुछ दोनों का मिला-जुला ही है। एकाकीपन यहाँ कहीं भी नहीं है।

इतना समझ लेने के बाद कुण्डलिनी शक्ति के जागरण तत्सम्बन्धी मान्यतायें उसका आधार-साधना का स्वरूप समझने में सुविधा हो सकती है। व्यक्तिगत जीवन में-मनुष्य कलेवर में-परा प्रकृति के-चेतन प्रवाह का केन्द्र स्थान मस्तिष्क के मध्य अवस्थित ब्रह्मरंध्र--सहस्रार कमल है। इसी को कैलाशवासी शिव या शेषशायी विष्णु एवं कालाग्नि कहते हैं। दूसरा केन्द्र जननेन्द्रिय के मूल गह्वर में है। उसे अपरा प्रकृति का केन्द्र कहना चाहिए। इसे शक्ति, पार्वती- एवं कुण्डलिनी जीवाग्नि कहते हैं।

इन दोनों को धन और ऋण विद्युत भी कहा जा सकता है। मानवीय शरीर को -पिण्ड को-इस दृश्य ब्रह्माण्ड का-विश्व विराट् का एक छोटा नमूना ही कह सकते हैं। जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व ब्रह्माण्ड में कहीं भी विद्यमान है उन सबका अस्तित्व इस शरीर में भी मौजूद है। जिस प्रकार वैज्ञानिक जानकारी प्रयोग विधि और यन्त्र व्यवस्था के आधार पर विद्युत, ईथर आदि शक्तियों में प्रत्यक्षता लाभ उठाया जाता है, ठीक उसी प्रकार योग साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा प्रकृति की प्रचंड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तृत्व के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकताएं सिद्धियाँ चमत्कार एवं असाधारण क्रिया कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम-जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।

इसी प्रकार व्यक्तित्व में गुण, कर्म, स्वभाव, संस्कार, दृष्टिकोण, विवेक प्रभाव, प्रतिभा, मनोबल, आत्मबल आदि की जो विशेषतायें दृष्टिगोचर होती हैं उन्हें चेतना तत्व से-भाव संवेदन की उपलब्धि माननी चाहिए। इसका केन्द्र मस्तिष्क स्थित ज्ञान केन्द्र सहस्रार कमल है। कालाग्नि यही शिव स्वरूप विद्यमान है। आत्म विद्या के दो लाभ बताये जा चुके है 1. व्यक्तित्व की भावनात्मक चेतनात्मक प्रखरता 2. शरीर की असामान्य क्रियाशीलता। इन्हीं को विभूतियाँ और सिद्धियाँ कहते हैं। विभूतियाँ मस्तिष्क केन्द्र से-ज्ञान संस्थान से-भाव ब्रह्म से प्रसृत होती हैं और सिद्धियाँ काम केन्द्र से-शक्ति निर्झर से-कुण्ड कुण्डलिनी से प्रादुर्भूत होती हैं। इन दोनों शक्ति केन्द्रों को मानवीय अस्तित्व के दो ध्रुव मानना चाहिए। पृथ्वी के दो सिरों पर उत्तरी दक्षिणी दो ध्रुव हैं ठीक इसी प्रकार मनुष्य का मस्तिष्क केन्द्र उत्तरी ध्रुव और काम केन्द्र दक्षिणी ध्रुव कहा जा सकता है। उन दोनों की असीम एवं अनन्त जानकारी प्राप्त करने और उन सामर्थ्यों को जीवन विकास के अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों में ठीक तरह प्रयोग कर सकने की विद्या का नाम ही कुण्डलिनी विज्ञान है। साधना के अनेक स्वरूप, साधन और मार्ग हो सकते हैं। पर उन्हें बाह्य प्रतीकों का अन्तर ही समझना चाहिए। समस्त साधनाओं का उद्देश्य वही है जो कुण्डलिनी में देखा जाता है। शरीर को ऋतु प्रभाव से बचाना वस्त्र धारण का उद्देश्य है। संसार में विभिन्न डिजाइनों के आकार प्रकार के कपड़े इसी प्रयोजन के लिए बनाये और सिये जाते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित अनेक अध्यात्मिक मान्यताओं और साधनाओं को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उनमें बाह्य भिन्नता दीखने पड़ने पर भी मूल प्रयोजन में कुछ विशेष अन्तर नहीं है। भारतीय अध्यात्म विद्या में इस विज्ञान को बिना अधिक लाग लपेट के सीधे साधे यथावत् मूल स्वरूप से प्रस्तुत कर दिया गया है। इससे समझने में सुविधा होती है और मंजिल को पार करना-लक्ष्य तक पहुँचना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाता है। कुण्डलिनी साधना की यही विशेषता है। उसमें दोनों तत्वों का आवश्यक समन्वय है।

जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य का साधनात्मक और भावनात्मक विश्लेषण गत दो अंकों में ‘सौंदर्य लहरी’ के कुछ श्लोकों के रूप में सामने आ चुका है। साधना एकाँगी नहीं सग्र-समन्वित और उभयपक्षीय होनी चाहिए सफलता का योग तभी बनता है। श्री आद्य शंकराचार्य का वेदान्त परक ज्ञान योग प्रख्यात है। पर उतने भर से भी काम कहाँ चला ? शक्ति की आवश्यकता उन्हें भी रही, सो कुण्डलिनी जागरण की शक्ति प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी। समग्र अध्यात्म का स्वरूप समन्वयात्मक ही है। उसमें परा और अपरा प्रकृति के-ज्ञान और कर्म के समन्वय की ही व्यवस्था है। जीवाग्नि का काम बीज ओर ब्रह्माग्नि का ज्ञान बीज दोनों को अध्यात्म अलंकार में नर-नारी जैसे संयोग संभाग के रूप में-रज और वीर्य के रूप चित्रित करते हुए यही कहा गया है कि इनका मिलन ही सफलताओं का स्त्रोत है। कुण्डलिनी तत्व ज्ञान एवं साधना विज्ञान की समन्वयात्मक साधना विद्या में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता ओर सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुण्डलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों में असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।

शिव और शक्ति दोनों का ही अध्यात्म शास्त्र में अग्नि के रूप में उल्लेख किया है यह अग्नि चूल्हे में जलने वाली आग नहीं वरन् जीवन अग्नि ही समझी जानी चाहिए। नीचे की अग्नि जीवाग्नि को चन्द्राग्नि कहते हैं। क्योंकि चन्द्रमा में जो ज्योति दिखाई देती है वस्तुतः वह सूर्य का ही प्रतिबिम्ब है। मस्तिष्क में अवस्थित शिव रूप सूर्याग्नि ही प्रकारांतर से कुण्डलिनी की अग्नि बनकर चमकती है। इसी को सोम और अमृत का नाम भी दिया जाता है। नाम रूप जो भी हो - शिव और शक्ति का कुण्डलिनी और ब्रह्मरन्ध्र को अग्नि के अलंकार के साथ सम्बोधित करते हुए उसका संकेत जीवन अग्नि के इन दो शक्ति स्रोतों -ध्रुवों और सूर्य चन्द्र युग्मों से ही है। साधना ग्रन्थों में इसकी चर्चा इस प्रकार मिलती है।

तस्य सर्व्वजगन्मूर्त्तिः शक्तिर्मायेति विश्रुता।

स कालाग्निर्हरो देवो गीयते वेदवादिभिः॥                   -कूर्म पुराण

वे शिव कालाग्नि रूप हैं ऐसा वेद वादियों ने कहा है। उनकी शक्ति -काली विश्वमूर्ति है।

तस्य मध्ये महानयग्निर्विश्वाचिर्विश्वतोमुखः।

तस्य मध्ये वहिंनशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता।

तस्याः शिखया मध्ये परमात्मा व्यवस्थिता॥         -चतुर्वेदोपनिषद् - 5

उसके बीच प्रचण्ड अग्नि की ज्वालायें चारों ओर धधकती है। उन लपटों के मध्य एक अग्नि शिखा-अणु शक्ति है। उसी के बीच परमात्मा की स्थिति है।

ज्चालामालासहस्त्राढ्यं कालानलशतोपमम्।

दृष्ट्राकरालंदुर्द्धर्षं जटामण्डलमण्डितम्॥       -कूर्म पुराण

ज्वालाओं की सहस्रों ही मालाओं से समन्वित तथा सैकड़ों कालानल के समान था। कराल दृष्टाओं से युक्त अत्यन्त दुर्धर्ष एवं जटाओं के मण्डल से स्वरूप था।

योग कालेन न मरुता साग्निना बोधिता सती।

स्फुरिता हृदयाकाशे नागरुपा महोज्ज्वला॥         -त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद्।

योग साधना से प्राणस प्रयोग द्वारा, प्रज्वलित अग्नि के समाज इस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है।

तथेति स होवाच-

आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिरावृत्तभगिंमण्डलाकारं तत्र मूलकंदे शक्तिः पावकाकार ध्यायेत् तत्रैव कामरुपपीठं र्वकामप्रदं भवति इत्याधारचक्रम्॥

तृतीय नाभिचक्रं पंचावर्तं सर्पपुटिलाकारं तन्मध्ये कुण्डलिनीं बालार्ककोटिप्रभाँ तटित्सनिभाँ ध्यायेत् सामर्थ्यशक्तिः सर्वसिद्धिप्रदा भवति मणिपूरकचक्रम्॥ -सौभाग्य लक्ष्युपनिषद् 3 / 1-3

उनने कहा-मूलाधार में योनि के आकार का तीन घेरे वाला ब्रह्म चक्र है। वहाँ सुप्त सर्पिणी की तरह कुण्डलिनी शक्ति का निवास है। जब तक वह जागृत न हो तब तक उस स्थान पर प्रचण्ड अग्नि की धधकती हुई ज्वाला का ध्यान करें ॥ 1 ॥

प्रातःकाल के अरुण सूर्य की तरह आभावती बिजली की तरह चमकती हुई, इस कुण्डलिनी को ध्यान द्वारा जागृत करते हैं। जागृत होने पर यह अनन्त सामर्थ्यवान् बना देती है और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करती है। ॥ 3 ॥

जाताँ तदानीं सुरसिद्धसंधा दृष्टवा भयाद्दुद्रुवरग्निकल्पाम्।

कालींगरालंकृतकालकंठीमुपेंद्रपद्योउगशक्रमुख्याः॥              -लिंग पुराण

महाविष से समलंकृत कण्ठ वाली अग्नि के सदृश्य स्वरूप वाली उस अवतीर्ण भगवती काली को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि समस्त देवगण भय से भागने लगे थे।

मूलाधाराभिधं चक्रं प्रथमं समूदीरितम्।

तत ध्येयं स्वरुपं तु पावकाकारमुच्यते॥

स्वाधिष्ठानाभिधं चक्रं द्वितीयं चोपरिस्थितिम्।

प्रवालाकुँर तुल्यं तु तत्र ध्येयं निगद्यते॥

तृतीयं नाभिचक्रेतु ध्येयं रुपं तडिन्निभम्।

तुर्ये हृदयचक्रे ते ज्योतिलिंगाँकृतीर्यते॥

पंचमे कण्ठचक्रेतु सुषुम्ना श्वेतवर्णिनी।

ध्येयं षष्ठे तालुचक्रे शून्यचित्तलयार्थकम्॥

भ्रुचक्रे सप्तमे ध्येयं दीपागुँष्टप्रमाणकम्।

आज्ञाचक्रेष्टमे ध्येयं रुपं धूम्रशिखाकृतिः॥

आकाशचक्रे नवमे परशुः स्वोर्ऋ्व शक्तिकः।

एवं क्रमेण चक्राणि ध्येयरुपाणि विद्धि च॥

अखण्डैकरसत्वेन ध्येयस्यैक्यअप्युपाधितः।

आकारा विविधायुक्ता नोपाधिश्चेतरः स्वतः॥

विद्याशक्ति विलासेन पावकात् विस्फुलिंगवत्।

अकस्मात् ब्रह्मणोअखण्डात् विविधाकृतयोअभवन्॥             -महायोग विज्ञान

मूलाधार चक्र में आत्म ज्योति अग्नि रूप दीखती है। स्वाधिष्ठान चक्र में वह प्रवाल अंकुर सी प्रतीत होती है। मणिपुर में विद्युत जैसी चमकती है। नाभि चक्र में वह लिंग आकृति की प्रतीत होती है। कंठ चक्र में वह श्वेत वर्ण, तालु चक्र में शून्यकार एकरस अनुभव में आती है। भ्रू चक्र में अंगूठे के प्रमाण जलती हुई दीप शिखा जैसी भासती है। आज्ञा चक्र में धूम्रशिखा जैसी और सहस्रार चक्र में चमकते हुए परशु जैसी दीखती है।

यह सभी ज्योतियाँ एक ही है। सभी आत्म ज्योति हैं। सभी परम आनन्ददायिनी है। विद्या शक्ति कुण्डलिनी की क्रीड़ा से एक ही अग्नि की अनेक चिनगारियों की तरह यह अनेक तरह की प्रतीत होती है।

अपाने चोर्ध्यवगे याते संप्राप्त वहिगमण्डले।

ततोअनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हत्ता॥

ततो यातौ वहयपानौ प्राणमुष्णस्वरुपकम्।

तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा॥

तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते।

दन्डाहतभुजंगीव निश्वस्य ऋजुताँ व्रजेत्॥                   -योग कुण्डल्यूपनिषद् 1। 43,44,45

उस अग्नि मंडल में जब अपान प्राण जाकर मिलता है तो अग्नि की लपटें और तीव्र हो जाती है। उस अग्नि से गरम होने पर सोई हुई कुण्डलिनी जागती है और लाठी से छेड़ने पर सर्पिणी जिस प्रकार फुंसकार कर उठती है वैसे ही यह कुण्डलिनी भी जागृत होती है।

प्राणस्थानं ततो वहिनः प्राणापानौ च सत्वरम्।

मिलित्वा कुण्डलीं यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः॥

तेनाग्निना च सतप्ता पवनेनैव चालिता।

प्रसाय स्वशरीरं तु सुषुम्नाबदनान्तरे॥                   -योग कुँडल्यूपनिषद 1।65,66

अग्नि स्थान में प्राण के पहुँचने से उष्णता से संतप्त कुण्डलिनी अपनी कुण्डली छोड़कर सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है।

चित्रों में शिव को जमीन पर लेटा हुआ और शक्ति को उनकी छाती पर खड़ा हुआ चित्रित किया जाता है। वह कुण्डलिनी जागरण के अवसर पर मूलाधार स्थिति प्राणाग्नि का सुष्ज्ञुप्ति अवस्था त्यागकर ब्रह्मरंध्र शिव संस्थान में जा पहुँचना और सहस्र कमल स्थिति सोम अमृत के मूलाधार की ओर स्रवित होने की साधना विज्ञान सम्मत प्रक्रिया का ही दिग्दर्शन है। दश देवियों के चित्रों में विपरीत रति के उल्लेख है। उस समागम में शिव को नीचे और शक्ति को ऊपर बताया जाता है। जागृत अवस्था में कुण्डलिनी की समर्थता और प्रमुखता का जीवन के हर क्षेत्र में छा जाना-यह इस चित्रण का संकेत है। वृहज्जावालोपनिषद् में इसकी चर्चा इस प्रकार है-

अग्नीषोत्मकं विश्वमित्याग्निराचक्षते।

सो शक्त्यामृतमयः शक्तिकरी तनूः॥

अमृतं यत्प्रतिष्ठा सा तेजो विद्याकला स्वयम्।

स्थूलसूक्ष्मेषु भूतेशु स एवं रसतेजसि (सी)॥

वैद्युदादिमयं तेजो मधुरादिमयो रसः।

तेजो रसविभेदैस्तु वृत्तमेतच्चराचरम्॥

अग्नेरमृतनिष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते।

अतएव हविः क्लृप्तमग्निषोमात्मक जगत्॥

अग्ने (अग्नि) रुर्ध्वं भवत्येषा (ष) यावत्सौम्यं परामृतम्।

यावदग्न्यात्मकं सौम्यममृतं विसृजत्यधः॥

अतएव हि कालाग्निरधस्ताच्छक्रिर्ध्वगा।

यावदादहनश्चीर्ध्बमघस्तात्पवनं भवेत्॥   -वृहज्जावलोपनिषद् ब्राह्मण 2

अग्नि और सोम इन दोनों के संयोग से यह जगत बना है। सोम में अमृत शक्ति भरी है। अग्नि में विद्या का निवास है। सोम और अग्नि का तेज सब प्राणियों में विद्यमान है।

अग्नि जब ऊपर आती है जब सोम को ग्रहण करती है । तब सोम अग्नि के रूप में परिवर्तित होकर नीचे की ओर चलता है । इस प्रकार रुद्र नीचे होते हैं और शक्ति ऊपर। ज्ञान शक्ति को शिव और क्रिया शक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं । इन दोनों का समन्वय सम्मिलन जब जीवन अग्नि को प्रदीप्त ज्वालाओं की तरह आलोकित होता है तो मन-मलीन, असफल और अस्त-व्यस्त जीवन क्रम एक अभिनव उत्कर्ष और उल्लास की परिस्थितियों से भर जाता है। ज्वलन्त शक्ति से अप्रभावित व्यक्ति का कोई भी दृश्य-अदृश्य काम शेष नहीं रहता। समस्त विश्व में संव्याप्त इस महा अग्नि का कुण्डलिनी साधना द्वारा एक अंश जब व्यक्तिगत जीवन में उपलब्ध कर लिया जाता है तो प्रगति की अनेक सम्भावना अप्रत्याशित रूप में सामने आ उपस्थित होती है-इसी अनुभव के आधार पर साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों ने कुण्डलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-

शक्ति कुण्डलिनोति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा।

ज्ञात्वेथं न तनुर्विशन्ति जननागर्भेअर्भकत्वंनराः॥     -शक्ति तन्त्र

कुण्डलिनी महाशक्ति के प्रयत्न से ही संसार का सारा व्यापार चल रहा है। जो इस तथ्य को जान लेता है वह क्षोभ-संताप भरे बन्धनों में नहीं बंधा रहता।

कूजन्ती कुलकुण्डली च मधुरं मत्तालिमालास्फुटं,

वाचः कोमलकाव्यवन्धरचनाभेदातिभेदक्रमैः।

श्वासोच्छ्वासविभजंनेन जगताँ जीवो यया धार्यते।

सा मूलाम्बुजगहरे विलसति प्रोद्दमादीप्त्यावलिः॥               -षट्चक्र निरुपणम्12

कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर वाणी में मधुरता आ जाती है। काव्य कला और साहित्य कला और साहित्य में प्रगति होती है। यह मूलाधार चक्र में दीप शिखा जैसी चन्द्र ज्योति जैसी प्रकाशित है, प्राण वायु द्वारा यह धारण की जाती है।12

मूलाधारे आत्मशक्तिः कुण्डलिनी परदेवता।

शायित भुजगाकारा सार्द्धत्रय बलयान्विता॥

यावत्सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा।

ज्ञान। न जायते तावत् कोटियोगविधेरपि॥

आधार शक्ति निद्रायाँ विश्वं भवति निद्रया।

तस्याँ शक्तिप्रबोधेन त्रैलोक्यं प्रति बुध्यते॥               -महायोग विज्ञान

आत्म शक्ति कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में साँड तीन कुण्डलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। जब तक वह सोती रहती है तब तक जीव पशुवत् बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी यह आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है। पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार जाग पड़ता है।

मनुष्य को चाहिये कि झूठ से कामना सिद्ध न करें। निन्दा, स्तुति तथा भय से भी झूठ न बोले और न लोभवश। चाहे राज्य भी मिलता हो झूठ अधर्म को न अपनावे। भोजन, जीविका बिना भी चाहे प्राण जाते हों तो भी धर्म का त्याग न करें क्योंकि जीव और धर्म नित्य हैं। वे मनुष्य धन्य है जो धर्म को किसी भी भाव नहीं बेचते।

-श्रीराम शर्मा आचार्य


अपनों से अपनी बात

यति और योद्धा का सम्मिश्रण कदाचित ही कहीं देखा जाता होगा। कारण कि यति की कोमलता, करुणा उसे दयालु क्षमा शील, उदार प्रकृति का बनाये रहती है। ईश्वर का विश्वासी अक्सर ईश्वर पर इतना निर्भर हो जाता है कि आपने कर्त्तव्य कर्मों का होना न होना भी ईश्वर इच्छा पर छोड़ देता है और जो कुछ हो रहा है सो ठीक मान लेता है, काम बड़े न बन पड़े तो क्या करें ? इस प्रकार अपने मन को समझा लेता है। वे न तो किसी से लड़ पाते हैं और न कोई लड़ा दुस्साहस करने लायक संकल्प ही कर पाते हैं। जब कि यह दोनों ही आधार आत्मिक विकास और लोक मंगल का व्यवस्था क्रम बनाये रहने के लिये नितान्त आवश्यक है।

आमतौर से यह माना जाता है कि जो आध्यात्मिकता के क्षेत्र में चला गया वह बाह्य क्षेत्र के लिए निरर्थक हो गया। क्योंकि संसार तो संघर्ष से चलता है, यहाँ हर किसी को हर कदम पर जीवन धारण किये रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। प्रगति के लिये तो वह अनिवार्य है। चाहे आत्मिक हो चाहे भौतिक हो दोनों ही दिशायें ऐसी है जो अपने-अपने ढंग से संघर्ष चाहती है। आत्मिक जीवन में अपने अपने दोष दुर्गुणों, कुसंस्कारों और प्रलोभनों-अवरोधों से लड़ना पड़ता है। गीता का प्रशिक्षण ही अन्तरंग जीवन, में पाँच प्राणों को सौ दोष दुरितों के कौरव पाण्डवों के रूप में लड़ा देने के लिए प्रादुर्भूत हुआ। आत्मिक साधना को भी समर कहा गया है। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर मधु कैटभ और शुम्भ निशुम्भ के रूप में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर में घुसे बैठे असुरों को आत्म शक्ति द्वारा निरस्त करने की शिक्षा है। इस प्रकार संघर्ष आत्मिक प्रगति का भी प्रमुख आधार है। भौतिक जीवन का तो कहना ही क्या ? यहाँ प्रगति तो दूर अपने अस्तित्व को बनाये रह सकना भी बिना संघर्ष सम्भव नहीं। इस दुनिया में देवताओं से असुर अधिक है। वे हर घड़ी घात लगाये रहते हैं और जो दुर्बल गाफिल पाया जाता है उसे ही धर दबोचते हैं। आँख से न दीखने वाले रोग कीटाणुओं से लेकर-मक्खी, मच्छर, खटमल पिस्सुओं तक और साँप बिच्छुओं से लेकर व्याघ्रों तक अन्य जीव-जन्तु जब आक्रामक बने बैठे है तो मनुष्य वेशधारी असुरों का तो कहना ही क्या। वे कमजोर और गाफिल की तलाश करते फिरते हैं और जो संघर्ष करने से कतराता है उसे ही धर दबोचते हैं। प्रगति के लिये तो इंच-इंच रास्ता बनाना पड़ता है। सफलतायें उपहार में किसी को नहीं मिली। प्रचण्ड मनोबल और प्रखर पुरुषार्थ के मूल्य पर उन्हें खरीदा ही जाता है। इस संसार में आगे बढ़ने और जीवित रहने की राय यही है। पर यति लोग अपने दार्शनिक रुझान के कारण इन दोनों ही विशेषताओं से खाली हो जाते हैं। फलतः उनकी प्रगति रुकी ही पड़ी रहती है। न वे आत्मिक दिशा में आगे बढ़ पाते हैं और भौतिक क्षेत्र में। प्रगति के आधार ही जब गंवा दिये गये तो फिर उपलब्धि कैसी ?

विचारशील लोग वर्तमान अध्यात्म की चिन्तन शैली को इसलिए प्रतिगामी मानते हैं कि वह प्रगति का पथ अवरुद्ध करती है मिथ्या सन्तोष पैदा करके आशा की ज्योति ही बुझा देती है। “स्व” को खोकर एक प्रकार से ऐसे व्यक्ति परावलम्बी हो जाते हैं, जबकि होना ठीक उलटा चाहिए था। अध्यात्म का अर्थ ही आत्म निर्भरता और आत्मिक पूर्णता है। जहाँ अपूर्णताओं से समझौता कर लिया जाये, प्रगति को अनावश्यक माना जाये और आत्मोत्कर्ष के लिए अभीष्ट पुरुषार्थ को किसी दूसरे की-भगवान की कृपा के साथ बाँध दिया जाये तो निस्सन्देह ही लक्ष्य की दिशा में बढ़ चलना अवरुद्ध ही हो जायेगा। स्थिति यही है, जिसे तथाकथित अध्यात्मवादियों के जीवन क्रम का विश्लेषण करके सहज ही जाना जा सकता है। यही कारण है कि वर्तमान आध्यात्मिकता को विचारशील वर्ग नापसन्द करते हैं उसे अनुपयोगी मानते हैं और व्यक्ति तथा समाज के विकास क्रम में बाधा समझते हैं। जबकि वास्तविकता वैसी है नहीं। अध्यात्म के मूल सिद्धान्त जिन्हें आज एक तरह से भुला दिया गया है वस्तुतः ऐसे प्रखर है कि उनका अवलम्बन करने से प्रगति का मार्ग अवरुद्ध नहीं होता वरन् खुलता है। यदि ऐसा होता तो प्राचीनकाल में घर-घर महामानव उत्पन्न होने -अपने समाज को परिष्कृत करते हुए समस्त संसार का हर क्षेत्र में नेतृत्व कर सकने-के आधार कैसे बनते ? भारतीय समस्त विश्व में गौरवान्वित कैसे होती ? और आध्यात्मिकता को देव विद्या-संजीवनी विद्या-ब्रह्मविद्या के नाम से क्यों पुकारा जाता और क्या उसे प्राप्त करने के लिए सर्वत्र लालसा, आकाँक्षा उफनती फिरती ?

गुरुदेव भारत के प्राचीन अध्यात्म तत्व दर्शन एवं अध्यात्म का मूर्तिमान प्रतिनिधित्व करते हुए अवतरित हुए। वे जानते थे कि वाणी और लेखनी के माध्यम से प्रचार और शिक्षण का कुछ असर तो होता है और उसकी आवश्यकता भी रहती है, पर उतने भर से काम नहीं चल सकता। प्रभावशाली शिक्षण वह होता है जो मूर्तिमान हो। प्रत्यक्ष को देखे बिना प्रेरणा नहीं मिलती। विचार केवल हलचल उत्पन्न करते हैं, उन्हें कार्यान्वित कैसे किया जा सकता है। उसका उदाहरण जब तक सामने न आवे तब तक श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर चलने की किसी को स्फुरणा ही नहीं मिलती, नमूना सामने है। किसी समय में केवल सात ऋषि थे और समस्त संसार के सातों द्वीपों का एक-एक करके समग्र नेतृत्व संभालते थे। कारण वे जो कहते थे सो करते भी थे। जो बताना चाहते थे, कराना चाहते थे, उसे उन्होंने अपने मन वचन और कर्म में अति गहराई तक समाविष्ट कर लिया था। यह समन्वय ही उनकी प्रभावशीलता का मात्र आधार था। विद्या और प्रतिभा का भी मूल्य है, जहाँ तक जीवन क्रम बदल देने जैसे घेर कर्म को कराने की व्यक्ति को पतन के गर्त से निकाल कर उत्कर्ष के शिखर पर पहुँचाने की आवश्यकता होती है वहाँ बाँस के डण्डे काम नहीं करते वहाँ मजबूत क्रेने ही काम करती है। प्राचीन काल में आत्म वेत्ता अपने को इतना समर्थ और प्रभावशाली बनाते थे कि लोक नेतृत्व कर सकें। इसके लिए वे बुद्धि या प्रतिभा को प्रखर करने में ही नहीं लगे रहते थे वरन् समग्र व्यक्तित्व को विचार एवं कर्म के समन्वय से प्रचण्ड बनाते थे। भारतीय तत्व ज्ञान की विश्वव्यापी गौरव गरिमा, प्रभावशीलता एवं सफलता का मूल कारण उसके व्याख्याओं द्वारा अपने जीवन प्रयोगशाला में अपने कथन की सार्थकता सिद्ध करना ही था। आज वह क्रम टूटा तो वह दर्शन भी बैठ गया, जिसकी अब केवल चर्चा ही शेष रह गई है।

सामान्य स्तर की जनता के मन में तथाकथित अध्यात्मवादियों के और धर्म धुरन्धरों के आचरणों को देखकर अरुचि उत्पन्न हुई है। दम्भ, छल, प्रपंच, भ्रान्ति और बहकावे के आधार पर कोई चीज देर तक खड़ी नहीं रहती ढोल की पोल आखिर तो विदित हो ही जाती है। दूसरों को त्याग का उपदेश स्वयं वैभव का संचय इस विडम्बना को जो भी देखता है मन खट्टा करता है। ईश्वर की दुहाई दिन रात देते रहने पर भी जिनके जीवन में कोई विशेषता न हुई उनका अनुगमन करके हमें क्या मिलने वाला है-उसमें भी सन्देह उत्पन्न होता है। मध्यम वर्गीय जनता का मन इन तथ्यों को जब देखता है तब उसकी रुचि इस ओर से घटती है। उच्च स्तर के विचारशील लोग थोड़ी और गहराई से देखते हैं उन्हें इस दर्शन में या उसकी व्याख्या में कहीं कोई भारी त्रुटि दिखाई देती है। ऊँचे स्तर की विचार सम्पदा के संपर्क में आने से व्यक्तियों में निखार आना चाहिए और प्रखरता उत्पन्न होनी चाहिए। यह कैसा दर्शन जो अपूर्णता को दूर करने के लिए तत्परता उत्पन्न करने की अपेक्षा उससे समझौता करले। यथा स्थिति से सन्तुष्ट रहने और परावलम्बन को उचित मानने को जो तैयार हो जाये वह कैसी उत्कृष्टता ? ऐसी आध्यात्मिकता को अपनाकर तो पुनः कमजोर और गाफिल लोगों की पंक्ति में ही जा खड़ा होगा जिन्हें आक्रामक तत्व जीवित नहीं रहने देते। भारत का पिछला इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। पिछले एक हजार वर्ष में यहाँ धर्म की ध्वजाएं खूब उड़ाई गई। जितने भी पन्थ सम्प्रदाय इस देश में उभरे हैं वे सभी प्रायः इसी एक हजार वर्ष का उत्पादन है। सिद्ध महात्माओं की बाढ़ इन्हीं दिनों आई। और देश पददलित भी इन्हीं दिनों हुआ। सोचा जाता है कि इन भक्ति उत्पादनों की अपेक्षा यदि समर्थ गुरु रामदास, वन्दा वैरागी, गुरु गोविन्द सिंह जैसी प्रखरता को आन्दोलित किया गया होता तो देश का अधिक हित साधन होता। इस स्तर का चिन्तन जब विचारशील वर्ग के मन में चलता है तो वे इस प्रचलित धर्म-अध्यात्म की मान्यताओं को अवाँछनीय और अनावश्यक मान लेते हैं। और उसे कल्पनाओं का जंजाल मात्र समझकर उदासीनता धारण कर लेते हैं। इस प्रकार सामान्य और उच्च दोनों ही स्तर के लोग जब महान तत्व ज्ञान के प्रति उपेक्षा बरतने लगेंगे अपने मन में उसका मूल्य गिरा लेंगे तो उससे भारी हानि होगी। उच्च दर्शन की उपेक्षा करके कोई समाज अपनी उत्कृष्टता स्थिर नहीं रख सकता और उसके अभाव में उसे दुर्बल एवं पतित ही होना पड़ेगा। वर्तमान दार्शनिक अवसाद ने कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न करदी है कि जिसका सुधार बिना एक क्षण गंवाये अविलम्ब आरम्भ किया जाना चाहिए।

भारतीय तत्व दर्शन एवं अध्यात्म के सम्मुख प्रस्तुत इस जीवन मरण जैसे अवरोध का विश्लेषण और निराकरण सही रूप से प्रस्तुत करने के लिए गुरुदेव ने न केवल कहा और लिखा वरन् उसे अपने कर्त्तव्य का अविच्छिन्न अंग भी बनाया। उन्होंने यह प्रतिपादन किया कि यदित और योद्धा दोनों का एक साथ रह सकना सम्भव है। सम्भव ही नहीं -स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। दयालुता का अर्थ अनाचार का संरक्षण नहीं और क्षमा का अर्थ पाप और अनीति को स्वच्छन्द रूप से कुहराम मचाते रहने की छूट देना नहीं है। रोगी पर दया की जानी चाहिए रोग पर नहीं। पापी को भी प्यार किया जा सकता है पर पाप के प्रति तो निष्ठुरता बरतनी ही पड़ेगी। सन्त की भी पूजा कसाई की भी पूजा। पुण्य की भी जय और पाप की भी जय। ऐसा सम दर्शन तो व्यक्ति को दार्शनिक भूल भुलैयों में उलझा कर संसार का सर्वनाश ही कर देगा। गुरुदेव ने अपने जीवन क्रम में उन तथ्यों को स्थान दिया जिनमें उनके यति तत्व के साथ योद्धा तत्व भी पूरी तरह जुड़ा हुआ है।

योद्धा के रूप में उन्हें देखा और परखा जाये तो लगेगा वे योद्धा पहले और यति पीछे थे। इसी प्रकार जब उनके यति गुणों को देखते हैं तो वे ही मुख्य मालूम पड़ते हैं। वस्तुतः दोनों तत्वों का विलक्षण समन्वय उनमें है, इसे संयोग नहीं मान लेना चाहिये वरन् यों समझना चाहिए कि उनकी हर क्रिया लोक शिक्षण के लिये थी और वे यह बताते थे कि यति और योद्धा के समन्वय से ही अध्यात्म की सर्वांग पूर्णता बनती है।

गुरुदेव के अबोध बचपन की बातों का तो ठीक से पता नहीं, पर जब से वे कुछ समझने समझाने लायक हुए तब से उनने अपनी साहसिक शूरवीरता को भी आगे ही रखा। जिस गाँव में जन्मे थे उस गाँव की एक बुढ़िया मेहतरानी के पैर में कीड़े पड़ गये थे। वह अकेली थी, इस स्थिति में कोई उसकी सेवा चिकित्सा करने को तैयार न होता था कीड़ों के कष्ट से बुढ़िया बेतरह रोती चिल्लाती, गुरुदेव से न रहा गया। वे चिकित्सक के पास गये। चिकित्सक उसे देखने जाने को तैयार न हुआ। तो पीठ पर लाद कर उसे ले गये। बारह वर्ष का बालक एक मन से अधिक भारी बुढ़िया को घोड़े की तरह चारों पैरों से चलता हुआ चिकित्सक के पास पहुँचा तो सब दंग रह गये। सुसम्पन्न घर का - उच्च ब्राह्मण कुल का अछूत मेहतरानी को इस प्रकार पीठ पर लाद कर चिकित्सक के पास पहुँचे यह एक बिलकुल अनहोनी बात थी चिकित्सक से विधि पूछी, दवा ली और जब तक बुढ़िया अच्छी न हो गई रोज ही उसकी मरहम पट्टी करने को ही नहीं उसकी भोजन व्यवस्था करने भी उसके घर जाते रहे।

अब से पचास वर्ष पूर्व का जमाना दूसरा था। उन दिनों छूतछात अब से अधिक थी। फिर पण्डित ब्राह्मण तो नहाने, छूने खाने में ही धर्म को समेटे बैठे थे। ऐसी परिस्थिति में उनके पूरे परिवार ने विरोध किया, गाँव के दूसरे लोगों ने भी उंगली उठाई। नतीजा यह हुआ के उनके घर में घुसने पर प्रतिबन्ध लग गया। बारह वर्ष का बालक आखिर करता ही क्या। घर से बाहर उन्हें हाथ पर रोटी दी जाती; कोई उन्हें छूता नहीं, घुड़साल में चारपाई डाल दी गई। यह सब हुआ पर मेहतरानी बुढ़िया की सेवा तब तक नहीं छटी जब तक कि वह पूरी तरह अच्छी नहीं हो गई। जब चिकित्सा क्रिया बन्द हो गई तब ब्राह्मणों की पंचायत ने दण्ड दिया कि इसे प्रायश्चित के लिये गंगा स्नान करने भेजा जाये और ब्रह्मभोज करने की व्यवस्था की जाये। बारह वर्ष के बालक का साहस तो देखिये, उनने यही कहा-मैंने ऐसा कोई पाप नहीं किया है, जिसका प्रायश्चित करना पड़े। गंगा स्नान जैसे शुभ कार्य में मुझे श्रद्धा है पर प्रायश्चित के रूप में तो उसके लिये भी तैयार नहीं हूँ। मुद्दतों यह झंझट चलता रहा। सारा परिवार, सारा गाँव, सारा समाज एक ओर और बारह वर्ष का बालक एक ओर। बालक प्रहलाद की तरह अड़ा ही रहा, समय ने वह बात पीछे डाल दी। बहिष्कार समाप्त हो गया। पर चर्चा बनी हरी कि जिसे मनुष्य सही समझे उसके लिये कितना कठोर और दृढ़ होना चाहिये इसका उदाहरण एक छोटे लड़के ने किस बहादुरी से प्रस्तुत किया।

सन् 30 का काँग्रेस संचालित सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हुआ। तब तक वे 18 वर्ष के हो चुके थे। उन दिनों आतंक बहुत था। गोली चलने लम्बी जेल होने-घर जायदाद जब्त होने की चर्चा हर किसी के मुँह पर थी। गुरुदेव ने निश्चय किया कि अन्याय का प्रतिकार करने के लिये बड़े से बड़ा कष्ट सहना चाहिए। वे सत्याग्रहियों की सेना में भर्ती हुए। घर वाले चिन्तातुर हो उठे। जिस दिन उन्हें जाना था, उससे एक दिन पूर्व ही घर में बन्द कर लिया गया। न जाने के लिए समझाने से लेकर बल प्रयोग तक के सारे उपाय परिवार द्वारा काम में लाये जा रहे थे। पर जो उचित है उस पर से रत्ती भर टलने की बात स्वीकार नहीं हुई। रात को टट्टी जाने के लिए घर की कैद से छूटे नंगे पैर, एक बनियान और नेकर पहने, हाथ में लोटा। घने अंधेरे में रास्ता उलट कर चल दिये और घोर अंधियारी, वर्षा के बीच भेड़ियों से भरे घने खार बीहड़, नदी नाले पर करते हुए रातों रात लम्बी यात्रा करके आगरा पहुँचे । जब तक घर वाले पता लगाने पहुँचे उससे पहले ही जेल चले गये।

उग्र सत्याग्रहियों में उनकी गणना थी। एक-एक करके तीन बार उन्हें उस अवधि में जेल जाना पड़ा और कुल मिलाकर लगभग चार वर्ष जेल रहे। जुर्माना हुआ। घर का सामान जब्त और नीलाम हुआ कई बार बुरी तरह पिटे और एक बार तो घोड़े के पैरों के नीचे कुचले जाने पर इतनी चोट लगी कि जीवन संकट में पड़ गया। गैर कानूनी कलकत्ता काँग्रेस में उत्तर प्रदेश का जत्था लेकर पहुँचे तो वहाँ गोलियों की बौछार से जहाँ कितने ही साथी खेत रहे वहाँ से आश्चर्य की तरह ही बचे रहे। बंगाल की आसन सोल जेल में इन्हें फिर बंद रखा गया। उन दिनों की दुस्साहस पूर्ण चर्चाएं जिनमें सन 42 की और मरी आन्दोलन की रोमाँचकारी घटनायें भी हैं शामिल है ऐसी हैं जिन्हें सुनते ही पसीना छूटता है। ऐसी घटनाएं न केवल उनके द्वारा योजना बद्ध रूप से संचालित होती रही वरन् स्वयं भी बढ़ चढ़ कर उनमें भाग लेते रहे। ऐसा दुस्साहसी व्यक्ति यति भी हो सकता है और यति में मृत्यु से अठखेलियाँ करने वाला, इतना दुस्साहस भी हो सकता है, यह एक अनोखी बात लगती है। पर है सत्य। इन घटनाओं के संदर्भ में उनका कहना यही था-आत्मा की अमरता और मृत्यु को वस्त्र बदलने जैसी सामान्य घटना मानने की गीता की शिक्षा-सदुद्देश्य के लिये बड़े से बड़ा दुस्साहस कर गुजरने की ही तो शिक्षा देती है।

गायत्री यज्ञ आन्दोलन उनके द्वारा भारत के ऐतिहासिक आन्दोलनों में से एक है। उसकी विशालता का मूल्याँकन किया जाये तो दाँतों तले उंगली दबानी पड़ेगी कि किस प्रकार उसमें करोड़ों व्यक्तियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और इन व्यवस्थाओं में किस प्रकार करोड़ों रुपयों की व्यवस्था सम्भव हुई उस अभियान के अनेक आध्यात्मिक पहलू भी है जो सूक्ष्म जगत को अनुप्रमाणित करने से सम्बन्ध रखते हैं। पर एक प्रत्यक्ष पहलू सामाजिक क्रान्ति भी थी। भारत की मूल समस्या सामाजिक है। राजनैतिक और आर्थिक समस्याएं तो उसे साथ जुड़ी हुई है। यदि देश में से ऊँच नीच, स्त्रियों को प्रतिबन्धित करना, विवाह शादियों में होने वाले अपव्यय जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर न किया जा सका तो देश का पिछड़ापन कभी दूर न होगा और राजनैतिक एवं आर्थिक प्रगति के बावजूद विकास की कोई सम्भावना साकार न होगी। कारण कि इस प्रकार की बुराइयों से जो क्षति निरन्तर होती रहती है, उसे कितनी भी बड़ी विकास योजनायें पूरा नहीं कर सकती। जब क्षति पूर्ति तक हमारे समस्त प्रयासों से संभव नहीं तो प्रगति की बात ही कहाँ से बनेगी ? इस लक्ष्य को भलीभाँति समझते हुए गायत्री यज्ञ आन्दोलन के साथ उन्होंने सामाजिक क्रान्ति की व्यवस्था को गहराई तक जोड़ कर रखा है।

गायत्री मन्त्र का मनुष्य मात्र को अधिकार दिये जाने की घोषणा करने से जब अछूत भी उसका उपयोग करने लगे तो पुरातन पन्थियों में खलबली मच गई। जो मन्त्र ब्राह्मणों का था, कान में कहा सुना जाने वाला था, उसे सब लोग प्रकट रूप में कहें सुनें यह कैसा अनर्थ ? यज्ञों में केवल ब्राह्मण लोग दक्षिणा लेकर आहुतियाँ देते थे। स्त्रियों - को अन्य वर्णों को उसमें प्रवेश मिलता ही नहीं था। उसमें सम्मिलित होने के लिए सबका खुला प्रवेश ? यज्ञ आयोजनों में आने वाले आगन्तुकों को कच्ची (दाल भात, रोटी) का प्रबन्ध और बिना जाति पाँति के भेद-भाव के उनका बनाया और परोसा जाना, यह उन दिनों घोर आश्चर्य का विषय था। इस व्यवस्था को अनाध्यात्मिकता, नास्तिकता आदि न जाने किन किन नामों से पुकारा जाता रहा। पुरातन पन्थियों ने उसका घोर विरोध किया। सभायें हुई, लेख छपे, धर्म ध्वजियों ने भाषण वक्तव्य दिये, काले झण्डे निकाले, नाश के नारे लगाये और सही गलत जो कुछ भी हो सकता था सब कुछ कहा गया। चर्चा फैलाई आचार्य जी ब्राह्मण नहीं लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई हैं और भी न जाने क्या-क्या कहा गया। कई बार तो उन्हें शारीरिक आघात पहुँचाने और अपशब्द कहने तक के अवसर आये। पर क्या मजाल कि चेहरे पर जरा भी उदासी आई हो। सामाजिक क्रान्ति का इतना बड़ा तूफानी अभियान खड़ा करने वाले में कितना दुस्साहस होना चाहिए उसे देखना नापना हो तो इस 110 पौंड भारी हाड़ माँस के पिंड में कितनी प्रचण्ड दृढ़ता विद्यमान है उसे उनके समीप ही जाकर जाना जा सकता है। यदि साहसी सैनिक की तरह उनके संघर्ष प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा लिया जाये तो पता चलेगा कि अन्याय और अनाचारों के विरुद्ध उनका प्रत्येक दिन ही लड़ने में बीता है यदि वे संघर्षात्मक घटना को इकट्ठे किये जाये और उनमें मिली सफलता और असफलताओं, घावों और चोटों को गिना जाये तो लगेगा कि वे अनाचार से आजीवन कट-कट कर लड़ने वाले योद्धा के रूप में ही जन्मे और शायद अन्तिम साँस तक वे इस युद्ध में संलग्न रहते हुए प्राण त्यागेंगे।

संकल्प की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक खतरों को सिर पर उठा लेने का उनका सहज स्वभाव है। सन् 60 में जब ये एक वर्ष के लिये अज्ञातवास गये थे तब गंगोत्री की भागीरथी और उत्तर काशी के परशुराम आश्रम के समीप रहना पड़ा। उन क्षेत्रों में शीत की प्रचंडता कई बार तो असहाय हो जाती है। सर्प, रीछ, व्याघ्र और दूसरे हिंसक जन्तुओं ने जीवन का संकट भी। एकाकी जीवन में भोजन तक की अव्यवस्था तथा अनेक प्रकार की संभावित आशंका सूनेपन की नीरसता तथा ऊब। इन सब बाधाओं के रहते अपने मार्ग-दर्शक का बताया साधन क्रम करना ठहरा सो किया ही। डर तो उन्हें छू भी नहीं गया है। कठिनाइयों से अठखेलियाँ करने में न जाने कैसा मजा उन्हें आता है। आत्मवेत्ता सिद्ध पुरुषों के संपर्क में आने के लिये उन्होंने अति भयानक अगम्य वन पर्वतों में कितनी दुस्साहस भरी यात्रायें की हैं और किन संकटों का सामना करते हुए क्या पाया है इसकी चर्चा जब जब उनके मुख से सुनने को मिलते तो यह लगता-दुर्बल अस्थि पिंजर वाले नगण्य से दीखने वाले कलेवर में न जाने इतना अदम्य साहस किसने कहाँ से, कितना कूट-कूट कर भर दिया है। इन दिनों चल रही उनकी तपश्चर्या भी कम उग्र और कम रोमाँचकारी नहीं है।

जब से उन्होंने विज्ञान के आधार पर अध्यात्म के प्रतिपादन का विषय हाथ में लिया है और अखंड-ज्योति में उसकी लेख माला प्रस्तुत करनी आरम्भ की है तब से वैज्ञानिक क्षेत्र में घोर हलचल मची हुई है। विज्ञान सदा अध्यात्म की काट करता रहा हैं और अध्यात्म ने विज्ञान सदा से व्यंग कटाक्ष किये हैं। अब तक दोनों में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहा हैं। किसी ने कल्पना तक नहीं की थी कि विज्ञान के आधार पर अध्यात्म का प्रतिपादन सम्भव हो सकेगा और दोनों को एक दूसरे का पूरक सिद्ध किया जा सकेगा। ऐसी सम्भावना तो व्यक्त की जाती थी पर आशा रखी जाती थी कि शायद कभी ऐसा प्रतिपादन किया जाय पर अभी तक सम्भव नहीं दीखता था, पर जब गुरुदेव ने उसके प्रतिपादन को अपने हाथ में लिया तो चूहे बिल्ली के विवाह जैसी विसंगति सामने आई इस प्रतिपादन प्रसन्नता व्यक्त की गई वहाँ कट्टर पन्थियों ने इसका विरोध भी खूब किया, जो हो बात इन्हीं तीन वर्षों में आगे बढ़ गई कि यह प्रतिपादन समस्त विश्व के विचारकों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के लिए एक अति वर्चक चर्चा का विषय बन गया। यह इसी के प्रकट होता है। केवल इसी विषय को लेकर औसतन 100 से अधिक प्रतिदिन मथुरा आते थे और तत्सम्बन्धी अनेक जिज्ञासायें व्यक्त की जाती थी। बात और बढ़ी और वह प्रतिपादन चुनौती के स्तर पर जा पहुँचा। कहा जाने लगा तर्क प्रमाणों की दृष्टि से आंकी बात समझ में आती हैं उसकी प्रमाणिकता प्रत्यक्ष पर निर्भर रहेगी सो अपने प्रतिपादनों को प्रत्यक्ष कीजिये। प्रायः एक वर्ष से संसार अनेक विज्ञान संस्थाओं द्वारा यह चुनौती दी जा रही हैं कि विचार और भावनाओं का स्थूल पदार्थों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है तो उसे प्रत्यक्ष करके दिखाया जाय। इतना भर मानते थे कि विचारों का विचारों पर व पड़ सकता है पर उनका पदार्थों पर कैसे प्रभाव पड़ा ?

यह सिद्ध किये बिना अध्यात्म में प्रचण्ड शक्ति होने मान्यता लोगों के मनों में नहीं बिठाई जा सकती और जब तक उतना आकर्षण न हो लोग उसकी अधिक उप-- स्वीकार न करके। चूँकि अगला समय भौतिक के स्थान पर अध्यात्म विज्ञान को प्रतिष्ठापित करने को आयेगा। इसके लिये आधार बनना चाहिए और तरह तरह की प्रत्यक्ष प्रामाणिकता प्रस्तुत की जानी चाहिए जो कि प्रत्यक्ष वादियों द्वारा माँगी जा रही हैं। अपना चमत्कार दिखाने के लिये नहीं वरन् सर्व साधारण को आत्म विद्या की उत्कृष्टता समझाने की और उस ओर रुझान उत्पन्न करने के लिये ऐसा प्रतिपादन एवं प्रत्यक्षी करण आवश्यक हो गया है और चुनौती को स्वीकार कर लिया गया हैं। चूँकि गुरुदेव को पिछले दिनों युग निर्माण योजना के संदर्भ में संगठनात्मक प्रचारात्मक और आँदोलनात्मक कार्य मनोयोग उधर ही लगा रहा। अस्तु उस प्रकार से प्रत्यक्ष प्रमाणित कर सकने योग्य क्षमता में कमी मालूम पड़ी। इस कमी को परी करने के लिये ही इन दिनों उनके तप साधन आध्यात्मिक व्यायामों के रूप में चल रहें हैं। वे कितने जटिल और कठिन हैं इसकी चर्चा सर्वसाधारण का विषय नहीं हैं। पर यहाँ इसलिये यह बताना पड़ा चढ़ी है और वे इस आयु में भी कितने दुस्साहसपूर्ण कार्य कितनी उमंग और कितने उत्साह के साथ कर सकने में संलग्न तथा समर्थ हैं।

अध्यात्म पर लगाया जाने वाला लांछन सही नहीं है कि जो यति है वह योद्धा नहीं हो सकता। दोनों का समन्वय सम्भव ही नहीं स्वाभाविक भी हैं। विश्वमित्र, अगस्त्य, शृंगी, परशुराम, वशिष्ठ, द्रोणाचार्य, दधीचि आदि ऋषियों के कठोर कर्तृत्वों को देखकर इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँचा जा सकता है कि अध्यात्म व्यक्ति को अकर्मण्य कर सकने की क्षमता प्रदान करता है। उसी प्रकार यह मान्यता भी सही नहीं है कि मानसिक दृष्टि से व्यक्ति को दीन दुर्बल, कायर, समझौतावादी एवं परावलम्बी बनना अध्यात्म की प्रवृत्ति हैं। सही बात यह है कि उससे संकल्प शक्ति और अधिक तीव्र होती है तथा मानसिक एवं आत्मबल की आश्चर्यजनक बढ़ोतरी होती हैं। ब्रह्मचारी नपुंसक जैसा दीखता भर है उसका पौरुष कामुकों की अपेक्षा बढ़ा-चढ़ा होता है। यति यदि सच्चा हो तो न उसका कम होता है न शौर्य-पराक्रम।

व्यक्तिगत भौतिक प्रगति का जहाँ तक सम्बन्ध है यदि कोई इस और से उदासीन रहे और उपयोग की दृष्टि से न्यूनतम मात्रा अपने लिये प्रयोग करता है, सादगी और मितव्ययिता का जीवन जीता है तो यह ठीक हैं। यदि इसे ही गरीबी कहा जाता हो तो हर्ज नहीं। क्योंकि व्यक्तिगत आकाँक्षाओं और वासना तृष्णाओं से बचा रहे तो भी मनुष्य की विभूतियों का उपयोग परमार्थ एवं लोक मंगल में हो सकेगा। इसी प्रकार यह लाँछन भी सही है कि अपने में व्यक्तिगत दृष्टि रखने वाले और ठगने वालों से बदला नहीं लेता। यह इसलिए सही है कि उस प्रतिशोध में बहुत शक्ति खर्च होती हैं, उससे लाभ तो अकेले का ही पर हानि सबकी होती हैं-- जो सामाजिक अथवा अधिक बुरी तरह के अनाचारों का उत्पीड़न सह रहे थे। वस्तुतः सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों से ही लड़ना अधिक उपयुक्त रहता है क्योंकि उनके मिटने से असंख्य लोगों को राहत मिलती हैं।

जहाँ तक व्यक्तिगत सुखोपभोग का सम्बन्ध है गुरुदेव ने अभावग्रस्त दरिद्री जैसी जीवन जिया। जहाँ तक व्यक्तिगत भौतिक उन्नति का सम्बन्ध है वे उसकी ओर सदा उपेक्षा की दृष्टि से देखते रहें। धन, यश और विलास इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगा तो ऐसी डुबकी लगाई कि यह मगर उन्हें ताकते ही रह गये और वे देखते-देखते उनकी पकड़ से बाहर। यदि उनने वैभव चाहा होता तो शासन में ऊंचे पर पहुँचे होते। राजनीति में उनका लोहा माना जाता, विद्वानों में मूर्धन्य गिने जाते और पैसा उनके पैरों में लोटा फिरता। फोटो छपने, अभिनन्दन ग्रन्थ मिलते और राज सम्मान की उपाधियों से विभूषित होते। और भी न जाने क्या-क्या होते। उनको हिमालय जितनी क्षमताओं की प्रतिक्रिया बड़े वैभव के रूप सामने खड़ी होती। पर इस सम्बन्ध में वे निस्पृह अवधूत की तरह ही बने रहे और अपनी बाल सुलभ सरलता को ही अपनी सर्वोत्तम संग्रहित संपत्ति मानते रहे। लोगों ने उन्हें कितना ठगा है, कुछ प्राप्त करने के लिये कितने-कितने प्रपंच रचे हैं और काम निकल जाने पर किस तरह तोता चस्मी दिखाते रहे हैं इसका कभी कोई-कोई चुटकुला उनके मुँह से सुनने को मिल जाता है। उन्हें उस पर तनिक भी क्षोभ नहीं, केवल लोगों का छोटापन समझकर विनोद मात्र करते हैं और कहते हैं, यह भोले लोग कुछ ऊँची चीज माँगने या पाने के इच्छुक होते तो हम जिस तरह एक समर्थ के दरवाजे पर जाकर अपनी झोली भर लाये थे उसी तरह यह लोग भी कुछ काम की और वजनदार चीज लेकर जा सकते थे पर ओछापन बेचारों को कृतज्ञता की सुखद अनुभूति तक का लाभ नहीं लेने देता है। जो बहुत पुराने परिचित हैं पर इस लम्बी अवधि में वे जहाँ के तहाँ रहे और गुरुदेव कहाँ से कहाँ पहुँचे हुए देख कुढ़ते हैं। और ईर्ष्या वश अनेक तरह की क्षति पहुँचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे ईर्ष्यालु लोगों के कुकृत्यों में बेसिर पैर के लाँछन लगाने से लेकर विष देने तक की जघन्य घटनायें शामिल हैं उनमें प्रतिशोध लेने की बात मन में कभी नहीं आई केवल बेचारे ही कहकर सम्बोधित करते रहे और उलट कर इसका परिणाम उनके लिये क्या हो सकता है। इस प्रकार व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत प्रतिशोध की बात उन्हें सूझी ही नहीं। अपने आपको एक प्रकार से भूले ही रहे। अनुभव करते हैं कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सत्ता को किसी महान सत्ता में घुला ही दिया है और अपना कहने लायक उनके पास कुछ रह ही नहीं गया हैं। प्रत्यक्ष इसे हानि या अपकर्ष कहा जा सकता है। लोग व्यंग करते हैं कि जबकि उनसे पिछड़े हुए लोग मोटरों और हवाई जहाजों में उड़े फिरते हैं तब उनके पास साइकिल रिक्शा भी नहीं हैं। उस नजर से देखने वाले अध्यात्म को घाटे का सौदा कह सकते हैं, पर तब फिर गुरुदेव को ही नहीं, विश्वामित्र, भर्तृहरि, बुद्ध, महावीर, गान्धी आदि न जाने कितनों को घाटा उठाने वाले सौदागर कहा जायगा। जब इतने दिवालिये मौजूद हैं तो हमें ही क्यों शर्म आये-यह कहते हुए अपनी गरीबी पर हमने उन्हें विनोद भरा रस लेते ही देख गया।

पर यह निस्पृहता केवल व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित हैं। समाज की सम्पन्नता और सुविधा बढ़ाने की उन्हें उससे लाख करोड़ गुनी चिन्ता है जितना किसी लोभी को अपनी व्यक्तिगत तृष्णाओं की पूर्ति के लिये हो सकती हैं। समाज में फैले हुए अनाचार के प्रति उन्हें उससे लाख गुना रोष है जितना अपना सर्वस्व लूट ले जाने वाले के और हाथ-पैर जल जाने वाले डाकू के प्रति हो सकता है। विश्व वेदना से व्यथित उनकी अंतरात्मा का रुदन कदाचित् ही कोई देख पाया हो। पर जो देख सकता है देख ले कि इस अनुपम में व्यथा और आक्रोश का हिमाच्छादित ज्वालामुखी जैसा कैसा विचित्र संयोग सन्निहित हैं।

वे अपनी आग में हिमालय को पिघलाने गये हैं। लेखनी से विचार क्रान्ति, नैतिक क्रांति की उनकी निमार्ण योजना चल रही हैं। रचनात्मक और आकर्षक कार्यक्रमों को लेकर उनका विशाल परिवार व्यक्ति और समाज को बदलने के लिए लगा हुआ हैं। यह आन्दोलनात्मक अभियान है जो उपयोगी भी हैं और आवश्यक भी। लोगों को अपने कर्त्तव्य का बोध कराने के लिए किये बिना काम नहीं चल सकता था, सो किया भी है, हो भी रहा हैं। पर जो हो रहा है वह कम है। उसके लिये अभी बहुत शक्ति की आवश्यकता है और शक्ति को उत्पन्न करने वाली अणु भट्टी से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा से भी अधिक प्रचण्ड तापमान की। सो उनकी वर्तमान तपश्चर्या का प्रयोजन यही हैं। दीपक अपने को लाकर प्रकाश करता है और वे अपने को जलाकर ऊष्मा पैदा करने चले हैं जो दावानल की तरह भड़के और पाप तथा पतन के इस दण्डकारण्य में छिपे हुए सुरों को जलाकर भस्म करदें।

बाहर से अति सरल अति सौम्य और अति शान्त रखने वाले इस महामानव में इतना रोष और इतना दर्द हो सकता है इसका पता उनके निकटवर्तियों छोड़कर और किसे होगा वे किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेते और न किसी को इंगित करते हैं पर समाज के 1.राजनेता 2. धर्मगुरु 3. बुद्धिजीवी 4. कलाकार और 5. सम्पत्तिवानों के प्रति यह कहते जरूर हैं कि इनके हाथ में जो शक्ति है उसका यदि उन्होंने सदुपयोग किया होता तो आज यह दुर्दिन न देखने को मिलते जो देखने पड़ रहे हैं। हो सकता है वे इन्हें ही पिघलाने के लिए तप कर रहें हों। हो सकता है उस तपश्चर्या की आग में पिघल कर इन पाँच पाषाणों में से शिलाजीत की धार बह निकले। हो सकता वे सर्वसाधारण में अपने करने गये हों। सम्भव है वे विस्मृतियों का दुरुपयोग करने बालक विभूतिवानों को पदच्युत करने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न करने गये हों।

यति और योद्धा की उभयपक्षीय वि`


सफलता का रहस्य



सफलता का रहस्य-

एक बार जर्मन दार्शनिक ने स्वामी दयानन्द से कहा ‘स्वामी जी ! आपका बलिष्ठ शरीर और ओजस्वी मुखमंडल देखकर मैं अत्यन्त प्रभावित हूं। क्या मुझ जैसे सामान्य व्यक्तियों के लिए यह सम्भव है कि आप जैसा सशक्त शरीर और तेजयुक्त मुख मंडल प्राप्त हो सके ?’

‘क्यों नहीं ! जो व्यक्ति अपने को जैसा बनाना चाहता है बना सकता है। हर व्यक्ति अपनी कल्पना के अनुरूप ही बनता बिगड़ता रहता है। तुम्हें सर्वप्रथम एक लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए फिर उसकी पूर्ति के लिए संकल्प करके तदनुकूल प्रयत्न करना चाहिए। एकाग्र मन से किये गये कार्य एक दिन सफलता की मंजिल पर अवश्य लाकर खड़ा कर देते हैं।’


आत्मा-भव की शक्ति

इत्वला और वातावी की ताँत्रिक शक्ति के आगे सारी मणिमती नगरी भयभीत थर्राती थी। असुर दैत्य बड़े उत्पाती और मायावी थे मणिमती नरेश तक उन दोनों भाइयों का कुछ बिगाड़ नहीं सके थे सामान्य मनुष्य की तो बात ही क्या थी।

वातापी छोटा था और उसने विवाह भी नहीं किया था किन्तु इल्वला गृहस्थ था किन्तु विवाह हुए दर्शियों वर्ष बीत गये उसे कोई सन्तान नहीं हुई थी। स्नेह और आत्मीयता जहाँ हर व्यक्ति की आन्तरिक चाह होती है वहाँ जब तक अधिकार पूर्ण स्नेह और प्रेम का दान न दिया जाये तब तक अन्तःकरण शान्ति नहीं पाता। तात्पर्य यह कि ममता और आत्मीयता का विनिमय ही सच्चा सुख है जिसने भी यह व्यापार किया जिन्दगी का सच्चा सुख केवल मात्र उसी ने पाया।

इसी अभाव के कारण दुखी इल्वला एक दिन तपस्वी ब्राह्मणों के पास गया और बोला- आप लोगों की कृपा हो जाये और मुझे एक सन्तान का वरदान मिल जाय तो आप जो भी कहेंगे से करने के लिए तत्पर हो जाऊँगा। दीन-भाव से कभी कोई शरण आये तो कितना ही बुरा क्यों न हो विज्ञजन उसे आत्मीयता प्रदान करते हैं अच्छा व्यवहार करते हैं और यह मानकर चलते हैं कि आत्मा बुरी नहीं सांसारिक परिस्थितियाँ और आकर्षण बुरे है सो यदि किसी आत्मा को सही रास्ते लगा दिया जाये तो वह उसे सबसे अच्छा पाठ और दंड होता है। दुत्कारना तो एक प्रकार से आत्मा का अपमान है और वह भी तब जब कि कोई भावना पूर्वक शरणागत हुआ हो।

ब्राह्मणों ने इसे फटकार दिया और कहा- दुष्ट तूने सैकड़ों का रक्त पिया है उसी का दण्ड़ दिया है भगवान् ने तुझे जा तेरा भला नहीं होगा। इल्वला पहले ही अपराधी था इस प्रताड़ना ने ता उसे और भी क्रूर बना दिया। उसने तपस्वियों के विनाश का षड़यन्त्र रचा। वातापी शरीर को अणु-अणु पदार्थ में विभक्त कर बिखर जाने और इच्छा मात्र से फिर अणु अणु संलपन से अपने यथार्थ रूप में आ जाने की विधा जानता था सो इल्वला ने वातापी की मदद ली। उसने समस्त ब्राह्मण का भोज दिया कपट रूप भेड़ बनाकर वातापी का माँस टुकड़े-टुकड़े कर रँधवाया गया और अन्य भोज्य पदार्थों के साथ उसे भी परोस दिया गया। स्वादेन्द्रिय में आसक्त ब्राह्मणगण षडयंत्र को जान नहीं पाये वे वातापी को माँस बड़े प्रेम पूर्वक खा गये। ब्राह्मण भोजन कर जैसे ही उठे इल्वला ने वातापी की जोर से आवाज दी और आवाज पाते ही वातापी के शरीर-कोश ब्राह्मणों के शरीरों को फाड़-फाड़कर निकल आये। वातापी ज्यों का त्यों असली रूप में आ गया पर समस्त ब्राह्मण वही ढेर हो गये।

समस्त राज्य में हाहाकार मच गया। इसी समय अपनी धर्म-पत्नी लोपा मुद्रा के लिये आभूषणों के लिये महर्षि अगस्त घूमते हुए इल्वला के पास पहुँचे। इल्वला ने अगस्त ऋषि के सम्मुख अपनी माँग प्रस्तुत की। महर्षि ने कहा - तात ! तुम्हें पुत्र मिल तो सकता है किन्तु यदि वह तुम्हें दुःख दे तो ऐसे पुत्र से क्या लाभ ? क्यों नहीं तुम आत्मा-कल्याण की इच्छा करते। यों पाप बढ़ाने से क्या लाभ ? हाँ यदि तुम आत्म संशोधन करना स्वीकार कर लो तो हम तुम्हारी मदद अवश्य कर सकते हैं। महर्षि की आत्मीयता ने असुर का हृदय बदल दिया और आत्म-कल्याण में जुट गया उससे उसे ऐसी शान्ति मिली कि फिर उसने पुत्र की भी कामना का परित्याग कर दिया।


Quotation

सबकी आत्मा एक जैसी है, सबकी आत्मा की शक्ति सामान है, मात्र कुछ की शक्ति प्रकट हो गई है, दूसरों की प्रकट होना बाकी है।

- महात्मा गाँधी


मत गीत रचो दरबारों के (Kavita)

ओ गीतों के सौदागर साहित्य विधाता, युगु पथ निर्माताओं, विश्व जगाने वालों।

अलख जगाने के बदले शृंगार सजाकर, खुद तो नहीं मगर पीढ़ी को लजा रहे हो॥

माना तुमने प्यार किया है, ठीक किया है, वह पानी ही क्या है जिसमें लहर नआये।

लेकिन इसका अर्थ नहीं उन हीर कणों को, यूँ चौराहे पर लाकर बिखराया जाये।

प्यार बहुत पावन है, शबनम है, चंदन है, सिर्फ हृदय का नहीं, आत्मा का बंधन है।

उस निर्गुण को सगुण बनाकर यूँ महफिल में, गाना,गाना नहीं बेसुरा सा कन्दन है॥

हमने भी अवने जीवन में प्यार किया है, केवल तट ही नहीं लहर को पार किया है।

इसीलिए मँझधारों की बल्कल के ऊपर, कूलों की रेशम चूनर को वार दिया है॥

हमने भी चाँदनी रात का नशा पिया है, ऊषा की किरणों से हम भी गरमायें हैं।

लेकिन वह अनुभूति हमें इतनी प्यारी है,, कभी हृदय में नहीं जुवाँ पर भी लाये हैं।

और एक तुम हो कि उसी को लक्ष्य बनाकर,अपनी बहादुरी की डंका पीट रहें हों॥

हमको तो लगता है जैसे लाश प्यार की, गीतों की रस्सी में बाँध घसीट रहें हो।

इन जलती सांसों को शबनम नहीं चाहिये, इनका लक्ष्य भस्म करदे वह फूँक चाहिये।

स्वाभिमान की आग जलादे जो रग-रग में, इन्हें बाँसुरी नहीं हृदय की हूक चाहिए॥

गलबहियों की बाते इन पीड़ित कंठों को, लगती होंगी जैसे कि लगादी-हो फाँसी।

सुनकर पायल की खनक याद आती होगी, टूटी खटिया पर लेटी बिटिया की खाँसी॥

जब तिरछी चितवन घायल करती है तुमको, मेंहदी रचवाती शरमीली नवल अलबेली।

तब गरीब कोई कराहता होगा बैठा, करके याद बहिन की क्वारी युवा हथेली॥

बहिन कि जिसका कल सुहाग ही रूठ गया है, उसे सुनाते हो तुम बात प्रिया अनबन की।

उस ठिठुरे आँचल वाली ममता के सन्मुख, शरमाई तस्वीर खींचते रे यौवन की॥

धिक्कार तुम्हें सो बार, कलम घिसने वालो, तुम कलम छोड़कर हार बनाओ कलियों के।

फिर उन्हें सजाने को प्रेयसि के जूड़े में, तुम जाकर चक्कर काटो उसकी गलियों के॥

यह कवि होने का बहुरुपियापन बन्द करो, साहित्य साधना का यह धंधा छोड़ो तुम ।

किस तरह मिले सपनों की रानी के दर्शन, नरगिसी कुञ्ज में बैठ कुलाबे जोड़ो तुम ॥

साहित्य सरोवर नहीं, असीम समुन्दर है, इसमें मोती तो है पर जल भी खारी हैं।

कवि होना बात गर्व की नहीं, मुसीबत है, लिखना न शौक है जीवन की लाचारी हैं॥

पोथी की पोथी हैं बेकार जिन्हें पढ़कर केवल जुबान से कोरी ‘वाह’ निकल जाये।

वह एक शब्द भी महाकाव्य से बढ़कर हैं, जिसको सुनकर भीतर से आह निकल जाये॥

इसलिये अगर कवि होने का दावा है तो, ये किस्से छोड़ो इकरारों-मनुहारों के।

युग-दर्पण रचने वालो कुछ तो शर्म करो, मत प्रजातन्त्र में गीत रचो दरबारों के॥

कलमों की नोकें पंख नहीं, सकींन करो, स्याही पानी में नहीं, पसीने में घोलो।

कल्पना फूल पर नहीं, धूल पर भी टाँको, आंखें सपनों में नहीं हकीकत में खोलो॥

तब जो साहित्य रचोगे तुम, शाश्वत होगा, जो भी स्वर निकलेगा वह होगी युगवाणी।

कविता न मंच की केवल कठपुतली होगी, साधना स्वयं हो जायगी भु-कल्याणी॥

-शशिनाथ मिश्रा 'शशि'

*समाप्त*