जमाने के साथ बदलिये!

अपने समय की सर्वोत्तम वस्तुयें भी कालान्तर में विकृतिग्रस्त होकर अनुपयोगी बन जाती है। जाड़े के कपड़े जो उन दिनों शरीर को सर्दी से बचाने के लिए उपयोगी एवं आवश्यक थे, कुछ समय पीछे गर्मी आने पर निरुपयोगी हो जाते हैं। तब कोई यह आग्रह करे कि ‘भूतकाल में उन्हें उपयोगी माना गया था, इसलिए अब भी उन्हें वैसा ही माना जाय और उसी प्रकार धारण किया जाय’ तो यह आग्रह अनुचित ही नहीं, हानि-कारक भी होगा। घोर गर्मी में भला ऊनी, मोटे, गरम कपड़े पहनने से क्या लाभ हो सकता है?

किसी जमाने में उस समय की परिस्थितियों के अनुसार कोई वस्तु अच्छी रही होंगी, पर समय बीत जाने पर जब अन्य प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई तब यह आवश्यक नहीं कि पुरानी कार्य-पद्धति ही ठीक बनी रहे। नई समस्याएँ सुलझाने के लिए नया दृष्टिकोण आवश्यक है। टूट-फूट को सुधारने के लिए मरम्मत की जो उपयोगिता है, वैसी ही पुरानी रीति-रिवाजों में असामयिकता उत्पन्न हो जाने पर उन्हें ठीक करने के लिए भी आवश्यकता होती है। जो समय को नहीं देखते, पहचानते उन्हें कुचलता हुआ जमाना आगे बढ़ जाता है और वे अपनी प्रतिगामिता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं।

-ईश्वरचन्द्र विद्यासागर


समृद्धि-सूत्र

शुक और शुकी एक वृक्ष की डाल पर बैठे सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे। कोटर में उनके बच्चे सोये थे। प्रातःकाल होने में अभी कुछ देर थी। तभी शुकी ने जिज्ञासु स्वर में शुक से पूछा- स्वामी! भगवान् की इस सृष्टि में साधन और संपत्ति का कही भी अभाव नहीं है फिर भी कितने ही लोग दुःखी, साधनहीन और संकटग्रस्त क्यों है? मैं कुछ समझ नहीं पाती।

शुक एक दार्शनिक हँसी हँसा और यह कथा कहना प्रारम्भ की- साँझ होने को थी शुकी! तभी एक दंपत्ति अपने तीन बच्चों के साथ इधर से निकले देखने से लगता था कि ये लोग दिन भर के थके माँदे है, और चल सकने की उनमें हिम्मत नहीं थी। सभी रुक गये और इसी वृक्ष के नीचे डेरा डाल दिया। उन दिनों मैं भी बालक ही था, तुम्हारे साथ विवाह तो अभी हुआ है, मैं अकेला ही बैठा बड़े ध्यान से इन नवागंतुकों के क्रिया-कलाप देखने लगा।

बच्चे बोले पिताजी! भूख लग रही है खाने को दो नहीं तो प्राण निकलते हैं। माँ तो यह सुनकर चिन्तित हो उठी, पर पिता था उत्साही, उसने कहा-बच्चों! जाओ थोड़ी सूखी लकड़ियां काट लाओ अभी भोजन तैयार करते हैं। पिता की बात सुनते ही बड़ा लड़का उठ खड़ा हुआ बोला-मैं जाता हूँ अभी सूखी लकड़ियां काट लाता हूँ। अभी वह उठ नहीं पाया था कि दूसरा लड़का खड़ा होकर बोला- पिताजी लकड़ियां तो मैं ही लाऊँगा मुझसे चुपचाप बैठा नहीं जायेगा, तब तक तीसरा उठकर चल भी पड़ा वह कह रहा था - मैं छोटा हूँ लकड़ियां लाने का अधिकार तो मुझे ही है।

क्यों! आपको हँसी क्यों आई? शुकी ने पूछा तो शुक ने बताया- मैंने उनसे कहा- मूर्खों तुम्हारे पास न तो अन्न है और न शाक या फल लकड़ियां लाकर क्या अपने हाथ-पाँव पकाकर खाओगे? इन पर तीनों लड़कों ने मेरी ओर देखकर कहा- अपने हाथ-पाँव नहीं- ओरे! पक्षी हम तो तुम्हें खायेंगे। उनका यह निश्चय सुनकर मैं डर गया शुकी! और बोला भाई तुम लोग मुझे मत खाना। चलो मैं तुम्हें खजाना बताता हूँ तुम उसे खोद लो और अपने अभाव दूर करो। यह कह कर मैंने उन्हें गन्धसादन ले जाकर रत्नों का ढेर दिखाया जिसे पाकर वे सब बहुत खुश हुए और अपने घर चले गये।

इससे निष्कर्ष क्या निकला? शुकी ने प्रश्न किया तो पक्षी बोला- निष्कर्ष अभी कहाँ शुकी- यह लोग अपने घर गये तो पड़ोसियों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह लोग इतने शीघ्र धनवान कैसे हो गये। लोगों ने पूछा तो उनने सारी बात बता दी। दूसरे ही दिन मैंने देखा कि इसी वृक्ष के नीचे वैसे एक और दंपत्ति भी आ टिके है।

उनके बच्चों ने भी खाना माँगा। पिता बोला- बच्चों जाओ और लकड़ियां ले आओ अभी भोजन तैयार करेंगे। लड़के आपस में झगड़ने लगे। स्वयं जाने को कोई तैयार नहीं था सब एक दूसरे को आज्ञा दे रहे थे। मैंने कहा- झगड़ो मत, लकड़ियां लाकर ही क्या करोगे- तुम्हारे पास रखा ही क्या है लकड़ियां ले भी आये तो खाओगे क्या? इस पर वे बनावटी स्वर में बोले- तुम्हें खायेंगे? मैं हँसा और बोला -मुझे खाने वाले तो पहले आये थे वे वह धन-दौलत भी ले गये तुम तो जैसे खाली हाथ आये वैसे ही खाली हाथ जाओगे। हुआ भी यही शुकी! वे बेचारे वैसे ही लौटे।

हँसते हुए शुक ने कहा- प्रिये अब कहो तो निष्कर्ष बताऊँ! नहीं स्वामी! शुकी बोली मैं समझ गई जिनके जीवन में क्रियाशीलता होती है, एकता और पौरुष में विश्वास होता है, लक्ष्मी उनका वरण अपने आप करती है।

अब तक उनके बच्चे भी जाग चुके थे और रात भी बीत चुकी थी पक्षी कोटर से निकले और चहचहाते हुए भोजन की तलाश में निकल पड़े।


प्राणि जगत की अतृप्त प्यास-प्रेम

सृष्टि का हर प्राणी हर जीव जन्तु स्वभाव में एक दूसरे से भिन्न है। कुछ अच्छे कुछ बुरे गुण सभी में पाये जाते हैं पर प्रेम के प्रति सद्भावना और प्रेम की प्यास से वंचित कोई भी एक जीव सृष्टि से दिखाई नहीं देता। मनुष्य जीवन का तो सम्पूर्ण सुख और स्वर्ग ही प्रेम है। प्रेम जैसी सत्ता को पाकर भी मनुष्य अपने को दीन हीन अनुभव करे तो यही मानना पड़ता है कि मनुष्य ने जीवन के यथार्थ अर्थ को जाना नहीं।

अमरीका के मध्य भाग में पायी जाने वाली एक छिपकली के सिर पर अनेक सींग होते हैं। यह माँसाहारी जन्तु क्रोध की स्थिति में होता है तो उसकी आंखों में रक्त उतर आता है, फिर वह शत्रु पर कैसा भी भयंकर आक्रमण करने से नहीं चूकती। इसका सारा जीवन ही चींटियों, गिराडो को मारने खाने में बीतता है पर अपनी प्रेयसी के प्रति उसकी करुणा भी देखते ही बनती है उसके लिये तो वह गिलहरी और खरगोश की तरह दीन बन जाती है।

बिच्छू बड़ा क्षुद्र जन्तु है किन्तु प्रेम की प्यास से मुक्त वह भी नहीं। वह अपने बच्चों से इतना प्यार करती है कि उन्हें जब तक वे पूर्ण समर्थ नहीं हो जाते अपनी पीठ पर चढ़ाये घूमती है। भालू खूँखार जानवर है, वह भूखा नहीं रह सकता पर जब कभी मादा भालू बच्चे देगी तो जब तक बच्चों की आंखें खुल नहीं जायेगी वह उनके पास ही बैठी भूख-प्यास भूलकर उन्हें चूमती चाटती रहेगी।

चींटियों के जीवन में भी सामान्यतः मजदूर चींटियों में कोई विलक्षणता नहीं होती, उनमें अपनी बुद्धि अपनी निज कोई इच्छा भी नहीं होती है , एक नियम व्यवस्था के अंतर्गत जीती रहती है तथापि प्रेम की आकाँक्षा उनमें भी होती है और वे अपने उस कोमल भाव को दबा नहीं सकती। इस अन्तरंग भाव की पूर्ति वे किसी और तरह से करती है। वह तितली के बच्चे से ही प्रेम करके अपनी आन्तरिक प्यास बुझाती है। यद्यपि यह सब एक प्राकृतिक प्रेरणा जैसा लगता है पर मूलभूत भावना का उभार स्पष्ट समझ में आता है। तितलियाँ फूलों का मधु चूसती रहती है उससे उनके जो बच्चे होते हैं उनकी देह भी मीठी होती है। माता-पिता के स्थूल शारीरिक गुण बच्चे पर आते हैं यह एक प्राकृतिक नियम है, तितली के नन्हे बच्चे, जिसे लार्वा कहते हैं, मजदूर चींटी सावधानी से उठा ले जाती है, उसके शरीर के मीठे वाले अंग को चाट-चाट कर चींटी अपने परिवार के लिये मधु एकत्र कर लेती है पर ऐसा करते हुये स्पष्ट -सा पता चलता है कि यह एक स्वार्थपूर्ण कार्य है। इससे नन्हे से लार्वे को कष्ट पहुँचता है इसलिये वह थोड़ी मिठास एकत्र कर लेने के तुरन्त बाद उस बच्चे को परिचर्या भवन में ले जाती है और उसकी तब तक सेवा सुश्रूषा करती रहती है जब तक लार्वा बढ़कर एक अच्छी तितली नहीं बन जाता। तितली बन जाने पर चींटी उसे हार्दिक स्वागत के साथ घर से विदा कर देती है। जीव शास्त्रियों के लिये चींटी और तितली की यह प्रगाढ़ मैत्री गूढ रहस्य बनी हुई है। उसकी मूल प्रेरणा अन्तरंग का वह प्यार ही है जिसके लिये आत्मायें जीवन-भर प्यासी इधर-उधर भटकती रहती है।

आस्ट्रेलिया में फैलेर्न्जस नामक गिलहरी की शक्ल का एक जीव पाया जाता है। उसे सुगर स्कवैरेल भी कहते हैं। यह एक लड़ाकू और उग्र स्वभाव वाला जीव है, तो भी उसकी अपने बच्चों और परिवारीय जनों के प्रति ममता देखते ही बनती है। वह जहाँ भी जाती है अपनी एक विशेष थैली में बच्चों को टिकाये रहती है और थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हें चाटती और सहलाती रहा करती है मानो वह अपने अन्तःकरण की प्रेम भावनाओं के उद्वेग को संभाल सकने में असमर्थ हो जाती हो। जीव-जंतुओं का यह प्रेम-प्रदर्शन यद्यपि एक छोटी सीमा तक अपने बच्चों और कुटुम्ब तक सीमित रहता है तथापि इस बात का प्रमाण है कि प्रेम जीव मात्र की अन्तरंग आकाँक्षा है। मनुष्य अपने प्रेम की परिधि अधिक विस्तृत कर सकता है इसलिये कि वह अधिक संवेदनशील और कोमल भावनाओं वाला है।

जीवों का प्यार पूर्णतया संतुष्ट नहीं हो पाता इसलिये अपेक्षाकृत अधिक कठोर, स्वार्थी और खूँखार से जान पड़ते हैं पर इसमें संदेह नहीं कि उनके अन्तःकरण में छुपे प्रेमभाव से तादात्म्य किया जा सके तो उन हिंसक व मूर्ख जंतुओं में भी प्रकृति का अगाध सौंदर्य देखने को मिल सकता है। भगवान शिव सर्पों को गले में लटकाए रहते हैं, महर्षि रमण के आश्रम में अन्दर बन्दर मोर गिलहरी ही नहीं सर्प, भेड़िये आदि तक अपने पारिवारिक झगड़े तय कराने आया करते थे। सारा ‘अरुणाचलम्’ पर्वत उनका था और उसमें निवास करने वाले सभी जीव-जन्तु उनके बन्धु बान्धव, सुहद सखा पड़ोसी थे। स्वामी रामतीर्थ हिमालय में जहाँ रहते वहाँ शेर, चीते प्रायः उनके दर्शनों को आया करते और उनके समीप बैठकर घंटों विश्राम किया करते थे। यह उदाहरण इस बात के प्रमाण है कि हमारा भाव विस्तृत हो सके तो हम अपने को विराट् विश्व परिसर के सदस्य होने का गौरव प्राप्त कर एक ऐसी आनन्द निर्झरिणी में प्रवाहित होने का आनन्द लुट सकते हैं जिसके आगे संसार के सारे सुख-वैभव फीके पड़ जाये।

600 वर्ष पूर्व की घटना है। रोम में एक महिला अपने बच्चे से खेल रही थी। वह कभी उसे कपड़े पहनाती कभी दूध पिलाती, इधर उधर के काम करके फिर बच्चे के पास आकर उसे चूमती चाटती और अपने काम में चली जाती। प्रेम भावनाओं से जीवन की थकान मिटती है। लगता है अपने काम की थकावट दूर करने के लिए उसे बार-बार बच्चे से प्यार जताना आवश्यक हो जाता था। घर के सामने एक ऊँचा टावर था उसमें बैठा हुआ बन्दर बड़ी देर से बड़े ध्यान से देख रहा था। स्त्री जैसे ही कुछ क्षण के लिए अलग हुई कि बन्दर लपका और बच्चे को उठा ले गया। लोगों ने भागदौड़ मचायी तब तक बंदर सावधानी के साथ बच्चे को लेकर उसी टावर पर चढ़ गया।

जैसे-जैसे उसने माँ को बच्चे से प्यार करते देखा था स्वयं भी बच्चे के साथ वैसा ही व्यवहार करने लगा। कभी उसे चूमता चाटता और कभी उसके कपड़े उतार कर फिर से पहनाता। इधर वह अपनी प्रेम की प्यास बुझा रहा था उधर उसकी माँ और घर वाले तड़प रहे थे, बिलख बिलख कर रो रहे थे। बच्चे की माँ तो एकटक उसी टावर की ओर देखती हुई बुरी तरह चीख कर रो रही थी।

बंदर ने यह सब देखा। संभवतः उसने सारी स्थिति भी समझ ली इसीलिये वह एक हाथ से बच्चे को छाती से चिपका लिया शेष तीन हाथ-पांवों की मदद से वह बड़ी सावधानी से नीचे उतरा और बिना किसी भय अथवा संकोच के उस स्त्री के पास तक गया और बच्चे को उसके हाथ में सौंप दिया। यह कौतुक लोग स्तब्ध खड़े देख रहे थे और देख रहे थे एक कटु सत्य, किस तरह बंदर जैसा चंचल प्राणी प्रेम के प्रति इतना गंभीर और आस्थावान हो सकता है। माँ के हाथ में बच्चा पहुंचा सब लोग देखने लगे उसे कही कोई चोट तो नहीं आई। इस बीच बंदर वहाँ से कहाँ गया, किधर चला गया यह आज तक किसी ने नहीं जाना।

पीछे जब लोगों का ध्यान उधर गया तो सबने यह माना कि बंदर या तो कोई दैवी शक्ति थी जो प्रेम की वात्सल्य महत्ता दर्शाने आयी थी अथवा वह प्रेम से बिछुड़ी हुई कोई आत्मा थी जो प्यास को क्षणिक तृप्ति देने आई थी। उस बंदर की याद में एक अखण्ड-दीप जला कर उसी टावर में रखा गया। इस टावर का नाम भी उसकी याद में (मंकी टावर) रखा गया। कहते हैं 600 वर्ष हुये यह दीपक आज भी जल रहा है। दीपक के 600 वर्ष से चमत्कारिक रूप से जलते रहने में कितनी सत्यता है, हम नहीं जानते पर यह सत्य है कि बंदर के अन्तःकरण में बच्चे के प्रति प्रसृत प्यार का प्रकाश जब तक यह टावर खड़ा रहेगा, लाखों लोगों का मानव जीवन की इस परम उदात्त ईश्वरीय प्रेरणा की ओर ध्यान आकर्षित करता रहेगा।

प्रेम ही जीवन का सच्चा यज्ञ है। जिसका प्रकाश, जिसकी ऊष्मा कभी मंद नहीं पड़ती वह मनुष्य को परमात्मा से मिला देने का भाव है। इसीलिये परमेष्ठी ब्रह्म जी ने उसे जीवन का अन्यत्म यज्ञ कहा है।


देव-मन्दिर के देवता और परमात्मा के दर्शन

“ स्वर्गादि उच्च लोक, अन्तरिक्ष पृथ्वी, जल आदि की उत्पत्ति हो चुकी तब परमात्मा ने लोकपालों की रचना का विचार किया। इस रचना का विचार आते ही सर्वप्रथम प्रकाश अणु पैदा किये। यह अणु अण्डाकार थे और उसमें पुरुष के लक्षण थे, फिर उस अंड में परमात्मा ने छेद किया जो मुख बना, मुख से वाणी, वाणी से अग्नि उत्पन्न हुई। इसके बाद दो छेद किये जो नासिका कहलाये उससे प्राण की उत्पत्ति हुई, प्राणों से वायु और नेत्रों के छिद्र बने। उनमें सुनने की शक्ति उत्पन्न हुई, श्रोतेन्द्रिय के द्वारा दिशाएँ प्रकटी, फिर त्वचा उत्पन्न हुई त्वचा से रोम, रोम से औषधियाँ, फिर हृदय, हृदय से मन और मन से चन्द्रमा प्रकट हुआ। फिर नाभि बनी, नाभि से अपान देवता और अपान देवता से मृत्यु देवता प्रकट हुये। फिर उपस्थ, उपस्थ से रेत, रेत से जल की उत्पत्ति हुई।”

“इस प्रकार उत्पन्न हुये देवतागण अभी तक अपने सूक्ष्म रूप में थे। परमात्मा ने उनमें भूख और प्यास की अनुभूति भी उत्पन्न कर दी थी किन्तु वे संसार-समुद्र में निराश्रय पड़े थे, उन्हें रहने के लिये योग्य स्थान का अभाव खटक रहा था। उसके लिये उन्होंने परमात्मा से प्रार्थना की तब परमात्मा ने उन्हें गाय का शरीर दिखाया। उस शरीर को देवताओं ने पसंद नहीं किया। तब फिर उन्हें घोड़े का शरीर दिखाया वह भी उन्हें अच्छा नहीं लगा। बहुत से शरीर विधाता ने देवताओं को दिखाये पर वे इन्हें पसंद नहीं आये तब उसने मनुष्य शरीर दिखाया। यह देवताओं को पसंद आ गया अग्नि उसमें वाणी बन कर घुस गया, वायु प्राण बन कर नासिका में, सूर्य चक्षु बनकर नेत्र गोलकों में प्रविष्ट हुआ दिशायें क्षेत्र बन कर कानों में घुसी औषधि रोम बन कर त्वचा में पहुंची, चन्द्रमा मन बन कर हृदय में उपस्थित हुआ मृत्यु अपान बन कर नाभि में जल रेत बन कर उपस्थ में स्थित हो गया।”

“ शरीर की यहाँ तक की रचना में पूरी तरह प्रकृति का ही आधिपत्य था देवताओं की प्रतिष्ठा होने के कारण शरीर देवमंदिर तो बन गया पर उसमें निवास करने वाली मूर्तियां एक नहीं अनेक थी सब की अपनी-अपनी आकाँक्षाएँ, अपनी-अपनी वासनायें थी। भगवान् ने विचार किया। यदि इन सभी देवताओं ने केवल अपनी वासनायें तृप्त करनी चाही तब तो यह शरीर एक भी दिन नहीं चल सकेगा। फिर इनके लिये मेरा भी तो कुछ अस्तित्व होना चाहिये अन्यथा वे मुझे कैसे जानेंगे। इस विचार के आते ही उसने मनुष्य शरीर की मूर्धा- शरीर का वह भाग जहाँ से दाहिने बाँये भाग बराबर-बराबर विरक्त होते हैं चोटी वाले स्थान से लेकर यह भाग नीचे चूतड़ों तक के सीवन वाले भाग तक चला जाता है -से प्रवेश किया। अब मनुष्य ने देखा कि मुझ में पंच भौतिक प्रकृति के अतिरिक्त बुद्धि रूप में कौन आ गया- तब उसने परमात्मा को पहचाना और दर्शन पाकर स्वर्गीय सुख में विभोर हो गया।”

ऐतरेय उपनिषद् की इस आख्यायिका में जहाँ सृष्टि के विकास का सूक्ष्म विज्ञान भरा पड़ा है वहाँ ईश्वर दर्शन का महत्वपूर्ण तत्वदर्शन भी। सामान्य दृष्टि से देखने पर इन्द्रियाँ ही मनुष्य शरीर में सक्रिय दिखाई देती है इस लिये अज्ञान ग्रस्त लोग दिन−रात उन्हीं की तृप्ति में जुटे रहकर मनुष्य देह रूपी मन्दिर को भग्न और गन्दा किया करते हैं। देवताओं को स्थूल पूजा मिलनी चाहिये पर यदि देवताओं की संतुष्टि ही एक मात्र शरीर का उद्देश्य रह जायेगा तो उस परमात्मा की प्राप्ति के आनन्द का क्या होगा जो इन सभी शक्तियों को उत्पन्न करने वाला आनन्द का आनन्द और सृष्टि का मूल है। सारी परिपूर्णतायें तो एकमात्र ब्रह्म में ही है उसे प्राप्त किये बिना आत्मिक सुख कहाँ ?

परमात्मा को कैसे प्राप्त किया जाये ? यह संसार के सामने एक जटिल और गंभीर प्रश्न है? ऐतरेय उपनिषद् इस प्रश्न की हल्की दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध है इसमें तथ्यों को बड़े सरल ढंग से समझाया गया है, यह बताया गया है कि इंद्रियों की वासनायें मनुष्य की आवश्यकताएँ नहीं वरन् देव शक्तियों की आकांक्षाएं होती है मनुष्य तो बुद्धि ज्ञान और चेतना को कहते हैं। बुद्धि परमात्मा की प्रतिनिधि है। उसे इंद्रियों का स्वामी बन कर देव शक्तियों का लाभ उठाना चाहिए और अपनी बौद्धिक एवं आत्मिक क्षमताओं का विकास करके विराट् ब्रह्म को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। यही परम पुरुषार्थ है और यही है योग। जो अपनी इंद्रियों का स्वामी बन गया उसे अपने लघु रूप को विराट् ब्रह्म में परिवर्तित करते देर न लगेगी।

अभी तक यह ज्ञान केवल शास्त्रों तक सीमित था। शास्त्रीय व्याख्याओं से विश्वास उठ जाने के कारण इस तरह के विवेचनों के प्रति अश्रद्धालु होना और इस तरह जीवन-विकास के मूल-ज्ञान से वंचित रह जाना स्वाभाविक ही था। इसे अपना दुर्भाग्य कहना चाहिये कि हमारे देशवासी स्वयं इस महत्तम विज्ञान को भूल गये जिसका प्रतिपादन आज भौतिक विज्ञान भी करता है।

शरीर विज्ञान मानता है कि मनुष्य का मस्तिष्क इंद्रियों की सामर्थ्य से बड़ा और उनका स्वामी है अतएव इंद्रियों को नहीं महत्व बौद्धिक शक्तियों को देना चाहिये। इस दृष्टि से मस्तिष्क की बारह नसों और सात शून्य स्थानों (सात लोक) की शोध एक विशिष्ट महत्व रखती है। यह नसें मस्तिष्क के नीचे वाले धरातल से निकलती है तथा शरीर के सभी तन्मात्रा अवयवों तक चली जाती है।

1. आलफैक्ट्री नस का सम्बन्ध नासिका नली से है जिससे मस्तिष्क सूँघने की अनुभूति करता है। 2. आष्टिक नस नेत्र गोलकों तक चली जाती है और वही मस्तिष्क को सामने वाली वस्तुओं का ज्ञान कराती है। 3. आकुलो मोटर का सम्बन्ध भी आँख से है इससे पुतलियों को गति मिलती है। 4. ट्राक्लियर नेत्र की माँस पेशियों को जोड़ने वाली नस है। 5. ट्राय जोव्हिनल मुख के निचले जबड़े एवं जीभ की माँस पेशियों से सम्बन्ध जोड़ती है और स्वाद की अनुभूति में सहायक है। 6. अब्डूऐन्ट आँख को भीतर की ओर खींचे रहती है। 7. फेशियल मुख की माँस पेशियों को। 8. आडिटरी- कानों में। 9. ग्लासोफेरिब्जयल-स्वर ध्वनि यंत्र (लेरिंग्स) जीभ, पेट और जिगर को मस्तिष्क के उस चमत्कारी अवचेतन अंश से जोड़ते हैं। 10. स्वाइनल अऐसरी गले को जाती है। 11 बेगस स्वर ध्वनि यंत्रों का फेफड़ों से सम्बन्ध जोड़ती है और 12 वीं हाइपोग्लोसल जीभ की मांसपेशियों को इसके अतिरिक्त सुषुम्ना शोषक जो कि लगभग सम्पूर्ण मेरुदण्ड है। मस्तिष्क का सम्बन्ध सीधे प्रजनन केंद्रों से जोड़ती है।

आधुनिक शरीर वैज्ञानिकों का ज्ञान अधिकांश शरीर के स्थूल अवयवों तक सीमित है। चेतना की आन्तरिक अनुभूति का ज्ञान वे नहीं कर सके। इसीलिये जीवात्मा के दार्शनिक पक्ष को इनमें से कोई भी प्रमाणित करने में आज तक सफल नहीं हुआ है। यही नहीं इन नसों में कई ऐसी है जिनके यथार्थ उद्देश्य की ही इन वैज्ञानिकों को जानकारी नहीं है उदाहरणार्थ अकुलोमीटर का सम्बन्ध मस्तिष्क से त्रिकुटी मध्य के उस भाग से है जहाँ ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं पर शरीर रचना शास्त्री उसे केवल दोनों पुतलियों पर से सम्बन्धित मानते हैं।

नाशवान शरीर की नहीं चिन्ता तो सदैव स्थिर रहने वाले यश की करनी चाहिये।- भोज

स्पाइनल नाभिस्थित सूर्य चक्र (सोलर फलैक्स) से सम्बन्धित है और योग विद्या में उसका अपना विशिष्ट महत्व है पर उसे भी शरीर रचना शास्त्री नहीं जानते यहां तक कि नाभि जैसे महत्वपूर्ण संस्थान का जिससे कि गर्भावस्था में सारे शरीर को पोषण मिलता है। तो भी यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि उन्होंने इन जानकारियों के आधार पर इतना तो सिद्ध कर ही दिया कि मस्तिष्क ही सम्पूर्ण इंद्रियों का अधिष्ठान है। यदि मस्तिष्क नहीं रहता तो इन सभी इंद्रियों की चेतना अपना कारोबार समेट कर उसे नष्ट कर देने में ही जुट जाती है और अपनी समस्त सूक्ष्म तन्मात्राओं को मस्तिष्क में ही केन्द्रित कर देती है यही चेतना इंद्रियों की सूक्ष्म तन्मात्रायें लेकर मृत्यु काल में शरीर से विदा होकर फिर दूसरी योनियों की तलाश में चली जाती है और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक मस्तिष्कीय द्रव्य प्रकृति के अज्ञान आवरण और इंद्रियों की लिप्साओं को स्वच्छ नहीं कर लेता। यजुर्वेद में ऋषि ने लिखा है-

यस्य प्राणाय मन्त्रस्य इद्ययुर्देंवा देवस्य महिमान भोजसा। यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजाँ सि देवः सविता महित्वना ॥ यजुर्वेद 11।6

अर्थात्- दूसरे सभी देवता (इन्द्रियाँ) जिस देवता (जीवात्मा) के अधीन गति करती है जब जीवात्मा शरीर त्याग देता है तो उसी के आधीन चली जाती है। जिस देवता (जीवात्मा)की यह ओजस-शक्तियां उन्हीं के अनुरूप बन जाती है यह श्रेष्ठ योनियों को प्राप्त होकर मुक्ति का स्वामी बनता है अन्यथा निम्नगामी योनियों में चला जाता है। इस प्रकार जीवात्मा के बड़प्पन के लिये प्राप्त हुई इंद्रियां ही उसे दुर्गति में ले जाने वाली अथवा मुक्ति में सहायक होती है।

इन्द्रियाँ स्ववश नहीं होती यह कहना गलत है ऐसा कहने की अपेक्षा यह कहना चाहिये हमने अपने मानसिक संस्थान को प्रखर नहीं बनाया। मनुष्य के मस्तिष्क की शक्ति अपार है हम उसका जागरण कर पाये तो सचमुच ही ब्रह्म की सारी शक्यों की अनुभूति शरीर में ही कर सकते हैं। साधारण अभ्यास से ही मस्तिष्क की शक्तियों का विकास होते देखा गया है योग प्रक्रिया तो उससे कही लाखों गुना उच्चस्तरीय विज्ञान है। अमरीकी प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट का सेक्रेटरी जेम्स ए॰ फेचरली ने अपनी याददाश्त का इतना विकास किया था कि वह 20000 व्यक्तियों से परिचित था और सब के बारे में सैकड़ों बाते जानता था। जर्मन मैथमेटीशियन जकेरियस से एक बार एक प्रदर्शन में पूछा गया- 2-2 का 100 गुणा करने से कितना गुणनफल आयेगा तो उसका उत्तर उसने प्रश्नकर्ता का वाक्य पूरा होते ही दे दिया मानो उसके मस्तिष्क में वह सब कुछ पहले से लिखा था। वैज्ञानिक मानते हैं कि हम सारे जीवन में मस्तिष्क के कुल 17 प्रतिशत भाग से काम लेते हैं शेष 83 प्रतिशत के बारे में वैज्ञानिक कुछ नहीं जानते।

रीडर डाइजेस्ट में “ आपके मस्तिष्क की सीमा क्या है” शीर्षक से अर्डिस हिटमैन ने एक लेख छापा था उसमें उन्होंने लिखा है कि सारे संसार में जितनी भी विद्युत और विद्युत उपकरणों की सामर्थ्य है, उसे पूरी तरह इकट्ठा करके तराजू के एक पलड़े पर रख दिया जाये और दूसरी तरफ मस्तिष्क का 3 पिन्ट (एक पिन्ट डेढ़ पाव के बराबर होता है) रखकर तौला जाये तो ग्रे मैटर की शक्ति कही अधिक होगी।

यह केवल सैद्धान्तिक कथा मात्र नहीं है इस पर प्रयोग हुये है और प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि मस्तिष्क के इस भूरे द्रव्य (ग्रे मैटर) में वह सारे गुण विद्यमान है जो परमात्मा में होने की कल्पना की जाती है। ईश्वर के बारे में मान्यता है कि वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा अजर अमर सनातन आदि है पूर्ण विकसित मस्तिष्क में वह सारे लक्षण हो सकते हैं। इन चमत्कारों पर मैकगिल यूनिवर्सिटी मान्ट्रियल में डॉ0 विल्डर पेनफील्ड के निर्देशन में खोज चल रही है। उनकी खोजे आज नहीं तो कल पूर्ण रूप से भारतीय दर्शन को प्रमाणित करेगी।

यह प्रयोग मस्तिष्क के चमत्कारी केंद्रों की विद्युत शक्ति बढ़ाकर किये गये है। एक रोगी को इलेक्ट्रोड के द्वारा मस्तिष्क के दृश्य भाग को स्पर्श कराया गया तो उसने बताया कि मैं सारे आकाश को देख रहा हूँ बड़े-बड़े तारागण घूम रहे हैं। कितने ही उल्कापात हो रहे हैं, आकाश की यह भयंकर हलचल देखते ही वह भयभीत हो उठा शायद उसकी स्थिति कृष्ण के मुँह में देखे गये भगवान के विराट रूप देखने वाले अर्जुन की सी हो गई हो। इसके बाद उसके श्रवण केन्द्र की शक्ति बढ़ाई गई तो उसने अजीब ध्वनियाँ सुनी और यह सिद्ध कर दिया हम जो ध्वनियाँ अपने आस-पास सुना करते हैं वही नहीं सृष्टि के अन्तराल में ग्रह नक्षत्रों के परिभ्रमण आदि की आकाश गंगाओं के विस्फोट आदि की भी भयंकर ध्वनियाँ सुनाई दे रही है। इसके बाद एक ओर आश्चर्यजनक स्थान में इलेक्ट्रिड स्पर्श कराया गया तो रोगी एकाएक हंस पड़ा और बोला - अरे, यह तो मेरी माँ का कमरा है, वह पियानो रखा है, मेरी माँ इधर ही आ रही है, वह कोई कपड़ा निकाल कर पहन रही है। कपड़े का यह रंग है वह अब नौकर को बुलाकर कार निकालने को कह रही है। पीछे फोन करके उसके घरवालों से पूछा गया तो सारी घटना ठीक वैसी ही थी जैसी रोगी ने बताई थी। इन प्रयोगों में वर्षों पूर्व के दृश्य और शब्द मस्तिष्क में ज्यों के त्यों सुने गये है।

यह खोजे इस बात की प्रमाण है कि बुद्धि और मस्तिष्क सचमुच ही ईश्वरीय चेतना के प्रतिनिधि है। हम उस शक्ति को - तुच्छ इन्द्रिय सुखों में खर्च न करके केवल मस्तिष्क को ही प्रखर बनाने में जुट जाये तो अपने आप में ब्रह्म की अनुभूति कर लेना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऋषियों का यह अलौकिक शोध आज भी उतना ही आनन्द वही उपलब्धियाँ दे सकती है पर यह तभी संभव है जब लोग इंद्रियों के गुलाम नहीं स्वामी बनकर उस शक्ति का क्षय रोके जो मस्तिष्क को वैसे ही प्रखर बनाकर विराट् की अनुभूति कराती है जैसे विल्डर पेनफील्ड इलेक्ट्रोड से अतिरिक्त विद्युत शक्ति देकर क्षणिक अनुभूति कराते हैं।


Quotation

ईर्ष्या त्यागी, प्रेम का आनन्द उसी ने पाया। वासनायें जीत ली, वह इस शरीर से ही भगवान् बन गया, समझना चाहिये। -हसन बसरी


चार प्रकार के मनुष्य

रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों के साथ टहलते हुए एक नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ मछुए जाल फेंक कर मछलियाँ पकड़ रहे थे। एक मछुए के पास स्वामीजी खड़े हो गये और शिष्यों से कहा ‘तुम लोग ध्यान पूर्वक इस जाल में फंसी मछलियों की गतिविधि देखो।

शिष्यों ने देखा कि कुछ मछलियां तो ऐसी है जो जाल में निश्छल पड़ी है उन्होंने निकलने की कोई कोशिश ही नहीं की, कुछ मछलियां निकलने की कोशिश तो करती रही पर निकल नहीं पाई’ और कुछ जाल से मुक्त होकर पुनः जल में क्रीडा करने लगी।

परमहंस ने शिष्यों से कहा-’ जिस प्रकार मछलियां तीन प्रकार की होती है उसी प्रकार मनुष्य भी तीन प्रकार के होते हैं। एक श्रेणी उनकी है जिनकी आत्मा ने बन्धन स्वीकार कर लिया है और इस भव-जाल से निकलने की बात सोचते ही नहीं, दूसरी श्रेणी ऐसे व्यक्तियों की है जो वीरो की तरह प्रयत्न तो करते हैं पर युक्ति से वंचित ही रहते हैं और तीसरी श्रेणी उन मनुष्यों की है जो चरम प्रयत्न द्वारा आखिर मुक्ति प्राप्त कर ही लेते हैं।’

परमहंस की बात समाप्त हुई जान एक शिष्य बोला -’गुरुदेव! एक चौथी श्रेणी भी है जिसके सम्बन्ध में आपने कुछ बताया ही नहीं ।’

‘ हाँ चौथी प्रकार की मछलियों की तरह ऐसी महान आत्माएं भी होती है जो जाल के निकट ही नहीं आती फिर उनके फंसने का प्रश्न ही नहीं उठता।’


संसार नाचता है एक उँगली के इशारे पर

अगस्त 1965 की बात है, बम्बई में एक फ्रांसीसी परामनोवैज्ञानिक श्री पाल गोल्डीन आये थे। गोल्डीन का कथन है- मनुष्य जितना व्यक्त है उतना ही नहीं है, वरन् वह अव्यक्त भी बहुत अधिक है। और इस शरीर में व्याप्त यह जो अव्यक्त अतीन्द्रिय (छठी शक्ति या सिक्सथ सेन्स) सत्ता है वह इतनी बलवान्, साधनों, सामर्थ्य से परिपूर्ण है कि उसे पूर्णरूप से जान लेने एवं प्राप्त कर लेने वाला मनुष्य कभी दुःखी और अभाव ग्रस्त नहीं रह सकता वह चाहे तो सारे संसार को एक उँगली के इशारे पर नचा सकता है।

आज की दुनिया तो तर्कवाद पर विश्वास करती है। श्रद्धा और विश्वास के लिये अब लोगों के अन्तःकरण में स्थान कहाँ रहा? आज की अशाँति, बढ़ते अपराध, द्वेष, क्लेश और वैमनस्य परस्पर विश्वास के अभाव में ही बढ़ रहे हैं। लोग तो त्यागी तपस्वी आत्माओं द्वारा लिखित वेद-पुराणों पर विश्वास नहीं करते पाल गोल्डीन की बात को कैसे मान लेते ? कुछ लोगों ने कहा- आप पचास-पचास लोगों को ही नचा कर दिखा दीजिये हम मान लेंगे हाँ सचमुच आत्मा नाम की कोई शक्तिशाली सत्ता मनुष्य देह में है।

श्री पाल गोल्डीन बोले- देह में नहीं यह कहो प्राणिमात्र सब वही एक आत्मा के विभिन्न रूप है। आत्मा को जानना और प्राप्त करना ही मनुष्य शरीर में अवतरण का मूल उद्देश्य है। चमत्कार और प्रदर्शनों से अहंकार बढ़ता है, आत्म कल्याण में बाधा उत्पन्न होती है, आप सब लोग तो भारतीय है यह बात तो आप सबने पढ़ी है और जानते हैं कि आत्मा को प्राप्त सिद्ध योगी उस शक्ति से संसार का अपने धर्म, जाति, संस्कृति और मानवता का कल्याण करते हैं। चमत्कार के छलावे में नहीं आते फिर आप लोग ही प्रदर्शन की बात करते हैं। अच्छा चलो यही तो होगा मेरी थोड़ी शक्ति व्यर्थ चली जाएगी पर भारतीय लोगों ने ही आत्मा पर विश्वास न किया, उसका उद्बोधन, उसकी प्राप्ति न की तो मानवता की लोककल्याण की पारमार्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कौन करेगा। इसलिए जाओ मंजूर किया- 15 अगस्त के दिन उस शक्ति का प्रदर्शन भी करके दिखलायेंगे।

“ 15 अगस्त को माटुँगा बम्बई के शरामुखानन्द हाल में फ्रांस के परामनोवैज्ञानिक आत्मशक्ति का प्रदर्शन करेंगे” यह समाचार अखबारों, पर्चा, पत्र-पत्रिकाओं द्वारा सारे शहर में आँधी तूफान की तरह फैल गया। उस दिन हजारों लोग यह प्रदर्शन देखने शरामुखानन्द हाल में उपस्थित हुए। ठीक बारह बजे जब हाल खचाखच भर गया और भीड़ को रोकना कठिन हो गया तो हाल के दरवाजे बन्द कर दिये गये । अब रंगमंच पर थे पाल गोल्डीन और विस्मय बम्बई के हजारों नागरिक।

“ आत्मशक्ति पर विश्वास नहीं करते, जिन्हें मनुष्य की भौतिक शक्ति पर ज्यादा विश्वास है वे लोग कृपा कर इधर स्टेज में आ जायें” पाल गोल्डीन ने सामने आते ही कहा। एक एक करके सैकड़ों लोग जिन्हें अपने मनोबल पर बड़ा विश्वास था वहाँ पहुँच गये। पाल गोल्डीन ने एक बार उन सब की ओर देखा- हाल में ऐसी निस्तब्धता छा गई जैसी नील आर्मस्ट्राँग ने चन्द्रमा पर उतर के भी न पाई होगी। गोल्डीन ने कहा- आप लोग देख रहे हैं यह सब लोग अपने को बड़ा शक्तिशाली मानते हैं। अभी मैं चुटकी बजाऊंगा और आप लोग देखेंगे कि इनमें से एक भी स्टेज पर खड़ा नहीं रहता। इतना कहकर उन्होंने माइक पर चुटकी बजाई। चुटकी बजाना था कि जैसे बिल्ली को देखकर चूहे भागते हैं, स्टेज पर चढ़े सभी व्यक्ति उतर कर भागे जैसे उनको भीतर से किसी ने बलात् डरा दिया हो। बात ही बात में सचमुच स्टेज खाली हो गया।

हम नहीं जानते शरीर में साँस कौन लेता है। हम नहीं जानते विचार कहाँ से उत्पन्न होते हैं। आंखों का मिचकना (पलकों का खुलना बंद होना), नाडी की गति, हिचकी, जम्हाई, जैसी क्रियायें कहाँ से प्रेरित होती है, इन छोटी छोटी क्रियाओं पर नियंत्रण भी नहीं कर सकते फिर स्थूल शरीर को ही सब कुछ मानना उचित नहीं। पाल गोल्डीन आज उस मौलिकतावादी मान्यता को ही पराजित करने को खड़े हुए थे। उन्होंने एक बार उपस्थित कई हजार लोगों की ओर देखा और बोले- यहाँ तक आने में आप सब लोग बहुत थक गये है अब थोड़ा आराम कर लीजिये यह कहते कहते उन्होंने चुटकी बजाई और जैसे बाजीगर के इशारे पर बन्दर कला दिखाता है वैसे ही हाल में उपस्थित विशाल जनसमूह बात की बात में इस तरह अपनी-अपनी कुर्सियों पर ढेर हो गया मानो उनमें से हर व्यक्ति 14-14 घंटे के परिश्रम से इस तरह थक कर चकनाचूर हो गया हो कि अपने आप की संभालने की शक्ति भी समाप्त हो गई हो। श्री पाल गोल्डीन थोड़ी देर में दुबारा चुटकी न बजाते तो बहुत संभव था लोगों के दिलों की धड़कन बंद हो जाती । चुटकी बजाते ही फिर सब लोग स्वस्थ होकर अपने अपने ठिकानों पर संभलकर बैठ गये।

यह सब मैं कोई हिप्नोटिज्म या बाजीगरी नहीं कर रहा। पाल गोल्डीन बोले- ‘ आत्मा की शक्ति इतनी प्रचंड और प्रखर है कि उसके सहारे कोई चाहे तो हजारों लाखों मील दूर बैठे व्यक्ति से ऐसे संपर्क स्थापित कर सकता है, लोगों को प्रेरित और प्रभावित कर सकता है, एक बार में सैकड़ों को रोग-मुक्त कर सकता है, रोगी बनाना तो क्या मार भी सकता है। आप सब लोग भारतीय है, अष्ट सिद्धियों के बारे में सबने सुना होगा वह तो जादू नहीं वरन् आत्मशक्ति के सामान्य गुण मात्र होते हैं। इसके बाद उन्होंने 25-30 लोगों को जिनमें महिलायें भी थी ऊपर स्टेज पर बुलाया और सब से बारी-बारी से पूछा- ‘ आपको कोई चर्म रोग, खाज , खुजली , दाद वगैरह तो नहीं है?’ प्रायः सभी ने इनकार किया। जो नहीं बोले उन्हें नीचे उतार दिया। फिर हाथ की चुटकी बजी और जैसे सिनेमा का पर्दा उठते ही कोई प्रहसन दृश्य सामने आता है- सब के सब कोई हाथ, कोई पाँव, कोई नाक तो कोई गर्दन इस तरह खुजलाने लगे जैसे उन्हें खुजली की पुश्तैनी बीमारी रही हो। यदि पाल गोल्डीन दुबारा चुटकी न बजाते तो बहुत संभव था लोग खुजला खुजलाकर अपना खून निकाल लेते।

एक सीन का पटाक्षेप और दूसरा प्रारम्भ। पाल गोल्डीन ने उन्हीं लोगों में से एक ने पूछा-” आप गाना जानते हैं ?” “नहीं” उत्तर मिला। दूसरे से पूछा- “ आप नृत्य कर सकते हैं ?” उत्तर मिला “नहीं।” इस तरह एक एक करके किसी से हारमोनियम बजाने की बात पूछी तो किसी से सरोद वायलिन, बंशी, तबला और झाँझ की। सबने इनकार किया तो सबको सम्मोहित से करते हुए पाल गोल्डीन ने हँसी की-”तब तो भाई आज का संगीत कार्यक्रम फेल हो जायेगा- खैर कोई बात नहीं- जब तक आत्मा की शक्ति है घबराने की जरूरत नहीं।” इसके बाद उन्होंने आर्कस्ट्रे का सारा सामान स्टेज पर मंगाया और एक कोने में रख दिया। फिर एक चुटकी बजी और देखते ही देखते सारा सीन बदल गया। जो लोग अभी नाचने गाने से इनकार कर रहे थे, गिटार और वायोलिन जिन्होंने हाथों से नहीं छुए थे वही लोग आगे बढ़े और एक एक वाद्य उठा कर ऐसे बजाने लगे मानो वे किसी संगीत विद्यालय के शिक्षक हो।

अहमिन्द्रो न पराजिग्ये। -ऋग्वेद

मुझ अविनाशी आत्मा को संसार में कौन पराजित कर सकता है।

एक क्षण में ही गाने वाले गाने लगे, नृत्य करने वाले नृत्य करने लगे। जितनी बार चुटकी बजी उतनी ही बार धुन बदली। फ्राँसीसी, अमेरिकी, भारतीय सभी तरह की धुनें और सभी तरह के नृत्य और गीत- दर्शक भी मुग्ध और अनोखे कलाकार भी। सारा काम यंत्रवत् जैसे बिजली बटन दबाते ही जल पड़ती, उठाते ही बुझ जाती वैसे ही सारा दर्शक समाज पाल गोल्डीन की उंगलियों के इशारे पर नाना प्रकार के करतब कर रहा था और गोल्डीन बताते जा रहे थे-” यह सब मेरी नहीं उस आत्म-सत्ता की शक्ति से हो रहा है जो जन जन के अन्तः करण में व्याप्त नाना शरीरों, रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। जिसे जानना ही मनुष्य का जीवन-लक्ष्य है। जिनको जाने बिना मनुष्य बंधनों से छुटकारा नहीं पाता। सच्चे सुख, शान्ति और संतोष की दात्री यह आत्मा ही है। उसे जानने का प्रयत्न न करने वाला अपना जीवन व्यर्थ ही गँवाता है।

पाल ने इस तरह के और भी अनेक करतब दिखाये, जो लोग जो काम नहीं करना चाहते थे उन्हें अन्तः प्रेरित करके उन्होंने वह काम खुशी-खुशी करने को विवश करके दिखा दिया। कि मनुष्य की भौतिक सामर्थ्य नगण्य और तुच्छ है सर्व समर्थ तो आत्मा ही है। उन्होंने अन्त में लोगों से कहा- अब सब लोग एक दूसरे को नये साल की मुबारकबाद देंगे और विदा हो जायेंगे, तो सबने चिल्लाकर कहा- अगस्त के महीने में नया साल कैसा ? तब पाल हँसे और बोले- बावलो! आत्मा कोई मरने जीने का पदार्थ नहीं, उसके लिये समय का कोई प्रतिबन्ध नहीं उसके लिए हर क्षण सब कुछ नया है और आप लोग भी देखेंगे कि आज से सचमुच नया साल आरम्भ हो गया है। इसके बाद फिर चुटकी बजी फिर वही जादू- अभी तक जो लोग मना कर रहे थे। वही एक दूसरे को शुभकामनाएं देने लगे सारे हाल में हलचल मच गई पाल ने चुटकी बजाई तब खामोशी आ गई।

पाल जो अपने आपको पूर्व जन्म का भारतीय बताते हैं उन्होंने प्रश्न किया- आप लोगों ने क्या यह सब स्वेच्छा से किया- तो सब ने कहा- उन्हें तो यह पता रहता था कि हम अमुक काम कर रहे हैं और किस की प्रेरणा से कर रहे हैं हम जान नहीं पाये।

प्रदर्शन समाप्त हो गया। लोग अपने घरों को लौट आये। आत्मा के प्रति लोगों में जिज्ञासायें उमड़ी और फिर शान्त हो गई क्योंकि यह आखिर प्रदर्शन ही तो था। जब तक अन्तः करण से इतनी प्रखर जिज्ञासा न उत्पन्न हो कि मनुष्य शरीर नश्वर है अमर तो वह आत्म-चेतना ही है, उसे ही प्राप्त करना चाहिये- तब तक ऐसे प्रदर्शन भी काम नहीं देते। आत्म-साक्षात्कार के लिये उत्कृष्ट अभिलाषा और वैराग्य तो अपने आप जगाना पड़ता है तब कही मनुष्य उसकी प्राप्ति के साधना पथ पर निष्ठापूर्वक अग्रसर हो पाता है। यह समाचार 16 अगस्त में बम्बई के अधिकांश समाचार पत्रों में छपा था ? 24 जुलाई 1966 के धर्मयुग अंक में सभी फोटो देकर इस घटना को विस्तार से छापा गया था।


संत तुकाराम

संत तुकाराम जन्मजात शूद्र थे। उनका ईश्वर भक्ति करना तथा भक्ति गीत लिखना तात्कालिक सवर्ण पंडितों की दृष्टि में अनुचित ही नहीं - एक अपराध था।

एक निकटवर्ती पंडित श्री रामेश्वर भट्ट ने उन्हें बुलाया और कहा कि तुम्हें शूद्र होने के नाते यह सब कुछ नहीं करना चाहिए। न ईश्वर भक्ति न भजन कीर्तन और न अभंगो की रचना।

तुकाराम अत्यन्त ही सरल स्वभाव के- आवश्यकता से अधिक नम्र तथा बहुत ही सीधे-सादे व्यक्ति थे। उन्होंने रामेश्वर भट्ट की बात स्वीकार कर ली। और पूछा- “ किन्तु जो अभंग रचे जा चुके है- उनका क्या होगा ?” तब उस हृदयहीन पंडित ने कहा- “उन्हें नदी में बहा दो।”

अनासक्त योगी तुकाराम ने सचमुच ही अपने अभंगो की पोथी इन्द्रायणी में प्रवाहित कर दी। उस दबाव में वे ऐसा तो कर गये, पर मन इतना मलहित हो गया कि वे विट्ठल मन्दिर के सामने तेरह दिन तक बिना अन्न, जल ग्रहण किए पड़े रहे। और सोचते रहे “मेरी भक्ति में ही कही कोई त्रुटि है जो भगवान मुझ से प्रतिकूल हो गया है।”

दुःखी मन की पुकार-जो मन सत्य के प्रकाश से उद्भासित हो- कभी खाली नहीं जाती। तेरहवें दिन तुकाराम को स्वप्न हुआ कि “पोथियाँ नदी किनारे पड़ी है- जाकर उठा ला “ तब उनके स्वप्न का हाल सुनकर उनके भक्तगण जयघोष करते हुए गये और पोथियाँ किनारे पर से उठा लाये।


यतोधर्मस्ततो जयः

महाभारत युद्ध प्रारम्भ हुआ तब भी महाराज युधिष्ठिर प्रतिदिन ईश्वर उपासना के लिए समय निकालते। युद्ध से वापस होते ही वे अपनी व्यक्तिगत साधना में लग जाते । इस समय उन्होंने किसी से भी न मिलने का नियम बनाया था।

अभी दस दिन ही बीते थी कि पाण्डवो की सेना में अफवाह फैल गई कि धर्मराज युधिष्ठिर प्रतिदिन सायंकाल वेष बदल कर कही जाया करते हैं। यह खबर अन्य पांडवों के कानों में भी पहुँची। पांडवों की सहायक सेनायें वलित न हो जाये इस दृष्टि से अर्जुन, भीम आदि ने वस्तुस्थिति जानने का निश्चय कर लिया।

एक दिन जब युधिष्ठिर अपने उपासना-कक्ष से निकल चलने लगे तो शेष पाँडव भी छिपकर उनके पीछे-पीछे हो लिये। उन्होंने देखा महाराज युधिष्ठिर हाथ में कुछ लिए उधर की ओर बढ़ रहे हैं जिधर दिन में संग्राम होता था। यह देखकर पांडवों की उत्सुकता और भी बढ़ गई। वे अपने को छिपाये उनका पीछा करते चले गये।

युद्ध स्थल आ गया तो पाँडव एक ओर छिपकर खड़े हो गये। देखने लगे महाराज युधिष्ठिर आखिर क्या करते हैं। युधिष्ठिर उन मृतकों में घूम-घूमकर देखने लगे कोई घायल तो नहीं है, कोई प्यासा तो नहीं है, कोई भूख से नहीं तड़प रहा, किसी को घायलावस्था में परिजनों की चिन्ता तो नहीं सता रही। युधिष्ठिर घायलों को देखते, पूछते और अन्न, जल खिलाते बड़ी देर तक वहाँ घूमते रहे। कौरव रहा हो या पाँडव बिना किसी भेदभाव के वह सबकी सेवा करते रहे। किसी को चिन्ता होती तो वे उसे दूर करने का आश्वासन देते। इस तरह उन्हें कई घण्टे वहाँ बीत गये।

शेष पाँडव उनके लौटने की प्रतीक्षा में खड़े थे। समय गया। युधिष्ठिर लौटे तो वे लोग प्रकट होकर सामने आ गये। अर्जुन ने पूछा- महाराज! आपको यों अपने आपको छिपाकर यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ी ?

युधिष्ठिर सामने खड़े बंधुओं को सम्बोधित कर बोले- तात्! इनमें से कई कौरव दल के है वे हमसे द्वेष रखते हैं यदि मैं प्रकट होकर उनके पास जाता तो वे अपने हृदय की बात मुझसे न बता पाते और इस तरह मैं सेवा के अधिकार से वंचित रह जाता ?

भीम नाराज हुये बोले- शत्रु की सेवा करना क्या अधर्म नहीं है ?

इस पर युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- बन्धु! शत्रु मनुष्य नहीं पाप और अधर्म हुआ करता है उसके विरुद्ध तो हम लड़ ही रहे हैं पर मनुष्य तो आखिर आत्मा है आत्मा से आत्मा का क्या द्वेष ? भीम युधिष्ठिर की इस महान् आदर्शवादिता के लिए नतमस्तक न हो पाये थे कि नकुल बोल पड़े - लेकिन महाराज! आपने तो सर्वत्र यह घोषित कर रखा है कि आप इस समय ईश्वर की उपासना किया करते हैं इस तरह झूठ बोलने का पाप तो आपको लगेगा ही ?

“नहीं नकुल” ? युधिष्ठिर बोले - भगवान की उपासना जप और स्तुति व जप-तप से नहीं होती कर्म से भी होती है। यह विराट् जगत उन्हीं का प्रकट रूप है यहाँ जो दीन-दुःखी जन है उनकी सेवा करना, जो पिछड़े और दलित लोग है उन्हें आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाना भी भगवान् का ही भजन है। इस दृष्टि से मैंने जो किया वह झूठ नहीं , ईश्वर की सच्ची उपासना ही है।

और कुछ पूछने का शेष नहीं रह गया था सहदेव ने आगे बढ़कर उनके चरणों में प्रणिपात कर कहा- लोग सत्य ही कहते हैं तात्! जहाँ सच्ची धर्मनिष्ठा होती है विजय भी वही होती है हमारी जीत का कारण इसलिये तो सैन्यशक्ति नहीं, आपकी शक्ति है जिसके कारण भगवान कृष्ण स्वयं हमारे सहायक हुये है।


अध्यात्म की उपेक्षा नहीं की जा सकती

सुप्रसिद्ध अमेरिकन उद्योगपति एडिंगटन ने अपना सम्पूर्ण जीवन धन संपत्ति की विशाल मात्रा अर्जित करने, भोग- ऐश्वर्य तथा इन्द्रिय सुखों की तृप्ति करने में बिताया। वृद्धावस्था में भी उनके पास धन- संपत्ति के अम्बार लगे थे। पर वह शक्तियां जो मनुष्य को आत्म-सन्तोष प्रदान करती है एडिंगटन के पास से कब की विदा हो चुकी थी। मृत्यु की घड़ियां समीप आई देखकर उनका ध्यान भौतिकता से हटकर दार्शनिक सत्यों और आध्यात्मिक तथ्यों की ओर आया। वह अनुभव करने लगे कि पार्थिव जीवन की हलचलें और भौतिक सुखोपभोग प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं। लोकोत्तर जीवन के सत्यों की शोध एक अनिवार्य कर्तव्य था। उसे भुला दिया गया। उन्होंने कहा- भौतिकता में क्षणिक सुख है और निरन्तर विकसित होने का विनाशकारी गुण निष्कर्ष तो इतने खराब होते हैं जिनके बारे में कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती। विक्षोभ और दुर्वासनाओं की भट्टी में जलता हुआ प्राणी मृत्यु के समीप आने पर जल विहीन मछली की तरह तड़पता है पर तब परिस्थितियां निकल चुकी होती है केवल पश्चाताप ही शेष रहता है।

जीवन के इस महत्वपूर्ण साराँश से वर्तमान और आगत पीढ़ी को अवगत कराने के लिये एडिंगटन ने एक महान साहस किया। उन्होंने एक संस्था बनाई और अपनी सारी संपत्ति इसीलिये दान कर दी कि यह संस्था मानव जीवन के आध्यात्मिक सत्य और तथ्यों की जानकारी अर्जित करे और उन निष्कर्षों से सर्व साधारण को परिचित कराये जिससे आगे मरने वालो को इस तरह पश्चाताप की अग्नि में झुलसते हुए न विदा होना पड़े। उसकी एक शाखा 32 ईस्ट 57 वीं गली न्यूयार्क में है। वहाँ प्रति वर्ष धर्म और विज्ञान के सम्बन्ध पर उत्कृष्ट कोटि के भाषण कराये जाते हैं।

इस शृंखला में विज्ञान दर्शन और धर्म (साइन्स फिलॉसफी एण्ड रिलीजन) शीर्षक के निबन्ध का साराँश आध्यात्मिक चेतना की पुष्टि में उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया जाता है। रसेल ब्रेन का कथन है - विज्ञान हमें पदार्थ की भौतिक जानकारी दे सकता है किन्तु पदार्थ कैसे, क्यों बना इसका उत्तर उसके पास नहीं है। जिन सत्य निर्णयों को विज्ञान नहीं दे सकता उन्हें केवल दर्शन और धर्म के द्वारा ही खोजा जा सकता है। “उसी का नाम अध्यात्म है।”

अज्ञात वस्तु की खोज मजेदार हो सकती है पर जब तक सम्पूर्ण वस्तु के सम्पूर्ण कारण को न जान लिया जाये उस वस्तु को जीवन का अंग बनाना घातक ही होगा। मान लीजिये एक ऐसा व्यक्ति है जिसे यह पता नहीं है कि अल्कोहल के गुण क्या है और हाइड्रोक्लोरिक एसिड के क्या गुण है। सल्फर, क्लोरीन फास्फेट की कितनी कितनी मात्रा मिलकर कौन सी दवा बनेगी ? पर वह जो भी भरी शीशी मिलती जाती है उनसे दवायें तैयार करता जाता है। तो क्या वे दवायें किसी मरीज को लाभ पहुँचा सकती है। नियंत्रण रहित विज्ञान ऐसी ही दुकान है जहाँ सीमित ज्ञान के आधार पर औषधियां बनती है उनसे एक रोग ठीक होता है पर तब जब दो नये रोग और पैदा कर देता है।

आकाश के ग्रह- नक्षत्र चक्कर लगाते हैं। पता है कौन ग्रह पृथ्वी से कितनी दूर है। किस ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने में कितनी यात्रा करनी पड़ती है। उनकी आन्तरिक रचना के बारे में भी जानकारियां मिल रही है। पर यह ग्रह- नक्षत्र चक्कर क्यों काट रहे हैं यह विज्ञान नहीं बता सकता उसके लिये हमें आध्यात्मिक चेतना की ही शरण लेनी पड़ती है अध्यात्म में ही वह शक्ति है जो मनुष्य के आन्तरिक रहस्यों का उद्घाटन कर सकती है। विज्ञान उस सीमा तक पहुँचने में समर्थ नहीं है।

अध्यात्म एक स्वयं सिद्ध शक्ति है उसका वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण नहीं किया जा सकता। मस्तिष्क के गुणों के बारे में विज्ञान चुप है। हम आजीवन कर्त्तव्यों से क्यों बँधे रहते हैं ? हिंसक डकैत भी स्वयं कष्ट सहते पर अपनी धर्मपत्नी अपने बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करते हैं। चोर और उठाईगीरों को भी अपने साथियों और मित्रो के साथ सहयोग करना पड़ता है। सहानुभूति, सेवा और सच्चाई यह आत्मा के स्वयं सिद्ध गुण है मानवीय जीवन में उनकी विद्यमानता के बारे में कोई सन्देह नहीं है। यह अलग बात है कि किसी में इन गुणों की मात्रा कम है किसी में कुछ अधिक होती है।

सौंदर्य की अदम्य पिपासा, कलात्मक और नैतिक चेतना को भौतिक नियमों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। इन्हें जिस शक्ति के द्वारा व्यक्त और अनुभव किया जाता है वह अध्यात्म है। हमारा 99 प्रतिशत जीवन इन्हीं से घिरा हुआ होता है। 1 प्रतिशत आवश्यकताएँ भौतिक है किन्तु खेद है कि 1 प्रतिशत के लिये जीवन के शत प्रतिशत अंश को न्यौछावर कर दिया जाता है। 99 प्रतिशत भाग अन्ततोगत्वा उपेक्षित ही बना रहता है इससे बढ़कर मनुष्य का और क्या दुर्भाग्य हो सकता है। अशाँति असन्तोष उसी के परिणाम है।

“विश्वास की इच्छा” (दि विल टु बिलीव) नामक पुस्तक के लेखक वैज्ञानिक विलियम जेम्स और हैण्डरसन ने जब महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन के सापेक्ष सिद्धान्त को पढ़ा- समय ब्रह्मांड, गति और सृष्टि के मूल तत्वों (टाइम, स्पेस मोशन एण्ड काजेशन) के साथ व्यक्तिगत अहंता का तुलनात्मक अध्ययन किया तो उन्हें भी यही कहना पड़ा कि भौतिक जगत सम्भवतः सम्पूर्ण नहीं है। हमारा सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्यात्मिक वातावरण में चल रहा है उस परम पालक अध्यात्म शक्ति को ही लक्ष्य कह सकते हैं। ऐसी शक्ति को अमान्य नहीं किया जा सकता।

उन्होंने आगे बताया कि वह तत्व जो विश्व के यथार्थ का निर्देशन करते हैं भौतिक शास्त्र के द्वारा विश्लेषण नहीं किये जा सकते। उनके लिये एक अलग स्केच तैयार करना पड़ेगा और सचेतन इकाइयों के द्वारा ही उनका अध्ययन करना होगा। यह सचेतन इकाइयां हमारे विचार, श्रद्धा, अनुभूतियाँ, तर्क और भावनायें है उन्हीं के द्वारा अध्यात्म को स्पष्ट किया जा सकता है। उन्हीं के विकास द्वारा मनुष्य जीवन में अभीष्ट सुख-शान्ति की प्राप्ति की जा सकती है। भावनाओं की तृप्ति भावनायें ही कर सकती है पदार्थ नहीं। इसीलिये भाव विज्ञान (अध्यात्म) को हम नहीं छोड़ सकते।


नास्तिक

एक आदमी बड़ा नास्तिक था वह कहता था कि सारा संसार स्वाभाविक है, क्रियायें प्राकृतिक अपने आप होती है। एक दिन एक लड़का एक बड़ा सुन्दर चित्र बनाकर लाया, वह आदमी उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने पूछा “यह शक्ल किसने खींची है।” तब तो लड़के ने कहा “ चाचा! मेरे ट्रेनिंग स्कूल में एक जगह एक कागज, रंगीन पेंसिलें और कलम दवात रखे थे। आप तो जानते ही है कि हर एक प्राकृतिक वस्तु में हरकत होनी स्वाभाविक है। झट अपने आप ही शक्ल खिंच गई। यह सुन वह आदमी बोल पड़ा कि यह भी कभी हो सकता है ? झट ही लड़का बोल पड़ा, यदि यह शक्ल बिना खींचने वाले के नहीं खिंच सकती तो यह संसार बिना किसी कर्ता के अपने आप नहीं बन सकता।


विकासवाद अथवा जीवात्मा का पतनवाद

महर्षि वशिष्ठ राम को पुनर्जन्म प्रकरण पढ़ा रहे थे। उस समय की बात है जब एक प्रसंग में उन्होंने राम को बताया-

आशापाश शताबद्धा वासनाभाव धारिणः । कायात्कायमुपायान्ति वृक्षाद्वृक्षमिवाण्डजा ॥

हे राम! मनुष्य का मन सैकड़ों आशाओं और वासनाओं के बन्धन में बँधा हुआ मृत्यु के उपरान्त उन क्षुद्र वासनाओं की पूर्ति वाली योनियों और शरीरों में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार एक पक्षी एक वृक्ष को छोड़कर फल की आशा से दूसरे वृक्ष में बैठता है।

मनुष्य जैसा विचारशील प्राणी इतर योनियों - मक्खी, मच्छर, मेढक, साँप, भैंस, नेवला, शेर, बाघ, चीता , भेड़िया, कौवा आदि योनियों में किस प्रकार चला जाता होगा। यह बात राम की समझ में नहीं आई। उन्होंने अपनी शंका महर्षि के समक्ष प्रकट की और कहा भगवन्! मनुष्य जैसा समझदार व्यक्ति भला दूसरी योनियाँ क्यों पसन्द करेगा ? इस पर महर्षि ने राम को जिस ढंग से जीवात्मा द्वारा अन्य शरीर धारण करने की अवस्था और मनोविज्ञान समझाया है वह वस्तुतः हर विचारशील प्राणी के लिए मनन करने की अत्यन्त महत्वपूर्ण वस्तु है- वशिष्ठ ने राम को वह तत्वज्ञान जिन शब्दों में दिया योग वशिष्ठ में उन्हें तीसरे अध्याय के 55 सूत्र में 39, 40, 41 और 4 श्लोकों में इस प्रकार बताया है-

हे राम! वीर्य रूप में जीवात्मा ही स्त्री की योनि में आता है और गर्भ में पककर एक बालक का रूप धारण करता है। (यहां शास्त्राकार का कथन प्रामाणिक है जिसमें आत्मा को अणोरणीयान् अर्थात्- सूक्ष्म से भी सूक्ष्म कहा गया है पुरुष शरीर का वीर्य कोष (स्पर्म) अत्यन्त सूक्ष्म अणु होता है) और अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के अनुरूप अच्छा या बुरा शरीर प्राप्त करता है। बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और इस प्रकार वह युवावस्था में पदार्पण करता है। पकी हुयी इंद्रियां अपने सुख माँगती है कुछ पूरी होती है अधिकाँश अधूरी। अधूरी रह गई वासनायें महत्वाकाँक्षायें वह मनुष्य अपने मन में भीतर ही भीतर दबाता रहता है क्योंकि एक बार उठी वासना जब तक पूर्ण नहीं हो जाती वह बलवती होती रहती है। फ्रायड ने स्वप्न प्रकरण में स्वीकार किया है कि मनुष्य की दमित वासनायें ही स्वप्न में उसी तरह के काल्पनिक चित्र तैयार करती है और मनुष्य अद्भुत तथा अटपटे स्वप्न देखता है। वासनाओं के दमन से शरीर के पंच भौतिक पदार्थों पर दबाव पड़ता है और वे क्रमशः कमजोर होते चले जाते हैं जिससे वृद्धावस्था आ जाती है और मनुष्य का शरीर मर जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने शरीरों को क्षेत्र या जगत कहा है महर्षि वशिष्ठ ने यह जो दूसरे जगत में जाने की बात कही उसका तात्पर्य दूसरी योनि के शरीर में ही है। यह विज्ञान भी मानता है कि अब तक ढूंढ़े गये 108 तत्व ही विभिन्न क्रमों में सजकर विभिन्न प्रकार के कोश और शरीरों की रचना करते हैं। इस प्रकार अपने मन की वासना के अनुरूप जीव तब तक अनेकों शरीर में भ्रमण करता रहता है जब तक उसकी वासनायें पूर्ण शान्त नहीं हो जाती और वह फिर से शुद्ध आत्मा की स्थिति में नहीं आ जाता। प्रबुद्ध आत्मा बालक के रूप में फिर से जन्म लेती है और अब यह उसके अधिकार की बात होती है कि वह अपना फिर से प्राप्त यह सौभाग्य सार्थक करे, आत्म साक्षात्कार, स्वर्ग मुक्ति जैसे पवित्रतम जीवन उद्देश्य को सफल बनाये या फिर से उन्हीं तुच्छ भोग-वासनाओं और अहंकार पूर्ण आकांक्षाओं की दिशा में अपनी प्रगति प्रारंभ करके फिर उन्हीं 84 लाख योनियों में चक्कर काटने के लिए चल दे।

जीवात्मा के बन्धन और मुक्ति के स्वरूप का इन पंक्तियों में महर्षि वशिष्ठ ने इतना सुन्दर और युक्ति संगत दर्शन प्रस्तुत किया है जिसे पढ़कर यही मानना पड़ता है कि उन्होंने अपनी बुद्धि अपने मन को कितना सूक्ष्म और शुद्ध बनाकर इन तथ्यों की खोज की होगी। इस देश में करोड़ों वर्षों तक आत्मा का यह दर्शन लोगों को जीवन मुक्ति की दिशा प्रदान करता रहा। यहाँ का औसत नागरिक भी मूल आत्मा के गुणों और शक्तियों से परिपूर्ण हुआ करता था। थोड़े शब्दों में भारतवर्ष में स्वर्ग ही उतर कर आ गया था।

किन्तु पश्चिम में इस सिद्धान्त से बिल्कुल उलटा “विकास वाद” का सिद्धान्त जब से चल पड़ा तब से जीवात्मा के इस महान् दर्शन का पतन शुरू हुआ और लोग आत्मा को ऊर्ध्वगामी और शक्तिशाली बनाने वाली साधनाओं को छोड़ बैठे। विकासवाद का सिद्धान्त मूल रूप से मनुष्य शरीर का रचना काल ढूंढ़ने और यह शरीर कैसे बना इस रहस्य को जानने के लिए प्रकाश में आया पर उसे जिस रूप में प्रस्तुत किया गया उससे मनुष्य और कला मनुष्य और उसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़े मनोविज्ञान का सम्बन्ध टूट गया। एक कोषीय जीवों से जटिल कोशों वाले शरीर की रचना का विकास दरअसल जीवात्मा के पतन का ही उल्टा खड़ा किया हुआ ढाँचा है। संसार में जीवों की संख्या इतनी अधिक है कि उनको एक क्रम में सजाकर यह सिद्ध करना कि मनुष्य शरीर अमीबा जैसे एक कोषीय जीव का विकसित रूप है कोई कठिन काम नहीं है पर विकासवाद का सिद्धान्त आखिर मनुष्य के साथ जुड़े हुए मनोविज्ञान को कहाँ संतुष्ट कर पाता है उसका खड़ा किया हुआ अपना ही ढाँचा अब बेबुनियाद सिद्ध हो रहा है।

उदाहरण के लिये स्वयं डार्विन ने जो कि विकासवाद के जन्मदाता थे यह माना है कि अन्य जीवों विशेष रूप से बंदर के शरीर से मनुष्य शरीर में विकसित होने की शृंखला हम ढूंढ़ नहीं सके। उन्होंने अपनी इस असफलता के बावजूद भी यह कहा कि एक दिन ऐसे अस्थि कंकाल मिलेंगे जो इस खोई हुई कड़ी की पूर्ति करेंगे। पीछे कुछ ऐसे अस्थि कंकाल भी मिले। उदाहरण के लिए 1979 में डॉ0 लीके ने टंगानियका प्रान्त में ओल्डुवहं जार्ह नामक स्थान में खुदाई कराते समय एक कंकाल पाया जिसका नाम “आस्ट्रोलीपि थोकस“ रखा गया । उस मनुष्य के पास ही हथियारों के आकार की कुछ वस्तुयें पाई गई। विकास शास्त्रियों ने उसे मनुष्य का बहुत समीपवर्ती वंशज माना। वैज्ञानिक कून ने पहले ही शंका प्रकट की थी कि विकासवाद की पुष्टि के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक जानकारियाँ उपलब्ध की जानी चाहिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि विकासवाद ही सही है अन्यथा वैज्ञानिक किसी भी तरीके से प्रमाण जुटाने का प्रयास करेंगे और इस तरह एक गलत सिद्धान्त को भी सच्चा प्रमाणित कर दिया जायेगा। उन्होंने यह बताया कि गिबन आरेन्यूटन, गोरिल्ला और चिम्पैन्जी ये अपना किया हुआ कर्म ही सर्वत्र फल देता है बिना किये कर्म का फल कही किसी ने भोगा है ?

कृतं फलति सर्वत्र, नाकृत भुज्यते क्वाचित् । - वेद व्यास (महाभारत)

चार बंदरों की जातियाँ है जिनमें गोरिल्ला और चिम्पैन्जी मनुष्य की शारीरिक बनावट से बहुत अधिक समानता रखते हैं। इनके कंकाल मनुष्य के कंकाल से मिलते-जुलते होते हैं इसीलिए यह संभव है जिन कंकालों को मनुष्य के और अन्य जीवों के बीच की कड़ी माना जाता है वे कड़ी न होकर किसी बंदरों के कंकाल रहे हो। कम से कम 1979 को खोजे गये अस्थि कंकाल के बारे में यही हुआ। वैज्ञानिकों ने इस कंकाल की खोज करते समय आगे चलकर पाया कि यह अस्थि कंकाल तो कुल 100 वर्ष ही पुराना है और इस जाति के लोग अभी भी धरती पर पाये जाते हैं।

वैज्ञानिक श्री सी0 एस0 कून अपनी पुस्तक दि ओरिजिन ऑफ रेसेस न्यूयार्क 1962 पेज 4 में विकासवाद को गलत बताते हुए लिखा है- अगर मनुष्य की जातियां कुछ हजार साल पहले किसी एक जाति के प्राणी से बनी होती हो तो उन सब जातियों को एक ही भाषा बोलनी चाहिए। एस्किमो और एल्यूट जाति के लोग एक ही भाषा बोलते हैं जबकि दोनों के इतिहास में 2000 वर्ष का अन्तर है। दूसरी ओर आस्ट्रेलिया और तस्मानिया में रहने वाली कुछ जातियां उन जातियों से समानता रखती है जिनको 100000 वर्ष पुराना माना जाता है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह भी पता चला है कि प्राचीन काल के मनुष्य का मस्तिष्क आज के मनुष्य के मस्तिष्क से विकसित था। तब के मस्तिष्क की क्षमता 1600 सी. सी. थी जबकि आज 1300 सी. सी. है। विकास क्रम में ऐसा नहीं होना चाहिये था। विकासवाद के अनुसार आदि मानव को बर्बर , असभ्य और जंगली होना था पर भूगर्भ की खुदाई से प्राप्त प्राचीनतम सिक्के, हथियार और कला-कृतियाँ इस बात की प्रमाण है कि आज की अपेक्षा पहले के लोग शरीर मस्तिष्क दोनों से अधिक समर्थ थे। अलेक्जेण्डर मारशाक ने अपनी पुस्तक दि बेटन आफ माटगेडियर नेचुरल हिस्ट्री वालूम एल 396 वर्षा के निरन्तर अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि प्राचीन मनुष्यों की कला और संस्कृति आज से ऊँचे स्तर की थी। विकासवाद के अनुसार कला को भी विकासोन्मुखी होना चाहिये। इससे प्रकट है कि विकासवाद का सिद्धान्त मनगढ़ंत अधिक तथा तथ्यपूर्ण कम है।

राकशेल्टर 9 औरंगाबाद मध्य प्रदेश की गुफा में जिराफ और खंगधारी घुड़सवार की आकृति बनी है। भारतीय पुरातत्व जिसकी मान्यतायें पाश्चात्य देशों पर ही आधारित है, इस चित्रकारी को ईसा से अधिक से अधिक 1000 वर्ष पुराना माना है जबकि हिन्दुस्तान में इतने समय पहले तक कोई भी जिराफ नहीं पाया जाता था। जिराफ का एक कंकाल हिमालय में मिला था जिसकी आयु 11 लाख वर्ष पूर्व बताई जाती हैं। इसी प्रकार मिर्जापुर की गुफाओं में रामगढ की गुफाओं में, फाँस की गुफाओं में ऐसे चित्र उपलब्ध है जो यह प्रमाणित करते हैं कि मनुष्य जाति अपने प्रादुर्भाव काल से कला और संस्कृति का ज्ञान रखती रही है। यह तथ्य विकासवाद से बिल्कुल उलटे है।

लगभग 211 करोड़ वर्ष पूर्व अमरीका में एक जानवर पाया जाता था उसके अस्थि कंकालों के अध्ययन के आधार पर उसका नाम मूर्खपाद (मोरोपस) रखा गया है इसी तरह के जीव कुछ अन्य जैसे डायनोरस, डेविल कार्क स्क्रू, स्टैबिंग कैट भी उस समय पाये जाते थे। यह अस्थि कंकाल विकास शास्त्रियों के लिये आज भी सिर दर्द है वे यह नहीं समझ पा रहे इन्हें विकास सिद्धान्त की किस श्रेणी में रखा जाये।

हमारा उद्देश्य इन पंक्तियों में विकासवाद की आलोचना करना नहीं यह बताना है कि इस सिद्धान्त ने मनुष्य जीवन के एक शाश्वत सिद्धान्त से किस प्रकार उसका ध्यान खींचकर उसे भ्रमित किया और उसे केवल भौतिक सुखों के ही आकर्षण जाल में फँसने को विवश किया।

मनुष्य से आश्चर्यजनक मनुष्य का मन और उसका मनोविज्ञान है मनुष्य की उत्पत्ति के साथ उसकी पुरानी हड्डियों का सम्बन्ध जोड़कर विकासवाद का सिद्धान्त बना दिया जाये पर उसके मनोविज्ञान के साथ सिद्धान्त तय न किया जाये इससे बढ़कर मूर्खता और दुर्भाग्य क्या हो सकता है। आज विज्ञान मानता है कि संस्कार और सम्पूर्ण मनोमय चेतना कोश के भीतर रहते हैं। वह शक्ति या प्रकाश के रूप में प्रकृति की विलक्षण और जटिलतम रचना है। सृष्टि के समस्त 108 प्रकार के तत्व और उनसे सम्मिश्रित 1ग 2ग 3ग 4ग 5ग 6ग 7ग 8ग 9ग 10ग 11ग 12ग 13ग 14ग 15ग 16ग----ज्ज्ज्ज्ज्ग 108 = प्रकार के गुणों सूत्रों से सम्पन्न कोश (सेल) मनुष्य शरीर में होते हैं यह संस्कार शक्ति के रूप में सदैव भ्रामर रहते हैं। केवल इनमें रासायनिक परिवर्तन हुआ करता है तब फिर यह क्यों न माना जाये कि मनुष्य की चेतना ही अपने एक-एक गुणों का त्याग करती हुई मनुष्य योनि से भटकती हुई अन्य योनियों में भ्रमण किया करती है। इस दृष्टि से यदि नये सिरे से अध्ययन प्रारम्भ किया जावेगा तो पता चलता कि विकासवाद का सिद्धान्त बिलकुल उलटा है और यह सच है कि मनुष्य चेतना ही है जो अपने मूलभूत गुणों को त्यागकर वासनाओं के कारण अन्य शरीरों में भ्रमण को विवश होता है। डॉ0 फ्रायड के अनुसार दमित वासनायें स्वप्न की कल्पना में आती है यदि उसी सिद्धान्त को भारतीय आचार्यों ने यह कहा कि जीवन भर की दबी हुई महत्वाकांक्षायें, वासनायें मन अन्य शरीरों में जाकर चरितार्थ करता है अर्थात् मनुष्य देखने में चाहे कितना ही साफ सुथरा शिक्षित दिखाई देता हो अपनी वासनाएं जब तक नहीं छोड़ता तब तक वह इन निकृष्ट योनियों में जाने को मजबूर होता रहता है इसमें चिढ़ने जैसी कोई बात क्यों हो ?

प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डॉ0 विल्डर पेनफील्ड ने मनुष्य के मस्तिष्क पर अनेक प्रयोग करके बताया है इंच के दसवें भाग जितनी मोटी लगभग 25 वर्ग इंच क्षेत्रफल की मस्तिष्क में काले रंग की दो पट्टियाँ होती है यह पूरे मस्तिष्क को ढके रहती है, मनुष्य जब पुरानी बाते स्मरण करता है तब विद्युत धारायें इन पट्टियों से गुजरती है और घटनायें याद हो जाती है। सामान्य स्थिति में मनुष्य अपनी मानसिक विद्युत को न तो इतना प्रखर बना पाता है और न ही एकाग्र के बिना किसी मदद से इस काली पट्टी के सम्पूर्ण इतिहास का पता लगा सके। पर वैज्ञानिक प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मन कभी मरता नहीं अपनी वासना और कर्मों के अनुसार वह बार -बार जन्म लेता और मरता है।

उदाहरण के लिये डॉ0 पेनफील्ड ने एक व्यक्ति की एक काली पट्टी में विद्युत प्रवाहित की तो वह एक गीत गुनगुनाने लगा जो न तो अमरीकन था न जर्मनी। उपस्थित कोई भी व्यक्ति उसे समझ नहीं सका। उस गीत को टेप-रिकार्ड कर लिया गया और भाषा शास्त्रियों की मदद ली गई तो पता चला कि वह भाषा किसी आदिवासी क्षेत्र की थी और वह गाना सचमुच ही उस क्षेत्र के लोग गाया करते हैं। इस तरह की अनेक घटनायें उन्होंने संग्रहित की है। जो यह बताती है कि जीवों में शरीर के विकासवाद को ही पुष्ट करने में लगे रहना समस्त मानव जाति के साथ एक प्रकार का धोखा है। हमें मन और उसके उत्थान या पतन का विज्ञान भी ढूंढ़ना चाहिये यदि मन की शक्ति वैज्ञानिक पा सके और उसे मानव जीवन के साथ जोड़ सके तो आज महर्षि वशिष्ठ की जो बात लोग समझ नहीं पा रहे कल राम की तरह सभी उसे समझने और मनुष्य शरीर में ईश्वरत्व की प्राप्ति करने लगे। जब तक यह नहीं होगा मनुष्य जात पतित और निम्नगामी योनियों में भ्रमण करती रहे तो इसे न तो कौतुक माना जाये न ही अतिशयोक्ति।


Quotation

पूर्ण सत्य की प्राप्ति तभी सम्भव है जब तुम इच्छाओं से छुटकारा पा लो।

-स्वामी रामतीर्थ

सन्त तुकाराम अपने प्रारम्भिक जीवन में जब अत्यन्त ही अभावग्रस्त हो गये तो उन्होंने लिखा “ हे भगवान्! अच्छा ही हुआ जो मेरा दिवाला निकल गया। अकाल पड़ा यह भी अच्छा ही हुआ। स्त्री और पुत्र भोजन के अभाव से मर गये और मैं भी हर तरह से दुर्दशा भोग रहा हूँ यह भी ठीक ही हुआ। संसार में अपमानित हुआ, यह भी अच्छा ही हुआ गाय, बैल, द्रव्य सब चला गया , यह भी अच्छा ही है। लोक-लाज भी जाती रही यह भी ठीक ही है। क्यों कि इन्हीं बातों के फलस्वरूप तो तुम्हारी मधुरिमामय, शाँतिपूर्ण गोद मिली। “


काल ब्रह्मांड और काररा का प्रदेश-स्वप्न

विश्व-विख्यात गणितज्ञ आइन्स्टीन को एक वैज्ञानिक गोष्ठी में किसी जटिल समीकरण का हल प्रस्तुत करना था। वे कई दिनों से उसे हल करने में लगे थे पर कोई हल निकल नहीं पा रहा था। एक दिन पूर्व वे सोये तब तक वह प्रश्न हल नहीं हो पाया था पर सो जाने के उपरान्त न जाने किस अज्ञात सत्ता ने उन सारे कठिन संदर्भों को सरल बनाकर आइन्स्टीन को उनके प्रश्न का समाधान प्रस्तुत कर दिया। स्वप्न टूटने के बाद आइन्स्टीन ने स्वप्न में देखे गये दृश्य के अनुसार फिर से प्रश्न को हल किया और उसका सही उत्तर उन्हें मिल गया। ऐसा उनके जीवन में कई बार हुआ इसलिये वे कहा करते थे स्वप्नों में कोई सत्य है जो हम वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे।

कुछ ग्रामीण कुछ प्रभावशील व्यक्तियों द्वारा ही स्वप्नों में सत्य घटनाओं के आभास की बात रही होती तो सम्भवतः इस तथ्य को उपेक्षित भी किया जा सकता था पर विस्तृत खोज करने पर पता चलता है कि स्वप्नों ने कई बार विश्व इतिहास को भी प्रभावित किया है। अब्राहम लिंकन ने अपनी हत्या का पूर्वाभास स्वप्न में ही पाया था। एलियस होवे ने सिलाई मशीन का ज्ञान स्वप्न में ही पाया था। कहते है- तुलसीदास द्वारा लिखी सारी चौपाइयाँ उन्हें कोई अतींद्रिय सत्ता स्वप्न में ही बता जाया करती थी। उनकी बुद्धि निर्मल और आत्मा इतनी पवित्र हो गई थी कि उन्हें स्वप्न की हर बात याद बनी रहती थी प्रातः काल वे उन चौपाइयों को भोज-पत्र पर लिख दिया करते थे।

यह बाते पुरानी कही जा सकती है स्वप्नों में पूर्वाभास और भविष्य के ज्ञान की घटनाएँ अभी भी कम घटित नहीं होती ? जितनी अधिक ये घटनाएं घटती जा रही है , उस अतीन्द्रिय लोक के प्रति वैज्ञानिक मन में जिज्ञासा भी बढ़ती जा रही है। कौन जाने यह जिज्ञासायें एक दिन वह तथ्य खोज निकाले जो आत्मा के रहस्य पर प्रकाश डालने वाले हो।

अंग्रेजी दैनिक इंडियन रिपब्लिक के सम्पादक रमेश चौधरी आरिगपूडि की अपनी जबानी कही और धर्मयुग 10 फरवरी 1963 अंक में छपी घटना- प्रथम निर्वाचन के दिन थे। श्री आरिगपूडि की एक दिन इच्छा हुई आँध्र के किसी निर्वाचन को अपनी आंखों से देखना चाहिये। वे मद्रास से नेल्लूर होते हुए अपनी ससुराल तेनाली पहुँचे। सायंकाल वे स्वस्थ चित्त सोये- लोग कहते है- फ्रायड ने लिखा है कि मनुष्य दिन भर की जो कल्पनाएं करता है वह दमित कल्पनाएं ही स्वप्न में उभरती है पर श्री आरिग पूडि के इस स्वप्न ने फ्रायड के तर्क को काट दिया।

रात गहरी नींद आई। प्रातः काल होने को थी तभी एक स्वप्न देखा- पिताजी बीमार है और तख्त पर लेटे है उनको हल्का दौरा आया और वे अचेत हो गये। हाथ तख्त से नीचे लटक गये। आंखें बन्द, ओठों से झाग बह निकला सुना कोई कह रहा है- “अब वे इस संसार में नहीं रहे। “

स्वप्न टूट गया। सामान्य स्वप्न लोगों को इतना कचोटते नहीं न जाने क्या बात थी कि श्री आरिग पूडि स्वप्न की बात जितना भूलना चाहते उतना ही तेजी से उभरता और उन्हें किसी अज्ञात आशंका से भर देता।

पिताजी विजयवाड़ा रहते थे। श्री अरिग पूडि ने उसी दिन तेनाली से कलकत्ता का टिकट कटाया। मार्ग में विजयवाड़ा पड़ता था पर वहाँ उतरने का उनका कोई इरादा नहीं था। विजयवाड़ा आया- श्री अरिगपूडि प्लेटफार्म पर उतरे एक बार फिर वही स्वप्न मस्तिष्क में झंकृत हुआ। न जाने किस प्रेरणा से उन्होंने सामान उतरवा लिया और घर की ओर चल पड़े। घर जाकर जो दृश्य उन्होंने देखा और सुना उसमें और स्वप्न में देखे दृश्य में पाई-पैसे का अन्तर नहीं था। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया आखिर जिसे लोग स्वप्न कहते हैं और जिनके बारे में मनोवैज्ञानिक भी कोई उचित निष्कर्ष नहीं दे पाते, उनमें इन सत्याभासों का क्या रहस्य हो सकता है ?

श्री उदयकुमार वर्मा रूस में पढ़ने वाले भारतीय स्नातक तब दोम अस्पीरान्तोव उनीवरसितेतस्काया ताशकंद 15 में रहते और ताशकंद में ही पढ़ते थे। जब भारत पाकिस्तान समझौता वार्ता के लिये वहाँ श्री लाल बहादुर शास्त्री तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष अयूब और रूसी प्रधान मंत्री श्री कोसीगिन एकत्रित हुए थे। एक दिन श्री वर्मा के पड़ोस में रहने वाली एक सोवियत छात्रा उनके पास आई और बोली- आप हमें श्री शास्त्री जी के आज दर्शन करा दे अन्यथा फिर उनके दर्शन नहीं हो पायेंगे। उसने बताया कि मैंने स्वप्न में देखा शास्त्रीजी की मृत्यु हो गई है। वर्मा जी ने इस बात का बुरा माना। उस दिन शास्त्रीजी का प्राच्य भाषा संस्थान ताशकंद में भाषण था। श्री वर्मा उक्त छात्रा के साथ वहाँ गये और शास्त्रीजी के दर्शन किये थे।

उसी रात को वर्मा ने स्वयं भी स्वप्न में देखा कि वे शास्त्रीजी को विदा करने हवाई अड्डा पहुँचे वहाँ कोई छात्रा कह रही है शास्त्रीजी तो मर गये है क्या आप उनके शव को विदा करने आये है। इसके बाद नींद टूटी। वर्मा ने छात्रा को बुलाकर नाराजी प्रकट की और कहा- देखो तुम्हारी उन बातों को मेरे अवचेतन मन पर प्रभाव पड़ा और मैंने भी वैसा ही अशुभ स्वप्न रात में देखा। पर वर्माजी को यह मालूम न था कि अवचेतन से भी अवचेतन कोई एक सत्ता जीवन प्रवाह के रूप में बाहर-भीतर सर्वत्र प्रवाहित हो रही है उसमें सारी अतीन्द्रिय क्षमताएं है और उसकी अनुभूतियां एकाएक गलत नहीं हो सकती।

सारा संसार जानता है कि 10 जनवरी 66 को उसी रात शास्त्रीजी का देहान्त हो गया। 11 को जब श्री वर्मा उन्हें काबुल प्रस्थान के लिए विदा करने जाने वाले थे तभी उन्हें समाचार मिला- शास्त्रीजी नहीं रहे तो वे स्तब्ध रह गये।

ऐसी घटनाओं ने ही वैज्ञानिकों को इस सम्बन्ध में विस्तृत खोज की प्रेरणा दी है। अमरीका के प्रसिद्ध डाक्टर आइसवुड ने बहुत समय तक स्वप्न-पीड़ित लोगों की चिकित्सा की। एक दिन उन्हें ख्याल आया- चूँकि स्वप्न- एक विचार एक स्पन्दन की नाई मस्तिष्क से निसृत होते हैं अतएव क्या रिकार्ड नहीं किया जा सकता ? उनकी इस जिज्ञासा ने ही “इलेक्ट्रोएन सेफलोग्राफ” यंत्र का आविष्कार किया यह यंत्र सोये हुये व्यक्ति के स्वप्नों को ध्वनि तरंगों की भाँति रिकार्ड कर देता है यदि उस व्यक्ति को स्वप्न की एक-एक बात याद रहे तो उन स्वप्न रेखाओं से और भी विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त की जा सकी है। अभी तक तो यह संभावना थी कि स्वप्नों को इस प्रकार अंकित कर लेने से एक व्यक्ति के स्वप्न दूसरे व्यक्ति देख सकेंगे, स्वप्न खरीदे और बेचे जा सकेंगे। पर पीछे जब “मैमी फला स्वप्न अनुसंधान संस्थान” की स्थापना हुई और सभी आयु वर्ग देश जाति के लोगों पर प्रयोग करके स्वप्नों का विश्लेषण किया तब पता चला कि स्वप्न एक सत्ता जगत है अर्थात् उस समय मानसिक चेतना का आत्मिक चेतना में आँशिक और पूर्ण विलय भी होता है। इस संस्थान ने यह पाया कि जो लोग अधिक पवित्र थे उनके स्वप्नों जहाँ भविष्य सम्बन्धी स्पष्ट जानकारियाँ थी वही जिन लोगों के मस्तिष्क दूषित थे उनके स्वप्न न केवल निताँत अस्पष्ट थे वरन् उनकी मानसिक स्थूलता इतनी अधिक थी कि उन्हें हर स्वप्न में कुछ न कुछ भयानक दृश्य दिखाई देते हैं।

डॉ0 कैल्विन हाल ने मैक्सिको आस्ट्रेलिया, नाइजीरिया के लोगों के लगभग 30 हजार स्वप्न एकत्रित किये और विश्लेषण किया तो पाया कि स्वप्नों को लोगों के व्यक्तिगत चरित्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिनके आचार-विचार अच्छे नहीं इन्हें तीन में से दो स्वप्न भयानक देखने पड़ते हैं। जिन्हें रात में 7-7 स्वप्न आते हैं, वह भी ऐसे ही अस्थिर चित्त लोग होते हैं। ईश्वर-भक्त , पुण्यात्माओं को यदि आहार में कोई गड़बड़ न हो तो रात में लम्बा, गहरा और इतना स्पष्ट स्वप्न दिखाई देता है जिसे बीसियों वर्षों तक ज्यों का त्यों रखा जा सकता है। इन्हें इन दृश्यों में सिनेमा के दृश्य से भी अधिक आनन्द आता है। उन्हें स्वप्न में संगीत, गायन नृत्य आदि भी देखने सुनने को मिलते हैं।

स्काटलैण्ड यार्ड पुलिस के अपराध विशेषज्ञों ने स्वप्नों को एक- दूसरे ही रूप में लिया और किसी अर्थ में भी उसका विशिष्ट महत्व यह सिद्ध हुआ कि जो चेहरे बाहर से बहुत सुन्दर, आकर्षक सभ्य और शिक्षित प्रतीत होते हैं आवश्यक नहीं कि वे भीतर से वैसे ही हो। लोग बाहर से कितनी ही बनावट क्यों न करे यदि उनका अन्तःकरण विकार ग्रस्त और पापपूर्ण है तो उनके स्वप्न में उसका असर स्पष्ट पड़ेगा। एक और बात सामने आई वह यह कि स्वप्न में पूर्व किये गये अपराध पानी को लहर की तरह बार-बार टकराते हैं। इसलिए स्वप्नों को अंकित करने की पद्धति से अपराधियों की पकड़ का एक अच्छा क्रम चल पड़ा । आगे तो विज्ञान स्वप्नों द्वारा पूर्व जन्मों के काण्ड भी खोलने वाला है इसमें जरा भी संदेह नहीं रह गया।

उदाहरण के लिये अमेरिकी पुलिस ने एक बार अमेरिका के शिक्षित और संभ्रान्त माने जाने वाले 1000 व्यक्तियों के स्वप्नों का विश्लेषण किया तो पाया कि उनमें से 40 प्रतिशत व्यक्तियों का सम्बन्ध किसी न किसी अपराध से है। कई लोग अपनी धर्म पत्नि के समक्ष बड़े चरित्रवान बनते थे। पर स्वप्नों में यह सत्य पाया कि यह उनके द्वारा किया गया सफेद धोखा था। कई लोग त्यागी दीखते थे पर उन्होंने कभी न पकड़ में आने वाले गबन किये थे। कई लोगों ने चोरियाँ, कई ने मिलावट और कितनों ने हत्यायें तक की थी। इससे अमेरिका में एक भय प्राप्त हो गया और लोगों ने स्वप्न विश्लेषण कराना बंद कर दिया क्योंकि इससे उनके जीवन में अपराध चाहे कभी भी हुए हो सामने आ सकते थे।

वैज्ञानिकों ने खोज करके पाया है कि 98 प्रतिशत अपराधी स्वप्न बार-बार आते हैं। कृत्रिम स्वप्नों द्वारा इन आवृत्तियों को उत्तेजित कर दिया जाता है जिससे किसी भी व्यक्ति के कितने प्राचीन अपराधों के दृश्य रिकार्ड आ जाते हैं। एक दिन सम्भव है कि हर व्यक्ति के जीवन के ऐसे रिकार्ड रखे जाये और उनका सम्बन्ध उसी तरह के स्वप्न देखने वालो से जोड़ा जाये तो पुनर्जन्म प्रमाणित होगा। विज्ञान इस दिशा में तेजी से अग्रसर हो रहा है।

स्वप्न को एक जगत एक प्रवाह, एक चेतन अस्तित्व कह सकते हैं जिसमें कोई काल नहीं कोई ब्रह्मांड नहीं क्योंकि वह एक मात्र मनोमय अनुभूति है उसका कोई निश्चित कारण भी नहीं आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं बता पाया कि स्वप्न क्यों देखते हैं। वह आत्म-चेतना की आँशिक अनुभूति मात्र है। जो यह प्रमाणित करता है कि जीवात्मा अपना विकास करके अतीन्द्रिय लोक को पा सकती है वहाँ भी सब कुछ है जिसकी स्थूल जगत में कल्पना हो सकती है। फ्रायड ने अपनी पुस्तक “इंटर पिटेशन आफ ड्रीम” में स्पष्ट स्वीकार किया है कि उस समय चित्त आत्मिक ज्ञान की अनुभूति उसी तरह करता है जैसे रेडियो की सुई रेडियो स्टेशन विशेष का। हम इन स्वप्नों के माध्यम से भी आत्मा के रहस्यों की कल्पना और चिन्तन कर सके तो आत्म-साक्षात्कार का मार्ग और भी सरल हो सकता है।


किस्मत लेकर आये है

चींटी ने पूछा बहन कोयल भविष्य की भी कुछ चिन्ता किया करो। कोयल हँसी और बोली- आनन्द तो हम पूर्व जन्म से ही किस्मत में लेकर आये है, तुम्हें बोझ ढोना है सो ढोती फिरो। कुछ दिन बीते, बरसात आई पानी-पानी, कोयल ठंड से सिकुड़ती भूख से पीड़ित चींटी के पास जाकर बोली- बहन कुछ खाने को दो। चींटी बोली- क्यों भूख सहन करना क्या किस्मत में नहीं लिखा


संत की सिखावन

कई दिन के परिश्रम के बाद वे एक साड़ी बुन पाये थे। सोच रहे थे कि वह बिक जावे तो उदर पोषण की आवश्यकताओं की पूर्ति की जावे, बात महात्मा तिरुवल्लुवर के जीवन की है वे जन्म से जुलाहे थे। लोक सेवी संत होकर भी उन्होंने अपनी आजीविका अपने परिश्रम से कमाने का व्रत आजीवन निभाया, वे इसे ईश्वर उपासना का ही एक अंग मानते थे, अपनी वैयक्तिक समस्याओं के लिए उन्होंने कभी भी पराश्रय नहीं लिया।

सन्त अपनी धैर्यशीलता और क्षमा के लिए विख्यात थे। गाँव का एक युवक इसे ढोंग कहता था हमेशा उनकी परीक्षा लेने की बात सोचा करता था। दैव योग से वे साड़ी लेकर बेचने बैठे ही थे कि वह युवक वहाँ आ पहुंचा। उसने साड़ी का मोल पूछा तो सन्त ने विनम्र वाणी में उत्तर दिया सामान और मजदूरी दोनों मिलकर साड़ी का मूल्य कुल दो रुपये होता है।

युवक ने साड़ी हाथ में ली और बीच से बराबर दो टुकड़ों में फाड़ दिया और पूछा- इन दो टुकड़ों में से अलग-अलग एक के कितने दाम होंगे। संत ने उसी निश्छलता से उत्तर दिया- एक - एक रुपया। फाड़े गये दो टुकड़ों में से एक के फिर दो टुकड़े करते हुए युवक ने पूछा अब इन टुकड़ों की कीमत कितनी होगी तो संत ने बिना अप्रसन्न हुए उत्तर दिया आठ आने। अब तक वह युवक उस टुकड़े के भी दो टुकड़े कर चुका था। अब उसने पूछा- अब इन टुकड़ों के कितने पैसे लोगे तो तिरुवल्लुवर ने धीर गंभीरता के साथ उत्तर दिया चार आने।

युवक साड़ी के टुकड़े पर टुकड़े करता गया। वह हर बार सोचता रहा कि इस बार संत कुद्ध होगे पर संत का हृदय था कि नवनीत। जितनी आँच दी उस युवक ने उतना ही पिघलता और गम्भीर होता गया। न उन्होंने युवक को वैसा करने से रोका और न किसी प्रकार का तर्क दिया।

युवक ने अब पलट कर पाशा फेंका। तार-तार हुई साड़ी को गोलमटोल गेंद की तरह लपेटता हुआ बोला- अब इसमें रह ही क्या गया है जो पैसे दिये जाये। यह लो तुम्हारी साड़ी के दो रुपये। यह कहकर वह धन का अभिमान प्रदर्शित करता हुआ दो रुपये निकालकर देने लगा तो तिरुवल्लुवर ने कहा - बेटा! जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं तो उसका मोल कैसे लूँ ?

युवक का उद्दण्ड हृदय अब तक पश्चाताप में बदल चुका था। उसने विनीत होकर कहा- महात्मन् मुझसे भूल हो गई साखी का मूल्य तो मुझे चुकाना ही चाहिए।

संत की आंखें डबडबा आई और वे बोले- वत्स! तुम्हारे दो रुपये चुका देने से इस क्षति की भरपाई तो नहीं हो जायेगी ? सोचो इसकी कपास पैदा करने में किसान ने कितना परिश्रम किया होगा, इसको धुनने और सूत बुनने में कितने लोगों का समय और श्रम लगा होगा साड़ी बुनी गई तब मेरे परिवार वालो ने कितनी कठिनाई उठाई होगी। तुम्हारे दो रुपये चुका देने से क्या इन सब का परिश्रम संतुष्ट हो जायेगा।

युवक अधीर हो उठा। उसकी आंखों से पश्चाताप के आँसू फूट पड़े। वह कहने लगा- ऐसा था तो आप मुझे साड़ी न फाड़ने के लिए बलपूर्वक रोक भी तो सकते थे ?

रोक क्यों नहीं सकता था बेटा! मेरा शरीर कुछ तुम्हारे शरीर से कमजोर तो है नहीं। पर वैसा करने से क्या तुम मान जाते। महापुरुष कह गये है क्रोध को क्षमा से अशिष्टता को शिष्टता से जीतना चाहिए। बलपूर्वक रोकने से तुम्हें शिक्षा देने का यह अवसर मिला वह कहाँ मिलता ?

युवक की उद्दण्डता पूरी तरह धुल चुकी थी। और उसने अनुभव कर लिया था जो शिक्षा क्षमा और प्रेम से दी जाती है वही अन्तःकरण में बैठकर चिरकाल तक प्रकाश देती रहती है।


सारा जीवन ही साधना बने !

रूढ़ अर्थों में साधना एक धार्मिक या आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसकी विभिन्न धर्म-संप्रदायों में अलग-अलग मान्यतायें है। हिन्दू धर्म में यम, नियम, आसन और प्राणायाम को बहिरंग तथा प्रत्याहार, छारगा, ध्यान और समाधि को अन्तरंग साधना-सोपान के रूप में स्वीकार किया गया है। जैनागमों में अनशन, अनोदरता, (आहार सम्बन्धी नियम) भिक्षाचर्या, वृत्ति संकोच, रस-परित्याग, काय-क्लेश और निर्विकारता को बहिरंग साधना की तथा प्रायश्चित , विनय, सेवा-परिचर्या, स्वाध्याय, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग को अन्तरंग अर्थात् तप संज्ञा दी गई है। बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और परपीड़न विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।

परन्तु साधना या तप कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है, जिसको नियमोपनियम के शिकंजे में कस दिया जाय। यह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, जिसका अनुगमन बदलती हुई परिस्थितियों के साथ व्यावहारिक धरातल पर होना आवश्यक है।

साधना केवल धार्मिक कर्मकाण्ड सापेक्ष क्रिया मात्र नहीं है। उसको यह रूप देकर धर्माचार्यों ने मानव-मात्र को एक संकुचित दायरे में बंद कर दिया है। गृह त्यागी, विरक्त और संन्यासी महाप्राण मनीषियों के आचार आदर्श का मान बिन्दु ही स्थापित कर सकते हैं, परन्तु लोक धर्म का रूप नहीं ले सकते। आज धर्म के नाम पर नई पीढ़ी नाक- भौं सिकोड़ती है, उसका दोष किस पर है ? जो धर्म लौकिक जीवन के बदलते आश्रमों के साथ अपने को गत्यात्मक नहीं बनाये रख सकता, उसका स्थान शास्त्रों में सुरक्षित रहने योग्य है। बुद्धि -विलक्षण लोगों के तर्क-वितर्क का विषय बनने योग्य है पर जन-पथ पर उसका रथ अग्रसर नहीं हो सकता।

जन-समाज में अधिकाँश संख्या तो गृहस्थों की है और जो नामधारी साधु-संन्यासी है, उनमें से भी अधिकाँश प्रच्छन्न गृहस्थ ही है। फिर यम-नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान- धारणा समाधि की कठोर प्रक्रिया में से गुजरने की अपेक्षा किससे की जा रही है ?

साधना वेष में नहीं है। साधना क्रिया-कांडों में भी नहीं है। साधना दिखाने के लिये नहीं की जाती। साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। आज भारत में तथा कथित साधकों की भरमार है फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है, जैसा कि एक साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।

साधना वह होती है, जहाँ का वातावरण आनन्द और प्रेममय बन जाता है। साधना वह होती है, जहाँ ईमानदारी और प्रामाणिकता मूर्त बन जाती है। ऐसी साधना आंतरिक पवित्रता, विशुद्ध प्रेम भावना, स्वार्थ त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी। जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा, उस दिन संसार का दूसरा रूप ही होगा। आवश्यकता है, साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में न उलझकर व्यक्ति जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।

आज अपेक्षा है, उस साधना की, जिसका वर्णन संत कबीरदास के एक पद में किया गया है। ‘साधो सहज समाधि भली’ इस पद म कबीर ने नाम ‘समाधि’ का लिया है, पर वह एक सम्पूर्ण जीवन साधना का दर्शन है। उन्होंने सारा जीवन-दर्शन ही क्राँतिकारी ढंग से प्रस्तुत किया है। नित्य जीवन की सहज क्रियाओं को लेकर महात्मा कबीर ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि मनुष्य जीवन की सही दिशा और सच्ची साधना क्या है।

जीवन अनेक मुखी होता है और विकास के रास्ते भी अनगिनत है। मनुष्य सबको तो आत्मसात् कर नहीं पाता। अतः वह कोई एक मार्ग पकड़ता है और उसी के द्वारा अपने जीवन को उन्नत बनाना चाहता है। कोई भक्ति का मार्ग चुनता है। कोई कर्म मार्ग की ओर अग्रसर होता है और कोई ज्ञानयोग की तरफ उन्मुख होता है।

विश्व में अनेक धर्म-ग्रन्थ है और उनके अपने-अपने सिद्धान्त तथा तौर-तरीके है और वे सब इसलिए है कि उनके द्वारा स्वयं व्यक्ति का, समाज का और अन्ततः विश्व का कल्याण हो, दुःख मिटे। सदियों से सबकी अपनी-अपनी परम्पराएं चली आ रही है। श्रद्धा और आस्थापूर्वक लोग उन परंपराओं पर चलते आ रहे हैं, उनको जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं।

जिन महापुरुषों ने जीवन और जगत की रीति को अंतर्चक्षुओं से देखा, उन्होंने देश, काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर युगानुरूप मार्ग निर्धारित किया और वही कालान्तर में धर्म बन गया। वही विशिष्ट साधना का पक्ष भी बन गया।

‘साधना’ शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है, यह अलग बात है। लेकिन शुद्ध रूप में साधना शब्द अर्थ से परे है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।

सब प्रकार की कलाओं की सिद्धि के लिए साधना करनी पड़ती है अर्थात् एकाग्रतापूर्वक अभ्यास करना पड़ता है। परस्पर-व्यवहार को सभ्य या समाज मान्य बनाने के लिए बचपन से ही संस्कारों की साधना करनी पड़ती है। प्रेम, उदारता, सेवा भावना आदि गुणों के लिए भी निरन्तर साधना करनी पड़ती है। व्यापार -व्यवसाय में भी ऐसी सैकड़ों बाते हैं जिनमें साधना की आवश्यकता होती है।

तो मतलब यह है कि साधना का कोई एक प्रकार या एक नियम नहीं है और वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। गाँधी जी ने कहा था कि मेरा जीवन ही सत्य की साधना में बीत रहा है। उनकी हर प्रवृत्ति के पीछे सत्य का आग्रह रहा करता था। महात्मा कबीर ने अपने पद में यही बात कही है। उन्होंने जब देखा कि लोग अमुक क्रियाओं को ही साधना मानते हैं और उतना सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गये। तो उन्होंने मशाल हाथ में लेकर साधना-मार्ग प्रकाशित किया। लोगों की आंखें खोलने का प्रयास किया कि हमारी वे सारी क्रियायें धर्म-क्रियायें है, साधनायें है जो हम सबेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं।

सच्चाई जीवन को उस सुदृढ़ शिला के समान बनाती है जिससे टकराने वाला टूट जाता है पर स्वयं अक्षुण्ण बनी रहती है। - विवेकानन्द

साधना को सिद्धि का रूप तभी प्राप्त होता है, जब वह साधना सहज हो जाती है। कबीर कहते है- मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है, मेरा कुछ भी करना सेवा ही है, मेरा सोना ही दण्डवत् है, जो कुछ बोलता हूँ वही जय है और खुली आंखों से जो कुछ देखता हूँ वही प्रभु का सुन्दर रूप है। इससे एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि हमें अपने भक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी विमुख नहीं होना चाहिये और नित्य जीवन की समस्त क्रियाओं में उसी विराट् विभु की लीला का, विराट् विश्व की सेवा का रस प्राप्त करना चाहिये।

जीवन की साधना का सबसे बड़ा सम्बल हमारा कर्मरत और समाजगत आचरण है। समाज से छिटक कर विशेष परिवेश को धारण करने से हम अपनी कल्पना की मुक्ति भले ही प्राप्त कर ले, पर इससे हमारा तथा समाज का कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा। बारह वर्ष तक साधना करके कोई व्यक्ति पानी पर चलने का अभ्यास करके चमत्कारी कहला सकता है, पर उसकी सिद्धि का कुल मूल्य रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में केवल चार पैसा है, क्योंकि चार पैसे खर्च करके नौका में बैठकर कोई भी नदी पार कर सकता है। हमारी बहुत सारी साधनाओं के मूल में यही अल्पमोली बाते हैं जिनसे हमें मुक्त होना है, अपने को सहज साधक बनाना है।

आज आवश्यकता है उस साधना की जो हल की मूठ पकड़े किसान, मशीन का पहिया घुमाते श्रमिक, प्रयोगशाला में प्रयोगरत वैज्ञानिक, व्यापारी -व्यवसायी एवं कलम घिसते कर्मचारी की परस्पर भिन्न परिस्थितियों में अध्यात्म की दीप-शिखा प्रज्ज्वलित कर सके। आज साधना की ही नहीं, अध्यात्म तक की नई व्यवस्था के साथ उपस्थित होना है।

अतः यह खुद अच्छी तरह समझ लेने की चीज है कि साधना और अध्यात्म का परम्परा प्राप्त रूप आधुनिक जीवन के संदर्भ में निरुपयोगी बन गया है। इनकी पुराण प्रथिम परिभाषा में आज की पीढ़ी के लिए कोई आकर्षण नहीं है। आशंका यह है कि ‘साधना’ और अध्यात्म घिसे पिटे खोटे सिक्के की तरह कही अपना चलन ही न गवा बैठे।

जब कोई कृषक लू-धूप की परवाह किये बिना हल चलाता है, तब वह साधना ही तो करता है। जरूरत तो बस इतनी है कि उसके कर्म को आत्म-केन्द्रित न होने देकर लोक-मंगल के पवित्र भाव से सम्पुष्ट किया जाए, ताकि उसका वही कर्म ‘स्व’ के साथ ‘पर’ के लिए होकर उसमें भाव-शुद्धि की भावना भर दे और उसको आध्यात्मिक दीप्ति प्रदान कर दे। पसीना चुचुआते शरीर से मशीन के साथ जूझते श्रमिक का कर्म किस साधना से कम है ? उसे साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए, तो वही उसके लिए आध्यात्मिक धर्म बन जाएगा। व्यापारी के धृति-साध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाये तो वही ‘स्व’ में ‘पर’ की साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा। तात्पर्य यह है कि साधना कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने, तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।

वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति को झुठलाया नहीं जा सकता। उनके द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को भी नहीं त्यागा जा सकता और उसके कारण परिवर्तित जीवन-मूल्यों को भी नकारा नहीं जा सकता। साथ ही उसके आनुषंगिक दोषों से भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता, तो फिर जो अपरिहार्य है, उसके साथ जूझकर अपनी शक्ति व्यर्थ गँवाने से क्या लाभ ? साधना और आध्यात्मिक उन्नयन के हमारे प्रयासों का उपादान तो आज का दिशाहारा, अशाँत, स्थापित जीवन- मूल्यों के प्रति अनास्थावान मानव है। हम उसी को समेटे, सहेंगे। उसे साधना और तप की नई दीक्षा दे, तभी तो कुछ काम बने। बाकी तो थोड़ी सिद्धान्त चर्चा ही होगी।


जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक

जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक अपने दरबार में बार-बार घण्टी बजा रहे थे, पर कोई भी चपरासी उपस्थित नहीं हो रहा था। आखिरकार उन्होंने उठकर बाहर देखा कि एक चपरासी बैठा बैठा ही सो रहा है। उसके हाथ में उसकी विधवा माँ का पत्र था, जिसमें अपनी निर्धनता तथा दुःख का जिक्र किया गया था। सम्राट ने सजल नेत्रों से वृद्धा माँ का पत्र पढ़ा और चपरासी की जेब में आवश्यकतानुसार रुपये रखकर चुपचाप अन्दर चले गये।


मृत्यु जीवन का अन्त नहीं

जीन्द (हरियाणा) का कालेज। एक विद्यार्थी के साथ उसकी छोटी बहिन भी कालेज चली आई। एक अध्यापक ने प्रयोगशाला में खड़ी उस बालिका से पूछा- बेटी यह शीशी में क्या रखा है, जानती है इसे छूना मत, नहीं तो जल जायेगी। अध्यापक ने कोई परीक्षा लेने के लिए नहीं पूछा था उसने तो साधारण हिदायत भर दी थी। किन्तु लड़की बोली- हाँ हाँ सर यह “कन्सन्ट्रेटेड नाइट्रिक एसिड “ है मैं इसे नहीं छूऊगी। उसने और भी शीशियों में रखे हुए घोलों को सही -सही बताकर अध्यापक और छात्रों को विस्मय में डाल दिया- इस आयु के बच्चे तो अच्छी तरह बोल भी नहीं सकते फिर इस बालिका ने अंग्रेजी और विज्ञान का यह असाधारण ज्ञान कहाँ से पाया ?

जो बात और अधिक विस्मय में डालती है वह यह है कि उक्त बालिका बिना किसी शिक्षा के पुस्तकें पढ़ लेती है उसे हिन्दी , उर्दू और अंग्रेजी का एक एफ. ए. के विद्यार्थी जितना ज्ञान है ? यह ज्ञान कहाँ से उपलब्ध हुआ ? क्या कोई ऐसी परम्परा भी है जिसमें बच्चों की जन्मजात प्रतिभा को विकसित किया जाता हो इन प्रश्नों पर विचार करने बैठते हैं तो अपने भारतीय दर्शन के उस सिद्धान्त की पुष्टि होती है जिसमें यह बताया जाता है कि मृत्यु के बाद ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता है वरन् जीवन एक शाश्वत विकास की प्रक्रिया है वह अनादि काल से चल रही हैं। जीवन की इकाइयां बराबर बनी रहेगी। पाश्चात्य वैज्ञानिकों का यह कथन सत्य नहीं है कि मनुष्य की वृक्ष वनस्पति की तरह एक सामान्य रासायनिक प्रक्रिया है और मृत्यु के साथ उसका अन्त हो जाता है। यहाँ वृक्षों की चेतनता को भी उसी विकास प्रक्रिया का ही अंग माना गया है।

कठोपनिषद् में नचिकेता यमराज से पूछते है- मरने के बाद मनुष्य की क्या गति होती है तो यमाचार्य उत्तर देते है-

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेता वुपाश्रतौ ॥ - द्वितीय वल्ली ।

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थारणुमन्येsनुसंयन्ति यथा कर्म यथा श्रुतम ॥ - द्वितीय वल्ली ।

हे नचिकेता! कोई भी देहधारी प्राण या अपान से ही जीवित नहीं रहता किन्तु जिसमें यह दोनों आश्रित है (कारण शरीर) उसी के आधार पर जीवित रहते हैं। अगले मंत्र में मृतात्मा देहान्त के पश्चात् कैसे रहता उस पर प्रकाश डाला है कहा है- आपने अपने कर्मों के अनुसार जिसने श्रवण द्वारा जैसा भाव प्राप्त किया, उसके अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारण के लिए विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्ष, लता, पर्वत आदि स्थावर शरीरों को प्राप्त होते हैं।

हमारे और भी धार्मिक ग्रन्थ और दर्शन पुनर्जन्म की परिकल्पना का समर्थन करते हैं। यों कहना चाहिये कि भारतीय आचार संहिता एक जीवन प्रस्तुत जीवन को ही दृष्टिगत रखकर नहीं की गई वरन् विश्वास के साथ की गई है कि मृत्यु के बाद भी जीव को कर्मानुसार पुनर्जन्म धारण करना पड़ता है जब तक आत्मा पूर्ण रूप से विकसित होकर परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर लेती तब तक वह जीवन-मरण के चक्र में घूमती रहती है।

गीता के अध्याय 2 में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है-

वासाँसि जीणानि यथा विहाय, नवानि गृहाति नरोsपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ - गीता 2/22

हे अर्जुन- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर दूसरे नये शरीर को प्राप्त होता है।

जीन्द की घटना तो भारतीय दर्शन की उस मान्यता का ही उल्लेख है। 11 वर्षीया बालिका के बारे में यह माना जा सकता है कि बौद्धिक प्रतिभा के कारण उसने अन्य समवयस्कों की अपेक्षा थोड़ा अधिक ज्ञान अर्जित कर लिया होगा पर जो वस्तु उसने कभी पढ़ी ही नहीं वह इस जन्म का विकास कैसे हो सकता है दूसरे उसे धर्म के गूढ रहस्यों का पता ही नहीं फिर भी वह बताती है कि मैं अर्विन अस्पताल दिल्ली के एक डाक्टर की पुत्री थी। हम अग्रवाल जाति के थे। मेरे जीप और कार थी। मेरा नाम सुमन था। मुझे खूब अच्छे-अच्छे मीठे पकवान खाने को मिलते थे मैंने इंटर तक पढ़ाई की थी।

पिछले जन्म के कई संस्कार इस जीवन में अपने आप परिलक्षित हो रहे हैं- 1. तो यही कि उसने बिना पढ़े अंग्रेजी का ज्ञान पाया। 2. उसका डील-डौल सामान्य गति से अधिक तेजी से बढ़ रहा है उसकी वर्तमान माँ बताती है कि बालिका को कोई अतिरिक्त खुराक नहीं दी जाती तो भी उसका शरीर असाधारण रूप से बढ़ रहा है 3. अब चूँकि वह निर्धन घर में है इसलिये उसे अच्छा खाना कभी कभी मिलता है वह उसका अधिकांश अपने बहन-भाइयों को देती है और कहती है कि ये वस्तुएं मैंने भरपेट खाई है 4. दिल्ली, अमृतसर, डलहौजी शिमला आदि स्थानों के वह कई रोचक वर्णन सुनाती है जिसे उसने देखा भी नहीं। यह चारों बाते पूर्व जन्म और पूर्व जन्म के सिद्धान्त को ही पुष्ट करती है।

इस घटना का सबसे आश्चर्यजनक पहलू तब सामने आया जब उसकी माँ के पेट से एक और कन्या जन्मी और जन्म लेते ही बड़ी बहिन फूट-फूट कर रोने लगी ‘- कहा- अरी! पूनम तू जीजाजी को और दोनों बच्चों को किसके सहारे छोड़ आई ? लोग कहते थे कि यह क्या पागलपन है किन्तु इस बालिका ने बताया कि यह छोटी बहिन पहले जन्म में मेरी बड़ी बहिन थी। इसका नाम पूनम था। इसकी शादी भिवानी के एक अध्यापक के साथ हुई थी। पूनम का रंग कुछ साँवला था इसलिए जीजाजी उसे चिढ़ाते रहते थे। पूनम ने उससे दुःखी होकर एक दिन आत्म- हत्या कर ली और इस तरह पूर्व जन्म की दो सगी बहने इस जन्म में भी सगी बहने हुई।

आश्चर्य यह है कि आत्मा की सूक्ष्मता के कारण किसी विशिष्ट व्यक्ति की पहचान संभव नहीं है फिर बालिका ने जन्म लेते ही अपनी बहिन को कैसे पहचान लिया जबकि इस में उसका शरीर उसकी मुखाकृति सब कुछ अलग है। यह यह बालिका भी 4-5 वर्ष की है और जब इस जन्म की बड़ी बहिन किसी को पूर्व जन्म की बाते बतानी लगती है तो छोटी बहिनें उसे रोकती है और कहती है अब यह सब बाते करने से क्या लाभ ? उनकी गंभीरता यह सोचने को विवश करती है कि क्या सचमुच हमारे मर जाने के बाद भी जीवन बना रहता है। यदि नहीं तो क्या हम सामान्य पशुओं जैसा जीवन जीकर ही मर जाया करे या फिर आत्म-कल्याण का कोई मार्ग ढूंढ़े और उस पर चले। यदि हम इन प्रश्नों का सही सही अर्थ ढूंढ़ लेते हैं तो अपना मानव शरीर भी सार्थक होना निश्चित है अविश्वास और अविवेक के कारण तो भटकना ही भटकना है। राजी से भटके या बेराजी से।

जन्म जीवन प्रक्रिया के व्यक्त होने और आगे बढ़ने का नाम है न कि पहली बार अस्तित्व में आने का- पाणिनि

हिंदुओं की बात दूसरी है हमारे जीवन में तो जन्म और पुनर्जन्म के संस्कार गहराई तक जमे है इसलिये अब केवल उतना ही आवश्यक रह जाता है कि हम अपने जीवन लक्ष्य को कैसे प्राप्त करे यह सोचे पर जो थोड़े से विज्ञान और पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित लोग पुनर्जन्म की कल्पना को स्वीकार नहीं करते उनके लिए यह घटनाएँ संभव है कुछ शिक्षा दे। मुसलमान और ईसाई भी पुनर्जन्म नहीं मानते पर पिछले दिनों इन दोनों वर्गों में भी पुनर्जन्म की ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी है कि इन वर्गों के विचारशील लोग भी अपने धर्म को नये ढाँचे और सिद्धांतों पर ढालने की सोचने लगे है। ईसाई और मुस्लिम दोनों अपने सिद्धान्त धीरे-धीरे बदल रहे हैं ऐसा करना ठीक भी है।

तुर्की के मिदित जिले में मुहम्मद नामक एक व्यक्ति आइसक्रीम बेच रहा था। उसके पास से एक 5 वर्ष का बालक गुजरा। बालक ने उसे देखते ही पूछा- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? आइसक्रीम वाले ने इनकार कर दिया - मैंने तो तुम्हें पहले देखा ही नहीं। किन्तु बच्चे ने तुनक कर कहा- तुम मुझे भूल गये हो - मैं अबीत हूँ। पहले तुम तरबूज और साग भाजी बेचा करते थे। मुहम्मद ने आश्चर्य वश और कई प्रश्न अबीत से पूछे जिसके उत्तर उसने सही पाये। अबीत बालक ने यह भी बताया कि मुहम्मद की तरफ उसके बहुत से पैसे भी निकलते हैं। मुहम्मद ने तमाम आदमियों के सामने यह बात स्वीकार ली।

अपने को पूर्व जन्म का अबीत बताने वाला यह लड़का तुर्की में ही अदाना जिले में सन 1956 में एक कसाई के घर जन्मा है। पहले जन्म में वह काफी धनी था उसकी दो धर्म-पत्नि बहिन और कई बच्चे थे। उसकी किसी कारण वश हत्या कर दी गई। अभी वह 3 वर्ष का ही हुआ था कि वह अपने पूर्व जन्म की अनेक बाते बताता और घर वालो को अपने पूर्व जन्म के घर ले चलने को मचलता रहता।

एक दिन उसके पिता- उसे मिदित जिले ले गये वहाँ उसने प्रत्येक वस्तु को अच्छी तरह पहचान लिया। उसने अपनी धर्म-पत्नि और बहिन को भी पहचान लिया और अपने जीवन के अनेक संस्मरण सुनाता रहा जिनकी उन सब ने पुष्टि की। इस घटना से मुसलमानों से अपनी पुनर्जन्म न होने की मान्यता के प्रति बड़ी हलचल उत्पन्न हुई सारे एशिया में विवाद उठ खड़ा हुआ और हजारों मुसलमानों ने पुनर्जन्म की धारणा को स्वीकार कर लिया।

धर्मयुग के 9।4।1967 अंक में छापी गई पूर्व जन्म की स्मृति उल्लेखनीय है। इंग्लैंड के एक नगर में एक व्यक्ति पोलक रहता है। उसकी दो लड़कियां थी। 11 वर्ष की जौआना और 6 वर्ष की जैकलीन में बड़ा प्रेम था। एक बार किसी दुर्घटना में दोनों की मृत्यु साथ-साथ हो गई। इसके कुछ दिन बाद श्रीमती पोलक गर्भवती हुई। उन्होंने इस बार दो जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया। उनका नाम जेनिफर और गिलियन रखा गया। जेनिफर गिलियन से कुल 4 मिनट छोटी थी। थोड़े दिन बाद ही ज्ञान होने पर उन्होंने पूर्व जन्म की बाते बताना शुरू किया। उन्होंने बताया कि वे ही जौआना और जैकलीन थी। अनेक घटनाएं बताई जो सत्य पाई गईं। पोलक का कहना है कि पहली लड़कियों और इन लड़कियों के खान-पान की रुचियों में कोई अन्तर नहीं है यही उदाहरण भारतीय पुनर्जन्म सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं आगे तो विज्ञान और भी रहस्य पूर्ण बातों से इस मान्यता का समर्थन करेगा।


सच्ची श्रद्धा

शिव और पार्वती कैलाश जा रहे थे मार्ग में गंगा स्नान की भीड़ देखकर पार्वती जी बोली- भगवन् देखिये लोग कितने धर्मनिष्ठ कितने श्रद्धालु है। शंकर जी हंसे और बोले- पार्वती सच्ची श्रद्धा तो किसी विरले में होती है यह सब तो श्रद्धालु कम, दुराचारी अधिक है।

स्नानार्थियों की परीक्षा के लिये दोनों नीचे उतर आये। पार्वती जी एक ब्राह्मणी का वेष बनाकर खड़ी हो गई और शिवजी एक अपंग पति का वेष बनाकर वही लेट गये। जो भी वहां से आता पार्वती जी आग्रह करती- मेरे अपाहिज पति को गंगाजी तक पहुँचा दे। सहायता की बात तो दूर कोई विदक कर निकल जाता और कितने ऐसे आते जो पार्वती पर बुरी दृष्टि डालते और उन्हें अपने पति को छोड़ देने तक को प्रभावित करते। शिवजी पार्वती जी की ओर मुस्कराकर कहते देख लो यही है इनकी श्रद्धा। अन्त में एक सज्जन किसान आया । उसने कहा माँ जी मैं इन्हें पहुँचा देता है आप आगे चलिये।

शिवजी प्रकट हुये और बोले- श्रद्धा यह है। जो लोक-सेवा की प्रेरणा न दे वह श्रद्धा तो इन निकल गये अन्ध भक्तों की तरह दिखावटी ही होती है।


प्रकृति के कलाकारों से सुरक्षा विधि सीखना

“वाकिंग स्टिक” कीड़ा होता है जिसका शरीर, हाथ पैर और रंग किसी सूखी लकड़ी की टहनी की तरह होता है। क्रियाशील अवस्था में कई दुष्ट व माँसाहारी जीव इस पर आक्रमण कर देते हैं और मारकर खा जाते हैं। शत्रुओं से बचने के लिए अन्ततः उसने ईश्वर प्रदत्त जीवन-सत्य को ही माध्यम बनाया। वह किसी दुश्मन को बढ़ता हुआ देखता है तो निश्चेष्ट लेट जाता है शत्रु आता है और देखता है कि जहाँ उसे कीड़ा दिखा था वह तो सूखी लकड़ी है भ्रम हो गया है यह समझकर वहां से निराश लौट जाता है और वाकिंग स्टिक की सुरक्षा हो जाती है।

अमेरिका में पाया जाने वाला कंगारू इस क्रिया में सबसे अधिक चतुर होता है। दुश्मन को देखते ही वह जमीन में इस प्रकार लेट जाता है मानो बिलकुल मर गया हो। जब तक शत्रु दूर रहता है तब तक तो वह विधिवत् साँस भी लेता रहता है पर जैसे ही शत्रु पास आया कि उसने आंखें भी बन्द की और साँस भी। शत्रु आता है उसे सूँघता है और मरा हुआ समझ कर वहां से चल देता है। कंगारू प्रसन्नतापूर्वक उठता है और अपने काम में लग जाता है।

मनुष्य जीवन में भी शत्रुओं की कोई कमी नहीं। बाहरी शत्रुओं में तो किसी प्रकार रक्षा भी की जा सकती है आंतरिक शत्रुओं से विजय पाना मनुष्य के लिए सबसे अधिक दुःसाध्य रहा है। शरीर रूपी गुफा जिसमें जीवात्मा रहता है और जिसे यह गुफा भगवान ने इसलिए दी थी कि वह उसमें सुरक्षापूर्वक रहकर आत्म-कल्याण और लोकमंगल की आवश्यकता पूरी करेगा उसी में 6 भयंकर शत्रु और अनेक छोटे-छोटे दुश्मन भी आ बैठे। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर यह प्रबल शत्रु मनुष्य की शक्ति निचोड़ते मित्रता और प्रेम पूर्वक रहने न देकर अपने ही लोगों से लड़ाते भिड़ाते रहते, शोषण छल-कपट और न जाने कैसी -कैसी दुष्टता की प्रेरणा देते रहते हैं मनुष्य को उनसे बचना भारी पड़ता है कोई उपाय कारगर नहीं होता जब यह शत्रु प्रबल हो उठते हैं उनसे रक्षा के उपाय प्रकृति के इन कलाकारों से सीखना चाहिए।

उदाहरण के लिए कभी कामवासना का वेग सताये, अथवा किसी के प्रति शत्रुता हो और अहंकार वश प्रतिशोध की भावना भड़क उठे उस समय वाकिंग स्टिक और कंगारू के समान निश्चेष्ट लेट जाइये और अनुभव करिये आप की मृत्यु हो गई। आपका प्राण शरीर छोड़कर बाहर खड़ा है और देख रहा है वह शरीर, वह इन्द्रियाँ जिनके विषय बड़े सुन्दर और सुखद प्रतीत होते हैं उनमें कितनी गंदगी और दुर्गंध भरी है। यह मनुष्य शरीर किसी बड़े काम के लिए मिला था पर उसका दुरुपयोग हुआ शक्तियां इन्द्रिय भोग और बखेड़ों में खर्च करदी- इस तरह के विचार कुछ देर तक इतनी गंभीरता से उठाये मानो आप सचमुच मर गये हो। उस क्षण की कल्पना आपमें वैराग्य भर देगी आप बुराई से बच जाएंगे।

जीव शास्त्र में इन क्रियाओं को मिमिक्री कहते हैं। डॉ0 वेटसन व फिटज मुलर ने जीवों की इन अद्भुत क्रियाओं पर गहन अनुसंधान किये और ऐसे सैकड़ों उदाहरण देकर जीवों की प्रकृति के रोमांचक पृष्ठ खोले पर इनका सर्वोत्तम लाभ मानव जाति को इन प्रेरणाओं के रूप में ही मिल सकता है। समुद्र के किनारे क्रिप्टी लिथोडस नामक एक केकड़ा पाया जाता है इनके शरीर की ऊपरी सतह कठोर होती है और रंग श्वेत। कोई दुश्मन आया और ये सतह पर बिछे कंकड़ के पत्थरों के बीच जा लेटे। उस समय कोई पास आ जाये तो यही समझेगा कि कोई पत्थर पड़ा है। केकड़ा कुछ बोल नहीं रहा होगा पर उसकी रूह कह रही होगी मनुष्य! तू भी अपने शरीर को कंकड़ पत्थर मिट्टी पानी का समझता और मानता कि इसमें निवास करने वाली जीवात्मा ही रक्षा और विकास के योग्य है तो यह- मानस शत्रु जो हर घड़ी तुम्हारी शक्तियों को खा जाने की ताक में बैठे रहते हैं धोखा खा जाते और तेरे पास आकर भी तेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। शत्रुओं से सुरक्षा के कोई एक दो उपाय ही नहीं सैकड़ों कला इन प्रकृति के कलाकारों से सीखी और प्रयोग में लाई जा सकती है। उदाहरण के लिए एक कीड़ा “लीफ इंसेक्ट” शत्रु को देखते ही वह हरी पत्तियों पर बैठ जाता है। शत्रु आता है तो पत्तियां ही पत्तियां देखकर निराश लौट जाता है। कैलिमा नामक तितली फूल-पत्तियों के आकार से इतनी मिलती-जुलती होती है कि उसको पहचानना कठिन हो जाता है उसके पिछले पंख तने और आगे वाले पत्तियों के आकार में होते हैं शत्रु को देखते ही यह किसी फूल वाले की मोटी शाखा को अपने पिछले पंखों से स्पर्श करा बैठ जाती है तब देखने से ऐसा लगता है कि किसी तने पर पत्तियाँ उगी हो। शत्रु धोखा खाकर चला जाता है। हर व्यक्ति के पास एक न एक गुण, कोई न कोई ऐसी विशेषता होती है। कोई चित्रकार होता है किसी संगीत की रुचि, कोई गा अच्छा लेता है तो किसी को व्यायाम का ज्ञान होता है, कोई लेखक हो सकता है और कोई सुन्दर चित्र देखने और सुन्दर पुस्तक पढ़ने की रुचि जाग्रत कर सकता है। यह सब लीफ इंसेक्ट और कैलिमा तितली को मिले प्राकृतिक गुणों के समान है कभी गुस्सा आये, काम विकार सताये स्थिति में मनुष्य इन गुणों से अपनी प्रवृत्ति की न केवल मनोविकारों से रक्षा हो सकती है वरन् रचनात्मक प्रकृतियों के विकास का मार्ग भी खुल सकता है। क्रोध, लोभ आये तो ठण्डा पानी पीकर भजन गाकर ही उन्हें झुठलाया और बेवकूफ बनाकर खाली मार्ग लौटाया जा सकता है।

एक और भी बढ़िया उपाय है मानसिक कुविचारों से उसके दुष्परिणाम की कल्पना। तितलियों की एक जाति ऐसी होती है जिनका माँस कड़वा और जहरीला होता है उन्हें कोई भी जीव खाना पसन्द नहीं करता। पर कुछ तितलियों को खाने वाले भी सैकड़ों शत्रु तैयार रहते हैं। स्वास्थ्य , खूबसूरत होने पर कामवासना के प्रवाह अधिक कराते हैं, पैसा हो तो अपव्यय और अहंकार की दुष्प्रवृत्तियां घेर सकती है, शरीर में बल हो तो ही बदमाशी सूझती है जब कभी ऐसे अवसर आये तब कामवासना से जर्जरित व्यक्तियों के दुर्बल शरीर और वृद्ध लोगों के टूटे शरीरों की कल्पना करके उसी प्रकार बचा जा सकता है जिस तरह गौतम बुद्ध उनसे बच गए थे और अपना जीवन पुण्य परमार्थ और लोक-सेवा में उत्सर्ग कर दिया था। अहंकार आये तो कंस, रावण, जरासंध लोभ आये तो हिरण्यकशिपु की दुर्दशा मोह सताये तो सैकड़ों बच्चे लिये फिरने वाली सुअरिया की कल्पना करके उनसे बचा और संभला जा सकता है। किसी भी घृणित विचार को उसके दुष्परिणाम के चिन्तन से काटने की कला आ जाये तो मनुष्य न केवल उस दुष्प्रभाव से बच सकता है वरन् आत्म- कल्याण की दिशा में भी तेजी से अग्रसर हो सकता है।

इतने पर भी बुराइयों के शत्रु न माने तो उन्हें डराना धमकाना और मारकर भगाना भी नीति संगत तथ्य है। अमरीका में जहरीले सांपों की एक ऐसी जाति पाई जाती है जिनका रंग बहुत ही चमकदार होता है। उसी क्षेत्र में कुछ साँप ऐसे होते हैं जिनमें कोई जहर नहीं होता। इनको जब किसी शत्रु से मुकाबला पड़ जाता है तो यह अपनी आकृति जहरीले सांपों जैसी बना लेते हैं शत्रु डर कर भाग जाते हैं और इस तरह इनकी रक्षा हो जाती है। हमारे मन में भी ऐसे साहस पूर्ण शक्तिशाली विचार जाग जाय तो बुरे विचारो को डांटकर , मारकर भगाया जा सकता है।

इस तरह इन जीवों की निश्चेष्ट करने की क्रियायें, अच्छे विचारो से बुरे विचार काटने की क्रियायें सीखकर आन्तरिक शत्रुओं से बचा जा सकता है। गुणों का विकास किया जा सकता है और आत्म- कल्याण के अवरोधों को दूर कर सुख-शान्ति का जीवन भी जिया जा सकता है।


Quotation

टिमटिमाते दीपक को देखकर सूरज बोला- नन्हे बच्चे अन्धकार की शक्ति तूने देखी नहीं, अजगर है वह, निगल जायेगा तुझे, चुपचाप बैठ , जीवन नष्ट मत कर। दीपक बोला- तात! निरंतर चलते रहने का व्रत आपने नहीं तोड़ा तो मैं ही उससे विमुख क्यों होऊँ


प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग

मनुष्य जिस स्थिति में रहता है उसी स्थिति में उसे दो प्रकार की शक्तियाँ मिलती है। एक जो उसे प्रेरणा, प्रसन्नता प्रदान करती है और उसका कल्याण चाहती है। दूसरी उसे कष्ट देती है, पतन की ओर ले जाती है। एक शक्ति भलाई की है दूसरी बुराई की। दोनों का संयोग ही मिलकर सृष्टि के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है।

यह शक्तियां ही चेतना रूप में मनुष्यों में भरी हुई है, उनका कोई पृथक स्पष्ट अस्तित्व नहीं है। संसार में जितने भी प्राणी रहते हैं सभी में कुछ गुण और कुछ दोष रहते हैं। सर्वथा निर्दोष तो परमात्मा ही माना जाता है। शेष सभी में कुछ अंश भलाई है कुछ बुराई। किसी में गुणों का आधिक्य है किसी में बुराइयों का बाहुल्य, जिसे एकदम अवगुणों का अवतार माना जाता है। कंस महा क्रूर शासक था, रावण का अत्याचार जगत् विख्यात है किन्तु दोनों ही पराक्रमी, पुरुषार्थी और साहसी थे। सिकन्दर दूरदर्शी था। हिटलर विचारवान था, चंगेज खाँ में और कुछ नहीं संगठन शक्ति थी। बुरे से बुरे व्यक्तियों में भी प्रेरणा और प्रसन्नता देने वाला कोई न कोई गुण अवश्य होता है। जिस प्रकार संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से अच्छा नहीं, न पूर्णतः बुरा। संसार में पूर्ण कोई नहीं।

बुराई करनी हो, निन्दा करनी हो तो अपने ही बहुत से गुण खराब होंगे, कई बुरी आदतें पड़ गई होगी उनकी की जानी चाहिये पर गुणवान बनने का, सफलता प्राप्त करने का और प्रसन्नता की मात्रा बढ़ाने की- इच्छा हो तो हमारे विचार गुणों मे, कल्याण करने वाले, दृश्यों, संदर्भों और व्यक्तियों पर केन्द्रित रहना चाहिये। ऐसे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति हमारी विचारधारा केन्द्रित रहेगी तो गुण ग्राहकता हमारा स्वभाव बन जायेगा। हृदय शुद्ध और मन बलवान होता चला जाएगा। अच्छे गुणों और कार्यों का चिन्तन करना आत्म-विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।

मधुमक्खी गुलाब के फूलों पर बैठती है और आक के फूलों पर भी। जंगली करील से लेकर सेमर, कचनार, बेला, चमेली और कमल में मधुमक्खी बैठती है। किसी में काँटे है या चुभन, कोई जंगली है या शहरी, किसी को लोग खाते हैं किसी को नहीं, यह न देखने वाली मधुमक्खी केवल पराग चूसने के ही मतलब से मतलब रखती है। अपनी इस लगन के कारण मधुमक्खी थोड़े ही दिनों में मधु का छत्ता भर लेती है कुछ आप पीती है कुछ संसार को बाँट देती है।

मनुष्य को चाहिये कि वह सदा ही किसी न किसी भले काम, भले व्यक्ति और भलाई के गुण का चिन्तन किया करे इससे उसके अन्तःकरण से अपने आप भलाई की शक्ति जन्मती है। उसे प्रेरणा और पुलक प्रदान करती है। इस तरह निरन्तर पुलकित रहने का जिसका स्वभाव बन जाता है संसार में उसके लिए न तो कुछ अमंगल रह जाता है और न अहितकर। यह केवल अपने मन को गुण ग्रहण करने की दिशा में लगा देने का चमत्कार मात्र है।

ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार चक्षु और मन क्रमशः मित्र और वरुण कहे गये है। चक्षु उपलक्षण से पाँच ज्ञानेंद्रियों का वाचक है। इनको संयत करके मन को शुद्ध भावों से उपेत करना वशिष्ठ का लक्षण है। वशिष्ठ का अर्थ श्रेष्ठ होना बताया है लिखा है कि इस प्रकार व्यावहारिक दृष्टि से भावोपेत होना और केवल गुणों का संग्रह करते रहना वशिष्ठ होने का प्रथम लक्षण है।

किसी व्यक्ति में मित्रता का गुण होता है। मित्रता आनन्द देने वाली वस्तु है उससे मित्रता का गुण सीख ले। दूसरा व्यक्ति संयमी है उससे शरीर को सुदृढ़ बनाने और सौंदर्य तथा यौवन बचाये रखने की धारणा पुष्ट कर ले। एक व्यक्ति में और सब दुर्गुण है किन्तु वह स्वच्छ, सुथरा रहता है। यह प्रसन्नता और प्रेरणा ग्रहण करने के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं। वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कार-संस्कृति, समाज व्यवस्था, शासन पद्धति, नगर-ग्राम, शिक्षा-दीक्षा, इतिहास, भूगोल, स्मृति-कर्मकाँड, उपासना एवं पर्व उत्सव, नदी , नाले , जंगल, पर्वत, खेत , खलिहान, विश्वास, मन्तव्य मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।

जीवन की सफलता किस बात पर निर्भर है ? इसका एक ही उत्तर है अपनी भावनाओं पर। मनुष्य अपनी कल्पनाओं से ही अपने आपको सफल अथवा विफल बनाता है। जैसी कल्पना की जाती है, अपने आसपास वैसी सृष्टि रच जाती है। कसाई की कल्पना जानवरों का वध करना होता है भेड़ बकरियाँ बेचने वाले , खाल और माँस खरीदने वाले, वध करने का स्थान और औजार सबकुछ उसकी इच्छा शक्ति जुटा देती है। यदि एक कसाई के लिए मनोवाँछित सृष्टि जुटा लेना कुछ असंभव नहीं होता तो उत्कृष्ट मनोभूमि द्वारा उत्कृष्ट वातावरण और उच्च सफलतायें प्राप्त कर लेना भी कोई असंभव बात नहीं है। केवल मनुष्य की मानसिक शक्ति का भलाई की दिशा में विकेन्द्रीकरण होना चाहिये।

बुराई की शक्ति सम्पूर्ण प्रबलता के साथ टक्कर लेती है इसमें संदेह नहीं है ऐसे भी व्यक्ति संसार में है जिनसे “कुशल क्षेम तो है” पूछने पर “आपको क्या गरज पड़ी” जैसे उत्तर मिल जाते हैं ऐसे प्रसंगों से आये दिन भेंट होती है इनसे टकराया जाय तो मनुष्य का सारा जीवन टकराने में ही चला जाता है। उनसे निबटा न जाय यह तो नहीं कहा जाता, पर किसी भी काम में हमारी विचार शक्ति सात्विक और ऊर्ध्ववती होना चाहिये। शत्रु से युद्ध करते हुए भी उसके गुण साहस और सूझ-बूझ की प्रशंसा करनी चाहिये।

यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाई। जब उसे पता चला कि इस संसार में सब विरोधी ही विरोधी है तो भगवान कृष्ण ने समझाया- अर्जुन! भद्र मनः कृणुष्व वृत्रतुये इस संसार संग्राम में तू भद्र मनस्कता के साथ युद्ध कर। कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही साँसारिक जीवन में सफलता का मूल मन्त्र है। यहाँ निरन्तर टकराने वाले से “जो अच्छा है सो सब मेरा” “बुरे से प्रयोजन नहीं “ की धारणा रखने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन को ऊँचा उठाता और मनुष्य जीवन का वीरोचित् लाभ प्राप्त करता है।

हम जहां रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति से आनन्द ले सकता है। सामान्य सतह पर खड़े होकर दीखने वाला दृश्य कम अच्छा लगता है अट्टालिका पर चढ़ जाने से वही वातावरण अच्छा लगने लगता है। स्वतः की उच्च या निम्न स्थिति के कारण ही संसार अच्छा या बुरा लगता है। जब यह अपने ही हाथ की बात है तो संसार को क्यों बुरा देखे क्यों बुराइयों का चिन्तन करे। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावे ?


ज्ञानार्जुन

लखड्शा नामक व्यक्ति पर युवावस्था में गृहस्थी को बोझ आ पड़ा। यद्यपि उसका मन साँसारिक झंझटों में नहीं लगता था फिर भी वह मन लगाकर कार्य करने लगा। परन्तु उस पर नित्य नये संकट आते गये। उसकी गृहस्थी उजड़ गई फिर भी वह प्रसन्न ही रहा। अन्त में सद्गुरु मिले जिनसे ज्ञानोपदेश पाकर साधना करने लगा और ज्ञानार्जुन के नाम से विख्यात हुआ।


भक्षक अणु विकिरण- रक्षक गौ माता

गाय के प्रति हमारी श्रद्धा का आधार उसकी अन्यतम उपयोगिता रही है। गाय के दूध, घी और मक्खन ही नहीं मूत्र और गोबर में भी ऐसे तत्व पाये जाते हैं जो मनुष्य की न केवल कठिन जीवाणुओं से रक्षा करते हैं वरन् आज तो यह स्वीकार किया जाने लगा है कि अणु-विकिरण जैसे भयंकर विष से मानव-जाति की रक्षा में भी पंचगव्य ही समर्थ है। संसार में बढ़ रही अणु- आयुधों की संख्या, बम- विस्फोट और उसके धुएं से मानव-जाति अगले दिन जो घुटन अनुभव करेगी उससे हमारी रक्षा गाय ही करेगी।

1963 के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री लिनस पालिंग को विश्व-शाँति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। ओस्लो में दिए गए एक भाषण में उन्होंने बताया- जैसी कि मेरी गणना है इस समय सारे संसार के पास 320000 मेगाटन बम है। स्टेंडर्ड अणुबम 20 मेगाटन के बराबर होता है। रूस और अमेरिका ने तो 60 मेगाटन और 100 मेगाटन के भी अणुबम बनाये है। इन अणुबमों की मारक क्षमता इतनी भयंकर है कि कोई भी वैज्ञानिक उसके सही-सही आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर सकता।

एक उदाहरण दिया जा रहा है। मान लीजिये सम्पूर्ण सोवियत संघ, सम्पूर्ण अमेरिका और योरोप एक क्षेत्र है और उसमें 80 करोड़ की आबादी रह रही है। इस समय संसार में संचित अणुबमों का कुल दस प्रतिशत ही इस क्षेत्र में डेढ़ सौ किलोमीटर क्षेत्र में एक बम के हिसाब से गिराया जाये तो 72 करोड़ लोग तो तत्काल ही मृत्यु के घाट उतर जाएंगे। शेष बचो में 6 करोड़ तो सख्त घायल होगे जो साल छः महीने कष्ट भोगेंगे जब मरेंगे। बाकी 2 करोड़ लोगों में से एक भी ऐसा न होगा जो रेडियो धर्मी धूल या निक्षेपित विषैली गैसों के प्रभाव से बचा हो। 1952 में एक ऐसा विस्फोट अमेरिका के एनीवंटाक एटाल प्रवाल द्वीप में किया गया था। उस विस्फोट के बाद द्वीप में कुछ न बचा था जो कुछ था सब गैस बन कर उड़ गया था।

न्यूयार्क, वाशिंगटन, पेरिस, लंदन, टोक्यो , बम्बई यह संसार के सबसे बड़े शहरों में गिने जाते हैं। इनमें से किसी भी बड़े शहर को ध्वस्त करने के लिये 20 मेगाटन बम काफी है। 20 मेगाटन की क्षमता का बम जहां भी गिरा दिया जायेगा वही 50 से 100 किलोमीटर तक क्षेत्र आग की धुआँधार लपटों में बदल जायेगा। उससे उत्पन्न विकिरण और रेडियो धर्मी विषैले धुंए से 300 किलोमीटर तक के सारे लोग मर जायेंगे। तब उस स्थान पर एक विकराल गड्ढा मात्र रह जायेगा। जिसका व्यास 20 किलोमीटर लम्बा होगा।

विस्फोट के तात्कालिक और दूरवर्ती विनाशकारी कारणों में सबसे बड़ा हाथ तो विस्फोट से उत्पन्न प्रखर ऊर्जा के विकिरण का होता है। उससे जन-धन संपत्ति का नाश तो होता ही है सृष्टि के जीव मारे जाते हैं और उसके बाद यह रेडियो धूलि न मालूम कितने लम्बे समय तक छाई रहती है और पृथ्वी से पैदा होने वाले खाद्य-पदार्थों को विषाक्त बनाती रहती है।

अब तक जो बम विस्फोट हो चुके है उनके ही अणु- विकिरण का प्रभाव हुआ है कि आकाश में रेडियो धर्मी धूलि भर गई है और अब अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान करके भी खाद्यान्न को शुद्ध नहीं रखा जा सकता।

इससे भी बुरा प्रभाव जीवों की प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है, भावी पीढ़ी इस विकिरण में सौ प्रतिशत प्रभावित होगी। एक 20 मेगाटन बम विस्फोट की रेडियो सक्रियता अभी जो नहीं जन्मे ऐसे 550000 बच्चों की अकाल मृत्यु का कारण बनेगी। यदि विस्फोट की क्षमता 600 मेगाटन बम की हुई तो उसका प्रभाव 160 लाख भावी बच्चों पर पड़ेगा। यदि वे किसी प्रकार सकुशल जन्म लेते हैं तो अधिकाँश विक्षिप्त, क्रूर- कर्मी त्रासदायक होगे। मानसिक ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी सैकड़ों दोष होगे। किसी का शरीर भारी होगा, धड़ पतला, किसी का एक हाथ बिलकुल ठीक होगा पर दूसरा हाथ हथेली तक पहुँचते -पहुँचते ठूँठ हो जायेगा। नाक किसी के चपटी होगी, किसी के नथुने आवश्यक और ऊपर से उठे हुए। जिन बच्चों को पर्याप्त सुविधा देकर पाला जायेगा, जो गर्भिणी बताये अधिक शुद्ध और प्राकृतिक वातावरण में रहकर बच्चों को जन्म देगी उन बच्चों की आयु में भी 10 से 15 वर्ष की कमी होगी। विकिरण का कुछ न कुछ प्रभाव उन पर निश्चित रूप से पड़ेगा। इस तरह की आशंकायें सन 1945 में ही अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ‘फ्रैक रिपोर्ट’ के नाम से प्रकाशित करा दी थी। उस समय किसी ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया था। ऊपर बताई गई सारी घटनायें अभी से योरोप और अमेरिका में स्पष्ट देखी जा सकती है। अविकसित भ्रूणों के जन्म की समस्या वहाँ अब हिन्दुस्तान की बेरोजगारी की समस्या की तरह फैलती जा रही है।

आज इस विकिरण के प्रभाव से 20 लाख व्यक्ति कैंसर या ऐसे ही रोगों से पीड़ित है आगे यह संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी ही कम नहीं होगी क्योंकि अभी तो अणुबम संसार के इने-गिने 4-5 देशों के पास ही है। उसमें करोड़ों की लागत आने पर भी दुनिया के अन्य देशों के लोगों में अणु-आयुधों के निर्माण की माँग बढ़ रही है। भारत जैसे शान्तिप्रेमी देश में भी सर्वेक्षण के उपरान्त “दि इन्स्टीट्यूट आफ पब्लिक ओपीनियन “ (यह एक ऐसी संस्था है जो किसी विषय पर जनमत संग्रह करती है) के डायरेक्टर द्वारा प्रस्तुत आंकड़े 15 अगस्त सन 70 के “दि हिन्दू “ समाचार पत्र में दिये गये वह भी अणु बम के निर्माण के पक्ष में है। प्रारम्भिक जाँच के अनुसार दिल्ली में अणु बम बनाने के पक्ष में 75 प्रतिशत लोग थे तो विपक्ष में कुल 22, कलकत्ता के पक्ष में 77, विपक्ष में 23, बम्बई में 72 पक्ष में और 28 विपक्ष में मद्रास में यह औसत लगभग बराबर था। उससे यह निश्चित होता है कि यहाँ भी अणुबम आज नहीं तो कल अवश्य बनेंगे। अभी तो दूसरे देशों के अणु-विस्फोट की जो धूलि और विकिरण यहाँ तक आ जाता है वही प्रभावित करता है पीछे तो यहाँ विस्फोट होगे तो विकिरण और भी तीव्र हो उठेगा और उसके सम्भावित दुष्परिणाम भी।

बम-विस्फोटक रुक नहीं सकते तो विकिरण के प्रभाव से मानव-जाति की रक्षा कैसे हो ? वह आज का सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है। पहले विकिरण को ही समझ लिया जाय। संसार में जितने भी पदार्थ है वे स्थूल है तो कम, हलके है तो अधिक मात्रा में अपने भीतर से ऊर्जा निकालते हैं। यह ऊर्जा उस पदार्थ के अच्छे बुरे प्रभाव से युक्त होती है बम में जो रेडियम, यूरेनियम, टिट्रियम, हीलियम जैसे विषाक्त तत्व प्रयुक्त है इनका अर्द्धजीवन करोड़ों वर्षा का है अर्थात् यह तत्व वायु मण्डल में करोड़ों वर्षा तक बने रहते हैं और अपने भीतर से रेडियो विकिरण निक्षेपित करते रहते हैं।

फरमाया रसूल अल्लाह ने कि गाय का दूध शिफा है और घी दवा, उसका माँस तो मर्ज (रोग) है।

-हजरत आयशा

अभी कुछ दिन पूर्व श्री नारायण स्वरूप शर्मा संसद सदस्य भारत सरकार के सूचना मंत्री श्री के0 के0 शाह से मिलने गये। बात भारतीय संस्कृति के कुछ मुद्दों पर चल पड़ी तो श्री के0 के0 शाह ने बताया कि- अभी कुछ दिन पूर्व ही रूस वैज्ञानिकों का एक शिष्ट मंडल भारत आया। वे लोग यहाँ की जीवन पद्धति का समीप से अध्ययन करना चाहते थे ताकि रूस में चल रहे उनके कुछ प्रयोगों को नई दिशा मिल सके।

इस शिष्ट मंडल के नेता वहाँ के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री शिरोविच थे- उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ जो प्रयोग हो रहे हैं, उनसे हमने गाय और यज्ञ के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य एकत्रित किये है जो भारतीयों को भी ज्ञात नहीं है। 1. गाय के दूध में रेडियो विकिरण से रक्षा करने की सबसे अधिक शक्ति होती है। 2. जिन घरों में गाय का गोबर लीपा जाता है उन घरों में रेडियो विकिरण का प्रभाव बिलकुल नहीं होता और 3. अगर गाय के घी को आग पर डाल कर धुआँ उठाया जाय- यानी हिन्दुस्तानी भाषा में हवन किया जाये तो वायु मंडल में रेडियो विकिरण का प्रभाव बहुत कम हो जायेगा।

इस भेंट वार्ता को मासिक “आरोग्य“ के सितम्बर 70 अंक के 80 पेज पर पेनल में छापा गया है और उसमें बताया गया है कि इन तथ्यों पर रूस में विस्तार से रिसर्च चल रहे हैं ताकि अणु-विकिरण के भावी दुष्प्रभाव से वहाँ के लोगों की रक्षा के लिये इन देखने में नगण्य जैसे महान् साधनों को प्रयुक्त किया जा सके।

एक ओर अणु विकिरण की यह मारक भयंकरता तेजी से बढ़ रही है दूसरी ओर उससे माता की तरह रक्षा करने वाली गाय के प्रति यज्ञ के प्रति हम भारतीयों की ही श्रद्धा समाप्त होती जा रही है। लोग भैंसें पालना भैंस का दूध पीना पसंद करते हैं। इसलिए गौ की तेजस्विता से हम जो सत्परिणाम प्राप्त कर सकते थे उनसे वंचित रह जाते हैं। गाय का मूल्य और महत्व पहले जितना था अब उससे सैकड़ों गुना अधिक हो गया है। यह अणु विकिरण के ऊपर के आंकड़े पढ़ कर सहज की अनुमान किया जा सकता है। मानव -जाति और मानवीय संस्कृति की रक्षा करनी है तो हम में से प्रत्येक को गाय पालन, गाय का दूध पीना और घृत से हवन से साँस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न करना बहुत आवश्यक हो गया है यदि ऐसा न हुआ तो अणु-आयुध हमारी भावी संतानों को नष्ट किए बिना न छोड़ेंगे।


अनुकरण अच्छा, अन्धानुकरण नहीं

एक गाँव में दो युवक रहते थे। दोनों में बड़ी मित्रता थी। जहाँ जाते साथ-साथ जाते। एक बार दोनों एक धनी व्यक्ति के साथ उसकी ससुराल गये। किसी धनी व्यक्ति के साथ रहने का यह पहला अवसर था सो वे अपने धनी मित्र की प्रत्येक गतिविधि ध्यान से देखते रहे। गर्मियों के दिन थे। रात में उक्त युवक के लिये शयन की व्यवस्था खुले स्थान पर की गई पर्याप्त शीतलता बनी रहे उसके लिए वहाँ चारों तरफ जल छिड़का दिया और रात के ओढ़ने के लिए बहुत ही हल्की मखमली चादर दी गई। अन्य दोनों युवकों ने इतना जाना कि इस तरह का रहन-सहन बड़े बड़प्पन की बात है। कुछ दिनों बाद उन्हें भी अपनी-अपनी ससुराल जाने का अवसर मिला पर वे दिन गर्मी के न होकर तीव्र शीत के थे। नकल तो नकल ही है। दोनों ने अपना बड़प्पन जताने के लिये बिस्तर खुले आकाश के नीचे लगवाया, लोगों के लाख मना करने पर भी उन्होंने बिस्तर के आस-पास पानी छिड़कवाया और ओढ़ने के लिये कुल एक-एक चादर वह भी हल्की ली। रात पाला पड़ गया सो दोनों को निमोनिया हो गया। चिकित्सा कराई गई तब कठिनाई से जान बची। इतनी कथा सुनने के बाद गुरुजी ने अपने शिष्य को समझाया - तात्! उचित और अनुचित का विचार किये बिना जो औरों का अनुकरण करता है वह मूर्ख ऐसे ही संकट में पड़ता है जैसे दोनों युवक।


श्रेष्ठता का माप दण्ड

आचार्य अश्वत्थ को महाराज देवरथ ने यज्ञ का ब्रह्म नियुक्त किया है, उन्हें आज ही आश्रम से प्रस्थान करना है समस्त विद्यार्थीगण प्रातः काल से ही चुप है। महर्षि के चले जाने पर वे सब स्नेह शून्यता सी अनुभव किया करते। आश्रम के प्रत्येक बालक पर उनका पितृतुल्य प्यार था इसीलिये छात्र उन्हें अपनी माँ के समान मानते और जब कभी उनका वियोग होता तो वे दुःखी हो जाते। मनुष्य की आंतरिक निर्मलता और स्नेह में कितनी शक्ति है जो औरों को भी सगा सम्बन्धी बना लेती है।

आचार्य अश्वत्थ चले गये। जब तक वे बाहर रहेंगे तब तक घर की सारी व्यवस्था वार्क्षी करेगा वे ऐसी व्यवस्था कर गये है- यह बात विद्यार्थियों को अच्छी नहीं लगी। वार्क्षी राजकुमार है इसलिये आचार्य प्रवर उसे अधिक महत्व देते हैं। यह बात सोचकर सभी छात्रों को क्षोभ उत्पन्न हुआ पर महर्षि उस बालक में कुछ और ही बात देखते थे जो अन्य किसी भी बालक में देखने को नहीं मिलती थी।

छात्रों ने अपना क्षोभ गुरुमाता के सम्मुख व्यक्त किया तो उन्होंने समझाया भी- तात! वार्क्षी राजकुमार है सही, वह वैभव विलासिता पूर्ण वातावरण में पला है यह भी ठीक है, तो भी उसकी चरित्रनिष्ठा सर्वोपरि है तात, कर्तव्य के आगे सौंदर्य आकर्षण भी उसे बाँध नहीं पाते, इस विशेषता के कारण वह महर्षि का प्रिय पात्र बन सका है।

आचार्य महिषी के इस कथन पर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ उन्होंने निश्चय कर लिया इस बार जब महर्षि वापस आयेंगे तब वे अपनी बात उनके सम्मुख अवश्य प्रकट करके उचित निराकरण की माँग करेंगे।

जब यह प्रसंग चल रहा था वार्क्षी लकड़ियां लेने गया हुआ था। वार्क्षी का सुगठित शरीर और राज्यकुलों वाली आभा का आकर्षण पहले ही क्या कम था पर आज जब कि वह साधारण वेष में ही लकड़ियां लेकर लौटा तो परिश्रम से तृप्त मुखाकृति कुछ अधिक ही आकर्षक हो उठी थी। उसे देखते ही आचार्य अश्वत्थ की कन्या वेदवती का अन्तः करण आन्दोलित हो उठा। वे पहले ही वार्क्षी से प्यार करती थी पर आज तो उसे सर्वथा एकाकी पाकर उसकी काम वासना उद्दीप्त हो उठी। वह निः संकोच वार्क्षी के समीप आ गई और पूछने लगी- वार्क्षी- अच्छा यह तो बताओ वसन्त ऋतु आती है तो कलियाँ उमंग से क्यों भर जाती है, क्यों वे अपना परिमल पराग सारे वातावरण में बिखेरने लगती है।

वार्क्षी के एक बार वेदवती की आंखों में अपनी आंखें डाली आंखों में वारुणि पान की सी अरुणाई झाँक रही थी। वार्क्षी ने हंसकर कहा- भद्रे! संभव है कली यह सब भ्रमर को आकर्षित करने के लिए करती हो किन्तु मुझे तो ऐसा लगता है कली स्वयं नहीं हँसती उसमें साक्षात ब्रह्म का सौंदर्य उल्लसित होता है।

पर तुम मेरे अन्तः करण की बात क्यों नहीं समझते वार्क्षी! यह कहते कहते वेदवती वार्क्षी के बिलकुल समीप आ गई वार्क्षी की भुजायें अपने हाथ में लेना ही चाहती थी किन्तु वार्क्षी पीछे हट गये और वे वहाँ से चुपचाप अपने पर्ण कुटीर की ओर चल पड़े यौवन की उमंग, चरित्र के शान्ति - प्रवाह पर विजय नहीं पा सकी।

सामने खड़ी आचार्य महिषी सब देख रही थी। वार्क्षी की इस दृढ़ता पर मुग्ध हुये बिना रह न सकी। महर्षि वापस आये तो उन्होंने सारी बात बताई- महर्षि ने कहा- भद्रे! जो साँसारिक आकर्षण में भी अपने आपको बचाकर अपने कर्त्तव्य की रक्षा करता है वही महानता का अधिकारी होता है। उन्होंने वार्क्षी को दुर्लभ योग-साधना सिखाई, विद्याध्ययन के उपरान्त वेदवती का पाणिग्रहण भी वार्क्षी के साथ करा दिया।


प्रगति (?) के चरण आदिवासी जीवन की ओर

एक महिला को आपरेशन थियेटर में लाया गया। पेट का आपरेशन होना था । जो सर्जन आपरेशन करता है उसके सहयोगी डाक्टर और प्रशिक्षित नर्सें भी साथ रहती है। महिला के शरीर पर बहुत हल्का कपड़ा पड़ा था। उससे उसका वह उदर भाग साफ दिखाई दे रहा था जिसका आपरेशन होना था। डाक्टर और नर्सों ने एक दूसरे की ओर ताक कर आश्चर्य व्यक्त किया कि सर्जन साहब तो कह रहे थे पेट में गाँठ है गाँठ का आपरेशन होना है पर यह स्त्री गर्भवती है। कोई धोखा तो नहीं.............................।

उनमें से एक डाक्टर अपने आश्चर्य को रोक नहीं सका। उसने दबे शब्दों में पूछ ही लिया- साहब! आपरेशन से पहले रोगिणी की जाँच पूरी करली गई है ? इस पर विशेषज्ञ सर्जन साहब का चिढ़ना स्वाभाविक ही था। यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें हर ऐसे व्यक्ति को महत्व देना भी तहजीब का एक भाग है।

इन पंक्तियों में कोई काल्पनिक कहानी अथवा मन गढ़ंत घटना का विवरण नहीं दिया जा रहा वरन् इस कथन की सत्यता का एक ज्वलन्त प्रमाण प्रस्तुत किया जा रहा है कि औषधि और शोध के नाम पर स्वास्थ्य और आहार के प्रयोजन के लिये आज जो व्यापक रूप से जीव हिंसा और वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं वह मनुष्य को इतना निर्दयी और कठोर हृदय बना सकते हैं कि एक दिन मनुष्य मनुष्य को गाजर-मूली की तरह मारने और पचाने लग जाये। यदि यह स्थिति ऐसी ही चलती रही, जैविक औषधियों की माँग ऐसी ही होती रही, उसका मानवीय हल न खोजा गया तो मनुष्य ऊपर से विद्वान सभ्य और सुसंस्कृत दिखाई देने पर भी आदिवासियों की भाँति हिंसक बर्बर और क्रूर होता चला जाएगा।

यह घटना अमेरिका की है और यदि क्रूरता की आत्मा को धिक्कारने वाले डाक्टर नार्मन बारसली एम. डी. ने इस रहस्य को खोला न होता तो शायद संसार चौंकता भी नहीं और न ही उपरोक्त कथन की सत्यता की ओर उसका ध्यान जाता। उन्होंने ऐसे रहस्यों का उद्घाटन अपनी पुस्तक “मेडिकल चाँस एण्ड क्राइम” में किया है। जिस महिला का आपरेशन हो रहा था वह एक इटेलियन स्त्री थी। कुछ दिन पूर्व उसे गर्भपात हो गया था उसके बाद ही उसने दुबारा गर्भ धारण किया था पर उसे समझ नहीं पाई थी। गाँठ समझ कर उसने डाक्टर को दिखाया था उन दिनों वह सर्जन भ्रूण सम्बन्धी अन्वेषण में जुटे थे। इनाम और नामवरी का लोभ भी मनुष्य से कैसे कैसे पाप कराता है। ताजे भ्रूण के लिए सर्जन ने इसे अच्छा अवसर समझा और यह जानते हुए भी कि इस आपरेशन से महिला की मृत्यु हो जाएगी, उन्होंने अन्त तक गाँठ बताकर ही उसका आपरेशन किया।

सहयोगी डाक्टर को अपनी नौकरी से हाथ तो धोना नहीं था जो किसी तरह प्रतिवाद करता। कदाचित् वह विरोध करता भी तो और डॉक्टरों की तरह एक नई जानकारी में सम्मिलित होने की सफलता पर उसे गर्व होने का अवसर कहाँ मिलता। सर्जन ने सबके देखते-देखते पेट की गाँठ जिसमें बालक पनप रहा था काटा और एक थैले में भरकर बिना किसी को दिखाये कार में रखा और प्रयोग के लिए घर की प्रयोगशाला में ले गये। उस महिला ने चौथे पाँचवे दिन तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग दिये।

अभी तक हम यही पढ़ते और सुनते आये है कि आज कल प्रयुक्त होने वाली औषधियों में रोगी मनुष्य के मल, मूत्र, रक्त , वमन, थूक तक का प्रयोग होता है। खटमल, खरगोश, चूहे, मेढक , बंदर, सुअर, गाय ,ऊँट, घोड़े आदि के शरीर काटकर सड़ाकर इंजेक्शन और औषधियां बनाने की बात अब पुरानी पड़ गई। अब तो दवाओं के ऊपर लिखा भी रहता है “स्वस्थ और खाने योग्य पशुओं की ग्रंथियों से निकाली गई औषधि। यही क्यों पुरुष और स्त्री की ग्रंथियों- डिम्बकोष, स्तन, पिचुट्री, थाइराइड थाइमस क्लोम, पीनियल ग्रंथियों से भी औषधियां बनने लगी। इन औषधियों में तुरन्त जन्मे बच्चे के ताडे को भी नहीं छोड़ा गया। अमेरिका की एक औषधि निर्माता फर्म जी, डब्लू कणिक कम्पनी ऐसी औषधियां बड़ी तेजी से बनाती चली आ रही है। जिसमें मनुष्य के पेट, हृदय, फेफड़े, यकृत, रीड़ के अंगों के साथ नसों का प्रयोग होता है। इन औषधियों के लिए एक दिन व्यापक रूप से नृशंस जन-मारक प्रयोग लेना पड़े, तो क्रूर और निर्दयी व्यक्ति तो अपने पुत्र और पुत्री की भी हत्या कर सकता है। जन साधारण को तो अपना चारा ऐसे ही मानेगा जैसे अफ्रीका और ब्राजील के कुछ इलाकों में आज भी कुछ नरभक्षी आदिवासी पाये जाते हैं। बोलीविया (ब्राजील) में कई पर्वत शृंखलायें ऐसी है जहाँ ऐसे आदिवासी पर्याप्त संख्या में पाये जाते हैं। विश्व प्रसिद्ध फ्राँसीसी पुरातत्व अन्वेषक कर्नल सेट और डॉ0 एरिक जैसे व्यक्तियों को भी यहां के आदिवासियों ने चट कर लिया था।

इस परिकल्पना की भयावहता तो तब अच्छी तरह समझ आयेगी जब ऐसी घटनायें जन-जीवन का अंग बन जायेगी। अभी भी स्थिति ऐसी नहीं है जिस पर चिन्ता न की जा सके। अखण्ड ज्योति के 3 पेज पढ़ने में जितना समय लगेगा उतने समय में मध्य संसार में कही न कही 25 हत्यायें हो चुकी होती है। प्रत्येक दिन हत्याओं का विश्व औसत 1440 है जो बहुत चिन्ताजनक है।

जीव -जंतुओं को काटने वाले मनुष्यों के प्रति दया भाव रख सकते हैं। यह कल्पना भी निराधार है। माँसाहार भी इसी कोटि का है। इसकी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये 1929 की पीटर कुरटेन की घटना यथेष्ट है। कुरटेन बहुत सभ्य और सुसंस्कृत माना जाता था। वह एक सम्पन्न व्यक्ति था। वृद्धावस्था तक वह सैकड़ों लकड़ियों को मार चुका था। इसी प्रकार एल्वर्ट फिश नामक अंग्रेज बच्चों को गाजर-मूली की काटकर फेंक ही नहीं देता था वरन् उन्हें पकाकर खा भी जाता था। जब उस पर मुकदमा चलाया गया तो वह स्वयं इस स्थिति में नहीं था कि वह बताता अब तक उसने कितने बच्चों को मारा है। कानपुर झाँसी वाले कनपटी मार बाबा भारतवर्ष में भी हो चुके है जो एक तेज अस्त्र से कनपटी के पास वार करके सैकड़ों निरीह के प्राण ले चुके थे। ऐसा वे शौकिया करते थे।

हत्यायें रुचि बने यह इसी बात की पुष्टि करती है कि मनुष्य में दया और करुणा मर रही है। दृश्य और कृत्यों से भावनायें बनती है यदि ऐसी भावनाओं का अभाव है तो उसमें एक मात्र दोष उन दृश्य और कर्मों का है जो जीव -हत्या, पशु-हत्या और माँसाहार के रूप में सामने आ रहा है। यदि इस स्थिति को आज न रोका गया तो कल हर पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को मारकर खा जाने के चक्कर में रहने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि आज का मनुष्य लौट भी तो उसी आदिवासी जीवन की ओर रहा है।


उपयोगहीन पत्थर

एक राजा ने महात्मा को अपना हीरे-मोतियों से भरा खजाना दिखाया। महात्मा ने पूछा ‘इन पत्थरों से आपको कितनी आय होती है ?’ राजा ने कहा ‘आय नहीं होती बल्कि इनकी सुरक्षा पर व्यय होता है ?’ महात्मा, राजा को एक किसान की झोंपड़ी में ले गया। वहाँ एक स्त्री चक्की से अनाज पीस रही थी। महात्मा ने उसकी ओर संकेत कर कहा ‘तुम्हारे उन उपयोगहीन पत्थरों से यह पत्थर अच्छे जो पूरे परिवार का भरण-पोषण करते हैं।’


मृत्यु से डरने का कोई कारण नहीं

मृत्यु का नाम सुनते ही साधारण व्यक्ति के होश उड़ जाते हैं। और एक क्षण के लिए जैसे वह मर जाता है। मृत्यु से डरने का मानव का स्वभाव सा बन गया है। साधारण सा रोग, मामूली सी घटना शत्रु का विचार आदि शंका जनक संयोग आते ही कमजोर आदमी काँप उठता है और सोचने लगता है कि कही यह बीमारी हमारे प्राण न ले ले। संभव है वहाँ जाने से हम किसी घातक घटना के शिकार बन जाये मृत्यु के भय से मनुष्य खाने-पीने और प्रतिकूलताओं से जमकर मोर्चा लेने से डरता रहता है।

यही नहीं किसी की मृत्यु देखकर किसी दुर्घटना का समाचार सुनकर भी अपनी मृत्यु की शंका से आक्राँत हो जाता है। यहाँ तक कभी-कभी स्वयं भी अकेले में संसार की नश्वरता का विचार आते अथवा अपनी आयु के बीते वर्षा पर विचार करने से भी वह मृत्यु भय से उद्विग्न हो उठता है। अन्धेरे में निर्भयता पूर्वक पदार्पण करने से भी उसे मृत्यु की शंका निरुत्साहित कर देती है। निः संदेह मृत्यु का भय बड़ा ही व्यापक और चिरस्थायी होता है।

किन्तु यदि इस मृत्यु भय पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जावे तो यह बड़ा ही शूद्र और उपहासास्पद प्रतीत होगा पहले तो जो अनिवार्य है अवश्यम्भावी है उसके विषम विषय में डरना क्या ? जब मृत्यु अटल है और एक दिन सबको मरना ही है तब उसके विषय में शंका का क्या प्रयोजन हो सकता है ? यह बात किसी प्रकार भी समझ में आने लायक नहीं है। हमारे पूर्वजों की एक लम्बी परम्परा मृत्यु के मुख में चली जा चुकी है और आगे भी आने वाले प्रजा उनका अनुसरण करती ही जायेगी तब बीच में क्या अधिकार रह जाता है कि उस निश्चित नियति के प्रति भयाकुल होते रहे। मृत्यु को यदि जीवन का अन्तिम अतिथि मानकर उसकी ओर से निश्चित हो जाये तो न जाने अन्य कितने भयो से हम अनायास ही मुक्ति पा जाये मृत्यु का भय ही वस्तुतः सारे भयो की जड़ है।

मृत्यु का भय अधिकतर सताता उन्हीं लोगों को है जो इस मानव जीवन का महत्व नहीं समझते और इसकी लम्बी अवधि को आलस्य, विलास एवं प्रमाद में ही बिता देते हैं और अपने आवश्यक कर्त्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों के प्रति ईमानदार नहीं रहते। सोचते हैं मेरी जिन्दगी बढ़ जाती, मृत्यु का निरन्तर बढ़ा चला आ रहा अभियान रुक जाता तो मैं अपने काम पूरे कर लेता। किन्तु उनकी यह कामना पूरी नहीं हो पाती। मृत्यु आती है और अकर्मण्यता के फलस्वरूप उनकी चोटी पकड़ के घसीट ले जाती है।

इसके विपरीत जिसने अपने कर्त्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों को रुचि एवं तत्परता से पूरा किया है, जीवन के करणीय कार्यों की उपेक्षा नहीं की है, आयु के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग किया है, उसे मृत्यु से डरने का कारण नहीं रह जाता। वह मृत्यु आने पर हँसता मुस्कुराता हुआ उसका स्वागत करता है और मृत्यु उसे संतुष्ट माता की तरह प्यार से गोद में उठाकर ले जाती और उन दिव्य स्थानों में पहुँचा देती है जहाँ उसके कर्त्तव्य के पुरस्कार उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। मृत्यु का भय कायर की वृति है कर्मवीर तो उसे मित्र की तरह तथा माता मानकर किसी समय भी उसका स्वागत करने का तैयार रहा करते हैं।

यदि मृत्यु से भयभीत रहने का स्वभाव स्थायी हो गया है और वह किसी प्रकार भी बदलते नहीं बनता तो भी उसका लाभ उठाया जा सकता है। जिस प्रकार शत्रु का भय सदैव सतर्क एवं संबद्ध बना देता है, सुरक्षा के प्रबंधों तथा व्यवस्था के लिए सक्रिय रखता है उसी प्रकार मृत्यु को एक आकस्मिक आपत्ति समझकर सतर्क एवं सावधान हुआ जा सकता है। यह बात सत्य है कि मनुष्य शरीर छोड़ने से उतना नहीं डरता जितना मृत्यु के बाद न जाने क्या गति होगी इस विचार से भयभीत होता है। उसे आशंका रहती है कि मृत्यु के बाद उसे कीट पतंगो की तरह निकृष्ट योनियों में जाना होगा। बैल, भैंसा, घोड़ा बनकर वह सब यातना सहन करनी होगी जैसे हम आज अपनी आंखों से उन्हें भोगते देख रहे हैं।

यदि यह आशंका मृत्यु भय को जन्म देती है- तब क्यों न ऐसे कर्मों, ऐसी गतिविधियों में संलग्न हो जाया जाये जिससे कि अंधेर लोकों तथा अधम योनियों की आशंका दूर हो जाये। अधिक से अधिक जितना प्रकाश, जितना आलोक हम इकट्ठा कर सके क्यों न करले। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि उजाले की प्राप्ति उज्ज्वल एवं आदर्श कर्मों से होती है। पुण्य, परमार्थ, परोपकार, परसेवा और पावन जीवन की पद्धति से आत्मा में अक्षय प्रकाश के भंडार भर जाते हैं। इससे पूर्व कि मृत्यु आये और अपमान पूर्वक चोटी पकड़ कर घसीट ले जाये क्यों न सत्पथ पर अग्रसर होकर प्रकाश का प्रबन्ध कर लिया जाये। क्यों न उस पुण्य प्रधान संबल को एकत्र कर लिया जाये जो हमारा, हमारी आत्मा की अनन्त एवं अगत पथ में सहायक बने।

इस विषय में साधन, सामान की शिकायत करना उचित नहीं। कोई भी सत्कर्म फिर चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा सच्ची परमार्थ भावना से किया गया है समान फल ही उत्पन्न करता है। क्योंकि कर्म से भावना ही प्रधान होती है उसका आकार-प्रकार नहीं। आइये, हम अपनी वासनाओं तथा एषणाओं को त्याग कर स्वार्थ तथा संकीर्णता की तिलाँजलि देकर क्रूरता, कपट और असत्य को बहिष्कृत कर द्वेष , दुर्भाव, तथा दयनीयता को छोड़कर- दया , दाक्षिण्य, उदारता, प्रेम, सौहार्द्र, दान तथा धर्म भावना के अक्षय दीप जला ले तब देखे मृत्यु का भय, परलोक का अन्धकार हमारी तटस्थ बुद्धि को किस प्रकार विचलित कर सकता है। अपने अधूरे कामों को पूरा करने में जुट जाइये, अपने कर्त्तव्यों से मुँह न चुराइये, पुण्य परोपकार का कोई अवसर न जाने दीजिये और अपनी आत्मा पर विश्वास कर जीवन को प्रखर गति से आगे बढ़ाइये, मृत्यु से भयभीत होने का कोई कारण न रह जायेगा। भावना के बदलते ही पश्चाताप के साथ क्रियाशील हो उठने पर मनुष्य के पूर्व अपराध क्षमा कर दिये जाते हैं और उसे एकबार फिर अपना सुधार करने और सुपथ निर्माण करने के लिए समय व अवसर दिया जाता है। यह तो साधारण साँसारिक व्यवहार में भी होता रहता है फिर उस परमपिता की सुन्दर, करुण और दयापूर्ण विधान धार में तो यह और भी सरल है।

मनुष्य किसी कारण से नहीं स्वयं अपने कर्मों से मारा जाता है- योगवशिष्ठ

इस साधारण पक्ष के साथ-साथ मृत्यु के सम्बन्ध में एक अधिक गहरा और सत्य पक्ष भी हैं। मनुष्य का जीवन दो तत्वों से मिलकर बना है। शरीर और उसमें निवास करने वाली चेतना। जीवन का चेतन-तत्व ही तो वास्तव में हम है। यह मृतिका पिंड तो उस चेतन की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। उसका वाहन भर ही है। रथ में बैठकर चलने वाला मनुष्य यदि स्वयं को रथ मान ले तो उसके नष्ट हो जाने पर मनुष्य को स्वयं अपने ही नष्ट मान लेना चाहिए। किन्तु ऐसा होता कहाँ है। रथ के नष्ट हो जाने पर भी उसका रथी यथावत बना ही रहता है। हाँ जब उसको अपने वाहन के प्रति अनुचित ममता हो जाती है उसे ही अपना अस्तित्व एवं सर्वस्व मान बैठता है तो अवश्य ही उसके नष्ट होने अथवा नष्ट होने की कल्पना से दुःख होता है। किन्तु यह तो अज्ञान है। इसको किसी भी प्रकार मान्यता नहीं दी जा सकती।

अपने को शरीर समझने वाले अज्ञानी व्यक्ति ही तो मृत्यु अर्थात् देहावसान से भयभीत रहा करते हैं। जो बुद्धिमान अपने को चेतन स्वरूप समझते है- वह मृत्यु के भय से कदापि क्लाँत नहीं होते। चेतन अथवा आत्मा अक्षय तथा अजर-अमर है उसकी मृत्यु होना तो दूर उसे कोई विकार तक नहीं घेरता। और यही अमर आत्मा ही तो मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व, उसका सच्चा स्वरूप है। देहाभिमान ही मृत्यु का मूल कारण है। इसे छोड़कर अपने सत्य स्वरूप आत्मा में विश्वास करिये आपको मृत्यु का भय होने का कोई कारण ही न रह जायेगा। शरीर तो आत्मा की सहायता, उसका अलंकरण तथा प्रकाश करने के लिये बदलते ही रहते हैं। हर पात के बाद आत्मा को एक नया तथा सुन्दर शरीर मिलता है। भगवान ने गीता में इस सत्य का उद्घाटन करते हुये स्पष्ट घोषणा कर दी है।

वासाँसि जीणानि यथा विहाय, नवानि गृहाति नरोपराणि तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही

अब इतने पर भी यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से भयभीत होता है तो यह उसका दुर्भाग्य ही है कि वह जो कुछ है, वह अपने को न मान कर वह मानता है जो वास्तव में है नहीं ।

इस सत्य से कौन इनकार कर सकता है कि दिनभर काम करने के बाद शरीर थक जाता है तो रात्रि में विश्राम की आवश्यकता होती है। मनुष्य मीठी नींद सोकर दूसरे दिन के लिये नई स्फूर्ति तथा शक्ति से भर जाता है। तब जीवन की एक लम्बी अवधि तक चलते रहने पर आत्मा यदि विश्राम करने के लिये मृत्यु रूपी नींद की गोद में चली जाती है तो इसमें खेद की क्या बात है। मृत्यु का एक विश्राम लेकर वह पुनः किसी दूसरे शरीर में जागती है और नवीन स्फूर्ति नये उत्साह से अपने लक्ष्य मोक्ष की अग्रसर हो चलती है।

एक नहीं हजार तर्क और युक्तियों से यह बात सिद्ध होती है कि मृत्यु यदि उसका वरण ठीक स्थिति में किया जाये तो जीवन से कही अधिक सुखकर तथा विश्रामदायिका हो पाई जाती है। महात्मा गाँधी के इस कथन में कितना यथार्थ सत्य छिपा हुआ है। इनको देख समझ कर भी क्या मृत्यु से घबराने, उससे घृणा करने अथवा उसे अवरणीय मानने का कोई इरादा हो सकता है। वे लिखते है-

‘ मुझे तो बहुत बार ऐसा लगता है कि मृत्यु को जीवन की अपेक्षा अधिक सुन्दर होना चाहिए। जन्म से पूर्व माँ के गर्भ में जो यातना भोगनी पड़ती है उसे छोड़ देता हूँ पर जन्म लेने के बाद तो सारे जीवन भर यातनायें ही भुगतनी पड़ती है। इसका तो हमें प्रत्यक्ष अनुभव है। जीवन की पराधीनता हर मनुष्य के लिए एक सी है। जीवन यदि स्वच्छ रहा तो मृत्यु के बाद पराधीनता जैसी कोई बात न होनी चाहिए। बालक जन्म लेता है तो उसमें किसी तरह का ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है फिर भी आत्मज्ञान नहीं हो पाता, पर मृत्यु के बाद तो ब्राह्मी स्थिति का बोध सहज ही हो जाता है। सदाचार का अभ्यास इसीलिए तो जीवन में आवश्यक बताया जाता है ताकि मृत्यु होते ही मनुष्य शाश्वत शाँति की स्थिति प्राप्त कर ले। ‘

वास्तविक बात तो यह है कि जिस मनुष्य ने अपने अपकर्मों द्वारा जीवन को काला बना लिया है। पुण्य प्रकाश से कोई वास्ता नहीं रखा उसका मृत्यु से डरना तो क्या जीवन तक से डर लगा करता है। सदाचार और पुण्य परमार्थ से आलोकित जिन्दगी में तो आनन्द है ही मृत्यु के पश्चात तो अक्षय आनन्द के कोष खुल जाते हैं। मृत्यु का भय छोड़िये और अपने पुण्य पुरुषार्थ द्वारा जीवन एवं मृत्यु दोनों को एक वीर योद्धा की तरह विजय कर अक्षय पद प्राप्त कर लीजिये।


चरित्र-रक्षा के लिये बलिदान

राजनर्तकी मुदाल के सौंदर्य की ख्याति पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह सारे उरु प्रदेश में फैली हुई थी। उसे पाने के लिए राजधानी के बड़े-बड़े सामंतों, विद्वानों, प्रचारकों तथा राज घराने तक के लोगों में कुचक्र चल रहा था। ठीक उसी समय मुदाल अपने बिस्तर पर लेटी अपने और राष्ट्र के भविष्य पर विचार कर रही थी।

देश के कर्णधार मार्गदर्शक और प्रभावशाली लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो गये तो फिर सामान्य प्रजा का क्या होगा ? अभी वह इस चिन्ता में डूबी थी कि किसी ने द्वार पर दस्तक दी- मुदाल ने दरवाजा खोला तो सामने खड़े महाराज करुष को देखते ही स्तम्भित रह गई।

इस समय आने का कारण महाराज! न चाहते हुए भी मुदाल को प्रश्न करना पड़ा।

बड़ा विद्रूप उत्तर मिला- मुदाल! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा उरु प्रदेश मुग्ध है। त्यागी, तपस्वी तुम्हारे लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं, फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे!

महाराज! सामान्य प्रजा की बात आप छोड़िये। आप इस देश के कर्णधार है, प्रजा मार्ग भ्रष्ट हो जाये तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर यदि समाज के शीर्षस्थ लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो जाये तो वह देश खोखला हो जाता है, ऐसे देश, ऐसी जातियाँ अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाती महाराज! इसीलिये आपका इस समय यहाँ आना, अशोभनीय ही नहीं, सामाजिक अपराध भी है।

किसी ने सच कहा है अधिकार और अहंकार मनुष्य के दो प्रबल शत्रु है। वह जिस अन्तः करण में प्रवेश कर जाते हैं उसमें उचित और अनुचित के विचार की शक्ति भी नहीं रह पाती। मुदाल के यह सीधे-साधे शब्द करुष को बाण की तरह चुभे। वे तड़प कर बोले- मुदाल हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये, तुम एक नर्तकी हो और शरीर का सौदा तुम्हारा धर्म है। कीमत माँग सकती हो, धर्म क्या है, अधर्म क्या है ? यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है।

नर्तकी भर होते तब तो आपका कथन सत्य था महाराज! मुदाल की गंभीरता अब दृढ़ता और वीरोचित स्वाभिमान में बदल रही थी - किन्तु हम मनुष्य भी है और मनुष्य होने के नाते समाज के हित, अहित की बात सोचना भी हमारा धर्म है। हम सत्ता को दलित करके अपने देशवासियों को मार्ग-भ्रष्ट करने का पाप अपने सिर कदापि नहीं ले सकते।

स्थिति बिगड़ते देखकर महाराज करुष ने बात का रुख बदल दिया। पर वे अब भी इस बात को तैयार नहीं थे कि साधारण नर्तकी उनकी वासना का दमन कर जाये और मुदाल का कहना था कि विचारशील और सत्तारूढ़ का पाप सारे समाज को पापी बना देता है। इसलिये चरित्र को वैभव के सामने झुकाया नहीं जा सकता। मुदाल ने बहुत समझाया पर महाराज का रौद्र कम न हुआ। स्थिति अनियंत्रित होते देखकर मुदाल ने कहा- महाराज यदि आप साधिकार चेष्टा करना ही चाहते हैं तो तीन दिन और रुके, मैं रजोदर्शन की स्थिति में हूँ आज से चौथे दिन आप मुझे “चैत्य सरोवर” के समीप मिलें, आपको यह शरीर वही समर्पित होगा।

तीन दिन करुष ने किस तरह बिताये यह वही जानते होगे। चौथे दिन चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में अगणित उपहारों के साथ महाराज करुष जब चैत्य विहार पहुँचे तो वहाँ जाकर उन्होंने जो कुछ देखा उससे उनकी तृष्णा और कामुकता स्तब्ध रह गई। मुदाल का शरीर तो वहां उपस्थित था पर उसमें जीवन नहीं था। एक पत्र पास ही पड़ा हुआ था - सौंदर्य राष्ट्र के चरित्र से बढ़कर नहीं चरित्र की रक्षा के लिये यदि सौंदर्य का बलिदान किया जा सकता है तो उसके लिए मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ शव देखने से लगता था मुदाल ने विषपान कर लिया है।

मुदाल के बलिदान ने करुष की आंखें खोल दी। उस दिन से वे आत्म-सौंदर्य की साधना में लग गये।


आध्यात्मिक काम-विज्ञान- 2

दो पहिये बिना गाड़ी नहीं चल सकती। नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग बिना सृष्टि का व्यवस्था क्रम नहीं चल सकता। दोनों का मिलन काम तृप्ति और प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होता वरन् घर बसाने से लेकर व्यक्तित्वों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवृत्तियों का ढाँचा दोनों के सहयोग से ही संभव होता है। यह घनिष्ठता जितनी प्रगाढ़ होगी विकास और उल्लास की प्रक्रिया उतनी ही सघन होती चली जाएगी।

कुछ समय से नर -नारी के सान्निध्य का प्रश्न अतिवाद के दो अन्तिम सिरों के साथ जोड़ दिया गया है। एक ओर नारी को इतनी आकर्षक चित्रित किया गया कि उसकी चंचलता को ही सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति सिद्ध कर दिया गया। कला ने नारी के अंग-प्रत्यंग की सुडौलता को इतना सराहा कि सामान्य भावुक व्यक्ति यह सोचने के लिए विवश हो गया कि ऐसी सुन्दरता को काम-तृप्ति के लिए प्राप्त कर लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। काव्य, संगीत, नृत्य , अभिनय, चित्र, मूर्ति आदि कला के समस्त अंग जब नारी की माँसलता और कामुकता ही आकाश तक पहुँचाने में जुट जाये तो बेचारी लोक को उधर मुड़ना ही पड़ेगा। इस कुचेष्टा का घातक परिणाम सामने आया । यौन प्रवृत्तियां भड़की, नर-नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक दूसरे के लिए अहित कर बन गये। यौन रोगों की बाढ़ आई, शरीर व मन जर्जर हो गया, पीढ़ियां दुर्बल से दुर्बलतर होती चली गई। दुर्बल काया और मनः स्थिति को मनुष्य दीन-हीन और पतित पापी ही बन सकता था बनता चला गया। नारी को रमणी सिद्ध करके तुच्छ मनोरंजन भले पाया हो पर उससे जो हानि हुई उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिनने भी मानवीय प्रकृतियों को इस पतनोन्मुख दिशा में मोड़ने के लिए प्रयत्न किया है वस्तुतः एक दिन वे मानवीय विवेक और ईश्वरीय न्याय की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किए जायेंगे।

अतिवाद का एक सिरा यह है कि कामिनी, रमणी, वैश्या आदि बना कर उसे आकर्षण का केन्द्र बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा यह है कि उसे पर्दे घूँघट की कठोर जंजीरों में जकड़ कर अपंग सदृश बना दिया गया। उस पर इतने प्रतिबंध लगाये गये जितने बन्दी और पशु भी सहन नहीं कर सकते। घर की छोटी-सी कोठरी में कैद नववधू के लिए परिवार के छोटी आयु वालो के सामने ही बोलने की छूट है। बड़ी आयु वालो से तो उसे पर्दा ही करना चाहिए। न उनके सामने मुँह खोला जा सकता है और न उनसे बात की जा सकती है। पशु को मुँह पर नकाब लगाकर नहीं रहना पड़ता। वे दूसरों के चेहरे देख सकते हैं और अपने दिखा सकते हैं। जब मर्जी हो चाहे जिसके सामने टूटी-फूटी वाणी बोल सकते हैं। पर नारी को इतने अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।

इस अमानवीय प्रतिबंध की प्रतिक्रिया बुरी हुई। नारी शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत पिछड़ गई। भारत में नर की अपेक्षा नारी की मृत्यु दर बहुत अधिक है। मानसिक दृष्टि से वह आत्महीनता की ग्रंथियों में जकड़ी पड़ी है। सहमी, झिझकी, डरी, घबराई, दीन-हीन अपराधिन की तरह यहां वहां लुकती छिपती देखी जा सकती है आज औसत नारी उस नीबू की तरह है जिसका रस निचोड़ कर उसे कूड़े में फेंक दिया जाता है। नव-यौवन के दो चार वर्ष ही उसकी उपयोगिता प्रेमी पतिदेव की आंखों में रहती है। अनाचार की वेदी पर जैसे ही उस सौंदर्य की बलि चढ़ी कि वह दासी मात्र शेष रह जाती है। जीवन की लाश का भार ढोती हुई- गोदी के बच्चों के लिए वह किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करती है। जो था वह दो-चार वर्ष में लुट गया अब बेचारी को कठोर परिश्रम के बदले पेट भरने के लिये रोटी और पहनने को कपड़े भर पाने का अधिकार है। बन्दिनी का अन्तः करण इस स्थिति के विरुद्ध भीतर ही भीतर विद्रोही बना रहे प्रत्यक्षतः वह कुछ न कर सकने की परिस्थितियों में ही जकड़ी होती है सो गम खाने और आँसू पीने के अतिरिक्त उसके पास कुछ चारा नहीं रह जाता।

ऐसी विषम स्थिति में पड़ी हुई नारी का व्यक्ति उसके अपने लिए- परिवार के लिए- बच्चों के लिए- कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता। जो खुद ही मर रहा है वह दूसरों को जीवन क्या देगा ? समाज की कैसी विडम्बना है कि एक ओर जहाँ नारी को आकर्षण केन्द्र मानकर उसके गुणानुवाद गाने में सारी भावुकता जुटायी। दूसरी ओर उसे इतना पद-दलित, पीड़ित प्रतिबंधित करने की नृशंसता अपनाई। यह दोनों अतिवादी सिरे ऐसे है जिनका समन्वय कर सकना कठिन है।

तीसरा एक ओर अतिवाद पनपा। अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों की पाप पतन की जड़ है इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस सनक के प्रतिपादन में न जाने क्या क्या घडंत घड कर खड़ी कर दी गई। लोग घर छोड़कर भागने में - स्त्री बच्चों को बिलखता छोड़कर भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े। आन्तरिक अतृप्ति ने उनकी मनोभूमि को सर्वथा विकृत कर दिया और वे तथाकथित संत महात्मा सामान्य नागरिकों की अपेक्षा भी गई गुजरी मनः स्थिति के दलदल में फँस गये। विरक्ति का जितना ढोंग उनने बनाया अनुरक्ति की प्रतिक्रिया उतनी ही उग्र होती चली गई। स्वाभाविक की उपेक्षा करके अस्वाभाविक के जाल जंजाल में बुरी तरह जकड़ गये है। “बन्दर का चिन्तन न करेंगे “ ऐसी प्रतिज्ञा आते ही बरबस बन्दर स्मृति में आकर उछल कूद मचाने लगता है। यों स्वाभाविक रूप से बंदर के बारे में कुछ न सोचा होता तो शायद वर्षों उसका स्मरण न आता। इस तथाकथित वैराग्य में नारी को पतन बताकर कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं किया गया। पर्दे के पीछे जो होता रहता है वह दयनीय है। अतिवाद कभी भी उपयोगी नहीं रहा। काम तो मध्यम मार्ग से चलता है उसी को अपनाकर कोई श्रेयाधिकारी बन सकता है।

काम को निकृष्ट प्रबन्धक न बनने दिया जाये तो वह शक्ति का स्रोत और आनन्द का झरना है। - इमर्सन

आध्यात्मिक काम विज्ञान का प्रतिपादन यह है कि अतिवाद की भारी दीवारें गिरा दी जाय और नारी को नर की ही भांति सामान्य और स्वाभाविक स्थिति में रहने दिया जाय। इससे एक बड़ी अनीति का अन्त हो जायेगा। अतिवाद के दोना ही पक्ष नारी के वर्चस्व पर भारी चोट पहुँचाते हैं और उसे दुर्बल जर्जर और अनुपयोगी बनाते हैं। इसलिए इन जाल-जंजालों से उसे मुक्त करने के लिए उग्र और समर्थ प्रयत्न किये जाये।

प्रयत्न होना चाहिए कि नारी की माँसलता की अवाँछनीय अभिव्यक्तियाँ उभारने वालो से अनुरोध किया जाये कि विष बुझे तीर कृपाकर तरकस में बन्द कर ले। इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गये है। उनने तलवार लगने पर जैसी कुचेष्टा की आशंका की करतूतें प्रारम्भ कर दी है। आग लगा देना सरल है बुझाना कठिन। मनुष्य की पशु प्रकृतियों को और काम विकारों को भड़का देना सरल है उभार से जो सर्वनाश हो सकता है उससे बचाव ढूंढ़ना कठिन है। नासमझ लड़के लड़कियों पर सिनेमा क्या प्रभाव डाल रहा है और उनकी को किधर घसीटे लिये जा रहा है इस पर दृष्टि डालने वाला दुःखी हुये बिना नहीं रहेगा। अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले विभूतिवानों से प्रार्थना की जाय कि वे नारी को पददलित करने के पूर्ण अभियान में जितना कुछ कर चुके उतना ही मान ले आगे की ओर निशाना न साधे। कवि लोग ऐसे गीत न लिखे जिनसे विकारोत्तेजक प्रवृत्तियां भड़के। साहित्यकार- उपन्यासकार कलम से नारी के गोपनीय संदर्भों पर भड़काने वाली चर्चा छोड़कर सरस्वती की साधना करे। अगणित धाराओं में प्रयुक्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय दे। गायक विकारोत्तेजना और शृंगाररस को कुछ दिन तक विश्राम कर लेने दे। गायन का अर्थ ही पिछले दिनों कामेन्द्रिय रहा है। राज्य दरबारों से लेकर मनचले आवारा हिप्पियों तक उसी को माँगा जाता रहा है। अब कुछ दिन से गान विश्राम ले ले और दूसरे रसों को भी जीवित रहने का अवसर मिल जाये तो क्या हर्ज है ? कुछ दिन तक घुंघरू न बजे, पायल न खनके तो भी कला जीवित रहेगी। चित्रकार नव यौवना की शालीनता पर पर्दा पड़ा रहने दे, पतित दुशासन द्वारा द्रौपदी को नंगी करने की कुचेष्टा न करे तो भी उनकी चित्रकारिता सराही जा सकती है। चित्रकला के दूसरे पक्ष भी है क्यों न कुशल चित्रकार सुरुचि उत्पन्न करने वाले चित्र बनाये । इन महारथी कलाकारों से कहा जाये कि सौजन्य का बालक अभिमन्यु इस बुरी तरह न मारा जाय। महाभारत का वह कुकृत्य महारथियों के माथे पर कलंक का टीका ही लगा गया। अब फिर कलाकार महारथियों के चक्रव्यूह में फँसा शालीनता का अभिमन्यु उसी तरह मारा गया तो यह भारत- महाभारत - समस्त संसार की दृष्टि में आदर्शवादिता और आध्यात्मिकता का ढिंढोरा पीटने वाला दम्भी ही माना जायेगा। जिस देश के कलाकार तक अपना उत्तरदायित्व न समझे उस देश के नागरिकों से कोई क्या आशा करेगा ? कलाकारों को कहा जाना चाहिए कि वे कृपाकर अपने कदम पीछे हटा ले। उनके इस अनुग्रह के बिना नारी की शीलता, पवित्रता, उत्कृष्टता और समर्थता को बचाया जा सकेगा।

इन्द्रियजन्य वासनायें उपभोग से शाँत नहीं होती , बढ़ती है जैसे आग में घृत की आहुति। -वेदव्यास

नारी के प्रति हमारा चिन्तन सखा, सहचर और मित्र जैसा सरल स्वाभाविक होना चाहिए। उसे सामान्य मनुष्य से न अधिक माना जाय न कम। पुरुष और पुरुष, स्त्रियाँ और स्त्रियाँ जब मिलते हैं तो उनके असंख्य प्रयोजन होते हैं, काम सेवन जैसी बात वे सोचते भी नहीं । ऐसे ही नर नारी का मिलन भी स्वाभाविक सरल और सौम्य बनाना चाहिए। इसी प्रकार रूढ़िवादियों से कहा जाना चाहिए कि प्रतिबंधों से व्यभिचार रुकेगा नहीं बढ़ेगा। जिस स्त्री का मुँह ढका होता है उसे देखने का मन चलेगा पर मुँह खोले सड़क की हजारों लाखों स्त्रियो में से किसी की ओर नजर गड़ाने की इच्छा नहीं होती चाहे वे रूपवान हो या कुरूप। पर्दा यह मान्यता मजबूत करता है कि नारी-नर का संपर्क वासना के अतिरिक्त और किसी प्रयोजन के लिए नहीं हो सकता। हमें अपनी बहिन, बेटी, माता, और पत्नी पर इतना विश्वास करना ही चाहिए कि वे बिना किसी प्रतिबन्ध के स्वेच्छा पूर्वक अपनी शालीनता अक्षुण्ण रख सकने में समर्थ है। जब शासक, सामान्य निरीह प्रजा की बहिन बेटियों की इज्जत लूटने के लिए भेड़ियों की तरह गली कूंचों में फिरते रहते थे वह जमाना बहुत पीछे रह गया। अब हम आत्म रक्षा के लिए उपयुक्त परिस्थितियों के बीच जी रहे हैं। फिर क्यों हम घूँघट, पर्दा , प्रतिबंध के बंधनों में उसे जकड़े और क्यों उसके स्वाभिमान जीवन की ईश्वर प्रदत्त सुविधा को छीनने का पाप कमाये ? इसी प्रकार अध्यात्मवाद के नाम पर नारी तिरस्कार और बहिष्कार की बेवक्त शहनाई बंद कर देनी चाहिए। जिन भगवान की हम उपासना करते हैं वे स्वयं सपत्नीक है। राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि किसी भी देवता को ले सभी विवाहित है। सरस्वती, लक्ष्मी, काली जैसी देवियों तक को दाम्पत्य जीवन स्वीकार रहा है। हर भगवान और हर देवता के साथ उनकी पत्नियाँ विराजमान है फिर उनके मनो को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए ?

सप्त ऋषियों में सातों के सातों विवाहित थे और उनके साधना काल की तपश्चर्या अवधि में भी पत्नियाँ उनके साथ रही। इससे उनके कार्य में बाधा रत्ती भर नहीं पहुँची वरन् सहायता ही मिली। प्राचीन काल में जब विवेक पूर्ण अध्यात्म जीवित था तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि आत्मिक प्रगति में नारी के कारण कोई बाधा उत्पन्न होगी।

रामकृष्ण परमहंस को विवाह की आवश्यकता अनुभव हुई और उनने उस व्यवस्था को तब जुटाया जब वे आत्मिक प्रगति के ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके थे। काम सेवन और नारी सान्निध्य एक बात नहीं है। योगी अरविन्द घोष की साधना का स्तर कितना ऊँचा था उसमें संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। उनके एकाकी जीवन की पूरी सार संभाल “माताजी” करती रही। इस संपर्क से दोनों में आत्मिक महत्ता बढ़ी ही घटी नहीं। प्रातःस्मरणीय माताजी ने अरविन्द के संपर्क से भारी प्रकाश आया और योगिराज को यह सान्निध्य गंगा के समान पुष्प फलदायक सिद्ध हुआ। तपस्वी ऋषि सपत्नीक स्थिति में रहते थे। जब जरूरत पड़ती प्रजनन की व्यवस्था बनाते अन्यथा आजीवन ब्रह्मचारी रहकर भी नारी सान्निध्य की व्यवस्था बनाये रखते। यह उनके विवेक पर निर्भर रहता था प्रतिबन्ध ऐसा कुछ नहीं था। संत लोग अपना व्यक्तिगत जीवन विवाहित या अविवाहित जैसा भी बिताये पर कम से कम उन्हें इस अतिवाद का ढिंढोरा पीटना तो बन्द कर देना चाहिए जिसके अनुसार नारी का नरक की खान कहा जाता है। यदि ऐसा वस्तुतः होता तो गाँधी जी जैसे सन्त नारी त्याग की बात सोचते। कोई अधिक सेवा सुविधा की दृष्टि से अविवाहित रहे तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। सच तो यह है कि सन्त लोग यदि सपत्नीक सेवा कार्य में जुटे तो वे अपना आदर्श लोगों के सामने प्रस्तुत करके उच्च स्तरीय गृहस्थ जीवन की संभावना प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रस्तुत कर सकते हैं।

काम का अर्थ विनोद, उल्लास और आनन्द है। मैथुन को ही ‘काम’ नहीं कहते। काम क्षेत्र की परिधि में वह भी एक बहुत ही छोटा और नगण्य या माध्यम हो सकता है। यदाकदा ही उसकी उपयोगिता होती है। इसलिए मैथुन को एक कोने पर रखकर -उपेक्षणीय मानकर भी काम लाभ किया जाता है। स्नेह, सद्भाव, विनोद, उल्लास की उच्च स्तरीय अभिव्यक्तियां जिस परिधि में आती है उसे आध्यात्मिक काम कह सकते हैं। नारी और नर को इस भाव प्रवाह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। घर में बहिन, बेटी, माता, भावज, चाची, दादी, भुआ, भतीजी आदि के साथ रहकर उनके साथ प्यार दुलार के पवित्र संबंधों सहित आनन्दित जीवन जिया जा सकता है तो घर से बाहर की परिधि में ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? हम पड़ोसी के परिवार में भी अपने ही घर परिवार की तरह बिना नर नारी का भेदभाव किये प्यार दुलार क्यों नहीं बिखेर सकते ?

नर नारी के बीच व्यापक सद्भाव- सहयोग की- संपर्क की - स्थिति में व्यक्ति और समाज का विकास ही संभव है। उससे हानि रत्ती भर भी नहीं । पुरुष डाक्टर नारी के प्रजनन अवयवों तक का आवश्यकतानुसार आपरेशन करते हैं। उसमें न तो पाप है, न अश्लील न अनर्थ। रेलगाड़ियों की भीड़ में नर-नारियों के शरीर पिचे रहते हैं। जहाँ पाप वृत्ति न हो वहाँ शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा ? हम अपनी युवा पुत्री के सिर और पीठ पर स्नेह का हाथ फेरते हैं तो पाप कहा लगता है। सान्निध्य पाप नहीं है। पाप तो एक अलग ही छूत की बीमारी है जो तस्वीरें देखकर भी चित्त को उद्विग्न करने में समर्थ है। इलाज इस बीमारी का किया जाना चाहिए। इस अनीति को जब तक बरता जाएगा, नारी की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी और इस पाप का फल व्यक्ति और समाज को असंख्य अभिशप्तों के रूप में बराबर भुगतना पड़ेगा।

भगवान वह शुभ दिन जल्दी ही लाये जब नर-नारी स्नेह सहयोगी की तरह - मित्र और सखा की तरह- एक दूसरे के पूरक बनकर सरल स्वाभाविक नागरिकता का आनन्द लेते हुए जीवनयापन कर सकने की मनः स्थिति प्राप्त कर ले। हम विकारों को रोके- सान्निध्य को नहीं। सान्निध्य रोक कर विचारो पर नियंत्रण पा सकना सम्भव नहीं है। इसलिए हमें उन स्रोतों को बन्द करना पड़ेगा जो विकार और व्यभिचार भड़काने में उत्तरदायी है। अग्नि और सोम, प्राण और रवि, ऋण और धन विद्युत प्रवाहों का समन्वय इस सृष्टि से संचरण और उल्लास की अग्रगामी बनाता चला आ रहा है। नर-नारी का सौम्य संपर्क बढ़ा कर हमें खोना कुछ नहीं- पाना अपार है।


पू॰ आचार्य जी के कार्य-क्रम

1- 9 से 12 फरवरी राउरकेला (उड़ीसा)

श्री बनवारी लाल अग्रवाल लाल बिल्डिंग , ओल्ड स्टेशन रोड पो0 राउरकेला जिला सुन्दरगढ (उड़ीसा)

2- 13 फरवरी 1971 - राजनाँदगाँव

श्री राधेश्याम चित लोग्मा- मंत्री श्री गायत्री महायज्ञ समिति- राजनाँदगाँव

3- 14 से 17 फरवरी 71 - बालाघाट (म ॰ प्र 0)

श्री रतनलाल कश्यप विभूति वागीश बन्धु- गोंदिया रोड बालाघाट (म ॰ प्र 0)

4- 18 से 20 फरवरी - हटा दमोह (म ॰ प्र 0)

श्री सुरेशचन्द्र अग्रवाल ओवरसियर हटा दमोह (म ॰ प्र 0)

5- 21 फरवरी 71 - डभरा

पं ॰ मोहनलाल उपाध्याय- संयोजक अखिल भारतीय गायत्री परिवार, डभरा (सक्ती) बिलासपुर (म ॰ प्र 0)

6- 22 से 25 फरवरी 71 बिलासपुर (म ॰ प्र 0)

श्री उमाशंकर चतुर्वेदी गायत्री साधना महल दयालबंद- बिलासपुर (म ॰ प्र 0)

7- 27 से 28 फरवरी 71 भोपाल (म ॰ प्र 0)

श्री डॉ0 कृष्ण वल्लभ पंड्या रेजीडेण्ट मेडिकल आफीसर एन॰ 5/ 22 एच. ई. एल. भोपाल. - 24 (म ॰ प्र 0)

8- 1 से 2 मार्च 71 - अशोकनगर

डॉ0 घनश्याम पाराशर चन्द्रशेखर आजाद वार्ड पो0 अशोकनगर - जिला गुना (म ॰ प्र 0)

9- 15 से 16 मार्च 71 थान्दला

श्री लक्ष्मीकाँत भटट 100 सुभाष मार्ग थान्दला (झावुआ) (म ॰ प्र 0)

10- 16 से 18 मार्च 71 अहमदाबाद

श्री चंदू भाई वी ॰ जोशी हर्षदीप, बकील वाडी, एल ॰ जी0 अस्पताल के सामने अहमदाबाद (गुजरात)

2- श्री प्रहलाद पूराणी 2232/2,- होली चकला, भण्डेरी पोल कालुपुर अहमदाबाद (गुजरात)

11- 19 मार्च 71 हिम्मतनगर-

श्री नर्मदा शंकर एल ॰ पुराणी मणिलाल काँसला वाला चाल , स्टेशन रोड हिम्मतनगर (गुजरात)

12- 20 से 22 मार्च 71 बड़ौदा

अखण्ड ज्योति अ॰ भा0 गायत्री परिवार शाखा श्रीमंस विद्यालय - पोलोग्राउड के सामने बड़ौदा (गुजरात)

13- 24 से 25 मार्च 71 - श्रीरामपुर

अ॰ भा0 गायत्री परिवार शाखा द्वारा एम ॰ गोकुलदास एण्ड क॰ पो0 वा0 नं0 4 पो ॰ श्रीरामपुर जिला अहमदनगर (महाराष्ट्र)

14- 26 से 28 मार्च - बम्बई

अखण्ड ज्योति गायत्री परिवार शाखा 5, विट्ठलवाडी, झवेरी बाजार, दूसरी मंजिल बम्बई- 2 फोन न॰ 299672

श्री विश्वनाथ सी0 द्विवेदी परमानंद चाल, ठाकुर द्वारा रोड पहली मंजिल , बम्बई -2 महाराष्ट्र फोन नं0 314287

15- 1 अप्रैल 71 महीदपुर (उज्जैन)

श्री शरद चन्द्र उपाध्याय एडवोकेट पो ॰ महीदपूर जिला उज्जैन (म ॰ प्र 0)

16- 2 से 4 अप्रैल 71 उज्जैन

श्री एम॰ सी0 शर्मा गार्ड , 18 टावर रोड वरामिहिर मार्ग नं0 1 उज्जैन (म ॰ प्र 0)

17- 5 से 6 अप्रैल 71- भोलियावास

श्री प्रभुलाल धाकड- ग्राम भोलियावास पो ॰ नीमच, जि0 मन्दसौर (म ॰ प्र 0)

18- 18 से 19 अप्रैल 71 इन्दौर

पंडित रेवाशंकर इंजीनियर 3, रूपराय नगर कालोनी इन्दौर

19- 20 से 22 अप्रैल 71 सेन्धवा

एन॰ आर॰ सोलंकी एका0 नगर पालिका पो ॰ सेन्धवा , (प ॰ निमाड ) म ॰ प्र 0

20- 28 अप्रैल से 2 मई - पोरबंदर (हजार कुँडी)

द्वारा- श्री राम भाई चश्मा वाला मार्डन आप्टिक्लस , गाँधी रोड, पोरबंदर (सौराष्ट्र) जयपुर और मन्दसौर के कार्यक्रमों में परिवर्तन संभव है सूचना अगले अंक में छपेगी।

21- 4 से 6 मई 71- ऊड (राज0)

श्री शान्ति लाल अम्बा शंकर दवे पो ॰ ऊड जिला सिरोही (राजस्थान)

22- 7से 10 मई 71- (हजार कुँडीय यज्ञ)

तिलस्वा महादेव (भीलवाडा) श्री भंवरलाल जी जोशी (प्रधान) द्वारा- श्री कुवर चन्द्र वीर सिंह जी

राजभवन, पो ॰ बिजौलिया जिला भीलवाडा (राज0)

23- 16 से 19 मई 71 भीलवाडा (हजार कुँडीय )

श्री मोहनलाल तिवारी वार्ड नं 2, मकान नं0 110, माणिक्य नगर भीलवाडा राजस्थान


दृश्य और दुनिया सन 2000 की

रूस द्वारा क्यूबा में अणु प्रक्षेपणास्त्र और अड्डे जमा देने की अमरी में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। सन 1962 में एक बार दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने जा डटी। इधर रूसी सैनिकों से जलपोत क्यूबा की ओर भाग चले आ रहे थे उधर अमेरिका के विध्वंसक वायुयान और अणु बमों से लैस मिसाइलें गड़बड़ करने लगी। युद्ध के लिए बस “स्विच” दबाना शेष रह गया था।

उस समय फ्रांस के नेताओं ने प्रसिद्ध फ्राँसीसी भविष्यवक्ता जूल वर्न से पूछा- “ इस युद्ध में विजय किसकी होगी ?” जूल वर्न ने छूटते ही उत्तर दिया- किसी की नहीं- इसलिये कि युद्ध होगा कि नहीं। रूस पीछे हट जायेगा।

इस बात पर उस समय तो किसी ने विश्वास नहीं किया। किन्तु कुछ ही घंटों पीछे जब आकाशवाणी ने घोषणा की - “रूस पीछे हट गया, युद्ध की संभावनाएं समाप्त हो गई। “ तो लोग जूल वर्न की भविष्यवाणी पर आश्चर्यचकित रह गये।

डाक्टर जूल वर्न प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक है पर उनकी सर्वाधिक ख्याति एक भविष्यवक्ता के रूप में हुई। अंतर्राष्ट्रीय जगत में उन्हें भविष्यवक्ता के रूप में जीन डीक्सन, प्रो0 हरार, कीरो, एंडरसन और चार्ल्स क्लार्क से कम महत्व नहीं दिया। उनके कई पूर्वाभास तो इतने सच हुए मानो वह घटनाएं उनके द्वारा ही गढ़ी गई हो। उन्होंने 1963 में चन्द्रमा पर सहमानव अंतरिक्ष यान उतर जाने की भविष्यवाणी दस वर्ष पूर्व की थी। वह सच निकली। उनकी जापान द्वारा मंचूरिया, इटली द्वारा अल्बानिया और इथेपिया पर अधिकार की भविष्यवाणी को किसी ने नहीं माना था पर 1939 से 1942 तक ही यह सब घटनाएं सच हो गई। हिटलर की सेनाएं डेनमार्क, बेल्जियम, लक्सेमबर्ग जीत चुकी थी। तब किसी ने पूछा- “ क्या हिटलर के विरुद्ध फ्राँस की भी पराजय हो सकती है ?” इस पर श्री वर्न ने बताया कि 20 जून 1940 को फ्रांस हार मान लेगा। 20 तो नहीं पर दो दिन बाद 22 को सचमुच फ्रांसीसियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

चीन अणुबम बना लेगा। मध्य पूर्व में आग भड़केगी और अरब की बहुत सी जमीन इजराइल के पास चली जायेगी। यह कथन भी सत्य होते लोगों ने देखे। इन भविष्यवाणियों का ही प्रभाव था कि एक समय फ्रांस और योरोप के अधिकांश नेता ग्रह- नक्षत्रों का पूरा ज्ञान नहीं लेते थे । स्वयं लार्ड माउन्टबेटेन ने माना था कि कोई अदृश्य सत्ता संसार में विचार पूर्वक काम कर रही है। यह प्रसंग मनुष्य के अहंकार कम करते हैं और उसे जीवन के सत्य के प्रति आग्रह शील होने की प्रेरणा भी प्रदान करते हैं।

श्री जूल वर्न की भविष्यवाणियों की एक रोचक शृंखला है उनमें से कितनी सच होती जा रही है और कितनी ही सच होने के लिए उत्सुकता बढ़ा रही है। उदाहरण के लिये- 1990 तक सारी पृथ्वी विशेषकर शहरी क्षेत्रों में फैक्ट्रियों तथा कल-कारखानों का धुआँ इतना अधिक बढ़ जायेगा कि 80 प्रतिशत वायु दूषित हो जायेगी। लोगों को अपने वजन से कुछ कम ही भार के शुद्ध आक्सीजन प्रदान करने वाले यंत्र शरीर से बाँध कर रखने पड़ेंगे। इस वायु प्रदूषण के कारण लोग पूरी तरह तो नष्ट के नहीं होगे पर उनकी स्थिति अर्द्ध विक्षिप्तों की सी होगी। बीमारियाँ बढ़ेगी साहस घटेगा। न केवल लोग भारतीयों का अनुगमन, वेष भूषा, खान पान, गृहस्थ सम्बन्धी के रूप में करेंगे वरन् भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति श्वेत जातियों का आकर्षण इतना अधिक बढ़ेगा कि सन 2000 तक दूसरे देशों में बीसियों हिन्दू देवी- देवताओं के मंदिरों की स्थापना हो चुकी होगी और उनमें लाखों लोग पूजा-उपासना भजन- कीर्तन और भारतीय पद्धति के संगीत का आनन्द लेने आने लगेंगे।

चीन अणुबम बनाकर भी एशिया का प्रभुता सम्पन्न देश नहीं बनेगा। उसकी भारतवर्ष से काफी समय तक शत्रुता रहेगी। भारत न केवल अपनी भूमि छुड़ा लेगा वरन् तिब्बत भी मुक्त हो जायेगा। उसके भारतवर्ष में मिल जाने की संभावनायें भी है। पाकिस्तान का कुछ भाग अफगानिस्तान ले लेगा कुछ भारतवर्ष। इस तरह उसका अस्तित्व अधिक दिन तक टिकेगा नहीं।

मनुष्य चन्द्रमा पर हो आने के बाद अन्य ग्रहों की टोह लेगा। 1985 तक सौरमण्डल के बारे में प्लूटो तक की जानकारियां उपलब्ध हो जायेगी और मानव अंतरिक्ष यान शुक्र या मंगल अथवा दोनों तक जाकर लौट आयेंगे। “गुरुत्वाकर्षण” पर मनुष्य का नियन्त्रण हो जायेगा और अणु शक्तियों से भी शक्तिशाली शक्तियों की खोज हो जायेगी। संसार के किसी सर्वाधिक प्राचीन पर्वत से जो वर्ष भर बर्फ से ढका रहता है कुछ ऐसी सामग्री, स्वर्ण-मुद्राओं का भण्डार मिल सकता है जो ईसा के पूर्व के इतिहास को बिलकुल ही बदल सकता है। यही नहीं उससे सम्बन्धित देश इतना शक्तिशाली हो सकता है कि रूस, अमरीका, ब्रिटेन,फ्राँस और जर्मनी मिलकर भी उसका सामना करने में समर्थ न हो। इसी प्रकार किसी भू-भाग से एक रहस्यमय शक्ति का अभ्युदय होगा जो आज तक कि इतिहास का सबसे अधिक समर्थ व्यक्ति सिद्ध होगा। उसके बनाये विधान सारे संसार में लागू होगे और सन 2050 तक वह सारी पृथ्वी को एक संघीय राज्य में बदल देंगे।

सन् 1970 से 1980 तक 10 वर्ष भीषण प्राकृतिक हलचलें होगी। वायु दुर्घटनायें, अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, भूकंप आदि बढ़ेंगे। तुर्की का अधिकाँश भाग भूकंप से नष्ट हो जायेगा। अरब में गृहयुद्ध हो जायेगा उसका लाभ इजरायलियों को मिलेगा। 1972 तक समुद्र के किनारे के कई भूभाग, कई टापू बिलकुल नष्ट हो सकते हैं और कई नये टापू निकलकर आ सकते हैं। नवोदित टापू में किसी शक्तिशाली जाति का अधिकार होगा। उनमें बहुत से रत्नों का ढेर मिलेगा जो उस जाति की आर्थिक समृद्धि बढ़ायेगा।

सन् 2000 तक विश्व की आबादी 640 करोड़ रुपये के लगभग होगी उसका अधिकांश अमरीका और एशिया में होगा। परमाणु युद्ध तो नहीं होगे पर वर्ग संघर्ष बढ़ेगा। एक ओर संघर्ष हो रहे होगे दूसरी ओर एक बिलकुल धार्मिक क्रान्ति उठ खड़ी होगी जो ईश्वर और आत्मा के नये रहस्य प्रकट करेगी। विज्ञान उनकी पुष्टि करेगा फलस्वरूप नास्तिकता और वाम पंथ नष्ट होता चला जायेगा और उसके स्थान पर लोगों में आस्तिकता, न्याय, नीति, श्रद्धा और कर्तव्य परायणता के भाव उगते हुए चले जायेंगे। यह परिवर्तन ही विश्व शान्ति के आधार बन सकते हैं।

परिवर्तन की भविष्यवाणी मशीन द्वारा

कैलीफोर्निया (अमरीका) की रैण्ड कारपोरेशन ने “एलेक्ट्रानिक ओरेकल” नामक एक ऐसी मशीन बनाई है जो अब तक की ऐतिहासिक, राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक जानकारियों के आधार पर भविष्यवाणी करती है। यह जानकारियाँ इस यंत्र में लगे सैकड़ों कंप्यूटरों में इलेक्ट्रानिक रूप में भरी गई है। इस मशीन द्वारा की गई अधिकाँश भविष्यवाणियाँ सत्य निकलती है। “ओरेकल” का विचार है 1985 के आस-पास पृथ्वी में एक बहुत बड़ी विचार क्रान्ति होगी जो संसार की परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन लायेगी। इस विचार क्रान्ति की रूपरेखा बताने में मशीन ने असमर्थता प्रकट की है।

इस प्रकार परिवर्तन की आवाज कहाँ से उठेगी और कौन उसका संचालन करेगा यह पूछे जाने पर वर्न ने बताया- जैसा कि मुझे आभास होता है यह आध्यात्मिक क्रान्ति भारतवर्ष से ही उठेगी। उसके संचालन के बारे में मेरे विचार जीन डिक्सन से भिन्न यह है कि वह व्यक्ति सन् 1962 से पूर्व ही जन्म ले चुका था। इस समय उसे भारतवर्ष में किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न होना चाहिए। यह व्यक्ति भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी रहा होना चाहिए और उसके अनुयायियों की बड़ी संख्या भी है। उसके अनुयायी देखते ही देखते सारे विश्व में अपना प्रभाव जमा लेंगे और असंभव दीखने वाले परिवर्तनों को आत्म-शक्ति के माध्यम से सरलता व सफलता पूर्वक सम्पन्न करेंगे।

श्री वर्न भविष्य के प्रति उत्सुकता को आत्मा की अविनश्वरता का प्रमाण मानते हैं जो ठीक भी है। कभी नाश न होने का आत्म-विश्वास शरीर को नहीं होता क्योंकि वह तो मरणशील है ही पर आत्मा तो अमर है इसलिए उसकी जितनी जिज्ञासा भूत के अस्तित्व के प्रति होती है उससे अधिक भावी परिवर्तन के प्रति। यदि इनके प्रति मनुष्य अपने बुद्धि-विवेक, सूझ-बूझ और पुरुषार्थ को भी युक्त कर दे तो न केवल एक व्यक्ति वरन् सम्पूर्ण मानव जाति का भविष्य बदल कर उसे उज्ज्वल बनाया जा सकता है। ये कार्य जब मनुष्य अपने आप नहीं कर पाते तब महापुरुष और सहायक जाग्रत आत्मायें पृथ्वी पर आती है और ईश्वरीय इच्छा के अनुरूप संसार का निर्माण करती है। वर्न का विश्वास है अगले दिनों इस इतिहास की पुनरावृत्ति होने वाली है, उस परिवर्तन को कोई रोक नहीं सकेगा।


जीव-जंतुओं की आशा-विधाता की निराशा

जीव-जंतुओं की आशा-विधाता की निराशा-

प्रजापति ब्रह्मा ने वृक्ष बनाये, वनस्पति बनाई, छोटे -छोटे जीव- जन्तु बनाये, बड़े-बड़े जीवधारी बनाये, पशु और पक्षी बनाये और जब देखा कि उनमें से एक भी सृष्टि को व्यवस्थित रख सकने में समर्थ नहीं, हर जीव खुदगर्ज साबित हुआ तब विधाता ने सम्पूर्ण प्रतिभा और ज्ञान सम्पन्न मनुष्य का निर्माण किया। मनुष्य को अपने समान क्षमतावान् देखकर विधाता की चिंता दूर हुई। सृष्टि की व्यवस्था मनुष्य को सौंप कर उन्होंने अपनी थकावट मिटाने के लिए लेट लगाई और शयन करने लगे।

एक हजार वर्ष की नींद टूटी तो विधाता ने देखा द्वार पर जीव-जंतुओं की भारी भीड़ जमा है। विधाता को जगाने और अपनी शिकायत पेश करने के लिए सब किवाड़ खटखटा रहे थे। चकित विधाता दरवाजा खोल कर बाहर निकले और जीवों से उनके दुःख का कारण पूछा। जीवों के प्रमुख प्रतिनिधियों ने बताया- भगवन्! आपने मनुष्य को बनाया था सृष्टि की व्यवस्था के लिए पर यह तो हम सब को ही सताये और नष्ट किये डाल रहा है।

सृष्टि का सौंदर्य नष्ट होता देख विधाता चिन्तित हुए और बोले- बच्चों दुःख न करो! मनुष्य ने अपनी सद्बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदल कर आप लोगों को इतना अहित नहीं किया जितना उसने अपना पतन किया है। जाओ कुछ दिन और प्रतीक्षा करो एक दिन उसकी यह दुर्बुद्धि ही उसे पशुवत् जीवन में ले जायेगी तब वह स्वयं अनुभव करेगा कि यदि -” हम भी पशुओं की तरह ही काम, क्रोध, मोह, मद और मत्सर प्रधान जीवन जीते हैं तो मनुष्य शरीर पाने का क्या लाभ ?” यह ज्ञान ही उसे पश्चाताप और सुधार की प्रेरणा देगा तभी सुख-शान्ति स्थापित होगी।

जीव-जंतु संतोष कर चले आये। हजारों वर्ष बीतने को आये वे अब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं मनुष्य को कब ज्ञान आये, कब वह मनुष्येत्तर प्राणियों सा निन्दनीय जीवन त्याग कर सृष्टि व्यवस्था संभाले।


अनासक्ति ही आत्मशाँति का हेतु!

बहुत प्राचीन काल में महावृष देश पर जनश्रुति नामक राजा राज्य करते थे। वे बड़े ही न्यायी, सत्यवादी, वीर , दानी तथा प्रजा वत्सल थे। उन्हें अपनी प्रजा के लिए हर एक नर-नारी के प्रति निज की संतानवत् ही स्नेह था।

उनका यह नित्य का नियम था कि सौ दुधारू पशु मात्रा में अन्न, वस्त्र तथा स्वर्ण मुद्राओं का दान करके ही भोजन ग्रहण करते थे। दानशीलता में उस समय उनकी कर का अन्य कोई नृपति नहीं था।

सब कुछ था, फिर भी आत्मा में शाँति नहीं थी। बड़े से बड़ा दान देकर भी उन्हें आत्म संतोष न मिल पाता। वे यही सोचते रहते कि “मैं असंख्य नर नारियों को नित्य अतुल दान दिया करता हूँ- मेरे समान कोई अन्य दयालु, उदार तथा दानशील शासक नहीं । “ और यही भावना उस समय चिंता का कारण बन जाती, जब उन्हें यह भावना होने लगती कि “कही कोई अन्य व्यक्ति मुझसे अधिक दानशील अथवा कृपालु तो नहीं।”

उनका यह अहं आंशिक ही सही- ईर्ष्या का भाव कभी उन्हें चैन न लेने देता और वे सदा मानसिक शाँति से वंचित ही रहते।

एक दिन वे अपनी प्रजा की वास्तविक स्थिति का परिचय पाने हेतु राज्य में भ्रमण कर रहे थे। वेश बदला हुआ था तभी उधर से दो व्यक्ति बात करते हुए निकले।

एक कह रहा था, “ राजा जनश्रुति के राज्य में हम कितने सुखी है। किसी प्रकार की चिन्ता अथवा अभाव हमें नहीं। योग्य शासक के रूप में तीनों लोकों में जनश्रुति की ख्याति फैल रही है। उनकी दानशीलता की कोई सीमा नहीं। “

तभी बीच में बात काटता हुआ दूसरा व्यक्ति बोला, “ हाँ भई- तुम ठीक कहते हो। पर सहस्रों व्यक्तियों को सुख-समृद्धि देने वाला यह नर रत्न - स्वयं आत्मिक शान्ति से वंचित है जो संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उससे तो वह रेकवा गाड़ी वाला कही उत्तम है। जिसने इस लोक की तथा लोकोत्तर शान्ति भी प्राप्त कर ली है। उसका पुण्य जनश्रुति की अपेक्षा कही अधिक है।

जनश्रुति ने यह सब सुना और उसी क्षण से उसका अहं हिम की शिला की भाँति बूँद बूँद कर गलने लगा। विवेक झकझोरने लगा। हृदय में अपने आप के प्रति एक हीन भावना का समावेश हो गया और आत्मा तड़प उठी उस नाचीज से गाड़ी वाले के दर्शनों के लिए- जो उनसे कही अधिक पुण्यवान कहा जा रहा था।

इस अहं भाव तथा आत्म प्रशंसा की छोटी दुर्बलता के होते हुए भी- नृपति में सच्चे ज्ञान के प्रति असीम तृषा थी।

दूसरे दिन ही भृत्यों को आज्ञा दी गई कि “ कही से भी, किसी भी प्रकार उस रेकवा गाड़ीवान् को ढूंढ़ निकाला जाए। “

पर अभी केवल रस्सी जली थी- बल नहीं गया था। रेकवा को ढूंढ़ लिया गया। सूचना राजा को दे दी गई। जनश्रुति छः सौ दुधारू गाये, सैकड़ों अश्वों सहित रथ, असंख्य स्वर्ण मुद्राएं तथा प्रचुर मात्रा में बहुमूल्य सामग्री लेकर रेकवा के निवास स्थान पर पहुँचे। किन्हीं साधु सन्त अथवा धार्मिक प्रवृत्ति के महापुरुषों से मिलने जाते समय उनकी दानशीलता कुछ अधिक ही विकसित हो जाया करती थी।

पर यह क्या ? जनश्रुति ने रेकवा को प्रणाम किया- उत्तर में रेकवा ने शुभ आशीर्वाद से भरे मंगल वचन कहे। तब नृपति के कहने पर कि” यह तुच्छ भेंट आपके लिए लाया हूँ - स्वीकार करके मुझे कृतार्थ करे “ रेकवा ने मंद हास्य के साथ कहा- तुम आध्यात्मिक ज्ञान पिपासा की शाँति हेतु यहां आये हो तब इन सब वस्तुओं की क्या आवश्यकता थी ? मैं क्या करूंगा इन्हें ले कर ? आप देखते हैं मेरी कुटी बहुत छोटी है। यह सब कुछ तो राजमहलों में ही शोभा देता है। आपका आना भर पर्याप्त होता। जब इन सब वस्तुओं की सारहीनता का बोध हो जाय तब चले आना- जो कुछ भी मेरे पास होगा- वह तुम्हारे जैसे जिज्ञासुओं के लिए ही है। “

जनश्रुति हतप्रभ होकर राजमहल लौट आये। उस दिन नींद भी नहीं आई। बेचैनी से पार्श्व लेते हुए ही रात्रि के तीन पहर बीत गये। चतुर्थ प्रहर में कही नींद लगी। रेकवा ने वे सब वस्तुएं स्वीकार नहीं की- इस बात का जनश्रुति के हृदय पर बड़ा गहरा असर हुआ था। आज उन्हें लगा कि आज तक मैंने जो भी दान, पुण्य किया वह सब निरर्थक, निरुद्देश्य ही था। पर इससे उनके हृदय में रेकवा के प्रति जो श्रद्धा तथा निष्ठा के भाव थे वे असीम हो उठे थे।

प्रातः होने पर नित्य की भाँति चारण आये और उनके गुणगान करते हुए गायन प्रारम्भ किया पर आज उन्हें वह प्रशंसा सारहीन-सी जान पड़ी। जनश्रुति आज भौतिक जगत से कही दूर- अपने आत्म भवन में ही रम रहे थे। तत्काल गुणवान की प्रक्रिया रुकवा दी गई। जनश्रुति की उद्विग्नता आज चरम सीमा पर थी । अब उन्हें ऐसा लग रहा था कि जब तक रेकवा से न मिलूँ - मुझे चैन नहीं मिलेगा। आज उन्हें वे सब गाथाएं भी याद आ रही थी जो रेकवा का पता लगाने गये हुये भृत्यों ने आकर सुनाई थी- कि किस प्रकार से सैकड़ों व्यक्ति अपनी चिंताएँ, उलझने तथा समस्याएं लेकर जाते है- और उस निरीह गाड़ीवान् से मानसिक परितोष लेकर लौटते हैं।

जनश्रुति बिना कुछ खाये-पिये ही चल दिये और रेकवा के समक्ष पहुंचे। आज न दल-बल साथ में था न कुछ भेंट-चढ़ावा। आज थी मुख मुद्रा में असीम गंभीरता, नयनों में चातक जैसी दर्शन-लालसा, हृदय में अपार वेदना, मन में अमित श्रद्धा तथा आत्मा में अनन्त ज्ञान की प्यास।

रेकवा उन्हें देखते ही प्रसन्नता से खिल गया। सादर बिठाया और कहा “राजन! आज आपने आध्यात्मिक शान्ति का राजमार्ग पा लिया है। “

राजा अवाक् थे। बड़ी मुश्किल में कह सके “ अभी कहाँ पाया है भगवन्! वह आपके अनुग्रह के बिना कहा प्राप्त होगा! अभी तक का जीवन निरर्थक ही चला गया अब आपकी कृपा हो जाये तो इस तप्त मानस पर शीतलता के कुछ छींटे पड़ जाये।

रेकवा ने कहा “ निरर्थक तो सृष्टि में एक कणिका भी नहीं है नरश्रेष्ठ! अभी तक आपने जो दान, पुण्य, प्रजा की सेवा अथवा कार्य किये, वे यश तथा प्रशंसा की भावना से किये। और यश-प्रशंसा तथा आदर आपको उन उपकरणों के माध्यम से मिला भी। “

जनश्रुति की जिज्ञासा अब कुछ और आश्चर्य मिश्रित होती जा रही थी। रेकवा जो एक साधारण गाड़ी हाँकने वाला था- इतना बड़ा दार्शनिक लग रहा था कि जनश्रुति का हृदय झुका जा रहा था।

तब फिर जनश्रुति ने प्रश्न किया “ पर आत्मा को शाँति नहीं मिली है अब तक। मैं राज्य, भोग, सुख, सुविधाएँ सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ देव! बस मुझे संतोष चाहिए- तृप्ति चाहिए- शाँति चाहिए। “

रेकवा अब भी अपने स्वाभाविक मंद हास्य के बीच डूबता इतराता प्रसन्न हो रहा था। उसने स्नेह से कहा “ अधीर न हो नृपवर! राज्य अथवा सुख के साधन कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं है आपको। बस इन सबके प्रति मन में जो आसक्ति का भाव है- उसे ही त्यागने से काम चल जाएगा। राज्य करिये- पर अपने आप को सेवक समझ कर। सुख साधनों का उपयोग करिए यह सोच कर कि यह सब आपके उस शरीर की सुरक्षा के लिए है- जिस पर सम्पूर्ण देश की सुरक्षा का भार है। दान भी खूब करिये, पर यही सोच कर कि वे सब वस्तुयें परमात्मा ने आपको केवल इसलिए दी है कि आप उन्हें दीन, पीड़ित तथा असहाय व्यक्तियों तक पहुंचा दे जो उनके सच्चे अधिकारी है। अपने आप को कर्त्ता न मान कर केवल माध्यम मान ले। आत्मा की शाँति और कही नहीं- आत्मा में ही छिपी होती है राजन्! उसे जाग्रत करने भर की देर होती है बस! जो इस तथ्य को देख लेता है वही वास्तव में दृष्टा है। आत्मा समस्त शक्तियों का भण्डार है। और यह भण्डार असीम है- अनंत है। “

जनश्रुति इस ज्ञानामृत का पान उसी प्रकार कर रहे थे , जैसे प्रथम पावस के जल को ग्रीष्म से तपी धरती बूँद-बूँद पी जाती है।

अब राजा अपने निवास स्थान की ओर लौट रहे थे। आज उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे कोई बोझ सा रखा था- वह अचानक ही आज हट गया है। तत्वज्ञानी रेकवा का एक एक शब्द स्मृति पटल पर जैसे शिला लेख की भाँति कर खुद कर गहरा हो गया था। राजा विचार कर रहे थे कि अभी तक कहाँ मैं अन्धकार मैं भटक रहा था। ये सन्त रेकवा एक साधन हीन सा दिखने वाला व्यक्ति अपने अन्दर कितना बड़ा व्यक्तित्व समेटे है। चारों ओर से ज्ञान एकत्रित होकर इसकी आत्मा में उसी प्रकार भर उठा है जैसे झील अपने चारों की ऊंचाइयों का जल अपने आप में खींचती रहती है और असंख्य प्राणियों के तृषा निवारण का उपकरण बन जाती है।

उस दिन से जनश्रुति के जीवन में जो परिवर्तन आये उन्हें लोगों ने खुली आंखों देखा तथा अनुभव किया। अब दिन रात वे भी असीम तृप्ति, अभेद्य शाँति तथा अखंड आनन्द का पान किया करते थे। आत्मा की सात्विकता का स्त्रोत जैसे फूट कर झर-झर करता बह रहा था।


आत्म कल्याण की साधना

एक नवयुवक, एक सिद्ध महात्मा के आश्रम में जाया करता था। महात्मा उसकी सेवा से प्रसन्न हो बोले- ‘ बेटा! आत्म कल्याण ही मनुष्य जीवन का सच्चा लक्ष्य है इसे ही पूरा करना चाहिए। “ यह सुन युवक ने कहा- ‘ महाराज! वैराग्य धारण करने पर मेरे माता पिता कैसे जीवित रहेंगे ? साथ ही मेरी युवा पत्नी मुझ पर प्राण देती है वह मेरे वियोग में मर जायेगी। ‘ महात्मा बोले- ‘कोई नहीं मरेगा बेटा! यह सब दिखावटी प्रेम है। तू नहीं मानता तो परीक्षा कर ले।’ युवक राजी हो गया तो महात्मा ने उसे प्राणायाम करना सिखाया और बीमार बन कर साँस रोक लेने का आदेश दिया। युवक ने घर जाकर वही किया। बड़े-बड़े वैद्यों की चिकित्सा हुई परन्तु दूसरे दिन ही उसने साँस रोक ली। घर वाले उसे मरा समझ हो-हल्ला मचाने तथा पछाड़ खाने लगे। पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गये।

तभी महात्मा जी वहाँ आ पहुँचे और युवक को देख कर उसकी गुण गरिमा का बखान करते हुए बोले कि ‘हम लड़के को जीवित कर देंगे, परन्तु तुम्हें कुछ त्याग करना पड़ेगा।’ घर वाले बोले कि ‘आप हमारा सारा धन, घर-बार यहाँ तक प्राण भी ले ले, परन्तु इसे जीवित कर दे।’ महात्मा बोले ‘एक कटोरा दूध लाओ।’ तुरन्त आज्ञा का पालन किया गया। महात्मा ने उसमें एक चुटकी राख डाल कर कुछ मंत्र सा पढ़ा और बोले- ‘ जो कोई इस दूध को पी लेगा वह मर जायेगा, और यह लड़का जीवित हो जायेगा।’ अब समस्या यह थी कि दूध को कौन पीवे ? माता-पिता बोले- ‘कही न जिया तो एक जान और गई। यदि हम रहेंगे तो पुत्र और हो जायेगा।’ पत्नी बोली- ‘इस बार जीवित हो जायेंगे तो क्या है, फिर कभी मरेंगे।’ मरना तो पड़ेगा ही। इनके न रहने पर मायके में सुख से जिन्दगी काट लूँगी। रिश्तेदार बगलें झाँकने लगे और पड़ोसी तो पहले ही नदारद हो गए। तब महात्मा ने कहा- ‘अच्छा, मैं ही इस दूध को पिये लेता हूँ।’ तो सभी प्रसन्न होकर बोले- ‘ हाँ महाराज! आप धन्य है। साधु संतों को जीवन ही परोपकार के लिए है।’ महात्मा ने दूध पी लिया और युवक को झकझोरते हुए बोले- ‘उठ बेटा! अब तो तुझे पूरी तरह ज्ञान हो गया कि कौन तेरे लिए प्राण देता है ?’ युवक तुरन्त उठ पड़ा और महात्मा के चरणों में गिर पड़ा। घर वालो के बहुत रोकने पर भी वह महात्मा के साथ चला गया और साँसारिक मोह त्याग कर आत्म कल्याण की साधना में लग गया।


अपनों से अपनी बात - हमारे जीवन की अदृश्य अनुभूतियां

अपनी अध्यात्म साधना की दो मंजिले 24 वर्ष में पूरी हुई। मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् आदर्शों में व्यतिक्रम प्रायः युवावस्था में ही होता है। काम और लोभ की प्रबलता के वही दिन है सो 15 वर्ष की आयु से लेकर 24 वर्षा से 40 तक पहुंचते पहुँचते वह उफान ढल गया। कामना, वासनायें, तृष्णा, महत्वाकांक्षायें प्रायः इसी आयु में आकाश पाताल के कुलावे मिलाती है। यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों ही प्रयुक्त किया जाता है।

उठती उम्र के लोग अर्थव्यवस्था से लेकर सैन्य चालन तक अनेक महत्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाते हैं और उन्हें उठाने चाहिये। महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों में बहुत अवसर रहता है। सेवा कार्य में योगदान भी नवयुवक बहुत दे सकते हैं लोक मंगल के लिए नेतृत्व करने की वह अवधि नहीं। शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द, रामदास, मीरा, निवेदिता जैसे थोड़े ही अपवाद ऐसे है जिन्होंने उठती उम्र में ही लोक मंगल के नेतृत्व का भार कंधों पर सफलता से वहन किया हो। आमतौर से कच्ची उम्र गड़बड़ी ही जाती है। यश, पद की इच्छा, धन का प्रलोभन, आकर्षण के बने रहते जो सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं वे उलटी विकृति पैदा करते हैं। अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता है।

यों बुराई भलाई किसी आयु विशेष से बंधी नहीं रहती। पर प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है जिसके कारण युवावस्था महत्वाकांक्षाओं की अवधि मानी गई है। ढलती उम्र के साथ -साथ सम्भवतः आदमी कुछ ढीला पड़ जाता है तब उसकी भौतिक लालसाएं भी ढीली पड़ जाती है। मरने की बात याद आने से लोक परलोक, धर्म कर्म भी रुचता है इसलिए तत्व वेत्ताओं ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है।

न जाने क्या रहस्य था कि हमें हमारे मार्ग दर्शक से उठती आयु में तपश्चर्या के कठोर प्रयोजन में उन्मुक्त कर दिया और देखते-देखते उसी प्रयास में 40 साल की उम्र पूरी हो गई। हो सकता है वर्चस्व और नेतृत्व के अहंकार का- महत्वाकांक्षाओं और प्रलोभनों में बह जाने का- खतरा समझा गया हो। हो सकता है आन्तरिक परिपक्वता - आत्मिक बलिष्ठता पाये बिना कुछ बड़ा काम न बन पड़ने की आशंका की गई हो। हो सकता है महान् कार्यों के लिए अत्यन्त आवश्यक संकल्पबल, धैर्य, साहस और संतुलन परखा गया हो। जो ही अपनी उठती आयु उस साधन क्रम में बीत गई जिसकी चर्चा पिछले अंक में कर चुके है।

उस अवधि में सब कुछ सामान्य चला, असामान्य एक ही था- हमारा गौ घृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीपक। पूजा की कोठरी में वह निरन्तर जलता रहता। इसका वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था कुछ ठीक से कह नहीं सकते। गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश- अनुशासन सो अनुशासन समर्पण सो समर्पण। एक बार जब ठोक बजा लिया और समझ लिया कि इसकी नाव में बैठने पर डूबने का खतरा नहीं है तो फिर आँख मूँदकर बैठ ही गये। फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से अधिक प्यारा होता है अपनी अन्धश्रद्धा कहिये अनुशासन प्रियता, या जीवन की जो दिशा निर्धारित कर दी गई, कार्य पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये। अखण्ड दीपक की साधना कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आती है। जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्व है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो वह प्राण प्रिय ही बन गया। 24 वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा सो उसे आजीवन चालू रखा जायेगा। हम अज्ञातवास गये थे- अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्म पत्नि संजोये रखेगी। यदि एकाकी रहे होते पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी अखण्ड दीपक संजोये रखना कठिन था। अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्म पत्नी ने असाधारण योगदान दिया है।

हो सकता है अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का स्वरूप हो। धूप बत्तियों का जलना, हवन सामग्री की- जप मंत्रों धारण की और दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की कोई स्वसंचालित प्रक्रिया बन जाती हो। हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि जल का संयोग रेल इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करना हो। हो सकता है अंतर्ज्योति जगाने में इस ब्राहा ज्योति से कुछ सहायता मिलती हो, जो ही अपने को इस अखण्ड ज्योति में भावनात्मक प्रकाश, अनुपम आनन्द, उल्लास से भरा पूरा मिलता रहा। बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर ही बाहर जलता दीखा, पीछे अनुभूति बदली और लगा कि हमारे अन्तःकरण में यही प्रकाश ज्योति ज्यों की त्यों जलती है और जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योर्तिमय हो रहा है। शरीर, मन और आत्मा में- स्थूल सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता का ध्यान करते रहे हैं सम्भवतः वह इस अखण्ड दीपक की ही प्रतिक्रिया रही होगी। सर्वत्र प्रकाश का समुद्र लहलहा रहा है और हम तालाब की मछली की तरह उस ज्योति-सरोवर में क्रीडा-कलोल करते विचरण करते हैं। इन अनुभूतियों, आत्मबल, दिव्य दर्शन और अन्तः उल्लास को विकासमान बनाने में इतनी सहायता पहुँचाई जिसका कुछ उल्लेख नहीं किया जा सकता। हो सकता है यह कल्पना ही हो पर सोचते जरूर है कि यदि यह अखण्ड ज्योति जलाई न गई होती तो पूजा की कोठरी के धुँधलेपन की तरह शायद अन्तरंग भी धुँधला बना रहता। अब तो वह दीपक दीपावली के दीप पर्व की तरह अपनी नस-नाड़ियों में जगमगाता दीखता है। अपनी भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही जब 32 वर्ष पूर्व यह पत्रिका प्रारम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगता था- पसन्द आता था “ अखण्ड ज्योति” रख दिया। हो सकता है उसी भावावेश में प्रतिष्ठापित पत्रिका का छोटा सा विग्रह संसार में मंगलमय प्रगति की प्रकाश किरणें बिखरने में समर्थ और सफल हो सका हो।

साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की किरणें फूट पड़ी। मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत् की साधना अपने काय कलेवर तक ही सीमित थी। दो आंखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख खोलकर उसे डरा भगा दिया। शरीर पर कड़े प्रतिबंध लगा दिये और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनमें आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी तो दुष्ट व्यवहार असंभव हो गया। मातृवत् परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई। शरीर ने सदा हमारा साथ दिया। मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर हरकतों से बाज आ गया। पीछे तो वह अपना पूरा मित्र और सहयोगी बन गया। स्वेच्छा से गरीबी वरण कर लेने- आवश्यकताएं घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले जाने और संग्रह की भावना छोड़ने से ‘परद्रव्य’ का आकर्षण चला गया। बाँटने और देने का चस्का जिसे लग जाता है, जो उस अनुभूति का आनन्द लेने लगता है उसे संग्रह करते बन नहीं पड़ता। फिर किस प्रयोजन के लिए परद्रव्य का पाप कमाया जाय ? गरीबी का- सादगी का- अपरिग्रही ब्राह्मण जीवन अपने भीतर एक असाधारण आनन्द, संतोष और उल्लास भरा बैठा है, इसकी अनुभूति यदि लोगों को हो सकी होती तो शायद ही किसी का मन परद्रव्य की पाप पोटली सिर पर लादने को करता। अपरिग्रही कहने भर जो है उसका अनुदान देने की प्रतिक्रिया अन्तः करण पर कितनी अनोखी होती है उसे कोई कहाँ जानता है ? पर अपने को तो यह दिव्य अनुभूतियों का भण्डार अनायास ही हाथ लग गया।

अगले कदम बढ़ने पर तीसरी मंजिल आती है- ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु।’ अपने समान सबको देखना। कहने सुनने में यह शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँच कर बात पूरी हो गई दीखती है पर वस्तुतः इस तत्व ज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्म सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का यही मूर्त रूप है कि हम हर किसी को अपना माने। अपने को दूसरों में और दूसरों को अपनों में पिरोया हुआ- घुला हुआ अनुभव करे। इस अनुभूति की प्रक्रिया यह होती है कि दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख अनुभव होने लगता है। ऐसा मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रहता, स्वार्थी की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दुःख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते हैं मानो यह सब अपने नितान्त व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किया जा रहा हो।

संसार में अगणित व्यक्ति पुण्यात्मा और सुखी है, सन्मार्ग पर चलते हुए और मानव जीवन को धन्य बनाते हुए अपना पराया कल्याण करते हैं यह देख सोचकर जी को बड़ी साँत्वना होती है और लगता है सचमुच यह दुनिया ईश्वर ने पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई है। यहाँ पुण्य और ज्ञान मौजूद है जिनका सहारा लेकर कोई भी आनन्द, उल्लास की- शान्ति और सन्तोष की दिव्य उपलब्धियाँ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकता है। पुण्यात्मा, परोपकारी और आत्मावलम्बी व्यक्तियों का अभाव यहां नहीं है। वे संख्या में कम भले ही हो पर अपना प्रकाश तो फैलाते ही है। धरती वीर- विहीन नहीं। यहाँ नर-नारायण का अस्तित्व विद्यमान है । परमात्मा कितना महान्, उदार और दिव्य हो सकता है इसका परिचय उसकी प्रतिकृति उन आत्माओं में देखी जा सकती है जिन्होंने श्रेय पथ का अवलम्बन किया और कांटों को तलुवों से रौंदते हुए लक्ष्य की ओर शान्ति, श्रद्धा एवं हिम्मत के साथ बढ़ते चले गये। मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाले इन महामानवों का अस्तित्व ही इस जगती को इस योग्य बनाये हुये है कि भगवान बार-बार नर तनु धारण करके अवतार लेने के लिए ललचाये। आदर्शों की दुनिया में विचरण करने वाले और उत्कृष्टता की गतिविधियों को अवलम्बन बनाने वाले महामानव बहिरंग में अभावग्रस्त दीखते हुए भी अन्तरंग में कितने समृद्ध और सुखी रहते हैं यह देखकर अपना चित्त भी पुलकित होने लगा। उनकी शान्ति अपने अन्तः करण को छूने लगी। महाभारत की वह कथा अक्सर याद आती रही जिसमें पुण्यात्मा युधिष्ठिर के कुछ समय तक नरक जाने पर वहाँ रहने वाले प्राणी आनन्द में विभोर हो गये थे। लगता रहा जिन पुण्यात्माओं की स्मृति मात्र से अपने को संतोष और प्रकाश मिला वे स्वयं न जाने कितनी दिव्य अनुभूतियों का अनुभव करते होगे।

इस कुरूप दुनिया में जो कुछ सौंदर्य है वह इन पुण्यात्माओं का ही अनुदान है। असीम अस्थिरता से निरन्तर प्रेत पिशाचों जैसा हाहाकारी नृत्य करने वाले अणु परमाणुओं से बनी- भरी इस दुनिया में जो स्थिरता व शक्ति है वह इन पुण्यात्माओं द्वारा उत्पन्न की गई है। प्रलोभनों और आकर्षणों के जंजाल के बंधन काटकर जिनने सृष्टि को सुरभित और शोभामय बनाने की ठान ली उनकी श्रद्धा ही इस धरती को धन्य बनाती रही है। जिनके पुण्य प्रयास लोक-मंगल के लिए निरन्तर गतिशील रहे, इच्छा होती रही इन नर-नारायणों के दर्शन और स्मरण करके पुण्यफल पाया जाय। जिनने आत्मा को परमात्मा बना लिया- उन पुरुष पुरुषात्तमों में प्रत्यक्ष परमेश्वर की झाँकी करके लगता रहा अभी भी ईश्वर साकार रूप में इस पृथ्वी पर निवास करते विचरते दीखते पड़ते हैं। इन पुण्यात्माओं का सान्निध्य प्राप्त करने में स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि आदि सबसे अधिक आनन्द पाया जा सकता है इस सच्चाई के अनुभवों ने हस्तामलकवत् स्वयं सिद्ध करके सामने रख दिया और कठिनाइयों से भरे जीवन क्रम के बीच इसी विश्व सौंदर्य का स्मरण कर उल्लसित रहा जा सका।

आत्मवत् सर्व भूतेषु की यह सुखोपलब्धि एकाँगी न रही, उनका दूसरा पक्ष भी सामने अड़ा खड़ा रहा। संसार में दुःख कम नहीं। कष्ट और क्लेश- शोक और सन्ताप- अभाव और दारिद्रय से अगणित व्यक्ति नारकीय यातनाएं भोग रहे हैं। समस्याएँ, चिंतायें और उलझने लोगों को खायी जा रही है। अन्याय और शोषण के कुचक्र में असंख्यों को बेतरह पिसना पड़ रहा है। दुर्बुद्धि ने सर्वत्र नारकीय वातावरण बना रखा है। अपराधों और पापों के दावानल में झुलसते, बिलखते, चीत्कार करते लोगों की नारकीय यातनाएं ऐसी है जिससे देखने , सुनने वालो के रोमाँच हो जाते हैं फिर जिन्हें वह सब सहना पड़ता है उनका तो कहना ही क्या ? सुख, सुविधाओं की साधन सामग्री इस संसार में कम नहीं है, फिर भी दुःख और दैन्य के अतिरिक्त कही कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। एक दूसरे को स्नेह सद्भाव का सहारा देकर व्यथा वेदनाओं से छुटकारा दिला सकते थे- प्रगति और समृद्धि की संभावना प्रस्तुत कर सकते थे पर किया क्या जाय जब मनोभूमि विकृत हो गई सब कुछ उलटा सोचा और अनुचित किया जाने लगा तो विष वृक्ष बोकर अमृत फल पाने की आशा कैसे सफल होती ?

सर्वत्र फैला दुःख, दारिद्रय, शोक, संताप किस प्रकार समस्त मानव प्राणियों को कितना कष्ट हो रहा है। पतन और पाप के गर्त में लोग किस शान और तेजी से गिरते मरते चले जा रहे हैं यह दयनीय दृश्य देखे, सुने तो अन्तरात्मा रोने लगी। मनुष्य अपने ईश्वरीय अंग अस्तित्व को क्यों भूल गया ? उसने अपना स्वरूप और स्तर इतना क्यों गिरा दिया ? यह प्रश्न निरन्तर मन में उठे पर उत्तर कुछ न दिया। बुद्धिमानी, चतुरता, समझ कुछ भी तो यहाँ कम नहीं है। लोग एक से एक बढ़कर कला-कौशल उपस्थित करते हैं और एक से एक बढ़कर चातुर्य चमत्कार का परिचय देते हैं पर यह इतना क्यों समझ नहीं पाते कि दुष्टता और निकृष्टता का पल्ला पकड़ कर वे जो पाने की आशा करते हैं वह मृग तृष्णा ही बनकर रह जायेगा केवल पतन और संताप ही हाथ लगेगा। मानवीय बुद्धिमता में यदि एक और कड़ी जुड़ गई होती समझदारी ने इतना और निर्देश किया होता कि ईमान को साबित और सौजन्य को विकसित किये रहना मानवीय गौरव के अनुरूप और प्रगति के लिए आवश्यक है तो इस संसार की स्थिति कुछ दूसरी ही होती। फिर सब सुख-शान्ति का जीवन जी रहे होते। किसी को किसी पर अविश्वास, सन्देह न करना पड़ता और कोई किसी के द्वारा ठगा, सताया नहीं जाता। तब यहाँ दुःख, दारिद्रय का अता पता भी न मिलता सदैव सुख-शान्ति की सुरभि फैली अनुभव होती।

समझदार मनुष्य इतना नासमझ क्यों जो पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख होता है इतनी मोटी बात को भी मानने के लिये तैयार नहीं होता। इतिहास और अनुभव का प्रत्येक अंकन अपने गर्भ में यह छिपाये बैठा था कि अनीति अपना कर- स्वार्थ संकीर्णता के आबद्ध रहकर हर किसी को पतन और संताप ही हाथ लगा है। प्रदत्त और निर्मल हुए बिना किसी ने भी शाँति नहीं पाई है। सम्मान और उत्कर्ष की सिद्धि किसी को भी आदर्शवादी रीति-नीति अपनाये बिना नहीं मिली है। कुटिलता सात पर्दे भेद कर भी अपनी पोल आप खोलती रहती है यह हम पग-पग पर देखते हैं फिर भी न जाने क्यों यही सोचते रहते हैं कि हम संसार की आंखों में धूल झोंक कर अपनी धूर्तता को छिपाये रहेंगे। कोई हमारी सुरभि संधियों की गन्ध न पा सकेगा और लुक छिपकर आँख मिचौनी का खेल सदा खेला जाता रहेगा यह सोचने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हजारों आंखों से देखने-हजारों कानों से सुनने और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा- किसी की भी धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता। वस्तुस्थिति प्रकट होकर रहती है और दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप खोलती और दुरभि संधियां आप बखानती है। यह सनातन सत्य और पुरातन तथ्य लोग समझ सके होते और अशुभ का अवलंबन करने पर दुर्गति होती है उसे अनुभव कर सके होते तो क्यों सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर कंटकाकीर्ण कुमार्ग पर भटकते ? और यों रोते बिलखते इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते।

दुर्बुद्धि का कैसा जाल जंजाल बिखरा पड़ा है और उससे कितने निरीह प्राणी- चीत्कार करते हुए फंसे जकड़े पड़े है, यह दयनीय दुर्दशा अपने लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गई। आत्मवत् सर्व भूतेषु की साधना ने विश्व मानव की इस पीड़ा की अपनी पीड़ा बना दिया लगने लगा- मानो अपने ही हाथ पांवों को कोई ऐंठ, मरोड़ और जला रहा हो। “सबमें अपनी आत्मा पिरोया हुआ है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए है” गीता का यज्ञ ज्ञान जहाँ तक पढ़ने सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्तःकरण में प्रवेश प्राप्त करे तो स्थिति दूसरी ही हो जाती है। अपने अंग अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित बेचैन करता है- अपने स्त्री, पुत्रों की पीड़ा जैसे अपना चित्त विचलित करती है ठीक वैसे ही आत्म-विस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दुःख अपना ही दुःख है और व्यथित पीड़ितों की वेदना अपने को ही नोचती फटकारती है।

पीड़ित मानवता की- विश्वात्मा की- व्यक्ति और समाज की व्यथा वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी। आँख, दाढ़ और पेट के दर्द से बेचैन मनुष्य व्याकुल फिरता है कि किस प्रकार - किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाय ? क्या किया जाय ? कहाँ जाया जाय ? की हलचल मन में उठती है और जो संभव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है। अपना मन भी ठीक ऐसे ही बना रहा। दुर्घटना में हाथ पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है। लगभग अपनी मनोदशा ऐसी हो तब से लेकर अद्यावधि- चली आती है। अपने सुख साधन जुटाने की फुरसत किसे है ? विलासिता की सामग्री जहर सी लगती है, विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई तो आत्म-ग्लानि से उस क्षुद्रता को धिक्कारा जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़प कर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे ? दर्द से कराहते बालक को मुँह मोड़कर पिता कैसे ताश शतरंज का साज सजाये ? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु की सम्वेदना जैसे ही प्रखर हुई निष्ठुरता उसी में गल जल कर नष्ट हो गई। जी में केवल करुणा ही शेष रह गई। वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत् बनी हुई है। उसमें कमी रत्ती भर भी नहीं हुई- वरन् दिन-दिन बढ़ोतरी ही होती गई।

सुना है कि आत्म-ज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्म-ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्म-ज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा-पूरा संदेह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो, जब भी प्रार्थना का समय आया तब भगवान से निवेदन यही किया। हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके, हमें समृद्धि नहीं वह शक्ति चाहिए जो आंखों के आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकें। बस इतना ही अनुदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र. देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करुणा की अनन्त संवेदनाओं से ओत-प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या कुछ कष्ट और अभाव है इसे सोचने की फुरसत ही कब मिली ? अपने को क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया है। केवल पीड़ित मानवता की व्यथा वेदना ही रोम रोम में समाई रही और यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। जो पाया उसका एक -एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्चा किया जिससे शोक संताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।

हमारी कितनी रातें सिसकती बीती है- कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर फूट-फूट कर रोये इसे कोई कहाँ जानता है ? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं , कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता समझते हैं पर किसने हमारा अन्तःकरण खोल कर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती । कहाँ तथा कथित आत्म ज्ञान को निश्चिंतता निर्द्वंदता और कहाँ हमारी करुण कराहों से भरी अन्तरात्मा। दोनों में कोई तालमेल नहीं। सो जब कभी सोचा यही सोचा कि अभी वह ज्ञान हमसे बहुत दूर है। शायद वह कभी मिले ही नहीं क्योंकि इस दर्द में ही जब भगवान् की झाँकी होती है, पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब कुछ चैन अनुभव होता है तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि को प्रयास करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नहीं जिसकी इच्छा ही नहीं वह मिला भी किसे है ?

पुण्य परोपकार की दृष्टि से कभी कुछ करते बन पड़ा ही सो याद नहीं आता। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कोई साधन बन पड़ा हो ऐसा स्मरण नहीं। आत्मवत् सर्व भूतेषु के आत्म-विस्तार ने सर्वत्र अपना ही आपा बिखरा दिखलाया तो वह मात्र दृष्टि दर्शन न रह गया। दूसरों की व्यथा वेदनायें भी अपनी बन गई और वे इतनी अधिक चुभन, कसक पैदा करती रही कि उन पर मरहम लगाने के अतिरिक्त और कुछ सूझा ही नहीं। पुण्य करता कौन ? परमार्थ के लिए फुरसत किसे थी ? विश्व मानव की तड़पन अपनी तड़पन बन रही थी सो पहले उसी से जूझना था, अन्य बाते तो ऐसी थी जिनके लिए अवकाश और अवसर की प्रतीक्षा की जा सकती थी। हमारे जीवन में क्रिया-कलापों के पीछे उसके प्रयोजन को कभी कोई ढूंढ़ना चाहे तो उसे इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि संत और सज्जनों की सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का जितने क्षण स्मरण दर्शन होता रहा उतने समय चैन की साँस ली। लोक-मंगल, परमार्थ, सुधार, सेवा आदि के प्रयास कुछ यदि हमसे बन पड़े तो उस संदर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह हमारी विवशता भर थी। दर्द और जलन ने क्षण भर चैन से न बैठने दिया तो हम करते भी क्या ? जो दर्द से इठा जा रहा है वह हाथ , पैर न पटके तो क्या करे ? हमारे अब के समस्त प्रयत्नों को लोग कुछ भी नाम है, किसी रंग में रंगे, असलियत यह है कि विश्ववेदना की आन्तरिक अनुभूति ने करुणा और संवेदना का रूप धारण कर लिया और हम विश्ववेदना को आत्मवेदना मानकर उससे छुटकारा पाने के लिए बेचैन घायल की तरह प्रयत्न प्रयास करते रहे। भावनायें इतनी उग्र रही कि अपना आपा तो भूल ही गये। त्याग, संयम, सादगी, अपरिग्रह आदि को दृष्टि से कोई हमारे कार्यों पर नजर डाले तो उसे इतना भर समझ लेना चाहिए कि जिस ढांचे में अपना अन्तःकरण ढल गया उसमें यह नितान्त स्वाभाविक था। अपनी समृद्धि, प्रगति सुविधा, वाहवाही हमें नापसंद हो ऐसा कहा नहीं जा सकता। उन्हें हमने जान बूझ कर त्यागा हो सो बात नहीं है। वस्तुतः विश्व-मानव की व्यथा अपनी वेदना बन कर इस बुरी तरह अन्तःकरण पर छाई रही कि अपने बारे में कुछ सोचने करने की फुरसत ही न मिली, वह प्रसंग सर्वथा विस्मृत ही बना रहा। इस विस्मृति को कोई तपस्या संयम कहे तो उसकी मर्जी। पर जब स्वजनों को अपनी जीवन पुस्तिका के सभी उपयोगी पृष्ठ खोलकर पढ़ा रहे हैं तो वस्तु स्थिति बता देना ही उचित है।

हमारी उपासना और साधना साथ-साथ मिल कर चली है। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये। वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता और विशालता मिले जिसके अनुसार अपने में सब को और सब को अपने में अनुभव किया जा सकना संभव हो सके। 24 महा गुरुचरणों का जप, ध्यान, तप, संयम सब इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं।

अपनी साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए समक्ष आये उतार चढावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो- और वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालो के लिए यह कैसे संभव हो सकता है ? इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूंढ़ना हो तो उसे हमारी जीवन यात्रा बहुत मार्ग-दर्शन कर सकती है। वस्तुतः हमने एक प्रयोगात्मक जीवन जिया है। आध्यात्मिक आदर्शों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है- और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है, हम इसी तथ्य की खोज करते रहे हैं ओर उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधि केन्द्रित करते रहे हैं। हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा-पूरा सहयोग रहा है सो अनावश्यक जाल-जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरलता उपलब्ध होती रही है। उसी की चर्चा इन पंक्तियों में कर रहे हैं कि जिन्हें इस मार्ग पर चलने की और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूंढ़ने की आवश्यकता है उन्हें अनुकरण के लिए एक सामाजिक आधार मिल सके।

आत्मिक प्रगति के पथ पर एक सुनिश्चित एवं क्रमबद्ध योजना के अनुसार चलते हुए हमने एक सीमा तक अपनी मंजिल पूरी करली है और उतना आधार प्राप्त कर लिया है जिसके बल पर यह अनुभव किया जा सके कि परिश्रम निरर्थक नहीं गया- प्रयोग असफल नहीं रहा। क्या विभूतियाँ या उपलब्धियां प्राप्त हुई इसकी चर्चा हमारे मुंह शोभा नहीं देती। इसके जानने सुनने और खोजने का अवसर हमारे चले जाने के बाद ही आना चाहिए। उसके इतने अधिक प्रमाण बिखरे पड़े मिलेंगे कि किसी अविश्वासी को भी विश्वास करने के लिए विवश किया जा सकेगा कि न तो आत्म विद्या का विज्ञान गलत है और न उस मार्ग पर सही ढंग से चलने वाले के लिए सफलता प्राप्त करने में कठिनाई है। इस मार्ग पर चलने वाला आत्म-शान्ति, आन्तरिक शक्ति और दिव्य अनुभूति की परिधि में घूमने वाली अगणित उपलब्धियों से कैसे लाभान्वित हो सकता है इसका प्रमाण ढूंढ़ने के लिए भावी शोध कर्त्ताओं की हमारी जीवन प्रक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। समयानुसार ऐसे शोध कर्ता उन विशेषताओं और विभूतियों के अगणित प्रमाण प्रत्यक्ष प्रमाण ढूंढ़ निकालेंगे जो आत्मवादी प्रभु परायण जीवन में हमारी ही तरह हर किसी को उपलब्ध हो सकना संभव है।


सत्य पथ तुमको बुलाता है।

(झलकन लाल वर्मा)


सत्य पथ तुमको बुलाता है (Kavita)

प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की । कल्पना चीखती है , छटपटाती है मधुर फल की॥

हृदय का रक्त करे दान यह मन्दिर गढ़ा हमने, अनेकों शीश हँस-हँस कर दिये इस पर चढ़ा हमने,

गिरा गौरव युगों से था किया फिर से खड़ा हमने, कठिनता से किया था प्राप्त अमृत का घड़ा हमने,

सुधा का घट हमारे पास तक आ ही नहीं पाया- कि होने लग गई वर्षा प्रतीक्षा पर हलाहल की। प्रतिष्ठा पा गई है मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

जहाँ देखो- वही पद के लिये पागल पिपासा है, घृणा, छल, द्वेष, हिंसा का भयंकरतम कुहासा है,

इन्हीं सबको समझ हमने लिया आधार जीवन का, न यह देखा कि है कितना बड़ा संसार जीवन का,

सुयश सौंदर्य मैला हो रहा है मान-सरवर का- उगलने लग गये है हंस के दल राशि कजल की। प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

चलो! लौटो कुपथ से- सत्य पथ तुमको बुलाता है, कुपथ देता नहीं कुछ- स्त्रोत जीवन के सुखाता हे,

समय की घोषणा सुनकर जो अपना पथ बदलते है- वही उत्कर्ष के तरु फूलते हैं और फलते हैं,

फंसा है संकटों में राष्ट्र देखो! आँख मत मूँदो, चिरन्तन सत्य के सिर पर न लाठी मारिये छल की। प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

*समाप्त*