पाप के स्वरूप में एक भयानक आकर्षण होता है, ऐसा आकर्षण जैसा एक शलभ के लिये दीप शिखा में। शिखा के सम्मोहन में फंसकर पतंगा अपने पंख जलाकर भी उसी की ओर रेंगता रहता है। यहाँ तक कि आखिर जलकर खाक ही हो जाता है।
क्या कारण है कि पाप के प्राणहन्ता सौन्दर्य की ओर मनुष्य दौड़ता रहता है। इसका प्रमुख कारण है सच्चे सौन्दर्य का साक्षात्कार न होना। यदि मनुष्य में शिव सौन्दर्य का दर्शन हो जाय तो वह पाप के झूठे आकर्षण में कदापि प्रेरित न हो। मनुष्य यदि एक बार सच्ची आंखों से अपनी आत्मा की ओर देखले तो उसे संसार के सारे पापों में घृणा हो जाय और वह निर्विकार हो उठे।
मनुष्य की इस सौन्दर्य विषयक भ्रान्ति ने ही इस स्वर्ग तुल्य पृथ्वी में बहु संख्यक व्यक्तियों के लिए नरक में परिणत कर रखा है। ऐसे लोग ईश्वर की प्रशंसनीय कृति-सुन्दरता में अपनी पाप-दृष्टि समेट कलुषित कर देते हैं। उनको प्रत्येक क्षण अपने नित्य स्वार्थ, पाशविक वासना, जघन्य रुचि की पूर्ति के अतिरिक्त और कोई विचार आता ही नहीं। इसके परिणाम स्वरूप वे स्वयं तो पतन के गर्त में गिरते ही है। अपने निकटवर्ती जनों के लिए भी काँटे बोते हैं। जिसे आत्म-कल्याण की तनिक भी इच्छा हो उसे सदैव पाप से घृणा करके चिन्तन ही करते रहना आवश्यक है ।
-रामकृष्ण परमहंस
पितामह ब्रह्माजी ने युद्ध की योजना बनाकर दी थी, विष्णु ने संगठित किया था, महर्षि दधीचि ने अस्थियाँ दी थीं जिससे वृत्रासुर को मारने वाला वज्र बना था-विजय इन योजनाओं और आयुधों में ही मिली थी किन्तु कृतघ्न अहंकार की जितनी निन्दा की जाये कम होगी, उसी अहंकार ने आज बिडौजा इन्द्र में आच्छादित कर लिया था। इन्द्र गाल बजाते घूम रहे थे-मैं न होता तो वृत्रासुर को कोई मार नहीं सकता था।
गुणों का सम्मान ही इस दृष्टि से दूसरे लोग प्रशंसा दे, सम्मान करे यह उचित ही नहीं आवश्यक भी है किन्तु व्यक्ति जब स्वयं ही कर्तापन का अभिमान हो जाता है तो वह अपने सहयोगियों की भी उपेक्षा करता है और भविष्य की सतर्कता को छोड़ बैठता है जिससे उसका पतन होने लगता है। परमपिता परमात्मा नहीं चाहते थे कि जो देवत्व इतने यत्नों के बाद विजयी हुआ वह अहंकार के कारण पतित हो जाये अतएव उन्होंने मधवन् का अहंकार नष्ट करने का निश्चय कर लिया।
विद्युत् चमकती है उसी प्रकार चौंध उत्पन्न हुई जब तक देवताओं की दृष्टि उधर उठे एक अनुपम काँति युक्त यक्ष समक्ष खड़ा दिखाई दिया। उसका मनोहारी सौन्दर्य देखते ही देवगण मोहित हो उठें ऐसा सौन्दर्य पहले कभी नहीं देखा था। इन्द्र ने अग्नि से कहा-जातवेद! टाप हम सब में पूज्य है , अग्रणी है आप ही जाकर पता लगायें यह यक्ष कौन है। हुताशन अपनी प्रशंसा सुन फूले न समाये। दीर्घ ज्वालायें लपलपाते हुये वे यक्ष के पास पहुँचे अहंकार प्रदर्शित कर पूछा-तुम कौन हो ?
यक्ष ने हँसकर कहा-अग्नि देव! अपनी शक्ति का अहंकार न करो-यदि तुम सचमुच इतने समर्थ हो तो इस तिनके को जलाकर दिखाओ। तिनके को देखकर हँसे मानो वह उनके लिये फूँक मारकर जला देने से भी सहज कार्य था। सारी शक्ति लगाकर प्रहार किया उन्होंने पर तिनके को न जला पाये। अग्नि अहंकार लेकर गये थे पराजय लेकर लौट आये।
इन्द्र ने तब महाबली मरुत को भेजा। मरुत से भी यक्ष ने वही बात कही। अपने बल का गर्व करने वाले पवनदेव भी तिनके को कण भर हिला तक न सके। तब क्रमशः वरुण, पृथ्वी और आकाश सभी ने शक्ति आजमाई पर उस तिनके का कोई कुछ भी बिगाड़ न सका। विस्मित इन्द्र स्वयं चल पड़े तिनके को पास जाकर देखा और फिर ऊपर दृष्टि उठाई तो वहाँ न कोई यक्ष था न उसकी छाया। इन्द्र बड़े विस्मित हुये और ध्यान लगाकर बैठ गये आखिर यह यक्ष कौन था ।
मन जब एकाग्र होता है और दत्त-चित्त होकर विराट् विश्व की-परिस्थितियों का, गतिविधियों का सर्वेक्षण करता है तब पता चलता है कि कर्तापन का अपना अहंकार नितान्त मिथ्या है। यह संसार अपने न रहने पर भी ज्यों का त्यों चलता रहता है। इसे चलाने और जीवन देने वाली तो कोई दूसरी ही महान् सत्ता है जब तक वह महान् चेतना अस्तित्व में है मनुष्य का अहंकार करना पाप ही तो है।
इन्द्र ने उस सत्ता को शीश झुकाया पुनः प्रकट हुए इन्द्र ने प्रणाम किया और कहा-भगवन् अपनी माया से समस्त देवों को परास्त करने वाले आप कौन हैं और यहाँ क्यों आये। यक्ष ने कहा-तात ! इस विश्व का अधिष्ठाता और कर्माध्यक्ष ब्रह्मा हूँ , तुमने अहंकार वश सेवा, त्याग और बलिदान की उन वृत्तियों को भुला दिया जिनके कारण तुम विजयी हुए थे । स्वयं-विजेता बनने का अहंकार हर कोई करने लगेगा तो श्रेष्ठ गुणों को कौन महत्व देगा ? यही पाठ पढ़ाने मुझे यहाँ आना पड़ा।
इन्द्र का मनोविकार धुल गया। उन्होंने भूल के लिये क्षमा माँगी और वहाँ से उठकर विश्व में पनप रही देव वृत्तियों के विकास और अभिनन्दन के लिये चल पड़े।
प्रत्येक कर्म का कोई अधिष्ठाता जरूर होता है। परिवार के वयोवृद्ध मुखिया के हाथ सारी गृहस्थी का नियन्त्रण होता है, मिलों-कारखानों की देख−रेख के लिये मैनेजर होते हैं, राज्यपाल-प्रान्त के शासन की बागडोर सँभालते हैं, राष्ट्रपति सम्पूर्ण राष्ट्र का स्वामी होता है। जिसके हाथ में जैसी विधि-व्यवस्था होती है उसी के अनुरूप उसे अधिकार भी मिले होते हैं। अपराधियों की दण्ड व्यवस्था, संपूर्ण प्रजा के पालन-पोषण और न्याय के लिये उन्हें उसी अनुपात से वैधानिक या सैद्धान्तिक अधिकार प्राप्त होते हैं। अधिकार न दिये जाये तो लोग
स्वेच्छाचारिता ,छल-कपट और निर्दयता का व्यवहार करने लगें। न्याय व्यवस्था के लिये शक्ति और सत्तावान होना उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है।
इतना बड़ा संसार एक निश्चित व्यवस्था पर ठीक-ठिकाने चल रहा है, सूरज प्रतिदिन ठीक समय से निकल आता है, चन्द्रमा की क्या औकात जो अपनी माहबारी ड्यूटी में रत्ती भर फर्क डाल दे, ऋतुएं अपना समय आते समय ही आती और लौट जाती है, टेसू गर्मी में ही फूलते हैं ,वर्षा तभी होती है जब समुद्र से मानसून बनता है। सारी दुनिया प्रकृति, सम्पूर्ण संसार ठीक व्यवस्था से चल रहा है, जो जरा-सा इधर-उधर हुआ कि उसने मार खाई। अपनी कक्षा से जरा डाँवाडोल हुये कि एक तारे को दूसरा खा गया। जीवन-क्रम में थोड़ी भूल हुई कि रोग-शोक, बीमारी और अकाल मृत्यु ने झपट्टा मारा । इतने बड़े संसार का नियामक परमात्मा बड़ा शक्तिशाली है।सत्तावान न होता तो कौन उसकी बात सुनता । दण्ड देने में उसने चूक की होती तो अनियमितता अस्तव्यस्तता और अव्यवस्था ही रही होती ।उसकी दृष्टि से कोई भी छुपकर पाप और और अत्याचार नहीं कर सकता । बड़ा कठोर वह ।दुष्ट को कभी क्षमा नहीं करना । इसी लिये वेद ने आग्रह किया है।
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहु कस्मैदेवाय हविषाविधेम॥ ऋ॰ वेद10।121।1
हे मनुष्यों ! बर्फ से आच्छादित पहाड़, नदियाँ , समुद्र जिसकी महिमा का गुणगान करते हैं। दिशायें उसकी भुजायें हम उस विराट विश्व पुरुष परमात्मा को कभी न भूलें।
गीता के “येन सर्वमिदं ततम “ अर्थात् “यह जो कुछ है वह परमात्मा से व्याप्त है” की विशद व्याख्या करते हुये योगिराज अरविन्द ने लिखा है-
“यह सम्पूर्ण संसार परमात्मा की ही सावररग्ण अभिव्यंजना है। जीव की पूर्णता या मुक्ति और कुछ नहीं और भगवान के साथ चेतना, ज्ञान, प्रेम और आध्यात्मिक सुख में एकता प्राप्त करना तथा भगवती शक्ति के कार्य संपादन में अज्ञान, पाप आदि से मुक्त होकर सहयोग देना है।यह स्थिति तब तक प्राप्त नहीं होती जब तक आत्मा अहंकार के पिंजरे में कैद है, अज्ञान में आवृत है तथा उसे आध्यात्मिक शक्तियों की सत्यता पर विश्वास नहीं होता । अहंकार का जाल ,शरीर ,मन,जीवन, शव, इच्छा, विचार , सुख और दुःख के संघर्ष ,पाप ,पुण्य, अपना ,पराया आदि के जटिल प्रपंच सभी मनुष्य में स्थित एक उच्चतर आध्यात्मिक शक्ति के बाह्य और अपूर्ण रूप मात्र है। महत्ता इसी शक्ति हैं, मनुष्य की नहीं ,जो प्रच्छन्न रूप से आत्मा में अधिगत है ।”
योगीराज के इस निबंध से तीन अत्यन्त महत्व पूर्ण सिद्धांत व्यक्त होते हैं । (1) यह संसार है परमात्मा से व्याप्त है उसके अतिरिक्त और सब मिथ्या है माया है भ्रम है, स्वप्न है। (1) मनुष्य को उसकी इच्छानुसार सृष्टि-संचालन के लिये कार्य करते रहना चाहिये।(3)मनुष्य में जो श्रेष्ठता ,शक्ति या सौन्दर्य है वह उसके दैवी गुणों के विकास पर ही है।
मनुष्य जीवन के सुख और शान्ति के लिये इन दोनों सिद्धांतों का पालन ऐसा ही पुण्य फलदायक है जैसा त्रिवेणी स्नान करना। मनुष्य दुष्कर्म अहंकार से प्रेरित होकर करता है पर वह बड़ा क्षुद्र प्राणी है, जब परमात्मा की मार उस पर पड़ती है तो बेहाल होकर रोता-चिल्लाता है। सुख तो उसकी इच्छाओं के अनुकूल सात्विक दिशा में चलने में ,प्राकृतिक नियमों के पालन करने में ही है। अपनी क्षणिक शक्ति के घमण्ड में आया हुआ मनुष्य कभी सही मार्ग पर नहीं चलता इसीलिये उसे साँसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। परमात्मा ने यह व्यवस्था इतनी शानदार बनाई है कि यदि सभी मनुष्य इसका पालन करने लगे तो इस संसार में एक भी प्राणी दुःखी और अभावग्रस्त न रहे।
ईश्वर उपासना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। नदियाँ जब तक समुद्र में नहीं मिल जाती अस्थिर व बेचैन रहती है।मनुष्य की असीमता भी अपने आपको मनुष्य मान लेने की भावना से ढकी हुई है।उपासना विकास की प्रक्रिया है। संकुचित का सीमा रहित करना, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ की ओर अग्रसर होना, “मैं” और मेरा छुड़ाकर “हम” और हमारे की आदत डालना ही मनुष्य के आत्म की ओर विकास की परम्परा है। पर यह तभी सम्भव है जब सर्व शक्तिमान परमात्मा की सत्ता को स्वीकार करलें, उसकी शरणागति की प्राप्ति हो जाय। मनुष्य रहते हुए उसकी मानवता को भेदकर उसे देव रूप में विकसित कर देना ईश्वर शक्ति का कार्य है। उपासना का अर्थ परमात्मा से शक्ति को प्राप्त करना ही है।
जान बूझकर या अकारण परमात्मा कभी किसी को दण्ड नहीं देता। प्रकृति की स्वच्छन्द प्रवृत्ति में ही सबका हित नियंत्रित है। जो इस प्राकृतिक नियम से टकराता है वह बार-बार दुःख भोगता है और तब तक वह वापस नहीं आता तब तक चैन नहीं पाता जब तक वापस लौटकर फिर उस सही मार्ग पर नहीं चलने लगता है। भगवान् भक्त की भावनाओं का फल तो देते हैं किन्तु उनका विधान सभी संसार के लिये एक जैसा ही है। भावनाशील व्यक्ति भी जब तक अपने पाप की सीमाएं नहीं पार कर लेता तब तक अटूट विश्वास, दृढ़ निश्चय रखते हुए भी उन्हें प्राप्त नहीं कर पाता । अपने से विमुख प्राणियों को भी वे दुःख दण्ड नहीं देते । दुःख दण्ड देने की शक्ति तो उनके विधान में ही । मनुष्य का विधान तो देश, काल और परिस्थितियों वश बदलता भी रहता है किन्तु उसका विधान सदैव एक जैसा ही है। भावनाशील व्यक्ति भी उसकी चाहे कितनी ही उपासना करे-साँसारिक कर्तव्यों की अवहेलना कर या देवी-विधान का उल्लंघन कर कभी सुखी नहीं रह सकते। जैसा कर्म बीज वैसा ही फल-यह उसका निश्चल नियम है दूसरों का तिरस्कार करने वाला कई गुना तिरस्कार पाता है। परमार्थ उसी तरह लौटकर असंख्य गुने सुख पैदा कर मनुष्य को तृप्त कर देता है। सुख और दुःख , बन्धन और मुक्ति मनुष्य के कर्म के अनुसार ही प्राप्त होते हैं। दुष्कर्मों का फल भागने से मनुष्य बच नहीं सकता इस विधान में कही राई रत्ती भर भी गुँजाइश नहीं है।
अशुभ कर्मों का सम्पादन और देह का जड़ अभिमान ही मनुष्य को छोटा बनाये हुए है। शुभ-अशुभ कर्मों के फल रूप सुख-दुःख का भोक्ता न होने पर भी आत्मा मोह वश होकर दुःख भोगती है। “मैं देह हूँ “ “मुझे सारे अधिकार मिलने ही चाहिये “ यह मान लेने से जीव स्वयं कर्ता-भोक्ता बन जाता है और इसी कारण वह “जीव”‘ कहलाता है। जब तक वह इतनी -सी सीमा में रहता है तब तक उसकी शक्ति भी उतनी ही तुच्छ और संकुचित बनी रहती है। जब वह इस भ्रम रूप देहाध्यास का परित्याग कर देता है तो वह शिव-स्वरूप,ईश्वर-स्वरूप हो जाता है।उसकी शक्तियाँ विस्तीर्ण हो जाती है और वह अपने आपको अनन्त शक्तिशाली , अनन्त आनन्द में लीन हुआ अनुभव करने लगता है।
अपनी तुच्छ सत्ता को परमात्मा की शरणागति में ले जाने से मनुष्य अनेकों कष्ट-कठिनाइयों से बच जाता है और संसार के अनेक सुख को का उपभोग करता है। गृहपति की अवज्ञा करके जिस तरह घर कोई भी सदस्य सुखी नहीं रह सकता उसी प्रकार परमात्मा का विरोध भी कभी सुखी या सन्तुष्ट नहीं रह सकता। परमात्मा की अवमानना का अर्थ है उसके सार्वभौमिक नियमों का पालन न करना। अपने स्वार्थ, अपनी तृष्णा की पूर्ति के लिये कोई भी अनुचित कार्य परमात्मा को प्रिय नहीं । इस तरह की क्षुद्र बुद्धि का व्यक्ति ही उसके कोप का भाजन बनता है पर जो विश्व-कल्याण की कामना में ही अपना कल्याण मानते और तदनुसार आचरण करते हैं ईश्वर के अनुदान उन्हें इसी तरह प्राप्त होते हैं जैसे कोई पिता अपने सदाचारी, आज्ञा पालक और सेवा भावी पुत्र को ही अपनी सुख-सुविधाओं का अधिकाँश भाग सौंपता है।
पापों का नाश हुये बिना, इंद्रियों का दमन किये बिना अन्तःकरण की शुद्धि नहीं होती। संसार में रहते हुये मनुष्य कर्मों से भी छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकता । अतः निष्काम कर्मयोग परमात्मा की प्राप्ति और साँसारिक सुखोपभोग का सबसे सुन्दर और समन्वय युक्त धर्म है। निष्काम भावनाओं में पाप नहीं होता वरन् दूसरों के हित की, कल्याण की और सबको ऊंचे उठाने की विशालता होती है जिससे अन्तःकरण की पवित्रता बढ़ती है और सुख मिलता है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को संसार समर का योद्धा बनकर ही जीवनयापन करना चाहिए। वह साहस , वह गम्भीरता और वह कार्य करने की भावना मनुष्य ब्रह्मा ज्ञान और ब्रह्मा सान्निध्य में ही प्राप्त करता है।
ईश्वर का ज्ञान हो जाने पर साँसारिक संयोग वियोग से उत्पन्न होने वाले सुख-दुख मनुष्य को बन्धन में नहीं बाँध पाते। यह कल्पित संसार जीव की अपनी कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है। इसमें घट-बढ़ हुआ करती है और इसमें जीव की ममता होने के कारण इसमें बढ़ती होने पर वह प्रसन्न होता है और कमी होने पर दुःखी होता है। उदाहरण के लिए-जब परिवार में कोई बच्चा पैदा होता है तो लोग खुशी मनाते हैं पर इससे परमात्मा की सृष्टि में कोई कमी नहीं आई। जीव तो अमर है जैसे पहले था, वैसे ही अब भी है, केवल पंच भौतिक तत्वों का एक शरीर के रूप में संयोग हुआ। इसी प्रकार कोई मर जाता है तो दुःख मानते हैं पर पहली स्थिति की तरह इस बार भी परमात्मा की सृष्टि तरह इस बार भी परमात्मा की सृष्टि में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। पंच भौतिक शरीर का वियोग मात्र हुआ जीव तो अपने मूल-रूप में अब भी विद्यमान है । इस गूढ़ रहस्य को न जानने के कारण ही मनुष्य साँसारिक बंधनों में बंधकर तरह-तरह के दुःख भोगता है। अतः कल्याणकारी पुरुष के लिये बादल समान क्षण-क्षण रंग बदलने पाले विनाश-शील व्यावहारिक जगत में मोह का सम्बन्ध न बाँधकर अविनाशी और अचल परम सत्ता में चित्त को जोड़ देने और लोक-कल्याण के लिये निष्काम करने में ही इस जीवन की सार्थकता है।
सद्-प्रेरणायें प्रत्येक मनुष्य के अन्तःकरण में छिपी रहती है। दुष्प्रवृत्तियां भी उसी के अन्दर होती है अब यह उसकी अपनी योग्यता, बुद्धिमत्ता और विवेक पर निर्भर है कि वह अपना मत देकर जिसे चाहे उसे विजयी बनादे ।चित्त का मूल स्वभाव शान्त है आत्मा आनन्दमय है जो इस अपनी मूल प्रवृत्ति को डिगाता नहीं अर्थात् सद्प्रेरणाओं में स्थिर रहता है, जगत में वही योद्धा अजेय है जिसका स्वभाव किसी भी प्राणी पदार्थ के स्वभाव से अपने शान्त स्थिर चित्त के स्वभाव को चलायमान नहीं होने देता । जगत के प्राणी और पदार्थों में इंद्रियों के द्वारा जिसके चित्त में क्षोभ उत्पन्न होता है वह निर्बल है। उसे अपनी वह निर्बलता का दण्ड भी भोगना ही पड़ता है। सुख का उपभोग तो यहाँ शक्तिमान सूरमा ही करते हैं।
परमात्मा जितना कृपालु है कठोर भी उससे कम नहीं है। उसकी एक शिव शक्ति भी है जो निरन्तर ध्वंस किया करती है। ईश्वर की आज्ञाओं की जो जान बूझकर अवज्ञा करता है उसे परमात्मा की कठोरता का दंड भुगतना ही पड़ता है। संसार की व्यवस्था, गृह समाज, राज्य या राष्ट्र से भी सर्वोपरि है। अतः गृहपति, राज्यपाल या राष्ट्रपति की तुलना में उसके पास शक्तियाँ भी अतुल होती है। विश्व नियम का प्रजा में पालन कराने वाला परमात्मा बहुत बड़ा है, बड़ा कठोर, बड़ा शक्तिशाली है। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है- लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ । इस समय इन लोगों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ , इसलिये हे अर्जुन ! जो यह प्रति पक्षी सेना है वह तेरे न मारने पर भी जीवित नहीं बचेंगे । बिना युद्ध के भी इनका नाश हो जायगा। -गीता 11।23
वह परमात्मा सचमुच बड़ा शक्तिशाली, बड़ा बलवान् है। उसकी अवज्ञा करके कोई बच नहीं सकता। अतः उसी के होकर रहें , उसी की आज्ञाओं का पालन करें, इसी में मनुष्य मात्र का कल्याण है।
“ 16 वर्षीया एक फ्रांसीसी युवती ने एक बार युवक से विवाह सम्बन्ध निश्चित किया। युवक भी उसे प्यार करता था अतएव विवाह की स्वीकृति तो उसने दे दी किन्तु साथ ही यह वचन भी ले लिया कि वह अभी कुछ दिन धन कमाएगा तब विवाह करेगा। युवती जानती थी कि गृहस्थ संचालन की सुविधायें धन से ही प्राप्त होती है अतएव उसने सहर्ष अनुमति दे दी। युवक अमेरिका चला गया और रोजगार शुरू कर दिया।”
3 वर्ष बाद उसने पर्याप्त धन कमा लिया किन्तु इस बीच एक मुकदमा लग गया और उसे मुकदमे में उलझना पड़ गया। युवक ने पत्र द्वारा प्रेयसी को सूचना भेजी दी कि वह कम से कम 10 वर्ष तक लौट नहीं पायेगा, युवती ने उत्तर में लिखा -तुम जब भी लौटोगे तभी विवाह करूंगी, मृत्युपर्यन्त तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी, युवक ठीक 14 वर्ष बाद लौटा , और यह देख कर आश्चर्य चकित रह गया कि जिस युवती को 14 वर्ष में 14 वर्ष में अधेड़ हो जाना चाहिए उसके नाक-नक्शे, शरीर स्वास्थ्य में बिल्कुल अन्तर नहीं पहले जैसी ताजगी, मानो उसे अमेरिका गये कुछ सप्ताह से अधिक न बीते हो। विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह संपन्न हुआ। दोनों सुख से रहने लगे पर युवक का विस्मय अभी तक भी दूर नहीं हुआ था सो उसने एक दिन युवती से पूछ ही तो लिया रहस्य ?
उक्त घटना का चित्रण करते हुये अमरीकी वैज्ञानिक और लेखक डॉ॰ बैनेट अपनी पुस्तक “वृद्धावस्था-कारण और निवारण (ओल्ड एज, इट्स काज एन्ड प्रिव्हेन्शन”) में लिखते हैं कि मनुष्य शरीर समुद्री लहर की तरह है जिसमें से कूड़ा कचरा हर घड़ी किनारे फेंका जाता रहता है और जल को शुद्ध रखा जाता रहता है। 80 दिन पीछे शरीर का एक भी कोश (ऐल) पुराना नहीं रह जाता । जिस तरह जीर्ण और पुराना हो जाने पर मकान को बदल दिया जाता है उसे और अधिक पक्की ईंटों से बनाकर नया कर देते हैं उसी प्रकार परमात्मा ने शरीर की व्यवस्था की है। हर पुराना कोश बदल जाता है और प्रकृति उसके स्थान पर स्वस्थ कोश स्थापित करती रहती है । फिर मनुष्य बूढ़ा क्यों हो जाता है ? बैनेट ने वर्षों इस बात पर विचार किया, मनन-चिन्तन और अन्य परीक्षण किये तब कहीं उसका उत्तर उसकी समझ में आया। वह उत्तर उन्होंने इस घटना के माध्यम से देते हुए आगे लिखा है के एक दिन युवक ने पूछ ही लिया अपनी नव विवाहिता से- तुम्हारे शरीर में अन्तर क्यों नहीं पड़ा ?
युवती अपने पति को एक 6 फुट शीशे के पास ले गई और उसके सामने खड़ी होकर बोली-यह है रहस्य मेरे स्वास्थ्य का। जिस दिन आप मेरे पास से विदा हुये मैंने संकल्प लिया कि आप जब लौटेंगे आपको इसी अवस्था में मिलूँगी । मैं प्रतिदिन प्रातःकाल सोकर उठती तो पहले इस शीशे के पास आती । इसी तरह इसके सामने खड़ी होकर अपने चेहरे को देखकर प्रसन्न होती और मस्तिष्क में एक बात उठाती कि कल जैसी थी अब भी ठीक वैसी ही हूँ मुझ में कुछ भी परिवर्तन नहीं होगा। फिर मैं काम पर लग जाती । दिन भर काम करती हंसती खेलती पर मन में अपने सवेरे वाले स्वस्थ चेहरे की ही कल्पना करती रहती और उससे हर क्षण एक नई स्फूर्ति अनुभव करती रहती। मैंने मन में सदैव अपने आप को 16 वर्ष का बनाकर रखा, उसी का प्रतिफल है कि 14 वर्ष बीत जाने पर भी मैं ज्यों की त्यों स्वस्थ हूँ ।
इस घटना द्वारा डॉ॰ बैनेट ने एक नये विज्ञान और अभूत पूर्व भारतीय को नई स्थापना दी है और लिखा है मनुष्य का मन जैसा होगा वैसा ही वह बनेगा। मनुष्य का मन बड़ा समर्थ है वह मिट्टी को सोना और सोने को हीरे में बदल सकने की सामर्थ्य से परिपूर्ण है।
जिस तरह मनुष्य ने शरीर को भोग की वस्तु समझ कर उसने अपने आपको महान् आध्यात्मिक सुख संपदाओं से विमुख कर लिया यह दुर्भाग्य ही है कि वह मन जैसी अत्यन्त प्रचण्ड शक्ति का उपयोग केवल लौकिक स्वार्थों और इन्द्रिय भोगो तक सीमित रखकर उसे नष्ट करता रहता है। मन भौतिक शरीर की चेतन शक्ति है-आइन्स्टीन के शक्ति सिद्धांत के अनुसार न कुछ भार वाले एक परमाणु में ही प्रकाश की गति फ् प्रकाश की गति अर्थात्- 186000 फ् 186000 कैलोरी शक्ति उत्पन्न होगी। 1 पौण्ड पदार्थ की शक्ति 14 लाख टन कोयला जलाने से जितनी शक्ति मिलेगी इतनी होगी । यद्यपि पदार्थ को पूरी तरह शक्ति में सम्भव नहीं हुआ । तथापि यदि इस शक्ति को पूरी तरह शक्ति में बदलना सम्भव होता तो एक पौण्ड कोयले में जितना द्रव्य होता है उसे शक्ति में बदल देने से सम्पूर्ण अमेरिका के लिये 1 माह तक के लिये बिजली तैयार हो जाती है। मन शरीर के द्रव्य की विद्युत शक्ति है मन की एकाग्रता जितनी बढ़ेगी शक्ति उतनी ही तीव्र होगी। यदि सम्पूर्ण शरीर को इस शक्ति में बदला जा सके तो 120 पौण्ड भार वाले शरीर की विद्युत शक्ति अर्थात् मन की सामर्थ्य इतनी अधिक होगी कि वह पूरे अमरीका को लगातार 10 वर्ष तक विद्युत देता रह सके। इस प्रचण्ड क्षमता से ही भारतीय योगी ऋषि महर्षि शून्य आकाश में स्फोट किया करते थे और वे किसी को एक अक्षर का उपदेश दिये बिना अपनी इच्छानुसार अपने संकल्प बल से समस्त भूमंडल की मानवीय समस्याओं का संचालन और नियंत्रण किया करते थे। शेर और गाय को एक ही घाट पानी पिला देने की प्रचण्ड क्षमता इसी शक्ति की थी। मन को ही वेद में “ज्योतीषां ज्योति “ अर्थात् प्रकाश का भी महाप्रकाश कहा है। डॉ॰ बैनेट उसे एक महान-विद्युत शक्ति (माइन्ड इज इग्रेट इलेक्ट्रिकल फोर्स) से सम्बोधित किया है।
खेद है कि मनुष्य इतनी अतुल शक्ति-संपत्ति का स्वामी होकर भी परमुखापेक्षी और दीन-हीन जीवन जीता है। मन एक शक्ति है यदि उसे विकृत और घृणित रखा जाता है तो सिवाय इसके कि दूषित परिणाम सामने आये और क्या हो सकता है । अमेरिका के रोगियों का मनोविश्लेषण करने से पाया गया है कि यों तो अधिकाँश सभी रोगी मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ थे किन्तु पेट के अधिकाँशतः प्रतिशत मरीज दूषित विचारो वालो व्यक्ति थे । डॉ॰ कैनन ने अध्ययन करके लिखा है कि “ आमाशय “ का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के “आटानोमिक “ केन्द्र से होता है। आटोनोमिक केन्द्र के दो भाग होते हैं। (1) सिंपेथेटिक, (2) पैरा सिंपेथेटिक यह दोनों अंग पेट की क्रियाएं संचालित करते हैं पाचन रस उत्पन्न करते हैं। यदि रोगी मानसिक चिंताओं और आवेगों से पीड़ित होगा तो निश्चित ही उसकी पेट की क्रियाओं में विपरीत प्रभाव पड़ेगा और उसका पेट हमेशा खराब रहेगा। इसलिये सामान्य स्वास्थ्य के लिये ही-मनुष्य का अच्छे और विधायक विचारो वाला होना अत्यावश्यक है।
सन् 1623 में किये गये डॉ॰ क्रेन्स डेलमार और डाक्टर राओ की शोधें शरीर और मन के संबंधों पर विस्तृत प्रकाश डालती है उनका कहना है कि शरीर में कोई रोग उत्पन्न नहीं हो सकता जब तक कि मनुष्य का मन स्वस्थ है। जाँच के दौरान जो महत्वपूर्ण निष्कर्ष हाथ लगे वह बताते हैं कि “स्नायुशूल“ उन्हें होता है जो आवश्यकता से अधिक खुदगर्ज तथा हिंसक होते हैं। “गठिया “ का मूल कारण ईर्ष्या है। निराश और हमेशा दूसरों में दोष देखने वाले लोग ही कैंसर का शिकार होते हैं। सर्दी उन्हें अधिक लगती है जो दूसरों को तंग किया करते हैं। हिस्टीरिया और गुल्म, चोर,ठग और निराश व्यक्तियों को होता है। अजीर्ण झगड़ालू लोगों को होता है। तात्पर्य यह कि हर बीमारी मनुष्य की मानसिक विकृति का परिणाम होती है। आज जो संसार में रोग-शोक की भयानक बाढ़ उपज पड़ी है। उसका कारण न तो कोई विषाणु है और न ही बाहरी वातावरण। उसका कारण तो विकृति और बुरे विचारो के रूप में हर व्यक्ति के मन के अन्दर बैठा हुआ होता है। यदि मनुष्य अपने मन को ऊर्ध्वगामी बनाले तो वह कुछ से कुछ बन सकता है उत्तम स्वास्थ्य तो उसका अत्यन्त स्थूल लाभ है। “मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बधं मौक्षयो“ अर्थात् बंधन और मुक्ति का कारण भी यह मन ही है।
डॉ॰ बैनेट ने स्वयं अपना उदाहरण इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। उन्होंने पुस्तक में अपनी दो फोटो छापी है। एक 40 वर्ष की उम्र की दूसरी 70 वर्ष की आयु की 70 वर्ष की आयु वाले फोटो में कोई झुर्री नहीं कोई सिकुड़न और बुढ़ापे के लक्षण नहीं जब कि 40 वर्ष की आयु वाले फोटो को देखने से लगता है कि यह बूढ़ा ही नहीं रोगी भी होगा ,धँसी आंखें पिचके गाल सूखा चेहरा ?
यह अन्तर कहाँ से आ गया उसका उत्तर देते हुये श्री बैनेट स्वीकार करते हैं कि उन्होंने मन के महत्व को 40 वर्ष की आयु में तब जाना जब शरीर बिलकुल कृश हो बया था। मैंने 40 वर्ष का जीवन बुरी मनःस्थिति में दूषित कर्मों का लिया। स्वास्थ्य इतना खराब हो गया कि एक क्षण की जिन्दगी भी 10 मन पत्थर से दबी जान पड़ने लगी तभी मैंने डॉ॰ मारडन, जोकि अमरीका के एक महान् अध्यात्म-परायण व्यक्ति है के विचार पढ़े उन्होंने अपनी पुस्तक “लौह इच्छा शक्ति” (एन आइरन बिल) में लिखा है -मनुष्य अपने विचार नयशक्ति कर ले। अपने विचार और चरित्र बदल ले तो वह अपने शरीर को नया कर सकता है। इस स्वाध्याय ने मुझे औषधि का वरदान दिया। मैंने अपने आपको स्वस्थ अनुभव करने सदैव प्रसन्न रहने सेवा सहयोग प्रेम मैत्री दया करुणा और परोपकार का जीवन जीने का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया और उसका जो सुफल मिला वह मेरी 70 वर्ष वाली फोटो में पाठक स्पष्ट देख सकते हैं।
डॉ॰ बैनेट की बात को सबसे पहले भारतीय तत्वदर्शियों ने जाना उन्होंने पहले ही लिख दिया है-”संकल्पं मातसं दवेी चतुसवर्ग प्रदायकम् “ अर्थात् मन के संकल्प में धर्म अर्थ ,काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी है। उसकी शुद्धता और उसकी विधेयक शक्ति की जानकारी होने पर ही वे प्रातःकाल प्रार्थना किया करते थे-यस्मात् ऋतु किंचन कर्म क्रियते। तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु (यजुर्वेद) अर्थात् जिसके बिना संसार का कोई भी कर्म नहीं हो सकता वह मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।
आज के रोग शोक आज की सामाजिक विकृतियों का कारण कोई बाह्य नहीं लोगों के मनों का दूषित हो जाना है। इसलिये आज की प्रमुख समस्या बेरोजगारी, आबादी ,खाद्यान्न आदि नहीं मन की विकृति है जब तक उसको न सुधारा जायेगा संसार से संकट कम करने की बात सोचना व्यर्थ और निरर्थक होगा।
योगवशिष्ठ में एक बहुत महत्वपूर्ण आख्यायिका आती है। यह उपाख्यान जीवन के उद्देश्य रहस्यों और मृत्यु के उपरान्त जीवन परम्परा पर प्रकाश डालता है इसलिये समीक्षाकार इसे योगवशिष्ठ की सर्वाधिक उपयोगी आख्यायिका मानते हैं। वर्णन इस प्रकार है-
किसी समय आर्यावर्त में पद्म नाम का राजा राज्य करता था । लीला नामक उसकी धर्मशील धर्मपत्नी उसे बहुत प्यार करती थी । जब कभी वह मृत्यु की बात सोचती वियोग की कल्पना से घबरा उठती । कोई उपाय न देखकर उसने भगवती सरस्वती की उपासना की और यह वर प्राप्त कर लिया कि यदि उसके पति की मृत्यु पहले हो जाय तो पति की अंतःचेतना राजमहल से बाहर न जाये । सरस्वती ने यह भी आशीर्वाद दिया कि तुम जब चाहोगी अपने पति से भेट भी कर सकोगी। कुछ दिन बीते पद्म का देहान्त हो गया। लीला ने पति का शव सुरक्षित रखवा कर भगवती सरस्वती का ध्यान किया सरस्वती ने उपस्थित होकर कहा-भद्रे ! दुःख न करो तुम्हारे पति इस समय यही है पर वे दूसरी सृष्टि में है उनसे भेट करने के लिए तुम्हें उसी सृष्टि वाले शरीर (मानसिक-कल्पना ) में प्रवेश करना चाहिए।
लीला ने अपने मन को एकाग्र किया, अपने पति की याद की और उस लोक में प्रवेश किया जिसमें पद्म की अंतर्चेतना विद्यमान थी । लीला नक जाकर जाकर कुछ क्षण जो कुछ दृश्य देखा उससे बड़ी आश्चर्यचकित हुई । उस समय सम्राट पद्म इस लोक के 16 वर्ष के महाराज थे और एक विस्तृत क्षेत्र में शासन कर रहे थे । लीला को अपने ही कमरे में इतना बड़ा साम्राज्य और एक ही क्षण के भीतर 16 वर्ष व्यतीत हो गये देखकर बड़ा विस्मय हुआ। भगवती सरस्वती ने समझाया भद्रे -
सर्गे सर्गे पृथग्रुपं सर्गान्तराण्यपि । तेष्पन्सन्तः स्थसर्गोधाः कदलीदल पीठवत्। योगवशिष्ठ 4।18।16।77
आकाशे परमाण्वन्तर्द्र व्यादेरगुकेअपि च । जीवाणुर्यत्र तत्रेदं जगद्वेत्ति निजं वपुः ॥ योगवशिष्ठ 3।443435
अर्थात्- हे लीला ! जिस प्रकार केले के तने के अन्दर एक के बाद एक परतें निकलती चली आती है उसी प्रकार प्रत्येक सृष्टि क्रम विद्यमान है इस प्रकार एक के अन्दर अनेक सृष्टियों का क्रम चलता है। संसार में व्याप्त चेतना के प्रत्येक परमाणु में जिस प्रकार स्वप्न लोक विद्यमान है उसी प्रकार जगत में अनंत द्रव्य के अनंत परमाणुओं के भीतर अनेक प्रकार के जीव और उनके जगत विद्यमान है। “
अपने कथन की पुष्टि में एक जगत दिखाने के बाद कहा- देवी तुम्हारे पति की मृत्यु 70 वर्ष की आयु में हुई है ऐसा तुम मानती हो इससे पहले तुम्हारे पति एक ब्राह्मण थे और वत उनकी पत्नी । ब्राह्मण की कुटिया में उसका मरा हुआ शव अभी भी विद्यमान है यह कहकर भगवती सरस्वती लीला को और भी सूक्ष्म जगत में ले गई लीला ने वहाँ अपने पति का मृत शरीर देखा -उनकी उस जीवन की स्मृतियाँ भी याद हो आई और उससे भी बड़ा आश्चर्य यह हुआ के जिसे वह 70 वर्षों की आयु समझे हुये थी वह और इतने जीवन काल में घटित सारी घटना उस कल्प के कुल 7 दिनों के बराबर थी। लीला ने देखा- उस समय मेरा नाम अरुन्धती था- एक दिन एक राजा की सवारी निकली उसे देखते ही मुझे राजसी भोग भोगने की इच्छा हुई। उस वासना के फलस्वरूप ही उसने लीला का शरीर प्राप्त किया और राजा पद्म को प्राप्त हुई।इसी समय भगवती सरस्वती की प्रेरणा से राजा पद्म जो अन्य कल्प में था उसे फिर से पद्म के रूप में राज्य-भोग की वासना जाग उठी, लीला को उसी समय फिर पूर्ववर्ती भोग की वासना ने प्रेरित किया फलस्वरूप वह भी अपने व्यक्त शरीर में आ गई और राजा पद्म भी अपने शव में प्रविष्ट होकर जी उठे फिर कुछ दिन तक उन्होंने राज्य-भोग भोगे और अन्त में मृत्यु को प्राप्त हुए।
इस कथानक में महर्षि वशिष्ठ ने मन की वासना के अनुसार जीवन की अनवरत यात्रा , मनुष्येत्तर योनियों में भ्रमण समय आकर ब्रह्माण्ड (टाइम एण्ड स्पेश) में चेतना के अभ्युदय और अस्तित्व तथा प्राण विद्या के गूढ रहस्यों पर बड़ा ही रोचक और बोधगम्य प्रकाश डाला है। पढ़ने सुनने में कथानक परियों की सी कथा या जादुई चिराग जैसा लगता है किन्तु भारतीय दर्शन की उस सूक्ष्मतम खोज आज विज्ञान का हर क्षेत्र कर रहा है। प्रस्तुत पंक्तियों में दिये गये वैज्ञानिक उद्धरण किन्तु पुष्टि करेंगे , विस्मय भी होगा कि भारतीय योगियों ने इस सूक्ष्मतम विज्ञान को बिना किसी यन्त्र की सहायता के कैसे जाना ।
देखने में लगता है कि आप भारतवर्ष के निवासी है , पर उसी समय आप पृथ्वी के भी निवासी है , उसी समय सौर मण्डल के भी । सूर्य एक सेकेंड में 100 ट्रिलियन अर्थात् 1000 मिलियन (10000000 किलोवाट) किलोवाट ऊर्जा पृथ्वी में फेंकता है वह ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि उससे नीपर जैसे 1 करोड़ बिजली घर स्थापित हो सकते हैं। सारी पृथ्वी की एक अरब आबादी तथा चींटी, मक्खी, कौवे, गिद्ध , भेड़ , बकरी ,गाय , हाथी, शेर , पेड़-पौधे , बादल, समुद्र सभी इस शक्ति से ही गतिशील है जिसमें यह शक्ति जितनी अधिक है (प्राणतत्व की अधिकता ) वह उतना ही शक्तिशाली और वैभव का स्वामी है। कीड़े मकोड़े उसके एक कण से ही जीवित है तो वृक्ष-वनस्पतियां उसका सबसे अधिक भाग उपयोग में लाती है। मनुष्य इन सबसे भाग्यशाली है क्योंकि वह इस शक्ति के सुरक्षित और संचित कोष को भी प्राणायाम और योग-साधनाओं द्वारा मन चाही मात्रा में प्राप्त भी कर सकता है।
हमारे लिये वर्ष 365 1/4 दिन का होता है पर सूर्य के लिये वह अपनी एक हजार किरणों के घूमने भर का समय, सूर्य का प्रकाश हर क्षण पृथ्वी के आधे भाग पर पड़ता है अर्थात् सूर्य का एक सेकेंड पृथ्वी के निवासी के लिये 12 घण्टे। कीट पतंगों के लिये तो उसे कल्प ही कहना चाहिये । सूर्य अरबों वर्ष से जी रहा है और करोड़ों वर्ष तक जियेगा पर इतनी अवधि में तो मनुष्यों की लाखों पीढ़ियां मर खप चुकी यदि सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक जितने लोग जन्म ले चुके उन सबके नाम लिखना सम्भव हो तो उसके लिये पृथ्वी के भार से कम कागज की आवश्यकता न पड़ेगी । सूर्य का एक जन्म इतना बड़ा है कि मनुष्य उसकी तुलना में अरबवें हिस्से की भी जिन्दगी नहीं ले पाया।
ठीक यही बात मनुष्य की तुलना में कीट-पतंग की है वायु मण्डल में ऐसे जीव है जो इतने सूक्ष्म है कि उनको इलेक्ट्रानिक सूक्ष्मदर्शी से ही देखना सम्भव है उनमें एक ही कोश (सेल) होता है । उसमें केन्द्रक सूर्य का ही एक कण होता है अन्य तत्वों में कोई भी खनिज , लवण या प्रोटीन , कार्बोहाइड्रेट मिलेंगे । अर्थात् जीव-चेतना और प्रकृति का समन्वय ही दृश्य जगत है । मनुष्य में गर्मी अधिक है , 100 वर्ष का जीवन उसे प्राप्त है पर कीड़े-मकोड़े शक्ति के एक अणु और शरीर के एक कोश से ही मनुष्य जैसी आयु भोग लेते हैं। मनुष्य जितने दिन में एक आयु भोगता है उतने में कीट-पतंगों के कई कल्प हो जाते हैं। प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक एन.एस. श्चेरविनोस्की एक कृषि विशेषज्ञ थे उन्होंने 50 वर्ष तक कीट-पतंगों के जीवन का सूक्ष्म अध्ययन किया और उससे कृषि नाशक कीटाणुओं के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण खोजे की । उन्हीं खोजो में भारतीय दर्शन को प्रमाणित करने वाले तथ्य भी प्रकाश में आये। वे लिखते है-टिड्डियों की सामूहिक वंशवृद्धि की अवधि सूर्य के एक चक्र अर्थात् 11 वर्ष से है अर्थात् 11 वर्ष में उनकी प्रलय और नई सृष्टि का एक क्रम पूरा हो जाता है वह भी 11 वर्षीय चक्र से सम्बन्धित है पर कुछ कीड़ों की सामूहिक वृद्धि 22 वर्ष , कुछ की 33 वर्ष है इस आधार पर उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी का सारा जीवन ही सूर्य पर आधारित है। सिद्ध होता है कि नन्हे-नन्हे जीवाणु (बैक्टीरिया) तथा विषाणु (वायरस) सभी का जीवन कोश (नाभिक या न्यूक्लियस) सूर्य का ही प्रकाश स्फुल्लिंग और चेतन परमाणु है जबकि उनके कोशिका सार (साइटोप्लाज्म )में अन्य पार्थिव तत्व । जीवन चेतना सर्वत्र एक सी है , परिभ्रमण केवल मन की वासना के अनुसार ही चलता रहता है।
नाभिक में भी नाभिक (न्यूक्लियस) होते हैं जिसमें यह भी सिद्ध होता है कि जिस प्रकार कोशिका सार (साइटोप्लाज्म ) का सूर्य नाभिक होता नाभिक अग्नि तत्व होता है ,अग्नि या प्राण में ही मन होता है उसी प्रकार मन की चेतना में ही विश्व चेतना या ईश्वरीय चेतना समासीन होनी चाहिये। प्रत्यक्ष में सूर्य भी स्व-प्रकाशित नहीं वह आकाश गंगा और निहारिकाओं के माध्यम से किसी सुदूर केन्द्रक से ही जीवन प्राप्त कर रहा है अर्थात् सृष्टि के समस्त मूल में एक सर्वोपरि शक्ति है उसे ही परमात्मा, माना गया है वही चेतना पदार्थ के संयोग से जीवों के रूप में व्यक्त होती है श्री शंकराचार्य ने तत्वबोध में इसी तथ्य की पुष्टि करते हुये लिखा है-
नित्य शुद्ध विमुक्तैक कखण्डानन्दमद्वयम्। सत्यु ज्ञानमनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेवतत्॥
एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मै वास्मीति वासना। हरत्यविद्या विक्षेपान रोगानिव रसायनम्॥ तत्वबोध 67-67
अर्थात्-जो तीनों कालों में रहने वाला, कभी नाश नहीं होता जिसका , जो मल रहित और संसार से विरक्त , एक और अखण्ड अद्वितीय आनन्द रूप है वही ब्रह्म है किन्तु वही ईश्वरीय चेतना “ मैं हूँ “ के अहंकार भाव के निरन्तर अभ्यास से उत्पन्न हुई वासना रोगों को रसायन के समान अविद्या से उत्पन्न होने वाले चित्त विक्षेप के कारण वास्तविक ज्ञान के कारण वास्तविक ज्ञान को काम करती हुई वासनाओं की पूर्ति में कभी यह कभी वह शरीर धारण करती भ्रमण करने लगती है ।
हमें मालूम है कि सूर्य ही नहीं चन्द्रमा ,बृहस्पति शुक्र , शनि तथा सभी तारागण तक विकरण करते हैं। किसी भी एक बिन्दु को ले लें और कल्पना करे कि वहाँ सभी विकरण आड़ी टेढ़ी दिशा में गमन कर रहे है तो पता चलेगा कि एक ही स्थान पर सूर्य प्रकाश का कण चन्द्रमा के कण को ,चंद्रमा का बृहस्पति के कण को बृहस्पति का शनि के कण को पार कर रहा होगा-फिर यह क्रम निरन्तर चल रहा होगा अर्थात् सिनेमा के पर्दे की तरह की गति और दृश्य उस समय हर ग्रह-नक्षत्र के अंतर्वर्ती क्षेत्र का विद्यमान होगा।जिस प्रकार सूर्य के रासायनिक आकाश मंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, सोडियम, सिलिकन, गन्धक, टाइटेनियम, मैंगनीज, कोबाल्ट, निकेल जिंक आदि 24 रासायनिक तत्व विद्यमान है उसी प्रकार हर ग्रह के आकाश क्षेत्र में भिन्न जाति के आकाश मंडल है यह तत्व ही ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं विकिरण उनका प्रभाव क्षेत्र लिये होगे अर्थात् वातावरण के हर बिन्दु पर विश्व का हर दृश्य विद्यमान है मूल चेतना उनमें से अपनी इच्छा (इच्छा आकाश स्वरूप है) यह अखण्ड ज्योति में पहले एक विस्तृत लेख में दिया जा चुका है । और वासना के क्षेत्र में विद्यमान रहती होगी तो कुछ आश्चर्य नहीं यदि वह पृथ्वी के ही किसी आकाश में रहकर भी किसी अन्य ग्रह दृश्यों और रासायनिक अनुभूतियों का रस ले रही हो । भले ही जैसा कि योगवशिष्ठ ने उनके काल और ब्रह्माण्ड की कल्पना की है उनका संसार कैसा भी क्यों न हो पर उस अणु में भी जीव-चेतना के लिये विराट् ब्रह्माण्ड दिखता होगा ।
वायुमंडल ही नहीं जीवन से रिक्त कोई स्थान नहीं । प्रसिद्ध डच व्यापारी एन्टान वान लीवेनहोक को जब भी अवकाश मिलता वह शीशों के कोने रगड़-रगड़ कर लेन्स बनाया करता उसने एकबार एक ऐसा लेन्स बनाया जो वस्तु को 270 गुना बड़ा करके दिखा सकता था । उसने पहली बार गन्दे पानी और सड़े अन्न में हजारों जीवों की सृष्टि देखी । कौतूहलवश एकबार उसने की थी कि आया शुद्ध जल एकत्र किया उसकी मंशा यह जानने की थी कि आया शुद्ध जल में भी कीटाणु होते हैं क्या वह यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसमें भी जीवाणु उपस्थित थे उसने अपनी पुत्री मारिया को बुलाकर एक विलक्षण संसार दिखाया-यह जीवाणु जल में तैर ही नहीं रहे थे तरह-तरह की क्रीडा करते हुये यह दिखा रहे थे कि उनमें यह इच्छायें, आकांक्षाएं मनुष्य के समान ही है भले ही मनुष्य जटिल कोश प्रणाली वाला जीव क्यों न हो पर चेतना के गुणों की दृष्टि से मनुष्य और उन छोटे जीवाणुओं में कोई अन्तर नहीं था । यह जीवाणु हवा से पानी में आये थे।
1838 में पौधे की संरचना का परीक्षण करते समय वैज्ञानिक माथियास शेलिडेन ने देखा कि पौधे भी कोशिकाओं से बने है और यह कोशिकाएं शक्ति भी बड़े जीव के भीतर एक जीवित जीव है इस प्रकार हर योनिधारी का शरीर ब्रह्माण्ड है और उनमें रह रहे अनेकों चेतन कोश जीव जो अपनी वासना के अनुसार काम करते हैं। हर कोश में विराट् ब्रह्माण्ड की बात विज्ञान भी स्वीकार करता है।
यह इलेक्ट्रानिक प्रकाश की बौछार से ही देखे जा सकते हैं इलेक्ट्रानिक विद्युदाणु होते हैं । मन भी एक प्रकार का सचेतन विद्युत परमाणु है-योग ग्रंथों से उसे “अग्नि स्फुल्लिंग कहा जाता है उसे ध्यान की एकाग्रता के समय अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु दिव्य प्रकाश कण के रूप में त्रिकुटी-दोनों भौहों के बीच आज्ञा चक्र नामक स्थान में देखा जाता है यही कीट-पतंगों में भी मन और मन की विशेषताओं के होने का प्रमाण है जो किसी भी विज्ञान से कम महत्व का नहीं।
कोशिका के अन्दर के दोनों भाग (1) केन्द्रक (न्यूक्लियस) और (2) कोशिकासार अर्थात् कोश को जीवित रखने वाले समस्त (साइटोप्लाज्म) भिन्न तत्व है एक दर्शक है , चेतन है और चेतना के सभी गुणों को धारण करके रखता है-वह नाभिक हुआ । कोशिकासार का समस्त रासायनिक पदार्थ-जैसे कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन ,बसा, लवण (सोडियम क्लोराइड आदि) , खनिज (लोहा आदि) , कार्बन तत्व (आर्सनिक कम्पाउण्ड) एक विशिष्ट झिल्ली से घिरा हुआ होता है। इस झिल्ली में अत्यन्त बारीक छेद होते हैं जिसमें से होकर आक्सीजन अन्दर जाता है और कोशिका के जीवन को सुरक्षित रखता तथा केशिका की रासायनिक क्रियाओं को जारी रखता है। कोशिकासार के परमाणु इन छेदों से बड़े होते हैं इसी कारण वे झिल्ली के भीतर रह पाते हैं अन्यथा सभी रासायनिक पदार्थ बह जाते और कोशिका मर कर नष्ट हो जाती । कोशिका स्वयं अत्यन्त सूक्ष्म इकाई है । फिर उसके संघटक रासायनिक तत्वों के अणु तो और भी सूक्ष्म हुये। वे 100000 गुना बड़े करके ही इलेक्ट्रानिक सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखे जा सकते हैं फिर इन छेदों की लघुता की तो कल्पना ही नहीं हो सकती । सूक्ष्मदर्शी से देखने पर ही कोशिका के वह दृश्य दिखाई देते हैं जिनकी योगवासिष्ठकार ने व्याख्या दी है पर कोशिका में प्रवाहित उन्मुक्त चेतना अन्दर के मन और उसकी चेष्टाओं का विज्ञान--
आज की फ्रायड और एलडर की साइकोलॉजी नहीं भारतीय दर्शन की प्रतिस्थापनाएं या भारतीय साधनापरक मनोविज्ञान ही दे सकता है।
माना कि मनुष्य को ईश्वरीय अनुदान अधिक मिले है किन्तु यदि केवल वासना और इच्छा पूर्ति ही उसका लक्ष्य है तो वह तो इतर मानव योनियाँ भी मनुष्य की तरह ही भोगती है उसमें कोई विशेषता नहीं । मनुष्य ने सूक्ष्म बुद्धि और विवेक की क्षमता प्राप्त की है तो उसे अंतर्जगत के सत्यों को समझना और आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना ही उसकी बुद्धिमानी हो सकती है अन्यथा मनुष्य जीवन भी एक प्रकार का उदार-शिशन परायण कीट-जीवन में पड़ा इन मानवेत्तर सृष्टियों में चक्कर काटता रहता है जहाँ उसको इच्छा पूर्ति के साधन मिल सकते हैं आत्मोद्धार के नहीं ।
संसार को जानने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि तुम अपने आप को जानलो--स्वामी रामतीर्थ
आज की शिक्षा का दोष यह है कि वह सब कुछ बताती है पर जीवन का सत्य क्या है इसे छुपा जाती है। इसे बदला जाना चाहिए।--डॉ॰ हेडगेवार
आकाश ने पृथ्वी के ऊपर उपेक्षावृत्ति डाली और व्यंगपूर्वक कहा-देखता हूँ आज-कल तुम ऐश्वर्य से फूली नहीं समाती , पर यह न भूलना यह सब मेरी कृपा का फल है मेरे ही प्रकाश , मेरे हो पवन और मेरे ही दिये पदार्थों के कारण तुम लहलहा रही हो। पृथ्वी बोली-स्वामी जब आप ही मुझमें घुले हुये हैं तो फिर नाहक घृणा क्यों करते हैं पृथ्वी की नम्रता के आगे आकाश की आंखें झुक गई कुछ बोलते न बना।
न्यूयार्क (अमरीका) शहर के सभी सम्भ्रान्त, व्यक्ति, बुद्धिजीवी और नगर की आबादी के हर क्षेत्र के नगर पार्षद उपस्थित है । हाल खचाखच भरा है । तभी एक व्यक्ति सामने स्टेज (मंच) पर आता है एक व्यक्ति ने प्रश्न किया-60 को 60 में गुणा करने पर गुणनफल क्या आयेगा तथा गुणा करते समय 47 वे अंक का गुणा करने पर जो पंक्ति आयेगी उसे बाई ओर से गिनने पर 36 वाँ अंक कौनसा होगा । प्रश्न सुनते ही वह व्यक्ति जो प्रदर्शन के लिये शक्ति आमन्त्रित किये गये थे वह निर्विकार रूप से कुर्सी पर बैठ गये । बिना किसी खड़िया कागज , पट्टी अथवा पेन्सिल के प्रश्न मस्तिष्क में ही हल करने लगे ।
सविकल्प समाधि वाले योगी ही यह क्षमता होती है कि वह अपनी सम्पूर्ण चेतना को शरीर के प्रत्येक अंक से खींच कर मस्तिष्क में केन्द्रित करले और विचार जगत में इस तरह घुल जाये जैसे दूध में पानी मिला देने पर पानी भी दूध हो जाता है। पानी का कोई अस्तित्व ही शेष नहीं रहता । विश्व-व्यापी चेतना की अनुभूति और प्राप्ति का यह भारतीय विज्ञान दुनिया के किसी भी विज्ञान से अधिक सूक्ष्म और मानव जीवन का हितकारी है उसी के द्वारा सृष्टि के गहन अन्तराल में चलने वाली सृजन, संहार और संचालन-प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त किया गया, किया जाता है उसे भला क्या समझेंगे तथाकथित बुद्धिवादी जिन्होंने आज पदार्थ विज्ञान को तो सब कुछ मान लिया पर जो चेतना पदार्थ की इच्छा , आकाँक्षा और हस्तान्तरण करती है उस महान् चेतना के अस्तित्व और विकास की प्रक्रिया को अन्धविश्वास कह कर अमान्य कर दिया ।
ध्यानस्थ व्यक्ति एक भारतीय थे । उनके अद्भुत मस्तिष्कीय करतबों से प्रभावित होने के कारण उन्हें अमरीका बुलाया गया । नाम था श्री सुरेशचन्द्र दत्त , बंगाल के ढाका जिले के रहने वाले । सुरेशचन्द्र दत्त ने कुल 45 मिनट में इतना लम्बा गुणा हल करके बता दिया, 47 वीं पंक्ति का 36 वाँ अक्षर भी । इससे पहले यही प्रश्न न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के एक पी॰ एच॰ डी॰ प्रोफेसर ने भी हल किया था प्रोफेसर साहब ने मौखिक न करके विधिवत कापी-पेन्सिल से गुणा किया था । प्रतिदिन 2 घंटा लगाने के बाद पूरा प्रश्न वे 8 दिन में हल कर पाये थे । दोनों गुणनफल मिलाकर देखे गये तो दोनों में अन्तर निश्चित था कि उनमें से आया श्री सुरेशचन्द्र दत्त अथवा प्रोफेसर साहब-किसी एक का हल गलत था। जाँच के लिये दूसरे गणितज्ञ बैठाये गये। उनका जो गुणनफल आया वह श्री सुरेशचन्द्र दत्त के गुणनफल जितना ही था एक भी अंक गलत नहीं था जबकि अमेरिकी प्रोफेसर साहब का हल 16 स्थानों पर गलत था । श्री सुरेशचन्द्र दत्त से ऐसे कई प्रश्न पूछे गये जिनके उन्होंने सर्व शुद्ध हल करके बता दिया। किस शताब्दी की किस तारीख को कौन सा दिन था-ऐसे प्रश्न पूछे गये जिनका उत्तर गलत नहीं निकला। अमेरिका के वैज्ञानिक और बुद्धिवादी लोग इस अद्भुत क्षमता पर आश्चर्य चकित थे । दूसरे दिन अखबारों में सुरेशचन्द्र दत्त की प्रशंसा-मशीन का प्रतिद्वंद्वी (राइवल आफ मशीन,दिमागी जादूगर(मेन्टल बिजर्ड) ) मनुष्य की शक्ल में हिसाब की मशीन (ह्युमन रेडी रेकनर) तथ्रर विद्युत की गति से भी तीव्र गति से गणित के प्रश्न हल करने वाला (लाइटिंग केलकुलेटर) आदि विशेषण देकर की गई । नवम्बर 1626 में “इंडियन रिव्यू“ में श्री सुरेशचन्द्र दत्त इस विलक्षण प्रतिभा की जानकारी विस्तार से दी गई और इस अद्भुत मस्तिष्कीय क्षमता पर आश्चर्य प्रकट किया गया ।
मनुष्य की जन्मजात विशेषताओं का कारण ? वैज्ञानिकों से पूछा जाता है तो उत्तर मिलता है वंशानुक्रम गुणों के कारण ऐसा होता है। 24 वंश सूत्र (क्रोमोसोम) पिता के 24 माता के लेकर मनुष्य शरीर की रचना होती है। मनुष्य की विशेषताओं का कारण यह गुण सूत्र ही होते हैं। प्रसिद्ध जीवनशास्त्री ग्रेगर जोहन मेन्डेल ने सर्वप्रथम पौधों पर परीक्षण करके यह सिद्धांत संसार को दिया था । 1822 ई॰ सन् में आस्ट्रिया में जन्मे श्री मेन्डेल ने 8 वर्ष तक लगातार मटर पर प्रयोग किया । उन्होंने दो किस्म के मटर लेकर पहले उन्हें अलग-अलग बोकर देखा तो अच्छे बीजों के मटर अच्छे और कमजोर के बीज कमजोर हुये। फिर दोनों प्रकार के मटर साथ-साथ बोये गये तब केवल अच्छे वाले मटर पैदा हुये । तिबारा फिर दोनों प्रकार के बीज बोने पर तीन चौथाई कमजोर मटर अलग बोकर देखे गये तो सभी मटर कमजोर व छोटे हुये किन्तु बड़े वाले बीज बोने पर उनमें से कुछ बड़े कुछ छोटे भी । आगे यही क्रम चल पड़ा इससे यह सिद्धांत निकाला गया कि आनुवाँशिक गुण कभी नष्ट नहीं होते। माता-पिता के प्रभावशाली गुण यदि अगली ही पीढ़ियों में व्यक्त हो जाये तो उसका यह अर्थ नहीं होता कि दूसरे गुण व संस्कार दब गये वरन् वे सुप्त संस्कार भी किसी न किसी पीढ़ी में उभरते अवश्य है। डार्विन ह्यूगो डह ब्राइज, विलियम बैटेशशेगरमैक तथा कारेन्स आदि वैज्ञानिकों ने भी इन तथ्यों की पुष्टि कर दी ।
इतना होने पर भी अभी तक यही तय है कि अनुवाँशिक गुणों को अधिकाँश सम्बन्ध केवल शारीरिक रचना से है । माता पिता यदि भूरी आँख वाले है तो उनकी सन्तान की किसी पीढ़ी में भूरी आँख वाले बच्चों का जन्म अवश्यम्भावी है। यह रही शारीरिक गुणों की बात । अभी तक बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक गुणों के बारे में कोई बात निश्चित नहीं हो पाती । जीव जंतुओं में सामाजिकता (सोशल लाइफ इन दि एनीमल वर्ल्ड) के लेखक प्रसिद्ध प्राणि वेत्ता तक ने यह माना है कि प्रेम भावनाओं का उदय क्यों कैसे और कहाँ से होता है यह अभी अनिश्चित है । डॉ॰ क्रू का कहना है अभी तक मानसिक व्यवस्था के बारे में विज्ञान किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा। यदि मान ले कि लोगों की विलक्षण मानसिक शक्तियाँ भी वंशानुक्रम है तो अतीन्द्रिय ज्ञान पूर्वाभास और विद्युत गति से भी तीव्र मानसिक सक्रियता को एक सार्वभौमिक मस्तिष्कीय प्रक्रिया का ही प्रमाण मानना पड़ेगा और यह विश्वास करना पड़ेगा कि ऐसी शक्ति मात्र किसी यौगिक साधनों के विकास का फल न होकर एक अनादि तत्व का ही गुण होगी।
श्री सुरेशचन्द्र दत्त के परिवार में उनकी ही तरह कोई विलक्षण बौद्धिक क्षमता वाला व्यक्ति समीपवर्ती तो पाया नहीं बया सम्भव है वह आदि पूर्वजों ऋषियों का अनुवाँशिक गुण रहा हो उस स्थिति में भी वह गुण और कही अनादि समय से ही आया होगा जो एक अनादि चेतन तत्व की ही पुष्टि करता है। श्री दत्त में इस सुप्त गुण का पता जब वे 8 वर्ष के थे तब चला । एक बार एक स्कूल इंस्पेक्टर मुआयने के लिये आये। उन्होंने कुछ मौखिक प्रश्न पूछे श्री सुरेशचन्द्र ने उन्हें सेकेंडों में बता दिये इंस्पेक्टर क्रमशः उलझे गुणक देता चला गया और श्री दत्त उनके सही उत्तर देते रहे । तब कही उन्हें स्वयं भी अपनी इस अद्भुत क्षमता का पता चला । पीछे तो वे 100 संख्या तक के गुणनफल और किसी भी बड़ी से बड़ी संख्या के वर्गमूल (स्क्वैयर रूट) तथा घन मूल (क्यूब रूट) भी एक सेकेण्ड में बता देते थे ।
मस्तिष्क विकास किसी भी वंशानुकूल विज्ञान से जटिल और वैज्ञानिक नियमों से परे है। वह विकासवाद के सिद्धांत पर भी लागू नहीं होता । विज्ञान का कथन है कि जीवों में बुद्धि शरीर और मस्तिष्क के भार के परस्पर अनुपात के अनुसार होता है किन्तु डॉ॰ डीबायर ने उस मान्यता को खण्डित करते हुए बताया कि खरगोश लोमड़ी, कुत्ते तथा घोड़े में क्रमशः 1 व 140 , 1 व 156 , 1 व दृष्टि से खरगोश को अधिक बुद्धिमान होना चाहिये, होता है घोड़ा अधिक बुद्धिमान। उसकी कुछ जातियाँ तो मानवीय बुद्धि जैसी सूक्ष्मता प्रदर्शित करती पाई गई है। अलग-अलग जीवों में तो यह जटिलता और भी बढ़ जाती है जो इस बात का प्रमाण होती है कि मस्तिष्क शरीर से भिन्न विलक्षण पदार्थ है। उसकी क्षमतायें श्री सुरेशचन्द्र दत्त की क्षमताओं से आश्चर्य जनक है। श्री दत्त के प्रदर्शन कोलम्बिया विश्व -विद्यालय तथा अन्य स्थानों में भी हुये इन प्रदर्शनों ने लोगों को एक नई कल्पना और नया विचार दिया भारतीय तत्व दर्शन की व्याख्या करने वाला कोई होता तो सम्भव था कि एक नये विज्ञान की खोज का क्रम तभी चल पड़ता।उस समय यह कौतुक कौतूहल मात्र उत्पन्न करके रह गये-पर वह आज बुद्धिजीवी को यह सोचने को विवश करते हैं कि मानसिक विलक्षणताओं का रहस्य क्या है वे वंशानुक्रम विज्ञान से जोड़े और सम्बन्धित किये जायें ?
ऐसी क्षमताओं वाले एक नहीं इतिहास सैकड़ों ही व्यक्ति हुये है। इतिहास प्रसिद्ध घटना है-एक बार एडिनबरा का बेंजामिन नामक सात वर्षीय लड़का अपने पिता के साथ कही जा रहा था । बातचीत के दौरान उसने अपने पिताजी से पूछा पिताजी मैं किसी दिन, समय पैदा हुआ था पिता ने समय बताया ही था कि दो सेकेण्ड पीछे बैजामिन ने कहा-तब तो मुझे जन्म लिये इतने सेकेण्ड हो गये । पिता ने आश्चर्य चकित होकर देखा तो उसमें 17800 सेकेण्ड का अन्तर मिला । किन्तु बैजामिन ने तभी हँसते हुये कहा पिताजी आपने सन् 1820 और 1824 के दो लीप-ईयर के दिन छोड़ दिये है। पिता भौचक्का रह गया बालक की विलक्षण बुद्धि पर दुबारा उतना घटाकर देख गया तो बच्चे का उत्तर शत प्रतिशत सच निकला । यह घटना मायर की पुस्तक ह्यूमन पर्सनालिटी में दी गई है और प्रश्न किया गया है कि आखिर मनुष्य अपने इस ज्ञानस्वरूप की वास्तविक शोध कब करेगा ? मापर्स ने लिखा है जब तक मनोविज्ञान की सही व्याख्याएं नहीं होती विज्ञान की शोधें अधमरी और मनुष्य-जीवन के उतने लाभ की नहीं होंगी जितनी कि अपेक्षा की जाती है।
हर प्रश्न का समाधान विज्ञान कर सका होता तो मनोविज्ञान का अस्तित्व ही न होता ?
-सेंट पीटर
मुहम्मद साहब राज्य की व्यवस्था को सुधारने लिए प्रयत्नशील थे । इसलिए उन्होंने अलग-अलग प्रान्त के लिए नये पदाधिकारी चुन कर भेजना शुरू कर दिया । वह चाहते थे कि नव निर्वाचित अधिकारी जनता को उचित मार्ग-दर्शन दे और न्याय पूर्वक शासन करे ! जबल का बेटा मुआज जब यमन की देखभाल के लिए चलने को तैयार हुआ तो मुहम्मद साहब ने उससे पूछा ‘ अपने प्रान्त में न्याय के लिए आधार किस बात को बनाओगे ?’
‘कुरान की आज्ञाओं को ।’
‘पर यह भी तो सम्भव है कि कुरान तुम्हारी पूर्ण रूप से सहायता न कर सके ।’
‘तब पैगम्बर के प्रमाण को जनता के सम्मुख रखूंगा ।’
‘और यदि पैगम्बर का उदाहरण भी तुम्हारी न्याय व्यवस्था में सहायक न हुआ तो ?’
तब तो मुझे अपने विवेक से ही काम लेना होगा ।’
मुहम्मद साहब मुआज की बातों से बड़े सन्तुष्ट हुये उन्होंने सभी अधिकारियों को इसी प्रकार शासन व्यवस्था चलाने का आदेश देते हुए कहा-परमात्मा ने बुद्धि और विवेक इसी लिये दिया है कि वह परंपराओं का अन्धानुकरण न कर सच्चाई को ही प्रतिष्ठा प्रदान करे ।
पूर्णमासी का चन्द्रमा शीश पर आकर झिलमिलाया और राजहंसों की टोली मान-सरोवर के प्रवास पर निकल पड़ी । हंस-शिरोमणि श्वेताक्ष दल का नेतृत्व सम्भाल कर आगे आगे उड़ रहे थे ओर भल्लाक्ष सबसे पीछे संरक्षक के रूप में । नीरव निशा का यह मौन-प्रवास ऐसा लग रहा था मानो विधाता की कोमल भावनाएं पर्यटन के लिये निकली हो और संसार के सुख-दुख का सर्वेक्षण कर रही हो ।
“श्वेताक्ष ! भल्लाक्ष ने निस्तब्धता तोड़ते हुए कहा-महामहिम जनश्रुति पौत्रायण की कीर्ति पताका भी विश्व इतिहास के आकाश में आज के चन्द्रमा के समान ही दमक रही है। उन्होंने अपना सारा जीवन प्रजा की भलाई में लगा दिया है । उनके राज्य में कोई भी दुःखी नहीं है-तुम सम्भवतः नहीं जानते होगे कि इस समय हम उन्हीं की राजधानी के ऊपर उड़ रहे है यह जो गगनचुम्बी अट्टालिकायें दीख रही है यह उन्हीं का प्रासाद है सचमुच वे बड़े ब्रह्मा ज्ञानी है।
श्वेताक्ष ने हँसकर कहा सच कहते हैं तात ! जनश्रुति पौत्रायाण एक महान आत्मा है। उनके गुणों की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है किन्तु वक ब्रह्मज्ञानी है इसमें अभी सन्देह है वित्तेषणा , पुत्रेषणा का त्याग ही नहीं करता जब तक योगी यश की कामना का भी परित्याग नहीं करता तब तक वह ब्रह्माविद नहीं हो सकता । ब्राह्मण तो सारे राष्ट्र में एक रैक्व मुनि ही है जो धन-निर्धन , यश, अपयश , मान , अपमान में सदैव एक समान निर्लिप्त जीवनयापन करते हैं।
महाराज जनश्रुति पक्षियों की भाषा समझते थे। पहले तो उन्हें राजहंसों की वार्ता कौतूहल वर्धक लगी पर जब उन्होंने अपने ही राज्य में रैक्व नामक किसी अन्य साधु की श्रेष्ठता की चर्चा सुनी तो उनका स्वाभिमानी अन्तःकरण मर्माहत हो उठा । आज तक उन्होंने प्रशंसा सुनी थी , यशोगान सुने थे किसी और को उनसे बड़ा बताया गया हो ऐसा वाक्य उन्हें पहली बार सुनने को मिला था सो उन्होंने महामुनि रैक्व का पता लगाने और सच्चे ब्रह्मा ज्ञानी की पहचान करने का निश्चय कर लिया ।
प्रातःकाल हेम, गज-रथ लेकर रैक्व मुनि से भेंट के लिये प्रस्थान किया । दिन भर यात्रा करने के उपरांत एक गाँव के किनारे मिले । एक छोटी सी बैलगाड़ी के सामने एक साधारण से बिस्तर पर बैठे रैक्व ग्रामवासियों को सुखी जीवन के स्वर्ण सूत्र समझा रहे थे । महाराज के सम्मुख आता हुआ देखकर उन्होंने वार्ता स्थगित कर उनका स्वागत किया बैठाया और जहाँ से प्रवचन छोड़ा था आगे की बात कहनी प्रारम्भ करदी । महाराज को संक्षिप्त स्वागत से सन्तोष न हुआ पर वे उस समय कुछ बोले नहीं ।
सभा विसर्जित हुई महाराज ने अपार धन महात्मा रैक्व को समर्पित करते हुये कहा-भगवान आप इतने विद्वान् होकर भी गाड़ी में भ्रमण करते हैं यह धन ले और अपनी दरिद्रता दूर करे ।
रैक्व ने उसे अस्वीकार करते हुए कहा-राजन् ! धन से लोगों की स्थूल सेवा हो सकती है आत्म-कल्याण का मार्ग दर्शन नहीं मुझे यह गाड़ी ही सर्वोत्तम धन है कहकर उन्होंने राजा की भी परवाह न करते हुए भी अपनी गाड़ी जोती और वहाँ से आगे के लिये चल पड़े । महाराज ने निर्लिप्त भाव से , यश अपयश की चिन्ता किये बिना एक लक्ष्य की ओर बढ़ता है वही आत्म-ज्ञानी तथा वही सच्चा ब्रह्मवेत्ता है।
मनुष्यों और पशु पक्षियों की तुलना करते हुये शास्त्रकार ने लिखा है-”ज्ञानं हि तोषाँधिको विशेषः।” अर्थात् आहार विहार, भय, निद्रा, कामेच्छा की दृष्टि से मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं पाया जाता । शारीरिक बनावट में भी कोई बड़ी असमानता दिखाई नहीं पड़ती । खाने-पीने, चलने, उठने, बैठने , बोलने, मल मूत्र त्याग के सभी साधन पशु और मनुष्यों को प्रायः एक जैसे ही मिले है। पर मनुष्य में कुछ विशेषतायें इन प्राणियों से भिन्न है। उसकी रहन सहन की रुचि, उचित अनुचित का भय, भाषा के कुछ विशेषतायें यह सोचने को विवश करती है कि वह इस दृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी है। उसकी रचना किसी उद्देश्य पर आधारित है । साधारण तौर पर शरीर यात्रा चलाने और मन को प्रसन्न करने की क्रिया पशु भी करते हैं किन्तु इसके पीछे उनका कोई विधिवत विचार नहीं होता । यह कार्य वे अपनी अन्तःप्रेरणा से किया करते हैं उनके जीवन में जो अस्त-व्यस्तता दिखाई देती है उससे प्रकट होता है कि उन्हें अनुचित का ज्ञान नहीं होता ।
मनुष्य का प्रत्येक कार्य विचारो से प्रेरित होता है। यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य को विचार शक्ति इसलिये मिली है कि उचित अनुचित को ध्यान में रखकर वह सृष्टि संचालन की नियमित व्यवस्था बनाये रखने में प्रकृति को सहयोग देता रहे। जो केवल खाने पीने और मौज उड़ाने की ही बात सोचते हैं इसी को जीवन का श्रेय मानते हैं उनमें और मनुष्येत्तर पशुओं पक्षियों और कीट पतंगों में अन्तर कहाँ रहा ? यह क्रियायें तो पशु भी कर लेते हैं।
विचार बल संसार को सर्वश्रेष्ठ बल है। विचार शक्ति का सूचक है । पशु निर्विचार होते हैं इसलिये वे परस्पर अपनी भावनाओं का आदान प्रदान नहीं कर सकते उनकी कोई लिपि नहीं , भाषा नहीं । किसी प्रकार का संगठन बनाकर अपने प्रति किये जा रहे, अत्याचारों का प्रतिवाद नहीं कर सकते । इसीलिये शारीरिक शक्ति में मनुष्य से अधिक सक्षम होते हुए भी वे पराधीन है। विचार शक्ति के अभाव में उनका जीवन क्रम एक बहुत छोटी सीमा में अवरुद्ध बना पड़ा रहता है ।
विश्रृंखलित ,ऊबड़-खाबड़ धरती को क्रमबद्ध व सुसज्जित रूप देने का श्रेय मनुष्य को है । घर, गाँव ,शहर, देश आदि की रचना सुविधा और व्यवस्था की दृष्टि से कितनी अनुकूल है। अपनी इच्छाएं , भावनाएं दूसरों से प्रकट करने के लिए भाषा-साहित्य और लिपि की महत्ता किससे छिपी है। आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और साँसारिक आह्लाद प्राप्त करने के लिए कला कौशल ,लेखन, प्रकाशन की कितनी सुविधायें आज उपलब्ध है। यह सब मनुष्य की विचार शक्ति का परिणाम है। मनुष्य को ज्ञान न मिला होता तो वह भी रीछ, बंदरों की तरह जंगलों में घूम रहा होता । सृष्टि को सुन्दर रूप मिला है तो वह मनुष्य की विचार शक्ति का ही प्रतिफल है। विचारो का उपयोग निःसन्देह अतुल्य है।
विचारो की विशिष्ट शक्ति का स्वामी होते हुए भी मनुष्य का जीवन निरुद्देश्य दिखाई दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा । जिसके कार्यों में कोई सूझ न हो, विशिष्ट आधार न हो उस जीवन को पशु जीवन कहे तो इसमें अतिशयोक्ति क्या है। हवाई जहाज निराधार आकाश में उड़ता है अभीष्ट स्थान तक पहुँचने का उसे निर्देश न मिलता रहे तो वह कही से कही भटक जायेगा । कुतुबनुमा की सुई वायुयान चालक को बताती रहती है कि उसे किस दिशा में चलना है इस निर्देश के आधार पर ही वह सैकड़ों मील का रास्ता पार कर लेता है। प्रत्येक प्राकृतिक पदार्थ किसी न किसी उद्देश्य से निर्मित है। सूर्य प्रतिदिन आसमान में आता है और लोगों को प्रकाश , गर्मी और जीवन देने का अपना लक्ष्य पूरा करता रहता है । वृक्ष, वनस्पति, वायु, जल ,समुद्र,नदियाँ सभी किसी न किसी लक्ष्य को लेकर चल रहे है । इस संसार में यह व्यवस्था तभी तक है जब तक प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक पदार्थ अपनी अवस्था के अनुसार अपने कर्त्तव्य कर्म पर स्थिर है।
मानव जीवन की महत्ता इस पर है कि हम वर्तमान साधनों का उपयोग अंतर्दर्शन या आत्म ज्ञान प्राप्ति के लिए करे । उद्देश्य का मार्ग बहुधा किसी विशिष्ट दिशा की ओर ही होता है। प्रकृति जिस ओर ले जाना चाहे उधर ही चलते रहे तो इन प्राप्त शक्तियों की सार्थकता कहाँ रही ? जैसा जीवन दूसरे प्राणी जीते हैं वैसा ही हम भी जिये तो विचारशीलता का महत्व क्या रहा ? बुद्धि की सूक्ष्मता, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ , विराट की कल्पना आदि ठीक वायुयान का मार्ग दर्शन करने वाले कुतुबनुमा की सुइग् के समान है , जिससे मनुष्य चाहे तो अपना उद्देश्य पूरा करने का निर्देशन प्राप्त कर सकता है । उद्देश्य कभी श्रमहीन और मात्र साँसारिक नहीं हो सकते । जिन साधनों की सरसता और श्रेष्ठता को कायम रखने के अतिरिक्त और कुछ अधिक नहीं होते । इन्हीं के पीछे पड़े रहे तो अपना वास्तविक लक्ष्य-जीवन लक्ष्य-पूरा न हो सकेगा।
यदि यह विचार बना लिया कि हमारा उद्देश्य जीवन मुक्ति है तो अभी से इसकी पूर्ति में जग जाइये। एकबार लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को उसमें जुटा दीजिये । अपने धैर्य से विचलित न हो , जो राह पकड़ी है उस पर दृढ़ता पूर्वक चलते रहे । तब देखे कि आप कितनी शीघ्रता से अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
‘नः निश्चिन्तार्था द्विरमन्ति धीरः ‘। अर्थात्-महापुरुषों का यह प्रधान सद्गुण है कि वे अपने जीवन उद्देश्य से कभी डिगते नहीं । महापुरुषों के जीवन में उद्देश्य की एकता और तल्लीनता, लगन और तत्परता इस ऊँचे दर्जे तक पाई जाती है कि वह पाठक के अन्तस्थल को झकझोरे बिना मानती नहीं । आपकी महानता की कसौटी भी इसमें है कि आप अपने लक्ष्य के प्रति कितने आस्थावान है ? उसकी पूर्ति के लिए आप कितना त्याग और बलिदान करते हैं ?
उद्देश्य बना लेना ही पर्याप्त नहीं हो सकता । यह भी परखना पड़ेगा कि आपका ध्येय कितना मूल्यवान है उद्देश्य उच्च न हुआ तो परिस्थिति बदलते ही उस विचारणा का बदल जाना भी सम्भव है । असाधारण लक्ष्यों ही वह शक्ति होती है जो मनुष्य को नियमित प्रेरणा रहे और उसे उत्साह से ओत प्रोत रखती रहे। मंजिल पहुँचने में जो बाधाएं आती है उनसे संघर्ष करने से धैर्य पूर्वक अन्त तक डटे रहने की क्षमता लक्ष्य की उत्कृष्टता से ही सम्भव होती है।
एक तो युद्ध स्थल , उस पर घनघोर अँधेरी रात और भयानक शीत ऐसा लगता था वीभत्सता साकार होकर व्याप्त हो गई हो। एक तम्बू के अन्दर कुछ सैनिक कोयले की अँगीठी जलाये बैठे आँच ले रहे है। उनका वायरलैस सेट पास ही रख है। युद्ध अभी खामोश है इसलिये सब अपने-अपने घरों की याद कर रहे है ऐसी ही चर्च में वक सब संलग्न है तभी वायरलैस पर कमाण्डर का हुक्म आता है अपनी उत्तर वाली चौकी की सहायता के लिए तुरन्त प्रस्थान करो ।
घटना जम्बू कश्मीर की है सन् 1661 जब भारत का पाकिस्तान युद्ध हुआ । यह सभी जवान जिस स्थान पर बैठे है वहाँ से 15 मील दूर है। सवेरा होने से पहले ही वहाँ पहुँचना है सवेरा हो जाने पर दुश्मन देख सकता था मार सकता था अतएव कैसी भी कठिनाइयों में सवेरा होने तक चौकी पहुंचना आवश्यक था। अतएव वहाँ से उसी प्रकार तत्परता पूर्वक आगे बढ़े जिस तरह मृत्यु को कभी न भूलने वाले योगी मनुष्य जीवन को अस्त व्यस्त तरीके से नहीं व्यवस्थित अनुशासन पूर्वक और तत्परता से जीते हैं।
13 नवम्बर की बात है। ठण्डक के दिन थे। 10 सिपाहियों की छोटी सी टुकड़ी अपने अस्त्र सँभाले नक्शे के सहारे आगे बढ़ रही थी । वायरलैस से कमाण्ड पोस्ट का संपर्क बना हुआ था । संवादों का आदान प्रदान भी ठीक ठीक चल रहा था कि एकाएक ऐसा स्थान आ पहुँचा जहाँ से आगे बढ़ना नितान्त कठिन हो गया । सारा स्थान बर्फ से ढक गया था । युद्ध में सैनिक नक्शों में नदी नाले , टीले, वृक्ष आदि संकेतों के सहारे बढ़ते हैं पर बर्फ ने पृथ्वी के सभी निशान मिटा डाले थे । पदी झरने सब जम चुके थे । पेड़ पौधे तक बर्फ से ढके थे ऐसी स्थिति में आगे बढ़ना मुश्किल हो गया । सभी सैनिक निस्तब्ध खड़े रह गये सोच नहीं पा रहे थे क्या किया जाये ?
कहते हैं युद्ध के समय अदृश्य आत्माओं की भावनाओं की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। द्वितीय महायुद्ध के दौरान अतीन्द्रिय अनुभूतियों , मृतात्माओं के विलक्षण क्रिया-व्यापार सम्बन्धी सैकड़ों घटनाओं के प्रामाणिक विवरण सैनिक रिकार्डस (डाकू मेन्स) में पाये जाते हैं। यह घटना भी उसी तरह की है और प्रकाश डालती है कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का चेतन शरीर का नाश नहीं होता । यदि आत्मा का चेतन शरीर का नाश नहीं होता । यदि आत्मा तुरन्त मृत्योपरान्त नींद में नहीं चली जाती और उसकी कोई प्रबल कामना भी नहीं होती तो वह साँसारिक कर्तव्यों में जीवित व्यक्तियों को जीवित व्यक्तियों की भाँति ही सहायता पहुँचा सकती है। यह घटना उस तथ्य की पुष्टि में ही दी जा रही है । इस टुकड़ी में जो दस सैनिक थे उन्हीं में से एक श्री गिरिजानन्द झा-मस्ताना के द्वारा प्रस्तुत यह घटना 1662 के एक धर्मयुग अंक में भी छपी थी।
अभी सैनिक इस चिन्ता में ही थे कि अब किस दिशा में कैसे बढ़ा जाये कि किसी की पर ध्वनि सुनाई दी । अब तक आकाश में चन्द्रमा निकल आया। आशंका से भरे सैनिकों ने देखा सामने एक ऑफिसर खड़ा है। कन्धे पर दो स्टार देखने लगता था वह लेफ्टिनेंट है । देखते ही सैनिकों ने उन्हें सैल्यूट किया । सैल्यूट का उत्तर सैल्यूट से ही देकर लेफ्टिनेंट बोले-देखो आगे का रास्ता भयानक है तुम लोगों को कुछ मालूम नहीं है। चौकी दूर है सवेरा होने में कुल चार घन्टे बाकी है इसीलिये बिना देर किये तुम लोग मेरे पीछे पीछे चले आओ । यह कहकर वे पीछे मुड़े-सैनिकों ने देखा लेफ्टिनेंट साहब की कमीज में पीठ पर गोल निशान है लगता था उतना अंश जल गया था ।
बिना किसी नक्शे के सहारे लेफ्टिनेंट साहब आगे आगे ऐसे बढ़ते जाते थे मानो वह सारा क्षेत्र उनका अच्छी तरह घूमा हुआ हो । सिपाही परेशान भी थे और चिन्तित भी कि यह अजनबी ऑफिसर इस इलाके के इतने माहिर क्यों है। कभी कभी आशंका भी हो जाती थी कि कहीं कोई दुर्घटना तो होने वाली नहीं है । चुपचाप चलने में खामोशी और उदासी सी अनुभव हो रही थी। उस उदासी करे दूर करते हुये कमाण्डर ने बताया-मेरी पीठ पर यह निशान जो तुम लोग देख रहे हो वह कल की गोलाबारी का है- हम लोग हमले की तैयारी में थे तभी पाकिस्तानी सेना ने गोलाबारी शुरू कर दी ।सब लोग जमीन पर लेट गये, तभी एक बम आकर मेरी उधर आकर फटा । उसी का एक टुकड़ा पेरी पीठ पर आकर गिरा कमीज जल गई । इससे आगे कुछ और कहने से पूर्व उन्होंने बातचीत का रुख मोड़कर कहा -तुम लोग शायद आत्मा की अमरता पर विश्वास न करते हो पर मैं करता हूँ मरने के बाद आत्मायें’ अपने जीवन विकास की तैयारी करती है, जिसकी जो इच्छायें होती है उसी तरह के जीवन की तैयारी में वे जुट जाती है कोई इच्छा न होने पर भगवान् अपनी ओर से प्रेरित करके उसे आगे के क्रम में नियोजित करते हैं।”
बातचीत करते करते रास्ता कट गया और रात भी । जिस चौकी पर पहुँचना था वह कुछ ही फर्लांग पर सामने दिखाई दे रही थी ऑफिसर रुका, उसके साथ ही सभी सिपाही भी रुक गये उसने पीछे मुड़कर कहा-देखो अब तुम लोग अपने स्थान पर आ गये अब तुम लोग जाओ हम यहाँ से आगे नहीं जा सकते । सैनिकों ने सैल्यूट किया और आगे की ओर चल पड़े । ऑफिसर ने सलामी ली पर आगे नहीं बढ़ा। सैनिकों ने उस गज आगे जाकर फिर पीछे की ओर उत्सुकता पूर्वक देखा कि साहब किधर जा रहे है किन्तु वे आश्चर्य चकित थे कि वहाँ न तो कोई साहब था और न ही कोई व्यक्ति। दूर दूर तक दृष्टि दौड़ाई पर कही कोई दिखाई न दिया ।
सिपाही चौकी पर पहुँचे जहाँ कमाण्डर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था । रात में वायरलैस संपर्क टूट गया था सैनिक कमाण्डर ने आते ही -पूछा-तुम लोग इस बीहड़ मार्ग में इतनी जल्दी कैसे आ गये । तो उन्होंने बताया कि एक लेफ्टिनेंट इन्हें यहाँ लेकर आये वे एक फर्लांग पहले कही अदृश्य हो गये।
लेफ्टिनेंट ?-उन्होंने आश्चर्य पूर्वक कहा यहाँ तो कोई भी लेफ्टिनेंट नहीं तुमको जिस व्यक्ति ने रास्ता दिखाया उसका हुलिया क्या था । सिपाहियों ने एक ही हुलिया बताया, कमाण्डर आश्चर्य चकित रह गया उनका कथन सुनकर, क्योंकि जिस लेफ्टिनेंट के बारे में उन्होंने बताया उनकी एक दिन पूर्व ही इसी स्थान पर गोला लगने मृत्यु हो गई थी।
वेद भगवान का कथन है-
इयं कल्याण्यअजरा मर्त्यस्यामृता गृहे। यस्मै कृता शये स यश्रकार जजार स॥ अथर्व वे 1 0।8।2
अर्थात्-मर्त्य शरीर में रहने वाली यह चेतना आत्मा अजर (जो कभी वृद्ध नहीं होती ) अमर (जिसका कभी नाश नहीं होता ) है । जो उसे प्राप्त करता है वह सुखी होता हैं
बन्धन और मुक्ति जैसे दर्शन की खोज करने वाला भारतीय योगियों ने प्रत्यक्षतः वह योग साधनायें भी विकसित की है जिनसे अपने प्राण शरीर को नियन्त्रित व स्थूल पदार्थों तथा स्थूल शरीर का इच्छानुसार उपभोग भी किया जा सके । परकाया-प्रवेश ( अपने शरीर से प्राण निकाल कर किसी शव में प्रवेश करके उसे जिन्दा कर देना ) तथा दूर की वस्तुओं को भी गुप्त रूप से उठा जाना आदि प्राण पर नियन्त्रण की ही सिद्धियां । योग उपनिषदों में उसकी विस्तृत व्याख्याएं है। योगवशिष्ठ 6।1।82।26 से 32 मंत्रों में भी बताया है-
रेचाकाभ्यासयोगेन जीवः कुण्डलिनी गृहात। उद्धृत्य योज्यते यावादामोदः पवनादिव॥
इति सिद्विश्रियं भुक्त्वा स्थित चेत्तद्वपुःपुनः। प्रविश्यन्ते स्वमन्यद्वा यद्यत्तात विरोचते॥
अर्थात्-रेचक प्राणायाम के अभ्यास से योगी । अपने प्राण कुण्डली में ऐसे ही ले आते हैं जैसे फूल से उसकी। सुगन्ध निकाल ली जाये उस स्थिति में शरीर निष्क्रिय चेष्टा रहित हो जाता है। उस अवस्था में शरीर को लकड़ी और पत्थर की भाँति त्यागा जा सकता है और किसी भी मुर्दा शरीर में सवार होकर फिर से जीवित मनुष्य के समान गतिशील भी हुआ जा सकता है।
यह घटना उपरोक्त तथ्य का प्रमाण है। गोला लगने के बाद लेफ्टिनेंट की मृत्यु हो गई युद्ध के समय कोई इच्छा या मन में वासना न होना स्वाभाविक है उस समय चित्तवृत्तियाँ एकाग्र रहती है ध्यानस्थ एकाग्रता के साथ हुई मृत्यु के बाद लेफ्टिनेंट की जीवात्मा को मृत्यु के बाद की नींद नहीं आई उस समय भी उन्हें अपने कर्तव्य का भाव बना रहा । उन्होंने देख कि इन सैनिकों को सहायता की आवश्यकता है तभी उन्होंने अपने ही मृत शरीर में फिर से अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा प्राणों को प्रवेश कर उससे उतनी देर काम ले लिया । टूटे फटे शरीर को यद्यपि देर तक साधे रहना कठिन था तथापि प्राण शक्ति द्वारा उतनी देर तक पूर्व शरीर को काम में लेकर उन्होंने देश भक्ति और कर्तव्य भावना का आदर्श रखा साथ ही सूक्ष्म शरीर की सत्ता और उसकी महान महत्ता को भी प्रमाणित कर दिया ।
नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ गीता 2।23
हे अर्जुन ! आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जल नहीं सकती , जल गीला नहीं कर सकता और वायु उसे सुखा सकने में समर्थ नहीं।
व्यक्तिगत अस्तित्व की महत्ता-
बनते हुए विशाल भवन के पास लगे ईंटों के ढेर ने कहा-’गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का निर्माण हमारे अस्तित्व पर आधारित है उसका शिलान्यास ही न हो तो कई मंजिलों की बात तो दूर रही एक दीवाल का खड़ा होना मुश्किल है भवन के आकार और आधार का श्रेय हमें ही तो है।’
गारे ने ईंटों की गर्व भरी वाणी सुनी तो उस पर न रहा गया ‘इतना झूठ क्यों बोलते हो। क्या तुम नहीं जानते कि एक सूत्र में पिरोकर , ईंट जोड़कर सुदृढ़ता प्रदान करने का श्रेय हमें ही है गारे के अभाव में ईंटों का ढेर ठोकर मारकर गिराया जा सकता है।’
किवाड़ और खिड़कियों ने भी प्रतिवाद किया-’गारे भाई ! यह कौन नहीं जानता कि ईंटों का जोड़ जोड़कर तुम दीवारें खड़ी करते हो । पर यदि उस मकान में खिड़की , दरवाजे न होंगे तो रहने को भी कौन तैयार हो जायेगा । ऐसे असुरक्षित मकान में कोई मुफ्त में भी रहने को तैयार न होगा । भवन की पूर्णता तो हम पर ही निर्भर करती है।’
शिल्पी उनकी बात चुपचाप सुन रहा था वह बोला-’आप लोगों में भले ही कितनी ही पारस्परिक सहयोग की भावना बढ़ जाये पर सबको एक सूत्र में पिरोने वाला तो मैं ही हूँ यदि मेरा हाथ न लगे तो ईंटें गारा और किवाड़ अपने अपने स्थान पर ही पड़े रहेंगे । मेरे शिल्प के बिना आपका कोई अस्तित्व नहीं ।’
और भवन ने फिर एकबार सोचा-’ सह-अस्तित्व के अभाव में व्यक्तिगत अस्तित्व का कोई महत्व नहीं है । झूठे अभिमान को छोड़कर दूसरों के महत्व को भी समझना चाहिये ।’
शब्द की उत्पत्ति प्राकृतिक के संघात के अतिरिक्त कभी नहीं हो सकती । दो वस्तुएं टकराती है तभी ध्वनि होती है। किन्तु सृष्टि में जितने भी चेतन जीव है वह अपनी इच्छा से अपने मुख-यन्त्र द्वारा इच्छानुसार बोल सकते हैं। जीवों का बोलना उनकी इच्छा महत्वाकाँक्षा आवश्यकता और चेतनता का प्रतीक होता है।
प्रश्न यह है कि क्या अदृश्य जगत में भी ऐसी कोई शक्तियों है जो इच्छा अनुभूति ही न रखती हो पर किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बोल भी सकती हो, शब्दों का उच्चारण भी कर सकती हो यदि की ऐसे उदाहरण मिले तो उन्हें अदृश्य सूक्ष्म जगत में भटकती हुई आत्माओं के अस्तित्व का ही प्रमाण मानना पड़ेगा और यह प्रमाण आज के सभ्यतावादी युग में देखने को मिल सकते हैं। “वान्डर बुक आफ दि स्ट्रेन्ज फैक्टस” नामक पुस्तक से उद्धृत दो उदाहरण नीचे प्रस्तुत है-
होनोलूलू से 75 मील की दूरी पर कवाई टापू है यह पश्चिमी आइलैण्ड के हवाइयाँ ग्रुप में आता है। नहिली के किनारे एक 60 फुट ऊँची और आधा मील लम्बी एक पहाड़ी है । इस बालू में कोरल, शेल्स तथा लावा के कण पाये जाते हैं जो अपने आप में एक आश्चर्य है उससे भी आश्चर्य यह है कि इस टीले से प्रायः कुत्ते के भौंकने की आवाज आया करती है। रात के अन्धकार और प्राकृतिक प्रकोप जैसे अवसरों पर यह ध्वनि बहुतायत से सुनने को मिलती है। बच्चों के लिये यह क्षेत्र निषिद्ध है क्योंकि यह बोजी सुनकर बच्चे डर जाते हैं। आज तक कोई भी विशेषज्ञ कोई भी वैज्ञानिक उस कारण की खोज नहीं कर पाया कि इस टीले से यह भौंकने की आवाज क्यों आती है।
ऐसा भी नहीं है कि पास के किसी गाँव आवाज आती हो । इतिहास में फ्रेड पैटजेल जिसे “हाग कालर चैम्पियन” के नाम से जाना जाता है वह तो उदाहरण है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि वह इतना ऊँचा बोलता था कि उसकी आवाज 3 मील दूर तक मजे से सुनी जा सकती थी किन्तु इस टापू में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं , कोई भी जन्तु नहीं जिसकी आवाज इतनी दूर तक पहुँच सकती हो । रहस्य ज्यों का त्यों रहस्य बना हुआ है और अपने विश्लेषण की एक लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहा है।
इसी प्रकार नील नदी के उस पार कारनक के खंडहरों में दो पत्थर की घूरती हुई प्रतिमायें है। दोनों एक दूसरे की ओर मुँह किये एक मील के फासले पर जमी है इनमें से एक प्रतिमा तो पत्थर की तरह चुप खड़ी रहती है पर दूसरी से अक्सर कुछ बोलने की आवाज आया करती है।पत्थर की मूर्ति क्यों और कैसे बोलती है उसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गई किन्तु अभी तक तो कुछ ज्ञात हो नहीं पाया। मूर्ति में कोई रेडियो यन्त्र भी नहीं लगे जिससे अनुमान किया जाये कि सम्भव है वह अदृश्य शब्द प्रवाहों को पकड़ लेते हो और वह ध्वनि में परिवर्तित हो जोते हो । फिर रहस्य क्या है यह सम्भव है कि मनुष्य हल न कर पाये क्योंकि उसकी आदत तो केवल स्थूल तक सोचने और समीक्षा करने की है अदृश्य सत्यों की शोध का उसमें स्वभाव और साहस कहाँ ? जो इन तथ्यों का पता लगाया जा सके ।
“कोई चमत्कार दिखाइये तो जानू कि संसार में सचमुच आत्मा और परमात्मा नाम की कोई वस्तु है ।” एक सज्जन ने महर्षि रमण से प्रश्न किया।
महर्षि शाँत हो गये और गम्भीर विचार की मुद्रा में बोले-तात ! अनन्त काल से सूरज आ जा रहा है , मर मरकर जी रहा है, तारागण चमक रहे है इस विराट से बड़ा और चमत्कार क्या हो सकता है। जिज्ञासु की शंका का समाधान हो गया उन्होंने अनुभव किया जीवन का प्रादुर्भाव ही ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है।
महान धर्मात्मा राजा जनश्रुति को जब भोग-विलास से वैराग्य हुआ तो उसने देखा कि अब तो उसका शरीर भी जर्जर हो चुका है। शरीर में तप और साधना की शक्ति भी नहीं रही। जीवन भर अज्ञान में अनेक पाप किये उनका पश्चाताप राजा को दलने लगा तो वह महामुनि रैक्य के पास पहुँचे और बोले भगवन् मैं धर्म चित्त हुआ राजा आज जीव भाव से आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ।
मुझे बतलाइये मृत्यु के बाद क्या होता है और क्या मेरी असहाय चेतना भी जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्ति पा सकती है।
महामुनि रैक्य ने बताया-राजन् ! जब मृत्यु का समय आता है तब सब इंद्रियों की वृति वाणी में लय हो जाती है वाणी की वृति मन में और मन की वृति तब प्राण में परिवर्तित हो जाती है। जागृत अवस्था में पाँच ज्ञानेंद्रियां मन की इच्छाओं पर नाचती थी पर मृत्यु के समय मन प्राण चेतना के वश में चला जाता है तब प्राण ही जीवन भर की स्थिति के अनुरूप नये निर्माण में जुट जाते हैं वह निर्माण चाहे अच्छा हो या बुरा उसका निर्णय चेतना के शरीर छोड़ते समय ही हो जाता है । जो लोग उपासना, तप, ज्ञान सम्वर्धन और साधना द्वारा अपना मनोबल और आत्म बल विकसित कर लेते हैं वह अनेक गुणों और संस्कारों से युक्त सुन्दर बनी रह पाते हैं और जिनकी इंद्रियों के प्रति लालसा जागृत बनी रहती है वे उन उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए पुनः कोई शरीर धारण करते हैं। यह पटाक्षेप तनातन काल तक चलते रहते हैं।
उपरोक्त कथन में मृत्यु विज्ञान पर जहाँ शास्त्रीय प्रकाश डाला गया है वहाँ यह समझाने का प्रयत्न भी है कि एक मृत्यु के बाद मनुष्य जीवन का अन्त नहीं हो जाता वरन् उसे अपने कर्मानुसार अन्य जन्म भी धारण करने पड़ते हैं। बार-बार जन्म और मृत्यु होती है जब तक सृष्टि का प्रत्येक जीव पूर्णता नहीं प्राप्त कर लेता यह प्रक्रिया कभी बन्द न होगी। पुनर्जन्म के इस के इस सिद्धांत को न मानने के कारण जहाँ ईसाई और मुसलमानों में अमानवीय आदर्श , हिंसा, भोगवाद, संग्रह, विलासिता और असामाजिकता का भाव बढ़ा वहाँ भारतीयों में कर्तव्य धर्म और सदाचार के प्रति अब भी प्रेम और निष्ठा जुड़ी हुई है। इस विश्वास का मनोवैज्ञानिक लाभ हिन्दू जाति को सत्कर्म के रूप में मिला हैं। अभी भी यदि दुनिया में कोई देश है जहाँ विश्व मानव के प्रति दया, करुणा ,क्षमा, उदारता ,नैतिकता और सामाजिकता का भाव बचा हुआ है तो वह भारतवर्ष ही है।
प्रस्तुत घटनायें इस बात का प्रमाण है कि पुनर्जन्म की मान्यता निराधार तथ्य नहीं । 1660 में राजकोट के सलोद बैंक के कर्मचारी प्रवीनचन्द्र शाह को एक पुत्री हुई । उसका नाम राजुल है। तीन साल तक बालिका के अति मस्तिष्कीय ज्ञान में जागृति के कोई लक्षण नहीं दिखाई दिये। पर थोड़े दिन बाद ही वह करने लगी कि वह तो जूनागढ की है उसका नाम गीता है। पहले तो घर वालो ने कोई ध्यान नहीं दिया पर बाद में लड़की के दादाजी ब्रजभाई शाह ने अपने दमाद को जूनागढ जाकर पता लगाने को कहा।
जब वहाँ जाकर खोज की गई तो पता चला कि टैली स्ट्रीट जुनागढ के गोकलदास ठक्कर की बेटी गीता की मृत्यु जब वह 2॥ वर्ष की थी तब हो गई थी। राजुल अपने घर पास मिठाई की दुकान का जिक्र किया करती थी। जब यह लोग बालिका को लेकर जूनागढ पहुँचे तो ऊपर पते पर बताये गये स्थान के पास ही उस दुकान को बालिका ने पहचान लिया । शाम को व लोग राजुल को लेकर गोकुलदास ठक्कर के घर गये। उनकी धर्म पत्नी काँताबेन खिड़की के पास खड़ी थी। ब्रजभाई ने राजुल से पूछा? क्या तू इन्हें पहचानती है तो बालिका ने थोड़ा दिमाग को जोर लगाया और बोली-” तुम मेरी माँ हो। “ यही नहीं उसने उन्हें “भाभी “ कहकर पुकारा तो सब लोग आश्चर्य चकित रह गये क्योंकि गीता (अब राजुल) अपनी माँ को भाभी कहकर ही पुकारा करती थी। शाह परिवार को भी बड़ा आश्चर्य हुआ कि अपने परिवार में तो माँ को बा कहा जाता है पर लड़की ने माँ को भाभी कहने का सम्बोधन कहाँ से सीखा।
दूसरे दिन घर के सब लोग मन्दिर दर्शन करने गये। बालिका से उस मन्दिर का पता पूछा तो उसने एक घर की ओर इशारा किया । लोगों ले समझा लड़की भूल गई पर काँताबेन ने बताया कि यह मकान सा दिखाई देने वाला ही मन्दिर है और वे प्रतिदिन यहाँ पूजा करती है तो लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। लड़की के कथन की सत्यता को सभी ने स्वीकार किया।
इसी तरह का एक और प्रसंग कल्याण मार्च 1666 में छपी बेमुला (लंका) का है। सुरेश मैतृमूर्ति नाम के एक व्यक्ति जिन्होंने बौद्ध धर्म में दीक्षा ली थी बीमार पड़ गये। बीमारी के दिनों में उन्हें किसी अज्ञात प्रेरणा से मालूम हो गया कि उनकी मृत्यु कल शाम तक अवश्य हो जायेगी और उनका दूसरा जन्म उत्तर भारत में कही होगा।
लोगों ने इनकी बातों का विश्वास नहीं किया क्योंकि तब स्थित काफी सुधर चुकी थी। दिन भर स्थिति सुधरती ही रही किन्तु बात उन्हीं की सच हुई सायंकाल से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई । मरने से पूर्व उन्होंने अपनी कलाई घड़ी अपने गुरुभाई श्री आनंद नेत्राय ने को दी । दोनों में बड़ा आत्म भाव था इसलिये श्री नेत्राय ने उनकी दूसरी बात का भी पता लगाने का निश्चय किया।
कई वर्ष बाद श्री आनन्द नेत्राय मद्रास और एक ज्योतिषी से सुरेश के पुनर्जन्म की बात पूछी । उक्त ज्योतिषी के पास 5000 वर्ष पुरानी कोई पुनर्जन्म विद्या की पुस्तक थी उसके आधार पर उसने बताया कि सुरेश का जन्म बिहार प्राँत में हुआ है । पिता का नाम रमेश सिंह और माता का नाम सावित्री बताया । इतने सूत्र मिल जाने पर श्री आनन्द नेत्राय ने पुलिस रिकार्ड की सहायता से पता लगाया। बच्चे का पता चल गया और कुछ विचित्र बाते सामने आई जैसे कि यह बालक भी अपने पूर्व जन्म की बाते बजाने लगा । आनन्द नेत्राय लंका में प्रोफेसर है वे बच्चे को वहाँ ले गये उसने जहाँ अनेक बाते स्पष्ट पहचानी वहाँ लोगों को अपनी घड़ी पहचान कर आश्चर्य चकित कर दिया आनन्द नेत्राय के हाथ की घड़ी देखते ही उसने कहा-”यह घड़ी मरी है। यह वही घड़ी थी जो मृत्यु के पूर्व सुरेश ने ही आनन्द जी को दी थी।
बिहार में जन्मे बालक ओर सुरेश के गुण , कर्म और स्वभाव में अधिकाँश साम्य पाया गया इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जीवात्मा की यात्रा जिस स्थान से (आत्मिक विकास की दृष्टि से) समाप्त हुई थी वही से फिर शुरू हो जाती है यदि मनुष्य अपने जीवन को संवारने , सुधारने ऊर्ध्वगामी बनाने में लग जाता है तो पिछले जीवन के अशुभ कर्मों का फल भोगते हुए भी उसका जीवन साधुओं जैसा निर्मल और उद्यत होता जाता है यदि पिछले जन्म के प्रारब्ध बहुत कठिन और जटिल न हुये तो थोड़े ही दिन में स्थिर शान्ति और आनन्द की प्राप्ति होती है यदि जीवन का अधिकाँश जन्म ग्रहण करना पड़ता है तो उसका दूसरा जन्म उच्च और श्री सम्पन्न कुल में होता है और फिर उसे जीवन मुक्ति की उपलब्धि होती है।
गीता का कथन है-
शरीरं यदवाप्नोति पच्चाप्यूत्क्रामतीश्सरः। गृही त्वैवानि संयति वायुर्गम्धानिवाशायात्॥ --गीता 5।8
अर्थात्-जिस तरह गन्ध के स्थान से गन्ध ग्रहण कर ले जाता है वैसे ही देहों में निवास करने वाला जीवात्मा जिस पहले शरीर को त्यागता है उससे इन मन सहित इंद्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है उसमें जाता है भावार्थ यह है कि मृत्यु के समय जैसे
भाव-कुभाव जीव के होते हैं वह अन्य जन्म में चले जाते हैं। सह संस्कार कहे जाते हैं और उन्हीं के आधार पर जब नये जीवन का प्रारम्भ करता है।
इसी सूक्ष्म जीवन विद्या पर प्रकाश डालते हुये अपौरुषेय वेद करते है-
“पुनर्मन पुनरायुर्म आगन्पुनः-प्राणः-पुनरात्मा म आगन पुनण्चक्षुः पुनः श्रोत्रं आगन् । वेश्वानरोऽदब्ध स्तनूपा अग्निर्नः पातु दुरितादवसात् ॥ यजु॰ 4।15
अर्थात्-सोने के समय मन आदि सब इंद्रियां लीन हो गई थी तब भी प्राण जागृत था तथापि उसके कार्य का हमें पता नहीं था वह सब कल के समान आज पुनः प्राप्त हुआ है यह आत्मा हमें पाप कर्मों से बचावे। जिस प्रकार निद्रा के पश्चात सभी इंद्रियां आदि स्वस्थ रूप में प्राप्त होती है उसी प्रकार महा निद्रा के पश्चात भी हम उन्हें नई शक्तियों के साथ प्राप्त करते हैं जो इस बात को नहीं जानता और इन्द्रियासिक्त या प्रमाद में पड़ा रहता है आत्म शक्ति को नष्ट कर क्षुद्र योनियों में पड़ता है । अग्निदेव (परमेश्वर) हमें स अधोगति से बचाये।
मृत्यु एक विधि व्याख्या है मात्र संयोग नहीं उसका एक उदाहरण इस प्रकार है बरेली जिले के बहेडी ग्राम में पुनर्जीवन की एक विलक्षण घटना घटित हुई । गन्ना विकास संघ के एक चपरासी की एक अल्पवयस्क पुत्री की मृत्यु हो गई । जब उसे दफनाने के लिये ले जाया जा रहा था तो शव हिलता डुलता दिखाई दिया । जमीन पर रखदी गई। और थोड़ी देर में ही वह जीवित होकर उठ बैठी । और भी विचित्र बात उस समय हुई जब उस बालिका ने जैसे ही लौटकर घर में कदम रखा तो पड़ोस की एक उसी आयु की बालिका की मृत्यु हो गई। यह घटना मृत्यु के सम्बन्ध में और भी दार्शनिक गूढ़ता पैदा करने वाली कही जा रही है। इससे पता चलता है कि मृत्यु परमात्मा भी एक नियन्त्रित व्यवस्था है भले ही उसे समझने में कुछ समय क्यों न लगे।
वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृहृति नराअपराणि। तथा शरीरणि विहाय जीर्णा नयन्यानि संयति नवानि देही। -गीता 2।22
अर्थात्-जिस प्रकार पुराना हो जाने पर वस्त्र बदल कर नया धारण करते हैं उसी प्रकार जीवात्मा जीर्ण शरीर बदलती रहती है।
पूर्व जन्म के आभास ने जीवन बदला -
सुप्रसिद्ध अँगरेज लेखक विलियम होन ने एकबार पहाड़ी स्थान की यात्रा की। ठहरने के लिये उन्होंने एक डाक बँगले में व्यवस्था की। उस स्थान में जाने के लिये उनके मन में जब भी कल्पना उठती उस रात वे एक विचित्र स्वप्न देखते जैसा कि वे पहले कई बार देख चुके थे। स्वप्न की सभी आकृतियाँ पहचानी सी लगती । एक स्वप्नों का प्रायः आना और उनसे कुछ आत्मिक घनिष्ठता सा लगना उनके लिये आश्चर्यजनक बात थी ओर जिज्ञासा वर्द्धक भी जिसका कोई वैज्ञानिक अर्थ निकालना सम्भव नहीं हो पा रहा था।
यात्रा के पूर्व तक श्री होन बहुत बड़े नास्तिक थे( संस्मरण श्री ई॰ डी॰ वाकर की प्रसिद्ध पुस्तक पुनर्जन्म (रिइन्कार्नेशन) से उद्धत) वे जब उस स्थान में पहली बार ही पहुंचे तो पता चला कि इस स्थान को वे कई बार स्वप्न में देख चुके है ऐसा लगा जैसे पूरा क्षेत्र उनका जाना हुआ हो । जब वे वेटिंग रूम की ओर चले तो एक कमरे को देखकर याद आया कि इसकी पीछे वाली खिड़की में गाँठ है। उत्सुकता वश उन्होंने कमरा खुलवा कर देखा तो सचमुच उसमें गाँठ थी। इस बात से वे बहुत अधिक प्रभावित हुये उन्होंने स्वीकार किया कि अदृश्य ही यह पिछले जन्म के संस्कार होगे। उस दिन के बाद से वे कट्टर आध्यात्मवादी हो गये। पीछे उन्होंने अपना शेष जीवन प्रकृतिवाद के खण्डन में ही बिताया।
आप तो आत्मदर्शी है ऋषिकुमार ! सभी जानते हैं जानते तरुणाई की साध, साधनाओं में घुला कर सिद्धि पाई है सब में ही अद्वैत आत्मा के दर्शन करते हैं आन, फिर क्या मैं आत्मा नहीं हूँ जो आन मेरी आकांक्षाओं की उपेक्षा करते है-एक मनमोहन दृष्टि इतना कहते कहते एक बार ऊपर उठी और महायोगी विरुपाक्ष के दाडिम से दमकते आनन पर टिककर एक क्षण में ही झुक गई।
अधरों पर एक मद्धिम मुस्कान बिखेरते हुये विरुपाक्ष ने उत्तर दिया-वारुणी आन सच कहती है आप में भी वही आत्मा है जो समस्त जीवों में है मुझमें यह जो चेतना काम कर रही है वह भी आत्मा ही है किन्तु देवि! विशुद्ध हुई आत्मा अपने ही गुणों का रसास्वादन करती है। करुणा का सुख , सेवा और सौजन्यता का अमृत प्राणिमात्र में प्रेम भाव की प्रतिष्ठा-भद्रे! मैं नहीं समझता इन भावनाओं से भी बढ़कर कोई सुख है इस संसार में ? तुम शारीरिक सौन्दर्य को इतना महत्व क्यों देती हो, आत्मा गुणों के प्रकाश में क्यों नहीं आती ?
वारुणी ने नीति शास्त्र पढ़ा था, दर्शन पढ़ा था, पातंजलि योग सूत्र भी उसने कंठस्थ किये थे किन्तु सब वैभव के बन्दीगृह में । वह एक नृत्यांगना के घर जन्मी भी, जब वह पढ़ती तब पायलों की झंकार
कहरवा और राग बेहरतवील की लय में उसका मन झूमा करता, पखावज के साथ उसका पैर झूमने लगता तो सितार के साथ उसकी चुनर हवा में थिरकने लगती। शिक्षित होकर भी वातावरण ने उसे भोग की भूख और वासना की प्यास दी थी वह आत्मा की निर्लेप भाव स्थिति को भला क्या जानती ? विरुपाक्ष का उपदेश काम नहीं आया पर यह भी सच था कि उसने अपने सौंदर्य का जो जाल विरुपाक्ष को पाशबद्ध करने के लिये फैलाया था वह भी चूर चूर हो गया। भद्रे ! विरुपाक्ष ने कहा-जब तक मनुष्य का मन निर्मल न हो वह भाव-प्रतिज्ञा को क्या समझेगा- लो मैं चला पर याद रखना तुम्हारी यह काम लिप्सा ही एक दिन तुम्हारे पतन का कारण बन सकती है” -यह कहकर महाभाग विरुपाक्ष वहाँ से चल पड़े। वारुणी उन्हें अपलक देखती ही रह गई।
पहला अवसर था जब वह किसी पुरुष द्वारा ठुकराई गई हो। वीरांगना वारुणी कि सौन्दर्य ने आकर्षित न किया हो ऐसा एक भी तो राजकुमार ,तरुण नागरिक श्री सामन्त नहीं बचा था अगस्तारण्य में । विरुपाक्ष ही ऐसे व्यक्ति थे जिसके संयम से समक्ष वारुणी स्वयं पराभूत हो गई थी।
वर्ष पर वर्ष बीतते गये । काल के थपेड़े खाकर वारुणी का सौन्दर्य न जाने कहाँ नष्ट हो गया। यौवन के पाप वृद्धावस्था में रोग और आवेश के रूप में फल-फूलकर सामने आये। अद्भुत है कर्म कृषि जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है। आज सारे नगर में विशूचिका का प्रकोप है हजारों लोग काल कवलित हो रहे है तथापि औरों के घर प्रकाश तो है सेवा-सुश्रूषा करने वाले तो है एक वारुणी ही ऐसी है जिसके घर में भी अन्धकार है और मन व मस्तिष्क में भी निराशा और सन्ताप की तमिस्रा। कष्ट बढ़ता जा रहा है पर प्राण नहीं निकलते । सारे शरीर में व्रण फूट रहे है घाव पोंछने वाला भी कोई नहीं है । वारुणी की आंखें पश्चाताप के आंसुओं से गीली हो रही है।
तभी द्वार खुलने की आवाज सुनाई दी। किसी ने आगे बढ़कर ज्योति स्तम्भ पर रखे सूखे दिये को टटोला और दीपक जलाया। आचार्य विरुपाक्ष वारुणी ने गीले नेत्र उठाकर देखा-अब उनसे वेदना की निर्झरिणी फूट रही थी । आचार्य ने आगे बढ़कर वारुणी को हाथ का सहारा देकर बैठाया , जल पिलाया घाव धारेये , औषधि लेपन किया। हलकी शीतलता- नींद आ गई वारुणी ने उसको स्वप्न में देखा-कि दिव्य ज्योति सम्मुख खड़ी कह रही है-वारुणी छोड़ इन भोगो की कामना को और आ मुझमें मिल जा । वारुणी का दर्द धुल गया और अब वह अपने आपको उस आत्मा में लीन अनुभव कर रही थी जिसमें महाभाग विरुपाक्ष विचरण किया करते थे।
सुख-दुख, सफलता-असफलता, उत्थान-पतन का हेतु “भाग्य” को मानने वालो को यह भी समझ लेना चाहिए कि भाग्य क्या है और उसका निर्माण किस प्रकार होता है ?यह विश्वास कर लेना कि परमात्मा स्वयं अपनी मर्जी से जिसके भाग्य में जो कुछ चाहता है लिख देता है , ठीक नहीं । ऐसा मानना परमात्मा की न्यायशीलता पर लाँछन लगाना है। किसी के भाग्य में सुख और किसी के के भाग्य में दुख लिख देने में परमात्मा की क्या अभिरुचि हो सकती है? वह क्यों तो अपनी ओर से सुखी बनाएगा । किसी को दुःखी बनाएगा। सुखी व्यक्ति से उसे कोई लोभ नहीं होता और दुखी व्यक्तियों से कोई शत्रुता नहीं होती । वह तो सबका पिता है। सारे प्राणी उस समान रूप से प्यारे होते हैं। सबके प्रति उसका समान भाव रहता है। वह न किसी का पक्ष करता है और न किसी का विरोध।
भाग्य अथवा प्रारब्ध मनुष्य के अपने कर्मों का फल होता है। जो मनुष्य करने योग्य शुभ कार्य करता है उसका परिपाक सौभाग्य के रूप में उसे प्राप्त होता है और जो अपना जीवन अशुभ कर्मों में लगाता है वह उसके परिपाक के रूप में दुर्भाग्य का भागी बनता है। इसमें भगवान को भला बुरा भला कहने का न तो कोई औचित्य है और न लाभ । मनुष्य के भाग्य निर्माण से परमात्मा की अपनी इच्छा अथवा मर्जी का कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने भाग्य के साथ परमात्मा की कृपा अथवा अकृपा को जोड़ लेना अज्ञान सूचक विचार है।
ऐसे अज्ञानपूर्ण विचार रखने वालो को एक बड़ी हानि होती है कि वे भाग्य निर्माण के लिए अपने कर्मों की ओर ध्यान न देकर परमात्मा की ओर ही देखा करते हैं इसी भ्रम के आधार पर वे भाग्यवादी कर्मों से विरत रहकर परमात्मा को मनाने और उसे प्रसन्न करने का उपक्रम करते रहते हैं और चाहते हैं कि उनकी पूजा अर्चना से प्रसन्न होकर परमात्मा कर्मफलों का अपना अडिग नियम बदल दे और उनके दुर्भाग्य के स्थान पर सौभाग्य को लेख लिख दे।
वह कुछ ऐसा चमत्कार कर दे कि वे बिना कुछ किये जिधर हाथ फैला दे उधर सारी सम्पत्तियाँ और सारी विभूतियां भागकर उनके पास आ जाये। परमात्मा उन्हें ऐसा भाग्यवान बना दे कि वे जिस वस्तु को छू दे वह सोना हो जाये। कदम रखते ही सफलता । किन्तु निश्चय मानिये ऐसा कभी नहीं हो सकता।जो बात जिस नियम के अंतर्गत होगी वह उसी नियम के अनुसार चलेगी । ईश्वरीय नियमों को अपवाद बना सकने की आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। भाग्य मनुष्य के कर्मों का फल होता है । वह उसके शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार ही बनता-बिगड़ता है।
भाग्य का निर्माण न तो कोई आकस्मिक संयोग है और न उसका बनना बिगड़ना किसी अन्य व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है। यह कर्म फलों का एक विधान है और इसका निर्माता स्वयं मनुष्य ही होता है।यदि मनुष्य चाहता है कि उसके भाग्य में श्री-समृद्धि, वैभव, ऐश्वर्य और सुख सुविधाओं का समावेश हो तो उसे सत्कर्मों में प्रवृत्त होना होगा । अच्छे विचार रखने और अच्छे कर्म करने होगे।
इस प्रतिपादन के साथ ही यहाँ पर यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि संसार में ऐसे बहुत से लोग देखे जोते हैं जो कर्मों के नाम पर असत्कर्म करते रहते हैं और भाग्य के नाम पर सौभाग्य भोगते हैं। निःसन्देह यह एक विचित्र और भ्रम में डालने वाला संयोग है। अनीति , अन्याय और अनाचार का फल तो दुःख तथा दण्ड होना चाहिये लेकिन बहुत से लोग इस आधार पर लाभ उठाते देखे जाते हैं। सौभाग्य सुख भोगते दीखते हैं। लेकिन दुःख और दण्ड आहरी ही तो नहीं होते । उनका एक भोग मानसिक और आध्यात्मिक भी तो होता है, जो प्रायः ऊपर से दिखलाई नहीं देता । कौन कह सकता है कि जिन अनीतिवानों को हम बाहर से प्रसन्न और सुखी देख रहे हों
उनके हृदय में शोक संतापों का दावानल जल रहा हो। उन्हें रेशमी गद्दों पर पड़े पड़े चिन्ता और आशंकाओं से करवटें बदलनी पड़ती हैं यह सर्वथा सम्भव है कि उनकी अनीति उनकी आत्मा को दिन दिन नरक के द्वार की ओर खींच रही हो । यह तो वह भुक्त भोगी ही जान सकता है जो ऊपर से तो प्रसन्न तथा सुखी दीखता है और भीतर ही भीतर नरक की यातना भोग रहा हो।
पापियों और दुष्टों को सुविधापूर्ण स्थिति में देखकर कर्म फलों के परिपाक में अविश्वास करने की भूल न कर लेनी चाहिये। यह सर्वथा असम्भव है कि पाप कर्म करने पर भी कोई सुख सौभाग्य का अधिकारी बन सकता है। कर्मों का परिपाक किसी एक जन्म में ही नहीं होता । उनका मनुष्य के पूर्व जन्मों से भी सम्बन्ध होता है। जो वर्तमान में अशुभ कर्म करता हुआ भी भाग्यवान दिखलाई देता है वह वास्तव में अपने पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों का भोग कर रहा होता है और वर्तमान कुकर्मों द्वारा आगामी जीवन में दुर्भाग्य भोगने की भूमिका तैयार करता है। भाग्य अभाग्य मनुष्य के कर्मों का ही फल होता है-इस सत्य के प्रति भ्रम में न आना चाहिए। यह एक अटल नियम है इसमें परिवर्तन सम्भव नहीं।
भाग्य मनुष्य के कर्मों के आधार पर बनता है और कर्मों के लिये वह स्वतन्त्र है। इस प्रकार मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है वह जिस प्रकार के शुभ और अशुभ कर्म करता चलेगा उसी के अनुसार उसका अच्छा बुरा भी बनता जायेगा । जिसमें भाग्यवान बनने की इच्छा हो उसे चाहिए कि वह उनके अनुरूप कर्तव्य करने लगे। ईश्वर तो केवल भाग्य लिखने वाला लेखक मात्र है उसका निर्णायक नहीं । मनुष्य के कर्मों के अनुसार वह उसके भाग्य लिपि लिखते रहने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता । अन्य देवी देवता तो दूर, ईश्वर ने स्वयं भी अपने पास यह अधिकार नहीं रक्खा है कि वह मनुष्य के कर्मों के विरुद्ध उसका शुभ या अशुभ भाग्य लिख सके। मनुष्य अपने सत्कर्मों के बल पर अपने भाग्य में मनोवाँछित बाते लिखने के लिए उसे विवश कर सकता है। तथापि वह किसी मिन्नत मनौती द्वारा अपकर्मों के बदले में भाग्य की शुभ लिपि लिखने के लिए उसे राजी नहीं कर सकता।
सत्कर्म करिये, सौभाग्यशाली बनिए। दुष्कर्म करिए और भाग्य को भयानक बना लीजिए-यह सर्वथा अपने हाथ की बात है। इसका सम्बन्ध अन्य किसी दृश्य अथवा अदृश्य शक्ति वंसयोग से नहीं है।
भाग्य निर्माण के लिए जिस कर्म पथ का निर्माण करना होता है वह भी मनुष्य को स्वयं ही बनाना होगा । उसका यह कार्य भी किसी दूसरे पर निर्भर होकर नहीं हो सकता । परमात्मा ने मनुष्य को इतनी स्वाधीनता, क्षमता और शक्ति देकर ही इस कर्मभूमि में भेजा है कि वह अपने लिये उपयोगी तथा अनुकूल परिस्थितियों का स्वयं सृजन कर सके मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं की तरह इस विशय में न तो विवश है और न पराधीन ।
अपना कर्तव्य पथ बनाने और उस पर चल कर लक्ष्य तक पहुँचने के लिये मनुष्य को पूर्णतया आत्म निर्भर ही होना पड़ेगा। दूसरों पर निर्भर होकर वह अपने ध्येय की पूर्ति नहीं कर सकता। संसार में सभी के पास अपने अपने काम और अपनी अपनी समस्याएं है। उन्हें उनसे ही फुर्सत नहीं मिल पाती तब भला वे किसी दूसरे के ध्येय को पूरा करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर किस प्रकार ले सकता है। और यदि भावुकतावश ले भी लेगा तो उसे पूरा करने में असफल ही रहेगा।यदा कदा किन्हीं समस्याओं अथवा कामों में किन्हीं दूसरों की सहायता तथा परामर्श तो लिया जा सकता है पर उन निर्भर नहीं रहा जा सकता कोई बुद्धिमान और सज्जन व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर रास्ता तो बतला सकते हैं लेकिन किसी के बदले रास्ता तय नहीं कर सकते और न कन्धे पर बिठा कर लक्ष्य तक पहुँचा सकते हैं। वह रास्ते तो मनुष्य को स्वयं अपने पैरों से चलकर पूरा करना होगा। किसी के बलबूते पर उन्नति और प्रगति की आशा उसी प्रकार से उपहासास्पद है जिस प्रकार यह आशा करना कि किसी दूसरे का खाया अन्न हमारे स्वास्थ्य के लिये उपयोगी होगा। अपना खाया अन्न तो अपने पेट के पचाये ही काम आयेगा।
प्रशस्त कर्तव्य पथ का निर्माण स्वावलम्बन द्वारा ही हो सकता है। अपनी उन्नति और सफलता के लिये दूसरों का मुँह ताकने वाले संसार से कुछ नहीं कर सकते , सिवाय इसके कि दूसरों के पास जा जाकर उन्हें निराश ही होता रहना पड़े। नरावलम्बी व्यक्ति की वे सारी शक्तियाँ, क्षमताएं और विशेषतायें कुण्ठित हो जाती है जिन्हें देकर परमात्मा ने उसे संसार में स्वतन्त्र रूप से कर्म करने को भेजा होता है। परावलम्बन से आत्म हीनता , आत्म-विश्वास और साहसहीनता का भाव ओढ़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी रहता है। उसे अपनी समस्याओं पर आप विचार करने , उपयोगी निर्णय लेने और कठिनाइयों से टक्कर लेने का साहस नहीं रहता ।
परावलम्बी जहाँ अपनी सफलता के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है वहाँ वह बहुधा अपनी कठिनाइयों और प्रतिकूलताओं का कारण भी दूसरों को ही मानता है । वह सोचता है कि अमुक व्यक्ति के ईर्ष्या द्वेश अथवा विरोध असहयोग के कारण ही उस पर ये कठिनाइयाँ आई है। इसके विपरित स्वावलम्बी व्यक्ति सदैव अपने बल, अपनी योग्यता और अपने प्रयत्नों में विश्वास करता है। वह आत्मविश्वास से उत्पन्न साहस के साथ आगे बढ़ता है, परिश्रम तथा पुरुषार्थ पूर्वक अपना पथ प्रशस्त करता है और दृढ़तापूर्वक उस पर अग्रसर होता है। उसके मार्ग में जो कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ आती है उनका डटकर मुकाबला करता और उन पर विजय पाता है।
पुरुषार्थी व्यक्ति , जोकि अपने बलबूते पर ही बढ़ने के विश्वास रखता है अपनी परिस्थितियों का दोष किसी दूसरे को नहीं देता वह उनका कारण अपनी किन्हीं कमियों अथवा असावधानियों को ही मानता है। वह जानता है कि यह संसार एक दर्पण की तरह है जिसमें अपना ही रूप दीखता है । इस जड़ तथा निरपेक्ष संसार में ऐसी शक्ति नहीं जो किसी के लिए अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियां निर्माण कर सके। जिसे प्रकार मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसी में विचरण करती रहती है। उसी प्रकार मनुष्य अपने गुणों और दोषों के आधार पर अपनी भली बुरी परिस्थितियाँ स्वयं बनाता है और उनमें उलझता सुलझता रहता है।
स्वावलम्बी व्यक्ति अपनी परिस्थितियों का उत्तरदायी स्वयं को मानता है। इस कारण वह उनके निवारण के लिये अपने अन्दर ही सुधार और विकास लाता है। अपनी इस ठीक नीति के कारण वह जल्दी ही अपनी अवाँछित परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर लेता है ओर आगे की ओर बढ़ चलता है। चूँकि परावलम्बी अपनी प्रतिकूलताओं ओर कठिनाइयों का कारण दूसरों को मानता है इसलिये वह उनके निवारण के लिये भी परमुखापेक्षी बना रहता है। सोचता है कि दूसरे सुधरे अच्छे बने और उसके साथ सहयोग करे तो उसकी कठिनाइयाँ दूर हो और वह आगे बढ़ सके। इस परावलम्बन का फल यह होता है कि अपने को उत्तरदायी न समझने के कारण वह अपना सुधार नहीं करता और उन्हीं परिस्थितियों में उलझा पड़ा रहता है।
मनुष्य को चाहिये कि वह भाग्य का निर्माता स्वयं अपने को माने । सौभाग्य के लिये सत्कर्म करे और कर्तव्य पथ पर जो भी बाधायें तथा कठिनाइयाँ आवे उन्हें स्वावलम्बी भावना से दूर करता हुआ बो बढ़ता जाए। संसार में अपने किये ही अपने काम पूरे होते हैं, अपने चले ही यात्रा पूरी होती है और अपना पसीना बहाने पर ही उन्नति तथा श्रेय का सौभाग्य मिलता है यह कभी भी नहीं भूलना चाहिये । ईश्वर ने मनुष्य को सबसे योग्य और सर्व सक्षम बनाया है । वह अपना विकास किसी भी सीमा तक कर सकता है और उन्नति के कितने ही उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।
मनुष्य जब बैठा रहता है तो उसका भाग्य भी बैठा रहता है जब वह सोता है तो भाग्य भी सो जाता है पर जब वह कमर बाँधकर चल देता है तो भाग्य भी सफलता की ओर बढ़ जाता है।
प्रणीवीर्यरसान्तस्था संविज्ज्गंममानतम्। तनोति लतिकान्तस्थो रसः पुश्पफलं यथा॥
चिच्छक्तिर्वासना बजरुपिणी स्वापधर्मिणी। स्थिता रसतया नित्यं स्थावरादिशु वस्तुशु॥
अर्थात्- जिस प्रकार प्राणियों के वीर्य में वास करने वाली चेतना शरीर के रूप में होती और चेतन वस्तुओं का विकास करती है उसी प्रकार वृक्ष लताओं के रस में चेतना होती है वह अपना आनंद फूल और फलों के रस रूप में व्यक्त करती है। बीज रूप चेतना जड़
या चेतन दोनों में एक ही हैं। एक अपनी जड़ता के कारण जड़ रूप में आ जाती है दूसरी सक्रियता के कारण जड़ रूप में।
इस सिद्धांत के आधार पर ही भारतीय तत्वदर्शी यह बताते हैं कि मनुष्य को अपनी चेतना का परिष्कार इस हद तक करना चाहिये कि वह शरीर के तुच्छ भोगो ते ही सीमित न रहकर विश्व-व्यापी विराट चेतना तक पहुँच जाये। यदि वह ऐसा नहीं करता, इन्द्रिय भोगो की ओर आकृष्ट होकर अपनी चेतना को शिथिल और निष्क्रिय बनाता है तो उसे जड़ योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
इन तथ्यों की पुष्टि के लिये जीव चेतना को प्रमुख आधार मानकर वैज्ञानिक व्यवस्थायें की जाये तो जो बाते भारतीय तत्व दर्शियों ने बहुत पहले कही थी उनकी पुष्टि आज नितान्त सम्भव है। पर यदि विज्ञान उन बातों को नहीं मानता , तो ऐसी घटनायें प्रस्तुत की जा सकती है जो इन बातों की पुष्टि करे। उदाहरण के लिए जीव विज्ञान कस एक उदाहरण नीचे दिया जा रहा है जो यह सिद्ध करता है कि वृक्षों में भी वैसी ही सुख-दुःख अनुभव करने वाली चेतना विद्यमान है जिस तरह मनुष्य शरीर में ।
अमरीका के सैनडिगो चिड़िया घर में एकबार एक बन्दर दम्पत्ति ने एक बच्चे को जन्म दिया। मादा ने खूब स्नेह और प्यार पूर्वक बच्चे का पालन-पोषण किया। बच्चा अभी 20 महीने का ही हुआ था कि मादा ने एक नये बच्चे को जन्म दिया। यद्यपि पहला बच्चा माँ का दुख पीना छोड़ चुका था तथापि संसार के जीव मात्र को भावनाओं की न जाने क्या आध्यात्मिक भूख है उसे अपनी माँ पर किसी और का अधिकार पसन्द न आया। उसने अपने छोटे भाई को हाथ से पकड़ कर खींच लिया और खुद जाकर माँ के स्तनों से जा चिपका।
स्वार्थ एक सामाजिक दोष है और अपराध का करण है। इसलिये उसकी हर सभ्य और भावनाशील समाज में निन्दा की जाती है पर यहाँ स्वार्थ की अपेक्षा भावुकता की मात्रा अधिक थी। भाव तो वह शक्ति है जो स्वार्थ को भी सभ्य कर देता है और नियम वृद्धता का भी उल्लंघन कर देता है। इससे लगता है भाव मनुष्य जीवन की मूल आवश्यकता है। हम उस आवश्यकता के कारण की शोध कर जाये तो जीवन विज्ञान के अदृश्य सत्य को खोज निकालने में सफल हो सकते हैं।
मादा ने अनुचित पर ध्यान नहीं दिया। उसने बड़े बच्चे को भावना पूर्वक अपनी छाती से लगा लिया और उसे दूध पिलाने के लिये इनकार नहीं किया जबकि अधिकार उसका छोटे बच्चे का ही था। दो तीन दिन में छोटा बच्चा कमजोर पड़ने लगा। चिड़िया घर की निर्देशिका बेले. जे . बेनशली के आदेश से बड़े बच्चे को वहाँ से निकाल कर अलग कर दिया गया। अभी उसे अलग किये एक दिन ही हुआ था, वहाँ उसे अच्छी से अच्छी खुराक भी दी जा रही थी किन्तु जीव मात्र की ऐसी अभिव्यक्तियाँ बताती है कि आत्मा की वास्तविक भूख, प्राकृतिक सम्पत्ति और पदार्थ भोग की उतनी अधिक नहीं जितनी कि उसे भावनाओं की प्यास होती है। भावनायें मिलने पर अच्छे और शिक्षित लोग भी खूँख्वार हो जाते हैं जबकि सद्भावनाओं की छाया में पलने वाले अभाव ग्रस्त लोग भी स्वर्गीय सुख का रसास्वादन करते रहते हैं। बड़ा बच्चा बहुत कमजोर हो गया जितनी देर उसका संरक्षक उसके साथ खेलता उतनी देर तो वह कुछ प्रसन्न दीखता पर पीछे वह किसी प्रकार की चेष्टा भी नहीं करता, चुपचाप बैठा रहता, उसकी आंखें लाल हो जाती , मुँह उदास हो जाता स्पष्ट लगता कि वह दुःखी है।
गिरते हुए स्वास्थ्य को देखकर उसे फिर से उसके माता पिता के पास कर दिया गया। वह सबसे पहले अपनी माँ के पास गया पर उसकी गोद में था छोटा भाई,फिर वही प्रेम की प्रतिद्वन्द्विता। उसने अपने छोटे भाई के साथ फिर रूखा और शत्रुता पूर्ण व्यवहार किया। इस बार माँ ने छोटे बच्चे का पक्ष लिया और बड़े को झिड़क कर अलग कर दिया मानो वह बताना चाहती हो कि भावनाओं की भूख उचित तो है पर औरों की इच्छा का भी अनुशासन पूर्वक आदर करना चाहिए। जो अपने से छोटों पर कृपा नहीं कर सकता, उनके प्रति स्नेह और उदारता व्यक्त नहीं कर सकता वह भी क्या इंसान।
कहते हैं अनुशासन-व्यवस्था और न्याय कि लिये थोड़ी कड़ाई अच्छी ही होती है। अहिंसा की शक्ति हिंसा से हजार गुना अच्छी ,घृणा नहीं संसार में करुणा बड़ी मानी जाती है, प्रेम देना चाहिए बैर नहीं बाँटना चाहिये पर यदि अहिंसा हिंसा , करुणा, चाटुकारिता तथा प्रेम में विश्वास की हिंसा की जा रही हो, अनीति और अन्याय का आचरण किया जा रहा हो तो दण्ड ही उस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता होती है। शक्ति की मनमानी रोकने के लिए युद्ध भी करना पड़े तो करना चाहिए। इस तरह का दण्ड , संघर्ष , युद्ध और उपेक्षा मानवता की ही श्रेणी में आते हैं । दण्ड पाकर बड़ा बच्चा ठीक हो गया अब उसने अपनी भावनाओं की-परितृप्ति का दूसरा और उचित तरीका अपनाया। वह माँ के पास उसके शरीर से सटकर बैठ गया । माँ ने भावनाओं की सदाशयता को समझा और अपने उद्धत बच्चे के प्रति स्नेह जताया उससे उसका भी उद्वेग दूर हो गया थोड़ी देर में वह अपने पिता के कंधों पर जा बैठा। कुछ दिन पीछे तो उसने समझ भी लिया कि स्नेह, सेवा, दया, मैत्री ,करुणा, उदारता, त्याग सब प्रेम के ही रूप है ; सो अब उसने अपने छोटे भाई से भी मित्रता करली। इस तरह एक पारिवारिक विग्रह फिर से हँसी खुशी के वातावरण में बदल गया। छोटे कहे जाने वाले इन नन्हें नन्हें जीवों के यदि मनुष्य कुछ सीख पाता तो उसका आज का जलता हुआ व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन भी कैसी भी परिस्थितियों में स्वर्गीय सुख और संतोश का रसास्वादन कर रहा होता।
आज का मनुष्य भावनाओं के अभाव में ही इतना दुराग्रही, स्वार्थी और उच्छृंखल हो गया है। यदि कुत्ते और बन्दर परस्पर प्रेम और मैत्री-भावना का निर्वाह कर सकते हैं तो विचारशील मनुष्य क्यों ऐसा नहीं कर सकता। यह कोई अत्युक्ति नहीं-अलीगढ़ जिले के कस्बा जवा में एक बन्दर और कुत्ते में मैत्री लोगों के लिए एक चुनौती है विरोधी स्वभाव के जीव परस्पर साथ साथ खेलते और साथ साथ रहते हैं। बन्दर अपने मित्र के जुए साफ करता है, कुत्ता बन्दर के तलुये सहलाता है। दोनों की मैत्री एक अव्यक्त सत्य का प्रतिपादन करते हुये कहती है कि भिन्न-भिन्न शरीर है तो क्या आकांक्षाओं इच्छाओं और भावनाओं वाली आत्मिक चेतना तो एक ही है कर्मवश भिन्न शरीरों में , भिन्न देश जाति और वर्णों में जन्म लेने वाले अपने को एक दूसरे से पृथक क्यों समझे। सब लोग अपने आपको विश्वात्मा की एक इकाई मानकर ही परस्पर व्यवहार करे तो कितना सुखी हो जावे।
निसर्ग में यह आदर्श पग-पग देखने को मिलते हैं कैफनी एस. सी. में स्टीव एण्ड स्किनर के पास एक मुर्गी थी । एकबार उसके प्रसूत बच्चों को बाज ने पकड़ कर खा लिया। उसके थोड़ी देर बाद मुर्गी ने एक बिल्ली का पीछा किया लोगों ने समझा मुर्गी में प्रतिशोध का भाव जाग गया है किन्तु यह धारणा कुछ देर में ही मिथ्या हो गई जब कि मुर्गी ने बिल्ली को पकड़ लिया उसके पास आ जाने से उसके चारों बच्चे भी पास आ गये मुर्गी ने चारों बच्चे स्वयं पाले और इस तरह अपनी भावना भूख को बिल्ली के बच्चों से प्यार करके पूरा किया।
डॉ॰ साहवर्ट ने जंगल जीवन की व्याख्या करते हुए एक गिलहरी और गौरैया में प्रगाढ़ मैत्री का वर्णन किया गिलहरी यद्यपि अपने बच्चों की देख−रेख करती और सामाजिक नियमों के अनुसार अन्य गिलहरियों से मुलाकात भी करती पर वह दिन के कम से कम चार घंटे गौरैया के पास आकर अवश्य रहती दोनों घन्टों खेला करते । दोनों ने एक-दूसरे को कई बार आकस्मिक संकट से बचाया और जीवन की रक्षा की। गिलहरी आती तब आती साथ कोई पका हुआ बेर गौरैया के लिये अवश्य लाया करती। गौरैया उस बेर को गिलहरी के चले जाने के बाद खाया करती।
भावनाओं की प्यास सृष्टि कि हर जीव को है एकात्म का प्रमाण है। प्यार तो खूँख्वार जानवर भी चाहते हैं। रूसी पशु प्रशिक्षक एडर बोरिस की जीवन की वास्तविक प्यास और अभिलाषा तो आन्तरिक है प्रेम की हैं वह कुछ देर वहाँ बैठकर एक सबक देकर चला गया। पर भावनाओं का वह पाठ, प्रेम की वह शिक्षा मनुष्य कब सीखेगा ? जिस दिन मनुष्य भावनाओं का सच्चे हृदय से आदर करना सीख गया उस दिन वह भगवान् हो जायेगा और यह धरती ही स्वर्ग हो जायेगी। तब स्वर्ग अन्यत्र ढूंढ़ने की आवश्यकता न पड़ेगी।
भगवान् बुद्ध भारत में क्यों जन्में-
द्वितीय विश्व युद्ध। रायफल की गोली जापानी सैनिक के कन्धे में लगी कि वह लड़खड़ा कर वही गिर पड़ा। निरन्तर रक्त बहने के कारण कमजोरी बढ़ने लगी। मृत्यु की काली चादर थोड़ी देर बाद उसे अपने में समेट लेना चाहती थी। वह जीवन और मृत्यु के बीच अपने को बड़ी विकट स्थिति में अनुभव कर रहा था।
एक भारतीय सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी तो सुप्त मानवता उसके अन्तर मन को कचोटने लगी। सोचने लगा कि मृत्यु के अन्तिम क्षणों में शत्रुता कैसी ? दुःख में समय सहायता करना तो प्रत्येक मानव का कर्तव्य होना ही चाहिए यह तो कुछ क्षणों का ही मेहमान है। सहायता की भावना से उसके पास गया। उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया और बड़े प्रेम के साथ बोतल में से एक गिलास में चाय करके उसके मुँह से लगाते हुए कहा-’प्यारे मित्र ! बुद्ध देश के सैनिक कितने बहादुर होते हैं यह तो तुमने युद्ध मोर्चे पर देख ही लिया अब प्यार से उन हाथों चाय भी पीलो।’
जापानी सैनिक के मन में प्रतिशोध की भावना जाग उठी । वह ऐसे समय भी बदला लेने का अवसर देख रहा था उसने लम्बा चाकू अपनी जेब से निकाला और भौंक दिया उसकी रान में । मरते हुये वह सैनिक नेकी का बदला इस प्रकार चुकायेगा भावुक भारतीय जवान को इस बात की स्वप्न में भी कल्पना नहीं थी।
हाथ से गिलास और बोतल एक ओर छूट गये। भारतीय सैनिक गिर पड़ा और उसके गिरते ही जापानी सैनिक भी दूसरी ओर लुढ़क गया। डाक्टरों के अनुसार चाकू का घाव प्राण घातक न था। दो-तीन दिन बाद उसका घाव भरने लगा । कमजोरी अवश्य थी। चलने फिरने में मजबूर था । करवट बदली तो तीसरे पलंग पर वही जापानी सैनिक भी कराहते हुए दिखाई पड़ा।
भारतीय सैनिक चलने-फिरने लायक हुआ तो अपने पलंग से उठा और चाय का प्याला लेकर जापानी सैनिक के पास जा पहुँचा । और मुस्कराते हुये चाय फिर उसके हाथ में दे दी और कहा उस दिन आपको चाय पिलाने की इच्छा अधूरी रह गई थी भगवान् ने मेरी प्रार्थना सुनली-आज आपको फिर चाय पिलाते हुये बड़ी शान्ति मिल रही है।
आत्म ग्लानि ने जापानी सैनिक के प्रतिशोध को जलाकर राख कर दिया था। अब तो उसका गला भर आया।
“भाई क्या बात है? ‘भारतीय सैनिक ने पूछा ।’
‘आज समझ पाया कि भारत में भगवान् बुद्ध का जन्म क्यों हुआ था ।’ इतना कहकर उसका सिर तकिये से नीचे लुढ़क गया।
अखंड-ज्योति जून 71 के एक लेख में लगातार 27 वर्ष तक एक स्त्री के सोने का वर्णन छपा है। तमोमय अवस्था जीवनी शक्ति शिथिल पड़ जाती है फलस्वरूप देह निष्क्रिय ओर चेतना शून्य होती चली जाती है। भारतीय योगियों एवं तत्वदर्शियों ने ऐसी योग-साधनाओं का विकास किया गया है जिनसे जीव चेतना अपने चिर जागृत , प्रखर और कारण शरीर में अवस्थित हो जाती है ऐसे योगी को निद्रा की भी आवश्यकता नहीं रहती गीता में भगवान् कृष्ण ने महान् योगाभ्यासी अर्जुन को निद्राजित बताया है अर्थात् आत्म चेतना में प्रविष्ट व्यक्ति सोये या न सोये उससे उनके शरीर ,मन और जीवन पर कोई दबाव नहीं आता ।
यहाँ एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे उक्त दर्शन की पुष्टि होती हैं। आरमण्ड जैक्वि लुहरवेट नामक एक फ्रांसीसी वकील ऐसा अद्भुत व्यक्ति था जो लगातार 71 वर्ष तक एक दिन तो क्या एक क्षण को भी नहीं सोया।
सन् 1761 में पेरिस में जन्मे अरमाण्ड जब कुल 2 वर्श के थे तब की 21 जनवरी 1763 की बात है उनकी माँ उन्हें लेकर सम्राट लुई सोलहवें का मृत्यु दण्ड देखने गई। वहाँ का वीभत्स दृश्य देखकर सहमा हुआ बच्चा घर आया वह उछल कूद मचा रहा था तभी ऊपर रखी कोई वस्तु सिर पर गिरी उससे सिर में भारी चोट आई बच्चे को अस्पताल पहुँचाना पड़ा।
कई दिन तक लगातार बेहोश रहने के बाद जब चेतनता वापस लौटी तब न जाने शरीर के किस हिस्से में क्या वापस परिवर्तन हुआ कि उस बच्चे को नींद आना ही समाप्त हो गया। एक दो दिन, सप्ताह महीनों तक प्रतीक्षा की जाती रही किन्तु गई नींद फिर आई ही नहीं । ट्रैनकुलाइजर्स ( नींद लाने वाली औषधियां ) से लेकर मालिश तक विविध उपचार कर लिये गये पर फिर नींद आई ही नहीं।
चिन्ता इस बात की थी कि न सोने कारण स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ेगा, एक दो दिन ही न सोने पर मन उद्विग्न हो उठता विक्षिप्तता अपने लगती है , सामान्य व्यक्ति यदि आठ घण्टे प्रतिदिन न ले तो उन्हें जीवन चलाना कठिन हो जाये पर आश्चर्य है कि आरमाण्ड के बारे में की गई ऐसी सब धारणायें निर्मूल सिद्ध हुई।
वह नियमित रूप से पढ़े, शारीरिक श्रम करते रहे पढ़ लिखकर वकील बन गये, रात में जब लोग सोया करते हैं तब भी वह मुकदमों के मजमून बनाया करते या पिछली कोई पुस्तक पढ़ते रहते पर नींद तो घंटों लेटे रहने पर भी नहीं आती। 71 वर्ष की आयु में आरमाण्ड की मृत्यु 1864 में हुई। इस बीच उन्हें एक क्षण को भी नींद नहीं आई।
शास्त्रकार का कथन है यह जीवात्मा की संकलजागर अवस्था है-
कस्मिंश्चित्प्ताक्तनेकल्पेकस्मिंश्चज्जागतिक्वचित्अनिद्रालव एवान्तः संकल्पैक पराः स्थिताः॥ -योग वशिश्ठ 6।2।50।1
अर्थात्-जीव बिना सोये हुए कल्प या इस जगत में जब केवल मस्तिष्कीय चेतना में रहते हैं अर्थात् सकंल विकल्प स्थिति में रहते हैं तब यह अवस्था होती है।
इसी अवस्था को विकसित कर बीज जागृत अवस्था में ले जाना पूर्ण निर्मल ओर विश्व चेतना की अनुभूति प्राप्त करना है योगी उसी के लिये विभिन्न साधनाओं द्वारा अपना सहस्रार जगाया करते हैं।
जनसंख्या में वृद्धि , उद्योगों के विकास, ग्रामीण लोगों का भी शहरों के प्रति आकर्षण , मनोरंजन के साधनों के क्षेत्र में विकास खाद्य समस्या पर बहुत सोचा विचारा जाता है इन पर विचार किया भी जाना चाहिये पर मनुष्य की जीवन जिस सांसों पर चलता है उससे भी आँख नहीं मूँद लेना चाहिये। ऐसी भूल मानव जाति की सबसे बड़ी बेवकूफी होगी।
यज्ञो द्वारा वायु-मण्डल के परिष्कार और जलवायु नियन्त्रण की बात तो अब हास्यास्पद समझा जाता है पर दरअसल आलोच्य यज्ञ करने और कराने वाले नहीं, वे तो आज नहीं तो कल निश्चित रूप से विश्व-संरक्षक माने ही जाने वाले हैं, दरअसल निन्दनीय तो आज की भौतिकता की वह बाढ़ है जो मनुष्य जाति को याँत्रिकता के रोग और धुँये की घुटन से भरती ही जा रही है। वायु-दूषण आज की मुख्य समस्या है उसे न रोका गया तो मानव अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में विस्तार से लिखा जाता रहा है।
इन पंक्तियों में धुयें की समस्या की ओर से सावधान करते हुये यह लिखा जा रहा है कि आज शहरी क्षेत्रों की ही समस्या नहीं रह गयी, उसके दुष्प्रभाव अब गांवों की ओर भी लपट मारने लगे। एक व्यक्ति बीड़ी-सिगरेट पीता है जहाँ तक मानवीय स्वतन्त्रता की बात है बीड़ी सिगरेट क्या, लोग अफीम तक खाते हैं यदि बीड़ी सिगरेट का धुआँ पेट से बाहर निकाले तब तो ठीक पर वे 3/4 धुआँ पेट से बाहर उगल कर शेष वायु को भी गन्दा बनाते हैं तो दूसरे विचारशील लोगों का यह नैतिक अधिकार हो जाता है कि वे अपने और भावी पीढ़ी की स्वास्थ्य रक्षा के लिये उनको न केवल समझदार वरन् संघर्ष करके भी रोकें। यही बात ग्रामीण किसानों के पक्ष में है शहरों द्वारा बढ़ रही धुयें की दाब को कम न किया गया तो वही गन्दा और विषैला धुआँ खेती को नष्ट कर डाल सकता है। इस स्थिति में यन्त्रीकरण के प्रभाव को प्रत्येक तरीके से निरस्त करना हम सबका नैतिक कर्तव्य हो जाता है।
जो फसलें अधिक संवेदनशील होती है जैसे फूल, सरसों, अरहर, आदि वह धुयें से बहुत प्रभावित होती है न्यूजर्सी और कैलीफोर्निया में इसके प्रत्यक्ष उदाहरण देखने में आये है।
वायु में धुयें के बढ़ने का अर्थ होता है उसकी कीटाणु नाशक शक्ति का नाश। स्पष्ट है वायु में कीटाणुओं को मारने वाली क्षमता नष्ट होगी तो भारी मात्रा में बढ़ेंगे और कृषि नष्ट करेंगे। अमेरिका के सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाले इन क्षेत्रों में कृषि कीटाणुओं की यहाँ तक भरमार पाई जाती है कि कभी किसी खेत में कीटाणुनाशक औषधि न पहुँचे तो उससे एक दाना भी बचकर न आये, जब डी.डी.टी. जैसी कीटाणुनाशक दवाओं के प्रयोग से अन्न विषैला बनता है दोनों ही समस्यायें भयंकर है उनसे बचाव कस एक ही उपाय है धुआँ बढ़ाने वाले उद्योगों का स्थान लघु कुटीर उद्योग और हस्त शिल्प ले लें तथा यज्ञो का विस्तार न केवल भारतवर्ष वरन् सारे विश्व में किया जाये।
कैलीफोर्निया में धुयें के कुहरे से 15 मिलियन (1 करोड़ 50 लाख रुपये) डालर्स की फसलों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुँचता है अप्रत्यक्ष क्षति 132 मिलियन डालर आँकी गई है यही समस्या अन्य राज्यों में भी है।
जान टी. मिडिल्यन(डाइरेक्टर यूनिवर्सिटी स्अटपाइड एअर पोलूजन रिसर्च सेन्टर) का कहना है कि फोटा केमिकल्स वाले वायु प्रदूषण से सभी 27 स्टेटस का प्रभावित हुई है पर कोलम्बिया के कुछ जिले सर्वाधिक । इनकी फसलें तो पिछले दिनों नष्ट होते होते बची। इसके अतिरिक्त डस्ट पार्टिकल्स , ठोस और द्रव केमिकल्स जिनमें तेल और कोयला मिला होता है उनसे सम्मिश्रित कोहरा भी फसलों को प्रभावित करता है। गैसों से हुआ वायू प्रदूषण जिनमें हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन आक्साइड, फ्लोरिड, सल्फर डाई आक्साइड शामिल है वह भी फसलों को नष्ट करता है। सूडान घास शकर के कणों , ढालें, पान, अलफाफा ओटस, मूँगफली,एप्रिकाटस विटरस , अंगूर, प्लम्बस अर्चिटस पेटूनियस,स्पैन ड्रेगन्स , लार्कस और रे ग्रास की जाँच करने पर पता चलता है कि वे वायु प्रदूषण से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं यदि इनको इससे न बचाया जा सका तो एक दिन वह सकता है कि जब ये पूरी तरह विषाक्त होने लगेंगे इनको अन्य कडुए जंगली फलों के समान अखाद्य मान लिया जायेगा।
16 वीं शताब्दी के अन्त में पृथ्वी मंडल पर कार्बन गैस (धुँये) की मात्रा 360000000000 टन थी, संडे स्टैडर्ण्ड के 26 जनवरी 1666 अंक ने इसमें वृद्धि पर चिन्ता करते हुये लिख है कि अकेले अमरीका के न्यूयार्क शहर में ही एक वर्श में 36000000 टन धुयें की वृद्धि हुई जबकि संसार में कितने शहर है और धुआँ-उद्योग कितना बढ़ रहा है इसके सुविस्तृत आंकड़े निकाले जायें तो यही कहा जा सकेगा कि संसार एक ऐसी प्रलय की ओर जा रहा है जिसमें जल वृद्धि या उपल वृद्धि न होकर केवल धुआँ इतना सघन छा जायेगा कि मनुष्य उसी में तड़फड़ा कर मार जायेगा।
धरती हमारी माता ,हमारी पोषक और जीवनदात्री है यदि अन्न और जल शुद्ध मिलता रहे तो भी हम रोगों और रोगों के कीटाणुओं से लड़ सकते हैं पर धुयें ने उसे भी बेकार कर दिया तो जीवन संकट में ही समझना चाहिए। औषधियां उसे बचाती और नष्ट करती है। इनसे तो भूमि के उर्वरक कीटाणु “कैमिस्ट” मरते हैं। कीटाणुनाशक औषधि छिड़का हुआ चारा मुर्गियों को खिलाकर देखा गया तो पाया गया कि उनके अण्डे कमजोर थे । आस्ट्रेलिया में डी.डी.टी. प्रयोग बन्द कर दिया गया है दूसरी ओर अमरीका यह औषधियां इतनी अधिक बनाता है कि प्रतिवर्ष उनके लिये 48 अरब कनस्तर ,28 अरब बोतलें ओर अथाह कागज की आवश्यकता होती है। लास एन्जिलस में ही पैकिंग के बाद बचा हुआ कूड़ा 1 करोड़ 20 लाख घन गज होता है जो यह बताता है कि जमीन को कीटाणुओं से बचाने की मूर्खता में उसे और भी तेजी से नष्ट होने में सहायता पहुँचाई जा रही है।
हमारी धरती शुद्ध और पौष्टिक अन्न दे-तब उसका एक ही विकल्प रह जाता है धुयें को कम किया जाये और वायुमंडल को शुद्ध रखने के तरीकों की खोज की जाये अन्यथा हमें मनुष्य की जनसंख्या से अधिक कीटाणुओं की जनसंख्या में वृद्धि के लिए तैयार रहना पड़ेगा।
मृत्यु बनाम वृद्धावस्था-
वृद्धावस्था अपनी काँपती गर्दन और झुकी कमर को सम्भाल ही रही थी तब तक मृत्यु ने आकर पूछा-’क्यों डर रही हो बहिन ! झुककर मेरी दृष्टि से तुम बच तो नहीं सकतीं ।जीवन में एकबार हमारा तुम्हारा मिलन तो निश्चित ही है इसे तो संसार का कोई भी व्यक्ति नहीं टाल सकता। तुम्हीं उससे कैसे बच सकती हो।
वृद्धावस्था ने कराहते हुये कहा-’मैं तो कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। मेरे झुकने का उद्देश्य तुम्हारी दृष्टि से बचना नहीं है। संसार के ऋण से मेरी कमर झुक गई है जीवन भर मैं संसार से लेती ही रही पर उसका सहस्रांश भी तो चुका नहीं पाईं। इसीलिए तो मेरी कमर ऋण भार और गरदन ग्लानि से झुक गई है। सोचती हूँ यह ख्याल पहले जब मैं युवा थी तभी आ गया होता तो कितना अच्छा होता । मृत्यु बोली अब जो भूल हुई उसे अगले जन्म में मत दोहराना कहकर उसने वृद्धावस्था पर प्रहार किया और उसका अन्त कर दिया।
परिस्थितियों की प्रतिकूलता और साधनों की कमी से हताश न होना चाहिये । क्योंकि उन्नति का आधार परिस्थितियों और साधनों पर निर्भर नहीं होता । उसका आधार है प्रबल आकाँक्षा और उसके अनुकूल पुरुषार्थ। जिसके पास यह दो साधन मौजूद है , संसार में उसकी उन्नति कोई नहीं रोक सकता।
यों तो उन्नति के लिये प्रायः सभी लोग सामान्यतः लालायित रहते हैं। किन्तु उन्नति की सच्ची आकाँक्षा किसी किसी के ही पास होती है लालसा ओर आकाँक्षा में अन्तर होता है । लालसा एक लहर के समान होती है किसी समय आ जाती है और बाद में विलीन हो जाती है। लालसा को कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता है। लालसा एक अकेली नहीं होती । उनकी संख्या बहुत हो सकती है।
किन्तु सच्ची आकाँक्षा एक व्रत ,एक संकल्प के समान होती है। उसमें दृढ़ता भी होती है और लगन भी। वह एक होती है और उसका लक्ष्य भी एक और निश्चित होता है सच्ची आकाँक्षा वाला व्यक्ति अपनी शक्तियों को अनेक विषयों में नहीं बिखेरता। वह अपनी सारी क्षमतायें अपनी एक ही आकाँक्षा को समर्पित कर देता है और उसी को पाने के लिये पूरा जीवन लगा देता है।
आज यदि विद्वान बनने की इच्छा होती है लेकिन कल व्यापारी बनने की कभी अध्यात्म लाभ करने की जिज्ञासा होती है और कभी शान शौकत का जीवन बिताने की। समाज की सेवा करने की इच्छा से मन में त्याग और बलिदान करने की भावना आती है तो कभी राज सत्ता का लोभ सताने लगता है, तो समझना चाहिए के हृदय में किसी विशय के प्रति सच्ची आकाँक्षा नहीं है। ये इच्छाएं और अभिलाषायें वे विविध वृत्तियां है जो चंचल मन की सृष्टि होती है। ऐसी चंचल वृति के लोग संसार में कोई उन्नति नहीं कर सकते । किसी एक विषय में उल्लेखनीय उन्नति करने के लिए मनुष्य को सारा जीवन लगा देना पड़ता है तब सारी वांछाएं किस प्रकार पूरी हा सकती है? कोई एक विशय चुनकर और उसी में तन मन लगा देने से उन्नति के शिखर पर पहुँचने की आशा की जा सकती है।
जो मनुष्य वास्तव में उल्लेखनीय उन्नति करना चाहता है उसे सबसे पहले अपनी बहुत सी अभिलाषाओं में कोई एक ऐसी अभिलाषा चुन लेनी चाहिए जिसमें उस की सबसे अधिक रुचि हो और जो अधिक से अधिक समाज के लिए उपयोगी हो । केवल स्वार्थमयी अभिलाषायें पूर्ण होने पर भी उस प्रकार का श्रेय सम्पादन नहीं कर पाती, जिसके आधार पर मनुष्य उच्च अथवा महान कहा जा सकता है।
इस प्रकार बहुत में से चुनी हुई अभिलाषा को उस आकाँक्षा में परिपक्व कर लेना चाहिए परिस्थितियाँ अथवा स्पर्धा जिसे परिवर्तित न कर सके। इस परिपाक का उपाय यही है कि उस आकाँक्षा को अभिलाषा की सीमा से निकाल कर व्रत, संकल्प अथवा जीवन लक्ष्य की कोटि में रख लेना चाहिए।
इतना करने के बाद उसे लगन और जिज्ञासा के दो सहायकों से संयुक्त कर देना चाहिए।
इस प्रकार उन्नति का एक क्षेत्र एक लक्ष्य और एक आकाँक्षा निश्चित हो जायेगी।
आकाँक्षा के परिपक्व हो जाने के बाद उसकी सफलता का प्रयत्न प्रारम्भ होता है। वह इस प्रकार कि जो कुछ विचार किया जाये उसी के विशय में, जो कुछ बात की जाये उसी के आधार पर और जो कुछ अध्ययन किया जाए उसी को लक्ष्य बनाकर। इस प्रकार उसके विशय में ज्ञान और अनुभव का विस्तार होगा। ज्ञान और अनुभव का संचय किये बिना किसी विषय में प्रगति कर सकना सम्भव नहीं। ज्ञान और अनुभव के अभाव में कभी कभी मनुष्य के बड़े गहरे पुरुषार्थ निष्फल चले जाते हैं। इतनी तैयारी करने के बाद मनुष्य को उसे मूर्तिमान करने के लिये सक्रिय पुरुषार्थ में लग जाना चाहिए। धीर-धीरे प्रगति होने लगेगी और उन्नति का लक्ष्य समीप आने लगेगा।
बहुत बार इतनी सब तैयारी कर लेने के बाद भी बहुत से लोग जीवन लक्ष्य में असफल हो जाते हैं। इसका कारण इसके सिवाय कुछ नहीं हो कि पुरुषार्थ और परिश्रम में कमी रक्खी गई होती है। होता यह है कि लोग थोड़ा सा काम करने के बाद ही थकान अनुभव करने लगते हैं अथवा थोड़ा सा ही परिश्रम करने के बाद बहुत कुछ कर लेने का सन्तोश करने लगते हैं । लक्ष्य की सफलता पुरुषार्थ से ही होती है लेकिन तब जब उसके लिये पूरा पुरुषार्थ किया जाये। जहाँ पूरा पुरुषार्थ लक्ष्य विजय करा देता है वहाँ अधूरा पुरुषार्थ स्वयं तो बेकार चला ही जाता है जीवन को भी असफल बना देता है।
अधूरे पुरुषार्थ के कई कारण हो सकते हैं। जैसे-शारीरिक निर्बलता। जो शरीर से कमजोर है, जिसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उसका थोड़े से परिश्रम में ही थक जाना स्वाभाविक ही है। श्रम करने के लिये तो शक्ति और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। निर्बल अथवा अस्वस्थ व्यक्ति के पास उसकी कमी होना अस्वाभाविक नहीं । जिसके पास शारीरिक विवशता हो उसे अपने स्वास्थ्य को ठीक करना चाहिये। यदि रोगी और अस्वस्थ रहता है तो ठीक प्रकार से अपनी चिकित्सा कराये। अपना आहार-विहार सँभाले । नियम और संयम का पालन करे। शरीर यदि स्वभावतः दुर्बल है तो अपने उपयुक्त , व्यायाम करे। भोजन को तत्वपूर्ण बनाये। स्वास्थ्य वर्धक वातावरण का सेवन करे और सदा प्रसन्न तथा उल्लसित रहने का प्रयत्न करे। इस प्रकार शारीरिक दुर्बलता दूर कर पूर्ण पुरुषार्थ के योग्य शक्ति का संचय किया जा सकता है।
पूरा पुरुषार्थ न कर सकने का एक कारण मानसिक भी हो सकता है। मानसिक कारणों से आलस्य , प्रमाद,उपेक्षा, टाल-मटोल, अनियमितता आदि हो सकते हैं। यह विकार और कुछ नहीं मानसिक व्यसन होते हैं जिनको मनुष्य यों ही पाल लिया करता है। आलस्य क्या है? काम करने के विशय में अनिच्छा । प्रमाद क्या है ? काम का महत्व न समझना । उपेक्षा क्या है ? अपनी निष्क्रियता का पालन करना। दीर्घ सूत्रता क्या है-समय का मूल्य न समझना । और अनियमितता है अपनी क्षमताओं को ऐसा आज्ञाकारी मानना कि जिस समय जितना काम चाहे हठपूर्वक ले सकते हैं। जबकि अपनी होती हुई भी बिना नियम के क्षमतायें किसी प्रकार भी उपयोगी तथा अनुज्ञाकारी नहीं होती। क्षमता कितनी ही क्यों न हो, यदि वह नियमपूर्वक का में नियोजित न की जायेगी तो कुछ भी उपार्जन नहीं कर सकती। बिखर फैल कर बेकार चली जायेगी। जबकि यदि थोड़ी क्षमता को भी विधिपूर्वक नियम के साथ किसी भी उससे कही अधिक काम कर सकती है जितना कि बिखरी हुई गाड़ी भार क्षमता कर सकती है।
इस प्रकार की सारी मानसिक कमजोरियों को दूर करने का एक ही उपाय है कि कुछ समय तक मन को नियमपूर्वक काम में लगाये रखने का अभ्यास कराया लाये।
एक क्षण भी उसे खाली न रहने दिया जाये। कुछ समय तक इस बलात्कार को चलाने के बाद मन ठीक रास्ते पर आ जायेगा। आलस्य की वृद्धि आराम द्वारा होती है। मनुष्य जितना अधिक आराम करता है उतना ही अधिक आलसी होता जाता है। यह धारणा नितान्त भ्रामक है कि आराम करने से नये बल, नये उत्साह और नव स्फूर्ति की प्राप्ति होती है। शक्ति ,उत्साह और स्फूर्ति तो आराम करने से नहीं बल्कि काम करने से प्राप्त होती और बढ़ती है। परिश्रम में स्वास्थ्य का गुण रहता है। जो मनुष्य जितना अधिक श्रम करेगा वह उतना ही स्वस्थ और निरोग रहेगा। जो स्वस्थ होगा, निरोग और निर्विकार होगा उसे उक्त गुणों की कमी रह नहीं सकती। आराम करने से बल और स्फूर्ति अवश्य मिलती है किन्तु तब जब पूरे परिश्रम के बाद विश्राम किया जाये। जिस प्रकार पूरे परिश्रम के बाद विश्राम लाभदायक होता है उसी प्रकार बेकार का विश्राम दो अभिन्न साथी है । राम के बाद विश्राम की उपयोगिता और आनंद है और विक्रम के बाद काम का आनन्द है। पर्याप्त काम और उचित विश्राम जीवन का वह सिद्ध मन्त्र है जिसके द्वारा मनुष्य किसी दूरस्थ लक्ष्य को भी सरलता पूर्वक पा सकता है।
संसार में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो शरीर से पूरी तरी स्वस्थ होते हैं लेकिन तब भी पुरुषार्थ की मात्रा पूरी नहीं कर पाते। ऐसे लोग वास्तव में कामचोर होते हैं। वे कभी कृत्रिम थकान का बहाना ले बैठते हैं तो कभी समय की कमी बतलाते हैं।
ऐसे निकम्मे और कामचोर इस कर्मभूमि पर बेकार के भार होते हैं। कामचोर प्रवृत्ति के लोगों को यदि संसार के सारे साधन दे दिये जाये और दो चार जीवन का समय दे दिया जाये तो भी वे प्रगति और उन्नति के नाम पर एक कदम भी आगे बढ़कर नहीं दिखला सकते।
थोड़े से काम में थकान अनुभव करने वाले वास्तव में काम में रस नहीं लेते जो उन्हें लेना चाहिये अथवा अपनी उपेक्षा वृति के कारण वह रस अनुभव नहीं कर पाते जो काम में भरा रहता है । अस्थिर मन और बिखरी लगन से काम करने में कर्ता को कभी आनन्द नहीं आ सकता । ज्यों-ज्यों वह बेमन, बेगार की तरह करेगा त्यों-त्यों काम उसके लिये नीरस बनकर भारी बनता जायेगा।
काम के लिये समय की कमी बतलाने वाले वास्तव में मिथ्यावादी होते हैं। जो इच्छा पूर्वक ईमानदारी से कुछ करना चाहते हैं उसके लिए समय की कमी नहीं रहती । एक दिन चौबीस घण्टों का समय होता है यदि आठ घंटे जीवन के अन्य कामों खाने पीने और आराम आदि करने में निकाल दिये जाये तो भी मनुष्य के पास काम के लिए सोलह घंटों का समय मिलता है। एक दिन में सोलह घंटों का समय कुछ नहीं होता। महात्मा गाँधी संसार के सबसे व्यस्त आदमी था। उनके पास काम की मात्रा ही ज्यादा नहीं थी बल्कि बड़ा महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी का काम था। उनका एक-एक क्षण व्यस्त रहा करता था । किन्तु तब भी उन्होंने अपने उस व्यस्त समय में से एक घंटा प्रतिदिन निकाल कर भारत की लगभग एक दर्जन भाषायें सीखली थी। ऐसे-ऐसे उदाहरण होते हुए भी, जिसके पास किसी अपने एक लक्ष्य के लिए सोलह घंटों का समय हो , यदि वह समय की कमी बतलाता है तो उसकी बात पर किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता । समय की कमी बतलाना कामचोरी के एक बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। काम की कमी कर्मठों तथा पुरुषार्थियों के पास तो रहती नहीं हाँ उसका अभाव आलसियों, प्रमादियों , गप्पियों और निठल्ले नवीसों के पास जरूर रहता है।
मनुष्य जीवन बड़ा मूल्यवान अवसर है। यह बार-बार नहीं मिलता। इसे यों ही नहीं खो देना चाहिए। अवश्य ही इसका लक्ष्य बनाकर उसे पूरा करने के लिए शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलताओं को जीतकर अखंड पुरुषार्थ करना ही चाहिए और समय तथा समाज पर अपनी प्रगति, उन्नति तथा सफलता की छान छोड़ ही जाना चाहिए।
कोर्ट मार्शल के सम्मुख तात्या टोपे को उपस्थित करने के बाद अँग्रेज न्यायाधीशों ने पूछा ‘यदि तुम चाहो तो अपने बचाव में कुछ कह सकते हो ।’ तात्या टोपे का स्वाभिमान जाग उठा उसने कहा-’मैंने ब्रिटिश शासन से टक्कर ली है । मैं जानता हूँ कि इसके बदले मुझे मृत्यु दण्ड प्राप्त होगा। मैं केवल ईश्वरीय न्याय और न्यायालय में ही विश्वास रखता हूँ इसलिये अपने बचाव के लिये मैं कुछ नहीं कहना चाहता । तात्या को जब फाँसी स्थल पर ले जाया गया तो उसने कहा ‘तुम लोग मेरे हाथ पैर बाँधने का कष्ट क्यों करते हो लाओ फाँसी का फन्दा मैं स्वयं ही अपने गले में डाल लूँ ।’ इन अंतिम शब्दों के साथ सत्तावन के स्वतन्त्रता संग्राम का वह सेनानी अमर हो गया।
जिसमें प्रगति की इच्छा नहीं वह मुर्दा है, जिसमें इच्छा है पर साहस नहीं वह मुर्दे का भी मुर्दा है।--लिंकन
भद्रे!-आचार्य द्रुमत उपकौशन ने अपनी पत्नी के देदीप्यमान ललाट की ओर प्रश्न वाचक दृष्टि डाली और बोले-मनुष्य जतीवन की सम्पूर्णता सफलता और तेजस्विता का आधार विद्या है-भगवती ! जिस प्रकार मेरी कन्या गृहकार्य निपुणा सुशीला और विदुषी है उसी प्रकार का बौद्धिक प्रतिभा संपन्न वी भी मिलता तो सोने में सुहागे को प्रसंग चरितार्थ हो जाता।
आचार्य माता ने कहा-ऐसे युवक की खोज करना आपके लिये तो कठिन नहीं है आर्य श्रेष्ठ ! आपके विद्यालय में तो न केवल सामान्य नागरिकों के बच्चे वरन् कौशल,कुरु, काँची,मगध, ऊरु, अर्यमारण्य, उदीच्यायनीय कावोज, वाराणसी और अंगिरा द्वीप तक के छात्र विद्याध्ययन करते हैं क्या उनमें से एक भी बालक आपकी कल्पना को साकार नहीं करता।
विद्या का अर्थ बौद्धिक प्रतिभा ही नहीं होता प्रिये! वरन् उसका व्यावहारिक जीवन में नीति निपुण समावेश भी होता है। पवित्र बाह्मचरण का भी अन्तःकरण कलुषित हो सकता है ऐसा व्यक्ति कितना ही शिक्षित हो विद्वान नहीं कहा जा सकता । विद्वता विराट् ब्रह्म की उस आभ्सान्तरिक अनुभूति का नाम है जो उसे विश्वात्मा के विद्वान्तो का नैष्ठिक अनुगामी बना देती है। ऐसा व्यक्ति घोर विशम परिस्थितियों में भी आत्मा को प्रतारित नहीं कर सकता अपने स्वार्थ के लिये एक कीड़े को भी न छला जाये जिसमें यह भाव हो वही सच्चा विद्वान है। मुझे सन्देह होता है कि इस परीक्षा में कही समस्त गुरुकुल असफल न हो जाये इसीलिये उसका साहस नहीं होता तथापि एक और उपाय कर देखता हूँ सम्भव है योग्य युवक की प्राप्ति यही हो जाये।
आचार्य प्रवर ने अपने समस्त स्नातकों को एकत्रित किया और बोले तात! टाप सब जानते हैं मेरी कन्या विवाह योग्य हो चुकी है, मेरे पास धन का अभाव है आप लोग अपने घरों में जाये और एक एक आभूषण मेरी कन्या के लिये लाये जो सर्वश्रेष्ठ आभूषण लायेगा उसी के साथ अपनी कन्या का विवाह कर देंगे। किन्तु यह बात गुप्त रहनी चाहिये, माता पिता तो क्या यदि दाहिना हाथ आभूषण लाये तो बाँये हाथ को भी पता न चले।
द्रुमुत उपकौशलाचार्य की कन्या असाधारण विदुषी, सुशीला और सौन्दर्यवर्ती थी, हर स्नातक का हृदय उसे पाने के लिए बेचैन हाउ उठा। वे सबके सब आतुरता पूर्वक घरों को गये और आभूषण चुरा चुराकर लाने लगे । जो भी स्नातक कैसा भी आभूषण लाता आचार्य उसे उसके नाम के सामने लिखकर एक ओर सुरक्षित रख देते कुछ ही दिनों में आभूषणों के अम्बार लग गये पर जिस आभूषण की खोज थी आचार्य प्रवर को वह अभी तक भी लाकर कोई न दे सका।
वाराणसी के राजकुमार ब्रह्मदत्त सबसे पीछे लौटे निराश और खाली हाथ । उत्सुकता पूर्वक आचार्य ने पूछा वत्स ! तुम कुछ नहीं लाये ? हाँ गुरुदेव ! यों कि आपने कहा था कि आभूषण इस तरह लाया जाये कि कोई देख भी न पाये वह शर्त पूरी करना असम्भव है-क्योंकि मैंने बहुत उपाय किये तो भी एकान्त तो मिल ही नहीं पाया।
क्या तुम्हारे माता पिता और अन्य कुटुम्बीजन सोते नहीं -रात में निकाल लेते आभूषण-आचार्य ने विरुमय दृष्टि डालते हुये पूछा। ब्रह्मदत्त ने उत्तर दिया तात! मनुष्यों से सूनापन मिल सकना सरल है पर वहाँ से मेरे अतिरिक्त मेरी आत्मा , सर्वव्यापी परमात्मा की उपस्थिति तो टाली नहीं जा सकती थी फिर आपकी शर्त कैसे पूरी होती।
आचार्य की आंखें चमक उठी, वह जो आभूषण चाहते थे मिल गया । ब्रह्मदत्त को उन्होंने हृदय से लगा लिया। सभी के आभूषण लौटा दिये उन्होंने और कन्या के पाणिग्रहण की तैयारी में जुट गये।
स्वर्ग मुक्ति और परमात्मा यदि कहीं आकाश में है तो वह शरीर में है। ‘यत्पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी हैं वह इस शरीर में है मूल और सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी भारतीय तत्व दर्शियों ने दी थी उसका विज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की वैज्ञानिक साधनायें भी। वे कठिन भले ही हों किन्तु भारतीय आध्यात्म और आस्तिकता कह परख का उससे बढ़िया न तो उपाय है न कोई दूसरा विज्ञान ।
साधारणतः देखने में शरीर की वाह्य त्वचा और आँख,कान नाक,मुँह,हाथ पाँव आदि थोड़े अंग ही दिखाई देते हैं पर इसके भीतर ज्ञान-विज्ञान का,शक्ति और पदार्थ का भाण्डागार छिपा पड़ा है। पदार्थ स्थूल होने से उसकी जानकारी अधिक मिल गई पर शक्ति सूक्ष्म होने से विज्ञान अभी तक उसके प्रवेश द्वार पर ही है।भौतिक शक्तियों का वाह्य विश्लेषण वैज्ञानिकोँ ने बहुत अधिक का लिया हैं पर उसका आध्यात्मिक शक्तियों से संयोग न होने के कारण उन्होंने मनुष्य शरीर चेतना की समस्याओं सुलझाने में कुछ भी योग न देकर उसे उलझा और दिया।
मनुष्य शरीर का सूक्ष्म और शक्ति भाग नाडियों से प्रारंभ हाता है। शरीर विज्ञान भी मानता है कि शरीर में नाडियों के इतना लम्बा जाल बिछा हुआ है कि यदि उस सब को लम्बा खींचकर जोड़ दिया जाये तो कवशुवत रेखा पर गाँठ लगाई जा सकती है । शिव संहिता के अनुसार शरीर में 34000 हजार नाड़ियां है। त्रिसिख ब्राह्मणोपनिषद्, दर्शनोपनिशद गोरक्ष पद्धति ,भूत शुद्धि तंत्र आदि ग्रन्थोँ में 72000 हजार नाडियों के होने का वर्णन है।प्रपंच सार में इनकी संख्या 3 लाख बताईं है। यह समस्त नाड़ियां शरीर को जाल की तरह जकड़े हुये है। सड़कों , रेलवे लाइनों सारी पृथ्वी में बिजली के तारों के अम्बार बिछे पड़े है।देखने मेंवे चुपचाप खड़े दिखाई देते हैं पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि बाहर से मात्र तार दिखाई देने पर भी दोनों तारों के अन्दर-अन्दर कई दिल्ली से मुम्बई को संदेश जा रहा हाता है कहीं कानपुर और कलकत्ता को जगमगाने वाली विद्युत तरंगें। अमेरिका की वेल लैबोरेटरी ने ऐसे टेलीफोन बनाये है जिनमें आवाज के अतिरिक्त बोलने वाले का चित्र भी टेलीविजन की तरह से दिखाई देता है । अर्थात् बिजली के तारों के अन्दर प्रवाह रूप से शब्द और संदेश नहीं दृश्य और शक्तियों भी बहती रहती है। पर हमारी स्थूल आँखें उन्हें देख,सुन,समझ नहीं पाती उसी प्रकार शरीर के अन्दर बिछी इन नाडियों में चल रही संदेश प्रणाली को भी हम देख,सुन नहीं सकते क्योंकि उन्हें देखने और समझने वाली आँखें बाहर नहीं भीतर है। जब तक उन्हें जागृत न करें इन नाडियों के महत्व को समझना और उनके द्वारा अतींद्रिय शक्तियों का उद्घाटन करना संभव नहीं। अन्ततः योग-साधनायें ही आधार रह जाती है। उनके द्वारा मनुष्य शरीर की शक्तियों, विज्ञान और ईश्वरीय देन का सही उपयोग हो सकता है।
नाडियों में प्रधान अनम्बुपा ,कुद्दु ,वरुणा यश्स्विनी, विडला, इडा, षा, शगिंणी, सरस्वती, हस्ति जिह्मा, विश्वोदरा आदि प्रमुख नाड़ियां है। पर उन सब में इडा,और पिंगला और अनके सहयोग से बनी सुशुम्ना ही सर्व प्रमुख है। क्योंकि शरीर के सभी आध्यात्मिक तत्व और तथ्य इन्हीं से संबंधित है। शेष सभी शरीर की भौतिक रचना से सम्बद्ध होने से उतने मूल्य और महत्व की नहीं है।
यह नाड़ियां मस्तिष्क के उस भाग को जहाँ चोटी निकलती है। कमर के उस भाग को जोड़ती है जहाँ मेरुदण्ड जाकर समाप्त होता है।इन दोनों स्थानों का शरीर के अन्य अंग प्रयत्नों से भी सम्बन्ध है और उनको प्रभावित करने तथा शरीर का प्रवाह ग्रहण करने में भी इनका हाथ है। तथा मेरुदंड का यह भाग आध्यात्मिक शक्तियों का केंद्र और सतलाकों का बीज लोक है। शक्तियाँ सामर्थ्य सिद्धियां, देवता, स्वर्ग अपवर्ग शिव,विष्णु, ब्रह्मा सब इसी मर्म में निवास करते हैं। इस शक्ति संस्थान को जागृत किये बिना ईश्वरीय शक्तियों का साक्षात्कार नहीं होता।
सुर्य को सौर मंडल में उस तरह टिकाया गया है कि वह आने सभी ग्रह उपग्रहों को नियमित रूप से प्रकाश व ऊर्जा बाँटता रहे कोई उससे वंचित न रहे उसी प्रकार शरीर की आध्यात्मिक प्रक्रिया को नियन्त्रित रखने और उसका ब्रह्माण्ड व्यापी तालमेल स्थापित करने के लिये पात प्रमुख केन्द्र भगवान् ने स्थापित किसे है। 6 चक्र और सातवाँ ब्रह्मा लोक या शून्य चक्र सातों के नाम (1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपुर(4) अनाहत (5) विशुद्ध (6) आज्ञा चक्र और (7) सहस्रार। मूलाधार जो गुदा और सीवन भाग की सीध में स्थित होता है यह पृथ्वी लोक का प्रतिनिधि है और समस्त भौतिक सुख संपदाओं का मूल है जिस प्रकार निहारिकाओं में बहकर आता हुआ पदार्थ सूर्य के माध्यम से पृथ्वी तक पहुँचता है उसी प्रकार मस्तिष्कीय दिव्य सी सुशुम्ना शीर्षक से होता हुआ मूलाधार तक आता है। पृथ्वी का अपना गुरुत्वाकर्षण अपनी उर्वरता अपने तत्व अलग है उसी प्रकार मूलाधार में पार्थिव गुण के बीज रूप से विद्यमान है इसीलिए इसे पृथ्वी लोक कहते हैं।
तत्वधारे मूले समयया लास्या परया, शिवा (नवा) त्मानं मन्ये-
अर्थात्-मूलाधार में नृत्य करती हुई देवी (शक्ति) वधा रसपूर्ण कामनाओं का तर्नन करने वाले शिवजी का चिन्तन करता हूँ।
मूलाधार चक्र की सिद्धि से मनुष्यों में श्रेष्ठता आरोग्य, आनन्द चित्त, काव्य सामर्थ्य आदि का विकास होता है।
पेडू स्थित स्वाधिष्ठान के बारे में सौन्दर्य लहरी में कहा है-
तब स्वाधिश्ठाने हूतवहमधिश्ठाय निरतं तमीडे संवर्त जननि महतीं- ताँ च समयाम्।
हे जननी! तुम्हारे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नि तत्व को प्रभाव में रखने वाली संवर्त अग्नि रहती है इसके जागरण से साँसारिक मोह, अहंकार छूट जाते हैं तथा काव्य व गद्य रचना की साहित्यिक प्रतिभा का विकास होता है।
तीसरा चक्र मणिपूर है अग्नि तत्व की प्रधानता वाले इस चक्र को स्वः लोक या सूर्य लोक का प्रतिनिधि मानते हैं यह नाभि स्थिति है नाभि ही खींची हुई श्वांस से प्राणाग्नि लेकर शरीर में अग्नि और ऊष्मा बढ़ाती है। इसको सिद्धि से संहार व पालन की तथा कुछ भी कहे सत्य हो जाने की क्षमता और प्रभुता का विकास होता है।
चौथा चक्र अनदृत हृदय में स्थित है और यह लोक का प्रतिनिधि है इसको शुद्ध या जागृत कर लेने पर इंद्रियों पर विलय ईश्त्व तथा योग सिद्धियां मिलती है। वायु तत्व की प्रधानता होने के कारण उनकी बुद्धि अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है किसी के भी मन की बात जानना सम्भव हो जाता है।
पाँचवे विशुद्वाख्य का स्थान कण्ठ , धुयें के समान तत्व वाले इस चक्र में जनः लोक प्रतिष्ठित है इसको जागृत कर लेने वाले त्रिकालदर्शी स्वस्थ रोगमुक्त सर्व समर्थ तथा ज्ञानी हो जाते हैं।
स्वर्ग और नरक दोनों अपने अन्दर है यह अपने मन पर निर्भर है कि स्वर्ग प्राप्त करे या नरक।
छठवाँ चक्र महतत्व वाला और तपः लोक का बीज स्थान है यह नाक की जड़ तथा दोनों भौहों के बीच द्विदल की बनावट वाला चक्र है। इसको जागृत कर लेने से मनुष्य सर्व दर्शी, मिताहारी , वाक् सिद्धि आदि सामर्थ्य पाता है। इसे तीसरी आँख भी कहते हैं इससे ही योगी बाह्मभ्यन्नर सब कुछ देखने में समर्थ होते हैं। फ्राँस के टूरकुइंग नगर में मशहूर क्लेमेण्ट नाम की लड़की 1766 में जन्मी थी उसके माथे पर केवल एक ही आँख थी उसमें यह सारे गुण थे । वह 15 वर्ष तक स्वस्थ जीवित रही और एक आश्चर्य के रूप में भारतीय योग विद्या का प्रमाण प्रस्तुत करती रही।
सातवें सहस्रदल कमल को ब्रह्म का निवास स्थान कहा जाता है इच्छा शक्ति या मनुष्य जीवन की नाना प्रकार की इच्छायें इस सत्य लोक में लय हो जाने पर ब्राह्मी भूत हो जाती है। चेतना केवल मात्र ब्रह्म हो जाती है। सहस्रार सिद्ध गौतम बुद्ध थे , राम और कृष्ण थे वह इसी चक्र की सिद्धि के कारण मनुष्य शरीर में ही भगवान् हो गये थे सहस्रार सिद्ध विश्व विजेता होता है । शक्ति और सिद्धियां उसकी दासी होती है-
मही मूलाधारे कर्माय मणिपूरे द्रुतवहम्। स्थितं स्वाधिश्ठाने हृदिमरुत माकाश मुपरि॥
मनोअपि भ्रृमध्मे सकलमपि भित्वा कुलपथम। सहस्त्रारे पद्यै सह रहसि पत्या विहरसि॥
हे जननी मूलाधार स्थित पृथ्वी से चलकर तुम मणिपुर स्वाधिष्ठान अनाहन भ्रू मध्य चक्र का वेधन करती हुई अपने पति परमपिता परमेश्वर से जा मिलती हो।
इस तरह योग शास्त्रों में नाडी विद्या के उन रहस्यों का उद्घाटन किया गया है जिन्हें जाकर योगी शरीर में ही सप्तलोकों में विचरण का आनन्द लेता है हर लोक की सिद्धि और सामर्थ्य का वह स्वामी हो जाता है ऐसा विज्ञान दुनिया के पर्दे पर आज तक किसी ने नहीं दिया। किन्तु अब वैज्ञानिक इन सत्यों को स्वीकार अवश्य करने लगे है। इस सम्बन्ध में कोराइन हेलाइन ने अपनी पुस्तक “आकल्ट एनाटमी “ में जो प्रकाश डाला है वह इन सप्त लोकों की रचना और उनमें निहित शक्तियों से 67 प्रतिशत मिलता जुलता है। डॉ॰ कोराइन हेलाइन स्वयं भी एक वैज्ञानिक थे और बाइबिल तथा आध्यात्म दर्शन का भी उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया था। भारतीय जिसे प्राण प्रवाह कहते हैं, थियोसाफी वाले जिसे जीवन शक्ति या वाइटैलिटि कहते हैं उसे उन्होंने “नर्व फ्लूड” नाडियों में बहने वाला द्रव्य कहा है। और हर ग्रन्थि या चक्र का विशेषता का कारण उस चक्र में उपस्थित अन्तः स्राव (हारमोन्स)
को माना है । भारतीय योग ग्रंथों में चन्द्र और सूर्य या गर्म और ठण्डी नाड़ियों को उन्होंने स्त्री वाचक और पुरुष वाचक माना है जो भारतीय योग-शब्दावली के समानार्थी ही है। प्राण में अग्नि तत्व की प्रधानता को उन्होंने फास्फोरस माना है।”सात पुष्प केन्द्र और उनकी पुप्तत कार्य शैली (दिसेविन फ्लग्वी सेंटर एण्ड देयर एसेटोरि एक्टिविरी) शीर्षक से उन्होंने भी लिखा है कि मनुष्य शरीर के यह सात केंद्र यद्यपि प्रसुप्त अवस्थान में रहते हैं तथापि उनका बहुत अधिक महत्व है। यदि आध्यात्मिक विचार प्रबुद्ध किये जा सके तो इन्हें प्रकाश व शक्ति के भंवरों के रूप में अनुभव किया जा सकता है तथा उनकी सुगन्ध और शोभा के दिव्य लाभ से लाभान्वित भी हुआ जा सकता है।
मूलाधार के त्रिकोण-अणु को कोराइन ने हेलाइन ने कुदिर के मुख्य कोण का पत्थर लिखा है और उसका स्थान ठीक वही है जो भारतीय योग ग्रंथों में है। दूसरा केन्द्र सोलर प्लैक्सस लाल नारगी सूर्य की भाँति हलके पीले रंग नाभि स्थित , तीसरा तिल्ली या स्पिलीन स्थित है उसकी सिद्धि श्री हेलाइन ने अप्रत्यक्ष वस्तुओं को देखने की क्षमा या दूरदर्शन माना है। इसके जागरण की स्थिति में रात में हवा में उड़ने के स्वप्न आते हैं।
चौथे केन्द्र हृदय की सिद्धि से पृथ्वी में पूर्व जीवन की स्मृति आ जाती है यह लिखकर उन्होंने एक प्रकार से ईसाई धर्म की पुनर्जन्म न मानने की धारणा को ठुकरा दिया है।
पृथ्वी से हम सब परिचित है पर अपने भीतर विद्यमान देवलोक को कोई नहीं जानता ।
इसे उन्होंने आध्यात्मिक तथा भौतिक विचार धारा के मध्य की विभाजन रेखा कहा है अर्थात् हृदय चक्र से ऊपर तक विकास हो जाने पर फिर मनुष्य की अधोगति नहीं हो सकती।
पाँचवाँ केन्द्र गला और छठवां केन्द्र भू मध्य मानने का मतलब विशुद्वाख्य तथा आज्ञा चक्र की उपस्थिति की ही पुष्टि होती है। सातवाँ केन्द्र सहस्रार के बारे में उन्होंने लिखा है कि यह केन्द्र शिर की चोटी पर मुकुट के रूप में अवस्थित है उसको पाने के बाद मनुष्य देवत्व में बदल जाता है।
“एटानामी एण्ड इमोशन” के लेखक डॉ॰ हैजेल ने भी स्वीकार किया है कि मनुष्य जीवन को प्रभावित करने में अंतःस्रावों (हारमोन्स) का बहुत अधिक महत्व है यह काम इन ग्रंथियों से ही सम्बन्धित होते हैं दोहरा काम करते हैं एक ओर शरीर की व्यवस्था दूसरे उनकी भावनाओं से तालमेल। यह भाव और पदार्थ के बीच की कड़ी है जब मनुष्य उन्हें जानकर उनका आत्म विकास में प्रयोग करता है तब वह इतिहास का असाधारण व्यक्ति बन जाता है। यह ग्रन्थियाँ “माइक्रोकास्म” पदार्थ की बनी होने से वह आकाशस्य नक्षत्रों से प्रभावित होती है इसलिये उन्होंने इन्हें अंतर्नक्षत्र (इन्टीरियर स्टार्स) से सम्बोधित किया है। और
पैरासेल्सस का कथन है-स्वर्ग हमारे अन्दर है यदि इन अंतःस्रावी ग्रंथियों और नाडी केंद्रों का विमोचन किया जाये तो विराट् विश्व को अपने शरीर में ही प्राप्त किया जा सकता है। वेद का कथन भी यही है-
सप्ताम्यासन्परिधयस्त्रियः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञ तन्वाना अब ध्नपुरुशं पशुम्॥
यत्पुरुशेण हविशा देवा यज्ञमतन्वत। बसन्ताअस्या सीदाज्यं ग्रीश्म इध्मः शरद्वविः॥ --यजुर्वेद 31।15-14
अर्थात्-यज्ञ वेदी की सात परिधियां इक्कीस समिधायें है ऐसे यज्ञ को देवताओं ने फैलाया है उसमें पशु (जीव) बँधा है। और देवताओं की इच्छानुसार तीन ऋतुओं में जीवन की हवि चढ़ाता रहता है। जो वाह्य कामनाओं को समेट कर इन शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बनाते हैं वे देवत्व को प्राप्त करते हैं।
परम योगी शुकदेव को आश्चर्य हुआ कि वैभव पूर्ण जीवन बिताने वाले राजा जनक को लोग विदेह और परम ज्ञानी क्यों मानते है? शुकदेव ने महाराज जनक का आतिथ्य स्वीकार किया उन्होंने जनक को रत्न जटित पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करते देखा और वस्त्र भी वे एक से एक बढ़कर कीमती पहने थे। शुकदेव को घोर निराशा हुई उन्हें विदेह का जीवन क्रम इन्द्रिय लोलुप व्यक्ति जैसा प्रतीत हुआ । अपार वैभव विलास के बीच रहकर भी कोई योगी रह सकता है वे इस बात की कल्पना तक भी स्वीकार नहीं कर पाये।
प्रातःकाल होते ही महाराज जलन ने सरयू स्नान का प्रस्ताव रखा। दोनों ही स्नान करने गये। जनक ने बहुमूल्य वस्त्र उतार कर नदी के किनारे पर रख दिये और स्नान के लिए जल में उतरे। शुकदेव ने भी वल्कल वस्त्र उतार दिये। स्नान के बाद दोनों ही संध्या पूजा में मग्न हो गये। अभी संध्या प्रारम्भ किये कुछ ही समय हुआ था कि किनारे पर खड़े अनेक व्यक्तियों ने चिल्लाना शुरू किया “आग-आग “ सचमुच समीपवर्ती भवन पूरी तरह आग की लपेट में आ गये थे। घाट पर भी आग फैलने की पूरी आशंका थी।
शुकदेव का ध्यान टूटा उन्होंने देखा कि किनारे का भवन धू-धू कर जल रहा है। वह अपने विकलन वसन लेने तट की ओर दौड़े । पर सम्राट को कोई चिन्ता नहीं । ध्यान में मग्न । सम्राट पूजा करके उठे तो तपस्वी शुकदेव ने अग्निकाँड की सारी घटना सुनाई।
विदेह ने मुस्कराते हुए कहा- मैं क्या? सभी मिथिला ही जल जाती । पर उसमें मेरा कुछ न जलता।
जनक के निर्लिप्त भाव ने तपस्वी की शंका का समाधान कर दिया।
आयरलैंड के क्रुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो दंपत्तियों के एक ही दिन कुछ मिनटों के ही अन्तर से दो पुत्र पैदा हुये। एक दाम्पत्य ने अपने बच्चे को नाम एलेनर ग्रेडी रखा दूसरे ने अपने बच्चे का नाम पैट्रिक रखा। दोनों बच्चे धीरे-धीरे अपने जीवन के स्वाभाविक विकास क्रम की ओर चल पड़े।
प्रति सेकेंड 3 बच्चों को जन्म हो जाने वाली इस पृथ्वी में शरीर धारण कोई अनोखी बात नहीं है आज कल तो जनसंख्या वृद्धि एक समस्या ही बन गई है क्योंकि खाद्यान्न में 1 से 2,2 से 3,3 से 4 की धीमी गति से प्रगति होती है जबकि बच्चे 1 से 2,2 स 4 और 4 से 8 की गुणोत्तर गति से अतएव अनुमान है कि कुछ दिन में जनसंख्या भूख के कारण कही अपना ही विस्फोट न करले ऐसी स्थिति में बच्चों के जन्म की चर्चा क्यों छेड़ी गई?
इसलिये कि जीवन के वास्तविक अर्थ को समझा जाये और उसका लक्ष्य भी प्राप्त किया जाये ? ऋग्वेद में बताया है--
अपाडं प्राडेति स्वध्या गृभीतीअमर्त्योमर्त्येना सयोनिः । ता शश्रन्ता-विशुचना वियन्तान्यअन्य चिक्युनं नि चिक्युरन्यम्॥ 1।164।38
अर्थात्-अन्न से बना हुआ यह शरीर तुम्हारे कल्याण के लिये मिला है अशुभ कर्म करके नीचे मत गिरो, महान् कार्य करो और ऊपर उठो।
किन्तु जड़ शरीर ओर इंद्रियों की आसक्ति में पड़े मनुष्य शरीर की सूक्ष्म चेतना की ओर ध्यान नहीं देते। प्रस्तुत पंक्तियों में दी जा रही घटना यह बताती है कि मनुष्य चेतना किसी सार्वभौमिक नियम के अनुसार किसी उद्देश्य के लिये जन्म लेता है उसे इस अद्वितीय चेतना और अन्तिम सत्य का ज्ञान प्राप्त करना और उसकी अनुभूति करना ही चाहिये। पैट्रिक और अलेनर ग्रेडी अलग अलग खेलते किन्तु एक दिन दोनों रोते रोते घर पहुँचे ,दोनों के दाहिने पैर पर लगभग एक ही स्थान पर चोट लगी थी। माता पिता ने पट्टी करदी कोई ध्यान नहीं दिया। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे तब कई बार ऐसा हुआ कि यदि परीक्षा में पैट्रिक को 260 अंक प्राप्त हुये तो दूसरे स्कूल में पढ़ रहे ग्रेडी को भी 260 ही अंक मिले। अन्तर पड़ा तो बहुत ही मामूली।
जिस दिन एडिनर ग्रेडी के विवाह सम्बन्ध की बान चली ठीक उसी दिन पैट्रिक की भी और संयोग यों हुआ कि दोनों की शादी एक ही दिन तय हुई और पहला बच्चा भी दोनों के एक ही दिन हुआ। इन घटनाओं ने लोगों का ध्यान हठात् इधर खींचा और आयरलैंड के शिक्षित व्यक्ति भी यह मानने लगे कि कोई एक सार्वभौमिकता सत्ता व नियम सृष्टि में काम अवश्य कर रहा है अन्यथा यह विचित्रताएं क्यों कर प्रकाश में आती। महात्मा गाँधी जी और लालबहादुर शास्त्री की जन्म तिथियाँ एक थी दोनों को जीवन एक सा था। पं॰ मोतीलाल नेहरू और श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर एक ही दिन जन्में उनकी उपलब्धियाँ लगभग एक जैसी थी । अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी और राष्ट्रपति लिंकन 100 वर्ष के अन्तर से जन्मे पर उनके जीवन की घटनाओं में इतनी अधिक समानता देखी गई कि लोगों को यहाँ तक कहते हुए सुना गया-”लिंकन की कैनेडी होकर जन्मे है।”
पैट्रिक और एलेनी ग्रेडी 66 वर्ष की आयु में एक ही दिन बीमार पड़े और एक ही समय मर कर चले गये पर अपने पीछे एक प्रश्नवाची चिन्ह छोड़ गये जो चिरकाल तक लोगों को मनुष्य जीवन की यथार्थता को खोजने की आध्यात्मिक प्रेरणा देता रहेगा।
मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे कोशों से बना है इनमें ही उसके शारीरिक रचना के सूत्र विद्यमान होते हैं। इन्हें वंश सूत्र का गुण सूत्र (क्रोमोसोम ) कहते हैं। क्रोमोसोम भी लक्षण बीज (जीन्स) से बने होते हैं। पैडीदार सीढ़ी की शक्ल के अत्यन्त सूक्ष्म यह लक्षण बीज (जीन्स) ही जीवों की रचना के उत्तरदायी होते हैं। जब तक इनमें विशेष परिवर्तन न हो तब तक विधाता ने जो बात पहले से तय करदी हे मनुष्य उन्हें पालन करने को बाध्य होगा अर्थात् सौन्दर्य, सुडौलता,स्वास्थ्य आरोग्य, कालापन या गोरापन ,बुद्धिमता-मूर्खता , कवित्व, नेतृत्व आदि का जो भी भाग्य भगवान् ने कहिये या प्रकृति ने निर्धारित कर दिया वह उन भाग्य की लकीरों को आसानी से बदल ले।
वैज्ञानिकों ने वह उपाय खोजे जिनसे लक्षण बीजों में परिवर्तन करके शरीर और मन के आकार प्रकार में परिवर्तन किया जा सके। इस क्रिया को आकस्मिक परिवर्तन या (क्यूटेशन) कहते हैं। जीन्स अत्यन्त सूक्ष्म तत्व है उनका भेदन उससे भी सूक्ष्म प्रकाश किरणें ही कर सकती है। क्यूटेशन क्रिया में “एक्स” अथवा कास्मिक किरणों की बौछार जीन्स पर की जाती है। जिससे बौछार किये गये प्राणी और बच्चों पर विलक्षण परिवर्तन होते हैं शरीर और मन के आकार प्रकार के परिवर्तन का और दूसरा उपास नहीं।
यदि है तो वह है विकासवाद का सिद्धांत-एलाल्यूशन थ्योरी-डार्विन, लेम्मार्क आदि का मत है कि मनुष्य एक कोशीय जीवों से प्राकृतिक परिवर्तनों के रूप में क्रमशः विकसित होता हुआ आज इस रूप पहुँचा है। उदाहरण कि लिये वर्तमान घोड़े को लोमड़ी जैसे किसी जीव का विकसित रूप मानते हैं जैसे-जैसे उस जीव की इच्छाओं में परिवर्तन होता गया शरीरों में भी परिवर्तन होता गया। इस दृष्टि से इच्छा संकल्प शक्ति को प्रकाश किरणों में भी सूक्ष्म वेधक शक्ति मानना विज्ञान सम्मत ही होगा।
अब यहाँ एक घटना दी जा रही है पेन्सिल वेनिया के मुर्गीखाने में एक मुर्गी ने अण्डे दिये अण्डे देने के बाद तथा उन्हें सेने के बाद मुर्गी आश्चर्यजनक ढंग से बदलने लगी। नये पंख , चमकदार गर्दन , मुर्गे की तरह की सिर पर कलंगी, लम्बी पूँछ अतिरिक्त उसके पैरों में तीन-तीन एड़ियां भी निकल आई। इस मुर्गों के मालिक डॉ॰ एम एस गिलैस्पी ने उसे ब्रुकलिन अजायबघर को दे दिया जहाँ उसे लोग उसकी मृत्यु हो जाने तक देखने आते रहे।
इस मुर्गी पर किन्हीं किरणों की बौछार नहीं की गई। उसकी इच्छा शक्ति ने सद्यः परिवर्तन का रूप ले लिया हो यह बात भी समझ में नहीं आती जबकि विकास बाद के सिद्धांत के अनुसार यह इन दो कारणों में से ही होना चाहिये इससे तो यही मानना पड़ेगा कि कोई एक अदृश्य इच्छा शक्ति प्रकृति में ही काम कर रही है उसी की प्रखरता मुर्गी में परिवर्तन में रूप में प्रस्तुत हुई हो। क्योंकि यदि अदृश्य लोकों की किरणों की बौछार की बात सोची जाये तब तो वैसे ही परिवर्तन उसके बच्चों और पास के अन्य जीवों पर भी होता पर वैसा नहीं हुआ। तब निश्चित ही यह प्रकृति की चेतन इच्छा व संकल्प शक्ति से ही ऐसा हुआ अतएव हमें स्थूल पदार्थों में भी चेतनता को अमान्य नहीं करा चाहिये। सावित्री की उपासना इस चेतना से संपर्क और उसका आशीर्वाद प्राप्त करने का ही वैज्ञानिक तरीका है उससे वंचित नहीं रहना चाहिये।
जैसे बछड़ा हजारों गौओं के बीच में अपनी माता को ढूंढ़ लेता है, उसी प्रकार पहले का किया हुआ कर्म भी कर्ता को पहचान कर उसका अनुसरण करता है।--वेदव्यास
परमार्थ का नाम सुनते ही लोग बहुधा यह समझ कर घबरा उठते हैं कि परमार्थ की प्रेरणा देने वाले उन्हें अपने आवश्यक स्वार्थों से छुड़ाकर कुछ इस प्रकार परोपकार तथा परसेवा के कार्यों में लगा देना चाहते हैं कि उनका परिवार छुट जाये । वे जीवन में आर्थिक उन्नति से वंचित रहकर न तो कोई तरक्की कर पायेंगे और न किसी ऊंचे पद पर पहुँच पायेंगे। वे गरीब रहकर सारे सुखों से रहित हो जायेंगे।
कहना न होगा कि इस प्रकार का विचार करने वाले लोग वस्तुतः परमार्थ का वास्तविक अर्थ नहीं समझते। मनुष्य का सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही माना गया है। जो काम भी ऊँचा और उज्ज्वल स्वार्थ लेकर किया जाता है उसका अन्तर्भाव एक प्रकार से परमार्थ ही होता है। स्वार्थ सिद्धि का परिणाम आत्म-सन्तोश, आत्म-सुख और आत्म-कल्याण ही तो हो सकता है। यही परिणाम परमार्थ का भी माना गया है। अन्तर केवल इतना ही है कि स्वार्थ का सुख अस्थायी एवं अन्त दुःखद होता है। किन्तु परमार्थ से प्राप्त सुख स्थायी और विक्षोभ रहित होता है। कोई भी बुद्धिमान, किन्हीं ऐसे स्वार्थों द्वारा सुख क्यों न पाना चाहेगा जिनमें परमार्थ का भी अन्तर्भाव भरा हुआ हो।
आत्मा का स्वार्थ जिन विचारो और कार्यों द्वारा सिद्ध होता है उन्हीं के माध्यम से संसार का कल्याण करने वाले परमार्थ की भी सिद्धि होती है। फिर क्यों न ऐसी गतिविधि ही अपनाई जाये जिससे स्वार्थ की भी सिद्धि हो और परमार्थ का भी साधन बने। उदाहरण के लिए स्वार्थ का सबसे स्थूल रूप उपार्जन का ले लिया जाये । उपार्जन का यहाँ पर अर्थ है धन कमाना । धन कमाने के लिए लोग खेती करते हैं, व्यवसाय करते हैं और नौकरी करते हैं।
यों तो खेती, व्यवसाय अथवा नौकरी करना मूलतः स्वार्थ है। पर यदि इसमें ऊँची भावना का समावेश कर दिया जाये तो इसी स्वार्थ के साथ परमार्थ का भी लाभ होने लगे। खेती करते हैं, सोचते हैं इससे जो उपज होगी उसमें अपना काम चलेगा, बच्चे का पालन होगा जीवन में सुख सुविधा की प्राप्ति होगी। इसके साथ यदि यह भाव और भी शामिल कर लिया जाये कि खेती करना हमारा पुनीत कर्तव्य है, इससे राष्ट्र को समाज को और प्राणियों को अन्न मिलेगा। इससे जो हमें लाभ होगा उससे हम संसार के एक अंश परिवार का पालन करेंगे , बच्चों को पढ़ा लिखाकर इस योग्य बना सकेंगे कि वे समान और संसार कुछ हित कर सकें अपनी आत्मा का उद्गार कर सके।
ऐसा भाव जागते ही खेती का वह स्वार्थ पूर्ण काम परमार्थ कार्य बन जायेगा। उसका आनन्द उस सुख से स्थायी उदात्त तथा अधिक होगा जो कि केवल संकीर्ण स्वार्थ रखने पर होता। विचारो की उदात्ता मनुष्य के कार्यों को भी ऊँचा बना देती है। खेती जैसे कार्य में भी परहित की परमार्थ भावना लगन और अधिक लगन और अधिक गौरव के साथ करेगा। इससे आनन्द भी आयेगा , सन्तोश भी मिलेगा और लाभ भी होगा। स्वार्थ में ही परमार्थ की साधना हो जायेगी।
इसी प्रकार व्यवसाय अथवा नौकरी की भी बात है। हम व्यवसाय करते है-इसलिए कि लोगों को वस्तुओं की सुविधा हो, राष्ट्र और देश की सम्पत्ति बढ़े, बहुत से आदमियों को काम मिले। व्यक्तिगत व्यवसाय को इस प्रकार सार्वजनिक सेवा कार्य मानकर चलने पर वह स्वार्थ परमार्थ बन जायेगा। व्यवसाय में ऊँची भावना के जुड़ते ही मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार अथवा चोर बाजारी और मिलावट की प्रवृत्ति पर आघात होगा और वे स्वयं ही नष्ट होने लगेंगी। ज्यों-ज्यों व्यवसायी निष्फल व्यवसाय का सुन्दर स्वरूप देखता जायेगा त्यों-त्यों वह उसे दृढ़ता पूर्वक अपनाता चला जायेगा। ज्यों-ज्यों वह इस क्षेत्र में उन्नत बनता जायेगा त्यों-त्यों उसका भय , आशंका और संशय दूर होता और आत्मिक सुख मिलता जायेगा। इस प्रकार स्वस्थ भी बनेगा और परमार्थ भी।
नौकरी में जब तक संकीर्ण स्वार्थ का भाव साथ बँधा रहता है, मनुष्य अपने को पराधीन , दूसरों की चाकरी करने वाला और दी-हीन समझता रहता है। पर ज्यों ही उसमें ऊँचे भावों को सम्मिलित करता है उसकी सारी दीनता चली जाती है । उसके सोचने का दृष्टिकोण इस प्रकार हो जाता है कि हम किसी एक व्यक्ति की चाकरी नहीं कर रहे है, हम पूरे राष्ट्र या पूरी समाज की सेवा कर रहे है। अपना काम पूरी जिम्मेदारी से करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। जिसका पालन पूरी तत्परता में करना है और मैं भी रहा हूँ। ऐसा भाव आते ही वह स्वार्थ परक कार्य भी परमार्थ परक बनकर अधिकाधिक सन्तोश , सुख और उत्साह देने लगेगा। मनुष्य अपने को पराधीन नहीं स्वावलम्बी अनुभव करने लगेगा। यही स्वाधीनता,यही अभय और यही आत्म गौरव तो परमार्थ का परिणाम है।
ऊँचे स्वार्थ में उन्नत भावों समावेश स्वयं एक परमार्थ है जो हर प्रकार से सरल एवं सुगम है जो संसार का कोई भी व्यक्ति बिना कठिनाई कि कर सकता है।
अब आइये, इसी न्याय द्वारा आगे बढ़िये। स्वार्थ की सिद्धि किस लिये की जाती है? आत्म-सन्तोश और आत्म सुख के लिए! कोई व्यक्ति यदि अपने स्वार्थ के लिए यदि किसी दूसरे के स्वार्थ का हनन करता है तो क्या यह आशा की जा सकती है कि उसे सुख, सन्तोश और शान्ति मिलेगी। दूसरों को हानि अथवा कष्ट पहुँचा कर कितने ही बड़े स्वार्थ की सिद्धि क्यों न कर ली जाये उससे शान्ति नहीं मिल सकती। सबसे पहले तो जिसको कष्ट हुआ है वह शान्ति से बैठने न देगा, दूसरे शासन, समाज और लोक निन्दा का भय बना रहेगा-जहाँ भय वहाँ शान्ति की सम्भावना असम्भव है। तीसरे मनुष्य में जो परमात्मा का निश्कलग एवं न्यायशील अंश आत्मा की विद्यमानता है वह उसे सोते जागते किसी समय भी चैन न लेने देगी हर समय टोकती रहेगी कि तुमने अमुक को कष्ट पहुँचा कर जो स्वार्थ की सिद्धि की है वह
ठीक नहीं। इसके लिए लोक अथवा परलोक में तुम्हें दण्ड का भागी बनना पड़ेगा।
ऐसी दशा में स्वार्थ की वह सिद्धि सुखदायक तो नहीं आसदायक अवश्य बन जाएगी। तब कहाँ तो स्वार्थ का मन्तव्य पूरा हुआ और परमार्थ का उद्देश्य।
स्वार्थ परमार्थ बने इसका एक सरल सा उपाय यह है कि केवल अपने उचित स्वार्थ की सीमाओं तक ही नियंत्रित रहा जाये उसकी परिधि इतनी न बढ़ाई जाये कि वह दूसरों की मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगे। यह सम्भव किस प्रकार हो? वह इस प्रकार कि अपने स्वार्थों में लोभ, लिप्सा और तृष्णा को स्थान न लेने के देना चाहिए। स्वार्थ में जब इन विकारों का दोष आ जात है। तब अच्छा स्वार्थ भी निकृष्ट वासनाओं में बदल जाता है जिससे सारे पापों सन्तापों का श्री गणेश होने लगता है मनुष्य का लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं। ऊँचे स्वार्थ परमार्थ ही है। अस्तु, एक स्वार्थ से स्वार्थ और परमार्थ के दोहरा काम निकालने के लिए स्वार्थ भावना को ऊँचा उठाइये, उसे अपनी मर्यादा तक ही सीमित रखिये और उसमें लोभ, लिप्सा अथवा तृष्णा का विकार कदापि न आने दीजिये।
अब आइये यही से एक कदम और आगे बढ़ा जाये। फिर दोहरा लीजिये कि स्वार्थ का उद्देश्य सुख और शाँति ही होता है। यदि ऐसा न हो तो फिर स्वार्थ का कौडी बराबर मोल न रह जाये। हमने उचित रूप से स्वार्थ लाभ किया । अब उस लाभ का यदि एक अंश लोक-सेवा में लगाते रहे, तो जानते हैं इसका क्या फल हो? वह यह कि हमें एक अनिवर्चनीय सुख ,शाँति और उल्लास मिले। वह ऐसे कि जब हम अपनी उपलब्धियों को आदर की दृष्टि से अपनत्व के भाव से देखेंगे और चाहेंगे कि उनकी दिन-दिन उन्नति एवं वृद्धि हो, इतना ही नहीं वे अपनी अपनी तरह उसमें सहयोग तथा सहायता भी करेंगे। इस लोकायतन से आने ला सुख कितना शीतल, कितना संतोषप्रद और कितना महान होगा? इसका अनुमान लगाया जा सकता है ? जब किसी के हित और सेवा में हमारा भी भाग होगा तो क्या समाज में प्रशंसा तथा पात्रता का अवसर नहीं मिलेगा ? जब यह सम्भव है तब कौन कह सकता है कि हमारा सुख शाँति के परिणाम वाला स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिए लोक सेवा , लोक हित और लोक कल्याण परमार्थ कहे जाने वाले कामों हित को भी स्वार्थ ही समझना चाहिए । परमार्थ भी वस्तुतः स्वार्थ ही है, एक ऊँचा स्वार्थ। और बुद्धिमानी व्यक्ति उसकी सिद्धि करने में कमी भी नहीं चूकते। परमार्थ परक स्वार्थ ही सच्चे सुख वास्तविक सन्तोश और यथार्थ कल्याण का हेतु है, निकृष्ट अथवा निन्दित स्वार्थ नहीं।
अब यहाँ पर छोटा सा प्रश्न उठता है। वह यह कि आखिर निकृष्ट स्वार्थ भावना से निकल कर ऊँचे स्वार्थ की परिधि में जाया किस प्रकार जाये? उसका एक साधारण सा उपाय यह है कि अपने व्यक्तित्व को उज्ज्वल, उन्नत, और विस्तृत बनाया जाये। जब तक हम इस आत्म गरिमा में नहीं प्रतिष्ठित होते कि हम समाज के एक उत्तरदायी अंग है परमात्मा के पवित्र अंश और संसार के प्राणी मात्र के शिर-मौर मानव है तब तक हमें अपनी निकृष्टताओं पर न तो लज्जा आयेगी और न आत्म ग्लानि होगी। हम अपने व्यक्तित्व की महानता से अपनी निकृष्टताओं की तुलना करे और देखे कि कौन-कौन से दोष हमारी प्रतिष्ठा के अनुरूप हमें नहीं बनने देते हैं। जिन वासनाओं, जिन अभीप्साओं और जिन भावनाओं को हम अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ने देखे उन्हें तुरंत ही निकाल कर फेंक दें। हमारा व्यक्तित्व मूल रूप से उज्ज्वल एवं उत्कृष्ट ही है। दोष पाप और मल ही उसे मलीन तथा निकृष्ट बना देते हैं। जिस दिन हम अपने इन विकारों को निकाल कर फेंक देंगे उस दिन हमारा व्यक्तित्व दूध के समान उज्ज्वल तथा निर्विकार हो उठेगा । अपने मूल व्यक्तित्व का दर्शन पाते ही हमारे निकृष्ट स्वार्थ स्वयं ही हमें छोड़कर चले जायेंगे और उनके स्थान पर परमार्थ परक ऊँचे स्वार्थ स्थापित हो जायेंगे। तब न तो जीवन में अशाँति की सम्भावना होगी और न असंतोष का समावेश।
इसी प्रकार व्यक्तित्व को विस्तृत अथवा समाज में फैला लेने से हम स्वयं ही अपने स्वार्थ में प्रतिबन्धित होकर चलने लगेंगे और कोई भी ऐसा काम न करेंगे जिससे लोक निंदक अथवा लोकापवाद का भागी का भागी बनना पड़े।
अपने वर्तमान कालीन व्यक्तित्व का परिमार्जन कर मूल व्यक्तित्व का दर्शन करिये। इससे निकृष्टताओं से मुक्ति मिलेगी। स्वार्थों में उदात्ता का समावेश होगा और आज के हमारे निन्दित स्वार्थ कल से ही परमार्थ परक बनकर आत्म-सन्तोश ,आत्म-शाँति और आत्म-सुख का उद्देश्य पूरा करते हुए स्वार्थ एवं परमार्थ दोनों का दुख देंगे।
प्रकृति का सिद्धांत यह है कि जितना दूसरों से लो, उतना ही दूसरों का दो भी। विश्व व्यवस्था का यही मूलाधार है।
रामानुजाचार्य ने अपने गुरु से एक मन्त्र प्राप्त किया, पर मन्त्र देते समय गुरू ने कह दिया था -’इस मन्त्र का रहस्य किसी भी न बताना । रामानुजाचार्य ठहरे उदार स्वभाव के व्यक्ति। उन्होंने अपने अनेक भक्तों को मंत्र दीक्षा देकर उस मंत्र का रहस्य बता दिया।
गुरु ने अपनी आज्ञा की अवहेलना देखी तो रुष्ट हो गये। ‘तुमसे मना कर दिया गया था फिर भी तुम नहीं माने और उस मंत्र का रहस्य सबको बता ही दिया। अब तुम्हारी दुर्गति होगी।’
रामानुज ने अपने गुरु की रोषपूर्ण बात सूनी तो चिन्तित हो गये उन्होंने स्वाभाविक रूप में गुरुदेव से प्रश्न किया-’मुझे तो दुर्गति मिलेगी ही पर जिन्होंने मंत्र दीक्षा ली है उनका क्या होगा ?’
‘यदि उन्होंने श्रद्धा पूर्वक मंत्र ग्रहण किया है तो सद्गति प्राप्त होगी !’
‘भगवान् ! यदि इतने लोगों को सद्गति प्राप्त होने के कारण मुझे दुर्गति मिलने वाली हो तो मेरे लिए चिन्ता की कोई बात नहीं।’ रामानुजाचार्य ने बड़ी नम्रता पूर्वक कहा।
सिंहासन पर आरुढ होते ही सम्राट तारावलोक ने प्रजा जन की परिस्थितियों के अध्ययन का निश्चय किया। सामान्य नागरिक के वेश में सप्ताहान्त तक राज्य भ्रमण करते रहे। जहाँ भी गये उन्होंने प्रजा की दुर्गति ही पाई। कोश के नाम पर उनके परिश्रम की कमाई राज्य हड़प लिया करे और उसका लाभ थोड़े से सत्ताधारी सामन्त उठाया करे और यह बात उन्हें पसन्द न आई अतएव वापस आते ही उन्होंने राजकीय कोश का धन प्रजाजनों को बाँट दिया।
किन्तु दुनिया में भावनाओं का, सदाचार का शोषण करने वाले लोग कम नहीं, सम्राट तारावलोक की उदार वृति देखकर कुछ शत्रु भी छद्म वेश में आये और जिस हाथी के कारण राज्य अपराजेय था उस कुवलाया पीड गजराज को भी माँग ले गये।
सम्भ्रान्त नागरिकों को सम्राट की यह भावातिरेकता अच्छी न लगी। उन्होंने जाकर महाराज का समझाया राजन्! धर्म और भावना परायण एक सीमा तक ही अच्छे होते हैं यदि वे सीमा का अतिक्रमण करते हैं ते अपने वृति से बचाने का निश्चय किया गया है आप वह हाथी वापस लेले अन्यथा गणराज्य आपकी उपेक्षा करेगा और आपको शासन च्युत होना पड़ेगा।
चिन्ता नहीं-तात! महाराज तारावलोक ने उत्तर दिया,यदि दुष्ट व्यक्ति के लिये दुष्टता धर्म है तो संत सज्जन को असफलता और विपत्ति के भय से सज्जनता का परित्याग करना चाहिए। मैंने दान दिया है उसे वापस नहीं ले सकता हाँ यदि मुझसे अनुचित कार्य हुआ तो हम राष्ट्र का शासन सूत्र सहर्ष त्यागने को तैयार है। यह कह कर सम्राट ने गद्दी छोड़ दी । महानी माद्री ने कहा-तात ! आपका निर्णय धर्मसंगत है आपकी सहायिका आपका साथ उन्हीं छोड़ेगी । वह भी राज्य त्याग के लिये समुद्यत हो गई।
और महाराज के पुत्र-स्वाभिमानी पुत्र-उन्होंने पिता से कहा-तात! हम आर्यकुल की परंपराओं को नव जीवन देना चाहते हैं। आपको याद है सत्य हरिश्चन्द्र के साथ भार्या ने ही नहीं कुमार रोहित ने भी त्याग किया था हम सहर्ष समुद्यत है आपके धार्मिक पथ का समर्थन करने के लिये हम आपकी ही साथ राज्य का परित्याग करते हैं।
दूसरे दिन ही सम्राट तारावलोक ने एक सामान्य नागरिक के वेश में राज्य दिया सम्राट चन्द्रावलोक ने पुनः सत्ता सम्भाल ली। तारावलोक अभी कुछ ही दूर जा पाये थे कि एक श्रमिकने उनके पुत्रों को दान में माँग लिया। महाराज कुछ कहें इसके पूर्व बालकों ने मर्यादा का पालन किया । वे श्रमिक के साथ चले गये और महाराज के सामने ही कठोर जीवन का अभ्यास करने लगे किन्तु महाराज उससे विचलित न हुये। और तब इन्द्र ने भी उनकी निष्ठा परखने का निश्चय किया। ब्राह्मण का वेश रखकर उन्होंने सेविका के रूप में उनकी पत्नी की दान माँगा। माद्रील ने कहा तात! शरीर आज नहीं तो कल नष्ट हो ही जायेगा। आत्मा से मैं प्रलय पर्यन्त आपकी ही रहूँगी अन्तिम समय आप पथ-से विचलित न हो ?
महाराज ने स्वीकृति दे दा। ब्राह्मणदेव वहाँ से चले गये। महाराज चन्द्रावलोक ने अपने पौत्रों के कठोर जीवन की बात सुनी तो वक द्रवित हो उठे वे पैदल चलकर वहाँ पहुँचे जहाँ वन में तारावलोक निवास करते थे। पुत्र तारावलोक की धर्मनिष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें हृदय से लगा लिया। उन्हें वापस राजधानी भी ले आये जहाँ उनके पुत्र और सौभाग्यवती माद्री पहले से ही स्वागत के लिये खड़े थे।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ॰ एहरन वर्ग अपनी कमर में एक तुलसी की लकड़ी का टुकड़ा बाँधे रहते थे। तुलसी की लकड़ी की ही एक कन्ठी कण्ठ में भी धारण किये रहते थे। एक बार उनके एक मित्र ने उनसे कहा-आप भी लगता है भारतवर्ष हो आये है,वहाँ के लोग बड़े अन्ध विश्वासी होते हैं छोटे छोटे बच्चों से लेकर बूढ़े तक कोई कंठी धारण किये रहते हैं तो कोई धातुओं के आभूषण, पूछो तो कहेंगे-इससे भूतो से रक्षा होती है, नजर ही लगती।
विचारशील वैज्ञानिक ने हँसकर कहा-अशिक्षा के कारण वहाँ के लोग सही बात का स्पष्ट विश्लेषण कर पाते हो वह अलग बात है पर इन बातों को मात्र अन्ध विश्वास न कहकर यह मानना चाहिये कि उनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार छिपे हुये है यदि उन्हें खोजा जाये तो उनसे नई वैज्ञानिक स्थापनाएं प्रकाश में आ सकती है। मैं तुलसी की लकड़ी पहने रखता हूँ आप नहीं जानते यह छोटी सी लकड़ी मुझे सैकड़ों रोग-कीटाणुओं से बचाती है। बीमारियों से रक्षा करती है।
एक मुट्ठी हवा में जितने सूक्ष्म कीटाणु होते हैं यदि वह सब मनुष्यों जितने बड़े आकार के हो जाये तो सारी धरती भी उनके रहने के लिये कम पड़ जाये।(1) फेयरी श्रिम्प (2)प्लैनेरिया (3)हाइड्रोजन (4) नेमाटोड नेक्टील्यूका (5) प्रोटोमिक्सा (6) डाइनोफलैजेलेट (7) हैलोस्फीरा आदि कीटाणु ऐसे है जिन्हें देखना चाहे तो इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप से कम ताकत का सूक्ष्मदर्शी काम नहीं देगा। इन अदृश्य जीवों से उत्पन्न विकृतियों और बीमारियों से बचने के लिये कुछ कवकरण वाली धातुएं और जड़ी-बूटियाँ पहनी जाती हो और इन रोग कृमियों को भूत जैसा अदृश्य हानिकारक कहा जाये तो उसे अन्ध विश्वास नहीं कहा जाना चाहिए।
कही प्रस्थान करने से पूर्व बड़ा के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना पढ़े लिखो की दृष्टि में अन्ध विश्वास हो सकता है कई स्थानों में आज भी मंगल कलश रखकर और स्वस्ति वाचन के साथ यात्रायें प्रारम्भ करने के विधान है कन्या की विदा,तीर्थयात्रा जैसे धार्मिक अवसरों पर ऐसा अनिवार्य रूप से किया जाता है उसे अन्ध विश्वास कहा जाता है पर किसी”ध्वनि-विद्या” के वैज्ञानिक को यह बात मालूम हो जाये तो उसे विज्ञान की शोध की नई दिशा मिल जाये । शब्द की सामर्थ्य से आज सारा विज्ञान जगत प्रभावित है। अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी की एक असाध्य बीमारी मंत्र से ठीक हुई यह कहा जाये तो लोग अन्ध विश्वास कहेंगे पर यदि उसे ही यह कहा जाये कि राष्ट्रपति कैनेडी की चिकित्सा “अल्ट्रासाउण्ड” द्वारा की गई तो उसे प्रामाणिक माना जायेगा। अल्ट्रासाउण्ड और मन्त्र दोनों समानार्थी है दोनों के उच्चारण और प्रयोग के तरीके भिन्न है यदि हमें मनुष्य शरीर यन्त्र की वास्तविकता और इसमें भरी आध्यात्मिक सामर्थ्य का पता होता तो मानते कि आशीर्वादवाची शब्द से लेकर स्वस्तिवाचन तथा मंत्र भी अन्ध विश्वास नहीं विज्ञान भूल तथ्य है केवल उन्हें आज के युग के संदर्भ में प्रस्तुत करने भर की कमी है यदि उसे वैज्ञानिक धरातल पर रखा जा सके तो यह मंत्र विद्या,शब्द विद्या अणुबम से भी आश्चर्यजनक चमत्कार उत्पन्न करती है, कर सकती है।
यह बीसवीं शताब्दी है इसमें किसी स्वर्गीय आत्मा द्वारा संस्कारित भूमि के महत्व
,तीर्थयात्रा, मंत्र जन्त्र पर विश्वास को अंध श्रद्धा कहा जाये तो एक नहीं लाख शिक्षित व्यक्ति उसका समर्थन करने लग जायेंगे सिद्धि के नाम पर ठगी और ढा़ग की निन्दा ही नहीं की जानी चाहिये उसकी उपेक्षा और प्रतिवाद भी आवश्यक है किंतु वहाँ यह भी आवश्यक है कि संस्कारों के सूक्ष्म अस्तित्व और मन्त्रविद्या कि वैज्ञानिक रहस्यों की भी जाँच हो। उनमें सत्यता का प्रतिपादन करने वाली घटनायें आज भी देखी जा सकती है। राजकोट से छपने वाला गुजराती जयहिन्द अखबार अपने 16-5-71 के संस्करण में “हाथ की उँगली से 3 मन वजन का पत्थर उठ सकता है क्या ?” शीर्षक से श्री नगेन्द्र पारेख का लेख छपा है “बीसवीं शताब्दी का विस्मय”।पूना से 16 मील दूर शिवपुर गाँव में “करम अली दरगाह “ में 3 मन का पत्थर पड़ा है।उस पत्थर को 11 आदमी दाहिने हाथ की उँगली लगाकर करम अली दरवेश बोले पत्थर अपने आप उठ जाता है।भगवान् राम का नाम लेकर उनकी शक्ति का विश्वास करके बन्दरों ने समुद्र में पत्थर तैरा दिये थे यह पौराणिक गल्प हो सकता है पर इस कथानक में सगिहित विश्वास की शक्ति का एक प्रतीक आज भी शिवपुर गाँव में देखा जा सकता है।धूल के एक लघुतम टुकड़े शक्ति की तुलना “मीथेन गैस” से तुलना की जाती है।एक चिंगारी से आग लगा दी जाये तो 68 पौंड आटे का बोरा 4000 वर्ग फीट कमरे में धूल के रूप में बदल जायेगा।इसके धमाके की शक्ति इतनी प्रचंड होगी कि उससे 24000 टन वजन को 100 फीट ऊपर उठा दिया। बुफैलो अमरीका में एक वार एक कारखाने में धूल के एक कण का धोखे से विस्फोट हो गया उससे 33 व्यक्ति तत्काल मर गये 80 व्यक्ति घायल हो गये सारी फैक्टरी धराशायी हो गयी और आस पास की इमारतोँ कंपन आ गया दराज पड़ गये।धूल के कण की महत्ता वैज्ञानिकों के सामने है। शब्दशक्ति की प्रचण्डता वे उससे भी अधिक मान चुके है पर भावनाओं द्वारा शक्ति और पदार्थ के संचालन में कही जाती है तो उसे अन्ध विश्वास कह दिया जाता है जबकी विज्ञान पदार्थ के साथ अपदार्थ का अस्तित्व और उसकी गणितीय शक्ति का भी अनुमान कर लिया है।फिर मंत्र शक्ति को भी विज्ञान भूत तथ्य मानने में किसी पदार्थवादी को संकोच क्यों होना चाहियें?
“वेधक दृष्टि” नाटक या ध्यान साधनायें-तथाकथित बुद्धिवादियों के लिये अन्ध विश्वास है।और समय की बर्बादी तो डॉ॰ मेस्मर के मैस्मरेजम और डॉ॰ क्लैरीगटन की “इविल आई” को क्या कहा जायेगा? जिन्होंने अपनी अन आध्यात्मिक साधनात्मक सिद्धांतों की शोध के आधार पर न केवल विज्ञान को चमत्कृत कर दिखाया वरन् यह भी सिद्ध कर दिया कि ध्यान अपने आप में प्रकाश,विद्युत और चुम्बक से भी शक्तिशाली विज्ञान है। डॉ॰चार्ल्स बाइडिन ने कई प्रयोग और प्रदर्शन करके ध्यान की एकाग्रता की सामर्थ्य को प्रमाणित किया था।वे एकान्त अंधेरे में बैठकर हजारों मील दूर हो कही घटनाओं के चित्रण अक्षर -ब अक्षर ऐसे का दिया काते थे जैसे टेलीविजन और बेतार का तार काम कंता हसंइतवने पर भी लाँ ध्यान के महत्व को नहीं मानें तो उनका अन्ध विश्वास; न कि धर्म और दर्शन का।
भूतों का भ्रम फैलाने के मनगढ़ंत प्रयोगों की निन्दा की जानी चाहियें और इस के कारनामों द्वारा लोगों को ठगने वाले ओझाओं,झाड़-फूँक करने वालो की उपेक्षा की जानी चाहिये किन्तु “सोसायटी फॉर आईफिकल रिसर्च “के अध्यक्ष-डॉ॰जी.एन.एम टीरेल की भूत सम्बंधी खोजों को भी अमान्य नहीं करना चाहियें क्योंकि उसमें मनुष्य जीवन के एक कठोर सत्य “कर्मफल”का विज्ञान छिपा हुआ है उसे न जानने के कारण ही आज संसार दिग्भ्रांत हो रहा है तथा पापात्माओं का जमघट बोलता जा रहा है।
डॉ॰ टीर्यन एडवर्ड्स ने एक वार कहा था कि--अन्धविश्वास किसी न किसी की छाया होती है छाया की उपेक्षा करें पर सत्य को भी प्रकाश में आने दें अन्ध विश्वास हानिकारक बना रहेगा जबकी वह वैज्ञानिक सत्य की छाया होता है सत्य की उपेक्षा से लोग दिग्भ्रांत होते और जीवन के वास्तविक लक्ष्य से वंचित रह जाते हैं।
विज्ञान को ही पूर्ण सत्य मानना भी अन्ध विश्वास है। विज्ञान सामयिक विश्लेषण है अंतिम सत्य नहीं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अन्ध विश्वास सामयिक भ्रम हो सकता है पर आधारभूत असत्य नहीं।”टालेमी” के सिद्धान्त किसी समय खगोल विद्या के अंतिम सत्य माने थे पर आज के वैज्ञानिक डॉ॰ फ्रेड हायल और पालोमोर जैसी वेदशालाओं ने उसे झूठा कर दिया।विज्ञान की पुस्तकों में “डाल्टन की एटामिक” थ्योरी पढ़ाते समय बेचारे विज्ञान के लेक्चरार भी अनुभव करते हैं कि हम विद्यार्थियों को एक गलत हो गया सिद्धान्त केवल इसी लिये पढ़ाते हैं कि वह पाठ्यक्रम में शामिल है।परमाणु सिद्धान्त अब अ-पदार्थ एण्टी एलीमेंट सिद्धान्त तक जा पहुँचा फिर भी वही पुरानी पढ़ाई थ्या उसे वैज्ञानिक अंधविश्वास नहीं कहा जायेगा।
विकास शास्त्री मनुष्य को एक कोशीय जीव का विकसित जन्तु मानते हैं। “दि ओल्ड राइडिल एण्ड दि न्यूएस्ट एन्सर”पुस्तक के पेज 64 में डॉ॰ जे हक्सले ने कुछ अस्थिपंजरों द्वारा सिद्ध किया है कि यह घोड़े के जातियों वाले मनुष्य के पूर्वज है। उसकी यह प्रतिस्थपना ही मनुष्य के विकास का सिद्धांत बन गया।और उसके बाद सर. जं. डब्ल्यू. डासन ने एक पुस्तक लिखी-”मार्डन आइडिया आफ इवोलेशन” नामक इस पुस्तक के पेज 116 में उन्होंने प्रमाण देकर हक्सले की प्रतिस्थापना को गलत सिद्ध कर दिया।उसे वैज्ञानिकों ने माना भी किन्तु हक्सले का सिद्धान्त अभी भी अपने स्थान पर टिका है।इससे चलता है कि आज का विज्ञान वस्तुतः अन्ध विश्वास और इस कम्युनिस्ट मान्यता पर टिका हुआ है कि बात कुछ भी हो प्रचार इतना अधिक करो कि झूठ भी सच हो जाये।
विख्यात वैज्ञानिक और महान् लेखक डॉ॰ विलियम ली हावर्ड ने एक “रोगमुक्त करने की क्षमता” पुस्तक लिखी है उसमें उन्होंने ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान को-अन्धा-बहरा-लूला और लंगड़ा बनाने वाला लिखा है कि यह औषधियां सन्देशवाहक तंत्रिकाओं तथा उनके प्रमुख स्टेशनों को नष्ट कर डालती है उन्होंने उसके सैकड़ों उदाहरण देकर इस दावे को सिद्ध किया है। “एनसाइक्लोपीडिया अमेरिकाना” कि लेखक डॉ॰ ओस्लर ने भी एलोपैथी के सिद्धांतों का खंडन करते हुये लिखा है कि रोग को औषधियां नहीं उपवास, व्यायाम, स्नान मालिश आदि विजातीय द्रव्य हटाने वाले साधन ठीक करते हैं तो भी आज का बुद्धिवादी अन्ध विश्वास ही करना चाहिये कि दिनों दिन उसी हानिकारक चिकित्सा पद्धति अपंगु और अन्धा बनाने वाला है फिर भी उसे लाँ मानते नहीं। आज के इस अन्ध विश्वास जिसने सभ्यता का रूप ले लिया उस पर रोना आता है उधर प्राचीन अंधविश्वासों के पीछे खड़ा सत्य व्यक्त होने के लिये रो रहा है। इस धमा चौकड़ी में अंतिम विजय किसकी हो यह निश्चित करना आज के विचारशील लोगों पर है वही इस समस्या का कुछ निंदा प्रस्तुत करे। अन्यथा वैज्ञानिक अन्ध विश्वास, धार्मिक अन्ध विश्वास से कही अधिक पतन और संकट का कारण हो सकता है।
प्रातः का समय था । भक्त लोग स्नान कर रहे थे । कुछ ब्राह्मण भी गंगा स्नान करने आये । पानी काफी गहरा था। अतः घुसकर स्नान करने का साहस नहीं हो रहा था। पात्र कोई नहीं था । एक किनारे पर सन्त कबीर स्नान कर रहे थे। उन्होंने देखा तो उनसे न रहा गया। उन्होंने अपना लोटा माँज-धोकर एक व्यक्ति को दिया और कहा कि जाओ, ब्राह्मणो को दे आओ ताकि वे सुविधा से स्नान करले।
कबीर का लोटा देखकर ब्राह्मण चिल्ला उठे-”अरे, जुलाहे के लोटे को दूर रखो। “भाइयों ! कबीर बोले-इस लोटे को कई बार माँजा और गंगाजल से धोया। फिर भी पवित्र न हुआ , तो यह मानव-शरीर जो दुर्भावनाओं से भरा है ,गंगाजी में स्नान करने से कैसे पवित्र होगा ?”
कबीर के ये शब्द सुनकर ब्राह्मण बड़े लज्जित हुए और एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।,
अन्ध विश्वास हानिकारक है पर अति विश्वास उससे भी घातक आज लोगों ने विज्ञान पर अति विश्वास कर लिया है इसी के फलस्वरूप व्यक्ति पतन की ओर जा रहा है। -डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद
माँस में स्थूलता बढ़ाने वाले तत्व हो सकते हैं पर दुर्बुद्धि, क्रोधी स्वभाव, असहिष्णुता, आलस्य कोष्ठ बद्धता अमानवता जैसे दुर्गुण भी माँसाहार में ही होते हैं । मानव अंतःकरण को प्रिय लगने वाले समस्त गुण शाकाहार से उपलब्ध होते हैं.यह बात प्रकृति के अध्ययन से स्पष्ट हो जाती है।
स्वामी वीर जी एकबार शाकाहार के समर्थन में व्याख्यान दे रहे थे बोले बैल और घोड़े शाकाहारी जीव हैं उनमें बोझा ढोने और दौड़ने की शक्ति तो मशीन से भी बढ़कर होती है। यदि मनुष्य केवल एक ही आहार भर पेट लेता रहे तो वह घोड़े की तरह मशीनों को भी परास्त करने वाला हो सकता है।
हाथी का बल विख्यात है वह भी शाकाहारी ही होता है- इस पर एक माँसाहारी सज्जन ने तर्क किया कि यदि हाथी अधिक बलवान् होता है तो शेर उसे क्यों परास्त कर देवा है ?-श्री वीर जी ने कहा-यदि आपके मन में यही भ्रम है तो आपको जानना चाहिए कि शेर को तो सुअर परास्त कर देता है जबकि शेर माँसाहारी होता है और सुअर अमाँसाहारी । शेर आवेश, छल और धोखे से आश्रय चकित करने वाले आक्रमण के कारण कभी हाथी को जीत लेता हो वह बात अलग है सीधे मुकाबले में हाथी कभी भी शेर का मुकाबला नहीं कर सकता ? एक और भी बात यह है कि हाथी पत्ता, घास, छाल, फल, दाना चाहे जो कुछ पा जाये खा जाता है तमाम तरह का आहार ठूँसते रहने के कारण तह जितना बलवान् होता है उतना बुद्धिमान नहीं, शेर बुद्धिमान होता है इसलिये भी वह एकाएक हमले में जीत सकता है पर हाथी के मुकाबले वह देर तक ठहर नहीं पाता ।
इंग्लैंड के प्राणि शास्त्री डॉ॰ इयेन हैमिल्टन ने अफ्रीका में रहकर लम्बे समय तक हाथियों के जीवन का अध्ययन किया वे दुनिया के सबसे बड़े हाथी विशेषज्ञ माने जाते हैं लिखते हैं कि हाथी से शेर कभी शेर से डरता नहीं एकबार मैंने देखा कि एक शेर ने हाथी के एक बच्चे पर धोखे से हमला कर दिया-उसकी माँ पास ही थी वह दौड़ी और सिंह से भिड़ गई और उसे पांवों से रौंदकर मार डाला। सत्य यह है कि शेर हाथी से डरते हैं और उनसे सीधे मुकाबले से सदैव कतराते हैं।
शक्ति की अपेक्षा मानवीय गुणों का महत्व अधिक है गुणों पर ही व्यक्ति, परिवार समाज और विश्व की सुख शाँति आधारित है। जहाँ माँसाहार दुर्गुणों का पोषण करता है वहाँ शाकाहार सद्गुणों की रक्षा और विकास इसलिए माँसाहार मानवता का पाप है वहाँ शाकाहार अंक पुण्य भी । ऊँट शाकाहारी जीव है वह सर्वाधिक सहिष्णु होता है,सर्प माँस खाता है इसीलिये क्रोधी, आलसी और चिड़चिड़े स्वभाव का होता है जबकि फुदकती रहने वाली क्रियाशील गिलहरी शाकाहारी होती है । समय पर यदि क्रोध और युद्ध प्रियता अनिवार्य हो तो वह भी शाकाहार में है भैंसा शाकाहारी जीव है इसकी युद्ध प्रियता और क्रोधी स्वभाव के आगे शेर तक हार मानते हैं। हिरण के शरीर जैसी लचक खरगोश जैसे जीव की उछाल और मेढ़े की सी प्रतिद्वंद्विता की शक्ति माँसाहारी जीवों में नहीं होती इससे यह सिद्ध होता है कि मानवता की रक्षा वाले सभी गुण शाकाहार में हैं माँसाहार में नहीं।
माँस खाकर अपने पेट को कब्रिस्तान बनाना मेरे लिये नितान्त असम्भव है। -जार्ज मर्नाड शा
गरुड पुराण में एक वर्णन आता है कि श्राद्ध पितरों का तर्पण किया जाता है तब मंत्रों द्वारा भेजे गये आवाहन के अनुसार परलोकवासी पितर स्वयं में उतरकर आते हैं और अपने पुत्र-पौत्रों द्वारा प्रदत्त अन्नादि को ग्रहण करते हैं सन्तुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं और अपने लोक को लौट जाते हैं। सम्भव है अपनी वासना के अनुरूप पितरों की आत्मायें जिसे लोक में हो वहाँ मंत्रों द्वारा प्रेरित भाव-स्पन्दन पहुँचते हो और जीव-चेतना आकर श्राद्ध ग्रहण हो पर आज की बुद्धिवादी दुनिया के लिये यह अन्ध-विश्वास है।
इन्द्र का तार आया है-उन्होंने अर्जुन को लिखा है-आपका नाम धनुर्विद्या में पी.एच.डी. के लिए सेलेक्ट (चुन लिया गया )हो गया है ,तुरन्त आइये ‘तार पढ़कर अर्जुन तैयारी करने लगे उधर उनकी पत्नी सुभद्रा,द्रौपदी तथा अन्य परिजन उनकी तैयारी करते हैं ताकि वे नियत समय पर इन्द्रलोक पहुँचकर उक्त प्रशिक्षण में भाग ले सके।
छतरपुर के किसी छात्र “जानसन एण्ड जानसन” शिक्षा योजना के अंतर्गत चुनाव होना ,छात्रवृत्ति मिलना अर अमेरिका जाकर पढ़ने का बुलावा होता तो उसे सच माना जाता पर अर्जुन के कभी इन्द्र लोक से बुलावा आया हो और वे कभी वहाँ जाकर शस्त्र विद्या सीखकर आये हो हय कहा जायेगा तो न केवल उसे काल्पनिक उड़ान कहा जायेगा तो न केवल उसे काल्पनिक उड़ान कहा जायेगा वरन् उसे भारतीयों का अतिवाद कह कर उसका उपहास भी किया जा सकता है। होना यह चाहिये था कि हमारे आर्षग्रंथों में एकसी कल्पनायें ऐसा विज्ञान दिया हुआ है उसके आधार पर विज्ञान को एक नई दिशा दी जाती है तो हम सत्य की शोध और वैज्ञानिक उपलब्धियों की दृष्टि से कुछ ही समय में रुस और अमेरिका से आगे होते। जिन बातों के लिये रूस, फ्राँस,अमेरिका व जर्मनी के वैज्ञानिकों को समय साध्य परीक्षण करने पड़ते और मस्तिष्क में जोर लगाना पड़ता है वह बातें हमारे अथर्व वेद से लेकर भारद्वाज वैमानिक प्रकरण तक पहले से ही शोधी हुई रखी है यदि अपने आर्षग्रंथों के प्रकाश में विज्ञान की खोज होती तो हमारी वैज्ञानिक प्रगति स्वतन्त्रता प्राप्ति के इन 24 वर्षों में ही बहुत चढ़ी बढ़ी होती ।
सन् 1656 में सहारा रेगिस्तान में प्रागैतिहासिक काल की गुफायें मिली उनमें मिले अनेक चित्र बड़े महत्वपूर्ण थे। इन्हीं चित्रों में कुछ ऐसे प्राणी भी दिखाए गये है जो आकाश में उड़ते हुये है। इन विचित्र प्राणियों को उड़ते उड़ते अन्तर्धान (वैनिश्ड) होते भी वितरित किया गया है इन चित्रों को देखकर प्रसिद्ध रूसी गणितज्ञ श्री एम.ए.ग्रेस्ट. ने लिखा है कि निश्चित ही उस समय आकाश के सुदूर नक्षत्रों के निवासी यहाँ आते रहे है भले ही हमारा विज्ञान अभी उस स्वरूप को समझने में समर्थ न हुआ हो” । कुछ लोगों ने प्रश्न किया-यदि तब आ सकते थे तो अब क्यों नहीं आते? उत्तर अँग्रेज विचारक ए.सी. क्लार्क ने दिया-सम्भव है पृथ्वी के निवासियों के व्यापक रूप से छाई दुर्भावनाओं के कारण उन्हें यहाँ आने में भय लगता हो या उन्हें घृणा हो गई हो यह भी हो सकता है कि हमारा सूक्ष्म वायु मण्डल इतना दूषित हो गया है कि उसमें से होकर उनके लिये पृथ्वी में उतरना कठिन हो गया हो।
कारण जो भी हो पर अब स्पष्ट होता जा रहा है कि अन्तरिक्ष के दूरवर्ती सितारों में भी जीवन अवश्य है और एक दिन फिर से ऐसा आ सकता है जब कि पृथ्वी के निवासियों के साथ उनका मुक्त पत्र-व्यवहार भी प्रारम्भ हो जाये। एक अलग डाक विभाग बनेगा जिसके पोस्टमैन अन्तरिक्ष की भाषा समझने वाले हुआ करेंगे। और बड़े सवेरे आकर दरवाजे पर दस्तक क्या करेंगे-अमुक भाई साहब, यह लीजिये आपके नाम क्रेव-निहारिका से एक्सप्रेस पत्र आया है, तार आया है या आपे जन्म दिन की बधाई सन्देश।” लाँग खुश होकर पत्र लिया करेंगे और अपना उत्तर प्रेषित करने के लिये अन्तरिक्ष.लिफाफा मँगाने के लिये नौकर को भेज दिया करेंगे।
यह पंक्तियाँ भविष्यवाणी; यूरोपियन जैसी अतिरंजित नहीं लगनी चाहिये क्योंकि यह बातें निश्चित ही कुछ ही दिनों में सच होने जा रही हैं। उसका प्रमाण है अन्तरिक्ष से आ रहे रहस्यमय संकेत सन् 1668 की बात है कैंब्रिज विश्व-विश्वविद्यालय लन्दन के कुछ शोध छात्र उस समय आश्चर्य चकित रह गये जब उन्होंने अन्तरिक्ष से आने वाली बीप-बीप-बीप की विचित्र ध्वनियाँ सुनी। यह संकेत किन्हीं बुद्धिमान प्राणियों द्वारा सम्प्रेषित थे उसका अनुमान इस बात से हुआ कि संकेत निश्चित गति और नियमित समय पर आ रहे थे। इन संकेतों को श्पल्सरश् नाम दिया गया। एक अनुमान यह भी था कि आकाश की किसी आकाश गंगा में विस्फोट हो रहा होगा यह ध्वनि उसी की होगी किन्तु श्पल्सरश् के अध्ययन के बाद क्वासर किरणों के विशेषज्ञ डॉ॰ मार्टिन स्मिड, ऐलेन लैण्डेज मार्टिन राइल तथा ग्राइम स्मिथ ने भी यह स्वीकार किया कि संकेत विस्फोट अन्य और अकारण नहीं वरन् एक व्यवस्थित विचार प्रणाली द्वारा ही भेजे गये हैं। तब से इस दिशा में वैज्ञानिकों की शोधें बड़ी तत्परतापूर्वक चल रही है और जो निष्कर्ष अब तक उपलब्ध हुये है उनसे भी उक्त धारण को ही बल मिलता है।
मुलार्ड रेडियो वेधशाला में इनकी विस्तृत खोज चल रही है। वेधशाला के संचालक,प्रसिद्ध नक्षत्र विद् श्री मार्टिन राइल ने जाँच के बाद पाया कि यह पल्सर ; संकेत क्रमश 1.337,1.6 तथा 1.6 सेकेण्ड के क्रम से आ रहे हैं और नियमित आ रहे हैं। उनका स्त्रोत 200 प्रकाश वर्ष दूर;एक प्रकाश वर्ष 5866713600000 मील के बराबर होता है यह तारे इससे भी 200 गुना दूर कहीं स्थित है।द्धके किसी कुल आधे मील व्यास वाले नक्षत्र से ही आ रहें हैं सम्भव है इतना बड़ा कोई अन्तरिक्ष स्टेशन ही आकाशस्थ प्राणधारियों ने लगा रखा हो यह संकेत उस प्रयोगशाला से भेजे जा रहे हों। कुछ भी हो पर यह निश्चित है कि वे किसी बुद्धिधारी जीव द्वारा भेजे जा रहे हैं। इससे
एक बात तो स्पष्ट है कि परलोक स्वर्ग और मुक्ति जैसी भारतीय कल्पना असंगत तथ्य नहीं तर्कपूर्ण महान उपलब्धि है उसे यों ही उपेक्षा में टाला नहीं जा सकता।
इस भारतीय मृत्यु के समय सूर्य की उत्तरायण गति को शुभ मानते हैं और दक्षिणायन को अशुभ। विश्वास यह है कि उत्तरायण मृत्यु से मनुष्य ऊर्ध्व लोकों में अर्थात् स्वर्ग में जाता है। भीष्म पितामह को तो उसके लिये एक कष्टसाध्य प्रक्रिया के अंतर्गत अपला प्राण स्थिर रखना पड़ा था। इस विश्वास का वैज्ञानिक पहलू जीवन के चुम्बकत्व से सम्बन्धित होने से है प्राण एक प्रकार की विद्युत परस्पर परिवर्तनीय शक्तियाँ हैं अपने प्राणोँ को चुम्बकत्व में बदल कर उत्तरी ध्रुव के सर्वाधिक चुम्बक प्रभावी क्षेत्र से आकाशगामी बनाने की कल्पना को भी इन खोजों से बल मिलता है। जो ड्रेल बैंक स्थ्ति रेडियो टेलिस्कोप द्वारा जाँच करने पर एस्ट्रानामिस्ट श्री ग्राहम स्मिथ ने पल्सर की रेडियो तरंगों को पोलराइज्ड पाया अर्थात् वे चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा प्रभावित थी और यही वह सबसे बड़ा प्रमाण है जिससे यह पुष्टि होती है कि यह पल्सर संकेत जीवधारियों द्वारा भेजे जा रहे हैं।
एक बार वैज्ञानिक चार्ल्स फ्रास ने एक सुझाव दिया था कि आकाश के जीवन धारियों को पृथ्वी से गणितीय संकेत भेजे जायें। फ्राँस की योजना अत्यधिक विकिरण वाले क्षेत्र साइबेरिया अथवा सहारा रेगिस्तान में ऐसी चिताये बनाने की थी जो पाइथागोरस की बनावट कि हों। उनके द्वारा गणित सम्बन्धी रेडियो संकेत भेजे जाने की बात थी पर संकट यह था कि यदि ऐसे संकेत सन् 1670 में भेजे जाये तो 11 प्रकाश वर्ष की दूरी वाले तारे में वे (कम से कम दूरी का पल्सर प्रकाश वर्ष का है।)11 वर्ष बाद पहुंचेंगे। यदि माना जाये कि वहाँ से उसका उत्तर तुरन्त भेज दिया जायेगा तो भी उसके पृथ्वी पर पहुंचने तक यहाँ सन् 1662 चल रहा होगा तब तक वैज्ञानिक या तो मर चुका होगा या बूढ़ा चारपाई में पड़ा होगा।
यह एक निराशाजनक कल्पना थी जिसने फ्रास के सुझाव को अमान्य कर दिया किन्तु पीछे मैरिनर-2 उपग्रह जो शुक्र को भेजा गया था उसके द्वारा भेजे संकेत और क्वासार-तथा लेसर किरणों के अस्तित्व में आ जाने से यह कठिनाइयाँ दूर होती प्रतीत हो रही हैं। एक कठिनाई यह भी है कि नक्षत्रों से आने वाले संकेत वायु, मंडल की ऊपरी सतह में आकर घुल जाते हैं या दूसरी तरफ बाहर ही बाहर बह जाते हैं और ध्रुवों में रहकर परीक्षण के अभी उपयुक्त साधन नहीं हैं पर चन्द्रमा आदि ग्रहों की खोज और वहाँ लेसर व क्वासार यन्त्रों की स्थापना से सम्भव है लेसर किरणें 100 करोड़ वाट प्रति वर्ग सेंटीमीटर तीव्र प्रकाश उत्पन्न कर सकती हैं जो सूर्य प्रकाश से 10 लाख गुना प्रखर होता है। यह कठिनाई शीघ्र दूर हो जाये और अंतरिक्ष में विकसित सभ्यता का पता लगाना सुगम हो जाये। ऐसा दिन दूर नहीं हैं। पुराण की बात को भले ही लोग अतिरंजित कल्पना मानें पर यह वैज्ञानिक तथ्य तो गलत नहीं हो सकते। यदि वैज्ञानिक उपलब्धियां सच निकलीं तो आज न सही कल तो लोगों को भारतीय परलोकवाद का आश्रय लेना ही पड़ेगा यदि ऐसा हुआ तो आज का विज्ञान अध्यात्मवाद से निश्चित ही प्रभावित होगा, वह दिन अब अधिक दूर भी नहीं है जब यह सब कुछ सच होकर ही रहेगा।
जन्म लिया सो मरेगा अवश्य -
एक वृद्धा का इकलौता बेटा दैवेच्छा से मर गया। इसलिये बुढ़िया माथा पटक-पटक रोने लगी। लोग समझाते थे पर धक्का गहरा था। इस कारण वह शान्त नहीं होने पाती थी। अब वह शव से चिपट गयी। लोगों के उसे किसी तरह अलग किया तो मुर्दा ले जाते समय वह पीछे-पीछे दौड़ी।
रास्ते में एक महात्मा मिले । उन्होंने बुढ़िया को इस तरह बिलबिलाती देखा तो का-’तु अपने बेटे को खिलाना ही चाहती है न?’ बुढ़िया ने ‘हाँ ‘ कहा । अब बुढ़िया में जैसे नया जीवन आ गया। वह महात्मा के चरणों पर लोट गयी। महात्मा ने कहा-’तु शहर में जा और किसी ऐसे घर से छटाँक राई ले आ, जहाँ कभी कोई मरा न हो। बस तेरा बेटा जी जायगा।’ अब वह अपनी पड़ोसिन के पास गयी और उससे छटाँक भर राई माँगी तो। बाद में महात्मा की शर्त याद आयी और उसने पड़ोसिन से पूछा-’तुम्हारे घर में कोई मरा तो नहीं है ?’ उसने जबाब दिया मेरी सास हाल ही मरी है’ इस प्रकार वृद्धा कई घर घूमी। कोई कहे कि लड़का मर गया है, कोई कहे कि लड़की मर गई है और कोई कहता है कि मेरा नातेदार मर गया है। इस तरह वह शहर भर के घर-घर से किसी न किसी के मरण का समाचार लेकर थकी हुई लौटी और महात्मा से कहने लगी- ‘सबके घर मरण हुआ है। अब क्या उपाय है ?’
महात्मा ने कहा-’जैसे सबके यहाँ मरण हुआ है वैसे ही तेरे यहाँ भी हुआ है। तब इसके लिये शोक क्या करना । मरण से तू भी नहीं बचेगी, इसलिए ईश्वर की शरण गह। ‘ बस, वृद्धा शान्त हो गयी और कुछ दिन बाद उसका पुत्र शोक दूर हो गया।
पाइलिन बीवर के जीवन का वह सबसे अधिक रोमाँचक दिन था जब उसने किसी पहाड़ को सवर्ण जैसी चमकती हुई धातु उगलते देखा । खेमे पहाड़ी से कुछ ही दूर पर थे जहाँ बीवर के अन्य सब सहकर्मी प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे। बीवर अकेले ही उठकर गया और धातु का एक टुकड़े इकट्ठे किये और पड़ाव की ओर चलने के लिए खड़ा हुआ तभी उसके पैरों के नीचे की जमीन धँसती हुई जान पड़ी । उसने देख खेमे का कहीं पता भी नहीं है वह स्थान जली हुई राख की ढेरी में परिवर्तित श्मशान जैसा लग रहा है।
बीने हुये सोने के ढेर सारे टुकड़े वहीं बिखर गये। भय से शरीर काँप गया बात क्या है यह समझने के लिए उसने फिर दृष्टि पीछे घुमाई तो एक और विलक्षण दृश्य दिखाई दिया । पर्वत की चोटी पर से हजारों छायाएं उतर रही थीं और भयंकर आवाज के साथ उसी की और सेना के सिपाहियों की तरह दौड़ी आ रही थीं । बीवर चिल्लाया और अचेत होकर वहीं ढेर हो गया । चेतना वापस लौटी तब वहाँ कुछ नहीं था । अब उसे भागते ही बना । बीवर ने फिर कभी उधर जाने की हिम्मत नहीं की ।
6 वर्ष बाद ठीक वैसी ही घटना मैक्सिको के युवक पैरेलटा के साथ घटी उसके भी सभी साथी इस अभियान में मारे गये थे वह तो उसका भाग्य था जो किसी तरह वह स्वयं शैतानी शिकंजे से बचकर निकल सका ।
पाइलीन बीवर और डान पैरेलटा दोनों ने अपने.अपने संस्मरण छपाये तब लोगों को सोना बरसाने वाले इस अद्भुत पहाड़ का पता चला । जिसके बारे में यह कहा जाता है कि आज तक वहाँ सोने के लालच में जो भी गया जीवित नहीं लौट पाया जो जिन्दा लौटा भी वह सोने का एक कण भी नहीं ला पाया है हाँ वह भय अवश्य लाया जिससे बाद में फिर उसने उधर जाने की कभी भी हिम्मत नहीं की । यह पहाड़ अमेरिका के एरिजेना प्राँत में पाया जाता है।
और आज तक वह प्रकृति के एक विलक्षण आश्चर्य के रूप में विद्यमान है। एरिजोना रुस के साइबेरिया प्राँत जैसा क्षेत्र है जिस तरह साइबेरिया अत्यन्त विकिरण वाला क्षेत्र है वैसे ही यह भी विचित्र आश्रयों से परिपूर्ण है । एक मीटर लम्बा और 600 फीट गहराई वाला बहुत बड़ा क्रेटर जो किसी उल्का पिंड के आघात से बना बताया जाता है यहीं पर है । इससे बड़ा 6 मील लम्बा और 700 फीट वाला क्रेटर केवल कनाडा में है और कहीं इतना बड़ा क्रेटर केवल कनाडा में है और कहीं इतना बड़ा क्रेटर नहीं है।
डान पैरेलटा की यात्रा के 2 वर्ष बाद सोने के लालच में दुनिया के सैकड़ों लोगों ने एरिजोना की यात्रा की इनमें अमेरिका के ही युवक सबसे अधिक संख्या में गये।
एकबार अमरीका के प्रसिद्ध डाक्टर लवरेन रोअली भी उधर पहुँच गये।लालच चाहे जिसे पागल कर सकता है। लवरेन किसी प्रकार पहाड़ी के पास तक पहुँचने में सफल हो गये पर घूर्णन जैसी एक भयंकर आवाज और सैंकड़ों मायाविनी छायाओं ने उन्हें घेर लिया । थोड़ी देर में उनका शरीर मृत होकर पड़ा था । उस मृत्यु, ने अमेरिका में खलबली मचादी । डाक्टरी जाँच से पता चला कि रोअली का रक्त चूस लिया गया है पर कैसे यह पता किसी भी तरह नहीं चल पाया । तब से इस पहाड़ का एक नाम खूनी पहाड़ भी पड़ गया ।
इस पहाड़ के बारे में विचित्रतायें हैं वह यह कि वह निश्चित समय पर ही सोना बरसाता है उसी प्रकार वहाँ पर जितनी भी हत्यायें अब तक हुई वह दिन के ठीक 4 बजे हुई। 4 बजे ही इस चोटी की परछाई पृथ्वी को छूती है। मरने वालों के शरीरों की एफ॰ बी॰ आई॰ द्वारा जाँच की गई उससे पता चलता है कि यहाँ आकर जिस किसी की भी हत्या हुई उसकी मृत्यु रक्त चूस लेने के कारण हुई जबकि किसी भी शव में घाव या चोट का कोई निशान नहीं मिलता। आस्ट्रेलिया के युवक फैंज हेरर
होमर तथा होनोलुलु के कई व्यापारियों की हत्यायें इसी पहाड़ के किन्हीं तान्त्रिक रहस्यों द्वारा ही हुई। सबसे रोमाँचक प्रसंग जर्मनी के इंजीनियर वाल्ज इस पहाड़ के रहस्यों का पता भले ही न ला पाया हो पर उसकी खोज में संघर्ष का तथा सोना प्राप्ति का सबसे अधिक आनन्द उसी पाया ।
वाल्ज इंजीनियर बनकर एरिजोना की खानों में काम कर रहा था तभी उसके मन में सोना बरसाने वाले उस पहाड़ के रहस्य जानने की तीव्र जिज्ञासा जागृत हुई। वाल्ज का अनुमान था कि पहाड़ी का रहस्य अपैची कबीले के प्रमुख तान्त्रिकों के हाथ में ही हो सकता है क्योंकि वही लोग उसके आस.पास बसे हैं। अपैची बड़े खूंख्वार होते हैं। श्वेतों से उन्हें बड़ी घृणा होती है। कई बार अमेरिकियों ने उनका विधिवत संहार किया है जिससे उनके मन में गोरों के प्रति और भी तीव्र घृणा के भाव हैं। 1872 का अपैची लीप विश्व प्रसिद्ध है जिसमें जानबाकर ने अपेचियों को बुरी तरह काटा था। इसके बाद अपैचियों के सरदार गैरोनियों ने गोरों पर गोरिल्ला धावे किये उसे नष्ट करने के लिये 1886 में जनरल नेल्सन ने युद्ध किया था और उन्हें पीछे धकेल दिया था तब से यह तान्त्रिक इसी पहाड़ पर शरण लिये हुये है जो भी आज तक वहाँ गया जीवित वापस नहीं लौट सका।
वाल्प ने चतुराई से काम लिया । उसने एक अपैची चुवती केन॰टी॰से प्रेम कर लिया और उसी से शादी भी करली । आदिवासियों का सद्भाव प्राप्त करने के लिये यह एक बड़ी बात थी जिससे वाल्ज को पहाड़ तक आने जाने का रास्ता खुल गया। इसने केन॰टी॰ से भी रहस्य जानने के प्रयास किये पर उसे शीघ्र ही मालूम हो गया कि केन॰टी॰ क्या तमाम आदिवासियों में कुछ ही तान्त्रिक ऐसे हैं जो इस रहस्य को जानते हैं तब नहीं।
इसने पहले तो केन॰टी॰ के सहयोग से काफी सोना इकट्ठा किया फिर जैकब विजनर नामक युवक से मित्रता करके इस पहाड़ के अन्तरंग रहस्यों का पता लगाने का काम शुरू किया वह कई बार सामने से पहाड़ की ओर गया पर हर बार उसकी भयावनी छायाएं उसकी और झपटी हर बार
उसे जान बचाकर भागना पड़ा इन्हीं प्रयत्नों में केन॰टी॰ का अपहरण कर लिया गया और अपैचियों ने उसकी जीभ काट ली जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अंततः निराश वाल्ज ने रास्ता बदला और लम्बा रेगिस्तान पार कर वह पीछे से पहाड़ी के पास पहुँचने में सफल हो गया।
रेगिस्तानी मैदानी में तम्बू गाढ़कर वाल्ज जैकब के साथ बाहर निकला अभी वह कुछ ही दूर जा पाया था कि उसे आग की सी चिनगारियाँ अपनी ओर बढ़ती दिखाई दीं। रात थी. पर देखते. देखते दिन का सा प्रकाश फैल गया उस प्रकाश में विचित्र भयंकरता थी। दोनों वहाँ से भागे तभी कुछ पत्थर उसके आस.पास गिरें। वाल्ज ने भागते. भागते एक पत्थर को छुआ तो देखा वह बिलकुल ठंडा था वह रुक गया पीछे मुड़कर देखा अब बरसने वाली लपटें भी शान्त हो चली थीं इसलिये वह फिर पहाड़ की ओर लौट पड़ा। उसे केन॰टी॰ से इतना मालूम हो गया था कि पहाड़ के अन्दर जाने के लिए एक सुरंग जाती है वाल्ज कुछ ही देर के परिश्रम से सुरंग जाती है वाल्ज कुछ ही देर के परिश्रम से सुरंग का दरवाजा पा गया। सहमता हुआ वह भीतर घुसा। वहाँ उसे कुछ कमरे और हजारों की संख्या में नर-कंकाल बिछे मिले देखने से लगता था वह कंकाल हजारों वर्षों से पूर्व तक के हैं। आगे बढ़ने पर उसे वह खड्ड भी दिख गया जहाँ सोने का लावा निकलता था पर सोने के वास्तविक स्रोत का उसे पता नहीं चल सका न ही आगे का रास्ता मिल सका। वहाँ की भीषण गर्मी के कारण आगे बढ़ना कठिन हो गया। दलदल के पास उन्हें देख लिया। जैकब तो वहीं मार दिया गया वाल्प किसी तरह बच निकला 1861 में उसकी मृत्यु, हो गई। उसकी डायरी के सहारे पीछे बरेनी आदि ने भी यात्रायें की पर सोना बरसाने वाले इस पहाड़ के मूल स्रोत का कोई पता न लगा सका। 1656 में फर्नेण्ड तथा फरेश ने पुनः इस पहाड़ के रहस्यों का पता लगाने का प्रयत्न किया जिसमें फरेश तो मारा गया और स्टेनले फिर निराश लौट आया इस तरह आज तक सोना बरसाने वाले इस पहाड़ की वास्तविकता पर पर्दा ही पड़ा हुआ है न कोई मृत्यु के कारणों को जानता है न सोने के मूल स्रोत को।
काशी में गंगा का किनारा।सुबह का समय। गंगा स्नान करने वालों की रेल-पेल । एक वृद्ध सज्जन नहाने के लिये नीचे उतर रहे थे कि उनका पैर फिसल गया और वह डूबने लगे। जब अपनी जान जोखिम में डालने को कोई तैयार न था, एक युवक ने, वृद्ध को डूबते हुये देखा तो वह गंगा में उसी स्थान पर कूद पड़ और एक डुबकी लगाकर निकाल लाया उन्हें किनारे की ओर। उस वृद्ध ने युवक के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हुये कहा आज तुमने मेरे प्राण बचाये है बोलो मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ ?
‘अरे! स्वा की इसमें क्या बात ! मुझे तैरना आता था अतरु आपको नदी में से बाहर खींच लाया। फिर मेरा कर्त्तव्य भी तो कुछ था ? युवक बोला। वृद्ध उस युवक की कर्त्तव्य निष्ठा की बात सुनकर बहुत प्रभावित हुये। वह बोले बेटा ! कुछ तो स्वीकार करना ही चाहिये अच्छा यदि आज कुछ नहीं माँगना चाहते,तो यह लो मेरे नाम पते का कार्ड। कभी कलकत्ते आना हो तो मैं तुम्हारी अवश्य सहायता करूंगा।
समय की बात उसी पते पर वह युवक कलकत्ता आ पहुँचा और उन वृद्ध सज्जन के कार्यालय में भी। उस घटना को बहुत समय हो चुका था अतरु वह पहचान नहीं पाये। युवक ने गंगा के किनारे की घटना सुनाई और वह पते का कार्ड उनकी ओर बढ़ाया तो सारी घटना जैसे ताजी हो गई हो। हां! हाँ! बोलो क्या बात है। मैं तुम्हारी सहायता किस प्रकार कर सकता हूँ।
युवक ने अपनी जेब से कुछ कागज निकाल कर उनके सामने मेज पर रख दिये और कहा मैंने कुछ कवितायें लिखी है उन्हें प्रवासी मासिक में प्रकाशित करवा दीजिये। वृद्ध ने कविताएं पढ़ी। उस समय उनके चेहरे पर बनती बिगड़ती रेखायें बता रही थीं कि वह किसी धर्म संकट में फँस गये। माथे पर पसीने की बूंदें छलकती दिखाई दीं। ओठ सूखने लगे बड़े साहस के साथ उन्होंने कहा यहां तुम बुरा न मानो तो अपनी बात कहूँ
कहिए!
प्रवासी एक उच्च स्तरीय पत्र है। उसमें यह साधारण सी कवितायें नहीं छापी जा सकतीं यदि सम्पादन का नियम तोड़कर ऐसा किया जायेगा तो मुझ पर पक्षपात का आरोप अवश्य लगेगा। हाँ यदि तुम चाहो तो मुझे उस दिन के अहसान के बदले पुनरु गंगा में फेंक सकते हो।आत्मा के विरुद्ध कार्य करना मेरे वश की बात नहीं।
यह वृद्ध सज्जन थे।प्रवासी और श्मार्डनरिव्यूश् मासिक के यशसवी सम्पादक पं॰ रामाननद चट्टोपाध्याय।
(लाखन सिंह भदौरिया)
कुछ भी देय-अदेय न सखा, दुखियों को कब-कब तक बाँटा। कैसे प्राण विदा दें तुमको, पीर बसाकर, जाने वाले॥
सविता-माता के प्राणों का अमृत-क्षीर पिलाने वाले, सुर-संस्कृति के महातेज की लाल-मशाल जलाने वाले,
अरुणोदय बन गई साधना, तप के नयन बन गये सावन, मानवता के चीत्कार पर, अमृत-सिन्धु लुटाने वाले,
मधुता बाँटी, गला-गला तन, मानव देह महान् बनाई, आँसू बोये, अर्घ्य चढ़ाया, कल्पवृक्ष की पौध उगाई,
हर राही को सम्बल सौंपा, कोई नहीं निराश्रित लौटा- कामधेनु को कंठ बाँधकर, अमृत-क्षीर पिलाने वाले।
कैसे प्राण विदा दे तुमको, पीर बसाकर जाने वाले॥
बिन्दु-सिन्धु को अंक भेंटकर, पुलक अचेतन-चेतन को दी,
चुभन राह की झेल-झेलकर वृन्दावन में, किलकन भर दी, जन्म-जन्म का विरह जगाया, मधु स्पर्श दिया प्राणों का,
पिघल बहे, पाहन मन जग के, अमृत पायी, पुलकन भरदी, कोख सनाथ हो गयी माँ की, धन्य हो गया, भू का जीवन,
ज्वालामुखी बसाये उर में, चितवन में, अमृत की छलकन, महिमावान प्राण, हिमगिरि से, द्रवित रहे हैं जग के दुःख से,
भरे-भरे बादल मन वाले, अधरों से मुस्काने वाले। कैसे प्राण विदा दें तुमको, पीर बसाकर जाने वाले॥
सृजन लहलहा रहा अश्रु का, बौराया भावों का फागुन, धरती पर समृद्धियाँ उतरी, करने जन-मन का आराधन,
तुम ऐसे निकले तीर्थंकर, अश्रु बहाकर जाने वाले। कैसे प्राण विदा दें तुमको, पीर बसाकर जाने वाले॥
*समाप्त*