सेवा से सत्य-प्राप्ति

गुफा में रहकर भी आकाश में महल बनाये जा सकते हैं और जनक की तरह महलों में रहने वाला भी विरक्त योगी हो सकता है, अपने मन को साधने की बात है तो वह गुफा में भी हो सकती है और शान-शौकत के बीच रहते हुए भी। मन, महत्वाकांक्षाओं के पंख लगाकर आकाश में विचरण करता रहे तो गुफा में रहने से कोई फायदा नहीं उससे शान्ति नहीं मिल सकती, अपने देश वासियों की सेवा करते हुये यदि कोई मोह उत्पन्न नहीं होता तो उससे वैभव के बीच रहकर भी परम शान्ति मिल सकती है।

मेरा भी लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, पृथ्वी के नश्वर राज्य की मुझे जरूरत नहीं है मैं भी परलौकिक राज्य की कामना करता हूं, पर उसके लिए गुफा चुनने की आवश्यकता नहीं हुई। मेरी गुफा मेरे साथ है। आत्म-दर्शन व्याकुलता मेरे हृदय में है सत्य को पाना ही मेरा इष्ट है उसके लिये मैंने सेवा को ही अपनी साधना चुना इसी जरिये मानवता की सेवा चाहता हूं। प्राणि मात्र के साथ मेरी आत्मा घुल जाना चाहती है, और शत्रु दोनों को एक भाव से देखता हुआ मैं किसी से घृणा या राग करता मुझे लोग घृणा से देखेंगे तो भी मैं उनसे प्यार ही करूंगा। जाति की सेवा से ही मुझे मुक्ति मिलेगी ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।


बैडूर्य कमी कांच नहीं हो सकता

आमोक्ष बहुत समय के बाद मिले थे। आचार्य भद्रबाहु के वह कभी सहपाठी रह चुके थे। सो उन्होंने उनको स्वागत राष्ट्राध्यक्ष के रूप में नहीं मित्र के रूप में किया। आमोक्ष ने स्वयं भी समस्त राजकीय प्रतिबन्ध तोड़कर आचार्य भद्रबाहु से भेंट की। बहुत देर तक दोनों में एकाँत वार्ता होती रही।

आमोक्ष ने कहा-तात ! गुरुकुल में पढ़ाया गया ब्रह्मज्ञान तो भूल ही गये। आप नहीं जानते परिस्थितियां मनुष्य को क्या से क्या कर सकती है राज्य का सुख वैभव तो योगियों को भी भ्रष्ट कर सकता है फिर हमारे लिए ते कहना ही क्या ? आप तो अभी भी आत्म-विकास की साधनाओं में रत है और एक हम हैं जो सारा धर्म-कर्म ही छोड़ बैठे विवशता को क्या कहा जाये।

आचार्य बोले-यह विवशता नहीं मनुष्य की भूल है तात ! यदि तुमने आत्म हित का ध्यान रखा होता तो परिस्थितियां कैसी भी हो कुछ नहीं बिगाड़ पातीं। आमोक्ष बोले-आर्य ! मेरे स्थान पर आप होते तो आपकी स्थिति होती ? भद्रबाहु ने हंसकर कहा- पि अच्छमणो, वेरुलिओ कायमणि ओमीसे। उवेइ कायभावं, पाहन्न गुणेण नियएण॥ वैडूर्य रत्न है ते उसे कांच की मणियों समय तक मिलाकर क्यों न रखो वह रत्न ही रहेगा कभी कांच नहीं के प्रति अटूट निष्ठा वाले का जीवन से हुई समझ कर आमोक्ष मन नहीं समय वे कुछ न बोल। प्रसंग बदल जधानी लौट आये। कुछ दिन पीछे भद्र पुरुषों के साथ वे आचार्य देना न भूले । आचार्य भद्रबाहु के लिये निवास व्यवस्था राजोद्यान के एकाँत अतिथि भवन में की गई। आमोद-प्रमोद के समस्त साधनों के अतिरिक्त वहां ऐसी कोई भी व्यवस्था न छोड़ी गई जो कामोद्दीपन में सहायक न होती हो। रत्न जटित सुकोमल शैय्या, सामंत शाही परिधान मदिर सुवास नृत्यांगनाओं के चित्र, सब कुछ था वहां रोग-उत्पन्न करने वाला। दृष्टि मात्र से काम-वासना भड़काने वाली सुन्दरियां परिचारिकायें नियुक्त हुई। आचार्य भद्रबाहु के आने पर उन्हें वहीं ठहराया गया।

नगरोत्सव एक सप्ताह चला, किन्तु भद्रबाहु को आकर्षित करने का हर सम्भव यत्न किया किन्तु वे अपने प्रयत्न में असफल रहीं। उत्सव एक पूरा ही पखवाड़ा बढ़ा दिया गया। सुन्दरियां जिस तरह पतिंगा लौ पर टूटता है, उन्मत्त होकर आचार्य भद्रबाहु को विचलित करने का प्रयत्न करती रहीं पर उन योगी के अन्तःकरण में दृष्टि दोष तक भी झांक न पाया।

बसंत पर्व, राजोद्यान की सुषमा सुन्दरियों के नृत्य गीत एक पल को भी उस वातावरण में कोई पहुंच जाता तो कामासक्त हुये बिना न रहता और आचार्य भद्रबाहु तब वहाँ समाधि लगाये बैठे थे जग की सुन्दरता में उनकी निष्कलुष आत्मा ब्रह्म के सौंदर्य में विलीन हो रही थी। महाराज आमोक्ष मंत्री परिषद के साथ वहां पहुंचे और आचार्य को प्रणिपात करते हुए बोले-सत्य है तात ! दृढ़ निष्ठा हो गई है आत्मा में जिसकी संसार प्रलोभन उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते।


Quotation

मनुष्य जीवन का उद्देश्य आत्म-दर्शन है और उसकी सिद्धि का मुख्य एवं एकमात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीवमात्र की सेवा करना है।-महात्मा गांधी


कला और संस्कृति की मूल प्रेरणा-प्रेम

साइलेशिया जर्मनी का एक प्राँत है वहां का बनज्लो नाम का कस्बा चीनी बर्तनों के लिये विख्यात है प्रेम भावनाओं की तुष्टि का प्रतीक ताजमहल सारे विश्व का एक आठवां आकर्षण माना जाता है किन्तु यहां के एक निर्धन कलाकार की कलाकृति ताजमहल से भी बढ़कर आकर्षण है उसे इसने अकेले बनाया और केवल अपने हृदय के भव्य उद्गारों को मूर्त रूप देने के लिए।

सन् 1753 की बात है युवक कलाकार एक कुम्हार के पास काम किया करता। कुम्हार की कन्या के प्रति उसके हृदय में प्रेम की भावना जागृत हुई कन्या भी उसे हृदय से प्रेम करने लगी पर कुम्हार ने अपनी पुत्री का हाथ किसी निर्धन व्यक्ति के हाथ में देना अस्वीकार कर दिया। यही नहीं उसने उस युवक को जो अब तक छोटे बर्तन भी बनाना सीख नहीं पाया था अपने पास से भगा दिया।

प्रेम आन्तरिक शक्तियों के केन्द्रीकरण की सामर्थ्य का दूसरा नाम है। सामान्य अवस्था में व्यक्ति का मन संसार के प्रत्येक आकर्षण की और भागता है। योगीजन अनेक योग-क्रियाओं का लम्बे समय तक अभ्यास करते हैं तब कहीं मन को नियंत्रण में लाते हैं किन्तु प्रेम-भावना उन समस्त योगाभ्यासों से बढ़कर है वह मन की बिखरी शक्तियों को तत्काल अन्तर्मुखी बनाकर उसे रचनात्मक दिशा दे देता है कल तक जो युवक मामूली बर्तन भी नहीं बना पाता था आज उसने संकलन किया एक अद्वितीय कलाकृति निर्मित करने का। उसने एक विशालकाय बर्तन बनाया जिसमें 30 बशेल्स (1 बशेल 8 गैलन के बराबर होता है) मटर के दाने भरे जा सकते थे नगर के वृद्धजनों ने इस बर्तन को देखा ते उनका हृदय युवक की भावनाओं के प्रति करुणा से द्रवित हो उठा। लोगों ने कुम्हार को विवश किया और कहा-निर्धनता मन की होती है यदि व्यक्ति की भावनायें परिष्कृत है तो धन को बड़ी बात नहीं तुम्हें अपनी कन्या का हाथ युवक कलाकार के हाथ में दे देना चाहिये। अन्त में कुम्हार को झुकना पड़ा। बर्तन आज भी वहां रखा है उसे लाग प्यार का बर्तन कहते हैं और इसको देखकर प्रेम-भावना के प्रतीक उस कलाकार की याद करते हैं।

प्रेम अपने आप में एक आनन्ददायी भावना है वह काम और यौन-पिपासा से भिन्न प्रकार की एक ऐसी तृप्ति है जो व्यक्ति को कला और संस्कृति के विकास की प्रेरणा देती है। यह ठीक है कि प्रेम जैसे अनिर्वचनीय सुख को काम-वासना से जोड़कर मनुष्य पतित भी कम नहीं हुआ तथापि आज संसार में जो सौंदर्य, कला और संस्कृति का विकास देखने में आ रहा है उसका मूल आधार वह प्रेम ही है जो छोटों के प्रति स्नेह, समवयस्कों के प्रति मैत्री दीन-दुखियों के प्रति करुणा, उदार मना लोक-सेवियों और महा पुरुषों के प्रति श्रद्धा और परमपिता परमात्मा के प्रति भक्ति के रूप में परिलक्षित होता है। यह भावनायें न होतीं तो मनुष्य और जड़ प्रकृति में कोई अन्तर न रहा होता।

अरस्तू कहा करते थे- अगर तुम दूसरों पर प्रभाव डालना चाहते हो तो तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना पड़ेगा जो सफलता पूर्वक दूसरों को स्फूर्ति और उत्साह दे सकें। यह तभी सम्भव है जब तुम उसके हृदय में प्रेम का उद्वेग कर सको। बाह्य आचरण द्वार किसी को आँशिक प्रेरणायें दी जा सकती है पर अपना बनाकर निरन्तर स्फूर्ति और चैतन्यता प्रदान करने का हो तो तुम्हें प्रेमास्पद ही बनना पड़ेगा। निष्काम प्रेमी जो केवल प्रेम के बदले प्रेम ही चाहता हो और कुछ भी नहीं।

मनुष्य ही नहीं सृष्टि के हर जीव में की प्यास अदम्य होती है। अमेरिका के सैनडिगो चिड़िया घर की निर्देशिका बेले जे. वेनशली ने चिड़िया घर में अपने उन्नीस वर्ष के अनुभवों का जिक्र करते हुये लिखा है-मैंने वन्य पशुओं के जीवन में भी प्रेम की तड़प देखी, वे भी प्रेम से सीखते सिखाते है- एकबार चिड़िया घर की मादा भालू ने एक बच्चे को जन्म दिया उसका नाम टाकू रखा गया। भालू जितना क्रोधी प्रकृति का खूंखार जानवर है उससे अधिक उसमें वात्सल्य भाव देखा जा सकता है। देखने से लगता है संसाद की विषम परिस्थितियों ने उसे क्रुद्ध होने को विवश न किया होता तो भालू संसार में सबसे अधिक स्नेह और ममता वाले स्वभाव का जीव होता। मादा चार माह तक बच्चे को पेट से चिपकाये गुफा में पड़ी रही। गुफा से वह बाहर भी नहीं निकली किन्तु फिर जैसे उसे याद आया कि बच्चे के प्रति प्रेम और वात्सल्य का यह तो अर्थ नहीं कि उसके आत्म-विकास को अवरुद्ध रखा जाये। मादा मांद से बाहर आई नन्हा शिशु उसके साथ-साथ बाहर निकला। मादा सीधे तालाब के पास पहुंची और पानी में उतर कर स्नान करने लगी। उसने अपने बच्चे को भी बहुत तेरा पानी में उतरने को प्रेरित किया मुंह से तरह-तरह की आवाज वह निकाली उससे प्रतीत होता मां उसे पानी में बुला रहीं है न आने के लिए उसमें गुस्सा भी है किन्तु वह अपनी प्यार भावना को भी दबा सकने में असमर्थ है, बच्चा अपनी मां के साथ खिलवाड़ करता है कभी-कभी किनारे पहुंच कर उसके बाल पकड़ कर बाहर खींचता है मानो वह मां को पानी में नहीं रहने देना चाहता पर मां जानती है कि आरोग्य के लिये बच्चे को स्नान कराना आवश्यक है। ममतावश उसने कई बार बच्चे को छोड़ा पर उसे गुस्सा भी दिखाना पड़ा। वह नाराजी भी प्रेम का ही एक अंग थी, भगवान भी तो नाराज होकर अपनी बनाई सृष्टि अपने बच्चों को दण्ड देता है पर उसकी दण्ड प्रक्रिया भी उसके प्रेम का ही प्रतीक हैं। खराब से खराब सृष्टि को भी वह नष्ट करना चाहता उसे सुधार की आशा रहती है इसलिये वह अपनी उस साधना को न बन्द करते हुये भी अपनी सन्तान पर प्यार रखना नहीं भूलता। स्वयं भी रोता रहता है पर नाराज होकर सृष्टि को नष्ट कर डालने की बात उसके मन में कभी आई नहीं।

एक दिन मादा ने जबरदस्ती की और उसे पानी में पकड़ ही तो ले गई उसने अपने पंजों से बच्चे को अच्छी तरह धोकर स्नान कराया। कभी वह डूबने लगता तो मां उसे सतह से ऊपर उठा देती। धीरे-धीरे शिशु-संशय दूर हो गया और वह अपनी मां के साथ अच्छी तरह तैरना सीख गया।

संसार में कला और संस्कृति का कूल प्रेम भावनायें ही है। प्रेम करना सबको आना चाहिये। प्रेम के दर्शन की जानकारी हर व्यक्ति को होनी चाहिए। प्रेम तो फूल पौधे भी करते हैं। फूलों का सौंदर्य और उनके अन्तस्तल से उड़ता हुआ मधु मकरन्द प्रेम ही है। प्रकृति का हर जड़ कण खाने पाने की प्रक्रिया में संलग्न है उसी के सहारे मनुष्य सभ्यता का विकास कर सका है। प्रेम की सच्चाई और पवित्रता के द्वारा आने वाली सृष्टि को और अधिक सुन्दर बनाने का काम हर व्यक्ति को करना चाहिये।


प्रेम का प्रताप

श्रीकृष्ण भगवान ने कौरवों पाँडवों को मिलाने के लिये दुर्योधन को सभा में जाकर समझाया, किन्तु मदान्ध दुर्योधन ने नहीं माना। उलटे वह अपने पराक्रम का वर्णन करता हुआ पाँडवों की निंदा करने लगा। अन्त में वह भगवान को कैद करने के लिये भी तैयार हो गया। उस मूर्ख को पता नहीं था कि जिन श्रीकृष्ण ने जन्म के दिन ही कंस के कारागार को तोड़ डाला था, वे उसके बन्धन में कैसे आयेंगे? भगवान ने अपना भयंकर रूप दिखाकर दुष्टों को डरा दिया। दुर्योधन के महल में भगवान के लिये भाँति-भाँति के पकवान बने थे। किन्तु जब एक भिखारी भी अभिमानी मनुष्य का अन्न नहीं लेता तो अखिल ब्रह्माण्ड के नायक श्रीकृष्ण उस पापी का अन्न कैसे खाते? उन्होंने दुर्योधन के पकवान त्यागकर विदुर की भाजी खाई। जब वे वह साग खा रहे थे, तब उन्होंने कहा-’रुक्मिणी आदि के हाथों बनी रसोई नित्य खाता हूँ, पर ऐसी तृप्ति कभी नहीं हुई।’ यह है प्रेम का प्रताप।


अद्भुतः अश्रुतोऽहम्- “मैं अद्भुत हूँ-अश्रुत हूँ”

अनेक प्रकार की योग साधनायें करने के उपरान्त ब्रह्मविद्या उपनिषद् के मंत्रदृष्टा ने क्रमशः शरीर मन की स्थूल शक्तियों का वेधन करते हुये मूल चेतना के प्राप्त किया। ब्राह्मी भूत हुये ऋषि ने ब्रह्म के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए लिखा है-

केवलोऽहमं कविः कर्माध्यक्षोऽहं करणाधिपः। गुहाषोऽहम गोप्ताऽह चक्षुषष्चक्षरस्म्यहम्॥

अर्थात्- मैं (ब्रह्म) केवल हूं मुझसे परे कुछ नहीं, कवि अर्थात् भाव हूं, कर्म का निरीक्षक और फल देने वाला, जो कुछ सृष्टि में है सबका स्वामी हूं, स्वयं ही अप्रकट रहकर विलक्षण कार्य करने वाला हूं जहां मानवीय नेत्र नहीं देख सकते उस विराट को, त्रिकाल को भी देखने में मैं ही समर्थ हूं।

परमात्मा के इस तात्विक रूप का साक्षात्कार तो मंत्र-दृष्टा ऋषि, उपनिषद्कार, सन्त और साधक ही कर सके हैं, योग-मार्ग और योग-साधनाओं का अभ्यास करने से उसके विज्ञानमय स्वरूप की झाँकी होती है किन्तु नहीं है मनोबल इतना सशक्त जिनका कि वे कठिन साधनायें कर सकें उनके लिये शास्त्रकार कहता है- “विष्णोरद्भुत कर्मणाः” वह अत्यन्त अद्भुत कम करता है-उसकी सत्ता को उसकी विलक्षण रचना द्वारा जानों और उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।

यों आकाश में लटकते हुये तारे, गेंद की तरह उछलती हुई पृथ्वी, यहाँ के तरह-तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, वायु, समुद्र सब एक से आश्चर्य है, मनुष्य शरीर जैसी आश्चर्यों की आश्चर्य मशीन आज तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं बना पाया। विचार तो यह रचनायें ही उसकी सत्ता का बोध कराने के लिये अपर्याप्त नहीं किन्तु जगत की रचना में प्रकृति का भी उतना ही भाग है जितना परमेश्वर का प्राकृतिक पदार्थ भी टूटते-फूटते संकुलित-विच्छिन्न होते रहते हैं उससे भी अनेक आश्चर्यजनक रचनायें बनती बिगड़ती रहती हैं उदाहरण के लिये सन् 1823 में सिनाई पर्वत के समीप वाली टोर की खाड़ी में पानी तीन बार खून के रंग का हो गया। उस समय वहाँ उपस्थित पानी के जहाज के नाविकों ने यह दृश्य देखा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यह समुद्र के सामान्य प्राकृतिक नियमों का अपवाद था अतएव जाँच के लिये वैज्ञानिक विशेषज्ञ और जीव शास्त्री बुलाये गये। डार्विन तथा एरहन वर्ग ने बताया कि यह समुद्र में कुछ पौधों के कारण हुआ। वह अपने अंदर से कोई तत्व निकालते हैं जिससे “ट्राइ ट्रेशन” जैसी क्रिया होती है जल लाल रंग का हो जाता है।

सूडान के फूजी अजी प्राँत में कुछ ऐसे पौधे पाये जात है जो अक्सर सीटी बजाया करते हैं कई बार इनकी सीटियां इतनी तीव्र बजती है कि आधुनिक सभ्यता में रंगे आज के युवकों द्वारा सिनेमा हाल या किसी हाल या किसी जल से प्रदर्शन की हूटिंग (सीटी बजाना, उछलना, कूदना, विघ्न डालना) भी मात खा जाती है। वैज्ञानिकों ने खोज प्रारम्भ की तो पता चला कि इन पेड़ों के नीचे कुछ कीड़े होते हैं जो तने को भीतर ही भीतर खोखला कर देते हैं और एक इंच या उससे भी बड़ा सूराख बना देते हैं। कई बर यह सूराख डालियों तक में जाकर फूटते हैं पेड़ वंशी बन जाता है जब हवा चलती और इन छेदों से गुजरती है तो सीटी बजने की सी तेज ध्वनियां उच्चरित होती है।

दक्षिणी अफ्रीका के वेलाविस्यिया नामक स्थान में एक विचित्र पेड़ पाया जाता है जो ऊंचाई में कुल 1 फुट का होता है किन्तु उसके तने की मोटाई 25 फीट होती है 100 वर्ष तक की आयु के इस वृक्ष में कुल 3 पत्तियां ही होती है जो जन्म से होती है और सैकड़ों पतझड़ हो जाने पर भी पौधे का साथ नहीं छोड़ती ।

यह आश्चर्य प्राकृतिक है प्रकृति की चेतनता ही इस तरह के विलक्षण आश्चर्यों का कारण होती है और इस तीसरे आश्चर्य की तरह कई बार वे इतने विलक्षण भी होते हैं कि प्रकृति अर्थात् जड़ परमाणुओं में भी एक विधिवत् मस्तिष्क की मान्यता अमान्य नहीं करते बनती। तो भी इन पर विज्ञान हस्तक्षेप कर सकता है विश्लेषण कर सकता है इसलिये ऐसे आश्चर्य किसी अव्यक्त सत्ता का बोध कराने के लिये ना-काफी माने जाते हैं।

मनुष्य शरीर में जड़ और चेतन दोनों ही सत्तायें काम करती है इसलिये स्थिति साफ नहीं हो पाती। कभी प्रकृति अर्थात् शरीर का रसायन भाग बल में होता है तो भावनायें दब जाती है इस समय अन्न से बना मन और उसकी वासनायें प्रखर हो उठती है और तब मनुष्य साँसारिक हो जाता है। उस समय उसका आध्यात्मिक दैविक स्वरूप दब जाता है और इन परिस्थितियों में यह शरीर ही नारकीय यंत्रणा का आगार बन जाता है। उपनिषद्कारों ने ब्रह्म प्राप्त पुरुषों के लिये जहां इस शरीर को देव मन्दिर कहा है वहां इस तरह के उदर परायण व्यक्तियों के लिये नारद परिव्राजकोपनिषद् में कहा है-

अस्थिस्थूणं स्नायुबद्ध माँस शोणित लेपितम्। चर्मावबद्ध दुर्गन्धि पूर्ण मूत्रपुरीषयोः॥

माँसासृक्पूय विण्मूत्रस्नायुमज्जा स्थित संहतौ। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढ़ो भविता नरकेऽपिसः॥

अर्थात्- खम्भों की तरह लगी है हड्डियां जिसमें, स्नायु-जाल से जो पूरा गया है माँस का जिस पर पलस्तर चढ़ा है और त्वचा द्वारा जिसे मढ़ दिया गया है। मल-मूत्र और दुर्गन्ध से भरा वह शरीर मूर्खों के लिये रोगों का ही घर है।

शरीर की सारी महत्ता उसके आग्नेय उसके सूक्ष्म तत्व रूप की है जिसके सम्बन्ध में ऊपर ब्रह्म-विद्या उपनिषद्कार ने बताया है उसी के विकास से मनुष्य ब्रह्म की चेतना को इस तरह प्राप्त कर सकता है जैसे रेडियो विद्युत् का सम्बन्ध संसार के किसी भी ट्राँसमीटर द्वारा प्रक्षेपित विद्युत् तरंगों के साथ जुड़ जाने वे वह रेडियो भी रेडियो स्टेशन की अनुभूति और प्रसारण वाला हो जाता है।

ईश्वरीय क्षमतायें शरीर और प्रकृति की क्षमता से बढ़ कर है क्योंकि प्रकृति और महाकूत भी ब्रह्म की ही उपज है-

“चिदानन्दोऽस्म्यहं चेताश्चिद्धनश्चिन्मयोऽस्म्यहम्”

अर्थात्-वह परमात्मा चिदानन्द, चेतना प्रदान करने वाला, चिद्घन और निरन्तर चेतना ही है।-उसकी रचनायें प्रकृति से भिन्न विलक्षण आश्चर्यों वाली होती यद्यपि व्यवस्थापिका के रूप में उसकी प्रकृति काम करती दीखती है पर वह अपनी क्षमतायें व्यक्त किये बिना भी नहीं रहता, अपनी सर्वोपरिता, अहंता और सत्ताभाव को यह आप ही व्यक्त किया करता है। संसार में ऐसे उदाहरण भी कम नहीं है। इन उदाहरणों द्वारा ही वह मानवीय बुद्धि को लौकिकता से अलौकिकता की और प्रेरित किया करता है।

चीन के चिहली नगर में एक यूनानी रहता था उसका जन्म 1389 में हुआ मृत्यु 1464 में। 75 वर्ष वह संसार के विलक्षण आश्चर्य के रूप में जिया। शी-स्वान नामक इस व्यक्ति का शरीर पारदर्शक था उसके शरीर के भीतर का माँस हड्डियां श्वांस गमन के मार्ग तक एक्स किरणों से भी अधिक स्पष्ट सभी अंग देखे जा सकते थे। मनुष्य शरीर में अद्भुत शक्ति के प्रदर्शन का यह अद्भुत उदाहरण था जिसका विज्ञान कोई भी हल प्रस्तुत नहीं कर सका।

शाँसी प्रान्त के राज्य मंत्री श्री लू मिन की आँख में दो-दो पुतलियाँ थी जो जीव-विज्ञान का अविजित-आश्चर्य ही बनी रही। लूमिन बाद में गवर्नर हो गये उनकी आँखों से काम करने की क्षमता में भी कोई अन्तर नहीं था। .... के टूरकोइंग स्थान में सन् 1793 में एक ऐसी लड़की ने जन्म लिया जिसकी केवल एक आँख थी वह 15 वर्ष तक “क्लीमेंट चाईल्ड” के नाम से विख्यात रहीं। यह एक आँख भी भारतीय योगियों की तृतीय आँख का प्रमाण थी और नाक के ठीक ऊपर दोनों भौहों के बीच थी। योग-विज्ञान की मान्यता है कि इस स्थान पर पीयूष ग्रन्थि होती है जो वस्तुतः आध्यात्मिक तीसरे नेत्र का काम करता है उसका जागरण हो जाने पर मनुष्य करोड़ों मील दूर की भी वस्तुयें देख और अनुभव कर सकता है। यह .... इस आँख से सब कुछ देख सकती थी। उसे देखकर यह अनुमान किया जा सकता है कि भगवान् उसे भेजकर मनुष्य को यह समझाने का प्रयास किया होगा कि मनुष्य बाह्य दृष्टि वादी ही न रहकर अन्तदृष्टा भी बने बिना उसके वह विश्व के यथार्थ को जान समझ नहीं सकता।

ग्रीन्स वर्ग के एक चनवाहे वाल्टर रिडिल मैन के पास एक भेड़ थी। भेड़ें संसार में बहुत है बहुत हो चुकी और ना जाने कितनी अभी होंगी- इस सामान्य से जीव से लाभ तो है पर उसमें कोई विशेषता न होने से उसे कोई महत्व पूर्ण स्थान प्राप्त नहीं। उसके शरीर में ऊन उगने का एक प्राकृतिक नियम है। दुनिया की हर भेड़ के शरीर में ऊन ही उगती है किन्तु इस भेड़ की पीठ पर घास उगती थी और भगवान की उस प्रेरणा का दिग्दर्शन कराती थी कि यह शरीर माटी का एक घरौंदा मात्र है प्रकृति की खूबसूरती है कि उसने हर शरीर में नई आकृति गढ़ी पर उससे यह सत्य ओझल नहीं हो जाता कि शरीर का उपयोग केवल पार्थिव सुखों तक ही सीमित है यदि उसका असाधारण उपयोग करना हो तो उसके चेतन अंश की भी खोज और प्राप्ति की जानी चाहिए परमात्मा ने यह प्रेरणा इस भेड़ की पीठ में घास उगाकर दी और अपनी महत्ता भी प्रतिपादित कर दी कि वह प्राकृतिक नियमों से भी बढ़कर कलाकार और रचनाकार है।

ईश्वर वाणी है- “अद्भुतः अश्रु तोऽहम्”- मैं अद्भुत हूँ, जो कभी नहीं सुना गया वह भी मैं ही हूँ यह थोड़े से उदाहरण इस तथ्य के साक्षी है। प्रयत्न करें, साधनायें करें, तो उसके विराट तात्विक स्वरूप को पाकर हम धन्य भी हो सकते हैं जिसके लिए मनुष्य जैसा शरीर जीव को प्रदान किया गया है।


परमेश्वर एक ही है

एक गाँव के बीच से होकर एक बैरागी महात्मा चले जा रहे थे। रास्ते के एक घर में स्त्री-पुरुष के बीच उन्होंने एक लड़ाई होते देखी। यह देखकर सन्त जी चुपचाप खड़े हो गये। पुरुष कह रहा था- ‘मैं तो जाऊँगा और काशी जाकर गंगा स्नान करने के बाद विश्वनाथ जी का पूजन करता हुआ ईश्वर को प्राप्त कर लूँगा। तेरे साथ रहने में मेरी इतनी आयु बेकार चली गई। मेरे बिना तेरा जो हाल होगा सो देखना।’ स्त्री बोली- मैं भी यहाँ रहने वाली नहीं। तुमसे पहले वृन्दावन को चली जाऊँगी, जहाँ मीरा ने अपने गिरिधर गोपाल को पाया था। वहीं जाकर मैं भी यमुना जी में स्नान करती हुई श्रीकृष्ण भगवान का दर्शन करूंगी। मेरे बिना भी तुम्हें जो अड़चने पड़ेंगी, सो देखना।’

बाहर खड़े महात्मा ने उन दोनों को बुलाकर पूछा- ‘तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो ?’ दोनों ने अपनी-अपनी बात कह सुनाई महात्मा जी व्यवहार तथा परमार्थ में भी कुशल थे। इसलिये उन्होंने दोनों को एक ही उत्तर दिया- ‘तुम दोनों का लड़ाने वाला तुममें से एक दूसरे काम नहीं हैं। और वह मन तुम जहाँ जाओ, वहाँ साथ रहेगा। इसलिये वहाँ जाकर भी तुम दोनों के मन की लड़ाई होती ही रहेगी। आखिर वहाँ जाकर जब मूर्तियों का पूजन करके ईश्वर को प्राप्त करना ही तुम्हारा अभीष्ट है न ? तो क्या तुम दोनों की मूर्ति ही ईश्वर जैसी नहीं है ? अरे, उससे भी अधिक अच्छी है। क्योंकि तुम्हारे में चेतना स्फुरित हो रही है और वह तो एकदम जड़ पत्थर की मूर्ति है। तुम्हारी आँखों में क्या ईश्वरी आनन्द नहीं झलक रहा है ? जाओ, घर में जाओ और आज से तुम परस्पर एक दूसरे को ईश्वर की मूर्ति मानकर पूजो। ऐसा करने से तुममें अब कभी लड़ाई ने होगी और तुम्हारा गृहस्थाश्रम संन्यासाश्रम की बराबरी करेगा।’ उन दोनों ने वैसा ही किया और सुखी हुये।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।

एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति॥

ब्राह्मण अनेक नामों से पुकारते, अनेक रूपों में कल्पना करते वह परमेश्वर एक ही है।


पदार्थ और चेतना-दो भिन्न अस्तित्व

इन्द्र अग्नि, वायु, आकाश आदि सभी देवताओं का ब्रह्मा ने आवाहन किया। उनके सामने एक तिनका रखा और कहा- इसे उठाओ, जलाओ और उड़ाओ पर एक नन्हें से तिनके को हस्तान्तरित करने में कोई भी सर्मा न हुआ तब ब्रह्म ने उस तिनके को उठाया, फूंक मारकर उड़ाया और जलाकर भी देखा दिया। पराभूत देवताओं को उपदेश देते हुए केनोपनिषद में ब्रह्म ने समझाया कि शक्ति का केन्द्र शरीर नहीं आत्म-चेतना है शरीर तो जड़ है, उसका अभिमान नहीं करना चाहिये।

इस आख्यायिका में बताया है कि मनुष्य के शरीर में विभिन्न पदार्थों की सम्मिलित शक्ति होने पर भी यदि चेतना नहीं है ते मात्र पिण्ड कुछ नहीं कर सकता-सर्व शक्तिमान चेतना है--आत्मा है जड़ शरीर नहीं, यह चेतना शरीर से स्वतन्त्र अस्तित्व है।

ऋग्वेद का कथन है-

अपश्यं गोपामनपद्यमानमा च पर च पथिभिश्चरन्तम्। स सध्रीचीः स विचूचीर्वज्ञान आवरी वर्ति भुवनेष्वन्तः॥ -ऋग्वेद 1.177.3

अर्थात्- यह जीवात्मा अनेक मार्गों द्वारा शरीर में आता है (शरीर से पैदा नहीं होता) शरीर से पृथक् होता है अविनाशी और इन्द्रियों का रक्षक होता है। वह शरीर के साथ भी रहता है शरीर को छोड़कर भी रहता है।

पाश्चात्य वैज्ञानिक अभी कोई ऐसा प्रयोग नहीं कर पाये जिससे आत्म-चेतना के अस्तित्व की पृथक् अनुभूति की जा सके। पर योग-साधनाओं द्वारा आत्मा को बोधगम्य बनाने वाले भारतीय योगियों ने ऐसे प्रमाण प्रत्यक्ष प्रदर्शनों द्वारा प्रस्तुत किये हैं जिनसे पता चलता है कि आत्मा अज्ञान वश शरीर के व्यापार में आसक्त पड़ा रहे यह अलग बात है पर वह है स्वशासी, अपने नियन्त्रण में आप। एकबार सुप्रसिद्ध योगी देशबन्धु की इस मान्यता को कुछ डॉक्टरों ने अमान्य किया फलस्वरूप बम्बई मेडिकल यूनियन की और से श्री देशबन्धु का प्रदर्शन कराया गया उसे देखने के लिये बम्बई मेडिकल कॉलेज के छात्र स्टाफ तथा अन्य विशिष्ट नागरिक भी एकत्र हुये। डॉ0 बसन्त जी रैले उनके शरीर परीक्षण के लिये नियुक्त किये गये । श्री देशबन्धु से कहा गया यदि आप मानते हैं कि चेतना के शरीर से भिन्न किया जा सकता है तो आप दाहिने हाथ की नाड़ी-क्रिया को शून्य करके दिखाइये ?

श्री देशबन्धु ने लम्बी श्वांस-प्रश्वांस क्रिया की। गहरी सांस ली और उसे बाहर निकाल दिया। दाहिना और बांया दोनों हाथ बाहर निकाल दिया। श्री रैले ने देखा बायें हाथ की नाड़ी यथावत् धक्-धक् कर रही थी पर दाहिने हाथ की नाड़ी में संचालन की जरा भी गति नहीं थी। दुबारा फिर वैसा ही करके उन्होंने दाहिने हाथ की नाड़ी चलाकर दिखा दी और बायें हाथ की नाड़ी गति को शून्य कर दिया। डॉक्टरों की टीम आश्चर्य चकित तब रह गई जबकि योगी देशबन्धु ने विभिन्न प्राणायाम क्रियाओं द्वारा सारे शरीर की नाड़ी संस्थानों को तो गतिशील रखा किन्तु हृदय गति को बिलकुल रोक दिया। हृदय गति रुक जाने पर मनुष्य एक भी क्षण जीवित नहीं रह सकता। पश्चिम अभी तक कोई ऐसा प्रयोग नहीं कर सका कि शून्य गति हृदय को गति देकर मृतक को जिन्दा कर दिया हो जबकि प्रत्यक्ष उदाहरण यह था कि शेष शरीर जी रहा था और शरीर का इंजन हृदय फेल पड़ा था। श्री देशबन्धु ने कहा- आत्मा स्वतन्त्र द्रव्य है उस पर केन्द्रस्थ होकर आश्चर्यजनक दिखने वाला हर काम सम्भव है।

डॉक्टरों ने उस समय यह तर्क किया कि सम्भव है यह सब आपने हिप्नोटिज्म द्वारा लोगों को सम्मोहित करके दिखाया हो इस पर उन्होंने दुबारा प्रयोग किया इस बार एक्सरे कार्डियोग्राम द्वारा विधिवत् हृदय गति की जाँच की तो भी परिणाम ज्यों का त्यों रहा। श्री देशबन्धु ने इसे महज खेज बताते हुये कहा आत्म-चेतना नाड़ी संस्थानों द्वारा इस शरीर से सम्बद्ध है यह क्रियायें और कुछ नहीं केवल मात्र ‘वेगस नर्व’ के नियन्त्रण का परिणाम है। भली भाँति नियन्त्रित आत्म-चेतना से दूरगमन परलोक अनुभूति, परकाया प्रवेश, ईशत्व वशित्व आदि विलक्षण सिद्धियाँ और सामर्थ्यों अर्जित की जा सकती है। अणु से विराट् बनने का श्रेय इन साधनाओं द्वारा ही समुपलब्ध होता है।

येग मार्ग न सही ऐसे अनुभव पाश्चात्य लोगों ने भी किये है और माना है कि शरीर की मुख्य चेतना अपने स्वतन्त्र अस्तित्व में वस्तुतः रह सकती है। द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान अगस्त सन् 1944 को एक फौजी अफसर को हुआ वह ऑफिसर स्काउट कार द्वारा जा रहा था तभी जर्मनी की एण्टी टैंक तोपों का सीधा प्रहार हुआ। ऑफिसर जिस गाड़ी में था उसमें और भी विस्फोटक पदार्थ भरे थे उनमें विस्फोट हो गया। उस समय की स्थिति का वर्णन करते हुए ऑफिसर ने द्वितीय विश्व युद्ध के मित्र राष्ट्र गजेटियर में लिखा है-जैसे ही विस्फोट हुआ मैं 20 फुट दूर जा गिरा ऐसा लगा मैं दो भागों में विभक्त हो गया। मेरा एक शरीर नीचे जमीन में पड़ा तड़प रहा है उसके कपड़ों में आग लगी है भय से वह अपने हाथ पैर बुरी तरह हिला रहा है किन्तु दूसरा शरीर इस शरीर के ऊपर आकाश में हवा की तरह तैर रहा था मैं अपने रूप को स्वयं पहचानने में असमर्थ था पर वहां की हर वस्तु, सड़क के पर का युद्ध दृश्य, झाड़ियां, जलती कार में सब कुछ देख रहा था। मुझे भीर से एक अन्तः प्रेरणा उठी कि तड़फड़ाने से कुछ लाभ नहीं जल्दी-जल्दी शरीर को जमीन से रगड़ो ताकि आग बुझ जाये। शरीर ने ऐसा ही किया। वह लुढ़क कर बगल की खाई में जा गिरा। खाई में कुछ नमी थी, आग बुझ गई और मुझे ऐसा लगा जैसे एक पक्षी द्वारा घोंसले में प्रवेश की तरह मैं फिर उसी शरीर में आ गया। अब मुझे शरीर की पीड़ा का पुनः भान होने लगा जबकि थोड़ी देर पूर्व यही दृश्य मैं मात्र दर्शक बना देख रहा था।

यह उदाहरण विवेक चूड़ामणी की इस सत्यता का ही बोध कराते है-

असंगोऽहमनंगो हमलिंगोऽहमभंगुरः। प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहमतान्तोऽहं चिरन्तनः॥

मैं (आत्म-चेतना) असंग हूं, अशरीर हूं, मेरा कोई लिंग भेद नहीं मेरा नाश नहीं होता, अत्यन्त शाँत अनंत अतान्त और पुरातन हूं मेरा कोई आदि अन्त नहीं।

भारतीय दर्शन के इन गूढ़ रहस्यों का मर्म श्री रामकृष्ण परमहंस बहुत सीधे सादे उदाहरण में समझाया करते कहा करते-जिस तरह प्याज की गांठ का छिलका उतार दो दूसरा छिलका आ जाता है छिलके उतारते जाओ अन्त में उसका बीज मात्र रह जाता है उसी प्रकार शरीर के पदार्थ की समीक्षा, उसका विश्लेषण करते जाओ तो समस्त स्थूल पदार्थों के बाद जो शेष बचेगा वह आत्म-चेतना ही होगी।

इसकी विधिवत् अनुभूति लम्बी योग-साधनाओं से सम्भव है पर कई बार आकस्मिक घटना भी आत्म-चेतना के प्रथक अस्तित्व का बोध करा देती है। जम्मू में शिक्षा विभाग के एक मध्यम श्रेणी कर्मचारी श्री गोपी कृष्ण ने किसी पुस्तक में पढ़ा-मस्तिष्क के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करने से परमात्मा की अनुभूति होती हैं। एक दिन वे इसी तरह ध्यान कर रहे थे। जिज्ञासा की प्रखरता में बड़ी प्रबल शक्ति है। मन की चंचलता के कारण ध्यान का जो लाभ कुछ लोग वर्षों अभ्यास के बाद भी नहीं ले पाते, वह उनकी तीव्र जिज्ञासा ने क्षण भर में प्रदान कर दिया उन्हें सहस्रार की स्पष्ट अनुभूति अकस्मात् हो गई। वे समझ न सके यह क्या हुआ वे एक दिव्य लोक में खोये से रहने लगे एक दिन वे तवी पुल पार कर रहे थे तभी उस प्रकाश के बोध के साथ ही उनके मस्तिष्क में बहुत ही दिव्य भाव छंद बद्ध काव्य के रूप में उदित हुये। साधारण शिक्षित व्यक्ति में असाधारण कवित्व शक्ति का उदय उनके लिये एक आश्चर्य बन गया। वे कवितायें लिखने लगे। आश्चर्य तब और भी गहरा हो गया जब उनके मस्तिष्क में जर्मन, फ्रेंच इटेलियन, संस्कृति, अरबी जिनका कि उन्हें ज्ञान भी नहीं था नियमित काव्य धारायें उतरने लगी। उनके इन काव्यों और विलक्षण मानसिक शक्तियों का परीक्षण अनेक पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने भी किया और उन विचारों को शृंखला बद्ध नियमित और व्याकरण के नियमों से नियन्त्रित पाया। रहस्य को न समझाने पर भी सबने माना कि श्री गोपी कृष्ण के शरीर में किसी ऐसी सत्ता का विकास हो गया है जो शरीर और मन की पहुंच से बहुत व्यापक पहुंच वाली है। यह विलक्षण घटनायें देखकर योग वशिष्ठ के यह कथन याद आते है-

आत्मा शरीर सम्बन्धी शरीरमपि नात्मनि भिथो विलक्षणावेता प्रकाश तमसी यथा।

देहनास्य न संबंधों मनागेवामलात्मनः। हेम्नः पंकलवेनेव तद्र तस्यापि मानवः॥

अर्थात्- आत्मा का शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं। अन्धकार और प्रकाश की तरह दोनों दो विलक्षण पदार्थ है। सोना कीचड़ में गिर जाने से उस पर कीचड़ का आवरण चढ़ गया जान पड़ता है तथापि सोने के कणों की शुद्धता में कोई अन्तर नहीं आता उसी प्रकार शरीर में आ जाने पर भी आत्मा के अस्तित्व में किसी प्रकार का अन्तर नहीं आता।

आधुनिक वैज्ञानिक चेतना को प्राकृतिक मानते हैं। उनका कहना है कि चेतन “प्रोटोप्लाज्म” (नमक को इतना पीसा जाये कि फिर उसके टुकड़े न हो सकें उस नमक का परमाणु कहते हैं, शरीर जिस पदार्थ से बना है उसकी लघुतम इकाई का नाम “सेल” है सेल या कोश जिन तत्वों से बनता है उसे प्रोटोप्लाज्म कहते हैं) ही है। प्रोटोप्लाज्म में शहर के समान नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बन, फास्फोरस आदि बारह पदार्थों से बना एक तरल पदार्थ होता है जिसे साइटोप्लाज्म कहते हैं। यह भौतिक पदार्थ भी इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रान, पाजिट्रान और नाभिक से बने है। हक्सले के हवाले से वैज्ञानिक कहते हैं कि इलेक्ट्रान निरन्तर गतिशील रहते हैं। प्रकृति के बदलते रहने से इलेक्ट्रानों धारा निरन्तर बहती रहती है उसी से निरन्तर चेतना का क्रम बना रहता है उसे ही चेतना या जीवन कहते हैं।

किन्तु, प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर ओलिवर लाज ने अपनी पुस्तक विज्ञान और धर्म (साइन्स एण्ड रिलीजन) के पेज 18 में स्पष्ट किया है कि प्रत्येक परमाणु कई इलेक्ट्रान से मिलकर बना होता है यह इलेक्ट्रान गति भी करते हैं पर वे एक दूसरे से चिपके नहीं रहते वरन् जिस तरह आकाश में ग्रह-नक्षत्र दूर-दूर परिभ्रमण करते हैं उसी तर यह भी अलग-अलग रहकर परिभ्रमण करते हैं इससे इलेक्ट्रान्स की निरंतर प्रवाह प्रक्रिया को चेतना या जीवन नहीं कहा जा सकता। किसी निश्चित निष्कर्ष पर न पहुंच पाने पर भी आज के विज्ञान ने यह मान लिया है कि चेतना अजर-अमर तत्व है। इलेक्ट्रान तो मन जैसी प्रचण्ड वेग वाली पदार्थ जन्य शक्ति का नाम है। आत्मा उससे भी भिन्न है सम्भव है उसकी खोज में भारतीय तत्व दर्शन मदद कर सके।


आत्म-ज्ञान के बिना अभाव दूर नहीं हो सकते

एक मनुष्य घोड़े पर बैठकर कहीं दूर जा रहा था। रास्ते में घोड़े को पानी पिलाने के लिये रहट चल रही थी। वह वहाँ पहुँचा। पानी के पास पहुँचकर घोड़े ने रहट की विचित्र आवाज सुनी, जिससे वह भड़क उठा। घोड़े वाले ने कहा- ‘भाई जरा आवाज बन्द कर दो तो इसे पानी पिला दें रहट बन्द कर दिया गया लेकिन अब पानी नहीं था। अब घोड़े वाले ने कहा-’अरे भले मानुस! मैंने आवाज बन्द करने को कहा था, पानी बन्द करने नहीं।’ किसान ने कहा-यदि तुम्हें घोड़े को पानी पिलाना हो तो मजबूती से पकड़े रखो। क्योंकि पानी आयेगा तो आवाज होगी ही। घोड़े वाले ने वैसा ही किया  ओर घोड़े ने पानी पीया। लोग बिल्कुल निरुपाधि भाव से भजन करना माँगते हैं। यह माँग तो उसी घोड़े वाले के समान है। क्योंकि मन घोड़े जैसा है। उपाधि छोड़ने का उपाय करोगे तो यह उत्पात मचायेगा। इसलिए उपाधियों पर ध्यान न देकर मन रूपी घोड़े की लगाम को मजबूती से पकड़ो और युक्तियों से उसे वश में करके आत्म-साक्षात्कार करो।

आत्म-ज्ञान के बिना अभाव दूर नहीं हो सकते, आत्म ज्ञानी को कोई अभाव नहीं होते।

-स्वामी रामतीर्थ


उपासना में संयम के चमत्कार

योग दर्शन व “ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका” आदि में संयम को उपासना का एक अनिवार्य अंग बताया गया है- “तत्जयात प्रज्ञा लोकाः” अर्थात्-संयम विजय से प्रज्ञा बुद्धि का विकास होता है। प्रज्ञा का अर्थ सार्वभौम ज्ञान से है इन्द्रियों की सामर्थ्य और समय की सीमा से परे अर्थात् जो कुछ देखा सुना है और जो कुछ देखा सुना भी नहीं उस समस्त ज्ञान को प्राप्त करना ही प्रज्ञ होना है। ब्रह्म की प्राप्ति भी संयम से विजित प्रज्ञा बुद्धि द्वारा ही होती है। इसलिए उपासना के साथ संयम को आवश्यक ही नहीं अनिवार्य माना गया है।

संयम का एक अर्थ होता है वीर्य की रक्षा या शरीर और मन की शक्तियों को अपव्यय से बचाना। कामवासना के नियन्त्रण का नाम भी संयम है और मौन रहना भी संयम है। किसी भी शक्ति-क्षय करने वाली इन्द्रिय के व्यापार को रोकना संयम कहलाता है उसके भौतिक साँसारिक लाभ भी स्पष्ट है। पहलवान जानते हैं कि ताकतवर होने के लिये पौष्टिक आहार व्यायाम से भी बढ़कर आवश्यक संयम है इसलिये वे प्रारम्भ में ही संयम का प्रतीक लँगोट और जांघिया बाँधने का अभ्यास करते हैं। विचारक जानते हैं कि मन को मथकर नई-नई कल्पनायें करना तभी सम्भव है जब वाणी द्वारा उसका क्षय रुके इसलिये वे प्रायः मौन रहते हैं। संयम की शक्ति से न जाने कितनी साँसारिक विभूतियां प्राप्त की जा सकती हैं क्योंकि सफलता की जननी शक्ति है और संयम शक्ति का “स्टोर”।

योग-विद्या का संयम इस संयम से विशद और व्यापक प्रभाव वाला है ऋद्धियाँ सिद्धियाँ और परमात्मा का हस्तामलक साक्षात्कार भी संयम से ही प्राप्त होते हैं उस संयम की परिभाषा करते हुये महर्षि पातंजलि ने योग-दर्शन अध्याय 3 सूत्र 4 में लिखा है- “त्रयमेकत्र संयमः” अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों के एकत्र होने का नाम ही “संयम” है। धारणा करें कि हमारी चेतना हमारा प्राण सूर्य चेतना और सूर्य प्राण का ही एक अंश है-अब सूर्य का ध्यान करें, मन को सूर्य में इस तरह घुला दें कि समाधि लग जाये अर्थात्-दोनों एक रस हो जाये तो हम सूर्य के साक्षात्कार वाले सूर्य की क्षमता, गरिमा वाले हो सकते है- मुख मंडल पर वही तेजस, शरीर में वैसी ही सक्रियता और शक्ति, बुद्धि में वैसी ही पारदर्शी निर्मलता और समस्त ब्रह्माण्ड के भेदों को जान लेने वाली सिद्धि यह सब सूर्य संयम के परिणाम होते हैं। ब्रह्म में संयम करने से उसी प्रकार अन्तःकरण ब्राह्मीभूत बन जाता है। ऐसा योग शास्त्रों में बताया है।

इन आन्तरिक आत्मिक सत्यों के परीक्षण का अभी तक कोई संगणक या यन्त्र विकसित नहीं हुआ पर ऐसे अनेक प्रमाण अवश्य है जिनसे संयम की महान् शक्ति का पता चलता है।

“कण्ठ कूपे क्षुत्पिपासा निवृत्ति” (पाँतजलि योग दर्शन 3.28)

अर्थात्-कण्ठ कूप में स्थित इड़ा नाड़ी पर संयम करने से भूख प्यास नहीं लगती। ऐसे अनेक ऋषि महात्माओं का पता है जो हिमालय के बर्फीले प्राँतों में रहते हैं जहां पत्तियां भी खाने को नहीं मिलती। बंगाल की गिरिबाला का वर्णन अखण्ड-ज्योति में छप चुका है जिसने इसी साधना के अभ्यास से भूख से निवृत्ति पाली थी, उसे जीवन भर खाने की आवश्यकता नहीं पड़ी थी। विज्ञान भी यह मानता है कि अन्न का पोषण तत्व आकाश से आता है कोई सूक्ष्म विधि खोजली जाये तो उस तत्व को हवा से ही खींचा और शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है।

“बलेषु हस्ति बलादीनि”

अर्थात्-शरीर के बल में संयम करने से हाथी के समान बल प्राप्त होता है। वस्तुतः अनन्त आकाश अनंत विद्युत् शक्ति का प्रवाह है शारीरिक शक्ति में मन का संयम करने से वह अपार शक्ति संचरित होकर शरीर को बलवान बना दे तो इसमें आश्चर्य क्या। महायोगी राममूर्ति ने इसी साधना का अभ्यास किया था वे ताकतवर कार को एक हाथ से रोक लेते थे, हाथी छाती पर चढ़ा लेते थे। लोहे की सांकलें तोड़ डालते थे वह सब इसी शक्ति के चमत्कार थे।

योग-विज्ञान की दृष्टि में छोटे से छोटा चमत्कार।

यहां एक और उदाहरण दिया जा रहा है जो इन्द्रियों की दिव्य शक्तियों में संयम के आश्चर्यजनक चमत्कार का बोध कराता है। बंगाल के वर्दवान जिले में एक महात्मा रहते थे। उन्होँने घ्राण-शक्ति पर संयम किया था और चाहे जब, चाहे जिस समय चाहे जिस मौसम में चाहे जिस प्रकार की सुगन्धि पैदा कर सकते थे। इसलिए उनका नाम ही गंध-बाबा पड़ गया था। वैसे उनका नाम स्वामी विशुद्धानन्द था उनके आस-पास सदैव ही तरह-तरह की सुगन्ध बिखरी रहा करती थी।

बात उन दिनों की है जब स्वामी योगानन्द बालक थे, उनकी योग-जिज्ञासायें उन दिनों बहुत प्रबल रहा करती थी, इन जिज्ञासाओं उन दिनों बहुत प्रबल रहा करती थी, इन जिज्ञासाओं की शुरुआत चमत्कार देखने से होती है सो एक दिन वे भी गन्ध-बाबा के पास उनका चमत्कार देखने के लिये जा पहुँचे। गन्ध-बाबा ने उनके पास आते ही पूछा-तू भी सुगन्ध के लिए आया है- बोल किस फूल की सुगन्ध चाहिये। युवक योगानन्द ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुये कहा-”गुलाब के फूल कि”- गन्ध बाबा ने युवक का हाथ पकड़ कर कहा - ले सूँघ और सचमुच हाथ से गुलाब के फूल की ऐसी बढ़िया सुगन्ध आने लगी मानो हाल का बनाया गुलाब सेन्ट हाथ से चुपड़ दिया गया हो। युवक ने एक गन्ध हीन फूल तोड़ा और गन्ध-बाबा ने हाथ में देते हुए कहा-आप इसमें चमेली के फूल की गन्ध भर सकते है--साधु ने मुस्कुराते हुये फूल की टहनी अपने हाथ में पकड़ी और फिर युवक को देते हुये कहा-ये लो सूँघो-युवकानन्द ने उसे सूँघा तो उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था कि उस फूल में सचमुच ही चमेली के फूल की महक आने लगी थी।

“फूल और फलों की सुगन्ध ला सकते हैं तो फूल और फल भी ला सकते होंगे”--युवक ने योगी से प्रश्न किया। योगी ने कहा-हाहा यह उससे सरल है। कौन-सा फल चाहिये आपको -सन्तरा युवक ने कहा-उन दिनों सन्तरों का मौसम नहीं था। बाजार में दस रुपये में भी एक सन्तरा नहीं मिलता था। स्वामी विश्वद्वानन्द ने पास रखी केले के पत्तों की पुड़िया उठायी और युवक के हाथ में देते हुये कहा- ये लो सन्तरे। युवक ने हंसते हुये कहा--पुड़िया नहीं सन्तरा माँगा है। योगी ने हंसते हुये कहा-पत्ते खोले--युवक आश्चर्यचकित था कि केले के पत्तों के बीच ताजे संतरे रखे थे, जैसे वे अभी-अभी तोड़ कर लाये गये हो।

अपनी सिद्धि की व्याख्या करते हुये स्वामी विशुद्धानन्द ने बताया कि इस सिद्धि के लिये मैंने बारह वर्ष तक संयम किया है। इस साधना का परिचय मुझे एक तिब्बती योगी ने दिया था जो स्वयं भारतीय योग साधनाओं के महा पण्डित और योगी थे। ऐसे चमत्कार योग शास्त्र में आत्म-कल्याण के लिये बाधक माने जाते हैं पर मैं अपने गुरु के आदर्श से यह प्रदर्शन इसलिये करता हूं कि लोग यह माने कि संसार में जो स्थूल है, दिखाई देता है वह सत्य नहीं। डॉक्टर सालोमन का कथन है कि प्रकृति ने हर वस्तु के लिए मौसम प्रदान किया है-- उस मौसम में ही वृक्ष उस तरह के परमाणु आकर्षित कर पाते हैं जो फल विशेष में, फूल विशेष में पाये जाते हैं, यह प्रकृति का नियम है योग शास्त्र की मान्यता भिन्न है वह डॉक्टर सालोमन की बात मानने को तैयार नहीं। भारतीय अध्यात्म विद्या संसार को परिपूर्ण मानती है। हर समय हर वस्तु विद्यमान है, सम्भव है एक समय एक स्थान पर एक तरह के परमाणु अधिकों दूसरे कम पर यह भी निश्चित है कि उसी समय दूसरी तरह के परमाणु कहीं दूसरी जगह अधिकार मात्रा में उपस्थित होंगे उन्हें आत्म-शक्ति द्वारा आकर्षित कर पदार्थ का रूप प्रदान करने कि शक्ति आत्मा में संयम में है।

स्वामी योगानन्द ने भी इसी घटना का उल्लेख अपनी आत्म-कथा में किया है। स्वामी विवेकानन्द ने भी ऐसी घटनाओं का वर्णन किया है। पर आत्म-विज्ञान की दृष्टि से संयम की अपेक्षा--”हृदय चित्तसंवित्” हृदय में संयम रखने से मन नियंत्रण में आता ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है--

मूर्द्ध ज्योतिषि सिद्ध दर्शनम्।

अर्थात्- मूर्धात् ज्योतिष (भू मध्य स्थित प्रकाश) में संयम करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है।

“नाभि चक्रे काव्यूहहज्ञानम्।”

अर्थात्- नाभि चक्र में संयम करने से शरीर की व्यय रचना का इतना सूक्ष्म ज्ञान हो जाता है जैसा डॉक्टर सात जन्मों में भी नहीं कर सकते। ये सिद्धियां और सामर्थ्य ऊपर वर्णित सामर्थ्य से कहीं अधिक महत्व की होती है। आत्म कल्याण, लोक-मंगल और ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक योगी ऐसा ही संयम करते हैं वे चमत्कार प्रदर्शन में पड़कर आत्मा-विकास का दिव्य लाभ प्राप्त करते हैं। यह चमत्कार तो इसलिये है कि भारतीय लोग योग-दर्शन के इस महत्व पूर्ण पहलू को समझे और इसके लाभ प्राप्त करें।

देखने, सुनने में यह बातें भारतीय दर्शन की अति रंजनायें लगती है पर यदि विश्व इतिहास की झांकी की जाये तो ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण मिल जाते हैं, जिन्हें मानसिक और आत्मिक शक्ति के केंद्रीकरण का अनुपम चमत्कारी कहा जा सकता है। उदाहरण के लिये ईस्वी सन् 286 में चीन के वी वाह्न नामक व्यक्ति के घर शक्ति के संयम (केन्द्रीकरण) का चमत्कार।

जिवैरो (अफ्रीका) में आज भी सिर को छोटा कर लेने की प्रथा है। कई लोग तो अपना पुरा शरीर ही घटाकर चौथाई तक कर लेते हैं आकृति की बनावट और नाक-नक्शे में कोई अन्तर नहीं आता फोटो की तरह शरीर छोटा (रिडीयूज) कर लेने की विद्या भी शक्ति संयम का ही चमत्कार है। पनामा पुरातत्व संग्रहालय में एक जिवैरो की खोपड़ी सुरक्षित है जीव शास्त्रियों ने परीक्षण करके बताया है कि इस व्यक्ति के बाल 16 इंच लम्बे थे जबकि खोपड़ी छोटी सी गेन्द (बेसबोल) जितनी थी। यह तभी से उसके पीछे दर्शकों की भीड़ लगने लगी। उसकी सुन्दरता को लोग घूर-घूर कर देखा करते। सारे चीन में बच्चा अलौकिक व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हो गया। कुछ दिन पीछे चीन के राष्ट्र अध्यक्ष ने उसे अपने पास रख लिया, किन्तु राजनैतिक उपद्रव होने के कारण उसे वहाँ से भागना पड़ा और वहीं पहले वाली मुसीबत फिर आ पड़ी। वह नान किंग आ गया जहाँ लोग उसे देखते ही रहते। बिना किसी सर्दी, खाँसी, जुकाम या मलेरिया, तपेदिक युवक केवल घूर-घूर के देखने के कारण 26 वर्ष की अल्पायु में ही मर गया। ऐसी थी सैंकड़ों लोगों कि मातृदृष्टि एक पुत्र ने जन्म लिया इस बच्चे का नाम बी ची रखा गया किन्तु कुछ पीछे बच्चे का नाम “ज्वेल” (जवाहर) पड़ गया क्योंकि यह असाधारण सुन्दर था। भारत वर्ष की स्त्रियाँ छोटी अवस्था के बच्चों को नजर लगने से बचाने के लिये उनके काजल का टीका या काला धागा बाँधती है सम्भव है उनके इस विश्वास के पीछे विवेक कम भाव-भीरुता अधिक हो तदापि हिप्नोटिज्म जैसे सम्मोहन अवस्था से इनकार भी नहीं किया जा सकता, दृष्टि द्वारा मानसिक शक्ति का प्रभाव हो सकना कोई असम्भव बात नहीं जैसा कि इस घटना से स्पष्ट है।

बी.ची. 5 वर्ष का था खोपड़ी बड़ी खोपड़ी से घटाई गई थी। यह उदाहरण आत्म-शक्ति के संग्रह और उसके मान उपयोग के स्थूल चमत्कार मात्र है इसी शक्ति का संयम (संचय) जब आत्म-कल्याण के लिये किया जाता है तो मनुष्य शरीर में ही भगवान बन जाता है।


निदक नियरे राखिये

शील और साधुता में समस्त भू-मण्डल में अगस्त्यारण के सम्राट वृष मातग अद्वितीय माने जाते थे किन्तु चन्द्र कलंक की भाँति उनके सौम्य-चरित्र पर आक्षेप ही था कि वे अपनी निन्दा नहीं सुन सकते थे। यश और आत्म-प्रशंसा से प्रसन्नता होती है, आत्म बल बढ़ता है किन्तु यदि सृष्टा ने आलोचना और निन्दा का सृजन न किया होता तो संसार के लोग परिमार्जन प्रक्रिया का लाभ न ले सके होते।

“स्नान न करने से शरीर दुर्गन्ध से भर जाता है, आत्मा से कुसंस्कारों की छान बीन और उनका दोष-परिमार्जन न किया जाता रहे तो व्यक्ति दुर्गुणों की दुर्गन्ध से भर जाता है। निन्दा न होती तो अपने क्रोड़ के शिशुवत पलने वाली इन बुराइयों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

वृष मातंग को यही बात बताते हुये उस दिन-उनके गुरु-आचार्य सहस्रपाद ने समझाया-तात ! यश व्यक्ति की सम्पत्ति है, यश की कामना से पुण्य करना तो धर्म है पर यश को इष्ट बनाना आसक्ति है। आसक्ति व्यक्ति को दूसरी न्यायोचित दिशा की बात सोचने नहीं देती इसलिये मनुष्य बुराई से बचने की अपेक्षा उससे घिर जाता है सो तुम जिस प्रसन्नता के साथ यश को स्वीकार करते हो उसी प्रसन्नता के साथ निन्दक कर निन्दा को भी स्वीकार करना।

आचार्य प्रवर का उपदेश शिरोधार्य कर वृष मातंग राज-प्रासाद वापस लौट आये। आते ही उन्होंने अपनी अन्तरंग परिचारिका तुषार का स्मरण किया। अन्य दासियाँ उसे बुलाने गई तो तुषार ने इनकार किया- मैं महाराज की सेवा में उपस्थित नहीं रह सकती?

सदैव प्रफुल्ल रहने वाली तुषार न केवल सम्राट वृष मातंग वरन् समस्त अन्तःपुर की प्राण थी। प्रसन्नता का, मुस्कान का कुछ आकर्षण ही ऐसा है कि ऐसे व्यक्ति के पास हर कोई बैठना चाहता है। कई दिन से तुषार परिलक्षित नहीं हुई थी महाराज एक अव्यक्त प्रसन्नता अनुभव किया करते, तुषार के न रहने से वह न जाने कहाँ विलुप्त हो चली थी सो वे स्वयं ही तुषार के कक्ष तक गये और तुषार के न उपस्थित होने का कारण पूछा? महाराज! जानती हूं सत्य कई बार कटु होता है किन्तु उसे व्यक्त न करना दुःखदायक भी- आप नहीं जानते आपके शरीर से दुर्गन्ध आती है सेविका तो हूं पर अपनी छोटी सी स्थिति में भी ऐसा कौन है जो प्रसन्नता न चाहता हो आपके समीप रहकर यदि मुझे मानसिक क्लेश हो तो मैं अवकाश क्यों न ले लूँ ऐसी सेवा से?

“मेरे शरीर से दुर्गन्ध”- वृष मातंग को क्रोध एक क्षण के लिए पारे की तरह उबल पड़ा-इस तुच्छ सी परिचारिका का यह साहस कि वह मेरे सम्मुख मेरी आलोचना करे मेरी बुराई करे तभी उन्हें आचार्य प्रवर के वह शब्द याद आये-तात ! निन्दा को भी यश के समान सुनने और सहन करने वाला योगी होता है- महाराज क्रोध को पी गये उसे व्यक्त नहीं होने दिया।

इससे महाराज को वस्तु स्थिति की परख का अवसर मिला-उन्होंने प्रधान भिषगाचार्य धेनुवृत को बुलाकर शरीर की परिक्षा कराई तो पता चला उनके दांतों में रोग उत्पन्न हो गया है। उसी के कारण दुर्गन्ध उत्पन्न होती है। राज-वैद्य ने यह भी बताया कि यदि कुछ दिन और ऐसे ही रहने दिया जाता तो आप दाँतों से रहित हो जाते।

महाराज को जितनी प्रसन्नता अपने शरीर की रक्षा हो जाने की हुई उससे भी अधिक इस बात की कि वे एक ऐसा पाठ सीख गये जिसकी ओर से वे अब तक विमुख थे। ‘निन्दक नियरे राखिये’ का पाठ आज ही उन्हें अच्छी तरह समझ में आया।


वैराग्य से सत्य सिद्धि

सद्गुणों से-पवित्र आचार-विचार से-वैसे ही सुख-शाँति और सहयोग पूर्ण भावनाओं एवं परिस्थितियों का विस्तार होता है। संकल्प, स्वाध्याय सत्संग आदि गुणों के विकास के साधन बताये गये हैं किन्तु जिस तरह दुर्गुणों का मूल कारण अनियंत्रित महत्वाकांक्षायें होती है वैसे ही सद्गुणों का भी मूल वैराग्य है। शास्त्रकार का कथन है-

यस्यास्ति भक्तिर्भगवहयकिन्चना- सर्वैगुणेस्तत्र समासते सुराः।

अकिंचना भक्ति - अर्थात् वैराग्य जहाँ है वहाँ समस्त सद्गुण विराजते हैं।

वैराग्य ऐसी निर्मल भावना है जो मनुष्य के मन को पक्षपात पूर्ण विचारों से बचाती है। चाहे वह अपने लिये हो, समीपस्थ सम्बन्धी अथवा किसी पड़ोसी के लिये हो। अपनी त्रुटि दोष और कमजोरियों पर तो वह कड़ाई से नियंत्रण करता ही है साथ ही उन सभी बुराइयों के विरोध में सहयोग करता है जो परमात्मा के मंगलमय विधान में विघ्न बाधा डालते हैं। इससे भलाई की शक्ति का विकास और परिवर्तन ही होता है।

विचारों की निर्मलता से दुरित दुर्गुणों का निवारण ही नहीं होता वरन् जिस तरह पतझड़ के बाद पेड़ों-पौधों में नई कोपलें फूट उठती है, चैत्र की नवरात्रियों के पास जिस तरह कोंपल प्रकृति नये-नये परिधान में निखरती है वैसे ही मस्तिष्क में भी वैराग्य की भावना आने से नई-नई कोमल भावनाओं का विकास होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी बात को इन चौपाइयों में व्यक्त किया है-

जानिअ तब मन बिरुज गोसाईं। जब उर वल विराग अधिकाई॥ सुमति छुधा बाढ़ई नित नई। विषय आस दुर्बलता गई॥

अर्थात्- जब हृदय में वैराग्य बल प्रस्फुटित होता है तो मन में विवेक का जन्म होता है। अन्तःकरण में सौमनस् की भूख प्रदीप्त हो उठती है जिससे मन में विषयों की ओर भटकने की दुर्बलता थी वह दूर होने लगती है।

गीता में मनोनिग्रह का मुख्य आधार वैराग्य को बताते हुए- भगवान कृष्ण कहते है-”अभ्यासेन तुकौन्तेय वैराग्येण च गृहृते” योग दर्शन में-’अभ्यास वैराग्याभ्याँ तन्निरोधः’ कहकर उपरोक्त कथन की पुष्टि कर दी। दरअसल स्वाभाविक दुर्बलता तब तक छूटती भी नहीं जब तक आत्मा के प्रति कौतूहल पूर्ण जिज्ञासा और संसार की निस्सारता का भाव मन में प्रकट नहीं होता है।

शास्त्र कहते हैं कि सिद्धियाँ और सफलतायें तो वैराग्यशील व्यक्ति की चरण दासी होता है। आत्म-विजय, मनोजय, राजनैतिक सफलतायें अध्यात्मिक प्रगति और साँसारिक सुख जिनकी प्रत्येक युग में आवश्यकता होती है वह वैराग्य वाले मनुष्य को स्वयमेव आवश्यकतानुसार मिलती रहती है। महाभारत में वैराग्य को सम्पूर्ण सिद्धियों का साधन बताते हुये लिखा है-

यच्छ भूतं भविष्ययं च भवम्च परम द्युते। तर्त्सवमनुपश्यामी पाणौ फल चिकिर्षिताम॥ --शाँ0 प॰ 54।1

इसके अर्थ में रामायण की यह पंक्तियाँ प्रयुक्त हैं-

जानहिं तीन काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥

-वह व्यक्ति जिनसे हृदय में वैराग्य बसता है वह यह जानता है हम भूत में क्या थे और भविष्य में क्या होंगे। सम्पूर्ण सिद्धियाँ उनकी हथेलियों पर होती हैं।

वैराग्य के अभ्यास की एक ही साधना है जगत के मिथ्यात्व को अनुभव करना, चिन्तन करना। भावनाओं में इतना उभार पैदा कर लेना कि न अहंभाव रहे, न मृत्यु, न मान-अपमान, शोक-वियोग का विकार। सम्पूर्ण कालों में व्याप्त आत्मा ही आत्मा दिखाई। मैं अजर हूँ, अमर हूँ, अक्षय, अविनाशी परम प्रकाश हूँ इस धारणा की पूर्ण पुष्टि वैराग्य कहा जाता है। साँसारिकता का मोह नष्ट हो जाये वही वैराग्य है।

वैराग्य के विकास के तरीके कई विचारकों ने कई तरह से व्यक्त किये हैं, उन सबका तात्पर्य एक ही है संसार के स्थूल पदार्थों के चिन्तन से मन को विरत कर भावनाओं में लगा देना- एक कवि कहता है-

मुट्ठी बाँधे आया जग में, हाथ पसारे जाएगा।

विनय पत्रिका यों कहती है-

सहस्रबाहु दस बदन आदि नृप, वचे न काल बली ते। हम हम कहि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।

सुत बनितादि जानि स्वारथ रत, न करु नेह सबही ते। अंतहु तोहि तजिगे पामर, तू न तजै अब ही ते।

-पर्पट पन्जरिका में जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य ने संसार की निस्सारता को यों व्यक्त किया है-

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिर बसन्तौ पुनरायातः। कालः क्रीड़ति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्चत्याशावायुः। भज गोविन्द भज गोविन्द गोविन्द मूढमते॥

बार-बार दिन, सायंकाल रात्रि आती है और देखते-देखते चली जाती है इस प्रकार काल की क्रीड़ा निरन्तर होती रहती है प्राणियों की आयु इस तरह क्षीण होती जा रही है। ऐ मन क्षण भंगुर इस संसार में आशाओं की वायु का परित्याग कर परमात्मा को जान।

ऐसे अवसर पर नानक भला कैसे चुप रहते। वे लिखते हैं-

आयु गवाँईं दुनिया में दुनिया चलै न साथ। पैर कुल्हाड़ी मारिया मूरख ने अपने हाथ॥

सबका अर्थ संसार के भौतिक सुखों को नगण्य सिद्ध कर पारलौकिक जीवन के लिये आत्म सुधार करना ही है। किसी शायर ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-

है बहारे बाग दुनिया चन्द रोज। देखलो इसका तमाशा चन्द रोज॥ ऐ मुसाफिर कूँच का सामान कर। है बसेरा इस सरा में चन्द रोज॥

इस संसार के सुख, तमाशे थोड़ी अवधि के लिये है। न जाने कब शरीर विनष्ट हो जाय और इस दुनिया को छोड़कर चल देना पड़े। इन परिस्थितियों को गम्भीरता पूर्वक अनुभव करना चाहिए इससे हमारे सामने एक ऐसे शुभ्र जीवन का विकास होने लगेगा जिसमें कटुता, कलह और वैमनस्य न होगा इसलिये अशान्ति न होगी। भोग न होंगे इसलिये रोगों से छुटकारा मिलेगा, कोई पराया न होगा, किसी के साथ भेदभाव, ऊँच-नीच, कम-ज्यादा का भाव न होगा। वैराग्य को इसीलिये सम्पूर्ण सद्गुणों के विकास का मूल कहा गया है। ऊपर की पंक्तियों का मनन-चिन्तन और उन्हें गुनगुनाते रहने से इसी मूल-भावना की दिनों दिन पुष्टि भी की जा सकती है। जीवन लक्ष्य प्राप्ति की आवश्यकता तो इससे स्वयमेव फलित होती है। “व्यास भाष्य” में बताया गया है-

“कोऽहमासं कथमहमासं किंस्विदिंदकथं स्विदिदं के वा भविष्यामः कथ वा भविष्याम इत्येवमस्य पूर्वान्तं परातं मध्ये स्वात्म भाव जिज्ञासा स्वरुपेणोपावर्तते एता यमस्थैर्ये सिद्धयः।”

पूर्ण विरक्त जनों को, जिन्होंने संसार के विषय सुख, राग, मोह, मदारि का परित्याग कर दिया है, मैं कौन था कैसे था? वर्तमान शरीर क्या है? कैसा है? आगे क्या होऊँगा? कैसे रहूंगा? इन सब बातों का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है।


स्वप्न द्वारा मन का आत्मा से मेल-मिलाप

रेडियो की सुई 340 किलो साइकिल्स पर लगाते ही हमारा रेडियो- रेडियो स्टेशन दिल्ली की शब्द तरंगें पकड़ने लगता है ऐसा इसलिए हुआ कि छोटे से रेडियो की विद्युत का रेडियो स्टेशन की विद्युत से सम्बन्ध जुड़ गया है। मन और आत्मा भी ऐसी ही दो छोटी और बड़ी विद्युत शक्तियाँ हैं। केनोपनिषद में मन को विद्युत कहा है- यन्मनः सहा इन्द्रः (गो0 उ॰ 4।11) में भी मन का विद्युत शक्ति कहा है। विद्युत का वेग एक सेकेंड में सवा लाख मील तक का है यही बात ऋग्वेद के 10।58 सूत्र के 1 से 11 मन्त्रों में देते हुए बताया है ‘यत् ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम् दूरकम् यत् ते पराः पारवतो मनो जगाम दूरकम्’- अर्थात् यह मन संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक क्षण भर में पहुँच जाता है।

अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में अमेरिका (शिकागो) के टेडसेरियस और जोहान्स द्वारा हजारों लाखों मील दूर और सैंकड़ों वर्ष हुई घटनाओं के कल्पना चित्र हू-ब-हू उतार देने का जिक्र किया है वह इस बात का प्रमाण है कि मन अपने तक सीमित क्षेत्र में ब्रह्मांड के प्रकाश-वर्षों की सीमाएं नाप सकने में समर्थ है वैदिक व्याख्यान माला में मन का “प्रचण्ड वेग” नामक प्रवचन में पंडित दामोदर सातवलेकर जी ने एक घटना का वर्णन किया है वह इस तथ्य का प्रकट करती है कि हम यदि ध्यान और विविध योग साधनाओं द्वारा अपने मन को सूक्ष्म पवित्र और नियंत्रित कर सकें तो वेद के अनुसार संसार के किसी भी क्षेत्र में होने वाली गतिविधि को संजय की दिव्य दृष्टि की तरह देख सकते हैं।

पं0 सातवलेकर जी लिखते हैं- वर्धा की अँग्रेजी पाठशाला में म॰ गोविन्द राव बावले अध्यापन का कार्य करते थे। उनकी धर्म-पत्नी चन्द्राबाई अपने बच्चे कमल के साथ सतारा जिले के ग्राम औंध अपने पिता के घर गईं थी। 1918 का अक्टूबर मास उन्होंने पति को चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा कि मैं अमुक दिन वर्धा पहुँच रही हूँ। सामान्य अवस्था में श्री बावले का पत्नी की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं था पर जब उनके आने की बात पता चला तो स्वभावतः प्रेम और मिलन की इच्छा उत्पन्न हुई। यही बात उनकी पत्नी के मन में भी हुई दोनों एक दूसरे का ध्यान और स्मरण करने लगे। ध्यान दो मनों को जोड़ता है, यही उसकी वैज्ञानिकता है गायत्री उपासक सूर्य का ध्यान करने से मेधा बुद्धि, प्रज्ञा आत्म-बल, शक्ति, शरीर में लाल कणों की वृद्धि, आरोग्य और दूसरों के मन की आने वाली घटनाओं के पूर्वाभास पाने लगता है उसका भी यही कारण है कि सविता--सूर्य सारे सौर मंडल का नियामक है उसके लिए सौर मंडल का कोई भी क्षेत्र समय, गति और अपने ब्रह्मांड से परे नहीं। उसका प्रकाश समस्त सौर मंडल को आवृत किये है इसलिए वह सभी क्षेत्र की गतिविधियों को एक ही दृश्य में देखता है बुध उसके सबसे पास 36000000 मील की दूरी पर है हम पृथ्वी वासी उसी को देखना चाहें तो बड़ी बड़ी दूरदर्शी मशीनों की आवश्यकता होगी पर उसके लिए तो बुध से भी 800 गुना अधिक दूरी वाला नेपच्यून भी ऐसे ही हैं जैसे परिवार के बच्चे। पर जब कोई व्यक्ति ध्यान द्वारा सूर्य को अपने अन्दर धारण करने लगता है तो उसकी मानसिक शक्ति आत्मिक व्यापकता में परिणत होने लगती है। यह घटना उसका उदाहरण है।

एक दूसरे को याद करने और मिलन की सुखद कल्पनाओं का क्रम दो तीन दिन तक चला एक दिन चला एक दिन एकाएक श्री बावले जी के मन में अनायास भयानक उदासी छा गई और उदासी बढ़ती गई। मित्रों के समझाने का भी कुछ असर न हुआ जबकि न तो कोई अशुभ पत्र आया था न अशुभ संवाद। उनका मन रह-रहकर औंध (सतारा) जाने के व्याकुल हो उठता। यदि उनका मन अत्यन्त निरामय और सूक्ष्म होता तो वह सारी बातें जो व्याकुलता के रूप में व्यक्त हो रहीं थीं तभी जान लेते पर ऐसा न हुआ। रात सोने पर उन्हें ऐसा लगा पत्नी कह रही हैं- आप आकर मुझे ले जाते तो क्यों ऐसा होता, अब जा रही हूं, रात में स्वप्न में मिला यह संकेत कितना स्पष्ट था यह उन्हें तब मालूम पड़ा जब अत्यधिक बेचैनी के कारण वे स्थिति सहन न कर सके और अपनी ससुराल गये वहाँ उन्होंने अपनी पत्नी को मृत पाया।

मन सामान्य स्थिति में अपने शरीर अपने विषयों के सुखों तक सीमित रहते रहते इतना स्थूल और संकीर्ण हो गया है कि वह दूरदर्शी घटनाओं का दृश्य और अनुभूति तो दूर, विचार और कल्पना भी नहीं कर पाता पर स्वप्न की अवस्था में उसके इन्द्रियों आदि के विषय सिमट कर आत्मभूत हो जाते हैं भले ही स्वप्न में अधिकाँश समय मन की कल्पनायें प्रधान रहती हों पर रात के किसी भी क्षण यदि वह आत्मा की ‘फ्रीक्वेंसी’ पर पहुँच जाता है तो व्यापक क्षेत्र की अनुभूतियाँ प्राप्त कर लेता है स्वप्नों का भविष्य में सत्य होना उसका स्पष्ट प्रमाण है। “सखाइवल आफ मैन” पुस्तक के पेज 112 में सर ओलिवर लाज ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि कोई माध्यम है अवश्य जिसके कारण अलौकिक ज्ञान हम तक पहुँचता है भले ही हम उसे न जान पाते हों उन्होंने इसी पुस्तक के 106-107 पेज में अपने कथन की पुष्टि में एक घटना भी दी है वह यों है- दृष्टि

पादरी इ॰ के इलियट अटलाँटिक समुद्र पर समुद्री यात्रा में थे 14 जनवरी 1887 की रात उन्होंने एक स्वप्न देखा कि उनके चाचा का पत्र आया है जिसमें छोटे भाई की मृत्यु की सूचना है। उन्होंने अपनी डायरी में इस घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि मैंने जब स्विट्जरलैंड छोड़ा तब भाई को सामान्य बुखार था पर वह मर जायेगा इसकी तो मन में कल्पना भी न आई थी, पर मैं जब इंग्लैण्ड पहुंचा तो मुझे जो सूचना मिली वह बिलकुल वही और वैसी ही थी जैसी समुद्र में स्वप्न में देखी थी इसका कारण परोक्ष दर्शन (क्लेयर वायेंस) के अतिरिक्त क्या हो सकता है ?

इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विज्ञान समस्त जानकारियां हमारे भारतीय आचार्यों, योगियों तथा तत्वदर्शियों की है। मांडूक्योपनिषद् में बताया है- स्वप्न स्थानाहुन्तः प्रज्ञः सप्ताँग एकोनविंशति मुखः प्रविविक्त भुक् तैजसो द्वितीयः पादः स्वप्न स्थान स्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वा द्वोर्त्कषति ह वै ज्ञान संततिं समानश्च भवति ॥ 10 ॥

अर्थात्-स्वप्न अवस्था में मन जाता है तब उसकी प्रज्ञा बुद्धि अन्दर ही काम करने लगती है और वह आत्मा रूप हो जाता है। इस समय इसके सात अंग (अर्थात् पांचों तत्वों की सूक्ष्म अवस्थायें या सूक्ष्म शरीर अहंकार और महत्तत्व), उन्नीस मुख (7 ज्ञानेन्द्रियां, 7 कर्मेन्द्रियां तथा पांच प्राण) भी उसी में लीन हो जाते हैं जिनसे आत्मा शरीर के समान ही संसार का भोग करता है। यह आत्मा का तेजस द्वितीय पाद है अर्थात् यह जागृति और सुषुप्ति के बीच की अंतर्दशा है उसकी अनुभूति आत्म तत्व की खोज में बड़ी सहायक हो सकती है।

शास्त्रों में सूर्य को इस जगत का आत्मा का है। आत्म पूजितोपनिषद में-”सूर्यात्म कत्वं दीपः” अर्थात्- सूर्यात्मकता ही दीप या सूर्य तेज में मन के विलय की स्थिति ही आत्म-साक्षात्कार ह। समस्त सूर्य मंडल एक प्रकार से सूर्य की प्रकाश-तरंगों का विद्युत् सागर है। देखने में ऐसा लगता है कि आकाश पोला और अँधेरा है पर यह बात सन् 1800 में ही यूरेनस की खोज करने वाले वैज्ञानिक लियम दर्शल ने बता दी थी कि अन्धकार नाम की कोई सत्ता संसार में है ही नहीं कण-कण में प्रकाश घुला हुआ है भले ही हमारी बाह्य आँखें उसे न देख पाती हों। अँधेरे में फोटो “फिल्में” धोने का आविष्कार इसी वैज्ञानिक सिद्धाँत पर आधारित है फिर भी हम उस सर्वव्यापी प्रकाशवान् विद्युत् आत्मा की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते उसका कारण है कि उसी माप, पवित्रता, प्रकाश पूर्णता, शुद्धता और तत्व की विद्युत् हमारे पास नहीं हमारा मन दूषित रहता है। अस्पष्ट स्वप्न, स्वप्नों में भय और विकार इसी बात के प्रतीक है कि हमारा मन अस्त-व्यस्त, अपवित्र है ऐसे बुरे स्वप्नों का कारण-

यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते।

अर्थात्- हमारे अज्ञान और पाप-मन के कारण दुःस्वप्न आते हैं। उनके परिहार का कारण बताते हुए ऋषि लिखते है-

स्वप्नं सुप्त्वा यदि पश्यसि पापं। पर्यावर्ते दुःष्वप्नात्पापत्स्वप्न्याद भूत्या। ब्रह्माहमंतरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः॥

अर्थात्- यदि स्वप्न में बुरे भाव आते हैं तो उन्हें अज्ञान, पाप और आपत्ति सूचक समझ कर उनके परिष्कार के लिए ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये जिससे मन के अंदर सतोगुण की वृद्धि होकर अच्छे स्वप्न दिखाई देने लगे और आत्मा की अनुभूति होने लगे।

ऊपर दी शास्त्रीय व्याख्याएं अब वैज्ञानिक सत्यता की आरे अग्रसर हो रही है इसलिए आत्मा की शोध, स्वप्न परिष्कार और विकास के विज्ञान की संभावनायें भी बढ़ चली है सत्य स्वप्नों की क्षणिक अनुभूति का कारण मन का शरीर में आत्मा के प्रतिनिधि सुषुम्ना शीर्षक में पात या मिलाप है। जागृत अवस्था में शरीर और मन का नियंत्रण मस्तिष्क से होता है। मस्तिष्क के उभरे हुये भाग को “गायराई” कहते हैं दो “गायराई” के बीच एक दरार होती है इसे “सलकस” होता है इसे केन्द्रीय (सेन्ट्रल सलकस) कहते हैं इसी के सामने गायरस में सारे शरीर को आज्ञा देने वाले कोष होते हैं। इन कोषों का शरीर की हर क्रिया पर नियन्त्रण होता है। आने वाली नसें (इफरेन्ट नर्व्स) सूचना लाती और जाने वाली (इफरेन्टे सूचना ले जाती है। जटिल से जटिल समस्यायें यह कोष ही सुलझाते हैं किन्तु जब मनुष्य सो जाता है तब सुषुम्ना के अनद का ‘ग्रे मेटर’ मस्तिष्क जैसे कार्य करने लगता है उस समय मस्तिष्क को इन सूचनाओं से अवगत रहना आवश्यक नहीं उदाहरण के लिये सोते हुये मनुष्य के शरीर पर मक्खी बैठे तो हाथ उसे हटा देगा पर जागने पर मस्तिष्क को उसका ज्ञान नहीं होगा क्योंकि यह कार्य सुषुम्ना ने किया। सुषुम्ना इड़ा और पिंगला (इड़ा- बाँई नाड़ी है जिससे सारे शरीर के बाँये अंगों को नाड़ियां जाती है।) पिंगला- दाँई नाडी है जिससे सारे दायें अंगों को नाड़ियाँ जाती है योग शास्त्रों में 72864 नाड़ियाँ बताई है। के मध्य की स्थिति अर्थात् ऋण व धन दोनों विद्युत् कणों का-या विद्युतीय अवस्था है वह इनसे सम्बन्ध रखती है पर उसका मुख्य सम्बन्ध आकाश से है। इसमें आकाश की सी ही पोलाई और वहीं द्रव्य प्रकाशवान् है इसे ही वह सुई कह सकते हैं जो सूर्योत्मकता आकाश या ब्रह्माण्ड के रहस्यों से मन का सम्बन्ध जोड़कर उसे व्यापक बनाती है। आत्मा से सम्बन्ध जोड़ती है। गायत्री उपासना या योग-साधनाओं से नाड़ी शोधन क्रिया होती है शुद्ध हुई सुषुम्ना में मन का प्रवाहित होना ही दिव्य स्वप्न दिखाता है उस समय एक विराट क्षेत्र में हमारी चेतना तैर रही होती है इसीलिये दिव्य आकृतियाँ, ग्रह नक्षत्र, पर्वत नदी, हरे-भरे स्थान दिखाई देते हैं। हमारे संस्कारों में अनेक जन्मों की स्मृतियाँ होने के कारण मन की चंचलता रेडियो की खड़खड़ाहट की तरह तब भी रहती है पर इन अनुभूतियों का लाभ कठिन परिस्थितियों में भी निरन्तर आत्म-विकास की और उन्मुख रहने में लिया जा सकता है।

स्वप्नों का सत्य होना उसके स्पष्ट प्रमाण है वैसे प्रमाण सैंकड़ोँ संग्रहित है वह अखण्ड ज्योति में पहले भी छपे आगे भी छपते रहेंगे पर उनकी सार्थकता तभी है जबकि हम आत्मा की प्राप्ति में मन के महत्व को समझें और उसे शुद्ध पवित्र बनाने के संकल्प और साधनाओं का अभ्यास करें।


बाल्यावस्था की नींद वृद्धावस्था में टूटी

स्टाक होम (स्वीडन) के पास मोस्टेरीज नाम का एक शहर है। घनी बस्ती के बीच एक कन्या पाठशाला। नगर के एक सम्भ्रान्त व्यक्ति की 13 वर्षीया कन्या करोफ्लाइम कार्ल्सडाटर इस स्कूल में पढ़ने जाया करती था। एक दिन की बात है कि रात्रि में पूर्ण नींद लेने के बाद भी उसे निद्रा का आवेश सा आता रहा। अपने आपको जागृत रखने का बहुतेरा प्रयत्न करने पर भी बेचारी रोक न सकी अकस्मात् पढ़ते-पढ़ते डेस्क पर रखी अपनी पुस्तकों में सिर रखकर सो गई।

सोना यों जीवन की सामान्य सी घटना लगती है। तो भी प्रत्येक व्यक्ति जीवन का एक तिहाई भाग सोकर गुजारता है। साठ वर्ष की आयु कहने की अपेक्षा यह कहना चाहिये कि वह चालीस वर्ष का जिया शेष 20 वर्ष उसने सोने में बिताये। सोना जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है जो शक्ति आहार से विश्राम और जागृत शिथिलीकरण से भी नहीं मिलती वह सोने से मिलती है सोकर जागने पर हर व्यक्ति नई शक्ति, नई स्फूर्ति अनुभव करता है इसलिये यह मानना चाहिए सोना जीवन के लिए अनिवार्य है।

भारतीय दर्शनकारों ने निद्रा को अज्ञान का प्रतीक माना है-”अभाव प्रत्ययालम्बनावृत्तिर्निद्रा” अर्थात्- ज्ञान के अभाव का जो आलम्बन करें और जो अज्ञान तथा अविद्या के अन्धकार में फँसी हुई वृत्ति होती है उसे निद्रा कहते अभाव ज्ञान के आश्रय पर ही निर्भर वृत्ति का नाम निद्रा है।

योगी इसे तमोगुण प्रधान वृत्ति मानते हैं। मृत्यु और निद्रा दोनों एक एक समान है। रात्रिकालीन निद्रा शरीर में तमोगुण वृद्धि से उत्पन्न शिथिलता के कारण आती है और मृत्यु अज्ञान एवं वासनाओं द्वारा प्राण के ह्रास द्वारा आती है पहली कुछ घण्टों की होती है दूसरी कई-कई वर्ष की होती है। पहली निद्रा टूटने पर जिस प्रकार मनुष्य अपने पिछले जीवन की याद रखता है और जहां से क्रम छोड़ा था आगे का काम शुरू कर देता है इसी प्रकार मृत्यु की निद्रा के उपरान्त मनुष्य अपनी वासना के अनुसार-

काले काले चिता जीवस्त्वन्योऽन्यो भवति स्वयं। भविताकार वानंत वसिना कलिको दयात्॥

अपने भीतर की वासना को मूर्तरूप देने की इच्छा से आकार धारण करने के लिए जीव अपना शरीर बदलता रहता है।

प्रस्तुत घटना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अज्ञान की अवस्था पार कर लेने के बाद संस्कार रूप से अपनी पूर्व इच्छाओं और वासनाओं के अनुसार कार्य प्रारम्भ करता है यद्यपि परिवार और परिस्थितियां मोड़ देने में महत्वपूर्ण क्षमता रखती है बौद्धिक क्षमतायें पूर्व विकास क्रम के अनुसार ही होती है, कारोफ्लाइन जब सो गई ताक उसके अध्यापकों ने उसे जगाने का बहुतेरा प्रयत्न किया पर वह प्रगाढ़ निद्रा में जा चुकी थी जगना असम्भव है यह जानकर उसे घर भेज दिया गया। एक दिन, दो दिन, तीन सप्ताह, माह, वर्ष बीत गया पर लड़की की नींद न टूटी। डाक्टरों, वैज्ञानिकों, शरीर विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों ने सार प्रयत्न कर लिये पर कारोफ्लाइन की नींद नहीं टूटी। उसे दूध, फलों का रस और इन्जेक्शन दिये जाते रहे जिससे शरीर की गतिविधियां सामान्य ढंग से चलती रही पर करोफ्लाइन की एकबार लगी नींद फिर टूटी ही नहीं।

निरन्तर सुरक्षा और प्रतीक्षा के 23 वर्ष बाद जब नींद टूटी तब वह 39 वर्ष की अधेड़ हो गई थी। युवावस्था नींद में चली गई का वह प्रत्यक्ष उदाहरण थी। जागते ही उसने पुस्तकें मांगी जहां से पढ़ाई का क्रम छोड़ा था वहीं से फिर प्रारम्भ कर दिया।


नाभि में बैठा हुआ सूर्य

सन् 1968 में फ्यूजी टेलीविजन कम्पनी जापान के डाइरेक्टर्स भारत आये दिल्ली में उन्हें पता चला कि भारत में एक ऐसा व्यक्ति है जो कांच, लोहा, तांबा, पिन, कंकड़, पत्थर चाहे जो कुछ खा सकता है तो भी उसकी शारीरिक क्रियाओं में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने उस व्यक्ति को दिल्ली बुलवाया स्वागत में जहां अन्य अतिथि स्वाद युक्त भोजन पाते हैं चाय, नाश्ता करते हैं वहां इन बेचारों को कीलें, पिनें, टूटे प्लास्क और कांच के गिलास खाने को दिये गये। उन्होंने वही बड़े प्रेम से खाये और जापानियों को दंग करके रख दिया। जापानी उन्हें साढ़े तीन माह के लिए जापान ले गये उन पर तरह-तरह के प्रयोग किये पर कोई रहस्य न जान सके आखिर इस मनुष्य दैत्य के पेट में क्या है जो वह मोटर ठेले खा जाने तक की क्षमता रखता है।

दृश्य प्रकृति का सृजेता सूर्य माना गया है उसी प्रकार शरीर रूपी जगत का सृजेता भी सूर्य है जो नाभि में बैठा हुआ है। डॉक्टरों और वैज्ञानिकों द्वारा लगभग महत्व हीन नाभि को भारतीय योग शास्त्र में भारी महत्व दिया गया है। बच्चा गर्भावस्था में नाभि के द्वारा ही माँ के शरीर से जुड़ा हुआ होता है और उसके शरीर विकास के लिए उसे नाभि द्वारा ही सारी वस्तुएं प्राप्त होती है नाभि का विस्तार सारे शरीर में है। अंतर्दृष्टि जागृत करने वाली प्रत्येक साधना का प्रारम्भ को भी प्राणाकर्षण प्राणायाम की यथेष्ट मात्रा एकत्र कर लेने के बाद सर्व प्रथम “लोम विलोम सूर्य भेदन प्राणायाम” का ही अभ्यास करना पड़ता है। पातंजलि कृत योग दर्शन में बताया है-नाभिचक्रे काय व्यूह ज्ञानम्-- नाभि चक्र में चित्त वृत्तियों को स्थिर करने से नाड़ी आदि शरीरस्थ स्थूल पदार्थों का ज्ञान होता है। पाश्चात्य देशों में अब लोग इसे सोलर फ्लैक्सस के नाम से जानने भी लगे है किन्तु उनका ज्ञान अभी नहीं के बराबर है।

छांदोग्योपनिषद् में कहा है-

स य एवमेतं द्रथरन्तरमग्नो प्रोते वेद ब्रह्म वर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न डग्नि माचामेन्न निष्ठी वेत्तद व्रतम्॥

जो इस रथन्तर (नाभि स्थित) साम की अग्नि में उपासना करता है वह तेजस्वी, प्रदीप्त जठराग्नि वाला होता है पूर्ण आयु पाता है। प्रजा और पशु से सम्पन्न प्रतिष्ठा वाला होता है वह कीर्ति से भी महान् होता है- अग्नि की ओर मुख करके न कुछ खाये न थूके यह व्रत है।

योगवशिष्ठ ने तो इसी अग्नि को, सूर्य को जो नाभि में स्थित है कुण्डलिनी शक्ति का द्वार माना है और लिखा है-

मंसं कुयंत्र जठरे स्थिते श्लिष्टमुखं मिथः। ऊर्ध्वाधः संमिलत्स्थूलहृयम्भः स्थैरिव वैतसम्॥

तस्य कुण्डलिनी लक्ष्मीर्निलीनान्त र्निजास्पदे। पद्यराग समुद्रस्य कोशे मुक्तावली यथा॥

है राम- देह रूपी यन्त्र के उदर भाग में नाभि के पास परस्पर मिले हुये मुख वाली धौंकनियों के समान माँस का पिण्ड इस तरह थरथराता हुआ (सूर्य भी कम्पनशील प्लाज्मा या अग्नि ही है) स्थित है जैसे ऊपर और नीचे बहने वाले दो जलों के बीच में सदा स्थिर रहने वाला वेत कुँज उसके भीतर कुण्डलिनी शक्ति इसी प्रकार स्थित है जैसे मूंगे की पिटारी में मोतियों की माला।

योग-विद्या के यह तथ्य जितने तथ्य पूर्ण है उतने ही आश्चर्यजनक पदार्थ को शक्ति में बदलने वाले इस शक्ति केन्द्र की भारतीय योगियों ने तब शोध की थी जब पश्चिम शक्ति की परिभाषा करना भी नहीं जानता था। यों यह शक्ति सामान्य अवस्था में शिथिल और उपेक्षित पड़ी रहती है अमर्यादित आहार विहार के कारण उसका क्षय भी होता रहता है तथापि उस क्षय को रोककर आश्चर्यजनक काम किये जा सकते हैं। किन्हीं व्यक्तियों में वह प्रमाण स्वयं व्यक्त होता है। ऐसा ही एक विस्मय पूर्ण उदाहरण यहां भी प्रस्तुत है। साधारण तौर पर मनुष्य का पेट फल-फूल, अन्न और रस पचाने की जितनी अग्नि वाला माना जाता है यदि लोहा शीशा पचाने की बात आये तो भारी शक्ति वाली अणु भट्टी की आवश्यकता होगी। कोई व्यक्ति बिना किसी बाह्य रसायन अथवा यन्त्र की मदद से यदि इस्पात जैसी पत्थर जैसी कठोर और साइनाइड जैसे मारक विष खाकर पचा जाये तो यही तो प्रमाणित होगा कि उसके पेट उसकी नाभि में वस्तुतः कोई अग्नि कुण्ड होगा यह विश्वास दिलाना इसलिये आवश्यक है ताकि लोग जठराग्नि प्रदीप्त करने वाले प्राणायाम, योगासनों की महत्ता समझें। ताकि लोग शरीर और शरीर के लक्ष्य का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करें और मनुष्य जीवन में आने का उद्देश्य भी सार्थक कर सकें।

डॉ0 अलख मोहन माथुर नामक इस भारतीय आश्चर्य का जन्म अलीगढ़ में हुआ। वे जन्मे भी समय से पहले और उल्टा तथा जुड़वा जन्म-जात आश्चर्य पिण्ड श्री माथुर मानव आश्चर्यों के प्रतीक है। एक दिन, जबकि वे चंडीगढ़ में डाक्टरी करते थे, उन्होंने सुना कि एक बालिका धोखे से सुई खा गई। सुई खाते ही लड़की की स्थिति मरणासन्न हो गई। डॉक्टरों ने किसी तरह आपरेशन करके बालिका के प्राण बचाये। इस घटना ने श्री माथुर को बहुत विचलित कर दिया वे सोचने लगे क्या सचमुच मनुष्य इतना गया-बीता निर्माण है कि एक नन्ही-सी सुई उसकी जान ले ले। कौतूहल वश उन्होंने उसी शाम ब्लेड का छोटा-सा टुकड़ा खाकर देखा। प्रातःकाल पाखाने के साथ वह टुकड़ा निकल गया पर साथ में रक्त भी गया जिससे पता लगता था कि ब्लेड की खरोंचें लगी है। दूसरे दिन उन्होंने फिर ब्लेड खाया और कई दिन तक उसके निकलने की प्रतीक्षा करते रहे पर न ब्लेड के टुकड़े निकले और न रक्त। हैरानी बढ़ने पर उन्होंने एक्सरे कराया तो उन टुकड़ों का कहीं पता नहीं चला।

फिर एक-एक करके वे धीरे-धीरे आलपिनें लोहे के टुकड़े, शीशा, पारा, प्लास्टिक, तांबा चाहे कोई भी धातु चबाने और पचाने लग गये। यह कोई चमत्कार नहीं था एक तथ्य था जो इस शरीर रूपी अद्भुत मशीन विज्ञान से सम्बन्ध रखता था इसलिए उसकी छान-बीन प्रारम्भ हुई। दिल्ली के गोविन्द बल्लभ पंत हास्पिटल में बम्बई, कलकत्ता, लखनऊ, चंडीगढ़, अलीगढ़, गाजियाबाद में परीक्षण हुए डॉक्टरी जांच की गई पर कोई नहीं बता सका कि कौन-सा तत्व है जो इन अभक्ष भक्ष्यों को भी पचा डालता है।

जापानी डाक्टरों ने तो उन्हें कई-कई दिन तक एकाँत में रखा। खाने के तुरन्त बाद से लेकर दिन में वैसे कई-कई बार एक्सरे और अन्य प्रयोग किये पर कुछ भी जान न पाये आखिर यह कौन-सा बला विज्ञान है। उन्होंने श्री माथुर को एक सार्टीफिकेट दिया “विश्व भर में अद्भुत भारतीय” (वर्ल्ड सरप्राइज मैन आफ इण्डिया) की उपाधि ही वे दे सके श्री माथुर जी को।

अनेकों ख्याति प्राप्त अन्य वैज्ञानिकों ने, राष्ट्रपति और प्रधान मन्त्री तक ने उनके यह करिश्मे देखे है। “इण्डियन मेडिकल इन्स्टीट्यूट” के डॉक्टरों ने उन्हें सायनाइड खिला दिया। जिसका एक रबा जीभ पर रखने भर से वह मनुष्य को मार सकता है उसका भी कुछ असर न हुआ माथुर पर डाक्टरों को पसीना छूट गया। बेचारे हक्के-बक्के रह गये इस प्रयोग पर।

प्रयोगों से भरी दुनिया में यह भी एक प्रयोग था प्रयोग करते-करते एक दिन यह सिलसिला भी टूट ही जायेगा पर तब भी शायद ही लोग यह अनुभव कर सकें कि शरीर में एक कोई ऐसी सूर्य जैसी प्रचण्ड शक्ति भी है जिसका सम्बन्ध भौतिक जगत से न होकर आध्यात्मिक सत्यों से है। जिसे पाना और जानना हो तो भारतीय योग विद्या का पल्ला पकड़ना पड़ेगा और पदार्थ से भी शक्तिमान उस अनादि अविनाशी अक्षर तत्व का ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा। श्री माथुर का इस तरह का विवरण कादम्बिनी के जुलाई 1970 अंक में भी छपा था।


Quotation

सारी दुनिया का ज्ञान प्राप्त करके भी जो स्वयं को नहीं जानता उसका सारा ज्ञान ही निरर्थक है।


आत्म एवं सनातनो

आर्य पिता शुद्धोधन ने अनुमति देदी है तात ! राज-प्रासाद में घिरा हुआ जीवन नीरस-सा प्रतीत होता है, राज्य भोग अब तृप्ति नहीं दे पाते। प्रकृति--माता की गोद आकर्षित करती है उठो और स्यंदन (रथ) साजो, हम वन-विहार के लिए प्रस्थान करना चाहते हैं ? सिद्धार्थ ने सारथी को सम्बोधित करते हुये कहा।

“राजकुमार की आज्ञा शिरोधार्य !” कहकर सूतक ने उन्हें प्रणाम किया। अश्वशाला के श्रेष्ठतम चार चारु-काबुली हय निकाले उसने राश बांधी, अम्बरी डाली और चन्दन के बन रथ पर उन्हें जोत दिया। स्वर्ण-तार जड़ित राजसी परिधान धारण कर राजकुमार राज भवन से बाहर आये तो ऐसा लगा जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा छिटक कर नकल आया हो। सेवकों ने बढ़कर सहारा दिया। सिद्धार्थ रथारुढ़ हुये और अश्व-दल द्रुत गति से आगे बढ़ चला।

राजधानी के गगनचुम्बी भवन पार कर रथ जनपथ पर मंद मंथर गति से बढ़ रहा था तभी एक महिला पथ पार करने की शीघ्रता में लड़खड़ा कर गिर गई। बैरागी राजकुमार के आदेश से रथ रुक गया। कुछ लोग आगे आये महिला को उठाते हुए उन्होंने अभ्यर्थना की-कुमार देव ! रथ के कारण नहीं महिला अभाव जन्य स्थिति के कारण गिर गई है। महाराज ! निर्धनता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है,चार पुत्र पहले हो चुके हैं उस पर भी मातृत्व बोझ, सूखी रोटियां पर पलने वाली इस अभागिन को दो दिन से अन्न भी नहीं मिला। इसी से आशक्त हो गई यह इसमें आपका क्या दोष आप वन-विहार के लिये जाइये, देव ! जाइये।

सूत-पुत्र ने रथ आगे बढ़ाया। सिद्धार्थ ने प्रश्न किया तात ! अभाव किसे कहते हैं,यह महिला क्योँ अभाव ग्रस्त है ? हम अभाव ग्रस्त क्यों नहीं ? सूत पुत्र ने सिर ऊपर आकाश की ओर उठाया और फिर अश्वों की राश ढीली करते हुये कहा’-आर्य पुत्र ! जीवनयापन की सामान्य सुविधाओं का उपलब्ध न होना अभाव है संसार के लोग इस स्थिति में इसलिए है कि कुछ लोग सम्पत्ति का परिग्रह करने को बड़प्पन मानते हैं। आप राज पुत्र है महाराज ! सारी प्रजा के परिश्रम का लाभ आपको मिलता है तो आपको क्यों अभाव होगा-अभाव ग्रस्त तो प्रजा होती है जिसे मात्र शोषण की वस्तु मानकर सत्ताधारी लोग सताया करते हैं।

असमानता-संसार का एक दुःख है, रथ अब राजधानी पार कर चुका था तभी आगे से आता हुआ दिखाई दिया वृद्ध। जरा ने जीर्ण कर दिया था गात जिसका। कमर झुक गई थी, दांत टूट गये थे आंखें धंस गई थी एक लकड़ी के सहारे चल रहे उस वृद्ध को देखकर सिद्धार्थ ने दूसरा प्रश्न किया-सारथी ! इन आर्य पुरुष को क्या हुआ है जो झुककर चलते हैं ? दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुये सारथी ने निवेदन किया तात ! यह शरीर की चौथी अवस्था जरावस्था-सबको ही एक दिन वृद्ध होना पड़ता है। संसार का कोई भी व्यक्ति इससे बच नहीं पाता। इन्द्रियों की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है तब चाहे वह मूर्ख हो या पंडित, गृहस्थ हो या विरक्त, रंक हो या राजा सब की यही अवस्था होती है।

हम भी नहीं बच सकते तात ! हमें तो कोई अभाव नहीं विधाता को हम जरा को दूर रखने के लिए स्वर्ण दे सकते हैं, मणि-मुक्ता दे सकते है-सिद्धार्थ कह रहे थे और सारथी समझ रहा था तात, संसार के तुच्छ लोग लोभ और लालच में पड़कर नैतिकता का नियमोल्लंघन कर सकते हैं ईश्वरीय विधान तो पत्थर की चट्टान के समान अटल और अडिग होते हैं।

क्रम अभी चल ही रहा था कि सामने से कुछ ग्रामीण जन आते दिखाई दिये। वंश खपाटिकाओं पर श्वेत वस्त्रावेष्टित कोई वस्तु चार व्यक्ति अपने कन्धों पर रखे चले आ रहे थे उन्हें देखते ही सारथी ने रथ खड़ा कर दिया। रथ से उतर कर सारथी ने तीन पग आगे बढ़ा और भूमि प्रणाम कर प्रदक्षिणा की और फिर रथ में आ बैठा-हांकदी अश्व फिर चल पड़े।

राजकुमार जो अभी चित्रवत् देख रहे थे बोले-सारथी, यह कौन लोग है, इनके कन्धों पर क्या है। तुम इन्हें देखकर रथ से क्यों उतरे ? तुमने किस देवता को प्रणाम किया ?

एक दिन एक बच्चा था तात ! फिर वह बड़ा हुआ-सारथी समझा रहा था सिद्धार्थ को मानो वह कक्षा “अ” वर्ग के नव-प्रविष्ट विद्यार्थी हों-उसने विवाह किया, संतानोत्पत्ति की। ऐश्वर्य, भवन, पुत्र, कलम-न मालूम क्या-क्या अर्जित किया उसने पर मृत्यु के मुख में गया वहीं बालक है यह आर्य अब लोग इसे ले जायेंगे और अग्नि में भस्मसात् कर देंगे इसके पार्थिव शरीर को। मृत्यु का यह देवता बड़ा प्रबल है। इसे हर कोई प्रणाम करता है तात ! इससे आप भी बच नहीं सकते।

सांसारिक विषमतायें, जरा और मृत्यु-फिर संसार का सत्य क्या है सनातन क्या है ? सूत पुत्र ! राजकुमार का गला भर आया था, भावनायें - उमड़ने लगी थी। सारथी ने समझाया-तात ! ज्ञानी जन कहते हैं सत्य और सनातन तो यह आत्मा है जो उसे प्राप्त कर लेता है पार्थिक अभाव, अशक्ति, अज्ञान उसे दुःखी नहीं कर पाते ?

ठीक है सूत पुत्र ! अब तुम रथ रोक दो, पग-पग पर परिवर्तनीय साँसारिक सुख और वैभव व्यर्थ है आत्मा ही शाश्वत है तो फिर आत्मा को ही प्राप्त करना चाहिए और अब मैं उसे ही प्राप्त करने जाऊंगा-तुम यह रथ यह सन्देश लेकर लौट जाओ कि सिद्धार्थ अब कभी लौटकर नहीं आयेगा।

स्तक खड़ा-खड़ा निर्निमेष देख रहा था और तब तक खड़ा देखता रहा जब तक कि लक्ष्य-सिद्धि का साधक सिद्धार्थ पूरी तरह आंखों से ओझल नहीं हो गया।


सेठ का अभिमान

किसी धनी सेठ ने एक संन्यासी को भोजन कराने के लिए बुलाया। अपनी समृद्धि के गुमान में सेठ उनके आतिथ्य आदि तो भूल गया और कहने लगा- देखिये महाराज ! सामने के उस दरवाजे से लेकर उस बंगले तक हमारे मकान की हद है। बगल में ही अपनी मिल है। शाम को बाग देखने आइयेगा। उसे मैंने अभी तैयार कराया है। बम्बई में मेरी धर्मशाला भी है। तुम्हारे जैसे गरीब साधु भूखों न मर जाय, इसलिए एक अन्न क्षेत्र भी खोल देने का विचार है। लेकिन यह विचार भविष्य के लिए है। अभी तो लड़कों के साथ विलायत जाना है। क्योंकि सुधरे हुए देशों की रीति-भांति जितनी जानी जाय, उतना ही अच्छा। अतएव यह काम पहले कर डालने की इच्छा है। कदाचित् अन्न क्षेत्र न खुले तो भी चल सकता है। क्योंकि तुम्हारे जैसे मारे-मारे फिरने वालों के लिए आध सेर खिचड़ी दी ही जाती है, वह अन्न क्षेत्र ही है न ?

संन्यासी ने सोचा कि इसका अभिमान छुड़ा देना चाहिये। अतएव उन्होंने दीवार पर टँगे नक्शे को दिखाकर पूछा-’सेठजी ! दुनिया के नक्शे में हिन्दुस्तान कहाँ है ? सेठ ने एक निशान पर उँगली रखी। संन्यासी फिर पूछा-’तो इसमें बम्बई कहाँ है ? सेठ ने एक छोटे से निशान को दिखाकर बताया। संन्यासी बोला-’बस, यही बम्बई है। अच्छा, अब यह बताओ कि इस बम्बई में तुम्हारे महल, बँगले और इनमें रहने वाले कुटुम्बी कहाँ है ? सेठ ने कहा-’यह बातें सारी पृथ्वी के नक्शे में भला कहाँ आ सकती है।’

संन्यासी ने कहा-’जब पृथ्वी के नक्शे में तुम्हारी समृद्धि का नाम-निशान भी नहीं है, तब उसका अभिमान किस वास्ते करते हो ?’ सेठ संन्यासी की बात समझ गया और अभिमान छोड़कर पुण्य कार्य करने लगा।


हम निकृष्ट स्तर का जीवन न जिएं

संसार में ऐसे लोग भी दिखलाई देते हैं जो निकृष्ट कोटि के होने पर भी समुन्नत और सम्पन्न बने हुए है। किन्तु इन उदाहरणों से उत्कृष्टता का महत्व नहीं घट जाता। निकृष्टता कितनी ही सम्पन्न और धन वैभव से भरी क्यों न हो साधारण स्थिति में रह रही उत्कृष्टता के सम्मुख टिक नहीं सकती। मनुष्य एक महान व्यक्तित्व है उसका सबसे पहला लक्ष्य उत्कृष्टता ही है बाद में धन, दौलत और पद प्रतिष्ठा। उत्कृष्टता मनुष्यता का भाव-पर्यायी है। जिसने लोभ, लालच अथवा अयोग्य उदाहरणों से प्रेरित होकर उत्कृष्टता का परित्याग कर दिया उसने फिर अपने पास रखा ही क्या ? मनुष्य यदि मनुष्यता से रीत होकर भौतिक विभूतियों से सम्पन्न हो जाये तो क्या वह आशा कर सकता है कि उसे मनुष्य सम्बोधन से ही बुलाया जाये। निकृष्ट व्यक्ति भले ही आकार प्रकार और सूरत शकल में मनुष्य दीखता हो किन्तु वस्तुतः वह मनुष्य न होकर कुछ और ही होता है।

भौतिक विभूतियों को प्राप्त करने के लोभ में जो दिव्य तत्व उत्कृष्टता का त्याग कर देता है, वह उस मनुष्य की तर ही मूर्ख माना जाएगा जो रंगीन कांच के लोभ में हीरे मोती का त्याग कर देता है। कहां तो छाया की तरह चंचल, बादल की तरह अस्थिर और नश्वरता के दोष से दूषित भौतिक विभूतियां, जिसका भावाभाव दोनों ही दुःखदायी होते हैं और कहां मन, बुद्धि और आत्मा के साथ समग्र व्यक्तित्व को तेजस्वी बना देने वाली उत्कृष्टता। इतना अन्तर होते हुए भी जो उत्कृष्टता की अपेक्षा भौतिक विभूतियों को अधिक महत्व देकर निकृष्टतम बन जाने को तैयार है उसकी बुद्धि, भाग्य और भविष्य पर तरस ही खाना पड़ेगा। भौतिक विभूतियों और लौकिक सम्पदाओं का भी अपना एक महत्व है किंतु उसी सीमा तक जिस सीमा तक उनकी प्राप्ति का प्रयत्न और उपलब्धि मनुष्य की उत्कृष्टता को प्रभावित न कर पाये। जिस बिन्दु से भौतिक विभूतियों और लौकिक सम्पदाओं की ऐषणा उत्कृष्टता को प्रभावित करने लग जाएं वहीं से वे सर्वथा त्याज्य बन जाती है।

निकृष्टता की तुलना में उत्कृष्टता का गौरव न कभी कम हुआ है और न आगे होगा। उत्कृष्ट तथा महानुभाव लोग कितनी ही विषम तथा विपन्न परिस्थिति में क्यों न सन्तोष किये हों तब भी वे उस निकृष्ट की तुलना में संसार में सम्मानित और आदृत बने रहेंगे जिसने असत् मार्गों तथा उपायों द्वारा ढेरों धन दौलत इकट्ठी कर रखी है। संसार में दुष्टता और धूर्तता कितनी ही बढ़ जाये और सज्जनों का जीवन कितना ही कठिन क्यों न हो जाये तथापि यह युग-प्रभाव अधिक दिन नहीं ठहर सकता। अन्ततः उत्कृष्टता को ही स्थिरता और सफलता का श्रेय मिलेगा। संसार की सद्-सम्पत्तियों पर उसी का अधिकार होगा और उसी का अधिकार होगा और उसी की जीत का शंखनाद गूंजेगा।

निकृष्टता तथा दुष्टता की आयु अधिक नहीं होती। तथापि उत्कृष्टता की परीक्षा के लिये उसको भी संसार में आने का अवसर दिया जाता है। कमजोर और संदिग्ध व्यक्तियों को धोखे में डालने के लिए वह ज्वार की तरह बढ़कर आसमान छूने लगती है किन्तु कुछ ही समय बाद भाटे की तरह उतर कर भूमिसात् हो जाती है। निर्बल अथवा संदिग्ध व्यक्ति उसके उस उफान को देखकर विचलित हो उठते हैं और भाटे की प्रतीक्षा किये बिना ही अधीर होकर समुन्नति का साधन मानकर निकृष्टता की नीति अपना लेते हैं। निकृष्टता के आधार पर सम्पन्न बनते लोगों का सामयिक उत्थान ही नहीं देखना चाहिए। उनकी उस दशा को भी उसी जिज्ञासा से देखना चाहिए जो उनके कुकर्मों का परिणाम होती है।

उत्कृष्ट आदर्शों वाले सत्पुरुष अपना हर कदम खूब सोच-विचार और नाप-तौलकर रखते हैं उन्हें कदम के बढ़ने की उतनी चिन्ता नहीं होती जितनी कि उसके सही होने की। वे जो कुछ करते और कहते हैं उसे पहले मर्यादा सत्य और सुशीलता की कसौटी पर कस लेते हैं। इस सोच विचार और पहचान परख के कारण उनकी प्रगति अन्धड़ की तरह नहीं हो पाती। उनके कदम जिम्मेवारी के साथ उठते पड़ते और बढ़ते हैं। निश्चय ही उत्कृष्टता के पुजारी अन्धाधुन्ध उन्नति तो नहीं कर पाते । तथापि वे जो कुछ उन्नति और प्रगति करते हैं वह दृढ़, स्थायी और चिरंजीवी होती है। उसके किसी भी कोण में पतन की सम्भावना का एक नगण्य सा भी बीज नहीं होता।

प्रदर्शन के विभ्रम से मुक्त होने के कारण इस अन्धी तथा स्वार्थ पूर्ण दुनिया में उत्कृष्टता जल्दी पहचानी नहीं जा पाती किन्तु एकबार जब वह पहचान ली जाती है ते फिर उसको समाज शिर आंखों पर चढ़ाये बिना नहीं रह सकता। किसी प्रतियोगिता में हजारों प्रत्याशी भाग लेते हैं। उनके से बहुत से बड़े ही वाचाल प्रदर्शनकारी और शान-शौकत वाले और व्यक्तित्ववान भी होते हैं और बहुत से सरल सीधे और साधारण भी। किन्तु जब चुनाव होता है ते प्रदर्शन पूर्ण निकृष्ट प्रतियोगियों को दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया जाता है और साधारण, सरल तथा सीधा प्रत्याशी अपनी उत्कृष्टता के कारण चुन लिया जाता है।

उत्कृष्टता में एक अलौकिक तेज तथा आत्म-विश्वास रहता है जो हर जगह हर स्थिति और परिस्थिति पर अपना प्रभाव डालता रहता है। उत्कृष्टता ईश्वरीय तेज का ही एक अंश होता है उसको न तो प्रशंसित किया जा सकता है और न पराजित। उत्कृष्ट व्यक्ति अभाव तथा कठिनाई में भी अपने तेज से दमकता रहता है जबकि निकृष्ट व्यक्ति वैभव और विभूति की चमक के बीच भी मलीन तथा कलुषित बना रहता है। मानव जीवन की यह उपलब्धि कुछ छोटी उपलब्धि नहीं है। इसलिए किसी लोभ, लालच अथवा प्रेरणा में पड़कर मनुष्य को उत्कृष्टता से विमुख न होना चाहिए।

निकृष्ट उपायों द्वारा मिलने वाले वैभव तथा ऐश्वर्य की अपेक्षा उत्कृष्टता की रक्षा के साथ गरीबी स्वीकार कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। ईश्वर ने मनुष्य को सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी बनाया है और तद्नुसार उससे उत्कृष्ट आचरण की आशा भी की है। अपने प्रभु अपने पिता और अपने रचयिता की आशा पर पानी फेरना अथवा उसके उपकारी निर्देश का न मानना भयानक कृतघ्नता है। बड़ा भारी विश्वासघात है। बहुधा लोग सुखोपभोग के लिये धन की तृष्णा से प्रताड़ित रहा है करते हैं। वे सोचा करते हैं कि अधिक से अधिक धन की सिद्धि होनी चाहिये उसके लिये कितने ही निकृष्ट साधन प्रयोग क्यों न करना पड़ें चिन्ता नहीं। आज के समय के बहुत से लोग ऐसा कर भी रहे है। किन्तु यदि गहरी और पैनी दृष्टि से देखा जाये तो पता चलेगा कि उस निकृष्ट धन से वे जिस सुख का उपभोग करते दिखलाई देते हैं वह वास्तव में उनके दुःख का कारण बना होता है। उस वैभव और विभूति के बीच भी वे बड़े ही अशान्त भीत और असन्तुष्ट रहा करते हैं। उनके साथ वे जिन महा पापों का संचय अपने अन्तःकरण में कर लिया करते है वे शोक-सन्तापों के रूप में प्रकट होकर उनका सुख चैन छीनते रहने की अपेक्षा कहीं अच्छा है कि उत्कृष्टता की रक्षा करते हुये कठिन और अभाव पूर्ण जीवन अंगीकार कर लिया जाए। मनुष्य की शोभा इसी में है कि वह उत्कृष्टता में अपना गौरव समझे और अल्प साधनों में भी सन्तोष पूर्वक अपनी आवश्यकताएं पूरी करता चले किन्तु भूलकर भी निकृष्टता की ओर न जाये। उस अभाव पूर्ण उत्कृष्ट जीवन में जो आत्मिक सुख, स्वर्गीय शान्ति और आत्म गौरव प्राप्त होगा वह वैभव पूर्ण निकृष्ट जीवन की झूँठी सुविधा से लाखों से लाखों गुना महत्वपूर्ण है।


शराब जितना आप जानते हैं उससे भी खराब

एवरडीन (ग्रेट ब्रिटेन) का रहने वाला ट्रिमेन्स डीलीरियम बहुत शराब पीता। लोगों ने समझाया भी मित्र अपनी मृत्यु असमय क्यों बुलाते हो पर उसने किसी कि एक न सुनी। एक दिन शराब पीकर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। देखने में जान पड़ता वह अतीन्द्रिय लोक में किसी से बात कर रहा है। फिर वह बुरी तरह चीख-चीख कर रोने लगा। भयानक अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई।

डॉक्टर जेम्स किक्र शव का पोस्टमार्टम कर रहे थे। मस्तिष्क चीरा गया तो बदबू आई, स्त्रीज से थोड़ा द्रव निकाल कर डॉक्टर किक्र ने उसे सूँघा तो उल्टी होने को आई, एक अलग पात्र में रखकर माचिस जलाकर पास ले गये तो वह भभक कर जल उठा उसमें से नीली लपटें उठ रहीं थी जो इस बात का प्रमाण थीं-द्रव और कुछ नहीं शराब है जो ट्रिमेन्स पिया करता था।

अन्न खाने और पचाने की एक नैसर्गिक क्रिया है यदि निसर्ग (प्रकृति) का अनुकरण बन्द कर दिया जाता है तो वैसे ही उपद्रव कहीं भी उठ खड़े कर दिये। अन्न,फल, रस, दूध आदि खाते हैं। मुँह में लार, पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड आदि की मदद से वहीं अन्न रस बनता है रक्त बनता है उसी से हड्डियाँ, मेदा, मज्जा, माँस, वीर्य और तेजस का निर्माण होता है। सब कुछ स्वाभाविक रीति से चलता है। मनुष्य आनन्दपूर्वक हँसते-खेलते जीता रहता है किन्तु शराब ? शराब बहुत कम गर्मी में गैस बन जाने वाला विषैला तत्व है। इसे पीते ही रक्त की शिराओं में तीव्र हलचल उत्पन्न होती है वह इस शराब को अपनी ओर आकर्षित करती है गैस का गुण है पोले भाग में ऊपर उठना सो शराब भी ऊपर की और भागती है प्रारम्भ में यह गैस रूप में होती है जिससे मस्तिष्क में उत्तेजना होती है। मस्तिष्क अत्यन्त सूक्ष्म और कोमल कोषों (न्यूरान्स) और “न्यूराग्लिया” से बना होता है। सबसे ऊपर सेरेब्रम जिसमें भूरा पदार्थ ग्रे मटैर बालू की परतों के समान लहरियादार जमा होता है। यह लहरें और पर्तें जन्म-जन्मान्तरों के गुणों, संस्कारों बौद्धिक क्षमताओं की भण्डार होती है शराब का सीधा प्रकार इन्हीं पर होता है जिससे मनुष्य विक्षिप्त और पागल हो जाते हैं और मृत्यु तक हो जाती है। डॉ0 आर्मस्ट्रांग ने लिखा है कि मैंने कई शराबी ऐसे देखे है जिनकी मृत्यु के बाद हुई चीर-फाड़ में उनके मस्तिष्क से पाँच ओंस तक शराब निकली। इसकी के प्रभाव से मस्तिष्क सन्तुलन खो बैठता है फलस्वरूप शराबी कभी दंगा कर देता है, कभी अनाप-शनाप बकता, कभी किसी को मार देता और कभी स्वयं भी आत्महत्या कर लेता है।

सेरेब्रम के पिछले हिस्से में “सेरीबेलम” नामक लघु मस्तिष्क और उसके नीचे मेडुला आब्लाँगेटा होगा है यह मस्तिष्क और सुषुम्ना (स्पाईनल कार्ड) के मध्य की कड़ी होती है ओर शरीर के ताप आदि का नियन्त्रण करती है। शराब के प्रभाव से यह संस्थान भी लड़खड़ा जाते हैं फलस्वरूप शरीर शिथिल हो जाता है इन्द्रियों की क्षमतायें नष्ट हो जाती है सर्दी-गर्मी का प्रकोप सताने लगता है, कानों में सनसनाहट रहने लगती है। देखने, सुनने, सूँघने स्वाद चखने तथा स्पर्श द्वारा वस्तुओं की पहचान करने की सारी क्षमतायें नष्ट हो जाती है।

गीता में भगवान् कृष्ण ने एक चेतावनी दी थी-

स्मृति भ्रंशाट् बुद्धि नाशो। बुद्धि नाशात् प्रणश्यति॥

अर्थात्- स्मृति क्षय हो जाने से बुद्धि नष्ट होती है बुद्धि नष्ट हो जाने से प्राणों का अन्त हो जाता है। “शराबी व्यक्तियों की मस्तिष्कीय जाँच ने यह बात अब स्पष्ट साफ कर दी है। मस्तिष्क का आधा भाग ही कड़े कोशों का होता है। शेष आधा भाग जिन न्यूरान कोशों (सेल्स) से बना होता है उनकी संख्या लगभग 1000000000 (एक अरब) होती है। न्यूराँग्लिया इनसे भी सूक्ष्म होने से उनकी संख्या इनसे दस गुनी अधिक होती है इन्हें संस्कार कोष कहा जा सकता है इनकी क्षमता असाधारण होती है न्यूरान कणों का नियन्त्रित उपयोग सारे विश्व में ब्रह्माण्ड में विचार क्रान्ति उत्पन्न कर सकता है पर यह सम्भव है जबकि उनकी संवेदनशीलता--भावुकता बनी रहे। महापुरुषों ने प्रेम ओर भावनाओं में सारे विश्व को बाँध लिया और जिसे भी जिस राह चाहा चला दिया। इनकी क्षमताओं से संसार अपरिचित है योगी जानते हैं कि इन कणों में सारे विश्व-ब्रह्माण्ड का नक्शा खिंचा हुआ है ध्यानस्थ योगी एक न्यूरान कण को देखकर किसी भी ग्रह-नक्षत्र की हलचल, वाराणसी के तेली धनीराम के घर के कोने में बैठी हुई चींटी क्या कर रही है देख सकता है इन कणों की संवेदनशीलता को शराब जड़ से नष्ट कर देती है ऐसा व्यक्ति न तो भावुक हो सकता है और न किसी का हित चाहने वाला उसे पत्थर की तरह कठोर ही कहा जाना चाहिये ।इन कणों की समाप्ति, नाश ही प्राणों का सर्वनाश कहलाता है। शराब और धर्म में इसी कारण परस्पर विरोध बताया गया है। शराब पीने वाला सामाजिक शत्रु है क्योंकि उसमें भावनाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।

शराब मस्तिष्क ही नहीं इन्द्रियों की सामर्थ्य को भी नष्ट करती है। दरअसल इन्द्रियां भी मस्तिष्क से ही तो नियंत्रित होती है अतएव ऐसा होना स्वाभाविक ही है। एक मोटर ड्राइवर शराब पीकर गाड़ी चला रहा था। कुछ ही दूर जाकर उसने एक पेड़ से टक्कर कर दी। सड़क के किनारे दूर तक यह अकेला ही पेड़ था। बेहोशी टूटने पर उसके बयान के लिये गये तो उसने बताया वहां दो पेड़ थे मैंने सोचा इनके बीच से मोटर निकाल दूं तो ऐक्सीडेंट हो गया।

मस्तिष्क दांया-बांया दो भागों में बंटा है दोनों अलग-अलग काम करने में समर्थ हैं पर जब कोई शराबी पीता है तब दोनों का सम्बन्ध टूट जाता है उसी कारण ऐसा भ्रम होता है। फ्राँस में एक बर सैनिक शराब पीकर युद्ध करने गये कमाण्डर आगे खड़ा हुआ और बोला-अरे यह क्या कर रहे हो अपने को ही गोली मारोगे क्या, रायफलें उल्टी करो सैनिकों ने कहा-अरे हां आज तो सचमुच धोखा हो गया था। धोखे में धोखा हुआ रायफलें उल्टी चलीं और सैनिकों ने अपना ही घात कर लिया।

बन्दूक न भी चलाये तो भी शराब अपने आपमें आत्मघात है मनुष्य को इस पाप से बचना चाहिये शराब पीकर उसे पाशविकता को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिये।


शाह वजिद्दौला

शाह वजिद्दौला को शराब पीने की बुरी लत थी। जिससे वह असाध्य रोग से ग्रसित हो गया। हकीम ने दवा दी और कहा कि दवा प्रातः चार बजे नियमित रूप से खाई जाये और शराब पीने से परहेज रखा जाये। हकीम के जाने के बाद नवाब ने पहरेदार को बुलाया और कहा-सवेरे चार बजे घण्टा लगाने के बाद मुझे जगाने की जिम्मेदारी तुम पर है। यह कहकर नवाब ने शराब पी और सो गया।

नींद ठीक नौ बजे सबेरे टूटी तो नवाब ने गुस्से में भर कर सन्तरी को बुलाया और कड़क कर पूछा- तुमने मुझे चार बजे जगाया क्यों नहीं ? सन्तरी ने कहा हुजूरे आला-मैंने तो आपको कई बार जगाया पर आप खुद ही सोये रहे।

अच्छा यह बात है नर्म होकर नवाब ने आदेश दिया-जाओ फिर से चार बजने का घण्टा बजाओ। सन्तरी ने हुक्म का पालन किया। घण्टा सुनते ही नवाब ने दवा खाई और भरी धूप में घूमने चल पड़े। सन्तरी उसकी मूर्खता देखकर मुस्करा कर रह गया।


भूत की मान्यता निराधार भी साधारण भी-

मैन चेस्टर की टुल्ली स्ट्रीट पर स्थित छोटे से मकान के पास जैसे ही प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री डॉ0 जे0 डी0 विलियम्स पहुंचे घर के लोगों ने उनका स्वागत किया। इस घर में पति-पत्नी और उनके दो बच्चे कुल चार ही व्यक्ति रहते थे। चारों तब घर में ही उपस्थित थे।

घटना के विस्तार में जाने से पूर्व यह बता देना आवश्यक है कि हम भारतीयों की यह जो मान्यता है कि धन, पुत्र, वासना आदि पर आसक्ति रहते यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसे कई बार मृत्यु के बाद बहुत समय तक किसी भूत-प्रेत की योनि में रहना पड़ता है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में सदैव ही अनासक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। चार आश्रम- (1) ब्रह्मचर्य विद्याध्ययन, (2) गृहस्थ, (3) वानप्रस्थ, (4) और संन्यास में अन्तिम दो की अधिकाँश शिक्षायें और कर्त्तव्य ऐसे है जिनमें प्रत्येक व्यक्ति को धीरे-धीरे परिवार धन-सम्पत्ति का मोह हटाकर अपन मन परमार्थ-साधना में लगाना पड़ता था। संन्यास दीक्षा के बाद तो वह सब कुछ त्याग कर अपने आप को उस तरह अनुभव करता था जैसे मकड़ी अपने बने बनाये जाले को स्वयं खाकर संतोष अनुभव करती है। तक जिसके पीछे बेटे होते थे वह उनकी आवश्यकता की सम्पत्ति उन्हें देकर शेष लोक-कल्याण में लगा कर घर छोड़ देते थे और आत्म-कल्याण की साधना में जुट जाते थे।

मोहान्ध व्यक्तियों के प्रेत-योनि में जान का कोई वैज्ञानिक आधार तो अभी समझ में नहीं आता किन्तु बौद्धिक और प्रामाणिक आधार अवश्य है। हम में से अनेकों को भूत का सामना करना पड़ जाता है पर यदि सामान्य लोगों की बात को भ्रम या अन्धविश्वास माने जैसा कि अनेक लोग किसी स्वार्थ वश या किसी को धोखा देने के लिये भी भूत-प्रेत की बात कहकर डरा देते हैं तो भी संसार में कई ऐसी घटनायें घटी है जिनमें इस विश्वास को विचारशील लोगों का भी और सामूहिक समर्थन भी मिला है।

यह एक घटना ऐसी ही है और उसे स्वयं डॉ0 जे0 डी0 विलियम्स ने स्वीकार भी किया है। दिल्ली स्ट्रीट के अनेक लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा। श्री विलियम्स महोदय ने इस घटना को 3 सितम्बर 1968 के इन्दौर से छपने वाले दैनिक अखबार नई दुनिया में छपाया भी उनका यह लेख विश्व के अनेक अखबारों में छपा और बहुत समय तक लोगों की चर्चा का विषय भी बना रहा।

घर की स्त्री श्री विलियम्स को एक आलमारी के पास ले गई। यहीं पर वह भूत था जो दिखाई तो नहीं दे रहा था पर पूछे गये किसी भी प्रश्न और अपनी उपस्थिति का प्रमाण एक विशेष प्रकार की खटपट के द्वारा दे रहा था। उसके संकेत बड़े ही शिक्षित व्यक्तियों जैसे थे। अँग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षर “ए” के लिये वह एक बार (खटपट) की आवाज करता था। इसके आगे जो अक्षर जितने नम्बर पर पड़ता है उस अक्षर के लिये उतने ही बार बिना रुके खट्-खट्-खट् का उसने संकेत बना लिया था उसी के माध्यम से वह पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी देता था।

यह खेल सारे दिन चलता रहा। घर के दूसरी आरे ऐसी कोई वस्तु नहीं थी कि वहां से खट्-खट् की आवाज आ रही होती लोगों ने सारी सम्भावनायें पहले ही छानबीन लीं थी। श्री विलियम्स को तो बहुत देर बाद बुलाया गया था। उनकी पराविद्या में रुचि होने के कारण ही उन्हें सूचना दी गई थी। उन्होंने सब जांच पड़ताल कर ली पर उन्हें कोई भौतिक कारण न मिला जिससे खट्-खट् का सूत्र समझ में आता।

स्त्री ने सर्वप्रथम श्री विलियम्स का परिचय कराया। फिर पूछा- क्यों तुम यहाँ उपस्थित हो तो भूत ने उत्तर में सर्वप्रथम बिना रुके 24 बार खट्-खट् की (इससे अँग्रेजी के वाई अक्षर की सूचना मिलती है।) फिर थोड़ा रुक कर 5 बाद (ई) फिर रुककर 19 बार (एस) खट्-खट् की इस तरह उसने अंग्रेज में “यस” कहकर अपने वहाँ होने की सूचना दी।

इसके बाद श्री विलियम्स ने उससे अनेक प्रश्न पूछे-भूत ने उनमें से अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये पर ऐसे किसी भी प्रश्न से सहमति प्रकट नहीं कि न उनके उनके उत्तर ही बताये जो मनुष्य जाति के लिये हितकर नहीं होते। उदाहरण के लिये जुये, सट्टे, शराब सम्बन्धी प्रश्न उसने नहीं बताये। भूत का कहना था जिन बातों से वह स्वयं दुःखी है वह बात नहीं बतायेगा। पर इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि मनुष्य को मृत्यु के बाद जीवन की अनेक घटनाओं की ही नहीं भाषा आदि की भी जानकारी रहती है और उसमें भविष्य को भी जानने की क्षमता आ जाती है जो आत्मा के गुण का ही परिचायक है।

एकाएक श्री विलियम्स ने पूछा-”आप कौन हैं क्यों उपस्थित हुये है” इस प्रश्न के उत्तर में उसी खट्खट् विधि से उसने बताया-मैं इसी मकान में रहता था, जब मैं वृद्ध था तभी मैंने अपने घर वालों से कह दिया था कि मुझे कब्रिस्तान में दफनाया जाये पर मेरी इच्छा के अनुसार मुझे नहीं दफनाया गया।”

इसके बाद मैंने लोगों से पूछ कर उस मकान में रहने वाले पहले किरायेदारों का पता लगाया तो उनसे मालूम हुआ कि सचमुच उनके पिता ने मृत्यु से पूर्व इस तरह की इच्छा व्यक्त की थी।

एक और विलक्षण बात थी कि यह भूत तभी तक यह खट्-खट् की आवाज करता था जब तक घर में सबसे छोटा वाला लड़का उपस्थित रहता था। पहले कई दिन जब-जब स्कूल या घर से बाहर रहा भूत ने उपस्थिति नहीं दर्शायी। उस दिन श्री विलियम्स और एक पादरी को लाये। इनकी उपस्थिति में भूत एक दो बातों के सामान्य उत्तर दे सका था कि लड़का जो आज कई दिन छिपा-छिपा रह रहा था। उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। इसके बाद उसके माता-पिता को भी बच्चे की ओर से बड़ी चिन्ता हो गई उन्होंने दूसरा मकान ढूंढ़ कर उस मकान को ही बदल लिया।

श्री विलियम्स ने भूत सम्बन्धी जिन तथ्यों का पता लगाया उनमें से कई जानकारी की दृष्टी से बड़े उपयोगी हो सकते हैं। भूत किसी का अहित नहीं कर सकता यदि सकता है तो वह कोमल और भीरु मस्तिष्क वालों को डरा सकता है या शरीर पर किसी तरह का नियंत्रण कर सकता है। दूसरे भूत को जिस वस्तु में इच्छा होती है वह केवल उतना ही सोचता रहता और उसी का दुःख करता रहता है। जब तक उस अवस्था में भी उसकी यह इच्छा शिथिल नहीं पड़ जाती तब तक मृत्यु वाली निद्रा नहीं आती जीवात्मा दूसरे जन्म की तैयारी नहीं कर पाती।

निष्कर्ष यह कि जन्म-मरण के चक्र में परलोक और पुनर्जन्म के रूप में हमारी इच्छायें ही हमें नचाती हैं हमें अपनी इच्छाओं को अपने वश में करके संसार के यथार्थ को जानना और प्राप्त करना चाहिये।

शैतान का वश नहीं चलता-

महर्षि कबीर अपने शिष्यों से कहा करते कि ‘रोज सवेरे शैतान आकर मुझसे प्रश्न करता है-’आज तू क्या खायेगा ?” मैं जवाब देता हूँ- ‘मिट्टी खाऊँगा।’ वह पूछता है-’क्या पहनेगा ?’ मैं जवाब देता हूँ-’मुर्दे का कपड़ा।’ वह फिर पूछता है ‘रहेगा कहाँ !’ मैं जवाब देता हूँ-’श्मशान में।’

मेरे उत्तर सुनकर शैतान मुझे बड़ा अभागा बताकर चल देता है। क्योंकि मैं उन सभी चीजों से अनिच्छा प्रकट करता रहता हूं कि जिनमें वह संसार के प्राणियों को फंसाकर मनुष्य से राक्षस बना देता है। इसी से उसका वश नहीं चलता।


तुलसी भूर्महादेवी-अमृतत्वप्रदायिनी

गौ, गंगा गीता गायत्री की तरह तुलसी वृक्ष को भी भारतीय धर्म और संस्कृति का आवश्यक अंग मानना वैज्ञानिक ऋषियों, आचार्यों की उपादेयता के फलस्वरूप ही है। तुलसी के गुणों का वर्णन करते-करते शास्त्रकार थक गया तो उसने एक वाक्य में सारी गाथा समाप्त कर दी-

अमृतोऽमृतरुपासि अमृतत्वदायिनी। त्व मामुद्धर संसारात् क्षीरसागर कन्यके॥

विष्णु प्रिये ! तुम अमृत स्वरूप हो, अमृतत्व प्रदान करती हो, इस संसार से मेरा उद्धार करो।

तुलसी की पूजा-अर्चा से वस्तुतः कोई स्वर्ग उपलब्ध होता है या नहीं, ज्ञात नहीं किन्तु रोग-शोक के नरक में फँसे हुये लोगों के लिये तुलसी सचमुच ही इतनी उपयोगी पाई गई है कि उसे “उद्धार कर्त्री” ही कहा ज सकता है।

तुलसी के अनेक गुणों का प्रकाश उसके अनेक पर्यायवाची नामों से ही हो जाता है। तुलसी के पत्ते चबाने से मुँह में लार जो कि अत्यन्त पाचक, अग्निवर्धक, भूख बढ़ाने वाला तत्व है बढ़ता है इसलिये उसे सुरसा कहा है। दूषित वायु, रोग और बीमारी के कीटाणु-’वायरस’ रूपी भूत, राक्षस और दैत्यों को मार भगाने के कारण उसे भूतध्नी, अपेतराक्षसी तथा दैत्यध्वनी कहते हैं। हिस्टीरिया, मृगी, मूर्छा, कुष्ठ आदि रोग जिन्हें पूर्व जन्मों के पाप कहा जाता है वस्तुतः जो दीर्घकालीन विकृतियों (पापों) के फलस्वरूप असाध्य रोग पैदा हो जाता है और जो बहुत उपचार करने पर भी अच्छे नहीं होते वह भी तुलसी से अच्छे हो जाते हैं इसलिए उसे पापाघ्नी कहा गया है। इसका एक नाम फूल-पत्री है अर्थात् इसके पत्ते चबाने से शरीर शुद्ध होता है, शरीर में जीवनी शक्ति बढ़ाती और स्थिर रखती है इसलिये इसे “कायस्था” तेजी से प्रभाव डालने के कारण तीव्र तथा यह एक अत्यन्त सरल चिकित्सा है इसलिये इसे “सरला” नाम से भी पुकारते हैं। यह तुलसी के हजारों नामों में से कुछ एक हैं जो उसके महान् गुणों की आरे संकेत करते हैं। अँग्रेजी में इसे पवित्र बेसिल (होली बेसिल) कहते हैं तो फ्रेंच इस सन्त-बेसिलिक सेंट कहकर पुकारते हैं बेसिल शब्द का अर्थ भी शाही होता है उसी प्रकार लेटिन नाम भी उसकी पवित्रता के अर्थ में आते हैं खेद है कि ऐसे गुणकारी पौधे की उपयोगिता भुलाकर हम भारतीय प्रत्येक हिन्दू के घर में एक वेदी बनाकर उसमें “तुलसी वृन्दावन” स्थापित कर उसे पूजते और पुष्प चढ़ाते थे वहाँ अब आवश्यकता पड़ने पर ढूँढ़ने से यह किन्हीं-किन्हीं घरों में ही मिल पाता है।

इस देश की धर्म प्राण जनता उसके महत्व को भू न जाये इसके लिये अनेक ऐसे कथानक तैयार किये गये जो उसके महत्व को बढ़ाते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी विष्णु भगवान् की पत्नी कहीं गई तो कामदेव ने कहा-जिस प्रकार घर में कन्या का पालन-पोषण एक पवित्र कर्त्तव्य माना जाता है और कन्यादान से पुण्य माना है उसी प्रकार घर में तुलसी के पौधे को कन्या की तरह पाला-पोसा जाये और उसका विवाह किया जाये। उसके विवाह के कर्मकाण्ड वाले मंत्र भी तैयार किये गये। इतनी सारी महत्ता देने का अर्थ हर हिन्दू के मस्तिष्क में उसके प्रति गहरी आस्थायें पैदा कर देना था सो उसकी उपयोगिता देखते हुए कोई अनुचित बात नहीं हुई। तुलसी की इतनी आवश्यकता और उपयोगिता पहले कभी नहीं हुई इस युग में है इसलिये यदि उसे उद्धार कर्मी कहा जाये तो अत्युक्ति नहीं। आज जब कि विज्ञान ने सारा वायुमण्डल दूषित कर वायु प्रदूषण (एयर पोलूजन) की समस्या उत्पन्न करदी, नये-नये रोग पैदा हो रहे हैं, तुलसी ही परित्राण दिलायेगी। घर-घर तुलसी वृक्ष रोप कर ही हम इन विकृतियों से बचाव कर सकते हैं।

गौरी तंत्र तुलसी महात्म्य में बताया है-

तुलसी पत्र सहितं जलं पिबति यो नरः। सर्व पापविनिमुक्तो मुक्तो भवति भामिनि॥

तुलसी दल को जल में डालकर जो उस शीत-कषाय को पीते हैं वे अनेक रोगों में छुटकारा पाते है- चरणामृत वस्तुतः एक प्रकार का शीत-कषाय ही है। राज निघंटु करवीरादि 152 में बताया है कि यह स्वाद और भोजन की रुचि बढ़ाती है, कीड़ों और छोटे कृमियों को जो आंख से नहीं दिखाई देते (वायरसों) को मारती है। चरक ने इसे दमा, पसलियों के दर्द खांसी हिचकी तथा विषों का दूषण ठीक करने में लाभदायक लिखा है कफ दूर करती है, इसमें कपूर की तरह की एक सुगन्ध होती है जो दुर्गन्ध मिटाती है। घरों के आस-पास और आंगन में तुलसी लगाने का यह एक बड़ा भारी लाभ था जिससे आजकल अश्रद्धा वश हम वंचित हो रहे है। धन्वन्तरि निघण्टु में बताया है कि जो लोग इसकी पत्तियां साफ करके खाते रहते हैं उनकी पाचन-क्रिया विकृत नहीं होती। भाव-मिश्र कैकदय राजबल्लभ और मदनपाल आदि भेषजज्ञों ने इसे हृदय के लिये लाभदायक, त्वचा के रोगों को मिटाने में समर्थ पेशाब की जलन दूर करने वाली, उल्टी बमन रोकने वाली बताया है। अन्य औषधियों के साथ मिलाकर तो यह दूसरे भी रोगों को नष्ट करती वह औषधियोँ के प्रभाव को बढ़ा देती है पर इसका सबसे बड़ा लाभ आने समीप वर्ती वातावरण को शुद्ध रखना है जिसके लिये इसे रोपना, मिट्टी देना, पानी डालना, काटते-छांटते रहकर उसके विकास में मदद भर देना होता है। सायंकाल घृत दीप रख दिया जाये तो घृत मिश्रित वायु रात में निकलने वाले अनेक रोग कीटाणुओं को, दूर भागने के लिये विवश करती है।

आधाशीशी, जुकाम, बेहोशी, कान, नाक, सिरदर्द आदि में तुलसी बहुत लाभदायक होती है। विदेशों में उपयोग में आने वाली-”रिंग फार्माकोपिआ आफ इण्डिया” और कुछ नहीं तुलसी की ही नस्वार है जिसे जुकाम में रामबाण मानते हैं। तुलसी मंजरी का धुआँ खाँसी में लाभदायक होता है। बीज वीर्य रोगों के लिये लाभदायक होता है। लंका में इसे पान में रखकर खाते हैं इन दिनों चाय का प्रचलन बहुत अधिक हो गया है जिससे भूख न लगना, हृदय और वीर्य संखलन की अनेक बीमारियाँ बढ़ रही है उसके विकल्प के रूप में गुरुकुल काँगड़ी ने एक चाय बनाई है जो तुलसी से ही बनती है। हृदय और मस्तिष्क को शीतलता देने में तुलसी अमृतोपम है। पद्मपुराण में लिखा है-

तुलसी मृत्तिका लिप्तं ललाट यस्मदृश्यते। कुलं स्पृशति नो तस्य कलिर्भुनिवरोत्तम॥

अर्थात्- चन्दन की तरह तुलसी की मिट्टी या लकड़ी को घिस कर माथे में लगाने से वंश परम्परा के (अनुवाँशिक) रोग भी अच्छे हो जाते हैं। मलेरिया प्रजनन, बच्चों और स्त्रियों के रोगों में तुलसी का भारी महत्व है। चरक, सुश्रुत, तुलसी रहस्योपनिषद् राघवानुभव, गरुड़ स्कन्द, वायु और पद्मपुराण वृहत्स्तोत्र रत्नाकर गौरीतंत्र त्रिपाद् विभूति महानारायणोपनिषद्, हारीत संहिता, कैयदेव निघण्टु, भाव प्रकाश, वनौषधि प्रकाश, अड़यार पुस्तकालय की सामरहस्योपनिषद् धन्वन्तरि निधण्टु, राजमार्तण्ड आदि ग्रन्थ तुलसी की महान् व्याख्याओं और गुणों से भरे पड़े है।

पाश्चात् राजयनज्ञ भी अब इधर आकर्षित हुये है। प्रारम्भिक जाँच से पता चला है कि तुलसी के पत्तों में हल्के पीले तथा हरे रंग का एक उड़न शील तेल पाया जाता है जो दूसरे सभी पौधों से भिन्न होता है थोड़ी देर रखा रहने से वह स्फटिक आकार का हो जाता है इसे ”बेसी काम्फ्र” कहते हैं। इसे ही तुलसी कपूर कहते हैं। इसमें “तारपीन” भी होता है। यह कृमि कीटों के नाश में बड़े सहायक होते हैं। साथ ही उस क्षेत्र में रहने वालों को प्राण-जनित ऊष्मा प्रदान करते रहते हैं। इन लाभों को देखते हुए ही तुलसी को हर घर में प्रतिष्ठित किया गया था। आज तो उसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है। जगह-जगह तुलसी बन, तुलसी सैनेटोरियम, तुलसी वृन्दावन बनने चाहिये अर नहीं तो प्रत्येक घर में आँगन में कम से कम एक तुलसी का पौधा तो अवश्य ही रहे।


पुरुषार्थ और परिश्रम ही सजीवता का चिन्ह है।

केवल प्राण धारण किये रहना ही जीवन नहीं है। जीवन का वास्तविक अर्थ पुरुषार्थ में निहित है। उन्नति और प्रगति में समाविष्ट है। संसार में न जाने कितने लूले-लंगड़े, अन्धे, गूंगे, बहरे, पागल और विक्षिप्त लोग प्राण धारण किये रहते हैं, किन्तु वे एक प्रकार से मृत ही होते हैं। क्योंकि वे जीवन की प्रगति के लिये कुछ कर नहीं पाते। कीट-पतंगों की तरह केवल श्वांसों को ढोते हुए जिन्दगी के दिन पूरी किया करते हैं। इसी प्रकार मरण शैय्या पर पड़े हुए बहुत से असाध्य रोगी प्राण रहते हुए भी मृत ही होते हैं, क्योंकि वे जीवन की उन्नति के लिये कुछ नहीं कर सकते।

यों तो संसार में लाखों करोड़ों लोग रहते हैं। किन्तु उनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो सही माइनों में जीवित कहे जा सकते हैं। उन जीवित कहे जाने वालों में ही वे आते हैं जो पुरुषार्थी है। जीवन की उन्नति और प्रगति के लिये प्राणपण से परिश्रम करने में तत्पर है। यह संसार के पुरुषार्थी लोग ही होते हैं जो उद्योग के आधार पर स्वयं तो जीवन के उच्च शिखर पर पहुंचते हैं साथ ही दूसरे लोगों को जीने और आगे बढ़ने में मदद करते हैं। संसार की सुन्दरता, उसकी सम्पन्नता और प्रगति जो कुछ भी दृष्टिगोचर होती है उन महान पुरुषों के परिश्रम का ही है जो पुरुषार्थी कहे जाते हैं।

सरी सम्पत्तियां और सारी विभूतियां परिश्रम की अनुगामिनी होते हैं। परिश्रम एक उत्पादक शक्ति है। बिना परिश्रम के किसी प्रकार का निर्माण नहीं हो सकता। व्यक्ति व्यर्थ में पड़ा-पड़ा अपना समय खराब किया करता है वह किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता। परिश्रम से केवल सम्पदाओं और विभूतियों का ही लाभ नहीं होता उससे और भी अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। बलिष्ठता, प्रफुल्लता, चैतन्यता, स्फूर्ति, उत्साह आनन्द परिश्रम का ही पुण्य फल होता है। परिश्रम के बाद मनुष्य को जिस प्रगाढ़ निद्रा का अधिकार मिलता है उसकी तुलना ब्रह्मानन्द से की जा सकती है। परिश्रम एक ऐसा देवता है जो किसी भी समय मन चाहे वरदान देने को तैयार रहता है। परिश्रम की महिमा अपार है।

एक समय ऐसा भी था जब भारत में घर-घर नर-रत्न पैदा होते थे। देश की धरती विद्वानों, ज्ञानियों और सत्पुरुषों से भरी रहती थी। ऐसा नहीं कि उस प्राचीनकाल में भारत पर ईश्वर की कोई विशेष कृपा रही हो ओर आज न हो। उसकी कृपा तो सब कालों में एक जैसी ही बनी रहती है। किन्तु उसका लाभ अलग-अलग युग में लोग अपनी योग्यता और पात्रता के अनुसार पाते और ठाते रहते हैं। पूर्व काल की अपेक्षा सुख और समुन्नति के साधन आज अधिक है। तब भी लाग उस काल जैसी उन्नति करते दृष्टिगोचर नहीं होते। इसका एक ही कारण है कि आज का मनुष्य पूर्व कालीन पुरुषों की अपेक्षा कम परिश्रमी तथा पुरुषार्थी हो गया है। आज के सुख-साधनों ने उसे आलसी और प्रमादी बना दिया है। अधिक सुख और आराम जीवन की गति और उसकी प्रखरता को कुण्ठित बना देता है। मनुष्य में अकर्मण्यता और अदक्षता का दोष आ जाता है। यह दोनों दोष ऐसे है जो किसी भी व्यक्ति को उन्नति को प्रगति से रहित जीवन काटने पर विवश करते हैं।

पूर्वकाल में लोगों में ऐसे दोष कम थे। वे आराम और आलस्य का जीवन बिताने की अपेक्षा परिश्रम तथा पुरुषार्थ को अधिक महत्व देते थे। कितना ही कोई धनवान और साधन सम्पन्न क्यों न होता पर वह बिना परिश्रम किये जीवित रहना लज्जा की बात समझता था। साधारण व्यक्ति ही नहीं बड़े-बड़े श्रीमन्त लोग भी आलस्य और विलास से बचाने और उन्नति तथा श्रेयस्कर जीवन के योग्य बनाने के लिए अपने राजकुमारों और प्रिय पुत्रों को महलों के सुख सुविधापूर्ण वातावरण से हटाकर अभाव तथा कठिनतापूर्ण गुरुओं के आश्रम में परिश्रमी, कर्मठ तथा ज्ञानवान बनने के लिये भेज देते थे।

वहां जाकर वे राजकुमार और श्रीमन्तज सामान्य गृहस्थों के बालकों के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाते थे। उन्हीं की तरह साधारण भोजन करते और सामान्य वस्त्र पहनते थे। उन्हीं की तरह आश्रम का सारा सेवा कार्य अपने हाथों से करते थे। गौएं चराना, लकड़ी काटना, कन्दमूल लाना, कुशा व समिधाओं का सारा प्रबन्ध वे राजाओं और श्रीमन्तों के पुत्र उसी प्रकार करते थे जिस प्रकार दूसरे सामान्य गृहस्थों के बच्चे। राम लक्ष्मण का विश्वामित्र की संरक्षता में कठिन तथा कठोर परिश्रमपूर्ण जीवन बिताना प्रसिद्ध ही है और नन्दबाबा के लाड़ले कृष्ण संदीपन गुरु के आश्रम में रहकर अपने मित्र सुदामा के साथ लकड़ी काटने जाते थे।

यह तो कल्पना ही नहीं की जा सकती कि महाराज दशरथ और ब्रजपति नन्द बाबा के पास धन सम्पत्ति अथवा साधन-सुविधा की कमी रही हो जिसके कारण उन्होंने अपने लाड़लों का गुरुओं के आश्रम में भेज दिया हो, और न यही कहा जा सकता है कि महलों में वे उनके लिये शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध नहीं कर सकते थे। वे लाग पूरी तरह समर्थ और सम्पत्तिशाली थे। लेकिन परिश्रम, पुरुषार्थ तथा स्वावलम्बन की महिमा जानने के कारण ही उन्होंने अपने बच्चों को उस कठिन और कर्मठ वातावरण में भेजा था। यदि वे उनको महलों में रखकर ही उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करते तो निश्चय ही अपनी सन्तानों को आलसी, विलासी और सुकुमार बना देते। महलों के वैभव और विलासपूर्ण वातावरण में वह कर्मठ और स्वावलम्बन का वातावरण नहीं ही मिलता। यह उन गुरु आश्रमों में किये गये परिश्रम, पुरुषार्थ तथा स्वावलम्बन का ही फल था कि राम चौदह वर्ष का कठिन वनवास हंसते-खेलते काट सकने में समर्थ हो सके। साधनहीन तथा निःसहाय होने पर भी स्वावलंबन, प्रयत्न और आत्म विश्वास के आधार पर रीछ बानरों की सेना एकत्र कर रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु को परास्त कर सके। यदि उनमें पुरुषार्थ की विशेषता न होती तो क्या वे इतना बड़ा श्रेय सम्पादन कर सकते थे। इसी प्रकार यदि कृष्ण को महलों में रख कर आलसी और अकर्मण्य बना डाला होता तो क्या वे अनेक असुरों के साथ कंस जैसे अत्याचारी को मार सकते थ और महाभारत जैसे युद्ध का नेतृत्व कर सकते थे। वे पूर्वकालीन महापुरुष जो भी श्रेय सम्पादित कर सके उसका आधार परिश्रम तथा पुरुषार्थ की वृत्ति ही थी जो उन्होंने प्रारम्भिक जीवन में विकसित की थी। और आजीवन बनाये रखी थी। इसी परिश्रम परम्परा के कारण ही भारत भूमि पूर्वकाल में वीरों, साहसियों, पुरुषार्थियों तथा महापुरुषों से भरी रहती थी।

आज के युग में इस बात की कमी दीखती है। उसका कारण परिश्रम से वैमुख्य ही है। परिश्रम और स्वावलम्बन को आज हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। इसके विपरीत आलस्य और सुकुमारता को ऊंची दृष्टि से। यह विषय ही आज देश की उन्नति का अभिशाप बनकर खाये जा रहा है। आज आमतौर पर देखने में आता है कि जिनके पास थोड़ी सी भी सुविधा होती है वह अपने बच्चे को जमीन पर पैर नहीं रखने देते हैं। थोड़ी दूर पर स्थित स्कूल जाने के लिए सवारियों का प्रबन्ध करते हैं। पुस्तकें आदि लाने ले जाने के लिए नौकर साथ भेजते हैं। घर पर भी साधारण से साधारण कामों के लिए नौकर लगा दिये जाते हैं, जहां बच्चों को प्रारम्भ से ही इस प्रकार काहिल, आलसी और अकर्मण्य बनाने की परम्परा चल रही हो वहां देश काल में कर्मठ, क्रान्तिकारी और श्रेयकारी महापुरुषों की आशा करना उपहासास्पद ही माना जायेगा। ऐसी परम्परा और वातावरण में तो आलसी, विलासी और प्रमादी लोग ही उत्पन्न होंगे। सो हो रहे है, जोकि भोजन, वस्त्र और स्नान ध्यान तक के लिये भी नौकर पर निर्भर रहते हैं।

श्रीमन्तों की बात छोड़ दीजिये। आज उनकी देखा-देखी सामान्य लोग भी परिश्रम करने में हेठी समझने लगे है। विलासिता की ओर प्रवृत्ति ले जाने से उनमें परिश्रम से मुंह चुराने का स्वभाव विकसित होता जा रहा है। काम और अधिक लाभ की एक विचित्र प्रवृत्ति चल पड़ी, इसी प्रवृत्ति ने देश में चारों ओर निर्धनता, अभाव और भ्रष्टाचार का बोलबाला कर रखा है। परिश्रम पर ध्यान न देकर पारिश्रमिक की ओर देखने वाले कभी सच्चे पुरुषार्थी नहीं हो सकते। फलस्वरूप न तो वे जीवन में कोई उन्नति कर सकते हैं और न प्रगति। सिवाय इसके कि मृतकों की तरह अगतिमय जीवन काटें और कीट-पतंगों की मौत मरकर चले जायें। इसी अकर्मण्यता के कारण ही तो भारतीय जनता आज संसार में, साधन होते हुए भी गया गुजरा जीवन बिता रही है।

उन्नति और प्रगति करने की आकाँक्षा प्रायः सभी में होती है। सभी चाहते हैं कि मैं धनवान, श्रेयवान वा और सम्पत्तिवान बनूं। मेरे पास भी कोठी, कार और नौकर-चाकरों। मेरा भी लम्बा-चौड़ा व्यापार चले। ऐसा कौन होगा जो यह न चाहेगा कि उसका ज्ञान बढ़े, वह भी आत्मा परमात्मा के विषय में जाने, आध्यात्म मार्ग में उन्नति करके अक्षय सुख और शान्ति का लाभ करें। किन्तु इस प्रकार वांछाएं करते रहने से ही तो मनोरथ पूरे नहीं जाते। यदि ऐसा सम्भव होता तो संसार में सभी धन कुबेर बन जाते और सभी मोक्ष का परमपद प्राप्त कर लेते। वाँछाओं की पूर्ति परिश्रम तथा पुरुषार्थ द्वारा ही होती है। उन्हें पूरा करने का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। यदि उन्नति और प्रगतिमय मानवीय जीवन की इच्छा है तो उसके लिये कठिन से कठिन परिश्रम और पुरुषार्थ करना ही होगा। परिश्रम धरती का कल्पवृक्ष है। इसका आश्रय लेते ही मनोवाँछित फल मिलने लगते हैं।

बहुधा लोग बड़े-बड़े धनवानों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और श्रेयधारियों को देखकर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह लोग बिना कुछ काम किये ही मजे में जीवन बिता रहे हैं समाज में मान सम्मान और पूजा पा रहे है। किन्तु यह अनुमान गलत है। ऐसा सोचने वाले यदि समाज के अगस्थ लोगों के जीवन में पूरी तरह घुसे और निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो पता चलेगा कि वे लोग एक सामान्य आदमी की अपेक्षा कहीं ज्यादा काम और परिश्रम करते हैं। वस्तुतः उनका सारा जीवन ही कर्त्तव्य मय हो जाता है। उनका खाना-पीना, सोना-जागना, सब कुछ काम के क्रम से ही निर्धारित होता है। वे खाते हैं तो काम करने की शक्ति प्राप्त करने के लिये, सोते हैं तो काम के लिए नव स्फूर्ति पाने के लिए। मनोरंजन करते हैं तो काम के लिये नव जीवन पाने के लिये। तात्पर्य यह कि संसार के सारे बड़े और बढ़े हुए आदमियों का सम्पूर्ण जीवन ही काम के क्रमों की एक सारिणी होती है। उनके पास फालतू खोने के लिये एक क्षण का भी अभाव होता है। इतना परिश्रम करने पर ही वे समाज में प्रतिष्ठित स्थान पाकर दूसरों के लिये प्रेरणा के उदाहरण पन पाते हैं। कोई बिना परिश्रम और पुरुषार्थ के भी आगे बढ़ सकता है-यह बात अपने मस्तिष्क से निकाल ही देना चाहिये।

सारे श्रेय, सारी सम्पत्ति और सारे साधन परिश्रम तथा पुरुषार्थ के ही अनुगामी होते हैं। उन्नति की देवी उन्हीं को बरती है जो इस रंगभूमि में अपनी पात्रता प्रमाणित करते हैं। बड़प्पन उन्हीं को मिलता है जो अपने सम्पूर्ण जीवन को परिश्रम और पुरुषार्थ की वेदी पर समर्पित कर देते हैं। परिश्रम और पुरुषार्थ उन्नति के ऊंचे शिखर पर चढ़ सकता है। इसमें रंच मात्र सन्देह अथवा अतिशयोक्ति नहीं है।


काम करने से आदमी छोटा नहीं बनता

स्वर्गीय पंडित नेहरू आयु से वयोवृद्ध होते हुए भी मन से एक स्वयंसेवक ही थे। एक बार जब वे प्रधान मंत्री थे-कुछ लोग उनसे मिलने आये। आने वालों की संख्या अधिक थी और कुर्सियां कम। जब वे उस कमरे में आये तो देखा कि कुछ लोग खड़े है। उनके बैठने के लिये कुर्सियां नहीं हैं और कोई उधर ध्यान भी नहीं दे रहा है।

वे तुरन्त अन्दर के कमरे में गये और एक कोच को उठाने लगे। तत्काल कई नौकर दौड़ पड़े और उन्हें उठाने के लिये मना करने लगे वे उसे खींच ही लाये, यह कहते हुए कि “घर आये हुए मेहमानों के स्वागत के लिये, हर कार्य करना अपना धर्म है। काम करने से आदमी छोटा नहीं बनता।”


छूत अछूत का भेद

महात्मा प्रतिदिन जेल जाते और एक बन्दी को उपनिषद् पढ़ाया करते। बंदी काल कोठरी में था तो भी उसके जीवन में अपूर्व मस्ती, विलक्षण ओज झलक रहा था मानो वह उपनिषद् नहीं पढ़ रहा था सोम-रस का पान कर रहा था।

चढ़ाव-चढ़ाव हों, उतार न हों तो जीवन क्या ? संकल्प-विकल्प, शान्ति-संघर्ष, उतार और चढ़ाव का नाम ही तो जीवन है एक सी स्थिति होती तो संसार में गति न होकर केवल शून्यता होती। बन्दी का जीवन उसकी प्रकार बीत रहा था, महात्मा नियमपूर्वक उसे उपनिषद् पढ़ाने जाते रहते।

एक दिन वह आया जब उन महात्मा ने अपने शिष्य के मन में शान्ति आर प्रसन्नता का अभाव ही नहीं पाया, देखा कि उसके मन में कोई भय समा गया है, देखने से लगता था वह रात भर सोया नहीं था। महात्मा ने पूछा- तात् ! ऐसी क्या बात हो गई चिन्तातुर क्यों दिखाई दे रहे हो-उपनिषद् पढ़कर भी जो व्यक्ति शाँति न पाये समझना चाहिये उसके लिये संसार में और कहीं शान्ति नहीं।

आप ठीक कहते हैं गुरुवर ! बन्दी ने अत्यन्त विनीत से भाव से उत्तर दिया। किन्तु न जाने क्यों आज रात भर एक भयंकर स्वप्न ने मुझे पीड़ित करके रखा, नींद टूट गई तब से उस स्वप्न की भयंकरता मन से दूर नहीं होती ?

क्या था वह स्वप्न संन्यासी ने अगला प्रश्न किया- उस प्रश्न का उत्तर युवक एक गांव के कच्चे मकान में पाया। एक कोठरी दिखाई दी जिसमें मेरी मां बाल खोले बैठी-बालों को सुखा रही थी तभी मैं हाथ में तलवार लिये अन्दर चला गया और मां के बाल पकड़ कर उसे कोठरी से घसीटता हुआ बाहर बरामदे में ले आया। मां चिल्लाती रही मैंने छोड़ा नहीं--सहन में आकर मैंने तलवार से उसका वध कर दिया। ‘‘ आप जानते है अपनी मां को कितना प्यार करता हूं, मेरी मां मुझे कितना स्नेह करती है, जो बात मेरी कल्पना में भी नहीं आई स्वप्न में कैसे आ गई ? यह भयंकर स्वप्न रात कई बार देखा उसी कारण मन उदास है।

महात्मा ने कुछ विचार किया--पूछा कल खाना बनाया, बाहर से मंगाकर तो कुछ नहीं खाया। युवक ने उत्तर दिया नहीं गुरुदेव पर हां कल का खाना पहले से स्वादिष्ट अवश्य था लगता था किसी नये रसोइये ने बनाया हो। महात्मा जी ने कुछ पूछे बिना-बन्दीगृह के कारी के पास जाकर पूछा क्या कल किसी नये भोजन पकाया ? कारागृह अधिकारी न कहा हां-उसके साथ साथ ही उसका रिकार्ड मंगाकर तो पता चला कि वह गांव का रहने वाला है अपनी मां की हत्या के अपराध में आजीवन सजा आया है। हत्या की परिस्थितियां ठीक वहीं थी जो ने स्वप्न में देखी थी। महात्मा के कहने से उसे काम से छुट्टी दे दी गई।

महात्मा फिर अपने शिष्य के पास आये और बात समझाते हुये बोले-वत्स ! व्यक्ति के मानसिक स्पर्श मात्र से दूसरों को कितना प्रभावित कर सकता यह उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। पूर्वजों ने छूत-अछूत भेद अच्छे बुरे कर्मों के आधार पर बनाया था न कि से ही छूत-अछूत होने का सिद्धान्त, उसका कारण इस से समझ गये होगे।

युवक सन्तुष्ट हो गया, रसोइया बदल जाने से उसने वह स्वप्न भी नहीं देखा। यह कथा पौराणिक कल्पना नहीं सत्य घटना है जो महात्मा आनन्द जीवन में तब घटी जब वे रणवीर को जेल में पढ़ाने जाया करते थे। इसे उपनिषदों के सार में उन्होंने प्रकाशित किया है।


जल उठ रहीं आग की लपट

प्रजा ऋषि के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी आरोग्य और दीर्घजीवन के लिये। ऋषि विज्ञानवेत्ता थे प्रत्येक पदार्थ की तात्विक समीक्षा करने की महान् आध्यात्मिक सामर्थ्य उनमें थी सो प्रजा द्वारा मार्गदर्शन की याचना उचित ही थी। महर्षि ने बताया--

“सर्वेषाम् भेषजम अप्सुमें”। “जीवनाँ जीवनम् जीयोजगत्”॥

है मनुष्यों ! जल प्राणियों का प्राण है मैंने तुम्हारे लिये सभी प्रकार की औषधियां जल में सुरक्षित रखी है।

आपो इद्वाँ उभेषजोरायो अभीव चातकी। आपस सर्वस्य भेषजो स्तास्तु कृष्णन्तु भेषजः॥

यह जल औषधि है रोगों को नाश करने वाला उनका शत्रु है। यह तुम्हारे सभी रोग दूर करेगा।” “अप्स्वन्तर यमृतमप्नु” (अथर्ववेद) अधिक क्या कहना यह जल तो अतृप्त है।

जल के महत्व को भारत ही नहीं विश्व के सभी देश और वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। फिनलैण्ड में हजारों वर्ष से शनिवार के दिन सामूहिक स्नान करने की प्रथा है। बड़े घरों में लोग गृह-वाटिकाओं में तालाब रखते हैं। जर्मनी में कटि स्नान और जल-चिकित्सा को व्यापक महत्व दिया गया है। वहां के वैज्ञानिक ब्राण्ड लीभर मिस्टर तथा जीम सीन ने जल-चिकित्सा पर शोधकों और उसे बहुत लाभकारी बताया जिससे वहां जल-चिकित्सा का सर्वत्र प्रसार हुआ। कुछ तो गांव के गांव ऐसे है जहां घर-घर जल-चिकित्सा होती है। अमरीका के फिलाडेलिफिया, न्यूयार्क वर्जीनिया, पेन्सिलवेनिया में जल चिकित्सा का बहुत प्रसार हुआ है। वियना के वैज्ञानिक विन्टरनीज ने अपने यहां जल-चिकित्सा के क्लास चलाये। रोम, जापान, चैकोस्लोवाकिया में प्राकृतिक झरनों आदि में स्नान का प्रचलन है वहां स्नान पर वैज्ञानिक खोजें हुई है। भारतवर्ष में तीर्थों के महत्व के साथ वहां स्नान का महत्व अनिवार्य रूप से जुड़ा है। गंगाजी का जल तो अमृत की तरह पूज्य माना गया है। यह सब देखते हुये प्राणियों का प्राण कहा जाये तो उसमें जरा भी अत्युक्ति नहीं। आयुर्वेद का कथन है--प्रातःकाल सोकर उठते ही एक गिलास शीतल जल पीने वाला सदैव नीरोग रहता है, मस्तिष्क शीतल, पेट का पाचन संस्थान मजबूत, आंखों में चमक रहती है शुद्ध जल मनुष्य का जीवन है बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है।

खेद है कि जल को इतना अधिक महत्व देने और उसकी शुद्धता को अनिवार्य मानने वाली मनुष्य जाति ही आज उसे गंदा करके स्वयं भी नष्ट होने, बीमार और चिर-रोगी होने के सरंजाम उठा रही है। अमरीका के प्रसिद्ध विचारक श्री आर्थर गाडफ्रे एक संस्मरण में लिखते है-- मैं उन दिनों हैसब्राडक हाइट्स पढ़ने जाता था उन दिनों न्यूजर्सी में सैडिल नदी के तट पर पहला कारखाना लगा था, कारखाने की कीचड़ बदबू इस बुरी तरह से उस पर गिरती थी कि हम लोग स्नान नहीं कर सकते थे। स्वार्थी आरे पेटार्थी लोगों ने हरे निवेदन को नहीं सुना था और अब तो पैसाइक, हैकेनसैक खाड़ी, हडसन सारी नदियां नरक कुण्ड बन गई है सारा जल दूषित हो गया। मनुष्य जाति जल को दूषित कर आत्मघात की तरह स्वयं रोगी बनने जा रही है इसे उसकी भूल नहीं मूर्खता ही कहा जा सकता है।

वायु प्रदूषण के समान आज जल प्रदूषण भी संसार के सामने एक महंगी समस्या बन गया है। अधिकाँश शहर नदियों के तट पर बसे होते हैं भारी उद्योग शहरों में ही होते हैं। कनाडा आदि विकसित देशों में तो हाइपीरियन जैसे टैंक भी बनाये गये है जो शहरों का मल और गन्दगी को साफ कर देते हैं केवल शुद्ध किया हुआ जल ही नदियों में गिरने देते हैं किन्तु भारतवर्ष में तो शहरों के लाखों लोगों का मल-मूत्र भी नदियों में ही गिराया जाता है। गंगा आदि काल से हमारी संस्कृति का अंग वर्ष की 12 अमावस्याओं के 12 स्नान तो निश्चित ही है पर्व और त्यौहार अलग जिनमें आज भी करोड़ों लोग स्नान करते और बर्तनों में जल भर ले जाते हैं, आज अधिकाँश मल-मूत्र का प्रवाह हो गई है। ऋषिकेश के एण्टी बापोटिक कारखाने से लेकर कलकत्ते तक उसमें कितना मैला, कूड़ा कचरा गिरता है उसकी याद करने मात्र से जी सिहर उठता है और लगता है आज सचमुच ही गन्दगी की दृष्टि से दुनिया नकर हो गई है।

“शो डाउन फॉर वाटर” नामक जल प्रदूषण (वाटर पोलूजन) पुस्तिका में अमेरिका ने इस समस्या को अत्यन्त जटिल, परेशान करने वाली और वर्तमान--अस्त्र-शस्त्रों से भी भयंकर बताया है और लिखा है कि उस समस्या के हल के लिये किये जा रहे प्रयत्नों से कई गुना वह और भी जटिल होती जा रही है। अमेरिका ने 1965 और 1966 में ऐसे कानून भी बनाये है पर विज्ञान और भारी उद्योगोँ के विकास के पागलपन के आगे लाखों को मारने और करोड़ों को बीमार बनाने वाली इस मामूली ( ? ) सी समस्या पर कौन ध्यान दे कौन सोचे ?

इंग्लैण्ड में साबुन, फिनाईल, डी0डी0टी0 और केवल कीटाणु नाशक औषधियों के निर्माण के कारण 45 करोड़ गैलन पानी दूषित कर दिया जाता है यही पानी बाद में घरों में पहुंचता है तो उसमें से झाग उठने लगते हैं उसे देखकर कोई भी अनुमान कर सकता है कि यह जल था या केवल मात्र गन्दगी बह कर आई। अमेरिका में इंग्लैण्ड से चार गुना अधिक जल नागरिक प्रयोग में आता है। कम ज्यादा संसार के सभी देश ऐसी गन्दगी निकालते हैं यह सारी ही समुद्र में जाती है। अमेरिका अपने यहां की रद्दी समुद्र में झोंक रहा है, अभी कुछ ही दिन पूर्व उसने 1440 प्राण घातक नर्व गैसों के रैकेट भर-भर फ्लोरिडा के पास समुद्र में फेंके है। यह दूषण जहां जल का आक्सीजन नष्ट करता है वहां समुद्र का सन्तुलन बनाये रखने वाले जीव-जन्तुओं और पौधों को भी मारता है उससे समुद्र की शोभा नष्ट होने की हानि उतनी गम्भीर नहीं जितनी उसके अमर्यादित होने की अगले दिनों समुद्र के भीषण उत्पात मनुष्य जाति को तंग कर सकते हैं। गन्दगी मिले जल की भाप भी दूषित होगी, मेघ दूषित होंगे तब फिर जो वर्षा होगी वह रोगों की वर्षा होगी उसका प्रभाव सीधे भी मनुष्य जाति के स्वास्थ्य पर पड़ेगा और फसलों के द्वारा भी जल (वरुण) हमारा देवता है और देवता को शुद्ध करके नहीं उसे सन्तुष्ट रख कर ही मनुष्य अपना हित प्राप्त कर सकता है। आवश्यक है कि विज्ञान की, भारी उद्योगों की ओर से हटा जाये। शहरों की ओर भागने की दौड़ को समाप्त कर लोग पहाड़ों और जंगलों में सीधा-साधा मेहनत कश जीवन जीने का आनन्द लेना सीखें। क्या फायदा यदि बीमार होकर शहरों में रहे और जीवन भर रोग झोंक से पिटते रहे।

जल-प्रदूषण के कुछ भयंकर दुष्परिणाम-टोरी केन्यन नामक एक तेल वाहक समुद्री जहाज ब्रिटेन के पास से गुजर रहा था 18 मार्च 1967 के दिन जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसका 30000 हजार टन तेल समुद्र में गिर गया और देखते-देखते 18 मील क्षेत्र में फैल गया। हवा के झोंकों और समुद्री तरंगों के कारण शीघ्र ही वह 100 वर्ग मील क्षेत्र को प्रभावित करने लगा। वही दूषित जल कुछ दिन बाद फ्राँस के तट तक जा पहुंचा। अब मौतें प्रारम्भ होती है अप्रैल 1970 में अलास्का तट (अमेरिका) के पास जल प्रदूषण से हजारों पक्षी, समुद्री सिंह और ह्वेल मछलियां मरी पाई गई। 400 सीलों का झुण्ड इस तेल-प्रदूषण की चपेट में आकर जान गंवा बैठा। हजारों समुद्री वृक्ष नष्ट हो गये।

दिल्ली में दस से भी अधिक नाले यमुना नदी में गिरते हैं कुछ दिन पूर्व वजीराबाद और ओखला के बीच हजारों मछलियां इस गन्दगी से मरी पाई गई। इन मछलियों का व्यावसायिक मूल्य 6 लाख रुपया आँका गया। 1965 में जल की समस्या गम्भीर हो गई सारी दिल्ली में पीलिया रोग ने भयंकर रूप धारण किया। सन् 1970 में भयंकर पीलिया होते होते बचा उसके बाद मॉडल टाउन के पीछे झील में हजारों मछलियां मरी पाई गई उनकी सड़न एक समस्या बन गई इसी पर गंगाजी के तट पर बसे मुँगेर (बिहार) में पेट्रोल के गंगा नदी में बह जाने के कारण गंगाजी के जल में 50 मील दूर तक आग लग गई पानी में आग की लपटें उठने लगीं लोग आश्चर्य और भय से इस काँड को देखते रहे।

यह है संक्षेप में जल प्रदूषण की कहानी जिससे मानव-जाति पर घिर रहे संकट का अनुमान होता है। मुँगेर में लगी आग लोगों को दिखाई दी इसलिये उसकी गम्भीरता को सभी ने समझा पर सच बात यह है कि लपटें भले ही दिखाई न दें भीतर-भीतर प्रदूषण की आग सारे संसार के जल में लगी हुई है यदि इसे रोकने का प्रयास न किया गया तो यही आग जो आज जीव-जन्तुओं को मार रहीं है कल सारी सृष्टि को मार कर रख सकती है। मनुष्य-जाति भी कुछ दिन पीछे लुप्त जन्तुओं की सारिणी में आ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं इसलिये वरुण देव को और अधिक कुपित न किये जाये तो ही अच्छा है ?


परमार्थ से बढ़कर यज्ञ नहीं

जब महाराज युधिष्ठिर का यज्ञ पूरा हो गया तो वहाँ आये हुए ऋषियों की एक सभा हुई। जिसमें यज्ञ की प्रशंसा होने लगी। सब लोग कहने लगे-ऐसी उदारता से कोई यज्ञ हुआ है, यह हमने नहीं सुना। क्योंकि इसमें नर-नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण जूठी पत्तल समेट रहे थे।’ इसी समय सभा के बीच में एक नेवला दिखायी पड़ा, जिसका आधा शरीर सोने का था। वह दिव्यवाणी में बोला-’तुम सब युधिष्ठिर के यज्ञ की क्या सराहना करते हो ? यज्ञ तो कुरुक्षेत्र में एक ब्राह्मण ने किया था। जिसके फलस्वरूप तत्काल विमान आया और उसमें बैठकर ब्राह्मण सकुटुम्ब स्वर्ग चला गया ! युधिष्ठिर तो भाइयों के साथ हिमालय पर गलने जायेंगे और वही भी पूरा नहीं पड़ेगा। नेवले की बात सुनकर सब लोग चकित हो गये। सभा के आग्रह से नेवले ने बात आगे बढ़ायी ! वह बोला-’कुरुक्षेत्र में एक ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधू रहते थे। बहुत दिनों से अन्न नहीं मिला था। इस कारण वे सब उपवास कर रहे थे। फिर भी वे अपने विचार पर दृढ़ थे। कई दिनों बाद ब्राह्मण खेत, दुकानों के आगे गिरा हुआ सेर-दो सेर अन्न बीन कर लाया और यथाविधि बनाकर तैयार किया। यज्ञादि का भाग काटकर बाकी अन्न खाने का तैयार हुआ, त्यों−ही एक अतिथि आ पहुँचा और उसने भोजन माँगा। ब्राह्मण ने भूखे रहकर अपना हिस्सा उस अतिथि को दे दिया। फिर भी उसका पेट नहीं भरा। तब उसकी स्त्री ने भाग दे दिया। फिर भी उसकी क्षुधा नहीं मिटी। तब पुत्र ने भी अपना हिस्सा दे डाला।

अन्त में उसकी पुत्रवधू भी अपना हिस्सा देने आयी । तब ब्राह्मण बोला-’पुत्री ! तू बहुत निर्बल है ! अन्न बिना तेरे शरीर को नुकसान पहुँचेगा-तू अपना भाग मत दे।’ पुत्रवधू बोली-’पिताजी ! आपका कथन यथार्थ है। लेकिन शरीर नष्ट भी हो जाय तो फिर प्राप्त हो जायेगा। किन्तु धर्म जाकर फिर वापस नहीं लौटेगा।’ यह वाक्य सुनकर ब्राह्मण के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा। इसी समय विमान आया और ब्राह्मण के सारे कुटुम्ब को बिठाकर स्वर्ग ले गया। मैं उस समय उस जगह लौट भर गया था। जिससे मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। बाकी आधा शरीर सोने का करने के लिए मैं यहाँ आया था। लेकिन वैसा नहीं हुआ। अतएव उस ब्राह्मण का यज्ञ आपके यज्ञ से बढ़कर था।” यह सुनकर सब लोग चुप हो गये सच है परमार्थ से बढ़कर यज्ञ नहीं।


भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ

आदि शक्ति गौरी को श्रद्धा और देवाधिदेव परमात्मा को विश्वास के रूप में भजन करने वाला सिद्धी प्राप्त करता है। बाइबिल की मान्यता है विश्वास पूर्वक की गई प्रार्थना बीमार को भी स्वस्थ कर देती है (एण्ड दि प्रेयर आफ फेथ शल सेव दि सिक)।

हमारे देश में यह विश्वास जनजीवन में गहराई तक घुला हुआ है ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब विश्वास पूर्वक की गई ईश्वरीय प्रार्थनायें चमत्कारिक लाभ देती है तथापि आज का तर्कवादी जगत पश्चिम के उदाहरण देकर कहता है यह मान्यतायें विभ्रम है। लोग यह नहीं जानते कि जिन बातों को इस देश का अन्धविश्वास कहा जाता है उन्हीं को पश्चिम में विज्ञान की भांति मानते और लाभ प्राप्त करते हैं।

अमरीका के “सीनेट पब्लिकेशन लीडर एवरेट डिक्शन आफ इलियास” के जीवन की एक घटना है। 1947 में अचानक उनकी दाँई आँख की रोशनी जाती रही। डॉक्टरों ने उस आँख को निकलवा देने की सलाह दी। डिक्शन को यह शब्द बाण की तरह हृदय में चुभ गये। सोचने लगे यदि मनुष्य इतना बेबस है तो भगवान् ने उसे बनाया ही क्यों ? दुःख और निराश्रित अवस्था न आती ते मनुष्य आध्यात्मिक सत्यों को कहाँ समझता ? भगवान् की याद आते ही उन्हें याद आये यह शब्द- “प्रेयर इज ए डाइरेक्ट पाइपलाइन टु गॉड” प्रार्थना परमात्मा तक पहुँचने का सीधा मार्ग है” उन्होंने डॉक्टर की बात अमान्य कर दी दुबारा चुनाव में खड़े होने का निश्चय त्यागकर इलियास चले आये। एक दिन रात में वे अत्यन्त दुःखी होकर भगवान् की प्रार्थना के लिये बैठे। एक क्षण के लिए आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई एक क्षण की सुखद अनुभूति को जब तक स्मरण हो गई एक क्षण सुखद अनुभूति को जब तक स्मरण करें समाधि टूट गई और उन्होंने एक सुखद आश्चर्य अनुभव किया कि उनकी आँख की रोशनी लौट आई है और अब वे पहली आँख से भी अधिक साफ देख सकते थे।

केंटकी के एशबरी कॉलेज के एक छात्र को समाचार मिला- तुम्हारी माँ मरणासन्न स्थिति में है डॉक्टरों ने घोषित कर दिया है कि मृत्यु दो-ढाई घण्टे से अधिक नहीं टल सकती। डॉ0 एल्सन इस घटना का विवरण देते हुये लिखते हैं यह समाचार पाते ही लड़का वहाँ गया जहाँ अपने राष्ट्रपति के जीवन काल में श्री आयजन होवर और उनकी धर्म-पत्नी नित्य प्रार्थना किया करते थे। युवक ने भरे अन्तःकरण से परमात्मा से प्रार्थना की प्रभो! मेरी माँ कि स्थिति में सुधार हुआ, डॉक्टरों ने परीक्षा की सब कुछ अस्वाभाविक गति से बदल रहा है शरीर का कष्ट दूर हो रहा है डॉक्टर एक - दूसरे का मुँह ताक रहे थे और कह रहे थे “गाड अच्छी हो गई और काफी दिन तक स्वस्थ जीती रही।

“दि मैन इन दि नेक्ट रूप”-बगल के कमरे का आदमी शीर्षक अध्याय में अपनी पुस्तक “सत्य की खोज” (ए सर्च आफ ट्रथ) पुस्तक में श्रीमती रुथ मान्ट गुमरी ने लिखा है-मैं अस्पताल में थी मेरे बगल के कमरे में एक मरीज के जोर-जोर से खाँसने की आवाज आ रही थी। नर्स ने बताया-”बेचारा यक्ष्मा से पीड़ित है आज रात किसी भी समय उसकी मृत्यु हो सकती है” यह सुनते ही मुझे बड़ा दुःख हुआ। लेटे-लेटे परमात्मा से प्रार्थना करने लगी- है प्रभु! उस बीमार को नया जीवन दो- प्रार्थना करते -करते न जाने कब नींद आ गई। प्रातःकाल उठी तो रोगी की खाँसी की आवाज नहीं सुनाई दी। नर्स को बुला कर पूछा- नर्स ने बताया रोगी अच्छा हो रहा है जिस दिन मैं अस्पताल से छूटी उसी दिन उसे भी ओ.के. सार्टीफिकेट देकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

विश्वास पूर्वक की गई ईश्वर-प्रार्थना से कुछ भी असम्भव नहीं।


क्रान्ति विश्वव्यापी होगी-होगी किन्तु बौद्धिक

“द्वितीय महायुद्ध हुआ उस समय शनि सायण वृष राशि तथा मिथुन राशि पर भ्रमण कर रहा था। गुरु वृष राशि के साथ मेष में भी था। ग्रह मानव जीवन पर अपनी-अपनी तरह से प्रभाव डालते हैं। शनि युद्ध कलह और रक्तपात का, साम्यवाद का प्रतीक है वृष और मिथुन राशि पर होना योरोप में व्यापक युद्ध का प्रतीक था गुरु बुद्धि और विद्या का प्रतीक है शनि के साथ बृहस्पति की युति इस बात का प्रतीक होती है कि युद्ध में बुद्धि कौशल भी साथ देगा- द्वितीय महायुद्ध के दौरान बिल्कुल यही बात हुई। युद्ध हुआ और नये-नये आयुधों उपकरणों के साथ उससे युद्ध प्रियता की शक्तियाँ बढ़ीं, साम्यवाद बढ़ा उस समय जो हिंसा का ताँडव हुआ वह तब से छुट-पुट चलता ही आ रहा है।”

“इस समय शनि सायण वृष राशि पर है और वह शीघ्र ही मिथुन राशि पर भ्रमण करने जा रहा है इस बार बृहस्पति फिर उसी राशि पर है किन्तु उसकी गति प्रतियोग में अर्थात् उल्टी है इसलिए सन् 1972 से आगे 73 का समय एक महायुद्ध जैसी विश्व-व्यापी अन्तक्रान्ति का समय है इसमें एक ओर विनाशकारी युद्ध की परिस्थितियाँ जीभ लपलपायेंगी, कहीं-कहीं चोटें होंगी, अल्पकालीन किन्तु मानवता का दिल दहला देने वाले युद्ध होंगे किन्तु बृहस्पति के विपरीत योग होने के कारण युद्ध लम्बे नहीं होंगे वरन् वे बुद्धिमान लोगों द्वारा निबटायें जाते रहेंगे बृहस्पति के प्रतियोग में होने से महायुद्धों के समानान्तर एक बौद्धिक क्रान्ति होगी उसका नेतृत्व भारत करेगा धर्म और संस्कृति का तेजी से विकास होगा जिसका प्रभाव महायुद्ध के समान ही व्यापक होगा।”

यह विचार अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के भारतीय ज्योतिषी श्री राधेश्याम श्री रावल जी ने टंकार पत्रिका के नवम्बर सन् 1968 अंक में प्रस्तुत किये। सौराष्ट्र निवासी श्री रावल जी की अनेक भविष्यवाणियां 25-26 जुलाई सन् 1968 के दैनिक जागरण, दैनिक विश्व मित्र में छपीं।

दोनों दैनिक पत्र कानपुर से निकलते हैं। लखनऊ से प्रकाशित ज्ञान भारती में भी उनकी महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां छपी है उनकी सहायता ने श्री रावलजी के भविष्य दर्शन की ओर बुद्धिजीवियों का व्यापक ध्यान आकर्षित किया है।

ज्ञान भारती मासिक के 1963 के फरवरी अंक पृष्ठ 120 में श्री रावल जी की भविष्य वाणी थी-”अगले दिनों देश के अनेक राज्यों से मिली-जुली सरकारें स्थापित होंगी 65 के अन्त तक भारत-पाक युद्ध होगा उसमें भारत अपनी पाकिस्तान के अधिकार में गई बहुत-सी सीमा वापस लौटा लेगा किन्तु फिर बात चीत द्वारा समझौता हो जायेगा।” इन भविष्यवाणियों को सभी ने सच होते देखा। ताशकंद समझौते के बाद लोगों का ध्यान पिछली भविष्य वाणियों की और आकर्षित हुआ तो उनसे फिर आगे की बातें पूछी गई। तब उन्होंने 1966 में टंकार पत्रिका में लिखा-”पाकिस्तान ताशकंद समझौते का पालन नहीं करेगा बंगाल में हिंसक घटनायें बढ़ेंगी और साम्यवाद में उग्र संघर्ष होगा जिसमें विजय समाजवाद की होगी। बैंकों का पूर्ण राष्ट्रीकरण होगा, विद्यार्थियों के आन्दोलन होंगे विश्व-विद्यालय बन्द रहेंगे। साम्प्रदायिक दंगे बढ़ेंगे। काँग्रेस दो गुटों में विभाजित होंगी। वित्त मन्त्री मुरारजी त्याग पत्र देंगे।” इन भविष्यवाणियों को उस समय कौतूहल पूर्वक सुना गया किन्तु शीघ्र ही उनकी सत्यता सामने आती गई और आज तक यह सभी भविष्य-वाणियाँ सच हुई।

इन्हीं दिनों मौरुस वुडरफ की भविष्य वाणी छपी तथा टेलीविजन पर भी उन्होंने घोषणा की थी कि 1968 में इन्दिरा का पतन हो जायेगा। यह भविष्य वाणी श्री रावल ने पढ़ी और उसकी प्रतिक्रिया कानपुर से छपने वाले साप्ताहिक टंकार में इस प्रकार छापी-इन्दिरा गाँधी का पतन नहीं होगा, वरन् उन्हें जनता का सुदृढ़ समर्थन मिलेगा और मौरुस वुडरफ की भविष्य वाणी गलत होगी- ऐसा हुआ भी 1971 के चुनावों ने तो इस स्थिति को और भी साफ कर दिया है।

श्री रावल की अन्य भविष्यवाणियां जो अब तक सत्य हुई वह इस प्रकार है-

पूर्वी बंगाल (पूर्वी पाकिस्तान) में प्राकृतिक प्रकोप और अन्तर्क्रान्ति होगी जिससे वहां के निवासी बहुत कष्ट उठायेंगे 70 में नासिर की मृत्यु हो जायेगी जॉनसन दुबारा राष्ट्रपति नहीं होंगे, रूस की राजनीतिक चालों के बावजूद भी इज़राइल जीती हुई भूमि नहीं छोड़ेगा। अयूब खां का पतन और श्री लंका में व्यापक राजनैतिक हलचलें होंगी। यह सभी भविष्यवाणियां सच हुई।

सन् 1972 और उससे आगे के ग्रह-चक्रों का विवरण देते हुए श्री रावल जी ने लिखा है-

शिक्षा संस्थानों में उठने वाले आन्दोलन के फलस्वरूप शिक्षा के स्वरूप पर नये सिरे से विचार होगा। भारत और नेपाल, भारत और रूस के सम्बन्धों में बिगाड़ पैदा होगा। एक ओर जातिवाद उग्र होगा दूसरी ओर साम्प्रदायिक दंगे होंगे। आज जो बरसाती मेंढ़कों की तरह हजारों राजनैतिक दल उमड़ पड़े है उनमें से अधिकाँश लुप्त होकर अधिक से अधिक 4 राजनैतिक पार्टियाँ शेष रह जायेंगी। फिर भी राज्यों में स्थिरता नहीं आयेगी और बार-बार राष्ट्रपति शासन लागू होते रहेंगे। अमरीका और रूस के सम्बन्धों में भयंकर बिगाड़ होंगे। देश में नक्सलवादी उत्पात कम न होंगे, दलबन्दी के कारण एकबार फिर मध्यावधि चुनाव हो सकता है। संविधान में साधारण हेर-फेर तो होगा पर किसी व्यापक परिवर्तन की बात नहीं होगी। प्रिवीपर्स समाप्त हो जायेंगे। पूर्ण राशनिंग की सम्भावना है। टैक्स बढ़ने से जनता भी परेशान होगी, व्यापारी भी। शहरी सम्पत्ति का परिसीमन होगा, वस्तुओं के मूल्य बढ़ेंगे। नौकरशाही का प्रभाव कम न होगा। रिश्वत, मिलावट और महंगाई बराबर बढ़ती रहेगी। अपराध बढ़ेंगे, उत्तरी सीमा पर भारत के लिए युद्ध का खतरा रहेगा और समुद्री तथा प्राकृतिक उत्पात सारी दुनिया में बढ़ेंगे।”

जहां इतना सब होगा मानव जाति पीड़ित होगी वहां श्री रावल जी की धारणा है कि भारतवर्ष में कृषि और विज्ञान की तीव्र प्रगति होगी। कुछ ऐसी वैज्ञानिक खोजें भारतवर्ष करेगा जिससे दुनिया के वैज्ञानिक हतप्रभ रह जायेंगे। यहां की सैन्य शक्ति बढ़ेगी और सत्ता में धर्म का हस्तक्षेप भी। नारी जाति को सम्मान मिलेगा। एकबार तो विश्व-व्यापी युद्ध की लपटें उठेंगी और उसे देखकर मानव जाति कांप जायेगी तब सारे देश भारतवर्ष की ओर मुंह ताकेंगे। भारत के प्रयत्नों से युद्ध तो नहीं होगा पर अन्तर्क्रान्ति किसी के भी रोके न रुकेगी, राष्ट्र संघ असफल रहेगा पर मानव के भाई-चारे की भावना का निश्चित विकास होगा। संसार एक धर्म, एक संस्कृति और एक समान विचारधारा पर अग्रसर होने के लिए बाध्य होगा।


भविष्य को ध्यान में रखकर विचार करना

एक राज्य में नियम था कि प्रत्येक राजा दस वर्ष तक राज्य करता और फिर वन को चला जाता। एक राजा उस गद्दी पर बैठा, परन्तु वह इस नियम से बड़ा चिन्तित था। धीरे-धीरे कर साढ़े नौ वर्ष निकल गये। छः महीने बाद ही उसे वन को चले जाना था। इससे बड़ा दुःखी था। तभी एक महात्मा वहां आये और राजा की चिन्ता सुनकर उन्होंने परामर्श दिया कि इस राजकीय अधिक से अधिक सम्पदा अभी से वन में भेज दो, वहां जाने पर उसका उपयोग करना। राजा ने वैसा ही किया और वन में जाकर आनन्द करने लगा। भविष्य को ध्यान में रखकर विचार पूर्वक जीने वाले लोगों का ही जीवन सार्थक होता है।


फिर न भटकना पड़े इतर मानव योनियों में

“ब्रिजेट एक सभ्य शिक्षित घराने की स्त्री है, उस पर पागलपन का आघात हो जाया करता है। उसका मनो-वैज्ञानिक चिकित्सक उससे कुछ पूछना चाहता है तो वह कहती है-मैं तो चुहिया हूँ मुझे दफना दो ? इतना ही नहीं जब कभी विक्षिप्तता की स्थिति होती वह हू-बहू चूहे के समान दोनों हाथ पैरों से रेंगने लगती और किसी सूराख के पास जाकर, किसी सन्दूक के पास जाकर उसके नीचे छुपने का प्रयत्न करती कभी-कभी वह सूराख ढूंढ़ने के लिए पूरी इमारत छान डालती जब लोग उसके पास पहुँचते और कहते-ब्रिजेट तुम यह क्या कर रही हो तो-वह कहती मैं तो चूहा हूँ और मर जाना चाहता हूँ।”

“सामान्य स्थिति में ब्रिजेट खाना पकाती, घर वालों को खिलाती कढ़ाई-बुनाई से लेकर घर के दूसरे काम-काज भी निबटाती है किन्तु मस्तिष्क की पेटी में न जाने क्या भरा है भगवान ने कि एक पुर्जे की ढील व्यक्ति को न जाने क्या से क्या बना देती है। ब्रिजेट जैसी भद्र महिला अपने आपको चुहिया कहती है और एकबार नहीं जब भी वह पागलपन की स्थिति में होती है उसके सारे क्रिया-कलाप हाव-भाव मुँह का जल्दी-जल्दी चलाना आदि सारी क्रियायें ठीक चूहों की तरह होती है। यह आश्चर्य नहीं कोई महत्व पूर्ण तथ्य है जो अभी वैज्ञानिकों की दृष्टि में नहीं आयें।”

प्रस्तुत घटना प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर जेम्स ने अपनी पुस्तक-मनोविज्ञान के सिद्धान्त (प्रिन्सिपुल्स आफ साइकोलॉजी) में वर्णन किया है ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें डॉक्टरों मनोवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों के सामने आती है पर इसे पाश्चात्यों का अन्ध-विश्वास ही कहना चाहिए कि जब भी ऐसी बातें आती है बजाय इसके कि कोई नई धारणा बनाई और नई शोध की जाये वे लोग पिटे-पिटाये “विकासवाद के सिद्धान्त” को आगे रख देते हैं और उसी के अनुसार घटना को तौलने परखने लगते हैं फलस्वरूप घटनाओं का कोई उचित निष्कर्ष और निराकरण किये बिना अध्याय जहाँ का तहां समाप्त कर देना पड़ता है।

हर्बर्ट स्पेन्सर का कथन है कि गाय का बछड़ा जन्म लेते ही गाय का सा रँभाना, चलना, फिरना आदि प्रारम्भ कर देता है यह उसकी सहजात क्रिया है अभ्यास से एक नस्ल के संस्कार दूसरी नस्ल (लाइक प्रोड्यूसेस) में चले आते हैं। यदि ब्रिजेट पागलपन की अवस्था में जर्मनी भाषा बोली हिब्र स्वाहिली फ्रेंच या जापानी बोलती और उन जैसी ही क्रियायें करती तो सहजात-क्रिया का तर्क यहां भी उचित बैठ जाता कि चूहे और मनुष्य में कोई सहजात सम्बन्ध न होने पर भी ब्रिजेट का अपने आपको चूहा बताना क्या यह तथ्य नहीं है कि ब्रिजेट के शरीर में विकसित चेतना कभी चूहे जैसी निकृष्ट योनि में रही होगी। मस्तिष्क की किसी गड़बड़ से वह संस्कार जागते हैं और वह अपने आपको चूहा समझने लगती है। अवचेतन मन के यह संस्कार ही है जो निद्रा की अचेतना में विचित्र स्वप्न सृष्टि का सृजन करते हैं।

निद्रा की अवस्था के बोध कई बार जागृत अवस्था में भी हो सकता है और पागलपन की स्थिति में मनुष्य का मन उन पुराने संस्कारों और पूर्व जन्मों की स्मृतियां उसके मस्तिष्क में आने लगती है उस समय मन और वर्तमान शरीर का सम्बन्ध विच्छेद हो जाने से मनुष्य को अपनी स्थिति का ज्ञान नहीं रहता। कौलोनी हैच मेन्टल हॉस्पिटल के असिस्टेंट मेडिकल ऑफिसर डॉ0 अलेक्जेंडर कैनन ने एकबार लैसेंट अखबार में एक लड़की का दिलचस्प विवरण छापा उसे पढ़ने से कठोपनिषद् का दर्शन याद आता है-

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥

हे नचिकेता ! यह शरीर तो रथ है वाहन है, उसका स्वामी जीवात्मा (आत्म-चेतनता) है बुद्धि उस रथ को हांकने वाला सारथी और मन लगाम है जो इन्द्रिय रूपी घोड़ों को पकड़ कर रखती है।

बुद्धि रूपी सारथी सो गया, मन की लगाम ढीली पड़ गई तो उच्छृंखल इन्द्रियों के घोड़े शरीर रथ को ले जाकर किसी गड्ढे में पटक देते हैं और तब जीवात्मा को अपनी विकास यात्रा को जारी रखने के लिए दूसरे रथ की खोज में चल देना पड़ता है जब तक जीव अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लेता यही क्रम चलता रहता है। लैसेंट अखबार में प्रस्तुत घटना यह बताती है कि मनुष्य एक नहीं हजारों रथ तोड़ चुका होता है तब कहीं मनुष्य शरीर में आता है इसलिये “बड़े भाग्य मानुष तन पावा-सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थनि गावा” का सिद्धान्त भारतीय आचार्यों ने दिया।

इस लड़की के मस्तिष्क में जब वह 13 वर्ष की थी सूजन का रोग उत्पन्न हो गया। 3 वर्ष तक कष्ट पूर्ण स्थिति के बाद उसमें एक नहीं अनेक नये व्यक्ति उदय हो गये।

कभी वह अपने को वस्तु कहती और उस स्थिति में जैसे कोई मिट्टी का ढेला पेड़ पौधा निश्चेष्ट होता है उसी प्रकार निश्चेष्ट हो जाती (2) कभी वह अपने को मैमीवुड कहती और जैसे कोई 4-5 वर्ष की बालिका बात करती है ठीक उसी टोन मुद्रा, हाव-भाव से बातचीत करती और बाल्यावस्था की अनेक बातों का वर्णन करती (3) कभी-कभी वह अपने को “टाम्स् डार्लिंग” कहती इस स्थिति में भी उसके भाव बच्चों जैसे ही होते पर क्रियायें और बोली बदल जाती थी (4) कभी वह अपने को एक मास्टरनी कहती, पढ़ाती और सामने बैठा हुआ कोई व्यक्ति उसके कहने के अनुसार पढ़ता नहीं तो मारने लगती (5) कभी-कभी वह अपने आपको मेमना कहती और मेमने की सी बोली और भाव भंगिमा व्यक्त करने लगती (6) उसकी योग्यता बिलकुल नहीं थी पर कभी-कभी वह अपने को चित्रकार कहती उस समय वह बिना किसी पूर्वाभ्यास के ऐसे सुन्दर चित्र बनाती कि देखने वाले दंग रह जाते। 15 अगस्त 1932 के लीडर अखबार में भी यह समाचार छपा था। विकास वाद के सिद्धान्त में निष्क्रिय जड़ पदार्थों की कोई अवस्था नहीं है जबकी यह लड़की कई अवस्थाओं में अपने आपको जड़ कहती। जड़ योनियों का वर्णन केवल मात्र भारतीय पुनर्जन्म सिद्धान्त में है और इस तरह वह घटना जहाँ विकासवाद और प्राणियों में सहजात .... का खंडन करती है वहाँ इसे सत्य का प्रतिपादन कि जी विशुद्ध रूप से स्वतन्त्र अस्तित्व है वह कर्म वश योनियों में भ्रमण करता रहता है।

आत्मा के गुण है सूक्ष्मता, इन्द्रियाधिष्टाता, .... चेतनता, अजर और अमर इन गुणों की पुष्टि करने और जीवात्मा के अनेक योनि शरीरों में आवागमन की .... करने वाली महत्वपूर्ण घटना-’ह्यूमन पर्सनालिटी भा में इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ0 मायर्स ने .... किया है। 18 वर्षीया अमरीकन लड़की “एनो विन्सस” .... मस्तिष्क में विक्षिप्तता आ गई उस समय वह कई बार अपने आपको क्वेकर सम्प्रदाय का सदस्य बताती और समय जो भाषण देती वे ठीक क्वेकर दर्शन के जैसे होते। उसने अपने आपको एकबार इंग्लैण्ड की रानी बताया और उस समय जो बातें कहीं पता लगाने पर .... हुआ कि वे सब सच थी।

निश्चेष्ट अवस्था में वह आँखें बन्द करके कोई पुस्तक पढ़ सकती थी। बहुत समय तक उस पर .... करने वाले डॉ0 “आयरा बैरोज” ने इस अवस्था में अंधेरे कमरे में एक सुई व धागा दिया और उस सुई धागा पिरोने के लिये कहा तो उसने बड़ी आसानी से धागा पिरोकर यह सिद्ध कर दिया कि आत्मा स्वयं प्रकाश .... है उसे देखने के लिये आँखें आवश्यक नहीं आँख, कान, नाक आदि सब उसकी अतीन्द्रिय शक्तियाँ है। वह दूसरे .... में रखी घड़ी में क्या बजा है यह बताकर सिद्ध करती है कि आत्मा के लिये करोड़ों मील दूर तक देखने में भी .... बाधा नहीं। वह उल्टी किताब पढ़ लेती थी और सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि वह सिर के ऊपर .... खोलकर जहाँ हिन्दू चोटी रखते हैं उस स्थान से पुस्तक .... देती थी मानों चोटी का स्थान आँख रही हो। इस तरह वह एक प्रमाण थी भारतीय योग विद्या की इस मान्यता का कि चोटी वाले स्थान से व्यक्ति की चेतना ब्रह्माण्ड व्यापी आदि चेतना से कैसा भी संपर्क-सम्बन्ध स्थापित कर सकती है।

यह लड़की सिर के बल एक हाथ के बल खड़ी हो जाती, कभी अपने को कुत्ता कहती और इस तरह भौंकने लगती कि पड़ोसी कुत्ते के भ्रम में पड़कर स्वयं भी भौंकने लगती उस स्थिति में वह पानी पीती नहीं ठीक कुत्तों की तरह ही जीभ से चाटती। उसने “हेस्टी पुडिंग” पुस्तक कभी भी पढ़ी नहीं थी तो भी उसके अध्याय के अध्याय और वह भी सोती हुई अवस्था में अपने दाहिने हाथ से लिख देती। लतीनी फ्रांसीसी भाषायें उसने कहीं भी पढ़ी नहीं थी पर लिख भी लेती और बोल भी लेती थी।

एक ही शरीर में अनेक व्यक्तित्व अपने आम में विलक्षण आश्चर्य थे उन्हें देखकर डॉ0 मायर्स और आयरा बैरोज को भी कहना पड़ा था-निःसन्देह मनुष्य विकासवाद से भी अधिक विलक्षण है जिसे हम वैज्ञानिक भी नहीं जानते।

इन सब घटनाओं को देखकर हमें अपने महर्षियों के तत्व-ज्ञान की ओर विवश होकर मुड़ना पड़ता है कि मनुष्य जीवन की इतनी अच्छी व्याख्या और विकल्प कोई अन्य ज्ञान व विज्ञान नहीं जितना कि भारतीय तत्व दर्शन। यजुर्वेद कहता है-

पुनर्मनः पुनरायुर्म आगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा। म आगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रौत्र म आगन्। वैश्वानरोऽदब्धस्तनूपा अग्निर्नः पातुः दुरितादवघात्॥

मुझे यह मन फिर से प्राप्त हुआ है। प्राण फिर से मिला है। यह देह भी पुनः मिली है आंख और कान फिर से मिले है। मुझे पुनर्जीवन मिला है हे सर्वजन हितकारी अग्नि देव ! मुझ दुराचार और पाप से बचाओ ताकि हम इस महान् जीवन का सदुपयोग कर सकें फिर मानवेत्तर योनियों में न भटकना पड़ें।


जीभ के समान सरल और कोमल बनो

आज से कई सौ साल पूर्व चीन के कन्फ्यूशियस नामक एक विख्यात महात्मा और दार्शनिक हुए है। वह बड़े ज्ञानी, विद्वान और अनुभवी विचारक थे। धर्म और ज्ञान की अनेक बातें वे इस प्रकार सहज भाव से समझा दिया करते थे कि किसी के मन में शंका के लिए गुँजाइश नहीं रह जाती और उसका सहज समाधान हो जाता।

जब वे मृत्यु के निकट थे और प्राण निकलने में कुछ ही क्षण शेष थे, उन्होंने अपने शिष्यों को पास बुलाकर अपने जीवन का अन्तिम सन्देश देने के उद्देश्य से धीरे-धीरे कहा-’मेरे प्यारे शिष्यों, जरा मेरे मुँह के भीतर झाँककर देखो तो कि जीभ है या नहीं ?’

एक शिष्य ने झाँककर देखा और बोला-’गुरुदेव, जीभ तो है।’ इसके बाद उन्होंने एक अन्य शिष्य की ओर संकेत करते हुये दूसरा प्रश्न पूछा-’देखो तो, मेरे मुँह में दाँत हैं या नहीं ?’ उस शिष्य ने उत्तर दिया-’गुरुदेव, आपके मुँह में दाँत तो एक भी नहीं है।’ महात्मा कन्फ्यूशियस ने फिर पूछा-’पहले दाँत का जन्म हुआ या जीभ का ?’ इस बार सब शिष्यों ने एक साथ उत्तर दिया-’गुरुदेव ! जीभ का।’

‘ठीक’ कहकर महात्मा कन्फ्यूशियस ने अपने शिष्यों से पुनः प्रश्न किया- ‘शिष्यों, जीभ जो दाँत से उम्र में बड़ी, अब भी मौजूद है किन्तु दाँत जो जीभ से उम्र में छोटे हैं, नष्ट क्यों हो गये ?’

इस प्रश्न को सुनकर सब शिष्य एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। किसी से भी उत्तर देते न बना। तब गुरुदेव ने उन्हें समझाया-’सुनो, जीभ सरल और कोमल है, इसी से वह अभी तक मौजूद है। दाँत क्रूर और कठोर थे इसी से शीघ्र नष्ट हो गये। तुम भी जीभ के समान सरल और कोमल बनो।’ और कन्फ्यूशियस ने अपनी आँखें सदा के लिए मूँद ली।


धन नहीं धन का संग्रह पाप

गोपाल्लव- हजार गायों का स्वामी नगर-सेठ। धन की अथाह राशि थी उसके पास। किन्तु तो भी गोपाल्लव के जीवन में कोई रस नहीं था, शान्ति नहीं थी, कभी उसने सन्तोष का अनुभव किया हो ऐसा कभी भी नहीं हुआ। वैभव विलास से परिपूर्ण जीवन का एक क्षण भी तो उसे ऐसा याद नहीं आ रहा था जब उसने निर्द्वंदता प्राप्त की हो।

विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे-धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।

गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।

नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा-अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था-उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।

परिचारक ने हंसकर कहा-वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य ! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिनभर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।

प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा-तात ! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की। स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला-”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात ! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं-यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा-कई दिन से आये नहीं। मोची ने उत्तर दिया-आर्य ! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।

गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।


सुख शान्ति के स्वर्ण सूत्र

अशान्ति है, दुःख है, असन्तोष है तो निश्चय ही हमारी जीवन विधि में किसी प्रकार की त्रुटियां तथा कमियां समाविष्ट है जिसके कारण वह हर्ष, वह उल्लास, वह आनन्द और वह शान्ति प्राप्त नहीं होती जो मानव जीवन जैसे महान् अवसर में प्राप्त होनी चाहिये। इसके विपरीत आये दिन हम सबकी चिन्ताएं, विषमताएं और वितृष्णाएं बढ़ती जा रही है। जीवन इतना अशान्त और क्लेश पूर्ण बनता जा रहा है कि जीवन एक भार और संसार एक बंदीगृह सा अनुभव होने लगा है। यह सब अशान्तियां और चिन्ताएं इस बात का प्रमाण है कि निश्चय ही हम त्रुटियों से भरा एक अनुपयुक्त जीवन जी रहे है।

किन्तु, केवल यह जान लेना भर ही पर्याप्त नहीं है कि हम एक अनुपयुक्त जीवन चलायें जा रहे है। इस सूचना का महत्व तो तब है जब हम अपनी जीवन विधि को बदलें और उसे अनुपयुक्त गति विरत कर उपयुक्त गति में डालें। मूर्ख और अज्ञानियों की जहां एक किस्म यह होती है कि वे अपनी भूलों, त्रुटियों तथा कमियों को समझ नहीं पाते। वहां एक इससे भी बढ़कर नासमझ वे लोग होते हैं जो अपनी न्यूनताएं जान लेने पर भी उन्हें दूर करने की ओर से उदासीन बने रहते हैं। जो कुछ जैसा चला जा रह है चलते देते हैं। इस प्रकार का प्रमाद मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी को शोभा नहीं देता। यह प्रमाद तो पशुओं की विरासत है कि वे जिस स्थान पर जिस गतिविधि में पड़ गये सो पड़ गये। उसको बदलने की ओर ध्यान नहीं देते फिर चाहे वह उपयुक्त हो अथवा अनुपयुक्त। बेचारे पशुओं के लिए तो एक विवशता है। वे न किसी बात पर विचार कर सकते हैं और न योजनापूर्वक कोई परिवर्तन ला सकते हैं। जिस जीवन विधि में उन्हें पड़ना पड़ता है उसी के अनुरूप अपने को अभ्यस्त बना लेते हैं और एक जड़ सहन शीलता के साथ उसे सहते चले जाते हैं। इस प्राकृत विवशता के कारण वे क्षमा किए जा सकते हैं। किन्तु मनुष्य, जो परम पुनीत, सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा का अंश है, इस प्रकार के पाशविक प्रमाद के लिए क्षमा नहीं किया जा सकता। वह अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप शिव और सुन्दर जीवन जीने के लिए बाध्य है। जो इस प्रतिबंध का सम्मान नहीं करता वह विद्रोही ही नहीं नास्तिक तक कहा जा सकता है। अस्तु, इस कलंक को मिटा डालने के लिए आज से ही तत्पर हो जाना चाहिए। अनुपयुक्त जीवन विधि का त्याग कर उपयुक्त जीवन-पद्धति की ओर बढ़ चलना चाहिए। जिससे सामान्य जीवन की समस्याओं का समाधान होगा ही साथ ही आत्म-कल्याण की संराधक आध्यात्मिक दिशा में भी प्रगति हो। और इस प्रकार लोक तथा परलोक दोनों की रचना एक साथ होती चले। क्योंकि परलोक सुधारने संभालने के लिए मनुष्य को अलग से कोई जीवन नहीं दिया जाता। यही एक वही जीवन है जिसमें लोक के साथ परलोक की भी खोज खबर रखनी होगी।

संसार की ऐसी कोई भी समस्या नहीं जिसका समाधान सम्भव न हो। फिर मनुष्य तो विशेष तौर पर शक्तियों का स्वामी है। यदि उसके पास लगन, निष्ठा और प्रयत्न की कमी न हो तो उसके लिए सब कुछ सरल सम्भव है। जीवन को अनुपयुक्त से उपयुक्त बनाने के भी अनेक उपाय है। उनमें से चार बातें ऐसी है जिनका जीवन में समावेश कर लेने से समस्या का बहुत कुछ समाधान हो सकता है। इन चार बातों को जीवन निर्माण के चार सोपान अथवा आधार भी कहा जा सकता है। जीवन निर्माण के चार सोपान है-सभी प्रकार की तुच्छताओं का त्याग-मिथ्यात्व को छोड़कर सरलता का ग्रहण-बन्धनों से मुक्त होने का साहस और जीवन में अध्यात्मवाद का समावेश करना। निश्चित है यदि मनुष्य जीवन में इन चार बातों को धारण करले ते उसका अनुपयुक्त जीवन उपयुक्त बन जायेगा। उसके जीवन से अशान्ति तथा असन्तोष का तिरोधान हो जायेगा और उसके स्थान पर आनन्द और उल्लास, शान्ति और सन्तोष की वृद्धि होने लगेगी।

तुच्छता मानव-जीवन की बहुत बड़ी कमी है। यह एक ऐसा दोष है जो मनुष्य को न केवल संकीर्ण बल्कि कृपण और पतित भी बना देता है। तुच्छता मनुष्य को उदारता, दान, दया, प्रेम अथवा करुण की सत्प्रवृत्तियों से वंचित कर देती है। स्वार्थ और केवल स्वार्थ ही उसके जीवन का लक्ष्य बन जाता है। तुच्छता से प्रोत्साहित दरिद्रता की प्रवृत्ति उसे भाव में भी अभाव और सम्पन्नता में भी विपन्नता का अनुभव कराती रहती है। इसलिये उसकी भौतिक वितृष्णा, इस सीमा तक बढ़ जाती है कि संग्रह करने में फिर वह उचित, अनुचित, कर्त्तव्य, अकर्तव्य अपने पराये, शोषण-पोषण आदि किसी बात का ध्यान नहीं रखता। उसको शीतलता का मानव सुलभ गुण छोड़ कर चला जाता है। अपने लाभ और लोभ के समक्ष उसे सारे आदर्श सारी मर्यादाएं और नीतियां महत्व हीन लगने लगती है। इस प्रकार तुच्छताएं प्रताड़ित मनुष्य के जीवन में शोक-सन्ताप और अशान्ति, असन्तोष के सिवाय किस आनन्द को अवसर मिल सकता है ?

तुच्छता मानव जीवन का बहुत घृणित दोष है। इसका तुरन्त त्याग कर देना चाहिए। उदारता और महानता की वृत्ति मनुष्य के लिए दो अलंकार माने गये है। उन्हें धारण करना ही उसकी शोभा है। उदारता का गुण अपने दूसरे सजातीय गुण त्याग को प्रोत्साहित करता है। त्याग को किसी तपस्या से कम महत्व नहीं दिया गया है। त्याग भाव से संग्रह करने वाला सत्पुरुष भूलकर भी ऐसे साधन तथा उपाय प्रयोग नहीं करता जो नीति अथवा आदर्श के विरुद्ध हों।वह तो नीति एवं न्याय पूर्वक कमाये गये धन धान्य में ही सुखी तथा सन्तुष्ट रहता है। त्यागी पुरुष के पास वितृष्णाएँ उसी प्रकार नहीं आ पाती जैसे शिखा के निकट भयंकर नहीं आ पाता। उदार पुरुष जो कुछ उपार्जित करता है वह केवल अपने स्वार्थ में ही नहीं लगाता। उसका ध्यान परमार्थ पर भी रहता है। वह जानता है कि लोक-परलोक की स्थिति परमार्थ पुण्य पर ही आधारित है। इस आधार को पुष्ट तथा अधिकाधिक स्थायी बनाने के लिए वह दान देता, अपनी उपलब्धियों का उचित भाग दूसरों की सहायता में लगता, परोपकार करता और धर्म की रक्षा और वृद्धि के लिए जो कुछ बन पड़ता है करने में कृपणता व संकोच नहीं करता। इस प्रकार पारमार्थिक त्याग से आभूषित सत्पुरुष में जब ‘सर्व भूत हितरताँ’-का भाव लेकर दया, करुणा तथा प्रेम का स्त्रोत जाग पड़ता है तब संसार का ऐसा कौन सा खेद, दुःख अथवा अशान्ति हो सकती है जो उसे छू भी सके। तुच्छता से मुक्त उदार पुरुष का ‘आनन्द और मंगल’ पर जन्म तथा कर्म सिद्ध-दोनों प्रकार का अधिकार होता है। जो निश्चय ही उसे मिलता है। इस निसर्ग नीति में अपवाद की सम्भावना कदापि सम्भव नहीं है।

मिथ्यात्व का मारा व्यक्ति अपने जीवन में सुख शान्ति की एक नन्ही बूंद के लिए भी तरसता रहता है। रहन-सहन, खान-पान, आचार-व्यवहार अथवा पूजा-पाठ आदि जिस भी क्रिया-प्रक्रिया में मिथ्यात्व का दोष लग जायेगा वही पाप की तरह त्रास दायिनी बन जाएगी। मिथ्या रहन-सहन वाले लोग बहुधा प्रसादी आलसी तथा प्रदर्शनवादी होते हैं। वे यह दिखलाने का प्रयत्न करते हैं कि वे इतने भाग्यवान है कि कम से कम काम करके भी अधिक से अधिक आराम और शान-शौकत से रहते हैं। उनको विचार रहता है कि उनका प्रदर्शन पूर्ण रहन-सहन देखकर लोग शायद उन्हें अमीर समझ कर प्रभावित होंगे। उनका मान-सम्मान करेंगे। किन्तु सच्ची बात यह है कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे मिथ्यावादियों से घृणा किये बिना नहीं रहता। जहां, इस कर्मप्रधान संसार में परिश्रम तथा पुरुषार्थ का महत्व है वहां बिना कुछ किये आराम का जीवन जीने वाले निश्चित ही चोर होते हैं, फिर चाहे वे कामचोर हों, प्रथम श्रमचोर हों अथवा अधिकार चोर हो। चोर चोर ही है किसी वस्तु का ही क्यों न हो। वह सच्चे समाज और सत्पुरुषों के बीच आदर का पात्र नहीं बन सकता। उसको तिरस्कार ही प्राप्त होगा जो उसके जीवन को अशान्त तथा सन्ताप युक्त बनाकर ही छोड़ता है।

खान-पान का मिथ्यात्व स्वास्थ्य की ही होली रच देता है। रोगी तथा अशक्त बनाकर सदा सर्वदा के लिए सन्ताप के हाथों में सौंप देता है। इसी प्रकार आचार-विचार का मिथ्यात्व भी मनुष्य को अपमान तथा अवहेलना का ही अधिकारी बनाता है। बाहर कुछ और भीतर कुछ और मन का भाव दुष्ट और व्यवहार सरल, बाहर परमार्थ की बात और भीतर स्वार्थ की विभीषिका-ऐसी मिथ्या व्यवहार तथा आचार वाला व्यक्ति अपनी खैरियत कब तक मनाएगा। एक दिन सत्य उभरेगा, झूँठ का भंडा फूटेगा, और तब उस मिथ्यावादी की क्या दशा होगी या होती है इस ते कोई भुक्त-भोगी ही जान सकता है।

उपासना का मिथ्यात्व न केवल लोक बल्कि परलोक को भी नष्ट कर देता है। जो मनुष्य मनुष्यों से छल करता है उसको ही जब सिर छिपाने का स्थान नहीं मिलता तो भला उस मनुष्य की लोक-परलोक में कौन रक्षा कर सकता है जो देवताओं के साथ छल करता है। निकृष्ट कामनाओं को साथ लेकर उपासना करना देवता से छल करना है अथवा श्रद्धा, आस्था या भक्ति न होने पर भी जो किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए वैसा करता है वह भी देवताओं से छल करता है। अथवा किसी साधना से देव कृपा प्राप्त कर लेने पर उसका उपयोग परमार्थ में न करके स्वार्थ में करने वाला अथवा उसके प्रभाव से दूसरों को भयभीत या आतंकित करने वाला देवताओं से छल नहीं करता बल्कि उन दिव्य शक्तियों के साथ विश्वासघात करता है। ऐसा विश्वासघात किसी मूल्य पर भो क्षमा नहीं किया जाता है। वह दिन रात आत्म-जन्य ताप से तो जलता ही रहता है साथ ही रौरव जैसे नरक में उसके लिए स्थान की व्यवस्था होती रहती है। ऐसे मिथ्यावादी लोगों का सुख-शान्ति के लिए तरसते रहना स्वाभाविक ही है। अस्तु जीवन में सुख-शान्ति पाने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह सच्चा और सरल जीवन अपनायें।

बन्धन, बन्ध नहीं है वे किसी प्रकार के भी क्यों न हों सदा दुःखदायी ही होते हैं। शारीरिक अथवा मानसिक किसी प्रकार के बन्धनों में बंधा व्यक्ति कभी भी सुख शान्ति नहीं पा सकता। इसलिये मनुष्य को चाहिये, यदि वह जीवन में सुख-शान्ति के दर्शन करना चाहता है तो हर प्रकार के उन बन्धनों को तोड़कर फेंक दे जो अनुचित एवं अनुपयुक्त हों। सड़ी-गली, रूढ़ियां, अर्थहीन रीति-रिवाज, अन्ध परम्परायें तथा मूढ़-विश्वास-वे चाहे सामाजिक हों अथवा धार्मिक किसी प्रकार उपयुक्त नहीं है। समाज की ताड़ना, अज्ञान का भय और संस्कारों का संघर्ष सहन करके भी इस प्रकार के अनुचित बन्धनों को त्याग कर मुक्त हो जाना चाहिए। इन बाह्य बन्धनों के साथ-साथ व्यसनों, वासनाओं तथा तृष्णाओं के बन्धन भी नहीं ही रखने चाहिए जो मनुष्य जितना अधिक व्यसनों, वासनाओं तथा तृष्णाओं से रहित होता है वह उतना ही अधिक शान्त तथा सुखी रहता है। व्यसनों अथवा वासनाओं में आनन्द की कल्पना अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। इस अज्ञान को त्याग कर व्यसनों तथा वासनाओं की हानियां समझनी और उनका त्याग कर ही देना चाहिए। व्यसनों तथा वासनाओं का त्याग सुख-शान्ति का सहज संराधक माना गया है।

सुख-शान्ति के यह चार स्तम्भ तब तक अपूर्ण तथा निर्बल ही रहेंगे जब तक मुख्य आधार आध्यात्मवाद का जीवन में समावेश नहीं किया जाएगा। एक तो अध्यात्मवादी स्वभाव से ही प्रसन्न चेता होता है। ज्ञान तथा विवेक की प्रबलता और परमात्मा में अटल विश्वास और उसके न्याय में अखण्ड आस्था रखने से संसार का कोई भी शोक-सन्ताप उसे प्रभावित नहीं कर पाता। वह सहज भाव से सुखी तथा सन्तुष्ट रहता है। पुनः जीवन में अध्यात्मवाद का आश्रय लेने से मनुष्य की तुच्छता, मिथ्यात्व तथा बन्धनों के प्रति आप से आप विरक्ति होने लगती है। इन तीन दोषों को दूर करने में अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता फिर भी यदि मनुष्य ने उपर्युक्त तीनों दोषों को दूर कर भी लिया किन्तु आध्यात्मवाद की उपेक्षा करदी तो वह एकबार शरीर से भले ही सुखी हो जाये पर आत्मा से दुःखी ही बना रहेगा। शारीरिक सुख लौकिक तथा क्षण भंगुर है। सच्चा सुख आत्मिक सुख ही है वह भक्ष्य भी होता है और उसका विस्तार लोक से परलोक तक जाता है। अस्तु सच्चे तथा भक्ष्य सुख शान्ति को पाने के लिए जीवन के अध्यात्मवाद का समावेश बहुत महत्व रखता है। इस प्रकार यदि मनुष्य जीवन सुधार के उपरोक्त चार आधारों को स्थापित कर अपनी गतिविधि का संचालन करे तो उसका जीवन अनुपयुक्त बन जाये। उसकी सारी समस्याओं का समाधान होता चले और उसके लिए तब सुख-शान्ति की जरा भी कमी न रह जाये।


जब कामना करें तभी वर्षा हो

उष्ण कटिबन्धीय प्राँतों अर्थात् विषवत् रेखा (इक्वेडोर) के 5 अक्षाँश उत्तर 5 नीचे के भाग में जहाँ सूर्य अत्यधिक ताप के कारण अग्नि वर्षा सी किया करता है वहाँ पर भयंकर चक्रवात (ट्रापिकल साइक्लोन्स) उठा करते हैं इनकी प्रतिक्रिया अटलाँटिक महासागर के निकटवर्ती क्षेत्रों में होती है और उससे वहाँ भी “हरिकेन” तथा “टेरनेडो” नाम के चक्रवात जैसे उठ खड़े होते हैं। प्रशान्त महासागर में उठने वाली आँधियाँ जिन्हें “टाइफून” कहा जाता है वह भी उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों का ही रूप है कुछ दिन हुये इन तुफानों ने अमरीका, जापान, पाकिस्तान, श्रीलंका में आफत बरपा करती थी। पूर्वी बंगाल में हजारों लाखों लोग इस विनाश लीला में काम आये। धनुष्कोटि और रामेश्वरम् अभी कुछ दिन पूर्व ही नष्ट होकर चुके है।

गर्म प्रान्तों में चक्रवातों का एक नियम है। गर्मी के कारण वायु मण्डल में तीव्र हलचल होती है और भारी भारहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है उस समय उस कमी के पूरी करने के लिए आस-पास की हवायें खिंचती है यह गति इतनी तीव्र होती है कि हवा के खिंचवा में ही हजारों टन बादल और समुद्र का जल भी खिंचा चला आता है जिससे आंधियों के साथ तीव्र वर्षा भी होती है अत्यधिक गर्म अफ्रीकी देशों में अत्यधिक वर्षा का कारण भी यही है पृथ्वी के किसी भी क्षेत्र में हुई आग्नेय हलचल का समुद्री वातावरण में तुरन्त प्रभाव पड़ता है क्योंकि वहां के ऊपरी मौसम में नमी रहती है गर्मी के कारण वायु शून्यता को पूरा करने के लिये यह हवायें दौड़े तो स्वाभाविक ही है कि अपने साथ समुद्री वातावरण के प्रभाव को जल को भी लेती जायें।

1924 में कुइन्स लैण्ड (ऑस्ट्रेलिया) के लाँगदीच में हुई वर्षा में मेंढ़कों, मछलियों यहाँ तक कि चूहों तक की वर्षा हुई। मछलियाँ बड़ी नहीं थी, डेढ़ से तीन इंच लम्बी थी तथापि उनका जीवित होना और हवा के द्वारा बादलों में खिंचे चले आना कम आश्चर्यजनक नहीं था। यह मछलियाँ कैसे आ गई वैज्ञानिकों ने इस पर खोज की तो पता चला की तेज आँधी तथा “जल बज्रा” में वह शक्ति होती है कि छिछले पानी की मछली तथा मेंढ़कों को भी लेकर आकाश में उड़ जाती है यही वर्षा के साथ गिर जाते हैं। कई स्थानों में लाल रंग की वर्षा होती है वह कोई आश्चर्य नहीं होता वरन् उष्ण कटिबन्धीय प्रान्तों के वातावरण में वायु-चक्रवातों की तीव्रता का ही फल होती है। यह समुद्र की ओर से इतनी तेजी से हवा खींचते हैं कि समुद्री भाप के साथ समुद्र में पाये जाने वाले दूसरे हलके तत्वों को भी खींच ले जाते हैं। आप्यका और किरीट वर्ग जन्तु अपने शरीर से लाल तत्व निकालते हैं जिससे पानी लाल हो जाता है यही लाल पानी लाल रंग की भाप बनकर उड़ता और लाल वर्षा करता है।

समुद्र में विकर्षण शक्ति ही नहीं होती आकर्षक शक्ति भी होती है यह आकर्षण शक्ति ज्वार-भाटा उत्पन्न करने वाले सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण से मुक्त होती है। सन् 1928 की बात है एक जापानी जहाजी बेड़ा “ओरियन्ट” से “टाकोमा” जा रहा था। रास्ते में बेड़े के कप्तान नेमरु ने समुद्र के ऊपर धूल भरी आँधी देखी तो आश्चर्यचकित रह गये समुद्र में धूल कहाँ ? धूल इतनी अधिक थी की डेक पर गिरी धूल ही साफ की गई तो वह 2 बाल्टी से भी अधिक निकली उसे परीक्षण और प्रमाण के लिये नाविक अपने साथ लेते आये। उत्तरी अटलांटिक में जस्टिन के कप्तान को भी ऐसी आँधी का सामना करना पड़ा। रुजवेल्ट लाईन स्टीमर का जैडेन जहाज जब कलकत्ता आया तो वह कोहरे की तरह लाल धूल और बालू से ढंका हुआ था जो लाल समुद्र में आई आई आँधी से ऐसा हो गया था। नाविक बीगल्स ने ब्राजील के पोर्टोप्राया से कई पैकेट धूल इकट्ठा की थी इस धूल का परीक्षण डा0 स्टेनबर्ग ने किया तो पाया कि उस धूलि में 67 जैव पदार्थ थे जो अफ्रीका में पाये जाते थे। अफ्रीका की मिट्टी और इस मिट्टी में समानता थी और इस बात का प्रमाण भी कि यह समुद्र की अपनी आकर्षण क्रिया द्वारा हवा के साथ अफ्रीका से उड़कर वहाँ पहुँच गयी।

यह प्रमाण इसलिये प्रस्तुत किये जा रहे है ताकि यह ठीक तरह समझा जा सके कि वायु मंडल के हर परिवर्तन का प्रभाव समुद्र में पड़े बिना नहीं रहता। यज्ञों द्वारा इसी विज्ञान पर आधारित एक महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसकी खोज आदिकाल में ऋषि ही कर सके थे। महर्षि अंगिरा का कथन है-”यज्ञ महायज्ञौ व्यष्टि समष्टिबन्धात्” अर्थात् यज्ञ व्यष्टि (एक व्यक्ति) को समष्टि (सारे विश्व ब्रह्माण्ड) से जोड़ता है। पुराण में लिखा है-

अन्नेन भूता जीवन्ति यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम्। पर्जन्यो जायते यज्ञार्त्सवं यज्ञामयं ततः॥

अर्थात्- जिस अन्न से समस्त प्राणी जीवित रहते हैं वह बादलों द्वारा उत्पन्न होता है और बादलों की उत्पत्ति यज्ञ से होती है यह सम्पूर्ण जगत यज्ञमय है।

अग्नि में कुछ वस्तुयें मन्त्रोच्चारण के साथ आहुति करने की क्रिया को लोग साधारण कह सकते हैं किन्तु उस सिद्धान्त को उपरोक्त वायु मंडल में परिवर्तन, समुद्र की आकर्षण विकर्षण क्रिया के संदर्भ में विश्लेषण करें तो वह क्रिया साधारण से असाधारण प्रतीत होगी। आस्ट्रेलिया और अमरीका में कृत्रिम वर्षा के प्रयोग हुये है हवाई जहाज से बादलों में खुश्क बर्फ छिड़की गई उससे बादलों का तापाँश कम हुआ और क्षणिक वर्षा हुई। ऐसे प्रयोग भारतवर्ष में भी हुये। इस सिद्धान्त को ऋग्वेद के दृष्टा कहीं अच्छा जानते थे-

अघ्न् घृत्रमृचीषम और्णवाभ महिशुवम्। हर्मना विध्यद बुर्दम्॥

अर्थात्- चमक दमक के साथ सर्प की भाँति रेंगते छाये इन बादलों को विद्युत् (इन्द्र) फाड़ता है और उन्हें बर्फ (ठण्डक) के द्वारा बींधता है जिससे वे वृष्टि करते हैं। अनावृष्टि रोकने का आज तक कोई भी वैज्ञानिक उपाय सफल नहीं हुआ। मौसम पर नियन्त्रण के अनसन्धान चल रहे है पर ऋषियों ने यज्ञ के द्वारा अनावृष्टि को भी मार लगाया था-”विष्टम्भेन वृष्टया वृष्टि जिन्व” अर्थात् अनावृष्टि को जीतो और सुवृष्टि को यज्ञ द्वारा पृथ्वी पर उतरो” “हारमोनिकल मैन” के लेखक प्रसिद्ध अमरीकी वैज्ञानिक डा0 एण्डरो जैक्सन डेविस ने पृष्ठ 31 से 131 तक में वृष्टि विज्ञान दिया है सिद्धान्त लगभग यज्ञ सिद्धान्तों जैसे ही है।

वातावरण के ताप का ही मौसम और वृष्टि पर असर नहीं होता पृथ्वी में ऋतु-परिवर्तन के लिये उत्तरदायी अयन मण्डल को सूर्य संचालित करता है। यज्ञ का सीधा प्रभाव सूर्य पर पड़ता है। विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि गुरुत्वाकर्षण केवल भार वाली पार्थिक वस्तुओं पर प्रभाव डालता है प्रकाश के अणु (फोटोन्स) और अग्नि स्फुल्लिंग उससे मुक्त होते हैं। सादृश्य और आर्न्तय का सिद्धान्त अखण्ड-ज्योति में वर्णन किया जा चुका है। उसी के अनुसार यज्ञ द्वारा उठी हुई लौ अपने साथ पदार्थों का सूक्ष्म अंश लेकर आकाश में उड़ जाता है और लाखों मील की दूरी पार कर सूर्य तक जा पहुँचता है। “यज्ञेनाप्यायिता देवा” यज्ञों से देवता सन्तुष्ट होते है-

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्गादित्य मुप तिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टि वृष्टेरन्नं ततः प्रजा॥

अर्थात्- अग्नि में विधि-विधान के साथ दी गई आहुतियां सूर्य देव को प्राप्त होती है उससे वृष्टि होती है वृष्टि से अन्न होता है और उससे प्रजा की उत्पत्ति होती है।

सूर्य वायु मण्डल को प्रभावित करता है सूर्य समुद्र को भी प्रभावित करता है (ज्वार-भाटा सूर्य और चन्द्रमा की ही आकर्षण शक्ति के कारण आते है) सूर्य को यज्ञ प्रभावित करता है यह बात साफ हो गई है कि सूर्य में उठने वाली चौंध पृथ्वी पर व्यापक असर डालती है यज्ञ की लपटें सूर्य में उसी प्रकार चौंध और हलचल उत्पन्न करती है जैसे कोई आग को लकड़ी से हिलाये डुलाये तो उसकी गर्मी और ज्वलनशीलता तीव्र हो उठती है कि सूर्य की हलचल पृथ्वी के वातावरण और समुद्र को प्रभावित करती है ताप और समुद्र के आकर्षण-विकर्षण, सूर्य द्वारा वायु मण्डल में हस्तक्षेप-यह दोनों ही बातें यज्ञ से सम्बन्धित है अतएव यज्ञ को न केवल वृष्टि वरन् ऋतु में हस्तक्षेप का एक जबर्दस्त वैज्ञानिक आधार माना जाना चाहिये।

वैज्ञानिक ग्रैहम ने अपने नाम से गैसीस व्यापनशीलता (ग्रैहम्स ला आफ डिफ्यूजन आफ गैसेज) का सिद्धान्त दिया है- निश्चित ताप और दाब पर गैसों की व्यापन गति उस गैस के घनत्व के वर्गमूल के विपरीत अनुपाती होती है (ऐट सरटेन टेम्परेचर एण्ड प्रेसर दि रेट्स आफ डिफ्यूजन आफ गैसेज आर इनवर्सली प्रप्रोर्शनल टु दि स्कवैयर रुटम आफ देयर डेन्सिटीज” अर्थात् गैस जितनी हलकी होगी उतनी ही शीघ्र वायु में मिलकर प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगी। विभिन्न काम्य प्रयोजनों के लिये चुनी गई औषधियाँ इसी सिद्धांत पर काम करती है। वृष्टि के लिये प्रयुक्त की जाने वाली औषधियाँ, समिधायें हलके परमाणुओं वाली होने से वे वातावरण में शीघ्र प्रभाव डालती है।

संसार में कोई भी वस्तु न तो पैदा होती है न नष्ट होती है। पंच महाभूत परिवर्तित होते रहते हैं और इस परिवर्तन के फलस्वरूप ही संसार का क्रम बदलता रहता है। अग्नि में जलाई गई वस्तुयें नष्ट नहीं होती वरन् व्यापक हो जाती है और समूचे वायु मण्डल में प्रभाव डालती है यह प्रभाव ऋतु परिवर्तन तक ही सीमित नहीं रहता, हर व्यक्ति के मस्तिष्क में पोला स्थान (वेन्ट्रिकिल्स) होते हैं। इनमें वायु भरा रहता है हमारे आस-पास का गन्दा, दूषित, बुरे विचारों से जैसा भी कुछ वातावरण होगा वहीं हमारे मस्तिष्क में भी होगा कैसी भी अच्छी परिस्थितियों में जन्मा बालक अपने जीवन का निर्धारण जितना पूर्व संस्कारों द्वारा नहीं करता उससे अधिक यह परिस्थितियां उसे प्रभावित करती और प्रेरणायें देती है। उत्तरी अमरीका की बिन्डसर स्टेट की विधान सभा के एक माननीय सदस्य और राजकीय पुस्तकालय के निर्देशक क्लेरेंस एडम्स दुनिया में इसलिये विख्यात नहीं कि वह एक विधायक थे वरन् उन्हें प्रसिद्धि इसलिये मिली कि वे एक भयानक डकैत थे। उन्होंने बीसियों डकैतियां डालीं पकड़े जाने पर उन्होंने बताया कि वे डकैती धन के लिये नहीं डालते थे वरन् उससे उनको मानसिक तृप्ति और विचित्र आनन्द की अनुभूति होती थी। यह एक उदाहरण है कि जब वायु मण्डल दूषित हो जाता है तो मानसिक दुष्प्रवृत्तियां भी बढ़ जाती है। यज्ञ द्वारा वायु मण्डल के शोधन का सबसे बड़ा लाभ लोगों की मानसिक सात्विकता को बनाये रखना था आज की परिस्थितियों का यह सर्वोत्तम लाभ है किन्तु यदि कोई चाहे तो इसे काम्य प्रयोजनों के लिये विज्ञान की भांति भी प्रयुक्त कर सकता है।

वृष्टि के लिये किये गये यज्ञ परीक्षण अधिकांश सफल हुये है वह भी इस तरह की खोजों के लिये प्रेरणा देते हैं। 1961 में 4 से 15 जून तक नांगलोई (दिल्ली) में वृष्टि के लिये यज्ञ कराया गया उसका खर्च श्री मुल्कराज जी भल्ला मैंनेजिंग डाइरेक्टर हिन्दुस्तान जनरल इन्डस्ट्रीज, दिल्ली ने दिया था परीक्षण के दौरान 8 जून के वहां दूर-दूर तक वर्षा हुई।

वर्षा ऋतु न होने पर भी 26 से 21 जुलाई तक प्रसिद्ध हकीम वीरुमल आर्यप्रेमी ने 1965 में अजमेर में यज्ञ कराया। यज्ञ के दिनों में ही 41/2 इंच वर्षा हुई। 1966 में कांग्रेस अधिवेशन जयपुर के लिये 8 से 12 फरवरी तक वृष्टि यज्ञ हुआ। 10 फरवरी से ऐसी तीव्र वर्षा हुई कि काँग्रेस अधिवेशन ही स्थगित करना पड़ा था। 1966 में सारे देश को सूखे का सामना करना पड़ा खंडवा में एक बूँद पानी नहीं गिरा तक वहाँ यज्ञ कराया गया। 11 को यज्ञ समाप्त होते ही वर्षा प्रारम्भ हुई और 4 इंच से भी अधिक वर्षा हुई। ऐसे सैंकड़ों प्रयोग हुये है जिनसे इच्छा-वृष्टि हुई है यह देखकर ऋषियों का दिया सूक्त याद आता है-”निकामे निकामे नः वर्षतु” जब हम कामना करते तभी वर्षा हो। यज्ञ मानव-जीवन की सुख शाँति समृद्धि का आधार है उसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये। मानव जाति की सुख-शाँति यज्ञों पर आधारित है इसलिये रु के अनिवार्य आवश्यकता मानकर उसका प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिये।


कुछ नोट कर लेने योग्य सूचनाएं

विश्व मानव का भावनात्मक नव-निर्माण करने के लिये हममें से प्रत्येक जीवित और जागृत आत्मा को कुछ न कुछ योग किसी न किसी रूप में प्रस्तुत करना ही चाहिये। निशा का अवसान और प्रकाश पुंज का उदय अब सन्निकट है इस ब्रह्म मुहूर्त में हमारी भावनात्मक श्रद्धाँजलि का अर्घ समर्पित होना ही चाहिये। मात्र दर्शक बनकर इस घड़ी में हम अवसाद ग्रस्त और अकर्मण्य ही बने रहे तो कल हमारी यह कृपणता शूलती और हूलती ही दुःख देती रहेगी।

इस पुण्य वेला में हम अपनी पुण्य तपश्चर्या के लिये चल पड़े पर आशा यह भी संजोये है कि नव-निर्माण के महान पथ पर हमारे साथ स्वजनों के भी कुछ कदम तो उठेंगे ही सम्भव हो तो आज की निम्नलिखित समय की पुकार पर विचार करें और बन पड़े तो इसकी पूर्ति के लिये कुछ न कुछ कर सकने का साहस जुटा ही डालें।

(1) युग-निर्माण योजना के सक्रिय सदस्य के लिये एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिये लगाते रहने का अनुबन्ध यदि आपने अभी तक नियमित रूप से पालन करने का क्रम नहीं बनाया है तो उसे आज से ही तत्परता पूर्वक आरम्भ कर दें।

(2) अपने प्रत्येक परिजन को हमने 17,18,19,20 जून के विदाई समारोह में भावना पूर्वक बुलाया हैं। यदि आप हमारे साथ सचमुच घनिष्ठता अनुभव करते हों तो उस अवसर पर आने का प्रयत्न करें। वे चार दिन आपके जीवन की अविस्मरणीय घटना बनकर रहेगी।

(3) अगले वर्ष 240 ऐसे युग-निर्माण सम्मेलन किये जाने थे जिनके साथ पांच कुण्डी या 9 कुण्डी यज्ञ भी जुड़े हुए हो। हमारे चले जाने से संगठन में निरुत्साह पैदा न होने पावे और अभीष्ट प्रक्रिया अधिक उत्साह पूर्वक चलती रहे, इस दृष्टि से भी यह आयोजन आवश्यक समझे गये। इस प्रस्ताव का जैसा स्वागत हुआ है उससे प्रतीत होता है कि सितम्बर 71 से जून 72 तक 9 महीने की अवधि में 1000 आयोजन हो सकेंगे। कम से कम एक आयोजन आपके प्रयत्न और पुरुषार्थ से सम्भव हो सके ऐसा प्रयत्न कीजिये।

(4) जिनका गला मीठा और तीखा है जिन्हें गाने और बजाने में रुचि है उन्हें जन-जागृति के लिये अपनी इस अभिरुचि का प्रयोग विशेष रूप से करने का साहस करना चाहिये। ऐसे लोग अधिक शिक्षण प्राप्त करने तथा प्रचर प्रयोजन में संलग्न होने की इच्छा हो तो गायत्री तपोभूमि मथुरा के पते पर अपनी योग्यता अभिरुचि एवं परिस्थिति की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करते हुए पत्र व्यवहार करलें।

(5) युग-निर्माण विद्यालय (गायत्री तपोभूमि मथुरा) का एक वर्षीय शिक्षा क्रम 1 जुलाई से आरम्भ होगा। जीवन जीन की कला के साथ-साथ औद्योगिक शिक्षण भी उसके साथ जुड़ा है। (अ) विद्युत् विभाग- बिजली का फिटिंग, बिजली के यंत्रों की मरम्मत, रेडियो, ट्राँजिस्टर बनाना (ब) प्रेस विभाग- प्रेस व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक क्रिया-कलाप का शिक्षण (स) गृह-उद्योग-साबुन, मोमबत्ती, खिलौने बुनाई, घरेलू वाटिका, रंगाई, धुलाई, मकान, वस्त्र फर्नीचर आदि की मरम्मत, फस्ट एड शस्त्र संचालन शिक्षण आदि (द) कला भारती- गायन, वाद्य, अभिनय, प्रकाश चित्र, भाषण, धार्मिक कर्मकाण्ड इन चार विषयों का भी समावेश है। 14 वर्ष से अधिक आयु के तथा कक्षा 8 से अधिक पढ़े छात्र ही लिये जाते हैं। जो छात्र प्रवेश पाना चाहें जल्दी ही नियम फार्म एवं आवेदन पत्र आदि मंगालें।

(6) युग-निर्माण योजना तथा अखण्ड-ज्योति का सम्मिश्रित एक एक मासिक पत्र अन्य भाषाओं में भी छपने लगा है। गुजराती, मराठी, उड़िया, अंग्रेजी में प्रकाशित होने लगा है। बंगला, तमिल आदि अन्य भाषाओं में छपने की भी तैयारी है। आपको अपने क्षेत्र में जिस भाषा का क्षेत्र हो उसमें उस भाषा की पत्रिका का प्रसार करना चाहिये ताकि अन्य भाषाओं में भी नव-निर्माण का प्रकाश फैले। इन भाषाओं में अपना साहित्य भी अनुवादित प्रकाशित होने वाला है जिनको उपरोक्त भाषाओं में अनुवाद की अच्छी योग्यता है वे अपना योगदान देने के लिये पत्र व्यवहार करलें।

(7) ऐसी व्यापारिक संस्थाओं की लिमिटेड कम्पनी आदि के रूप में आवश्यकता अनुभव की जा रही है जो (1) कैलेंडर तथा चित्र प्रकाशन, (2) बड़े पैमाने पर ग्रामोफोन रिकार्डों का निर्माण, (3) धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाओं को परिष्कृत करके उनके आधार पर बौद्धिक क्राँति, नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति कर सकने की प्रेरणा से भरे फिल्मों का लगातार निर्माण। (4) छोटी नाटक मंडलियां जो आदर्शवादिता को लेकर आगे बढ़े। ऐसी योजना चला सकने से पूंजी की सुरक्षा, धन लगाने वालों को ब्याज का लाभ होने के साथ-साथ जन-जागृति का अति महत्व पूर्ण प्रयोजन भी सिद्ध हो सकता है। जिन्हें ऐसे व्यापार संस्थान चलाने, पूंजी जुटाने आदि का अनुभव हो व इस दिशा में उत्साह पूर्वक कदम बढ़ावें। उन्हें सुलता का पथ-प्रशस्त करने वाला प्रकाश उपलब्ध रहेगा।

(8) सितम्बर 71 से लेकर जून 72 तक के 9 महीने युग-निर्माण आन्दोलन की विविध विधि व्यवस्थाओं एवं योजनाओं के माध्यम से देश-व्यापी बनाये जाने का समय है। इस अवधि में हर प्रतिभाशाली एवं भाव सम्पन्न परिजन को जितना सम्भव हो अधिक से अधिक समय देने का अनुरोध है। छुट्टियां लेकर अथवा जैसे भी हो हममें से प्रत्येक कुछ समय दे और अपनी योग्यता अभिरुचि का विस्तृत विवरण लिखे ताकि उस समय का समुचित उपयोग किया जा सके।

(9) प्रचार जीपें खरीदने संगीत वाद्य आदि के यन्त्र उपलब्ध करने, प्रचार साधन विकसित करने, प्रकाशन की व्यवस्था बढ़ाने, विद्यालय का विस्तार करने आदि प्रयोजनों के लिये गायत्री तपोभूमि को आर्थिक साधनों की भारी कमी अनुमान होती है। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो वे इस अभाव की पूर्ति में कुछ योगदान कर सकते हैं। महीने में एक दिन की आमदनी देकर तो निर्धन व्यक्ति भी कुछ न कुछ सहारा दे सकते हैं। यह उदार प्रवृत्ति पनपनी ही चाहिये।

(10) 1 जुलाई से जीवन निर्माण एवं समाज निर्माण के छह छह महीन वाले पाठ्य-क्रम चल पड़ेंगे। रात्रि पाठशालाओं एवं अपराह्न शालाओं के रूप में यह शिक्षण क्रम सर्वत्र चलाया जाना चाहिये। पाठ्य पुस्तकें तैयार है।

(11) युग-निर्माण योजना का संगठन तथा क्रिया-कलाप देश-व्यापी ही नहीं विश्व-व्यापी भी बनता जा रहा है। उसके द्वारा प्रचारात्मक संगठनात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य इतने अधिक परिमाण में है रहे है कि इस महा अभिमान को इस युग का लोक शक्ति जगाने वाला सबसे बड़ा अभियान कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। पर आन्दोलन का स्वरूप एवं क्रिया-कलाप प्रकाशित न होने में जन-साधारण को उसकी गतिविधियां अविज्ञात ही है। अब निश्चय किया गया है कि योजना की कार्य-पद्धति से सर्व साधारण को परिचित करने तथा शाखाओं एवं कार्यकर्ताओं का मार्ग दर्शन करने के लिये एक समाचार पाक्षिक पत्र निकाला जाय अगले महीने से ही युग-निर्माण योजना के साथ समाचार प्रधान पाक्षिक भी निकालना आरम्भ कर रहे है। उसको नाम पाक्षिक युग-निर्माण योजना होगा। वार्षिक चन्दा (7) वार्षिक होगा। शाखाएं तथा सक्रिय कार्यकर्ता उनका चन्दा भेजकर मंगाना आरम्भ करदे। मासिक मासिक युग-निर्माण योजना अपने वर्तमान कलेवर में यथावत निकलती रहेगी।


अपनों से अपनी बात

विगत 20 वर्षों में बड़े प्रयत्न पूर्वक जागृत आत्माओं का एक-एक फूल इस विश्व उद्यान में से हमने बीना और उसे एक सूत्र में पिरोकर अपने विशाल परिवार की माला बनाई है। समय आ गया कि यह माला भगवान् के चरणों पर चढ़ाई जाये और हमारी जीवन भी की कमाई का श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाय। 1 लाख व्यक्तियों का विशाल परिवार जिसे कौटुम्बिकता एवं आत्मीयता के खाद पानी से सींच कर एक सुविकसित उद्यान के रूप में विकसित किया गया हो, अपने आप में एक बड़ा काम है। पर इसकी सार्थकता तभी है जब उसका श्रेष्ठतम सद् उद्देश्य के नये प्रयोग हो सके। अन्यथा ‘बड़ा कुटुम्बी बड़ा दुखी’ वाली उक्ति ही अपने ऊपर चरितार्थ होने लगेगी।

बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभावतः हर मनुष्य में भरी पड़ी है। उसके लिये किसी को सिखाना ही पड़ता। धन, पद, इन्द्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता ? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं है ? पेट और प्रजनन के लिये किसका चिंतन योचित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों के समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही वस्तुतः महा मानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का संकल्प और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महा मानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियां महा मानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती है कि उन्हीं के लिये सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है ओछे स्तर के- बड़प्पन के भूखे लोग बरसाती उद्भिजों की तरह अहर्निश बढ़ते चले जा रहे हैं पर महामानवों की उद्भव स्थली सूनी पड़ी है। गीदड़ों के झुण्ड बढ़ चले पर सिंहों की गुफाएं सुनसान होती चली जा रही है। इस युग की सब से बड़ी आवश्यकता महामानवों का उद्भव होना ही है। वे बढ़ने तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक सन्तापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिये किया था इस खान से नर रत्न निकले और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरम्भ करें। युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान को उथले स्तर के व्यक्तियों द्वारा नहीं केवल उन्हीं लोगों से सम्पन्न किया जा सकता है जिनको महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके।

हर विभूति कुछ मूल्य देकर खरीदी जाती है। उपहार पाने के लिये भी पात्रता उत्पन्न करनी पड़ती है। समय आ गया कि अपने विशाल परिवार के सामने उन प्रयोगों को प्रस्तुत करें जो आत्मबल सम्पन्न तथा लोक निर्माण में समर्थ व्यक्तियों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हमने अपनी जीवन साधना में इन तत्वों का समावेश किया और मंजिल की एक सन्तोष जनक लम्बाई पार कर चुके। अपने हर अनुयायी से इस अवसर पर यही अनुरोध कर सकते हैं कि जितना अधिक सम्भव हो इसी मार्ग पर कदम बढ़ायें जिस पर हम चलते रहे है। महामानव बनने के लिए जिन त्याग बलिदानोँ का मूल्य चुकाना पड़ता है आत्म परिष्कार का जो प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी की चर्चा यहाँ कर रहे है।

हम अपने जीवन का भावी कार्यक्रम निर्धारित कर चुके है, अपनी धर्म-पत्नी को एक निश्चित कार्य-पद्धति में जुटा दिया। हमारे साथ चल सकने की हिम्मत जिनने दिखाई उन्हें बुला कर युग-निर्माण योजना में जुटा दिया। गायत्री तपोभूमि में एक ऐसी टीम छोड़ दी जो हमारे संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चों पर समर्थ चतुरंगिणी की तरह लड़ती रहेगा। अब हमारा विशाल परिवार ही शेष रह गया है जिसे कुछ अन्तिम निर्देश देकर जाना है। कितने व्यक्ति कहते रहते हैं कि हम आपके साथ हिमालय चलेंगे। उनसे यही कहना है कि वे आदर्शों के हिमालय पर उसी तरह चढ़ें जिस तरह हम जीवन भर चढ़ते रहे। तपश्चर्या का मार्ग अति कठिन है। हमारी हिमालय यात्रा काश्मीर की सैर नहीं है जिसका मजा लूटने हर कोई विस्तार बाँधकर चलदे। उसकी पात्रता उसी में हो सकती है। जिसने आदर्शों के हिमालय पर चढ़ने की प्राथमिक पात्रता एकत्रित कर ली। सो हम अपने हर अनुयायी से अनुरोध करते रहे है और अब अधिक कहें और अधिक सजीव शब्दों में अनुरोध करते हैं कि वे बड़प्पन की आकाँक्षा को बदल कर महानता की आराधना शुरू करदें। यह युग परिवर्तन का शुभारम्भ है जो हमारे परिजनों को तो आरम्भ कर देना चाहिए। हम बदलेंगे युग बदलेगा’ का नारा-हमें अपने व्यक्तिगत जीवन कि विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन प्रस्तुत करके सार्थक बनाना चाहिए। निःसन्देह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव यदि आ जाये तो फिर कोई शक्ति युग-परिवर्तन एवं नव-निर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेंगी।

अपना विशाल परिवार हमने एक ही प्रयोजन के लिये बनाया और सींचा है कि विश्व-मानव की अन्तर्वेदना हलकी करने में और रुदन, दरिद्र, जलन से बचाने के लिये कुछ योगदान सम्भव हो सके, पेट और प्रजनन की कृमि कीटकों जैसी सड़न से ही हम सब बहुमूल्य जिन्दगी न बिता डालें वरन् कुछ ऐसे हो जो जीवनोद्देश्य को समझें और उसे पूरा करने के लिये अपनी विभूतियों और सम्पत्तियों का एक अंश अनुदान दे सकने में तत्पर हो सकें। उच्च आदर्शों पर चल कर विश्व के भावनात्मक नव-निर्माण की दृष्टि से ही हमने अपना विशाल परिवार बनाया। यों दुख कष्ट से पीड़ितों की सहायता के लिए हमारे पास जो कुछ था उसे देते रहे पर उसका प्रयोजन विवेकहीन तथा कथित दानियों द्वारा लोगों की तृष्णा भड़काना स्वल्प प्रयत्न में अधिक लाभ उठाने की दुष्प्रवृत्ति जगाना एवं भिक्षा-वृत्ति का अभ्यस्त बनाना नहीं था। सिद्ध पुरुष हमें संयोग ने ही बना दिया, मनोकामना पूर्ण करने की बात अनायास ही हमारे ऊपर लग पाई वस्तुतः हम लोक मानस में उत्कृष्टता की वृष्टि करने वाले एक संदेश वाहक के रूप में ही आये और जिये। परिवार भी अपने मूल प्रयोजन के लिये ही बनाया।

अपने इस हरे-भरे उद्यान परिवार के फले-फूले परिजन वट-वृक्षों से हम कुछ आशा अपेक्षा रखें तो उसे अनुचित नहीं कहा जाना चाहिए उनके लिए कुछ भाव भरा संदेश प्रस्तुत करें तो इसे उचित ओर उपयुक्त ही माना जना चाहिए। हमारा प्रत्येक परिजन को बहुत ही मार्मिक और दूर-दर्शिता भरा परामर्श हैं, उन्हें गम्भीरता पूर्वक लिया जाना चाहिए उन पर चिंतन−मनन किया जाना चाहिए और यदि वे उचित जंचे तो तद्नुकूल अपनी मनोभूमि एवं क्रिया-पद्धति में ढालने के लिए विचार किया जाना चाहिए।

हमारा पहला परामर्श यह है कि अब किसी को भी धन का लालच नहीं करना चाहिए और बेटे-पोतों को दौलत छोड़ मरने की विडम्बना में नहीं उलझना चाहिये। यह दोनों ही प्रयत्न सिद्ध होंगे। अगला जमाना जिस तेजी से बदल रहा है उससे इन दानों विडम्बनाओं से कोई कुछ लाभान्वित न हो सकेगा वरन् लोभ और मोह की इस दुष्प्रवृत्ति के कारण सर्वत्र धिक्कार भर जायेगा। दौलत छिन जाने का दुख और पश्चाताप सताएगा सो अलग। इसलिए यह परामर्श हर दृष्टि से सही ही सिद्ध होगा कि मानव जीवन जैसी महान् उपलब्धि का उतना ही अंश खर्च करना चाहिए जितना निर्वाह के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हो। इस मान्यता को हृदयंगम किये बिना आज की युग पुकार के लिये किसी के लिये कुछ ठोस कार्य कर सकना सम्भव न होगा। एक ओर से दिशा पड़े बिना दूसरी दिशा में चल सकना सम्भव ही न होगा। लोभ-मोह में जो जितना डूबा हुआ होगा उसे लोक मंगल के लिए न समय मिलेगा न सुविधा। सो परमार्थ पक्ष पर चलने वालों को सबसे प्रथम अपने इन दो शत्रुओं को-रावण कुम्भ करण को- कंस, दुर्योधन को निरस्त करना होगा। यह दो आन्तरिक शत्रु ही जीवन-विभूति को नष्ट करने के सब से बड़े कारण है। सो इनसे निपटने का अन्तिम महाभारत हमें सबसे पहले आरम्भ करना चाहिए। देश के सामान्य नागरिक जैसे स्तर का सादगी और मितव्ययिता पूर्ण जीवन स्तर बनाकर स्वल्प व्यय में गुजारे की व्यवस्था बनानी चाहिए और परिवार को स्वावलम्बी बनाने की योग्यता उत्पन्न करने और हाथ-पाँव से कमाने में समर्थ बना कर उन्हें अपना वजन आप उठा सकने की सड़क पर चला देना चाहिये। बेटे-पोतों के लिये अपनी कमाई की दौलत छोड़ मरना भारत की असंख्य कुरीतियों और दुष्ट परम्पराओं में से एक है। संसार में अन्यत्र ऐसा नहीं होता। लोग अपनी बची हुई कमाई को जहाँ उचित समझते हैं वसीयत कर जाते हैं। इसमें न लड़कों की शिकायत होती है न बाप को कंजूस कृपण को गालियाँ पड़ती है। सो हम लोगों में से जो विचारशील है, उन्हें तो ऐसा साहस इकट्ठा करना चाहिए। जिनके पास इस प्रकार का ब्रह्म वर्चस न होगा। वे माला सटक कर, पूजा-पत्री उलट-पलट कर मिथ्या आत्म प्रवंचना भले ही करते रहें। वस्तुतः परमार्थ पथ पर एक कदम भी न बढ़ सकेंगे। समय, श्रम, मन और धन का अधिकाधिक समर्पण विश्व-मानव की सेवा को समर्पण कर सकने की स्थिति तभी बनेगी जब लोभ और मोह के खर-दूषण कुछ अवसर मिलने दें लोभ और मोह ग्रस्त को ‘आपापूती’ से ही फुरसत नहीं, बेचारा लोक-मंगल के लिये कहाँ से कुछ निकाल सकेगा और इसके बिना जीवन साधना का स्वरूप ही क्या बन पड़ेगा ? जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक सम्पत्ति मौजूद है, उनके लिये यही उचित है कि आगे के लिये उपार्जन बिलकुल बन्द कर दें और सारा समय परमार्थ के लिये लगायें। प्रयत्न यह भी होना चाहिए कि सुयोग्य स्त्री-पुरुषों में से एक कमाये घर खर्च चलाये और दूसरे को लोक-मंगल में प्रवृत्त होने की छूट दे दे संयुक्त परिवारों में से एक व्यक्ति विश्व सेवा के लिये निकाला जाय और उसका खर्च परिवार वहन करें। जिनके पास संग्रहित पूँजी नहीं है। रोज कमाते रोज खाते हैं उन्हें भी परिवार का एक अतिरिक्त सदस्य बेटा ‘लोक-मंगल’को मान लेना चाहिए और उसके लिए जितना श्रम समय और धन अन्य परिवारियों पर खर्च होता है उतना तो करना ही चाहिए।

परमार्थ प्रवृत्तियों का शोषण करने वाली इस विडम्बना से हम में से हर एक को बाहर निकल आना चाहिए कि “ईश्वर एक व्यक्ति है और वह कुछ पदार्थ अथवा प्रशंसा का भूखा है, उसे रिश्वत या खुशामद का प्रलोभन देकर उल्लू बनाया जा सकता है और मनोकामना तथा स्वर्ग मुक्ति की आकाँक्षायें पूरी करे के लिये लुभाया जा सकता है। ‘इस अज्ञान में भटकता हुआ जन-समाज अपनी बहुमूल्य शक्तियों को निरर्थक विडम्बनाओं में बर्बाद करता रहता है। वस्तुतः ईश्वर एक शक्ति है जो अन्तः चेतना के रूप में सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों के रूप में हमारे अन्तरंग में विकसित होती हैं। ईश्वर-भक्ति का रूप पूजा-पत्री की टण्ट-घण्ट नहीं विश्व-मानव के भावनात्मक दृष्टि से समुन्नत बनाने का प्रबल पुरुषार्थ ही हो सकता है। देवताओं की प्रतिमायें तो ध्यान के मनोवैज्ञानिक व्यायाम की आवश्यकता पूर्ति करने की धारणा मात्र है। वस्तुतः जैसे देवी-देवता मूर्तियों और चित्रों में अंकित किये गये है उनका अस्तित्व कहीं भी नहीं है। उच्च भावनाओं का अलंकारिक रूप ही ईश्वर के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऋतम्भरा प्रज्ञा के ही सरस्वती कहते हैं। मन को सधाने के लिए ही उसकी अलंकारिक छवि विनिर्मित की गई है। वस्तुतः अन्तरंग में समुत्पन्न सद्ज्ञान ही सरस्वती है। इस तथ्य को समझे बिना अध्यात्म भी कोई जाल-जंजाल ही सिद्ध होगा और मनुष्य को आत्म प्रवंचना में भटका कर उसकी उन शक्तियों में बर्बाद कर देगा जो लोक-मंगल की दिशा में प्रयुक्त होने पर व्यक्ति और समाज का भारी हित साधन कर सकती थी। हमारा परामर्श है कि परिजन कल्पित ईश्वर की खुशामद में बहुत सिर फोड़े। अपने अन्तरंग को और विश्व-मानव को समुन्नत करने के प्रयत्नोँ में जुट जायें और उस त्याग बलिदान की वास्तविक ईश्वर भक्ति तथा तपश्चर्या समझें। इस प्रक्रिया को अपना कर वे ईश्वरीय अनुग्रह जल्दी प्राप्त कर सकेंगे। पूजा उपासना का मूल प्रयोजन अन्तरंग पर चढ़े हुए मल आवरण विक्षेपों पर साबुन लगाकर अपने ज्ञान और कर्म को अधिकाधिक परिष्कृत करना भर है। ईश्वर को न किसी की खुशामद पसन्द है न धूप दीप बिना उसका कोई काम रुका पड़ है। व्यक्तित्व को परिष्कृत और उदार बनाकर ही हम ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी बन सकते हैं। इस तथ्य को हमारा हर परिजन हृदयंगम करले तो वह मन्त्र-तन्त्र में उलझा रहने की अपेक्षा उस दिशा में बहुत दूर तक चल सकता है जिससे कि विश्व कल्याण और ईश्वरीय प्रसन्नता के दोनों आधार अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है।

पहले ही कहा जा चुका है कि परिवार के प्रति हमें सच्चे अर्थों में कर्तव्यपरायण और उत्तरदायित्व निर्वाह करने वाला होना चाहिये आज मोह के तमसाच्छन्न वातावरण में जहां बड़े लोग छोटों के लिये दौलत छोड़ने की हविस में और उन्हीं की गुलामी करने में मरते-खपते रहते हैं, वहाँ घर वाले भी इस शहद की मक्खी को हाथ से नहीं निकलने देना चाहते जिसकी कमाई पर दूसरे ही गुलछर्रे उड़ाते हैं। आज के स्त्री बच्चे यह बिलकुल पसन्द नहीं करते कि उनका पिता या पति उनके लाभ देने के अतिरिक्त लोक-मंगल जैसे कार्यों में कुछ समय या धन खर्च करें। इस दिशा में कुछ करने पर घर का विरोध सहना पड़ता। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं इस और दिलचस्पी लेने लगे तो अपने लिये जो मिलता था उसका प्रवाह दूसरी ओर मुड़ जायेगा। ऐसी दशा में स्वार्थ संकीर्णता के वातावरण में पले उन लोगों का विरोध उनकी दृष्टि में उचित भी है, पर उच्चादर्शों की पूर्ति उनके अनुगमन से सम्भव ही नहीं रहती। यह सोचना क्लिष्ट कल्पना है कि घर वालों को सहमत करने के बाद तब परमार्थ के लिये कदम उठायेंगे। यह पूरा जीवन समाप्त हो जाने पर भी सम्भव न होगा। जिन्हें वस्तुतः कुछ करना हो उन्हें अज्ञानग्रस्त समाज के विरोध की चिन्ता न करने की तरह परिवार के अनुचित प्रतिबन्धों को भी उपेक्षा के गर्त में ही डालना पड़ेगा। घर वाले जो कहें जो चाहे वहीं किया जाये यह आवश्यक नहीं। हमें मोहग्रस्त नहीं विवेकवान होना चाहिए। और पारिवारिक कर्तव्यों की उचित मर्यादा का पालन करते हुए उन लोभ एवं मोह भरे अनुबन्धों की उपेक्षा ही करनी चाहिए जो हमारी क्षमता को लोक मंगल में न लगने देकर कुटुम्बियों की ही सुख-सुविधा में नियोजित किये रहना चाहते हैं। इस प्रकार का पारिवारिक विरोध आरम्भ में हर महामानव और श्रेयपथ के पथिक को सहना पड़ा है। अनुकूलता पीछे आ गई यह बात दूसरी पर आरम्भ में श्रेयार्थी को परिवार के इशारे पर गतिविधियां निर्धारित करने की अपेक्षा आत्मा की पुकार के ही प्रधानता देने का निर्णय करना पड़ा है।

हमारा चौथा परामर्श यह है कि पुण्य परमार्थ की अन्तः चेतना यदि मन में जागे तो उसे सस्ती वाहवाही लूटने की मानसिक दुर्बलता से टकरा कर चूर-चूर न हो जाने दिया जाय। आमतौर से लोगों की ओछी प्रवृत्ति नामवरी लूटने का ही दूसरा नाम पुण्य मान बैठती है और ऐसे काम करती है जिनकी वास्तविक उपयोगिता भले ही नगण्य हो पर उनका विज्ञापन अधिक हो जाय। मन्दिर, धर्मशाला बनाने आदि के प्रयत्नों को हम इसी श्रेणी का मानते हैं। वे दिन लद गये जबकि मन्दिर जन जागृति के केन्द्र रहा करते थे। वे परिस्थितियां चली गई जब धर्म प्रचारकों और पैदल यात्रा करने वाले पथिकों के लिये विश्राम ग्रहों की आवश्यकता पड़ती थी। अब व्यापारिक या शादी-ब्याह सम्बन्धी स्वार्थपरक कामों के लिये लोगों को किराया देकर ठहरना या ठहराना ही उचित है। मुफ्त की सुविधा वे क्योँ लें-और क्यों दें। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह के विडम्बनात्मक कामों से शक्ति का अपव्यय बचाया जाना चाहिये और उसे जन मानस के परिष्कार कर सकने वाले कार्यों की एक ही दिशा में लगाया जाना चाहिये। हमें नोट कर लेना चाहिए कि आज की समस्त उलझनों और विपत्तियों का मात्र एक ही कारण है मनुष्य की विचार विकृति। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों ने ही शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनैतिक संकट खड़े किये है। वाह्य उपचारों से--पत्ते सींचने से कुछ बन नहीं पड़ेगा हमें मूल तक जाना चाहिये और जहां से संकट उत्पन्न होते हैं उस छेद को बन्द करना चाहिये। कहना न होगा कि विचारों और भावनाओं का स्तर गिर जाना ही समस्त संकटों का केन्द्र बिन्दु है। हमें इसी मर्मस्थल पर तीर चलाने चाहिए। हमें ज्ञानयज्ञ और विचार-क्राँति को ही इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता एवं समस्त विकृतियों की एक मात्र चिकित्सा मान कर चलना चाहिए। और उन उपायों को अपनाना चाहिए जिससे मानवीय विचारणा एवं आकाँक्षा को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता का स्तर उन्मुख किया जा सके। ज्ञान-यज्ञ की सारी योजना इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर बनाई गई है। हमें अर्जुन को लक्ष्य भेदते समय मछली की आंख देखने की तरह केवल युग की आवश्यकता विचार-क्राँति पर ही ध्यान एकत्रित करना चाहिए और केवल उन्हीं परमार्थ प्रयोजनों को हाथ में लेना चाहिए जो ज्ञान-यज्ञ के पुण्य-प्रयोजन पूरा कर सकेगा। अन्यान्य कार्यक्रमों से हमें अपना कन बिलकुल हटा लेना चाहिए, शक्ति बखेर देने से कोई काम पूरा नहीं सकता हमारा चौथा परामर्श परिजनों को यही है कि वे परमार्थ भावना से सचमुच कुछ करना चाहते हों तो उस कार्य को हजार बार इस कसौटी पर कस लें कि इस प्रयोग से आज कि मानवीय दुर्बुद्धि को उलटने के लिये अभीष्ट प्रबल पुरुषार्थ की पूर्ति इससे होती है या नहीं। शारीरिक सुख सुविधायें पहुंचाने वाले धर्म-पुण्यों को अभी कुछ समय रोका जा सकता है, वे पीछे भी हो सकते हैं पर आज की तात्कालिक आवश्यकता तो विचार-क्राँति एवं भावनात्मक नव-निर्माण ही है सो उसी को आपत्ति धर्म युग धर्म-मानकर सर्वतोभावेन हमें उसी प्रयोजन में निरत हो जाना चाहिए। ज्ञान-यज्ञ के कार्य इमारतों की तरह प्रत्यक्ष नहीं दीखते और स्मारक की तरह वाह-वाही का प्रयोजन पूरा नहीं करते तो भी उपयोगिता की दृष्टि से ईंट चूने की इमारतें बनाने की अपेक्षा इन भावनात्मक परमार्थों के परिणाम लाख करोड़ गुना अधिक है। हमें वाह-वाही लूटने की तुच्छता से आगे बढ़कर वे कार्य हाथ में लेने चाहिए जिनके ऊपर मानव-जाति का भाग्य और भविष्य निर्भर है। यह प्रक्रिया ज्ञान-यज्ञ का होता अध्वर्यु बने बिना और किसी तरह पूरी नहीं होती।

लोभ और मोह के बंधन काटने और अज्ञान प्रलोभन से ऊंचा उठाने पर ही जीवनोद्देश्य पूरा कर सकने वाले-ईश्वरीय प्रयोजन एवं युग पुकार के पूरा कर सकने वाले मार्ग पर चल सकते हैं सो इसके लिये हमें आवश्यक साहस जुटाना ही चाहिए। इतने से कम में कोई व्यक्ति युग-निर्माताओं महा मानवों की पंक्ति में खड़ा नहीं हो सकता। इन चार कसौटियों पर हमें खरा सिद्ध होना ही चाहिए। फौज में भर्ती करते समय नये रंगरुटों की लम्बाई, वजन, सीना तथा निरोगिता जाँची जाती हैं, तब कहीं प्रवेश मिलता है। बड़प्पन की तृष्णा में मरने खपने वाले नर-पशुओं के वर्ग से निकल कर जिन्हें नर-नारायण बनने की उमंग उठे उन्हें उपरोक्त चार प्रयोजनों को अधिकाधिक मात्रा में हृदयंगम करने तथा तद्नुकूल आचरण करने का साहस जुटाना चाहिए। यदि यह परिवर्तन प्रस्तुत जीवनक्रम में न किया जाया तो मनोविनोद के लिए कुछ छुट-पुट भले ही चलता रहे कोई महत्व पूर्ण ऐसा कार्य एवं प्रयोग न बन सकेगा जिससे आत्म-कल्याण और लोक-मंगल की सन्तोष-जनक भूमिका सम्पन्न हो सकें।

युग-परिवर्तन के लिए अपनी चतुर्मुखी योजना हर प्रेमी परिजन को भली प्रकार समझ लेनी चाहिए। (1) प्रचारात्मक (2) संगठनात्मक (3) रचनात्मक (4) संघर्षात्मक अपनी प्रक्रिया क्रमशः इन चार चरणों में विकसित होगी। शुभारम्भ प्रचारात्मक प्रयोग से किया गया है। ज्ञान-यज्ञ या विचार-क्राँति के नाम से इसी प्रयोग को पुकारते हैं। जब तक वस्तु स्थिति विदित न हो, समस्याओं बीमारियों का निदान और कारण मालूम न हो, तब तक उपचार का सही कदम नहीं उठ सकता। अपने प्रचार अभियान में इन दिनों यही सिखाया जा रहा है कि व्यक्ति और समाज की समस्त समस्याओं का एक मात्र कारण मनुष्य की चिन्तन-पद्धति का विकृति हो जाना है। इसे सुधरे बदले बिना किसी समस्या का चिरस्थायी हल न निकलेगा। वस्तु स्थिति है भी यही। भावनात्मक नवनिर्माण ही विश्वव्यापी प्रगति और शान्ति का एक मात्र हल है। इस तथ्य पर सर्वसाधारण का ध्यान जितनी गहराई तक केन्द्रित होगा उतनी ही तत्परता से बौद्धिक क्राँति के सरंजाम जुटेंगे। उनके स्थान पर परिष्कृत प्रचार तन्त्र का निर्माण करना पड़ेगा। इस दृष्टि से वे सभी कार्य अति महत्वपूर्ण है जिनका आरम्भ युग-निर्माण योजना के अंतर्गत इन दिनों छोटे रूप में आरम्भ किया गया है। वाणी, लेखनी, प्रकाशन, कला, संगीत, अभिनय, शिक्षा, प्रदर्शन, वाक्य पट, समारोह आदि अगणित प्रचार माध्यमों की विशाल परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। जिसके लिए प्रचुर धन-शक्ति की आवश्यकता है। मस्तिष्कों को ढालने के लिये प्रचार तंत्र जितना समर्थ होगा उतना ही सफलता पूर्वक मानवीय चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को परिष्कृत किया ज सकेगा। प्रचार तंत्र द्वारा वर्तमान विनाशात्मक स्वरूप को निरस्त करने के लिये उतना ही बड़े सृजनात्मक प्रचार तंत्र को खड़ा करना पड़ेगा। इसके लिये साहित्य-निर्माण उसकी खपत, प्रवचन, संगीत, फिल्म आदि अनेक माध्यमों के विशाल रूप दिया जाना है। इसके लिए प्रचुर परिमाण में धन-शक्ति और जन शक्ति की जरूरत पड़ेगी। इसकी व्यवस्था हम लोग स्वयं बड़ी आसानी से जुटा सकते हैं यदि लोभ और मोह के जंजाल से निकल कर वासना तृष्णा को ठोकर मार कर- निर्वाह भर के लिए प्राप्त पर सन्तोष करके अपनी शारीरिक मानसिक और आर्थिक क्षमता को प्रयुक्त करने लगें।

योजना का दूसरा चरण संगठनात्मक है। भीड़ का संगठन बेकार है। मुर्दों का पहाड़ इकट्ठा करने से तो बदबू ही फैलेगी। जिनके मन में कसक है जो वस्तुस्थिति को समझ चुके है उन्हीं का एक महान् प्रयोजन के लिए एकत्रीकरण वास्तविक संगठन कहला सकता है। युग-निर्माण परिवार संगठन में अब वे ही लोग लिये जा रहे है जो ज्ञान-यज्ञ के लिए दस पैसे और एक घण्टा समय देने के लिये निष्ठा और तत्परता दिखाने लगे है कर्मठ लोगों का संगठन बन जाने पर प्रचारात्मक अभियान को सन्तोषजनक स्तर तक पहुंचा देने पर ऐसी स्थिति आ जायेगी कि जो अति महत्व पूर्ण इन दिनोँ शक्ति एवं स्थिति के अभाव में कर नहीं पा रहे है वे आसानी से किये जा सकें।

सृजनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम की हमें अति विशाल परिमाण पर तैयारी करनी होगी। इन दिनों तो उनकी चर्चा मात्र करते हैं बहुत जोर नहीं देते क्योंकि जिस लोक-समर्थन के लिए प्रचार और कार्य कर सकने के लिए जिस संगठन की आवश्यकता है वे दोनों ही तत्व अपने हाथ में उतने नहीं है जिससे कि अगले कार्यों को सन्तोष-जनक स्थिति में चलाया जा सके। पर विश्वास है कि प्रचार और संगठन का पूर्वार्ध कुछ ही दिन में संतोष जनक स्तर तक पहुंच जायेगा तब हम सृजन और संघर्ष का विशाल और निर्णायक अभियान आसानी से छेड़ सकेंगे और उसे सरलता पूर्वक सफल बना सकेंगे।

सृजन एक मनोवृत्ति है, जिससे प्रभावित हर व्यक्ति को अपने समय के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए कुछ न कुछ कार्य व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से निरन्तर करना होता है। उसके बिना उसे चैन ही नहीं मिलता। किस परिस्थिति का किस योग्यता का व्यक्ति नवनिर्माण के लिए क्या रचनात्मक कार्य करें यह स्थानीय आवश्यकताओं को देख कर ही निर्णय किया जा सकता है। युग-निर्माण योजना के ‘शत-सूत्री’ कार्यक्रमों में इस प्रकार के संकेत विस्तार पूर्वक किये गये है। रात्रि पाठशालायें प्रौढ़ पाठशालायें, पुस्तकालय, व्यायामशालायें स्वच्छता, श्रमदान, सहकारी संगठन, सुरक्षा शाक, पुष्प, फल उत्पादन आदि अनेक कार्यों की चर्चा उस संदर्भ में की जा चुकी है। प्रगति के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि हर नागरिक में मन में यह दर्द उठता रहे कि विश्व का पिछड़ापन दूर करने के लिए-सुख-शान्ति की सम्भावनायें बढ़ाने के लिये उसे कुछ न कुछ रचनात्मक कार्य करने चाहिए। यह प्रयत्न कोटि-कोटि हाथों, मस्तिष्कों और श्रम सीकरों से सिंचित होकर इतने व्यापक हो सकते हैं कि सृजन के लिए सरकार का मुँह ताकने और मार्ग दर्शन लेने की कोई आवश्यकता ही न रह जाय।

दुष्टता की दुष्प्रवृत्तियाँ कई बार इतनी भयावह होती है कि उनका उन्मूलन करने के लिये संघर्ष के बिना काम ही नहीं चल सकता। रूढ़िवादी, प्रतिक्रिया वादी, दुराग्रही मूढ़मति अहंकारी, उद्दण्ड निहित स्वार्थ ओर असामाजिक तत्व विचारशीलता और न्याय की बात सुनने को ही तैयार नहीं होते। वे सुधार और सदुद्देश्य को अपनाना तो दूर और उलटे प्रगति के पथ पर पग-पग पर रोड़े अटकाते हैं। ऐसी पशुता और पैशाचिकता से निपटने के लिये प्रतिरोध और संघर्ष अनिवार्य रूप से निपटने के लिये प्रतिरोध और संघर्ष अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हिन्दू-समाज में अन्ध परम्पराओं का बोलबाला है। जाति-पाँति के आधार पर ऊँच-नीच, स्त्रियों पर अमानवीय प्रतिरोध, बेईमानी और गरीबी के लिये विवश करने वाला विवाहोन्माद मृत्यु-भोज, धर्म के नाम पर लोक-श्रद्धा का शोषण, आदि ऐसे अनेक कारण है जिनने देश की आर्थिक बर्बादी और तज्जनित असंख्य विकृतियों को जन्म दिया है। बेईमानी, मिलावट, रिश्वत और भ्रष्टाचार का हर जगह बोलबाला है, सामूहिक प्रतिरोध के अभाव में गुण्डात्मक दिन-दिन प्रबल होता जा रहा है और अपराधों की प्रवृत्ति दिन दूनी रात चौगुनी पनप रही है। शासक और नेता जो करतूतें कर रहे है उनसे धरती पाँवों तले निकलती है। यह सब केवल प्रस्तावों और प्रवचनों से मिलने वाला नहीं है। जिनकी दाढ़ में खून लग गया है या जिनका अहंकार आसमान छूने लगा है वे सहज ही अपनी गतिविधियाँ बदलने वाले नहीं है। उन्हें संघर्षात्मक प्रक्रिया द्वारा इस बाते के लिये विवश किया जायेगा कि वे टेढ़ापन छोड़ें और सीधे रास्ते चलें। इसके लिये हमारे दिमाग में गाँधीजी के सत्याग्रह, मजदूरों के घिराव, चीनी कम्युनिस्टों की साँस्कृतिक क्रान्ति के कडुए मीठे अनुभवों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी समग्र योजना है जिससे अराजकता भी न फैले और अवाँछनीय तत्वों को बदलने के लिये विवश किया जा सके। उसके लिए जहाँ स्थानीय, व्यक्तिगत और सामूहिक संघर्षों के क्रम चलेंगे वहाँ स्वयं सेवकों की एक विशाल ‘युगसेना’ का गठन भी करना पड़ेगा जो बड़े से बड़ा त्याग बलिदान करके अनौचित्य से करारी टक्कर ले सकें। भावी महाभारत इसी प्रकार का होगा वह सेनाओं से नहीं -- महामानवों लोकसेवियों और युगनिर्माताओं द्वारा लड़ा जायेगा। सतयुग लाने से पूर्व ऐसा महाभारत अनिवार्य है। अवतारों की शृंखला-सृजन के साथ-साथ संघर्ष की योजना भी सदा साथ लाई है। युग-निर्माण की लाल मशाल का निष्कलंक अवतार अगल दिनों इसी भूमिका का सम्पादन करें तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।

प्रचारात्मक, संगठनात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक चतुर्विधि कार्यक्रमों को लेकर युग निर्माण योजना क्रमशः अपना क्षेत्र बनाती और बढ़ाती चली जायेगी। निःसन्देह इसके पीछे ईश्वरीय इच्छा और महाकाल की विधि व्यवस्था काम कर रहीं है, हम केवल उसके उद्घोषक मात्र है। यह आन्दोलन न तो शिथिल होने वाला है, न निरस्त। हमारे तपश्चर्या के लिये चले जाने के बाद वह घटेगा नहीं - हजार लाख गुना विकसित होगा। सो हममें से किसी को शंका कुशंकाओं के कुचक्र में भटकने की अपेक्षा अपना वह दृढ़ निश्चय परिपक्व करना चाहिए कि विश्व का नव निर्माण होना ही है और उससे अपने अभियान को, अपने परिवार को अति महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका का सम्पादन करना ही है।

परिजनों की अपनी जन्म-जन्मान्तरों की उस उत्कृष्ट सुसंस्कारिता का चिन्तन करना चाहिए जिसकी परख से उन्हें अपनी माला में पिरोया है। युग की की पुकार, जीवनोद्देश्य की सार्थकता, ईश्वर की इच्छा और इस ऐतिहासिक अवसर की स्थिति, महामानव की भूमिका को ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े कदम उठाने की बात सोचनी चाहिए। इस महा अभियान की अनेक दिशाएं है जिन्हें पैसे से, मस्तिष्क से, श्रम सीकरों से सींचा जाना चाहिए जिसके पास जो विभूतियां है उन्हें लेकर महाकाल के चरणों में प्रस्तुत होना चाहिए। लोभ, मोह के अज्ञान और अन्धकार की तमिस्रा को चीरते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए और अपने परिवार के लिए रख कर शेष को विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए। नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपका कर उसे प्रकाशवान रखा है अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलती रखने के लिये हमारी ही तरह अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएं। परिजनों पर यही कर्तव्य और उत्तरदायित्व छोड़कर इस आशा के साथ हम विदा हो रहे है कि महानता की दिशा में कदम बढ़ाने की प्रवृत्ति अपने परिजनों में घटेगी नहीं बढ़ेगी ही।


VigyapanSuchana

अगले वर्ष युग-निर्माण आन्दोलन एवं नव निर्माण की विचार धारा को अति व्यापक बनाने की दृष्टि से 240 युग-निर्माण सम्मेलन समारोहों का संकल्प प्रस्तुत किया था। प्रतिक्रिया को देखते हुए लगता है कि सितम्बर 71 से जून 72 को 9 महीने की अवधि में वे 1000 से कम नहीं अधिक ही होंगे। एक आयोजन आपके क्षेत्र में भी हो सके इसकी तैयारी अभी से करें और उसकी पुष्टि विदाई समारोह के अवसर पर करालें। यह उपहार हमें परमप्रिय लगेगा।


भगीरथ सुरसरि लाने चले

(लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’ भोजपुरा, मैनपुरी)


भगीरथ सुरसरि लाने चले (Kavita)

भगीरथ सुरसरि लाने चले ! विश्व के अग्नि-कुण्ड में मग्न, मांगती है मानवता त्राण ! द्रवित सविता के तेजोवलय, हिमालय को पिघलाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

घुमड़ कर कण्ठ-देश में रुद्ध, ऋचाओं का वह बादल-राग ! सुधा के मेघ मंद स्वर मौन, बुझेगी जिनसे युग की आग ! धधकते अधरों तक जो प्राण, बादलों से अंगड़ाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

ऊषायें जग, इठलाने लगीं, निशाओं के कांपे है गात, तिमिर का यह अन्तिम त्यौहार, सिहरती तारों की बारात ! खिला शतदल से जन-जन प्राण, अरुण-से, तप मुस्काने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

प्रभंजन बुझा सके कब ‘ज्योति’ प्रलय के सतत् उठे भूचाल, प्रात का करने को अभिषेक, रात भर जलती रही मशाल ! परि-पलकों में रोके सिन्धु, लक्ष्य को अर्घ्य चढ़ाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

प्राण का कन-कन देता रहा, मगर कब दानी बना दधीचि, कल्पतरु के घर भूखी-भीड़ निरख, जो जगा दृगों को सींच ! खुलें, युग के अक्षय भंडार, दीनता-दुर्ग ढहाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

कमंडल से ढुलका पीयूष, उमड़ते अंजलियों के ओक, असंख्यों तृषित प्राण पी गये, बुझी कब तृषा, दुखी है लोक ! देव, इतने उदार हो गये, सिन्धु बनकर लहराने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

प्यार का पा अगाध स्पर्श, पिघलते गये प्राण-पाषाण, नींद का उतरा नहीं खुमार, विदा के क्षण पहुंचे है आन ! मिलन का देकर मधु सामीप्य, विरह का ज्वार जगाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

दानि, होगा जब हमसे दूर, दान होगा जब अपने पास ! दीनता जब होगी धनवान, प्राप्ति का तब होगा विश्वास !! पास रहकर, जिससे थे दूर-दूर रह, पास बुलाने चले ! बिसूरेगी, बरसेगी याद, विरह-सुधियां सुलगाने चले !! भगीरथ सुरसरि लाने चले !

*समाप्त*