जीव के लिये मनुष्य शरीर एक अलभ्य अवसर है ! इसका सदुपयोग करने से जीव जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करता हुआ परम शाँति का अधिकारी बन सकता है। किन्तु यदि वह इस अवसर को व्यर्थ गँवाता है अथवा दुरुपयोग करता है तो फिर नरक की यातनायें तैयार है और चौरासी लाख निकृष्ट योनियों में भ्रमण करने की विवशता सामने हैं। इन्द्रिय तृप्ति तो जीव अन्य योनियों में भी कर सकता है पर परम पद की प्राप्ति कर सकना केवल मनुष्य शरीर में ही सम्भव है। चिर काल के पश्चात् ही यह सुर दुर्लभ मानव-जीवन प्राप्त होता है, इसे निरर्थक न गँवाना चाहिये।
स्वयं शाँति से रहना और दूसरों को शाँति से रहने देना यही जीवन जीने की सर्वोत्तम नीति है। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जो हमें अपने लिये पसन्द न हो। सत्य ही बोलना चाहिए और अन्याय के मार्ग पर एक कदम भी नहीं धरना चाहिये। श्रेष्ठ, सदाचारी और परमार्थ युक्त जीवन ही मनुष्य की उपयुक्त बुद्धिमता कही जा सकती है।
महामुनि मेतार्य ने कृच्छ चांद्रायण तप विधिवत सम्पन्न किया। अनुष्ठान काल में सम्पूर्ण एक मास केवल आँवला के फलों पर ही निर्वाह किया, इससे उनके शरीर में दुर्बलता तो थी किन्तु तपश्चर्या से अर्जित प्राण शक्ति और आँवले के कल्प के कारण उनके सम्पूर्ण शरीर में तेजोवलय स्पष्ट झलक रहा था।
अनुष्ठान समाप्त कर वे राजगृह की ओर चल पड़े। नियमानुसार वे दिन में एक बार किसी सद्गृहस्थ के घर भोजन ग्रहण कर लोक-कल्याण के कार्यों में जुटे रहते थे। उनकी लोक कल्याणकारी वृति देख कर मगध का हर नागरिक उनके आतिथ्य को अपना परम सौभाग्य मानता था।
आज वे राजगृह के स्वर्णकार के द्वार पर खड़े थे। स्वर्णकार कोई आभूषण बनाने के लिये स्वर्ण के छोटे-छोटे गोल, दाने बना कर ढेर करता जा रहा था। द्वार पर खड़े मेतार्य को देखा तो उसका हाथ वही रुक गया “ अतिथि देवोभव “ कहकर उसने मुनि मेतार्य का हार्दिक स्वागत किया। उनकी भिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए जैसे ही वह अन्दर गया वृक्ष पर बैठे पक्षी उतर कर वहाँ आ गये जहाँ स्वर्णकार सोने के दाने गढ़ रहा था। उन्होंने इन दानों को अन्न समझा सो जब तक स्वर्णकार वापस लौटे सारे दाने चुग डाले और उड़कर डाली में जा बैठे।
स्वर्णकार बाहर आया और सोने के बिखरे दानों को गायब पाया तो उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। उसने देख द्वार पर मुनि मेतार्य चुपचाप बैठे है आतिथ्य भूल गया-पूछा- आचार्य प्रवर यहाँ कोई आया तो नहीं - नहीं तात ! मेरे सिवाय और तो कोई नहीं आया मेतार्य ने सहज ही उत्तर दिया। इस पर स्वर्णकार को क्रोध और भी बढ़ गया उसने निश्चय कर लिया मेतार्य ने ही वह स्वर्ण चुरा लिया और अब यहाँ ढोंग करके बैठा है।
मेतार्य से उसने पूछा- स्वर्णकण तुमने चुराये हैं ? इस पर वे कुछ न बोले। अब तो स्वर्णकार को और भी विश्वास हो गया कि मेतार्य ही वास्तविक चोर हैं सो उसने अन्य कुटुम्बियों को भी बुला लिया और उनकी अच्छी मरम्मत की। जितनी बार पूछा जाता- तुमने स्वर्ण चुराया है- मेतार्य चुप रहते- कुछ भी न बोलते इससे उनका संदेह और बढ़ जाता।
अन्त में निश्चय किया गया कि मेतार्य के मस्तक पर गोले चमड़े की पट्टी बाँध कर चिल-चिलाती धूप में पटक दिया जाये। यही किया गया उनके मत्थे पर चमड़े की गीली पट्टी बाँध दी गई और धूप में कर दिया गया। जैसे जैसे पट्टी सूखती गई महर्षि का सिर कसता गया। शरीर पहले ही दुर्बल हो रहा था। पीड़ा सहन न हो सकी। वे चक्कर खाकर गिर पड़े। दिन उन्होंने परणन्तक पीड़ा में बिताया।
साँझ हो चली। वृक्ष पर बैठे पक्षियों ने बीट की तो वह दाने नीचे गिरे। किसी ने देखा तो कहा अरे सोने के दाने तो पक्षियों ने चुन लिये महर्षि को क्यों कष्ट दे रहे हो- स्वर्णकार हक्का बक्का रह गया। उसने दौड़कर महर्षि के माथे की पट्टी खोली- उन्हें जल पिलाया और दुःखी स्वर में पूछा-महामहिम ! आपने बता दिया होता कि स्वर्ण दाने पक्षियों ने चुगे हैं तो आपकी यह दुर्दशा क्यों होती ?
महर्षि मुस्कराये और बोले- वैसा करने से जो दंड मैंने भुगता उससे भी कठोर दंड इन अज्ञानी पक्षियों को भुगतना पड़ता। महर्षि की इस महा दयालुता पर सबको रोमाँच हो आया। स्वर्णकार बोला-जो प्राणिमात्र में अपनी तरह अपनी ही आत्मा को देखता है वही सच्चा साधु है।
अपने आपसे प्रेम करके अपनी प्रसुप्त आत्म-शक्तियों का किस प्रकार विकास किया जाये, अपने पड़ोसी अपने स्वजन सम्बन्धियों से लेकर ग्राम, नगर, प्रदेश, देश और विश्व के मानव मात्र में प्रेम भावनाओं का प्रतिरोपण करके किस प्रकार मनुष्य जीवन में स्वर्गीय परिस्थितियों का आविर्भाव किया जाये और फिर उससे भी आगे बढ़कर सृष्टि के इतर मानव प्राणियों, पेड़-पौधों तथा निर्जीव वस्तुओं तक से प्रेम-भव की घनिष्ठता स्थापित करके किस प्रकार विश्वात्मा की अनुभूति, साक्षात्कार और पूर्णानन्द की प्राप्ति सम्भव है इन नियमों की निश्चित प्रक्रियायें भले ही हमें ज्ञात न हों तो भी मानव जाति का आस्तित्व केवल मात्र प्रेम के लिये टिका हुआ है। ऐसा गाँधी जी कहा करते थे।
प्रेम की शक्ति समस्त भौतिक शक्तियों से बढ़कर है यही वह भाव है छोटे से केन्द्र जीवात्मा को विराट जगत से जोड़ते में समर्थ हो पाती है। प्रेम न होता तो सृष्टि में टकराव और संघर्ष इतना अधिक बढ़ जाता कि उसका अस्तित्व दो दिन टिकना भी असम्भव हो जाता। वैज्ञानिक मान न हो तो पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाये। जड़ परमाणुओं को एक आकर्षण जोड़कर रखता है उसी प्रकार चेतन प्राणियों को भी एक ही आकर्षण एक ही केन्द्राभिसारी बल बाँधकर रखता है वह है प्रेम । प्रेम कला में हम कितने पारंगत हो सकते हैं उसी अंश में अपना विकास कर सकते हैं।
भौतिक आकर्षण और समान स्वार्थों की पूर्ति के लिये मेल-मिलाप में प्रेम जैसा ही आकर्षण होता है और चूँकि उसमें प्रारम्भिक प्रेम के नियमों का अस्तित्व होता है इसलिये मानव जाति भूल से उसे ही प्रेम समझने लगती है। दस प्रेम को प्रेम मानते हुये भी स्थूल और वासना जन्य ही कहा जायेगा। अदीस अबाब के मध्य में सिदिस्त के किले में वहाँ का अच्छा चिड़ियाघर है इस चिड़ियाघर संरक्षक वोकले हेतेयस ने 20 वर्षों तक लगातार शेरों के जीवन का सूक्ष्म अध्ययन किया। इस अध्ययन के दिनों में उन्होंने इन वन्य पशुओं से सम्बन्धित अनेक घटनायें ............ लित करके लिखा है कि शेर अपने बच्चों से प्यार नहीं करता कभी कभी तो वह उनको जख्मी भी कर देता है। इसके विपरीत शेर अपनी पत्नियों से बहुत प्रेम करते हैं। शेर शेरनी एक दूसरे से प्रेम करते हैं और एक दूसरे को समझते हैं। शेर यह नहीं सहन कर सकता कि शेरनी पर मक्खी भी आकर बैठे।
यह अध्ययन प्राणियों में प्रेम की जन्म-जात आकाँक्षा की प्रतीक है भले ही उसकी सीमा इतनी संकुचित हो कि शेर अपने प्रेम के बीच में बच्चों की उपस्थिति भी सहन न कर सकता हो।
भालू का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही होता है। इसमें नर माँदा से प्रेम करता है पर अपने बच्चों से शत्रु जैसा व्यवहार करता है और मादा अपने बच्चों से इतना प्रेम करती है कि उनके लिये वह कितने ही सप्ताहों तक मांदा में छिपी पड़ी रहती है पानी तक नहीं पीती भूख मिटाना तो और भी दूर की बात रही।
मनुष्य जाति पशुओं से विकसित श्रेणी का प्रेम करती है पर उसे जागृत आत्माओं वाला प्रेम नहीं कह सकते। एक गाँव में एक बच्चा नदी के पानी में डूब रहा था किनारे और भी लोग खड़े थे पर स्वयं डूब जाने के भय से कोई कूद नहीं रहा था। उसकी माँ ने अपने को संकट में डाला और तैरना न जानते हुए भी वह पानी में कूद गई। यहाँ यदि और कोई व्यक्ति कूदकर उस बच्चे को बचता तो उसकी वह निष्काम सेवा प्रेम की उत्कृष्टता का प्रतिपादन करती माँ के लिये कर्तव्य भाव था उसे श्रेष्ठ तो कहा जा सकता है पर समस्त मनुष्य जाति की तुलना में वह साधारण प्रेम था दैवी नहीं। वह स्त्री बच्चे को बचाने के लिये आगे बढ़ती है और स्वयं डूबने लगती है तब उसका पति कूदता है और अपनी पत्नी को बचाता है। इस तरह उसने जो प्रेम प्रदर्शित किया उस प्रेम को वन्य जीवन का सा ही प्रेम कहा ज सकता है।
मनुष्य का प्रेम कुछ इसी तरह का स्वार्थ और शारीरिक सम्बन्धों की ................. तक अनुबद्ध हो जाने से हमारी आत्मिक प्रगति का द्वार बन्द हो जाता है यह हमारी लघुता का प्रतीक है प्रकृति की प्रेरणा नहीं। आत्म-चेतना की सन्तुष्टि का आधार सीमाबद्ध प्रेम नहीं हो सकता। दूसरी जागृत आत्मायें, भले ही वे अपना विकास ............. किसी क्षुद्र योनि में चला रही हो, इस सीमा को तोड़ती हैं और बताती हैं कि आत्मा के प्रेम का विस्तार किसी वर्ग, जाति और लिंग तक सीमित न होकर समस्त सृष्टि में फैली चेतना के मूल तक है उसी से सच्ची सन्तुष्टि मिल सकती है।
27 अक्टूबर 70 की जूनागढ़ (गुज.) की घटना है। यहाँ से 23 किलोमीटर दूर नखदी गाँव में कोई नव-जात शिशु को फेंक गया। उसको देखते ही चील, कौवे और सियार खाने को लपके किन्तु तभी कुत्ता वहाँ आ धमका और बच्चे की तब तक रक्षा करता रहा जब तक दूसरे लोगों ने पहुँचकर बच्चे को उठा नहीं लिया। इस बीच अन्य हिंसक जीव भी वही मँडराते रहे पर कुत्ता वहाँ से हटा नहीं।
अलीगढ़ के कस्न्ना जवाँ में एक बन्दर और कुत्ते की मैत्री विघटित भावनाओं वाले इस युग में लोगों को चुनौती देती है और बताती है कि विपरीत स्वभाव के दो पशु परस्पर प्रेम कर सकते हैं परन्तु मनुष्य परस्पर स्नेह से नहीं रह सकता, यह दोनों ही अमानव मित्र दिन-रात साथ साथ रहते हैं। विश्राम के समय बन्दर कुत्ते के जुयें बीनकर और कुत्ता बन्दर के तलुए सहलाकर अपनी प्रेम भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।
अपने स्वभाव अपनी रुचि की भिन्नता के बावजूद भी यदि दूसरे जीव परस्पर प्रेम से रह सकते हैं तो बुद्धिशील मनुष्य को तो उनसे बढ़कर ही होना चाहिये। ऐसा नहीं होता तो यही लगता है कि चेतना की गहराई को जितना मनुष्य नहीं जान सका प्रेम दर्शन का जो अभ्यास मनुष्य नहीं कर सका वह दूसरे प्राणी हँसी-खुशी से कर सकते हैं। यहाँ तक कि दो शत्रु स्वभाव के जीवों में भी उत्कट मैत्री रह सकती है।
फैजावाद डिवीजन के सुलतानपुर जिला स्थित अस्पताल में एक बालक इलाज के लिये भरती किया गया है। इस का बालक 9 वर्ष पूर्व सियारों द्वारा अपहरण कर लिया गया था। नन्हें से जीव के प्रति उनकी सहज करुणा-प्रेम उमड़ा होगा तभी तो उन्होंने उसे खाने की अपेक्षा पाल-लेना उचित समझा होगा। बहुत सम्भव है सियारों में उसको खाने के लिये संघर्ष भी हुआ हो जीत इस दिव्य शक्ति कह हुई सियारों ने बच्चे को पाल लिया। उसे अपनी तरह चलना-फिरना, बोलना और खाना तक सिखाकर यह सिद्ध कर दिया कि आत्म-चेतना शरीर नहीं शरीरों से भिन्न तत्व है वही समस्त जीवों में प्रतिभासित हो रहा है इस मूल की ही सन्तुष्टि जीवन की सच्ची उपासना है।
कुछ आत्मायें बोल नहीं सकती पर प्रेम तो परावाणी है जो हाव-भाव और आँखों की चमक से व्यक्त हो जाता है उसके लिये शरीर उपादान नहीं वह व्यक्त होने के लिये आप समर्थ है। त्याग और बलिदान, सेवा और साधना ही उसके रूप हैं। यह देखने को तब मिला जब अलकनन्दा में बाढ़ आई हुई थी, गढ़वाल जिले के श्रीनगर ग्राम में बाढ़ से बचने के लिये 20-22 व्यक्ति एक बड़े पेड़ पर चढ़ गये। रात तक पानी सिमट गया तो वे नीचे उतरने लगे। लेकिन नीचे एक ............... विषधर खड़ा था और वह किसी को उतरने नहीं देता था। कोई मारने को करता तो उधर दौड़ कर भगा देता। रात इसी तरह बीती सवेरा हुआ तो साँप अपने आप चला गया और तब उन लोगों ने देखा कि वहाँ इतना गहरा दलदल था कि यदि सर्प ने न रोका होता तो उन सबकी जीवित समाधि लग जाती।
............... की मात्या इलाके की 1952 को एक घटना उससे भी विलक्षण और इस बात का प्रमाण है कि दो घनिष्ठ शत्रु भी दो घनिष्ठ मित्रों का सा प्रेमी जीवन जी सकते हैं। पति और पत्नी के सिद्धाँत भिन्न हों तो भी प्रेम का आदान-प्रदान चलते रह सकता है यह घटना उसका उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यहाँ कुछ दिन से एक चीता सक्रिय था उसने बहुत उत्पात मचा रखा था पर कोई उसे मार न पाता था। उनका कारण था उनकी एक बन्दर से अटूट मैत्री। ....
इस तरह का मुक्त प्रेम जो शारीरिक सुखों, इन्द्रियों के आकर्षणों जाति वर्ण और देश की सीमाओं से पर हो वही सच्चा प्रेम है। ऐसा प्रेम ही सेवा, मैत्री, करुणा, दया, उदारता और प्राणि मात्र के प्रति आत्मीयता का भाव जागृत कर तुच्छ जीवात्मा की परमात्मा से मिलाता है हमारे प्रेम का दायरा संकुचित न रहकर समस्त लोक-जीवन के प्रति श्रद्धा के रूप में फूट पड़े तो आज जो भागवत अनुभूतियाँ दुःसाध्य जान पड़ती हैं कल वही काँच के स्वच्छ दर्पण में अपने साफ प्रतिबिम्ब की तरह झलकने लग सकती है।
बड़े बनने की महत्वाकाँक्षा में मनुष्य इस तरह उलझ जाता है कि वह छोटी के मूल्य और उनकी महत्ता को समझ ही नहीं पाता। वह उनकी अपेक्षा करता है फलतः मनुष्य को छोटा बनना चाहिए, लघुता में प्रभुता अब मात्र साहित्यिक या भावनात्मक उक्ति नहीं रही वह एक वैज्ञानिक सत्य भी सिद्ध हो चुकी है।
लघुता की गतिशीलता विराट् की गति से की जा सकती है। हीरा आदि ठोस पदार्थ दिखाई देते हैं, स्थूल होते हैं उनके अणुओं (मालेक्यूल्स) की गति प्रति घण्टा 960 मील होती है। तरल पदार्थों से थोड़ा और दुगना हो जाता है दि मैकेनिज्म आफ नेचर (एन्ड्राड लिखित) में लिखा है-1 ओंस पानी में इतने परमाणु होते हैं कि उन्हें संसार के सभी स्त्री, पुरुष व बच्चे उन्हें गिनें तो गणना 40 वर्ष में पूरी होती है पर उस तरल को जब और सूक्ष्म छोटे-छोटे टुकड़े में -गैस रूप में कर दिया जाता है तो अणुओं की संख्या और गतिशीलता लक्ष-लक्ष गुना अधिक हो जाती है गैस के अणुओं के बीच की दूरी एक इंच के तीस लाखवें हिस्से से भी कम होती है फिर भी वह एक सेकेण्ड में 6 अरब बार परस्पर टकराते हैं। ठोस देखने में बड़ा लगता है पर उसकी गति स्थूल होती है। गैसें कई तो दिखाई भी नहीं देती पर इतनी क्रियाशील होती हैं कि उनके माध्यम से उनकी गतिशीलता के आधार पर लाखों मील दूर की बात को एक सेकेण्ड में जान लिया जाये आगे इसी विज्ञान के विकास द्वारा लाखों वर्ष पूर्व की घटनाओं का चित्रण चलचित्र की भाँति सम्भव हो जाये तो कुछ असंभव नहीं इसी को कहते हैं लघुता की महत्ता। प्रकाश का अणु आज तक पकड़ में नहीं पर वह सारे संसार को प्रकाश, गर्मी देता है उसकी पहुँच इतनी विकट है कि वह एक सेकेण्ड में 186000 मील पहुँच जाता है। मनुष्य का उतावला मन यदि स्थूल से सूक्ष्म तथा उसे छोटा बनाया जा सके, बड़े होने के अहंकार से बचाकर उसे छोटे बनाया जा सके तो उसमें एक सेकेण्ड के भी लाखवें हिस्से में सारे ब्रह्मांड का भ्रमण कर आने की क्षमता, सक्रियता विद्यमान प्रत्यक्ष देखी जा सकती है। सूक्ष्म बनाया हुआ मन ही त्रिकालदर्शी होता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन ने मन, आत्मा और परमात्मा को तत्व ही माना हैं।
छोटा बनने से वजन कम नहीं हो जाता। भारतीय दर्शन की मान्यता यह है कि परमाणु आकाश में अपने सदृश परमाणुओं के साथ घनीभूत हो जाता है तो उसकी शक्ति का पारावार नहीं रहता। विज्ञान अभी उस स्थिति तक पहुँचा नहीं जिस दिन वह इस स्थिति में पहुँचेगा पायेगा कि कोई एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु अत्यन्त घनीभूत सत्ता विश्व में विद्यमान है उसकी महत्ता उसके वजन का पारावार नहीं मानवीय चेतना उस सूक्ष्म चेतना से मिलकर ही अपनी अणिमा को गरिमायुक्त बनाती है। एक स्क्वायर इंच टुकड़े लकड़ी का वजन 1 छटाँक से अधिक होगा। प्लैटिनम लोहे से भी अधिक वजनदार होता है क्योंकि उसके परमाणुओं में सघनता होती है। “ आर्म चेयर साइन्स “ लन्दन से निकलने वाले 1937 के पत्र में बताया गया कि- आकाश के कुछ सितारों के द्रव्य 1 क्यूबिक इंच के हो तो भी उनका वजन 27 मन होगा, एक तारे के इतने ही द्रव्य का वजन 16740 मन पाया गया। ज्येष्ठ तारे के बारे में कहा जाता है कि उसका नग अँगूठी में लगा दिया जाये तो उस अँगूठी का वजन 8 मन होगा।
छोटा बनने में व्यक्ति की सक्रियता बढ़ती है उसका वजन बढ़ता है। मनुष्य छोटे से छोटा हो जाये तो उसे जीतना, उठा सकना कठिन हो जाये वह अपने आपको सारे संसार से बड़ा, वजनदार और विश्वव्यापी बना सकता है।
डॉ. विकी नामक प्रसिद्ध खगोलज्ञ से एकबार एक पत्रकार ने प्रश्न किया– आप बता सकते हैं अति सूक्ष्म से अति विशाल कितना बड़ा है डॉ. विकी ने खड़िया उठाई और एक बोर्ड में लिखा 100000000000000000000000000000000000000000000000 (10 से आगे 47 शून्य) गुना। जबकि यह मात्र अनुमान है सत्य में विराट् जगत कितना विराट् है उसकी कोई माप जोख नहीं है।
उसी प्रकार अणु इतना सूक्ष्म है कि उसकी सूक्ष्मता की सही माप कठिन है। परमाणु के नाभिक का व्यास 0000000000001 मिलीमीटर होता है इस नगण्य जैसी स्थिति को आँखें तो इलेक्ट्रानिक सूक्ष्मदर्शी से भी कठिनाई से ही देख पाती है। दोनों परिस्थितियाँ देखते ही ऋषियों का “अणोरणीयान् महतोमहीयान्” अर्थात्- ”वह अणु से अणु और विराट् से विराट् है” वाला पद याद आता है।
“मनुष्य इन दोनों के मध्य का एक अन्य विलक्षण आश्चर्य है ?” यह कहने पर डॉ. विकी से प्रश्नकर्ता ने पूछा- सो क्यों ? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने बताया मनुष्य जिन छोटे-छोटे कोशों (सेल्स-शरीर की सूक्ष्मतम इकाई का नाम सेल है यह जीवित पदार्थ का परमाणु होता है ) से बना है उनकी संख्या भी ऐसी ही कल्पनातीत अर्थात् 7000000000000000000। इसमें आश्चर्य यह है कि इन सभी अणुओं में प्रकाशमान नाभिक की संगति आकाश के एक तारे से जोड़े तो यह देखकर आश्चर्य होगा कि समस्त ब्रह्माण्ड इस शरीर में ही बसा हुआ है। डॉ. विकी के इस कथन और ऋषियों के “यह ब्रह्माण्डे तत्पपिण्डे” जो कुछ ब्रह्माण्ड में है वह सब मनुष्य देह में ऐसी विलक्षणता और विराट् देह प्राप्त करके भी मनुष्य अब क्षुद्र जीव जन्तुओं का सा जीवन जीता है तो ऐसा होता है कि मनुष्य को इस शरीर की देन देकर भगवान ने ही भूल की अथवा मनुष्य ने स्वयं ही उस सौभाग्य को अज्ञान द्वारा नष्ट कर लिया।
मनुष्य सूर्य मंडल के जीवन चक्र हैं। सूर्य से सवा नो करोड़ मील दूर रहने वाली हमारी पृथ्वी को ग्रह कहते हैं क्योंकि इसका अपना प्रकाश नहीं है यह सूर्य की द्युति से चमकता है। शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, प्लूटो सभी सूर्य से उधार प्रकाश पाकर चमकते हैं इसलिये इन्हें ग्रह-उपग्रह कहते हैं। जो अपनी चमक से चमकते हैं उन्हें तारा कहते हैं। सूर्य इस परिभाषा के अंतर्गत एक तारा ही है। इसके आठ ग्रह हैं। इन आठों ग्रहों के अपने अपने चन्द्रमा हैं। कम से कम 2500 छोटे उपग्रह भी सौर परिवार के सदस्य हैं। अपने सौर मंडल में दो विशाल उल्का पुँज और पुच्छल उल्का पुँज और पुच्छल तारे भी हैं।
अन्य तारे, सूर्य और उसके अन्य सदस्य ग्रह-उपग्रहों से मिलकर बना संसार एक आकाश गड़ा कहलाता है। हम जिस’ स्पाइनल’ आकाश गंगा में रहते हैं उसमें विभिन्न गैसों की बनी 19 निहारिकाएं है। अपना सौरमंडल उन्हीं में से एक है। प्रत्येक निहारिका में 25 खरब तारों के होने का अनुमान है। इस तरह अपनी आकाश गंगा में ही 25x19=475 खरब तारागण होंगे।
19 निहारिकाओं वाली आकाश गंगा का क्षेत्रफल 100000 x 32000 = 3200000000 वर्ग प्रकाश वर्ष है। 1 प्रकाश वर्ष में 186000 x 60 x 60 x 24 x 365 1 /4 =5869713600000 मील होते हैं फिर 3200000000 वर्ग प्रकाश वर्षों की दूरी का तो कोई अनुमान ही नहीं हो सकता 475 खरब तारामण्डल तो इस क्षेत्र के केवल 1 प्रतिशत भाग में बसते हैं शेष 99 प्रतिशत भाग तो शून्य है। देखने में ऐसा लगता है कि तारागण बहुत पास पास हैं यदि वे चलते होगे तो प्रतिक्षण आपस में टकराते रहते होंगे पर आकाश में कोई भी तारा परस्पर 25000000000000 मील दूरी से कम नहीं।
आकाश की गहराई की सीमा यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अभी तक तो आकाश गंगा में ही चक्कर काट रहे है। हमें अपनी पृथ्वी स्थिर और सूर्य को उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते दिखाई देता समझ में आता है पर खगोलज्ञों ने सिद्ध कर दिया है कि सूर्य नहीं पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है। यह सब समिति दृष्टिकोण की बातें है जिस प्रकार मनुष्य अपने एक गाँव एक प्राँत एक देश का ही निवासी मानकर रहन- सहन, खान-पान, वेषभूषा, भाषा संस्कृति के प्रति संकुचित दृष्टिकोण अपनाता है पर जब वैज्ञानिकों के यह संदर्भ सामने आते हैं तब पता चलता है कि अनन्त आकाश के क्षुद्र जन्तु मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं। समस्त मनुष्य जाति एक है। उसे एक नियम व्यवस्था के अंतर्गत परस्पर मिल जुलकर रहना चाहिये। यदि वह परस्पर बैर भाव रखता है स्वार्थ और संकीर्णता की बात सोचता और करता है तो यह उसकी अबुद्धिता ही कही जायेगी।
इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों के कथन भी पूर्ण सत्य नहीं। उनके द्वारा प्रतिष्ठापित मान्यतायें अभी हमारी दार्शनिक मान्यताओं और हमारे ऋषियों की उपलब्धियों के सामने वैसी जैसे अन्त आकाश में आकाश गंगा और निहारिकाओं के सिद्धाँत हमें जीवन की वास्तविकता को भौतिक वरन् जैसा वेद कहते है-
पतंगमक्तमसुरस्य मायया हदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः।
समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनाँ पदमिच्छन्ति वेवसः॥
परमात्मा की अद्भुत इच्छा द्वारा शरीर धारण करके प्रकट हुये मनुष्यों ! अपने आपको ज्ञान भक्ति और मनन द्वारा प्राप्त करो संसार समुद्र के बीच प्रत्येक पदार्थ को कवि की दिव्य से देखना चाहिए। जो ध्यान में स्थित होकर तेज को मूल स्थान को ढूंढ़ते हैं वही आत्मा का पूर्ण रहस्य प्राप्त करते हैं।
विज्ञान और ब्रह्मांड की गहराइयाँ उसी ओर लेकर चल रही हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि सूर्य है कि सूर्य भी अपने समस्त परिवार के साथ अपनी आकाश गंगा के केन्द्र से 33000 प्रकाश वर्ष दूरी पर रहकर 170 मील प्रति सेकेंड की गति से उसकी परिक्रमा कर रहा है। इस तरह हम सौर मंडल-निहारिका से आकाश गंगा के सदस्य हो गये। जितना यह विराट् बढ़ा हम और छोटे हो गये उसी के अनुसार हमारे विचार और व्यवहार का तरीका भी बदलना चाहिये, तब तक जब हम सम्पूर्ण अस्तता को प्राप्त नहीं कर लेते।
अमरीका की माउन्ट पैलोमर वेधशाला में सबसे बड़े 200 इंच व्यास वाली दूरबीन है इसे वैज्ञानिक हाले ने बनाया था। बड़े दृष्टिकोण से संसार की असलियत का सबसे अधिक स्पष्ट और सही अनुमान होता है इस दूरबीन से देखने पर पता चला कि अपनी आकाश गंगा से 3000000000 प्रकाश वर्ष अर्थात् 20000000000000000000000 मील की दूरी पर सूर्य मंडल जैसे 1000000000 और सौर मंडल या निहारिकाएं है। ऊपर दिये आंकड़ों के अनुसार इन निहारिकाओं में तारागणों की संख्या 25000000000 खरब होनी चाहिये। जबकि इन तारागणों द्वारा घेरे जाने वाला क्षेत्र कुल 1/100 ही होगा अर्थात् सम्पूर्ण विस्तार इन तारागणों के क्षेत्रफल से कही 99 गुना अधिक होगा।
इस सारे नक्शे को एक कागज में उतारना पड़े और दूरी का मापक 1 प्रकाश वर्ष को 1 इंच के बराबर माना जाये तो भी कागज की लम्बाई कई निहारिकाओं की लम्बाई से बढ़कर होगी। ज्यामिती शास्त्र (ट्रिगनोमेट्री) के अनुसार चन्द्रमा की दूरी निकालने के लिए चार हजार मील की लम्बी आधार रेखा चाहिए फिर इन निहारिकाओं में बसने वाले तारे तो इतने दूर हैं कि उनकी दूरी निकालनी पड़ जाये तो 20 करोड़ मील लम्बी तो आधार रेखा ही चाहिये इतनी बड़ी पटरी (फुटा) बनानी सम्भव हो जाये तो उसका एक छोर पृथ्वी में रखकर नापने से भी सूर्य की आधी दूरी तक की ही माप हो सकेगी। सूर्य को पाने के लिए उसके दो गुने से भी अधिक लम्बाई आवश्यक होगी।
अनंत विस्तार के यह संदर्भ संकेत करते हैं कि मनुष्य अणु से ही उलझा न रहकर विराट् का अर्थ भी निकाले और विराट् भी बने । भगवान ने उसे जो सर्वशक्ति सम्पन्न देह और बुद्धि दी है वह भी इसीलिए कि उसे तुच्छ जीवों की सी स्थिति में ही पड़े न रहकर आत्मा का उत्थान और कल्याण करना चाहिए।
श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) से 87 मील दूर अमरनाथ की यात्रा और हिम शिवलिंग के दर्शन करने केवल भारतवर्ष अपितु संसार के अन्य प्रदेशों से भी प्रतिवर्ष हजारों लोग आते हैं। हिन्दू जन अपनी श्रद्धा के सुमन भगवान् आशुतोष के चरणों में समर्पित करने के लिये और दूसरे विदेशी लोग प्रकृति का वह चमत्कार देखने के लिये जिसका कोई वैज्ञानिक विश्लेषण आज तक नहीं किया जा सका।
चन्द्रमा पृथ्वी की ऐसी दिशा में अवस्थित है कि वह पृथ्वी वासियों को 30 दिन में- एक पक्ष में क्रमशः बढ़ता हुआ पूर्णमासी के दिन पूर्ण दर्शन देने की स्थिति में आ जाता है तो दूसरी बार क्रमशः घटता हुआ अमावस्या के दिन बिलकुल छुप जाता है। यहाँ विज्ञान का कार्य-कारण सिद्धाँत समझ में आता है । कोई क्रिया विशेष कारणों की उपस्थिति में ही सम्भव है पर जब कोई कार्य कारण बना सम्भव हो तब ? विज्ञान के पास उसका कोई जबाब नहीं। वह ऐसी क्रियायें नहीं मानता पर सृष्टि में यह भी होता है तब मानना पड़ता है कि सृष्टि में सब कुछ स्थूल पदार्थों का ही अस्तित्व नहीं स्थूलोत्तर चेतन अस्तित्व भी और स्थूल से कही अधिक सशक्त है।
अमरनाथ इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है। अमावस्या के दिन उस बिन्दु पर कुछ भी नहीं होता जहाँ उसके दूसरे ही दिन चन्द्रकला की दशा के ही अनुसार एक हिम शिवलिंग का विकास प्रारम्भ हो जाता है और बढ़ते-बढ़ते ही पूर्णमासी के दिन पूर्ण शिवलिंग का रूप ले लेता है। अमरनाथ अत्यधिक शीत प्रदेश है। वहाँ साल भर बर्फ जमा रहती है। श्रावण के महीने में वहाँ की बर्फ कम रहती है मौसम भी कुछ अनुकूल हो जाता है तब हजारों शरणार्थी वहाँ जाकर इस अद्भुत शिवलिंग के दर्शन करते हैं। शिवलिंग के पास ही और भी मूर्तियाँ जमती है उनको पार्वती जी, गणेशजी और कार्तिकेय जी मानकर पूजन किया जाता है। अमरनाथ के इस विचित्र रहस्य के कारण की खोज आज तक कोई भी नहीं कर सका। जो भी उसे देखता है ईश्वर की महिमा कह कर सिर झुका लेता है।
यदि यह सब प्रकृति का ही खेल है तो भी हमारा ध्यान ऋग्वेद की ओर जाता है जिसमें कहा गया है-
गयः केशिनः ऋतुथा विचक्षते संवत्सरे- वपत एकएषाम्। विश्वेमेको अभिचश्टे शचीभिर्धाजिरेकस्य दद्वशे न रुपम्।
अर्थात्- जगत् के कारण स्वरूप ब्रह्म, जीव और प्रकृति तीनों पदार्थ अनादि है। परमात्मा जीव को कर्मफल प्रदान करने के लिये अध्यक्षता करता है पर व्यवस्थापिका प्रकृति ही है जो परमात्मा के आदेशों के अनुसार जीव और परमात्मा चेतन होने के कारण उनके प्रकाशमय स्वरूप की तो निश्चितता हो जाती है पर प्रकृति भी सत्व गुण वाली होने के कारण प्रकाशमय अर्थात् चेतन ही है “परमात्मा की अनुवर्ती होने पर भी वह स्वतन्त्र अस्तित्व है इसलिये अपने उपासक को वह परमात्मा की तरह ही फल देती है कई बार जिस प्रकार नाराज पिता को भी माता अपने सौंदर्य और काम गुण द्वारा प्रभावित करके पुत्र के अपराध क्षमा करा लेती है प्रकृति भी जीव के लिये कर्माध्यक्ष परमात्मा से क्षमा प्राप्त कराकर उसके लिये सुख-समृद्धि का द्वार खेल देती है।
सावित्री उपासना को प्रकृति की उपासना कहकर कुछ लोग उसे जड़ उपासना का दोष लगाते हैं यहाँ उसके भाव पक्ष को ही स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रकृति का सत्व-गुण उतना ही चेतन और सर्वशक्तिमान है जितना ब्रह्मा इसलिये ब्रह्मा की उपासना से जो लाभ मिल सकते हैं वह सब प्रकृति की भावनात्मक उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
अमरीका के केण्टकी राज्य में मैमथ नामक प्राकृतिक गुफा है इसे मनुष्यों ने नहीं बनाया प्रकृति ने अपने आप बनाया है उस पर कारीगरी देखते ही बनती है डिजाइनर खंभे और कमरे कोई 200 मील लम्बे क्षेत्र में फैले हुये हैं इसी में तालाब और नाले भी है जिनमें जल बिहार भी किया जा सकता है। घनघोर अन्धकार वाली गुफा की आश्चर्य उसकी दीवारें है अनुमानतः कई दीवारें तो इसमें पाँच मंजिल की इमारत जितनी ऊँची है। जो कार्य किसी इंजीनियर से हो सकता है वह प्रकृति ने अन्तःप्रेरणा से करके यह दिखा दिया कि उसमें किसी भी योग्यतम इंजीनियर से बढ़कर ही बुद्धि और शक्ति है।
काँगड़ा जिले के डाडा सीखा गाँव की एक ......... को खोदने पर एक पत्थर मिला। पत्थर किसी इमारत या पुरातत्व विभाग का दबा हुआ टुकड़ा न होकर विशुद्ध खनिज है पर जब उसे बाहर निकाला गया तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि उस पत्थर में एक चिड़िया का हूबहू चित्राकृति है। चोंच, पूँछ, पंजे सारे अवयव ठीक किसी चित्रकार जैसे ही है उसे देखने के लिये हजारों की भीड़ जमा रहती है लोग समझ नहीं पा रहे जहाँ हवा पहुँचती नहीं जहाँ खाने-पीने के नाम मिट्टी ही मिट्टी है उस अन्ताल में दबी यह प्रकृति आखिर किस तरह चित्र बनाती रही। कारण कुछ भी हो प्रकृति ने इस उदाहरण से सिद्ध कर दिया कि वह इंजीनियर ही नहीं कुशल चित्रकार भी है।
अमरीका के पश्चिमी भाग में स्थित “सेलोस्टोन नेशनल पार्क “ जाने का अवसर मिले तो वहाँ का “ ओल्ड फेथफुल “ गीजर अवश्य देखना चाहिये। पृथ्वी के भीतर से प्राकृतिक तौर पर निकलने वाले फव्वारों को “गीजर” कहते हैं भूगर्भ शास्त्रियों का कथन है कि पृथ्वी के गर्भ में जल राशि की छिपी तहें है। जो तहें ज्वालामुखी पहाड़ों के पास है वह कभी-कभी ज्वालामुखी अग्नि ताप के संपर्क में आ जाती है। यह तापमान उस पानी को उबालने लगता है। भाप मिश्रित होने के कारण वह धरती को फोड़कर निकल पड़ता है और पृथ्वी से बाहर गर्म फव्वारे के रूप में फूट पड़ता है।
ज्वालामुखी की आग हो अथवा धरती के भीतर का पानी सब प्रकृति के ही विभाग है इसलिये इस सकारण दृश्य को भी प्रकृति का ही खेल कहा जा सकता है पर जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह गीजर अपने विचित्रता लिये हुये हैं वह यह है कि यह लगभग एक घण्टे के अन्तर से बराबर छूटता रहता है और इस तरह वह सिद्ध करता है कि प्रकृति को समय और नियमितता का भी ज्ञान है।
इच्छा तो भगवान् की ही समझ में नहीं आती फिर प्रकृति की इच्छा को समझना तो और कठिन है पर उसकी चेतनता में कोई अन्तर नहीं है। अनन्याँ तस्य ताँ विद्धि स्पन्दशक्तिं मनोमयरम्। योगवसिष्ठ “चिन्मात्रं स्पदशक्तिश्च सथैवैकात्य यर्वदा।- अर्थात् चिति और स्पन्द शक्ति एक ही है उसमें भी वैसा ही मन है जिस प्रकार ब्रह्म मनोमय है। विभिन्न प्राकृतिक पदार्थों में मन को प्रभावित करने की सामर्थ्य भी होती है वह केवल खाने से ही नहीं स्पर्श और दर्शन से भी होती है। प्राचीनकाल में अधिकाँश लोग जंगलों में प्रकृति के संसर्ग में रहा करते थे क्योंकि उससे उन्हें मानसिक शान्ति मिलती थी। धातुओं के प्रयोग में हमारे यहाँ जो सावधानी बरती गई है वह वैज्ञानिक तथ्य है कि विभिन्न धातुएं विभिन्न प्रकार से मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं इस संदर्भ में आयरलैंड के कार्कनगर में पाये जाने वाले ब्लार्नी पत्थर के चमत्कारिक गुण की चर्चा करना अनुपयुक्त न होगा। “ब्लार्नी” शब्द का अर्थ है ................और जैसा कि नाम से स्पष्ट होता है इस पत्थर के बारे में यहाँ कहा जाता है कि इसे जो भी चूम लेता है उसमें कुछ बनने की सामर्थ्य का चमत्कारिक विकास होता है। यह ............. बैनकबर्न की लड़ाई के अवसर पर, जब कि जनरल बैकार्डी ने राबर्ट ब्रूस की सहायतार्थ 5 हजार सैनिक दिये ......... राबर्टब्रूस ने उपहार स्वरूप मैकार्थी को दिया था। मैकार्थी ने उसे अपने किले की बुर्ज पर जड़वा दिया था। आज भी हजारों पर्यटक प्रतिवर्ष कोर्क शहर केवल इस पत्थर को चूमने और प्रकृति के अद्भुत प्रभाव से लाभान्वित होने के लिये जाते हैं। अतरीका इस पत्थर को लेने के लिये करोड़ों डालर देने को तैयार है पर आयरलैण्ड ने ....... लिये करोड़ों डालर देने को तैयार है पर आयरलैंड ने से कभी बेचने की इच्छा भी नहीं की। भारतीय पर्यटक ....... सरोस कावस जी ने खुद जाकर इस पत्थर को चूमा और 4 अगस्त 1963 के धर्मयुग ........ में उसका विवरण कर स्वीकार किया है कि इस पत्थर ने उन्हें भी प्रभावित अवश्य किया है।
शास्त्रीय मान्यतायें प्रमाण की ही कसौटी पर खरी नहीं उतरती अब विज्ञान भी इस बात को मानने लगा है। जर्मन जीव शास्त्री हैकेल का कथन है कि प्रकृति में जो कुछ भी आक्सीजन, पानी, रोशनी, पेड़-पौधे, कीटाणु, पशु-पक्षी और मनुष्य है वे सब तरंग मात्र हैं इस विज्ञान का नाम “इकॉलाजी” दिया गया है और उसका सिद्धाँत है कि सृष्टि की हर वस्तु एक दूसरे पर अवलम्बित तरंग या चेतना रूप ही है इस तरह विराट् प्रकृति की विराट् ब्रह्म के समान ही चेतना सिद्ध होती है। उस चेतना में आत्म चेतना को घुलाकर जीव न केवल प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों का अवगाहन कर सकता है वरन् उसकी महान् कृपा का अधिकारी पात्र भी बन सकता है जैसा कि गायत्री उपासना से लाभ मिलने की बात कही जाती है। स्थूल की उपासना द्वारा सूक्ष्म का अवगाहन और प्राप्ति जैसी विधा और कोई नहीं है इसलिये इस उपासना को सर्वोपरि मानते हैं।
भक्तराज जयदेव की धर्मपत्नी का राजभवन में बड़ा सम्मान था। एक बार उन्होंने रानी से कहा कि “पति के मरने पर उसकी देह के साथ सती होना निम्न श्रेणी का पतिव्रत धर्म है। सच्ची पतिव्रता तो वे है जो पति का मृत्यु संवाद मिलते ही प्राण त्याग देती हैं।”
रानी को इसमें शंका हुई। एक दिन राजा के साथ जयदेव भी आखेट स्थल पर गये थे। अवसर पाकर रानी ने उनकी पत्नी से कहा कि ‘पण्डित जी को वन में एक शेर खा गया।’ जयदेव की स्त्री श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण कहती हुई धड़ाम से भूमिगत हो गई। उनके मरने का रानी को बड़ा दुःख हुआ। बहुत देर तक वे अपने झूठ बोलने पर पछताती रही।
राजा के साथ जयदेव लौटे तो उन्हें पूर्ण समाचार दिया गया। जयदेव ने कहा ‘रानी माँ से कहो कि वे घबराएं नहीं, मेरे मृत्यु संवाद से उनके प्राण गये हैं जो मेरे जीवित लौटने पर लौट भी आयेंगे।’ भक्तराज अपनी पत्नी की मृत देह के पास हरि कीर्तन में विह्वल हो गये एक क्षण उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु का भी ध्यान न रहा ? और तभी उनकी पत्नी की देह में चेतना लौट आई।
महर्षि अंगिरा ने शिष्य गोपमाल का तिलक किया .............................- तात ! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अन्तःकरण की आकाँक्षा अत्यन्त प्रबल है तो भी तुम जाओ ................ धर्म की मर्यादा के अनुसार गृहस्थ-धर्म ........... करो।
आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरुदेव ! पर यह संसार मायाधन है वहाँ जाकर मुक्ति जैसे जीवन-लक्ष्य को भूल जाऊं तो ?
भूलोगे नहीं तात ! यदि तुमने कर्म के फल में आसक्ति रखी तो गृहस्थ जैसे कठोर उत्तरदायित्व का पालन करते हुए भी तुम उसी लक्ष्य की और अपने आप को .......... पाओगे, जिसके लिये तुम गृहस्थ का परित्याग करना चाहते हो। गोपमाल ने और अधिक प्रतिवाद नहीं किया। वह अपने घर आ गया। श्रावस्ती के एक ग्रामीण कन्या हेमामालिनी के साथ विवाह कर सुख से जीवन बिताने लगा।
गृहस्थी के कार्य बड़े बेढंगे होते हैं एक बार धन के भव में गोपमाल को अपनी गायें बेचनी पड़ी, तब तो पता नहीं चल पाया पर जब वह गायें विचरकर चली गयीं और उनका वध भी हो गया तब उसे पता चला कि गायें धोखे से कसाई के हाथ बेच दी गयीं। गोपमाल का अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठा। इस अनजाने में हुये पाप के प्रति उसका अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठा। इस अनजाने में हुये पाप के प्रति उसका अन्तःकरण तीव्रता से छटपटाने लगा।
अब उसने निश्चय किया कि गृहस्थी के उत्तरदायित्वों का परित्याग कर देगा। उसने यह बात किसी से बताई नहीं तथापि उसने जीवन में आकस्मिक परिवर्तन और तीव्र विरक्ति देख कर हेमामालिनी ने उसके मन की बात जान ली। उसने निश्चय कर लिया यदि गोपमाल गृहस्थ का परित्याग करते हैं तो मैं भी उनके साथ ही गृह परित्याग कर दूँगी।
रात्रि का निविड़ अन्धकार हाथ को हाथ नहीं सूझता था, गोपमाल चुपचाप उठा जैसे ही आगे बढ़ने को हुआ देखा कि हेमामालिनी सम्मुख खड़ी है। मुझे मत रोको देवी ! उससे आहत वाणी में कहा।
रोकती नहीं आर्य, मैं तो स्वयं भी आपके साथ चलने को प्रस्तुत हूँ आत्मकल्याण क्या पुरुष की ही आवश्यकता है नारी की नहीं ? हेमामालिनी ने पूछा ! “ हे भन्ते। किन्तु अन्तेवासी जीवन को कठोरता तुम कैसे सहन कर सकोगी। गोपमाल ने प्रतिवाद किया। “
आप कर सकते हैं तो मैं भी कर सकती हूँ याद है परिग्रहण के समय मैंने आपको हर कष्ट में साथ रहने का वचन दिया था उसे भी तो पालन करना है। गोपमाल कुछ उत्तर दे इससे पूर्व ही एक आकृति सामने आई। गोपमाल ने उन्हें पहचाना। यह तो महर्षि खड़े है उसने उन्हें प्रणाम किया। आशीर्वाद देते हुए अंगिरा ने कहा-तात ! तुम दोनों आत्म-कल्याण के इच्छुक हो, दोनों तितीक्षाएं सहन करने के लिये तैयार हो पर जो सामाजिक जीवन की विपरीत परिस्थितियों से ही नहीं लड़ सकता वह भला, एकान्त जीवन के संघर्ष से क्या मुकाबला करेगा। तुम्हारे पलायन से भी संसार इस तरह के पाप और अपराध करेगा फिर क्या उचित न होगा कि तुम संसार में ही रहकर लोगों को पाप से बचाने और उन्हें सन्मार्ग पर लगाने का प्रयत्न करो।
लेकिन गुरुवर अनजान में हुई भूलों का उत्तरदायी कौन होगा- देव ! यही समझने में तो निष्काम कर्मयोग का सारा मर्म छिपा है। मनुष्य कर्म करे पर सफलता या विफलता सुख या दुःख मान या अपमान सब में अपने आपकी स्थिर रखकर फल से प्रभावित न हो तो संसार की बुराइयों का उत्तरदायी भी भगवान को माना जा सकता है। मनुष्य को तो अपने आपको उसका प्रतिनिधि मानकर लोक सेवा का ध्यान रखना चाहिए।
गोपमाल को मानो सिद्धि मिल गई उस दिन से उसने कर्म से विरक्ति का परित्याग कर दिया और लोक कल्याण को ही अपना लक्ष्य मानकर जीवन यापन करने लगा।
पदार्थ विज्ञान की दृष्टि में आत्मा का या किसी समष्टि सत्ता (ईश्वर) का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। जो कुछ है शरीर है,चेतना शरीर की ही संपत्ति है। जल, वायु, ऊष्मा मिट्टी इन चारों के रासायनिक संयोग से शरीर में एक चेतना उत्पन्न हो जाती है, वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व हो ? आत्मा की सर्वव्यापकता और सनातन होने की बात भी पदार्थ विज्ञान नहीं मानता। इसी पदार्थवादी मान्यता पर आज अधिकाँश संसार चल रहा है, इसे ही प्रकृतिवाद, जड़वाद, पदार्थवाद या भौतिकवाद कहते हैं।
विज्ञान और यान्त्रिक विज्ञान (साइन्स एण्ड टेक्नोलॉजी) का जितना अधिक विकास होता जा रहा है, प्रक्षेपणास्त्र, अंतरिक्षयान, टेलस्टार, लेजर यन्त्र आदि का जितना अधिक विकास होता जाता है लोग आत्मा और परमात्मा को उतना ही भुलाते जा रहे है। अब अमैथुनी सृष्टि का समय आ पहुँचा। पुरुष की आवश्यकता नहीं रही। कृत्रिम निषेचन क्रिया द्वारा स्त्रियों को गर्भ धारण कराया जाने लगा। संगणक (कंप्यूटर) एक ऐसा यान्त्रिक मस्तिष्क है जिसने आदमियों की आवश्यकतायें पूरी करनी प्रारम्भ कर दीं। यन्त्र किसी दुकान में डाक्टर का, विक्रेता का, .................................. कर सकता है। नई शब्दावली, व्याकरण पढ़कर एक ही साथ एक ही भाषा का विश्व की 15 भाषाओं का अनुवाद कर सकता है। ऐसे आश्चर्यजनक निर्माण करके तो मनुष्य को ईश्वर की आत्मा की और धर्म की आवश्यकता रही ही नहीं ?
लोगों ने प्रश्न किया यदि शारीरिक तत्वों की रासायनिक क्रिया ही मानवीय चेतना के रूप में परिलक्षित होती तो फिर ज्ञान और विचार क्या है ? भौतिकतावादी इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में देते है-” जिस प्रकार जिगर उत्पन्न करता है और उससे भूख उत्पन्न होती है उसी पदार्थों की प्रतिक्रिया उनके कार्य ही विचार है और जो कुछ देखती हैं (परसेप्सन) वही विचार और ज्ञान के साधन हैं। रासायनिक परिवर्तनों से काम, क्रोध, आकर्षण, प्रेम, स्नेह आदि गुण आविर्भूत होते हैं उनका सम्बन्ध किसी शाश्वत सिद्धान्त से नहीं है। यह एकमात्र भ्रम है। और इसी प्रकार लोक मर्यादायें या नैतिकता भी लोगों की सम्मतियाँ मात्र है इनकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।
यदि विज्ञान की इन मान्यताओं को विज्ञान के द्वारा ही तौलें और कसौटी पर कसें तो उनका थोथापन आप प्रकट हो जाता है। यदि यह संसार रासायनिक संयोग मात्र है तो वैज्ञानिक हवा, पानी , मिट्टी और विभिन्न खनिज व धातुएं मिलाकर भी “ प्रोटोप्लाज्मा” क्यों नहीं तैयार कर सके ? प्रोटोप्लाज्म ही वह इकाई है जिससे जीवित प्राणियों की रचना होती है। इसका रासायनिक विश्लेषण कर लिया गया किन्तु नये सिरे से प्रोटोप्लाज्म तैयार नहीं किया जा सका।
हमारे साथ जो एक विचार प्रणाली काम करती है, ज्ञान, अनुभूति, आकाँक्षायें काम करती है, प्रेम, आकर्षण स्नेह, उमंग के भाव होते हैं, वह एक कंप्यूटर में नहीं होते। उसमें जितनी जानकारियाँ भरदी जाती है उस समिति क्षेत्र से अधिक काम करने की क्षमता उसमें उत्पन्न नहीं हो सकी। जर्मन का एक वैज्ञानिक एक कंप्यूटर पर काम रहा था। वह उसके हाथों के नीचे झुका हुआ कोई यन्त्र ठीक करने में लगा हुआ था तभी कोई यन्त्र खराब हो गया और लोहे का हाथ उस वैज्ञानिक के सिर में लगा। सिर फट गया। मुश्किल से जान बची। प्रश्न यह है कि मनुष्य जैसा विवेक और आत्म चिन्तन का विकास मनुष्य कृत किसी भी मशीन में नहीं है तो मनुष्य को भी एक रासायनिक संयोग कैसे कहा जा सकता है।
कुम्हार मिट्टी लाता है, उसमें रंग, पानी मिलाकर तरह-तरह के बर्तन और खिलौने बनाता है यह खिलौने कैसे है इससे पहले यह भी पूछते हैं यह खिलौने किसने बनाये है। संसार की रचना के पीछे भी कुम्हार की भाँति ही कोई साक्षी तत्व होना ही चाहिए। यदि वह प्रकृति ही है तो उसमें विचार और ज्ञान की क्षमता यदि है तो उसका स्वतन्त्र अस्तित्व उसी प्रकार होना चाहिए जैसे आँख शरीर का एक अंग होकर भी अलग वस्तु भी है।
मनुष्य आज तक संसार के करोड़ों जीवों की तरह का एक भी नया जीव तैयार नहीं कर सका। यहीं से एक सर्वशक्तिमान सत्ता पर विश्वास करना आवश्यक हो गया। धर्म यही तो है कि हम अपने आपको उन शक्तियों को पहचानने योग्य बनायें।
देखना (परसेप्शन) भी रासायनिक गुण नहीं वरन् वाह्य परिस्थितियों पर अवलम्बित ज्ञान है हमें पता है कि यदि आँखों के प्रकाश न टकराये तो वस्तुयें नहीं देखी जा सकती। यदि प्रकाश किसी वस्तु से टकराकर हमारी आँखों तक पहुँचता है पर हमारी आंखें खराब है इस स्थिति में भी उस वस्तु को देखने से हम वंचित हो जाते हैं। ज्ञान का एक आधार प्रकाश रूप में वाह्य जगत में भी व्याप्त है और अपने भीतर भी दोनों के संयोग से ही ज्ञान की अनुभूति होती है। हम जब नहीं देखते तब भी दूसरे देखते रहते हैं और जब हम देखते हैं तब भी हमारा विचार उस दृश्य वस्तु से परे बहुत दूर का चिंतन किया करता है यह वह तर्क है जिनके द्वारा हमें यह मानने के लिये विवश होना पड़ता है चेतना से अधिक समर्थ और शक्तिशाली है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी अनुमान या विश्वास के बिना हम अधूरे हैं। हम कहाँ देखते हैं कि पृथ्वी चल रही है और सूर्य का चक्कर लगा रही है। हमारी आंखें इतनी छोटी है कि विराट् ब्रह्माण्ड (गैलक्सी) में होने वाली हलचलों को बड़े-बड़े उपकरण लगाकर भी पूरी तरह नहीं देख सकते हैं। वहाँ जा कुछ, जहाँ-जहाँ से परिक्रमा पथ बनाते हुए यह ग्रह नक्षत्र चलते हैं उसका ज्ञान हमने अनुमान और विश्वास के आधार पर ही तो प्राप्त किया है यह अनुमान इतने सत्य उतर रहे है कि एक सेकेण्ड और एक अंश (डिग्री) समय और कोण का अन्तर किये बिना अन्तरिक्षयान इन ग्रह नक्षत्रों में उतारे जा रहे है। जहाँ हमारी आँखों का प्रकाश नहीं पहुँचता या जिन स्थानों का प्रकाश हमारी आँखों तक नहीं पहुँचता वहाँ की अधिकाँश जानकारी का जायजा हम विश्वास और अनुमान के आधार पर ही ले रहे है विश्वास एक प्रकार की गणित है और विज्ञान की तरह भावनाओं के क्षेत्र में भी वह सत्य की निरन्तर पुष्टि करता है।
केवल मात्र विज्ञान के दुष्परिणाम वैसे ही निकले जैसे बीमार को दवा न दें उलटे उसके कमरे में दही, चाट-पकौड़ी आदि वस्तुयें रखदें। रोगी उन्हें देखकर ललचाता है। स्वतन्त्र होने से खा भी लेता है। उसे क्षणिक स्वाद भी मिलता है इसलिये दवा की कड़ुवाहट के बदले वह उस अपथ्य को पसन्द भी करता है पर अन्ततः वह उससे अपनी मृत्यु को ही तो निमन्त्रण देता है। विज्ञान की वर्तमान मान्यताओं ने मनुष्य को स्वच्छन्दता देकर युद्ध, रोग, खाद्य संकट महामारी और अपराध आदि वह परिस्थितियाँ पैदा करादी हैं जो आज मनुष्य के लिये वैसी ही हानिकारक सिद्ध हो रही हैं।
कहते हैं शरीर में हल्दी लगा कर पानी में प्रवेश करें तो मगर आदि हिंसक जन्तु उसकी गन्ध से दूर भाग जाते हैं और स्नान करने वाला निर्द्वंद्व स्नान कर आता है। धर्म ऐसा ही ज्ञान है, विवेक है, श्रद्धा है, विश्वास है जो मनुष्य को पदार्थ वादी सभ्यता के दोषों से बचाये रखता है इसलिये उसे आवश्यक ही नहीं जीवन में अनिवार्य स्थान देना ही पड़ेगा। धार्मिक विश्वासों के बिना हम जीवन में स्थायी सुख-शान्ति अर्जित नहीं कर सकते।
एक महात्मा के पास एक व्यक्ति ने आकर पूछा-’महात्मन् ! आप जीव और ईश्वर में एक ही चैतन्य का वास बताते हैं, परन्तु ईश्वर के समान जीव सर्वज्ञ क्यों नहीं होता ?’ महात्मा ने एक लोटा जल गंगाजी से लाने की आज्ञा दी। वह व्यक्ति एक लोटा जल लाया तो महात्मा बोले-’बच्चा ! गंगाजी जी में जहाज चलते हैं इसमें क्यों नहीं चलते ?’ वह बोला- गंगाजी में अथाह पानी है, लोटे में तो जहाज आवेगा ही नहीं।’ महात्मा ने समझाया-इसी प्रकार जीवात्मा में थोड़ा और ईश्वर में अनन्त गुण हैं।’
जहाँ तक सामान्य जगत की बात है उसे पदार्थों की ....... पदार्थों का खेल कहा जा सकता है पर वहाँ इस संसार के अनेक ऐसे विलक्षण आश्चर्य और अलौकिक ....... भी दिखाई देते हैं जो पदार्थ के रासायनिक और ............ गुणों से भिन्न क्रिया कर रहे प्रतीत होते हैं वे इस बात के प्रमाण होते हैं कि संसार में कोई एक विचारशील सार्वभौमिक कलाकार सत्ता काम कर रही है। मनुष्य और प्रकृति दोनों की सामर्थ्य से परे यही आश्चर्यजनक घटनायें सके होने का प्रमाण देती हैं और उसके प्रति श्रद्धा रखने और उसकी ही शोध, साक्षात्कार करने की प्रेरणा दी हैं।
मिशिगन (अमेरिका) में एक ऐसा व्यक्ति है जो मुँह में साँस खींचकर आँखों से निकाल सकता है इन सज्जन का नाम एल्फ्रड लागेवेन। इस तरह की अनुभूति उन्हें अपने आप तब हुई जब एक दिन उन्होंने मुँह में हवा भर गोल फुलाये तो उन्हें अनायास ही ऐसा लगा कि हवा आँखों से निकल रही है। आँखों के आगे हाथ लगाकर देखा तो हवा की स्पष्ट अनुभूति हुई। इस बात को वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने भी अनुभव किया।
आँख का काम देखना है हवा छोड़ना नहीं, कान सुनने के लिये भगवान् ने बनाये हैं खाना खाने के लिये नहीं। यदि कोई ऐसी अद्भुत बातों का प्रदर्शन कर सकता है तो इसे आश्चर्य और अपवाद ही कह सकते हैं। सच कहा जाये तो यह आश्चर्य और इस तरह के अपवाद उत्पन्न करने की क्षमता मनुष्य में न होकर उसकी ईश्वरीय सत्ता कि है जिसने आश्चर्यों का आश्चर्य इतना बड़ा संसार तैयार कर दिया।
कुछ लोगों को लगा कि अल्फ्रेड किसी टेकनीक से हवा जैसी अनुभूति हाथों को करा देता होगा तो वह मोमबत्ती जलाकर ले आये और जब अल्फ्रेड ने मुँह को पूरी तरह साँस से भर कर बन्द कर लिया तब उसके नथुने का बन्द करके मोमबत्ती आँखों के सामने ले जाई गई और कहा गया अब आप इसे आँख से फूँक मारकर बुझाइये। अल्फ्रेड ने सचमुच आँख से फूँक मारी और उस जलती मोमबत्ती को बुझा कर दिखा दिया। उसकी यह विलक्षणता इस बात की प्रमाण है कि मनुष्य शरीर भगवान् की बनाई हुई रहस्यपूर्ण विशेषताओं का प्रतीक है, यदि आन्तरिक दृष्टि से खोज की जाये तो इस शरीर यन्त्र से सैकड़ों ऐसे कार्य किये जा सकते हैं, स्थूल दृष्टि से जो विलक्षण चमत्कार ही जान पड़ते हों।
आँख के लेन्स इस तरह बनाये गये हैं कि जो वस्तु सामने जैसी हो वैसी ही दिखाई देती रहे। यह सब प्राकृतिक होता तो दृढ़ नियम की भाँति आदि मानव से लेकर प्रलय के अन्तिम मरणासन्न व्यक्ति तक सबसे यही नियम काम करते रहना चाहिये था पर यहाँ तो बीच में ही उलट फेर हो जाने से फिर वही बात प्रमाणित होती है कि इस संसार में जो कुछ हो रहा है वह सब ईश्वरीय बुद्धि कौशल का ही खेल है। उदाहरण के लिये पेरु में कैम्पा नामक एक ऐसी आदिवासी मनुष्यों की जाति रहती है जिनकी आँखों के लेन्स हमेशा उल्टे होते हैं उसका परिणाम यह होता है कि यह लोग हर वस्तु को उल्टा ही देखते हैं। पुस्तकें पढ़ते समय वे उसे उल्टा रखते हैं तब उसके अक्षर उन्हें सीधे समझ में आते हैं।
पेरु के इन केम्पाओं की भाँति हमने भी संसार को प्रकृति-प्रवाह से प्रतिकूल दृष्टिकोण अपनाकर देखने की क्षमता उत्पन्न की होती तो वह सूक्ष्म रहस्य भी हमारे सामने स्पष्ट हो गये होते जो स्थूल दृष्टि से समझ में नहीं आते पर जिनके अस्तित्व पर कोई सन्देह नहीं है। यह विषय और तत्व आध्यात्मिक हैं। परमात्मा, आत्मा, लोक परलोक पुनर्जन्म आदि से सम्बन्धता है उन्हें समझने के लिये सामान्य सृष्टि क्रम से उलटा ही दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है।
साधारणतया होता यह हैं कि मनुष्य की मृत्यु दिखाई नहीं देती। उस समय की अनुभूति केवल मरने वाले को ................ है वह भी यह व्यक्त नहीं कर पाता कि वह ......... का जीवन जीने के कारण दुःख, कितनी .............. के साथ प्राणों का परित्याग करता है इसलिये .......... इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्याय के प्रति अन्य .......... भी दृष्टिकोण सामान्य सा नासमझी का ही रह ..............।
मृत्यु जीवन का अनिवार्य ही नहीं एक अति महत्वपूर्ण ........... है यह दो अवस्थाओं की संधि है। संधि का महत्व .......... अधिक होता है कि उस स्थिति में दो बिलकुल ............ दिशाओं का एक ही स्थान पर ज्ञान होता है। संध्या ......... महत्व इसीलिये सर्वाधिक होता है क्योंकि उस बिन्दु ............ और अन्धकार एकाकार होते हैं सत्य और असत्य ............ और प्रकृति, जन्म और मृत्यु की परिस्थितियों का ............... बढ़िया चिन्तन, ज्ञान और अनुभूति उसी समय हो ............. है इसीलिये ध्यान और उपासना के लिये सन्ध्या ............ सबसे उपयुक्त माना गया। मृत्यु भी एक ऐसी ही ................ सन्ध्या है जिसमें जीवन के स्थूल और सूक्ष्म ......................... का ज्ञान होता है इसलिये उसकी विशेष तैयारी के .............. यहाँ पूर्व विधान बनाये गये है।
हम उन पर ध्यान नहीं देते पर दूसरे जीवों के जीवन ................. उसका कितना महत्व है, इसे देखना हो तो किसी जला-.................. के किनारे पहुँचकर “स्टेन्टर” नामक जीव को देखना चाहिये। वह मृत्यु के समय एक क्षण तूफान से पूर्व के वातावरण की भाँति अत्यन्त शान्त प्रतीत होता है दूसरे ही क्षण एक भयंकर विस्फोट के साथ अपने प्राण निकाल ................. है। उस विस्फोट को सुनते हुये भय लगता है मानों “स्टेन्टर” मृत्यु के समय भावी जीवन की कल्पना से भयभीत हो उठा हो। भले ही ऐसा कुछ न हो तो भी यह घटना मनुष्य को इस महत्वपूर्ण स्थिति पर ध्यान देने और उसके लिये आवश्यक तैयारी करने को बाध्य अवश्य करती है।
यह घटनायें व्यक्तियों से जीव-जन्तुओं से सम्बन्धित कही जा सकती हैं पर उस सत्ता की क्रीड़ा-स्थली मनुष्य और मनुष्येत्तर जीवों के शरीर मात्र नहीं समस्त ब्रह्माण्ड ही उसका घर हैं। उसकी अद्भुत लीलाएं भी सर्वत्र देखने को मिलती हैं। ऐसा ही एक आश्चर्य पिछले वर्ष बिहार राँची जिले में उद्घाटित हुआ। राँची से 130 मील दूर मराचट्टी थाने के अंतर्गत एक जंगल में एक नाला बहता है उसी के पास एक महुये का वृक्ष हैं। वृक्ष निर्जीव वस्तु मानी जाती है पर इस महुआ वृक्ष की विलक्षणता ने तो यही सिद्ध कर दिया कि वृक्ष का शरीर भले ही निर्जीव और जड़ हो, जड़ तो मनुष्य का शरीर भी है पर काम कर रही होती है वृक्षों के मूल में भी वैसी ही चेतना काम करती हैं।
इस वृक्ष के बारे में पिछले वर्ष सन् 70 के अगस्त मास में एक अफवाह फैली कि उसके नीचे पहुँचते ही जो भी पहुँचता है उसके हाथ वृक्ष की ओर खिंचने लगते हैं और थोड़ी देर में वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। इसके बाद उस व्यक्ति के पुराने से पुराने रोग अच्छे हो जाते हैं। और वह अपने आपको बिलकुल स्वस्थ और हलका अनुभव करता है। एक विचित्रता यह भी है कि वहाँ से जो लोग किये हुए पापों के प्रति प्रायश्चित का भाव लेकर जाते और फिर कभी दुष्कर्म न करने का संकल्प कर लेते हैं उनमें स्वास्थ निरोगिता के लक्षण स्थायी हो जाते हैं फिर वापस आ गये।
कहने में यह बातें अन्ध-विश्वास और मनगढ़न्त सी लगती हैं पर कोई सत्य, कोई अलौकिक आश्चर्य उसमें अवश्य है इसकी पुष्टि “नव-भारत टाइम्स” जैसे राष्ट्रीय ख्याति के अखबार ने की हैं। इस अखबार के सम्पादकों ने अपना निजी संवाददाता इस वृक्ष की परीक्षा लेने को भेजा था। संवाददाता ने वहाँ के अनुभव 30 नवम्बर के दैनिक नव-भारत टाइम्स में छपाये भी थे।
महुआ वृक्ष के चमत्कार की घटना का वर्णन देते हुए लिखा है- अघहर ग्राम का एक किसान जागेश्वर महतो लकड़ियाँ लेकर घर लोट रहा था। थकावट के कारण उसने इस वृक्ष के समीप लकड़ियों का गट्ठर पटक दिया नाले में हाथ-पैर धोये और जैसे ही महुआ वृक्ष के नीचे आकर बैठा कि उसके हाथ अपने आप ऊपर की ओर खिंचने लगे थोड़ी देर में वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। कुछ देर बेहोशी दूर हुई तो उसने अपने पेट के बहुत पुराने मर्ज में आराम और शरीर में ताजगी अनुभव की। उसने यह बात गाँव के अन्य लोगों का बताई। गाँव के न केवल हिन्दू, वरन् मुसलमान और ईसाई धर्मावलम्बियों ने भी जाकर परीक्षण किया और उन्होंने भी उस चमत्कार को आश्चर्यजनक रूप से सत्य पाया। कुछ दिन में वहाँ सैकड़ों लोगों की भीड़ बढ़ी तो वहाँ सरकार ने अव्यवस्था के कारण प्रतिबन्ध लगा दिया पर यह बात संवाददाता ने भी स्वीकार की है कि और सब बातें अन्ध-विश्वास मान ली जायें तो भी वृक्ष के नीचे बैठते ही हाथों का अनायास ऊपर की ओर खिंचना फिर मूर्च्छित होकर गिर पड़ना और मूर्छा अपने आप दूर हो जाना इत्यादि प्रकट सत्य ऐसे हैं जिन्हें मात्र अन्ध-विश्वास नहीं कहा जा सकता उसके पीछे कोई दैवी सत्य अवश्य होना चाहिए।
हमारे देश में अन्ध-विश्वास बहुत अधिक फैला है इसलिये उसके मध्य हुई सत्य बातें भी अन्ध-विश्वास कहकर शिक्षित लोगों द्वारा सृष्टि की आद्य शक्तियों और सूक्ष्म तत्वों की उपेक्षा की जाती रहती है। आत्मा, परमात्मा परलोक और पुनर्जन्म जैसे आध्यात्मिक सत्यों और सिद्धाँतों को भुलाया जाना इस बात का प्रमाण है कि हम स्थूल जगत से आगे किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये सामर्थ्य भी नहीं। प्रकृति वादी इन पूर्वाग्रहों ने हमारी भौतिक वासनाओं को प्रखर किया है आज की अशान्ति आज के द्वन्द्व, आज के विग्रह और विभीषिकायें उसी का परिणाम हैं ऐसे भौतिकवादी दर्शन को ही मान्यता देना भी एक प्रकार का अन्ध-विश्वास ही है। यदि चाहें तो इस तरह की घटनाओं से अध्यात्मिक सत्यों की भी प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं।
इंग्लैंड के विश्व विख्यात प्लीमथ बन्दरगाह पर बने प्रसिद्ध प्रकाश स्तम्भ एडिस्टोन के पीछे भी एक ऐसी ही विलक्षण घटना जुड़ी हुई है। यूरोपियन भी जिसकी आश्चर्य के साथ चर्चा करते और यह मानते हैं कि ऐसी घटनायें किसी अतीन्द्रिय कारण का ही फल हो सकती हैं।
यह प्रकाश स्तम्भ हेनरी विस्टनले नामक अँगरेज शिल्पी ने बनाया था। इसे बनाने में उसने अपनी सारी आत्मा लगा दी थी। अपने निर्माण के प्रति उसका प्यार इसी बात से प्रकट होता है कि उसने इस प्रकाश स्तम्भ का एक छोटा मॉडल भी बनाया और उसे अपने घर में ड्राईंग रूम में सजाकर रखा।
दिन बीतते गये एकबार की बात है कि समुद्र में भयंकर तूफान आया। तूफान ने न केवल इस बन्दरगाह को ध्वस्त कर दिया वरन् इस प्रकाश स्तम्भ को भी बर्बाद कर दिया। विस्टनले उस समय बन्दरगाह से 200 मील दूर अपने घर पर था। इधर समुद्र में तूफान आया और प्रकाश स्तम्भ गिरा उधर घर में रखा वह मॉडल भी अपने आप जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। और ठीक इसी समय अपनी चारपाई पर लेटे विस्टनले ने कहा अब जब न यह कलाकृति रही और न वह तो मैं ही जीकर क्या करूं इतना कहते कहते उसने भी अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। दस समय तो इन शब्दों का अर्थ वहाँ उपस्थित कोई भी व्यक्ति नहीं समझा पाया पर पीछे जब सब बातें प्रकाश में आई तो लोग आश्चर्यचकित रह गये कि दो जड़ और एक चेतन- तीन आत्माओं का एक साथ विसर्जन क्यों हुआ और 200 मील दूर बैठे मिस्त्री विस्टनले को इसका पूर्वाभास अपने आप कैसे हो गया।
यह आश्चर्य संसार की व्यवस्था में किसी विचारशील सत्ता के स्पष्ट प्रमाण है। चाहें तो इनसे प्रेरित होकर भी सृष्टि के कलाकार की खोज में आरुढ़ हो सकते हैं।
मनुष्य स्वयं देवता है, उसकी पूजा की जानी चाहिये, अन्तःकरण में सोया देवत्व जगाया जाना चाहिये। -स्वामी विवेकानंद
हिरण गाने से, हाथी हस्तिनि से, पतंग दीपक से, भ्रमर गंध से, और मछलियाँ जीभ के स्वाद से मोहित होकर अपने प्राण खो देती हैं। फिर जिन्हें पाँच इन्द्रियाँ हैं और जो सभी विषयों की आसक्ति में फंसते हैं तो उनको मृत्यु क्यों छोड़ेगी ?
रसौली (एक प्रकार उभरी हुई गाँठ की बीमारी) की मरीज एक स्त्री एक बार श्रीमती जे.सी.ट्रस्ट के पास गई और अपने रोग की चिकित्सा के लिए कोई औषधि देने की प्रार्थना करने लगीं। श्रीमती ट्रस्ट अमेरिका की विश्व विख्यात संत है जिन्होंने धर्म और अध्यात्म को वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न ही नहीं किया अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों से सैकड़ों पीड़ित और पतित लोगों का भला भी किया है। उनके प्रवचन और आध्यात्मिक गवेषणाएं सुनने के बड़े बड़े वैज्ञानिक तक पहुँचते थे।
ट्रस्ट ने उस महिला को बहुत ध्यान से देखा और कहने लगीं- आप नहीं समझ सकती पर जिन्हें प्रकाश की गति और अवस्था का ज्ञान होता है वे यदि कोई न भी बताये तो भी, किसी के भी अन्तरंग की बात जान लेते हैं। आप शरीर में मुझे कुछ काले रंग के अणु दिखाई देते हैं जो इस बात के प्रतीक हैं कि आपके जीवन में कही कोई त्रुटि, विकृति या ऐसी अनैतिक प्रवृत्तियां हैं जो आप दूसरों से छिपाती रहती है। आप प्रायश्चित का साहस कर सकें तो हम विश्वास दिलाते हैं आपका यह छोटे से छोटा रोग तो क्या भविष्य में अवश्यम्भावी कठिन रोगों का निवारण भी उससे हो सकता है।
स्त्री बोली- माता जी ! मैं आपके पास चिकित्सा के लिए आई हूँ उपदेश तो बहुतेरे पादरियों सन्त और धार्मिक व्यक्तियों से सुन चुकी ! औषधि दे सकती हैं तो दीजिये, अन्यथा हम यहाँ से जायें।
उस महिला की तरह सैकड़ों लोगों के जीवन विकार ग्रस्त होते हैं मन में दूषित- क्रोध, लोभ, मद मत्सर आदि विकार उठते रहते हैं, उनसे प्रेरित जीवन से जा पाप संभव है उन्हें लोग एक सामान्य ढर्रे की तरह अपना रहते हैं। काम वासना से पीड़ित व्यक्ति किसी भी नारी को देख कर उत्तेजित हो उठता है, क्रोधी व्यक्ति ही किसी को दुश्मन की तरह देखता और वैसा ही कटु व्यवहार करता, लोभी व्यक्ति ही चोरी से लेकर रिश्वत छल कपट और मिलावट तक करते हैं भले ही उससे समाज का कितना ही अहित क्यों न हो ? जब उससे यह कहा जाता है कि पाप और विकारों का कर्म भोग भोगना पड़ेगा। यह पाप ही आधि-व्याधि, रोग शोक और बीमारियों के रूप में फूटते हैं इन्हें अभी सुधार लो, अभी प्रायश्चित कर पाप के बोझ से मन को हलका कर लो तब वह इन विचारों को दकियानूसी पिछड़ापन कहता है और तर्क देता है कि विकास के लिये संघर्ष अनौचित्य प्राकृतिक सत्य है प्रकृति यही सब कर रही है मनुष्य क्यों न करें ? वह कर्मफल के सिद्धांत को मानने को तैयार नहीं होता। विकारों को वह विकास न मानकर शारीरिक आवश्यकताएं मानता है और उनकी किसी भी उपाय से पूर्ति-धर्म। इन मान्यताओं के कारण ही आज न केवल सामाजिक व्यवस्थायें विचलित हुई वरन् लोगों के जीवन रोग शोक से भरते चले जा रहे हैं। पाप और मनोविकार सचमुच रोग और भविष्य के लिए अन्धकार उत्पन्न करते हैं यह बात अब केवल तर्क संगत रही वरन् विज्ञान सम्मत भी हो गई है।
एक बार इंग्लैंड के डाक्टरों ने एक प्रयोग किया। एक बन्दी के एड्रीनल में “मेडुलरी भाग” में हलकी सी विद्युत करेंट प्रवाहित करके देखा कि उससे “एड्रिलीन” हारमोन के स्राव की मात्रा बहुत बढ़ गई उस समय बन्दर की मुख मुद्रा में भयानक क्रोध के लक्षण उभर आये। फिर उन्होंने कुछ तीव्र रसायनों द्वारा उस भाग को “शून्य” कर दिया और तब फिर विद्युत करेंट प्रवाहित किया तब “एड्रिलीन” बहुत थोड़ा निकला। बन्दर उस समय कुछ ज्यादा क्रोधित भी नहीं हुआ। इसके साथ एक ऐसे व्यक्ति का परीक्षण किया गया जिसने किसी महिला के पर्स की चोरी करली थी। उस समय वह अत्यन्त भयभीत था कि कहीं पुलिस पकड़ न ले और उसे पीटा न जाये। डाक्टरों उसकी जाँच की तो पाया कि उसका सारा केन्द्रीय नाड़ी स्थान उत्तेजित है और उससे शरीर के पूरे यन्त्र (मेटाबोलिज्म) पर असर पड़ रहा है ऐसे समय तीव्र-असर वाली बीमारियाँ होने की सम्भावना डाक्टरों ने भी स्वीकार की। चिन्ता व शोक की स्थिति में “थैलमस” कोलिकल स्टेमुलेटिंग हारमोन रिलीजिंग फैक्टर” में कमी हो जाने आदि क उदाहरण से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि बुरी भावनायें मनुष्य शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव निश्चित रूप से डालती हैं। वही रोग के रूप में उत्पन्न होते हैं इसलिये यदि रोग से स्थायी बचाव करना है तो अपने मनोमय संस्थान को शुद्ध रखना ही पड़ेगा। साथ ही साथ अब तक जो मलिनतायें मन में भर गई उन्हें प्रायश्चित द्वारा परिमार्जित करना ही होगा। तब तक मनुष्य इन्हें स्वीकार नहीं करता वह अंतर्दहन से बच नहीं सकता।
“हारमोन्स” क्या है” और उनका मनुष्य शरीर से क्या सम्बन्ध है यह समझने से उक्त तथ्य की गहराई में निवेश किया जा सकता है। मनुष्य शरीर में दो प्रकार की ग्रन्थियाँ (ग्लैण्ड्स) होती हैं। ग्रन्थियाँ एक ऐसे कोशों ........ के समुदाय को कहते हैं जो किसी गाँठ की शक्ल में बदल जाते हैं और जिनसे रासायनिक स्राव निकलता रहता है इस स्राव को ही “हारमोन्स” कहते हैं। एक ग्रन्थियाँ वह होती है जिनका सम्बन्ध नलिकाओं द्वारा शरीर से होता है दूसरी नलिका विहीन (डक्टलेस ग्लैड्स) ......... होती है जिनका सम्बन्ध नलिकाओं से नहीं होता है वे स्राव मस्तिष्क की गति-विधि के अनुसार निकालती और मनुष्य शरीर पर प्रभाव डालती हैं। यही सर्वाधिक महत्व की हैं। अभी वैज्ञानिक इनके बारे में पूर्णतया नहीं जान पाये। जब जानेंगे तब पूर्व जन्मों के संस्कार, पुनर्जन्म आदि के कितने ही आश्चर्यजनक तथ्य सामने आयेंगे ऐसा अनुमान हैं। हम नहीं जानते पर अब विज्ञान यह बताने लगा है कि मनुष्य की अच्छी बुरी भावनाओं के द्वारा ही अच्छे या बुरे हारमोन्स शरीर में स्रवित होकर रासायनिक सन्तुलन या विकृति उत्पन्न करते हैं। नलिका विहीन ग्रन्थियों (डक्टलेस ग्लैड्स) में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थि “पिचुट्री” होती है। इसका स्थान मस्तिष्क के प्रति-पृष्ठीय भाग (वेन्ट्रल साइड) में “आप्टिक कैजमा” अर्थात् दोनों आँखों को मिलाने वाले स्थान पर ललाट के पीछे होता है। इसका मन से सीधा सम्बन्ध होता है इसलिये मन में उठने वाली हर तरंग उनको प्रभावित करती है और यदि वह तरंगें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, कादर्य, चोरी, तृष्णा जैसी हुई तो उनका विकारों के अनुरूप तीव्र प्रभाव इन ग्रन्थियों पर पड़ता है और तब स्राव की मात्रा बहुत अधिक निकल जाती है और शरीर पर विषाक्त प्रभाव पड़ता है साथ ही भविष्य के लिये रासायनिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इससे अच्छा स्वस्थ और खाता-पिता दीखते हुये भी व्यक्ति भीतर ही भीतर घुटन, असन्तोष अनुभव करता और कुछ दिन में किसी खास प्रकार के रोग का शिकार हो जाता है। यह मनोविकार अचेतन मन से निसृत होते रहते हैं कई बार न चाहते हुये भी बुरी वासनाएं और मनोविकार उठ खड़े होते हैं वह पूर्व जन्मों के ज्ञात अज्ञात कर्मों के ही स्पन्दन होते हैं हम अपने संशोधन की क्रिया छोड़ देते हैं इसीलिये वह विकार रोग बनकर फूटते रहते है। दवा से रोग दब तो जाते हैं पर उसका पूर्ण उपचार तभी हो पाता है जबकि निरन्तर उठने वाले मन के बुरे विचारों का शमन हो और उसके स्थान पर अच्छे अच्छे विचारों की स्थापना हो। भारतीय पश्चाताप पद्धतियाँ यही करती है और इसीलिये उनका आत्म-विकास से गहन सम्बन्ध माना गया है। पाप का प्रायश्चित किये बिना कोई ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त नहीं कर सकता वह इसी तथ्य का प्रतीत बोध है।
पिचुट्री ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त होती हैं (1) एन्टीरियर पिचुट्री (2) मिड़ पिचुट्री (3) पोस्टीरियर पिचुट्री। एएटीरियर पिचुट्री से एफ.एस.एच (फोलिकिल स्टेमुलेटिंग हारमोन्स) निकलते हैं और गर्भाशय प्रजनन कोशों आदि पर प्रभाव डालते हैं। दूसरा एल.एच. (यमटी लरइजिंग हारमोन) यह कामोत्तेजक हारमोन है और इसकी विकृति उपदेश, प्रमेह आदि रोग पैदा करती है। तीसरे टी.एस.एच (थाइराइड स्टमुलेटिंग हारमोन्स) से थायरक्सीन नामक स्राव निकलता है जो गले आदि को प्रभावित करता है। रक्त, क्षार, लवण, आदि का सन्तुलन यही रखता है। उसकी विकृति से ही घेंघा आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। (4) प्रोलेक्टीन (5) एड्रीनल स्टेमुलेटिंग हारमोन्स भी यही से निकलते हैं अभी उनके सम्बन्ध में कुछ सन्तोषजनक खोजें हो नहीं पाई। मिड पिचुट्री से एम.एस.एच (मेलन आफर्स) हारमोन निकलता है यह त्वचा और शरीर के रंग रूप को प्रभावित करता है। पोस्टीरियर पिचुट्री के (1) “आक्सीटोसीन” से पेशाब पर नियन्त्रण होता है इसकी त्रुटि से मूत्र रोग हो जाते हैं। (2) वासोप्रेसीन का सम्बन्ध गर्भवती स्त्रियों से होता है। गर्भावस्था में सन्तुलित न रहने वाली महिलाओं का वासीप्रेसीन गड़बड़ होकर बीमारियाँ पैदा करता है।
इसी तरह (1) थाइराइड, (2) एड्रिनता, (3) कार्टिको स्टेराइडस, (4) पैक्रियास, (5) पैराथायराइड, (6) एस्टोजेन, (70) प्रोजेस्ट्रन आदि हारमोन्स का पता चला है और डाक्टरों ने इन पर गम्भीर खोजें की है और उनके द्वारा शारीरिक व्यवस्था के अनेक आश्चर्यजनक तथ्य ढूंढ़ निकाले हैं। अभी प्रत्येक मनोभाव का अलग-अलग विश्लेषण तो नहीं किया जा सका पर इस सत्यता में कोई अविश्वास नहीं रह गया कि मानसिक आवेगों का इनसे गहरा संबंध है और मानसिक विकृति के कारण इनमें विकृति उत्पन्न होती और पैदा करती है। बुरे कर्म और पाप इनकी चरम परिणति होते हैं उनसे हारमोन का अति वृष्टि जैसा स्राव मनुष्य जीवन के लिये इतना घातक हो सकता है कि मस्तिष्क में अपना स्थायी प्रभव बनाकर जन्म-जन्मान्तरों तक दुःख देता रहे।
श्रीमती ट्रस्ट के समझाने से दस महिला पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने अपने जीवन के सारे दोष स्वीकार किये और बताया कि उसे क्रोध बहुत आता है इसी दुर्भाव के कारण वह अनेकों पाप कर चुकी है। उसने कई बार चोरी भी की है और झूठ-मूठ कहकर लोगों को लड़ाया भी उसने अपने सारे ऐब स्वीकार कर लिये इसके बाद ट्रस्ट के कहने से उसने कुछ दिन उपवास किया, उसने दसकी गाँठ भी अच्छी हो गई और मन की अशान्ति भी दूर हो गई। श्रीमती ट्रस्ट ने इसी तरह एक नवजात शिशु के रोग उसकी माँ से प्रायश्चित कराकर ठीक किये। उन्होंने उसे सैकड़ों व्यक्तियों से निष्कासन तप कराकर उन्हें शरीर और मन से शुद्ध बनाया वह उपरोक्त वैज्ञानिक सत्य का ही प्रतिफल था।
एक बढ़ई का वसूला नदी में गिर गया। बढ़ई ने ईश्वर को पुकारा तो नदी से सोने का एक वसूला निकला। उसने कहा यह मेरा नहीं है। तो चाँदी का निकाला, उसने वह भी न लिया। तब लोहे का वसूला निकाला, उसने वह ले लिया। तभी नदी से आवाज आई-’तेरी ईमानदारी के इनाम में यह दोनों वसूले तुझे दिये ! वह तीनों लेकर चल पड़ा। सामने से एक दूसरा बढ़ई आया, उसने सोने, चाँदी के वसूले देखे और उनके मिलने का हाल सूना तो उसी जगह आकर अपना वसूला नदी में डाल ईश्वर को पुकारने लगा। तभी सोने का वसूला निकला, उसने खुशी से कहा यही मेरा है ! नदी से आवाज आई- ‘तू बेईमान है, यह वसूला तेरा नहीं है। नदी में घुसकर अपना वसूला लेले।’ और इसके साथ ही सोने का वसूला नदी में समा गया। ईश्वर बेईमान की पुकार नहीं सुनता।
टेलीविजन सेट आन (चालू) हुआ और राष्ट्रपति ट्रूमैन अपनी पुत्री मार्गरेट से बातचीत करने लगे- अनुमान से सर्वथा भिन्न का संदर्भ- ट्रूमैन कहने लगे- एक दिन रात के लगभग तीन बज रहे थे जिस कमरे में हम सो रहे थे किसी ने दस्तक दी। बिस्तर से उठकर द्वार खोले तो दृश्य दिखाई दिया उससे तो मैं विस्मित और अवाक् ही रह गया। मैंने देखा- भूतपूर्व राष्ट्रपति लिंकन का भूत सामने टहल रहा है। आगे बढ़ने का साहस नहीं हुआ द्वार बन्द किये और बिस्तर पर आ लेटा।”
घटना उनके राष्ट्रपति काल की ही है और है भी व्हाइट हाउस की ही। प्रायः सभी अमरीकी राष्ट्रपति अपनी संवेदन शीलता, परिश्रम शीलता, साहस और उद्यमशीलता के लिये सदैव सारे संसार के आकर्षण बिन्दु रहे है हजारों लोगों ने उससे अपनी-अपनी तरह की प्रेरणायें ग्रहण की हैं पर बहुत कम लोग होगे जो 18 एकड़ में बने इस भव्य प्रसाद, “व्हाइट हाउस“ जिसमें अमरीका का हर राष्ट्रपति निवास करता है, के सम्बन्ध में कुछ ऐसे कथ्य व तथ्यों से परिचित होगे जो मनुष्य की चिन्तन की दिशाओं को बलात् एक अन्तरंग मरणोत्तर जीवन की ओर खींच ले जाते हैं। यह भी विलक्षण बात है कि सारे अमरीका में व्हाइट हाउस को मरणोत्तर अस्तित्व का प्रमाण माना जाता है जबकि वहाँ की सभ्यता से प्रभावित अन्य देशों में लोगों का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात् जीवन का कुछ अस्तित्व शेष नहीं रहता है।
मन में दुर्बलता न आये, भय पैदा न हो इस दृष्टि से भूत-प्रेत का चिन्तन न करें यह किसी हद तक ठीक भी है किन्तु अधिकतम सौ वर्ष के जीवन के भौतिक सुख भौतिक चिन्तन में पड़कर करोड़ों अरबों वर्षों से भी अधिक शाश्वत एवं अनन्त अन्त जीवन की अपेक्षा आत्मा के लिये कभी भी हितकारी नहीं कही जा सकती ? भूत है तो क्यों है ? उसका स्वरूप क्या है ? यदि व्हाइट हाउस के ऐसे प्रभावशील और विशिष्ट व्यक्ति मानते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो यह जानना ही चाहिये कि वह क्यों बना रहता है और क्या उस स्थिति में भी आत्मा सुख-शाँति की अनुभूति कर पाती होगी जो मनुष्य जीवन का यथार्थ लक्ष्य है।
व्हाइट हाउस की यह घटनायें दिलचस्प ही नहीं गम्भीर भी है एक बार हालैंण्ड की महारानी विल्हेल्मिना ने अमेरिका का भ्रमण किया तब वे विशिष्ट सम्मानित अतिथि के रूप में व्हाइट हाउस में ही ठहराई गई। एक दिन उनके कमरे के दरवाजे को किसी ने खटखटाया। उन्होंने दरवाजे को खोला तो देखा सामने काली छाया के समान अब्राहम लिंकन का भूत खड़ा है अब्राहम लिंकन की हत्या की गई थी। वे महान् व्यक्ति थे जब वे राष्ट्रपति थे तब भी विलास और ऐश्वर्य की उन्हें कोई कमी क्यों रही होगी। फिर उनका भूत क्यों ? भारतीय दर्शन के अनुसार उनमें आसक्ति का भाव रहा होगा उसी से उनकी आत्मा व्हाइट हाउस को छोड़ना नहीं चाहती होगी। ठीक इसी समय भौतिक विज्ञान की इस मान्यता का भी खण्डन हो जाता है कि जीवन की चेतना रासायनिक है यदि जीवन विद्युत, चुम्बक आदि के समान कोई स्थूल और रासायनिक चेतना होती है तो लिंकन की मृत्यु के बाद उनका अस्तित्व क्यों बना रहता ?
श्रीमती विंल्हेल्मिना ने उस समय के राष्ट्रपति रुजवेल्ट से उस घटना का जिक्र किया तो वे बोले- मैडम ! हम तो लिंकन के कारण पहले ही परेशान रहे है अब जो मेरी पत्नी का अध्ययन कक्ष है वह पहले सोने का कमरा था पर लिंकन का भूत उसी कमरे में हमेशा आता रहता, इसी कारण अपनी पत्नी को इच्छानुसार उसे बदलना पड़ा। कुमारी मेरी नामक मेरी सेक्रेटरी ने लिंकन को कई बार कई मुद्राओं में देखा हम कह नहीं सकते यह सब क्या है। इन भूतपूर्व राष्ट्रपतियों को मृत्यु के बाद भी व्हाइट हाउस से क्यों लगाव बना रहा है।
राष्ट्रपति क्वीवलैण्ड की पत्नी ने राष्ट्रपति भवन में एक बच्चे को जन्म दिया था। बच्चा कुछ ही दिन में चल बसा। उस बच्चे से सम्भवतः उनका मोह मृत्यु के बाद भी नहीं छूटा था इसी कारण उनकी आत्मा भी व्हाइट हाउस में लिंकन की तरह ही भटकती है। उनकी विचित्र प्रकार चीख कई बार सुनी गई। राष्ट्रपति बिल्सन की पत्नी ......... में एक बार ऐसा हुआ कि गुलाब के बगीचे का स्थान बदल दिया जाये तो उससे राष्ट्रपति भवन की सुन्दरता ओर भी बढ़ जायेगी। एतदर्थ उन्होंने माली को बुलाकर कहा इस बगीचे का स्थान बदल दो। गुलाब का यह बाग राष्ट्रपति मैडीसन की धर्मपत्नी ने लगवाया था। व्हाइट हाउस में किसी परिवर्तन या नई व्यवस्था का अधिकार राष्ट्रपति की पत्नी को ही होता है। जब माली बगीचे के पास आया तो वह वहाँ खड़े हुए श्रीमती मैडीसन के भूत को देखकर घबरा उठा। लौटकर उसने सारी बात श्रीमती विल्सन से कही। विल्सन भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करती थीं पर उन्होंने स्वीकार किया जब मैं बगीचे के पास स्वयं गई तो श्री मैडीसन का भूत वहाँ था, मुझे ऐसा लगा कि वह कह रही हैं कि यदि बगीचा बदला तो भला न होगा डरकर श्रीमती विल्सन ने अपनी सारी योजना रद्द कर दी।
क्या यह घटनायें हमें यह सोचने को विवश नहीं करती कि इस वर्तमान जीवन की तमाम उपलब्धियाँ भी आत्मिक सुख, शाँति और स्वर्ग की आकाँक्षा को परिपूर्ण नहीं कर सकती वरन् उनसे आसक्ति बढ़ने का एक गम्भीर संकट तब तक बना रहता है जब तक हम स्वयं ही आत्म-कल्याण की परिस्थितियों का अन्वेषण और प्राप्ति के प्रयत्न न करें। यदि उसे ही है तो हमें आत्म-कल्याण के साधनों का अध्ययन गम्भीरतापूर्वक करना होगा जो बड़े वैज्ञानिक ढंग से भारतीय दर्शन में समझाई गई हैं।
लिंकन का भूत तो अमेरिका के राष्ट्रपति भवन का विशिष्ट अपवाद है अन्यथा वहाँ के भी लोग यह मानते हैं कि कुछ एक राष्ट्रपतियों को छोड़कर प्रायः सभी की रूहें अब भी वहाँ विद्यमान हैं और यही कारण है कि जब भी कोई नया राष्ट्रपति चुनकर आता है और परम्परा के अनुसार वर्तमान राष्ट्रपति की पत्नी उसकी पत्नी को राष्ट्रपति भवन (व्हाइट हाउस) का परिचय कराती हैं तब वह भूतों के अस्तित्व और स्थानों की भी पूरी जानकारी अवश्य दे देती है।
फिर भी ऐसी घटनायें वहाँ आये दिन होती रहती है। राष्ट्रपति एडम्स की पत्नी को वहाँ कपड़े सुखाते देख गया, लिंकन को जूतों के फीते खोलते देखा गया। क्वीवलैण्ड की श्रीमती को हँसते और चिल्लाते सुना गया। इस अतीन्द्रिय अस्तित्व और अनुभूति का कारण क्या हो सकता है यह शोध व अध्ययन का लम्बा विषय है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मनुष्य का मृत्यु के बाद भी अस्तित्व बना रहता है। भारतीय दर्शन की इस मान्यता को निराधार कहने वालों को पहले अमरीकी राष्ट्रपतियों, उनकी पत्नियों और सहकर्मियों को अनुत्तरदायी और झूठा कहना होगा पर यदि उनकी विशिष्टता पर विश्वास हो तो हमें भारतीय दर्शन के इन आधारभूत तथ्यों पर भी विश्वास करना और अपने जीवन को आध्यात्मिक पद्धति से ढालने का अभ्यास करना होगा।
मनुष्य अपनी छाया को देखकर उसे पकड़ने दौड़ा छाया भी उतने वेग से भागी मनुष्य उसे पकड़ न सका।
आकाश से आवाज आई। मूर्ख ! माया आज तक किसी ने पकड़ पाई है ? तू इस भ्रम के पीछे मत दौड़, प्रकाश की और जीवात्मा का कल्याण कर।
मनुष्य लौट पड़ा प्रकाश की ओर, प्रकाशपुंज ज्यों-ज्यों पास आता गया छाया पुरुष के पीछे-पीछे भागती आई और प्रकाश की प्राप्ति के साथ वह भी मनुष्य में समा गई।
गुरु माता बड़े ही स्नेहार्द्र कण्ठ स्वर से पुकार रही थीं- “आओ वत्स, भोजन के लिये कब से प्रतीक्षा कर रही हूँ।
किन्तु कच का मन आत इतना अवसाद से घिरा हुआ था कि भोजन तो क्या- कुछ भी ग्रहण करने की इच्छा नहीं हो रही थी। बार-बार आग्रह करने पर भी जब वह भोजनशाला में नहीं गया और भूख न होने की बात कही- तो आचार्य शुक्र स्वयं आये। उसे प्रबोध करके कहने लगे “कच बेटा ! उठो भोजन करलो। मुझसे तो अप्रसन्न नहीं हो न ? फिर मेरे कहने से, चाहे थोड़ा ही कुछ खा लो ! मन की उलझनों के लिये शरीर के साधारण धर्मों की उपेक्षा उचित नहीं।”
यों तो कच ऋषि शुक्राचार्य के आश्रम में एक शिक्षार्थी मात्र था। किन्तु उसके सद्गुणों- सहज ग्रहणशील बुद्धि स्वभावगत मधुरता तथा कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व के कारण वे उसे पुत्रवत् ही मानते थे। उतनी ही आत्मीयता तथा स्नेह था उसके प्रति ऋषिवर का , जितना अपनी जिन की एक मात्र सन्तान- देवयानी से था।
अतः वह उस स्नेहाग्रह को न टाल सका और अनिच्छा पूर्वक ही मात्र को भोजन कर आया।
इस समय उसके समक्ष बड़ी जटिल समस्या थी। गुरु पुत्री- देवयानी भी वर्षों से उसके साथ ही आश्रम में विद्याध्ययन कर रही थी। यों वही रहने के कारण निश्श्दिवस का ही साहचर्य था। देवयानी को वह निज की बहिन जैसा ही मानता। गुरु कन्या आखिर भगिनी ही तो होती है। और स्नेह भी इतना था उसके प्रति जिसकी तुलना नहीं हो सकती। गंगोत्री की पावन धारा सा निर्मल, निष्कलुष स्नेह।
किन्तु देवयानी- पता नहीं कब उस निर्मम स्रोत से सींच-सींच कर अपने उर में प्रणायाँकुर लगा बैठी। मानस पटल पर कच की मूर्ति जीवन देवता के रूप में प्रतिष्ठित की ओर उसमें पता नहीं कितने भावनाओं तथा सम्भावनाओं के अरुणाभ रंग भर लिये।
अब जब अपनी विद्याध्ययन की अवधि समाप्त हो जाने पर वह वापिस देवलोक जाने को उद्धत हुआ- तो देवयानी का प्रणायाँसक्त निवेदन सामने रास्ता रोककर खड़ा था। आज प्रायः ही तो- देवयानी ने अनुरोध किया था कि तुमसे विवाह किये बिना मैं नहीं रह सकती।” कच को वही समस्या उद्वेलित किये थी।
सायंकाल फिर वही प्रसंग। निस्तब्ध वातावरण। उधान की समस्त मधुरता जैसे स्पन्दन हीन थी इस समय। एक स्फटिक शिला पर दोनों बैठे थे ! देवयानी अश्रुपूरित नयनों से देख रही थी कच की भाव-भंगिमाओं को आखिर उससे न रहा गया तो बोली “ आखिर मैंने क्या अपराध कर डाला है ऐसा-जो बोलते भी नहीं कुछ।” कच ने तत्परता से कहा “ ऐसा न कहो देवयानी ! मैंने कब कहा कि तुमने कुछ अपराध किया है। मैं तो अपनी बात कह रहा था- आखिर तुम मेरी भगिनी हो- गुरु कन्या। मैं तुमसे कैसे .................................।”
“पर यह तो सोचो कच कि मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी। आज तक जिन स्वप्नों के सहारे जीवन में सुख का सृजन किया था-उनके टूट जाने पर कैसे जीवन धारण कर सकूँगी।”
कच बोला- स्वप्नों के आकाश महल से अधिक महत्व इस कठोर धरती पर बसे घरों का होता है। सिद्धान्त तथा आदर्श कल्पनाओं से कही महत्वपूर्ण होते हैं। देवयानी ने डबडबाई आंखें पोछते हुए कहा- आत्मा-सन्तोष का भी तो महत्व है। जीवन में उसको पाने के लिये ही तो हम सब निरन्तर प्रयत्नशील है। अनादि काल से जीवन उसी की खोज में तो अनवरत प्रयत्नशील है।
देवयानी की निराशा अन्तिम सीमा पर पहुँच चुकी थी। उसे लगा जैसे बहते-बहते नाव एकदम उलट गई हो। बड़ी मुश्किल से उसने कहा जैसे डूबते हुए भी कोई तिनके का सहारा माँग रहा हो “मेरी परिणय याचना को स्वीकार कर लो कच- मैं अन्तिम बार तुम्हारे समक्ष फिर अपनी झोली फैलती हूँ।
किन्तु वह व्यक्तित्व तो जैसे पत्थर की चट्टान की भाँति अडिग था। सान्त्वना के स्वर में प्रबोध करते हुए कहने लगा- मेरे हृदय के स्नेह की तुम सदा से अधिकारिणी रही हो और भविष्य में भी इसी प्रकार तुम्हें सदा ममता........... प्यार देता रहूँगा। किन्तु भगिनी मानकर ही। निर्मल स्नेह की निर्झरिणी सदा तुम्हारे लिये बहती रहेगी। देवयानी ! आदर्शों एवं मर्यादाओं को छोड़कर जीन धारण किये रहना जीवित रहना मृत्यु से भी महंगा पड़ेगा।
देवयानी का धैर्य टूट गया। दुःख जब अपनी सीमा को पार कर जाता है तो फिर क्रोध में बदल जाता है। उसे भी क्षुब्धता ने इतना आक्राँत कर दिया कि अपना मानसिक सन्तुलन बनाये न रख सकी और शाप देने पर उतारू हो गई। अन्ततः उसने शाप दे डाला-”तुमने जो भी विधा मेरे पिता से सीखी है- वह सब विस्मृत हो जाय।”
देवयानी का शाप सार्थक हुआ और कच समस्त विधा- संजीवनी विधा- जिससे मृतक प्राणी को दुबारा जिन्दा किया जा सकता है- भूल गया। फिर भी उसे असीम सन्तोष था। विधा खेकर भी उसने धर्म- मर्यादा तथा नीति की रक्षा करली थी।
विधा दुबारा अर्जित की जा सकती थी किन्तु- धर्म एक बार गया तो कुख्याति तथा पाप का ही भागी बनना पड़ता है। मर्यादा एक बार टूटी तो फिर किसी वस्तु से नहीं जोड़ी जा सकती। बड़ी वस्तु के लिये छोटी-कम महत्वपूर्ण वस्तु का त्याग। यही शाश्वत नियम है। इसी से लोक जीवन में आदर एवं सम्मान मिलता है और इसी से मिलती है संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि- आत्म-सन्तोष।
भारत के प्रसिद्ध संगीत शास्त्री श्री विष्णु दिगत्बर पुलुस्कर तब इतने विख्यात नहीं थे। लाहौर में उनका एक कार्यक्रम रख गया। कुछ, उन्हें बहुत कम लोग जानते थे इस कारण, तथा कुछ, प्रचार की कमी के कारण- जब सभा प्रारम्भ हुई तो श्रोता केवल पाँच ही थे।
आयोजन कर्ताओं ने उन पाँचों का पैसा लौटा कर आयोजन रद्द करने का निश्चय प्रगट किया। किन्तु श्री पुलुस्कर जी अपने सिद्धान्त के पक्के थे। वे बोले “ भले ही पाँच श्रोता हों मैं तो अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करूंगा ही। इनका क्या दोष है जो इन्हें निराश किया जाय ?” और तब पूरे तीन घन्टे उन्होंने अपना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
श्रोता मुग्ध थे और विस्मय विस्फारित नेत्रों से आयोजन देख रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे किसी मनुष्य का संगीत सुन रहे है या किसी फरिश्ते का। कार्यक्रम के अन्त में घर लौटे तो उनके संगीत की दर-दर भूरि-भूरि प्रशंसा की। उनके कानों में दिगम्बर पुलुस्कर के संगीत के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं से जो भी मिला उससे केवल उस संगीत की ही चर्चा की। दूसरे दिन जब लाहौर के संगीत रसिकों को इस घटना का पता चला तो बड़ी संख्या में लोग पुलुस्कर जी को सुनने के लिये उमड़ पड़े। अब हालत यह भी कि टिकट प्राप्त करने के लिये लाइन लगीं कितनों को तो केवल इसलिये निराश लौट जाना पड़ा कि हाल में जितने लोगों के बैठने की जगह थी आगन्तुक उससे बहुत अधिक थे।
“मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है”- इस घोषणा के पीछे कोई सत्य भी है या नहीं इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है।
मनुष्य की सर्व श्रेष्ठता का आधार यही तो माना जाता है कि उन में बुद्धि एवं विवेक का तत्व विशेष हैं। उसमें कर्त्तव्य परायणता, परोपकार, प्रेम, सहयोग, सहानुभूति, सहृदयता तथा संवेदनशीलता के गुण पाये जाते हैं। किन्तु इस आधार पर वह सर्वश्रेष्ठ तभी माना जा सकता है जब दृष्टि के अन्य प्राणियों में इन गुणों का सर्वथा अभाव हो और मनुष्य इन गुणों को पूर्ण रूप से क्रियात्मक रूप से प्रतिपादित करें। यदि इन गुणों का अस्तित्व अन्य प्राणियों में भी पाया जाता है और वे इसका प्रतिपादन भी करते हैं तो फिर मनुष्य को सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानने के अहंकार का क्या अर्थ रह जाता है।
आइये, पहले शारीरिक तथा बौद्धिक विशेषताओं की पालना करली जाये। शेर, हाथी, गैंडा, चीता, बैल, भैंसे, शुतुरमुर्ग, मगर मत्स्य आदि न जाने ऐसे कितने थलचर, नभचर और जलचर जीव परमात्मा की इस सृष्टि में पाये जाते हैं जो मनुष्य से सैकड़ों गुना अधिक शक्ति रखते हैं। मछली जल में जीवन भर तैर सकती है, पक्षी दिन भर आकाश में उड़ते रहते हैं क्या मनुष्य इस विषय में उनकी तुलना कर सकता है ? परिश्रम शीलता के संदर्भ में हाथी, घोड़े, ऊँट बैल, भैंसे आदि उपयोगी तथा घरेलू जानवर जितना परिश्रम करते और उपयोगी सिद्ध होते हैं, उतना शायद मनुष्य नहीं हो सकता। जबकि इन पशुओं का मनुष्य के भोजन में बहुत बड़ा अन्तर होता है।
पशु-पक्षियों के समान स्वावलंबी तथा शिल्पी तो मनुष्य हो ही नहीं सकता। पशु-पक्षी अपने जीवन तथा जीवनोपयोगी सामग्री के लिए किसी पर कभी भी निर्भर नहीं रहते। वे जंगलों, पर्वतों, गुफाओं तथा पानी में अपना आहार आप खोज लेते हैं। उन्हें न किसी पथ-प्रदर्शक की आवश्यकता पड़ती है और न किसी संकेतक की। पशु-पक्षी स्वयं एक दूसरे पर भी इस सम्बन्ध में निर्भर नहीं रहते। अपनी रक्षा तथा आरोग्यता के उपाय भी बिना किसी से पूछे ही कर लिया करते हैं। जीवन के किसी भी क्षेत्र में पशु-पक्षियों जैसा स्वावलम्बन मनुष्यों में कहाँ पाया जाता है। यहाँ तो मनुष्य एक दूसरे पर इतना निर्भर हैं कि यदि वे एक दूसरे की सहायता न करते रहें तो जीना ही कठिन हो जाय।
मनुष्य शिल्प, अनुकरण तथा उपकरणों पर निर्भर रहता है। वह कोई भी वस्तु अथवा स्थान का निर्माण बिना किसी से सीखे, देखे अथवा औजारों के अभाव में नहीं कर सकता। जबकि पशु-पक्षी अपना निवास स्वयं अपनी अन्तःप्रेरणा से बना लिया करते हैं। न तो वे उसके लिए किसी के पास शिक्षा लेने जाते हैं और न उन्हें किन्हीं उपकरणों की आवश्यकता होती है। लोमड़ी, बिलाव तथा शृंगालों आदि के निवास कक्ष देखते ही बनते हैं। वे अपनी मांदों तथा विवरों में सब प्रकार की सुविधा का समावेश कर लेते हैं। पक्षियों के घोंसले तथा कोंटर तो उनकी निर्माण कला के जीते जागते नमूने ही होते हैं। वया का घोंसला, मधुमक्खी का छत्ता, मकड़ी का जाला तथा चींटी, का विवर देखकर तो यही कहना पड़ता है कि परमात्मा ने उन क्षुद्र समझे जाने वाले जीवों को गजब की निर्माण बुद्धि दी है। उनका वह सूक्ष्म शिल्प देखकर मनुष्य का मन ईर्ष्या कर उठता है।
पशु-पक्षी अपनी घ्राण तथा दृष्टि शक्ति से ऋतुओं तथा आपत्तियों का ज्ञान इतना शीघ्र, सच्चा और यथार्थ रूप से कर लेते हैं कि मनुष्य के बनाये वैज्ञानिक बैरोमीटर आदि यन्त्र भी नहीं कर सकते। लोग पक्षियों एवं पशुओं की गतिविधियाँ देखकर ऋतु तथा संभाव्य के सम्बन्ध में बड़े बड़े निर्णय कर लेते रहे हैं और उस सम्बन्ध में उन्हें कभी धोखा नहीं हुआ है। आज कल के प्रशिक्षित कुत्तों ने तो अपराधों तथा अपराधियों की खोज में चतुर से चतुर जासूसों को मात दे दी है। पशु-पक्षी किसी भी ज्योतिषी से बढ़कर आकाश की गतिविधियों का अध्ययन कर लेते हैं उन्हें उनकी तरह किसी वेधशाला की आवश्यकता नहीं होती उनकी वेधशाला उनकी नासिका तथा आँखों में ही बनी हुई है। पशु-पक्षियों से अधिक मार्ग का ज्ञान मनुष्यों के लिये किसी प्रकार भी सम्भव नहीं। एक स्थान के पक्षी को किसी भी स्थान पर ले जाकर क्यों न छोड़ दिया जाये वह बिना किसी भूल अथवा भ्रम के अपने स्थान पर लौट आयेगा। इसी विशेषता के कारण बहुत समय तक कबूतर तथा हंस आदि पक्षी पत्र वाहक का उत्तरदायित्व निर्वाह करते रहे है।
वनस्पतियों का ज्ञान पशु-पक्षियों से अधिक एक आयुर्वेदाचार्य भी नहीं रखता। वे देखते अथवा सूँघते ही पहचान लेते हैं कि अमुक वनस्पति विषैली अथवा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है, जबकि मनुष्य उन्हें बड़े-बड़े प्रयोगों के आधार पर ही पहचान पाता है। यदि ऐसा न हो तो बीहड़ जंगलों में जहाँ, हितकर तथा अहितकर वनस्पतियाँ एक दूसरे के पास ही नहीं एक दूसरे से लिपट-चिपटकर आती हैं, वे अपना गुजर कैसे कर सकें। शीघ्र ही अज्ञान वश कोई विषैली वनस्पति खाकर जीवन खोते रहते, जबकि न तो उनके लिये कोई मेडिकल कॉलेज ही खुले हैं और न कोई आयुर्वेदाचार्य उन्हें इस ज्ञान की शिक्षा देने जाता है। इस प्रकार इन साधारण बातों में देख सकते हैं कि पशु-पक्षी, बल, बुद्धि, विद्या, परिश्रम तथा शिल्प आदि में मनुष्यों से कहीं आगे है। तब इस आधार पर अपने को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानना कहाँ तक न्याय संगत है।
कर्त्तव्य के सम्बन्ध में भी मनुष्य पशु-पक्षी की तुलना में कहाँ आते हैं। परमात्मा ने उन्हें जो भी थोड़े बहुत, बड़े छोटे कर्त्तव्य सौंपे हैं उनका वे पूरी तरह से उत्साहपूर्वक निर्वाह करते हैं। वे नित्य नियम से प्रातःकाल जागते अपनी अपनी भाषा में परमात्मा का गुण-गान करते। दिनभर अपनी जीविका के लिये दौड़ते घूमते तथा परिश्रम करते और संध्या समय नियत समय पर अपने अपने निवासों पर लौट आते हैं। वे अपनी आजीविका आप तलाश करते न किसी की चीज पर निर्भर रहते और न चुराने का प्रयत्न करते हैं। वे प्रकृति के विशाल प्राँगण से अपना आहार चुग आते और दूसरों के लिये छोड़ आते हैं। न तो संग्रह करने की कोशिश करते हैं और न कुछ चुराने अथवा छीन लाने की। हजारों पशु अपने नियत स्थान पर और न जाने कितने पक्षी एक ही पेड़, खेत अथवा मैदान में साथ-साथ खाते और मौज करते रहते हैं। न तो कोई किसी को भगाता है और खाने से मना करता है। किसने कितना खा लिया इस और तो उनका कभी ध्यान ही नहीं जाता। यदि एक जाति के पक्षियों के बीच विजातीय पक्षियों का झुण्ड आ जाता है तो वे उन्हें भी आहार ग्रहण करने का पूरा अवसर तथा स्वतन्त्रता देते हैं।
कभी भी देखा जा सकता है कि जब कोई पशु-पक्षी कहीं आहार का संग्रह देख लेता है तो चुपचाप चोर की तरह खाने नहीं लगता, वह सबसे पहले अपनी भाषा में अपने सहचरों को बुला लेता है और तब सबके साथ मिलकर खाया करता है। आप कभी भी किसी स्थान पर दाने डालकर देख सकते हैं कि जहाँ एक पक्षी ने देखा कि उसने दूसरों को पुकारना शुरू किया और थोड़ी ही देर में पंडुक, गौरैया, तोते आदि न जाने कितने पक्षी वहाँ पर जमा हो जायेंगे। लोग बन्दरों को चने अथवा गेहूँ डालते हैं। जहाँ बन्दर ने देखा नहीं कि उसने ऊह-ऊह करके आवाज देना शुरू किया और क्षेत्र के सारे छोटे बड़े बन्द आकर उसका लाभ उठाते हैं। खाते समय भी कोई सबल कदाचित ही किसी निर्बल को भगाता हो। नर एवं मादा का भी उनमें कोई अन्तर नहीं देखा जाता।
अपने नीड़ में सुरक्षित ही क्यों न बैठा हो किन्तु खतरा देखते ही कोई भी पक्ष तत्काल चीखकर सबको उस खतरे के प्रति सावधान कर देता है। कभी भी देखा जा सकता है कि किसी विलाव अथवा बाज को कोई ऐसा पक्षी देखले जो उनकी आँखों से ओट में बैठा हो अथवा उनकी पहुँच से परे हो, और उनका खतरा किसी अन्य पक्षी को ही क्यों न हो तथापि वह विचार किये बिना कि बाज या विलाव उसे देख लेगा, वह चीख-चीखकर अपने साथियों को सजग कर देता है। गिलहरी बिल्ली को देखते ही किर-किर करती हुई तब तक पेड़ पर दौड़ती रहती है जब तक बिल्ली ही न भाग जाय अथवा सभी गिलहरियों के साथ पक्षी तक सजग एवं सतर्क नहीं हो जाते। किसी कारण से अभी लड़ चुकने पर भी पक्षी अथवा पशु खतरे से अपने उस द्वेषी को भी सावधान करने के अपने कर्त्तव्य से नहीं चूकता। पशु-पक्षी एक दूसरे को, खुजलाते, सहलाते, चाटते तथा रोमों की कीट बीनते कभी भी देखे जा सकते हैं। यह सब देखकर स्पष्ट कहा जा सकता है कि सहायता, सहयोग तथा पारस्परिकता के आधार पर मनुष्य पशु-पक्षियों से किसी भी दशा में आगे नहीं है।
मजबूरी के कारण हिंस्र जीवों को छोड़कर अन्य कोई पशु-पक्षी मनुष्य को कभी भी कोई क्षति नहीं पहुँचाता। बल्कि मनुष्य ही उल्टा अपने मनोरंजन के लिए पिंजड़ों में बन्दी कर लेता है, स्वाद के लिये मारकर खा जाता है। काम लेने के लिये अपने अधीन बना लेता है। चमड़ा, हड्डी तथा चरबी के लिये उनका वध करता रहता है। मनुष्य पशु-पक्षियों को क्षुद्र तथा अपने से हीन मानता है किन्तु यह नहीं देखता कि पशु-पक्षी उसे कितना क्षुद्र तथा अविश्वासी मानते हैं। जंगली हिरन गायों के बीच हो सकता है। भैंसों, बैलों तथा अन्य तृण जीवी पशुओं के बीच जा सकता है, उनके साथ उठ बैठ सकता है किन्तु मनुष्य की छाया से घृणा करता है उसे देखते ही दूर भाग जाता है। एक पक्षी बैल के सींग पर बैठ सकता है, उसकी आँख नाक में लगी चीजों को निर्भयता पूर्वक अपनी चोंच से खा सकता है। शेर तक की पीठ पर बैठकर उसके रोओं के कीटाणु चुन सकता है किन्तु मनुष्य पर भूलकर भी विश्वास नहीं करता। दूर से ही इस अपने को दिव्य प्राणी कहने वाले को देखकर ‘फुर’ से उड़ जाते हैं। इस तुलना में तो सच पूछा जाये तो मनुष्य पशु-पक्षियों से गया बीता ही है।
कृतज्ञता तथा वफादारी में मनुष्य पशु-पक्षियों की तुलना ही नहीं कर सकता। आप किसी कुत्ते के बच्चे को पालिये उसका प्रेमपूर्वक पालन कीजिए तो वह होश संभालते ही रात रात भर आपके घर की चौकसी करता रहेगा। जरा सा खटका होते ही भौंक भौंक कर आपको सजग कर देगा। आपत्ति के समय प्राण देकर भी आपकी रक्षा करेगा। आपके आक्रमणकारी पर आपसे पहले ही जा पहुँचेगा। फिर भी इसके लिये वह आप पर कोई अहसान न दिखलायेगा आपसे कोई विशेष सुविधा अथवा अच्छा भोजन न माँगेगा। आप जो कुछ जूठा, सीठा, ताजी, बासी दे देंगे खाकर सन्तुष्ट रहेगा और कृतज्ञता पूर्वक आपके चारों ओर दुम हिलाता घूमेगा आपके पैरों में प्रेम से लिपटेगा। न जाने कितने चेतक आदि स्वामी भक्त घोड़ों और हाथियों ने अपने पालन कर्त्ता की जान बचाने में अपनी जान गंवा दी है और आज भी गंवा देते होंगे। कितने मनुष्यों के ऐसे उदाहरण मिल सकते हैं जिन्होंने अपने उपकारी पशु के लिये खतरा झेल लिया हो, उसकी रक्षा में जान खोई अथवा क्षति उठाई हो। इन सब बातों के होते हुए भी यदि मनुष्य अपने आपको पशु-पक्षियों से ऊँचा और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानता है तो यह उसका दम्भ ही कहा जायेगा।
हाँ मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी तब माना जा सकता है जब वह इन पशु-पक्षियों की विशेषताओं तथा गुणों से आगे बहुत आगे निकल जाये। उसमें इतने प्रेम, सहानुभूति दया, करुणा तथा उदारता एवं सम्वेदना का विकास हो जाये कि परस्पर संघर्ष, शोषण तथा असहयोग, द्वेष, ईर्ष्या आदि के विचार तो दूर ही हो जायें साथ ही संसार के अन्य पशु-पक्षियों तक पर भी उसका प्रभाव पड़े। वे मनुष्य को देखते ही प्रेम विभोर होकर अपनी-अपनी बोली में “हमारा जेष्ठ एवं श्रेष्ठ आ गया” कहते हुये उसका स्वागत करने लगें और चारों ओर घेरकर अपना स्नेह तथा श्रद्धा व्यक्त करने लगें। अभी वह दिन दूर है जब मनुष्य अपने को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहलाने के योग्य होगा।
मनुष्य होकर भी जो दूसरों का उपकार करना नहीं जानता उसके जीवन को धिक्कार है। उससे धन्य तो पशु ही हैं जिनका चमड़ा तक (मरने पर) दूसरों के काम आता है।
22 अप्रैल को अमेरिका के नवयुवकों ने सामूहिक रूप से “पृथ्वी दिवस” (अर्थ-डे) मनाया। उस दिन के लिये व्यापक तैयारी और कार्यक्रमों के प्रचार के लिये एक अखबार “अर्थ-टाइम्स” निकाला गया जिसमें उस दिन सामूहिक रूप से मोटर कार आदि यातायात के यान्त्रिक साधन छोड़ कर पैदल या ताँगे इक्के में चलने की अपील की गई। यों घेराव, हड़ताल नक्सल पन्थी आन्दोलनों के इस युग में आन्दोलन और प्रदर्शन मनुष्य समाज की सामान्य घटनाओं के रूप में गिने जाने लगे हैं पर यह आयोजन अपने आप में इतना महत्वपूर्ण एवं चौंकाने वाला है कि एक बार तो आधुनिक सभ्यता का अहर्निश गुणगान करने वालों को भी चक्कर आ गया। सारी दुनिया की पत्र-पत्रिकाओं ने इस अभूतपूर्व आयोजन और उससे सम्बन्धित भयंकर समस्या पर लेख और समाचार छापकर दुनिया का ध्यान इस प्रश्न पर विचार करने के लिये झकझोर कर आकर्षित किया-”आया आज की यान्त्रिक सभ्यता से उत्पन्न धुयें नहीं-नहीं जहर को रोका जाना चाहिये अथवा मनुष्य को उस दिशा में बढ़ने ही देना चाहिये जिधर रोग शोक और भयंकर बीमारियों में घुट-घुट कर प्राण देने के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता।”
यह समस्या क्या है ? इसे समझ लेना आवश्यक है। आजकल शहर, शहरों में कारखानों, मोटरों, कारों, रेलों, भट्टियों, चिमनियों आदि की संख्या तेजी से बढ़ रही है इनसे जो धुआँ निकलता है, वह इतना सघन होता जा रहा है कि बम छोड़े जायें या न छोड़ें जायें यह धुआँ ही एक दिन मनुष्य को घोंट कर मार देगा। अभी-अभी वैज्ञानिकों ने शोध करके बताया है कि धुयें की घुटन बर्दाश्त न कर सकने वाले कई पक्षियों की जातियाँ नष्ट हो गई और वे कुछ ही समय में लुप्त जन्तुओं की श्रेणी में चली गई। अभी यह स्थिति जीव-जन्तुओं के प्राणों पर आ बनी है कल मनुष्यों पर भी पड़ेगी इस में संदेह नहीं है।
जापान की राजधानी टोक्यो में सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या कभी कभी बढ़ जाती है तो वहाँ धुआँ इतनी बुरी तरह से छा जाता है कि सरकारी तौर पर उसकी घोषणा करानी पड़ती है सरकारी कर्मचारी उसकी घुटन से बचने के लिये गैस मास्क (एक प्रकार का यन्त्र जो हवा का दूषण छानकर शुद्ध हवा ही श्वाँस नली में जाने देता है) पहनना पड़ता है। 1966 में टोकियो में 65 बार इस तरह की चेतावनी दी गई। ट्रैफिक पुलिस को आध-आध घण्टे बाद अपनी ड्यूटी छोड़ कर चौराहों की बगल में बनी आक्सीजन टंकियों में जाकर आक्सीजन लेनी पड़ती थी। कई बार ऐसा हुआ जब सिपाहियों ने भूल की वे आक्सीजन लेने नहीं गये तो कई-कई सिपाही एक साथ मूर्छित हो होकर गिरे।
जापान में सौ व्यक्तियों के पीछे एक व्यक्ति अनिवार्य रूप से ब्राँकाइटिस (श्वाँस नली में सूजन की बीमारी) का रोगी है उसका कारण और कुछ नहीं यह धुआँ ही है जिसे कल-कारखाने व यातायात क वाहन उगलते रहते हैं। यहाँ के अमेरिकन सैनिकों में इन दिनों एक नया राग चमक रहा है जिसका नाम “तोक्यो योकोहामा डिसीज” रखा गया है उसका कारण भी डाक्टर वायु की इस गन्दगी को ही बताते हैं। इस बीमारी में साँस लेने में घुटन, खाँसी और अपच आदि लक्षण होते हैं।
अमेरिका के ब्राजील राज्य में साओ पालो और रायो डि जेनेरो दो पड़ोसी नगर है। 1914 के आस-पास साओ पालो की जितनी जनसंख्या थी अब आबादी उसे दो गुनी अधिक पच्चास लाख हो गई है जनसंख्या वृद्धि के समानान्तर ही वहाँ कल कारखाने और फैक्ट्रियां भी बढ़ी हैं अनुमान है कि उक्त अवधि में साओ पालो में पाँच हजार नये कल कारखाने स्थापित हुये हैं इसके विपरीत रायो डि जेनेरो की नगर-कारपोरेशन ने सन् 1873 में दी गई पत्रिकाओं की “आर्गेनिक डस्ट” चेतावनी (इय चेतावनी से पहले ही यह कहा गया था कि यदि कल कारखाने बढ़े तो उनका धुआँ मनुष्य जाति के लिये भयंकर खतरा बन जायेगा) को ध्यान में रखकर औद्योगिक प्रगति को बढ़ने नहीं दिया। अब स्थिति यह है कि साओ पालो के आकाश में प्रतिदिन उस टन हाइड्रोफ्लूओरिक एसिड और लगभग एक हजार टन सल्फ्यूरिक एनहाइड्रइड वायु में धूल रहा है और उससे नगर में ब्राँकियल (श्वाँस नली सम्बन्धी बीमारी) से मरने वालों की संख्या भी दुगुनी हो गई है। प्रातःकाल लोग घरों से खाँसते हुये निकलते हैं-इस स्थिति की भयंकर अनुभूति करने वाले मेड्रिड के लोग कहते हैं “हम प्रातःकाल की साँस के साथ उतना दूषित तत्व पी लेते हैं जितने से कोई एक डीजल इंजन दिन भर सुविधा पूर्वक चलाया जा सकता है। एक ओर साओ पालो धुयें में घुट रहा है दूसरी ओर रायो डि जेनेरो के लोग अभी भी इस दुर्दशा से बचे हुये है।
जो बात अमरीकी युवकों की समझ में अब आ रही है उस बात को भारतीय ऋषियों ने करोड़ों वर्ष पूर्व अनुभव कर लिया था। वे जानते थे कि पृथ्वी के निवासियों का स्वास्थ्य और आरोग्य आकाश और वायु की शुद्धि पर आधारित है इसीलिये यज्ञ जैसे विज्ञान का आविर्भाव किया गया था। अग्नि में पदार्थ को हजारों लाखों गुना सूक्ष्म बनाकर आकाश में फैला देने की अद्भुत शक्ति होती है। उसके साथ मन्त्रों का उच्चारण शब्द विज्ञान की सामर्थ्य से सन्धि करा कर उस सूक्ष्म हुये तत्व को और भी दूर आकाश तक निक्षेपित कर सुगन्धित औषधियों के प्रभाव को फैला देता या उसका फल यह होता था कि सारा आकाश शुद्ध बना रहता था। आकाश की शुद्धि स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है। साथ ही उससे जलवायु का नियन्त्रण, बीमारी के कृमियों का संहार आदि लाभ भी मिलते थे इसलिये यज्ञ सदैव से अति पवित्र और आवश्यक धर्म कर्त्तव्य माना गया था। उसके प्रभाव आज भी इस देश के आकाश में विद्यमान हैं और धर्म सदाचार सद्गुण परायणता आदि को स्थिरता के साथ वायु की शुद्धता को भी सुरक्षित किये हुये है। आज जो संसार में वायु-दूषण एक विकराल समस्या बन गया है उससे मुक्ति के लिये भी आगे यज्ञ ही मूलभूत आधार होंगे।
आज अमेरिका के वायु मण्डल में प्रतिदिन हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन, कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर आक्साइड, सीसे के कण आदि विषैले तत्वों की 200000000 टन मात्रा भर जाती है। कई बार तापमान गिर जाने से मौसम में ठंडक आ जाती है जिससे यह धुआँ ऊपर नहीं उठ पाता, ऐसी स्थिति में सघन बस्तियों वाले लोग जहाँ पेड़ पौधों का अभाव होता है ऐसे घुटने लगते हैं जैसे किसी को कमरे में बन्द करके भीतर धुआँ सुलगा दिया गया हो। यह धुन्ध इतना ही नहीं करती, उसमें रासायनिक प्रतिक्रियाएं भी होती है। इसके फलस्वरूप नाइट्रोजन डाई आक्साइड, ओजोन और पऔक्सि आक्ल नाइट्रेट नाम विषैली गैसें पैदा हो जाती हैं। उससे फेफड़ों के रोग आँखों की बीमारियाँ और खाँसी गले के रोग असाधारण रूप से बढ़ते हैं अमेरिका में इन बीमारियों से मरने वालों की संख्या कुल मरने वालों में एक तिहाई से कम नहीं है।
हमारे ऋषि महान् वैज्ञानिक थे उन्होंने आत्मा और ब्रह्म जैसी अत्यन्त सूक्ष्म सत्ता को खोज निकाला था। यन्त्र, विद्या उनकी चुटकी का खेल था पर वे इन बुराइयों को जानते थे इसीलिये देश को मशीनों से दूर रखा था और लोगों को अधिक से अधिक प्रकृतिस्थ जीवन यापन की प्रेरणा दी, तभी यह देश शारीरिक बौद्धिक, मानसिक एवं आत्मिक दृष्टि से सभी देशों का सिरमौर रहा। यहाँ जैसे दीर्घजीवी और इच्छानुसार मृत्यु वरण करने वाले व्यक्ति विश्व में और कहीं नहीं मिलते। हमारा दुर्भाग्य है कि उन्हीं की संतान हम भारतीय अपनी संस्कृति को न धारण आज उस यान्त्रिक सभ्यता के पीछे अन्धी दौड़ लगा रहे है। योरोप आज जिससे साँस लेने और पिण्ड छुड़ाने के लिये “अर्थ-डे” जैसे आयोजन कर रहा है।
आने वाले समय में यह धुआँ पृथ्वी में अनेक अप्रत्याशित भयंकर परिवर्तनों के लिये वातावरण तैयार कर रहा है। इटली का पदुआ नगर कला की दृष्टि से सारे संसार में प्रसिद्ध है। गिओटी के बनाये भित्ति चित्रों को, पिटी पैलेस, ................... बेकिओ तथा दि वैसेलिका आफ सान लोरेंजीं (यह अब वहाँ की प्रसिद्ध इमारतें हैं) आदि नष्ट होते जा रहे है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण बताते हैं यह सब वायु की अशुद्धि के कारण है। इन ऐतिहासिक स्थानों के रख रखाव में काफी धन और परिश्रम खर्च होता है तब भी वायु की गन्दगी से ........ अपने आपको बचा नहीं पाते तो खुले स्थानों की सुरक्षा की तो कोई बात ही नहीं उठती। इन स्थानों में यह विषैली रासायनिक प्रक्रियाएँ वायु दुर्घटनाओं, बीमारियों का ही कारण न होंगी वरन् भूकम्प, पृथ्वी-विस्फोट समुद्र में तूफान आदि का कारण भी होगी। नई सन्तान पर उसका असर गर्भ से ही होगा। अमेरिका में अभी से विकलाँग कुरूप और टेढ़े-मेढ़े बच्चों की पैदाइशें प्रारम्भ हो गई हैं कुछ दिनों में खरदूषण, त्रिशिरा, मारीच जैसी टेढ़ी, कुबड़ी भयंकर संतानें उत्पन्न हों तो कुछ आश्चर्य न होगा। वायु की अशुद्धि से मनुष्य जीवन का अन्त बहुत निकट दिखाई देने लगा है उससे कैसे बचा जाये अब इस प्रश्न को उपेक्षित नहीं किया जा सकता।
औषधि रुपये एक की, स्वस्थ रहे संसार
नानक ने सोचा कबीर की बुद्धि की परीक्षा करनी चाहिये। उन्होंने एक चवन्नी कबीर के पास भेजी और कहला भेजा कि इस चवन्नी की कोई ऐसी वस्तु लेनी चाहिये जिसे खाकर एक सौ व्यक्ति तृप्त हो जायें ?
कबीर ने चवन्नी ले ली, बाजार गये और चार आने की बढ़िया वाली हींग लाये। उसी दिन नगर के एक सेठ भोज कर रहे थे। चार आने की हींग कबीर लेकर सेठ के पास पहुँचे और उसकी छोंक लगवा दी। वह दाल जिस-जिसने खाई हींग की बघार ने सब को तृप्त किया। कबीर की हींग की सबने प्रशंसा की।
अब कबीर ने सोचा नानक की बुद्धि की परीक्षा लेनी चाहिये। उन्होंने एक रुपया नानक के पास भेजा और कहलवा भेजा एक रुपये की औषधि से सारे संसार के रोगियों को अच्छा कर दो। नानक ने गम्भीरता पूर्वक विचार किया सारे संसार में 3 अरब तो मनुष्य ही हैं उन्हीं को एक स्थान पर बुलाना कहाँ सम्भव है ? फिर भेड़, बकरी, चूहे, खरगोश, मछली, कछुए न जाने कितने जन्तु इस पृथ्वी पर हैं एक रुपये में सब की औषधि किस प्रकार हो ? उन्होंने एक रुपये की गुग्गल, छा छबीला, तालीस पत्र, कपूर कचरी, पृष्ठपर्णी आदि औषधियाँ मंगाई हवन करने लगे। औषधियाँ जल कर कर नष्ट नहीं हुई वायुभूत होकर सारे संसार में फैल गई। जलचर, थलचर, नभचर, सबने साँस ली औषधि सब के शरीर में पहुँची सबके शरीरों के कीटाणु नष्ट हो गये। सब स्वस्थ हो गये।
कबीर ने नानक की भूरि-भूरि प्रशंसा की तो नानक ने कहा- कबीर यह श्रेय तो उन ऋषियों का है जिन्होंने संसार के स्वास्थ्य के लिये यज्ञ जैसे महान् विज्ञान की शोध की थी।
स्वामी योगानन्द ने तब योग दीक्षा नहीं ली थी पर उनने भारतीय दर्शन का स्वाध्याय किया था, उनकी जिज्ञासायें बहुत प्रखर थीं इसलिये वे किसी एक अध्यात्मिक व्यक्ति की खोज में रहते थे जिसमें आत्मिक प्रतिभाओं का विकास स्पष्ट देखने में आता हो। उन्होंने इस दृष्टि से परख की तो पता चला कि युक्तेश्वर में वह सारी क्षमतायें है जो किसी योगी में होनी चाहिए। यद्यपि वे सदैव आत्मकल्याण की साधना में लगे रहते थे तथापि लोगों के मन और मस्तिष्क की बातें जान लेने, आशीर्वाद से किसी का भला कर देने, भविष्य जान लेने आदि की अतींद्रिय क्षमताओं का उनमें पूर्ण जागरण हो चुका था। योगानन्द उनके शिष्य हो गये। योग के प्रति उनमें कौतूहल का भाव तो रहता था पर प्रारम्भिक अवस्था होने के कारण वे कठिन साधनाओं में प्रवेश का साहस नहीं कर सकते थे।
सन्तोष नाम एक लड़का योगानन्द का मित्र था। उसके पिता डॉ. नारायण चन्द्र राय नास्तिक व्यक्ति थे। किसी भी भौतिकतावादी व्यक्ति की तरह उन्हें आत्मा, परमात्मा, परलोक, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मुक्ति आदि किसी पर भी कोई विश्वास न था। धार्मिक व्यक्ति मिलते उनसे वे प्रायः उल्टे तर्क किया करते। जिज्ञासायें और बाज हैं व्यंग और जिज्ञासायें तो आध्यात्मिकता का लक्षण हैं यदि वह न हों तो व्यक्ति ईश्वर और आत्मा जैसे जटिल विषय तो क्या सामान्य जीवन से सम्बन्धित बौद्धिक और मानसिक क्षमतायें ही विकसित नहीं का पाता। डाक्टर साहब थे कि वे जिज्ञासा के नाम पर धार्मिकता का व्यंग और उपहास ही अधिक किया करते थे। सच्ची लगन होती तो उन्हें वह परिस्थितियाँ मिलती अवश्य। आज के भ्रान्त युग में जबकि धर्म के नाम पर ठगी अधिक हो रही है सच्ची आध्यात्मिकता का न अन्त हुआ और न ही कभी इस देश से होगा।
एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे ही मूड में योगानन्द से उनके गुरु से भेंट करने की इच्छा प्रकट की। मित्र सन्तोष के पिता होने के कारण वे डॉ. साहब को पिता की तरह ही मानते थे। उन्हें लेकर वे श्री युक्तेश्वर के पास आये। बड़ी देर तक बातचीत होती रही। पीछे वे उठकर चले गये तो उनने छूटते ही योगानन्द से कहा- “ऐसे मृत व्यक्तियों को आश्रम में क्यों ले आते हो।” यह घटना स्वामी योगानन्द की पुस्तक “ओटोबाई ग्राफी आफ योगी” के आधार पर उद्धृत की जा रही है।
श्री योगानन्द ने समझा कि जिसकी मानसिक चेष्टायें भौतिकता, स्वार्थ और भोगवाद में आसक्त हों वे एक प्रकार से मृतक ही होते हैं इसी अर्थ में युक्तेश्वर ने उन्हें मृत कहा होगा। फिर भी उन्होंने पूछ ही लिया-गुरुदेव! डाक्टर साहब तो जीवित हैं आपने मृत कैसे कह दिया।
श्री युक्तेश्वर बोले- बेटा वह 6 महीने से अधिक जीवित रहने वाला नहीं। 15 दिन में ही बीमार पड़ जायेगा। डाक्टरी इलाज तो उसे अच्छा न कर सकेंगे पर पीछे तुम मुझसे रक्षा कवच ले जाना उससे उसका स्वास्थ्य 6 सप्ताह में ही अच्छा हो जायेगा। लेकिन उसे समझाना वह बाद में माँस न खाये, शराब न पिये। फिर कुछ देर रुककर बोले- मानेगा तो वह है नहीं और इसीलिये उसकी मृत्यु हो जायेगी।
योगानन्द आश्रम से वापस आ गये। 15 दिन बीते सचमुच डॉ. साहब किसी असाध्य रोग से पीड़ित हो चार पाई पर पड़ गये। डाक्टरों ने बहुतेरा इलाज किया पर अच्छे होने की अपेक्षा वह क्षीण ही होते गये। योगानन्द श्री युक्तेश्वर से एक रक्षा कवच ले आये। पहले तो राय साहब ने उसे पहनने से ही इनकार कर दिया पर पुत्र सन्तोष और घर वालों के कहने से उनने उसे धारण कर लिया। उसके बाद से एकाएक उनकी स्थिति में सुधार होता गया और सचमुच ही 6 सप्ताह पीछे वे पूर्ण चंगे हो गये।
योगानन्द ने श्री युक्तेश्वर का आगे का भी सन्देश उन्हें कह सुनाया पर श्री राय जी थे अन्धे भौतिकतावादी। न तो घटनाओं से उन्होंने कुछ सीखा न आध्यात्मिकता उनमें श्रद्धा जगा सकी। उन्होंने स्वस्थ होते ही माँस खाना, अंडे खाना शुरू कर दिया। यही नहीं उन्होंने ऐसा न करने को अवैज्ञानिक, मूर्खता और दकियानूसी आदि जो कुछ भी शब्द उनकी दिमागी डिक्शनरी में थे प्रयुक्त कर डाले। बात उनने एक की भी न सुनी। कुछ दिन में उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया तो एक दिन योगानन्द से व्यंग करते हुये कहा-देखो माँस खाकर कितना मोटा हो गया-नैतिकता, जीव दया आदि का उपदेश भला ऐसे सख्त व्यक्ति को क्या प्रभावित करे उनके लिये तो प्रकृति के क्रूर दण्ड प्रहार ही प्रयुक्त होते जो आज नहीं तो कल, सवेर नहीं तो थोड़ा देर से ही सही पर वे अवाँछनीयता के दण्ड से वंचित नहीं रह सकते। जीव हिंसा जैसे पाप के दण्ड से कोई बच नहीं सकता।
उसी रात न जाने कैसा क्या हुआ। 9वाँ महीना पूर्ण होने को कुल एक दो दिन ही शेष थे। रात दिल में दर्द पैदा हुआ और डाक्टर साहब आध घण्टे में ही संसार से विदा हो गये। श्री योगानन्द ने सुना तो उनके मुख से यही निकला-सचमुच जो संसार की परिस्थितियों पर गम्भीरतापूर्वक दूरदर्शी विचार नहीं करते केवल अपने थोड़े से ज्ञान के कारण ही अहंकार में डूबे फिरते हैं वह न भी मरें तो भी मृत ही है। उन्हें क्या तो कोई महात्मा, क्या स्वयं भगवान भी नहीं बचा सकता।
सनत की कृपा सब पर समान है उनके लिये अच्छे, बुरे में कोई भेदभाव नहीं। वे तो सभी के कल्याण का प्रयत्न करते हैं। सेवा से ही सच्ची तृप्ति के आधार पर कोई आये वे सभी को कुछ न कुछ देने की भावना रखते हैं।
एक दिन योगानन्द (तब उनका नाम मुकुन्द था) के साथ शशि नाम उनका एक और भी मित्र श्री युक्तेश्वर के दर्शनों के लिये उनके पास गया। श्री युक्तेश्वर ने और बातचीत के दौरान थोड़ा गम्भीर होकर शशि से कहा- बेटा! मनुष्य जीवन का उपयोग क्षणिक इन्द्रिय सुख ही नहीं यदि ऐसा ही होता तो मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या रह जाता। मनुष्य को दी गई-बुद्धि विवेक, ज्ञान और आत्मिक सम्पदायें इस बात के लिये हैं कि वह संसार की यथार्थता समझें और जीवन लक्ष्य प्राप्त करें। बुद्धिधारी होकर भी यदि मनुष्य इन्द्रिय सुखों तक ही सीमित रहता है तो इसे उसका पागलपन ही कहना चाहिये। यह में इसलिये कह रहा हूँ कि तुम्हारा जीवन बड़ा अस्त-व्यस्त असंयमित है यदि तुम संभले नहीं तो आने वाले दिनों में गम्भीर संकट में पड़ जाओगे।
योगियों जैसे दूरदर्शी विचार और अनुभव शक्ति सब मनुष्यों में ही धार्मिकता का सारा प्रशिक्षण इसी धुरी पर घूमता है पर अश्रद्धालु लोग उसे कहाँ समझ पाते हैं। शशि के लिये युक्तेश्वर के इतने शब्द “संजीवनी” थे पर तब जब वह उनकी वास्तविकता समझता। उसने सुना तो पर एक कान से, दूसरा कान उपदेश को निकल जाने के लिए खुला रखा। धार्मिक उपदेश सुनने के नहीं, व्यवहार में लाने के लिये होते हैं। केवल सुन लेना या पाठ कर लेने मात्र से आत्म-कल्याण हो जाता तो ऋषि मनीषी जीवन भर कठोर साधनायें न किया करते।
न समझने का यह फल हुआ कि बीमार पड़ गया। जाँच करने से पता चला कि टी.बी. हो गई। उसके दोनों फेफड़ों में गहरे जख्म पैदा हो गये। बचने की ना उम्मीद हो गई। तब एक दिन वह अपने पिता को लेकर पुनः युक्तेश्वर के पास आया और बोला- गुरुदेव! आपकी बात न मानने का फल मेरे सामने है। आत्म बल की कमी के कारण ऐसा हुआ महात्मन् अब तो कुछ कृपा करिये। आगे से अपने आपको अवश्य संभालूंगा। तुच्छ इन्द्रिय भोगों से मन को हटाकर उसे पुण्य परमार्थ में लगाऊँगा।
श्री युक्तेश्वर उसके जीवन के सारे पाप आदि देर तक पूँछते रहे। युवक ने सारी बातें पश्चाताप पूर्वक बतादी और आगे से फिर वैसा कुछ न करने का वचन दिया। युक्तेश्वर ने कहा- जाओ जौहरी के यहाँ से “ज्योतिथचूड़ा” लेकर पहन लेना। अब की तुम्हें अच्छा कर देंगे। फिर कभी दुराचार और इन्द्रिय असंयम में प्रवृत्त मत होना, अन्यथा अध्यात्म कोई जादू नहीं जो तुम्हारी बार-बार रक्षा करता रहेगा आखिर तो तुम्हें अपना उद्धार आप करना हैं।
शशि उनकी बात मान गया। वह कुछ ही दिन में पूर्ण स्वस्थ हो गया। औषधि तो उसने नाम मात्र की ही ली। उसे आध्यात्मिकता पर ऐसा विश्वास हुआ कि उसके जीवन का सारा उद्देश्य, रीति-नीति और कर्म कलाप ही बदल गये। फिर वह पूर्ण स्वस्थ और सुखी जीवन जिया। एक भी रोग उसके पास नहीं फटका।
भौतिक दृष्टि से यह शंकास्पद बातें हैं पर अब इन शंकाओं को दूर करने का समाधान विज्ञान ने खोज लिया हैं। रोग रासायनिक अस्तव्यस्तता के परिणाम होते हैं। कैल्शियम की कमी से दांतों की बीमारी हो जाती हैं। शरीर का 75 प्रतिशत भाग 16 रासायनिक तत्वों से बना हैं। इन्हीं की अस्त-व्यस्तता से दुनिया भर के रोग होते हैं। जिन्हें डाक्टर स्थूल परीक्षण द्वारा अलग-अलग नाम देते हैं।
आध्यात्मिक पुरुष रोगों का कारण इन रासायनिक तत्वों की सूक्ष्म अवस्था को मानते हैं। वस्तुतः शारीरिक और मानसिक सभी संस्कार “जीन्स” में होते हैं जो जीवित शरीर की इकाई कोश (सेल) का सूक्ष्म भाग है। उसे प्रकाश या लहर जैसी चेतना भी कह सकते हैं। सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति के आचरण उनके रोगी या नीरोग होने का पता लगा लेते हैं और आवश्यकतानुसार अपनी ओर से उन सूक्ष्म कणों में परिवर्तन कर उन्हें बचा भी लेते हैं।
योगी-महात्माओं के लिए, सिद्धि की गहराइयों तक पहुँचे हुये अध्यात्मवादियों के लिये यह सब बातें कोई अधिक महत्व नहीं रखती। इनसे तो अध्यात्म की सर्वोपरिता ही सिद्ध हो सकती हैं। अध्यात्म का मूल-प्रयोजन अंतःकरण को प्रकाशित करना, जन्म और मृत्यु के अन्तर को पाटना, बन्धन मुक्ति और लौकिक व पारलौकिक सुख-शाँति प्राप्त करना है उसके लिये आवश्यक है कि डाक्टर साहब की तरह केवल तर्कवादी ही न बना जाये जीवन में श्रद्धा आनी चाहिये और उस श्रद्धा का उपयोग आत्म-सुधर में किया जान चाहिए। तभी हम अध्यात्म के लोभों से सही अर्थों में लाभान्वित हो सकते हैं।
प्राचीन युग की बात है। तब प्रजा अधिकतर धर्मप्राण थी। फिर भी अधार्मिकता तत्व किसी मात्रा में थे ही। अधिकाँश व्यक्ति त्यागी, सेवा परायण एवं ईश्वर भक्त साधुजनों से सदुपदेश तथा सद्ज्ञान प्राप्त किया करते थे।
एक सन्त थे। वे जनता को धार्मिक उपदेश देते थे। किन्तु उन्होंने यह पढ़ा था शास्त्रों में- कि “ज्ञान-दान बिना किसी प्रतिदान की आशा अथवा लाभ के बिना ही किया जाना चाहिए- अन्यथा उसकी महत्ता कम हो जाती है।” सो सन्त अपना निर्वाह टोपियाँ सी कर , बेचकर ही करते थे। नित्य के व्यय के पश्चात् उन्हें नित्य एक पैसे की बचत भी हो जाती थी जिसे वे दान कर दिया करते थे।
उसी नगर के एक प्रतिष्ठित सेठ जी भी सन्त का प्रवचन सुना करते थे तथा उनकी गतिविधियों को निकट से देखा करते थे। उन्होंने देखा कि साधु जी नित्य एक पैसे का दान करते हैं।
उन्हें भी दान करने की प्रेरणा मिली और उन्होंने भी उस दिन से धर्म खाते में एक निश्चित मात्रा में धन निकालना प्रारम्भ कर दिया।
जब राशि पाँच सौ रुपये हो गई तब वह उसे लेकर सन्त के पास पहुँचे। बोले- मैंने धर्म खाते में निकाली हुई ये राशि एकत्रित की है। अब इसका क्या करूं ?”
सन्त ने सहज भाव से कहा-”जिसे तुम दीन-हीन समझते हो उसे दान कर दो।”
सेठ जी गये। उन्होंने देखा एक दुबला-पतला- भूख से पीड़ित अन्धा मनुष्य जा रहा हैं। उन्होंने उसे सौ रुपये देकर कहा-”सूरदास जी ! आप इन रुपयों से भोजन, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक वस्तुयें ले लेना।”
अन्धा आशीर्वाद देता हुआ चला गया। किन्तु सेठजी को न जाने क्या सूझा कि वे उसके पीछे-पीछे चले। उन्होंने देखा कि आगे जाकर उस अन्धे ने उन रुपयों को खूब माँस खरीदकर खाया। शराब पी। और जुये के अड्डे पर जाकर जुये के दाव पर रुपये लगा दिये। नशा चढ़ा और वह सब रुपये हार गया। तब जुये के अड्डे वालों ने उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया।
सेठ को बड़ी ग्लानि हुई। एक क्षण के लिये दान धर्म से विश्वास भी हट गया पर फिर वह साधु के पास गये और उन्हें सब कुछ कह सुनाया।
सन्त मन ही मन मुस्काये। और उसे अपना बचाया हुआ पैसा देकर कहा-” आज इसे किसी आवश्यकता वाले को देना और कल अपनी बात का उत्तर ले जाना।”
सेठ जी ने आगे जाकर एक भीख माँग रहे दीन दरिद्र व्यक्ति को वह पैसा दिया और छिपकर उसके पीछे हो लिये। वह व्यक्ति थोड़ी दूर गया। उसने अपनी झोली में से एक मरी हुई चिड़िया निकाल कर फेंक दी। एक पैसे के चने खरीदे और उन्हें खाकर तृप्त हो कह प्रसन्न होता हुआ आगे चला।
सेठ जी ने उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया ? तब वह व्यक्ति बोला-”कई दिन से भूखा था मैं कुछ न पाकर यह चिड़िया पकड़ लाया था कि भूनकर खा लूँगा किन्तु अब आपने पैसे दे दिया तो अब प्राणों की हत्या क्यों करूं ? इतना अन्न मिल गया। क्या यह सन्तोष की बात नहीं ?”
सेठ जी ने यह घटना भी सन्त को सुना दी। और दोनों घटनाओं का अन्तर पूछा।
सन्त बोले-”वत्स ! महत्ता केवल देने भर की नहीं होती। हमने जो धन दान में दिया है वह किन साधनों द्वारा प्राप्त किया गया है ? इसकी भावना उस धन के साथ जुड़ जाती है, तुम्हारा अनीतिपूर्वक बिना परिश्रम के कमाया गया धन पाकर प्राप्तकर्ता ने सौ रुपये भी अनीति के कार्यों में लगाये। अतः तुम्हें उस उपयोग कर्ता के अनुरूप पाप ही लगेगा और मेरा पैसा परिश्रम से कमाया हुआ था अतः जिसके पास गया, उसके द्वारा सद्बुद्धि पूर्वक ही व्यय किया गया।” सेठ की समझ में तथ्य आ गया और उस दिन से ही उसने व्यापार पूरी ईमानदारी के साथ करना प्रारम्भ कर दिया।
भक्त नामदेव की पत्नी और भागवत नामक व्यक्ति की पत्नी परस्पर सहेलियाँ थीं। भागवत की स्त्री के पास एक पारसमणि थी, वह उसने नामदेव की स्त्री को देकर कहा- ‘ उससे तू अपने काम लायक लोहा सोना बनाले और फिर तुरन्त इसे मुझे लौटा दे। सावधान! किसी को यह बात मालूम न हो।’ नामदेव की पत्नी ने बहुत सा लोहा सोना बना लिया। घर आने पर नामदेव को यह बात मालूम हुई तो उसने पारस ले लिया और चन्द्रभागा में स्नान कर पारसमणि को उसमें डाल दिया।
मालूम होने पर नामदेव की पत्नी ने अपनी सहेली से सब बात कह दी। सहेली ने अपने पति भागवत से सब बात कही तो वह बड़ा कष्ट हुआ। उसने यह बात उड़ा दी कि नामदेव ने पारस मणि चुराली है और वह उसे माँगने के लिए घाट पर गया। देखते-देखते वहाँ भीड़ लग गई। नामदेव ने कहा-’मणि चन्द्र भागा को अर्पण करदी। नहीं मानते तो निकाल कर दिखा दूँ।’ लोग बोले-नदी से मणि निकाल लाना सम्भव नहीं।’ नामदेव ने डुबकी लगाई और कुछ कंकड़ लाकर सामने रख दिये। बोले-’लो, एक बदले पारस मणि।’ व्यंग्य करते हुए भागवत ने उन कंकड़ों से लोहा लगाया तो तुरंत सोना बन गया। लोग नामदेव की जय जयकार कर उठे।
ऐसे न जाने कितने व्यवसायी, दुकानदार, मजदूर, कारीगर, अध्यापक व क्लर्क आदि काम करने वाले लोग ..................... को मिलते हैं जिन्होंने अपने काम अपने पद अथवा अपनी स्थिति में रंच मात्र भी उन्नति नहीं की। वे आज भी उसी स्थान, उसी दशा में घिस-घिस करते हुये पड़े है जहाँ पर दस-बीस साल पहले थे। जब कि बहुत से न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचे हैं। इस उन्नति एवं अनुन्नति के पीछे केवल एक ही कारण काम कर रहा होता है- और वह है उन्नति करने की इच्छा अनिच्छा।
यथा स्थान घिस-घिस करते रहने वालों में उन्नति करने की इच्छा का अभाव रहता है। सच्ची इच्छा में करुणा की शक्ति भरी रहती है। जब मनुष्य एक अच्छी स्थिति पाने, स्थान से आगे बढ़ने, काम को ऊपर उठाने के लिये तड़प उठता है, व्यग्र एवं बेचैन हो जाता है तब उसमें एक लगन जाग उठती है। वह अपनी तरक्की के साधन खोजने उपकरण इकट्ठे करने और मार्ग निकालने के लिए प्रयत्नशील हो उठता है। सच्ची इच्छा, यथार्थ आकाँक्षा से विपरित व्यक्ति रात-दिन, उठते-बैठते, खाते-पी, बात एवं व्यवहार करते समय भी अपने लक्ष्य के प्रति जागरुक रहता है। वह कहीं भी क्यों न हो कुछ भी क्यों न करता हो उसके लक्ष्य की तस्वीर सदैव उसके सामने रहती है। जाग्रत अवस्था में तो वह अपने लक्ष्य के प्रति विचार एवं क्रियाशील रहता ही है, सोते में भी लगनशील व्यक्ति अपने लक्ष्य के ही सपने देखा करता है। अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार व्यक्ति उसके साथ तन-मन से एकाकार हो जाता है।
इच्छा तथा जिज्ञासा जीवन के लक्षण है। जिसमें इच्छा का प्रस्फुटन होता है, जिज्ञासा एवं उत्सुकता का जन्म होता रहता है, नित्य नये कदम बढ़ाने, तरक्की करने की उत्सुकता और नित्य नई बातें सीखने ज्ञान एवं योग्यताएं प्राप्त करने की जिज्ञासा जाग्रत रहती है वह ही यथार्थ रूप में जीवित है। एक स्थान पर पड़े रहना, एक स्थिति में स्थिर रहना, एक ही दशा को स्वीकार किये रहना जड़ता का चिन्ह है। पत्थर पहाड़ आदि जड़ वस्तुयें है। यह जहाँ जिस स्थिति में पड़ जाती हैं, पड़ी रहती हैं। इनमें जीवन तत्व का सर्वथा अभाव होता है। पेड़, पौधे आदि यों तो चेतन की तुलना में जड़ ही माने गये है। पर उनमें जीवन तत्व का प्रभाव नहीं होता। यद्यपि वे एक स्थान से उठकर दूसरे स्थान पर स्वयं नहीं जा सकते तब भी दिन-दिन बढ़ते और विकास करते रहते हैं। नये-नये फूल फल उगाते रहते हैं। पशु यद्यपि चेतन श्रेणी में माने गये है। तथापि वे मानसिक रूप से जड़ ही होते हैं। नैसर्गिक इच्छाओं की प्रेरणा के अतिरिक्त उनमें और किसी प्रकार की इच्छा का स्फुरण नहीं होता। नई कल्पनायें, नये विचार अथवा नूतन जीवन का उनसे कोई परिचय नहीं होता। वे जिस स्थिति में आदिकाल में थे, आज भी उस ही स्थिति में रह रहे है।
अपनी पूर्व स्थिति में यथा स्थान पड़े रहने वाले व्यक्ति एक प्रकार से पशुओं के समान ही मानसिक जड़ता से आक्रान्त रहते हैं। जो काम, जिस श्रेणी में उन्होंने प्रारम्भ किया, उसी प्रकार उसी स्थिति में करते जा रहे है। उसे विकसित करने आगे बढ़ाने, अथवा उसमें कोई वाँछनीय परिवर्तन लाने की जिज्ञासा उनमें होती ही नहीं। वे प्रातः काल उठे, यन्त्रवत अपने आवश्यक नित्य कर्म निपटाये और बिना किसी उल्लास अथवा नई आशा से काम पर चले गये उसी दायरे उसी परिधि में मृतत्व चक्कर लगाया और शाम को वापस आ गये। किसी दिन भी न तो वे कोई नई बात सीखते हैं और न किसी नवीनता का पुट प्रकट करते हैं। कार्य करने की यह रुचि और यह पद्धति घोर मानसिक जड़ता की सूचक है।
ऐसी मानसिक जड़ता के रोगी व्यक्ति ही समाज में स्थगन, अरुचिता तथा अपरूपता को प्रश्रय देने वाले होते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों को देख कर अन्य लोग किसी समाज की सभ्यता, असभ्यता, उन्नति अनुन्नति तथा असमानता एवं विषमता का अन्दाजा लगाते हैं, और उसी के अनुसार उसका महत्व एवं मूल्याँकन करते हैं। पुरुषार्थी, परिश्रमी तथा कल्पना शील व्यक्ति समाज में जितने सौंदर्य का अभिवर्धन करते हैं, उसे उस प्रकार के मानसिक जड़ जोग घटा देते हैं। समाज की अवमानना का दोष बहुत कुछ ऐसे ही जीवित मृत लोगों पर रक्खा जा सकता है।
अनुन्नतिशील व्यक्ति की संतानें भी कठिनता से ही इस पैतृक दोष को त्याग कर उन्नतिशील हो पाती है। अन्यथा, वे भी अधिकतर यह मानसिक जड़ता विरासत में पाकर उसकी परम्परा बनाये रखती हैं। इसके लिये उन बेचारों को कोई दोष भी नहीं दिया जा सकता। वे तो स्वभावतः पिता का ही अनुसरण करेंगे। जो कुछ सामने देखेंगे सीखेंगे और जिन संस्कारों को पायेंगे उन्हीं के अनुसार गतिशील होंगे। जिस व्यवसायी के पास कारोबार को आगे बढ़ाने की न तो कल्पना है और न इच्छा, जिज्ञासा वह भला अपने पुत्र को उसकी प्रेरणा दे भी कैसे सकता है ? और यदि पुत्र अपनी किसी मौलिकता को प्रकट करता, कोई परिवर्तन अथवा मोड़ लाने का साहस करता भी है तो उसका असाहसी पिता हानि अथवा बिगाड़ के .......... से उसे निरुत्साह करने में ही बुद्धिमानी समझता है। आगे निकल कर पैर बढ़ा कर परिवर्तन लाकर अथवा खतरा उठाने का साहस दिखला कर व्यवसाय की उन्नति का प्रयत्न करना वह अनियन्त्रित उच्छृंखलता के समान अनुचित एवं अवाँछनीय मानता है। उसे तो उसी अनुन्नत आशा में पड़े रह कर, उसी फटे-पुराने व्यवसाय को उसी प्रकार घिस-घिस कर चलाते रहने में ही सुरक्षा एवं कल्याण दिखाई देता है। आलस्य जन्य तामसी सन्तोष में वह अपनी अध्यात्मिक खूबी समझता है फटा पुराना, गन्दा गलीज मन कर और उल्टा-सीधा, मोटा-झोटा पेट आध पेट खाकर और टूटे-फूटे, मैले-कुचैले साधन शून्य घर में चुपचाप बिना किसी उत्साह उल्लास के जिन्दगी काट डालने में बड़ी बहादुरी समझते हैं। जब कि यह आलस्य एवं ........ जन्य अभाव के अभिशाप के सिवाय तपो त्यागमय ...... आस्था से आभूषित निर्लिप्त एवं निराधार जीवन ........... प्रकार भी नहीं माना जा सकता।
इसके लिये यदि ऐसे निरीह अथवा निस्पृह व्यक्तियों का मनोऽन्वेषण किया जाये तो न जाने इस मरघट में कामनाओं की कितनी सड़ी लाशें, ईर्ष्या, द्वेष, तृष्णा एवं वितृष्णाओं, डाह एवं दुर्भावनाओं के कितने काले विषधर निकल पड़ें। अपने दुर्गुणों के कारण अभाव एवं दयनीयता से ग्रस्त व्यक्ति के अन्तर में भी आध्यात्मिक महनीयता का कोई अंकुर उपज सकता है-यह सर्वथा असम्भव है। उसमें तो कृपणता, कर्कशता, कटुता तथा अप्रकट कुटिलता की ही आशा की जा सकती है। जो अकर्मण्य अथवा असाहसी व्यक्ति अपना लोक नहीं सुधार सकता वह परलोक के सुधार में तत्पर माना जाये यह तो अजीब सी बात है।
मनोमृत अथवा जीवन जड़ मनुष्य अपरुपता एवं असंगतियों के बड़े पोषक होते हैं और उन्हें अपने इस दुर्गुण में संकोच भी नहीं होता। जिस कुरूप दशा में घर हैं उसी में दफ्तर, दुकान अथवा सभी निमन्त्रणों में चले गये। देश काल के अनुसार अपनी दशा सुधारने की जरा भी जरूरत नहीं समझते उन्हें उस स्थान में एक धब्बे की तरह चिपक जाने में जरा भी ग्लानि नहीं होती। पास-पड़ौस आमने-सामने की दुकानें मकान तरक्की कर रहे हैं उन्नत, विकसित एवं सुन्दर होते जा रहे हैं-किन्तु उनके बीच वे एक विजातीय तत्व की तरह विद्रूपता तथा विसंगति को लिये स्थापित है। उन्हें यह सब देखकर भी कुछ परिवर्तन लाने का विकास अथवा सुधार करने का उत्साह नहीं होता। माना उनके साधन की ससीमता और समता उन्हें मजबूर करती है, वे ऊँची- ऊँची अट्टालिकायें बड़े-बड़े सौध प्रासादों का निर्माण नहीं कर सकते किन्तु अपने घर दुकानों को झाड़-बुहार कर लीप पोत कर, झाड़-झंखाड़ और कूड़ा-कर्कट हटाकर, उनकी खपरैल, छप्पर अथवा छानी को व्यवस्थित तथा सहेज सुधार कर साफ सुथरा तथा जुगुप्सा रहित तो बना ही सकते हैं। लेकिन यह उनका तथा उनके सम्बन्धित व्यक्तियों का दुर्भाग्य ही है कि उनकी मानसिक जड़ता की छाप उनके हर अनुबन्ध पर पड़ी रहती है।
वैसे सत्य बात तो यह है कि जब कोई एक व्यक्ति अपने व्यवसाय तथा कारोबार को आगे बढ़ा कर साधन सम्पन्न बन सकता है तब दूसरा क्यों नहीं बन सकता। किन्तु कठिनाई तो यह है कि जड़ात्मा व्यक्तियों में उन्नति की कोई अनुभूति ही नहीं होती। वे तो भाग्य के भरोसे यथा स्थान पड़े-पड़े घिस-घिस ही करते रहते हैं। प्रयत्न शून्य रह कर भाग्य का भरोसा रखने वालों के हिस्से जो दुर्भाग्य नाम का दण्ड निश्चित रहता है वह उन्हें मिलता है। मौलिक रूप से न सही, देखा-देखी ही यदि ऐसे व्यक्ति उन्नति का कुछ प्रयत्न करें, हाथ, पैर हिलाये तब भी तो बहुत कुछ हो सकता है, किन्तु कहाँ ? वे तो अपनी विरुपवृत्ति के बन्दी बने माँस पिंड की तरह बैठे दूसरों की उन्नति एवं विकास को टुकुर-टुकुर देखा और मन ही मन डाह करते रहते हैं।
व्यवसाय छोटा है, दुकान कम चलती है, माल की कमी है-फिर भला तरक्की कैसे हो-यह बहाना कोई अर्थ नहीं रखता। व्यवसाय छोटे से ही बड़ा होता है। दुकान उपयुक्तता के आधार पर ही चलती है, और माल ................... तथा सद्भावना के भरोसे मिलता है। बाजार में जाइये, लोगों से संपर्क करिये, लेन-देन का व्यवहार बढ़ाइये, वचन का पालन करिये और देखिये कि आपको माल की कमी नहीं रहती ! दुकान समय से खोलिये, इच्छा और खरा माल रखिए, उचित दाम लीजिए और ग्राहकों से मित्र एवं विनम्र व्यवहार कीजिए। खुद साफ रहिये दुकान की हर चीज साफ रखिये। आकर्षक ढंग से सजा कर रखिये और वह चीजें अवश्य रखिये जिनकी माँग रहती है और तब देखिये कि आपकी दुकान चलती अथवा आप जो कुछ बेचना चाहें लोग वही खरीदें तो यह नीति उलटी है। आप वह चीजें रखिये जिनकी लोगों को जरूरत है और वह बेचिए जिन्हें ग्राहक खरीदना चाहें। ग्राहकों की आवश्यकता एवं रुचि के साथ साम्य रखने वाला दुकानदार सफल और उसे वैषम्य रखने वाला निश्चित रूप से असफल होता है।
इसी प्रकार मजदूर अध्यापक अथवा क्लर्क के विषय में भी यही बात है। बिना उन्नति की जिज्ञासा जगाये तरक्की नहीं हो सकती। मजदूर को चाहिये कि वह ठेले की तरह ढोने के काम में ही सन्तुष्ट न रहें। अपने काम को इतनी रुचि तत्परता, व्यवस्था तथा सावधानी के साथ करें कि स्पष्ट झलकने लगे कि यह काम पूरे मनोयोग से किया गया है। माल को ठीक से उठाना, यथा स्थान ठीक से रखना कम से कम जगह में अधिक से अधिक माल सजा देना। बिना टेके और बिना रोके समय से अपना पूरा काम करना, मजदूरों का ठेकेदार कर सकते हैं, वेतन तथा पद वृद्धि कर सकते हैं।
प्राइमरी का एक मिडिल पास अध्यापक ट्रेनिंग करके अपनी पदोन्नति कर सकता है इन्ट्रेन्स, एफ.ए, बी.ए. तथा एम.ए. पास करके विद्यालयों व कॉलेजों में जा सकता है। एक से दो विषयों में अधिकार प्राप्त कर अपनी योग्यता बढ़ा सकता है। अपने विषय में पूर्णता प्राप्त कर दूसरों की दृष्टि में ऊपर उठ सकता है। विद्यालय के अन्य कामों में दक्षता प्राप्त कर प्रिंसिपल अथवा प्रधानाचार्य का दाहिना हाथ बन सकता है आदि ऐसी उन्नतियाँ हैं जो कोई भी अध्यापक सहज ही में उपलब्ध कर सकता है।
क्लर्क जैसे सीमित स्थान में भी उन्नति कर सकने की कुछ कम सम्भावनाएँ नहीं हैं। साधारण क्लर्क टाइप सीख कर उपयोगिता बढ़ा सकता है। अपने काउन्टर के अतिरिक्त अन्य स्थानों का काम सीख कर अपना विस्तार कर सकता है। चिट्ठी-पत्री, जानकारी, सूचना, नियमों तथा विषय में निपुणता प्राप्त कर अपने अधिकारियों को निर्भर बना सकता है।
तात्पर्य यह है कि उन्नति का आधार कोई स्थान, पद अथवा अवसर नहीं है उसका आधार है जिज्ञासा, इच्छा नवीनता तथा अखण्ड परिश्रम एवं लगन ! जीवन में यथा स्थान पड़े-पड़े घिस-घिस करते रहना जड़ता का लक्षण है। अपनी उन्नति का प्रयत्न न करना न केवल अपने साथ ही बल्कि पुत्रों तथा समाज के साथ भी अन्याय करना है। समाज की शोभा उसकी सफलता एवं सम्पन्नता हमारी उन्नति एवं विकास पर निर्भर है। अस्तु हम आज जहाँ पर पड़े है। वहाँ से आगे बढ़ने ऊँचे उठने में तन, मन धन भर कोई कसर उठा नहीं रखनी चाहिये।
“धर्म और विज्ञान में कोई संगति नहीं” - विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ धार्मिक अपेक्षाएं समाप्त होती जायेंगी। जिन लोगों ने उक्त धारणायें बना रखी है अगली पंक्तियाँ पढ़कर उन्हें पता चलेगा कि आज संसार में भौतिक विज्ञान से लेकर रसायन शास्त्र, जीव शास्त्र, औषधि शास्त्र, वैमानिकी विद्या, पदार्थ विद्या तक की जो कुछ भी प्रगति दिखाई दे रही है उससे कहीं अधिक समृद्ध भारतीयों की वैज्ञानिक जानकारी रही है। चूँकि आत्मा जीवन का मूल है शरीर नष्ट प्रायः और परिवर्तनशील भाग, इसलिये यहाँ जो आत्म-कल्याण के साधनों को प्रमुखता दी गई तथा शारीरिक और भौतिक सुखों को गौण माना गया वह भारतीय आचार्य की दूरदर्शिता और प्रज्ञा का ही प्रमाण था।
धर्मपाद की पुस्तक “बोधि राजकुमार वत्थु” पुस्तक में एक आख्यायिका आती है। बोधि राजकुमार ने एक कारीगर से महल बनवाया। इस महल की डिजाइन और बनावट इतनी आकर्षक और सुदृढ़ थी कि उस समय के सारे राजा बोधि राजकुमार से ईर्ष्या करने लगे। स्थापत्य और वस्तु कला की दृष्टि से गत शताब्दी तक भारतीय परम्परायें बेजोड़ रही हैं उस जमाने का तो कहना ही क्या, वह हमारी कला प्रगति का चरम-विकास युग था। पाश्चात्य सभ्यता की आँधी को इस देश में घुसने न दिया जाता, तो आज भी हम कला के क्षेत्र में विश्व शिरोमणि रहे होते। दुनिया हमारे पाँव पूजती जबकि आज हमारे देश का शिक्षित नेतृत्व खुद ही अपना गौरव भुलाकर विदेशियों की ओर ताकता है।
बोधि राजकुमार ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह कारीगर कहीं और जाकर इससे भी अच्छा महल तैयार कर दें इसलिये उन्होंने उसे वहीं बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया और निश्चय किया कि उसके हाथ कटवा दिये जायें। यह व्यक्तित्व महत्वाकांक्षा ही इस राष्ट्र के लिये घातक बनी यदि उसे रोका गया होता तो सम्भवतः इस देश को पराधीनता का मुँह देखना न पड़ता। दुःख है कि राजनीति की जिन भूलों के कारण यह देश पहले गुलाम बना था वह महत्वकांक्षाएं आज भी शासन-तन्त्र को गुमराह कर रही है उसे रोकने का साहस हमारी स्वाभिमानी प्रजा को करना ही पड़ेगा।
कारीगर ने अपने एक मित्र के द्वारा अपनी स्त्री के पास खबर भेजी कि वह अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर पुत्रों सहित मिले के लिए राजा से विनय करें। इस बीच उसने स्वयं बन्दी होकर भी राजा से प्रार्थना की कि यदि से यन्त्र दिये जायें तो वह हाथ कटाने से पूर्व राजा को एक अद्भुत वस्तु भेंट कर सकता है। राजा ने बात मान ली। इस बीच उसने एक सुन्दर गरुड़ यन्त्र (हैलिकाप्टर) तैयार किया। उधर उसकी पत्नी ने पति की आज्ञानुसार स्थायी सम्पत्ति बेच दी और अपने पुत्रों को लेकर राजा के पास गई और अपने पति से बन्दीगृह में ही भेंट करने की प्रार्थना की। राजा ने स्वीकृति देदी। इसके बाद “बोधि राजकुमार वत्थु’ में लिखा है-पुत्र दारुमरुस सकुनस्स कुच्छियं निसीदयित्व वातपातेन निक्सनित्वा पलायि” अर्थात् कारीगर ने अपनी धर्म पत्नी और बच्चों को उस गरुड़ यन्त्र में बैठाया और बन्दीगृह से पलायन कर गया। राजा के सिपाही देखते ही रह गये वह जाकर नेपाल में रहने लगा।
भारद्वाज ऋषि कृत, ‘अंशु-बोधिनी’ पुस्तक के 28वें प्रकरण “वैमानिकी प्रकरण” में विमान विद्या से सम्बन्धित अनेक सूक्ष्म और प्रामाणिक तथ्यों का उल्लेख है। यदि प्राचीन संस्कृत वाङ्मय पर शोध की जाये और इन सूत्रों के आधार पर विज्ञान को एक नई दिशा दी जाये तो हमारे देश के वैज्ञानिक आज जो विदेशियों के ज्ञान के आधार पर अपनी जानकारियाँ बढ़ाते हैं वह कुछ ही समय में विज्ञान के आश्चर्यजनक रहस्यों की खोज करके भारत को महान् वैज्ञानिक प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते हैं इस पुस्तक के यह अंश उसी का प्रमाण हैं -
शक्त्युग्दमों भूतवाहो घूमयानश्शिखेद्गमः अंशु वाह................... मुखो मणिवाहो मरुतखः। इत्पष्टकाधिकरणे वर्गाष्यु...... शास्त्रतः।
आठ प्रकार से चलने वाले विमान आकाश में चलते है- (1) शैत्युद्गमौ अर्थात् विद्युत से चलने वाले। (2) ............... अर्थात् जो अग्नि, वायु, जल आदि ईंधनों से चलते हैं। (3) धूमयान अर्थात् भाप सये चलने वो। (4) शिखोद्गम अर्थात् पंचशिखी तेल से चलने वाले। (5) अंशुवाह तारामुखो या जो विभिन्न ताराओं में जाया करते थे जो सूर्य की ऊर्जा से संचालित होते हैं। (6) उल्कारस ............. चुम्बक शक्ति। (7) मणियों की शक्ति से चलने वाले तथा (8) जो केवल वायु की शक्ति से चलते थे ................ आठ प्रकार के विमान थे। इस प्रकरण में ............. को ऊपर किस गति से ले जाना चाहिए, आकाश ................ अर्थात् बादल, बिजली, उल्का आदि से किस ................. किन यन्त्रों से रक्षा की जानी चाहिए इन सब बातों के साथ यह भी बताया है कि किसी भी ग्रह में उतरने से पहले उसकी परिक्रमा की जाये फिर उतरते समय .............. सावधानी रखी जाये आदि आदि। यह सब पढ़ने से .............. लगता है कि आज जो जर्मनी, अमरीका और रूस ............... उन्नति कर रहे है उस सबका आधार हमारे यहाँ ............... जर्मनी ले जाया गया अथर्ववेद ही है। हमारे ............ में होने के कारण अभी पाश्चात्य देशवासी सारे .................. नहीं पाते इसीलिए उन्हें लम्बे परीक्षणों के दौर ............. पड़ता है। हमारे लिये तो वह सारा मसाला ............. खोज की जाये रिंच और ढिभरी जैसे साधारण ....................... उनकी बनावट आदि के विस्तृत उल्लेखों वाला ................... हमारे यहाँ अभी भी सुरक्षित है आवश्यकता केवल ............. इकट्ठा करने और उस पर शोध करने की है। कुछ ................ अमृत बाजार पत्रिका ने इस आशय का एक लेख ..................... बताया था कि हैदराबाद के पत्थर घाटी नाम .................. डॉ. सैयद मुहम्मद कासिम जिनके पुरखे कभी ............ मौलवी रहे हैं उनके पास इस तरह के साहित्य ............... भण्डार सुरक्षित है। खोज की जाये तो सारे .............. ऐसी पाण्डुलिपियाँ आज भी सुरक्षित मिल सकती है।
विमान ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी भारत का विज्ञान उल्लेखनीय प्रगति पर था। ब्रह्माण्ड विकास की जानकारी के लेख अखण्ड-ज्योति में पहले छप चुके है। प्रकाश की गति की जानकारी सर्व प्रथम 1675 में रोमर ने की थी इसके बाद 1925 में “माइकल सन” ने गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रकाश की गति 186864 मील प्रति सेकेण्ड निकाला। यह जानकारियाँ बहुत हाल की हैं भारतीय ग्रन्थों का अवलोकन करते हुए हम मुनि आत्रेय की भागवत पढ़ते हैं तो उसमें प्रकाश की गति का मान निकालने वाली इकाइयाँ मिलती हैं। उनसे प्रकाश की गति 187670 मील प्रति सेकेण्ड निकलती है। इस मान में और आज के मान में कोई बड़ा अन्तर नहीं है सम्भव है आज के वैज्ञानिक कई ऐसी भूलें करते हों जो तब भी हमारे यहाँ के आचार्यों को ज्ञात रही हों और हमारे मानक ही सही हों जो भी हो इतना तो निश्चित ही है कि हमारी पहले की जानकारियाँ अत्याधुनिक थी। इन सारी जानकारियों के आधार पर ही हमारे यहाँ “आत्मा” और ब्रह्म जैसे सूक्ष्म तत्वों का ज्ञान प्राप्त किया गया है जबकि आज का विज्ञान इनका उपयोग इन्द्रिय सुख और भौतिक महत्वाकांक्षाओं में नियोजित करके मानवीय कल्याण को दिग्भ्रमित करने में लगा हुआ है। विज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग लौकिक सुखों की अभिवृद्धि नहीं अपितु अमरत्व प्रदान करना और साँसारिक भयों से मुक्ति प्रदान करना है।
पाक्र, डैविस की पाँच पीढ़ियों ने केवल चिकित्सा शास्त्र पर क्रमबद्ध अनुसन्धान किये हैं। उसने भारतीय चिकित्सा पद्धति को आधुनिकतम बताते हुए लिखा है कि यहाँ शल्य (आपरेशन) चिकित्सा तक का अच्छा ज्ञान था। सुश्रुत को इस देश का महान सर्जन मानकर उनका एक कल्पना चित्र बनाकर प्रसारित भी किया। यह चित्र रीडर्स डाइजेस्ट के एक अंक में छपा भी था। पाक्र डेविस ने आचार्य सुश्रुत को ने केवल एक महान डाक्टर माना वरन् यह भी स्वीकार किया है कि उनकी औषधियाँ और चिकित्सा पद्धति ने सारे विश्व को प्रभावित किया।
यह सुश्रुत ही है जिन्होंने सर्व प्रथम शरीर के भीतरी अंगों की बनावट का वर्णन किया है। सुश्रुत संहिता में उन्होंने बताया है-शरीर में 900 संधियाँ, 700 रक्त वाहनियाँ, 500 माँस पेशियाँ, 300 हड्डियाँ है। 300 अर्थात् नलिका जो आधुनिक चिकित्सा जगत में पूर्ण रूप से खोजी भी नहीं जा सकी उनका ज्ञान सुश्रुत को था उन्होंने इनके लिए ‘रसकुल्पा’ अर्थात् रस स्रावित करने वाली नाम दिया है। सुश्रुत संहिता में 101 अस्त्रों का भी उल्लेख है और उन औषधियों का भी वर्णन है जो किसी अंग को सुन्न करने और आपरेशन के बाद “एण्टी सेप्टिक” के रूप में दी जाने में प्रयुक्त होती थी।
एक बार आश्रम के किसी लड़के ने खेलते समय धातु का कोई टुकड़ा निगल गया। वह टुकड़ा आँतों में जाकर अटक गया और कष्ट देने लगा। टुकड़े को आपरेशन करके निकालने में चुम्बक का प्रयोग करके उसे बाहर निकाला गया। यह घटना इस बात की प्रमाण है कि उस समय चिकित्सा पद्धति में चुम्बक का भी प्रयोग होता था।
कर्नल अल्कार ने भारतीय ग्रन्थों का अवलोकन करने के बाद लिखा है कि आज जिन बातों की हमारे वैज्ञानिक कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसी अस्त्र विद्या-भारतीयों के पास थी। उन्हें विभिन्न गैसों का ज्ञान था हाइड्रोजन बमों का निर्माण भारतवर्ष में हुआ है। प्रोफेसर बिल्सन ने तो यहाँ तक लिख है- “राकेट भारतीय आविष्कार लगते हैं आज उनकी केवल नकल हो रही है।”
शुक्रनीति में जिस बन्दूक और उसमें गोला भरकर दागने का उल्लेख है वह आजकल की बन्दूकों से किसी भी स्थिति में खराब न रही होगी उसका प्रमाण-
नालीके द्विविध ज्ञेयं वृहत्क्षुद्रविभेदतः। तिर्यगूर्ध्वयुतं छिद्रं नालं पंचवितस्तिकम्॥ मूलाग्रयो लक्ष्यिभेदि तिल बिन्दु युतं सदा। यन्त्राघाताग्नि कृद्ग्राव चूर्ण धृर्क्कण मूलकम्॥ प्रबाह्यं शकटाद्यैस्तु सुयुतं विजयप्रदम्॥ -शुक्रनीति अ॰ 4
इन पंक्तियों में बन्दूक की सारी रचना व बारूद का वर्णन है। कई बनावटें तो ऐसी मिलती-जुलती है जैसा कि ऊपर बन्दूक की ‘ओर साई’ का वर्णन है आज की बन्दूक से हू-बहू मिलता है इससे लगता है आज का विज्ञान हमारे यहाँ से ले जाये गये ग्रन्थों का ही परिणाम है। आज जब कि अपना सारा देश दूसरों के प्रयोगों की नकल करके आगे बढ़ना चाहता है तथा यह कहना भूल नहीं होगी कि यदि हम अपने ही उपलब्ध ज्ञान को एक नई दिशा दे सके होते तो अध्यात्म ही नहीं भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन्नति के पथ पर तेजी से अग्रसर हो गये होते। हमें आगे यही करना है। अपने देश की वैज्ञानिक प्रतिभाओं को शोध के लिये अपनी ही तरह का ज्ञान प्रस्तुत करना है ताकि हम विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के देशों के पछाड़ सकें। और यह बता सकें धार्मिक लोग पूजा उपासना करना ही नहीं जानते वरन् आर्थिक औद्योगिक व वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़कर सर्व शक्तिमत्ता की अभिव्यक्ति भी अच्छी तरह जानते हैं।
एक अँग्रेजी युवती ने इटली से एक कीमती घड़ी खरीदी। इंग्लैंड आने पर उसे ज्ञात हुआ कि घड़ी की कीमत कम है। उसे धोखा दिया गया है- ठग लिया गया। युवती ने इटली के तात्कालिक अधिनायक मुसोलिनी को पत्र लिखा जिसमें ठगी का पूर्ण उल्लेख था। लौटती डाक से ही उसे मुसोलिनी का पत्र मिला जिसमें उक्त धोखा देही के लिए क्षमा प्रार्थना की गई थी। साथ ही क्षति पूर्ति के पैसे भी मिल गये।
इसके पश्चात् घड़ी के व्यापारी का पत्र उक्त युवती को प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था ‘अपनी गलती के लिए हम हृदय से क्षमा चाहते हैं।’ व्यापार में अनीति के कारण हमारी दुकान सील बन्द करदी गई है। आप सिफारिशी पत्र लिख दें तभी फिर खुल सकती है। युवती ने पत्र लिखा दिया। पर राष्ट्र का चरित्र ऐसे ही सुरक्षित रखा जाता है।
“रेलगाड़ी पागल हो गई” शीर्षक से कुछ दिन पूर्व दैनिक ‘अमर उजाला’ में एक समाचार छपा था। पुरा विवरण इस प्रकार था-आगरा से काठ गोदाम की ओर जाने वाली एक मालगाड़ी का ड्राइवर सो गया (बीमार या मूर्छित होना जैसा कोई और कारण भी हो सकता है) फलस्वरूप मालगाड़ी को जहाँ भी रुकना था वह वहाँ नहीं रुकी रेलवे अधिकारी चिन्तित हो उठे। रेलगाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से जा रही थी। उसमें डीजल की मात्रा इतनी थी कि वह आसाम तक पहुँचने के लिये पर्याप्त हो जाती इसलिये आसाम तक पूरी लाइन साफ कर देने की व्यवस्था कर दी गई। दैवयोग से मथुरा से आगे मुरसान स्टेशन पर ड्राइवर जग गया और गाड़ी रुक गई अन्यथा वह कहाँ टकरा जाती, जाना कहाँ था, जा कहाँ पहुँचती इसका कुछ ठिकाना न था।
यह एक अपवाद समाचार था आये दिन वायुयान दुर्घटनाओं, रेल की भिड़न्त और उससे सैंकड़ों लोगों की दुर्घटनायें समाचार पत्रों में आती रहती हैं उन्हें भी आकस्मिक व अपवाद के रूप में ही माना जाता है। आज जब कि संसार की जनसंख्या भीषण रूप से बढ़ रही है सम्भव है इन दुर्घटनाओं का मूल्य न आँका जाता हो पर यातायात के याँत्रिक साधनों की वृद्धि ने जन-जीवन को दुर्घटनाओं से कितना भयाक्रान्त कर दिया है उसकी कल्पना भी कम दुःखद नहीं है। यह रोग चूँकि अभी भारतवर्ष में अधिक नहीं फैला इसलिए उधर ध्यान कम जाता है पर इस दृष्टि से पश्चिमी देशों का निरीक्षण करें तो यही कहना आयेगा-मनुष्य यातायात में इतनी शीघ्रता न कर पैदल चलने में ही राजी रहता तो कहीं अधिक नफे में रहता।
अमेरिका में रास्तों पर चलने वाले 100 में 17 व्यक्ति -मोटर-ठेलों द्वारा कुचल दिये जाते हैं, इंग्लैंड में प्रतिवर्ष 40 प्रतिशत सड़कों पर चलने वो लोग घर के बजाय स्वर्ग पहुँचा दिये जाते हैं। इटली में कारों की संख्या कम है 100 में से 9 के पास ही कारें होती हैं तो भी यह कम कारें ही 56 प्रतिशत पथिकों को कुचल डालती है और जापान जिसका औसत इटली से भी कम है प्रतिवर्ष 100000 यात्रियों में 402.2 आदमियों की पीस डालता है। इन सभी आँकड़ों को इकट्ठा करने पर पता चला कि संसार में आज यातायात दुर्घटनाओं से उतने लोग मरते हैं जितने संक्रामक बीमारियों से भी नहीं मरते।
पैदल चलने में शरीर की नस-नस हिल अवश्य जाती है पर उससे शरीर में कितनी शक्ति आती है यह भी किसी से छिपा नहीं। एक मील चलने से शरीर का जो व्यायाम करना पड़ता है उससे मनुष्य को 1 दिन के लिए अतिरिक्त शक्ति मिलती है और 1 दिन की आयु बढ़ जाती है। प्राचीनकाल में लोग लम्बी-लम्बी यात्रायें बहुत थोड़े समय में किया करते थे उनमें इतनी शक्ति और स्फूर्ति बनी रहती थी जब कि आज मोटरों और कारों पर चलने वाले लोग आराम से यात्रायें करने पर भी घर वापस आने पर हारे, थे, टूटे और बीमार से लगने लगते हैं। प्राचीनकाल में तीर्थ-यात्राओं और परिक्रमाओं का विधान था उसमें जहाँ शुद्ध और सुसंस्कृत वातावरण का लाभ लेने का भाव था वहाँ हमेशा घरों में बैठे रहने के आलस्य को पैदल यात्राओं द्वारा भगाना भी उद्देश्य था। इन यात्राओं से परिक्रमाओं से लोग भरपूर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते थे।
मोटर हो चाहे रेलें उनका धुआँ गैस यात्रियों के मस्तिष्क पर बुरा असर डालती है। हार्वर्ड युनिवर्सिटी के डा0 रीस.ए. मैकफारलैण्ड का कथन है कि मनुष्य को नियमित रूप से स्वस्थ और ताजा रखने के लिये 18 से 50 फुट प्रति सेकेण्ड की गति से चलती हुई 1 घन मीटर ताजी हवा की आवश्यकता होती है इसी प्रकार वायु में नमी की 15 प्रतिशत से कमी भी स्वास्थ्य और मस्तिष्क पर बुरा असर डालती है। इसके अतिरिक्त यात्रियों की सामूहिक अपान और मुँह से निकाली हुई दूषित वायु मोनो आक्साइड पैदा करती है जिससे देखने आराम से यात्रा करने वाले यात्री की आँख, कान, मस्तिष्क और रक्त में विकार उत्पन्न होने लगते हैं। यह विकार जहाँ यात्रियों के लिये स्वास्थ्य घातक होते हैं वहाँ ड्राइवरों के लिए ज्ञान नाशक। उनके मस्तिष्क के तन्तु और माँस-पेशियाँ नियन्त्रण में रहना छोड़ देती है दुर्घटनायें इसी का प्रतिफल होती है आज सारा योरोप उसके निश्चित दुष्परिणाम भुगत रहा है।
यह कहना चाहिये आज योरोप में यात्रा करना उतना ही जोखिम भरा हो गया है जितना कि तूफानी समुद्र में ........... हुई नाव लेकर चलना। स्वीडन में 1 लाख वाहन प्रतिवर्ष 76.1 आदमियों को रौंद डालते हैं, अमेरिका में अनेक सुरक्षा साधनों के बावजूद 52.6, न्यूजीलैण्ड में 53.8 ........... डेनमार्क के 1 लाख रजिस्टर्ड वाहन 101.8 यात्रियों को मार डालते हैं। फ्राँस उससे भी आगे है वह अपनी .......... मोटरों, कारों और ठेलों द्वारा 112.9 व्यक्तियों को पीस डालता है तो स्विट्जरलैंड और जर्मनी की गाड़ियाँ क्रमशः 153 और 153.8 व्यक्तियों को जिन्दा चबा जाती है। यह अकाल मृत आत्मायें आकाश और वातावरण में हाहाकार करती घूमती होंगी तो उससे मनुष्य जाति सूक्ष्म अन्तःकरण कितना अशाँत होता होगा उसकी कल्पना करना भी कठिन है।
सारा संसार घण्टे भर की यात्रा की सीमा में जाये उससे लाभ कुछ नहीं हानियाँ अपार है इसलिए यातायात के साधनों में वृद्धि द्वारा सारे संसार को एक बिन्दु पर ला देने का तर्क कोरी मूर्खता है। जब यह साधन नहीं थे इतिहास बताता है कि तब भी सारा संसार इतने ही समीप था। समीपता विचारों, सिद्धान्तों और मानवीय आदर्शों की ही अच्छी हो सकती है उसके दूसरे माध्यम है। गन्दगी बढ़ाने वाले शरीरों की समीपता से जो विकार बढ़ने चाहिये आज संसार में वही बढ़ रहे है अतएव इन साधनों में विकास के प्रयत्नों को अच्छा कदापि नहीं कहा जा सकता।
आज सब कुछ इससे उल्टा हो रहा है। योरोप में प्रतिवर्ष 500 व्यक्ति सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं और लगभग 1 लाख दुर्घटनाओं के शिकार होकर जीवन भर के लिये अपाहिज हो जाते हैं फिर भी प्रयत्न यह हो रहे है कि यहाँ अभी 100 व्यक्तियों पर 15 मोटरों का औसत है वहाँ जल्दी ही 100 व्यक्तियों पर 50 और 75 का औसत हो जाये। यदि विकास की गति इसी तरह बढ़ती गई तो एक दिन वह भी आ सकता है जब न तो पैदल के लिये पगडंडियाँ रह जायेंगी और न ही पैदल यात्री। तब लोगों को मारने वाले यमराज को भी अपना कार्यालय स्थायी रूप से बन्द कर देना पड़े तो कोई अचम्भा नहीं क्योंकि तब लोग अपने आप ही दुर्घटनाओं के शिकार होकर मर जाया करेंगे। आखिर यातायात के यह कृत्रिम साधन बढ़ेंगे तो दुर्घटनायें और मृत्यु दरें भी 79 व 37 प्रतिशत से शत प्रतिशत होगी ही। तब साहित्य भी पैदल चलने के लाभों के स्थान पर यातायात की दुर्घटनाओं का ही लिखा जाया करेगा जो इन पंक्तियों से भयंकर ही होगा। उस विभीषिका से बचाव अभी हो सकता है और वह भी इस तरह कि इन बनावटी साधनों की अपेक्षा लोग पैरों पर चलना सीखें, हवा में उड़ने की बात कम सोचें।
किसी राजा ने एक महात्मा से पूछा- ‘अगर तू रेगिस्तान में प्यास से व्याकुल हो और पानी वाला तुझसे आधा राज्य माँगे तो देगा या नहीं। राजा ने उत्तर दिया- अवश्य दूँगा। फिर हकीम भी आधा राज्य माँगे तो तू देगा ? राजा ने उत्तर दिया-जरूर दूँगा।’ इस पर महात्मा जी ने कहा-’ऐसी क्षणिक राज्य, सम्पत्ति पर घमण्ड न करो जो एक लोटे पानी के लिये और फिर दवा के लिये बिक जाये।’
मानवीय चेतना के विकास क्रम पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि उसके परिष्कार से स्वर ताल मेल गायन और वाद्य के रूप में परिष्कृत होता चला आया और ............... एक स्वतन्त्र शस्त्र एवं विज्ञान ही बन गया। इन दोनों को मिलाकर शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहें और अन्तरंग ......... उल्लसित एवं परिष्कृत करने की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया समझे तो यह सब प्रकार उचित ही होगा। जन मानस को उल्लसित करने की दृष्टि से संगीत की उपयोगिता असंदिग्ध है। काण्ठ का माधुर्य और गायक का भाव प्राकट्य वाद्य यन्त्रों की सहायता से एक ऐसी .......... उत्पन्न करता है जो सुनने वालों के कान को बेधती हुई-मस्तिष्क को छेदती हुई अन्तःकरण के मर्मस्थल को जा टकराती है। गायन का जो भी प्रयोजन है वह जन मानस को अपनी ओर बरबस खींचता है। पिछले दिन स्वर साधना का प्रधान लक्ष्य जन मानस में कामुकता, इन्द्रिय लिप्सा और कुत्सा को भड़काना रहा है। राज परिवारों के चाटुकार गवैये बजैये धन की लालसा और दुर्बुद्धियों द्वारा मिलने वाली प्रशंसा के लिए लालायित होकर कठपुतली की तरह नाचते रहे है। कवियों ने अपने अन्न दाताओं की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए वैसी ही कविता रची जैसी कि बुद्धि विकृति भरी सत्ता ने चाही। इन दिनों गायन और वाद्य का प्रयोजन नारी की पवित्रता को पददलित करके उसे वेश्या उपयोगिता रूप में नियोजित करना और उसके प्रति वासना भरी लिप्सा दृष्टि से सोचने के लिए जन मानस तैयार करना भर शेष रह गया है। हम कहीं भी जायें लैला मजनू के अफसाने ही सुनने को मिलेंगे। कविता, गायन, वाद्य की त्रिविध धाराएं एक ही प्रयोजन के लिये कटिबद्ध हो रही है। इसे एक मानवीय दुर्भाग्य की विभीषिका ही कहना चाहिए जिससे शब्द ब्रह्म को लोक मंगलकारी परमपुनीत गन्ध को नावदान की गन्दी नाली बनाकर रख दिया।
कला की सार्थकता और व्यक्ति की दुर्बलता सर्वमान्य है। शब्द ब्रह्म का उपयोग यदि पतन और सर्वनाश के लिए किया जाता है तो वैसा तो वैसा ही परिणाम होकर ही रहेगा। हो भी रहा है। धन, बुद्धि, बल की शक्तियों से भी बढ़कर ‘शब्द’ की अद्भुत शक्ति होती है। उसे कुत्सा भड़काने में नियोजित किया जाये तो सार्वजनिक उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को कौन कैसे बचा सकेगा ? स्वर और ताल का उपयोग अतीत में लोक मानस के परिष्कार में किया जाता रहा। तब शब्द का उपयोग प्रबोध के लिए सद्ज्ञान के लिये होता था। कण्ठ से निकलने वाले गीत गायक और श्रोता की सुप्त सत्प्रवृत्तियों को जगाते थे। स्वर और ताल की सरस्वती का अति पवित्र और अति समर्थ प्रतीक विग्रह माना जाता था सो उन देव तत्वों का उपयोग कुत्सा कामुकता भड़काने वाले प्रयोजनों के लिए करने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था। इन दिनों हम ऐसे ही युग में रह रहे है जिसने गायकों, वादकों, अभिनेताओं, कवियों, साहित्यकारों, चित्रकारों, चित्रकारों का एक बड़ा कलाकार वर्ग कुरुचि पूर्ण लिप्सा भड़काने में ही कला की सार्थकता अनुभव करता है। जिन्होंने अपने कण्ठ को लोक मानस की प्रसुप्त महानता जगाने के लिए समर्पित, संकल्पित और प्रतिबन्धित किया हो ऐसे शब्द योगी अब बड़ी कठिनाई से जहाँ तहाँ ही मिलेंगे। दुरुपयोग में अमृत भी विष बनता है सो अन्तरंग से भाव गरिमा प्रदीप्त कर सकने की सामर्थ्य से भरा पूरा ‘शब्द’ अब अधःपतन का माध्यम बन कर रह रहा है।
आज शब्द ब्रह्म की साधना की महत्ता धूलि में मिल गई है और संगीत वह मात्र गवैये बजैये नचकैयों का धंधा मात्र बन कर रह गया है। प्राचीनकाल में ऐसी स्थिति से चिढ़कर एक बार औरंगजेब ने अपने राज्य का समस्त वाद्य यन्त्रों को इकट्ठे करके जनाजा निकाला था और उन्हें जलवा दिया था तथा गवैये बजैये अपने राज्य से बाहर निकाल दिये थे खोज ऐसा भी कर सकती है। अनाचार खीज उत्पन्न करेगा ही। भगवान राम अपने राज्य में इन कला कोढ़ियों की अभिवृद्धि की आशंका से चिन्तित थे। बाल्मीकि रामायण के अनुसार भरत जी जब चित्रकूट पर भगवान राम से मिलने गये तब उन्होंने भरत से राज्य के कुशल समाचार जानने के लिए अन्य प्रश्न पूछते हुए यह भी पूछा कि कहीं आपने राज्य में गवैये, नचकैये तो बढ़ नहीं गये हैं ? निस्सन्देह जहाँ इन कला कोढ़ियों की संख्या बढ़ेगी वहाँ छूत के रोग की तरह भ्रष्टता का दावानल भड़केगा और वहाँ सब कुछ स्वाहा होकर रहेगा।
आज का अनाचार कल मानवीय विवेक को औरंगजेब की पुनरावृत्ति करने की बात फिर सोच सकता है। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से तभी बचा जा सकता है जब शब्द ब्रह्म की साधना लोक मंगल और जन मानस के परिष्कार का लक्ष्य सामने रख कर किये जाने का क्रम चल पड़े।
समय आ गया कि कला का उपयोग लोक मंगल के लिए करने के लिए कुछ साहसपूर्ण कदम उठाये जायें। सो इस प्रकार का प्रशिक्षण और प्रसार करने के लिए साहस और उत्साह के साथ कदम बढ़ाये जा रहे हैं और उसमें योगदान देने के लिए प्रत्येक स्वर साधक को सादर आमन्त्रित किया जा रहा है। अगले वर्ष संगीत के माध्यम से लोक शिक्षण के लिए अलख जगाने वाली मंडलियाँ बनाई जा रही है उनके स्थिर अंग बनकर काम करने वाले कितने ही गायकों वादकों की जरूरत पड़ेगी और उनके निर्वाह का प्रबंध किया जायेगा। इसके अतिरिक्त अपने स्थिर विद्यालय में भी कला को एक अनिवार्य अंग बना दिया गया है। अगले वर्ष के छात्रों को स्वावलम्बन की शिक्षा प्राप्त करने के अतिरिक्त यह विशेष लाभ भी मिलने लगेगा।
युग-निर्माण विद्यालय मथुरा के अंतर्गत कला भारती कक्ष क्षरा इस दिशा में विशेष प्रयत्न किया जा रहा है। जिनके कण्ठ स्वर तीखे और मधुर हैं, जिन्हें गायन वाद्य से रुचि है तथा थोड़ा अभ्यास भी करते रहे हैं उन्हें इसी जून से आरम्भ होने वाली कक्षाओं में सम्मिलित होने के लिये विशेष रूप से आह्वान किया जा रहा है। यों विद्यालय में पूर्ववत् 1. बिजली सम्बन्धी शिक्षण जिसमें रेडियो, ट्रान्जेस्टरों का सुधार निर्माण, फिटिंग, विद्युत यन्त्रों का सुधार 2. प्रेस व्यवसाय तथा उसके क्रिया कलाप का ज्ञान 3. संगीत, अभिनय, प्रकाश चित्र आदि प्रचार माध्यमों का शिक्षण 4. छोटे गृह उद्योग। यह चार वर्ग रहेंगे ही छात्र जीवन निर्माण की शिक्षा, सामाजिक पुनरुत्थान, आजीविका उपार्जन का स्वावलम्बन प्राप्त कर सकें उन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का सुअवसर भली प्रकार प्राप्त करने का अवसर मिलेगा ही पर अबकी बार संगीत ज्ञान, शब्द योग की साधना का विशेष शिक्षण प्राप्त करते रहने का एक विशेष लाभ और मिलने लगेगा।
जिनके पास समय कम है, स्वर कण्ठ तीखे हैं तथा गायन वाद्य का थोड़ा बहुत ज्ञान पहले से ही है उन्हें स्वल्प कालीन शिक्षण की एक अतिरिक्त व्यवस्था की गई है यह प्रशिक्षण मात्र एक महीने का 1 अगस्त से 31 तक चलेगा। इस थोड़े समय में भी कला रुचि रखने वाले व्यक्ति समुचित लाभ ले सकेंगे।
एक वर्षीय प्रशिक्षण के लिए छात्रों तथा एक महीने के लिए कला शिक्षार्थियों को अभी से आमन्त्रित किया जा रहा है। विद्यालय की सभी पुरानी नियमावली रद्द कर दी गई हैं और नई बनाई गई हैं सो जिन्हें शिक्षण प्राप्त करना है नियमावली मंगालें और अभी से अपना प्रवेश तथा स्थान सुरक्षित करालें।
एक मन्दिर में, एक सीखतर गायक गा-बजा रहा था। उसके ताल स्वर चूक जाते थे। वहाँ ही एक साधु बैठे थे, उन्होंने गायक को उसकी गलती बताई। गायक ने कहा- तुम्हें ताल स्वर से क्या मतलब ? मैं तो अपने भगवान को रिझा रहा हूँ। साधु ने हँस कर कहा- ‘मूर्ख ! तू मुझे तो रिझा ही नहीं सका, भगवान् को क्या रिझाएगा ? वह क्या मुझसे भी गया बीता है ?’
पिछले दिनों अग्नि तत्व को बहुत महत्व मिला और में एक कोने में उपेक्षित पड़ा रहा। फलतः सृष्टि का समाज -सारा सन्तुलन गड़बड़ा गया। हवन कुण्ड के चारों ओर एक पानी की नाली भरी रखी जाती है। कर्मकाण्ड ज्ञाता जानते हैं कि यज्ञ कुण्ड में अग्नि कितनी ही प्रदीप्त क्यों न रहे उसके चारों ओर घेरा सोम का-जल का ही होना चाहिए। अग्नि को उतने समारोह पूर्वक यज्ञ आयोजनों में स्थापित नहीं किया जाता जितनी धूमधाम के साथ जल यात्रा की जाती है। अग्नि का-ग्रीष्म ऋतु का उत्ताप तीव्र होते ही वर्षा ऋतु दौड़ आती है और उस तपन का समाधान प्रस्तुत करती है।
नर को अग्नि ऊष्मा और नारी को सोम, जल कहा गया है। नर की प्राण शक्ति का पुरुषार्थ क्षमता और कठोरता का बौद्धिक प्रखरता का अपना स्थान है और उसका प्रयोग किया जाना चाहिए पर यदि उसे उच्छृंखल छोड़ दिया गया-नारी का नियन्त्रण उस पर न हुआ तो सृष्टि में क्रूरता और दुष्टता का उत्ताप ही बढ़ता चला जायेगा। परम्परा यह रही है कि नर के श्रम साहस का उपयोग कम चलता रहा है, पर-नारी ने अपनी मृदुल भावनाओं से मर्यादाओं में रहने के लिए नियंत्रित और बाध्य किया है उसकी मृदुल और स्नेह सिक्त भावनाओं ने क्रूरता को कोमलता में बदलने की अद्भुत सफलता पाई है। यह क्रम ठीक तरह चलता रहता-पुरुष का शौर्य, अपनी प्रखरता से सम्पदायें उपार्जित करता और नारी अपनी मृदुलता से उसे सौम्य सहृदय बनाती रहती तो दोनों सही पहियों की गाड़ी से प्रगति की दिशा में सृष्टि अवस्था की यात्रा ठीक प्रकार सम्पन्न होती रहती। चिर-साल तक वहीं क्रम चला। उपार्जन नर ने किया और उपयोग नारी ने। अब वह क्रम नहीं रहा। अब उच्छृंखल नर हर क्षेत्र में सर्व सतत् सम्पन्न हुआ दैत्य, मानव की तरह निरंकुश सत्ता का उद्धत उपयोग कर रहा है। नारी तो मात्र भोग्या, रमणी, कामिनी बन कर विषय विकारों की तृप्ति के लिए साधन सामग्री मात्र रह गई है। उसके हाथ से वे सब अधिकार छीन लिये गये जो अनादिकाल से उसे सृष्टिकर्ता ने सौंपे थे।
वैयक्तिक पारिवारिक सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हर क्षेत्र में दिशा निर्धारण के सूत्र नारी के हाथ में रहने चाहिए। तभी उपलब्ध सम्पदाओं का सौम्य सदुपयोग सम्भव हो सकेगा। आज हर क्षेत्र में विकृतियों की विभीषिकाएं नग्न, कृत्य कर रही हैं इसके स्थूल कारण कुछ भी हो सूक्ष्म कारण यह है कि नारी का वर्चस्व नेतृत्व कहीं भी नहीं रहा, सर्वत्र नर को ही मनमानी घर जानी चल रही है। उसकी प्रकृति में जो कठोरता का भला या बुरा तत्व अधिक है उसी के द्वारा सब कुछ संचालित दीख पड़ता है। जल के अभाव में अग्नि-सर्वनाशी दावानल का विकराल रूप धारण कर लेती है इन दिनों नारी को उपेक्षित तिरस्कृत करने के उपरान्त जो विद्रूप अपनाया है उसका परिणाम व्यापक हाहाकार के रूप में सामने प्रस्तुत है।
स्थिति को बदलने और सुधारने के लिए भूल को फिर सुधारना होगा और वस्तु स्थिति उपलब्ध करने के लिये पीछे लौटना होगा। नारी का वर्चस्व पुनः स्थापित किया जाये और उसके हाथ में नेतृत्व सौंपा जाये यह समय की पुकार और परिस्थितियों का माँग है उसे पूरा करना ही होगा। नवयुग-निर्माण के लिए जन मानस में जिन कोमल भावनाओं का परिष्कार किया जाना है वह नारी सूत्रों से ही उद्भूत होगा। युद्ध, संघर्ष, कठोरता, चातुर्य, बुद्धि कौशल के चमत्कार देख लिये गये। उनने सम्पदाएँ तो कमाई पर उसकी एकाँकी उद्धत प्रकृति उसका सदुपयोग न कर सकी। स्नेह सौजन्य, सद्भाव सफलता का प्रतीक तो नारी है। उसी वर्चस्व मृदुलता का संचार कर सकने में समर्थ है। उसे उपेक्षित पड़ा रहने दिया जाये तो उपार्जन कितना भी-किसी देश में क्यों न होता रहे- सदुपयोग के अभाव में वह विश्वघातक ही सिद्ध होता रहेगा। सन्तुलन तभी रहेगा जब नारी को पुनः उसके पद पर प्रतिष्ठापित किया जाये और शक्ति के उन्मत्त हाथी पर स्नेह का अंकुश नियोजित किया जाये। भावनात्मक नवनिर्माण का यह अति महत्वपूर्ण सूत्र है। नारी का पिछड़ापन दूर किये बिना-उसे आगे लाये बिना-कोई गत नहीं। इस कदम को उठाये बिना हमारी धरती पर स्वर्ग अवतरण करने और मनुष्य में देवत्व का उद्भव करने के हमारे स्वप्न साकार न हो सकेंगे।
प्रतिबंधित नारी को स्वतन्त्रता के स्वाभाविक वातावरण में साँस ले सकने की स्थिति तक ले चलने में प्रधान बाधा उस रूढ़िवादी मान्यता की है जिसके अनुसार उसे या तो अछूत, बन्दी, अविश्वस्त घोषित कर दिया गया है या फिर उसे कामिनी की लाँछना से कलंकित कर दिया है इन मूढ मान्यताओं पर प्रहार किये बिना उनका उन्मूलन किये बिना यह सम्भव न हो सकेगा कि अन्ध परंपरा के खूनी शिकंजे ढीले किये जा सकें और नारी को कुछ कर सकने के लिए अपनी क्षमता का उपयोग कर सकना सम्भव हो सके। यह लेख माला इसी प्रयोजन के लिए लिखी जा रही है और यह प्रतिपादित किया जा रहा है कि नारी न तो कामिनी है-न अविश्वस्त न नरक में धकेलने वाली न बन्दी बना कर रखा जाने योग्य भूखी अथवा दासी। वह मनुष्य जाति की आधी इकाई है-और उसका व्यक्तित्व वर्चस्व नर के समान ही नहीं वरन् अधिक उपयोगी भी है। उसे सरल स्वाभाविक स्थिति में जीवन यापन करने की छूट दी जा सके तो विश्व की वर्तमान विषम परिस्थितियों में आश्चर्यजनक मोड़ लाया जा सकता है और अन्धकार से घिरा दीखने वाला मानव जाति का भविष्य आशा के आलोक से प्रकाशवान होता हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है।
सर्वसाधारण को यह समझना और समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार पुरुष पुरुष मिल कर कुछ कार करें या स्त्रियाँ स्त्रियाँ मिल कर सहयोग सान्निध्य जगावें तो व्यभिचार अनाचार की आशंका नहीं की जा सकती। उसी प्रकार नर और नारी मिलजुल कर रहें तो उसमें प्रकृतितः कोई जोखिम या कुकल्पना की ऐसी आशंका नहीं है जिससे भयभीत होकर आधे मनुष्य समाज पर नारी पर अवाँछनीय प्रतिबंध आरोपित किये जायें। नर नारी का प्राकृतिक मिलना कितना उपयोगी आवश्यक एवं उल्लासपूर्ण है इसका परिचय हम भरे-पूरे परिवार में-जिसमें सभी वर्ग के नर-नारी अति पवित्रता के साथ रहते है-आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। घर परिवार में पति-पत्नी के जोड़ों के अतिरिक्त कौन किसे कुदृष्टि से देखता है या कुचेष्टा करता है। यह स्थिति विश्व परिवार में भी लाई जा सकती है और सर्वत्र नर-नारी समान रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए स्नेह सद्भाव का संवर्धन करते हुए आत्मिक और भौतिक विकास में परस्पर अति महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यह स्थिति लाई ही जानी चाहिए-बुलाई ही जानी चाहिए।
अवरोध केवल गर्हित दृष्टिकोण ने प्रस्तुत किया है। इसके लिए अधिक दोषी कलाकार वर्ग है जिसने समाज के सोचने की दिशा ही अति भ्रमित करके रखदी। नारी को रमणी कामिनी और वेश्या के रूप में प्रस्तुत करने की कुचेष्टा में जब कला के सारे साधन झोंक दिये गये तो जन मानस विकृत क्यों न होता ? चित्रकार जब उसके मर्मस्थलों को निर्लज्ज निर्वसन बनाने के लिए दुशासन की तरह अड़े बैठे है, कवि जब वासना भड़काने वाले ही छन्द लिखें, गायक जब नख शिख का उत्तेजक उभार और लम्पटता के हाव-भावों भरे क्रिया-कलापों को अलापें-साहित्यकार कुत्सा ही कुत्सा सृजन करते चले जायें-और प्रेस तथा फिल्म जैसे वैज्ञानिक माध्यमों से उन दुष्प्रवृत्तियों को उभारने में पूरा-पूरा योगदान मिले तो जनमानस को विकृत और भ्रमित कर देना क्या कुछ कठिन हो सकता है ? हमें इस विकृति के मूल स्त्रोत कला के अनाचार को रोकना बदलना होगा। स्नेह और सद्भाव की- देवी सरस्वती के साथ किया जाने वाला यह बर्बर व्यवहार यदि उल्टा जा सकता हो तो लोक मानस में नारी के प्रति स्वाभाविक सौजन्य फिर पुनः जीवित किया जा सकता है।
रूढ़िवादियों से कहा जाये कि वे दिन में आँखें मल कर न बैठे रहें। विवेक का युग उभरता चला आ रहा है। औचित्य की प्रतिष्ठा करने के लिए बुद्धिवाद की प्रखरता प्रातःकालीन ऊषा की तरह उदय होती चली आ रही है। उसे रोका न जा सकेगा। कथा पुराणों की दुहाई देकर-प्रथा परम्परा का पल्ला पकड़ कर-अब देर तक वे प्रतिबन्ध जीवित न रखे जा सकेंगे जो नारी को व्यभिचारिणी और अविश्वस्त समझ कर उसे अगणित बन्धनों में जकड़े हुए है। विवेक और न्याय की आत्मा तड़प रही है, वह इस बात के लिए मचल पड़ी है कि नारी के साथ बरती जाने वाली बर्बरता का अन्त किया जाये। से वह सब होकर रहेगा। उसे कोई भी अवरोध देर तक रोक न सकेगा। अगले दिनों निश्चित रूप से नर और नारी परस्पर सहयोगी बनकर स्नेह सद्भाव के साथ स्वाभाविक जीवन जियेंगे और एक दूसरे को आशंका या यौन आकर्षण की दृष्टि से न देख कर पुण्य सौजन्य के आधार पर निर्माण और निर्वाह के क्षेत्रों में प्रगतिशील कदम बढ़ाते चलेंगे। रूढ़िवाद के लिए उचित यही है कि समय रहते बदले अन्यथा समय उनकी अवज्ञा ही नहीं दुर्गति भी करेगा। उदीयमान सूर्य रुकेगा नहीं, उल्लू, चमगादड़ और वनविलाव ही चाहे तो मुँह छिपा कर किसी कोने में विश्राम करने के लिए अवकाश प्राप्त कर सकते हैं।
इसी प्रकार तथाकथित सन्त महात्माओं को कहा जाना चाहिए कि वे अपने मन की संकीर्णता, क्षुद्रता और लुषिता से डरे उसे ही भवबन्धन मानें। नरक की खान ही है। नारी को उस लाँछना से लाँछित कर उस मानव जाति की भर्त्सना न करें जिसके पेट से वे स्वयं पैदा हुए है और जिसका दूध पीकर इतने बड़े हुए है। अच्छा हो हमारी जीभ पुत्री को न कोसे-भगिनी को लाँछित न करें- नारी नरक की खान हो सकती है यह कुकल्पना अध्यात्म के किसी आदर्श या सिद्धान्त से तालमेल न खाती। यदि बात वैसी ही होती तो अपने इष्टदेव राम, कृष्ण, शिव आदि नारी को पास न आने देते। ऋषि आश्रमों में ऋषिकाएं रहती। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि देवियों का मुख देखने से पाप लग गया होता। निरर्थक की डींगे न हाँके तो ही अच्छा है। अन्तरात्मा प्रज्ञा, भक्ति साधना, मुक्ति बुद्धि यह सभी स्त्रीलिंग है। यदि नारी नरक की खान है और स्त्री लिंग, इस शब्दों के साथ जुड़ी हुई विभूतियों को बहिष्कृत किया जाना चाहिए। अच्छा है अध्यात्मवाद के नाम पर भौंड़ा भ्रम जंजाल अपने और दूसरों को दिग्भ्रान्ति करने की अपेक्षा उसे समेट कर अजायब घर की कोठरी में बन्द कर दिया जाये।
सर्वसाधारण को इस तथ्य से परिचित कराया जाना ही चाहिए कि नर-नारी को सघन सहयोग यदि पवित्र पृष्ठभूमि पर विकसित किया जाये तो उससे किसी को कुछ भी हानि पहुँचने वाली नहीं है वरन् सब का सब प्रकार लाभ ही होगा। नारी कोई बिजली या आग नहीं है जिसे छूते ही या देखते ही कोई अनर्थ हो जाये। उसे अलग-अलग रखने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को मनुष्य के अधिकार मिलने चाहिए। विश्व में राजनैतिक स्वतन्त्रता की माँग पिछले दिनों बहुत प्रबल होती चली आई है और उसने परम्परागत ताज, तख्तों की जड़ मूल से उखाड़ कर फेंक दी। यह प्रवाह परिवर्तन राजनीतिक तक ही सीमित न रहेगा। मनुष्य के समान स्वाधीनता दिला कर ही वह गति रुकेगी। गुलाम प्रथा का अन्त हो गया अब दास-दासी खरीदे व बेचे नहीं जाते वर्ग भेद और रंग-भेद के नाम पर बरती जाने वाली असमानता के विरुद्ध आरम्भ हुआ विद्रोह प्रबल से प्रबलतर होता चला जा रहा है और दिन दूर नहीं जब कि मानवीय सम्मान और अधिकार से वंचित कोई व्यक्ति कहीं न रहेगा। जन्म-जाति, वंश, वर्ण, रंग आदि के नाम पर बरती जाने वाली असमानता अब देर तक जिन्दा रहने वाली नहीं है। वह अपनी मौत के दिन गिन रही है। इसी संदर्भ से यह भी गिरह बाँध लेनी चाहिए कि नर ओर नारी के बीच बरता जाने वाला भेद भाव भी उसी अन्याय की परिधि में आता है। नारी को पराधीनता मनुष्य के आधे भाग की आधी जनसंख्या की पराधीनता है। यह कैसे संभव है वह आगे भी आज की ही तरह बनी रहे। स्वतन्त्रता का प्रवाह नारी को भी इन अनीति मूलक बन्धनों से मुक्ति दिला कर रहेगा। दिन दूर नहीं कि गाड़ी के दो पहियों की तरह-शरीर की दो भुजाओं की तरह नर-नारी सौम्य सहयोग करते दिखाई पड़ेंगे। समय का प्रवाह आज नहीं तो कल इस स्थिति को उत्पन्न करके रहेगा। अच्छा हो वक्त रहते हम बदल जायें तो अमिट भावनाओं से लड़ मरने की अपेक्षा उसके लिये रास्ता खुला छोड़ दे अच्छा तो यह है कि न्याय और विवेक की दिव्य किरणों के साथ उदय होने वाली इस ऊषा की अभ्यर्थना-करके अपनी सद्भाव सम्पन्नता का परिचय देने के लिए आगे बढ़ चलें।
नव निर्माण की प्रक्रिया इस दिशा में अधिक उत्सुक इसलिए है कि भावी विश्व का समग्र नेतृत्व नारी को ही सौंपा जाने वाला है। राज सत्ता का उपयोग पिछले दिनों आक्रमण, आतंक, शोषण और युद्ध लिप्सा के लिए होता रहा है पुरुष के नेतृत्व के दुष्परिणाम इतिहास का पन्ना-पन्ना बता हरा है। अब राज सत्ता नारी के हाथ सौंपी जायेगी ताकि वह अपनी करुणा और मृदुलता के अनुरूप राज सत्ता के अंचल में कराहती हुई मानवता के आँसू पोंछ सके। शिक्षा से लेकर न्याय तक-वाणिज्य से लेकर धर्म धारण तक हर क्षेत्र का नेतृत्व जब नारी करेगी तब सचमुच दुनिया तेजी से बदलती चली जायेगी। कला के सारे सूत्र जब नारी के हाथ सौंप दिये जायेंगे तब उस देव मंच से केवल शालीनता की दिव्य धाराएं ही प्रवाहित होंगी और उस पुण्य जाह्नवी में स्नान करके जन मानस अपने समस्त कषाय कल्मष धोकर निर्मल निष्पाप होता दिखाई देगा।
नर का नेतृत्व मुद्दतों से चला आ रहा है उसकी करतूत करामात भली प्रकार देखी परखी जा चुकी। अच्छा है वह सम्मान पीछे हट जाये और पेन्शन लेकर कम से कम नेतृत्व की लालसा से विदा हो ही जाये। करने के लिये बहुत काम पड़े है। पुरुष को उनसे रोकता कौन है ? बात केवल नेतृत्व की है। बदलाव का तकाजा है कि ग्रीष्म का आतप बहुत दिन तप लिया और वर्षा की शाँति और शीतलता की फुहारें झरनी चाहिए। सर्वनाश की किस विषम विभीषिका में मनुष्य जाति फंसी पड़ी है उससे परित्राण नेतृत्व बदले बिना सम्भव नहीं। नारी की करुणा उसे सशक्त और समर्थ बनाने के लिए वह सब बौद्धिक प्रक्रिया संजीव करनी पड़ेगी जो इस लेख माला के अंतर्गत प्रस्तुत की जा रही है।
नर नारी के सम्मिलन से खतरा केवल एक ही है कि यह वर्तमान विकृत वासना का ताण्डव रोका नहीं गया तो पाश्चात्य देशों की तरह स्वच्छंदता के वातावरण में बढ़ चला यौन अनाचार बिखर पड़ेगा और वह भी कम विघातक न होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जहाँ नारी स्वातंत्र्य के लिए हमें प्रयत्न करना है वहाँ यह चेष्टा भी करनी है कि कामुकता की ओर बहती हुई मनोवृत्तियों को परिष्कृत करने में कुछ उठा न रखा जाये। नारी का सौम्य और स्वाभाविक चित्रण इस संदर्भ में अति महान है। कला के विद्रूप को कोसने से काम न चलेगा, उसे गन्दे हाथों से छीन लेना शासन सत्ता के लिए तो सम्भव है पर हम लोग जन स्तर पर इस प्रजातन्त्र पऋति के रहते कुछ बहुत बड़ा प्रतिरोध नहीं कर सकते हम यही कर सकते हैं कि दूसरा कला मंच खड़ा करें और उसके माध्यम से नारी की पवित्रता प्रतिपादित करते हुए लोक मानस की यह मान्यता बनायें कि नारी वासना के लिए पवित्रता का पुण्य स्फुरण करने के लिए है। कला मंच यह सब आसानी से कर सकता है। साहित्य का सृजन इसी दिशा में हो, कविताएं ऐसी ही लिखी जायें, चित्र इसी प्रयोजन के लिए बनें, गायक यही गायें, प्रेस यही छापे, फिल्म यही बनायें तो कोई कारण नहीं कि नारी का स्वाभाविक एवं सरल सौम्य स्वरूप पुनः जन मानस में प्रतिष्ठापित न किया जा सके ऐसी दशा में वह जोखिम न रहेगा जिसे पाश्चात्य लोग भुगत रहे है। उनने नारी स्वतंत्रता तो प्रस्तुत की पर विकारोन्मूलन के लिए कुछ करना तो दूर उलटे उसे भड़काने में लग गये और दुष्परिणाम भुगत रहे है। हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए। हम दृष्टिकोण के परिष्कार के प्रयत्नों को भी नारी स्वतंत्रता आँदोलन के साथ मोड़कर रखे तो निश्चय ही वैसी आशंका न रहेगी जिससे विकृतियों के भड़क पड़ने का विद्रूप उठकर खड़ा हो जाये।
साथ ही हमें आध्यात्मिक काम विज्ञान के उन तथ्यों को सामने लाना होगा जिनके आधार पर यौन सम्बन्ध की-काम क्रीड़ा की उपयोगिता और विभीषिका को समझा जा सके और उसके दुरुपयोग के खतरे से बचने एवं सदुपयोग से लाभान्वित होने के बारे में समुचित ज्ञान सर्वसाधारण को मिल सके। अगले अंक में इसी संदर्भ में कुछ अधिक लिखेंगे।
हमारे जाने के दिन अब अति निकट आ गये। अगले अति महत्वपूर्ण कार्य पूरे करने के लिए हमें जाना पड़ रहा है। आत्म विद्या के शक्ति पक्ष की धाराएं इन दिनों एक प्रकार से सूख ही गई है। न तो ऐसे व्यक्तित्व दिखाई पड़ते हैं जो अपने ब्रह्म वर्चस्व से विपन्न परिस्थितियों से टक्कर ले सकें और न ऐसे आधार उपलब्ध हैं जो आत्मिक क्षमता को आशाजनक रीति से अग्रगामी कर सकें। आत्मविद्या के नाम पर कथा-प्रवचनों तक सीमित दर्जे का कथोपकथन ही जहाँ तहाँ देखने सुनने को मिलता है। ओछे व्यक्तित्वों का ऊँचा प्रवचन अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता वह केवल मनोरंजन मात्र रह जाता है। आज आत्मिक चर्चा, मात्र कौतूहल की ही पूर्ति करती है। उस क्षेत्र में ब्रह्म वर्चस्व सम्पन्न व्यक्तित्व कहाँ उभर रहें है यदि उभरे होते तो महामानवों को-अपने प्रभाव से लोक मानस बदलने से लेकर-परिस्थितियाँ पलटने तक का कार्य उतना कठिन न रहता जितना आज दिखाई पड़ रहा है।
आत्म विद्या का आरम्भिक पक्ष ज्ञान चर्चा है। उच्च स्तरीय पक्ष शक्ति सम्पादन है। साधना से जो शक्ति उत्पन्न होनी चाहिए आज उसका सर्वथा अभाव ही दीखता है लगता है वे रहस्य लुप्त हो गये। यदि होते तो सामर्थ्य सम्पन्न ऐसे आत्मवेत्ता जरूर मिलते जो मानव समाज के अन्धकार में उलझे हुए भविष्य को उज्ज्वल बनाने में-विषम परिस्थितियों को सरल बनाने में कुछ आशाजनक योगदान दे सकें। राजनैतिक क्षेत्रों में कुछ तो उलटा-पुलटा हो रहा है पर आध्यात्मिक क्षेत्र में शून्यता छाई हुई है। दम्भ और प्रवंचना का ही बोल बाला है। आत्म-बल की सामर्थ्य जो संसार की समस्त सामर्थ्यों से बढ़-चढ़ कर मानी जाती रही है यदि हमारे पास होती तो व्यक्ति और समाज को वर्तमान दुर्दशा से निकालने में उसका प्रयोग अवश्य सम्भव हो सका होता। चमत्कारों के नाम पर आज जहाँ तहाँ कुछ बाजीगरी दीखती है उससे अपने को सिद्ध पुरुष साबित करने और लोगों की मनोकामना पूर्ण करने का पाखण्ड मात्र ही खोजा जा सकता है। बेवकूफों को बदमाश कैसे ठगते और उलझाते हैं इसका ज्वलन्त उदाहरण देखना है तो आज के तथाकथित करामाती और चमत्कारी कह जाने वाले ढोंगियों की करतूतों को नंगा करके आसानी से देखा जा सकता है। वास्तविक सिद्ध पुरुष न करामात, चमत्कार दिखाते हैं और न हर उचित अनुचित मनोकामना को पूरा करने के आश्वासन देते हैं। असली आत्मवेत्ता अपने आदर्श प्रस्तुत करके अनुकरण का प्रकाश उत्पन्न करते हैं और अपनी प्रबल मनस्विता द्वारा जन-जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न करके व्यापक विकृतियों का उन्मूलन करने की देवदूतों वाली परम्परा को प्रखर बनाते हैं। इस स्तर के आत्मवेत्ता यदि संसार में रहे होते तो बुद्ध, दयानन्द, गाँधी जैसी युगान्तरकारी हस्तियाँ अवश्य सामने आती। अध्यात्म क्षेत्र के वर्तमान कलेवर को यदि उखाड़ कर देखा जाये तो वहाँ दम्भ और शून्य के अतिरिक्त और कुछ मिलने वाला नहीं। जो है वह और भी ज्यादा दिग्भ्राँत है। आत्म विद्या की जितनी शून्यता और दुर्दशा आज है वैसी पहले कभी भी नहीं रही।
इस अभाव की पूर्ति करने के लिए- विश्व की सर्वोच्च एवं सर्व समर्थ शक्ति आत्म विद्या सिद्ध करने के लिए हमें कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त करनी होंगी यह अन्वेषण प्रयोग और लाभ अनायास ही नहीं मिलने वाला है इसके लिए कठोरतम प्रयत्न करने पड़ेंगे। हम वही करने जा रहे है। इस दृष्टि से हमारी भावी गतिविधियाँ उत्साह वर्धक ही होंगी। जाने के वियोग का दुःख स्वजनों को है-हमें भी है- पर बड़े के लिए छोटे का त्याग करना ही पड़ता है। वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए बीज को गलना ही पड़ता है। हमें भी उस क्रम से छुटकारा नहीं मिल सकता था, सो मिला भी नहीं। आत्म विद्या के तत्व ज्ञान और शक्ति विज्ञान को आज के युग और आज के व्यक्ति के लिए किस प्रकार का किस हद तक- व्यावहारिक बनाया जा सकता है और आज की विकृत परिस्थितियाँ बदलने में उसे किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है यह सीखना, खोजना, प्रयोग करना और सर्व साधारण के सामने बुद्धि संगत एवं व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत कर सकने की स्थिति प्राप्त कर लेना सचमुच एक बहुत बड़ा काम है। इस काम को हम सफलता पूर्वक कर लेते हैं तो उसके ऊपर हमारे भावी जीवन की कष्ट साध्य प्रक्रिया प्रताड़ना और स्वजनों की वियोग वेदना को निछावर किया जा सकता है। हमें यही करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है से हम निर्धारित व्यवस्था को पूरा करने जा भी रहे हैं। 20 जून के अब दिन ही कितने रह गये। विश्वास किया जाना चाहिए कि हम दूसरे बाबा वैरागियों की तरह कर्मण्यता के दिन नहीं काटेंगे-विश्व मानव के प्रति अपनी श्रद्धा को उपेक्षा में नहीं बदलेंगे-स्वर्ग मुक्ति और ऋद्धि सिद्धि के व्यक्तिगत स्वार्थ से हमारा मन राई भर भी नहीं फिसलेगा-जब तक हमारी अन्तिम साँस चलेगी विश्व मान की सेवा से मुंह नहीं मोड़ेंगे। यदि हमें लगता कि हमारी इस भावी उग्र तपश्चर्या का प्रतिफल लोक मंगल के लिए वर्तमान गति विधियों की अपेक्षा हलका पड़ेगा तो शायद अपने मार्ग दर्शक से यह फैसला बदले का अनुरोध भी करते। पर बात वैसी है नहीं। हम निष्क्रिय दीखेंगे पर वस्तुतः आज की अपेक्षा लाख गुने अधिक सक्रिय होंगे। भागीरथ जैसा तप करके गंगावतरण की सामयिक पुनरावृत्ति करना ही हमारा मात्र प्रयोजन है सो आँखों में वियोग के आँसू रहने पर भी हमारा अन्तरंग टूटा नहीं है वरन् आशा और उल्लास ही भरा हुआ है।
हमारा प्रयोजन समझने में किसी को भूल नहीं करनी चाहिए। हम प्रचण्ड आत्म शक्ति की एक ऐसी गंगा को लाने जा रहे हैं जिससे अभिशप्त सगर सुतों की तरह आग में जलते और नरक में बिलखते जन समाज को आशा और उल्लास का लाभ दे सकें। हम लोक मानस को बदलना चाहते हैं। इन दिनों हर व्यक्ति का मन ऐषणाओं से भरपूर है। लोग अपने व्यक्तिगत वैभव और वर्चस्व से-तृष्णा और वासना से-एक कदम आगे की बात नहीं सोचना चाहते, उनका पूरा मनोयोग इसी केन्द्र बिन्दु पर उलझा पड़ा है हमारी चेष्टा है कि लोग जीने भर के लिए सुख सुविधा पाकर सन्तुष्ट रहें। उपार्जन हजार हाथों से करें पर उसका लाभ अपने और अपने बेटे से सीमित न रख कर समस्त समाज को वितरण करें। व्यक्ति की विभूतियों का लाभ उसके शरीर और परिवार तक ही सीमित न रहे वरन् उसका बड़ा अंश देश-धर्म, समाज और संस्कृति को-विश्व मानव को-लोक मंगल को मिले। इसके लिए व्यक्ति के वर्तमान कलुषित अन्तरंग को बदलना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तिवाद के असुर को समूहवाद के देवत्व में परिणत न किया गया तो सर्वनाश के गर्त में गिरकर मानवीय सभ्यता को आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ेगा। इस विभीषिका को रोकने के लिए हम अग्रिम मोर्चे पर लड़ने जा रहे है। स्वार्थपरता और संकीर्णता की अन्ध तमिस्रा असुरता में पैर से लेकर नाक तक डूबे हुए जन मानस को उबारने और सुधारने में हम अधिक तत्परता और सफलता के साथ कुछ कहने लायक कार्य कर सकें हमारी भावी तपश्चर्या का प्रधान प्रयोजन यही है। आत्म विद्या की महत्ता को भौतिक विज्ञान की तुलना में अधिक उपयोगी और अधिक समर्थ सिद्ध करने में ही उस उपेक्षित क्षेत्र के प्रति लोक रुचि मुड़ेगी सो उसे प्रामाणिकता की हर कसौटी पर-खरी सिद्ध कर सकने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त करने हम जा रहे है। हमारा भावी जीवन इन्हीं क्रिया कलापों में लगेगा। सो परिवार के किसी स्वजन को हमारे इस महा प्रयाण के पीछे आशंका या निराशाजनक बात नहीं सोचनी चाहिए।
जिन परिजनों को हम अब तक आगे बढ़ाते और प्यार करते रहे है उन्हें उस क्रम में रत्ती भर भी न्यूनता अनुभव न होने देंगे। शरीर के प्रत्यक्ष दर्शन न हो सकने और कानों से प्रत्यक्ष हमारी बात न सुन सकने के अतिरिक्त और किसी की कुछ हानि न होने देंगे। हमारे प्यार और अनुदान की गंगा यमुना के प्रवाह में राई भर भी कमी आने वाली नहीं, स्वजन हमें भले ही देख न सकें पर हम उन्हें जरूर देखते रहेंगे। हम अपने पुण्य और तप का एक अंश लोगों की कठिनाइयाँ सरल बनाने में लगाते रहें हैं और उस सहृदयता को हम खोने नहीं जा रहे है वरन् और भी समर्थ बनाते चले जायेंगे। माताजी हरिद्वार रहेंगी वे हमारे प्रतिनिधि के रूप में यह कार्य भली प्रकार करती रहेंगी। अब तक यदि हमारे दरवाजे पर 20 प्रतिशत व्यक्ति निराश और खाली हाथ लौटे हैं तो अब 5 प्रतिशत ही लौटेंगे। दुःखी और कष्ट पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और सेवा का जो क्रम चलता आ रहा है उसके प्रति हमारा असाधारण मोह है उससे हमें सन्तोष भी बहुत मिला है सो उसे बन्द या शिथिल करना हमसे बन भी नहीं पड़ेगा इस प्रकार के जिन्हें लाभ मिलते रहे है या मिलने की आशा है उन्हें निराश तनिक भी नहीं होना चाहिये वरन् अपनी आँखों में अधिक चमक इसलिये पैदा कर लेनी चाहिए कि माता-पिता की कमाई और समर्थता बढ़ने पर जिस तरह बच्चों को अनायास ही लाभ मिलता है उस तरह का लाभ अपने परिवार को मिलता ही रहता है। शरीर देखने ओर कान से आवाज सुनने की बात न भी बन पड़े तो भी नई उपलब्धियाँ इतनी अधिक होंगी कि उनकी तुलना में इन दो लाभों का छिन जाना किसी को बहुत अधिक नहीं अखरना चाहिए। यह व्यक्तिगत लाभ अनुदान की बात हुई-समस्त समाज को हमारी इस तप साधना का जो लाभ मिलने वाला है वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक होगा और समय की एक भारी आवश्यकता उससे पूरी हो सकनी सम्भव होगी। समय ही बतायेगा कि हमारा भावी जीवन विश्व मंगल की दृष्टि से कितना उपयोगी सिद्ध हुआ और ढलती एवं निरर्थक समझे जाने वाले बुढ़ापे की आयु का भी कितना महत्वपूर्ण सदुपयोग सम्भव हो गया।
विदाई की घड़ियों में हमारा जी बहुत प्यार दुलार से भरा हुआ है, इन दिनों हमारी मनः स्थिति कुछ विचित्र और विलक्षण हो गई है जैसी जीवन भर कभी नहीं रही। कर्त्तव्य को प्रधानता ही हम देते रहे हैं और उसी दृष्टि से सम्बन्धित व्यक्तियों की न्यूनाधिक महत्व देते रहे है। जो लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सके उन पर हमारा ज्यादा ध्यान केन्द्रित रहा। जो अपनेपन में ही खोये रहे उनको दया का पात्र भर समझा और जो बन पड़ा सहायता करके भुला दिया। यहीं ढर्रा जीवन भर चलता रहा। एक भूल निरन्तर होती रही कि जो विषम परिस्थितियों में जकड़े हुए थे, जिनकी योग्यता स्वल्प थी, वे अपना जीवनयापन और कुटुम्ब का पोषण भी ठीक तरह कर सकने में असमर्थ थे, वे लोक-मंगल के लिए अपनी परिस्थिति, मनोभूमि और समर्थता के अभाव में कुछ कर नहीं सकते थे। अभावों से जर्जर स्थिति उन्हें हर बार हमारी सहायता के लिए ही उन्मुख करती थी। कष्ट की निवृत्ति में जहाँ से भी सहारा मिले वहाँ पहुँचना और समर्थ का द्वार खटखटाना मनुष्य का स्वभाव है, सो वे प्रत्यक्षतः इसी प्रयोजन के लिए आये हैं ऐसा दीखा। पर बहुत बार यह भूल होती रही कि उनके मन में जो असामान्य स्नेह, ममता और आत्मीयता के भाव हमारे प्रति थे उनकी गहराई में न उतर सके। प्रत्यक्षतः सहायता की याचना करने के कारण उन्हें हलका समझ लिया और परोक्षतः उनकी ममता और श्रद्धा की जो कली खिल रही थी उसे देख न सके। अब नजर डालते हैं तो यह भूल शूल की तरह चुभती है। भाव भरे स्नेही की उपेक्षा कानूनी अपराध भले ही न हो पर आत्मिक दृष्टि से वह भी हलका पाप नहीं है। बात तब सूझी जब समय निकल गया। व्यक्ति कितना ही समझदार क्यों न हो भूलें उससे भी होती रहती है यह तथ्य हमारे ऊपर कितना अधिक स्पष्ट होता है। नया जीवन जीना पड़ता तो शायद यह भूल न करते पर अब तो समय निकल गया। हाथ मलना ही शेष है। सो जिन किन्हीं के प्रति हम यह भूल करते रहे है, उनकी विवशता को स्वार्थ-परता समझ कर उपेक्षा करते रहे हो, जिनके भी स्नेह और सौजन्य को नगण्य मानते रहे हों- लोक-मंगल के लिए कुछ न कर सकने या कम करने - के कारण जिन पर झल्लाते रहे हों उन पिण्डदान और तर्पण के श्रेष्ठतम आधार माने जा सकते हैं। हमारी आत्मा जहाँ कही भी स्वजनों को यह धर्मकृत्य करते देखेगी-सन्तोष और आनन्द अनुभव करेगी। इस क्रिया-कलाप में संलग्न भावनाशील परिजनों को हमारा स्नेह, आशीर्वाद, संरक्षण, सहयोग और सान्निध्य अपने चारों ओर बिखरा दिखाई देगा। सुविकसित पुष्पों पर उड़ने वाले भौरों की तरह ऐसे दूरदर्शी दौर सेवाभावी परिजनों के इर्द-गिर्द हम मंडराते ही रहेंगे और उन्हें अपना भाव भरा गुंजन अति उत्साह पूर्वक निरन्तर सुनाते रहेंगे। मिशन के अगले कदम रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों से भरे हुए हैं। अवांछनीयता के विरुद्ध एक अति उग्र और अति व्यापक संघर्ष छेड़ना पड़ेगा। विचारों को विचारों से काटने की एक घमासान लड़ाई अगले दिनों होकर रहेगी। अनुचित और अन्याय का उन्मूलन किया जाना है इसके लिये घर-घर और गली-गली में जो भावी महाभारत लड़ा जायेगा उसकी रूपरेखा विस्तारपूर्वक बता चुके है, यह विश्व का अन्तिम युद्ध होगा इसके बाद युद्ध का वर्तमान वीभत्स स्वरूप सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। अनुचित के उन्मूलन के साथ-साथ सृजन के लिए अनेक रचनात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित की जाती हैं। नींव खोदना ही काफी नहीं - महल की दीवार भी तो चुननी पड़ेगी। ध्वंस के साथ सृजन और आपरेशन के साथ मरहम पट्टी और सिलाई, सफाई का प्रबंध अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। सो समयानुसार वे कथायें भी जल्दी ही सामने आने वाली हैं। ज्ञान-यज्ञ की आग में पका पकाकर इन दिनों उस सृजन के लिए ईंट चूने के भट्टे लगाये जा रहे हैं। इसमें जैसे ही प्रखरता आई कि दूसरे मोर्चे खड़े हुए। अज्ञान, अभाव और अशक्ति के तीनों मोर्चों पर अपनी सेना कमान संभालेगी। बौद्धिक क्रान्ति अकेली नहीं है। उसके साथ-साथ नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति अविच्छिन्न रूप से सम्बन्ध है। राजनैतिक स्वाधीनता के लिये लड़ा गया संग्राम जितनी जन-शक्ति और साधनों से लड़ा गया, अपना मोर्चा बहुत बड़ा कम से कम तिगुना होने के कारण उसके लिए जन शक्ति, श्रम शक्ति, भाव शक्ति और धन शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी। ज्ञान यज्ञ के विस्तार से ही यह उपलब्धियाँ हाथ लगेंगी इसलिए इसी आरम्भिक चरण पर इन दिनाँक अधिक जोर दिया जा रहा है। सीमित इतने तक नहीं रह सकते। हाथ पाँवों में जरा सी गर्मी आते ही मंजिल की ओर अधिक तत्परता पूर्वक कदम उठने स्वयं ही शुरू हो जायेंगे और वे तब तक बढ़ते ही रहेंगे जब तक मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता। हम इस सारे चक्र व्यूह का संचालन पर्दे के पीछे बैठकर करेंगे। हमारा प्रयाण नव निर्माण के पथ पर चलने वाले किसी दृश्य व्यक्तियों से अधिक समर्थ बनकर-अधिक साहस और अधिक क्षमता के साथ अधिक योगदान अधिक मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ होंगे। सोये हुए काम को अधूरा छोड़कर हम कन्धा डालने वाले नहीं है। हमारी सत्ता दृश्य रहे या अदृश्य-लोक में रहे या परलोक में-इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। प्रश्न केवल मिशन की प्रगति में योगदान करने का है सो हम किसी भी स्थिति में रहते हुए निरन्तर करते रहेंगे। साथी सहचरों को अकेला छोड़कर चल देना हमारे लिये उचित नहीं होता। सो हम कुछ अनुचित करने भी नहीं जा रहे हैं। मथुरा में संगठन और आन्दोलन का संचालक होगा। हरिद्वार से प्रकाश, स्नेह और अनुदान का वितरण होता रहेगा और हम शीत और गर्मी की तरह अधिक व्यापक बनकर अदृश्य पर दृश्य से अधिक समर्थ बनकर हर स्वजन को स्पर्श और प्रभावित करते रहेंगे। चले जाने के बाद तीन स्थानों में तीन शक्तियाँ तीन गुना काम करेंगी और अपनी त्रिविध क्रिया-पद्धति दिन-दिन अधिक समर्थ और अधिक गतिशील होती चली जायेगी। किसी को भी निराशा की बात नहीं सोचनी चाहिए। निराशा, असफलता और अन्धकार की बात सोचना-हमारे-हमारे मार्ग दर्शक और भगवान के ऊपर अविश्वास करने के बराबर होगा जिनने इस महा अभियान को सफल बनाने में अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर लगा दिया है।
इतना सब होते हुए भी विदाई आखिर विदाई ही है। मनुष्य कितना ही विवेकी क्यों न हो आखिर कच्चा दूध पीकर ही पला है और कच्ची मिट्टी से ही बना है। हम न सन्त है, न स्थिति प्रज्ञ, न अवधूत, न परमहंस। मात्र भाव भरे-अन्तःकरण को लाद ले चलने वाले तुच्छ से मानव प्राणी मात्र है। विद्या, तप, सेवा आदि से हमारा मूल्याँकन ही किया जाना चाहिए। कोई हमें सही रूप से जानना चाहें तो हमें भावनाओं का निर्झर कहना पर्याप्त होगा। ............ हमने बखेरा और बटोरा है। स्नेह के सौदागर के रूप में हमें समझा जाये तो ठीक है। भले ही अपनी सहज प्रवृत्ति के अनुसार बिना किसी लोभ या लाभ को बीच में ..... विश्व मानव को प्यार किया हो पर इससे क्या - हजार गुना होकर वह लौट तो अपने ही पास आया। जिन्हें हमने दुलारा उन्होंने भी अपनी ममता अर्पित करने में ... बाँटने की उमंग उठती रही और जब उसका प्रतिदान हजार गुना होकर लौटा तो उत्साह और भी अधिक बढ़ गया। इस तरह जीवन के लगभग सो ही क्षण एक प्रेम योगी के रूप में व्यतीत हो गये। भले ही उसे भावुकता कहा जाये पर वह प्रवृत्ति अब इतनी सघन हो चुकी है कि उसे छोड़ सकना कम से कम इस शरीर में इस जन्म में तो सम्भव है ही नहीं। मजबूरी तो आखिर मजबूरी ही होगी। अपने आप में हमने बहुत सुधार परिवर्तन किये हैं पर इस भावुकता को यदि लोग दुर्बलता मानते हों-बअ .............. परमहंस स्थिति का व्यवधान मानते हो तो भी वह इतनी सरस है कि हमसे छोड़ते न बनेगी। हम बिना ब्रह्म ज्ञानी बने, एक नगण्य मनुष्य के रूप में सन्तोष पूर्वक जी लेंगे पर अन्तरंग की भाव भरी यह प्रवृत्ति छूट न सकेगी।
यह भाव भरी अन्तरंग मनःस्थिति विदाई के क्षणों इस बार फिर मचल पड़ी। यों शिविरों और यज्ञों में इसी वर्ष अपने अधिकाँश स्वजनों को देख चुके हैं और उनसे स्पष्ट परामर्श कर चुके है पर मन न जाने किस मिट्टी का बना है जो भरता ही नहीं विदाई की घड़ी जैसे जैसे समीप आती है वैसे वैसे भीतर ही भीतर कोई फिर कोंचने काटने ............. मचलने लगा है कि एक बार अपने परिवार को फिर आँख भर कर, जी भर कर देख लिया जाये। सो उसका ताना-बाना बुनना शुरू भी हो गया। हम 20 जून को .............. छोड़ देंगे। माताजी भी साथ ही चल पड़ेगी। इससे 17, 18, 19, 20 का एक स्नेह समारोह रखा है। ............... की शाम तक आने के लिए कहा गया है ताकि 17 को सम्मेलन आरम्भ हो सके। इन दिनों कोई बड़ा यज्ञ नहीं रखा है। एक छोटा प्रतीक यज्ञ ही उस भूमि पर पर्याप्त रहेगा। अपने जीवन समुद्र का मंथन करने पर जो रत्न हमने पाये हैं उन्हें दिखाने या देने का प्रयत्न इन्हीं दिनाँक करेंगे। भविष्य में हम स्वजनों के लिये क्या करेंगे और परिजन हमारे लिए क्या करें इसकी भी एक रूपरेखा प्रस्तुत करेंगे। जिस स्नेह सूत्र में अपने परिवार को हम कितने ही जन्मों से बाँधे हुए है जिस माला में अनेक जागृत आत्माओं को पिरोये हुए हैं उसकी शोभा सार्थकता घटने की अपेक्षा बढ़ती ही चली जाये इसका उपाय सोचेंगे। और भी न जाने क्या करेंगे इस समय कहना समय से पहले की बात होगी पर कुछ करेंगे जरूर ऐसा जो अद्भुत हो और असाधारण। सबसे बड़ी उपलब्धि होगी हमारी आत्म तृप्ति। सामान्यतः मरते समय हर वयोवृद्ध को अपने कुटुम्ब परिवार के लोगों को आँख भर देख लेने की इच्छा होती है। लोग तार देकर बुलाते हैं और शिर पर पाँव रखकर दौड़ते आते हैं। प्रत्यक्ष उपयोगिता इसकी भले ही कुछ न हो पर भावनात्मक दृष्टि से यह सभी सम्बन्ध लोगों के लिए बड़े सन्तोष का कारण रहता है कि महा प्रयाण के समय हम सब हिल मिल लिये। जो उस अवसर को खो देते हैं वे पीछे पछताते रहते हैं। यात्री को भी एक अभाव ही अनुभव होता है और अमुक स्वजन का न मिल सकना कष्ट कर लगता है। अपने ऊपर भी वह बात लागू होती है। अपना भी जी कुछ ऐसा ही कर रहा है कि जाते समय अन्तिम बार फिर एक दफा स्वजनों को जी भरकर देख लें और आँखों में वह तस्वीरें खींचलें जो एकाकी मन में सामने प्रस्तुत होकर भाव भरी स्मृतियों को उभारती रहे। सूनेपन में अपने लिये मन बहलाने का यह एक अच्छा आधार रहेगा। और भी कितने ही कारण हैं। देश भर के प्रभावशाली परिजनों का परस्पर परिचय प्राप्त कर लेना अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इस सम्मेलन और परिचय के दूरगामी परिणाम होंगे। हम कितने अधिक और कितने समर्थ बन चुके इसकी एक हलकी सी झाँकी सम्मेलन में आने वाला हर कोई प्राप्त कर सकेगा। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुये परिजनों को उपरोक्त सम्मेलन में आने के लिये गत अंक में आमन्त्रण छाप चुके है। इस अंक में उसकी पुष्टि और समर्थन करते हुए आग्रह कर रहे है कि जिनकी हमारे प्रति सचमुच ही कुछ भावनात्मक घनिष्ठता जुड़ गई हो तो वे सभी मथुरा आने की तैयारी में तुरन्त ही लग जायें।
इस बार यह प्रतिबन्ध उचित ही लगाया गया है कि जिनका हमारे विचारों से सीधा सम्बन्ध या परिचय नहीं है उन्हें, विशेषतया अबोध स्त्री, बच्चों को तीर्थयात्रा या घुमाने दिखाने के प्रयोजन से बिलकुल भी न लाया जाये। उन दिनों गर्मी अधिक होगी, ठहराने के लिये तम्बुओं के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं, पानी की तंगी रहेगी। स्त्री, बच्चे बेकार परेशान होंगे और परेशान करेंगे। मिशन से सम्बन्ध और हमारी विचारणा के साथ जुड़ी हुई महिलाओं के ऊपर प्रतिबन्ध नहीं है। दर्शन झाँकी की लकीर पीटने वालों को रोका जा रहा है। उनकी व्यवस्था हमारे लिये भारी और कष्ट साध्य पड़ेगी। इस प्रकार जो आशीर्वाद वरदान मात्र पाने के आकाँक्षी है उन्हें भी रोका गया है। उनके लिये पत्र व्यवहार पर्याप्त है। आने की जरूरत नहीं है। फिर माताजी उनकी सहायता के लिये मौजूद ही रहेंगी। इस भाव भरे अवसर पर वे लोग हमें हैरान न करें। धन, सन्तान, विवाह, नौकरी, तरक्की, बीमारी, मुकदमा, दुश्मनी आदि की उलझने सुलझाने के लिये कितने व्यक्ति हमारे पास आते और सहायता प्राप्त करते रहे है। वह क्रम आगे भी जारी रहेगा। शायद उनकी परी बात सुन सकना इस अवसर पर भाव भरी मनःस्थिति में हमारे लिये सम्भव भी न हो सके। इसलिये उन्हें न आने के लिये ही कहा गया है। इस अवसर पर केवल उन्हें ही आमन्त्रित किया गया है जो हमारे अन्तरंग से, दर्द से, मिशन से, परिचित हैं और उनसे सहानुभूति रखते हैं। अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य इसी स्तर के होंगे। वे आ सकते हैं, और उन्हें भी आग्रह पूर्वक साथ ला सकते हैं जो नियमित सदस्य तो नहीं हैं पर मिशन की क्रिया पद्धति और विचारणा से परिचित हैं। उसे पढ़ते -सुनते रहे हैं और उपयोगिता से सहमत हैं। उन्हें आमन्त्रित करने और साथ में घसीट लाने के लिये परिजन हमारा प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और आग्रह अनुरोध पूर्वक साथ ला सकते हैं। स्वीकृति माँगने और सूचना देने का पुराना नियम इस अवसर पर भी जारी रहेगा। इससे ठहराने आदि का प्रबन्ध करने में सुविधा रहती है। सो यथा सम्भव जल्दी ही सूचना देने और स्वीकृति पाने का कार्य निपटा लिया जाना चाहिए।
यह सामीप्य, सान्निध्य और सम्मेलन हमारी ही तरह आगन्तुकों के लिये भी एक कभी न भुलाई जा सकने वाली स्मृति बनकर रहेगा। हमें सन्तोष होगा और परिजनों को प्रकाश मिलेगा। इसलिये विचारणा और भावना की दृष्टि से हमारे साथ एकता, घनिष्ठता अनुभव करने वाले हर परिजन के लिये यह एक अन्तिम और अति महत्वपूर्ण अवसर है। अच्छा यही हो कि इसे उपेक्षा की दृष्टि से न देखा जाये और गंवाया न जाये। इस समय की चूक हमें भी कष्टकारक होगी और परिजन भी पछताते रहेंगे। सो उचित यही है कि तैयारी में आज से ही लग जाया जाये। जहाँ सच्ची चाह होगी वहाँ समस्त अड़चनों को चीरते हुए राह भी निकल ही आवेगी।
विदाई सम्मेलन के साथ आदर्श विवाह भी
विदाई सम्मेलन के अवसर पर आदर्श विवाहों का भी आयोजन रहेगा। विवाहोन्माद उन्मूलन का आन्दोलन अगले दिनाँक बहुत तीव्र गति से चलाया जाना है अपने परिवार के हर सदस्य को यह कहा जायेगा कि वह बिना बेकार के बहाने बनाये-बिना घर कुटुम्ब वाले दकियानूसी की आड़ लिये-बिना दहेज और बिना खर्च की आदर्श शादियाँ करने के लिये आवश्यक साहस एकत्रित करें और कदम बढ़ावें। यों यह आन्दोलन बहुत दिन से चल रहा है पर अब उसे अधिक तत्परता से गति दी जानी चाहिए।
सम्मेलन 17 से शुरू है। इसी दिन शादियों के उपयुक्त शुभ दिन है। ऐसे यज्ञ आयोजनों में मुहूर्त दोष नहीं देखे जाते फिर भी उस दिन संयोग वश परम शुभ मुहूर्त है जो हर वर-वधू के लिये मंगलमय होगा। जो शादियाँ अगले वर्ष की जानी हैं उन्हें इसी अवसर पर कर लिया जाये। हमारे हाथों विवाह पढ़ाने और संस्कार कराने और आशीर्वाद पाने का इससे अच्छा सुअवसर फिर किसी वर-वधू को मिलने वाला नहीं है। इस अनुपम लाभ की दृष्टि से आदर्श विवाह आन्दोलन को बड़े पैमाने पर गति देने की दृष्टि से-परिजनों में इसके लिये आवश्यक उत्साह और मार्ग-दर्शन प्रस्तुत करने की दृष्टि से -इस अवसर पर कराये जाने वाले विवाह बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।
हमारी इच्छा है कि बड़े पैमाने पर इस पर आदर्श विवाह हों। इसलिए परिजनों के जो विवाह सम्बन्ध निश्चित हो चुके हों उन्हें मथुरा कराने का ही निश्चय किया जाना चाहिये। तारीख 17 गुरुवार को तीसरे पहर विवाह होंगे। वर कन्या तथा दोनों पक्ष के लोग तारीख 16 को ही आ जायें। तथा उसकी सूचना यथासम्भव जल्दी ही देकर स्वीकृति प्राप्त करली जायें ताकि व्यवस्था की पूर्व तैयारी में सरलता रहें।
ज्ञान-यज्ञ के लिये अब तक लेखों के माध्यम से-साहित्य निर्माण और वाणी के माध्यम से विचार परिष्कार का कार्य किया जाता रहा है। उससे सफलता भी मिली है और वह क्रम आगे भी चलता रहेगा। लेखनी वाणी की ही तरह एक उपयोगी दिशा ‘कला’ की ओर भी है जिसे साधनों के अभाव में अब तक कार्यान्वित न किया जा सका। समय आ गया कि अब इस संदर्भ में अधिक ध्यान दिया जाने और अधिक साहस पूर्ण कदम उठाने के लिए अग्रसर हुआ जा रहा है।
अगले वर्ष - हमारे चले जाने के बाद - जन संपर्क और जन-जागृति का प्रयोजन पूरा करने के लिये - देश भर में गायत्री यज्ञों के साथ जुड़े हुए युग-निर्माण सम्मेलनों का सिलसिला एक सुव्यवस्थित योजना के अनुसार चलाया जायेगा। आशा की गई है कि इस गायत्री जयन्ती - जून 71 से अगली गायत्री जयन्ती जून 72 तक 240 ऐ आयोजन सम्पन्न होंगे। सजीव शाखाओं को इसके लिये प्रेरणा दी गई है और वे निर्णय एवं संकल्प के साथ 17 से 20 जून वाले विदाई सम्मेलन में अपने निर्णय की घोषणा करेंगी। भविष्य में गायत्री यज्ञ छोटे रहा करेंगे। 5 कुण्ड के या अधिक से अधिक 9 कुण्ड के। जिस विशेष प्रयोजन के लिये हमें देश भर में विशाल यज्ञ आयोजनों के लिये निर्देश मिला था वह पूरा हो चुका। 1000 कुण्ड वाले मथुरा के गायत्री महायज्ञ में इस संकल्पित धर्मानुष्ठान का आरम्भ हुआ था उसकी पूर्णाहुति 6 सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञों से कराके हम जा रहे है। गत 12 वर्षों में 24000 गायत्री यज्ञ सम्पन्न हो गये और विशाल युग निर्माण अभियान के शुभारम्भ श्रीगणेश में जितना धर्मानुष्ठान आवश्यक था वह पूरा कर दिया गया। भविष्य में मूल लक्ष्य पर भावनात्मक नव-निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित रखा जायेगा। गायत्री यज्ञ तो अपनी संस्कृति के प्रतीक का स्थान सुरक्षित रखने की दृष्टि से ही आयोजनों में सम्मिलित रखे जायेंगे। उन पर अधिक धन तथा समय खर्च नहीं किया जायेगा। इस दृष्टि से छोटे पाँच कुण्डी या नौ कुण्डी गायत्री यज्ञ तक ही भविष्य में सीमित रहने के निर्देश शाखाओं को जारी कर दिये गये हैं और कहा गया है कि युग-निर्माण सम्मेलनों को ही प्रमुखता दी जाये ताकि बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की रहती आवश्यकता पूरी करने में अपनी सारी शक्ति नियोजित की जा सके।
अगले वर्ष देश भर में ऐसे 240 युग-निर्माण सम्मेलन छोटे गायत्री यज्ञों सहित-सम्पन्न होंगे। उनका संकल्प लेने वाली शाखाएं अपनी प्रतिज्ञा उस 45 कुण्डी यज्ञ पर बैठ कर लेंगी जो विदाई सम्मेलन के अवसर पर सम्पन्न होगा। 17 से 20 जून तक परिजनों का जो विदाई सम्मेलन बुलाया गया है उसमें भारी संख्या में परिजन स्वभावतः एकत्रित होंगे। उस अवसर पर कितनी ही अति महत्व की और अति आवश्यक बातें बतानी हैं और अन्तिम निर्देश देने है। हमारी ममता और परिजनों की श्रद्धा भी इसके लिये विवश करेगी और सम्मेलन बहुत बड़ा हो ही जायेगा। हम जिन्हें अन्तिम समय पर आँखें भरकर देख लेने के लिये लालायित है वे भला क्यों इस अन्तिम मिलन के लिये आतुर न होंगे। जून की गर्मी होते हुए भी सम्मेलन की विशालता असंदिग्ध है। उस अवसर पर बड़ा यज्ञ करने की बात सोची जा रही थी पर वह विचार इसलिये छोड़ दिया गया कि उस थोड़े से समय को परस्पर विचार विमर्श में ही खर्च किया जाना चाहिये। बड़े यज्ञ का काम इतना अधिक फैल जाता है कि उस पर से समय ही नहीं बचता। सो मात्र 45 कुण्ड का ही एक यज्ञ रखा गया है। 45 कुण्ड का इसलिये कि हमारे यज्ञीय जीवन की आयु 45 वर्ष है। 60 से 15 वर्ष तो ऐसे ही बचपन के चले गये। उनकी गिनती क्या की जाये। एक वर्ष को एक यज्ञ कुण्ड मानकर- इन वर्षों में हुए क्रिया-कलाप से प्रकाश और प्रेरणा लेने का प्रतीक यह 45 कुण्डी यज्ञ आयोजन रखा है। 9-9 कुण्डों की पाँच यज्ञ शालाएँ रहेंगी। इससे भविष्य में ऐसी यज्ञ शालाएँ बनाने और उनकी विधि व्यवस्था समझने की आवश्यकता भी इसी से पूरी हो जायेगी।
अगले वर्ष युग-निर्माण सम्मेलनों का संकल्प लेकर आने वाली शाखाओं के प्रतिनिधि ही इन यज्ञों पर बैठेंगे। पूर्णाहुति में झोला पुस्तकालय चलाने वाले और ज्ञान घट रखने वाले सक्रिय कार्यकर्ता भी सम्मिलित होते रहेंगे। आशा की गई है कि इस विदाई सम्मेलन में 240 सम्मेलनों के प्रतिज्ञा संकल्प हो जायेंगे और उनकी तारीख इसी समय नियत करदी जायेंगी। ताकि वे अपनी तैयारी में लौटते ही लग सकें। इन आयोजनों को जन समाज के लिये अधिक आकर्षक बनाने और अधिक जन-समूह एकत्रित करने के लिये संगीत एवं चित्र माध्यमों को प्रधानता दी जायेगी। इस प्रयोजन के लिये तीन माध्यम तैयार किये जा रहे है। 1. युगनिर्माण चित्रावली में प्रस्तुत 24+24=48 तथा अन्य 12 इस प्रकार 60 चित्रों की एक चित्र प्रदर्शनी हर सम्मेलन में लगाई जाया करेगी। 2. स्लाइड प्रोजेक्टरों द्वारा सिनेमा जैसे रंगीन चित्र दिखाते हुये उनकी व्याख्या लाउडस्पीकर से करते हुए मनोरंजन के साथ विचार परम्परा का प्रयोजन जोड़ा जायेगा। 3. संगीत की एक विशेष मंडली रहेगी जिसमें प्रमुख गायक खड़ा होकर धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथानक गायन करेगा और उसके साथ-साथ अति मधुर 8-10 बाजों का साज बजता रहेगा। सामान्यतः यह कथानक गायन वाद्य दो घन्टे का होगा। प्रकाश चित्र-एक घण्टे के इस प्रकार रात्रि का तीन घण्टे का यह अति आकर्षक कार्यक्रम चला करेगा। प्रातः चित्र प्रदर्शिनी दर्शकों की ज्ञान वृद्धि किया करेगी। प्रातः 5 या 9 कुण्डी गायत्री यज्ञ उसी के साथ मुण्डन, जनेऊ आदि संस्कार, बुराइयाँ छोड़ने तथा अच्छाइयों के संकल्प किये जाते रहेंगे। जहाँ सम्भव होगा वहाँ बिना दहेज के आदर्श विवाह भी इसी अवसर पर सम्पन्न कराये जाया करेंगे। उपस्थित लोगों को अन्य रचनात्मक एवं संघर्षात्मक प्रवृत्तियाँ अपनाने की प्रेरणा इस अवसर पर नियोजित विचार गोष्ठियों तथा प्रवचनों द्वारा दी जाया करेगी। नवनिर्माण साहित्य के विक्रय और वितरण की व्यवस्था भी साथ साथ रहेगी। इस प्रकार यह सम्मेलन अपने आपमें एक अति महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा कर सकने वाले सिद्ध होते रहेंगे।
तैयारी यह की जा रही है कि 1. चित्र प्रदर्शनी, 2. प्रकाश चित्र यन्त्र, 3. संगीत मंडली लेकर एक बड़ी जीप सारी साधन सामग्री के साथ चले। यज्ञ के आवश्यक उपकरण भी। इस जीप का इंचार्ज तपोभूमि का प्रमुख कार्यकर्ता चला करे और एक यज्ञ से दूसरे यज्ञ की शृंखला पूरी करते हुए अपना कार्यक्रम नियोजित किया करे। यों एक ऐसी साधन सम्पन्न जीप की लागत बहुत पड़ेगी पर किसी प्रकार भगवान उसकी भी पूर्ति करेंगे। सोचा यह जा रहा है कि ऐसी चार जीपें उन 240 युगनिर्माण सम्मेलनों को बनाई जा सकेगी जो विदाई सम्मेलन के अवसर पर संकल्पित एवं नियोजित किये जायेंगे।
एक तीखी आवाज का-प्रभावशाली व्यक्तित्व का गायक-और 5-6 कलानेट पिस्टन, बन्शी, हारमोनियम, तबला, बेन्जों, घुंघरू जैसे वाद्य यन्त्र बजाने वाले कुल 7 व्यक्तियों की यह मंडली चला करेगी और यही प्रकाश चित्र, चित्र प्रदर्शिनी, यज्ञ आयोजन संस्कार, साहित्य विक्रय आदि का प्रयोजन पूरा कर लिया करेगी। देश भर में भ्रमण करती हुई यह जीप मंडली निश्चित रूप से जन जागृति का महान प्रयोजन पूरा करती रह सकेगी।
छह बाजा बजाने वाले प्रत्येक जीप पर रहने से चार जीपों पर 24 की आवश्यकता पड़ेगी। 4 गायक। 28-300 संगीत ज्ञाताओं की यह मंडली स्थायी रूप से रखी जायेगी और उन कार्यकर्त्ताओं को तपोभूमि स्तर का जीवन यापन करने तथा परिवार पालने की आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जायेंगी। इसे वेतन, पारिश्रमिक पुरस्कार आदि नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह बाजारू दर से काफी कम होगा। इसलिये उसे निर्वाह ही कहना चाहिए। सेवा-भावना-त्याग वृत्ति-जिनमें नहीं है जो अपनी योग्यता का पूरा मूल्य माँगते हैं ऐसे लोग गली-गली भरे पड़े है। उन्हें कभी भी कहीं से भी कितनी ही बड़ी संख्या में नौकर रखा जा सकता है। पर ऐसे लोगों से काम क्या चलेगा ? उनका प्रभाव भी किस पर क्या पड़ेगा ? इसलिए तलाश उन्हीं की की जा रही है जो गीत वाद्य में रुचि एवं क्षमता रखने के साथ-साथ मिशन का स्वरूप समझ चुके हैं और जिनमें सेवा साधना की उत्कृष्ट भावना जाग चुकी हो। ऐसे व्यक्तियों का प्रशिक्षण तुरन्त किया जाना है ताकि अगले ही दिनों उनका उपयोग किया जा सके।
उपरोक्त प्रचार मंडली का अंग बन सकने और अपनी कण्ठ मधुरता एवं वाद्य योग्यता का लाभ समाज को देने की योग्यता तथा इच्छा जिनमें हो वे मथुरा से संपर्क करलें और पत्र व्यवहार करलें उनका प्रशिक्षण भी तो किया जाना है इसलिये यह संपर्क जल्दी ही किया जाना चाहिए।
अगले वर्ष छोटे गायत्री यज्ञों सहित युग-निर्माण सम्मेलन कर सकने का जिनमें उत्साह हो वे उसकी तैयारी के लिए क्या करना होगा इसकी विस्तृत जानकारी मिल कर या पत्र लिखकर मथुरा से प्राप्त कर सकते हैं।
“आइन्स्टाइन को विद्यार्थी जीवन में सभी छात्र बुद्धू कहकर चिढ़ाते थे। कई बार अनेक छात्रों ने उनकी पीठ पर बुद्धू की चिट तक चिपका दी थी। कक्षा में गणित के प्रश्न समझाने के बाद अध्यापक कोई बात पूछते तो आइन्स्टाइन बगलें झाँका करते थे। उनके इस बुद्धूपन से परेशान होकर अध्यापक ने कई बार कह दिया था ‘तुम सात जन्मों में भी गणित नहीं सीख सकते।’
यही बालक बड़ा होकर विश्व का प्रसिद्ध महान अणु वैज्ञानिक तथा गणितज्ञ बना। एक बार एक विद्यार्थी ने आइन्स्टाइन से महानता का रहस्य पूछा तो उन्होंने कहा कि मैंने अपने जीवन में कभी भी हिम्मत न हारी इसीलिए गणित जो मेरे लिए सबसे कठिन विषय था इतना आसान बन गया।”
1. “अखण्ड-ज्योति” का चन्दा, गायत्री और आर्ष साहित्य का पैसा मनीआर्डर, चेक, ड्राफ्ट “अखंड-ज्योति संस्थान” के नाम से भेजना चाहिये।
2. अन्य सभी साहित्य, ज्ञान घट (गुल्लक), धकेल युग-निर्माण योजना हिन्दी, अंगरेजी, गुजराती, उड़िया और मराठी युग-निर्माण योजना का चन्दा मनीआर्डर, चेक अथवा ड्राफ्ट से युग-निर्माण योजना द्वारा गायत्री तपोभूमि के नाम से भेजे जायें। इनसे सम्बन्धित पत्र व्यवहार भी इसी पते से करना चाहिए।
3. यज्ञ, प्रकाशन, विद्यालय के लिये दान, अनुष्ठान का पैसा, धर्म घट मासिक दा यह सब “गायत्री मन्दिर ट्रस्ट” के नाम से भेजने में सुविधा रहती है।
4. मनीआर्डर, ड्राफ्ट या चेक यहाँ के किसी कार्यकर्ता के व्यक्तिगत नाम से नहीं भेजना चाहिये। जहां तक सम्भव हो ड्राफ्ट भेजे जायें, चेक में असुविधा होती है।
5. व्यक्तिगत दुःख-कष्ट और साधनाओं सम्बन्धी परामर्श वाले पत्र माताजी के नाम घीया मण्डी के पते पर भेजे जाने चाहिये अन्य मिशन सम्बन्धी पत्र व्यवस्थापक गायत्री तपोभूमि के पते पर भेजना ठीक रहता है।
6. चन्दा भेजने के साथ ग्राहकों के नाम पतों की लिस्ट भेजी जाती है उसके साथ व्यक्तिगत बातें नहीं लिखनी चाहिये। इसी प्रकार शाखाओं के समाचार भी अलग पृष्ठ पर लिखे जायें। एक लिफाफे में कई तरह के पत्र तो हो सकते हैं पर उन्हें अलग-अलग कागज पर लिखने से उन्हें निबटाने में सुविधा रहती हैं
7. पत्रों की लिखावट साफ हो, विशेषकर ग्राहकों के नाम पते पूरे और साफ लिखे जाने चाहिये। पता साफ होने और गलत होने से पत्रिकायें भटकतीं और शिकायतें बढ़ती है।
8. पत्रिकायें न मिलने की शिकायत अखण्ड-ज्योति के लिये 15 तारीख के बाद और युग-निर्माण योजना के लिये 30 तारीख के बाद करनी चाहिये। साथ में ग्राहक नम्बर लिखना न भूलें कानूनी प्रतिबन्ध के कारण अब शिकायत पर भेजे जाने वाली पत्रिकायें 15 दिन बाद यहाँ से भेजी जाती हैं अतएव दुबारा पत्रिका के लिये 15 दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
9. चन्दा भेजा गया हो और पत्रिका न मिल रही हो तब उनकी शिकायत के साथ अपना पिछला ग्राहक नम्बर नये सदस्य होने की स्थिति में “नया ग्राहक” मनीआर्डर भेजने का विवरण यदि मनीआर्डर किसी और के द्वारा भेजा गया हो तो उसका पूरा हवाला भी देना आवश्यक होता है।
1. 1 से 3 मई मन्दसौर (मध्य प्रदेश)
पता- श्री गोवर्धनलाल विजयवर्गीय जनकपुरा बड़ा चौक, मन्दसौर (मध्य प्रदेश)
2. 12 से 16 मई पोरबन्दर (गुजरात)
पता- अखिल भारतीय अखण्ड ज्योति गायत्री प. शा. द्वारा श्री रामभाई चश्मा वाला मार्डन आप्टिकल्स गान्धी रोड़ पोरबन्दर (गुजरात)
3. 18 से 21 मई भीलवाड़ा (राजस्थान)
पता श्री मोहनलाल तिवारी वार्ड नं. 2 मकान नं. 110 माणिक्य नगर, भीलवाड़ा (राजस्थान)
4. 22 से 23 मई कोटा (राजस्थान)
पता-1. श्री रामेश्वर प्रसाद मु. पो. सीसवली, कोटा
2. श्री भूरिसिंह हाड़ा पुलिस इन्सपेक्टर रामचन्द्रपुरा, छावनी कोटा (राजस्थान)
5. 24 से 25 मई जयपुर (राजस्थान)
पता-श्रीमती चन्द्रमुखी रस्तोगी 2, बिचून बाग, संसार चन्द्र रोड़, जयपुर (राजस्थान)
(माया वर्मा)
वह चला-उसे रहा पुकार महाकाल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
अग्रदूत ओ प्रकाश के बढ़े चलो। अन्धकार है घिरा प्रदीप बन जलो॥
झुक सके नहीं कभी, सगर्व उठा भाल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
है अधर्म से वसुन्धरा कराहती। जोड़ कर, मनुष्यता पनाह माँगती॥
दिग्दिगंत में घिरा हुआ तिमिर कराल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
लो शपथ अभी कुरीतियाँ मिटायेंगे। लो शपथ अभी कि नया युग बसायेंगे॥
जी सके-मनुज सहास विश्व को निहाल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
युग नया पुकारता “मुझे विकास दो”। सूखते अधर उन्हें नमी व हास दो॥
मोड़ दो अनीति की सशक्त वक्र चाल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
वह तुम्हें बुला रहा, कि “आओ सामने”। “मूल्य प्राण का चुका, मशाल थामने”॥
कार्य है अपूर्ण अभी, लो उसे सम्हाल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
जा रहा प्रवास पर सदैव के लिये। वेदना व्यथा समस्त विश्व की पिये॥
भेंट करो साथी ! विश्वासों की माल। देखना बुझे न कहीं क्राँति की मशाल॥
*समाप्त*