भगवान् को बार-बार याद करो

एक हाथी है, उसे नहला धुला कर छोड़ दो तब फिर वह क्या करेगा ? मिट्टी में खेलेगा और अपने शरीर को फिर गन्दा कर लेगा, कोई उस पर बैठे तो उसका शरीर भी गन्दा अवश्य होगा । लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद पक्के बाड़े में बाँध दिया जाये ?-तब फिर हाथी अपना शरीर गन्दा नहीं कर सकेगा ।

मनुष्य का मन भी हाथी के समान है। एक बार ध्यान,  साधन और भगवान् के भजन से वह शुद्ध हो गया तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिये । इस संसार में पवित्रता भी है गन्दगी भी है । मन का स्वभाव है वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा । इसलिये उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिये एक बाड़े की जरूरत होती है जिसमें वह घिरा रहे । गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके ।

ईश्वर का भजन--उसका निरन्तर ध्यान एक बाड़ा है जिसमें मन को बन्द रखा जाना चाहिये, तभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव सम्भव है। भगवान् को बार-बार याद करते रहोगे तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी । उस समय दूषित वासनाओं में पड़ने से स्वतः भय उत्पन्न होगा और मनुष्य उस पापकर्म से बच जायेगा जिसके कारण वह बार-बार अपवित्रता और मलिनता उत्पन्न कर लिया करता है ।


पराजित मृत्यु-अपराजित आकाशज

यमराज के सम्मुख हाथ जोड़े खड़ी मृत्यु ने विनय की-भगवन् ! ऐसा तो हुआ है कि कोई व्यक्ति आजीवन संयमशील रहा हो, कभी परिश्रम से जी न चुराया हो, अभक्ष्य न खाया हो और शुद्ध सात्विक वातावरण में रहा हो ; फलस्वरूप उसने दीर्घजीवन पा लिया हो पर अन्ततः उसे भी मेरे ही चंगुल में आना पड़ा । जिस घर में मेरा पैर न पड़ा हो ऐसा कोई घर नहीं किन्तु उस आकाशज ने तो मुझे हैरान कर दिया । वह मरता ही नहीं, मैंने कोटि उपाय कर लिये ।

यमराज हँसे और बोले-देवी ! हमारा वश तो स्थूल शरीरों तक है, कामनाग्रस्त जीव अपनी किसी इन्द्रिय की लिप्सा से प्रेरित होकर जीव-तन धारण करता है । उसकी वह कामना शरीर पाकर और भी उग्र होती है । इन्द्रिय सुख से तृप्ति नहीं होती, जितना भोगो - भोग की इच्छा उतनी ही बढ़ती है, और भोग भोगने के लिये जीवन-शक्ति नष्ट करनी पड़ती है । जीवन-शक्ति जहाँ नष्ट होती है वहीं अपना अस्त्र चलता है देवी ! आकाशज में कोई इच्छा नहीं, वह कामना-रहित है इसलिये उसे स्थूल शरीर धारण करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वह अपने सूक्ष्म शरीर से ही द्रष्टा बना घूमता है । उसे मार सकना तब तक सम्भव नहीं जब तक उसकी वासना का पता न चले। पहले तुम जाकर उसकी इच्छा का पता लगाओ ।

मृत्यु देवलोक से धरती पर आई और गुप्त रूप से आकाशज के साथ रहने लगी । मनुष्य जब कामना-रहित होता है तो उसकी बुद्धि साफ रहती है वह सभी दिशाओं को देख सकता है, सुन सकता है, सोच सकता है । मृत्यु चाहती थी छिपकर रहना किन्तु तत्त्वदर्शी आकाशज से वह छिप नहीं सकी । आकाशज ने अच्छी तरह जान लिया कि मृत्यु साथ लगी है, कोई भी दाँव लगा सकती है; किन्तु उसे किसी प्रकार की इच्छा थी नहीं जो मृत्यु से भय खाता। इसलिये वह पूर्ण निर्द्वंद्व रहा और मृत्यु देवी की प्रेरणा से खेल समझकर खेलता रहा ।

मृत्यु ने उसे प्रेरित किया - अब वे काशीराज के राजोद्यान में उपस्थित थे । आकाशज ने देखा वहाँ भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे पुष्प खिल रहे हैं, पक्षी गुंजन कर रहे हैं, तितलियाँ एक फूल से दूसरे फूल की ओर दौड़ी चली जा रही है कलियों की सुवास से संपूर्ण वातावरण मादक हो उठा है । राजकुमारी उस मधुरिमा सौंदर्य का पान करती हुई सरोवर तक आती हैं और प्रातः स्नान के लिये निर्वसन हो जाती हैं। मृत्यु ने आकाशज को प्रेरित किया-देख राजकुमारी के अंग-प्रत्यंग से काम टपक रहा है। ऐसी सजीव सौंदर्य-श्री क्या तूने कहीं अन्यत्र देखी है ? वैराग्य भाव त्यागकर इस सुन्दरी को वरण कर ।

आकाशज ने मृत्यु की ओर देखा और हँसकर बोला- भन्ते ! स्त्री के गरे में यही राजकुमारी जब पिण्ड रूप से फँसी थी तब मैंने इसके दोनों रूप देखें थ--एक स्थूल शरीर दूसरा सूक्ष्म । यह जो सौंदर्य है वह हाड़ माँस के शरीर का है। इसे भोगकर कौन सन्तुष्ट हुआ है ! मैं अपने सूक्ष्म शरीर को जानता हूँ। वही सत्य है, वही नित्य और वही अमर सुख देने वाला है। मैं इस राजकुमारी की भी कामना नहीं करता । यदि करूँ तो फिर मुझे भी ऐसा ही शरीर धारण करना पड़ेगा। जब तक मैं इस सुन्दरी का आलिंगन करने योग्य होऊँगा, यह वृद्ध हो जायेगी। फिर इसमें कोई आकर्षण न रहेगा। इसलिए मैं किसी इच्छा से बँधना नहीं चाहता ।

मृत्यु यह सुनकर अवाक् रह गई । यमराज के पास लौट आई ओर बोली-आपने सच ही कहा था देव ! जो निष्काम होते हैं, उन्हें तो मैं भी नहीं जीत सकती ।


ईश्वर का प्रतिबिंब प्रेम है, प्रेम हृदय आलोक

एक आदमी ने सूफी सन्त खुसरो के समीप जाकर पूछा- "आपको रात में नींद भी आती है, अथवा रात में भी ईश्वर की याद में रोया करते हैं " ? खुसरो ने उत्तर दिया-

मन कुजा खुसपम् कि अज फरयादे मन ।

शब  न  मीखुसपद्  कसे  दर  कूए  तो ॥

ऐ भाई ! मुझे नींद कहाँ आती है, स्थिति तो यह है कि मेरे रोने से पड़ोसी भी नहीं सो पाते ।

प्रेम-मानवीय गुणों का, भक्ति का वह स्वरूप है जो सांसारिकता हो या आध्यात्मिकता दोनों के लिए इतनी शक्ति, उष्णता और क्रियाशीलता प्रदान करता है, जितनी अन्य कोई भी भावना पैदा नहीं कर पाती । सच पूछा जाय तो-

गर न हुई दिल में मए इश्क की मस्ती ।

फिर क्या दुनियादारी क्या खुदापरस्ती ॥

अर्थात्-यदि अन्तःकरण में प्रेम न हो तो न तो सांसारिकता में कुछ मजा आता है और न ही ईश्वर की भक्ति में । प्रेम ही वस्तुतः इस लोक-संचालन व व्यवस्था का मूलाधार है । प्रेम ही वह तत्व है जिसका विकास हुये बिना मनुष्य परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता ।

ऐसा जानने से पहले प्रेम की पहचान आवश्यक है। प्रेम एक अनादि तत्व है, दर्शन है । भौतिक सुखों की आकाङ्क्षा का नाम प्रेम नहीं है, रूप-सौंदर्य पर दीवानगी का नाम भी प्रेम नहीं है । प्रेम कर्तव्य और आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा का नाम है । एक बार शायर बलदेव के पास एक युवक ने जाकर कहा - श्रीमान् मुझे अमुक युवती से प्रेम है। मैं चाहता हूँ कि वह हर-क्षण मेरे पास रहे, और कहीं ना जाये। इस पर बलदेव ने उत्तर दिया-

हुस्न पर  मुश्ताक होना हर  किसी को  पसन्द है ।

‘बल्देव’ सादिक यार पर दिलोजाँ निसारी और है ॥

अरे मित्र ! सौंदर्य पर न्योछावर होना कोई बड़ी बात नहीं, यह तो हर कोई कर सकता है। अच्छी वस्तु किसे नहीं लुभाती पर श्रेष्ठ वस्तु की आकाङ्क्षा तो वही सार्थक है जो उस पर अपना हृदय, अपना प्राण भी निसार कर सकता हो । हृदय और प्राण दिये जाने का अर्थ अपनी क्षमताओं का औरों के उत्थान में प्रयोग करना है । सच्चे प्रेम का अर्थ है हमारे पास जो भी ज्ञान, वैभव और विभूतियाँ हैं उनसे अपने प्रेमास्पद की इच्छाओं, आकाङ्क्षाओं और वृत्तियों का विकास किया जाये, उसे यशस्वी बनाया जाये । ऐसे प्रेम में पाना कम, खोना ही अधिक है ।

प्रेम ‘रस’ है, उसे ढककर रखा जाता है । दिखावट-उसे खोलकर रखना है, जो विकृति उत्पन्न करता है । सांसारिक प्रेम अपने प्रियास्पद के प्रति कर्तव्य और आत्मोन्नति के रूप में स्वतः व्यक्त होता है। इसी प्रकार ईश्वरीय प्रेम लोक-सेवा, दया, क्षमा, करुणा, उदारता आदि दैवी गुणों में स्वतः अभिव्यक्त होता है।  ससाराभिमुख प्रेम को न तो चिल्लाकर व्यक्त करना आवश्यक है और न ही भक्ति प्रेम का बखान-

जिन्हें है इश्क सादिक से कहाँ फर्याद करते हैं ।

लबों पर मुहरे खामोशी दिलों से याद करते हैं ॥

जो सच्चे प्रेमी होते हैं वे अपना प्रेम दिखाते नहीं फिरते, उनका मुँह बन्द और दिल याद करता रहता है ।

वस्तुतः प्रेम एक शक्ति है। यदि उसे बाँधकर न रखा जाये तो वह जीवन का बहुमुखी विकास कर सकने की अपेक्षा इधर-उधर बिखर कर नष्ट ही हो जाती है । ईंधन इंजन के भीतर जलाया जाता है तो वह ऐसी शक्ति देता है, ताकत देता है जिससे कि वह शक्ति उस इंजन और इंजन के साथ जुड़े हुये हजारों डिब्बों और यात्रियों को खींचकर गन्तव्य तक पहुँचा देता है । वही ईंधन, वही आग पटरी से बाहर बिखरी होती तो वहाँ न कोई गति होती न प्रगति । भौतिक प्रगति का पथ हो अथवा आत्मोन्नति का, ईश्वर दर्शन का मार्ग प्रेम को भीतर ही छिपाकर रखा जाता है ।

हृदय में जगाया प्रेम नष्ट नहीं होता निरर्थक नहीं जाता । वह प्रेम यदि भौतिक है तो अन्तः वृत्तियों को विकसित कर जीवन में क्रियाशीलता, स्वावलम्बन, कला निपुणता, अनुशासन और कर्त्तव्य परायणता के भाव पैदा करता है। अपनी पत्नी से प्रेम करके कोई उसके पास बैठा नहीं रहता, वह जानता है बैठना तो किसी भी क्षण के लिये सम्भव है; फिर बैठना तो जीवन की इतिश्री, आह्लाद और उल्लास को खो देना है। वह अपनी पत्नी को सजाने सँवारने की आवश्यकता अनुभव करता है। इसके लिए उसे कर्म करने की आवश्यकता पड़ती है, वह स्वयं क्रियाशील होता है, विकास की नई विधायें खोजता है और अपने आपको सांसारिक द्वेष, आकर्षणों से बचाकर भी रखता है, क्योंकि उसका लक्ष्य तो उसके पास है भटकने की उसे कहाँ फुरसत ।

इसी प्रकार परमात्मा का प्यार मानसिक शक्तियों को--बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, प्रज्ञाचक्षु ईश्वर के भक्त ही होते हैं। आत्म-परायण व्यक्ति तीन काल की बातें जान लेने जितना पवित्र हो जाता है । काव्य-सृजन की क्षमता, दूरदर्शिता, वाक् सिद्धि, भाव विह्वलता यह सब ईश्वरीय प्रेम की ही किरणें हैं। ईश्वरीय प्रेम से अन्तः सामर्थ्यों का विकास ध्रुव सत्य है । ऐसे प्रेमी के लिए प्रियतम तो अपने आप न्योछावर होता है-

कबीर मन निर्मल भया जैसे गङ्गा नीर ।

पीछे-पीछे हरि फिरत कहत कबीर-कबीर ॥

साँवलिया मैंने चाकर राखो सी ।   (मीरा)

प्रेमी की चाह तो एक ही होती है--प्रेमी की याद न भूल जाये। उसे तो प्रेमी के प्रेम के अतिरिक्त और किसी वस्तु की इच्छा क्यों होने लगी ?

दिल देके लिया करते हैं सौदा यही उश्शाक ।

सौदाई   कभी   दूसरा   सौदा   नहीं   करते ॥

अन्तःकरण का प्रेम, प्रेम से ही सन्तुष्ट होता है, प्रेम की अपनी मस्ती ही क्या कम सुखद है जो उसके आगे किसी और सुख की आकाङ्क्षा की जाये। एक दूसरे के लिये निरन्तर जलने से रयि-प्राण के मिलन जैसा आनन्द मिलता है । प्रत्यक्ष देखने में विरह की जलन और दर्द के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता पर-

मिली  वह दर्द में लज्जत कि जखमैदिल पै गर कोई ।

छिड़कता  है  नमक  तो हम उसे  मरहम समझते हैं ।।

वस्ल  में  हिज्र  का  गम, हिज्र में मिलने  की खुशी ।

कौन  कहता   है   जुदाई   से  बिसाल   अच्छा   है ।।

विरह का, प्रेम के दर्द का अपना रस है, अपनी अनुभूति है। उसमें तो दूसरों के द्वारा दिया दुःख भी अच्छा लगता है । मिलना बिछुड़ना दोनों में एक-सा सुख यही प्रेम की विशेषता है । परमात्मा दो विपरीत शक्तियों की एकीभूत सत्ता ही तो है, इसीलिए तो कहते हैं जहाँ प्रेम है वहाँ परमात्मा है । प्रेम हृदय का प्रकाश है । ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम ही है ।


लघु कहानी - भावना की प्रधानता

कर्माबाई भगवान् पंढरी नाथ को पुत्रभाव से पूजती और प्रेम करतीं । वे प्रातःकाल बिना स्नान किये ही खीर बनातीं और भगवान् का बाल-भोग इस भाव से लगातीं कि भगवान् को शैय्या त्यागते ही भूख लगती है ।

एक दिन एक शास्त्रीजी ने कहा-वाह ! कर्माबाई भगवान् का भोग नहा धोकर लगाना चाहिये कि बिना स्नान किये ? कर्माबाई ने उस दिन स्नान करके ही भोग लगाया । रात उन्होंने स्वप्न में देखा-भगवान् पंडरीनाथ खड़े भूख-भूख चिल्ला रहे हैं। कर्माबाई ने पूछा-देव ! आज खीर नहीं खाई क्या ? भगवान् बोले माँ ! खीर तो मैंने खा ली, पर आज तेरा वह प्रेम--वह भावना नहीं मिली जो रोज मिला करती थी । कर्माबाई उसी दिन से फिर बिना नहाये ही भोग चढ़ाने लगी ।


मनुष्य देह में मेरा विलक्षणा-विराट

बाई डाँगों अफ्रीका के गाँव मबाई तथा फ्रांस के ‘केन्ड्री’ स्थान में एक प्रकार का वृक्ष पाया जाता है जो वनस्पति विज्ञान के सभी नियमों का उल्लंघन कर एक ऐसा अपवाद बन गया है, जिसका हल कोई भी वनस्पति शास्त्री आज तक खोज नहीं पाया। इस वृक्ष की जड़ें एक ऐसी कील या चूल की तरह होती हैं जिसमें रखकर किसी यन्त्र को चारों ओर घुमाया जा सके । कभी-कभी तूफान आते हैं तो प्रदेश के छोटे-बड़े हजारों पेड़-पौधे धराशायी हो जाते हैं किन्तु तूफान जब इस पेड़ के समीप से गुजरता है तो वृक्ष चूल नुमा जड़ के सहारे चक्कर काटने लगता है जैसे कोई लट्टू नाचता है । जितनी देर तूफान-वृक्ष नाचता रहेगा, तूफान खतम-और नाच बन्द-पौधा अपनी विकास यात्रा प्रारम्भ कर देता है । जड़ें फिर अपना काम शुरू कर देती हैं। यह वृक्ष लोगों के लिये आश्चर्य का विषय बना हुआ है ।

मनुष्य देह में भी बहुत कुछ ऐसा है जिसके बारे में हम नहीं जानते पर वह इतना आश्चर्यजनक अद्वितीय क्षमताओं से परिपूर्ण है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक उस जैसी मशीन आज तक बना नहीं पाये । अपनी विचार शक्ति को केन्द्रित कर भारतीय योगियों ने जब इस शरीर-गह्वर में प्रवेश कर उसका आद्योपान्त भ्रमण किया तो पाया कि जिसे हम शरीर कहते हैं वह तो विराट् ब्रह्मांड है; सात लोक और उन्हें धारण करने वाला विराट् आकाश इसी में छिपा बैठा है । बड़ी-बड़ी निहारिकाओं से लेकर आकाश गंगा और सौर मण्डल तक अपने-अपने ग्रह उपग्रह लिये इसमें चक्कर काट रहे हैं। मनुष्य शरीर दिखाई न दिया होता यदि इसमें पार्थिव कण विद्यमान न होते । स्थूल कणों की उपस्थिति स्वरूप अन्नमय कोश या प्रोटोप्लाज्मा की ईंटों से चुनाव की हुई इस बिल्डिंग में स्थूल भाग दृश्य है इसलिये यह नहीं मान लेना चाहिए कि शरीर केवल मात्र एक स्थूल पिण्ड है वरन् इसमें सूक्ष्म इतना है कि सारा आकाश ही अपने सम्पूर्ण घटकों के साथ छिपा बैठा है। इस सूक्ष्म शरीर को न जानने के कारण ही मनुष्य शारीरिक इन्द्रिय लिप्सा और भौतिक सुखों के आकर्षण में पड़ा जिन्दगी के दिन गँवाया करता है । एक दिन मृत्यु आती है और इस ईश्वर-प्रदत्त महान् सौभाग्य को नष्ट करके चली जाती है ।

मृत्यु के भय और अमरत्व की इच्छा ने भारतीय आचार्यों को विचार की एक नई दिशा दी-उन्होंने खोज की-

स्थूल शरीरं किम् ? पञ्चीकृत पञ्च महाभूतैः कृतं सत्कर्मजन्य सुख-दुःखादि भोगायतनं शरीरम् ।

अस्ति   जायते, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते   विनश्यतीति  षड्विकारवदेतत्स्थूल   शरीरम् ॥ (श्री शंकराचार्य कृत तत्त्वबोध)

अर्थात् -स्थूल शरीर किसे कहते हैं ? विश्लेषण से पाया गया कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँचों महाभूतों से किए गए कर्मों के द्वारा उत्पन्न सुख-दुःख आदि के भोगने का प्रधान आश्रय यह शरीर उत्पत्ति, वृद्धि, घटना, बढ़ना, ढीला पड़ना और नाश हो जाने वाला इन छः विकारों से युक्त है। इसमें अति सूक्ष्म आकाश है। अर्थात् आकाश-तत्व से शरीर की रचना प्रारम्भ होती है । आकाश तत्त्व दो भागों में बँटकर रहता है। आधा तो वह अपने ज्यों के त्यों स्वरूप में रहता है। शेष आधे को वायु भाग में मिला देता है। इस सम्मिश्रित भाग का आधा भाग अग्नि तत्व से मिलकर तेज या प्राण के रूप में व्यक्त होता है । इस तेज का आधा भाग जल से मिलकर तरल भाग रक्त आदि का निर्माण करता है इसी जल वाले आधे भाग से पृथ्वी तत्व अर्थात् स्थूल शरीर का निर्माण होता है । इस दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि भारी भरकम और स्थूल दिखाई देने वाले शरीर में सर्वाधिक अंश आकाश है जिसके बारे में आज का विज्ञान कुछ भी नहीं जानता । और भारतीय योगियों ने इस सम्बन्ध में इतना अधिक जाना कि इसी शरीर में मूल चेतना-ब्रह्म को प्राप्त कर लिया-अमरत्व प्राप्त कर लिया । वेद में कहा गया है-

यस्मिन्   भूमिरन्तरिक्षं   द्यौर्पस्मिन्न   ध्याहिता ।

यत्राग्निश्चन्द्रमाः  सूर्यो   वातस्तिष्ठ   न्त्यार्पिताः ॥

यस्य   त्रय   स्त्रिंशद्देवा  अंगे   सर्वे  समाहिताः ॥ -अथर्ववेद  10/ 7/ 12/ 13

अर्थात्-भूमि अन्तरिक्ष और द्युलोक इसी शरीर में ही है जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु रहते हैं। तैंतीस देवता भी इसी शरीर में रहते हैं ।

अष्टाचक्रा    नवद्वारा   देवानां   पूरयोध्या ।

अस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ।

तस्मिन्   हिरण्यये  कोशे  त्र्यरे  त्रिप्रतिष्ठिते ।

तस्मिन् यद्यक्षमात्मन्वत् तद्वै ब्रहृविदो विदुः ।  -अथर्ववेद 10/ 2/ 31-32

अर्थात्- यह देह देवताओं की पुरी अयोध्या है। इसमें ८ चक्र हैं, नौ द्वार हैं, सुनहरे कोशों से आच्छादित हृदय कमल है जो तेज से घिरे स्वर्ग के समान है । इस कोश में ही आत्मा विराजमान है उसे ब्रह्मज्ञानी ही जानते हैं ।

भारतीय दर्शन और जीवन पद्धति में स्थूलता को कम महत्व दिया गया और देव भाग को अधिक। यह यहाँ की सर्वोपरि विज्ञानवादिता थी । अब शरीर-विद्या विशारद भी इन मान्यताओं पर उतरने लगे हैं कि वस्तुतः शरीर का सारा संचालन अधिकांश इन देव शक्तियों-ग्रहों-उपग्रहों या सूक्ष्म आकाश भाग से ही होता है । “ओकाल्ट एनाटोमी एण्ड दि बाइबिल” पुस्तक में डॉ. कोराहन हेलिन ने-कोलम्बिया विश्व-विद्यालय के डॉ. लुहस वर्मन के निबन्ध-व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रन्थियाँ (ग्लैण्ड्स रेगुलेटिंग पर्सनालिटी) के हवाले से बताया है कि मनुष्य के शरीर में कुछ ऐसी ग्रन्थियाँ हैं जो देखने में छोटी होती हैं, पर उनका महत्व असाधारण है । पाचन क्रिया से लेकर मनोवेगों तक का सारा नियन्त्रण इन ग्रन्थियों से ही होता है। इन्हें वाहिनी हीन (डक्ट लेस) ग्रन्थियाँ (ग्लैण्ड्स) कहा जाता है। अंतःस्रावी हारमोन्स इन ग्रंथियों से ही स्रवित होकर शारीरिक उतार-चढ़ाव, घटना, बढ़ना, बुढ़ापा, मृत्यु आदि का कारण बनते हैं ।

एनाटोमी मेडिकल कालेज कर्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. चार्ल्स आर स्टार्क यार्ड ने इन ग्रन्थियों के आधार पर मनुष्य जीवन की एक नई धारणा प्रस्तुत की है, जो भारतीय आध्यात्मिक शोधों से शत-प्रतिशत मेल खाती है । षट्चक्रों की भारतीय खोज और जीव-शास्त्रियों द्वारा वर्णित सात ग्रन्थियों के क्रिया विज्ञान में कितना साम्य है। इसे कभी फिर लिखेंगे तो पाठक आश्चर्य करंगे। जिन बातों को विज्ञान ने अत्यन्त कुशल मशीनों द्वारा जाना, भारतीयों ने योग-साधनाओं द्वारा उससे भी अधिक आगे बढ़कर किस तरह प्राप्त कर लिया । डॉ. स्टाकर्ड लिखते हैं कि आन्तरिक स्राव वाली ग्रन्थियाँ एक महान् शासक के रूप में गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक स्त्रियों पुरुषों तथा समस्त रीढ़ की हड्डी वाले जीवों तक का नियन्त्रण करती है। “फिजियोलॉजी” तथा सोशलॉजी की मान्यतायें भी अब “अन्तराकाश” के अस्तित्व और उसके प्रचण्ड प्रभाव को स्वीकार करने लगे हैं। “ग्लैण्ड्स ऑफ डेस्टिनी” के लेखक डॉ. ईबो गैकी काव ने तो यहाँ तक मान लिया है कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (इन्डोक्राइन ग्लैण्ड्स) पर नियन्त्रण रखने वाले लोगों ने ही इतिहास पर अधिकार रखा है और जमाने को कहाँ से कहाँ बदल दिया है । नैपोलियन बोनापार्ट का उदाहरण देते हुये उन्होंने लिखा है कि यदि वाटरलू के युद्ध के समय नैपोलियन बोनापार्ट की “पिचुट्री ग्लैण्ड” (पीयूष ग्रन्थि) में खराबी नहीं आ जाती तो वह हारता नहीं। जो नैपोलियन अत्यन्त दूरदर्शी निर्णय भी तुरन्त ले लेने की क्षमता रखता था उसकी विवेक बुद्धि बुरी तरह लड़खड़ा गई । जिस समय वह एल्वा में निर्वासित था, उस समय उसकी लेगर्ड ग्रन्थि लड़खड़ा गई । यह सारी बातें तब प्रकाश में आई जब सेंट हेलेना में उसके शव की अन्त्य परीक्षा (पोस्ट मार्टम) की गई । जब तक उसने इन ग्रन्थियों पर नियन्त्रण रखा, जब तक उसकी अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ सशक्त रहीं, वह नैपोलियन सारी दुनिया को जीतता रहा पर जैसे ही वह इन शक्तियों से वंचित हुआ वह नष्ट ही हो गया ।

योग साधनायें इन देव-शक्तियों के विकास का ही वैज्ञानिक उपक्रम है । आने वाले दिनों में जबकि अंतःस्रावी ग्रन्थियों के पदार्थ (मैटर) की खोज होगी और उसकी तुलना ग्रहों के पदार्थ से की जायेगी तो लोग आश्चर्य करेंगे कि मनुष्य शरीर में आकाश तत्व किस विलक्षणता के साथ उपस्थित है और कितने आश्चर्यजनक ढंग से मनुष्य को अपनी इच्छा से बाँधें हुए है ।

“ओकाल्ट एनाटोमी एण्ड दि बाइबिल” पुस्तक के वैज्ञानिक लेखक ने उस तरह का तुलनात्मक अध्ययन, जिस तरह “कुण्डलिनी तन्त्र” में भारतीय योगियों ने किया है वैसा तो नहीं किया पर उसने माना है कि इन ग्रन्थियों का सम्बन्ध निश्चित रूप से नक्षत्रों (स्टार्स) से है । उन्होंने इन्हें “आन्तर्नक्षत्र” (इन्टीरियर स्टार्स) लिखा है और बताया है कि सूर्य और हरिग्रह पीनियल ग्लैण्ड से सम्बन्ध रखते हैं इसे तृतीय नेत्र ग्रन्थि भी कहा जाता है। उससे भ्रू-मध्य में “आज्ञा-चक्र” का ही स्पष्ट प्रमाण मिलता है आज्ञा-चक्र जागृत करने वाला “ऊँ” ध्वनि सुन सकता है । सब तरफ की दूरवर्ती घटनायें देख सुन सकता है । यह सूर्य शक्ति का प्रभाव है । वरुण और चन्द्र का सम्बन्ध ‘पिचुट्री ग्रन्थि’ से है । चन्द्रमा के उतार चढ़ाव से मन पर उतार चढ़ाव होता है। यह इन दोनों तत्त्वों की एकता का प्रमाण है। बृहस्पति का प्रभाव उपवृक्क (एड्रिलन) पर, मंगल का प्रभाव प्रजनन ग्रन्थि (गोनाड्स) पर, बुद्ध का प्रभाव गल ग्रन्थि (थायराइड्स) पर है। सूर्य का पैरा थायराइड्स (उपगल ग्रन्थि) से सम्बन्ध है। इन ग्रहों के उतार चढ़ाव इन ग्रन्थियों को प्रभावित करते हैं। रामायण में कहा गया है कि-

“उमादारु योषित की नाईं, सबहिं नचावत राम गोसाईं”

हे गोरी ! जिस प्रकार डोरी उँगलियों में बाँधकर कलाकार कठपुतली को नचाता है परमात्मा उसी प्रकार सारी सृष्टि को । उसमें इसी तथ्य का प्रतिपादन है । मनुष्य इस आकाशीय प्रक्रिया से बँधा हुआ नाचता रहता है ; पर जो लोग अपने इस सूक्ष्म शरीर को विकसित करके अपनी चेतना का उत्तरोत्तर विकास कर विराट् पुरुष से जोड़े देते हैं वे इन ग्रन्थियों पर, शरीर यन्त्र पर  उसी तरह नियन्त्रण कर सकते हैं, जिस तरह कोई अत्यन्त सुदूरवर्ती केन्द्रस्थ विराट तारा समस्त ब्रह्मांड का नियंत्रण करता है ।  आने वाली खोजें बतायेंगी कि सिद्ध योगी और ब्रह्मांड की-महाशक्ति में कोई अन्तर नहीं होता । पैरासेल्स ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है ।

कुछ समय पूर्व फ्राँस के क्लरमान्ट में ऐसी वर्षा हुई जिसे आज भी लोग लाल वर्षा या रक्त वर्षा के नाम से याद करते हैं । इस वर्षा में जो जल बरसा वह लाल रक्त के समान था । वैज्ञानिक आज तक इसका रहस्योद्घाटन नहीं कर पाये कि उसका कारण क्या था, किसी किसी का कहना था सहारा रेगिस्तान में लाल पत्थरों के महीन कण हवा में उड़ते हैं वह कण ही भाप के साथ मिल गये होंगे-उसी से यह वर्षा हुई । इस निष्कर्ष से लोग संतुष्ट नहीं हुये ; तथापि पदार्थ विज्ञान के अनुसार कोई न कोई दूरवर्ती कारण तो है ही जिसके कारण यह घटना घटी । मनुष्य जीवन में घटने वाली  शारीरिक, बौद्धिक घटनायें और विलक्षणतायें जो समझ में नहीं आतीं वे भी ऐसी ही सूक्ष्म हैं जो हमारे शरीर से प्रभावित होने पर भी समझ में नहीं आतीं । उन्हें तो तभी जाना - समझा जा सकता है, जबकि हमारी मनश्चेतना अत्यन्त सूक्ष्म और निर्मल होती हो । योग साधनाओं में मन को ही सूक्ष्म प्रखर और प्रकाश पूर्ण बनाया जाता है जिससे वह शरीर के अंग-प्रत्यंग का भेदन कर वहाँ की सूक्ष्म गतिविधियों का पता पा सके । शरीर में ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी विज्ञान के द्वारा जाना जा सका है । इन योग साधनाओं की वैज्ञानिक जाँच की जा सके तो मनुष्य जाति उन सूक्ष्म सत्यों से भी लाभान्वित हो सकती है, जिन्हें देववाद कहकर या भावनावाद कहकर ठुकरा दिया जाता है पर उनका महत्व इतना अधिक है कि मनुष्य का सारे का सारा जीवन ही इन्हीं के सहारे संचालित होता है ।

जिस तरह वह अफ्रीकन पौधा अपवाद है, मनुष्य का शरीर भी अपवाद और ईश्वरीय विलक्षणता से ओत-प्रोत है । इसमें ब्रह्मांड ही उतरा हुआ है । जो लोग इसे जान लेते हैं वह मुक्त हो जाते हैं, समर्थ हो जाते हैं । शरीर के नाश हो जाने पर भी उनका नाश नहीं होता । वे विराट् हो जाते हैं ।


अन्तरिक्ष से लेकर वृक्ष वनस्पति तक फैली आत्मा

एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया - आचार्य प्रवर ! विद्या और अविद्या में भेद क्या है ?

श्वेताश्वतरोपनिषद् का आचार्य उत्तर देता है-

“क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या ।”

हे तात ! नाशवान जड़ पदार्थ है वही अविद्या है तथा अविनाशी आत्मा ही विद्या रूप है ।

इसी उपनिषद् में अविनाशी आत्मा की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि-

अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः बुद्ध गुणेनात्मगुणेन चैव ।

आराग्र मात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।

भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥            -  श्वेता श्वतरोपनिषद ५/८-९

अर्थात्-तात ! वह अँगूठे जितना लघु होकर भी संकल्प-विकल्प युक्त (अर्थात् सोचता विचारता है) तथा अपनी बुद्धि के गुण से और श्रेष्ठ कर्मों के गुण से सुई के अग्रभाग जैसे आकार वाला हो गया है ऐसा सूर्य के समान तेजस्वी आत्मा भी ज्ञानियों ने देखा है । बाल के अग्रभाग के सौवें अंश से भी सौवें अंश परिमाण वाला भाग ही प्राणी का स्वरूप जानना चाहिये वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिमाण वाला आत्मा असीम गुणों वाला हो जाता है ।

इन दो ऋचाओं में शास्त्रकार ने जीवन के विराट-दर्शन को सूत्र-रूप में पिरो दिया है । प्रकट है कि शरीर दो प्रकार के परमाणुओं से बनता है। एक होते हैं जड़ दूसरे चेतन। जड़ परमाणु चूँकि स्थूल है इसलिये वह दिखाई देते हैं किन्तु चेतना एक प्रकार की तरंग, शक्ति और प्रकाश रूप है और देह में इस प्रकार सोखी हुई है जिस प्रकार सूखी मिट्टी का ढेला जल को जज्ब (सोख लेता है) कर लेता है । उसके अस्तित्व का प्रमाण बुद्धि है- उसी के न रहने पर शरीर सोचने विचारने की क्रियायें बन्द कर देता है । इस शक्ति का सांसारिक प्रयोजनों में खर्च करते रहने से वह नष्ट होती रहती है और जीव छोटा से छोटा (शरीर से भी और योनियों से भी ) होता चला जाता है। अनेक कल्पित रूपों में व अनेक शरीरों में वह तब तक भ्रमण करता रहता है जब तक श्रेष्ठ कर्मों के गुण से वह फिर से शक्ति संचय करता हुआ सूर्य के समान असीम और तेजस्वी नहीं हो जाता । यह भी कहा है कि ज्ञानियों ने उसे देखा है- ज्ञानियों ! सम्बोधन का अर्थ ही है ज्ञान-अर्थात् वह ज्ञान से ही देखा जा सकता है । ज्ञान कोई पदार्थ नहीं है वह निरपेक्ष अवस्था है अर्थात् जिस समय पदार्थ, समय, गति और कारण सभी एकाकार हो जाते हैं, ध्यान की उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है । ध्यान द्वारा ही वह आत्मा अपने प्रकाश रूप में दिखाई देता है ।

आज का विज्ञान यों आत्मा के अस्तित्व तक पहुँच गया है पर इसी ध्यान और अनुभूति (ज्ञान) के अभाव में वह इस तत्व को मानने को तैयार नहीं होता । मनुष्य शरीर जिन छोटी-छोटी प्रोटोप्लाज्मा की ईंटों से बना है वह दो भागों में विभक्त है-(1) नाभिक (न्यूक्लियस) (2) साइटोप्लाज्म, इसके अंतर्गत जल, कार्बन, नाइट्रोजन, आकाश आदि सभी पंच भौतिक ठोस द्रव तथा गैस अवस्था वाले पदार्थ पाये जाते हैं। विभिन्न प्राणधारियों के यहाँ तक कि मनुष्य-मनुष्य के साइटोप्लाज्म में भी फर्क होता है । यह वंशानुगत कारणों आहार पद्धति और जलवायु आदि पर आधारित है और परिवर्तनशील भी है । आहार के नियमों तथा एक स्थान से दूसरी जलवायु वाले स्थान में परिवर्तन के फलस्वरूप हमारे शरीरों के स्थूल भाग में अन्तर आ सकता है पर अभी तक चेतन की अर्थात् नाभिक की क्रियाओं पर विज्ञान कोई नियंत्रण नहीं पा सका अलबत्ता वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि नाभिक में ही मनुष्य की सारी बौद्धिक चेतना काम करती है । उसमें न केवल अमर व अविनाशी गुणसूत्र विद्यमान हैं वरन् वह सूत्र सारे ब्रह्मांड को नाप सकने की क्षमता से परिपूर्ण है । सारे शरीर में यह चैतन्य तत्व एक शक्ति, एक तरंग की भाँति विद्यमान है । उसी के न रहने पर शरीर नहीं रहता ।

यह चेतना ही है जो मनुष्य शरीर से लेकर सृष्टि के स्थूल कणों तक में व्याप्त हो रही है । जहाँ तक चेतना का अंश प्राकृतिक परमाणुओं से शक्तिशाली होता है वहाँ तक तो जड़ और चेतन का अन्तर स्पष्ट प्रतीत होता रहता है पर एक अवस्था ऐसी आती है जब जड़ता चेतनता का पूरी तरह घटाटोप हो जाती है ।यह वही अवस्था है जब चेतना पूर्ण रूप से जड़ गुणों वाली अर्थात् कंकड़-पत्थर जैसी स्थिति में चला जाता है । मुख्य रूप से सृष्टि की चेतना एक ही है पर वह गुणों का द्वारा क्रमशः जड़ होती चली गई है। जो जितना जड़ हो गया वह उतना ही उपभोग्य हो गया ; पर जिसने अपनी चेतना का जितना अधिक विकास किया, वही उतना उपभोक्ता होता चला जाता है ।

विकास शास्त्रियों ने मनुष्य को अन्यान्य जीवों का विकसित रूप बताया है । कहा नहीं जा सकता यह सिद्धांत कितना सच है किन्तु उन्होंने एक शरीर से दूसरे शरीर में विकास की जो कड़ियाँ बैठाई है वह दरअसल सराहनीय और परिश्रम का काम था । इसी सिद्धान्त से आज यह भी पुष्ट किया जा सकता है कि यह आत्मा ही जड़ व चेतन सर्वत्र गतिशील है । पेड़, पौधों को जड़ और चेतन के बीच की नीचे की कड़ी कहा जा सकता है और जीवित-ग्रहों को उच्च कड़ी । यह प्रतिपादन ही जड़ता से असीम चेतनता के विकास का प्रमाण माना जा सकता है ।

यही चेतना जड़ में भी जाती है इसका प्रमाण है वृक्ष। वृक्ष को शास्त्रों में जड़ चेतन की संधि योनि माना गया है । यलोस्टोन  नेशनल पार्क (अमरीका) में जहाँ उबलता पानी पृथ्वी से निकलता है वहाँ पर चारों ओर लाल रंग वैज्ञानिकों को हैरान किये रहा । ऐसा किन्हीं जलाशयों के किनारे नहीं मिलता। फिर इस लाल रंग का रहस्य क्या है यह जानने के लिये शोध प्रारम्भ हुई। तब पता चला कि यह काई न होकर जीवित पदार्थ है । इतनी तेज गर्मी में जहाँ कि मनुष्य का हाथ झुलस जाता है जीवन का अस्तित्व वैज्ञानिकों के लिये आश्चर्य की बात थी।  इस आश्चर्य में एक और भी आश्चर्य बाद में समझ में आया। वह यह था कि इस जीवित पदार्थ में जीवन और निर्जीवन दोनों के गुण विद्यमान हैं। यह फालयम स्यानोफाइटा वर्ग की एक “अलगी” है। सामान्यतः “अलगी” में नीला हरा-सा रंगीन द्रव (पिगमेंट) क्लोरोफिल के साथ रहता है पर कुछ में लाल रंग का भी द्रव होता है ।

फायलम यूग्लेनो फाइटा में भी पौधे व जन्तुओं दोनों के गुण पाये जाते हैं। इसमें “क्लोरोफ्लास्ट” (इसी में क्लोरोफिल नाम का हरा द्रव्य होता है जो मुख्यतः वृक्षों का गुण है) रहता है। यह इसके पौधा होने का प्रमाण है; लेकिन जिस प्रकार पौधों के कोशों (सेल्स) में दीवार (सेलवाल) होती है, उस तरह की दीवार इनमें नहीं होती वरन् इनके चारों ओर पहुँचा भोजन एन्जाइम्स के द्वारा पचाया जाता है । एन्जाइम्स ये स्वयं निकालते हैं । यह भोजन अन्धेरे में पचा सकते हैं। इनकी वृद्धि भी एक कोश से दूसरे कोश में होती है। कोशीय भित्ति (सेलवाल) के स्थान पर इनमें लचीली कोशीय झिल्ली होती है। वह ठोस भूमि पर संकुचित होती और फैलती है तो इस क्रिया द्वारा वह चल भी लेती है इनमें “आई स्पाट” भी होता है, जिससे यह विश्वास किया जाता है कि यह देखते भी हैं । इसके ही पास में एक छिद्रवाहिनी (वेक्यूल) होती है, वह पानी व भोजन चूसने तथा निकालने का भी काम करती है। वेक्यूल ज्यादातर एक कोशीय जन्तुओं में होता है। इनमें एक जीवधारी के पोषण (न्यूट्रिशन), ग्रहण पचाना (हालिजिक) तथा लैंगिक प्रजनन (सैक्सुअल रिप्रोडक्शन) गुण भी होते हैं । इन सभी उदाहरणों से यह विदित होता है कि जिसे वनस्पति घटक माना जाता है वह भी एक जीव की ही कोई अवस्था है । इसी प्रकार जीव धीरे-धीरे अपनी चेतनता के रहे-सहे अंश को छोड़ता हुआ एक दिन पूर्ण जड़ स्थिति में चला जाता है ।

जीवात्मा के उच्च श्रेणी विकास का प्रमाण है जीवित ग्रहों में “प्लाज्मा” की उपस्थिति। पृथ्वी के सभी जीवधारियों के शरीर ठोस और द्रव पदार्थों से बने हैं।  इन्हीं की एक अवस्था है गैस । एक पदार्थ का आयतन जितना सघन होगा वस्तु उतनी ही ठोस होगी पर जितना-जितना वह द्रव तथा गैस रूप में आती जायेगी उसका आयतन बढ़ता जायेगा । ठोस की शक्ति से गैस की शक्ति बड़ी होती है पर गुणों की दृष्टि से गैस में भी ठोस के गुण रहते हैं । वैज्ञानिक अब यह भी मानने लगे है कि जीवन केवल ठोस स्थिति में ही नहीं, द्रव व गैस की अवस्था में भी रह सकता है । वैज्ञानिकों को ऐसे प्रमाण मिले हैं कि जब पृथ्वी तप्त तवे के समान जल रही थी, तब भी एक कोषीय जीव पृथ्वी पर उपलब्ध थे । और अब एक नई शक्ति “प्लाज्मा” के ज्ञान ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि यदि गैस स्थिति में जीवन रह सकता है तो प्लाज्मा में भी रह सकता है। प्लाज्मा “प्राण शक्ति” का वैज्ञानिक नाम है। इसे सूक्ष्म शरीर या प्रकाश शरीर कहा जाता है । विज्ञान के अनुसार प्लाज्मा कोई विशिष्ट वस्तु न होकर ठोस-द्रव तथा गैस की तरह ही पदार्थ की चौथी अवस्था है (हिन्दी डाइजेस्ट सन् 1962 अप्रैल अंक पेज 69) आकाश में चमकते हुये तारे प्लाज्मा ही है । यह प्लाज्मा एक प्रकार का ईंधन या आहार ही है। तारागण उसे किस प्रकार ग्रहण करके अपना जीवन धारण किये हुये हैं। अभी तक वैज्ञानिक यह जानने में समर्थ नहीं हो पाये पर विशिष्ट तत्वों से प्लाज्मा का निर्माण करके उन्होंने यह सिद्ध अवश्य कर दिया है कि जिस प्रकार हमारे शरीरों में नाभिकीय द्रव्य की उपस्थिति से ही साइटोप्लाज्मा का निर्माण होता है, उसी प्रकार हमारे सितारों में भी नाभिकीय गुण होने चाहिये। यदि ऐसा है तो फिर उन्हें भी जीवधारी ही मानना चाहिये जैसा कि भारतीय आर्ष-ग्रन्थों में सूर्य को आत्मा,  चन्द्रमा पृथ्वी आदि को भी देवता कहा है।

प्लाज्मा अत्यन्त सूक्ष्म होने पर भी अत्यन्त शक्तिशाली पदार्थ है। एक पौण्ड नाइट्रोजन के प्लाज्मा से एक इंजिन पूरे एक वर्ष तक चल सकता है । गैस को अत्यधिक गर्म करने से इलेक्ट्रान तीव्र गति करते हैं और एक परमाणु का इलेक्ट्रान टूट कर अलग हो जाता है व अन्य परमाणु आयन बन जाता है । यह आयनी भूत गैस ही प्लाज्मा कहलाती है । आजकल विद्युत तारों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थानों पर ले जाई जाती है पर प्लाज्मा के बारे में ज्ञान से वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं  कि यह विज्ञान जब पूरी तरह विकसित हो जायेगा तो तारों के झंझट से मुक्ति मिल जायेगी। तब केवल चुम्बकीय आकर्षण द्वारा कहीं भी शक्ति पैदा कर ली जा सकेगी ।

प्लाज्मा एक प्रकार का प्रकाश और तापयुक्त प्राण ही है । मनुष्य शरीर से लेकर अन्य चेतन धारियों में वही शक्ति जीवन का आधार है। इसी शक्ति के पतन से मनुष्य लघुतम बनता है तो इसी के विकास से वह सूर्य जैसी महान् गुणों वाली चेतना में अपना विकास करके विराट् बन जाता है । इसी का नाम विद्या है। इस विद्या की प्राप्ति के लिये ही भारतीय आचार्यों ने अनेक साधनायें विकसित की हैं। प्लाज्मा की शक्ति से ही अनुमान किया जा सकता है कि आत्म-शक्ति के सूक्ष्म या प्रकाशीय विकास द्वारा मनुष्य कितना समर्थ व शक्तिशाली बन सकता है । जबकि आज का विज्ञान केवल जड़ की व्याख्या और उसी के याँत्रिक नियंत्रण में लगा है। यही अविद्या है । अविद्या को हटाकर विद्या की प्राप्ति कर सकें तो शास्त्रकार के कथन के अनुसार अंगुष्ठ मात्र प्राणी सूर्य जैसा विराट् बन सकता है ।


लघु कहानी - परमहंस देव का मन

तोतापुरी जी ने अपने चमकते हुए पीतल के लोटे की तरफ संकेत करते हुए कहा- “देखिए, यह लोटा कैसा चमचमा रहा है । यदि इसे रोज माँजा न जाय तो इस पर मैल चढ़ जायेगा । यही दशा मन की भी है । यदि ध्यान धारणा आदि द्वारा मन को निरन्तर स्वच्छ न किया जाय, तो उस पर भी मैल चढ़ जायगा और उसकी दमक का स्थान मलिनता ले लेगी ।”

परमहंस देव ने हँसकर कहा “किन्तु महाराज ! यदि यही लोटा सोने का हो-तब तो मलिन होने की कोई सम्भावना नहीं” तोतापुरी समझ गये, परमहंस का मन वास्तव में स्वर्ण-कांति जैसा ही देदीप्यमान तथा अपरिवर्तनशील है ।


दृश्य और अदृश्य का संधि द्वार- स्वप्न

“स्वप्न-समीक्षा” (इंटरप्रिटेशन ऑफ़ ड्रीम्स) नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानवेत्ता डॉ. फ्रायड एक घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं -

“मेरे शहर के एक सम्भ्रान्त व्यक्ति के पुत्र का देहावसान हो गया । रात में अन्त्येष्टि सम्भव नहीं थी। अतएव प्रातःकाल अंत्येष्टि का निर्णय कर लाश के चारों तरफ मोमबत्तियां जलाकर रख दी गईं। एक व्यक्ति को पहरे पर नियुक्त कर मृतक का पिता अपने कमरे में जा, सो रहा । निद्रा के प्रवेश किये थोड़ा समय ही हुआ था कि पिता ने स्वप्न में देखा-उसका लड़का सामने खड़ा कह रहा है- बाबा ! तुम यहाँ सो रहे हो और मैं जल रहा हूँ, मेरा शरीर यहीं जल जाने दोगे क्या ? यह स्वप्न देखते ही पिता की नींद टूट गई। खिड़की से झाँककर देखा तो जिस कमरे में बच्चे का शव रखा हुआ था, तेज प्रकाश दिखाई दिया। अज्ञात आशंका से पिता वहाँ दौड़कर गया और देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि पहरे वाला व्यक्ति अलग हटकर सो गया है और मोमबत्ती गिर जाने से कफ़न में आग लग चुकी है । थोड़ी देर और पहुँचना न होता तो लाश का क्या, घर का ही पता न चलता । जलकर खाक हो जाता !

डॉ. फ्रायड ने स्वप्नों की गम्भीर समीक्षाएं की हैं और उन्हें अधिकांश मन में दबी हुई वासनाओं की अवचेतन मन में काल्पनिक स्थिति माना है । फ्रायड का कथन है कि मनुष्य दिन भर अनेक तरह की इच्छायें किया करता है, किन्तु साधनों के अभाव, सामाजिक प्रतिबन्ध, कानून के भय आदि के कारण वह इच्छाएँ पूरी नहीं कर पाता। मन स्वप्नावस्था में इन दमित इच्छाओं की ही मनचीती किया करता है । इस सम्बन्ध में निःसन्देह फ्रायड के तर्क और प्रस्तुत घटनायें जोरदार हैं, हमारे अधिकांश हलके स्वप्न सचमुच शरीर की गड़बड़ी, मन की दबी हुई इच्छाओं के द्योतक होते हैं; किन्तु इस तरह के उदाहरण के बाद, जैसा कि इस लेख की आरम्भिक पंक्तियों में दिया गया है-फ्रायड ने स्वीकार किया है कि स्वप्न का संसार दृश्य जगत तक और मन की स्थूल वासनाजन्य कल्पनाओं तक सीमित किया जाना भूल ही होगी; अलबत्ता हम यह नहीं जानते कि जो स्वप्न भविष्य में हू-बहू सत्य हो जाते हैं उनका रहस्य क्या है।

(1)स्वप्न में मनुष्य अपने आपको उड़ता हुआ देखता है ? फ्रायड ने उत्तर दिया-चिड़ियों को, जहाजों को उड़ते देखकर मन में स्वयं उड़ने की इच्छा आई होगी पर मनुष्य शरीर से उड़ना सम्भव न होने के कारण वह इच्छा जागृत अवस्था में दब गई और स्वप्न में उसी ने उड़ने का रूप ले लिया ।

(2)स्वप्न में मनुष्य ऊपर से गिरता क्यों अनुभव करता है ?-फ्रायड की बुद्धि ही तो थी-बुद्धि तो समुद्र की सतह तक की खोजकर लाती है। फिर इस प्रश्न का तुक्का मिलाना उसके लिए कितनी बड़ी बात थी । फ्रायड बोले-मनुष्य बन्दरों की सन्तान है, बन्दर जंगलों में रहते थे और पेड़ों पर सोते थे । कभी उन्हें अच्छा आसन नहीं मिल पाता था तो वे सोते-सोते जमीन पर गिर जाते थे । बन्दर से विकसित होकर मन मनुष्य बन गया पर उसके संस्कारों में छाया, वह पेड़ में गिरने का भय न गया-उसी भय का परिणाम है कि मनुष्य सोते समय गिरने के दृश्य देखता है ?

फ्रायड की इस तरह की व्याख्याओं में सम्भव है कुछ दम हो। मन की अपनी कल्पनाओं का महत्व कम नहीं। हमारी ज्ञात कल्पनायें स्वप्न जगत का सृजन करती हो तो आश्चर्य क्या ? किन्तु छोटे से छोटे व्यक्ति से लेकर आइंस्टीन एलियंस होवे के जीवन तक में ऐसी घटनायें आईं जब उन्होंने जटिल समस्याओं के हल स्वप्न जगत में पाये । प्रसिद्ध रसायनज्ञ बोलर ने जीव-रसायन और कार्बनिक रसायन के अन्तर को स्पष्ट करते हुए बताया था कि प्रत्येक जीवधारी के शरीर में लाखों यौगिक पाये जाते हैं, उन सभी में कार्बन अनिवार्य रूप से रहता है। यही नहीं सभी जीवित कोष कार्बन के गुणों पर भी आधारित रहते हैं। यह एक जबर्दस्त प्रयोग था जो दो प्रकार की चेतनाओं के अस्तित्व को स्वीकार करता है। जीव-चेतना के अतिरिक्त प्रकृति की चेतना भी । इसे भारतीय शास्त्रों में आत्मा और मन कह सकते हैं, आत्मा जैसे गुणों वाला होकर भी मन का उसी प्रकार  स्थूल किन्तु आत्मा से सम्बन्ध है जैसे कार्बन की प्रत्येक जीव चेतना में उपस्थिति । यह ज्ञात हो जाने के बाद ‘कार्बनिक-रसायन’, रसायन विज्ञान का एक स्वतन्त्र क्षेत्र ही बन गया किन्तु कार्बन परमाणुओं की रचना और उनके वलय का रहस्य वैज्ञानिक तब तक भी न जान पाये थे जब तक कि उसके 700000 से अधिक कार्बन-यौगिक ढूँढ लिये गये थे । यह समस्या हल न हुई होती यदि जर्मनी के प्रसिद्ध रसायनज्ञ डॉ. फ्रेडरिक कैकेलू ने एक महत्वपूर्ण स्वप्न नहीं देखा होता जिसमें 6 कार्बन परमाणुओं को नाचते देखकर कैकूले ने कार्बन परमाणु की संरचना का ज्ञान प्राप्त किया था । इस तरह स्वप्न का योगदान मनुष्य जीवन से उतना ही नहीं है जितना हमारी स्थूल बुद्धि उसे जानती है । या जितना हम मानव मन की स्थूल व्याख्या करने से जान पाते हैं ।

अमेरिका का एक साधारण गृहस्थ चार्ल्स फिलमोर ईश्वरभक्त था, सच्चा और सरल व्यक्ति था। कहा जा सकता है इसी कारण उसके स्वप्न भी सात्विक होते रहे होंगे; किन्तु एक रात फिलमोर जब सो रहे थे उन्होंने एक स्वप्न देखा-एक अज्ञात शक्ति ने कहा तुम मेरे पीछे-पीछे आओ। फिलमोर पीछे-पीछे चल पड़े। अपने स्वप्न का वर्णन करते हुये वे स्वयं लिखते हैं - मैं एक शहर में पहुँचा, वह शहर मैंने पहले भी देखा था । इसलिये मुझे साफ पता चल गया कि यह ‘कंसास’ (अमेरिका का एक शहर ) है। फिर मुझे एक स्थान पर ले जाया गया। उस स्थान के बारे में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं था पर मुझे मेरे मार्ग-दर्शक ने बताया-यहीं पर तुम्हें काम करना है-उसने एक अखबार दिखाया। जब तक उसका पहला अक्षर “यू” पढ़ने में आये कई और अखबार उसके हाथ में दिखे और नींद टूट गई ।

चार्ल्स फिलमोर एक ईश्वर विश्वासी भक्त व्यक्ति थे। उन दिनों वे ध्यान-साधना का अभ्यास कर रहे थे । उन्होंने कई प्रभावशाली व्यक्तियों को ध्यान की एकाग्रता द्वारा अच्छा करके स्वस्थ किया था। अतएव उन्हें लोग एक सन्त के रूप में प्रतिष्ठा देते थे; पर उन्हें ऐसा कोई ख्याल नहीं आया था कि “प्रार्थना और ध्यान साधना का प्रसार करना चाहिये । एक दिन कुछ लोग स्वयं ही उनके पास आये और उक्त योजना उनके सामने रखी वहीं पर ‘मौन मिलन समाज’ (सोसायटी आफ साइलेंट यूनिटी) नामक संस्था का श्रीगणेश किया गया । उसके लिये कार्यालय खोलने की बात आई तो कंसास शहर चुना गया । वही स्थान जो फिलमोर ने स्वप्न में देखा था । अखबार निकाला गया,  उसका नाम”यू” से बनने वाला दी-”यूनिटी” रखा गया। पीछे वहाँ से कई एक पत्र-पत्रिकायें छपीं जिनकी फिलमोर ने कभी कल्पना भी न की थी ।

स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति । तस्य वा एतस्य पुरूषस्य द्वे एव स्थाने भवतः इदं च परलोक स्थानं च संध्यं तृतीयं स्वप्न स्थानं तस्मिन्सन्धे स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोक स्थानं च ॥  -वृहदारण्यक ४/३/९

अर्थात्-वह आत्मा ही स्वप्न अवस्था में जाकर इस लोक का अतिक्रमण करता है। इस पुरुष के दो स्थान होते हैं- एक तो यह लोक दूसरा परलोक और तीसरा संधि स्थान । यह संधि स्थान जहाँ से इस लोक को भी देखा जा सकता है उस लोक को भी। इसे स्वप्न स्थान कहते हैं ।

दो कमरों के बीच दरवाजे पर खड़ा मनुष्य जिस प्रकार इस कमरे को भी देख सकता है उस कमरे को भी, इसी प्रकार स्वप्न में जीव-चेतना मन अपने दृश्य जगत सम्बन्धित कल्पना तरंगों के चित्र भी देख सकती है और आत्मा के अदृश्य विराट जगत में झाँककर भूत और भविष्य की उन गहराइयों तक की भी थाह ले सकती है जो समय और ब्रह्मांड की सीमा से परे केवल विश्व-व्यापी मूल चेतना में ही घटित होते रहते हैं। जो स्वप्न जितना गहरा और भावनाओं के साथ दिखता है वह इस अदृश्य जगत की उतनी ही गहरी अनुभूतियाँ पकड़ लाता है। योगियों का मन अत्यन्त सूक्ष्म हो जाने और प्रगाढ़ निद्रा आने के कारण वे अपने मन को आत्मा के व्यापक क्षेत्र में प्रविष्ट कराकर स्वप्न में आत्म जगत का आनन्द ही नहीं लिया करते वरन् अपने भूत को जानकर वर्तमान को सुधारने और भविष्य को जानकर होतव्यता से बचने का भी उपक्रम करते रहते हैं। इसलिये योगी “अविजित” रहता है। उस पर सांसारिक परिस्थितियाँ हावी नहीं होने पातीं । वह उन पर स्वयं ही हावी बना रहता है । स्वप्न ने ही योगी को इस शरीर में रहते हुए विराट आत्मा के रहस्य खोले हैं, जो मन को अधिक पवित्र और सूक्ष्म बनाने के साथ स्वतः खुलते जाते हैं -

य एष स्वप्ने महीप मानश्च रव्येष आत्मेति । -छान्दोग्य उपनिषद  ८ /१० /१

तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्त सप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्मेष आत्मेति ॥ -छान्दोग्य उपनिषद्  ८ /११ /१

अर्थात्-स्वप्न में जो अपने गौरव के साथ व्यक्त होता है वह आत्मा है । प्रगाढ़ निद्रा में आनन्दित होता हुआ जो उस स्वप्न से भी बढ़कर शाश्वत है वह आत्मा है, उसका कभी अन्त नहीं होता ।

विज्ञान की भाषा में आत्मा को एक सर्वव्यापी विद्युत (यूनिवर्सल वायटैलिटी) और मन जो कि शरीर के स्थूल अंश की चेतना है, उसे  सीमाबद्ध विद्युत कह सकते हैं । रेडियो की विद्युत को यन्त्रों के द्वारा (एक फ्रीक्वेंसी पर) किसी भी रेडियो स्टेशन की तरंगों से मिलाकर वहाँ की गतिविधियों का ज्ञान कर लेते हैं । उसी प्रकार मन द्वारा भी विश्वव्यापी चेतना का परिभ्रमण, दर्शन और ज्ञान की अनुभूति का नाम स्वप्न है । मन विद्युत को जितना सूक्ष्म और उच्च स्तर का बनाया जा सकता है उतनी ही सत्य अनुभूतियाँ उपलब्ध की जा सकती हैं पर इस सिद्धान्त में कोई सन्देह नहीं । स्वप्नों के सत्य पूर्वाभास इसी वैज्ञानिक सत्य का समर्थन करते हैं, और आत्मा की शोध व उसके विकास का मार्ग प्रस्तुत करते हैं । स्वप्न केवल मन की दमित इच्छाओं का प्रतीक ही नहीं, वह काल, ब्रह्मांड और गति से परे का दर्शन और विज्ञान है। उससे वर्तमान जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने, (2) अब तक लाखों वर्षों, हजारों योनियों में भ्रमित जीवन के स्वरूप और (3) भविष्य -ज्ञान के महत्वपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन और विकास करने का एक अत्यन्त उच्चकोटि का शोध कार्य सम्पन्न किया जा सकता है । उससे विज्ञान को भी नई दिशायें मिल सकती हैं। विभिन्न प्रकार के स्वप्नों का वर्गीकरण करके न केवल मानवीय जीवन की गहराइयाँ खोजी जा सकती है बल्कि आत्म-विश्लेषण भी किया जा सकता है और दूसरों का मार्ग-दर्शन भी ।


सद्वाक्य एवं लघु कहानी - सन्त एकनाथ

सद्वाक्य -

जो प्रकट है उतना ही विज्ञान नहीं वरन अप्रकट का विज्ञान भी जबरदस्त है यदि उसे भुलाया गया तो इसे वैज्ञानिक अन्धविश्वास ही कहा जाएगा । -रोम्या रोलां

लघु कहानी -

कुछ ग्रामीण एक साँप को मार रहे थे, तभी उधर आ पहुँचे सन्त एकनाथ और बोले भाइयो ! इसे क्यों पीट रहे हो-कर्मवश सर्प होने से क्या ? यह भी आत्मा ही तो है । एक युवक ने कहा-आत्मा है तो फिर काटता क्यों है ? एकनाथ ने कहा-तुम लोग सर्प को न मारो तो वह तुम्हें क्यों काटेगा ? लोगों के एकनाथ के कहने से सर्प को छोड़ दिया ।

कुछ दिन पीछे एकनाथ अँधेरे में नदी स्नान करने जा रहे थे । तभी उन्हें सामने फन फैलाये खड़ा सर्प दिखाई दिया। उन्होंने उसे बहुत हटाना चाहा पर वह टस से मस न हुआ । एकनाथ मुड़कर दूसरे घाट स्नान करने चले गये । उजाला होने पर लौटे तो देखा बरसात के कारण वहाँ एक गहरा खड्डा हो गया है । सर्प ने न बचाया होता तो एकनाथ उसमें कब के समा चुके होते ।


आत्मजयी विजयी भव

आपकी विजय सराहनीय है महाराज ! आप सचमुच वीर हैं। ऐसा न होता तो आप गालव नरेश को तीन दिन में ही कैसे जीत लेते-राजपुरोहित पर्णिक ने महाराज सिंधुराज की ओर देख किंचित मुस्कराते हुए कहा। बात का क्रम आगे बढ़ाये हुये वे बोले-किन्तु महाराज ! सेना की विजय से भी बढ़कर विजय मन की है। जो काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी सांसारिक ऐषणाओं को जीत लेता है वही सच्चा शूरवीर है । उस विजय के आगे यह रक्तपात वाली, हिंसा वाली, शक्ति वाली विजय तुच्छ और नगण्य सी लगती है ।

महाराज सिन्धुराज ने केवल परिचारक को देखते हुये कहा-’आचार्य प्रवर’ हम वैसी विजय भी करके दिखला सकते हैं। आपने लगता है हमारे पराक्रम का मूल्यांकन नहीं किया-सम्राट के स्वर में अहं मिश्रित रूखापन था ।

राज पुरोहित पर्णिक की सूक्ष्म दृष्टि महाराज के उस मनोविकार को ही तोड़ रही थी इसलिये वे निःशंक बोले-आपके पराक्रम को कौन नहीं जानता आर्य श्रेष्ठ ! आपको सिंहासन पर आसीन हुये अभी दशक ही तो बीता है। इस बीच आपने कलिंग, अरस्ट्रास, मालव, विन्ध्य, पंचनद सभी प्रान्त जीत डाले, क्या यह सब पराक्रमी होने का प्रमाण नहीं ! किन्तु यदि आप एकबार महर्षि बेन के दर्शन करके आते तो पता चलता कि वे आपसे भी कहीं अधिक पराक्रमी हैं, विजयी हैं। उन्होंने राग-द्वेष व सम्पूर्ण ऐषणाओं पर विजय पा ली है ।

सिन्धुराज को अपने - सामने वह भी राज पुरोहित के मुख से किसी और की प्रशंसा अच्छी न लगी । उन दिनों राज पुरोहित राज्य की आचार संहिता के नियंत्रक हुआ करते थे । सिन्धुराज उनका कुछ कर ही नहीं सकते थे। तो भी उन्होंने महर्षि बेन के दर्शन करने का निश्चय कर लिया ।

सूर्योदय होने में अभी थोड़ा विलम्ब था। महाराज सिंधुराज अस्तबल पहुँचे। वहाँ उनका अश्व सजा हुआ तैयार था वे उस पर आरूढ़ होकर महर्षि बेन के आश्रम की ओर चल पड़े । मार्ग में उन्हें एक वृद्ध जन दिखाई दिये। वे मार्ग में पड़े काँटे साफ कर रहे थे, कँटीली झाड़ियाँ काटकर उन्हें दूर फेंक रहे थे । उन्हें देखकर महाराज ने उनको रोका और पूछा-महान् तपस्वी बेन का आश्रम किधर है, ओ वृद्ध ।

वृद्ध ने एकबार महाराज की ओर देखा फिर अपने काम में जुट गये-महाराज को यह अवहेलना अखरी। उनका अहंकार जाग पड़ा, बोले-शठ देखता नहीं मैं यहाँ का सम्राट हूँ, बता-बेन का आश्रम किधर है । वृद्ध ने पुनः आँखें उठाई - ओठों पर एक हलकी मुस्कराहट तो आई फिर वे उसी तरह अपने काम में जुट गये । महाराज का क्रोध सीमा पार कर गया । घोड़े को वृद्ध की ओर दौड़ा दिया। उन्हें रौंदता हुआ घोड़ा आगे बढ़ गया । इस बीच महाराज ने अपनी चाबुक से वृद्ध पर प्रहार भी किया और अपशब्द कहते हुये आगे बढ़ गये । वे अभी थोड़ा ही आगे गये कि महर्षि की प्रतीक्षा करते खड़े उनके शिष्य दिखाई दिया। महाराज ने पूछा-आपके गुरु बेन कहाँ है-शिष्यों ने बताया कि वे प्रतिदिन हम लोगों से पूर्व ही उठकर मार्ग साफ करने निकल जाते हैं। आप जिधर से आये उधर ही तो होंगे वे !

और तब महाराज का क्रोध पश्चात्ताप में बदल गया। वे उन्हीं पैरों लौटेत् महर्षि उठकर खड़े हो गये थे, कटी हुई झाड़ियाँ ठिकाने लगा रहे थे । घोड़े से उतर कर महाराज उनके चरणों पर गिर कर क्षमा माँगने लगे- बोले भगवन् ! पहले ही बता देते कि आप ही महर्षि है तो वह अपराध क्यों होता ?

बेन मुस्कराये । बोले बेटा ! तूने मेरी प्रशंसा की, उससे मन में अहंकार उठा, उसे-मारने की लिये यह आवश्यक ही था । तेरा उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगा । महाराज सिन्धुराज पानी-पानी हो गये ; उन्होंने अनुभव किया सच्ची वीरता दूसरों को नहीं अपने को जीतने में है ।


बुद्धि के सुन्दरतम उपयोग ही-धर्म

मनुष्य और अन्य जीव-जन्तुओं की शारीरिक रचना में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं है । दो हाथ, दो पाँव मनुष्य के भी होते हैं पशुओं के भी । नाक के दो नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुँह, दाँत, जीभ, पेट, अस्थि पिंजर, पीठ, चमड़ी, बाल, जननेन्द्रियाँ मनुष्य के अतिरिक्त जीव-जन्तुओं और पक्षियों में भी पाये जाते हैं । अन्तर बहुत थोड़ा है । इन समानताओं के आधार पर ही मनुष्य को सामाजिक पशु (मैन इज दी सोशल ऐनीमल) कहा जाता है । कुछ साधारण अपवादों को छोड़कर मनुष्य और पशु-पक्षियों की शारीरिक रचना में कोई बड़ा अन्तर नहीं है ।

मनुष्य जिस कारण भिन्न श्रेणी का पशु है वह उसकी “बुद्धिशीलता” है । यों बुद्धि, और जीवों को भी मिली है पर दूरदर्शी निष्कर्ष केवल मनुष्य ही निकाल सकता है । गृहस्थ-सम्बन्ध पशु-पक्षी भी स्थापित कर लेते हैं, अंडे, बच्चे देना उन्हें भी आता है, कारीगरी नहीं जानते तो न सही पर मकान बनाने की आवश्यकता से वे भी अनभिज्ञ नहीं । बया पक्षी का घोंसला तो इंजीनियरों की बुद्धि को भी मात देता है । मकड़ी अपना मकान ऐसा व्यवस्थित बनाती है कि कुशल भवन निर्माता भी दाँतों तले उँगली दबाते हैं । मकड़ी किसी ऊँची दीवाल, वृक्ष या बिजली के खम्भे पर चढ़ती है और देखती है हवा किधर चल रही है । फिर उधर ही बिना माध्यम के उड़कर चलती हुई दो ऐसे उपयुक्त स्थानों को जोड़कर ऐसा आलीशान बँगला तैयार कर लेती है जैसा हवाई बँगला मनुष्य आज तक नहीं तैयार कर पाया ।

किन्तु मनुष्येतर प्राणियों की यह सारी सूझ-बूझ थोड़े समय के घिराव में ही होती है । उन्हें यह पता नहीं होता कि वृद्धावस्था के लिये एक निष्ठावान् साथी आवश्यक है;  इसलिये विवाह करके रहना चाहिये । उन्हें मौसम का ज्ञान नहीं होता इसलिये अच्छे-अच्छे मकान भी आये दिन गिराने पड़ते हैं । उन्हें धर्म और संस्कृति की, समानता, एकता और संगठन की महत्ता मालूम नहीं; इसलिये बच्चा सयाना होते ही कहीं दूर चला जाता है और वे असहाय सा जीवन बिताते रहते हैं ।

दूर का निर्णय लेने की योग्यता केवल मनुष्य में ही है । जीवों के रहन-सहन और इतिहास के लम्बे अनुभवों के आधार पर दूरगामी निष्कर्ष निकल लेने की क्षमता के आधार पर ही मनुष्य एक सर्वांगपूर्ण जीवन पद्धति विकसित कर सका । विवेकपूर्ण भूत और भविष्य को वर्तमान के केन्द्रबिन्दु पर एकाकार करने की क्षमता के कारण ही मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी सिद्ध हुआ हाथी, घोड़े, बैल, भैंस जैसे बलवान् जीवों को भी वह अपने नियन्त्रण में रखने लगा ।

बहुत दूर तक सोचने-विचारने और तदनुरूप आचरण करने की इसी क्षमता का नाम धर्म है । उसमें तत्त्वदर्शन भी आता है और सांस्कृतिक आचार संहिताएँ भी । कोलम्बस का समुद्री जहाज जब सबसे पहले अमेरिका पहुँचा, वहाँ के आदिवासियों ने जहाज को बड़े कौतूहल के साथ देखा । उनके लिये वह बिलकुल नई वस्तु थी । उन्होंने कोलम्बस से जहाज कैसे चलता है, कितने लोग बैठ सकते हैं, आँधी-तूफान से उसे कैसे बचाया जा सकता है यही प्रश्न नहीं पूछे वरन् यह भी पूछा कि जहाज आया कहाँ से, उसे किन-किन वस्तुओं से कैसे-कैसे बनाया गया ?

ऐसे यह सृष्टि क्या है, उसे किसने बनाया, मनुष्य क्या है, मृत्यु के बाद वह कहाँ चला जाता है आदि दार्शनिक जिज्ञासायें और उनकी जानकारियाँ भी धर्म है पर उनका सम्पूर्ण आधार बुद्धि का समुचित उपयोग भी है । ज्ञान के रूप में, विवेक और विचार के रूप में मिली मनुष्य की यह संपत्ति रहस्यपूर्ण तो है पर बड़े महत्त्व की है । उन सम्पूर्ण रहस्यों को खोजा भी इसी से जा सकता है और मनुष्य जीवन के उद्देश्य को भी इसी से प्राप्त किया जा सकता है । बुद्धि का उपयोग करना न आता होता तो मनुष्य उस भेड़िये बालक रामू की तरह होता जो शरीर से तो मनुष्य था पर भेड़ियों के साथ रहने के कारण उसकी विचार क्षमतायें पशुवत् हो गई थीं और वह अपने बारे में भी कुछ सही निर्णय नहीं ले सकता था ।

जब तक मनुष्य जाति इस ज्ञान की - बुद्धि और विवेक की शक्ति की महत्ता समझती रही, उसका उपयोग और विकास करती रही, तब तक यह संसार बड़ा सुखी रहा । दूरदर्शी परिणामों को दृष्टि में ला सकने के कारण वह उन सभी पशु प्रवृत्तियों से बचा रहा जो जीवन का सुख, सुरक्षा और शांति भंग करती थी । पर धीरे-धीरे उसकी बुद्धि ने पलटा खाया । वह ज्ञान की अपेक्षा पदार्थ में अधिक सुख अनुभव करने लगा । उसे दूरवर्ती परिणाम सोचने में कुछ, अटपट दिखाई दी ; इसलिये तात्कालिक सुखों की स्पर्द्धा हुई । उसके लिये यन्त्रों पर यन्त्रों का, मशीनों पर मशीनों का विकास हुआ । सुख को ज्ञान और भावनाओं में ढूँढ़ने की अपेक्षा भौतिक साधनों में ढूँढ़ने के कारण उसकी वही बुद्धि साधनों के अम्बार लगाती चली गई, जो अब तक मनुष्य को आत्मा से परमात्मा तक, ससीम से असीम, अणु से विभु तक पहुँचा दिया करती थी । जैसे-जैसे मनुष्य प्रकृति में सुख ढूंढने लगा, वह पदार्थों की जड़ता के बन्धन में पड़ने लगा । ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ-पाखण्ड, स्वच्छन्दतावाद सामन्तवाद आदि बुराइयों में जकड़ता गया । कहने को आज का संसार बहुत चतुर और बुद्धिशील है पर वह दुःखी और अशान्त भी उतना ही है इसका कारण अपनी बुद्धि का दूरदर्शी उपयोग न करना ही था ।

अमेरिका के एक द्वीप (आइलैंड) के लोग अपने आपको संसार का सबसे सभ्य एवं सुसंस्कृत मानते हैं । यहाँ लोगों ने कामुकता को जीवन का सुख माना । उन बन्धनों, मर्यादाओं को तोड़ दिया जो इस मार्ग में आड़े पड़ रही थी । वहाँ के लोग वस्त्र तक नहीं पहनते यौन विषय उन्हें अनिवार्यतः पढ़ाये जाते हैं । यौन सदाचार की कोई मर्यादा उन्होंने नहीं रखी ।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के अध्यक्ष डॉ. ग्राहम ब्लेन ने इन परिस्थितियों के विस्तृत अध्ययन के बाद बताया कि परिवर्तित दृष्टिकोण का एक परिणाम यह हुआ कि सन्तति निरोध की प्रभावशाली विधियों में वृद्धि के बावजूद भी आजकल अमरीका में अठारह में से एक बच्चा ऐसा होता है जिसे जन्म देने वाले माता-पिता विवाहित नहीं होते । 1953 में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार ऐसी युवतियों की संख्या 50 प्रतिशत थी जबकि युवकों की 67 प्रतिशत । इस बात को वहाँ का प्रत्येक नागरिक समझता है । इसलिये विवाह के बाद पति-पत्नी कभी विश्वास का जीवन नहीं जी पाते। उनमें आये दिन छोटी-छोटी बातों में झगड़े और तलाक होते हैं । हम मानते हैं यौन-सदाचार के मामले में हमारा संकट बुद्धि के गलत उपयोग के कारण बढ़ा है ।

यह एक छोटा सा उदाहरण है जो यह बताता है कि बुद्धि जैसी बहुमूल्य संपत्ति पाकर भी मनुष्य में अपने तरह से दूरगामी विचार करने की क्षमता का नितान्त अभाव होने के कारण मनुष्य के आचार-विचार और पशुओं की जीवन-पद्धति में कोई विशेष अन्तर नहीं गया है।

पशुओं से भिन्न कोटि का एक विचारशील प्राणी होने की संविद् हम तभी कर सकते हैं जबकि हमारे सोचने विचारने की पद्धति दूरवर्ती और विराट् बने व हमारे व्यवहार में भी वह निष्कर्ष उभर कर आगे आये। आहार-बिहार, रहन-सहन, वाणिज्य व्यापार, बोली-भाषा, न्याय-नीति आदि सामाजिकता के जितने भी वर्गीकरण है उन्हें सर्वप्रथम एक सार्वभौमिक पद्धति पर परखने की प्रणाली प्रारम्भ करनी पड़ेगी । तभी हम अपने आपको पशुओं से भिन्न सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी सिद्ध कर सकेंगे ।


आर्जूये दीदे जानाँ बज्म में लाई मुझे

“जीव को अपनी वासना प्यारी लगती है” रामकृष्ण परमहंस बोल रहे थे-अपनी बात समझाते हुये उन्होंने एक कहानी कही-बंगाल के एक गाँव की एक स्त्री मछली बेचने बाजार गई । लौटते समय रास्ते में आँधी और तेज बरसात होने लगी । मछली वाली के साथ एक मालिन भी थी मालिन का घर पास था । उसने मछली वाली को घर में टिका लिया । उसे भोजन कराया और बरामदे में जहाँ सुगन्धित फूल रहते थे सुलाकर आप भी सोने चली गई ।

मछली वाली को फूलों की गन्ध बड़ी अप्रिय लग रही थी, उसके मारे नींद नहीं आ रही थी । तब उसको एक उपाय सूझा अपनी मछलियाँ ढोने वाली टोकरी ली उसने और उसमें थोड़ा पानी छिड़का, पानी छिड़कने से मछलियों की बदबू उभर आई । टोकरी को सिरहाने रख लिया नींद आ गई मछली वाली ने चैन से रात काटली ।

मनुष्य के मन में भरी विषय वासनाओं का स्वरूप कुछ ऐसा ही है । जीवन पर्यन्त वह अपनी वासनाओं की पूर्ति में ही संलग्न रहता है और मरता है तब भी यह वासनायें ही उसे पुनर्जन्म के घेरे में उसी प्रकार खींच ले जाती है जिस प्रकार गोबर की गन्ध गुबरैले को ? पुनर्जन्म और कुछ नहीं अपनी वासनाओं की पूर्ति का नया प्रयास ही होता है । पुनर्जन्म के बहुत से प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं । अक्टूबर 1946 में जबलपुर से 18 मील दूर ग्राम कालादेही के शिव मन्दिर के पुजारी श्री कन्हैया लाल जी चौबे के घर एक बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया दामोदर प्रसाद । बालक 6 वर्ष का हुआ तभी से वह रामायण, गीता, वाल्मीकि रामायण, भोज प्रबन्ध, भर्तृहरिशतक आदि आर्ष ग्रन्थों के श्लोक और उनके अर्थ उच्चारण करने लगा । बालक को विद्यालय में प्रवेश कराया गया तो उसकी इस विलक्षण योग्यता से अध्यापक बहुत प्रभावित हुये । उन्होंने पूछा-उसे यह ज्ञान किस तरह प्राप्त हुआ ? इसका वह कुछ उत्तर नहीं दे पाया पर लड़का हमेशा हरिद्वार जाकर पढ़ने का आग्रह करता और कहता कि उसने वहाँ से ही पढ़ाई छोड़ी । 16 सितम्बर 1952 के “केलोडर” अखबार में जो इलाहाबाद से छपता था यह घटना प्रकाशित हुई और उसे पुनर्जन्म की घटना बताते हुये लिखा कि बच्चे की पढ़ने की अतृप्त इच्छा ही इस जन्म में उसका जीवन उद्देश्य बन गई है ।

28 वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तक पूर्व-जन्म स्मृति में एक दिलचस्प घटना श्री कैकई नन्दन सहाय की छपी है और बताया है कि उनके चचेरे भाई श्री नन्दन सहाय बी.ए. को 1906 में हैजा हो गया उस समय उनकी आयु 16 वर्ष की थी । मृत्यु के बाद से ही पत्नी को 2 मास का गर्भ था । पति की मृत्यु के बाद से ही पत्नी खराब-खराब स्वप्न आने शुरू हुये । एक दिन उन्होंने स्वप्न में अपने मृत-पति को देखा । वह कह रहे थे- मैं तुम्हारे ही पास रहूँगा (मृत्यु के समय वे पत्नी-वियोग से बहुत दुःखी थे ) तुम्हारे ही पेट से जन्म लूँगा लेकिन तुम्हारा दूध नहीं पिऊंगा । मेरे लिये दूध का अलग से प्रबंध रखना । मेरी बात की सत्यता यह होगी कि जन्म से ही मेरे सिर पर चोट का निशान होगा ।”

कुछ दिन बाद पुत्र जन्मा तो घर वाले कौतूहल में रह गये कि वह लड़का आकृति में हूबहू अपने पिता जैसा ही था । हमशक्ल होना आनुवंशिक कारणों से हो सकता है किन्तु सिर में चोट का निशान इस बात का प्रतीक था कि बच्चा निरा आनुवंशिक ही न होकर स्वप्न का सत्य भी था। उसमें अपनी ही चेतना लौटी थी। बच्चा छोटे से ही पत्नी (वर्त्तमान में माँ ) का दूध नहीं पीता था अतएव उसके लिये एक धाय रखी गई । वही उसे दूध पिलाती थी । लड़का किसी और स्त्री के स्तनों से तो दूध पी लेता था किन्तु कोई उसकी स्त्री (वर्तमान में माँ) के स्तनों का दूध निकालकर चम्मच से भी पिलाता तो वह नहीं पीता था, मुँह से उगल देता था । बच्चे की वासना पत्नी में थी सो उसने उसी के गर्भ से जन्म लेना स्वीकारा, पर उससे अलग रहना नहीं ।

अपनी पुस्तक “रिइन्कार्नेशन” में विलियम वाकर एटकेन्सन ने ऐसी बहुत सी घटनायें दी हैं, जो पुनर्जन्म के साथ-साथ जीव की इच्छा-शक्ति की प्रबलता को भी प्रमाणित करती है । पर यह सारी घटनायें मनुष्यों से सम्बन्धित होने पर उनसे पुनर्जन्म में इच्छाओं के एक पक्षीय महत्त्व का प्रकाश पड़ता है । 15 दिसम्बर 1963 को धर्मयुग में छपे “सत्या जैन” के एक संस्मरण से जीव की वासना और प्रेम के पहलू पर विस्तृत प्रकाश पड़ता है । सत्या जैन ' आखिर वह रहस्य क्या था ' शीर्षक से लिखती है-

मेरी माँ के पुत्र पैदा हुआ । बच्चा देखने में बहुत स्वस्थ और सुन्दर था । जिस दिन बच्चे का जन्म हुआ उसी दिन घर में कहीं से चिड़ियों का एक जोड़ा आ पहुँचा और उसी कमरे की कड़ियों में आ बैठा जिसमें माँ और सद्यः प्रसूत बच्चा था । कौतुकवश रात में हम लोगों ने उन चिड़ियों को उड़ाने का बहुत प्रयत्न किया पर वे उड़ी नहीं, बैठी ही रहीं । माँ ने मना कर दिया ; कहा - बैठी रहने दो तुम्हारा क्या लेती है । दिन में पक्षियों का जोड़ा उड़ गया और दिनभर दिखाई नहीं दिया किन्तु रात होने को थी तभी दोनों फिर उसी कड़ी पर आ बैठे । यह स्थान जहाँ बच्चा लेटा था ठीक उसके ऊपर था । इसलिये मुझे आशंका थी कहीं यह बच्चे के ऊपर बीट न कर दें, इसलिये डंडे से डराकर उन्हें भगा दिया और रोशनदान बन्द कर दिया । हम लोग अभी एक ही नींद सोये थे कि वह चिड़ियों का जोड़ा न जाने कैसे दरवाजे से होकर अन्दर आ गया । नींद टूटी तब उसी कड़ी पर बैठा मिला । उसी समय उन्हें बाहर भगाने वाले थे पर माँ ने फिर मना कर दिया । यह क्रम कई दिन तक चलता रहा । एक दिन एकाएक बच्चे की तबियत खराब हो गई । डाक्टरों ने दवा दी, इन्जेक्शन लगाये। कई दिन की बीमारी के बाद बच्चा कुछ स्वस्थ सा लगा। दवा पीकर बच्चा सो गया । सबने सोचा अब ठीक है हम भी सो गये। कृष्णपक्ष की सुनसान रात थी । बच्चा एकदम रोया सब लोग जाग पड़े । उस समय भी दोनों पक्षी रोशनदान की कड़ी पर बैठे थे अलबत्ता रोशनदान बन्द था । बच्चे की तबियत एकाएक बिगड़ती चली गई । थोड़ी ही देर में उसने दम तोड़ दिया । इधर सब लोग रो-पीट रहे थे उधर पक्षियों का जोड़ा-जो कभी भगाये नहीं भागता था, रोशनदान के शीशे को धकेलकर उस अँधेरी रात में न जाने कहाँ विलीन हो गया । बच्चा नहीं रहा। उस दिन के बाद से फिर वे पक्षी भी कभी दिखाई नहीं दिये । टोले मुहल्ले के जान-अनजान सबने इस घटना को सुन कोई कहता है पक्षी-बच्चे के मित्र थे, उसके साथ रहने आये थे । कोई-कोई कहता है वह बच्चे के पूर्व के माता-पिता थे । पक्षी होकर भी बच्चे के प्रति स्नेह आकर्षण बना रहा और वे अपनी उस वासना के फलस्वरूप ही कड़ी में आकर बैठते। कोई-कोई उन्हें भूत कहते। सत्य तो भगवान् ही जानते होंगे पर पक्षियों हठपूर्वक बच्चे के पास रहना, उसके आने के समय आना और मृत्यु के समय ही भाग जाना एक रहस्य है जो बताता है कि जीव चेतना जिस अवस्था में है उससे भी बहुत पहले की अपनी इच्छाओं-वासनाओं से जुड़ी हुई अवश्य है। इसी बात को योगवासिष्ठ कहता है-

वासनामात्र सारत्वादज्ञस्य सफलाः क्रियाः ।

सर्वा एवा फला ज्ञस्य वासनामात्र संक्षयात् ॥       -  ६/१/८७/१८

अर्थात् -अपनी वासनाओं में बँधे अज्ञानीजन कर्मों के फल भुगतते रहते हैं । किसी उर्दू शायर ने इसी बात को यों कहा है-

आर्जूये दीदे जानाँ बज्म में लाई मुझे ।

आर्जूये दीदे जानाँ बज्म से भी ले चली ॥

अर्थात्-इच्छायें और अभिलाषायें इस संसार में लायी थीं वही मुझे इस संसार से ले भी जाती हैं ।

जब तक मनुष्य इच्छाओं का दास है बन्धनमुक्त नहीं हो सकता-

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदिश्रिताः ।

अथ मर्त्योंऽभृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥     -कठोपनिषद्

अर्थात्’-हृदय की कामनायें और वासनायें नष्ट होती हैं तभी जीव अमृतत्व और ब्रह्मत्व प्राप्त करता है ।’ सारांश यह है कि हम इच्छायें त्यागे बिना आध्यात्मिक सत्यों का अनुभव नहीं कर सकते । इच्छायें करें तो वह निष्काम और लोक सेवा की करें जिससे कर्तव्यपालन का श्रेय भी मिले और कर्म-बन्धन में भी न बंधे ।

सुप्रसिद्ध दार्शनिक एफ.एच. विलिस ने भारतीय धर्म के आत्मा के विकास सिद्धान्त को पूरी तरह माना है और लिखा है कि कई बार एक जन्म के छोड़े हुये अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये श्रेष्ठ आत्मायें दुबारा जन्म लेती हैं। उनके पहले के किये हुये कार्यों और अगले जन्म के विचार और चिन्तन में अद्भुत साम्य इस बात का प्रमाण होता है । श्री विलिस ने ऐसे अनेकों जोड़े ढूंढ़े थे और उनके द्वारा इस दर्शन की पुष्टि की थी। इनका कहना है कि ईसा मसीह जो काम शेष छोड़ गये थे उन्हें उन्होंने दुबारा अपोलोनियस आफ टियाना के रूप में जन्म लेकर पूरा किया । ग्लैडस्टोन पहले जन्म में सिसरो था, श्रीमति बीसेन्ट पहले ब्रनो थी । शौपनिहार के विचार बौद्धमत से इतने मिलते हैं कि उसे बुद्ध ही कहा जा सकता है ।

इसी प्रकार फिश्टे, काँट और हैगल को भी भारतीय आत्मायें कहा जा सकता है । और तो और स्वयं भगवान् को भी 24 अवतार लेने पड़ते हैं और हर बार अपनी सृष्टि व्यवस्था का काम सँभालना पड़ता है। इस तरह पुनर्जन्म का कारण जहाँ निम्न आत्माओं में वासनायें और इच्छायें होती हैं वहाँ श्रेष्ठ आत्माओं में महान् कार्यों के संकल्प सम्भव हैं। हममें भी अनेक आत्मायें ऐसी ही हों जो महान् संकल्प लेकर धरती में आई हों, पर विषय-वासनाओं की शीत लहर में अपने संकल्प की तेजस्विता भूल बैठी हों - आत्म-मनन द्वारा हमें उन संकल्पों की याद करनी चाहिये और मनुष्य-जीवन के महान् सदुपयोग का लाभ लेना चाहिये ।


लघु कहानी - स्वर्ग और नरक का अस्तित्व

स्वर्ग और नरक का अस्तित्व

जापान के सन्त हाकुइन के पास एक योद्धा स्वर्ग और नरक के अस्तित्व के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा से गया । सन्त ने ऊपर से नीचे तक बड़े ध्यान से उसे देखा, पास में बिठाया और पूछा तुम कौन सा व्यवसाय करते हो ?’

‘मैं शस्त्र जीवी हूँ ।’

‘तुम्हारी शक्ल तो भिखारियों जैसी लगती है । मुझे आश्चर्य है कि किस मूर्ख राजा ने तुम्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया ।’

उस योद्धा को सन्त की बात सहन न हुई, क्रोध के कारण उसका चेहरा तमतमा उठा, उसका हाथ तलवार की मूठ पर गया । सन्त की दृष्टि उस तलवार पर गई तो उन्होंने अपनी बात शुरू करते हुए पुनः कहा ‘अच्छा तो तुम्हारे पास तलवार भी है । अरे इससे तुम मेरा सिर काटना चाहते हो पर मेरी समझ में इससे पेंसिल भी काटना कठिन है ।’

अब तो उस योद्धा का पारा चढ़ गया उसे सन्त की बातें सहन न हो सकीं, सन्त और कुछ कहते तब तक तलवार म्यान से बाहर आ चुकी थी । उस योद्धा ने सन्त के मुँह से सुना ‘वीरवर ! यह नरक का द्वार खुल गया ।’ और उस योद्धा ने सन्त की बात सुनकर तलवार म्यान में रखली, और अपनी भूल को सिर नवाकर स्वीकार किया ।

तब सन्त ने कहा ‘अब यदि तुम स्वर्ग के दर्शन करना चाहते हो तो वह भी कर सकते हो । काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ और हिंसा नरक के द्वार है और प्रेम, दया, शांति, सन्तोष, क्षमा और संयम आदि सद्गुण ईश्वर प्राप्ति के साधन हैं ।


नाटक द्वारा मनःशक्तियों का केंद्रीकरण और सम्मोहन

प्रस्तुत लेख में भारतीय सम्मोहन विद्या और त्राटक द्वारा उपलब्ध लाभों का प्रत्यक्षदर्शी वर्णन दिया जा रहा है । अनुभव डाक्टर अलैक्जेंडर कैनन के हैं । श्री कैनन हाँगकाँग में रहते थे । ब्रिटिश गवर्नमेंट ने उन्हें नाइट की पदवी दी थी । उन्होंने आजीवन आत्म तत्व की खोज की और उसके लिये चीन, तिब्बत, भारत ही नहीं सुदूर पश्चिमी देशों की यात्रा की और महत्वपूर्ण अनुभव अर्जित किये । प्रस्तुत अंश उनकी पुस्तक “इनविजिबुल इन्फ्लूयन्स” से उद्धृत किया जा रहा है ।

एक बार डॉ. कैनन को एक लामा का निमन्त्रण मिला । उसके लिये उन्होंने तिब्बत की यात्रा की । जो रास्ता बताया गया था उसमें से होते हुए वे एक ऐसे मठ के समीप पहुँचे जिसके किनारे 50 गज चौड़ी विशाल खाई थी, उसे पार करके जाना किसी भी भाँति सम्भव न था । अभी यह विचार करते हुए श्रीकैनन खाई की ओर बढ़ ही रहे थे कि आगे एक लामा खड़ा दिखाई दिया । उसने नमस्कार करके पूछा-आप डॉ. अलैक्जेंडर कैनन है न, मैं आपकी सहायता के लिये यहाँ आया हूँ । आप कृपया अपने साथी इन स्त्री-बच्चों को वापस कर दीजिये जब तक आप इस मठ में रहें ये लोग गाँव की धर्मशाला में विश्राम करेंगे । लामा के कहने पर स्त्री, बच्चों को वापस कर दिया गया ।

अब वे उस खाई के समीप पहुँचें । लामा की गतिविधियां स्वचालित यंत्र की भाँति और बड़ी विलक्षण-सी थी। उसने बताया-अब मै आपको कुछ प्राणायाम, शरीर का शिथिलीकरण तथा कुछ ऐसे योग साधन बताऊंगा जिनसे आपका शरीर हलका रुई की तरह हो जायेगा और आप बादलों की तरह उड़कर खाई पार कर लोगे मैं आपके साथ ही होऊंगा ।

श्रीकैनन ने भारतीय योगियों द्वारा तो ऐसे योग-कारनामे देखे थे और सुना था कि यहाँ ऐसी योग साधनायें ढूंढ़ी गई है जो पाश्चात्य-विज्ञान से भी अधिक विस्मय से भरी हुई है। अणिमा - जिसमें जीव-चेतना अणु के समान बनकर कण - कण की खोज कर लाती है, महिमा - जिसमें मनुष्य पर्वत समान विशाल और शक्तिशाली हो जाता है, गरिमा शरीर को बहुत भारी और लघिमा हलका कर लेने को कहते हैं । प्राप्ति लाखों मील दूर की वस्तु के स्पर्श आदि प्राप्ति की सिद्धि है तो प्राकाम्य कोई भी कामनायें तत्काल पूर्ति कराने वाली सिद्धि है। शरीर के भीतर अदृश्य चक्रों, उपत्यिकाओं, कुँडलिनी और मन पर अधिकार कर इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य प्रदान करने वाला ईशत्व सिद्धि तथा परिस्थितियों और शक्तिशाली पदार्थों को भी वश में रखने की वाशित्व सिद्धि भी भारतीय योग विद्या के चमत्कार हैं। मन को कण्ठ में संयम करने से अदृश्य राग रागनियों का सुनना, नाभि में संयम करने से भूख न लगना जैसी संयम और सूर्य-वेध, नाड़ी-शोधन, उज्जायी, भ्रामरी आदि प्राणायाम भी भारतीय योग-विद्या की विद्यायें है ; तो वस्ति, धौति, नौलि, नेति, वज्रोली और कपालभाति क्रियायें भी भारतीय योगी जानते हैं। श्री कैनन ने लामा से पूछा आप लोग भी यह सब जानते हैं क्या ? तो उसने बताया हाँ यह भारतीय योग विद्या ही है। एक समय प्रसिद्ध “बज्रयान-योगी पद्म संभव भारतवर्ष से बुद्ध धर्म का प्रचार करने तिब्बत आये थे । उन्होंने ही तिब्बत में इन साधनाओं का प्रचार किया था । भारतवासी धीरे-धीरे इस महान् विज्ञान को भूलते जा रहे हैं जब कि तिब्बत में अनेक लामा अभी भी इन साधनाओं और गुह्य आत्मविद्या के ज्ञाता है ; डॉ. लोवसांग रम्पा जैसे लामा योगविद्या ज्ञाताओं की ख्याति अमेरिका और इंग्लैंड तक में हुई है ।

लामा के बताये अनुसार साधन करने के बाद डॉ. कैनन ने आँखें खोलीं तो वे हैरान थे कि अभी एक क्षण पूर्व तो हम खाई के उस पार थे अब खाई के इस पार कैसे आ गये । वहाँ से चल कर वे मठाधीश लामा के सम्मुख पहुँचे। उन्होंने डॉ. कैनन का स्वागत किया । डॉ. कैनन लिखते हैं - लामा के शरीर के बाहर तीन फीट के घेरे मैंने नीले रंग का विलक्षण तेज देखा। उससे लामा की आकृति बड़ी दिव्य लग रही थी । लामा से योग-विद्या और आत्मा आदि पर देर तक बातचीत होती रही । उन्होंने यह भी बताया कि अब शीघ्र ही संसार में ऐसा परिवर्तन आने वाला है जिसमें भौतिक विज्ञान की अपेक्षा आत्म-विज्ञान की भावनाओं का महत्त्व बढ़ जायेगा; लोग धन, यश, पद की अपेक्षा प्रेमभाव, कर्त्तव्य भाव, मैत्री और सेवा आदि भावनाओं को अधिक महत्त्व देंगे ।

इस बीच लामा ने डॉ. कैनन को योग-विद्या के अनेक चमत्कार दिखाये । लामा ने यह भी बताया-योग चमत्कार की वस्तु नहीं है पर आपको एकान्त में बुलाकर और यह सब दिखाकर मैं आशा करता हूँ कि आप योग-विद्या के भाव से लोगों को अवगत करावें । एक दिन लामा ने त्राटक विद्या का अद्भुत करिश्मा देखा । कफ़न में लपेटा एक शव लाकर डाक्टर कैनन के सामने रख दिया गया। डॉ. कैनन ने परीक्षा की और बताया इसे तो मरे हुये 24 घन्टे से भी अधिक हो गये । किन्तु तभी लामा ने कुछ पढ़ा। कोई मन्त्र लगता था। फिर अपनी आँखें शव पर गड़ाईं और बोले-उठो भाई कितनी देर से पड़े हो - यह शब्द उधर मुँह से निकले इधर मृतक ने आँखें खोल दीं। चारों ओर देखा फिर उठ बैठा और खड़ा होकर डॉ. कैनन के पास तक गया, कैनन को प्रणाम किया । तिलस्मी किस्सों की तरह- डॉ. कैनन हैरान थे मृत व्यक्ति को खड़ा देखकर नहीं वरन् यह जानकार कि यही वह व्यक्ति था जो विविध योग साधनायें करा कर मुझे खाई से अन्दर लाया था । लामा ने बताया यह व्यक्ति तो सात वर्ष से मृत है। इसे कई वर्ष तक इसी तरह रख सकते हैं। इसी बीच डॉ. कैनन मन में जो भी बात आई, लामा अपने आप बता देता था। उसका उत्तर भी दे देता था । कैनन हैरान थे आखिर वह कौन-सी वस्तु है, जिसे माध्यम बनाकर यह लामा मन की सारी बातें जान लेता है ?

हठयोग प्रदीपिका में लिखा है-

निरीक्षेत्रिश्चलादृशा सूक्ष्म लक्ष्यं समाहितः ।

अश्रु  संपात पर्यन्तं आचार्यें स्त्राटक स्मृतम् ॥

मोचनं नेत्ररोगाणां तं द्रादीनाँ कपाटकम् ।

यत्रतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटक पेटकम् ॥             -   ह.प्र. 2/31-32

अर्थात्-एकाग्रचित्त होकर मनुष्य किसी सूक्ष्म वस्तु को सामने रख कर तब तक देखे जब तक आँखों में आँसू न आ जायें । आचार्यों ने इसे त्राटक कहा है । त्राटक से नेत्र रोग दूर होते हैं, तंद्रा और आलस्य दूर होते हैं । इस त्राटक से गुप्त रहस्यों का ज्ञान होता है, इसलिये योगी इसे सोने की पेटी की तरह गुप्त रखते हैं ।

दूसरे के मन की बातें जान लेना, औरों को प्रभावित करना, मूर्छित कर लेना त्राटक की ही सिद्धि है। योग्य और अनुभवी योगियों के मार्ग-दर्शन में सीखा हुआ त्राटक सब प्रकार की सिद्धि देने वाला है । जिस समय तुर्कों ने भारत पर हमला किया लीलाब्रज ने इसी विद्या के आधार पर उनका हमला विफल कर दिया था । आचार्य कमलरक्षित ने यवन-सेना पर पूर्ण कुंभ का प्रयोग करके 500 सैनिकों को मार डाला था और सारी सेना रक्त वमन करने लगी थी । इससे चिढ़कर उन्होंने विक्रम शिला और नालन्दा के विशाल योग ग्रन्थागार को जला डाला था । सिद्ध पीठों को नष्ट करने और योगियों को मारने का कुचक्र भी इसी कारण रचा गया था कि पीछे सैनिकों से लड़ना आसान हो गया और विदेशी सेना ने इस देश पर विजय पाई । महाभारत काल में इस विज्ञान की जो अनेकों शाखायें खोजी गई थीं। वे इसी समय या तो नष्ट कर दी गईं या विदेशों को चली गईं ।

डॉ. कैनन लामा के योग-बल से बड़े प्रभावित हुये। उन्होंने त्राटक सीखा भी और उसका प्रचार भी किया । उनकी पुस्तक-”इनविजिबुल इन्फ्लूएन्स” इस सम्बन्ध में और भी प्रकाश डालती है । यह घटना कल्याण योगांक में भी छपी थी और सम्मोहिनी विद्या नामक पुस्तक में श्री चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने भी छापी थी जो कि 1938 में छपी थी ।

इसके बाद डॉ. कैनन को लामा ने बड़े सम्मान के साथ विदा किया। लौटते समय उन्हें खाई पार कराने के लिये वही पहले वाला लामा उपस्थित मिला-उन्होंने इस बार गौर से देखा तो पाया कि वह सचमुच यंत्र की भाँति किसी और के इशारे पर काम करता है। उसकी आँखों की पुतलियाँ नहीं चल रही थीं । एक बार तो डॉ. कैनन डरे भी कि यह तो उनके साथ शव चल रहा है पर शीघ्र ही वे सम्भल गये कि इस शव के भीतर बातचीत करते हुए वह मुख्य लामा ही चल रहे हैं, जिनके योग-बल की कोई थाह नहीं है । भारत से सीखी साधना का एक विद्वान् लामा इतना शक्तिशाली हो सकता है तो कोई भारतीय योगी कितना शक्तिशाली होता होगा सहज ही सोचा जा सकता है ।

लामाओं से सीखी त्राटक विद्या को डॉ. कैनन ने भी ध्यान साधना का ही अंग माना है। उन्होंने लिखा है कि साधक लामा लोग सूर्योदय के एक घण्टा पहले से सूर्योदय तक यह साधना करते हैं । श्वेत पत्थर, शालिग्राम या स्फटिक पत्थर को आँखों की सीध, उतनी ही ऊँचाई तथा 2 फीट की दूरी पर रखकर टकटकी लगाकर जितनी देर संभव हो, स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा जाता है । आँखें थक न जायें ; तब तक जब यह अभ्यास करना चाहिये । पत्थर पर दृष्टि स्थिर होने के बाद घी का दीपक जलाकर उसकी लौ पर दृष्टि स्थिर की जाती है। जब ज्योति शिखा पर दृष्टि स्थिर हो जाए हो जाये, तब यही प्रयोग ठुड्डी को कंठ कूप (गले में जो गड्ढा सा बनता है) में लगाकर अपनी नाक के अग्रभाग पर करना चाहिये ।

दूर त्राटक दूर के पौधों पर, गोलाकार गुंबज वाले मन्दिर, चन्द्रमा तथा अन्य तारों पर किया जा सकता है । इन पर दृष्टि स्थिर होने पर सूर्य पर भी किया जा सकता है । पर सबको नहीं करना चाहियें । यह सारी क्रियाएं बिना अनुभवी मार्गदर्शक के भी नहीं करनी चाहिए। योग-ग्रन्थों में वर्णित ध्यान-बिन्दु साधना भी त्राटक ही है। उसमें बिना आँख बन्द किए दोनों भौहों के बीच ध्यान किया जाता है । यह ध्यान प्रारम्भ में किसी मूर्ति या चित्र के रूप में करते हुये प्रकाश की लौ के रूप में किया जाता है । भ्रूमध्य स्थित आज्ञा चक्र या तीसरे नेत्र का उन्मीलनइस साधना की सिद्धि है । इससे योगी में आश्चर्यजनक क्षमतायें उत्पन्न होती हैं। दूसरों के मन की बातें जान लेना, दूर की वस्तुओं, घटनाओं का ज्ञान, दूरवर्ती आकाश में हो रही सूक्ष्म हलचलों का ज्ञान और स्वप्नावस्था में दिव्य-दृश्य तथा भविष्य में होनी वाली घटनाओं का पूर्वाभास सब इसी साधना के सत्परिणाम हैं। पर यह साधनायें सात्विक आहार-बिहार तथा मनोवृत्ति वाले लोगों को योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिये। अन्यथा लाभ होने के बजाय हानि अधिक होती है । इसलिये इन साधनाओं के अभ्यास के पूर्व यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि वे अभी साधना की कठिनाई (कठिनाई केवल मन के आकर्षण, इच्छाओं को मारने की होती है ) को झेल सकेंगे या नहीं । दुर्बल मन वालों को यह नहीं सिखायी जाती । साधना एक प्रकार का समर (युद्ध) है; उसे मनस्वी, सशक्त और तेजस्वी व्यक्ति जीतते हैं। जिनमें इस तरह का संकल्प बल हो, केवल उन्हें ही इसका अभ्यास करना चाहिये ।


लघु कहानी- ध्यान का महत्त्व

ध्यान का महत्त्व

दो मित्र थे । एक व्यक्ति दिन भर परिश्रम कर पेट भरता । दूसरा केवल दो घण्टे परिश्रम करता था । पहला व्यक्ति तो और भी क्षीणकाय हो गया, दूसरा नगर प्रसिद्ध पहलवान बन गया । पहलवान को दिन व दिन मान व धन मिलता जा रहा था । एक दिन उन दोनों की भेंट हुई, तो पहलवान ने उससे पूछा-’तुम तो दिनभर मेहनत करते हो तो तुम्हारा शरीर और दुर्बल हो गया है और मैं केवल दो तीन घंटे ही मेहनत करके और अधिक शक्तिवान हो गया हूँ।’ फिर उसने पूछा- ‘तुम जब मेहनत करते हो तो तुम्हारा ध्यान कहाँ रहता है ।’ उस दूसरे ने कहा-’पैसे कमाने में । पहलवान ने कहा-’यही कारण है, मेरा ध्यान तो मेहनत करते समय शक्ति में लगा रहता है। मैं सोचता हूँ मेरी ताकत बढ़ रही है।’


प्राण परिवर्तन की अद्भुत घटना

एक ही तारीख, एक ही दिन धरती के ठीक विपरीत भागों में एक ही नाम के दो व्यक्ति बीमार पड़े - अचेतावस्था में एक का प्राण दूसरे के शरीर में, दूसरे का प्राण पहले के शरीर में परिवर्तित हो जायें तो ? उसे मात्र संयोग नहीं वरन् आत्मा का अद्भुत तत्त्व दर्शन और किसी सर्वोपरि बुद्धिमान सत्ता की अनोखी लीला ही कहेंगे ।

22 सितम्बर सन् 1874 की बात है, रूस के यूराल पर्वत स्थित नगर औरन वर्ग का एक धनकुबेर यहूदी बीमार पड़ा, डाक्टरों ने उसे सन्निपात होना बताया । उसकी नाड़ी लगभग टूट गई, शरीर ठंडा पड़ गया, बत्तियाँ जला दी गईं। अन्तिम प्रार्थना की जाने लगी, तभी मरणासन्न यहूदी इब्राहिम चारकों के शरीर में फिर से चेतना लौटती दिखाई दी, श्वाँस गति धीरे-धीरे तीव्र हो उठी, आँखें खुल गईं, उसने अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। लगा अब बिलकुल ठीक हो गया, कुछ गड़बड़ दीख रही थी - इतनी ही कि वह कुछ विस्मित, आश्चर्यचकित सा दीख रहा था मानो इस स्थान के लिये वह निरा अनजान हो ।

गीता के 23 वें अध्याय में मनुष्य शरीर को क्षेत्र और उसमें निवास करने वाली आत्म-चेतना को क्षेत्रज्ञ कहा है और बताया है-

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभि धीयते ।

एतद्यो वेत्तितं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।

क्षे़त्र क्षेत्रज्ञयोज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतंमम ॥    -  गीता 13/1-2

अर्थात्-हे अर्जुन जिस प्रकार से खेत में बोये हुये बीज समय पर फल देते हैं उसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षेत्र है और उसके द्वारा किये गये कर्म बीज। यह संस्कार रूप कर्मबीज समय पर फल देते हैं । इस प्रकार प्रकृति के गुणों से भी उन्हें जानने वाला पुरुष (चेतना) तत्व रूप से दो वस्तुयें है यह जानने वाला (क्षेत्रज्ञ) शरीर का संस्कार जन्म चेतना से भिन्न है जो ऐसा जानता है वह फिर जन्म नहीं लेता, देवत्व को प्राप्त करता है ।

इन पंक्तियों में आत्मा के जिस पृथक अस्तित्व की बात स्वीकार की गई है, प्रस्तुत घटना उसका जीता जागता उदाहरण है। यह घटना सर्वप्रथम सेन्टपीटर्सवर्ग की वीकली मेडिकल जर्नल में छपी। उसी के आधार पर उसे “थियोसाफिकल इन्क्वारीज” ने छापा और बाद में यह अक्टूबर सन् 1884 में आर्य-पत्रिका में भी छपा ।

होश में आने के बाद इब्राहीम चारको ने जो शब्द कहे उन्हें सुनकर घर वाले थोड़ा चौंके क्योंकि वह भाषा घर में कोई नहीं समझ पाया । घर वालों ने अपनी भाषा में बातचीत करनी चाही पर इब्राहीम चारको ने जो कुछ कहा उसे घर का एक भी सदस्य नहीं समझ पाया । लोगों ने समझा इब्राहीम पागल हो गया । वह इसी तरह दिन भर बड़बड़ाता, शीशे में चेहरा देखता और घर से भागने की चेष्टा करता । पागलों का इलाज करने वाले डाक्टर परेशान थे कि पागल होने पर मनुष्य चाहे जितना ऊल-जलूल बोले पर बोलता अपनी भाषा है और अस्त-व्यस्त बोलता है पर इब्राहीम जो कुछ बोलता है वह सब एक ही भाषा के शब्द है । उसने कागज पर कुछ लिखा उसे भाषा विशेषज्ञों से पढ़ाया गया तो पता चला कि उसने जो लिखा वह लैटिन भाषा के क्रमबद्ध शब्द और वाक्य थे जो निरर्थक नहीं थे । इब्राहीम चारको को लैटिन के एक अक्षर का भी ज्ञान नहीं था यही हैरानी थी कि वह आधे घण्टे के अन्तर से लैटिन किस तरह जान गया ।

अब उसे सेन्टीपीटर्सवर्ग की मेडिकल यूनिवर्सिटी में ले जाया गया । वहाँ लैटिन भाषा जानने वाले प्रोफेसर आरेलो ने उसका परीक्षण किया। पहली बार इब्राहीम ने खुलकर लैटिन में बात की। उसने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा-आज मैं खुश हूँ कि कम से कम आप मेरी बात तो सुन और समझ सकते हैं । आप यकीन नहीं करेंगे पर यह है सच भगवान् जाने कैसे हुआ पर मैं ब्रिटिश कोलम्बिया (उत्तरी अमेरिका) का रहने वाला हूँ, न्यूवेस्ट मिनिस्टर में मेरा घर है। मेरी पत्नी भी है और बच्चा भी। मेरा नाम इब्राहीम ही है पर इब्राहीम चारको नहीं, इब्राहीम उरहम है। प्रोफेसर आरलों ने उस समय तो यही कहा कि यह सब जासूसी षड़यंत्र सा लगता है। इससे अधिक वे कुछ जान न पाये। इसी बीच इब्राहीम वहाँ से चुपचाप भाग निकला। फिर बहुत दिनों तक उसका पता न चला। लोगों ने समझा वह किसी नदी-जोहड़ में डूबकर मर गया।

कुछ दिन बाद ब्रिटिश कोलम्बिया के अखबारों में एक विचित्र घटना छपी। ठीक उसी दिन, जिस दिन रूस का इब्राहीम चारको बीमार पड़ा था, न्यूवेस्ट मिनिस्टर के एक साधारण परिवार में भी इब्राहीम उरहम नामक अँगरेज बीमार पड़ा। न्यूवेस्ट मिनिस्टर ग्लोब में ठीक ओरनवर्ग की सीध में पड़ता है। यदि  कोई लम्बी कील ओरनवर्ग से घुसेड़ी जाये और वह पृथ्वी में आर-पार कर जाये तो न्यूवेस्ट मिनिस्टर में ही पहुँचेगी। बीमार थोड़ी देर अचेत रहा और जब होश में आया तब यहूदियों जैसी भाषा बोलने लगा। उसने अपने बच्चों तक को पहचानने से इनकार कर दिया। इसी बीच एक दूसरा इब्राहीम न्युवेस्ट मिनिस्टर आ पहुंचा उसकी शक्ल सूरत रूसियों की सी थी। लैटिन बोलता था और इब्राहीम उरहम की पत्नी को अपनी पत्नी बताता था । उसने बहुत सी ऐसी बातें बताईं जो वह और उसकी पत्नी ही जानते थे। पत्नी ने वह बातें स्वीकार तो की पर उसने कहा-सब बातें सच होने पर भी शक्ल में तो तुम मेरे पति से भिन्न शरीर के हो।

यह समाचार अखबारों में छपा तव प्रो0 आरलो ब्रिटिश कोलम्बिया आये और यह देखकर हैरान रह गये कि यह वही व्यक्ति था जिसका उन्होंने पूर्व परिक्षण किया था। आत्म विज्ञान की जानकारी के अभाव में पाश्चात्य वैज्ञानिक भी इस घटना का कुछ अर्थ न निकाल सके। रहस्य रहस्य ही बना रह गया किंतु इस घटना की याद करने वाले अमरीकन आज भी आश्चर्यचकित होकर विचार करते हैं - सचमुच शरीर से पृथक कोई आत्म-चेतना है जो शरीर व्यापार में संलग्न होकर भी मुक्त जीवन तत्त्व हो ? इस रहस्य का विश्लेषण भारतीय धर्म विज्ञान और तत्त्व-दर्शन ही कर सकता है। विविध योग साधनाओं द्वारा इस का यथार्थ ज्ञान और अनुभूति कोई भी मनुष्य प्राप्त सकता है।


लघु कहानी- मनुष्य की संकल्प शक्ति ही सबसे बड़ी है

मनुष्य की संकल्प शक्ति ही सबसे बड़ी है

पत्थर की एक बड़ी चट्टान को देखकर शिष्य ने बुद्ध से पूछा ‘भगवन् ! क्या इस चट्टान पर किसी का शासन सम्भव है ?

‘पत्थर से कई गुनी शक्ति लोहे में होती है। इसीलिए लोहा पत्थर को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देता है।’ भगवान बुद्ध ने शिष्य की जिज्ञासा को शान्त करते हुए उत्तर दिया। तो फिर लोहे से भी कोई वस्तु श्रेष्ठ होगी ?’ शिष्य ने प्रश्न किया। ‘क्यों नहीं ? अग्नि है। जो लोहे के अहं को गलाकर द्रव्य रूप में बना देती है।’

‘अग्नि की विकराल लपटों के सम्मुख किसी की क्या चल सकती होगी ?’

‘केवल जल है जो उसकी उग्रता को शीतल कर देता है’

' जल से टकराने की फिर किसमें ताकत होगी ? प्रतिवर्ष बाढ़ तथा अति वृष्टि द्वारा जन और धन की अपार हानि होती है ।'

‘ऐसा क्यों सोचते हो वत्स ! इस संसार में एक से एक शक्तिशाली पड़े हुए हैं। वायु का प्रवाह जलधारा की दिशा बदल देता है । संसार का प्रत्येक प्राणी वायु के महत्त्व को जानता है, क्योंकि इसके बिना उसके जीवन का महत्त्व ही क्या है ?’

‘जब प्राण ही जीवन है, फिर इससे अधिक महत्वपूर्ण वस्तु के होने का प्रश्न ही नहीं उठता।’

अब भगवान बुद्ध को हँसी आ गई। उन्होंने कहा--मनुष्य की संकल्प शक्ति द्वारा वायु भी वश में हो जाती है। मानव की यह शक्ति ही सबसे बड़ी है।’


धर्मो रक्षति रक्षताः

आचार्य धर्मघोष अपने शिष्यों सहित परिव्रज्या करते हुये आगे बढ़ रहे थे। परिव्राजक जीवन जहाँ लोकसेवा का माध्यम है वहाँ आत्मोन्नति का साधन भी। इसीलिये एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य की भाँति प्राचीन काल में उसे जीवन के तृतीयांश के साथ जोड़ दिया गया था। संन्यासी के लिये तो वह अनिवार्य कर्तव्य भी था। आचार्य धर्मघोष उसी धर्माचरण का पालन कर रहे थे। वे गाँव-गाँव धर्म एवं संस्कृति का प्रसार करते हुये आगे बढ़ रहे थे।

तभी आ गया आषाढ़ का पहला दिन। आकाश मेघों से घिर गया, पुरवाई बहने लगी, विद्युत चमकने लगी, मोर कूककर वर्षागमन की सूचना देने लगे। निर्धारित नीति के अनुसार आचार्य को परिव्रज्या त्याग कर चातुर्मास करना चाहिये था। बरसात के चार महीने संन्यासी को यात्रा करना वर्जित है। सो उन्हें भी उसका पालन करना ही चाहिये था।

क्षुद्रमति! गाँव का नायक-जहाँ वे ठहरे हुये थे- आचार्य प्रवर बोले तात! वर्षा आ गई। हम बढ़कर आगे के गाँव भी नहीं जा सकते। चार महीने यहीं विश्राम करना होगा। आपको कुछ कष्ट तो नहीं होगा-हमारी व्यवस्था में।

कष्ट !”“““““क्षुद्रमति बोला-फिर कुछ क्षण चुप रहा वह-उसका सारा जीवन ही संघर्ष से परिपूर्ण था किन्तु कष्ट शब्द उसके कानों में पहली बार पद रहा था।  उसने कहा - आर्य श्रेष्ठ ! आप जैसे सर्वथा त्यागी और तपस्वी के आतिथ्य में कष्ट क्या हो सकता है ?किन्तु एक बात है-कहने में संकोच भी होता है और उसे छुपाया भी नहीं जा सकता। आप नहीं जानते, इस गाँव के सभी लोग दस्यु कर्म करते हैं। दूसरों को लूट कर अपना जीवन चलाना ही हमारा धर्म है। मुझे सन्देह है कि आपके चार माह यहाँ रहने से कहीं बन्धु-बान्धवों की मति न पलट जाये । हम ठहरे दुष्टकर्मा व्यक्ति, आप साधु सन्त। हमारा प्रभाव तो आप पर क्या पड़ेगा आपकी संगति से कहीं हमारे साथियों की बुद्धि न पलट जाये ? “फिर एक क्षण चुप रहकर क्षुद्रमति बोला-किंतु हाँ एक उपाय है यदि आप वचन दें कि चार मास यहाँ रहते हुये आप और चाहे जो कुछ करें ग्रामवासियों को उपदेश न दें। यदि ऐसा कर सकते हों, तो आप इस गाँव में सहर्ष चातुर्मास कर सकते हैं, हमें आपका आतिथ्य स्वीकार है।

धर्मघोष ने विचार किया, नीच साधनों से अर्जित कमाई पर जीवित रहना पड़ेगा। यह ख्याल आते ही वे कुछ चिन्तित हुये, पर धर्म के साधन - शरीर को जिन्दा रखने और धार्मिक मर्यादा का पालन करने के लिये इस शर्त को आपाद्धर्म के रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त कोई चारा भी तो नहीं था। उन्होंने तरुण सरदार क्षुद्रमति की शर्त स्वीकार करली। धर्म-याजकों से कह दिया गया चातुर्मास की अवधि भर वे किसी को भी उपदेश नहीं करेंगे।

चार मास बीत गये, धर्मघोष ने किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया चातुर्मास समाप्त होते ही साधु-संगत वहाँ से चल पड़ी। ग्रामवासी और स्वयं क्षुद्रमति उन्हें कुछ दूर तक पहुंचाने आये। आचार्य धर्मघोष आंखों में अश्रु भरे चल रहे थे। एक ओर वे विचार कर रहे थे मनुष्य जीवन की अज्ञानता पर-मनुष्य थोड़े समय के लिये धरती पर आता है। जानते हुए कि यह शरीर कुछ ही दिन का मेहमान है। दुष्कर्म करता है- दूसरी ओर उनकी कर्तव्य भावना कचोटती थी - तुमने चार मास तुच्छ ही सही पर इनके परिश्रम और जीवन संकट में डालकर कमाये द्रव्य से अपनी जीवन रक्षा की है, सो बदले में उनका कुछ उपकार तो करना ही चाहिए।

गाँव की सीमा ऐसे ही विचार करते पार हो गई- धर्मघोष रुके- क्षुद्रमति ने उनके पुण्य चरणों में प्रणिपात कर क्षमायाचना करते हुए-- भगवन् ! हमसे जो भूलें हुई हों, क्षमा करना। कभी इधर आना हो तो फिर सेवा का अवसर देना। आचार्य धर्मघोष की आंखें छलक उठीं। उन्होंने स्नेहपूर्वक क्षुद्रमति को हृदय से लगाते हुए और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-तात् ! तुम्हारी सेवा से जितना हम प्रसन्न हैं, उतना ही इस बात के लिए दुःखी कि आप लोगों के अन्न पर चार मास बिताये, उसका कुछ भी ऋण चुकाये बिना जा रहे हैं। हमारे पास धर्म - शिक्षा के अतिरिक्त और है भी क्या ? अब तो चातुर्मास बीत चुका है, अब हम आपके गांव की सीमा से बाहर भी है। आप कहें तो एक उपदेश चलते समय देते जायें-थोड़े समय में अधिक कहा भी क्या जा सकता है ?

क्षुद्रमति ने एकबार साथियों की ओर दृष्टि डाली दूसरे क्षण कहा--महामहिम आप एक उपदेश दें- हम उसका जीवन भर पालन करेंगे।

ठीक है अबुस ! आचार्य धर्मघोष बोले- आज से तुम लोग व्रत लो सूर्यास्त के बाद कभी कुछ खाना मत- रात्रि के समय भोजन को हिंसा कहा गया है। उससे कई बार विषैले कीटाणु पेट में चले जाते और हानि पहुंचाते हैं। इसलिये विज्ञजनों ने रात्रि में भोजन ग्रहण करना वर्जित किया है।

क्षुद्रमति और उसके साथियों ने आचार्य प्रवर का उपदेश स्वीकार कर लिया। साधुगण आगे बढ़ गये और क्षुद्रमति साथियों सहित बस्ती वापस लौट आया। कुछ दिन ऐसे ही बीते। ग्रामवासियों ने सूर्यास्त से पूर्व ही भोजन करने का नियम बना लिया। फिर एक दिन दस्यु-कर्म की योजना बनाई गई। क्षुद्रमति अपने साथियों को लेकर प्रातःकाल से ही निकल गया। निकटवर्ती राज्य के एक गाँव में डकैती डाली उन्होंने। बहुत सा धन लेकर वे रातों रात लौट पड़े। कुछ दूर बाहर आकर थके हारे दल ने भोजन और विश्राम की व्यवस्था की। दो दस्यु सामग्री जुटाने के लिए भेजे गये। उन दोनों के मन में पाप आ गया। उन्होंने मदिरा खरीदी, उसमें विष मिला दिया ; और सारी सामग्री लेकर आ पहुंचे। दूसरे दस्यु जब सुरापान करने लगे। क्षुद्रमति ने प्याला भरा हाथ में लिया, भोजन पर दृष्टि डाली, तभी उसे याद आ गया वह वचन जो उसने आचार्य धर्मघोष  को दिया था। पापमति दस्युगणों ने धर्म-अधर्म का कुछ भी विचार किये बिना भोजन और सुरापान प्रारम्भ कर दिया। विष के प्रभाव से एक-एक कर दस्युगण मृत्यु के मुख में जाने लगे। क्षुद्रमति के सामने सारी स्थिति स्पष्ट हो गई। एक ओर उसे आचार्य के उपदेश से जीवन रक्षा की याद आ रही थी, दूसरी ओर उसे अपने ही स्वजनों की इस पाप बुद्धि और दुर्गति पर पश्चात्ताप हो रहा था

क्षुद्रमति का अन्तःकरण हाहाकार कर उठा- लोभ-पाप अन्ततः पतन ही करता है, धर्म की एक चिनगारीरक्षा ही करती है। फिर क्यों न धर्म का आश्रय लिया जाये। ऐसा पवित्र और महान् जीवन क्यों व्यर्थ गँवाया जाये।

क्षुद्रमति की बुद्धि पलट गई। उसने दस्युकर्म छोड़ दिया। गाँव में रहकर कृषि करने लगा- परिश्रम से कमाकर खाने लगा। उसके जीवन में आई धर्म की एक किरण सुख-शान्ति के प्रकाश पुंज की भाँति जीवन में छा गई। उसके साथ सारे ग्रामवासियों का भी जीवन धन्य हो गया।


लघु कहानी - गीता का सच्चा अर्थ

गीता का सच्चा अर्थ

चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण की यात्रा पर निकले थे। रास्ते में उन्होंने एक सरोवर के किनारे एक ब्राह्मण को गीता पाठ करते देखा। वह गीता के पाठ में इतना तल्लीन था कि उसे अपने शरीर की सुध नहीं थी। उसका हृदय गद्गद् हो रहा था और नेत्रों से आंसुओं की धारा बह रही थी। पाठ समाप्त होने पर चैतन्य ने पूछा, तुम श्लोकों का अशुद्ध उच्चारण कर रहे थे, तुम्हें इसका अर्थ कहाँ मालूम होगा ?’ उसने उत्तर दिया- "भगवन्! मैं। कहाँ जानू” संस्कृत। मैं तो जब पढ़ने बैठता हूँ तो ऐसा लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर बड़ी भारी सेना सजी हुई खड़ी है। जहाँ बीच में एक रथ पर भगवान् कृष्ण अर्जुन से कुछ कह रहे हैं। उन्हें देखकर रुलाई आ रही है, चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “भैया तुम्हीं ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है। और अपने गले लगा लिया।


प्रगति पथ पर निरन्तर अग्रसर रहें

अपनी वर्तमान स्थिति में पड़ा रहना किसी को पसन्द नहीं है। हर व्यक्ति अपने स्थान से आगे बढ़ना चाहता है गतिशीलता जीवन का लक्षण है। जो जीवित है, प्रबुद्ध और चैतन्य है वह एक स्थान पर ठहर ही नहीं सकता। एक स्थान पर ठहरने से जहाँ विकास रुक जाता है वहाँ जीवन का आनंद भी जाता रहता है। आनन्द नवीनता, परिवर्तन और निरंतर गतिशीलता में है। कितना ही सुंदर स्थान क्यों न हो, कितना ही मोहक वातावरण क्यों न हो यदि उसमें एक लम्बे अरसे तक रहना पड़े तो वह स्थान और वह वातावरण अखरने लगेगा। उसे बदलने की इच्छा होगी। इस वांछित परिवर्तन के लिए मनुष्य को क्रियाशील अथवा गतिशील होना पड़ेगा। जीवन अगति को अधिक देर सहन नहीं कर सकता। यदि उसे अगतिशीलता के लिए विवश किया जाएगा तो उसकी शक्ति नष्ट होने लगेगी, उसमें जड़ता आने लगेगी और वह मृत्यु की ओर बढ़ने लगेगा। प्रगतिशीलता जीवन का लक्षण है, उसकी अभिव्यक्ति है ।

अगति अथवा जड़ता आते ही जीवन तत्त्व नष्ट होने लगता है। बहती हुई नदियाँ जहाँ रुक जाती हैं, वहीं उनका पानी सड़ने लगता है। हवा जहाँ रुक जाती है, विषैली हो जाती है। वनस्पति अपनी विकासशीलता खोते ही सूखने लगती है। जड़ता मृत्यु का लक्षण है। जो व्यक्ति एक स्थान पर पड़े-पड़े जीवन काटने के आदी होते हैं वे मृत ही माने जाते हैं। यदि उनकी शारीरिक मृत्यु नहीं भी हुई होती है तो भी वे मानसिक रूप से मर चुके होते हैं। उनमें इच्छा, उत्साह, आशा तथा साहस का अभाव रहता है। उनकी जीवनीशक्ति समाप्त हो चुकी होती है। जिस प्रकार प्राणों को बनाए रखने के लिए प्रति श्वास पर नई हवा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन संस्थान को सक्षम, उपयोगी तथा सशक्त बनाए रखने के लिए, उसे प्रखर और दीर्घजीवी बनाए रखने के लिए नित्य नई शक्ति की आवश्यकता होती है। जीवनदायिनी इस शक्ति की प्राप्ति गतिशीलता, पुरुषार्थ तथा कर्मयोग से मिलती है। जीवन की इन गतिविधियों में स्थगन आते ही जीवन-यन्त्र में स्थगन आने लगता है। मनुष्य अनुपयोगी और निकम्मा होकर बेकार हो जाता है। परमात्मा की विधायिनी प्रकृति निरर्थकता के प्रति बड़ी असहिष्णु होती है। वह अपने राज्य में बेकार और फालतू चीजों को सहन नहीं करती! जल्दी ही मृत्यु रूप में उन्हें उठा कर फेंक देती है। इसीलिए निकम्मे आलसी और गतिहीन व्यक्ति अपेक्षाकृत जल्दी इस संसार से विदा होते रहते हैं। गतिशीलता जीवन है, आयु और शक्ति है। इसे जीवन में बनाए ही रहना चाहिए।

परमात्मा की इस पावन सृष्टि में जिधर भी दृष्टि डालिए गतिशीलता दृष्टिगोचर होगी। सूर्य, चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र जिनको देखिये चल रहे हैं। वायु तो एक क्षण भी ठहर नहीं सकती। नदियाँ बह रही हैं। वृक्ष उग रहे हैं, कलियाँ खिल रही हैं, समुद्र लहरा रहा है और इन सब गतिशीलता के साथ हमारी पृथ्वी निरन्तर अपनी धुरी पर परिभ्रमण कर रही है। संसार का प्रत्येक अणु निरन्तर गतिशील है। गतिशीलता प्रकृति का नियम है, जीवन है और उसका सौंदर्य भी। इन चारों की गतिमानता के बीच जो जड़ता और अगति को अंगीकार किए रहेगा उसे यह शक्तिमयी प्रकृति विजातीय एवं विरोधी तत्व मान कर कैसे रहने देगी। वह जल्दी ही उसे अपनी बुहारिका मृत्यु का विषय बना ही देगी।

मनुष्य निरन्तर गतिशील रहे यह उसके निर्माता की इच्छा है। यदि ऐसा न होता तो वह उसे जड़ न बनाकर चेतन क्यों बनाता, और क्यों उसे बौद्धिक, मानसिक तथा शारीरिक शक्तियों से सम्पन्न करता। यह संसार उस परमात्मा की रंगस्थली है। मनुष्य उसका मुख्य अभिनेता है। नायक है। सक्रियता अभिनय का विशेष अंग है। जो अभिनेता, जो नायक अपने अभिनय से उदासीन होकर निश्चेष्ट और निर्गति बना रहे, वह किस प्रकार पुरस्कृत हो सकता है। इस नाटक के सूत्रधार परमात्मा की इच्छा है कि मनुष्य अपने जीवन अभिनय को सफलतापूर्वक व्यक्त करे और उसके विशाल सामान्य, अनन्त ऐश्वर्य, अतुलित विभव और वैभव में अपना भाग सुरक्षित करे। वह चाहता है कि मनुष्य अपनी योग्यता, पात्रता और उपयुक्तता प्रकट करे और वह उसे मनोवांछित श्रेय और सौख्य का पुरस्कार अनुग्रह करे।

मनुष्य को सौंपा गया वह अभिनय क्या है? वह है एक निश्चित लक्ष्य के प्रति गतिशीलता, प्रयत्नशीलता, पौरुष, विकास और प्रगतिशीलता। परमात्मा अपने सारे पुत्रों तथा पात्रों पर समान रूप से कृपालु हैं। तथापि वह अपने अटल विधान की अपेक्षा से मजबूर है कि, उसका जो पुत्र जो पात्र प्रयत्नशील और पुरुषार्थी नहीं है, जिसने आलस, प्रमाद, अकर्मण्यता, जड़ता और अगति आदि की आसुरी वृत्तियों की दासता मानली है उसे किसी प्रकार भी पुरस्कृत नहीं कर सकता। फिर भी वह दयानिधान इतनी सहायता करने के लिए हर समय तैयार रहता है कि जो मनुष्य अपना कर्तव्य करने को तैयार हो उसके लिए उचित और उपयुक्त साधनों और संयोगों की व्यवस्था कर दे। क्योंकि जो आवश्यकतानुसार माँगता है उसे वह जरूर देता है और जो उसका द्वार खटखटाता है उसके लिए वह खुलता ही है। प्रमाद, आलस्य, निराशा तथा निरुत्साह को छोड़कर, और परिकर कस कर जो कर्तव्य क्षेत्र में उतर पड़ता है, परमात्मा की प्रेरणा से उसकी प्रतिकूल परिस्थितियों के मुंह सीधे होने ही लगते हैं। अचानक, अनायास, अप्रत्याशित अथवा विधि-विधान एवं क्रमपूर्वक उसके लिए संयोग और साधन जुटने ही लगते हैं।

स्वयं मनुष्य का अपना जन्म अर्थात् मनुष्य योनि मिलना ही गतिशीलता तथा विकास का प्रमाण है। अथवा यह कह लीजिए कि यह मानव-जन्म जीव की प्रकृति तथा विकासशीलता का पुरस्कार है। इस जन्म से पहले मनुष्य चौरासी लाख अधम तथा निम्न योनियों की यात्रा में रहा है। यदि उसने उस विकट तथा विषम अवस्थाओं में भी अपनी प्रगतिशीलता कुण्ठित कर ली होती तो क्या वह किसी प्रकार युग-युग की उस दुरूह तथा अंधेरी यात्रा को पार कर चुका होता ? निश्चय ही नहीं। जड़ता के हाथ पड़ कर वह न जाने किस दयनीय योनि में नारकीयता भोग रहा होता। और आज इस पवित्र, प्रकाशपूर्ण तथा सर्वसमर्थ मानव-योनी में न आ सका होता। यह उसकी अखण्ड गतिशीलता का ही पारितोषक है कि वह उस प्रचण्ड यात्रा को पूरा करके कृतकृत्य हो सका है।

किन्तु मनुष्य की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हो गई है। मनुष्य जीवन ही उसका गन्तव्य नहीं है। अभी इसके आगे एक लम्बी यात्रा और पड़ी है। किंतु वह पिछली यात्रा के समान अंधेरी अथवा विषमतापूर्ण नहीं है। आगे का पथ बड़ा ही प्रकाशपूर्ण, पवित्र और प्रशस्त है। वह यात्रा है नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, अणु से विभु और आत्मा से परमात्मा बनने की। क्या इतनी विराट् यात्रा बिना प्रगतिशीलता के पूरी हो सकती है ? निश्चय ही गन्तव्य अथवा लक्ष्य के अनुसार उसके लिए अखण्ड, उदात्त और आदर्श प्रगतिशीलता की आवश्यकता होगी। योग्य सारे सम्बल परमात्मा ने मनुष्य को पहले ही दे रखें हैं। सिवाय इसके कि आलस्य और अकर्मण्यता की अगति दशा का दास बन जाए और कोई कारण नहीं है जो उसे इस महान यात्रा से विरत अथवा वारित रख सके।

आत्मा का अपने प्रियतम परमात्मा से वियोग है। वह उससे मिलने के लिए निरंतर छटपटाती रहती है। उसका संयोग करना मनुष्य का पावन कर्तव्य है, उत्तर दायित्व है। इसके अतिरिक्त मनुष्य उसका आभारी भी है। आत्मा ने ही अपनी चेतना देकर मानव-यन्त्र को मनुष्य बनाया है। उसी ने मिट्टी के इस स्तूप को सुन्दर, सशक्त और सक्षम-शरीर बनाया है। वही कमों में कुशलता और मन, बुद्धि तथा विवेक में प्रकाश बनकर प्रकट होती है। यह आत्मा की सेवा का ही प्रतिफल है कि मनुष्य सफलता, श्रेय और सम्पदाओं का अधिकारी बनता है। मनुष्य पर आत्मा का बहुत आभार है। उसे चाहिए कि वह प्रत्युपकार के रूप में उसका मिलन उसके प्रियतम परमात्मा से कराने का प्रयत्न करें। उपकारी का प्रत्युपकार न करना कृतघ्नता है, पाप है। उससे बचना ही चाहिए।

आत्मा के इस आभार को उऋण करने का एक ही उपाय है। वह है प्रगतिशीलता और आत्म-विकास ; और इस उपाय का आधार है पुरुषार्थ। मनुष्य को संकल्प कर लेना चाहिए कि वह कर्तव्य के प्रशस्त पथ पर प्रतिदिन कदम बढ़ाता चला जाएगा। वह किसी भी परिस्थिति में अपना अभियान एक क्षण को भी न रोकेगा। वह बाधाओं से लड़ेगा, प्रतिकूलताओं से संघर्ष करेगा और साहसपूर्वक अपने कदम को आगे ही बढ़ाता जाएगा। इस संघर्ष के लिए वह स्वास्थ्य, आरोग्य, शक्ति और क्षमताओं को न केवल सुरक्षित ही रखेगा बल्कि निरन्तर नियमपूर्वक बढ़ाता रहेगा। वह दिन-दिन आगे बढ़ेगा, ऊपर चढ़ेगा और निश्चित ही अपना लक्ष्य पाएगा और आत्मा से परमात्मा का मिलन कराएगा।

उन्नति और प्रगति का अधिकारी होने पर भी बहुत बार मनुष्य उससे उदासीन ही हो रहते हैं। इसका प्रधान कारण अज्ञान तो होता ही है, उनकी अपनी मानसिक न्यूनता भी कम काम नहीं करती। उन्हें अपने प्रति विश्वास नहीं होता। हर समय यही सोचते रहते हैं कि हमारे पास साधन नहीं है, अवसर नहीं है और न हममें इतनी क्षमतायें ही हैं जिनके आधार पर आगे बढ़ सकते हैं। अपनी इस हीन और हेय भावना के करण वे कोई नया पुरुषार्थ करने को तैयार नहीं होते। अपनी यथास्थिति में पड़े-पड़े चुपचाप जीवन काट जाने में ही अपना कल्याण समझते हैं। बहुत बार तो वे यह भी करते हैं कि यदि किसी ऊंचे पुरुषार्थ की ओर बढ़े तो संभव है उनका यह सब कुछ भी चला जाएगा जो उनके पास है। अपने प्रति इस प्रकार का अविश्वास तथा हेय भाव निश्चय ही बहुत बुरा है। ऐसी आत्महीनता से ग्रस्त लोग वास्तव में कोई उन्नति अथवा प्रगति नहीं कर सकते।

ऐसे निराश और नगण्य व्यक्तियों को आत्म-विश्वास के लिए नन्ही सी चींटी और छोटी सी मधु-मक्खी से शिक्षा लेनी चाहिए। इन दोनों प्राणियों के पास कौन से साधन और कौन सा बल होता है। तब भी चींटी अपने बिल में न जाने कितनी सामग्री संचय कर लेती है और मधुमक्खी शहद के छत्ते के छत्ते बनाकर तैयार कर देती है। यदि यह दोनों प्राणी अपने को निराश जनों की तरह अशक्त और हेय समझकर पड़े रहे है तो क्या जल्दी ही उनका अस्तित्व समाप्त न हो जाएगा !

लेकिन नहीं वे अपने पर जरा भी अविश्वास नहीं करतीं और परमात्मा की दी हुई थोड़ी सी शक्ति के आधार पर ही प्रबल पुरुषार्थ , रात-दिन काम करके अपना भण्डार भर लेती हैं। शक्ति अथवा साधनों की बहुतायत उन्नति अथवा प्रगति का आधार नहीं है। उसका आधार है परिश्रम पुरुषार्थ और आत्मनिष्ठा। मनुष्य तो उन प्राणियों से बहुत महान और शक्तिशाली है। उसे अपने पर विश्वास करना चाहिए और जो भी शक्ति और साधन है उन्हीं के आधार पर कोई ऊंचा तथा आदर्श लक्ष्य निश्चित कर पुरुषार्थ में संलग्न हो जाना चाहिए। अवश्य ही वे उन्नति और प्रगति के अधिकारी बनेंगे। बूँद-बूँद संचय करने से एक दिन खाली घट भर ही जाता है। कदम-कदम चलकर मंजिल मिल जाती है और सीढ़ी-सीढ़ी चढ़कर छत पर पहुँचा जा सकता है। आत्म-विश्वास जगाइए, साहस का सहारा लीजिए, परिश्रम और पुरुषार्थ कीजिए। ईश्वर आपकी सहायता करेगा ; क्योंकि वह उन उत्साही तथा महत्वाकांक्षियों की सहायता अवश्य करता है जो अपनी सहायता आप करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।

कुछ सद्वाक्य

आत्मा एक चेतन तत्त्व है, जो अपने रहने के लिए उपयुक्त शरीर का आश्रय लेता है और एक देह से दूसरी देह में जाता रहता है । भौतिक शरीर आत्मा को धारण करने के लिए विवश होता है ।   - गेटे

जो अपनी राह आप बनाता है , वह सफलता के शिखर पर चढ़ता है पर जो औरों की राह ताकता है , सफलता उसका मुँह ताकती रहती है । - स्पेंसर


पश्चात्ताप प्रक्रिया बन्द न की जाये

अपराध यदि व्यक्त है, किसी की चोरी की गई, किसी की हत्या हुई, मिलावट के अपराध में पकड़ा गया, रिश्वत में मिले नोटों में किसी अधिकारी के हस्ताक्षर थे उसने आकर पकड़ लिया ; ऐसे अपराधी जेल भेज दिये जाते हैं। किसी-किसी को शारीरिक दंड देकर छोड़ दिया जाता है और मान लिया जाता है कि उससे अपराधी का दोष परिमार्जन हो गया।

भारतीय मान्यतायें इससे भिन्न हैं। शाश्वत जीवन की कल्पना और कर्म-अकर्म के फल भोग के लिये बार-बार जीव-शरीरों में आने वाली अमर चेतना यदि स्वतः अपने पापों का - अपराधों का परिष्कार नहीं कर लेती तो वह निरन्तर अधोगति की ओर अग्रसर होती चली जाती है और नरक के - पतन के गड्ढे में जा गिरती है। कूकर, शुकर योनियों में जन्म, सर्प और भेड़िये के शरीर में आना आत्म चेतना के गुप्त मन की वह प्रेरणायें ही होती हैं, जो उसे शारीरिक और मानसिक पाप करने की प्रेरणा देती रहती है। शास्त्रकार ने उसका उपाय बताते हुए लिखा है

एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः अनाविष्कृपापांसतु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत।  - मनुस्मृति  11/226

प्रकट पाप की शान्ति के लिये द्विजों को पूर्वोक्त चान्द्रायण आदि व्रत करना चाहिये और गुप्त पाप की शान्ति के लिये मंत्रों का जप और होम करें।

पाप कैसा भी हो उसके लिये उत्तरदायी व्यक्ति स्वयं ही होता है। एक बार डा0 सिगमंड फ्रायड से किसी ने पूछा-स्वप्न कौन दिखाता है तो फ्रायड ने छूटते ही उत्तर दिया मनुष्य का मन। उन सज्जन का अभिप्राय यह था कि मनुष्य सामाजिक जीवन की अनेक परिस्थितियों से घिरा होता है, कोई उसे डाँट देता है तो गुस्सा आता है, कोई कामुक प्रदर्शन करता है तो मन में काम वासना के विकार उठ खड़े होते हैं, खाने-पीने का भी प्रभव पड़ता है। यह सब मिलकर स्वप्न में प्रभाव डालते हैं ; इसलिये स्वप्न का कारण व्यक्ति के मन को मानना उसकी दृष्टि में एकपक्षीय निर्णय था किंतु विचारक फ्रायड उस मत के नहीं थे। यद्यपि काम जैसे नाजुक विज्ञान का भी वे शालीन विश्लेषण नहीं कर पाये ; तथापि पाप के प्रति उनकी विवेचना भारतीय विचारकों के विवेचन से मेल खाती है। पाप और अपराध किसी और कारण से नहीं व्यक्ति की अपनी मानसिक कमजोरी से होते हैं और उसका दंड भुगते बिना वह उस मानसिक दुर्बलता से बच नहीं सकता। यह कहना गलत है कि इन्द्रिय लिप्सायें और महत्वाकांक्षायें व्यक्ति की प्राकृतिक प्रेरणायें है पाप नहीं। मनोविज्ञान अभी उस स्थिति में तो नहीं पहुँच सका, जिससे इस जन्म के अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार ही अगले जन्म होने की बात साबित हों, पर गुप्त मन के विकारों के दुष्परिणाम अब स्पष्ट चुके हैं। 22 दिसम्बर 1658 को लन्दन से प्रकाशित होने वाले “संडे टाइम्स” में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य मांटगुमरी हाइड जो कि अमरीका के अपराधी समाज का अध्ययन करने गये थे - एक लेख छापा। उसमें लिखा था- आज संयुक्त राज्य अमेरिका में जो सबसे अधिक वस्तु परेशान किये हैं वह है बाल अपराध की समस्या। 20 वर्ष से कम आयु के बच्चे चाहे जब चाहे जिसे गोली मार देते हैं। लास एन्जिल्स में एक लड़के ने एक लड़की को केवल इसलिये गोली मार दी क्योंकि वह एक ऐसी लड़की के चेहरे से मिलती-जुलती थी जो उसके एक प्रतिद्वन्द्वी लड़के के घर की थी। उस लड़की को देखते ही उसे कुढ़न हुई और उसने गोली मार दी। ओहियो की एक बाल अपराध अनुसंधान समिति ने 54 बाल अपराधियों के स्वभाव का परीक्षण कर, पाया कि 53 अपराधी एस थे, जिन्होंने बिना कुछ सोचे समझे अज्ञात प्रेरणा से अपराध किया। इन अपराधों का कारण माता-पिता की भावुक अस्थिरता को, पारिवारिक असंगठन और मनोमालिन्य को दिया जाता है किंतु हर जगह ऐसा नहीं होता । जन्मजात संस्कारों का अपना महत्त्व होता है और उसकी वैज्ञानिकता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। ऐसे अपराधों के व्यापक अध्ययन और अमेरिकन सुधार (करेक्शन) संघ में 35 वर्षों तक निरंतर काम करने वाले महामन्त्री श्री एडवर्ड कांस ने भी यही निष्कर्ष निकाला और कहा - अपराध वृद्धि का कोई सरल उत्तर दे सकना कठिन है। अधिक से अधिक उसके लिये माता-पिता और परिवार को ही दोष दिया जा सकता है पर कुछ कारण अप्रकट भी है उसका मूल्य और महत्त्व कम नहीं आंका जाना चाहिये।

मन एक प्रकार का विद्युत है। जिस प्रकार संसार के सभी पदार्थ नष्ट नहीं होते केवल रूपांतरित होते हैं, मन भी नष्ट नहीं होते; मनुष्य अपने व्यक्त जीवन में जो भी विचार और कर्म करता है वह सब संस्कार रूप में मन में जमते और अपनी गाँठें मजबूत बनाते चले जाते हैं। ऊपर से देखने पर मनुष्य वही रहता है पर शारीरिक परिवर्तन के समान ही उसके मानसिक संस्कार परिवर्तन भी प्रौढ़ होते चले जाते हैं और यदि उनका समय रहते निदान नहीं कर लिया जाता तो वे काले अणुओं के रूप में जीवात्मा के साथ चले जाते हैं। वही कुसंस्कार अगले जन्मों में मनोविकार, अपराध भावना आदि के रूप में फूट पड़ते हैं और मनुष्य जीवन को अज्ञात गंदगी की ओर बढ़ा ले जाते हैं। ऊपर से रखने पर मनुष्य कितना ही अच्छा क्यों न दिखाई देता हो, उसकी असलियत उसके मन में छिपी रहती है। वही व्यक्ति संस्कारों में अज्ञात कल्पना और विचारों के रूप में स्वप्नों में अभिव्यक्त होती रहती है। वास्तव में इन संस्कारों का विश्लेषण ही सच्चा मनोविज्ञान हो सकता है। केवल मात्र किसी के बाह्य स्वभाव का अध्ययन मनोविज्ञान नहीं।

हिटलर युवावस्था में साहसी, धीर और वीर प्रकृति का व्यक्ति था किंतु अपनी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर उसने हिंसा बरतनी शुरू की, हजारों निरीह व्यक्तियों को उसने मौत के घाट उतार दिया तो दूसरों का कितना अनर्थ हुआ उससे अधिक उसने अपना पतन कर लिया। 1945 में जबकि उसे आत्म रक्षार्थ एक बंकर में भूमिगत होना पड़ा तब उसकी स्थिति यह थी कि वह अपने बड़े से बड़े विश्वासपात्र को भी सन्देह से ही देखता। वह इतना भयभीत रहता था कि ताजी हवा लेने के लिये बंकर से ऊपर भी नहीं आता था। गोरिंग लुफ्तवाफ को उसने जर्मन वायुसेना का प्रधान सेनापति - अपना वफादार मानकर नियुक्त किया था, उसने विद्रोह किया भी नहीं था पर उसने ग्रीम को उसके देशद्रोही होने की बात कही। ग्रीम सारी स्थिति जानता था पर भयवश खुद भी सच्ची बात नहीं कर सकता था। हिटलर का मानसिक संताप इतना अधिक बढ़ गया कि उसे पैर में लकवा मार गया। दो दिन पूर्व तक उसके बाल काले थे पर एक दिन में ही उसके बाल सफेद कैसे पड़ गये इस बात पर स्वयं उसकी प्रेमिका इवा और गोवेल्स की पत्नी फ्रा. भी आश्चर्यचकित हो उठी थी। अन्ततः अपनी मानसिक स्थिति नियंत्रण से बाहर पाई तो हिटलर को आत्महत्या ही उससे बचने का एकमात्र उपाय सूझा और उसने आत्महत्या कर ली।

मन के कुसंस्कारों को छुपाना पाप का भी पाप है। इसीलिये भारतीय आचार्यों ने निष्कासन तप का सिद्धांत बनाया था। लोगों को चान्द्रायण आदि कराते समय उनसे सारे पाप कबूल कराये जाते थे। देखने में प्रायश्चित्तकर्त्ता को अपना स्वाभिमान नष्ट होता सा दीखता है, उससे औरों की हँसी का डर भी रहता है किंतु भूलें स्वीकार कर लेने से मन में जो गाँठें पड़ सकती थीं, पड़ने से बच जाती है और मनुष्य एक व्यवस्थित जीवन के लिए शुद्ध संस्कारी जीवन के लिए तैयार हो जाता है।

२३ जुलाई १९६० का बम्बई का समाचार है। 25 वर्ष पूर्व सिन्ध हैदराबाद में देश विभाजन के समय मजिस्ट्रेट बी॰ ए॰ गहानी की अदालत में एक केस आया-श्री गहानी ने यह बात स्वयं ही तब बताई जब वे बम्बई के मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट थे - केस एक वृद्ध के खिलाफ था। सुनवाई की तारीख के दिन श्री गहानी फैसला तैयार नहीं कर सके थे। वृद्ध बीमार था इसलिए वह स्वयं नहीं आ पाया था, तारीख बढ़ाने के लिए लड़के को भेज दिया लड़के को तारीख बढ़ाने की प्रार्थना नहीं करनी पड़ी।

मजिस्ट्रेट ने तारीख बढ़ाने की घोषणा करा दी। वृद्ध ने उसका अर्थ यह लगाया कि फैसला उसके विपरीत गया होगा, तभी तारीख बढ़ाई गई। इस सदमे से उसकी मृत्यु हो गई। अगली तारीख में जब मजिस्ट्रेट ने उसे निर्दोष घोषित किया तब लड़के ने बताया कि वह तो उसी दिन मर गये। इससे मजिस्ट्रेट के मन में अपने छिपाव का मनस्ताप रहने लगा। 24 वर्ष तक इस मनोव्यथा की स्थिति में रहने के बाद जब बोझ असह्य हो चला तो उनने सार्वजनिक रूप से अपनी भूल स्वीकार की और उन्हें तभी अपनी मनोव्यथा से मुक्ति मिली - भले ही अकर्तव्य के लिये उन्हें उपहास और फटकार ही क्यों न मिली हो। इसके साथ ही यदि उपवास या व्रत आदि कर लिया जाता तो दोष और भी शान्त हो जाता। अरब के प्रसिद्ध हकीम श्री इब्न सीना ने अपनी पुस्तक “कानून” में एक दिलचस्प उदाहरण दिया है जो “पूर्व जन्म कृतं पापं व्याधि रूपेण तिष्टति” पूर्व कृत पाप ही व्याधि के कारण होते हैं - वाली भारतीय मान्यता का समर्थन करता है। गजनी का महमूद इब्नसीना को अपने पास रखना चाहता था पर जब इब्नसीना ने इनकार कर दिया तो उसने बल प्रयोग करना चाहा। इब्नसीना हर्केनियाँ भाग गये। वहाँ का शासक बीमार था जिसे कोई भी अच्छा नहीं कर सका था। इब्नसीना उसे देखने गये। नब्ज पकड़कर बोले-आप अनेक शहरों के नाम बोलिये। एक खास शहर का नाम लेने पर रोगी की नब्ज़ फड़की। फिर एक ऐसा आदमी बुलाया गया जो उस शहर की हर गली को जानता हो। इस बार गलियों के नाम पुकारे गये। एक विशेष गली का नाम लेने पर फिर वैसी ही नब्ज़ फड़की। इस तरह से इब्नसीना ने उस युवती का पता लगा लिया जिसे शाह ने देखा था और उससे विवाह करना चाहता था पर उसे जानता नहीं था। मन के अज्ञात सागर में कहाँ के, किस जन्म के संस्कार भरे हैं यह इस से स्पष्ट है। हमारे शरीर की हर ज्ञात-अज्ञात क्रिया पूर्व कृत कर्म और विचारणा के आधार पर चलती है इसलिए जीवन की शुद्धता, सुख और शान्ति का आधार ही यही है कि मन शुद्ध हो, सात्विक विचारों वाला संकल्पशील हो ।

अब ऐसे यन्त्र भी बन चुके हैं जिनके प्रयोग से पता चलता है कि मन में रागात्मक अनुभव जितना तीव्र होगा, त्वचा का विद्युत अवरोध उतना ही घट जाएगा। इसी आधार पर सच और झूठ का विश्लेषण करने वाली मशीनें बनाई गई हैं। यह मशीन “स्फिग्मोमैनोमीटर” तथा न्यूमोग्राफ से बनाई गई हैं। एक फीते पर सच या झूठ का ग्राफ त्वचा की प्रतिरोधकता के अनुसार खिंच जाता है। आगे अज्ञात संस्कारों को जानने वाली मशीनें भी बन सकती हैं। पापों की पोल खोलने वाले यन्त्र भी आ सकते हैं। उन सबका निष्कर्ष यही होगा कि मनुष्य अपनी भावनाओं को शुद्ध रख कर ही सुखी रह सकता है। उसका एक मात्र उपाय प्रायश्चित प्रक्रिया ही होगी। अपनी भूलें स्वीकार करने और उचित दण्ड के लिए सहर्ष तैयार होने के अतिरिक्त हमारी सुख-शान्ति और सद्गति का दूसरा उपाय नहीं। उससे बचने का अर्थ अपना ही अहित, आत्मघात होगा जिसका बुरा फल न जाने कितने जन्मों तक भोगना पड़ेगा। अच्छा हो अपने संस्कार जीवन में शुद्ध कर लें।


वचन-भंग मांसाहार से बड़ा पाप

सद्वाक्य

भूल-सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है जब कि बुराइयों से मूँह मोड़ना सबसे बड़ा पाप है ।      - महात्मा गांधी

वचन-भङ्ग माँसाहार से बड़ा पाप

इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर भोज था उसमें गाँधीजी भी आमन्त्रित थे। नियत समय पर गांधीजी पहुंच गये। भोज में एकत्रित सभी व्यक्ति उच्च प्रतिभा और सम्मान वाले व्यक्ति थे। भोजन परोसा गया। उन्होंने देखा भोजन की थाली में माँस है तो वे उठकर खड़े हो गये और खाने से इनकार कर दिया। लोग आश्चर्य चकित रह गये। तभी एक अँग्रेज ने कहा-माँस खाने से क्या होता है ? गाँधीजी बोले-माँ को दिये गये वचन को तोड़ना ही क्या कम पाप है जो मैं माँसाहार के पाप पर, विचार करूं।


समर्थता से भी बढ़कर सामूहिकता

प्रकृति का एक पन्ना - एक अध्याय समर्थता का - जो जितना समर्थ है शारीरिक शक्ति से ओत-प्रोत है वह उतना अधिक वसुन्धरा की संपत्ति का उपभोग करता है। प्रकृति ने हर शक्तिशाली को शासन और शोषण की खुली अनुमति दी है, बड़ा पेड़ छोटे पेड़ को बढ़ने नहीं देता, बड़ी मछली छोटी मछली को पकड़ कर खा जाती है, जंगल में रहने वाले ताकतवर शेर-चीते, बाघ, रीछ अपने से कम शक्ति  वाले बकरी, भेड़, गाय, हिरण, साँभर को मारकर खा जाते हैं। प्रकृति की कृपा सामर्थ्य के साथ जुड़ी हुई है। सांसारिक सुख-सुविधाओं और साधनों का अधिकतम भोग करना हो, शासन करना हो तो शक्ति की साधना करनी चाहिये, समर्थता बढ़ानी चाहिये। प्रकृति का एक पन्ना।

इस दृष्टि से शारीरिक शक्ति वाले लोगों को क्या दुनिया पर शासन करने का नैतिक अधिकार है ? जैसा कि कई पाश्चात्य जातियाँ साम्राज्य लिप्सा के बचाव में दलील दिया करती हैं ? शाकाहारी भारतीय क्या माँसाहारी लोगों की श्रेष्ठता स्वीकार कर उनके ही आदर्शों को मानने लगें ? जैसा कि आज की परिस्थितियों में हो रहा है इस देश के नागरिक आहार-विहार, रहन-सहन, वेष-भूषा सब बातों में पश्चिम की नकल करते हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि इस देश के लोग उनके मुकाबले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं।

इस देश, भारतवर्ष ने शक्ति की परिभाषा भिन्न की है। हमारी शक्ति खुराक पर नहीं तत्त्व पर, भावनाओं पर आधारित है। इस दृष्टि से न तो मन न शरीर किसी भी दृष्टि से हमारी समर्थता पाश्चात्यों से कम नहीं, तो भी यदि शरीर की स्थूल ताकत को ही प्रमुखता दी जाये तब भी किसी को शक्ति से हार मानना नहीं चाहिये। स्थूल समर्थता से हार मन लेने का अर्थ नैतिक पराजय होती है, चारित्रिक हार होती है और जो जातियाँ नीति, सदाचार और चरित्र की रक्षा नहीं कर पातीं, वह मात खा जातीं, खोखली हो जाती हैं।

प्रकृति का दूसरा पन्ना - आततायी समर्थता से संघर्ष के लिये विकल्प - सहयोग संघबद्धता और सामूहिकता का पन्ना है। यह पन्ना समर्थता के पन्ने से भी अधिक महत्वपूर्ण है और शिक्षा देता है कि जब आततायी शक्तियाँ या अनैतिकता सिर उठाये, ऐसा लगे कि दुष्टता प्रबल हो रही है, उसे जीत पाना कठिन है तब उसका प्रतिकार सामूहिक और संगठित शक्ति द्वारा होना चाहिये।

कुछ दिन पूर्व आस्ट्रेलिया के किसानों को एक विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा। उनकी फसल तैयार होती, तब वहाँ के तोते फसलों की फसलें उजाड़ जाते, रखवाले तरह-तरह के उपाय करके हारे किंतु तोतों पर नियन्त्रण न कर सके। एक भी तोता उनकी पकड़ में नहीं आता था। तब कुछ बुद्धिमान आदमियों ने स्थिति के अध्ययन की आवश्यकता अनुभव की। कुछ लोग छिपकर बैठे। उन्होंने देखा तोते खेत पर एकाएक आक्रमण नहीं करते वरन् पहले सब खेतों से दूर छिपकर बैठ जाते हैं। कुछ तोतों का झुण्ड आगे जाकर बड़े पेड़ों पर मोर्चा (आव्जर्वेशन पोस्ट) लगाते हैं। फिर वे उड़कर पता लगाते हैं कोई है तो नहीं ! यदि मैदान साफ हुआ तो वे अपने दूरवर्ती साथियों को संकेत भेज देते हैं। फिर सब तोते दल-बल के साथ जा पहुँचते, और बात की बात में खेत साफ कर देते। यह रहस्य जान लेने के बाद ही उन तोतों पर नियंत्रण किया जा सका। साथ ही आस्ट्रेलियनों ने सहयोग और सामूहिकता का महत्त्व भी समझ लिया।

उकाब छोटा-सा पक्षी - एक किलो वजन पैरों में बाँध दिया जाये तो उड़ना हराम हो जाये, पर कई उकावों की संगठित शक्ति जो भी देख ले, सामूहिकता के वर्चस्व की सराहना किये बिना न रहेगा। उकाब इकट्ठे चलते हैं और 10-10 किलो वजन के खरगोश और हिरन के बच्चों को भी उठा ले जाते हैं। उकाब तो कई बार आपस में झगड़ भी पड़ते हैं पर प्रसिद्ध विचारक प्रिन्स क्रोपाटकिन अपनी पुस्तक “ संघर्ष नहीं सहयोग” (म्युचुअल एण्ड) में लिखा है कि चीलों को आपस में झगड़ते किसी ने कभी भी नहीं देखा । यही कारण है कि उनकी सामूहिक शक्ति उकावों पर भी विजय पा लेती है। वे उकावों का पीछा करके उनका शिकार हड़प लेती हैं। सहयोग की शक्ति इस बात पर निर्भर है कि प्रत्येक सदस्य कितने प्रेम और वफादारी, मैत्री और एकता का परिचय देता है। जो लोग इन नियमों का पालन करते हैं, कभी किसी से हारते नहीं। बाज तक को भी यह चीलें हरा देती हैं और उनके द्वारा पकड़ी हुई मछलियों को छीन लेती हैं।

प्रसिद्ध प्राणी विशेषज्ञ लेवेलिएण्ट ने एक स्थान पर लिखा है कि गिद्धों में परस्पर इतनी प्रगाढ़ मैत्री होती है कि वैसी मनुष्य समाज में भी नहीं होती। उनने गिद्धों को ‘सामाजिक जीव’ की संज्ञा दी है और लिखा है कि गुफाओं में तो तीन-तीन, चार-चार गिद्धों के घोंसले पास-पास पाये जाते हैं। शिकार वे कभी अकेले नहीं खाते। शिकार के पास पहुँचकर अपने सभी साथियों के आ जाने की प्रतीक्षा करते हैं। और इकट्ठे मिलकर ही उसका आहार करते हैं। उस समय शक्तिशाली कुत्ते और दूसरे हिंसक जंगली जीव भी इनका कुछ नहीं कर पाते।

प्रिन्स क्रोपाटकिन ने अपनी पुस्तक “म्युचुअल एण्ड” में इंग्लैंड के हम्बर जिले में समुद्री चिड़ियों का दिलचस्प वर्णन किया है। और बताया हैं वहाँ भाँति-भाँति के पक्षियों के शिकार से लेकर मनोरंजन के लिए उड़ने तक में सामूहिक भावना देखकर ऐसा लगता है मनुष्य जाति ने भी सामूहिकता के दर्शन को समझा होता तो वह इसी धरती में स्वर्ग-सुख का रसास्वादन करता।

समुद्र में पानी में डूबकर मछलियाँ पकड़ने वाले पनडुब्बों का मेल-मिलापी जीवन बड़ा ही आकर्षक और अनुकरणीय होता है। नदियों और तंग खाड़ियों में वे दो पार्टियों में विभक्त होकर शिकार करते हैं और फिर परस्पर मिलकर बैठते हैं। रात में हर समूह अपने-अपने सदस्यों के साथ अलग-अलग डेरों को लौट जाते हैं। एक गिरोह में पचास-पचास हजार पनडुब्बे तक रहते हैं पर उनमें कभी भी अधिकार के लिए झगड़ा होते नहीं देखा गया।

सामूहिकता की शक्ति, सामूहिकता का सुख शारीरिक समर्थता से से भी हजार गुना सुखकर होता है। जो लोग, जो जातियाँ इस बात को जान लेती हैं, वे कभी दुःखी नहीं होतीं। कभी किसी से पराजित नहीं होतीं। विभिन्न वर्गों में बँटी हिन्दू जाति अपनी प्रगाढ़ सामाजिकता, सामूहिकता, मैत्री,प्रेम, विश्वास और एक का हित दूसरे से सम्बद्ध मानती रही- तब तक इसे कोई जीत न पाया। यह कौम हारी तब, जब जाति-पाँति, वर्ग-भेद, प्रान्त-प्रदेश के नाम पर फूट पड़ी। इन बुराइयों को निकाल सकें तो हम किसी भी समर्थ और जिन्दादिल कौम की तरह दुनिया में सर्वोपरि हो सकते हैं।


एकता में शक्ति

एक पिता के चार पुत्र थेे। चारों में प्रायः हमेशा ही झगड़ा बना रहता। इससे उनकी शारीरिक और आर्थिक ही नहीं,बल्कि मानसिक और बौद्धिक अवनति भी होती जा रही थी। यह देखकर पिता बड़ा दुःखी हुआ। पिता ने मरते वक्त अपने पुत्रों को बुलाया और उन्हें एक लकड़ी का गट्ठर दिया और कहा - तोड़ो इसे। लड़कों ने भरसक प्रयत्न किया परन्तु न तोड़ सकें। अन्त में उसने कहा- ‘एक -एक तोड़ो’ ।तब वे बड़े आराम से टूटने लगीं। तब पिता ने कहा-’यदि इस प्रकार मिलकर रहोगे तो कोई तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सकेगा। और यदि फूट रही तो इसी प्रकार जैसे लकड़ियाँ क्षण में ही टूट गईं, नष्ट हो जाओगे। उस दिन से लड़के मिलकर रहने लगे।


कैन्सर चाहिए तो सिगरेट पियें

ठीक एक सौ वर्ष पूर्व जब कैन्सर अपने चिन्ताजनक रूप में सामने आया। जीव शास्त्री डा॰ लिविंग स्टोन ने लिखा था- ”कैन्सर नई सभ्यता की देन है”- तब उनकी बात को उपेक्षा में टाल दिया गया। सिगरेट, शराब, यंत्रीकरण और उसका धुआँ, कालिख, वाहनों का विस्तार - यही सब वे उपादान हैं जो आज सभ्यता के अंग के रूप में सामाजिक प्रतिष्ठा हड़प किये बैठे हैं और बदले में कैन्सर जैसी भयानक बीमारी बढ़ाते चले जाते हैं। द्वितीय महायुद्ध के बाद हुए अनुसंधानों ने इस बात की पुष्टि भी की है और चेतावनी भी दी है कि यदि मनुष्य जाति को स्वस्थ, समर्थ और जिन्दा रखना है तो सभ्यता का पुनर्मूल्यांकन किये बिना कल्याण नहीं।

कैन्सर ने आज से 40 वर्ष पूर्व ही एक जीवन नाशक, प्राणघातक रोग का रूप धारण कर लिया था तब से अब तक इस कठिन रोग के कारण और निवारण पर जो भारी अनुसंधान हुये वे इस बात की पुष्टि करते हैं-फेफड़े, मुँह और त्वचा के कैन्सर धूम्रपान, तमाखू-गूड़ाखू तथा विषैले धुएँ के कारण ही उत्पन्न होता है। यह परिणाम थोड़ी देर से स्पष्ट हो पाते हैं इसलिये लोग उस पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पाते इसलिये अब से 20-25 वर्ष पूर्व हुये अनुसंधानों और वैज्ञानिकों द्वारा दी गई चेतावनी का कोई असर न हुआ। अखबार वाले पत्र-पत्रिकाओं और किन्हीं किन्हीं देशों में तो रेडियो और टेलीविजन भी अपनी कमाई अपने लोभ के कारण सिगरेटों के विज्ञापन छापते और प्रसारित करते रहे। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि उससे सीधी-सादी भोली-भाली जनता का कितना अहित होता है। ऐसा अखबार चाहे उसका मालिक और सम्पादक कितने घराने, कुलीन कुटुम्ब से सम्बन्ध रखता हो, समाज का शत्रु ही माना जायेगा जो अपनी कमाई के लिए सिगरेट का विज्ञापन छापता और इस कैन्सर बढ़ाने वाली घातक आदत को बढ़ावा देता रहता है।

बीस साल में सिगरेट पीने वालों की संख्या और मात्रा बहुत अधिक इन विज्ञापन बाजियों के कारण बढ़ी और उसी का परिणाम है कि अकेले ब्रिटेन में कैन्सर रोग से मरने वाले लोगों की मृत्यु दर 74 प्रतिशत बढ़ गई । वहाँ प्रति वर्ष 50 हजार लोग सिगरेट पीने के कारण उत्पन्न हुई बीमारियों से मरते हैं। यह संख्या ब्रिटेन की कुल मृत्यु का दसवाँ भाग है। अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे की स्थिति भी ऐसी ही है। भारतवर्ष मृत्यु की इस दौड़ में कुछ पीछे अवश्य है पर हमारी पश्चिमी सभ्यता की ओर दौड़- हमें इस प्रतियोगिता में आगे बढ़ा दे तो कुछ आश्चर्य नहीं।

1970 के अनुसंधान और सिगरेट सम्बन्धी आँकड़ों के आधार पर पहले ही इस बात की आशंका पैदा कर दी गई थी। उस वर्ष अमेरिका में 51 हजार पुरुष और 11 हजार स्त्रियाँ (इंग्लैंड व अमेरिका में स्त्रियाँ धूम्रपान करती हैं। उनकी संख्या भी पिछले 20 वर्षों में बढ़ी है और उसी हिसाब से मृत्यु दर भी) कैन्सर से मर सकती हैं। इसके बाद अनेक प्रयत्नों के बाद मरने वालों को बचाया न जा सका। यह मृत्यु दर 35 वर्ष पूर्व कैन्सर से मरने वालों की संख्या से 13 गुनी अधिक थी।

अमेरिका में ऐसे यन्त्र बनाये गये हैं जिनकी आंतरिक रचना फेफड़ों सी होती है। यह मशीनें सिगरेट पीती है। तो उसके धुयें से फेफड़ों की रासायनिक प्रतिक्रिया, “टार” (तमाखू का विषैला रसायन) और अन्य रसायनों को इकट्ठा किया जाता है जिससे खोज में मदद मिलती है। इन शोधों ने निर्विवाद सिद्ध कर दिया है कि सिगरेट पीने वाले को तो कैन्सर का शिकार बनाती ही है, उस व्यक्ति के कोशों में इस तरह की आनुवंशिक खराबियाँ पैदा कर देता है जिससे कि उनकी संतानें सिगरेट न भी पियें तो भी उन्हें कैन्सर होने की सम्भावना रहेगी। अपनी सन्तानों के प्रति इस पाप का पश्चात्ताप यही हो सकता है कि सिगरेट पीने वालों को बच्चे पैदा करने का अधिकार न दिया जाये। उनके विवाह को सामाजिक अपराध माना जाए। इससे न केवल आनुवंशिक रोगों की रोकथाम होगी वरन् जनसंख्या की समस्या भी हल होगी। बीमारों की जनसंख्या की समस्या तो जनसंख्या से भी घातक होगी।

कैन्सर विरोधी अंतर्राष्ट्रीय संघ के प्रधानमन्त्री, कनाडा के राष्ट्रीय कैन्सर संस्थान के व्यवस्थापक निर्देशक व कैन्सर सभा के टोरंटो के उपसभापति व्यवस्थापक डा॰ राबर्ट एम. टेलर की रिपोर्ट है- कनाडा की 2 करोड़ आबादी में से प्रतिवर्ष 18 हजार लोगों की मृत्यु कैन्सर, हृदय, छाती के रोगों से होती है। “सिगरेट क्यों नहीं पीना चाहिए” लेख में उन्होंने इस मृत्यु-दर का कारण धूम्रपान ही माना है और लिखा है-जो धूम्रपान नहीं करते वे भी हवा में छोड़े गये सिगरेट के धुयें से प्रभावित होते हैं। अतएव न पीने वाले लोगों का नैतिक अधिकार है कि वे सिगरेट पीने वालों को सिगरेट पीने से रोकें या फिर उन्हें मुंह से धुआँ न निकालने को बाध्य करें। कनाडा में 82 प्रतिशत न पीने वाले इसी मत के हैं। जबकि पीने वालों में ही 73 प्रतिशत ने माना कि वे बुरा कार्य करते हैं। यह आँकड़े 1967 में कैन्सर सम्बन्धी एक मत संग्रह में आये।

रूस में प्रयोगशालाओं में कुछ खरगोशों को धूम्रपान का अभ्यस्त बनाकर उन पर प्रयोग किये गये उससे स्पष्ट हो गया कि सिगरेट ही कैन्सर का मुख्य कारण है। कैन्सर विरोधी अंतर्राष्ट्रीय संघ के अध्यक्ष निकोलाई ब्लोरिबन ने स्वीकार किया है कि रूस में तमाखू विरोधी अभियान चलाया जा रहा है।

अमरीका की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के भूतपूर्व चीफ सर्जन डा॰ लूथर टेरी ने तीन वर्ष अमरीका में हुए-”धूम्रपान तथा स्वास्थ्य” विषय सम्मेलन में कहा था- कैन्सर के बारे में अनिश्चय की स्थिति समाप्त हो चुकी है। यह स्पष्ट हो चुका है कि यह रोग धूम्रपान की ही देन है।” इस अन्तिम निश्चय के साथ जहाँ दूसरे देशों में सिगरेट विरोधी अभियान चल रहे हैं वहाँ अपने देश भारतवर्ष में धूम्रपान बढ़े, तमाखू सेवन बढ़े इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिये। यहाँ भी समाज-सेवी व्यक्तियों और संगठनों को धूम्रपान के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संघ ने एक फोटो छापी है जिसमें एक व्यक्ति मुँह में सिगरेट लगायें है और भूत का हाथ माचिस जलाकर सिगरेट सुलगाने में मदद कर रहा है भाव है कि “सिगरेट पीना मौत को बुलाना है।”

ब्रिटेन के दो तिहाई डाक्टर सिगरेट पीते थे। कैन्सर सम्बन्धी तथ्य जब से सामने आये, अब एक तिहाई डाक्टर ने सिगरेट पीनी छोड़ दी, शेष एक तिहाई भी छोड़ने के यत्न में हैं। इसका लाभ भी हुआ जहाँ पिछले दिनों वहाँ कैन्सर से मृत्यु-दर में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई, डाक्टरों के बीच 30 प्रतिशत दर घट गई।

इंग्लैंड, फ्रांस, चैकोस्लोवाकिया, इटली, नार्वे, आयरलैण्ड, डेनमार्क तथा स्विट्जरलैंड में सिगरेट के विज्ञापनों पर रोक लगा दी गई है। इस वर्ष अमेरिका में रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा सिगरेटों के विज्ञापन को कानूनी तौर पर रोक दिया गया है। ब्रिटेन में तो “सिगरेट विरोधी” अभियान चलाये गये हैं। “स्मोक स्टापर्स लि॰”, “समोकर्स एकानिमस” आदि संस्थाएं रेडियो, टेलीविजन तथा अखबारों के माध्यम से धूम्रपान विरोधी अभियान चला रही है।

जो लोग सिगरेट नहीं छोड़ सकते उन्हें भी सिगरेट पीना कम करना चाहिए। ब्रिटेन के स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा तथा गृह मन्त्रालय के प्रधान चिकित्साधिकारी जार्ज गाडबर ने 1970 के “विश्व-स्वास्थ्य” फरवरी अंक में लिखा है।- “तीन सिगरेटों में से आखिरी अधिक हानिकारक होती है। चूँकि” टार और निकोटिन का अधिकांश भाग तम्बाकू व फिल्टर में सोख जाता है इसलिए सिगरेट का सबसे ज्यादा आखिरी टुकड़ा, सबसे नुकसानदायक हो जाता है।, इसी प्रकार जब दूसरी सिगरेट पी जाती है तब निकोटीन तथा टार फेफड़ों की नलियों को विषाक्त करने लगते हैं और उनमें बलगम बनने लगता है। यह बलगम “टार” से मिलकर फेफड़े में खिसक जाता है वहाँ वह सड़ने व जमने लगता है। यही धीरे-धीरे कैन्सर में परिणत हो जाता है। जो धुआँ साँस के माध्यम से बढ़ता जाता है वह “टार” की मात्रा शरीर के अन्य भागों में बढ़ाने लगता है। इसलिए सिगरेट जितनी अधिक पी जायेगी हानि उतनी ही अधिक होगी।

डा॰ क्युलर हेमंड के अनुसार 25 वर्ष तक जो सिगरेट नहीं पीते ऐसे 78 प्रतिशत लोग 65 वर्ष या उससे अधिक जीते हैं। जो लोग प्रतिदिन 40 या इससे अधिक सिगरेट पीते हैं उनकी आयु घटकर 54 प्रतिशत रह जायेगी, जबकि जो लोग कम पियेंगे उनकी 65 प्रतिशत तक आयु बढ़ जायेगी। इससे पता चलता है कि सिगरेट पूरी तरह न छूटे तो कम करने से भी लाभ है।


सद्वाक्य व लघु कहानी - ईश्वर का सहारा

यूनान के शाह का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन खराब होता गया। बचने के आसार नजर नहीं आ रहे थे। अन्त में वहाँ के सभी हकीमों ने मिलकर यह निश्चय किया यदि निर्धारित लक्षणों वाले किसी व्यक्ति का पित्ताशय प्राप्त हो सके तो शाह के जीवन को बचाया जा सकता है।

शासकीय कर्मचारी निकल पड़े और दो-तीन दिन की खोज-बीन के बाद चाहे हुये लक्षणों वाले एक बालक को पकड़ लाये। निर्धन माँ बाप का वह सीधा-साधा बालक। पिता को विपुल मात्रा में धन दे दिया गया तो उसने चूँ तक न की।

काजी से इस सम्बन्ध में परामर्श लिया गया तो उन्होंने भी कह दिया कि राजा के प्राण रक्षा हेतु यदि प्रजा के किन्हीं एक दो व्यक्तियों को अपना बलिदान भी देना पड़े तो वह अपराध की कोठी में नही आयेगा।

वह लड़का राजा के सम्मुख उपस्थित किया गया। सभी हकीम अपनी तैयारी के साथ आये ही थे। जल्लाद को तलवार से काम तमाम करने की आज्ञा दे दी गई। जल्लाद ने जैसे ही तलवार उठाई कि बालक को ऊपर आकाश की ओर देखकर हँसी आ गयी।

राजा को, मृत्यु के मुँह में जाते बालक को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने संकेत से उस जल्लाद को रुकने के लिए कहा। ‘जल्लाद ने अपना हाथ नीचे कर लिया। बालक गम्भीर हो गया उसने कहा-’आज मैंने देखा कि माता-पिता जिस सन्तान के लिए प्राण देते हैं उन्होंने उसे पैसों के लोभ में आकर बेच दिया। काजी जो धर्म और मर्यादा की रक्षा करने वाला कहा जाता है उसने राजा को खुश करने के लिए धर्म के सिद्धान्त को ही बदल दिया और राजा के जीवन को बचाने के लिए भले ही किसी के प्राण लिए जाये पर धर्म उस अपराध को अपराध और पाप की दृष्टि से मान्य करने को तैयार नहीं। प्रजा का रक्षक बादशाह ही भक्षक बना जा रहा हो उस समय ईश्वर के अलावा व्यक्ति को सहारा देने वाला और हो भी कौन सकता है?’

अतः मुझे उस परमपिता की याद करके हँसी आ गई कि यहाँ तो ऐसा अंधेर मचा हुआ है देख सबका रक्षक क्या करता है?

‘मुझे क्षमा कर बेटा! अब तू निश्चित होजा। जल्लाद की तलवार अब तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सकेगी।’ शाह ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा। यूनान के शाह ने भूल स्वीकार करली पर आज धूम्रपान के बारे में उपरोक्त तीनों तथ्य ज्यों के त्यों हैं।


शास्त्रादपि-शरादपि

कोंकण के एक छोटे से गाँव में, छोटी सी चौपाल में समर्थ गुरु रामदास उपदेश कर रहे थे-समस्त जीव भगवान् के बनाये हैं। कोई शक्तिशाली है इसका यह अर्थ नहीं होता वह अपने से अशक्त को मारे और सताये। जो जिस स्थिति में है उसे उसी स्थिति से आत्म-विकास का अवसर मिलना चाहिए।

गाँव की भावुक और श्रद्धालु प्रजा समर्थ के उपदेश से बहुत प्रभावित हुई। प्रतिदिन ऐसा ही उपदेश चलता, कीर्तन होते। गाँव के लोग भक्तिपूर्वक आते और भजन का आनन्द लूटते। लेकिन दुनिया में सब अच्छे ही अच्छे लोग नहीं, बुरे और निन्दक भी कम नहीं। ऐसे भी लोग है जिनको अपनी इंद्रियों के सुख, शरीर की वासना, सांसारिक वैभव जैसी स्थूल प्रवृत्तियों के आगे कुछ सूझता ही नहीं। भावनाओं का विज्ञान उनकी दृष्टि में पागल-कृत्य से अधिक कुछ नहीं होता। स्थूल प्रकृति का भाग समस्त ब्रह्माण्ड का चौथाई भी नहीं है। शेष सारा अंतर्गत भावनाओं से ही भरा हुआ है। तथापि स्थूल बुद्धि, वासना से डूबे मन की मूर्खता को क्या कहा जाये जो मनुष्य को भावनाओं के सत्य की अनुभूति ही नहीं करने देता। ऐसा ही एक व्यक्ति - एक पटेल इस गाँव में भी रहता था। वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट था इसलिए समर्थ के कीर्तन में भाग लेने वालों को बलपूर्वक रोक लेता। कहता-मूर्खों कथा-कीर्तन से भला नहीं होगा। खाओ पियो मौज करो, मर जायेंगे तब देखा जायेगा, अभी तो दुनिया धरती का आनंद ले लो।

कोई कह भी देता- पटेलजी! मनुष्य शरीर भगवान् की अमूल्य देन है इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग आध्यात्मिकता से ही सम्भव है-पटेल को यह शब्द विष-बुझे बाण की तरह लगते और वह कई बार लोगों को पीट भी देता। कीर्तन में भाग लेने वालों से उसकी दुश्मनी सी हो गई। लोग कहते भी-भाई तुम्हें धर्म-कर्म से मतलब नहीं-न सही, हमें क्यों रोकते हो। समर्थ यहाँ रोज-रोज थोड़े ही आयेंगे। पर पटेल पत्थर का बना था। किसी की एक न सुनी; डराना, धमकाना बराबर जारी रहा।

समर्थ उसके अत्याचार की कहानी सुनते, कुछ सोचकर चुप रह जाते। धर्म प्रचार चलता रहा और पटेल उन लोगों को दण्ड देता रहा जो लोग कीर्तन में सम्मिलित होते। एक दिन बड़े सवेरे समर्थ स्नान करके आ रहे थे। उन्होंने देखा एक आदमी एक मुर्गा पकड़े लिए जा रहा है। उन्होंने टोका मुर्गा कहाँ लिये जा रहे हो? तब तक आ गए पटेल के सामने बोले, महाराज! धर्मकार्य के लिए-मेरा बेटा बीमार हुआ, तब मनौती मानी थी। इसे काली की भेंट चढ़ाने ले जा रहा हूँ। फिर थोड़ा व्यंग से बोला- क्यों आज कथा-कीर्तन की छुट्टी कर दी क्या ?

और समर्थ इससे पूर्व कि पटेल कुछ और कहे - लपके और एक हाथ से पटेल को तथा दूसरे हाथ से उस आदमी को जो मुर्गा पकड़े था, धर दबोचा। पटेल समझता था, धर्म-कर्म वाले लोग कायर और कमजोर होते हैं पर भुट्टे सी गर्दनों को कसकर समर्थ ने दाबा तो उसे हिचकी आ गई। समर्थ की समर्थता का अनुमान करना उसे कठिन हो गया।

समर्थ बोले-आज रात काली ने मुझे स्वप्न दिया कि मेरा पेट मुर्गे से नहीं भरेगा, दो मोटे-ताजे आदमी चाहिए, काली बहुत भूखी है चलो आज तुम्हारी बली चढ़ा दें। पटेल का दम खुश्क हो गया। समर्थ के पैरों पर गिर गया और बोला - महाराज फिर कभी किसी जीव को नहीं सताऊँगा-कोई दुष्कृत्य नहीं करूँगा।

दूसरे दिन सभा जुड़ी-लोगों ने देखा-पटेल सबसे आगे बैठा कीर्तन कर रहा है-एक ग्रामीण ने हँसकर दूसरे ग्रामीण के कान में कहा-जेठ में बरसात कैसी? दूसरे ने कहा भाई-आज कल लोग शास्त्र की बात को कम मानते हैं, उन्हें थोड़ा शक्ति से भी मनवाना पड़ता है।


प्राणिमात्र से यथायोग्य व्यवहार करें

स्वर्ण को किसी रूप में क्यों न परिवर्तित किया जाये, किसी भी साँचे में ढाला जाये-सोना अन्ततः सोना ही रहेगा ‘अतः प्रवृत्ति भूतानाम्’-का अन्य कोई तात्पर्य नहीं है। इसका केवल यही तात्पर्य है कि यह चराचरमय सारी सृष्टि परमात्म रूप ही है। इसका उद्भव परमात्मा से हुआ है। इसका अस्तित्व परमात्मा से ही है और अन्त में यह परमात्मा में ही मिल जायेगी। परमात्मा से पृथक उसकी कोई कल्पना नहीं है। जल स्वयं ही बादल बनता है। स्वयं ही बूँद, बुद-बुद तथा सरिता एवं सागर का रूप धारण करता है। स्वयं ही हिम एवं निर्झर बनता है। स्थान स्थिति और स्वरूप के अनुसार नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी तत्वतः सब है जल ही।

बीज में केवल एक तरह का एक ही पदार्थ होता है। उसमें मूल, फूल, पत्ते तथा शाखा प्रशाखा नहीं होतीं। किन्तु जब वह अंकुरित होकर बढ़ता है तब एक ही पदार्थ-गूदा-विभिन्न रूपों में स्फुरित होकर सर्वांग वृक्ष का रूप धारण कर लेता है। इसी प्रकार मूल परमात्म तत्त्व एक ही है। वह स्वयं ही विविध प्रकार से विकसित होकर विश्व-वैचित्र्य के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

परमात्मा से भिन्न सृष्टि की कल्पना की ही नहीं जा सकती। जो कुछ हमें दिखाई दे रहा है, जिसे हम अनुभव कर रहे हैं अथवा जिसकी भावना कर सकते हैं वह सब परमात्म तत्व ही है। यह सारा जगत् परमात्मा से उत्पन्न हुआ है, उसी से उसी में व्याप्त है और एक दिन उसी में लीन हो जायेगा। न तो कुछ परमात्मा से पृथक है, और न परमात्मा किसी से भिन्न है। माता-पिता, स्त्री-पुरुष पति-पत्नी, भाई-बहिन, शत्रु-मित्र, भला-बुरा जो हमारे मन में आता है वह सब परमात्मा ही है और जो कुछ व्यवहार हम करते हैं, ईश्वर की आज्ञा से ईश्वर के प्रति ही हम करते हैं।

इस न्याय के अनुसार यह शंका की जा सकती है कि जब संसार का प्रत्येक प्राणी ईश्वर स्वरुप है, तब किसी से यथायोग्य व्यवहार किस प्रकार किया जा सकता है। सांसारिक मर्यादा के अनुसार किसी से समानता का, किसी से श्रेष्ठता का या कनिष्ठता का व्यवहार करना पड़ता है। इतना ही क्यों कभी-कभी ऐसे अनिवार्य अवसर आ पड़ते हैं जबकि किसी को बुरा-भला कहने अथवा दण्ड देने दिलाने की आवश्यकता हो जाती है। तब यदि किसी से कठोर व्यवहार किया जायेगा तो यह एक प्रकार से ईश्वर के प्रति ही अशिष्टता होगी। क्या इस प्रकार का व्यवहार करना किसी विचारशील व्यक्ति के योग्य होगा?

साधारण रूप से सोचने पर यह शंका ठीक ही मालूम होती है कि-"जब स्त्री पुत्र से लेकर चोर-चाण्डाल तक सब ईश्वर के ही स्वरूप हैं, तब भला उनसे यथायोग्य कनिष्ठता अथवा कठोरता का व्यवहार किस प्रकार किया जा सकता है ? ईश्वर मानते हुये बच्चे को ताड़ना देना अथवा चोर डाकू को दण्ड दिलवाना भी तो पाप ही होगा? और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो सामाजिक व्यवस्था में व्यवधान आता है। संसार में कुविचारों तथा कुप्रवृत्तियों की वृद्धि होती है?”

इस शंका का साधारण का समाधान यह है कि भगवान् जिस समय जिस रूप में अपने सामने उपस्थित हों उस समय उनसे यथायोग्य व्यवहार करना ही उनका आदर करना है। कटु, कठोर अथवा असत् व्यवहार तो क्या, बड़े और क्या छोटे, किसी से किया ही नहीं जाना चाहिए। बच्चे के हित में उसे ताड़ना देते समय भी हृदय में क्रोध का भाव नहीं होना चाहिये अथवा किसी अपराधी को दण्ड दिलाते समय प्रतिशोध की भावना होना एक पाप ही है। अपराधी को दण्ड दिलाते समय भी यही भाव होना चाहिये कि उसकी ताड़ना का प्रबन्ध करना उसके सुधार तथा सामाजिक शान्ति के लिये आवश्यक है। इसलिए ऐसा करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। इससे हमारा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है।

क्रोध, आवेश, उद्वेग अथवा प्रतिशोध के वशीभूत होकर किसी से कटु व्यवहार करना आध्यात्मिक क्षेत्र में पाप ही है और सामाजिक सीमा में असज्जनता है।

वेश अथवा स्वरूप के अनुसार ही यथायोग्य व्यवहार करना ईश्वर की आज्ञा का ही पालन है! शर शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह द्वारा उपाधान माँगे जाने पर अर्जुन का उनके मस्तक को बेध कर बाणों का तकिया बना दिया जाना देखने में कितना क्रूर कर्म है। किन्तु पितामह भीष्म को उस समय उसी प्रकार का उपाधान योग्य था। इसीलिये ही तो उन्होंने कौरवों द्वारा लाये गये रेशमी उपाधानों को अस्वीकार करके अर्जुन को इस कठोर कर्म के लिए भी विजय का आशीर्वाद दिया था। यह भीष्म पितामह के वेश के योग्य व्यवहार था। उस समय अर्जुन की करुणा भीष्म वेश के प्रतिकूल होती और यदि वे वैसा करने से इनकार कर देते तो अपने कर्तव्य से गिर जाने और पितामह के आशीर्वादपूर्ण प्रसन्नता से वंचित रह जाते।

इसी प्रकार बच्चे के रूप में आये हुये भगवान् के स्वरूप का ध्यान न करके यदि उसके साथ श्रद्धा भक्ति, पूजा अर्चा का व्यवहार किया जाये तो यह अयुक्त होगा, जिससे भगवान् प्रसन्न होने के स्थान पर रुष्ट ही हो जायेंगे। भगवान राम समझ कर चोर अथवा चाण्डाल की चाटुकारी करना भी उस वेश में आये भगवान् का अपमान करना ही है। भगवान् की प्रसन्नता स्वरूप के प्रति शास्त्रोक्त व्यवहार करने में ही है। वेश के अनुरूप व्यवहार न करना ही वास्तव में अनुचित है।

जिस प्रकार नाटक में कभी-कभी गुरुजन भी अधीनों का अभिनय किया करते हैं। ऐसे समय में यदि लघुजन यह सोचकर कि यह तो मेरे गुरुजन हैं -नाटक के अनुरूप बड़प्पन का अभिनय न करें तो नाटक ही बिगड़ जाये और उक्त भावुक अभिनेता उसकी असफलता का अपराधी बने। गुरुजन के अभिनय के अनुसार बड़प्पन का नाटकीय व्यवहार करने से वे किसी भी दशा में रुष्ट नहीं हो सकते। उस समय का वह व्यवहार उनकी प्रसन्नता तथा उत्साह का ही हेतु बनेगा। गुरुजन ही नहीं, संसार के प्राणी मात्र को ईश्वर का स्वरुप समझ कर उनके प्रति आदर एक स्थायी भाव होना चाहिए; साथ ही संसार लीला में रस तथा रोचकता लाने के लिये वेश के अनुसार यथायोग्य व्यवहार करना उक्त स्थायी भाव के गिर्द घूमने वाला संचारी होना चाहिए। छोटा हो अथवा बड़ा, किसी के भी प्रति अनादर का स्थायी भाव रखना एक पाप ही है संसार का प्रत्येक प्राणी उस परम पिता परमात्मा का ही स्वरूप है।

माता-पिता अथवा गुरुजन के वेश में आये हुये भगवान् हमारी पूजा के अधिकारी हैं। जबकि स्त्री, पुत्र के रूप में आये हुए भगवान् से आदर पाना हमारे योग्य है। इस व्यवहार में व्यतिक्रमण होने से भगवान् की शाश्त्रोक्त आज्ञा का उल्लंघन होगा। भगवान् कदापि इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि स्त्री-पुत्र अथवा नौकर-चाकर के वेश में आने पर उनसे सेवा लेने के स्थान पर सेवा की जाये। कनिष्ठ के वेश में आने पर उनका मन्तव्य होता है कि उन्हें आत्म प्रसन्नता, आत्मलीला तथा अभिनय के लिये सेवा करने का अवसर दिया जाये।

जहाँ पिता के रूप में भगवान् हमारी श्रद्धा-भक्ति के अधिकारी हैं वहाँ स्त्री, पुत्र तथा कनिष्ठ जनों के रूप में हमारे स्नेह प्रेम तथा करुणा दया के पात्र हैं, एवं अन्य के रूप में ताड़ना के। इस यथायोग्य व्यवहार के मूल में ममता-कामना अथवा अहंकार सक्रिय न होना चाहिए। यदि यह व्यवहार कर्तव्य के स्थान पर मनोविकारों से प्रेरित हो जाते हैं तो निश्चय ही किसी भी वेश के अंतिम स्वरूप भगवान् का अनादर करना होगा। परम रूप में सबको भगवान् का स्वरूप समझकर यथायोग्य व्यवहार ही सच्चा कर्म-योग है। ममता, मत्सरता, स्वार्थ अथवा अहंकार से प्रेरित कोई भी काम अयोग्य कर्म हैं।

यथायोग्य व्यवहार से भगवान की पूजा करते रहना एक बड़ी और ऊँची उपासना है। उपासना का तात्पर्य भगवान को प्रसन्न करना ही होता है। एकान्त में बैठ कर जप-तप द्वारा वे उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वेश के अनुसार यथायोग्य व्यवहार किये जाने से, कारण स्पष्ट है कि यदि उन्हें लीलापरक संसार अभीष्ट न होता तो वे इसकी रचना इतने वैचित्र्यमय ढंग से नहीं करते और न माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, भले-बुरे और अपने- पराये के अभिनय ही करते। इस विचित्रता के मूल में उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि लोग प्रत्येक में उनका स्थायी भाव रखते हुए यथायोग्य व्यवहार करते हुए इस संसार नाटक को सरस तथा सफल बनाएँ। संसार की इस सक्रिय लीला से मुख मोड़ कर जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर उसकी उपासना किया करते हैं, वे उनकी प्रीति के उतने सत्य पात्र नहीं बन पाते, जितने कि संसार के रंग-मंच पर सच्चाई के साथ अपना अभिनय अदा करते हैं।

सच्चे भक्त तथा यथार्थ दार्शनिक सचराचर जगत को परम पिता का ही स्वरूप समझकर निर्भय एवं निर्द्वन्द्व होकर यथायोग्य व्यवहार द्वारा ही भगवान का पूजन किया करते हैं। इस स्थिति में वे पारिवारिक, सामाजिक तथा सांसारिक होते हुये भी सच्चे भागवत् एवं सच्चे आत्मलीन बने रहते हैं। व्यवहार पूजा एकान्त पूजा से कहीं अधिक सरल एवं सरस होती है। इसमें कोई भी भक्त सब प्रकार से वर्तते हुए भी, सब प्रकार की अनुभूतियों का रसता हुआ भी-बंधन मुक्त रहा करता है।

सामाजिक अथवा पारिवारिक व्यवस्था में शास्त्रोक्त व्यवहार की अवहेलना करने से भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होगा- उनके नाटक में विकृति अथवा विकार उत्पन्न होगा-जो कि उस लीलाधर भगवान को किसी प्रकार भी वांछनीय न होगा। सर्वत्र सब में भगवान की भावना रखने वाला व्यक्ति अवसर स्थिति तथा स्वरूप के अनुसार शास्त्रोक्त व्यवहार करने वाला ही सच्चा भक्त है। सब में भगवान् का स्वरूप देखने वाला यदि देशकाल के अनुसार किसी से क्रोध भी करेगा तो वह भी उसका अभिनय ही होगा। यथार्थ में क्रोध न होने से वह उसके दोष का भागी न बनेगा। स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, यहाँ तक कि समग्र जड़-चेतन सृष्टि उस एक परमात्मा का ही स्वरूप है और उसके साथ यथायोग्य व्यवहार किया जाना ही उसकी सच्ची उपासना है-ऐसी निष्ठा रखने वाला कर्म योगी, कर्मों के बंधनों में न बँधकर संसार सागर से मुक्त हो जाता है ऐसा ध्रुव सत्य, सत्य है इसमें शंका न करना सबसे बड़ी आस्तिकता है; सर्वोपरि भक्ति है।


लघु कहानी - अमेरिका के उपराष्ट्रपति

अमेरिका के उपराष्ट्रपति श्री जैफरसन साधारण पोशाक में किसी नगर के एक होटल में पहूँचे और होटल व्यवस्थापक से निवास के लिए एक कमरे की माँग की। होटल व्यवस्थापक ने उस व्यक्ति को निम्न कोटि का समझकर स्थान देने से मना कर दिया। जैफरसन उसे समय अकेले ही थे। नौकर कोई साथ में था नहीं। अतः अपनी अटैची स्वयं ही उठाकर वे दूसरे होटल में चले गये।

थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति ने आकर सूचना दी ‘आपने जिस व्यक्ति को अभी ठहराने से मना कर दिया था वह कोई साधारण व्यक्ति न था, वरन् अपने देश के उपराष्ट्रपति श्री जैफरसन ही थे। अब होटल व्यवस्थापक को काटो तो खून नहीं । वह अपराध पर पश्चात्ताप करने लगा। उसने सोचा उपराष्ट्रपति के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हो गया, अब तो न जाने वह क्या दंड देंगे। उसने जल्दी ही अपने नौकर को उनके पीछे-पीछे ही भेजा और कहा ‘तुम माननीय अतिथि से क्षमा माँग कर ससम्मान यहाँ लिवा लाना।’

जैफरसन तब एक दूसरे होटल में ठहर चुके थे उन्होंने नौकर की बात सुन कर जवाब दिया ‘तुम अपने मालिक से जाकर कह देना कि जिस होटल में साधारण से किसान को ठहरने के लिए स्थान नहीं मिल सकता तो फिर वहाँ अमेरिका का उपराष्ट्रपति भी कैसे ठहर सकता है?’


जीव जंतुओं की विलक्षणतायें-आत्म-चेतना की माया

अफ्रीका के घने जंगलों में एक पौधा पाया जाता है जिससे अनेक जीव जन्तुओं को खाद्य मिलता है। यह पौधा जमीन के अन्दर से उग तो आता है किन्तु धरती से ऊपर आते ही किसी अज्ञात आवश्यकता - आकांक्षा के कारण पौधा आगे बढ़ने से इनकार कर देता है। पौधे का न बढ़ना जीवों के लिए उसी प्रकार कष्टदायक हो सकता है जिस प्रकार अध्यात्म के न रहने से मानव जीवन के भौतिक सुख भी कष्टदायक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में एक छोटी सी गिलहरी कमाल करती है।

कहते हैं परोपकार की आकांक्षा से एक बार एक गिलहरी ने भगवान् राम को समुद्र पाटने में मदद की थी और समस्त मानव जाति को एक पाठ सिखाया था कि मानवता की रक्षा और दुष्कृत्यों के विनाश में छोटे से छोटे व्यक्ति को भी सहयोगी बनना और जितना बन बड़े उतना ही सहयोग देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। इस पौराणिक गाथा को अतिरंजन कहा जा सकता है पर अफ्रीका वाली यह घटना-घटना नहीं यह आश्चर्यजनक सत्य अभी भी होता है। उस पौधे का विकास रुके इसके पूर्व ही गिलहरी कहीं से कुछ बीज इकट्ठा करती है और उस पौधे की जड़ के पास गड्ढा खोदकर उन्हें गाड़ आती है। जिस प्रकार समुचित शिक्षा और संस्कार पाने से छोटे-छोटे बच्चों का बौद्धिक और आत्मिक विकास होने लगता है, उसी प्रकार यह बीज उस पौधे के लिए खाद, पानी हो जाते हैं। और वह पूरे उत्साह के साथ बढ़ने, फलने-फूलने लगता है। गिलहरी जब तक अपना पार्ट अदा नहीं करती तब तक पौधा सूखा सा, प्रेम के अभाव में अविकसित मनुष्य जीवन की तरह ठूँठ खड़ा रहता है।

ईल चिड़िया भोजन और भ्रमण के लिए हजारों मील दूर चली जाती है पर अण्डा देना होता है तब वह अपने जन्म स्थान पर लौट आती है। चिड़िया का मरणकाल आ जाता है तब वह चाहे जहाँ भी हो, जन्म स्थान को लौट पड़ेगी। मृत्यु के लिए वह हर स्थिति में अपने घर ही पहुँचेगी। सालमन पक्षी भी जीवनभर कहीं रहे, मृत्यु के समय वह वहीं आ पहुँचता है जहाँ उसका जन्म होता है मानो वह सारे जीवन यह याद रखता हो कि किन परिस्थितियों के कारण उसे इस योनी में जन्म लेना पड़ा। जन्म पूरी कर लेने के बाद फिर वैसा निकृष्ट जीवन मिले वह अपने मूल स्थान पर लौटकर जीवन दिशा बदल देता है।

मुर्गी बच्चा देती है, 15 मिनट होने के बाद बच्चा अपने दाने-चारे के लिए चल देता है और कोई खतरा देखता है तो अपने आप ही खतरे की सूचक ध्वनि निकालने लगता है, जबकि इससे पहले वह ध्वनि न अपनी माता से सुनी होती है, न पिता से या बन्धु-बान्धवों से। जब बर्र के बच्चे छोटे होते हैं और उसका मरण काल आ धमकता है। घर में छोटे-छोटे बच्चे जो अपना खाद्य नहीं जुटा सकते, उनकी रक्षा का कर्त्तव्यभाव अलग सताता है ; तब भी बर्र आँखफुट्टे (ग्रास हापर्स ) को पकड़ कर टुकड़े-टुकड़े करके रख देती है, स्वयं मरने के लिये चल देती है। पीछे बच्चे वह मांस खा-खा के बड़े हो जाते हैं।

गिलहरी का बीज छुपाना, सालमन और ईल द्वारा अपनी मृत्यु के समय हजारों मील दूर से घर आना, चूजे का वंश परिपाटी के आधार का बिना शिक्षण ज्ञान का होना और मरते दम तक छोटी सी बर्र में कर्त्तव्यपालन की भावना-प्रश्न उठता है कि जीवों में इस तरह गणितीय बुद्धि का रहस्य क्या है ? आज का बुद्धिवादी व्यक्ति, आज का जीव शास्त्री उत्तर देगा कि यह सब प्रकृति की प्रेरणा से होता रहता है। इसे आनुवंशिक संस्कार भी कह सकते हैं ? रहन-सहन के मामले में सम्भव है प्रकृति की प्रेरणा जीव-जन्तुओं के लिये सहायक होती हों किन्तु कुछ ऐसी विलक्षणतायें हैं जो न तो प्रकृति की प्रेरणा हो सकती हैं और न बायोलॉजिकल-प्रतिक्रिया। अंतःप्रेरणा की वह विलक्षणतायें ही जीव मात्र में एक ही चेतना के अस्तित्व का प्रमाण होती हैं और इस बात का भी प्रमाण है कि मनुष्य की बुद्धि जैसे गुण यदि आनुवंशिक कारण हो सकता है तो वह मनुष्य चेतना के अनेक जीव-जन्तुओं की चेतना में परिवर्तन का भी प्रमाण हो सकता है। सीधे-सीधे कह सकते हैं कि मनुष्य चेतना द्वारा कर्मवश अन्य जीवों के शरीर में जाकर जन्म लेने की भारतीय मान्यता कोई अवैज्ञानिक बात नहीं सूक्ष्म सत्य है, जिसे इन उदाहरणों द्वारा समझा, परखा और खोजा जा सकता है कि किस गुण का मनुष्य किस जीव से मिलता होगा। मनोविज्ञान की यह शोध ही जीव-चेतना के सच्चे इतिहास और अस्तित्व की जानकारी दे सकती है।

वह कारण जो कि हमें इस तरह की बात सोचने को विवश करते हैं वह है जीव-जन्तुओं का पूर्वाभास और उनमें विलक्षण मानवीय गुणों का उभार। सन् 1965 की बात है छिन्दवाड़ा मध्य प्रदेश के जिला प्रकाशन अधिकारी दयाकृष्ण विजयवर्गीय प्लेटो क्लब में थे। तब उन्होंने कौवों को एक विशेष ध्वनि करते हुए गोलाकार उड़ते हुये देखा। कौवे क्लब के पास सरकारी बंगले के ऊपर मँडरा रहे थे। कौओं का इस प्रकार उड़ना मृत्यु सूचक माना जाता है। श्री विजयवर्गीय जी ने इस घटना को धर्म युग सितम्बर अंक में छपाते हुए लिखा है-कौवों की इस तरह की उड़ान से मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। कुछ ही दिनों पश्चात् उस सरकारी बँगले में रहने वाले डिप्टी कलेक्टर श्री सावन्त की पत्नी का देहान्त हो गया। इस घटना के दो माह बाद मैंने कौवों को फिर उसी प्रकार अपने मकान के पास उड़ते देखा। इससे फिर मुझे भय उत्पन्न हुआ। इस घटना के दो-तीन दिन पीछे ही पड़ोस में रहने वाले आयकर कार्यालय के चौकीदार की मृत्यु हो गई। ये घटनायें मुझे यह सोचने के लिए विवश करती है क्या सचमुच कौवों को मनुष्य की मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है ? यदि हाँ तो क्यों?

भारतीय शास्त्रकार आत्मा को आकाश से भी सूक्ष्म तत्त्वमानते हैं। तत्त्व की समीक्षा हो सकती है सम्भवतः इसीकारण वैशेशिक दर्शन में आत्मा को द्रव्य माना गया है। द्रव्य में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को देखा जाना, अनुभव किया जाना आत्मा के वश की ही बात हो सकती है। इस दृष्टि से कौवे भी ठीक वैसी ही आत्मा हैं जैसी मनुष्य। उन्हें कौवा मानकर घृणा करना आत्म-चेतना का ही अपमान और एक आश्चर्यजनक सत्य से आंखें मूँद लेना है। इससे मनुष्य जाति का अहित होता है। वह जीवनगत संकीर्णता के कारण विश्वव्यापी आत्म-चेतना की अनुभूति नहीं कर पाता।

अमरीका के पश्चिमी द्वीप समूह की राजधानी के पास एक ज्वालामुखी पर्वत है नाम है मौंट पीरी। सन् 1904 की घटना है। इस पर्वतीय क्षेत्र के जीव-जन्तु बहुत घबराये हुये से थे। कुत्ते दिनभर भूँकते, रात में सियार चिल्लाते। कुछ दिन पीछे तो कुत्ते, सियार, अजगर ही नहीं अन्य पशु-पक्षी भी उस क्षेत्र को छोड़कर चले गये। सारा क्षेत्र वीरान नजर आने लगा। उस क्षेत्र को छोड़कर चले गये। सारा क्षेत्र वीरान नजर आने लगा। उस क्षेत्र के निवासी हैरान थे- आखिर इन जीव-जन्तुओं को हो क्या गया है, जो इस तरह पलायन कर रहे हैं। और एक रात ज्वालामुखी फूट पड़ा। अपनी भयंकर ध्वनि और गति के साथ। लगातार कई दिन तक अग्नि वर्षा होती रही और उसने करोड़ों रुपयों की संपत्ति के साथ-साथ लगभग 30 हजार मनुष्यों को भूनकर रख दिया। जबलपुर में हुये सांप्रदायिक दंगे के समय भी कुत्तों ने ऐसी ही चेतावनी हूक-हूक कर दी थी जिसे वहाँ के लोग अब तक भी याद करते हैं।

मनुष्य बड़ा बुद्धिमान जीव है। फिर भी वह नहीं समझ पाता, क्योंकि उसने अपने जीवन से प्रकृति को हटाकर कृत्रिमता को प्रवेश दे दिया है। उसने बैरोमीटर बनाये, गुब्बारे उड़ाये, टेलस्टार उड़ाये तो भी भविष्य में होने वाली घटनाओं का व्यक्तिशः इतना अच्छा पूर्वाभास नहीं कर पाता, जितना कि साधारण और तुच्छ समझे जाने वाले सियार कुत्तों ने, कीट-पतंगों ने जान लिया। आत्मा कर्मवश, वासना और पापवश इन क्षुद्र योनियों में जाती है तो क्या हुआ ! वह अपना द्रव्य-गुण थोड़े ही त्याग सकती है। उसकी अपनी विशेषतायें मनुष्य जीवन में न सही-जीव-जन्तुओं में ही सही, प्रगट हुये बिना रहती नहीं। मनुष्य के लिये तो यह अलभ्य अवसर होता है कि वह अपने सर्वांगपूर्ण शरीर यन्त्र का उपयोग आत्म-विकास में करे, पर उसने तो अपना जीवन इतना भौतिक और बाह्यमुखी बना लिया है कि अन्तःकरण की बात जो उसका यथार्थ सत्य है - जीवन है उसकी बात कभी सोच ही नहीं पाता।

पशु-पक्षियों के विलक्षण स्वभाव प्राकृतिक प्रेरणायें हो सकती हैं, पर उनको पूर्वाभास का, बौद्धिक क्षमता का अस्तित्व प्राकृतिक प्रेरणा न होकर आत्मा के गुणों का ही प्रकटीकरण हो सकता है। उस आत्मा को ही जानने के लिए शास्त्रकार जोर देते हैं। वहीं सर्वव्यापी सर्वज्ञ है उसी को पाने में पूर्णता है। प्रो॰ कर्वी, डा॰ वेलियन्ट तथा डा॰ डी. स्वैस आदि वैज्ञानिकों ने ऐसे अनेक विलक्षण प्रमाण और जानकारियाँ इकट्ठी की है, जो जीव-जन्तुओं की असाधारण क्षमताओं का प्रतिपादन करती है। इन्होंने भी स्वीकार किया है कि जीव-जन्तुओं में मनुष्य के समान ही कोई आश्चर्यजनक सत्य है, जिसे हम नहीं जानते। उन्होंने पशु-पक्षियों के पूर्वाभास की अनेक घटनायें दी हैं। और उन्हें ग्रह-उपग्रहों की यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान का माध्यम माना है।

वैदिक, पौराणिक और लोक साहित्य में जीव-जन्तुओं की विलक्षणताओं के वर्णन से एक ओर आत्मा की सर्वव्यापकता का प्रतिपादन मिलता है तो दूसरी ओर उनकी इन असाधारण क्षमताओं का उपयोग भी हुआ है। पक्षियों की प्रज्ञा के उपयोग के प्रमाण-

खाटी मोर महातुरी, खाटी होय जु छाछ।

मेहमही पर परन को जाने काछै काछ॥

अर्थात् मोर आतुरतापूर्वक बोलता है तब शीघ्र वर्षा आती है।

ढोकी बोले जाय अकास।

अब नाहीं बरखा कै आस॥

अर्थात् ढोकी बोलकर आकाश में उड़ जाये तो मानना चाहिये कि अब वर्षा नहीं होगी।

प्राचीनकाल में किसान, वणिक इन जानकारियों से बड़ा लाभ लिया करते थे। तब पशु-पक्षियों से प्रेम मनुष्य जाति के समान ही किया जाता था। फिर यदि जटायु ने अपनी कृतज्ञता जान देकर दर्शायी हो तो आश्चर्य क्या ?

बसन्तराज शाकुनं, घाघ और भड्डरी की कहावतों पशु-पक्षियों की विलक्षण योग्यताओं और पूर्वाभास वर्णन मिलता है। प्रस्थान काल में गाय बछड़े को दूध पिलाती देखना, नेवले का रास्ता काटना शुभ माना गया है। सारस का दाहिने बोलना, शुक का बायें बोलना शुभ लक्षण है। किसी की मृत्यु की सूचना गिद्ध दाहिने बोलकर देता है। रात में घर उल्लू का बोलना मृत्यु का या चोरी आदि अनिष्ट का सूचक होता है। कौवा घर की मुंडेर पर बैठता है तो स्त्रियाँ उसकी ध्वनि पहचानने का प्रयास करती हैं। ' बसन्तराज शाकुनं' में बताया है कि यदि कौवा कर-कर बोलता है तो गृह-कलह, शरीर फुलाकर कँपाकर कर्कश शब्द करता है तो किसी की मृत्यु का, "कुलकुल" ध्वनि अतिथि के आने की सूचना तथा “कूँ कूँ” धन लाभ की सूचक होती है। विस्मय ध्वनियों का नहीं वरन् इस बात का है कि जिस बात को मनुष्य जैसा बुद्धिशील प्राणी नहीं जान पाता, उसे यह पक्षी कैसे जाने लेते हैं। भविष्य का ज्ञान रखने वाले इन जीव-जन्तुओं को तब क्या तुच्छ मानना शोभा देता है। क्या उनसे आत्मा की सर्वव्यापकता का शिक्षण और ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता।


सद्वाक्य एवं लघु कहानी - जीवात्मा में थोड़ा और ईश्वर में अनन्त गुण

सद्वाक्य

जीव मात्र में एक ही चेतना-आत्मा के दर्शन करता है, वहीं सच्चा ब्रह्मज्ञानी है।     -वेदव्यास

लघु कहानी

जीवात्मा में थोड़ा और ईश्वर में अनन्त गुण

एक महात्मा के पास एक व्यक्ति ने आकर पूछा-’महात्मन्! आप जीव और ईश्वर में एक ही चैतन्य का वास बताते हैं, परंतु ईश्वर के समान जीव सर्वज्ञ क्यों नहीं होता?’ महात्मा ने एक लोटा जल गंगाजी से लाने की आज्ञा दी। वह व्यक्ति एक लोटा जल लाया तो महात्मा बोले-’बच्चा! गंगाजी में जहाज चलते हैं इसमें क्यों नहीं चलते?’ वह बोला-गंगाजी में अथाह पानी है लोटे में तो जहाज आवेगा ही नहीं।’ महात्मा ने समझाया-’इसी प्रकार जीवात्मा में थोड़ा और ईश्वर में अनन्त गुण है।’


अध्यात्मिक काम विज्ञान-6

शरीर शास्त्री और मनोविज्ञान वेत्ता यह बताते हैं कि नर,नर का सान्निध्य-नारी, नारी का सान्निध्य मानवीय प्रसुप्त शक्तियों के विकास की दृष्टि से इतना उपयोगी नहीं जितना भिन्न वर्ग का सान्निध्य। विवाहों के पीछे सहचरत्व की भावना ही प्रधान रूप से उपयोगी है। सच्चे सखा सहचर की दृष्टि से परस्पर हँसते, खेलते जीवन बिताने वाले पति-पत्नी यदि आजीवन काम सेवन न करें तो भी एक दूसरे की मानसिक एवं आत्मिक अपूर्णता को बहुत हद तक पूरा कर सकते हैं। मनुष्य में न जाने क्या ऐसी रहस्यमय अपूर्णता है कि वह भिन्न वर्ग के सहचरत्व से अकारण ही बड़ी तृप्ति और शांति अनुभव करती है। अविवाहित जीवन में सब प्रकार की सुविधायें होते हुए भी एक उद्विग्नता, अतृप्ति और अशांति बनी रहती है। विवाह के बाद एक निश्चिन्तता सी अनुभव होती है। साथी की प्रगाढ़ मैत्री का विश्वास करके व्यक्ति अपनी समर्थता दूनी ही नहीं, दस गुनी अनुभव करता है। एकाकी जीवन में जो शून्यता थी उसकी पूर्ति तब होती है जब यह विश्वास बन जाता है कि हम अकेले नहीं, दूसरे साथी को लेकर चल रहे है जो हर मुसीबत में सहायता करेगा और प्रगति के हर स्वप्न में रंग भरेगा। यह विश्वास मन में उतरते ही मनोबल चौगुना बढ़ जाता है और उत्साह भरी कर्मठता और आशा भरी चमक से जीवन-क्रम में एक अभिनव उल्लास दृष्टिगोचर होता है। विवाह का मूल लाभ भिन्न वर्ग के सान्निध्य से होने वाले उभय पक्षीय सूक्ष्म शक्ति प्रक्रिया का अति महत्वपूर्ण प्रत्यावर्तन तो है ही, एक मनोवैज्ञानिक लाभ अन्तरंग का एकाकीपन दूर करना और समर्थता को द्विगुणित हुई अनुभव करना भी उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का आशापूर्ण भविष्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

काम-सेवन विवाहित जीवन में आवश्यकतानुसार मर्यादाओं के अंतर्गत-उपयुक्त होता रहे तो उसमें कोई बड़ा अनर्थ नहीं है। पर उसे आवश्यक या अनिवार्य न माना जाय। मोटे तौर से पति-पत्नी की परस्पर मनःस्थिति वैसी ही होनी चाहिए जैसे दो पुरुष या दो नारियों की सघन मित्रता होने पर होती है। सखा, साथी, मित्र, स्नेही का रिश्ता पर्याप्त है। कामुक और कामिनी को दृष्टि में रखकर किये गये विवाह घृणित है। रूप, रंग, शोभा, सौंदर्य के आधार पर उत्पन्न हुआ आकर्षण एक आवेश मात्र है। उस आधार पर जो जोड़े बनेंगे वे सफल न हो सकेंगे। रूप, यौवन की सारी चमक एक छोटा-सा रोग बात ही बात में नष्ट करके रख सकता है। फिर कोई दूसरा अधिक सुन्दर आकर्षण सामने आ जाय तो मन उधर ढुलक सकता है। रूपवान में दोष, दुर्गुण भरे पड़े हों, तो भी निर्वाह देर तक नहीं हो सकेगा। शारीरिक आकर्षण की खोज आज की विवाह सफलता का प्रधान अंग बनती जा रही है। रूपवान लड़के-लड़कियों की ही माँग है। कुरूपों की बाजार दर-बदर दिन-दिन गिरती जाती है। यह प्रवृत्ति बहुत ही विघातक है। चमड़ी की चमक ही यदि अच्छे साथी की कसौटी बन जायेगी तो फिर आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता का क्या मूल्य रह जायगा? फिर भावनाओं की, सद्गुणों की, स्नेह सौजन्य की कीमत कौन आँकेगा?

चमड़ी का रंग या नख-शिख की बनावट को शोभा, सौंदर्य की दृष्टि से सराहा जा सकता है। नृत्य अभिनय में उसको प्रमुखता मिल सकती है। नयनाभिराम मनमोहक आकर्षण भी उसमें देखा जा सकता है। ईश्वर की कृति की इस विभूति से प्रसन्न हुआ जा सकता है। दाम्पत्य-जीवन में उसकी कोई बहुत उपयोगिता नहीं है। मिलन चमड़ी का आँख-नाक का नहीं वरन् अन्तरंग का होता है और उसकी उत्कृष्टता निकृष्टता चेहरे या अवयवों की बनावट से तनिक भी सम्बन्ध नहीं रखती। हो सकता है कोई काला कुरूप व्यक्ति योगी अष्टावक्र नीतिज्ञ चाणक्य अथवा पाँचाली द्रौपदी की तरह उच्च मनःस्थिति धारण किये हो। रूपवती नर्तकियाँ, अभिनेत्रियाँ, नट-नायक कोई उच्च भावनाशील थोड़े ही होते हैं। बन्दीगृह में क्रूर कर्म करने के दण्ड में अगणित नर-नारी आते रहते हैं उनके कुकर्मों का विवरण सुनकर रोमांच खड़े हो जाते हैं। रूप रंग के आवरण में उनके भीतर प्रेत-पिशाच का वीभत्स नृत्य देखकर दिल दहल जाता है। विवाह का वास्तविक आनन्द और लाभ जिन्हें लेना हो उन्हें साथी का चुनाव करने में रंग रूप की बात उठाकर ताक में रख देनी चाहिये। केवल सद्भावना निष्ठा, सौजन्य, व्यवस्था, उदारता, दूरदर्शिता, उत्साही और हँसमुख प्रकृति जैसे सद्गुणों पर ही ध्यान देना चाहिये। सज्जनों के बीच ही चिरस्थायी मैत्री का निर्वाह होता है। दुर्जन तो क्षण भर में मित्र बनते हैं। और पल भर में शत्रु बनते देर नहीं लगती। अभी बहकावे की मीठी-मीठी बातें कर रहे थे और चापलूसी की अति कर रहे थे, अभी तनिक सी बात पर खून के प्यासे बन सकते हैं। प्रेम के जाल में ऐसे ही लोग दूसरों को फँसाते फिरते बहुत देखे जाते हैं। इसलिये विवाह की सोचने से पहले-साथी के चुनाव की कसौटी निश्चित करनी चाहिए और वह यह होनी चाहिए कि रंग रूप कैसा ही क्यों न हो, साथी की आंतरिक स्थिति में स्नेह सौजन्य का समुचित पुट होना ही चाहिए। जिन्हें ऐसा साथी मिल जाय, समझना चाहिए कि उसका विवाह करना सार्थक हो गया।

काम-सेवन के सम्बन्ध में उपेक्षा वृत्ति बरती जानी चाहिए। इस प्रयोग का स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। कम ही लोग ऐसे होते हैं। जिनके पास अपनी शारीरिक, मानसिक आवश्यकता की पूर्ति के अतिरिक्त इतना ओजस् संचित रहे जिसे क्रीड़ा कल्लोल में व्यय कर सकें। आमतौर से वर्तमान परिस्थितियों में लोग इतनी ही शक्ति उपार्जित कर पाते हैं। जिसके आधार पर किसी प्रकार काम चलता रहे और गाड़ी लुढ़कती रहे। इस स्वल्प उत्पादन में से यौन संपर्क में अपव्यय किया जायगा तो उसका सीधा प्रभाव समग्र स्वास्थ्य और जीवन यात्रा पर पड़ेगा। विषयी मनुष्य अपनी श्रमशीलता, तेजस्विता, स्फूर्ति, निरोगता, प्रतिभा, स्मरण शक्ति, साहसिकता, स्थिरता, सन्तुलन आदि सभी शारीरिक मानसिक विशेषतायें खोते चले जाते हैं। यह अपव्यय जितना बढ़ता है उतना ही खोखलापन बढ़ता चला जाता है, आसक्ति का शिकंजा अपने गले में कसा जाना हर कामुक व्यक्ति निरन्तर अनुभव करता रहा है। यह एक प्रकार से स्वेच्छापूर्वक, हँसते-खेलते की जाने वाली, मन्द गति से की जाने वाली आत्महत्या ही है।

प्रजनन जब उचित और आवश्यक हो तो उचित मर्यादाओं के अंतर्गत काम-सेवन में ढील छोड़ी जा सकती है। यदि अपनी या साथी की तन्दुरुस्ती या मनःस्थिति ठीक न हो तो इस प्रकार के छेड़छाड़ का कोई तुक नहीं रह जाता। पति-पत्नी के बीच इस प्रकार का धैर्य, संतुलन रहना ही चाहिए कि जब तक अति आवश्यक न हो-दोनों की पूर्ण सहमति न हो तब तक इस प्रसंग को उपेक्षित ही किया जाय। साथी की अनिच्छा रहने पर उसे विवश करना एक प्रकार से बलात्कार जैसा अपराध ही है, भले ही वह विवाहित साथी के साथ किया गया हो। कानून उसे भले ही दण्डनीय न माने पर नैतिक दृष्टि से उसे निर्लज्ज बलात्कार ही कहा जायगा। ऐसा प्रसंग जिससे साथी का मन रोष या क्षोभ से भर जाय निश्चित रूप से कामुक पक्ष के लिए हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होगा। क्षणिक उद्वेग शान्त करके जितनी प्रसन्नता पाई गई थी, कालान्तर में उसकी प्रतिक्रिया उनके गुणी अप्रसन्नता की परिस्थिति लेकर सामने आवेगी। अस्तु, हर समझदार पति-पत्नी की आदि से अन्त तक ऐसी मनःस्थिति विनिर्मित करनी चाहिए कि कोई किसी को कठिनाई, क्षति या असमंजस में न डाले। दाम्पत्य-जीवन के बीच ब्रह्मचर्य की निष्ठा का जितना प्रभाव होगा उतना ही पारस्परिक सद्भाव प्रगाढ़ होता जायगा और वह लाभ मिलेगा जिसे प्राप्त करना विवाह का मूल प्रयोजन है।

जननेन्द्रिय का अमर्यादित उपयोग यौन रोग उत्पन्न करता है। विशेषतया नारी को तो इससे अत्यधिक हानि उठानी पड़ती है। औसत नारी महीने में एकाध बार से अधिक काम-क्रीड़ा का दबाव सहन नहीं कर सकती। प्रजनन की दृष्टि से हर बच्चे के बीच कम से कम पांच वर्ष का अन्तर होना चाहिए। जल्दी-जल्दी बच्चे उत्पन्न करने और काम-क्रीड़ा का अधिक दबाव पड़ने पर नारी अपना शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य भी खो बैठती है। दैनिक काम-क्रीड़ा का स्वरूप हँसी, विनोद, मनोरंजन, चुहल, छेड़छाड़ तक सीमित रहे तभी ठीक है। हर्षोल्लास बढ़ाने वाले, छुटपुट क्रिया-कलाप चलते रहे तो चित्त प्रसन्न रहता है, परस्पर घनिष्ठता बढ़ती है और सान्निध्य का मनोवैज्ञानिक ही नहीं काम प्रयोजन भी पूरा हो जाता है। यौन-संपर्क को यदा-कदा के लिए ही सीमित रखना चाहिए। आये दिन की इस विडम्बना में फँस कर मनुष्य अपना स्वास्थ्य ही नष्ट नहीं करता, प्रतिक्रिया के आनन्द से भी वंचित हो जाता है। कामुक व्यक्ति बहुत घटिया और उथला आनंद ले पाते हैं। उसमें जो ऊंचे स्तर का उल्लास है उसे प्राप्त करने के लिए देर तक संग्रहित शक्ति होनी चाहिए। जिन्हें यौन रोगों से बचना हो उन्हें इस प्रकार की सतर्कता रखना ही चाहिए।

इस संदर्भ में यह समझ ही लिया जाय कि जननेन्द्रिय का सीधा संबंध मस्तिष्क से है। वहाँ जो कुछ गड़बड़ होगी उसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ेगा। मनोविज्ञान वेत्ताओं के अनुसार उचित समय पर उचित काम-सेवन का अवसर न मिलने से जहाँ अपस्मार, मूर्छा, भूत-प्रेत, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, स्मरणशक्ति की कमी, सिर दर्द, हृदय रोग, नाड़ी विकृति आदि रोग उत्पन्न होते हैं वहाँ अति काम-सेवन भी ऐसे ही उद्वेग उत्पन्न करता है। लम्पटों का शरीर जितना क्षीण होता है, मन उससे भी अधिक विक्षिप्त, असंतुलित, रहने लगता है। अनेकों मानसिक रोगों से त्रस्त उन्हें पाया जायगा जिन्होंने काम-सेवन की दिशा में अति बरती। इस प्रकार का दुरूपयोग यों दोनों के लिए ही हानिकारक है पर नारी को तो उसकी क्षति असाधारण रूप से उठानी पड़ती है। अतएव विवाहित जीवन को काम क्रीडा के उच्छृंखल उपयोग की खुली छूट नहीं मान लेनी चाहिए और उस संदर्भ में लगभग वैसी ही सतर्कता उपेक्षा बरतनी चाहिए जैसी की अविवाहित-जीवन में बरती जाती है। इस शक्ति संग्रह का सर्वतोमुखी प्रतिभा और व्यक्तित्व के विकास पर सीधा असर पड़ता है। सुहागिन की अपेक्षा विधवाएँ अथवा कुमारियाँ अधिक तेज-तर्रार और स्फूर्तिवान पाई पाती हैं। उनकी अन्तःशक्ति का अनावश्यक क्षरण न होना ही इसका प्रधान कारण है। इस लाभ से विवाहितों को भी वंचित नहीं होना चाहिए।

काम सेवन का वैज्ञानिक स्वरूप यह है कि शरीरों की विद्युत-शक्ति का इस प्रयोग द्वारा अति द्रुतगति से प्रत्यावर्तन होता है। मानवीय विद्युत की मात्रा शरीर में भी पाई जाती है पर उसका भण्डार-चेतन संस्थान में ही देखा पाया जाता है। यौन संस्थान की नींव में यह बिजली अकूत मात्रा में भरी पड़ी है। जैसे ही जननेन्द्रिय निकट आती है वैसे ही वह प्रसुप्त शक्ति बीज सजग और प्रबल हो उठता है और तत्काल दोनों पक्ष अपनी विद्युत शक्ति का विनिमय करने लग जाते हैं। ऋण विद्युतधारा धन की ओर धन धारा ऋण की ओर दौड़ने लग जाती है। नर नारी को और नारी नर को अपना शक्ति प्रवाह प्रस्तुत करते हैं। इस सम्मिलन एवं प्रत्यावर्तन का ही वह परिणाम है जो काम-सेवन के आनन्द के रूप में उस क्षण अनुभव किया जाता है। यह विशुद्ध रूप से प्राण और रयि शक्ति के-अग्नि और सोम के परस्पर प्रत्यावर्तन की अनुभूति है। यह प्रयोग अति महत्वपूर्ण है। इससे जहाँ व्यक्तित्वों का विकास हो सकता है वहाँ विनाश भी संभव है। प्रबल विद्युत धारा वाला पक्ष-निर्बल पक्ष को अपना अनुदान देकर उसे ऊंचा उठने और परिपुष्ट बनने में सहायता कर सकता है, पर जिसके शरीर में क्षीण प्राण है, वह साथी को क्षति ही पहुँचा सकता है। इसका परिणाम यह भी हो सकता है कि दोनों शारीरिक दृष्टि से न सही प्राण-शक्ति की दृष्टि से समान स्तर पर आ जावें।

वेश्या शरीर का क्षरण करते रहने पर भी अपना रूप सौंदर्य बनाये रहती है। इसके कारण शरीर शास्त्री नहीं बता सकते। इसका उत्तर प्राण विद्या के ज्ञाताओं के पास है। वे मनस्वी कामुकों की शक्ति चूसती रहती है और जिस स्थिति में सामान्य गृहस्थ नारी मृत्यु के मुख में जा सकती थी उस स्थिति में भी अपने चेहरे पर चमक और शरीर में स्फूर्ति बनाये रहती है। यदि उनके प्रेमी घटिया प्रकार के रोगी या मूर्ख स्टार के हों, तो फिर उनका स्वास्थ्य और तेज कभी भी स्थिर न रहेगा। यों शरीर की दृष्टि से युवाकाल में नर-नारियों में बिजली अधिक रहती है। इसी से उसका आकर्षण युवा वर्ग के साथ काम-सेवन की लालसा संजोये रहता है। शरीर में विद्युत शक्ति है तो, पर थोड़ी और घटिया स्तर की ही पाई पाती है। असली शक्ति भण्डार मस्तिष्क और हृदय में भरी रहती है। स्वस्थ और सुन्दर व्यक्ति भी यदि मनोबल की दृष्टि से घटिया है तो उसे इस संदर्भ में अशक्त ही माना जायगा।

कुरूप और ढलती आयु का व्यक्ति भी उसके आन्तरिक स्तर के अनुरूप प्रबल प्राण रह सकता है। असलियत यह है कि शरीर की स्थिति से प्राण क्षमता का संबंध बहुत ही कम है। किसी भी आयु में मनःस्थिति के अनुरूप प्राण की प्रबलता या न्यूनता हो सकती है और उसका लाभ-हानि साथी को भोगना पड़ सकता है।

यों ब्रह्मचर्य सभी के लिये उचित है पर उन प्राण संपन्न उच्च व्यक्तियों के लिए तो बहुत ही आवश्यक है। वे इस प्रकार का व्यतिक्रम करके अपनी प्रगति को ही रोक देंगे। साथी को उतना लाभ न मिलेगा, जितनी स्वयं क्षति उठा लेंगे। इसलिए ब्रह्मचर्य की महत्ता असंदिग्ध है। प्राण को संचित करते रहा जाये और यदा-कदा उसका उपयोग काम-क्रीड़ा में कर लिया जाय तो साथी की सहायता की दृष्टि से भी समर्थ पक्ष की यही बुद्धिमता होगी। कामुक व्यक्ति बाहर से ही चमक-दमक के भले दीखें, भीतर से खोखले होते हैं और वे जिससे भी संपर्क बनाते हैं उसी की शक्ति चूसने लगते हैं। लम्पट व्यक्ति के साथ दाम्पत्य-जीवन बना कर उसका साथी शारीरिक और मानसिक क्षति ही उठा सकता है। क्षीण प्राण वाला व्यक्ति समर्थ पक्ष की कुछ सहायता नहीं कर सकता। ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी ही अपनी विशेष विद्युत-धाराओं से एक-दूसरे को लाभान्वित कर सकते हैं। प्रशंसनीय केवल इसी स्तर पर का काम-सेवन कहा जा सकता है, जिससे प्रबल शक्ति प्रवाह का लाभ दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी आवश्यकता की पूर्ति और अतृप्ति निवारण के लिए कर सकें।

संतान उत्पादन के सत्परिणाम संयमशीलता पर निर्भर है। कामुकता की दिशा में अति करने वाले दंपति कुछ ही दिनों में अपनी जननेन्द्रियों की मूल सत्ता खो बैठते हैं। ऐसे पुरुष को नपुंसक और नारी को बंध्या होते देखा जाता है। गर्भ रहे भी तो गर्भपात होने, दुर्बल या मृत सन्तान होने का खतरा बना रहता है। ऐसे माता-पिता, मूर्ख दुर्गुणी, रोगी, अविकसित सन्तान ही उत्पन्न कर सकते हैं। समर्थ सन्तान के लिए जिस परिपक्व अण्ड एवं शुक्र की आवश्यकता है, उसका निर्माण ब्रह्मचारी जीवन से ही संभव है। पुष्ट शरीर वाले युवक युवती मिलकर पुष्ट शरीर वाले बालक को तो जन्म दे सकते हैं पर उसकी मनःशक्ति बुद्धिमत्ता एवं तेजस्विता अपूर्ण ही रह जायगी। आन्तरिक समस्त विशेषतायें और विभूतियाँ प्राण-शक्ति से संबंधित है। प्राण का परिपाक ब्रह्मचर्य ही कर सकता है। इसलिए जिन्हें आन्तरिक दृष्टि से मेधावी, प्रतिभावान और दूरदर्शी सन्तान अपेक्षित हो उन्हें अपनी अन्तःक्षमता की सुरक्षा एवं परिपुष्टि का ध्यान रखना चाहिए। यह उपलब्धि अधिक संयम से ही प्राप्त कर सकना सम्भव है। इसलिए गृहस्थ रहते हुए भी ब्रह्मचारी की स्थिति बनाये रहकर अपना, अपने साथी का और भावी सन्तान का भविष्य उज्ज्वल बनाने की बात सोचनी चाहिए। काम-सेवन क्षुद्र मनोरंजन के लिए इंद्रिय तृप्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उसका सदुपयोग तो प्राण प्रत्यावर्तन द्वारा एक दूसरे के अभावों को पूर्ण करने में ही किया जाना चाहिए। यह प्रयोजन केवल प्राणवान और प्रबुद्ध पति-पत्नी मिलकर ही कर सकते हैं। अपने देश और समाज और वंश का मुख उज्ज्वल कर सकने वाली सन्तान उत्पन्न करना हर किसी के वश की बात नहीं है। इसके लिए इन्द्रिय संयम की साधना करनी पड़ती है। और प्राण को परिपुष्ट करने वाली सत्प्रवृत्तियों से भरा-पूरा व्यक्तित्व बनाना पड़ता है। वस्तुतः सुयोग्य सन्तानोत्पादन भी एक साधन है जिसके लिये संयमी ही नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है।

दो वस्तुयें मिलने से तीसरी बनने की प्रक्रिया रसायन कहलाती है। केमिस्ट्री इस विज्ञान का नाम है। रज और वीर्य मिलने से भ्रूण की उत्पत्ति होती है और नौ महीने की अवधि पूरी करके वही भ्रूण बालक के रूप में प्रसव होता है। यह स्थूल गर्भधारण या प्रजनन हुआ। इसके अतिरिक्त भी एक प्राण प्रत्यावर्तन होता है। जिसे अनेक अवसरों पर अनेक रूपों में देखा जा सकता है। शिष्य के प्राण में गुरु अपना प्राण प्रतिष्ठापित करके उसकी प्रतिभा, मेधा और विद्या को प्रखर बनाता है। यह कार्य स्कूली मास्टर नहीं कर सकते। वे तो बेचारे मात्र जानकारी दे सकने वाले पाठ भर पढ़ा सकते हैं। वह विद्या जो शिष्य को गुरु के सामान ही प्रखर बना दे, केवल तपस्वी गुरुओं द्वारा ही उपलब्ध हो सकती है। योगी अपने साधकों को शक्तिपात करते हैं, वे अपनी तप शक्ति शिष्य को देकर बात की बात में उच्च भूमिका तक पहुँचा देते हैं। मरणासन्न रोगी को रक्त दान देकर पुनर्जीवन प्रदान किया जा सकता है। इसी प्रकार दुर्बल प्राण को सबल प्राण बनाने का कार्य शक्ति प्रत्यावर्तन जैसी प्रक्रिया से सम्पन्न करती है। काम-सेवन का ऊँचा स्तर यही है। वह बच्चे पैदा करने के लिए नहीं, दो प्राणों के समन्वय से एक नवीन प्रतिभा विकसित करने के लिए किया जा सकता है। सतोगुणी और सौम्य दंपति एक प्राण साधना के रूप में यदि काम-सेवन करते भी हैं तो इसका प्रयोजन एक अद्भुत प्रतिभा को जन्म देना होता हैै, जो आवश्यकतानुसार एक या दो शरीरों में पैदा की जा सकती है। यह उच्चस्तरीय शिशु जन्म है। ऐसा काम-सेवन अभिशाप न होकर वरदान भी हो सकता है। विष को भी यदि संशोधन करके भेषज बना दिया जाय तो वह विघातक न रह कर संजीवन बूटी बन सकता है। काम-प्रक्रिया को विष बनाकर अपने मरण का साज न संजोयें बल्कि उसे अमृत बनाकर दो व्यक्तित्वों के असाधारण उत्कर्ष एवं विश्व-कल्याण में कर सकने में समर्थ एवं प्राण प्रयोजन सिद्ध करें। यह पूर्णतया अपने बस की बात है और अपनी बुद्धिमत्ता दूरदर्शिता पर निर्भर है।


लघु कहानी - अपनी प्रजा की देखभाल

छत्रसाल अपनी प्रजा की देखभाल बच्चों की तरह करते थे। वह समय-समय पर अपने राज्य का दौरा करते और जन-संपर्क द्वारा उनसे कठिनाईयां पूछते रहते थे। एक बार उनके स्वस्थ और सुन्दर शरीर को देखकर एक युवती उनकी ओर आकर्षित हुई। कामातुरता के सम्मुख भय और लज्जा कैसी !

वह युवती महाराज के पास आई और मौका देखकर बोली “राजन्! आप जैसे दयालु राजा के राज्य में भी मैं दुःखी रहती हूँ’।

राजा बड़े दुःखी हुए। वह सोचने लगे कि मेरे निरन्तर प्रयत्नशील रहने पर भी राज्य के स्त्री-पुरुष दुःखी रहें, अभावग्रस्त रहें फिर मेरे राज्य करने से भी क्या लाभ है ?

वे बोले देवी! बताइये आपको क्या कष्ट है, मैं उसे दूर करने के लिए भरसक प्रयत्न करूंगा।

‘राजन! ऐसी मीठी-मीठी आश्वासन भरी बातें कह तो सब देते हैं, पर करते विरले ही हैं। आप वचन दें तब तो मेरा बताना भी सार्थक है।’

उस युवती महिला ने अपना पाँसा फेंका। महाराज ठहरे सरल हृदय वाले और प्रजावत्सल, उन्होंने कहा देवी ! आपके दुख दूर करने के लिए मैं यथाशक्ति प्रयत्न करूंगा।

बात बड़ी छोटी सी है। मैं चाहती हूँ कि आप जैसी सन्तान मेरे भी हो।

उसकी बात सुनकर कुछ क्षण के लिए महाराज छत्रसाल स्तब्ध रह गये पर उन्होंने बड़ी विवेकशीलता तथा संयम से कार्य किया। वे उस कामातुर नारी के चरणों में मस्तक नवाकर बोले-माताजी! सम्भव है आप जिस पुत्र को जन्म दें, वह मेरी तरह न हो अतः आज से आप मुझे ही अपना पुत्र स्वीकार कर लीजिए।

राजा की यह बात सुनते ही उस महिला का स्वप्न टूट गया। उसे अपनी त्रुटि का बोध हो गया। पर छत्रसाल अपने जीवन भर उसके प्रति श्रद्धा रखते रहे और राजमाता की तरह सम्मान प्रदान करते रहे।


सतयुग की लाली-संवत् 1981 में आली

बंगाल में मछलियाँ पकड़ने का एक विचित्र उपाय प्रचलित है। गाँवों के लोग नाले के किनारे अथवा अपने खेत में एक विशेष प्रकार का गड्ढा बनाते हैं और उसका सम्बन्ध नाले से जोड़ देते हैं। गड्ढा नाले से भी नीचा रखा जाता है। छोटी-बड़ी मूर्ख मछलियाँ पानी के उस प्रवाह को देखकर नई धारा की ओर आकर्षित होकर चल निकलती हैं और उस छोटे-से गड्ढे में जा पहुँचती हैं। फिर वे नाले में नहीं जा सकतीं। अब गड्ढे का मालिक जब चाहता है, जिस मछली को चाहता है, पकड़ कर खाता रहता है। समझदार मछलियाँ इस दिग्भ्रांति से सदैव दूर ही रहती हैं और वे मछली-मार की पकड़ में नहीं आतीं।

ऐसा ही एक गड्ढा भारतीय धर्म और संस्कृति की वैदिक धारा में बहते हुये भारतीय जीवन प्रवाह को मोड़कर तब बनाया गया जब इस देश में विदेशी शासक आये। उन्होंने देखा ज्ञान-विज्ञान-व्यापार वाणिज्य, कला-कौशल, भाषा-भेषज आदि की दृष्टि से अत्यन्त समर्थ यह समाज धर्म के साथ सीमेन्ट चूने की तरह मजबूती से जुड़ी हुई है। इस देश और महान जाति की वैदिक परम्पराओं को नष्ट किये बिना इसे कैद नहीं रखा जा सकता था। इसलिये विदेशी शासकों ने सबसे पहले हमारे धार्मिक आचारों पर चोट की और कुछ स्वार्थी पण्डितों के द्वारा इस तरह का साहित्य निर्माण कराया जिसे अविच्छिन्न सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रवाह से अलग ले जाने वाला गड्ढा ही कहना चाहिए। भोली-भाली भारतीय जनता धर्म के नाम पर उधर ही बहती चली गई और विदेशियों द्वारा तैयार किये गये बौद्धिक परावलंबन के जाल में फँस गई। देश स्वतन्त्र हो गया, पर आज भी यह देश उसी जाल में उलझा हुआ है - वही संकीर्ण मान्यतायें बनाये उस अंधेरी दुनिया में ही अपने जीवन का सुख सार समझे बैठा है।

कलियुग समाप्त हो गया, अब उसकी पूँछ पर कपड़ा बाँधकर लम्बा किया जा रहा है। वह कोई कब तक कर सकता है। विदेशी शासकों ने धूर्त पण्डितों को बुलाकर उन्हें धन दिया, सम्मान दिया, जागीरें दीं, राजपद दिये। बीरबल और टोडरमल से विद्वानों ने भी अकबर का आश्रय ले लिया तो बेचारी साधारण प्रजा क्या करती। उससे कहा गया-

यस्तु कार्तयुगो, धर्मो न कर्त्तव्यः कलौयुगे।

पापप्रमुक्ताश्च सदा कलौ नार्यो नरास्तथा॥

विहितान्यपि कर्माणि धर्मलोप भयाद्बुधैः।

समापने निवृत्तानि साध्वभावा कलौयुगे॥   -निर्णय सिन्धु

अर्थात्- कलियुग में लोग पापरहित है इसलिए किसी को सतयुग के धर्म-कर्म नहीं करने चाहिये।

इसी प्रकार के स्वार्थी पण्डितों के माध्यम से विदेशी शासकों ने एक कलिवर्ज्य प्रकरण तैयार कराया। महाभारत काल के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उस समय भारतवर्ष विश्वसंघ था, सारी दुनिया के लोगों से हमारे राजनयिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध थे। जलावतरण विज्ञान, जहाज और नौकाएँ भारतवर्ष की ही देन है। व्यापार उन्मुक्त रहने तक यह देश गरीब नहीं हो सकता था। जाति-पाँति के साथ ऊँच-नीच का भेद न होता तो सम्पूर्ण हिन्दू जाति संगठित बनी रहती, विधवाओं को विधुरों की तरह समान न्याय दिया जाता तो आज का चारित्रिक खोखलापन दूर रहता। वर्णाश्रम धर्म के रहने तक लोगों के स्वास्थ्य मेधा बुद्धि पर कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं था। गुरु शिष्य परम्परा के आदर्शों को अन्ध भक्ति नहीं बौद्धिक प्रखरता और तर्क व निष्ठा के रूप में रहने दिया जाता तो इस देश की विचारणा कुण्ठित न होती। ब्राह्मण अपने धर्म का पालन करते रहते तो राष्ट्रीय परम्पराएँ और जातीय तेजस्विता नष्ट न होतीं। साधु-संन्यासी भेद-भाव बन्द कर अद्वैत आत्मा का प्रवचन मन, वचन, कर्म से निर्वाह कर सकने में समर्थ बना रहता तो इस देश की पारिवारिक, सामाजिक और जातीय आदर्श परम्पराएँ नष्ट न होतीं। शुद्धि संस्कार का क्रम बना रहता तो सारी दुनिया को प्रभावित करने वाला भारतीय धर्म घटते-घटते मरणोन्मुख स्थिति में न पहुँचता। विदेशी शासकों ने देखा जब तक इस देश की यह आदर्श परम्परायें नष्ट नहीं होतीं, हिन्दू-जाति समर्थ बनी रहेगी और आये दिन संघर्ष करती रहेगी। इसलिये उन्होंने इन आदर्शों को नष्ट करने का विधिवत् कुचक्र रचा। पंडितों द्वारा तैयार किया गया “कलिवर्ज्य प्रकरण” उसी का प्रतिफल था, जिसके द्वारा ये प्रतिबन्ध लगाये गये :-

(1) समुद्री यात्रा अधार्मिक कृत्य है।

(2) दूर देश की यात्रायें नहीं करनी चाहिए।

(3) एक जाति दूसरी जाति से विवाह न करें ।

(4) विवाह छोटी आयु में हों।

(5) गुरु जो कहे वह स्वीकार किया जाये।

(6) शोध कार्य नहीं करना चाहिए।

(7) विधवा विवाह न किये जाये।

(8) अपहृत स्त्रियों को शुद्ध न किया जाये।

(9) स्त्रियों के यज्ञोपवीत संस्कार न कराये जायें, उन्हें वेद न पढ़ने दिये जायें।

(10) सम्पत्ति का स्वामित्व केवल पुत्र को ही र,हे पुत्री को नहीं।

(11) ब्राह्मण जो कभी शास्त्र द्वारा सामाजिक व्यवस्था और तेजस्विता को बनाये रखता था, उसे खाना-पकाने का साधारण काम दिया गया और इस काम को करने वाले सेवकों को शुद्र कहकर चौके से बाहर किया गया।

(12) संन्यासी भी शूद्रों से भिक्षा न लें।

(13) शुद्धि संस्करण में ऐसे प्रतिबन्ध - जो कोई न कर सके या करे तो मृतक भोज की तरह आर्थिक व्यवस्था को चरमरा कर रख दे।

(14) अन्य जाति वालों द्वारा यज्ञ बन्द।

(15) प्रायश्चित प्रक्रिया का बहिष्कार। आदि।

यह सभी नियन्त्रण कलियुग के नाम पर किये गये। उसका एक ही उद्देश्य था - भारतीय जनता को सामर्थ्यहीन बना देना। लोग आपस में ही लड़ने झगड़ने लगे, संगठन शक्ति नष्ट हो गई। अरब, जर्मनी और हालैण्ड तक अपहरण कर भारतीय स्त्रियाँ बाहर ले जाई गईं, पर किसी भी भारतीय का स्वाभिमान जागृत न हुआ। अपहृत स्त्रियों को पाकर विधर्मियों ने अपनी संख्या बढ़ा ली। यहाँ के लोग उस पाखण्ड को समझ न सके जो तथाकथित पण्डितों ने विदेशी शासकों के इशारे पर बनाया था। यह प्रतिबन्ध आचार्य चार्वाक के नास्तिक दर्शन से भी भयंकर थे और उन्हीं का प्रतिफल है कि यह देश अभी तक भी सँभल नहीं पा रहा है।

लाख वर्ष का कलियुग और वर्तमान समय कलियुग का प्रथम चरण ही है यह प्रतिपादन भी इन पण्डितों का ही एक सुनियोजित षड़यंत्र था अन्यथा कलियुग कभी का समाप्त हो चुका। अब तो विदेशी शासन भी नहीं रहा इसलिए कलियुग सम्बन्धी “कलिवर्ज्य प्रकरण” को नष्ट कर दिया जाना चाहिए और उसके स्थान पर शुद्ध वेद विहित संस्कारों एवं आदर्श परम्पराओं को प्रतिष्ठा दी जानी चाहिये।

कलियुग वास्तव में कोई ऐसा युग नहीं है जिसके लिये ऋषियों ने अलग से आचार संहिता निश्चित की हों। यह मास, पक्ष, दिन, तिथि की तरह एक सामान्य काल गणना मात्र है। इसके साथ मनुष्यों के आचार दर्शन की संगति जोड़ने का कोई क्रम नहीं है। बुधवार को चोरी न कि जाय और शुक्रवार को करने में कोई दोष नहीं। इस प्रकार की मान्यतायें उपहासास्पद ही मानी जायेंगी।

5 सितम्बर 1926 में प्रातःकाल की बात है। सुप्रसिद्ध विद्वान एवं ज्योतिषाचार्य ज्योतिर्भूषण श्री गोपीनाथ शास्त्री चुलैट के अन्तःकरण में एक ध्वनि प्रस्फुटित हुई-”देखो मैं धरती पर आ गया हूँ, मुझे दुष्कृत्यों का, पापपूर्ण विचारणाओं का अन्त करके धर्म को प्रतिष्ठा देनी है। कलियुग समाप्त हुआ, सतयुग की ऊषा आ गई। तुम्हारी जैसी पवित्र आत्माओं को अब इस महान् कार्य में जुट जाना चाहिए।”

स्वप्न की बात थी, इसलिये शास्त्री जी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। पर दिन में उन्हें दिवास्वप्न की भाँति फिर वही शब्द सुनाई दिये - ”सतयुग का सूर्य उगना चाहता है। उठो और कलियुग के सम्बन्ध में फैली भ्रामक मान्यताओं को समाप्त करने में हमारी मदद करो। मैं धर्म की स्थापनार्थ जन्म ले चुका हूँ। क्या तुम मेरी मदद नहीं करोगे?” इस बार के शब्द पहले से भी अधिक वेधक थे। श्री शास्त्री जी धार्मिक और साधनाशील व्यक्ति होकर भी ऐसे अन्धश्रद्धालु नहीं थे कि मन में आये हुये किसी भी संकल्प-विकल्प को पागलों की भांति स्वीकार कर लेते। ईश्वर उपासना, योग और साधनाओं से मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण इतने स्वच्छ हो जाते हैं कि ईश्वरीय प्रेरणाओं और दूर भविष्य की अनजानी घटनाओं के दृश्य चलचित्र की भाँति उतरते चले आते हैं। श्री शास्त्री जी इस बात को स्वीकार करते थे, पर वे इस तरह का अहंकार अपने लिये व्यक्त नहीं करना चाहते थे। श्री शास्त्री जी ने सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष को स्वतन्त्र होने की भविष्यवाणी की थी, वह सच हुई। उन्होंने दस वर्ष पूर्व ही गान्धीजी की मृत्यु की भविष्यवाणी की थी, वह भी सच निकली थी। उन्होंने बताया था, सन् 1970 में अमरीका का कोई मनुष्य चन्द्रमा की परिक्रमा करेगा। यह भविष्यवाणी उन्होंने “कलिवर्ज्य प्रकरण” में “पृथ्वी की प्रदक्षिणा नहीं करनी चाहिए " इसका खंडन करते हुए लिखा था, कि भारतीय विमान आदिकाल से ही पृथ्वी और अन्य ग्रहों की प्रदक्षिणा करते हुये उड़ते और उतरते रहे हैं। यह बात शीघ्र देखने में आयेगी, जबकि 1970 में अमरीका निवासी चन्द्रमा पर उतर जायेंगे। इसलिए हम भारतीयों को भी प्रदक्षिणा विज्ञान की शोध करनी चाहिए। श्री शास्त्री जी की अनेक भविष्यवाणियों में उत्तरी सीमान्त से आक्रमण (चीन का हमला) आदि की भविष्यवाणी भी सच हो चुकी है। उन्हें अपनी अतीन्द्रिय अनुभूति के प्रति विश्वास सा जागृत हुआ, फिर भी वे उस बात को एकाएक मान लेने वाले नहीं थे। उन्होंने उसी समय 5/9/26 के मध्याह्न काल की लग्न कुण्डली बनाई जो इस प्रकार थी-

लग्न तुला उच्च के शनि युक्त थी, पराक्रम के स्थान पर उच्च का केतु, सुख के स्थान में गुरु, सप्तम में स्वगृही मंगल, नवें में उच्च का राहु, कर्म स्थान में स्वगृही चन्द्र और शुक्र के साथ उसकी युति, जो विज्ञान और नये धर्म की प्रतिष्ठा का सूचक होती है, लाभ भाव में बुद्ध और स्वगृही सूर्य का संयुक्तिकरण भारतवर्ष के धन और ऐश्वर्य की वृद्धि के सूचक थे । यह लग्न भगवान कृष्ण, भगवान् राम के जन्म की लग्न के संदर्भ में याद दिलाती थी और यह बोध होता था कि संसार में फिर से धर्म की स्थापना करने वाली शक्ति व अवतार का प्राकट्य हो गया होना चाहिये, भले ही लोग उसे बाद में समझ पायें ।

इस विचार के आते ही उन्होंने सतयुग का प्रचार प्रारम्भ किया । उन्होंने “युग-परिवर्तन” नामक एक पुस्तक लिखी, जो अकोला (महाराष्ट्र) से प्रकाशित हुई । इस पुस्तक में उन्होंने ज्योतिष-गणना के आधार पर बताया है कि पौष कृष्णा 30 संवत् 1982 से कलियुग का अन्त हो जाता है और अब युग सन्धि चल रही है जिसमें पिछले अज्ञानान्धकार का अन्त और नव युग की लाली बढ़ती जायेगी । यह समय भारतवर्ष के लिये जहाँ तीव्र हलचलों का है, वहाँ इस देश की महान् सफलता, समृद्धि - नैतृत्व का प्रतीक भी है । आने वाले समय में यह देश ज्ञान और विज्ञान दोनों ही दृष्टि से विश्व का सर्वोपरि राष्ट्र होगा ।

युगों की काल गणना को ज्योतिष के जिन गणितीय सिद्धान्तों के आधार पर निकाला गया, उसे देशभर के विद्वानों ने सत्य माना और पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक में जहाँ भारतीय समाज के अन्धश्रद्धालु वर्ग में फैली भ्रान्तियों का शास्त्रीय निराकरण किया गया है, वहाँ अन्तिम अनुच्छेद में ज्ञान क्रान्ति के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला गया है। और बताया है - " इस देश में एक जबर्दस्त विचार-क्रान्ति होने वाली है। इस विचार-क्रान्ति के फलस्वरूप:-

(1) शिक्षण पद्धति बदल जायेगी । अभी लोग नौकरी के लिये पढ़ते हैं। कुछ दिन में ही एक ऐसी शिक्षा पद्धति का आविष्कार होगा, जिसमें पढ़े लोगों को नौकरी की नहीं, नौकरों की दरकार होगी।

(2) ईश्वरभक्ति का स्वरूप माला-जप तक सीमित न रहकर समाज के पिछड़े वर्ग की सेवा के रूप में आयेगा।

(3) लोग मोक्ष की नहीं सेवा की कामना करेंगे।

(4) वकील-बैरिस्टरों से लोगों को घृणा होगी और भूगर्भ विद्या, रसायन शास्त्र, यंत्र विद्या, खनिज - धातु, चुम्बक-विद्या आदि के नये क्षेत्रों और विज्ञान का विस्तार होगा, जिसका कि नैतृत्व भारतवर्ष से होगा।

(5) धर्म और आत्म-विज्ञान की आस्था का तीव्र विकास होगा।

(6) बेहिसाब फैली जातियाँ सिमट कर चार वर्णों में ही सीमित हो जायेंगी। जातीय संकीर्णताएँ नष्ट होंगी। उसका प्रभाव खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाजों पर पड़ेगा।

(7) वेद-ज्ञान का विस्तार सारे विश्व में होगा।

(8) संविधान का आधार मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ होंगी।

(9) विधवा विवाहों को शास्त्र विरुद्ध न माना जायेगा।

(10) लोग संघशक्ति पर विश्वास करेंगे।

(11) मन्दिर बनाने की अपेक्षा भग्न मन्दिरों का निर्माण पुण्यदायक माना जायेगा। मन्दिर जन-जागृति के केन्द्र बनकर काम करेंगे।

(12) परिवारों में स्नेह सद्भाव बढ़ेगा।

(13) भारतीय लोग ऐसे विमान का अनुसन्धान करेंगे जो निर्धूम होंगे। अग्नि, वर्षा, वायु, सूर्य आदि मानवीय इच्छा के अनुरूप काम करेंगे । मृत व्यक्तियों से संपर्क स्थापित करने वाली विद्या का विकास होगा।

(14) स्थान-स्थान पर प्रयोगशालाओं ओर उद्यमशालाओं की स्थापना होगी । "

युग-परिवर्तन इस शताब्दी की एक ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत हो तो उसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहियें। विचार-क्रान्ति और वह भी एक सुदृढ़ संगठन शक्ति के आधार पर होने की बात विश्व की अनेक उच्च आत्मायें स्वीकार कर चुकी हैं। इस तरह की भविष्यवाणियाँ 'अखण्ड-ज्योति ' में छपी भी हैं, तथापि लोगों का ध्यान इस बात की ओर जाना स्वाभाविक ही है कि एक युग के क्षय और नवयुग के आगमन की सन्ध्या में मार्गदर्शक या अवतार की प्रक्रिया को कौन पूरा करेगा। कल्कि पुराण के आलंकारिक चित्रण को समझा जा सके तो उसमें वह सारे गूढ़ार्थ स्पष्ट है तथापि अनेक भविष्य वक्ताओं तथा योग-आत्माओं ने उस सम्बन्ध में भी प्रकाश डाला है । उन संकेतों के आधार पर पता लगाया जा सकता है कि कहीं कोई ऐसी सत्ता हम सबके समय में ही तो काम नहीं कर रही ? और हम उसे पहचान न पा रहे हों । नीचे दिये जा रहे संकेत सम्भव है, इस संदर्भ में जिज्ञासुओं का कुछ समाधान कर सकें ।

“नया अवतार” के सम्बन्ध में उत्तराखण्ड के सुप्रसिद्ध योगी स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती ने एक पुस्तिका छापकर उसे सारे देश में बाँटा। उसमें बताया गया था - वह एक सुदृढ़ संगठन का स्वामी होगा। परमात्मा से लेकर व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्ध तक के बारे में वह जो विज्ञान और आचार संहिता बनायेगा, उसे तर्कवादी और शिक्षित लोग भी मानेंगे। फलस्वरूप जो भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही तर्कवादी या शिक्षित क्यों न हो, उस व्यक्ति के संपर्क में आयेगा, उसके सिद्धान्तों को मानने लगेगा। फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में शिक्षित व्यक्तियों का व्यापक प्रादुर्भाव बढ़ेगा ।

उन महापुरुष के माथे पर- जहाँ दोनों भौहें मिलती हैं, अँगरेजी के वी के आकार का अर्द्धचन्द्र चिह्न प्रकट होगा। गर्दन और नाभि में भी ऐसे चिह्न होंगे। वह विशुद्ध भारतीय वेष-भूषा में होगा। उसका स्वभाव बालकों जैसा निर्मल, योद्धाओं जैसा साहसी, अश्विनीकुमारों की तरह श्वेत बाल हो जाने पर भी चिर-युवा और शास्त्रों का प्रकाण्ड पण्डित होगा ।

“खण्डेलवाल बन्धु” पत्रिका के दिसम्बर 70 अंक में मोहनस्वामी की भविष्यवाणी का अंश-” वह ब्राह्मण परिवार में जन्म लेगा। वह सारे देश में घूमेगा और लोगों को अपने विचारों से प्रभावित करेगा । 24 अक्षर वाले मंत्र से अपने पिता द्वारा दीक्षित होगा। 24 वर्ष बाद प्रकट होगा । चौबीसवाँ अवतार होगा। 24 अक्षर का उसके जीवन में बहुत महत्व होगा। "

इसी पत्रिका में उत्तर प्रदेश के एक ज्योतिषी, जिनका नाम नहीं दिया गया, की भविष्यवाणी - ”अवतार धोती कुर्ते में नौजवान के रूप में सामने आयेगा । वह यज्ञ करायेगा, ललाट पर चिह्न होंगे, माथे पर चन्द्रमा होगा, महाकाल के रूप में ताण्डव करेगा ।”

पुरातन इतिहास शोध प्रतिष्ठान, मथुरा ने “ प्राचीनतम राष्ट्र इतिहास की लघु रूप-रेखा” नामक एक फोल्डर छापा है। पेज 7 व 8 में सभी मनुओं का काल निर्धारण करते हुये लिखा है - ”पौराणिक साहित्य के अनुसार दक्ष, ब्रह्म, धर्म, रुद्र देव और इन्द्र सावर्णियों के मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं। कल्कि अवतार भी हो चुका है, जिसने बौद्ध प्रभाव को भारत से निरस्त किया था। उसका कल्कि सम्वत् - ज्योतिष गणना में मान्य है। इस समय ब्राह्म रात्रि का तमोमय सन्धिकाल है। "

इस कथन में नवयुग के निर्माणकर्त्ता का परिचय, सूत्र रूप में पिरोया हुआ धर्म को नया जीवन देने वाली सत्ताही इस तमोमय सन्धिकाल की सत्ता-स्वामी और मार्गदर्शक होगी। कई लोग इन तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपने या अपनी इच्छा के व्यक्तियों के साथ घटित करने का प्रयत्न करेंगे। पर सृजन की सत्ता अपने महान् कर्मों के द्वारा आप प्रकट होगी, लोग उसे पहचानते हैं या नहीं, यह अलग बात है पर इतना सत्य है, कि नये युग का जन्मदाता आ चुका, नया प्रकाश अपनी लाली के साथ फूट रहा है। हमें उठना चाहिये और इस युग-सन्ध्या में ईश्वरीय आकाँक्षा का अभिवन्दन करना चाहिये।


लघु कहानी - अपना यथार्थ व्यक्तित्व श्रेष्ठ है

किसी राजा ने एक बिलाव पाल रखा था। वह उसे बहुत प्यार करता था और दुलार से उसका नाम रख दिया था ‘व्याघ्र’।

एक दिन दरबार में ‘व्याघ्र’ नाम पर चर्चा होने लगी। किसी दरबारी ने कहा कि व्याघ्र से अच्छा नाम तो वनराज ‘सिंह’ का है। इसे सिंह क्यों न कहा जाय। यह बात राजा को पसंद आ गई और उसे सिंह के नाम से बुलाया जाने लगा।

कुछ दिन बाद एक मन्त्री ने बातचीत करते-करते यह सम्मति दी कि सिंह से तो मेघ बड़ा होता है जिसकी गर्जना को सुनकर सब जानवर डर जाते हैं। इसलिये इसका नाम मेघ रखा जाना उचित है। उस दिन से उसका नाम ‘मेघ पड़ गया।

एक दिन कोई विद्वान् कवि राजा के दरबार में आये। उन्हें मेघ नाम अच्छा न लगा। पवन के वेग से मेघ जरा-सी देर में छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, इसलिये राजा के बिलाव को पवन क्यों न कहा जाय ? राजा इससे सहमत हो गये। उन्होंने बिलाव को पवन कहना आरम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात् प्रसंगवश किसी मन्त्री ने कहा-”महाराज ! दुर्ग, पवन को भी रोक देते हैं। आँधी और तूफान भी उसे हिला नहीं सकते। इस बिलाव का नाम ‘दुर्ग’ रखना बहुत ठीक होगा । अब बिलाव ‘दुर्ग’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया!

पर अभी इस नाम-चर्चा का अन्त नहीं आया था। एक दिन कोई अन्य देशीय अतिथि वहाँ आया था। उसने ‘दुर्ग’ नाम की कथा सुनकर कहा कि-चूहा बड़े-बड़े दुर्गों में छेद कर देते हैं। इस दृष्टि से यदि इसे ‘चूहा, कहा जाय तो अधिक उपयुक्त होगा। कुछ दरबारियों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी और बिलाव का नाम बदलकर ‘चूहा’ रख दिया गया।

बहुत दिन तक ‘चूहा’ नाम ही चलता रहा। फिर एक दिन जब नाम की चर्चा चल पड़ी तो प्रधान आमात्य ने कहा कि यह बिलाव तो स्वयं चूहों का शिकार करता है और चूहे इसे देखते ही अन्तर्धान हो जाते हैं। तब चूहा के बजाय बिलाव नाम ही क्या बुरा है? यह बात सबकी समझ में आ गई और बिलाव अपने असली नाम से ही पुकारा जाने लगा। अब नाम बदलने की समस्या सदा के लिये समाप्त हो गई । राजपुरोहित ने इसकी चर्चा करते हुए एक समय कहा--अपना यथार्थ व्यक्तित्व श्रेष्ठ है। हम जैसे हैं वैसे ही कहे जायें तो कोई हर्ज नहीं। जो स्थिति नहीं है, वैसा बनने में अनिश्चितता और विडंबना ही रहती है और उससे कोई लाभ नहीं निकलता।


अपनों से अपनी बात - हमारा कार्यभार और उसका चार भागों में विभाजन

यह अंक पाठकों के हाथों पहुँचने के बाद चार-पाँच सप्ताह ही हमारे सदा के लिए अज्ञातवास चले जाने के शेष रह जायेंगे। इसके बाद एक ही लेख हम अपनों से अपनी बात स्तम्भ के अंतर्गत अपनी कलम से और लिख सकेंगे। इसके बाद चिरकाल के लिये हमारी लेखनी एक प्रकार से विश्राम ही ले लेगी। यों भगवान् शंकर की जटाओं में से प्रवाहित होने वाली गंगा की तरह नवचेतना का प्रवाह भविष्य में भी गतिशील रहेगा। माता भगवती हमारे और परिजनों के बीच एक माध्यम का काम करेंगी। अब भी हम माध्यम मात्र हैं। जन जागरण के लिए जिस प्रकाश और स्फुरण को हम अग्रसर करते रहे हैं, वह वस्तुतः हमारा था नहीं। पुराणों के निर्माण संदर्भ में कहा जाता है कि उन्हें व्यासजी ने बोला और गणेश जी ने लिखा है। इस कथन में कितना तथ्य है यह कहना कठिन है पर हमारे सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि एक अति उच्चकोटि की देव सता द्वारा हमारा मार्गदर्शन ही नहीं हुआ वरन् उंगली पकड़ कर छोटे बच्चे को चलाने वाली माता की तरह-कलम पकड़कर लिखना सिखाने वाले अध्यापक की तरह-वह सब कराया है जो हमने किया है, वही सब लिखाया गया है जो लिखा गया है। आगे भी यह क्रम जारी ही रहने वाला है। पाठकों को उस ज्ञान-गंगा के स्नान से वंचित न रहना पड़ेगा, जिसकी शीतलता और स्फुरणा से वे अब तक लाभान्वित होते रहे हैं। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकायें इसी प्रकार निकलती रहेंगी। हमारे मार्गदर्शक का-हमारा-प्रकाश माताजी के माध्यम से सर्व साधारण को प्रेरणा देने के लिए भविष्य में भी उपलब्ध रहेगा ; पर उसकी स्थूल प्रक्रिया जो अब तक चलती रही है एक प्रकार से बन्द हो जायगी। जो शक्ति हमारे हाथों से काम कराती रही, वही अब माताजी तथा उनके सहायकों द्वारा, जिनमें चि0 बलराम सिंह परिहार प्रमुख है- इस मशाल को प्रज्वलित रखेंगे और और पाठकों को जो बौद्धिक भोजन मिलता रहा है, उससे कम स्तर का नहीं ऊंचे ही स्तर का पोषण सिंचन मिलता रहेगा। पिछले दिनों हमने स्वयं इतना अधिक लिखकर रख दिया है जिसके प्रकाशन की व्यवस्था बनाने का अभी अवसर ही नहीं आया, उसे छापने में हमारे उत्तराधिकारियों को अभी दस वर्ष और लग सकते हैं फिर भी स्थूलतः यह समझ जाना चाहिए कि हमारी लेखन प्रक्रिया का यह अन्तिम चरण है। इस मई अंक के बाद जून का अगला अंक ही चालू कलम से लिख पावेंगे। ‘अपनों से अपनी बात’ का स्तम्भ तो हमारे हाथ से अन्तिम रूप में लिखा जायगा। यों माताजी इस प्रकरण को आगे भी जारी रखेंगी।

जिस कार्य को हम अब तक अकेले करते रहे उसका स्वरूप और विस्तार अब अनेक गुना हो गया है। इसलिए उसके भार, उत्तरदायित्व एवं कर्तृत्व का भी विभाजन किया जा रहा है। हम स्वयं ऐसी शक्ति उपार्जन करेंगे-जो सजग और सामर्थ्यवान आत्माओं में नव-निर्माण की दिशा में चलने योग्य कसक, उमंग एवं हिम्मत उत्पन्न कर सकें। कुसंस्कारी और ओछे स्तर के लोग पेट और प्रजनन के लिए जिये - वासना तृष्णा के लिए बहुमूल्य मानव-जीवन नष्ट करें तो उनकी उपेक्षा की जा सकती है। पर जिन्हें धर्म, अध्यात्म, परमार्थ और कर्तव्य का ज्ञान है, वे भी लोभ, मोह और कायरता के बंधनों में बँधे युग पुकार की अनसुनी करते रहे, युग परिवर्तन के महाभारत में गाण्डीव पटककर कायर बने बैठे रहें तो यह असह्य है। अगले 23 वर्ष विश्व के इतिहास में एक अभूतपूर्व परिवर्तन प्रस्तुत करने वाले आ रहे हैं। मानवीय भविष्य को विनाश के गर्त से निकाल कर उज्ज्वल बनाने का अति नाजुक समय सामने खड़ा है, इस वेला में हर जागृत एवं उत्कृष्ट आत्मा की लोभ, मोह की जंजीरें काटकर असुरता की लंका ढाने और संस्कृति की सीता वापिस लाने के लिए रीछ-बानरों की भूमिका सम्पादित करनी पड़ेगी। जिस मूर्छना के कारण वे बहुत सोचते हुए भी कर कुछ नहीं पा रहे हैं उस अवसाद को दूर करने और उन्हें कर्म क्षेत्र में उतारने के लिए एक विशिष्ट अनुदान की जरूरत पड़ेगी। अर्जुन को, हनुमान को जो अनुदान मिला था वही इस युग के उन महामानवों को देना होगा, जो समर्थता प्रसुप्त हो जाने के कारण कुछ कर नहीं पा रहे हैं। हमें स्वयं ऐसा ही अनुदान 15 वर्ष की आयु में मिला था। फलस्वरूप हम पेट और प्रजनन तक सीमित न रहकर कुछ ऐसी महत्वपूर्ण कार्यपद्धति अपनाने में साहसपूर्वक जुड़ सके जो अपने लिए ही नहीं असंख्य अन्यों के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध हुई। जो सौभाग्य हमने पाया वही अब अन्य असंख्यों को दे दे। अगले दिनों ऐसे कर्मठ लोकसेवी उत्पन्न होंगे जो त्याग और बलिदान के अस्त्र-शस्त्र लेकर नव निर्माण के महान अभियान का नेतृत्व कर सकने की ऐतिहासिक एवं अनुकरणीय भूमिका प्रस्तुत कर सके। जिस उग्र तपश्चर्या को करने हम जा रहे हैं, उसका मूल प्रयोजन संस्कारवान आत्माओं को महामानवों के रूप में परिणत हो सकने योग्य सामर्थ्य प्रदान करना है। हमारा सुनिश्चित विश्वास है कि जो कार्य पिछले सेवा काल में हम प्रत्यक्ष रहकर न कर सकें, उसे अगले दिनों परोक्ष रूप में रहकर कर सकेंगे। 24 वर्ष की हमारी तपश्चर्या ही थी जिसने विगत 20 वर्षों के सेवा काल में इतना कुछ कर दिखाया, जिसे अनुपम और अद्भुत कहना अत्युक्ति न होगी । अगले दिनों हमारे क्रिया-कलाप प्रत्यक्ष न दीखेंगे और उनका श्रेय हमें न मिलेगा पर इससे क्या ? तथ्य तो तथ्य ही रहेगा। इन दिनों सच्चे और कर्मठ लोक निर्माताओं का भारी अभाव है, जिनमें विश्व मानव के भविष्य निर्माण का साहस एवं उत्सर्ग उमड़ पड़ रहा हो ऐसे कर्मवीर कहीं दिखाई नहीं पड़ते सार्वजनिक क्षेत्र में धन, पद और यश के लोभी सिंह की खाल ओढ़े श्रृगाल भर विचरण कर रहें हैं। सच्ची लगन के थोड़े से भी कर्मवीर क्षेत्र में रहे होते तो विश्व का कायाकल्प हो सकना कठिन न रह जाता। इसी अभाव की पूर्ति करने के लिए हम अपने भीतर प्रचण्ड दावानल उत्पन्न करेंगे जिसकी ऊष्मा से जंगल वृक्ष के वृक्ष जलते दिखाई पड़ें और लोक निर्माण के लिए जिन साहसी सैनिकों का आज अभाव दीख रहा है उसकी कमी पूरी की जा सके। हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे उसकी गर्मी असंख्य जागृत आत्मायें अनुभव करेंगी और लोभ मोह की कृपणता छोड़कर आज के एकमात्र ईश्वरीय निर्देश-भावनात्मक नवनिर्माण के, युग परिवर्तन के महान अभियान में अपना ऐतिहासिक योगदान करेगी। अगले दिनों बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी किस तरह उद्भूत होती है उसे लोग आश्चर्य भरी आँखों से देखेंगे। भावी महाभारत का संचालन करने के लिए कितने कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्छना को छोड़कर आगे आते हैं।इस चमत्कार को अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देखने के लिए सहज ही हर किसी को प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना जो असम्भव को संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दे, हमारे ज्वलन्त जीवन क्रम का अन्तिम चमत्कार होगा। अब तक के जिन छुटपुट कामों को देखकर लोग हमें सिद्ध पुरुष कहने लगे हैं, उन्हें अगले दिनों परोक्ष कर्तृत्त्व का लेखा-जोखा यदि सूझ पड़ें, तो वे इससे भी आगे बढ़कर न जाने क्या-क्या कह सकते हैं। निश्चित रूप से हमारी भावी परोक्ष साधना कुछ ऐसा अनुदान विश्व मानव के सम्मुख प्रस्तुत करेगी जो उसके भाग्य और भविष्य की दिशा ही मोड़ दे। सगर के साठ हजार पूत्रों को नरक की आग में जलने से बचाने के लिए गंगा का अवतरण सम्भव करने वाले भागीरथ की तरह ज्वलंत मानवीय समस्याओं का सृजनात्मक और ध्वंसात्मक हल प्रस्तुत करने के लिए हमें बहुत कुछ करना है। युग-संताप को बुझा सकने वाली ज्ञान-गंगा का अवतरण करने के लिये हमें उन्हीं पदचिह्नों का अनुगमन करना है जिन पर महाभाग भगीरथ ने प्रयाण किया था। हमारी भावी तपश्चर्या का मूल प्रयोजन यही है।

आज की परिस्थितियों में आत्म-साधना किस स्तर के व्यक्ति के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकती है। यह आज का नया शोध कार्य है। प्राचीन काल में जो शारीरिक, मानसिक, भौतिक एवं तात्त्विक परिस्थितियाँ थीं वे अब बदल गईं। साधना तपश्चर्या का जो क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है, वह आज की परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। अब वे प्रयोग-प्रयोजन एवं साधन-क्रम सफल नहीं हो सकते, जो प्राचीनकाल की परिस्थितियों में तो उपयुक्त थे, पर आज उन्हें निष्फल और निरर्थक ही कहा जा सकता है। आत्मबल बढ़ाने के लिये आत्म-साधना का अवलम्बन आवश्यक है। पर युग साधन का प्रस्तुतीकरण न होने से उस मार्ग के पथिकों को बहुत श्रम करने पर भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज की परिस्थितियों में सफल सिद्ध हो सकने वाली साधन पद्धति को खोज निकाला जाय। इसके लिये वैज्ञानिक प्रयोग करने पड़ेंगे। गत 60 वर्षों के व्यवस्थित जीवन-क्रम ने अपनी काया और चेतना को इस योग्य बना दिया है कि उसे प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जा सके। हम अपने ऊपर अनेक अध्यात्मिक प्रयोग करेंगे और उसने परिणामों का इस मार्ग के पथिकों के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे। हम दूर और अप्रत्यक्ष रहेंगे पर हमारे प्रयोगों का परिणाम माताजी के माध्यम से अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों द्वारा सर्वसाधारण को विदित होता रहेगा। हमारा विश्वास है कि भौतिक विज्ञान के उत्साहवर्धक प्रशिक्षण की तरह आत्म-विज्ञान की सफल शिक्षा का द्वार भी अगले दिनों खुल ही जायगा और उसका ऐसा लाभ उपलब्ध हो सकेगा जिसके आधार पर मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सके। इस शोध कार्य के उत्तरदायित्व को अपने कंधे पर लेकर जाते हुए हमें इन वियोग की दर्द भरी घड़ियों में भी संतोष एवं गर्व का अनुभव हो रहा है।

अपना विशाल परिवार जिसे हम अत्यधिक प्यार करते हैं-चर्म चक्षुओं के सामने से विलग हो रहा है, इसका एक दुर्बल-मन मानव प्राणी की तरह हमें भी बहुत दुख है। वियोग की कसक जो कि बार-बार बेचैन कर देती है, जब यह सोचते हैं कि शुरू में आन्तरिक अभिव्यक्ति प्रकट न करते हुए भी जिन स्वजनों को हम प्राणप्रिय मानते हैं उन्हें देखना भविष्य में हमारे लिये कभी सम्भव न होगा। उनके साथ हँसने-बोलने, अपनी कहने उनकी सुनने का अवसर न मिलेगा, तो जी बहुत टूटता है और आँखें सजल हो जाती हैं और जी बहुत उदास हो जाता है । प्राणप्रियों के विछोह और महाप्रयाण के समय मनुष्य को कितनी व्यथा हो सकती है इसका पिछला अनुभव हमें नहीं है । अब उसका अनुभव हो रहा है तो लगता है हमारे जैसे कोमल अंतरंग वाला व्यक्ति इस दर्द और कसक को कितनी कठिनाई से सहन कर पाता होगा । अपने को इन दिनों सम्भालते बहुत है, बाहर से हँसने और निश्चिन्त दिखने का उपक्रम भी बहुत बनाते हैं पर वह बनावट भी ठीक तरह बन नहीं पाती । जरा से गहरे प्रसंग आ जाते हैं तो दर्द उभर पड़ता है और बेबसी आँखों में से टपक पड़ती है। अपने को उपहासास्पद न बनने देने के लिए हमें इन दिनों जो बनावट बनानी पड़ रही है उसे सम्भालना भी एक मुसीबत बन गया है । पुत्र शोक में कातर वेश्या को राज सभा में नाचने के लिये जिस तरह दुहरे उपक्रम करने पड़ते हैं, उसी तरह इस वर्ष अनेक सम्मेलनों, यज्ञों, आयोजनों, परामर्शों में सम्मिलित रहते हुए हमें करने पड़ते हैं। एक वर्ष से यह व्यथा अधिक उभरी है । इसकी अन्तिम परीक्षा 17,18,19,20 जून को होने वाला विदाई समारोह है। उस अवसर पर कहना बहुत है पर रुँधा हुआ गला न जाने कुछ कहने भी देगा या नहीं। यह आशंका इन दिनों बुरी तरह मन पर सवार है। जो हो इतने दिन निकल गए , वह समय भी पार होगा। हमारी आन्तरिक इच्छा इस अंतिम अवसर पर अपने प्राणप्रिय स्वजनों को एक बार फिर जी भर कर देख लेने की है; सो हमने पत्रिका की पंक्तियों में निमन्त्रण छाप देने के अतिरिक्त आत्मिक-अप्रत्यक्ष रूप से भी आह्वान-प्रेरित किया है । हमें आशा है कि हमारे प्रायः सभी घनिष्ठ परिजन इस अवसर पर प्रस्तुत होंगे । हमारे प्रगाढ़ आमंत्रण को ठुकराना किसी बहुत ही कठोर व्यक्ति के बस की बात हो सकती है । अन्यथा जीवन में अमिट स्मृति की तरह छाये रहने वाले इस अनुपम सुअवसर को छोड़ सकना किसी भी स्वजन के लिये सम्भव न होगा । इसी मान्यता के आधार पर सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं। इस अन्तिम मिलन से हमारा जी बहुत कुछ हलका हो जायेगा। चार दिन का समय कम ही है पर उसमें भी हम अपनी वैखरी, मध्यमा, परा और पश्यंती वाणियों को प्रयोग करके स्वजनों से इतना कुछ कह सुन लेंगे जितना चिरकाल के सान्निध्य में भी कदाचित सम्भव नहीं हो पाता ।

20 जून को हम चले जायेंगे । 10 दिन माताजी की व्यवस्था शान्तिकुञ्ज में बनाकर अपने गंतव्य स्थान को प्रयाण कर देंगे । ये प्रत्यक्ष मिलन का उपक्रम समाप्त हो ही जायेगा पर परोक्ष रूप से हमारा हर घनिष्ठ परिजन यह अनुभव करेगा कि हम छाया की तरह उसके साथ चलते हैं और प्राणवायु की तरह उसके अंतरंग का मृदुल एवं समर्थ स्पर्श करते हैं । भाव भरे अन्तःकरणों का मूल्य हमारी दृष्टि से समुद्र की रत्नराशि से अधिक है । उनके प्रति हमारा सम्मान सद्भाव और ममत्व यथावत् ही नहीं बना रहेगा वरन् और भी अधिक बढ़ता रहेगा । हमें विश्वास है इतनी सघन आत्मीयता, प्रतिक्रियारहित नहीं हो सकती। सो परिजनों को भी हमारे प्रति वैसा ही स्नेह सद्भाव बनाये रहने को विवश होना पड़ेगा - जैसा कि इन दिनों रखा करते हैं । हम किसी आत्मीय को भूलने वाले नहीं हैं, सो हमें भी भुला सकना किसी के लिए आसान न होगा । प्रत्यक्ष का संपर्क नियति ने तोड़ दिया तो क्या, अप्रत्यक्ष संबंधों की मृदुल सरसता का अनुभव करने से किसी को कोई नहीं रोक सकता । इस स्नेह सूत्र में तो हम अपने परिवार के साथ आगे भी चिरकाल तक घनिष्ठता के साथ बँधे रहेंगे । और कुछ किसी के लिये कर सकना, दे सकना सम्भव होगा, सो उनके प्रयत्न सामर्थ्यभर करते रहेंगे । प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने की विवशता परिजनों को भी प्रेरित करती रहेगी। सो आदान-प्रदान का क्रम हम लोगों के बीच अभी टूटने वाला नहीं है । अप्रत्यक्ष समीपता आज की ही जितनी नहीं वरन् उससे भी अधिक उपयोगी अगले दिनों बनी रहेगी ।

हमारे भावी कार्यक्रमों में

(1) नव-निर्माण के लिए महानुभावों का सृजन,

(2) आत्मबल सम्पन्न बनने की युग साधना की शोध  तथा

(3) परिजनों का मृदुल एवं समर्थ स्नेह-सहयोग

यह तीन ही प्रयोजन मुख्य हैं।

समय, स्थान, कार्य-पद्धति आदि के बारे में हमें जानने की इच्छा भी नहीं हुई । जाना भी नहीं । क्योंकि हमारा समर्थ मार्गदर्शन हमारी उतनी चिन्ता तथा व्यवस्था करता है, जितनी हम स्वयं भी नहीं कर सकते । ऐसे मार्गदर्शक को पाकर भी यदि हम पूछ-ताछ, उखाड़-पछाड़ करते हैं, तो यह एक प्रकार से अपनी अश्रद्धा ही होगी । जिसके हाथों अपना वर्तमान और भविष्य बेच दिया, जिसके चरणों पर अपना तन, मन, धन सर्वस्व अर्पण कर दिया, उसकी इच्छा और प्रसन्नता में अपने अस्तित्व को घुला कर ही समर्पण योग की साधना पूरी होनी है । उससे हमारा न तो कोई अनुरोध है, न आग्रह, न इनकार, न संशोधन। छाया तो काया के पीछे ही चलती है चाहे सरल मार्ग पर चलना पड़े या ऊबड़ - खाबड़ पर। सो हम चलते ही आये हैं, चलेंगे भी। जब आदेश का पालन भर अपना धर्म रह गया तो फिर पूछ-ताछ की जरूरत भी क्या पड़े ? क्यों पड़े ? जहाँ रखा जायेगा रहेंगे । जो कराया जायगा करेंगे, उपरोक्त विविध कार्यक्रम भी उसी की इच्छा मात्र है। हम तो पोली बाँसुरी भर हैं। इसमें से क्या राग निकले, कब क्या स्वर लहरे, यह उसी का काम है, जिसके अधरों से अपने को सटाकर ही हम धन्य हो गये हैं। वह इस पोली बाँसुरी में से क्या स्वर निकालता है। इसे सुनने वाले स्वयं समय-समय पर सुनते रहेंगे । हमारी भावी कार्य-पद्धति एवं स्थिति की भावी रूप रेखा का परिचय इतना ही हमें मालूम है सो बता दिया ।

कार्य विभाजन में दूसरी जिम्मेदारी माताजी के ऊपर डाली गई है । यों वे रिश्ते में हमारी धर्म-पत्नी लगती हैं, पर वस्तुतः वे अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं । उनमें मातृत्व की इतनी उदात्त गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सके । हमारा अभाव किसी आत्मीयजन को खटकने न पायें । स्नेह के अभाव में कोई पौधा सूखने कुम्हलाने न पाये यह भार उन्हीं के कंधों पर डाल दिया गया है । बाप के मर जाने पर माँ, मेहनत मजदूरी करके भी बच्चों को पाल लेती है, पर माँ के न रहने पर बाप के लिये वह भार कठिन हो जाता है । हमारा न रहना परिजनों को कुछ ही समय अखरेगा । पीछे वे अपने आपको अभावग्रस्त या असुरक्षित अनुभव न करेंगे । माताजी का प्यार और प्रकाश उन्हें समुचित मात्रा में मिलता रहेगा युग-निर्माण आन्दोलन का संचालन वे स्वयं करेंगी । अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण हिन्दी पत्रिकाओं को हम जिस तरह संभालते थे उसी प्रकार वे उन्हें सम्भालेगी । इस कार्य के लिये उन्हें कुछ सहायकों की जरूरत पड़ेगी सो हमने व्यवस्था जमा ली है । अभियान का दिशा निर्धारण माताजी ठीक तरह करती रहेंगी । उन्हें हमारी तरह अधिक बातें करना नहीं आता पर आत्मिक गुणों की दृष्टि से वे हमसे कुछ आगे ही है पीछे नहीं । परिवार को प्यार और प्रकाश देने की जिम्मेदारी उन पर छोड़ कर हम एक प्रकार से निश्चिंत है । हमें रत्ती भर भी यह भय नहीं है कि आन्दोलन या संगठन हमारे जाने के पीछे लड़खड़ा जायगा । सच तो यह है कि हमने कुछ किया ही नहीं । एक दिव्य शक्ति ही बाजीगर की तरह हमें कठपुतली की तरह नचाती रही है और उसी की उंगलियों में बँधे धागे के सहारे उछल कूद करते रहे है । लोग जिसे हमारा कर्तृत्व पुरुषार्थ समझते हैं, उसकी असलियत हमीं जानते हैं । दिव्य सत्ता स्वयं हमें निमित्त बनाकर काम कर रही है । हमें तो व्यर्थ ही लोग श्रेय देते और लज्जित करते हैं । जिस शक्ति के सहारे यह प्रबल प्रयास अब तक चलता रहा है वह आगे भी स्वयं ही उसे चलायेगी । माताजी माध्यम रहें तो भी उनके पीछे वही समर्थ सत्ता रहेगी जो हमारे पीछे है । आन्दोलन घटने की आशंका होती तो काम बढ़ने और उसके वर्ग विभाजित करने की जरूरत ही क्यों पड़ती । हमें काम को अधूरा छोड़ने - चलती गाड़ी को ठप्प करने की सूझ क्यों सूझती ? हर किसी को यह परिपूर्ण विश्वास रखना चाहिये कि अगले दिनों अभियान की गति और अधिक बढ़ जायगी ओर वह मानवीय भविष्य के निर्माण की अपनी भूमिका अब की अपेक्षा अगले दिनों हजार गुनी तेजी के साथ सम्पन्न करता चला जायगा ।

माता भगवती देवी 20 जून के बाद हरिद्वार - ऋषिकेश के बीच सात ऋषियों की तपस्थली, जहाँ गंगा की सात धारायें प्रवाहित हुई हैं - अपने छोटे से ‘शान्ति कुञ्ज ’ नामक आश्रम में निवास करेंगी । जिस प्रकार हमने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण सम्पन्न किये थे, उसी प्रकार वे भी करेंगी। अखण्ड घृत-दीप मथुरा से उन्हीं के पास चला जायगा । आश्रम में फल और शाक उगाने की व्यवस्था बना दी गई है । एक गाय रहेगी जिसका घी दीपक में और छाछ दूसरों के लिये प्रयुक्त होती रहेगी । सम्पादन, पत्र व्यवहार आदि में सहयोग देने के लिये एक दो व्यक्ति उनके पास रहेंगे । आगन्तुकों को 24 घंटे से अधिक उनके पास ठहरने पर प्रतिबन्ध रहेगा । अपनी तपश्चर्या की उपलब्धियों से वे लोगों के दुख-कष्ट निवारण के उस क्रम को जारी रखेंगी, जिसे हम जीवन भर निबाहते रहे हैं। मनुष्य के पास धन, बल, बुद्धि, प्रतिभा आदि की जो भी विभूति हो उसका न्यूनतम भाग अपने लिये रखकर शेष को अपने से पिछड़े हुओं की सेवा सहायता में लगाना चाहिये । यही मानवीय धर्म हमने जीवन भर निबाहा। हमारे पास जो कुछ भौतिक था, वह समाज को देते रहे । तपश्चर्या की कमाई हुई उसे भी अपने लिए - स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि आदि के लिये नहीं रखा, वरन् पीड़ितों की व्यथा निवारण और पिछड़े हुओं की उन्नति के लिए रत्ती-रत्ती खर्च करते रहे। सो स्वभावतः अनेक व्यक्ति अब भी वैसी ही आशा हमसे रखेंगे । हमारे चले जाने पर अपने को असहाय समझेंगे । इस अपने बाल परिवार की साज-सम्भाल करने के लिए हम माताजी को छोड़े जाते हैं । वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती, खर्च करती हमारी परम्परा को जीवित रखे रहेंगी ।

(1) नवनिर्माण अभियान का प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन, नीति निर्धारण,

(2) हमारी बौद्धिक एवं साधनात्मक उपलब्धियों से सर्वसाधारण को अवगत कराते रहने का माध्यम  और

(3) अखण्ड दीपक एवं गायत्री पुरश्चरण श्रृंखला को गतिशील रखकर कष्टपीड़ितों की सहायता एवं परिजनों को प्यार - प्रकाश का अनुदान।

यह तीन काम माताजी के जिम्मे है। हमारी अब तक की कार्य पद्धति का इतना अंश माताजी के जिम्मे छोड़ दिया गया है ।

हमारा तीसरा प्रत्यक्ष आन्दोलनात्मक, प्रकाशात्मक, संगठनात्मक, सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रम गायत्री तपोभूमि से चलेगा। वहाँ कार्यकर्त्ताओं की एक बहुत अच्छी टीम इकट्ठी हो गई है जो निस्पृह भाव से लोक-मंगल एवं जन-कल्याण के प्रयोजन को पूरा करने में त्याग और बलिदान की भावना से निरत हैं। कभी फोड़े - फुन्सी उठते रहते हैं, सो मानव स्वभाव है, उनका कतर बोनट पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। सब मिलाकर यह टीम ऐसी है जिसके कन्धे पर हम तपोभूमि में चल रही गतिविधियों तथा क्षेत्र में विस्तृत आन्दोलना का उत्तरदायित्व संतोष पूर्वक छोड़ सकते हैं। अभी लगभग एक दर्जन कर्मठ कार्यकर्त्ता तपोभूमि में रह रहे हैं, आगे और भी नये आने वाले हैं। देशव्यापी कार्य को देखते हुए कार्यकर्त्ताओं की संख्या बढ़ने ही वाली है। आशा है आगे यह संख्या बहुत बढ़ जायगी। इस टीम को अहंकार या लोलुपता पैदा न होने पाये, इसके लिए कड़े नियम बना दिये गये हैं। इनमें से कोई गुरु बनने, पैर पुजाने, व्यक्तिगत रूप में दान-दक्षिणा लेने का प्रयास न करे, ऐसी सख्त मनाही कर दी है। अपने पीछे के सभी लोग लोकसेवी, कार्यकर्त्ता मात्र रहेंगे। वही उनका स्तर होगा। अलग-अलग संस्थाएँ बनाने, किसी क्षेत्र का अलग संगठन करके, उसके अलग महन्त बन बैठने और केन्द्र को कमजोर करने तथा उसके साथ प्रतिद्वंद्विता उभारने की भी अपने किसी भी अनुयायी उत्तराधिकारी को रोके जा रहे है। यश, लोलुप और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ग्रस्त व्यक्ति ही अक्सर ऐसे उपद्रव खड़े करते हैं, जिससे सेवा का आदर्श भूलकर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत अहंता बढ़ाने लगता है। सार्वजनिक जीवन का यही अभिशाप है और इसी चट्टान से टकराकर अनेक महत्वपूर्ण संगठन टूटे हैं, टूट रहे हैं। सो हमने अपने देश भर में फैले उत्तराधिकारियों को - खासतौर से गायत्री तपोभूमि के निवासियों को ऐसे कुकृत्य न करने का बहुत आग्रह और अनुरोधपूर्वक रोक दिया है। अब हम अपने पीछे सृजनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों को चलाते रहने के लिए एक टीम गायत्री तपोभूमि में छोड़े जा रहे हैं। जो किसी से पैर छुआने के लिए सहमत न होगी, पर दूसरों के पैर छूकर अपनी नम्रता का परिचय देती है और सार्वजनिक जीवन की पवित्रता को अक्षुण्ण रखे रहेगी।

गायत्री तपोभूमि की कार्यकर्ता टीम का नेतृत्त्व करने के लिए हमने श्री लीलापति शर्मा को नियुक्त कर दिया है। तपोभूमि की व्यवस्था, शाखाओं संगठनों तथा क्षेत्रीय कार्यक्रमों को भी वे ही संभालेंगे। उन्हें हमारा प्रतिनिधि माना जाय। यह फैसला हमने बहुत सोच समझ कर किया है। हमें आशा है कि उन्हें सर्वत्र बड़े भाई की तरह, हमारे संगठनात्मक उत्तराधिकारी की तरह ही स्वीकार किया जायगा और व्यवस्थात्मक अनुशासन रखा जायगा।

गायत्री तपोभूमि में युग-निर्माण विद्यालय, हिन्दी तथा विभिन्न भाषाओं की युग-निर्माण पत्रिकाओं का संचालन, पुस्तकें, विज्ञप्तियाँ, पोस्टर आदि का प्रकाशन, कला-भारती आदि के कार्यक्रम भी दैनिक यज्ञ एवं निवासियों के अनिवार्य गायत्री साधना के साथ-साथ चलते रहेंगे। संगठन का मार्गदर्शन मथुरा से होगा।

अभी ज्ञान-यज्ञ का प्रथम चरण ही चल रहा है। इस आधार पर प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने और कार्यकर्ता सहयोगी उत्पन्न करने का आरम्भिक प्रयोजन पूरा किया जा रहा है। थोड़ी मजबूती आते ही दूसरे रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्य हाथ में लिये जावेंगे। अगले वर्ष 240 युगनिर्माण सम्मेलन किये जाने हैं। जिनके साथ 9 कुण्डी छोटे गायत्री यज्ञ भी जुड़े रहेंगे। इनका मुख्य प्रयोजन शाखा के साधनों को अधिक विस्तृत और प्रभावी बनाना है। इसकी एक विस्तृत रूप-रेखा बना ली गई है। इन सम्मेलनों को सफल बनाने के लिए मथुरा से संगीत मंडलियाँ तथा प्रकाश चित्र-यन्त्र (स्लाइडर प्रोजेक्ट) भेजे जाते हैं। इसके लिये कुछ जीपें भी खरीदी जा रही हैं। इस सारी योजना का संचालन गायत्री तपोभूमि से ही होगा और देश-व्यापी हमारे सभी परिजन उसका पूरा-पूरा सहयोग करेंगे। हम यह आशा और विश्वास लेकर तथा सर्वसाधारण को आश्वासन देकर जा रहे हैं कि अगले दिनों नव-निर्माण का पुण्य प्रयास घटेगा नहीं बढ़ेगा ही। गायत्री तपोभूमि स्थित युग-निर्माण योजना का केंद्र हमारी जलाई मशाल को भविष्य में हमसे अच्छी तरह जलाये रहने में समर्थ होगा। इस ईश्वरीय प्रयोजन के पीछे भगवान का , हमारे गुरुदेव का, हमारा तथा उत्तराधिकारियों के भाव भरे पुरुषार्थ का जो प्रचण्ड बल है वह उसे गिरने या घटने न देगा। अभियान गतिशील होगा और विश्व मानव के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगा।

अपने, माताजी के, लीलापति जी के नेतृत्व में एकजुट होकर कार्यरत गायत्री तपोभूमि की टीम के कार्य विभाजन की चर्चा की जा चुकी । अब चौथा उत्तरदायित्व परिजनों का रह जाता है। उनमें से प्रत्येक को एक घण्टा समय और दस पैसा रोज ज्ञान-यज्ञ के लिए देने की बात भूल नहीं जानी है वरन् हमारा सौंपा हुआ एक अति पवित्र उत्तरदायित्व समझना है। दस पैसा वाली धनराशि केवल घर में झोला पुस्तकालय रखने के लिए ही खर्च की जानी है। हम ऐसी व्यवस्था बनाकर जा रहे हैं कि जन-मानस को प्रेरणा देने वाला अति उत्कृष्ट साहित्य भविष्य में भी तपोभूमि से प्रकाशित होता रहे। कहा जा चुका है कि हम अपना हस्तलिखित साहित्य इतना अधिक छोड़े जा रहे हैं। जो लगातार दस वर्ष तक छपता रहे तब कहीं पूरा हो पावेगा। यह प्रस्तुत साहित्य से अधिक ऊँचे स्तर का होगा, सो उसे परिजनों के घरों में रहना ही चाहिये और उसे संपर्क क्षेत्र में पढ़ाने के लिये-सुनाने के लिए-समय लगाया जाना ही चाहिए। यह प्रक्रिया ठीक से चलती रही तो अपना ज्ञान-यज्ञ अखण्ड बना रहेगा और उसकी चिनगारियाँ आज के व्यापक अनाचार को अन्धकार को मिटाने के लिए समर्थ परिवर्तन प्रस्तुत कर सकने में सफल होगी। इस प्रयास में कहीं किसी की कमी नहीं आने देनी चाहिए। अपने कार्य की सूचना मथुरा नियमित रूप से भेजते रहना चाहिए ताकि वे माताजी तक और पीछे हम तक पहुँचती रहें। हमने सारा जीवन, समय तथा वैभव लोक-मंगल के लिए उत्सर्ग करके परिजनों के सामने एक पुण्य परम्परा प्रस्तुत की है। जो हमसे, हमारे निशान से, प्यार करते हैं, उन्हें कम से कम इतना तो करते ही रहना चाहिये कि एक घण्टा समय और दस पैसा ज्ञान-यज्ञ के लिए नियमित रूप से देते रहने का जो छोटा-सा त्याग, बलिदान अनिवार्य रूप से निबाहते रहने के लिए कहा गया है, उसे निष्ठा- पूर्वक निबाहते रहें। जो इतना निबाह लेगा उसी से यह आशा की जायगी कि कुछ और बढ़े-चढ़े कदम उठाकर सृजनात्मक और संघर्षात्मक भावी प्रक्रिया में कुछ कहने लायक योगदान दे सके। नव-निर्माण प्रयोजन की कर्मठता के लिए उपरोक्त अनिवार्य शर्त जो पूरा कर सकेंगे उन्हें आरम्भिक कसौटी पर कसा जाने पर खरा माना जायगा और उन उत्तरदायित्वों को सौंपा जायगा जो महामानवों के हाथों ही सम्पन्न किये जा सकने सम्भव हैं।

यों हम जा ही रहे हैं, पर अपने अतिरिक्त अन्य तीन घनिष्ठ सहयोगियों

(1) शान्ति कुञ्ज स्थित तपस्विनी माताजी,

(2) लीलापत जी के नेतृत्व में ज्ञान-यज्ञ एवं संगठन सँभालने वाली गायत्री तपोभूमि स्थित कार्यवाहिनी टीम  और

(3) नित्य का अनुदान देने वाले कर्मठ परिजन

(इन तीनों की) ही पूरी-पूरी देखभाल और साज-सँभाल करते रहेंगे। अपने ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व को इन तीन साथियों में बाँटते हुए हम यह आशा लेकर जा रहे है कि वे सभी अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी तथा तत्परता के साथ वहन करेंगे। इन तीन वर्गों के अलावा भी हमारे अनेक स्नेही स्वजन रह जाते हैं। उन्हें भी प्यार और प्रकाश देने में कंजूसी नहीं करेंगे। स्थूल शरीर भर से हम जा रहे है। पर हमारा सूक्ष्म अस्तित्व अब की अपेक्षा अनेक गुना प्रखर हो जाने के कारण सम्बद्ध लोगों को अपने समीप बहुत कुछ कहने और देने के लिए उपस्थित ही अनुभव होता रहेगा।


आवश्यक -सूचना

आवश्यक -सूचना

माता भगवती देवी 20 जून के बाद सप्त सरोवर, हरिद्वार रहेंगी। भविष्य में उनका साधना क्रम वहीं चलेगा। उनके साथ रहने के लिए एक परिश्रमी, सेवाभावी, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त, निरोग साक्षर महिला की आवश्यकता पड़ेगी। निर्वाह व्यय माताजी उठायेंगी। जो महिला अपने को इसके लिए उपयुक्त समझें वे माताजी से अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार कर लें।


तुमने क्राँति मशाल जलाई

(माया वर्मा)


तुमने क्रान्ति मशाल जलाई (Kavita)

नूतन युग के नवल सृजेता! कण्टक शैया-शायी।

स्वयं जले, औ जलकर तू ने क्रान्ति मशाल जलायी॥

देखी जब वेदना जगत की, करुण नयन भर आये।

युग-व्यापी था प्रश्न , विश्व की पीड़ा कौन मिटाये?

तब तुमने नव अंकुर सा बचपन बलिदान किया था।

तरुणाई संन्यास बन गई, विष का पात्र पिया था॥

दिन की बात कहाँ है? तुम तो रातों में भी जागे।

कैसे भी तो मिटें मनुज के ये दुष्कर्म अभागे॥

कल्मष, पाप, छद्म मिट जायें, भाव हृदय में छाया।

अग्नि प्रकट प्राणों से की, औ नूतन यज्ञ रचाया॥

चले रोकने शब्द रुदन का, तप्त त्रस्त जगती से-

अन्तर के झनझना उठे स्वर, गूँजी मधु शहनायी।

दुःखी नयन से मेंट उदासी मृदु मुस्कान बखेरी।

दिखे सूखते अधर, न की फिर नम करने में देरी।

त्रस्त, निराश, हताश हृदय में नवल प्रेरणा भर दी।

रही अधूरी कहीं साधना, खुद ही पूरी कर दी।

घाव दिखा रिसता, तो मरहम विहँस, तुरन्त लगाया।

राहहीन, भूले मनुष्य को, कर गहि मार्ग दिखाया॥

जागे तुम रातों को जग की विकल वेदना पीकर।

पाया है सन्तोष, दंश को आशाओं से सीकर॥

फसल उगेगी निश्चित, सुख, सन्तोष, तृप्ति की मनहर।

स्वेद बहाया और पौध, जो तुमने आज लगायी॥

आज बिछुड़ने की बेला है, पथ नहीं रोकेंगे।

औ देकर विश्वास हृदय का, तुमको विदा करेंगे॥

यह मशाल चिर ज्वलित रहेगी, रक्त हृदय का पीकर।

ज्योति न बुझने देंगे, अवसर पड़ा प्राण भी देकर।

जीवन बाँटा है तुमने, निज प्राण गलाकर छिटका।

मृत मानवता पुनः जी उठी पी अमृत तव घट का॥

नवल यज्ञ के उद्गाता को कौन न पहचानेगा।

युग दृष्टा, युग सृष्टा, तुमको विश्व सदा मानेगा।

युग-युग तक जग याद करेगा। युग के उद्घोषक को।

नव जागृति का सूत्रपात होगी यह सजल विदाई।

- माया वर्मा

*समाप्त*


सद्वाक्य व लघु कहानी - ईश्वर का सहारा

यूनान के शाह का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन खराब होता गया। बचने के आसार नजर नहीं आ रहे थे। अन्त में वहाँ के सभी हकीमों ने मिलकर यह निश्चय किया यदि निर्धारित लक्षणों वाले किसी व्यक्ति का पित्ताशय प्राप्त हो सके तो शाह के जीवन को बचाया जा सकता है।

शासकीय कर्मचारी निकल पड़े और दो-तीन दिन की खोज-बीन के बाद चाहे हुये लक्षणों वाले एक बालक को पकड़ लाये। निर्धन माँ बाप का वह सीधा-साधा बालक। पिता को विपुल मात्रा में धन दे दिया गया तो उसने चूँ तक न की।

काजी से इस सम्बन्ध में परामर्श लिया गया तो उन्होंने भी कह दिया कि राजा के प्राण रक्षा हेतु यदि प्रजा के किन्हीं एक दो व्यक्तियों को अपना बलिदान भी देना पड़े तो वह अपराध की कोठी में नही आयेगा।

वह लड़का राजा के सम्मुख उपस्थित किया गया। सभी हकीम अपनी तैयारी के साथ आये ही थे। जल्लाद को तलवार से काम तमाम करने की आज्ञा दे दी गई। जल्लाद ने जैसे ही तलवार उठाई कि बालक को ऊपर आकाश की ओर देखकर हँसी आ गयी।

राजा को, मृत्यु के मुँह में जाते बालक को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने संकेत से उस जल्लाद को रुकने के लिए कहा। ‘जल्लाद ने अपना हाथ नीचे कर लिया। बालक गम्भीर हो गया उसने कहा-’आज मैंने देखा कि माता-पिता जिस सन्तान के लिए प्राण देते हैं उन्होंने उसे पैसों के लोभ में आकर बेच दिया। काजी जो धर्म और मर्यादा की रक्षा करने वाला कहा जाता है उसने राजा को खुश करने के लिए धर्म के सिद्धान्त को ही बदल दिया और राजा के जीवन को बचाने के लिए भले ही किसी के प्राण लिए जाये पर धर्म उस अपराध को अपराध और पाप की दृष्टि से मान्य करने को तैयार नहीं। प्रजा का रक्षक बादशाह ही भक्षक बना जा रहा हो उस समय ईश्वर के अलावा व्यक्ति को सहारा देने वाला और हो भी कौन सकता है?’

अतः मुझे उस परमपिता की याद करके हँसी आ गई कि यहाँ तो ऐसा अंधेर मचा हुआ है देख सबका रक्षक क्या करता है?

‘मुझे क्षमा कर बेटा! अब तू निश्चित होजा। जल्लाद की तलवार अब तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सकेगी।’ शाह ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा। यूनान के शाह ने भूल स्वीकार करली पर आज धूम्रपान के बारे में उपरोक्त तीनों तथ्य ज्यों के त्यों हैं।