महाशून्य की यात्रा

जीव जिस रूप में आता है, उसी रूप में चला जाता है। न आने के समय कोई साथ था, न जाने के समय। यात्रा के पड़ाव में अनेक संगी-साथी अवश्य हो जाते हैं, सो सुखमय यात्रा के लिए जहाँ यह आवश्यक है कि सब लोग प्रेमभाव से चलें, नीति और सदाचार का पालन करें, विश्वबंधुत्व की भावना का अनुशीलन करें। वहाँ यह भी नितांत आवश्यक है कि अपनी एकाकी यात्रा के लिए भी पूर्ण तैयारी करते हुए आगे बढ़े। निराशा, भय और विक्षोभ उस महाशून्य की यात्रा में बाधक न बनें, इसके लिए जो भी अभी तैयार नहीं हुआ, उसका यहाँ आना निरर्थक गया।

'मैं' शरीर नहीं हूँ, शरीर अवश्य मेरा है। दूर से आता रथ तो दिखाई देता है, किंतु रथी नहीं। अपनी दृष्टि का छोटा होना— अपनी दर्शन की क्षमता का संकुचित होना, मात्र कारण है अन्यथा बुद्धि जानती है कि रथ में जुते हुए घोड़ों को सीधे रास्ते लाने, ले जाने वाले वाहन में कोई रथी अवश्य बैठा होगा। शरीर भी एक रथ है, आत्मा उसका सारथी, इंद्रियाँ ही वह घोड़े है जिन पर नियंत्रण रखकर सारथी उन्हें जिधर चाहे ले जा सकता है। महत्त्व रथ और घोड़े का नहीं, उसके स्वामी का—आत्मा का है, सो अपनी दृष्टि, अपनी बुद्धि, अपना ज्ञान और तर्क इतना संकीर्ण नहीं होना चाहिए कि आत्मा को भी न पहचाना जा सके।

घोड़े (इंद्रियाँ) थके, रथ (शरीर) टूटे, इसके पूर्व हमें उस स्थान तक पहुँच ही लेना चाहिए, महाकाल की महानिशा में सुखपूर्वक विश्रामकर, जहाँ से आगे की यात्रा में बढ़ा जा सके। भारी मन, थके शरीर, भटके हुए पथ की यात्रा कष्टप्रद होती है, इसलिए इस जीवन-यात्रा को बहुत सोच-समझकर जीना चाहिए।

—भगवान् बुद्ध


काकवृत्ति बनाम हंसवृत्ति

राजहंस कपिष्टल, इंदुजात, श्वेतपुच्छ, उद्रक और विनता पाँचों ने मंत्रणा की और फिर निकल पड़े प्रवास पर। सुदूर देशों का प्रवास राजहंस प्रतिवर्ष किया करते और कठोर शीत के चातुर्मास समाप्त होते ही मानसरोवर आ जाते। इस प्रवास में जहाँ देश-दुनिया के रंग-बिरंगे दृश्य दीखते वहाँ संसार के विभिन्न लोगों से भेंट और उनकी परिस्थितियों के अध्ययन द्वारा एक विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने में भी उन्हें मदद मिलती।

अनेक देश और भूखंड पार करते हुए राजहंसों की टोली समुद्रतट पर रुकी। कोणार्क राजवंश के प्रसिद्ध उद्यान यहीं पर थे। वहाँ का माली इन राजहंसों का प्रतिवर्ष आतिथ्य करता। राजहंस प्रत्युपकारवश माली को प्रतिवर्ष एक उपदेश दिया करते। इस बार भी माली ने अभ्यागतों को सुंदर मीठे फलों से ब्रह्मभोज कराया। टोली-नायक— 'कपिष्टल' ने माली को उपदेश दिया और कहा— "तात ! जो व्यक्ति अपनी शक्ति और साधनों की मर्यादा में रहता है वह स्वल्पसाधनों में भी अपना जीवन हँसी-खुशी में बिता लेता है, किंतु अपनी शक्ति से अधिक का मिथ्या प्रदर्शन करने वाले न केवल संकट में पड़ते हैं, अपितु उपहास और निंदा के पात्र भी बनते हैं।"

माली राजहंस की विद्वता से बहुत प्रभावित हुआ। मार्ग के लिए भी कुछ देने लगा तो राजहंसों ने मना किया। कहा—"तात ! संचय पाप है, यह खाद्य तुम ले जाओ, दुनिया में और बहुत से लोग अभावग्रस्त हैं, उन्हें दे दो, सामर्थ्यवान लोग अपनी आवश्यकताएँ आप पूरी कर लेते हैं, कुछ भी मिले, कहीं से भी मिले, उदरस्थ कर लेने की काकवृत्ति घटिया लोगों का काम है।"

कपिष्टल के यह शब्द वटवृक्ष पर बैठे कौवे 'उपद्रवी' ने सुन लिए। पंख फुलाता हुआ उपद्रवी राजहंसों की टोली के पास जाकर भला-बुरा कहने लगा और बोला—"राजहंसों ! तुम लोग यदि श्रेष्ठता का अभिमान करते हो तो चलो न हमारी तुम्हारी प्रतिद्वंद्विता हो जाए। यह देखो विशाल समुद्र दूर तक फैला है, चलो न देख लें, किसके पास शक्ति है, इसे पार करने की। अभी पता चल जाएगा कि तुम लोग समर्थ हो अथवा मैं!

राजहंस हँसे और बोले—"तात ! हम लोग किसी से प्रतिद्वंद्विता नहीं करते, आप भी न किया करें, परमात्मा ने एक से बढ़कर एक क्षमतावान प्राणी रचे हैं, फिर कोई अपनी शक्ति का गर्व क्यों करे।" यह कहकर राजहंसों की टोली ने उछाल भरी और फिर अपनी यात्रा पर चल पड़े। किंतु उपद्रवी कौवा उन्हें यों छोड़ने वाला नहीं था। अहंकार की सहजात है— 'अशांति', सो कौवा कैसे शांत हो जाता, वह भी राजहंसों की बगल में उड़ चला और थोड़ा तेजी दिखाकर आगे हो गया। आगे-आगे काक पीछे अपनी सहज स्वाभाविक गति में हंस, कौवा बीच-बीच में कोई-न-कोई व्यंग मारता जाता और कहता—"थक जाना तो बता देना-हम तो केवल तुम्हें अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं, मारना नहीं चाहते।” राजहंस बिना कोई उत्तर दिए— समुद्र के ऊपर धीर-गंभीर उड़ते चले जा रहे थे।

अभी कुछ ही देर उड़े हुए हुई थी कि बकवादी कौवे का शरीर थक गया, पंख ढीले पड़ गए, यों लगा कि अब गिरा— तब गिरा, किंतु हेकड़ी उसकी अभी तक भी जाती न थी। कौवा अब एक क्षण में समुद्र में गिरने वाला था, अपने ही कृत्य पर उसकी आँखें डबडबा आईं। यह देख राजहंसों को दया आ गई, उन्होंने कौवे को अपनी पीठ पर बिठाया, फिर पीछे लौटे और कौवे को वहाँ पर पहुँचा दिया, जहाँ वह रहता था। अभी तक उसका दम फूल रहा था। कपिष्टल बोले— "तात ! आगे कभी अपनी शक्ति से बढ़कर प्रदर्शन मत करना अन्यथा मारे जाओगे"— यह कहकर टोली फिर अपने प्रवास पर चल पड़ी।


अपने को जानें, भवबंधनों से छूटें

संसार में जानने को बहुत कुछ हैं; पर सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने आपके संबंध की है। उसे जान लेने पर बाकी जानकारियाँ प्राप्त करना सरल हो जाता है। ज्ञान का आरंभ आत्मज्ञान से होता है, जो अपने को नहीं जानता वह दूसरों को क्या जानेगा ?

आत्मज्ञान जहाँ कठिन है, वहाँ सरल भी बहुत है। दूसरी वस्तुएँ दूर भी हैं और उनका सीधा संबंध भी अपने से नहीं है। किसी के द्वारा ही संसार में बिखरा हुआ ज्ञान पाया और जाना जा सकता है, पर अपना आपा सबसे निकट है, हम उसके अधिपति हैं— आदि से अंत तक उसमें समाए हुए हैं, इस दृष्टि से आत्मज्ञान सबसे सरल भी है। शोध करने योग्य एक ही तथ्य है— आविष्कृत किए जाने योग्य एक ही चमत्कार है— वह है अपना-आपा। जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।

बाहर की चीजों को ढूँढ़ने में मन इसलिए लगा रहता है, कि अपने को ढूंढ़ने के झंझट से बचा जा सके। क्योंकि जिस स्थिति में आज हम हैं। उसमें अँधेरा दीखता है और अकेलापन। यह डरावनी स्थिति है। सुनसान को कौन पसंद करता है। खालीपन किसे भाता है। अपने को इस विपन्न स्थिति में रखकर स्वयं ही अपने को डरावना बना लिया है और फिर उससे भयभीत होकर स्वयं ही भागते हैं। अपने को देखने, खोजने और समझने की इच्छा इसी से नहीं होती और मन बहलाने के लिए बाहर की चीजों को ढूँढ़ते फिरते हैं, कैसी है यह विडंबना।

क्या वस्तुतः भीतर अँधेरा है ? क्या वस्तुतः हम अकेले और सूने हैं ? नहीं, प्रकाश का ज्योति-पुंज अपने भीतर विद्यमान है और एक पूरा संसार ही अपने भीतर विराजमान है। उसे पाने और देखने के लिए आवश्यक है कि मुँह अपनी ओर हो। पीठ फेर लेने से तो सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता और हिमालय तथा समुद्र भी दीखना बन्द हो जाते हैं। फिर अपनी ओर पीठ करके खड़े हो जाएँ तो शून्य के अतिरिक्त और दीखेगा भी क्या ?

बाहर केवल जड़ जगत है। पंचभूतों का बना हुआ निर्जीव। बहिरंग दृष्टि लेकर तो हम मात्र जड़ता ही देख सकेंगे। अपना जो स्वरूप आँखों से दीखता है, कानों से सुनाई पड़ता है, जड़ है। ईश्वर को भी यदि बाहर देखा जाएगा तो उसके रूप में जड़ता या माया ही दृष्टिगोचर होगी। अन्दर जो है, वही सत् है। इसे अंतर्मुखी होकर देखना पड़ता है। आत्मा और उसके साथ जुड़े हुए परमात्मा को देखने के लिए अन्तःदृष्टि की आवश्यकता है। इस प्रयास में अन्तर्मुखी हुए बिना काम नहीं चलता।

स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, शांति आदि विभूतियों की खोज में कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है। बाहर भरी हुई जड़ता में चेतना कैसे पाई जा सकेगी। जिसे ढूँढ़ने की प्यास और चाह है वह तो भीतर ही भरा पड़ा है। जिसे कुछ मिला है यहीं से मिला है। कस्तूरी वाला हिरण तब तक उद्विग्न और अतृप्त ही फिरता रहेगा जब तक कि अपने ही नाभिकेन्द्र में कस्तूरी की सुगन्ध सन्निहित होने पर विश्वास न करेगा, बाहर जो कुछ भी चमक रहा है सब अपनी ही आँखों का प्रकाश-प्रतिबिंब मात्र है।

श्रुति कहती है—"अपने आपको जानो, अपने को प्राप्त करो और अमृतत्व में लीन हो जाओ।" उसी को ऋषियों ने दुहराया है और तत्त्वज्ञानियों ने उसे ही सारी उपलब्धियों का सार कहा है। क्योंकि जो बाहर दीख रहा है, वह भीतरी तत्त्व का ही विस्तार है। अपना आपा जिस स्तर का होता है संसार का स्वरूप भी वैसा ही दीखता है। बाहर हमें जैसा देखना पसन्द हो उसे भीतर से खोज निकालें। यही अन्वेषणा की चरम सीमा है।

दुःख, दारिद्रय, शोक, सन्ताप और अभाव, उद्वेग का निवारण करने के लिए इन अनात्मतत्त्वों की अंतरंग में जमी हुई जड़ों को खोदना पड़ेगा। भीतर का दीपक जलने पर ही बाहर फैले अन्धकार का समाधान होगा। जो कुछ हमारे लिए अभीष्ट और आवश्यक है, उसकी समस्त संभावनाएं अपने भीतर सुरक्षित रखी हुई हैं। आवश्यकता उन्हें प्रयोग करने की है। अपने आपे का प्रयोग करना यदि हमें आया होता तो हम दूसरे ईश्वर बन सकने में समर्थ होते। अपने को खोकर हमने खोया ही खोया है। बाहर ढूँढ़ने में जीवन गँवा डाला, पर मिला कुछ नहीं, मिलता तब जब बाहर कुछ होता।

अनात्मतत्त्वों की जो गन्दगी भीतर भर गई है, उसे निकाल दें तो शेष वही रह जाता है जो हमारा स्वरूप है। कुछ पाने के लिए कुछ खोने के लिए तप-साधन किए जाते हैं। आत्मा तो स्वयं उपलब्ध ही है। उसे पाने के लिए कुछ करना नहीं है। करने की बात इतनी ही है कि जो अनुपयुक्त और अवांछनीय अपने भीतर भर लिया है उसे निकाल कर फेंक दें। यह परिशोधन ही उपलब्धि का निमित्त बन जाता है।

किसी तत्त्ववेत्ता से जिज्ञासु ने पूछा—" गुरुदेव, तप-साधना से आपने क्या पाया ?" उन्होंने उत्तर दिया—"खोया बहुत,पाया कुछ नहीं।" जिज्ञासु ने आश्चर्य से पूछा—"ऐसा क्यों ?" ज्ञानी ने कहा—जो पाने लायक था, वह तो पहले से ही प्राप्त था। जो खोने लायक विषय, विकार और अज्ञान, अन्धकार के अनात्मतत्त्व भीतर घुस पड़े थे, उन्हें साधना से निकाला भर है। इस तरह साधक—साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं, हम स्वप्न खोते हैं, तब सत्य पाते हैं।

रोवर गोडंल ने अपनी पुस्तक ‘दी कन्टेन्योटेरी साइन्सेज एण्ड दी लिवरेटिव एक्पीरियेन्स ऑफ योग’ में लिखा है—"मनुष्य को यह जानने से पहले कि वह वास्तव में क्या है, अब तक के जाने हुए को भूलना होगा।" वर्तमान नकारात्मक मान्यताओं के कारण मानव अपने भीतर स्थूल अहंवाद के साथ जुड़ी हुई मिथ्या मान्यताओं से ही परिचित हो पाया है। आत्मिक प्रगति के लिए हमें आत्मबोध का प्रशिक्षण आरम्भ से ही करना होगा। क्योंकि उन तथ्यों को जिन पर आत्मोन्नति निर्भर है, एक प्रकार से हमने भुला ही दिया है।

कालीदास ने कहा है—अपने को जानने का प्रयत्न करो। अपने स्वरूप को समझो और जिस लिये जन्मे हो उस पर विचार करो। तुम्हें दिशा मिलेगी और सही दिशा में कदम उठ गए तो वह प्राप्त करके रहोगे जिसके पाए बिना अपूर्णता और अतृप्ति घेरे ही रहेगी।

स्वामी विवेकानन्द ने एक कथा सुनाई—"एक तत्त्वज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे, संध्या आने वाली है, काम समेट लो। एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था। उसने समझा संध्या कोई बड़ी शक्ति है जिससे डरकर यह निर्भय रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए हैं। सिंह चिन्ता में डूब गया और उसे संध्या का डर सताने लगा।

पास के घाट का धोबी दिन छिपने पर अपने कपड़े समेटकर गधे पर लादने की तैयारी करने लगा। देखा तो गधा गायब। उसे ढूँढ़ने में देर हो गई। रात घिर आई और पानी बरसने लगा। धोबी को एक झाड़ी में खड़खड़ाहट सुनाई दी, समझा गधा है। सो लाठी से उसे पीटने लगा। धूर्त यहाँ छिपकर बैठा है। सिंह की पीठ पर लाठियाँ पड़ींं तो उसने समझा यही संध्या है सो डर से थर-थर काँपने लगा। धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लादकर घर चल दिया। रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला। उसने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा —यह क्या हुआ ? तुम इस प्रकार लदे क्यों फिर रहे हो? सिंह ने कहा—संध्या के चंगुल में फँस गए हैं, वह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है।”

सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं, उसकी भ्रान्ति थी, जिसके कारण धोबी को कोई बड़ा देवदानव समझ लिया गया और उसका भार एवं प्रहार बिना सिर हिलाए स्वीकार कर लिया गया। हमारी यही स्थिति है, अपने वास्तविक रूप को न समझने और संसार के साथ—जड़ पदार्थों के साथ अपने संबंधों का ठीक तरह से तालमेल न मिला सकने की गड़बड़ी, ने ही हमें उन विपन्न परिस्थितियों में धकेल दिया है, जिनमें अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ दीखता ही नहीं। इस भ्रान्ति को ही माया कहा गया है। माया को ही बंधन कहा गया है और दुःखों का कारण बताया गया है। यह माया और कुछ नहीं वास्तविकता से अपरिचित रखने वाला अज्ञान ही है।

गीता में माया की व्याख्या और प्रतिक्रिया समझाते हुए भगवान ने कहा है।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।

ज्ञान अज्ञान के द्वारा ढक दिया गया है, इस कारण सब प्राणी मोह को प्राप्त होते हैं।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया समावृतः।

अपनी योगमाया से ढके हुए होने के कारण मैं सबके लिये दृश्य नहीं हूँ।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

तीन गुणों से युक्त इस मेरी माया को पार करना बड़ा कठिन है।

शरीर को आत्मा समझ बैठने—शरीर के सुख-दुःख, हानि-लाभ और संयोग-वियोग को आत्मा पर घटित हुई मान लेने से मनुष्य दुःखी होता है, उपलब्धियों की अपेक्षा यदि अपना ध्यान आत्मा के निर्मल निर्विकार स्वरूप में बना रहे और जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्त्तव्य कर्मों को करते रहने एवं दिव्य विचारों में रमण करने की प्रवृत्ति अपना ली जाए तो न दुःख की गुंजाइश रहे, न शोक की। अपने को आत्मा बना इस संसार को परमेश्वर का स्वरूप मानकर परमात्मा के लिए आत्मा द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले अनुदानों-कर्त्तव्य कर्मों को अपनाते हुए जीवन-यात्रा पूरी करने लगे तो सारे दुःख दूर हो जाएँ, जिन्हें अज्ञता के कारण मायाबद्ध जीव पग-पग पर भुगतता रहता है।


नियमों के पालन से आत्मसंयम और अनुशासन की शिक्षा मिलती है

कलकत्ता के हाईकोर्ट के जज स्वर्गीय श्री गुरुदास बनर्जी एक बार वायसराय के साथ कानपुर से कलकत्ता के लिए यात्रा कर रहे थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय कमीशन संबंधी किसी आवश्यक चर्चा के लिए वायसराय ने उन्हें अपने ही डिब्बे में बुला लिया। बातचीत के मध्य भोजन का समय हुआ तो वायसराय ने उनसे भी भोजन पाने का अनुरोध किया। बनर्जी साहब ने उत्तर दिया—"मैं रेल में कुछ नहीं खाता, थोड़ा-सा गंगाजल रखे हुए हूँ, वही पी लेता हूँ।"

वायसराय को विश्वास नहीं हुआ। इतना प्रगतिशील व्यक्ति भी धार्मिक मान्यताओं का इतनी कट्टरता के साथ पालन कर सकता है। उन्होंने कहा—"तो फिर लड़के को ही भोजन ग्रहण करने को कहिए।" पर बच्चे ने भी इंकार करते हुए कहा—"मेरे पास घर की बनी थोड़ी सी मिठाई है, उसका नाश्ता कर लिया है, अन्य कोई वस्तु ग्रहण न करूँगा।"

वायसराय आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा—"आप लोग उपवास कर रहे हैं तो मैं ही भोजन कैसे ग्रहण करूँ ?" वायसराय की आज्ञा से इलाहाबाद में गाड़ी रोक दी गई। वहाँ बनर्जी ने अपने पुत्रसहित त्रिवेणी स्नान किया, तो फिर गाड़ी आगे बढ़ी। लौटने पर वायसराय को धन्यवाद देते हुए कहा—"कुछ खा-पी लेने से किसी की जाति जाती हो, इस संबंध में मेरा कोई तर्क नहीं, पर इन नियमों के पालन से आत्मसंयम और अनुशासन की शिक्षा मिलती है। हमारे धर्म और संस्कृति में जो ऐसी बाते हैं, उनको मैंने इसीलिए हृदय से स्वीकार किया है।"


सद्वाक्य

जिस प्रकार पीतल के पात्रों को यदि नित्य स्वच्छ न किया जाए तो वे अपनी चमक खो देते हैं और जंग लग जाता है, उसी प्रकार यदि साधक नित्य साधना ना करे तो उसका हृदय भी अपवित्र होने लगता है।

— तोतापुरी


आश्चर्यों से भरी ईश्वरीय सत्ता

संसार का सातवाँ आश्चर्य ताजमहल मानवीय बुद्धि, ज्ञान और कला-कौशल का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। बुद्धि तत्त्व के रहस्य अगम अगोचर हैं। जो कुछ थोड़े से प्रकट हैं, वह मनुष्य और अन्य जीवधारियों के हैं। उन सब में मनुष्य की बुद्धि ने ही आश्चर्यजनक आविष्कार और रचनाएँ की हैं, इसीलिए आज मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार हो गया है, किंतु अचरज भरी नीचे दी गईं घटनाओं का मनन किया जाए तो पता चलेगा कि मनुष्य की अंतःप्रकृति के समान ही बाह्य प्रकृति भी एक विराट मस्तिष्क की स्वामिनी और सहचरी है। उसकी रचनाएँ मानवीय ज्ञान से कहीं अधिक सर्वशक्तिमान ज्ञान का अस्तित्व प्रतिपादित करती हैं।

एलोविले— नारमैंडी (फ्रांस) में एक ओक का वृक्ष है, जिसकी आयु लगभग 1 हजार वर्ष हो चली। वृक्ष की विशालता और उसके तने की राक्षसी मोटाई देखकर एक अंग्रेज के मन में उसको एक जगह खोखला करके गिरजाघर बनाने की बात आई। उसने अपने विचार को क्रियान्वित भी किया। एक-दो मंजिला गिरजाघर इस विशाल वृक्ष के तने में बनाया गया, जो 1696 से लेकर अब तक ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। एक ओर गिरजाघर में बैठकर पूजा-उपासनाएँ चलती रहती हैं तो दूसरी ओर वृक्ष भी ऋतु के अनुसार फलता-फूलता रहता है। तने के भीतर बना गिरजाघर आश्चर्य हो गया, पर उस वृक्ष के नियंता को किसी ने भी आश्चर्य से नहीं देखा। यह ऐसा ही है जैसे कि लोग विराट ब्रह्मांड में समुद्र की एक बूँद के समान पृथ्वी को ही सब कुछ मानते हैं; पर विराट जगत की कल्पना उन्हें कभी नए ढंग से सोचने की प्रेरणा ही नहीं देती।

बारजक विवारेस में पियरे डिफोरनेल नामक एक ऐसा व्यक्ति हुआ, जिसको तीन शताब्दियों का पिता माना गया है। 129 वर्ष जी कर मरने वाले इस किसान ने तीन विवाह किए। तीनों पत्नियों से उसे तीन पुत्र हुए। पहला पुत्र हुआ 1699 में अर्थात 17 वीं शताब्दी में, दूसरा 1738 अर्थात 18 शताब्दी में तीसरा बेटा जन्मा, तब उसकी आयु 120 वर्ष की थी, यह सन् 1801 की बात है अर्थात 19वीं शताब्दी की। इस बच्चे के 9 वर्ष बाद भी वह स्वस्थ जीवन जिया और अपने आपको “वान्डर बुक ऑफ स्ट्रेन्ज फैक्टस्” (अजनबी सच्चाइयों की आश्चर्यजनक पुस्तक) में उल्लेख होने का पात्र बनाया; किंतु इस वृक्ष की जो हजार वर्ष से खड़ा है। इस बेचारे मनुष्य से क्या तुलना, फिर क्यों न यह माना जाए कि प्रकृति का मस्तिष्क मानवीय मस्तिष्क से कहीं अधिक सक्षम और विशाल है।

कुतुबनुमा जैसी छोटी सी मशीन भी भगवान की उँगलियों से बने 'कुतुबनुमा पौधे' की नकल के बिना मनुष्य नहीं बना सका। इस वृक्ष को कुतुबनुमा वृक्ष इसलिए कहते हैं कि इसकी पत्तियाँ हमेशा उत्तर-दक्षिण की ओर ही घूमी रहती हैं। दुनिया भर की सारी मशीनें शरीर रचना का आधार हैं या प्रकृति के किसी भाग का अनुकरण। फिर नकलची मनुष्य को सबसे बुद्धिमान माना जाए अथवा यह कि सृष्टि में श्रेष्ठतम बुद्धि का अधिष्ठाता तो कोई और ही शक्ति है, जिसका नियंत्रण सारे विश्व-ब्रह्मांड में है, मनुष्य बेचारे की पहुँच तो चंद्रमा तक ही हो पाई है।

और जब निम्न प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं, तब तथाकथित बुद्धिवाद को पसीना आ जाता है। कोई उत्तर देते नहीं बनता विज्ञान का दम भरने वाले बौद्धों (बौद्धों का अर्थ बुद्ध धर्म मानने वालों से नहीं वरन ज्ञान-विज्ञान का दम भरने वाले उन लोगों से है, आस्तिकता जिनकी दृष्टि में अंधविश्वास  के अतिरिक्त कुछ नहीं) को। इस तरह की एक घटना लिसेनागियर (आयरलैण्ड) की ही है। माता बिद्दी कैशल्श एक ऐसी स्त्री थीं, जिसने अपने गर्भ से एक बार दो चार नहीं पूरे 100 मुर्गी के अंडे दिए। मातृ भावनावश कहें अथवा किन्हीं पूर्वजन्मों के संस्कार, जिस तरह मुर्गी अपने अंडों के ऊपर बैठकर उन्हें बच्चे न निकलने तक सेती रहती है। बिद्दी कैशल्श लगातार एक घोंसला बनाकर और अंडे उसमें सुरक्षित रखकर 3 सप्ताह तक उसमें बैठी रही। 3 सप्ताह बाद उन अंडों में से आदमी के नहीं 100 मुर्गी के बच्चे पैदा हुए। वैसे तो विकासवादी अध्यात्मिक धार्मिक मान्यताओं की खाल उधेड़ते रहते हैं और जहाँ-तहाँ से नर कंकालों के आधार पर सिद्ध करते रहते हैं कि मनुष्य एक कोशीय जीव अमीबा का विकसित रूप है, पर जब उनसे पूछा जाता है कि यह मुर्गी के बच्चे जो स्त्री के पेट से पैदा हुए तो वे झुँझला पड़ते हैं और कहते हैं कि यह अपवाद है। अपवाद ही सही, पर उसका भी तो कुछ बौद्धिक आधार होना चाहिए। यह विश्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त क्या हो सकता है ?

कुल 77 रासायनिक सूत्रों को जोड़कर एक साधारण सा 'यीस्ट' बना लेने वाले डा॰ हरगोविन्द खुराना को नोबेल पुरस्कार मिला। यह हम सबके लिए गर्व की बात हुई कि मनुष्य में कितनी बौद्धिक क्षमता है, पर जो लाखों-करोड़ों रासायनिक सूत्रों से बने पिंड और अरबों रासायनिक सूत्रों से बने ब्रह्मांडों की रचना करता है, उस विलक्षण बौद्धिक अस्तित्व को पुरस्कार देना तो दूर, मान्यता देना भी आज के लोगों को भारी पड़ रहा है, इसे बौद्धिक दिवालियापन न कहा जाए तो और क्या कहा जाए। पदार्थ में भाव (अपदार्थ) की उपस्थिति विज्ञान ने सिद्ध कर दी, फिर भावना-स्त्रोत को अमान्य किया जाए और पदार्थ तथा स्रोतों के सिद्धांत तय किए जाएँ तो इसे मनुष्य का एकपक्षीय चिंतन ही कहा जाएगा।

आज भी ऐसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं,  जब कि जड़ और चेतन के संयोग की आश्चर्यजनक घटनाएँ देखने को मिल जाती हैं। वैज्ञानिक उनका कोई उत्तर नहीं दे पाते। सराक्यूज की रोने वाली मूर्ति का रहस्य अभी तक अमरीकी वैज्ञानिक खोज नहीं पाए। यहाँ प्रस्तुत है यूरेक्थम के प्रसिद्ध मंदिर का ऐतिहासिक वर्णन, जो सराक्यूज की रोने वाली मूर्ति से भी बढ़कर आश्चर्यजनक है। यह मंदिर ग्रीक की राजधानी एक्रोपोलिस में स्थित है। बात उस समय की है जब थामस ब्रूस एल्गिन केअर्ल सन् 1799 में तुर्की में ब्रिटिश राजदूत थे। तुर्की के अधिकारियों से उसने इस मंदिर को तोड़कर उसकी मूर्तियाँ इंग्लैंड ले जाने की आज्ञा प्राप्त कर ली। मंदिर गिराने के लिए मजदूरों का एक जत्था रात में काम पर लगाया गया। एक्रोपोलिस निवासियों को इस बात का पता चला तो वे अपने सारे काम छोड़कर भगवान से प्रार्थना करने के लिए बैठ गए। इसी समय यह अविस्मरणीय घटना घटित हुई। अभी बाहर की चहार दीवारी ही हट पाई थी, जैसे ही मजदूरों ने मूर्ति को तोड़कर हटाया। उसके अंदर से एक भयंकर चीख सुनाई दी । कई मजदूर भयभीत होकर गिर पड़े और उनका रक्त तक जम गया।

कहते हैं— एक भारी हथौड़े से पिस्टन में पूरी शक्ति लगाकर चोट मारी जाए और पिस्टन को स्वेच्छापूर्वक पीछे को उछलने दिया जाए तो सिलेंडर में रखा हुआ सारा पानी जमकर बरफ हो जाएगा। यदि उस बरफ पर एक गर्म जलता हुआ लोहे का टुकड़ा रखकर उस पर उसी हथौड़े की पूरी शक्ति लगाकर चोट की जाए तो वही बर्फ पानी हो जाएगी और वह फिर पानी ही न रहेगी; वरन उबलकर हाइड्रोजन व ऑक्सीजन गैसों में बदलकर इतना भयंकर विस्फोट करेगी कि वह लोहा भी पिघलकर गैस बनकर उड़ जाएगा। मजदूरों के शरीर का खून जम जाना इस सिद्धांत की याद दिलाता है और यह बताता है कि वह चीख भारी हथौड़े की मार से भी भयंकर रही होगी। फिर मजदूर उस मूर्ति के अतिरिक्त दूसरी मूर्ति नहीं तोड़ सके। कहते हैं जिस खंबे पर मूर्ति रखी थी, वह इस प्रकार बना था कि मूर्ति हटते ही चारों ओर से हवा एकदम खिंची, उसी से विस्फोट हुआ, पर वैज्ञानिक इस बात को मानते नहीं। यदि ऐसा होता तो गर्मियों में उठने वाले बवंडर (साइक्लोन) से भी भयंकर ध्वनियाँ होती, जबकि ऐसा कहीं सुना नहीं गया। यह मूर्ति आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है और 'यूरेक्थम के रहस्य' के नाम से यह आवाज आज भी रहस्यमय बनी हुई है। उसका कोई वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हो पाया। जड़ और चेतन का यह आकस्मिक संयोग,   भावसत्ता का अस्तित्व ही प्रतिपादित करता है। उसकी ओर से बिलकुल मुँह मोड़ना मनुष्य जाति के लिए अहंकार की तृप्ति हो सकती है, उपयोगी नहीं।

शाप और वरदान इसी भावसत्ता के विस्फोट और प्रमाण हैं। उससे यह पता चलता है कि मनुष्य अपनी चेतन-आत्मा से सान्निध्य, संपर्क साधकर कहीं अधिक समर्थ और शक्तिशाली हो सकता है। भौतिक भोग तो उसे रोगी, दुःखी और अशांत ही बना सकते हैं, सो वही इन दिनों हो भी रहा है। भावसत्ता के अस्तित्व और उसकी शक्ति का प्रमाण है— लिपजिम, जर्मनी का न्यायाधीश 'बेनेडिक्ट कारजो', जिसका जन्म 1620 में हुआ और मृत्यु 1666 में।

कारजो दुनिया का भयंकरतम न्यायाधीश था। अपने कार्यकाल की लंबी अवधि में उसने 30 हजार से अधिक लोगों को फाँसी की सजा दी। फाँसी की सजा देने के बाद वह फाँसी होते देखने स्वयं भी जाता था। साथ में कुत्ता भी ले जाता था और फाँसी से मरे हुए मृतक की लाश को  कुत्ते से नुचवाता था। ऐसा कोई दिन नहीं गया उसके कार्यकाल में जबकि उसने कम से कम 5 व्यक्तियों को फाँसी न लगवाई हो। एक दिन एक दुःखी मनुष्य की आत्मा कराह उठी। फाँसी पर चढ़ने के पूर्व उसने शाप दिया— "तेरी कुत्तों जैसी मृत्यु होगी, जिस दिन तेरा कुत्ता मरेगा उसी दिन तू भी मर जाएगा और कितने ही जन्म तू बार-बार कुत्ता होकर मरेगा।"

अभी शाप दिए कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन उसके पालतू कुत्ते को एक पागल कुत्ते ने काट लिया, फिर उसी कुत्ते ने उसे काट लिया। कुत्ता मर गया। उसके कुल तीन घंटे पीछे कुत्तों की तरह भौंक-भौंककर उसकी भी मृत्यु हो गई। यह तो पता नहीं, अगले जन्म में क्या हुआ, पर यह आश्चर्य तो सभी को हुआ कि निर्दोष आत्मा के शाप, जिसे भावनाओं का आंतरिक विस्फोट कहना ज्यादा उपयुक्त है— उसे किस तरह नारकीय परिस्थितियों में जा धकेला।

तात्पर्य यह है कि संसार में मनुष्य की बुद्धि से भी बड़ी बुद्धि है। उस भावसत्ता का नाम ही भगवान है। वही इतना विराट होकर विराट् ब्रह्मांड की विलक्षण रचना, पालन-पोषण और विनाश की क्रीड़ा किया करता है। आश्चर्य मनुष्य की बुद्धि और उसका ज्ञान नहीं, भगवान है, उसे भी जानने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।


स्वामी रामतीर्थ

स्वामी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे। सेनफ्रांसिस्को बन्दरगाह पर जलयान ठहरा। सब यात्री उतरने की तैयारी करने लगे। पर स्वामी रामतीर्थ मस्ती से इधर-उधर डेक पर टहल रहे थे

इस विचित्र मस्ती को देखकर एक अमेरिकन ने आश्चर्य से पूछा—"श्रीमान्, आपका सामान कहाँ हैं ?"

स्वामी रामतीर्थ ने कहा—"जो शरीर पर है उतना ही मेरा सामान है और कुछ मेरे पास नहीं।"

अमेरिका जैसे मँहगे और व्यस्त देश में बिना धन और सामान के कोई परदेशी व्यक्ति किस प्रकार रह सकता है ? यह असम्भव जैसी बात देखकर उस अमेरिकन ने फिर पूछा—"तब क्या यहाँ कोई आपका घनिष्ठ मित्र सम्बन्धी रहता है?"

स्वामी रामतीर्थ ने पूछने वाले के कंधे पर हाथ रखकर कहा—"सारे अमेरिका में मेरा एक ही मित्र है और वह हो तुम।"

इस आत्मीयता का उस अमेरिकन पर जादू जैसा असर पड़ा और सचमुच ही उनका सच्चा मित्र बन गया। अमेरिका यात्रा में उसने स्वामी जी की भारी सहायता की।


Quotation

पुराण सुनने के बाद, श्मशान से लौटने के बाद तथा मैथुन के बाद जो बुद्धि होती है वह यदि सदा बनी रहे तो कौन मुक्त नहीं हो सकता ? —संस्कृत सूक्ति


बौद्धिक क्षमता का भण्डागार ऋतम्भरा का क्रिया-व्यापार

सन् 1722 में जापान के मुसाशी प्रान्त में एक बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया हनावा होकीची। दुर्भाग्यवश यह बालक जब कुल सात वर्ष का ही था, अन्धा हो गया। फिर भी उसने पढ़ा, सुनकर पढ़ा और अपनी प्रतिभा का इतना अधिक विकास किया कि वह संसार के प्रमुख विद्वानों की श्रेणी में जा पहुँचा। उसकी स्मरणशक्ति को दैवी स्मरणशक्ति की उपमा दी जाती है और 94 वर्ष की आयु तक अध्यापन करने वाले इस महापंडित के बारे में कहा जाता है कि वह 400000 हस्तलिपि की सूची तैयार करा सकता था। इन सूचीपत्रों से जिन्हें उसे केवल एक बार ही पढ़कर सुनाया गया था, उसने गुन्शो रिन्जु नामक एक 2820 खण्ड की पुस्तक तैयार की। 1910 में इस पुस्तक का दूसरा संस्करण छपा था। जापान के लोगों ने बड़े सम्मान के साथ अपने घरों में इसे रखा है।

ग्रीक में ऐसा ही एक व्यक्ति हुआ है पारेसन—उसने मिल्टन की सारी कृतियों को रट लिया था और उन्हें न केवल पेज नम्बर एक से लेकर दो तीन चार को सुनाता जा सकता था, वरन् पीछे से अर्थात् पेज नम्बर सौ से निन्यानवे, अट्ठानबे, सत्तानवे की ओर भी-सुनाता चला जा सकता था। विलक्षण स्मृति का एक उदाहरण है- गमबेटा का जो श्रीमती रूथ की पुस्तक का एक-एक शब्द पीछे, से सुना सकता था। विक्टर ह्यूगो और साहित्यकार ओसियन की पुस्तकें भी केवल एकबार पढ़कर उसने दुबारा पीछे से बोलकर सुना दीं। लोग आश्चर्य किया करते थे और कहते थे कि गम्बेटा के मस्तिष्क में टेप की तरह कोई इलेक्ट्रो मेगनेटिक पट्टी है, जिसमें उसका पढ़ा हुआ एक-एक अक्षर रिकार्ड हो जाता है, वह भी केवल एकबार पढ़ने से, जबकि साधारण व्यक्ति के लिए पुस्तक का एक-एक अनुच्छेद ही कंठस्थ करना कठिन हो जाता है।

म्युनिच की राष्ट्रिय लाइब्रेरी के संचालक जोसेफ बनहार्ड डकन अपनी सहायता के लिए विभिन्न भाषाओं के 9 सचिव रखते थे। सभी नौ सचिवों को साथ बैठाकर नौ भाषाओं पर 9 विभिन्न विषयों पर आफिसियल कार्यवाही या और जो कुछ भी नोट कराना होता था, नोट कराते चले जाते थे। इतना ही नहीं बाइबिल उन्हें पूर्णतया कंठाग्र थी और आगे-पीछे कहीं से भी कोई भी पेज खोलकर उनसे पूछा जाता, तो वहाँ से आगे का अंश धड़ल्ले से बोलने लगते थे। भाषा और ज्ञान की तौल होती तो उनके मस्तिष्क का वजन करना कठिन हो जाता, ऐसा लोग कहा करते थे। इतनी बड़ी लाइब्रेरी की करोड़ों पुस्तकें उनके मस्तिष्क में थी यहाँ तक कि रखने का स्थान तक उन्हें मालूम रहता था।

1767 में जन्में प्रसिद्ध जर्मनी कवि, लेखक और राजनीतिज्ञ नवाब कार्ल विल्हेम वान हम्बोल्ट का विवाह 38 वर्ष की अवस्था में एक बहुत ही गुणवान स्त्री कैरोलिन वान डैक्रोडेन के साथ हुआ। विवाह के बाद से ही उसने अपनी प्रिय पत्नी के सम्मान में प्रतिदिन 100 पंक्तियों की कविता लिखना प्रारंभ किया और यह क्रम पूरे 44 वर्ष तक, जब तक वह जिया, जारी रखा। 6 वर्ष का जीवन हम्बोल्ट ने विधुर का बिताया इस बीच वह प्रतिदिन अपनी स्त्री की मजार पर जाता और 100 पंक्तियाँ लिखने का क्रम जारी किए रहा। तमाम जीवन में उसने 1606000 पंक्तियाँ लिखीं। इतनी कविताओं की-पंक्तियाँ यदि छपाई जाये तो अखण्ड ज्योति साइज की 5577 फर्मे अर्थात् 44616 पेज के बराबर मोटी पुस्तक बैठेगी। इस मोटाई का अनुमान लगाना हो तो अखण्ड ज्योति के 58 वर्ष 1 माह के समस्त अंकों को एक के ऊपर एक चुनना होगा। यह ऊँचाई लगभग 25 फुट बैठेगी। जबकि कविताओं में कोई भी पंक्ति दुबारा उपयोग में नहीं लाई गई।

एकबार फ्राँस की एक अदालत में एक मुकदमा पेश हुआ। अपराधी के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, तथापि उसकी पैरवी करने वालों ने सुप्रसिद्ध एटार्नी लुईस बर्नार्ड को अपना वकील चुनकर मुकदमा लड़ा। सैनिक अदालत से उसे सजा हो गई। एटार्नी ने अदालत से याचना की कि उसे मुकदमा राजा के सामने ले जाना है, अतएव सजा 5 दिन के लिए रोक दी जाए क्योंकि राजा 5 दिन के लिए बाहर थे। अदालत ने यह बात अस्वीकार कर दी। एटार्नी ने इस पर तर्क उपस्थित करने की आज्ञा माँगी और वह मिल गई। उसने अपना तर्क पूरी ज्यूरी के सामने लगातार 120 घंटे अर्थात् पूरे 5 दिन 5 रात तक जारी रखा।  इस बीच उसने कानून शास्त्र के दुनिया भर के पन्ने जबानी अदालत के सामने रखकर अपनी आश्चर्यजनक बौद्धिक क्षमता का सिक्का जमा दिया। सम्भव है वह और भी बोलता, पर इसी बीच राजा साहब आ गए  और इस प्रकार उन्हें महाराज के सामने पेश होने का समय भी मिल गया और इसी बिना पर क्षमादान भी।

कहते हैं स्वामी रामतीर्थ अमेरिका जा रहे थे तब एक दिन जहाज में दो अंग्रेजों में झगड़ा हो गया। उनका मुकदमा पेश हुआ और गवाह माँगा गया तो दोनों ने इन साधु की उपस्थिति की बात कही। उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा —"मुझे यह तो मालूम नहीं कि गलती किसकी है, पर उन्होंने अपनी-अपनी  भाषा में जो कुछ कहा था, वह उन्होंने हूबहू वही अक्षर उसी टोन में सुना दिया।"

परमा (इटली) में इसी प्रकार 1464 में फ्राँसिस्को मैरिया ग्रापाल्डो नामक व्यक्ति पैदा हुआ। इस व्यक्ति की विचित्र विशेषता यह थी कि वह एक ही समय में अपने दोनों हाथों से एक कॉपी के दोनों ओर के पेजों पर अलग-अलग कविताएँ लिखता हुआ चला जाता था। लोग कहते थे कि ग्रापाल्डो के दो मस्तिष्क हैं। अब तो विज्ञान ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि मस्तिष्क दायें-बायें दो भागों में विभक्त हैं। दोनों अलग-अलग काम करते रहने में सक्षम है, इतने पर भी इस रहस्य का पर्दा ज्यों का त्यों बना हुआ है कि मस्तिष्क की यह विलक्षण विशेषताएँ क्या केवल मात्र  स्वाध्याय, शिक्षण और अभ्यास का ही परिणाम हैं अथवा मस्तिष्क में निवास करने वाले किसी अलौकिक आध्यात्मिक तत्त्व की यह विशेषताएँ हैं।

इसका उत्तर खोजने के लिए किसी सैद्धान्तिक विवेचन के पूर्व कुछ उदाहरण जान लेना आवश्यक हैं। (1) 1724 में स्काटलैण्ड में डंकन मैक इन्टायर नामक व्यक्ति जन्मा। वह स्काटलैण्ड का इतना बड़ा कवि माना जाता है जितना भारत में सूर और तुलसी। इतना होते हुए भी वह न तो लिख सकता था और न ही पढ़ा, क्योंकि उसने कहीं से भी शैक्षिक योग्यता प्राप्त नहीं की थी।

(2) होमर और सुकरात न केवल संत थे, वरन् कबीर की तरह कवि और साहित्यकार भी थे। कबीर ने कलम और कागज नहीं छुआ था और उनकी उलटबांसियां तथा पद आज एम.ए., बी.ए. की पुस्तकों में पढ़ाए जाते हैं। अपना मस्तिष्कीय सृजन वे मस्तिष्क में ही लिखकर रखते थे, कागज कलम से तो उसे औरों ने लिखा। कैन्टरबरी के प्रधान पादरी टामस क्रेमर ने 3 महीने में पूरी बाइबिल पढ़कर कंठस्थ कर ली थी, पर होमर और सुकरात ने तो न कभी पढ़ा था और न लिखा था, यह इस बात का प्रमाण है कि बौद्धिक क्षमताओं का आधार शैक्षणिक ज्ञान नहीं, वरन् कोई मस्तिष्कीय अध्यात्म का प्रतिफल है। उस शक्ति का विकास केवल आध्यात्मिक साधनाओं-प्रक्रियाओं पर आधारित है, मात्र अक्षर अभ्यास पर नहीं।

भारतीय योगदर्शन जिस ऋतम्भरा प्रज्ञा की बात कहता है और बताता है कि मनुष्य ब्रह्मचर्य और विभिन्न योग साधनाओं द्वारा अपनी बौद्धिक सक्षमता और सूक्ष्मता इतनी अधिक बढ़ा सकता है कि वह न केवल ऊपर जैसी विलक्षण क्षमताओं और सिद्धियों का सहज ही स्वामी बन सकता है, वरन् वह हर किसी के मन की बात जान सकता है। भूत और भविष्य को इस प्रकार जान सकता है मानो वह वर्तमान में आँखों के सम्मुख घटित हो रहा हो। इस प्रकार की मेधा और प्रज्ञा के लिए आर्षग्रन्थों में स्थान-स्थान पर परमात्मा से प्रार्थना की गई है-

“सनिं मेधामयासिष स्वाहा” मेधां में वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः।    — यजुर्वेद  ३२/१५

अर्थात्-परमात्मा हमें मेधा बुद्धि दें। वरुण देवता हमें उत्तम मेधा बुद्धि प्रदान करें।

परमात्मा को बुद्धि में धारण करने से ऋतम्भरा प्रज्ञा का विकास होता है, ऐसा आर्ष ग्रन्थों में कहा है। ब्रह्म एक तत्त्व है, जिसे बुद्धि द्वारा ही धारण किया जा सकता है। राख का कण, आग के बीच रखने से वह लाल हो जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मी चेतना की प्रतिनिधि बुद्धि को भी ब्रह्म के साथ संयुक्त कर देने से वह ब्रह्ममय-सर्वांतर्यामी हो सकती है। भाव और ज्ञान प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वरीय तत्त्व धारणा के ही परिणाम हैं। ब्रह्म को छोड़कर मनोबल बढ़ाया जा सकता है, मेधा व ऋतम्भरा प्रज्ञा नहीं। आज ज्ञान तो बहुत दिखाई दे रहा है, पर ऋतम्भरा प्रज्ञा का सर्वत्र अभाव है। इसी कारण लोग पढ़े लिखे दिखाई देने पर भी अज्ञानान्धकार में भटक रहे हैं।

शरीरशास्त्र की दृष्टि से स्मृति ज्ञान या मनोभाव कहाँ से उत्पन्न होते हैं, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका, किन्तु यह निश्चित है कि मस्तिष्क लाखों-करोड़ों न्यूट्रानों से बने हैं। इन्हीं में ज्ञान टेप किया हुआ रहता है। न्यूट्रानों को प्रदीप्त करना केवल नाभिक के लिए (ईश्वरीय सत्ता के लिए) ही सम्भव है। न्यूट्रान नाभिक में पाया जाने वाला द्रव्यमान है। इस द्रव्य के सक्रिय होने से ज्ञानक्रम चलता है। विश्व व्यापी चेतना के साथ इनका क्या सम्बन्ध हो सकता है, यह कभी आगे पढ़ने को मिलेगा।


अत्याचारी शासक एक चीते से अधिक भयंकर होता है

अब से सैकड़ों वर्ष पहले की घटना है। एक बार चीन के महान् दार्शनिक कन्फ्यूशियस, अपने कुछ शिष्यों के साथ ताई नामक पहाड़ी पर से कहीं जा रहे थे। एक स्थान पर वे सहसा रुक गए। शिष्यों ने जिज्ञासु नेत्रों से उनकी ओर देखा। वे बोले—"कहीं पर कोई रो रहा है।" इतना कहकर वे रुदन को लक्ष्य करके चल पड़े। शिष्यों ने उनका अनुगमन किया।

कुछ दूर जाकर उन्होंने देखा एक स्त्री रो रही है। उन्होंने बड़ी सहानुभूति से रोने का कारण पूछा। स्त्री ने बताया कि इसी स्थान पर उसके पुत्र को एक चीते ने मार डाला। कन्फ्यूशियस ने कहा—"किन्तु तुम अकेली ही दीखती हो तुम्हारे परिवार के अन्य लोग कहाँ हैं ?" स्त्री ने कातर होकर बताया —"अब उसके परिवार में है ही कौन। इसी पहाड़ी पर उसके ससुर और पति को भी चीते ने फाड़ डाला था। "कन्फ्यूशियस ने बड़े आश्चर्य से कहा—"‘तो तुम इस भयंकर स्थान को छोड़ क्यों नहीं देती ?" स्त्री बोली—"इस स्थान को इसलिए नहीं छोड़ती कि यहाँ पर किसी अत्याचारी का शासन नहीं है।"

महात्मा कन्फ्यूशियस यह सुनकर चकित हो गए। उन्होंने शिष्यों की ओर उन्मुख होकर कहा—"यद्यपि, निश्चित रूप से यह स्त्री करुणा और सहानुभूति की अधिकारिणी है। तथापि इसकी बात ने हम लोगों को एक महान् सत्य प्रदान किया है। वह यह कि अत्याचारी शासक एक चीते से अधिक भयंकर होता है। अत्याचारी शासन में रहने की अपेक्षा अच्छा है कि किसी पहाड़ी अथवा वन में रह लिया जाए। किन्तु यह व्यवस्था सार्वजनिक नहीं हो सकती। अस्तु, जनता को चाहिए कि वह अत्याचारी शासन का समुचित विरोध करे और सत्ताधारी को अपना सुधार करने के लिए विवश करने का उपाय करे। अत्याचारी शासन को भय के कारण सहन करने वाला समाज किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता। विकासहीन जीवन बिताता हुआ वह युगों तक नारकीय यातना भोगा करता है तथा सदा-सर्वदा अवनति के गर्त में ही पड़ा रहकर जिस-तिस प्रकार जीवन व्यतीत करता रहता है। अतः दुशासन को पलटने के लिए जनता सदैव जागरुक रहे।"


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आत्मविकास का पौधा सांसारिक विषय--वासना की भूमि पर नहीं उगता, उसके लिए यत्नपूर्वक तैयार की हुई प्रेम-वारि से तर समतल भूमि चाहिए। —रामतीर्थ


सच्ची सेवकाई

जगारिका के नगरश्रेष्ठ अनंगपाल का स्वभाव जितना मृदुल और सौम्य था, भार्या बिंदुमती थी उतनी ही कर्कश और कुटिल। कोई भी परिचारिका उसकी सेवा में आज तक एक मास से अधिक न टिक पाई थी। नगरश्रेष्ठ निराश हो चुके थे और निश्चय कर चुके थे कि बिंदुमती को कितने ही कष्ट क्यों न उठाने पड़े, अब और कोई परिचारिका नियुक्त नहीं करेंगे।

एक दिन अनंगपाल के एक सेवक ने एक निर्धन कन्या उपस्थित की नाम था— 'चौलिया'। उसके माता-पिता स्वर्गवासी हो चुके थे। आश्रय की खोज में भटक रही कन्या को देखते ही अनंगपाल की करुणा उमड़ उठी। उन्होंने उसके शीश पर स्नेह-वत्सल हाथ फेरा और कहा—"बेटी ! सेविका तो क्या, तुम मेरी पुत्री के समान इस घर में रह सकती थीं, किन्तु दैवयोग से गृह-स्वामिनी के तीखे और कर्कश स्वभाव के कारण तुम इस घर में रह भी पाओगी ? मुझे पूरा सन्देह है।

आपने मुझे पुत्री कहा—"आर्य! आपकी यह शालीनता और सज्जनता इतनी बड़ी है कि उसके सम्मुख कोटि-कर्कशतायें भुलाई जा सकती हैं। आर्य ! फिर सेवा का सच्चा अधिकार भी तो उन्हें ही है, जो ऊबे, उत्तेजित और संसार से खीझे व निराश जैसे हैं। माताजी के स्वभाव की चिन्ता आप न करें। मुझे सेवा का सौभाग्य प्रदान करें।

चौलिया अब इस गृह की परिचालिका बन गई। घर की एक-एक वस्तु को व्यवस्थित किया चौलिया ने। गन्दी-भद्दी-टूटी-कलूटी वस्तुओं को साफ-सुथरा, ठीक किया, सजाया चौलिया ने। प्रातः चार बजे जब दूसरे लोग सो रहे होते तो चौलिया जागती और सायंकाल सबको सुलाकर सोती, एक क्षण भी उसने निरर्थक नहीं खोया किन्तु बदले में मिला क्या ? बिंदुमती की फटकार, अपमान और मार।

एकान्त पाकर अनंगपाल  ने कहा—"बेटी ! तू मुझसे निर्वाह साधन लेकर कहीं सानन्द रह, इस नारकीय यंत्रणा में क्यों प्राण दे रही है।" चौलिया ने उत्तर दिया— " तात ! यदि मैंने माँ बिंदुमती की कोख से जन्म लिया होता तो क्या आप मुझे यों हटाते ? मुझसे भूल होती होगी, तभी तो माँ जी डाँटती और मारती हैं, इनमें बुरा मानने की क्या बात !"अनंगपाल चुप हो गये।

उस रात बिंदुमती को एकाएक ज्वर हो गया। चौलिया उनकी देखभाल के लिए नियुक्त की गई। एक दिन दो दिन क्रमशः कई दिन बीत गए, ज्वर सन्निपात में परिवर्तित हो गया, चिकित्सकों ने ज्यों-ज्यों चिकित्सा की, स्थिति त्यों-त्यों बिगड़ती गई। इस बीच घर के सब लोगों ने अपनी दैनिक क्रियाएँ यथावत् निबटाईं, किन्तु चौलिया को किसी ने न स्नान करते देखा, न शयन करते। अपनी सगी माँ की कोई क्या सेवा करेगा, चौलिया ने जैसी सेवा बिंदुमती की की, किन्तु दैवयोग किसके टाले टलता है। एक रात बिंदु की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ, उसने आँखें खोली-सामने चौलिया खड़ी थी, अनंग  को बुलाया बिंदु ने, उन्हें देखते ही बिंदु की आँखें छलक पड़ी। कुछ कहना चाहा, पर निकले कुल दो शब्द-बेटी चौलिया...........और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। बिंदुमती का देहावसान हो गया।

इधर अर्थी जा रही थी श्मशान को उधर चौलिया किसी नए आश्रय की खोज में। अनंग ने समझाया बेटी ! यह घर तेरा घर है, तू कहाँ जा रही है? तो चौलिया बोली—" माँ थी तब तक उसकी सेवा के लिए मेरी आवश्यकता थी और मुझे भी अपनी सहनशीलता का अभ्यास करने के लिए उनकी आवश्यकता थी। अब वे नहीं रहीं तो मुझे अन्यत्र वैसी ही परिस्थिति ढूँढ़ने के लिए जाना चाहिए, जहाँ मेरा रहना अधिक सार्थक हो सके।

अनंगपाल देखते ही रह गए और चौलिया वैसी ही स्थिति वाला अन्य स्थान ढूँढ़ने के लिए आगे बढ़ गई।


प्रेम का आरंभ होता है, अंत नहीं

प्रेम का आरंभ होता है- अंत नहीं। क्योंकि उससे निवृत्ति मिलती है न उसकी पूर्ति होती है। इसी से प्रेम को नित्य कहा जाता है और अनंत। वासना की तृप्ति, रोगों की प्रचुरता से हो सकती है। भले ही वह कुछ समय उपराम के रूप में क्यों न हो। आग पर घी की मात्रा अत्यधिक डाल दी जाए तो वह कुछ समय के लिए तो अंत होती दीखती है इसी प्रकार वासना, लिप्सा, तृष्णा, और मोह का समाधान अभीष्ट वस्तु या व्यक्ति प्राप्त हो जाने पर संभव है, भले ही वह कुछ समय के लिए ही क्यों न हो। कुछ समय की बात इसलिए की जा रही है कि संसार की समस्त वस्तुएँ जिनमें काया भी गिनी जा सकती है, विकारी है। उनमें रुचिकर लगने वाले तत्त्वों से अरुचिकर लगने वाले तत्त्वों की मात्रा कम नहीं, अधिक  ही होती है।

सत् और तम से मिलकर यह संसार बना है। रज तो इन दोनों का सम्मिश्रण है, जो हमें दीखता है। वस्तुतः रज की कोई पृथक सत्ता नहीं है। सुर और असुर के—शुभ और अशुभ के—भगवान् और शैतान के संग का सम्मिश्रित स्वरूप मनुष्य है, इसलिए उसमें जितनी श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है उतनी ही निकृष्टता भी विद्यमान है। इसी से मनुष्य को अपूर्ण कहा जाता है। इस संसार में कोई जीवधारी पूर्ण नहीं।  पूर्णता प्राप्त करने पर काया धारण करने की, जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रहती। पूर्ण पुरुष बिना काया के भी—सूक्ष्म शरीर के द्वारा सूक्ष्मजगत में  हलचलें उत्पन्न करके वह काम कर सकते हैं जो देहधारियों द्वारा संभव नहीं होते। लोक-शिक्षण के लिए-जनता का मार्गदर्शन करने के लिए कोई देहधारी देवदूत भेजे जाएँ और वे प्रभु का कार्य पूरा करने के लिए लीलाएँ प्रस्तुत करें, यह बात दूसरी है। ऐसे अपवादों को छोड़कर आमतौर से मनुष्यों में अपूर्णता का, विकारों का—त्रुटियों का—बहुत बड़ा अंश पाया जाता है।

यही बात वस्तुओं के बारे में भी है, वे न मिलने तक बड़ी आकर्षक लगती हैं क्योंकि तब तक उनका एक पक्ष—आकर्षण के रूप में ही दीखता रहता है।जब समीप आते हैं और वे उन पदार्थों की प्राप्ति के साथ ही जो साज-संभाल, सुरक्षा, उपयोग, उपभोग आदि की जिम्मेदारियाँ कन्धों पर आती हैं, तथा उन वस्तुओं में जो परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, दोष दृष्टि में आते हैं, उनके कारण सारा आनन्द ही चला जाता है। गरीबों को अमीरी प्राप्त करने की बड़ी अभिलाषा रहती है, पर अमीरों को अंतर्द्वंद्वों से बेतरह उद्विग्न देखा गया है उनमें से कितने ही आत्महत्या करते तथा विरक्त होते देखे गए हैं। सांसारिक वस्तुओं में यही विशेषता है कि जब तक वे दूर रहती हैं तब तक प्रिय लगती हैं और वे जैसे ही जितनी ही समीप आती हैं उतना ही आकर्षण खो बैठती हैं। विवाह होने से पूर्व प्रेमिका या मंगेतर जितनी सुहावनी—आकर्षक लगती हैं, विवाह होने के बाद पत्नी बन जाने पर वह आकर्षण चला जाता है। दिन में सूर्य और रात में चन्द्रमा कितने सुन्दर लगते हैं पर यदि उनके समीप पहुँचा जाए तो मुसीबत ही खड़ी हो जाएगी। सूर्य की प्रचण्ड ज्वाला और चंद्रमा की वायुरहित अनियंत्रित शीत ताप वाली स्थिति में किसी को एक क्षण भी ठहरना न भाएगा।

लिप्सा, तृष्णा और वासना जो आमतौर से प्रेम का आवरण ओढ़कर हमारे सामने आती हैं, यही झंझट उत्पन्न करती हैं। जिस पदार्थ की आज बहुत उत्कण्ठा थी वह मिल जाने के बाद अरुचिकर बन जाता है। यही कारण है कि न तो भोग से तृप्ति होती है और न भोग्य पदार्थों की एकरूपता से। एक ही मिठाई कोई बहुत दिनों तक नहीं खाना चाहेगा। भोजन में रोज-रोज नए पदार्थ बदलने की आकांक्षा के पीछे, यही रहस्य छिपा हुआ है कि जिस पदार्थ को जितना आकर्षक समझा गया था, मिलने के बाद उसका आकर्षण चला गया। नित नए भोजन-व्यंजन पाने की इच्छा के पीछे यही मर्म छिपा पड़ा है कि न मिलने तक वस्तु के गुण ही गुण दीखते हैं, पर जब उसको प्राप्तकर लिया जाता है तो दोष भी सामने आ जाते हैं। अथवा यों कहिए कि अपनी कल्पना का नशा वस्तुस्थिति समझने के बाद नीचे उतर आता है। यह बात अन्य इन्द्रियों के संबंध में भी है। आज जो खेल देखा था उसे कल देखने की इच्छा नहीं होती। आज जो गीत सुना कल वह फीका लगता है। व्यभिचारी की काम-वासना भी नई-नई आकृति के भोग्य व्यक्ति ढूंढ़ती है। पुरुषों को नई स्त्रियाँ और स्त्रियों को नए पुरुषों में रति रहती है। इसी से कहा जाता है कि वस्तुओं और व्यक्तियों का आकर्षण,भले ही प्रेम नाम से पुकारा जाए, वस्तुतः वह लोभ और मोह का भावुकता भरा सम्मिश्रण ही है।  इसे कोई प्रेम समझे तो समझता रहे, पर वास्तविकता से वह दूर ही है।

प्रेम का स्तर ऊँचा है। वह न वस्तु के स्थूल रूप को देखता है और न व्यक्ति के शरीर आकर्षण को। वरन् प्रेमी की दृष्टि उन आवरणों के अन्तराल में छिपी हुई दिव्यसत्ता को देखने की—उसकी रसानुभूति उपलब्ध करने की रहती है। साकार मूर्ति पूजा के माध्यम से हम पदार्थों के भीतर छिपी हुई दिव्यसत्ता को अनुभव करने और उसके साथ भक्तिभावना का समन्वय करने का अभ्यास करते हैं। देव प्रतिमाएँ धातु या पत्थर की बनी होती हैं। धातु तथा पत्थर का मूल्य नगण्य है। उनका सामान्य उपयोग उपेक्षापूर्वक होता रहता है, चाहे तो इस व्यवहार को तिरस्कार भी कह सकते हैं। पर इसी पत्थर या धातु की बनी देव प्रतिमा के सम्मुख हम भावविभोर हो जाते हैं। यह भावना पत्थर या धातु के प्रति नहीं, वरन् उसके अंतराल में छिपी हुई देवसत्ता के प्रति है। जहाँ ऐसी दृष्टि होगी वहाँ वह पत्थर कभी भी अनाकर्षक प्रतीत न होगा, वरन् जितना पुराना होता जाएगा उतना ही सम्मान बढ़ता जाएगा। यही बात प्राचीन ध्वंसावशेषों, ऐतिहासिक स्मारकों, तीर्थों के बारे में लागू होती हैं। स्थूल रूप से वे सब पुराने-धुराने जीर्ण-शीर्ण होने के कारण— नई इमारतों की तुलना में मूल्य, कला, उपयोगिता आदि की दृष्टि से नगण्य ही ठहराये जा सकते हैं, पर चूँकि उनके पीछे ऐतिहासिक और भावनात्मक तथ्य जुड़े हुए हैं। इसलिए वे स्वभावतः बहुत आकर्षक लगते हैं और उन्हें देखने के लिए लोग बहुत धन और समय खर्च करके बहुत कष्ट उठाते हुए भी पहुँचते रहते हैं।

यदि स्थूलदृष्टि से इन दर्शनीय स्थानों का मूल्यांकन किया जाए तो निःसन्देह उनमें से सभी अनाकर्षक लगेंगे। जो आकर्षक हैं उनके चित्र आदि देखकर काम चलाया जा सकता है। पर देखने की जो तीव्र अभिलाषा होती है, उसके पीछे उन स्थानों या स्मारकों के पीछे जुड़ा सूक्ष्मदर्शन ही है, जो बरबस ही व्यक्ति को अपनी ओर खींचता रहता है। मेले-ठेले देखने जाते हैं तो एक दुकान पर बहुत देर खड़े रहने की इच्छा नहीं होती, पर तीर्थों या देव मंदिरों के बारे में यह बात लागू नहीं होती। बार-बार उन्हें देखते हैं, पर आकांक्षा बनी ही रहती है। कितने ही व्यक्ति अपना प्रिय घर-परिवार छोड़कर भी इन पुण्यतीर्थों में निवास करने लगते हैं। सुविधा की दृष्टि से यद्यपि घर-परिवार ही अच्छा था, पर भावना का आकर्षण उन असुविधाजनक स्थानों में निवास करने पर शान्ति प्रदान करता है। यह तथ्य बताते हैं कि वस्तु का स्थूलरूप देर तक आनन्द नहीं दे सकता। उसकी अंतःसत्ता की सूक्ष्मता और दिव्यता को देखा-समझा जा सके तो ही वह चिर उल्लास दे सकने में समर्थ होगा। मूर्तिकारों के यहाँ बिकने वाली एक से एक सुन्दर प्रतिमा में वह श्रद्धा या आकर्षण नहीं होता जो किसी प्राचीनकाल की अनगढ़ देव प्रतिमा में होता है। यह सूक्ष्मदर्शन का ही चमत्कार है।

व्यक्तियों के बारे में भी यही बात लागू होती है। उनके साथ यदि बाह्य आकर्षणों से प्रभावित होकर प्रेम किया गया है तो उसमें स्थिरता न रह सकेगी। रंग, रूप पर हाव-भाव पर मोहित होकर कई व्यक्ति परस्पर प्रेमी बन जाते हैं। धन, कौशल, कला, सफलता, पद, सत्ता, विनोद आदि के आकर्षण भी कई बार मित्रता के लिए आकर्षित करते हैं। आमतौर पर इन्हीं आधारों पर मित्रता जुड़ती रहती है। युवा स्त्री-पुरुषों के बीच जो जल्दी और गहरी मित्रता जुड़ जाती है, उसके पीछे आमतौर से वासना की तृप्ति तथा दूसरे भौतिक लाभों की प्राप्ति ही प्रधान कारण देखी जाती है। यों इस आकर्षण को भी प्रेम का ही नाम दिया जाता है और गीत वैसे ही गाए जाते हैं। पर वस्तुतः बात वैसी ही नहीं है।

शाश्वत प्रेम का स्तर उससे बहुत ऊँचा हैं। वह यदि वस्तु से किया गया है तो उसकी उपयोगिता के प्रति श्रद्धा रखकर ही किया जाता है। मंदिरों में प्रसाद प्रायः एक ही तरह का मिलता है, पर उसे स्वाद की दृष्टि से न देखकर श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है, इसलिए उसमें स्वाद-परिवर्तन की इच्छा या अरुचि नहीं होती । संसार में जो वस्तुएँ हैं। वे मेरे उपभोग के लिए नहीं, वरन् इस विश्व की शोभा व्यवस्था बनाए रहने के लिए परमात्मा की पुनीत कृति के रूप में है। यह मान्यता यदि मन में हो तो कोई पदार्थ अरुचिकर नहीं लगेगा, वरन् उसकी लोक मंगल के लिए आवश्यकता को समझते हुए श्रेष्ठतम उपयोग करने की इच्छा होगी। तब दुरुपयोग किसी वस्तु का न हो सकेगा, न अपव्यय किया जा सकेगा, न उपेक्षापूर्वक रत्तीभर बर्बादी संभव होगी। हर वस्तु को यहाँ तक कि कूड़े और मल-मूत्र को भी उसके उचित स्थान पर इस प्रकार रखने की बुद्धि जगेगी, जिससे उसे तिरस्कृत या हेय न समझा जाए।यह प्रेमदृष्टि यदि पदार्थों के प्रति उत्पन्न हो जाये तो निश्चय ही उन्हें अधिक स्वच्छ, व्यवस्थित एवं सदुपयोग की स्थिति में ही रखा जायेगा। तब किसी पदार्थ से न तो अरुचि होगी, न घृणा, न निराशा।

व्यक्तिप्रेम के सम्बन्ध में भी यही बात है। मनुष्य के भीतर रहने वाली परम पवित्र आत्मा में जब स्नेह भावना जुड़ती है तो उसकी श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा रखने और उसे अभिसिंचित करने की भावना रहती है। दोष हर व्यक्ति में संभव है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जो त्रुटियाँ हैं उन्हें सुधारने पर आशा भरा विश्वास रखा जाता है और जब तक अनुकूलता उत्पन्न न हो तब तक सहने और निबाहने का भाव रखा जाता है। इस सन्तुलित दृष्टि के साथ जो प्रेम किया जाता है वह न तो त्रुटियाँ सामने आने पर निराश होता है और न रंग-रूप अथवा लाभ का आकर्षण घटने पर खिन्न होता है। आस्था के आधार पर जब मिट्टी के ढेले को गणेश बनाकर रखा जा सकता है और उसकी उपासना का आनंद पाया जा सकता है तो मिट्टी की काया में समाए हुए अमृत आत्मा के समावेशयुक्त सजीव व्यक्ति के प्रति क्यों आत्मीयता नहीं बनाए रखी जा सकती ?

प्रेम वस्तुतः एक आन्तरिक दिव्य अनुभूति है जो पदार्थ या व्यक्ति के माध्यम से विकसित भर होता है। अन्ततः वह आदर्शों पर जाकर जम जाता है और  समस्त विश्व में फैल जाता है। प्रेम एकांगी  होता है। इसलिए उसका आदि होता है, अंत नहीं। कलम टूट जाने से भी मस्तिष्क में भरी विद्या का अन्त नहीं होता, इसी प्रकार किसी पदार्थ या व्यक्ति के अनुपयुक्त या हानिप्रद सिद्ध होने पर भी सहज आत्मीयता में कमी नहीं आती। अपनापन जिस बालक में जुड़ा होता है, वह कुरूप या बीमार होने पर भी स्नेहभाजन, कृपापात्र एवं सहयोग का अधिकारी ही बना रहता है। यह आत्मीयता जब अपनी प्रौढ़ स्थिति में पहुँचती है तो उसकी प्रेम-साधना व्यष्टि से बढ़कर समष्टि में संव्याप्त हो जाती है, और उस पदार्थ या व्यक्ति के न रहने पर भी अवरुद्ध नहीं होती। अपने शरीर में भरे हुए अशुभ और अवांछनीय तत्त्वों को जब हम सहन कर लेते हैं तो दूसरों के दोष देखकर ही क्यों अपनी प्रेम-साधना समाप्त कर ली जाए?

प्रेम की कभी तृप्ति नहीं होती, क्योंकि उसका क्षेत्र व्यापक है। अधिक सेवा, अधिक त्याग, अधिक अनुदान देने की प्रेमभरी प्रवृत्ति तब तक विकसित होती ही रहती है जब तक कि उसका अपना कहने लायक कुछ भी शेष रहता है। प्रेमी देना ही जानता है सो देते-देते जब अपनी अहंता तक प्रभु चरणों में समर्पित नहीं कर देता, तब तक अतृप्ति ही बनी रहती है। पूर्ण समर्पण में जब अहंता का लय हो जाता है, तभी तृप्ति मिलती है। जब तक प्रेमी का अस्तित्व मौजूद है—पूर्ण समर्पण नहीं हुआ, तब तक अतृप्ति ही रहेगी। सो तत्त्वदर्शियों ने ठीक ही कहा है-प्रेम का आरंभ होता है,अंत नहीं।क्योंकि न उससे निवृत्ति मिलती है और न उसकी पूर्ति होती है।


Quotation

प्रतिशोध और सहनशीलता से हम प्रेम को ईश्वर के समकक्ष पहुँचा सकते हैं। -महात्मा गाँधी


जीव ब्रह्म कैसे बनता है ?

अमरीका के न्यू मैक्सिको के अलामगार्डो रेगिस्तान में 16 जुलाई 1945 को पहली बार परमाणु विस्फोट किया गया। परीक्षण सफल रहा और यह निश्चित हो गया कि यदि किसी पदार्थ का परमाणु विस्फोट किया जाए तो उससे भयंकर ऊर्जा प्राप्त होती है। परीक्षण की सफलता के तत्काल बाद वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में एक बात आई, वह यह कि जिस प्रकार परमाणु तोड़े जा सकते हैं उसी प्रकार जोड़े भी जा सकते हैं। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि परमाणु बम में अधिकतम 10 प्रतिशत द्रव्य ही ऊर्जा में बदल सकता है, शेष निरर्थक चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि विस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा निहित ऊर्जा से हमेशा कम होगी उदाहरण के लिए मान लीजिए एक दीपक जल रहा है। उसमें से चीरकर आधी बत्ती निकालकर दूसरे दीपक में डाल दी जाए, तो लौ विभक्त हो जाएगी और प्रत्येक स्थिति में पहली बत्ती की लौ से कम ही होगी। यह ऐसा ही है जैसे ब्रह्म से उत्पन्न होने वाली प्रत्येक सत्ता जीवित होने और ब्रह्म का अंश होने पर भी ब्रह्म के समान न तो शक्तिशाली होगी और न व्यापक। जीव और आत्माएँ हर दृष्टि से स्वल्प-समर्थ ही होगी तब तक, जब तक कि उससे चीरकर अलग हुई रहेंगी।

इसी बीच वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में एक बात याद आई। वह यह कि सूर्य भी तो अपने भीतर से नाभिकीय ऊर्जा का ही सृजन करता है। उसका ताप भी लगभग 20000000 डिग्री सेन्टीग्रेड होता है, किन्तु उसमें तो कहीं भी इस प्रकार विस्फोट नहीं होता। परीक्षण और संकलित जानकारियों के आधार पर मालूम हुआ कि सूर्य एक परमाणु को तोड़ता नहीं, वरन् दो तथा अनेक परमाणुओं को जोड़ता है। इसे संलयन-क्रिया कहते हैं। एक बाती के साथ दूसरी बाती जोड़ देने से लौ द्विगुणित हो उठती है उसी प्रकार हाइड्रोजन परमाणुओं का सूर्य के केन्द्र में संलयन-जुड़ना भी भारी ऊर्जा का उत्पादन करता है। यह ऊर्जा ही पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवन का आधार है। यों कह सकते हैं कि सूर्य की चेतना ही प्राण हैं।

यहाँ यह बता देना ठीक है कि मनुष्य भी समस्त संवेदनाएँ यथा-प्रेम, दया, करुणा, श्रद्धा, विश्वास, परोपकार ऐसे जो भी कुछ भाव हैं, वह सब नाभिकीय गुण हैं। नाभिकीय रचना सब जगह एक ही है जैसी धन और ऋणविद्युत आवेश (चार्ज) वाली होती है। तात्पर्य यह है कि जिस तरह की चेतना मनुष्य शरीर में है, शारीरिक तत्त्वों के अन्तर होने पर भी वही नाभिकीय (न्यूक्लियिक) चेतना सूर्य में भी होनी चाहिए। इसी बात को यों भी कहते हैं कि जड़-चेतन में सर्वत्र एक ही आत्मा विद्यमान हैं।विज्ञान की भाषा में यह कह सकते हैं कि समस्त पदार्थों में विद्यमान नाभिकीय चेतना ही विराट चेतना का अंश है।

ध्यान-मन की एकाग्रता द्वारा अपनी प्राणमय चेतना (नाभिकीय चेतना) को सूर्य या अन्य किसी चेतना के साथ जोड़ देने से दो तत्त्वों का मिलन ऐसे ही हो जाता है जैसे दो दीपकों की लौ मिलकर एक हो जाती है। व्यक्ति अपनी अहंता भूलकर जब किसी अन्य अहंता से जोड़ लेता है तो उसकी अनुभूतियां और शक्तियाँ भी वैसी ही—इष्टदेव जैसी ही हो जाती है। ध्यान की परिपक्वता को एक प्रकार का संलयन ही कहना चाहिए। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि वह शक्ति विस्फोट की शक्ति से भी अधिक प्रखर होती है। आत्मचेतना को ब्राह्मीचेतना से मिलकर ब्रह्मसाक्षात्कार इसी सिद्धान्त पर होता है।


स्वप्न-दर्पण अतींद्रिय जगत के प्रतिबिंब

संसार का ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो स्वप्न न देखता हो और स्वप्नों की विचित्रताएँ अनुभव न करता हो। किन्तु कितने लोग ऐसे हैं जो स्वप्नों से कुछ सीख और कुछ अर्थ निकाल पाते हैं। मनुष्य प्रतिदिन सोता है। प्रतिदिन निद्रा के बीच वह कुछ क्षणों के लिए स्वप्नों के अज्ञात जगत की सैर करता है। यदि इस परिभ्रमण का कभी कोई अर्थ नहीं निकलता तब तो यह कहा जा सकता था कि स्वप्न, मात्र मानसिक कल्पना का चित्रण है, पर हजारों सच्चाईभरे स्वप्न समीक्षा की कसौटी पर कसे जाएँ तो पता चलेगा कि स्वप्न जागृत ओर अतीन्द्रियलोक का संधि द्वार हैं। इन घटनाओं द्वारा उस अदृश्य संसार की बहुत-सी बातों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

बहुत समय पहले की बात है, मैनचेस्टर के एक दंपत्ति के दो लड़के खो गए। बहुत पता लगाने पर भी पुलिस उन्हें खोज नहीं पाई। एक रात की बात है कि स्त्री ने एक स्वप्न देखा कि उसके पति ही उन दोनों लड़कों को लेकर एक ऐसे स्थान पर गए जो बहुत ही सघन भीड़ वाला है। एक स्थान पर उसने चेस्टर सिटी लिखा देखा। उसने देखा कि इसके बाद उसका पति बच्चों को लेकर एक खंडहर मकान में घुसा और वहाँ जाकर उनकी हत्या कर दी। हत्या करते देख स्त्री चीख पड़ी, नींद टूटी उसे पूरा शक हो गया कि हत्या उसके पति ने ही की है, जो आज कई दिनों से ही बाहर है। उसने पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखाई, पर स्वप्न की बात मानने के लिए पुलिस वाले बिलकुल तैयार न हुए। स्त्री ने जोर डालकर कहा—"मैंने स्वप्न में जो-जो स्थान देखे हैं, उन सबको पहचान जाऊँगी। आप हमें चेस्टर ले चलिए।" पुलिस वाले मान गए। वह स्त्री को लेकर वहाँ पहुंचे, तो एक स्थान को पहचानकर स्त्री तंग गलियों में से गुजरती हुई उसी खंडहर में जा पहुँची। वहाँ जले शव के निशान तथा गड़ी हुई हड्डियाँ मिलीं। पीछे बाप पकड़ा गया तो उसने सारी बातें अक्षरशः वैसे ही स्वीकार कीं जैसे कि स्वप्न के आधार पर स्त्री ने रिपोर्ट लिखाई थी। लोग छुपकर पाप करते हैं और यह मानते हैं कि उन्हें तो कोई नहीं देख रहा, पर यह घटना बताती है कि कोई एक जागृत देवता सब कुछ देखता-सुनता रहता है, भले ही उसका विधान लोग देर से समझ पाएँ, पर वह कष्ट देने और दिलाने से चूकता नहीं।

“मैनचेस्टर की ही एक स्त्री ने एक रात” में तीन बार एक ही स्वप्न देखा कि उसकी लड़की मोटर ऐक्सीडेंट का शिकार हो गई है। प्रातःकाल यह स्वप्न सच निकला। जब इस आशा का समाचार मिला कि लड़की ऐक्सीडेंट में मर गई। स्वप्न और ऐक्सीडेंट के समय विचित्रता यह थी कि पहली बार का स्वप्न भविष्य सूचक था। दूसरी बार का स्वप्न आया, ठीक उसी समय दुर्घटना हुई। तीसरी बार का स्वप्न भविष्यदर्शी स्वप्न था। यह घटना यह प्रमाणित करती है कि हमारे कितने ही स्वप्न ऐसे होते हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते, पर जो वस्तुतः किन्हीं भी घटनाओं से संबंधित होते हैं। चित्त शान्त और निर्मल हो तो न समझ आने पर भी घटनाओं के पूर्वाभास द्वारा आत्मशोधन—प्रक्रिया का संचालन किया जा सकता है।

आए दिन ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते रहते हैं कि कोई व्यक्ति मरा और मरने के घंटे-दो घंटे बाद जीवित हो गया। जीवित होने पर उसने बताया कि उसे यमराज के सामने ले जाया गया। यमराज ने मुस्कराकर कहा भाई गलत आदमी को ले आए  इसी नाम का दूसरा व्यक्ति अमुक स्थान में है, उसे लाओ। जिस समय यह व्यक्ति जी कर उठा, ठीक उसी समय वह दूसरा व्यक्ति मर गया।

ऐसी घटनाएँ काल्पनिक उड़ान जैसी लगती हैं और मृत्योत्तर जीवन को उपहासास्पद बनाती लग सकती हैं, किन्तु क्राडिफ में एक ऐसी घटना घटी, जिसने उक्त दावे को पुष्ट करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि अतीन्द्रिय जगत में दैवी-विधानों की बात बिलकुल झूठ नहीं हो सकती। भले ही कुछ लोग इसे अंधविश्वास मानते हों अथवा बना देते हैं। उक्त घटना प्रसिद्ध लेखक जे.बी. प्रीस्टले द्वारा वर्णित सत्य घटना है। प्रीस्टले लिखते हैं कि एक रात एक परिचित स्त्री ने स्वप्न देखा कि वह सड़क दुर्घटना की शिकार हो गई है। वह जब जागी तो उसके शरीर के अंग-अंग में चोट जैसा दर्द था और वह अपने आपको बिल्कुल मृत जैसा अनुभव कर रही थी।

दूसरे दिन अखबार में एक घटना छपी थी। इस स्त्री की एक हमनाम स्त्री दुर्घटना का शिकार हो गई थी। दुर्घटना का स्थल, दुर्घटना का कारण, वाहन दोनों बिल्कुल वही थे जैसा कि इस स्त्री ने स्वप्न में देखा था। लगता था स्वप्न भूल कर गया नाम की। जिसे स्वप्न दिखाना था, उसे न दिखाकर उसी नाम की उसी शहर की अन्य स्त्री को दिखाया गया।

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि बाह्य वातावरण का स्वप्नों पर प्रभाव पड़ता है; उदाहरण के लिए दो सोते हुए व्यक्तियों को चुना गया। पहले एक की आँख के सामने एक जलती हुई मोमबत्ती ले जाई गई। इस मोमबत्ती की प्रतिक्रिया उस व्यक्ति को स्वप्न में हॉकी खेलने के दृश्य के रूप में दिखाई दी, जबकि दूसरे व्यक्ति को उसी मोमबत्ती की प्रतिक्रिया एक मोटे आदमी द्वारा डंडा लिये मारने की मुद्रा के रूप में हुई। यहाँ भी अपनी-अपनी मनोभूमियाँ निर्णायक भूमिका अदा कर रही थीं। पहला व्यक्ति एक युवक है, खेल-कूद में अभिरुचि रखता है, इसलिए उसे मोमबत्ती की लौ, गेंद और शेष भाग हॉकी स्टिक के रूप में दिखी जबकि दूसरा था ऑफिस का एक क्लर्क। अपने ऊपर वाले अफसरों से डरने वाला भीरु किस्म का। मनोभूमि की विशिष्टता के बावजूद दोनों में एक बात समान रूप से सिद्ध हुई, वह यह कि अंतर्मन की चेतना के अतिरिक्त बाह्य परिस्थितियाँ भी स्वप्ननिर्माण-क्रिया में भाग लेती हैं।

यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है जो ठीक इससे विपरित है और यह सिद्ध करता है कि स्वप्न जगत की सत्ता और क्रियाशीलता इतनी सशक्त और समर्थ है कि वह शरीर पर भी अपना तीव्र प्रभाव छोड़ सकती है। घटना 15 मार्च 1970  के दैनिक नवभारत टाइम्स में फोटो सहित छपी और इस प्रकार है।

दक्षिण इटली में फादर पिआओ नामक एक भिक्षु रहा करते थे। सिसली में उनकी एक शिष्या थी, उसका नाम था— एंज-ला-टोना। एक दिन एंज-ला-टोना ने स्वप्न में अपने धर्मगुरु पिआओ के दर्शन प्राप्त किए। उसी समय से एंज-ला-टोना के हाथों की दोनों गदेलियों पर घाव हो गए, साथ ही साथ सीने पर भी। घटना का सार समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि फादर पिआओ के भी ठीक इन्हीं अंगों अर्थात् हाथ की दोनों गदेलियों और सीने में घाव थे। सामान्य अवस्था में घाव सूखे रहते थे, किन्तु कभी कोई अंधा, लँगड़ा, लूला, अपाहिज व्यक्ति फादर के सामने आ जाता और उनकी करुणा उमड़ उठती तो यह घाव अपने आप हरे हो जाते। उनके जख्मों में बिल्कुल ताजा रक्त आ जाता।

यह घटना जहाँ आत्मा का भावनास्वरूप प्रतिपादित करती है वहाँ ध्यान और सारूप्य की भारतीय मान्यता का भी समर्थन करती है। सूर्य का ध्यान करते हुए ध्यान का परिपक्व होकर “अहं” का सूर्य रूप हो जाना और उन सामर्थ्यों सिद्धियों का स्वामी बन जाना जो सूर्य में हैं (गायत्री उपासना की सिद्धि) यह भी इस घटना से स्पष्ट समर्थित और प्रतिपादित हो जाता है।

इस घटना पर टिप्पणी करते हुए पत्रकार ने एक और घटना साथ में दी है। कलकत्ता के एक चीनी की, जिसे स्वप्न में दिखा कि उसे लाटरी का प्रथम पुरस्कार मिला है। उसने दूसरे दिन लाटरी खरीदी और सचमुच उसे पुरस्कार मिला। इन पंक्तियों के साथ एक प्रश्न किया गया है—मनुष्य आज चन्द्रमा तक पहुँच गया। बड़े-बड़े प्रमेय उसने हल कर लिए किन्तु इस प्रकार की घटनाओं का कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण उसके पास है क्या ? अर्थात् नहीं—भाव सत्य,भाव-विज्ञान द्वारा ही उद्घाटित हो सकता है। उसकी अनुभूति उन साधनाओं द्वारा ही सम्भव है जो मन की स्थूलसत्ता का अतीन्द्रियसत्ता से मेल कराकर ऐसे रहस्यों को एक सामान्य बात बनाकर अलौकिकसत्ता की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त कर देती हैं। यह साधनाएँही भारतीय तत्त्व दर्शन के ठोस प्रमाण हैं, छुट-पुट घटनाएँ तो मात्र अतीन्द्रिय सत्य के अस्तित्व का प्रतिपादन भर कर सकती है।

फादर पिआओ की घटना अपनी तरह की अकेली नहीं है। इसमें एक व्यक्ति का दर्द दूसरे के शरीर में उतर आया तो लिवरपूल में एक घटना ऐसी घटी, जिसमें स्वप्न ने रोग ठीक कर दिया। 1919 की बात है लिवरपूल में जेम्स नामक एक व्यक्ति रहता था, जो बहुत पहले कभी फौज में रह चुका था। एक लड़ाई के दौरान तोपों की भारी गर्जना के कारण उसके कान के पर्दे फट गए थे और वह बहरा हो गया था। पैंशन पर आ जाने के बाद एक रात उसने एक स्वप्न देखा। उसने अपने आपको सेंट विनिफ्रेड कुँए के पास खड़ा पाया। लिवरपूल के लोग उसे गंगा की तरह पवित्र मानते हैं। थी बात स्वप्न की, पर जेम्स को देवदर्शन की तरह बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सोचा इस कुँए में स्नान कर लेना चाहिए। पानी निकालकर उसने जैसे ही शरीर पर डाला कि उसे शीत की-सी कंपकंपी लगी। और इसी क्षण उसकी नींद टूट गई। वह हड़बड़ा कर उठ बैठा, पास में सो रहे उसके घरवालों ने पूछा कौन ! और यह 'कौन' शब्द जेम्स के जीवन का नया सन्देश बन गया। उसने आश्चर्यपूर्वक बताया—"मैं हूँ जेम्स,'' पर यह क्या हो गया, जिस बहरेपन को अच्छे-अच्छे डाक्टर ठीक नहीं कर सकते थे, एक स्वप्न ने कैसे ठीक कर दिया? यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि स्वप्न में जो तत्त्व सक्रिय रहता है उसे सर्वव्यापी ही नहीं सर्वशक्तिमान भी होना चाहिए।

रेवरेण्ड फ्रीमैन विल्स की लँगड़ी टाँगें भी इसी तरह स्वप्न में ठीक हुईं थीं। जब उसने यह स्वप्न देखा था कि कोई एक फरिश्ते ने आकर उसके टूटे हुए अंग में प्रकाश की किरणें इस तरह फेंकी जैसी कोई प्लाज्मा लाइट वैल्डिंग करते समय किसी धातु पर फेंकी जाती है। स्वप्न टूटने पर जागे विल्स यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि उनकी टाँगें जिनके बारे में डॉक्टरों का कथन था कि मृत्यु होने तक यह टाँगें सीधी नहीं हो सकती, ठीक हो गई और विल्स चलना- फिरना तो क्या दौड़ में भी लोगों को पछाड़ने लगा। बिना किसी औषधि, बिना किसी शल्य-क्रिया के इस प्रकार किसी असाध्य रोगी का ठीक हो जाना स्वप्नसत्ता को और भी रहस्यपूर्ण ही बनाता है।

स्वप्नों द्वारा अपने किसी प्रियपात्र को पूर्वाभास कराना, किसी होनहार घटना से सजग करना अथवा कोई महत्त्वपूर्ण सन्देश देना सम्मोहन-क्रिया का एक अंग है। योगीजन, सिद्ध और सन्त एकाग्रचित्त से अपनी भावनाएँ प्रेक्षित कर इस तरह के संदेश दिया करते हैं। कई बार लोग अपनी विकट-वासना और गन्दी मनोभूमि के कारण इन संदेशों को ग्रहण न कर पाएँ, यह दूसरी बात है, पर इस तथ्य की सत्यता पूर्ण प्रमाणसम्मत है। बात उन दिनों की है जब रूस में क्रान्ति मच रही थी। वहाँ के डेनियल बेवर नामक प्रसिद्ध विचारक ने उन दिनों चीन में एक लामा के बारे में सुन रखा था कि वह किसी भी व्यक्ति की भूतकालीन घटनाओं को स्वप्न में दिखा देने की क्षमता रखता है।

श्री बेवर उस तांत्रिक से एक बौद्ध मंदिर में मिले और उस तरह का प्रयोग देखने की इच्छा प्रकट की। लामा ने एक नवयुवक पर एक प्रयोग करके दिखाया। योग-निद्रा स्वप्न की अनुभूति कराने के बाद लामा ने पाल नामक इस युवक से पूछा—"तुमने क्या देखा?" उसने बताया कि मैं रूस के सेन्ट पीटर्सवर्ग नगर में हूँ। मेरी प्रेमिका एक बड़े शीशे के सामने खड़ी श्रृंगार कर रही है। उसे उसकी दासियाँ 'क्रास आफ अलेक्जेंडर' हीरे की अँगूठियाँ पहना रही हैं। मैंने मना किया कि नहीं तुम यह अँगूठी मत पहनो। मैंने सारी बातचीत रूसी भाषा में ही की। अपनी प्रेमिका से मिलन का यह स्वप्न बड़ा ही मधुर रहा।

“तभी एक दूसरा स्वप्न भी दिखाई दिया। मैंने अपने आपको एक परिवर्तित दृश्य में निर्जन रेगिस्तान में पाया। मेरे दो बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, पर मैं उनके लिए भोजन नहीं जुटा पाया। मुझे एक ऊँट ने हाथ में काट लिया। मेरा अंत बड़ी दुःखद स्थिति में हुआ।”

अपने सम्मुख यह घटना देखने के बाद डॉ. वेबर रूस लौटे। दैवयोग से एक बार सेंट पीटर्सबर्ग में उनकी भेंट एक स्त्री से हुई। उससे इस बात का क्रम चल पड़ा तो वह एकाएक चौंकी और बोली आप जिस महल की बातें बता रहे हैं, वह मेरा ही मकान है। मेरे पास 'क्रास आँफ एलेक्जेंडर' हीरे की अँगूठी भी थी। मैं उसे कई बार पहनना चाहा करती थी, किन्तु मेरा प्रेमी रास्पुटिन इसे पसंद नहीं करता था। ठीक जिस तरह आपने पाल की घटना सुनाई, वह मुझे यह अँगूठी पहनने से रोकता था।

डॉ. वेबर उस स्त्री के साथ उसके घर गए। हूबहू वही दृश्य जो स्वप्न में देखकर पाल ने बताए थे। डॉ. वेबर आश्चर्यचकित रह गए और माना कि स्वप्न सत्य था और यह भी कि जीवात्मा के पुनर्जन्म का सिद्धान्त मिथ्या नहीं है। वे सहारा जाकर दूसरी घटना की भी जाँच करना चाहते थे, पर कोई सूत्र न मिल पाने से वे निराश रह गए पर यह सत्य था कि उनको जितनी भी जानकारियाँ मिली, उन्होंने उन मान्यताओं का समर्थन ही किया। इन घटनाओं का उल्लेख प्रो. वेबर ने अपनी पुस्तक 'द मेकर ऑफ हैवेनली ट्राउजर्स' में किया है।


बुढ़िया की सीख

अपनी सेना से बिछुड़कर शिवाजी एक ऐसे स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ दूर-दूर तक आबादी दिखाई न देती थी। कुछ अँधेरा हो चला था। तभी कुछ दूर पर उन्होंने दीपक का मन्द प्रकाश देखा। वे उधर गए और एक झोपड़ी के सम्मुख आ खड़े हुए। एक बुढ़िया बाहर आई और उन अभ्यागत को झोंपड़ी के अन्दर ले गई। शिवाजी थके होने के साथ-साथ भूखे भी थे। बुढ़िया ने यह अनुभव कर लिया। उसने हाथ-मुँह धोने के लिए गर्म पानी दिया और बैठने के लिए चटाई बिछा दी। शिवाजी हाथ-मुँह धोकर आराम से बैठ गए। कुछ ही समय पश्चात बुढ़िया ने एक थाली में पकी हुई कोदों परोसकर उनके सम्मुख रख दीं।

शिवाजी असहनीय रूप से भूखे थे। तुरन्त कोदों का बड़ा-सा कौर भरा। तभी ओ माँ कहकर ! हाथ झटकने लगे। कोदों बहुत गर्म थीं।

बुढ़िया ने देखा तो बोली—”तू भी शिवा जैसे स्वभाव का मालूम होता है।” शिवाजी ने पूछा—”माता ! तूने शिवा से मेरी तुलना किस आधार पर की ?”

बुढ़िया बोली—”जिस प्रकार शिवा आस-पास के छोटे किले न जीतकर बड़े-बड़े किले जीतने की उतावली करता है, उसी प्रकार तूने भी किनारे-किनारे की ठंडी कोदों को खाना शुरू न करके, बीच में से बड़ा कौर भरकर हाथ जला लिया ! बेटा उतावली से काम बनता नहीं, बिगड़ता है। मनुष्य को उन्नति के लिए छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए सावधानी और धैर्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उतावली के साथ बड़े-बड़े कदम उठाकर कोई बड़ा लक्ष्य नहीं पाया जा सकता। जिस दिन शिवा छोटे-छोटे किलों से अपना विजय-अभियान प्रारंभ करेगा, उसी दिन से उसे कभी पीछे हटने की आवश्यकता न होगी, और एक दिन ऐसा आयेगा जब वह अपने मनोनीत लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।"

शिवाजी ने बुढ़िया की सीख गाँठ बाँध ली, जिसके फलस्वरूप उन्होंने इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया।

लक्ष्य सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक उसकी साधना में उतावली से विरत होकर जो धैर्यवान व्यक्ति दृढ़तापूर्वक धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं। इसके विपरित जो व्यक्ति छलांग लगाकर जल्दी ही जीवनलक्ष्य प्राप्त करने की उतावली करते हैं, वे बहुधा अपनी साधना में असफल रहकर उपहासास्पद बन जाते हैं।


विचार शक्ति (मंत्र शक्ति) द्वारा पदार्थ का हस्तान्तरण

मलाया के राजा परमेसुरी अगोंग ने अपनी पुत्री राजकुमारी शरीफा साल्वा का विवाह निश्चित किया। तैयारियाँ कई दिन पूर्व से ही प्रारम्भ हुईं। और विवाह से एक दिन पूर्व ही धूम-धाम में बदल गईं ।

मलाया सघन वर्षा के लिए सारे संसार में विख्यात है। यहाँ काफी घने जंगल हैं और उनमें तरह-तरह के जीव-जन्तु परमात्मा की विलक्षण सृष्टि-सर्जन का बोध कराते हैं। मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित 128478 वर्ग मील क्षेत्र और 10674200 जनसंख्या वाले इस देश में मलय,चीनी, भारतीय और बोर्निया जाति के लोग रहते हैं। भारत की तरह मंत्र-तंत्र पर इस देश के लोग बहुत विश्वास रखते हैं। भारत में तो मंत्र-साधना ने अब अधिकांश या तो आडंबर का रूप ले लिया है या अनभिज्ञता का, पर मलाया में आज भी मंत्रशक्ति का सर्वत्र बोल-बाला है। सार्वजनिक समारोह तथा राजकाज तक में मंत्रशक्ति का सहयोग लिया जाता है।

इधर विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं, उधर बादल सघन होते जा रहे थे। प्रकृति और प्राणी जगत की इच्छाओं में विलक्षण वैषम्य पाया जाता है, इसलिए प्रकृति को लोग विद्रोहिणी मानते हैं। कई बार उसका दमन चक्र चलता है तो देश-देश नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। किन्तु भारतीय मान्यता इन सबसे भिन्न यह है कि प्रकृति पुरुष की आत्मिक चेतना की सहचरी है। अपनी भावचेतना या विचारशक्ति द्वारा प्रकृति के कार्यों में ठीक उसी प्रकार व्यवधान और रोक उत्पन्न की जा सकती है, जिस प्रकार प्रकृति मनुष्यों के काम में अवरोध उत्पन्न कर देती है। यह शक्ति तप और कष्ट साध्य तो है, तत्त्ववेत्ता उसके प्रदर्शनों को अनुचित मानते हैं और प्रकृति को व्यवस्थापिका मानकर उसके विधान में हस्तक्षेप न करने के पक्ष में भी हैं, किन्तु जब मनुष्य यह चुनौती देता है कि आत्मशक्ति नाम की प्रकृति से बड़ी कोई शक्ति नहीं तो सिद्धिसम्पन्न योगी इस तरह के चमत्कारों को भी बुरा नहीं मानते । यहाँ भी उद्देश्य लोगों का ध्यान सूक्ष्मचेतना की ओर प्रेरित करना ही होता है।

विवाह प्रारंभ होने में अभी कुछ देर थी कि बरसात प्रारंभ हो गई। इतनी घनघोर बरसात हुई कि नदी-नाले उमड़ पड़े। एक बार को तो लगा कि विवाह का शाही रंग नष्ट हो गया, पर यह चिन्ता प्रकृतिवादी को हो सकती है, अध्यात्मवादी को नहीं। महाराज परमेसुरी को अपने देश की मंत्रशक्ति पर विश्वास था। रहमान नामक एक ताँत्रिक स्त्री को बुलाया गया। आज एक प्रकार का रसायन बादलों में छिड़ककर थोड़ी-सी कृत्रिम-वर्षा करा लेने की योग्यता तो वैज्ञानिकों ने पा ली है, पर यह अध्यात्म की शक्ति है, जो इच्छानुसार प्रकृति के काम को भी रोक सकती है, अभी तक वैज्ञानिक भी यह शक्ति प्राप्त नहीं कर सके।

रहमान ने प्रयोग किया और तब वहाँ का दृश्य ही कुछ और था। जानते सब हैं कि जब पृथ्वी के पूर्ण भाग में सूर्य का प्रकाश रहता है तब पश्चिमी गोलार्द्ध में रात्रि का सघन अन्धकार विराट की यह धूप-छांव भले ही कोई न देख पाता हो किन्तु उस दिन न केवल मलयवासियों ने वरन् सुदूर देशों से पधारे शाही अतिथियों ने भी देखा, सारे नगर में वर्षा हो रही है, पर जिस क्षेत्र में विवाह समारोह संपन्न हो रहा है, वह बादलों से घिरा होने पर भी उसमें एक बूँद पानी नहीं गिर रहा। विवाह आयोजन जिस धूम धाम से प्रारंभ हुआ था, समापन भी उसी धूम-धाम से हुआ। तब तक उस क्षेत्र में एक बूँद भी पानी नहीं गिरा और जैसे ही रहमान ने दूसरा मन्त्र फूँका, उस क्षेत्र में भी वर्षा प्रारंभ हो गई।

सन् 1963-64 में इसी प्रकार राष्ट्र मंडलीय क्रिकेट दल मलाया में खेलने गया। प्रकृति को तो परमात्मा के आदेश का पालन करना ठहरा। वह मनुष्य की सुविधा-असुविधा की बात नहीं देखती। खेल अभी शुरू होने को ही था कि जोरदार बरसात शुरू हुई। मलाया की क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष ने रेम्बाऊ के एक विख्यात वमोह (ताँत्रिक को मलाया में वमोह कहते हैं) को बुलाया। खेल ठीक समय पर प्रारंभ कर दिया गया क्योंकि वमोह आ गया था। आधे लोग खेल देख रहे थे और आधे मंत्रशक्ति के विचित्र प्रमाण को। सारे नगर कुआलालम्पुर में दूर-दूर तक वर्षा हो रही थी, किन्तु क्रिकेट के मैदान में एक बूँद भी बारिश नहीं हुई मानों उतने स्थान पर शब्दशक्ति ने कोई विशाल छतरी बुन दी हो। खेल समाप्त होने तक यही स्थिति रही। 15 मार्च 1964 के धर्मयुग में इस समाचार को बड़े आश्चर्य के साथ छापा गया।

ऐसी ही स्थिति एक बार 'दि ईयर ऑफ दि ड्रेगन' फिल्म की शूटिंग के अवसर पर भी उपस्थित हुई थी। शूटिंग प्रारंभ हुई ही थी कि बारिश आ गई। विख्यात वमोह [ताँत्रिक] अब्दुल्ला बिन उमर की सेवाएँ ली गईं और उसी का परिणाम था कि जिस क्षेत्र में शूटिंग हो रही थी, उस क्षेत्र में एक बूँद भी पानी नहीं हुआ उसके चारों ओर इतनी सघन वर्षा हुई कि सारा क्षेत्र जलमग्न हो गया।

आज लोग चेतनाशक्ति को सक्षम और समर्थ न बना पाएँ तो यह दोष आत्मविद्या का, मंत्रशक्ति का नहीं, वरन् लोगों की भौतिकवादी असक्ति का है। हमें जानना चाहिए कि हमारे भीतर क्रियाशील आत्मचेतना की शक्ति और सामर्थ्य अकूत है। योग-साधनाओं द्वारा उसे प्रखर बनाया जा सके तो बरसात को रोकना तो क्या, सूर्य जैसी महाशक्ति की ऊर्जा का हस्तान्तरण कर सारे सौर मंडल का मन्थर और युग परिवर्तन तक किया जा सकता है। थोड़े से भूभाग की तो बात ही क्या है।

इस प्रकार की योगशक्ति का प्रदर्शन अकेले भारत वर्ष में, मलाया में ही होता हो, शेष विश्व उससे अनभिज्ञ हो, सो बात नहीं। इस सम्बन्ध में 'रिसर्चेज साइकोलॉजिक आइकरेस्पाण्डेन्स सर ला मैग्नेटिज्मे वाइटल एण्ट्रे अन सालिटेयर एट एम डिल्यूज' पेरिस (फ़्रांस) के अध्यक्ष डॉ. बिल्लाट ने व्यापक शोधें की हैं और इन क्रियाओं को पदार्थ विज्ञान के समान ही व्यवस्थित विज्ञान की संज्ञा दी है। 27 अक्टूबर 1820 के दिन एक अन्धी स्त्री ने डॉ. बिल्लाट के आग्रह पर प्रदर्शन किया और अपनी पराशक्ति से एक फूल मँगाकर वहाँ उपस्थित सैकड़ों लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया।

रैन्थम (मैसाच्यूसेट्स) में एक डाक्टर रहते थे। उनका नाम था—डॉ. लार्किन। इनके घर में एक नौकरानी थी, जिसका नाम था 'जेनी'। जेनी के बारे में लोगों में एक चर्चा सारे मुहल्ले में व्याप्त थी कि उसने अपनी इच्छाशक्ति पर इतना जबर्दस्त अधिकार प्राप्त किया हुआ है कि सैकड़ों मील की दूर की वस्तु भी वह अपनी इच्छाशक्ति से मँगा सकती है और वापस भेज भी सकती है। डॉ. लार्किन को इन सब बातों पर विश्वास नहीं था। वे प्रायः इस सत्य का प्रतिपादन किया करते। 'जेनी' जानती थी कि प्रदर्शन से किसी को थोड़ी देर के लिए आश्चर्यचकित तो किया जा सकता है,पर प्रदर्शन अन्ततः अपने दर्शन, पर और परा विद्या तीनों के अहित में ही होता है। सो वह डाक्टर के साथ विवाद में पड़ना नहीं चाहती थी, किन्तु डॉ. लार्किन उसके पीछे ही पड़ गये। तब 1840 की बात है जेनी ने एक दिन प्रदर्शन की आज्ञा दे दी।

डॉ. लार्किन ने उन लोगों को इकट्ठा किया, जो इस पर विश्वास करते थे, ताकि उन्हें मौके पर ही अंधश्रद्धालु प्रमाणित किया जा सके। अपने मित्रों परिजनों के अतिरिक्त उन्होंने नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी सम्मिलित किया। उन्होंने अपनी ओर से कोई डेढ़ बालिस्त का एक टुकड़ा लिया और उसे अपने रसोई घर के सामने जाकर रख दिया। फिर सब लोगों के साथ मकान के बड़े वाले हाल में उपस्थित हुए। दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द कर दिये गए, जिससे बाहर की हवा भी अंदर ना आ सके।

जेनी ने मंत्र पढ़ा, प्रार्थना की और मन ही मन में उथल-पुथल करने वाली विचारशक्ति का संचार किया। न कोई खटका हुआ न कोई शीशा टूटा। दरवाजे ज्यों के त्यों बन्द थे। तभी पास में फर्श पर डाले कपड़े को जेनी ने उठाया लोग आश्चर्यचकित रह गए यह देखकर कि ठीक वही लोहे का टुकड़ा जो बाहर रसोई घर के सामने रखा गया था,कपड़े के नीचे रखा हुआ है। डॉ. लार्किन अपने साथियों सहित रसोई घर की तरफ गये। जाकर देखा तो वहाँ से लोहे का टुकड़ा गायब था। रसोई घर का ताला लगाकर चाबी अपने हाथ में लिए वे वापस लौटे और बोले—"अच्छा जेनी ! अब इस टुकड़े को रसोई घर के अंदर पहुँचा दो। जेनी ने क्रिया-योग का प्रयोग किया और फिर कपड़ा उठाया तो उसके नीचे से लोहे का टुकड़ा गायब था। डॉ. लार्किन वापस लौटकर रसोई घर गए, ताला खोला, तो देखा कि वहाँ ठीक वही लोहे का टुकड़ा रखा हुआ है। पदार्थ किस प्रकार से वायुभूत होकर एक स्थान से दूसरे स्थान उड़ जाता है और किस प्रकार परमाणुओं का एक स्थान पर संलग्न हो जाता है। यह सब डॉ. लार्किन समझ नहीं सके, किन्तु उन्होंने मान लिया कि इच्छाशक्ति-मंत्रशक्ति में वस्तुतः कुछ यथार्थ अवश्य है।

सामान्य क्रिया कलाप देखने में शरीर करता दिखाई देता है पर उसमें इच्छा की ही मूल प्रेरणा रहती है। वह प्रेरणा विद्युतशक्ति की भाँति शरीर में इफरेन्ट नाड़ियों द्वारा शरीर के किसी विशेष अंग जाती और “अफरेन्ट नाड़ियों द्वारा संदेश लाती हैं। यदि मन को पूर्ण एकाग्र किया जा सके तो नाड़ियों में दौड़ने वाली इस अग्नि विद्युत को बहुत दूर तक भेजा, पदार्थ को जलाया, टुकड़े-टुकड़े किया जा सकता है और वायुभूत कणों में इच्छाशक्ति द्वारा ही कहीं भी खींचकर एकत्र किया जा सकता है। योग विज्ञान में यह बहुत ही छोटा चमत्कार है। पदार्थवादियों के लिये इसमें चाहे जितना कौतुक क्यों न भरा हो ?


अपराधों के पश्चाताप

घटना है—चार वर्ष पुरानी। आस्ट्रेलिया में होबर्ट के समीप स्थित जंगल में भयंकर अग्निकांड। उसमें भस्म होने वाले प्राणियों की संख्या का कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया। आँधी भी 114 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रही थी।

लोग भाग कर अपनी जान नहीं बचा पा रहे थे। आस-पास में बसे नगरों की ओर अग्नि दौड़ती जा रही थी। वहाँ के जेलखानों के फाटक जलकर राख हो गए। यदि कैदी चाहते तो आसानी से फरार हो सकते थे।

उनकी दृष्टि में शासकीय भवन राष्ट्रिय संपत्ति था। और राष्ट्रिय संपत्ति की सुरक्षा प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है। निरन्तर 36 घंटों तक कैदी आग बुझाने के कार्यों में व्यस्त रहे। अपने प्राणों को संकट में डालकर भी सरकारी भवनों की सुरक्षा का कार्य उन्होंने किया।

समय पर कितनी ही दमकलें भी आ गईं। आग पर काबू पा लिया गया। सभी कैदी अपनी -अपनी कोठरियों में वापिस आ गए। जेलर द्वारा उनकी उपस्थिति ली गई। सभी कैदी यथावत थे। जेलर को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह कुछ कैदियों से पूँछ बैठे—"क्या आप लोग जेल से मुक्त नहीं होना चाहते ? आप सबको कितना स्वर्णिम अवसर जेल छोड़कर भागने का था, फिर भी आप नहीं भागे?"

'महोदय! बन्धन में रहना तो कोई व्यक्ति नहीं चाहता। फिर उस पर हम लोग कैदी हैं। न्यायालय द्वारा जितने समय का कारावास दण्ड दिया गया है, उससे पूर्व भागना नियमों को तोड़ना है। हाँ, यदि शासन द्वारा हमारे दण्ड को कम कर दिया जाता या रिहा कर दिया जाता, तब तो चले भी जाते। हमें तो जेल में रहकर अपने अपराधों के पश्चाताप करने का अवसर दिया गया है।'—कैदियों का उत्तर था जेलर को।


पाण्डित्य से बड़ा चरित्र

राजगृही का बौद्ध विहार इन दिनों तरुणी परिव्राजिका के पाण्डित्य और सारिपुत्र की उत्कृष्ट योग-साधना की चर्चा का केंद्र बना हुआ था। बौद्ध स्तूप ही क्यों, राज्य के कोने-कोने तक कुंडलकेशा के पांडित्य और सारिपुत्र की साधना की ख्याति फैल रही है। प्रतिदिन हजारों जिज्ञासु कुंडलकेशा के पास आते और धार्मिक समाधान प्राप्त करते, जबकि सारिपुत्र आत्मशोध के लिए नितांत एकाकी जीवनयापन को ही महत्त्व दे रहे थे।

उनका एकाकीपन भंग किया धीरे-धीरे कुंडलकेशा ने। 'कुछ सीखने की आकाँक्षा' तो एकमात्र बहाना थी, जिसके माध्यम से कुंडलकेशा प्रतिदिन सारिपुत्र के समीप जाने लगी। एक ओर पांडित्य का अहंकार दूसरी ओर नारीसुलभ सौंदर्य का दर्प। कुंडलकेशा का अनुमान था एक दिन सारिपुत्र दीपशिखा के प्रति शलभ की भाँति उसके प्रणय-पाश में बँध जाएँगे, पर सारिपुत्र का वैराग्य कागज की नाव नहीं थी, जो जलावतरण होते ही गलकर नष्ट हो जाती। कुंडलकेशा ने यों तो आत्मकल्याण के लिए संघ में प्रवेश किया था,पर अपनी दुर्बलता उसने स्वयं ही जान ली थी। प्रेम और सांसारिक सुख का आकर्षण अभी तक नष्ट नहीं हुआ था वह प्रतिदिन सारिपुत्र के पास धार्मिक चर्चा की बात लेकर जाती, पर उसका प्रत्येक हाव-भाव इस बात का स्वतः संकेत कर देता था कि कुंडलकेशा उद्दाम-काम पिपासा से पीड़ित नारी है। यह बात धीरे-धीरे सारिपुत्र भी समझने लगे, पर उन्होंने अपना मनोबल टूटने नहीं दिया।

सौंदर्य-जाल सारिपुत्र को बाँध नहीं पाया, तब कुंडलकेशा का अहंकार जाग उठा। वह सारिपुत्र को अपने पांडित्य से पराजित करने की बात सोचने लगी। धर्म सम्मेलन होता या कोई विचारगोष्ठी कुंडलकेशा सभासदों के संमुख ही ऐसे तार्किक प्रश्न पुछ बैठती,कि सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को जिनका उत्तर देना कठिन हो जाता था। सारिपुत्र योगी थे। योग-उपार्जित तत्त्वज्ञान वाचिक ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक सारभूत होता है, सो अल्पशिक्षित होते हुए भी, और यह जानते हुए  भी कि कुंडलकेशा का मंतव्य प्रश्नों का समाधान नहीं, किसी भांति पराजित करना भर है, वे प्रश्नों का यथोचित उत्तर दे दिया करते।

सारिपुत्र को लगा जैसे कहीं इस तरह उनका भी अभिमान तो नहीं जाग रहा, क्योंकि वे वज्रदेह हनुमान के समान कुंडलकेशा के हर तर्क-तीर को निरस्त बनाते जा रहे थे। साधना की रक्षा के लिए उन्होंने अहंकार को मारने का निश्चय किया और उस दिन से उन्होंने कुंडलकेशा द्वारा पूछे गए हर प्रश्न का उत्तर मौन में देना प्रारंभ कर दिया।

काल  की गति बड़ी निर्मम होती है। कुंडलकेशा संग्रहणीग्रस्त हो गई। उनका सारा शरीर सूखकर काँटा हो गया। सौंदर्य का स्थान बीमारी की थकावट और वमन-विरेचन की अपवित्रता ने ले लिया था। तथागत भगवान् बुद्ध देशाटन पर थे। आज वह देशाटन से लौटे थे।  कुंडलकेशा के समाचार भी सुने थे। उन्होंने न तो उसे देखा ही था, न दीक्षा ही दी थी। उन्होंने कुंडलकेशा को देखने की इच्छा प्रकट की, किन्तु कौन जाता उसके पास, सभी मुँह फेरकर खड़े हो गए केवल सारिपुत्र ऐसे थे, जिनके मुख पर घृणा का कोई भाव नहीं था। वे चुपचाप उठे और संघ शिविर की ओर चले गए।

तथागत आए हैं, तुम्हारी याद कर रहे हैं कुंडलकेशा। एक मधुर कंठ-स्वर सुनाई पड़ा, कुंडलकेशा को। साश्चर्य उसने देखा सारिपुत्र स्वयं ही उसे लेने उपस्थित हुए हैं। कुंडलकेशा का अहंकार चूर-चूर हो उठा। करुणा आँसुओं के रूप में फूट पड़ी और वह सारिपुत्र के चरणों में गिर पड़ी।

“उठो भद्रे ! तथागत की शरण में किसी का अकल्याण नहीं होता” कहकर उन्होंने कुंडलकेशा को हाथ का सहारा देकर उठाया, मानों वह उसकी सगी बहन हो और उसे लेकर भगवान् बुद्ध के पास चले पड़े।


सदाचरण ही कल्याण का एकमात्र मार्ग

जीवन में पूर्णता और शांति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपना आचरण सुधारने पर सबसे प्रथम ध्यान देना पड़ता है। कषाय-कल्मषों से भरा हुआ जीवन इतना भारी होता है कि वह नीचे तो गिर सकता है, पर ऊपर नहीं चढ़ सकता है। ऊपर चढ़ने वाले का भार हलका होना चाहिए। बोझिल बनाने वाले दुष्कर्म ही हैं, जो चित्त को भ्रमित और अस्थिर बनाए रहते हैं । शान्तचित्त उसका रहेगा, जिसे कुकर्मों की आग हर घड़ी जलाती नहीं। स्थिर मन उसका रहेगा, जिसे पतन का पश्चाताप और तृष्णा का प्रलोभन उद्विग्न नहीं करता। नीति,धर्म और सदाचार का रास्ता अपनाकर ही मनुष्य चैन से रह सकता है और अपने समीपवर्तियों को चैन से रहने दे सकता है। विद्या पढ़ने मात्र से कोई ज्ञानी नहीं होता, विद्यावान् वह है, जिसने अपने आचरणों को सुधारने में सावधानी बरती।

नाविरतो दुश्चरितात्, नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि, रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ — कठोपनिषद

अर्थात् —जिनने दुष्ट आचरण नहीं छोड़े, जिन्होंने संयम नहीं साधा, जिनके संशय समाप्त नहीं हुए,जिनका मन अशांत रहता है, ऐसे व्यक्ति को न आत्मा की प्राप्ति होती है और न परमात्मा की। चाहे वह कितना ही विद्वान क्यों न हो।

संयमशील व्यक्ति अपनी शक्तियों को अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं होने देता, उन्हें बचाकर ब्रह्मवर्चस एकत्रित करता है। तदनुसार बढ़े हुए मनोबल से वह अपने आन्तरिक शत्रुओं से लड़ सकने और उन्हें परास्त कर सकने में सफल होता है। ज्ञान और चिन्तन-मनन का फल यही है कि व्यक्ति अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने के लिए अग्रसर है। ज्ञान की यथार्थता चरित्र की कसौटी पर ही परखी जाती है।

तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। —तैत्तिरीय उपनिषद्

अर्थात् — तप करो। तप में परम सिद्धियाँ प्रदान करने की सामर्थ्य है।

इन्द्रियनिग्रह को तप कहा गया है। मन को कुमार्ग से रोक सकने के साहस का नाम तप है । पाप और पतन की ओर घसीट ले जाने वाली तृष्णा और वासना के प्रवाह को रोक लेना तप है । तपस्वी को समस्त सिद्धियाँ मिलती हैं। तप से आत्मसाक्षात्कार होता है और तपस्वी ही पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ होता है। ऐसे तपस्वी लोग ही पृथ्वी के स्तंभ हैं । उन्हीं के पुण्य के फल से इस सृष्टि का सारा क्रम चल रहा है। जिन्होंने व्रतशीलता की दीक्षा ली, सत्य को अपनाया। तपस्वी जीवन जिया और ज्ञान की साधना करते हुए परमार्थपरायण बने। ऐसे व्यक्ति ही संसार को स्थिर रखे हुए हैं।

सत्यं वृहत मुग्रं दीक्षा, तपोब्रह्म यज्ञः- पृथिवीं धारयन्ति। —अथर्ववेद

अर्थात् —महान् सत्य, उग्र दीक्षा, तप, ज्ञान और परमार्थ इन्हीं के आधार पर पृथ्वी टिकी हुई है।

आत्मा का प्राप्त होना मात्र साधना-उपासना पर निर्भर नहीं है। जिसके आचरण पवित्र न हों, वह योग-साधना में सफल नहीं हो सकता। आत्मा की प्रगति और परमात्मा की उपलब्धि के लिए सत्यनिष्ठ और तपस्वी जीवन जीना पड़ता है। आत्मा ज्ञानस्वरुप, सत्य, शिव और सुन्दर है। उसे प्राप्त करके मनुष्य सबकुछ प्राप्त कर लेता है, पर इस लाभ को हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता। आत्मसाक्षात्कार के अधिकारी वे हैं, जिन्होंने मन और इन्द्रियों को जीत लिया। अज्ञान के अन्धकार से बचना ही आत्मसाक्षात्कार का प्रत्यक्ष फल है।

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा, सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो, यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः॥ —मुण्डकोपनिषद

अर्थात्-यह आत्मा सत्य और तप से प्राप्त होता है। आत्मज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होता है। यह आत्मज्ञानस्वरूप, दर्शन करने योग्य और सुन्दर है। जिन जितेन्द्रिय तत्त्वदर्शियों ने इसका साक्षात्कार किया है, वे कहते हैं —"आत्मा ही मनुष्य को प्रकाशवान बनाता है।"

संसार में सम्मान उनका होता है, जो सत्यनिष्ठ हैं। उन्हीं पर जनता की श्रद्धा होती है। जिनका आचरण, व्यवहार, संभाषण असत्य का है, ऐसे लोग सबकी आँखों में गिर जाते हैं, न कोई इनका सम्मान करता है और न विश्वास। आत्मिक और भौतिक ऐश्वर्य उनके लिए सुरक्षित है। जिनका व्यवहार सच्चाई से भरा हुआ है। मिथ्याचारी का वैभव बादल की छाया की तरह अस्थिर रहता है और शीघ्र नष्ट हो जाता है।

दृष्ट्वा रुपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः। अश्रद्धामनृते sदधाच्छृद्धां सत्ये प्रजापतिः॥ ऋतेन सत्यमिन्दिय विपान शुक्रमन्धस। इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयो sस्मृत मधु॥ —यजु॰ 19/77

अर्थात् —प्रजापति ने असत्य में अश्रद्धा और सत्य में श्रद्धा को स्थापित किया। मनुष्य सत्य से भौतिक और आत्मिक ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। यह सत्य अमृत के समान मधुर है।

सत्य का आचरण, सच्चाई का व्यवहार अमृत के समान मधुर है। वह अपने अन्तःकरण में शांति तथा संतोष उत्पन्न करता है और दूसरों को अग्रगामी बनाता है। सच्चाई और सज्जनता का व्यवहार जिस किसी के साथ भी किया जाए वह बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता। सत्य व्यवहार से परस्पर स्थिर घनिष्ठता और मित्रता उत्पन्न होती है। विश्वास बढ़ता है और सहयोग मिलता है। पर असत्य के आचरण से खिन्न होकर मित्र भी शत्रु बन जाते हैं।

हिरण्ययेन पात्रेण सत्यस्या पिहितं मुखम्। —ईशोपनिषद

अर्थात्—लोभ-लालच ने सत्य के मुख को ढँक दिया है। सत्य का व्यवहार सरल है। उसमें सुविधा भी है और शांति भी। पर देखा जाता है कि दुर्बल मन वाले मनुष्य प्रलोभनों से ललचाकर असत्य का सहारा लेकर लाभान्वित होने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रलोभन से जो बच सके, अनीति से प्राप्त होने वाले वैभव को ठुकरा सके, न्याय और परिश्रम के उपार्जन पर संतोष कर सके, वही सत्य पर आरुढ़ रह सकता है। भले ही उसके पास वैभव कम है, पर आत्मिक पवित्रता और सत्यनिष्ठा के कारण उसका साहस सदा ऊँचा रहता है। ऐसे लोगों के लिए सत्यरूपी भगवान का मुख सदा खुला रहता है और अपने कर्त्तव्यपालन के रूप में परमेश्वर का साक्षात्कार करते हुए संतुष्ट एवं प्रसन्न बना रहता है।

समूलो वा एष परिशुष्यति। यो अनृतम् अभिवदति॥ —प्रश्नोपनिषद्

अर्थात्- जो असत्य आचरण करता है सो समूल नष्ट हो जाता है।

अनीति के मार्ग पर चलते हुए कोई कुछ लाभ उठा भी ले तो वह स्थिर नहीं रहता, वरन् उस उपार्जनकर्त्ता को जड़ मूल से नष्ट कर देता है। अग्नि जहाँ रखी जाती है, वहीं जलाती है, पाप का आचरण जो करता है, वह दूसरों को ठगने और हानि पहुँचाने में उतना सफल नहीं होता, जितनी अपनी हानि कर लेता है। ठगा गया व्यक्ति अपनी पूर्ति किसी प्रकार कर लेता है। उस हानि को उठाकर भी काम चला लेता है पर जिसने असत्य का आचरण किया उसका नाश वह पापकर्म ही कर देता है और आत्मप्रताड़ना के कारण उसे निरन्तर उद्विग्न रहना पड़ता है। आत्मरक्षा के लिए आवश्यक है कि हम अपने धर्म की रक्षा करें और असत्य आचरण से बचें।


Quotation

सच्चा आदमी एक मुलाकात में ही जीवन बदल सकता है, आत्मा को जगा सकता है और अज्ञान को मिटाकर प्रकाश की ज्योति फैला सकता है। -प्रेमचन्द


300 वर्ष आयु के श्री तैलंग स्वामी

वाराणसी की गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है। गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं। वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएँ हो रही थीं। आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।

पुलिस के आठ-दस जवानों ने पता लगाया, मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी जब कि घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है। एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी, पर आखिर पकड़ना तो था ही, वे आगे बढ़े। योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था, मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो। साथ ही वह कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे, मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों, किसी से भी उन्हें भय न हो। मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता, तो अनेक सिद्धियों-सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा, तो भी उन्हें बालकों जैसी क्रीड़ा का आनन्द लेने का मन तो करता ही है। यों कहिए आनंद की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है। बालसुलभ सरलता और क्रीड़ा द्वारा ऐसे ही आनंद के लिए 'श्री तैलंग स्वामी' नामक योगी भी इच्छुक रहे हों, तो क्या आश्चर्य ?

पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए और वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया। स्वामी जी गंगा में कूद गए, पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं; हाँ! चारों तरफ से घेरा डाल दिया, कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा। लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा— तब सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे। अब अस्ताचलगामी हो चले, किन्तु स्वामी जी प्रकट न हुए। कहते हैं, उन्होंने जल के अंदर ही समाधि ले ली। उसके लिए उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी और यह जन श्रुति थी कि तैलंग स्वामी पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगाए जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते नहीं देखा, तथापि उनकी आयु 300 वर्ष की बताई जाती है। वाराणसी में घर-घर में तैलंग स्वामी की अद्भुत कहानियाँ आज भी प्रचलित हैं। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था। 300 पौंड वजन था उनका, जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई; इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी। आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया शायद इसीलिए वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गए। इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे, पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातःकाल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं। शक्ति तो आखिर शक्ति ही है। संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा संपादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या। इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची, स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे और उस पार जा रही नाव के मल्लाह को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े। लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे और जिस प्रकार मेंढ़क मिट्टी के अंदर और उत्तराखण्ड के रीछ बर्फ के नीचे दबे, बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे। किन्तु यह क्या, जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलितकर तैरता चला जाता है, उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों । नाव उस पार नहीं पहुँच पाई, स्वामी जी पहुँच गए। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा होगा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई, तब तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। हनुमान जी ने मेघनाथ के सारे अस्त्र काट डाले, किन्तु जब उसने ब्रह्म-पाश फेंका तो वे प्रसन्नतापूर्वक बँध गए। लगता है श्री तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की अवहेलना नहीं करना चाहते थे, पर यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत चढ़-बढ़कर है। तभी तो वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस बार चुपचाप ऐसे बैठे रहे, मानों उनको कुछ पता ही न हो। हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई और हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर रात गहरी नींद सोया क्योंकि उसे स्वामी जी की गिरफ्तारी मार्के की सफलता लग रही थी।

प्रस्तुत घटना 'मिस्ट्रीज आँफ इंडिया एण्ड इट्स योगीज' नामक लुई-द-कार्टा लिखित पुस्तक से उद्धृत  की जा रही है। कार्टा नामक फ़्रांसीसी पर्यटक ने भारत में ऐसी विलक्षण बातों की सारे देश में घूम-घूम कर खोज की। प्रसिद्ध योगी स्वामी योगानंद ने भी उक्त घटना का वर्णन अपनी पुस्तक 'आटो बाई ग्राफी आँफ योगी' के 31 वे परिच्छेद में किया है।

प्रातःकाल ठंडी हवा बह रही थी, थानेदार जी हवालात की तरफ आगे बढ़े तो शरीर पसीने में डूब गया- जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायुसेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रहा था। फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया ? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को भी खुला नहीं, फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गए। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे, पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था। आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया, चारों तरफ पहरा लगा और ताली लेकर थानेदार थाने में ही सोया। सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बंद ताला बाकायदा बंद था। सन्तरी पहरा भी दे रहे थे। उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे थे। थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं, उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

श्री तैलंग स्वामी के बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार जलते हुए तेज कड़ाहे में खौल रहे तेल में पानी के छींटे डाले जाएँ  तो तेल की ऊष्मा उसे भाप बनाकर पलक मारते दूर उड़ा देती है। उसी प्रकार विष खाते समय एक बार आँखें जैसे झपकती पर न जाने कैसी आग उनके भीतर थी कि विष का प्रभाव कुछ ही देर में पता नहीं चलता, कहाँ चला गया। एक बार एक आदमी को शैतानी सूझी, चूने के पानी को लेजाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा—" महात्मन् ! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ।" स्वामी जी उठाकर पी गए उस चूने के पानी को, और अभी कुछ ही क्षण हुए थे कि  वह आदमी जिसने चूने का पानी पिलाया था, कराहने और चिल्लाने लगा। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा-याचना की तब कहीं पेट की जलन समाप्त हुई। उन्होंने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है, यह तो न्यूटन का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य होती है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र, प्राण उसकी ऊर्जा, ईंधन अथवा शक्ति, मन इंजन और ड्राइवर चाहे जिस प्रकार के अद्भुत कार्य लिए जा सकते हैं इस शरीर से। भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य योगविद्या, योगसाधना में सन्निहित हैं, जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते हैं।


Quotation

शोक में, आर्थिक संकट में या प्राणान्तकारी भय उपस्थित होने पर जो अपनी बुद्धि से दुख-निवारण के उपाय का विचार करते हुए धीरज धारण करता है, उसे कष्ट नहीं उठाना पड़ता। —वाल्मीकि


चींटियों की चतुराई आत्मतत्त्व की गहराई

सुप्रसिद्ध जीवशास्त्री बेल्ट एक बार चींटियों के सामाजिक जीवन का अध्ययन कर रहे थे। एकाएक मस्तिष्क में कौतूहल जागृत हुआ— यदि इन चींटियों को मकान छोड़ने को विवश किया जाए, तब यह क्या करेंगी। बेट्स चींटियों की बुद्धि की गहराई और उसकी सूक्ष्मता की माप करना चाहते थे, अतएव चींटियों के एक बिल के पास ऐसा वातावरण उपस्थित किया, जिससे चींटियाँ आतंकित हों। पास की जमीन थपथपाना, पानी छिड़कना विचित्र शोर करना आदि। चींटियों ने उसी तरह परिस्थिति को गम्भीर माना जिस तरह अतिवृष्टि, अनावृष्टि, तूफान, समुद्री उफान जैसे प्राकृतिक कौतुक मनुष्य को डराने-धमकाने और ठीक -ठिकाने लाने के लिए बड़ी शक्तियाँ करती हैं और मनुष्य उनसे डर जाता है।

जिस स्थान पर बिल था, आधा फुट पास ही वहाँ एक छोटी सी ढाल थी। सर्वेयर चींटियाँ चटपट बाहर निकलीं और उस क्षेत्र में घूमकर तय किया कि ढलान के नीचे का स्थान सुरक्षित है। उनके लौटकर भीतर बिल में जाते ही मजदूर गण सामान लेकर भीतर से निकलने लगे। बाहर आकर चींटियों ने दो दल बनाए। एक दल अपनी महारानी को लेकर नीचे उतर गया और खोजे हुए नए स्थान पर पहुँचाकर बिल के बाहर पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया, मानो वे सब किसी विशेष काम की तैयारी करने वाले हों।

सामान ज्यादा हो और दूरी की यात्रा हो तो मनुष्य बैलगाड़ी, रेल, मोटर और हवाई जहाज का सहारा लेते हैं। माना कि चींटियों के पास इस तरह के वाहन नहीं हों। यह भी संभव है कि वे आदिमयुग के पुरुषों की तरह समझदार हों और यांत्रिक जीवन की अपेक्षा प्राकृतिक जीवन बेहतर मानती हों; अतएव उन्होंने वाहन न रचे हों, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनमें परिस्थितियों के विश्लेषण और तद्नुरूप क्रिया की क्षमता नहीं होती। चींटियों का जो दूसरा दल ऊपर था, समय और बोझ से बचने के लिए ऊपर से सामान लुढ़काना प्रारम्भ किया। नीचे वाली चींटियाँ उसे संभालती जा रही थीं और बिल के अंदर पहुँचा रही थीं। ऐसा लगता था जैसे बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में हैलिकाप्टर से अन्न के बोरे गिराए जा रहे हों।

यह घटना यह बताती है कि बौद्धिक दृष्टि से नन्ही सी चींटी मनुष्य से कम नहीं। नन्हें-नन्हें जीवों में सूक्ष्मज्ञान की यह क्षमता जहाँ यह बताती है कि आत्म तत्त्व वह चाहे कितना ही लघु और चाहे कितना ही विराट क्यों न हो, आत्मिक गुणों की दृष्टि से एक ही है। फिर मनुष्य को अपने आपको संसार के सबसे अधिक बुद्धिमान होने का अहंकार नहीं करना चाहिए।

मनुष्य जाति जैसे आचार-विचार और रहन-सहन छोटी-छोटी पिपीलिकाओं में देखकर स्वभावतः आश्चर्य होता है। जीव-जन्तुओं की 'हीमेनोटेरा' शाखा में जिसमें बर्र, ततैया और मक्खियाँ भी पाई जाती हैं, चींटी उसी प्रकार सबसे ज्यादा समझदार है जिस तरह विश्व की समस्त जातियों में भारतीयों का आत्म-ज्ञान, संगठन, सूझ बूझ, विचार-शक्ति और अन्तःप्रेरणा के साथ-साथ कर्तव्यपालन की मर्यादा परस्पर हित-अहित का ध्यान जितना यह चींटियाँ रखती हैं उतना ही मनुष्य भी रखता होता, तो वह दुनिया का सबसे अधिक सुखी प्राणी होता। आज की तरह अशिक्षा, जनसंख्या, बेकारी, अपराध आदि समस्याओं में वह फिरता नहीं। माना कि चींटियों को भगवान ने 'वाक् शक्ति' नहीं दिया। तदपि उनके सिर में पाये जाने वाले तंतु इतने सजग होते हैं कि एक दूसरे के सिर का स्पर्श करते ही उसके विचार वे आसानी से ग्रहण कर लेती हैं। परावाणी का ज्ञान भारतीयों ने सम्भवतः चींटियों से ही प्राप्त किया और ऐसी योग साधनायें विकसित कर डालीं, जो मस्तिष्क के ज्ञानतन्तुओं को इतना सजग कर देती हैं कि किसी के भी मन की, अन्तःकरण की भावलहरियों को आकाश के माध्यम से ही पकड़ा जा सके, भले ही कोई मुँह से कुछ बताए या नहीं।

यह तो है कि स्वार्थ और अहंकारवश यह चींटियाँ भी लूटमार करती हैं। पड़ोसी चींटियों की कालोनियों पर आक्रमण करके सामान छीन ले जाती हैं, पर उसमें भी उनका अनुशासन और नैतिकता मनुष्यों से बढ़कर होती है। जीवशास्त्री डॉ. डगलस ने अफ्रीका के जंगलों में हुए चींटियों के युद्ध का बड़ा रोचक वर्णन किया है और लिखा है कि महायुद्ध जैसा ये हमला चींटियों के दो दलों में 17 दिन तक चला। प्रतिदिन प्रातःकाल से आक्रमण प्रारम्भ होता और सायंकाल को जाकर युद्ध विराम होता। जिस तरह मनुष्य के युद्ध में संचार, निर्माण, सप्लाई, एम्युनिशन आदि अलग-अलग विभाग काम करते हैं उसी प्रकार चींटियों के दोनों दलों में रसद पहुँचाने वाले अलग, निर्माण कार्य वाले अलग, संदेश लाने ले जाने वाले अलग-अलग विभाग काम कर रहे थे। लड़ने वाली चींटियाँ सेंग्विन कहलाती हैं। और तो और रात में उनका जासूसी विभाग भी सक्रिय रहता। अनेक दुश्मन चींटियाँ बंदी बनाई जाती हैं और उनके साथ ठीक कैदियों जैसा व्यवहार होता है। लूट में एक दूसरे का माल मिलता वह जमा किया जाता। जब तक एक दल की चींटियाँ और उनकी रानी मार नहीं डाली गईं तब तक युद्ध अविराम चलता रहा और फिर जीते पक्ष की चींटियों का विजयोल्लास देखते ही बनता था। खूब शराब पी गई, दुम हिला-हिलाकर चींटियाँ नाची कूदीं। यह उत्सव कई दिन तक चलता रहा। अविजित चींटियाँ जो बचीं दास बनाकर रखी गईं और उन्हें मजदूरी का काम सौंपा गया। मनुष्य जाति में भी तो सब कुछ इसी प्रकार का चलता है, यदि मनुष्य आत्मतत्त्व को नहीं पहचानता और सामान्य प्राकृतिक जीवों की भाँति स्वयं भी जिंदगी जीता है, तो उसे भी जीव-जंतुओं का एक वर्ग ही माना जाएगा।

ऊपर 'शराब' शब्द का प्रयोग किया गया है, सो यों ही निरर्थक में नहीं। मनुष्य जाति अपने मद्यपान की बुराई को संभव है यों समझ न पाती हो कि उसकी बुद्धि अपने दोष को दोष नहीं विशेषण मानती है। संभवतः आज इसीलिए शराब सभ्यता का प्रतीक मानी जाने लगी है, किन्तु उससे होने वाली बीमारियाँ, जातीय समर्थता का विनाश, आर्थिक अपव्यय, बौद्धिक क्षमता का नाश और फिर वंशानुगत कुसंस्कारों की जड़ें आदि ऐसी भयंकर हानियाँ हैं, जिन पर लोग गौर नहीं करते। चींटियाँ भी कई बार ऐसी बेवकूफी करती हैं। उसका मूल्य कितना भयंकर चुकाना पड़ता है, यह कभी मनुष्य को पता चले तो एक बार तो वह भी शराब पीने से डरे बिना रहे नहीं।

चींटियों के लिए शराब की ठेकेदारी एक प्रकार का 'भुनगा' करता है। शैतान किस प्रकार क्षणिक सुख और उत्तेजना की मृगतृष्णा में फँसाकर मनुष्य को शराब पिलाता है, उसका रोचक उदाहरण देखना हो, तो चींटियों के पास पड़ोस में रहने वाले इस सुनहरे रंग के भुनगे को ढूँढ़ना पड़ेगा। इसके शरीर में सुनहरे बालों के गुच्छे होते हैं, उनमें से एक विशेष प्रकार का खुशबूदार द्रव्य निकलता है। भुनगा पहले तो एक प्रकार की मनमोहक विशेष संगीत ध्वनि करता है। कर्णेन्द्रिय की तृष्णा चींटियों को उधर खींच ले जाती हैं। झुण्ड की झुण्ड चींटियाँ उसके पीछे चल देती हैं। भुनगा बीन बजाता आगे बढ़ता है सम्मोहित चींटियाँ पीछे-पीछे। अब भुनगा अपने शरीर से वह मादक पदार्थ निकालता है, जिसे अपनी प्यारी शराब मानकर चींटियाँ पीने लगती हैं और पी-पीकर झूमने लगतीं हैं। सिर पर सवार शैतान उचित-अनुचित सोचने नहीं देता, उसी प्रकार चींटियाँ भी होश-हवाश खोकर पीती हैं और इतना अधिक तक पीती हैं कि बेहोश हो जाती हैं। अब भुनगा उनको इस प्रकार शिकार बनाता है जैसे बीमारियाँ शराबी मनुष्य के शरीर को। इस दृष्टि से मनुष्य भी चींटियों जैसा मूर्ख प्राणी कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति नहीं। चींटियों में तो भी ऐसा होता है उनकी समझदार रानी शराबी चींटियों को उस शरारती भुनगे के इन्द्रजाल में न फँसने की चेतावनी देती रहती हैं। पर मनुष्य समाज में ऐसे समझदार और सेवा भावी लोग कहाँ, जो मनुष्य को इस बुरी लत से बचा ले।

कई भुनगे शिकारी नहीं होते, वे चींटियों को ऐसे ही शराब पिलाते रहते हैं, पर उससे भी चींटियों में उच्छृंखलता, कर्त्तव्यविमुखता, क्रूरता ऐसी ही पैदा होती है जैसे किसी भी शराबी मनुष्य में। ऐसी शराबी चींटियाँ तक जब अपने दल में बुरी मानी जाती हैं तो शराबी मनुष्य को यदि बुरा कहा जाए, तो उसमें क्या आश्चर्य ?

मनुष्यों की दुनिया बड़ी विचित्र है। चींटियों की भी उससे कम नहीं। मनुष्य के हर काम में समझदारी दिखाई देती है किन्तु यदि ध्यान से देखा जाए तो चींटियों का रहन-सहन उनसे भी अधिक समझदारी का दिखेगा। यह विधिवत् घर बनाकर रहती हैं। कहते हैं एम्पायर स्टेट बिल्डिंग संसार की सबसे बड़ी आठ सौ से अधिक कमरों वाली इमारत है, पर चींटियों का हर किला ऐसा ही विशाल होता है। स्थापत्य कला में चींटियाँ मनुष्य से थोड़ा ही पीछे हैं। पानी निकालने और वर्षा के दिनों में बिल के अंदर पानी से सुरक्षित रहने के लिए यह बढ़िया घर बनाती हैं।

पौष्टिक आहार की आवश्यकता को यह अच्छी तरह समझती हैं सो वन की पत्तियाँ इकट्ठी करने से लेकर कुछ चींटियों का दूध निकालकर पीने-पिलाने का चींटियों को विलक्षण ज्ञान होता है। मनुष्य को पशुपालन-कुशलता पर गर्व हो सकता है, पर चींटियों में और मनुष्यों में इस दृष्टि से ज्यादा अन्तर नहीं। दूध (हनीड्यू) देने वाली चींटियों गायों की तरह सफेद होती है। उनकी सुरक्षा और विकास के लिए चींटियाँ विशेष व्यवस्था रखती हैं। उन पर सन्तरी तैनात होते हैं जो बिलकुल चरवाहों जैसा काम करते हैं। कृषक चींटियाँ खेती करती हैं, भंगी सफाई, सिपाही रक्षा और चौकीदारी का काम करते हैं तो शिल्पकार चींटियाँ घर आदि बनाने का। इतना होने पर भी वे एक कुटुंब के सदस्यों की भाँति ऊँच-नीच और छूत-अछूत का भेदभाव किए बिना संगठित जीवनयापन करती हैं। आलसी और अकर्मण्य तो अपने बच्चे को भी अच्छे नहीं लगते, सो चींटियों के यहाँ भी आलसी नर अधिकांश मार ही डाले जाते हैं। मनुष्य समाज में ऐसे लोग अपनी अभावजन्य स्थिति के कारण नष्ट होते हैं।

कहते हैं चींटियों से हाथी भी डरते हैं। यह बात सच है उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली पैरासोल चींटियाँ क्रोध के समय बड़ी भयंकर और हाथी को भी मार डालने वाली होती हैं, पर इन्हीं चींटियों की विशेषता है कि वे बागवानी का भी शौक रखती हैं और अपने उपयुक्त बढ़िया फलों और छाया वाले पौधों का   विधिवत् पालन-पोषण करती हैं।

चींटियों का जीवन-व्यापार और मनुष्य जाति का जीवन-व्यापार एक स्थान पर लिखकर तुलना करते हैं तो लगता है कि शरीर के आकार-प्रकार में अन्तर होने पर भी मानसिक और बौद्धिक क्षमताएँ एक ही तत्त्व के गुण प्रतीत होते हैं। शास्त्राकार का यह कथन है कि जीव, मात्र आत्मा के टुकड़े हैं, गलत नहीं है। यदि मनुष्येत्तर दुनिया का सूक्ष्म अध्ययन करें तो पता चलेगा कि आत्मचेतना ही है जो कहीं तो विराट सूर्य के रूप में अपनी सृष्टि के साथ क्रीड़ा करती है तो वही कहीं मनुष्य बन जाती है, कहीं चींटी और दीमक। जीवमात्र में एक ही आत्मा देखने और जानने वाला ही सच्चा योगी, पंडित और ज्ञानी हो सकता है।


वीर बालक

एक व्यक्ति रेल में नदी के पुल पर चौकीदार का काम करता था। उसका चौदह वर्ष का लड़का भी उसके साथ था। एक दिन नदी में भीषण बाढ़ आई हुई थी। कई गाँव बह गए। बाप पुल देखने गया था और बेटा घर पर ही रहा। बाद में वह भी घर से निकला तो देखा कि पुल टूटा हुआ है। उसने बाप को पुकारा, पर कोई उत्तर नहीं मिला। उसने सोचा कि गाड़ी आने का समय हो रहा है यदि उसे न रोका गया तो गाड़ी नदी में जा गिरेगी और सब लोग मर जाएँगे। उसने गाड़ी को रोकने का निश्चय किया।

रेलगाड़ी वहाँ पहाड़ के तंग दर्रे से निकलती थी और वहाँ खड़े होने को भी जगह नहीं थी, किन्तु वह पटरी पर ठेला रखकर लाल रोशनी ले उस पर चढ़ गया। इतने में ही गाड़ी आ गई। ड्राइवर ने उसे देखकर गाड़ी खड़ी करने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह आगे बढ़ती चली गई। इतने में ही इंजिन के धक्के से ठेला कई फुट ऊँचा उछल पड़ा। लड़के की मृत्यु हो गई परन्तु हजारों व्यक्तियों के प्राण बच गए।


उपभोगार्थी-उपयोगार्थी

सुवर्णजात प्रतिदिन सहस्र मुद्राओं का दान करते थे, कोई भी याचक उनके पास से निराश, खाली हाथ नहीं लौटता था। तो भी यह रहस्य ही था कि सुवर्णजात के एक निजी सेवक अनुरथ ने कभी कुछ माँगा तो सुवर्णजात एक ही नपा-तुला उत्तर देते—"तुम्हें जब भी कुछ देने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ तो सूर्य देवता हाथ पकड़ लेते हैं, क्या करूँ, विवश हूँ।"

अनुरथ जड़बुद्धि नहीं था, वह निरन्तर अवसर की प्रतीक्षा में रहने लगा। एक बार सूर्य ग्रहण पड़ा। अनुरथ उस समय स्वामी के समीप ही था। ग्रहण प्रारंभ  होते ही उसने कहा—"स्वामी इस समय तो सूर्य को राहू ने पकड़ लिया है। अब तो वे रोक नहीं सकते, अब तो कुछ दीजिए। सुवर्णजात पकड़ में आ गए, इनकार नहीं कर सके। उन्होंने अपने सेवक को बहुत-सा धन और स्वर्ण मुद्राओं का दान दिया।

अनुरथ के मन की दमित इच्छाएँ, जो धन के अभाव से प्रसुप्त पड़ी थीं, एकाएक भड़क उठीं। अब तक जहाँ उसका संयमित जीवन बीत रहा था, अब भोग -विलास का भूत उस पर चढ़ बैठा। मकान बनाने से लेकर विवाह करने तक की जो महत्त्वाकांक्षाएँ तत्काल पूर्ण हो सकती थीं, अनुरथ ने पूरी कर लीं और देखते-देखते न केवल सारा धन स्वाहा कर लिया, अपितु अनेक रोग और दुर्बलताएँ भी उसने पैदा कर लीं।

जब तक धन रहा,काम की कौन पूछता, निदान धंधा भी उसने छोड़ दिया था। अब, जब पास कुछ न बचा तो फिर सुवर्णजात के पास गया और काम पर रखने की याचना करने लगा। सुवर्णजात ने उत्तर दिया—"तात ! रिक्त स्थान की पूर्ति कर ली गई। अब उस सेवक को हटाना नीति विरुद्ध है; अतएव उसे हटाकर तुम्हें काम पर रखना तो असंभव  है; अलबत्ता तुम्हें उपाय बता सकता हूँ। तुम “श्री” बीज लगाकर यदि भगवती लक्ष्मी की उपासना करो तो उनसे तुम्हें अवश्य ही धन प्राप्त हो सकता है।" अनुरथ उस दिन से देवी की उपासना करने लगा।

भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और वर माँगने को कहने लगीं।अनुरथ ने उन्हें अपने घर चलने का आग्रह किया। लक्ष्मी जी बोलीं—"वत्स ! घर जाकर कुछ काम करो। उद्यम उद्योग जुटा तो मैं स्वतः तेरे पास आ जाऊँगी, किन्तु भोग वृत्ति में आसक्त अनुरथ के पास इतना समय कहाँ था। वह लक्ष्मी जी से ही हठ करता रहा। लक्ष्मी जी बोली—"अच्छा तो तुम पहले भोगीलाल और उद्योगीलाल के पास जाकर देख आओ दोनों में से किसकी लक्ष्मी तुम्हें पसंद है, वही मैं तुम्हें दे दूँगी।"

अनुरथ ने क्रम-क्रम से जाकर दोनों स्थान देखे। भोगीलाल के पास धन संपत्ति तो बहुत थी। उसका वह मनमाना उपभोग भी करता था, पर अपनी भोगदृष्टि के कारण उसने अपना स्वास्थ्य चौपट कर लिया था। घर पर दिनभर लड़कों में कलह मची रहती थी। 'कर' को लेकर आए दिन राजकीय कर्मचारी उसे सताते रहते। बेचारा तीन रोटी खाता और मुश्किल से तीन घंटे सो पाता। सारा जीवन आतंक, भय, चिन्ता, निराशा और व्याधियों से ग्रस्त। उधर उद्योगीलाल के पास जाकर देखा तो उनका कारोबार खूब फैल रहा था। घरवाले खूब अच्छा खाते भी थे, पहनते भी अच्छा थे, पर परिश्रम भी उतना ही करते थे; फलतः स्वस्थ भी थे, प्रसन्न भी। हाँ उसे कल के लिए मुश्किल से ही बचता था।

वापस लौटकर अनुरथ ने देवी से कहा—"भगवती ! अब मुझे धन नहीं चाहिए। सारा मर्म समझ लिया। धन का यथार्थ लाभ लोभ में नहीं, उसका सदुपयोग करने में है। धन का उपयोग वही करता है, जो नीति और परिश्रमपूर्वक अपनी कमाई आप करता है। इसलिए अब मुझे वरदान का धन नहीं चाहिए, आवश्यकतानुसार आप ही पैदा कर लूँगा।"


नारी को स्वतंत्रता मिले, साथ ही दिशा भी

नारी समाज को समय की प्रगति के सामाजिक क्रूर बन्धनों से धीरे-धीरे छुटकारा मिलता जा रहा है। बहुत पिछड़े, अशिक्षित, अहंकारी और संकीर्ण, अनुदार लोगों में ही अब घूँघट, परदा प्रथा की कठोरता शेष रह गई है। बाकी समझदार लोग अब अपनी बच्चियों को भी शिक्षा दे रहे हैं और उन्हें घर से बाहर काम करने के लिए जाने देने के प्रतिबंध भी उठा रहें हैं। महिलाओं का उत्साह और रुझान भी इसी दिशा में है। औचित्य और न्याय का तकाजा भी यही है। प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिपादन भी इसी दिशा में है। स्वतंत्रता और सम्मान एवं औचित्य का जो व्यापक समर्थन हो रहा है, उसने भी नारी के ऊपर लदे हुए पिछले सामन्ती बंधनों को निरस्त करने में सहायता ही की है। इन अनेक कारणों के मिल जाने से नारी की स्वतंत्रता का एक नया युग आरंभ हुआ है। अंधे मानव समाज को सामाजिक पराधीनता के अवांछनीय बंधनों से इस प्रकार मुक्ति पाते देखकर सर्वत्र प्रसन्नता और सन्तोष की ही अभिव्यक्ति होनी चाहिए।

पर दुर्भाग्य की करामात तो देखिए, वह पिछली खिड़की से छद्मवेश बनाकर फिर घुसपैठ करने में लग गया है और वह नारी पराधीनता के लिए नए किस्म के जाल बंधन बुनकर फिर ले आया है। पहले लोहे की जंजीरों से कैदी बाँधे जाते थे, अब सोने की जंजीरों या रेशमी रस्सों से उन्हें बाँधा जाने लगे तो इसे कोई प्रगति भले ही कहता रहे; वस्तुतः यह बन्धन उतने ही दुखद रहेंगे जितने कि लोहे वाले समय में थे।

नारी को नर के समान ही अपने व्यक्तित्व के विकास और लोक निर्माण में अपनी प्रतिभा का समर्थ योगदान कर सकने का सुअवसर मिले, तभी उनकी स्वाधीनता सच्ची और सार्थक कही जा सकती है। यदि उपलब्ध नारी तंत्र को सही दिशा मिली होती तो सचमुच मानव जाति का यह एक बहुत बड़ा सौभाग्य होता और उससे उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ देखकर सन्तोष व्यक्त किया जा सकता था, पर हुआ ठीक इससे उलटा है।

पत्रकार, कलाकार, साहित्यकार, चित्रकार, कवि, अभिनेता, गायक, वादक सब मिलकर पुरुष की पशुप्रवृत्ति को भड़काने और उसे तृप्त करने का वातावरण बनाने में लग गए हैं। उन्होंने अमीरों और विलासियों की कामुकों और कुत्सितों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कल्पवृक्ष की तरह फूल और फल देना आरंभ कर दिया है। उनका सारा बुद्धिकौशल और क्रियाकलाप इस दिशा में लग गया है कि नारी को रमणी और कामिनी के रूप में उसी तरह बने रहने दिया जाए, जैसी कि वह सामन्ती जमाने में थी। तब वह बलात् बंधित की जाती थी। अब वैसी परिस्थिति नहीं रही तो उसी कार्य को इस चतुरता से सम्पन्न किया जाए कि नारी उसी गर्हित स्थान पर स्वेच्छापूर्वक खड़ी रहे, जहाँ उसका शोषण पूर्ववत् निर्बाध गति से चलता रहे।

नारी का चित्रण साहित्य, चित्र, गीत, काव्य, मंच आदि पर जहाँ भी आज हो रहा है वहाँ उसे रमणी और कामिनी ही चित्रित किया जाता है। माता, भगिनी और पुत्री के रूप में उसे उभारने वाली रचनाएँ, कृतियाँ, अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़ने पर भी कहीं न मिलेंगी। जब फूहड़ चित्रण में निम्न वर्ग की निकृष्टता और सम्पन्न वर्ग की कुत्सा भड़काने के निमित्त बनकर इन तथाकथित कलाकारों को प्रचुर धन कमाने ओर बहती गंगा में हाथ धोने का अवसर मिलता हो तो वे उसे छोड़ें भी क्यों ?

जहाँ नारी फैशनपरस्त भड़कीली और निर्लज्ज होती दिखाई पड़े वहाँ वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए उसे दोष नहीं ही दिया जा सकता। यह उसकी विवशता है। यह उसके भोलेपन का शोषण है। जब हर मासिक पत्रिका में सजी-धजी नटनियों की कुत्सित भाव-भंगिमा में सभी तस्वीरें छपती हैं, और वैसे ही चित्र, कैलेंडर, हर दीवार पर टँगे मिलते हैं, तो उसे देखकर एक भोली नारी यही मान्यता बना सकती है कि उसके अस्तित्व की सार्थकता इसी ढाँचे में ढल जाने में हो सकती है। सिनेमा आज का एकमात्र मनोरंजन रह गया है, उसमें नारी जिस प्रकार की पोशाक पहनती है, जिस तरह का वेष-विन्यास बनाती है, जैसे हाव-भाव दिखाती है, जैसा जीवनक्रम बनाती है, उसी का अनुकरण करने में ही तो वह सिनेमादर्शक जैसे स्तर के इस सारे समाज में अच्छी लग सकती हैं। ऐसे संस्कार सिनेमा देखने वाली, उस संदर्भ के लेख चित्र पढ़ने वाली लड़की भला और किस निष्कर्ष पर पहुँचेगी।

बढ़ती हुई साज-सज्जा, श्रृंगारिकता, भड़कीली पोशाक, नख-शिख की लीपा-पोती, केश-विन्यास में बरती जाने वाली विलक्षणता इस बात का प्रमाण है कि नारी को उसके लिए अर्धसहमत कर लिया गया जहाँ निशाचर लोग उसे ले जाना चाहते हैं। शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता और शालीनता के परिधान बिलकुल दूसरी बात है और भड़कीलापन नितान्त प्रतिकूल। पर दोनों को मिला देने वाले तर्क थोथी वाचालता ही कहे जाएँगे।

सज-धज की प्रतिक्रिया क्या होती है। इस संदर्भ में एक छोटा-सा किन्तु बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्मरण यह है कि एक बार लाहौर की एक लड़की ने महात्मा गाँधी को एक पत्र लिखा कि “जब वह कॉलेज जाती है, तब शोख लड़के उसे छेड़ते हैं, क्या करूँ ?” गाँधी जी उसे उत्तर दिया "तुम अपने सिर के बाल मुड़ा लो, फिर कोई लड़का तुम्हारी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखेगा।” बात आई-गई हो गई, पर तथ्य जहाँ का तहाँ खड़ा है। यदि नारी की शालीनता अक्षुण्य रखना है, और उसके व्यक्तित्व का समग्र विकास संभव किया जाना है तो उसे श्रृंगारिकता के वातावरण से निकालना ही पड़ेगा।

अमेरिका की श्रीमति बेट्टी प्राइडन के नेतृत्व में इन दिनों 'नारी मुक्ति आँदोलन' चल रहा है। उसमें इस विषाक्त वातावरण को उत्पन्न करके नारी को फिर सामंती बंधनों में जकड़ने के षडयंत्र का पर्दाफाश किया जा रहा है। नारी को समझाया जा रहा है कि वह इस जाल में फँसने से इनकार करने का साहस एकत्रित करे और लोगों को यह बताए कि वह न तो कठपुतली है और न गुड़िया, न वह कामिनी है, न रमणी, उसका अस्तित्व वर पशुओं की कुत्साएँ तृप्त करने के लिए नहीं है और न वह उपभोग्या है। और बताना होगा कि वह भी मनुष्य है और मनुष्य की तरह रहने और जीने की अधिकारिणी है। उसकी मनस्विता और प्रतिभा का उपयोग उसके स्वास्थ्य, ज्ञान, कौशल के अभिवर्धन में होना चाहिए, ताकि वह भी एक सुयोग्य विश्व नागरिक की भूमिका प्रस्तुत कर सकने में समर्थ बन सके।

नारीमुक्ति आंदोलन में जहाँ विश्व नारी को एक आदर्शवादी दृष्टिकोण दिया है वहाँ उसने उन मान्यताओं को व्यावहारिक रूप देने के लिए यह कार्यक्रम भी घोषित किया है कि इन आदर्शों को स्वीकार करने वाली प्रत्येक नारी केवल सज्जनोचित सीधी-साधी पोशाक पहने। भड़कीली, उद्धत लोगों की नजर अपनी ओर खींचने वाली कोई चित्र-विचित्र पोशाक न पहने और न बालों को उद्धत ढंग से सजाए। होठ , नाखून तथा कपोलों को रंग तथा मसालों से पोतना, लंबे नाखून रखना, इठलाते हुए चलना, उच्छृंखल ढंग से बातचीत करना इस आंदोलन से सहमत नारियों के लिए निषिद्ध है। इस सादगी और शालीनता को इन्होंने नारी के गौरव और स्वातंत्र्य को अक्षुण्ण रखने का महत्त्वपूर्ण प्रमाण माना है।

नारीमुक्ति आंदोलन से सहमत नारियाँ अब ऐसी सर्वमान्य पोशाकों का सृजन कर रही हैं, जो नर और नारी के लिए समान रूप से उपयोगी हों। उनमें अन्तर भी हो तो बहुत थोड़ा। चीन ने भी अपने देश में नर और नारियों के लिए लगभग एक-सी पोशाक निर्धारित की है। उनमें नाम मात्र का अंतर है। यह नारी के सम्मानास्पद आदर्श की उचित व्यवस्था है। उपरोक्त आंदोलन ने न केवल श्रृंगार प्रसाधनों का परित्याग किया है वरन् उनकी होली भी जगह- जगह जलाई है और उन उपकरणों को नारी के लिए अपमानजनक बताया है। नर और नारी की समान पोशाक का जहाँ प्रचलन हुआ है वहाँ निस्संदेह कामुकता की दृष्टि और प्रवृत्ति को भारी आघात लगा है और उसका मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव यह हुआ कि वे लोग विशुद्ध मनुष्यों की तरह बिना लिंगभेद की बात सोचें, सीधे-साधे ढंग से रहने लगे हैं। जिस प्रकार पुरुष-पुरुष या नारी-नारी मिलकर अश्लील बातें नहीं सोचते, वरन् उपयोगी वार्तालाप करते हैं, उसी प्रकार का रहन-सहन अपनाने से असमानता का स्तर और यौन आकर्षण स्वतः घट गया है। इस जंजाल से छुटकारा पाकर नारी को पुरुषों की तरह ही अपने व्यक्तित्व तथा भविष्य के निर्माण की चिन्ता करने—उसके लिए प्रयत्न करने और समाज की प्रगति में योगदान देने के लिए सोचने तथा कुछ करने का अवसर मिलने लगा है। नारी स्वातंत्र्य का यही रचनात्मक लाभ है, जो मिलना ही चाहिये। श्रृंगार सज्जा से लेकर यौन आकर्षण की केन्द्र बनने से यदि वह इनकार न करे तो फिर यह स्वतंत्रता भी पूर्ववर्ती परतंत्रता की ही तरह पतन और प्रवंचना भरे दुष्परिणाम प्रस्तुत करती रहेगी।

आरंभ कहीं से भी हुआ हो यह आंदोलन विश्वव्यापी होना चाहिए और भारत में भी इस दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। समस्या विश्वव्यापी है। नारी के साथ पूर्वकाल से दृष्टता बरती जाती रही है; अब उसे छलना के रूप में बदला जा रहा है। एक हाथ से जंजीर ढीली होने और दूसरे हाथ से नई रस्सी कस देने से स्थिति कहाँ बदली ? परिवर्तन ऐसा लाया जाना चाहिए, जिससे नारी द्वारा भी नर की ही तरह एक सुयोग्य और सुसंस्कारी मानव की भूमिका का संपादन  किया जा सके। उसके लिए बौद्धिक और भावनात्मक वातावरण तैयार किया ही जाना चाहिए। इसका आरंभ यदि नारी द्वारा आकर्षक श्रृंगारिकता से इनकार करने के रूप में किया जा सके, तो उसे प्रशंसनीय ही कहा जाएगा। अपने देश में यह आंदोलन जेवरों के बहिष्कार के रूप में होना चाहिए। क्योंकि हाथ, पैर, गले और कमर में बँधी हुई यह धातुओं की जंजीर नारी की पराधीन स्थिति का ही समर्थन करती हैं।

भारत की परिस्थितियाँ, अशिक्षा तथा रूढ़िवादी कट्टरता को देखते हुए समान पोशाक की बात तो यहाँ अभी मुश्किल से ही चलेगी, पर इतना तो हो ही सकता है कि भड़कीलेपन का अंत हो जाए।अनावश्यक ध्यान बटाने वाली रंग-बिरंगी,चित्र-विचित्र पोशाकें न पहनी जाएँ। और विलायती ढंग का उनका पहनावा उनके छिछोरेपन और शालीनता पर आँच लाने वाला घृणास्पद समझा जाने लगे, ऐसा वातावरण बनाया ही जाना चाहिए। अध्यापिकाऍ इस दिशा में बहुत काम कर सकतीं हैं। उन्हें गुरु एवं माता का गौरव ध्यान में रखकर स्वयं तो उच्छृंखल वेशभूषा से परहेज करना ही चाहिए साथ ही लड़कियों को भी चुस्त पोशाक से लेकर चित्र-विचित्र फैशन बनाने और बालों का तमाशा खड़ा करने से रोकना चाहिए। उत्सवों और शादियों में जो फूहड़ सज-धज होती है इसके स्थान पर भी सादगी का प्रचलन होना चाहिए। ऐसे अनेक सुधार हैं जो तुच्छ दीखते हुए भी नारी स्वातंत्र्य की सार्थकता संबंधी प्रकाश दे सकते हैं। सुलझे विचारों के लोग अपने लड़के-लड़कियों की एक सी पोशाक रख सकते हैं, जिससे वे लड़की लड़के नहीं, मात्र बालक ही प्रतीत हों। बालों का भी सीधा सादा ढंग रह सकता है जो सहज स्वच्छता की दृष्टि से उपयोगी हो—व्यर्थ की श्रृंगारिकता को बढ़ावा न दें और जिसकी साज-संभाल आसानी से रखी जा सके।

यह तो प्रतीकात्मक प्रक्रियाएँ हुईं। मूल बात यह है कि नारी को अश्लील आकर्षणों का केन्द्र नहीं बनाया जाना चाहिये। साहित्य, संगीत, कला के नाम पर उसे रमणी बनने के लिए उसे आकर्षित न किया जाए, वरन् पुरुष के सह-स्तर वाले मित्र एवं सहचर के रूप में उत्तरदायी विश्व नागरिक के सपने अपने गौरवशाली स्थान को सम्भाले रह सकने योग्य साहस एवं चरित्र प्रदान किया जाए। पुरुष वर्ग का कर्त्तव्य है कि वह नारी को बहकाने फुसलाने और गिराने का प्रयत्न छोड़ें और उसे भावनात्मक बौद्धिक एवं व्यावहारिक सहयोग इस प्रकार का प्रदान करें, जिससे उसकी प्रतिभा को विकसित होने और नवनिर्माण की भूमिका संपादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकने का अवसर मिल सके। साथ ही नारी में वह चेतना उत्पन्न की जानी चाहिए कि वह अपने विरुद्ध खड़े किए गए षडयंत्र में फँसने से इनकार कर सके। उसके मानवीय स्वाभिमान का तकाजा है कि वह किसी को आकर्षित करने के लिए श्रृंगार करने को तिलांजलि देकर अपनी प्रतिभा की प्रखरता बढ़ाती हुई समाज का नैतिक मार्गदर्शन और नेतृत्व कर सकने में समर्थ हो सके। इस स्तर का वातावरण एवं उत्साह उत्पन्न करने के लिए हमें विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिए, ताकि नारी स्वातंत्र्य का विश्व को समुचित लाभ मिल सके।


ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं

रूस के सुप्रसिद्ध खगोल-विशारद आई.एस.श्क्लोव्स्की  ने 'इण्टेलीजेन्ट लाइफ इन दि यूनीवर्स' नामक पुस्तक न लिखी होती तो तत्त्वदर्शन का परलोकवाद सिद्धान्त पूरी तरह धूल-धूसरित हो गया होता। उसने अनेक तर्कों और वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर यह लिखा है कि-"हमारी आकाशगंगा क्षेत्र में जिसमें कि अपना समस्त सौरमंडल भी आता है लगभग 10 लाख ऐसे ग्रह हैं जहाँ कि धरती के समान ही बुद्धिमान और सभ्य लोग निवास करते हैं। इनमें से कई लोक तो इतने सुन्दर हैं कि उनकी तुलना स्वर्ग से की जा सकती है।”

जीवात्मा के अन्य लोकों में गमन की बात को अंधविश्वास माना जाए तो विज्ञान की उक्त धारणा को भी अज्ञानग्रस्त काल्पनिक उड़ान ही कहा जाएगा; क्योंकि ब्रहांड कितना अनंत और समीप है, उसकी कुछ यथार्थ जानकारी अभी तक भी पूर्णतः नहीं मिल पाई है। हम जिस सौरमंडल में रहते हैं, वह “स्पाइल” नामक आकाश गंगा से प्रकाश पाता है और इस आकाश गंगा की चौड़ाई 100000 (एक लाख) प्रकाश वर्ष है। एक प्रकाश वर्ष अनुमानतः 6000000000000000000 मील की दूरी को कहते हैं। तात्पर्य यह है कि समस्त आकाशगंगा वाले ब्रहांड की दूरी इससे भी 1 लाख गुना 600000000000000000000000 मील की है। श्री श्क्लोव्स्की के अनुसार इस दूरी में बसे बौद्धिक शक्ति वाले लोगों वाले उन ग्रहों की परस्पर दूरी 300 प्रकाश वर्ष अर्थात् 1800000000000000000000 मील की दूरी पर है।

विज्ञान के महारथी अल्बर्ट आइन्स्टीन का मत है कि संसार में अधिकतम वेग वाला विमान प्रकाश की गति वाला हो सकता है, इससे अधिक तीव्र गति  भौतिक जगत में सम्भव नहीं हैं; अतएव कितना भी कोई प्रयत्न करे, बुद्धि संपदा वाले प्राणियों से संबद्ध इन ग्रहों में आवागमन सम्भव नहीं हो सकता। हमारे सबसे समीप का तारा “प्राक्सिमा सेन्टारी” है; यद्यपि वह एक वीरान क्षेत्र है, तथापि यदि वहीं जाया जाए तो एकबार की यात्रा में 4 वर्ष 4 महीने लगेंगे। इतनी लम्बी यात्रा की थकान इतनी भयंकर होगी कि व्यक्ति लगभग अर्द्धमृत हो जाएगा।

भौतिक दृष्टि से सभ्यता वाले सितारों की यात्राएँ असंभव हैं, किन्तु जब हम “मन” नामक शक्ति की कल्पना करते हैं और उसकी गति का अनुमान करते हैं।  तब पता चलता है कि नियंत्रित मन तो एक सेकेंड में हजारों प्रकाशवर्ष की सीमाओं को पार कर सकता है। एक सेकेंड में जितनी कल्पनाएँ हो सकती हैं, उतनी बड़ी से बड़ी दूरियाँ मन पार कर सकने में समर्थ है। इस मानसिक चेतना के कहीं ठहरा दिया जाए तो भौतिक दृष्टि से अदृश्य होने पर भी विद्युत चुम्बकीय स्पंदनों की भांति उससे किसी भी अज्ञात स्थान की जानकारी ली जा सकती है। ब्रहांड के ज्ञान का और आत्माओं के परलोकगमन का आधार यह मन ही है। जब उस सूक्ष्मता में चित्तवृतियों का निरोध किया जाता है तो सारा ब्रह्माण्ड भ्रू मध्य में उतर आया दीखता है। तब योगी चाहे तो किसी मन चाहे ग्रह में प्रवेशकर उससे आत्मरूप हो सकता है, स्वर्ग अथवा मुक्ति भी प्राप्त कर सकता है।


सिडनी केस- फ्रैंक कुक तक

किरायेदार ने सोचा मकान बहुत बढ़िया है, यहाँ बहुत अच्छा रहेगा। और नहीं तो यह मकान मोल ही ले लूँगा। इन्हीं कल्पनाओं में खोया हुआ किरायेदार विलियम फ्राँक गहरी निद्रा में सो गया। किन्तु अभी उसे सोये हुये एक घंटा भी नहीं हुआ था कि किसी ने हाथ के इशारे से उसे जगा दिया। फ्राँक ने चद्दर हटायी, देखा एक बहुत ही भयंकर हरी आँखों वाली आकृति उसके सामने खड़ी है। उसने पूछा कौन है ? किन्तु जैसे यह प्रश्न हवा में खो गया, उसी प्रकार पता नहीं चला कि वह छायाकृति एकाएक कहाँ अन्तर्धान हो गई।

फ्राँक उठे, बत्तियाँ जलाकर सभी दरवाजे खिड़कियों की जाँच की, सब बिलकुल बंद थे। बाहर से चिड़िया तो आ सकती थी, किंतु बिल्ली नहीं धँस सकती थी,फिर यह पूरी दानवाकृति कहाँ से आई, कौन थी वह, कहाँ चली गई। उन्होंने निश्चित किया—"यह मेरे अवचेतन मन की कल्पना थी, जिसने स्वप्न में विधिवत् एक मनुष्य की आकृति खड़ी कर दी।" मन को आश्वस्तकर फ्राँक फिर सो गये किन्तु जैसे ही आधी रात नियराई, एक बार फिर वही पहले जैसी स्थिति। ठीक वही शक्ल फिर सिरहाने खड़ी थी और फ्राँक को झकझोरकर जगा रही थी। फ्राँक के मुँह से कौन तो निकला—उस कौन के साथ एक कराह-सी मालूम पड़ी। उन्होंने स्पष्ट खड़े हुए एक आदमी को देखा, किंतु जैसे ही उन्होंने फिर बत्ती जलाई वहाँ न राम न रहीम। फ्राँक बुरी तरह घबड़ा गए। रात जागते हुए बिताई। जहाँ उस मकान को खरीदने की सोच रहे थे। दूसरे ही दिन छोड़कर भाग गए।

यह कोई गल्पकथा नहीं लिखी जा रही, वरन् एक सच्ची घटना है जो सिडनी (आस्ट्रेलिया) शहर की हेयर फोर्ड स्ट्रीट के एक मकान में घटित हुई। जिसकी जाँच मनोवैज्ञानिकों ने भी की और सच पाया। उन्होंने माना कि अदृश्य जगत में यक्ष-गंधर्व, ब्रह्म, राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, बेताल, किन्नर आदि होने की भारतीय मान्यता निराधार नहीं है।

फ्राँक के जाने के बाद एक अन्य सज्जन पधारे। मकान किराये पर ले लिया। उस समय मुहल्ले वालों ने बताया—श्रीमान् जी इस मकान में एक किरायेदार पहले भी आए थे, पर वह इन-इन परिस्थितियों में मकान छोड़ गए। कह नहीं सकते आपका मकान हितकर होगा अथवा नहीं, पर सुना यह जाता है कि इस मकान का मालिक जो चाय पीने का बेहद शौकीन था, शराब और माँस तो उसके लिए जल पीने की तरह थे। सदैव दुर्गंधित शरीर वाले उस दानवाकृति मकान मालिक ने शरीर छोड़ा, तब से इस मकान में कोई टिका नहीं। कहते हैं उसकी आत्मा इसी मकान में चक्कर काटती है। कोई और मनुष्य उस घर में रहे यह उससे बर्दाश्त नहीं होता। उसके रिश्तेदार चाहते हैं कि मकान का कुछ किराया मिले, पर यह अदृश्य भटकती आत्मा किरायेदार को रहने नहीं देती।

नम्बर दो का यह किरायेदार यह सब सुनकर जोर से हँसा और बोला—" लगता है तुम आजकल हिंदुस्तानी दर्शन (फिलॉसफी) पढ़ रहे हो। हिंदू लोग ही मानते हैं कि मरने के बाद जीव जिंदा रहता है। तुम्हें मालूम नहीं हम पश्चिम वाले इस पर कोई विश्वास नहीं करते और निर्भीक जीवन जीते हैं। आज के विज्ञानवादी युग में तुम्हारी ये बातें तो उस बच्चे जैसी लगती हैं, जिसे उसकी नानी ने किसी कहानी में डरा दिया हो।"

बात वहीं समाप्त हो गई। मकान उन्होंने ले लिया और उसी दिन सामान लाकर जम भी गए। इसे अंतर्चेतना की मजबूती कहा जाए अथवा एक प्रकट सत्य की, उन सज्जन की पहली और दूसरी रात दो रातें तो अच्छी तरह गुजर गईं। किंतु तीसरी रात जैसे ही कोई एक बजने को हुआ कि उन्हें किसी ने कंधे झकझोरकर जगा दिया। इतनी तेजी से जगाया गया था कि नींद तड़फड़ा कर टूट गई। उन्होंने देखा एक बहुत ही भारी-भरकम शरीर का व्यक्ति सामने खड़ा है। उसकी आँखें हरी थीं और शरीर काली छाया जैसा। देखते ही पहला हाथ बिजली की बत्ती के स्विच पर गया। बत्ती जलने पर उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, दिखाई तो कोई नहीं दिया पर उनका अविश्वासी मन इतना डर गया कि अच्छी तरह बोलना कठिन था। जिन्हें पहले ही अतींद्रिय  अस्तित्व पर विश्वास होता है वे यह जानते हैं कि उच्छिष्ट आत्माएँ अपने आप अभिशापित होती हैं, वे दूसरों का कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं ? जिनमें कुछ ऐसी क्षमता होती भी है वह देव-श्रेणियाँ होती हैं और अहित सोचने की अपेक्षा मनुष्य का हित ही करती हैं। शंकालु मन, उक्त सज्जन को इन सब बातों का कोई पता न था, सो उस रौद्र-कल्पना ने उन्हें इतना डरा दिया कि वे भी शेष रात सो नहीं सके। दूसरे दिन वे भी वहाँ से सादर विदा होकर दूसरे घर में चले गए।

यह घटना सिडनी पुलिस हैड क्वार्टर के रिकार्ड से उद्धृत की जा रही है, जिसको यह विलक्षण रिपोर्ट इस तीसरे व्यक्ति से प्राप्त हुई। इस बार माइकल कुक नामक एक सज्जन आए और यही मकान किराए पर लेकर रहने लगे। उनसे किसी ने कुछ कहा भी नहीं। उन्हें या उनके परिवार को कभी इस बात की कल्पना भी नहीं थी, उनका इस पर अपना कोई विश्वास भी नहीं था किंतु एक रात की बात है कि कोई आहट पाकर उनकी कन्या जग गई और नेत्र खोलते ही जो भयंकरता, उसने देखी सो आँखें खुली की खुली रह गईं। अच्छी स्वस्थ कन्या की आँखों ने झपकना बंद कर दिया और कोई भी चिकित्सक उसे ठीक न कर सका। उस आकृति का जो भी दृश्य इस कन्या ने बताया वह पहले दो किरायेदारों के विवरण से सौ फीसदी मिलता जुलता था।

उसके बाद एक दिन श्रीमान् कुक के साथ भी ठीक वैसी ही घटना घटित हुई। श्री कुक उसे देखकर न केवल चीख उठे, वरन् रोने भी लगे। उन्होंने उसे बिस्तर उठाकर फेंकते हुए देखा। एक दिन उन्होंने पूरी केतली चाय गर्मकर रखी थी। किसी काम से वे थोड़ा बाहर निकलकर आए, दुबारा जब फिर चाय पीने के लिए आए, तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि वही हरी आँखों वाला वीभत्स छाया पुरुष केतली में ही मुँह लगाए चाय पी रहा है। कहीं एक बूँद चाय गिरी नहीं, फिर चाय का इस प्रकार देखते-देखते वायुभूत हो जाना, एक बहुत रोमाँचक घटना थी। उन्होंने कई बार उसे सेवकों की तरह काम करते हुए भी देखा और कई बार स्वयं बाहर खुला हुआ रखा सामान उठाकर खाते हुए भी देखा। श्री कुक ने अंततः सपरिवार मकान छोड़ दिया, पर चलते-चलते उसकी रिपोर्ट हैड-क्वार्टर में लिखा गए ताकि पीछे और कोई उसमें आकर तंग न हो।

पुलिस ने जाँच का निश्चय किया। एक पुलिस कांस्टेबल जाँच के लिए भेजा गया। सिपाही ने घूम-घूम कर पूरा बंगला देखा, पर वहाँ उसे न कोई आकृति दिखी न कोई छाया। सिपाही ने कुक को कई बार कोसा और कहा—"लोगों को पुलिस को तंग करने में मजा सा आता है।" उसने मकान में ताला बंद किया और थाने लौटकर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट को बताया—"वहाँ कुछ भी तो नहीं है।" दूसरे दिन ऑफिसर ने उसी सिपाही को फिर भेजा, इस बार सिपाही ताला खोलकर घर में प्रविष्ट हुआ तो उसने जो कुछ देखा, उससे उसके रोंगटे खड़े हो गए। कमरों का सारा सामान अस्त-व्यस्त पटका पड़ा था। करीने से लगी कुर्सी-मेज इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। रसोई घर में उसे केतली में चाय मिली, जिसे देखने से लगता था किसी ने अभी हाल चाय बनाकर पी है। मकान में चारों तरफ ताला बंदी थी। कोई आने जाने का रास्ता नहीं, फिर अंदर कौन आया, किसने चाय बनाई? अभी वह इन्हीं विचारों में खोया पीछे को मुड़ा ही था कि ठीक वही आकृति उसके सामने खड़ी थी। पुलिस कांस्टेबल के शरीर से पसीना फूट पड़ा। बड़ी मुश्किल से बेचारे ने भागकर दरवाजे बंद किए, ताला लगाया और थाने लौट आया। थाने में सही घटना लिखाकर घर लौटा तो डर के मारे उसे बुखार आ गया। वह पन्द्रह दिन बाद ठीक हुआ।

इसके बाद सीनीयर पुलिस अफसरों तथा सी.आई.डी. कर्मचारियों ने भी छान-बीन की। कई ने तो वह आकृति ज्यों की त्यों देखी भी, पर जिन्होंने उसे देखा भी नहीं, उन्होंने भी मकान का सामान कई बार अदल-बदलकर रखकर जाँच की। बाहर पहरा होने के बावजूद सामान किस प्रकार तितर-बितर हो जाता है यह रहस्य कोई भी सुलझा न सका। मनोवैज्ञानिक तथा पत्रकारों ने भी न्यू कैसल में रह रहे माइकेल कुक से बातचीत की तथा मौके पर जाकर जाँच भी की। सारे तथ्य सही पाए और सबने एक स्वर से यह माना कि कोई ऐसी सत्ता सचमुच है, जो नितांत स्थूल न होकर भी समर्थ मनुष्य जैसे काम कर सकने में सक्षम है। यदि यह सत्य है तो आत्मा के अस्तित्व की, मानवेत्तर जीवन, परलोक और पुनर्जन्म की भारतीय मान्यताएँ निराधार नहीं कही जानी चाहिए, वरन् उस मान्यता के महत्त्वपूर्ण पहलुओं का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए। जब तक विज्ञान इस तरह के रहस्यों का उत्तर नहीं देता, तब तक अतींद्रिय अस्तित्व से इनकार करने का कोई कारण नहीं होना चाहिये।

कहते हैं इस मकान में पहले एक वृद्धा रहती थी। जो घर के अंदर किसी से जोर-जोर से बातचीत किया करती थी। कभी-कभी उसका स्वर इतना रोबीला और आदेशपूर्ण होता था, मानों वह अपने किसी नौकर से काम करा रही हो। इतना होने पर भी उस व्यक्ति को किसी ने कभी नहीं देखा। कभी किसी ने वृद्धा से पूछा—अजी आप किससे बातें किया करती हैं तो वह हँसकर इतना ही उत्तर देती—बेटा ! जिससे मैं बात कर सकती हूँ तुम्हें तो उसको देखने की हिम्मत भी नहीं हो सकती। वृद्धा के आत्मबल पर लोग आश्चर्य करते और कहा करते कि जिसके कारण दूसरे लोग मकान में रह भी नहीं पाते,उसे बुढ़िया कैसे नाच नचाती है। वह इन दिनों बीमारी के कारण अस्पताल में थी, तब अन्य किरायेदार आए और यह बात असली रूप में सामने आई। घटना सामने आ जाने पर भी अव्यक्त-सी है और उसके गर्भ में सैकड़ों यथार्थ छिपे हुए हैं जिन्हें जाने-समझे बिना मनुष्य जीवन की यथार्थता को समझ पाना कठिन है।


गुरुदेव के उपकार की स्थूल निशानी है

 स्वामी दयानन्द जी  अपने गुरु के आश्रम में झाडू लगाते, आश्रम का पानी भरने से लेकर सभी काम वे स्वयं करते। एक दिन जल्दबाजी में किसी दूसरे काम में लग जाने से झाडू तो निकाल दी, किंतु कूड़े को एक ओर लगा दिया, सोचा बाद में फेंक देंगे। बाहर से तो विरजानन्द जी अंधे थे, किन्तु उनकी अंतर्दृष्टि से दयानन्द जी की यह ढिलाई और बाद के लिए काम को टाल देने की बात कैसे छिप सकती थी ? कुटिया में प्रवेश करते समय गुरुजी का पैर कूड़े के ही ढेर पर पड़ गया। अब तो दयानन्द जी पर वह मार पड़ी, जिसका ठिकाना नहीं। उस समय लगी एक चोट का निशान हमेशा के लिये स्वामी जी के कन्धे पर बना रहा। किंतु दयानन्द जी ने कहा—”गुरुदेव! मेरा शरीर कितना कठोर है, आपके दुबले पतले कोमल हाथों में बड़ी चोट लगी होगी। आप इस तरह मुझे न मारा करें।” फिर वे गुरुदेव के पैर दबाने लगे।

विरजानन्दजी तो शिष्य को सहनशीलता का पाठ पढ़ा रहे थे, महर्षि की निगाह जब कभी अपने शरीर पर लगे उस चोट के निशान पर पड़ती अथवा कोई पूछता—”महाराज, यह चोट कैसे लगी?” तो उनकी आँखें भर आतीं, गुरुदेव की याद करते और कहते-”यह गुरुदेव के उपकार की स्थूल निशानी है।”


पेट या मालगाड़ी का इंजन

अभी कुछ समय पूर्व ग्रीक में एक व्यक्ति ऐसा हुआ है जो प्रतिदिन 100 पौंड से भी अधिक भोजन ग्रहण कर जाता, पेय और नाश्ता उससे अतिरिक्त। ग्रीक निवासियों ने  “मिलो आफ क्रोटोना” नामक इस व्यक्ति की स्मृति में एक यादगार खड़ी की है जैसा कि मुमताज महल की स्मृति है—ताजमहल।

वास्तव में यह यादगार (मानूमेन्ट) मिलो क्रोटोना की नहीं, उसके विशाल शक्ति वाले पाचन संस्थान की यादगार है, जो यह बताती है कि प्रकृति के दिए हुए  साधन कितने सक्षम और समर्थ हैं कि यदि मनुष्य उनका दुरुपयोग न करे तो दुनिया की मशीनें मनुष्य शरीर का क्या मुकाबला कर सकती हैं।

क्रोटोना तो वास्तव में अपनी इस यादगार के कारण मशहूर हो गया, वरना उससे भी अधिक सक्षम पाचन शक्ति वाले लोग हुए हैं। भारतवर्ष में बुजुर्गों के बारे में ऐसी सच्ची कहानियाँ गाँव-गाँव सुनने को मिल जाती हैं और उनके साथ यह उपदेश भी कि यदि मनुष्य गलत आहार-विहार के कारण शरीर की अग्नि को नष्ट न करे तो पेट खराब होने का कोई कारण नहीं। प्रो.पी.जी. ग्रे के अनुसार जब मिट्टी के 200 से अधिक कीटाणु कार्बोलिक एसिड जैसा जहरीला रसायन पीकर पचा जाते हैं, पचा ही नहीं जाते, वरन् उसी से अपना शारीरिक विकास भी करते हैं। तब यदि मनुष्य पेट की गड़बड़ी और मन्दाग्नि का रोना रोए तो यही कहना पड़ेगा कि उन्होंने शरीर को परमात्मा की देन जैसा मानकर उसे पवित्र और सुरक्षित नहीं रखा, वरन् उसे चमड़े की मशीन मानकर उसकी शक्ति निचोड़ने भर में आनन्द अनुभव किया।

शरीर की गर्मी नष्ट न की जाये तो मनुष्य कितना खा सकता है, उसकी एक दूसरी घटना है डेट्रायट—मिचगन (अमरीका) की, जिसके आगे मिलो क्रोटोना का भोजन तो बच्चे की खुराक कही जानी चाहिए। रेलवे विभाग में काम करने वाला—एडिको साढ़े 6 फुट लम्बा और 210 पौंड वजन का था और एक दिन में 150 पौंड अर्थात्-डेढ़ मन से भी ज्यादा खाना खा जाता। 5 व्यक्तियों के सामान्य परिवार के लिए जो भोजन, एक सप्ताह के लिए पर्याप्त होता,एडिको का उससे मुश्किल से ही एक बार पेट भरता।

यदि वह किसी होटल में खाने बैठ जाता तो फिर कुछ देर के लिए दूसरे सभी लोगों का खाना बन्द हो जाता, फिर उन्हें खाने की आवश्यकता भी नहीं होती थी, एडिको का चारा देखकर ही उनकी भूख मर जाती थी। बड़े सुअर के माँस से बनी 60 टिकियाँ और आड़ू तथा जामुन से बनी 25 कचौड़ियाँ वह एक ही बैठक में साफ कर जाता था। फिर इस पेट में पहुँचे कोयले को जलाने के लिए जल की आवश्यकता होती थी, उसके लिए बोतलें रखी जातीं और तब एक बार में गिनकर पूरी पचास बोतलें पानी भी पी जाता था।

रविवार के दिन वह विशेष खाना खाता था। उस दिन वह सुअर का माँस न लेकर 15 मुर्गे खाता था। एक बार उसने पेट भर भोजन करने के बाद लोगों की जिद रखने के लिये 3 पेरु पक्षी भी उदरस्थ कर लिए, जिनका वजन 60 पौंड था। 24 पौंड पनीर और 300 अण्डे उसका हलका-फुलका नाश्ता था। वैसे वह दिन भर में दो-तीन बार खाता था और प्रतिदिन बड़े सुअर की भुनी हुई 45 बोटियाँ, 60 टिकियाँ, भुना हुआ आलू दो गैलन, 10 कप काफी, 50 बोतल बियर तथा शराब 50 बोतल अन्य जल या कोकाकोला जैसा पेय और 50 कचौड़ियाँ उसका भोजन होते थे। उसके सामने विवाह का प्रस्ताव आया तो उसने कहा—मुझे पूरा भोजन मिलता रहे, इसी में आनन्द है, विवाह किया ही नहीं।

यह घटना बताती है कि यदि नष्ट न करें तो पेट में पूरे एक मालगाड़ी को खींचने में इंजन को जितनी गर्मी और आग चाहिए, वह कुदरत ने आदमी के पेट में भरी है, भले ही लोग उसे पहचान व समझ न पाएँ।


श्री आद्य शंकराचार्य के कुण्डलिनी अनुभव

शास्त्रार्थ में जब शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया तो उनकी पत्नी भारती ने कहा अभी मेरे पति ही हारे हैं, मैं उनकी अर्धांगिनी हूँ। मुझे भी हरा सकने पर आपकी विजय पूरी मानी जाएगी। शास्त्रार्थ उनसे भी हुआ, उनने काम विद्या संबंधी अनेक प्रश्न पूछे। शंकराचार्य ब्रह्मचारी होने के कारण उस विषय में अनभिज्ञ थे। प्रतिपादन यह था कि कामविद्या भी अध्यात्म विद्या का अविच्छिन्न अंग है। उसे न तो उपेक्षित रखा जा सकता है और न अनावश्यक बताया जा सकता है।जीवन-व्यवस्था एवं आत्मिक प्रगति में उनका भारी उपयोग है। सो उस संदर्भ में भी आत्मवेत्ता की जानकारी होनी चाहिए। श्री शंकराचार्य को भारती का तर्क स्वीकार करना पड़ा।

उन्होंने उत्तर देने के लिए समय माँगा, कथा है कि अपना शरीर छोड़कर शंकराचार्य ने एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश करके जीवन धारण किया और उसकी रानियों के साथ रहकर कामविद्या सीखी। शिक्षण पूरा होने पर वे राजा का शरीर छोड़कर अपने पूर्व शरीर में पुनः आ गए और भारती के प्रश्नों का उत्तर देकर उसका समाधान किया।

भगवान् शंकराचार्य ने अपनी शक्ति-साधना के अनुभवों की हलकी-सी झाँकी सौंदर्यलहरी में प्रस्तुत की है। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। उपनिषद्कार के अनुसार यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होती। दुर्बलता के रहते ब्रह्म तक पहुँच सकने की क्षमता कहाँ से आ सकती है। इस दृष्टि से ब्रह्मविद्या के सहारे ब्रह्मवेत्ता बनने और ब्रह्मतत्व को प्राप्त करने के प्रयत्न में भगवान् शंकराचार्य को शक्ति-साधना करनी पड़ी। और इसके लिए योगाभ्यास के—प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि के प्रयोग ही पर्याप्त नहीं रहे, वरन् उन्हें पंच-तत्वों की प्रवृत्ति का संचार और नियंत्रित कर्तीृ अपराविद्या का अवलम्बन लेकर शरीर और मन को भी समर्थ बनाना पड़ा। इस प्रयोजन के अपराविद्या की साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। अश्लील कोई अवयव या कोई क्रियाकलाप नहीं। प्रजनन को अपने यहाँ एक धर्म कृत्य माना गया है। सोलह संस्कारों में गर्भाधान भी एक संस्कार है। जिसकी पृष्ठभूमि धर्मकृत्यों के देवता और गुरुजनों के आशीर्वाद के साथ विनिर्मित की जाती है। भगवान् शिव का प्रतीक विग्रह जननेन्द्रिय के रूप में ही है, जिसे धर्मभावना और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। निन्दनीय वह प्रक्रिया ही हो सकती है, जिसके द्वारा पशुप्रवृत्ति को भड़काने में सहायता मिले।

शंकराचार्य ने भारती के प्रश्नों को यह कहकर टाला नहीं कि हम संन्यासी हैं, हमें 'कामविद्या' के संदर्भ में कुछ जानना या बताना क्या आवश्यक है? वे जानते थे कि योग परा और अपराविद्या के सम्मिश्रण का नाम है। परा अर्थात् ब्रह्मविद्या ज्ञान-विद्या अपरा अर्थात् शक्तिविद्या आत्मवेत्ता को दोनों ही जाननी चाहिए। जो शक्ति है, उसके सदुपयोग-दुरुपयोग की जानकारी होना भी आवश्यक है। शरीर के क्रिया-कलाप और मन के उल्लास, जिस सूक्ष्म शक्ति से प्रेरित, प्रोत्साहित और कर्म प्रवृत्त होते हैं, उस कुण्डलिनी शक्ति को उपेक्षा में नहीं डाला जा सकता। इस उपेक्षा से विकृतियाँ उत्पन्न होने और सदुपयोग की अनभिज्ञता से अहित ही हो सकता है। इसलिए गृहस्थ, ब्रह्मचारी सभी के लिए उसे जानना आवश्यक है। भारती ने इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कामकला संबंधी प्रश्न पूछे। और शंकराचार्य ने उन प्रसंगों को निरर्थक या अनुपयुक्त नहीं बताया, वरन् यह स्वीकार किया कि ब्रह्मचर्य-ब्रह्मवेत्ता को भी रोम-रोम में संव्याप्त शक्ति का स्थूल न सही, सूक्ष्मप्रयोग तो जानना ही चाहिए, वह उन्हें विदित न था सो पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उन्हें अवकाश-अवधि माँगनी पड़ी और आवश्यक ज्ञान प्राप्त करके शास्त्रार्थ की पूर्णता करनी पड़ी।

मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरंध्र में 'ज्ञानबीज' और जननेन्द्रिय मूल में 'कामबीज' स्थित हैं। कामबीज को नारी की 'योनि' की संज्ञा दी जाती है और ज्ञानबीज को 'शिश्न' की। यह मात्र आकर्षक कल्पना ही नहीं; इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी हैं; जिस पर विस्तृत प्रकाश अगले अंक में डालेंगे। इस समय तो इतना ही समझना पर्याप्त होगा कि उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह यह दो अत्यंत सामर्थ्यवान् प्रचण्ड क्षमताओं से परिपूर्ण दो शक्ति-संस्थान विद्यमान हैं। मस्तिष्क का सदुपयोग जानने और करने वाले व्यक्ति जिस प्रकार भौतिक और आत्मिक प्रगति कर सकते हैं, उसी प्रकार कामशक्ति कुंडलिनी का सदुपयोग करके भी जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और उल्लास विकसित किया जा सकता है। न केवल शरीर और मन के विकास के लिए, न केवल भौतिक सफलताएँ, समर्थताएँ प्राप्त करने के लिए, वरन् आत्मिक और भावनात्मक प्रगति के लिए इस शक्ति की प्रक्रिया का ज्ञान एवं अनुभव होना आवश्यक है।

अध्यात्म शास्त्रों में कुण्डलिनी के संबंध में बहुत कुछ बताया गया है। यथा--

अपाने मूलकन्दाख्यं कामरुपं च तज्जगुः। तदेव वह्रिकुण्डं स्यात् तत्त्वपकुण्डलिनी तथा॥६॥ योग राजोपनिषद

अपान स्थल मूलाधार में कंद है। उसे कामरूप-कामबीज कहते हैं। उसे ही वह्नि कुण्ड अथवा कुण्डलिनी तत्त्व कहते हैं।

एष बीजी भवान् बीजमहं योनिः सनातनः। एवमुक्तःअथ विश्वात्मा ब्रह्म विष्णुमभाषत॥६६॥  — वायु पुराण

जीव ने ब्रह्म से कहा। आप बीज हैं, मैं योनि हूँ। यह क्रम सनातन है।

पूर्वभागे ह्यधोलिंग शिखिन्यां चैव पश्चिमम। ज्योतिर्लिंगं भ्रुवोर्मध्ये नित्यं ध्यायेत्सदा यतिः॥८०॥

कुंडलिनी स्थान पर अधोलिंग का, शिखा स्थान पर पश्चिम लिंग का और भृकुटियों के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करना चाहिए।

प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाला केन्द्र है— जननेन्द्रिय मूल—कुण्डलिनी चक्र। और पुरुष का मनुष्य शरीर से मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरन्ध्र—सहस्रार चक्र में अवस्थित है। जब तक दोनों का मिलन नहीं होता, बिजली की दो धाराएँ-पृथक-पृथक रहने की तरह मानव जीवन में भी सब कुछ सूना रहता है। पर जब इन दोनों शक्तिकेन्द्रों का परस्पर संबंध-समन्वय-सहचर्य आरंभ हो जाता है तो ग्रीष्म और शीत के मिलने पर आने वाले बसन्त की तरह जीवन उद्यान भी पुष्प-पल्लवों से भर जाता है। इसी प्रयत्न के किए जाने वाले प्रयोग को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। शंकराचार्य के ज्ञान और अनुभव में यही कमी देखकर भारती ने उनकी साधना-अपूर्णता को चुनौती दी थी और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा था।

काम केन्द्र में स्फुरणा बड़ी सरस और कोमल है। समस्त कलाएँ और प्रतिभाएँ वहीं पर केन्द्रीभूत हैं। जो लोग उस सामर्थ्य को मैथुन प्रयोजन के तुच्छ क्रीड़ा -कल्लोल में खर्च करते रहते हैं, वे उन दिव्य विभूतियों से वंचित रह जाते हैं जो इस कामशक्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़कर उपलब्ध की जा सकती हैं। आत्मविद्या के ज्ञाता इस कामशक्ति को न तो हेय मानते हैं और न तिरस्कृत करते हैं, वरन् उसके स्वरूप, उपयोग को समझने और सृजनात्मक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने के लिए सचेष्ट होते हैं।

ब्रह्म को शिव और प्रकृति को शक्ति— कहते हैं। इन दोनों के मिलन का अतीव सुखद परिणाम होता है। ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित और ज्ञानबीज और जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित कामबीज का मिलन भी जब संभव हो जाता है, तो बाह्य और आन्तरिक जीवन में आनन्द, उल्लास का ठिकाना नहीं रहता है। ब्रह्मानन्द की तुलना मोटे अर्थ में विषयानन्द से की जाती रही है। यह अन्ततः शक्तियों का मिलन भी अलंकारिक भाषा में ब्रह्ममैथुन कहा जाता है। कुण्डलिनी-साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द भी साधक को सहज ही मिलने लगता है।

सहस्त्रारोपरिबिन्दौ कुण्डल्या मेलनं शिवे। मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्तितम्॥ —योगिनी तंत्र

हे पार्वती, सहस्रकमल में जो कुल और कुण्डलिनी—महासर्प और महासर्पिणी का मिलन है। उसी को यतियों ने परम मैथुन कहा है।

परशक्त्यात्म मिथुन- संयोगानन्दनिर्गराः। मुक्तात्ममिथुनं तत् स्त्यादितरस्त्रीनिवेषकाः॥ —तंत्र सार

आत्मा को परब्रह्म के साथ प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस में निमग्न रहना। यही यतियों का मैथुन है। कामसेवन नहीं।

ईडापिंगलयोः प्राणान् सुषुम्नायां प्रवर्तयेत्। सुषुम्नायांशक्तिसुद्दिष्टा जीवोsयं तु परः शिवः। तयोस्तु संगमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम्॥ —तंत्र सार

इड़ा, सुषुम्ना और जीवात्मा संगम इसे मैथुन सुख कहते हैं।

शंकराचार्यकृत सौंदर्यलहरी में कुण्डलिनीशक्ति को रूपवती युवती के रूप में चित्रित किया गया है और उसके ब्रह्ममिलन को काम-कल्लोल, मैथुन, संभोग की भाषा में चित्रित किया गया है। सो यह कुछ अटपटा-सा लगता है, पर प्राचीनकाल की अलंकारिक शैली में पहेली-बुझौअल की तरह इस प्रकार का साहित्यिक-काव्यात्मक-अलंकारिक प्रयोग चलता रहा है। सो इसे अलंकारिक-अभिव्यंजना ही माना जाना चाहिए और इसमें अश्लीलता ढूँढ़ने की अपेक्षा काव्यात्मक रसिकता के पीछे, झाँकते हुए उस प्रतिपादन को ही देखना चाहिए, जो व्यक्ति के कलेवर में छिपे हुए दो महान शक्तिकेन्द्रों के पारस्परिक संपर्क के लिए की जाने वाली साधना को प्रतिपादित करते हैं।

सन्त कबीर की 'उलटा बासियों” में इसी प्रकार का प्रयोग है। उन्होंने जीवात्मा को प्रेमिका और परमात्मा को प्रेमी के रूप में चित्रित किया है। आंतरिक स्थिति या साधनात्मक अनुभूतियों को पहेली-बुझौअल के रूप में प्रस्तुत किया है।उनके दो अटपटे पद्य नीचे देखिए —

(1)

देखि देखि जिय अचरज होई। यह पद बूझै बिरला कोई॥

धरती उलटि आकाश को जाय। चींटी बैठी हाथी खाय॥

बिना पवन के पर्वत उड़े। मगर मच्छ तरुवर पर चढ़े॥

सूखे सरोवर उठें हिलोर। बिन जल चकवा करें किलोल॥

बैठा पंडित पढ़ै पुरान। बिन देखी का करै बखान॥

(2)

वधू ऐसा ज्ञान विचारी। ताते भाई पुरुष से नारी॥

ना मैं व्याही ना मैं क्वारी। नित-नित पूत जनूँ सो हारी॥

काले मूँड को एक न छोडो। अजहूँ रही कुआरी॥

ब्राह्मन के घर रही ब्राह्मनी। जोगी के घर चेली॥

कलमा पढ़ि-पढ़ि भई तुरकिनी। घर-घर फिरुँ अकेली॥

पीहर जाऊँ न रहूँ सासरे। पुरुष हि अंग न लाऊँ॥

कहे कवीर सुनो रे संतो। अंग से अंग न छुवाऊँ॥

कुण्डलिनी महाशक्ति को विभिन्न साधनात्मक ग्रन्थों में सुन्दरी, युवती, कामिनी के रूप में चित्रित किया है। और उसके विविध क्रियाकलापों को यौवन अंगों के साथ तुलना करते हुए श्रृंगार रस की काव्य शैली का अनुकरण किया है-यथा—

युवती सा समाख्याता सा महाकुण्डली परा। —कामधेनु तंत्र

इस कुण्डलिनी महाशक्ति को ही परम सुंदरी युवती कहते हैं।

कामीकलां कामरुपां चिकित्वा नरो जायते- कामरुपश्च कामः॥११॥ —त्रिपुरोपनिषद्

वह महाशक्ति कामरूप है। उसे कामकला भी कहते हैं। जो उसकी उपासना करता है, वह कामरूप हो जाता है। और उसकी कामनाएँ फलवती होती हैं।

यानाड़ी सूक्ष्मरुपा परम पदगता सेवनीया सुषुम्णा। सा कान्तालिंगनासी न मनुज रमणी सुन्दरी—वारयोवित्

कुर्याचन्द्रार्कयोगे युगपवन गतं मैथुनं नैव योनो ! योगीन्द्रो विश्ववन्द्यः सुखमय भवने तां —परिस्यज्य नित्यम्। —भैरव या मन तन्त्र

रूपवती सुषुम्ना नाड़ी ही आलिंगन करने योग्य कांता है। इस महाशक्ति का आत्मा के साथ संयोग का काम ही मैथुन है। स्त्री संभोग नहीं।,योगीजन इस परम मैथुन का ही रसास्वादन करते हैं।

महाशक्ति की साधना से उत्पन्न अनुभूतियाँ कितनी कोमल, कितनी सरस, कितनी मधुर, कितनी रमणीय, कितनी कमनीय और कितनी मोद-प्रमोद भरी होती हैं, इसकी झाँकी उपनिषद्कार तत्त्वज्ञानी ने इस प्रकार कराई है।

सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः पाशेनैव- प्रतिबघ्नात्यभीकाम्। इषुभिः पंचभिर्धनुषा च विधत्यादिशक्ति ररुणा विश्वजन्या॥१३॥ —त्रिपुरोपनिषद

उसका अंकुश मधु की तरह अत्यंत मधुर है। क्रूर भी उस पाश में बँध जाते हैं। पाँच बाणों वाले काम-धनुष में वह अरुणा सबको अपनी मुट्ठी में रखती है।

सौंदर्यलहरी के कतिपय श्लोकों में कुण्डलिनी के कामबीज की महत्ता और उसकी उपलब्धियों की ओर संकेत किया है। नीचे उनमें से कई श्लोक इसलिए दिए जा रहे हैं कि आत्मसाधना के पथ पर चलने वाले पथिक यह समझ सकें कि अपने अन्तरंग में भरी हुई क्षमता का श्रेष्ठतम लाभ कैसे उठाया जा सकता है। कामबीज का भोंड़ा लाभ तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग सभी उठाते हैं। पर यदि उसका विशिष्ठ उपयोग संभव हो सके, तो उससे असंख्य गुनी आनन्द, उल्लास भरी उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। कुण्डलिनी जागरण से जहाँ ब्रह्मानंद की हिलोरें अन्तःकरण को विभोर करती हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी है कि शारीरिक आनंद को न केवल उत्साहवर्धक बना सकें, वरन् उपयोगी भी बना सकें। ऐसे हास-विलास शरीरों की जितनी क्षति करते हैं, उससे अनेक गुनी उपलब्धियाँ भी लाकर रख देते हैं। इस प्रकार उस शक्ति का भौतिक उपयोग भी उतना ही आनंदमय, उत्साहवर्धक और लाभदायक बन जाता है, जिससे गृहस्थ और ब्रह्मचर्य का समन्वित लाभ प्राप्त किया जा सके। कुण्डलिनी विद्या को इसीलिये भुक्ति और मुक्ति उभयसंपदाएँ प्रदान करने वाली कहा गया है —

पूज्याविभावती सौम्या भोगिनीं भोगशायिनी॥९६॥

त्रैलोक्यसुन्दरीन्म्यासुन्दरीकामचारिणी॥९७॥ —कूर्म पुराण

वह दीप्तिमान देवी सौम्या, भोगिनी, भोगशायिनी, त्रैलोक्य सुंदरी, रम्य, सौम्यरूपा और कामचारिणी है।

यद्वा मण्डलाद्वा स्तन विम्वमेकं मुखं चाथ स्त्रीणि गुहासदनानि। कामी कलां काम रूपां चिकित्वा नरो जायते काम रुपश्च कामः॥ — त्रिपुरोपनिषद् ॥११॥

जो स्तन मुख की तरह गोल तथा एक मुख वाला है। उसके नीचे तीन गुहा सदृश घर बने हुए हैं। ऐसी कामकला का कोई कामी मनुष्य उपभोग करता है तो उसकी कामनापूर्ण होती है और वह स्वयं कामरूप हो जाता है। कुण्डलिनी जागरण का वास्तविक लाभ तो आन्तरिक शक्तियों का अभिवर्धन ही है। ऐसा अभिवर्धन जिसमें रूखापन, नीरसता, सूनापन, उदासीनता नहीं, वरन् पग-पग पर हर्षोल्लास का हास-परिहास का साधन विद्यमान है। सौंदर्यलहरी में इसी तथ्य का प्रतिपादन करने वाली कुछ भगवान् शंकराचार्य की अनुभूतियाँ है, जो समझने योग्य हैं —उनमें से कुछ नीचे देखिये।

अराले: स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः। परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुहरुचिम्॥

दरस्मेरे यस्मिन्दशनरुचिकिंजल्करुचिरे। सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः॥

भावार्थ-बल खाती हुई कटी, भ्रमरी जैसी चंचलता; अलकावलि से आच्छादित मुख, कमल पुष्पों जैसा परिहास; स्फटिक जैसे दाँतों से युक्त हे देवि, तेरी मुस्कराहट के समय निकलने वाली सुगंध से कामदहन करने वाले शिवजी भी भ्रमर की तरह उन्मत्त हो जाते हैं।

संकेत—मन को सिकोड़कर बैठे हुए, निष्क्रिय, निराश और नीरस लोग भी कुण्डलिनी की स्फुरणा प्राप्त करके इठलाते हुए, भ्रमरी जैसे सक्रिय अलकावलि जैसे स्निग्ध, शोभित, बढ़ चलने वाले, हँसमुख स्वभाव और अपनी वाणी से सर्वत्र सुगंध फैलाने वाले बन जाते हैं और निष्क्रिय लोगों को भी आशा और स्फूर्ति की उमंग से उन्मत्त कर देते हैं।

गते कर्णाभयर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती। पुरां भेतुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले। इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके। तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः।

भावार्थ-तेरे विशाल नेत्र कानों तक जा पहुँचे हैं और दो पलकों को पंखों की तरह धारण किये हुए हैं। यह कान तक तने हुए कामदेव के पुष्पबाण शिवजी के चित्त को भी अशांत कर देते हैं।

संकेत—कुण्डलिनी-साधक का दृष्टिकोण विशाल, परिष्कृत और दूरदर्शी हो जाता है। विशाल नेत्र अर्थात् विशाल हृदय एवं विशाल दृष्टिकोण का विस्तार। उन पर मर्यादा और लोकहित के दो बंधन अर्थात् पलक पंख। इस आंतरिक सुसंपन्नता से समर्थ बना हुआ साधक अपने प्रतिपादन पर भगवान का भी सिंहासन हिला सकता है। और ईश्वर की भी निष्क्रियता को उसी तरह क्रियाशील बना देता है जैसा कि कामदेव ने शिवजी के चित्त को भी अशांत कर दिया था।

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं, पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत्। स्मरो अपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा, मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम्॥

भावार्थ-पूर्वकाल में विष्णु ने तुम्हारी आराधना करके मोहिनी रूप पाया और शिवजी के मन में भी काम विकार उत्पन्न कर दिया। कामदेव भी तुम्हारी ही आराधना से अपनी पत्नी का नयनाभिराम बना हुआ है और बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी क्षोभ उत्पन्न करता रहता है।

संकेत—मोहिनी वह जो दूसरों को मोहित कर ले, पर स्वयं मोहित न हो। योग साधना से मनुष्य में वे सद्गुण विकसित होते हैं, जिनके कारण दूसरे सभी लोग उससे प्रभावित एवं आकर्षित होते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण हो जाने पर मनुष्य स्वभावतः सम्मान और श्रद्धा का केन्द्र बन जाता है, यही व्यक्ति का मोहिनी रूप है। इस सफलता को पाने के साथ-साथ आत्मवेत्ता स्वयं किसी पर मोहित नहीं होता। न व्यक्ति न पदार्थ दोनों में उसे आकर्षण नहीं होता। वह तो अपनी आत्मा पर ही मोहित रहता है, इसलिए उसका प्यार  कर्त्तव्य एवं आदर्श की परिधि में सीमाबद्ध हो जाता है। ऐसी मोहिनीवृति कुण्डलिनी साधना के प्रभाव से उपलब्ध होती है।

कुण्डलिनी जागरण के साथ−साथ कामवृति का भी परिष्कार होता है। बहिर्मुखी लोगों के मन में उससे काम-क्षोभ भी उत्पन्न हो सकता है और बढ़ सकता है। पर विज्ञसाधक उसे रचनात्मक प्रयोजन में मोड़कर जीवन को अधिक सरस एवं उल्लसित बना लेते हैं।

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पंचविशिखा, वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः। तथाप्येकः सर्वेमहिगिरी सुते कामपिं कृपामपांगात्ते लब्ध्वा जगदिदमनंगो विजयते॥

भावार्थ—कामदेव पुष्पों का धनुष, भ्रमरी की रस्सी, पाँच विषयों के बाण, वसंत रूपी सेनापति, मलयगंधरूप रथ में बैठकर—शरीर न रहते हुए भी सारे जगत को अकेला जीत लेता है। उस कामदेव को यह सामर्थ्य तुम्हारी कृपा से ही प्राप्त होती है।

संकेत—कुण्डलिनी का केंद्र जननेंद्रिय मूल में रहने से कामप्रवृत्ति का प्रदीप्त होना स्वाभाविक है। यह प्रवृत्ति इच्छा और क्रिया दोनों का सृजन करती है। मस्तक में उपस्थित ज्ञानकेन्द्र के निर्णयों को आकांक्षा एवं क्रिया के रूप में बदल देना इसी शक्ति का कार्य है। कामप्रवृत्ति मनुष्य का मन, शरीर और स्वभाव सभी प्रफुल्लित, आशान्वित एवं स्फूर्तिवान रहते हैं। इसका सदुपयोग होने से व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से कामदेव सरीखा आकर्षक हो जाता है। पुष्पों की तरह हँसता, मुस्कुराता मुख, भ्रमर जैसी दिव्य रसिकता, पाँचों ज्ञानेंद्रिय का निग्रह, मलयगंध जैसी प्रवृत्ति से सम्पन्न होने वाला व्यक्ति अकेला ही संसार को  प्रभावित कर सकता है। कामप्रवृत्ति के सदुपयोग का  यही स्वाभाविक परिणाम है। कुण्डलिनीशक्ति की कृपा से यह उपलब्धियाँ सहज ही संभव हो जाती हैं।

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जड़ं, तवापांगालोके पतितमनुधावन्ति शतशः। ग्लद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्त्रस्तसिचया, हठात् त्रुट्यत्कांच्यो विगलितदुकूला युवतयः॥

भावार्थ—वृद्ध, कुरूप, क्रीड़ा से अनभिज्ञ जड़ मनुष्य भी तुम्हारी दृष्टि पड़ने पर इतना कमनीय और रमणीय हो जाता है कि अनेक युवतियाँ उसके पीछे असंयमी होकर अस्त-व्यस्त की तरह भागने लगती हैं।

संकेत—मानसिक दृष्टि से निराश को वृद्ध, दुर्गुणी को कुरूप और नीरस, कर्कश स्वभाव वाले को मूढ़ कहते हैं। ऐसा व्यक्ति भी कुण्डलिनी साधना से सहृदय, सज्जन, सद्गुणी और सरस बनकर एक प्रकार से अपना आंतरिक कायाकल्प ही कर डालता है। सिद्धियाँ और सफलताएँ— ऋद्धि और सिद्धियाँ उसके पीछे ऐसे ही भागती हैं, जैसे कुलटा नारियाँ किसी रूप, सौंदर्य सम्पन्न आकर्षक स्वभाव वाले कामुक युवक के पीछे बिना बुलाए ही फिरने लगती हैं।

मुखं विन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो, हकारार्द्धं ध्यायेद्धरमहिषि ते मन्मथकलाम्। सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु, त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रविन्दुस्तनयुगाम्॥

भावार्थ—तेरी काम कला के प्रभाव से मनुष्य के लिए स्त्रियों के मन में तु्रंत क्षोभ उत्पन्न कर देना बाँये हाथ का खेल होता है। सच तो यह है कि तेरी साधना करने वाला इन सूर्य-चन्द्ररूपी दो स्तनों वाली प्रकृति-तरुणी को भी अपने इशारे पर नचा सकता है।

संकेत—महाशक्ति की साधना से उत्पन्न आकर्षण प्राण- प्रवाह (काम) के प्रभाव से अनेक सत्प्रवृत्तियाँ और सफलताएँ आकर्षित होने लगती हैं। जैसे खिले हुए फूल पर तितलियाँ और मधुमक्खियाँ मंडराती हैं वैसे ही उस साधक को विभूतियों का दुलार और सहयोग अनायास ही सब ओर से प्राप्त होता है। यह प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है और परिस्थितियाँ उसके इशारे पर नाचती, बदलती, सँभलती रहती हैं।

एक गाथा यह प्रचलित है कि एक बार शंकराचार्य के पिताजी कहीं प्रवास में गए और अपनी अनुपस्थिति में अपनी पत्नी को भगवती के विग्रह की पूजा करते रहने का निर्देश कर गए। इसी बीच एक दिन शंकराचार्य की माताजी पूजा न कर सकीं, तो उन्होंने बालक को दूध लेकर भगवती का भोग लगाने भेजा। भोग लगाया पर दूध ज्यों का त्यों रखा रहा। तब बालक ने रोकर पीने की प्रार्थना की। भगवती ने उसे पी लिया। अब बालक को और व्यथा हुई। भोग से बचा दूध उन्हें मिलता था, वह तो भगवती पी गई, उसे खाली हाथ रहना पड़ा। दूध न मिलने के कारण रोते हुए शंकराचार्य को भगवती ने छाती से लगा लिया और उसे स्तन पान कराया। इसे पीते ही वे प्रचंड विद्वान और प्रखर कवि हो गए और अद्भुत रचनाएँ करने लगे। इसी घटना का संकेत सौंदर्य लहरी के श्लोक 75 में मिलता है। इस गाथा की चर्चा कैवल्य शर्मा ने अपनी टीका में की है।

श्री शंकराचार्य की भावविभोरता देखते ही बनती है। महाशक्ति के अनुग्रह से वे जिस प्रकार कृतकृत्य हुए और उन्होंने उसकी महान संभावनाओं तथा अनुकंपाओं का स्वरूप समझा, उसे देखते हुए यह भावविभोरता उचित भी है।

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः। सुधा सूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्ध्यरचना॥

स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं। त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियं॥

भावार्थ—तुम्हारी ही दी हुई वाक् शक्ति से तुम्हारी ही स्तुति करना, सूर्य को दीपक दिखाना, ओस से चन्द्रमा को अर्घ चढ़ाने अथवा समुद्र के ही जल-कणों से महासागर करने जैसा ही बाल-प्रयास है।

संकेत—मनुष्य के पास जो कुछ है सो सारा वैभव इस कुण्डलिनी नाम से संबोधित पराशक्ति का ही है। तुम्हारी दी हुई वाणी, काया, चेतना तथा सामग्री से ही तुम्हारा स्तवन वंदन कैसे हो ? इसका विकल्प यही है कि साधक अपना आत्मसमर्पण इस सत्ता के चरणों में करके उसी के दिव्य संकेतों के अनुरूप दिव्य जीवन जीने के लिए कदम बढ़ाए और सच्ची साधना करने वाले सच्चे साधक को लोक-परलोक में आनन्द-उल्लास भरा रखने वाली परम गति को प्राप्त करे।

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः। पयः पारावारः परिवहति सारस्वतमिव॥

दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता॥

भावार्थ—तेरे स्तनों से बहने वाले ज्ञानामृतरुपी पयपान करके यह द्रविण शिशु (शंकराचार्य) प्रौढ़ कवियों जैसी कमनीय कविताएँ रच सकने में समर्थ हो गया।

संकेत—श्री आद्य शंकराचार्य अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मैं तुच्छ-सा द्रविड़वंश का बालक कुण्डलिनी माता का ज्ञानामृतरूपी पयपान करने के कारण इतना समर्थ हो गया कि बचपन में ही प्रौढ़कवियों जैसा साहित्यसृजन करने लगा। ऐसा ही मेधा-प्रगति का लाभ दूसरे श्रद्धावान साधक भी उठा सकते हैं।

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमात्मानुसदृशी— ममन्दं सौन्दर्य्यस्तवकमकरन्दं विकिरति। तवास्मिन् मन्दारस्तवकसुभगे यातु चरणे, निमज्जनमज्जीवः करणचरणैःषट्चरणताम्॥

भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ।

संकेत—श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही कामना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमात्मानुसदृशी— ममन्दं सौन्दर्य्यस्तवकमकरन्दं विकिरति। तवास्मिन् मन्दारस्तवकसुभगे यातु चरणे, निमज्जनमज्जीवः करणचरणैःषट्चरणताम्॥ भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ।

संकेत—श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही कामना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचनं, गतिः प्रादक्षिण्यं भ्रमणमदनाद्याहुतविधिः। प्रणामः सम्वेशः सुखमखिलमात्मार्पणदशा, सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम्॥

भावार्थ—हे माँ ! मेरे सभी वाक्य जप हों, हाथों की सभी क्रियाएँ मुद्रा हों, हर कदम प्रदक्षिणा हों, आहार के ग्रास आहुतियाँ हों, मेरे प्रणाम तुम में तादात्म्य हों, मेरे सभी सुख तुम्हारी अखिल आत्मा में समर्पित हों, मैं जो कुछ भी करूँ सो सभी तुम्हारी पूजा में गिने जाएँ।

संकेत—कुण्डलिनी शक्ति से उपलब्ध आत्मिक शक्ति एवं उत्कृष्ट विचारणा के आधार पर साधक की विचारणा तथा क्रिया देवोपम हो जाती है और उसके द्वारा सोचा गया प्रत्येक विचार, कार्य भगवान की आराधना जैसा ही मंगलमय होता है। मनुष्य शरीर में देवत्व का उदय करने में कुण्डलिनी शक्ति का अनुपम योगदान मिलता है। श्री शंकराचार्य ने बहुत कुछ पा लेने के बाद अंतिम रूप में यह माँगा है कि वे सर्वतोभावेन महाशक्ति में ही लीन हो जाएँ।

व्यास जी बोलते गए और गणेश जी लिखते गए  इस प्रकार जब महाभारत पूरा हो गया तो व्यासजी ने कहा—"मैंने चौबीस लाख शब्द बोले, पर आप उस समय में सर्वथा मौन रहे। एक भी शब्द न कहा।" गणेश जी ने कहा—"बादरायण, सभी प्राणियों में सीमित प्राण शक्ति है। जो उसे संयमपूर्वक व्यय करते हैं, वे ही उसका समुचित लाभ उठा पाते हैं। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है-वाचोगुप्ति अर्थात् वाणी का संयम।"


संघर्ष, प्रलय, महासंघर्ष और फिर एक नया युग

'प्रकृति को इतना क्रुद्ध पहले कभी नहीं देखा गया होगा जितना वह 20 वीं शताब्दी के अंत में देखी जाएगी। जल के स्थान पर पृथ्वी, पृथ्वी के स्थान पर जल, प्रलय जैसी स्थिति के बाद दुनिया में थोड़े से अच्छे लोग संसार को अच्छा बनाएंगे।

युग बदलने वाली शक्ति न तो राजसत्ता होगी और न कोई वाद, वह होगी मानवीय अन्तःकरण को छूने वाली—भाव-वृत्ति।'   —नौस्ट्राडम

फ्रांस के मिलन नगर की बात है और घटना सन् १५१५ की है, जब एक रास्ते से कई पादरी गुजर रहे थे। बारह वर्ष का एक लड़का उनके पास आया। दूसरे लोग तो उन पादरियों में जो सबसे बड़ा था और आगे-आगे चल रहा था, उसको झुककर प्रणाम करते थे, किन्तु यह छोटा सा बच्चा उन पादरियों की मंडली के बीच में घुस गया और उनमें से एक तरुण संन्यासी के पैरों में लोट गया।

लोगों को आश्चर्य हुआ कि बच्चे ने एक साधारण पादरी को शीश झुकाया, जबकि अन्य उससे बड़े थे उन्हें प्रणाम क्यों नहीं किया? एक व्यक्ति ने प्रश्न किया—"बेटा ! इन महात्मा जी (पादरी) में क्या विशेषता देखी, जो बाकी सबको छोड़कर इन्हें प्रणाम किया।" बच्चे ने बहुत सरल किन्तु दृढ़ वाणी में उत्तर दिया-”आप लोग नहीं जानते,यह तो हमारे होने वाले 'पोप' महोदय हैं।

लोग हँस पड़े। हँसना ठीक भी था। उस युवक में विशिष्टता का एक भी तो लक्षण ऐसा नहीं था, जिसके आधार पर संभावना की जाती कि वह महाशय पोप बनेंगे।किन्तु सन् 1585 में जब फेली पेरेत्ती नामक यही युवक पोप चुना गया तो लोग आश्चर्यचकित रह गए और कहने लगे उस बच्चे ने इस अनिवार्य संभावना को कैसे जान लिया था?

यह बालक कोई सामान्य बालक नहीं था, वरन् अपने बल रूप में फ्रांस के सुप्रसिद्ध ज्योतिष नोस्ट्राडम थे, जिन्होंने 16 वीं शताब्दी में 20 वीं शताब्दी तक की लगभग 1000 भविष्यवाणियाँ की हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ पिछले पाँच सौ वर्षों से सारे संसार को प्रभावित करती रही हैं, पर अब जबकि एक शताब्दी पुरानी होकर दूसरी नई शताब्दी आ रही है, तब उनकी भविष्यवाणियों का महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है। प्रस्तुत पंक्तियों में उन्हीं के अतीन्द्रिय पूर्वाभासों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

नौस्ट्राडम का जन्म फ्रांस के सेंट रेमी नामक स्थान में 13 दिसम्बर 1503 में हुआ। यह तो होता है कि किसी में पूर्वजन्मों से मिले विरासत—संस्कार किसी विशेषता के रूप में प्राप्त हो जाते हैं, पर उनकी पूर्णता और परिपक्वता के लिए इस जीवन में भी सीमित विशेषताओं का परिष्कार और अभिवर्धन करना पड़ता है। नौस्ट्राडम में भूत और भविष्य को देखने की क्षमता बाल्यकाल से ही संस्काररूप में थी। उन्होंने ईश्वर भजन द्वारा आत्मा को निर्मल बनाकर विविध साधनाओं और स्वाध्याय द्वारा अपनी इस क्षमता का और भी अधिक विकास किया। उन्होंने ज्योतिर्विज्ञान पढ़ा, दर्शन पढ़ा और संसार की परिस्थितियों का ज्ञान प्राप्त किया और इस तरह उनकी प्रतिभा और भी चमकती चली गई। वे उस युग के मूर्धन्य ज्योतिषी और अतीन्द्रिय दृष्टा माने जाने लगे।

उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि 20 वीं शताब्दी में जर्मनी में एक ऐसे तानाशाह का प्रादुर्भाव होगा जो सारे योरोप में प्रलयंकारी ताण्डव दृश्य उपस्थित कर देगा। इसका नाम 'हिस्टर' होगा और सचमुच ही कुल एक अक्षर के अन्तर से 'हिटलर' का प्रादुर्भाव जर्मनी में इसी रूप में हुआ। इसी प्रकार की उनकी दूसरी भविष्यवाणी थी कोर्सिका (फ्रांस) में जन्म लेने वाले एक वीर सिपाही की, जिसके बारे में उन्होंने कहा था—"यह व्यक्ति एक अद्वितीय इतिहासकार होगा। सिपाही से उन्नति करते हुए वह 25 वर्ष की आयु में ही सम्राट बन जाएगा। इसकी वीरता के सम्मुख अंग्रेज काँप जाएँगे, पर एक दिन वह गिरफ्तार हो जाएगा और उसका पतन हो जाएगा।" इसका नाम उन्होंने 'नैपोलियन' ही बताया था और सचमुच नैपोलियन बोनापार्ट ऐसा ही हुआ जैसा कि नौस्ट्राडम ने भविष्यवाणी की थी। उनकी भविष्यवाणियों का विस्तृत उल्लेख 'माइकेल डी नौस्ट्राडम की शताब्दियाँ-और सच्ची भविष्यवाणियाँ'—(सेन्च्युरीज एण्ड ट्रू प्रोफेसीज आँफ दि माइकेल डी. नौस्ट्राडम) पुस्तक में मिलती हैं। 'दि न्यूज रिव्यू' नामक पत्रिका समय-समय पर इन भविष्यवाणियों को छापती और उनकी सत्यता का प्रतिपादन करती रहती है।

20 वीं शताब्दी का सर्वाधिक उल्लेख करने वाले इस महान भविष्य दृष्टा ने लिखा है—”20 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विज्ञान का विकास इतना अधिक हो जाएगा कि अधिकांश-सारी दुनिया नास्तिक हो जाएगी। सामाजिक आचार-विचार भू-कुंठित हो जाएँगे। चरित्र नाम की कोई वस्तु नहीं रह जाएगी। फैशन की धूम मचेगी। घरों में लोग नाम मात्र को रहने वाले रह जाएँगे। अधिकांश लोग इधर-उधर घूमने और गलियों में भोजन करने वाले हो जाएँगे। इन परिस्थितियों में अपनी तरह का 'एक' विश्व विख्यात व्यक्ति किसी महान धर्मनिष्ठ पूर्वी देश में जन्म लेगा। यह व्यक्ति अकेला ही अपने छोटे-छोटे सहयोगियों के द्वारा सारे संसार में तहलका मचा देगा। यह ऐतिहासिक महापुरुष एक ऐसे महासंघर्ष को जन्म देगा कि घर-घर और नगर-नगर अन्तर्द्वन्द्व छिड़ जाएगा। इस अन्तःक्रांति का समय 20 वीं शताब्दी के अंत और 21 वीं शताब्दी के प्रारम्भ का है। उसके बाद संसार में सर्वत्र मानवता का आधिपत्य होगा। लोग आसुरी वृत्तियों का परित्याग कर देंगे और संसार स्वर्गतुल्य सुखमय बन जाएगा।”

नौस्ट्राडम की यह भविष्य वाणी भी सच होकर रहेगी इसके प्रमाण (1) एकबार उन्होंने भविष्यवाणी की—तीन महीने के बाद फ्रांस में भयंकर प्लेग फैलेगा, जिसमें लाखों लोगों की मृत्यु होगी। तीन माह तक एक भी ऐसी घटना नहीं घटी। 91 वें दिन पहली बार पेरिस में प्लेग होने की छोटी-सी सूचना मिली। उसके बाद ही इस महामारी ने इतना जोर पकड़ा कि सारे फ्रांस में तहलका मच गया और इस तहलके के साथ ही नौस्ट्राडम की प्रसिद्धि सारे योरोप में फैल गई।

(2) प्लेग समाप्त हो चला तब उनसे किसी ने पूछा—"अगली बड़ी घटना क्या होगी।" ”सम्राट की मृत्यु”— उन्होंने कहा। लुई को सिंहासनारूढ़ हुए मुश्किल से 3 या 4 वर्ष हुए थे। उनका शरीर स्वास्थ्य भी अच्छा था। एक ही माह के अंदर साधारण सी 'मधुमेह' की बीमारी के कारण उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई; जबकि इस बात की कतई संभावना नहीं थी।

(3) इसके बाद उन्होंने फ्राँस की 'मेजीनाट लाइन' के नष्ट होने की भविष्यवाणी की, जो सत्य हुई।

(4) जर्मनी के विभक्त होने की भविष्यवाणी सत्य हुई। अमरीका के एक के बाद एक कई राष्ट्रपति मारे गए। इसकी चेतावनी नौस्ट्राडम बहुत पहले ही दे गए थे।

20 वीं शताब्दी के बारे में उनका कहना था कि “प्रकृति को इतना क्रुद्ध पहले कभी नहीं देखा गया होगा, जितना वह 20 वीं शताब्दी के अन्त में देखी जाएगी। जल के स्थान पर पृथ्वी, और पृथ्वी के स्थान पर जल, प्रलय जैसी स्थिति बनकर सामने आवेगी। कहीं अतिवृष्टि कहीं अनावृष्टि, कई ज्वालामुखी और स्थान-स्थान पर सैनिक-क्रांतियाँ होंगी।

तब संसार को बदलने वाली एक अद्भुत शक्ति सक्रिय होगी। वह न तो किसी देश की राजसत्ता होगी न कोई वाद या पंथ होगा, वरन् एक ऐसा व्यक्ति होगा जो अपनी भावनाओं की सौजन्यता द्वारा ही सारे संसार को एकता के सूत्र में बाँध देगा। उसके बाद दुनिया में इस तरह का अमन स्थापित होगा, जितना आज तक संसार में कभी भी देखा-पाया न गया होगा।

इतिहास के इस अद्वितीय महापुरुष के बारे में नौस्ट्राडम ने भी कुछ संकेत दिए हैं, जैसे उसके मस्तक पर चन्द्रमा और पाँव में पद्म होगा होगा। वेषभूषा बहुत ही सादी होगी। दो विवाह होंगे, दो पुत्र होंगे, दो ही पुत्रियाँ होंगी-और दो बार ही वह स्थान-परिवर्तन करेगा। दोनों बार अपने निवास से उत्तर दिशा की ओर ही स्थान-परिवर्तन करेगा।

सन् 1566 के जुलाई मास में, सबसे अधिक भविष्यवाणियाँ करने वाला यह प्रसिद्ध भविष्यदृष्टा, एक दिन शाम को अपने कमरे में बैठा कुछ सोच रहा था। एकाएक कुछ सोचकर उसने घर के सभी लोगों को बुलाया और कहा—" देखो जी ! आज की रात मेरे जीवन की अन्तिम रात है। मैं सवेरा नहीं देख पाऊँगा पर तुम लोग मेरी मृत्यु पर दुख न करना। मैं भगवान् के काम में हाथ बँटाने के लिए जा रहा हूँ। धरती पर फिर से आऊँगा, सम्भव है तब तुम लोगों में से कोई मेरा सहयोगी—सम्बन्धी हो या नहीं पर भगवान् का घर तो सारा संसार है। मैं उनकी सहायता कर रहा होऊँगा, इसलिये मेरी मृत्यु को सब लोग शुभ मानना।

कोई खाँसी नहीं कोई बुखार नहीं। नौस्ट्राडम के इस कथन ने सबको विस्मित तो किया, पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ। नौस्ट्राडम प्रतिदिन की भाँति ही सोए, पर जो जीवन औरों के लिए भविष्यवाणियाँ करता रहा, अपने प्रति की गई उसकी भविष्यवाणी भी गलत कैसे होती। उस रात सोने के बाद उनकी नींद सचमुच टूटी ही नहीं। भोर की प्रतीक्षा करते हुए उन्होंने इस संसार से विदा ली, वह अब आया है। पता नहीं युगनिर्माताओं की किस श्रेणी में चुप-चाप महाकाल के युग प्रत्यावर्तन  में (उनकी आत्मा) महाकार्य में सहयोग कर रही हो, योगदान दे रही हो।


जेन-एडम्स

समर्थ होते हुए भी किसी दु:खी अथवा आवश्यकतापीड़ित व्यक्ति की सहायता न करने वालों को क्या कहा जाएगा और क्या कहना होगा उन उपकारी आत्माओं को जो अपने सारे साधन मनुष्यों की मदद के लिए मुक्त कर देते हैं। अठारह वर्षीया छात्रा जेन-एडम्स ऐसी ही महान् आत्माओं में से थीं, जिसने दूसरों का दु:ख दूर करने के लिए अपने घर के द्वार खोल दिए थे।

घटना 1883 की है। अमेरिका के शिकागो शहर की छात्रा जेन-एडम्स उस समय लन्दन के एक कॉलेज में अध्ययन कर रही थीं। वह छात्रावास से बहुधा कॉलेज पैदल ही जाया करती थी। इसका कारण यह नहीं था कि उसके पास सवारी के लिये पैसों की कमी थी। वास्तविक कारण यह था कि वह रास्ते में दु:खी, असहाय एवं आवश्यकतापीड़ित व्यक्तियों को देखती और उनका दु:ख-दर्द पूछती हुई जाया करती थी। उसे अपने इस कार्य से बड़ी आत्मिक सांत्वना मिला करती थी। उसका हृदय कोमल तथा करुणापूर्ण था। वह दीन-दु:खियों की सहायिका बनकर अपने मानव जीवन को सार्थक बनाना चाहती थी। उसका नित्य का यह कार्यक्रम उस भविष्य की भूमिका थी, जिसमें वह जन सेवा करने का विचार किए हुए थी।

एक दिन उसने देखा कि एक बालक किताबों के अभाव में स्कूल न जा सकने के कारण बुरी तरह रो रहा है। उसने फुटपाथों पर पड़े असहाय रोगियों को रोते-कराहते देखा। उसने देखा कि बेरहम मालिक —भाड़ा न चुका सकने की विवशता के कारण वर्षा से भीगी घोर जाड़ों की रात में किराएदार को धक्का देकर बाहर निकाल रहा है और सामान फेंक रहा है। उसने देखा कि शिक्षा के अभाव में उसके पड़ोस की स्त्रियाँ बुरी तरह लड़ती झगड़ती और गाली-गलौज करती हैं। उसने ऐसे और अपाहिजों को भी देखा, जो दानों के लिए मुँह बायें दम तोड़ रहे हैं।

कुमारी जेन-एडम्स के हृदय से एक आह निकल पड़ी और उसकी आत्मा कह उठी— “मानवता की यह दशा।” जेन ! जिनको तेरी सहायता की आज और अभी आवश्यकता है, उनको तू भविष्य के लिए टाल रही है। कल किसने देखा है। जो कुछ कर सकती है, इनके लिए आज, अभी कर। कुमारी जेन-एडम्स के इन छोटे-छोटे परोपकारी कार्यों की अंतर महानता ने उसे एक विख्यात समाज सेविका बना दिया।


अपनों से अपनी बात

गुरुदेव के जीवन दर्शन की चर्चा,उनकी स्तुति प्रशस्ति के लिए नहीं, वरन् इसलिए  करनी पड़ रही है कि उसे आधुनिक परिस्थितियों में आत्म विकास का सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित और प्रत्यक्ष शास्त्र कहा जा सकता है। वे भेजे ही इसलिए गए कि विडंंबना और भ्रम से भरे हुए आज के तथाकथित अध्यात्म की निरर्थकता ने जनमानस में जो अश्रद्धा और अविश्वास का वातावरण प्रस्तुत कर दिया है, उसका निराकरण किया जा सके।

आत्मशोधन की तपश्चर्या से अपना उद्धार आप करने के राजमार्ग को छोड़कर जो स्वल्पकाल में स्वल्पश्रम से अपरिमित लाभ पाने के लिये अधीर हो उठे हैं और ऐसे जादू भरे तंत्र-मंत्र ढूंढ़ते हैं, जिनके आधार पर वे मनचाहे लाभ प्राप्त कर सकें, उन्हें यह नोट कर लेना चाहिए कि बहुमूल्य वस्तुएँ उचित मूल्य चुकाने पर ही मिलती हैं। असली हीरे की अँगूठी दस पैसे की नहीं मिलती। यदि मिलती हो तो समझना चाहिए कि नकली है और बेचे जाने पर उसकी एक पाई भी वसूल न होगी। जादू की तरह तुर्त-फुर्त चमत्कार दिखा सकें, ऐसे कर्मकांडों की तलाश में भटकने वाले लोगों को गुरुदेव यह बताना चाहते हैं कि सिद्धियों और विभूतियों का गरिमा और महिमा का राजमार्ग आत्मशोधन और आत्म निर्माण की चाल से चले बिना पूरा नहीं हो सकता। कोई सीधी पगडंडी ऐसी नहीं है, जो देवता, मंत्र, गुरु या संप्रदाय का पल्ला पकड़ने से सहज ही परम लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। अध्यात्म एक क्रमबद्ध विज्ञान है जिसका सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति उसी तरह लाभान्वित हो सकता है जिस तरह कि बिजली, भाप, आग आदि की शक्तियों का विधिवत् प्रयोग, करके अभीष्ट प्रयोजन पूरा किया जाता है।

समझा जाता है कि किसी समर्थ मार्गदर्शक, देवता या मंत्र की कृपा से अद्भुत शक्तियाँ मिलती हैं और साधना से चमत्कारी आत्मिक प्रगति का अवसर मिल जाता है। यदि यह तथ्य सच हो तो भी उसके मूल में व्यक्ति की पात्रता वाली शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। गुरुदेव ने उसी गायत्री मंत्र की उपासना की, जिसे संध्यावंदन के समय आमतौर से सभी धर्मप्रेमी हिंदू जपा करते हैं। उनका भी इष्ट वही सविता देवता था जिसे उपासना करने वाले सामान्य तथा नित्य ही जल चढ़ाते और प्रणाम करते हैं। समर्थगुरु उन्हें मिले पर ऐसे सिद्ध पुरुषों से यह पृथ्वी रहित नहीं है। और यह भी निश्चित है कि उनका द्वार सभी के लिए खुला पड़ा है। बादल सर्वत्र बरसते रहते हैं। तालाब लाखों मन पानी जमा कर लेते हैं पर पत्थर की चट्टान पर एक बूँद भी नहीं ठहरता। सूर्य सबके लिये गर्मी, रोशनी लेकर उदय होता है, पर जिसने अपनी खिड़की, दरवाजे बंद कर रखें हैं, उसे कुछ लाभ सूर्य देवता भी नहीं पहुँचा पाते। मंत्र और देवताओं में कोई शक्ति न हो—साधना-उपासना का कोई परिणाम न निकलता हो, सो बात नहीं है। प्रश्न पात्रता का है। अधिकारी के पास उपयुक्त साधन अनायास ही खिंचते चले आते हैं। फूल के पास कितनी मधुमक्खी और भौंरे बिना बुलाए ही मंडराने लगते हैं। चुम्बक अपने समीपवर्ती लोह-कणों को सहज ही खींच लेता है। साधक की पात्रता में ही चमत्कार भरा रहता है, जिसके आधार पर मंत्रदेवता और सहायक को सहज ही द्रवित होकर अभीष्ट सामर्थ्य प्रदान करने का वरदान देना पड़ता है।

गुरुदेव गायत्री महामंत्र के माध्यम से ऋतंभरा प्रज्ञा और ब्रह्मवर्चस्व की साधना करते थे। इन तत्वों को वे आत्मदेवता में ही समाविष्ट मानते थे। कहते थे निकट तपोवन अपना अन्तःकरण ही है, यहीं एक ब्रह्मचेतना में तादात्म्य स्थापित करने का जो प्रयत्न किया जाता है वही सच्ची साधना है। विश्वव्यापी देवसत्ता का प्रतिनिधित्व अपनी अन्तःचेतना करती है सो उसे ही मना लिया जाए, उठा लिया जाए, तो फिर इस संसार की कोई ऐसी वस्तु शेष नहीं रह जाती जो प्राप्त न की जा सके। ईश्वर के राजकुमार मनुष्य के लिए अपने पिता की हर संपदा का अधिकार सहज ही प्राप्त है। पात्रता के उपयोग के प्रयोजन की उत्कृष्टता सिद्ध करके कोई भी विभूतियों के भंडार में से कुछ भी प्राप्त कर सकता है। ऐसा उनका विश्वास था, ऐसा ही कहते मानते रहते थे। गुरुदेव की साधना-पद्धति को जितना मैंने देखा-समझा, इतना अवसर शायद ही और किसी को मिला हो। 24 वर्ष तक हर वर्ष 24 लक्ष का गायत्री महापुरश्चरण वे करते रहे। सर्वसाधारण को इस संदर्भ में इतनी भर जानकारी है कि प्रतिदिन छः घंटा बैठकर वे 11 माला प्रति घंटा के हिसाब से 66 माला का गायत्री जप करते थे। परम सात्विक पाँच मुट्ठी आहार पर निर्भर रहते तथा अनुष्ठानकाल में प्रयुक्त होने वाले बंधन प्रतिबंधों का कठोरता से पालन करते थे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल और दृश्य साधना थी। जितना देखा जा सके मोटे तौर से उतना ही तो समझा जा सकता है। उनका बाह्य-उपासना में इतना ही दीखता था, सो समझने वाले उतना ही समझ सकते थे। पर वस्तुतः उनकी साधना इन क्रियाकलापों तक ही सीमित नहीं थी, वरन् काया के कर्मकाण्डात्मक क्रियाकलापों से बहुत आगे बढ़कर मन और प्राण की सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर की परिधि  प्रवेश कर गई थी।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, विज्ञानमय कोश जागरण, अनावरण की विधि-व्यवस्था है। इसका कर्मकांड और  विधि- विधान तो समयानुसार गुरुदेव स्वयं ही बता देंगे पर उनकी अतिनिकिटवर्ती सहचरी होने के कारण मैं इतना ही कह सकती हूँ कि अपनी पाँचों इन्द्रियों और पांचों मनः संस्थानों का परिष्कार करने में उन्होंने अथक परिश्रम किया था और निरन्तर यह प्रयत्न किया था कि इन दसों देवताओं को विनाश के मार्ग पर एक इंच भी न गिरने दिया जाए, वरन् उन्हें पवित्रता और प्रखरता के पथ पर ही अग्रसर रखा जाए। इस प्रकार अन्तरंग की देव शक्तियों को परिमार्जित कर उन्होंने देवता, मंत्र और गुरु का अनुग्रह प्राप्त किया और उन पाँच शक्तिकोशों को जागृत करने में सफल हो गए, जिन्हें अनेक अद्भुत ऋद्धि सिद्धियों का केन्द्र माना जाता है।

आत्मशोधन, आत्मनिर्माण, इंद्रियनिग्रह और मनोजय के साथ जुड़ी हुई अपनी उच्चस्तरीय गायत्री साधना के माध्यम से आत्मदेव को सजग बनाकर गुरुदेव ने क्या पाया, इसकी अविज्ञात उपलब्धियाँ इतनी अधिक और इतनी अद्भुत हैं कि उनपर सहसा किसी को विश्वास नहीं हो सकता। अस्तु जिन्हें आज प्रमाणित न किया जा सके, उनपर अभी पर्दा पड़ा रहना ही उचित है। समय आने पर वे आज के अविज्ञात तथ्य कल विज्ञात और प्रमाणित होंगे तब यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी कि इस संसार का—इस मानव का सर्वोपरि पुरुषार्थ एवं साफल्य आत्मसाधना के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। अभी तो उन सर्वविदित विशेषताओं को दुहरा देना ही पर्याप्त होगा जो सिद्धियों की दृष्टि से आकर्षक ही नहीं अद्भुत भी हैं।

गुरुदेव के निकट संपर्क में आने वाले इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे कि वे एक शरीर रहते हुए भी पाँच शरीरों जितना—भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों का संपादन एक साथ ही करते रहते थे। यह सब कैसे हो पाता था, इस रहस्य का पता लगाने वाले एक व्यक्ति को दस घंटे कठोर श्रम का अधिक से अधिक हिसाब लगाने पर यही कहकर चुप होना पड़ा कि इतना काम पाँच शरीरों, पाँच व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकना संभव है। एक व्यक्ति एक शरीर से तो इतना काम कभी भी नहीं कर सकता।

(1) जब बाहर रहना पड़े, तब की बात अलग, साधारणतया घर पर जब भी वे रहते थे, छह घण्टा प्रतिदिन उपासना किया करते थे। यह आत्मिक श्रम एक व्यक्ति को पूरी तरह थका देने के लिए पर्याप्त है। शारीरिक श्रम आठ घंटे, मानसिक श्रम सात घंटे और आत्मिक श्रम छह घंटे ही हो सकता है। छह घंटे की उपासना एक व्यक्ति को पूरे दिन थका देने वाली मेहनत के बराबर ही गिनी जानी चाहिये।

(2) औसतन उनके पास देश विदेश के प्रायः 500 पत्र आते थे। जिनमें से कितने ही काफी लंबे और जटिल समस्याओं से भरे रहते थे। इन सबको वे स्वयं खोलते थे। 400 के उत्तर कार्यकर्ताओं को उत्तर नोट कराते हुए लिखाते थे। 100 के लगभग ऐसे होते थे, जो उन्हें स्वयं ही लिखने पड़ते थे। दूसरों को बताकर इतनी जटिल समस्याओं के समाधान लिखाए भी नहीं जा सकते थे। फिर उनमें से कितने ही नितांत गोपनीय भी होते थे। बड़े दफ्तरों में जहाँ पत्र खोले और उत्तर दिए जाने का ही काम होता है, हिसाब लगाया जाए तो यह काम 10 क्लर्कों का है। अत्यंत मुस्तैदी से करने पर भी कोई एक व्यक्ति 10 घंटे से कम में नहीं निपटा सकता। गुरुदेव की आदत थी कि वे किसी भी पत्र को 24 घंटे से अधिक बिना उत्तर का रोकते न थे। देश-विदेश में अगणित लोगों को अतिमहत्वपूर्ण मार्गदर्शन, प्रकाश एवं समाधान देने के लिए विशाल परिवार का संगठन और संबंध बनाए रहने के लिये यह आवश्यक भी था। देखने वाले और लेखा-जोखा लेने वाले यह जानकर चकित रह जाते थे कि किस प्रकार एकाकी इतना काम वे इस वृद्धावस्था में भी निपटा लेते थे।

(3) इतने ग्रंथों का लेखन उनका अद्भुत कार्य है। 20 वर्षों में जो उनने लिखा है, उसका वजन लगभग उनके शरीर की तौल के बराबर है। आर्ष ग्रंथों का आदि से अंत तक अनुवाद, नवनिर्माण के संदर्भ में लिखी गई लगभग 400 पुस्तकें, 100 विज्ञप्तियाँ और भी न जाने कितना क्या-क्या लिखा है, जो लिखा है, वह इतना गंभीर और महत्त्वपूर्ण है कि उसके लिए जो लिखा गया है, उससे सौ गुना अधिक पढ़ने की आवश्यकता पड़ी है। यह पढ़ने-लिखने का काम इतना बड़ा है कि एक व्यक्ति पूरे २४ घंटे सारे जीवन भर यही करता रहे तो भी तुलना नहीं हो सकती। इतना तो मानना ही पड़ेगा कि यह कार्य एक व्यक्ति के पूरे समय और श्रम से कम नहीं है।

(4) व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षण और सहायता प्राप्त करने मार्गदर्शन परामर्श के लिए नित्य सैकड़ों व्यक्ति उन्हें निरंतर घेरे रहते थे। प्रातः छह बजे से लेकर रात को 8 बजे तक 10 घंटे में से केवल एक घंटा ही मध्याह्न भोजनविश्राम का बचता था, बाकी 9 घंटे उनके आस-पास जमात जुड़ी ही रहती थी। सम्पूर्ण भारत ही नहीं, विदेशों तक से, कष्टपीड़ितों से लेकर नवनिर्माण योजना में संलग्न कर्मठ कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों, दार्शनिकों, विद्वानों और साधकों की भारी भीड़ में वे सदा ही घिरे रहते थे। इतना किए बिना इस विश्वव्यापी महाभियान को गति प्रदान कर सकना, संभव भी नहीं था, जिसके लिये वे जन्मे और जिए थे। (5) पाँचवाँ कार्य उनका प्रचारकार्य और जनसंपर्क था। उपलब्ध सूचनाओं से यही प्रमाणित होता है कि प्रायः पूरे वर्ष उन्हें बाहर रहना पड़ता होगा। अन्यथा इतने सम्मेलनों—आयोजनों, गोष्ठियों, व्यक्तिगत परामर्शों तथा शोधसंपर्क के लिए महत्त्वपूर्ण प्रवासों की बात बन ही कैसे पाती। विगत 20 वर्षों में से एक भी दिन ऐसा नहीं मिलेगा,जबकि उनके बाहर रहने की सूचना उपलब्ध न की जा सके।

यह पाँचों ही कार्य उनके अनवरत रूप से चलते रहे। इनमें से प्रत्येक कार्य का विवरण इतना विस्तृत है कि उसे वर्ष के पूरे 365 दिन−दिन लगाए बिना निपटाया ही नहीं जा सकता। किसी भी दृष्टि से हिसाब लगा लिया जाए, किसी भी कसौटी पर परख लिया जाए, पाँचों प्रकार का प्रत्येक कार्य उनके निज के द्वारा ही संपन्न किया हुआ मिलेगा। और उनमें से प्रत्येक उतना है, जो पूरे शरीर से समग्र तत्परता के साथ पूरे वर्ष में ही निपटाया जा सकता है। इस बात को यों भी कह सकते हैं कि वे एक दीखते हुए भी पाँच थे। गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ कहे-बताये भर जाते हैं, पर उसके अनन्य उपासक ने प्रत्यक्ष करके दिखा दिया कि एक शरीर से पाँच गुनी स्तर की क्रियाशक्ति कैसे संभव हो सकती है। इसके अतिरिक्त अभी उन रहस्यों पर पर्दा ही पड़ा रहना चाहिए,जो इतनी अद्भुत हैं कि उन पर सहसा विश्वास करना किसी के लिए भी कठिन होगा। पर हैं वे अक्षरशः सत्य। समय आने पर उनका भी सप्रमाण उद्घाटन सर्वसाधारण के समक्ष होकर रहेगा।

यह चर्चा इसलिए करनी पड़ी कि गुरुदेव, मात्र व्यक्ति न थे, एक सजीव प्रयोगशाला के रूप में अध्यात्म विद्या की समर्थता और सार्थकता प्रमाणित करने आए थे और उनके प्रयोगों से सर्वसाधारण को परिचित होना ही चाहिए। निंदा,स्तुति से वे बहुत ऊँचे उठे हुए थे। इन दोनों को उन्होंने समान समझा और लोग क्या कहते हैं,इस पर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया। वे अपने अन्तःकरण के अतिरिक्त और किसी को अपनी गतिविधियों की समीक्षा कर सकने लायक मानते ही न थे। ऐसे वीत राग की कोई क्यों प्रशंसा स्तुति करे और उससे क्या प्रयोजन सोचे ? फिर जबकि वे आँख से ओझल हैं तो उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है। चर्चा तथ्यों पर प्रकाश डालने की दृष्टि से की गई और यह प्रकट करने का प्रयत्न किया गया है कि व्यक्ति सचमुच ही ईश्वर का राजकुमार, युवराज है। सचमुच ही पिंड में ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान हैं और साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा उन्हें उठाया जा सकता है। पाने लायक जो कुछ इस संसार में है, उसे आत्मदेव को जगाकर सहज ही पाया जा सकता है। गुरुदेव कहते थे पाँच ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति को समझना और उनका सदुपयोग कर सकना ऐसा प्रयोग है, जिसके द्वारा अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, विज्ञानमय कोशों को जगाया जा सकता है और उनके सहारे समर्थ सिद्ध पुरुष जैसा लाभ उठाया जा सकता है। वे यह भी कहते थे कि मन बुद्धि चित्त अहंकार और प्राण की पंचधा सूक्ष्म काया स्थूल शरीर से भी असंख्य गुनी सामर्थ्यवान है।

वृहदारण्यक में एक उपाख्यान आता है—देवताओं ने वाणी से कहा —"आप हमारे उत्कर्ष का माध्यम बनिए।" सत्यव्रती वाणी ने वरदान दिया और देवता शक्तिशाली हो गए। असुरों ने सोचा इस तरह तो देवता हमें जीत लेंगे। उन्होंने देववाणी को पापविद्ध कर दिया, वह उचित-अनुचित कुछ भी बोलने लगी; फलतः देवताओं का वह अस्त्र निष्फल हो गया। तब देवताओं ने घ्राण-इन्द्रिय से कहा — "तुम हमारी सहायता करो।" श्रेष्ठ ग्राही घ्राण ने देवों की सहायता की और वे बढ़ चले। तब असुरों ने गिराने के लिए घ्राण को पापविद्ध कर दिया और वह शुभ-अशुभ किसी भी गंध को ग्रहण करने लगी; फलतः वह अस्त्र भी निष्फल हो गया और देव गिरने लगे। तब देवता चक्षु के पास गए और उनसे सफलता की प्रार्थना की। श्रेयदर्शन का व्रत धारण किए हुए चक्षु देवताओं को समुन्नत करने लगे। तब कुटिल असुरों ने उन्हें भी पापविद्ध कर दिया। और वे उचित-अनुचित कुछ भी देखने लगे; फलतः उनकी शक्ति भी नष्ट हो गई और देव हतप्रभ हो गए। इसी प्रकार कानों को असुरों ने पापविद्ध किया और वे भी असहाय हो गये। उसी प्रकार मन ने देवताओं की सहायता की पर पापविद्ध होने पर वह भी असहाय हो गया।

अन्ततः दु:खी देवताओं ने प्राण का आश्रय लिया और असुर उसे पापविद्ध न कर सके, अस्तु देव विजयी हुए और असुर हार गए। उपनिषद्कार ने प्रतिपादन किया है कि जो इस प्राण की रक्षा करता है, वह कभी नहीं हारता और मृत्युंजय बन जाता है।

कथानक में इसका उद्घाटन किया गया है कि इंद्रियाँ देवशक्तियों से ओत-प्रोत हैं। यदि उन्हें पाप कर्मों में निरत न होने दिया जाए, और वे केवल कल्याण को ही ग्रहण करें और श्रेयपथ पर ही चलें तो उनमें सन्निहित शक्ति भंडार के सदुपयोग से मनुष्य जीवन-संग्राम के हर मोर्चे पर विजयी हो सकता है। पर यदि इंद्रियाँ असंयमी, उच्छृंखल और कुमार्गगामी हो जाएँ तो फिर देव जैसे वैभववानों को भी पराजय का मुँह देखना पड़ेगा। जिसका प्राण प्रबल है—संकल्प अडिग है,वही पापविद्ध किए जाने के असुर षडयंत्र को विफल कर सकता है और पराभव की हर आशंका को निरस्त करते हुए अजर-अमर मृत्युंजय बन जाता है।

लगता है गुरुदेव ने इस कथानक का मर्म अपने जीवनक्रम में उतार लिया। इन्द्रियों से परिचारिका जैसा काम लेते रहे। दूसरों की तरह उच्छृंखल न होने देने के लिए सदा सजग रहे। अभक्ष उन्होंने खाया नहीं—अनीति का अन्न कभी गले से नीचे नहीं उतरने दिया। साधनाकाल में ५ मुट्ठी जौ का आटा और ५ पाव छाछ दैनिक आहार पर निर्वाह करते रहे, इसके पश्चात भी न उन्होंने स्वाद को आगे आने दिया न अनीति उपार्जित अभक्ष के लिए मुँह खोला। क्षुधा बुझाने के लिए औषधिरूपी अन्न के अतिरिक्त स्वाद के सम्बन्ध में कभी सोचा तक नहीं। वाणी से असत्य बोलने और छल करने की आवश्यकता ही कभी नहीं पड़ी। न किसी को कुमार्ग पर चलाया न किसी का जी दुखाया। ऐसी निष्पाप और निर्मल जिह्वा पर सरस्वती ही विराजमान रह सकती थीं सो रही थीं, उनके आशीर्वाद निष्फल नहीं गये न कभी परामर्श टाले गये। इस वाक् पवित्रता ने उनका अन्नमय कोश जागृत करने में भारी सहायता की। तद्विषयक उपासना का कर्मकांड तो उपकरण एवं निमित्तमात्र था।

वे सदा सर्वत्र सद्भावना और श्रेष्ठता की गन्ध सूँघते रहे। किसी की दुर्भाव दुर्गन्ध उन्होंने कभी ग्रहण की ही नहीं। निंदकों से कभी बुरा न माना, वरन् उन्हें साबुन का प्रयोजन पूरा करने वाला हितैषी मानकर दुलारा। दुर्जनों में भी सज्जनता ढूँढ़ी और हर भले-बुरे में ईश्वर का अंश विद्यमान देखते हुए उसे स्वच्छ और सुन्दर बनाने के लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न करते रहे। घ्राण देवता को उन्होंने पापविद्ध नहीं होने दिया फलतः वह उन्हें साधन-समर में विजयी ही बनाता रहा और उसने मनोमय कोश की जागरण-प्रक्रिया को सरल बनाने में भारी सहायता पहुँचाई।

आँखों से उन्होंने श्रेय ही देखा। नारी के प्रति माता, पुत्री और भगिनी की ही दृष्टि रही। हम पति-पत्नी होते हुए भी सहोदर भाई की तरह पवित्रतापूर्वक जिए। लोक -शिक्षण के लिए बालक उत्पन्न करने पड़े तो वह कार्य भी धर्मकृत्य की भावना से ही संपन्न हुआ। विकारों को तब भी मन में नहीं उठने दिया। जो पढ़ा वह मंगलमय के अतिरिक्त और कुछ न था। श्रेय को ढूँढ़ने और प्राप्त करने में ही चर्मचक्षुओं को तथा विवेक चक्षुओं को समान रूप से नियोजित किए रहे। गांधारी की पवित्र दृष्टि ने दुर्योधन का शरीर वज्र जैसा बना दिया था। दमयंती के रोषपूर्ण दृष्टि पात से व्याध जलकर भस्म हो गया था। संजय ने दिव्यदृष्टि से देखकर महाभारत का सारा वृत्तांत धृतराष्ट्र को सुनाया था। आचार्य जी ने दृष्टि को पवित्र रखकर वे समस्त विशेषताएँ उत्पन्न कर लीं थीं। जिसकी ओर उन्होंने भावभरी दृष्टि से देखा वह निहाल होता चला गया। ऐसे दिव्य चक्षुओं से ही अर्जुन ने भगवान के विराट् रूप को देखा था। चक्षु देवता को जिसने सिद्ध कर लिया, उसके लिए प्राणमय कोश में सन्निहित सिद्धियाँ करतलगत ही समझी जानी चाहिए। गुरुदेव ने आज्ञाचक्र को जागृत करने की, प्राण में प्रखरता लाने की, क्रिया-प्रक्रिया की जरूर है, पर उनमें जो खाद्य-पानी लगा, वह नेत्रों को पवित्रव्रती बनाए रखने और असुरता द्वारा उन्हें पापविद्ध होने न देना ही सफलता का प्रधान कारण रहा है।

कानों से केवल दिव्य प्रयोजन ही सुनना, निंदा, चुगली, असूया की उपेक्षा करना, सज्जनों के सदवचनों में ही रुचि रखना। स्नेह संभाषणों को याद रखना और कटु-कर्कशता को भूल जाना, कर्णेन्द्रियों की पुण्य-साधना है। निरर्थक सुनने और सुनाने में जिसे अरुचि रहती है, जो दूसरों की व्यथा वेदना खोजने और सत्परामर्श सुनने को आतुर रहते हैं, वे कान धन्य हैं। उन्हें अमृतकलश कहना चाहिए, इन्हीं से छन-छनकर मस्तिष्क में देवत्व का संचय होता है और आनन्द, उल्लास से अन्तःकरण भरने लगता है। आनंदमय कोश को जागृत करने के लिए नादयोग प्रभृत साधनाएँ करनी पड़ती हैं, पर उनकी परिपुष्टि जिस भूमिका पर होती है, वह कर्णेंद्रिय का सदुपयोग ही है।

विज्ञानमय कोश का परिष्कार त्वक्-इंद्रिय पर निर्भर है। यहाँ त्वक् का तात्पर्य कामेंद्रिय से है। कुंडलिनी शक्ति की प्रचंड क्षमता इसी केन्द्र पर केन्द्रीभूत होती है। ब्रह्मरंध्र, क्षीरसागर, सहस्रारकमल में ज्ञानबीज सन्निहित है। और मूलाधार चक्र—जननेंद्रिय चक्र में विज्ञान की भौतिक शक्तियों का भंडार भरा पड़ा है। नई सृष्टि उत्पन्न कर सकने की—नया संसार बसाने की—स्फुरणा इसी स्थल पर विराजमान है। गुरुदेव ने इस शिवकेन्द्र को पवित्रतम देव प्रतिमा की तरह ही समझा और उस शक्ति-स्त्रोत का एक भी कण अपव्यय न करके ऊर्ध्वरेता की तरह ब्रह्म स्फुरणा में ही प्रयुक्त किया। विज्ञानमय कोश के जागरण में मिली सफलता का श्रेय वे तद्विषयक साधना-पद्धति को कम, ब्रह्मरेतस् निष्ठा को अधिक दिया करते थे। पाँच-तत्त्वों के प्रकाश को प्रस्फुटित करने वाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ वस्तुतः पाँच देवियाँ हैं, जो उन्हें व्यभिचारिणी वेश्या के कुपथ पर नहीं धकेलता, उन्हें मातृवत् श्रद्धा के साथ संपूजित करता है। उसके पास सिद्धियों की कमी नहीं रहती।

मन, बुद्धि, चित, अहंकार और प्राण यह पाँच देवता पाँच शक्तिकोशों के अधिपति हैं। इनको भी इंद्रियों की तरह ही संभालना पड़ता है। मन की चंचलता अयोग्य भोग-विलास के लिए भटकने न पाए, वासनाओं में रमण न करने लगे— तृष्णाएँ अयोग्य मार्ग में संपदा और सुख एकत्रित करने के लिए मचलने न लगें। इस नियंत्रण से मन को निग्रहीत किया जाता है। बुद्धि अपने साथ पक्षपात, दूसरों के साथ अन्याय, रुचिकर का समर्थन और अरुचिकर का विरोध करने लगती है।और तुरंत का लाभ देखने वाली और दूरवर्ती  परिणामों की ओर से आँख बंद कर लेने का दोष आ जाने से बुद्धि की पवित्रता पापविद्ध हो जाती है। चित्त की प्रवृत्ति उत्कृष्टता की अभिरुचि छोड़कर निकृष्ट अभिव्यंजनाओं में भटकने लगे तो समझना चाहिए कि उसकी दिव्यशक्ति का नाश हो चला। अहंता अपने को ईश्वर का दिव्य अंश, सृष्टि की सुव्यवस्था का उत्तरदायी, आदर्शों का प्रतिष्ठापक मानने के स्थान पर शरीर और संपदा का अहंकार करने वाली उद्धत और उच्छृंखल आचरण करने वाली बन जाए तो समझना चाहिए, उसका देवत्व भी नष्ट हुआ। प्राण का स्वरूप है, सन्मार्ग पर चल सकने का साहस और कुमार्ग पर किसी भी भय या लोभ के कारण उत्पन्न होने वाले आकर्षण को ठुकरा देने की धृष्टता। जो जीवनोद्देश्य की पूर्ति और ईश्वर की आज्ञा का पालन करने में बड़े से बड़ा त्याग-बलिदान प्रस्तुत कर सके वह सच्चे अर्थों में प्राणवान है। प्राण देवता की आराधना सन्मार्गगामी शूरवीर बनकर की जाती है गुरुदेव इन पाँचों  आत्मदेवताओं को भी उसी तरह साधते रहे, जिस तरह कि इंद्रिय देवियों  की पवित्रता अक्षुण्य बनाए रहने में तत्पर रहे। गायत्री माता के पाँच मुख और दस हाथ अलंकारिक दृष्टि से चित्रित किए जाते हैं। कितनी ही मूर्तियाँ तथा तस्वीरें इस प्रकार के चित्रण समेत  मिलती हैं। यह पाँच मुख अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश और विज्ञानमय कोश हैं। दश भुजाएँ उपरोक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच देवियों और पाँच मनसतत्त्व से संबंधित पाँच देवता है। इन दोनों को मिलाकर गायत्री महाशक्ति की दश भुजायें बनती हैं।

सामान्य जप, अनुष्ठानों के कर्मकांड पूरे करने के साथ जो पंचमुखी, दशभुजी दिव्य गायत्री को अपने प्राण, हृदय मस्तिष्क और आचरण में घुला लेता है, वह वैसा ही लाभ प्राप्त कर सकता है जैसा कि गुरुदेव ने उपलब्ध किया है। — भगवती देवी शर्मा

युग-निर्माण की वर्तमान गतिविधियों को तथा भावी तैयारियों की विस्तृत जानकारी परिजनों तथा सर्वसाधारण तक पहुँचाने के लिए गत जुलाई से युग निर्माण योजना को पाक्षिक रूप से भी निकाला जा रहा है। इससे इस आंदोलन में रुचि रखने वालों को प्रोत्साहन तथा मार्ग-दर्शन प्राप्त हो रहा है।

युग निर्माण आंदोलन की प्रवृत्तियों में अभिरुचि रखने वाले परिजनों से अनुरोध है कि वह इस पाक्षिक पत्रिका के भी सदस्य बनकर अभियान को अपना सहयोग प्रदान करें। वार्षिक मूल्य = 10) मात्र

पता- पाक्षिक, युग-निर्माण योजना, मथुरा।


सुख के छलावे— लक्ष दुख में याद आवें

न कोई आलसी था न कोई दीन-दरिद्र। न कोई अस्वस्थ था न कोई आधि-व्याधिग्रस्त। शील और सौजन्य का पालन करने वाली प्रजा, धर्मनीति और मर्यादाओं पर चलने वाले प्रजापति दोनों ही सुखी और समृद्ध थे। बात बहुत समय पूर्व मिथिला राज्य की है तब वहाँ के सम्राट थे—धर्मरुचि चारुदत्त।

प्रवाह रुक जाने से जिस प्रकार जल में कीचड़ और सड़ांध आ जाती है, जीवनगति में वैभव-विलास का ठहराव उसी प्रकार लोगों में अनैतिक वृत्तियों के प्रोत्साहन का कारण बन जाता है। इसीलिये महापुरुष अपने जीवन में कुछ न कुछ अभाव और तितीक्षाएँ जानबूझ कर रखते आए हैं। कष्ट, जीवन गति में प्रवाह के अनिवार्य तत्त्व हैं। जहाँ कष्ट रहता है वहाँ लक्ष्यगामिता भंग नहीं होने पाती। मिथिला निवासियों के साथ यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। धीरे-धीरे उनका शील नष्ट होने लगा, शील नष्ट होने से शक्ति और तेजस्विता जाती रही, शक्ति गई और रोग-शोक ने आ घेरा। रोग-शोक आए और संपत्ति नष्ट हुई। संपत्ति के विनाश से बौद्धिक क्षमताएँ और सामाजिक आचार कुंठित हो चले। जहाँ कुछ समय पहले सुख और शांति का सावन बरसता था, उसी मिथिला में सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई। शांति और व्यवस्था के  लिए लोग प्यासे डोलते थे और एक मुट्ठीभर भी शांति किसी को नहीं मिल पा रही थी।

चिंचित राष्ट्राध्यक्ष ने राजपुरोहित से मंत्रणा की और अनुभव किया कि सुखासक्ति ही समस्त अनर्थ की जड़ है।योजना निश्चित हुई, उन्होंने अपने चुने हुए सैनिक बुलाए और आज्ञा दी कि स्थान-स्थान पर लोगों के घरों में आग लगा दी जाए, जिसके पास संपत्ति अधिक है, छीन ली जाए। यह प्रयत्न किया जाए कि प्रजा में किसी प्रकार आतंक छा जाय राजसत्ता का।

ऐसा ही किया गया। लोगों की संपत्ति फूँकने और लुटने लगी। अभी तक जो लोग भोग-विलास में डूबे पड़े थे, वे इन अप्रत्याशित संकटों के कारण चौंक पड़े। कितने ही लोग महाराज चारुदत्त के पास आरोपपत्र लेकर पहुँचे। महाराज ने उनकी कुछ बात तो सुनी नहीं, उलटे उन्हें पकड़वाकर कारागार में ठूँस दिया और घोषणा करा दी कि इन सबको एक सप्ताह के भीतर जीवित कोल्हू में पीस दिया जाएगा।

यह उद्घोष सुनकर प्रजा स्तब्ध रह गई। जिसने जहाँ सुना, वहीं भगवान् को पुकारा—"हे नाथ ! महाराज की मति को यह एकाएक क्या हो गया ?" कुछ लोग इसे अपने कर्मों का फल कहकर आत्मनिरीक्षण और आत्मशोधन की बात कहने लगे, तो कुछ जप-तप अनुष्ठान और दान-दक्षिणा आदि पुण्य की। महाराज ने यह सब देखा तो अनुभव किया कि प्रजा अब ठिकाने आने लगी है।अब उन्होंने नया आदेश निकाला। बंदीजनों को अभी तो नहीं 6 माह बाद मृत्युदंड दे दिया जायेगा। अब तो लोग बहुत आश्वस्त हुए और मंगल आचरण के साथ लोक-परलोक, आत्महित का चिन्तन और निदिध्यासन करने लगे।

6 माह बाद फाँसी का दिन आया। हजारों लोग मृत्युदंड देखने के लिए उमड़ उठे। महाराज ने ऊँचे मंच पर खड़े होकर प्रजा को संबोधित कर कहा—"अकारण कष्ट देने का जो उद्देश्य था, पूरा हुआ। जाओ और अब आगे से यह ध्यान रखो कि जीवन का उद्देश्य भोग-विलास में नहीं आत्मकल्याण में है। इस लक्ष्य को भूलोगे तो वही दुर्दशा होगी, अभी जिससे निकलकर आये हो।"

प्रजा ने अपनी भूल समझी और दोषपूर्ण जीवन-पद्धति का  परित्याग कर सदाचारपूर्वक जीने लग गई।


हृदय का हिमालय पिघलने लगा

(माया वर्मा)


हृदय का हिमालय पिघलने लगा (Kavita)

स्त्रोत उमड़ा तुम्हारे मधुर स्नेह का। तो हृदय का हिमालय पिघलने लगा॥

मैं चला जा रहा था दिशाहीन ही, तम निशा थी घिरी घोर अज्ञान की। बुद्धि में पल रहे, पाप-कल्मष दुखद, बेलि बढ़ती रही घोर अभिमान की॥

यह तुम्हारी दयादृष्टि ही है, कि जो- आत्मव्यापी कलुष आज धुलने लगा। तो हृदय का हिमालय पिघलने लगा॥

जिन्दगी भी अभी तक मरुस्थल बनी, धार तुमने बहाई--कि अंकुर उगे। हर दुखी गीत के, चिर सहारे बने, स्वर तुम्हारे अतुल प्रेरणा में पगे॥

प्यार की जो बखेरी उषा-लालिमा- उर कमल मुस्करा-आज खिलने लगा। तो हृदय का हिमालय पिघलने लगा॥

साधना है नहीं, पास मेरे सखे, हैं नहीं, भक्ति या शक्ति या भावना। किन्तु पाता रहूँ यह कृपा की किरण, पल रही आत्मा में यही कामना॥

हाथ जब गह लिया-छोड़ दोगे नहीं। एक विश्वास यह-अब मचलने लगा। तो हृदय का हिमालय पिघलने लगा॥

*समाप्त*