अध्यात्म और विज्ञान के विग्रह ने जिस सर्वनाशी सम्भावना का सूत्रपात किया है। उसकी प्रथम झाँकी आस्था संकट के रूप में सामने है। आदर्शवादी मूल्यों के गिर जाने से मनुष्य विलासी, स्वार्थी, अनुदार ही नहीं अपराधी बनता और गरिमा को निरन्तर खोता चला जा रहा है। इससे उसका अपना पतन-पराभव तो हुआ ही है, समूचे समाज को समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं का सामना करना पड़ रहा है। अभी पानी गुनगुना भर हुआ है अगले दिनों जब वह उबलेगा, भाप बनेगा और बन्द बर्तन को फाड़कर विस्फोट रौद्र रूप का परिचय देगा तो दिल दहलाने वाली आशंकाएँ सामने आ खड़ी होंगी। आवश्यकता है कि समय रहते समाधान सोचा जाय और विपन्न वर्तमान के भयानक भविष्य का रूप धारण करने से पूर्व ही स्थिति को सम्भाल लिया जाये।
अध्यात्म की अपनी शाश्वत सत्ता है किन्तु विज्ञान ने भी अपनी सामयिक प्रौढ़ता उत्पन्न कर ली है। दोनों लड़ेंगे तो सुन्द-उपसुन्द दैत्य बन्धुओं की तरह एक-दूसरे का विनाश करके अन्ततः ऐसी रिक्तता उत्पन्न करेंगे जिसे फिर से भर सकना असम्भव नहीं हो अत्यधिक कठिन अवश्य होगा। विग्रह को सहयोग में बदल देना है तो कठिन काम, पर उसे किसी न किसी प्रकार करना ही होगा। इसके अतिरिक्त महामरण ही एकमात्र विकल्प है। अस्तु उसे किया ही जाना चाहिए, करना ही चाहिए। देव और दैत्य मिलकर समुद्र मन्थन करने में तत्पर हुए और चौदह बहुमूल्य रत्न उपलब्ध करने के श्रेयाधिकारी बने। उसी उपाख्यान की पुनरावृत्ति के रूप में अध्यात्म और विज्ञान को परस्पर सहयोग करने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ साकार करने पर सहमत किया जा सकता है।
सम्पूर्ण उरु प्रदेश में राज नर्तकी मृदाल की ही चर्चा थी। उनकी सौंदर्य ख्याति पूर्णमासी के चन्द्रमा की भाँति सर्वत्र फैली थी। मृदाल से प्रणय याचना करने वाले सामन्तों, विद्वानों, राजघराने के युवा कुमारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। नृत्याँगना होते हुए भी उसकी पवित्रता अक्षुण्ण थी। भले ही उस नश्वर सौंदर्य की अग्नि में दीपक की लौ पर मर मिटने वाले पतंगों की भाँति राज्य की मूर्धन्य प्रतिभाओं की अपनी चरित्र की आहुति देने की तैयारी और इस शृंखला में सम्मिलित होने वालो की उत्तरोत्तर वृद्धि को देखकर वह अत्यन्त चिन्तित हो उठी। ईश्वर प्रदत्त यह सौंदर्य कहीं अभिशाप न बन जाय, इस सोच में वह बराबर डूबी रहती थी।
विचार विमग्न बिस्तर पर लेटी वह करवटें बदल रही थी। बिगड़ती हुई राज व्यवस्था की चिन्ता उसे खाये जा रही थी। विचारों की शृंखला टूटी, द्वार पर दस्त से। दरवाजा खोला पर सामने महाराज करुष को देखते ही स्तम्भित रह गई। किसी अप्रत्याशित आशंका से उसका मन भयभीत हो उठा। सादर आसन पर बैठाकर साहस संजोकर सहमते हुए मृदाल ने महाराज से आने का प्रयोजन पूछा।
करुष ने उत्तर दिया-मृदाल ! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा उरु प्रदेश मुग्ध है। विद्वान, प्रतिभावान त्यागी सभी तुम्हारे लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार बैठे है। फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे ?
आशंका सच निकली। महाराज करुष मृदाल की सौन्दर्याग्नि में अपने चरित्र की आहुति देने पहुँचे थे। अग्नि परीक्षा की यह अद्भुत घड़ी थी-मृदाल के लिए। एक ओर राजा की क्षणिक प्रसन्नता का प्रश्न था जिसकी पूर्ति कर वह बड़ा से बड़ा पारितोषिक प्राप्त कर सकती थी। दूसरी ओर देश के चरित्र की रक्षा का प्रश्न था। अन्तरात्मा ने कहा कि हर कीमत पर चरित्र की रक्षा की जानी चाहिए।
वह बोल पड़ी, राजन्! आप तो देश के कर्णधार हैं। राज्य का भविष्य आप पर अवलम्बित है, आप का यह अशोभनीय कदम राज्य के चारित्रिक पतन का करण बन सकता है। रात्रि की इस नीरव बेला में आगमन न केवल आपकी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है बल्कि सामाजिक दृष्टि से अपराध भी है।
राजा करुष को लगा जैसे किसी ने तमाचा मार दिया हो। सत्ता के अहंकार ने जोर मारा। मृदाल के पवित्र शब्द भी करुष को तीन से चुभे। वे तड़पकर बोले हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये हैं, तुम एक नर्तकी हो-धर्म और अधर्म का निर्णय करना तुम्हारा काम नहीं है।
स्थिति बिगड़ते देखकर मृदाल ने समझ लिया इस समय महाराज कामान्ध हैं, विवेक से काम लेना होगा। मृदुल एवं संयत स्वर में वह बोली, “महाराज इस समय में रजोदर्शन की स्थिति में हूँ। चौथे दिन आप मुझ से मिलें। सब कुछ आपके लिए समर्पित होगा।”
तीन दिन करुष ने किसी तरह बेचैनी से बिताये। चौथे दिन अगणित उपहारों के साथ वह मृदाल से मिलने आधी रात को पहुँचे, द्वार पहले से ही खुला था। चारपाई पर मृदाल का कंकाल जैसा शरीर पड़ा था। उसमें सौंदर्य और आकर्षण का नामोनिशान न था। मृदाल के होंठ हिले। वह धीरे-धीरे कम्पित स्वर में बोली महाराज तीव्र विरेचक औषधि द्वारा कामाग्नि को भड़कने वाले शरीर के सौंदर्य को समाप्त कर दिया है। यह शरीर समर्पित है आपको। आपके चरित्र की देश को विशेष आवश्यकता है। इसीलिए मैंने यह कदम उठाया। इसी स्वर के साथ उसकी वाणी थम गई - शरीर निष्प्राण हो गया।
पश्चाताप और ग्लानि से करुष का मन भर उठा। इस बलिदान से करुष के जीवन की दिशाधारा ही बदल गई।
परमात्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप कहा गया है। उस विराट का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित्, आनन्द ये तीनों मिलकर कारण शरीर का ढाँचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत, अजर, अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना -दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों-आस्थाओं से युक्त। आनन्द अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अन्तःकरण। आशा, उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवन क्रम। आत्मा का सहज स्वभाव है ऊँचा उठना, अपने विराट स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अन्ततः समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव-ब्रह्म सम्मिलन से निःसृत परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करती है।
इस आत्म गरिमा से अपरिचित मनुष्य भटकता है। यह विस्मृति अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती है। इन्हें ही माया के आवरण-मनुष्य के विभ्रम कहा जा सकता है। ये ही रोग-शोकों के रूप में अन्ततः बाहर प्रकट होते हैं।
सच्चिदानंद का पहला चरण है ‘सत्’। ‘सत्’ मनुष्य को जीवन के क्षण भंगुर होने का बोध कराता है। हम अजर, अमर, अविनाशी है। पंचतत्वों से बनी इस काया अवयवों के बिखर जाने पर भी हमारी सत्ता बनी ही रहेगी। यह बोध बना रहे तो भटकाव से बचा जा सकता है।
सत् की अनुभूति व्यक्ति को यह विचार करने पर विवश करती है कि यह शरीर मरणधर्मा है। परन्तु आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। वह तो एक सतत् प्रवाह है। आत्मा का स्वास्थ्य ही मानव की समस्त सफलताओं का प्राण है। यह तभी सम्भव है जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है। सत् परायण व्यक्ति आशावादी होता है। अपने कर्मों के फल के लिए वह उद्विग्न नहीं होता। स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए जीता है।
सत् में आस्था रखने वाला व्यक्ति सृष्टि को चलाने वाली बुद्धिमान, उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था में दृढ़ विश्वास रखता है। वह जानता है कि विधि-विधानों, नियमों के अनुरूप चलने वाली इस सृष्टि की व्यवस्था में किसी तरह की अनुशासनहीनता, अनियंत्रण, अदूरदर्शिता का स्थान नहीं है। कर्मफल से पूर्णतः अवगत यह व्यक्ति अपनी समस्त गतिविधियों का निर्धारण सुघड़ता पूर्वक करता है। वह जानता है कि आत्मा कभी नहीं बदलती। बदलता तो यह चोला है। फिर एवं उपभोगों में स्वयं को लीन करना इस सृष्टि के मुकुटमणि मानव के लिए कतई शोभनीय नहीं है। ऐसा चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
अन्तःकरण की दूसरी विशेषता है ‘चित्’। उच्च स्तरीय आस्थाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों से युक्त व्यक्ति ‘चित्’ परायण कहलाता है। ‘चित्’ अर्थात् स्वयं के विषय में उत्कृष्टतापूर्ण मान्यता, अपने लक्ष्य के प्रति चेतनता, सजगता। ये वे निष्ठाएँ हैं जो मनुष्य की जीवनयात्रा की रूप रेखा बनाती है।देवत्व में आस्था, आदर्शवादी उत्कृष्टता में अटूट विश्वास, सर्वोच्च सत्ता के प्रति समर्पण भाव ‘चित्’ के परिष्कृत स्वरूप है।
ऐसे व्यक्ति लोकसेवी का --समर्पित व्यक्ति का-जीवन जीते हैं। आदर्शों की बलिवेदी पर वे अपने समस्त स्वार्थों को होम देते हैं। उनकी सारी मान्यताएँ चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की और अभिमुख हो जाता है। शहीद, समाज सुधारक, लोकसेवी, सन्त, सामान्य, परजीवट के धनी व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वे जो जीवन जीते हैं, आदर्शों रूपी ईश्वर को समर्पित होता है। अपनी निष्ठाओं के आधार पर वे स्वयं तो उच्च प्रगतिशीलता की भूमिका को प्राप्त होते ही है, सहज श्रद्धा व जन-सम्मान के भी पात्र बनते हैं। अध्यात्म उनके भीतर से प्रस्फुटित होता रहता है। क्रियाओं में, विचारणा में, भाव संवेदनाओं में प्रभु स्वयं आदर्शों के रूप में प्रतिभासित होते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति अहंकार से कोसों दूर होते हैं। लोकेषणा से दूर वे जनसेवा को ही, उदारता-करुणा विस्तार को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, इसी को उपासना कहते हैं।
‘चित्’ एक ऐसा गुण है जो परिष्कृत स्वरूप में व्यक्ति को महामानव बना देता है। पर जब यही विकृति की ओर अग्रसर हो जाता है, तो अनेकानेक समस्याओं, मानसिक असन्तुलनों एवं शारीरिक सन्तापों को जन्म देता है। आदर्शवादी से निष्ठा हटते ही पतन तेजी से होता है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण स्वयं के विषय में मान्यताएँ गरिमायुक्त नहीं रहतीं। श्रेष्ठ चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।
सच्चिदानंद का तीसरा व अन्तिम पक्ष ‘आनन्द’। इसके बिना आत्मा की परिपूर्ण व्याख्या सम्भव नहीं। जीवात्मा का लक्ष्य ही आनन्द है। इसे परिष्कृत भाषा में कहा गया हैं “रसो वैसः” - वह परमात्मा रस से आनन्द से परिपूर्ण हैं। इस रस को प्राप्त करने के लिए विभिन्न मार्गों से साधक पुरुषार्थ करता है एवं सन्तोष का आनन्द लेता है। इस रस का अन्तरंग पक्ष है-भाव संवेदनाओं से लबालब अन्तःकरण। करुणा, दया सेवा, भावना, भक्तिभाव रस के परिष्कृत स्वरूप हैं। जब इनका विकास महज स्वाभाविक रूप से होता है, तो ये व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ऐसे महामानव विश्व मानवता की सेवार्थ अपने जीवन की आहुति दे देते हैं। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला आनन्द क्षणिक है, ऐसी मान्यता रखने वाले ये महापुरुष अपनी क्षमताओं को पूरा उपयोग उच्च उद्देश्य की ओर नियोजित करने में करते हैं। जमा करने में नहीं, वितरण में विश्वास रखते हैं। परस्पर सौहार्द्र की वृद्धि ही उनका लक्ष्य होता है। उन्हें सद्विचारों, सद्भावनाओं एवं सत्कर्मों में रस आता है। यह अक्षुण्ण आनन्द उन्हें जिस ऊँचाई तक ले जाता है, उसे पाकर भौतिक आकर्षण उन्हें प्रलोभित कर नहीं पाता।
चेतना पर माया, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर के जो आवरण पड़े हैं, इनके कारण जीव इस उद्गम स्त्रोत तक पहुँच नहीं पाता। प्यास निरन्तर बनी रहती हैं। कस्तूरी अपनी नाभि में लिये हिरन जिस प्रकार सुगन्ध की खोज में मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनन्द की खोज में विविध योजनाएँ बनाता, कल्पना करता एवं अथक प्रयत्न करता है। यह पुरुषार्थ असफल, असमाधानकारक ही होता है। अन्तःकरण की गहन परतों में छिपे आनन्द के स्त्रोत की खोज बाह्य जगत में चलने के कारण भटकाव, थकान, अशाँति निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।
आनन्द की मिठास और भी गहन है। इसकी विकृति वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में बाहर परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासना आकर्षक एवं लुभावनी लगती है। विषयों के सेवन में मन लगने लगता है तो व्यक्ति विलासी, प्रमादी, आलसी होता चला जाता है। जिह्वा का असंयम, कामेन्द्रियों का उपभोग, संग्रह का लोभ अनेकानेक मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है।
विषयों के सेवन में जब इतनी तृप्ति एवं तुष्टि मनुष्य को मिलती है तो उसके मूल स्त्रोत में कितनी मिठास होगी, यह कल्पना मात्र से ही हृदय पुलकित हो उठता है। भगवान रसमय है। इस रस को आत्म-सत्ता के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को धरोहर बनाकर दिया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। इसे अन्तःकरण के उल्लास, सन्तोष, शाँति जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जाता है। भक्ति रस की धाराएँ ऐसे ही अन्तःकरण में बहती है। ये ही कभी मीरा, कभी चैतन्य एवं कभी रामकृष्ण परमहंस जैसी विभूतियों के रूप में प्रकट होती हैं। सर्वोच्च सत्ता, परब्रह्म से, मिलन संयोग की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है।
सत् चित् आनन्द की अनुभूति एवं सुनियोजित सद्गति व्यक्ति को कहीं का कहीं पहुँचा देती है। इसी अनुभूति का अभाव भटकाव को जन्म देता है। कारण शरीर की इन तीन धाराओं को, उनके उद्देश्य को एवं विकृति के दुष्परिणामों को जानना आवश्यक है। समस्त व्याधियों के मूल में जो बीज है वह व्यक्ति की स्वयं के मरणधर्मा होने की अनुभूति ने होना, आदर्शवादी, उत्कृष्टता में विश्वास का अभाव तथा आनन्द की प्राप्ति हेतु बाह्य जगत में भटकाव। मनुष्य आत्मा-गरिमा से यदि परिचित होने का प्रयास करे, तो वह जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि-रसानुभूति का आनन्द ले सकता है। समस्त विकारों से मुक्ति मिल जाती है जब व्यक्ति स्वयं की अजरता, अमरता पर चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
चेतना की बौद्धिक और आदतों के समुच्चय वाली परतों की सही जानकारी और उन्हें उपयोग में लाने की विधि-व्यवस्था हाथ लग सके तो समझना चाहिए कि तथाकथित “कारुँ के खजाने” से भी अधिक बहुमूल्य सम्पदा हाथ लग गई। पिछड़ी हुई परिस्थिति वस्तुतः अनगढ़ मनःस्थिति की ही परिणति होती है। अन्यथा हर किसी के चेतन में इतनी क्षमता विद्यमान है कि आज का पिछड़ापन कल सुसम्पन्न वैभव में विकसित किया जा सके। कालिदास, वरदराज आदि कितने ही लोग ऐसे हुए है जो मस्तिष्कीय पिछड़ेपन के कारण मूर्ख माने जाते थे, किन्तु जैसे ही उनने अपने उपेक्षित अस्त-व्यस्त अन्तराल को समेटना, सुधारना और ढालना प्रारम्भ किया वैसे ही वे मूर्धन्य विद्यावानों की श्रेणी में जा पहुँचे।
अचेतन तो उससे भी आगे है। आदतें सुधार लेने पर तो असंख्य पतितों को उत्कर्ष के शिखर पर पहुँचते हुए देखा गया है। सूरदास, तुलसीदास, वाल्मीकि, अजामिल, अँगुलिमाल, अम्बपाली आदि अनेकों के गये-गुजरे जीवन सुधरे और ऊँचे उठे है। अचेतन हठी तो है पर ऐसा नहीं कि यदि संकल्पपूर्वक उसे बदलने, ढालने का प्रयत्न किया जाय तो सफलता नहीं ही मिले। आदतें आखिर अपनी विचारणा और कार्य पद्धति की परिणति है। क्रमिक विकास प्रक्रिया के अनुरूप वे बदलती सुधरती भी रही है। फिर कोई कारण नहीं कि अब उन्हें अधिक उपयुक्त परिष्कृत बनाने के लिए मोड़ा-मरोड़ा न जा सकें। ढलाई में दबाव की आवश्यकता पड़ती है। संयंत्रों को चलाने के लिए ऊर्जा चाहिए। रेल, मोटर, हवाई जहाज बहुत भारी होने पर भी तेजी से दौड़ते हैं। शर्त यही है कि उन्हें आवश्यक ईंधन मिलता रहे।
सामान्य बुद्धि की तुलना में अचेतन चित्त की स्थिति अधिक भारी और अधिक गरिमामयी है उसको आगे धकेलने के लिए आवश्यक ऊर्जा चाहिए। हाथ गाड़ी को ऐसे ही धक्का मारकर आगे बढ़ाया जा सकता है, किन्तु रेल चलानी हो तो शक्तिशाली ईंधन का प्रबन्ध करना पड़ेगा। बुद्धि को अध्ययन, परामर्श, से अधिक तीक्ष्ण समुन्नत बनाया जाना सरल है किन्तु अचेतन के अभ्यासों को नये ढाँचे में ढालने के लिए भट्टी जैसे सरंजाम जुटाने पड़ेंगे। धातुएँ कठोर होने पर भी पिघलती और ढलती रहती है किन्तु इसके लिए आवश्यक तापमान तो चाहिए ही आदतें धीरे-धीरे करके ढलती आई हैं। यदि नया कार्यक्रम शालीनतायुक्त बना लिया जाय तो वे धीरे-धीरे उसे भी अपना लेंगी। जिस प्रकार अब तक बदलने सुधरने में आना-कानी करते हुए भी अन्ततः सहमत होती ही चली आई हैं।
किन्तु यदि धीरे-धीरे सुधारने की प्रतीक्षा न करनी हो तो फिर अधिक सुदृढ़ संकल्प, प्रखर साहस और सुनिश्चित कार्यक्रम बनाकर उसे अपनाने के लिए व्रतशील होना पड़ता है। मन्दी आग पर वस्तुएँ धीरे-धीरे पकती है किन्तु उन्हें यदि जल्दी ही उबालना-खौलाना हो, तो चूल्हे की आग तेज करनी पड़ती है अन्तःक्षेत्र की सुधारात्मक प्रगति में यदि तीव्रता लानी हो तो उसके लिए दो ही उपाय रह जाते हैं (1) बाहरी परिस्थितियों का ऐसा दबाव जिसमें नई रीति अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न रहेगा (2) अन्तःक्षेत्र में से वह दबाव स्वयं उत्पन्न किया जाय। साधना या तपश्चर्या इसी को कहते हैं। साधना का बाह्य स्वरूप देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि किसी बाहरी शक्ति से कुछ याचना की जा रही है और अभीष्ट वस्तु देने के लिए किसी बाहरी सत्ता के लिए नाक रगड़ने, गिड़गिड़ाने, लुभाने जैसी कुछ उथली बचकानी रीति-नीति अपनाई जा रही है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आत्म-सत्ता इतनी समर्थ है कि उसे थोड़ा-सा कुरेदने और थोड़ा-सा ईंधन डालने भर से चिनगारी को ज्वाला बनने में कोई कठिनाई पड़ने वाली नहीं है।
मनःशास्त्री बताते हैं कि बुद्ध वैभव से भी अधिक चमत्कारी अचेतन की रहस्यमय परतें है। उन्हें श्रेष्ठ प्रयोजन के लिए यदि थोड़ा कुरेदा, उकसाया जा सके तो व्यक्तित्व परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। शरीर से बलिष्ठ, बुद्धि से प्रखर मनुष्यों को विविध विधि सफलताएँ प्राप्त करते देखा जाता है। यदि उससे एक कदम आगे और बढ़कर अचेतन के प्रसुप्त देवता को जागृत किया जा सके तो वह अंगद, हनुमान, भीम, अर्जुन, जैसा समर्थ और सहायक सिद्ध हो सकता है।
मनःसंस्थान का प्रायः सात प्रतिशत भाग ही सामान्यतः प्रयोग में आता है। अब तक इस संदर्भ में जो खोजे हुई है तथा उपलब्धियाँ हस्तगत हुई है, उन्हें समूची क्षमता का तेरह प्रतिशत माना जाता है। यदि इससे आगे की जानकारी, जागृति तथा क्षमता हस्तगत हो सके तो निश्चय ही मनुष्य सामान्य न रहकर असामान्य बन जाय। उसे महामानव अति मानव की संज्ञा दी जा सकेगी। सामान्यजन इन्द्रिय शक्ति के सहारे ही अपना ढर्रा चलाते हैं किन्तु यदि किसी को अचेतन के सम्हालने सजाने में सफलता मिल सकें तो वह अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न होगा। ऐसा बलिष्ठ-जिसे देव या दैत्य कहा जा सके। ऋद्धि, सिद्धियों की चमत्कारी चर्चा पढ़ने, सुनने को मिलती रहती है। यह किसी देवी-देवता की अनुकंपा का प्रसंग नहीं है वरन् अविज्ञात, अनगढ़ स्थिति में पड़ी रहने वाली अचेतन क्षमता की जागृति भर है।
मनुष्य क्या है ? यह पूछने की अपेक्षा यह देखना चाहिए कि वह क्या नहीं है ? ईश्वर ने अपने राजकुमार को अपने स्तर-का ही बनाया है और उसे अपनी सम्पदा का उत्तराधिकारी नहीं साझेदार बनाया है। वयस्क, परिपक्व होने पर ही बहुमूल्य वस्तुओं का सदुपयोग करना आता है। इसी दृष्टि से भगवान ने अचेतन की तिजोरी में ऐसी रत्नराशि भर दी है जो तभी खोली जा सके जब उसके सदुपयोग की पात्रता प्रामाणिकता अर्जित की जा सके। यह परिपक्व साधना के आधार पर अर्जित की जाती है।
सामान्य चेतन लोक व्यवहार में काम आता है और बुद्धि वैभव समझा जाता है। अचेतन से व्यक्तित्व के विकसित होने में सहायता मिलती है। प्रतिभावान् नेतृत्व कर सकने में समर्थ, मनस्वी व्यक्ति जीवन से हर क्षेत्र में सफलताएँ प्राप्त करता है। इसमें उसका विकसित व्यक्तित्व ही प्रधान भूमिका निभाता है। कहना न होगा कि व्यक्तित्व की विशेषता पूर्णतया अचेतन के स्तर पर निर्भर है। जिस प्रकार आहार-विहार से शरीरगत स्वास्थ्य बलिष्ठ बनाया जाता है, जिस प्रकार अध्ययन अनुभव से बुद्धिमता अर्जित की जाती है ठीक उसी प्रकार परिस्थितियाँ अथवा साधनाएँ अचेतन को किसी बड़ी छलाँग लगाने के लिए तत्पर करती है। यह व्यक्तित्व विकसित करने की प्रक्रिया है। जिसकी परिणति प्रतिभाओं, विशिष्टताओं, सफलताओं, सम्पन्नताओं के रूप में हस्तगत होती हैं। इसे लौकिक जीवन को ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा बनाने वाला क्षेत्र कह सकते हैं।
अब इससे आगे एक कदम और बढ़ाया जाय। एक और ऊँचे लोक में प्रवेश किया जाय तो चेतना के उच्चतम लोक में प्रवेश मिल सकता है। यह सुपर चेतन है। जिसे अन्तःकरण कहा जाता है। उसमें आदतें नहीं आस्थाएँ निवास करती है। मान्यता, अभिरुचि, आकाँक्षा एवं संवेदना का समन्वय अन्तःकरण कहा जाता है। यह श्रद्धा विनिर्मित है। श्रद्धा बुद्धि से कहीं ऊँची है। बुद्धि को न्यायाधीश कहा जाय तो श्रद्धा को राष्ट्रपति की उपमा देनी पड़ेगी। श्रद्धा हर व्यक्ति की मौलिक सम्पदा है। वह किन्हीं न किन्हीं मान्यताओं के साथ जुड़ी अवश्य रहती है। कुकर्मियों की भी अपनी श्रद्धा होती है। यह दूसरी बात है कि उन्होंने दुष्टता के सिद्धान्तों और प्रयोगों को अपनाना उपयुक्त समझा हो। शिकारी-नशेबाज-प्रपंची, आततायी स्तर के व्यक्ति भी अपना अन्तराल एक खास किस्म का संजोये रहता है। उसी आधार पर उन्हें साहस करने और जोखिम उठाने में तत्पर होते देखा जाता है।
आमतौर से इस दुष्टता को श्रद्धा नहीं कहते हैं। इसे पवित्र एवं उत्कृष्ट मान्यताओं के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। श्रद्धा की गरिमा और क्षमता पर प्रकाश डालते हुए गीतकार ने उसे एक शब्द में समूचा व्यक्तित्व ही कह दिया है। कथन है कि “जिसकी जैसी श्रद्धा है वह ठीक वैसा ही है।” किसी का वास्तविक मूल्याँकन करना हो तो उसके अन्तराल में सम्मिलित श्रद्धा के स्तर का पर्यवेक्षण करना चाहिए। अगणित प्रेरणाओं का उद्गम स्त्रोत -वही है। हर व्यक्ति का अपना सत्य है और वह उसकी मान्यताओं के ढाँचे में ढला हुआ है। हर व्यक्ति का अपना प्रिय एवं अभीष्ट है। यह उसकी आकाँक्षा द्वारा निर्धारित हुआ है। हर व्यक्ति की अपनी भाव संवेदनाएँ है वे उसकी आस्थाओं के साथ अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है। इस अन्तराल को मानवी सत्ता का उद्गम केन्द्र कह सकते हैं।
परमाणु का ऊर्जा केन्द्र “नाभिक” को माना जाता है ठीक इसी प्रकार मनुष्य की स्थिति एवं सम्भावनाओं का केन्द्र बिन्दु उसके अन्तःकरण अन्तराल को समझा जा सकता है। यहीं से मनःसंस्थान को निर्देश मिलता है। और वह एक अच्छे सेवक की तरह वैसा ही सोचना आरम्भ कर देता है। जिससे कि आकाँक्षा की पूर्ति सम्भव हो सके। मन की सोचने की दिशाधारा पूर्णतया अन्तःकरण के संकेतों पर निर्भर है वह तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण इसी स्तर के ढूँढ़ता है, और क्रमबद्ध करता है। जिससे अपने अधिष्ठाता अन्तःकरण की इच्छापूर्ण हो सके। इसके लिए वह चिन्तन तन्त्र को ही नियोजित नहीं करता वरन् शरीर वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए-नियोजित करता है। अन्तःकरण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार का ननुनच करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अन्तराल को ही मनःसंस्थान और कार्य-कलापों का सूत्राधार कह सकते हैं। जो किया या सोचा जाता है उस समूचे क्रिया तन्त्र का अधिष्ठाता अन्तःकरण को ही कहा-माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी यही है वह तथ्य जिसके आधार पर व्यक्तित्व का समूचा स्वरूप उसकी श्रद्धा पर अन्तःकरण की स्थिति से अविच्छिन्न-सम्बद्ध माना गया है। गीतकार की उपरोक्त उक्ति में इसी यथार्थता को उजागर किया गया है।
मनोविज्ञान की भाषा में अन्तःकरण को सुपर चेतन कहा गया है। अध्यात्म शास्त्र में इसे जीवात्मा का निवास कहा गया है। यह दुष्टता के साथ जुड़ जाने पर दर्पण की तरह कुरूपता से आच्छादित भी दिखाई पड़ सकता है। किन्तु यदि उसे उसकी वास्तविक एवं उच्चस्तरीय स्थिति में रहने का अवसर मिल सके तो इसे देवत्व का क्षेत्र कहा जा सकेगा। सुपर चेतन को ही भगवान कहा गया है। उसी की अनुकूलता अनुकंपा प्राप्त करने के लिए पूजा प्रार्थना की जाती है। परब्रह्म परमात्मा ही सृष्टि की नियामक सत्ता है वह प्रवाह चलाने व्यवस्था बनाने और सन्तुलन रखे रहने तक ही अपने मूलभूत उत्तरदायित्वों का वहन करती है। उसे न किसी से राग है न द्वेष। उसके लिए आस्तिक, नास्तिक सभी एक जैसे है। कर्म, व्यवस्था ही परब्रह्म का अनुशासन तथा परिपूजन है। मनुष्य की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने वाला उस पर अनुग्रह करने वाला वरदान देने वाला जो ईश्वर है, वह हर मनुष्य के साथ रहता और अन्तराल में बसता है। इसी को सुपर चेतन कहते हैं। तत्व दर्शन और योग विज्ञान पर आधारित ब्रह्म विद्या का एकमात्र उद्देश्य सुपर चेतन को अन्तःकरण के उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं, आस्थाओं, आकाँक्षाओं से अनुप्राणित करता है। यह ही मनुष्य का भाग्य विधाता है जो व्यक्ति द्वारा अपनाई गई रीति-नीति को बारीकी से देखता और उसी अनुरूप अनुकंपा एवं प्रताड़ना से पुरस्कृत, तिरस्कृत करता है।
निश्चय ही पुकारने और खींचने में बड़ा अन्तर हैं-सहायता के लिये तुम सर्वदा पुकार सकते हो और पुकारना ही चाहिए और उसके बाद उत्तर आयेगा ग्रहण करने और आत्मसात् करने की तुम्हारी क्षमता के अनुपात में खींचना तो एक स्वार्थपूर्ण क्रिया है जो तुम्हारी क्षमता की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में शक्तियों को उतार सकती है। और इस तरह वे हानि-कारक हो सकती हैं।
मनुष्य एकाकी खाता-सोता तो है, पर वस्तुतः वह इस विराट् विश्व का नन्हा-सा घटक भर है। उसे निर्वाह सामग्री, प्रसन्नता, सम्पन्नता और सफलता की अनेकानेक उपलब्धियाँ समूचे समाज के योगदान से ही उपलब्ध होती है। लगने को तो यह भी लग सकता है कि हमारा सम्बन्ध-संपर्क एवं आदान-प्रदान थोड़े से लोगों तक हैं, पर थोड़ी लम्बी-दृष्टि फैलाने पर पता चलता है कि मानवी समुदाय के मध्य सहयोग की एक लम्बी शृंखला बनी हुई है। भूतकाल के दिवंगत मनुष्यों के अनुसंधान एवं उपार्जन का लाभ हम-सब अद्यावधि उठा रहे हैं और भविष्य में भी अनुदानों का यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहने वाला है। मछली का जीवन जल है और मनुष्य का अस्तित्व समाज पर निर्भर है।
विद्वान् ‘हेगल ने समष्टि मन को ही ‘विराट् पुरुष’ का संज्ञा दी है। विराट् ब्रह्म के रूप में इस निखिल ब्रह्माण्ड की सत्ता को ही चित्रित-प्रतिपादित किया जाता रहा है और “सियाराम मय सब जग जानी” वाली उक्ति के अनुसार समाज या संसार को भी विराट् की उपमा दी जाती रही हैं, किन्तु तत्वदर्शियों के गहन प्रतिपादन में ‘समष्टि-मन’ को ही वह गरिमा प्रदान की जा सकती है, जिसमें उसे ईश्वर या उसके समतुल्य ठहराया जा सकें।
ब्रह्माण्ड में भला-बुरा सब कुछ हैं। यहाँ नीति के साथ अनीति भी चलती है और देव के साथ असुर का अस्तित्व भी मौजूद है। किन्तु ‘समष्टि-मन’ विश्व के समग्र हित साधन को ही आधारभूत कारण मानता है। तद्नुरूप मात्र कल्याणकारी प्रतिपादनों को ही अंगीकार करता है। यह समूहवाद या समाजवाद से ऊँची स्थिति है। समूह वर्ग विशेष के होते हैं। उसमें मनुष्य के स्तरों का विभेद भी हो सकता है और अन्य प्राणियों को मानवी नीति-नियमों से पृथक भी रखा जा सकता है, किन्तु ‘समष्टि-मन’ तो एक प्रकार से सार्वभौम नीति-निष्ठा-सहकारिता एवं उदारता का समन्वित स्वरूप रहेगा। अन्यथा उसके प्रभाव से व्यष्टि-मन को-उत्कृष्टता की दिशा देने योग्य प्रखरता एवं क्षमता ही न रह जायेगी।
विराट् पुरुष अथवा समष्टि-मन में उस श्रेय का ही बाहुल्य रहेगा। ऐसा श्रेय जिसे सहयोग एवं औचित्य का समन्वय कहा जा सके। ‘हेगल’ के प्रतिपादन का यही सार संक्षेप है।
कार्डिनल न्यूमेन ने अपने ग्रन्थ ‘ग्रामर आफ असेण्ड’ में अन्तरात्मा से उठने वाली उच्चस्तरीय प्रेरणाओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है और उसे ‘इलेक्ट्रिक फेकल्टी’ नाम दिया है। वे कहते हैं-”धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली ‘श्रद्धा’ इसी उद्गम स्त्रोत से निःसृत होती है।”
व्यक्ति और समाज के हित साधन की बात सोचने वाली चिन्तन प्रक्रिया को बुद्धिमत्ता या दूरदर्शिता ही कहा जा सकता है, पर अन्तःकरण का विस्तार इतने सीमित क्षेत्र में ही समाप्त नहीं हो जाता, वरन् इसके आगे की उच्चस्तरीय स्थिति है-अन्तरात्मा। यह विशुद्ध रूप में उन्हीं आदर्शों का समर्थन करती है जो व्यक्ति और समाज के बुद्धिसंगत प्रतिपादनों से भी कहीं ऊँचे होते हैं।
न्यूमेन के अनुसार मनुष्य के विचारों के तर्क से परे एक विलक्षण शक्ति कार्य करती है, जिसे श्रद्धा-विश्वास की शक्ति कहा जा सकता है। तर्क, तथ्य और प्रमाण बुद्धि को प्रभावित करते हैं, पर वह प्रभाव व्यक्ति को उतना ही स्वीकार करने की आज्ञा देता है जिसमें पूर्व कल्पित स्वार्थों पर आँच न आती हो।
भौतिक स्वार्थों की उपेक्षा करके भी जो उत्कृष्टता को अपनाने की प्रेरणा उत्पन्न करती और उसे अपनाने में कुछ भी हानि उठाने का साहस देती है वही ‘श्रद्धा’ है। इसे अन्तरात्मा की आवाज या अंतर्ध्वनि भी कह सकते हैं। यह परत जिनकी भी विकसित हो सके उन्हें देवताओं की श्रेणी में गिना जा सकता है। ऐसे ही लोग महामानव कहलाते हैं और ऋषि-कल्प श्रद्धा के अधिकारी बनते हैं। समय परलोक मानस पर-ऐसे लोग ही गहरी छाप छोड़ते और महत्वपूर्ण परिवर्तन की भूमिका सम्पादित करते हैं।
बोगार्ड्स कहते है-समाज का प्रवाह उस दिशा में बहना चाहिए जिससे उसके सदस्यों को सत्प्रवृत्तियाँ पनपाने के लिए प्रोत्साहन एवं पोषण मिल सके। साथ ही व्यक्तियों का निजी तथा सम्मिलित प्रयास यह होना चाहिए कि वे सभ्य समाज के गठन में योगदान दें। बादल बरसने से नदियों में पानी पहुँचता है और नदियाँ समुद्र को भरा-पूरा रख कर उसे बादल उत्पन्न कर सकने योग्य बनाये रहती है। इसी प्रकार व्यक्तियों के पुरुषार्थ का लक्ष्य होना चाहिए। समुन्नत समाज की संरचना और समुन्नत कहलाने वाले समाजों को इस तथ्य की प्रमुखता देनी चाहिए कि उस ढाँचे में सुसंस्कृत व्यक्तित्वों को ढालने, परिपुष्ट करने की क्षमता पर्याप्त मात्रा में बनी रहे।
डेविस कहते है-”आज देशों और समाजों के उन्नत-अवनत होने का अनुमान इस आधार पर लगाया जाता है कि उनके पास सम्पन्नता के साधन-स्त्रोत कितने है ? शस्त्र-सज्जा तथा अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है? व्यक्ति का उसकी बलिष्ठता, सम्पन्नता और शिक्षा-कुशलता के आधार पर ऊँचे और नीचे होने का निर्णय किया जाता है। किन्तु स्मरण रखने योग्य बात यह है कि जिस प्रकार अनेकों मूढ़ मान्यताएँ हट रही हैं उसी प्रकार यह मान्यता भी देर तक बनी नहीं रहेगी कि साधनों-सुविधाओं के आधार पर समाजों एवं व्यक्तियों का मूल्य-निर्धारण किया जाता रहे।
वह दिन दूर नहीं जब उत्कर्ष एवं अपकर्ष के सम्बन्ध में नई परख-प्रक्रिया व्यवहार में आने लगेगी। उसके अनुसार यह सोचा जायेगा कि जिस समाज में सामाजिकता की भावना जितनी अधिक होगी-उसके सदस्य नागरिक जिस हद तक सहकारी प्रयासों में, जितनी गहरी श्रद्धा के साथ संलग्न हों, उसे उतना ही श्रेष्ठ और समुन्नत स्वीकार किया जाय।
“अगले दिनों प्रजाजनों की चरित्र-निष्ठा और व्यवहार कुशलता ही व्यक्तियों को सम्मान और सहयोग दिला सकेंगे और राष्ट्रों-समाजों की श्रेष्ठता भी इसी पर अवलम्बित रहेगी कि सदाशयता को कहाँ किस स्तर तक समझा और अपनाया जा रहा है।
मनुष्य की दो दुनिया है, एक अपनी दूसरी सम्मिलित। दोनों का अपना-अपना महत्व है। एक-दूसरे की पूरक रहने के कारण उन दोनों का समन्वय रहना आवश्यक है।
निजी दुनिया वह है जिसमें इंद्रियां तृप्ति की वासना और मनःतुष्टि की तृष्णा कहा जाता है। इन दोनों के समन्वय को आकाँक्षा कहते हैं। व्यक्तिगत उमंगे और चेष्टाएँ इसी प्रेरणा केन्द्र से उद्भूत होती है। आत्मा केन्द्रित व्यक्ति इसी परिधि में अपने चिन्तन एवं प्रयास को नियोजित किये रहते हैं। इसी परिधि की उपलब्धियों के अनुरूप अपने को सुखी-दुःखी, सफल-असफल मानते रहते हैं।
सम्मिलित चेतना इससे आगे की है, उसमें परिवार, स्वजन, संपर्क और समाज का सुविस्तृत क्षेत्र आता है। इसकी तुष्टि और प्रगति का भी वैसा ही ध्यान रखना पड़ता है जैसा कि अपने आपका। दोनों के बीच इतनी सघनता है कि एक के बिना दूसरा का मनोरथ एवं प्रयोजन पूरा हो नहीं सकता। विकसित व्यक्तित्व ही साझे की दुनिया में अपना स्थान बनाने और उपयोगी आदान-प्रदान कर सकने में सफल होता है।
प्रगतिशील को उभयपक्षीय प्रगति का उसी प्रकार ध्यान रखना पड़ता है जैसा कि गाड़ी को अपने दोनों बैलों या पहियों का। इनमें से एक भी लड़खड़ाने लगे तो गतिरोध खड़ा होगा और गतिशीलता का लाभ मिलने के स्थान पर टूट-फूट को सुधारने का नया जंजाल खड़ा होगा। व्यक्तित्व की दृष्टि से ‘सुसंस्कारिता का जितना महत्व है उतना ही समष्टिगत सफलताओं के लिये सज्जनोचित शालीनता एवं सघन सहकारिता का।
यह सही है कि मनुष्य पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है और समीपवर्ती परिस्थितियाँ उसे अपने अनुरूप ढाँचे में ढालती चली जाती है। इस प्रतिपादन में बहुत कुछ सच्चाई होते हुए भी यह कमी है कि उसमें उस दूसरे पक्ष को महत्व नहीं दिया गया जो प्रायः इतना ही सामर्थ्यवान् है, जितना कि पारिवारिक एवं सामाजिक पर्यावरण।
व्यक्ति का ‘स्व’ भी एक प्रचण्ड सामर्थ्य है। वह दुर्बल पड़ता है, तो ही पर्यावरण से प्रभावित होती है। अन्यथा यही आत्मा जब अपनी प्रखरता को विकासवान बनाती है तो असाधारण समर्थता का परिचय देती है। इतना असाधारण जिसे परिस्थिति को उलट डालने अथवा उन्हें अवरोध न बन सकने की स्थिति में पहुँचाने योग्य बनाकर रख दे।
वातावरण भौतिक पदार्थों से बना है, किन्तु अन्तराल चेतनामय। चेतना की वरिष्ठता प्रख्यात है। वायुयान-जलयान जैसे विशालकाय संयन्त्र भी सचेतन-संचालक के संकेत पर चलते हैं। यदि चेतना का स्तर ऊँचा हो तो उसकी सामर्थ्य वातावरण को-उसके प्रवाह को मोड़ने-मरोड़ने में भी समर्थ हो सकती है।
चेतना सर्वथा परावलम्बी नहीं है। उसे परिपोषण की सामग्री भर बाहर से मिलती है। किन्तु वास्तविक शक्ति तो भीतर से ही उदय होती है। पेड़ हवा में साँस लेते हैं पर उन्हें जीवन-रस की उपलब्धि जमीन के भीतर छिपी हुई जड़ों से ही प्राप्त होती है। हीरा खरादा तो चरखी पर जाता है और बिकता जौहरी की दुकान पर है उनका निर्माण किसी अविज्ञात खदान की गहरी परत में ही होता है।
व्यक्ति स्वनिर्मित है ऐसा कहा जाय तो उसे अत्युक्ति नहीं माना जाना चाहिए। अपनी उमंग अपनी हिम्मत और अपनी मेहनत से ही कोई कुछ पा सकता है। जड़ों को खुराक मिलती तो है जमीन से ही, पर चूसने की विशिष्टता उनकी अपनी होती है। इसी आधार पर वह एक समूचे पेड़ को पनपाने और फला-फूला बनाने में समर्थ होती है।
चेतना की मौलिक विशेषता जिस स्तर की होती है, जितनी समर्थ होती है, उसी अनुपात से बाह्य जगत् का सहयोग मिलता चला जाता है। चेतना अनगढ़ मूर्छित और विकृत हो तो समझना चाहिए कि प्रचुर साधन और भरपूर सहयोग होते हुए भी प्रगति पथ पर बढ़ चलना तो दूर अपनी स्थिति को यथावत् बनाये रखना तक कठिन हो जायेगा।
प्रगतिशीलता का अर्थ यदि सम्पन्नता किया जायेगा और उसके साथ चिन्तन की श्रेष्ठता को न जोड़ा जायेगा तो फिर लक्ष्य यही बन जायेगा कि भौतिक समृद्धि को किसी भी प्रकार उपार्जित किया जाय। समृद्धि के मन-चाहे उपयोग में आकर्षण की अधिकता रहती है। यदि उस पर भावनात्मक उत्कृष्टता का अंकुश न रहे, तो फिर समृद्धि की उत्कृष्टता ऐसी आतुरता उत्पन्न करेगी कि उसे धर्म-मर्यादाओं का स्मरण दिलाने से भी नियन्त्रित न किया जा सकेगा और वह कुछ भी-किसी भी उपाय से कर गुजरने-अनीति और उच्छृंखलता बरतने तक में प्रवृत्त होती दिखाई पड़ेगी। ऐसी प्रगति व्यक्ति को दुर्गुणी और समाज को अनाचारी बना देगी। कहना न होगा कि प्रकृति और चेतना के शाश्वत नियम इस प्रकार के अनुपयुक्त मार्ग से उपार्जित सम्पदा को सहन न करेंगे, फलतः सर्वत्र संकट, विग्रह और विनाश के दृश्य उपस्थित होंगे।
जीव-चेतना के साथ जुड़ी हुई जिस प्रगति आकाँक्षा की चर्चा की जाती है, उसे सुसंस्कृत दृष्टिकोण एवं शालीनता युक्त चरित्र के रूप में ही मान्यता दी जा सकती है। उसी के माध्यम से व्यक्ति की विशिष्टता बढ़ती है। व्यक्तित्व की विशिष्टता एक शक्तिशाली चुम्बक है, जिसके आकर्षण से उपयोगी साधन-सामग्री उतनी मात्रा में सहज ही उपार्जित होती रहती है, जितनी कि निर्वाह के लिए आवश्यक है। इससे अधिक मात्रा का उपार्जन एवं उपयोग व्यक्ति में अनेक दुर्व्यसन उत्पन्न करेगा और समाज में अपराधी दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देगा। दूरदर्शी विवेकशील सदा से यही कहते रहे हैं कि यदि भौतिक उपार्जन औसत नागरिक स्तर का ही किया जाना चाहिए। उसे संग्रह में -कुटुम्बियों में-मुफ्त बाँटने में-बर्बाद न करके लोकोपयोगी कार्य में खर्च कर दिया जाय। लालच इस नीति युक्त दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता। फलतः बढ़ी हुई सम्पदा-प्रगति दिखते हुए भी सुखद प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करती। यही कारण है कि उत्कृष्टता का अंकुश न रहने पर समृद्धि सर्वत्र दुष्परिणाम ही उत्पन्न करती देखी गई है। भले ही उसके अधिपति कुछ समय तक विलासी-संग्रही के रूप में अपने अहंकार का प्रदर्शन करते फिरे।
यह कठिनाई भावनात्मक प्रगति में नहीं है। दृष्टिकोण में उत्कृष्टता-विचारणा में दूरदर्शिता और गतिविधियों में शालीनता का समावेश बढ़ता चले तो क्रमशः व्यक्तित्व का वजन बढ़ता जायेगा। ऐसा व्यक्ति अपनी आँखों में समूचे समुदाय की आँखों में वजनदार बनता जायेगा। जिसका जितना मूल्याँकन किया जाता है, उसे उसी स्तर के प्रतिफल, अनुदान एवं उपहार भी मिलते रहते हैं। व्यक्तित्ववानों की अपनी क्षमताएँ विकसित होती हैं और उनके सहारे उपयुक्त निर्वाह की साधन सामग्री सहज ही उपार्जित की जा सकती है। इसके विपरीत संकीर्ण-स्वार्थपरता में निमग्न व्यक्ति प्रायः अनुदार असामाजिक और कई वार अपराधी प्रवृत्ति के भी होते हैं। ऐसे लोगों का मूल्य सर्वसाधारण की दृष्टि में गिर जाता है। फलतः वे दूसरे की सहानुभूति, सहायता, आत्मीयता से वंचित रहने पर उपार्जन उपयोग भी एक सीमा तक ही कर पाते हैं। उसकी छीन-झपट का एक नया सिलसिला चल पड़ता है। फलतः कड़ुवे-मीठे आक्रमण करने वाले- अपने-बिरानों से चमड़ी बचाना तक कठिन हो जाता है।
गुण-अवगुण की कतिपय कसौटियाँ पार करने के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि एकाँगी समृद्धि चमकीले साँप की तरह लगती तो आकर्षक है, पर वे अपने विष-दंश से असीम हानि पहुँचाती है। इसके विपरीत व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने का लक्ष्य निर्धारित करने पर घाटा तो इतना ही हो सकता है कि निर्वाह के अनिवार्य साधनों से सन्तुष्ट रहना पड़े और ठाट-बाट में धनवानों जैसा सरंजाम न जुट सके। इतने पर भी इस मार्ग पर चलते हुए जो सन्तोष और सम्मान मिलता है उसका वैयक्तिक एवं सामाजिक मूल्य कुछ कम नहीं है।
वे दिन बहुत पीछे रह गये जब सम्पन्नताजन्य ठाट-बाट को -अपव्यय को- देखकर लोग अमीरों को ईश्वर का प्यारा- भाग्यवान् बुद्धिमान् मानते और नत-मस्तक होते थे। अब मूल्याँकन की कसौटियों में जमीन आसमान जितना अन्तर आ गया है। इन दिनों समाजवादी साम्यवादी-चिन्तन व्यवहार में भले ही बेहतर पाया हो-अर्थ-दर्शन के रूप में वह पूरी तरह लोक-समर्थन प्राप्त कर रहा है। उस मान्यता के अनुरूप अधिक संग्रही, अधिक विलासी, अधिक अपव्ययी लोग नीतिवान नहीं समझे जाते। अस्तु, उन पर ‘अनीति की कमाई-विलास की लड़ाई’- की उक्ति के अनुरूप तरह-तरह के लाँछन लगाये जाते हैं। वैभव की चकाचौंध तो अभी भी है और उसे लोग झपटना हड़पना तो अभी भी चाहते हैं किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि वैभववानों की प्रशंसा एवं प्रभावों के दिन लद गये। उन पर हर कोई अनीति उपार्जन का लाँछन लगाता है, भले ही वह अनुचित ही क्यों न हो ? पुरातन काल में अपना-अपना भाग्य कहकर सन्तोष कर लिया जाता था, पर अब तो ईर्ष्या के उभार का मौसम है। साम्यवादी प्रतिपादन ने ऐसी ही लोक-दृष्टि का विस्तार किया है और वह अधिकाँश जन-समुदाय के गले उतर गई है। अपराधी को दण्ड देने के प्रचलन में, सम्पन्नों को कोसने-लाँछित करने गरमागरम चर्चा तो होती ही है। साथ ही अपहरण के सफल-असफल उपाय भी दिमागों में चलते एवं जब तक क्रियान्वित भी होते रहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि लोगों के बीच बड़ी हुई आर्थिक असमानता ने अपराधी दुष्प्रवृत्तियों को इन दिनों अत्यधिक बढ़ावा दिया है। विश्लेषण करने पर इसी नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि दूसरों प्रभावित करने, उनसे इज्जत पाने का सपना सर्वथा निरर्थक निकला उलटे तीन हानियाँ हुई - पैसा गया, प्रामाणिकता घटी, संकट बढ़ा और दुर्गुणी दुर्व्यसनों का ऐसा भार अकारण ही लद गया जो व्यक्तित्व का मूल्य गिराता और मनः संस्थान पर तनाव उत्पन्न करने वाले जंजालों से जकड़ता है।
संचय को उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ना या भोगना उसी हालात में उसी मात्रा में उचित है जितने से उनके वयस्क होने तक का गुजारा एवं स्वावलम्बन का आधार खड़ा हो सकें। ब्याज-भाड़े की कमाई बैठे-बैठे खाते रहने का प्रबंध करना, मुफ्त का माल अनगढ़ पीढ़ी पर छोड़कर चले जाना, उनका हित-साधन नहीं है और न दुलार का परिचय देने वाला तरीका। यह तो विनाश का मार्ग है, जिस पर अभिभावक अनजाने ही दुलार के नाम पर अपनी सन्तान को धकेलते हैं।
यही सब है, उन सफलताओं की परिणित, जिन्हें भौतिक सम्पदा कहते हैं। विद्या, बुद्धि प्रतिभा, कला का - पदासीन या प्रतापी होने का लाभ तभी है, जब उनके साथ शालीनता का अनुशासन जकड़ा रहे। उसकी पकड़ ढीली होते ही यह सभी विभूतियाँ अनुपयुक्त मार्ग पर चल पड़ती हैं। दुर्बलों को दबोचने और उनसे अपना उल्लू सीधा करने के काम आती है।
मात्र वैभव बड़प्पन का मार्ग तो बारूद का खेल-खेलने की तरह है। उसमें फुलझड़ी उड़ती तो दिखती है, पर चिनगारी से जलने और पैसे की बर्बादी होने की हानि भी स्पष्टतः सामने खड़ी रहती है। वैभव का उपार्जन एक बात है और उसके उत्पादन एवं उपयोग में शालीनता का समावेश होना-सर्वथा दूसरी। सम्पदा तो दुधारी तलवार है। यदि उसका अभ्यास एवं प्रयोग सही न हुआ तो उसका होना, न होने से भी अधिक महंगा पड़ेगा। अविवेकी के हाथ में पड़ा हुआ वैभव तो बन्दर के हाथ में तलवार के समान है जिसने मक्खी मारने का लाभ सोचने पर भी मालिक की नाक काटकर हानि पहुँचायी थी।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए हमें शान्त चित्त से-निष्पक्ष न्यायाधीश जैसे विवेक का उपयोग करते हुए यह देखना होगा कि सम्पदा को प्रमुखता दी जाय या महानता को ? निश्चय ही दूरदर्शिता का फैसला महानता की गरिमा स्वीकारने और उसे उपलब्ध करने के प्रयास में जुट पड़ने का ही होगा।
यह विश्व ब्रह्माण्ड किस प्रकार बना और फिर किस प्रकार सुविस्तृत होते-होते इस स्तर तक पहुँचा, इसका ऊहापोह खगोलवेत्ता अपने-अपने ढंग से करते रहते हैं। इस संदर्भ की रहस्यमय जानकारी यह है कि पदार्थ की बहिरंग हलचलें और भीतर की अद्भुत क्षमताएँ अकारण अथवा स्वेच्छाचार पर निर्भर नहीं है वरन् उनके पीछे ऐसे तथ्य जुड़े हुए है जिन्हें चेतन जगत की परम्पराओं के अनुरूप कह सकते हैं।
प्राणि-जगत की प्रगति का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि उस क्षेत्र में जो कुछ हुआ है या होने वाला है वह वस्तुपरक नहीं वरन् भावपरक है। आकाँक्षाएँ उभरती हैं और बुद्धि तथा काया तद्नुरूप काम करना आरम्भ कर देती है। स्नेह सहकार से प्रेरित होकर वे एक दूसरे के साथ बँधते और आदान-प्रदान का उपक्रम चलाकर उपयोगी उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त उनका साहस है जो पराक्रम के लिए अन्तःक्षेत्र में अभीष्ट विद्युत का उत्पादन करता है। बिजली न होने पर संबंध यन्त्रों का चल सकना सम्भव नहीं, इसी प्रकार साहस के अभाव में शारीरिक पुरुषार्थ बन पड़ते हैं और न मनःक्षेत्र के महत्वपूर्ण संस्थान कुछ महत्वपूर्ण सोचने-कुछ सारगर्भित निष्कर्ष निकालने में समर्थ होते हैं।
प्राणि-जगत की विशेषतया मनुष्य समाज की अद्यावधि प्रगति का सार संक्षेप यही है। इन्हीं प्रवृत्तियों ने उसे नर पशु से नर नारायण स्तर तक पहुँचा देने को सड़क बनाई है। यदि उपरोक्त तीन अतिरिक्त प्रवृत्तियाँ मनुष्य में न होतीं तो वह भी आदिम काल की उसी स्थिति में पड़ा रहता जिसमें कि अन्यान्य प्राणी रह रहे है।
सृष्टि क्रम के अनुसंधानी बताते हैं कि आरम्भ में मात्र अनगढ़ पदार्थ यत्र-तत्र बिखरा पड़ा था, न उसका कोई व्यवस्थित स्वरूप था और न निश्चित क्रिया-कलाप। लक्ष्य विहीन पथहारे की तरह वह ऐसे ही निरुद्देश्य भटकता था। जब उसका सुनिश्चित स्वरूप बनने का समय आया तो आगे पीछे तीन महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं और उनने प्रस्तुत ब्रह्माण्ड का एक स्वरूप एवं कार्यक्रम निर्धारित कर दिया।
कहते हैं कि अनगढ़ पदार्थ में विस्फोट हुआ और बढ़ती गई। यह दूसरा चरण गति है। गति न केवल आगे ही बढ़ती गई वरन् उनने एक कक्षा बनाई और परिक्रमा करने की नीति अपनाई। परिक्रमा आवेग बाहरी कक्षा में परिभ्रमण साथ ही अपनी धुरी पर अपने क्षेत्र में लट्टू की तरह घूमना। इस प्रक्रिया के साथ-साथ एक और नया तथ्य उभरा-वह था गुरुत्वाकर्षण। गुरुत्वाकर्षण अर्थात् बड़े के प्रति छोटे का नमन और छोटे के प्रति बड़े हुए स्नेह सहयोग का अनुदान। इन्हीं तीन सिद्धान्तों पर प्राणि-जगत का विकास हुआ है और उन्हीं पर पदार्थ ने अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए अनुशासन बनाये और अपनाये हैं। इस संदर्भ में अधिक जानना हो तो उस प्रक्रिया पर और भी पैनी नजर डालनी पड़ेगी।
सृष्टि के आदि में हुआ विस्फोट कहीं बाहर से नहीं भीतर से ही उभरा। चेतना के क्षेत्र में इसे अदम्य अभिलाषा कह सकते हैं। इसके उपरान्त जब छितराया हुआ पदार्थ अनगढ़ स्थिति को छोड़कर सुव्यवस्थित रहने की स्थिति तक पहुँचा तो उसमें दो शक्तियाँ काम करने लगीं एक आकर्षण की दूसरी विदूषण की। ग्रह पिण्डों में पाई जाने वाली गुरुत्वाकर्षण शक्ति, अनेक साधनों को बाहर से खींचकर अपने वैभव में सम्मिलित करती है। विकर्षण आगे बढ़ने का पुरुषार्थ और अवरोध को चीर डालने की भूमिका बनाता है। ग्रह आगे बढ़ते हैं।
इसके लिए उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यह आदिम विस्फोट से उसे उपलब्ध है। यह आरम्भ ऐसी घड़ी में हुआ है कि उसका अन्त कभी भी न हो सकेगा। इसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण सृष्टि की उद्गम बेला में ही प्रादुर्भूत हुआ और वह भी जब तक इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है तब तक यथावत् ही बना रहेगा।
सृष्टि के आधारभूत कारणों को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। एक वह जबकि गुम-सुम पड़े हुए द्रव्यमान को यह ‘ऊत’ सूझी कि यह जड़ जैसी नीरस निस्तब्ध स्थिति स्वीकार नहीं। इससे सन्तुष्ट नहीं बैठा जस सकता है। आगे बढ़ना और क्रीड़ा-कल्लोल करना ही चाहिए। यह सब विचारपूर्वक योजनाबद्ध हुआ था संयोगवश इस पर विवाद करने की आवश्यकता नहीं। इतना समझा जा सकता कि वह उमंग उठी अवश्य। भले ही उसका कारण कुछ भी क्यों न रहा हो। यह एक आधारभूत कारण है जिसने निस्तब्ध घनीभूत पदार्थ यान को वर्तमान ब्रह्माण्ड के रूप में विकसित परिणित होने का कौतूहल खड़ा कर दिया।
इसके उपरान्त दूसरी प्रक्रिया है विस्फोट के साथ गति का जुड़ा होना। यदि विस्फोट के साथ गति न होती तो एक धमाका भर होने और उसी समय कुछ उछल-कूद होने के उपरान्त बात सदा सर्वदा के लिए शान्त हो जाती और उसका एक घटना मात्र के रूप में ही विवरण मिलता और समय के साथ-साथ विस्मृत के गर्त में गिरता चला जाता। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। विस्फोट धमाका भर नहीं रहा वरन् एक गतिशीलता बनकर ब्रह्माण्ड के उसके घटक अवयवों का स्वभाव बनकर रह गया। वह स्वभाव ही अग्रगमन के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन उसी गोलाकार गतिशीलता का उतार-चढ़ाव है।
तीसरा गुरुत्वाकर्षण बल सर्वविदित है। यदि वह न हो तो ग्रह तारक एक दूसरे के साथ रस्सों में जकड़े हुए जिस प्रकार अधर में टंगे है वैसा शक्य ही न हो सके। उनके बीच कोई तालमेल ही न बैठे। धुरी पर घूमने और कक्षा में परिक्रमा करने का अनुशासन ही न रहे। यह ग्रह पिण्ड स्वेच्छाचारी मायावरों की तरह इधर-उधर भटकने-एक दूसरे से टकराने चिपकने लगे। फिर दिनमान के रूप में जो काल एक सुनिश्चित स्थिति बनाये हुए है उसका भी कोई अस्तित्व न रहे। ऐसी दशा में जीवनधारियों की न तो उत्पत्ति ही हो सकती है और न उनके निर्वाह की साधन व्यवस्था। ऐसी दशा में ब्रह्माण्ड का स्तर भी अलाव से उठने वाले और इधर-उधर छितराने वाले धुएँ से अधिक और भी कुछ न बन पड़ेगा। गुरुत्वाकर्षण को एक प्रकार से नीतिमान एवं अनुशासन जैसी मानवी विशिष्टता के समतुल्य गिना जा सकता है। विस्फोट में मूल स्थिति उमंग की आकाँक्षा कह सकते हैं। विस्फोट का साहस पराक्रम। गुरुत्वाकर्षण का सहकार अनुशासन। सृष्टि के यही तीन आधार ही इस ब्रह्माण्ड की संरचना के मूलभूत कारण हैं। उन्हीं ने जीव विकास का इतना लम्बा इतिहास गढ़कर खड़ा कर दिया। अमीबा से लेकर सुविकसित प्राणियों के वर्तमान रूप में पहुँचाने तक की अति कठिन महायात्रा इन्हीं तीन साधनों के सहारे सम्भव हो सकी है। पदार्थ और प्राणी की प्रगति का इतिहास जिस कागज, कलम और स्याही से लिखा गया है उसे आकाँक्षा-साहसिकता एवं सहकारिता के रूप में माना जा सकता है। आकाँक्षा को ही सत्, सहकारिता को ही रज और साहसिकता को ही तप कहते हैं।
पुराने समय की बात है। एक महात्मा को किसी जघन्य अपराध में पकड़ लिया गया व उन्हें दोषी मान दोष स्वीकारने के लिए यातनाएँ दी गई। महात्मा थे बिल्कुल निर्दोष। चुपचाप वे मार सहते गए अन्ततः उन्हें छोड़ दिया गया।
एक सज्जन यह दृश्य देख रहे थे उन्होंने पूछा “गजब है आप इतने दुर्बल व कृषकाय इतनी यातना कैसे सह गए।” महात्मा बोले ‘विपत्ति सहने के लिए शरीर की नहीं, आत्मा की शक्ति होना चाहिए।’
भारतीय संस्कृति में जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य माने गये है-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म, अर्थ और मोक्ष की तरह काम को भी उतना ही महत्व मिला है। काम का अर्थ सामान्यतया रति कर्म समझा जाता है, पर विशिष्ट अर्थ विनोद, उल्लास, उमंग, उत्साह और आनन्द माना जाता है। काम वस्तुतः जड़ चेतन में समाहित एक ऐसी शक्ति है जो सतत् हलचल करने, आगे बढ़ने - ऊँचे उठने और साहसिक प्रयत्न करने की प्रेरणा उभारती रहती है। काम सृष्टि की समस्त हलचलों का मूलभूत कारण है।
जड़-पदार्थों में यही धन और ऋण विद्युत के रूप में कार्य करता और परमाणुओं में सन्तुलन बनाये रखते हुए प्रचण्ड गति भरता है। वृक्ष वनस्पतियों के विकसित अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होने पर काम का उभार की कारण बनता है। चेतन प्राणियों में नर, नारी जैसे विपरीत तत्वों के रूप में प्रकट होता है। चिड़ियों की चहचहाहट, नन्हें जीवों का फुदकना, मचलना, कुलाचें भरना सबमें काम की क्रीडा उल्लास की ही प्रेरणाएँ दृष्टिगोचर होती हैं। किशोर वय में वह उभार, उफान के रूप में प्रकट होकर शरीर में नये परिवर्तनों के रूप में लड़के और लड़कियों में विभिन्न शारीरिक, मानसिक उभारों में अपना परिचय देता है। युवावस्था में जोश, उमंग और उत्साह दिखायी देता है। वृक्ष वनस्पतियों में जब उभार आता है तो उनमें नई-नई कोपलें निकलती कलियाँ खिलती और पुष्पित होकर उनकी शोभा बढ़ाती है।
जीव-जन्तु भी यौवन आते ही सहचर की खोज में निकल पड़ते हैं और साथी मिलते ही परस्पर आबद्ध हो जाते हैं। सन्तानोत्पादन का सिलसिला चल पड़ता है। किशोर वय में लड़के, लड़कियों के बीच स्वाभाविक आकर्षण होता है। जिसकी परिणति आगे चलकर दांपत्ति सूत्रों में होती है। नर-नारी आदान-प्रदान द्वारा संतानोत्पत्ति की ओर अग्रसर होते हैं। बनने और बढ़ने वाले इस नये परिवार की व्यवस्था जुटाने में उनकी अधिकाँश क्षमताएँ खप जाती है, यह काम बीज की ही परिणति है जो विशाल वट वृक्ष की तरह विस्तारित होकर विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ती है।
काम को हेय और घृणित तब माना जाता है जब वह यौनाचार के संकीर्ण अर्थों में प्रयुक्त होता है और उसे वासना तृप्ति का एकमात्र आधार समझ कर असामाजिक, अनैतिक एवं अमर्यादित रूप में क्रियान्वित किया जाता है। प्रकृति प्रेरणा से मनुष्य ही नहीं, अन्याय जीव जन्तुओं में भी यह प्रक्रिया अपने आप चलती रहती है। मनुष्य भी यदि काम जैसी सृजनात्मक शक्ति को यौन सन्तुष्टि और प्रजनन तक सीमित रखता है तो उसमें और अन्य जीव जन्तुओं में कोई विशेष अन्तर नहीं रहता और तब काम जैसी महाशक्ति की वह गरिमा नहीं रहती जो शास्त्रों में वर्णित है-जिसकी स्तुति अभ्यर्थना की गई है।
‘सेक्स’ शब्द जिन अर्थों में प्रयुक्त है वह काम का स्थूल धरातल है। काम की परिष्कृत धारा प्रेम है। शौर्य, साहस पराक्रम, जीवट, उत्साह और उमंग उसकी ही विभिन्न भौतिक विशेषताएँ है। उत्कृष्ट विशेषताएँ उदात्त भाव सम्वेदनाएँ काम की आध्यात्मिक विशेषताएँ हैं। सेक्स के इंद्रियां धरातल से उठकर प्रेम और भाव सम्वेदनाओं के विस्तृत क्षेत्र में पहुँचना ही काम का परम लक्ष्य है। इन्द्रिय सीमा में लिप्त काम अतृप्ति और अशान्ति को ही जन्म देता है। पवित्र प्रेम में परिवर्तित होकर सन्तोष और दिव्य आनन्द का कारण बनता है।
शरीर, मन और बुद्धि तीनों में ही काम शक्ति क्रियाशील है। संयम और उर्ध्वगमन की साधना द्वारा ‘काम’ का रूपांतरण होता है। रूपांतरण का अर्थ है सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उल्लास का समावेश हो जाना।
प्रायः समझा यह जाता है कि दांपत्ति-जीवन में काम सेवन अनिवार्य है और इसके बिना पति-पत्नि के बीच प्रेम और घनिष्ठता स्थापित नहीं हो सकती। यह मान्यता निराधार है। कितने ही महापुरुष ऐसे हुए हैं जो आजीवन ब्रह्मचारी रहे और उनका दांपत्ति-जीवन अन्य व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक सुखी, सन्तुष्ट सरस और आनन्ददायक बना रहा। महात्मा गाँधी ने 32 वर्ष की अवधि में ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया और आजीवन उस व्रत का पालन किया। इससे कस्तूरबा और उनके बीच घनिष्ठता घटी नहीं बल्कि उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। शारदामणि के साथ जीवन पर्यन्त साथ रहते हुये भी रामकृष्ण परमहंस आजीवन ब्रह्मचारी रहे। उन दोनों के बीच जो माधुर्य प्रेम और आत्मीयता थी वह देखते बनती थी।
काम के संयम का अर्थ हैं - उसे रचनात्मक दिशा देना। दमन से तो विकृति उत्पन्न होती और अनेकानेक मनोरोगों को जन्म देती है। नदियों की प्रचण्डधारा को मोड़कर बाँध बनाया, विद्युत उत्पन्न किया जाता है। छोटी-बड़ी नहरों में छोड़कर खेतों को सींचने का काम लिया जाता है। उस धारा को रोक दिया जाय और दिशा न दी जाय तो पानी फूट-फूटकर बह निकलेगा और समीपवर्ती क्षेत्र की आप्लावित कर देगा। ‘काम’ के साथ भी यही बात लागू होती है।
वैचारिक और भावनात्मक क्षेत्र में काम शक्ति का नियोजन कर क्षणिक इन्द्रिय तुष्टि की तुलना में कहीं उच्चस्तरीय और स्थायी आनन्द की अनुभूति की जा सकती है। कवि, कलाकार साहित्यकार संगीतज्ञ प्रायः अपनी ही धुन और मस्ती में खोये रहते हैं। इन्द्रियों के स्थूल धरातल से वे ऊपर उठे होते हैं। कला, साहित्य, संगीत, कविता जब साधना का अंग बन जाती है तो उसमें होने वाली रसानुभूति की तुलना में काम सेवन तुच्छ और हेय जान पड़ता है।
ललित कलाओं में गायन विद्या सर्वश्रेष्ठ है। इसमें भावों के प्रवाहित होने के लिए ऊँचे और सरस क्षेत्र मिल जाने से काम का स्थूल आवेश समाप्त हो जाता है। बुद्धि क्षेत्र में उच्चस्तरीय दार्शनिक विचारों का चिन्तन-मनन काम परिष्कार का सशक्त माध्यम है। बुद्धि और भाव के क्षेत्र में काम की शक्तिधारा परिष्कृत और परिशोधित होकर प्रवाहित होने पर उनमें उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावों से भर देती है। शरीर के स्थूल केंद्रों की ओर उसका प्रवाह अपने-आप कम होता जाता है। फलतः कामोद्वेग नहीं रहता।
काम की चरम परिणति ईश्वर प्रेम के रूप में होती है। भक्त भगवान के बीच भाव-तादात्म्य घनिष्ठता आत्मीयता, सरसता की एकरूपता स्थापित हो जाने से दिव्य आनन्द की निर्झरिणी प्रवाहित होने लगती है जिसके समक्ष सभी साँसारिक सुख निस्सार जान पड़ते हैं। इसे ही काम बीज का ज्ञान बीज में उत्कर्ष कहते हैं। यही है काम का परम लक्ष्य।
संगीत साधना में आजीवन निरत प. विष्णु दिगम्बर अपने पीछे सुयोग्य संगीत साधक छोड़ जाने के लिए प्रयत्नशील रहे। इस प्रयत्न की सफलता सन्तोषजनक नहीं दीख रही थी। इस पर उनके एक मित्र ने व्यंगपूर्वक पूछा - ‘इतनी मेहनत करके आखिर आपने कितने ‘तानसेन’ पैदा कर लिये ?’
पंडित जी गम्भीर हो गये और बोले -’तानसेन भी अपने जैसे तानसेन पैदा नहीं कर सके तो फिर मेरे जैसे तुच्छ आदमी की तो बिसात ही क्या है’ फिर मैंने तो कानसेना पैदा किये हैं और सुनने वालों में यह योग्यता जगाई है कि संगीत कैसा होना चाहिए। यह परख और जागरुकता बनी रहीं तो देर-सबेर में वैसे संगीत साधक भी बन सकेंगे जैसे कि मैं चाहता हूँ।
आदमी शरीर, बुद्धि और साधनों की दृष्टि से क्यों अधिक बलिष्ठ, कुशल और सम्पत्तिवान बनता चला आया ? जबकि अन्य प्राणी करोड़ों वर्ष से अपनी आदिम स्थिति में ही पड़े हुए हैं। प्रगति की दिशा में वे कुछ कदम ही आगे बढ़ सके है। प्रकृतिगत परिस्थितियाँ, सुविधा-असुविधा तो प्रायः सभी के लिए एक जैसी है, फिर किसी ने उनका लाभ किस कारण उठाया है और कोई क्यों उनसे अनजान-अपरिचित बना रहा ?
इस गुत्थी का समाधान प्रकृति के जैविक एवं भौतिक सिद्धान्तों से नहीं हो सकता। उसका कारण ढूँढ़ने के लिए शरीर संरचना से आगे बढ़कर बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर की परतों को कुरेदना पड़ेगा, जो मनुष्य में अन्यान्य सभी प्राणियों की तुलना में कहीं अधिक उच्च स्तरीय पायी जाती हैं।
स्तरीय से तात्पर्य कुशलता-तीक्ष्णता से नहीं वरन् उस विशेष दृष्टि से है जिसे बोल-चाल की भाषा में नैतिकता या सामाजिकता कहते हैं। उसी को सज्जनता सदाशयता के नाम से निरूपित किया जाता है। यही मनुष्य की वह भौतिक विशेषता है जो उसे काय-संरचना की दृष्टि में नहीं, कुशलता-क्षमता की दृष्टि से भी नहीं वरन् दूरदर्शिता एवं नीतिमत्ता की दृष्टि से अलग करती है।
शरीर की दृष्टि से जीवधारियों में हाथी, गैंडा, ऊँट, जिराफ, घोड़ा, चीता जैसी अनेकों जातियाँ हैं जिन्हें कहीं अधिक बलिष्ठ, विशाल एवं परिपुष्ट कहा जा सकता है। इसी प्रकार घ्राण-शक्ति में क्षुद्र कीटकों से लेकर कुत्ते तक में ऐसी विशेषताएँ पाई जाती है जिनके सहारे वे अविकसित होते हुए भी अनेकानेक आवश्यकताओं को पूरा करते और साधन जुटाते रहते हैं। चमगादड़ जैसे स्पर्श-प्रधान प्राणियों की भी कमी नहीं। हिंस्र पशु-पक्षी शिकार पकड़ने में जैसे छल-छद्म भरे हथकण्डे अपनाते चक्रव्यूह रचते हैं उसे देखकर धूर्तों और कूटनीतिज्ञों की भी दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। बिल्ली, मकड़ी आदि प्राणियों को ऋतु परिवर्तन का भूकम्प का प्रकृति दुर्घटनाओं का पूर्वाभास प्राप्त करने की अद्भुत क्षमता होती है। इसी आधार पर ही सम्भावित विपत्ति से बच निकलने और सुरक्षित स्थान तक जा पहुँचने में सफल होते रहते हैं।
शहद को मक्खी का मधु-संचय, चींटी का सहकारी समाज दीमकों की वास्तुकला, मकड़ी की तन्तु-विद्या इतनी उच्चस्तरीय है कि मनुष्य के लिए उनका मुकाबला कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। बन्दरों की तरह छलाँग लगाना, पक्षियों की तरह उड़ना मछली की तरह डुबकी लगाना उसे कहाँ आता है। ऐसी ही अन्यान्य विशेषताओं के क्षेत्र में मनुष्य दूसरों से पिछड़ा हुआ ही सिद्ध होता है। हिरन, घोड़े और चीते तक के साथ दौड़ने में प्रतिद्वन्द्विता कर सकना उसके लिए कहाँ सम्भव हो सकता है। जुगनूँ की चमक, मोर सा सौंदर्य, कोकिल सा कठ उसे प्रकृति ने कहाँ दिया ?
इतने पर भी वह प्रगति पथ पर अपने अन्य सभी साथियों को हर प्रतियोगिता में पीछे छोड़ता हुआ आगे बढ़ता चला आया है। आदि काल के विशालकाय प्राणी अतिशय समर्थ होते हुए भी अपने अस्तित्व की रक्षा व कर सके और प्रतिकूलताओं के कुछ ही थपेड़ों से धराशायी हो गये।
इंग्लैंड के प्रसिद्ध शरीर शास्त्री एडवर्ड टामसन ने गोरिल्ला और आदमी की शरीर-संरचना पर तुलनात्मक अध्ययन किया तो पाया कि ‘एनाटामी’ की दृष्टि से दोनों के मध्य कोई बड़ा अन्तर नहीं है। मस्तिष्क एवं वाणी के अवयव भी प्रायः एक जैसे हैं। फिर दोनों के स्तर में जमीन-आसमान जैसा अन्तर क्यों ? इसके उत्तर में उनने इतना ही लिखा है कि आदमी के अन्दर एक मौलिक विशेषता है। वह आत्म-नियन्त्रण, सहयोग सम्पादन, एवं दूरगामी परिणामों को समझने की ऐसी चेतनात्मक विशिष्टताओं से सम्पन्न है जिनकी वानर वर्ग के अन्य समुदाय में भारी कमी है। इसी कमी-वेशी ने मनुष्य और अन्य प्राणियों के बीच जमीन-आसमान जैसा अन्तर उपस्थित कर दिया है।
डार्विन के समकालीन दो और विकासवादी प्रख्यात हुए है। एक ‘बफन’ दूसरे ‘लिनीयस’। दोनों ने अपने-अपने ढंग से इस क्षेत्र में भारी शोध की हैं और वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जीवों के विकास क्रम में जो समय एवं साधनों का योगदान रहा है उसके आधार पर मानवी विकास क्रम को सिद्ध कर सकना शक्य नहीं। मनुष्य की विचित्रता और विलक्षणता उसको ऐसी बुद्धिमत्ता है जिसे चतुरता को नहीं, शालीनता की ही संज्ञा दी जा सकती हैं।
विशालकाय महागज सरीसृप एवं महागरुड़ आकार और पराक्रम की दृष्टि से अपने समय में प्राणी जगत में मूर्धन्य माने जाते थे। चलते-फिरते बुलडोजरों अन्धड़ों की तरह वे जिधर भी निकलते थे कत्लेआम मचाते चले जाते थे। उनका प्रतिद्वन्द्वी भी कोई नहीं था। निर्वाह के साधन भी कम नहीं थे, पर वे समय की गति के साथ दौड़ नहीं सके और अपना अस्तित्व गंवा बैठे। जबकि मनुष्य कितनी ही बार हिम प्रलयों, दुर्भिक्षों, जल-प्रलयों एवं ऐसे ही अन्य व्यापक प्रकृति प्रकोपों को सहन करता हुआ भी सृष्टि का मुकुटमणि बना हुआ है।
मानवी विशेषताओं में उसकी उदार चेतना को ही प्रमुख माना जा सकता है। उसी के कारण उसकी पशु−प्रवृत्ति, संकीर्ण स्वार्थपरता-सदुद्देश्यों का महत्व समझ सकने और उन्हें अपनाने में समर्थ हो सकी। दूसरे प्राणी अपनी शरीर रक्षा को-उसके लिए आवश्यक साधनों की उपलब्ध कराने की इच्छा में ही निमग्न रहते हैं। मनुष्य करता तो यह भी है, पर इतने तक सीमित नहीं रहता। वह आत्म-गौरव की बात सोचता है और मैत्री करुणा के निमित्त किये जाने वाले त्याग पराक्रम से आनन्द, सन्तोष का रसास्वादन करता है। यह प्रवृत्ति सद्भावना के नाम से जानी जाती है। यही हैं वह विलक्षणता जिसने निजी प्रतिभा को विकसित करने तथा दूसरों का स्नेह-सहयोग एकत्रित करने में सफलता पाई। यही है वह दैवी अनुकंपा जिसके कारण मनुष्य को प्रगति के अनेकानेक क्षेत्रों में असाधारण सफलता उपलब्ध हो सकी।
विकासवाद के प्रणेता डार्विन ने ‘आरिजिन ऑफ स्पेशीज’ पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि प्राणियों का अस्तित्व एक-दूसरे के सहयोग के ऊपर निर्भर करता है। अपनी दूसरी पुस्तक ‘मनुष्य का अवतरण’ में वे लिखते हैं कि असंख्य प्राणि समुदायों में पृथक-पृथक प्राणियों का आपसी जीवन-संघर्ष समाप्त हो जाता है। संघर्ष का स्थान सहयोग ले लेता है। फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है। उनका कहना है कि योग्यतम की श्रेणी में वे नहीं आते जो सबसे अधिक बलवान अथवा चालाक हैं, बल्कि वे हैं जो अपने समाज के हित के लिए क्या निर्बल-क्या बलवान सभी की शक्ति को इस प्रकार एकत्रित एवं संगठित करना जानते हैं कि वह एक-दूसरे का पोषक हो। जिन समुदायों में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्राणियों की जितनी अधिकता होगी वे ही सबसे अधिक उन्नत होंगे और फूले-फलेंगे।
विकासवाद के सिद्धान्त “स्ट्रगल फॉर एक्जीसटेंस एण्ड सरवाईवल ऑफ दी फिटेस्ट” के वास्तविक स्वरूप को डार्विन का उपरोक्त मत भली-भाँति स्पष्ट करता है। डार्विन के सबसे निकटवर्ती अनुयायी प्रो. केसलर थे। रूस की प्रकृतिवादियों की परिषद् में एक बार व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा - “जीवन संघर्ष का नियम तो प्रकृति में दिखाई तो पड़ता है, किन्तु वह अपवाद है। पारस्परिक सहयोग का नियम ही शाश्वत है। केसलर का कहना है कि डार्विन के जीवन-संघर्ष को व्याख्या गलत ढंग से की गई। यद्यपि में जीवन संघर्ष के नियम से सर्वथा इन्कार नहीं करता। पर मेरा कहना तो यह है कि पारस्परिक संघर्ष की तुलना में पारस्परिक सहयोग के द्वारा प्राणि-संसार और मानव जाति का कहीं अधिक विकास होता है।”
उक्त सम्मेलन में प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ एवं भूगोल शास्त्री साइवर्ट सोफ भी उपस्थित थे। उन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये-”मुझे डार्विन का ग्रन्थ ‘आरिजिन ऑफ स्पेशीज’ पढ़ने को मिला। अभी पुस्तक का नया-नया प्रभाव था। जंगलों में घूमना, जीव-जन्तुओं, पक्षियों का अध्ययन करना मेरा शौक था। मैं लम्बे समय तक अपने अध्ययन काल में इस प्रतीक्षा में बैठा रहा कि एक ही जाति के प्राणियों में तीव्र प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष देखने को मिलेगा, किन्तु मुझे निराशा ही हाथ लगी।”
अराजकतावाद (एनाकिंज्म) शासन पद्धति के प्रणेता एवं प्रसिद्ध विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन का कहना है कि जीवन संघर्ष के प्रत्यक्ष एवं व्यापक पक्षों का गहराई से जब अध्ययन करते हैं तो सबसे पहले पारस्परिक सहयोग के उदाहरण बहुतायत संख्या में सामने आते हैं।
प्रिंस क्रोपाटकिन अपनी पुस्तक ‘म्युचुअल एड’ में लिखते हैं कि जो प्राणी सामाजिक जीवन एवं परस्पर सहयोग के लाभ को समझते एवं आचरण करते हैं, वे ही जीवित रहते हैं। जबकि अधिक चालाक एवं होशियार होते हुए भी जिनमें पारस्परिक सहयोग की प्रवृत्ति नहीं होती, उन्हें प्रकृति नष्ट कर देती है।
प्रिंस क्रोपाटकिन प्रशान्त महासागर के द्वीपों में रहने वाले निवासियों -एस्किमो, रेड इण्डियनों के बीच जाकर भी अध्ययन किया। वे लिखते हैं कि समूह में संगठित रूप से मित्रतापूर्वक रहना इन जातियों का सबसे बड़ा गुण है, अन्यथा इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों में उनका अस्तित्व कभी का समाप्त हो गया होता। उनका कहना है कि प्रशाँत महासागर के टापू में रहने वाली जाति ‘पोलिनेशियन’ की अद्भुत एकता के ऊपर तो एक मोटी पुस्तक लिखी जा सकती है। ‘फ्यूजियन जाति’ को भी यही विशेषता है। वे भी पापुओं की भाँति समुदाय में रहते तथा परिश्रमशील होते हैं। वे हर वस्तु का सम्मिलित उपयोग करते हैं।
पूर्वी ग्रीनलैंड में तो और भी अधिक कठोरतम संघर्ष जीवित रहने के लिए करना पड़ता है। एस्किमो जाति में एक मात्र जीवन निर्वाह का साधन मछली पकड़ना है। प्रिंस क्रोपाटकिन आगे लिखते हैं कि एस्किमो लोगों का संगठन साम्यवादी आधार पर हुआ है। शिकार एवं मछलियाँ पकड़ने में उनके हाथ जो कुछ भी आता है, उस पर सम्पूर्ण जाति का अधिकार होता है। उनका विश्वास है कि किसी व्यक्ति विशेष की यदि संपत्ति एकत्रित हो जायेगी तो हमारी जातीय एकता छिन्न-भिन्न हो जायेगी। इससे बचाव के लिए उनके बीच एक परम्परा प्रचलित है। जब भी किसी एक व्यक्ति के पास संपत्ति एकत्रित हो जाती है वह व्यक्ति अपनी जाति के लोगों को एक बड़े उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित करता है। सभी मिल-जुलकर खाते एवं नाचते हैं। इसके आयोजन में हुए खर्च के बाद जो धन बचता है, धनी व्यक्ति सभी आमंत्रित लोगों में बाँट देता है। ‘डेल’ नामक एक विद्वान जो इस जाति का अध्ययन करने के लिए एक बार यूक्रेन नदी के किनारे गये तो एस्किमो लोगों ने स्वयं उन्हें इस प्रकार के आयोजन में सम्मिलित किया। एक धनी एस्किमो ने अपनी दस बन्दूकें, दस बालदार खाल, दो सौ ऊदबिलाव, पाँच सौ कम्बल जो भी उसकी कुल सम्पत्ति थी- को आमंत्रित सभी व्यक्तियों में बाँट दिया। डेल ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा हैं कि -”एस्किमो जाति की यह प्रथा एवं ऐसी उदारता आज भी सभ्य जातियों में नहीं दिखाई पड़ती। निस्सन्देह यही कारण है कि इस दुर्गम क्षेत्र में यह जाति प्रकृति प्रतिकूलताओं में भी जीवित बनी हुई है।
मानवी प्रगति में उसकी शरीर संरचना, बुद्धिमत्ता, परिस्थितियों की अनुकूलता आदि अन्यान्य कारण भी रहे होंगे; किन्तु उन सब में प्रमुख है उसकी सद्भावना। इसी के आधार पर उसने स्नेह-सहकार सीखा और हिल-मिलकर रहने, मिल-बाँटकर खाने का आदर्श अपना कर उत्कर्ष के माँग पर क्रमिक प्रमाण करते-करते वह आज की स्थिति तक आ पहुँचा है।
सही व्यक्तियों का निर्माण किया जाता है निर्वाचन नहीं। निर्वाचन एक अवधि तक ही सही रहता है इसके बाद वह पदजन्य विकृतियों से भर जाता है जनमत को चुनने का नहीं हटाने का अधिकार होना पर्याप्त है।
समर्थता -वैभव-बड़प्पन तथा साधनों का बाहुल्य होते हुए भी दूरदर्शिता, तेजस्विता एवं साहसिकता के अभाव में हर किसी को पतन, पराभव का सामना करना पड़ सकता है। इस तथ्य को साक्षी वे विशालकाय प्राणी देते हैं जो कभी इस धरती पर छाये हुए थे और जिनकी सामर्थ्य अद्भुत थी।
जीवों के विकास क्रम की आरम्भिक अवधि में महागज, महा सरीसृप एवं महागरुड़, धरती समुद्र एवं आकाश में अपना आधिपत्य जमाये हुए थे। उनके लिए आहार की भी कमी नहीं थी, फिर भी वे अपना अस्तित्व पूरी नहर गंवा बैठे। अब उनके वंशजों तक का अता-पता नहीं मिलता। मात्र उपलब्ध अस्थि पिंजरों से ही उनके अस्तित्व तथा विनाश की जानकारी मिलती है। वैभव की महत्ता तो है किन्तु परिस्थितियों से जूझने की क्षमता भी तो चाहिए ही।
सदियों वर्ष पूर्व धरती पर दानवाकार अत्यन्त बुद्धिशाली डायनोसौर ‘महासरीसृप’ अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँच गये थे। बुद्धिमान होते हुए भी वे अपनी परम्परा को कायम न रख सके और रहस्यमय ढंग से अचानक विलुप्त हो गये।
साढ़े 6 करोड़ वर्ष पूर्व आर्कटिक क्षेत्र में ऐसे जीवधारी बहुतायत से पाये जाते थे जो न तो मैमल्स (महागज) और न ही रेप्टाइल्स (सरीसृप) इन्हें ‘डायनोसौर’ कहा जाता था। 50 हजार वर्ष पूर्व जब दीप समूहों के किनारे धीरे-धीरे एक दूसरे से अलग होने लगे तथा पहाड़ियां सिकुड़कर बड़े-बड़े पर्वतों का रूप धारण करने लगीं उसी समय डायनोसौर तेजी से विकसित होकर विश्व के समस्त क्षेत्र में (मात्र अन्टार्कटिका को छोड़कर) फैल गये थे। सैकड़ों फुट लम्बे तथा हजारों टन वजनी ये जीवधारी अपने समय के इतिहास प्रसिद्ध प्राणी थे। इनमें सबसे अधिक विकसित “सोरो निथोइडेस डायनोसौर” थे इन्हें बर्ड लाइक रेप्टाइल्स (महागरुड़) कहा जाता था। इनका मस्तिष्क विकसित, लम्बा तथा चिड़ियों जैसे चोंच-पंख आदि विकसित थे। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एड्रियन जे. डेस्माण्ड के अनुसार ये जन्तु अन्य डायनोसौर से भिन्न एवं अधिक बुद्धिमान थे। इनके पास अपनी सुरक्षा के लिए चिड़ियों जैसी चोंच भी थी। फिर भी नष्ट होने से ये बच नहीं पाये। कुछ इस प्रकार की आपाती घटनाएँ घटित हुई कि डायनोसौर की छोटी बड़ी सभी स्थलीय एवं समुद्री जातियाँ हर प्रकार की जलवायु में रहने वाली जातियाँ विलुप्त हो गयी। किसी भी जीव के आश्चर्यजनक रूप से इस तरह विलुप्त होने की विश्व में यह आश्चर्यजनक घटना है।
डायनोसौर के बारे में प्रारम्भिक मान्यताएँ थीं कि ये जीव दानवाकार भारी भरकम शरीर वाले मन्द बुद्धि कोल्ड ब्लडेड, ओवर इवाल्वड (अति विकसित) तथा अपने लिए स्वयं भारभूत थे। शरीर के अनुपात में मस्तिष्क छोटा होने के कारण अपनी रक्षा करने में ये प्राणी असफल रहे। आठ टन वजन वाला टाइनोसोर्स अपनी दो टांगों पर चलता था। जबकि 50 टन वजनी ‘ब्रोन्टोसोरस’ जमीन से सटकर चलता था। अतः यह स्वीकारा जाने लगा है कि डायनोसौर गर्म रक्त वाले प्राणी होने चाहिए। इनमें से अधिकाँश बहुत ही बुद्धिमान एवं उच्च विकसित कोटि के प्राणी थे।
डायनोसौर भारी भरकम काया होने के कारण विकास की चरम सीमा को प्राप्त कर अचानक गायब हो गये। वातावरण में एकाएक परिवर्तन तथा पर्वतों के सिमटने के कारण ये जीव स्वयं को परिवर्तन के अनुकूल ढाल नहीं पाये। वस्तुतः अस्तित्व का मूल-मंत्र शारीरिक विकास नहीं-बड़ा शक्तिशाली होना नहीं-तेजस्वी होना है। शरीर विशाल होते हुए भी अन्दर परिस्थितियों से मोर्चा लेने की क्षमता न हो तो वह सामर्थ्य किस काम की। पुरुषार्थ किया जाय, पर साहस वर्धन - तेजस् वृद्धि की दृष्टि से, न कि शरीर-बल बढ़ाने के लिये।
खोपड़ी की पिटारी में रखे हुए लिबलिबे भूरे पदार्थ की हलचलों को मन या मस्तिष्क कहते हैं। सोचने विचारने का काम इसी मशीन से चलता है। विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ एवं स्मृतियाँ इसी क्षेत्र में रहती हैं। तर्क, ऊहापोह, विश्लेषण, निर्धारण करने वाला तंत्र बुद्धि कहलाता है। मन तो मात्र इच्छा या कल्पना करता रहता है। इन्हीं दोनों के समन्वय से बनने वाली स्थिति को बुद्धिमत्ता कहते हैं। व्यवहार का निर्धारण एवं उसकी उलट-पुलट के लिए इसी संस्थान में सन्निहित अनुभव एवं चातुर्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते, प्रतिस्पर्धा जीतते तथा अवरोधों से जीतने, सफलता का पथ प्रशस्त करने में अपना कमाल दिखाते हैं।
मस्तिष्कीय कौशल की विशिष्टता सर्वविदित हैं। अस्तु, उसे समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न भी सर्वत्र किये जाते हैं। स्कूली शिक्षा का प्रधान उद्देश्य यही हैं। उसके माध्यम से वस्तुओं का स्वरूप एवं लोक-व्यवहार के अनेक पक्षों को समझने-समझाने का प्रयत्न किया जाता है। संपर्क, परामर्श, घटनाओं का निकटवर्ती पर्यवेक्षण इस प्रयोजन में विशेष रूप से काम आता है। इस संदर्भ में मस्तिष्कीय कोशिकाओं की संरचना भी तीक्ष्णता को न्यूनाधिक करती रहती है। समुन्नत मस्तिष्क व्यक्तियों का सहयोग अर्जित करने से लेकर अभीष्ट सफलताएँ उपलब्ध करने में अपने चमत्कार आये दिन दिखाता रहता है। आमतौर से इसी प्रतिभा के आधार पर मनुष्य का बाजारू मूल्याँकन होता और श्रेय मिलता है।
किन्तु समझा जाना चाहिए कि यह लोक-व्यवहार में काम आने वाला व्यक्ति की प्रवीणता निखारने वाला मस्तिष्क तंत्र बहुत कुछ होते हुए भी सब कुछ नहीं है। उसके भीतर दो और परतें हैं जिनमें से एक को अचेतन और दूसरी को अति चेतन कहते हैं। इन तीनों परतों में ही मनुष्य का समूचा व्यक्तित्व समाया है। अध्यात्म की भाषा में इन्हीं तीनों को स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं। इनका समन्वय ही समग्र व्यक्तित्व है।
बाजारू व्यक्तित्व ही आमतौर से देखा जाता और खरीदा-बेचा जाता है। इतने पर भी इस रहस्य से अवगत होना ही चाहिए कि चेतना की गहराई में उतरने पर ही बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती हैं। धरती पर रेत, मिट्टी बिखरा पड़ा है पर गहराई में खोदने पर जीवन-प्राण समझा जाने वाला जल मिल जाता है और भी अधिक खोदने पर बहुमूल्य खनिज पदार्थ एवं तेल हाथ लगते हैं। समुद्र की ऊपरी सतह पर तो शैवाल, समुद्र फेन आदि तैरते रहते हैं। मोती तो गहराई में उतर कर ही हस्तगत होते हैं। नारियल की जटा तथा खोपड़ा तोड़ने के उपरान्त ही गिरी हाथ लगती है। ईंधन बरामदे में, कपड़े कोठरी में और जेवर तिजोरी में रहते हैं। इसी प्रकार चेतना की उथली परत बुद्धिमत्ता कहलाती है किन्तु उससे भीतर उतरने पर अचेतन मन का चमत्कार देखने को मिलता है।
आदतों का अपना महत्व है। मनुष्य का सारा ढर्रा उसी के आधार पर चलता है। गुण, कर्म, स्वभाव में इन आदतों का ही आधिपत्य दृष्टिगोचर होता है। तर्क का अपना महत्व है। विषय को समझने और विचार बदलने के लिए अध्ययन परामर्श से भी काम चल जाता है किन्तु आदतों को क्या कहाँ जाय, वे इतनी हठीली होती है कि किसी बात का औचित्य या अनौचित्य स्वीकार कर लेने पर भी तद्नुरूप परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं होती। नशेबाजी की आदत इसका हुए भी-उसे छोड़ने की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी नशेबाज एक प्रकार से अपने आप को विवश असहाय अनुभव करता है और अनुभव करता है कोई भूत-पिशाच उससे बलपूर्वक उस काम को करा रहा है। इसी हठीली परत को अचेतन कहते हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे ‘चित्त’ कहते हैं। चित्त अर्थात् चिन्तन का परिपक्व अभ्यास।
शरीर की अन्तरंग क्रियाएं इसी चित्त - अचेतन के द्वारा गतिशील रहती है। माँसपेशियों का आकुँचन-प्रकुँचन, रक्त का आवागमन पलकों का निमेष -उन्मेष, फेफड़ों का श्वास-’प्रश्वास, ग्रहण, विसर्जन, शयन, जागरण आदि शरीर की अभ्यस्त गतिविधियों का संचालन यह चित्त ही सोते-जागते करता रहता है और मनुष्य को उनके होने न होने तक का अनुभव नहीं होता। न केवल शरीर संचालन में वरन् सोचने तथा काम करने के ढर्रे में भी इसी की प्रेरणाएँ काम करती है। घोड़ा अस्तबल में जा घुसता है और कबूतर दरबे में। वे यह नहीं सोचते कि इस बंधन में स्वतः प्रवेश करने से क्या लाभ? आदतों को नफा नुकसान से कोई मतलब नहीं होता, वे जिस ढाँचे में ढल जाते हैं, उसी ढर्रे को अपनाये रहने का हठ करती हैं। इन आदतों को डालने में लम्बा समय लगता है फिर उन्हें उखाड़ना तो और भी अधिक कठिन पड़ता है।
जो हो, इस तथ्य को स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने की यदि किसी को वास्तविक इच्छा हो तो उसे अपने अचेतन से जूझने की साहसिकता संजोनी चाहिए। क्योंकि आमतौर से अभ्यस्त आदतें वैसी घटिया स्तर की होती हैं जिन्हें पशु प्रवृत्तियाँ कहा जा सके। आधुनिक मनोविज्ञानी भ्रम वश इन्हीं कुसंस्कारों को मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्ति मानने लगे है और उनके सुधार परिष्कार की बात सोचने की अपेक्षा उल्टा समर्थन, पोषण, प्रोत्साहन करने लगे है।
मनुष्य को सृष्टि के आदि से लेकर अब तक की लम्बी जीवन यात्रा में अनेकानेक ऐसी परिस्थितियों में रहना पड़ा है जिन्हें मानवी सभ्यता की दृष्टि से हेय ही कहा जा सकता है। बच्चे को छोटी चड्ढी या फ्राक पर्याप्त होती है, पर वयस्क होने पर तो उसे पूरी पोशाक चाहिए। क्षुद्र योनियों को क्षुद्र परिस्थितियों में रहने पर जिस स्तर का जीवन जीना पड़ता है, उसकी संग्रहित आदतें मनुष्य जन्म में प्रवेश करते ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् सभ्यता अपनाने का दबाव पड़ने पर भी अन्तराल के अंधेरे कोंतरों में छिपकर बैठी रहती है। नीति-मर्यादा के मानवीय अनुबंधों को तोड़-फोड़कर अभ्यस्त स्वेच्छाचारिता को अपनाने के लिए वे अवसर पाते ही उछाल लगातीं और करामात दिखाती रहती हैं। मानवी गरिमा के साथ उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की विशिष्टता जुड़ी हुई है। उसे समझने समझाने में भी कोई बड़ी कठिनाई नहीं होती। उपदेश पग-पग पर नीति के एवं उदारता के समर्थन में सुने जाते हैं। उन्हें स्वीकारने में भी किसी को कोई आपत्ति ही होगी। किन्तु कठिनाई तब पड़ती है जब निकृष्ट परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते जो आदतें अन्तरंग की गहराई में घुस गई हैं उन्हें सुधारने, बदलने की बात सोची जाती है।
अचेतन एक पूरा तिलस्म हैं। उसे खुलकर खेलने का अवसर नहीं मिलता तो छद्म अपनाता है और अनेकानेक बहाने गढ़कर मन की मौज बरतने के लिए दाँव पेंच लड़ाता है। वस्तुतः हर मनुष्य के भीतर एक अच्छा खासा महाभारत खड़ा रहता है। पशु प्रवृत्तियाँ अपना हठ नहीं छोड़ती और मानवी, गरिमा अपने आप को पतित पराजित स्थिति में रहने के लिए सहमत नहीं होतीं। दो साँड़ों के युद्ध में जिस प्रकार खेत से उगे पौधे नष्ट होते रहते हैं, दो पाटों के बीच जिस प्रकार अनाज पिसता रहता है, दो तलवार ठूँसने पर जिस प्रकार म्यान फटता रहता है उसी प्रकार इस अन्तर्द्वन्द्व में जीवन प्रगति का भी दिवाला पिटता रहता है। सारी शक्ति तो इस अन्तःकलह में ही चूक जाती है। फिर उत्कृष्टता की दिशा में चलने और उस क्षेत्र में कुछ पराक्रम, पुरुषार्थ करने का सुयोग कैसे बने ? उच्चस्तरीय प्रगति की आकाँक्षा हर किसी के भीतर रहती है पर उसका साधन तभी बन सकता है जब अचेतन को कुसंस्कारिता से मुक्ति दिलाने और सुसंस्कारिता के ढांचे में ढालने के लिए कोई कहने लायक कदम उठाया जा सकें।
अध्यात्म, तत्व ज्ञान और साधना विधान का प्राथमिक ढाँचा इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सृजा गया है कि उस उपचार से अन्तःचेतना के अभ्यासों को बदलने, सुधारने एवं ढालने की प्रक्रिया चल पड़े। वस्तुतः यही परम पुरुषार्थ हैं। उपेक्षा के गर्त में गिराये हुए अचेतन का यदि सही मूल्याँकन किया जा सके और उसे मानवी गरिमा के अनुरूप आदतें अपनाने के लिए सहमत किया जा सके तो समझना चाहिए कि सर्वतोमुखी प्रगति के द्वार खुल गये। एक ऐसा समर्थ साथी मिल गया जिसकी सहायता से आसमान तक ऊँचा उठ सकना सम्भव हो सके। परिष्कृत अचेतन को यदि अंगद-हनुमान की, नल-नील की, भीम-अर्जुन की उपमा दी जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। जिन दैवी विभूतियों का ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से चमत्कारी वर्णन होता रहता है, उसे संक्षेप में अचेतन की उभरी हुई विशिष्टता ही समझा जाना चाहिए।
साधना मार्ग के संबंध में फैली हुई यह भ्रान्ति निरर्थक है कि यह प्रक्रिया देवी-देवताओं को चंगुल में फँसाकर उनसे चमत्कारी सिद्धि -वरदान झटक लेने के लिए प्रयुक्त की जाती है। वस्तुतः उस माध्यम से अचेतन और उच्च चेतन की रहस्यमय परतों को परिष्कृत समुन्नत किया जाता है। इसी क्षेत्र में अगणित अतीन्द्रिय क्षमताएँ और व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बना देने वाली विभूतियाँ छिपी पड़ी है। उनका जागरण उन्नयन होने से मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक समुन्नत सुसंस्कृत बनता है और देवोपम बनने की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होता है। साधना विज्ञान में मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान और उनकी विलक्षणताओं के प्रकटीकरण की अनुभूत विधि-व्यवस्थाओं का परिपूर्ण समावेश है।
‘लोअर सेल्फ या ‘स्व’ की परिधि से ऊपर की ओर की यात्रा ही अंतर्जगत की यात्रा है, आँतरिक प्रगति का सच्चा मार्ग है। केवल इस अनुभूति मात्र का उठना कि कुछ बिल्कुल अलग, रोजमर्रा के स्वरूप से विभिन्न मेरे भीतर कुछ हैं-सारे व्यक्तित्व को बदलकर रख देता है। जब क्रिया-कलाप भी उसी दिशा में नियोजित होने लगते हैं तो महामानव, देवमानव, सुपरमैन की परिधि में मनुष्य प्रवेश कर जाता है।
हमारा चिन्तन दुःखद विरोधी परिस्थितियों से न प्रभावित होकर अति मन के भीतर में उभर कर आना चाहिए। वस्तुतः जो कुछ भी सुन्दर है, शिव हैं, शुभ है वह मानवी स्थिति में नहीं, अतिमानवी स्थिति में ही करतलगत हो सकता है। केवल एक ही परिस्थिति ऐसी हो सकती है जिसमें स्थायी सुख-शान्ति, अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति हो। वह अतिमानव के स्तर पर बनती है जिसे “कास्मिक गुडनेस” “सुपर काँशसस्टेज” कहा जा सकता है। हर धर्म, पंथ, मत ने ही यही मूल दर्शन सबको सिखाया है कि परम तत्व को पाने के लिए भौतिक मन, ‘लोअर सेल्फ’ से ऊँचे उठो। ऊँचाई से सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
किसी जिज्ञासु ने ईरान के दार्शनिक कवि शेखसादी से प्रश्न किया -”भगवन्! परोपकारी बड़ा होता है या ताकतवर ?”
शेख सादी ने उत्तर दिया और कहा - “पहले तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो तो मैं तुम्हारी जिज्ञासा का समाधान कर दूँगा। यह बताओ कि हातिम के समय में सबसे बड़ा पहलवान कौन था ?”
जिज्ञासु ने बहुत सोचा-विचारा पर उसे पर्याप्त समय तक प्रयत्न करने पर भी इसका उत्तर न सूझ। अन्त में उसने कहा - “हातिम के उपकार तो विख्यात हैं आर उनकी कथा सबको याद हैं। पर उस जमाने के किसी पहलवान ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके कारण उसे आज तक याद रखा जाता।”
शेख सादी ने उसे समझाया कि “तुम ने ठीक ही कहा है। इस कथन में ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी मौजूद है” पूछने वाला सन्तुष्ट होकर चला गया। उसने परोपकार की महत्ता को समझ लिया।
आँख उठाकर मोटी दृष्टि से देखने पर ऊपर आसमान में एक नीली सी चादर तनी दिखती है उसमें कुछ जुगनू जैसे चाँद सितारे टँके चमकते दृष्टिगोचर होते हैं। मोटी दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य भी इसी प्रकार छोटे-मोटे हलके-फुलके प्रतीत होते हैं, पर यदि गम्भीरतापूर्वक देखा और बारीकी में उतारा जाय तो कितनी ही रहस्यमय परतें खुलती चली जाती हैं और उथली दृष्टि से जो सामान्य जैसा प्रतीत होता था वह अत्यन्त महत्वपूर्ण लगने लगता है।
आकाश को रात में देखने पर एक धुँधली सी सफेद बदली सिर के ऊपर दीखती है। दादी अपने नाती-पोते पोतियों को उसे ‘हाथी की सड़क’ बताती और कहती है कि आधी रात इस पर होकर इन्द्र राजा का हाथी गुजरता है। यह बदली हमारी आकाश गंगा है। उसी की बेटी वह देवयानी निहारिका है जिसमें हमारा सौर-मण्डल एक कोने में बैठा-बैठा दिन काटता और चरखा चलाता है। लटकते हुए सितारे वस्तुतः अपने सूर्य के भाई बन्धु हैं। दूरी इतनी अधिक है कि उसके मीलों की गणना करते-करते सिर चकराने लगे।
इस संदर्भ में प्रश्न उठता है कि यह विश्व ब्रह्मांड आखिर बना कैसे ? जब यह नहीं बना था तब क्या स्थिति थी। क्या प्राणियों की तरह यह ब्रह्माण्ड भी जन्मता, बढ़ता और मरता है। ऐसे-ऐसे अनेकों प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करते हुए संक्षेप में इस सृष्टि की जन्मपत्री पढ़नी और उसकी ग्रह दशा देखनी चाहिए।
बीसवीं सदी में भौतिक (फिजिक्स) के क्षेत्र में असाधारण प्रगति हुई है। खगोल विज्ञानियों ने भौतिकी के कुछ सिद्धान्तों एवं उपकरणों का प्रयोग खगोल-विज्ञान में किया फलस्वरूप ‘खगोल भौतिकी’ नामक विज्ञान की एक नई शाखा का उदय हुआ। खगोल भौतिकी से खगोल विज्ञान की जानकारियों एवं गवेषणाओं में महत्वपूर्ण योगदान मिला है।
ई.पी. हब्बल ने 1942 में ‘साइन्स इन प्रोग्रेस’ की तीसरी सिरीज के “दी प्रोबलम ऑफ एक्सपेन्डिग यूनीवर्स” नामक लेख में लिखा है कि “यह ब्रह्माण्ड लगभग शून्य है। ब्रह्माण्ड के महाशून्य में भौतिक पदार्थ पिण्ड बहुत दूर-दूर फैले हुए है। ब्रह्माण्ड के महाशून्य की तुलना में स्थूल भौतिक पदार्थ अत्यन्त न्यून परिणाम में है।
पहले खगोल विज्ञानियों की मान्यता थी कि सूर्य ब्रह्माण्ड का केन्द्र हैं, परन्तु खगोल भौतिकी के अनुसन्धानों से पता चला कि हमारा सूर्य तो एक छोटा सा नक्षत्र है। ऐसे अरबों-खरबों सौर मण्डल एक निहारिका (नेबुला) के अंतर्गत हैं। अपना सौर-मण्डल जिस निहारिका का सदस्य है उसे ‘देवयानी’ नाम दिया गया है। कई अरब निहारिकाओं का समुच्चय आकाश गंगा (मिल्की वे या गैलेक्सी) कहा जाता है। ब्रह्माण्ड में असंख्यों आकाश गंगाएँ हैं। अपनी ‘देवयानी’ निहारिका मन्दाकिनी आकाश गंगा की एक निहारिका है। लगभग 20 हजार निहारिकाओं के अस्तित्व के बारे में स्पष्ट पता चला है। हब्बल महोदय के अनुमान के अनुसार निहारिकाओं की संख्या इसके अतिरिक्त और दस गुनी होगी। उन्होंने अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से यह प्रामाणित किया कि ब्रह्माण्ड फैलता जा रहा है, निहारिकाएं एक-दूसरे से दूर हटती जा रही है।
हमारी आकाश गंगा (गैलेक्सी या मिल्की वे) मन्दाकिनी का व्यास आर.ए. लिटलटन की “दी माडर्न यूनीवर्स” के अनुसार एक लाख प्रकाश वर्ष है। प्रकाश की चाल 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड है। इस गति को 1 वर्ष कहा जाता है। ब्रह्माण्ड की विशालता की कल्पना से मानवीय बुद्धि हतप्रभ रह जाती है।
वी.जे. बाक और पी.एफ. बाक की “दी मिल्की वे” के अनुसार अपनी आकाश गंगा (मिल्की वे) में लगभग 1000 हजार खरब नक्षत्र हैं। मन्दाकिनी मिल्कीवे की निकटवर्ती गैलेक्सी को एन्ड्रमेडा कहा जाता है। इसका आकार भी हमारी गैलेक्सी के लगभग बराबर हैं।
“दी माडर्न यूनीवर्स” नामक पुस्तक में आर.ए. लिटलटन ने उल्लेख किया है कि खगोल भौतिकीविदों के अनुसार ब्रह्माण्ड में लाखों गैलेक्सी विद्यमान हैं। मानव-निरीक्षण सीमा से परे भी गैलेक्सियाँ है उनको किसी भी उपाय से जाना नहीं जा सकता क्योंकि उनकी गति निरन्तर बढ़ती जाती है और अन्ततः उनका वेग प्रकाश के वेग से अधिक हो जाता है, तब वे अदृश्य हो जाती हैं। ब्रह्माण्ड सतत् फैलता बढ़ता जा रहा है।
वीलेन डी. सिट्टेर ने “थ्योरीज ऑफ दी यूनीवर्स” में बताया है कि ब्रह्माण्ड शून्य है उसमें भौतिक पदार्थ नगण्य हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि शून्य की तुलना में भौतिक पदार्थ द्वारा घेरा हुआ अवकाश अत्यल्प है इसलिए ब्रह्माण्ड का घनत्व समग्र भौतिक पदार्थ के घनत्व की अपेक्षा लाखों गुना कम है। उसके अनुसार गैलेक्सियाँ निरन्तर और तेजी से एक दूसरे से दूर भाग रही है।
ए.एस. एडिंगटन ने “दी एक्सपेन्डिग यूनीवर्स” एवं जी.जे. ह्नीट्रो ने “दी स्ट्रक्चर ऑफ दी यूनीवर्स” वीलेन डी. सिट्टेर के ब्रह्माण्डीय मॉडल का समर्थन किया है।
“दी न्यू पाथवेज ऑफ साइन्स” में ए.एस. एडिंगटन महोदय ने भौतिक तन्त्र और विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में गहरा संपर्क बतलाया है। उन्होंने भी ब्रह्माण्डीय प्रसार के सिद्धान्त को स्वीकारा है।
“दी क्रीएशन आँव दी यूनीवर्स” में जी. गैमो ने उल्लेख किया है कि खरबों वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड में भौतिक पदार्थ बहुत ही संपीड़ित अवस्था में था और उसका निरन्तर क्रम विकास हो रहा है। उनके अनुसार ब्रह्माण्ड का फैलाव सदैव होता रहेगा। उसकी कोई सीमा रेखा नहीं है वह अनन्तदिक तक फैलता ही रहेगा।
“दी थ्यौरीज आँव कास्मोलाजी” लेख में एच. ब्रोण्डी ने उल्लेख किया है कि एक ओर तो गैलेक्सियाँ एक दूसरे से दूर हटती जा रही है और अन्त में अदृश्य होती जा रही है, दूसरी ओर भौतिक पदार्थ की निरन्तर रचना हो रही है जिससे नयी गैलेक्सियों का निर्माण भी हो रहा है। इस कारण ब्रह्माण्ड में भौतिक पदार्थ का अस्तित्व सदा बना रहेगा, ब्रोण्डी महोदय ने गैलेक्सियों की तुलना मनुष्यों एवं जीवधारियों से की है। जिस प्रकार कुछ व्यक्ति मरते हैं और अन्य नये जन्म लेते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में कुछ आकाश गंगाएँ (गैलेक्सियाँ) दूर जाते-जाते अदृश्य हो जाती हैं और उसके स्थान पर नीय गैलेक्सियों की उत्पत्ति होती रहती है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड में गैलेक्सियों की संख्या सदा लगभग एक-सी रहती है। डी.डब्ल्यू. स्कियामा ने भी अपने “इबोल्यूशनरी प्रोसेस इन कास्मोलॉजी” नामक लेख में इसी तथ्य का समर्थन करते हुए कहा है कि ब्रह्माण्ड में गैलेक्सियाँ पहले भी विद्यमान थीं और भविष्य में भी बनीं रहेंगी, ब्रह्माण्ड कभी भी गैलेक्सियों से रिक्त नहीं होगा।
कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि हमारे विश्व-ब्रह्माण्ड के अतिरिक्त एक और भी जगत है जो भौतिक पदार्थों के विपरीत तत्वों से बना हुआ है। भौतिक तत्वों से विनिर्मित अपने जगत को - ‘कॉसमॉस’ कहा जाता है तथा विपरित तत्वों या प्रति पदार्थ से बने जगत को ‘एन्टी कॉसमॉस’ नाम दिया गया है।
काल गणना के सामान्य माप दण्ड चार हैं दिन, सप्ताह, मास एवं वर्ष। दिन की गणना सूर्यास्त तक के काल से की जाती है। सप्ताह की काल गणना सूर्य का परिभ्रमण करने वाले ग्रहों से संबंधित है। मास, चन्द्र द्वारा पृथ्वी की एक परिक्रमा का काल है। वर्ष, सूर्य की पृथ्वी द्वारा परिक्रमा का समय है।
प्रकाश पिंडों को मोटेतौर पर चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है - एक सूर्य जिसका प्रकाश इतना तीव्र है कि उसकी उप स्थिति में अन्य प्रकाश पिण्ड दिखाई नहीं पड़ते। पृथ्वी के जितने भाग पर सूर्य का प्रकाश जितने, समय तक रहता है, उसे दिन कहा जाता है। पृथ्वी के ध्रुवों पर प्रायः छह-छह महीने के दिन-रात होते हैं। पृथ्वी की आकृति गोलाकार होने से उसका लगभग आधा भाग ही हर समय सूर्य के सामने रह पाता है। उसी भाग में दिन और शेष में रात्रि रहती है। भूमध्य रेखीय देशों में दिन-रात बराबर होते हैं। चूँकि पृथ्वी 24 घण्टे में अपनी कक्षा पर परिभ्रमण कर लेती हैं। इसलिए प्रायः दिन-रात 24 घण्टे का होता है। सूर्य के अतिरिक्त अन्य प्रकाश पिण्ड रात्रि के समय ही दिखाई पड़ते हैं। रात्रि में दिखाई पड़ने वाले ज्योति पिण्डों में सबसे निकटवर्ती होने के कारण सबसे बड़ा ‘चन्द्रमा’ मालूम होता है। अन्य तारों को एवं तारा गुच्छों को दो वर्गों में रखा जा सकता है - एक तो वे तारे जो टिमटिमाते हैं - दूसरे वे जो नहीं टिमटिमाते। वस्तुतः वे तारे टिमटिमाते दिखाई पड़ते हैं जो सूर्य के परितः परिभ्रमण नहीं करते। ये तारे सूर्य से छोटे एवं कम प्रकाशवान नहीं हैं, वरन् अनेकों गुना बड़े एवं प्रकाश युक्त हैं, परन्तु सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी से अत्यधिक दूरी पर आकाश में अवस्थित होने के कारण छोटे दिखाई देते हैं।
अवकाश में पृथ्वी जिस मार्ग से सूर्य के चारों ओर घूमती है, उसे 12 भागों में बाँटा गया है। एक भाग को एक राशि के नाम से सम्बोधित किया जाता है। एक माह में पृथ्वी जितनी दूरी घूम जाती है वह ‘राशि’ कहलाती है। इस क्षेत्र में आने वाले विशिष्ट तारा गुच्छों को 12 विभिन्न नाम दिये गये हैं जिन्हें मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन। चन्द्रमा प्रतिदिन अवकाश में जितना मार्ग तय करता दिखाई देता है, उतने को नक्षत्र कहते हैं, पृथ्वी एक माह में जितना मार्ग तय करती दिखाई देती हैं, चन्द्रमा एक दिन में उससे सवा दो गुना मार्ग तय करता दिखाई पड़ता है। नक्षत्रों की संख्या 28 हैं।
सृष्टि के सृजन और उसके अन्त तक के विनाश का यह संक्षिप्त परिचय है। अभी अपना ब्रह्माण्ड किशोरावस्था में चल रहा है। यौवन और प्रौढ़ता तक पहुँचते-पहुँचते उसमें और भी अधिक वृद्धि होगी और परिपक्वता बढ़ेगी। वह स्थिति भी सदा न रहेगी वह क्रमशः जराजीर्ण होते हुए मरण का वरण करेगा। इसके बाद फिर वही क्रम चलेगा। हर छोटी-बड़ी वस्तु को इसी जन्म-मरण के चक्र में समान रूप से परिभ्रमण करना पड़ता है। कैसी है यह सृष्टा की बाल-क्रीड़ा, जिसमें रहकर वह स्वयं मोद मनाता है और दूसरों को हँसने रोने का खट्टा-मीठा स्वाद चखाता है।
उस समय बौद्धों के धर्मग्रन्थ चीनी लिपि में ही प्राप्त थे। तेत्सुजेन नामक एक जापानी व्यक्ति की इच्छा से उन्हें जापानी लिपि में प्रकाशित कराने की हुई। पर इस कार्य के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता थी। बड़ी लगन से चन्दा जमा किया। 10 वर्षों के निरन्तर परिश्रम के बाद इतना धन जमा हुआ जिससे प्रकाशन किया जा सके। पर तभी यूजी नदी में बाढ़ आ गयी जिससे लाखों व्यक्ति तबाह हो गये। तेज्सुजेन ने अपनी समस्त धनराशि बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए दे दी।
इसके बाद पुनः दूने उत्साह से तेज्सुजेन चन्दा इकट्ठा करने में जुट गया। इसके बाद भी पर्याप्त धन जमा करने में 10 वर्ष लगे। अबकी बार प्रकाशन कार्य प्रारम्भ होने जा ही रहा था कि हैजे की बीमारी फैल गयी और लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। जन-समूह की स्थिति की भयावहता को समझते हुए तेज्सुजेन ने इस बार भी सारा धन दान में दे दिया।
इसके बाद तेज्सुजेन निरन्तर बीस वर्ष तक परिश्रम करता रहा। तब कहीं जाकर इतना धन जमा हो पाया कि धर्मग्रन्थ जापानी में प्रकाशित हो पाये।
एक मित्र ने उससे पूछा - ‘जो कार्य दस वर्ष में पूरा हो जाता उसके लिये तुमने 40 वर्ष क्यों व्यय किये ? तेज्सुजेन ने उत्तर दिया - ‘धर्मग्रन्थों का प्रकाशन तो कुछ वर्ष बाद भी हो गया। कोई विशेष हानि नहीं हुई? परन्तु पीड़ित मानवता की सेवा करने का वह मौका बाद में नहीं मिल सकता था। दीन-दुःखी मनुष्यों की सेवा करना सर्वप्रथम है, अन्य कार्य गौण हैं।’
साधनों की स्वल्पता, परिस्थितियों की प्रतिकूलता तथा प्रवीणता की न्यूनता रहते हुए भी प्रचण्ड संकल्प शक्ति और अदम्य साहसिकता के बल पर मनुष्य क्या कर सकता है ? इसके जीते-जागते प्रमाण मिस्र के महान पिरामिड हैं जिनकी विशालता देखने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
यह आश्चर्य तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब उस क्षेत्र में वे साधन कहीं भी दिख नहीं पड़ते जिनके माध्यम से इस निर्माण कार्य को सम्पन्न किया गया है। इतना ही नहीं, यह भी देखने की बात है कि उस जमाने की आवश्यकता, वास्तुकला तथा यान्त्रिक साधनों का प्रचलन न होने पर भी यह सब किस प्रकार बन पड़ा होगा।
विश्व का सर्वोत्तम आश्चर्य मिस्र के पिरामिड, मानव कौशल के कीर्ति स्तम्भ हैं। मिस्र के निवासी इस चेओप्स के गुम्बज को “खूफू का हौरीजन” के नाम से पुकारते हैं। वर्तमान में इसी को महान पिरामिड के नाम से जाना जाता है। गत पचास शताब्दियों में -लगभग 2700 ई. पू. चेओप्स ने पूर्ण कीर्तिं-स्तम्भ के निर्माण की योजना बनाई।
इस दीर्घकाय गुम्बज के निर्माण हेतु केरियो के कोलाहलपूर्ण शहर से 5 मील दक्षिण पूर्व गिजा के पठार पर सहस्रों राजगीर, पत्थर खोदने वाले एवं असंख्यों श्रमिकों ने 30 साल तक घोर श्रम किया।
इसमें संलग्न पत्थरों में से कितनों का ही वजन ढाई से पन्द्रह टन तक है। महान पिरामिडों में 25 लाख अवरोध हैं। फिर भी मनुष्य ने इसके पत्थरों को काटा और निर्माण कार्य हेतु आगे बढ़ते गये। लीवर, रोलर एवं रेधे के सिवाय उनको कोई अतिरिक्त मदद नहीं प्राप्त हुई। उन शिल्पकारों के पास कोई मापक यन्त्र नहीं थे फिर भी पिरामिडों के कोने अपने में पूर्ण हैं, सीधे कोणों की दिशाओं में बने हुए हैं। आश्चर्यजनक यथार्थ के साथ परिधि के चार चिन्ह (कुतुबनुमा) निर्मित हैं। दो अन्य पिरामिड चेओप्स के उत्तराधिकारियों के गिजा समूह में हैं तथा 80 पिरामिड नील नदी के पश्चिमी किनारे तक फैले हुए है।
आधुनिक अनेक खण्डों की ऊँची इमारतों के निर्माण के समान पिरामिडों की संरचना में बड़ी संगठित समरूपता परिलक्षित होती है। नदी की ओर से पत्थर के एक विशाल रास्ते का निर्माण हुआ जो पठार के किनारे से आधा मील झुका हुआ हैं। इसके पृथक निर्माण में पूरे 10 वर्ष लग गये। श्रमिकों के एक समूह द्वारा इसी ढाल की सहायता से विशालकाय प्रतिभाओं को बिना पहिये की गाड़ी में रखकर नाव के द्वारा नील नदी पर लाया गया। पत्थरों की एक लम्बी एवं मुश्क बेंत की असामान्य मोटाई की रस्सी के द्वारा सुरक्षित रखा गया।
समाधि स्थल एवं चित्रशाला के अन्तः भाग की रेखायें तथा अस्वान की चट्टानें मिस्र में नील नदी के प्रथम झरने पर निर्मित की गयी थीं। इन्हें माल ढोने वाली नावों की मदद से 600 मील की दूरी तक पहुँचाया गया। कलाकारों ने उसकी चमक के लिए मूसल आदि का भी उपयोग किया होगा। ऐसा प्रतीत होता है।
प्रवीण चित्रकार, कलाकार, मूर्तिकार, राजगीर एवं चित्रकला संबंधी व्यक्ति जीवन पर्यन्त रहे। लेकिन अकुशल श्रमिकों ने वर्ष में केवल तीन माह ही कार्य किया। जब पतझड़ ऋतु में नील नदी बाढ़ ग्रस्त होती तभी यह एक लाख से करीब कृषक श्रमिक अपनी फसलों के बोने के पश्चात् कार्य का इन्तजार करते थे।
पिरामिड के हृदय में 140 फीट ऊँचा रेगिस्तान है। चोटी के नीचे राजा का कक्ष बना हुआ है। एक तहखाने में 34 फीट लम्बी, 17 फीट चौड़ी और 19 फीट ऊँची स्वच्छ चमकदार पत्थर रेखायें खिंची हुई है।
हजारों टन राजगीरी सहायता ऊपर उपस्थित होते हुए भी इनमें उत्पीड़क एवं व्याकुल कर देने वाली चीखों का आभास होता है। कमरे के आखिरी तल पर पत्थर की कब्र बनी है जो चेओप्स के स्वयं का विश्रामगृह माना जाता है।
इस निर्माण में सबसे बड़े आश्चर्य की बात वे अविज्ञात ध्वनियाँ हैं जो पिरामिडों में थोड़ा भीतर प्रवेश करते ही सुनाई देने लगती हैं। खोजने पर कहीं से वे सूत्र नहीं मिलते जो बता सकें कि यह विचित्र आवाजें आखिर आती कहाँ से हैं।
कभी-कभी वहाँ शहद की मक्खियों के उड़ने की तरह जोर-जोर की भिनभिनाहट होती है। कई बार वे टिड्डी दल के उड़ने जैसी प्रतीत होती हैं। कई बार वहाँ ऐसा लगता है मानो पत्थर की चट्टानों को किसी बड़े जोर से चीरा जा रहा हो। कभी हाँफते कभी कराहने, कभी चिल्लाने और कभी गीत गाने जैसी स्वर लहरियाँ वहाँ गूँजती हुई प्रतीत होता है कि कदाचित निर्माण कार्य अभी भी चल रहा है और श्रमिक तरह-तरह का कोलाहल कर रहे हैं। मसाला पीसने, टाँकी से पत्थर तोड़ने तथा छोटे हथौड़े और बड़े धन चलाने की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं।
इस प्रकार के ध्वनि प्रवाह सम्भवतः उसी समय के है जब यह निर्माण कार्य चलता रहा होगा। इमारतों की रहस्यमयी संरचना ने उस समय की आवाज को सोख लिया होगा और वे ग्रामोफोन रिकार्डों की तरह समय-समय पर अपनी प्रतिध्वनि प्रकट करते होंगे।
पिरामिडों के बने हजारों वर्ष बीतने को आते हैं, पर उनके पीछे छिपी अदम्य संकल्प शक्ति का चमत्कार अभी भी अपनी कहानी आप कहते देखा जा सकता है।
कुयोग और सुयोग के संबंध में कोई प्रत्यक्ष तर्क तो इतना लागू नहीं होता कि अमुक वस्तु, घड़ी या घटना को किस कारण शुभ या अशुभ होना चाहिए। क्यों उसके कारण दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटनी चाहिए और क्यों उसकी उपस्थिति से सुखद संभावनाओं की शृंखला चल पड़ना चाहिए। फिर भी देखा यह गया है कि कभी कभी यह कुयोग-सुयोग के संयोग इस तरह वस्तुओं के साथ जुड़ जाते हैं मानों वे जुड़े न होकर चेतन हों, मानों उनकी भी बुरी या भली प्रकृति हो।
प्रख्यात कोहिनूर हीरे के संबंध में ऐसा ही घटना क्रम जुड़ा हुआ है। वह जहाँ भी, जब भी, जिसके पास भी गया है वहाँ संयोगवश ऐसी दुर्घटनाएँ घटी हैं जिसके कारण उसे बदनामी मिली और अभागा कहा गया। मिस्र के पिरामिडों के साथ भी ऐसे ही संयोगों की शृंखला है। जिनने भी उसके रहस्यों को खोदने-कुरेदने का प्रयत्न किया, वही दुर्भाग्य की चपेट में आया और बेमौत मारा गया। कई इमारतें भुतही कही जाती हैं और समझा जाता है कि जो भी उनमें रहेगा डरावने दृश्य देखेगा और मुसीबतों में फंसेगा। जिन स्थानों के साथ निर्दयता के घटनाक्रम जुड़े हैं वहाँ भी संत्रस्त आत्माएँ छाई रहती हैं और वहाँ रहने वालों का अनिष्ट करती है। श्मशानों के संबंध में विशेष रूप से ऐसा समझा जाता है। मृतात्माएँ वहाँ अपने वियोग पश्चाताप से खिन्न होकर रुदन करती रहती है। कई बार प्रतिशोध से भरे आक्रोश भी स्थान विशेष या वस्तु विशेष के साथ चिपक जाते हैं और उपयोगकर्ताओं को चैन से नहीं बैठने देते। कुयोग की जो घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं उनमें एक ऐसे जलयान की भी है जो जब तक जिया स्वयं त्रास पाता रहा और उपयोग कर्ताओं को कष्ट देता रहा।
सितम्बर 1872 के प्रारम्भ में न्यूयार्क के 44 नम्बर पोतघाट पर ‘मेरी सेलीस्टी’ नामक जहाज पर लगभग 1700 कामर्शियल अल्कोहल के पीपे पुर्तगाल ले जाने के लिए लादे गये थे। जहाज पर कैप्टन वेन्जामिन स्पूनर व्रिग्स, उनकी पत्नी, सरा ब्रिग्स और दो वर्षीय पुत्री सोफिया मिटल्डा के अतिरिक्त सात अन्य कर्मचारी थे। जहाज के मालिक अमेरिकी नागरिक जेम्स विचेस्टर थे।
यह जहाज जब से बना था तभी से उसके साथ अनेकों दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ जुड़ती चली गयी।यह जहाज 1861 में स्पेंसर आइलैण्ड नोवा स्कोशिया में बना, तब उसको ‘आमेजान’ नाम से रजिस्टर्ड किया गया था। सजिस्ट्री कराने वाला पहला कैप्टन 48 घण्टों में मृत्यु के मुख में चला गया। उसकी पहली यात्रा में वह ‘मायने’ के किनारे दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसकी मरम्मत के समय दूसरा कैप्टन आग लगने से मर गया। तीसरे कैप्टन से ‘डोवर की खाड़ी’ में एक अन्य दो मस्तूल वाले जहाज से टक्कर हो गई जिससे दूसरा जहाज डूब गया। चौथी यात्रा में वह ‘केप ब्रेटन द्वीप’ में जमीन में धँस गया जिससे ध्वस्त हो गया। भग्नपोत को किसी प्रकार निकलवाया गया और उसके दो-तीन मालिक बदलते बदलते जेम्स विचेस्टर के हाथ में आया।
जेम्स विचेस्टर ने जहाज की भली प्रकार मरम्मत करायी और अत्युत्तम स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। जहाज की पुरानी शक्ल जो ब्रिटिश व्यापारी जहाज द्वारा बनायी गयी थी, उसको बदलवा दिया और नाम भी बदलकर ‘मेरी सेलीस्टी’ रख दिया।
5 नवम्बर 1872 को जब ‘मेरी सेलीस्टी’ नामक जहाज की यात्रा शुरू होने वाली थी, उसी समय उसके पास में लगे हुए एक अन्य ‘डीग्रेशिया’ नामक जहाज के कैप्टन एडवर्ड मोर हाउस के साथ बैठकर ‘मेरो सेलीस्टी’ के कैप्टन बेजामिन स्पूनर ब्रिग्स ने भोजन किया था। उसके दस दिन पश्चात 15 नवम्बर 1872 को ‘डीग्रेशिया’ वहाँ से चला था। कुछ दिन बाद उसके कैप्टन ने एजोर्स और पुर्तगाल के मध्य पुर्तगाल से लगभग 600 मील दूर एक जहाज को एक ऐसी स्थिति में पाया जिससे अनुभवी नाविक तुरन्त अनुमान लगा सकता है कि जहाज नियन्त्रण में नहीं। अतः कैप्टन मोरहाउस अपने कुल साथियों के साथ एक नाव में बैठकर उस जहाज की ओर चल दिये। समुद्री तूफान के कारण दो घण्टे के कड़े परिश्रम के पश्चात् वे कहीं उस दूरी पर पहुँच सके जहाँ से उसका नाम पढ़ा जा सका। वह जहाज ‘मेरी सेलीस्टी’ था। जहाज पर जीवित या मृत कोई भी व्यक्ति नहीं मिला, लेकिन माल सब ज्यों का त्यों था। केबिन की टेबल पर खाना आधा खाया हुआ था और बगल में स्टोव पर कुछ पकाने के लिए रखा गया था।
कैप्टन के केबिन से प्राप्त ‘लांग बुक’ में -आठ बजे प्रातः 25 नवम्बर की यह टिप्पणी थी कि ‘सान्ता मेरिया’ द्वीप समूह पार हो गया। जिस दिन ‘डीग्रेशिया’ के कैप्टन मोर हाउस ने यह देखा, 5 दिसम्बर था। ‘मेरी सेलीस्टी’ की लांग बुक की अन्तिम एन्ट्री को हुए ग्यारह दिन बीते थे और जहाज बिना किसी व्यक्ति के 600 मील चला आया था।
‘डीग्रेशिया’ नामक जहाज जिब्राल्टर 12 दिसम्बर 1872 को पहुँचा तथा ‘मेरी सेलीस्टी’ 13 दिसम्बर को प्रातः आ पहुँचा। उस जहाज को कैप्टन मोरहाउस के नेतृत्व में लाया गया था इसलिए उसने जिब्राल्टर में ‘ब्रिटिश ऐडमिरलटी प्रोक्टर’ एफ. साॉली फ्लड के पास ‘मेरी सेलीस्टी’ जहाज के सामान आदि के बारे में क्लेम दिया।
मार्च 1873 के निर्णय में ‘डीग्रेशिया’ के कैप्टन मोरहाउस को ‘मेरी सेलीस्टी’ जहाज एवं उसमें लदे सामान की कुल कीमत का पांचवां हिस्सा उसके मालिक जेम्स विंचेस्टर को देना पड़ा। साढ़े तीन माह बाद जहाज को जेनेवा में खाली करके न्यूयार्क ले जाया गया। इसको नये कैप्टन एवं नवीन कर्मचारियों द्वारा जेनेवा तक ले जाया गया। न्यूयार्क वापस पहुँचने पर विंचेस्टर ने ‘मेरी सेलीस्टी’ को तुरन्त बेंच दिया।
‘मेरी सेलीस्टी’ जहाज की बदकिस्मती की घटना के कारण कोई कैप्टन या कर्मचारी उस पर काम करने को तैयार नहीं होता था। उसके कई मालिक बदल गये और सबको कुछ न कुछ घाटा उठाना पड़ा। अन्त में 1884 में गिलमैन सी. पार्कर ने उसकी खरीद लिया और जहाज का दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास देखते हुए उसका बीमा करा दिया। जहाज वेस्ट इण्डिज की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, किन्तु बीमा कम्पनी को यह सन्देह हो गया कि जान-बूझकर जहाज की कीमत वसूल करने के लिए ऐसा किया गया। कोर्ट में केस चला परन्तु जज ने जहाज की पूर्व की कहानी देखते हुए निलमन सी. पार्कर को रिहा कर दिया। उसके 8 महीने बाद पार्कर की मृत्यु हो गई। एक कर्मचारी पागल हो गया। एक ने आत्महत्या कर ली। ‘मेरी सेलीस्टी’ जहाज जिसके पास भी रहा उसको दुर्भाग्य के सिवा और कुछ नहीं मिला।
1958 ई. की घटना है। अमेरिका के प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक बर्नार्ड हटन ने स्वयं पर घटित इस घटना का उल्लेख अपनी “हीलिंग हैण्ड्स” नामक पुस्तक में किया है। ‘हटन’ महोदय न्यूराडिटिस रोग से पीड़ित थे साथ ही उनकी आँखों की देखने की क्षमता भी नष्ट प्रायः हो चुकी थी। नेत्र-रोग विशेषज्ञ डा. हडसन उनकी चिकित्सा कर रहे थे। उन्होंने ‘हटन’ की आँखों के इलाज को असाध्य बता दिया और कहा कि दूसरा ऑपरेशन करने पर आँखों की शेष क्षीण ज्योति के भी चले जाने का खतरा है।
उसी समय हटन की धर्मपत्नी श्रीमती पर्ल हटन को मालूम हुआ कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के सुविख्यात नेत्र चिकित्सक स्वर्गीय डा. लैंग की प्रेतात्मा ‘एलिंसबरी’ के मिस्टर चैपमैन पर आती है और वह चैपमैन के माध्यम से सैकड़ों नेत्र रोगियों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर चुकी है। श्रीमती पर्ल ने अपने पति से ‘एलिंसबरी’ जाने के लिए आग्रह किया तो बर्नार्ड हटन ने उसको भ्रान्ति व अन्धविश्वास कहा। परन्तु श्रीमती पर्ल ने निवेदन करते हुए कहा कि यह समझ लीजियेगा कि ‘एलिंसबरी’ का भ्रमण किया है। अस्तु श्री हटन अपनी पत्रकारिता वाली बुद्धि को लेकर ‘एलिंसबरी’ पहुँच गये।
मि. चैपमैन के यहाँ उन्हीं की प्रतीक्षा की जा रही थी। उस समय युवक चैपमैन पर डा. लैंग की आत्मा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई दे रहा था। उसका चेहरा, हावभाव बिल्कुल बुद्ध डा. लैंग जैसा लग रहा था। उसने बर्नार्ड हटन को गाड़ी से उतरते ही अपने कक्ष में बुलाया और कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा - “आइये मि. हटन आप नेत्र रोग से पीड़ित हैं। मैं डा. लैंग हूँ आप की हर सम्भव सहायता करूंगा।
बर्नार्ड हटन यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि युवक चैपमैन के व्यक्तित्व में आकस्मिक परिवर्तन कैसे हो गया। मि. चैपमैन यह सब कुछ आँख बन्द किये तन्द्रा जैसी अवस्था में कह रहे थे। मि. हटन की तर्क बुद्धि कभी इसे सम्मोहन सोचती, कभी टेलीपैथी, कभी ‘थाट ट्रान्सफरेन्स’ तो कभी दिव्य-दृष्टि आदि। विचारों का ऊहापोह उनके मन में चल रहा था। मि. चैपमैन के माध्यम से डा. लैंग, मि. हटन की कुर्सी के समीप पहुँचे और अपनी बन्द आँखों को हटन की आँखों के पास जमाकर देखा और बोले-”तुम्हें माइनस 18 नम्बर का चश्मा लगता है।” उस समय वास्तव में ही मि. हटन को माइनस 18 नम्बर का लैंस का चश्मा लगता था। बर्नार्ड हटन की आँखों को दो-तीन बार उँगलियों से स्पर्श करके डा. लैंग ने बताया-”युवक मि. हटन! तुम्हारी आंखों का बचपन में जो ऑपरेशन हुआ था, बिल्कुल ठीक था।” हटन महोदय स्वयं भूल चुके थे कि कभी उनका ऑपरेशन हुआ था, परन्तु तब याद आया कि 6 वर्ष की अवस्था में तत्कालीन प्रसिद्ध डॉक्टर ने उनकी आँखों का ऑपरेशन किया था। उस डॉक्टर की भी मृत्यु हो चुकी थी।
मि. हटन की आँखों को दुबारा उँगलियों से स्पर्श करके डा. लैंग ने कहा-”तुम्हारी आँखों का लिम्फ डे्रनेज सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है -ग्लाकोमा हो गया है।” हटन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह तो स्वर्गीय डा. लैंग की जानकारी व प्रश्नों से ही हतप्रभ हो गये थे। इसके बाद डा. लैंग ने बताया कि “जिस बीमारी के वायरस तुम्हें कष्ट दे रहे थे वे तो तुम्हारे डा. के उपचार से नष्ट हो गये हैं, परन्तु उसके स्थान पर प्रतिक्रिया स्वरूप नई भयंकर बीमारी हो गयी है। हिपेटाइटिस वायरस के आक्रमण के कारण तुम्हारे ‘लिवर’ को क्षति पहुँच रही और कष्ट बढ़ रहा है। तुम्हारी पूरी शक्ति क्षीण हुई जा रही है।”
मि. हटन महोदय को डा. लैंग की बाते, रोग की व्याख्या एक पहेली सी लग रही थी, उनकी पत्रकार बुद्धि को कुछ कहते नहीं बन पड़ रहा था। अन्त में डा. लैंग ने कहा -”मि. हटन, मैं तुम्हारी आँखों का एक ऑपरेशन करूंगा जिसमें तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा क्योंकि यह ऑपरेशन सूक्ष्म शरीर का होगा स्थूल का नहीं। तुम हमारी बातें और उपकरणों का प्रयोग अनुभव करोगे पर देख नहीं सकोगे। मेरे अन्य सहायक भी प्रेतात्माएँ हैं।”
इतना कहकर डा. लैंग ने अपना काम शुरू कर दिया। मि. हटन उनकी उँगलियों को चलते, ऑपरेशन के उपकरणों को इधर-उधर प्रयोग करते हुए अनुभव कर रहे थे। डा. लैंग बीच में बोलते जा रहे थे- ‘मैं तुम्हारे सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से थोड़ा अलग कर रहा हूँ, फ्लूइड की जाँच कर रहा हूँ क्रिस्टल, लेन्स, रेटिना ........... आदि आदि!’ कुछ मिनट बाद उन्होंने कहा -”अब आपरेशन पूरा हो गया है, तुम्हारे सिलियरी मसल्स अत्यन्त कड़े हो गये थे।” इसके पश्चात डा. लैंग ने अपने सहायकों से कहा-”यदि हिपेटाइटिस वायरस का आपरेशन न किया गया तो वह आपरेशन अधिक लाभदायक न होगा।” डा. लैंग ने एक बार पुनः आँखें बन्द कीं। उसी मुद्रा में ‘हटन’ के शरीर पर हाथ फेरा। बर्नार्ड हटन को लगातार महसूस हो रहा था कि जैसे उनके मूर्छित शरीर पर आपरेशन किया जा रहा हो।
ऑपरेशन पूरा करने के बाद डॉ. लैंग ने हाथ के सहारे से मि. हटन को उठाकर बैठा दिया। उस समय हटन को काफी कमजोरी अनुभव हो रही थी। तभी एक नर्स “मिस मार्गेट” आयीं और उसने हाथ का सहारा देकर हटर महोदय को खड़ा कर दिया। चलते समय डॉ. लैंग ने कहा -”मि. हटन, मैं आपकी बराबर सहायता करता रहूँगा और अपने सूक्ष्म शरीर से ऑपरेशन भी करता रहूँगा। आपकी नेत्र ज्योति पुनः वापस आ जायेगी और आपका जीवन सुखमय बीतेगा। ऐसा मुझे पुरी आशा है।”
मिस माग्रेट ने ‘हटन’ को कार में बैठा दिया उस समय उन्हें कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था, परन्तु थोड़ी ही देर में धीरे-धीरे उन्हें सब कुछ स्पष्ट नजर आने लगा। वह प्रसन्नतापूर्वक अपने घर आ गए। बार-बार मि. हटन का हृदय प्रेतात्मा द्वारा की गयीं अप्रत्याशित सहायता से भर जाता था। इस विलक्षण घटना ने उनका जीवन क्रम ही बदल दिया।
ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि मरणोत्तर जीवन में सभी प्राणी भूत-प्रेत बनते हैं और जिनके संपर्क में आते हैं उन्हें डराने या दुःख देने भर का कुकृत्य करते रहते हैं। ऐसी आत्माएँ भी होती तो है, पर उनमें से प्रायः विकृष्ट स्तर की होतीं और विक्षोभ ग्रस्त होकर मरी होती है। इसके विपरीत ऐसी दिवंगत पुण्यात्माएँ भी होती है जो जिस प्रकार जीवन काल में सद्भाव प्रदर्शित करने में, उदार सेवा साधना में निरत रहीं वैसा ही प्रयास वे मरने के उपरान्त भी करती रहती हैं। शरीर न रहने पर भी आत्मा का स्तर एवं रुझान मरणोत्तर जीवन में भी प्रायः वैसा ही बना रहता है।
एक बार नारद जी कीचड़ में पड़े एक शूकर को देखकर दयार्द्र होकर बोले - ”चल मैं तुझे स्वर्ग ले चलूं।”
शूकर ने कहा - ”तुम्हारे स्वर्ग में क्या है ? बाबा।”
नारद जी ने कहा - अरे मूर्ख स्वर्ग में खाने के बत्तीस भोग, छत्तीसों व्यंजन, सेवा को अप्सराएं, सुनाने को संगीत, देखने को नृत्य, सब कुछ स्वर्ग में है। चल, उठ!
शूकर उठा पर उठते-उठते उसने पूछा - “महाराज आप के स्वर्ग में खुड़ियाँ और कीचड़ के गड्ढे भी हैं या नहीं?” नारद जी हँसे - अरे मूर्ख स्वर्ग में इनका क्या काम?
शूकर ने कीचड़ में फिर से लेटते हुए कहा - ‘फिर वहाँ है ही क्या खाक?’
मृत्यु के किनारे को छूकर लौटने वाले अनेकों व्यक्तियों की घटनाओं पर वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है।
1970 में अमेरिका में इसी विषय पर अध्ययन करने के लिए एक संस्था बनाई गई-”सांइटिफिक स्टडी ऑफ नियर डेथ फिनोमेना।” डॉ. रेमण्ड ए. मूडी नामक विख्यात मनश्चिकित्सक ने इसका नाम एन. डी. ई. (नियर डेथ एक्पीरियेन्स) रखा। प्रतिवर्ष 100 से अधिक लोगों पर अध्ययन किया। अब तक किए गये सैकड़ों परीक्षणों के उपरान्त उन्होंने पाया कि कुछ समानताएँ सब में होती हैं। जो भी व्यक्ति मृत्यु के निकट पहुँच गये, उन्होंने सबसे पहले शरीर को छोड़ने के बाद दूर से उसे देखा। अनेक मृतक संबंधी भी मिलते हैं। घने अन्धकार भरे मार्ग से प्रकाश की ओर गमन का अनुभव होता है। प्रकाश की ओर जाते ही शान्ति और आनन्द की अनुभूति होती है।
इन विभिन्न तथ्यों का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए 250 वैज्ञानिकों, मनोविशेषज्ञों, मनश्चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का एक संगठन बना।
ऐसे 100 व्यक्ति जिन्हें डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था और जो पुनः जीवित हो गये, उनसे साक्षात्कार कर उनके अनुभव इकट्ठे किये गये। 1975 में रेमण्ड मूडी ने इसी संकल्प को एक पुस्तक “लाइफ आफ्टर डेथ” का रूप दिया। मृत्यु के निकट पहुँचने वाले व्यक्तियों के कुछ अनुभव लगभग एक से पाए गये। जैसे-मृत्यु के समय अत्यधिक पीड़ा होना और डॉक्टर द्वारा मृत घोषित कर देना। अन्धकार पूर्ण मार्ग से गुजरकर प्रकाशित स्थान में पहुँचना।
वह शरीर से अपने आप को पृथक अनुभव करता है। दृष्टा की तरह अपने शरीर को देखता है। शरीर से तुरन्त मोह दूर नहीं होता, कुछ समय उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। दीवार खिड़की आदि उसके लिए बाधक नहीं रहते अब वह और अधिक शक्ति महसूस करता है। डॉक्टर व संबंधी गणों को शरीर के इर्द-गिर्द खड़े देखता, उनके प्रत्येक प्रयास को देखता है। मृत मित्र संबंधियों की आत्माएँ भी मिलती है। एक दिव्य प्रकाश उसके सामने आता है। यह प्रकाश उसे संकेत देता है कि जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को याद करो। जीवन की सुखद और दुःखद घटनाओं के साथ वैसी ही पार्श्व भूमि वहाँ तैयार होती जाती है। वैसी ही ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ऐसा अनुभव होता है कि एक प्रदेश की सीमा छोड़कर दूसरे प्रदेश में प्रवेश कर रहा है। इसके तुरन्त बाद उसे लगता है कि अब अपने शरीर में पुनः लौटना पड़ेगा। उसे ऐसा बताया जाता है कि उसकी मृत्यु का समय नहीं हुआ। लेकिन वह नये सुखद अनुभव के कारण पुराने जीवन में नहीं जाना चाहता। उसकी अनिच्छा होने पर भी उसे पुराने शरीर से जोड़ दिया जाता है।”
डॉ. एलिजाबेथ कबलररोस ने भी रेमण्ड की तरह ही कुछ प्रयोग किये हैं। “एमरी यूनीवर्सिटी ऑफ अटलाँटा” के कार्डियोलोजी के सहायक प्रोफेसर डॉ. माइकेल सेबोम का कथन है - रेमण्ड मूडी की पुस्तक में वर्णित घटनाओं पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। लेकिन नियर डेथ एक्पीरियेन्स पर शोध करने में मेरी भी रुचि जागी।” उनकी सहायिका सारा क्रुजिगर के साथ मिलकर उन्होंने 120 नियर डेथ एकसपीरेन्स के उदाहरणों पर अध्ययन किया। उनमें से 40 प्रतिशत व्यक्तियों ने डॉ. मूडी की रिपोर्ट के अनुसार ही अपने अनुभव बताये। इसी प्रकार ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टीकट’ के प्रोफेसर डॉ. केनेथरिंग ने 102 मृत्यु के मुख से निकल आये व्यक्तियों से भेंट की। डॉ. के अनुरूप ही 50 प्रतिशत व्यक्तियों ने अपने अनुभव बताये।
‘सेन्टल्युक हास्पिटल’ के हृदय विशेषज्ञ डॉ. फ्रेड शूनर ने ऐसे ही 2300 व्यक्तियों की जाँच की। उनमें 60 प्रतिशत लोगों के अनुभव मूडी के बताये अनुसार पाये गये। इस प्रकार सम्पूर्ण अमेरिका में इन शोध निष्कर्षों के प्रति कौतूहल जागृत हुआ है।
मनोवैज्ञानिकोँ के अनुसार मनुष्य की इच्छा, आकाँक्षा, स्वर्ग की सुखद कल्पना नर्क के प्रति भय भावना इत्यादि के अनुसार ही मनुष्य को ये अनुभव होते हैं। वैसे इनमें वास्तविकता कुछ नहीं हैं। डा. रसेल नोइस ने मनोविज्ञान की नवीनतम शाखा में ‘डिपर्सनोलाइजेशन’ की परिकल्पना बतायी। इस परिकल्पना के अनुसार मन दुःखदायी अनुभवों से बचने के लिए ‘इगोडिफेंसिव मेकेनिज्म’ के माध्यम से सुख की कल्पना करता है।
डा. कार्लिंस ओसिस और इरलेण्डर हाल्डसन इन दोनों मनोवैज्ञानिकों ने मिलकर भारत और अमेरिका के उदाहरणों का तुलनात्मक अध्ययन किया। परीक्षणों के उपरान्त बताया कि दो भिन्न देशों की धार्मिक मान्यताएँ भिन्न होने के बावजूद भी दोनों स्थानों के प्रमाणों में बहुत कुछ एकता है।
कनेथरिंग जिन्होंने ‘लाइफ ऐट डेथ’ तथा ‘ए सांइटिफिक इनवेस्टीगेशन ऑफ नियर डेथ एक्पीरियेन्स’ नामक पुस्तकों में उल्लेख किया है - “यह मैं अवश्य स्वीकार करता हूँ कि शारीरिक मृत्यु के बाद भी हम ‘कान्शस एक्जिस्टेन्स’ जारी रख सकते हैं। यह बात मैं अपने निजी अनुभव एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार बता सकता हूँ कि मृत्यु के निकट जाने से हम उच्चतर अस्तित्व से परिचित होते हैं। जिस हम मृत्यु कहते हैं उसके बाद हम उस उच्चतर अस्तित्व का यथेष्ट उपभोग कर सकते हैं।”
प्राकृतिक मृत्यु एक बहुत ही मन्द प्रक्रिया है। यह क्रमशः आगे बढ़ती है। पहले जीव-कोष धीरे-धीरे मरने लगते हैं। फिर विभिन्न ऊतक (टिशूज) संवेदनाहीन होते हैं। उसके बाद शरीर के विभिन्न अवयव-हृदय, फेफड़े आदि निष्क्रिय होते हैं और अन्त में मस्तिष्कीय क्षमता नष्ट होती तथा शरीर मृत हो जाता है।
शरीर को पर्याप्त मात्रा में प्राणवायु न मिलने पर जीव-कोष नष्ट होते हैं। विभिन्न जीव-कोषों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। मस्तिष्क के जीव-कोष सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। प्राण वायु कम पड़ने पर वे सर्वप्रथम नष्ट होते हैं जबकि रीढ़ की हड्डी के इतनी जल्दी नहीं। जीवकोष प्रायः या तो फूल जाते हैं और अत्यधिक फूलने से फट जाते हैं या इतने सिकुड़ जाते हैं कि पूर्व स्थिति में नहीं आ पाते। शरीर के कुछ अवयव नष्ट हो जाने पर भी वह जीवित रहता है। शरीर को मृत तब घोषित किया जाता है जब हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार धड़कन बन्द होना, श्वास बन्द होना आँखों में स्थिरता, शरीर का तापमान गिरना आदि लक्षण मृत्यु के हैं। इन लक्षणों के बाद 10 मिनट से लेकर 2 घण्टे के अन्दर अस्थि पंजर के सभी स्नायु कड़े हो जाते हैं। रक्त जम जाने के कारण शरीर का रंग नीला पड़ने लगता है। इसके बाद के 24 घण्टों में शरीर के ऊतकों को बैक्टीरिया विघटित करने लगते हैं। इस प्रक्रिया को ‘सोमेटिक डेथ’ कहते हैं जब शरीर का प्रत्येक कोष मर जाता है।
मरणोत्तर जीवन के संबंध में प्रकाश डालने से पूर्व मरण और जीवन के दोनों तथ्यों का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है। शरीर की मृत्यु के कुछ लक्षण निश्चित हैं। उनके माध्यम से यह जाना जा सकता है कि कोई व्यक्ति कायिक दृष्टि से मर गया। इस संबंध में शरीर शास्त्रियों के कुछ निर्धारण हैं। तदनुसार अब देखना यह है कि क्या शारीरिक मृत्यु मानवी चेतना का भी अन्त कर देती है ? इस संबंध में कुछ विचारणीय तथ्यों पर नये सिरे से विचार करना होगा। प्रकृति की रहस्यमय संरचना में पदार्थ तो कलेवर भर है। उसका प्राण ‘ऊर्जा’ के रूप में पाया जाता है और कलेवर बदल जाने पर भी वह किसी अन्य रूप में बना रहता है। जिस प्रकार अध्यात्मवादी आत्मा को अमर मानते हैं उसी प्रकार विज्ञान ने पदार्थ को भी अमर माना है और उसके स्वरूप में रूपांतरण होते रहने की बात को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसे कि शरीर के बदलते रहने और आत्मा के अक्षुण्ण बने रहने की बात अध्यात्मवादी कहा करते हैं।
क्वांटम, चुम्बकत्व, विद्युत क्षेत्र, सापेक्षित जैसे सिद्धान्तों पर गहरी दृष्टि डालने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि पदार्थ का मूलरूप तरंग के रूप में है और वह एक या दूसरे माध्यम से अपना अस्तित्व बनाये ही रहता है। विश्व ब्रह्माण्ड में असंख्य स्तर की तरंगें संव्याप्त है। पर उनमें से नापने पकड़ने में थोड़ी सी ही आई है। यंत्रों के आविष्कार अभी इतने ही हुए हैं जो सामान्य स्तर की तरंगों के अस्तित्व की जानकारी दे सकें। इनसे सूक्ष्म यन्त्र जब भी बन सकेंगे तभी उन रहस्यमय पदार्थ तरंगों की जानकारी मिल सकेगी जो अभी संभावना क्षेत्र में होने पर भी अपनी सत्ता का आभास देने लगी हैं।
मनुष्य शरीर भी पदार्थ का समुच्चय है। उसका मूल स्वरूप भी ऊर्जामय है। शरीर के इर्द-गिर्द फैला रहने वाला तेजोवलय तथा विचार तरंगों के रूप में आकाश को आच्छादित किये रहने वाला चेतन प्रवाह अपने-अपने स्तर की ऊर्जा का परिचय देते हैं। चूँकि पदार्थ कभी मरता नहीं। इसलिए यह मनुष्य की आत्मा न सही, शरीर या पदार्थ भर माना जाय तो भी यह कहा जा सकता है कि मरण के उपरान्त भी उसकी वह ऊर्जा बनी रहती हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘प्राण’ कहा जाता है।
ईश्वर में फैला रहने वाला, ऊर्जा तरंगों से बना मनुष्य शरीर मरण के उपरान्त भी अपना अस्तित्व बनाये रहता है। भले ही आज के अविकसित यन्त्र उसे देखने पकड़ने में समर्थ न हो सकें। जब अस्तित्व विद्यमान ही रहा तो उसके परिचय प्रमाण या प्रकटीकरण के जो स्वरूप बनते रहते हैं सिद्धान्ततः उनकी संभावना स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
शरीर सत्ता पुनर्जन्म के रूप में भी अपनी पिछली क्षमताओं तथा आदतों का परिचय तो देती ही रहती है। मरण और जन्म के मध्य में यदि जीव सत्ता अपने अस्तित्व का परिचय प्रेत-पितरों के रूप में देती हो, तो उसे अमान्य नहीं ठहराया जाना चाहिए। विकसित विज्ञान अगले दिनों उस अवधि में प्राणी की स्थिति का भी पता लगा लेगा जो अभी अविज्ञात और रहस्यमय बनी हुई है। मरण से पूर्व और जन्म के उपरान्त जब जीवन शृंखला के अविच्छिन्न संबंधों का कई आधारों पर प्रमाण परिचय मिलता है तो कोई कारण नहीं कि कुछ समय की डुबकी वाली स्थिति का विवरण जाना न जा सकें। विज्ञान क्षेत्र को भी कुछ समय उपरान्त उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचना पड़ेगा जिस पर कि आत्म-विज्ञान बहुत समय पहले पहुँचा और मरणोत्तर जीवन को सुनिश्चित बताने में समर्थ रहा है।
एक बार जब स्वामी रामतीर्थ अमेरिका की यात्रा पर गये हुए थे तो एक अमेरिकन स्त्री उनके पास आयी आर विलाप करने लगी - ‘स्वामी जी। मेरे एकमात्र पुत्र की मृत्यु हो गयी है। मैं बड़ी दुःखी रहती हूँ। कृपया मुझे दुःख दूर करने का कोई उपाय बताइये।”
स्वामी जी ने कुछ पल विचार किया और दूसरे दिन आने की बात कही। आते ही वह बोली - ‘स्वामीजी, बताइये आपने मेरे लिए क्या उपाय सोचा है। इसमें जो भी व्यय होगा, मैं निस्संकोच करूंगी।
स्वामी जी ने एक अनाथ बालक का हाथ पकड़ाते हुए कहा -’आप इसे अपने पुत्र की भाँति पालें।’
स्त्री को इसकी तनिक भी आशा न थी। वह चौंकते हुए बोली - “पर यह तो असम्भव है कि मैं इसे अपने पुत्र की भाँति मानूँ।”
स्वामी जी ने उत्तर दिया ‘तो फिर आपके लिये दुःख दूर करना और आनन्द पाना भी सम्भव नहीं है। जो अपनी आत्मीयता का विस्तार कर लेता है, दूसरों में अपना रूप देख सकता है, उन्हें अपना बना सकता है, वही आनन्द पा सकता है।’
सामान्य दृष्टि से मनुष्य हाड़माँस का पिण्ड भर दिखाई देता है, जो चलता है, बोलता है, हंसता है, गाता है अर्थात् जीवित है। स्थूल दृष्टि से कई प्राणी उससे बढ़-चढ़कर हैं। फिर भी मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है। इसका कारण उसकी बौद्धिक एवं भावनात्मक क्षमताएँ है। इन क्षमताओं के आधार पर ही वह शिक्षा, उद्योग, कृषि, चिकित्सा, शिल्पकला और विज्ञान आदि कई क्षेत्रों में अन्य प्राणियों से बहुत आगे बढ़ सका है और आश्चर्यजनक प्रगति कर सृष्टि का मुकुटमणि बना हुआ है। यह विस्मयकारी प्रगति उसकी बौद्धिक क्षमता के ही प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त भाव-सम्वेदना के क्षेत्र में भी वह अन्य प्राणियों से कहीं बढ़-चढ़कर है। सहानुभूति और प्रेम प्यार की कोमल सम्वेदनाओं के आधार पर उसने अपने पारस्परिक संबंधों को जितना मधुर बनाया है और चिन्तन के क्षेत्र में जितना रस विभोर करने का अवसर प्राप्त किया है, यह उसकी भावनात्मक क्षमता सम्भावना की प्रक्रिया का ही परिचायक है।
अन्य प्राणी बौद्धिक और भावनात्मक क्षेत्र में मनुष्य से पिछड़े होने के कारण ही, शरीर क्षेत्र में उससे अधिक बलिष्ठ और अधिक क्षमतावान् होने के बाद भी कनिष्ठ हैं। बौद्धिक और भावनात्मक क्षमताओं के कारण ही मनुष्य को वैसा श्रेय सौभाग्य मिला है, जो सृष्टि के अन्य प्राणियों को प्राप्त नहीं है। इन क्षमताओं से भी अधिक आश्चर्यजनक और विस्मयकारी है - मनुष्य की अतीन्द्रिय चेतना।
केवल सामान्य चिन्तन और बौद्धिक प्रगल्भता की सम्भावनाओं से भरा होने के कारण ही मानवी मस्तिष्क को जादुई पिटारा कहा जाता है। मस्तिष्क का यह परिचय उसकी विशेषताओं का यह विश्लेषण तो बहुत आधा-अधूरा है। इसके गहन अन्तराल में उतरने पर प्रतीत होता है कि इसमें वे दिव्य चेतनाएँ भरी हुई हैं जिन्हें अलौकिक और अतीन्द्रिय कहा जा सकें। इन सम्भावनाओं और विशेषताओं की व्याख्या सामान्य मस्तिष्कीय गतिविधियों के आधार पर नहीं की जा सकती। प्राचीन काल में ऋषि, मुनि योग-साधना द्वारा उस दिव्य चेतना को विकसित करने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुए थे। इन दिनों चूँकि क्षमताओं को जागृत करने की वह विद्या लुप्त हो गई है इसलिए इन्हें बाजीगरी, हाथ की सफाई, जादुई करतब और मनोरंजन चमत्कार के समतुल्य माना जाने लगा। कुछ धूर्त लोगों ने मूर्खों को भ्रमग्रस्त करने और उन्हें ठगने के लिए, स्वार्थ साधन के लिए तथाकथित चमत्कार प्रस्तुत किए और लोगों में योग विज्ञान के प्रति अश्रद्धा बढ़ने लगी। इसे अवैज्ञानिक और ‘सूडोसाइन्स’ का फतवा देने वालों की आज सर्वत्र भरमार है। परन्तु इस संबंध में अब जो तथ्य सामने आते जा रहे है। उनके कारण अतीन्द्रिय चेतना वैज्ञानिक आधार पर भी प्रामाणित होने लगी है।
पिछले कई वर्षों से अनेक मनोवैज्ञानिक और परामनोवैज्ञानिक इन दिव्य क्षमताओं, अतीन्द्रिय शक्तियों का अध्ययन करते रहे हैं। इस संबंध में तरह-तरह की मान्यताएँ स्थापित की गई है। लेकिन मान्यताओं का आधार निरीक्षण और विवेचन मात्र था। इसलिए इन सम्भावनाओं को कोई वैज्ञानिक समर्थन नहीं मिला था। अब इन सम्भावनाओं और क्षमताओं का अध्ययन तथा परीक्षण कई भौतिक विज्ञानी भी कर रहे हैं और जो निष्कर्ष सामने आ रहे है, उनसे यही बात सिद्ध होती है कि अतीन्द्रिय चेतना को प्रामाणित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक आधार हैं। हाल ही में अमेरिका के दो प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. हेराल्ड पुरहोफ तथा डा. रसेल टार्ग ने अतीन्द्रिय चेतना के संबंध में ऐसे कई व्यक्तियों को अध्ययन किया जो अतीन्द्रिय चेतना से सम्पन्न बताए जाते थे। इन वैज्ञानिकों ने ऐसे व्यक्तियों का न केवल अध्ययन किया, वरन् कई तरह के प्रयोग भी किए और पाया कि अतीन्द्रिय शक्तियों के दावे निराधार या छलावे नहीं है।
प्रयोगों की शुरुआत अमेरिका के एक प्रसिद्ध लेखक रिचार्ड बाख से हुई। बाख अपने व्यवसायिक जीवन में एक उड़ाके थे। एक दिन समुद्र किनारे टहलते-टहलते सुना कि जैसे किसी ने पुकार कर कहा हो “जोनाथन लिविंग्सटन सीगल”। आवाज बहुत साफ थी और लग रहा था कि कोई बाख को ही संबोधित कर रहा हैं रिचर्ड बाख इस नाम के किसी भी व्यक्ति को नहीं जानते थे और न ही उन्हें किसी ने आज तक इस नाम से पुकार था। इस नाम को सुनने के बाद वे एक विचित्र सम्मोहित की-सी अवस्था में आ गए और तुरन्त ही घर लौट पड़े। लौटते ही उन्होंने जो लिखना शुरू किया तो चार-पाँच सौ पृष्ठों की एक मोटी किताब लिख डाली और वह भी एक ही बैठक में। यह एक उपन्यास था। इसके पहले बाख ने उपन्यास लिखना तो दूर रहा कोई लघु कथा भी नहीं लिखी थी।
बाख का दावा था कि यह पुस्तक उन्होंने परामनोवैज्ञानिक शक्तियों के वशवर्ती होकर लिखी थी। पुस्तक बाख के इस दावे के साथ प्रकाशित हुई। अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका “साइकिक” ने रिचर्ड बाख से इस विषय पर भेंट वार्ता ली और प्रकाशित किया। यह भेंट वार्ता डा. रसेल टार्ग ने पढ़ी और उन्होंने इस दावे की सच्चाई को परखने का निश्चय कर लिया। इसके पूर्व भी डा. टार्ग और पुरहोफ अतीन्द्रिय शक्तियों से संबंधित दावों की सच्चाई परख चुके थे और इस विषय में कई प्रयोग कर चुके थे। दोनों वैज्ञानिकों ने सन् 1973 में इस तरह के अनुसन्धान प्रयोगों की योजना बनाई थी और पहला प्रयोग 29 मई 1973 को किया। प्रयोग के लिए न्यूयार्क के प्रसिद्ध कलाकार इंगो स्वान को चुना गया था। इंगो स्वान के संबंध में प्रसिद्ध है कि वह आँखें बन्द करके मीलों दूर के दृश्य देख लेता है। अर्थात् उसमें अतीन्द्रिय दर्शन की क्षमता है। इंगो को इस पराशक्ति पर प्रयोग करने के लिए राजी किया गया और उन्हें एक कमरे में बन्द कर दिया गया।
इस कमरे में इंगो के अतिरिक्त और कोई नहीं था। था तो केवल एक वीडियो रिकार्डर जो आवाज भी टेप करता है और तस्वीर भी। इंगो को कमरे में पहुँचने तक यह नहीं बताया गया था कि उनसे क्या क्या पूछा जाने वाला है। कमरे में प्रवेश करते ही प्रयोगकर्ता रसेल टार्ग की बातों का टेप, टेपरिकार्डर पर खोल दिया गया। पूछा गया था कि हमारा एक मित्र जो इस समय अमुख अक्षाँश और अमुक देशान्तर पर है, वहाँ क्या कर रहा हैं? हमें खुद भी इस बात का पता नहीं है कि वह कहाँ है और किस स्थिति में है? कौन से नगर या क्षेत्र के किस हिस्से में हैं?
इंगो ने आँखें बन्द की और कुछ देर तक अपने चित्त को एकाग्र क्या-क्या देख रहे हैं? बीच-बीच में वह कागज पर रेखाचित्र भी खींचते जाते थे। इस प्रकार इंगो ने उस साथी के संबंध में कई विवरण बताये और उस स्थान के नक्शे बनाए। कुछ हफ्तों बाद जब वह व्यक्ति वापस लौटा, जिसके बारे में प्रश्न किए गए थे तो उसे इंगो द्वारा बनाए गए नक्शे और दिए गए विवरण, जिन्हें टेप कर लिया गया था, बनाए गए। साथी ने बताया कि इंगो स्वान द्वारा दिये विवरण ही सही नहीं है बल्कि उन्होंने जो नक्शे खींचे और नक्शों में दृश्यों की दूरियों का जो अनुपात दिया है, वह भी हू-ब-हू सही है। पुरहोफ और रसेल टार्ग अपने इस प्रयोग के निष्कर्ष से चकित थे।
पर वह वैज्ञानिक ही क्या जो एकाध प्रयोग से ही सन्तुष्ट हो जाय। एकाध प्रयोगों पर भी आधारित हो सकती है। इसलिए उन्होंने प्रयोगों में विविधता लाकर इस निष्कर्ष का खरा-खोटापन भली-भाँति परख लेने का निश्चय किया। उन्होंने विभिन्न तरह के कई प्रयोग किए। इन प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष इनके विवरणों सहित प्रकाशित होने लगे तो वैज्ञानिक द्वय के पास दर्जनों फोन आने लगे कि हम अनुभव करते हैं, हमारे भीतर भी ऐसी कुछ शक्तियाँ हैं और उनका परीक्षण करने के लिए हम अपने को आपके प्रयोगों में सम्मिलित करना चाहते हैं।
स्वाभाविक ही सब प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता था। कुछ खास प्रस्तावकर्ताओं को ही चुना जा सका। ऐसे प्रस्तावकों में एक थे वरबैंक शहर के उप-मेयर और पुलिस कमिश्नर रह चुके पैट्रिक एच. प्राइस। पैट्रिक ने अपनी इस क्षमता का उपयोग अपने पुलिस जीवन में भी किया था और कई अपराधियों को पकड़ा था। पैट्रिक पर डा. टर्ग और पुरहोफ ने फोन पर ही प्रयोग किए। इन प्रयोगों की कुल संख्या नौ थी और आश्चर्य की बात थी कि इनके निष्कर्ष अतीन्द्रिय चेतना के अस्तित्व को पूर्व प्रयोगों के समान ही पुष्ट करते थे। उल्लेखनीय है कि सभी प्रयोग भिन्न-भिन्न तरह के थे और उसके विवरण भी एक ऐसे वैज्ञानिक को विश्लेषण करने के लिए दिये गये थे जिसे यह भी पता नहीं था कि मामला क्या है? जिन नौ स्थानों को पैट्रिक ने बन्द कमरे में बैठकर पहचाना था उनकी दूरी वहाँ से दो से पन्द्रह किलोमीटर तक थी। विश्लेषण कर्ता वैज्ञानिक ने इन सभी विवरणों का विश्लेषण कर वही निष्कर्ष निकाले जो डा. टार्ग पुरहोफ ने निकाले थे।
पुरहोफ और टार्ग के अतिरिक्त और भी कई वैज्ञानिक अतीन्द्रिय चेतना की वास्तविकता जाँचने में लग हुए हैं। इस विषय में फ्राँस के डॉ. पाल गोल्डीन का नाम उल्लेखनीय है। वे अपने विषय का अध्ययन करने के लिए संसार के कई देशों की यात्रा कर चुके है। सैकड़ों प्रयोग और निरीक्षण करने के बाद डॉ. गोल्डीन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य के पास एक छठी इन्द्रिय भी हैं, जिसके संबंध में लोगों को बहुत कम जानकारी है। पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सुनने, बोलने, देखने, सूँघने और स्पर्शानुभूति की क्षमता से तो सभी परिचित हैं, परन्तु छठी इन्द्रिय जिसे पराशक्ति भी कहा जाता सकता है, इन पाँचों इन्द्रियों से अधिक महत्वपूर्ण है। किन्हीं-किन्हीं में यह संयोगवश प्रकट होती है और देखने संपर्क में आने वालों को चकित कर देती है। किन्तु वह आकस्मिक है। प्रयत्नपूर्वक उसे बढ़ाया जा सकता है और उससे अधिक लाभ उठाया जा सकता है जो पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से प्राप्त होना संभव है।
अध्यात्म की इन मान्यताओं को, अतीन्द्रिय चेतना की इन सम्भावनाओं को विज्ञान ने आरम्भ में निराधार भावुक मान्यताओं की संज्ञा दी थी और कहा था कि इनका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है, पर अब ऐसी बात नहीं है। चेतना के क्षेत्र में जो नित नवीन खोजें होती हैं कि मस्तिष्क मात्र चिन्तन का एवं शरीर मात्र संचालन, कार्य सम्पादन का उत्तरदायित्व ही नहीं सम्भालता है। शरीर और मस्तिष्क का कार्यक्षेत्र वहीं तक सीमित नहीं है। जितना कि समझा जाता है। बल्कि उसकी परिधि बहुत व्यापक है। परामनोविज्ञान जो काफी समय से इन शक्तियों का प्रतिपादन पुष्टीकरण करता आ रहा है, आरम्भ में भूत विद्या जैसी जादुई चर्चा कहा गया था। किन्तु अब प्राप्त तथ्यों ने इसे विज्ञान की ही एक शाखा मानने जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है और उसकी गम्भीरता तथा वास्तविकता को स्वीकारा, समझा व माना जाने लगा है। अमेरिका की विज्ञान संस्था ए.ए.ए.एस. ने परामनोविज्ञान संस्था को अपना पूर्ण सदस्य माना है और उसके प्रतिनिधि अन्य वैज्ञानिकों के साथ बैठते, विज्ञान काँग्रेसों में भाग लेते हैं। परामनोविज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उसमें मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले और मस्तिष्क द्वारा प्रभावित होने वाले सभी आधार सम्मिलित रखे गये हैं। उसी की एक शाखा अतीन्द्रिय विज्ञान है जिसे पी.एस.आई. कहा जाता है। इस शाखा में अतीन्द्रिय दृष्टि, पूर्वाभास, विचार सम्प्रेषण आदि कई धाराएँ सम्मिलित है।
अतीन्द्रिय चेतना की बहुत सीमित सम्भावनाओं पर ही अभी प्रयोग परीक्षण किए जा सके है। इस दिशा में प्रयोगों का क्रम जारी है और अगले दिनों बहुत कुछ प्राप्त होने की आशा की जा रही है तथा समझा जा रहा है कि मनुष्य अतीन्द्रिय चेतना के क्षेत्र में प्रगति कर विलक्षण सामर्थ्यों का अधिष्ठाता बन सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति क्षमता सम्पन्न है। अकूत क्षमताओं का भण्डार है। सृष्टा ने जब मनुष्य जाति की रचना की तब सबसे पहले उसने उसकी कठिनाइयों को ध्यान में रखा होगा और फिर उनका सामना करने के लिए विलक्षण क्षमताओं का समावेश किया। पर आज मानव वर्ग गुमराह हो गया है। अपनी क्षमताओं, प्रतिभाओं को देख-परख नहीं पाता। स्वयं को उस स्तर का नहीं आँकता जिस स्तर का वास्तव में वह है। यदि ऐसा हो पाता तो मनुष्य आज इतना त्रस्त नहीं होता। उससे घुटने टेकने की प्रवृत्ति जाती रहती।
महान दार्शनिक नाँरमन विनसेंट पील ने विभिन्न प्रकार के लोगों से साक्षात्कार किया और पाया कि व्यक्ति यदि चाहे तो अपनी कठिनाइयों को स्वयं निरस्त करके उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। उसमें अद्भुत क्षमताओं का भण्डार भरा पड़ा है।
यदि जीना दूभर हो जाये तो अपने आप से प्रश्न करना चाहिए कि यह जीवन अस्त-व्यस्त क्यों है? कठिनाई क्या है? और यह पता लगते ही समस्या का निदान करना चाहिए। हर समस्या का हल अपने में मौजूद है। भगवान बुद्ध का कहना था - “मन ही सब कुछ है। आप जो भी चाहेंगे वह हो सकता।” यदि हम कमजोर हो गए और हार गए तो इसका मतलब यह होगा कि हमने असफलताओं को अपने विचारों पर हावी होने का मौका दे दिया एवं अपने आपको जानने समझने में वास्तविकता से विपरीत दिशा में बढ़ गए। यह स्वयं को अन्धेरे में भटकाने जैसी बात होगी तथा इससे क्षमताएँ कुण्ठित होंगी।
इससे बचने का एकमात्र उपाय यही है कि अपने प्रति बनी गलत धारणाएँ बदली जायें जो हमारे अंतर्मन में जड़ जमाती और अपने संबंध में सही मूल्याँकन करने में असमर्थ रही है।
मन के हारे हुओं को सफलता शायद ही कभी मिलती हैं। उनके मन-मस्तिष्क में यह बात बुरी तरह घर कर गई होती है कि अक्षम हैं। कठिनाइयों, परेशानियों, संकटों का सामना करने, उन्हें हटा सकने की क्षमता उनमें नहीं है। फलतः यदि कहीं सफलता के चिन्ह दृष्टिगोचर होते भी है तो उन्हें स्वीकार एवं ग्रहण नहीं हो पाते। इसके विपरीत सशक्त मनोबल वालों के सामने बड़ी विघ्न-बाधाएँ भी नतमस्तक हो जाती हैं। कारण, कि वे हर प्रकार की समस्याओं का हल निकालने के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखते हैं। अस्तु, अन्ततः वे सफल भी होते हैं।
कवि एलाव्हीलर बीलकाँक्स ‘सही चिन्तन’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “चिन्तन ही मनुष्य है। अध्ययन, कथन अथवा श्रवण वह नहीं हो सकता। लगातार चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
हममें से अधिकाँश सृजनात्मक शक्ति का महत्व ही नहीं समझ पाते तथा उस शक्ति की पूर्णतः अवहेलना कर देते हैं। कुछ लोग सोचते हैं ‘सृजनात्मक शक्ति’ केवल कुछ प्रतिभाशाली लोगों को ही अनुदान स्वरूप मिलती है। वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। हर व्यक्ति में अपने व्यक्तित्व और भविष्य का इच्छित निर्माण कर सकने की क्षमता विद्यमान है।
माइकेल ड्रूरी का कहना है कि सृजनात्मक शक्ति प्रत्येक मनुष्य में जन्मजात रूप से निहित होती है, परन्तु उस सामर्थ्य का उपयोग करना साहसी, धैर्यवान और प्रयत्नशील लोगों से ही बन पड़ता है।
आधुनिक खगोल विज्ञान के जनक सरविलियम हर्सचेल ने जब सर्वोत्तम दूरबीन बनाने का विचार किया तो उन्हें पहले काँच पीसना और आइने पर पालिश चढ़ाने का काम सीखना पड़ा। इस तरह कई महीनों के सतत् प्रयास के बाद वे पहला आइना बना पाए, परन्तु वह भी त्रुटिपूर्ण पाया। सतत् परिश्रम और दीर्घकालीन एकनिष्ठ अभ्यास से दो सौ असफल प्रयत्नों के बाद ही वे सन्तोषप्रद दूरबीन बना सके। गीताकार ब्रहम्स को अपनी पहली स्वर संगति की रचना करने में बीस वर्ष का समय लगा था। किन्तु वे हारे नहीं और तत्परता के सहारे समयानुसार लक्ष्य तक पहुँचे। किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए गहरी रुचि एवं लगनशीलता आवश्यक है। विश्व-विख्यात संगीत विज्ञानी मोजार्ट में तत्काल स्वर रचना करने की विलक्षण क्षमता थी परन्तु वे भी तो एक बार में एक ही रचना कर सकते थे।
ड्रूरी का कहना है कि जब हम किसी बड़े कार्य को हाथ में लेते हैं तो सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है। सूर्य समय पर उगता, पृथ्वी धीरे-धीरे घूमती है। किन्तु वे अपने कार्य को सुनिश्चित गति से व्यवस्थापूर्वक करते रहते हैं। यही सृजनात्मक शक्ति का स्वरूप एवं रहस्य है।
यदि हम कोई काम प्रभावशाली ढंग से प्रारम्भ नहीं कर सकते तो उसे शुरू करना भी नहीं चाहते। यह सृजनात्मक के लिए घातक है। हेलेन केलर ने लिखा है “जब हम किसी संकल्प को या अच्छे मनोभाव को बिना किसी उपयोग के नष्ट हो जाने देते हैं, तो उसका अर्थ होता है कि हमने सौभाग्य गँवा दिया। इसी प्रवृत्ति के कारण यथार्थतः कामों की सफलता में रुकावट आती है।”
दार्शनिक ड्रूरी का कहना है कि यदि हम कुछ करना, बनाना या दिखाना चाहते हैं तो बिखरी हुई अनेकों संभावनाओं में से एक को अपना लक्ष्य चुनकर उसी के लिए संकल्प एवं धैर्यपूर्वक कार्य करना चाहिए। केवल लक्ष्य के प्रति ही नहीं, प्रतिदिन के क्रिया-कलापों में भी गहरी रुचि होनी चाहिए। प्रयत्नों की आरम्भिक असफलताओं के बावजूद हमें पूर्ण तन्मयता से अपने निर्धारित प्रयास में तत्परतापूर्वक तब तक लगे रहना चाहिए, जब तक कि हम पूर्ण रूप से परिष्कृत होकर अपने उद्देश्य को न पा लें।
मेथम बर्ने का कहना है कि अपने आप की खोज ही सृजनात्मक शक्ति प्रदान करती है और यह खोज हमें अकेले ही करनी है, जैसे हम अकेले जन्म लेते और मरते भी अकेले ही हैं।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का निवास दूसरी मंजिल पर था। एक दिन उनके पास उनका एक नौकर एक आवश्यक पत्र लेकर पहुँचा। गर्मी का समय था। गर्मी की तपन से नौकर बेहाल हो सीढ़ी नहीं चढ़ पा रहा था। वह सीढ़ी के कोने में ही बैठकर सो गया। विद्यासागर किसी काम से नीचे उतर रहे थे। नौकर को सीढ़ी पर सोते देख वे तुरन्त समझ गए कि यह किसी आवश्यक कार्य से ही मेरे पास आ रहा होगा। उसके हाथों में लगा पत्र उनने धीरे से निकाला और पढ़ने के बाद वापस अपने कमरे में गए।
कमरे से पंखा व जल लेकर नौकर को हवा करने लगे।
इसी बीच उनके एक मित्र आ गये। नौकर के ऊपर हवा करते देख स्तम्भित होकर बोले! आपने तो गजब कर दिया। 7-8 रुपये महीना पाने वाले नौकर के ऊपर हवा कर रहे हैं।
करुणार्द्र शब्दों में तुरन्त ही विद्यासागर बोले - “तो क्या हुआ? मेरे पिता जी भी तो 7-8 रुपये महीना ही पाते थे। एक दिन सड़क पर चलते-चलते इसी प्रकार मेरे पिता जी बेहोश हो गये थे तो एक फेरी वाले ने उन्हें पानी पिलाया था तथा हवा की थी। मैं तो इस नौकर में अपने स्वर्गीय पिताजी की मूर्ति ही देख रहा हूँ।
आहार को सुपाच्य बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जीव-कोष के एक छोटे से भाग की होती है। उसे “माइटोकाण्ड्रिया” कहते हैं। जीव कोष के इस अत्यन्त छोटे हिस्से की जाँच इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से की जा सकती हैं। प्रत्येक जीवकोष में वे अनेकों होते हैं। हाई पावर माइक्रोस्कोप की सहायता से देखने में वे गोल या लम्बे आकार के दिखाई देते हैं। इनका आकार स्थिर नहीं रहता, बदलता रहता है।
नवीनतम शोध के अनुसार जीवकोष को शक्ति का बड़ा भाग माइटोकाण्ड्रिया से प्राप्त होता है। शरीर के सभी जीवकोष में यह घटक होता है, केवल रक्त कणों में नहीं, अतः उन्हें अलग से आक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है।
माइटोकाण्ड्रिया का जीव विज्ञानियों के लिए इतना अधिक महत्व है कि एक विज्ञान की अलग प्रशाखा बनायी गई जिसको ‘सेल-बायोलॉजी’ या ‘साइटोलाजी’ के नाम से जाना जाता है। माइटोकाण्ड्रिया कई प्रकार के रसायन बनाता है जिसके अध्ययन के लिए रसायन विज्ञान की एक नई शाखा बनी है जिसे ‘साइटोकैमिस्ट्री’ कहते हैं। शिकागो यूनीवर्सिटी के डा. सिलविया एच. बेन्स ली एवं नार्मण्ड एल. हॉर और ‘राकफेलर इन्स्टीट्यूट फॉर मेडिकल रिसर्च’ के डा. अलबर्ट क्लाड ने विभिन्न प्राणियों के जीवकोषों से ‘ माइटोकाण्ड्रिया’ को अलग कर उनका गहन अध्ययन किया है।
आहार के कणों को विभिन्न घटकों में विभाजित करने का कार्य यही घटक करता है और उसे सुपाच्य बनाता है। इतना ही नहीं, माइटोकाण्ड्रिया की रासायनिक प्रक्रिया से पर्याप्त ऊर्जा शक्ति भी उत्पन्न होती है। संग्रहित ऊर्जा का रासायनिक स्वरूप ए.टी.पी. (एडीनोसिन ट्राइफाँस्फेट) है। शरीर में जहाँ-जहाँ शक्ति की आवश्यकता होती है, वहाँ अधिक मात्रा में माइटोकाण्ड्रिया पाये जाते हैं। ‘माइटोकाण्ड्रिया’ जीवकोष का एक घटक तो अवश्य है, पर साथ ही आश्चर्यजनक बात यह है कि वह अपने अधिष्ठाता पर नियन्त्रण भी करता है।
वण्डर बिल्ट यूनीवर्सिटी के रसायन शास्त्री अर्स जूथर को सन् 79 में जीवकोषों के अन्तराल में पाये जाने वाले विशेष रासायनिक पदार्थों की खोज पर नोबेल पुरस्कार मिला था उनके लम्बे अन्वेषणों और निष्कर्षों ने यह सिद्ध किया है कि रोगों के मूल कारण उतने उथले नहीं है जितने कि अनाड़ी चिकित्सक समझते हैं। मौसम, आहार, चोट-फेट, एलर्जी जैसी दैनिक उथल-पुथल से तो शरीर संरचना स्वयं ही निपटती रहती है। उनका कुछ प्रभाव होती भी है तो उसे थोड़ी लड़-झगड़ के उपरान्त निपटाने या तालमेल बिठा लेने में सफल हो जाती है। इन्हीं उथले कारणों को दुर्बलता या रुग्णता का कारण मान बैठना भूल है।
जीव कोषों के गहन अन्तराल को निरखने-परखने वाले मूर्धन्य शरीर शास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सभी महत्वपूर्ण और कष्ट साध्य रोगों की जड़ें जीव कोषों के अन्तराल में सन्निहित रहती है। यदि उन गहन परतों में कोई गड़बड़ उठ खड़ी होती है तो उसका प्रभाव शरीर को सुनियोजित रखने वाली अनेक क्रिया-प्रक्रियाओं पर पड़ता है। फलतः व्यतिक्रम जहाँ भी उभरता है, वहीं चित्र-विचित्र नाम रूप के रोग उठ खड़े होते हैं।
जिस प्रकार परमाणु का मध्यवर्ती नाभिक उसकी सामर्थ्य का आधारभूत केन्द्र बिन्दु है उसी प्रकार जीव कोष के कलेवर में सन्निहित अनेकानेक रसायनों एवं हलचलों का सूत्र-संचालक उस भाग को कह सकते हैं जिसे ‘माइटोकाण्ड्रिया’ नाम दिया गया है। इसकी कार्य प्रणाली को केमिकल सिगनल कहते हैं। चिकित्सा शास्त्र में इसी को ‘मीडिएटर’ नाम दिया जाता है।
हारमोनों की विलक्षण शक्ति से सभी परिचित है। उनकी न्यूनाधिकता, स्वस्थता एवं विकृति की ऐसी कितनी आश्चर्यजनक परिणति होती है जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाता पड़ता है। अब सोचा यह जाने लगा है कि कायिक और मानसिक क्षेत्रों की सन्तुलित एवं उभरी पिछड़ी स्थिति के लिए विभिन्न हारमोन ही जिम्मेदार होते हैं। उनकी रासायनिक प्रतिक्रिया किस प्रकार होती है इस संबंध में लम्बे समय से पर्दा पड़ा चला आ रहा था। यह समझा नहीं जा रहा था कि किस प्रकार हारमोन शरीर संस्थान को इतना प्रभावित करते हैं जितना कि आहार, व्यायाम, चिकित्सा आदि के समस्त उपचार मिलकर भी नहीं कर पाते। हारमोनों में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थ कुछ भिन्न किस्म के तो होते हैं, पर उतने भर से किस प्रकार इतनी विलक्षणताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, यह समझने में भारी कठिनाई हो रही थी।
व्यक्ति का असाधारण रूप से लम्बा या ठिगना, पतला या मोटा, कामासक्त या नपुँसक होना हारमोनों की न्यूनाधिकता से होता है। नर में नारी की और नारी में नर की प्रवृत्ति उभरने का कारण भी हारमोन ही होते हैं। ऐसी-ऐसी अगणित विचित्रताएँ है जो हारमोन क्षेत्र में तनिक भी असाधारणता उत्पन्न होने पर कार्य संरचना से लेकर मानसिक स्तर तक के स्वरूप में विस्मयजनक हेर-फेर करते रहते हैं। इतना विदित होते हुए भी अभी तक यह नहीं समझा जा रहा था कि राई-रत्ती जितनी मात्रा के स्राव यह जादुई परिणति किस माध्यम से किस प्रकार प्रस्तुत करते रहते हैं ?
नवीनतम शोधों के आधार पर हारमोनों की सूक्ष्मता एक रासायनिक विद्युत प्रवाह के रूप में जीव कोष के अन्तराल का स्पर्श करती है। पारस्परिक सहयोग से विचित्र परिणति उत्पन्न करती है। यह प्रायः उसी स्तर की होती है जैसी कि शुक्राणु और डिम्ब के अत्यल्प छोटे घटकों के मिलन से भ्रूण कलल का उत्पन्न होना। सामान्य व्यवहार बन जाने के कारण उत्पन्न होना। सामान्य व्यवहार बन जाने के कारण यह प्रतिक्रिया कुछ आश्चर्यजनक नहीं लगती, पर नये सिरे से विचार करने पर दो कोशिकाओं की निकटता का एक अभिनव व्यक्तित्व का ढाँचा बन जाना सचमुच ही जादू चमत्कार जैसा अद्भुत है। ठीक इसी प्रकार हारमोनों की रासायनिक विद्युत विभिन्न जीवकोषों के अन्तराल में प्रवेश करके किस प्रकार स्वास्थ्य सन्तुलन को बनाती बिगाड़ती है इस प्रक्रिया को भी कम आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिए।
रोगों के निदान एवं उपचार में आमतौर से मोटा-छोटा अन्वेषण किया जाता है। वैद्य, हकीम नाड़ी, जीभ, नाखून, आँखें आदि देखकर रोग का नाम और कारण ढूंढ़ते हैं। डॉक्टर पैथालॉजी के अनुरूप मल-मूत्र, धड़कन, तापमान, रक्त आदि की जाँच-पड़ताल तथा कारणों की पूछताछ करते हैं। होम्योपैथ लक्षणों की भिन्नता देखते हुए शरीर की विषाक्तता को जानते और उस कमीवेशी को ‘विषस्य विषमौषधम’ सिद्धान्त के अनुरूप सन्तुलित करते हैं। बायोकैमी में लवणों को न्यूनाधिकता को रुग्णता का कारण माना जाता है। और उस क्षति-पूर्ति से उपचार की बात सोची जाती है। यह सभी पद्धतियाँ चिर पुरातन हैं। उनके सहारे आयेदिन अनेकानेक रोगी एक को छोड़ दूसरे चिकित्सक के दरवाजे भटकते रहते हैं। अन्धे के हाथ बटेर पड़ने की बात दूसरी है, किन्तु यथार्थता इतनी ही है कि अभी तक एक भी रोग का कारगर इलाज किसी भी चिकित्सा पद्धति के हाथ नहीं लगा है। सभी अँधेरे में ढेला फेंकते और संयोगवश किसी को कुछ लाभ मिल सके तो उसी का श्रेय झपटते हुए मूँछों पर ताव देते हैं।
चिकित्सा क्षेत्र का यह भटकाव क्या भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा ? क्या यह अनिश्चितता इसी प्रकार चलती रहेगी ? इसकी निराशाजनक सम्भावनाओं में आशा की एक किरण फूटती दिखाई पड़ती है वह है जीवकोष के नाभिक में पाई जाने वाली असीम क्षमता और उसमें होने वाले तनिक से हेरफेर से कायिक परिस्थितियों में हो सकने वाले परिवर्तनों की सम्भावना। कठिन और जटिल रोगों का कारण जीवकोष के इसी अन्तराल में खोजा जा सकता है और वहाँ सुधार परिवर्तन करने के लिए हारमोन स्रावों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
आशा की इस किरण के बावजूद भी यह प्रश्न बना ही रहता है कि हारमोन क्षेत्र के किस घटक को किस प्रकार इस स्तर की भूमिका निभाने के लिए कहा जाय, जिससे वे अमुक क्षेत्र के जीवकोषों के अन्तराल में अभीष्ट परिवर्तन करने वाली भूमिका निभा सकें।
अभी इस क्षेत्र में चिकित्सा शास्त्री मौन हैं। वे कारण को समझ लेने पर अगले दिनों उसमें सुधार कर सकने का रास्ता निकालने की आशा लगा रहे हैं। धरती से रेडियो सिगनल भेज कर जब अंतरिक्षीय यानों पर नियन्त्रण किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि जीवकोषों के अन्तराल को परमाणु नाभिक की तरह वशवर्ती न बनाया जा सके। भौतिक उपाय उपचार भी इस प्रयोजन के लिए कारगर हो सकते हैं। अध्यात्म विज्ञान तो ऐसे प्रयोजनों की पूर्ति में अपनी विशिष्टता चिरकाल से सिद्ध करता रहा है अब जबकि अध्यात्म विज्ञान का पुनर्जीवन हो रहा है तो कोई कारण नहीं कि हारमोन एवं जीवकोष के मध्य में चलने वाले सूक्ष्म आदान प्रदानों को अभीष्ट उद्देश्य के लिए प्रयुक्त न किया जा सकें।
कारनेल यूनीवर्सिटी मेडिकल कालेज के मूर्धन्य डॉक्टर जूलियन मैकगिलन ने लम्बी शोधों के उपरान्त यह सिद्ध किया है कि किस प्रकार जीव कोषों में विकृति आने पर अनेकानेक रोग उपजते और बढ़ते हैं। विषाणुओं का आक्रमण, आहार बिहार का व्यतिक्रम आघात प्रतिघात जैसे कारण ही अब तक रोगों के कारण माने जाते रहे है। इनमें से एक के भी न होने पर रोग उपज पड़ने में जो असमंजस होता था उसका समाधान उत्पन्न विक्षेप बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के भयानक रोगों को जन्म दे सकते हैं।
इतना सिद्ध होने पर मात्र आधी मंजिल पार हुई है। आधी अभी भी शेष है। कारण ढूँढ़ लेना एक बात है और उसका उपचार ढूँढ़ना दूसरी। विशेषतया तब, जब कि जीवकोष के बहिरंग की जाँच पड़ताल में उलझा हुआ चिकित्सा विज्ञान उसके अन्तराल में प्रवेश पाने और ‘माइटोकाण्ड्रिया’ जैसे सूक्ष्म संस्थान को समझने और उसमें उलट-फेर करने के संबंध में एक प्रकार से अनाड़ी जैसी स्थिति में ही रह रहा है।
जहाँ स्थूल का अन्त है वहाँ से सूक्ष्म का आरम्भ होता है। पदार्थ विज्ञान जहाँ थक जाता है, वहाँ अध्यात्म उस भार वहन की जिम्मेदारी उठाता है। समझा जाना चाहिए कि अध्यात्म विज्ञान उस असमंजस को दूर करेगा जिसमें जीवकोष और हारमोन के मध्यवर्ती विद्युत प्रवाह को आरोग्य रक्षा एवं रोग उपचार के लिए ठीक प्रकार तालमेल मिला सकने की स्थिति तक पहुँचाया जा सके।
पशु यज्ञ का विशाल आयोजन हो रहा था। पंक्तिबद्ध होकर पशु खड़े थे। पास ही बधिक आदेश की प्रतीक्षा में चमचमाती तलवार लिये खड़ा था।
निरीह पशुओं की बलि दे ही जाने वाली थी कि तभी सहसा भगवान बुद्ध ने वहाँ प्रवेश किया। वे सीधे अजातशत्रु के पास गये और एक तिनका उनके सामने रखकर बोले -’इस तिनके को तोड़कर तो दिखाइये। अजातशत्रु ने उसके दो टुकड़े कर दिये। तथागत ने पुनः आदेश दिया-’अब इस जोड़ो।’ ‘ऐसा कैसे सम्भव है भगवन्?’ अजातशत्रु ने प्रश्न किया।
भगवान बुद्ध समझाने लगे ‘तो राजन, जिस प्रकार टूटे तिनके को जोड़ना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार पिता के बध से उत्पन्न पाप को निरीह प्राणियों की बलि से दूर करना सम्भव नहीं है। पशु हिंसा से तुम्हारा पाप बढ़ेगा ही घटेगा नहीं। जो प्राण हम में है, वही इन प्राणियों में है। सभी प्राणियों को अपने समान समझकर व्यवहार करो।’
तथागत के इन वचनों ने अजातशत्रु का हृदय परिवर्तन कर दिया और उन्होंने पशुबलि का आयोजन स्थगित कर दिया।
देवासुर संग्राम समाप्त हुआ। विजय देवताओं के हाथ लगी। इन्द्र की सभास्थली में सभी देवतागण अपने-अपने पराक्रम की चर्चा कर मन में फूले नहीं समा रहे थे। देवताओं के बढ़ते अहंकार को शक्तियों के अधिष्ठाता ब्रह्म सुन रहे थे। अहंकार पतन और पराभव का कारण है। समय रहते उस पर अंकुश लगना चाहिए। यह सोचकर तेजस्वी दीप्तिमान महायज्ञ के शरीर में यह देव सभा के द्वार पर प्रकट हुए। कोलाहल बन्द हुआ। उसका स्थान नीरव स्तब्धता ने ले लिया।
आगे बढ़कर जातवेदा अग्नि ने सभा भवन का दरवाजा खोला और आगन्तुक से प्रश्न किया “आप कौन है? यहाँ आने का अनुग्रह कैसे किया?”
प्रश्न का बिना उत्तर दिए तेजस्वी व्यक्ति ने प्रति प्रश्न किया ‘तू कौन है?’
अग्नि ने अहंकार मिश्रित स्वर में अपना परिचय दिया “मैं जातवेदा अग्नि” हूँ। हर वस्तु को पल भर में जला देता हूँ। आगन्तुक ने एक तिनका सामने रखा और अग्नि से उसे जलाने को कहा। अग्नि को लगा जैसे किसी ने सारी शक्ति निचोड़ ली हो। वे अपने को निष्प्राण और निस्तेज अनुभव कर रहे थे । फिर भी जलाने का उपक्रम किया, पर असफल रहे। निराश और उदास होकर वहीं भूमि पर बैठ गये।
दरवाजे पर अग्नि को गये अधिक देरी हो चुकी थी। पवन देव वस्तुस्थिति का अवलोकन करने पहुँचे। भूमि पर निस्तेज अवस्था में अग्निदेव को बैठे देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। सामने सूर्य की भाँति तेजस्वी अतिथि को उन्होंने पूछा “महाभाग! आपका परिचय?”
अतिथि ने उलटकर वही प्रश्न पवनदेव से भी किया। पवन ने कहा “मुझे वेगवान ‘मातरिश्वा’ कहते हैं। मैं बहता हूँ और अपने प्रवाह में बहुतों को बहा ले जाता हूँ।” आगन्तुक के अधरों पर मन्द मुस्कान तैर गई। उसने वहीं तिनका पवन के सामने रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा। मातरिश्वा ने अथक प्रयत्न किया पर तिनका चट्टान की भाँति अड़ा रहा। टस से मस न हुआ। हारे थके पवन भी सिर झुकाकर ‘जातवेदा’ के निकट बैठ गये।
अग्नि और पवन के वापिस न लौटने पर देवगण को चिन्ता बढ़ी। सभी वरिष्ठ देवता स्थिति को जानने के लिए द्वार पर पहुँचे। पवन और अग्नि के सिर झुकाये बैठे देखकर सभी आतंकित हो उठे। वरुण और अन्तरिक्ष में परिचय पूछा तो आगन्तुक ने वहीं पद्धति दुहराई। अपना परिचय दिए बिना उनसे उलटकर प्रश्न पूछे। एक ने कहा मैं गीला कर देने वाला वरुण और दूसरे ने कहा मुझे सबको उदरस्थ करने वाला अन्तरिक्ष कहते हैं। दोनों के सामने तिनका पड़ा था, पर न तो वे उसे गीला कर सके और न ही उदरस्थ कर सके। विवश होकर उन्हें भी अपने देव बन्धुओं की बगल में बैठ जाना पड़ा।
परम तेजस्वी आगन्तुक अब स्वयं आगे बड़ा और ऊँचे सिंहासन पर बैठे देवाधिराज इन्द्र से पूछा कि ‘क्या तू भी अपनी शक्ति का परिचय दे सकता है?’ साथियों की दुर्गति इन्द्र के सामने थी। वे क्या उत्तर देते? सबका अहंकार चूर हो गया था। सभा में नीरवता छा गई।
स्तब्धता को भंग करते हुए तेजस्वी पुरुष ने स्वयं अपना परिचय दिया - मैं महायक्ष हूँ मुझे सर्वशक्तिमान ब्रह्म कहते हैं। आत्मबल के रूप में मुझे जाना जाता है। मेरे तेज से ही शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। सभी शक्तियों का अधिष्ठाता में हूँ। मेरी सत्ता से ही जड़−चेतन में हलचल और चैतन्यता पायी जाती है। देवताओं! पंचतत्वों से बने कलेवरों और उपकरणों की प्रशंसा न करो। ब्रह्म ही बल है। ब्रह्म तेजस ही विजय होता है। अस्तु प्रशंसा करनी हो तो उसी की करो। महत्ता उसी की समझो। आराधना उसी की करो।
आगन्तुक महायक्ष देवगण को वास्तविकता को बोध कराकर अपनी आभा के साथ अन्तरिक्ष में अदृश्य हो गये। देवताओं का मिथ्या अहंकार समाप्त हुआ और तब से वे आत्मबल की आराधना में संलग्न हो गये।
मनुष्य की काय संरचना ऐसी है जिसे यदि तोड़ा मरोड़ा न जाय, महज गति से चलने दिया जाय तो वह लम्बे समय तक बिना लड़खड़ाये कारगर बनी रह सकती है। आरोग्य स्वाभाविक है और रोग प्रयत्नपूर्वक आमंत्रित। सृष्टि के सभी प्राणी अपनी सहज आयु का उपभोग करते हैं। मरण तो सभी का निश्चित है, पर वह जीर्णता के चरम बिन्दु पर पहुँचने के उपरान्त ही होता है। मात्र दुर्घटनाएँ ही कभी-कभी उसमें व्यवधान उत्पन्न करती है। रुग्णता का अस्तित्व उन प्राणियों में दृष्टिगोचर नहीं होता जो प्रकृति की प्रेरणा अपनाकर सहज सरल जीवन जीते हैं। मनुष्य ही इसका अपवाद है। इसी मूर्ख जीवधारी को आये दिन बीमारियों का सामना करना पड़ता है। बेमौत मरते भी वहीं देखा जाता है।
दुर्बलता, रुग्णता और असामाजिक मृत्यु कोई दैवी विपत्ति नहीं हैं। मनुष्य द्वारा अपनायी गई रहन-सहन संबंधी मूर्खता की प्रतिक्रिया मात्र है। आहार-बिहार में संयम बरता जा सके और मस्तिष्क को अनावश्यक उत्तेजनाओं से बचाये रखा जा सके तो लम्बी अवधि तक सुख पूर्वक निरोग जीवन जिया जा सकता है।
आरोग्य की उपलब्धि के लिए बहुमूल्य टानिकों या औषध-रसायनों की खोजने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। जो उपलब्ध है उसे बर्बाद न करने की सावधानी भर बरती जाय तो न बीमार पड़ना पड़े, न दुर्बल रहना पड़े और न असमय बेमौत मरने की आवश्यकता पड़े। चिकित्सकों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा आरोग्यार्थी यदि रहन-सहन में सम्मिलित कुचेष्टाओं को निरस्त कर सकें तो यह उपाय उनकी मनोकामना सहज ही पूरी कर सकता है।
जिन्होंने रोगों से बचे रहकर लम्बी जिंदगी का आनन्द लिया है उनकी जीवनचर्या पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि सरल और सौम्य रीति-नीति अपनाने भर से शरीर लम्बे समय तक निरोग और सक्षम बना रह सकता है। दुर्बलता तो सामर्थ्य के अपव्यय से उत्पन्न होती है। रुग्णता प्रकृति विरोधी आचरण अपनाने का दण्ड भर है, जो जीवन सम्पदा के साथ उत्तेजनात्मक खिलवाड़ करते हैं वे ही उसे असमय होली की तरह जलाते और समय से पूर्व बेमौत मरते देखे जाते हैं।
बहुमूल्य भोजन और शाही सुविधा न पाने पर भी सामान्य जन-जीवन में निर्वाह करने वालों में भी असंख्यों दीर्घजीवी पाए गए है। इससे प्रतीत होता है कि आरोग्य प्राप्ति के लिए न गरीबी बाधक है न अशिक्षा। इसके लिए इतने भर से काम चल सकता है कि मनुष्य सहज जीवनचर्या अपनाये और विलासिता की ललक में बरती जाने वाली उच्छृंखलता से बचा रहे। दीर्घ जीवन के क्षेत्र में सफल व्यक्तियों के संबंध में जानकारी एकत्रित करने पर सरलता समर्थक तथ्य ही उभर कर आगे आते हैं।
पिछली जन-गणना के अनुसार भारत से शतायु व्यक्तियों की संख्या साठ हजार से अधिक है। इससे प्रतीत होता है कि दरिद्रता इस क्षेत्र में उतनी बाधक नहीं जितनी कि समझी जाती हैं।
फ्राँस में सौ वर्ष या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति लगभग तीन सौ हैं। परन्तु करीब 10,000 ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी आयु 95 और 100 वर्ष के मध्य है। फ्राँस की सर्वाधिक आयु प्राप्त एक महिला हैं श्रीमती फैलिसी जो अब से लगभग 15 वर्ष पूर्व 108 वर्ष की थी।
अमेरिका में 1960 में 10,369 व्यक्ति शतायु थे। सन 1964 में यह संख्या 12,000 हो गयी। 1964 में वहाँ फ्लोरिडा में एक भण्डार चलाने वाले व्यक्ति थी चार्ली स्मिथ 121 वर्ष के थे। वह नीग्रो थे।
वहाँ की जनसंख्या को देखते हुए इतनी कम संख्या में दीर्घजीवियों का होना बताया है कि शिक्षा या सुविधा साधनों से नहीं दीर्घजीवन का सीधा संबंध प्रकृति अनुसरण से है।
16 अक्टूबर 1964 को आगरा में रजिस्ट्रार जनरल की एक रिपोर्ट से ज्ञात हुआ था कि उस समय देश में चालीस व्यक्ति डेढ़ सौ वर्ष की अवस्था से अधिक आयु के थे। इनमें से 35 ग्रामीण निवासी तथा शेष शहरी क्षेत्रों के निवासी थे।
भारत के सर्वाधिक उम्र के व्यक्ति रज्जा कदर का अगस्त 1964 में निधन हुआ था। वह कुलगाम गाँव का निवासी 178 वर्ष की आयु में दिवंगत हुआ। सन 1964 168 वर्ष की आयु वाले तीन व्यक्ति असम और एक पश्चिमी बंगाल में थे। 160 वर्ष की अवस्था का एक व्यक्ति मध्य प्रदेश में विद्यमान था।
भारत की वृद्ध जन सम्मान समिति ने दीर्घायु का आनन्द लेने वाले व्यक्तियों की सम्मतियाँ या सुझाव तथा निजी जीवन पद्धति का संकलन किया। उनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार हैं-
ईरान के 191 वर्षीय श्री सैयद अबू तालेव मौसाबी का कहना हैं कि दीर्घायु का रहस्य “सुखी परिवार एवं कठोर परिश्रम” है। उनका स्वयं का खूब भरा-पूरा परिवार है तथा कुछ न कुछ श्रम अब तक भी करते रहते हैं।
रूस के 158 वर्ष की आयु वाले श्री मुस्लियोव शिराली फरजाली ने दीर्घ जीवन का रहस्य बताते हुए कहा - “मैं नित्य प्रातःकाल उठ जाता हूँ। बारहों महीने ठंडा पानी पीता हूँ। दिन में कभी नहीं सोता। दूध खूब पीता हूँ परन्तु शराब और सिगरेट कभी नहीं पीता एवं सदैव खुले में सोता हूँ।
सिंगापुर की 133 वर्षीय श्रीमती नोरिया विगते वायुमेन ने लम्बी आयु का कारण अपना ईश्वर विश्वास बताया। वह नियमित रूप से दिन में पाँच बार नमाज पढ़ती है।
अमेरिका के 122 वर्षीय श्री चार्ली स्मिथ ने भी अपनी लम्बी आयु का रहस्य ईश्वर विश्वास की दृढ़ भावना को बताया। वे अपनी नियमित जीवनचर्या में नैतिक नियमों का पूरा समावेश रखते हैं।
जापान की सर्वाधिक आयु वाली महिला श्रीमती कोवायासी यासू का कहना है कि मात्र सब्जियों के आहार और गहरी नींद ही उनकी लम्बी आयु का कारण है। उन्होंने कभी शराब या तम्बाकू को हाथ नहीं लगाया और न ही दवाइयां ली हैं। उनकी आयु 118 वर्ष है।
रूस के खरकोव विश्व विद्यालय में ऐसे व्यक्तियों का एक रिकार्ड है जो वहीं के निवासी तथा सौ वर्ष से अधिक आयु वाले है। लम्बी उम्र वाले मनुष्य वहाँ पूरे राष्ट्र के सभी भागों में होते हैं। उस रिकार्ड में शताधिक आयु वाले 40 हजार से भी अधिक लोगों के नाम दर्ज है।
सोवियत संघ में क्रान्ति से पूर्व वहाँ के लोगों की औसत आयु 32-33 वर्ष की और अब 70 वर्ष से भी अधिक हो गयी है। वहाँ बुढ़ापे के संबंध में अनेकों वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षा शास्त्रियों ने शोध कार्य किया है तथा बुढ़ापा रोकने के सफल प्रयास भी हुए है। प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री इवान पावलाव ने खोज की है कि “दीर्घ जीवन के लिए किए गए प्रयासों में स्नायु प्रणाली का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।” उन्होंने असमय बुढ़ापा आने के कारणों में स्नायु प्रणाली का ठीक से कार्य करना प्रमुख माना है। उसी से उच्च रक्तचाप, चयापचय क्रिया से संबंधित बीमारियाँ उत्पन्न होती है।
रूस के शरीर शास्त्रियों ने भोजन की अधिकता को रोग पैदा करने के लिए बहुत उत्तरदायी बताया है। उन्होंने भूख से कुछ कम खाने का परामर्श दिया है।
जीव विज्ञानी इल्यामेचनिकोव कहते हैं कि अपच ही अधिकाँश रोगों का प्रमुख कारण है और इसे आवश्यकता से अधिक खाकर लोग स्वयमेव ही उत्पन्न करते हैं। इस बुरी आदत को यदि अपने पैरा पर आप कुल्हाड़ी मारना कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होंगी।
अगर तुम्हारे होठ मुस्कराना चाहते हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करो और यदि न हों तो उन्हें मुस्कराने के लिए मजबूर करो।
शरीरगत ऊर्जा का केन्द्र मूलाधार माना गया है और चेतना ऊर्जा का उद्गम केन्द्र सहस्रार। मूलाधार चक्र जननेन्द्रिय मूल में है और सहस्रार चक्र मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में। इन दोनों की तुलना दक्षिण और उत्तर ध्रुवों से की जाती है। जिस प्रकार धरती का समस्त वैभव अंतर्ग्रही अनुदानों से परिपूर्ण है और वह ध्रुव केन्द्रों के माध्यम से उपलब्ध होता है। ठीक उसी प्रकार सहस्रार के माध्यम से ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ उपलब्ध की जाती है, और उपयोग में बची खुची जो अनावश्यक लगती हैं, वे मूलाधार से निकल जाती है। सहस्रार को उत्पादन अर्जन का माध्यम और मूलाधार को विसर्जन निष्कासन का द्वार कहा गया है। आध्यात्मिक कमाई ब्रह्मरन्ध्र के केन्द्र से होती है और उसका खर्च यदि महत्वपूर्ण प्रयोजन में नहीं बन पड़ा तो मूलाधार के समीप वाला छिद्र उसे काम कौतुक के सहारे विसर्जित करता बहाता रहता है। सहस्रार के माध्यम से समाधि का आनन्द और मूलाधार के माध्यम से कुण्डलिनी का लाभ उठाया जा सकता है।
दिव्य उपार्जनों को प्रखर बनाने और श्रेष्ठ उपयोग में लगाने की विद्या का नाम कुण्डलिनी जागरण है। कुण्डलिनी उस प्राण विद्युत का नाम है, जिसमें शरीरगत ऊर्जा का अंश कम है और प्राण चेतना का भाग अनुपात अधिक होता है। यदि उसका महत्व समझा और उपयोग जाना जा सके तो मनुष्य प्रचलित सम्पदा उपार्जनों की तुलना में अधिक उच्चस्तरीय लाभ कमाने में सफल हो सकता है।
कुण्डलिनी का शब्दार्थ है - घेरा बना कर बैठना। कुण्डलिनी मारकर सर्प बैठता है। इसलिए उसी की उपमा प्रायः काम में लायी जाती है। पृथ्वी शेषनाग के फन पर रखी हुई है। आकाश तत्व का देवता ‘अनन्त’ महासर्प है। इस पौराणिक मान्यता में विश्व-ब्रह्माण्ड की तथा पृथ्वी की स्थिति का निरूपण है। पाताल को शेष लोक कहते हैं। ऊपर के ब्रह्मलोक पर भी शेष सर्प का ही आधिपत्य है। विष्णु भगवान शेष सर्प पर सोये हुए हैं। शिव लोक में भी सर्प साम्राज्य है, वे भगवान शंकर के अंग- अंग से लिपटे हुए है। इस प्रकार अधःलोक और ऊर्ध्वलोक में पृथ्वी के ऊपर और नीचे सर्पसत्ता का ही आधिपत्य है। इस विवेचना से कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप की आरम्भिक जानकारी मिलती है।
शक्ति का ही विकसित रूप पदार्थ है। शरीर के अवयव या रासायनिक पदार्थों से बने हैं, पर मूलतः वे शक्ति रूप हैं। शक्ति ही सघन होकर रासायनिक तथा दूसरे पदार्थों का रूप धारण करती है और इन्हीं के संयोग से शरीर बन जाते हैं। संक्षेप में शरीर रचना का मूलतत्व-मूल आधार एक विद्युत शक्ति के रूप में ही उद्भूत होता है। रतिक्रिया के घर्षण से यही विद्युत उत्पन्न होती है। उसी से शुक्राणु एवं डिम्ब कीट मिल कर गर्भधारण का सुयोग बनाते हैं। शरीरगत सभी हलचलों, क्षमताओं और विशेषताओं का श्रेय जिन गुण सूत्रों को दिया जाता है-वह वस्तुतः एक सचेतन विद्युत की ही प्रतिक्रियाएं हैं। यह प्राण विद्युत किसी शरीर का उत्पादन करने से लेकर उसका आजीवन बना रहने वाला ढाँचा खड़ा करती है इस ढांचे में शरीर और मन दोनों की ही संरचना सम्मिलित है। संक्षेप में प्राणधारियों के काय कलेवर का अस्तित्व, स्वरूप एवं भविष्य निर्धारण करने वाली प्राण विद्युत का नाम कुण्डलिनी है।
कुण्डलिनी का दूसरा सिरा मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र में है। यह चेतना मूलक है। चेतना यों समस्त शरीर में संव्याप्त है, पर उसका संचार केन्द्र मस्तिष्क ही है। प्राण विद्युत का ज्ञानपरक सिरा मस्तिष्क में और शक्ति परक सिरा मूलाधार में है। दोनों प्रायः पृथक ही रहते हैं। दोनों सिरे अपने-अपने सीमित प्रयोजनों को ही पूरा कर पाते हैं। पृथक-पृथक उनकी शक्ति इतनी ही है कि अपने स्थानीय उत्तरदायित्व को वहन कर सके। बिजली के दो तार अलग-अलग रहें तो उनसे कोई विशेष प्रयोजन पूरा नहीं होता, पर जब वे मिल जाते, है तो उस संयोग से प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न होता है। कुण्डलिनी जागरण की साधना में प्राण-विद्युत के दोनों सिरों को मिला दिया जाता है। इस मिलन का चमत्कार वैसा ही होता है, जिस प्रकार नर-नारी के मिलन से एक नये उत्साह का, नये उत्तरदायित्व का और नये परिवार का आरम्भ होता है। कुण्डलिनी जागरण में मूर्छना की समाप्ति और चेतना की अभिवृद्धि ही नहीं, दो शक्ति ध्रुवों की मिलन प्रक्रिया भी सम्मिलित है।
मूलाधार वाला सिरा प्रजनन के लिए उत्साह एवं सामर्थ्य जुटाने में लगा रहता है और उसी प्रवाह की पूर्ति कर पाता है। सहस्रार की सामर्थ्य भी उपार्जन, उपयोग एवं व्यवहार व्यवस्था में नियोजित हो जाती है।
मूलाधार चक्र को प्राण ऊर्जा जीवनी शक्ति, सृजन प्रेरणा, जिजीविषा, उमंग आदि में स्त्रोत के रूप में समझा जा सकता है। उसका अनवरत प्रयास काया के समस्त भौतिक प्रयोजनों में आवश्यक समर्थता एवं प्रेरणा उत्पन्न करने में लगा रहता है। इन्हीं में से एक प्रेरणा उत्पन्न करने में लगा रहता है। इन्हीं में से एक उत्साह काम-क्रीड़ा है। “काम” शब्द का वास्तविक अर्थ क्रीड़ा-विनोद एवं खिलाड़ी जैसे आनन्द की अनुभूति है इस प्रयोजन में प्रायः काम कौतुक ही हलचल को प्रधानता मिल जाती है। इसलिए रति प्रयोजनों के अर्थ में ही इन दिनों ‘काम’ शब्द का उपयोग होने लगा है। मूल अर्थ इसमें कहीं अधिक व्यापक है, उसे कर्मठता और प्रगतिशीलता का उमंग भरा सम्मिलन कह सकते हैं। यदि ऐसा न हो तो जीवन के चार पुण्य फलों में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में काम शब्द का प्रयोग न हुआ होता। भला योगी, तपस्वी, ब्रह्मज्ञानी, तत्वज्ञानी क्यों ‘काम’ जैसी अश्लील और शक्ति क्षरण करने वाली प्रक्रिया को जीवन फलों में सम्मिलित करते।
कुण्डलिनी का दूसरा ऊपरी सिरा मस्तिष्क मध्य सहस्रार में है। यह जीव चेतना का ज्ञान धारणा का केन्द्र है। यह जितना विकसित होता चला जाता है, समझदारी बढ़ती जाती है। उसी अनुपात में मनुष्य अधिक आजीविका एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इस केन्द्र की रहस्यमयी परतें कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास से उभारी और सशक्त बनायी जा सकती हैं। इस उपार्जन को दिव्य ज्ञान या दिव्य दृष्टि कहते हैं। अतीन्द्रिय ज्ञान के कौतूहलपूर्ण चमत्कारों की चर्चा प्रायः होती रहती है। विशिष्ट बुद्धिमानों की उद्भूत मस्तिष्कीय प्रतिभा का विवरण सुनने को मिलता रहता है। उसके पीछे किसी रहस्यमय चेतना परत का प्रस्फुरण ही काम करता है। दूरदर्शी सूझबूझ के सहारे लोग ऐसी योजनाएँ बनाते हैं, जिनके सफल होने में कदाचित ही व्यवधान पड़ते हैं। इसे भी मानसिक विशिष्टता ही कह सकते हैं, जो सर्व साधारण में नहीं होती है। ऐसी उपलब्धियों में भी उन्हीं गहरी पर्तों का उभार काम करता है, जिन्हें सामान्य प्रयत्नों से नहीं वरन् कुण्डलिनी जागरण जैसे आध्यात्मिक प्रयत्नों से ही पूरा किया जाता है। तत्वदर्शी, महामनीषी ब्रह्मज्ञानी आत्माएँ अपनी दिव्य क्षमताओं को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में प्रयुक्त करने की उपयोगिता समझते हैं। फलतः वे महात्मा, देवात्मा, ब्रह्मात्मा जैसी भूमिकाएँ सामान्य शरीर धारण किए रहने पर भी निबाहते रहते हैं। उसमें हेर-फेर करने की क्षमता भी उसमें पाई जाती है, इसलिए उन्हें सिद्ध पुरुष भी कहा जाता है। यह मानवी सत्ता के उत्तरी ध्रुव का प्रखरीकरण हुआ। इसे महासर्प का जागरण भी कह सकते हैं।
दक्षिणी ध्रुव का-मूलाधार का -जागरण वह है, जिसमें कामुकता को उदात्त परिष्कृत बनाया जाता है। मनुष्य पराक्रमी पुरुषार्थ, मनस्वी, तेजस्वी, ओजस्वी बनता है और महामानवों जैसी भूमिका निभाता है। उसकी काम-क्रीड़ा हँसते-हँसाते स्वभाव में मिलते-मिलाते व्यवहार में सुविस्तृत होती देखी जा सकती है, ऐसे व्यक्ति कुरूप होते हुए भी सुन्दर, जराजीर्ण रहते हुए भी सुन्दर लगते हैं। इसे महासर्पिणी का चमत्कार ही समझा जाना चाहिए।
गायत्री महामन्त्र के मन्त्र शिरोमणि होने एवं भारतीय संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ मंत्र घोषित किये जाने के अनेकों कारण हैं। मंत्र में शब्दों का गुंथन इस वैज्ञानिक रीति से हुआ है कि उसके जप से साधक की अन्तःचेतना में प्रसुप्त सूक्ष्म संस्थानों पर आघात होता है। प्रसुप्ति जागृति में बदलती है। शक्ति स्रोतों के भंडार खुल जाते हैं। अन्तः जागरण बाह्य चेतन जगत से संपर्क जोड़कर इतनी सामर्थ्य को संचित कर लेता है जिसे असामान्य, चमत्कारी कहा जा सके। यह तो मंत्र का वैज्ञानिक पक्ष हुआ।
वैचारिक पक्ष में जीवन एवं जीवन से संबंधित प्रत्येक छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान समाहित है। मन्त्र में सन्निहित तत्व दर्शन में सृष्टि के सभी रहस्यों, तथ्यों का निरूपण किया गया है जो ईश्वर, जीव एवं प्रकृति के स्वरूप एवं आपसी संबंधों को व्यक्त करते हैं। मंत्र के 24 अक्षरों में छिपे तत्वज्ञान के चिन्तन-मनन द्वारा ज्ञान के उस स्त्रोत तक पहुंचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों से आत्म-ज्ञान, बाह्य-ज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
वैज्ञानिक एवं वैचारिक पक्ष की तुलना में गायत्री महामन्त्र का भाव पक्ष कहीं अधिक प्रेरणादायक, समर्थ एवं प्रभावशाली है। विश्व की किसी भी संस्कृति में मात्र 24 अक्षरों में ब्रह्म विद्या एवं साधक विज्ञान का इतना सशक्त एवं समग्र दर्शन नहीं मिलता। भाव संवेदनाओं की पराकाष्ठा का दर्शन यदि कहीं करना हो तो गायत्री महामन्त्र में किया जा सकता है। भावों की उदात्तता के कारण ही सर्वश्रेष्ठ मन्त्र होने का श्रेय उसे प्राप्त हो सका है।
मन्त्र का देवता सविता है। सविता शब्द “षृड प्राणिगभैविमोचन याषू प्रेरणो” धातुओं से बना है। ‘षृड़’ धातु से बनाने पर “यः सुते चराचर जगत् उत्पादयति स सविता”-जो चराचर जगत को उत्पन्न करता है वही सविता है। ‘यू’ धातु से बनाने पर - यः सुवति प्रेरयति सर्वान् स सविता।” अर्थात् तो सबको सद्मार्ग की ओर प्रेरित करता है, वह सविता है। इन सभी अर्थों के अनुसार जड़ चेतन को उत्पन्न करने वाले तथा सबको पवित्र बनाने एवं श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करने वाले भगवान सविता है। सूर्य की भी सविता कहते हैं। सूर्य स्वयं प्रकाशमान है तथा दूसरों को प्रकाशित करते हैं। इसी प्रकार सविता देव भी स्वयं प्रकाश पुज हैं तथा सबमें अपने प्रकाश का आलोक वितरित करने वाले हैं। गायत्री उपासक - सविता का साधक भी इन्हीं उदात्त भावनाओं से सम्पन्न बनता चला जाता है।
मन्त्र के तीन चरण हैं। तीनों में दिव्य प्रेरणाएँ भरी पड़ी है। उन्हीं का आह्वान, अवगाहन साधक करता तथा अपनी धारणा शक्ति का विकास करता है। प्रथम चरण है - तत्सवितुर्वरेण्यं। पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, अग्नि में, विद्युत में, सूर्य में सर्वत्र भगवान सविता का तेज समाया हुआ है। अपने भाव नेत्रों से इष्ट की - परमात्मा की झाँकी सविता के प्रकाश पुंज के रूप में सर्वत्र करता हुआ साधक भाव-विभोर हो उठता है। सविता को उज्ज्वल पवित्र ज्योति एक अनिवर्चनीय आनन्द में डुबोये रहती है। इस दिव्यज्योति का गुणगान उपनिषदों में भी मिलता है।
‘न तत्र सूर्योभाति न चन्डतारक, नेमा विद्युतोभान्ति कुतोयमग्निः। तमेव भान्त मनु भाँति सर्वें, तस्यमासा सर्वमिदविभति॥’
अर्थात् - उसकी ऐसी दिव्य ज्योति है कि उसके समक्ष सूर्य, चन्द्र तारे सभी फीके पड़ जाते हैं। बिजली की चमक उसके आगे कुछ नहीं हैं - अग्नि की बात ही क्या है। उसे महाज्योति पुँज से ही प्रकाश लेकर ये सभी अलोकित हो रहे हैं। उसी दिव्य ज्योति का अवगाहन, आराधन सविता साधक करता है। उस वरणीय ज्योति का अधिकारिक धारण करने की कामना करता है।
प्रथम चरण में सविता के रूप में उस परत सत्ता के दिव्य गुणों का वर्णन हुआ है, जिसकी स्तुति कर साधक फूला नहीं समाता स्तुति के उपरान्त प्रार्थना का क्रम है। सविता का प्रकाश स्तुति के उपरान्त साधक कह उठता है - “भर्गो देवस्य धीमहि” अर्थात् जिन दिव्य गुणों का विशेषताओं का हम ध्यान करते हैं वह हमारे अन्दर अवतरित हों। भक्त-भगवान का, साधक साध्य का, उपासक-उपास्य का, जीव-ब्रह्म का तादात्म्य, एकरूपता परस्पर के आदान-प्रदान इष्ट की दिव्यता के अवतरण से ही सम्भव हैं। मंत्र के द्वितीय चरण में यही प्रार्थना की गई है। हे प्रकाश-पुँज पापनाशक, दिव्य, आनन्द-दायक परमात्मा स्वरूप सविता देव आप हमारे अन्दर अवतरित हों। हम आपके दिव्य गुणों को अपने अन्दर धारण करते हैं। आप हमारे भीतर अवस्थित हो जायें जिससे आपके आलोक से हमारा अन्तःकरण जगमगा उठा।
मंत्र के तृतीय चरण में इस तथ्य का स्पष्टीकरण हुआ है कि दैवीय गुणों की शक्तियों को क्यों धारण करना चाहते हैं? “धियो योनः प्रचोदयात्”-- ताकि वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित कर दें। बुद्धि प्रसुप्त तमिस्रा के घोर अन्धकार में सोयी पड़ी है। उसे अपने लक्ष्य का कर्तव्यों का बोध नहीं है। सांसारिक आकर्षणों में इस तरह भटक गयी है कि उसे अपनी गरिमा का भान नहीं है। मंत्रों के तृतीय भाग में यही प्रार्थना की गई है--”हे सविता देव अपने दिव्य गुणों के साथ हमारे अन्तः में अवतरित होकर बुद्धि को अन्धकार की तमिस्रा से प्रकाश की ओर ढकेल दो। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश प्रातःकाल अपने तेजस्वी स्वर्णिम किरणों के साथ आकर सोये हुए प्राणियों को जमा देता और कर्मों में प्रवृत्त करता है। उसी प्रकार सविता देव का प्रकाश भी गायत्री साधक के अन्तःकरण में आकार बुद्धि को प्रकाशित करता है। प्रसुप्ति-जागृति के रूप में परिलक्षित होती है। बुद्धि में प्रज्ञा का अवतरण होता है। असत्य की जड़ता की तमिस्रा छंटती है। सत् का- चैतन्यता का प्रादुर्भाव होता है। प्रज्ञा की और उन्मुख बुद्धि जड़ता के बन्धनों लोभ मोह के आकर्षणों में नहीं बंधती। उसके स्वः की परिधि संकुचित नहीं रहती। विस्तृत होकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में विस्तार ही जीवन का प्रयोजन है। गायत्री महामंत्र की दिव्य प्रेरणाओं को धारण कर साधक इसी लक्ष्य की प्राप्ति की और तत्पर होता है।
महामंत्र में वर्णित आशय से स्पष्ट हैं कि इसे इतना अधिक गौरवास्पद स्थान भारतीय संस्कृति में क्यों मिला हैं। इसमें किसी व वस्तु की कामना नहीं की गई हैं। की भी गई है। तो बुद्धि को निर्मल पवित्र बनाने - सन्मार्ग पर प्रेरित करने की । वह भी अपने लिए मात्र नहीं -समष्टि के लिए प्रार्थना की गई हैं । “यौनः” हम सबकी बुद्धि श्रेष्ठ मार्ग की ओर अग्रसर हो। दृष्टा ऋषि इस तथ्य से परिचित थे कि समष्टि के कल्याण में ही व्यक्ति का भी हित निहित हैं। इसी कारण प्रज्ञा के अवतरण की प्रार्थना भी समष्टि के लिए की गई है।
गायत्री मंत्र का भाव पक्ष इतना उदात्त इतना पवित्र एवं मानव मात्र के लिए कल्याणकारक हैं कि उसके चिन्तन एवं मनन द्वारा अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं। सही रूप से महामंत्र का अवगाहन, आराधन एवं चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
बिजली भौतिक शक्ति हैं उससे कई काम तो होते हैं, पर साथ ही तनिक भी असावधानी से प्राण-घातक संकट भी सामने आ खड़ा होता है। बन्दूक चलाने वाले जानते हैं कि गोली छूटते समय पीछे की ओर झटका भी लगता है। अणु विस्फोट से ऊर्जा तो उत्पन्न होती है पर साथ ही विकरण का सर्वनाश खतरा भी जुड़ा रहता है। आतिशबाजी का खेल खेलने वाले-हिंस्र पशुओं का शिकार खेलने वाले कई बार भारी खतरा उठाते देखे गये हैं। ताँत्रिक साधनाओं के संबंध में भी यही बात है।
ताँत्रिक अघोरी, कापालिक स्तर की आसुरी वाममार्गी साधनाओं में भावनाओं का नहीं क्रियाओं का महत्व माना जाता है। उनमें चरित्र को नहीं दुस्साहस के रूप में विकसित किये जाने वाले मनोबल मात्र का चमत्कार है। मशीनों में भावना नहीं क्रिया होती है। इस क्रिया शक्ति को ही जड़ पदार्थों में सन्निहित कार्यरत पाया जाता है। ताँत्रिक साधनाओं में शरीरगत, मनोगत विशिष्ट शक्तियों को उभारने वाली उत्तेजनाएँ उत्पन्न की जाती हैं और उस उफान का बिना नैतिक अनैतिक विचार किये मनचाहे उपचारों में प्रयोग किया जाता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि तंत्र प्रयोग के सभी प्रहार लक्ष्य आसुरी अनैतिक है। उस स्तर की शक्यों का उपार्जन सृष्टा के कठिन एवं दुरूह कारण हैं साथ ही उस क्षेत्र में प्रवेश करना भी खतरे से खाली नहीं रखा है।
कई बार ताँत्रिक साधक विधि-विधान में तनिक सी गलती हो जाने के कारण पागल तक होते देखे गये हैं। भौतिक शक्तियाँ सभी ऐसी हैं उनमें क्षमा का कोई नियम नहीं है। साँप, सपेरों पर भी हमला बोलता है। दाव लगने पर सरकस के हिंस्र पशु अपने पालनकर्ता की ही बोटी-बोटी नोंच डालते हैं। मशीनों की चपेट में आने पर उनके संचालक भी हाथ-पैर कटाते और जान गँवाते देखे गये हैं। भौतिक क्षेत्र में क्रिया ही प्रधान है। सी गलत प्रयोग का वहाँ हाथों हाथ प्रतिफल मिलता है।
भावना क्षेत्र उसे सर्वथा भिन्न है। उसमें उच्च स्तरीय आस्थाओं, श्रद्धाओं और संवेदनाओं का साम्राज्य है। यहाँ उपचारों का मूल्य कानी-कौड़ी और स्नेह सौजन्य का मूल्य पर्वत के समान है। छोटा बच्चा माता को हर दृष्टि से हैरान ही करता रहता और एक भी शिष्टाचार का पालन नहीं करता, फिर भी ममत्व एवं वात्सल्य की सघनता के कारण माँ बच्चे के बीच जो आत्मीयता पाई जाती है वह देखते ही बनती है। बालक के प्रायः सारे ही व्यवहार अनगढ़ असभ्य जैसे होते हैं फिर भी माता उनके कारण कभी तनिक भी खीजती नहीं पाई जाती। गोदी में चढ़ने के लिए हाथ बढ़ाना- आंख मिलने पर मुस्करा देना भर बालक का ऐसा कृत्य है जिसके बदले माता अपना सब कुछ लुटाने को तैयार रहती है। दक्षिणमार्गी उपासना मार्ग के साधक और साहस में इसी प्रकार के भावभरे आदान-प्रदान चलते हैं। उनमें कर्मकाण्डों का अधूरापन या व्यतिक्रम कोई खास बाधा नहीं डालता। यों उचित तो यही है कि हर वर्ग स्तर के लोग नियम मर्यादाओं के परिपालन में सतर्कता बरतें और सही तरीका ही अपनायें।
वैदिक दक्षिणमार्गी, भक्ति परम्परा, भाव प्रधान होने से उसमें भी यों क्रिया-कृत्यों का कर्मकाण्डों का आश्रय तो लिया जाता है पर इतनी चिन्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती, जितनी कि ताँत्रिक उपक्रमों में तनिक सा व्यतिरेक उत्पन्न होने पर प्राण संकट आ उपस्थित होने की उत्पन्न होती है। यही वैदिकी और ताँत्रिक साधनाओं का अन्तर है। वैदिक देव साधनाओं में मूल व्यतिरेक का दुष्परिणाम अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि जितने सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए उससे कम मिले या विलम्ब लगे। उलटकर हानि होने की तो किसी भी प्रकार आशंका नहीं की जा सकती।
मध्यकाल के अन्धकार युग में जब प्रचलन ताँत्रिक उपचारों का ही हो गया और ‘मद्य माँस न पीने व मुद्रा मंथुन सेवन’ के पंचमकार ही उपासना क्षेत्र के अधिष्ठाता बन गये तब उस व्यापक अनाचार को निरस्त करने के लिए भगवान बुद्ध का अवतरण हुआ और उन्होंने उस अनाचार की धज्जियाँ उड़ाई’। उन्हीं दिनों की बात है कि पुरोहित वर्ग ने अपनी विशिष्टता सिद्ध करने तथा अर्थ उपार्जन का नया स्त्रोत उभारने के लिए उस मान्यता का परिपूर्ण समर्थन किया कि विधि-विधान में राई-रत्ती भूल जाने पर भी देवता रुष्ट हो जाते हैं और फिर कर्ता से उलट कर बदला लेते हैं। यह मान्यता योजना बद्ध ढंग से फैलाई गई। उसके समर्थन में बहुत कुछ कहा एवं लिखा गया।
यह मान्यता ताँत्रिक उपचारों के क्षेत्र तक ही फैलनी और सीमित रहनी चाहिए थी। पर दुर्भाग्यवश उसने वैदिक-दक्षिण मार्गी-दैवी साधना उपासना के क्षेत्र पर आक्रमण बोल दिया। इतना ही नहीं उसे भी बेतरह अपने चंगुल में फँसा लिया। दैनिक उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
यह भयाक्रान्त आशंका ऐसे अवसरों पर स्पष्टता प्रकट होती है जब किसी उपासक को सामान्य कारणों से किसी कठिनाई, असफलता या विपत्ति का सामना करना पड़ता है। उसका शंका शंकित मन सर्वप्रथम इसी बात में उलझना है कि हो न हो यह पूजा उपचार में कोई त्रुटि रहने के कारण उत्पन्न हुआ अनर्थ है। ऐसी दशा में एक ओर कुआँ दूसरी ओर खाई देखकर उपासना के मार्ग पर बढ़ने वाला यही सोचता है कि क्यों इस व्यर्थ झंझट में फँसे। भविष्य के लिए वह इस जंजाल से किसी प्रकार पिण्ड छुड़ाने भर की बात ही सोचता है।
उपरोक्त भ्रान्ति क्रमशः मनों में इतनी गहरी उतरती गई है कि अध्यात्म तत्व ज्ञान से अपरिचित, भावुक भक्तजनों में से कितने ही जीवनक्रमों में कोई कठिनाई या व्यवधान आते ही सोचने लगते हैं कि उनकी पूजा विधि या तो गलत है या फिर उसमें भूल रह गई हैं। इसी कारण उन्हें कठिनाई या असफलता का सामना करना पड़ रहा है।
भगवान का नाम, उपासना का उपक्रम एक ही परिणाम उत्पन्न कर सकता है और वह है काषाय−कल्मषों के कारण उत्पन्न होने वालों से परिणाम उलटा उपद्रव खड़ा करने की उसकी प्रकृति ही नहीं है। उसके कारण किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होने की आशंका तो करनी ही नहीं चाहिए। माता कभी अहित न तो कर सकती है न वैसा सोच ही सकती है। धरती माता, गौ माता, प्रकृति माता की सहज प्रकृति स्नेह करने, सहायता करने एवं सुविधा साधन उपलब्ध कराने ही है। वे छेड़खानी करने पर अधिक से अधिक इतना ही कर सकती हैं कि सहयोग से हाथ खींच लें। पतन पराभव के षड़यन्त्र अपने ही अंचल की छाया में पलने वालों के विरुद्ध वे कर ही नहीं सकतीं। साधना उपासना की भक्ति माता भी ऐसी ही हैं। उसका आश्रय लेने पर कष्ट घटते हैं, बढ़ते नहीं।
अचिन्त्य चिन्तन से अपना ही अहित होता है। क्रोध, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, आशंका जैसे मनोविकार धारण कर्ता ही सर्वनाश करते हैं। जिनके विरुद्ध दुर्भाव रखे जाते हैं उनका अहित तो कदाचित ही स्वल्प मात्रा में हो पाता है। आपत्तियों का कारण आमतौर से मनुष्य के अब के या पिछले विभ्रम, दोष दुर्गुण या कुकृत्य ही होते हैं। दण्ड का तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य भविष्य में अधिक सावधानी बरतें और अधिक सही सभ्य रहें। प्रकृति प्रकोप से भी कोई प्रतिकूलताएँ भुगतनी पड़ें तो उनका तात्पर्य भी आग में पकाने, खराद पर चढ़ाकर चमकीला बनाने धार रखकर पैना करने जैसा ही होता है। प्रखर और प्रतिभावान बनने वालों में से प्रत्येक को प्रतिकूलताओं से जूझकर ही अपने को अधिक समर्थ सक्रिय बनने का लाभ उपलब्ध हुआ है। ऐसे ही अनेक कारण दंडात्मक सुधारात्मक प्रस्तुत कठिनाइयों के हो सकते हैं। उन सबका विचार किये बिना समस्त अज्ञात कठिनाइयों को दोष अपनी छुट-पुट-सी उपासना के मत्थे मढ़ देना सर्वथा अनुचित है।
लोगों में एक बहुत बुरी आदत यह पाई जाती है कि वे अपनी कठिनाइयों का कारण किसी दूसरे को कसूर सोचकर सस्ते में अपना मन हलका करते रहते हैं। अमुक ने जादू टोना करके हमें या हमारे परिवार को हैरानी में डाल दिया है, ऐसा सोचते रहने वाले और निर्दोष पड़ौसियों पर अकारण ही दुर्भाव थोपते रहने वालों की कमी नहीं। भूत पलीतों और ग्रह-नक्षत्रों पर ऐसे ही इल्जाम लगाने वालों की मूर्ख मण्डलों के सदस्य लाखों नहीं करोड़ों होंगे।
अवाँछनीय दोषारोपण से अपनी आत्मा कलुषित होती हैं, आत्मा निरीक्षण और आत्म-सुधार का अवसर हाथ से निकलता है, प्रतिरोधों से जूझने की सामर्थ्य कुँठित होती है। जब देवता या भगवान ही विपत्ति बरसाने का कारण हैं तो उनसे जूझने की प्रतिकार चेतना कोई किस प्रकार उभारे। ऐसी मनःस्थिति में हताश होकर आंसू बहाते रहने या जिस पर दोष थोपा गया है उसे कोसते रहने के अतिरिक्त और कोई चारा ही शेष नहीं रह जाता। यह मनःस्थिति मनुष्य का भविष्य अन्धकारमय बनाने वाली ही सिद्ध हो सकती है।
यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि उपासना की सफलता में कर्मकाण्ड का महत्व दस प्रतिशत और सघन श्रद्धा की भूमिका नब्बे प्रतिशत होती है। यदि श्रद्धा डगमगाने लगे तो समझना चाहिए कि कर्मकाण्ड की लकीर पीटते रहने से कोई लाभ नहीं। आगत कठिनाइयों का कारण यदि उपासना को सोचा माना जाने लगा तो समझना चाहिए अब यह श्रद्धा के पैर जमने जैसी कोई सम्भावना रह नहीं गई। जो तन्त्र विनय वंदन का प्रतिफल अनिष्ट उत्पन्न कर सकता है वह निश्चय ही निकृष्ट स्तर का घिनौना होना चाहिए। उसका आश्रय लेने पर आयेदिन ऐसे ही उपद्रव खड़े होने का भय बना रहेगा। प्रत्यक्ष है कि भय, अनिश्चितता और दुष्टता की आशंका मन में उठने लगे तो फिर उस केन्द्र पर श्रद्धा विश्वास का भक्ति भावना का स्नेह समर्पण का कोई आधार बन ही नहीं सकता। यदि आस्था सुदृढ़ न हुई तो फिर कोई श्रेष्ठ कर्मकाण्डों वाली उपासना भी किसी के लिए कभी भी परिणाम में फलप्रद नहीं हो सकती। उसमें लगाया हुआ श्रम निष्फल ही नहीं जायगा वरन् असफलताजन्य आक्रोश के कारण नास्तिकता में परिणित होता चला जाएगा। ऐसे लोगों से तो वे लोग कहीं अच्छे जो उपासना करते ही नहीं। उन्हें कम से कम असन्तोष, आक्रोश एवं नास्तिकता के गर्त में जा गिरने का अनर्थ तो नहीं अपनाना पड़ता। इस प्रकार वे नफा भले ही न कमायें, अकारण घाटा देने का संकट नहीं सहते।
किसी की उपासना करनी हो तो उसके प्रयोजन परिणाम की आशा इतनी ही करनी चाहिए कि इससे अपने आत्म परिष्कार में सहायता मिलेगी। आगत संकट इस किलो भारी हो तो उपासना के आधार पर उपलब्ध हुए मनोबल के कारण आधा तिहाई ही रह जायगा।
प्रतिकूलता और उपासना की संगति बिठाने का तत्वतः आवश्यकता है नहीं, क्योंकि दोनों के क्षेत्र सर्वथा भिन्न हैं। प्रतिकूलता आमतौर से व्यक्ति की कुशलता पर निर्भर रहती है। जबकि उपासना से अन्तःक्षेत्र की सत्प्रवृत्तियाँ को उभारने और व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता के समावेश का अवसर मिलता है। कुशलता प्रतिभा पर साँसारिक सफलता सुविधा की न्यूनाधिकता निर्भर है। जबकि उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है। ऐसी दशा में एक-दूसरे की जोड़ने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी प्रचलित भ्रम मान्यताओं के अनुरूप यदि उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए। सफलताओं का श्रेय उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
आदमी-आराध्य, सेवा-साधना है आज मेरी। साधना का प्राण जन-जन की अकथ पीड़ा घनेरी।
नयन का निर्माल्य ही अन गंग-नीर पवित्र करता दूसरे की परि भरती श्वाँस में अर्जित प्रखरता।
आचमन आत्मीयता का, प्यार का चन्दन सुहाता। हर दुःखी जन के लिए स्नेह अन्तर का लुटाता।
आज माला पर दुःखों की भावना के साथ फेरी। आदमी-आराध्य, सेवा-साधना है आज मेरी।
मखमली आशीष में गुरु के-मिला लिपटा खजाना। मनुज-जीवन की सफलता-यज्ञमय जीवन बिताना।
बस तभी से जल रहा जीवन हिमानी शीत हरने। कर्म की आहुति लगी है दूसरों के घर बिखरने॥
प्रज्वलित है प्राण-तन तो अन्त में है भस्म-ढेरी। आदमी-आराध्य, सेवा-साधना है आज मेरी।
ध्यान में साकार हो उठती सभी की वेदनाएँ। और उनको ही मिटाने उमंग पड़ती प्रार्थनाएँ।
माँ! मिटा दो विश्व से कुण्ठा, निराशा और पीड़ा। विश्वमानव हो सुखी, जीवन बने शुभ रास क्रीड़ा।
शक्ति दो माता! लगाओ मत दया में आज देरी। आदमी-आराध्य, सेवा-साधना है आज मेरी।
*समाप्त*