“महत्वाकांक्षाओं का लक्ष्य यदि आदर्शवादी वरिष्ठता को रखा जा सके तो ही उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। आरम्भ से ही आत्म सन्तोष मिलने लगता है। इस प्रयास में सत्प्रवृत्तियाँ उभरती और उपयोगी आदतें परिपक्व होती है। व्यक्तित्व का परिष्कार इस मार्ग पर चलने वालों को दैवी वरदान की तरह मिलता है। जिसकी कीमत पर जो महत्वपूर्ण है, ऐसा कुछ भी आसानी से खरीदा जा सकें।
आदर्शवादी महत्वाकाँक्षा अपने लिये जितनी लाभदायक होती है उससे अधिक जन साधारण के लिये उपयोगी सिद्ध होती है। महामानवों को अनिवार्यतः लोकसेवा में प्रवृत्त होना होता है अतएव उनके प्रयास परिश्रम से अनेकों का भला होना और बदले में श्रद्ध भरा सहयोग मिलना स्वाभाविक है।
भौतिक महत्वाकांक्षाएं पानी के बबूले की तरह अपना चमत्कार दिखाती और थोड़ी-सी स्वार्थ सिद्धि का जायका चखाती विस्मृति के गर्त में चली जाती है जबकि आदर्शवादिता समुद्र में खड़े प्रकाश स्तम्भों की तरह अपना गर्वोन्नत मस्तक उठाये खड़ी रहती है। उस ऊंचाई और रोशनी से नाविक अपनी प्राण रक्षा करते और दर्शन सराहते हुये उधर से निकलते हैं।
महत्वाकांक्षाएं श्रेयस्कर भी है और हेय भी। यदि वे क्षुद्र प्रयोजनों में लगे तो हेय और यदि सत्प्रयोजनों की दिशा में चल पड़ें तो समझना चाहिए कि उनसे अधिक श्रेष्ठ उपलब्धि और कोई हो ही नहीं सकती।
सत्य शिव के साथ परमात्मा की तीसरी विशेषता बतायी गई है सुंदरम् की। वह सुन्दरता ही उसे प्रिय है। उसका अंशी होने के नाते जीवात्मा भी हर सुंदर वस्तु को देखकर आकृष्ट होती है। प्रकृति के मनोरम दृश्य, हरियाली, पुष्पों से लदे उद्यान को देखकर किसका मन नहीं पुलकित होता है। सुन्दर पुरुष, स्त्रियों में भी अपना एक विशेष आकर्षण होता है जिनकी और हर कोई सहज ही आकर्षित हो जाता है। सौन्दर्य की ओर आकर्षण अन्तरतम की अभिव्यक्ति है। जो शाश्वत सौन्दर्य की खोज सर्वत्र करती है। तथा उसे प्राप्त करने की सतत् प्रेरणा देती है।
शास्त्रों में वर्णन है कि बाह्य स्वरूप की दृष्टि से प्रतीत होने वाला संसार मिथ्या है। अर्थात्् जिन बाहरी वस्तुओं में सौन्दर्य दिखायी पड़ता है यह एक भ्रम मात्र है। फिर ऐसा बोध क्यों होता है ? इसका उत्तर ऋषि देते हैं कि अपना आपा ही आकर्षित होकर विविध वस्तुओं एवं संसार को सुन्दर बनाता है सौन्दर्य का दिग्दर्शन इस आरोपण की प्रतिक्रिया मात्र है। तथ्य तो यह है कि शाश्वत सौन्दर्य का केन्द्र बिन्दु अंतरात्मा है। सौन्दर्य की धाराएं यही से प्रस्फुटित होती तथा गोमुख से निकलने वाली गंगा की भाँति समस्त जड़ चेतन में सौन्दर्य का अभिसिंचन करती है। यह मूली स्त्रोत अपने प्रवाह को रोक दे, तो सर्वत्र कुरूपता ही दिखायी पड़ने लगे।
प्रतिच्छाया पड़ने मात्र से संसार एवं सम्बन्धित वस्तुएं इतनी सुन्दर, इतनी अनुपम प्रतीत हो सकती है। तो उसका मूल स्वरूप कितना विलक्षण अनिवर्चनीय हो सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कल कल करती तीव्र वेग से बहती गंगा को देखकर मन को तृप्ति एवं शान्ति मिलती है। गंगा इतनी शान्ति एवं तृप्ति दायक हो सकती है तो उसका मूल स्त्रोत में सुख का दृश्य कितना दिव्य अनुपम एवं मनोरम होगा इसकी तो मात्र कल्पना की जा सकती है अथवा वे अनुभव कर सकते हैं जो गौमुख के निकट जाकर दिव्य दर्शन का लाभ उठा चुके हैं।
सौन्दर्य की टोर आकर्षण स्वाभाविक है, पर देखा यह जाता है कि वस्तुओं एवं व्यक्तियों के प्रति यह आकर्षण कुछ ही समय तक रहता है और एक अवधि के बाद विकर्षण में बदल जाता है और फिर मन के स्मरण करने के लिए नये स्रोतों की खोज करता है। व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति आकर्षण समय-समय पर बदलता रहता है। यह इस बात का परिचायक है जो शाश्वत सौन्दर्य की निरन्तर खोज करती रहती है। वस्तुओं एवं व्यक्तियों के क्षणिक आकर्षणों को ही वास्तविक मानकर आनन्द प्राप्त करना चाहती है किन्तु उसके इस प्रयास में निराशा एवं असफलता ही हाथ लगती है।
सौन्दर्य का वास्तविक एवं शाश्वत स्त्रोत अपनी आत्मा है जिस दिन इस तथ्य का बोध हो जाता है उस दिन से बाह्य आकर्षण निस्सार जान पड़ते हैं। आत्म सत्ता के प्रकाश से ही वे भी सुन्दर प्रतीत हो रहे थे, यह ज्ञान होते ही दृष्टि बहिर्मुखी यहीं रहती अन्तर्मुखी बन जाती है। आत्मदर्शन के लिए यात्रा अंतर्जगत से आरम्भ होती है ।इस अभिनव यात्रा में एक से बढ़कर एक मनोरम दृश्य अंतर्दृष्टि से देखने को मिलते हैं जिनकी तुलना में बाह्य सौन्दर्य फीका एवं अवास्तविक जान पड़ता है। इस अविराम अंतर्यात्रा की परिणति दिव्य दर्शन के रूप में होती है। आत्म-सत्ता के दर्शन से ही शाश्वत सौन्दर्य का बोध होता है। जिसकी रसानुभूति दिव्य, अनिवर्चनीय एवं इतनी सुखद होती है कि उसके सामने संसार के समस्त सुख उथले प्रतीत होते हैं।
वह समय अब पीछे छूटता जा रहा है जब यह कहा जाता था कि चेतना जड़ की उत्पत्ति मात्र है-आत्मा का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। संसार के मूर्धन्य दार्शनिकों एवं मनीषियों ने यह स्वीकार किया है कि मनुष्य मात्र जड़ परमाणुओं का समुच्चय नहीं है उसके भीतर ऐसी कोई सत्ता काम कर रही है जो स्वतन्त्र एवं अविनाश है गहराई से अपनी ही सत्ता का विश्लेषण एवं विचार करने पर उपरोक्त तथ्य की पुष्टि हो जाती है।
अपरिवर्तनीय, अविनाशी, शाश्वत शरीर से परे आत्म-सत्ता का परिचय मनुष्य जीवन के अध्ययन से मिलता है। हर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि अमुक समय मेरा बचपन था जब मैं बाल सुलभ चेष्टाओं में निरत रहता था। किशोरावस्था में प्रविष्ट करते ही विद्याध्ययन में अभिरुचि जगी। कुछ करने एवं विशिष्ट बनने की आकांक्षा मन में उमड़ती-घुमड़ती रहती थी। युवावस्था आई विवाह हुआ। दाम्पत्ति जीवन में बँधे। पति-पत्नी के बीच स्नेह का आदान-प्रदान चला। कुछ समय बाद प्रौढ़ावस्था आयी और अन्तः जीवन के उत्तरार्ध वृद्धावस्था में प्रवेश करना पड़ा। बचपन से लेकर वृद्धावस्था के अविराम क्रम की अनुभूति प्रत्येक व्यक्ति करता रहता है। शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन के इस क्रम में एक अपरिवर्तनीय तत्व भी कार्य करता है। अमुक समय बचपन था अमुक युवाकाल तथा अमुक प्रौढ़ावस्था। विश्लेषण करने पर यह बात स्पष्ट होती है कि हर अवस्थाओं की अनुभूति करने वाली कोई सत्ता है जो सभी शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों एवं सम्बन्धित घटनाक्रमों को देखती रहती है किन्तु स्वयं उनसे अप्रभावित रहती है। परिवर्तनों, घटनाक्रमों, एवं दृश्यों के इस दृष्टा को ही आत्मा कहा गया है, जो समस्त जीवन प्रवाह का आदिकारण एवं प्रणेता है। जिसके शरीर से विलग होते ही सारी शरीर गत हलचलें समाप्त हो जाती है और निष्प्राण भौतिक शरीर ही अवशेष बचता है। जो कभी आत्म-सत्ता की उपस्थिति में इतना अधिक कीमती एवं उपयोगी था उसे शीघ्रातिशीघ्र सड़न के डर से जलाकर छुट्टी पायी जाती है।
अपनों का अपनापन भी उस दृष्टा के बने रहने पर ही रहता है। जान से भी प्यारे-आंखों के दुलारे बच्चों, युवकों अथवा वृद्धों के प्रति मोह तभी तक रहता है जब तक आत्मा की चैतन्यता शरीर में विद्यमान है। वस्तुतः जिस शरीर अथवा जिस व्यक्ति के प्रति हमारा स्नेह झलकता है वह भी प्रकारान्तर से आत्म-सत्ता के प्रति ही होता है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण इस तथ्य को अधिकाँश व्यक्ति नहीं समझ पाते और यह आत्मानुभाव व्यक्ति के प्रति मोह के रूप में प्रकट होता है। यह सत्य इस बात से भी प्रकट होता है कि शरीक की आकृति ठीक वही रहती है किन्तु न तो कोई उसे संजोकर रहता है और न ही निष्प्राण शरीर के प्रति राई-रत्ती भर आसक्ति दिखाई पड़ती है। विशेषता शरीर की रही होती तो वह बाद में भी उसकी तरह बनी रहती किन्तु ऐसा कहीं नहीं देखा जाता। अस्तु महत्व एवं विशेषता आत्म-सत्ता की ही प्रभावित होती है।
स्वयं निर्लिप्त होते हुए भी वह जीवन में गति उभरता मन एवं बुद्धि को अलोकित करता, प्राणों से अनुप्राणित करता ज्ञानेन्द्रियों में संवेदन भरता, कठपुतली की भाँति मनुष्य से नृत्य कराता रहता है। जीवन उसी की अभिव्यक्ति है। बचपन उसका एक चरण है-यौवन दूसरा तथा वृद्धावस्था तीसरा। किन्तु वह स्वयं इन तीनों अवस्थाओं की परिधि से परे है।
आद्य शंकराचार्य ने इस अनुभूति को इस प्रकार व्यक्त किया है। वर्तमान को मैं जानता हूँ-भूत को मैंने जाना है और भविष्य को मैं जानूंगा। अनुभव की इस परम्परा में ज्ञातव्य वस्तु का ही परिवर्तन दिखायी पड़ता है-ज्ञाता का स्वरूप कभी परिवर्तित नहीं होता-वह सदा अपने स्वरूप में यथावत् बना रहता है।” इस तथ्य को अन्यत्र प्रतिपादित करते हुए शंकराचार्य लिखते हैं, कि-”हर कोई आत्मा के अस्तित्व में जाने अनजाने विश्वास करता है ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपनी सत्ता में अविश्वास व्यक्त करे और वह कहे “मैं नहीं हूँ”। मैं हूँ यह बोध हर काल हर अवस्था में बना रहता है। अतः इस चिरंतन बोध का बना रहना आत्म-सत्ता के अस्तित्व का स्वतः प्रमाण है।
प्रसिद्ध दार्शनिक रेने रिकार्ड का मत है कि “मान भी ले कि आत्मा नहीं है तो भी यह तो मानना ही होगा कि मैं सन्देह करता हूँ कि आत्मा है या नहीं । यदि यह स्वीकार कर लिया जाये कि मैं संदेह करता हूँ तो विवश होकर यह मानना होगा कि मैं उक्त सन्देह के प्रति विचार करता हूँ। अस्तु जो विचार करेगा वही सन्देह कर सकेगा, कि मैं हूँ या नहीं हूँ। अगर मैं विचार करता हूँ तो यह निश्चित हो गया कि मैं हूँ।
पाश्चात्य दर्शन शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान वर्कले का कहना है कि “रंग की अपने आज में कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।-देखने वाला हो तभी रंग की सत्ता है। शब्द की सत्ता भी सुनने वाला हो तभी है इसी प्रकार रंग रस, गंध की भी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है इनको अनुभव करने वाला हो तो ही इनकी सत्ता है और अनुभूति की यह विशेषताएं, ज्ञानेन्द्रियों की भी अपनी मौलिक नहीं है। इन्हें उपरोक्त क्षमताएं आत्म-सत्ता द्वारा मिली हुई है। इस तथ्य को और भी स्पष्ट रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है। मरणोपरांत भी शरीर एवं सम्बन्धित ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेंद्रियां का आकार प्रकार उसी तरह बना रहता है। हाथ, पैर, मस्तिष्क, आँख, कान, नेत्र सभी विद्यमान रहते हैं। हाथ, पैर, मस्तिष्क आँख, कान, नेत्र सभी विद्यमान रहते हैं। किन्तु न तो हाथ हिलते हैं और न ही पैर जो कभी बड़ा से बड़ा काम देखते-देखते कर डालते थे-वे ही अपने को हिला डुला सकने में भी असमर्थ सिद्ध होते हैं। नेत्र के सभी अवयव विद्यमान रहते हैं किन्तु उनमें न तो प्रकार होता है और न ही देखने की क्षमता। कान और नाम यथावत होते हुए भी कहाँ वे ध्वनियों को सुन और गंध को सूंघ पाते हैं ? मस्तिष्क जो कभी विलक्षण प्रतिभा का केन्द्र था-कठिन से कठिन गुत्थियों को हल करने में सक्षम था, वह भी निश्चेष्ट पड़ा रहता है। उसके सभी कलपुर्जे ठीक होते हुए भी न तो सोच पता है और नहीं उसकी प्रखरता रहती है।
कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के सभी अवयव ठीक रहते हुए भी शरीर से चेतना के निकलते ही अपनी क्षमताओं एवं विशेषताओं को गंवा बैठना, इस बात का प्रमाण है कि उन सबमें आत्म-सत्ता का प्रकाश ही प्रकाशित होकर विभिन्न प्रकार की हलचलों के लिए प्रेरणा एवं शक्ति दे रहा था। उसके अपनी विभूतियों को-प्रकाश शक्ति एवं प्रेरणाओं को समेटते ही सभी इन्द्रियाँ, निष्प्राण हो जाती है।
अस्तु प्रत्यक्ष नेत्रों से दिखायी न पड़ना ही आत्म-सत्ता के न होने का प्रमाण नहीं है। विविध प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक हलचलों एवं विशेषताओं में अदृश्य प्रेरणाएँ आत्मा की ही होती है। अभिव्यक्ति तो जड़ पदार्थों की होती है-चेतना की नहीं। आत्मा अस्तित्वपूर्ण होते हुए भी अभिव्यक्ति से परे है। उसकी अनुभूति हो सकती है। अनुभूति अपनी सत्ता की अनुभूति होना ही आत्मा का सबसे बड़ा प्रमाण है। शरीर में रहते हुए भी वह शरीर से परे है। इन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों में शक्ति एवं प्रकाश भरते हुए भी उनसे परे है मन द्वारा शरीर एवं बुद्धि को संचालन करते हुए भी वह मन से सर्वथा अलग है।
उस चिरंतन, शाश्वत अविनाशी आत्म-सत्ता के अस्तित्व को न मानने का कोई विवेकपूर्ण कारण नजर नहीं आता “चेतना जड़ की उत्पत्ति है तथा जड़ परमाणुओं के नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाता है आत्मा कर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।” ये सभी मान्यताएं दार्शनिक एवं वैचारिक दृष्टि से विवेकसंगत नहीं है। उचित यही है कि निष्पक्ष निर्णय वृद्धि को आधार बनाकर आस्तिकता सम्बन्धी भावनाओं पर किया जाये एवं हठधर्मिता का खण्डन किया जाये।
प्रत्यक्षवादियों की मान्यता है कि जिन चीजों का अस्तित्व है वे प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती है। यही स्थूल कसौटी वे ईश्वर के लिए भी प्रयुक्त करते हैं तथा उस पर खरा नहीं उतरने पर वे उस परम सत्ता को मानने से इन्कार करते हैं। गहराई से विचार करने पर ज्ञात होता है कि ईश्वरीय सत्ता का परिचय पाने के लिए बनाया गया यह माप दण्ड कितना उथला, अविवेकपूर्ण एवं अवैज्ञानिक है।
हर अस्तित्ववान चीज के मापदण्ड के लिए एक सुनिश्चित पैमाना होता है। यही पैमाने द्वारा ही दृश्य अथवा अदृश्य वस्तुओं का यथार्थ परिचय पा सकना सम्भव है। यदि निर्धारित पैमाना ही गलत सिद्ध हुआ तो भला सम्बन्धित वस्तु का सही विश्लेषण कर सकना कैसे सम्भव है। भार मालूम करने के लिए विभिन्न प्रकार के बाट प्रयोग किए जाते हैं। वस्तुओं की लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई गहराई मापने के लिए गज, फीट, मीटर जैसे मापदण्ड प्रयुक्त होते हैं। कोई वस्तु कितना स्थान घेरती है, यह उसका आयतन माना जाता है। वातावरण की सर्दी-गर्मी मनुष्य के शरीर का तापक्रम बैरोमीटर, थर्मामीटर जैसे यन्त्रों से ज्ञात होते हैं। समय-काल समापन के लिए दो विधियाँ प्रचलित है, एक पुरातन, दूसरी नवीन। पुरातन प्रक्रिया सूर्य की गति पर आधारित है जबकि नवीन मनुष्य कृत घड़ियों पर। गति मापक यन्त्रों द्वारा वस्तुओं की गति मालूम की जाती है। विद्युत चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ध्वनि जैसी शक्ति को नापने के लिए विभिन्न प्रकार के यन्त्र प्रचलित है।
भौतिक वस्तुओं एवं शक्तियों का परिचय ठीक तरह प्राप्त कर सकना तभी सम्भव है जबकि निश्चित वस्तु अथवा शक्ति के लिए निर्धारित पैमाने का प्रयोग किया जाये। मापदण्ड के लिए चुना गया आधार ही गलत हो तो सम्बन्धित वस्तु की सही जानकारी नहीं प्राप्त की जा सकती। भार मापक यन्त्रों द्वारा वस्तुओं की लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई अथवा गहराई मालूम करने के प्रयास से असफलता एवं निराशा ही हाथ लगेगी। लम्बाई, चौड़ाई मापने वाले मापक से भला वस्तुओं का भार कैसे निकाला जा सकता है ? थर्मामीटर से किसी चीज की गति मालूम की जाये तो इस प्रयास को उपहासास्पद ही कहा जायेगा। अभिप्राय यह है कि निश्चित जानकारी के लिए निर्धारित पैमाने का प्रयोग करने पर अभीष्ट प्रयोजन में सफलता मिलती है।
थोड़ा और आगे बढ़े तो ज्ञानेन्द्रियों का क्षेत्र सामने आता है जहाँ कि भौतिक यन्त्रों की पहुँच नहीं हैं रूप रगड़ स्पर्श तन्मात्रा की अनुभूतियाँ सचेतन इन्द्रियों को होती है। आंखें दृश्य देखती है। कान ध्वनियों को सुनते हैं। ज्ञानेन्द्रियों अच्छे-बुरे गन्ध की अनुभूति कराती है। जिह्वा स्वाद का बोध कराती है। त्वचा, शीत एवं गर्मी का अनुभव करती है। ज्ञानेन्द्रियों से होने वाली अनुभूतियां किसी यन्त्र के माध्यम से प्राप्त करना चाहें तो ऐसा सम्भव नहीं है। इस प्रकार का कोई भी वैज्ञानिक उपकरण अब तक नहीं बन सका है जिनसे ज्ञानेन्द्रियों का काम लिया जा सके। इन इन्द्रियों की भी भौतिक उपकरणों की भाँति सीमा एवं मर्यादा है। कान सुनने की भूमिका निभा सकते है--देखने अथवा बोलने की नहीं। नेत्र दृश्यों को देख सकते है--सुनने अथवा सूँघने की नहीं। घ्राणेंद्रिय द्वारा गंध के अतिरिक्त देखने अथवा बोलने के कार्य में असफलता ही हाथ लगेगी। अर्थात्् शरीर की ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी निर्धारित सीमा में निर्धारित भूमिका निभा पाने में ही सक्षम है।
थोड़ा और भी गहराई में चले तो सूक्ष्म जगत का क्षेत्र सामने आता है। विचारणा एवं भावना का। इनके स्वरूप एवं सामर्थ्य की जानकारी पूर्णतया प्राप्त कर सकना वैज्ञानिकों के लिए अभी सम्भव न हो सका है।
मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की नवीनतम जानकारियाँ भी अपनी बाल्यावस्था में है। मात्र इतना जाना जा सका है कि भौतिक शक्तियों की भाँति विचार एवं भाव भी एक शक्ति है जो मनुष्य को असामान्य रूप से प्रभावित करती है। तथ्य से परिचित होते हुए भी वैचारिक क्षमता एवं भाव शक्ति को नापने के लिए अब तक कोई यन्त्र आविष्कृत नहीं हो सका है। एक ही वातावरण में पले एवं एक ही माता-पिता के सन्तान होते हुए भी एक बच्चा मेधावी, सुसंस्कृत एवं महान बन जाता है। जबकि दूसरा दुष्ट प्रवृत्तियों में निरत होकर परिवार एवं समाज के लिए भारभूत सिद्ध होता है। मनोविज्ञान मूलभूत प्रवृत्तियों की प्रेरणा को कारण मानकर चुप हो जाता है। भली-बुरी प्रवृत्तियाँ क्यों उत्पन्न होती है ? एक व्यक्ति के मन में सद्मार्ग पर पर चलने की तथा दूसरे को दुष्कर्म करने की प्रेरणा क्यों उठती है, इसका रहस्योद्घाटन अभी भी सम्भव नहीं हो सका है। उनका स्वरूप सामर्थ्य की जानकारी के प्राप्त करने के लिए यदि वैज्ञानिक यंत्रों का सहारा लिया जाये तो यह कार्य असम्भव ही होगा। मन की सूक्ष्म एवं सूक्ष्मतम परतों की उधेड़-बुन करने, विचारों एवं भावनाओं के स्तर स्वरूप एवं सामर्थ्य समझने के लिए मनोविज्ञान को अभी और भी गहराई में प्रविष्ट करना होगा।
दृश्य एवं मनोजगत का परिचय प्राप्त करने के लिए निर्धारित पैमाना एक निश्चित सीमा मर्यादा के भीतर रहते हुए सीमित जानकारी देने के का प्रयोजन पूरा करना है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि बोध का क्षेत्र जितना इन्द्रियों के पकड़ में आता है वहीं तक सीमित है। ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित विषयों का भी एक बड़ा भाग जानकारी से अछूता रह जाता है । उदाहरणार्थ देखने-सुनने एवं अनुभव करने की एक निश्चित सीमा है। कान 10 से 20 हजार हर्ट्ज (ध्वनि तरंग नापने की ईकाई) के बीच की ध्वनि तरंगों को ही सुन पाते हैं। इससे ऊपर अथवा कम डेसीबल की ध्वनियाँ इन कानों से नहीं सुनी जा सकती है। जबकि हर क्षण ऐसी तीव्र ध्वनियां उठती है। जिनको हमारे कान नहीं पकड़ पाते। जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं वह स्वयं 29 किलो मोटर प्रति सेकेंड की गति से भयंकर गर्जन-तर्जन करती हुई सूर्य की परिक्रमा के लिए दौड़ी चली जा रही है, पर उसकी गर्जना को हम कहाँ सुन पाते हैं। ऐसी अनेकों तीव्र एवं मन्द आवाज की ध्वनियाँ निरन्तर प्रवाहित हो रही है जिनकी कोई जानकारी हमें नहीं मिल पाती। यही बात दीखने गंध फैलाने वाली वस्तुओं के संदर्भ में लागू होती है। अर्थात्् दृश्य जगत एवं सम्बन्धित पदार्थों की सापेक्ष जानकारी मानव द्वारा निर्धारित पैमाने द्वारा प्राप्त हो पाती हैं। ये पैमाने भी सीमा का अतिक्रमण करने पर अपनी असमर्थ व्यक्त करने लगते हैं।
परमात्मा को रंग रूप, स्पर्श आकार से परे माना गया है। अध्यात्म का मूल प्रतिपादन है। कि वह कर्मेंद्रियों ज्ञानेन्द्रियों की ही नहीं बुद्धि की भी पकड़ सीमा से परे है। गीता कहती है।--
इन्द्रियाणि परामण्य्राहुरिन्द्रिभ्य पर मनः! मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्ध परतस्तु सः!!
इन्द्रियाँ शरीर से परे, इन्द्रियों से परे मन, मन से परे बुद्धि है और वह परमात्मा बुद्धि से भी परे हैं।
दृश्य एवं अदृश्य का बोध कराने वाले हमारे निर्धारित पैमाने एवं ज्ञानेन्द्रियाँ जब वस्तु जगत की ही पूरी जानकारी नहीं दे पाते तो भला उस परम सत्ता की जानकारी किस प्रकार दे सकते हैं ऋषियों ने पवित्र अन्तःकरण को ईश्वरीय अनुभूति का आधार माना है और यह कहा है कि उस विराट् सत्ता का अंश जीवा अनुभूति कर सकना हर किसी के लिए सम्भव है। अन्तः की निर्मलता, पवित्रता एवं समानता ही एकमात्र एवं अनुभूति सम्भव है।
“वास्तविक धर्म यह है कि जिन बातों को मनुष्य अपने लिए अच्छा नहीं समझते दूसरों के साथ भी वैसा कदापि न करें।” --महाभारत
विकास इस सृष्टि की सुनियोजित व्यवस्था है। पदार्थ और प्राणी अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप अपने-अपने ढंग से विकास कर रहे हैं। सृष्टा एक से बहुत हुआ यही उसका विकास विस्तार है। सृष्टि के आरंभ में थोड़ा-सा घनीभूत पदार्थ था। उसी में अन्तः स्फुरणा हुई और फट पड़ा। फटने पर अनेकों निहारिकाएं और ग्रह उपग्रह जैसी इकाइयाँ बनी। बनने भर से काम नहीं चुका वे सभी घटक गतिशील हो गए। गतिशील क्या ? कि प्रयोजन के लिए ? किस दिशा में ?इनका समन्वित उत्तर एक ही है, विकास विस्तार के लिए। सभी ग्रह पिण्ड यहाँ तक कि समूचा ब्रह्मांड आगे बढ़ने के लिए द्रुतगति से आगे, और आगे, अधिक आगे अनवरत क्रम में बढ़ता ही चला जा रहा है। यह बात सृष्टि संरचना से सम्बन्धित है कि गति अन्ततः चक्र के रूप में परिवर्तित हो जाती है।
सृष्टा की चेतना का विकास भी इसी क्रम से हो रहा है। वह स्वयं सीमित रहने में सन्तुष्ट न रह सका और असीम होने के लिए मचल पड़ा। विश्व चेतना ने अपने को अनेक प्राणि घटकों में विभाजित किया और संख्या विस्तार देखते-देखते असीम हो गया। पर इतने से भी बात बनी नहीं। इन प्रत्येक प्राण घटकों में प्राणियों ने अपने उद्गम केन्द्र की मूलभूत आकाँक्षा को अपनाया और वे भी विकास क्रम को अपनाते हुए एक सुनियोजित योजना के अंग बन गए। जो कार्य प्राणी कर रहे हैं। वही पदार्थ सम्पदा में भी हो रहा है। पृथ्वी अपने आरम्भ काल में हर दृष्टि से अनगढ़, अविकसित, अस्थिर, मन्दगति और वैभवों हलचलों से रहित थी। अब उसकी वह स्थिति नहीं रही। आज की और आदिम पृथ्वी के स्तर में आकाश पाताल जितना अन्तर है। यह बात आदिम प्राणी और आज के प्राणी में देखी जा सकती है। स्वयं मनुष्य का आदिम काल कैसा अनगढ़ था और वह आज किस स्तर तक आ पहुँचा इसे देखते हुए विकास क्रम की अदम्य अभिलाषा एवं प्रक्रिया का दर्शन भली-भाँति किया जा सकता है।
न केवल प्राणि और पदार्थ के मूल स्वरूप में वरन् उनसे उत्पन्न होने वाले अनेकानेक सम्मिश्रणों में भी यही प्रगतिक्रम अनवरत गति से चल रहा है। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, व्यवसाय, कला, कौशल, नीति, चिकित्सा, विज्ञान, व्यवसाय, कला, कोशल, नीति, विग्रह, उपार्जन, उपभोग आज के तरीकों में असाधारण प्रति हुई है। विकास विस्तार की, सुविधा साधनों की दृष्टि से हम पूर्वजों से कही आगे हैं और यह मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि भावी पीढ़ियाँ हमसे ही अधिक बुद्धिमान तथा सुविधा सम्पन्न होंगी। गतिचक्र तो प्रगति की दिशा में चलता ही रहेगा।
चिन्ता और अवरोध का प्रसंग तक आता है जब गति अपने सामान्य क्रम से विचलित होकर अगति या दुर्गति का मूढ़ता या उच्छ खेलता का रूप धारण करती है। कभी मंगल और बृहस्पति के मध्य में वर्तमान ग्रह पिण्डों के अतिरिक्त कोई विशालकाय ग्रह पिण्ड भ्रमण करता था। उसे अब सूझी। अपनी कक्षा का अतिक्रमण करके अनिर्णीत मार्ग पर चल पड़ा। फलतः किसी अन्य ग्रह से जा टकराया, दोनों चूर-चूर हो गए। स्वयं भी मरा और दूसरे को भी ले बैठा । दोनों का चूरा आज भी क्षुद्र ग्रह खण्डों के रूप में अपनी कक्षा बनाए परिभ्रमण कर रहा है। उस पूर्ण ग्रह के सदस्यों को फिर कभी कभी अपने पूर्वजों की परम्परा का स्मरण हो आता है और छोटे हुए होते भी वैसी उच्छृंखलता बरतने लगते हैं। ये टुकड़े पृथ्वी, चन्द्रमा आदि पर आये दिन उल्काओं के रूप में बरसते रहते हैं। वायुमण्डल में प्रवेश होते ही वे स्वयं तो जल-भुनकर समाप्त होते ही रहते हैं, पर साथ ही जहाँ गिरते हैं उस धरातल को भी भारी क्षति पहुँचाए बिना नहीं रहते।
ऐसे व्यक्तिक्रम यदा-कदा न केवल प्रकृति पदार्थों में वरन् मनुष्यों के वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में भी उत्पन्न होते रहते हैं। भूकम्प, ज्वालामुखी, उल्कापात, चक्रवात, तूफान जैसी प्रकृति दुर्घटनाओं से कितना संकट एवं विनाश प्रस्तुत होता है यह सभी जानते हैं। शासनों एवं समाजों में भी इतिहास के अनेकों अवसरों पर ऐसे ही विग्रह खड़े हुए हैं और उनके कारण सभी को भारी संकटों का सामना करना पड़ा है। हिम प्रलय जैसे कई भयानक अवसर धरती के इतिहास में आये है और उनने संचित सभ्यता एवं प्रगति पर वज्राघात जैसा प्रहार करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न की है जिसे उपलब्धियों को समाप्त करके नये सिरे से प्रारम्भ करने जैसा उपक्रम कहा जा सकता है।
ऐसे ही व्यक्तिक्रम समाजों, देशों के राज्यों में आते रहे हैं। जापान और जर्मनी की पिछली लड़ाइयों में कितना कुछ सहन करना पड़ा और चलते हुए विकास क्रम में कितना व्यवधान उत्पन्न हो गया इसे इतिहास का हर विद्यार्थी जानता है। सभ्यताओं के, शासनों के उत्थान-पतन के इतिहास भी ऐसे ही है। यदि प्रवाह समस्वरता पूर्वक चले रहे तो प्रगति क्रम उससे कहीं आगे होता जहाँ कि आज किसी प्रकार पहुँच सका है।
यदि आत्म-निरीक्षण के क्षेत्र में उतरा जा सके तो प्रतीत होगा कि उस अदृश्य जगत में अपने लिए विनाश और विकास की असीम साधन सामग्री और अनन्त सम्भावनाओं के भण्डागार भरे पड़े हैं। उत्थान के लिए आमतौर से बाहरी उपलब्धियों को ही सफलता कहा जाता है और उनके हस्तगत होने को ही सौभाग्य मान कर सराहा जाता है। पर वास्तविकता कुछ और ही है। सौभाग्य ऊपर से नहीं टपकता भीतर से उभरता है। पेड़ों को फल-फूलों से लदा देखकर कोई यह भी सोच सकता है कि यह ऊपर आसमान से टपककर पेड़ से चिपक गए होंगे। पर यथार्थता यह है कि जमीन में दबी जड़ खुराक खींचती और पतली नलिकाओं द्वारा पेड़ के हर अवयव तक पहुँचाकर उसे हरा-भरा, परिपुष्ट एवं फल-फूलों से लदा हुआ बनाती है। भले ही वे आवरण के पीछे छिपी हुई अपनी गतिविधियों गुपचुप रीति से सम्पन्न करती रहती हों।
गीतकार ने उत्थान और पतन के तथ्यों का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है कि ‘अपने आप ही अपना उत्थान करना चाहिए। अपने को गिराना नहीं चाहिए। इसका तार्त्पय यह हुआ कि व्यक्ति स्वयं ही अपने उत्कर्ष-अपकर्ष का पूरी तरह जिम्मेदार है। इस संदर्भ में और भी खुलासा करते हुए शास्त्रकार ने कहा है--’मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है।’ यहाँ चेतना के अनगढ़ और सुगढ़ होने की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं की ओर ही किया गया संकेत समझा जाना चाहिए। ईश्वर की अनुकम्पा, दैवी सहायता की बात सोचनी हो तो भी उस उक्ति को ध्यान में रखा जाना चाहिए जिसमें कहा गया है कि ‘ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।’
परमेश्वर के दस या चौबीस अवतारों की मान्यता में मत्स्य, कच्छम, वाराह, नृसिंह, वामन से लेकर क्रमशः कलाओं का बढ़ते जाना और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारह कलाओं वाला, पूर्ण पुरुष कृष्ण की सोलह कलाओं वाला माना जाना यही बताता है कि अवतारों में भी इसी विकासक्रम के अनुरूप स्तर बढ़ता चला आया है। बुद्ध को बीस कलाओं का तथा निष्कलंक प्रज्ञावतार को चौबीस कलाओं वाला निरूपित किया गया है। समस्त कला” चौंसठ मानी गई है। उनमें से अवतारों का विकास अभी आँशिक रूप में ही हुआ है। जो जाना शेष है उसमें अभी यह प्रगतिशीलता का क्रम चलता ही रहेगा।
मनुष्य के बारे में भी यही बात है। आदिम काल में उसकी काया भले ही अधिक परिपुष्ट रही हो, पर वह चेतना की दृष्टि से निश्चय ही पिछड़ा हुआ रहा होगा। अब उसकी समझदारी, साधन-सम्पन्नता और कला के रूप में प्रकट होने वाली भाव-संवेदना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है। यह प्रगतिक्रम भविष्य में भी तब तक चलता रहेगा जब तक कि पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने की बात बन न जाये। मनुष्य भविष्य में किन विशेषताओं से सम्पन्न होगा ? उसकी प्रगति का क्षेत्र और स्तर क्या रहेगा ? इस संदर्भ में विज्ञजनों ने अपने-अपने रुझान और चिन्तन के अनुरूप निष्कर्ष निकाले हैं। जिसकी दृष्टि में जिस तथ्य का अधिक महत्व है उसने उसी प्रकार की प्रगति की महत्व दिया और भविष्य का कल्पना चित्र उभारा है। समग्र चिन्तन ही समग्रता की बात सोच सकता है। इसमें कमी रहने के कारण भविष्य दृष्टाओं ने भविष्य की प्रगति के एकाँगी एवं अधूरे चित्र तैयार किए हैं।
मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रगति का जो कल्पना चित्र आप्त पुरुषों ने खींचा है उसे एक शब्द में ‘देवता कहा गया है। कहते हैं कि ‘देवता’ स्वर्ग में रहते हैं। वे श्वेत होते हैं। अजर अर्थात्् जरा रहित प्रौढ़ परिपक्व रहते हैं। वे अमृत पीते और अमर रहते हैं। अदृश्य पंख रहने के कारण वे समूचे अन्तरिक्ष में उड़ते और कहीं भी जा पहुँचते हैं। श्रेष्ठता का समर्थन सहयोग करना उनका रुचिकर विषय और स्वभाव होता है।
काया से प्रोढ़, सुन्दर, युवा होना यह बताता है कि उनके व्यक्तित्व का बाह्य स्वरूप अशक्तता, रुग्णता आदि से मुक्त स्वस्थ, परिपुष्ट एवं सौन्दर्य सज्जित होना चाहिए । प्रौढ़ता संयम पर और सुन्दरता सुरुचि पर निर्भर है यह गुण जहाँ भी होंगे व्यक्ति स्वस्थ और सुन्दर लगेगा भले ही उसके अवयवों की प्रकृतिगत रचना कैसी भी क्यों न हो ? हब्शी लोग भी पारख्यों की दृष्टि में कुरूप नहीं होते। श्वेत कलेवर भी यहाँ प्रतीकात्मक ही है। कालिमा, कलुष की-तमिस्रा की प्रतीक मानी गई है। इस आधार पर उसे हेय ठहराया जाता है अन्यथा आँखों की पुतली को काले रंग की होने के कारण कौन कुरूप या हेय ठहराने की धृष्टता करेगा ? भगवान राम और कृष्ण काले रंग के बनाए जाते हैं। शंकर की छवि भी इसी प्रकार की है। पृथ्वी को धारण करने वाले तथा समुद्र मंथन की भूमिका निभाने वाले शेष भगवान का रंग भी काला था। कैश सौन्दर्य सज्ज में अग्रणी माने जाते हैं उनकी सराहना कालेपन के आधार पर ही होती है। इन तथ्यों पर ध्यान रखने पर देवताओं का श्वेत वर्ण कहा जाना उज्ज्वल, धवल, निष्कलंक व्यक्तित्व का प्रतीक ही समझा जा सकता है।
देवताओं का बहिरंग जिस रूप में प्रतिपादित किया गया है उसमें उनके धवल, प्रखर एवं परिपक्व व्यक्तित्व का ही आभास मिलता है देवता शब्द का मोटा अर्थ है ‘ देने वाला। जिसकी भावनाएं सही दूसरों को समुन्नत सुसंस्कृत देखने को उमंगती रहें, जिनकी गतिविधियाँ सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में निरत रहें उन्हें देव स्वभाव का अधिष्ठाता कहा जा सकता है। सद्भाव सम्पन्न, उदार, सेवाभावी, परमार्थ परायण व्यक्ति इसी वर्ग में गिन जा सकते हैं। जिनकी आत्मिक विभूतियाँ और भौतिक संपत्तियां उत्कृष्टता की समर्थक आदर्शवादिता में सहयोगरत हो उन्हें देव प्रकृति का कहा जा सकता है’ देवताओं के जो चित्र खींचे गए है उनमें उनकी आकृति, प्रकृति का विशेषण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि वे जन सामान्य की अपेक्षा क्रियाशीलता, विचारणा, एवं भाव संवेदनाओं की दृष्टि से कहीं अधिक उच्चस्तरीय रहे होंगे। ऐसे लोग जहाँ भी रहेंगे वही सुख शान्ति एवं प्रगति का हंसता-हंसाता, खिलता-खिलाता वातावरण प्रस्तुत करेंगे। ऐसा वातावरण ही स्वर्ग है।
इन पंक्तियों में यह निरूपित किया गया है कि मनुष्य का समग्र विकास देवता के रूप में होना चाहिए। यह उत्कर्ष की चरम सीमा है। ‘देवत्व’ ही वह वैभव है जिसकी परिणति अनेकानेक ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में प्रकट परिलक्षित होती है। देवत्व को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, ब्रह्मास्त्र आदि नामों से पुकारा जाता है। इन नामों में इस बात का संकेत है कि -देवत्व’ की विभूतियों से संपन्न व्यक्ति किस प्रकार लोहे जैसी अनगढ़ परिस्थितियों से घिरा रहने पर भी किस तरह देवत्व का पारस छूकर बहूमूल्य सोने की तरह सम्मानास्पद हो सकता है। उसका यश शरीर अमृत पीने वालों की तरह इतिहास के पृष्ठों पर अमिट रह सकता है। लोक सम्मान एवं जन-सहयोग की असीम मात्रा उपलब्ध करने के कारण वह कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर मनोकामना पूर्ण कराने वालों की तरह किस तरह प्रचुर साधन सम्पन्न हो सकता है। पवित्र और प्रखर व्यक्तित्व ही इन्द्र वज्र की ब्रह्मास्त्र की कोटि में आते हैं। वे जिस भी अवाँछनीय पर टूट पड़ते हैं, उसे निस्सार करके रख देते हैं। ये समूची फलश्रुतियाँ उत्कृष्ट व्यक्तियों के मूल्य एवं प्रभाव की और--पूर्णता के लक्ष्य बिन्दु ‘देवत्व’ के स्वरूप की और ही इंगित कर देती हैं।
वारेन एस. स्मिथ नामक इंग्लैंड के एक विद्वान ने बर्नार्डशा के भाषणों को “रिलीजियस स्पीचेज आँ बर्नार्डशा” पुस्तक में संकलित किया है। इस पुस्तक में बर्नार्डशा के धर्म सम्बन्धित विचारों का उल्लेख किया गया है। एक भाषण में उन्होंने कहा था कि “यदि वास्तव में हम कुछ महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो हमारा काई धर्म होना चाहिए। यदि हमारी सभ्यता को वर्तमान भयंकर स्थिति से निकालने के लिए कुछ किया जाना है तो यह ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाना है जिनका कोई धर्म है।” उन्होंने यहाँ तक कहा कि “ जिन व्यक्तियों का कोई धर्म नहीं होता वे कायर एवं असभ्य होते हैं।”
बर्नार्डशा के इन विचारों में धर्म की महत्ता एवं इस क्षेत्र की व्यापकता का प्रतिपादन स्पष्ट परिलक्षित होता है। धर्म का अर्थ होता है ‘कर्त्तव्य’। जिसको परम्परागत मान्यताओं, निर्धारित पूजा उपचारों तक सीमित नहीं किया जा सकता है। कर्तव्यों में आदर्शों एवं सिद्धान्तों का उच्चस्तरीय पुट होता है। जिसे देशकाल की संकुचित सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता। सामयिक आवश्यकता के अनुरूप उसका गढ़ा जो जा सकता है, पर वह स्वरूप शाश्वत नहीं बन सकता जो प्रत्येक काल एवं परिस्थितियों में उपयोगी हो। धर्म के मूल में यदि कोई तत्व शाश्वत बन सकता है तो वह है-”श्रेष्ठ आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति गहन आस्था, सुदृढ़ विश्वास। जो वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा परिस्थितियों से नहीं जुड़ा होता” पूजा, उपचार, देवी-देवता के माध्यम से इन्हीं तत्वों को उभारा-विकसित किया जाता है। जार्ज बर्नार्डशा ने धर्म को परोक्ष रूप से उच्चस्तरीय सिद्धाँतों एवं आदर्शों के रूप में ही स्वीकार किया एवं माना है कि धर्म अर्थात्् आदर्शों एवं सिद्धाँतों के अभाव में कोई भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया जा सकता तथा महान कार्यों में सफल होने के लिए धर्म का अवलम्बन लेना आवश्यक है।
धर्म के इस प्राण प्रतिपादन की उपेक्षा करने से वह मात्र परम्पराओं, कर्मकाण्डों, तथाकथित पूजा-उपचारों का साम्प्रदायिक जाल-जंजाल बन कर रह जाता है। मान्यताओं के दुराग्रह से कर्तव्यों की उपेक्षा होने लगती है। अन्धविश्वासों को पनपने एवं विकृतियों को घुसने का अवसर मिल जाता है। पिछले दिनों यही हुआ। धर्म के तत्वज्ञान-श्रेष्ठ आदर्शों एवं सिद्धाँतों की अवमानना हुई। फलस्वरूप धर्म साम्प्रदायिक विकृतियों से भर गया। इन विकृतियों ने नास्तिकता
के प्रसार में भी योगदान दिया है। धर्म के महान लक्ष्य, स्वरूप एवं तत्वदर्शन के स्पष्ट न होने के कारण ही उसकी विकृतियों को देखकर कार्लमार्क्स जैसे विचारक कह उठे “धर्म सताये हुए प्राणियों का रुदन है। निर्दयी व्यक्तियोँ का हथियार है। गरीबों की अफीम है। इसमें विश्वास पिछड़ी सभ्यता का परिचायक है। मायावी एवं काल्पनिक सुख देने वाले ऐसे धर्म की अवहेलना करना प्रगति का चिन्ह है।”
कार्लमार्क्स के इन विचारों में धर्म की विकृतियों के प्रति आक्रोश स्पष्ट झलकता दिखायी देता है। इस कथन में धर्म के उस स्वरूप की अवमानना निन्दा की गई है जो व्यक्ति एवं समाज को दिग्भ्रान्त करता हो- परावलम्बी बनाता एवं भ्रम जंजालों में उलझाता हो स्पष्ट है कि विकृतियाँ धर्म का स्वरूप नहीं अपवाद हैं। जिनकी निन्दा हुई और सदा होनी भी चाहिए। किन्तु भूल यह हुई कि इन अपवादों को ही धर्म का स्वरूप मान लिया गया तथा कहा गया कि धर्म मनुष्य के लिए अनुपयोगी है। किसी भी वस्तु को तब कि अनुपयोगी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसके विषय में पूरी जानकारी न हो-तर्क, तथ्यों एवं प्रमाणों की कसौटी पर कस न लिया गया हो।
धर्म का क्षेत्र उतना ही विस्तृत है जितना कि यह ब्रह्माण्ड। व्यक्ति, समाज की सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप समाज का नेतृत्व करने वाले मनीषी कर्तव्यों, नियमों के आचार संहिता गढ़ते-बनाते हैं। नियमों उपनियमों से बना यह स्वरूप समाज की सामयिक आवश्यकता की पूर्ति करता है। इस दृष्टि से इस स्वरूप की भी अपनी महत्ता है। किन्तु यह सर्वकालीन, सार्वभौम नहीं हो सकता। आवश्यकता पड़ने, परिस्थितियों के बदलने पर उसे परिवर्तित भी किया जा सकता है।
समाज के कल्याण में लगे समाज सेवी, देश की सीमाओं पर डटे प्रहरी, समाज की साधन-सुविधा के अभिवर्धन के प्रयत्नों में निरस्त वैज्ञानिक भी धार्मिक ही कहे जायेंगे। भले ही इनका विश्वास किसी सम्प्रदाय देवी-देवता में न हो। अपने कर्त्तव्यों के प्रति अटूट आस्था एवं तद्नुरूप प्रयत्नशीलता उनके धार्मिक होने का परिचालक है। समाज को श्रेष्ठ चिन्तन देने वाले विचारक भावनाओं को उद्वेलित विस्तृत करने वाले कवि संगीतज्ञ, कलाकार क्या धार्मिक नहीं कहे जा सकते ?
पाश्चात्य जगत के प्रसिद्ध विचारक “जॉन के अर्ड” अपनी पुस्तक “एन इन्ट्रोडक्सन टू फिलॉसफी आफ रिलीजन” में लिखते हैं “यह आवश्यकता नहीं कि धर्म के सिद्धान्तों को रूढ़िवादी अर्थों में लिया जाय।क्योंकि कितने ही व्यक्ति ऐसे हो सकते हैं जो इसमें विश्वास न करते हों । किन्तु धर्म की जो विशेषताएँ एक धार्मिक व्यक्ति के अन्दर होनी चाहिए वे उनके अन्दर विद्यमान होती है। उनकी विचारणा एवं क्रिया-कलापों में उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धाँतों का समावेश होता है।” इस कथन में धर्म के व्यापक स्वरूप का ही प्रतिपादन है।
धर्म की महत्ता एवं उपयोगिता आज के बुद्धिवादी युग में तभी स्वीकार की जा सकती है। जबकि उसके स्वस्थ स्वरूप, लक्ष्य एवं निहित तत्व-दर्शन को जन-सामान्य के समक्ष रखा जाय। धर्म सम्प्रदाय के सिद्धान्तों में जब तक मतभेद बना रहेगा तब तक वह अपनी गरिमा नहीं प्राप्त कर सकता।
धर्म के तत्वदर्शन में एक छुपता होना अनिवार्य है। अनुपयोगी, अविवेकपूर्ण सिद्धाँतों, मान्यताओं के प्रति दुराग्रह का मोह छोड़कर स्वस्थ रीति-नीति अपनानी होगी। सिद्धाँतों में सार्वभौमिकता होने से ही विचारशील वर्ग उसे स्वीकार कर सकेगा। ऐसी स्थिति में धर्म क्षेत्र में भी वैज्ञानिक अन्वेषण की ही विधि अपनानी होगी। वैज्ञानिक चाहें एशिया के हों अथवा यूरोप के उनकी मान्यताओं, नियमों में एकरूपता है। विचारों सिद्धाँतों में समता है। परस्पर सहयोग की भावना भी इसी कारण है। जबकि हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी सभी के बीच परस्पर मतभेद है। विज्ञान की तरह धर्म के सिद्धाँतों में एकरूपता नहीं दिखायी पड़ती। परस्पर के मतभेदों के कारण ही आज का बुद्धिजीवी धर्म से दूर भागता, अवहेलना करता है, तथा कहता है कि धर्म अपने सजातियों को नहीं जोड़ सका तो अन्यों को क्या दे सकेगा। यह लाँछन अकारण नहीं है। मतभेदों पर विचार करने पर पता चलता है कि इसका प्रमुख कारण है- अपनी मान्यताओं के प्रति दुराग्रह-धर्म के कलेवर के प्रति अनावश्यक मोह।
धर्म को प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध करने कल्याणकारी बनाने के लिए उसके लक्ष्य, तत्वदर्शन एवं सृजनात्मक स्वरूप को जन-सामान्य के समक्ष रखना होगा। भ्रान्त धारणाओं को अलग की स्वस्थ, पवित्र एवं परिष्कृत स्वरूप को प्रस्तुत करना होगा। विचारशीलता ने विज्ञान को सत्यान्वेषी बनाया है, फलतः अनुपयोगी, असत्य मान्यताओं के झाड़-झँखाड़ कटते चले गये। स्वस्थ तथ्यों को पौधों के समान भली-भाँति फलने-फूलने का अवसर मिला। वर्तमान वैज्ञानिक उपलब्धियाँ उन्हीं विवेक सम्मत विचारों की परिणति हैं।
विचारों की गन्दगी और जीवन के संकट दोनों समानुपाती हैं। विचार जितने गन्दे होंगे जीवन उतना ही अधिक व्याधिग्रस्त बनता जाएगा। -चरक
‘गति’ शब्द का अर्थ है- हलचल। पदार्थ अपने ढंग की हलचलें करते हैं और प्राणी अपने ढंग की। पदार्थ की छोटी इकाई परमाणु परिवार और बड़ी इकाई ब्रह्माण्ड के भीतरी और बाहरी क्षेत्रों में अनवरत गतिशीलता पाई जाती है। क्या जड़, क्या चेतना इस संसार को कोई भी वर्ग सर्वथा निष्क्रिय नहीं है, यह दूसरी बात है कि उस क्रियाशीलता की दौड़ दूसरे पदार्थों की तुलना में मन्द हो या तात्र। चेतन प्राणियों की तुलना में वनस्पतियों की हलचल सीमित और स्वल्प है किन्तु मिट्टी, पत्थर, खनिज आदि में जो गतिशीलता दृष्टिगोचर होती है वह वनस्पतियों की तुलना में भी न्यून है। मिट्टी से पत्थर, पत्थर से लोहे में प्रत्यक्ष गतिशीलता कम पाई जाती है किन्तु जो सर्वथा निष्क्रिय दिखाई पड़ते हैं, उनकी सूक्ष्म संरचना पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि जिन परमाणुओं से मिलकर वस्तुओं का निर्माण हुआ है, वे अपने क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं। ग्रह नक्षत्रों समेत यह समूचा अन्तरिक्षीय परिवार धुरी या कक्षा में और अन्ततः किसी बड़े केन्द्र की प्रदक्षिणा में दौड़ लगाता हुआ देखा जा सकता है। इसलिए तत्वतः यहाँ ‘अगति’ जैसी कोई बात है नहीं।
इतने पर भी शब्द कोष में अगति, अवगति, दुर्गति एवं प्रगति का उल्लेख ये व्यवहार में भी प्रयुक्त होते हैं। पर इनकी कोई स्थिर विवेचना नहीं हो सकती। इन्हें सापेक्ष ही माना जा सकता है और किसी से तुलना करके ही यह बताया जा सकता है कि उपरोक्त शब्द कहीं लागू हुए या नहीं। एक बच्चे ने शरीर विकास की दृष्टि से प्रगति की, लेकिन बौद्धिक क्षेत्र में वह दूसरे बच्चों से पिछड़ा रहा तो फिर उसकी स्थिति पर प्रगति शब्द कहाँ लागू हुआ। ऐसे तो चोर के डाकू बन जाने पर भी उसने प्रगति की है- ऐसा कहा जा सकता है फिर भी सज्जनता के क्षेत्र में वह पिछड़ता ही चला गया है। अगति, अवगति एवं दुर्गति के सम्बन्ध में भी ऐसा ही कहा जा सकता है। भले और बुरे वर्ग अपने-अपने क्षेत्रों में उपलब्ध होने वाली सफलताओं को प्रगति कहते हैं। जबकि वह उन्नति दूसरे वर्ग के लोगों की दृष्टि में पतन, पराभव के रूप में गिनी जाती है। गायिका ने नृत्य सीख लिया और अधिक ग्राहक पटाने लगी तो उस समुदाय में उसकी यह सफलता सराही जायेगी। पर कुलीनता की मर्यादाओं को महत्व देने वाले अवगति, दुर्गति के रूप में भर्त्सना भी कर सकते हैं। ऐसी दशा में किसे प्रगतिशील, किसे असफल अधःपतित कहा जाय ? इस संदर्भ में सहज ही असमंजस सामने आ खड़ा होता है।
यही निर्णय पर पहुँचने के लिए तुलनात्मक विवेचना से निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता पर ‘प्रगति’ को मान्यता देने कुछ कसौटियाँ निर्धारित करनी होंगी। जीवधारी के भीतर जिस अनुगमन की उत्कंठा पाई जाती है- जिस प्रेरणा से उसकी बुद्धि और काया प्रयत्नरत रहती है, उस आकाँक्षा का प्रवाह किस दिशा में चल पड़ा ? यह देखना होगा और जाँचना होगा कि वह प्रवाह साथ में बहने वाले के लिए श्रेयस्कर हुआ या नहीं ? लोक-हित की दृष्टि से उसकी उपयोगिता मानी गई या नहीं ? यदि प्रयत्नों की दिशाधारा सही है तो उसे ‘प्रगति’ शब्द से सम्मानित करने में हर्ज नहीं। इसके विपरीत यदि ऐसी सफलताएँ अर्जित की गई हैं जो पहले की अपेक्षा उन्नति करने के रूप में तो दृष्टिगोचर होती हैं किन्तु उनकी परिणति में दुष्परिणाम ही सामने आने वाले हैं तो समझना चाहिए कि तात्कालीन सफलता प्रकारान्तर से असफलता की ही पर्यायवाचक मानी जायेगी।
प्रतिभा की अभिवृद्धि उत्साहवर्धक तो है पर देखना यह भी होगा कि उत्पन्न हुआ पराक्रम एवं कौशल किस दिशा में नियोजित हुआ। जिस दिशा में प्रगति हुई, वह प्रकृति अनुशासन मानवी नीति, नियम एवं सामाजिक सहयोग सन्तुलन की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होती है या नहीं। अन्यथा प्रतिभाशाली तो उद्दण्ड, उच्छृंखल, ठग और अनाचारी आतंकवादियों को भी कहा जाने लगेगा। तर्क यह दिया जा सकता है कि सामान्य जनों के स्वभाव एवं क्रिया-कलापों की तुलना में वे अपनी अधिक समर्थता एवं तत्परता प्रकट करते हैं जिसके लिए उन्हें भी उन्नतिशील कहा जाना चाहिए।
इस संदर्भ में विवेकयुक्त निर्धारण यही है कि प्रगति की दिशा विश्व मानव के नियत नीतिमान के अनुरूप रही या नहीं ? इस बात की जाँच पड़ताल करके ही किसी नतीजे पर पहुँचा जाय। कई तोड़-फोड़ करने वाले ही अपने कुकृत्यों से उत्पन्न आतंक को भी अपनी विशिष्टता में गिनी, शेखी बघारते एवं मूंछें ऐंठते देखे गये हैं। जिन्हें इस अनाचार के लाभों में हिस्सा मिलता है वे ‘कसाई के कूकर’ ऐसे आतंकवाद की प्रशंसा भी कर सकते हैं और जिस तिस तर्क के सहारे उसका औचित्य बताने में भा बुद्धि कौशल के सहारे तीर तुक्का बिठा सकते हैं। इतने पर भी अवाँछनीय कृत्यों में निरत लोगों का मूंछें ऐंठना और चमचागिरी करने वालों से वाह-वाही सुनना इस बात का प्रमाण नहीं हो सकता कि उस विशेषता या सफलता को प्रगतिशीलता की सराहनीय संज्ञा दी जाय या नहीं।
मानवी मूल्याँकनों का निर्धारण इसी शाश्वत सिद्धान्त के आधार पर होता रहा है कि उसने निजी जीवन में नीतिमत्ता के अनुशासन को कितनी सच्चाई एवं कड़ाई के साथ पाला एवं सम्पादित समर्थता का कितनी उदारता के साथ कितने उच्चस्तरीय कार्यों के लिए नियोजित किया। सर्वजनीन विवेक ने ऐसे ही लोगों की ऐसे ही प्रयासों की प्रशंसा की है। उन्हें उपयोगी माना और कृतज्ञता भरा सम्मान प्रदान किया है। यह कसौटी हर दृष्टि से उपयोगी भी है। इस मार्ग का अवलम्बन करने वाले कई दृष्टि से नफे में रहते हैं।
नीति और अनीति की विवेचना करने वाली, औचित्य और अनौचित्य के बीच अन्तर करने वाली एक ऐसी कभी न बुझने वाली ज्योति हर मनुष्य के अन्तराल में तभी से प्रज्वलित है जबसे उसे मानवी कलेवर में प्रवेश करने का अवसर मिला। अति आरम्भ काल में तो प्रसुप्त मूर्च्छित अनुग्रह भी हो सकती है किन्तु जैसे -जैसे परिपक्वता आती है उसी अनुपात से यह विवेक भी जागृत होता है कि उचित और अनुचित की विभाजन रेखा कहाँ है ? इसे परतंत्र की अन्तरात्मा कहते हैं। यह अनौचित्य अपनाने पर अन्तर्द्वन्द्व खड़े करती है। स्वार्थवश अनुचित काम करने के आवेश में किया कुछ भी जाता रहे । अन्तराल औचित्य का पक्ष समर्थन करने और अवाँछनीय को हेय ठहराने का झण्डा हर हालत में बुलंद किये ही रहेगा। दबा देने पर उसकी आवाज धीमी तो हो सकती है किन्तु सर्वथा किसी भी दशा में नहीं हो सकता। अनीति अपनाने पर अन्तर्द्वन्द्व हर हालत में बना ही रहेगा और उस मार्ग पर चलने वाले का आन्तरिक असन्तोष भले ही पश्चाताप एवं परित्याग के रूप में प्रकट न हो पर इतना तो निश्चित है कि चैन से भी बैठने नहीं देगा। आत्मधिक्कार की छोटी-बड़ी चिनगारी अवसर मिलते ही फूटती रहेगी।
इस स्तर के अन्तर्द्वन्द्व व्यक्तित्व की छवि उभारने एवं बिगाड़ने में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं, इसे सामान्य जन तो नहीं जानते पर मनःशास्त्र के विशेषज्ञ एक स्वर से कहते पाये जाते हैं कि अंतर्जगत में दो व्यक्तित्वों का विकसित होना वैसा ही अनुपयुक्त है जैसा एक म्यान में दो तलवारों का घुस पड़ना। एक मुख में दो जीभों का होना। शरीर में विजातीय द्रव्य घुस पड़ते या भूत-पलीत के आवेश आते हैं तो स्थिति कितनी विचित्र हो जाती है। मस्तिष्क की स्वाभाविक सम्पदा विवेक को छीनकर जब नशा उस संस्थान पर अपना अड्डा जमाता है तो दोनों की खींचतान में सोचने से लेकर करने तक की समस्त प्रक्रिया बेतरह लड़खड़ाने लगती है और नशेबाज की स्थिति उपहासास्पद एवं दयनीय बन जाती है।
एक मर्द की दो औरतें-एक औरत के दो मर्द होने पर आये दिन कैसी खींच-तान चलती है इसे सभी जानते हैं। एक नौकर के दो मालिक होने पर भी उसकी नाक में दम आती है। दो मस्तिष्क, दो दिल, दो मुख, दो जननेन्द्रिय वाले व्यक्ति की स्थिति कैसी विचित्र होगी, इसकी कल्पना करने भर से बड़ा अजीब लगता है। एक जंगल में दो शेर- एक राज्य में दो राजा कहाँ रह पाते हैं। एक खेत को चरते दो साँड जा पहुँचे तो उन्हें मल्ल युद्ध करते देर न लगेगी। मुहल्ले के अधिकारी कुत्ते दूसरे मुहल्ले वालों को कहाँ फटकने देते हैं। रक्त के प्रहरी कण तक विजातीयों को सहन नहीं करते और अवाँछनीय प्रवेश को मार भगाने के लिए अच्छा-खासा महाभारत खड़ा करते हैं। सूजन, व्रण, दर्द, ज्वर आदि विग्रहों की अनुभूति इसी नियम के अंतर्गत होती है कि शरीर की स्वस्थ चेतना विजातीय द्रव्य को सहन न करे और उसे खदेड़ने के लिए जान हथेली पर रखकर संघर्ष करे।
ठीक ऐसा ही तब होता है जब अन्तरात्मा की मूल प्रकृति उत्कृष्टता के विपरीत चिन्तन या आचरण अपनाये जाते हैं। नीति की पक्षधर यह चिनगारी अपना अस्तित्व पूर्णतया किसी भी स्थिति में खोती नहीं। उपेक्षित, तिरस्कृत, दुर्बल होने पर भी उसका अनीति विरोधी संघर्ष चलता ही रहता है भले ही वह परिस्थिति के अनुरूप कितना ही धीमा या धूमिल क्यों न हो।
अंतर्द्वंद्वों के परिणाम कितने घातक होते हैं-इसकी जानकारी कुछ समय पहले तक लोगों को उतनी अच्छी तरह नहीं थी जितनी कि इन दिनों अचेतन मनःसंस्थान के विशेषज्ञ विश्लेषणकर्ताओं ने प्रस्तुत की है। आधुनिकतम मनोविज्ञान के निष्कर्ष इस तथ्य का विश्वासपूर्वक उद्घाटन करते हैं कि अन्तर्द्वन्द्वों से भयानक अवरोध मनुष्य की समग्र प्रगति में और दूसरा नहीं हो सकता। भीतरी लड़ाई में चेतना की इतनी शक्ति खप जाती है कि वास्तविक प्रगति की सही रूपरेखा बनाना और उसके लिए समग्र सरंजाम जुटाना बन ही नहीं पड़ता। अस्तु अन्तर्द्वन्द्वों से ग्रसित व्यक्ति मात्र दुष्टता और भ्रष्टता के क्षेत्रों में ही अपनी उछल-कूद मचाते रह सकते हैं। ऐसी मानसिक प्रखरता वे सम्पादित कर ही नहीं सकते जिसके सहारे उन लाभों को प्राप्त कर सकना शाक्य हो सके जो उच्चस्तरीय प्रगति के लिए आवश्यक है।
सरिता के सुरम्य तट पर सुशोभित शिव मंदिर, पास ही घाट पर धोबियों के पत्थर पड़े थे। मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग और धोबी का एक पत्थर दोनों कभी एक ही पर्वत उपत्यिका से साथ साथ चले थे। काल गति ने एक को शिव प्रतिमा बना दिया तो दूसरे को धोबी का पत्थर।
धोबी का पत्थर आत्महीनता अनुभव कर दुःखी होता। एक दिन उसे रहा नहीं गया, शिव लिंग को सम्बोधित कर कहा-”तात! आप धन्य हैं। देव मन्दिर में प्रतिष्ठित हैं। भव बन्धनों से जकड़े प्राणी आपके पास आकर कितनी शान्ति, कितना सन्तोष अनुभव करते हैं। काश यह पुण्य सुयोग हमें भी मिलता।”
शिव-लिंग आत्म-प्रशंसा सुनकर गम्भीर हो उठे बोले “तात! आपका दुःख करना निरर्थक है। आप नहीं जानते हम तो मात्र आने वाले लोगों को क्षणिक शाँति ओर शीतलता प्रदान करते हैं आप तो निर्विकार भाव से हर किसी का मैल धोते रहते हैं। आप की साधना धन्य मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तो आप ही है। इसलिये जब लोग मेरी उपासना करते हैं। तब मैं आपकी क्रिया करता हूँ।
घाट का पत्थर गदगद हो उठा और दुगुने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
आदिम मनुष्य सचमुच बन्दर की औलाद या उसकी बिरादरी का रहा होगा। सभी प्राणियों को प्रकृति ने इतना सहज ज्ञान दिया है कि वे उसके सहारे अपनी शरीर यात्रा भर चलाते रहे सके। ये उसके अन्तराल में विभूतियों की कमी नहीं। वह इस दृष्टि से सम्पन्न-सामर्थ्यवान है। पर पात्रता के अभाव में दुरुपयोग के लिये कोई क्यों आना वैभव लुटाये? प्रकृति को कृपण तो नहीं कहेंगे, पर वह अदूरदर्शी भी नहीं है। जो जितना संभाल सके उतना ही दिया जाय, इस संदर्भ उसने सदा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है। इस परीक्षा में मनुष्य ने सदा से ही आगे रहने की चेष्टा की और तद्नुरूप प्रकृति का आँचल उठाकर एक के बाद एक बहुमूल्य विभूतियां हस्तगत करने में सफलता पाई।
वायु प्रदूषण, आत्मिक विकिरण, जल प्रदूषण, ऊर्जा स्रोतों का अत्यधिक दोहन, विलास के साधनों का अमर्यादित उपयोग, प्रलयंकर शास्त्रों का निर्माण और उनकी अधिसंख्य देशों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे संकट भरे कदम महाप्रलय जैसी चुनौती सामने लेकर खड़े है। एक ओर विज्ञान क्षेत्र के मनीषी मूर्धन्यों के सामने यह समस्या है कि इस दुरुपयोग को कैसे रोका जाय और उनके कारण उत्पन्न हो रहे अनेकानेक विग्रहों, संकटों से कैसे उबरा जाय ? दूसरी और एक और प्रश्न भी उनके सामने है कि मनुष्य को अधिक सुखी समुन्नत बना सकने का प्रयोजन पूरा करने के लिये किन नये शोध क्षेत्रों में प्रवेश किया जाय। इनकी नीति क्या हो व इनकी मर्यादा को कहाँ किस प्रकार बाँधा जाय ? दोनों ही प्रश्न मानवी बुद्धिमत्ता के समक्ष एक प्रश्न चिन्ह बनकर खड़े है और कहते हैं कि सही समाधान न निकला तो विज्ञान अपना पोषण धर्मी रूप त्यागकर महारुद्र बनेगा और प्रलय का ताण्डव नृत्य आरम्भ करेगा। आखिर नियति ही है। मनुष्य को सीमित सुविधा छूट ही दे सकती है। औचित्य का अतिक्रमण सहन नहीं कर सकती। इसीलिये मूर्धन्य विचारकों के असार विनाश और विकास के मध्य झेलने वाले हलके से धागे को सही दिशा देना ही वह कार्य है जिस पर वर्तमान का समाधान तथा भविष्य का निर्धारण पूर्णतया अवलम्बित है।
आज की सबसे बड़ी समस्या है दुरुपयोग को रोकना और उपयोगी को अपनाना। इसका समाधान पाने हेतु समुद्र जितनी गहराई में उतरते तथा अन्तरिक्ष को मथ डालने वाली मनीषा का समग्र मन्थन करने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि निर्धारण की कसौटी “उत्कृष्ट आदर्शवादिता” को अपनाकर चला जाय और उसकी छत्र छाया में हर स्तर का निर्णय किया जाय। मानवी सत्ता की उच्चस्तरीय विशिष्टता एक ही है-”आदर्शों के प्रति आस्था”। इसी ने उसे चिन्तन के क्षेत्र में उत्कृष्टता और व्यवहार के क्षेत्र में उदार सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ प्रदान की है और उसकी गौरव गरिमा को बढ़ाया है। इस विशिष्टता की जितनी उपेक्षा की जायेगी उतनी ही विपत्ति उभरेगी और विनाश की विभीषिका बढ़ेगी। इस सत्प्रवृत्ति को पुरातन भाषा में ‘आध्यात्मिकता’ कहा जाता है। यह शब्द किसी को अटपटा लगता हो तो “दूरदर्शी आदर्शवादिता” जैसा कोई शब्द देने में किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये। यही है कि वह कसौटी जिस पर अद्यावधि प्रगति के उपयोग में हुई भूलों को सुधारना और जो उपलब्ध है, उसका सर्वहित में सदुपयोग कर सकना सम्भव हो सकता है। साथ ही इसी आधार को अपनाकर विज्ञान की भावी दिशाधारा का उपयुक्त निर्धारण हो सकता है।
विज्ञान ने पदार्थ जगत में असीम चमत्कार उत्पन्न किये हैं। अब उसका काम है कि मानवी चिन्तन, चरित्र और लोक परम्पराओं को प्रभावित करे। इन क्षेत्रों में घुसी हुई भ्रान्तियों एवं अवाँछनीयताओं को उसी प्रकार निरस्त करें जिस प्रकार उसने पिछले दिनों भौतिक जगत् की वस्तुस्थिति के सम्बन्ध में यथार्थता की जानकारी रखते हुये सत्य की शोध का अधिष्ठाता कहलाने का क्षेत्र सम्मान पाया और अपना महान उत्तरदायित्व निभाया है। उसकी वह सेवा पिछली सहस्राब्दियों में प्रस्तुत किये गये अनुदानों की तुलना में अकेली ही अत्यधिक भारी-भरकम सिद्ध होगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “जो धर्म वैज्ञानिक अनुशासन पर सही न ठहराया जा सके उसे नष्ट कर देना चाहिये। जितनी जल्दी ये अनावश्यक अन्ध परम्परायें व मूढ़ मान्यतायें धर्म से निकाल दी जाये, उतना ही ठीक है। जब यह सब हो चुकेगा तो जो कुछ भी बच रहेगा।, वह बहुत उज्ज्वल, शाश्वत व अपनाने योग्य होगा।” वस्तुतः विज्ञान और अध्यात्म का, सम्पदा और उत्कृष्टता का, शक्ति और शालीनता का, बुद्धि और नीति-निष्ठा का समन्वय अपने युग का सबसे बड़ा चमत्कार समझा जायेगा। विज्ञान क्षेत्र पर छाई हुई मनीषा को यह युग धर्म निभाना ही चाहिये।
विज्ञान युग के प्रारम्भिक दिनों में पदार्थ की ही सत्ता मानी गयी थी और कि चेतना का कोई स्वतन्त्र आस्तित्व नहीं है। मान्यता यह थी कि विश्व पदार्थमय हैं। जड़-चेतन के नाम से जाने वाले सभी घटक मात्र पदार्थ हैं। अस्तु उनकी नियति भी पदार्थ जैसी ही है। पर अब उस मान्यता में सुधार परिवर्तन करने का समय आ गया। पिछली दो शताब्दियों की खोजों ने यह मान्यता विकसित की है कि चेतना का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है। वह प्राणियों में पृथक-पृथक इकाइयों के रूप में ब्रह्मव्यापी है। प्रकृति की तरह ही चेतना की सीमा एवं क्षमता अनन्त है। इतना ही नहीं, चेतना वरिष्ठ होने के कारण उस क्षेत्र की उपलब्धियाँ भी तुलनात्मक दृष्टि से अत्यधिक है। इंजन कितना भी सशक्त क्यों न हो, उसे चलाने के लिये चेतन ड्राइवर भी चाहिए। ‘आटोमेटिक’ कहलाने वाली मशीनें भी किसी न किसी रूप में संचालक का निर्देश प्राप्त करती ही रहती है। ठीक उसी प्रकार काय संचालन से लेकर विश्व-व्यवस्था में एक अदृश्य चेतना शक्ति काम करती है।
विज्ञान की ‘इकॉलाजी’ धारा ने इन दिनों पूरे जोर-शोर और साहस विश्वास के साथ यह सिद्ध करना आरम्भ कर दिया है कि प्रकृति के साथ मात्र शक्ति एवं क्रिया ही जुड़ी नहीं है, एक और विभिन्न क्रिया भी आच्छादित है, जिसे दूरदर्शी -सन्तुलन बिठाने-औचित्य अपनाने से लेकर सुखद सम्भावनाएँ अपनाने तक की विशेषताओं से सुसम्पन्न कहा जा सकता है। यह विशिष्टता जड़ पदार्थ में स्वभावतः नहीं पाई जाती। फिर भी उस प्रक्रिया का अस्तित्व ही नहीं सुदृढ़ अनुशासन भी प्रमाणित हो रहा है। इस दिशा में परामनोविज्ञान, पराभौतिकी आदि अन्य विज्ञान धाराओं ने भी अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर समर्थन आरम्भ कर दिया है। स्थिति बदलती जा रही है और चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व मानने की विवशता बढ़ती जा रही है। मनीषी आइन्स्टीन ने अपने अंतिम दिनों प्रायः अर्ध आस्तिकता स्वीकार करली थी और वे चेतना की सत्ता एवं वरिष्ठता मानने लगे थे। तब से लेकर अब तक और भी बहुत कुछ हुआ है। वह सभी ऐसा है जो चेतना की सामर्थ्य को पदार्थ में सन्निहित क्षमता से भी अधिक सामर्थ्यवान एवं उपयोगी सिद्ध करता है पुरातन भाषा में ब्रह्माण्डीय चेतना को परब्रह्म के नाम से और उसके वैयक्तिक अस्तित्व को आत्मा कहा जाता था। अब विज्ञान के लिए विश्व चेतना एवं व्यक्ति चेतना के अस्तित्व से इंकार करना उतना आसान नहीं रह गया जितना कि एक शताब्दी पूर्व था।
चेतना का क्षेत्र निस्सन्देह उससे भी कहीं अधिक समर्थता से भरा-पूरा है जितना कि अब तक पदार्थ जगत को जाना-पाया गया है। पदार्थ में मात्र शक्ति एवं क्रिया है, जबकि चेतना में कहीं अधिक ऊँचे स्तर की ऐसी क्षमता विद्यमान है जो पदार्थ को सदुपयोग में नियोजित कर सके। इतना ही नहीं, उसमें कुछ ऐसी विशेषताएं भी हैं जो व्यक्ति विचारणा, भावना, आस्था, आकाँक्षा को पाशविक प्रवृत्तियों से विरत करके उस उच्चस्तरीय भाव भूमिका में पहुँचा सके, जिसमें सज्जन, महामानव, सन्त-सुधारक, ऋषि, देवदूत एवं भगवान निवास करते हैं। कहना न होगा कि ऐसे व्यक्तित्व एवं संसार की सर्वोच्च विभूति कहलाते हैं। उनके आदर्शों का अनुकरण करके अनेकों को ‘महान’ बनने का उत्साह प्रकाश एवं श्रेय प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि धन, शस्त्र, शिक्षा-बल, कला आदि समस्त वैभव एक तराजू के पलड़े पर और महामानवों के व्यक्तित्वों को दूसरे पलड़े पर रखा जाए तो गरिमा सम्पदा की नहीं, सज्जनता, श्रेष्ठता कही सिद्ध होगी। संसार के इतिहास में से ईसा, जरथुस्त्र, मेजिनी, बुद्ध, गाँधी लिंकन कन्फ्यूशियस अरस्तू, कागाबा, विवेकानंद को निकाल दिया जाय तो फिर वह मात्र अनाथ असहाय भोंड़ी भीड़ का झुण्ड भर रहा जाता है। समय आ गया कि अब हम विशालकाय संयन्त्रों तथ्यों तक सीमित न रहें, उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ उत्पन्न करने के लिये प्रयास करें। उसके लिये विज्ञान के सहकार की नितान्त आवश्यकता है।
प्रकारान्तर से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि विश्व वसुधा में श्रेष्ठता संवर्धन के लिए अध्यात्म ओर विज्ञान का समन्वय सम्भव किया जाय। उत्कृष्टता की पक्षधर मान्यताओं, आकाँक्षाओं, उमंगों का उत्पादन कभी अध्यात्म तत्त्वज्ञान अकेला ही कर लेता था। उन दिनों साहित्य, संगीत कला आदि के सम्वेदनात्मक माध्यम पूरी तरह अध्यात्म का समर्थन सहयोग करते थे। आज जब पदार्थ ही सब कुछ है तो चिन्तन और चरित्र की पक्षधर आस्थाओं को अपनाने का उद्भव कैसे हो ? ये न उपजे तो विश्व व्यवस्था का सदाशयता सम्पन्न नवनिर्माण किस प्रकार सम्भव हो ?
इन प्रश्नों का उत्तर भी विज्ञान को ही देना होगा क्योंकि पुरातन अध्यात्म अपनी निजी दुर्बलताओं और अनास्थापरक प्रत्यक्षवादी प्रतिपादनों के कारण जराजीर्ण हो चुका। इससे वर्तमान परिस्थितियों में किसी चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती। इसका उपयोग तो इतना भर है कि वर्तमान खण्डहर को हटाकर पुरानी मजबूत नींव पर नये भवन का निर्माण कर दिखाया जाय। मरणासन्न धर्म को अमृत संजीवनी पिलाने का काम भी विज्ञान के हनुमान को करना होगा। यह उत्तरदायित्व उसी का है कि प्रस्तुत साधनों का उपयोग करने न केवल प्रशिक्षण प्रतिपादन के लिये उत्कृष्टता समर्थक वातावरण बनाये-साधन जुटायें वरन् ऐसे उपाय भी खोजे जिनसे काय कलेवर एवं मनःसंस्थान की रहस्यमय क्षमताओं को उभार कर सामान्यों को असामान्य बनाया जा सकना सम्भव हो सके।
वर्तमान उपेक्षा, असहकारिता-विग्रह की वृत्ति को हटाकर जब विज्ञान और अध्यात्म के मध्य सहयोग भरी रीति-नीति निर्धारित होती तो फिर समुद्र मन्थन जैसे सत्परिणाम की संभावना पुनः अपनी इसी धरती पर अवतरित होगी। ठण्डे और गरम तार के मिलने से बिजली का प्रवाह सभी देखा है। इन दो महाशक्तियों के मिलन और सम्मिलित प्रयासों की परिणति अपनी इस धरती के सुन्दर, सुव्यवस्थित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में जो योगदान देगी उसकी परिणति की कल्पना भर से देवयुग के दृश्य आँखों के सामने आ खड़े होते हैं और आशा भरी पुलकन उत्पन्न होती है।
महाभारत के युद्ध में कौरवों ने गुरु द्रोणाचार्य को सेनापति नियुक्त किया। द्रोणाचार्य पहले दिन का युद्ध बड़ी वीरतापूर्वक लड़े, परात विजय श्री अर्जुन के हाथों रही। यह देखकर दुर्योधन को बड़ी निराशा हुई। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गये और कहने लगे-’गुरुदेव। अर्जुन तो आपका ही शिष्य है। आप तो उसे क्षण भर में पराजित कर सकते हैं फिर यह देर क्यों ?
‘तुम ठीक कहते हो दुर्योधन कि अर्जुन मेरा शिष्य है और उसकी सारी विद्या से मैं भली-भाँति परिचित हूँ- गुरु द्रोणाचार्य ने कहा, किन्तु उसका जीवन कठिनाइयोँ से संघर्ष करने में बीता है और मेरा सुविधापूर्वक दिन बिताने में। विपदाओं ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया हैं।’ यदि सुलझे हुए दृष्टि कोण से विश्लेषण किया जाय तो विपत्तियाँ सहायक ही सिद्ध होती हैं।
सामान्यतया यह समझा जाता है कि मनुष्य का शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ होने में आहार-बिहार का और मानसिक दृष्टि से बुद्धिमान होने में शिक्षा व्यवस्था का हाथ होता है। आमतौर से दानों प्रकार की समर्थताएँ प्राप्त करने के लिए इसी प्रकार के उपाय भी अपनाए जाते हैं। शरीर को स्वस्थ सुदृढ़ बनाने की इच्छा होते ही पौष्टिक आहार एवं व्यायाम, संयम-ब्रह्मचर्य जैसे साधनों को जुटाया जाता है। स्वयं विद्वान बनने या स्वजन सम्बन्धियों को बुद्धिमान बनाने के लिए अध्ययन-अभ्यास का उपक्रम अपनाया जाता है। ज्ञान वृद्धि के लिए सत्संग, स्वाध्याय की और कला-कौशल की प्रवीणता के लिए अभ्यास, अनुभव का आश्रय लिया जाता है। यह उपयुक्त भी है और प्रचलित भी। इतने पर भी इस मार्ग में एक भारी असमंजस यह बना रहता है कि बहुतों की मूल प्रकृति ही कुछ विचित्र होती है और उन पर इस उत्कर्ष प्रयत्नों का काई कारगर परिणाम प्रस्तुत नहीं होता। मन्दबुद्धि, चंचल, उद्धत, अनगढ़ प्रकृति के ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जाते हैं जिन पर उपयुक्त शिक्षण का प्रभाव भी नगण्य जितना ही होता है। यही बात शारीरिक विकास के संदर्भ में भी है। कुछ बालक ऐसे होते हैं जिनकी लम्बाई, मोटाई अपनी निज विलक्षणताओं के साथ जुड़ी होती है। कई ठिगने दुबले शरीर वाले ऐसे होते हैं जिन्हें कुछ भी खिलाया या कराया जाय अपनी निजी विशेषता से बहुत अधिक आगे-पीछे नहीं हटते बढ़ते। साधनों की असमर्थता वहाँ भी प्रकट होती है जहाँ दरिद्र परिवारों के व्यक्ति भी लम्ब-तड़ंग और भारी-भरकम पाये जाते हैं जबकि साधन सम्पन्न परिवारों में जन्मे, पले व्यक्ति भी दुबले, ठिगने एवं शारीरिक दृष्टि से असमर्थ जैसी स्थिति में बने रहते हैं।
विकास साधनों की उपयोगिता आवश्यकता से कोई इन्कार नहीं करता। वे अपना काम करते हैं और करना चाहिए। इतने पर भी यह असमंजस अपने स्थान पर यथावत् ही बना रहता है कि मनुष्य की अपनी निजी विशेषता एक सुनिश्चित तथ्य जैसी बनकर भारी चट्टान की तरह अड़ी बैठी रहती हैं और बहुत हिलाने-डुलाने, उठाने-हटाने का प्रयत्न करने पर भी उत्साहवर्धक परिणाम उपलब्ध करने के मार्ग में बाधा ही बनी बैठी रहती है। देखा गया है कि शारीरिक और मानसिक विकास में मनुष्य की निजी विशेषता का असाधारण महत्व है। सुधार प्रयत्नों ने उस पर सीमित प्रभाव ही होता है और परिवर्तन भी यत्किंचित् ही हो पाता है। उदाहरण के लिए मनुष्य के चेहरे, रंग एवं कार्यशक्ति पर दृष्टिपात किया जा सकता है। अफ्रीका के नीग्रो, यूरोप के गोर, चीन के मंगोल, अरब के तगड़े, कांगो के बौने एकत्रित करके यह जाना जा सकता है कि उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति में भी भारी अन्तर पाया जाता है। चेहरा, नाक, आँख, होंठ, दाँत, बाल, नाखून जैसे अंगों को देखकर यह जाना जा सकता है कि यह भिन्नता उन समुदायों को निजी विशेषता है। इसका परिस्थितियों या साधनों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। काले नीग्रो, अमेरिका जैसे शीत प्रधान देश में गोरों के बीच बसते हुए भी अपने रंग और चेहरे को पीढ़ी-दर पीढ़ी यथावत बनाये रहते हैं। इसी प्रकार गोरे लोग दक्षिण अफ्रीका जैसे गर्म क्षेत्र में शताब्दियों से बसे होने पर भी काले नहीं हुए। उनकी सन्तानें गोरे रंग की तथा माँ-बाप जैसे चेहरों की होती हैं जबकि पड़ौस में बसे मूलनिवासी अपने काले रंग, घुँघराले छोटे बाल, चौड़ी नाक, मोटे होंठ जैसी विशेषताएँ यथावत बनाए रहते हैं। सन्तानें इसी प्रकार उत्पन्न होती रहती हैं।
इससे प्रतीत होता है कि प्रान्त, क्षेत्र वातावरण आदि का प्रभाव मनुष्य की शारीरिक स्थिति पर उतना नहीं पड़ता जितना कि वंश परम्परा का। पख्तूनिस्तान के पठान बंगाल में बस जाने पर भी प्रायः वैसी ही पीढ़ियों बनाये रहते हैं और दुबले बंगाली पख्तूनिस्तान में बस जाने पर भी अपने वंशजों के काय-कलेवर में कोई विशेष परिवर्तन कर नहीं पाते।
यही बात बौद्धिक संरचना के सम्बन्ध में भी है। मारवाड़ी, बंगाली, द्रविड़, केरली, ब्राह्मण, कायस्थ, आदिवासी जैसे वंशजों के चिन्तन, स्वभाव, कौशल,स्वर, चातुर्य आदि पर एक विशेष आवरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है, पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।
एक ही पेड़ पर रहने वाले, एक ही वातावरण में पलने वाले, एक जैसा आहार करने वाले पक्षियों की आकृति और प्रकृति का अन्तर स्पष्ट देखा जा सकता है। पशुओं, पक्षियों से लेकर कृमि-कीटकों तक के अगणित प्राणी, पास-पड़ौस में बसते और एक ही प्रकार के साधनों पर निर्भर रहते हुए भी अपनी मौलिक विशेषताएं बनाये रहते हैं और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलाते रहते हैं। इसे वंश-परम्परा कहते हैं।
वंश परम्परा की चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि अगले दिनों मानवी विकास के लिए किये जाने वाले प्रबल प्रयत्नों में यही कठिनाई सबसे अधिक आड़े आयेगी कि परम्परागत आकृति एवं प्रकृति में हेर-फेर कैसे किया जाय? धीमी गति से यत्किंचित् सुधार होते चलने की प्रतीक्षा करते रहना अब इस प्रगति युग में संभव नहीं। न इतना धैर्य है और न इतना अवकाश अवसर कि वंश परम्परा के साथ जुड़ी हुई विशेषताओं में क्रमिक परिवर्तन की आशा लगाये बैठा रहा जाय और सुधार प्रयत्नों से होने वाले अत्यन्त धीमे परिवर्तन पर संतोष किया जाय?
विकासवाद के अनुसार प्राणियों को आदिम काल से लेकर अर्वाचीन परिणति तक पहुँचने में लाखों वर्ष लगे हैं और उतार-चढ़ावों से होकर गुजरना पड़ा है। यह प्राणियों की मनःस्थिति और प्रकृतिगत परिस्थितियों के तालमेल का परिणाम हुआ। अब इसमें एक कड़ी प्रशिक्षण की-सुधार प्रयत्नों की और जोड़ी जा सकती है जो प्राणि-विकास के भूतकाल में नहीं जुड़ सकी। इतने पर भी प्राणियों की अपनी निजी विशेषता इतना हठीली है कि उसे द्रुतगति से बदल जाने और समय के माँग को पूरा कर सकने के लिए सहमत करना नितान्त कठिन है। अन्य प्राणियों की आकृति-प्रकृति में अन्तर हो सकता हो तो उनके स्वयं के लिए तथा विश्व-व्यवस्था के किए कितना उपयुक्त होगा? उस प्रसंग को छोड़ दे तो भी मानवी प्रगति की जो आकुल-व्याकुल आवश्यकता समझी जा रही है, उसकी पूर्ति में प्रधान अवरोध वंश-परम्परा की हठवादिता ही सबसे बड़ा कारण है जिसके कारण प्रशिक्षण और साधन का प्रबंध करने पर भी अभीष्ट सफलता मिलती दिख नहीं रही है।
मानवी प्रकृति के चार अंग है-(1) कायिक बलिष्ठता (2) मानसिक कुशाग्रता (3) मान्यताएं एवं आदतें (4) आकाँक्षाएं एवं सम्वेदनाएँ। सुधार प्रयत्नों से इन चारों विभूतियों में कुछ भी सुधार नहीं हो सकता ऐसा तो नहीं कहना चाहिए। तो भी इतना तो मानना ही होगा कि वंश परम्परा से चली आ रही निजी विशेषताओं में आवश्यक हेर-फेर किए बिना सुधार प्रयत्नों में सीमित प्रगति ही संभव हो सकेगी और उसकी गति बहुत ही धीमी होगी। खासतौर से तब, जबकि उपरोक्त विशेषताओं को एक साथ विकसित करके नवयुग के अनुरूप समान व्यक्तित्व सम्पन्न, परिपूर्ण, सुविकसित, समर्थ, समुन्नत एवं सुसंस्कृत मनुष्य समाज के विनिर्मित करने की आवश्यकता अनुभव की जा रही हो।
इस संदर्भ में विज्ञजनों का ध्यान इस तथ्य पर गया है कि नवयुग के अनुरूप समुन्नत मनुष्य की पीढ़ियाँ विकसित करने के लिए उसकी मौलिक संरचना एवं विशेषता का द्वार खटखटाया जाय और उस मर्म स्थल में हेर-फेर करके वह मार्ग निकाला जाय जिससे व्यक्तित्व के मर्मस्थल को सुधारना और मौलिक विशेषताओं से युक्त मनुष्य काक निर्माण संभव हो सकेगा। घटिया पीढ़ियां इन दिनों शिक्षा और स्वास्थ्य संवर्धन के प्रयासों को निरर्थक बना रहा है। पर यदि अगले दिनों बढ़िया व्यक्तित्व ढल सके तो भविष्य में उनकी पीढ़ियां समुन्नत स्तर की बनती चली जाएँगी। तब उनके लिए न तो सुधार शिक्षण को भारी प्रयत्न करने होंगे और न प्रगति प्रवासों के असफल होते रहने का रोना, रोना पड़ेगा।
कुछ समय पूर्व यह माना जाता था कि मनुष्य की निजी विशेषताएँ ईश्वर प्रदत्त हैं, वे भाग्य-विधान, या पूर्व संचित संस्कारों के कारण पल्ले बँधी होती है और उन्हें बदल सकना मनुष्य के बस से बाहर है। तब इस क्षेत्र के परिवर्तन के लिए किसी दैवी शक्ति के अनुग्रह से ही गुत्थी सुलझने की आशा की जाती थी। व्यक्ति का परिवर्तन, पीढ़ियों का समुन्नतिकरण यों अभीष्ट तो सदा से रहा है और उसके लिए यथा संभव प्रयत्न भी चला है। इतने पर भी परिणाम की दृष्टि से प्रायः निराश जैसा ही होना पड़ा है। प्रयत्नों की असफलता को दैवी दुर्विपाक मानकर मन समझाने और असंतोष करने के अतिरिक्त उन दिनों और काई चारा था भी नहीं।
अब परिस्थितियों में भारी अन्तर हुआ है। वंश परम्परा को विधि-विधान मानते रहने की अपेक्षा अब मनुष्य के हाथ में ऐसे सूत्र लग गए हैं जिनसे यह विश्वास बँधा है कि मानवी व्यक्तित्व के हर क्षेत्र में परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वंश-परम्परा के उद्गम स्रोतों को ढूँढ़ निकालने में अब सफलता मिल गई है। तद्नुसार यह योजना बन रही है कि भावी पीढ़ियों का इच्छित निर्माण उन मर्मस्थलों में परिवर्तन करने से सम्भव हो सकेगा जो व्यक्ति की आकृति एवं प्रकृति को गढ़ने के लिए मूलतः उत्तरदायी है।
वंश परम्परा को अब शाप, वरदान, भाग्य या अपरिवर्तनीय तथ्य नहीं माना जाता वरन् उसे एक ऐसा प्रवाह माना जाता है जो शुक्राणुओं और डिम्बाणुओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहता चला जाता है यह प्रवाह जटिल भी और हठी भी। फिर भी यह गुँजाइश विद्यमान है कि उसमें प्रयत्नपूर्वक परिवर्तन किया जा सकता है और प्रवाह की पुरातन दिशाधारा को उलटकर उसे अभीष्ट दिशाधारा में बह चलने के लिए सहमत किया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि वंश परम्परा के कारण स्वास्थ्य, कौशल, स्वभाव आदि की जो शारीरिक, मानसिक एवं अन्तःकरण परक जो परिस्थितियाँ वर्तमान पीढ़ी के गले बँधी हुई हैं उन्हें उतारा जा सकता है साथ ही उनमें ऐसा सुधार समावेश किया जा सकता है जो भविष्य के समुन्नत मनुष्य के लिए अभीष्ट आवश्यक समझा गया है।
प्रजनन का उत्तरदायित्व वहन करने के लिए भूतकाल में मात्र शुक्राणु और डिम्बकीट के सम्मिलन को श्रेय दिया जाता रहा है। पर अब उसके भीतरी अति सूक्ष्म एवं अति समर्थ घटकों का पता चला है जिन्हें ‘गुण सूत्र’ कहा जाता है। भूतकाल में पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु थी। पर अब उसके अन्तराल में उनके लघुकाय घटक ढूँढ़ निकाले गए हैं। इन्हें इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रोन, पाजिट्रान आदि नामों से जाना जाता है । ठीक इसी प्रकार अब प्रजनन घटक शुक्राणु-डिम्बाणु नहीं रहे वरन् उनके भीतर पाये जाने वाले अत्यन्त सूक्ष्मघटक ‘गुणसूत्र’ न केवल प्रजनन के वरन् वंश परम्परा के साथ लिपटी हुई अनेकानेक क्षमताओं एवं विशेषताओं को हस्तान्तरित करने वाले माने गये हैं।
यों यह ‘गुण सूत्र’ शरीर की समस्त कोशिकाओं में निहित है, पर प्रजनन कृत्य को सफल बनाने में शुक्राणुओं और डिम्बाणुओं में पाये जाने वाले घटक ही तात्कालिक भूमिका का निर्वाह करते हैं। इनके अन्तराल में न केवल नई सन्तान की आकृति वरन् प्रकृति भी घुली होती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी पानी की लहर की तरह आगे-आगे बढ़ती जाती है। इन गुण सूत्रों के साथ संरचना करने वाले रासायनिक पदार्थ तो रहते ही है साथ ही एक ऐसा अदृश्य विद्युत प्रवाह भी घुला रहता है जिसमें पूर्व पीढ़ियों के अनेकानेक रहस्य सभी कायिक, मानसिक विशेषताएँ जुड़ी रहती है। इन गुण सूत्रों में पितृ-पक्ष और मातृ-पक्ष दोनों का सम्मिश्रण रहता है। न केवल पिता, दादा, परदादा सरदादा आदि की वरन् माता, नानी, परनानी, सरानानी आदि कितनी ही पूर्व पीढ़ियों की विरासत सन्निहित रहती है। आवश्यक नहीं कि वे सभी विशेषताएँ एक साथ नई संतान में प्रकट हों वरन् अनुकूलता के अनुरूप उनमें से कुछ विशेषताएँ संतान में प्रकट होती हैं और कुछ फिर किसी आयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में चुपचाप पड़ी रहती है। इनके प्रवाह में हर नई पीढ़ी के अनुभव अनुदान जुड़ते चले जाते हैं। आदि मानव की तुलना में अर्वाचीन पीढ़ी में पाये जाने वाले गुण सूत्र अत्यधिक विकसित है। उनके साथ एक के बाप दूसरी पीढ़ी के अनुदान जुड़ते चले आये है और सब मिलाकर स्थिति इतनी साधन सम्पन्न बन गई है कि उनमें पाये जाने वाले पक्षों में यदि उपयोगी का भेद एवं उपयोग करना संभव हो सके तो हर स्तर की संतति उत्पन्न कर सकना भी सरल सिद्ध हो सकता है।
गुणसूत्र की संरचना एवं व्याख्या विवेचना काफी जटिल है तो भी मोटी जानकारी के रूप में वंशानुक्रम के विद्यार्थी भी सामान्य ज्ञान से सम्बन्धित कुछ जानकारियाँ प्राप्त कर लेते हैं। इस प्राथमिक परिचय में जो सिखाया जाता है उसका साराँश यह है कि-”मानव जीवन के विधायक कुछ उत्पादन तत्व होते हैं, उन्हें बीजकोष कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की बीजकोष अपने विशिष्ट गुणों से युक्त होते हैं। इन्हीं विशिष्ट गुणों को लेकर बालक जन्म लेता है। किसी भी व्यक्ति के गुण उसके जनक माता और पिता पर ही आधारित नहीं हैं, वरन् उसके दादा, परदादा और पूर्वजों से भी संक्रमित होकर आते हैं।”
“प्रत्येक सेल में वंशसूत्र (क्रोमोसोम्स) कुल 46 होते हैं जिनमें से 23 शुक्र (पिता) एवं 23 अण्डकोष (माता) से आते हैं। इन 46 में से 44 ओटोजोम्स (शरीर निर्माण सम्बन्धी) एवं 2 सेक्स क्रोमोसोम्स (लिंग निर्धारण सम्बन्धी) होते हैं। ग् मादा का एवं ल् नर का प्रतीत माना जाता है। ग्ल् का संयोग लड़के को एवं ग्ग् का संयोग लड़की को जन्म देता है।”
“माता और पिता के 23-23 वंश सूत्रों के जीन्स (पित्रैकों) का फ्यूजन एक रासायनिक क्रिया के रूप में होती है। यही रासायनिक संयोग के वंशानुगत गुणों का विधायक होता है। परीक्षण यही बताते हैं कि व्यक्ति की शारीरिक विशेषताएँ जैसे रंग, रूप, लम्बाई, स्वास्थ्य आदि पित्रगत होते हैं साथ ही मानसिक, चारित्रिक एवं स्वभाव जन्य विशेषताओं में भी बहुत कुछ समानता पाई जाती है।”
यही घटक वे जीवन तत्व है जो ने केवल नई पीढ़ियाँ विनिर्मित करते हैं वरन् उन्हें पूर्वजों की चिर संचित शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक बहुमूल्य सम्पदाओं के रूप में उन्हें हस्ताँतरित भी करते रहते हैं। नई पौध किस स्तर की हो इस संदर्भ में इसी बीज को संभालने-सुधारने की आवश्यकता पड़ेगी। खेत में क्या उगाना है यह निश्चय करने के उपरान्त सर्वप्रथम उसके लिए उपयुक्त बीज की तलाश करनी पड़ती है। यह ठीक है कि खाद-पानी की सहायता से बीज को अंकुरित, विकसित एवं फलित होने का अवसर मिलता है। किन्तु साथ ही यह भी निर्विवाद है कि जो बोया जायेगा वही उगेगा। वृक्ष का स्वरूप और वैभव उसी स्तर का होगा जो कि बीज था। अतएव नव निर्माण में उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों की फसल उगाने और उससे विश्व-वसुधा का भंडार भरने की योजना बनाते समय ध्यान इस बात पर भी केन्द्रित करना होगा कि उसके लिए उपयुक्त स्तर के बीज की व्यवस्था की जाय। अच्छी फसल उगाने के लिए बीज भंडारों का दरवाजा खटखटाया जाता है। अच्छी नस्ल उत्पन्न करने के लिए परिपुष्ट नर ढूंढ़े जाते हैं। नवयुग की संरचना में अग्रगामी भूमिकाएँ प्रस्तुत कर सकने वाले महामानवों की पौध उगाने के लिए भी उच्चस्तरीय गुण सूत्रों की तलाश करनी पड़ेगी। वे प्रस्तुत न मिलें तो फिर जो है उन्हीं को इस स्थिति तक परिष्कृत करना होगा कि अभीष्ट पीढ़ियों का निर्माण संभव हो सके।
यह जीवन समुद्र यात्रा की भाँति है जिसमें हम सभी एक ही संकुचित नौका में परस्पर मिलते हैं। मृत्यु तट पर पहुँचने के समान है जहाँ हम सभी अपने-अपने लोक को चले जाते हैं। मृत्यु जो कि शाश्वत सत्य है, क्रान्ति है और जन्म तथा जीवन धीरे-धीरे और स्थिर रूप से होने वाला विकास है। मनुष्य की उन्नति के लिए स्वयं जीवन जितना आवश्यक है उतनी ही आवश्यक क्रान्ति है।
कुछ थोड़ी-सी विशेषताएँ ऐसी होती हैं जिनके बिना समय तो कट सकता है, पर आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं। प्रगतिशीलों का पर्यवेक्षण करने पर उनमें कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ पाई हैं जिनने उन्हें सामान्य परिस्थितियों से घिरे होते हुए भी आगे बढ़ाया और आश्चर्यजनक उपलब्धियों का अधिकारी बनाया। जिनमें उनकी कमी रही वे सुविधा सम्पन्न होते हुए भी गई-गुजरी स्थिति में पड़े रहे और उपलब्ध अवसरों को एक-एक करके चूकते चले गये।
ऐसी विशेषताओं में सर्वप्रथम है-जागरुकता। इसका अर्थ है अपनी हर गतिविधियों पर कड़ी निगाह, हर समय मुस्तैदी फुर्ती का होना। न वर्तमान को अधिक अच्छा बनाने के सम्बन्ध में लापरवाही बरती जाय और न भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाले साधनों के उपार्जन में शिथिलता अपनायी जाय। अपने भीतर भी अनेकों छिद्र हो सकते हैं। कार्य पद्धति को अधिक परिष्कृत करने के लिए बहुत कुछ सोचने, खोजने एवं सुधारने की आवश्यकता बनी रहती है। यह एक दिन का प्रसंग नहीं, आये दिन अच्छे से बेहतर, बेहतर से सर्वोत्तम की प्राप्ति के लिये प्रयत्नरत रहना होता है। इस प्रयास में जागरुकता की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। सतर्कता ही, सुधार-परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाती है और उसी अवलम्बन के सहारे आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
दूसरी अनिवार्यता है परिश्रम और मनोयोग का उत्साह भरा समन्वय। जिसके स्वभाव में इनका समावेश हो जायेगा, उसके प्रयत्न उथले न होंगे। चंचल चित्त, अस्थिर मति किसी प्रसंग की गहराई में नहीं उतरते और उथले चिन्तन, उथले प्रयासों में बन पड़ने वाले छुटपुट क्रिया-कलापों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। उतावले उतने होते हैं कि हाथों हाथ फल न मिले तो ऊबने लगते हैं। परिणामों की आतुरता में न कठोर परिश्रम ही करते बनता है और न तन्मयता भरा मनोयोग ही एकाग्र होता है। ऐसी दशा में वे लाभ किस प्रकार मिले जो अनवरत श्रम, उत्साह भरे मनोरोग एवं लम्बे समय तक टिके रहने वाले धैर्य की कीमत पर ही खरीदे जाते रहे हैं। इस मनोयोग को प्रकारान्तर से तल्लीनता की साधना भी कहा जा सकता है। जिस भी काम को हाथ में लिया जाय उसे मेहनत पूर्वक, पूरा मनोयोग लगाकर काम में रस लेते हुए जब सम्पादित किया जाने लगेगा तो जो परिणाम निकलेंगे उन्हें चमत्कारों की सत्ता दी जा सकती है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात है उत्तरदायित्वों को समझना उन्हें निभाना। यह मनुष्य के भारी भरकम होने के चिन्ह हैं। व्यक्तित्व की प्रौढ़ता-परिपक्वता इसी आधार पर आँकी जाती है। किसी काम में हाथ डाल देना-कुछ भी घोषणा कर देना और किसी भी पद पर जा बैठना एक बात है और जो सम्भाला गया है, उसे पूरा कर दिखाना दूसरी। सफलता-असफलता में अन्य बातें उतनी बाधक नहीं होतीं जितनी कि लापरवाही और गैर जिम्मेदारी। कन्धे पर आये हुए उत्तरदायित्वों से इस या उस बहाने बचना बुरी बात है। जो उठाया गया है-उसे बहन भी करना चाहिए। काम को पूरा करना और खूबसूरती के साथ पूरा करना, यह मनुष्य की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। जो इसे समझते हैं और अपने प्रयासों में कमी नहीं आने देते, वे असफल रहने पर भी सफलों की श्रेणी में गिने जाते हैं। निन्दा असफलता की उतनी नहीं होती जितनी गैर जिम्मेदारी और लापरवाही की।
जोखिम उठाने का उत्साह रहना प्रगतिशीलता का अगला महत्वपूर्ण चिन्ह है। दौड़ने में ठोकर लगने और पिछड़ने पर भद्द पिटने का खतरा तो रहेगा ही। जो इसी पक्ष को बढ़ा-चढ़ा कर सोचते हैं उन पर हमेशा दब्बूपन, भय, संकोच ही चढ़ा रहता है फलतः यथा स्थिति ही उन्हें संतोषजनक लगती है। प्रगतिपथ न तो सरल है और न सुनिश्चित है, उसमें जोखिम भी है। इतने पर भी जिन्हें श्रेय की गरिमा से लगाव है वे खतरे उठाकर भी उस मार्ग पर चलते हैं। तैराक, पर्वतारोही, सरकस के कलाकार आये दिन खतरे उठाते और अपने पराक्रम का परिचय देते गौरवान्वित होते देखे गये हैं। इसी शौर्य साहस को जो जीवनोत्कर्ष की योजनाओं को पूर्ण करने में नियोजित करते हैं, उनकी प्रतिभा निखरती और गरिमा बढ़ती है, भले ही अभीष्ट सफलता में विलम्ब या व्यतिरेक ही क्यों न उत्पन्न होता रहे।
अगली प्रमुख अड़चन प्रगतिशीलता के मार्ग में है-प्रलोभनों, आकर्षणों और दबावों से विचलित हो उठना और सदुद्देश्य से पैर पीछे हटा लेना। महानता का मार्ग चुनने वालों के लिए यह अशोभनीय है। व्यापार में हानि लाभ को देखते हुए नई नीति अपनाने में हर्ज नहीं किन्तु जहाँ तक चरित्र का-सदुद्देश्यों में संलग्नता का प्रश्न है-वहाँ उस दुर्बलता की भर्त्सना ही की जायगी। प्रगतिशील ऐसी द्विविधा आने पर दृढ़ता का परिचय देते हैं और उस नीति को नहीं बदलते जो आदर्शों और सिद्धान्तों पर अवलम्बित है। जीवट के नाम से इसी सत्प्रवृत्ति को सराहा जाता है।
सज्जनता और प्रगतिशीलता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। दुराग्रही और उद्दण्ड भी डरा धमका कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। इतने पर भी उन्हें न साथियों का सम्मान मिल सकता है और न भावभरा सहयोग। इस अभाव में साधनों की सफलता तो मिल सकती है किन्तु वह प्रगतिशीलता हस्तगत नहीं होती जो व्यक्तित्व को गरिमा सम्पन्न बनाती और सर्वतोमुखी प्रतिभा उभारने में काम आती है। सद्भाव सम्पादन एक ऐसा लाभ हैं जिसे जितना उपार्जित किया जा सके उतना ही श्रेयस्कर है। उसके आधार पर न केवल सफलता का पथ प्रशस्त होता है वरन् गरिमा एवं क्षमता भी बढ़ती चली जाती है। इसके लिए कुछ अतिरिक्त रूप में सीखना नहीं पड़ता वरन् स्वभाव में विनय और व्यवहार में दूसरों के प्रति सम्मान का समावेश करने भर से काम चल जाता है। इतनी कम पूँजी में इतना अधिक लाभ उपार्जित करने का और कोई आधार नहीं है जितना कि सज्जनोचित व्यवहार के फलस्वरूप उत्पन्न होता है।
सर्वतोमुखी प्रगति की यही रीति-नीति है। व्यक्तित्व निर्माण एक पुरुषार्थयुक्त कला-कौशल है। उपरोक्त सिद्धान्त तो शाश्वत है एवं प्रकारान्तर से कई रूपों में जनमानस उनसे अवगत भी है, पर इसे सही रूप में अपने ऊपर उतारने के लिए जो अध्यवसाय करना होता है, समय-समय पर आत्म समीक्षा करके अपने को ‘एलर्ट’ बनाना होता है। उसे अधिकाँश व्यक्ति भूल जाते हैं। अध्यात्म के इस पहले चरण ‘व्यक्तित्व निर्माण’ को सही ढंग से समझ कर अपने जीवन रथ को प्रगति पथ पर दौड़ा सकना सम्भव है।
एक छोटा-सा कुत्ता अपने पूरे वेग से गाड़ी के साथ दौड़ा जा रहा था। वह जी तोड़ दौड़ रहा था। हिजहाइनेस आगाखाँ का घोड़ा भी डर्नी की दौड़ में इससे तेज और क्या दौड़ता रहा होगा ?
तीन पल में वह पिछड़ गया। और अब वह धीरे-धीरे लौट कर फिर अपने मालिक के खाट के पास जा बैठा। रोज ही गाड़ी अपने पर उसके साथ दौड़ता है रोज हारता है, पर शर्म से डूब नहीं मरता, निर्लज्ज कहीं का ?
रोज-रोज की पराजय से जिसकी आँखों में समाया विजय का स्वप्न और पैरों में उमड़ा अभियान का संकल्प परास्त नहीं होता। वह कुत्ता हो या किसी राष्ट्र का सिपाही क्या एक प्रेरक चरित्र का संरक्षक नहीं है ?
पृथ्वी के धरातल पर सब कुछ सामान्य है। जितना ऊँचा उठना होगा अन्तरिक्ष विचरण में उतना ही आनन्द मिलेगा। जमीन पर पड़े खड़े होने वाले को इर्द-गिर्द की चीजें ही दीखती हैं। पर पहाड़ की चोटी पर खड़ा या वायुयान पर चढ़ा व्यक्ति दूर-दूर तक के क्षेत्र का पर्यवेक्षण कर सकता है। यह आँखों की विशेषता नहीं, ऊँचाई पर पहुँचने पर सहज ही मिलने वाली विशालता की उपलब्धि है।
जमीन पर धूलि उड़ती, धुँध छाई और गर्मी अनुभव होती है, पर यदि कुछ ऊँचाई पर पहुँचा जाय तो इनमें से एक भी गड़बड़ी शेष नहीं रह जाती। सब कुछ साफ स्वच्छ दिखता है। मैदानी इलाकों की अपेक्षा पहाड़ों पर रहने वाले अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ रहते हैं। गर्मी के दिनों में साधन सम्पन्न लोग पहाड़ी स्थानों पर चले जाते हैं। शीतलता अनुभव करते और स्वास्थ्य लाभ करते हैं। यह ऊँचा चढ़ने का चमत्कार है। सर्वविदित है कि जितना ऊँचा उठा जायगा उतनी ठण्डक मिलेगी। जीवन क्रम में उत्कृष्टता की दिशा में उठना व्यक्तित्व का मूल्य बढ़ाता और सुख-शाँति प्राप्त करता है।
पृथ्वी की एक सीमा तक ही वायुमण्डल है और थोड़ी दूर तक गुरुत्वाकर्षण। उस परिधि को पार कर लेने पर राकेट अन्तरिक्ष में पहुँचकर अपने को भार रहित स्थिति में पाते हैं। इतना ही नहीं वे बिना किसी ईंधन की सहायता के अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करने लगते हैं। धरातल पर थोड़ी-सी दूर चलना भी कठिन पड़ता है और वाहनों को गति देने के लिए ईंधन का प्रबन्ध करना पड़ता है किन्तु ऊँचा उठ जाने पर ऐसे किसी अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता। अवरोध, विग्रह और संकट नीचे के स्तर पर रहने वालों को ही हैरान करते हैं। ऊँचे पर खड़े होने वाले पर नीचे से फेंके गये पत्थर पहुँचते ही नहीं, वरन् उलटकर उसी के सिर पर गिरती हैं। जबकि नीचे खड़े या गड्ढे में गिरे व्यक्ति पर एक बच्चा भी पथराव करके कचूमर निकाल सकता है। प्रकृति के यही सिद्धान्त मानव जीवन की अगति-अवगति पर भी लागू होते हैं।
परिधियों के पार करने में ही प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। थोड़ा ऊँचा उठ जाने पर तो सर्वत्र आनन्द और सन्तोष ही शेष रह जाता है। राकेट ऊपर उछालते समय भारी शक्ति नियोजित करनी पड़ती हैं। आवाज भी होती है और खतरा भी रहता है। पर जैसे ही निचली परिधि से आगे उठ सकना सम्भव हुआ कि सब कुछ सरल ही सरल बन जाता है। राकेटों से लेकर मनुष्यों तक को एक ही तरह का अनुभव होता है।
पृथ्वी से 95 मील की ऊँचाई तक वायुमण्डल की सामान्य प्रकृति में विशेष अन्तर नहीं आता। इससे ऊपर सूर्य वायु के अणुओं को परमाणुओं में-आक्सीजन को ओजोन में तोड़ने की प्रक्रिया द्वारा ही दिन रात गर्म किये रहता है।
अन्तरिक्ष में एक स्थान वह आता है जहाँ वायु अत्यधिक विरक्त हो जाती है। वहाँ की गर्मी को तेज गर्मी कहने की अपेक्षा “विकिरण की अवशोषण” क्रिया कहना अधिक उपयुक्त है। अर्थात् वायु प्राणभूत होती रहती है। सूर्य की ऊष्मा एक तरह से यहीं वायु कणों में सवारी करती है।
ऊँचाई की स्थिति ही ऐसी है जहाँ जैसे देवताओं को अपने अनुदान अधिक मात्रा में देने का अवसर मिलता है। हलकी-फुलकी स्थिति ही उसे अवधारण भी कर सकती है।
स्वर्ग कहाँ है ? इसका उत्तर ऊपर उँगली उठाकर ऊपर आसमान की ओर इशारा करके ही दिया जाता है। ईश्वर कहाँ रहता है इसका उत्तर भी ऊपर की ओर देखने से मिलता है। ऊर्ध्वगमन, ऊर्ध्वरता, उत्थान, उत्कर्ष आदि शब्दों में ऊपर उठने का ही संकेत है। सद्गति के - उन्नति के यही चिन्ह हैं। इस सबके पीछे एक ही मर्म है - उत्कृष्टता अपनाना। सामान्य लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण, क्रिया-कलाप एवं इच्छा आकाँक्षाओं की अपेक्षा अपना स्तर ऊँचा रखना। इसी को सन्त परम्परा कहते हैं। महामानव इसी रीति-नीति को अपनाते हैं। आत्मबल-सम्पादन, ईश्वर का अंचल ग्रहण इसी कसौटी पर परखा जाता है कि व्यक्ति नर-पशुओं जैसी संकीर्ण-स्वार्थपरता अपनाए हुए है या आदर्शवादी उत्कृष्टता का परिचय दे रहा है।
पृथ्वी के ऊपर पाये जाने वाले अयन मण्डल की अनेकानेक विशेषताएँ हैं। ऐसी जिन्हें चमत्कारी विभूतियाँ या उच्चस्तरीय विशेषताएँ कह सकते हैं। पृथ्वी वाले उनकी कल्पना ही कर सकते हैं यदि उस क्षेत्र में पहुँचने का और आँखें पसार कर देखने का अवसर मिल सके तो किसी अद्भुत लोक में जा पहुँचने की ही अनुभूति उसे होगी। चमत्कारों की कल्पनाएँ करने वाले - देवलोक की अलौकिकताओं के संबंध में जिनने कुछ सुना-पढ़ा है वे उस क्षेत्र को लगभग मिलता-जुलता ही अनुभव कर सकते हैं। ऊँचाई अपने आप में चमत्कार है। उस दिशा में जो जितना उठता है उसे अपनी मनःस्थिति ही नहीं बाहर का परिस्थिति भी जादुई, प्रसन्नतादायक एवं उल्लास भरी अद्भुत दिखाई पड़ती है।
अयन मण्डल-आयनोस्फियर केवल सूर्य की ही अतिबैंगनी किरणों के प्रभाव को कम नहीं करता, अपितु अन्य ग्रह-नक्षत्रों और तारों से जो प्रकाश और उनका विकिरण पृथ्वी की ओर प्रवाहित करता है, उसे भी संशोधित करता रहता है। परन्तु ‘आयनोस्फियर’ अधिकाँशतः सूर्य से प्रभावित होते हैं। उन पर सूर्य के द्वारा प्रक्षेपित किरणों के प्रभाव से ही ऋतुओं के परिवर्तन होते हैं। ये प्रभाव कभी कम और कभी अधिक होते हैं।
आयनोस्फियर के मुख्यतः चार स्तर होते हैं। इन स्तरों को वैज्ञानिकों ने डी, ई, एफ-वन और एफ-टू अक्षरों द्वारा सम्बोधित किया है। डी क्षेत्र केवल दिन के समय बनता है। पृथ्वी की सतह से इसकी ऊँचाई 35 से 45 मील ऊपर तक है। ‘ई’ क्षेत्र अधिक अयनीकृत है। यह 45 से 70 मील ऊपर तक है। इसके 120 मील ऊपर तक एफ-वन स्तर है और 250 मील की ऊँचाई तक एफ-टू। एफ-टू सबसे ज्यादा अस्थायी होता है और यह सर्दियों के मौसम में एफ-वन स्तर से मिलकर एक रूप हो जाता है।
सूर्य से निःसृत होने वाली शक्तिशाली किरणों में कुछ अदृश्य किरणें ऐसी भी होती हैं, जिनसे हमारी चमड़ी का रंग बदल सकता है। इन अदृश्य किरणों को परा बैंगनी किरणें कहा जाता है। यदि ये अधिक मात्रा में आने लगें तो शरीर निष्प्राण भी हो सकता है। अयन मण्डल इन किरणों के घातक प्रभाव को ऊपर ही रोक लेता है।
आयनोस्फियर की उपस्थिति पृथ्वी के ऊपरी धरातल पर रेडियो-तरंगों के प्रसारण का कारण है। इसके कारण दूसरे अन्य ग्रहों के प्रभाव पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाते। सूर्य में होने वाले परिवर्तनों का इस अयन-मण्डल (आयनोस्फियर) पर भी प्रभाव पड़ता है। सूर्य की अल्ट्रावायलेट विकिरण तथा विद्युत प्रभावित कणों की शक्तिशाली धाराएँ, जो सूर्य के ऊपरी धरातल से तेजी से निकल रही हैं, उस समय, जब सूर्य पर कोई परिवर्तन होते हैं, हलचलें होती हैं तो उसका प्रभाव अयन मण्डल के कवच को प्रभावित करता है। उस समय पृथ्वी का वातावरण अचानक बदलने लगता है, उस समय पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में चुम्बकीय तूफान, अयन मण्डल में जलजलाहटें तथा रेडियो सम्बन्धों के कटाव होते हैं। इसी समय मध्यरात्रि में अक्षाँशों तक में ध्रुवीय आभाएं विचित्र प्रकाश रश्मियाँ आदि देखे जाते हैं।
पृथ्वी के ऊपरी वातावरण की परिस्थितियों के देखने से लगता है यह पृथ्वी को अनिष्ट से बचाने वाला छाता तथा अनेकानेक उपयोगी अनुदान बरसाने वाला मेघ मण्डल है। सूर्य को -अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों को धरती निवासियों के लिए अनेकों अनुदान भेजने का माध्यम यह आयनोस्फियर ही है।
मनुष्य जीवन को भूलोक माना जाय तो उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही - उसका आयनोस्फियर है। उसकी सहायता से ही सुरक्षा और प्रगति - शान्ति और समृद्धि के बहुमुखी उद्देश्य पूरे होते हैं।
अनेक काय कलेवर में मनुष्य रक्त, माँस मज्जा और हड्डियों का समुच्चय मात्र दिखता है। विज्ञान भी अपने अध्ययन एवं विश्लेषण द्वारा इन्हीं की जानकारी देता है। अधिक से अधिक यह कहकर चुप हो जाता है कि शरीर के भीतर कोई चेतना काम कर रही है जो समस्त शारीरिक हलचलों का कारण है। आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार काया तो स्थूल भाग है जिसकी सामर्थ्य सीमित है और सीमित ही प्रयोजन पूरा कर पाती है। शरीर के भीतर ही एक अदृश्य सूक्ष्म शरीर निवास करता है जिसके भीतर एक से बढ़कर एक संभावनाएं भरी पड़ी है। सन्निहित सुषुप्त सूक्ष्म शक्ति संस्थानों का जागरण यदि सम्भव हो सके तो मनुष्य असाधारण शक्ति का स्वामी बन सकता है और इन अतीन्द्रिय सामर्थ्यों के जागरण से वे कार्य भी सम्पन्न किए जा सकते हैं जो विज्ञान की दृष्टि में असम्भव प्रतीत होते हैं।
किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों के जीवन में ये क्षमताएँ अनायास प्रकट हो जातीं और ऐसे कारनामे कर गुजरती है जिन्हें देखकर विस्मित रह जाना पड़ता है। अन्तःशक्ति के आकस्मिक जागरण का प्रत्यक्ष कारण भले ही समझ में न आए, पर ये उपलब्धियाँ पूर्व जन्मों के संचित साधना पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती हैं। जिन्हें करतल गत कर असम्भव काम भी पूरे किए जा सकते हैं।
प्रसिद्ध विद्वान ‘फ्रैंकिस किंग’ ने एक पुस्तक लिखी है- ‘मिस्टीरियस नालेज’ इस पुस्तक में उन्होंने एक ऐसे विलक्षण शक्ति सम्पन्न व्यक्ति का उल्लेख किया है जो बिना किसी वैज्ञानिक उपकरणों के शल्य चिकित्सा करता तथा कठिन से कठिन रोगों से मुक्ति दिला देता था। ब्राजील के एक छोटे से गाँव में जन्मे “जोस एरीगो” नामक इस व्यक्ति को अपनी विलक्षण सामर्थ्य के कारण भारी ख्याति मिली। शल्य-चिकित्सा में अपनी अतीन्द्रिय शक्ति का उपयोग करना भी उसने विचित्र ढंग से आरम्भ किया।
रिश्ते में लगने वाली एक बूढ़ी औरत पेट के ट्यूमर के कारण मरण शैया पर पड़ी थी। मिलने गये व्यक्तियों में से एक ‘एरीगो’ भी थे। स्नेही सम्बन्धी सभी उस औरत को घेर कर खड़े थे। इतने में एरीगो को जाने क्या सूझी वह दौड़कर रसोई घर में गया और एक छोटा सा जंग लगा चाकू उठा लाया और कमरे में उपस्थित सभी व्यक्तियों को यह कहते हुए कि वह मरीज के उपचार के लिए एक विशेष प्रयोग करना चाहता है, सबसे बाहर निकल जाने के लिए कहा। एरीगो तथा घर के एक अभिभावक को छोड़कर सभी बाहर निकल आए। कमरे में मौजूद दूसरा व्यक्ति उसे रोके इसके पूर्व ही उसने छोटे चाकू से वृद्धा का पेट कुछ ही सेकेंड में चीर डाला। पर आश्चर्य कि मरीज को जरा भी तकलीफ नहीं हुई। पेट के भीतर मौजूद नारंगी के आकार के ट्यूमर को उसने काटकर बाहर निकाल दिया और उसके बाद दोनों हाथों से कटाव को आपसे में जोड़कर दबा दिया। पूरे इस विचित्र आपरेशन में कुछ ही मिनट लगे होंगे। सबसे रहस्यमय बात यह थी कि पेट के ऊपर आपरेशन को कोई निशान भी नहीं था। और न तो उस महिला को किसी प्रकार की पीड़ा हुई और न ही रक्त स्राव। ट्यूमर के निकलते ही महीनों से मरणान्तक पीड़ा से छुटकारा मिल गया।
एक दिन एक राजनीतिक सभा में भाषण देने के लिए एरीगो के चिर-परिचित मित्र का आना हुआ। सभा की समाप्ति के बाद दोनों मित्र एक होटल में मिले। बातचीत के सिलसिले में मित्र ने बताया कि अपने फेफड़े में मौजूद ट्यूमर की मर्मान्तक पीड़ा से वह किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढो रहा है। चिकित्सकों ने इतने नाजुक स्थान पर आपरेशन करने से इन्कार कर दिया है क्योंकि उसमें जीवन के लिए खतरा है। वार्ता के उपरान्त दोनों सो गये।
रात्रि के समय राजनीतिक मित्र ने अनुभव किया जैसे किसी का हाथ उसके शरीर के ऊपर रेंग रहा हो। कुछ मिनटों तक यह क्रम जारी रहा। दूसरे दिन प्रातः उन्होंने देखा कि उनके कपड़े फटे हुए थे जैसे किसी ने जान-बूझकर दर्द वाले स्थान के ऊपर चीरा लगाया हो। और दूसरे ही दिन से उस कष्ट से छुटकारा मिल गया जिसके उपचार में मूर्धन्य चिकित्सकों ने भी अपनी असमर्थता व्यक्त की थी।
अब तक एरीगो की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। ब्राजील ही नहीं अमेरिका एवं यूरोप के अन्य देशों से भी अधिक संख्या में रोगी, परीक्षक एवं वैज्ञानिक उसके पास आने लगे। उसकी शल्योपचार की चमत्कारी प्रक्रिया एवं असाधारण सफलता को देखकर वैज्ञानिकों को भी दाँतों तले उँगली दबानी पड़ी। अनेकों प्रयोगों को प्रमाणिकता की कसौटी पर कसने के उपरान्त सभी ने एक स्वर से स्वीकार किया कि एरीगो के भीतर कोई अलौकिक शक्ति है जिसके द्वारा वह उपचार करता है।
‘टाईम’ पत्रिका के संवाददाता डेविड सेण्ट क्लेर उसकी प्रसिद्धि सुनकर वास्तविकता को जानने पहुँचे। उनके सामने ही एरीगो ने एक अन्धे लड़के के आँख का आपरेशन किया। आँख को गोलक के बाहर हाथ से निकाल कर उन्होंने उसकी झिल्ली को थोड़ा इधर-उधर किया और पुनः गोलक के भीतर बैठा दिया। लड़के को किसी तरह का कोई कष्ट नहीं हुआ। इस छोटे से कुछ मिनटों के, बिना किसी पीड़ा के हुए आपरेशन से बच्चे को वरदान के रूप में नेत्र ज्योति मिल गई।
प्रत्यक्ष प्रामाणिकता की जाँच-पड़ताल करने के उपरान्त संवाददाता डेडि सेण्ट क्लोर ने लिखा कि “निस्सन्देह एरीगो के भीतर कोई ऐसी अलौकिक शक्ति है जिसके द्वारा वह इस प्रकार के असम्भव काम करने में सफल होता है। विज्ञान के आधार पर उस रहस्यमय शक्ति का कोई कारण समझ में नहीं आता।
एरीगो का जन्म सन् 1918 में ब्राजील के एक छोटे से गाँव में हुआ। बचपन से ही उसे विलक्षण अनुभूतियाँ होने लगी थीं, कभी उसे रहस्यमय दृश्य दिखायी पड़ते तो कभी विचित्र प्रकार के सन्देश मिलते थे। आरम्भ में तो वह स्वयं भी इनका कारण नहीं जान पाता था, किन्तु अपने माता-पिता से अक्सर अपनी अनुभूतियों की चर्चा करता था। मन का भ्रम कहकर उसके अभिभावक उसकी बातों की उपेक्षा कर देते थे। कुछ वर्षों तक तो इसी प्रकार चलता रहा। एरीगो के असामान्य जीवन की शुरुआत तब आरम्भ हुई, जब उसने अनायास उस वृद्धा की सर्जरी कर डाली।
इस प्रकार की अनेकों दिव्य क्षमताएँ मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं जो हर व्यक्ति में सोई पड़ी हैं। साधना पुरुषार्थ द्वारा उनका जागरण सम्भव है। स्थूल काया तो खाने, पीने, सोने, श्रम करने एवं मस्तिष्क सोचने-विचारने लौकिक गुत्थियों को सुलझाने जितना सामान्य प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। शरीर के भीतर विद्यमान सूक्ष्म एवं कारण शरीर की क्षमताएँ स्थूल शरीर एवं मस्तिष्क की तुलना में कई गुनी अधिक है। उसमें एक से बढ़कर एक आश्चर्यजनक सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उनका जागरण यदि सम्भव हो सके तो स्थूल उपचार द्वारा दूसरों को राहत पहुँचाना ही नहीं, अदृश्य की जानकारियाँ भूत एवं भविष्य का ज्ञान जैसी कितनी ही चमत्कारी शक्तियाँ करतलगत की जा सकती हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं द्वारा इन शक्तियों को प्राप्त कर सकने का मार्ग हर किसी के लिए खुला पड़ा है।
जो मनुष्य अपने को तुच्छ समझता है वह केवल अपना ही मूल्य नहीं घटाता किन्तु समस्त मनुष्य जाति को अप्रतिष्ठित करता है। मनुष्य जहाँ महापुरुषों को देखता है। वहीं उसे अपने बड़े होने का ज्ञान आ जाता है और जितना ही सच्चा इस महानता का दर्शन होता है उतना ही सरल उसका महान् होना निश्चित हो जाता है। -टैगोर
10 अक्टूबर 1966 को सायं 5 बजकर 20 मिनट पर न्यूटन एलिनाथ (अमेरिका) नामक स्थान पर पाँच व्यक्ति एक साथ घूमने के लिए निकले। अचानक उनकी दृष्टि धरती से मात्र 15 मीटर ऊपर उड़ती एक यान जैसी वस्तु पर पड़ी। कुछ ही मिनट बीते होंगे कि उड़ती हुई वस्तु का अगला हिस्सा ऊपर की ओर उठा और देखते ही देखते वह अदृश्य हो गई। देखने वाले उन व्यक्तियों ने बताया कि वह उड़ने वाली वस्तु लगभग 6 मीटर लम्बी, 2 मीटर व्यास वाली, एल्युमिनियम जैसी चमकदार धातु से बनी सिगार जैसी शक्ल की थी। उसके अगले हिस्से में छोटा सा छेद था जो प्रवेश द्वार जैसा लगता था। पेंदे के पिछले भाग का रंग हल्का हरा भूरा था। उसके चारों ओर हल्की नीली धुँध थी। यान से किसी प्रकार की ध्वनि तो सुनाई नहीं पड़ रही थी किन्तु वातावरण में एक विचित्र प्रकार के कम्पन का आभास मिल रहा था। उस स्थान से दस किलोमीटर दूर भी कुछ व्यक्तियों ने ऐसे ही यान को कुछ ही सेकेंड के अन्तर से देखा। उनके द्वारा बताये गये विवरण भी ठीक उसी प्रकार के थे।
लेकन हीथ (इंग्लैण्ड) में रात्रि को तीन बजे रायल एयर फोर्स के राडार संयंत्रों ने तेज गति से उड़ती हुई कई उड़नतश्तरियों को देखा। पृथ्वी से 1200 मीटर ऊँचाई पर साढ़े तीन हजार किलोमीटर प्रति घण्टा की गति से वह पश्चिम दिशा की ओर उड़ रही थी। इतनी ही ऊँचाई पर उड़ते हुए एक विमान के चालक ने पाया कि उड़न तश्तरी जैसे यान किन्हीं-किन्हीं स्थानों पर धीमी गति करके किसी वस्तु का निरीक्षण करते प्रतीत हो रहे हैं। रायल एयर फोर्स के एक लड़ाकू विमान ने उनका पीछा किया किन्तु कुछ ही दूरी पर जाकर वे अदृश्य हो गई। इंग्लैण्ड के अनेकों स्थानों पर उसी रात उड़न तश्तरियों को अनेकों व्यक्तियों ने देखा। तथ्य की खोज करने वालों ने जितने भी प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए उन सबने घटनाक्रम का विवरण एक ही जैसा सुनाया।
सैकड़ों वर्ष से संसार के अनेकों देशों में उड़न तश्तरियों के विषय में समय-समय पर प्रमाण मिलते रहे हैं किन्तु आश्चर्य यह है कि उनका रहस्य अभी रहस्य ही बना हुआ है। वैज्ञानिकों के अनेकों प्रयास भी इस रहस्योद्घाटन में असमर्थ सिद्ध हुए है। ऐसी सम्भावना है कि जिस प्रकार पृथ्वी के वैज्ञानिक अन्य ग्रह नक्षत्रों की टोह लेने के लिए समय-समय पर अपने उपग्रह भेजते रहते हैं उसी तरह अन्य ग्रहों के निवासी भी पृथ्वी पर खोज के लिए अपने यान भेजते हैं। तथ्य जो भी हो। इतना तो सुनिश्चित कि उड़न तश्तरियों की अद्भुत बनावट, तीव्र गति एवं स्वनियन्त्रित प्रक्रिया को देखकर ऐसा लगता है उनका संचालन कुशल मस्तिष्क द्वारा हो रहा है। इनके आविष्कारों की असाधारण वैज्ञानिक प्रगति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वे अकस्मात दिखायी पड़ती है और बिना कोई प्रमाण छोड़े देखते ही देखते अदृश्य हो जाती है। उनका अचानक गायब हो जाना इस बात का प्रमाण है कि उनके बनाने वालों ने ऐसी तकनीक का विकास कर लिया है जिससे वस्तु को किसी ऐसी अवस्था में पहुँचा दिया जाय कि वह दिखायी न पड़े।
अपने भीतर अगणित रहस्य छिपाये आज भी संसार के वैज्ञानिकों को चैलेंज देती हुई दिखायी पड़ती है। 24 अक्टूबर 1978 ‘मेलबोर्न’ में एक छोटा विमान चालक सहित उड़न तश्तरी को देखने के बाद लापता हो गया। घटना इस प्रकार बतायी जाती है। बीस वर्षीय युवा चालक फ्रेडरिक वालेंटिच ने आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया के बीच चार्टर्ड उड़ान भरी। चालक फ्रेडरिक ने मेलबोर्न हवाई अड्डे के ऊपर से रेडियो संदेश में हवाई अधिकारियों से पूछा कि 1500 मीटर की ऊँचाई पर उसी क्षेत्र में कोई दूसरा विमान तो नहीं उड़ रहा है। उसने अधिकारियों को सूचना देते हुए कहा कि वह इसलिए पूछ रहा है कि उसे मेलबोर्न से 182 मील दूर किंग आइसलैंड के पास से उड़ते हुए एक लम्बी आकार की कोई वस्तु तेज गति से उड़ती हुई दिखायी पड़ रही है। हवाई अड्डे के अधिकारियों के उत्तर की बिना प्रतीक्षा किए उसने अपना सन्देश जारी रखा। उसने बताया कि लम्बी आकार की वस्तु तीव्र गति से उड़ती हुई मेरे यान की ओर आ रही है। अब मेरे विमान के ठीक ऊपर आकर चक्कर काट रही है। उसके भीतर से हरा प्रकाश निकल रहा है। फ्रेडरिक के अन्तिम शब्द थे कि ‘मेरे विमान के इंजन में रुकावट सी आ रही है। यान अब भी मेरे विमान के ऊपर छाया है। इसके बाद रेडियो पर धातु के टकराने जैसा शब्द तेज शोर सुनाई पड़ा तथा विमान का नियन्त्रण कक्ष से संबंध टूट गया। मेलबोर्न हवाई-अड्डे से अनेकों जहाजों ने खोज के लिए उड़ान भरी किन्तु चालक एवं यान का कुछ भी पत्ता न चल सका और न ही किसी प्रकार की दुर्घटना का कोई चिन्ह ही मिला।
कहीं जासूसी करने की दृष्टि से छोड़े गए किसी देश के विमान तो नहीं हैं, पर प्राप्त तथ्य बताते हैं कि इतने विकसित किस्म के विमान अभी तक धरती पर बने नहीं हैं। कम से कम इंजन के बारे में तो स्थिति सर्वत्र एक जैसी है जबकि यह विलक्षण तश्तरियाँ हर बार किसी अविज्ञात ऊर्जा द्वारा संचालित पाई गई।
5 जनवरी 1979 इंडियन एक्सप्रेस दैनिक पत्र में एक घटना प्रकाशित हुई थी जो इस तरह है। दक्षिण अफ्रीका के जोहान्स वर्ग नगर के समीप एक महिला एवं उसके पुत्र ने अपने घर के निकट एक उड़न तश्तरीनुमा वस्तु को उतरते देखा। प्रत्यक्षदर्शी श्रीमती भीगन क्वीजेट ने एक इन्टरव्यू में बताया कि उनके लड़के ने रात्रि को कुत्ते को भौंकता देखकर उन्हें जगाया। दोनों बाहर आए तो कुत्ता एक दिशा की ओर दौड़ा। दोनों कुत्ते के पीछे-पीछे चल पड़े। लगभग बीस गज की दूरी पर एक तश्तरी जैसी आकृति की वस्तु खड़ी थी। सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यान से सटे हुए मनुष्याकृति से मिलते-जुलते पाँच व्यक्ति खड़े थे। अलग-अलग लिए गये इण्टरव्यू में उसके पुत्र ने भी यही बात बतायी। श्रीमती क्वीजेट ने अपने पुत्र से कहा कि जल्दी से अपने पिता को बुला लाओ। इतने में ही पाँचों मनुष्याकृतियाँ तश्तरी के खोह में समा गई और देखते ही देखते उड़न तश्तरी हवा में गायब हो गई।
ऐसी घटनाएँ भारत वर्ष में भी घटित हो चुकी हैं। 3 अप्रैल 1978 को रात्रि 9 और 10 बजे के बीच अहमदाबाद, (गुजरात) राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र के अनेकों स्थानों पर सैकड़ों व्यक्तियों ने उड़न तश्तरी देखी। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने इसे अपने शोध का विषय बनाया है। उन्होंने इसका नाम यू. एफ. ओ. (अनआइडेण्टीफाइड फ्लाइट आब्जेक्ट) दिया है। शोध के लिए जे. एलन हाइनेक ने नार्थ वेर्स्टन विश्व विद्यालय में यू.एफ.ओ. केन्द्र की स्थापना की है जिसका लक्ष्य है रहस्यमय उड़न तश्तरियों की जानकारियाँ एकत्रित करना।
डॉ. फ्रेडरिक जैसे वैज्ञानिक का विश्वास है कि सभ्यता एवं जीवन का केन्द्र पृथ्वी तक ही सीमित नहीं है। अन्य ग्रहों की अभी पूरी जानकारी हमें नहीं है किन्तु ऐसा लगता है कि जीवन अन्यत्र भी है। हमारी तुलना में वहाँ सभ्यता कहीं अधिक विकसित है। इसका एक प्रमाण है-उड़न तश्तरियाँ। उन्होंने यह भी कहा कि पृथ्वी ऊर्जा का स्त्रोत है। यह भी सम्भावना है कि अन्य ग्रहों के निवासी पृथ्वी पर ऊर्जा संग्रह करने आते हों और इसकी तकनीक उन्होंने विकसित कर ली हो।
निस्सन्देह अभी भी मानवी जानकारियाँ सीमित हैं। एक सामान्य-सी उड़न तश्तरी वर्षों से रहस्यमय बनी हुई है और तथ्य का बोध कराती हैं कि ब्रह्माण्ड की असीम जानकारियों के लिए उसे पुरुषार्थ की एक लम्बी मंजिल पूरी करनी होगी।
धर्म के लिए मनुष्य लड़ता है, झगड़ता है, दंगा फसाद करता है, लिखता है। परन्तु धर्म के लिए करता कुछ नहीं है।
सिद्धान्तों-आदर्शों की चर्चा करना एक बात है और उनका परिपालन दूसरी। चर्चा एवं व्यवहार में इनकी एकरूपता स्थापित हो जाने पर महानता के पथ पर अग्रसर होने का सुदृढ़ आधार बन जाता है। यह न हुआ तो स्थिति उपहासास्पद हो जाती है। सिद्धान्त एवं आदर्श आचरण में न उतर पाने के कारण कोई प्रभाव नहीं दिखा पाते और वाक् विलास के साधन मात्र बनकर रह जाते हैं। इसके विपरित जब ये वाणी तक ही सीमित न रह कर चरित्र में घुलकर व्यवहार के अंग हो जाते हैं तो जनमानस को सत्प्रेरणा देने के सशक्त आधार बन जाते हैं।
ईमानदारी, प्रमाणिकता, चरित्रनिष्ठा की परख तो विशिष्ट अवसरों पर हुआ करती है। परीक्षा की घड़ियों से गुजरने के पूर्व तो हर व्यक्ति ईमानदार चरित्रनिष्ठ है। किन्तु इस यथार्थता का बोध कसौटी पर कसने से होता है। सोने की वास्तविक परख अग्नि में तपने के बाद होती है। आग से दूर रहकर तो हर चमकदार वस्तु सोना होने का दावा कर सकती है, किन्तु अग्नि परीक्षा से गुजरने के बाद यह प्रामाणित होता है कि वस्तुओं का दम्भ कितना मिथ्या था। प्रायः अधिकाँश व्यक्ति बातें आदर्शों एवं सिद्धान्तों की करते हैं। किन्तु देखा यह जाता है कि अवसर प्रस्तुत होते ही उनमें से अधिकतर टिके नहीं रह पाते। लोभ-मोह के प्रवाह उन्हें बहा ले जाते हैं। उस समय तात्कालिक लाभ ही सूझता और उपयोगी प्रतीत होता है। लाभ उठाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इस युग प्रवाह में डूबते-उतरते-बहते समाज के विपुल समुदाय को आज सर्वत्र देखा जा सकता है।
थोड़े से व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिनकी ईमानदारी अडिग और अटूट होती है। बड़ी से बड़ी हानि उठाकर भी वे अपनी इस विशेषता की रक्षा करते हैं। लोभ-मोह के अवसर उन्हें विचलित नहीं कर पाते। अपनी प्रामाणिकता को हर कीमत पर अक्षुण्ण रखने का प्रयास करते हैं चाहें इसके लिए कितनी भी कष्ट कठिनाइयाँ क्यों न उठानी पड़ें। यह वर्ग ही समाज का मेरुदण्ड होता है। देश-जाति और इतिहास ऐसे ही व्यक्तियों से धन्य बनता और आगामी पीढ़ियों के श्रद्धा सुमन चढ़ते हैं।
प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ जीवन भर घोर विपन्नता और अभावों से ग्रस्त रहे। यहाँ तक कि पेट भरने के लिए भोजन और ठंड से बचाव के लिए वस्त्रों तक की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में न हो सकी। जीवन भर कठोर श्रम करते हुए किसी तरह आजीविका का प्रबन्ध करते रहें। वे चाहते तो अपनी साहित्य कृतियों के आधार पर सम्पदा अर्जित कर सकते थे लेकिन यह तो उनके आदर्शों के खिलाफ था। उन्हीं दिनों राबर्ट वाल्पोल अपनी पार्टी के प्रचार के लिए 50 हजार पौंड प्रतिवर्ष लेखन कार्य पर खर्च करता था। उसने गोल्डस्मिथ को भी इस कार्य के लिए आमंत्रित किया। तब गोल्डस्मिथ ने उत्तर दिया-”किसी पार्टी के लिए अपनी कलम बेचने की अपेक्षा में अपनी आवश्यकताएँ स्वयं पूरी कर सकता हूँ। आपकी सहायता की मुझे कोई जरूरत नहीं।”
चार्ल्स द्वितीय ने अपने ऐश्वर्य-विलास के साधन जुटाने के लिए राजकीय सम्पति को बेचना आरम्भ किया। उसने चंद चाँदी के टुकड़ों के सहारे राज्य के सभी प्रमुख व्यक्तियों को अपने साथ मिला लिया। लेकिन संसद सदस्य मार्बल एक ऐसा दृढ़ चरित्र सम्पन्न व्यक्ति था जिसे चार्ल्स को कोई भी प्रलोभन नहीं खरीद सका। उसने राजा की अनैतिक गतिविधियों के विरुद्ध जन आन्दोलन खड़ा किया। चार्ल्स के संकेत पर राज्य के कोषाध्यक्ष ने मार्बल को भारी रकम देकर डिगाना चाहा। एक हजार पौंड की उस समय बड़ी कीमत थी - उसे लौटाते हुए मार्बल ने कहा-”मुझे पता है आप मुझ पर यह कृपा क्यों कर रहे हैं, लेकिन में भी कर्त्तव्य पय से किसी कीमत पर विचलित नहीं हो सकता। ईश्वर ने जीवन-निर्वाह की पर्याप्त सामर्थ्य मुझे दी है।” मार्बल मृत्युपर्यन्त अवाँछनीयता के विरुद्ध लड़ता रहा। उसकी समाधि पर अब भी ये शब्द अंकित है- “सदाचारी व्यक्ति उसके प्रति श्रद्धा रखते थे लेकिन दुराचारी डरते थे। कई लोग उनके अनुयायी थे लेकिन उसकी महानता की तुलना कोई नहीं कर सकता।”
वैज्ञानिकों के इतिहास में सर हेंफरी डेवी और फैराडे ने ऐसा आदर्श चरित्र प्रस्तुत किया जिस पर मानव जाति के श्रद्धा सुमन सदैव चढ़ते रहेंगे। हेफरी डेवी ने खदानों में काम करने वाले मजदूरों को आजीविका उपार्जन के लिए जब जीवन-मृत्यु के बीच झूलते देखा तो सिहर उठे। सोचने लगे-क्या इनके असुरक्षित जीवन के लिए कुछ किया जा सकता है ? इसी दिशा में निरन्तर चिन्तन, प्रयोग परीक्षण और संकल्पबल के सहारे ‘सेफ्टी लैंप’ के आविष्कार में अनन्तः सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने उसे ‘पेटेन्ट करवा कर धन कमाने के बजाय जनता में बिना किसी मूल्य के प्रचलित कर दिया। इस पर उनके मित्र ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा-”यदि इसे पेटेन्ट करवा देते, तो पाँच या दस हजार वार्षिक कमा सकते थे।” तब डेवी ने उत्तर दिया - “मेरा तो उद्देश्य मानवता की सेवा करना है न कि धन कमाना। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मेरे अपने दो हाथ पर्याप्त हैं अधिक धन मुझे पथ-भ्रष्ट कर देगा धन-सम्पत्ति से न तो मनुष्य को यश मिलता है और न ही आन्तरिक सन्तोष।”
डेवी का शिष्य फैराड भी विज्ञान का महान साधक था। उसने भी अपने सभी आविष्कारों को पेटेन्ट न करवा कर निर्धनता को ही स्वीकार किया। मेडम क्यूरी व पेरी क्यूरी ने भी रेडियम के आविष्कार को जन-सामान्य में प्रचलित कर दिया। क्यूरी दम्पत्ति न केवल आविष्कारक थे वरन् महान जनसेवी भी थे। वे अपने आविष्कार से लाखों की सम्पत्ति कमा सकते थे लेकिन उन्होंने अभावपूर्ण जीवन को हँसते-हँसते स्वीकार किया। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से कितने ही गरीब रोगियों की उपचार व सेवा सुश्रूषा की।
फ्राँस के प्रसिद्ध वकील चेमिलार्ड के जीवन की एक घटना से उनकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। चेमिलार्ड एक मुकदमा इसलिए हार गये क्योंकि उन्होंने भूल वश एक महत्वपूर्ण कागज अदालत को नहीं दिखाया। चेमिलार्ड स्वयं अनभिज्ञ थे कि वह कागज उनके पास है। मुवक्किल हानि का यह आघात सहन नहीं कर सका। उसने क्षोभ और क्रोध में भरकर कहा कि “आपकी छोटी सी गलती से मैं बरबाद हो गया।” बाद में ढूँढ़ने पर वह कागज उन्हें अपने बैग में मिल गया। परन्तु उस मुकदमे की पुनः कोई अपील न हो सकी। इस पर वकील ने मुवक्किल की क्षतिपूर्ति अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति देकर की लेकिन प्रामाणिकता पर किसी प्रकार की आँच न आने दी।
ग्राह्य ने घड़ी निर्माण के क्षेत्र में कुछ ही दिनों में प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। उसकी यह विशेषता थी कि काम करते समय उसका पूरा ध्यान अपनी बनाई वस्तु के गुण और उपयोगिता पर रहता था। जब तक वह अपने काम को सर्वोत्तम ढंग से नहीं कर लेता तब तक उसे सन्तोष नहीं मिलता। एक बार एक भारतीय ने उससे एक घड़ी खरीदी। ग्राह्य ने घड़ी बेचते हुए कहा “यदि आप इसमें कुछ मिनटों का भी अन्तर पायें तो मैं आपके दाम लौटा दूँगा” सात वर्ष बाद वह व्यक्ति भारत से लौटा। उसने ग्राह्य से कहा-”घड़ी में कुछ सेकेंडों का अन्तर हो जाता है फिर भी घड़ी बहुत अच्छी है अन्तः इसे वापिस नहीं करूंगा।” लेकिन ईमानदारी की कसौटी पर हर बार खरा सिद्ध होने वाला ग्राह्य इस पर कैसे सन्तोष करता ? बहुत कहने समझाने के बावजूद भी ग्राह्य ने घड़ी वापिस ले ली और उसके दाम लौटा दिये।
ईमानदारी, प्रामाणिकता और चरित्रनिष्ठा की कसौटी पर खरे उतरने वाले व्यक्ति जनसामान्य के बीच प्रकाश स्तम्भ की तरह होते हैं। अपनी दृढ़ चरित्रनिष्ठा पर स्वयं गौरव और आत्म सन्तोष तो अनुभव करते ही हैं, देश, जाति और इतिहास भी ऐसे व्यक्तियों से धन्य बनता है।
मार्टिन प्रिंस मनोवैज्ञानिक जगत के प्रसिद्ध विद्वान है। उन्होंने मानवी व्यक्तित्व का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया है। व्यक्तित्व संबंधी अपनी खोजों में मार्टिन ने अनेकों रहस्यात्मक और महत्वपूर्ण तथ्य प्रकट किए हैं। उनका कहना है कि “मनुष्य के भीतर एक साथ कई प्रकार के व्यक्तित्व कार्य करते हैं। उनमें आपस में यदि सामंजस्य और सहयोग है तो मनुष्य के विकास में असाधारण योगदान मिलता है। परस्पर असहयोग होने से विकासक्रम अवरुद्ध हो जाता है। मानसिक एवं शारीरिक रोग भी मनुष्य के भीतर दो व्यक्तित्वों के आपसी संघर्ष के प्रतिफल होते हैं।”
व्यक्तित्वों की भिन्नता और आपसी संघर्ष कैसी-कैसी समस्याओं को जन्म देते हैं इसका एक रोचक उदाहरण ‘प्रिंस’ ने अपनी पुस्तक में ‘मैकनवारो’ नामक महिला का प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं कि इस मैकनवारों के भीतर एक साथ तीन व्यक्तित्व रहते थे। एक सामान्य स्वभाव का था। दूसरा सन्त और तीसरा शैतान प्रकृति का। इन तीनों में एकरूपता न रहने से उक्त महिला का जीवन पागलों जैसा बन गया है। साधारण व्यक्तित्व को अन्य दो व्यक्तित्वों का ज्ञान न था जबकि ‘शैतान’ व्यक्तित्व को अन्य दो व्यक्तित्वों की क्रियाओं का ज्ञान रहता था। फलस्वरूप शैतान व्यक्तित्व अन्य दो के कार्यों में निरन्तर बाधा पहुँचाता था। उदाहरणार्थ यदि सामान्य ‘व्यक्तित्व’ कोई वस्तु आलमारी में एक निश्चित स्थान पर रख देता तो शैतान उसे वहाँ से हटाकर कहीं अन्यत्र छिपा देता था। अपनी ही रखी हुई वस्तु को ढूंढ़ने में उस महिला को विशेष कठिनाई होती थी। उसकी इच्छा के विरुद्ध भी कितनी ही बार शैतान व्यक्तित्व अनेकों काम करा देता था जो नैतिक दृष्टि से उचित न होते थे। अपनी गल्तियों का भान बाद में होने पर वह महिला पश्चाताप करती रहती थी। मानसिक द्वन्द्वों के कारण उसकी स्थिति विक्षिप्तों जैसी बन गई।
मार्टिन द्वारा प्रस्तुत किया गया उदाहरण अचरज भरा लगता है किन्तु बारीकी से अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि अधिकाँश व्यक्तियों की यही स्थिति होती है। मनुष्य के भीतर दो व्यक्तित्वों का संघर्ष चलता रहा है। पौराणिक भाषा में जिसे देवासुर संग्राम कहा जा सकता है। अमुक स्थान में देवता निवास करते हैं और अमुक में असुर तथा उनके बीच युद्ध होते रहते हैं का वर्णन भारतीय धर्म पुराणों में ही नहीं विश्व के अन्यान्य धर्म ग्रन्थों में भी आता है। यह व्यक्तित्व के दो भिन्न स्वरूप का अलंकारिक वर्णन - चित्रण है जो यह दर्शाता है कि देव और असुर के बीच अर्थात् मनुष्य के भीतर काम करने वाले दो व्यक्तित्वों के बीच परस्पर मतभेद एवं संघर्ष होने पर व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न हो जाता है। विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा अनेकों प्रकार के शारीरिक, मानसिक विक्षोभ उत्पन्न होते हैं। पुराणों में वर्णन आता है कि देवता और असुर जब तक एक दूसरे से अलग रहे - असहयोग करते तथा लड़ते रहे। परिस्थितियाँ विपन्न और प्रतिकूल बनी रहीं। सर्वत्र अव्यवस्था फैली दोनों ने जब परस्पर सहयोग करना स्वीकारा तो समुद्र मन्थन जैसे दुस्तर एवं कठिन काम का सिलसिला चल पड़ा जिसकी परिणति चौदह दिव्य रत्नों की उपलब्धियों के रूप में सामने आयी। जिसे प्राप्त कर विश्व वसुधा धन्य हो गई।
मनुष्य के मानसिक जगत में चलने वाले संग्राम का यह अलंकारिक चित्रण है। संघर्ष रुकने - देव और असुर रूपी दो व्यक्तित्वों के बीच सहयोग का क्रम चलते ही मनुष्य के सर्वांगीण विकास का दौर द्रुतगति से चल पड़ता है।
आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों द्वारा एक सर्वथा नवीन तथ्य उजागर हुआ है कि विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग मन के द्वन्द्वों से पैदा होते और द्वन्द्वों की उत्पत्ति दो प्रकार के व्यक्तित्वों के परस्पर टकराहट से होती है। संघर्ष की प्रतिक्रिया की अनुभूति अनेकों प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक असन्तुलनों के रूप में तो होती है किन्तु इसका बोध नहीं रहता कि अपनी ही सत्ता दो घटकों में बैठे टकराव उत्पन्न कर रही है। जो अशान्ति, असन्तोष, व्यग्रता विक्षोभ, भय, चिन्ता जैसे असन्तुलनों से आरम्भ होकर अनेकों प्रकार के मानसिक रोगों का कारण बनते हैं।
क्रिया विचारणा एवं भावना के तीनों ही क्षेत्रों में एकरूपता हो तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है। इसके विपरीत इन तीनों में एकता न होने पर विकास क्रम अवरुद्ध हो जाता है। सामान्यतया इन तीनों में एकता कम ही स्थापित हो पाती है। प्रायः युग्म दो का बन जाता है। प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने वाला व्यक्तित्व उन्हीं के समन्वय से बनता है जिसे ज्ञात व्यक्तित्व कहते हैं। अपने इस व्यक्तित्व का बोध अधिकाँश व्यक्तियों को होता है। सम्भव है मनुष्य अपने ज्ञात स्वत्व में चरित्रवान, आदर्शवादी एवं सिद्धान्त निष्ठ हो किन्तु अज्ञात व्यक्तित्व में अनुदार, अनैतिक, क्रूर एवं व्याभिचारी हो सकता है। इसका प्रमाण कितने ही व्यक्तियों में मिलता रहता है। नीति, सदाचार, आदर्श एवं सिद्धान्त की बातें करते कितने ही व्यक्ति देखे जाते हैं किन्तु लोभ मोह के वासना तृष्णा के अवसर आते ही वे उस प्रवाह में बह जाते हैं। इसका कारण यह होता है कि भीतरी अज्ञात व्यक्तित्व में निकृष्ट प्रवृत्तियों के संस्कार जड़ जमाये रहते हैं और अवसर उपस्थित होते ही प्रबल हो उठते तथा बाह्य-प्रत्यक्ष व्यक्तित्व पर हावी हो जाते हैं। न चाहते हुए भी कितनी ही बार मनुष्य कितने ही ऐसे कार्य कर जाते हैं जो सामाजिक एवं नैतिक दृष्टि से अनुचित होते हैं और जिसके लिए वे बाद में भारी पश्चाताप करते हैं। यह अचेतन व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि मनुष्य अपने को अशक्त एवं असमर्थ पाता है। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाह्य, भीतरी सामंजस्य न होने से द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है। “डबल पर्सनालिटी” को मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में सभी प्रकार के मनोरोगों का कारण माना गया है।
द्विमुखी व्यक्तित्व के निर्माण के बाह्य परिस्थितियाँ कारण हैं अथवा मनुष्य स्वयं ? क्या उनमें एकता स्थापित कर व्यक्तित्व को श्रेष्ठ, शालीन बनाया जा सकता है जैसे प्रश्नों के संबंध में मनोवैज्ञानिकों एवं मनोचिकित्सकों का कहना है कि अपने व्यक्तित्व को छिन्न-भिन्न करने का जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है। उसकी चिन्तन एवं क्रिया प्रणाली के सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन पक्ष का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो भारी विक्षोभ पैदा करेंगे। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक का कहना है कि “मनुष्य चिन्तन कुछ और करता है तथा उसका प्रत्यक्ष भूमिका भिन्न प्रकार की होती है। चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
इससे स्पष्ट है कि व्यक्तित्व को समग्र एवं एकरूप बनाये रखने के लिए चिन्तन वाणी एवं क्रिया-कलाप तीनों में एकरूपता स्थापित करनी होगी। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्यक्तित्वों में जिसकी भूमिका मनुष्य के विकास में सहायक हो सकती है, इसका निर्धारण कैसे हो ? क्योंकि कभी-कभी स्थिति उलटी भी हो सकती है। अप्रत्यक्ष व्यक्तित्व सुसंस्कारी हो सकता है और प्रत्यक्ष कुसंस्कारी। इस विषम स्थिति में किसकी बात मानी जाय और चिन्तन एवं अभ्यास द्वारा किसे सशक्त बनाया जाय, उसका उत्तर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल युग ने दिया है जो प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन करता है। वे कहते हैं कि “प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष से परे मनुष्य की मूल सत्ता” दी अनडिसकवर्ड सेल्फ है। जो अपनी प्रेरणाएँ उदात्त भावनाओं के रूप में सतत् संप्रेषित करता रहता है। अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को उसकी प्रेरणा के अनुरूप ही ढाला जाय। व्यक्तित्व को पूर्ण तभी बनाया जा सकता है।
मनुष्य के सृष्टि के अगणित रहस्यों को जान लेने और अनसुलझी गुत्थियों की सुलझा लेने का दावा करता है। यह गलत भी नहीं है कि उसने विज्ञान की सहायता से अब तक सृष्टि के कई अज्ञात रहस्यों का पता लगा लिया है और अपने ज्ञान भण्डार को पहले की अपेक्षा काफी समृद्ध बना लिया है। अब से सौ साल पहले तक पांच वर्षों में विकसित हुआ। उसे अधिक भी कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। इस समृद्ध भण्डार के आधार पर उसने अपने लिए सुविधा साधनों का भण्डार कर लिया है। जितना कि कुछ मनुष्य ने अर्जित और उपलब्ध किया है, उस आधार पर उसे सृष्टि का सर्वाधिक समृद्ध और सबसे शक्तिशाली प्राणी कहा जा सकता है। फिर भी जीवन जितना जटिल है, उसे पूरी तरह जान लेने का दावा नहीं किया जा सकता है।
स्थूल के सम्बन्ध में तो मनुष्य ने बहुत कुछ जाना, ज्ञान की कई परतें खोली पर यह एक विचित्र तथ्य है कि वह अपने आपके सम्बन्ध में अभी अनभिज्ञ, लगभग अज्ञ ही है। स्थूल सृष्टि के रहस्य सुलझाने में तो फिर भी सफलता मिल रही है, किन्तु सूक्ष्म को समझने का जितना प्रयास किया जाता है। पहेली उतनी ही उलझती जाती है। उदाहरण के लिए मनुष्य के अपने मन को ही लिया जाए। मन के सम्बन्ध में कुछ विस्तार से जानने की बात तो दूर, मनुष्य अभी मन की भाषा ही पढ़ने और समझने में असमर्थ है। दूसरे प्राणी क्या करते हैं ? किस तरह संवाद प्रेषित कतर है ? वे अपने मनोभावों को कैसे व्यक्त करते हैं ? इस सम्बन्ध में बहुत सी बाते जान ली गई है। परन्तु मनुष्य का अपना मन किस भाषा में सोचता है ? क्या कहता है ? क्यों कहता है ? आदि प्रश्न अनुत्तरित ही है।
अभी तक मन के एक छोटे से हिस्से, चेतन मन का सम्बन्ध में ही स्वल्प-सी जानकारी प्राप्त की जा सकती है । उसका बहुत बड़ा हिस्सा, अचेतन मन तो अभी भी मनुष्य की समझ से परे है। उसके विषय में अनुमान और अटकलबाजी से ही काम चलाया जाता है । अचेतन मन के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह स्वप्नों की भाषा बोलता है और स्वप्न क्या है ? इस सम्बन्ध में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता । अर्थात् दूसरों के सम्बन्ध में बहुत कुछ जान जाने, पता लगा लेने के बावजूद भी मनुष्य अपने अस्तित्व के एक हिस्से की भाषा को जानने पढ़ने में असमर्थ है। है न प्रकृति का मजाक! या मनुष्य की समर्थता!
इस स्थिति को चाहे जो कहे, पर अचेतन की भाषा या स्वप्नों का संसार जितना जटिल और जितना उलझा हुआ है, उतना ही चमत्कारी और विमुग्ध कर देने वाला हैं। सम्बन्ध में मनःशास्त्री केवल यही कह पाए है कि जिन्दगी की समस्याएँ सुलझाने के लिए जिस प्रकार हमें संसार क्षेत्र में विचरण करना पड़ना है उसी प्रकार अंतर्जगत की गुत्थियों का हल निकालने के लिए स्वप्नों की भूल-भुलैया में प्रवेश करके उसे जानना और समझना पड़ेगा। प्राचीन काल में इस विद्या का बहुत विकास हुआ था और ऐसे अनेक मनीषी मौजूद थे जो स्वप्नों का ध्यानपूर्वक सुनने के बाद उसने सन्निहित तथ्यों का विश्लेषण कर देते थे। उन स्वप्नों को त्रिकाल दर्शन की विद्या कहा जाता था अर्थात् स्वप्नों का अध्ययन करने की ऐसी पद्धति उन दिनों विकसित हुई थी, जिसके आधार पर स्वप्नों के माध्यम से भूत काल की वे स्मृतियाँ जो भुला दी गई थी, वर्तमान की परिस्थितियाँ तथा भावी सम्भावनाओं के बारे में जान पाना संभव था। लेकिन यह विद्या भी स्वप्नों को पूरी तरह समझने या उनका विश्लेषण कर पाने में समर्थ नहीं थी। ऐसी कई उदाहरण है जिनके अचेतन ने अपनी भाषा में लोगों को ऐसे-ऐसे वरदान दिए है कि उन्होंने मनुष्य जाति के इतिहास को नये मोड़ दिए।
प्राचीन काल के उदाहरणों को छोड़ भी दिया जाए तो भी इसी युग में ऐसे अनेकों प्रमाण है, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य का अचेतन मन कितना समर्थ है ? काश! उसकी भाषा को पढ़ा और समझा जा सके तो बहुत सम्भव है कि प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रगति यात्रा को पूरा करता हुआ सत्य तक पहुँच सके। स्वप्नों के इसी महत्व को बताते हुए प्रसिद्ध वैज्ञानिक, फ्रेडरिक कुकले ने कहा थे कि यदि हम स्वप्नों की भाषा समझना सीख ले, तो सृष्टि का कोई भी रहस्य, रहस्य नहीं रह जाएगा और हम सत्य को प्राप्त कर सकेंगे।
यह जानकर आश्चर्य होता है कि आधुनिक युग में जिन आविष्कारों और वैज्ञानिक सिद्धान्तों की धूम मची हुई है, उनमें से कई उपलब्धियों के सूत्र वैज्ञानिक ने अचेतन की इसी भाषा को संयोगवश पढ़ लेने के बाद ही पकड़े थे। जिस युग में हम रह रहे हैं उसे परमाणु युग कहा जाता है। युद्ध से लेकर शान्तिपूर्ण उद्देश्यों तक के लिए परमाणु शक्ति का उपयोग हो रहा है। इस शक्ति के उपयोग की संभावना का पता प्रसिद्ध वैज्ञानिक नील्स बोरह ने लगाया था। इस शताब्दी के आरंभ में जब वह विज्ञान के विद्यार्थी थे, तब परमाणु के अस्तित्व का पता तो लगाया जा चुका था किन्तु किसी को यह मालूम नहीं था कि उसकी संरचना किस प्रकार की है। वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने के लिए तरह-तरह के सैकड़ों प्रयोग कर रहे थे, किन्तु किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच पाना संभव नहीं हो रहा था। नील्स बोहर भी उसके लिए प्रयत्नरत थे।
एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि वे सूरज के बीचों बीच उबलती हुई गैसों के गर्भ में खड़े है, तथा सूरत के चारों ओर अन्तरिक्ष में अनेक ग्रह चक्कर काट रहे हैं। इन ग्रहों को उन्होंने स्वप्न में ही एक पतले तन्तु से जुड़े हुए देखा। जब कोई ग्रह नील्स के पास से गुजरता था लगता था वे कुछ कहते जा रहे हैं। कुछ कह रहे हैं ?यह स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था। देखते ही देखते जलती हुई गैस शान्त हो गई, सूरज ने ठोस रूप ग्रहण कर लिया और इसके बाद सब कुछ टूट कर बिखर गया। सपना भी टूटा किन्तु सपने में जो कुछ दुखा था वह मन मस्तिष्क पर इस प्रकार छाया रहा कि जागने के बाद भी एक-एक दृश्य याद आता रहा। अचानक नील्स के मन में न जाने कैसे यह विचार उठा कि सपने में जो कुछ देखा है, वह कही परमाणु रचना का भेद तो नहीं है। यह सोचते ही वह गणना में जुट गए और अनुसंधान के आधार पर पाया कि सचमुच परमाणु की संरचना उसी प्रकार की है। स्मरणीय है नील्स द्वारा पता लगाये गए परमाणु के रचना स्वरूप ने ही परमाणु भौतिकी की नींव डाली है, जिस आधार पर आज परमाणु ऊर्जा के विकास और उत्पादन की लम्बी-चौड़ी योजनाएं बनाई जाती है।
आज घर-घर में सिलाई मशीन का प्रचलन है। इस मशीन को बनाने के लिए एलियास को घोर मानसिक यातनाएं सहनी पड़ी थी। हुआ यह था कि मशीन तो बना ली गई थी पर यह नहीं सूझ रहा था की सुई में धागा कहाँ डाला जाए कि वह नीचे धागा अपने आप खींच ले। हाथ की सुई की तरह आखिरी छोर से लेकर होते, सुई के बीच में छेद बनाकर सब तरह से प्रयोग कर डाले किन्तु सफलता नहीं ही मिलती दिखाई दी। अन्ततः वह निराश हो गए। अपना प्रयोग विफल होने की घोषणा करने के बाद उस दिन निराश और थके मन से बिस्तर पर लेटे। पता नहीं कब नींद आ गई और नींद में एक सपना देखा। सपना इस प्रकार था कि जंगली जाति के कुछ लोग ‘हो’ को पकड़ कर अपने राजा के पास गए तथा राजा को बताया कि इस व्यक्ति ने सिलाई मशीन बनाई है, किन्तु उसे चालू नहीं कर पाया ? और फिर बिना स्पष्टीकरण का मौका दिए यह शाही फरमान निकाल दिया कि यदि 24 घण्टे के भीतर सिलाई की मशीन चालू नहीं की गई तो उसे भाले से मार दिया जाए। एंलियास ने देखा कि उसे चारों ओर से हाथ में भाला ‘ लिए सैनिकों ने घेर रखा है, बीच में आग जल रही है और उस आग की रोशनी में भालों की नोंक चमक रही हैं हो का ध्यान भालों की नोक पर केन्द्रित हो गया, उनमें छेद हो रहे थे।
अचानक हो की आंखें खुल गई और वह बिस्तर से उठे तथा सुई निकाल कर उसका नीचे वाला हिस्सा लोहे से काटा तथा नोक वाले हिस्से में छेद किया। इस सुई की उन्होंने मशीन पर चढ़ा दिया और मशीन चल निकली। पिछले दिन विफल घोषित कर दिया गया आविष्कार एक सपना देखकर ही सफल हो गया।
आजकल देहातों और खेतों में जंगली जानवरों से रक्षा के लिए जो छर्रेदार बन्दूकें काम में लाई जाती है, कभी इनका युद्ध के लिए उपयोग होता था। तब उनमें इस्तेमाल होने वाले छर्रे बनाने के लिए सीसे के तार खींचने पड़ते थे या उसकी चादर बनाई जाती थी और बाद में उसे काट कर छर्रे तैयार किये जाते थे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्सवाट को छर्रे बनाने की यह पद्धति बहुत जटिल लगी। वे इसी उधेड़ बुन में लग गए कि ऐसी कोई रीति की खोज कैसे हुई इस सम्बन्ध में वाट ने लिखा है कि एक रात मैंने सपना देखा कि मैं आँधी में उड़ता चला जा रहा हैं उतने में वर्षा शुरू हो गई मगर वर्षा में बजाय पानी की बूंदें गिरने के मेरे सिर पर शीशे के छर्रे गिर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि मैं बनाना चाहता था। मेरी नींद खुल गई, मैंने इस सपने पर कोई ध्यान नहीं दिया, सोचा यह मेरे मन का इच्छाओं का एक प्रतिबिम्ब हैं। मगर वही सपना मुझे अगली रात से लेकर लगातार चार रात तक बार-बार दिखाई देता रहा बार-बार एक ही सपना देखने के कारण में चौंका और मैंने अपने आपसे पूछा यह क्या है ? मुझे लगा कि इसमें शीशे को पिघला कर उसकी बूंदें हवा के माध्यम से पानी में टपकाने का संकेत है।
उन दिनों वैज्ञानिकों के पास आज जैसी सुसज्जित प्रयोगशालाएं तो थी नहीं। जेम्सवाट एक ऐसे जलाशय की खोल में लग गए जो किसी दीवार से सटा हो। एक चर्च की दीवार के पीछे ऐसे जलाशय मिल गया और उन्होंने वहाँ प्रयोग करने की अनुमति प्राप्त कर ली, प्रयोग करने के लिए वह पिघला हुआ शीशा लेकर गिर्जे के बुर्ज पर चढ़े और वहाँ से शीशे की बूंद पानी में टपकाई। पूरा पिघला हुआ शीशा इस प्रकार टपका देने बाद वे नीचे उतरे और देखा तो चकित रह गए कि शीशे के वैसे ही छर्रे तैयार हो गए थे। जैसे उन्होंने सपने में आकाश से बरसते हुए देखे थे।
अब से करीब 350 वर्ष पूर्व हुए प्रसिद्ध फ्राँसीसी दार्शनिक रेने देकार्ते ने अपना जीवन सेना में नौकरी से आरम्भ किया था। बहुत दिनोँ तक सैनिक रहने और सैनिक जीवन की कठिनाइयों को सहने से वह इस जिंदगी से तंग गा गये थे। वे किसी तरह दिन काट रहे थे। 10 नवम्बर 1918 की रात को उन्होंने एक विचित्र सपना देखा ओर उस स्वप्न में उनके जीवन की दिशाधारा ही नहीं मोड़ दी, उन्हें सैनिक जीवन से अवकाश प्राप्त करने का रास्ता भी सुझा दिया। उस स्वप्न के आधार पर उन्होंने गणित और दर्शन के समन्वय का ऐसा प्रतिपादन किया जिसने यूरोपीय जगत के दार्शनिक चिन्तन की नई दिशा दे डाली।
प्रख्यात गणितज्ञ हेनरी फेहर ने गणित के 38 विद्वानों से उनके जीवन चिन्तन और विश्वासों के बारे में पूछा तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 31 विद्वानों ने कठिनतम प्रश्न और प्रमेयों का हल स्वप्न में ही किया था। स्वामी रामतीर्थ के सम्बन्ध में तो प्रसिद्ध है कि गणित का कोई कठिन प्रश्न आने पर वे उसे हल करने की भरसक कोशिश करते। फिर भी हल नहीं होता तो वे थक कर सो जाते थे और सोते समय स्वप्न में ही उन्हें अपने प्रश्नों का हल मिल जाता था।
सचमुच मानव मन की सामर्थ्य अपार है किन्तु दुर्भाग्य यह है कि अपना सबसे निकटवर्ती और सबसे विश्वस्त यह अनुचर उपेक्षित ही पड़ा रहता है। न इसे समझने का प्रयास किया जाता है और न ही इसकी बातों पर ध्यान दिया जाता है। काश! मन को मित्र बनाया जा सके और वह क्या कहता है ? क्या बताता है ?यह जानने के लिए उसकी भाषा को समझा जाने लगा तो जीवन की अनेकानेक गुत्थियाँ सहज ही हल हो जाएं और प्रत्येक मनुष्य विभूतिवान बन जाए। क्योंकि व्यष्टि, मन का सम्बन्ध सर्वसमर्थ सत्ता से उसी प्रकार जुड़ा हुआ है, जितना प्रत्येक प्राणी का सूर्य से। सबके लिए प्रकाश उपलब्ध है और सबके लिए समान सामर्थ्य।
तीन वर्ष पूर्व अमेरिका में ‘स्वाइन फलू’ निरोधक योजना बड़े पैमाने पर लागू की गयी। इन्फ्लुएंजा के वायरस निरोधक टीके सभी को सुरक्षा उपचार के नाते लगाने का निश्चय किया गया। इसके बावजूद भी व्यक्ति रोगी हुए शरीर और काल कवलित हुए। कारण था फ्लू निरोधी टीका, जिसका स्नायु संस्थान पर घातक प्रभाव सरकार के चेतने तक करीब पाँच सौ व्यक्तियों की जान ले चुका था। रोग की आशंका मात्र से जन समुदाय के स्वास्थ्य से अदूरदर्शितापूर्ण खिलवाड़ का यह एक छोटा-सा उदाहरण है।
ऐलोपैथी आज की सुविकसित अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति है। रोग विज्ञान, शरीर विज्ञान एवं शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से गहन अध्ययन एवं शोध के आधार पर रोगों की संभावना, स्वरूप एवं जटिलताओं के सम्बन्ध में बड़ी मजबूत नींव इस पद्धति के वेत्ताओं ने खड़ी की है। यह बात चिकित्सा के सम्बन्ध में खरी नहीं उतरती । एक नहीं अनगिनत उदाहरण इस बात को गले नहीं उतरने देते कि यह पद्धति सुनिश्चित है हानि रहित है।
आधुनिक चिकित्सालयों में हृदय सम्बन्धी कष्टों के लिए विशेष यूनिट होती है। इन्हें इन्टेन्सिव केयर यूनिट कहा जाता है। एक-एक के निर्माण पर लाखों रुपये खर्च आता है। 1838, 1848, 1868, में हृदय कष्ट के लिए जितने व्यक्ति अमरीकी अस्पतालों में भर्ती किये गये, उनमें मरने वालों की संख्या में पहले की अपेक्षा कोई कमी नहीं थी। जबकि इन्हीं व्यक्तियों के प्रयोगशाला परीक्षण इलेक्ट्रो कर्डियोग्राम, एक्सरे आदि के प्रयोग से होने वाले खर्च में तिगुनी वृद्धि हुई है। 22 अप्रैल 1879 का लैसेट पत्र लिखता है कि “हृदय कष्ट का उपचार घर में भी उतनी ही दक्षता से संभव है ,जितना कि अस्पताल में।” एक अध्ययन से वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि हृदय कष्ट के संकटपूर्ण छह सप्ताह के बाद घर पर रहने वाले को आय0 सी0 यू0 में चिकित्सा कराने वाले दलों में मरने वालों की संख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं था।
एक्सरे एक व्यय साध्य प्रयोग है, पर पूरे विश्व में परीक्षण का महत्वपूर्ण अंग है। जितने एक्सरे कराये जाते हैं, उनमें से आधे व्यर्थ होते है। इसकी कैंसर उत्पादकता पर भी लोगों का अब ध्यान गया है। बचपन में एक्सरे कराने वाले कई व्यक्तियोँ को चढ़ती उम्र में कैंसर से ग्रस्त होते पाया गया है। उपचार एवं परीक्षण के अलावा तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष चीर-फाड़ का है। एक अमेरिकी विशेषज्ञ डा0 एलबर्ट हैवरकैम्प का कहना है कि गर्भस्थ बालकों के परीक्षण हेतु आज सैंसर उपकरण का प्रयोग अधिकाधिक हो रहा है एवं बिना किसी प्रयोजन के माँ के पेट की आपरेशन कर बच्चे की प्रसूति कराई जा सकती हैं। अब अमरीका में चार में से एक बच्चे का जन्म ऑपरेशन द्वारा होता है। 9 अक्टूबर 1977 के लैंसेट के अनुसार ऐसे बच्चों का स्वास्थ जन्म के कुछ माह अधिक ही खराब रहता है। उन्हें श्वास संस्थान सम्बन्धी रोग अधिक होते हैं। न्यूकोनिया एवं आगे चलकर टी.वी. होने के अवसर उन्हें अधिक होते हैं। इन माँओं के गर्भाशय की झिल्ली में भी सूजन आ जाती है। आगे जब भी प्रसव हो तो उसमें ऑपरेशन की आवश्यकता होती है।
उपचार, परीक्षण, सर्जरी के अतिरिक्त एक चौथा आहार का है। जितनी उदारता इस क्षेत्र में आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने दर्शायी है उतना ही रोगों का प्रत्याक्रमण बढ़ता चला गया है। बीसवीं शताब्दी के भोजनक्रम में मैदा, चीनी चोकरमुक्त भोजन की ही प्रधानता है। चोकर रहित भोजन आंतों की सक्रियता को कम करता है। जगह-जगह थैलियाँ बन जाती है, जिन्हें डायवटिकुलोसिस रोग का कारण कहा जाता है। यह रोग कैंसर को जन्म देने वाला माना जाता है। सामान्य प्राकृतिक आहार करले वाले आदिवासियों में यह कष्ट नहीं के बराबर होता है।
उपरोक्त चारों पक्षों की समीक्षा करने के बाद चिकित्सा पद्धति के औचित्य पुनर्विचार करना आवश्यक हो जाता है। आरम्भिक लाभ के बावजूद अन्ततः घाटा कहा तक स्वीकार्य है, इस पर विवेक बुद्धि यही कहती है कि यह अदूरदर्शिता से पूर्ण अन्धविश्वास यथाशीघ्र जन मानस से मिटाया जाना चाहिए। तुरन्त का चमत्कार हतप्रभ तो कर देता है, पर अपने दूरगामी दुष्परिणाम छोड़ जाता है। वह उपेक्षणीय तो नहीं है, पर एलोपैथी वह चिकित्सा का शब्दार्थ भी कुछ ऐसा ही इंगित करता है। ‘द बुक ऑफ नालेज एनसाइक्लोपीडिया” के अनुसार एलोपैथी वह चिकित्सा पद्धति है जो औषधि के प्रयोग से व्याधि के अलावा अन्य दूसरे लक्षण पैदा करती है, कष्टों को जन्म देती है। भावार्थ यही कि वह एक बीमारी का उपचार करने के लिए दूसरा रोग उत्पन्न कर देना हैं एण्टी बायेटिक्स शब्द का अर्थ है वे औषधियां जो जीवन के घातक है। एण्टी अर्थात् विरुद्ध, बायेसिस अर्थात् जीवन। इसीलिए ‘हीलिंग एण्ड कान्क्वेस्ट ऑफ पेन” के लेखक डा0 जे0 फील्ड कहते हैं कि वर्तमान चिकित्सा पद्धति एक प्रयोग मात्र है। इसमें वैज्ञानिक अन्धविश्वास की ही प्रधानता है।
इन सब तथ्यों पर विचार करने पर यही श्रेयस्कर जान पड़ता है कि उन पक्षों का पुनर्मूल्यांकन किया जाये जो रोग का कारण बनते हैं। इतना बन पड़ने पर ही अभीष्ट चिकित्सा पर कुछ टिप्पणी की जा सकनी संभव है। शरीर का धर्म है अपनी रक्षा के लिए व्यवस्था बनाना। जीवन शक्ति के रूप में उसे एक सुरक्षा संस्थान मिला हुआ है। रक्त के श्वेत कण एवं इम्यून संस्थान सुरक्षा सेना, सीमा आरक्षी बल का कार्य करते हैं। बाह्य आक्रमणकारी जीवाणु विषाणु पहले मानव शरीर में सुरक्षा पंक्ति की कमजोरी का जायजा लेते हैं। उनकी घातक सामर्थ्य में वृद्धि शरीर की कमजोरी के साथ बढ़ती जाती है एवं शरीर रोगी हो जाता है। रोग से निवृत्ति भी इस पर निर्भर करती है कि कितना शीघ्र विकार द्रव्यों का निष्कासन सम्भव हो पाता है। शरीर के निष्कासन संस्थानों का सक्षम होना व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आन्तरिक अंगों में से एक का भी व्याधिग्रस्त होना कमजोर जीवनी शक्ति, अपाहिज शारीरिक स्थिति एवं नये-नये रोगों के आक्रमण में निकलता है। गुर्दे छन्नी की तरह रक्त में से विजातीय द्रव्यों को निकालकर मूत्र रूप से बाहर निकाल फेंकते है। यही गुर्दे जब रोगग्रस्त हो जाते हैं तब सारा विजातीय द्रव्य शरीर में एकत्र होता चला जाता है। ऐसे व्यक्ति जीवित लाश की तरह अपनी यात्रा खींचते हैं। न श्वास ढंग से ले पाते हैं और न ही ठीक से सो पाते हैं। बाह्य जीवाणु विषाणुओं का घातक प्रभाव उन्हें शीघ्र मृत्यु के मुख में ले जाता है। चयापचय के परिणाम स्वरूप उत्पन्न विकार द्रव्य जब एकत्र होते चले जाते हैं , आहार विहार में व्यतिक्रम आ जाता है, प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या का निर्धारण नहीं हो पाता है तो रोगों की बाढ़-सी आ जाती है।
इस मूल आधार को समझने के बाद चिकित्सा व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित कर सकना संभव है। किसी भी लक्षण को दबाने के बजाय उसे जन्म देने वाले कारण को जड़ से मिटाना ही श्रेयस्कर है। तुरन्त लाभ की दृष्टि से तो यही उचित लगता है कि सामयिक दृष्टिगत होते ही लक्षण को मिटा दिया जाये। गन्दगी पर मिट्टी को डालने पर वह उस समय तो आँखों से ओझल हो सकती है, पर वह नष्ट नहीं होती । दर्द को, वेदना को हरेक औषधियों से उस समय तो मिटाया जा सकता है। परन्तु मूलरूप में बैठे रोग को यदि समूल नष्ट नहीं किया गया तो वह नये रूप में आधिक तीव्रता से उभर कर आ सकता है। अन्ततः निष्कर्ष यही निकलता है कि इस चिकित्सा पद्धति के अन्तराल में छिपे अन्य विश्वास को जड़ से निकाल फेंककर अब जन मानस को अपनी सृष्टि का परिमार्जन करना ही चाहिए। जितना भी श्रेष्ठ है, वह तो ग्राहय है, पर सामयिक लाभ का दर्शन किसी भी मूल्य पर जीवन में नहीं उतारा जा सकता है।
विकल्प के रूप में हमारे समक्ष एक ऐसा जीवन दर्शन आता है जिसे प्राकृतिक आहार विहार, रोगों के प्रति परिष्कृत दृष्टिकोण एवं औषधीय पौधों के रूप में सब ओर उपलब्ध जड़ी-बूटियों की प्रधानता हो
अनियमित एवं प्रकृति के जीवनक्रम विजातीय द्रव्य को एकत्र होने के लिए बाध्य करता है। ऐसे में खान-पान के विषय में सर्वव्याप्त अन्धविश्वासों के प्रति जनमानस का सचेत होना अत्यावश्यक है। सर्वसुलभ वनस्पतियोँ हरी सब्जियों में अन्य खनिज पदार्थों की अपेक्षा नमक इतना होता है कि शरीर की आवश्यकता की पूर्ति बराबर होती रहे। पर इससे भी अधिक मात्र स्वाद पूर्ति हेतु लिया जाने वाला ‘सोडियम क्लोराइड’ नामक यह रसायन हृदय, रक्त संस्था, गुर्दों पर प्रतिकूल प्रभाव डालकर अनावश्यक तत्वों के जमाव तथा आवश्यक घटकों के निष्कासन में सहायक होता है। दूध, हरी सब्जियाँ, अंकुरित श्रम में रुचि लेने वाले व्यक्ति को पूरी मात्रा में कैलोरी दे सकने में समर्थ है, ऐसा मत विख्यात चिकित्सकों का है। फिर भी अनावश्यक चर्बी युक्त, जिव्हा को रुचिकर भोजन जिस मात्रा में पूरे विश्व के लिया जाता है, वह मात्र एक प्रकार की भ्राँति ही है जो विश्वमानस को जकड़े हुए है।
वनस्पतियोँ के जीवनी शक्ति संवर्धन एवं रोग निवारण में उपयोग कर चिर पुरातन काल से प्रतिपादित होता चला गया है। कहा जाता है कि एक बार ब्रह्माजी ने च्यवन ऋषि को निर्देश दिया कि पृथ्वी पर जो भी पौधा व्यर्थ हो, तोड़ लाओ। 11 वर्ष भटकने के उपराँत वे ब्रह्माजी के सामने नतमस्तक होकर बोले-”प्रभो! पृथ्वी पर एक भी पत्ता ऐसा नहीं मिला जो किसी न किसी रोग के उन्मूलन में सहायक न हो।” उससे पेड़ पौधों, जड़ी-बूटियाँ की महत्ता समझ में आती है। चरक ऋषि के बारे में वर्णित है कि वे औषधियों से उससे गुणों को पूछते जाते थे एवं तदनुसार उपयोग हेतु उनका संकलन करते थे।
इन सब आख्यानों से औषधीय पौधों की विलक्षण प्रभावकारी क्षमता पर प्रकाश पड़ता है। इसी मान्यता के कारण हिन्द अध्यात्म में पौधों को देव समान मानकर पूजा अभ्यर्थना करने का स्वरूप बनाया गया है। पौधों को को मध्यम योनि प्राप्त देव पुरुष माना गया है। उपनिषद्कारों का कथन है कि-
यो देवो अग्नौ यो अप्सु या विश्व, भुवनमाविवेश। य औषधीषु योवनस्पतिषु तस्मै, देवाय नमोरमः॥ वेश्ताश्वतरोपनिषद 2।17
अर्थात्-”जो परमात्मा अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में समाविष्ट है, जो औषधियाँ में है तथा वनस्पतियों में है, उस परमात्मा को नमस्कार कर लिया है। इसी पर शोधें केन्द्रित भी है।
पाश्चात्य जगत में सबसे महत्वपूर्ण शोध इन दिनोँ ‘एजींग’ (वार्धक्य) पर चल रही है कि किस तरह अपनी मृत्यु को आगे बढ़ाया जा सके, इसी पर सारे प्रयास केन्द्रीभूत है। हिमालय की तराई में प्रारम्भ, कायाकल्पी एवं अमरकंटकी नामक पौधे इन्हीं विशेषताओँ से भरे पूरे हैं। इस पर विशद खोज की आवश्यकता है। वार्धक्य को नियन्त्रित करने से मानव को कैंसर रूपी असाध्य रोग का उपचार भी हस्तगत हो सकता है। काया कल्प एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका सपना चिकित्सकगण देखते आये है। इन दोनों औषधियों में ये क्षमताएं छिपी पड़ी है। ‘चंदलिया’ नामक औषधि से पथरी का उपचार राजस्थान में लोकप्रिय है। इसी प्रकार सहज सुलभ शंख पुष्पी स्मरण शक्ति को तेर करने के लिए बड़ी तादाद में गाँवों में प्रयुक्त होती आयी है।
आज कैंसर का उपचार रेडियो आइसोटोपो के माध्यम से किया जाता है। हिमालय के ऊपरी भाग में पाये जाने वाले ‘कुमारिका’ पौधे में भी इन आइसोटोपो का पहचान लिया गया है। कैंसर का उपचार इससे संभव है। प्रत्यक्ष प्रयोग परीक्षण द्वारा यह सिद्ध किया जा सके तो चिकित्सा विज्ञान की यह सबसे बड़ी क्राँति होगी। रतनजोत, इल्लर विल्लर,सेल्सिया, भापिया, निकोटियाना आदि पौधों में भी कैंसर का उपचार ढूंढ़ा जा रहा है। केन्द्रीय भैषज्य अनुसंधान संस्थान लखनऊ एवं बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में इन पर प्रयोग चल रहे हैं।
एक्यूपंक्चर पद्धति के जन्मदाता चीन ने जड़ी बूटियां पर आधारित चिकित्सा पद्धति का विकास करके कम खर्च में ही अपनी आबादी को अच्छा स्वास्थ्य देने में सफलता प्राप्त की है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति भले ही इन जड़ी-बूटियों पर आधारित प्राचीन उपचार पद्धतियों की भर्त्सना करती हो, लेकिन यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि प्रयोगशालाओं में रासायनिक विधियों से तैयार इन दवाओं में से अनेक के गुणकारी तत्वों की जानकारी सर्वप्रथम जड़ी-बूटियों के माध्यम से ही हुई थी।
ल्हासा में स्थापित तिब्बती चिकित्सा संस्थान में चीनी आयुर्वेद से सम्बन्धित अनेक असभ्य पुस्तकें सुरक्षित है। एवं विशेषज्ञ के अनुसार चीन में लगभग 5000 जड़ी-बूटियाँ इलाज के काम प्रयुक्त हो रही है। आधुनिक शोध उपकरणों का उपयोग का चीन ने अपनी जड़ी-बूटी कोष में निरन्तर अभिवृद्धि की है। ‘वर्मवुड’ नामक जड़ी से चीनी आयुर्वेदज्ञों ने ‘चिगं हाओस्’ नामक दवा निकाली है जो मलेरिया रोग में क्लोरोक्विन से भी बढ़कर उपयोगी पाई गयी है। चीन में सड़कों के दोनों ओर पेड़-पौधे लगाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी पौधे अवश्य लगाए जाये। स्वास्थ्य कार्यकर्ता उन्हें एकत्र करने व उगाने में सतत् व्यस्त रहते हैं। वे इन औषधियों से काढ़ा, चूर्ण, अवलेह बनाकर गाँव-गाँव घूमकर बाँटते रहते हैं। सन 1971 से अब तक चीन सरकार तीन लाख स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रशिक्षित कर ग्रामीण क्षेत्रों में भेज चुकी है। हृदयाघात में ‘साल्विया मिल्टिरोइजा’, ब्लड कैंसर में ‘सिफेलोटेक्सस’, साँस अवरोध में ‘रियम टाँकुटीमकम तथा रेफेनर’ का चीन में बड़ी सफलता से प्रयोग किया गया है। यह चीनी आयुर्विज्ञान ईसा से 600 वर्ष पूर्व का है जबकि भारत का आयुर्वेद का इतिहास इससे भी पुराना है।
चीन की तरह भारत को भी इस गरिमा के प्रति सचेत हो जाना चाहिए। इस देश की विशाल जनसंख्या के स्वास्थ्य की सुरक्षा और रोगों से बचाव के लिए महंगी चिकित्सा पद्धति कतई उपयोगी नहीं है। पीपल, तुलसी जैसी दिव्य वनौषधियों की हमारे यहाँ पूजा की जाती रही है। इनकी रोग निवारण क्षमता के अतिरिक्त भी इनमें कई ऐसे गुण है जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास में सहायक हो जाते हैं भरामाँसी, पीलीक कनेर, सर्पगंधा, गुग्गल, हरिद्रा, दारुहल्दी जैसी औषधियोँ पर विशद अनुसंधान किया गया है एवं फलदायी परिणाम सामने आये है। शरीर औषधि अनुसंधान परिषद के निर्देशक डा. पी.एन.बी. कुरुप के अनुसार अब भारतीय जड़ी-बूटियों से ऐसी दवाओं को बनाने में सहायता मिल सकने की संभावना है जो असाध्य रोगों को ठीक कर सके।
आयुर्वेद की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण है। आवश्यकता मात्र उसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुतीकरण की है। पिछले दिनों अमेरिका के एक विद्यार्थी ने पूना आयुर्वेद कॉलेज से आयुर्वेद में स्नातक की उपाधि ली है। प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त इस प्रतिभाशाली वैज्ञानिक ने आयुर्वेद के इस महान स्वरूप को विश्व व्यापक बनाने का संकल्प लिया है। रूस के राष्ट्रपति लियोनिड ब्रेजनेव के हृदयाघात के उपचार के लिए भारत से ही आँध्र प्रदेश के एक जड़ी-बूटी विशेषज्ञ द्वारा ‘सुनुम-ए-मुख्रीफ ए सतावन’ नामक जड़ी बूटी भेजी गयी थी।
यह विज्ञान चिर प्रतिष्ठित चिकित्सा विज्ञान है । बड़े सुनिश्चित एवं मजबूत आधारों पर खड़ी यह पद्धति प्रकृति के अनुकूल जीवनचर्या को प्रधानता देती है। हमारे चारों ओर पायी जाने वाली इन दिव्य वनौषधियाँ के उपयोगी को यदि बढ़ावा दिया जा सके तो एक वैकल्पिक जीवन दर्शन एवं पीड़ित मनुष्यता के लिए समग्र चिकित्सा प्रणाली का प्रतिपादन किया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से यह पद्धति कम खर्च की भी है और हानि रहित भी। रोग निवारण में कुछ समय भले ही अधिक लगें, पर प्रतिकूल परिणाम सामान्यतया इसके नहीं होते। जीवनी शक्ति संवर्धन एवं जैविक वातावरण के अनुकूल ही शरीर की व्यवस्था का सुनियोजन इन औषधियों का उद्देश्य है। अध्यात्मवादी दर्शन यही है। आज इसी को अपनाये जाने का नितान्त आवश्यकता है।
मनुष्य के विषय में जब भी विचार किया जाता है, उसकी स्थूल काया-बाह्य संरचना पर ही मुख्यतः ध्यान केन्द्रित होता है। जड़वादी दार्शनिक, प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक कार्यों के साथ-साथ मन की सत्ता का अस्तित्व भी स्वीकारते है। यही स्थिति चिकित्सा विज्ञानियों की भी है। वे यह तो मानते है कि मानसिक विकार एवं भ्राँतियाँ रोगोत्पत्ति में एक प्रमुख कारण है, पर वे भी प्रधानता शारीरिक लक्षणों-उनकी बाह्य प्रतिक्रियाओं पर देते चले आये हैं। एनाटामी एवं फिजियोलॉजी विज्ञान इन दो से परे किसी भी सत्ता के अस्तित्व को नकारते हुये चिकित्सा हेतु मन विश्लेषण, तनाव शामक औषधियों एवं शारीरिक लक्षणों के तात्कालिक उपचार क्रमों को ही प्रधानता देता है।
आयुर्वेद का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों का विकास तो अभी अभी गत कुछ शताब्दियों में हुआ है। परन्तु भारतीय आयुर्वेद विज्ञान रोग की जड़ के निदान का वर्णन कर उपचार हेतु दैनन्दिन के जीवनक्रम में उपलब्ध होने वाली जड़ी-बूटियां तथा रसायन आदि की व्यवस्था करता आया है। इस विज्ञान में रोगोत्पत्ति निदान व चिकित्सा हेतु समग्र मानव और उसके आन्तरिक जीवन पर विचार किया जाता है। जिस ‘साइको सोमेटक’ रोग को पाश्चात्य वैज्ञानिक मनोरोगों की शारीरिक प्रक्रिया बता कर आज वर्णन करते हैं।, उसकी व्याख्या सूत्रात्मक शैली में -’प्रज्ञापराध’ के रूप में आयुर्वेद में पहले ही कर दी गयी है।
चरक संहित के अनुसार-
धीध्तिस्मृतिविभ्रष्ट-कर्म,यत्कुअस्तेअशुभम्। प्रज्ञापराधं तं व़िद्यात् सर्वदोष प्रकोपनम्॥
अर्थात्- बुद्धि, धैर्य और स्मृति से भ्रष्ट होकर मनुष्य जो अशुभ कर्म करता है उस प्रज्ञापराध जानना चाहिए, उसे सर्वदोष प्रकुपित होते है।”
किसी भी चिकित्सा विज्ञान में पूर्वजन्म के अशुभ कर्मों एवं उनकी इस जन्म में रोगों के रूप में परिणित का वर्णन इस प्रकार न हुआ होगा जैसा कि महर्षि चरक ने किया है।
निदिष्टं दैवशब्देन कर्मयत् पौवदेहिकम। हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलक्ष्यते॥
अर्थात्-”पूर्व जन्म का कर्म भी, जिसे दैव कहते हैं, कालाँतर में रोगों हेतु देखा जाता है।
प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर ये प्रतिपादन प्रयोगशाला में सिद्ध भले न किये जा सकें, पर इनकी दैनन्दिन जीवन व्यापार में लीला सर्वत्र दृष्टिगोचर होती रहती है। ‘प्रज्ञा’ को आयुर्वेद ने परमपवित्र एवं अमूल्य निधि बताया है जो मानव को सृष्टा का वरदान है जो इसे जितना प्रखर परिष्कृत बनाये रखता है व न केवल अपने आपको व्यक्तित्व सम्पन्न बनाता है अपितु अपने स्वस्थ जीवन का पथ भी प्रशस्त करता है। प्रज्ञा उसे कहते हैं जो दुर्भाव-द्वेषों में मुक्त हो भावना प्रधान बुद्धि हो, जिसमें आदर्शवादी निष्ठाओं का जीवन में समावेश हो एवं कृत्रिम रहित हो।
इस शब्द को आधार बनाकर स्वस्थ-अस्वस्थ मानसिकता एवं तदनुसार रोगों का निर्धारण कितना सूझबूझ कर किया गया है, यह आज की व्याधियों की अनेकानेक थ्योरीज एवं ‘रोगोत्पत्ति’ पर किये गये प्रतिपादनों को पढ़कर पता चलता है। कीटाणुवाद जो आज ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति का मूल आधार है, को भी ‘चरक ने अस्वीकार नहीं किया है। अन्तर बस इतना ही है कि इसे पूर्व जन्म में पाप कर्म का फलोदय इस जन्म में उस प्रज्ञापराध की जीवनी शक्ति के हास से परिणति तथा प्रतिक्रिया रूप में जीवाणु वर्ग का शरीर में प्रवेश बताते हैं। ‘आल्टरनेटिव मेडिसिन’ के समर्थक अब आधुनिक विश्व में बढ़ते जा रहे हैं। वे भी जीवाणु के आक्रमण को अनास्था-असन्तुलन की फलश्रुति मानते हैं। यह अनास्था ही शास्त्रों में ‘प्रज्ञापराध’ के रूप में वर्णित की गयी है।
प्रज्ञापराध का कारण है- विवेक से च्युत होना। काम, क्रोध, लोभ इत्यादि के वश में होकर मनुष्य जब स्वयं पर संयम खो बैठता है तब उसे उचित अनुचित का भान नहीं रहता। वह अनायास ही ऐसा अपराध कर बैठता है जो काया के स्वस्थ जीवनक्रम का असन्तुलित कर देता है। असंयम चाहे वह शारीरिक, समय की अनियमितता हो अथवा अर्थ एवं वाणी का असंयम- इन की परिणति होती है। असन्तुलित चित्तवृत्ति में । यही अपनी बाह्य अभिव्यक्ति शारीरिक रोगों के लक्षणों के रूप में करती है। विडम्बना यह है कि उपचार इन लक्षणों का किया जाता है न कि उस जड़ का जो गहरे में बैठी रहती है एवं उपयुक्त परिस्थितियाँ पाकर फूटती रहती है। गरुड़ पुराण में उल्लेख आता है-
“चितायंत धातुवश्यं शरीरं चिते नष्टे ध् तवोयन्ति नाशम्। तस्माच्चित सर्वंदा रक्षणीयं स्वस्थें चिते धातवः सम्भवन्ति॥”
अर्थात्- “मानवी काया चितायत है और धातुओं के वश में है। चित के नाश से धातुएं नष्ट होती है, इसलिए सर्वदा चित की रखा करनी चाहिए। यदि चित स्वस्थ है तो धातुएं पुष्ट होती है और पुष्ट धातुओं का अर्थ है स्वस्थ नीरोग काया।”
चरक के अनुसार प्रज्ञापराध का वास्तविक रूप इस प्रकार है-
“संग्रहेण चारितयोगवर्ज कर्म वाउमनशरीर महित मनुपिदिष्टं यत्तच्च मिथ्यारोग विद्यात्।
इति त्रिविध विकल्पं त्रिविधमेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्थेत्॥
अर्थात्-”मन, वचन और शरीर के लिए अहितकर और शास्त्र निषिद्ध अतियोग, अयोग और मिथ्यारोग इन त्रिविध विकल्प रूप कर्मों को प्रज्ञापराध कहते हैं।”
आयुर्वेद का यह कथन कि वेगों (ड्राइव या मोटिव) को अनुचित रूप से रोकने या बलपूर्वक प्रवृत्त करने से रोगोत्पत्ति होती है-वैज्ञानिक शोध का विषय हैं। मलमूत्र वीर्य वायु का प्राकृतिक प्रवार न तो एकाएक रोकना चाहिए, न ही उन्हें बलपूर्वक क्षणिक होने देना चाहिए क्योंकि फी से ही अनन्तः रोगों का कारण बनते हैं।
इन अपराधों के अतिरिक्त वाणी के अपराधों को भी प्रज्ञापराधों में गिना गया है और उन्हें रोगों का कारण माना गया है। वाणी का सद्प्रयोग और दुरुपयोग ही आनन्द व उद्वेग का स्वास्थ्य एवं अस्वस्थता का कारण बनता है, ऐसा शास्त्रों का मत है। वाणी के संयम को वांग्मय तप बताया गया है, जो स्वस्थता का सहज साधन है। इसी आधार पर बताया जाता है कि रोगी से कहे गये प्रेम सहानुभूति से युक्त चिकित्सक के वचन रोगी का आधा रोग दूर कर देते हैं संयत, मिष्ट और सत्य वचन युक्त मृदु वाणी व्यवहार एक सुसंस्कृत और स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण है।
प्रज्ञापराध व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसकी प्रतिक्रियाएं समाज के हर घटक पर होती है और सामाजिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव पड़ता है। दुष्कर्मों का बढ़ना उनसे सूक्ष्म वातावरण का प्रदूषित होना तथा उसकी परिणति प्रकृति पर दुष्प्रभाव के रूप में होना एक तथ्य है। इसी व्यापक सामाजिक प्रज्ञापराध को ‘धर्मग्लानि’ के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है।
वस्तुतः स्वस्थ जीवन का आधार है- आध्यात्म सिद्धान्तों का जीवन के हर क्षण हर गतिविधि में व्यापक समावेश। दवाओं से स्वास्थ्य नहीं खरीदा जा सकता है।
850 करोड़ रुपयों की वार्षिक खरीद करने वाले 36 करोड़ की जनसंख्या वाले भारतवर्ष के नीति निर्माताओं को नागरिकों का स्वास्थ्य सुधारने मात्र के लिए नहीं, राष्ट्रीय अर्थनीति को आमूलचूल रूप से बदलने व राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाने के लिए भी इस ओर तुरन्त ध्यान देना चाहिए।
प्रज्ञापराध और कुछ नहीं, प्रकारान्तर से आस्था संकट है-अनास्था पर दैत्य का दुष्प्रभाव ही है। यही व्यष्टिगत व समष्टिगत रोगों का मूल कारण है। राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य हेतु इसके निवारण हेतु अध्यात्म सिद्धान्तों का, उत्कृष्टता की पक्षधर मान्यताओं का जनस्तर पर व्यापक प्रचार-प्रसार अति आवश्यक है।
मृत्यु वे विषय में अनेकानेक भ्रांतियां है। जीवन के इस पटाक्षेप के रहस्य को जानने समझने की सहज अभिलाषा मानव को आदि काल से रही है। मनुष्य क्यों वृद्ध होता है, उसकी मृत्यु किस कारण से होती है, मरणोपरांत क्या यह जीवन यात्रा इसी काया के साथ समाप्त हो जाती है। यह वैज्ञानिकों के लिए ज्वलन्त प्रश्न बना हुआ है। क्या अमरत्व प्राप्त करना संभव है, यह आज के वैज्ञानिकों के शोध का मूल विषय है। इसी कारण मृत्यु की जैव-रासायनिक एवं जैव भौतिकीय पृष्ठभूमि का पता लगाया जा रहा है।
एक तथ्य फिर भी सुनिश्चित है कि मृत्यु की परिभाषा तब तक संभव नहीं हो पायी है। एक मान्यता तो यही चली आयी है कि जब नाड़ी की गति मन्द होते-होते रुक जाये, रोगी श्वास लेना बन्द कर दे, उसे मृत घोषित कर देना चाहिए। एक पुराना तरीका यह भी था कि नाक के सामने शीशा रखकर साँस से उठने वाली भाप की उपस्थिति से व्यक्ति के जीवित होने की स्थिति बताई जाये। परन्तु नवीनतम शोधों, उपलब्ध तकनीकी ज्ञान व मानव की तथ्यान्वेषी बुद्धि ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने को विवश कर दिया है कि मस्तिष्क की महत्ता ही सर्वोपरि है। मस्तिष्क की मृत्यु ही वास्तविक मृत्यु है।
‘क्लिनिकल डेथ’ अर्थात्- डाक्टरी मृत्यु उसे कहते हैं, जिसमें सामान्य जाँच पड़ताल के बाद यह घोषणा कर दी जाये कि हृदय संस्थान ने अब काम करना बन्द कर दिया है। काफी समय तक इसे ही मृत्यु का प्रतीक माना जाता रहा । कई ऐसे मामले आये, जिसमें मृत व्यक्ति कुछ देर बाद गहरी साँस लेकर पुनर्जीवित हो गया। अन्तिम यात्रा को जा रही लाश में एकाएक कम्पन हुआ और वह उठकर बैठ गयी। चिकित्सक द्वारा प्रामाणित मृत व्यक्ति जब पोस्टमार्टम के लिए पहुँचाया जा रहा था, उठकर बैठ गया और पूछा बैठा, “मुझे कहाँ ले जाया जा रहा है” इन सब की वैज्ञानिक तह में जाने पर चिकित्सकोँ ने मृत्यु की परिभाषा का पुनर्निर्धारण किया। उपरोक्त घटनाओं को ग्रहा अथवा रहस्यमय न मानकर यह बताया गा कि हृदय काम करना बन्द भी कर दे तो भी मृत्यु तब तक नहीं होती, जब तक मस्तिष्क जीवित है, उसकी कोशाओं में विद्युत सक्रिय तरंगें विद्यमान है। हृदय की मृत्यु ‘काडियक डेर्थ’ है। मस्तिष्क की मृत्यु सेरिब्रल डेथ एवं कोषियों की मृत्यु सेल्युलर डेर्थ। सेरिब्रल डेथ की अंतिम पड़ाव है जिसका बाहरी स्वरूप मस्तिष्कीय तरंगों (इलेक्ट्रो एनसेफेलोग्राम) का समान्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
मस्तिष्क की मृत्यु ही अंतिम सत्य है, यह चिर पुरातन अध्यात्म प्रतिपादन है। कहा गया है कि मस्तिष्क एक प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। जीवन की सक्रियता एवं स्फूर्ति मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर निर्भर है। व्यक्तित्व का सारा कलेवर यही विनिर्मित होता है। यही वह पावर हाउस है, जहाँ से शारीरिक इंद्रियां शक्ति प्राप्त करती है। स्थूल गतिविधियाँ ही नहीं, विचारों भावनाओं का नियंत्रण भी यही होता है।
विचार यदि जीवित है तो मस्तिष्क भी जीवित हैं। जो व्यक्ति जीवित रहते हुए अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग कर लेता है, वह स्वयं का तो विकास करता ही है, और समाज का सम्मान भी पाता है। यही मस्तिष्क जब विचार शून्य हो जाता है, उसकी सोचने समझने की क्षमता नष्ट हो जाती है। अथवा कोई भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में मनुष्य स्वयं को असमर्थ ही पाता है तो उसे मृतवत ही कहा जाना चाहिए।
बालक की विकास अवस्था में प्रारंभिक वर्षों में (तीन से बारह वर्ष तक) सर्वाधिक वृद्धि दृष्टि से उसके मस्तिष्क की होती है। उसके मस्तिष्क का व्यास बढ़ जाता है स्थूल दृष्टि से विकास की गति तीव्र होते हुए भी हर दृष्टि से यह बालक परावलंबी ही होता है। विचारों की दृष्टि से वह परिपक्व नहीं होता, तब तक स्वतंत्र निर्णय बुद्धि उसमें नहीं विकसित होती। स्नायु विज्ञानी बताते हैं कि इस आयु के बाद मस्तिष्क का स्थूल विकास तो रुक जाता है, पर उसमें सूक्ष्म क्षमताएँ विकसित होने लगती हैं। भाव परक संवेदनाएँ, अपने पराये का ज्ञान, विपरीत लिंग के प्रति सहज आकर्षण, जीवनोद्देश्य-इन सब को उसे भान होने लगता है। उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, वृद्धि हर दृष्टि से युवा सम्पन्न होता है। पर इस उपलब्धि को बनाये रखने के लिए उसे अपना मस्तिष्क सतत् क्रियाशील, जीवन्त बनाये रखना होता है। स्थूल तरंगों का मापन कुछ भी निर्णय दे समग्र विकसित मस्तिष्क ही किसी के सही अर्थों में जीवित होने का प्रमाण देता है।
यह तथ्य सुनिश्चित समझा जाना चाहिए कि यह जीवन मस्तिष्क से ही आरम्भ होता है एवं मस्तिष्क पर ही समाप्त हो जाता है। चिकित्सा जगत में ‘क्लीनिकल मृत्यु’ के विषय में सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण सोवियत चिकित्सक डा॰ वी॰ नेगोविस्की ने किए हैं। उनके अनुसार मृत्यु एक अकस्मात् होने वाली घटना नहीं, धीमी प्रक्रिया है जिसमें जीव कोष धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ते हैं। मस्तिष्कीय मृत्यु (सेरिमल डेथ) तो प्राणी का जीवित स्पन्दन है। जब वह समाप्त हो जाता है तो इस पार्थिव काया का भी अन्त हो जाता है।
परन्तु इन सबके मूल में जो सूक्ष्म सत्य अंतर्निहित है, वह विशिष्ट ही है। जीवित व्यक्ति में मृत्यु की विभीषिका अनेकानेक परिस्थितियों में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। ‘सिफिलिस’ नामक यौन रोग की अन्तिम अवस्था में मस्तिष्क के बुद्धि, सामाजिक व्यवहार, संवेदना वाले मृतप्राय हो जाते हैं। इसी तरह ‘सठियाना’ रोग नहीं, एक स्थिती है। जब व्यक्ति की चिंतन क्षमता समाप्त हो जाये, नागरिक कर्तव्यों की छोटी छोटी बातों का उसे ध्यान न रहे, उसकी स्थिति गयी बीती हो जाती है जीवित होते हुए भी मृतवत वह अपनी लाश ढोता है। डिप्रेशन, न्यूरोसिस, साइकोसिस, ऐसे रोग है, जिनमें शारीरिक दृष्टि से पर्ण स्वस्थ होते हुए भी मनुष्य का अस्तित्व नहीं के बराबर होता है। एक बेचारा, जो सारा दोष परिस्थितियों को देता रहता है। किसी तरह अपनी जीवन की गाड़ी चलाता रहता है, वह दार्शनिक दृष्टि से मृत्यु की ओर अग्रसर होता माना जाता है।
हमारे मस्तिष्क की संरचना लगभग उसी स्तर की है, जैसी पृथ्वी के ध्रुव प्रदेशों की । इसके सामान्य से दिखने वाले कण वस्तुतः अनोखे चुंबकत्व से भरे पड़े है। उत्सर्जित विद्युतीय ऊर्जा को यों तो ई.ई.जी. द्वारा मापा जा सकता है। परन्तु वह उस पूरी शक्ति सम्पदा का मात्र कुछ हिस्सा ही है। शेष ऊर्जा तो चेतना स्तर की होने के कारण याँत्रिक पकड़ एवं परख से बहुत आग की है। अनेकों जर्मन एवं स्विस वैज्ञानिकों ने वर्षों तक असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्तियों का अध्ययन कर मात्र यह पाया है कि मस्तिष्क के दोनों हिस्सों की काटेक्स संरचना में कुछ अन्तर होता है। वैसे यह विभिन्नता अलग-अलग व्यक्तियों में सामान्यतः देखने में आती है। वस्तुतः मानसिक क्षमता, चारित्रिक दृढ़ता, संवेदनाएं, उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कार्यों को करने की जीवट आदि विषय स्थूल मस्तिष्क के नहीं है। चेतन की परिधि में आने वाली इन विशिष्टताओं का विशद अध्ययन परामनोवैज्ञानिक कर रहे हैं। इन सबके निष्कर्ष यही है कि प्रस्तुत शक्तियों का जागरण एवं मानसिक क्षमतायें का पूर्ण उपयोग ही जीवन की समस्त सफलताओं का मूल है यही जीवन है।
मस्तिष्कीय मृत्यु को जैविक दृष्टि से भले ही सब वैज्ञानिक ने स्वीकार किया हों। भारतीय अध्यात्म का यह सनातन प्रतिपादक रहा हैं। इस तथ्य को जिनने समझ लिया, वे सफल, समर्थ, समाजोपयोगी जीवन जीकर महामानव का पद पा गए। इसी जीवन में स्वर्गमुक्ति का यह राजपथ प्रत्येक के लिए खुला पड़ा है। यदि चाहे तो वह मस्तिष्क का समग्र विकास कर देवत्व की अनुभूतियों का रसास्वादन कर सकता है। इसके विपरीत जीवित लाश की तरह जीकर भर्त्सना का पात्र भी बन सकता है। यही इस पृथ्वी का स्वर्ग-नरक है। इस जीवन की परिणति किसी भी रूप में होती हो, उसे किस तरह जिया गया, यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
मानवी चेतना ब्रह्मांडीय चेतना का ही एक घटक है। ब्रह्मांड की प्रकृतिगत हलचलों एवं चेतनात्मक प्रवाहों से मानव ही नहीं, प्राणी समुदाय भी प्रभावित होते रहते हैं। सूक्ष्म में सर्वव्यापक इस शक्ति को अध्यात्मवादियों ने ‘ब्रह्म’ की संज्ञा दी है। और वैज्ञानिकों ने अपने गहन पुरुषार्थ से इस शक्ति में अंतर्निहित सत्य को खोजने का प्रयास जारी रखा। दृष्टि थोड़ी भिन्न होते हुए भी मूर्धन्य वैज्ञानिकों का यही मत था कि दृश्य जगत का संचालन करने वाली कोई अदृश्य सत्ता अवश्य है। प्रकृति के प्रकोपों, दण्ड व्यवस्था के रूप में उसकी झाँकी हमें यदाकदा देखने को मिलती है। मानवी स्वास्थ्य पर इनके संभावित प्रभावों पर भी वैज्ञानिक अब ध्यान दे रहे हैं। अपनी खोजों के प्रति अत्यधिक आशावान् तर्क बुद्धि इन विभीषिकाओं का जब कारण खोजती है तो स्वयं को असहाय पाती है। ऐसे में आवश्यक है कि भावी संकटों की पृष्ठ भूमि जानकर स्वयं को सचेत रखा जायें।
प्राणी पृथ्वी पर निवास करते हैं उन पर अन्तरिक्ष से आने वाली किरणें, सौर मण्डल की ऊर्जा, अंतर्ग्रही शक्तियाँ आदि का ही नहीं पृथ्वी के अन्तराल में चल रही सूक्ष्मतम हलचलों का भी प्रभाव पड़ता है। जो सूक्ष्म तरंगें पृथ्वी के अन्दर निरन्तर सक्रिय रहती है, वे सर्केडियम रिडम के रूप में मानव मन की हलचलों, प्राणियों के व्यवहार तथा मौसम के सन्तुलन पर गहरा प्रभाव डालती है। इन सब वैज्ञानिक निष्कर्ष से यही तथ्य सत्यापित होता है कि मानव की विचार तरंगें, अन्तरिक्ष जगत के कम्पन एवं पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों के भी सूक्ष्मतम परमाणु एक ही इकाई से विनिर्मित है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों से इस बात का पता चला है कि जब तूफान आने को होते हैं, मानवी स्वभाव में आकस्मिक ऐसे परिवर्तन होते हैं कि वह चिड़चिड़ा हो जाता है। स्वभाव में चंचलता आ जाती है। यदि रात हो तो भयावह सपने भी दिखाई देते हैं। हिस्टीरिया और मिरगी के रोगियोँ को इन दिनों रोगों के दौरे बढ़ने की सम्भावना अधिक हो जाती है। आत्महत्या की मनोवृत्ति वाले रोगी एवं निराश मन स्थिति के व्यक्ति ऐसे समय अनायास ही अपनी इच्छा पूरी करने में प्रवृत्त होते देखे गए हैं। अमेरिका के सेनफ्रांसिस्को नगर में एक पर्यवेक्षण के अनुसार गहरे कुहासे के छाने पर आत्महत्या करने वालों की संख्या उन दिनों एकाएक दस गुना बढ़ जाती है। मानवी स्वभाव में निरंकुशता का प्रादुर्भाव होने लगता है। बलात्कार और अपराधों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। जब बैरोमीटर का पारा निम्नतम बिन्दु पर होता है तब तूफान आने की संभावना बढ़ने लगती है एवं चोरी डकैती की घटनाओं में वृद्धि का क्रम आरंभ हो जाता है।
मानव मस्तिष्क ही नहीं, प्राणी भी इन मौसम सम्बन्धी परिस्थितियों से प्रभवति होते हैं। चिड़ियाएं अपने घोंसलों को छोड़कर आकाश में मंडराने लगती है। मछलियाँ अपने आप मछुआरों के जाल में फंस जाती है। गायें अपने बन्धन तोड़कर भागने लगती है। प्रकृति की व्यवस्था में होने वाले इन असन्तुलनों का प्रभाव समान रूप से सभी पर पड़ता है। भले ही प्रभावित होने वाले जीवधारी इस अव्यवस्था के लिए सीधे उत्तरदायी न हों।
वस्तुतः मानव इस पृथ्वी पर एकाकी नहीं है। अपने हर प्रयास के लिए वह परावलम्बी है। जड़ चेतन जगत में अन्तराल में असंख्य ऐसी शक्तियाँ कार्य कर रही है,
जिनमें से कुछ की ही जानकारी मनुष्य को है। जीवधारियों के हर क्रिया-कलाप का प्रभाव अन्य प्राणियों पर, वातावरण पर, मौसम पर तथा इस सृष्टि के सन्तुलन पर पड़ता है। इन सब परिवर्तनों का प्रभाव जब उलट कर हमले करता है तब प्रकृति की दण्ड व्यवस्था अथवा अधिक जागरुकता?, सहनशीलता एवं आत्मरक्षा की प्रबल पुरुषार्थ परायणता के रूप में सभी को इसे शिरोधार्य करना पड़ता है।
प्रकृतिगत असन्तुलनों की चर्चा करते हुए डाक्टर पीटरसन लिखते हैं कि पुरातन युग के चिकित्सा रोग निदान और उपचार प्रक्रिया में मौसम के परिवर्तनों का पहले से ही अनुमान कर तद्नुरूप व्यवस्था बनाते थे। उन्हें मौसम के कारण स्वास्थ्य और शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की किसी न किसी रूप में जानकारी थी। उनके अनुसार “भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान तथा मौसम विज्ञान के संदर्भ में मनुष्य के शारीरिक विकास एवं मानसिक सक्रियता को जिस प्रकार महत्ता दी जाती है। वह अकारण नहीं है। इसे अन्धश्रद्धा नहीं, वरन् विशुद्ध वैज्ञानिक तथ्य माना जाना चाहिए।” स्वयं डॉ. पीटर्सन इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि रोगियों पर मौसम परिवर्तन की सुनिश्चित प्रतिक्रिया होती है।
यूगोस्लाविया के भू भौतिक विशेषज्ञों का मौसम में होने वाले असामान्य परिवर्तन के संदर्भ में कहना है कि जब सौर मण्डल और पृथ्वी के झुकाव में थोड़ा भी परिवर्तन होता है तो मौसम में भी भारी उथल-पुथल होती है। ससेक्स विश्वविद्यालय के डॉ0 जॉन ग्रिविन का कथन है कि सौर धब्बों की स्थिति में बदलाव होने से वायुमण्डल में कई अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार की हलचलें सौर मण्डल में इन दिनों स्पष्टता दिखाई दे रही है।
ब्रिटेन के मौसम विशेषज्ञ आर्थर मेन्किन्स परमाणु परीक्षणों को वातावरण के समस्त असन्तुलनों का कारण मानते हैं। अतिवृष्टि, सूखा, भूस्खलन, एवं भूकंप की बढ़ती घटनाओं के पीछे उनने रेडियो विकिरण को प्रमुख कारण बताया है। इन दिनों होने वाले मौसम परिवर्तन अप्रत्याशित से लगे, पर जब परोक्ष पर दृष्टि डाली जाती है तो उनकी पृष्ठभूमि भी स्पष्ट समझ में आने लगती है।
पिछले वर्ष अमेरिका के कई नगरों में वायु मण्डल का तापमान हिम बिन्दु से भी 20 डिग्री सेन्टीग्रेड नीचे चला गया। मास्को में इतनी बर्फ पड़ी है कि विगत सौ वर्षों का रिकार्ड टूट गया है। इस स्थिति को देखते हुए अमेरिका के प्रसिद्ध विज्ञानी डॉ0 राबर्ट जैस्ट्रा का कथन है कि द्वितीय बर्फ युग के शीघ्र आने की सम्भावना है। प्राप्त इतिहास के अनुसार एक हजार वर्ष पूर्व अमेरिका को हिमयुग के मध्य होकर गुजरना पड़ा था। जहाँ इतनी अधिक ठण्ड इन देशों में पड़ी, वहीं पश्चिम आस्ट्रेलिया में तापक्रम एक सौ पच्चीस डिग्री सेन्टीग्रेड तक रिकार्ड किया गया।
ये सारे वैज्ञानिक तथ्य चेतावनी देते हैं कि मनुष्य को यथाशीघ्र वस्तुस्थिति से अवगत हो जाना चाहिए। मौसम में बदलते परिवर्तन एवं उनकी प्रतिक्रिया स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की विकृतियां व्यक्ति को वैभव प्राप्ति हेतु किये जाने वाले पुरुषार्थ के लिए नया चिन्तन करने पर विवश करती है। उचित यही है कि अपने ऊपर आने वाले संकटों से बेखबर न रहा जाये। संभावित प्रतिकूलताओं को पहले से ही सोच कर यह निर्धारित किया जाये कि इनसे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है। व्यक्ति को अच्छे से अच्छे की आशा करनी चाहिए पर बुरे से बुरे के प्रति असाधारण तो रहता है, पर यह प्रयास एकांगी है, यदि वह अध्यात्म का दूसरा पक्ष अपनाने के लिए तैयार न हो।
मनुष्य की उत्कृष्टता, योग्यता बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहे। पराक्रम में कमी न आने दे। साथ अदृश्य की गतिविधियां भी उसे प्रभावित करती है। सच तो यह है कि अदृश्य की हलचलें, कर्म विपाक की तरह ही पृथ्वी के वातावरण तथा प्राणियों की स्थिति पर छाई रहती है।
अदृश्य के सम्बन्ध में कुछ करने में आमतौर से मनुष्य को असहाय पाते हैं, पर बात ऐसी है नहीं, अध्यात्म के प्रयोग विश्व चेतना के साथ मिलकर ऐसे परिवर्तन कर सकते हैं। जिससे प्रकृति की हलचलों की प्रतिकूलता से मोड़कर अनुकूलता में परिवर्तित किया जा सके।
आस्था को प्रभावित करने वाले विचार प्रवाह को दर्शन कहते हैं। समय, देश एवं काल की परिस्थितियों के अनुरूप विश्व के सभी दर्शन इसी लक्ष्य की आपूर्ति करते आये हैं। उनके स्वरूप एवं प्रतिपादनों में भिन्नता हो सकती है। पर मूल प्रयोजन में नहीं। प्रकारान्तर में सभी दर्शनों का एक ही लक्ष्य है-मानवी चिन्तन को आदर्शनिष्ठ और सिद्धान्त निष्ठ बनाना। ऐसे विचार प्रवाह देना जिससे मनुष्य उत्कृष्टता की ओर चल पड़े। विश्व भर में प्रचलित समस्त आस्तिकवादी दर्शन अपने अपने ढंग से इस लक्ष्य की ही आपूर्ति करते हैं। मनुष्य श्रेष्ठ कैसे बनें आदर्शों भरा जीवनयापन कैसे अपनायें, यही है मूलभूत लक्ष्य जिसके लिए अनेकों प्रकार के दर्शन समय-समय पर बने। मानवी चिन्तन प्रवाह की श्रेष्ठता की ओर घसीट ले जाने में दर्शन की असामान्य भूमिका होती है।
विश्व भर में प्रचलित सभी दर्शनों में विवादों की भरमार हैं प्रयोजन स्पष्ट होते हुए स्वरूप में मतभेद को देखते हुए सामान्य व्यक्ति दिग्भ्रांत हो जाता है। स्वरूप की अस्पष्टता अनेकों को भटकाती है। भारतीय ऋषियों की यह विशेषता रही है। मानव समाज के लिए सबसे उपयोगी एवं कल्याणकारी रहस्यों को ऐसे सरल एवं ग्राह्य ढंग से प्रस्तुत किया जिनको समझने एवं अपनाने में कोई कठिनाई न हो। ‘यज्ञ’ इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है । यज्ञ दर्शन में समाहित विचार एवं प्रेरणायें आस्था परिशोधन एवं आदर्शों की प्रतिष्ठापन की एक सशक्त माध्यम है। इसमें सन्निहित विचार प्रवाह में मनुष्य को श्रेष्ठ, उदार एवं उदात्त बनाने के सारे तत्व विद्यमान है। उतने छोटे शब्द में उत्कृष्ट दर्शन के वे सारे तत्व विद्यमान है जो आस्था को परिशोधित परिमार्जित करते हो। ऐसे किसी दर्शन की खोज करनी हो तो विवादों से रहित एवं बोधगम्य हो तो वह यज्ञ दर्शन ही हो सकता है।
यज्ञ अपने में एक समर्थ और समग्र दर्शन हैं। इसकी सरल और सुबोध प्रेरणाओं में मनुष्य को उदार एवं उदात्त बनाने के वे सारे तत्व मौजूद है जो संसार के अन्य किसी भी दर्शन में नहीं है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का पिता कहा गया है। पिता अर्थात् पालनकर्ता। समाज का परिपालन एवं संरक्षण देने वाला। यही है वह प्रमुख आधार जिससे समाज प्रगति करता एवं समुन्नत बनता। यज्ञीय दर्शन व्यक्ति एवं समाज को श्रेष्ठ, शालीन व समुन्नत बनाने में समर्थ है। अपने वह समग्र है। और असीम संभावनाएं समाहित किये हुए हैं। यज्ञीय प्रेरणाओं को व्यवहार में उतारा जा सके तो स्थायी सुख शाँति का मजबूत आधार बन सकता है।
यज्ञ के क्रिया पक्ष में कोई आस्था व्यक्त करने से इन्कार कर सकता है। पर उसका दर्शन पक्ष इतना सशक्त एवं प्रेरणादायक है जिसको देखकर किसी प्रकार के मतभेद की गुंजाइश नहीं हो सकती हैं वह इतना जबरदस्त है। कि एक नास्तिक भी सन्निहित प्रेरणाओं की उपयोगिता से नकार नहीं कर सकता। महत्व तो क्रिया पक्ष का भी कम नहीं है। आस्था परिशोधन एवं आदर्शवादिता की स्थापना में यज्ञ प्रक्रिया एक सशक्त अध्यात्मिक पद्धति सिद्ध होती है। मनोविज्ञान के विशेषज्ञ जानते हैं कि मनुष्य स्वभावतः स्थूल प्रतीकों के माध्यम से कोई भी बात शीघ्रता से सीखता है। शिक्षण, प्रेरणायें उद्बोधन उतना काम नहीं करते। यज्ञ प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक शिक्षण की एक सशक्त विधि है जिसके द्वारा परोक्ष किन्तु स्थायी प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ता है सुसंस्कारों की प्रतिष्ठापना होती है। दृष्टि खुली रखी जाये तो यज्ञ के प्रत्येक कर्मकाण्ड मनुष्य को उपयोगी प्रेरणाएं देने में सक्षम है। वे मात्र कृत्य कल्प नहीं है। अंतःकरण में श्रेष्ठ संस्कारों की स्थापना की एक सफल मनोवैज्ञानिक विधि है।
मतभेद यज्ञ-प्रक्रिया को देखकर उठ सकता है। उस पक्ष को छोड़ भी दिया जाये तो भी यज्ञीय दर्शन स्वयं समस्त मानव जाति को उपयोगी प्रेरणाएं देने में सक्षम हैं। यज्ञ के तीन अर्थ शास्त्रों में बताये गये है। 1. दान 2. संगति करण, 3. देवपूजन सेवा इन्हें व्यक्ति एवं समाज निर्माण के तीन महत्वपूर्ण आधार तीन सिद्धान्त समझा जा सकता है। यज्ञ में सन्निहित इन तीनों आधारों को अपनाया जा सके तो नव निर्माण की समग्र प्रगति की सुदृढ़ आधारशिला तैयार हो सकती है।
दान से अभिप्राय अपनी क्षमता, प्रतिभा एवं सम्पन्नता को लोक कल्याण के लिए समर्पित करने के लिए मन को तैयार कर लेना । यह उदारवादी दृष्टिकोण ही मनुष्य को त्याग बलिदान के लिए परमार्थ पर पर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। दान प्रवृत्ति पर ही सृष्टि का अस्तित्व है। संसार की गतिशीलता कायम है। पिण्ड से लेकर ब्रह्मांड तक में यही परम्परा क्रियारत है। सृष्टि के सन्तुलन एवं सुव्यवस्था का कारण है। एक भ्रूण के लिए भी यह भंग हो जाये तो सम्पूर्ण गतिचक्र में अवरोध उत्पन्न हो जायेगा। मनुष्य से लेकर मनुष्येत्तर जीवों का अस्तित्व इस बात पर ही निर्भर करता है। सहयोग की त्याग की प्रवृत्ति पर ही व्यक्ति एवं समाज का विकास निर्भर करता है। मनुष्य को जीवन्त अस्तित्व स्वयं में माँ के परिपोषित करती हुई नौ माह तक कष्ट सहती है। इस उत्कृष्ट त्याग के फलस्वरूप ही सुन्दर आकर्षक मनुष्य आकृति प्रकट होती है। पिता के संरक्षण, परिपोषण से लेकर सामाजिक सहयोग की परम्परा में यज्ञ को दान की ही प्रवृत्ति काम करती दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य ही नहीं, मनुष्येत्तर जीवों और वृक्ष वनस्पतियों में भी सहयोग की प्रवृत्ति ही उनके अस्तित्व को बनाये रखती है। परस्पर एक दूसरे को आबद्ध करती है। दान के महत्व और इसके व्यक्ति एवं समाज के उत्कर्ष में योगदान के रहस्य से ऋषि अवगत थे। यही कारण है कि उन्होंने सक्षम एवं समर्थ व्यक्ति को अपनी क्षमता और प्रतिभा को समाज के लिए उत्सर्ग करने की प्रेरणा दी हैं समर्थों को अनुदान अभावग्रस्तों, निर्बलों को न मिले तो समाज की सुव्यवस्था स्थिर नहीं रह सकती। समर्थ यदि अपनी समर्थता को समाज के लिए न प्रस्तुत करें तो अव्यवस्थाएं फैलती है। यह प्रवृत्ति मानवी गरिमा के प्रतिकूल और कठोरता अमानवता का परिचायक है।
यज्ञ की प्रेरणा है दान त्याग एवं बलिदान के लिए संघर्ष अपने को प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित सहमत करना। दूसरा आधार भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। संगतिकरण से अभिप्राय है एक रूप कर लेना। समान बन जाना। आकृति एवं प्रकृति में एकरूपता स्थापित हो जाना। यज्ञ संगतिकरण की प्रेरणा देता है। ईश्वर के प्रतीक स्वरूप विश्व से तादात्म्य स्थापित कर सबमें उसका दर्शन कर एकरूप हो जाना। अपनी चेतना को विश्व चेतना में विलीन कर देना। लकड़ी अग्नि के संपर्क में आकर उसी का रूप ग्रहण कर लेती है। सामान्य नदी नाले भी गंगा में मिलकर गंगाजल बन जो है। ईश्वर श्रेष्ठ एवं दिव्यताओं से ओत-प्रोत है। उसकी संगति व्यक्तित्व में इन्हीं विशेषताओं के रूप में परिलक्षित होना चाहिए। संगतिकरण सम्पूर्ण प्रकृति में आमूल चूल परिवर्तन कर देता है। आकृति भी बदल जाती है। विश्व चेतना विश्व मानव के साथ संगतिकरण अन्त की उदात्तता एवं महानता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। विश्व चेतना के साथ तादात्म्य आत्मवत् सर्वभूतेषु, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के रूप में प्रकट होती है।
सामान्यतया मनुष्य का संगतिकरण पदार्थों से होता है। फलतः पदार्थों के जड़ संस्कार को ही ग्रहण करता है। भौतिक वस्तुओं की आसक्ति मृग तृष्णा के समान है। अतृप्ति एवं असंतोष का कारण बनती है। चेतना की दिव्यता, सरसता एवं मधुरता की अनुभूति नहीं हो पाती। संगतिकरण पदार्थों से होता है। फलतः शाश्वत सुख से सदा वंचित बने रहते हैं। यज्ञ अपनी सत्ता से चेतना का विश्व चेतना के साथ संगतिकरण करने की प्रेरणा देता है। अपनी सत्ता आत्म सत्ता के रूप में सभी प्राणियों में विद्यमान है। उसको परम सत्ता से प्राणी मात्र में समायी चेतना के साथ संपर्क जोड़ा जा सकें। एकरूपता बन सके तो विश्व चेतना की विशेषताओं एवं विभूतियों से सम्पन्न बना जा सकता है। यज्ञ उसी की प्रेरणा देता है।
संगतिकरण की फलश्रुति है। मानव मात्र प्राण मात्र में अपनी ही सत्ता की अनुभूति करना। यही है वह मानवी आधार जिसकी भाव अभिप्रेरणा द्वारा मनुष्य उदात्त बन सकता है। जब सबमें अपनी ही सत्ता विद्यमान है तो अपने पराये का भेद कैसा ? प्रत्येक के दुख अपने जैसे लगने लगेंगे। मनुष्य को समाज के समष्टि की प्रगति में ही अपनी उन्नति दिखाई देगी। संकीर्णताओं के बन्धन कट जाते हैं। परमार्थ में मनुष्य मात्र के कल्याण में ही सुख की अनुभूति होती है। संगतिकरण का सिद्धान्त विश्व बन्धुत्व की वसुधैव कुटुम्बकम् के सपने को साकार करने में सशक्त भूमिका सम्पादित कर सकता है।
यज्ञ का तीसरा अर्थ होता है - देवपूजन। लोक व्यवहार में उसे सेवा कहते हैं। देव पूजन अर्थात् देव प्रवृत्तियों की अभ्यर्थना, आराधना। इसके लिए सेवा का मार्ग अपनाना होता है। समाज के देवत्व बढ़े स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण हो यह सवा अवलम्बन द्वारा ही संभव है। सेवा अर्थात् अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को पीड़ा एवं पतन में नियोजित करना। यह मनुष्यता का मेरुदण्ड है। करुण हृदय मात्र दूसरों की पीड़ा को देखकर द्रवित ही नहीं हो उठता वरन् कुछ ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित भी करता है। देवता की पूजा इसी रूप में हो सकती है। अन्तः की करुणा उभरकर बाहर आ जाये सहयोग करने के लिए हृदय मचलने लगे यही है देवत्व और दैव पूजन का लक्ष्य। देव प्रवृत्तियों के संरक्षण, प्रचलन और परिवर्धन की आपूर्ति सेवा मार्ग के अवलम्बन से होती है। अभावग्रस्तों पीड़ितों को राहत मिलती और समाज में सत्प्रवृत्तियां पनपती है।
दान, संगतिकरण और देवपूजन का यज्ञीय दर्शन मनुष्य को उदार एवं उदात्त बनाने में हर दृष्टि से सक्षम है। इन तीनों सिद्धान्तों में मानवी विकास के लिए असीम संभावनाएं सन्निहित है। मानवी अंतःकरण में महानता का बीजारोपण करने एवं आस्थाओं को सुदृढ़ बनाने में इन तीनों की असाधारण भूमिका होती हैं। मनुष्य को उदार एवं उदात्त बनाने वाले इन तीनों आधारों में किसी प्रकार का कोई मतभेद नहीं हो सकता। थोड़े समय के लिए आस्तिकवादी सिद्धान्तों को लेकर विभिन्न दर्शनों में विभेद हो सकता है और होता भी है। पर मानवी मूल्यों की प्रतिष्ठापना करने वाले, व्यक्ति व समाज को श्रेष्ठ समुन्नत और शालीन बनाने वाले शाश्वत सिद्धान्तों के प्रति नहीं। यज्ञ दर्शन विवादों से परे ऐसा ही एक दर्शन है जिसमें वे सारे सिद्धान्त समाहित हैं जिनके अवलम्बन से व्यक्ति व समाज की उन्नति व शांति निर्भर करती है। सदियों से चली आ रही ऋषि प्रणीत इस परम्परा में सन्निहित प्रेरणाओं एवं शिक्षाओं को समझा एवं अपनाया जा सके तो समस्त मनुष्य जाति की समग्र प्रगति सुख शाँति का पथ प्रशस्त हो सकता है।
आइजनहावर जब अमेरिका राष्ट्रपति बने तो उनके शो केस में एक झाडू भी रखती थी। आगन्तुकों को यह देखकर आश्चर्य होता था। एक बार स्वयं आइजनहावर ने इसका रहस्य खोला-
‘मैंने अपने चुनाव के भाषणों में कहा था कि राष्ट्रपति बन जाने पर मैं राष्ट्र की गन्दगी दूर करूंगा। राष्ट्रपति बनने पर मुझे जो विविध उपहार मिले उसमें यह झाडू भी थी। उपहार भेजने वाले ने इसके साथ यह टिप्पणी भेजी थी कि मुझे विश्वास है यह झाडू सदैव आपका कर्त्तव्य स्मरण कराती रहेगी। यही उपहार मुझे सबसे अच्छा लगा, प्रेरणास्पद लगा इसलिए मैंने इसे शो केस में रखवा दिया है।’
शक्ति उपासना का तत्वज्ञान भारतीय अध्यात्म शक्ति का अविच्छिन्न अंग है। गायत्री को आद्य शक्ति कहा जाता है। उसकी शाखाएं प्रशाखाएं अन्य देवी देवताओं में प्रकट होती चली गई। ब्राह्मी, वैष्णवी, शाँभवी के त्रिवर्ग में विभाजित होने के उपरान्त गायत्री अनेक नामों से जाने वाली देवियों के रूप में विस्तृत होती चली गई है। अन्यान्य देवशक्तियाँ की उपासना की प्रकारान्तर से आदि शक्ति गायत्री की प्रवाह धारा में ही सम्मिलित होती जाती है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में संव्याप्त महाशक्ति को गायत्री कहते हैं। ब्रह्मांड के भी तीन शरीर है भूः’ भुवः स्वः उन तीनों में ही त्रिपदा ही संव्याप्त है। इस प्रकार जो कुछ भीतर और बाहर है वह सब कुछ गायत्रीमय कहा जा सकता है। आद्य शक्ति का सुविस्तृत परिचय शास्त्रकारों ने इसी रूप में दिया है।
इड़ा च फ्िडल चैव सुषुम्णा च तृतीयका। गान्धारी हस्ति जिव्हा व पूषापूषा तथैव च॥
अलुम्बुषा कुहूश्चैव शंखिनी प्राण वाहिनी। नाड़ी चत्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैबुर्धः॥
हत्पद्यस्था प्राण शक्ति कण्ठस्था स्वप्न नायिका। तालुस्या त्वं सदाधारा बिन्दुस्या बिन्दुमालिनी॥
मूले तु कुण्डली शक्तिर्व्यापिनी केश मूलना। शिखा मध्यासना त्वंहि शिखाग्रेतु मनोन्मनी॥
किमन्द् बहुनोक्तेन यकिंतचिज्जगती.ये। तत्वसव त्वं महोदवि श्रिये संध्ये नामेअस्तुते॥ देवी भागवत
अर्थ -- इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हिस्तजिव्हा, पूषा, अषूषा, अलम्बुषा, कुटटू और शंखिनी आदि नामों से विख्यात प्राण वहन करने वाली नाड़ियों के रूप में तुम सबसे शरीर में निवास करती हो-ऐसा प्राचीन बुद्धजन कहते हैं। तुम प्राण शक्ति से हृदय कमल पर विराजमान रहती हो। कण्ठ में रहकर स्वप्न का सृजन करना तुम्हारा सहज गुण है। तुम सर्वधारा स्वरूपिणी हो। तालुकों में तुम्हारा निवास है। भौहों के मध्य में बिन्दु रूप में विराजती हो। तुम्हें बिन्दुमालिनी कहते हैं। मूलाधार में कुण्डलिनी नाड़ी तुम्हारी ही आकृति है। व्यापक रूप से तुम सबसे रोमकूप में विराजती हो। तुम्हारी शिखा के मध्य में परमात्मा तथा शिखा के अग्रभाग में मनोमनी शक्ति विराजमान रहती है। महादेव! अधिक कहने से क्या त्रिलोकी में जो कुछ है वह सब तुम्हीं हो। संधये! मैं मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए तुम्हें नमस्कार करता हूँ।
आद्य शक्ति गायत्री साधना के दो मार्ग है एक दक्षिण दूसरा वाम। दक्षिण मार्ग में पंचकोशों का अनावरण करना होता है और वाम मार्ग में षटचक्रों का जागरण। षट्चक्र वेधन में प्रयुक्त होने वाली प्राण प्रक्रिया को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। सरल उनके लिए जो उस मार्ग पर चलने का साहस जुटाते हैं। कठिन उनके लिए जो कौतूहल भर से रस लेते हैं। साधना की कठिन प्रक्रिया अपनाने का सुदृढ़ निश्चय और अविचल संकल्प नहीं करते।
दोनों ही मार्ग अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है। इनमें न कोई छोटा है न बड़ा। प्रत्यक्ष जीवन में कुण्डलिनी और परोक्ष जगत में समाधि प्रक्रिया को आधार बनाना पड़ता है। दोनों की समन्वित प्रतिफल ही समग्र विकास की आवश्यकता पूर्ण करता है।
कुण्डलिनी की ताँत्रिक और समाधि योग की वैदिक प्रक्रिया का समन्वय ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी ऋषि परम्परा में दोनों को साथ लेकर चलने का परामर्श दिया गया है। ब्रह्मवर्चस् इसी समन्वय का परिणाम है।
युग सन्धि के प्रथम चरण में सभी प्राणवान प्रज्ञापरिजनों को नये सिरे से उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ रही है। नव सृजन को ऐतिहासिक उत्तरदायित्व जिन्हें वहन करना है। उन्हें सर्वप्रथम अपनी आत्म शक्ति को तद्नुरूप उगाना बढ़ाना पड़ेगा। अन्यथा वे इच्छा रहते हुए भी कुछ कर नहीं सकेंगे, मनोरथ कितने की गढ़ते रहें। इस प्रयोजन के लिए अब शान्तिकुँज में दस दिवसीय साधना सत्रों की नई शृंखला चलाई गई है और महापुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों-प्राण दीक्षा ले चुके भावनाशीलों-प्रज्ञापुत्रों-समयदानियों एवं वरिष्ठ परिजनों को कहा गया है कि वे इन नये निर्धारण के साधना सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। भले ही वे इससे पूर्व दस वर्षों में कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
इस अनुरोध की सन्तोषजनक प्रतिक्रिया हुई है। गायत्री तीर्थ के आरण्यक रूप में विकसित होते ही साधना के बड़ी संख्या में आवेदन आये हैं। वे सभी साधनों के बड़ी संख्या में आवेदन आये हैं। वे सभी ऐसे है, उन्हें बिना हिचक स्वीकृति मिलनी चाहिए। किंतु प्रत्यक्ष कठिनाई यह है कि शाँतिकुँज में स्थान एकान्त नितान्त आवश्यक है, उतना देने पर पूरे 4000 से ऊपर के आवेदन आ चुके। वरिष्ठ प्रज्ञापरिजन एक लाख के ऊपर हैं। उनकी स्थिति के अनुरूप साधनाएं कराई जानी है। सभी परामर्श किये जाने हैं। फिर स्थान, समय और माँग का तालमेल कैसे बैठे 400 एक बार में करने से दस दस दिन वालों सत्रों में हर महीने मात्र 1200 साधन शाँतिकुँज पहुंच सकेंगे एक वर्ष प्रायः पन्द्रह हजार। एक लाख वरिष्ठ परिजन अभी शेष है, उनके लिए प्रायः सात वर्ष चाहिए। फिर जिस तेजी से नये बढ़ रहे हैं उसे देखते हुये तो 14 वर्ष भी प्रस्तुत परिजनों के लिए कम पड़ेंगे। इतने दिनों में तो युग संधि का महत्वपूर्ण भाग ही समाप्त हो चुकेगा। इतने विलम्ब से मिला हुआ अवसर कितनों के काम आवेगा ? और उससे समय की तात्कालिक आवश्यकता को पूर्ण करने में कितना योग दान मिलेगा ?
लेकिन साधना के सहारे अभीष्ट आत्मबल अर्जित करने और प्रशिक्षण द्वारा सामयिक प्रेरणा एवं प्रज्ञा उभारने की आवश्यकता को इसलिये रोके नहीं रखा जा सकता है कि शाँतिकुँज के स्थान सीमित है। युग की माँग तो यथा समय पूरी होनी ही चाहिएं। कठिनाई आती है तो दूसरा मार्ग खोज जाये।
नया निर्धारण यह है कि वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन पत्राचार विद्यालय के रूप में चलाया गया है। ऐसे पाठ्यक्रम अधिकाँश विश्वविद्यालयों ने चलाये हैं। छात्रों की असुविधा तथा विद्यालय की सीमाबद्धता का समाधान इन पत्राचार विद्यालयों से निकाला जा सकता है। विदेशों में तो यह प्रक्रिया बहुत समय पहले चल पड़ी है, तेजी से बढ़ी है और आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। इसी उपाय का अवलम्बन प्रज्ञा अभियान को भी अपनाना पड़ रहा है।
अब सभी वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनोँ से अनुरोध किया गया है कि पत्राचार विद्यालय के माध्यम से अभीष्ट मार्गदर्शन प्राप्त करने का सूत्र जोड़ ले। इसके माध्यम से वे सामयिक परामर्श प्राप्त करें और उपासना एवं जीवन साधना में उन विशिष्ट तत्वों का समावेश करें जो इन्हीं दिनों नितान्त आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा इस स्तर के सभी वरिष्ठ परिजनों से इसी का अनुरोध किया जा रहा है।
कौन क्या उपासना करे और साधना किस प्रकार चलाये इसके निर्धारण सभी के लिए एक जैसे नहीं होंगे वरन् हर व्यक्ति की मन स्थिति, परिस्थिति, परम्परा एवं पूर्व प्रगति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग होंगे। किसे, किस प्रयोजन के लिए किस स्तर की आत्मशक्ति चाहिए, कौन कितना कर सकने में समर्थ है, इन सब बातों का तालमेल बिठाकर ही साधन विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त मनुष्य को वर्तमान जीवन मिलता है। पिछले जन्मों में हर व्यक्ति के पृथक संस्कार थे, वही इस जीवन में छाये रहते हैं, उन्हीं में मनुष्य नाचना रहता है, न करने योग्य करता और दुष्परिणाम भुगतता है। देवोपम मनुष्य शरीर को यों रोते कल्पते गंवा देने की भूत आत्मबोध के अभाव में होती है। व्यक्ति अपना विश्लेषण कर ही नहीं पाता। यह कार्य कोई सिद्ध समर्थ ही कर सकते हैं। शरीर और मन का अध्ययन लोगों के सामान्य क्रिया - कलापों से कोई भी कर सकता है, पर अंतःकरण का वेधन कोई दिव्य तत्वदर्शी ही कर सकते है। इसे इस परिवार का सौभाग्य कहना चाहिए कि इसे वह समर्थ संरक्षण पूज्य गुरुदेव के रूप में प्राप्त है। वे न केवल प्रत्येक व्यक्ति की सूक्ष्म स्थिति के अनुरूप साधनायें सिखाएंगे अपितु उनकी पुर्वजन्मों की गाठों को खोलने, अपना प्राण देने और साधना द्वारा अर्जित शक्ति की जीवन में विकसित होने देने के लिए आवश्यक खाद पानी और संरक्षण भी देंगे। इसे अब तक के साधन क्रम का सर्वश्रेष्ठ अध्याय मानना चाहिए। अच्छी तरह निर्वाह कर लेने पर इस पत्राचार साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
इस विभाग के सम्बन्ध जोड़ने वाले सर्वप्रथम ‘आवेदन पत्र’ की माँग करेंगे। यह पत्र व्यवहार शाँतिकुँज हरिद्वार से ही होगा। भेजे हुये प्रश्नों के उत्तर में वे अपनी मनःस्थिति एवं परिस्थितियों का सुविस्तृत विवरण भेजेंगे। इसकी एक-एक पंक्ति को महत्व देते हुए साधनात्मक निर्धारण उसी प्रकार किये जायेंगे जैसे कि मूर्धन्य चिकित्सक रोगी की पिछली और अब की प्रत्येक परिस्थितियोँ का गंभीरतापूर्वक निदान करने के उपरांत चिकित्सा का निर्धारण करते हैं।
यह पत्राचार विद्यालय इसी आश्विन नवरात्रि से आरंभ हो रहा है। जिन्हें इस दिवसीय साधना सत्रों में स्थान न मिले, वे न तो निराश हों और न प्रतीक्षा करें । उन्हें पत्राचार विद्यालय के माध्यम से घर बैठे अपनी साधना और शिक्षा की प्रकारान्तर से वैसी ही व्यवस्था बना लेनी चाहिए जैसी कि शाँतिकुँज में पहुंचने पर संभव थी।
इस संदर्भ में जिन्हें भी इच्छा अभिरुचित हो, शाँतिकुँज हरिद्वार से “पत्राचार विद्यालय के छात्रों का आवेदन पत्र” मंगाले। उसका उत्तर पहुँचने पर ही साधनाक्रम एवं परामर्श निर्देशन का सिलसिला चल पड़ेगा। इस संदर्भ में अन्य किसी प्रकार की फीस या खर्च तो नहीं देना पड़ेगा, किन्तु हर पत्र के साथ पचास पैसे के टिकट या उतने ही टिकट वाला लिफाफा भेजते रहना आवश्यक हैं। पाठ्यक्रम, परामर्श, उत्तर स्टेशनरी आदि का सारा खर्च तो संस्था वहन करना होगा। पाठ्यक्रम एवं उत्तर भारी हो जाने के कारण उन पर पैंतीस पैसे न लगाकर पचास पैसे लग जाते हैं।
सन 81 में प्रमुख प्रज्ञा परिजन इस पाठ्यक्रम को पूरा कर सकें, इस दृष्टि से उसे दस खण्डों में विभक्त किया है। हर महीने तारीख 10, 20 और 30 को यह पाठ्यक्रम भेजे जायेंगे। हर बार बड़े साइज के चार पृष्ठों का एक पत्रक उपासना सम्बन्धी -दूसरा उतने ही आकार का जीवन साधना सम्बन्धी रहा करेगा। इस प्रकार दस बार में दोनोँ प्रकार में मिलाकर 20 पाठ्यक्रम पत्रक पहुँच जायेंगे।
अगला पाठ्यक्रम भेजे जाते समय एक विशेष प्रश्न पत्र साथ में रहा करेगा, जिसमें पिछली बार के पत्रक के सम्बन्ध में आवश्यक पूछताछ की जाया करेगी। इनका उत्तर लिखकर साधन भेजते रहेंगे इस प्रकार जहां दस बार पाठ्यक्रम एवं प्रश्न पत्र का लिफाफा शाँतिकुँज से साधन के पास भेजा जाया करेगा, वहाँ साधन भी उनके उत्तर दस बार ही शाँतिकुँज भेजेंगे। इस आधार पर प्रायः वैसे ही आदान प्रदान चल पड़ेगा जैसा कि शाँतिकुँज आकर दस दिन साधना करने वालों और सूत्र संचालकों के मध्य चलता है।
सभी प्रश्न पत्रों के अभीष्ट अनुपात में उत्तर मिलते रहने पर उत्तीर्ण साधकों को ‘प्रज्ञापुत्र’ का प्रमाण पत्र भी भेजा जायेगा। जब सुविधा होगी, तब दस दिन का एक सत्र शाँतिकुँज हरिद्वार के दिव्य वातावरण में रहकर करने के लिए कहा जायेगा। इसे इस प्रशिक्षण की पूर्णाहुति के रूप में माना जा सकता है।
पत्राचार विद्यालय के पाठ्यक्रम के रूप में नहीं छपेंगे और न वे नियमित रूप से प्रवेश पाने वालों के अतिरिक्त अन्य किसी को दिये नहीं जा सकेंगे। इस विचार विनिमय, मार्गदर्शन एवं अनुदान क्रम को सीमित लोगों तक ही मर्यादित रखा गया है। उपयुक्त वस्तु उपयुक्त पत्रों के साथ ही पहुंचें, इसलिए अनुबन्ध अनुशासन रखे रहने, गरिमा बनाये रहने की दृष्टि से आवश्यक समझा गया है।
अमेरिका के वाशिंगटन शहर में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी है। इसे एक पराजपे ने स्थापित किया है। वे यज्ञ द्वारा खेतों में फसल के बढ़ने का प्रतिपादन करते हैं। रासायनिक खाद एवं कीटनाशक दवाओं से ऊबे, अमेरिकनों को वे विकल्प के रूप में मंत्रोच्चारण से दी गयी थी की आहुतियों का मार्ग सुझाते है। विश्वविद्यालय की यह मान्यता है कि फसलों के सभी रोगों का रामबाण इलाज यज्ञ है। यज्ञ से फसल उत्पादन में वृद्धि की इस पद्धति को उन्होंने हो थैरेपी कामिग नाम दिया है।
खेती में नियमित किये गये यज्ञ से वातावरण शुद्ध होता है एवं इससे पौधों में तेजी से बढ़ने व जमीन से अधिक शक्ति खींचने की सामर्थ्य आती है। इससे जो फसल होती है वह स्वादिष्ट होती है। 200 एकड़ तक के खेतों में बीचों बीच किये गये यज्ञ से पौधों की जड़ों का स्वरूप ही बदल जाता है। लम्बाई में भले ही कोई फर्क न आये, उनकी जमीन से पोषक तत्व खींचने की सामर्थ्य में निश्चित ही वृद्धि होती है।
इसके लिए विश्वविद्यालय ने अपने खेतों पर ही प्रयोग किये हैं। निष्कर्ष यह निकाले गये है कि यज्ञ करने से जमीन में नमी ज्यादा बनी रहती है। यदि पानी की सिंचाई के साथ स्नेह, श्रद्धा का पुट हो एवं मंत्रोच्चार भी किया जाये तो परिणाम और भी अच्छे होते हैं। पराजपे के अनुसार पीछे भी स्नेह के भूखे हैं। यदि किसान अपनी फसल से प्यार करे उन्हें पुचकारे तो वे बीमार नहीं होते, अच्छा उत्पादन देते हैं।
यह सभी का अनुभव है कि पौधों की बीमारियों के लिये प्रयुक्त कीटनाशक दवाओं से जमीन कमजोर होती है। एवं फसल का उत्पादन भले ही बढ़ जाये, गुणवत्ता की दृष्टि से वह गौण हो जाती है। इसी कारण कीटनाशक दवाओं के उपयोग पर अब पुनर्विचार किया जा रहा है। अग्निहोत्र विश्व विद्यालय कीटाणुओं के नाश के लिए यज्ञ की राख एवं गोबर की खाद का प्रचार कर रहा है। पानी में राख मिलाकर उसकी सिंचाई से पौधों की जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है। मंत्रोच्चार के साथ की गयी सिंचाई पौधों की सामर्थ्य में और भी वृद्धि कर देती है। अग्निहोत्र विश्व विद्यालय के अनुसार ये मंत्र पौधों के लिये टॉनिक का काम करते हैं।
आज की फसलों की गिरती गुणवत्ता के पीछे वे वातावरण प्रदूषण को मुख्य कारण मानते हैं। इसीलिए यज्ञ की महत्ता भी प्रतिपादन करते हैं। जो वातावरण को शुद्ध करता है। धूमीकृति औषधियाँ, घी धान हवा में मिलकर उसे शुद्ध करती है और फिर वर्षा के माध्यम से जमीन में पहुँचकर जड़ों का पोषण करती है। उनके अनुसार यज्ञ का धुआँ पहले पूरब की ओर उड़ता है व फिर घड़ी की तरह घूमता है। इसका प्रभाव आठ किलोमीटर की परिधि में होता है। इससे उन्हें विश्वास है कि वे अमेरिका के दक्षिणी भाग में लगने वाले “अल्बीनों नामक फसल नाशक कीड़े को समाप्त कर सकेंगे।”
(लाखन सिंह भदौरिया)
दो न आँसू की दुहाई, साधनाओं के सुमन दो।रात से मत तिलमिलाओ, प्रात की हंसती किरण दो॥
भावनाओं से भरा मन,साधनाओं से हरा मन,हारते पग को समय की चेतना के नव चरण दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
तप प्रभा से फट रही पौ,युग निशा में जल रही लौ,तुम सृजन के देवता को खिलखिलाता आचरण दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
यदि पिघल कर प्राण बहने,चल पड़े हो लहर बनने,हो जगी बैचैनियां तो दर्द दुख को सन्तरण दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
व्यष्टि में जो बिन्दु बन्दी,कर सके जो सिन्धु बन्दी,उस समष्टि उपासना को, भक्ति के गीले नयम दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
व्यक्ति में विस्तार कितना,बूँद, पारावार जितना,प्यास कुँभज सी जगाकर, तुम तुषा की तृप्ति कण दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
प्यास को वरदान कर दे,तृप्ति की जो दान कर दे,त्यागमय उस चेतना को भावनाओं के नमन दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
*समाप्त*