सत्य रूपी नारायण की साधना और उपलब्धि

सत्य को नारायण कहा गया है। सत्यनिष्ठा में परमेश्वर की झाँकी देखी जा सकती है। हम उसे स्वीकार करें जो यथार्थ है। उसी को अपनायें जो यथार्थ है। यथार्थता को ढूंढ़ते हुए ही जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

शक्ति का स्रोत सत्य में सन्निहित है। जिसने सत्य को पकड़ लिया मानो उसकी पकड़ में परमेश्वर आ गया और जिसे पाना था उसे पा लिया।

वाणी का सत्य, विराट सत्य का एक अंश है। पालनीय वह भी है पर यह मानकर न चले कि जो जानकारी थी उसे प्रकट कर देने से ही बात पूरी हो गई। अवाँछनीय व्यक्तियों से वह सत्य छिपाया भी जा सकता है जिसे पचाने की क्षमता उनमें नहीं है। गो घृत को अमृतोपम कहा है, पर जिस ज्वर-ग्रस्त को लंघन हो रहे हैं उसे उतने समय तक उसे न देना ही ठीक रहता है। इस प्रकार यदाकदा वाणी में नग्न सत्य का सीमित प्रयोग भी अभीष्ट हो सकता है, पर जीवन को सत्य का अनुयायी रखना तो ऐसा आदर्श है जिसे कभी भी-किसी स्थिति में भी शिथिल नहीं किया जाना चाहिए। सत्य वह प्रकाश है जिससे आत्म तेज प्रकाशवान होता है और जो कुछ अपने भीतर दिव्य है वह अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है। इस विश्व में सूर्य की ऊष्मा और आभा से जीवन का आविर्भाव हुआ। प्राणियों में प्राण का स्पन्दन उसी के कारण है। जीवन रूपी विराट् का प्रत्येक दिव्य स्पन्दन सत्य के द्वारा ही गतिशील और फलित होता है। देवत्व का विकास सत्य का अवलम्बन लिये बिना हो ही नहीं सकता। मानवीय वर्चस्व केवल उन्हें उपलब्ध होता है जिनकी अन्तरात्मा में सत्य के प्रति प्रगाढ़ आस्था है। जिसने जीवन और सत्य को परस्पर ओत-प्रोत कर लिया, समझना चाहिए उसे तत्व की प्राप्ति हो गई।


सेवा से ऊब क्यों? उससे अरुचि किसलिये?

मैंने इतना तो कर लिया, क्या अब सदा मैं ही करता रहूँगा। दूसरों को सेवा कार्य करना चाहिए। ऐसा सोचना उचित नहीं। सेवा कार्य आत्मा की आवश्यकता का पोषण है। उसको निरन्तर और निर्बाध गति से करते रहना इसलिए आवश्यक है कि हम जीवित रहें-हमारी आत्मा, और उसकी सुरुचि जीवित रहे। किसी पर एहसान करने के लिए-दूसरों के सहायक और उपकारी बनने के लिए-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भी नहीं-यश के लिए भी नहीं-सेवा का प्रयोजन आत्मा की गरिमा को अक्षुण्य रखने और उसका जीवन साधन जुटाये रखने के लिए है।

जो सेवा की आवश्यकता और महत्ता को समझता है, उसे-उससे कभी भी ऊब नहीं आती। जो ऊबता हो समझना चाहिए अभी उसे सेवा का रस नहीं आया। जब एक बार उस परम-धर्म का रसास्वादन कर लिया जाता है तो उसे छोड़ सकना सम्भव ही नहीं होता। फूलों में कैसा रस है इसे मधुमक्खी जानती है और वह जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से उसी मधुरिमा में निमग्न रहती है। न थकती है न ऊबती है और कभी यह नहीं सोचती कि इतना लम्बा समय मधु संचय के प्रयोजन में लग गया अब कोई और धन्धा ढूंढ़ेंगे। विश्राम करेंगे। वह ऐसा इसलिए नहीं सोच सकती कि उसका अन्तरात्मा उस क्रिया-कलाप की गरिमा को समझ ही नहीं स्वीकार भी कर चुका है।

भ्रमर का आश्रय और कहाँ है? पराग से विमुख होकर वह और क्या खोजे? तितली को अपने सौंदर्य के समतुल्य पुष्प के अतिरिक्त और कुछ दीखता भी तो नहीं। आखिर वह जाय भी कहाँ? बैठे भी कहाँ? करे भी तो क्या? जिनका दृष्टिकोण उत्कृष्टता का अभ्यस्त हो गया उन्हें निष्कृष्टता की दुर्गन्ध में साँस ले सकना सम्भव भी नहीं है। सेवा धर्म छोड़ कर अन्यत्र आत्मा की गरिमा के अतिरिक्त और कोई कार्य है भी तो नहीं।

हम साँस आजीवन लेते रहते हैं। इतने दिन साँस लेते रहे, अब हम विश्राम करेंगे, दूसरों का यह भार उठाना चाहिए। कोई हमीं ने ठेका लिया है। बात ठीक है। मन न करे तो साँस लेना कभी भी बन्द किया जा सकता है। पर यह स्मरण रखना चाहिए कि यह विचार जिस क्षण कार्यरूप में परिणत होगा उसी क्षण दम घुट जायगा।

अन्न बहुत दिन खाया अब नहीं खायेंगे। पानी इतने दिन से पीते चले आ रहे हैं अब नहीं पियेंगे। स्वतन्त्र कर्तृत्व के धनी मनुष्य के ऊपर फल पाने का ही बन्धन है, कर्म करने का नहीं। सो अन्न, जल ग्रहण करना छोड़ा भी जा सकता है पर यह भूलना न चाहिए कि यह ऊब जीवन के प्रति ऊब ही सिद्ध होगी। यह अनशन हमें विश्राम का आनन्द नहीं लेने देगा, मृत्यु के मुख में धकेल देगा।

हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, गुर्दे, जिगर आदि भी विश्राम की माँग कर सकते हैं। जब तक कहते सुनते भर रहे तब तक तो काम चल सकता है पर जब अड़कर विश्राम करने ही बैठ जायँ तो फिर सारा सरंजाम ही विश्राम करेगा। इनका विश्राम, चिरनिद्रा की अखण्ड शान्ति-श्मशान जैसी नीरवता में परिणत होगा।

सूर्य ने कब छुट्टी मानी, चन्द्रमा ने कब विश्राम लिया, पृथ्वी का चलना कब बन्द हुआ हवा कब रुकी, समुद्र कब शान्त हुआ। जीवन इसीलिए जीवित है कि वह अनवरत रूप से चल रहा है। सौर मण्डल की तरह परमाणु मण्डली भी अथक रूप से कार्य संलग्न है। क्षुद्रता सो सकती है, पर महानता के लिए जागरण के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं। सूर्य का अन्धकार के साथ तालमेल बैठ ही नहीं सकता। सेवा आत्मा का स्वभाव है। गुण है, इसलिए वह कर्म में स्वभावतः परिणत होता रहेगा, फूल और गंध पृथक नहीं हो सके। मछली पानी के बिना रह ही नहीं सकती है। आत्मा का स्वभाव है-प्रेम। और प्रेम की परिणति है सेवा। उससे छुट्टी कैसी? उससे ऊब क्यों? उसे छोड़ा कैसे जा सकता है?


परमेश्वर के अजस्र अनुदान को देखें और समझें

बनाने और सँभालने वाले को अपनी वस्तु से स्वभावतः प्रेम होता है। हम मकान बनाते हैं, बगीचा लगाते हैं, चित्र बनाते हैं, पुस्तक रचते हैं; उनसे स्वभावतः लगाव और प्रेम होता है। ईश्वर ने हमें बनाया है, सँभाला है-और भविष्य में भी हमारी सँभाल रखने का उत्तरदायित्व उसी के कन्धों पर है ऐसी दशा में उसका प्रेम भी हमें अनायास ही प्राप्त रहता है।

अपनी सन्तान को कौन प्यार नहीं करता है। पशु-पक्षी तक उनके लिए कष्ट सहते त्याग करते हैं, और अविकसित हृदय में भी ममता, आत्मीयता उगाते हैं। यदि ऐसा न होता तो उन जीव-जन्तुओं के शिशुओं का जीवन धारण ही कठिन हो जाता। मनुष्य तो अन्य बातों में अन्य जीवों से आगे होने के कारण सन्तान पालन के लिए और भी अधिक तत्पर रहता है। केवल उनके भरण-पोषण का ही नहीं-शिक्षा-दीक्षा, विवाह शादी, रोटी-रोजगार, सुख-दुःख में भी पूरी सहायता करता है। अपना अधिकाँश समय, प्यार और प्रयत्न उन्हीं के लिए नियोजित रखता है। यहाँ तक की मरने के उपरान्त अपनी जीवन भर की कमाई भी उसी के लिए उत्तराधिकार में छोड़ जाता है। अपने सृजन में ऐसा प्यार होना स्वाभाविक है।

हम परमेश्वर की सन्तान हैं। विकसित जीव अपनी सन्तान को अधिकतम दुलार देते हैं। ईश्वर को यदि प्राणधारी माना जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह सर्वोपरि सुविकसित प्राणी है। यदि ऐसा न होता तो मनुष्य जैसा सर्वसाधन सम्पन्न सन्तान की उत्पत्ति कैसे करता। जन्म देकर ही कोई सहृदय अभिभावक अपनी सन्तान को भटकने के लिए नहीं छोड़ देता; फिर परमात्मा हम से विमुख कैसे हो सकता है। जब सन्तान के प्रति प्रेम होना सृष्टि का नियम है तो परमेश्वर का प्यार-अपनी सर्वोत्तम कृति-परम प्रिय सन्तान-मनुष्य के लिए क्यों नहीं होगा?

इस प्रेम की विशिष्टता का परिचय इसी से मिलता है कि हमें ईश्वर प्रदत्त अत्यधिक सुविधायें उपलब्ध हैं। ऐसा लगता है मानो यह सारा जगत हमारी ही सेवा सुविधा और प्रसन्नता के लिए बनाया हो। जिस और भी दृष्टि दौड़ाई जाय हर्षोल्लास प्रदान करने वाले साधनों का बाहुल्य दीखता है। छोटे-बच्चों को अभिभावक सुन्दर खिलौने लाकर देते है। जिधर भी दृष्टि दौड़ाकर देखें उधर ही एक से एक बढ़कर सुन्दर-सुसज्जित, मधुर गतिशील और भाव भरे खिलौने भरे और खड़े दीखते हैं। कैसा सुन्दर है यह विश्व। कैसी सुरम्य है इनकी शोभा कैसा महान है इसका सृजेता।

मानवीय सुविधा का क्या ठिकाना। शरीर को ही लें, एक से एक अद्भुत क्षमता वाली इन्द्रियों के उपकरण जादू के पिटारे जैसा मन, ऋद्धि-सिद्धि जैसी प्रज्ञा दर्पण में देखें तो देवता जैसा दीखता है यह अपना ‘आपा’। जीवन को जीवन में घुला देने वाली पत्नी, किलकते, फुदकते बच्चे, वात्सल्य भरे अभिवादन, भुजाओं की तरह साथी बन्धु तथा मित्रगण। कितना सुन्दर है यह सब। आजीविका के साधन, मनोरंजन की सुविधायें, प्रगति पथ के सहायक गुरुजन, क्या नहीं है यहां? प्रकृति अपना अञ्चल ताने छाया कर रही है। सूरज, चन्द्र, तारे, बादल, पवन, ऋतु परिवर्तन, क्या नहीं है यहाँ? वाहन, सहायक, पशु, वैज्ञानिक सुविधायें, इस सब सरंजाम पर दृष्टि डालते हैं कि परमेश्वर का प्रेम और अनुदान असीम मात्रा में अपने चारों ओर बिखरा पड़ा है। यह सब उसके प्रेम का प्रत्यक्ष परिचय नहीं तो और क्या है? जरा विचार करें, यदि हमारे पिता ने हाथ सकोड़ लिया होता, उपेक्षा दिखाई होती तो बन्दर, कबूतरों से भी घटिया जीवन ही जिया जा सकता था। अद्भुत और अनुपम सुविधायें जिनका हम उपभोग कर रहे हैं। अपने बलबूते उन्हें कैसे जुटाया जा सकता था।

वह हमारी अन्तरात्मा में विराजमान है। अहर्निशि साथ रहने वाले साथी की तरह वह सहायता करने के लिए सदैव उपस्थित रहता है। पग-पग पर आने वाली कठिनाईयों का वही समाधान करता है। विपत्ति की भयावह विभीषिकाओं से बचा लेने के लिए उसी की लम्बी भुजाएं सहायता के लिए आगे आती हैं। संकट की घड़ी में धैर्य बँधाने वाला, सहारा देने वाला, रास्ता बताने वाला वही तो है। उत्ताल तरंगों वाले इस संसार सागर से हम उसी की नाव में बैठकर तो पार होते हैं। परमेश्वर के प्रेम में कमी कहाँ है? उसके अनुदानों में न्यूनता कहाँ ढूँढ़ी जा सकती है।

परमेश्वर के द्वारा अपने ऊपर अनवरत रूप से बरसते हुए प्रेम का कदाचित हम अनुभव कर सके होते तो उस अनुभूति की प्रतिक्रिया हमारे अन्तःकरण में भी प्रेम प्रवाह उत्पन्न करती। गाय के वात्सल्य को यदि बछड़े ने समझा होता तो उसे लगता कि मैं निरीह नहीं हूँ। एकाकी नहीं हूँ। मेरा कोई है और किसी का मैं हूँ।

हम किसी के नहीं और कोई हमारा नहीं। दूसरों की तो बात ही क्या-अपने आप के भी हम नहीं हैं। स्थिति की विषमता यहाँ तक पहुँची है कि न आत्मा के हम और न आत्मा हमारा। न परमेश्वर हमारा और न परमेश्वर के हम। यह विडम्बना कैसे उत्पन्न हो गयी। अपने बिराने कैसे हो गये। अनन्य और अभिन्न आत्मीयता का प्रवाह कहाँ रुक गया? कैसे रुक गया?

यह विस्मृति की मूर्छना ही है जिसने अपने को पहचानने से वंचित कर दिया। प्रेम की अमृत वर्षा का अनुभव तक कर सकने में हम असमर्थ हो गये। हाय, हमारा यह क्या हो गया। मति रूपी सीता को कौन रावण हर ले गया। अपने लिए विलाप, रुदन और पतन ही क्यों रह गया? उत्कर्ष और आनन्द की समस्त उपलब्धियाँ कौन चुरा ले गया? हम एकाकी इस भयावह श्मशान में कहाँ आ भटके? आ क्यों गये? कौन यहाँ ले आया?

यह सारी माया इस अविद्या मरीचिका की है जिसने जल में थल और थल में जल दिखाने की भ्रान्ति उत्पन्न कर दी। परमेश्वर का प्रेम यदि याद रहा होता तो उसके साथ डोरी भी बँधी रहती। तब जीवन की पतंग झोंके खाती हुई-नष्ट होने के लिए इस गर्त में क्यों गिरती?

जिस परमेश्वर ने इतना दिया है। उसी का पल्ला पकड़े रहते तो विवेक रूपी चिन्तामणि का एकमात्र उपहार जो शेष रह गया है वह भी प्राप्त कर लेते। यदि वह रत्न मिल जाता तो फिर कोई अभाव क्यों प्रतीत होता, कोई कष्ट क्यों सताता? अभाव यहाँ है कहाँ-कष्ट यहाँ आया कहाँ से? इस स्वर्ग में कुत्साओं के लिए स्थान कहाँ है? कुण्ठाओं के लिए गुंजाइश कहाँ है? परमेश्वर के राज्य में-परमेश्वर के पुत्र के लिए कष्ट अभाव-यह कैसे हो सकता है?

अज्ञान ही है जो रुलाता है? अन्धकार ही है जो गिराता है। इस अज्ञान अन्धकार में भटक इसीलिए रहे हैं कि परमेश्वर के प्रेम रूपी प्रकाश ने साथ रखने से इनकार कर दिया। यदि अपने अत्यन्त प्रिय पात्र के बरसते हुए प्रेम को अनुभव किया होता तो उससे लिपटने की, उसे साथ रखने की-अन्तःकरण में स्थान देने की चेष्टा की होती। यदि उससे लिपट जाते तो राम भरत के मिलन जैसा आनन्द आता। तब राधा कृष्ण की तरह, आत्मा और परमात्मा की एकता ने इस मधुबन में ऐसा रास रचाया होता कि यहाँ हास उल्लास के अतिरिक्त और कुछ दीखता ही नहीं।


Quotation

कितना सुन्दर जीवन हो यदि मनुष्य को इस बात का विश्वास हो जाय कि मानव जीवन की मूल सत्ता में आनन्द है। -अज्ञात

परमेश्वर के प्रेम में न्यूनता ढूँढ़ना व्यर्थ है। अपनी दयनीय स्थिति के लिए दैव को दोष देना निरर्थक है। देखने के-सोचने के उलटे तरीके को बदलें। आत्मा और परमात्मा की सघनता को समझें, उसकी तरह सोचें और उसके इशारे पर चलें तो वह हमारा हो जाय।

परमेश्वर का प्रसाद हम निरन्तर पा रहे हैं, उसे देख सकें तो उसे पाने के लिए व्याकुलता भी जग पड़े। इस महान जागरण में ही मानव जीवन की सार्थकता सन्निहित है।


रहस्यमयी आत्मविद्या के अन्वेषण की आवश्यकता

यह संसार जितना विस्तृत है उसके रहस्य उससे भी अधिक गहन हैं। हमें उन रहस्यों को समझने के लिए मस्तिष्क खुला रखना चाहिए और तथ्य एवं प्रमाणों के आधार पर जो भी सत्य सिद्ध हो उसे स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

जो हम जानते या मानते हैं सर्वांगपूर्ण नहीं है। अभी उसमें सुधार और परिष्कार की बहुत गुंजाइश है। यह क्रम अनन्त काल तक चलता रहेगा क्योंकि मनुष्य की बुद्धि का क्षेत्र और विकास का क्रम बढ़ते रहने पर भी उसमें अपूर्णता बनी ही रहेगी। प्रकृति की परिधि निस्संदेह मनुष्य की समझ से कहीं अधिक बड़ी है। इसलिए बौद्धिक विकास के साथ-साथ नवीन तथ्यों के सामने आने और नवीन रहस्यों का उद्घाटन होने का सिलसिला बना ही रहेगा।

किसी समय मनुष्य ने आत्म-विज्ञान पर बहुत ध्यान दिया था और प्रयत्न करके अनेक ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं, जिन्हें आज अद्भुत और आश्वस्त समझा जाता है। आज भौतिक विज्ञान पर ध्यान दिया गया है और ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त की गई हैं जो प्राचीन काल के लोगों की दृष्टि में अद्भुत और आश्वस्त समझी गई होंगी। आज से हजार वर्ष पूर्व का मनुष्य यह विश्वास करने को शायद ही तैयार होता कि भविष्य में रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन, रेल, मोटर, वायुयान, कम्प्यूटर, अणु आयुध जैसे आविष्कार सम्भव हो जायेंगे। जब वो वस्तु सामने होती है उसे सामान्य कहते हैं और जिसका प्रचलन नहीं है उसी को अद्भुत और अविश्वस्त मानते हैं।

आध्यात्मिक अन्वेषणों, रहस्यों और उपलब्धियों के बारे में भी यही बात है। इस प्रकार के प्रसंग जब सामने आते हैं तो उन अलौकिकताओं को आश्वस्त ठहरा दिया जाता है। किम्वदन्तियों और दन्त कथाओं का प्रचलन अधिक हो जाने से ऐसा अविश्वास उचित भी है। किन्तु हमें आग्रही नहीं होना चाहिए और तथ्यों के आधार पर अपनी मान्यताओं में हेर-फेर करने की कोमलता मस्तिष्क में बनाये रखनी चाहिए।

भौतिक वैज्ञानिकों द्वारा प्रकृति के अन्तराल में छिपे हुए नित नये रहस्यों का उद्घाटन होता रहता है। आत्मिक-विज्ञान की दिशा में भी यदि वैसा ही अन्वेषण परीक्षण चल पड़े उस दिशा में भी प्रयोग के लिए उत्साह उत्पन्न हो जाय तो ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो आज समझ में नहीं आते किन्तु कल उन्हें सिद्धान्त घोषित किया जा सकता है।

अन्वेषण के लिए ऐसा व्यापक क्षेत्र खाली पड़ा है। फिलीपीन के एक तान्त्रिक की ऐसी ही एक उपलब्धि साप्ताहिक ‘धर्म-युग‘ में छपी है। उससे प्रतीत होता है कि संसार में ऐसी रहस्यमय शक्तियाँ भी विद्यमान हैं जिनको यदि सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध किया जा सके तो मानवीय कष्टों की निवृत्ति में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। घटना इस प्रकार है-

फिलीपीन में एक आश्चर्यजनक चिकित्सक है-टोनी एप गोआ। उसकी चिकित्सा प्रणाली इस युग के चिकित्सा शास्त्रियों को अचरज में डालती है। वे उसे देखने जाते हैं उसकी प्रणाली देखते हैं, तो चकित रह जाते हैं पर समझ नहीं पाते कि उसका कारण क्या है और यह सब कैसे सम्भव होता है।

27 वर्षीय तान्त्रिक टोनी चिकित्सा व्यवसाय करता है। मुख्य रूप से वह शल्य चिकित्सक है। ट्यूमर, केन्सर, मोतियाबिन्द के आपरेशन करता है और विकृत माद्दा शरीर में से निकाल कर बाहर रख देता है। उसके पास न चाकू है न कैंची न सुई फिर भी ऑपरेशन करते रहना एक अद्भुत काम है। जो जादू जैसा प्रतीत होता है।

टानी क्लेजन के कुवाओं इलाके में दो मंजिल मकान में रहता है। ऊपर अपने परिवार सहित खुद रहता है नीचे उसका अस्पताल है। विभिन्न रोगों से ग्रस्त आपरेशन योग्य रोगी ही उसके पास आते हैं, उन्हें वह एक मेज पर लिटाता है मन्त्र पढ़ता है। चाकू का काम उसका हाथ करता है। काटने-फाड़ने चीरने की क्रिया वह उंगली से करता है। ट्यूमर, केन्सर, गाँठ, मवाद आदि को भीतर से निकाल कर बाहर रख देता है। इसके बाद वह बिना सुई के घाव को जोड़ देता है। इस बीच उसका चचेरा भाई एल्फ्रेडो उसको साथ रहता है और तौलिया देने-चीजें उठाने जैसे काम करता रहता है। थोड़ा खून तो निकलते देखा जाता है पर रोगी को दर्द जरा भी नहीं होता और आपरेशन ठीक और सम्पन्न हो जाता है। प्रतिदिन ऐसे 10 से लेकर 20 तक आपरेशन उसे करने पड़ते हैं।

रोगियों की-प्रशंसकों की भारी भीड़ उसे घेरे रहती है। पहले वह फिलीपीन की राजधानी मनीला में रहता था। ख्याति के साथ-साथ भीड़ बढ़ी तो उसने वह स्थान छोड़ दिया। नई जगह में उसने नाम का बोर्ड आदि कुछ नहीं लगाया है तो भी लोगों ने वहाँ का पता लगा लिया और रोगी वहाँ भी पहुँचते हैं। जो आधुनिक आपरेशनों से सम्भव है वह कर देने का दावा टोनी भी करता है। उसकी चिकित्सा विधि देखने डॉक्टर वैज्ञानिक आते हैं और सारे क्रिया-कृत्य के फोटो फिल्म ले जाते हैं पर इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते कि यह असम्भव दीखने वाली बात सम्भव कैसे हो पाती है।

टोनी सपगोआ अपने इस कार्य का श्रेय किसी देवता को देता है। कहता है-उसका ‘अद्भुत रक्षक’ जो कराता है वही करता है। आपरेशनों में वही उसके साथ रहता है और सहायता करता है। इसके अतिरिक्त उस देवता के बारे में वह कुछ अधिक नहीं बताता।

मियामी फ्लोरिडा के वेल्क पेरा साइकोलॉजी रिसर्च फाउण्डेशन के प्रतिनिधि डॉ0 बनर्जी वहाँ गये। यह सब देखा-क्रिया-कलाप के फोटो भी लाये पर इस निष्कर्ष पर न पहुँच सके कि यह सब कैसे और क्यों कर संभव होता है?

क्या मनुष्य के भीतर ऐसी अद्भुत शक्तियाँ हैं जिनसे वह मानवीय कष्टों के सरल करने की जटिल प्रक्रियाओं को सरल कर सके? क्या कोई अदृश्य शक्ति और आत्माएं विद्यमान हैं जो इस प्रकार के कार्यों में मनुष्य का सहयोग कर सकें? क्या अतींद्रिय विज्ञान और गूढ़-विद्या में ऐसी संभावनायें विद्यमान हैं जो मनुष्य की वर्तमान क्षमता में अधिक वृद्धि कर सकें और उसे अधिक सुखी एवं सफल बना सकें ? इन प्रश्नों का समाधान ढूँढ़ने के लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए। फिलीपीन जैसी घटनायें प्रायः हर देश में समय-समय पर उपलब्ध होती रहती है। हमें बिना अन्ध-विश्वासी और अविश्वासी बने तथ्यों का अन्वेषण करना चाहिए।

उपेक्षित और लुप्त प्रायः आत्म-विज्ञान को यदि अन्वेषण और प्रयोगों का क्षेत्र मान लिया जाय और उसके लिए भौतिक विज्ञानियों जैसी तत्परता बरती जाय तो अगले दिनों ऐसे अनेक उपयोगी रहस्य उद्घाटित हो सकते हैं जो भौतिक आविष्कारों से भी अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकें।


विशेषता को काम में लाओ पर घमण्ड मत करो

सन्त याँगत्सी अपने शिष्यों सहित सुँग गये। वहाँ वे एक सराय में ठहरे।

सराय के मालिक की दो औरतें थी। एक रूपवती-दूसरी कुरूपा। अचम्भा यह था कि कुरूप का सम्मान होता था और रूपवती दुत्कारी जाती थी।

इस अनहोनी का कारण पूछा-तो सराय के नौकरों ने बताया। रूपवती को अपने रूप का ज्ञान है, सो वह बात-बात में नखरे दिखाती है। कुरूप को अपनी सूरत का ज्ञान है सो वह नम्र व्यवहार करती है। कोई रूपवती की बड़ाई को स्वीकार नहीं करता और न कुरूपा की हीनता को मंजूर करते हैं। सो सम्मान कुरूपा को मिलता है और तिरस्कार सुन्दरी को

याँगत्सी ने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए कहा-बच्चों, तुममें जो विशेषता हो उसे काम में लाओ, पर घमण्ड मत करो, अन्यथा गुण रहते हुए भी तुम सम्मान प्राप्त न कर सकोगे।


अणुशक्ति से अधिक सामर्थ्यवान आत्मशक्ति

विश्व का कण-कण शक्ति से भरा पड़ा है। पर दुर्भाग्यवश हम उसके अभाव में पग-पग पर अभाव और कष्ट अनुभव कर रहे हैं। अणु की शक्ति का क्या ठिकाना सूर्य तो शक्ति का स्रोत ही है। गामा किरणें, कॉस्मिक किरणें, रेडियो किरणें, एक्स किरणें प्रभृति कितनी ही शक्तिधाराएं लोक-लोकान्तरों से इस पृथ्वी पर आती रहती हैं, उनका एक बहुत छोटा अंश प्रयुक्त होता है, शेष ऐसे ही अस्त-व्यस्त होकर विनष्ट हो जाता है।

शक्तिशाली बनने के लिए हमें दो कदम उठाने पड़ेंगे एक, आस-पास बिखरी हुई शक्ति का संचय; दूसरे उसका सदुपयोग। संचय कर सकने की क्षमता न होने से घोर जल वर्षा होते रहने पर भी एक बूँद चुल्लू पानी नहीं मिलता और हाथ मलते रह जाते हैं। इस प्रकार प्रस्तुत वस्तुओं का यदि सदुपयोग न हो सके तो भी लाभदायक स्थिति प्राप्त करने से वंचित ही रहना पड़ता है। यदि शक्ति की व्यापकता और प्रचुर मात्रा में उपस्थिति से परिचित होने के साथ-साथ उसका संग्रह और सदुपयोग विधान भी समझ में आ जाय तो समझना चाहिए कि हम सर्वशक्तिमान न सहीं अतीव शक्तिशाली अवश्य बन सकते हैं और आज की दयनीय स्थिति से कहीं आगे बढ़ सकते हैं।

अणु के स्वरूप, बल तथा बाहुल्य पर दृष्टिपात करें तो आश्चर्य होता है कि अपने अति समीप अतिशय शक्ति भण्डार प्रस्तुत है किन्तु उससे लाभ उठाते नहीं बन पड़ रहा है। अणु शक्ति की संक्षिप्त जानकारी भी हमें आश्चर्य में डाल देती है।

अणु का आकार एक इंच के 20 करोड़वें भाग की बराबर होता है। अब तक बने सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों में से कोई भी अणु को अकेला नहीं देख सकता। उसे तोलने की कोई तराजू भी नहीं बनी है। फिर भी गणित के आधार पर उसकी नाप-तौल, आकृति-प्रकृति, आदि का बहुत कुछ विवरण जान लिया गया है। परमाणु को एक ब्रह्माण्ड कह सकते हैं। उसके भीतर ग्रह नक्षत्र भी हैं और आकाश भी। बीचों-बीच एक ‘केन्द्रक’ है प्रोटोन और न्यूट्रॉन से बना। बाकी खाली मैदान पड़ा है जिसके इलेक्ट्रोन चक्कर लगाते रहते हैं। ‘केन्द्रिक’ को यदि एक गेंद की बराबर माना जाय तो पूरे परमाणु कलेवर को 2000 फुट व्यास का मानना पड़ेगा। भ्रमणशील इलेक्ट्रानों का भार न्यूट्रॉन या प्रोट्रॉन की अपेक्षा 1850 अंश ही होता है। सभी परमाणुओं में इन उप अणुओं की संख्या समान नहीं होती। किसी तत्व में वे कम होते हैं किसी में अधिक।

भूतकाल में यह मान्यता थी कि यह समस्त संसार पाँच तत्वों से मिल कर बना है। उन पाँच तत्वों के नाम पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश माने जाते थे। पर ज्ञान के अभिवर्धन के साथ उपरोक्त मान्यता को झुठला दिया है। नये प्रतिपादन यह बताते हैं कि पूर्व मान्यता वाले तथाकथित पञ्च तत्व मौलिक तत्व नहीं है। वे एक प्रकार के सम्मिश्रण हैं। जल कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं। वह कुछ गैसों का सम्मिश्रण है। यही बात शेष चार तत्वों के संबंध में कही गई है।

भौतिक तत्वों की शोध का क्रम चल ही रहा है। वह अभी पूर्ण नहीं हुआ। पिछले दिनों 104 मौलिक तत्व ज्ञात किये जा चुके हैं। इनमें से 92 को सर्वथा प्राकृतिक माना जाता है शेष को मिश्रित या कृत्रिम। अगले दिनों इन तत्वों की संख्या और भी बढ़ने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

मौलिक तत्वों के शोध प्रयास में ‘परमाणु’ को ‘अविभाज्य’ तत्व की मान्यता मिली हुई थी पर पीछे उसे भी एक सम्मिश्रण सिद्ध कर दिया गया। विज्ञानी-प्राउट ने उसे धनावेश और ऋणावेश दो घटकों में विभक्त बताया। धनावेश को ‘प्रोटोन’ नाम दिया गया और ऋणावेश को-इलेक्ट्रोन। पीछे क्यूरी दम्पत्ति ने परमाणु में एक और तत्व की खोज की जिसे ‘न्यूट्रॉन’ नाम दिया गया, इसे आवेश रहित बताया गया। सी0डी0 टन्डरसन ने इलेक्ट्रान के समतुल्य किन्तु आवेश में विपरीत स्थिति के एक ओर नये कण की खोज की उसका नाम ‘पॉजीट्रान’ पड़ा। जापानी वैज्ञानिक युकावा ने उसी परमाणु परिवार के मेसान कणों की खोज की, इन्हें पाई मेसान, के मेसान क्यूमेसान नाम दिया गया है।

परमाणु के उपरोक्त अंग-प्रत्यंगों में भी अब भेद उपभेद निकलते चले आ रहे हैं। हाइपेरान परिवार के ‘लैक्वडा कण, ऐन्टा हाइपे रान, सिग्मा केस्केड, फोटान, न्यूट्रिनों आदि परमाणु के उपभेद इन दिनों विशेष शोध के विषय बने हुए हैं। इन मौलिक तत्वों के अतिरिक्त लगभग वैसी ही विशेषताओं से युक्त नये तत्व कणों का कृत्रिम सम्मिश्रण तैयार किया जा रहा है। इन सब एटॉमिक कणों की आकृति और प्रकृति में अति आश्चर्यजनक नवीनतायें प्रकट होती चली जा रही हैं।

भावी शक्ति स्रोत के लिए इन दिनों परमाणु शक्ति पर निगाह लगी हुई है और उसका सुलभ उपयोग तलाश किया जा रहा है। आश्चर्य है कि परमाणु जैसी नगण्य इकाई-तुच्छ सी वस्तु किस प्रकार शक्ति का प्रचण्ड स्रोत बनकर मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकेगी।

परमाणु में शक्ति उत्पन्न करने का क्रियाकलाप है-अणु-विखण्डन। इसके लिए मूल तथा यूरेनियम का प्रयोग किया जाता है। उस पर न्यूट्राणुओं का आघात करने से आसानी से टूट जाता है। उपलब्ध यूरेनियम का सर्वांश विखण्डन के योग्य नहीं होता। उसमें 0.71 प्रतिशत ही विखण्डनीय अंश है शेष तो अन्य वस्तुयें ही उसमें मिली हुई हैं-जिन्हें उर्वर कहा जा सकता है। प्रयत्न यह हो रहा है कि इस उर्वर अंश को भी विखण्डन से सहायता देने योग्य बनाया जाय। वैज्ञानिकों की भाषा में शुद्ध अंश को यूरेनियम-235 और अशुद्ध अंश को -238 कहा जाता है। इस 238 अंश पर न्यूट्रानों का आधार करके उसे भी एक नये पदार्थ-प्लूटोनियम-239 में परिणत कर लिया जाता है। इस प्रकार लगभग यह सारा ही मसाला घुमा फिरा कर परमाणु शक्ति उत्पन्न करने में प्रयुक्त हो सकने योग्य बना लिया जायगा।

एक घन फुट यूरेनियम से इतनी शक्ति उत्पन्न की जा सकती है जितनी 17 लाख टन कोयले में से अथवा 72 लाख बैरल तेल में होती है। इसे 320 खरब घनफुट प्राकृतिक गैस की बराबर भी समझा जा सकता है।

अणु शक्ति का न केवल बिजली उत्पन्न करने में उपयोग है वरन् केन्सर सरीखे जटिल रोगों की चिकित्सा में भी उसे प्रयुक्त किया जाता है। बम्बई के टाटा संस्थान ने इस दिशा में बहुत प्रगति की है।

परमाणु को अँग्रेजी में ‘एटम’ कहते हैं। यह मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है-जिसका अर्थ होता है-’अविभाज्य’ ग्रीक ही क्यों सर्वत्र यही मान्यता था। अणु को पदार्थ की सबसे छोटी इकाई माना जाता था पर अब वह लगभग 30 इकाइयों का-एक प्रकार का राष्ट्र मण्डल है। एक 30 ग्रह नक्षत्रों वाला परिभ्रमण शील सौर परिवार भी कहा जा सकता है।

अणु बम, पनडुब्बियों के संचालन, बर्फ तोड़ने आदि में उसका प्रयोग काफी दिनों से चल रहा है। अन्तः ग्रह नक्षत्रों में यात्रा करने वाले राकेटों में अणु शक्ति का भारी योगदान है। आगे तो वह सर्वसाधारण की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने में लिए सर्वसुलभ ही बनने जा रही है।

यूरेनियम में अग्नि और रेडियम सक्रियता के दोनों गुण हैं। इसलिए उसके निर्माण एवं उपयोग में पूरी-पूरी सावधानी बरतनी पड़ती है। तनिक सी असावधानी से भयंकर अग्नि काण्ड हो सकता है। और रेडियो सक्रियता फैल पड़े तो महाविनाश उत्पन्न कर सकती है। जहाँ यह प्रयोग होते हैं वहाँ ऐसे विशिष्ट उपकरण लगाये जाते हैं जिनसे हवा में यूरेनियम के धूलि कण जमा न होने पायें।

अणु शक्ति की तरह ही मनुष्य की चेतना शक्ति है जिसके अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त, आत्मबोध को अन्तःकरण के रूप में जाना जाता है। लगन, तत्परता, एकाग्रता, तन्मयता, निष्ठा, दृढ़ता, हिम्मत जैसे मानसिक गुण ऐसे हैं जिनके आधार पर अणु शक्ति से भी करोड़ों गुनी अधिक प्रखर आत्मिक शक्ति को जगाया, बढ़ाया, रोका, सँभाला और प्रयुक्त किया जा सकता है।

अणु विज्ञान से बढ़कर आत्म विज्ञान है। जड़ अणु में जब इतनी शक्ति विद्यमान है तो जड़ की तुलना में चेतन का जो अनुपात है उसी हिसाब से आत्म शक्ति की महत्ता होनी चाहिए। अणु विज्ञानी अपनी उपलब्धियों पर गर्वान्वित हैं और उस सामर्थ्य को युद्ध अस्त्र से लेकर बिजली की कमी को पूरा करने जैसी योजनाओं में प्रयुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। आत्म विज्ञानियों का कर्त्तव्य है कि वे उसी लगन और तत्परता के साथ आत्म शक्ति की महत्ता और उपयोगिता को इस प्रकार प्रमाणित करें कि सर्वसाधारण को उसकी गरिमा समझा सकना सम्भव हो सके।

महामानव वस्तुतः एक जीवन्त प्रयोग परीक्षण है जिन्हें आत्म शक्ति के संग्रह और सदुपयोग कर सकना आया और उस प्रयोग के द्वारा प्रगति पथ पर बढ़ चलने का लाभ उठाया। ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति की त्रिवेणी को केन्द्रित कर उससे उत्पन्न सामर्थ्य को रचनात्मक दिशा में प्रयुक्त कर सकने की विधि व्यवस्था को अध्यात्म विज्ञान कहते हैं। मध्यकाल में उसका स्वरूप अन्धविश्वासी जनता और श्रद्धा शोषक साधना व्यवसायी लोगों द्वारा विकृत अवश्य हो गया और उससे अनास्था भी फैली; पर उससे मूल तथ्य पर कोई आँच नहीं आती। सत्य जहाँ था वहाँ का वहीं मौजूद है।

अणु शक्ति की ऊर्जा बिखर जाने से हानि होती है। आत्म शक्ति का रावण, कुम्भकरण, भस्मासुर, हिरण्यकश्यपु की तरह दुरुपयोग होने का खतरा है। सिद्धि चमत्कारों के हास-परिहास में उसे कौतुक-कौतूहल के बाजारू स्तर पर रखकर उपहासास्पद भी बनाया जा सकता है; पर यदि उसे ठीक तरह समझा और सँभाला जाय-वैयक्तिक विकास और सामाजिक उत्कर्ष में उसका सुविज्ञ व्यक्तियों द्वारा उपयोग किया जाय तो उसकी गरिमा अणु शक्ति की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।


वह मत करो, जिसके लिए पीछे पछताना पड़े

वह मत करो, जिसके लिए पीछे पछताना पड़े। निरर्थक वस्तुयें बड़ी मात्रा में एकत्रित कर लेने से भी क्या लाभ, जो उत्तम है उसका थोड़ा सा सञ्जय भी उत्तम है। अव्यवस्थित और असंयत रहकर सौ वर्ष जीने की अपेक्षा ज्ञान और धर्मपूर्वक एक वर्ष जीवित रहना अच्छा है। धुआँ देकर देर तक सुलगती रहने वाली और कालिख उत्पन्न करती रहने वाली अग्नि की अपेक्षा थोड़ी देर उज्ज्वल प्रकाश देकर बुझ जाने वाली आग सराहनीय है।

जिसने धर्म का आधार छोड़ दिया, जो निरंकुश और स्वेच्छाचारी की तरह सोचता और करता है उससे दुष्कर्म ही बन पड़ेंगे वह कुमार्ग पर ही चल सकेगा। धर्म बन्धनों में अनेक स्थानों पर बँधा हुआ मन ही उद्दण्ड घोड़े की तरह काबू में रह पाता है। ढालू जमीन पर फैलाया हुआ पानी जैसे ऊपर की ओर नहीं चढ़ता वैसे ही स्वेच्छाचारी मन न तो भली बातें सोचता है और न भले कार्य करता है, मन को कुमार्ग से रोकना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है, जिसने अपने ऊपर संयम कर लिया वह इस त्रैलोक्य का स्वामी है।

पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा देखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान वस्तुओं के ढेर को जला कर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है। मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।

-भगवान महावीर


मरण सृजन का अभिनव पर्व

मृत्यु हमारा सबसे अधिक प्रिय पात्र और शुभ चिन्तक अतिथि है। उसके आगमन पर डरने घबराने जैसी कोई बात है नहीं। शरीर जब आयु की अधिकता से जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, अवयव अपना कर्त्तव्य निबाहने में असमर्थ बन जाते हैं, मरम्मत की चिन्दियाँ भी जब काम नहीं करती तब नया यन्त्र लगाने की जरूरत पड़ती है। इसी परिवर्तन का नाम मृत्यु है।

कारखानेदार पुरानी मशीनें हटाते रहते है, पुरानी मोटरें बेचते रहते हैं और उनके स्थान पर नई मशीन, नई मोटर लगाते हैं। इससे कुछ असुविधा नहीं होती, सुविधा ही बढ़ती है। पुरानी मशीन आये दिन गड़बड़ी फैलाती थी, पुरानी मोटर धीमे-धीमे और रुक-रुक कर चलती थी नई लग जाने से वह पुरानी अड़चनें दूर हो गईं; नई के द्वारा बढ़िया काम होने लगा। जीर्णता के साथ कुरूपता बढ़ती है और नवीनता में सौंदर्य रहता है। पुराने पत्ते रूखे, शुष्क और कठोर हो जाते हैं जब कि नई कोपलें कोमल और सुन्दर लगती हैं। पुराने पत्ते झड़ने पर, पुरानी मशीन उखड़ने पर-पुरानी मोटर बिकने पर कोई इसलिए रञ्ज नहीं मानता कि अगले ही दिन नवीन की स्थापना सुनिश्चित है।

आत्मा अनादि और अनन्त है। वह, ईश्वर जितना ही पुरातन है और कभी नष्ट न होने वाला सनातन है। उसकी मृत्यु सम्भव नहीं। शरीर का परिवर्तन स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी है। हर पदार्थ का एक क्रम है जन्मना-बढ़ना और नष्ट होना। नष्ट होना एक स्वरूप का दूसरे स्वरूप में बदलना भर है। यदि यह परिवर्तन रुक जाय तो मरण तो बन्द हो सकता है पर जन्म की भी फिर कोई सम्भावना न रहेगी। यदि जन्म का उल्लास मनाने की उत्कण्ठा है तो मरण का वियोग भी सहना ही होगा। वधू अपने माँ-बाप से बिछुड़ कर सास श्वसुर पाती है, सहेलियों को छोड़कर पति को सहचर बनाती है। यदि मैका छोड़ने की इच्छा न हो तो फिर ससुराल की नवीनता कैसे मिलेगी?

पीतल के पुराने बर्तन टूट जाते हैं तब उस धातु को भट्ठी में गलाकर नया बर्तन ढाल देते हैं। वह सुन्दर भी लगता है और सुदृढ़ भी होता है। पुराने टूटे, चूते-रिसते, छेद, गड्ढे और दरारों वाले शरीर बर्तन को चिता की भट्ठी में गलाया जाना तो हमें दिखता है पर उसकी ढलाई की फैक्टरी कुछ दूर होने से दीख नहीं पड़ती है। सोचते हैं पुराना बर्तन चला गया। खोज करने से विदित हो जायगा कि वह गया कहीं भी नहीं-जहाँ का तहाँ है सिर्फ शकल बदली है।

पुराने मकान टूट-फूट जाते हैं उन्हें गिरा कर नया बनाना सुरक्षा और सुविधा की दृष्टि से आवश्यक है। नया बनाने के लिए जब पुराना गिराया जा रहा होता है तो कोई रोता कलपता नहीं। शरीर के मरने पर फिर दुःखी होने का क्या कारण है?

बहुत दिन साथ रहने पर बिछुड़ने का कष्ट उन्हें होता है जिनकी ममता छोटी है। कुछ ही चीजें जिन्हें अपनी लगती हैं-कुछ ही व्यक्ति जिन्हें अपने लगते हैं वे प्रियजनों के विछोह की बात सोचकर अपनी संकीर्णता का ही रोना रोते हैं। वस्तुतः कोई किसी से कभी बिछुड़ने वाला नहीं है, समुद्र में उठने वाली लहरें जन्मती और मरती भर दीखती हैं पर यथार्थ में समुद्र जहाँ का तहाँ है। कोई लहर कहीं जाती नहीं-सागर का समग्र जल जहाँ का तहाँ परिपूर्ण रहता है। कुछ समय के लिए बादल बन कर उड़ भी जायं तो नदियों के माध्यम से फिर अगले क्षण उसी महा जलाशय में आकर किल्लोल करता है। मरने के बाद भी कोई किसी से नहीं बिछुड़ता। सूर्य की किरणों की तरह हम सब एक ही केन्द्र में बँधे हुए हैं। कुछेक प्राणी ही हमारे अन्य सब बिराने इस सीमा बद्धता से ही शोक है।

मृत्यु का अर्थ है कुरूपता का सौंदर्य में परिवर्तन। अनुपयोगिता के स्थान पर उपयोगिता का आरोपण। इससे डरने का न कोई कारण है और न रुदन करने का।


जीवन की रिक्तता प्रेम प्रवृत्ति से ही भरेगी

देखते हैं दुनिया प्रगति कर रही है। धन बढ़ रहा है। विद्या और बुद्धि का चमत्कार चारों ओर बिखरा पड़ा है। विज्ञान ने देव लोक जैसी सुविधायें इस धरती पर प्रस्तुत कर दी हैं। मनोरंजन के माध्यम तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। चिकित्सा ने मौत को चुनौती दी है। और भी न जाने क्या-क्या बढ़ता चला जा रहा है।

इस प्रगति के युग में न जाने कौन सी विकृति मनुष्य के भीतर घुसती बढ़ती चली जा रही है जिससे वह सूना-खोखला-एकाकी-डरावना और खोया-लुटा सा बन रहा है। न किसी के जीवन में आनन्द, न उल्लास, न संतोष, न शान्ति। मदिरा पीकर उन्मत्त फिरने वाले की तरह तुच्छ सी उपलब्धियों पर आदमी इठा तो फिरता है-दूसरों पर धाक जमाने की कुचालों में तो उलझा है पर उस उमंग से दिन-दिन वंचित ही होता चला जा रहा है जो आँतरिक शान्ति और समस्वरता के आधार पर उत्पन्न होती है। और जिसके बिना जलन, खीज और अतृप्ति ही जीवन में शेष रह जाती है।

क्या खो गया आदमी से? किस अभाव में ग्रस्त है मनुष्य? यह विचारना होगा स्वल्प साधनों में जब करोड़ों वर्षों से शान्ति और सन्तोषपूर्वक जिया जाता रहा है तो इतने प्रचुर साधनों के रहते, इतना उद्वेग क्यों? इतने असन्तोष और नैराश्य का कारण क्या? जिससे विक्षिप्त बैताल की तरह आदमी को सन्तोष की प्यास में हर दरवाजे से टकराना पड़े और हर जगह से खाली हाथ लौटना पड़े?

सचमुच किसी बड़े अभाव ने मनुष्य पर आक्रमण किया है? सचमुच कोई बड़ी भूल हो गई है। वस्तुतः कुछ बड़ी चीज गुम गई है। यह है-प्रेम भावना का अभाव, जिसने सब कुछ होते हुए भी, मनुष्य को कुछ भी नहीं जैसी स्थिति में ला पटका है।

प्रेम-जिसकी सत्ता, महत्ता और उपयोगिता का इन दिनों लगभग विस्मरण जैसा ही कर दिया गया है-मानव जीवन की सबसे बड़ी विभूति है। शरीर से ऊपर उठकर जो कुछ आदमी के पास ‘दिव्य’ है। उसकी तृप्ति प्रेम के अतिरिक्त और किसी से हो ही नहीं सकती। शरीर में 95 प्रतिशत पानी का अंश है। उसे जीवित रखने के लिए पानी चाहिए। प्यास को सहन कर सकना कठिन है। उसके बिना काया सूखती-मुरझाती-कुम्हलाती चली जायगी और क्रमशः अपने अस्तित्व को ही गँवा देगी।

शरीर से ऊपर जो ‘दिव्य’ है। उसकी संरचना में ‘प्रेम’ का बाहुल्य है। उसे सजीव रखने के लिए प्रेम सिंचन अनिवार्य है। यदि वह न मिल सके तो भीतर मरघट ही जलेगा। तब आन्तरिक उद्वेग, अन्तरंग के सारे ढाँचे को लड़खड़ा देगा। इसी लड़खड़ाहट के साथ आज की दुनिया जी रही है। बढ़ती हुई नशेबाजी के पीछे एक बड़ा कारण यही है कि प्रेम के अभाव से उत्पन्न अन्तरंग की रिक्तता का सहन कर सकना सम्भव नहीं हो पा रहा है, और इस अभाव से आन्तरिक चीत्कार को दबाने के लिए नशे पिये जा रहे है। गम गलत करना ही आज की नशेबाजी का प्रमुख कारण है। नींद की गोलियाँ खाये बिना रात नहीं कटती। नशा पिये बिना दिन नहीं बीतता। तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का यही हाल है। पिछड़े हुए लोग भी इसी तरह जिन्दगी की लाश ढो रहे हैं।

प्रेम-व्यसन नहीं है। भावुकता का उभार भी नहीं है इसे सम्वेदनात्मक दुर्बलता नहीं समझा जाना चाहिए। यह आत्मा की प्यास है। वह एकाकी-बन्दी की तरह काया में कैद रह कर गुजारा नहीं कर सकता। उसका कोई अपना होना चाहिए। वह किसी का होकर रहना चाहता है। मिलन ने इस दुनिया को सृजा है। ब्रह्म ने माया को साथ लिया-शिव ने शक्ति का अञ्चल पकड़ा। इसके बिना यह विश्व उपवन अस्तित्व में ही न आता। सृजन का आधार ‘मिलन’ है। रसायन शास्त्र, मिलन से उत्पन्न अद्भुत सम्भावनाओं का रहस्योद्घाटन करता है।

विद्युत तरंगें ऋण और धन प्रवाहों के मिले बिना गतिशील ही नहीं होती। प्राणियों का जन्म रयि और प्राण का योग हुए बिना कैसे सम्भव हो सकता है।

इसमें जो कुछ ‘दिव्य’ है, वह भी जड़ की भाँति ही ‘मिलन’ की अपेक्षा करता है। यह ‘अन्तःमिलन’ आत्माओं की पारस्परिक सच्ची और निकटतम घनिष्ठता पर आधारित है। इसी को प्रेम कहते हैं। जड़ जगत में एक और एक मिलकर दो होते हैं। चेतन जगत में एक और एक मिलकर ग्यारह की उक्ति ही प्रचलित है। वस्तुतः वे असीम और अनन्त बनते हैं। मिलन का सृजन है। उसी में से उल्लास फूटता है और प्रगति में सहस्रमुखी सम्भावनायें सामने प्रस्तुत होती हैं। इसके विपरीत वियोग-सूनापन, एकाकीपन-इतना भयावह है कि उसे सहन करना कठिन पड़ता है।

अणु को अपने परिवार से विलग किया जाता है तो उससे भयानक विस्फोट होता है। अणु विखण्डन की प्रक्रिया आज विश्व को ग्रसित कर सकने की विभीषिका बनी बैठी है। सती के वियोग में शिव विक्षिप्त हो गये। मृत काया को कन्धे पर रखकर वे ताण्डव नृत्य करने लगे और संसार के लिए संकट उत्पन्न हो गया। प्रेम विहीन-एकाकी-सूना-व्यक्ति कितना कर्कश हो सकता है-कितना अतृप्त और उद्विग्न रह सकता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज के जन समाज में से प्रत्येक को देखा जा सकता है।

वैभव बढ़ा तो बुद्धि का चमत्कार और साधनों का बाहुल्य भी। पर अन्तरंग को भुला दिया गया। शरीर से ऊपर भी कुछ है क्या उसे समझने की उपेक्षा की गई। सो शरीर को सब कुछ मिलने पर भी बना कुछ नहीं। भीतर की प्यास ने भौतिक उपलब्धियों को निरर्थक सिद्ध कर दिया। निरर्थक ही नहीं वे अनर्थ मूलक भी बनती चली गईं। ‘दिव्य’ का नियन्त्रण न रहने पर ‘जड़’ उच्छृंखल सिद्ध हुआ। घातक-विनाशकारी-भयावह और सत्यानाशी। क्रम यही चलता रहा। वापिस लौटने के लिए-भूल सुधारने के लिए-कुछ किया, सोचा न जा सका, तो वह दिन दूर नहीं जब यह तथाकथित प्रगति मनुष्य के भीतर का ‘मनुष्य’ खा जायगी और आदमी नर-पशु बन कर प्रेत पिशाचों की तरह दुनिया के मरघट के क्रन्दन भरा कोलाहल करता हुआ दिखाई देगा।

प्रेम कितना सरस, मधुर, सुखद और सृजनात्मक है इसकी एक झाँकी सच्चे हृदय से सम्बद्ध हुए दाम्पत्य-जीवन में देखी जा सकती है। यों यह छाया मात्र है। क्योंकि इसमें ‘अर्थ’ और ‘काम’ के दूसरे मौलिक तत्व भी मिले रहते हैं। प्रेम इससे ऊँचा है उसमें अपेक्षा नहीं रहती-केवल अपना अनुदान ही इतना प्रबल होता है जिसके आधार पर साथी के सहयोग के बिना भी परिपूर्ण आनन्द प्राप्त किया जा सके। मीरा, सूर, तुलसी आदि सन्तों ने भगवान से प्रेम किया और प्रतिदान की अपेक्षा न करते हुए अपने उत्पादन से अपना घर भर लिया, मनुष्य माता की कुछ उपेक्षा हो भी सकती है पर अन्य जीवों में जो मातृ भावना पाई जाती है उस उदार वात्सल्य को ‘प्रेम’ ही कहना चाहिए यह कितना मधुर और सरस है इसे किसी माता का हृदय पढ़कर ही देखा समझा जा सकता है। पति-पत्नी-प्रेमी प्रेयसी में ‘प्रेम’ की छाया देखी जा सकती है। छाया इसलिए कि उसके आकर्षणों में भौतिक कारण जुड़े रहते हैं और उन आकर्षणों में न्यूनता आने पर आधार डगमगाता देखा जाता है। फिर भी छाया को देखकर मूल वस्तु का अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कितना अधिक दिव्य और कितना उल्लासपूर्ण होगा।

प्रेम आत्मा की प्रकृति और प्रवृत्ति है। आन्तरिक विकास का एक क्रम है। ‘स्व’ की सीमा बद्धता का उल्लंघन किये बिना-भव बन्धनों से मुक्ति नहीं। जो अपनेपन में जितना खोया, जकड़ा हुआ है वह उतना ही एकाकीपन अनुभव करेगा। “न कोई हमारा, न हम किसी के” यह स्थिति अत्यधिक भयावह है। ऐसा मनुष्य स्वार्थ के लिए किसी के साथ भी-कुछ भी कर सकता है। उसकी अनैतिकता सभी सीमाओं का उल्लंघन कर सकती है। नैतिक मर्यादायें केवल सहृदयता पर अवलम्बित करती हैं। कानून और समाज के दण्ड से बच निकलना वर्तमान चतुरता के लिए बाँये हाथ का खेल है। सज्जनता का ढोंग भरा प्रदर्शन रच लेना कुशल लोगों के लिए तनिक भी कठिन नहीं है। नीति और सदाचार की वास्तविकता सहृदयता पर ही निर्भर है। दूसरों के कष्ट को अपना कष्ट समझने की-दूसरों की सुख-सुविधा को अपनी जैसी समझने की कोमल सम्वेदनायें जब तक अन्तःकरण में प्रस्फुटित न होगी तब तक कोई मनुष्य सच्चे अर्थों में न सच्चरित्र हो सकता है और न उदार। दूसरों के प्रति ममता भरी कोमल संवेदनाओं के इस उभार को ही ‘प्रेम’ कहते हैं।

आरम्भिक अभ्यास के लिए-वह स्त्री, पुत्रों के, साथी सहयोगियों के, संत सज्जनों के माध्यम से भी विकसित किया जा सकता है। पर उतनी ही परिधि में उसे सीमित नहीं रखा जा सकता। प्रेम-ईश्वर की तरह व्यापक तत्व है, उसे संकीर्ण सीमा बद्धता से अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है। व्यायामशाला में श्रम करके पहलवान बना जाता है पर उसका कार्यक्षेत्र यहीं तक सीमित नहीं हो सकता। पति पत्नी-परस्पर भरपूर प्रेम करें यह उचित भी है और आवश्यक भी। क्योंकि प्रसुप्त प्रेम भावनाओं का विकास करने के लिए-गमले में बोये हुए पौधे की तरह आरम्भ में वही उचित है पर विशाल वृक्ष का वह पौधा सदा गमले तक सीमित नहीं रखा जा सकता। थोड़ा बढ़ने पर उसे ऐसे स्थान पर आरोपित करना पड़ता है जहाँ उसे विशाल वृक्ष के रूप में विकसित होने पर अवसर मिले। प्रणय बन्धन के समय गृहस्थ जमाने की चिन्ता करना उचित है, पर बाल-बच्चों के माध्यम से प्रेम का क्षेत्र विस्तार करने के उपरान्त उसे वानप्रस्थ के माध्यम से विश्वव्यापी बनाने का कदम उठाया ही जाना चाहिए। जो प्रेम दो व्यक्तियों तक सीमित होकर रह जाय उसे ‘अन्धा’ और ‘अपंग‘ की श्रेणी में रखा जायगा। यह बात पुत्र, मित्र आदि के संबंध में लागू होती है। इनसे स्नेह सद्भाव बढ़ा कर शुष्क प्रेम अंकुरों को हरित और पल्लवित किया जा सकता है पर उसकी सार्थकता और पूर्णता तो ‘विश्व प्रेम’ के रूप में परिणत होने पर ही सम्भव है।

आज की आन्तरिक रिक्तता प्रेम भावनाओं के कुण्ठित हो जाने पर कारण उत्पन्न हुई है। साधन रहते हुए भी घोर दरिद्र जैसी दयनीय स्थिति में पड़े रहने का एक ही कारण है किसी को अपना और अपने को किसी का न समझना अपनी ही संकीर्ण स्वार्थपरता में उलझे रहना। इन्द्रिय सुखों, तृष्णाओं, वैयक्तिक सम्पन्नता की महत्वाकाँक्षाओं में उलझा मनुष्य-जाल में जकड़े हुए हिरन की तरह तड़पता ही रहेगा। ‘पर’ को ‘स्व’ में और ‘स्व’ को ‘पर’ में घुलाने की प्रवृत्ति ही मानवीय सन्तोष और उत्कर्ष का आधार बन सकती है। इस प्रेम प्रवृत्ति को विकसित करके ही जीवन की रिक्तता और शून्यता को भरा जा सकता है। व्यक्ति और समाज में उल्लास, चरित्र एवं उत्कर्ष का उद्भव ‘प्रेम’ प्रवृत्ति को विकसित किये बिना और किसी तरह सम्भव न हो सकेगा।


कर्मयोगी तिलक

सन् 1916 की 23 जुलाई को लोकमान्य तिलक की 60वीं वर्षगाँठ थी। पूना में हीरक जयन्ती मनाने की तैयारियाँ धूमधाम से की गई। लोग अपने प्रिय नेता का जन्मदिन मनाने के लिये हजारों की संख्या में एकत्र हुये।

बड़े ही मधुर वातावरण में गीत, वाद्य, भाषण आदि चल रहे थे तभी स्टेज पर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट चढ़ते दिखाई दिये। ब्रिटिश हुकूमत में एक पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट आज के एक आई0जी0 से बढ़कर ताकत रखता था। उसे रंगमंच पर चढ़ते देखकर लोगों के होश गुम हो गये।

किन्तु तिलक निश्चल, शान्त और प्रसन्न मुद्रा में ही बैठे रहे। पुलिस कप्तान ने उनके हाथ में कागज दिया जिसमें सरकार के खिलाफ भाषण देने पर उनसे चालीस हजार के जमानत व मुचलके माँगे गये थे। न देने पर जेल भेजने की धमकी भी थी। कोई और होता तो घबड़ा जाता पर कर्मयोगी तिलक ने कागज हाथ में लिया और जेब के हवाले कर दिया। थोड़ी ही देर में कार्यक्रम फिर यथावत चलने लगा। ऐसा लगा मानो उनके साथ कोई घटना ही न घटी हो।


सूक्ष्म जगत का प्रत्यक्षीकरण अतीन्द्रिय ज्ञान से

जो कुछ हम आँखों से देखते हैं क्या वह सब सत्य है? जो इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है क्या वह यथार्थ है? इस प्रश्न पर तात्विक दृष्टि से विवेचन करने पर पता चलता है कि इन्द्रियाँ बहुत हद तक स्वयं धोखे में रहती हैं और हमारी अन्तः चेतना को धोखे में डालती हैं। इस धोखेबाजी से भरे हुए कुहरे को ही माया कहा गया है।

सत्य का निरूपण करने के लिये-वस्तु स्थिति को जानने के लिये एक दूसरा माध्यम अपने पास है उसे छठवीं इन्द्रिय कहना चाहिए। विवेक, दूरदर्शिता, तत्व बोध है वह आधार है जो हमें वास्तविकता के निकट पहुँचा सकता है और उस यथार्थता से अवगत होकर हम सही जीवन नीति अपनाने में समर्थ हो सकते हैं।

प्रत्यक्षवाद की इन दिनों बहुत धूम है। जो सामने है जो देखा समझा जा सकता है उसी को स्वीकार किया जाय, यह आज की माँग है। पर देखना यह भी है कि जो कुछ सामने है-प्रत्यक्ष है, दीखता है, वह सही भी है या नहीं, यदि आंखें ही धोखा दे रही हैं, अनुभूति कराने वाले यंत्र ही गड़बड़ी पैदा कर रहे हों, तो फिर जिस प्रत्यक्ष पर विश्वास करने के लिये कहा जा रहा है, उसकी यथार्थता की बात कैसे बनेगी? और जबकि परिस्थितियों ने अपनी जानकारी को ही भ्रमित कर रखा है तब उस आधार पर मिले हुये ज्ञान को यथार्थ कैसे माना जायगा?

सत्य को कसौटी पर कसा जाना चाहिये। अन्ध विश्वास का अनुगामी नहीं होना चाहिए। यह कहना ठीक है। बुद्धि रहते हुए अबुद्धिमत्तापूर्ण मान्यताओं को क्यों अपनाया जाये जब यथार्थता जानने के कितने ही साधन अपने पास मौजूद हैं तो बिना जाँच पड़ताल किये किसी बात को क्यों माना जाय? यह कथन उचित है। सत्य और असत्य को विलग करने के लिये परीक्षात्मक विश्लेषण से ही काम लेना पड़ेगा। बिना जाने परखे दन्त कथाओं पर क्यों विश्वास किया जाय। किम्वदन्तियों को सत्य क्यों माना जाय? बुद्धिवादी क्षेत्र का यह कथन उचित है। सत्य की समीक्षा होनी ही चाहिए। यथार्थता की परखने में कोई हर्ज नहीं।

किन्तु यहाँ इस तथ्य का भी ध्यान रखना पड़ेगा कि जिस थर्मामीटर से बुखार नापा जाता है कहीं वही तो खराब नहीं पड़ा हुआ है। खराब थर्मामीटर उग्र बुखार को न्यून अथवा न्यून तापमान को उग्र बता सकता है। उस भ्रान्त उपकरण को सही मानकर यदि उपचार आरम्भ कर दिया जाय तो रोगी के लिए प्राण संकट ही खड़ा हो जायगा। चिकित्सक के लिए उचित है रोगी का निदान करने से पूर्व यह देखें कि उसके थर्मामीटर स्टेथिस्कोप, आदि यंत्र सही हैं या नहीं, यदि वे सही न हों तो फिर उनका आश्रय लेकर ऐसे माध्यम अपनाने चाहिए जो रोगी की वस्तुस्थिति प्रकट कर सकने में समर्थ हों।

परोक्ष जीवन, सूक्ष्म जगत, आत्मा, ईश्वर, आत्म-बल आदि अध्यात्म क्षेत्र की अति प्रचण्ड सत्ताएं यदि आँखों से नहीं देखी जा सकती और इन्द्रियों से अनुभव नहीं की सकतीं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उन दिव्य तत्वों का अस्तित्व ही नहीं है। उन्हें जानने समझने के लिए हमारे पास दूरदर्शी विवेक, आन्तरिक अनुभूति और सूक्ष्म दर्शन के अन्य माध्यम मौजूद हैं। उनके द्वारा सारा अतीन्द्रिय जगत प्रत्यक्ष हो सकता है और उस शक्तिशाली सत्ता की यथार्थता को समझा जा सकता है जो आँखों से भले ही न देख जा सके पर दृश्य जगत की भाँति ही जिसका अस्तित्व मौजूद है।

स्थूल जगत का स्वरूप समझने के लिए मोटे तौर पर इन्द्रिय ज्ञान का सहारा लिया जाता है। सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का उपयोग भी इन्द्रियाँ ही करती हैं। इस दृश्यमान की जानकारी मस्तिष्क को इन्द्रियों द्वारा मिलती है। वह उसका स्वरूप निर्माण करता है। मोटे तौर पर यथार्थता की परख यही है। पर यह प्रणाली सही नहीं है। दृश्य जगत की यथार्थता जानने में ही आंखें बराबर धोखा खाती रहती हैं, और मस्तिष्क पग-पग पर भ्रम में पड़ता है।

यदि इसी आधार पर हम सत्य का निरूपण करने चलें तो प्रत्यक्ष जगत के बारे में भी सही निष्कर्ष निकाल सकना संभव नहीं, फिर अदृश्य जगत की तो बात ही क्या है। वह अतीन्द्रिय है। इन्द्रियों की पहुँच, उसका विश्लेषण, निरूपण कर सकने में समर्थ नहीं। उसके लिए तत्व दृष्टि को विकसित करने की आवश्यकता है। वह अपने भीतर प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। यदि उस दिव्य दर्शन की विवेक सम्मत क्षमता को विकसित कर लिया जाय तो परोक्ष जीवन एवं सूक्ष्म जगत को भी प्रत्यक्ष की तरह ही देखा, समझा और अनुभव किया जा सकता है।

इन्द्रियों से आँखों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे बहुत ही भोंड़े और अधूरे होते हैं, उनको सच मानकर चला जाय तो हमारी दुर्गति ही हो सकती है मृग मरीचिका का उदाहरण पुराना है। ऊसर क्षेत्र में जमीन का नमक उभर कर ऊपर आ जाता है। रात की चाँदनी में वह पानी से भरे तालाब जैसा लगता है। प्यासा मृग अपनी तृषा बुझाने के लिये वहाँ पहुँचता है और अपनी आँखों के भ्रम पर पछताता हुआ निराश वापिस लौटता है। इन्द्र धनुष दीखता तो है पर उसे पकड़ने के लिये लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। जल बिन्दुओं पर सूर्य की किरणों की चमक ही आँखों पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालती है और हमें इन्द्रधनुष दिखाई पड़ता है, उसका भौतिक अस्तित्व कहीं नहीं होता।

सिनेमा को ही लीजिये। पर्दे पर तस्वीर चलती-फिरती, बोलती, रोती-हँसती दीखती है। असंभव जैसे जादुई दृश्य सामने आते हैं। क्या वह सारा दृश्यमान सत्य है। प्रति सेकेंड सोलह की गति से घूमने वाली अलग-अलग तस्वीरें हमारी आँखों की पकड़ परिधि से आगे निकल जाती हैं फलतः दृष्टि भ्रम उत्पन्न हो जाता है। स्थिर तस्वीरें चलती हुई मालूम पड़ती हैं। लाउडस्पीकर से शब्द अलग जगह निकलते हैं और तस्वीरें अलग जगह चलती हैं पर आँख कान इसी धोखे में रहते हैं कि तस्वीरों के मुँह से ही यह उच्चारण या गायन निकल रहे हैं।

प्रातः कालीन ऊषा और सायंकालीन सूर्यास्त के समय आकाश में जो रंग-बिरंगा वातावरण छाया रहता है क्या वह यथार्थ है? वस्तुतः वहाँ कोई रंग नहीं होता यह प्रकाश किरणों के उतार चढ़ाव की दृष्टि संस्थान के साथ आँख मिचौनी ही है। आसमान नीला दिखता है पर वस्तुतः उसका कोई रंग नहीं है पोल का रंग हो भी कैसे सकता है? आसमान को नीला बताकर हमारी आँखें धोखा खाती हैं और मस्तिष्क को भ्रमित करती हैं।

आँखों का काम मुख्य तया प्रकाश के आधार पर वस्तुओं का स्वरूप समझना है। पर देखा जाता है कि उनकी आधी से ज्यादा जानकारी अवास्तविक होती है। कुछ उदाहरण देखिए। कारखानों की चिमनियों से धुआँ निकलता रहता है। गौर करके उसका रंग देखिए वह अन्तर कई तरह का दिखाई देता रहता है। जब चिमनी की जड़ में पेड़, मकान आदि अप्रकाशित वस्तुएं हों तो धुआँ काला दिखाई देगा पर यदि नीचे सूर्य का प्रकाश चमक रहा होगा तो वही धुआँ भूरे रंग का दीखने लगेगा। लकड़ी, कोयला अथवा तेल जलने पर प्रकाश के प्रभाव से यह धुआँ पीलापन लिये हुए दीखता है। वस्तुतः धुँए का कोई रंग नहीं होता। वह कार्बन की सूक्ष्म कणिकाओं अथवा तारकोल सदृश्य द्रव पदार्थों की बूँदों से बना होता है। इनसे टकरा कर प्रकाश लौट जाता है और वे अँधेरी काले रंग की प्रतीत होती हैं।

प्रकाश के रंग बिरंगे दृश्य का तमाशा प्रयोगशाला में देखा जा सकता है। धूल कणों से मुक्त ‘वेंजनी’ द्रव को काँच के बरतन में रखिये। आतिशी शीशे से सूर्य की किरणें इस पर केन्द्रित कीजिए। आपालो किरणों को लम्बवत दिशा में इसे देखिए। द्रव के भीतर हलके नीले रंग का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।

काँच के बर्तन में हाइपोसल्फाइट आफ सोडा का पतला घोल डालिए। उसमें गंधक के तेजाब की कुछ बूंदें टपका दीजिए ऊपर वाली प्रक्रिया की तरह देखिए। गहरे नीले रंग का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।

थोड़ा सा एलाइल आयोडाइड काँच की नली में डालिए उस पर प्रकाश केन्द्रित कीजिये। गैस बनेगी। पहले वह नीली सी होगी पीछे प्रकाश का प्रभाव बढ़ने से वह श्वेत दिखाई देगी।

रेल के इंजन में बाइलर की निकास नली से निकलती हुई भाप निकलते समय तो नीली होती है पर थोड़ा ऊपर उठते ही संघतित हो जाने पर भाप के कणों का आकार बढ़ जाता है और वह श्वेत दिखाई देने लगती है।

जिन फैक्ट्रियों में घटिया कोयला जलता है उनका धुआँ गहरा काला होता है और यदि उसमें से आर-पार सूर्य को देखा जाय तो सूर्य गहरे लाल रंग का दिखाई देगा।

पानी के भीतर अगणित जीव-जन्तु विद्यमान रहते हैं पर खुली आँखों से उन्हें देख सकना संभव नहीं, माइक्रोस्कोप की सहायता से ही उन्हें देखा जा सकता है। आकाश में जितने तारे खुली आँखों से दिखाई पड़ते है उतने ही नहीं हैं। देखने की क्षमता से आगे भी अगणित तारे हैं जो विद्यमान रहते हुए भी आँखों के लिए अदृश्य ही हैं बढ़िया दूरबीनों से उन्हें देखा जाय तो दृश्य तारागणों की अपेक्षा लगभग दस गुने अदृश्य तारे दृष्टिगोचर होंगे।

परमाणु अणु की सत्ता को दूर सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से भी उसके यथार्थ रूप में देख सकना अभी भी संभव नहीं है। उसके अधिक स्थूल कलेवर की गणित के अध्यात्म पर विवेचना करके परमाणु और उसके अंग प्रत्यंगों का स्वरूप निर्धारण किया गया है। अणु संरचना के स्पष्टीकरण में जितनी सहायता उपकरणों ने की है उससे कहीं अधिक निष्कर्ष अनुमान पर निर्धारित गणित परक आधार पर निकाला जाना संभव हुआ है।

यथार्थता की तह तक पहुँचने के लिए सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए हमें परख के आधार को अधिक विस्तृत करना पड़ेगा। इन्द्रिय जन्य ज्ञान को ही सब कुछ मान बैठना भूल है। जो भौतिक प्रयोगशाला से प्रत्यक्ष हो सके वह सही है ऐसी बात भी तो नहीं है। ऊपर प्रकाश की आँख मिचौनी से रंगों की गलत अनुभूति होने की चर्चा की गई है। सत्य तक पहुँचने के लिए इन्हीं भोंडे उपकरणों को परिपूर्ण मानकर चलेंगे तो अन्धकार में ही भटकते रहना पड़ेगा। किम्वदन्तियों और दन्तकथाओं के प्रतिपादनों से मुक्ति पाने के प्रयास में यदि इन्द्रिय ज्ञान की भोंड़ी भूल-भुलैयों में भटक पड़े तो केवल पिंजड़ा बदला भर हुआ। स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही।

भौतिक जगत में भी हमें यथार्थ की तह तक पहुँचने के लिए विवेक का सहारा लेना पड़ता है और सूक्ष्म विवेचना को प्रमाण मानना होता है। अध्यात्म जगत यदि आँखों से दिखाई नहीं पड़ता, ईश्वर और आत्मा की, परोक्ष जीवन की अनुभूति इन्द्रियों से नहीं होती तो यह नहीं मान बैठना चाहिए कि उनका अस्तित्व ही नहीं है। प्रत्यक्ष की परिधि हमें चौड़ी करनी चाहिए। इसमें अतीन्द्रिय ज्ञान को भी सम्मिलित करना चाहिए। विवेक शीलता, ऋतम्भरा प्रत्यक्ष तत्व दृष्टि, योग भूमिका जैसे आधार ही अदृश्य जगत की प्रामाणिकता सिद्ध कर सकते हैं। अध्यात्म प्रयोगों से उत्पन्न चमत्कारी निष्कर्षों को परख कर भी उसके अस्तित्व को समझने में सहायता मिल सकती है।


Quotation

जो सत्य को केवल बुद्धि से समझना चाहता है, वह अनेक बार असत्यों के इन्द्रजाल में फँस जाता है। सत्य सुन्दर है, किन्तु असत्य जब सत्य का रूप रखकर सम्मुख आता है तो और भी आकर्षक दीखता है। जो स्वभावतः सुन्दर होता है वह सामान्यतः सुन्दर लगता है किन्तु जब किसी को रिझाने के लिये सजगता पूर्वक सोलह शृंगार किये जाते हैं, तब उसकी प्रतिक्रिया का तीव्र होना स्वाभाविक है। लोग उस सौंदर्य रूप जाल में फँस ही जाते है, किन्तु असत्य छलने के मन्तव्य से अपने स्वरूप को नख से सिख तक सजा कर ही आता है।

केवल बुद्धि के बल पर सत्यासत्य की परख करने में प्रवंचना की शंका रहती है। सत्य बुद्धि से परखने की नहीं, जीवन में अनुभव करने की वस्तु है। जीवन में अनुभूत किया हुआ सत्य ही वास्तविक सत्य है, शेष असत्य भी हो सकते हैं।


हमारा जीवन असीम पर निर्भर है।

छोटी परिधि में जीवन यापन की कल्पना अवास्तविक है। कोई सोचता भर रहे कि हम छोटे से घर परिवार में रहकर-दो चार रोटी खाकर जरा सी आवश्यकताएं पूरी करते हुए सरल-सा छोटा-सा स्वावलम्बी जीवन जीते हैं। पर यह मान्यता थोड़ी सी अधिक गहराई में उतर कर विचार करने से गलत सिद्ध होती है। हम अत्यधिक विशाल परिवार के सदस्य हैं। और हमारी आवश्यकताएं इतनी अधिक और इतनी मूल्यवान हैं कि उनके साधन जुटाने के लिए अति दूरवर्ती ग्रह-नक्षत्रों को अपनी क्षमता का एक महत्वपूर्ण अंश भेजना पड़ता है। यदि वह अनुदान न मिलें तो हमें उतना अभाव-ग्रस्त रहना पड़े कि जीवन को धारण किये रहना भी न बन पड़े।

अन्न, जल और वायु पर हमारा त्रिविधि आहार निर्भर है। मोटे-तौर पर अन्न खेत में, जल कुँए में और हवा, आकाश में विद्यमान दीखती है। हवा अनायास ही मिलती रहती है, जल थोड़े पैसा खर्च करने या कृषि क्रिया करने से मिल जाता है। पर इन तीनों की उत्पत्ति का मूल कारण जो परमाणु हैं उनकी गतिशीलता अदृश्य रेडियो तरंगों पर निर्भर रहती है। यदि वे तरंगें पृथ्वी पर उचित मात्रा में उपलब्ध न हों तो परमाणुओं की जीवन निर्मात्री गतिशीलता समाप्त हो जाय और अन्न, जल, वायु तीनों ही इस रूप में न रह सकें, जिस रूप में इस समय मिलते हैं। तब आधार-विहीन जीवन की स्थिरता भी न रहेगी। मनुष्य तो क्या पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं का भी जीवन सम्भव न हो और वृक्ष वनस्पतियों का स्वरूप यदि बन भी गया तो वह वर्तमान स्वरूप से सर्वथा भिन्न अत्यन्त भोंडे और विकृत रूप में ही शेष रहेगा। उस स्थिति में पृथ्वी धीरे-धीरे अन्य ग्रहों की तरह निर्जीव होती चली जायगी।

धरती पर जीवनोपयोगी परिस्थितियों का आधार जिन रासायनिक हलचलों और आणविक गतिविधियों पर निर्भर है; वे अन्तरिक्ष से आने वाली रेडियो तरंगों पर अवलम्बित हैं। शक्ति के स्रोत उन्हीं में हैं। विविध विधि हलचलों की अधिष्ठात्री इन्हीं को कहना चाहिए। हमारा परिवार-हमारा शरीर हमारा अस्तित्व सब कुछ प्रकारान्तर से इन रेडियो तरंगों पर निर्भर है जिन्हें हम आत्मा की तरह जानते भले ही नहीं पर निश्चित रूप से अवलम्बित उन्हीं पर है। जीवन लगता भर अपना है पर उसमें समाविष्ट प्राण इसी अदृश्य सत्ता पर निर्भर हैं जिन्हें विज्ञान की भाषा में रेडियो तरंग पुञ्ज कहते हैं।

चेतन जगत में जिस तरह ब्रह्म की सत्ता व्याप्त है उसी तरह पदार्थों के अस्तित्व और क्रिया-कलाप में इन रेडियो तरंगों की सत्ता प्राण की तरह समाई हुई है।

यह तरंगें कहाँ से आती हैं? क्या यह धरती की अपनी सम्पत्ति या उपज है? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान इस रूप में देता है कि धरती के पास जो जीवन सम्पदा है वह पूरी की पूरी उधार ली हुई है। सूर्य की ऊर्जा धरती पर एक संतुलित मात्रा में बिखरती है। रोशनी और गर्मी के रूप में उसे हम अनुभव करते हैं, अप्रत्यक्ष रूप से उसमें जीवन तत्व भी सम्मिलित हैं। सूर्य यदि न हो अधिक दूर या अधिक पास हो तो फिर पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह किसी प्राणधारी के निवास के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बन जायगी। सूर्य की ऊर्जा को बहुत बड़ा श्रेय इस धरती को जीवन प्रदान करने का है।

सूर्य से उपलब्ध होने वाली ऊर्जा जिस रूप में पृथ्वी पर आती है वह भी अकेले सूर्य की सम्पत्ति नहीं है उसे साथ में अन्य ग्रह तारकों का अनुदान भी मिला जुला होता है। रेडियो तरंगों का अति महत्वपूर्ण भाग-तो सूर्य की अपेक्षा अन्य ग्रहों से ही अधिक आता है। पृथ्वी पर विद्यमान रेडियो शक्ति का स्रोत तलाश करने पर उसका उद्गम अति दूरवर्ती क्वासर तारकों में और अति निकटवर्ती ‘पल्सर’ पिण्डों से आता है। यदि उनका अनुदान बन्द हो जाय तो फिर यहाँ सब कुछ सुनसान ही दिखाई पड़ने लगे और वह अन्न, जल, वायु भी उपलब्ध न हो जिसे हम तुच्छ और स्वल्प श्रम साध्य समझते हैं। यह वस्तुयें सस्ती कितनी ही हों पर उनकी उत्पादक क्षमता उन दूरवर्ती अति कृपालु पिण्डों की उदारता पर निर्भर है जिनके बारे में हम कुछ भी नहीं जानते।

इस संसार में प्रचुर मात्रा में रेडियो तरंगें बरसाते ‘क्वासर’ तारक हमारी पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी पर हैं इनकी खोज डच खगोल विज्ञानी मार्टिन स्मिड में नामक व्यक्ति ने की कैलीफोर्निया के पालोयर शिखर पर लगी 200 इंच व्यास वाली विशालकाय दूरबीन के आधार पर लम्बे समय तक अनुसन्धान करते रहने पर वह इन तारकों का पता लगाने में समर्थ हुआ।

क्वासर का प्रकाश पृथ्वी तक आने में 10 करोड़ प्रकाश वर्ष लगते हैं। दूरबीनों ने जो कुछ इन तारों के बारे में दिखाया है वह 10 करोड़ वर्ष पुराना दृश्य है हो, सकता है कि इस बीच वे नष्ट भी हो गये हों और प्रकाश किरणें, उस समय से चलती रहकर अब कहीं धरती तक आ पहुँची हों।

सन् 60 में अत्यन्त तीव्र रेडियो तरंगें प्रसारित करने वाले चार तारे देखे गये। यों इनका प्रकाश क्षीण था पर रेडियो तरंगों का प्रसारण अत्यधिक था। पहचानने के बाद उनका नाम क्वासी स्टेलर सोर्सेज (क्वासर) रखा गया।

रेडियो टेलिस्कोप-एक्सरे टेलिस्कोप प्रभृति शक्तिशाली यन्त्रों से क्वासर नक्षत्रों के द्वारा पृथ्वी पर आने वाले प्रभावों को जाना गया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि ईथर में संव्याप्त रेडियो तरंगों की प्रस्तुत क्षमता को बहुत बड़ा अनुदान इन क्वासर तारकों से मिलता है।

क्वासर हमसे बहुत दूर हैं और इतनी अधिक तेजी के साथ हमसे दूर हट रहे हैं जिसे अकल्पनीय ही कहना चाहिए। क्वासर तारकों में से एक तो 28000 मील प्रति सैकिण्ड के हिसाब से हमारी आकाश, गंगा को छोड़कर शून्य आकाश में दौड़ता चला जा रहा है। इन दूरवर्ती क्वासरों के अतिरिक्त इसी प्रयोजन में सहायक निकटवर्ती पल्सर पिण्ड भी हैं। रेडियो किरणें उनसे भी हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं।

आकाश में छोटे-छोटे कितने ही पिण्ड छितरे पड़े हैं। इन्हें ‘पल्सर’ नाम से जाना जाता है। इनका व्यास प्रायः 10 मील का पाया गया है। अब तक इनकी संख्या 37 खोजी जा चुकी है। और भी रेडियो दूरबीनों की पकड़ में आने वाले हैं। यह सर्वथा सुनिश्चित अवधि के अन्तर से अति तीव्र रेडियो तरंगें छोड़ते हैं। इस अन्तर को एक सैकिण्ड के तीसवें भाग से लेकर 3 सैकिण्ड तक का पाया गया है। इस अन्तर को ‘बीच-बीच’ की ध्वनि के साथ सुना जाता है। पहले अनुमान था कि किसी अन्य ग्रह के प्राणी एक निर्धारित क्रम प्रक्रिया के साथ टेलीग्राम की डैमी से निकलने वाले ‘गरगट्ट’ प्रवाह की तरह कुछ संदेश संकेत भेज रहे हैं। इस संदर्भ में भी बहुत खोज हुई, पीछे यह निष्कर्ष निकला कि पल्सर जितने छोटे हैं उतने ही तीव्र रेडियो तरंगों के संचारक भी। पृथ्वी पर फैली हुई रेडियो क्षमता की समर्थता में इनका भी बड़ा हाथ है।

सन् 1054 में एक अति भयंकर तारा विस्फोट हुआ। क्रैव नीहारिका के मध्य में हुए इस विस्फोट का जिसका प्रकाश आकाश के सुदूर क्षेत्र में भारी चमक के रूप में देखा गया। उसका अवशेष-सुपर नोवा के रूप में अभी भी मौजूद है। पल्सर उसी के मलबे से बने हैं और वे प्रकाश ही नहीं गामा किरणें और एक्स किरणें भी बड़ी मात्रा में धरती पर भेज रहे हैं। देवज्ञ किप थार्न ने इन्हें भीमकाय आकाशी लट्टू बताया है।

एकाकी जीवन की कल्पना व्यर्थ है। वस्तुतः हम अत्यन्त विशालकाय ब्रह्माण्ड के एक तुच्छ से घटक हैं। जीवन के उद्भव से लेकर उसे गतिशील रखने वाले साधनों के लिए न केवल पृथ्वी पर फैले मनुष्य जानवरों और वनस्पतियों पर निर्भर रहना पड़ता है वरन् अन्तरिक्ष के सुदूर निवासी ग्रह पिण्ड भी हमारी जीवन यात्रा के आधार हैं।

न हम क्षुद्र हैं न हमारा जीवन छोटा है। यह छोटा कुछ नहीं जो कुछ है सो विराट् और विशाल ही है। हमें अपने को विराट मानना चाहिए और विशाल दृष्टिकोण रखते हुए विश्व नागरिक का कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व को समझना चाहिए। क्षुद्रता नहीं विशालता ही हमारी वास्तविकता है।


दिव्य दृष्टि का संचार स्रोत-तृतीय नेत्र आज्ञाचक्र

संसार में अभी तक ऐसा फोटो कैमरा नहीं बना जो टैकनीकलर, विस्टा विजन और थ्री0डी0 के टेक्नोलॉजी युक्त हो। शत-प्रतिशत साफ फोटो खींचता हो। जिसमें फोटोग्राफर की आवश्यकता न हो और फिल्मप्लेट आदि लगाने का झंझट न हो। ऐसा कैमरा बनना तो दूर किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में इस तरह की सम्भावना की कल्पना भी अभी तक नहीं आई है। यदि कोई सोचने भी लगे तो इन सारी सुविधाओं से सम्पन्न किसी विशालकाय तन्त्र की ही कल्पना की जा सकती है। इतने उपकरण होते हुए भी उसका साइज एक इञ्च जितना छोटा है। उसे तो सर्वथा अंश रूप ही कहना चाहिए।

यान्त्रिक जगत में ऐसा फोटो यन्त्र भले ही न बना हो, भले ही उसकी सम्भावना अशक्य मानी जाय पर ऐसा कैमरा अपने पास मौजूद है और उसका उपयोग जन्मकाल से ही हम लोग कर रहे हैं-यह जादू जैसा फोटो यन्त्र है-’नेत्र’।

हमारे नेत्र बहुत ही सम्वेदनशील और सक्रिय हैं। अपने पलक एक मिनट में प्रायः तीस सैकिण्ड बन्द रहते हैं और लगभग उतनी ही देर खुले रहते हैं। यह क्रियाकलाप निरन्तर अनायास ही चलता रहता है पर आश्चर्य यह है कि हमें इसका पता तक नहीं चलता। यों आंखें गर्भस्थ शिशु के पाँच महीने में ही बन कर तैयार हो जाती हैं और उनकी वृद्धि का क्रम छः वर्ष की आयु तक चलता रहता है। फिर भी उससे संबंधित मस्तिष्कीय संस्थानों के विकास में 26 वर्ष लग जाते हैं। दृष्टि संबंधी प्रखरता एवं परिपक्वता का क्रम पूरा होने में प्रायः 25 वर्ष लग जाते हैं। इससे पूर्व उसकी आकृति ठीक बन जाने पर भी मानसिक केन्द्र में कुछ न्यूनता ही बनी रहती है।

पलकों के निचले भाग में से एक प्रकार का अश्रु जल स्रवित होता रहता है, यह नेत्र गोलकों पर पड़ने वाली धूलि आदि साफ करता रहता है। वर्षा के दिनों में मोटर ड्राइवर के सामने वाले शीशे पर जमने वाली बूँदों को जिस प्रकार ‘विन्डशील्ड वाइपर’ साफ करता चलता है उसी प्रकार पलकें झपकने की क्रिया और यह अश्रुजल स्राव आँखों की निरन्तर सफाई करते रहते हैं। इस अश्रु जल में जीवाणु नाशक तत्व भी घुले रहते हैं जिनके कारण आँखों का शुद्धिकरण भी चलता रहता है।

आँखों की क्षमता प्रायः डेढ़ सौ प्रकार के रंग भेद पहचानने की है। उनकी बनावट अजीब है स्लोलाइट की तरह पारदर्शक, चमड़े की तरह मजबूत, रबड़ की तरह खिंचनी स्फटिक की तरह स्वच्छ और आजीवन काम देने वाली कभी न घिसने-टूटने वाली वस्तुओं से मिलकर आँखें बनी हैं। दूर दृष्टि और निकट दृष्टि की-प्रकाश के अनुरूप फैलने-सिकुड़ने की सभी विशेषतायें इस नेत्र कैमरे में विद्यमान हैं। बुढ़ापे में ‘कलर फिल्टर’ के तन्तु घिस आने से नीले और काले रंग को पहचानने की क्षमता घटती जाती है। आँख के दृश्य कलेवर से लेकर मस्तिष्क के दृष्टि संस्थान तक की लम्बाई जरा सी है पर उतने से ही गह्वर में प्रायः 13 करोड़ 70 लाख कोष होते हैं। प्रकाश की प्रतिक्रिया को यही तन्तु ग्रहण करते हैं।

आँखों के पीछे का गड्ढा जिसे ‘फोबिया’ कहते हैं। बारीक चीजें देखने के काम आता है यह नेत्र संस्थान दूषण रहित हों तो एक इञ्च के दस हजारवें भाग को भी ठीक तरह देखा और पहचाना जा सकता है।

आँखें देखती जरूर हैं पर उसका निष्कर्ष और प्रभाव स्पष्ट करने वाला संस्थान मस्तिष्क के पिछले भाग में स्थित है। टेलीफोन पद्धति में ‘क्रास टाक’ जैसी प्रक्रिया ही नेत्र संस्थान पर होती है और उसी से देखने की प्रक्रिया ठीक तरह अपना काम कर पाती है। मस्तिष्कीय दृष्टि संस्थान में सन्निहित कोषों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। यह कोष बाह्य जगत के लाल हरे और नीले रंगों से प्रभावित होते हैं इन्हीं कारणों से रंगों के उतार-चढ़ाव एवं सम्मिश्रण से बनने वाले अगणित रंग हमें परिलक्षित होते हैं। मस्तिष्क ज्ञान का 85 प्रतिशत भाग इन्हीं नेत्र गोलकों द्वारा उपलब्ध एवं विकसित होता है।

आँखों की स्थूल शक्ति की भी अपनी महत्ता है। आँखें न रहने पर संसार में सर्वत्र जब घोर अन्धकार ही शेष रह जाता है, उस स्थिति की कल्पना करें तो प्रतीत होगा कि नेत्र ज्योति मानव जीवन की कितनी बड़ी आवश्यकता है। पर इससे भी बढ़कर है हमारी सूक्ष्म दृष्टि जो उस अदृश्य जगत को दृश्यमान करती है जो चर्म चक्षुओं की पकड़ से बाहर है।

यह नहीं समझना चाहिए कि प्रकाश के माध्यम से हमारी आँखें जो देख पाती हैं, उतना ही दृष्टि क्षेत्र है। वस्तुतः प्रकाश का सूक्ष्म स्वरूप ऐसा भी है जो हमारी नेत्र सीमा से बाहर रहते हुए भी संसार में विद्यमान है और उसे भी देखा- समझा जा सके तो हम समस्त विश्व को अपने दृष्टि क्षेत्र में ले सकते हैं। तब ‘दूरदर्शी’ शब्द मात्र समझदार लोगों के-आगे की बात सोचने वालों के लिए ही लागू न होगा वरन् सचमुच हम उस स्थिति में पहुँच जायेंगे कि दूर की-अति दूर की-समस्त संसार की घटनाओं को देख सकें।

राडार यन्त्र में यही होता है वह प्रकाश किरणों से अधिक सूक्ष्म रेडियो किरणों के आधार पर दूरवर्ती वस्तुओं को उनकी हलचलों को देख सकता है। टेलीविजन पर दूरवर्ती दृश्य हमारे सामने छाया रूप में प्रस्तुत होते हैं, उसी से मिलता जुलता पर दूसरे सिद्धान्त पर आधारित राडार उपकरण है। दूरदर्शन में हमें टेलीविजन की तरह वह भी सहायता पहुँचाता है।

राडार एक प्रकार की वैज्ञानिक आँख है जो प्रकाश तरंगों की अपेक्षा रेडियो तरंगों के माध्यम से देखने का प्रयोजन पूरा करती हैं। राडार-शब्द-रेडियो डिटेक्शन एंड रेंजिंग का संक्षिप्तीकरण है।

हमारी आँखें किसी वस्तु को तभी देख पाती हैं जब प्रकाश की किरणें उससे टकराकर परावर्तित होती हैं। अँधेरे में न देखने का कारण यही है कि प्रकाश के अभाव में उसकी किरणें वस्तुओं पर पड़ती ही नहीं तो फिर वे परावर्तित होकर आँखों तक लौटेंगी ही कैसे? आँखों में स्वयं तो इतनी शक्ति है नहीं कि वे किसी वस्तु को प्रकाशवान बना सकें।

राडार को जादुई आँख कह सकते हैं। जिसमें देखने की ही नहीं वस्तुओं को प्रकाशित करने की भी क्षमता है। राडार के एन्टीना में एक ऐसा ट्रान्समीटर लगा होता है जो वस्तुओं को प्रकाशवान बनाता है। साथ ही एक ऐसा रिसीवर भी लगा होता है जो प्रकाशित वस्तु से टकराकर लौटने वाली किरणों को ग्रहण कर सके।

यहाँ यह जान लेना चाहिए कि राडार द्वारा फेंका हुआ प्रकाश सूर्य या बिजली के प्रकाश जैसा चमकीला नहीं होता न वह खुली आँखों से दिखाई पड़ता है। इसे वस्तुतः प्रकाश नहीं रेडियो कम्पन कहना चाहिए। प्रकाश किरणों की तरह रेडियो किरणें भी होती हैं पर वे चमकीली न होने के कारण आँखों को दिखाई नहीं पड़ती। अन्य बातों में दोनों समान हैं।

रात में सामने से मोटर आ रही हो तो उसके प्रकाश से सामने वाले ड्राइवर की आंखें चौंधियाने का खतरा रहता है। तेज रोशनी की ओर कुछ देर देखा जाय तो भी आँखें चौंधिया जाती हैं और उनका दीखना बन्द हो जाता है। इसके लिए लगातार देखना रोकना पड़ता है। या तो पलक झपक कर-या रोशनी को जलाते-बुझाते रहकर यह व्यवस्था करनी पड़ती है कि लगातार देखने का सिलसिला न चले। ठीक यही बात रेडार में होती है। रेडियो तरंगें भेजने और ग्रहण करने के बीच थोड़ा सा व्यवधान रखना पड़ता है। यह सिलसिला चालू रखकर दूरवर्ती वस्तुओं को देख सकना राडार के लिए सम्भव होता है।

रेडियो तरंगों की चाल भी लगभग उतनी ही है जितनी कि प्रकाश किरणों की होती है। एक सैकिण्ड में 3 लाख किलोमीटर तक की होती है। इतनी दूरी तक रेडियो किरणों के जाने और वापिस लौटने में एक सैकिण्ड के दस लाखवें भाग जितना समय लगता है। यह अत्यधिक स्वल्प समय है। इस अवधि में भी विराम की व्यवस्था करना कठिन प्रतीत होता है। फिर भी वैज्ञानिकों ने इसके लिए उपकरण बना लिये हैं। रेजोनेन्ट, ट्रान्सफार्मर, इम्पीडेन्स, इंवर्टर और स्पार्क गैपों का समन्वय करके एक विचित्र प्रकार का ड्यप्लेकसर विनिर्मित किया गया है, जो स्वल्प समय में भी प्रेषण ग्रहण के बीच व्यवधान रखे जाने की व्यवस्था पूरी करता रहता है।

रेडियो किरणें जिस वस्तु से टकरा कर जितनी देर में लौटती है, उस समय गणना के आधार पर यह जाना जाता है कि अभीष्ट वस्तु कितनी दूरी पर है और उसकी आकृति किस प्रकार की है। यन्त्र में रहने वाली ‘ए-स्कोप’ प्रक्रिया वस्तु की दूरी का ठीक निर्धारण कर देती है। इन दिनों पुरानी पद्धति में और भी सुधार हुए हैं। सूक्ष्म तरंगों का प्रयोग करने वाले ‘केलैस्ट्रीन’ एवं कैवटी मैग्नेट्रोन यन्त्र अब हर बात को और भी अच्छी तरह अंकित करने लगे हैं।

रेडियो तरंगें बादल, धुआँ, कुहरा, अँधेरा सामने होने पर रुकती नहीं और वे निर्दिष्ट दिशा में बिना किसी अवरोध के बढ़ती चली जाती हैं। जबकि प्रकाश किरणें ऐसी रुकावट आने पर अवरुद्ध और कुण्ठित हो जाती हैं। राडार पद्धति में इसीलिए प्रकाश किरणों की अपेक्षा रेडियो तरंगों का उपयोग किया जाता है।

आकाश में उड़ने वाले जहाजों की दूरी दिशा तथा शकल यह राडार ठीक-ठीक बता देता है। आँधी तूफानों की परिधि तथा चाल का पता चल जाता है। आकाश के ग्रह नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन करने में उससे बड़ी सहायता मिलती है। बड़ी-बड़ी दूरबीनें जो देख नहीं पातीं उन्हें बता देना राडार के लिए सरल है। उल्कापात आदि के विवरण वे बराबर अंकित करते रहते हैं। ग्रह नक्षत्रों की दूरी तथा परिधि का अंकन भी इसी पद्धति से सम्भव हुआ है। शुक्र ग्रह तक रेडियो किरणें जाने और वापिस लौटने में लगभग 7 मिनट लगते हैं इसी आधार पर उसकी दूरी लगभग 2 करोड़ मील निश्चित की गई है।

हवाई जहाज आकाश में उड़ते हैं। अँधेरे और कुहरे में उन्हें रास्ते का पता कैसे लगे? उनमें लगे ‘वैठीगेटर’ इसी पद्धति से नगर, नदी, पर्वत, मैदान आदि को दिन की तरह देखते चलते हैं। पानी के जहाजों को भी यह पद्धति सामने के टापुओं, चट्टानों, जहाजों का विवरण बताती है। युद्ध के समय इनका बहुत उपयोग है। पनडुब्बियों की स्थिति का इसी आधार पर पता चलता है। प्रक्षेपणास्त्र फेंकते समय दूरस्थ वस्तु की सही जानकारी इसी यन्त्र से विदित होती है। द्वितीय महायुद्ध में जर्मन वायु आक्रमणों से ब्रिटेन को किसी प्रकार जिन्दा रख लेने का श्रेय इन्हीं यन्त्रों को है।

रेडियो तरंगें अनेक प्रकार की होती हैं। पर उनमें से रेडार उन ‘सुपर फ्रीक्वेन्सी’ वाली तरंगों का ही प्रयोग करता है जो अत्यधिक कम्पन वाली किन्तु ‘अल्पावधि की’ होती हैं। यह एक सीमा तक ही जाती है। कितनी दूरी तक उन्हें प्रयुक्त करना है इसकी सीमा इंडिकेटर में पहले से ही व्यवस्थित कर देनी पड़ती है। यह यन्त्रों की शक्ति और देखने की आवश्यकता के अनुरूप सीमा बन्धन किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि रेडियो तरंगों की सीमा इतनी ही है। यह तो उनका एक सीमा बन्धित विशेष प्रयोग है। उनकी ऊर्जा अनन्त दूरी तक


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परमात्मा की सुन्दर सृष्टि को व्यक्तिगत मानापमान, द्वेष और हिंसा से किसी को भी आलोड़ित करने का अधिकार नहीं है। -विशाख

चलती हुई-सब व्यवधानों को पार करती हुई-असीम तक चली जा सकती है।

दोनों भवों के मध्य भाग में जो बाल रहित खाली स्थान है उसे भृकुटि कहते हैं उसके नीचे अस्थि आवरण के उपरान्त एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि है। इसे ‘आज्ञा चक्र’ कहते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से उसका कार्य और प्रयोजन अभी पूरी तरह नहीं समझा जा सका पर आत्म विद्या के अन्वेषी इसके अति महत्वपूर्ण कार्य को बहुत पहले से ही जानते हैं। इसे तीसरा नेत्र या दिव्य नेत्र कहते हैं। दृव्य दृष्टि यहीं से निःसृत होती है।

भगवान शिव के चित्रों में प्रदर्शित यह एक तीसरा नेत्र इसी स्थान पर अंकित रहता है। कथा है कि इस तीसरे नेत्र को खोलने पर एक प्रचण्ड अग्नि ज्वाला निकली थी और उसी से कामदेव जलकर भस्म हो गया था। भगवती दुर्गा के चित्रों में भी यह तीसरा नेत्र इसी स्थान पर विद्यमान है। यह तीसरा नेत्र हर मनुष्य के शरीर में मौजूद है। प्रश्न केवल विकसित करने का है। सामान्यतया दो चर्म चक्षु ही काम करते हैं और उन्हीं से जीवन के साधारण काम-काज चलाये जाते रहते हैं।

यह तीसरा नेत्र-आज्ञाचक्र यदि विकसित किया जा सके तो उससे राडार, टेलीविजन और एक्सरे यन्त्रों के तीनों काम लिये जा सकते हैं। राडार, रेडियो किरणें फेंकता है और उनके वापिस लौटने से उस स्थान का विवरण प्राप्त करता है जिस स्थान पर वे किरणें टकराई थी। टेलीविजन से दूरगामी दृश्य दिखाई पड़ते हैं। संजय ने महाभारत का सारा दृश्य इसी पद्धति से देखा था और धृतराष्ट्र को पल-पल की विस्तृत खबरें देते रहने का कार्य-दायित्व भली प्रकार निबाहा था। एक्सरे से आवरण से ढकी वस्तुयें भी दीखती हैं। शरीर के भीतरी भागों के फोटो उसी से लिये जाते हैं और क्षयजन्य घाव, हड्डी टूटना, गोली छर्रा आदि का लगा होना उसी के द्वारा लिये हुए फोटो से जाना जाता है। किसी लकड़ी के बक्स में जेवर आदि रखें हो तो एक्सरे द्वारा उसके फोटो लेकर भीतर क्या है यह जाना जा सकता है। आज्ञाचक्र इन तीनों प्रयोजनों को भली प्रकार पूरा कर सकता है।

सुदूर क्षेत्रों के निवासी व्यक्तियों की परिस्थितियों तथा विभिन्न स्थानों में घटित होने वाली घटनाओं का विवरण आज्ञाचक्र बता सकता है। उससे वहाँ के दृश्य देखे जा सकते हैं जहाँ नेत्रों की पहुँच नहीं है। भूगर्भ में छिपे हुए रहस्य प्रकट हो सकते हैं और अन्तरिक्ष में जो सूक्ष्म क्रिया-कलाप अभी पक रहा है, निकट भविष्य में प्रत्यक्ष होने वाला है, उसका पूर्व रूप समझा जा सकता है। यह साँसारिक अगम्य ज्ञान की उपलब्धि हुई। इससे ऊपर आत्म सत्ता का-आत्म चेतना का-दैवी संकेतों का अभ्यास है। इसे देख सकना इतना अद्भुत और आकर्षक है कि उस स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति परा और अपरा प्रकृति के सारे रहस्यों से ही अवगत हो जाता है। तब यह स्थूल जगत के क्रिया कलापों के और बाल-क्रीड़ा में रचे हुए रेत बालू के घर मकानों जैसी स्थिति में पाता है। ईश्वरीय सत्ता, आत्मा की स्थिति, जीवन का स्वरूप, जन्म जन्मान्तरों की शृंखला, कर्त्तव्य पथ, लोक व्यवहार का आधार आदि महत्वपूर्ण आधार ही उसे वास्तविक लगते हैं। ऐसा दिव्य दर्शी मनुष्य बाल बुद्धि से प्रेरित ओछी रीति-नीति को त्याग कर अपनी गतिविधियों में उन तत्वों का समावेश करता है जो महामानवों के लिए उचित और उपयुक्त हैं।

तीसरे नेत्र के खोलने से जो विवेक बुद्धि जागृत होती है उससे काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे मृग मारीच अपने असली रूप में प्रकट हो जाते हैं और उन्हें नष्ट करने के लिये शिवजी के तीसरे नेत्र की तरह हर विवेकवान की दिव्य दृष्टि खुलती है। परिष्कृत दृष्टिकोण विकसित हो जाने के कारण उसके सोचने और करने का तरीका माया मोह ग्रस्त-अज्ञान अन्धकार में भटकने वाले लोगों से सर्वथा भिन्न होता है।

दो नेत्र प्रकृति ने दिये हैं, तीसरा नेत्र खोलने और दिव्य दृष्टि प्राप्त करने को आज्ञाचक्र साधना करना-दूरदर्शी विवेकवान का काम है। हमें इस परम पुरुषार्थ के लिए साहस जुटाना ही चाहिए।


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दिन ढलने लगा। व्यक्ति की परछाई लम्बी और लम्बी होने लगी। वह मन ही मन प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी। उसे लगा मानो आज बाजी मार ली हो। अभिमान के स्वर में परछाई ने व्यक्ति से कहा-’आज वह दिन भी आ गया जब तुम्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा। तुम जैसे थे वैसे ही बने रहे और मैं तुम्हारी होकर भी तुमसे कितनी बड़ी हो गई।

व्यक्ति ने हँसते हुए कहा-’पगली! सत्य और असत्य में यही तो अन्तर होता है। मूल सत्य में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। अपने मिथ्या स्वरूप को देख लो जो सदैव घटता बढ़ता रहता है।


आत्म बोध आन्तरिक कायाकल्प प्रत्यक्ष स्पर्श

‘मैं’ कौन हूँ, क्यों हूँ, किसका हूँ? यह प्रश्न ऐसे हैं जिनको उपेक्षित-बिना हल किया हुआ, छोड़ दिया जाय तो वह लापरवाही बहुत महंगी पड़ती है। जीवन का सारा आनन्द ही चला जाता है। आनन्द ही नहीं चला जाता, वरन् इस उलझी हुई गुत्थी में उलझकर मनुष्य ऐसी जिन्दगी जीने के लिए विवश होता है जिसे नीरस और भारभूत ही कहा जा सके।

पिछले अंक में उस मनःस्थिति का चित्रण किया गया है जिसमें अपने आपको शरीर मान लेने से साँसारिक सुख-दुख, हानि-लाभ, मान-अपमान किस तरह उद्विग्न उद्वेलित करते हैं और हर परिस्थिति, आशंका एवं असंतोष से भरी रहती है। जो कुछ उपार्जन किया था उसका हर्ष रत्ती भर होता है और उसके साथ जुड़ी हुई विषमताओं का चिन्तन पहाड़ भर। जिसमें हर्ष स्वल्प और विषाद अपरिमित हो ऐसी जिन्दगी जीकर कौन अपने आपको सौभाग्यशाली मानेगा?

किन्तु अपने संबंध में सही ढंग से सोचने की विधि हाथ लग जाय तो देखते-देखते जादू की तरह असन्तोष और उद्वेग की स्थिति सन्तोष और उल्लास से भर जाती है। आगे और पीछे जो अन्धकार दीख रहा है उसे प्रकाश में परिणत होते देर नहीं लगती। इसी स्थिति को आत्मज्ञान कहते हैं। इसे एक प्रकार का आन्तरिक काया-कल्प ही कहना चाहिए। सुना है कि किन्हीं दिव्य विधियों से वृद्ध और जीर्ण शरीर को नवयौवन की स्थिति में बदला जा सकना सम्भव है। उस विधि को काया-कल्प कहते हैं। शारीरिक काया-कल्प के उदाहरण और प्रयोग इन दिनों प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ते; पर आत्मिक काया-कल्प हर किसी के लिए सम्भव है। आज ही-अभी ही वह स्थिति प्राप्त की जा सकती है जिसके आधार पर गरीबी को अमीरी में-दुर्भाग्य को सौभाग्य में-शत्रुओं को मित्रों में आशंकाओं को-उल्लास में परिवर्तित किया जा सके। इस अन्धकार को प्रकाश में परिणत करने वाली प्रक्रिया को आत्म-बोध कहते हैं। यह आत्म-बोध कोई दैवी वरदान, जादू या चमत्कार नहीं है; सिर्फ उस मान्यता और श्रद्धा का नाम है जो अपने स्वरूप को सही रूप में समझने का अवसर देती है और इतनी सामर्थ्य प्रदान करती है कि पिछले ढर्रे को बदल कर नये सिरे से वस्तुस्थिति के अनुरूप सोचने और करने की पद्धति को अपनाया-कार्यान्वित किया जा सके।

आत्म-बोध-आत्मोत्थान-आत्म साक्षात्कार-जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। इससे बड़ी उपलब्धि इस मनुष्य के लिए और कोई दूसरी हो ही नहीं सकती। मैं क्या हूँ? कौन हूँ? किसलिये हूँ, इस तथ्य को समझ लेने के बाद यह भी अनुभूति होने लगती है कि उपकरण, औजार एवं पदार्थों का उपयोग, उपभोग-संबंध, स्नेह की सीमा कितनी रहनी चाहिए, इस सीमा का स्वरूप और निर्धारण जब भी जो भी कर लेगा वह दिव्य-जीवन जियेगा सुख शान्ति से ओत-प्रोत रहेगा और सर्वत्र धरती के देवताओं की तरह महामानवों की तरह हर किसी के अन्तरंग पर श्रद्धा भरा शासन करेगा।

मैं क्या हूँ? इस प्रश्न का उत्तर-शरीर हूँ, के रूप में ही हमारी अन्तः मान्यता देती है, सो परिवर्तनशील प्रकृति के साथ जुड़ी हुई परिवर्तनीय प्रतिक्रियाएं देह के साथ भी जुड़ी ही रहेंगी। संबंधित पदार्थ भी बदलेंगे ही और जिनके साथ स्नेह संबंध है उनमें भी भौतिक कारणों से अन्तर आवेगा ही। रात और दिन की तरह प्रिय-अप्रिय द्वन्द्वों का फेर चलता ही रहेगा और उसे भूल में क्षण-क्षण में प्रिय-अप्रिय अनुभव होते ही रहेंगे। दृष्टिकोण में निषेधात्मक तत्व अधिक होने से एक और भूल होती रहेगी कि शरीर को-संसार द्वारा जो सुख-सुविधायें मिल रही हैं उन्हें देखना-समझना और मोद मनाना सम्भव न हो सकेगा, इसके विपरीत जो अभाव अभियोग हैं वे ही आँखों के आगे खड़े रहेंगे, इस स्थिति में किसी सुसम्पन्न व्यक्ति के लिए भी यह सम्भव नहीं कि वह सुख-शान्ति का अनुभव कर सके।

आमतौर से हर व्यक्ति यही प्रयास करता है कि - दूसरे लोग उसे बड़ा, सुखी या सम्पन्न समझें। इसी का ढाँचा खड़ा करने में उसकी सारी शक्ति लगी रहती है। सारे प्रयास इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। वस्त्र-आभूषण, शृंगार, ठाठ-बाट, डिग्री, पद आदि के बड़प्पन प्रदर्शित करने वाले आचरण बड़ी कठिनाई से जमा किये जाते हैं और उसी संचय में सारा समय, श्रम एवं मनोयोग खप जाता है। दूसरे लोग अपनी ही समस्याओं में उलझे होते हैं, उन्हें किसी की अमीरी, गरीबी का मूल्यांकन करने में क्या रुचि हो सकती है, पर हर व्यक्ति समझता यही है कि सब का सारा ध्यान मेरे ही ऊपर केन्द्रित है और यह मनोवैज्ञानिक भूल मनुष्य को उस निरर्थक क्रियाकलाप और चिन्तन में लगाये रहती है जिसे तात्विक दृष्टि से पूर्णतया निरर्थक कहा जा सके। किसी ने-कुछ देर के लिए-हमें साधन सम्पन्न-अमीर-बड़ा आदमी जान या मान भी लिया तो इससे क्या तो अपना प्रयोजन सधा, और क्या उसे लाभ हुआ?

आत्म-बोध न होने से मनुष्य की महत्वाकाँक्षायें-चेष्टाएं-योजनाएं-गतिविधियाँ, एक प्रकार की निरर्थक कामों में-लगी रहती हैं और बहूमूल्य मानव-जीवन ऐसे ही उन विडम्बनाओं में गल जाता है। जो सुख-साधन भौतिक-जीवन में उपलब्ध थे उनको भी दृष्टिकोण के कारण समझा और सराहा नहीं जाता। स्त्री, सन्तान, शरीर, शिक्षा, सहायक, साधन जो कुछ भी मिले हुए हैं उनके मूल्य-महत्व को भी यदि समझने की चेष्टा की जाय-इनसे मिलने वाली सहायता सुविधा का लेखा-जोखा लिया जाय तो भी हर व्यक्ति को अपनी स्थिति बहुत हद तक हर्ष, सन्तोष से भरी हुई प्रतीत हो सकती है; पर इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय, जिसके अनुसार केवल अभाव और छिद्र ही दिखाई पड़ते हैं। अपनी कुरूपता हर किसी को कुरूप प्रस्तुत करती है। आन्तरिक दुर्बलता, आशंका-अविश्वास, अवरोध, द्वेष, घृणा के रूप में फुफकारती और वातावरण को विषाक्त करती रहती है। सो इन्हीं विडम्बनाओं में उलझा हुआ-विभीषिकाओं से संत्रस्त, आशंकाओं से उद्विग्न-मनुष्य अन्तर्दाह की आग में हर क्षण जलता हुआ नारकीय जीवन जीता है। यह सब आत्म बोध न होने का परिणाम है।

मैं क्या हूँ? इसका उत्तर अपने अब तक के चले आर रहें ढर्रे वाले अभ्यास के अनुरूप नहीं वरन् तत्व चिन्तन के आधार पर देना चाहिए। दूसरे लोग क्या कहते हैं-क्या सोचते हैं और क्या करते हैं-इससे भी हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए। निस्संदेह वातावरण अन्धकार भरा है। प्राचीन काल में सतयुगी व्यक्तित्व, कर्तृत्व और वातावरण-शुद्ध चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी। आज सब कुछ उल्टा है; यदि आज वस्तुस्थिति समझने के लिए लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं इसे आधार बनाया जाय तो निश्चित रूप से हमें अवाँछनीय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा और अनुचित रीति-नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ेगा।

आत्मबोध की पहली सीढ़ी यह है कि लोक-चिन्तन की अवाँछनीयता को समझा जाय और अपनी अब तक की ढर्रे पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य


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जीवन का द्वार तो सीधा है किन्तु मार्ग अत्यन्त संकीर्ण है। -संत मैथ्यू

को अस्वीकार किया जाय। काया-कल्प में पुराना शरीर छोड़ना पड़ता है और नया ग्रहण करना पड़ता है। विवाह होने पर वधू पितृ-गृह छोड़ती है साथ ही अब तक का स्वभाव अभ्यास भी। उस नवविवाहिता को पति के घर में जाकर नये स्वजनों से घनिष्ठता बढ़ानी पड़ती है और ससुराल की विधि-व्यवस्था में अपने को ढालना होता है। ठीक ऐसा ही परिवर्तन आन्तरिक काया-कल्प के अवसर पर करना पड़ता है। आत्मबोध एक प्रकार के अन्धकार का परित्याग कर प्रकाश को वरण करना है। इसके लिए क्रान्तिकारी कदम उठा सकने वालो साहस की जरूरत पड़ती है। ढर्रे में राई-रत्ती अन्तर करने से काम नहीं चलता। यह पढ़ने और सुनने की नहीं सर्वतोमुखी परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक लोक को छोड़कर दूसरे लोक में जाने-एक शरीर त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करने जैसी इस प्रक्रिया को जो कोई सम्पन्न कर सके उसे ही आत्मा ज्ञानी कहा जायगा। आत्म-बोध और आत्म-साक्षात्कार इसी स्थिति का नाम है। ब्रह्म संबंध, आत्म-दर्शन, दीक्षा-लाभ, चक्षु, उन्मीलन, दिव्य जागरण इसी को कहते हैं। यह छलाँग जो लगा सके उसे इस दुस्साहस का परिणाम दूसरे ही क्षण परिलक्षित होगा। अपने को तत्काल नरक में से निकल कर स्वर्ग में अवस्थित अनुभव करेगा। मैं क्या हूँ? इस प्रश्न का समाधान, इतना बड़ा लाभ है कि उस पर समस्त संसार की समग्र सम्पदाओं को निछावर किया जा सकता है।

व्यक्ति जब अपने को ईश्वर का परम-पवित्र अविनाशी अंश समझता है; आत्मा को रूप में अनुभव करता है और शरीर को एक उपकरण भर स्वीकार करता है तो उसे अपनी पिछली मान्यताओं, आकाँक्षाओं योजनाओं और गतिविधियों में आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव होती है। संबंधित वस्तुयें संग्रह करके निरर्थक मोह बढ़ाने के लिए नहीं, वरन् सदुपयोग भर के लिए अपने पास एकत्रित हुई हैं यह निष्ठा जब जमती है तो फिर लोभ और मोह में परले सिर की मूर्खता ही दिखाई देती है। सम्पदा प्रकृति का ही एक रूप है। यह अनादि काल से चली आ रही है। और अनन्तकाल तक चली जायगी। जो सोना अपने पास आज है वह सृष्टि के जन्मकाल से ही इस संसार में विद्यमान था। उस पर लाखों व्यक्ति कुछ-कुछ देर के लिए अपना अधिकार बनाते चले आ रहे हैं। प्रलय काल तक वह सोना बना रहेगा और उस पर करोड़ों व्यक्ति अपना अधिकार जमाते चले जायेंगे। जमीन, जायदाद, वस्तुयें आदि सृष्टि के साथ जन्मी और उसके रहने तक इस दुनिया में बनी रहेंगी, कुछ समय के लिए वे अपने साथ संयोगवश जुड़ गईं तो उन्हें अपनी मान बैठना, उनके संग्रह का लोभ करना, कैसे उचित ठहराया जा सकता है? पदार्थों का मोह जिस शरीर के साथ जुड़ा हुआ है वह शरीर ही कल परसों जाने की तैयारी में बैठा है, फिर पदार्थों का-सम्पदा साधनों का लोभ किसलिए?

उपलब्ध सम्पत्ति का सदुपयोग ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है उसकी जमाखोरी में कोई समझदारी नहीं। उपार्जन को श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगाना चाहिए। बेटे-पोतों के लिए उत्तराधिकार का ताना-बाना बुनना सदुपयोग नहीं है। अपने साथ मोह बन्धनों में बँधे हुए चन्द व्यक्तियों को अपने श्रम का सारा उपार्जन सौंप दिया जाय और वे उस हराम की कमाई पर गुलछर्रे उड़ायें इस विडम्बना में क्या औचित्य है? श्रम उपार्जन खाकर ही कोई व्यक्ति उसका लाभ लेता है, हराम की कमाई तो हर किसी को गलाती है। आत्मवादी की सुनिश्चित मान्यता यही हो सकती है। जिसकी समझ में यह तथ्य आ गया उसे नये सिरे से अपनी सम्पत्ति के बारे में चिन्तन करना पड़ेगा और आश्रित, असमर्थ परिजनों की उचित व्यवस्था के अतिरिक्त जो कुछ उसके पास बच जाता है उसे लोक-मंगल के लिए नियोजित करने का ही निर्णय करना पड़ता है। आत्म-बोध के साथ यदि इस स्तर का दुस्साहस जुड़ा हुआ न हो तो उसे बकवादियों का बाल-विनोद ही कहा जायगा। असंख्यों व्यक्ति स्वाध्याय सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते हैं। जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा समझा जा सकता है।

परिवार के रूप में जुड़े हुए कुछ व्यक्ति ही अपने हैं? अपना प्यार उन्हीं तक सीमित रहना चाहिए? उन्हीं तक अपनी सारी महत्वाकाँक्षायें सीमित कर लेनी चाहिए यह रीति-नीति उससे बन ही नहीं पड़ेगी जो अपने को ‘आत्मा’ मानेगा। आत्म-ज्ञान का प्रकाश आते ही दृष्टिकोण में उस विशालता का समावेश होता है जिसके अनुसार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मानने से कम में किसी भी प्रकार संतोष नहीं हो सकता।

भगवान् के उद्यान के रूप में-संबंधित परिवार को कर्तव्य-निष्ठ माली की तरह सींचना-सँजोना बिल्कुल अलग बात है और बेटे-पोतों के लिए मरते खपते रहना अलग बात, बाहर से देखने में यह अन्तर भले ही दिखाई न पड़े पर दृष्टिकोण की कसौटी पर रखने पर जमीन आसमान जितना अन्तर मिलेगा। मोहग्रस्त मनुष्य अपने कुटुम्बियों की सुविधा, सम्पदा और बढ़ाने और इच्छा पूरी करने की धुन में उचित अनुचित-आवश्यक अनावश्यक का भेद भूल जाता है और घरवालों की इच्छा तथा खुशी के लिए वह व्यवस्था भी जुटाता है जो न आवश्यक है न उपयुक्त। मोहग्रस्त के पास विवेक रह ही नहीं सकता।

परिष्कृत दृष्टि से कुटुम्बियों को समुन्नत, सुसंस्कारी, सुविकसित बनाने के कर्तव्य को ही ध्यान में रखकर पारिवारिक विधि-व्यवस्था निर्धारित की जाती है। उसने यह नहीं सोचा कि कौन राजी रहा कौन नाराज हुआ। चतुर माली अपनी दृष्टि से पौधों को काटता छाँटता-निराता गोड़ता है, पौधों की मर्जी से नहीं। विवेकवान गृहपति केवल एक ही दृष्टि रखता है कि परिवार को सुसंस्कारी और सुविकसित बनाने के लिए जो कठोर कर्तव्य पालने चाहिए उसका पालन अपनी ओर से किया जा रहा है या नहीं। परिजनों की इच्छाओं का नहीं उनके हित साधन का ही उसे ध्यान रहता है। आत्म-बोध के साथ परिवार के प्रति इसी दृष्टिकोण के अनुरूप आवश्यक हेर-फेर करना पड़ता है। तब वह मोह छोड़ता है और प्यार करता है। प्यार के आधार पर की गई परिवार सेवा उसके स्वयं के लिए और समस्त परिवार के लिए परम-मंगलमय सिद्ध होती है।

अपने शरीर के बारे में भी आत्म-बोध के प्रकाश में नई रीति-नीति ही अपनानी पड़ती है। उसे वाहन उपकरण मात्र मानना पड़ता है। आत्मा की भूख के लिए शरीर से काम लेने और शरीर की लिप्सा के लिए आत्मा को पतन के गर्त में डालने की दृष्टि में जमीन आसमान जितना अन्तर है। शरीर और मन को मैं मान बैठने पर इन्द्रियों की वासनाएँ और मन की तृष्णायें ही जीवनोद्देश्य बन जाती हैं और उन्हीं की पूर्ति में निरन्तर लगा रहना पड़ता है। पर जब वह मान्यता हट जाती और अपने को आत्मा स्वीकार कर लिया जाता है तो मन को बलात् उस चिन्तन में नियोजित किया जाता है जिससे आत्मकल्याण हो और शरीर से वह कार्य कराये जाते हैं जो आत्मा का गौरव बढ़ाते हों उसका भविष्य उज्ज्वल बनाते हों।

आत्म-बोध, एक श्रद्धा है। आत्म-साक्षात्कार एक दर्शन है, जिसे यदि सचाई के साथ हृदयंगम किया जाय तो दृष्टिकोण ही नहीं बदलता वरन् क्रिया-कलाप भी बदल जाता है। इस परिवर्तन को ही आत्मिक कायाकल्प कहते हैं। यह जिस क्षण भी सम्भव हो जाय उसी दिन अपने में भारी शान्ति, संतोष, उल्लास और उत्साह दृष्टिगोचर होता है और लगता है मानो नरक से निकल कर स्वर्ग में आ गये।


मनुष्य की महत्ता उसकी भीतरी स्थिति से परखी जायगी

एक अमीर था-’डाइब्स’ उसके पास दौलत की कमी न थी। सो रंग-राग भी करता और पादरियों को दक्षिणा देकर पूजा-पाठ भी कराता। लोग समझते थे वह पुण्यात्मा है। पादरी कहते थे उसे स्वर्ग के राजा का प्यार मिलेगा।

एक गरीब था-’लाजारस’ जिन्दगी भर दूसरों की सेवा करता रहा। बुढ़ापे और बीमारी का शिकार हुआ। मरते समय उसे उस दयनीय स्थिति में देह छोड़नी पड़ी कि न रोटी न कपड़ा न दवा, न परिचर्या। भूखा, प्यासा, नंगा और गन्दा एक मुर्दा, कूड़े के साथ कितनी गड्ढे में डाल दिया गया।

लोगों ने कहा लाजारस अभागा था और पापी। उसे न ईश्वर की कृपा मिली-न लोगों की सहायता। जिन्दगी भर कष्ट सहे और अन्त में भी दुर्गति का शिकार हुआ।

मरने के बाद उस अमीर और-उस गरीब को भी परलोक में जाना पड़ा।

‘डाइब्स’ नरक में डाला गया और लाजारस को स्वर्ग के राजा ने चूमा।

बाइबिल ने इस प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा है-बाहरी वैभव और आचरण से नहीं, मनुष्य की महत्ता उसकी भीतरी स्थिति से परखी जायगी।


जीवन और मरणोत्तर जीवन का तारतम्य

अब से कोई बीस वर्ष पूर्व इंग्लैंड में एक ऐसी घटना प्रकाश में आई जिसने एक प्रकार से तहलका ही मचा दिया।

पोर्ट्स साउथ रोड इशर कस्बे के पास से गुजरती है इस घने जंगलों से घिरे हुए क्षेत्र में लगातार ऐसी घटनाएं होने लगीं कि कोई मोटर उधर से गुजरती तो बन्दूक की गोली की तरह सनसनाती हुई चीज आती और मोटर के शीशे, छत या दरवाजे से टकराकर उसमें छेद कर देती। छेद एक इंच का इतना साफ सीधा, गोल और व्यवस्थित होता मानो किसी बहुत होशियार मिस्त्री ने सधी परखी हुई मशीन से किया है। अन्यथा काँच भी किसी चीज की टक्कर से टूट सकता है, उसके टुकड़े बिखर सकते हैं पर चिकने किनारे वाला सही छेद होना तो सचमुच एक बड़े अचंभे की बात है।

घटनाएं लगातार होने लगी। उधर से गुजरने वाली मोटरों को उस दुर्घटना का अक्सर सामना करना पड़ता। मोटर रुकती, आस-पास को क्षेत्र खोजा छाना जाता, पर आक्रमण कहाँ से होता है, कौन करता है इसका कुछ भी पता न चलता।

पुलिस ने भारी माथा पच्ची की पर कुछ पता न चला। गुप्तचर विभाग के स्काटलैण्ड यार्ड ने आहत मोटरों को वैज्ञानिक जाँच के लिए प्रस्तुत किया पर वहाँ भी सुराग न मिला। इशर कस्बे की नगर पालिका ने तो पुलिस के खिलाफ एक प्रस्ताव ही पास कर डाला कि वह इस क्षेत्र को आतंकित करने वाली इन वारदातों को न रोक पाती है न खोज करती है। पुलिस वाले लाचार थे, कुछ समझ ही काम नहीं करती थी कि किस आधार पर खोज आगे बढ़ाई जाय। कितने ही पत्रकार वस्तुस्थिति पर प्रकाश डालने के लिए उधर पहुँचे। मोटरों पर अदृश्य आक्रमण होने, केवल शीशे टूटने, गोल और सही छेद होने, कोई जनहानि न होने मोटर के इंजनों को कोई आघात न लगने की बात एक साथ मन पर बिठाने से ऐसा चित्र बन जाता था जिसका हल सूझ ही न पड़े। सुरक्षा के सारे प्रयत्न बेकार हो गये। घटनाएं रुक नहीं रहीं थी। कौतूहल और आतंक बढ़ने से उस क्षेत्र का आवागमन रुकने भी लगा था और हर तरह की परेशानी अनुभव की जा रही थी।

कोई कहते थे कि इस घने जंगल में कोई मृत्यु किरण जैसा परीक्षण हो रहा है और वे किरणें छिटक कर ऐसा छेद करती हैं। इन किम्वदंतियों का विज्ञान विभाग ने स्पष्ट खण्डन किया। फिर कारण क्या हो सकता है यह रहस्य बीस वर्ष बाद भी अभी जहाँ का तहाँ बना हुआ है। कुछ समय बाद दुर्घटनाएं बन्द हो गई पर गुप्तचर विभाग के खोज कार्यों में वह तथ्य अभी भी जहाँ का तहाँ मौजूद है।

परोक्ष जीवन और अदृश्य जगत पर विश्राम करने वाले इस घटनाक्रम का संबंध दो भूतकालीन तथ्यों के साथ जोड़ते हैं इनमें से एक तथ्य यह है कि यह क्लेयर माउण्ट स्टेट पहले एक जागीरदार ड्यूक आफ न्यू कान्सिल के पास थी। उसने इस क्षेत्र में एक सुन्दर झील बनवाई। विलियम केन्ट नामक ठेकेदार ने इसे बहुत दिलचस्पी और खूबसूरती के साथ बनवाया। तैयार हो गयी तो ड्यूक ने उसका पैसा दबा लिया और अपने नौकरों से उसे उसी झील में फिंकवा दिया। बेचारा किसी प्रकार निकल तो आया पर दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। सुना जाता है कि उसकी क्षुब्ध आत्मा को मोटर स्वामी ड्यूक के साथ-साथ मोटरों से भी घृणा करने लगी होगी और अब ड्यूक के न रहने पर उन्हीं से बदला लेती होगी,

दूसरी एक और घटना भी इस स्टेट से संबंधित है और उस आधार पर भी उद्विग्न मृतात्मा द्वारा इस प्रकार के उपद्रव की बात सोची जाती है। लार्ड क्लाइव ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से हिन्दुस्तान गया। वहाँ उसने छल बल से जहाँ अँग्रेजी राज्य बढ़ाया वहाँ अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधन भी खूब किया। वह करोड़ों रुपये की जागीर बनाकर ले गया और जागीरी शान से रहने के लिए इसने क्लेयर माउण्ट का इलाका खरीद लिया। नवाबी ठाठ और वैसी ही विलासिता के साथ वहाँ रहने लगा। इंग्लैंड भर में उसके दुष्ट दुराचरण की चर्चा थी। हर कोई उससे घृणा करता था। कहीं उसे न सम्मान मिलता था, न स्वागत, न सहयोग। उस जंगल में महल बनाकर वह बहुत से खानसामा, रसोइया, नौकर, वेश्याएं साथ लेकर रहा करता था। किसी को वह सुहाता न था न उसे कोई। सुनसान जंगलों में मरघट के प्रेत की तरह विचरण करके वह अपना जी बहलाता था अपने पुराने कुकृत्यों की याद करके वह जीवन के अंतिम दिनों में अर्द्ध विक्षिप्त की तरह रहने लगा था। खूँखारों जैसी इसकी प्रकृति हो गई थी, मोटरों की आवाज उसे बहुत ही ना पसन्द थी। उसने एक दिन सनक में आकर पास वाली सड़क को बन्द करा दिया और मोटरों के लिए बारह मील दूर रास्ता बना दिया ताकि उसके कान में उसकी द्वेष केन्द्र मोटर की न आवाज आये न उसकी सूरत दीखे।

क्लाइव भारत में किये गये अपने द्वारा कुकर्मों की लम्बी गाथा के पृष्ठ खोलता, कोई दूसरा सुनने वाला न होता तो अपने आप से ही बातें करता। एक दिन इसी असह्य मानसिक तड़पन में आत्महत्या कर ली और घिनौने कुत्ते की तरह ऐसे ही उधर कहीं दफना दिया गया।

क्लाइव की आत्मा संभव है अपना मोटर द्वेष अभी भी धारण किये हुए हो और संभव है इसी के क्षेत्र में उनका आवागमन उसे सहन न होता हो और आक्रमण का ऐसा अनोखा शस्त्र उसी के द्वारा प्रयुक्त किया जाता हो।

मरने के बाद मनुष्य की काया ही नष्ट होती है। अन्तःकरण चतुष्टय मरने के बाद भी यथावत बना रहता है। यदि मन आत्म-ग्लानि, आक्रोश आदि भावों से भरा रहे तो उससे न केवल इस जीवन में अशान्ति रहती है वरन् अगले जीवन में भी वह मनः स्थिति बहुत अंशों में ज्यों की त्यों बनी रहती है और विश्राम के लिये मिले हुए उस अवकाश में भी प्राणी को चैन नहीं लेने देती।

इस तथ्य पर उपरोक्त घटनाओं से प्रकाश पड़ता है। इस प्रकार का यही एक प्रमाण नहीं वरन् समय-2 पर ऐसी ही अनेक घटनायें घटित होती रहती हैं पर इन्हें महत्व नहीं मिलता। उपहास और अविश्वास के गर्त में वे घटनाएं भी उपेक्षित हो जाती हैं जो वस्तुतः बहुत प्रामाणिक थीं; यदि उनका गहराई से विश्लेषण होता तो उस प्रत्यक्ष के आधार पर परोक्ष पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ सकता था।

उपरोक्त इशर कस्बे के समीप वाले जंगल की घटना को इसलिए महत्व मिला कि पुलिस, पत्रकार आदि लोगों ने उसमें दिलचस्पी ली। यदि वे लोग उस खोज-बीन में भाग न लेते तो मोटर वालों की ही सनक या शरारत कहकर उसे अपेक्षित कर दिया गया होता। यह ठीक है कि कितनी ही मनगढ़न्त ऊल-जुलूल बातें भी होती रहती हैं पर उनमें से कुछ ऐसी भी होती हैं जिनकी खोजबीन करने से उन तथ्यों पर प्रकाश पड़ सकता है जो अभी तक एक प्रकार से अपूर्ण, उपेक्षित और अविश्वस्त ही बने हुए हैं।


Quotation

चित्त को क्षुद्र वासनाओं से विरत करने का एक बहुत बड़ा साधन कला है, काव्य, चित्र, संगीत आदि का जिस समय रस मिला करता है उस समय भी शरीर और इन्द्रियों के बन्धन ढीले पड़ गए होते हैं और चित्त आध्यात्मिक जगत में खिंच जाता है।

-सम्पूर्णानन्द

इस घटना में ठेकेदार की आत्मा का प्रकोप सिद्ध नहीं होता। क्योंकि एक व्यक्ति के दुर्व्यवहार का क्षोभ प्रायः एक तक ही सीमित रहता है। दूसरी बात यह है कि अन्याय पीड़ित व्यक्ति की अन्तरात्मा कलुषित नहीं होती इसलिए वह उग्र स्तर के ऐसे विग्रह नहीं करती जो अन्य निर्दोष लोगों को कष्ट पहुँचाए।

जिसका जीवन स्वयं में कलुषित रहा हो, जिसने अनेकों को कष्ट पहुँचाने में रस लिया हो, स्वार्थ सिद्धि के लिए कितनों के साथ ही अनाचार विश्वासघात किया हो। ऐसे ही लोगों की आत्माएं इतनी हिंस्र हो सकती हैं जो अनायास लोगों को कष्ट पहुँचाकर अपनी पूर्व आकाँक्षाओं की तृप्ति करे। इस दृष्टि से क्लाइव की आत्मा के द्वारा यह उपद्रव होता हो तो आश्चर्य की बात नहीं है।

घटना इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि एक शरीर छोड़ने और दूसरा प्राप्त करने के मध्यान्तर में आत्मा को सूक्ष्म शरीर धारण करके अन्तरिक्ष में विचरण करना पड़ता है। यह इसलिए भी होता होगा कि शरीर रहते किये हुए दुष्कृत्यों के परिणामों को वह अधिक विस्तारपूर्वक देख समझ सके और भविष्य के लिए उस अवाँछनीय नीति की अनुपयुक्तता को स्वीकार कर सके।

दूसरा तथ्य यह प्रकट होता है कि सूक्ष्म शरीर बिल्कुल असमर्थ नहीं हो जाता, उसमें न केवल भावनात्मक क्षमता रहती है वरन् भौतिक वस्तुओं को प्रभावित करने जैसे सामर्थ्य भी रहती है। यदि ऐसा न होता तो मोटर के शीशों में ठीक गोल छेद करना कैसे बन पड़ता? उस क्षमता को प्रेम जीवन में भी भले और बुरे प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करके पुण्य और पाप की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

मरणोत्तर जीवन में संस्कार क्षेत्र प्रौढ़ रहता है, विचार तंत्र सो जाता है। जिस प्रकार के विचारों और कार्यों में मनुष्य जीवन भर रहता है वहीं अन्तः चेतना मरणोत्तर स्थिति में प्रबल रहती है और अनायास ही उसी स्तर की गतिविधियों का क्रम चलता रहता है।

मरणोत्तर जीवन, शान्त, सुखी, परोपकारी स्थिति का रहे, इसके लिए इसी जन्म में तैयारी करनी पड़ती है। उच्च विचार और शुद्ध जीवन रखकर जहाँ इह लौकिक जीवन सराहनीय और सम्मानित स्तर का रखा जा सकता है वहाँ उसका परिणाम मरणोत्तर काल में देवोपम हो सकता है। दुष्ट और दुरात्म जीवन क्रम न इस लोक में सराहा जाता है न परलोक में शान्ति मिलने देता है।


त्यागी तपस्वी को राज दरबार से क्या मतलब

एक दिन दो साधु एक महात्मा से मिलने गये। जिस समय वे उनकी कुटिया पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि महात्मा जी दरबार में गये हुए हैं। महात्मा के राज दरबार में जाने की बात सुनकर वे दोनों साधु सोचने लगे कि ‘निःस्वार्थी’ महात्मा को राजा के दरबार में जाने की क्या आवश्यकता? मालूम होता है कि महात्मा जी भी पूरे महात्मा ही हैं।

इस तरह विचार-विमर्श होने से महात्मा जी के प्रति उनके हृदय में कुछ अश्रद्धा-सी उत्पन्न हो गयी। थोड़ी देर ठहर कर इन्होंने पता लगाया कि वे कब तक वहाँ से लौटेंगे। मालूम हुआ कि अभी उनके आने में तीन घण्टे के लगभग लगेंगे।’ अब इन दोनों ने सोचा कि ‘लाओ तब तक कहीं घूम-फिर आवें। बेकार बैठे-बैठे यहाँ क्या करेंगे।’ इन दोनों में से एक साधु की कफनी फटी हुई थी। इसलिए ये दोनों एक दरजी की दुकान पर उसे सिलाने के लिये जा पहुँचे थोड़ी देर बैठे थे कि इतने में दरजी की एक अँगूठी खो गयी। उसने इन्हीं दोनों को अँगूठी का चोर ठहराया। तुरन्त पुलिस आ पहुँची और इन दोनों साधुओं को बाँधकर राजा के पास ले गये। राजा ने मामले की जाँच-पड़ताल की तो वे ही चोर साबित हुए। बस, उन्होंने तुरन्त इन दोनों को हाथ काट लेने की आज्ञा दी। इसी बीच महात्मा जी आ पहुँचे। उन्होंने राजा साहब को समझाया कि आप और वह दरजी दोनों ही भ्रम में हैं। ये साधु निर्दोष हैं। महात्मा के कहने पर राजा ने इनको छोड़ दिया। इसके बाद वे महात्मा इन दोनों को बड़े सम्मान के साथ अपने आश्रम पर ले आये और उनका सत्कार किया। थोड़ी देर बाद मौका पाकर महात्मा जी ने कहा-’मुझे मालूम है कि आप लोगों के हृदय में यह सन्देह उत्पन्न हो गया है कि मैं राज दरबार में क्यों जाता हूँ। आपका यह सोचना भी ठीक ही है कि एक त्यागी तपस्वी को राज दरबार से क्या मतलब! परन्तु आप जैसे लोगों पर कहीं अन्याय न हो जाय। इसीलिये मैं वहाँ जाया करता हूँ।’


जो जिएं, वह जीने की कला भी सीखें

मोटर प्राप्त कर लेना बड़ी बात नहीं। बड़ी बात है उसे चलाने, सँभालने और बनाने की कुशलता प्राप्त करना। चलाना न जानने वाला व्यक्ति यदि उसका उपयोग करेगा तो उस मशीन को ही नहीं अपने हाथ पैरों को भी तोड़ लेगा। इसके विपरित यदि चलाना, बनाना आता है तो अपनी मोटर न होते हुए भी ड्राइवर का-मिस्त्री का-धन्धा करके गुजारा किया जा सकता है।

जीवन एक बहुमूल्य मोटर की तरह है। इसकी एक विचित्रता यह है कि ड्राइवर रखने से काम नहीं बनता। इसे स्वयं ही चलाना पड़ता है। चलाने की विधि जानना-इस मोटर मालिक के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस ओर से बरती गई उपेक्षा-लाभ के स्थान पर उलटी हानिकारक ही सिद्ध होगी।

मनुष्य जीवन का कैसे-किस प्रयोजन के लिए-उपयोग किया जाय? इस तथ्य को समझना और उसकी प्रयोग प्रक्रिया को जानना नितान्त आवश्यक है। यह न किया जा सका तो उससे भारी हानि उठाने की आशंका रहेगी। बिजली की अँगीठी खरीद लेना ठीक है पर उसका प्रयोग भी तो जानना चाहिए। अनाड़ीपन से उसे काम में लाये तो दूध गरम करने का लाभ उठाने के स्थान पर प्राण गँवाने की विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।

मनुष्य जीवन पा लेना भी एक बड़ा सुअवसर है। पर उसका समुचित लाभ तभी मिल सकता है जब जीवन जीने की कला भी आती हो। लोग यही सबसे बड़ी भूल करते हैं। सीखने के लिए काफी दौड़-धूप करते हैं। शिक्षा के अनेक क्षेत्रों में प्रवेश करके निष्ठावान बनते हैं। साहित्य कला, शिल्प, विज्ञान, दर्शन आदि में पारंगत होकर आजीविका और पद प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं। पर यह तथ्य विस्मृत ही बना रहता है कि जीवन जीने की कला भी सीखनी चाहिए। यदि यह शिक्षा प्राप्त न की गई तो जो कुछ सीखा गया है वह भारभूत बना रहेगा। बाहर का वैभव कितना ही बढ़ जाय, अन्तःक्षेत्र में अभाव, असन्तोष ही छाया रहेगा।

नाव में बैठकर एक पण्डित जी नदी पार कर रहे थे। रास्ते में मल्लाह से पूछते जाते थे कि तुमने ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, साहित्य, दर्शन आदि पढ़े हैं। एक-एक करके वह सब प्रश्नों के उत्तर नहीं में देता चला जाता था। पण्डित जी बहुत खिन्न हुए और उसके अनाड़ीपन की भर्त्सना करने लगे। इतने में नाव भँवर में पड़ी। मल्लाह बहुत प्रयत्न करने पर भी उसे न बचा सका और वह डूबने लगी। जो यात्री तैरना जानते थे कूद पड़े और पार निकल गये। पण्डित जी डुबकी लेने लगे। मल्लाह ने उनसे पूछा-आपको तैरना आता है। पण्डित के नहीं कहने पर उसने अपना माथा ठोका और कहा-तैरना न जानने की हानि आपके विद्वान होने की अपेक्षा आज अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती थी।

जीवन कैसे जिया जाय? इसे न जानना सबसे बड़ा अनाड़ीपन है। इन्द्रियाँ अति महत्वपूर्ण उपकरण हैं-उनका सदुपयोग करके अपनी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है। मन की सामर्थ्य का तो कहना ही क्या, उसे जिस कार्य में तत्परतापूर्वक लगा दिया जाय उसी में चमत्कार उत्पन्न करता है। समय की सम्पदा-श्रम की महत्ता इतनी बड़ी है कि उसके बदले कुछ भी अभीष्ट वस्तु खरीदी जा सकती है; पर हम अपनी इन आन्तरिक विभूतियों का न तो स्वरूप समझते हैं और न उपयोग। जीवन के प्रति हमारा क्या दृष्टिकोण हो। और दूसरों से किस प्रकार व्यवहार करें इतनी मोटी सी बातें न समझने के कारण हम पग-पग पर असफल होते और ठोकर खाते हैं। जीवन जीने की कला का यदि ज्ञान रहा होता तो जो कुछ उपलब्ध है उसका समुचित लाभ उठा सकना सम्भव हुआ होता और हम आनन्द एवं उल्लास भरा जीवन जीते।


भावना और शालीनता अन्य प्राणियों में भी है।

जिस प्रकार ज्ञान के अंकुर अन्य जीवधारियों में एक सीमा तक मौजूद हैं उसी प्रकार उनमें भावनायें भी विद्यमान हैं। भावुकता पर मनुष्य का ही एकमात्र अधिकार नहीं है, वह अन्य जीवों में भी पाई जाती है और अवसर मिलने पर वह विकसित भी होती है।

टारजन-प्रख्यात वन मानव की कथा प्रसिद्ध है। वह मात्र गप्प नहीं है, उसमें यथार्थता का बहुत बड़ा भाग विद्यमान है। एक 11 वर्ष का अंग्रेज बालक एक जहाज से बिछुड़ कर अफ्रीका के जंगलों में जा फँसा, वहाँ उसे वानरों ने पाल लिया। अन्य पशुओं का भी उसे भावनात्मक सहयोग मिला और लगातार पन्द्रह वर्ष तक उनके बीच रहकर वह वन परिवार के प्राणियों का परिचित ही नहीं स्नेह भाजन भी बन गया।

वन प्रदेशों में तप साधना करने वाले तपस्वियों के पास सिंह, व्याघ्र निर्भय आते-जाते रहते हैं। उन्हें कष्ट देना तो दूर उलटे सहायता करते हैं। सिंह, गाय का तपोवनों में जाकर एक घाट पर पानी पीना, इस बात का प्रमाण है कि उन्हें भाव शून्य न समझा जाय; अवसर मिलने पर उनकी भावुकता मनुष्य से भी आगे बढ़ सकती है। उत्तर प्रदेश आगरा जिले के खंदोली कस्बे के पास जंगलों में एक मादा भेड़िया ने मनुष्य के बच्चे को उठा लिया था पर करुणावश उसे मारा नहीं वरन् उसे दूध पिलाकर पाल लिया जब वह छः वर्ष का हो गया तब शिकारियों ने इस बालक को भेड़ियों की माँद से पकड़ा था।

बंगाल के मालदा इलाके में राबर्ट वैसी नामक शिकारी ने अपने शिकार वर्णन में एक ऐसे अन्धे चीते का जिक्र किया है जिसकी मित्रता एक बन्दर से थी और वह बन्दर ही अपनी आहट तथा आवाज के सहारे चीते को साथ ले जाकर शिकार कराता था। उक्त शिकारी ने जब उस चीते को मारा तो बन्दर लड़ने आया और जब उसे भी गोली लगी तो मरे हुए चीते की लाश तक दौड़ता हुआ पहुँचा और उसी से लिपट कर प्राण त्यागे।

सिन डिगो में (अमेरिका) चिड़िया घर निर्देशक एम॰ बेले वेन्शली ने अपने एक प्रयोग की चर्चा करते हुए लिखा है-चिड़ियाघर में एक भालू के नवजात शिशु को सुअर के नये जन्मे बच्चे के साथ रखा गया। दोनों में भारी मित्रता हो गई। दोनों साथ-साथ घूमने घर से निकलते और शाम को साथ-साथ वापिस आते। भालू के बच्चे का नाम रखा गया-गागिला। सुअर के बच्चे का कोशे। कोशे बड़ा हो गया तो कुछ उच्छृंखलता बरतने लगा और मनमौजी की तरह कहीं जाकर पड़ा रहा। शाम को चिड़ियाघर के अधिकारियों ने कोशे को गैर हाजिर पाया। तलाश किया तो मिला नहीं। ढूँढ़ने की एक युक्ति निकाली गई। रीछ के बच्चे गागिल को कटघरे से बाहर ले जाकर अँधेरे में छोड़ दिया गया। वह अँधेरे से डर कर चिल्लाने लगा। आवाज सुनते ही कोशे से न रहा गया और वह जहाँ छिपा था वहाँ से निकल कर सीधा गागिल के पास आया और उसे पकड़ लिया गया।

आरा (बिहार) जिले के एक गाँव में एक कुतिया ने बन्दर के मातृविहीन बच्चे को अपना दूध पिलाकर पाला था। बच्चा अपनी सुरक्षा के लिए कुतिया की पीठ पर बैठा फिरता था। कुतिया अपने अन्य बच्चों के साथ उसे लेकर एक जगह सोती थी।

सीधी (मध्य प्रदेश) में एक राजपूत का कुत्ता अपने मालिक को अतिशय प्यार करता था। मालिक की मृत्यु हो गई। लाश को जलाया गया। कुत्ता देखता रहा। सब लोग घर चले गये पर वह नहीं गया। चिता के पास ही बैठा रहा। लोगों ने उसे हटाने की बहुत कोशिश की पर हटा नहीं। खाने को दिया पर खाया नहीं। आँसू बहाता और कराहता रहा। इसी स्थिति में तेरहवें दिन उसकी मृत्यु हो गई। उसे भी मालिक के पास ही चिता में जलाया गया। शाकाहारी जानवरों में इस तरह की भावनात्मक-करुणा और सहृदयता बहुत देखने को मिलती है। यह आहार की सात्विकता का प्रभाव है। माँसाहारी पशु इस दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए होते हैं उनकी क्रूरता शिकार तक ही सीमित नहीं होती वरन् अपने निज के बच्चों के प्रति भी वे वैसे ही निर्दय होते हैं। मौका मिल जाय तो अपने बच्चों का सफाया करने में वे चूकते नहीं। रीछ और बाघों की मादायें अपने पति देवताओं की इस क्रूरता से भली-भाँति परिचित होती हैं इसलिए वे छोटे बच्चों को छिपाये-छिपाये फिरती हैं। कहीं इधर-उधर जाती है तो बच्चों को झाड़ियों में छिपा जाती हैं। बच्चे भी डरे सहमे तब तक चुपचाप अपनी जान बचाये बैठे रहते हैं जब तक कि उनकी माँ लौटकर नहीं आ जाती। इस सिलसिले में कई बार तो बच्चों की हिमायत में मादा को नर से काफी झगड़ना पड़ता है और उसमें चोट-चपेट तक हो जाती है।

सिंह स्वभावतः बहादुर नहीं होता। शिकार करते समय लुक छिपकर आक्रमण करने की और तनिक सा खतरा दिखाई पड़ने पर भाग खड़े होने की, प्रवृत्ति उसकी कायरता ही प्रकट करती है। हाँ दाँत, पंजे, शरीर की बनावट और क्रोध की मात्रा ही उसे वीर बनाये हुए है।

ईशागढ़ के राजा ने एक शेर का बच्चा पाला। उसे कटघरे में रखा जाता था और कटा हुआ माँस दिया जाता था। जवान हो गया तो एक दिन जिन्दा बकरा उसके कटघरे में घुसाया गया और उसके द्वारा शिकार किये जाने का दृश्य देखने का प्रबन्ध किया गया। पर बकरे को देखते ही शेर डर गया और एक कोने में मुँह छिपाये बैठा रहा। दो घण्टे तक यही स्थिति रही। जब बकरा बाहर निकाला गया तब कहीं सिंह की जान में जान आई।

ऐसी ही एक घटना भरतपुर राज्य में बहुत दिन पूर्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर हुई थी। सुअर सिंह के कटघरे में छोड़ा गया तो सिंह डरकर हक्का-बक्का हो गया और सुअर को छेड़ने की बजाय अपनी ही जान बचाने की तह ढूँढ़ता रहा।

मन की दृष्टि से ही नहीं शरीर की दृष्टि से भी हिंस्र पशु पिछड़े हुए होते हैं और जल्दी थकते हैं। माँसाहारी प्राणी शक्तिशाली होते हैं और शाकाहारी दुर्बल। यह मान्यता सही नहीं है। माँसाहारियों में क्रूरता और धूर्तता की मात्रा अधिक होती है। शाकाहारी सरल स्वभाव के होते हैं। सरलता का अनुचित लाभ उठाकर ही माँसाहारी जीतते हैं अन्यथा शक्ति की दृष्टि से उनका पिछड़ापन ही सिद्ध होता है।

यदि सूँड़ को अस्त-व्यस्त करने में सिंह सफल न हो सके तो हाथी निश्चय ही सिंह को मार देगा। सिंह और हाथी के युद्ध में यदि दाव लग जाय तो सिंह को सूँड़ में लपेट कर पछाड़ देना और पैरों तले कुचल देना हाथी के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। बाघ, चीते आदि अपनी दहाड़ से ही हिरन को डरा कर भयाक्रान्त कर देते हैं और उसे दबोच लेते हैं। अन्यथा दौड़ में हिरन ही आगे रहेगा। उसकी छलाँग 11 गज की होती है जबकि शेर, चीते 6 गज से अधिक नहीं उछल सकते। भेड़िये, लोमड़ी, खरगोश को दौड़ में नहीं पकड़ सकते। वे धूर्तता से उन्हें घेर कर ही दबोचते हैं। खुले मैदान में यदि दौड़ने की प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़े तो भेड़िये हताश हो जाते हैं। पहले ही झपट्टे में यदि उनका दाँव न लगा तो पीछा करना छोड़ देते हैं और वापिस लौट आते हैं।

कई प्राणी बुद्धि, भावना और कुशलता तीनों ही दृष्टि से काफी आगे बड़े-चढ़े होते हैं। कई बार तो वे मनुष्य को चुनौती देते हैं। उनकी बुद्धिमता, व्यवस्था और सृजनात्मक शक्ति देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इस स्तर के प्राणियों में ‘बीवर’ प्रख्यात है।

‘बीवर’ एक प्रकार का जल और थल निवासी-एक प्रकार का बड़ा चूहा है जो पहले केवल उत्तरी अमेरिका में पाया जाता था पर अब उसकी नस्ल प्रायः सभी ठण्डे मुल्कों में फैल गई है। उसकी लम्बाई पूँछ समेत 3 से 4 फुट और वजन में 50 से 65 पौण्ड तक होते हैं। उनकी आयुष्य 15-20 वर्ष तक होती है। शरीर पर बहुत ही मुलायम और चमकीली ऊन होती है।

बीवर की समाज भावना और गृह निर्माण कला अद्भुत है। वे अपना या अपने परिवार का ही ध्यान नहीं रखते वरन् सुख-दुःख में अपने क्षेत्रवासियों की भी पूरी सहायता करते हैं। रोगी, दुर्बल, आपत्तिग्रस्त या भोजन कमाने में असमर्थ साथियों को वे किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने देते। अपनी सुविधाओं के साधनों में ही व्यस्त नहीं रहते वरन् यह भी तलाश करते हैं कि किसी साथी को कोई कष्ट तो नहीं है। प्रसव काल आने पर मादा बीवर की सहायता करने अनेक सहेलियाँ आ जाती हैं और उस समय की आवश्यकताओं को देखते हुए जच्चा की समुचित सहायता करती हैं। अपने बच्चों की तरह पड़ोसिन के बच्चों का भी यह मादायें ध्यान रखती हैं और उन्हें न कुछ असुविधा होने देती हैं और न उच्छृंखलता बरतने देती हैं।

किसी शत्रु के आक्रमण होने अथवा प्राकृतिक विपत्ति आने पर सूचना पाते ही साथियों को सावधान कर देते हैं और भाग निकलने में पहले कमजोरों को अवसर देते हैं।

मकान तो उनके देखने ही योग्य होते हैं। पेड़ों की छाल, पत्तियाँ, घास, लकड़ी के टुकड़े, गीली मिट्टी आदि वस्तुओं की सहायता के बीवर अपने मजबूत और शानदार कमरे बनाते हैं। उनकी लम्बाई चौड़ाई 4-5 फुट और ऊँचाई 3 फुट होती है। मुलायम घास के सुविधा सम्पन्न और गरम रहने वाले बिस्तर तैयार करते हैं। पत्तियों, कलियों और दूसरी रंग-बिरंगी चीजों से वे उन्हें सजाते भी खूब हैं। इन्हें देखकर उनकी कलाप्रियता सराहने को जी करता है। परिवार की वृद्धि के साथ एक दूसरे से सम्बद्ध तथा सटे हुए नये कमरे बन जाते हैं। बड़े परिवार तो एक गाँव, मुहल्ले की तरह बने हुए देखे गये हैं।

पेड़ काटने में वह बहुत कुशल होता है। दाँतों के सहारे 100 फुट ऊँचे और 7 फुट मोटे विशाल वृक्षों को काटकर जमीन पर पटक देना उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। यह पेड़ पुल और बाँध बनाने के लिए काटता है, नदी, नालों को पार कर दूर-दूर तक आहार की खोज में जाने के लिए पुल बनाता है, काटे हुए पेड़ों को कई बीवर मिलकर कंकड़ पत्थर की सहायता से लुढ़का ले जाते हैं और उन्हें यथा स्थान जमाते हैं। वे बहने न पायें इसलिए कंकड़ पत्थरों के भार से उनके सिर दबाते हैं। यह पुल हलके फुलके नहीं वरन् कई बार तो इतने बड़े होते हैं कि हाथी उन पर से उतर जाय। किसानों को, ग्वाले गड़रियों को, इस निर्माण से जल प्रवाहों को पार करने में बड़ी सुविधा होती है।

वे अपना घर इन पुलों के आस-पास बनाते हैं और उसके दो द्वार रखते हैं एक जल की ओर दूसरा थल की ओर। आहार ढूँढ़ने और विपत्ति के समय भागने के लिए वे किसी भी क्षेत्र को चुन लेते हैं। पानी में मछली की तरह वे देर तक रह सकते हैं और वहाँ मछली, केकड़ों, मकोड़ों का शिकार करते हैं। थल में घास, छाल, कन्द, मूल बीज जो कुछ मिलता है इकट्ठा करते हैं। सर्दियों के लिए इतना आहार इकट्ठा कर लेते हैं कि उस असुविधा के समय किसी प्रकार का कष्ट न हो।

समझदारी और शालीनता का ठेका मनुष्य के पास ही नहीं है। अन्य प्राणी भी अपनी स्थिति के अनुरूप कई क्षेत्रों में काफी आगे बढ़े चढ़े हैं। हमें दूसरों से श्रेष्ठ होने का ही अहंकार नहीं करते रहना चाहिए वरन् अन्य प्राणियों से कुछ सीखना भी चाहिए। हो सके तो उनकी कुशलता बढ़ाने में सहयोग भी करना चाहिए।


प्रेम तो अद्वैत है

एक भक्त देवता के मन्दिर में गया। द्वार खटखटाया प्रवेश पाने के लिए। देवता उठकर दरवाजे पर आया और पूछा- तुम कौन हो? भक्त ने कहा- मैं हूँ आपका भक्त-प्रेमी।

देवता ने दरवाजा बन्द कर लिया-और कहा इस मन्दिर में दो के लायक जगह नहीं है। यहाँ ‘मैं’ और ‘तू’ दो नहीं रह सकते। कुछ दिन बाद वह भक्त फिर आया।

द्वार खटखटाया। देवता फिर आया और उसी तरह पूछा-तुम कौन हो। भक्त ने कहा-’तू’ देवता ने भक्त को छाती से लगा लिया और कहा-प्रेम तो अद्वैत है। वहाँ तो एक होकर ही रहा जाता है।


आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास क्रम

महात्मा वह है जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करता है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण, महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच आत्मा को महानता के स्तर तक पहुँचाया जाना संभव है और पहुँचाया जाता भी रहा है।

मर्यादाओं से आबद्ध रहकर नागरिक कर्तव्यों का पालन करते रहना, उद्धत आचरणों से बचना, शील और सौजन्य को निबाहना यह मनुष्यता का आवश्यक उत्तरदायित्व है। जिन्होंने अपने भीतर आत्मा को समझा है और उसकी गौरव महिमा को ध्यान में रखा है उसे संयम, सदाचार और कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ा हुआ शालीन जीवन जीना ही पड़ेगा।

महात्मा की गरिमा इससे अगली मंजिल है। महान का अर्थ है विशाल व्यापक। जो आत्मा अपने शारीरिक मानसिक और पारिवारिक कर्तव्यों से आगे बढ़कर विश्व मानव के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिये अग्रसर होता है मानवीय कर्त्तव्यों से आगे के देव कर्तव्यों को वहन करने के लिये तत्पर होता है वह महात्मा है। महात्मा अपने लिये नहीं सोचता, विराट के लिये सोचता है, अपने लिये नहीं करता, विराट् के लिये करता है-अपने लिये जीवित नहीं रहता, विराट् के लिये जीता है।

अपना शरीर हर छिद्र से मलीनता निस्सृत करता है। पर इसलिये कौन उसे घृणास्पद और त्याज्य ठहराता है कि इसमें गंदगी विद्यमान है। घृणा की आवश्यकता नहीं समझी जाती और शरीर को स्वच्छ करने पर ही ध्यान रहता है। अपनी ही तरह दूसरों की विविध मलीनताओं के रहते जो हेय, घृणास्पद, पतित और त्याज्य नहीं ठहराता वरन् अपनी सहज ममता से प्रेरित होकर उसे निर्मल बनाने के लिये श्रम करता है वह महात्मा है। अपना छोटा बच्चा दिनभर गलती करता रहता है, उसका बहिष्कार नहीं करते और देखभाल, डाँट डपट, तोड़-फोड़ के अवसरों की रोक-थाम करके जितना संभव होता है उस क्षति का बचाव करते हैं। इस पर भी जो हानि होती रहती है उसे सहन करते हैं। छोटे बालकों और अभिभावकों के बीच यह चिर अतीत से चला आ रहा है। दिग्भ्रान्त जन समाज के अनाचरणों के प्रति आक्रोश उत्पन्न किये बिना जो धैर्य और शान्तिपूर्वक विग्रह की रोकथाम पर ध्यान देता है उस उदारमना व्यक्ति को महात्मा कहना चाहिए।

हम अपने और अपने प्रियजनों के दुःखों से दुःखी होते हैं। इस क्षेत्र में सुख संवर्धन का प्रयत्न करते हैं। हमें अपना सुख, यश, वैभव, उत्कर्ष प्रिय लगता है और जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी इसी सुखद स्थिति में रखने के लिए प्रयत्न करते हैं, यह परिधि जब बड़ी हो जाती है और प्यार दुलार का, ममता आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ जाता है तो वैसी ही अनुभूति हर किसी के साथ जुड़ जाती है। दूसरों का कष्ट अपना कष्ट लगता है; अपने को सुखी बनाने के लिये जिस प्रकार अपना स्वभाव और चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिये विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभाषित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गये। जिसकी अहंता ग्रीष्म की हिम बन कर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिये यह महात्मा का ही विग्रह है।

जब तक स्व, पर का ऊहापोह चलता रहता है तब तक आत्मा और महात्मा का प्रेम प्रसंग आदान-प्रदान, परिहास, मनुहार चल रहा समझा जाना चाहिए। जब द्वैत की समाप्ति हो जाय और केवल एक ही शेष रहे स्व, पर का अन्तर सोचने की गुंजाइश ही न रहे तब समझना चाहिए उसी काय कलेवर में परमात्मा का अवतार हो गया।


अन्य लोक वासियों का पृथ्वी से संपर्क

30 जून 1908 साइबेरिया के ताइना प्रदेश में एक ऐसा भयंकर धमाका हुआ, जिसका कारण अभी तक ठीक तरह समझा नहीं जा सका। संध्या के बाद अँधेरी बढ़ती आ रही थी, अचानक सारा आसमान ऐसे तेज प्रकाश से जगमगा उठा मानो कई सूर्य एक साथ निकल पड़े हों। गर्मी इतनी बढ़ी कि लोग प्राण बचाने के लिए जहाँ-तहाँ दौड़े। हजारों हवाई जहाज एक साथ उड़ने जैसी भर्राहट आसमान में गूँजने लगी, उसी समय ऐसी तेज-आँधी पैदा हुई कि सैकड़ों वर्ग मील के पेड़-उखड़ गये और मकानों की छतें उड़ गई।

इस भयंकर विग्रह को दूर-दूर तक सुना, समझा देखा और अनुभव किया गया। जहाजों जैसी भर्राहट हजारों मील तक सुनी गई। यूरोप भर में तीन रातें अँधेरे से रहित पूरे प्रकाश में बीती। आकाश में बादल छाये रहे। लाल, नीले और हरे रंग की किरणें चमकती रहीं, वेधशालाओं के यन्त्रों ने भूकम्प अंकित किया। इर्कतुस्क की वेधशाला ने लम्बी पूँछ वाली तेज प्रकाश जैसी कोई वस्तु दौड़ती हुई नोट की और पुच्छल तारे जैसी आकृति बताई।

बेनोबरा तक पहुँचते-पहुँचते यह प्रकाश और भी अधिक चमक से भर गया। आग के गोले जैसा उछला और भयंकर धमाके के साथ फट गया। इस विस्फोट की गर्मी तीन दिन तक छाई रही। इसके बाद स्थिति संभली तो जाँच-पड़ताल की जा सकी। देखा गया तो सारा जंगल जलकर खाक हो गया था। बड़े पेड़ों के ठूंठ जहाँ तहाँ सुलग रहे थे। पशु-पक्षी कोयले की तरह जले-भुने पड़े थे। उस समय यही अनुमान लगाया कि आकाश से कोई उल्का जमीन पर गिरी है और उसी के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने पर जलने से यह विस्फोट हुआ है। पर यह समाधान भी पूरा और संतोषजनक नहीं था।

घटना के बीस वर्ष बाद सुयोग्य वैज्ञानिकों का एक दल नये सिरे से उस दुर्घटना की जाँच करने भेजा गया। दल ने पूरे इलाके की छान-बीन की पर उल्कापात में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होने वाले धातुओं के टुकड़े कहीं भी नहीं मिले। उल्का छोटी चीज तो होती नहीं उसका आकार बड़ा होता है। जमीन में धँसने की शंका को निवारण करने के लिए भी सारी धरती कुरेद ली गई पर उसके किसी परत में भी कुछ न मिला, उल्का धँसने पर जमीन में गड्ढा होना चाहिए सो भी कहीं न था।

एक और विशेष बात देखी गई कि पूरे ताइना प्रदेश की जमीन पर राख फैली पड़ी थी और उसमें रेडियो सक्रिय तत्व बड़ी मात्रा में मौजूद थे। उल्काओं में ऐसे तत्व कभी नहीं होते।

वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जमीन से 3 मील ऊपर अति शक्तिशाली हाइड्रोजन बम जैसा विस्फोट हुआ है। पर यह हुआ कैसे? किया किसने? बम बना कहाँ? आया कहाँ से? उस समय तक संसार में विज्ञान की जो स्थिति थी, उसमें इस प्रकार के अणु बम बनने की कतई सम्भावना नहीं थी।

रूसी वैज्ञानिकों के अग्रणी एलेक्जेंडर काजनसोव ने सन् 1959 में अपना प्रतिपादन यह प्रस्तुत किया कि अणु शक्ति से चलने वाला कोई अन्तरिक्षयान धरती पर आया, उतरने की टैक्निक ठीक तरह से न बन पड़ने से यान का आकाश में विस्फोट हो गया। इसके बाद समस्त संसार के वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए प्रयास करने लगे कि क्या अन्य ग्रहों में जीवन है? और क्या वहाँ के निवासी अन्तरिक्षयान बनाने और उन्हें पृथ्वी तक ला सकने में समर्थ हैं?

मानवी बुद्धि सीमित है उसकी जानकारी बहुत समझी जाने पर भी एक प्रकार से अति स्वल्प ही है। ब्रह्माण्ड का विस्तार ही नहीं रहस्य भी इतना बड़ा है कि उसे पूरी तरह समझ पाना भौतिक उपकरणों के आधार पर शायद कभी भी सम्भव न हो सकेगा।

व्यापकता की परिधि को स्पर्श करने वाला माध्यम केवल एक ही आत्मा का साधना समुद्भूत ब्रह्मवर्चस उसे जागृत, परिष्कृत और सूक्ष्म बनाकर उन रहस्यों को भी समझा जा सकता है जो भौतिक उपकरणों और लौकिक चिन्तन तक सीमित बुद्धि के लिए एक प्रकार से सदा रहस्यमय ही बने रहेंगे।

इस ब्रह्माण्ड में पृथ्वी अकेला ही बुद्धिधारी जीवों का ग्रह नहीं है, ऐसे-ऐसे असंख्यों पिण्ड इस विशाल ब्रह्माण्ड से भरे पड़े हैं। उनमें से कितने ही ग्रहों के निवासी हम धरती के मनुष्यों की अपेक्षा अत्यधिक ज्ञान सम्पन्न और साधन सम्पन्न हैं। जिस तरह हम लोग चन्द्रमा पर उतर चुके, सौर-मण्डल के अन्य ग्रहों की खोज के लिए अन्तरिक्ष यान भेज रहे हैं, सौर-मण्डल से बाहर के तारकों के साथ रेडियो संपर्क जोड़ रहे हैं, उसी प्रकार अन्य ग्रहों के बुद्धिमान मनुष्यों का हमारी धरती के साथ संपर्क बनाने, अनुसंधान करने का प्रयत्न चल रहा हो तो उसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है।

अति दूरवर्ती यात्राओं में साधारण ईंधन कारगर नहीं हो सकते उनमें परमाणु शक्ति को ही आधार बनाया जा सकता है। सम्भव है कि अन्य ग्रहों का अन्तरिक्ष यान पृथ्वी से संपर्क स्थापित करने आया हो और किसी गैर-जानकारी और खराबी के कारण वह नष्ट हो गया हो, उसे ही साइबेरिया में हुए अणु-विस्फोट जैसी स्थिति में देखा गया हो।

इससे पूर्व भी ऐसे कितने ही बिखरे हुए प्रमाण मिलते रहें हैं जिनसे यह अनुमान लगाया जाता है कि किन्हीं ग्रह लोकों के निवासी पृथ्वी पर आवागमन करने में किसी हद तक सफलता प्राप्त भी कर चुके हैं।

सहारा के रेगिस्तान में-सेफारा पर्वत पर ऐसी विचित्र गुफायें पाई गई जिनमें अन्य लोकवासी मनुष्यों की आकृतियाँ थी। प्रो0 हेनरी ल्होत के अन्वेषक दल ने इन विचित्र अवशेषों को देखकर उन्हें विशाल मंगल ग्रही देवता की अनुकृति बताया।

रूस के इटरुस्किया प्रदेश में भी ऐसे ही अवशेष मिले हैं जिनसे अन्य ग्रह निवासियों के साथ पृथ्वी-वासियों का संबंध होने पर प्रकाश पड़ता है।

दक्षिणी अमेरिका की ऐडीज पर्वत माला में चस्का पठार पर ऐसे चमकीले पत्थर जड़े हुए पाये गये हैं जो अन्तरिक्षयानों के प्रकाश से प्रकाशित होकर उन्हें सिग्नल देते रहे होंगे। इसी पर्वतमाला पर एक जगह विचित्र भाषा में कलेण्डर खुदा मिला है। तत्ववेत्ताओं ने इस कलेण्डर में 290 दिन का वर्ष और 24 तथा 25 दिन के महीने प्रदर्शित किये गये हैं। ऐसा वर्ष किसी अन्य ग्रह पर ही हो सकता है।

आस्ट्रिया में सौ वर्ष पूर्व 785 ग्राम भारी एक ऐसी इस्पात नली मिली है जिसे 5 करोड़ वर्ष पुरानी बताया जाता है। तब मनुष्य अपने पूर्वज बंदरों के रूप में था। उस समय तक आग का आविष्कार नहीं हुआ था तब इस्पात कौन ढालता। सोचा जाता है कि यह भी किन्हीं अंतर्ग्रही यात्रियों का छोड़ा हुआ उपकरण है। गोबी मरुस्थल के चपटे पत्थरों पर पाये गये पद चिन्हों की करोड़ों वर्ष पुरानी स्थिति में किन्हीं अन्य ग्रह निवासियों के आगमन की स्मृति आँकी जाती है।

समृद्ध लोकों में समुन्नत प्राणियों के अस्तित्व की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विज्ञान इसकी शक्यता स्वीकार करता है। अन्य लोकों से आने वाली ध्वनि तरंगों से किन्हीं प्रसारणों को सुना गया है और उनका विश्लेषण हो रहा है।

भौतिक उपकरण और भौतिक क्रिया-कलाप इस दिशा में किस हद तक कब तक सफल होगा इसे भविष्य ही बतावेगा। पर भूतकाल यह बताता है कि आत्मिक सशक्तता बढ़ाकर उसके आधार पर लोक-लोकान्तर की समुन्नत आत्माओं से न केवल संपर्क ही संभव है वरन् उनके साथ महत्वपूर्ण सहयोगात्मक आदान-प्रदान भी संभव है। स्वर्गलोक वासी देवताओं के साथ मनुष्यों के संपर्क संबंध की पौराणिक गाथाओं में ऐसे ही तथ्य विद्यमान हैं। उस विज्ञान को पुनः समुन्नत करके लोकान्तर व्यापी आत्म चेतना के साथ घनिष्ठता उपलब्ध की जा सकती है और इस प्रकार विश्व बन्धुत्व के लक्ष्य को ब्रह्माण्ड बन्धुत्व तक विकसित किया जा सकता है। साइबेरिया विस्फोट सम्भव है इसी दिशा में अँगुली निर्देश करता हो।


शक्ति की कमी सूर्य पूरी करेगा

शक्ति की पग-पग पर आवश्यकता होती है। वैयक्तिक जीवन विकास से लेकर कल कारखाने चलाने तक विविध प्रयोजनों के लिये पग-पग पर शक्ति की जरूरत पड़ती है अशक्त व्यक्ति को तो हर प्रकार से पराश्रित रहना पड़ता है; यदि सामर्थ्य और भी अधिक घट जाय तो भोजन पचाना और मल विसर्जन करना भी कठिन हो जाता है तब दूसरों की सहायता से भी कुछ काम नहीं चलता।

कृषि, उद्योग, मजूरी आदि कार्यों द्वारा आजीविका उपार्जित की जाती है इन्हें करने वालों में शारीरिक मानसिक क्षमता भी होनी ही चाहिए इसके अतिरिक्त यंत्र वाहन आदि के चलाने में भी शक्ति के आधार ढूँढ़ने पड़ते हैं। शरीर से ही सब कुछ नहीं हो जाता, उपकरणों को गतिशील करने के लिए पहले बैल घोड़ा आदि की पशु शक्ति काम में लाई जाती थी अब भाप, बिजली, तेल, अणु आदि से वह काम लिया जाने लगा है।

बढ़ते हुए उत्पादन के लिए शक्ति की अधिकाधिक मात्रा में जरूरत पड़ने लगी है। तेल, कोयला आदि साधन सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हैं। बढ़ती हुई माँग वे पूरा न कर सकेंगे और कुछ ही दिन में समाप्त हो जायेंगे तब हमें अन्य प्रकार के ऐसे ईंधन की जरूरत पड़ेगी जो भारी खर्चीला न हो तथा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो सके। इस संदर्भ में अणु शक्ति की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान गया है। प्रयत्न भी हो रहे हैं पर भारी कठिनाई यह है कि अणु भट्टियों में निकली हुई राख को कहाँ फेंका जाय। समुद्र में फेंका जाय या जमीन में गाड़ा जाय हर हालत में संकट उत्पन्न होगा। समुद्र में फेंकने पर उसका जल विषाक्त होता है, उस जल को लेकर बरसने वाले बादल संकट उत्पन्न करते हैं। जमीन की गड़ी हुई वह राख भी चुप बैठने वाली नहीं है। जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट करेगी और उगी हुई वनस्पति में तना खोद कर निकाली गई धातुओं में वह प्रभाव आवेगा। किसी कारणवश अणु भट्टी फूट पड़े तो उससे फैला हुआ विकरण व्यापक क्षेत्र में विनाश उत्पन्न करेगा। फिर अणु शक्ति उत्पन्न करने वाला ईंधन भी सीमित ही है। सदा तो वह भी काम नहीं दे सकता।

ऐसी दशा में सूर्य ही एकमात्र ऐसा शक्ति केन्द्र रह जाता है जिसके अनन्त शक्ति भण्डार में से अपने लिये आवश्यक ऊर्जा अभीष्ट मात्रा में सरलता पूर्वक ली जा सकती है और उससे उद्योग उत्पादन से लेकर परिवहन तक के विभिन्न कार्य एवं यंत्र चलाये जा सकते हैं। निकट भविष्य में सूर्य ही धरती की आन्तरिक शक्ति की आवश्यकता को पूरी करेगा।

ऊर्जा के स्रोत की समस्या के निराकरण का उपाय बताते हुए डॉ0 फ्रायलच लिखते हैं कि समस्त सौर मण्डल में दिखाई दे रही ऊर्जा जनित सक्रियता का एकमेव आधार और स्रोत सूर्य है। पिछले दिनों कुछ उपग्रह और चन्द्रयान छोड़े गये तब यह बात स्पष्ट हो गई कि सूर्य की ऊर्जा को विद्युत शक्ति में बदला जा सकता है। इन उपग्रहों में जो विद्युत संस्थान काम करता है उसके लिए लगे बिजली के सेलों की क्षमता बहुत सीमित है पर ऐसा प्रबन्ध किया गया है कि वे आकाश में सूर्य की गर्मी से बार-बार चार्ज होते हैं और इस प्रकार विद्युत-सप्लाई को शिथिल नहीं पड़ने देते।

जबकि सेल चार्ज हो सकते हैं बड़े-बड़े बिजली घरों, कल कारखानों के लिए भी विद्युत शक्ति का विपुल मात्रा में सूर्य से उत्पादन किया जा सकता है उसके लिए इंजीनियर लोग ऐसे जनरेटरों के निर्माण की दिशा में तत्पर हैं जो सूर्य की ऊर्जा को सीधे विद्युत शक्ति में बदल सकें।

डॉ0 फ्रायलच के इस सिद्धान्त की समीक्षा में ही वह सत्य भी उभर कर सामने आया जिसका प्रतिपादन इन पंक्तियों में किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ऐसी ही शक्ति मनुष्य के शरीर में भी है व्यक्तिगत आवश्यकता के छोटे-छोटे काम तो इस बिजली से भी चलाये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए टार्च का काम, पढ़ने के लिए प्रकाश का बैटरी खर्च, रेडियो ट्रांजिस्टर आदि के लिए साधारण बिजली की आवश्यकता को अपने शरीर से भी पूरा किया जा सकता है भविष्य में ऐसे “ट्रान्सफार्मर” यंत्र बन सकते हैं जो शारीरिक विद्युत को भौतिक विद्युत में बदल सकें।

तात्पर्य यह कि शरीर में काम करने वाली बिजली सूर्य-ऊर्जा का ही रूपांतर है। फ्रायलच के अनुसार मनुष्य ही नहीं यह क्रिया तो सृष्टि के हर जीव में है। तात्पर्य यह कि सूर्य ही सीधे-सीधे प्राण-प्रदाता है सृष्टि के जीवन जगत का। अब केवल मात्र प्रश्न यह है कि उस ऊर्जा को विद्युत में बदला कैसे जाए?

भौतिक यंत्रों के लिए विद्युत उत्पादन के लिए लेन्स या कोई उपकरण प्रयुक्त हो सकते हैं पर शरीर को प्राण विद्युत से भरने का माध्यम मन ही है। मन एक प्रकार से दो विजातीय वस्तुओं में सम्बन्ध स्थापित करने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग है यह बात अमेरिका के सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर, टेडसेरियस तथा जोहान्स ने सिद्ध कर दी है। टेडसेरियस कल्पना का फोटोग्राफ कैमरे में उतार देने वाले जादूगर के रूप में विख्यात हैं वे न केवल वर्तमान वरन् अतीत के भी फोटो कैमरे में उतार देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हर वस्तु में विद्युत है मन एक प्रकार से ट्रान्समीटर और रिसीवर दोनों का काम कर सकता है तब फिर सूर्य के मानसिक ध्यान द्वारा सूर्य ऊर्जा को विद्युत में रूपांतरित करने और उससे अपने शरीर में प्राणवान बनाने की प्रक्रिया को भी एक महत्वपूर्ण विज्ञान मानना चाहिए।

अगले दिनों मनुष्य को शारीरिक श्रम की अपेक्षा बौद्धिक श्रम अधिक करना पड़ेगा। उसके लिए ऐसे शक्ति स्त्रोत की आवश्यकता पड़ेगी जो प्रचुर श्रम करने योग्य सामर्थ्य मस्तिष्क को प्रदान करता रह सके। शरीर को अपना क्रिया कलाप जारी रखने और आजीविका उपार्जन के लिए जो शक्ति खर्च करनी पड़ती है उसकी पूर्ति अन्न, जल तथा वायु से हो जाती है। रस, रक्त, माँस, मज्जा आदि की आवश्यक मात्रा आहार में मिल जाती है पर चिन्तन का समय और स्तर यदि बढ़ा-चढ़ा हो तो उसके लिए अन्न से उत्पन्न होने वाला रक्त ही पर्याप्त नहीं उसे दूसरे किस्म की अतिरिक्त खुराक चाहिए जो मस्तिष्कीय सचेतन केन्द्रों की आवश्यकता पूरी करते रह सकें। यह इसलिए भी आवश्यक होगी कि शारीरिक श्रम घट जाने के कारण पाचन अंग शिथिल होंगे। खुराक थोड़ी खाई जा सकेगी फलस्वरूप उससे किसी स्वल्प मात्रा में बनेगा। वह मुश्किल से उतना होगा जिससे शरीर के दैनिक क्रिया कलाप चल सकें। मस्तिष्कीय कार्यों के लिए इस प्रकार एक और कठिनाई उत्पन्न हो जायगी।

उस कमी को पूरा करने के लिए भी सूर्य का ही आश्रय लेना पड़ेगा। भौतिक विज्ञानी इतना ही सोच और कर सकते हैं कि सूर्य से बिजली के स्तर की ऊर्जा प्राप्त कर लें। मस्तिष्कीय और चेतनात्मक शक्ति की अभीष्ट


Quotation

उद्देश्य को यदि आरम्भ से ही साधना के पथ पर थोड़ा-थोड़ा प्राप्त न करते रहें, तो इस दीर्घ अराजकता के अवकाश में साधना ही सिद्धि के स्थान पर अधिकार जमा लेगी, शुचिता को ही अन्तिम प्राप्ति समझ लेंगे और अनुष्ठान ही देवता बन जायगा।

-रवींद्र नाथ टैगोर

मात्रा प्राण के रूप में कैसे प्राप्त की जाय? यह साधना विज्ञान का विषय है। सूर्योपासना इसी प्रयोजन को पूरा करती है, उससे आहार द्वारा स्वल्प मानसिक शक्ति के झंझट से बचकर अभीष्ट मात्रा में सूर्य से मस्तिष्कीय शक्ति प्राप्त की जा सकती है। उतना ही नहीं, ओजस्, तेज और वर्चस्व भी इतना मिल सकता है जिससे व्यक्तित्व को हर दिशा में तेजस्वी और प्रतिभावान बनाया जा सके। सूर्योपासना एक विशुद्ध विज्ञान है जिससे मानव जीवन की अगणित आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य सशक्तता प्राप्त होती है। गायत्री मंत्र द्वारा सूर्य शक्ति का आह्वान करके हमारे पूर्वज अपने व्यक्तित्व को सर्व समर्थ बनाये रहने में सफलता प्राप्त करते रहे। हमारे लिये भी उस पथ का अनुसरण श्रेयस्कर ही होगा।


कर्मफल और स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया

स्वर्ग और नरक नाम के कोई नगर-ग्राम, देश या स्थान कहीं भी नहीं है। सौर मण्डल के ग्रह उपग्रहों को खोज लिया गया है। इस निखिल ब्रह्माण्ड के तारकों महासूर्यों और आकाश गंगाओं की अद्यावधि जानकारियों में अब तक ऐसे किसी लोक के अस्तित्व की सम्भावना नहीं दीखती जैसी कि विविध धर्म सम्प्रदायों में उनका अपने-अपने ढंग से उल्लेख किया है।

तब क्या स्वर्ग नरक, मात्र कल्पना भर हैं। कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए कोई माध्यम नहीं है क्या? जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल सका उनके लिए ईश्वर के दरबार में कोई व्यवस्था नहीं है क्या? सद्गति और दुर्गति का कोई माध्यम न हो तो फिर शुभ कर्म और अशुभ कर्म करने वालों का तदनुरूप प्रतिफल कैसे मिलेगा? आदि अनेक प्रश्न उभर कर आते हैं और यह असमञ्जस उत्पन्न करते हैं कि यदि स्वर्ग-नरक का अस्तित्व था ही नहीं तो धर्म संस्थापकों ने इतना बड़ा उनका कलेवर रचकर खड़ा क्यों कर दिया?

हमें जानना चाहिए कि स्वर्ग नरक दोनों का अस्तित्व है और उनके माध्यम से शुभ-अशुभ कार्यों के फल मिलने की समुचित व्यवस्था मौजूद है। अन्तर केवल स्थान विशेष का है सन्देहास्पद बात केवल इतनी भर है कि उनके लिए कहीं कोई नियत ग्राम या स्थान है या नहीं।

इहलोक हमारा प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप और परलोक हमारा भावनात्मक दृष्टिकोण है। इन दोनों ही लोकों में कर्म फल मिलने की समुचित व्यवस्था मौजूद है। उसका निर्माण स्वसञ्चालित प्रक्रिया के आधार पर हुआ है। किसी बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप की उसमें आवश्यकता नहीं है। यही व्यावहारिक भी था और तर्कसंगत भी। एक छोटे से मुकदमे का फैसला कराने में कितने वकील, गवाह, जज, पुलिस आदि कार्यकर्त्ता लगते हैं। कितने कागज, सबूत इकट्ठे करने पड़ते है। मनुष्य जीवन में क्षण-क्षण पर भले-बुरे कर्म बनते हैं। एक दिन में ही उनके दण्ड पुरस्कार की सैंकड़ों मिसल फाइलें बन सकती है। जीवन भर में तो वे असंख्यों हो जायेंगी। फिर तीन सौ करोड़ से अधिक मनुष्य इस धरती पर मौजूद हैं। उन सबका लेखा-जोखा रखना-और दण्ड पुरस्कार का विधान बनना इतना बड़ा हो जायगा कि उसके लिए मनुष्य लोक से अधिक कर्मचारी लग जायेंगे। अस्तु अन्य सत्ता के माध्यम से दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था होना एक प्रकार से कठिन ही नहीं असम्भव भी है।

मनुष्य को जहाँ इच्छा पूर्वक भले-बुरे कर्म करने की स्वतन्त्रता मिली है वहाँ उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने और परिणाम प्रस्तुत करने की स्वसञ्चालित प्रक्रिया भी साथ ही जोड़ दी गई है। समस्त सृष्टि में यही हो रहा है, बीज जमीन में बोया जाता है, खाद, पानी मिलते ही वह अंकुरित होता है और पौधा वृक्ष बनने लगता है। ईश्वर सर्वत्र समाया हुआ है इसलिये यह कार्य ईश्वर करता है यों कहने में भी हर्ज नहीं है। पर ईश्वर भी इतना झंझट कहाँ तक सिर पर लादता उसने स्वसञ्चालित प्रक्रिया बनाकर अपना कर्म फल संबंधी प्रयोजन सरल कर लिया है।

चक्की में ऊपर से अनाज डालते हैं नीचे आटा निकलता जाता है। कोल्हू में ऊपर से सरसों डालते ही तेल टपकता रहता है। मोटर में मीटर लगा रहता है और वह बताता रहता है कि कितने मील चल दिये। यह स्वसञ्चालित मशीनों का जमाना है। बड़े-बड़े प्रिंटिंग प्रेस घण्टे में हजारों कागज इसी आधार पर छापते हैं। एक बार मशीन चला दी फिर सारा काम अपने आप वे मशीनें करती रहती हैं। इधर कच्चा माल डाला जाता रहता है उधर से तैयार बनकर निकलता रहता है।

कर्मफल की प्रक्रिया भी इसी तरह की है। बुरे कर्म के दुखद परिणाम जिन्हें नरक कहते हैं, निश्चित रूप से मिलते हैं और भले कर्मों का सत्परिणाम जिन्हें स्वर्ग कहा जाता है मिलना भी उतना ही सुनिश्चित है। यह स्वसंचालित ढंग से होता रहता है। शरीर अपने कर्म-फल की व्यवस्था स्वयं कर लेता है। बैठे रहिए तोंद बढ़ जायगी और चलना फिरना कठिन-अपच, दिल की धड़कन आदि कितने ही कष्टकर रोग घेर लेंगे। श्रम करना धर्म है और हरामखोरी पसीना न बहाना अधर्म। शारीरिक पाप किया बैठे रहने का उसका फल मोटापे के साथ जुड़े हुए कष्टों के रूप में सामने आ गया। अधिक खाया-पेट में दर्द-रात भर जगे-सिर में दर्द, नशा पिया बदहोशी, जहर खाया-मौत, स्नान करने में आलस-बदबू, जुँऐ, खाज। नियमित व्यायाम पहलवान, पथ्य परहेज-निरोगता, यह दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था शरीर अपने आप ही किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना स्वतः ही कर लेता है। कर्म करने की अपनी इच्छा-फल देने की उस स्वसंचालित-ईश्वरीय सत्ता की इच्छा। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। कर्म कर लें उसके फल से बचे रहें यह नहीं हो सकता।

आलसी दरिद्री रहते हैं, प्रमादी के लिए प्रगति के द्वार बन्द हो जाते हैं, क्रोधी शत्रुओं से घिर जाता है, धूर्त मित्रों से वंचित हो जाता है, बेईमान के सहयोगी बिछुड़ जाते हैं, उद्दण्ड को घृणा मिलती है, अपव्ययी ऋणी बनता है। यह दण्ड व्यवस्था हर किसी को पग-पग पर अनुभव होती है। श्रेष्ठ गुण, श्रेष्ठ स्वभाव और श्रेष्ठ कर्म करते हुए मनुष्य सम्मानित, यशस्वी, सहयोग सम्पन्न, समृद्ध सफल बनता है और उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है। स्वयं सुखी रहता है और दूसरों को सुखी बनाता है। यह कर्म फल की-स्वर्ग नरक प्रक्रिया निरन्तर सामने रहती है। पापी, दुष्ट, दुरात्मा राजदण्ड भुगतते हैं, घृणास्पद बनते हैं और स्नेह सहयोग से वंचित होकर मरघट के प्रेत पिशाच बने एकाकी घूमते हैं। यह घृणित जीवन नरक नहीं है तो और क्या है? सेवा भावी, सद्गुणी, सन्त-सज्जन धरती के देवता समझे जाते हैं और मरने के बाद भी वन्दनीय, श्रद्धास्पद ही बने रहते हैं, उनकी यश गाथायें अनेकों को प्रेरणा भरा प्रकाश देती रहती हैं। इसे स्वर्ग प्राप्ति न कहें तो और क्या कहें? सम्मानास्पद, श्रद्धा पात्र सज्जन और प्रामाणिक किसी व्यक्ति को माना जाय इससे बढ़कर सौभाग्य और सन्तोष की बात और क्या हो सकती है। इस प्रकार के कर्म फल प्राप्त करते रहने की-स्वर्ग नरक जैसी प्रक्रिया हम निरन्तर फलित होती देखते रहते हैं।

कई व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर अपनी वस्तु स्थिति छिपा लेने में प्रवीण बन जाते हैं और इस प्रकार पाप कर्म करते हुए दूसरों द्वारा मिलने वाले दण्ड से बच निकलने की तरकीब निकालते हैं। यह चतुरता आज कल बहुत चल पड़ी है। इससे कुछ लाभ तो है पर हानि उससे कहीं अधिक है। लाभ यह है कि सरकार की पकड़ में आने पर राजदण्ड से बच जाते हैं। पाप प्रकट न हो तो दूसरों के द्वारा घृणा निन्दा एवं विलगता से होने वाली हानि बच जाती है। पर इसमें जो छिपाव का ताना-बाना बुनना पड़ता है वह अंतर्मन में एक विचित्र प्रकार की घुटन पैदा करता है। दुष्कर्म के साथ दुराव मिल जाने से भाँग में भी अफीम मिली बन जाती है। अंतर्मन की बनावट ऐसी है कि वह इस घुटन को पचा नहीं सकती।

नीला थोथा खा लेने पर उलटी हुए बिना रहती नहीं। जमालगोटा खा लेने पर दस्त जाना ही पड़ेगा। कच्चा पारा खालें तो शरीर में से फोड़े बनकर फूटेगा। यह विष ऐसे हैं जो पच नहीं सकते। पच जायें तो और भी भयंकर प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं और जीवन दुर्लभ कर देते हैं। ठीक उसी प्रकार दुष्कर्म और दुराव मिलकर एक ऐसा विष बनाते हैं जिसे चतुर मनुष्य देर तक छिपाये तो रह सकते हैं पर अंतर्मन को पचा लेने के लिए रजामन्द नहीं कर सकते। सिगरेट का धुआँ पेट में भर लेना तो सम्भव हैं पर वहाँ रुक नहीं सकता। मुँह बन्द कर लें तो नाक में से होकर बाहर आयेगा। भीतर किसी भी हालत में रुकेगा नहीं।

हवा भरे गुब्बारे को पानी में जितने जोर से डुबाते हैं अवसर मिलते ही वह उसी वेग से उछलकर ऊपर आ जाता है। छिपे हुए पाप शारीरिक व्याधि और मानसिक ‘आधि’ बनकर समय-कुसमय ऐसी बुरी तरह फूटते हैं कि कारण प्रतीत नहीं होता। चिकित्सा उपचार काम नहीं करते। यह पाप शरीर और मन को कष्ट देने तक ही सीमित नहीं रहते वरन् अन्तरिक्ष में अनेक अदृश्य विपत्तियों का सृजन करते रहते हैं। पत्थर के कोयले की अँगीठी कितने ही व्यक्ति ठण्ड से बचने के लिए कमरे में बन्द करके रख लेते हैं। तत्काल ठण्ड से तो बचत दीखती है पर आकाश में ऐसा विष भर जाता है जिससे सोते-सोते ही उनकी मौत हो जाती है। शरीर में चोट नहीं लगी, बुखार आया नहीं, मस्तिष्क की नस फटी नहीं, सब कुछ ज्यों का त्यों; मौत का कुछ कारण मोटी आँख से दिखाई नहीं पड़ता। पर जानकार जानते हैं कि अँगीठी ने वायु में विष घोल दिया और वही मौत का कारण बना। ऐसे कितने ही अज्ञात अप्रत्यक्ष कारण अनायास ही विपत्ति बनकर सामने आ जाते हैं, जिनका अपने तात्कालिक क्रिया कलाप से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं दीखता। इसी प्रकार कई बार सुविधा सफलतायें भी मिल जाती हैं जिनके लिए उचित श्रम और प्रयत्न नहीं किया गया होता। यह असंगत अवरोध और अनुदान-दैव इच्छा एवं भाग्य का खेल बनकर सामने आते हैं। उनका प्रत्यक्ष कारण नहीं दीखता पर परोक्ष कारण वह स्वसंचालित प्रक्रिया ही होती है जिसने अपने कर्मों का फल अन्तरिक्ष में धीरे-धीरे तदनुरूप वातावरण बनाया और वह भले बुरे अप्रत्याशित अवसर सामने आकर खड़े हो गये।

समय लग सकता है। आज का फल आज मिलने से व्यक्ति श्रम में पड़ सकता है और यह सोच सकता है कि बुरे कर्म के दण्ड से बच गये या भला कर्म निष्फल चला गया, पर वस्तुतः ऐसा होता कभी नहीं। तुरन्त या कालान्तर में इसका रहस्य अज्ञात होने के कारण प्रत्यक्ष वादी, उतावले, अनास्थावान हो उठते हैं पर यदि धैर्य रखा जाय तो प्रतीत होगा कि इसी जन्म में अथवा अगले जन्म में प्रत्येक कर्म का भला बुरा परिणाम मिलना सुनिश्चित है। उसी व्यवस्था क्रम पर तो यह विश्व टिका हुआ है, यदि यह असंदिग्ध हो जाय तो फिर ऐसा अन्धेर फैले-ऐसी अराजकता उपजे कि कहीं कुछ सँभलना-सँभालना सम्भव न हो सके। फिर न कोई पाप से डरे और न पुण्य का झंझट और नुकसान उठाये।

दृष्टिकोण अपने आप में चित्त की प्रसन्नता अप्रसन्नता-सन्तोष, असन्तोष, शान्ति-अशान्ति बनकर पग-पग पर फलित होता रहता है। सत्कर्म करने पर मन में अनायास ही सन्तोष और उल्लास उठता रहता है। किसी कष्ट पीड़ित की सहायता अपना काम हर्ज करके यदि कर दी जाय तो भीतर ही भीतर एक परम सात्विक हलका और शीतल मलयज पवन जैसा आनन्द उठता अनुभव होगा। इसके विपरीत यदि चोरी, ठगी, अनीति बरत कर किसी को क्षति पहुँचाई होगी तो भीतर ही भीतर कोई खटमल, पिस्सू की तरह काट रहा होगा और आत्म ग्लानि से अन्तःकरण में उद्वेग बढ़ रहा होगा। वस्तुतः यही आत्म सन्तोष और आत्म धिक्कार अन्तःकरण को बलिष्ठ और दुर्बल बनाते हैं और इसी आधार पर प्रगति के अगणित मार्ग खुलते और अवरुद्ध होते हैं। पापी का अन्तरात्मा दिन-दिन दुर्बल होता जाता है दूसरों पर से ही नहीं अपने पर से भी उसका विश्वास उठ जाता है। आत्मबल खोकर मनुष्य चैन नहीं पा सकता भले ही उसके पास पैसे कौड़ियों के टीले क्यों न जमा हो जायें। आत्म ग्लानि से भरी मनोभूमि को नरक कहा जा सकता है क्योंकि प्रकारान्तर से अनेक दुश्चिन्तायें, आशंकायें, विभीषिकायें इतना सताती हैं कि उसकी तुलना में नरक वर्णित कष्टों की तुलना सहज ही की जा सके।

जो हर युवती को अपनी पुत्री की तरह देख सके-पराये पैसे को ठीकरी जैसा समझे, अपने स्वल्प उपार्जन से सादगी का जीवन जीते हुए सन्तुष्ट रहे, चरित्र उज्ज्वल रखे और दूसरों के प्रति स्नेह सहयोग भरा दृष्टिकोण रखे-उसे निरन्तर अपने भीतर एक अमृत जैसी निर्झरणी कल-कल ध्वनि से प्रवाहित होती हुई अनुभव होगी और लगेगा कि भावना क्षेत्र में स्वर्गीय सुषमा ही प्रादुर्भूत हो रही है।

मरने के बाद भी भले-बुरे कर्मों के दण्ड कितने ही प्रकार से मिलते होंगे। दो जन्मों के बीच सुखद और कष्ट कर स्थिति रहती होगी, अगले जन्म उत्कृष्ट या निकृष्ट मिलते होंगे। स्वर्ग नरक का स्थान भाव नगर ही सही-प्रतिफल की व्यवस्था मरणोत्तर जीवन में भी रहती होगी। पर इस जन्म में तत्काल भी भले-बुरे परिणाम मिलते रहते हैं और स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया भी हमें नियन्त्रण में रहने और विवेक पूर्ण रीति-नीति अपनाने के लिए बाध्य करती रहती है।


हृदय आरोपण या हृदय परिवर्तन

चिकित्सा शास्त्र की शल्य क्रिया शाखा एक व्यक्ति के शरीर का दूसरे शरीर में आरोपण करने की विधि-व्यवस्था में एक बड़ी सीमा तक प्रगति कर चुकी है। किसी की आँख किसी के शरीर में लगाई जा सकती है। हड्डियों का आरोपण भी इसी तरह किया जाता रहा है। गुर्दे भी बदल गये हैं। एक व्यक्ति का रक्त दूसरे की नसों में चढ़ाने की प्रक्रिया तो बहुत दिनों से चल रही है। बन्दर की पौरुष ग्रन्थियाँ मनुष्य के शरीर में लगा कर बुढ़ापे को जवानी में परिवर्तन करने का प्रयत्न किया जाता रहा है।

जहाँ तक शल्य-क्रिया का संबंध है वहाँ तक इस क्रिया-कलाप की विधि-व्यवस्था संबंधी जानकारी को सराहा ही जायगा और यही कहा जायगा कि मनुष्य की तत्परता एवं प्रयत्नशीलता किसी भी क्षेत्र में कुछ भी चमत्कार दिखा सकती है।

इतना होते हुए भी प्रकृति के साथ इस दिशा में प्रबल संघर्ष करना पड़ रहा है और उसमें सफलता नहीं मिल रही है। हर व्यक्ति की मूल प्रकृति में काफी अन्तर रहता है। यों कहना चाहिए कि जितने व्यक्ति उतनी प्रकृति होती है। किसी की आकृति किसी से नहीं मिलती। हर मनुष्य की शक्ल अपने ढंग की अनोखी है। उस तरह का दूसरा व्यक्ति-कभी हुआ है और न होगा। मनुष्य ही क्यों पशु पक्षियों में भी यही भिन्नता पाई जाती है। तभी तो गड़रिया अपनी भेड़ों में से एक भी बिछुड़ कर दूसरे झुण्ड में चली जाय तो आसानी से पहचान लेता है। मोटे रूप में सब भेड़ें एक सी दीखते हुए भी वस्तुतः उनकी बनावट में अन्तर होता है। शक्ल, सूरत की तरह ही शरीर की अन्तरंग प्रक्रिया में, भारी अन्तर पाया जाता है भले ही वह मोटे विश्लेषण में समझ में न आये।

यह अन्तर अपने स्तर में भिन्न स्तर को स्वीकार नहीं करता और यदि ठूँसा जाय तो विद्रोह खड़ा कर देता है। यदि अपने रक्त से मिलते-जुलते वर्ग का रक्त नसों में प्रवेश करें तो ही शरीर उसे स्वीकार करेगा अन्यथा भिन्नता रही तो विद्रोह खड़ा हो जायगा और जिस लाभ की आशा से रक्त चढ़ाया गया था उसकी अपेक्षा दूसरी तरह की हानि खड़ी हो जायगी, अन्य अवयवों के बारे में भी यही बात है। आँख, गुर्दा, पौरुष ग्रन्थि आदि अवयव यदि अपने शरीर की प्रकृति से तालमेल खाते हैं तो ही उनका आरोपण सफल होगा, अन्यथा वह प्रयास निरर्थक हो जायगा। कई बार तो उल्टी हानि की आशंका रहेगी।

हृदय आरोपण का प्रयत्न इन दिनों बड़े उत्साह के साथ चल रहा है। पर उसमें भी यही कठिनाई है। हृदय अन्य अंगों की तुलना में और भी अधिक संवेदनशील होता है इससे दूसरे शरीर की भिन्न स्थिति को आत्म-सात करने के लिए प्रकृति तैयार नहीं होती, फलस्वरूप वे प्रयत्न अक्सर असफल हो जाते हैं।

केपटाउन (अफ्रीका) के अस्पताल में एक 25 वर्षीय युवती डेनेज डारवाल घायल अवस्था में दाखिल हुई। 2 दिसम्बर 67 को मोटर दुर्घटना में वह लड़की कुचल गई। डाक्टरों ने उसके अच्छे हो सकने की सम्भावना से इनकार कर दिया।

इसी समय एक हृदय रोगी वाशंकाँस्की के लिए हृदय बदलने की आवश्यकता अनुभव की गई थी। घायल लड़की के माँ बाप ने उसका हृदय दूसरे रोगी के लिए देना स्वीकार कर लिया।

डॉक्टर बर्नार्ड ने अपने 30 सुयोग्य साथियों की सहायता से यह कार्य अपने हाथ में लिया दोनों के हृदय निकाले गये। लड़की का हृदय-वाशंकाँस्की को लगाया गया यह प्रक्रिया बड़ी जटिल थी पर उसे कुशल सर्जनों द्वारा होशियारी से पूरा कर लिया गया।

कई दिन पश्चात् होश में आने के बाद वाशंकाँस्की ने आंखें खोली। प्रेस टेलीविजन को इण्टरव्यू दिया और आपरेशन की सफलता व्यक्त की। इससे आशा की जाने लगी कि यह हृदय आरोपण प्रक्रिया सफलता की ओर बढ़ेगी।

किन्तु भवितव्यता को कुछ और ही मंजूर था रोगी की स्थिति बिगड़ने लगी। एक सप्ताह बाद उसके शरीर में श्वेत रक्त कणों ने विरोधी प्रतिक्रिया आरम्भ कर दी। दवाओं की बेहोशी से शरीर जैसे ही सम्भला कि प्रतिक्रिया तेज होती चली गई। उसे निमोनिया हुआ और 18 दिन उपरान्त उसकी मृत्यु हो गई।

हृदय आरोपण की सफलता अभी पूर्णतया संदिग्ध है। जो प्रयोग परीक्षण किये गये हैं उन पर अध्ययन करना शेष है कि यह जादुई कौतुक के स्तर पर नहीं-व्यापक सम्भावनाओं को देखते हुए सम्भव भी है या नहीं, फ्रांसिस्को में सम्पन्न हुए डाक्टरों के एक सम्मेलन ने राष्ट्र संघ से माँग की है कि फिलहाल समस्त विश्व में हृदय आरोपण के प्रयोग बन्द करा दिये जायें क्योंकि अब तक जितने आपरेशन इस तरह के हुए हैं उनके साथ जुड़ी हुई समस्या इतनी अधिक और इतनी गम्भीर है कि उनके अध्ययन करने और निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए अभी काफी काम करना शेष है।

एक व्यक्ति का हृदय दूसरे व्यक्ति को लगाने के संबंध में अनेक नैतिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं। वर्तमान कानून के अनुसार आत्महत्या को अपराध माना गया है। जिस प्रयत्न में मरण निश्चित हो उसे आत्म-हत्या माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी को अपना हृदय देता है तो फिर वह स्वेच्छा मृत्यु आत्महत्या की श्रेणी में क्यों न गिनी जायगी? फिर जो व्यक्ति दूसरे का हृदय अपने में लगवायेगा क्या वह नर-बलि वाले कानून की पकड़ में न आयेगा? क्या उसे स्वार्थ प्रयोजन के लिए दूसरे का प्राण लेने वाला हत्यारा न कहा जायगा?

स्वेच्छा हृदय दान के उपरान्त दूसरी स्थिति वह आती है जिसमें किसी दुर्घटना-ग्रस्त या रोग-ग्रस्त व्यक्ति के अन्य अंग तो मृतक घोषित कर दिये जायें किन्तु हृदय ठीक हो। ऐसे अचेतन व्यक्ति का हृदय यदि उसके घर वाले निकालने की स्वीकृति देते हैं तो देखना यह होगा कि क्या उन्हें उस तरह से स्वीकृति देने का अधिकार भी है? डॉक्टर यदि किसी को पूर्ण मृत घोषित कर देते हैं तब तो उसका हृदय भी बेकार हो जायगा। यदि जीवित रहते हृदय निकाला जाता है तो यह कैसे कहा जा सकेगा कि उस तथा-कथित सम्भावित मृतक को अच्छा न किया जा सकेगा। अनेक घटनायें ऐसी होती रहती हैं जब उनमें एक बार मान लिया गया कि व्यक्ति लगभग मर गया। उसके मृतक कृत्य की तैयारी पूरी कर ली गई, फिर प्राण लौट आया और वह जीवित हो सका। ऐसी दशा में किसी डॉक्टर को पूर्ण मृत होने से पूर्व यह भविष्य वाणी करने का अधिकार कैसे मिल सकता है कि यह व्यक्ति अवश्य ही मर जायगा?

जीवित व्यक्ति का हृदय लिया जाना-नैतिक और कानूनी प्रश्न है। पूर्ण मरने पर हृदय बेकार। जीवित स्थिति में लेने से हत्या या आत्महत्या का अपराध। जब तक न्याय और औचित्य की दृष्टि से यह निश्चित न हो जाय कि इस प्रकार का हृदय दान उचित है-उसका आदान-प्रदान, आरोपण एक उलझन भरा गम्भीर प्रश्न ही बना रहेगा। फिर जितने हृदय रोगी आज हैं, उनके लिए इतने हृदय दान मिल भी कहाँ सकेंगे? प्रयोग परीक्षण की बात दूसरी है पर इससे हृदय रोगों का उपचार का सर्व सुलभ मार्ग तब भी नहीं निकलेगा जब हृदय आरोपण को कानूनी सहमति भी मिल जाय। फिर उसके पीछे वह आशंका भी विद्यमान है कि सम्पन्न लोग प्रलोभन अथवा अनाचार के बल पर स्वार्थ साधन के लिए अनैतिक तरीकों से ‘हृदय’ प्राप्त करने की दुरभि संधियाँ करने-कराने लगेंगे और संसार में एक नये अनाचार का द्वार खोलेंगे।

तात्विक दृष्टि से यह तथ्य अंगों के आरोपण में ही नहीं-हर क्षेत्र में सदा प्रखर रहेगा कि समान स्थिति ही आत्मसात की जा सकती है। प्रकृति में बहुत अधिक भिन्नता होने पर तालमेल बैठता नहीं इसलिए समूह रचना, संगठन, मैत्री, परिवार, विवाह आदि प्रयोजनों में समान विचार, समान उद्देश्य, समान स्वभाव और समान प्रकृति का तालमेल ही ठीक बैठता है। या तो वह पहले से ही अनुकूल हो या फिर पीछे प्रयत्न करके अनुकूलता उत्पन्न की जाय, यदि ऐसा न हो सका प्रकृति भिन्नता बनी रही तो समन्वय काम-चलाऊ ही रहेगा उसमें गहराई न आ सकेगी आत्मसात होने की प्रक्रिया भी न बन पड़ेगी और वह समन्वय ऐसा ही उखड़ा-उखड़ा सा रहेगा। यदि भिन्नता, प्रतिकूलता के स्तर पर पहुँच गई तो वह विच्छेद विद्रोह की स्थिति उत्पन्न होकर ही रहेगी। इसलिए समूह रचना की दिशा में कदम बढ़ाते हुए प्रकृतिगत समानता ढूँढ़ने या विनिर्मित करने की आवश्यकता को भुला न दिया जाना चाहिए।

शत-प्रतिशत समानता तो नहीं मिलती पर जिसका रक्त स्तर जिसके रक्त से समान पड़ता है उसे शरीर स्वीकार कर लेता है। पूर्ण प्रकृति तो किसी की भी नहीं मिलती, पर जिनमें अधिकतर समानता रहती है उनका स्नेह संबंध बना रह सकता है। पर यदि दिशायें उल्टी रहीं-और परिवर्तन संभव न हुआ तो वह बन्धन हर दृष्टि से कष्टकर और असफल ही बना रहेगा। अंगों के आरोपण की तरह मैत्री परिवार बढ़ाने की आवश्यकता पूरी करने के प्रयास में भी यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।

हृदय आरोपण का प्रश्न वस्तुतः जटिल और विचारणीय है। हृदय के रुग्ण हो जाने पर जीवन की स्थिरता ही संकट में पड़ जाती है और कभी भी प्राण संकट उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है। अस्वस्थ हृदय यदि बदल कर उसके स्थान पर स्वस्थ का आरोपण हो सके तो निस्सन्देह एक बहुत बड़ी बात हो सकती है और नवजीवन की संभावनायें साकार हो सकती हैं।

एक आदमी का हृदय दूसरे को लग सकता है कि नहीं इसका निष्कर्ष निकालना शरीर शास्त्रियों का काम है, यह प्रक्रिया नैतिक है या अनैतिक यह निर्णय करना न्याय शास्त्र का काम है। जितने हृदय के रोगी हैं उतने स्वस्थ हृदय मिल भी सकेंगे क्या? उनका मूल्य चुकाना और आपरेशन फीस चुका सकना सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिए संभव है क्या, इसका विचार करना समाज शास्त्र वेत्ताओं की परिधि में आता है। उन्हें अपने-अपने ढंग से सोचना चाहिए और यदि हृदय आरोपण उचित और सरल हो तो उसके लिए अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अध्यात्म शास्त्र हृदय आरोपण की बात तो नहीं करता पर हृदय परिवर्तन का प्रतिपादन करता है और इसे सर्वथा सम्भव बताता है। हृदय रुग्णता की तरह ही हृदयगत विकृति भी भयावह है।

हृदय रोगों की तरह हृदय विकृतियों के होने वाली हानियों पर भी विचार किया जाना चाहिए और हृदय चिकित्सा की तरह भाव-विकृतियों के निराकरण को भी महत्व मिलना चाहिए। हृदय आरोपण को शरीर शास्त्री जितना महत्व दे रहे हैं उससे अधिक महत्व अध्यात्म शास्त्रियों को हृदय परिवर्तन पर देना चाहिए।

हृदय आरोपण सफल होने पर भी मनुष्य जैसे का तैसा रहेगा पर हृदय परिवर्तन होने पर वह तत्काल तुच्छ से महान बनेगा। वाल्मीकि, अँगुलिमाल, अजामिल, विल्व मंगल का हृदय परिवर्तन ही हुआ था कि उनका कलुषित जीवन मूर्तिमान देवत्व बन गया। छोटे घर परिवारों में उत्पन्न हुए व्यक्ति अपने में महानता विकसित करते ही ऐसे मार्ग पर चल पड़े जिस पर उन्होंने आत्म-कल्याण भी किया और विश्व-कल्याण में ऐतिहासिक योगदान दिया। कबीर, रामदास, रामकृष्ण परमहंस, शंकराचार्य, रामतीर्थ, विवेकानन्द, तुलसीदास आदि की असामान्य स्थिति का कारण उनके दृष्टिकोण का बदलना-हृदय परिवर्तन ही एकमात्र कारण था। गाँधी, बुद्ध, मीरा, ईसा आदि का महान जीवन उनकी साधना-सुविधा ने नहीं हृदय परिवर्तन ने ही सम्भव किया।

सहृदय व्यक्ति अपने हृदय के टुकड़े काट कर अनेकों के हृदय क्षेत्र में बो सकता है। गन्ना, गुलाब, बरगद, चाँदनी आदि की डालियाँ काट कर बोई जाती हैं और वे ही अंकुरित होकर नया पौधा बन जाती हैं। हृदय आरोपण तो एक व्यक्ति का रक्त पिण्ड दूसरे को देने से एक का ही लाभ होता है और वह भी तब जबकि देने वाले को लेने वाले के पक्ष में अपने जीवन का अन्त करना पड़े। हृदय परिवर्तन में ऐसी बात नहीं है। सहृदय व्यक्ति अपनी महानता, ममता, क्षमता दूसरों के अन्तःकरण में आरोपित कर सकता है। अपने टुकड़े काट कर वह दूसरों को देता चलता है उससे अन्य लोग महान बनते हैं पर देने वाले को कोई क्षति नहीं उठानी पड़ती है वरन् आन्तरिक उल्लास का लाभ होता है। हमें हृदय परिवर्तन के अस्पताल खोलने चाहिए और उसकी शल्यक्रिया का विधान जानना चाहिए। यह प्रयोग हृदय आरोपण से अधिक श्रेष्ठ और श्रेयस्कर सिद्ध होगा।


आकाशगमन और जल गमन की सिद्धियाँ

अगस्त 62 की अन्तरिक्ष उड़ान में वोस्तोक-3 यान की यात्रा करने वाले निकोलायेव ने अन्तरिक्ष की स्थिति का कुछ विवरण सुनाते हुए कहा था-अन्तरिक्ष में फर्श, जमीन, दीवार आदि छूकर चलने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। खाली पोल में आदमी सहज ही चल सकता है। यान की दीवार से उंगली छूकर एक छोटा धक्का देना काफी है। इतने भर में चलने की गति उत्पन्न हो जायगी। फिर मजे में चलते रहिए। हाथ और पैरों की सहायता से किसी भी दिशा में बढ़ा चला जा सकता है। चल ही नहीं वहाँ पानी की तरह तैर भी सकते हैं। तैराक पानी को हाथ पैरों से धक्का देकर अपनी गति बढ़ाता है। अन्तरिक्ष के शून्य में भी उसी तरह तैरा जा सकता है।

गुरुत्वाकर्षण की परिधि से बाहर जाकर स्थूल शरीर का अन्तरिक्ष की पोल में कितनी ही दूरी तक चलना, दौड़ना, तैरना सम्भव है। उसमें आरम्भ में एक छोटे झटके की और पीछे संकल्प शक्ति के आधार पर हाथ पैरों की थोड़ी हरकत करने भर की जरूरत पड़ेगी। इस स्थिति को प्राप्त कर लेना अब अधिक कष्ट साध्य नहीं रहा। सिद्धान्ततः तो वह स्वीकार ही कर लिया है और अन्तरिक्ष में तथा धरती पर भारहीनता की स्थिति में मनुष्य का आकाश गमन प्रत्यक्ष करके देख लिया गया है।

गुरुत्वाकर्षण से रहित कमरे पृथ्वी पर बनाये गये हैं। भारहीनता की स्थिति का अभ्यास कराने के लिए अन्तरिक्ष यात्रियों को उन्हीं कमरों में रखकर उस तरह की स्थिति का अनुभव कराया जाता है। अस्तु अब यह भी आवश्यक नहीं रहा कि गुरुत्वाकर्षण की परिधि में ऊपर उठने के बाद ही आकाश गमन किया जा सके। पृथ्वी के किसी कमरे में विज्ञान ने उस तरह का वातावरण उत्पन्न करके यह सिद्ध कर दिया है कि गुरुत्वाकर्षण से रहित अन्तरिक्ष की स्थिति गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के भीतर भी पैदा की जा सकती है।

योग सिद्धियों में वर्णित आकाश गमन जैसी सिद्धियों की चर्चा को दन्त कथा नहीं मान लिया जाना चाहिए। मानव शरीर में भौतिक उपकरण में प्रयुक्त होने वाले सारे आधार बीज रूप में मौजूद हैं उन शक्ति बीजों को विकसित करके शरीर के कणों को इतना हल्का बनाया जा सकता है जिन पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव न पड़े और मनुष्य का आकाश में उड़ सकना संभव हो सके। प्रयोग की बात आगे की है। पर सिद्धान्त रूप में उसे अब असंभव नहीं कहा जा सकता। मनोबल की प्रचण्ड क्षमता का, शारीरिक विद्युत का मस्तिष्कीय कम्प्यूटर का कायिक रेडिया सक्रियता का वैज्ञानिकों ने जो परिचय पाया है उससे वे आश्चर्यचकित रह गये हैं। सूक्ष्म क्षेत्र की परिधि भौतिक विज्ञान के क्षेत्र से बाहर हैं। षट्चक्र, तीन ग्रंथियाँ, पंच कोश, दस प्राण, तीन शरीर, कुण्डलिनी विद्युत भण्डार, सहस्रार, सूर्य संस्थान आदि सूक्ष्म शरीर के शक्ति भण्डागारों का जब रहस्योद्घाटन होगा तो प्रतीत होगा कि भौतिक विज्ञान की पकड़ में आने वाली मानवीय काया की अद्भुत विशेषताओं की तुलना में अप्रत्यक्ष शरीर की सामर्थ्य असंख्य गुनी अधिक है। इस सामर्थ्य के बल-बूते आकाश गमन की सिद्धि असंभव नहीं ठहराई जा सकती।

जल पर इसी शरीर से बिना किसी जल यान के चल सकना योग साधना की सिद्धियों के अंतर्गत आता है। पूर्व काल में समुद्र पार करने के परिष्कृत साधन नहीं थे। लकड़ी के जहाज समुद्र यात्रा करते तो थे पर उनकी चाल धीमी होती थी। समुद्री तूफानों का खतरा भी रहता था। बहुत दूर की यात्रा तो जहाज करते भी नहीं थे। ऐसी स्थिति में योग माध्यम से उपलब्ध सिद्धियों का उपयोग दूर गमन के लिए किया जाता था। आकाश गमन की सिद्धि से सरल सिद्धि जल गमन की थी। नदी, सरोवरों को पार करने में उससे बहुत सहायता मिलती थी। समुद्र पर भी चला जा सकता था। उन दिनों अब की अपेक्षा वर्षा अधिक होती थी और जल जंगल एक हो जाते थे।

बंगाल जैसे जल प्रधान देशों में तो जल प्लावन से मार्ग ही अवरुद्ध हो जाते थे। तब जल गमन की भारी उपयोगिता अनुभव की जाती थी। आज जल यात्रा के अनेक नये साधन निकल पड़े और पुराने परिष्कृत हो गये। यंत्रों ने उनकी क्षमता बढ़ा दी। ऐसी दशा में सस्ती जल यात्रा की तुलना में कष्ट साध्य जल गमन की सिद्धि उतनी उपयोगी नहीं रह गई। फिर भी मानव शरीर की अद्भुत क्षमताओं की एक कड़ी के रूप में उसकी गरिमा तो है ही उससे इतना पता चलता ही है कि नर-पशु स्थूल काया से जितना पुरुषार्थ करता दीखता है उसकी सीमा अन्तिम नहीं है। सूक्ष्म और कारण शरीर को विकसित किया जा सके तो संसार के समस्त प्राणियों की सम्मिलित विशेषताओं की तुलना में मानवी विशेषतायें कम नहीं अधिक ही सिद्ध होंगी। पक्षियों की तरह उड़ना, मछली की तरह तैरना उसके लिए असंभव नहीं रह जायगा।

पानी की सतह के ऊपर एक अदृश्य झिल्ली होती है। जिसे सतह की तनाव शक्ति-सरफेस टेन्शन भी कहते हैं। यह परत कई बार घनी भी होती है। उसके ऊपर कोई हलकी चीज इस तरह धीरे से तैराई जाय कि उस झिल्ली को आघात न लगे तो वह पानी पर तैरती रहेगी। हजामत बनाने का ब्लेड यदि होशियारी के साथ इस परत के ऊपर छोड़ दिया जाय तो वह तैरता रहेगा, डूबेगा नहीं।

मृत सागर-डैड सी-में क्षार आदि बहुत हैं, उसका पानी भारी है इसलिए उसमें कोई मनुष्य डूबना चाहे तो डूब नहीं सकेगा। कारण कि मनुष्य शरीर के कण उस पानी की तुलना में हल्के हैं। हल्की चीज भारी द्रव में नहीं डूब सकती।

जल कणों से जो भी चीज हल्की होगी आसानी से तैरने लगेगी। लकड़ी हल्की होती है। हवा भरे गुब्बारे, रबड़ के ट्यूब हल्के होते हैं और वे पानी पर तैरते हैं। शरीर गत कणों के भार में न्यूनता करना और उन्हें जल कण की तुलना में हलके बना लेना योग साधनाओं द्वारा संभव है। स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर की सत्ता यदि प्रखर हो उठे तो उतना हलकापन देह में उत्पन्न किया जा सकता है कि वह जल पर बिना डूबे चल सके एवं आकाश में बिना गिरे उड़ सके। भौतिक विज्ञान की तरह जब आत्मिक विज्ञान की शोध होगी और उस क्षेत्र के विज्ञानी जब आत्मशक्ति उद्भव में साधना रत होंगे तो उन चमत्कारों को प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा जो भूतकाल में प्रत्यक्ष प्रचलन के रूप में विद्यमान थे पर अब उन्हें केवल दन्त कथा माना जाता है।


शब्द जाल का उतना महत्व नहीं जितना भावना का

एक अनपढ़ किसान ने अपने गुरु से दीक्षा ली। गुरु ने मन्त्र दिया-’ॐ लक्ष्मी पतये नमः’ किसान ने भक्ति और निष्ठा के साथ इसी मन्त्र का जप आरम्भ कर दिया किन्तु अनपढ़ होने के कारण वह मूल मंत्र भूल कर ‘ॐ लछमनये मयः ‘जप करने लगा। एक दिन भगवान विष्णु लक्ष्मी के साथ उधर से विचरण करते हुए निकले, अशुद्ध जप करते देख लक्ष्मी जी किसान के पास जाकर पूछने लगीं-तुम किसका जप कर रहे हो, किसान मुँह से शब्द तो रट रहा था पर ध्यान में उसे बस रहे थे भगवान। उसे लक्ष्मी जी के शब्द सुन न पड़े। लक्ष्मी जी के कई बार टोकने से उसका ध्यान भंग हो गया-खीझकर किसान ने उत्तर दिया-तुम्हारे पति का ध्यान कर रहा हूँ बोलो क्या करोगी?

लक्ष्मी जी अपने स्वामी की भक्ति से बड़ी प्रसन्न हुई और किसान को धन धान्य से परिपूर्ण कर दिया। नारद जी ने भगवान से एक दिन इसी प्रसंग का विवरण देकर लक्ष्मी जी की शिकायत की तो भगवान बोले-नारद हमारे यहाँ शब्द जाल का उतना महत्व नहीं जितना भावना का। किसान की भावना निर्दोष थी फिर उसे लक्ष्मी जी ने वरदान दिया तो क्या हुआ।


कारखानों का धुँआ घुट-घुटकर मरने को विवश करेगा

विज्ञान की अन्धी दौड़ कल कारखानों की भरमार करती चली जा रही है। बहुत जल्दी-अधिकाधिक मात्रा में लाभ उपार्जन के लिए लालायित लोग नित नये कारखाने खड़े करते चले जा रहे हैं। इसे प्रगति कहा जाता है और सभ्यता का वरदान घोषित किया जाता है।

सरकारें इसका समर्थन करती हैं और उन्हें टैक्स आदि की अधिक आमदनी होती है। अर्थ शास्त्रियों की दृष्टि तात्कालिक लाभ पर केन्द्रित रहती है। वे कहते हैं कारखाने सस्ती चीजें बनाते हैं, साफ सुथरी और सुन्दर। हाथ से काम करने पर चीजें उतनी साफ सुथरी भी नहीं बनती हैं और महँगी भी पड़ती हैं। इसलिए गृह उद्योग, हस्त कौशल अधिक श्रम साध्य और स्वल्प लाभ देने के कारण निरर्थक हैं। प्रोत्साहन कारखानों को ही मिलना चाहिए।

जनता की गरीबी बेकारी को देखते हुए गृह उद्योगों का प्रत्यक्ष और प्रबल विरोध तो नहीं किया जाता। आँसू उनके भी पोंछे जाते हैं पर ध्यान सभी का बड़े कल कारखानों पर है। इनमें चन्द लोगों को काम मिलता है और शेष असंख्यों को बेकार बेरोजगार बना दिया जाता है।

इस हानि के अतिरिक्त सबसे बड़ी हानि है, कारखानों से निकलने वाले धुँए से उत्पन्न होने वाला वायु दूषण। कारखानों का धुँआ हवा में मिलकर जन साधारण के शरीर में विषैले तत्व पहुँचाता है, इससे स्वास्थ्य बिगड़ता है, बीमारियाँ बढ़ती है, आयुष्य घटता है और अकाल मृत्यु का शिकार बनना पड़ता है। आँखों से न देखते हुए भी परोक्ष रूप से यह कारखाने सार्वजनिक स्वास्थ्य को जिस बुरी तरह से नष्ट करते हैं उसे देखते हुए इनकी उपयोगिता के पक्ष में दिये जाने वाले सभी तर्क निरर्थक सिद्ध होते हैं।

यह धुँआ कभी-कभी आकाश में वायु सघनता और शीतलता की मात्रा बढ़ जाने से जहाँ-तहाँ बरसने लगता है, उससे होने वाली तात्कालिक हानि को लोग देखते समझते हैं और उस संबंध में हाय तौबा मचाते है; पर स्थिति सुधरते ही फिर सब कुछ ठण्डा हो जाता है।

वायु दूषण मानव जाति के लिए एक संकट बनता जा रहा है। कारखाने, मोटरें, भट्टियाँ दिन-रात विषैला धुँआ उगलती रहती हैं। सभ्यता की घुड़दौड़ में यह बाढ़ थोड़े ही दिन से आई है, उसी ने हर विचारशील को चिन्ता में डाल दिया है। आगे चलकर दिन दूने रात चौगुने क्रम से बढ़ने वाले इन कारखानों द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य का कैसा सर्वनाश होगा उस विभीषिका का स्वरूप सामने आते ही सिर चकराने लगता है।

पेन्सिलवेनिया (अमेरिका) में मोनोनग सेला नामक नदी के किनारे डोनोरा नामक एक छोटी सी औद्योगिक बस्ती है, यहाँ कल कारखाने बहुत हैं। यों यहाँ इन फैक्ट्रियों का धुँआ आमतौर से छाया रहता है और उसे सहन करने में लोग अभ्यस्त भी हो गये हैं पर 28 अक्टूबर को तो वहाँ स्थिति ही विचित्र हो गई। धुँए और धुलि भरी धुन्ध ऐसी छाई कि चार दिन तक बरसाती घटाओं जैसी अँधियारी छाई रही। किसी ने यह जाना ही नहीं कि दिन निकला। दिन में भी रात लगती रही, कालोंच इतनी बरसी कि सड़कों पर उनकी परतें जम गई और निकलने वालों के पैर उस पर स्पष्ट रूप से छपने-उभरने लगे। हवा में गन्धक मिली हुई तेज गन्ध सूँघी जा सकती थी। सड़क पर कारें चलना बन्द हो गई। बीमारों से अस्पताल खचाखच भरे थे। डॉक्टर अपनी जान बचाने के लिए कहीं दूर चले जाने के लिए पलायन करने लगे।

गले की खराबी, सिर में चक्कर, उलटी, आँखों की सूजन आदि रोगों से उस 18 हजार आबादी की छोटी सी बस्ती में 6 हजार बीमार पड़े। इनमें से कितनों को ही मौत के मुँह में जाना पड़ा।

ऐसी ही एक घटना घटी मेक्सिको के रोजारिका क्षेत्र में बस्ती तो सिर्फ 15 हजार की है पर वहाँ हाइड्रोजन सलफाइड तथा दूसरी तरह के कारखाने बहुत हैं। एक दिन किसी गलती से कारखाने की गैस बन्धन तुड़ाकर एक घण्टे के लिए खुले आकाश में भ्रमण करने के लिए निकल पड़ी। इतनी सी देर में उसने सारे नगर को हिला दिया। 320 तो अस्पताल में भरती हुए जिनमें से कितने ही तो घर लौटे नहीं वहीं प्राण गँवाने पड़े।

ऐसी ही विपत्ति एक बार लन्दन में आई। दिसम्बर का महीना था। यकायक काले धुँए के बादल आसमान में घिर आये। उनकी सघनता इतनी अधिक हो गई कि दस फुट से आगे कुछ भी दीख नहीं पड़ता था। आसमान में वायुयानों का उड़ना और जमीन पर मोटरों का चलना असम्भव हो गया। सूरज आसमान में एक धुँधली बत्ती की तरह लटकता भर दीखता था, रोशनी उसमें से निकल ही नहीं रही थी। हवा में सल्फर डाइ ऑक्साइड जैसी अनेकों विषाक्त वस्तुयें घुली थीं। साँस लेना कठिन हो रहा था। इससे कितने बीमार पड़े यह गिनना तो कठिन है पर मौत का लेखा-जोखा यह है कि उन्हीं 4-5 दिनों में 4 हजार तुरन्त मर गये और बीमारों में से 8 हजार कुछ ही दिन में चल बसे।

सन् 56 में ऐसा ही एक और वायु दूषण लन्दन पर बरसा था जिसमें एक हजार व्यक्ति मरे थे। इसके कुछ दिन पहले ऐसा ही एक और झोंका चार सौ की जान ले चुका था। न्यूयार्क में सन् 93 में दो सौ इसी कुचक्र में फँसकर मरे थे। सन् 66 में 168 लोग मरे। वायु में बढ़ी हुई धुन्ध तथा विषाक्तता को देखकर स्वास्थ्य अधिकारियों ने लोगों को घरों में बन्द रहने की ही सलाह दी। सड़कों पर तो इतनी कालोंच बरस रही थी कि उसका साँस के साथ भीतर जाना खतरे से खाली नहीं था। लोग सब काम छोड़ कर यह विपत्ति टलने तक घरों में ही बन्द बैठे रहे।

धुँआ उगलने वाली कारखानों की भट्टियाँ बन्द की गई, मोटरें चलना रोका गया, घरों में चूल्हे जलाने पर पाबन्दी लगी। अच्छा हुआ मौसम सुधर गया अन्यथा स्थिति को देखते हुए 40 लोगों के इस विपत्ति के चपेट में आने का अनुमान लगा लिया गया था।

बेल्जियम की म्यूजा घाटी में लोहे के कल कारखाने अधिक हैं। उस क्षेत्र में विशेष रूप से और अन्य क्षेत्रों में सामान्य रूप से एक दिन धुँए से भरा कुहासा छाया, धुन्ध और घनी होती गई। तीन दिन तक यही स्थिति रही लोगों के दम फूलने लगे। खाँसी हुई, दमा जैसी बीमारी उमड़ी, अनेकों लोग बीमार पड़े। अस्पताल भर गये डाक्टरों के यहाँ भीड़ लग गई और देखते-देखते उसी घुटन में 63 व्यक्तियों को प्राणों से हाथ धोना पड़ा। मृतकों में बूढ़ों और बच्चों की संख्या अधिक थी।

कारखानों और दूसरी भट्टियों का धुँआ निकल कर आकाश में छाने लगता है। अवसर पाते ही वह धरती की ओर झुक जाता है और ‘थर्मला इन्वर्शन’ (ताप-व्युत्क्रमण) का अवसर पाते ही धुन्ध के रूप में बरसने लगता है। जब वह वायु गर्मी से प्रभावित रहती है तब तक धुँए धुन्ध के कारण हवा के साथ ऊपर उठते रहते हैं पर जब शीतलता के कारण वायु नम होती है तो धूलि का उठाव रुक जाता है और वह वायु दूषण नीचे की ओर ही गिरने लगता है। हवा का बहाव बन्द हो जाने पर तो यह विपत्ति और भी बढ़ जाती है।


Quotation

श्रेय के लिए, मनुष्य को सब त्याग करना चाहिए।

अच्छा हो समय रहते चेता जाय। धुँआ उड़ाने वाले यन्त्रों पर प्रतिबन्ध लगाया जाय। उन्हें घनी आबादी वाले नगरों की अपेक्षा कहीं विरल जंगलों में धकेल कर छितरा दिया जाय। ध्यान गृह उद्योगों पर दिया जाना चाहिए। ताकि बेकारी की समस्या हल हो, अधिक लोगों को काम मिले और वायु दूषण की विभीषिका से बचा जा सके, बड़े कारखाने उन्हीं वस्तुओं के लगें जो गृह उद्योगों से न बन सकती हों। मोटरें उन्हीं के पास रहें जिन्हें राष्ट्रीय हित के किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। धनियों को अधिक सम्पत्तिशाली बनाने और बड़े लोगों की हविश और विलासिता के पोषण की बलिवेदी पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के विनाश का बीजारोपण करना न्याय और औचित्य की दृष्टि से अवाँछनीय ही ठहराया जायगा।


मन को रोकें नहीं-दिशा दें

मनोविज्ञानी फ्राइड अपनी पत्नी और बच्चे समेत एक उद्यान में सैर करने गये। बैठे गपशप कर रहे थे। इतने में एक छोटा चार वर्ष का बच्चा गायब हो गया निगाह दौड़ाई तो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। पत्नी बहुत घबराने लगी और ढूँढ़ने के लिए आतुरता प्रकट करने लगी।

फ्राइड ने सान्त्वना देते हुए कहा-घबराने की कोई बात नहीं है। पास के उद्यान में वह झूले पर झूल रहा होगा, अभी चलते हैं उसे पा लेना।

सब लोग चले और देखा कि सचमुच बच्चा पास वाले उद्यान में झूले पर झूल रहा है।

फ्राइड की पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने पूछा-आपको कैसे मालूम हो गया था कि बच्चा यहाँ इस झूले पर झूल रहा है।

उन्होंने उत्तर दिया। मैं सुनता चला आ रहा था। रास्ते में जब वह पार्क पड़ा तब बच्चे ने उस पर झूलने का आग्रह किया था। तुमने मना कर दिया था। बच्चे की उत्सुकता बढ़ी होगी। उसने ज्ञान और अनुभव बढ़ाने की अन्तःप्रेरणा से वहाँ जाना और वस्तु स्थिति को देखना आवश्यक समझा होगा। मना करने से उसके रहस्य जानने की उत्सुक इच्छा ने और अधिक इसके लिए उत्साहित किया होगा और वह आँख बचाकर यहाँ चला आया होगा। इस वस्तु स्थिति को मैं समझता था। सो ही मैंने निश्चित रूप से यह कह दिया कि वह पड़ौस के बगीचे में झूले पर होगा।

फ्राइड ने पत्नी से इस संदर्भ में इतना और कहा कि-मन का बिल्कुल यही हाल है। जिसे न करने के लिए कहा जाता है-जिधर से रोका जाता है उधर ही उसकी प्रवृत्ति और अधिक होती है। रहस्य जानने, ज्ञान बढ़ाने और अनुभव इच्छा करने के लिए वह ऐसे प्रसंगों के संपर्क में अधिक आतुरता पूर्वक आने का प्रयत्न करता है, जहाँ से उसे रोका जाय।

मन को रोकना काफी नहीं। उसे ऐसी दिशा देनी चाहिए जिसमें अधिकाधिक रस मिले और रुचि जुड़े। जहाँ अधिक आकर्षण होगा मन वहीं जायगा। कुमार्ग पर से मन को रोकने का बार-बार निषेध करना एकाँगी है। उसकी दिशा परिवर्तन के लिए यह आवश्यक है कि मन के लिए कोई अधिक आकर्षक क्षेत्र काम करने और विचरण करने के लिए उपलब्ध हो।

एक साधक साधना कर रहे थे। मन काबू में न आता था, वह निर्धारित लक्ष पर न रुक कर अन्न माँगता था। इस कठिनाई का समाधान करने के लिए वे अपने गुरु के पास पहुँचे।

गुरु ने उस समय तो कुछ उत्तर न दिया पर अगले दिन एक नई साधना बताने के लिए उसे बुलाया।

साधक पहुँचा तो उन्होंने कहा-आज बहुत ही शुभ मुहूर्त है। ऐसा मन्त्र बताता हूँ जो आज ही सिद्ध हो जायगा और मनवाँछित फल देगा। साधन को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने वह छोटा मन्त्र भली प्रकार याद कर लिया तथा सरल सा विधि विधान भली प्रकार समझ लिया।

चलने लगा तो गुरु ने उसे रोका और कहा-एक छोटा सा प्रतिबन्ध और है जिसे इस साधना के समय पालन करना आवश्यक है।

साधक ने उत्सुकता पूर्वक उसे भी पूछा-उसने कहा जप के समय बन्दर का ध्यान नहीं आना चाहिए। प्रतिबंध जरा सा था उसे पालन करने में क्या कठिनाई हो सकती थी। साधक प्रसन्न होता हुआ चला गया।

जब वह जप करने बैठा तो प्रतिबंधित बन्दर का ध्यान ही मस्तिष्क पर हावी होने लगा उसने जितना ही मन को रोका उतना ही अधिक तीव्रता के साथ बन्दर का ध्यान आया पूरा दिन इसी खींचतान में चला गया। साधन न हो सका। पूरे समय बन्दर ही मन पर सवार रहा।

संध्या होने पर साधक दुखी होता हुआ गुरु के पास आया और अपनी असफलता बताई।

गुरु मुसकराये और उनने कहा-पिछले दिन की तुम्हारी शंका का यही उत्तर है। मन के निरोध में यही कठिनाई है कि जिस काम से उसे रोका जाता है उसी के लिए वह आतुर होता है। ज्ञान और अनुभव बढ़ाने की उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति इसके लिए उसे विवश करती है। इसलिए मन को साधने में प्रतिबन्ध कड़े करने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त रहता है कि सम्मुख प्रस्तुत कार्य में अधिक आकर्षण उत्पन्न किया जाय। बंधन ढीले रखे जायं और यदि बहुत अनुचित न हो तो तथाकथित बन्धनों को कभी कुछ ढीला करके मन को यह देख समझ लेने दिया जाय कि जिसके लिए वह आतुर था वह कितना निस्सार और निरर्थक क्षेत्र है। अनुभव के बाद निकाला हुआ निष्कर्ष अधिक स्वस्थ और परिपक्व होता है।

वस्तु प्राप्त न होने पर अभाव की स्थिति में किया हुआ त्याग कच्चा है। उपयोग और उपभोग के बाद जो वस्तु छोड़ी जाती है उसकी निरर्थकता के बारे में मन निश्चिन्त रहता है। जहर खाने, आग छूने जैसे अनुभव करना तो बहुत महँगा पड़ता है पर जहाँ तक इन्द्रियों की अनुभूति का संबंध है उन्हें उचित सीमा में छूट देकर यह अनुभव कर लेने देना चाहिए कि वह रस लिप्सा निरर्थक भी है और हानिकारक भी।

एक साधु ने एक दिन एक विचित्र आचरण किया इसके कौतुक को देखने के लिए बहुत लोग इकट्ठे हो गये।

उनने एक बड़ा बर्तन भर के कढ़ी पकाई। खाने पर ऐसे जुटे कि हटे ही नहीं। अधिक मात्रा खा जाने पर उलटी हुई। कुल्ला किया और फिर खाने पर जुट गये। इस प्रकार वे सारे दिन कढ़ी खाने, और उलटी करने में लगे रहे। अन्त में उन्होंने बची हुई कढ़ी को कुत्तों के आगे फेंक दिया।

इस अद्भुत प्रसंग का कारण उपस्थित लोगों ने पूछा तो उनने यही कहा कि-बहुत दिन से मन कढ़ी के लिए मचल रहा था। उसे कितनी ही बार समझाया कि मेरी वात प्रकृति-शारीरिक स्थिति में वह हानिकारक है और मानसिक स्थिति में इस प्रकार की लिप्सा अशोभनीय। पर यह ज्ञान चर्चा उसके गले उतरती ही न थी। जब भी कढ़ी देखता मचलने लगता। एकान्त में भी उसी की इच्छा और कल्पना करता। समझाने-बुझाने के प्रयत्न सफल न हुए तो फिर यह निश्चय किया कि मन को वस्तु स्थिति समझ लेने और उसका अनुभव कर लेने का अवसर दिया जाये। आज मैंने वही किया। मनमर्जी जितनी कढ़ी खाने की ही छूट नहीं दी वरन् इस बात के लिए विवश किया कि वह कढ़ी खाने की अति करे। उलटी होने पर भी कढ़ी खाते रहने की प्रक्रिया इसीलिए अपनाई। शाम तक मन को कढ़ी से घोर अरुचि हो गई। उसे बार-बार कहा-अभी और खा-अभी और खा-जब उसने बिलकुल इनकार कर दिया तो फिर बची खुची कुत्ते को डाल दी। अब मन ने वस्तु स्थिति समझ ली। तृप्ति कर ली और घृणा की स्थिति तक कदम बढ़ा लिये। अब उसके ललचाने और मचलने का अवसर न आवेगा।

जहाँ तक इन्द्रिय संयम का प्रश्न है वहाँ तक को मन थोड़ी छूट देकर रसानुभूति का अनुभव प्राप्त कर लेने देना चाहिए। अपने यहाँ गृहस्थ उपयोग के बाद शम, दम, तितीक्षा का विधान बताया गया है। युवावस्था में उपभोग का अवसर मिल जाता है और उस ओर का आकर्षण समाप्त हो जाता है। इसके बाद वानप्रस्थ और संन्यास में संयम साधना ठीक स्वाभाविक और बिना व्यवधान के चलने लगती है। किन्तु यदि बिना उपभोग के बालकपन से ही इन्द्रिय भोग का निषेध रहे तो मन की स्वाभाविक प्रकृति दूसरे को उस मार्ग पर चलते हुए देखकर तीव्र हो उठती है और उस संयम साधना के कभी भी भाव प्रवाह के दबाव से खंडित होने की आशंका बनी रहती है।

जहाँ तक इन्द्रिय संयम का प्रश्न है मन में उपभोग की हानियों को समझना चाहिए और ऐसे अवसरों से बचना चाहिए जिनमें उस प्रकार के उभार उत्पन्न होते हों। पर कड़े प्रतिबन्ध नहीं लगाने चाहिए। युवावस्था में तो विशेष रूप में ढील करनी चाहिए और मर्यादित एवं वैध इन्द्रिय तृप्ति पर कठोर प्रतिबन्ध नहीं लगाने चाहिए। न बहुत आकर्षण न अति का निषेध, इस बीच की मनोभूमि में संयम साधना बहुत ही सरलता के साथ सधती हुई चली जाती है।

निर्धारित लक्ष के महत्व और महात्म्य पर पूरा चिन्तन करना चाहिए। उसके मधुर कल्पना चित्र बनाने चाहिए और इस मार्ग पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचने पर जो उपलब्धियाँ मिल सकती हैं उनका लाभ कल्पना क्षेत्र में भली प्रकार जमाना चाहिए। सामान्य जीवन क्रम और उस असामान्य आदर्शवादी लक्ष्य की पूर्ति के परिणामों को अलग-अलग देखना-समझना और फिर उनकी तुलनात्मक समीक्षा करना यह सिद्ध कर देता है कि नर-पशु जैसे लोभ-मोहग्रस्त जीवन और आदर्शवादी मार्ग पर चलने पर प्राप्त स्थिति में कितना अधिक अन्तर है। यह कल्पना क्षेत्र जितने प्रखर होंगे-यह तुलनात्मक निष्कर्ष जितना प्रखर होगा, उतना ही महानता का लक्ष्य अपनाने की गरिमा स्पष्ट होती जायगी। तब मन पूरी उत्सुकता और उत्कण्ठा के साथ उस दिशा में लगेगा यह निर्णयात्मक निष्कर्ष जिस आकर्षण को उत्पन्न करता है वही स्थायी होता है और फिर उस दिशा में चलता हुआ मन भागने या भटकने के लिए रस्सी नहीं तुड़ाता। मन के विग्रह का सीधा और सरल मार्ग यही है।


टुर्माटाग्लिफिक्स

मनुष्य की आन्तरिक स्थिति उसकी त्वचा को देखकर जानी जा सकती है। इस तथ्य का निर्धारण हो जाने के उपरान्त अब इस विज्ञान की शोध का एक विशेष क्षेत्र मान लिया गया है और इस संबंध में विस्तृत अनुसंधान आरम्भ हो गया है।

त्वचा देखकर शरीर की अन्तःस्थिति और मन की गुत्थियों को समझने के विज्ञान का नाम है-”टुर्माटाग्लिफिक्स” इस विद्या के आधार पर इस प्रकार के परीक्षणों में एक और नई महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ जायगी। आगे रक्त, मूत्र, मल, आदि परीक्षणों का झंझट कम हो जायगा और अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह सही जानकारियों को प्राप्त कर सकना संभव हो जाएगा।

मिनि थायोलिस (मिनेसटा) के नाड़ी विशेषज्ञ डॉक्टर मिल्टन आल्टर और उनके सहयोगी डॉक्टर शुलन वर्ग ने इस संदर्भ में लम्बी खोज की है और शरीर की आंतरिक स्थिति का सही पता लगाने में अद्भुत सफलता पाई है।

जिन अंगों की त्वचा पर इस प्रकार के लक्षण अधिक स्पष्ट उभरते हैं उनमें हथेलियाँ, हाथों, के पोरवे, तलवे, और पैरों की उँगलियाँ मुख्य है। उनको शारीरिक और मानसिक स्थित के कारण कई तरह के उतार चढ़ाव-गड्ढे तथा टीले उभरते दबते रहते हैं। झुर्रियाँ और सलवटें पड़ती मिटती रहती हैं कोमलता और कठोरता में चमक और रुक्षता में अन्तर आता रहता है।

उपरोक्त शरीर शास्त्रियों का कहना है कि मोटे तौर से हथेलियों, तलवों, और उनकी उँगलियों में समय का अन्तर होने पर भी कोई खास अन्तर दिखाई नहीं पड़ता पर वाटी की से निरीक्षण करने पर उनमें बराबर हेर-फेर होता रहता है। यह परिवर्तन मनुष्य की वर्तमान और भावी स्थिति की सम्भावना को बहुत कुछ स्पष्ट करता है।

हस्त रेखा विज्ञान के पीछे सम्भवतः यही आधार रहा होगा। प्रणाम आशीर्वाद की प्रक्रिया अंग स्पर्श द्वारा समर्थ और दुर्बल व्यक्तियों के इन अंगों में रहने वाली महत्वपूर्ण संवेदनशीलता का आदान-प्रदान भी संभव है, एक बड़ा कारण रहा है।


प्रायश्चित द्वारा आन्तरिक मलीनता का परिशोध

कर्म का फल अनिवार्य है। यह सारी विश्व व्यवस्था कर्म फल की सुनिश्चितता के आधार पर खड़ी है। ईश्वर न्यायकारी कहा जाता है। अदालत का यही कर्त्तव्य है कि वह अपराधी को दण्ड दे और जिसकी क्षति हुई है उसकी पूर्ति कराये। ईश्वर भी यही करता। यदि वह पूजा प्रार्थना करने वालों को बिना दण्ड के छोड़ दिया करे तो उसे न्यायशील कैसे कहा जायगा? खुशामद करने वालों को छूट, न करने वालों का कैद-यह तो विशुद्ध पक्षपात हुआ। भाई-भतीजावाद, यार दोस्तों को विशेष लाभ, ऐसा अँधेर तो ओछे अधिकारी करते हैं। यदि ईश्वर भी वैसा ही करने लगे तो फिर न्याय का अस्तित्व ही क्या रह जायगा। फिर कर्म फल का सिद्धाँत ही कहाँ रहा?

पापों को क्षमा कराने और कर्मफल के दण्ड से बच निकलने की तरकीबें ढूंढ़ने के हेर-फेर में न पड़कर औचित्य, ईमानदारी और बहादुरी का रास्ता यही है कि प्रायश्चित के लिये तैयार हों। अगले जन्मों तक घोर कष्ट सहने और नरक की आग में बुरी तरह जलने की अपेक्षा-साहसपूर्वक प्रायश्चित करके स्वयं ही आगे बढ़ा जाय और स्वेच्छापूर्वक दण्ड भोग कर उस कर्म फल से इसी जन्म में निवृत्ति प्राप्त कर लें। ऐसी हिम्मत और ईमानदारी से अपना अन्तःकरण निर्मल होता है। चित्त पर चढ़ा हुआ भार हलका होता है। समाज में भी इस ईमानदारी की प्रशंसा होती है और खोया हुआ विश्वास तथा सम्मान फिर मिल जाता है। ईश्वर भी उसी सज्जनता का सम्मान करता है और दण्ड की कठोरता को हलकी कर देता है। न्यायालय में कोई अपराधी स्वयं उपस्थित होकर स्वेच्छापूर्वक अपनी गलतियाँ स्वीकार करे और क्षतिपूर्ति करने एवं दण्ड पाने की सहमति प्रकट करे तो निश्चय ही न्यायाधीश उसकी बदली हुई भावना की कद्र करेगा और हलका दण्ड देकर उसका फैसला कर देगा प्रायश्चित इसी प्रक्रिया का नाम है।

धर्मशास्त्रों ने पग-पग पर हर व्यक्ति को यह परामर्श दिया है कि वह अपने पाप कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए साहस प्रदर्शित करे और भगवान से समाज के सामने अपने बदले हुए अन्तःकरण की वास्तविकता प्रमाणित करके अपना भविष्य अन्धकार में से निकाल कर उज्ज्वल बना ले। इस संदर्भ में शास्त्रों का पन्ना-पन्ना प्रमाणों से भरा पड़ा है :-

यावंतो जंतवः स्वर्गे तावंतो नरकौकसः।

पापकृद्याति नरकं प्रायश्चितपरांगमुखः॥

गुरुणि गुरुभिश्चैव लघूनि लघुभिस्तथा।

प्रायश्चित्तानि ह्यन्येच मनुः स्वायम्भुवोऽव्रवीत्।

-शिवपुराण

जो मनुष्य अपने किये हुए दुष्कर्मों का कोई भी प्रायश्चित शास्त्रानुसार नहीं किया करते हैं वे ही पापात्मा प्राणी नरक में जाया करते हैं। स्वायम्भुव मनु ने तथा अन्य महर्षियों ने भी बड़े पापों के बड़े प्रायश्चित और छोटे-छोटे पाप कर्मों के छोटे प्रायश्चित बतलाये हैं।

पश्चात्तापः पापकृताँ निष्कृतिः परा।

सर्वेषाँ वर्णितं सद्भिः सर्वपापविशोधनम्॥

पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चित्तं करोति सः।

यथोपदिष्टं सद्भिर्हि सर्वपापविशोधनम्॥

प्रायश्चित्तमधीकृत्य विधिवन्निर्भयः पुमान्।

स याति सुगतिं प्रायः पश्चात्तापी न संशयः॥

-शिवपुराण

पश्चात्ताप ही पापों की परम निष्कृति है। विद्वज्जनों ने पश्चात्ताप से सब प्रकार के पापों की शुद्धि होना कथन किया है। पश्चात्ताप करने से जिसके पापों को शोधन न हो, उसे प्रायश्चित करना चाहिये। विद्वानों ने इससे सब पापों का शोधन होना कहा है। विधिपूर्वक अनेक प्रकार के प्रायश्चित करने पर भी मनुष्य भय रहित नहीं हो पाता। परन्तु पश्चात्ताप करने वाले को सुगति की प्राप्ति होती है।

विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते।

न तत् कुर्यां पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते॥

कर्मणा येन तेनेह पापाद द्विजवरोत्तम ।

एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन् धर्मेषु प्रतिदृश्यते॥

जो मनुष्य पापकर्म बन जाने पर सच्चे हृदय से पश्चाताप करता है वह उस पाप से छूट जाता है तथा फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूंगा ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर वह भविष्य में होने वाले दूसरे पाप से भी बच जाता है।

विप्रवर! शास्त्रविहित (जप, तप, यज्ञ, दान आदि) किसी भी कर्म का निष्काम भाव से आचरण करने पर पाप से छुटकारा मिल सकता है। ब्रह्मन् धर्म के विषय में ऐसी श्रुति देखी जाती है।

शातातपस्मृति में प्रायश्चित्य की आवश्यकता एवं अनिवार्यता का प्रतिपादन इस प्रकार किया है :-

प्रायश्चित विहीनानाँ महापातकिनाँ नृणाम ।

नरकान्ते भवेज्जन्म चिन्हाँकितशरीरिणाम्।

प्रतिजन्म भवेतेषाँ चिन्हं तत्पापसूचितम् ।

प्रायश्चित्ते कृते याति पश्चात्तापवताँ पुनः॥

महापातकजं चिन्हं सप्तजन्मनि जायते।

उपपापोद्भवं पंच त्रीणि पापसमुद्भवम्॥

दुर्ष्कमजा नृणाँ रोगा यान्ति चोपक्रमैः शमम्।

जपैः सुरार्चनेर्होमैर्दानैस्तेषाँ शमोभवेत् ॥

पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये।

बाधते व्याधिरुपेण तस्य जप्यादिभिः शमः॥

कुष्ठञ्च राजयक्ष्मा च प्रमेहो ग्रहणा तथा ।

मूत्र कृच्छ्राश्मरी कासा अतीसारभगन्दरौ॥

दुष्टब्रणं गण्डमाला पक्षाधातोऽक्षिनाशनम् ।

इत्येवमादयो रोगा महापापोद्भवाः स्मृताः॥

किये हुये पापों के प्रायश्चित न करने वाले, मनुष्यों का जन्म अंकित शरीर वाले महान पातक करने वाले मनुष्यों का जन्म नरकान्त में होता है। महान पातक का सूचक वह चिन्ह उनको प्रत्येक जन्म में रहता है। किये हुये पाप का पश्चात्ताप करने वालों का प्रायश्चित कर लेने पर वह चला जाता है । महापातक के कारण होने वाला चिन्ह सात जन्म तक रहता है। उप पाप से होने वाला पाँच जन्म तक तथा साधारण पाप से समुत्पन्न चिन्ह तीन जन्म तक रहता है। मनुष्यों के दुष्कर्म से होने वाले रोग उपक्रमों के द्वारा शान्त होते हैं। ऐसे उन रोगों की शान्ति जप, देवार्चन होम और दानों के द्वारा होती है पूर्व जन्म में किया हुआ पाप नरक के परिक्षय हो जाने पर मनुष्यों को किसी व्याधि के रूप में उत्पन्न होकर सताता है और उसका उपशमन जपादि द्वारा होता है। कुष्ठ, राजयक्ष्मा, प्रमेह, संग्रहणी, मूत्र कृच्छ, पथरी, कास, अतिसार, भगन्दर, दुष्टव्रण, गण्डमाला, पक्षाघात और नेत्रहीनता इत्यादि रोग महापातकों के कारण ही उत्पन्न होते हैं।

जलोदरं यकृत प्लीहा शूलरोगव्रणानि च ।

श्वासजीर्णज्वरच्छर्द्दिभ्रममोहगलग्रहाः ।

रक्तार्वुद विसर्पाद्या उपपापोद्भवा गदाः ॥

दण्डापतानकश्चित्रपुः कम्पविचर्चिकाः ।

वल्मीकपुण्डरीकाद्या रोगाः पापसमुद्भवा।

अर्शआद्या नृणाँ रोगा अतिपापाद्भवन्ति हि।

अन्ये च बहवो रोगा जायन्ते वर्णसंकराः ॥

उच्यन्ते च निदानानि प्रायश्चित्तानि वै क्रमात ।

शातातपस्मृति 1 से 10

पापों का प्रायश्चित न करने वाले मनुष्य नरक को तो जाते ही हैं अगले जन्मों में उनके शरीरों में उन पापों के चिन्ह भी प्रकट होते हैं।

प्रायश्चित न किया जाय तो अनेकों जन्मों तक वे पाप चिन्ह प्रकट होते हैं। उसका निवारण प्रायश्चित करने पर ही होता है।

महापापों के चिन्ह सात जन्मों तक मध्यम पापों के चिन्ह पाँच जन्मों तक और छोटे पापों के चिन्ह तीन जन्मों तक रहते हैं।

दुष्कर्मों से उत्पन्न प्रारब्ध जन्म रोग प्रायश्चित, जप, पूजन, होम, दान आदि से शान्त हो जाते हैं।

कुष्ठ, राजक्षया, प्रमेह, संग्रहणी, मूत्र कृच्छ, पथरी, श्वांस, भगंदर ,नासूर, गण्ड माला, पक्षाघात, अन्धता जैसे भयंकर रोग महापातकों के फलस्वरूप होते हैं।

जलोदर, तिल्ली, यकृत, शूल, व्रण, श्वास, अजीर्ण, ज्वर, जुकाम, भ्रम, मोह, जलग्रह रक्तार्वुर, विसर्य, आदि रोग उप पातकों के कारण होते हैं।

दण्ड पतानक, चित्रबपु, कम्प विशूचिका, पुण्डरीक आदि रोग सामान्य पापों के कारण होते हैं। इनके अतिरिक्त सम्मिश्रित रोग भी होते हैं।

इन सब प्रायश्चित विधान करना चाहिये।

अकृत्वा विहितं कर्म्म कृत्वा निन्दितमेव च दोषमाप्नोति पुरुषः प्रायश्चतं विशोधनम् ॥ प्रायश्चितमकृत्वा तु न तिष्ठेद् ब्राह्मणः क्वचित् यद्ब्रू युर्ब्राह्मणाः शान्ताः विद्वाँसस्तत्समाचरेत्।

कूर्म पुराण

निन्दित हेय कुकर्म करने पर मनुष्य को पाप लगता है। उसका शोधन प्रायश्चित द्वारा करना चाहिए।

श्रेष्ठ विद्वान और तपस्वी ब्रह्म वेत्ताओं से प्रायश्चित पूछना चाहिए और तदनुसार व्यवस्था करनी चाहिए ।

कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा चाहे अच्छा से भोगो चाहे अनिच्छा से। दंड के भागी बन कर कर्म फल भोगने की अपेक्षा वैसी स्थिति आने पूर्व स्वयं ही प्रायश्चित द्वारा उसे भोग लेना, अधिक सरल, सुखद और श्रेयस्कर है। मात्र धर्म या ज्ञान के पठन - श्रवणों से दुष्कर्मों से निवृत्ति नहीं हो सकती ।

मैले कुचैले गन्दे कपड़े जिन्हें किसी का मन देखने छूने पहनने को नहीं करता उसे शुद्ध आकर्षक और पहनने योग्य स्थिति में बदल देना धोबी का काम है। हेय स्थिति को श्रेय में बदल देने का चमत्कार धोबी का हाथ ही कर दिखाता है। यह कार्य प्रायश्चित प्रक्रिया का है वह मनुष्यों की गिरी गन्दी जीवन स्थिति का काया कल्प जैसा परिवर्तन करती है और देखते-देखते उच्च भूमिका में पहुँचा देती है ।

धोबी कपड़े को गरम पानी में डालता है, उसका मैल फुताता है, साबुन से गंदगी को काटता है। पीटता है। इसके बाद कलप लगा कर स्त्री कर देता है। इतने क्रिया-कलाप में होकर गुजर जाने पर गंदा पुराना मैला कपड़ा-नये से भी अधिक आकर्षक बन जाता है। प्रायश्चित में ठीक यह सब करना होता है ।

अपनी गुण कर्म स्वभाव की मलीनताओं को समझना, इस जीवन में किये हुए पापों को स्मरण करना, उनके लिए दुखी होना और यह सब छोड़ने के लिए प्रबल तड़पन का उत्पन्न होना यह गरम पानी में कपड़े को मन में डालना है।

दबे हुए छिपे हुए मैल को फुलाकर स्पष्ट कर देना। अपनी जो बुराइयाँ-भूले, पाप कृतियाँ छिपाकर रखी थी उन्हें प्रकट कर देना । मन में दुराव की कोई गाँठ न रखना, भीतर बाहर से एक सा हो जाना यह मैल का फुलाना है। आज की स्थिति में सर्वसाधारण के सम्मुख अपने दुश्चरित्र प्रकट कर सकने का साहस न होता हो तो कम से कम एक शोधक मार्गदर्शक के सम्मुख तो सब कुछ कह ही देना चाहिए। पाप का प्रकटीकरण पाप को हलका करता है और चित पर से भारीपन का बोझा साबुन लगाना भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करना है। प्रायश्चित की सार्थकता तभी है जब पिछली गतिविधियों को बदलकर श्रेयता के पथ पर चलने का निश्चय हो। यह निश्चय ही साबुन है। स्थूल साबुन ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जिसे इस योग्य समझा जाय, जिसके सामने पाप प्रकट किये जायें और जिसके परामर्श से प्रायश्चित विधान का निश्चय किया जाय ।

लकड़ी से पिटाई पानी में धुलाई प्रायश्चित की तपश्चर्या जिसे पिछली भूलों के दंड स्वरूप स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। शारीरिक और मानसिक सुविधाओं से कुछ समय के लिए अपने को वंचित कर देना, यही तप कहलाता है किस कर्म के लिए किस स्थिति के व्यक्ति को क्या तपश्चर्या करनी चाहिए, यह विषय बहुत ही सूक्ष्म है। इसका निर्णय किसी तत्व ज्ञानी से ही कराना चाहिए अलग स्थिति के व्यक्तियों के लिए न एक ही दुष्कर्म की गरिमा भारी हलकी होती है, दंड के लिए भी शारीरिक, मानसिक स्थिति का ध्यान रखना पड़ता है। यह निर्णय स्वयं नहीं करना चाहिए वरन् किसी तत्व ज्ञानी से ही कराना चाहिए ।

कलप लगाना, स्त्री करना यह है कि जो क्षति समाज को पहुँचाई है उसकी पूर्ति के लिए दान, त्याग, ऐसा कार्य या अपनी जैसी स्थिति हो उसके अनुसार पुण्य परमार्थ के कार्य करने चाहिए। इससे उस ऋण से मुक्ति मिलती है जो अनीति द्वारा अपहरण करके अपने सिर पर एकत्रित किया था। जो कभी न कभी ब्याज समेत चुकाना ही पड़ता। अच्छा यही है कि उसे ईमानदारी और स्वेच्छा पूर्वक इसी जन्म में चुका दिया जाये, कलप लगाना यही है।

स्त्री करने का अर्थ है भावी जीवन की रीति-नीति का व्यवस्था पूर्वक निर्धारण। इसमें सोचने का ढंग दृष्टिकोण बदलना और कार्य पद्धति का हेर-फेर, यह दोनों ही बात सम्मिलित हैं। शरीर की क्रियायें बदलें मन न बदले तो भी काम नहीं चलेगा और मन बदल जाय शरीर वही है कर्म करता रहे तो भी वह विडम्बना ही है। दोनों की परिवर्तित स्थिति को भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करती है और जिस पर चलने के लिए सुदृढ़ निश्चित किया जाता है उसी की सार्थकता है। प्रायश्चित का आरम्भ जीवन शोधन की तड़प से आरम्भ होता है मध्य में शोधनात्मक क्रिया कृत्य करना पड़ता है और अन्त में भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने के रूप में उसकी पूर्णाहुति करनी पड़ती है। सर्वांगीण प्रायश्चित की यही समग्र प्रक्रिया है।

प्रायश्चित के लिए क्या करना होता है। इसकी तीन प्रक्रिया हैं। एक तो अपने मन से ही जो दुष्कर्म छिपा कर रखे हैं दूसरों के बताये नहीं है, उसे उचित तो यही है कि सर्वसाधारण पर प्रकट कर दिया जाय। इससे अपने मन में पड़ी हुई दुराव की ग्रंथियां खुल जाती हैं समाज को धोखे में रखने की कुचेष्टा का अन्त हो जाता है। यदि पाप के कारण अपयश या अविश्वास मिलना चाहिए तो वह सामाजिक दण्ड मिल जाता है। इस प्रकार मन का आधा बोझ हलका हो जाता है। यदि इतना साहस न हो, समाज उतना उदार नहीं दीखता कि प्रायश्चितकर्ता की वर्तमान मनः स्थिति की श्रेष्ठता को समझकर उसे पिछली भूलों के लिए क्षमा कर दे। शत्रु उस प्रयत्न का अनुचित लाभ उठायेंगे ऐसे आशंका हो तो इन पापों का प्रकटीकरण किन्हीं श्रेष्ठ महापुरुषों के सामने अवश्य ही कर देना चाहिए और उनके परामर्शानुसार बताये हुए पाप दण्ड भुगतने के लिए साहस करना चाहिए।

प्रायश्चित का दूसरा कदम है तपश्चर्या एवं तितीक्षा द्वारा अपने आप को शारीरिक एवं मानसिक कष्ट देना। चांद्रायण व्रत, कृच्छ चांद्रायण व्रत, संतापन व्रत, पंचगव्य, प्राशन, केश मुँडन, तीर्थ पद यात्रा, मौन, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, शीत सहन, ग्रीष्म सहन, भूमि शयन आदि तपश्चर्या के कितने ही साधन विद्यमान हैं, उन्हें अपनी सामर्थ्य एवं स्थिति के अनुसार करना चाहिए।

तीसरा कदम है ऋण विमोचन। अर्थात् समाज को जितनी हानि उस पाप कर्म द्वारा पहुँचाई है उसकी अन्य प्रकार से क्षति प्रयोजन के लिए उसे लगा देना चाहिए इस प्रकार वह हेय उपार्जन जो अपने पास ऋण रूप जमा था उसे पुण्य परमार्थ द्वारा समाज को वापिस लौटाकर ऋण मोचन हो सकता है। शास्त्रों में यही तीन प्रायश्चित की प्रक्रियाएं बताई गई हैं-

योऽन्यथा संतमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते।

स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः।

-मनुस्मृति

जो अपनी वस्तुस्थिति को छिपाता है। जैसा कुछ है उससे भिन्न प्रकार का प्रकट करता है वह चोर, आत्म हत्यारा और पापी कहलाता है।

कृत्वा पापं न गूहेत गुह्यमानं विवर्द्धते।

स्वल्पं वाथ प्रभूतं वा धर्मविद्धयो निवेदयेत॥

ते हि पापे कृते वेद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम्।

व्याधितस्य यथा वैद्य बुद्धिमन्तो रुजापहाः

-पारासर स्मृति

पाप कर्म वन पड़ने पर उसे छिपाना नहीं चाहिए छिपाने से वह बहुत बढ़ता है। पाप छोटा हो या बड़ा उसे किसी धर्मज्ञ से प्रकट अवश्य कर देना चाहिए इस प्रकार उसे प्रकट कर देने से पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे चिकित्सा करा लेने पर रोग नष्ट हो जाते हैं।

तस्मात् प्रकाशयेत् पापं स्वधम सतत चरेत्।

क्लीवों दुःखी च कुष्ठी च सप्त जन्मानि वै नरः॥

परासर स्मृति

पाप को छिपाने से मनुष्य, सात जन्मों तक कोढ़ी, दुःखी, नपुंसक होता है। इसलिए पाप को प्रकट कर देना ही उत्तम है।

आचक्षाणेनत्पापमेतत्कर्म्मास्मिशाधिमाम्।

वह अपने किये हुए पाप को भी मुँह से कहता हुआ दौड़े कि मैं ऐसे कर्म के करने वाला हूँ मुझे दण्डाज्ञा प्रदान कीजिए।

चान्द्रायणन्तु सर्वेषाँ पापनाँ पावनं परम्।

कृत्वा शुद्धिमवाप्नोति परमं स्थानमेव च॥

सम्वर्त स्मृति

एक चांद्रायण व्रत ही ऐसा है जो पापों की अपवित्रता से मनुष्य को पवित्रता की ओर ले जा सकता है। इस तपस्या के द्वारा आत्मा शुद्धि करने वाला परम पद पाता है।

उपवासपराकादिकृच्छृचान्द्रायणादिभिः।

शरीरशोषणम्प्राहस्तापसास्तप उत्तमम्॥ कू.पु.

उपवास पराक आदि तथा कृच्छ चान्द्रायण आदि के द्वारा जो शरीर का शोषण किया जाता है उसी को तापसा लोग उत्तम तप कहते हैं।

प्राजापत्येन कृच्छ्रेण ततः पापात्प्रमुच्यते।

वतिक्रमाश्च ये केचिद्वाँमनः कायसंभवाः॥

सद्भिः सह विनिश्चित्य यद्ब्रूयुस्तत्समाचरेत्॥

धर्म अतिक्रमों के होने पर प्राजापत्य कृच्छ व्रत करना चाहिए। इसके करने से वह पाप से मुक्त हो जाता है। ये व्यतिक्रम जो कोई भी हों मन-वाणी और कर्म के द्वारा उत्पन्न होने वाले समझे जाते हैं सत्पुरुषों के साथ इनके प्रायश्चितों के विषय में विशेष निश्चय करके जो भी कुछ वे कहें उसे ही करना चाहिए।

ग्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा।

पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं व्रजेत् ॥

जो धन अनीति पूर्वक लिया है उसे दान द्वारा लौटा देना चाहिए और तपश्चर्या द्वारा उस कुकर्म का प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा न करने पर वह संचित पाप रौरव नरक में धकेलता है।

अग्निहोत्रं तपः सत्यंवेदानाँचैवसाधनम्

आतिथ्यंवैश्यवदेवंचइष्टमित्यभिधीयते॥

वापीकूपतडागनिदेवत यतनानिच।

अन्नप्रदानमर्थिभ्यः पूर्तभित्यभिधीयते॥

मार्कण्डेय पुराण

अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदाध्ययन तथा अतिथि सत्कार यज्ञ कर्म इष्ट कर्म कहे जाते हैं। कुआँ, बावड़ी, मन्दिर, अन्न, वस्त्र आदि का दान यह पूर्ति कर्म है। इष्ट और पूर्ति कर्म सदा करते रहने चाहिए।

पाप कर्म आध्यात्मिक प्रगति में प्रधानतया बाधक रहते हैं। इनके कारण जप तप आदि से सफलता नहीं होती। ईश्वर की ओर मन एकाग्र नहीं होता पर यदि चित को प्रायश्चित विधान द्वारा निर्मल बना लिया जाय तो आत्मशान्ति और साधनात्मक सफलता का द्वारा खुल जाता है।


जागरुक ही इस जीवन अनुष्ठान में जागृत रहते हैं

एक संत दस शिष्यों समेत सघन वन में रहते थे। एक रात्रि को उनने एक विशेष साधना कराई। शिष्यों को पंक्तिबद्ध होकर ध्यान करने के लिए बिठा दिया।

रात्रि के तीसरे प्रहर गुरु ने धीमे से आवाज दी-राम। राम उठा गुरु ने उसे चुपके से दुर्लभ भी सिद्धि प्रदान की। अब दूसरे की बारी आई। पुकारा श्याम। पर श्याम सो रहा था। इस बार भी राम ही आया और दूसरी सिद्धि भी लेकर चला गया।

शेष सभी शिष्य सो रहे थे। गुरु को उस दिन दस सिद्धियाँ देनी थी। सोते को जगाने का निषेध था। दसों बार राम ही आया और एक-एक करके दसों सिद्धियाँ प्राप्त करके कृत-कृत्य हो गया। सोने वाले दूसरे दिन जागे। वे पछताये तो, पर यह भी समझे कि जागरुक ही इस जीवन अनुष्ठान में जागृत रहते हैं। भगवान की पुकार सुनते हैं और धन्य हो जाते हैं।


कुण्डलिनी के दो आग्नेय शक्ति तत्व

ब्रह्माण्ड के प्रतिनिधि इस पिण्ड में यों सभी अवयव और सभी क्रिया-कलाप अनोखे हैं पर ध्रुव केन्द्रों की सत्ता और महत्ता का जितना बखान किया जाय उतना ही कम है। पृथ्वी को जो भी सामर्थ्य मिलती है उसका आधार सूर्य है। सूर्य का शक्ति प्रवाह धरती के जिस मर्म केन्द्र में होकर प्रवेश करता है उस स्थान का नाम उत्तरी ध्रुव है। जिस तरह भोजन मुँह में होकर किया जाता है उसी तरह धरती का मुँह उत्तरी ध्रुव है। चिड़िया अपने छोटे बच्चे को मुँह में पिसा हुआ चारा उगल कर खिलाती रहती है उसी तरह सूर्य रूपी चिड़िया अपने छोटे बच्चे इस भू-पिण्ड को यह सब वैभव प्रदान करती रहती है जिससे उसका जड़ चेतन परिवार इतना सुरम्य बना हुआ है।

वह मुँह-जहाँ होकर यह भूलोक सामर्थ्य ग्रहण करता है उस मुख गह्वर को उत्तरी ध्रुव ही कहना चाहिये। मनुष्य काया रूपी धरती का मुँह ब्रह्म रन्ध्र है। इसके चुम्बकीय केन्द्र बिन्दु को सहस्रारचक्र कहते हैं। धरती पर अनायास ही प्रकृति क्रम से सूर्य की सामर्थ्य बरसती और प्रविष्ट होती है उसी प्रकार हमारा ब्रह्म-रन्ध्र रूप सूर्य अपनी सामान्य क्षमता धरती के प्रतिनिधि मूलाधार चक्र को प्रदान करता रहता है। मानव जीवन की अगणित प्रकट और अप्रकट क्षमतायें इसी कारण प्रकाश में आती हैं और मनुष्य को विभूतिमयी प्रतिभा अपनी गरिमा प्रदर्शित करती हैं। कुण्डलिनी शक्ति को दीप्तिमान अग्नि कहा गया है पर उसका मूल स्रोत सहस्रार चक्र ही है। उसे भी कालाग्नि कहा गया है।

कायगत यह दो अग्नियाँ ही शरीर और मन के माध्यम से विविध विधि क्रिया-कलाप उत्पन्न करती हैं। यह अग्नि सन्तुलन यदि अस्त-व्यस्त, असन्तुलित, असम्बद्ध या शिथिल हो जाय तो मनुष्य हारा हुआ, टूटा हुआ, निराश, हताश और हतवीर्य दिखाई पड़ेगा। वह जीवित भले ही रहे पर उसमें से आशा और स्फूर्ति की चमक एक प्रकार से पलायन ही कर चुकी होगी। ओजस, तेजस, मनोबल, आत्मबल, ब्रह्मवर्चस् की जो दीप्तिमान चिनगारियाँ मनुष्य के भावना क्षेत्र और क्रिया क्षेत्र में उड़ती हुई दिखाई पड़ती है उन्हें इन्हीं दो दिव्य अग्नियों का प्रकाश परिचय कहा जायगा। आध्यात्मिक भाषा में इसे कुण्डलिनी शक्ति की प्रस्फुटित आभा कहकर सम्बोधित किया जाता है।

ध्रुवीय चुम्बकत्व पृथ्वी की मौलिक सम्पदा नहीं है। कुछ दिन पूर्व तक वैज्ञानिक यह समझते थे कि अपनी कक्षा में घूमने से तथा सूर्यताप सम्मिश्रण से यह चुम्बकत्व उत्पन्न होता है। पर अब कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय (सैत्रदिगो) के खगोल विज्ञानी डॉ0 डब्ल्यू एक्सफोर्ड ने अपनी दीर्घकालीन शोध के उपरान्त उसे सूर्य से प्रवाहित हो रहे एक निर्झर के रूप में प्रतिपादित किया है। उन्होंने वाशिंगटन की ‘इंटरनेशनल मैनमेटो स्फियर कान्फ्रैन्स में अपना शोध निबन्ध पढ़ते हुए कहा कि सूर्य का शक्ति प्रवाह समस्त धरती पर नहीं वरन् उत्तरी ध्रुव के एक विशेष स्थल पर बरसता है जो ध्रुव प्रभा के रूप में खुली आँखों से भी देखा जा सकता है। वहाँ से वह प्रकाश फिर पृथ्वी के वायुमण्डल तथा अंतर्गर्भ में प्रवेश करके धरती में जीवन उत्पन्न करता है। यह शक्ति प्रवाह इतना तीव्र होता है कि यदि धरती उसे अपने व्यापक क्षेत्र में तत्काल वितरित कर दे तो वह क्षण भर में जल-वल कर भस्म हो जाय।

मानवी काया की ठीक यही स्थिति है चेतना के प्राण सूर्य ‘सविता’ से उसकी दिव्य किरणें ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करती हैं। वहाँ से वह प्रपात दक्षिण ध्रुव तक बहता चला आता है और वहाँ नियंत्रित, परिष्कृत होकर विभिन्न दिव्य नाड़ियों द्वारा शरीर और मन के विभिन्न क्रिया कलापों का संचालन करने के लिए वितरित हो जाता है। कुण्डलिनी का यही क्रम है। शक्ति वितरण का वही प्रत्यक्ष केन्द्र जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित ‘अग्नि गह्वर’ काम बीज ही है। इसी को संग्रह भण्डार कहना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर उनका पानी एक विशाल जलाशय में रोक लिया जाता है और फिर वहाँ से नहरें निकाल कर सुविस्तृत भूमि खण्ड की सिंचाई होती है उसी प्रकार सूर्य रूपी हिमालय से निकलने वाली प्राण प्रवाह की सरिता का जल ब्रह्मरन्ध्र से अवतरित होता है। उसे उद्गम स्थल कह सकते हैं। यहाँ से वह प्रवाह मेरुदण्ड में होकर बहता हुआ काम बीज के बाँध में जमा होता है। इस विशाल जलाशय पर नियन्त्रण करने वाले अधिकारी जितना जल जहाँ जिस नहर में भेजकर जिस भूखण्ड को सींचना चाहते हैं उसकी व्यवस्था बना देते हैं। मूलाधार के शक्ति गह्वर में अनन्त भण्डार भरा पड़ा है। यही समय पर कामोत्तेजना के रूप में उछलता, उफनता, लहराता, गरजता दिखाई पड़ता है। यदि उस जल का कुछ उपयोग न किया जाय और ऐसे ही जमा रहने दिया जाय तो वह तोड़-फोड़ कर अपना रास्ता बनाता है। नहरों में काट देने से सिंचाई होने लगती है और बाँध टूटने का खतरा भी चला जाता है। कुण्डलिनी विद्या को इस बाँध जलाशय के उपयोग का उपयुक्त मार्ग ही कहना चाहिए। जो उसे जानते हैं वे सिद्ध पुरुषों जैसा लाभ उठाता है जो अपरिचित रहते हैं उन्हें ऐसे खतरों का सामना करना पड़ता है जिसके लिये पीछे पश्चाताप ही हाथ रह जाय।

दक्षिण ध्रुव को वितरक संस्थान माना गया है। उत्तर ध्रुव से लेकर दक्षिण ध्रुव तक एक ऐसी विद्युत पट्टी है जिसमें असह्य ऊष्मा भरी रहती है। सूर्य से आने वाला शक्ति प्रवाह ध्रुव पर अवतरित होता है। वहाँ टकरा कर उसमें उछाल आता है। जैसे रबड़ की गेंद पूरे वेग से वहाँ टकराने पर उछल जाती है उसी प्रकार यह शक्ति प्रवाह भी उछल कर उस स्थान पर गिरता है जिसे दक्षिण ध्रुव कहते हैं। उछाल के आकाश मार्ग को हम चाहें तो अपने काय-विश्व में मेरुदण्ड कह सकते हैं। ब्रह्मरन्ध्र से टकराकर सविता के दिव्य प्राण उछल कर जिस मार्ग से सञ्चय भण्डार में स्थिर होता है उसे मेरुदण्ड कह सकते हैं। मस्तिष्कगत ऊष्मा को योनि गह्वर तक पहुँचाना मेरुदण्ड का काम है। इस मार्ग की प्रवाह धारा को इड़ा कह सकते हैं। कुण्डलिनी समस्त शरीर को पोषण भेजती है। मस्तिष्क को विशेष रूप से। इस विशेष संचार मार्ग को पिंगला कहा गया है।

उत्तरी ध्रुव में एक विशेष प्रभा मण्डल संव्याप्त रहता है। सूर्य न रहने पर भी वहाँ दीप्तिमान प्रकाश बना रहता है। सूर्य, चन्द्र आदि न होने पर भी यह प्रकाश अस्तित्व बहुत अचम्भे जैसा लगता है। यह चुम्बकीय विद्युत कणों की प्रकीर्णता ही है। यह प्रकाश जैसा दीखने वाला विद्युतीय परिमण्डल एक लम्बी रज्जु माला जैसा होता है। उसकी कई रंग की ज्योतियाँ झिलमिलाती सी दीखती हैं। यह रंग तेजी से परिवर्तित-उद्भूत और तिरोहित होते रहते हैं। अलास्का विश्वविद्यालय के ध्रुव शोध केन्द्र संस्थान ने इस रंग भरी झिलमिल के जो चित्र खींचे वे अपरिचित लोगों के लिए बहुत ही कौतूहल वर्धक थे।

कुण्डलिनी साधना के संदर्भ में जब नादबिन्दु साधना के शिक्षण का समय आवेगा तब बतायेंगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।

सूर्य इन दोनों ध्रुवों को अपनी अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है। फिर भी वे इसलिए ठण्डे हैं कि वहाँ सूर्य की रोशनी तथा गर्मी फैलकर नष्ट हो जाती है। लगभग 5000000 वर्ग मील क्षेत्र उत्तरी ध्रुव और 3000000 वर्ग मील क्षेत्र दक्षिणी ध्रुव एक प्रकार का दर्पण क्षेत्र है जहाँ से सूर्य किरणें परावर्तित होकर लौट आती हैं सूर्य की 80 प्रतिशत शक्ति इन ध्रुव प्रदेशों में नष्ट हो जाती है या यों कहना चाहिये कि वहाँ की बर्फ और नम वायु मण्डल में ऊर्जा जज्ब हो जाती है इसलिए यह क्षेत्र जहाँ अत्यधिक शीत वाला है वहाँ अन्दर शक्ति की मात्रा भी बहुत अधिक है।

भगवान मनुष्य को जो भी अनुदान वरदान और अनुग्रह प्रदान करते हैं उनका 80 प्रतिशत भाग इन दोनों ध्रुवों को सूर्यचक्र और अग्निचक्र को ही प्राप्त होते हैं। पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिये कि हमारी ठण्डक, उपेक्षा, अकर्मण्यता, मोह ग्रस्तता में वह सारे दिव्य अनुदान-वरदान निरर्थक चले जाते हैं। उस अनुदान का सदुपयोग कैसे किया जा सकता है और उस माध्यम से सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है यह विज्ञान कुण्डलिनी योग में भरा पड़ा है।

जब पहली बार वह अन्वेषक लकड़ी के जहाज इन प्रदेशों में पहुँचे तो वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि यहाँ एक मील दूर बैठे आदमी से भी उसी तरह बातचीत की जा सकती है मानो वह बिलकुल पास ही बैठा हो। ट्रैक्टर और विद्युत जनरेटर की आवाजें दसियों मील दूर से सुनी जा सकती है। चलते समय बर्फ में चरमराते जूतों तक की चरमराहट की आवाज एक मील दूर तक सुनाई पड़ती है। लेकिन यह सब होता तभी है जब तापमान शून्य से नीचा होता है। कभी-कभी हवा की परत आकाश में इतनी सघन हो जाती है कि आकाश में उड़ते वायुयान की आवाज भी नीचे नहीं आ पाती। खामोशी और आवाज की परस्पर विरोधी परिस्थितियाँ इन ध्रुवों में देखकर प्रकृति का यह निरालापन देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

अपना मनः क्षेत्र यदि साँसारिक विषय विकारों की ज्वलनशील आग से विरत करके शून्य तापमान तक ले जाया जा सके तो इस संसार में कहाँ क्या हो रहा है-कौन क्या कर या सोच रहा है, इसकी सूक्ष्म ध्वनि बहुत स्पष्ट से सुनाई पड़ सकती है और भूतकाल एवं वर्तमान की घटनाओं परिस्थितियों को ही नहीं भविष्य की सम्भावनाओं को भी जाना जा सकता है। यदि अपना मन तपश्चर्या की, योगाग्नि की गरम पट्टी को आकाश से आच्छादित कर ले तो फिर संसार के आकर्षण, प्रलोभन, कौतूहल, भय, मनोविकार के ढोल ही क्यों न बजते रहें उनका एक भी शब्द कान में नहीं आता और घोर कोलाहल भरे वातावरण में रहते हुए भी चित को समाधिस्थ जैसा बनाकर रखा जा सकता है। यह ध्रुवों जैसी परिस्थितियाँ कुण्डलिनी साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती है क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों का त्यों लेखा-जोखा ही कुण्डलिनी विज्ञान में सन्निहित है।

कुण्डलिनी उस सार्वभौमिक जीवन तत्व (ठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्य द्यद्बद्धद्ग श्चद्बठ्ठद्गद्बश्चद्यद्गह्य) को कहते हैं जो इस विश्व के कण-कण में चेतना रूप में संव्याप्त हैं। इसके भीतर आकर्षण अट्रैक्शन (्नह्लह्लह्ड्डष्ह्लद्बशठ्ठ)एवं विकर्षण (क्रद्गश्चह्वद्यह्यद्बशठ्ठ) की दोनों ही धारायें विद्यमान हैं। इन्हें स्थूल रूप से विद्युत इलेक्ट्रिसिटी (श्वद्यद्गष्ह्लह्द्बष्द्यब्) और चुम्बक मैगनेटिज्म (रुड्डद्दठ्ठद्गह्लह्यद्व) के रूप में प्रत्यक्ष किया जा सकता है। हर्बर्ट स्पेन्सर के अनुसार इसे जीवन का सार (ऐसेन्स आफ लाइफ) कहा जाना चाहिए। इसका ईसाई धर्म पुस्तक बाइबल में “महान सर्प” के रूप में उल्लेख किया गया है।

साधना शास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को ऊष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का भी होता है।

ब्रह्मज्योतिर्वसुधा मा ब्रह्मस्थानीय उच्चयते।

ततो यः पावको नाम्ना यः सद्भिर्योग उच्चयते।

-मत्स्य पुराण

ब्रह्मज्योति अग्नि ब्रह्म रन्ध्र स्थान में निवास करती है। यह साधकों को पवित्र करने वाली है। यही योगाग्नि है।

चन्द्राग्निरविसंयुक्तो आद्या कुण्डलिनी माता।

हृत्प्रदेशे तु सा ज्ञया अंकुराकारसंस्थिता॥ 27॥

-अग्नि पुराण

चन्द्र और सूर्य की शक्ति से भरी हुई कुण्डलिनी शक्ति हृदय में रहती है उनकी ज्योति अंकुर के आकार की है।

मूलाधारादा ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त सुषुम्ना सूर्याभा।

तन्मध्ये तटित्कोटिसमा मृणालतन्तु सूक्ष्मा कुण्डलिनी।

तत्र तमोनिवृतिः तदर्शनार्त्सवपापनिवृतिः॥

-मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् 1। 2

मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक सूर्य के प्रकाश जैसी सुषुम्ना नाडी फैली हुई है। उसी के साथ कमल तन्तु से सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति बँधी हुई है। उसी के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है और पापों से निवृत्ति होती है।


देव, दानव या मानव कुछ भी बना जा सकता है।

मनुष्यता भूलोक है। इस धरती के श्रेष्ठ नागरिक बनकर मानवीय कर्तव्यों को पूरा करते हुए हम भू-लोक वासी मानव प्राणी कहला सकने का गर्व और गौरव अनुभव कर सकते हैं।

इससे ऊँचे लोक में जाने की इच्छा हो, स्वर्ग के पाने और रहने की इच्छा हो, तो हमें ऊँचा उठना होगा। कर्त्तव्यनिष्ठ नागरिक मात्र रहने भर से सन्तुष्ट न होकर करुणा और ममता का विकास करना होगा। पुण्य और परमार्थ अपनाना होगा। अपना चरित्र उस मार्ग-दर्शक स्तम्भ के रूप में विनिर्मित करना होगा जिसके प्रकाश में अगणित लोग सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

आत्म-निर्माण मानवी कर्तव्य है, पर देव भूमिका की प्राप्ति आत्म-विकास से ही सम्भव है। अपनी अहंता जब संकीर्णता के बंधन तोड़ती हुई विशाल और व्यापक बनती है, लोक-कल्याण ही आत्म-कल्याण लगता है, तब समझना चाहिए हम देव बनें। देवताओं के लिए ही स्वर्ग बना है। हमारा विकसित देवत्व निश्चित रूप से हमें वहाँ पहुँचा देगा, जिसे स्वर्ग कहा जाता है। स्वर्ग ऊपर है, वहाँ पहुँचने के लिए ऊँचा उठना ही पड़ेगा। चरित्र, दृष्टिकोण और कर्म तीनों को ऊँचा उठाते हुए कोई भी व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में सरलता पूर्वक प्रवेश कर सकता है।

नरक में जाने की इच्छा हो तो वह भी पूर्णतया अपने हाथ की बात है। नरक नीचे है। उसे अधःलोक कहते हैं। पतित जीवन जीने वाले, पतित दृष्टिकोण अपनाने वाले और पतित कर्म करने वाले अपने समग्र अधःपतन के कारण सहज ही नरक तक पहुँच सकते हैं।

नीति और सदाचरण की मर्यादाओं का उल्लंघन कर्तव्य धर्म की उपेक्षा, दूसरे के प्रति निष्ठुरता और दुष्टता का व्यवहार, इन्द्रियों का स्वेच्छाचार, मन की कुटिलता जिसने अपना ली, उसे नरक तक पहुँचने में कोई रुकावट नहीं रहती। वह फिसलता हुआ, उस स्थान तक पहुँचने और चिरकाल तक रहने में सफल हो सकता है-जिसे नरक कहा जाता है और जहाँ की असत्य मंत्रणाओं का वीभत्स वर्णन किया जा सकता है। उसे देखना ही नहीं-अनुभव करना भी पूरी तरह अपने हाथ में है। इसके लिए केवल अपनी प्रवृत्तियों को पतनोन्मुख भर बनाना है।

मनुष्य, देव और असुर यह तीन वर्ग माने गये हैं। यों वर्णनकर्ताओं ने इनकी आकृति का भी अन्तर किया है पर वह आलंकारिक है। यह तीनों ही वर्ग मनुष्य जाति में ही होते हैं। वस्तुतः आकृति में नहीं प्रकृति में अन्तर होता है।

देवता सुन्दर होते हैं, स्वर्ग में रहते हैं, वरदान देते हैं और सत्कर्म देखकर प्रसन्न होते हैं। स्वयं सुखी रहते हैं और सब को सुखी करते हैं। देखने में सुन्दर, स्पर्श में सुकुमार, सदा तरुण और अमर, अमृतपायी होते हैं। कल्प-वृक्ष के समीप रहने के कारण उनकी कोई कामना अपूर्ण नहीं रहती।

असुरों का काला कलंकित मुख होता है। दाँत बड़े-बड़े सबको खा जाने की लोभ लिप्सा के प्रतीक। सिर पर सींग-हर किसी को त्रास देने का, कष्ट पहुँचाने का-गिराने की दुष्प्रवृत्ति का परिचय देते हैं। लाल नेत्र-अहंता, ईर्ष्या और आवेश के प्रतीक। यह असुर न चैन से बैठते हैं और न बैठने देते हैं। भयावह ही उनकी आकृति होती है और भयंकर ही प्रकृति।

मनुष्य इन दोनों का मध्यवर्ती है। उपकार न बन पड़े न सही पर कम से कम किसी का अपकार नहीं करता। अनुकरणीय और अभिवन्दनीय न बन सके पर घृणित और हेय बनकर नहीं जीता। कर्तव्यनिष्ठ सदाचार और स्वाभिमानी संयत जीवन जीता है मनुष्य। मनुष्य भू-लोक में रहते हैं। देवता स्वर्ग में और असुर नरक में रहते हैं। यह तीनों ही स्थितियाँ हम स्वेच्छापूर्वक वरण करते हैं और उसी स्तर के बन कर रहते हैं।

अपनों से अपनी बात


गुरुदेव क्यों आये? क्यों चले गये?

गत मास गुरुदेव का आकस्मिक आगमन हुआ। वे शान्तिकुँज आये और थोड़े समय यहाँ रहकर चले गये। यों उनने हरिद्वार का आश्रम विश्व की दीप्तिमान आत्माओं से संपर्क बनाये रहने, उन्हें बल और परामर्श देते रहने, विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों की गुत्थियाँ सुलझाने के लिए ही बनाया है। वे आरम्भ से ही घोषित करते रहे हैं कि जब-जब उन्हें आवश्यकता अनुभव हुआ करेगी, तब जितने दिन आवश्यक होगा उतने दिन वे यहाँ ठहरा करेंगे और अन्य समय अपने भावी जीवन के साधन क्षेत्र में तत्पर रहा करेंगे। पर इस बार उनका आना आकस्मिक ही हुआ।

वसन्त पर्व तक यहाँ न आने का उनका प्रतिबन्ध था सो पूर्ण हो चुका था। इस बीच उनने अपना अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कर लिया था। बंगला देश के मुक्ति संघर्ष के दाव पर लगे हुए भारत के भविष्य के प्रति वे अति सतर्क रहे और राष्ट्र के जीवन-मरण जैसे उस प्रश्न को हल करने के लिए दिव्य शक्तियाँ जो काम कर रहीं थी उसके प्रमुख पात्र के रूप में संलग्न रहे। वस्तुस्थिति ऐसी ही थी। जिसमें वसन्त पर्व से पूर्व उनका आना हो भी नहीं सकता था। फिर वह दिन उनके जीवन लक्ष्य की मञ्जिल पर एक-एक कदम बढ़ते चलने का दिन भी रहा है। अपने संबंध में भावी कार्यक्रम निर्धारित करने से लेकर नव निर्माण के अपने क्रिया-कलाप की दिशा निश्चित करने तक का शुभ मुहूर्त था। ऐसी दशा में इससे पूर्व उनका आना कैसे हो सकता था? उस पर्व पर वे परिजनों को झकझोरने के लिए कुछ विशेष प्रयास करने और सजग आत्माओं के साथ संपर्क बनाने में संलग्न रहे। यह सभी आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य थे जो उन्होंने यथा समय सम्पन्न कर लिये। इस समय उनके आने का प्रत्यक्ष कारण मेरा स्वास्थ्य था। वह अकस्मात बिगड़ा। हृदय के कई अत्यन्त घातक दौरे आये। वे असामान्य थे। जहाँ तक कष्ट सहने का प्रश्न है वहाँ तक सारा जीवन तितीक्षा के अभ्यास में लगा है। गुरुदेव की छाया में रहकर अधिक नहीं तो इतना तो सीखा ही है कि आगत आपत्तियों के समय धैर्य, साहस और विवेक को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहना चाहिए। व्यथा को इस तरह दबाये रहना चाहिए कि समीपवर्ती किसी अन्य को उसका आभास न होने पाये। मल-मूत्र त्याग की क्रिया दूसरों को जुगुप्सा उत्पन्न करती है, इसलिए उसे छिपाकर किया जाता है। प्रजनन प्रकरण भी गुप्त रखा जाता है। कारण यही है कि उसे देखकर दूसरों के मन में कुरुचि उत्पन्न होती है। कष्टों की प्रक्रिया भी ऐसी है। मानव जीवन में सुखों के साथ दुःखों का भी युग्म है। सम्पत्ति ही नहीं विपत्ति भी भगवान मानव कल्याण के लिए भेजते हैं। माता दुलार भी करती है और चपत भी लगाती है। उसकी दोनों ही क्रियायें बालक के-मनुष्य के हित में होती हैं, यह तथ्य असंख्य बार समझा और हृदयंगम किया गया है। गुरुदेव के संपर्क में ऐसे ही पाठ पढ़ती रही हूँ कि रुदन को मुस्कान में कैसे बदला जाना चाहिए। इस बार हृदय रोग के दौरे हुए उन्हें चिकित्सकों ने एक स्वर से प्राणघातक ठहराया और उनसे बच निकलने पर आश्चर्य प्रकट किया।

उस विपत्ति काल में धैर्य, विवेक और साहस को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने का शक्ति भर प्रयत्न करने पर भी यही विदित हो रहा था कि अब शरीर और प्राण अपना संबंध विच्छेद करने जा रहे हैं। यों गुरुदेव की प्रत्यक्ष निकटता का अभाव भी कम कष्टकारक नहीं रहा है। वे जिस स्थिति में रहते हैं और मुझे जिस स्थिति में रहना पड़ता है उसे राम वन गमन के पश्चात् भरत की मनोवेदना से तौला जा सकता है। उनकी अप्रत्यक्ष समीपता को छीन सकना तो किसी की भी-स्वयं उनकी सामर्थ्य में नहीं है-पर प्रत्यक्ष समीपता निरर्थक हो सो बात भी नहीं। उसकी भी अपनी आवश्यकता और उपयोगिता है। वह छिन जाने से भीतर ही भीतर सूनेपन की धुन्ध छा गई है। वे किस कष्ट में रहते हैं और मैं किस सुविधा साधनों के बीच रहती हूँ, यह असमानता कई बार रुला देती है, लगता है कि अपना बहुत बड़ा वैभव कहीं चला गया है और उसका स्थान शून्य की स्तब्धता ने ले लिया है, पर हृदय रोग के दौरे के समय यह बात भाव चिन्तन तक सीमित न रह कर और आगे बढ़ गया। लगा कि शरीर और प्राण ही अब विलग होने जा रहे हैं।

ऐसे समय में एक ही इच्छा थी कि उनके प्रत्यक्ष दर्शन करते हुए ही नेत्र बन्द हों। समर्पित काया और आत्मा का उन्हीं के हाथों समापन हो और उसके बाद जो कुछ बच जाय सो उन्हीं में लीन हो जाय। उस विपत्ति की घड़ी में यह अनुरोध उन तक पहुँचाना पड़ा। यों अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के लिए जीवन भर कभी उन पर रत्ती भर भी दबाव नहीं पड़ने दिया है। उनकी इच्छा और व्यवस्था में सहायक न सही कम से कम बाधक कभी भी नहीं बनी हूँ। ऐसी दशा में उनकी तप साधना में व्यतिरेक उत्पन्न करने जैसा रुचा जरा भी नहीं पर विवशता ने यह करा लिया। लाचार होकर ही मैंने उन्हें पुकारा कि यदि सम्भव हो तो इस घड़ी में वे कितनी प्रकार उपस्थित होने की कृपा करें। पत्नी के नाते नहीं-उनकी साधिका के नाते, अनन्य साधनारत-अकिंचन आराधिका की तरह ही यह इच्छा व्यक्त करने का साहस कर सकी।

जैसे ही पुकार उन तक पहुँची, वे अविलम्ब शान्तिकुँज उपस्थित हो गये। शारीरिक कष्ट तो उनके आगमन के समय भी बहुत था पर मानसिक कष्ट उनके सामने आते ही भाव भरे आँसुओं के साथ बह गया। कुछ समय वे यहाँ ठहरे। उनकी करुणा और ममता के साथ बरसते हुए अमृत कण कितनों की आत्माओं को जीवनदान देते हैं। मुझे तो उस काय कष्ट से भी त्राण मिल गया। उनके आगमन के उपरान्त भी कुछ समय कष्ट रहा। पर वह क्रमशः हलका होता चला गया और वह दिन आ गया कि वे प्रयोजन पूरा करने के लिए पुनः वापिस लौट गये।

आहार-विहार का सन्तुलन रखने से आमतौर पर रोग नहीं होते। हम लोगों को भी उस तरह के काय कष्टों में फँसने का अवसर नहीं आता। इस बार तो कुछ कारण ही दूसरा था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस का अन्त गले के कैन्सर से हुआ। वह न तो उनके आहार विहार का व्यतिक्रम था और न प्रारब्ध भोग अथवा देवी प्रकोप। वे अपनी उपलब्ध तप पूँजी की सीमा से अधिक खर्च भावावेश में करते रहे। भले ही वह जन कल्याण के लिए किया गया हो पर प्रकृति की मर्यादा का व्यतिक्रम तो हुआ ही। आमदनी से अधिक खर्च करने वाले की जो दुर्दशा होती है वह उनकी भी हुई।

अपने सामने भी एकमात्र कारण वही था। पिछले दिनों परिवार के लिए जितना अनुदान आवश्यक था वह दिया तो पूरा गया पर उसका उपार्जन उतना न हो सका। अखण्ड दीपक पर कुमारी कन्याओं के माध्यम से शान्तिकुँज में जो अखण्ड गायत्री जप-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों के निमित्त चल रहा है, उसके अतिरिक्त अपनी उपासना थोड़ी सी ही हो पाती है। अधिकाँश समय तो पत्रिकाओं के सम्पादन, पत्रों के उत्तर तथा आगन्तुकों के स्वागत सत्कार में ही निकल जाता है। गुरुदेव ने अपनी सारी शक्ति विश्व महत्व के कार्यों में पूरी तरह लगा रखी थी। विशाल परिवार की विविध आवश्यकतायें पूरी करने का भार मेरे ऊपर आ पड़ा। शक्ति कम और बोझ अधिक पड़ने से अपना ढाँचा चरमराने लगा तो उसमें कुछ आश्चर्य भी नहीं था। यही है अपने इन दिनों के रोग-प्रकोप का कारण।

अब स्थिति बहुत कुछ काबू में आ गयी है। गुरुदेव के अनुदान की मात्रा बढ़ जाने से परिजनों की आत्मिक और भौतिक सहायता के लिए जो किया जाना चाहिए उसे अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह निभाया जा सकेगा।

गुरुदेव केवल मेरे लिए ही आये हों और परिवार के लिए कुछ सन्देश निर्देश न दिये हों सो बात नहीं। संयोगवश जिन लोगों से भेंट हो गयी उन्हें वे व्यक्तिगत रूप से भी कुछ बता गये हैं। शेष सभी लोगों के लिए कुछ सन्देश दे गये हैं उनका उल्लेख इन पंक्तियों में किया जा रहा है। यों अखण्ड-ज्योति का-मेरा अस्तित्व अब केवल उनकी सन्देश वाहिका के रूप में ही है। प्रेरणा स्रोत वे ही हैं। जो कुछ किया जा रहा है-पत्रिकाओं में जो छपता है उसे प्रकारान्तर से गुरुदेव का ही प्राण प्रवाह मानना चाहिए। अपना कार्य तो उनके संकेत सन्देशों को कार्यान्वित करना ही है।

परिवार को लोक मंगल के लिए अधिक सक्रिय होना चाहिए यह इच्छा उन्होंने बार-बार व्यक्त की। यों जो कुछ किया जा रहा है उसे भी नगण्य नहीं कहा जा सकता, पर जीवन निर्वाह के अतिरिक्त बची हुई शक्तियों की जमाखोरी और फिजूल खर्ची बन्द करके उसे युग प्रयोजन के लिए नियोजित कर दिया जाय तो बाहर के लोगों की बात छोड़िए, अपना छोटा सा परिवार ही-राष्ट्र निर्माण ही नहीं, विश्व निर्माण भी असंदिग्ध रूप से कर सकने में भली प्रकार समर्थ हो सकता है।

हम में से अधिकाँश भगवान पर-संसार पर अहसान करने के लिए-यश और महत्व प्राप्त करने के लिए यत्किंचित् सेवा कार्य बड़ी कठिनाई अनुभव करते हुए-अन्यमनस्क भाव से करते हैं। कारण यह कि सारा ध्यान व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में लगा रहता है। भौतिक साधनों की अधिकाधिक मात्रा-विलासिता और अहंता की तृप्ति ही जीवन लक्ष्य बन कर रह जाती है उसी में सारा मनोयोग नियोजित रहता है। स्त्री पुत्र तक ही समस्त संसार सीमित दिखाई पड़ता है। सुखी और समृद्ध बनने के लिए इस संसार में दो ही साधन दिखाई पड़ते हैं-एक स्त्री दूसरे बच्चे-कर्त्तव्य पालन तो उनके लिए भी किया जाना चाहिए, पर जीवन की समस्त विभूतियाँ इन्हीं दो पर न्यौछावर कर दी जायें यह सर्वथा अवाँछनीय है। मनुष्य के कर्त्तव्य इससे बाहर भी हैं और उन्हें पूरा भी किया जाना चाहिए।

गुरुदेव परिजनों से अपेक्षा करते रहे हैं और इस बार मेरे माध्यम से विशेष अनुरोध किया है कि लोक मंगल के कर्त्तव्यों को भी अपने नित्यकर्म में ही जोड़ लें और उसकी पूर्ति भी उसी तरह करें जैसे अपनी शारीरिक आर्थिक और पारिवारिक समस्यायें हल करने के लिए की जाती है। स्वार्थपरता की संकीर्णता में ही डूबे रहना आपा-धापी की कीचड़ में ही कुलबुलाते रहना मानवीय गरिमा को देखते हुए किसी भी प्रकार शोभनीय नहीं। हमें परमार्थ प्रयोजन को जीवन लक्ष्य के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ रखना चाहिए। मनुष्य की सुख-शान्ति सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर है, अतएव हर व्यक्ति को सामाजिक उत्कर्ष के लिए व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से भी अधिक प्रयत्नशील रहना चाहिए। कहना न होगा कि युग निर्माण योजना की विचारणा और प्रक्रिया व्यक्ति एवं समाज को समग्र रूप से समुन्नत करने में असंदिग्ध रूप से सर्वांगपूर्ण है। इसमें भाग लेना इस युग की सबसे बड़ी-सबसे महत्वपूर्ण और सबसे आवश्यक साधना है। परिवार के प्रत्येक परिजन को पूरे उत्साह के साथ इसमें भाग लेना चाहिए।

आत्म साधना में ईश्वर उपासना, आत्म चिन्तन, आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रधान रूप से सम्मिलित रहना चाहिए। जप, ध्यान, पूजन वन्दन की क्रिया नियमित रूप से चलनी चाहिए, पर उसमें भावनाओं का गहरा पुट रहना चाहिए। लकीर पीटने की चिह्न पूजा अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकती। भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से जितनी विरक्ति होगी उतनी ही आत्मिक विभूतियों के सम्पादन में अभिरुचि एवं तत्परता बढ़ेगी। इस तथ्य को भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए। अस्तु उपासना का कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं मान लिया जाना चाहिए, वरन् उसके प्रयोजन की उत्कृष्टता बनाये रहनी चाहिए। यदि ईश्वर को रिश्वत और खुशामद के बल पर फुसला कर अपने भौतिक स्वार्थ साधनों का जाल बिछाया जा रहा है तो समझना चाहिए कि वह भक्ति, साधना, उपासना से हजारों कोसों दूर भौतिक मायाजाल है, जिससे आत्म प्रवञ्चना के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

आत्म चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास के लिए अन्तरंग जीवन को समर्थ, सशक्त बनाने के लिए, अन्तर्मुखी होना अत्यन्त आवश्यक है। अपने स्वरूप, लक्ष्य, कर्त्तव्य और उपलब्ध जीवन विभूतियों के श्रेष्ठतम सदुपयोग की बात निरन्तर सोचते रहना चाहिए। अधिक मिले के प्रयास के साथ साथ जो मिला है उसके उत्कृष्ट उपयोग की बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यही हैं वे उपदेश जो परिजनों के प्रति सन्देश रूप में देकर गुरुदेव चले गये हैं। इन्हें श्रद्धा और तत्परता के साथ पालन करना अब हमारा कार्य और कर्त्तव्य है। यों वे प्रकारान्तर से इन्हीं बातों को सदा ही लिखते रहे हैं, पर इस बार उनने विशेष रूप से जोर दिया है कि कहने और सुनने-लिखने और पढ़ने तक ही अध्यात्म सीमित नहीं कर लिया जाना चाहिए वरन् उसे व्यावहारिक जीवन क्रम में समाविष्ट और ओत-प्रोत करने का प्रयत्न करना चाहिए। उनके व्यक्तित्व के प्रति जितनी श्रद्धा रखी जाती है उतनी ही यदि उनके परामर्श और निर्देश को हृदयंगम किया जाय तो निस्सन्देह हम उनके पथ पर-उनके साथ-साथ कदम मिलाते हुए उस लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं जो मानवीय जीवन की महान उपलब्धि का वास्तविक प्रयोजन और लाभ है।

भविष्य में वे कब वापिस लौटेंगे इसका कुछ ठीक निश्चय नहीं। यह उन्होंने पूर्णतया अपने या अपने मार्गदर्शक के हाथ में रखा है कि जब कभी आवश्यकता समझे तब आयें और जब प्रयोजन पूरा हो जाय तब चले जायें। प्रतिबन्ध का काल समाप्त हो गया। आवागमन पर रोक की अवधि वसन्त पर्व पर समाप्त हो गयी। तो भी वे बिना प्रयोजन और अभीष्ट शक्ति सञ्चय किए बिना जल्दी ही आने वाले नहीं हैं, फिर भविष्य में गायत्री तपोभूमि में या अन्यत्र पिछले दिनों जिस प्रकार उनके दर्शनों के लिए भीड़ लगा करती थी उसकी पुनरावृत्ति अब कभी भी नहीं होने वाली है। जब वे शान्तिकुँज कुछ समय के लिए आवें तभी दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ पड़े ऐसा भविष्य में कभी भी सम्भव न होगा।

जो थोड़ा बहुत समय वे शान्तिकुँज आने के लिए निकाल पाया करेंगे उसके एक-एक क्षण का सदुपयोग होगा। उनके निवास के लिए एक नितान्त एकाँत कक्ष बना दिया गया जिसमें वे एकाकी रहेंगे। लगभग 20 घण्टे उनकी व्यक्तिगत उपासना-साधना के लिए निश्चित रहा करेंगे केवल कुछ घण्टे ही नितान्त आवश्यक परामर्श के लिए निकल सका करेंगे। यह बहुमूल्य समय दर्शन, शंका समाधान-भौतिक प्रयोजनों के लिए आशीर्वाद जैसे तुच्छ कार्यों में बर्बाद नहीं किया जायगा। प्रेरणा प्राप्ति के आत्मिक प्रयोजनों के संदर्भ में ही वह घड़ियाँ नियोजित रहेंगी। उसके लिए पहले से ही पत्र व्यवहार कर लेना चाहिए कि किसी की उत्कण्ठा यदि मिलने की है तो उसका प्रयोजन क्या है और उसे न्यूनतम कितने समय में पूरा किया जा सकता है। घण्टों स्वच्छन्द दर्शन, सत्संग, हास-परिहास-संपर्क सान्निध्य के लिए बैठे रहने की बात अब बहुत पीछे रह गई है। यों पहले ही उनका समय मूल्यवान था, पर अब तो इतना अधिक बहुमूल्य है और उसके साथ समस्त विश्व के इतने महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं कि उनमें तनिक भी व्यतिरेक उत्पन्न करना अनुचित ही कहा जायगा। अगली बार जब कभी वे आवें तब किसे, क्यों, कितने समय तक मिलना आवश्यक है यह पहले से ही हम लोगों से पत्र व्यवहार कर लेना चाहिए। यदि मिलना नितान्त आवश्यक समझा जायगा तो ही उसके लिए व्यवस्था बनाई जायगी।

इस प्रतिबन्ध में न तो अहंता है और न स्वार्थपरता। जैसे बड़े आदमी छोटों से नहीं मिलते और घर बैठे गपशप करते रहते हैं, या अपने स्वार्थ साधन में तत्पर रहकर दूसरों की आवश्यकता की उपेक्षा किया करते हैं, वैसी बात स्वप्न में भी नहीं है। जो गुरुदेव को जानते हैं उन्हें यह समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि वे तप साधना द्वारा ऊँचे उठ रहे हैं नीचे नहीं गिर रहे हैं। उनका प्रेम और ममत्व परिजनों के लिए ही नहीं-मानव मात्र के लिए-प्राणि मात्र के लिए जिस वेग-आवेग के साथ उमड़ता रहता है उसमें कमी नहीं आई वरन् इन दिनों वृद्धि ही हुई है। पर उस प्रेम का उपहार अनुदान प्रस्तुत करने के लिए उन्हें कुछ उपार्जन और सञ्चय भी करना चाहिए। तपश्चर्या में निरत समय इसी प्रयोजन के लिए है। यदि वह अनिवार्य जनसंपर्क को छोड़कर ऐसे ही दर्शन सत्संग के लिए लग जायें तो वे उसी स्थिति में बने रहेंगे जिसमें अपने को असहाय, अभावग्रस्त अनुभव करते हुए भी वे उग्र साधना के लिए दौड़ पड़े थे। वे हमें प्यार करते हैं-हमें उनसे प्यार करना चाहिए। हमारे प्यार का एक सच्चा स्वरूप यह हो सकता है कि उच्च स्तरीय प्रयोजनों में इन दिनों लगे हुए उनके समय में अपने मोहवश अनावश्यक व्यवधान उत्पन्न नहीं करें। वे इन दिनों जिस कार्य में लगे हुए हैं उस पर विश्व मानव के भविष्य की अति महत्वपूर्ण सम्भावनायें टिकी हुई हैं। यदि हम उसे अपने मोह के लिए प्रयुक्त करते हैं तो उसकी हानि विश्व मानव को ही भुगतनी पड़ेगी। इतनी बड़ी क्षति पहुँचाकर हम अपनी भावुकता तृप्त करें यह किसी प्रकार भी उचित न होगा।

शाखाओं का संगठन-युग-निर्माण प्रक्रिया का सञ्चालन, परिजनों की व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान परामर्श जैसे कार्य उन्होंने मेरे जिम्मे छोड़े हैं। उन्हें यथाशक्ति कर भी रही हूँ। उन्हीं कार्यों के लिए उन्हें भी खटखटाया जाय तो यह पुनरावृत्ति मात्र ही हुई। टिकट बाबू जब टिकट बाँट ही रहा है तो उसी को खरीदने के लिए स्टेशन मास्टर को क्यों तंग किया जाय। उनका सा व्यक्तित्व तो कहाँ से लाऊँ, पर उपरोक्त काम मैं उसी तरह निभा रही हूँ जितना कि उनके द्वारा सम्भव था। ऐसी दशा में वे ही बातें उनके सामने रखने की कुछ आवश्यकता नहीं रह जाती। जो इतना समझ सकेंगे वे सहज ही अपनी भावुकता पर नियन्त्रण कर लेंगे।

उपयुक्त परिजनों की आत्मिक प्रगति में अतिरिक्त सहायता करने की उनकी आकाँक्षा अभी भी यथावत है। वह घटी नहीं वरन् बढ़ी ही है। प्रशिक्षण का समय चला गया। अब वे किसी को विस्तारपूर्वक सिखा, समझा न सकेंगे। इसके लिए जितना लम्बा समय चाहिए वह रह नहीं गया है। अब वे केवल प्रत्यावर्तन करेंगे। अपनी उपार्जित शक्ति का वितरण भर करेंगे। इसके लिए पूरे तीन दिन शान्तिकुँज में रहना पर्याप्त होगा। आचार्य यम के द्वार पर बालक नचिकेता तीन दिन पड़ा रहा था और आग्रह पूर्वक पञ्चाग्नि विद्या का अति महत्वपूर्ण अनुदान लेकर वापस लौटा था। वैसा ही कुछ यहाँ भी होगा। जब वे सुविधा की स्थिति में होंगे तब यही किया करेंगे।

साधक तीन दिन तक पूर्ण एकान्त सेवन करेंगे-मौन रहेंगे और मस्तिष्क को सब प्रकार के विचारों से खाली रखेंगे। शौच, स्नान जैसे नित्य कर्मों के अतिरिक्त यथा सम्भव अधिक से अधिक निःचेष्ट रहेंगे। शरीर से ही नहीं मन से भी। गंगाजल पियेंगे। मेरे द्वारा बना और परोसा भोजन ही करेंगे।

इस अवधि में गुरुदेव अपनी अन्तःस्थिति को उनके अन्तरंग में उतारते रहेंगे। बछड़ा जिस तरह दूध पीता, भूमि जैसे वर्षा का जल सोखती, लकड़ी जैसे आग पकड़ती, बैटरी जैसे चार्ज होती है ठीक उसी मनःस्थिति में साधक अपनी मनोभूमि बनाये रहेंगे और जहाँ तक सम्भव होगा मनःक्षेत्र को पूर्णतया खाली रखेंगे। साधक को इतना भर करना है। निवास, भोजन आदि की व्यवस्था शान्तिकुँज में ही रहेगी। इस अवधि में हर साधक अपने ऊपर एक दिव्य शक्ति अवतरित होते हुए अनुभव करेगा और इससे लाभान्वित होकर इतनी शक्ति प्राप्त कर लेगा जिसके आधार पर प्रगति का पथ-प्रशस्त हुआ स्पष्ट दिखाई देने लगे।


Quotation

शांतिकुंज पधारने पर पूज्य गुरुदेव से विभिन्न विषयों पर चर्चा भी होती रही। परिजनों की व्यक्तिगत, आत्मिक प्रगति, परिवार का शाखा संगठन, शान्तिकुँज की भावी रूपरेखा तथा युग परिवर्तन की विश्वव्यापी प्रक्रिया पर उनने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये। वे सभी नोट कर लिये गये हैं; उन्हें अगले महीने की अखण्ड ज्योति में छाप दिया जायगा। अगला पूरा अंक इसी विवरण का होगा।

ऐसा क्रम कब चलेगा, कितने दिन चलेगा यह सर्वथा अनिश्चित है। इसकी कोई सार्वजनिक घोषणा भी नहीं होगी। केवल इच्छुक व्यक्तियों के नाम नोट रहेंगे और क्रमानुसार उन्हें बुलाया जाता रहेगा। एक बार में उतने ही साधकों को बुलाया जायगा जितनों को देने के लिए उपयुक्त क्षमता उपलब्ध होगी। साधारण तौर पर दस से लेकर बीस तक साधकों को बुलाया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण से लेकर शक्तिपात तक की समस्त क्रिया-प्रक्रिया को इस थोड़े ही समय में प्रशस्त करने का उपक्रम बन जायगा। इस भावी साधना प्रक्रिया का भावी स्वरूप और आधार अखण्ड-ज्योति के किसी अगले अंक में वर्तमान अस्वस्थता दूर होने पर ही प्रस्तुत करूंगी। इस समय तो उस प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डाला गया है जिसके अनुसार गुरुदेव कुछ समय के लिए यहाँ आये और चले गये।


“युग-अभिनन्दन”


युग-अभिनन्दन (Kavita)

पुनर्जागरण के स्वर छेड़ो जन-मन के तारों पर,

तभी विश्व में नूतन युग का अभिनन्दन होगा।

आज सृजन की डोली लेकर आगे बढ़ो कहारों।

आज प्रगति की धार न बाँधो सीमित कूल कगारो।

धरती के सीने के ऊपर की चादरें हटा दो-

हर पतझड़ की जड़ें काटकर, खुलकर हँसो, बहारो!

श्रम के सर्जक! उठो! बहाओ स्वेद ईंट-गारों पर।

वही भूमि के भाग्य-भाल का वर, चन्दन होगा।

तभी विश्व में नूतन युग का अभिनन्दन होगा॥

आज किसानों की कुटिया के सन्तोषों को पूजो!

मुक्त सृजन के सरगम के संग कर्म-कोकिलों! कूजो!

द्वार-द्वार से बहती आओ मनुज-प्यार की गंगे।

बन्धु-भाव के सप्त स्वरों! तुम विश्व-गगन में गूँजो!

विश्वासों का दाव लगाओ मत थोथे नारों पर-

तभी सार्थक ‘जन-मन-गण’ का यश वन्दन होगा।

तभी विश्व में नूतन युग का अभिनन्दन होगा॥

और धार चमकाओ कृषकों! निज हल की फालों पर,

रीझ उठे जीवन की मुरली सरल ग्राम-ग्वालों पर।

किसी नयन को भिगो न पायें अब अभाव के आँसू-

मुखरित कलियों की छाया हो गलियों के गालों पर!

पीछे सृष्टि बसायेंगे हम व्योम-चाँद-तारों पर,

पहले धरती का हर मरुथल नन्दन वन होगा।

तभी विश्व में नूतन युग का अभिनन्दन होगा॥

प्रतिपल सजग रहो सीमा पर विजयी पहरेदारों!

लक्ष्मण-रेखा अब न लाँघना, ओ लोभी हत्यारों!

जो भी पतझड़ चले लाँघने इस बसन्त का वैभव,

उसे फूँक देना पलभर में फौलादी अंगारों।

अटल एकता सकल राष्ट्र की डटे सिंह द्वारों पर,

तभी सुरक्षा के कन्धों पर युग-सर्जन होगा।

तभी विश्व में नूतन युग का अभिनन्दन होगा॥

(जगदीश सहाय खरे ‘जलज’ एम0ए0)

*समाप्त*