उसे अवश्य पा लोगे

किसी पहाड़ी झील को देखो। तुषार की रुपहली पर्त छाई हुई है। हवा चलती है, पानी बरसता है। बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है। किन्तु झील की निश्चलता में अन्तर नहीं आता। किनारों पर रंग-रंग के पक्षी कूजते और किलोल करते हैं। किन्तु उस झील में कोई विक्षेप उत्पन्न नहीं होता। तट पर फैली वृक्षावली में एक से एक सुन्दर फूल खिलते, शाखा से छूटकर झील पर गिरते; किन्तु झील के स्थिर हृदय में उनका कोई प्रतिबिंब नहीं उठता। वह अपने निर्विकल्प भाव में एक समान तन्मय रहती है। तुम में यदि उस झील की तरह स्थिरता तन्मयता और निर्विकल्पता का धैर्य है तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।

कुम्हार तालाब से मिट्टी खोद लाता है। उसे कूट-पीसकर महीन बनाता और छानकर साफ करके पानी डालकर उसे खूब मसलता है तैयार हो जाने पर चाक पर चढ़ा कर अपनी इच्छा के अनुसार वह उसे आदमी, पशु या पक्षी का रूप देता है। किन्तु इतना सब होने पर भी मृत्तिका कुछ नहीं बोलती। सबकुछ समभाव से सहन करती हुई कुम्भकार की इच्छा के वशवर्ती रहती है। यदि तुममें उस मृत्तिका की भाँति सहनशीलता और नम्रता है तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।

मरुस्थल में भटके प्राणी की वाँछा में पानी की लालसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पानी के लिए उसकी व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि उसे सिकता कणों में पानी का आभास होने लगता है। पनघट पर खड़े पथिक की प्यास में न तो इतनी व्याकुलता होती है और न ऐकान्तिकता। वह पानी के अतिरिक्त वहाँ के दृश्य भी देखता और रस लेता है। यदि मुझे पाना चाहते हो तो पनघट पर खड़े प्यासे पथिक की इच्छा नहीं मरुस्थल में भटके तृषित प्राणी की आकाँक्षा लेकर चलो, एक दिन तुम उसे अवश्य प्राप्त कर लोगे।

-संत एमर्सन


सुख शाँति का राजमार्ग-धर्माचरण

धर्म एक राजमार्ग है जिस पर चलते हुए भौतिक प्रगति और आत्मिक शान्ति को प्राप्त करने के लिए लक्ष्य तक सरलतापूर्वक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है।

पहुँचना सभी पूर्णता तक चाहते हैं- अभीष्ट सबको सुख है। इच्छा सभी की एक है पर रास्ता भटक जाने से लोग कँटीली झाड़ियों में उलझ जाते हैं। और सुख की चेष्टा करते हुए भी दुःख पल्ले पड़ता है।

प्रगति का राजमार्ग एक ही है-धर्म का अवलम्बन। इसी सड़क पर चलते हुए यात्रा सरल और सुनिश्चित रह सकती है। पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने की कोई और सीधी पगडंडी नहीं है। जो उतावली करके जल्दी पहुँचने की आतुरता में पगडंडी ढूँढ़ते हैं वे भूल भुलैयों में भटक कर ऐसे दलदल में जा फँसते हैं जहाँ से न आगे बढ़ना होता है न पीछे हटना। मंजिल दूर रह जाती है और जाल में फँसे पक्षी की तरह एक नये संकट का और सामना करना पड़ता है।

अधर्म का रास्ता अपनाकर भौतिक प्रगति के लिए आतुर लोग पगडंडी पर चलने वाले लोग ही हैं। उन्हें देरी स्वीकार नहीं। बीज बोने के दिन ही उन्हें फल चाहिए अंकुर उगने से लेकर पौधे को विकास क्रम पूरा करने में जो समय लगता है उतनी प्रतीक्षा वे नहीं करना चाहते। यह उतावली अवाँछनीय कार्य करने की अनीति पूर्वक उपार्जन के लिये विवश करती है। आज की इच्छा कल ही पूरी हो जाय-परसों के लिए इन्तजार न करना पड़े इस जल्दबाजी में लोग भटकते और कुमार्गगामी बनते हैं। तत्काल कुछ मिलता भी दीखे तो वह जुगनू की चमक जैसा जादू होता है। उसमें ठहरने की क्षमता जरा भी नहीं होती। रोशनी में चमकते पानी के बुलबुले मोती जैसे दीखते भर हैं उन्हें संग्रह करके कोई मोती का व्यापारी नहीं बन सकता। अधर्म का आचरण करके किसी ने भी आज तक स्थिर प्रगति नहीं की। ओस चाटने से किसी की प्यास नहीं बुझी। अनीति की कमाई किसी को शान्ति नहीं दे सकी।

धर्म का मार्ग वैसा ही है जैसा विद्यार्थी का क्रमिक अध्ययन करते हुए स्नातक बनना। माली विधिवत- बगीचा लगाता है और तत्परतापूर्वक शाँत चित्त से पौधों को सँभालता रहता है। वह जानता है कि फल नियत अवधि पूरी होने पर ही आवेंगे। आज विद्यालय में भर्ती होने वाला छात्र कल एम.ए. बनने को आतुर हो तो नकली प्रमाण पत्र ढूंढ़ने का ही कुछ जाल रचेगा। आम की गुठली से पौधा बनने और उन पर फल लगे दिखाते हुए बाजीगर फिरते रहते हैं पर उन जादू के पेड़ों से आम की फसल उगाने का उपार्जन सम्भव नहीं। न वह एम.ए. का नकली प्रमाण-पत्र काम आता है और न बाजीगर का बगीचा यशस्वी होता है। तुर्त-फुर्त सफल बनने का लालच ही मनुष्य को अधर्म का मार्ग अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस कँटीली पगडंडी पर चलने के लिये जो भी मचला उसने धोखा ही खाया है कष्ट ही उठाया है।

धर्म का पहला लक्षण है धैर्य। भगवान मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाते हुए पहला बताया है -’धृति’। धृति अर्थात् धैर्य। धैर्य का तात्पर्य है उतावली छोड़कर, अभीष्ट प्रयोजन का अभीष्ट मूल्य चुकाने की व्यवस्था बनाना लम्बी मंजिल को क्रमिक गतिशीलता के साथ साहस और उत्साह के साथ पूरी करना।

धर्म की राह पर चलते हुए ही भौतिक प्रगति और आत्मिक पूर्णता का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है। धार्मिक व्यक्ति का पहला प्रयास अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना होता है। उसमें जहाँ-जहाँ मलीनता होती है वहीं धर्म वृत्ति उसे स्वच्छ करती है। इस स्वच्छता के साथ ही वह साहस विकसित होता है जिसके सहारे सन्मार्ग पर चलते हुए चिरस्थायी प्रगति और सुख शान्ति का वरण किया जा सके।


उपासनाएं सफल क्यों नहीं होती?

उपासना देवी-देवताओं की की जाती है। स्वयं भगवान अथवा उसके समाज परिवार के देवी-देवता ही आमतौर से जन साधारण की उपासना के केन्द्र होते हैं। विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति, दर्शन, भोग, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।

यह मान्यता कई बार सही साबित होती है कई बार गलत। प्राचीन काल के इतिहास पुराण देखने से पता चलता है कि कितने ही साधकों और तपस्वियों ने कठिन उपासनाएं करके अद्भुत शक्तियाँ, विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। स्वयं भी इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएं देव प्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएं थी और उन्हें, उनने तप साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था प्रमाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिये सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जो उपरोक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।

साथ-साथ यह भी देखने में आता है कि घर-बार छोड़कर-पूरा समय देवाराधन में लगाये हुए व्यक्ति साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई गुजरी स्थिति में चले गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गई न आत्मिक महत्ता। न उन्हें सुख प्राप्त था न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और न विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा विशेषता उपलब्ध हुई। वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गई। भौतिक सुख सम्पत्ति न सही आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता तो भी सन्तोष किया जा सकता था पर वैसा भी कुछ वे प्राप्त न कर सके।

यह स्थिति स्वभावतः मन को असमंजस में डालती है। उसी प्रक्रिया का अवलम्बन करने से एक को लाभ एक को हानि ऐसा क्यों? एक को सिद्धि दूसरे के हाथ निराशा यह किसलिए? कैसे? वही देवता, वही मञ्च, वही विधि, एक की फलित एक की निष्फल इसका क्या कारण? यदि भगवान या देवता और उनकी उपासना अन्ध-विश्वास है तो फिर उससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी -रोशनी देता है फिर देवता और उनके उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं क्यों?

इस उलझन पर अनेक दृष्टियों से विचार करने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि देवता या मन्त्रों में जितनी अलौकिकता दृष्टिगोचर होती है, उससे लाभान्वित हो सकने की पात्रता साधक में होना नितान्त आवश्यक है। मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त है। तेज धार की तलवार में सिर काटने की क्षमता है इसमें सन्देह नहीं पर वह क्षमता सही सिद्ध हो इसके लिये चलाने वाले का भुजबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं पर उससे लाभान्वित होने के लिये उसी प्रकार के यन्त्र चाहिये। यन्त्र उपकरणों के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता अनर्थ मूलक भी बन जाता है।

स्वाति के जल से मोती वाली सीपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृत उसी को जीवन दे सकता है जिसका मुँह खुला हुआ है। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृत अथवा प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो उससे लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक यही बात देव उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो, देवता और मन्त्रों का लाभ भी वे ही उठा पाते हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मन्त्रों से लाभ उठाने के लिये भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।

गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से आचरण और चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर लें तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अंतःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जायं, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाय तो अन्ततः उसके लिये घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।

भगवान और देवता कहाँ हैं? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है। इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि यह दिव्य चेतन सत्ता निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणु गति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं उन्हें पूरा करने में संलग्न हैं। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की जड़ चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को सँभालने का विशालकाय काम पड़ा है सो वे उसी में लगी रहती हैं। एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्न रखता है। व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके लिये समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा दिव्य सत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि ही उस व्यक्ति इकाई को देखता सँभालता है। वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वार सम्पन्न होती है।

व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप यह देव अंश समर्थ बनते हैं और दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा साधक की आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अंतरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, नंगा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मन्त्र जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।

विराट ब्रह्म कितना ही महान क्यों न हो व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होगा अन्तरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है पर वह हर अन्तःकरण में समान रूप में प्रबल नहीं होती सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों का एक झोंका घुस जाय तो भी उसकी अन्तरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिये उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं प्रायश्चित किये बिना भी चैन न पड़ेगा। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरन्तर क्रूर कर्म ही करता रहता है उसकी अन्तरात्मा यदा कदा बहुत हलका सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा। ईश्वर दोनों के हृदय में है। दोनों की अन्तरात्मा की प्रकृति एक सी है- दोनों ही अपना कर्त्तृत्व निबाहती हैं। पर दोनों की स्थिति सर्वथा भिन्न है। सज्जन ने सत्प्रवृत्तियों को पोषण देकर अपनी अन्तरात्मा को निर्मल बनाया है उसकी प्रबलता कभी शाप-वरदान के चमत्कार भी प्रस्तुत कर सकती है। पर दूसरे ने अपनी आत्मा को निरन्तर पद दलित करके उसे भूखा रखकर दुर्बल बना रखा है वह न तो प्रबल प्रतिरोध कर सकती है और न कभी उसके द्वारा ईश्वर की पुकार आदि की जाय तो उसका कुछ प्रतिफल निकल सकता है।

सर्वव्यापी, साक्षी, दृष्टा, नियन्ता, कर्ता, हर्ता, सत चित आनन्द आदि विभूतियों से सम्पन्न विराट ब्रह्म है। देव शक्तियाँ भी अपनी सीमित परिधि के अनुरूप निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त और निर्धारित प्रयोजनों में तत्पर हैं उन विराट सत्ताओं की उपासना सम्भव नहीं। उपासना के लिये प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा। अनुरूप उसका पोषण करते -समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ सुन्दर और बहुत दूध देती है। दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली रुग्ण और कम दूध देती है। इसका कारण उन दोनों ग्वालों की गौ सेवा में न्यूनाधिकता का होना ही है। अपने अन्तरंग में अवस्थित देवता को भगवान को अपनी आस्था निष्ठा, पवित्रता आदि विशेषताओं के द्वारा समर्थ बनाया जाता है। इसके उपरान्त ही पूजा उपासना रूपी बाल्टी में दूध दुहने की बात बनती है।

रामकृष्ण परमहंस की काली ने विवेकानन्द को आत्मशक्ति से सम्पन्न बनाकर उन्हें महामानवों की पंक्ति में ला खड़ा किया। दूसरे ताँत्रिक, अघोरी, कापालिक, ओझा, उसी काली देवी से झाड़ फूँक के छुटपुट प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। विराट महाकाली एक है। पर रामकृष्ण परमहंस के अन्तरंग में परिपोषित काली अंश की क्षमता उनके अनुरूप थी और ओझा, अघोरी लोगों की काली बहुत दुर्बल और ओछे किस्म की होती है। अर्जुन के कृष्ण की सामर्थ्य अलग थी। मीरा सुर के कृष्ण अलग थे और रासलीला करने वालों के पुजारियों के कृष्ण अलग हैं। आकृति प्रतिमा दोनों की एक सी हो सकती है पर सामर्थ्य में असाधारण अन्तर होगा। यह अन्तर उन साधकों की आन्तरिक स्थिति के कारण विनिर्मित हुआ होता है।

इस तथ्य को हमें समझना ही होगा। न समझने से हमें असमंजस और भ्रम में पड़ना पड़ेगा, निराशा हाथ लगेगी और सम्भव है तब उपेक्षा ही नहीं नास्तिकता भी सामने आ खड़ी हो। उसी मन्त्र और उसी विधान से एक व्यक्ति आश्चर्यजनक प्रतिफल प्राप्त करता है और ठीक उसी रीति-नीति को अपनाकर दूसरा व्यक्ति सर्वथा निराश असफल रहता है। इसमें न विधि विधान को दोष दिया जाना चाहिये और न देवता की निष्ठुरता या भाग्य को कोसा जाना चाहिए और न देवता की निष्ठुरता या भाग्य को कोसा जाना चाहिए। तथ्य यही है कि हमने अपने इष्ट देव को इतना परिपुष्ट नहीं बनाया कि वे हमारी प्रार्थना के अनुरूप उठ खड़े होने और सहायता कर सकने में समर्थ होते। द्रौपदी के कृष्ण अलग थे वे एक पुकार सुनते ही दौड़कर आये। हमारे कृष्ण अलग हैं वे लगभग लंघन में पड़े रोगी की तरह हैं पुकार सुनने और सहायता के लिये खड़े होने की सामर्थ्य उनके हाथ पैरों में है नहीं, फिर वे प्रार्थना क्या उत्तर दें?

अध्यात्म विद्या के तत्वदर्शियों ने इस तथ्य को छिपाया नहीं है। उन्होंने सदा यह कहा है कि इस विराट ब्रह्म में जो कुछ दिव्य महान, पवित्र, प्रखर है उसका एक अंश हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। जो चाहे उसे ठीक तरह संजोने संभालने में लग सकता है और उन मणि मुक्ताओं से अपने जीवन भाण्डागार को भरा पूरा कर सकता है। उपेक्षा करने अथवा दुर्गति करने से वे निरर्थक ही बनकर रह जायेंगे। हर किसी के मस्तिष्क में गणेश विद्यमान है जो बुद्धि विकास की साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ों में पानी नहीं देगा उनके विनायक भगवान सूखे मूर्च्छित एक कोने में पड़े होंगे। लड्डू, खीर खिलाने, स्तोत्र पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता न कर सकेंगे। बुद्धिमान और विद्वान बन सकना सम्भव न होगा। हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है। व्यायाम करने वाले संयमी ब्रह्मचारी लोग बजरंग बली के भक्त प्रमाणित हो सकते हैं पर जिनने अपने असंयमी और भ्रष्ट आचरण से हनुमान जी को पीड़ित प्रताड़ित करने में कमी नहीं छोड़ी; उनका ‘हनुमान चालीसा’ पाठ कुछ ज्यादा कारगर नहीं होगा। वे आरोग्य और बलिष्ठता का वरदान अपने रुग्ण हनुमान से कैसे प्राप्त कर सकेंगे?

बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती है जो स्तुति, जप, पूजा, प्रसाद के तनिक से प्रलोभन पर ललचाये जा सकते हैं और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाये जा सकते हैं। अधिकाँश पूजा, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि विधानों, कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट-घंट से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूलि झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुतः न भगवान इतने भोले हैं न कोई देवता इतना सरल है, न कोई मन्त्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप, रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइन्स ही कहना चाहिए। उसके नियम और प्रयोजनों को समझकर तदनुकूल चलने से ही लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने-सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद मन्त्र जप, उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।


हिम्मत न हारिए (Kahani)

सेनाध्यक्ष को सूचना मिली कि शत्रु के आक्रमण की गति तीव्र हो गई है। वह अब नगर के समीप ही पहुँचने वाला है। वह विचलित हो गया और निराशा में डूब गया।

सेनाध्यक्ष की पत्नी ने भी समाचार सुना था। वह अपने पति के पास आकर गम्भीर हो गई और बोली मैंने इससे भी बुरी सूचना पाई है।

उसने घबड़ा कर पूछा-सो क्या? पत्नी ने कहा आपके चेहरे पर झलकने वाली व्यग्रता और निराशा सेना की हार से भी बुरी है। जब तक हिम्मत को नहीं हारा जाय तब तक कोई पराजय स्थायी नहीं रह सकती।


मंत्र साधना के आधार और चमत्कार (2)

मन्त्र साधना की सफलता के लिए साधक का उपयुक्त व्यक्तित्व निर्माण करना एक ऐसा कार्य है जिस पर जितना अधिक ध्यान दिया जाय उतना ही उत्तम है। शरीर के क्रिया कलाप ऐसे हों, जिनमें इन्द्रिय शक्ति कलुषित एवं विकृत न होती हो। इस दृष्टि से इन्द्रिय निग्रह, संयम और सदाचार पर अत्यधिक जोर दिया जाना चाहिए। साथ ही भावनाओं की उत्कृष्टता मंत्र शक्ति में प्राण फूंकती है इस बात को ध्यान में रखा जाय। साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संशय रहित रहना चाहिए। इसके लिए सतत प्रयत्न करते रहने और तत्काल फल प्राप्ति के लिए उतावली न करने का धैर्य भी आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत जीवन की रीति-नीति एवं लोक व्यवहार में सौम्य, उदात्त एवं निर्मल दृष्टिकोण रहना चाहिए। स्नेह, सद्भावना, सज्जनता, करुणा एवं उदारता का अन्तः करण में जितना अधिक समावेश होगा, उसी अनुपात में साधना की सफलता के लिए उपयुक्त मनोभूमि बनेगी। इस प्रकार का शारीरिक और मानसिक निर्माण अध्यात्मिक प्रगति की कुँजी समझी जानी चाहिए। साधक की सफलता का तीन चौथाई श्रेय इसी तथ्य पर निर्भर है। विधि-विधान को तो एक चौथाई ही महत्व दिया जा सकता है। इन दिनों साधना पथ के पथिकों को जो असफलता जन्य निराशा ही हाथ लगती है उसका एक बहुत बड़ा कारण जीवन साधना की उपेक्षा और विधि-विधान को ही सब कुछ मान बैठने की भूल है यदि यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राजमार्ग पर चलने की सर्वांगपूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया-कलापों की।

साधना विधान के अन्य माध्यम भी हैं पर मंत्र साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इससे संकल्प शक्ति जागृत एवं नियन्त्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और बाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।

मंत्र क्या है, इसके बारे में आज की स्थिति, सार्वभौम ओर सर्वजनीन दृष्टि से कुछ कह सकना कठिन है कारण यह है कि इन दिनों साम्प्रदायिक पक्षपात और पूर्वाग्रहों का बोलबाला है। हर सम्प्रदाय अपनी परम्परा को प्रधानता देता है। अन्य मत वालों की बात उसके गले नहीं उतरती। किसी प्रकार समझा भी दिया जाय तो श्रद्धा नहीं जमती। ऐसी दशा में सामयिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यही कहना ठीक होगा कि साधक अपनी मान्यताओं के आधार पर कोई मन्त्र अपना ले और उसी पर श्रद्धा केन्द्रित करे तथा उसी को साधना का माध्यम बनाये। ऐसी दशा में विधि-विधान भी अपनी-अपनी परम्पराओं के अनुसार अपनाना होगा। यों यह मार्ग भी देर सवेर में लक्ष्य तक पहुँचा ही देगा और अश्रद्धा, संदेश एवं आशंका के वातावरण में किये गये उपयुक्त मन्त्र की अपेक्षा अधिक अच्छा रहेगा। पर यह काम चलाऊ समझौता है, तथ्य नहीं। यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के दोष से मुक्त किया जा सके तो उसे यह कहने में कोई संकोच न होगा कि गायत्री मन्त्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मन्त्र और तंत्र की अगणित शाखा-प्रशाखाएं इसी का विस्तार परिवार है। अन्य धर्मावलम्बियों के अन्य मंत्र हो सकते हैं जब कभी सार्वभौम एवं सर्वजनीन मन्त्र की खोज पूर्वाग्रहों को दूर रखकर निष्पक्ष भाव से उसकी निजी महत्ता के आधार पर की जायेगी तो उसका निष्कर्ष गायत्री मन्त्र ही निकलेगा। पर इन दिनों इसी के लिए आग्रह करना साधना के क्षेत्र में गतिरोध उत्पन्न करना होगा। अभी तो सरल प्रतिपादन यही है कि अपनी श्रद्धानुरूप मन्त्र और परम्परानुसार विधि-विधान अपना लिया जाय। यह तरीका भी बुरा नहीं है। प्रगति धीमी भले ही रहे पर प्रगति लक्ष्य की ही ओर होती रहेगी।

मन्त्र साधन के संदर्भ में गत मास, ध्वनि और लय की चर्चा की जा चुकी है और जप का प्रयोजन समझाया जा चुका है। श्रद्धा और एकाग्रता युक्त मनोभूमि में स्वच्छ शरीर मन, वस्त्र स्थान और उपकरणों का ध्यान रखते हुए किया हुआ जप तुरन्त स्फूर्ति प्रदान करता है और जिस प्रकार चाय आदि उत्तेजक पदार्थ पीने पर तत्काल फुरती दिखाई पड़ती है वैसा ही अनुभव साधना काल एवं उसके उपरान्त होता है। लगता है कि कुछ अतिरिक्त और महत्वपूर्ण शक्ति कहीं से मिलती है और वह अपेक्षा कृत अधिक आत्म बल सम्पन्न बना है। हर्ष, सन्तोष और प्रकाश के रूप में मंत्र की उपलब्धि को सहज ही परखा जा सकता है। कहना न होगा कि इसका लाभ अपने तक ही सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव बाह्य जगत पर भी पड़ता है। किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को इस उपलब्धि से प्रभावित और परिवर्तित किया जा सकता है। सिद्धि इसी का नाम है।

स्वामी रामतीर्थ ने एक बार कहा था-ईश्वर बना जा सकता है उसे देखा या दिखाया नहीं जा सकता। सूक्ष्म तत्व के बारे में भी यही बात है। ईथर तत्व में शब्द प्रवाह के संचार को रेडियो यंत्र अनुभव करा सकता है ‘ईथर’ को उसके असली रूप में देखा जा सकना संभव नहीं। गर्मी, सर्दी, सुख, दुख की अनुभूति होती है। उन्हें पदार्थ की तरह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता है। मंत्र में उच्चारित शब्दावली मंत्र की मूल शक्ति नहीं वरन् उसको सजग करने का उपकरण है। किसी सोते को हाथ से झकझोर कर जगाया जा सकता है। पर यह हाथ ‘जागृति’ नहीं अधिक से अधिक उसे जागृति का निमित्त होने का श्रेय ही मिल सकता है। मंत्रोच्चार भी अन्तरंग में और अन्तरिक्ष में भरी पड़ी अगणित चेतन शक्तियों में से कुछ को जागृति करने का एक निमित्त कारण भर है।

किस मन्त्र से किस शक्ति को, किस आधार पर जगाया जाय इसका संकेत हर मन्त्र के साथ जुड़े हुए विनियोग में बताया जाता है। वैदिक और ताँत्रिक सभी मंत्रों का विनियोग होता है। आगम और निगम शास्त्रों में मन्त्र विधान के साथ ही उसका उल्लेख रहता है। जप तो मूल मन्त्र का ही किया जा जाता है पर उसे आरम्भ करते समय विनियोग को पढ़ लेना अथवा स्मरण कर लेना आवश्यक होता है। इससे मन्त्र के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।

मन्त्र विनियोग के पाँच अंग (1) ऋषि (2) छन्द (3) देवता (4) बीज (5) तत्व। इन्हीं से मिलकर मन्त्र शक्ति सर्वांगपूर्ण बनती है। पंच तत्वों के सम्मिश्रण से विभिन्न शरीर और पदार्थ बनते हैं। इसी प्रकार विनियोग के पाँच अंग उसे प्रत्यक्ष और सजीव बनाने वाले आधार माने जाते हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर की पाँच परतें हैं इन्हें आवरण या कोश भी कहते हैं। प्याज में भी वैसी ही हैं उन्हें (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय कोश, और (5) आनन्दमय कोश कहते हैं। इन्हें पाँच शक्ति भण्डार भी कह सकते हैं। पृथ्वी पर जैसे पाँच महाद्वीप हैं उसी प्रकार चेतन सत्ता को स्थूल एवं सूक्ष्म प्रकृति की मनुष्य काया में इन पाँच माध्यमों से देखा-समझा जा सकता है। मन्त्र विनियोग में पाँचों अंग ऋषि, छन्द, देवता, बीज और तत्व इन पाँचों आधारों को प्रस्फुटित, प्रदीप्त एवं प्रयुक्त कैसे किया जाय इसका पथ-प्रदर्शन करते हैं। अस्तु किसी मन्त्र की साधना करते हुए उसके विनियोग भाग को भी जानना समझना और अपनाना आवश्यक है।

‘ऋषि’ तत्व का संकेत है- मार्गदर्शक गुरु। ऐसा व्यक्ति जिसने उस मन्त्र में पारंगतता प्राप्त की हो सर्जरी, संगीत जैसे क्रिया-कलाप अनुभवी शिक्षक ही सिखा सकता है। पुस्तकीय ज्ञान से नौकानयन नहीं सीखा जा सकता इसके लिए किसी मल्लाह का प्रत्यक्ष पथ-प्रदर्शन चाहिए। चिकित्सा ग्रन्थ और औषधि भण्डार उपलब्ध रहने पर भी चिकित्सक की आवश्यकता रहती है। विभिन्न मनोभूतियों के कारण साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो जाता है कि शिष्य का न केवल पथ-प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मन्त्र साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।

छन्द का अर्थ है- लय। काव्य में प्रयुक्त होने वाली पिंगल प्रक्रिया के आधार पर भी छन्दों का वर्गीकरण होता है, यहाँ उसका कोई प्रयोजन नहीं। मन्त्र रचना से काव्य प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है। फिर यदि हो भी तो उसके जानने न जानने से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। यहाँ लय को ही छन्द समझा जाना चाहिए किसी स्वर में किस क्रम से, किस उतार चढ़ाव के साथ मन्त्रोच्चारण किया जाय यह एक स्वतंत्र शास्त्र है। सितार में तार तो उतने ही होते हैं, उँगलियाँ चलने का क्रम भी हर वादन में चलता है, पर बजाने वाले का कौशल तारों पर आघात करने के क्रम में हेर-फेर करके विभिन्न राग-रागनियों का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करता है। मानसिक, वाचिक, उपाँशु, उदात्त, अनुदात्त स्वरित ही नहीं मन्त्रोच्चार के और भी भेद-प्रभेद हैं जिनके आधार पर उसी मंत्र द्वारा अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की जा सकती हैं।

ध्वनि तरंगों के कम्पन इस लय पर ही निर्भर हैं। साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मन्त्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का -लय का-निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मन्त्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिये उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।

विनियोग का तीसरा चरण है-देवता? देवता का अर्थ है- चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्ति प्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेक रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं पर हर एक की फ्रिक्वेन्सी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रॉडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे संबन्ध स्थापित करने के पृथक माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए यह संभव होता है कि अपनी पसंद का रेडियो प्रोग्राम सुने और अन्यत्र में चल रहे प्रोग्रामों को बोलने से रोक दें। निखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म चेतना की अनेक धाराएं समुद्री लहरों की तरह अपना पृथक अस्तित्व लेकर भी चलती हैं। भूमि एक ही होने पर भी उसमें परतें अलग-अलग तरह की निकलती हैं। समुद्रीय आगाध जल में पानी की परतें तथा असीम आकाश में वायु से लेकर किरणों तक की अनेक परतें होती हैं। इसी प्रकार ब्रह्म चेतना के अनेक प्रयोजनों के लिए अद्भुत अनेक शक्ति तरंगें निखिल ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती रहती हैं। उनके स्वरूप और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए उन्हें देवता कहा जाता है। साकार उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मन्त्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विधान निर्धारित है। स्थापना, पूजन, स्तवन आदि क्रियाएं इसी प्रयोजन के लिए होती हैं। निराकारी साधक ध्यान द्वारा उस शक्ति को अपने अंग प्रत्यंगों में तथा समीपवर्ती वातावरण में ओत-प्रोत होने की भावना करते हैं। किसके लिए देव संपर्क का क्या तरीका ठीक रहेगा यह निश्चय करके ही मन्त्र साधक को प्रगति पथ पर अग्रसर होना होता है।

बीज का अर्थ है उद्गम। मानवी काय कलेवर में विभिन्न शक्तियों के लिए विभिन्न स्थान निर्धारित हैं। षटचक्रों 108 उपत्यिकाओं, सहस्र शक्ति नदियों का निर्धारित स्थान है। उन स्थानों को शक्ति संपर्क के स्विच बोर्ड कह सकते हैं। स्विच दबाने पर बत्ती जलने लगती है। किस मन्त्र के देवता का शरीर में संपर्क स्थान कहाँ है और उसे किस विधि में प्रभावित किया जाय इसी जानकारी को बीज विज्ञान कहते हैं। ह्रीं, श्रीं, क्लीं ऐं, हुँ, यं, वं, रं, लं आदि बीज अक्षर भी हैं जिन्हें किसी मन्त्र में अतिरिक्त शक्ति भरने का सूक्ष्म इंजेक्शन कह सकते हैं। आवश्यकतानुसार मन्त्रों के साथ इन अतिरिक्त बीजों को भी जोड़ दिया जाता है। गायत्री मन्त्र और मृत्युँजय मन्त्र में इसी आधार पर कई बीज उलट-पुलट कर लगाये जाते हैं। यद्यपि उन्हें लगाना अनिवार्य नहीं पर मन्त्र के उद्गम स्थान को जो जानना ही चाहिए। टेलीफोन के डायल को घुमाकर अभीष्ट नम्बर से बातें की जा सकती हैं। बीज स्थान और बीज शक्ति का प्रयोग करके मन्त्र को समर्थ बनाने वाली ब्रह्म चेतना के साथ संबंध जोड़ा जा सकता है और उसका समुचित लाभ उठाया जा सकता है।

तत्व को मन्त्र की कुँजी कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में इसे लक्ष्य भी कहा जा सकता है। अक्सर साधना करने से पूर्व संकल्प पढ़े जाते हैं। उनमें यह प्रतिज्ञा रहती है कि इस साधना का उद्देश्य क्या है। इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है? स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में भी मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके भी तत्व साधना की जाती है।

आयुर्वेद शास्त्र में वस्तुओं के स्थूल, सूक्ष्म और कारण प्रकृतियों का वर्णन है। सामान्य तथ्य अन्न का स्थूल भाग रक्त माँस बनता है। सूक्ष्म भाग में बुद्धि और मनः चेतना विकसित होती है और कारण प्रभाव से अन्तरात्मा को पोषण मिलता है। योग शास्त्र में आहार का सात्विक, राजस, तामस वर्गीकरण किया गया है। मनुष्यों के तीन शरीर होते हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इसी प्रकार हर वस्तु के अन्तराल में उपरोक्त प्रकृतियों की न्यूनाधिकता भरी रहती है। पेड़ों में से यज्ञ कार्य के लिए केवल वही प्रयुक्त होते हैं जिनकी सूक्ष्म और कारण शक्ति अभिष्ट अप्रयोजन निर्धारण में सहायक होती है। इसी आधार पर यह निर्माण निर्धारण किया जाता है कि किस मन्त्र की, किस उद्देश्य के लिए किस स्थिति का व्यक्ति, साधना करे तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिये। तत्व निर्धारण में इन्हीं बातों का ध्यान रखा जाता है।

दबी हुई प्रसुप्त क्षमता को प्रखर करने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यंत्रों को चलाने के लिए ईंधन चाहिये। हाथ या पैर से चलने वाले यंत्रों के लिए न सही उन्हें चलाने वाले हाथ पैरों को काम करते रहने के लिए ऊर्जा की जरूरत रहती है। यह तापमान जुटाने पर ही यन्त्र काम करते हैं। मन्त्रों की सफलता भी ऊर्जा उत्पादन पर निर्भर है। साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिये वमन, विरेचन, स्नेहन, नस्व यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिये हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार-ऋषि, छंद, देवता, बीज, और तत्व हैं जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।


अपने वर्चस्व का घमंड न करे (Kahani)

सरोवर में कमल खिला। उसने अपनी गरिमा को देखा और गर्व सहित बोला-दिशाओं मेरा नमन करो-संसार में श्रेष्ठता सम्पन्न के अभिवादन का जो क्रम चला आ रहा है, क्या तुम उसे नहीं जानतीं?

कमल की गर्वोक्ति सूरज ने भी सुनी। वह आसमान से अकड़ कर चिल्लाया-दिशाओं इसके बहकावे में मत आना। वर्चस्व का स्रोत मैं हूँ। मेरे कारण ही तो यह विकसित हो सकता है।

दिशाएं हँस पड़ी उन्होंने दोनों पर व्यंग करते हुए कहा घमंडियों -वर्चस्व तुम्हारे पास नहीं। वह जहाँ है-वहाँ चुपचाप अवस्थित है उसे इस तरह अपनी गरिमा बखाननी नहीं पड़ती।


शक्ति सागर की प्रचण्ड लहरें-ब्रह्माण्ड किरणें

हमारे ज्ञान का 83 प्रतिशत भाग नेत्रों के माध्यम से आकर मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इस दृष्टि दर्शन का माध्यम है- प्रकाश। प्रकाश के आधार पर ही नेत्र देख पाते हैं। नेत्र स्वस्थ होते हुए भी -प्रकाश के अभाव में कुछ देख नहीं सकते। अँधेरे में उनकी क्षमता कुण्ठित हो जाती है। साथ ही ज्ञान का द्वार भी बन्द हो जाता है। अध्यात्म परिभाषा में ज्ञान और प्रकाश एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। प्रकाश दर्शन का जहाँ भी तात्विक विवेचना में उल्लेख हुआ होगा वहाँ रोशनी नहीं वरन् ज्ञान गरिमा की ही चर्चा रही होगी।

जैसे-जैसे हमारे ज्ञान का विस्तार हो रहा है उसी प्रकार भौतिक प्रकाश की विशालता के भी परत खुलते चले जा रहे हैं। हमारे नेत्र सात रंग की प्रख्यात प्रकाश किरणों को ही देख पाते हैं पर अब विदित हो चला है कि नेत्रों की पकड़ से बाहर भी उसकी विशालता दृश्यमान ज्योति की तुलना में अत्यधिक विस्तृत है। ब्रह्माण्ड किरणें, गामा किरणें, एक्स किरणें, परा बैंगनी प्रकाश, ऊष्मा तरंगें, रेडियो तरंगें, प्रकाश परिवार के अंतर्गत ही आती हैं।

इन सब में शक्तिशाली और अद्भुत हैं-ब्रह्माण्ड किरणें। अनन्त आकाश से विद्युत चुम्बकीय विकिरणों की इस धरती पर निरन्तर वैसी ही वर्षा होती रहती है जैसे वर्षा ऋतु में बादलों से पानी की या दिन में सूर्य से ऊष्मा की वर्षा होती है। कुछ समय पहले गामा किरणें शक्ति की दृष्टि से अग्रणी मानी जाती थीं पर अब विज्ञान जगत का ध्यान ‘ब्रह्माण्ड किरणों’ पर केन्द्रित है। शक्ति स्रोत के रूप में उन्हें ही अब सर्वोपरि माना जाता है। इन इन्द्रियातीत किरणों को विज्ञान की भाषा में कॉस्मिक रेज कहते हैं।

धरती से 30 किलोमीटर ऊपर जाने पर वायु-मण्डल में कुछ विशिष्ट परमाणुओं की वर्षा होती हुई अनुभव में आती है। अन्वेषण बताता है कि ये कण परमाणु नहीं वरन् उनके ‘नंगे नाभिक’ हैं। परमाणु तो एक सौर परिवार की तरह हैं जिसके मध्य में नाभिक रहता है और चारों और परिक्रमा करने वाले इलेक्ट्रोन गतिशील रहते हैं। किन्तु ब्रह्माण्ड विकिरण में इलेक्ट्रॉनों से रहित नंगे नाभिक ही होते हैं, इनमें से कम शक्ति वाले तो पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति से खिंचकर ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं और शेष शक्तिशाली कण पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करते हैं। तब वायुमण्डल के परमाणु नाभिकों और ब्रह्माण्ड किरण नाभिकों में टक्कर होती है। इस संगम समन्वय से नई जाति के कणों का जन्म होता है। इन्हें मेसोन, हाईपरोन, ऋण न्यूक्तियोन, आदि नामों से जाना जाता है। इतने पर भी इन ब्रह्माण्ड किरणों का अस्तित्व समाप्त नहीं होता ये वायु नाभिकों से टकराती, नये नाभिकों को जन्म देती हुई पृथ्वी तल तक चली आती हैं। हाँ उनका वह रूप नहीं रहता जो वायुमण्डल में प्रवेश करने से पूर्व था। यहाँ वे बहुत कुछ बदली हुई स्थिति में होती हैं। पृथ्वी पर अब तक 30 से भी अधिक परमाणु तत्वों की खोज की जा चुकी है। इन्हें विनिर्मित, विकसित और गतिशील बनाने में जिस सिक्रोट्रोन तत्व को श्रेय है वह ब्रह्माण्ड किरणों की ही प्रतिकृति है। इस एक शब्द में अनन्त शक्ति का उद्गम कहना चाहिए। जेनेवा में स्थापित प्रोट्रॉन-सिक्रोट्रोन 28 अरब इलेक्ट्रोन वाल्ट शक्ति के ‘बीम’ पैदा कर सकता है। ब्रह्माण्ड विकिरण के कुछ कण तो इससे भी 10 लाख गुने अधिक शक्तिशाली हैं।

यह ब्रह्माण्ड किरणें कहाँ से आती हैं इनका उद्गम स्रोत कहाँ है? इसका अन्वेषण करते हुए यह पता लगा है कि इस निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त कोटि-कोटि तारागणों में कुछ बूढ़े होकर मरते रहते हैं। और उनके मरण से नये तारकों का जन्म होता है। यह नये तारे जब अस्तित्व में आते हैं तब उनकी उम्र जिस परिधि में बिखरती है वहाँ उसे ब्रह्माण्ड किरणों के विकिरण के रूप में अनुभव किया जाता है। वृद्ध तारकों के मरण अवसर पर अति उच्च तापमान के कारण हीलियम, हाइड्रोजन आदि तत्व के ज्वलन प्रक्रिया से भयंकर विस्फोट होता है वह तारा टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाता है इस विस्फोट की आभा लगभग एक महीने तक आकाश में दृश्यमान रहती है। यह विस्फोट जन्य पदार्थ नये ढंग से एक नये तारे के रूप में प्रकट होता है- इसे विज्ञानी-सुपर नोवा-कहते हैं। यह अभिनव तारक ही ब्रह्माण्ड किरणों का उद्गम स्रोत होता है। वर्तमान अभिनव तारक का नामकरण ‘क्रैव’ नेवुला के नाम से प्रख्यात है। तारों की मरण-जन्म प्रक्रिया प्रायः 300 वर्षों में एकबार देखने की मिलती है। वर्तमान अभिनव तारक का ज्योति पुंज हमसे लगभग 3000 प्रकाश वर्ष दूर है। इसका व्यास 5 प्रकाश वर्ष है।

एक सैकिण्ड में प्रकाश की गति 186000 मील है। एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी चल सकता है उसे प्रकाश वर्ष कहते हैं। इस गणना के आधार पर क्रैव नेवला नाम नवीन तारे की दूरी और परिधि का आश्चर्यजनक विस्तार कल्पना क्षेत्र में बिठाया जा सकता है।

अपनी आकाश गंगा में मात्र तारे ही भरे नहीं है उसके मध्याकाश में विरल गैर तथा धूलि से बने हुए ऐसे विशालकाय बादल भी हैं जो निरन्तर विचरण करते रहते हैं। ‘क्रैव नेवुला’ से निकली हुई ब्रह्माण्ड किरणें कुछ तो सीधी पृथ्वी पर आती हैं कुछ इन बादलों से टकरा कर बिखर जाती हैं और उनका धरती पर अवतरण सभी दिशाओं में होने लगता है।

धरती के विभिन्न प्रयोजनों में संलग्न-विभिन्न प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने में तत्पर-महाशक्ति, धरती की अपनी उपज नहीं है वह अन्यत्र से आती है। धरती उसका उपयोग भर करती है। उपयोग भी इतना कम जिसे पर्वत की तुलना में राई जितना समझा जा सके। शेष शक्ति तो ऐसे ही बिखरती, अस्त-व्यस्त होती हुई, फिर किसी अज्ञात दिशा में ही चली जाती है।

शक्ति की तनिक सी उपलब्धि होने पर हम मदोन्मत्त हो जाते हैं। अच्छा स्वास्थ्य, चमकता सा रंग, रूप, तेज मस्तिष्क, मुट्ठी भर पैसा, तनिक सी सत्ता प्रशंसा पाकर हम अहंकार में इठे-इठे फिरते हैं और समझते हैं न जाने क्या पा लिया और क्या बन गये। यह अहं वृति अपने आपको और विराट् विश्व के स्वरूप को न जानने के कारण है।

शक्ति के उद्गम पर यदि हम विचार करें तो पृथ्वी की समस्त हलचलों को प्रेरित करने वाली अन्तरिक्ष से अवतरित होने वाली ऊष्मा पर ध्यान जाता है। प्रकाश की महत्ता को समझने का प्रयत्न करते हुए उससे भी बड़ी शक्तिधारा सामने आ जाती है। ब्रह्माण्ड किरणें कितनी अद्भुत, कितनी भयंकर और कितनी उग्र हैं, इसकी थोड़ी सी झाँकी मिलते ही लगता है इस धरती को घेरे हुए महाशक्ति का समुद्र लहरा रहा है और उसमें हम मानव प्राणी मच्छरों की तरह अपना जीवनयापन कर रहे हैं।

शक्तिमान की महाशक्ति की तनिक सी झाँकी ब्रह्माण्ड किरणों में होती है। उनकी भी प्रेरक दूसरी सत्ता मौजूद है। धरती उसी शक्ति के हाथों का एक नन्हा सा खिलौना है और हम सब हैं उस खिलौने से चिपके हुए रजकण। अपनी तुच्छ उपलब्धियों पर अहंकार करना वस्तुतः शक्ति के विराट स्वरूप को न समझने के कारण ही होता है। यथार्थता को यदि समझ सकें तो अपने नगण्य से अस्तित्व को समझें और विनयावनत होकर रहें।


Quotation

व्यवस्था और नियम समाज की रचना के लिये होते हैं। महत्व नियम और व्यवस्था का नहीं, अपितु समाज के संगठन और जीवन को है।

यदि समाज के जीवन के लिये मर्यादा स्थापित करने की आवश्यकता हो तो मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम के समान मर्यादायें बाँधी जाती हैं और यदि मर्यादा-उल्लंघन की आवश्यकता हो तो योगेश्वर कृष्ण की भाँति मर्यादा तोड़ी भी जाती है।

-दीन दयाल उपाध्याय


पाप और ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी से मत डरिये

संकट भयंकर तब तक लगता है जब तक उसके साथ मुठभेड़ नहीं होती। जब उसके साथ गुंथ जाया जाता है और मानसिक सन्तुलन बिगड़ने नहीं दिया जाता, तो प्रतीत होता है कि जितना सोचा गया था- उससे आधी चौथाई भी उसकी वास्तविक भयानकता नहीं थी। संकटों के साथ गुंथने का जैसे-जैसे अभ्यास होता जाता है, वैसे-वैसे वे स्वाभाविक दैनिक कार्यों की तरह सरल प्रतीत होने लगते हैं।

अपने लिये साँप और शेर बहुत भयंकर होते हैं पर बहुत से लोगों का धन्धा ही उन्हें पकड़ना मारना है। सपेरे रोज ही काले विषधर नाग पकड़ते हैं, शिकारी आये दिन शेर, बाघ का शिकार करते हैं उन्हें वे जरा भी डरावने नहीं लगते वरन् उन्हें ढूंढ़ते रहते हैं और मिल जाने पर प्रसन्न होते हैं। जबकि अजनबी व्यक्ति को साँप, शेर की तस्वीर देखते और चर्चा सुनने भर से पसीना छूटता है।

अँधेरे से घुसने में डर लगता है। सुनसान में प्रवेश करते हुए पैर काँपते हैं। मन तरह-तरह की आशंकाएं उठती है कि उस अँधेरे-सुनसान में न जाने क्या विपत्ति होगी। शेर, साँप, बिच्छु, भूत आदि की कितनी आशंकाएँ सामने आती हैं और दिल धड़कने लगता है। पर जब उसमें निधड़क प्रवेश किया जाता है-दीपक लेकर देखा जाता है तो प्रतीत होता है कि वहाँ डरने जैसा कुछ भी नहीं था। मन की दुर्बलता ही है जो जरा सा आधार मिलते ही तिल का ताड़ बनाती है। काल्पनिक भय गढ़ कर उन्हें इस तरह विचित्र करती है मानो प्राणघाती सर्वनाशी संकट आ गया। अब बचना कठिन है। जबकि वस्तुतः जरा सा कारण ही वहाँ रहा होता है और वह भी इतना छोटा कि उसके साथ आसानी से निपटा जा सके।

दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग अँधेरे में रहते और आते-जाते हैं। वन्य प्रदेशों में यदाकदा ही दीपक का प्रयोग होता है। किसान खेतों पर सोते हैं और रात को रखवाली करते हैं। छोटी झोपड़ियाँ बनाकर सघन जंगलों में लोग परिवारों समेत रहते हैं। धनी लोग सघन बस्ती से हटकर खुले बँगलों में रहते है। चोर डाकू, साँप, बिच्छू शेर, बाघ, भूत पलीत कहाँ किस को खाते हैं। यदाकदा तो दुर्घटनाएं दिनदहाड़े बीच बाजार में भी हो सकती हैं। संकट के वास्तविक अवसर कम ही आते हैं। अधिकतर तो लोग काल्पनिक संकट गढ़ते हैं और अपने बनाये उस खिलौने को देखकर डरते मरते रहते हैं।

भय वस्तुतः कायरता की प्रतिकृति है। अपना मुँह जैसा भी होगा वैसा ही दर्पण दीखेगा। आँखें पर पीले काँच का चश्मा पहन लिया जाय तो हर चीज पीली दिखाई देगी। कायर मनुष्य की आन्तरिक दुर्बलता संसार रूपी दर्पण में विपत्ति बनकर दीखती है। संकट का सामना करने की -उससे उलझने, निपटने की क्षमता अपने में नहीं है, यह मान लेने के बाद ही डर आरम्भ होता है जिसे यह भरोसा है कि कठिन अवसर आवेंगे तो सूझबूझ के साथ उनका मुकाबला करेंगे। उन्हें हटाने के लिये जूझेंगे। इसके लिये आवश्यक समझ और बल अपने पास हैं। मित्र और सहायक भी काम आयेंगे और ईश्वर साथ देगा। इस प्रकार की हिम्मत यदि अपने में मौजूद हो तो काल्पनिक डरों से छुटकारा मिल पाता है और तीन चौथाई मन को बोझ हलका हो जाता है। वास्तविक कारण एक चौथाई होते हैं सो उनके साथ अपने शौर्य को बढ़ाने का व्यायाम समझ कर लड़ा जा सकता है। तैरना, कूदना, मोटर चलाना, व्यायाम प्रतियोगिता, वन पर्वत की यात्रा, यह सभी जोखिम भरे काम हैं। इनमें थोड़ी सी चूक कठिनाई खड़ी कर सकती है पर उस आशंका के कारण कौन उन साहसिक कार्यों का आनन्द छोड़ता है। डर से बचने के उपाय सोचते रहने पर भी उनसे बचे ही रहेंगे, इस बात का कोई निश्चय नहीं। बीमारी कौन चाहता है? मौत किसे सुहाती है पर जब आने की घड़ी आ पहुँचती है तो बचने की सारी तरकीबें बेकार चली जाती हैं। निःशंक होकर रहना और जब जो संकट आवेगा उससे निपट लिया जायेगा ऐसी हिम्मत रखना, बस संसार में चैन से रहने का यही तरीका है।

भय एक प्रकार की अकड़न है। अकड़न की बीमारी सारे शरीर को जकड़ देती है। अंग सीधे ही नहीं होते, चलना-उठना कठिन हो जाता है। रक्त ठण्डा पड़ जाता है और दिमाग सोचना बन्द कर देता है। चाहने पर भी शरीर कुछ काम नहीं करता। लकवा गठिया जैसे रोग ऐसे ही होते हैं जो जीवित मनुष्य को मृतक जैसा बना देते हैं। उन्हीं में से एक रोग है-भय। डर का अर्थ है-पुरुषार्थ की शक्ति रहते हुए भी उसका कुण्ठित हो जाना। सिंह को देखकर हिरन चौकड़ी भरना भूल जाते हैं- खड़े हो जाते हैं और बेमौत मरते हैं। यदि उनमें हिम्मत बनी रहती और छलाँग भरते, तो प्राणिशास्त्रियों के अनुसार हिरन शेर की अपेक्षा अधिक दौड़ सकता है और उसकी पकड़ से बच सकता है। पर डर का क्या किया जाय। हिम्मत हार जाने पर तो मौत के मुँह में जाने के अलावा और कुछ रास्ता बनता नहीं।

कथा है कि एकबार यमराज ने महामारी को पृथ्वी पर भेजा और पाँच हजार मनुष्य मार लाने के लिये आदेश किया। बीमारी गई और अपना काम पूरा करके लौट आई। मृतक गिने गये तो वे पंद्रह हजार थे। यमराज ने डाँटा और पूछा-आदेश से तिगुने मृतक क्यों? महामारी ने गम्भीरतापूर्वक कहा-उसने केवल पाँच हजार ही मारे हैं। शेष तो डर के मारे खुद ही मर गये हैं।

मानसिक दुर्बलता के अतिरिक्त डर का एक और कारण है- अनैतिकता। जिसकी अन्तरात्मा कलुषित और पाप कर्म से लिप्त है वह कभी चैन की नींद न सो सकेगा। उसे दूसरे की और से तरह-तरह की आशंकाएं रहेंगी। उन्हें उनसे धोखा होने का -बदला लेने का- फँसा देने का डर बना ही रहेगा। पोल खुल जाने पर बदनामी फैलेगी और लोग सतर्क होकर उसके जाल में फँसने तथा साथ देने से अलग हो जायेंगे। निन्दा और असहयोग की स्थिति में उसका भविष्य ही अन्धकारमय हो जायेगा। इस डर से उसका मन सदा आशंकित रहता है। पाप कर्म के फलस्वरूप, समाज का दण्ड, राज दण्ड तथा ईश्वरीय दण्ड मिलते हैं तीनों इकट्ठे होकर या अलग-अलग से वे कभी न कभी मिलकर ही रहेंगे इस भय से भीतर ही भीतर बड़ी बेचैनी रहती है। इस आत्मदेव की पीड़ा उसे निरन्तर टोंचती रहती है बाहर वाले दण्ड मिलने में तो देर सवेर भी हो सकती है पर आत्मदण्ड को कुमार्ग पर कदम धरते ही मिलना आरम्भ हो जाता है और वह निरन्तर दुःख देता रहता है।

बेईमान और झूठा मनुष्य आंखें मिलाकर दूसरों को नहीं देख सकता और न जी खोलकर बात करने की हिम्मत पड़ती है। बनावटी उथली-उखड़ी बाते करते हुए उसका ओछापन प्रत्यक्ष प्रकट होता रहता है और उसकी मुखाकृति, चेष्टा, भावभंगिमा, गतिविधियाँ वास्तविकता प्रकट करती रहती हैं। अपना आपा ही-चुगली करता है और मूक वाणी से यह घोषित करता रहता है- कि यहाँ धोखा ही धोखा है।

कर्जदार अकसर अनैतिक लोग ही होते हैं। आमदनी से अधिक खर्च करना-चोरी, उठाईगीरी की तरह सर्वथा अनैतिक है। अपनी हैसियत, औकात, आमदनी से बढ़कर ठाट-बाट बनाना, दूसरों को ठगने जैसी कुचेष्टा ही है। ऐसे फिजूलखर्च लोग कर्जदार हो जाते हैं, चुका पाते नहीं मित्रों के बीच न उनका विश्वास रह जाता है न सम्मान। जिनका पैसा चाहिए उनसे आंखें चुराते हैं और नये शिकार तलाश करते हैं। ऐसे लोग पग-पग पर डरते रहते हैं कि कर्जदार उनकी इज्जत खराब न कर दें।

सचमुच किसी आकस्मिक मुसीबत में फँस जाने वाला व्यक्ति मित्रों की सहानुभूति का पात्र होता है। वस्तुस्थिति समझ कर लोग उसका सम्मान कम नहीं करते। पर जो फिजूल खर्ची की अनैतिकता अपना कर कर्जदार बना है उसे हर जगह शर्मिन्दगी और लानत का ही सामना करना पड़ेगा। अनैतिकता अपना कर कर्जदार बना है उसे हर जगह शर्मिन्दगी और लानत का ही सामना करना पड़ेगा। अनैतिकता का हर कदम डराने वाला होता है। चोर और व्यभिचारी, बेईमान और अनाचारी व्यक्ति पग-पग पर अपने आस-पास संकट मँडराता देखते हैं। हर किसी को आशंका भरी दृष्टि से देखते हैं कि कहीं किसी को उसके कपट जाल का पता न चल गया हो और कोई उसका भंडाफोड़ न कर दे। यह आशंका अपने आप में इतनी डरावनी है कि मिलने वाले दण्ड की अपेक्षा वह पहले ही मानसिक श्रेष्ठता, स्वभाव और सद्गुणों का नाश कर चुकी होती है।

डर का एक बड़ा करण अज्ञान भी है। आदिम काल में मनुष्य को सूर्य ग्रहण, बिजली की कड़क, पुच्छल तारे आदि के बारे में कुछ पता न था। वह इनसे डरता था और देवता समझ कर उनके कोप से बचने के लिये तरह तरह के पूजन बलिदान करता था। पीछे जब वास्तविकता समझ में आ गई तो वह डर सहज ही चला गया। भूत पलीतों का डर अब धीरे-धीरे समाप्त होता चला जाता है।

ग्रह दशा-जन्म कुण्डली जैसी फलित ज्योतिष की मान्यताएं भी लगभग ऐसी ही हैं। कभी सोचा जाता था कि आसमान में रहने वाले ग्रह-नक्षत्र मनुष्यों पर कोप अनुग्रह करते हैं इसी से उसे सुखः दुःख मिलते हैं। अब यह प्रकट हो गया है कि यह आकाश में स्थित पिण्ड निर्जीव हैं बहुत दूर हैं और व्यक्तिगत रूप से उनका किसी को दुख सुख पहुँचा सकना असम्भव है। यह तथ्य समझ में आने पर लोगों ने ग्रह नक्षत्रों से कल्पित देवी देवताओं से डरना छोड़ दिया है। ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ अनेक प्रकार के डर स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।

जिसका भय करना चाहिए उसका नहीं किया जाता और जिनका डर करने की कतई जरूरत नहीं, उनसे डरते रहते हैं। पाप से डरना चाहिए, कर्मफल से डरना चाहिए और ईश्वर के न्याय से। पर इनसे कौन डरता है। चोरी करते हुए, भोले लोगों को ठगते हुए, छल प्रपंच रचते हुए, नशेबाजी, व्यभिचार, बेईमानी, असत्य भाषण करते हुए कौन डरता है? डरते हैं मिट्टी के पुतले मनुष्य से -लोहे के टुकड़ों से बने हथियारों से काल्पनिक भूत पलीतों से और दीन-दुर्बल, कुकर्मी आतंकवादियों से - हमें आपने इस अज्ञान को समझना चाहिए। मनुष्य की गरिमा को समझना चाहिए और उन अकिंचन व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थितियों से-डरने से इन्कार कर देना चाहिए जो वस्तुतः तुच्छ एवं असमर्थ हैं। डरना ही हो तो ईश्वर की दण्ड व्यवस्था और दुष्प्रवृत्तियों से डरना चाहिए दुःख तो हमें इन्हीं के कारण मिल सकता है।


भोजन के अनुसार मन के संस्कार(Kahani)

पूर्णिया श्रावक को अपने जीवन में अनेक बार सपत्नीक भूखा रहना पड़ा। वह अभावग्रस्त रह सकते थे पर अपनी मानसिक शान्ति किसी भी शर्त पर खोने को तैयार न थे। जब तक वह अपने घर आये अतिथि को भोजन न करा देते स्वयं न करते थे।

एक दिन की बात। सुबह का समय। पूर्णिया स्वाध्याय में रत थे। पर बीच-बीच में स्वाध्याय का क्रम टूट जाता, मन उचट जाता, विचार शृंखला टूट जाती, उसे नये सिरे से जोड़ते और फिर पढ़ना शुरू करते। प्रयत्न करने पर भी मन में स्थिरता नहीं आ रही थी। स्वाध्याय का निर्धारित समय पूर्ण हो गया और अपने आसान से उठ बैठे।

पत्नी ने उनकी मुख मुद्रा पर बनती बिगड़ती रेखाओं को देखा। समझ गई आज कोई बात आवश्यक है। ऐसा उतार-चढ़ाव उसने कभी देखा न था। शायद किसी चिन्ता ने आ दबाया हो पूछ बैठी ‘आज क्या स्वास्थ्य ठीक नहीं’ शरीर तो ठीक जान पड़ता है पर मन की अस्वस्थता ने एकाग्रता आने ही न दी। मानसिक घबराहट का कारण जानने पर भी समझ में नहीं आ रहा क्या बात है? आज अपने घर में अनीति से अर्जित की गई कोई वस्तु तो नहीं आ गई। क्योंकि भोजन के अनुसार ही मन के संस्कार बनते बिगड़ते रहते हैं। ध्यान आ गया। दूसरे ही क्षण बोली क्षमा कीजिए आज भूल हो गई मैं पड़ौसी के यहाँ चूल्हा जलाने के लिये आग लेने गई। कंडा अपने साथ ले नहीं गई थी। उसकी के कंडे पर आग ले आई थी और जल्दी-जल्दी में देना भूल गई।

पैसे दो पैसे की चीज ने पूर्णिया के विचारों में कैसा गतिरोध पैदा कर दिया उन्हें अपनी मानसिक अस्वस्थता का कारण मालूम हो गया उन्होंने एक कंडा पड़ोसी के यहाँ वापिस भेज दिया। जो अनीति के उपार्जन से अपना और अपने परिवार का पालन करते हैं, उनकी स्थिति कैसी होगी, इसका अनुमान आप लगा सकते हैं।


समग्र अध्यात्म-प्रेम, ज्ञान और बल का समन्वय

अध्यात्म की त्रिवेणी तीन धाराओं में प्रवाहित होती है (1) प्रेम (2) ज्ञान (3) बल। इन तीनों का सन्तुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र अध्यात्मवादी हो सकता है।

प्रेम हमारे अन्तःकरण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी प्रकार दूसरों के लिए भी चाहना उठने लगे तो उसे प्रेम का प्रकाश कहना चाहिए। अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। अपने शरीर मन, यश, सुख की चाहना रहती है। यह अपना आपा जितना विस्तृत होता चलेगा वह उतना ही प्रिय लगेगा और उसे सुखी समुन्नत बनाने की उतनी ही तीव्र उत्कंठा उठेगी। अपना परिवार जिस तरह प्यारा लगता है उसी तरह यह आत्मीयता की परिधि विस्तृत होती जाती है और अपना ‘प्रिय’ क्षेत्र बढ़ता चला जाता है। उसके लिये सेवा सहायता करने की इच्छा होती है और सत्कर्म ही बनते हैं। अपनों के साथ दुष्टता कौन करता है। प्रेम भावना की वृद्धि मन में से सभी दुष्प्रवृत्तियों को हटा देती है और मनुष्य सज्जन और सच्चरित्र एवं सहृदय बनता चला जाता है। प्रेम असंख्य सद्गुणों का स्रोत है इसलिए उसे अध्यात्म का प्रथम चरण माना गया है।

दूसरा घटक है-ज्ञान। यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं। जीवन के लक्ष्य को हम भूल जाते हैं। आत्मकल्याण की बात विस्मृत हो जाती है और कर्त्तव्य धर्म का पालन करने की गरिमा समझ में नहीं आती। इन्द्रियों की वासना और मन की तृष्णा पूरी करने के लिए अहंकार की पूर्ति के लिये निरर्थक कार्य करते हुए जीवन बीत जाता है और पाप की गठरी सिर पर लद जाती है। यह सब अज्ञान का फल है। अपने को शरीर नहीं आत्मा मानकर चलें। आत्मकल्याण को दृष्टि से जीवन क्रम निर्धारित करें और वासना तृष्णा को अनियन्त्रित न होने दें। अहंकार के स्थान पर आत्मबल बढ़ाने में लगें तो समझना चाहिए ज्ञान की उपलब्धि हो गई। स्कूली शिक्षा या धर्म पुस्तकें पढ़ लेने का नाम ज्ञान नहीं है। यह तो एक आस्था है जो अन्तःकरण में प्रकाशवान होकर हमें सही और गलत का विवेक कराता है। यह ज्ञान जो जितना प्राप्त कर लेता है वह उतना ही सफल आत्मवादी कहा जाता है।

तीसरा चरण है-बल। निर्बल को न साँसारिक सुख मिलता है न आत्मिक। हमें बलवान बनना चाहिए। मनोबल के आधार पर ही आपत्तियों से निपटना प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है। लोभ, मोह जैसे शत्रुओं को परास्त करते हुए प्रलोभनों से बचते हुए आदर्शवादिता के मार्ग पर अपनी प्रवृत्तियों को मोड़ सकना साहसी और पराक्रमी व्यक्ति के लिए ही सम्भव है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सामर्थ्यवान और सशक्त बनाना पड़ता है। आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी दुर्बलताएं दूर करनी पड़ती हैं और आर्थिक क्षेत्र में इतना स्वावलम्बी रहना पड़ता है कि किसी के आगे हाथ न पसारना पड़े।

मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है (1) अन्तःकरण (2) मस्तिष्क (3) शरीर। इसी विभाजन को अध्यात्म की भाषा में कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर कहते हैं। अंतःकरण का वैभव है-प्रेम मस्तिष्क का धन-ज्ञान। शरीर का वर्चस्व है-बल। चूँकि शरीर से ही आर्थिक पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध है इसलिए धन, व्यवहार कौशल और संगठन को भी इसी क्षेत्र में गिना जाता है।

इन तीनों के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनना है। एकांगी से काम नहीं चलता। अन्न, जल और वायु के त्रिविध आहार पर जीवन निर्भर है। आध्यात्मिक जीवन की यह तीनों प्रवृत्तियाँ समान रूप से आवश्यक हैं। इनका समन्वय ही त्रिवेणी का संगम है। उस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके ही हम जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।


प्राणधारियों में अतीन्द्रिय चेतना विद्यमान है।

शरीर और मस्तिष्क की प्रत्यक्ष शक्तियाँ सर्व-विदित हैं। शरीर श्रम करता है और मस्तिष्क सोचता है, भौतिक विज्ञान इतना ही जानता है पर उनमें अतीन्द्रिय चेतना भी है, यदि है, तो क्यों है? इन प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास नहीं। क्योंकि भौतिक शक्तियाँ तो अपने स्थूल नियमों तक ही सीमित रहेंगी। उनमें व्यतिक्रम होने का कोई कारण नहीं। पर देखा जाता है कि मनुष्य में ही नहीं, मनुष्येत्तर प्राणियों में भी कुछ ऐसी विशेषताएं पाई जाती हैं जो इन्द्रिय शक्तियों की परिधि से बाहर की बात है। हाड़ माँस का बना शरीर उन्हीं नियमों का पालन करेगा जो उसके लिये निर्धारित हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क भी उतना ही सोचेगा जो उसने सीखा है। पर सामान्य लौकिक ज्ञान की परिधि का उल्लंघन करके कई बार ऐसा कुछ दीखने को मिलता है जिससे विदित होता है कि आत्मा के भीतर कुछ ऐसी विशेषता है जो ऐसी जानकारी भी प्राप्त कर लेती है जो उसकी शारीरिक मर्यादा के अनुसार सम्भव नहीं अतीन्द्रिय चेतना का अस्तित्व अनेक बार प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। उसे झुठलाया नहीं जा सकता।

यदि भौतिक विज्ञान जीवधारी की जड़ प्रकृति को ही एक स्थूल उत्पादन मानता रहेगा तो उसे अतीन्द्रिय चेतना का भी कोई आधार एवं कारण न मिलेगा। जब प्राणी एक ‘चलता फिरता वृक्ष’ ही ठहरा तो उसकी शारीरिक एवं मानसिक हलचलें भी शरीर ज्ञान से बाहर कैसे जा सकती हैं। पर वे जाती हैं। ऐसी दशा में भौतिक विज्ञान को प्राणी को जड़ जगत की ही एक हलचल मानने तक सीमित नहीं रहना होगा वरन् आत्मा की अलौकिक सत्ता को स्वीकार करना होगा। अतीन्द्रिय चेतना का समाधान तभी मिल सकता है।

जार्जिया (रूस) निवासियों में काकेशियाई कुत्ते त्साब्ला की कथा घर-घर प्रचलित है। वह इतना स्वामिभक्त और कर्त्तव्य परायण था कि उसकी तुलना करके लोग अपने कर्मचारियों का उद्बोधन करते रहते थे। तिब्लिसी क्षेत्र में यह कुत्ता अपने मालिकों के जानवरों को प्रायः अकेला ही ले जाया करता था। जानवरों को कहाँ चरना है, कहाँ बैठना है, कहाँ पानी पीना है, कब लौटना है यह सब बातें उसके ध्यान में थीं। कोई जानवर झुण्ड से बाहर निकल कर इधर-उधर खिसक न जाय इसका वह पूरा ध्यान रखता था और भेड़िये, तेन्दुए जो उस क्षेत्र में भेड़-बकरियों की घात लगाते रहते थे उनसे जूझने के लिए सदा मुस्तैद रहता था। उसने ऐसी कई लड़ाइयाँ जीती भी थीं। घायल होकर भी उसने अपने शिकारियों को भगाया और अपने झुण्ड के किसी जानवर का बाल बाँका न होने दिया। मालिक के छोटे लड़के सान्द्री से वह इतना हिला-मिला था कि दोनों पास-पास बैठकर खाते और फुरसत के समय भरपूर खेलते।

इस कुत्ते की एक दूर के पशु फार्म पर जरूरत पड़ी मालिक ने उसे देना मंजूर कर लिया। त्साब्ला की आंखें बन्द करके ट्रक में पटक कर उसे सैकड़ों मील दूर उस नये फार्म में ले गया। वहाँ उसे बाँधकर रखा गया। कुत्ते का बुरा हाल था न उसने कुछ खाया न पिया, रोता रहा। एक दिन उसका दाव लग गया तो रस्सी तुड़ाकर भाग निकला। आंखें बन्द करके ट्रक में डालकर लाया गया था फिर भी उसने अन्तःप्रेरणा के आधार पर दौड़ लगाई और नदी नाले पार करता हुआ भूखा, प्यासा, रास्ते के शत्रुओं से जूझता, क्षत-विक्षत शरीर लेकर अपने पुराने स्थान पर लौट आया अपने प्यारे साथी सान्द्रों से लिपट-लिपट कर रोया।

इस घटना को लेकर जार्जिया विज्ञान एकेडमी के शरीर शास्त्री आई.एस. वेकेताश्विली ने शोध कार्य आरम्भ किया कि क्या पशुओं में अतिरिक्त अतीन्द्रिय चेतना होती है? और क्यों वे उसके आधार पर बिना इन्द्रियों का प्रत्यक्ष सहारा लिये वह काम कर सकते हैं जो आँख कान आदि से ही सम्भव है।

उन्होंने यह परीक्षण कई जानवरों पर किये कि क्या उनमें इतनी अतीन्द्रिय चेतना होती है जिसके सहारे वे प्रधान ज्ञानेन्द्रिय आँख का काम कर सकें। इसके लिए उन्होंने एक बिल्ली पाली। नाम रखा-ल्योवा। उसकी आँखों पर ऐसी पट्टी बाँधी गई जिससे वह कुछ भी देख न सके। उसे साधारणतया बाँधकर रखा जाता, पर जब खाने का वक्त होता तो उसे खोला जाता। और खाने की तश्तरी कमरे के एक कौने पर दूर रख दी जाती। शुरू में तो उसे अपना भोजन तलाश करने में कठिनाई हुई पर पीछे वह इतनी अभ्यस्त हो गयी कि कमरे के किसी भी स्थान पर रखा जाय वह वहीं पहुँच जाता।

नाक की गन्ध से सूँघ कर उसके आधार पर वह ऐसा कर सकती है यह बात वैज्ञानिक जानते थे इसलिये उन्होंने इसके साथ ही अतीन्द्रिय ज्ञान की एक कठिन परीक्षा यह रखी कि तस्तरी में ही पत्थर के टुकड़े भी रख दिये जाते। गन्ध तो सारे प्लेट में से उठती थी इसलिये उसमें रखी हुई किसी चीज को वह मुँह में डाल सकती थी। पर देखा गया कि बहुत ही निश्चित रीति से उसने अपना खाना ही खाया और पत्थर के टुकड़ों को चाटा तक नहीं। इसी प्रकार कुछ दिन में वह रास्ते में रखी हुई कुर्सी, सन्दूक आदि को बचाकर इस तरह अपना रास्ता निकालने लगी जिससे किसी चीज के गिरने की दुर्घटना भी न हो और चलना भी कम पड़े।

इसी प्रयोग के लिए एक छोटा काला कुत्ता पाला गया। नाम रखा जिल्डा। इसकी आँखों पर भी पट्टी बाँध दी गई प्रयोगशाला में क्या चीज कहाँ रहती है इसका उसे पता तक न था। वह कुछ दिन में ही सब कुछ भाँप गया और बिना किसी से टकराये बुलाये हुई आवाज पर पहुँचने लगा।

वेरेताश्विली ने अपने परीक्षणों शृंखला में मनुष्यों को भी जोड़ा है। उसने एक ऐसे जन्माँध छोटे लड़के की कथा लिखी है जो उन्हें एक व्यक्ति के पास तक रास्ता दिखाता हुआ-टेड़ी-मेढ़ी गलियाँ पार करते हुए ईंट पत्थरों और गड्ढों को बचाता हुआ उछलता कूदता आगे गया था।

इन परीक्षणों से उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि अतीन्द्रिय चेतना, हर प्राणी में विद्यमान रहती है। किसी में न्यून किसी में अधिक। कुछ जन्म जात रूप से उसकी पर्याप्त मात्रा साथ लेकर आते हैं और कुछ प्रयत्न करके उसे जगा या बढ़ा सकते हैं। उनने अपने निष्कर्षों में यह भी कहा है कि अन्धों में यह अतीन्द्रिय ज्ञान का एक स्तर लिविरिंथ रेसेप्टर अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो जाता है यदि प्रयत्न किया जाय तो उनकी यह क्षमता अधिक विकसित हो सकती है और वे नेत्रों वाले मनुष्यों से भी अधिक उपयोगी जीवन जी सकते हैं।

प्राणियों में एक बड़ी विशेषता यह है कि वे परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेते हैं। प्रकृति के उतार-चढ़ाव और परिस्थितियों के प्रवाह विकट तो जरूर होते हैं पर इतने नहीं कि मनुष्य की जिजीविषा को चुनौती दे सकें। प्राणी के शारीरिक एवं मानसिक क्षमता ढलती बदलती रहती है और यदि उसे विषम परिस्थितियों में रहना पड़े तो अपने में तदनुकूल सहनशीलता एवं परिवर्तन उत्पन्न कर लेती है। इसी प्रकार जिनके समीप रहना पड़ता है उनका प्रभाव ग्रहण करके प्राणी उसी रंग−रूप और आकृति-प्रकृति में भी ऐसा हेर-फेर कर लेता है जिसने वातावरण के साथ उसके सदृश ही प्रतीत होने लगे। समीपता का प्रभाव मानसिक ही नहीं, शारीरिक भी होता है। इसे प्रकारान्तर से अतीन्द्रिय चेतना ही कहना चाहिए सर्दी में गल जाना, गर्मी में जल जाना ही सम्भव हो सकता है फिर शरीर अपने ढाँचे और क्रम की ही परिस्थिति के अनुरूप ढलने और बदलने लगे तो इसे अतींद्रिय चेतना के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?

उत्तरी ध्रुवों पर सफेद भालू होता है वह बर्फ में इस प्रकार बैठा रहता है कि दूसरे को कुछ पता ही नहीं चलता कि वह भालू है या बर्फ की कोई चट्टान। वृक्षों की झाड़ियों में रहने वाले तेंदुए, जिराफ, हिरन, सर्प आदि के शरीर पर ऐसे निशान बन जाते हैं कि उन्हें देखने पर वे भी वृक्ष की कोई शाखा जैसे ही दीखते हैं।

तितलियों की छटा भारतवासी दार्जलिंग में देख सकते हैं। जैसे रंग के फूल वैसे ही रंग की तितलियाँ अलग से देखा जाय तो मात्र फूल भर मालुम पड़ता है उस पर कोई बैठा होगा उसका तनिक भी आभास नहीं होता पर जब उन फूलों के पास जाया जाय तो उन्हीं जैसे रंग की तितलियाँ उड़ने लगती हैं। इस प्रकार रंग-बिरंगे फूलों के साथ उन्हीं रंगों की तितलियाँ एक अपूर्व छटा दिखाती हैं। कई तितलियाँ तो पत्तों के रंग की ही नहीं उनके आकार की भी होती हैं। जब पतझड़ में पत्तों का रंग पीला पड़ता है तो वे भी अपना हरा चोला पीला कर लेती हैं।

बाँस के पेड़ पर लटका रहने वाला साँप, बिल्कुल बाँस की टहनी जैसा लगता है उस पर गाँठों जैसे निशान तक होते हैं।

जिन जीवों को शत्रुओं से खतरा होता है और आत्मरक्षा की अतिरिक्त आवश्यकता अनुभव करते हैं उनकी आकृति और प्रकृति में ऐसा विकास हो जाता है जिसमें वे आत्मरक्षा सरलतापूर्वक कर सकें।

समुद्री घोड़ा अपने शरीर को घासपात से ढके रहता है ताकि खूँख्वार जल-जंतु उसे पेड़ भर समझें और हमला न करें। कुछ घोंघे ऐसे भी होते हैं कि जब मछलियों के आक्रमण के शिकार होते हैं तो एक काला सा द्रव मुँह से उगल देते हैं; उस कालिमा की धुँध में मछलियाँ उन्हें ठीक तरह देख नहीं पाती इतने में वे उनकी पकड़ से बाहर खिसक जाते हैं। मेडागास्कर में एक ऐसी छिपकली होती है जिसमें तेज दौड़ने की क्षमता नहीं होती। उसे मांसाहारी पक्षी आसानी से पकड़ सकते हैं। आत्मरक्षा के लिये उसे एक अद्भुत विशेषता यह उत्पन्न हुई है कि उसकी पूँछ की जड़ बहुत कमजोर होती है। जब वह मुसीबत में फँसती है तो झिटककर अपनी पूँछ तोड़ डालती है और वह टुकड़ा कटने के बाद फड़फड़ाने लगता है। आक्रमणकारी उसे ही शिकार समझ कर खाने लगता है और चुपचाप चिपकी हुई छिपकली इसी प्रकार अपने प्राण बचा लेती है।

फलों में और शाक भाजियों में पड़े हुए कीड़े प्रायः उन्हीं के रंग के होते हैं। पक्षियों के अण्डों को खा जाने के घात में कितने ही जन्तु फिरते रहते हैं। इसलिए पक्षी इस तरह की टहनियों में या घासपात में उन्हें छिपाकर सेते हैं जहां वे घात कर्ताओं की दृष्टि से अपने अण्डों का बचाव कर सकें।

हमें यह मानकर चलना होगा कि प्राणी जड़ जगत का घासपात जैसा उत्पादन नहीं है और न चलता फिरता वृक्ष है-जैसा कि विज्ञान द्वारा माना जाता रहा है। जीवधारी की चेतना में आत्मा का प्रकाश है और उस प्रकाश में वह सामर्थ्य विद्यमान है जो इन्द्रिय सामर्थ्य की परिधि से आगे की बात सोच सके और ऐसे कदम उठा सके जैसे जड़ पदार्थों के लिये उठा सकना सम्भव नहीं हो सकता।


ईश्वर प्रेम (Kahani)

एक सन्त महिला, नाम था राविया और काम था ईश्वर भक्ति। भ्रमण करते हुए कितने ही सन्त, सत्संग प्राप्ति की इच्छा से उसके पास आकर ठहरा करते थे। एक साधु ने राविया के धर्म ग्रन्थ को उठाया और पढ़ने लगा। उसमें एक पंक्ति कटी हुई थी। उसने पाठ वहीं छोड़ दिया और कहा ‘तुम्हारा यह धर्म ग्रन्थ तो अपवित्र हो गया किसी ने इसे नष्ट कर दिया है अब दूसरा लेना होगा। आखिर यह तो बताइये कि यह शैतानी का कार्य किसने किया?’

मैंने-छोटा सा उत्तर था राविया का

‘अब तो साधु की हैरानी और भी बढ़ गई वह समझ ही नहीं पाया कि ईश्वर भक्त महिला अपने धर्म ग्रन्थ को नष्ट करने का कार्य कैसे कर सकती है। राविया ने कहा-पंक्ति को पढ़ा भी है।’

‘हाँ ! हाँ! उसमें लिखा है- शैतान से घृणा करो।’ साधु का कहना था।

‘मैंने जब से ईश्वर से प्रेम किया है तब से मेरे हृदय में घृणा बची ही नहीं है। ईश्वर प्रेम ने मेरे संकुचित दृष्टिकोण को विशाल सहृदयता में बदल दिया है। यदि शैतान भी आकर सामने खड़ा हो जाये तो उसे भी मैं प्रेम ही करूंगी।


भगवान के लिये द्वार खोलें -स्थान बुहारें

भगवान हमारे अन्दर प्रवेश करना चाहते हैं, पर करें कैसे? द्वार तो हमने सभी बन्द कर रखे हैं। भगवान हमारे भीतर निवास करना चाहते हैं, पर वहाँ जगह तो सभी भरी पड़ी है।

अन्तरंग के कौने-कौने में हमने कबाड़ भर रखा है न जाने कितनी कामनाएं-कितनी तृष्णाएं कितनी लालसाएं उसमें डेरा डाले पड़ी हैं। ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, छल, दंभ और मत्सर जैसे दुष्ट दस्युओं ने रही बची जगह घेर रखी है। अब उसमें तिल रखने भर की जगह नहीं। इस क्षेत्र पर पूरा आधिपत्य इन्हीं का है। इनका परिवार ही सारे भवन घेरे बैठा है। बाहर से और किसी को न आने देने के लिए इन्होंने भीतर से कपाट बन्द कर रखे हैं। भगवान के लिए भी प्रवेश निषेध है ।

पूजा उपासना का उपक्रम हम इसलिये रखा करते हैं कि भगवान हमारे भीतर प्रवेश करे और अन्तःकरण में निवास करें। उन्हें तो हम केवल तृष्णाओं और वासनाओं को समुन्नत, परिपुष्ट करने में सहायता करने भर के लिये बुलाते हैं।

एक दुखी लकड़हारा जंगल में मौत को पुकार रहा था मौत को दया आई और उसने प्रकट होकर पूछा-मेरे लिये सेवा बताओ, तैयार हूँ। लकड़हारा घबरा गया। बुला तो लिया पर अब उससे क्या काम कराये? उसने सकपकाते हुए कहा- लकड़ी का गट्ठा बहुत भारी था, उसे उठा कर सिर पर रखवा देने के लिए ही आपको बुलाया जायं। मौत ने गट्ठा सिर पर रखवा दिया और मुस्कराती हुई चली गई।

भगवान को हम लकड़हारे की तरह ही बुलाते हैं; सिर पर गट्ठा रखवाने के लिए। उसकी गोदी में बैठने का हमारा मन है कहाँ? मन तो इन नट नर्तकों के साथ हास परिहास में-उनके स्वागत सत्कार में लगा है जिनने अन्तरंग का कोना-कोना घेर कर अपने कब्जे में कर लिया है।

हमारी प्रार्थना में बल कहाँ है जो भगवान को प्रभावित कर सके। गन्दगी से सने पात्र में रखकर किसी संभ्रान्त व्यक्ति को भोजन दिया जाय तो वह उसे कैसे स्वीकार करेगा। हमारा व्यक्तित्व भीतर और बाहर बेतरह गन्दगी से भरा पड़ा है। उसमें रखकर दी हुई प्रार्थना भगवान कैसे ग्रहण करेंगे?

बर्तन में दूध भरना हो तो पहले से उसमें भरी हुई मिट्टी को निकाल कर फेंकना पड़ेगा; तभी उस खाली जगह में दूध भरा जा सकेगा। यदि हमें भगवान को अपनी भीतर बुलाना हो तो उनके लिये उस स्थान को खाली कराना पड़ेगा जहाँ स्वार्थ और लोभ के परिवार ने अपना अड्डा जमा रखा है।

भगवान को बुलाना ठीक है। पर पहले उनके बैठने के लिये जगह बनानी चाहिये। पूजा प्रार्थना करना ठीक है। पर पूजा पात्रों की तरह अपने हाथों को सत्कर्मों द्वारा और वाणी को सत्य द्वारा भी शुद्ध करना चाहिए। जिस मन से पूजा प्रार्थना की जाती है पहले उसकी मलीनता धोनी चाहिए। गन्दे पात्र में रखी पूजा सामग्री भगवान को कैसे स्वीकार होगी। कामनाओं से भरे मन में उन भावनाओं का उदय कैसे होगा जो भगवान को द्रवित करने में समर्थ होती हैं।

स्वार्थ और संकीर्णता कपाट खोलें तो भगवान का भीतर प्रवेश हो। मुख में भरे हुए तृष्णा के ताम्बूल खाली हों तो स्तुति की जाय। प्रभु का अनुग्रह प्राप्त होने में विलम्ब का कारण केवल एक है उसे ग्रहण करने और रखने के लिए पात्रता का न होना। यदि भीतर के कपाट खोल दें और भगवान को बैठने के लिए स्थान खाली कर दें तो उनका प्रवेश, आगमन और अनुग्रह तनिक भी कठिन न रह जायेगा।


शरीरगत ऊर्जा एक प्रचण्ड शक्ति भण्डागार

यों शरीर को हाड़-माँस का पुतला-मिट्टी का खिलौना और पंचतत्वों का बेमेल खेल कहा जाता है। पानी के बबूले से उपमा देकर क्षण भंगुर बताया जाता है। इस कथन में इतना ही सार है कि यह विपत्ति टूट पड़ने पर नष्ट भी हो सकता है, पर जैसी भी कुछ इसकी सत्ता है उस पर दृष्टिपात करने से वह परमाणु भट्टियों जैसा शक्तिशाली संयंत्र सिद्ध होता है। उसकी संभावनाएं अनन्त हैं। ब्रह्माण्ड का बीज इस पिण्ड को सही ही बताया गया है। जो शक्तियाँ ब्रह्माण्ड में देखी गई हैं या भविष्य में देखी जायेंगी उनका बीज इस पिण्ड में इस प्रकार मौजूद है कि यदि कोई उसे सोच सके तो देखते-देखते विशाल काय वृक्ष के रूप में परिणत हो सकता है।

माँस पेशियों में भरी हुई कोशिकाओं में छलकती हुई त्वचा में चमकती हुई ऊर्जा दियासलाई की तरह छोटी है पर यदि ठीक तरह जला दिया जाय और अभीष्ट आधार के साथ नियोजन कर दिया जाय तो उसे प्रचंड दावानल के रूप में संव्याप्त भी देखा जा सकता है। नन्हें से परमाणु को जब अपनी शक्ति प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है तो वह धरती को हिला देता है और आसमान को कँपा देता है। मानव शरीर की ऊर्जा के अतिरिक्त चैतन्य तेजस भी विद्यमान है अस्तु इसकी सामर्थ्य और भी अधिक बढ़ जाती है। यदि उसका प्रकटीकरण एवं प्रस्फुरण किया जा सके तो उसका चमत्कार देखते ही बने। मनुष्य में ऋद्धि-सिद्धियों का भंडार भरापूरा परिलक्षित हो।

शरीर पर लिपटे हुए सीधे-साधे त्वचा परिधान को ही गंभीरतापूर्वक देखिये। उसकी रचना और प्रक्रिया कितनी सम्वेदनशील, सूक्ष्म, जटिल और सशक्त है। एक वर्ग फुट त्वचा में लगभग 72 फुट लम्बी तंत्रिकाएं जाल की तरह बिछी हुई हैं। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई 12 फुट बैठती है। शरीर की गर्मी को जब बाहर निकलना आवश्यक होता है तो वे फैल जाती हैं और जब ठंड लगती है तो भीतर की गर्मी बाहर न निकलने देने से शरीर को गरम बनाये रखने के लिए वे सिकुड़ जाती हैं।

सम्पूर्ण शरीर की त्वचा में लगभग दो लाख स्वेद ग्रन्थियाँ हैं इनमें से पसीने के रूप में शरीर के हानिकारक पदार्थ बराबर बाहर निकलते रहते हैं। यदि स्नान करने में आलस बरता जाये तो चमड़ी पर पसीने सूखकर एक परत जैसी बन जाती है और उसके विषैलेपन से बदबू ही नहीं आती वरन् खुजली, दाद, फुन्सियाँ जैसी बीमारियाँ भी पैदा हो जाती हैं। चमड़ी की बीमारियों में कोढ़ मुख्य है। संसार में एक करोड़ पाँच लाख कोढ़ी हैं जिनमें से 26 लाख तो केवल भारत में ही हैं।

यों चमड़ी सीधी-सादी सफाचट दीखती है पर उसमें इतने छोटे-छोटे भेद-प्रभेद भरे होते हैं कि आश्चर्य करना पड़ता है कि किस प्रकार उसमें इतनी चीजें भरी हुई हैं। एक वर्ग सेन्टीमीटर चमड़ी में 15 तेल ग्रन्थियाँ, 10 रोंए, 30 लाख कोशिकाएं, 4 ताप सूचक तंत्र, 200 दर्द सूचक स्नानु छोर, 25, स्पर्शानुभूति तंत्र, 4 गंज स्नायु, 3 हजार संवेदना ग्राहक कोशिकाएं 100 स्वेद ग्रन्थि, 3 फुट रक्त वाहिनियाँ। इन सब का अपना-अपना अनोखा कर्तृत्व है, और वह ऐसा अद्भुत है कि मानवकृत समस्त संयंत्रों को इस त्वचा प्रक्रिया के सम्मुख तुच्छ ठहराया जा सकता है।

त्वचा के भीतर भरी हुई माँस पेशियों को देखिये। यों वे घिनौनी लगती हैं पर उनका प्रत्येक कण कितनी ऊर्जा सम्पन्न है इसे देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है। ताकत का लेखा-जोखा लिया जाता है, खेलों में, युद्धों में प्रतियोगिताओं में काम के मूल्याँकन में ताकत की परख होती है। कौन कितना ताकतवर है- कौन कितना कमजोर इस बात का लेखा-जोखा लिया जाता है। यह ताकत कहाँ रहती है? कहाँ से आती है?

शारीरिक शक्ति का स्रोत हमारी माँस पेशियाँ, लचक, स्फूर्ति, आकुँचन-प्रकुँचन सब कुछ उन्हीं के ऊपर निर्भर रहती है। जब उनमें समर्थता भरी रहती है तो मनुष्य को वज्रअंगी, लौह पुरुष आदि विशेषणों से सम्बोधित किया जाता है। कुश्ती, दौड़ भारोत्तोलन, छलाँग, दबाव आदि के अवसरों पर जो करामात शरीर दिखाता है उसे स्वस्थ माँस पेशियों का चमत्कार ही कहना चाहिए यदि वे ढीली पड़ जायें, क्षमता खो बैठें तो फिर चलना, खड़ा होना और भोजन पचाना तक कठिन हो जाय।

माँस पेशियों को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं (1) बहुत बारीक तन्तुओं से बनी हुई जो गति पैदा करती हैं- चलने, खाने, हँसने आदि में इन्हीं का उपयोग होता है मस्तिष्क की आज्ञा इच्छा होने पर ही इनमें सक्रियता आती है (2) जो स्वतः निरंतर कार्य करती हैं। पाचन क्रिया, श्वाँस प्रश्वाँस, रक्त संचालन, पलक झपकना, पसीना निकलना आदि कार्य वे स्वतः सम्पन्न करती रहती हैं (3) वे जिनमें दोनों विशेषताएं हैं और शरीर के भीतर की रासायनिक क्रिया से प्रभावित रहती हैं। इन तीनों का ही अपना महत्वपूर्ण उपयोग है। इन्हीं के सम्मिश्रित प्रयत्नों के फलस्वरूप हम स्वस्थ और बलिष्ठ दिखाई पड़ते हैं। यदि इनमें कमजोरी आने लगे तो दर्द होने लगेगा। पैरों की भड़कन, पीठ दर्द, और कमर का दर्द, जैसी शिकायतें माँस पेशियों में अकड़न, कठोरता बढ़ने के कारण ही इस तरह के दर्द होते हैं।

माँस पेशियों का काम देखने में सरल सा लगता है। पर वस्तुतः उनकी संरचना और कार्य पद्धति इतनी अधिक जटिल है कि अन्वेषक चकित रह जाते हैं। अणु विज्ञान को, उसके क्रिया-कलाप को, अणु यंत्रों को जटिल माना जाता है माँस पेशियों को इच्छित या अनिच्छित क्रिया कलाप करने में कितनी जटिल क्रिया पद्धति का सहारा लेना पड़ता है उसका विश्लेषण करते हुए कारीगर की अद्भुत कारीगरी को चकित रहकर ही देखना पड़ता है।

हाथ पैर सबके पास हैं। फिर किसी में क्षमता कम किसी में अधिक क्यों होती है? समझा जाता है यह अभ्यास से घटती बढ़ती है। बेशक इच्छा शक्ति और अभ्यास भी सहायक होता है पर मूल बात माँस पेशियों की सशक्तता ही मनुष्य की बलिष्ठता और कोमलता का मुख्य कारण है।

भोजनालय में जो कार्य चूल्हे का है-कारखाने में जो कार्य बायलर या इलेक्ट्रिक मीटर का है वही कार्य माँस पेशियाँ करती हैं। गर्मी पैदा करना उन्हीं का काम है। इस गर्मी के बल पर ही अन्य सब अंग गतिशील रहने में समर्थ होते हैं। माँस पेशियाँ सारे शरीर को गरम रखती हैं और स्वयं गरम रहती हैं उन्हें एक प्रकार के हीटर भी कह सकते हैं। शरीर और मन का सम्बन्ध बनाये रखने में इनकी भूमिका अद्भुत है। ज्ञान तन्तु समूह इन्हीं में ओत प्रोत होता है। हंसने से लेकर रोने, नृत्य से लेकर भाग खड़े होने तक, सोने से लेकर जगने तक के समस्त मनोभावों का प्रकटीकरण शरीर द्वारा तभी संभव होता है जब यह माँस पेशियाँ ठीक से काम करें। रक्त चाप, हृदय रोग जैसे जटिल रोगों में वस्तुतः उन स्थानों की माँस पेशियाँ ही दुर्बल हो जाती हैं। यह दुर्बलता जितनी बढ़ेगी रुग्णता और मृत्यु का प्रकोप उसी अनुपात से होता चला जायेगा।

नोबेल पुरस्कार विजेता आकार जे-ज्योगी ने माँस पेशियों की सक्रियता के पीछे दो रासायनिक तत्व खोजे हैं- (1) प्रोटीन सार्क्टन (2) मायोसिन। वे कहते हैं इन दोनों का संयोग माँस पेशियों में सक्रियता उत्पन्न करता है। यह दोनों प्रोटीन कहीं बाहर से नहीं आते। स्वतः ही पैदा होते हैं और उनके उत्पादन में इच्छा शक्ति का बहुत योगदान रहता है।

आहार शास्त्र की दृष्टि से प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की उपयुक्त मात्रा माँस पेशियों के पोषण के लिए आवश्यक है। पर साथ-साथ इस खुराक को ग्रहण करने और आत्मसात करने की मौलिक क्षमता तो पहले से ही माँस पेशियों में होनी चाहिए यदि वह न हो तो ऐसी खुराक भी कुछ विशेष कारगर नहीं होती।

अधिक काम करने से यह माँस पेशियाँ ही थक जाती हैं। उन्हें समुचित विश्राम न मिले तो अधिक दौड़ाने पर थक कर गिर पड़ने वाले घोड़े की तरह वे भी गड़बड़ाने लगती हैं। और अधिक काम करने की उतावली सोने का अण्डा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर सारे अण्डे एक साथ निकाल लेने वाले लालची की तरह घाटे में ही रहता है काम करने और विश्राम देने के संतुलन का ध्यान रखकर ही पेशियों को स्वस्थ और सक्रिय रखा जा सकता है।

कुछ पेशियाँ कभी भी विश्राम नहीं लेतीं। हृदय, मस्तिष्क, पाचन यंत्र, फुफ्फुस आदि का काम दिन रात निरन्तर चलता रहता है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त कभी भी इनको छुट्टी नहीं मिलती। यह थकान भी मौत का कारण है। यदि बीच-बीच में उन्हें विश्राम मिल जाया करे तो आयुष्य बढ़ाने में माँस पेशियों का वह पुनः शक्ति संचय बहुत ही उपयोग सिद्ध हो सकता है।

गहराई में क्यों जाया जाय, शक्ति के चेतना स्तर को अभी क्यों छुआ जाय। त्वचा और माँस पेशियों की सम्मिलित शक्ति का ही विवेचन किया जाय तो प्रतीत होगा कि इनका सम्मिलित स्वरूप ही किसी बड़े बिजली घर से कम नहीं है।

शक्ति का मूल स्रोत है ऊर्जा। बिजली का उत्पादन ऊर्जा से ही होता है। भाप द्वारा, कोयला जला कर, तेल पैट्रोल से, पानी को ऊँचे से गिराकर उसके वेग द्वारा और अब अणु शक्ति से बिजली पैदा की जाती है। यह ऊर्जा की ही विविध प्रतिक्रिया है।

विद्युत उत्पादन का एक आधार रासायनिक क्रिया भी है। बैटरी इसी आधार पर बनती है। वोल्टा, एम्पीयर, आरस्टेड, फैराडे प्रभृति वैज्ञानिकों ने इस संबंध में नये आविष्कार किये हैं।

किसी तंत्र के कार्य करने की क्षमता ऊर्जा कहलाती है। ऊर्जा के अनेक स्तर हैं। पदार्थों की गति के कारण उत्पन्न होने वाली, गतिजऊर्जा, रासायनिक सम्मिश्रण से उत्पन्न होने वाली रासायनिक ऊर्जा, वस्तुओं की स्थिति के कारण उत्पन्न स्थितिजऊर्जा कही जा सकती है। कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिनमें अधिक मात्रा में ऊर्जा तत्व विद्यमान रहते हैं उन्हें ईंधन कहते हैं। ऊर्जा एक से दूसरे रूप में रूपांतरित तो होती रहती है पर उसका नाश कभी नहीं होता। यह रूपांतरण प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। रासायनिक पदार्थ जलते हैं और बैटरी की विद्युत उत्पन्न होती है। पैरों द्वारा घुमाये जाने पर साइकिल चलती है यह पैरों की ऊर्जा का साइकिल की गति में रूपांतरण है। परमाणु ईंधन विखण्डित होकर ही परमाणु शक्ति उत्पन्न होती है। बायलर के नीचे कोयला जला और ज्वलन शीलता ने ताप के रूप में ऊर्जा उत्पन्न की। भाप बनी उससे रेल चली। गैस बनी उससे प्रकाश की बत्तियाँ जलीं। भाप टरबाइन, फोरसेन्ट लेम्प, हीटर, रासायनिक मिश्रण विद्युत जनकेटरी की प्रक्रिया में ऊर्जा की शक्ति क्षमता को विविध प्रयोजनों के लिए विविध रूपों में कार्यान्वित किया जाता है। आज कल प्रोपेज गैस से चलने वाले ताप विद्युत उत्पन्न करने वाले हलके जेनरेटर टेलीविजन आदि छोटे कामों के लिए खूब प्रयोग होते हैं।

दो विभिन्न प्रकार की धातुओं अथवा धातु मिश्रणों के तारों के सिरे यदि पिघला कर जोड़ दिये जायं और उनके सिरों को विभिन्न तापमानों पर रखा जाये तो उनमें विद्युत धारा प्रवाहित होने लगेगी यह तार विद्युत है।

कुछ धातुएं गरम होने पर अपनी सतह में इलेक्ट्रोन उभारती हैं। पास में कोई ठंडी वस्तु हो तो यह उत्सर्जित इलेक्ट्रोन उस पर जमा हो जाते हैं। इस स्थानांतरण से विद्युत प्रवाह आरम्भ हो जाता है। स्थानान्तरण के मध्य भाग में धनावेश युक्त कणों वाली कोई गैस भर दी जाती है इस प्रकार प्लाज्मा बनता है। प्लाज्मा की उपस्थिति इलेक्ट्रॉनों के आवेश को संतुलित करने के लिए आवश्यक है।

इन दिनों मैग्नटो हाइड्रो डायनेमिक चुम्बकीय द्रव गतिज पद्धति विद्युत निर्माण में सबसे अधिक प्रयुक्त होती है। इसका आधार यह है कि वात्विक चालकों के चुम्बकीय क्षेत्र में घुमा कर विद्युत वाहक बल इलैक्ट्रोमोटिव, फोर्स पैदा की जाय। इसके स्थान पर यदि दूसरा प्रयोग किया जाय तो भी यही फोर्स पैदा होगी। धात्विक चालकों के स्थान पर यदि गैसीय चालक ‘प्लाज्मा’ का प्रयोग किया जाय और उस गैस को चुम्बकीय क्षेत्र में होकर निकाला जाय तो विद्युत उत्पादन का वही प्रयोजन पूरा होगा।

एक जस्ते की छड़ एक ताँबे की छड़ यदि नींबू के रस में डाली जायं तो उनके बीच एक विभावान्तर पैदा होता है और उससे उपकरणों में विद्युत प्रवाह चल पड़ता है। रासायनिक बैटरियाँ इसी पद्धति से बनती हैं।

ईंधन सेल की पद्धति को न समाप्त होने वाली बैटरी पद्धति कहा जा सकता है। प्रयुक्त रसायनों की शक्ति जब समाप्त हो जाती है तब बैटरी अपना काम बन्द कर देती है। पर ईंधन सेल का प्रवाह क्रम बन्द नहीं होता। हाइड्रोजन ऑक्सीजन के मेल से पानी की उत्पत्ति होती है। यदि वे दोनों गैस लगातार मिलती रहें तो पानी का निर्माण अनवरत रूप से होता रहेगा। इसमें बाहरी और किसी ईंधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी आधार पर यह शोध चल रही है कि हाइड्रोजन ऑक्सीजन के संमिश्रण की भाँति या कोयला, हवा अथवा पैट्रोलियम हवा के सम्मिश्रण से क्या ईंधन सैल बन सकते हैं ?

अन्तरिक्ष यात्रा में यह ईंधन सेल ही काम आता है। भारी चीजों की बड़ी मात्रा में लम्बी दूरी तक उड़ान संभव ही नहीं है। ईंधन सेल का एक और स्रोत ढूँढ़ा जा रहा है वह है सूर्यताप। साधारणतया सूर्य से गरमी और रोशनी प्राप्त की जाती है। यों साधारणतया वह भी काम की चीज है, पर उसमें जो अगली संभावनाएं विद्यमान हैं उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अणु भट्टियाँ और अणु रसायन बनाने के महंगे और खतरनाक झंझट में पड़ने की अपेक्षा, सूर्य से शक्ति प्राप्त करके बिजली की आवश्यकता पूरा कर सकना शक्य हो जायेगा। सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी पर एक वर्ग मीटर जगह में 1400 वॉट के करीब बिजली बखेरती है। इस शक्ति का उपयोग जिस दिन मनुष्य के हाथ में होगा उस दिन ऊर्जा का विपुल भण्डार उसकी मुट्ठी में आ जायेगा।

बैटरी क्षेत्र में एक नया प्रयोग न्यूक्लीय बैटरियों का जब जल्दी ही बड़े पैमाने पर प्रयुक्त होने लगेगा। एक खोखला बेलन चारों ओर रहेगा। बीच में छड़ रहेगी। उस छड़ पर बीटा किरणों का उत्सर्जन करने वाले रेडियो आयसोटोप चढ़ा दिये जायेंगे। बेलन की सतह पर इलेक्ट्रोन जमा होंगे। छड़ और बेलन को तार से जोड़ दिया जायेगा और विद्युत धारा प्रवाहित होने लगेगी।

लौह विद्युत का रूपांतर और ताप चुम्बकीय विद्युत का रूपांतरण सैद्धान्तिक रूप से सम्भव मान लिया गया है अब उसके सरलीकरण के प्रयोग चल रहे हैं। वेरियम टाइटेनेट के रबे को यदि 120 डिग्री से ॰ से अधिक गरम किया जाय तो उसकी आन्तरिक संरचना में परिवर्तन उपस्थित होता है। इस परिवर्तन की प्रक्रिया को यंत्रों द्वारा विद्युत में रूपांतरण किया जा सकता है। चुम्बक रूपांतरण का भी यह आधार है।

शरीर को रासायनिक आधार पर विनिर्मित होने वाली बैटरी के समकक्ष रखा जा सकता है। इसके घटक ईंधन सेल कहे जा सकते हैं जो मरण पर्यन्त सूक्ष्म बने रहते हैं। जब तक जीवन है तब तक इस बैटरी की क्षमता समाप्त नहीं हो सकती। अन्तरिक्ष यात्रियों के लिए यही ईंधन उपयुक्त समझा गया है। मनुष्य भी एक अन्तरिक्ष यात्री है। वह अपने पिता के घर से इस मर्त्य लोक में महत्वपूर्ण शोध अथवा प्रयोजन पूरे करने आया है उसे अपनी जीवन यात्रा के लिए ईंधन चाहिए वह त्वचा और माँस पेशियों के रूप में स्पष्टतः मिला हुआ है। इतना ही नहीं उसके पास और भी अधिक गहरे शक्ति स्रोत हैं पर ऊर्जा के स्थूल रूप में इस माँस त्वचा मिश्रित कलेवर को भी अति महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

इस शरीरगत ऊर्जा का चैतन्य प्राणियों पर प्रत्यावर्तन करके उन्हें लाभान्वित किया जा सकता है। इसका एक छोटा सा प्रयोग जर्मन के डॉक्टर मैस्पर ने किया और उसे मैस्मरेजम नाम दिया।

मैस्मरेजम के आविष्कर्ता हैं-जर्मनी के डॉक्टर फ्रासिस्कस एन्टोनियम मैस्पर। वियना में उन्होंने चिकित्सा शास्त्र पढ़ा और उपाधि प्राप्त की। उन्होंने एक महत्वपूर्ण शोध निबंध प्रस्तुत किया था जिसमें बताया गया कि अविज्ञात नक्षत्रों में एक तरल चुम्बकीय पदार्थ इस धरती पर आता है और उससे हम सब प्रभावित होते हैं। इस पदार्थ का सन्तुलन यदि शरीर में गड़बड़ाने लगे तो शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। यदि किसी प्रकार यह चुम्बकीय सन्तुलन ठीक कर दिया जाय तो बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य फिर ठीक हो सकता है।

इस का प्रयोग भी उन्होंने रोगियों पर किया और सफलता तथा ख्याति भी अर्जित की वे लोह चुम्बक को अपने शरीर की विद्युत से प्रभावित करते थे और फिर उस चुम्बक को रोगी के शरीर से स्पर्श कराके उस अभाव की पूर्ति करते थे जो रोग का कारण थी। इसके लिए वे अपनी संकल्प शक्ति की साधना द्वारा अपना मनोबल तथा आवश्यक चुम्बकीय विद्युत की मात्रा बढ़ाते थे। उनकी चिकित्सा प्रणाली में दूर से आने वाली मधुर और मादक संगीत का प्रयोग किया जाता था ताकि रोगी को मानसिक एकाग्रता और भाव सान्त्वना का लाभ मिले। अपने में शारीरिक विद्युत की मात्रा बढ़ाना और उस लौह चुम्बक के माध्यम से रुग्ण व्यक्तियों को लाभान्वित करना यही उनका चिकित्सा क्रम था। लाभान्वित रोगियों के मुँह से प्रशंसा सुनकर कष्ट पीड़ितों की संख्या दिन-दिन बढ़ने लगी और वह हर रोज सैकड़ों तक पहुँचती।

अमेरिका में इन दिनों 17 चोटी के शल्य चिकित्सक इस प्रणाली का प्रयोग कर रहे हैं और सम्मोहन विज्ञान के आधार पर रोगियों को सेवा सहायता पहुँचा रहे हैं। महिलाओं की प्रसव पीड़ा कम करने में तो इन प्रयोगों को शत-प्रतिशत सफलता मिली है। दर्द न होने के इंजेक्शन लगाने की अपेक्षा सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा उन्हें कष्ट मुक्त स्थिति का लाभ देना अधिक उचित और हितकर समझा गया है। प्रसूताओं को भी यही उपचार अधिक उपयुक्त लगा है।

डॉ. हार्थसेन बेहोशी की आवश्यकता की आधी मात्रा दवा की देकर और आधा सम्मोहन का उपयोग करके अपना काम चलाता है। शल्यचिकित्सा के समय आवश्यक एनेस्थिशिया की मात्रा उन्होंने 50 प्रतिशत घटा दी है। इससे रोगी अर्ध मूर्छित भर रहता है। सम्मोहन के प्रभाव से उसे कष्ट बिल्कुल नहीं होता।

कैडर्स अस्पताल में एक 14 वर्षीय लड़की का कान का आपरेशन होना था उसमें 5 घण्टे लगने थे। इतने लम्बे समय तक दवाओं की बेहोशी पीछे घातक सिद्ध हो सकती थी थी इसलिए सम्मोहन के आधार पर आपरेशन करने का निश्चय किया गया। यह आपरेशन सफल रहा। इतनी देर तक इतना गहरा आपरेशन करने की इस सफलता ने इस विज्ञान की महत्ता को अब असंदिग्ध रूप से स्वीकार कर लिया है।

केन्सर की असहनीय पीड़ा किसी दवा से काबू में नहीं आती। केन्सर से कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ती हैं। जो नई बनती हैं वे अन्य कोशिकाओं के साथ फिट नहीं बैठतीं। उसका उपचार शल्य चिकित्सा रेडियो विकरण आदि से किया जाता है। पर दर्द घटाने का उपचार उपलब्ध होने से अब उस अभाव की पूर्ति सम्मोहन विज्ञान द्वारा की जाने लगी है और इससे रोगियों को बड़ी राहत मिली है।

मस्तिष्कीय चोट, अबुँद सूजन, रक्तचाप, हृदयशूल, उन्माद जैसे कष्टों में सम्मोहन का उपयोग निरापद समझा गया है। कमजोर हृदय वालों पर क्लोरोफार्म जैसी दवाओं की हानिकारक प्रतिक्रिया होती है, इसलिए उनके आपरेशनों में भी सम्मोहन ही ठीक समझा गया है।

डॉ. हार्थमैन ने इस उपचार से न केवल रोगी अच्छे किये हैं वरन् व्यसनी और बुरी आदत वालों की कुटेवें भी छुड़ा दी हैं। नशेबाज जो अपने को आदत से लाचार मानते थे इस व्यसन से छुटकारा पा सके। बिस्तर में पेशाब कर देने वाले बड़ी उम्र के बच्चे भी इस व्यथा से छूटे।


Quotation

मानव-जाति, युग-युगान्तर से उन स्वार्थी लोगों द्वारा अज्ञान में कैद रक्खी गई है, जिनका लक्ष्य मनुष्य के दिमागों को संकुचित और अव्यवस्थित बनाये रखना रहा है।

-आर॰ जैफरीज

हृदय के संकुचन के समय यदि रक्तचाप 160 एम.एम. से अधिक हो और प्रकुँचन के समय वह 90 एम.एम. से अधिक हो तो रक्तचाप बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में वाये क्षेमककोष्ट पर अधिक दबाव पड़ता है-रक्त संचार से अधिक शक्ति लगानी पड़ती है। यह क्रम कैसे रोका जाय, इसके लिए अन्य चिकित्सा इतनी उपयोगी सिद्ध नहीं हुई जितना कि सम्मोहन सफल रहा।

माँस पेशियों द्वारा उत्पादित और त्वचा तन्तुओं द्वारा संचारित शरीरगत ऊर्जा को संकल्प शक्ति द्वारा एकत्रित करना और उसे किसी दूसरे के कष्ट निवारण में प्रयोग करना यही मैस्मरेजम का प्रचलित प्रयोग है। पर यह आरम्भ है अन्त नहीं। यह एक छोटा सा उपचार मात्र है। योग की तंत्र शाखा में इस शरीरगत ऊर्जा का उच्चस्तरीय उत्पादन और प्रयोग का विधान विज्ञान भरा है। यदि इस आधार, इस शक्ति स्रोत से लाभ उठाया जा सके तो मनुष्य अपना और दूसरों का असीम हित साधन कर सकता है।


मृत्यु को न जाने हम क्यों भूल बैठे हैं?

जीवन के बहुमूल्य क्षण एक के बाद एक तेजी से बीतते चले जा रहे हैं। दिन और रात की उभय पक्षीय खेंच कर रही आरी इस वृक्ष को काटती चली जा रही है। उसका गिरना निश्चित है। आज नहीं कल। कह नहीं सकते कच्चे धागे पर टँगी हुई मौत की तलवार कब टूट पड़े और इस सरस लगने वाले जीवन का अन्त कर दे।

अनेक कठिनाईयों हमें याद रहती हैं और उनके हल निकालते हैं। आपत्तियों की संभावना को पहले से ही देख लेते हैं और समय रहते उनके बचाव का रास्ता खोज लेते हैं। कम से कम सचेष्ट और प्रयत्नशील तो रहते ही हैं। संभावित आपत्तियों को सर्वथा विस्मृत तो नहीं ही करते।

पर कैसा घोर आश्चर्य है कि मृत्यु जैसे सर्वोपरि संकट की बात कभी सूझती ही नहीं। संकट भी ऐसा वैसा नहीं- इतना भयानक कि दीखने वाले सारे खेल को एक ही फूँक में उड़ा कर रख दे। सो भी इतना अनिश्चित कि कभी भी कल ही सामने आकर खड़ा हो जाय और जो कुछ हाथ में है सब कुछ छीन कर ले जाय। ऐसे संकट की कभी याद भी न आये। इससे बढ़कर मनुष्य की अचरज भरी भूल और क्या हो सकती है?

गोदी के बच्चे काल उठा ले जाता है। हँसते-खेलते बालक, उछलते-कूदते किशोर, इठलाते मरदाने युवक आँखों के सामने रोज ही मरघट में जाते रहते हैं। समय पूरा करके शतायु भोगने वाले भाग्यशाली उँगलियों पर गिनाये जितने होते हैं। अधिकाँश तो आधी अधूरी उम्र में ही विदाई ले लेते हैं। हम यही मान कर बैठे हैं कि अपने मरण का कोई प्रश्न नहीं। अजर अमर की तरह हम लाख करोड़ वर्ष जियेंगे। मरना तो औरों को है। हमारी मृत्यु क्यों आयेगी?

कदाचित मृत्यु को देखा और समझा जा सकता होता बिल्ली जिस चूहे पर घात लगाये बैठी रहती है उस विभीषिका को समझा होता। काल के मुख में जाने वाले गोदी में भरे हुए चने चवैने के रूप में अपने को देखा होता तो अपनी वस्तु स्थिति निरीक्षण कर सकने वाली दूरदर्शिता सार्थक हो जाती।

दूसरों की काया को चिता में जलते हुए देख कर यदि अपनी काया की वैसी ही दुर्गति कल नहीं तो परसों होने की यथार्थता को यदि अनुभव किया होता तो मूर्छा जगती जो आज घोर अज्ञान के अन्धकार में डाले हुए बालू के किले खड़े करने की बालक्रीड़ा में लगी मोद मना रही है।

देवोपम विभूतियों से सम्पन्न यह मनुष्य शरीर उच्च उद्देश्यों के लिये मिला है। अनुकरणीय आदर्शवादी जीवन, विश्वकल्याण में योगदान आत्मा का परमात्मा से विवाह जैसे अति महत्वपूर्ण कार्य इसी मनुष्य जीवन की शुभ घड़ी में सम्पन्न होने थे। पर हाय रे दुर्भाग्य यह पुण्य वेला पशुओं से भी गई गुजरी बीत रही है। पशु मर्यादाएं नहीं तोड़ते, पाप नहीं बटोरते पर अपनी गतिविधियां तो उलटी हो चलीं। मनुष्य से देवता बनना लक्ष्य था पर पशु भी न रह सके पिशाच बन कर यह पाप की इतनी भारी गठरी सिर पर जमा करली जिसे न जाने कब तक ढोते रहना पड़ेगा।

यह सब क्यों हुआ? कर्म से च्युत होकर अकर्म में भटकना-इतनी तीव्र बुद्धि के रहते कैसे संभव हो सका कारण एक ही है माया के आवरण में छिपी मृत्यु को भुला देना।

मृत्यु को याद रखें, उसे इर्द-गिर्द मँडराती हुई देखें। काया के चिता का खाद्य बनने से जो क्षण बच रहे हैं उनका महत्व समझे तो विवेक की आँख खुलें। यदि यथार्थ सूझे तो उस ओर बढ़ने के लिये भी कदम बढ़े। अभी तो मेढ़क पतंगे खाने में रस ले रहा है यह भूल ही रहा है कि उसके आधा धड़ अजगर के मुँह में जा चुका। तृष्णा के पतंगे खाने का मनोरथ पूरा होने से पहले ही मौत अपना अस्तित्व समाप्त कर देगी। मृत्यु का प्रत्यक्ष लक्ष्य न जाने क्यों हमारी आँख से ओझल रहता है। इस अन्धता को क्या कहें?


ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कलाकृति असम्मानित न हो

कोई प्रतिष्ठित मूर्तिकार इस बात को ध्यान में रखकर मूर्ति बनाता है कि उसकी यह कृति सराही जाय और उसके निर्माता को, कलाकारिता को सम्मान मिले। अच्छे चित्रकार अपनी प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखते हैं और जो चित्र बनाते हैं अपने सम्मान को भी जुड़ा रखते हैं। प्रत्येक कलाकार अपनी कला-कृतियों में अपनी गरिमा का ध्यान रखता है। यदि वह भोंड़ी या भद्दी होती है तो उस कृति का ही तिरस्कार उपहास नहीं होता वरन् उसके सृजेता कलाकार का भी गौरव गिरता है।

ईश्वर की सर्वोत्तम कृति मनुष्य है। इसे बनाने तराशने में उसने अपनी कलाकारिता का अन्त कर दिया है। शरीर के एक-एक पुर्जे की रचना और कार्यशैली पर विचार करते हैं तो विदित होता है कि संसार के समस्त वैज्ञानिक मिलकर ईश्वर निर्मित किसी एक अवयव की सही प्रतिकृति नहीं बना सकते। समस्त शरीर की संरचना तो एक जादू के महल की तरह है।

मन का -मस्तिष्क का तो कहना ही क्या? गणक कंप्यूटर पर आश्चर्य किया जाता है पर विविध प्रयोजनों के लिए बने हुए उत्कृष्टतम लाखों कम्प्यूटर मिलकर भी मस्तिष्कीय चेतना की तुलना नहीं कर सकते। मन की, चित्त की-बुद्धि की क्षमता का तो कहना ही क्या? संसार में दीखने वाला समस्त मानवीय कर्तृत्व आश्चर्य जैसा लगता है। मनुष्य के उद्भूत से पूर्व का संसार और आधुनिक संसार की तुलना करते हैं तो इस दुनिया का अदभ्य निर्माण हुआ प्रतीत होता है। मनुष्य के हाथ में जितने साधन प्रस्तुत हैं उन्हें देखकर अचम्भा होता है। भविष्य की प्रगति संभावनाएं और भी अधिक हैं। पर यह सब तत्वतः हैं क्या? मानवीय बुद्धि की एक क्यारी में उगे हुए पुष्पों की एक फसल ही इसे कह सकते हैं। समग्र बुद्धि की-सर्वांगीण उपलब्धियाँ यदि कभी एकत्रित की जा सकीं तो इस धरती पर स्वर्ग निछावर किया जा सकेगा और मनुष्य का अभिवन्दन देवता करेंगे।

यह शारीरिक और बौद्धिक क्षमता की बात हुई। अभी भावना क्षेत्र की सूक्ष्म दिव्यता की बात शेष है भावना उभार-जब प्रेम और आत्मीयता के रूप में प्रस्फुटित होता है तो प्रतीत होता है अमृत स्वर्गलोक में नहीं मानवीय अन्तःकरण में विद्यमान है। तात्विक प्रेम की गंगा जिस उद्गम से उमड़ती है वह स्थान शिव के शीर्ष जैसा पवित्र और महान बन जाता है। प्रेमी स्वयं कितना पाता है- और प्रेमपात्र को कितना देता है इसका लेखा-जोखा साँसारिक गणित से सम्भव नहीं हो सकता। जिसे प्रेम नहीं मिला उसे इस संसार से खाली हाथ जाना पड़ा। जिसे प्रेम मिल गया उसे तथाकथित अभावग्रस्त जीवन में भी हुलास-उल्लास बिखरा दिखाई पड़ेगा। जो प्रेम दे सका है उसका तो कहना ही क्या-उससे बढ़कर दानी और कौन हो सकता है। जीवन रस से बढ़कर और किसी के पास क्या हो सकता है? अन्तःकरण की उत्कृष्टता का सार तत्व प्रेम है। यह जहाँ बनता है वहाँ इत्र संस्थान जैसा सुगन्धित, हिमि शिखर जैसा धवल, शीतल पाया जायेगा। उस अनुदान की वर्षा वह जिस पर करता है उसे मृतक से जीवित कर देता है। प्रेम का आदान-प्रदान कर सकने वाला अन्तःकरण कितना दिव्य और अलौकिक है इसकी चर्चा शब्दों में कैसे की जाय?

सूक्ष्म चेतना का जो ईश्वरीय अनुदान मनुष्य को मिला है उसकी थोड़ी सी झाँकी कभी-कभी योगी तपस्वी आत्म-ज्ञानी करते हैं। ब्रह्माण्ड की समस्त सत्ता और महत्ता बीज रूप में मनुष्य के भीतर विद्यमान है। इसे विकसित प्रकाशित भर करने की चेष्टा, साधना विज्ञान करता है। भौतिक सिद्धियों और दिव्य विभूतियों का इतना बड़ा भण्डागार मानवीय चेतना में सन्निहित है कि उसे विकसित करते चलने पर ईश्वरीय सृजन के इस विराट ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ है उस सबके उपयोग और उपभोग की सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है। इतना ही नहीं जीव समग्र ब्रह्म बन सकता है।

कोई मूर्ति-मूर्तिकार नहीं बन सकती। कोई चित्र-चित्रकार नहीं बन सकता। कोई पुत्र पिता का स्थापनापन्न नहीं कहलाता। पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि वह यदि सीधे मार्ग पर चले तो ईश्वर भक्त ही नहीं वह साक्षात् ईश्वर भी बन सकता है। अपने दर्पण में समस्त सृष्टि के दर्शन कर सकता है और अपनी आत्मा में सबको प्रतिष्ठित करके उसके साथ क्रीड़ा-कल्लोल कर सकता है। मनुष्य की संभावनाएं असीम हैं। जितना असीम परमात्मा है उतना ही महान उसका पुत्र- आत्मा भी है।

मूर्तिकार ने इस मूर्ति को बनाने में अपनी कला का अन्त कर दिया है। ईश्वर कितना महान और अद्भुत है, उसे देखना, जानना हो तो उसकी कलाकृति मानव प्रतिमा को बारीकी से देखा जाय। उसके कण-कण से जो सुन्दरता-गरिमा टपकती है वह अपने आपमें अनुपम है। ऐसा सर्वांगपूर्ण सृजन इस विराट् ब्रह्माण्ड में अन्यत्र कहीं भी ढूँढ़े नहीं मिल सकता।

ईश्वर का अरमान पूरा हो गया और क्रिया-कलाप सम्पन्न। अब हमारा कर्त्तव्य आरम्भ होता है कि उस कर्त्तृत्व को कलुषित और कलंकित न करें। सृष्टा की गरिमा को गिरने न दें और उन अरमानों को चोट न पहुँचायें जिन्हें लेकर सृष्टा ने इतनी तीव्र आकाँक्षा की और सृजन का कष्ट उठाया।

हमें चाहिए कि अपने स्वाभिमान और ईश्वर के सम्मान को समझें और अपना स्तर वैसा रखें जिससे आत्मा और परमात्मा का गौरव गिरने न पाये। निष्कृष्ट गतिविधियाँ अपनाकर हम अपने को कलंकित नहीं करते वरन् ईश्वर की गरिमा को भी गिराते हैं। हमें प्रतिष्ठित होकर जीना चाहिए। अपनी और अपने सृजेता की प्रतिष्ठा को नष्ट न होने देना चाहिए।

अपनी प्रतिकृति-मनुष्य के रूप में बनाने का-उसमें अपनी समस्त कला को समाविष्ट करने का ईश्वरीय प्रयोजन यह रहा है कि उसे ऐसा साथी और सहायक प्राप्त हो सके जो उसकी सृष्टि को सुरम्य एवं सुविकसित बनाने में उसका हाथ बँटाये।

सहायकों की इच्छा करना उचित भी है और स्वाभाविक भी। सरकारी तंत्र, अधिकारी कर्मचारियों की सहायता से चलता है। अकेला शासक सुविस्तृत शासन तंत्र की व्यवस्था कैसे चलाये? कल कारखानों में एकाकी मालिक सब काम कहाँ करता है। कारीगरों और श्रमिकों की सहायता से ही उस संस्थान की गतिविधियाँ चलती हैं। ईश्वर के इतने बड़े राज्य में असंख्य प्रकार के क्रियाकलापों के संचालन में यदि साथी सहायक की, अधिकारी कर्मचारी की आवश्यकता समझी गई हो तो यह उसका औचित्य भी है।

ईश्वर की सर्वोत्तम कलाकृति दर्शाने भर के लिए मनुष्य का सृजन नहीं हुआ वरन् उसे इसलिए भी साधन सम्पन्न सत्ता के रूप में विनिर्मित किया गया है कि वह इस सृष्टि को सुरभित, सुव्यवस्थित, सुन्दर और समुन्नत बनाने में अपना बढ़-चढ़कर योगदान प्रस्तुत करे। स्वयं इस तरह रहे जिससे दूसरों को अपने चलने का अनुकरणीय दिशा ज्ञान मिलता रहे। उसका कर्तृत्व ऐसा हो जिससे अव्यवस्था को व्यवस्था में, उच्छृंखलता को शालीनता में, निकृष्टता को उत्कृष्टता में, कुरूपता को सुन्दरता में परिणत किया जा सकना सम्भव हो सके।

हम ईश्वर के अरमान, श्रम और कौशल को निष्फल न होने दें। ऐसा जीवन जियें जो इस अनुपम सृजन की पग-पग पर सार्थकता सिद्ध कर सके।


दुसरो को अपने आप से बड़ा समझो (Kahani)

रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्य इसी बात पर झगड़ा करने लगे कि उनमें से कौन बड़ा है? झगड़ा तय न होने पर गुरुदेव के पास जाकर उन्होंने पूछा- हम दोनों में बड़ा कौन है?

परमहंस को शिष्यों की बात सुनकर हँसी आ गई। बोले ‘इस साधारण सी बात के लिये परस्पर झगड़ने की क्या आवश्यकता? तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो बहुत सरल है। तो दूसरे को बड़ा समझता है वही बड़ा है।’ इतनी जल्दी अपने झगड़े का समाधान पाकर वह दोनों बहुत शर्मिन्दा हुए और उसी दिन से एक दूसरे को बड़ा मानने लगे।


सन्मार्गगामी को दैवी सहायता मिलती है।

परमार्थ मार्ग पर चलने वालों को दैवी सहायता मिलती है। चूँकि उनका लक्ष्य ऊँचा होता है इसलिये उस पुण्य प्रयोजन के आधार पर ईश्वरीय अनुग्रह का मिलना भी स्वाभाविक है। समय-समय पर ऐसी सहायता परमार्थी व्यक्तियों को मिलती भी रही है। यदि वह न मिलती तो वे साधन हीन स्थिति और विपरीत परिस्थितियों के बीच महत्वपूर्ण सफलताएं कैसे प्राप्त करते?

सन्मार्ग पर चलने वालों को सत्कार्य करने वालों को सदा दैवी सहायता मिलती रही है। संसारी लोग वैभव और पुरुषार्थ के चमत्कार को समझते हैं और जिसकी कमान चढ़ी होती है उसकी जय बोलते हैं, उसकी सहायता करते हैं। सन्मार्गगामी न्याय-नीति को अपनाये रहने के कारण उतनी जल्दी और उतनी बड़ी मात्रा में सफलता प्राप्त नहीं करते जितनी कि येन-केन उपलब्धियाँ प्राप्त कर लेने की नीति अपनाने वाले। फिर भी देवपथ का अनुभव करने वाले हारते नहीं और न साधनों के अभाव में उन्हें असफल रहना पड़ता है। दैवी सहायता समय-समय पर उन्हें मिलती रहती है।

कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, वह अबला असहाय खड़ी थी, उसे मनुष्य की नहीं ईश्वर की सहायता प्राप्त हुई और उसकी लाज बच गई। दमयन्ती बीहड़ वन में अकेली थी, व्याध उसका सतीत्व नष्ट करने पर तुला था। सहायक कोई नहीं। उसकी नेत्र ज्योति में भगवान प्रकट हुए और व्याध जलकर भस्म हो गया। दमयन्ती पर कोई आँच नहीं आई। प्रहलाद के लिये उसका पिता ही जान का ग्राहक बना बैठा था, बच कर कहाँ जाय। खम्भे में से नृसिंह भगवान प्रकट हुए और प्रहलाद की रक्षा हुई। घर से निकाले हुए पाण्डवों की सहायता करने, उनके घोड़े जोतने भगवान स्वयं आये। नरसी मेहता की सम्मान रक्षा-भगवान ने अपनी सम्मान रक्षा की तरह ही मानी। ग्राह के मुख से गज के बन्धन छुड़ाने के लिये प्रभु नंगे पैरों दौड़े आये थे।

मीरा को विष का प्याला भेजा गया और साँपों का पिटारा पर वह मरी नहीं। न जाने कौन उनके हलाहल को चूस गया और मीरा जीवित बची रही। गाँधी को अनेक सहयोगी मिले और वे दुर्दांत शक्ति से निहत्थे लड़कर जीते। भागीरथ की तपस्या से गंगा द्रवित हुई और धरती पर बहने के लिये तैयार हो गई। शिवजी सहयोग देने के लिये आये और गंगा को जटाओं में धारण किया, भागीरथ की साधना पूरी हुई। दुर्वासा के शाप से संत्रस्त राजा अम्बरीष की सहायता करने भगवान का चक्र सुदर्शन स्वयं दौड़ा आया था। समुद्र से टिटहरी के अण्डे वापिस दिलाने में सहायता करने के लिये भगवान अगस्त मुनि बनकर आये थे। नल और नील ने समुद्र पर पुल बाँधने का असम्भव दीखने वाला काम सम्भव कर दिया था। हनुमान को समुद्र लांघने की शक्ति भी किसी अदृश्य शक्ति से ही उपलब्ध हुई थी।

ऐसे उदाहरण संसार भर में बिखरे पड़े हैं। सन् 1874 की बात है। इंग्लैंड का एक जहाज धर्म प्रचार के सिलसिले में- न्यूजीलैण्ड के लिए रवाना हुआ। उसमें 214 यात्री थे। वह विस्के की खाड़ी से बाहर ही निकला था कि जहाज के पेंदे में छेद हो गया। मल्लाहों के पास जो पम्प थे तथा दूसरे साधन थे उन सभी को लगाकर पानी निकालने का भरपूर प्रयत्न किया पर जितना पानी निकलता था उससे भरने की गति तीन गुनी तेज थी।

निराशा का वातावरण बढ़ता जाता था। जब जहाज डूबने की बात निश्चित हो गई तो कप्तान ने सभी यात्रियों की छोटी लाइफ बोटों में उतर जाने और उन्हें खेकर कहीं किनारे पर जा लगने का आदेश दे दिया। डूबते जहाज में से जो जाने बचाई जा सकती हों, उन्हें ही बचा लिया जाय। अब इसी की तैयारी हो रही थी।

तभी अचानक पम्पों पर काम करने वाले आदमी हर्षातिरेक से चिल्लाने लगे। उन्होंने आवाज लगाई कि जहाज में पानी आना बन्द हो गया अब डरने की कोई जरूरत नहीं। यात्रियों ने चैन की साँस ली और जहाज आगे चल पड़ा। कार्ल्पस डाक बन्दरगाह पर उस जहाज की मरम्मत कराई गई तब पता चला कि उस छेद में एक दैत्याकार मछली की पूँछ फँसकर इतनी कस गई थी कि ने केवल छेद ही बन्द हुआ वरन् मछली भी घिसटती हुई साथ चली आई।

‘धर्म युद्ध’ के संदर्भ में संलग्न इन यात्रियों की जीवन कथा इस अद्भुत प्रकार से होने की बात ईसाई समाज में धर्मात्माओं को दैवी सहायता मिलने की श्रद्धा बनाये रखने के संदर्भ में अक्सर कही जाती है।

कई ऊपर से दीखने वाली विपत्ति के पीछे भी ईश्वरीय अनुग्रह छिपा रहता है। तात्कालिक हानि कालाँतर में हानि उठाने वालों को भी सुखद सिद्ध होती है और साथ ही दूसरों का भी उससे भला होता है। इसलिये प्रत्येक हानि को दुर्भाग्य सूचक या दैवी कोप ही नहीं मान लेना चाहिए।

लीसवे का समुद्री प्रकाश स्तम्भ आजकल जहाँ खड़ा है वहाँ किसी जमाने में जहाजों के लिए भारी खतरा था उस उथलेपन में फँसकर अनेकों जलयान या तो नष्ट हो जाते थे या क्षतिग्रस्त। उस स्थान पर प्रकाश स्तम्भ खड़ा करना भी सम्भव नहीं हो रहा था क्योंकि वहाँ की जमीन बालू मिट्टी की थी।

सन- 1771 में एक जहाजी दुर्घटना हुई। एक रुई से लदा अमेरिका जहाज दुर्भाग्य का शिकार होकर किसी दलदल में फँसकर नष्ट हो गया। कुछ विचित्र संयोग ऐसा हुआ कि रुई, बालू और उस जल के विचित्र सम्मिश्रण से वह रुई पत्थर जैसी कठोर हो गई। फलस्वरूप उसी की नींव पर प्रकाश स्तम्भ खड़ा किया गया जिससे भविष्य में उस क्षेत्र में जहाज नष्ट होने की आशंका समाप्त हो गई। उस एक जहाज के डूबने से जो प्रकाश स्तम्भ बना उसके कारण अमेरिकी जहाज भविष्य के लिए उस तरह की दुर्घटना के शिकार होने से सदा के लिए बच गये और अन्य यानों को भी उस तरह के संकट से छुटकारा मिल गया। अभिशाप को वरदान में बदलने वाली यह दुर्घटना यह आशा दिलाती है कि किसी अनिष्ट के पीछे मंगल भी छिपा हो सकता है।

एक भारवाहक का उच्छृंखल गधा एक रात चुपके से घर से खिसक गया। उसके मालिकों ने उसे कई दिन ढूँढ़ने के बाद मुश्किल से एक जगह खड़ा पाया। अमेरिका की इट्टाही पहाड़ियों की जिस सुरम्य घाटी में यह गधा खड़ा था वहाँ कुछ देर सुस्ताने के बाद उसके मालिक रुके और वे लोग उसे घर ले चलने के लिये घसीटने लगे, पीटा भी पर वह अड़ियल बनकर खड़ा हो गया और लौटने से इनकार करने लगा।

मालिकों ने ध्यान से देखा तो दीखा कि वहाँ रजत सीसिया धातु की बहुत बड़ी खान है। इस पहाड़ी पर उन्होंने कब्जा कर लिया, उन दिनों के अमेरिकी कानून के अनुसार खाली जगह पर कब्जा करने वाले ही उसके मालिक हो जाते थे। कब्जा होने के बाद मालिकों की सरकारी स्वीकृति के लिये अर्जी दी गई। सन् 1865 में इस प्रकार की अर्जियों की सुनाई करने वाले इदाही अदालत के न्यायाधीश श्री नार्मन वक ने सारी कथा-ध्यान पूर्वक सुनी और उपरोक्त दोनों व्यक्तियों को कब्जा देते हुए अपने फैसले में यह भी लिखा कि इस खान का असली शोधकर्ता और कब्जा करने वाला वह गधा है इसलिये आमदनी के एक बड़े अंश का अधिकारी वह गधा है।


Quotation

मनुष्य की आयु सीमित है और संसार की सभी वस्तुएँ मिटने वाली हैं, पर वे ही जीवित हैं, जो दूसरों के लिये जीते हैं। बाकी सब तो मुर्दे से भी बढ़कर हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

यह स्थान आज वंकर पहाड़ी तथा सुल्ली खान के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी सम्पत्ति अब 43 अरब डालर ने अधिक है। अड़ियल गधा अपने शोध उपहार की आमदनी का एक बड़ा अंश प्राप्त करता रहा।

इस कम्पनी मालिकों ने गधे के नाम की सम्पत्ति को परमार्थ प्रयोजनों के लिये सुरक्षित रखा और वहाँ कितने ही लोकोपयोगी कार्यों की नींव डाली अदृश्य सहायता का ऐसा ही सदुपयोग होना भी चाहिए।


उत्तेजित कामक्रीड़ा से प्राणशक्ति का क्षरण

साधना में ब्रह्मचर्य का विशेष महत्व बताया गया है और उसकी आवश्यकता का स्थान-स्थान पर प्रतिपादन किया गया है। उसका कारण मात्र शरीर की एक धातु के क्षरण से होने वाली नगण्य सी क्षति को बढ़ा-चढ़ा कर तूल देना नहीं वरन् प्राण तत्व भी एक बड़ी मात्रा में सन्निहित रहता है। मुख्य हानि इसी के क्षरण की है।

शरीर शास्त्रियों ने स्वाभाविक और सामान्य काम सेवन में कोई हानि नहीं देखी है वरन् उसे लाभदायक भी बताया है। आंकड़े प्रस्तुत करके यह बताया जाता है कि विवाहितों की अपेक्षा अविवाहित अधिक बीमार पड़ते और अधिक मरते हैं। मानसिक रोगी भी अविवाहित ही ज्यादा होते हैं। फ्राइड आदि मनोविज्ञान वेत्ताओं ने तो काम वासना को जीवन की एक आवश्यक और उपयोगी प्रवृत्ति बताया है और चेतावनी दी है उस पर अनावश्यक रोग बाँध करने से शरीर और मन दोनों को अनेक रोगों का शिकार एवं क्षतिग्रस्त होना पड़ सकता है।

भारतीय योगियों ने भी वीर्यपात में जो शारीरिक तत्व चले जाते हैं उनकी बहुत परवाह नहीं की है क्योंकि रक्त निकल जाने पर प्रकृति द्वारा नये रक्त के रूप में जिस तरह जल्दी ही उसकी पूर्ति कर दी जाती है उसी प्रकार वीर्य की क्षति भी पूरी होती रह सकती है। इसलिये अपने यहाँ स्वप्नदोष में होने वाली हानि को आध्यात्मिक दृष्टि से कोई बहुत बड़ी चिन्ता की बात नहीं बताया गया है। उसे शारीरिक विकार मात्र कहकर चिकित्सा कराने भर का निर्देश देकर बात समाप्त कर दी है।

प्राण वीर्य के साथ घुलने से पूर्व ही ऊर्ध्वगामी होकर मस्तिष्क में चला जाय और वहाँ ओजस् विद्युत के रूप में परिणत होकर स्थूल शरीर के समस्त प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अवयवों को परिपुष्ट करे इसके लिये वज्रोली मुद्रा आदि की साधना बताई गई है। वीर्य से खींचा गया यह स्वत्व या तत्व जिसे ओजस् कहते हैं न केवल स्थूल शरीर को प्रभावित करता है वरन् ‘सूक्ष्म शरीर’ और ‘कारण शरीर’ को भी प्रभावित एवं परिपुष्ट करता है। कामोत्तेजना से रक्त का मंथन होकर रेतस् ग्रन्थियों द्वारा वीर्य का निर्माण, उसका एक नियत थैली में संचय और स्खलन के साथ उसका मूत्रेन्द्रिय द्वारा बाहर निकल जाना, इस मोटी बात को शरीर शास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है। पर यह जानकारी किसी-किसी को ही है कि कामवासना के विचार समस्त शरीर में फैले हुए प्राण तत्व का मंथन करते हैं और सम्भोग के समय वीर्यपात के साथ साथ ही इस प्राण प्रवाह का एक अंश भी बाहर चला जाता है। फलतः इससे व्यक्ति क्रमशः दुर्बल होता जाता है। शारीरिक दृष्टि से उतना नहीं जितना कि मानसिक दृष्टि से।

इसलिये ब्रह्मचर्य का जहाँ भी आध्यात्मिक चर्चा के संदर्भ में जिक्र आये वहाँ प्राण के प्रवाह को नष्ट न होने देने की चिन्ता को ही प्रधान कारण माना जाना चाहिये। मन से कामवासना के विचार एवं उत्तेजना को हटाकर उस कृत्य को विशुद्ध धर्म भावना से करने के लिये अपने यहाँ गर्भाधान को एक दिव्य संस्कार मात्र माना गया है। इस मनोदशा में विकारी हलचलें मन में न रहने से वह प्रयोजन प्राण को नष्ट नहीं करता वरन् मात्र संतानोत्पादन अथवा शारीरिक प्रयोजन पूरे करता है। मनोविकारों से रहित कामसेवन से ब्रह्मचर्य की मूल आवश्यकता को विशेष क्षति नहीं पहुँचती। इसके विपरीत यदि शारीरिक ब्रह्मचर्य तो निभाया जाय पर मानसिक अभिलाषा और आकाँक्षा उद्दीप्त रहे तो उसे लगभग कामसेवन जितनी ही क्षति पहुँचती रहेगी।

प्राण तत्व की उत्तेजना कामवासना से जुड़ी हुई है। वासना प्रदीप्त हुई कि प्राण भड़के और उफना हुआ दूध जिस प्रकार कड़ाही से निकल कर इधर-उधर बिखर जाता है उसी प्रकार वासना की उद्दीप्तता प्राण का हरण और क्षरण निरन्तर करती रहती है। ऐसे अविवाहित जिनके मस्तिष्क निरंतर विकार ग्रस्त रहते हैं यदि शरीर शास्त्रियों के अनुसार विवाहितों की अपेक्षा अधिक मरते और अधिक अस्वस्थ रहते हों तो आश्चर्य की बात नहीं। इसी स्तर के लोगों को यदि फ्राइड आदि मनोवैज्ञानिकों ने काम प्रवृत्ति की उद्दीप्तता को रोकने के खतरे बताये हों तो उसे भी अनुचित नहीं कहा जा सकता इसका अर्थ यह न समझा जाय कि विकारों को भड़कने देने से पूर्व रोकने को किसी ने मना किया है।

साधु जीवन और सौम्य सरल मनोवृत्ति की भला कौन निन्दा करेगा। पवित्र दृष्टि रखने की महत्ता से कौन इनकार करेगा? नारी के प्रति पवित्र और श्रद्धा भरी-माता भगिनी और पुत्री की भावनाएं रखकर उनके बारे में उक्त भावना रखकर विचार करने की विधि मालूम होने से नारियों के संपर्क में रहने से भी कुछ बिगड़ता नहीं, इसके विपरीत वन जंगलों में एकाकी रहने और एकान्त सेवन करने पर भी यदि मन में वासनात्मक विचारों की प्रचण्डता रहती हो तो कहा जाना चाहिए कि वहाँ भी व्यभिचार ही चल रहा है।

नारी स्वयं बुरी नहीं है उसका वासनात्मक पक्ष ही बुरा है। जब कामिनी, रमणी और रूपसी के रूप में दुर्बुद्धिपूर्वक उसे देखा जाता है तब सर्पिणी, डाकिनी बनती है अन्यथा वह पवित्रता और शक्ति की प्रत्यक्ष देवी है उसका सान्निध्य एवं चिन्तन उत्कर्ष का ही कारण बनता है। भारतीय धर्म में देवियों की प्रतिमाएं युवा और अति सुन्दर नारियों के रूप में ही बनाई गई हैं। लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, गायत्री, सावित्री आदि की मूर्तियाँ, तस्वीरें जहाँ कहीं भी मिलेगी अति सुन्दर और सुसज्जित युवती के कलेवर में ही विनिर्मित हुई होंगी। उनके अंगों में उभार ही रखे गये हैं। इसलिये कि साधक नारी के इस स्तर के रूप में श्रद्धा और पवित्रता का समुचित समावेश कर सके।

प्राचीन काल के लगभग सभी ऋषि अपने वन्य आश्रमों में पत्नियों समेत रहते थे। उनमें से प्रायः सभी की संतानें थी। फिर भी उनका ब्रह्मचर्य दो कारणों से अक्षुण्य था- एक यह कि उनने कामुकता के लिये मनः क्षेत्र में स्थान नहीं दिया। दूसरे जब समागम की आवश्यकता अनुभव हुई तब उस क्षरण को केवल शरीरगत धातुओं की क्षति तक ही सीमित रखा और प्राण को उसमें से विलग करके रोक लिया। यह वज्रोली मुद्रा द्वारा सम्भव है।

दूध में से मक्खन निकाल कर-बिना क्रीम के दूध में कुछ अधिक शक्ति नहीं रह जाती। इसी प्रकार प्राण को विलग करके रोक लेने के बाद समागम, मात्र एक इन्द्रिय विनोद अथवा सन्तानोत्पादन प्रयोजन मात्र की भौतिक आवश्यकता पूर्ण करने मात्र की एक सामान्य वस्तु रह जाती है इस प्रकार गृहस्थ योगी के लिये भी तात्विक ब्रह्मचर्य का पालन कर सकना सम्भव हो सकता है। इसके विपरीत जिसे वह प्राण पृथक्करण की विद्या नहीं आती और मन में कामुकता की कल्पनाएं भरे रहता है उस विरक्त को भी सामान्य लम्पट गृहस्थों जैसी ही क्षति उठानी पड़ती रहती है।

प्राण का सम्बन्ध भावनात्मक उफान से है। मैथुन के समय यदि उस प्रक्रिया में अति रस लिया जाय, रसिकता का उत्तेजक वातावरण बनाया जाय तो उससे प्राण उत्तेजित होगा और प्राण प्रत्यावर्तन भी। सुयोग्य संतानोत्पादन के अतिरिक्त अथवा साथी के साथ प्राण शक्ति का समन्वय संतुलन करने के लिये ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि क्रीड़ा कौतुक में रुचि ही हो तो उसे अन्यमनस्क होकर अपेक्षा पूर्वक शरीर क्रिया तक ही सीमित रखना चाहिये। तन्मयता का उसमें समावेश न किया जाय। वेश्याएं इसी उपेक्षा वृत्ति को अपनाये रहकर अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर पाती हैं।

काम-क्रीड़ा का संस्कार मन पर न पड़े तभी यह सम्भव है कि उसे और बार-बार अभिरुचि का आकर्षण प्रोत्साहन रुक सके। गृहस्थों को ब्रह्मचर्य की रक्षा की दृष्टि से प्राण शक्ति की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जब संयोग आवश्यक प्रतीत हो तो उसे उदासीन अन्यमनस्क वृति से शरीर क्रिया तक ही सीमित कर लेना चाहिए। मन पर उसका गहरा प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहिए। इस प्रकार आँशिक ब्रह्मचर्य गृहस्थ में भी रखा जा सकता है और महत्वपूर्ण प्राण शक्ति के अनावश्यक क्षरण से बचा जा सकता है।


विवाह की सफलता-सघन आत्मीयता पर निर्भर है।

प्रजनन प्रक्रिया में जो आवेश, उद्वेग है, नर-नारी के बीच जो आकर्षण है, वह प्रकृति ने इस प्रयोजन के लिए सँजोया है कि उस आधार पर दो व्यक्तित्वों के मिलन की भावनात्मक एवं रासायनिक क्रिया, इस जगत के लिए कुछ उपयुक्त अनुदान प्रस्तुत करती रहे।

दो वस्तुओं के मिश्रण से तीसरी वस्तु बनाने की रासायनिक प्रक्रिया से हर कोई परिचित है। औषधि शास्त्री जानते हैं कि यदि अमुक वनस्पतियों, धातुओं अथवा क्षारों का अलग-अलग सेवन किया जाय तो उससे सामान्य परिणाम ही रहेगा पर यदि उन्हें मिला दिया जाय तो इस मिश्रण से एक नई वस्तु नई प्रक्रिया उत्पन्न होगी। रसायन शास्त्र इस रीति-नीति को खोजता रहता है और उपलब्ध ज्ञान के आधार पर नित नये आविष्कार करता रहता है।

यही मिश्रण सृष्टि निर्माण क्रम में चलता रहने से रंग-बिरंगे और विविध प्रतिभाओं से सुसम्पन्न फूल और तरह-तरह के स्वाद वाले फल उत्पन्न होते हैं। नर-नारी के बीच ऐसे अदभ्य घुलनशील तत्व हैं कि यदि वे गहन स्तर तक परस्पर मिल सकें तो एक नया व्यक्तित्व उत्पन्न होता है और उसके प्रभाव से दोनों अपना पुराना स्तर खोकर नये स्तर के बने जाते हैं। कुमारी अवस्था में लड़की जिस स्तर की थी उसमें विवाह के बाद काया कल्प जैसा परिवर्तन होता है और किशोर लड़के विवाह से पूर्व जिस प्रकृति के थे विवाह के बाद वे इतने बदल जाते हैं कि केवल आकृति ही पुरानी रह जाती है। प्रकृति में जमीन आसमान जैसा अन्तर उपस्थित होता है। पर यह होगा तभी वे दोनों भाव गह्वर में गहराई तक उत्तर कर एक दूसरे में घुल जाने की स्थिति प्राप्त कर लें। शारीरिक संयोग बहुत उथला है। वह नाई की दुकान पर हजामत बनवा लेने या तेल मालिश करा लेने, दाद-खुजाने जैसी नगण्य और तुच्छ क्रिया है, वह भी विवाह का एक प्रयोजन है, पर उतने भर से व्यक्तियों का मिलन या घुलन पूरा नहीं होता, उसके लिए ममता, आत्मीयता, भावुकता, वफादारी और आत्मसमर्पण के भाव गहन स्तर पर उत्तर कर एकत्व में परिणत होने चाहिए।

व्यक्तित्व के घुलन का अर्थ है इतनी भावनात्मकता जिसमें शरीरों की भिन्नता का आभास ही नष्ट हो जाय। एक प्राण दो शरीर का आभास होने लगे इतनी सघनता के प्रतिफल दो होते हैं- एक प्रखर एक अभिनव व्यक्तित्व का ऐसा नव निर्माण जिसकी आभा से दोनों शरीर समान रूप से जगमगा उठें। दूसरा प्रतिफल होता है सन्तान की ऐसी उपलब्धि जो अगणित प्रतिभाओं और विशेषताओं से सम्पन्न हो। विवाह का मूल प्रयोजन यही है। नर-नारी के बीच स्वाभाविक आकर्षण का कारण यही है। रतिक्रिया में जिस आनन्द, आवेश का समावेश है उसका कारण भी यही है। प्रकृति चाहती है उसकी दुनिया में जीवधारियों का वंश ही न बना रहे वरन् उनका स्तर भी विकसित होता रहे, भावनात्मक सघनता का सम्मिश्रण, व्यक्तित्वों का स्तर विकसित करता है और पीड़ियों में विशेषता भरता है उच्चकोटि के गुण से सम्पन्न सन्तति का जन्म होता है। दो भिन्न लिंगी प्राणियों की अपूर्णताओं का समाधान करे एक दूसरे के पूरक बनते हुए पूर्णता को प्राप्त करें यही दाम्पत्य जीवन का मूलभूत प्रयोजन है।

जहाँ पति-पत्नी की प्रकृति मिल जाती है और दोनों में परस्पर सघन सहयोग होता है वहाँ इच्छित सन्तान का होना सुनिश्चित है।

कोर्ट फील्ड (इंग्लैंड) के कर्नल जान फ्रान्सिसवान की पत्नी लुईस एलिजाबेथ अत्यन्त धार्मिक प्रकृति की विदुषी महिला थी। पति भी उनके ठीक उसी प्रकृति के थे। दोनों दूध पानी की तरह एक थे। सन्तान के सम्बन्ध में दोनों की इच्छायें भी एक सी थीं। पति को जब अवसर मिलता गिरजा जाते पर पत्नी तो बहुत ही भक्ति भाव सम्पन्न थीं वे घण्टों उपासना करती थीं और यह प्रार्थना करती थीं कि उनकी सभी सन्तानें धर्म की सेवा में ही अपने जीवन का उत्सर्ग करें। उनकी यह मनोकामना पूर्णतः सफलीभूत हुई। लुईस के 8 लड़के 5 लड़कियाँ थीं। वे सभी धर्मसेवी बने, अविवाहित रहे और सारा जीवन ईसाई मिशन के लिए दान कर दिया। पादरी और ननों के रूप में पवित्र जीवन बिताने वाले पवित्र माता के इन पवित्र बच्चों की चर्चा पाश्चात्य जगत में शताब्दियों तक चर्चा का विषय रही है।

दो व्यक्तित्वों के मिलन की जादूगरी रासायनिक प्रक्रिया भावनात्मक प्रक्रिया उत्पन्न करने की असाधारण उपलब्धि के लिए पति-पत्नी के बीच सघन प्यार और विश्वास होना चाहिए। उसमें आशंकाओं और तुनकमिज़ाजी के लिए कोई स्थान नहीं। जब साथी के गुण ही गुण दिखाई पड़ें - और भूल, अपेक्षा अथवा विनोद, उपहास की वस्तु बन जाय उसके कारण मनोमालिन्य उत्पन्न होने की सम्भावना ही न हो तब समझना चाहिए कि सच्चे मन से समर्पण या घुलने की बात पूरी हुई। आशंकाओं, सन्देहों, अविश्वासों, छिद्रान्वेषणों के बीच सघनता फलती-फूलती नहीं उसे विश्वास और ममत्व का उन्मुक्त आकाश चाहिए।

जर्मनी का प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ लेखक और कवि कार्ल्स हम्बोर अपनी पत्नी को अत्यधिक प्यार करता था। पत्नी का नाम था-कैटोलिन वान। पत्नी यों गुणवती और सुयोग्य भी थी पर पति के प्यार ने उसकी दृष्टि में उसे मानवी नहीं देवी बना लिया था। वह उसके सम्बन्ध में प्रायः प्रतिदिन 100 पंक्तियों की कविता लिखता था। 38 वर्ष की उम्र में उसने यह विवाह किया था। पत्नी अधिक दिन जीवित न रही। पर उसने दूसरा विवाह नहीं किया और सौ पंक्तियों की कविता करने का क्रम उसने विधुर होने के बाद भी जारी रखा। जब तक वह इस श्रद्धाँजलि का उसकी कब्र पर चढ़ा नहीं देता था तब तक वह सोता नहीं था।

यदि इतनी सघनता न हो तो दोनों में से जिसका व्यक्तित्व अधिक प्रतिभा सम्पन्न और जबरदस्त होता है उसी की छाप सन्तान पर पड़ती है। इसलिए सन्तान का स्तर उसी दिशा में विकसित होता है। हलके स्तर का सरल व्यक्तित्व अपनी कोमलता के कारण दब जाता है। ऐसे गृहस्थ तो चलता रह सकता है पर एक पक्षीय प्रयत्न एक हाथ से ताली बजाने की तरह अपूर्ण ही रहता है।

फ्रान्स के एक पादरी यह सिद्ध करना चाहते थे कि यदि एक पक्ष सज्जन है तो दूसरे को अपने में ढाल सकता है। यह बात तभी हो सकती है जब दूसरा पक्ष जैसा भी कुछ है अपना पूर्ण समर्पण कर दे। यदि दोनों व्यक्तित्व अपनी अहंता अलग-अलग बनाये रहें तो उनमें जो जबरदस्त होगा उसी की विजय होगी। पर सज्जन पादरी एकाँगी बात सोचते थे वे पुरुष की सज्जनता के महत्व को ही सब कुछ मानते थे। उसने अपनी बात सही सिद्ध करने के लिए विपरीत गुण, स्वभाव वाली पत्नी से विवाह करके सुयोग्य सन्तान की बात सिद्ध करने का प्रयत्न किया, पर वे सफल न हो सके।

यह क्लारमान्ट (फ्रान्स) के पादरी क्रेटीन यह दावा करते थे कि वंश परम्परा से अपराधों का कोई सम्बन्ध नहीं है। मनुष्य का भला या बुरा होना शिक्षा, संस्कार तथा वातावरण पर निर्भर है। वंशानुक्रम की अद्भुत विशेषताओं पर बल देने वाले वैज्ञानिकों को चुनौती देने के लिए उन्होंने गृहस्थ जीवन स्वीकार किया और एक अपराधी वंश की लड़की से विवाह कर लिया। उसका बाप पड़ौसी के घर में ईर्ष्यावश आग लगाने के अपराध में जेल काट चुका था। विवाह के बाद संतानें भी हुई उनकी शिक्षा-दीक्षा पर भी यथासम्भव ध्यान दिया गया किन्तु वंश परम्परा का प्रभाव सन्तान पर समयानुसार उभरता ही गया और वे कई पीड़ियों तक आगे भी अपराध ही करते रहे।

क्रेटीन के तीन लड़के हुल पियरी-टामस और वैयातिस, तीनों ही समयानुसार अपराध प्रकृति के बने और डाकेजनी, हत्या जैसे अपराधों में समय-समय पर वे तीनों ही फाँसी पर चढ़ा दिये गये।

पियरी फाँसी पर चढ़ने से पूर्व अपनी एकमात्र संतान छोड़ गया था- जीन फ्रांसिस- बड़ा होने पर वह भी एक डकैती में पकड़ा गया और बाप की तरह वह भी मौत के घाट उतार दिया गया।

टामस के दो लड़के थे-मार्टिन तथा जान फ्रांसिस यह दोनों भी तलवार के घाट उतारे गये।

मार्टिन का बेटा भी अपराधी प्रवृत्तियों में व्यस्त रहा और केने फ्रान्स की जेल में सड़-सड़ कर मरा।

पादरी के तीसरे लड़के की सन्तान का भी यही हाल हुआ। वैयातिस का एक मात्र लड़का भी अपनी पत्नी के साथ आजीवन कैद की सजा भुगतते-भुगतते जेल में ही मरा। जेल जाने से पूर्व वे सात बच्चे उत्पन्न कर चुके थे वे भी जब बड़े हुए तो अपराधों का ही धन्धा अपनाया और उन सब ने भी अपने बाप दादों की परम्परा निबाही और जेल काटते-फाँसी खाते समाप्त हुए।

कइयों का वंश परम्परा की रक्षा और रक्त शुद्धि पर बहुत ध्यान रहा है। उनका कहना यह रहा है कि अपना रक्त अपने रक्त में घुलकर ही शुद्ध रह सकता है। दूसरी जाति या स्वभाव के लोगों के साथ रक्त का सम्मिश्रण नहीं होना चाहिए। इससे रक्त दूषित होता है और अवाँछनीय सन्तान उत्पन्न होती है। अभी भी रोटी बेटी को वंश कुल की मर्यादाओं में सीमित रखने की बात यही सोचकर की जाती है। इस सम्बन्ध में मिश्र में तो अति ही बरती गई। वहाँ के शासक सोचते थे कि राजवंश का रक्त अत्यन्त पवित्र है। उसे दूसरे रक्त के साथ घुलकर अपनी विशेषता नहीं खोनी चाहिए इसलिए विवाह शादी अपने घर परिवार में ही नहीं, सगे बहिन भाइयों में ही सीमित रखी जाय। यह प्रयोग किया तो बहुत दिन गया, पर सफल नहीं हुआ।

मिश्र के टाल्मी राजवंश में प्राचीन काल में भाई-बहिन की शादी का प्रचलन था। वह वंश अपने को दैवी शक्तियों से उत्पन्न मानता था और दूसरे लोगों के साधारण रक्त के साथ अपना रक्त नहीं मिलाना चाहता था। रक्त शुद्धि की दृष्टि से उन लोगों ने यह प्रथा चलाई और वह बहुत समय तक चलती भी रही। इतिहासकारों के अनुसार यह क्रम तेरह पीड़ियों तक चला और वह तब बन्द हुआ जबकि एक बार सब लड़के ही लड़के पैदा हो गये और बाहरी लड़की लिये बिना वंश डूबने का ही खतरा पैदा हो गया।

मिश्र के दूसरे उच्च समझे जाने वाले घरानों में भी राजवंश की देखा-देखी यह प्रथा चल पड़ी थी। मिश्र की अति सुन्दर साम्राज्ञी ‘क्लियोपात्रा’ अपने रूप लावण्य के लिए प्रख्यात थी उसने अपने विनोद कौतुक की तृप्ति के लिये एक-एक करके दोनों सगे भाइयों से विवाह किया और पसन्दगी से उतर जाने पर दोनों को मरवा भी डाला।

टैक्सास के गवर्नर हेनरी स्मिथ ने एक-एक करके अपनी तीनों सगी बहिनों से खुद ही विवाह किया था लोग जब उसकी निन्दा करते थे तो वह यही कहता- नर-नारी की घनिष्ठता को आवश्यकतानुसार प्रणय से बदलना प्रकृति के कानून में दोषयुक्त नहीं- मनुष्य समाज ने भले ही उस पर बन्धन लगाये हों।

मूल प्रश्न रक्त शुद्धि का नहीं व्यक्तियों की घुलनशीलता का है। इसके लिये एक पक्ष का प्रयास सफल नहीं हो सकता, इसमें दोनों को ही पिघलना पड़ता है और यह प्रयत्न करना पड़ता है कि घनिष्ठ एकता को हर कीमत पर बनाये रहा जाय। यदि ऐसा न हुआ तो फिर जो पक्ष अधिक सबल होगा दूसरे पर छा जाने का प्रयत्न करेगा। यहाँ समर्थता का अर्थात् शारीरिक या बौद्धिकता, सबलता से नहीं वरन् भावनात्मक प्रचण्डता से है। यदि किसी में घृणा या प्रतिहिंसा की भावना तीव्र है तो उसी की तीव्रता रहेगी। सीधा सरल स्वभाव उसके भावनात्मक दबाव से अपना प्रभाव खो बैठेगा। भले ही वह शारीरिक या बौद्धिक दृष्टि से बलिष्ठ या विकसित ही क्यों न दिखाई पड़े।

बर्लिन (जर्मनी) की एक महिला इमगार्डव्रन्स ने पाँच बार विवाह किये। उनमें से प्रत्येक को क्रमशः आत्महत्या करके ही अपने जीवन का अन्त करना पड़ा। उसकी भावात्मक प्रचण्डता इतनी तीव्र थी कि पति उसके शिकार होकर अपना सन्तुलन खोते चले गये।

कई बार कई व्यक्तियों को यह सनक सवार रही है कि चूँकि पुरुष पक्ष बहुत स्वस्थ, सुयोग्य एवं समर्थ है इसलिये उसे बहुत विवाह करने चाहिए और बहुत बच्चे पैदा करने चाहिए ताकि वे उसी के जैसे गुण वाले हों, और उनका नाम या वंश अधिक ख्याति प्राप्त करे। यह प्रयोग अनेक जगह हुए हैं पर उससे संख्या मात्र बढ़ी। पति-पत्नी में सघन विश्वास का वातावरण न बना, प्रेम और सौहार्द्र भी पैदा न हुआ, फलस्वरूप सन्तान संख्या वृद्धि की बात तो सहज थी सो पूरी हो गई पर पिता के गुण ही सब सन्तान में होंगे यह प्रयोजन पूरा न हुआ। घृणा और अविश्वास के वातावरण में चलने वाले दाम्पत्य जीवन किसी प्रकार गाड़ी धकेलते तो रहते हैं पर उनको जो शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं वंश परम्परागत लाभ मिलना चाहिए वह बिल्कुल भी नहीं मिलता।

मोरक्को का एक नगर है। यहाँ के सभी निवासी अपने को राजकुमार कहते हैं। इस नगर का संस्थापक था मुलाई इस्माइल नामक एक मुसलमान राजा। उसने कितने ही युद्ध किये और गुलाम पकड़े। पकड़े गये पुरुषों को उसने शहर की इमारतें बनाने में लगाया और स्त्रियों को बच्चे उत्पन्न करने में लगाया। इन दो शौकों को पूरा करने के लिए ही वह युद्ध लड़ता और आक्रमण करता था। उसकी मृत्यु समय तक जीवित और समर्थ बच्चों की संख्या 888 हो गई थी और गुलाम इतना बड़ा नगर बना चुके थे जिनमें इन सब बच्चों के स्वतन्त्र परिवार रह सकें इस कार्य में उसे बीस वर्ष लगे। उसकी छोड़ी हुई इन 888 सन्तानों के वंश वृद्धि से ही यह पूरा नगर बसा है। अस्तु वे सभी राजा के वंशज होने के कारण अपने को राजकुमार या राजकुमारी कहते हैं।

हाँ कई पत्नियाँ होते हुए भी उनके बीच स्नेह सौहार्द्र, विश्वास और प्रेम का वातावरण बना रहे तो उस विषमता के बीच भी सन्तुलन बना रह सकता है और सामूहिकता के साथ सौजन्य का एकत्रीकरण भी सफल हो सकता है।

हंगरी के प्रसिद्ध वायलिन वादक रैक्ज पाली-अपनी कई पत्नियों द्वारा उत्पन्न तथा गोद लिये हुए 49 बच्चों के पिता थे। उन्हें अपनी वायलिन वादन कला की ही तरह बालकों के समूह में खेलने में भी आनन्द आता है। उनने अपनी इन दोनों अभिरुचियों को परस्पर मिला कर रखा। सभी बच्चों को वायलिन वादन सिखाया और उनमें से एक को छोड़कर शेष सभी अपने पिता की तरह वायलिन कलाविदों के रूप में प्रख्यात हुए।

भारत में बहुपत्नी प्रथा कभी थी। इनमें श्रीकृष्ण भगवान को भी सम्मिलित बताया जाता है। पर यह प्रयोग सफल तभी हो सकता है जब इस सारे समूह का स्तर बहुत ही उच्च कोटि का हो, अन्यथा ईर्ष्या-द्वेष की आग जब एक पत्नी एक पति वाली स्थिति में नरक उत्पन्न कर देती है तब बहुपत्नी या बहुपति वाली स्थिति घटिया स्तर से तो सर्वनाश ही प्रस्तुत करेगी।

विवाह का उद्देश्य यदि संख्या वृद्धि करने वाला पशु प्रजनन हो तो बात दूसरी है अन्यथा व्यक्तित्वों में प्रखर प्रत्यावर्तन उत्पन्न करना और प्रतिभाशाली सन्तान प्राप्त होना तभी सम्भव है जब नर-नारी के बीच अत्यन्त गहरे एवं सघन स्तर की आत्मीयता स्थापित हो सके। ऐसे ही विवाह सच्चे अर्थों में विवाह हैं अन्यथा उन्हें एक मजबूरी का निर्वाह मात्र ही कहा जा सकता है।


सज्जनता बुराई को सज्जनता से खत्म कर देती है (Kahani)

एक सज्जन सेठ जमुना लाल बजाज के घोर विरोधी थे और बात-बात में उनकी कटु निन्दा किया करते थे।

एक दिन वे उदास ओर खिन्न बैठे हुए थे। जमनालाल उधर से निकले, गाड़ी रोककर कुशल समाचार पूछा और उदासी का कारण भी।

उनने अपने मन की बात कह दी। जमनालाल की निन्दा, आलोचना में एक पुस्तक उनने लिखी थी। छपाने में 500) लगते थे। उतना प्रबन्ध न हो पाने से वे दुःखी थे।

कारण जानकर जमनालाल जी ने जेब से निकाल कर उनके हाथ में 500) थमा दिये और कहा-इतनी छोटी बात के लिए आपको इतना खिन्न नहीं होना चाहिए?

आलोचक महोदय पानी-पानी हो गये।


आहार हमें मनस्वी और आत्मशक्ति सम्पन्न भी बना सकता है।

रसायन शास्त्री मानव शरीर को एक रासायनिक पिंड मानते हैं। मुख की लार से लेकर, पाचन संस्थान में स्रवित होने वाले रसों और हारमोनों तक विधि स्राव रासायनिक प्रक्रिया ही उत्पन्न करते हैं। स्नायु संस्थान, तन्त्रिका जाल और कोशिका समूह में जहाँ विद्युत धाराएं अपना काम करती हैं वहाँ रासायनिक प्रक्रियाएं भी चलती रहती हैं। अन्न को रक्त के रूप में और रक्त को माँस मज्जा के रूप में बदलने का काम यही रासायनिक पद्धति करती है जिसके आधार पर जीवन-क्रम के अन्यान्य सारे क्रिया-कलाप निर्भर हैं। श्वास के माध्यम से ऑक्सीजन का शरीर में प्रवेश रक्त में उसका घुलना और ऊर्जा उत्पन्न करना इसे रासायनिक प्रक्रिया के अतिरिक्त और क्या कहें।

औषधि शास्त्र मनुष्य की रुग्णता और बलिष्ठता के पीछे रासायनिक हलचलों का कारण ही मानता है। मल परीक्षा, मूत्र परीक्षा, रक्त परीक्षा आदि में यही तो देखा जाता है कि भीतर कौन सा रसायन घट या बढ़ रहा है। औषधियाँ क्या हैं? विशुद्ध रूप से रसायन हैं जो पदार्थ भीतर कम पड़ रहा है या बढ़ रहा है उसे सन्तुलित करने के लिये ही तो विभिन्न प्रकार के खनिज, क्षार, विटामिन, प्रोटीन आदि शरीर में पहुँचाये जाते हैं। ईंट, चूने से बने मकान की टूट-फूट भी तो आखिर ईंट चूने से ही सुधारी जाती है। फिर शरीर में आई अव्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिये रसायनों के अतिरिक्त और क्या माध्यम हो सकता है। इसी मान्यता पर समस्त औषधि शास्त्र का निर्माण हुआ है।

अध्यात्म शास्त्री भी मानवी चेतना को परिष्कृत करने के लिये रसायनों का प्रयोग करता है। उसकी मान्यता है कि वस्तुओं में स्थूल, सूक्ष्म और कारण यह तीन शक्तियाँ होती हैं। अन्न का स्थूल स्वरूप रक्त माँस बनता है। उसके सूक्ष्म रूप से मस्तिष्क एवं विचार बनते हैं और कारण रूप भावनाओं को विनिर्मित करता है यदि सड़ा, बुसा, विषाक्त अन्न होगा तो उससे पोषण तो दूर उलटे रोग उत्पन्न होंगे।

यदि दुष्प्रवृत्तियों के साथ कमाया हुआ और दुष्ट मनुष्यों के हाथों बना, परोसा अन्न होगा तो उससे मस्तिष्क में दुर्बुद्धि उत्पन्न होगी। इसी प्रकार यदि उसे प्रसाद भावना से पकाया और औषधि भावना से खाया न गया होगा; बनाने और खिलाने की स्नेहसिक्त सद्भावनाओं का समन्वय न होगा तो उससे खाने वाले का अन्तःकरण विकसित न होगा-उसकी भावनाओं में उच्च स्तरीय उभार न आयेगा। आहार केवल स्थूल दृष्टि से ही पौष्टिक एवं स्वल्प न होना चाहिये वरन् उसके पीछे न्यायानुकूल उपार्जन और सद्भावनाओं के समन्वय का भी तारतम्य जुड़ा रहना चाहिये तभी वह अन्न मनुष्य के तीनों आवरणों का समुचित पोषण कर सकेगा और तभी उसे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वांगीण विकास का अवसर प्राप्त होगा।

आहार के साथ जुड़े हुए कुछ तत्व शरीर भूमिका से आगे बढ़कर मनः क्षेत्र को प्रभावित करते हैं इसका प्रमाण वे वस्तुएं देती है जिन्हें नशीली कहते हैं। नशा, पदार्थ का सूक्ष्म गुण है। वह रक्त माँस पर तो प्रभाव डालता ही है साथ ही मस्तिष्क को-मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को भी प्रभावित करता है। नशे का प्रभाव होते ही मनुष्य का मस्तिष्क बेकाबू हो जाता है और वह कुछ का कुछ सोचने, देखने, समझने लगता है। इतना ही नहीं-धीरे-धीरे उस नशेबाजी का प्रभाव सेवनकर्ता के गुण, कर्म, स्वभाव पर पड़ता चला जाता है उसका चरित्र, दृष्टिकोण, स्वभाव आदि का स्तर निरंतर गिरता चला जाता है। यह तथ्य बताते हैं कि आहार का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं है यह केवल भूख बुझाने, स्वाद देने और रक्त माँस बनाने की स्थूल शारीरिक क्रिया तक सीमित नहीं रहता वरन् उसके सूक्ष्म प्रभाव मस्तिष्क को ही नहीं अन्तःकरण को भी प्रभावित करते हैं।

आत्म विद्या के ज्ञाता सदा से यह कहते आये हैं कि आत्मोन्नति की साधना तक प्रक्रिया में आहर शुद्धि का अति महत्वपूर्ण स्थान है। यदि उस ओर ध्यान नहीं दिया जाय और प्राणायाम, प्रत्याहार, नेति, धोति आदि आगे के क्रिया-कलापों में उलझा जाय तो वह समय पूर्व की बात होगी। अक्षर ज्ञान सीखे बिना किसी बच्चे को ज्यामिति के कठिन प्रश्न हल करने को कहा जाय तो यह अनुपयुक्त ही होगा। आहार में मस्तिष्क और भाव स्तर को सात्विकता की दिशा में अग्रगामी बना सकने वाले तत्वों से संयुक्त न बनाया जा सके तो भूखे पेट फुटबाल खेलने जैसा उपहासास्पद होगा। आत्मिक प्रगति के लिये आहार शुद्धि पर पूरा-पूरा ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

आहार के रासायनिक तत्वों का विश्लेषण बहुत पहले से होता रहा है। खाद्य पदार्थों में कौन तत्व कितनी मात्रा में होना चाहिये यह तालिकाएं स्वास्थ्य विभाग की ओर से मुद्दतों से दी जाती रही हैं। जहाँ तक माँसल शरीर का संबंध है वहाँ तक वे उपयुक्त भी हैं। पर मनुष्य केवल माँस पिण्ड ही तो नहीं है। उसमें बौद्धिक और भाव चेतनाएं भी मिलती हैं। उनके सुपोषण का समावेश भी आहार में होना चाहिए।

नशीले पदार्थों के बारे में कुछ दिन पूर्व तक उसका गुण, खुमारी, मस्ती जितना सीमित माना गया था और इसीलिये लोग उसे थकान मिटाने, गम गलत करने के नाम पर पीते थे। भाँग, गाँजा, चरस, अफीम, शराब जैसे नशीले पदार्थ इसी प्रयोजन के लिये पिये जाते थे। पर अब उनमें अन्य अनेक विशेषताएं, नवीनताएं पाई गई हैं कि वे ऐसी अनुभूतियाँ कराते हैं जो सामान्य चिन्तन से बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती हैं। कुछ रसायन ऐसे हैं जो मस्तिष्कीय कणों को वर्तमान परिस्थिति एवं उपस्थिति से सर्वथा भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ सामने उपस्थित करते हैं। मस्तिष्कीय कणों की चिन्तनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का सम्बन्ध भी नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से तारतम्य तो मिलते रहते थे, पर इन अभी नये प्रकाश में आये पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट गया और आँखें वह देखने लगीं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न था।

मैक्सिको के आदिवासी ‘पेयोटे’ पौधे का एक मादक रस बनाकर पीते रहे हैं। इस पौधे से हैवलाक एलिस और ई॰ हक्सले के प्रयत्न से एक नया रसायन बना-मैस्कालिन। इसका नशा पिया तो इन दोनों वैज्ञानिकों ने अत्यंत अद्भुत प्रकार की अनुभूतियाँ पाई। एलिस ने लिखा है मैंने देखा अत्यन्त सुन्दर हीरे जवाहरात खेतों में बिखरे पड़े हैं वे देखते-देखते पौधे की तरह उगे, और फूलों से लद गये। वे फूल रंग बिरंगी तितलियों के रूप में बदलने और आकाश में उड़ने लगे। चमकीले हीरों का फूल और तितलियों के रूप में आकाश में उड़ना मुझे अत्यन्त प्रिय लगा एलिस के साथी हकसले ने लिखा है-’ईसा के अवतरण’ आदम द्वारा सृष्टि सृजन काल जैसी दिव्य परिस्थितियाँ मैंने अनुभव कीं और किसी युग एवं वातावरण में अपने को पाया जो पवित्र सौंदर्य (ग्रेस) से ओत प्रोत था। मैंने अपने को किसी दिव्यलोक की दिव्य परिस्थितियों में रहता हुआ अनुभव किया।

मैक्सिको की एक और घटना न्यूयार्क निवासी वैकर आर. गोर्डन वासन ने लिखी है। वह अपनी रूसी पत्नी के साथ आदिवासी क्षेत्र में पहुँचा। उसने वहाँ की सौगात एक चमकीले कुकुरमुत्ते के रूप में चखी। उसे अपनी सराय आलीशान महल, बादशाही सजावट इन्द्र धनुष चित्रकारी, झिलमिलाती हुई दीवारों के रूप में नजर आई। फिर वह सारा महल मोम की तरह पिघल कर एक सुन्दर सरोवर के रूप में बदल गया।

इस विचित्र कुकुरमुत्ते को वासन अपने साथ लाया। इनकी रासायनिक जाँच डॉ. हाफमैन की रसायनशाला में हुई। उससे एक रसायन बनाया गया-सीलो साद्रविन। इसे साइको कैमिकल-मनोवैज्ञानिक औषधि की श्रेणी में सम्मिलित किया गया।

मादक द्रव्य अनुसंधानकर्ता डी. क्विन्सी ने अपनी पुस्तक ‘कन्फेशन्स आफ आपियम ईटर’ नामक पुस्तक में अफीम और उसी जाति के अन्य रसायनों का वर्णन करते हुए लिखा है कि वे सेवन करने वाले को किसी विचित्र लोक में उड़ा ले जाते हैं और ऐसी कल्पनाएं दृश्यमान करते हैं जिनका वास्तविकता से बहुत कम सम्बन्ध होता है। अलग-अलग देशों में यह रसायन थोड़े अन्तर के साथ पाया जाता है। मध्य पूर्व के अरब देशों में ‘हशीश’ ‘कीफ’ (मोरक्को) मेरी होना (अमेरिका) में प्रचलित हैं। उनके नाम तकरीरी-दग्गा-मेकोन्हा आदि भी हैं। इनके रसायनों में अन्तर भी होता है और उनकी पिनक में होने वाली अनुभूतियों के स्तर में भी अन्तर रहता है पर है यह अफीम जाति के ही रसायन।

कुछ ही समय पूर्व एक नया रासायनिक मति परिवर्तन रसायन सामने आया है उसका नाम है-एल.एस. डी. अंग्रेजी दवाऐं बनाने वाली स्विस कम्पनी ‘सेन्डीज’ की प्रयोगशाला में काम करते हुए डॉ. हाफमेन ‘अर्गट’ नामक औषधि पर अन्वेषण कर रहे थे। उनका प्रयत्न उस अर्गट-फफूँदी से रक्त स्राव रोकने की दवा बनाने के लिए चल रहा था। इसके लिये वे उसे ‘लाइसर्जिक ऐसिड’ में बदलने का प्रयास कर रहे थे, पर कुछ ऐसी उलट-पुलट हुई कि उस खोजबीन में एक नया रसायन बन पड़ा- उसका नामकरण हुआ लाइसर्जिक एसिड डाइएविले, याइड इसी को संक्षेप में एल0एस0डी0 कहते हैं। उन्होंने उस रसायन की 20 माइक्रोग्राम जितनी जरा सी मात्रा चखी, बस फिर क्या था वे दिव्यलोकों की सैर करने लगे। उन्हें लगा कि उनकी मृत्यु हो गई, देह सोफे पर पड़ी है, वे आकाश में उड़ रहें हैं और दिव्यलोकों की सैर कर रहे हैं।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान वर्ग की रसायनों पर प्रयोग करते हुए श्रीमती वार्वेरा डनलप को भी एक रसायन की प्रभाव से ऐसे ही विचित्र अनुभव करने का अवसर मिला। उनके सामने नींबू की कटी हुई दो फाँकें पड़ी थीं उनमें उन्हें सोने के पहाड़, चाँदी के पेड़, अंतरिक्ष से उतरते अज्ञात चेहरे, सुरम्य सरोवर, बाँसुरी वादन जैसी मुग्धकारी संगीत लहरे उत्पन्न होती हुई अनुभव हुई।

मस्तिष्क पर पड़ने वाले विभिन्न और विचित्र प्रभावों की ओर उपरोक्त प्रयोग ध्यान, आकर्षित करते हैं और बताते हैं कि मस्तिष्क का स्तर आहार की परिधि से बाहर नहीं। उसे भी प्रभावित किया जा सकता है। केवल स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन से ही नहीं-आहार के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं की दिशा भी बदल सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के आधार पर मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुये दुर्भावना युक्त मनुष्य के अन्तःकरण को छुपाया जा सकता है और उनकी प्रवृत्ति-मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।

कुछ पदार्थ स्वतः ऐसे होते हैं जिनमें स्वतः ही सतोगुणी दिव्य शक्ति रहती है और उनका सेवन क्रियागत रूप से चेतना स्तर में दिव्य प्रवृत्तियों का समावेश करता है उन्हें या अन्य पदार्थों को, किन्हीं मनस्वी व्यक्तियों की चेतना मिश्रित करके उपयोगी बनाया जा सकता है अथवा अपनी संकल्प शक्ति से भी उन्हें आत्मबलवर्धक बनाया जा सकता है। किन्हीं महापुरुषों के हाथ से स्पर्श करके दिये हुये प्रसाद का यही महत्व है। पूजा के समय प्रयुक्त नैवेद्य और जल भी ऐसा ही प्रभाव ग्रहण कर लेते हैं। पंचामृत, तुलसी-पत्र, यज्ञ भस्म जैसे पदार्थों में स्वयं की शक्ति में जब मन्त्र शक्ति का समावेश हो जाता है तो वे आत्मिक विशेषताओं के अभिवर्धन में और भी अधिक योगदान करती हैं। सद्भावना सम्पन्न माता, पत्नी या बहिन के हाथ के बनाये हुए भोजन का महत्व उनकी भावनाओं का समावेश रहने की दृष्टि से है। ब्राह्मण के हाथ का बनाया, परोसा भोजन करने की प्राचीन परिपाटी का आधार भी यही था। भोजन को भगवान का प्रसाद या औषधि श्रद्धा के साथ ग्रहण करने का फल कितना प्रभावी होता है इसे कोई भी व्यक्ति अनुभव करके देख सकता है।

शारीरिक स्वास्थ्य पर वर्गीकृत आहार के वर्गीकृत प्रभाव का विश्लेषण अन्वेषण हो रहा है- सो ठीक पर अगला कदम विज्ञान का यह होना चाहिये कि शरीर से असंख्य गुने महत्वपूर्ण मस्तिष्क और अन्तःकरण को विकसित करने वाले आहार के सूक्ष्म तत्वों का अन्वेषण भी करें। माँस पिण्ड की तुलना में निस्संदेह चेतना स्तर का महत्व अधिक है इसलिये आहार की शरीर सम्बन्धित रासायनिक प्रभाव परिणति के ज्ञान तक ही हमें सीमाबद्ध नहीं रहना चाहिए। मनस्वी और आत्मशक्ति सम्पन्न बनाने वाले आहार स्तर की भी गम्भीर शोध की जानी चाहिये।


ब्राह्मणत्व जन्म से नहीं, कर्म से

ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठता गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर है। जन्म के आधार पर नहीं। उच्च कुल में जन्म लेने मात्र से कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। उसके लिये अभीष्ट ज्ञान एवं कर्म भी होना चाहिये। तभी वह सम्मानास्पद पद प्राप्त करने का अधिकारी होता है। वर्ण व्यवस्था में जन्म को नहीं कर्म को शास्त्रकारों ने प्रधान माना है। उसी का उल्लेख भी है-

न योनिःनापि संस्कारों न श्रुतं न च सन्ततिः।

कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्॥

-महाभारत वन. 313।108

ब्राह्मणत्व न जन्म जाति से, न संस्कार से, न विद्या से प्राप्त होता है। उसका एकमात्र आधार सदाचार है।

पूज्यः श्रोतियको नित्यं सदाचारसमन्वितः।

सद्वृतः कलुषैर्मुक्तस्तीर्थभूतोजनोऽनघः॥

क्षत्रियाणां कुले जातो विश्वामित्रोऽस्ति मत्समः।

वेश्यापुत्रो वसिष्ठश्च अन्ये सिद्धाः द्विजादयः॥

जन्मनाब्रह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विजउच्यते।

विद्ययायातिविप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय लक्षणम्॥

-पद्म पुराण

ब्रह्माजी ने कहा-जो विप्र श्रोत्रिय हो और नित्य ही सदाचार से समन्वित हो, सत् चरित्र वाला हो, समस्त प्रकार के कलुषों से मुक्त जो अनघ विप्र होता है वह तीर्थ स्वरूप हुआ करता है।

विश्वामित्र महर्षि तो क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुये थे किन्तु उनकी तपश्चर्या की क्रिया ऐसी उच्च स्तर की थी कि वह मेरे समान ही जगत्पूज्य एवं वन्दनीय हो गये हैं। वसिष्ठ महामुनि वेश्या से समुत्पन्न पुत्र हैं- और इनके अतिरिक्त अन्य भी द्विज आदि सिद्ध हैं।

ब्राह्मण तो जन्म से होता है अर्थात् ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न होने से ब्राह्मण कहलाता है किन्तु वह द्विज तभी होता है, जबकि उसके समुचित संस्कार किये जाते हैं। जब उसे विद्या प्राप्त होती है तो उसको विप्रत्व का पद मिलता है।

ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये।

त्रैलोक्यं धारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरताश्रयाः॥

-पाराशर स्मृति

जो ब्राह्मण वेद पढ़ते हैं, यज्ञों में निरत हैं, जितेंद्रिय हैं, उन्होंने अपने तप से तीनों लोकों को धारण किया हुआ है।

एतद्देश सूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।

स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥

इस देश में उत्पन्न ब्राह्मणों से संसार के सब मनुष्य अपने-अपने चरित्र आचरण की शिक्षा ग्रहण करें।

ऋजु वश्शुद्ध वर्णाभाः क्षमावन्तो द्विजातया।

स्वधर्म निरता येस्युस्ते द्विजेषु द्विजातया॥

- सूर्य दर्शन सिद्धान्त

असली ब्राह्मण वे हैं जो सच्चे हैं, शुद्ध हैं, क्षमाशील हैं। दयालु और धर्मपरायण हैं।

ब्रह्मयज्ञं तु यजते योगेद्वेदात्मकं सदा।

ब्रह्मणो विपुलं ज्ञानमैर्श्वयं च प्रवर्तते॥

ततः प्रथममैर्श्वयं युँजानेन प्रवर्तितम्।

ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूतानाँ हितं मिच्छता॥

- हरिशवंश पुराण

जो सच्चे ब्राह्मण वेदानुकूल ब्रह्म-यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, उससे उनको विपुल ज्ञान और ऐश्वर्य प्राप्त होता है। उस प्राप्त ऐश्वर्य को स्वार्थ में व्यय न करके परोपकार में लगा देना ब्राह्मण का आवश्यक कर्त्तव्य है।

उपवासब्रतं चैव स्नानं तीर्थ फलं तपः।

द्विजसपादन चैव सम्पन्न तस्य तत्फलम्॥

जो ब्राह्मण अपने कर्तव्य, कर्म में निरत हैं उन्हें अनायास ही व्रत, उपवास, स्नान, तीर्थ, तप का फल मिल जाता है।

जन्मजा ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते।

विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्चयते॥

जन्म में ब्राह्मण जानना चाहिए। संस्कार से द्विज कहलाता है। विद्या से विप्रत्व की प्राप्ति होती है और इन तीनों के मिल जाने से श्रोत्रिय कहलाता है।


कुमारी कन्याओं की आध्यात्मिक गरिमा

साधु और ब्राह्मण की गरिमा इसलिए बताई गई है कि उन्होंने सात्विकता की मात्रा अपने भीतर सर्व-साधारण की अपेक्षा अधिक मात्रा में धारण की होती है। असल से साधु ब्राह्मण की गरिमा किसी वंश या वेश की नहीं वरन् साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा उनके बढ़े हुए सतोगुण की ही है।

यही गरिमा स्वभावतः कन्याओं में होती है। नर की अपेक्षा नारी में सात्विकता की मात्रा अधिक होना सर्वविदित है। वह मात्रा ब्रह्मचारिणी अविवाहित कन्याओं में और भी अधिक होती है। इसलिए कन्याओं को स्वभावतः वह स्थिति प्राप्त है जो ब्राह्मण और साधुओं को बहुत प्रयत्न एवं साधन करने के उपरान्त प्राप्त होता है।

नवरात्रि की साधना के उपरान्त कन्या भोज का प्रचलन है। ब्रह्मभोज के समान ही कन्या भोज है। आज की परिस्थिति में तो कन्या का महत्व ब्राह्मण से भी अधिक है। कारण कि ब्रह्मचर्य पालन, बालसुलभ निर्मलता एवं कन्या तत्व की स्वाभाविक विशेषता के कारण वे आज के नाममात्र के ब्राह्मणों की अपेक्षा कहीं आगे हैं। इसलिए विवेकशील लोग आवश्यकता पड़ने पर ब्राह्मण भोजन की अपेक्षा कन्या भोजन को अधिक उपयुक्त मानते हैं।

साधना विज्ञान में ‘कुमारी’ को भगवती दुर्गा का ही स्वरूप माना गया है और इसी नाम से उसकी प्रतिमा स्थापित करके पूजा विधान बनाया गया है। बाल-गोपाल को भगवान कृष्ण का सर्वोत्तम प्रतीक माना जाता है। युवावस्था के उभार उतने सात्विक नहीं रहते जितने बालकपन के होते हैं। इसलिए सतोगुणी निष्ठा वाले भक्त साधक सदा भगवान के बाल रूप को ही अपनी ध्यान प्रतिमा में स्थापित करते हैं और उसी रूप की प्रतिमा बनाते हैं।

युवावस्था की देवियों की अपेक्षा ‘कुमारी’ पूजन को इसलिए शक्ति साधना में प्रमुख स्थान है कि उसमें विकारों का उद्भव ने होने से सात्विकता की मात्रा अधिक रहती है। जहाँ अन्य देवियाँ विवाहित होने के कारण रजोगुणी क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी हैं वहाँ ‘कुमारी’ का ब्रह्मचर्य एवं शैशव उसकी गरिमा को सहज ही बढ़ा देता है। शक्ति उपासना क्षेत्र में कुमारी पूजन को प्राथमिकता इसीलिए दी गई है।

कुमारी कन्याओं में सात्विकता का अंश अधिक रहने से उन्हें उपासना क्षेत्र में प्राथमिकता दी गई है तो यह उचित तर्क संगत एवं तथ्यपूर्ण ही है। जप अनुष्ठान पाठ, पूजन आदि में कन्याएँ जितनी अधिक सफलता प्राप्त करती हैं, उतनी अन्य किसी आयु में संभव नहीं होती।

शान्तिकुञ्ज (हरिद्वार) में कुमारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री जप कराया जा रहा है। 24 लक्ष के 24 पुरश्चरण 6 वर्षों में पूरे होंगे। यह अनुष्ठान ब्राह्मणों की अपेक्षा कन्याओं द्वारा इसलिए कराया जा रहा है कि कुमारिकाओं की सात्विकता से अभीष्ट परिणाम अधिक सुनिश्चित रूप से सफल होंगे।

कुमारी कन्याओं की सतोगुणी विशेषताओं के कारण शास्त्र में उन्हें पूजा के योग्य ठहराया गया है :-

महाराज प्रयत्नेन सर्वसिद्धफलप्रदम्।

सर्वयज्ञोत्तम भूप कुमारीपूजनं शृणु॥

कृते यस्मिन्महालक्ष्मीरचिरेण प्रसीदति।

आमन्त्रयेद्दिने पूर्व कुमारीं भक्तिपूर्वकम्॥

पूजादिने समाहूय कुमारी माद्यदेवताम्।

कुमारी पूजनं कृत्वा महालक्ष्मी प्रसीदति॥

-वृहज्जोतिषार्णक धर्मस्कन्ध

शक्ति पूजा में कुमारी पूजन का बड़ा महत्व है। उससे सब सिद्धियाँ मिलती है। यह पूजन यज्ञों से भी उत्तम है। उससे महालक्ष्मी प्रसन्न होती है।

देवीबुद्धय्या महाभक्तया तस्माता परिपूजयेत्

सर्वविद्यास्वरूपा हि कुमारी नात्र संशयः।

एका हि पूजिता बाला सर्व हि पूजितं भवेत्।

-योगिनी तंत्र

देवी भावना से कुमारी कन्या पूजन करो। कन्याएँ निस्संदेह विद्या रूपिणी हैं। एक बालिका की पूजा करने पर उसमें समस्त देवी देवताओं की पूजा हो जाती है।

तस्माच्च पूजयेद्वालाँ सर्वजातिसमुद्भवाम्।

जातिभेदों न कर्तव्यः कुमारी पूजने शिवे॥

-रुद्रयाझल तंत्र

कुमारिकाओं का पूजन बिना जाति भेद के करें। जो उन में जाति भेद का विचार करता है तो वह भूल करता है।

कुमारी पूज्यते यत्र से देशः क्षितिपावनः।

महापुण्य तमो भूयात्समन्तात्क्रोश पंचकम्॥

-योगिनी तंत्र

जहाँ कन्या की पूजा होती है वह स्थान पवित्र हो जाता है। पाँच कोस तक उस स्थान की पवित्रता बिखरी रहती है।

अन्ते च प्राप्यते तेन परं निर्वाणमुत्तमम्।

कुमारी पूजने काले साधकः शिवताँ व्रजेत॥

-योगिनी तंत्र

कन्या पूजन करने वाले को शिवत्व की प्राप्ति होती है और वह निर्वाण पद का अधिकारी बनता है।

कुमारी पूजन फलं नार्हामि सुन्दरि।

जिह्व कोटि सहस्रै स्तु वक्त कोटि शतैरपि॥

तस्माच्व पूजयेद्वालाँ सर्व जाति समुद्भवाम।

जाति भेदों न कर्त्तव्यः कुमारी पूजने शिवे॥

अर्थ-भगवती गायत्री देवी की उपासना में कुमारी कन्याओं की पूजन का महान फल होता है। भगवान शंकर स्वयं मुख से कहते हैं- सुन्दरी! मैं तो कुमारी के पूजन का फल सहस्र करोड़ जिह्वा तथा शत कोटि मुखों से भी नहीं कह सकता हूँ। इसलिये सभी जातियों की कन्याओं का पूजन करें। शिवे! कुमारी कन्या के पूजन में जाति के भेद का तो ध्यान कभी करना ही नहीं चाहिए।

जातिभेदान्म देशानि नरकाल निवर्त्तते।

निचिकित्सा परो मन्त्री ध्रुवञ्च पातकी भवेत्।

देवी वुद्धया महा भक्ताया तस्मस्ताँ परिपूजयेत्।

सर्व विद्या स्वरूपा हि कुमारी मात्र संशयः॥

एकाहि पूजिता वाला सर्व हि पूजितं भवेत्।

अर्थ- कुमारी कन्या के पूजन में जाति भेद का विचार करने पर घोर नरक में जाकर गिरता है और वहाँ से कभी भी वापिस नहीं लौटता है। मन्त्रवान् मनुष्य यदि संदिग्ध होकर कर्म किया करता है तो महापातकी हो जाता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है। अतएव परमोत्कृष्ट भक्ति की भावना से कुमारी कन्या को साक्षात् देवी सावित्री का ही स्वरूप समझकर उसकी सांगोपाँग अर्चना करनी चाहिए। कुमारी कन्या सर्वविद्या स्वरूपिणी होती है- इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है।

अर्थ-जिस स्थान में कन्या (कुमारी) की पूजा होती है वह स्थान भूमण्डल में परम पवित्र होता है। वह स्थान चारों ओर पाँच कोश तक अतीव पुण्यमय होता है। इस भारत मण्डल में कुमारी की पूजा करने पर इस कुमारी की देह से प्रत्यक्ष रूप में एक अद्भुत प्रभा प्रकाशित होती है।

पृथ्वी पर शयन करें और नित्य कुमारी कन्याओं का पूजन करें। क्रमशः एक पूजन के लिए एक कन्या नो दिन तब बढ़ाता जाय।

कुमारी पूजन से दुख दारिद्रय का और शत्रुओं का नाश होता है तथा धन, आयु और बल की वृद्धि होती है। देव तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली इन कुमारियों की देवी रूप में पूजा करें। कन्याओं को वस्त्र, अलंकार, माला गंध एवं यंत्रों से पूजा करनी चाहिए। कुमारी कन्याओं के पूजन सहित यह नवरात्रि का व्रत सब प्रकार श्रेयस्कर है।

-देवी भागवत

असुरों का संहार करने वाली उस कुमारी रूप देवी की सभी ने पूजा की, देवताओं ने फूल बरसाये। तब से कुमारी पूजा चल पड़ी।

कुमारी पूजा करने वालों की काया कंचन जैसी हो जाती है। और वह भैरव की तरह प्रसन्न रहता है।

-योगिनी तन्त्र


धार्मिक अन्धविश्वास ने अगणित निरीहों का रक्त बहाया है।

धर्म जितना सम्मानास्पद और आवश्यक है उतना ही धार्मिक अन्धविश्वास हेय एवं घृणित हैं। अन्न जब भोजन बनकर थाली में आता है तब वह आदरणीय होता है और उपयोगी भी, पर जब वही अन्न पेट में पहुँचने के बाद सड़े हुए मल के रूप में बाहर निकलता है तो वह घृणित, दुर्गन्ध युक्त और अस्पर्श बन जाता है। यही बात धर्म के ऊपर भी लागू होती है। उसे मनुष्य जाति का प्राण कहना चाहिए जब अज्ञान के आवरण में लपेटा हुआ और धर्म व्यवसायों द्वारा विकृत किया हुआ होता है तो उसे अन्ध विश्वास कहते हैं। अन्ध विश्वास ने जितना अहित किया है उतना तो अधर्म ने भी नहीं किया।

प्राचीन काल में धर्म के नाम पर प्रचलित अन्ध परम्पराओं ने नर बलि प्रथा प्रचलित की और उस मूढ़ता की बलि वेदी पर असंख्यों मनुष्यों का रक्त बहा और क्रन्दन से आकाश गूँजा, फिर भी निष्ठुर धर्मभीरुता पिघली नहीं और वह अनर्थ हजारों वर्षों तक चलता रहा। उस धर्मानुष्ठान को करने वाले अपने को धर्मात्मा कहते रहे और आश्चर्य यह कि जनता भी उनके उन कार्यों में आंखें मूँद कर सहयोग देती रही।

नर बलि सभ्यता के साथ-साथ घटती चली गई। अब उसके विरुद्ध कानून भी बन गये हैं और सभ्य समाज में उसके विरुद्ध वातावरण भी है पर खेद है कि उसी का छोटा रूप पशु बलि के रूप में अभी भी विद्यमान है और समझदार कहे जाने वाले विभिन्न धर्मों के तथा कथित धर्म परायण लोग भी उसे निष्ठुरतापूर्वक अपनाये हुए हैं। उस कुकृत्य को करते हुए न संकोच अनुभव करते हैं न लज्जा।

मैक्सिको के नेशनल म्यूजियम में एक सात फीट ऊँचा गोलाकार पत्थर रखा हुआ है जिसे संसार का सबसे अधिक खूनी पत्थर कहा जाता है। यह पाषाण प्राचीन अजटेक्स राज्य के आदिवासियों की परम्परागत बलिवेदी रहा है।

अजटेक्स निवासी धार्मिक मान्यताओं वाले भोले-भाले लोग थे। उनका विश्वास था कि मानव बलि चढ़ाने से देवता प्रसन्न होते हैं और संसार की भलाई करते हैं। यदि उन्हें यह उपहार न दिया जाय तो रुष्ट होकर दैवी प्रकोप उपस्थित करते हैं। इस विश्वास के आधार पर समय-समय पर वे अपने ही लोगों को पकड़ कर बलि चढ़ा देते थे। कोई पूजागृह बनता था या राज्याभिषेक होता था तब तो बलि की मात्रा प्रक्रिया का प्रश्न बन जाता था। पिछले उदाहरणों से अधिक संख्या बढ़ाना ही उत्साह का प्रतीक माना जाता था। बलि की प्रथा भी बड़ी वीभत्स थी। सिर काटने की कम कष्टकर पद्धति वे नहीं अपनाते वरन् छाती चीरकर हृदय निकालना और उस कलेजे को देवता के सम्मुख प्रस्तुत करना यही अधिक कष्टकारक तरीका वे अपनी धर्म भावना के चरितार्थ करने का उत्तम प्रमाण मानते थे।

कोलम्बस के अमरीका पहुँचने से दो वर्ष पूर्व उन्होंने युद्ध देव का मन्दिर बनाया। इसके लिए कई वर्षों से बलि नर संग्रह करके कैदियों के रूप में विशाल संख्या में एकत्रित किये गये थे। जो उस उत्सव में काम आये। देव प्रतिष्ठा के अवसर पर उन बलि मानवों का झुण्ड जुलूस के रूप में निकाला गया। उनका जुलूस दो मील लम्बा था यह लम्बा जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। कई पुजारी क्रमशः उनका हृदय चीरने में निरन्तर लगे रहते थे। इस प्रकार अहर्निशि चार दिनों में कितने ही वध कर्त्ताओं द्वारा यह अनुष्ठान पूरा हो पाया और बहता हुआ रक्त उसे पवित्र मन्दिर के पत्थर घुटने में काम लाया गया।

अजटेक्स जाति का एक तीर्थ टियोकाली के निकट वन्य प्रदेश में बना हुआ एक देवालय था। स्पेन निवासियों ने उस क्षेत्र की खोज की तो मायन मोलोक के इर्द-गिर्द 1,36,000 मनुष्यों की झोपड़ियाँ उधर बिखरी पाई गई। यह निरीह मानव बलिदान किये गये थे और उन्हें इस दुखदायी विपत्ति में फँसने देने का एकमात्र प्रचलन वह अन्ध विश्वास था जिसे वहाँ के निवासी एक गहरी धर्म श्रद्धा के रूप में ही अपनाये हुए थे।

फ्राँस के पुरातत्व विज्ञानी डॉ. फ्राँसिस मेहजोरे प्रशान्त महासागर के फतुहिवा द्वीप के खंडहरों की खोज करने गये। उनने एक लुप्त मानव जाति के इतिहास को जानने के लिए यह प्रयत्न किया तो यह भी सुना जाता है कि उस विचित्र जाति के संग्रहीत स्वर्ण कोष के रूप में कोई बड़ी राशि उन्हीं खंडहरों में कहीं जमा है। ज्यों-त्यों कर फ्रांसिस वहाँ पहुँच ही गये और जो कुछ उनने ढूंढ़ निकाला वह भी कम नहीं था।

उस द्वीप में भी बहुत से खण्डहर, तहखाने, बुर्जियाँ इस प्रकार के टूटे पड़े थे जिससे विदित होता था कि कोई समुन्नत जाति इस क्षेत्र में रही होगी। यहाँ प्राकृतिक साधन भी जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त थे वह जाति लुप्त कैसे हो गई, इस प्रश्न का समाधान उन्हें अधिक खोज करने के लिए प्रोत्साहन कर रहा था।

उस द्वीप के ‘पाड’ नामक एक वनवासी व्यक्ति को लेकर फ्रांसिस उस सघन वन में गये। उपलब्ध प्राचीन सभ्यता के चिन्ह और अवशेषों ने उन्हें इस निष्कर्ष पर तो पहुँचाया कि यहाँ कोई साधन सम्पन्न और बुद्धिमान लोग रहे हैं पर वे फिर समाप्त कैसे हो गये। इतिहास का यह पृष्ठ बहुत परिश्रम के बाद ही खुला।

उस प्रदेश में भ्रमण करते हुए उनने उस क्षेत्र में नरबलि की प्रचलित प्रथा के बहुत प्रमाण पाये जो सर्वत्र बिखरे पड़े थे। वट वृक्षों जैसी जटाओं वाले पेड़ों पर नर मुण्ड इस तरह फँसे पड़े थे मानों वे उन्हीं में फले हों अस्थि कंकाल जहाँ तहाँ छितरे पड़े थे। ऐसे पत्थर पाये गये जिनमें मनुष्य का सिर फँसा कर उन्हें कुल्हाड़ी से काटा जाता था। वीभत्सता की कथा कहने वाले यह प्रमाण इतने अधिक थे कि एक शब्द में उसे किसी समय का नर बलि क्षेत्र कहना भी अत्युक्ति न होगी।

फ्राँसिस इस नतीजे पर पहुँचे कि यहाँ कोई प्रगतिशील जाति रही है। यदि ऐसा न होता तो ऐसे वास्तुकला के गहरे ज्ञान से सम्बन्धित मजबूत भवन बनाना और उनके साधन जुटाना सम्भव ही न होता। जो उपकरण वहाँ मिले वे भी बौद्धिक प्रगति और समृद्धि की साक्षी देते थे। पर लगता है धार्मिक विश्वासों की यह मान्यता उनके मन में जम गई थी कि देव शक्तियों के कोप अनुग्रह पर ही मनुष्य का सुख दुख निर्भर है और वे देव शक्तियाँ नर बलि पाकर प्रसन्न होती हैं। जो जितनी अधिक बलि दे सकेगा वह उतना ही देव अनुग्रह का भाजन बनेगा।

इसी श्रद्धा से प्रेरित होकर वह मनुष्य घाती बन गये जो जिसके चंगुल में फंसे जाता वह उसे पकड़ कर बलि चढ़ा देता और अपनी समृद्धि की आशा करता। सम्भव है इससे प्रतिशोध की भावना भी जमीं हो और उनमें देव अनुग्रह की लालसा के साथ इस प्रतिशोध वृति ने भी नर बलि की मात्रा को अति की सीमा में पहुँचा दिया हो। हो सकता है पुरोहितों ने इस प्रक्रिया को और बढ़ावा दिया हो और वे सब इस नर बलि की प्रथा में निमग्न होकर अपना अस्तित्व ही खो बैठे हों।

इस शोध में फ्रांसिस के साथ रहे आदिवासी पाड ने प्रचलित दन्त कथाओं के आधार पर बताया कि इस लुप्त जाति के लोग समय-समय पर बड़े-बड़े धार्मिक समारोह मनाते थे। दूर-दूर से उस उत्सव में सम्मिलित होने के लिए वे लोक इकट्ठे होते थे। मशालें जलाई जाती थी। नगाड़े बजते थे। शंख और सींगों से बनी तुरही का प्रयोग इसी अवसर पर होता था। इसके बाद मद्यपान और नर बलि का वीभत्स दौर। रक्त की धाराएँ बह जातीं। घायलों और मृतकों को देव कृपा का पात्र समझा जाता था। यह धर्मानुष्ठान इतने बढ़े कि वह समुन्नत जाति उसी जंजाल में फँसकर अपना अस्तित्व गँवा बैठी।

अफ्रीका की धर्म पुरोहित महिलाएँ- डाकिन देवताओं को प्रसन्न करने के नाम पर भूतकाल में अगणित मनुष्यों का प्राण हरण करती रहीं हैं।  कभी-कभी तो इन दिनों भी वहाँ ऐसी घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं।

कुछ दिन पूर्व तंगानिका (अफ्रीका) की राजधानी दारेस्सलाम के उच्च न्यायालय में तीन डायनों के विरुद्ध अभियोग चला उससे उस क्षेत्र में प्रचलित इस अघोर विद्या के सम्बन्ध में कई बातें प्रकाश में आई।

रुफीजी डेल्टा के आस-पास डायन विद्या का बाहुल्य है। उस क्षेत्र में ऐसी अनेक अघोरिने फैली पड़ी हैं। पकड़ी गई महिलाओं के नाम थे नेआम सेनी 70 वर्ष, जामाल्टा 40, जाविवू 20 वर्ष, वे रंग-बिरंगी जादुई चादरें (काँगा) ओढ़े बैठी थीं उनका विश्वास है कि इसे पहन लेने पर कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

पुलिस अधिकारी ने उन पर नृशंस हत्याओं के अभियोग लगाये। जब उनके विरुद्ध चार्ज उनकी ‘की रुफीजी’ भाषा में लगाये गये तो वे मुस्करा भर दीं मानों कोई प्रशंसनीय कार्य करने का श्रेय उन्हें दिया जा रहा हो।

पूर्वी अफ्रीका में डायनी वृत्ति एक प्रकार का पौरोहित्य कर्म है। जिसे अधिकतर महिलाएँ ही अंगीकार करती हैं। देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें यह तंत्र साधना करनी पड़ती है। उन अफ्रीकियों का विश्वास है कि देवता उनके वशवर्ती रहते हैं उनकी सहायता से वे किसी का भी भला-बुरा कर सकती हैं। इसलिए वे उनसे डरते हैं। सम्मान देते हैं और सहायता करते हैं। वे सोचते हैं इनसे झगड़ने में वे घाटे में रहेंगे।

तीनों में सब से छोटी-बीस वर्षीय जाविबू ने अदालत में अपना बयान देते हुए कहा। दूसरी डायनों के आदेश से उनके दल में उसे सम्मिलित होना पड़ा और इसके लिए उसे अपने पति को भी होमना पड़ा। अन्य डायनों ने कहा था यदि वह उनके दल में भर्ती न होगी तो उसका सर्वनाश कर दिया जायेगा। वह डर गई और उनके विकराल जंगल में बने मठ में सम्मिलित हो गई। दीक्षा के समय गाँव के मुखिया की लड़की का वध किया गया और उसके माँस के टुकड़े काट-काट कर सबने प्रसाद रूप में ग्रहण किये। वह छोटी लड़की एक झाड़ी में छिपाकर रखी गई थी। कुछ खिलाकर बेहोश जैसा कर दिया गया था। बेचारी वध के समय रोने चिल्लाने की स्थिति में भी नहीं थी। डायनों ने कहा तुझे भी अपने पति की बलि इसी प्रकार देनी होगी।

इसे बाद 7 मार्च सन् 1962 को धर्माध्यक्ष डाकिन नेआमसेनी कुछ दवा लेकर आई और कहा गुप्त रूप से इसे अपने पति मसौदी को खिला देना। मैं सकपकाई जरूर पर अब डाकिनों के दल से अलग होना असंभव था। उनकी नाराजी से सब का सर्वनाश हो सकता था इसलिए उनका कहना मानना पड़ा। दवा खाकर मसौदी भयंकर रूप से बीमार पड़ा। वह दर्द और मूर्छा में पड़ा ही था कि दूसरों डाकिनें धड़धड़ाती हुई चली आई और उसे उठा कर ले गई। मसौदी पर अब क्या बीतने वाली है इसकी कल्पना करके मैं काँपने लगी और भागी हुई अपने ससुर के पास पहुँची और सारा भेद बता दिया।

दो दिन तक पचास आदमियों की दौड़ धूप के बाद मसौदी एक झाड़ी में पड़ा मिला। उसके शरीर पर कुछ ऐसा पोत दिया गया था जिससे वह बुरी तरह सूज गया। घर उसे लाया तो गया पर डाकिनी की एवाएं इतना अधिक असर कर चुकी थीं कि वह तीसरे ही दिन मर गया।

अदालत ने इन तीनों डाकिनों को क्रमशः 6 वर्ष 5 वर्ष और 3 वर्ष की सजा दी। उनने अपने फैसले में लिखा इस क्षेत्र में फैला हुआ अन्ध विश्वास एक प्रकार से डाकिनी आतंक को पुष्ट पोषण ही कर रहा है। जिस मुखिया की लड़की की बलि दी गई थी उस तक ने गवाही नहीं दी। ऐसी दशा में सबूत के अभाव में प्राणदंड जैसी सजा कैसे दी जाय? जबकि वस्तुतः वे आये दिन इसी प्रकार की हत्याएँ और क्रूर कर्म करती रहने की अपराधी हैं।

पूर्ण नर बलि न सही, अर्ध नर बलि की घटनाएं तो न जोन कितनी होती रही है। धर्म के नाम पर इस प्रकार नृशंस आचरणों से इतिहास के पन्ने के पन्ने भरे हुए है।

वियना से करीब 200 मील उत्तर पूर्व में क्राको नगर है। वहाँ के न्यायाधीश को एक गुमनाम पत्र मिला कि वे सोला नामक ईसाई मिशन के भिक्षुणी आश्रम में एक भिक्षुणी 20 वर्ष से नरक जैसी छोटी कोठरी में पड़ी अमानवीय पीड़ाएं सह रही है, उसे मुक्त कराया जाय। उसे इतना विकट उत्पीड़न सहना पड़ा है कि पागल जैसी हो गई है।

न्यायाधीश असमंजस में पड़ गये। यदि सूचना मखौल मात्र हुई तो? पोप अथवा सम्राट इस मामले को उखाड़ने से रुष्ट हो जायँ तो? इसके विपरीत यदि कुछ न किया जाय तो पत्रों के संवाददाता कर्तव्य पालन न करने का अदालत पर आरोप लगायें तो? बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने मामले की जाँच कराना ही उचित समझा और वह आरोप पत्र जाँच के लिए इस विभाग के अधिकारी सिग्मंड गेहार्ट को सौंप दिया।

आस्ट्रिया के उन दिनों के कानून पर धर्माध्यक्षों का प्रभाव था, उनकी आज्ञा बिना पुलिस धर्म स्थानों में प्रवेश नहीं कर सकती थी। फिर भी अधिकारी ने स्थानीय धर्माध्यक्ष से आज्ञा प्राप्त कर ली और उस महिला को तलाश करने लगे। पहले तो स्थानीय प्रबंधिकाओं ने बहुत आना काना की पर पीछे पुलिस की सतर्कता से उस कैद की कोठरी और बंदी महिला को ढूँढ़ ही लिया गया।

कोठरी क्या थी साक्षात नरक था। 4 फुट 11 इंच लम्बी, 1 फुट 11 इंच चौड़ी इस पिंजड़े जैसी हवा और प्रकाश से रहित कोठरी में ही यह महिला कैद थी। घोर बदबू और घुटन से भरे हुए उस डिब्बे में। उसी के एक कोने में बनी नाली पर मल मूत्र त्यागना पड़ता था। नियत समय पर एक बार भोजन पानी दरवाजों के छेद में होकर मिल जाता। इस लम्बी 20 साल की अवधि में उसे एक बार भी बाहर नहीं निकाला गया और न कभी नहाने कपड़े धोने की सुविधा दी गई। रक्त माँस से रहित हड्डियों का ढाँचा इतने दिनों इस स्थिति में जीवित कैसे रहा आश्चर्य इसी का था।

इतना अमानवीय कठोर दंड उसे किस अपराध में भुगतान पड़ रहा है, इसका उत्तर देते हुए उसने इतना ही कहा-मैंने किसी से प्रेम किया था, कौमार्य व्रत भंग किया था। पर यह सब भी तो ----- पूरी बात कहे बिना ही वह फुट-फुट कर रोने लगी। आश्रम की प्रमुख भिक्षुणी ने भी उस पर यह दुराचार का आरोप ही दुहराया।

पुलिस अधिकारी क्रोध से काँप रहा था उसने सफाई देने वाली भिक्षुणियों से कहा तुम सब शैतान की औलाद हो। मनुष्यता से रहित। जिस स्थिति में इसे बीस वर्ष तक रखा गया तुम लोग उसमें बीस मिनट रह कर तो दिखाओ।

लोगों की भारी भीड़ आश्रम के बाहर जमा थी। सुनने वालों और देखने वालों को इतना क्रोध आ रहा था कि इन भिक्षुणियों को जीवित ही जला दें। पथराव तो चारों और से हो ही रहा था। पुलिस ने बड़ी कठिनाई से व्यवस्था कायम रखी।

23 जुलाई 1869 को यह मुकदमा आरम्भ हुआ। प्रमुख भिक्षुणी ने अदालत में बयान देते हुए कहा-इस मुकदमें द्वारा हमारे पवित्र पुरातन विहार की प्रतिष्ठा नष्ट करने की अधर्मियों द्वारा निन्दनीय चेष्टा की जा रही है। शासन को हमारे धार्मिक अधिकारों के बारे में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अदालत ने आश्रम के सभी कार्यकर्ताओं पर अमानवीय पीड़ा पहुँचाने और नागरिक स्वतंत्रता अपहरण करने के अपराध लगाये। प्रमाण प्रत्यक्ष था। सभी को दण्ड का भागी होना पड़ सकता था पर अदालत की कार्यवाही बीच में ही बंद हो गई। पोप और सम्राट ने मिलजुल कर ऐसे अवरोध खड़े कर दिये कि मुकदमा चलना संभव ही न हो सके। जो गवाही देना चाहते थे उन्हें दूसरे तरीकों से रास्ते में आने से हटा दिया गया। धर्म की आड़ में अपराधी बच गये और अदालत को सब कुछ विदित होने पर वह भी कुछ न कर सकी। इस प्रकार इस कलंक काण्ड पर पर्दा डाल कर न्याय का टूटा-फूटा द्वार भी बंद कर दिया गया।

धर्म को जीवित रहना चाहिए और उसका समर्थन पोषण करना चाहिए पर धर्म के नाम पर प्रचलित इस अन्धविश्वास का जिसने सदा से मनुष्य को कलंकित किया है और समाज को पतन के गर्त में गिराया है जितनी जल्दी हो सके उन्मूलन ही करना चाहिए।


फान किले नारवे (Kahani)

फान किले नारवे जहाजी बेड़े में एक केविन बॉय था जुआन ने तो मुसेन यह लड़का मैक्सिको में जहाज छोड़कर भाग खड़ा हुआ इसी बीच उसे चेचक की बीमारी हो गई। लड़के ने न तो अपने को प्रकट किया और न अपनी बीमारी का भेद किसी को बताया। इस पर वो छूत का रोग अमेरिका में बुरी तरह फैला और उस महामारी ने 30 लाख व्यक्तियों की जान ले ली।


जाइये, पहले रूठे मन को मनाइये

बुद्धिमान उसे कहा जाता है जो ‘टूटे’ का बनाना और रूठे को मनाना जानता है। कपड़े, बर्तन, फर्नीचर, मकान आदि की टूट-फुट होती रहती है। उसकी मरम्मत की जाती है। जो टूटा उसे फेंक दिया जाय, ऐसा कैसे हो सकता है? सब कुछ नया ही नया हो यह कैसे सम्भव है? इसी प्रकार जो रूठ जाय उससे खुद भी रूठ बैठें तो घर परिवार का चलाना कठिन है। कभी पत्नी से अनबन हो जाती है, कभी बच्चों से कहन-सुनन। कभी भाई से मनचाल हो जाती है तो कभी पड़ौसी से मन-मुटाव बन जाता है, इस स्थिति को ऐसे ही रहने दिया जाय अथवा ऐंठ को और कड़ी करते रहा जाय, तो काम नहीं चलेगा। उलझन बढ़ती ही जायेगी, जिनके साथ रहना है उनसे मीठे सम्बन्ध रहने में ही लाभ है।

मन हमारा सबसे निकट का सम्बन्धी है। पत्नी, बच्चे, भाई, पड़ौसी तो दूर वह शरीर से भी अधिक समीप रहने वाला स्वजन है। शरीर से तो सोते समय सम्बन्ध ढीले हो जाते हैं, मरने पर साथ छूट जाता है पर मन तो जन्म जन्मान्तरों का साथी है और जब तक अपना अस्तित्व रहेगा तब तक उसका साथ भी छूटने वाला नहीं है। मन मुख्य और शरीर गौण है। मन की मर्जी पर आत्महत्या आदि से शरीर छोड़ा जा सकता है। शरीर परिपुष्ट होने से मनोविकार दूर नहीं किये जा सकते। शरीर की सामर्थ्य तुच्छ है, मन की महान। मन का शासन शरीर पर ही नहीं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर है। उत्थान-पतन का वही सूत्रधार है। निन्दा और प्रशंसा उसी की गतिविधियों की होती है। किसी को सन्त, ऋषि, देवदूत और महापुरुष बना देना यह मन की सज्जनता का ही चमत्कार है।

ऐसे उपयोगी और सामर्थ्यवान साथी को रूठने नहीं देना चाहिए। रूठ जाय तो मनाना चाहिए। हमारी आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है। अन्य काम छोड़कर भी इस ओर ध्यान देना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके रूठे मन को मना लेना चाहिए।

मन आँख से दिखाई नहीं पड़ता, इसलिये उसका रूठना भी नहीं दीखता, पर विवेक की आँख से देखें तो वह रूठा हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा। रूठने वाले की पहचान है- साथ न देना- कहना न मानना, सहयोग न करना, नुकसान करना। बच्चा रूठ जाता है तो ऐसे ही उपद्रव करता है। घर का सामान तोड़ता-फोड़ता है और अपने हाथ पैर पीटता है। घर को नुकसान पहुँचाता है और स्वयं कष्ट पाता है। रूठी हुई पत्नी भोजन करना, बोलना बन्द कर देती है। मन को पुष्ट करने में उपयुक्त स्वाध्याय सत्संग की खुराक लेनी उसने बन्द कर दी है। आत्मा के पास बैठकर कभी विचार नहीं करता कि घर का बनाव-बिगाड़ किसमें है। कुमार्गगामी होकर रूठे बच्चे की तरह सफलता साधन सद्गुणों को तोड़ता फोड़ता रहता है और स्वयं निन्दा, तिरस्कार, अभाव, दारिद्रय, शोक संताप का भागी बनकर कष्ट पाता है। रूठा हुआ नौकर या तो काम करता ही नहीं, करता है तो ऐसे ढंग से कि मालिक को उलटा नुकसान पड़े। मन ने आत्मोन्नति के सारे प्रयास अवरुद्ध कर रखे हैं, कुछ करता है तो ऐसा विलक्षण जिससे इस लोक और परलोक में भविष्य अन्धकारमय ही बनता चला जाय। यह रूठने के प्रत्यक्ष चिह्न हैं।

यह असहयोग अवरोध देर तक नहीं चलने देना चाहिए। वह अपना भाई है उसके साथ राम भरत जैसे मधुर सम्बन्ध बनाने चाहिए, रावण विभीषण की तरह सुन्द उपसुन्द की तरह परस्पर द्रोही-विद्रोही बनकर रहने में क्या आनन्द?

मन ने यदि साथ दिया होता तो शरीर की ऐसी दुर्गति न होती जैसी आज है। उसने काया को स्वस्थ और समर्थ रखने के लिए संयम बरता होता। लिप्सा के फेर में न पड़ा होता। जीभ को, कामेन्द्रिय को व्यवस्था में रखा होता। आहार-विहार की नियमितता बरती होती तो काया गुलाब के फूल की तरह खिली हुई और गेंद की तरह उछलने वाली रही होती। बीमारी और कमजोरी की इस घर में घुसने की हिम्मत ही न पड़ती। मन रूठा बैठा रहा, शरीर को देख संभाला ही नहीं, रुग्णता ने घेरा डाल लिया, शरीर टूटा, आत्मा को अशान्ति रही और मन स्वयं ही उस रुग्ण काया में रहकर टूटे मकान में रहने वाले किरायेदार की तरह उद्विग्न बना रहा।

मन यदि रूठा हुआ न होता तो उसने अपने आपको संभाल लिया होता। अपने को गुण, कर्म, स्वभाव से सुसज्जित सुसंस्कृत रखा होता, पर वह तो कोप भवन में बैठा था। कपड़े फाड़े, बाल बखेरे, बिना नहाये-धोये ऐसा ही गन्दा पड़ा रहा। अपना वेष बिगाड़ा, सम्मान खोया और बाप का काम बिगाड़ा। आत्मा को सहयोग देना तो सुसंस्कृत स्थिति में ही हो सकता था मलीनता और कुत्सा का कलेवर ओढ़ लेने पर तो वह भारभूत ही रह सकता था, सो ही रह भी रहा है।

जीवन क्षेत्र को सँभालने का उत्तरदायित्व यदि उसने संभाला होता तो आज इस उद्यान की शोभा देखते ही बनती। शिक्षा से यदि उसने प्यार किया होता और एक दो घण्टे रोज भी पढ़ने के लिए उत्सुकता प्रकट की होती तो- अन्धाधुन्ध अपव्यय होने वाले समय में से थोड़ा सा शिक्षा के लिए भी लग सकता था और पिछले जो दिन ऐसे ही बर्बाद हो गये अब तक अपनी स्थिति उच्चकोटि के विद्वान जैसी हो गई होती। पर उसने विद्या में रस लिया कब? रूठा जो बैठा रहा।

देवत्व के सारे उपकरण अपने भीतर विद्यमान थे। एक उँगली के सहारे यह सारा साज झंकृत हो सकता था। अपने भीतर बैठा सन्त, ऋषि, देव प्रतीक्षा करता रहा, जरा सा सहारा मिले तो ऊपर उभर कर आये। पर मन को फुरसत ही नहीं मिली। वह रूठा रहा, भटकता रहा-और अँगूठा दिखाता रहा, समय की निधि चुकती चली गई। अवसर हाथ से निकलता रहा। जीवन सन्ध्या निकट आ गई तो भी हाय रे मन! तेरा सहयोग न मिल सका।

मन से अपनी दयनीय दुर्दशा का वर्णन करना चाहिए। परमात्मा का राजकुमार-सकल साधनों से सम्पन्न इस प्रकार दीन-हीन, निन्दित, तिरस्कृत, असफल, असहाय बना फिरे यह कितने दुख की बात है। यह दुर्दशा केवल एक ही कारण से हुई है कि गाड़ी के दो पहियों में सहयोग नहीं रहा। आत्मा की गौरवशाली वर्चस्व की उपलब्धियों के लिए यह जीवन मिला है यदि मन साथ दे तो महामानव की गरिमामयी स्थिति में प्रकाश और उल्लास भरा जीवन अब भी जिया जा सकता है। जो गया सो बहुत था पर जो बचा है सो भी कम नहीं। यदि उतने में भी परस्पर सहयोग रह सके तो अभी भी उतना अवसर है कि अभिशाप को वरदान में बदला जा सके।

मन कुचाल छोड़, इन्द्रिय लिप्साओं में भटकना छोड़। वासना आग की तरह है, भोग उपभोग से यह शान्त होने वाली नहीं है। इन्हें तृप्त करने के जितने ही साधन जुटायेगा उतनी ही अतृप्ति भड़केगी। फिर उनके कुचक्र में जितना ही फँसा जाय उतनी ही क्षमता, आयु, प्रतिभा घटती है। क्षणिक चटोरेपन के पीछे समर्थता की सम्पत्ति को गँवाने और दिन-दिन दुर्बल होते जाने से क्या लाभ? बता मन, तू कोयलों के ऊपर मुहरें निछावर करने में क्या बुद्धिमत्ता अनुभव कर रहा है?

आत्मा रोती-बिलखती रही, उसके सन्तोष, उत्थान कल्याण के लिए एक कदम नहीं बढ़ाया गया, एक प्रयत्न नहीं किया गया। अन्तरात्मा की सहचरी सत्प्रवृत्तियाँ कुम्हलाई, मुरझाई ओर सूख गई उन्हें सींचने के लिए एक लोटा पानी नहीं डाला जा सकता। सद्भाव के बालक अपने पोषण की पुकार करते रहे उनकी आवश्यकताएं जुटाने से मुँह मोड़े रहा गया, पर दुर्बुद्धि दुष्प्रवृत्ति और दुर्भावनाओं के पोषण के लिए तरह-तरह के साज-सरंजाम जुटाये जाते रहे। परिवार का पोषण विकास करना पर्याप्त था। पर उन्हें विलासी और धन, कुबेर बनाकर छोड़े जाने के मोह से सारी ममता उन्हीं पर उड़ेल दी गई। उन्हें ही अपना समझा गया। जो कुछ किया जाये उन्हीं के लिए, जो कुछ सोचा जाय उन्हीं के लिए-सम्पन्न बनाया जाय तो उन्हीं को, समृद्ध बने तो वे ही। उस छोटे से दायरे में अपनी सारी ममता समेट कर मन तू ठगा गया। इस मोह ग्रस्तता ने लोक भी बिगाड़ा और परलोक भी। बता मन तू इसी चाल पर कब तक चलता रहेगा? विश्व परिवार की और से कब तक आंखें बन्द कराये रहेगा?

मन तू शरीर का मित्र बना और आत्मा का शत्रु। शरीर को ठाठ-बाट जुटाने में, बड़प्पन दिलाने में, सत्ताधारी बनाने में लगा रहा, उसी के ताने-बाने बुनता रहा। पर इससे मात्र अहंकार बढ़ा। शरीर पर चिन्ता का भार बढ़ा और इस गधे पर इतना बोझ लादा कि कमर ही टूट गई। बाहर वाले बड़प्पन देखकर चोंधियाते जरूर हैं पर भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला पड़ा है। मन तू खुद भी मरा और अपने मित्र शरीर को भी मारा। यदि तू आत्मा का मित्र बन गया होता और जितना श्रम शरीर के लिए किया है उतना आत्मा के लिए करता, तो आनन्द आ जाता। आत्मा ऊँची उठकर परमात्मा बन जाती और तू यशस्वी होता-धन्य हो जाता। पर हाय रे कुचाली, तू तो रूठा ही बैठा रहा-उलटा ही चलता रहा-घर को खोखला किया और अपनों को चौपट कर दिया जिन बिरानों को अपना सब कुछ समझ रहा था, उनकी करतूतें देख-अहसान मानना तो दूर -अधिक शोषण के लिए उतावले और कृतघ्नता से बावले बने फिर रहे हैं। तेरे सारे प्रयास एक तरह से निरर्थक और निष्फल ही चले गये।

जीवन लक्ष्य की बात सोचने के लिए तुझे फुरसत ही नहीं मिली-कर्तव्य का ध्यान कभी आया ही नहीं-ईश्वर के दरबार में जाकर लेखा-जोखा देना पड़ेगा-यह कभी सूझा ही नहीं -स्वार्थपरता की संकीर्ण परिधि में कीचड़ के कीड़े की तरह कुलबुलाता, बिलखता रह गया अभागे। अपने को ज्वलन्त दीपक की तरह प्रकाशवान बनाकर सबको प्रकाश देता और स्वयं प्रकाशपुँज कहलाता। यह मार्ग तुझे क्यों नहीं सूझा? विश्व भगवान की सेवा साधना के लिए भीतर से हुलास क्यों नहीं उठा-पत्थर के टुकड़ों पर सिर पटककर ईश्वर भक्ति की विडम्बना तो रचता रहा पर प्रेम के अमृत की एक बूँद भी सच्ची भक्ति के रूप में कभी नहीं उपजी। आस्तिकता का कलेवर ओढ़े फिरने वाले नास्तिक-बता तेरी इस बाल-क्रीड़ा से ईश्वरीय अनुग्रह का एक कण भी कैसे मिल सकेगा?

भूलें, बहुत हो चुकीं। बहुत क्या यों कहना चाहिए कि अब तक का सारा जीवन भूल-भुलैयों में भटकते हुए ही बीत गया। जब वस्तुस्थिति पर विचार आता है- हानि का लेखा-जोखा सामने आता है, तो छाती फटती है। जितना समय, श्रम और प्रयत्न मृग तृष्णा में भटकते बीता यदि वह सही दिशा में -राजमार्ग पर चलने में लगा होता तो अब तक कितनी मंजिल पार हो गई होती। कितने ऊँचे पहुँचे होते, कितने आगे बढ़े होते। पर कोल्हू के बैल की तरह-बालू में से तेल निकालने की तरह हाथ कुछ नहीं आया। खीज, क्षीणता, जलन और पछतावें के सिवाय इस भूल भरे मार्ग पर और मिलना ही क्या था? सब कुछ गँवा बैठने पर भी तृष्णा और वासना के शूल अभी भी वैसा ही दर्द करते रहते हैं- और चैन नहीं मिलने देते।

मन, तेरे हाथ जोड़ते हैं, तेरे पैर छूते हैं, तेरे चरणों पर लोटते हैं, तू जीता हम हारे। पर अब कृपाकर रूठना छोड़ दे। कुचाल मत चल। सही रास्ते पर आ जा आत्मा का बन-उसी के साथ रह-उसी की सहायता कर-उसी के काम आ। आखिर तू आत्मा का ही तो पुत्र है। माता के साथ दुष्टता-माया के साथ रासविलास। बच्चे इस रास्ते से पीछे लौट। बाप अब तो कृपा कर। तेरी शरण में आये- शरणागत को अब और आगे मत सता। तू रूठना छोड़ दे-मन जाय- तो जीवन सन्ध्या की इन घड़ियों में भी अन्धकार को प्रकाश में बदला जा सकता है। देवता, अब तू प्रसन्न हो-वरदान दे तभी नाव पार उतरेगी अन्यथा अब डूबे-तब डूबे।

ऐसा चिन्तन, मनन हमें नित्य ही एकान्त में करना चाहिए। मन के साथ वार्तालाप करने का नाम ही मनन चिन्तन है। उसी को स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।


Quotation

फान किले नार्वे जहाजी बड़े में एक केविन बॉय था जुआन ने तो मुसेन। यह लड़का मैक्सिको में जहाज छोड़कर भाग खड़ा  हुआ।

इसी बीच उसे चेचक की बीमारी हो गई । लड़के ने न तो अपने को प्रकट किया और न अपनी बीमारी का भेद किसी को बताया ।

इस पर वो छूत का रोग अमेरिका में बुरी तरह फैला और उस महामारी ने ३० लाख व्यक्तियों की जान ले ली ।

-अज्ञात

मन को हर्ष और उल्लासमय बनाओ, इससे हजारों हानियों से बचोगे और लम्बी उम्र पाओगे।

-शेक्सपियर


भय आधी मृत्यु

गरुड़ को द्वार पर ही छोड़कर भगवान विष्णु भीतर चले गये। विश्व व्यवस्था पर उन्हें शिवजी से देर तक चर्चा करनी थी। इतना समय कैसे काटा जाये-अभी द्वार पर रुके गरुड़ यह सोच ही रहे थे कि उन्हें समीप ही दाने चुग रहा एक कपोत दिखाई दिया। उन्होंने संकेत से कपोत को समीप बुलाया और समय काटने के लिये उसी से बातचीत प्रारम्भ कर दी।

अभी वार्ता अच्छी तरह प्रारम्भ भी न हो पाई थी कि यमराज आ धमके। उन्होंने कबूतर की ओर एक अर्थपूर्ण दृष्टि डाली और न जाने क्या सोचकर हँस दिये। फिर बिना कुछ कहे अन्दर चले गये। यमदेव का अपनी ओर दृष्टिपात करके हँसना था कि कबूतर के प्राण सूख गये। कम्पित स्वर में उसने गरुड़ से कहा- तात! यमदेव की हँसी अकारण नहीं हो सकती है। वे त्रिकाल दर्शी और मृत्यु के देवता हैं अवश्य ही मेरी मृत्यु आ गई है इसीलिये वे मुझे देखकर हँसे। बन्धु ! मेरी सहायता करो, मुझे अविलम्ब यहाँ से हटाकर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो।

गरुड़ हँसे और कहने लगे, मित्र! जिस तरह आपातकालीन परिस्थितियों में राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी मन्त्रणायें करते और आपातकालीन परिस्थितियों से निबटने के उपाय ढूँढ़ते हैं वैसे ही संसार की बिगड़ती स्थिति को सुधारने के उपायों पर विचार करने के लिये भगवान विष्णु को शिवजी ने बुलाया है, यमराज भी इस वार्ता में सहायक होंगे इसीलिये वे यहाँ आये हैं, तुम निरर्थक भय मत करो। मित्र! नीति कहती है भय आधी मृत्यु है, इसलिये किसी को अकारण भय नहीं करना चाहिये जो अवश्यम्भावी है उसके लिये तो भय करना और भी मूर्खता है। उस परिस्थिति के लिये तो शूरवीरों की तरह तैयार रहना चाहिए।

गरुड़ ने बहुतेरा समझाया पर भीत-कपोत की समझ में कुछ न आया। उसके मस्तिष्क ने विचार करना तक छोड़ दिया। सच है भयग्रस्त व्यक्ति इसी कारण एक संकट से अनेक संकट स्वतः पैदा कर लेते हैं।

उसने गरुड़ से कहा-तात! आप तो मुझे विन्ध्याचल की नीलाद्रि गुफा तक पहुँचा दीजिये वहाँ मैं पूर्ण सुरक्षित रहूँगा। “गरुड़ ने बहुतेरा समझाया” -अभी यमराज आते होंगे उन्हीं से पूछकर शंका-समाधान कर लिया जाय पर कबूतर के मस्तिष्क में पूर्वाग्रह का अज्ञान छा गया था। उसने एक भी न सुनी। अंततः गरुड़ को उसकी प्रार्थना स्वीकार ही करनी पड़ी। चटपट अपनी पीठ पर बैठाकर वे कबूतर को विन्ध्याचल ले जाकर नीलाद्रि गुफा में छोड़ आये।

गरुड़ लौटकर अभी एक क्षण विश्राम भी न कर सके थे कि भीतर से यमदेव निकल आये। वहाँ कबूतर को न पाकर उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ। उन्होंने गरुड़ से प्रश्न किया तात! आपके पास कुछ समय पूर्व जो कपोत क्रीड़ा कर रहा था वह कहाँ गया? गरुड़ ने हंसकर कहा-महाराज! आपकी यह विकराल दाढ़ी, लम्बी मूंछें और भयंकर आकृति और उस पर आपकी असामयिक हँसी ने उस बेचारे को भयग्रस्त कर दिया। बहुत समझाने पर भी वह माना नहीं, अभी-अभी उसे विन्ध्याचल एक सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आ रहा हूँ। यमराज कुछ गम्भीर होकर पूछने लगे आपने वहाँ और किसी को तो नहीं देखा-गरुड़ ने कहा नहीं-हाँ जिस गुफा में उसे छोड़कर आया उसके अन्दर जाते हुये किसी बिल्ली के पञ्जों के निशान मैंने अवश्य देखे क्यों कोई बात है क्या?

यमराज ने कहा- हाँ बात न होती तो पूछता क्यों? तात-मैं यहां से निकला तो मैंने कबूतर के मस्तक पर विधि का एक लेख पढ़ा-लिखा था एक घड़ी बाद इसे विन्ध्याचल की एक बिल्ली खा जायेगी। मैंने उसे शिवलोक में देखकर विचार किया था कि ब्रह्माजी भी कभी-कभी कितनी भूल करते हैं कहाँ विन्ध्याचल -कहाँ शिवलोक-पर अब स्पष्ट हो गया कि वैसे चाहे कबूतर बच जाता पर उसके भय ने लगता है ब्रह्माजी के लेख को सचमुच सत्य कर दिया। बेचारा कबूतर उस गुफा में भी न बच सका अन्त में बिल्ली ने उसे यथासमय खा ही लिया।


लोकोपयोगी बनिये-लोकप्रिय बनिये

लोकप्रिय होने की अभिलाषा स्वाभाविक है। यह उचित भी है। समूह की मर्यादाओं में रहकर व्यक्ति अपने को अनैतिक और अवाँछनीय कार्यों से इसलिये भी बचाये रहता है कि दूसरे उस पर उँगली ने उठायें और घृणास्पद अविश्वासी ने समझें। इस लोक-लाज के बन्धनों में बँधा हुआ व्यक्ति अपने को सभ्य और सज्जन प्रमाणित करने की चेष्टा करता है। फलस्वरूप उच्छृंखलताओं पर किसी सीमा तक तो बन्धन बँधा ही रहता है।

मनुष्य और मनुष्य का मिलन यदि वह प्रकृति और प्रवृत्ति का साम्य लिये हुये हो तो निस्सन्देह बड़ा मनोरञ्जक और उत्साहवर्धक लगता है। ऐसे मिलन के क्षण हँसी खुशी में कट जाते हैं और वैसा अवसर बार-बार आने की उत्कण्ठा बनी रहती है। जबकि अस्त-व्यस्त और हेय प्रकृति के लोग साम्य-मिलन से प्रसन्नता और आकर्षण अनुभव करते हैं तब सज्जनों और सद्भाव सम्पन्न विचारशीलों के मिलन के आनन्द की तो बात ही क्या है। लोकप्रियता इस जनसंपर्क का पथ-प्रशस्त करती है। साथ ही सम्मान प्राप्ति का भाव भी उसमें जुड़ा रहता है। लोक परिचित व्यक्ति तो उद्धत आचरण एवं चौंकाने वाली कौतूहल वर्धक करतूतें करके भी हुआ जा सकता है, भूत-पलीत की ऐसी ही कुछ अनहोनी चर्चा अपने साथ जोड़कर भी लोक परिचित हुआ जा सकता है पर उसमें घृणा, उपहास अविश्वास प्राप्त होने तथा छिछोरा, ओछा समझे जाने का जोखिम भी रहता है। लोक-प्रियता इससे भिन्न है वह सभ्य और सज्जनों को-गुणी और पुरुषार्थियों को ही उपलब्ध होती है। इसे प्राप्त करने के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं वे अंततः उपयोगी ही सिद्ध होते हैं। इस मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति को अपने में अनेक ऐसी विशेषताएं उत्पन्न करनी पड़ती हैं जिनका परिणाम व्यक्ति और समाज के लिये श्रेयस्कर ही होता है। इस दृष्टि से लोकप्रियता प्राप्त करने की आकाँक्षा का समर्थन ही किया जाना चाहिये और उसके लिये आवश्यक पथ-प्रदर्शन भी किया जाना चाहिये। इस संदर्भ में कुछ ध्यान रखने योग्य सूत्र नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं-

1- अपनी आकृति चैतन्य और सजग जैसी रखिये। वस्त्रों को स्वच्छ और करीने का रखिये। मैले-कुचैले, टूटे-फटे, अस्त-व्यस्त, बिना बटन और बिना करीने के कपड़े चाहे वे कीमती ही क्यों न हों व्यक्ति के आलसी और लापरवाह होने की चुगली करते हैं। फैशन बनाने और शृंगार कर, सज-धज कर निकलने की बात तो नहीं कही जा रही है। पर वेश-विन्यास और चेहरे की चेष्टा ऐसी अवश्य होनी चाहिए जिससे स्वच्छता, जागरुकता और व्यवस्था का परिचय मिलता हो। चाल-ढाल, उठन बैठन, बातचीत में प्रमाणिकता और व्यवस्था की छाप रहनी चाहिए। हाथ मटकाना, आंखें नचाना, अकारण हँसना या ऐसी भावभंगिमा जो सभ्योचित न हो, नहीं अपनाई जानी चाहिए। दाँत से नाखून काटने, बार-बार अकारण सिर या कोई अंग खुजाने की आदत कई लोगों को पड़ जाती है और वे छोटी बातें दूसरों पर ऐसा असर डालती हैं जिससे व्यक्तित्व का मूल्य गिर जाता है। लोकप्रियता के लिए प्रथम व्यवस्था हमें यह जुटानी चाहिए कि अपनी वेश-भूषा एवं आकृति प्रकृति में सज्जनता और शिष्टता का आवश्यक पुट विद्यमान रहे।

2- चैतन्य और प्रसन्नता-बनाये रहें। चेहरा मनुष्य की आन्तरिक स्थिति का दर्पण है, इस कहावत में बहुत कुछ सचाई है। चेहरे पर प्रसन्नता और हलकी मुसकान का बना रहना इस बात का प्रतीक है कि वह व्यक्ति उलझनों से रहित है और सफलताओं की सम्भावनाओं से भरा-पूरा है। ऐसे ही व्यक्तियों का सान्निध्य लोग पसन्द करते हैं। मनहूस शकल बनाये बैठे रहने वाले, उदासी, खिन्नता विपत्ति और असफलता का भाव प्रकट करने वाले चेहरे दूसरों की उपेक्षा का कारण बनते हैं। मनोमालिन्य मतभेद अथवा उलझी हुई गुत्थी, प्रसन्न मुख चेहरे से बात की बात में सुलझ जाती है जबकि उसी बात को तूल देने वाले और गम्भीरता से लेने वाले लोग उलझन को और भी अधिक बढ़ा देते हैं। चर्चा के प्रसंगों में जहाँ तक सम्भव हो प्रसन्नता, आशा और उत्साहवर्धक प्रकरणों को ही आगे रखना चाहिए। आवेश और उत्तेजना से सदा बचे रहा जाय। मतभेद के प्रसंग यदि अनिवार्य हों तो ही आगे बढ़ाये जायें अन्यथा बातचीत के लिए वही आधार चुनने चाहिए जिनमें मतैक्य स्पष्ट दीखता हो।

3- शालीनता और सज्जनता को स्वभाव का अंग बना लें। अकारण आत्म प्रशंसा की आदत बुरी है, इससे अपना घटियापन प्रकट होता है। इसी प्रकार दूसरों की कमियों भूलों तथा असफलताओं की बार-बार चर्चा करना यह बताता है कि उनको तिरस्कृत लाँछित किया जा रहा है। अपनी सफलता को बार-बार बढ़ा चढ़ाकर चर्चा करना अपने अहंकारी उथली प्रकृति के होने का चिह्न है। अपने स्वाभिमान तथा दूसरों के स्वाभिमान की रक्षा की जानी चाहिए पर वह अहंकार को स्पर्श न करने पाये। अपनी गलती माने और दूसरों से कुछ सीखने के लिये जो व्यक्ति तैयार रहते हैं वे अपनी महत्ता की सहज छाप दूसरों पर छोड़ते हैं। अक्खड़, जिद्दी, अशिष्ट और रूखे स्वभाव के व्यक्ति अकारण ही अपने मित्रों की संख्या घटाते और विरोधियों को बढ़ाते चले जाते हैं। हमें सज्जनोचित नम्रता, शिष्टता और सज्जनता का वार्तालाप ही करना चाहिए वरन् समय-समय पर लोगों की सहायता और सेवा का भी कुछ न कुछ प्रयत्न करते ही रहना चाहिए। अपनी उदारता की छाप छोड़ने वाला ही लोकप्रिय बन सकता है।

4- अपने को प्रमाणिक सिद्ध कीजिये-वचन का पालन, समय की पाबन्दी, ईमानदारी और सचाई का व्यवहार, लेन-देन की सफाई, युवा नारियों के प्रति सम्भाषण अथवा व्यवहार में लोक मर्यादाओं का अधिक पालन, गोपनीयता की रक्षा, चुगली, निन्दा और ईर्ष्या से अरुचि, व्यंग और उपहास भरे मजाक न करना जैसे सज्जनोचित गुणों की मात्रा अपने में बढ़ा लेने से जहाँ अपने कार्य व्यवसाय में बढ़ोतरी होती है, वहाँ विश्वसनीयता एवं प्रमाणिकता के आधार पर लोकप्रियता में भी वृद्धि होती है।

5-लोकप्रियता का तकाजा यह है कि हम अपनी ही तरह दूसरों की इच्छायें भी जानें, उनकी अभिरुचि, आकाँक्षा तथा समस्याओं को सुने, समझे और जितनी उचित तथा सम्भव हो उतनी उनकी सहायता करें। यह सहायता परामर्श, प्रोत्साहन और जहाँ अपनी पहुँच हो वहाँ तक उन्हें पहुँचा देने के रूप में भी हो सकती है। सहानुभूतिपूर्ण रुख रखना और जब सम्भव हो सके तब उचित सहयोग देने का आश्वासन देना भी लोगों में आशा तथा उत्साह जगाये रहता है और लोकप्रियता बढ़ती रहती है।

6- अपने को उपयोगी सिद्ध कीजिए-लोग आमतौर से उसकी ओर आकर्षित होते हैं जिससे कुछ आशा होती है या प्रसन्नता मिलती है। लोग अपने पास आयें और प्रसन्नता लेकर जायें ऐसा वातावरण बनाये रहना चाहिये और यथासम्भव ऐसे साधन भी प्रस्तुत करने चाहिए अपनी योग्यताएं तथा विशेषताएं क्रमशः ऐसे बढ़ाते चलना चाहिए कि लोग आपको उपयोगी और समय पड़ने पर कुछ सहायता कर सकने वाला समझें। केवल गप्पे हाँकने विदूषक का पार्ट करने, बेगार में मारे-मारे फिरने, दोस्ती बाजी में पैसे उड़ाने, झूठे खैरख्वाह बनने, झूठी उम्मीदें दिलाने जैसे छिछले उपायों से जो सस्ती लोकप्रियता प्राप्त की जाती है वह ठहरती नहीं। उथले प्रयत्नों का कभी गहरा प्रभाव नहीं हो सकता।

हमारा व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए जो दूसरों की अपेक्षा अधिक विशेषता लिये हुए हो। आवश्यक नहीं कि धन, विद्या या पद में ही हम दूसरों से बड़े हो। यदि चरित्र, नम्रता, प्रमाणिकता, सज्जनता की दृष्टि से भी हम अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें तो निस्सन्देह लोकप्रियता बढ़ती जायेगी। मित्रों तथा प्रशंसकों की संख्या बढ़ेगी। जो व्यक्ति जितना लोकोपयोगी बनता जाता है उतना ही लोकप्रिय बनता जाता है। हमारा व्यक्तित्व जितना उत्कृष्ट बनता जायेगा उतना ही जनसाधारण को आकर्षित और प्रभावित करने की अपनी क्षमता बढ़ेगी और लोकप्रियता अनायास ही पीछे-पीछे भागती चली आयेगी।


सम्पदा नहीं महानता श्रेयस्कर है।

सम्पत्तिवान होकर सुखी रहा जायेगा ऐसा आमतौर से सोचा जाता है और इस भ्रान्त-धारणा के कारण लोग उचित-अनुचित का ध्यान रखे बिना जैसे भी बने वैसे सम्पत्ति उपार्जन का प्रयत्न करते हैं। प्रयास का परिणाम भी होता है। उद्योगी व्यक्ति धनी बन भी जाते हैं पर उस धन से सुख मिलेगा ही यह पूर्णतया संदिग्ध है दूसरे लोग धनी को सुखी समझें यह बात अलग है पर अनीतिपूर्वक उपार्जन करके उसे छाती के नीचे दबाकर बैठे रहने वाले व्यक्ति वस्तुतः इस धन से दुख ही अधिक पाते हैं। जिससे तृष्णा भी शान्त न हो और लोक-परलोक में दुःख उठाना पड़े ऐसा कृपण धनवान बनने से क्या लाभ?

आस्ट्रिया का अन्तिम राजा इतना धनी था कि उसे ‘न भूतो न भविष्यति’ कहा जाता था। ईसा से 226 वर्ष पूर्व जब वह मरा तो वह अपने महल में ढेरों ऐसी स्वर्ण अट्टालिकायें छोड़ गया था, जिनमें प्रत्येक में 4, 04, 202 ग्रेन से अधिक स्वर्ण लगा था, इतिहासकार डेरोडोलस के अनुसार इन अट्टालिकाओं में केवल स्वर्ण ही 98,325,000,000 उन दिनों का डालर मूल्य का था। संयुक्त राज्य अमेरिका का समस्त राज्य कोष 4,800,00,000 डालर का था। अनुमान लगाया जाना चाहिए कि समस्त अमेरिका की तुलना में वह धन 20 गुना अधिक था। निनवे नगर का उन दिनों विशाल वैभव राज्य महल तक ही सीमित रहा। उससे जनता कुछ लाभ न उठा सकी। जैसे ही शासन दुर्बल हुआ कि वह सारा राज्य वैभव लुटेरों द्वारा लूट लिया गया और वे भवन खंडहर मात्र रह गये।

अल्जीरिया के समुद्री डाकुओं ने भूमध्य सागर से होकर गुजरने वाले जहाजों के लिए भारी आतंक उपस्थित कर रखा था। उसके आक्रमण से शायद ही कोई बच पाता इस प्रकार उस क्षेत्र का व्यापार एक प्रकार से ठप्प ही पड़ा था। फ्रान्सीसी तो उनसे आजिज आ गये थे पर वह कुछ कर नहीं पाते थे। 300 वर्षों से अधिक समय तक अल्जीरियाई डाकुओं का यह उत्पात पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा ही चलता रहा।

निदान 7 नवम्बर 1942 को अमेरिका के नेतृत्व में एक जहाज बेड़ा इन डाकुओं से निपटने के लिए भेजा गया। फ्रान्स भी उसमें शामिल था। निदान डाकुओं पर विजय प्राप्त कर ली गई और उनमें लूट का धन वापिस लेने का निर्णय किया गया। फ्रान्स सरकार ने 1830 से चल रही इस डकैती में फ्रान्स को उठानी पड़ी क्षति का लेखा-जोखा तैयार करके बताया कि 55,684,525 स्वर्णिम फ्रेंक मुद्रा की उसे क्षति उठानी पड़ी है।

अल्जीरिया के कोषाध्यक्ष से चाबियों का गुच्छा लिया गया। खजाना खोला गया तो उससे सोने की ईंटें, हीरे, जवाहरात तथा ब्रिटिश नोटों का ढेर मिला, गिना गया तो वह 55,684,527 की निकली। क्षति-पूर्ति के लिए माँगे गये धन से ठीक दो फ्रंक धन अधिक। इस प्रकार फ्रान्स ने एक ही दिन में सारी क्षति पूर्ण कर ली और अल्जीरिया वालों को 300 वर्षों की उत्पात भारी कमाई क्षण भर में गँवा देनी पड़ी।

संचित सम्पदा जो किसी के काम न आये। किसी की आवश्यकता पूरी न करे और न किसी गिरे को उठाये उसे एक प्रकार का अभिशाप ही समझना चाहिए। संग्रहकर्त्ता की तृष्णा और कृपणता उसे एक प्रकार से दुर्भाग्य का प्रतीक बना देती है, फिर वह सम्पत्ति जहाँ भी जिसके पास भी रहती है उसी को संकट में डालती है।

संसार के बहुमूल्य हीरों के साथ एक विचित्र इतिहास जुड़ा हुआ है वे देर तक किसी के भी पास नहीं रहे। रुलाकर ही वे प्राप्त किये गये और जब वे गये तब अपनी निशानी रुलाई ही पीछे छोड़ गये।

संसार के प्रसिद्ध कोहिनूर हीरे के पीछे ऐसी ही दर्दनाक कथा जुड़ी हुई है। 186 कैरेट का यह बहुमूल्य हीरा 14 वीं सदी से 18 वीं सदी तक भारत में रहा और उसके लोभ में अनेक राजा महाराजाओं को अपने सिर कटाने पड़े। नादिरशाह ने इसे अपने तख्त ताऊस में जड़वाया फिर वह ईरान गया, ईरान से फिर वापिस आया। पीछे उसे अँग्रेज ले गये इस बीच इस अभागे हीरे के लिए कितनों को अपने प्राण गँवाने पड़े यह एक रोमाञ्चकारी गाथा है।

रूस की महारानी कैथरीन का एक बहुमूल्य हीरा उसके प्रियपात्र पोटेमाक्रिन के पास पहुँचा। उसे नेपोलियन ने छीना और अपनी पत्नी युजीन को विवाहोपहार के रूप में दे दिया। वह बेचारी भी उसे कैथरीन की तरह चैन से न पहन सकी। वह छिना और 1872 में लन्दन के बाजार में उसे नीलाम कर दिया गया।

रूसी राजदूत की तेहरान में हत्या कर दी गई। इस पर आक्रमण करने के लिये तैयार रूप से क्षमा-याचना के रूप में ईरान ने ‘शाह आफ एशिया’ नामक 88॥ कैरेट का हीरा भेंट करके तत्कालीन शासक जार का क्रोध ठण्डा किया।

इंग्लैंड के राजा हेनरी आफ नवारी के वित्त-मन्त्री डी. सेन्सी ने एक कीमती हीरा विश्वासी नौकर के हाथों भेजा डाकुओं से घिर जाने पर उस स्वामिभक्त नौकर ने अपना पैर चीरकर उसमें वह हीरा छिपा लिया। डाकुओं ने उसे लूटकर मार दिया। राजा ने उसकी लाश तलाश कराई तो उसमें वह हीरा मिल गया। इसके बाद वह डासेन्सी नामक हीरा लुई चौदहवें के पास चला गया और रुलाई की परम्परा साथ लेकर फिर किसी राज परिवार में जा छिपा।

स्टार आफ ईस्ट नामक 26 कैरेट का हीरा आर्च ड्यूक फर्डिनेण्ड के पास था। उनकी हत्या हो गई। उस हत्या के बहाने 1914 का प्रथम महायुद्ध छिड़ा और उसने लाखों के प्राण लिये। इसके बाद न जाने वह हीरा कहाँ चला गया।

128 कैरेट का हीरा ‘स्टार आफ साउथ’ के मालिक को मारकर उसके नौकर ने चुरा लिया। नौकर पानी के जहाज से उसे बेचने के लिये किसी दूसरे देश में जा रहा था कि जहाज के कप्तान को पता चल गया और उसने उसे मारकर वह हीरा हथिया लिया। इसे गुप्त रूप से मद्रास के गवर्नर सर टामस पिट ने खरीद लिया। जब वे इंग्लैंड वापिस पहुँचे तो मालूम हुआ कि यह रहस्य पहले से ही लोगों को विदित हो चुका है और उसे लूटने के लिए डाकू लोग घात लगाये बैठे हैं। पिट जान बचाने के लिये भाग खड़े हुए और भिखारी का वेश बनाये मुद्दतों उसे छिपाये फिरे फिर उन्होंने किसी को बेचकर अपना पिण्ड छुड़ाया। जिसने खरीदा था वह भी मुसीबत में फँसा और अन्ततः उसने भी बिना कीमत लिये ही उसे फ्रान्स के राज्यकोष में जमा कर दिया।

अपने आपको आकर्षण का केन्द्र बनाने की दृष्टि से लोग अपने में धन की, कला की तथा दूसरी विशेषतायें उत्पन्न करते हैं और उस विचित्रता के कारण लोगों का ध्यान खींचकर अपने अहंकार की पूर्ति करते हैं। पर ऐसा आकर्षण जिससे किसी का हित साधन न होता हो विपत्ति का कारण बनता है। ललचाई हुई आँखों से जो भी वस्तु देखी जाय उसे उपयोगी भी होना चाहिए। इसके विपरीत यदि वह आकर्षण मात्र रह गई तो वह सम्पदा जनता की नजर लगने से भी नष्ट हो जाती है। रूप सौंदर्य से लेकर निरुपयोगी सम्पदा तक का यही हाल होता है।

सन् 286 में जन्मा और 312 में मरा चीन का सुप्रसिद्ध रत्न व्यापारी वी.ची. ह्वान अपने रूप लावण्य के लिए भी उतना ही प्रख्यात था जितना कि अपने व्यापार की प्रामाणिकता के लिए। वह जहाँ भी जाता, दर्शकों की भीड़ लग जाती। कहने वाले कहते विधाता ने उसे जिस साँचे में ढाला है, उसने दूसरा कोई नहीं ढाला। जो देखता सो अपलक ही होकर रह जाता।

चीन के राजा ने उसे अमात्य बनाया पर वहाँ भी वह ठहरा नहीं- उसके नानकिंग जाने की बात सोची और वहीं चला गया। नानकिंग की जनता ने ऐसा देवताओं जैसा सुन्दर मनुष्य कभी आँखों से देखा न था, सो उसे देखने के लिए ठट्ठ के ठट्ठ लग गये। इतने लोगों का एक साथ इस प्रकार अभिरुचि के साथ देखना ह्वान के लिये अभिशाप बन गया। वह खड़ा-खड़ा लुढ़क पड़ा और दर्शकों के बीच ही उसकी मृत्यु हो गई।

मनुष्य बड़प्पन के लिये भी प्रयत्न कर सकता है और महानता की दिशा में भी चल सकता है। यह दो मार्ग पृथक-पृथक हैं। प्रतिभा निस्सन्देह प्रगति की सम्भावनायें प्रस्तुत करती है और सफलताएं सामने लाकर खड़ी करती है पर महत्व उस उपार्जन का नहीं उसके उपयोग का है। यदि सदुपयोग न किया जा सके तो उस उपार्जन को हेय ही ठहराया जायेगा। मनुष्य को निर्णय करना चाहिये कि उसे किस दिशा में चलना है। लक्ष्य में तनिक सा अन्तर रहने से उसके परिणामों में जमीन आसमान जैसा अन्तर आ जाता है।

स्विट्जरलैण्ड की नोजन नदी अपने मूल उद्गम से निकल कर पोम्पापलस नगर में दो भागों में विभक्त हो गई है। जमीन के ढलान ने इस विभाजन को दिशा परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। आधी नदी दक्षिण दिशा को चली गई है और उसका अन्त भूमध्य सागर में हुआ है। शेष आधी उत्तर दिशा में बही है और अंततः उत्तरी सागर में जा मिली है। विभाजन के स्थान पर ढलान का अन्तर तनिक सा है पर दिशा बदल जाने से एक ही नदी का जल सर्वथा भिन्न और एक दूसरे से अति दूर स्थान पर जा पहुँचा।

जेम्स स्वेन यों स्काटलैण्ड का निवासी था पर रोजी रोटी की तलाश में बाहर निकला और मैसाचुसेट्स, बोस्टन आदि में कुछ धन्धा-पानी करते हुए अंततः वह 1787 में फ्रान्स जा पहुँचा और वहाँ स्थायी रूप से बस गया उसने व्यापार में अच्छी सफलता पाई और क्रमशः उन्नति करते हुए बड़ा धनी बन गया।

उस समय फ्रान्सीसी सरकार अमेरिका की कर्जदार थी। यों लिया तो 20 करोड़ डालर ही गया था पर उसे ब्याज समेत 25 करोड़ डॉलरों में चुकाया जाना था फ्रान्सीसी सरकार उन दिनों ऐसी तंगी में थी कि उतना धन सहज ही चुका सकना उसके लिए शक्य न था। जेम्स सोचता रहा जब राष्ट्रीय स्वाभिमान दाँव पर लगा हुआ हो तो एक व्यक्ति का धनी बनकर जीना निरर्थक है। उसने अपनी सारी सम्पदा बेच दी वह इतनी अधिक थी कि उतने से ही अमेरिकन सरकार का सारा कर्ज उतर गया और फ्रान्स पूरी तरह ऋण मुक्त हो गया।

स्वेन के अपने गुजारे के लिये कुछ भी न बचा। वह जैसे-तैसे गुजारा करने लगा और पीछे कर्जदार भी हो गया। कर्ज न चुका सकने के अभियोग में उसे लम्बी सजा भुगतनी पड़ी। जेल से छूटने पर उसका स्वास्थ्य जर्जर हो गया। छूटने के तीन दिन बाद ही वह असहाय स्थिति में मर गया। पर उसने किसी से भी यह शिकायत नहीं कि मैंने फ्रान्स की जनता के लिये इतना किया तो दूसरे लोग मेरी तनिक सी सहायता करने भी आगे नहीं आते।

उदार मनुष्य भले ही धन, विद्या बल, वैभव कुछ भी उपार्जित करें पर उनका लक्ष्य यही रहता है कि इसे लोक मंगल के लिये खर्च किया जाए, ऐसे ही मनुष्य धरती के देवता कहलाते हैं और युग-युगान्तरों तक सराहे जाते हैं।


कर्तव्य पालन ही सबसे बड़ा पुरस्कार (Kahani)

कर्तव्य पालन ही सबसे बड़ा पुरस्कार

पूर्व दिशा में उषा की लालिमा दिखाई देने लगी। अन्धकार के विदा होने का समय निकट आ गया। भगवान भास्कर भी अपने रथ पर सवार गगन पथ पर आगे बढ़ने लगे। दीपक की लौ ने अपना मस्तक उठाकर सूर्य को प्रणाम किया और बुझ गया।

सूर्य को देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि मेरी अनुपस्थिति में दीपक ने अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाया है। वह दीपक को वरदान देने के लिए तैयार हो गया।

दीप की आत्मा सहज भाव से बोल पड़ी ‘सूर्य देव’! संसार में अपने कर्त्तव्य पालन से बढ़कर कोई अन्य पुरस्कार भी हो सकता है, मैं नहीं जानती। मैंने तो आपके द्वारा दिये गये उत्तरदायित्वों का निर्वाह किया है इसमें प्रशंसा की बात ही क्या?

सूर्य ने सन्तुष्ट होकर अपने रथ को आगे बढ़ने का आदेश दिया।


साहस के रहते अपंगता बाधक नहीं

शरीर में कोई अंग कम हो या अपंग हो तो उस स्थिति में स्वभावतः साधारण जीवन क्रम बिताना कठिन होता है। ऐसे बाधित व्यक्ति आमतौर से दूसरों की कृपा पर निर्भर परावलम्बी जीवन जीते अथवा भिक्षा वृत्ति पर निर्वाह करते देखे गये हैं।

इस प्रकार के लोगों को शारीरिक कमी के कारण जितनी कठिनाई उठानी पड़ती है, उससे कहीं ज्यादा मानसिक दुर्बलता से उठानी पड़ती है। हर कोई उन्हें दया का पात्र, बेचारा, अभागा दैवी कोप का भाजन, प्रारब्ध भोगी आदि कहते बताते रहते हैं। हर किसी के मुँह से जब वह अपने बारे में यही सुनता रहता है तो उसे विश्वास जम जाता है कि वस्तुतः वह दुर्भाग्य ग्रस्त ही जन्मा है। अब वह कुछ कर न सकेगा, उसकी प्रगति के मार्ग बन्द हैं। उसे दूसरों के आश्रित होकर जीने की बात सोचनी चाहिए। यदि भाग्य में स्वावलम्बी जीवन होता तो फिर विपत्ति ही क्यों आती। आदि विचार जब निरन्तर मन में घूमते रहते हैं तो फिर उसका साहस टूट जाता है, मन भर जाता है और प्रगति की बात तो दूर अपने पैरों आप खड़े हो जाने का मनोबल भी जागृत नहीं होता।

शरीर की कमी वस्तुतः इतनी बड़ी कमी नहीं हैं जिसे मनोबल द्वारा पूरा न किया जा सके। महत्वपूर्ण काम तो मस्तिष्क करता है, दूसरे अंग तो उसकी आज्ञाओं का पालन भर करते हैं। यदि एक अंग बिगड़ गया है तो उसकी आवश्यकता दूसरा अंग पूरी कर सकता है। यदि उत्कृष्ट इच्छा शक्ति काम करे तो वह अस्त-व्यस्त अंग भी कुछ काम दे सकता है। इस प्रकार शरीर के अन्य अंग को अधिक सक्षम बनाकर उस विकृत या अपंग अवयव की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।

संसार में ऐसे अनेकों मनुष्य हुए हैं, जिनका शरीर किसी दुर्घटना के कारण अथवा जन्मजात रूप से अपंग हो गया। किन्तु उसका मनोबल बना रहा, हिम्मत नहीं हारी और साहस समेट कर प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे उन्हीं टूटे फूटे अंगों से काम लेना शुरू किया, विकारग्रस्त अंग की आवश्यकता दूसरे अंग से पूरी की और इस प्रकार जोड़-तोड़ मिलाकर अपनी गाड़ी धकेलनी आरम्भ कर दी।

सामान्य लोग इच्छा शक्ति दुर्बल होने के कारण सभी अंग सही होने पर भी कुछ महत्वपूर्ण काम कर नहीं पाते, ऐसे ही आलस में पड़े असफल जीवन बिताते रहते हैं। इसके विपरीत इच्छा शक्ति के धनी मनस्वी व्यक्ति अंगहीन अथवा साधन हीन होने पर भी इतनी प्रगति कर लेते हैं कि जिसे देखकर सर्वांग गठित किन्तु आलसी व्यक्तियों को ही अभागा मानना पड़ता है।

वस्तुतः साहस की प्रखरता सबसे बड़ा अवलम्बन है। इच्छा शक्ति जिसकी तीव्र है उसे कठिनाई या कमी तिरस्कृत जीवन जीने के लिये बाध्य नहीं कर सकती वह स्वावलम्बी और प्रगतिशील होकर ही रहता है। पुरुषार्थ और मनोबल में वह शक्ति मौजूद है जिसके आधार पर दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सके।

चार्ल्स फेलू सन् 1830 में बेल्जियम के एक छोटे देहात में पैदा हुए और 70 वर्ष की आयु भोगकर सन् 1900 में मरे। वे बिना हाथों के पैदा हुए थे पर 19वीं सदी के महान चित्रकारों में से एक थे। उन्होंने हाथों के अभाव की पूर्ति पैरों से की और अत्युत्तम चित्र बनाने लगे इनके हर चित्र के नीचे लिखा रहता था, ‘केवल पैरों की सहायता से चित्रित’ उनकी कला से प्रभावित होकर बेल्जियम और रूस के शासन ने उनकी सहायता भी की। बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने उनसे हाथ मिलाने की रस्म पूरी करने के लिए उनका पैर छुआ और उसे हिलाया। राजा कहा करते थे, हाथ मिलाने की ऐसी सुखद अनुभूति मुझे जीवन में अन्यत्र कभी नहीं मिली।

उत्तरी अमेरिका के बाल्टीमोर नगर का निवासी जानी नामक व्यक्ति 27 अगस्त 1910 को पैदा हुआ। उस विचित्र बालक के शरीर में कमर से नीचे का कोई भाग उसके शरीर में था ही नहीं। पैरों का निशान भी जिसके न हो ऐसा गोल गेंद सा बच्चा देखने के लिए भीड़ बहुत जमा हुई पर किसी को भी उसके कुछ घण्टे से अधिक जीवित रहने की आशा नहीं थी; परन्तु वह मरा नहीं- जीवित बच गया। जीवित ही नहीं रहा वरन् अपने बुद्धि बल और अध्यवसाय में एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया कि यदि साहस और लगन का अभाव न हो तो शारीरिक अपूर्णताओं के रहते हुए भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

जानी ने शिक्षा प्राप्त की। एक कुशल टाइपिस्ट बना, नकशा नवीस और लेखक बना। इतना ही नहीं उसने हँसने-हँसाने और जादूगरी तथा नट विद्या में भी प्रवीणता प्राप्त की। वह एक विलक्षण नर्तक था, उसका नृत्य देखने के लिए दर्शकों की अपार भीड़ जमा होती थी।

बचपन में उसने हाथों के बल चलना सीखा और पढ़ने की आयु में बराबर स्कूल जाता रहा। 14 वर्ष की आयु में उसने हाई स्कूल उत्तीर्ण किया। खेलों में भी उसकी रुचि थी। बिना पैर का होते हुए भी, केवल हाथों के सहारे उसने बेसबाल, टेनिस, आँखमिचौनी, तैराकी, गोताखोरी में प्रवीणता प्राप्त की। वह जीवन भर हँसता और हँसाता रहा। कभी किसी ने पैर न होने की चर्चा चलाई तो उसने यही कहा-मनोबल के रहते किसी अवयव का अभाव मनुष्य की प्रगति और सुख-शान्ति में बाधक नहीं हो सकता।

वेने (न्यूजीलैण्ड) की डच बस्ती में फ्रांसिस ए. वरडेट नामक अन्धे व्यक्ति ने अपने पुरुषार्थ से लगातार 13 वर्ष के परिश्रम से एक विशालकाय मकान बनाया। जिसमें तीन तल्ले, सात कमरे और स्नान घर आदि सभी व्यवस्थायें मौजूद हैं। सब कुछ करीने से बना हुआ है और वस्तुयें इस तरह व्यवस्था पूर्वक कलात्मक ढंग से लगी हुई हैं मानो किसी कुशल इञ्जीनियर ने उसे बनाया है।

इस अंधे व्यक्ति ने मकान की पूरी योजना स्वयं ही बनाई। छोटे से बड़े काम तक बढ़ई, राज मिस्त्री, लुहार आदि के बहुत से काम उसने स्वयं किये और जहाँ अनिवार्य हो गया वहीं दूसरों की सहायता ली। तिरसठ वर्ष की आयु में एक अन्धे व्यक्ति द्वारा आरम्भ कराया गया यह कार्य एक विलक्षण सूझ-बूझ और लगन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता है जिसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है। जबकि बुढ़ापे से थके होने और आराम करने की बात दूसरे वृद्धों के मस्तिष्क में रहती है तब वरडेट जैसे उद्योगी की यह पुरुषार्थ परायणता एक नया ही उदाहरण प्रस्तुत करती है। न्यूजीलैण्ड सरकार ने उस मकान को अपराजेय इच्छा शक्ति, उत्साह, धैर्य और सूझ-बूझ की मूर्तिमान प्रदर्शनी के रूप में खुला रखा है ताकि दूसरे लोग भी प्रेरणा प्राप्त करते रह सकें।

सोलहवीं सदी का प्रसिद्ध नृत्यशास्त्री सीवस्टीन स्पिनोला-फ्रेंच नृत्य एवं संगीत का पिता माना जाता है। उसकी प्रगति गाथा बड़ी प्रेरक है। 11 वर्ष का जब वह बालक ही था तभी उसके दोनों पैर एक दुर्घटना में घुटनों से नीचे के काट दिये गये। देखने वालों की दृष्टि में वह अपंग और दया का पात्र था। पर उसने अपने को स्वयं वैसा ही नहीं माना और जब अपनी चर्चा होती तो यही कहता पैर तो शरीर का सबसे निचला और कम उपयोगी अंश है। जब तक मेरा मस्तिष्क और हृदय मौजूद है तब तक न मुझे अपंग कहा जाय और न दयनीय माना जाय। वह कटे हुए पाँवों को ही प्रशिक्षित बनाता रहा और नृत्यविद्या में इतना पारंगत हो गया कि उसकी कला देखकर दर्शक मन्त्र मुग्ध ही नहीं हो जाते थे वरन् उस विषय में रुचि रखने वाले उससे शिक्षा भी प्राप्त करते थे। नृत्य ही नहीं उससे गायन में भी पारंगतता प्राप्त की, इतना ही नहीं उसने फ्रान्सीसी गायन को महत्वपूर्ण दिशायें भी दीं।

ऐसी ही एक और भी उदाहरण है जिसमें किसी अंग से काम न लिये जाने पर उसमें अतिरिक्त क्षमता उत्पन्न हो जाने का प्रमाण भी मिलता है। बाधित लोग यदि प्रयत्न करके देखें तो उनके अपंग समझे जाने वाले अवयव भी कुछ विशेष काम कर सकने योग्य किसी अद्भुत शक्ति से सम्पन्न भी दिखाई पड़ सकते हैं। कास्पर हासर गेंड उची राज्य का राजकुमार था। गद्दी के लालचियों ने उसका अपहरण बचपन में ही कर लिया और राज्य को हथियाने का अपना रास्ता साफ कर लिया। अपहरणकर्त्ताओं ने इतनी तो दया दिखाई कि उसे मारा नहीं वरन् ऐसे स्थान पर कैद कर दिया जहाँ प्रकाश और हवा की बहुत कमी थी। उन्होंने सोचा कुछ दिन में वह ऐसे ही बीमार होकर मर जायेगा।

कास्पर 18 साल तक ऐसे ही अन्धकार भरे वातावरण में कैद रहा। एक बार उसे अवसर मिला तो उस काल कोठरी से निकल भागा और अन्सपच, बाइवेरिया के जंगलों में भटकते-भटकते अपनी जन्मभूमि जा पहुँचा। तब तक लोग उसे पूरी तरह भूल गये थे।

पर उसमें दो अतिरिक्त विशेषताएं पाई गई जो वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों के लिए खोज का विषय बनीं और उसकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का अध्ययन करके नये निष्कर्ष निकालने में उनसे बहुत सहायता ली।

कास्पर दिन में तारे देख सकता था। यह बात असत्य नहीं थी। ग्रह गणितज्ञों ने जब भी उससे पूछा उसने विदित नक्षत्रों के स्थान सही बताये। उसके कथन में रत्तीभर भी अन्तर नहीं पाया गया इससे निष्कर्ष निकला कि यदि नेत्र-ज्योति को किसी विशेष परिस्थिति में रखकर विशिष्ट विशेषताओं से सम्पन्न किया जा सके तो वह इतनी तीव्र भी हो सकती है कि सूर्य का प्रकाश रहते हुए भी तारे देख सकने जैसे अद्भुत कार्य कर सके। दूसरी विशेषता यह भी कि बहुत छोटी उम्र में उसका अपहरण किया और उसे एकाकी रखा गया था। ऐसी स्थिति में उसका मानसिक विकास आयु वृद्धि के साथ नितान्त स्वल्प ही हो सका। काम-वासना से वह अपरिचित था और लोक व्यवहार में भी उसकी गति छोटे बालकों से अधिक नहीं थी।

शरीर के किसी अंग का टूट-फुट जाना उतना बड़ा दुर्भाग्य नहीं है जितना मनोबल खो देना। यदि अपंग कहे जाने वाले लोगों का मनोबल ऊँचा उठाया जा सके, उनमें साहस और उत्साह पैदा किया जा सके तो वे न केवल स्वावलम्बी वरन् प्रगतिशील भी बन सकते हैं। इच्छाशक्ति की सामर्थ्य शरीर के किसी अंग से अधिक मूल्यवान है यदि यह तथ्य लोग समझ सकें तो फिर इस संसार में एक भी दुर्भाग्यग्रस्त दिखाई न पड़े।


सादगी भरा जीवन (Kahani)

लखनऊ में हजरत गंज का भीड़भाड़ वाला चौराहा। जहाँ वाहनों की कमी नहीं रहती। एक सज्जन गाँधी टोपी लगाये, खादी की धोती कुरता पहने किसी वाहन की प्रतीक्षा में इधर-उधर घूम रहे थे। चेहरे पर मुस्कान और कभी चिन्ता की बनती मिटती रेखायें। ऐसा लगता था मानो उन सज्जन को कहीं जल्दी में जाना है और वाहन मिल नहीं रहा है।

आखिर एक मरियल से जुते हुये घोड़े वाले इक्के पर बैठकर विश्वविद्यालय की ओर चल दिये। उनका इक्का गोमती पुल पर पहुँचा ही था कि सामने से एक कार आकर रुकी। इक्के वाले को भी अपना इक्का रोकना पड़ा। उसकी कार में से एक सज्जन नीचे उतरे ओर अभिवादन के बाद बोले ‘आपके लिये यह कार तैयार है आप इक्के को यहीं छोड़ दीजिये मैं आपको अभी विश्वविद्यालय पहुँचाये आता हूँ।’

‘आपकी इस कृपा के लिए धन्यवाद। अब विश्वविद्यालय रह ही कितनी दूर गया है जैसी कार, वैसा इक्का, क्या अन्तर पड़ता है?’ यह उत्तर देने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय के उपकुलपति आचार्य नरेन्द्र देव थे। जिन्हें विश्वविद्यालय की एक आवश्यक मीटिंग में जाना था और कार कितने ही दिनों से खराब पड़ी थी।

वह अपने वेतन का एक तिहाई छात्रों के हित में खर्च करते थे और एक तिहाई समाजवादी दल की गतिविधियों के लिये स्वेच्छा से दान देते थे अब रह गया वेतन का 33 प्रतिशत भाग उसमें आकस्मिक आये हुये सभी खर्चों को पूर्ण करना सम्भव न था।

विश्वविद्यालय के उपकुलपति के जीवन में कितनी सादगी थी।


अपनों से अपनी बात - बहुमूल्य अनुदान के लिए पात्रता की शर्त

आत्मिक विभूतियों की गरिमा-भौतिक सम्पदाओं से हजार गुनी बढ़कर है। आत्मबल की तुलना संसार के किसी बल वैभव से नहीं की जा सकती है। ईश्वरीय अनुग्रह से सम्पन्न व्यक्ति कितना समर्थ होता है और अपनी सामर्थ्य से कितनों को प्रकाश देता, पार उतारता है, इसकी यथार्थता जानने के लिये हमें आत्मबल सम्पन्न महामानवों की जीवनियाँ पढ़नी चाहिए। विश्व आकाश में उनका प्रकाश सूर्य चन्द्र की तरह चमकता रहता है। काय कलेवर न रहने पर भी वे युगों तक अपने प्रकाश से अगणित भूले-भटकों का श्रेयानुवर्ती मार्गदर्शन करते रहते हैं। ऐसे देव मानवों से ही मानवता गौरवान्वित होती है।

सच तो यह है कि हमने न कभी आत्मबल संग्रह का महत्व समझा और न कभी सच्चे मन से उसके लिये प्रयत्न किया। यदि उस गरिमा की ठीक तरह समझा गया होता और गम्भीरता पूर्वक उसके लिए कुछ किया गया होता तो कोई कारण नहीं कि कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हाथ न लगती।

एक अत्यन्त भ्रम भरी मान्यता यह प्रचलित है कि ईश्वर किसी ऐसी खुशामदी भोले और मापदण्ड रहित व्यक्ति का नाम है। उसे थोड़े पूजा उपचारों और जप स्तवन का लोभ देकर वशवर्ती बनाया जा सकता है। इसी प्रकार धर्मानुष्ठानों के कर्मकाण्ड मात्र का आकाश-पाताल जैसा महात्म्य मानकर यह सोचा जाता है कि उतने भर से ही सकल मनोकामनाएं सिद्ध हो सकती हैं। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रधान बाधक पाप प्रवृत्तियों के निराकरण के स्थान पर यह सोचा जाता है कि स्नान दर्शन जैसे क्रिया कौतुक करके उनके दण्ड परिणामों से बचा जा सकता है। यह मान्यताएं आदि से अन्त तक गलत है। जब तक इन भ्राँतियों से ऊपर न उठा जायेगा तब तक न तो आत्मबल सम्पादन के लिए आवश्यक कुछ ठोस प्रयत्न बन पड़ेंगे और न उथले क्रिया कौतुकों से किसी के हाथ कुछ लगेगा।

उपरोक्त भ्राँतियाँ कितनी निरर्थक हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज के तथाकथित आत्मवादियों के स्तर और स्वरूप को देखकर सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। पूजा, अर्चा में निरत व्यक्ति सर्वथा खाली हाथ दीखते हैं जबकि व्यायाम में, व्यापार में यश गौरव में, कला-कौशल में निरत व्यक्ति अपने प्रयोजन में काफी सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं। 56 लाख सन्त जिस देश में हो वह इस दयनीय दुर्दशा में पड़ा रहे यह हो ही नहीं सकता। किसी जमाने में सात ऋषि थे और वे तत्कालीन विश्व के सात द्वीपों को प्रकाशवान करते थे पर आज तो यह सन्त महात्मा स्वयं अपने लिये भार बनकर रह रहे हैं। देवाराधन से प्रचण्ड वरदान प्राप्त कर सकना एक सचाई है पर आज देश के 7 लाख मन्दिरों में पूजा-अर्चना के लिए नियुक्त 7 लाख पुजारियों की स्थिति दयनीय है। दूसरों की समृद्धि सुरक्षा बढ़ाने के लिये जप, पाठ, अनुष्ठान करते रहने वाले पंडित लोग स्वयं निर्धनता से ग्रस्त रहें इसका क्या कारण है?

तथ्यों का ऊहापोह करने पर यही स्पष्ट होता है कि या तो आत्म विज्ञान ही मिथ्या है या उसका प्रयोग सही ढंग से नहीं हो रहा है। पिछले दिनों आत्म विज्ञान के मिथ्यात्व की ही घोषणा की जाती रही है। कम्युनिज्म ने उसे कपोल कल्पित कहा। वैज्ञानिकों ने उसे अवैज्ञानिक ठहराया। पूजा-पाठ से निराश व्यक्तियों ने उस पर अविश्वास प्रकट किया। नीत्से प्रभृति बुद्धवादियों ने आस्तिकता को अप्रमाणिक ठहराया। यह प्रवाह पिछले दिनों इतने जोरों से चला-आस्तिकता पर बुद्धिवाद के इतने प्रबल प्रहार हुए कि आत्म विज्ञान के समर्थक हतप्रभ रह गये। लगने लगा कि अगली पीढ़ी संभवतः नास्तिकों की ही पीढ़ी होगी।

ऐसे विषम अन्धकार को चीरते हुए गुरुदेव का व्यक्तित्व प्रकाश में आया। उन्होंने आत्मवादी वर्तमान प्रयोग की असफलता तो स्वीकार की, पर साथ ही यह भी कहा कि आत्मविज्ञान मिथ्या नहीं - उसके प्रयोग में त्रुटि है उस संदर्भ में प्रचलित मान्यताएं दोषपूर्ण हैं। यदि मान्यताओं और प्रयोगों का स्तर सुधार लिया जाय तो अध्यात्म की क्षमता पूर्वकाल की तरह पुनः प्रचण्ड यथार्थता के रूप में सामने प्रस्तुत हो सकती है। लगता है गुरुदेव का अवतरण नास्तिकवादी प्रवाह को आस्तिकता की दिशा में मोड़ने के लिये ही हुआ। उन्होंने प्राचीन काल के धर्म प्रचार को और तत्वदर्शियों से भिन्न प्रकार की ऐसी शैली अपनाई, जिसके बिना नास्तिकतावादी आक्रमण और आत्मवादी क्षेत्र में फैले हुए घोर अन्धेर अन्धकार का निराकरण हो ही नहीं सकता था।

अध्यात्मवाद का स्वरूप, दर्शन और प्रयोग को समझने के लिये हमें गुरुदेव के प्रतिवादनों को ही नहीं उनके प्रयोगों को भी समझना होगा। उनकी कथनी को ही नहीं करनी को भी महत्व देना होगा और आस्तिकता का विवेचन विश्लेषण करने के साथ गुरुदेव की उपलब्धियों पर भी विचार करना होगा। इस प्रत्यक्ष प्रमाण से ही बुद्धिवादी आशंकाओं और अनास्थाओं का समाधान सम्भव है। जिस प्रकार शोध प्रबन्धन के लिये अन्वेषण कार्य किया जाता है उसी प्रकार यदि गुरुदेव के जीवन प्रयोगों की खोज की जाय तो अध्यात्म तत्वज्ञान की यथार्थता पर अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्रमाणिक प्रकाश पड़ सकता है तथा इन दिनों जो गतिरोध विग्रह इस क्षेत्र में उठ खड़ा हुआ है उसका हल समाधान मिल सकता है।

गुरुदेव ने लम्बे गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला पूर्ण की, पर मन्त्र जप के साथ-साथ वे अपनी अन्तः चेतना पर जमे हुए कषाय कल्मषों को रगड़ने, धोने, छुड़ाने का भी प्रयास करते रहे। शरीर चेतना से ऊँचे उठकर उनने आत्मबोध प्राप्त किया, अपने को आत्मा के रूप में अंगीकार किया। शरीर और मन को बाह्य उपकरण मानकर उसी अनुपात से उन्हें संरक्षण दिया। आत्म-परिष्कार जब लक्ष्य बना तो सर्वतोमुखी प्रगति प्रयास भी उसी क्षेत्र में केन्द्रित होने स्वाभाविक थे। पुरश्चरणों का कर्मकाण्ड और आत्म-परिष्कार का प्रबल पुरुषार्थ- यह उभय पक्षी समन्वय ही उस तपश्चर्या में प्रखरता उत्पन्न कर सका। यदि वह एकाँगी रहा होता, माला भर गिनते रहने की लकीर पिटती रहती तो असंख्य अन्य भजनानंदियों की तरह वे भी छूँछ ही बने रहते।

अखण्ड दीपक पर पुरश्चरणों की शृंखला सम्पन्न करते हुए उन्होंने भावना क्षेत्र में यह निष्ठा परिपक्व की कि जीवन को ज्वलन्त दीप शिखा की तरह अन्तरंग एवं बहिरंग क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न करने के लिये तिल-तिलकर जलते रहने की प्रक्रिया व्यवहार में लाई जानी चाहिये यदि दीप उपकरण के साथ-साथ वे आत्म-ज्योति को प्रकाशवान बनाने का लक्ष्य सामने रखकर न चले होते तो उनकी अखण्ड-ज्योति भी मात्र रोशनी पैदा करने का तुच्छ सा प्रयोजन पूरा कर सकी होती।

उपासनात्मक विधान का कर्मकाण्ड और जीवन साधना की निरन्तर गतिशील तप साधना का समन्वय ही वह मर्म है जिसके आधार पर गुरुदेव अध्यात्म विज्ञान की गरिमामयी यथार्थता को अपनी उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित कर सके। हर कोई जानता है कि उनका व्यक्तित्व ‘असाधारण’ है। युग-निर्माण परिवार का विशालकाय संगठन, हर दिशा से प्रगति पथ पर अग्रसर युग-परिवर्तन अभियान। एक लाख सजग आत्माओं की सृजन सेना का गठन, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का गगन भेदी शंखनाद, आर्ष साहित्य का सर्व सुलभ सरलीकरण, युग साहित्य के सृजन का अजस्र प्रवाह आदि लोक मंगल के लिये उनके प्रयासों को अनुपम और ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है। अपनी व्यक्तिगत तप साधना से उनने अगणित व्यक्तियों की भौतिक और आत्मिक सहायताएं की हैं उनके प्रतिफल को देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है। गुरुदेव की निजी देवोपम जीवनचर्या का लेखा-जोखा लिया जाय तो उसे पग-पग पर अतिमानवी और चमत्कारी पाया जा सकता है। एकाकी व्यक्ति इतने बड़े सफल प्रयासों का साधन रहित स्थिति में कैसे सृजन संचालन कर सकता है यदि एक शब्द में इसका उत्तर लेना हो तो उसे अध्यात्म विज्ञान की यथार्थता का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सकता है।

भूतकाल के आत्मबल सम्पन्न महामानवों की अति मानवी क्षमता के विवरण अत्युक्ति भी कहे जा सकते हैं पर इस जीवित प्रामाणिकता से इनकार कैसे किया जाय। यह मूर्तिमान तथ्य यह सिद्ध करता है कि आत्म-जागरण और आत्मबल सम्पादन-संसार की बड़ी से बड़ी सफलता से बढ़कर हैं। उसे प्राप्त कर सकना मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

आत्मविद्या के इस एक सजीव प्रमाण से भी उसकी गरिमा का निश्चय हो सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि फिर इस प्रयास में संलग्न लाखों व्यक्तियों को कुछ लाभ क्यों नहीं मिलता। इसका एक ही उत्तर है- उपासना क्रम का उथलापन। लोग क्रिया-कृत्यों को सब कुछ मान बैठे हैं- धर्मानुष्ठानों का विधि-विधान ही उनके लिए सब कुछ है, गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कार से लेकर भावना क्षेत्र में स्नेह साधना के दिव्य दृष्टि-कोण को स्थान देने की आवश्यकता ही नहीं समझी। फलस्वरूप उस छोटे से शारीरिक श्रम का जितना स्वल्प लाभ हो सकता है था उसके अतिरिक्त और कुछ अधिक हाथ न लग सका। ईश्वर को अबोध बालक मान बैठना उपहासास्पद है। शब्द जञ्जाल में तुच्छ से उपहारों में छुट-पुट क्रिया-कृत्यों से उसे बहकाने, फुसलाने का प्रयास अपने ही अनाड़ीपन का परिचय देना है। इन दिनों अधिकाँश लोगों की ऐसी ही अधूरी बचकानी पूजा-पत्री लकीर पीटने की तरह प्रयुक्त होती रहती है। ऐसी दशा में निराशा हाथ लगे तो आश्चर्य ही क्या? अधूरे प्रयास की असफलता को अध्यात्म तत्वज्ञान की संदिग्धता मान बैठना किसी भी प्रकार उचित न होगा।

गुरुदेव की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने आस्तिकता की गरिमा को अपनी जीवन प्रयोगशाला में यथार्थ सिद्ध किया और उन लोगों का मुँह बन्द किया जो इसे भ्रम या छद्म कह रहे थे। इस संदर्भ में अगली कड़ी यह है कि आत्मिक प्रगति का यही वह आधार उन्होंने प्रतिपादित किया जिसे सम्प्रदायवादी अन्धड़ ने एक प्रकार से विस्मृत एवं अस्त-व्यस्त ही कर दिया था। गुरुदेव ने अपने लेखों और प्रवचनों में ही नहीं आचरण की भाषा में भी यह कहा कि यदि देव सान्निध्य ईश्वरीय अनुग्रह आत्मबल अभीष्ट हो तो सबसे प्रथम चरण दृष्टिकोण के परिष्कार का उठाया जाना चाहिए। अपने को मात्र शरीर और मन से बना माँस पिण्ड मानकर वासना, तृष्णा के पेट प्रजनन के क्षुद्र प्रयोजनों में ही संलग्न नहीं रहना चाहिए वरन् कुछ आत्म-कल्याण की मानवी गरिमा की जीवनोद्देश्य की बात भी सोचनी चाहिए और उसके लिए भी कुछ कारगर प्रयत्न करने चाहिए। यदि इस स्तर की आकाँक्षा और चेष्टा जग पड़े तो निस्सन्देह जीवन क्रम में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता भरती चली जायेगी। कहना न होगा श्रेष्ठ चिन्तन और उत्कृष्ट कर्तृत्व को गहन आस्था स्तर पर अपना लेना ही आत्मबल सम्पादन का एकमात्र आधार है। जिसने इस अवलम्बन को अपना लिया उसके लिए दिव्य अनुदान करतलगत रहेंगे। वह अपने को ईश्वरीय सत्ता का उत्तराधिकारी अनुभव करेगा अन्तःकरण पर से अहंता और लिप्सा के कषाय कल्मष हटते ही अन्तरंग में छिपा पड़ा ब्रह्मवर्चस ज्योतिर्मय हो उठेगा और व्यक्ति अपने को ईश्वर में और ईश्वर को अपने में ओत-प्रोत अनुभव करेगा।

यही है वह साधना उपक्रम जिसे गुरुदेव अनन्य निष्ठा के साथ आजीवन अपनाये रहे और जो भी संपर्क में आया उसे आत्म विद्या के इसी मर्म तथ्य को समझाने में लगे रहे। कहा नहीं जा सकता कि बात कितनों के गले उत्तरी पर जिनने भी उसे गहराई से समझा और अपनाया उन्होंने अपने प्रयास के अनुरूप वही पाया जो गुरुदेव ने तथा पूर्ववर्ती आत्मवादियों ने समय-समय पर प्राप्त किया है। जो सस्ते मूल्य में अत्यधिक पाने की जुआरी मनोवृत्ति अपनाकर ईश्वर संपर्क में भी दाव लगाते रहे- प्रचलित प्रवञ्चना से ऊँचे न उठ सके उनके तनिक से तन्त्र-मन्त्र द्वारा मनोकामनाओं की पूर्ति की कौड़ी कदाचित ही पट्ट पड़ी होगी।

कभी-कभी ऐसा आवश्यक होता है कि कोई सिद्ध पुरुष अपनी तप पूँजी में से एक अंश किसी दीन-दुखी को देकर उसका बोझ हलका कर देते हैं और अपनी सहज सज्जनता से यह कह देते हैं कि यह अमुक मन्त्र या देव का अनुग्रह है। इससे आरम्भिक छात्र का कुछ आकर्षण बढ़ता है। इस सीमा तक इसका औचित्य भी है। पर साथ ही एक हानि भी हो सकती है। यदि कोई छुट-पुट मन्त्र-तन्त्र का भारी लाभ मान बैठे और किसी देव आत्मा के अनुदान को भूल बैठे तो न केवल वह कृतघ्न ही बनता है वरन् इस भ्रम में भी पड़ जाता है कि मन्त्र-तन्त्र के क्षुद्र प्रयासों से भविष्य में भी कोई बढ़-चढ़कर लाभ उपलब्ध किया जा सकता है।

गुरुदेव के व्यक्तित्व का अधिक गहरा विश्लेषण किया जाय तो उन्हें यथार्थ अध्यात्म का सजीव तत्वदर्शन और प्रमाणिक तप विधान कह सकते हैं। उन्होंने अब तक के अपने क्रिया-कलाप से यह सिद्ध किया है कि आत्म विद्या की उपलब्धियाँ समस्त विश्व की सम्मिलित समृद्धि उपलब्धियों से असंख्य गुनी अधिक सामर्थ्यवान हैं। उन्होंने उस विस्मृत और उपेक्षित आधार को भी पुनर्जीवित किया है जिस पर चलकर अनादि काल से अद्यावधि आत्मिक सफलताएं असंदिग्ध रूप से प्राप्त की जा रही हैं। युग की बढ़ती हुई नास्तिकता के प्रतिरोध के लिए कम से कम इतना प्रयोग आवश्यक था, सो एक प्रकार से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। अब उन लोगों के मुँह चुनौती पूर्वक बन्द किये जा सकते हैं जो अध्यात्म विज्ञान की यथार्थता को कपोल कल्पना कहकर झुठलाते थे। उसी प्रकार साधना प्रयोगों में लगे लोगों के सम्मुख असफलता का कारण भी स्पष्ट हो गया। अब उन्हें विधि-विधानों का दोष ढूंढ़ने की अपेक्षा अपने उथलेपन की समीक्षा करनी पड़ेगी। अब निर्भ्रान्त आत्मवादियों को आत्म परिष्कार का महत्व समझना होगा और भौतिकवादी लिप्साओं की पूर्ति के लिए नहीं आत्मवादी महानता विकसित करने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के विकास का मार्ग अपनाना पड़ेगा। सस्ते मोल में बहुमूल्य उपलब्धियों के लिए ललचाने वाले जुआरियों की भीड़ निस्सन्देह छूट जायेगी पर गहरे समुद्र में गोते लगाकर मोती समेटने वाले साहसी लोग आगे भी आयेंगे। कीमत चुकाकर बहुमूल्य उपलब्धियाँ खरीदने वाले ही सच्चे व्यापारी होते हैं। यदि उनका अभाव हो जाय तो फिर संसार में व्यापार की पद्धति ही न चले। आत्मिक क्षेत्र में भी साहूकार, सौदागर होंगे ही- सभी तो उचक्के, गठकटे नहीं होते। यथार्थता स्पष्ट हो जाने पर साहसी शूरवीरों को कुछ बहूमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। प्रक्रिया कष्ट साध्य जरूर रहेगी पर उससे आत्मविद्या का गौरव घटेगा नहीं बढ़ेगा ही।

अब तक की गुरुदेव की बहुमूल्य जीवन चर्चा के अंतर्गत हुए अद्भुत प्रयोग का सार निष्कर्ष यह है कि उन्होंने आत्म विज्ञान की यथार्थता जन साधारण के सामने इस रूप में रख दी कि उसे संदिग्ध अप्रामाणिक, छद्म, उपहासास्पद अवैज्ञानिक न कहा जा सके। उस मार्ग पर चलने के इच्छुकों को यात्रा के स्वरूप और श्रम की वास्तविकता की जानकारी हो सके। एक जीवन यदि एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विज्ञान पर छाये हुए अन्धकार के बादलों को हटाने घटाने में समर्थ हो सका तो यह उसकी सफलता ही मानी जायेगी। विशेषतया आज के युग में तो वह तत्व दर्शन के जीवन मरण का प्रश्न हल करने जितनी अनिवार्य हो गई थी। गुरुदेव के अवतरण ने उस गुत्थी को एक प्रकार से सुलझा कर उस मार्ग पर चलने के इच्छुकों का आशाजनक रीति से पथ प्रशस्त कर दिया है।

गुरुदेव के जीवन का पूर्वार्ध मथुरा में पूरा हो गया। उत्तरार्ध में वे कुछ अधिक महत्वपूर्ण कदम उठाना चाहते हैं। जिन्होंने अध्यात्म तत्व ज्ञान का स्वरूप समझा लिया है, उस दिशा में चलना आरम्भ कर दिया है और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सच्चे मन से इच्छुक हैं उन्हें अपने प्राणों का एक अंश देकर इस योग्य बनाया जाय कि वे उनकी जलाई मशाल को भविष्य में भी अखण्ड बनाये रह सकें। अध्यात्म की समर्थता एवं प्रमाणिकता के साक्षी बनकर प्रकाश स्तम्भों की भूमिका सम्पादन कर सकें। प्रत्यावर्तन अनुदान का यही प्रयोजन है। गुरुदेव व्याकुल हैं कि उनकी जो उपार्जित पूँजी है उसे वे जल्दी से जल्दी बाँट वितरण करके अपने भार को हलका कर लें और जिस तरह खाली हाथ आये थे उसी तरह पाप पुण्य की पूँजी समाप्त करके प्रभु के चरणों में हलके फुलके खाली हाथ जा पहुँचे। शारीरिक पाप उनमें कभी बने नहीं, मानसिक मोह क्षोभ के कुछ कल्मष जमे होंगे तो उन्होंने अपनी प्रचंड तप साधना की आग में जलाकर नष्ट कर दिया है। अपने कल्मष जल गये तो उन्होंने दूसरों के बदले के कठोर प्रायश्चित किये और उन्हें दण्ड दुष्परिणामों से बचाया। यह क्रम अभी भी जारी है और आगे भी जारी रहने वाला है।

तप साधना के जो पुण्य बचे हैं वे भी उन्हें समाप्त करने हैं क्योंकि स्वर्ग और ऐश्वर्य जैसे फल भुगतने के लिए फिर उन्हें बन्धन में बँधना पड़ सकता है। इसलिए उपार्जित पुण्य और तप की पूँजी भी वे जमा नहीं रखना चाहते। प्रत्यावर्तन उसी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इस अनुदान का थोड़ा सा भी अंश मिल सका वे निश्चित रूप से उसके लिये भाग्य की सराहना जन्म−जन्मांतरों तक करते रहेंगे।

अगले पाँच वर्ष में मेरा अखण्ड गायत्री महापुरश्चरण पूरा हो जायेगा-तभी तक प्रत्यावर्तन अनुदान की भी पूर्णाहुति हो जायेगी। पाँच वर्ष बाद गुरुदेव का यह उत्तरार्ध भी पूरा हो जायेगा। इसी बीच शान्ति कुञ्ज भी विश्वव्यापी महिला जागरण का केन्द्र बन लेगा। इसके बाद उनका कोई सामाजिक उत्तरदायित्व शेष न रहेगा। शाँतिकुँज इन दिनों उनका डाक बँगला है, आवश्यकता होने पर यहाँ आते और जाते रहते हैं तब यह क्रम भी समाप्त हो जायेगा और वे अपने प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप का अन्त करके मात्र परोक्ष रीति से विश्व मानव की सेवा विलक्षण क्रिया कलाप के साथ सम्पन्न करेंगे जिसकी चर्चा इस समय अनावश्यक है।

प्रत्यावर्तन अनुदान की सूचना छपने पर बड़ी संख्या में आत्म-विद्या में अभिरुचि रखने वालों के कितने ही पत्र आये हैं। इन सभी को इस प्रतीक्षा में सुरक्षित रख लिया गया है कि उनकी पात्रता का परिचय प्राप्त किया जाय। उर्वर भूमि में बीजारोपण से ही श्रम की सार्थकता होती है। विशेष प्रकार की सीप में ही स्वाति बिन्दु मोती बनते हैं। अशक्त को दूसरे का रक्त देकर शक्त बनाया जाता है पर उस क्रिया को सम्पन्न करने से पूर्व डॉक्टर यह देख लेता है कि रक्त देने और लेने वाले का स्तर एक सा है कि नहीं। यदि उसमें अन्तर हो तो रक्तदान का प्रयोजन पूर्ण न हो सकेगा। यही बात इस अध्यात्म अनुदान के सम्बन्ध में है यदि गृहीता का अन्तः स्तर गया गुजरा हो तो उसे कुछ लाभ न मिल सकेगा उलटा दाता का अनुदान रेत में घी डालने की तरह निरर्थक चला जायेगा।

इन दिनों जोर इस पर दिया जा रहा है कि प्रत्यावर्तन अनुदान के गृहीता अपनी पात्रता विकसित करें ताकि उनके लिये जो खर्च किया जाना है वह सार्थक सिद्ध हो सके। इस संदर्भ में जुलाई की अखण्ड ज्योति में कुछ चर्चा की जा चुकी है। स्थूल परीक्षण की दृष्टि से उसमें यह कहा गया है कि उस पथ के पथिकों को ‘युग साधना’ में संलग्न होना चाहिये। अध्यात्म साधनाएं युग के अनुरूप बदलती रही हैं। भगवान राम ने अपने अनुयायियों को लंका अभियान में जुटाया था। भगवान बुद्ध ने युवा नर नारियों को संन्यास देकर धर्म प्रचार के लिये विश्व भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने शिष्यों को आत्म-कल्याण की तप साधना “एक हाथ में माला एक हाथ में भाला” का मन्त्र दिया था। गाँधी जी ने अपने शिष्यों को खादी पहनने और जेल जाने के सत्याग्रह संग्राम में लगाया था। युग के अनुरूप लोक साधनाएं बदलती रही हैं। आज के युग के अनुरूप वही युग साधनाएं हैं जिन्हें ‘युग-निर्माण योजना’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है। इन आदर्शों के अनुरूप अपनी मनोभूमि और क्रिया-कलाप कैसे ढाला जाय इसका अधिक स्पष्ट और अधिक व्यावहारिक रूप ‘नई छपी’ हमारी ‘युग-निर्माण योजना’ में प्रस्तुत किया गया है इस प्रकाश में अपने चिंतन और क्रियाकलापों को परिष्कृत विकसित किया जाना चाहिये। विकसित मनोभूमि ही उस अनुदान को सार्थक बना सकेगी।

पात्रता के विकास की मूल कसौटी है जीवन का लक्ष्य निर्धारण। यदि यह मान लिया जाय कि जीवन में शरीर और आत्मा दोनों की साझेदारी है; इनमें आत्मा का हिस्सा कम से कम आधा जरूर है। तो व्यक्ति को यह निश्चय करना ही पड़ेगा कि समय, श्रम, चिन्तन, धन, मनोयोग, प्रभाव, वैभव आदि का आधा भाग शरीर और मन की तुष्टि के लिये लगाया जाय और शेष आत्म कल्याण के लिये नियोजित रखा जाय। यह बँटवारा यदि सिद्धान्त के रूप में कर लिया जाय अपना वास्तविक स्वार्थ उच्च स्तरीय उद्देश्य की पूर्ति को मान लिया जाय तो फिर फुरसत न मिलने आदि के बहानों के लिये कोई गुंजाइश न रहेगी। तृष्णाएं भले ही पूरी न हों पर आवश्यकताएं सहज पूरी होती रहेंगी साथ ही युग साधना के परमार्थ प्रयोजन में लगाने के लिये बहुत कुछ प्रस्तुत रह सकेगा।

लोभ और मोह के बन्धन उन्हीं को बाँधते हैं जो अपनी अहंता को शरीर और मन मात्र मानकर चलते हैं जिनने आत्मा को काया से पृथक माना-आत्मिक और कायिक स्वार्थों का वर्गीकरण किया सुख साधनों के अतिरिक्त शान्ति सन्तोष एवं आनन्द उल्लास को भी चाहा उनके लिए युग साधना के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाना और कर्तृत्व व्यवहार में लाना नितान्त सरल प्रतीत होगा। उन्हें किसी अड़चन अवरोध की कठिनाई प्रतीत न होगी।

अपने को बदला जाय तो सारी परिस्थितियाँ बदलें। बड़प्पन की ऐषणाओं को तिलाँजलि देकर महामानव बनने की महत्वाकाँक्षा विकसित की जाय तो हर किसी के लिये उस स्तर की पात्रता सहज ही उपलब्ध हो जायेगी जो प्रत्यावर्तन अनुदान के लिए अनिवार्य आवश्यकता घोषित की गई है। आशा है उत्सुक परिजन इस संदर्भ में अधिक गम्भीरता करेंगे। इस प्रकार की कीमत पर जो मिल सकता है वह इतना बहुमूल्य है कि किसी को इसके लिये बहुत सोच विचार और असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है।


शान्ति कुँज आना हो तो इन अनुरोधों को ध्यान में रखें (Kahani)

शान्ति कुँज आना हो तो इन अनुरोधों को ध्यान में रखें

आगन्तुकों की रेल पेल ने शान्ति कुँज की सामान्य क्रमचर्या को इन दिनों बेतरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। अस्तु दर्शनार्थियों, आगन्तुकों और अतिथियों को निरुत्साहित एवं व्यवस्थित करने के लिये कुछ नियम प्रतिबन्ध रखने के लिये विवश होना पड़ा है। शान्तिकुँज आने से पूर्व इन पंक्तियों को भली भाँति पढ़ समझ लेना चाहिए।

(1) मात्र दर्शनों के लिये शान्ति कुँज नहीं आना चाहिये, अति आवश्यक होने पर ही शाँतिकुँज आयें

(2) आने से पूर्व अपने ठहरने आदि की व्यवस्था अन्यत्र करें, तदुपरान्त ही यहाँ पधारें।

(3) भेंट-वार्ता हर समय सम्भव नहीं। इसके लिये मध्याह्नोत्तर तीन से पाँच बजे तक का समय निर्धारित है। आशा है परिजन तीनों अनुरोधों का ध्यान रखेंगे। ताकि यहाँ वे प्रयोजन पूरे किये जा सकें जिनके लिये आश्रम की स्थापना की गई है।


आत्मविश्वासी पर ही दूसरे भी विश्वास करते हैं।

कहते हैं-विश्वास पर दुनिया टिकी हुई है। एक दूसरे पर विश्वास रखकर ही परस्पर का व्यवहार चल रहा है। नव वधू यह विश्वास करके चलती है कि पति उसका आजीवन साथ देगा। मित्रों और बन्धुओं पर सामयिक सहायता और सद्व्यवहार का भरोसा रखा जाता है। रुपया जमा करते समय बैंक पर विश्वास करते हैं कि जमा पूँजी सुरक्षित रहेगी। बिल्टी छुड़ाते समय यह भरोसा रखते हैं कि रेल से माल यथावत् मिल जायेगा। रेलगाड़ी पर सवार होते समय यह मान लिया जाता है कि वह बिना जोखिम यथा स्थान पहुँचा देगी। जमीन पर भरोसा करके ही बीज बोया जाता है कि वह लौटा आयेगा। बन्दूक यही मानकर खरीदी जाती है कि जब निशाना साधेंगे- गोली चलेगी और अपना काम करेगी संसार के लगभग सारे काम यह मानकर ही किये जाते हैं कि सही वस्तु पर सही रीति से भरोसा किया गया है तो उसका परिणाम भी सही निकलेगा।

किन्तु इसमें गड़बड़ी भी होती रहती है। विश्वासघात के उदाहरण सामने आते रहते हैं, दगाबाजी की, ठगी की ऐसी घटनाएं भी घटित होती रहती है जिनमें आशा के विपरीत-विश्वास के विरुद्ध परिणाम निकलता है और निराश होना पड़ता है। भले ही ऐसी घटनाएं कम हों, पर होती जरूर हैं। बेशक दुनिया का काम विश्वास के आधार पर चल रहा है- उसे अपनाये बिना कोई रास्ता भी नहीं। किसी पर विश्वास न करें- अविश्वास और शंका की दृष्टि से ही हर काम को, हर बात को हर व्यक्ति को देखें तो भी काम नहीं चलेगा।

इस विश्वास और अविश्वास के झूले में झूलती हुई दुनिया में एक ही व्यक्ति ऐसा है जिसकी वफादारी और विश्वासनीयता पर कभी उँगली नहीं उठाई जा सकती और जो कभी भी धोखा नहीं दे सकता ऐसे सच्चे मित्र का नाम है- ‘अपना आपा’ इस पर जितना भरोसा किया जायेगा उतनी ही शक्ति बढ़ेगी और दूसरे भी उसी अनुपात से अपने ऊपर भरोसा करने लगेंगे।

आत्मविश्वास से बढ़कर सुनिश्चित परिणाम और किसी का नहीं हो सकता। अपने ऊपर-अपनी सामर्थ्य पर यदि भरोसा किया जाय और यह माना जाय कि कई अभावों, कठिनाईयों के रहते हुये भी अपने में इतनी सामर्थ्य विद्यमान है कि किसी भी दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है और किसी भी झंझट से जूझा जा सकता है। अपनी क्षमता पर विश्वास न करने के कारण ही हम दूसरों की दृष्टि में दुर्बल और असमर्थ सिद्ध होते हैं।

अपनी क्षमता पर अपनी प्रामाणिकता पर अविश्वास करना-उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं से वंचित रहना है। अपने ऊपर भरोसा न करने से न आत्मबल विकसित होगा न मनोबल बढ़ेगा। मनस्वी और तेजस्वी व्यक्ति वे होते हैं जिनका आत्म-विश्वास बढ़ा-चढ़ा होता है।

कठिन प्रसंगों पर आत्म-विश्वास जितना सहायक होता है उतना और कोई नहीं। संसार के पराक्रमी व्यक्तियों का इतिहास वस्तुतः उनके मनोबल की आत्मविश्वास की गरिमा ही सिद्ध करता है। सफलता उचित मूल्य चुकाये बिना किसी को नहीं मिली। अपने ऊपर भरोसा न करने वाले लोग यह सोचते हैं हम इतना बोझ कैसे उठा सकेंगे? इतना कठिन काम कैसे कर सकेंगे? आदि निषेधात्मक आत्म-हीनता भरे विचार मनुष्य की आधी शक्ति नष्ट कर देते हैं और कल्पित आशंका प्रगति की ओर बढ़ने ही नहीं देती। सफलता मिले भी तो कैसे?

हम अपने ऊपर भरोसा करें-आत्म विश्वास करें। और नई सूझ-बूझ, नई स्फूर्ति का उन्नयन देखें। आत्मविश्वास का सत्परिणाम असंदिग्ध है। जो अपने ऊपर भरोसा करता है-दुनिया उस पर भरोसा करती है।


बोलो साहस की जय!


बोलो साहस की जय!