भेंट विशाखा से हुई (Kahani)

तथागत विहार करके दीर्घकाल बाद श्रावस्ती पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट विशाखा से हुई। उनके उद्यान का क्या कहना? जब विशाखा को यह पता चला कि तथागत आज उसी के यहाँ आतिथ्य ग्रहण करने वाले हैं तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपने भाग्य को बार-बार सराहा और भगवान बुद्ध के ठहरने की सारी व्यवस्था अपनी देख-रेख में करवाई। फिर भी बुद्ध यह देख रहे थे कि विशाखा के चेहरे पर जो प्रसन्नता होनी चाहिए वह नहीं है। अशान्ति और निराशा ने उन्हें घेर रखा है।

तथागत को वस्तुस्थिति समझने में देर न लगी। उन्होंने कहा-’मैं इसीलिये तो कहता हूँ कि मनुष्य को अपनी आवश्यकता बढ़ानी न चाहिए। नाना प्रकार की इच्छायें आवश्यकताओं को जन्म देती हैं और फिर मनुष्य उन्हीं के चक्कर में पड़कर अपने सुख तक की बाजी लगा देता है। अत्यधिक इच्छायें व्यक्ति स्वातंत्र्य की हंता हैं। अतः मैं नहीं चाहता हूँ कि उनकी पराधीनता ग्रहण कर दुःख को आमन्त्रित किया जाये।’

‘भगवन्! आप तो पहेली सी बुझाते हैं। यदि कोई उपाय हो जिससे इच्छायें कम की जा सकें तो बताइये न।’

‘उपाय बड़ा सरल है। यदि मनुष्य सुख की खोज बाह्य वस्तुओं में न करके अपने अन्दर ही करने लगे तो उसे विविध इच्छाओं की असारता तथा व्यर्थता का आभास सहज ही हो जायेगा और व्यर्थ के भटकाव से मुक्ति मिलेगी।’


दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से छूटना ही ‘मुक्ति’ है।

‘मुक्ति’ को परम पुरुषार्थ माना गया है। कैदी जेल से छूटता है, छात्र कालेज छोड़ता है, गर्भ से बालक धरती पर आता है तो उसे प्रसन्नता भी होती है और सुविधा भी मिलती है। भव बन्धनों से छुटकारा प्राप्त कर मनुष्य भी समस्त शोक संतापों से रहित होकर सच्चा जीवन लाभ लेता है।

मुक्ति मरने के बाद होती है और किसी लोक विशेष में रहना पड़ता हो ऐसी बात नहीं है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों के ही बन्धन जीव को बाँधे हुए हैं, यदि उनसे छुटकारा प्राप्त करलें फिर जीवन-मुक्ति का आनन्द जीवित रहते हुए ही-इसी जन्म में मिलता है, उसके लिए परलोक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

मुक्त पुरुष न किसी को उद्विग्न करते हैं और न किसी से उद्विग्न होते हैं। उनके लोभ-मोह आदि शत्रु नष्ट हो चुके होते हैं। वे दूसरों की मनःस्थिति जानते हैं और लोकप्रिय आचरण करते हैं। प्रिय और मधुर वाणी बोलते हैं। वे सूक्ष्म बुद्धि से निर्णय करते हैं। सज्जन नागरिकों की तरह आचरण करते हैं। सबके बन्धु होते हैं।

कर्तव्य कर्मों में निष्ठापूर्वक किन्तु उदासीन की तरह लगा हुआ न आकाँक्षा करता है, न चिन्ता, न द्वेष, न हर्ष, न उद्वेग। अवसर के अनुसार यथोचित व्यवहार करता है। भक्त के प्रति भक्त, शठ के प्रति शठ, बालकों के साथ बालक, वृद्धों के प्रति वृद्ध और बुद्धिमानों के साथ बुद्धिमानों जैसा व्यवहार करता है। युवाओं में युवकों की तरह रहता है और दुखियों को देखकर दुखी होता है। वह न कभी दीन होता है न उद्धत, न बौखलाता है और न खिन्न, न उद्विग्न होता है न हर्षोन्मत। जिसके मन पर हर्ष, शोक, भय, काम, क्रोध और कृपणता का प्रभाव नहीं होता वह जीवन मुक्त ही है।

- यो. व.


मानवी सत्ता ब्रह्माण्ड सत्ता की प्रतिकृति है।

एक परमाणु सौर मण्डल की सूक्ष्म अनुकृति है। उसका मध्य भाग-केन्द्रक-हमारे सूर्य-सौरमण्डल का प्रतिनिधित्व करता है। परमाणु के इस केन्द्रक सूर्य के चारों ओर इलेक्ट्रान नामक परमाणु उसी तरह घूमते रहते हैँ जिस तरह कि सौरमण्डल के ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। सौरमण्डल के घेरे में जिस प्रकार बहुत बड़ा आकाश रहता है, उसी तरह परमाणु मण्डल के बीच भी पोल रहती है। विभिन्न सौर मण्डलों की स्थिती में एक दूसरे से पर्याप्त भिन्नता होती है, इसी प्रकार परमाणुओं वर्गों के भीतरी भाग में भारी भिन्नता रहती है, यद्यपि वे बाहर से एक जैसे दीखते हैं। यूरेनियायस्क के एक परमाणु 92 इलेक्ट्रान होते हैं। कार्बन में उनकी संख्या केवल छह होती है।

प्रत्येक मनुष्य एक ब्रह्माण्ड है। उसका आत्म सूर्य है जिसके इर्द-गिर्द ग्रह परमाणु भ्रमण करते रहते हैं। मानवी काया में भ्रमण करने वाले अणु जीवाणु एक विशेष प्रकार की विद्युत उत्पन्न करते हैं। उसी विद्युत से प्रभावित होकर मस्तिष्क से लेकर इन्द्रिय तथा अन्य अवयव अपना काम करते हैं। जड़ में चेतना उत्पन्न होने का माध्यम यही है। साधारणतया अणुओं में हलचल भर रहती है। चिन्तन तथा अनुभूति उनमें नहीं है। पर मानवी विद्युत जिसे ‘प्राण’ कहा जाता है, जड़ अणुओं के समूह में चेतना, विचारणा और अनुभूति उत्पन्न कर देती है और सजीव जीवन आरम्भ कर देती है। निर्जीव, अनुभूति रहित जीवन तो पत्थर चट्टानों में भी रहता है।

पृथ्वी के ध्रुवों के आस-पास चुम्बकीय आँधियाँ चलती रहती हैं। अस्थिर रंग-बिरंगा प्रकाश- आरोरा वेरियस छाया रहता है। यही ध्रुव स्थान अन्य ग्रहों के विकरण प्रकाश एवं प्रभाव को पृथ्वी पर लाता है और यहाँ की विशेषताओं को अन्य लोकों तक ले जाता है। इस ध्रुवीय क्षेत्र को ब्रह्माण्ड का संपर्क कह सकते हैं। इन ध्रुव केन्द्रों के माध्यम से चलने वाले अन्तर्ग्रहीय प्रत्यावर्तन के बलबूते ही धरती अपनी वर्तमान परिस्थितियों में बनी हुई है। इतना ही नहीं-अन्य ग्रहों की वर्तमान परिस्थितियों में भी इस भू ध्रुवों में चलने वाले अनवरत प्रत्यावर्तन का महान योगदान है। यदि किसी कारण यह आदान-प्रदान बन्द हो जाय तो पृथ्वी की स्थिति में इतना विषम परिवर्तन होगा कि तब यहाँ जीवन का अस्तित्व भी संदिग्ध हो जायेगा। साथ ही ग्रहों की कक्षाओं और स्थितियों में परिवर्तन होने से सौरमण्डल की प्रस्तुत गतिविधियों में भारी उलट-पुलट हो जायेगी। भू ध्रुवों के माध्यम से होने वाला शक्ति प्रत्यावर्तन ही अपने सौरमण्डल की वर्तमान स्थिति बनाए हुए है। तनिक से क्षेत्र में होने वाला तनिक सा क्रियाकलाप पृथ्वी सौरमण्डल और उस पर सौरमण्डल के महा सूर्य के प्रदक्षिणा क्रम में कितना भारी योगदान कर रहा है, इस तथ्य पर जितनी गहराई से विचार किया जाय उतना ही अधिक मार्मिक रहस्योद्घाटन होता चला जाता है।


Quotation

परमात्मा पूजा का नहीं प्रेम का भूखा है।

-स्वामी दयानन्द

मनुष्य का अन्तःकरण भी ऐसा ही चेतना ध्रुव संस्थान है। उसके भीतर इच्छा शक्ति, भावना शक्ति संकल्प शक्ति, आकर्षण शक्ति, विकर्षण शक्ति जैसी अगणित ज्ञात और अविज्ञात क्षमताएं भरी पड़ी हैं, यदि उन्हें जागृत किया जा सके, उनका उपयोग करना सीखा जा सके तो इस विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त समस्त विभूतियाँ करतलगत हो सकती हैं। मानवी अन्तःकरण सौरमण्डल को कार्य करने का पथ प्रशस्त करते रहने वाले आकाश की तरह ही असीम है और उसमें जो कुछ भरा पड़ा है उसे अन्तरिक्ष आकाश से कहीं अधिक शक्तिशाली समझा जाना चाहिए। दुर्भाग्य इतना ही है कि हम अपनी करतलगत सम्पदा से अपरिचित ही रहते रहे हैं।


हम परमात्मा सत्ता से ओत-प्रोत हैं।

श्रुति कहती है-’वैषम्य नैघृण्ये न सापेक्ष्त्वात्, तथा हि दर्शयति’- परमात्मा के न पक्षपात है और न क्रूरता किन्तु उसे प्राणियों के धर्म अधर्म की अपेक्षा रहती है वह शरीरधारियों के शरीरों की रचना करता है, उनमें अवस्थित रहकर उनकी जीवन प्रणाली का संचालन करता है। इससे अधिक वह और कुछ भी नहीं करता। कर्म करने की स्वतन्त्रता देकर वह जीवों के कर्मों का दृष्टा भर बनकर रहता है। कर्म जीव के अधीन है और फल ईश्वर के, जीव के कर्म ही उसे शुभ अशुभ परिणाम भोगने-विभिन्न योनियों में जाने के लिए विवश करते हैं। उन्नति और अवनति का, सुख और दुख का कारण भी वह स्वयं ही है, इसमें न तो ईश्वर का पक्षपात है और न क्रूरता।

अन्तः प्रेरणा के धागे से बँधा हुआ शरीर और मन कर्म करता है और उन कर्मों से जुड़ी हुई उचित अनुचित की प्रक्रिया जीवन का भला बुरा स्वरूप विनिर्मित करती है। इसी दृश्य जीवन का परिणाम परिपाक सुखदायी अथवा दुखदायी परिस्थितियों के रूप में सामने आता है। यही है देवी शाप वरदान। इसे ईश्वर की इच्छा या विधान कहा जाता है। इस कथन से इतना ही सत्य है कि ईश्वर की इच्छा यही रही है कि अन्तः संस्थान को जो जिस स्तर का बनाये उसकी क्रिया प्रक्रिया उसी स्तर की बने और तदनुसार ही उसे फल भोगने पड़ें। इस विधि व्यवस्था को ईश्वर इच्छा कहा जाय तो उचित है, किन्तु यदि अन्तःप्रेरणा को भला बुरा बनाना या किसी को शुभ किसी को अशुभ मार्ग पर चलने के लिए- सुख या नरक में गिरने को बलात् घसीटने वाली ईश्वर इच्छा की बात कही जाय तो वह पूर्णतया असत्य है। इससे तो ईश्वर अन्यायी-पक्षपाती और अन्धेर, अव्यवस्था फैलाने वाला मनमौजी कहा जायेगा। जबकि वह वैसा है कदापि नहीं। ईश्वर इच्छा इतनी ही है कि आत्म विधातकों और आत्म निर्माताओं को यथोचित दण्ड पुरस्कार मिलने की विधि व्यवस्था सुनिश्चित और सुव्यवस्थित रीति से चलती रहे।

बन्धन और मोक्ष का कारण मन है मन का बिगाड़ और सुधार ही पतन एवं उत्थान का कारण है। मन ही हमें स्वर्ग और नरक की सैर कराता है इसलिए तत्वदर्शन सारा प्रयास व्यक्ति को मन का परिष्कार करने की प्रेरणा देने पर केन्द्रित है।

गीता कहती है-

मन एवं मनुष्याणं कारणं बन्धमोक्षयोः।

बन्धाय विषयासक्त मुक्तयै निर्विषयं स्मृतम्॥

अर्थात् मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है। लिप्सा और लालसाओं में आसक्त मन ही बन्धन का कारण है। विषयासक्ति से विरत मन ही मोक्ष का आधार है।

योग वाशिष्ठ कहती है-

शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा नैव वध्येत् कर्हिचित्।

वन्धमोक्षौ मानस्संस्थौ तस्मिन् शान्ते प्रशाम्यतः॥

अर्थात् आत्मा सदा शुद्ध और मुक्त है उसे बन्धन में कौन बाँध सकता है? मन का माया में उलझ जाना ही बन्धन है। जब वह उलझन सुलझकर अशान्ति शान्ति में परिणत हो जाती है तो फिर सर्वत्र शान्ति ही अनुभव होती है।

‘अहं ब्रह्मास्मि’ सूत्र का अर्थ यह है कि मैं ब्रह्म हूँ। पर इसमें यह भाव नहीं है कि केवल मैं ही ब्रह्मा हूँ, और कोई नहीं। वरन् यह प्रतिपादन है कि इस विश्व में सर्वत्र ब्रह्म चेतना ही विद्यमान है और उसका एक घटक होने के नाते में भी ब्रह्म ही हूँ। “एतदात्ममिदं सर्व” यह समस्त विश्व ब्रह्म रूप है। वह सर्वव्यापी ब्रह्म अपने में भी परिपूर्ण है। तब उसे अन्यत्र ढूंढ़ने जाने का श्रम क्यों किया जाय? ब्रह्म जिज्ञासा के लिए उत्सुक श्वेतकेतु को यही बताया गया कि ‘स आत्मा तत्व मसि श्वेतकेतो’ अर्थात् हे श्वेतकेतु वह परम आत्मा तू ही है।

योगवशिष्ठ के अनुसार-भगवान रामचन्द्र जी को संसार से तीव्र वैराग्य हुआ और वे विरक्त जीवन जीने की तैयारी करने लगे तो महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया-राम तुम संसार का त्याग क्यों करते हो? संसार क्या ब्रह्म से भिन्न वस्तु है?

गन्ध वायु में मिलती है फिर भी वायु निर्लिप्त रहती है। आकाश में गन्ध व धुँआ मिलते रहते हैं किंतु आकाश निर्मल ही रहता है। जगत के प्रपञ्च में लोक व्यवहार करते हुए भी आत्मा की निर्मलता बनी रह सकती है।

सत्ताधिपति घोषित किया गया है।

वेदान्त दर्शन के अनुसार यह ब्रह्म सत्ता तीन प्रकार की है (1) पारमार्थिक (2) व्यावहारिक (3) प्रतिभासिक। निर्गुण, निराकार, अचिन्त्य, सृष्टा, दृष्टा, साक्षी, नियन्ता पारमार्थिक सत्ता है। साकार ईश्वर, जीव, जगत, परलोक स्वर्ग, नरक, शाप, वरदान, अवतार, देव, आदि लोक व्यवहार में प्रयुक्त व्यावहारिक सत्ता है। स्वप्न की तरह वस्तुओं में प्रतिभासित, माया समाविष्ट, प्रतिभासिक सत्ता है। बाजीगर की तरह अपने में से ही विभिन्न पदार्थों का सृजन और अपने में ही लीन करके क्रीड़ा कलोल प्रक्रिया इसी प्रतिभासिक सत्ता का स्वरूप विस्तार है।

वेदान्त की शिक्षा है कि भगवान हममें वैसा ही ओतप्रोत है जैसा कि समस्त विश्व में। उसी की सम्पदाओं का हम उपभोग करते हैं। हम उस सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान सत्ता के ही कलपुर्जे हैं। अविनाशी और अनन्त प्रभु के ही हम परम प्रिय बाल बच्चे हैं।” यह मान्यता यदि गम्भीरता पूर्वक सुनी समझी जाय तो अपने सम्बन्ध में विचार करने के लिए एक नवीन दृष्टि मिलती है। उसी दर्शन को यदि व्यवहार में अपनाया जाय तो फिर दिव्य जीवन ही जिया जा सकेगा। महामानव की भूमिका में ही हमारी गति-विधियाँ चल रही होंगी।

वेद का अर्थ है ज्ञान और अन्त का अन्त है चरम परिणति वेदान्त अर्थात् ज्ञान की चरम सीमा। इस लक्ष्य तक पहुँचकर और कुछ इस जीवन में- इस संसार में प्राप्त करने को शेष नहीं रह जाता। वेदान्त दर्शन किसी सम्प्रदाय, जाति या वर्ग से बँधा हुआ नहीं है। उसे ब्रह्मविद्या की पृष्ठभूमि के रूप में ही माना समझा जाना चाहिए। सबमें एक ही आत्मा को मान लेने के उपरान्त भिन्नता का और कोई कारण नहीं रह जाता। फिर उसे किसी विभेद या वर्ग की सीमा में कैसे अवरुद्ध किया जा सकता है। “एकम् सद् विप्रा वहुधा वदन्ति” उस एक को ही विद्वानों ने अनेक प्रकार से कहा है, का सिद्धान्त मानने वालों को स्वस्थ मतभेद में कुछ आपत्ति हो ही नहीं सकती।


अकाल से पीड़ित ग्रामवासी (Kahani)

अकाल से पीड़ित ग्रामवासी एक युवक नेता के पास पहुँचे और बोले- “हम भूख से मरे जा रहे हैं और हमें कही अन्न ही नहीं मिल रहा।”

मुखिया ने कड़ककर पूछा- “बताओ किसने अन्न चुराकर जमा कर रखा है? - इस प्रश्न पर निगाहें तो कई उठीं पर बोल उनमें से एक भी न सका। युवक मुखिया ने अनुभव किया यह लोग नाम बताने से भयभीत हो रहे हैं।”

इस बार उसने फिर कड़क कर पूछा- ‘कोई भी क्यों न हो, डरो मत नाम बताओ? एक क्षीण आवाज आई-आपके पिताजी ने। युवक की आँखें लाल हो गई-ग्रामवासियों को लेकर पिता के गोदाम में घुस गया और पिता के देखते देखते सारा अनाज दुखियों में मुफ्त बाँट दिया।

यह युवक स्वतन्त्रता संग्राम के वीर सेनानी बंतासिंह थे जिन्होंने अँगरेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रान्ति का डंका बजाया था।


मनुष्य में अन्तर्निहित अलौकिक दिव्य शक्ति

मानव प्राणी यों अन्य प्राणियों की तरह बोलने सोचने वाला पशु मात्र है। कितनी ही बातों में तो वह अन्य जीवों की तुलना में कहीं अधिक पिछड़ा हुआ है, फिर भी उसे सृष्टि का मुकुट मणि बनने का जो सौभाग्य प्राप्त है उसका प्रधान कारण वह अलौकिक शक्ति ही है जिसे परमात्मा ने अपने इस परम प्रिय ज्येष्ठ के रोम-रोम में कूट-कूट कर भरा है। इन्हीं शक्तियों ने उसे स्नेह, सहकारिता, सद्भाव, संयम, परमार्थ जैसे सद्गुण प्रदान किये और उन्हीं के बलबूते वह अनेक भौतिक एवं आन्तरिक समृद्धियों सिद्धियों का अधिपति बन सका। मनस्विता, तेजस्विता की महिमा से सभी परिचित है। आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाकर उपासना और साधना का सहारा लेकर मनुष्य चाहे तो इतना ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सके।

अतीन्द्रिय शक्ति के चमत्कार किन्हीं किन्हीं में कभी-कभी दीख पड़ते हैं। इनसे यह पता चलता है कि इसके अन्दर ऐसे बीज मौजूद हैं जो साधारण प्राणियों में नहीं होते। दूसरे प्राणी खाना जनना भर जानते हैं अस्तु उनके क्रिया-कलाप भी उतने ही रहते हैं जितनी कि उनके माँस पिण्ड में क्षमता होती है पर मनुष्य के भीतर विचारणा की उच्चस्तरीय जागृति मौजूद है, फलस्वरूप उसकी अन्तर्निहित महिमा भी यदा-कदा झरोखों में से झाँकती दिखाई पड़ जाती है।

आत्म शक्ति से सम्बन्धित अलौकिक एवं अद्भुत क्षमताओं के जब उदाहरण सामने आते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य में अतिरिक्त विशेषताएं मौजूद हैं। यदि उनका विधिवत् विकास किया जा सके तो जो कुछ मनुष्य ने भौतिक एवं बौद्धिक दृष्टि से उपार्जित किया है उससे कहीं अधिक मात्रा में सिद्धियों और सफलताओं से उपलब्ध कर सकता है।

मार्टिन इबोन का पुस्तक- ‘ट्रू एक्सपीरियन्स इन प्रोफेसी’ वालटर जे. मैसी की अनुभूति छपी है जिसमें लेखक की पत्नी द्वारा चाय के प्याले में एक ऐसी भयानक भविष्यवाणी का उल्लेख है जो दो सप्ताह के भीतर ही सच होकर सामने आई। बात यों थी कि एक दिन उनके मित्र मि. हाफमैन चाय पीने के लिए बुलाये गये। चाय छानी ही जा रही थी कि उनकी पत्नी ने उस प्याले में तैरता हुआ एक घटना क्रम फिल्म की तरह देखा- “किसी होटल के मैनेजर को गोली मारकर एक हत्यारा एक कार पर चढ़ कर भाग जा रहा है दो मोटर साईकिल उसका पीछा कर रही हैं। हत्यारे ने पीछा करने वालों पर भी गोली चलाई, उनमें से एक सवार मारा गया। अन्ततः हत्यारा मोटर छोड़कर एक अधबनी झोंपड़ी में घुस गया उसे पड़ौस में रहने वालों ने देखा और पुलिस को पकड़वा दिया।”

दृश्य इतना प्रभावोत्पादक था कि चाय छानते हुए महिला अर्धमूर्छित जैसी हो गई और पात्र उसके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। कुछ समय बाद होश आने पर उसने वह सब बताया जो प्याले में देखा था। बात को विस्मय के साथ सुना गया पर उसमें कुछ यथार्थ भी हो सकता है इस पर किसी को विश्वास न हुआ।

उस समय की बात समाप्त हो गई पर महिला के मस्तिष्क पर प्रभाव ज्यों का ज्यों बना रहा। वह यही बात कहती या तो यह घटना हो चुकी है या होने वाली है। अतएव इस अनुभूति से पुलिस को सूचित कर देना चाहिए। पति-पत्नी में दो दिन बाद विवाद चला अन्ततः यह मान लिया गया कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी जाये। वे लोग पुलिस दफ्तर पहुँचे और स्वप्न में दीखे हत्यारे की हुलिया तथा पोशाक सहित सारी सूचना प्रस्तुत की तो उन्हें सनकी मात्र समझा गया और बड़ी बेरुखी के साथ उनकी सूचना एक बेकार समझी जाने वाली रिपोर्टों की फाइल में दबा दी गई।

पूरे दो सप्ताह भी न हो पाये थे कि ठीक ऐसी ही घटना का विवरण दैनिक पत्रों में छपा। कैलीफोर्निया के एक होटल के मैनेजर की तिजोरी से बहुत सा धन लूटने और उसे गोली से मार देने का विवरण बड़ा सनसनीखेज था, साथ ही उस समाचार में यह विवरण भी था कि हत्यारे का पीछा करने वाले दो मोटर साईकिल पर सवार पुलिसकर्मियों में से भी एक गोली से मारा गया। बाद में एक अधबनी झोंपड़ी में वह हत्यारा लूट के धन समेत पकड़ा गया।

इस समाचार को पढ़ने के बाद वाल्टर मैसी और उनकी पत्नी पुलिस दफ्तर गये और पन्द्रह दिन पूर्व की उनकी सूचना का विवरण देखने के लिए अनुरोध किया, सारा पुलिस दफ्तर आश्चर्यचकित रह गया कि क्योंकर वह इतने दिन पूर्व की सूचना अक्षरशः सही निकली और पुलिस मैन के मारे जाने तथा रंगे हाथों हत्यारे के पकड़े जाने का घटना क्रम सही निकला। बाद में यह चाय की प्याली का विवरण अखबारों में भी छपा और इस प्रसंग को लेकर पूर्वानुभूती के रहस्य पर चर्चा होती रही।

आगामी 6 अप्रैल सन् 1974 को इंग्लैंड के अति चमत्कारी जादूगर राबर्ट हडची की सौवीं वर्ष गाँठ मनाई जायेगी। अपने समय का वह अद्भुत व्यक्ति था। उसके जीवनकाल में इंग्लैंड के प्रसिद्ध दैनिक पत्र ‘डेली मिरर’ ने उसकी चमत्कारी पर कई प्रकार के लाँछन लगाये थे और आशंका प्रकट की थी। राबर्ट ने उन्हें चुनौती दी फलस्वरूप परीक्षण के समय उसने यह करतब सबके सामने दिखाया कि पूरी सावधानी और मजबूती के साथ हथकड़ी बेड़ियों में जकड़ा गया पर वह दो मिनट में ही उन्हें कच्चे धागे की तरह तोड़कर फेंकने में सफल हो गया। कमरे में बन्द करके बाहर से ताला लगा देने पर भी वह सबके सामने बाहर निकल आया। सुरंगों में बन्द करके बाहर से छेद पूर तरह बन्द कर दिये जाने पर भी वह बाहर निकला तब भी उसने उस अवरोध को तोड़कर सबके सामने उपस्थित होने में सफलता पाई। यह सब कैसे सम्भव हो सका उसका रहस्योद्घाटन उसकी शताब्दी के अवसर पर उस वसीयत द्वारा होगा जो उसने इसी अवसर पर सर्वसाधारण की जानकारी के लिए लिखकर अपने जीवन काल में ही रख दी थी।

योरोप के परा मनोविज्ञान शोध क्षेत्र में पीटर हरकौस अभी भी एक पहेली बना हुआ है। वह न कोई योगी है, न सन्त, न साधक। फिर भी अनायास ऐसी विलक्षण अतीन्द्रिय शक्ति उसे उपलब्ध रही जिसे देखने वाले यह समझ नहीं पाते कि किस विशेषता के कारण वह अविज्ञात बातें बताने में समर्थ हो सका।

पीटर गरीब घर में जन्मा, वह दीवारों पर पुताई करके अपना पेट पालता था, एक दिन दीवार की पुताई करते हुए वह सीढ़ी से गिरा और गहरी चोट आई अस्पताल में भर्ती किया गया। होश आया तो उसने पास के पलंग पर पड़े हुए मरीज से कहा-आपने अपने स्वर्गीय पिता द्वारा उपहार में दी हुई घड़ी बेचकर अच्छा नहीं किया। पिताजी यह आशा करते हुए मरे थे कि लड़का इस उपहार को स्मृति के रूप में सुरक्षित रखेगा। मरीज सन्न रह गया कि यह सर्वथा अपरिचित व्यक्ति उसके निजी जीवन की ऐसी घटना की चर्चा कैसे कर रहा है जिसकी जानकारी उसके अतिरिक्त और किसी को थी ही नहीं। इसी प्रकार पीटर ने एक दिन अपनी नर्स से कहा-आप कल रेल के सफर से लौटी तो सामान में से अटैची को रेल के डिब्बे में ही क्यों भूल आई? नर्स को इस भूल का पता स्वयं भी नहीं था। घर आकर देखा तो सचमुच एक छोटी अटैची रेल में ही छुट गई थी नर्स को उस नुकसान पर इतना दुःख नहीं हुआ जितना कि एक मरीज द्वारा इस प्रकार की आश्चर्यजनक उक्ति पर आश्चर्य।

एक दिन पीटर रेलवे स्टेशन पर था कि एक यात्री को पकड़कर जोर से चिल्लाया- ‘पकड़ो, इसी ने कुछ घण्टे पूर्व महिला की हत्या की है। पुलिस ने उसे पकड़ लिया। पीछे हत्या का भेद खुला और सचमुच वही व्यक्ति हत्या का दोषी पाया गया। इस प्रकार एक होटल में चाय पीते हुए उसने पास की मेज पर चाय पीते हुए एक साधारण व्यक्ति की ओर घूरकर देखा और चुपके से मैनेजर को बताया कि यह व्यक्ति अंग्रेजी जासूस है इसे तुरन्त पकड़वा दो।’ पीछे उसकी बात सोलह आने सच निकली।

द्वितीय युद्ध के दिनों में उसे संदिग्ध व्यक्तियों की सूची में दर्ज करके जेल भेज दिया गया। वह कैदियों को कितनी ही अद्भुत बातें बताया करता था। एक दिन उसने यों ही कहा कि 4 जून सन् 44 को फ्राँस पर हमला होगा और अन्ततः जर्मनी हार जायेगा। इसमें अन्तर दो दिन का ही पड़ा। हमला 4 जून को न होकर 6 जून को हुआ और जर्मनी की अप्रत्याशित हार हुई। सन् 48 में उसने बेल्जियम पुलिस को सहायता करके जेम्स नामक डाकुओं द्वारा अपहरण किये व्यक्ति की मृत्यु का पता बताया, फलतः हत्यारों को मृत्यु दण्ड मिला। एक दिन बेल्जियम के हवाईअड्डे पर वह चिल्ला रहा था इस हवाई जहाज पर कोई न चढ़े। यह एक घण्टे बाद ही जलकर नष्ट हो जायेगा। तब उसे पागल का प्रलाप भर समझा गया, पर आश्चर्य कि सचमुच ही उस जहाज का उसी प्रकार जलकर दुखद अन्त हुआ।

साधना तपस्या से कई विशेष व्यक्ति असाधारण शक्ति प्राप्त करते हैं पर पीटर की अनायास ही उपजी सहज अतीन्द्रिय चमत्कारिता कोई अविज्ञात कारण अपने गर्भ में छिपाये बैठी है।

विज्ञान वेत्ता जे.वी. राइन और उनकी पत्नी लुई ई. राइन ने मिलकर उस सम्बन्ध में भारी शोध की है कि स्वप्नों में कई बार ऐसे संकेत क्यों मिलते हैं, जिनमें भविष्य में घटित होने वाली पूर्व सूचनाओं का संकेत होता है। यह डॉक्टर राइन विज्ञान अन्वेषण के कार्य में निरत थे पर जब उनकी पत्नी ने ऐसी दर्जनों घटनाओं का विवरण सुनाया जिनमें स्वप्नों की सार्थकता सिद्ध होती थी तो उनने अपने अन्वेषण का क्षेत्र बदलकर स्वप्नों में पूर्वाभास को अपना विषय बना लिया और लगभग 4000 ऐसी घटनाओं का संग्रह प्रकाशित किया है जिनमें स्वप्नों के माध्यम से लोगों को भवितव्यता की पूर्व सूचना प्राप्त हुई थी।

डॉ. राइन ने अपने अन्वेषण पर कितनी ही विज्ञान गोष्ठियों में भाषण दिये और इस संदर्भ में अधिक गहरी शोधें किये जाने की आवश्यकता बताई। ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (बी.बी.सी.) के माध्यम से उनके कई भाषण इंग्लैंड के रेडियो से भी प्रसारित हुए।

राइन के शोध निष्कर्षों में तीन बातें प्रमुख हैं एक यह कि मनुष्य के अन्दर कोई ऐसी अविज्ञात चेतना विद्यमान है जो सुदूर क्षेत्र तक अपना सम्बन्ध सूत्र बनाये हुए है और वह उपयुक्त अवसरों पर रहस्यमयी घटनाओं का उद्घाटन कर सकती है। दूसरा यह कि परस्पर घनिष्ठ व्यक्तियों में सहज ही, तथा मनस्वी लोगों द्वारा प्रयत्न पूर्वक मनःस्थिति का आदान-प्रदान हो सकता है। तीसरा यह कि पुरुषों की अपेक्षा यह अतीन्द्रिय शक्ति महिलाओं में कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। विशेषतया उनमें जो धार्मिक रुचि अधिक लेती हैं।

स्वप्नों की सार्थकता पर ऐसी ही शोधें अन्य अन्वेषकों ने भी की हैं और उनने अपनी ढूंढ़ खोज का विवरण पुस्तकाकार छपाया है। ऐसी पुस्तकों में ड्यू मारियर की ‘पेटर टूवेट् एन’ और किपलिंग की ‘ब्रश वुड व्वाय’ पुस्तकें प्रसिद्ध हैं।

दूरवर्ती स्वजनों के साथ घटित होने वाली घटनाओं तथा भवितव्यताओं का पूर्वाभास कितनी ही बार ऐसे विचित्र ढंग से सामने आता है कि न तो उन्हें झुठलाया जा सकता है और न उनका आधार अथवा कारण समझ में आता है।

इस संदर्भ में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. नेलसन वाल्ट का कथन है कि-मनुष्य के अन्दर एक बलवती आत्म-चेतना रहती है, जिसे जिजीविषा एवं प्राणधात्री शक्ति कह सकते हैं। यह न केवल रोग निरोध अथवा अन्य आत्म रक्षा जैसे अस्तित्व संरक्षण के अविज्ञात साधन जुटाती है वरन् चेतना जगत में चल रही उन हलचलों का पता लगा लेती है जो अपने आगे विपत्ति के रूप में आने वाली हैं। पूर्वाभास बहुधा अपने ऊपर तथा अपने सम्बन्धियों के ऊपर आने वाले संकटों के ही होते हैं। सुख सुविधा की परिस्थितियों का ज्ञान कभी-कभी या किसी-किसी को ही हो पाता है।


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बहुत से व्यक्ति कम योग्यता रहते हुए भी बहुत काम कर डालते हैं, और बड़ी सफलता प्राप्त करते हैं, इसका एकमात्र कारण होता है- सन्तुलित मस्तिष्क, निश्चित कार्यक्रम और व्यवस्थित क्रिया पद्धति।

-स्वेड मार्डिन

परा मनोविज्ञानी हैराल्ड कहते हैं स्वप्न में ही नहीं, अपितु जागृत स्थिति में भी कई बार बिल्कुल सही पूर्वाभास होते पाये गये हैं जिनका सामयिक परिस्थितियों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। उन्होंने फ्राँसीसी उड्डयन संस्थान में काम करने वाले एक यान चालक की विमान दुर्घटना में मृत्यु होने का उल्लेख किया है और बताया है कि ठीक दुर्घटना के समय ही रास्ता चलती उनकी एक मात्र बहिन को यह अनुभव हुआ था कि अभी अभी उनका भाई वायुयान दुर्घटना में मरा है। दूसरे दिन ठीक वैसा ही समाचार भी उसे मिल गया। इस प्रकार के प्रसंगों में व्यक्तियों की पारस्परिक आत्मीयता की सघनता का बहुत हाथ रहता है।

मनःशास्त्री हेनब्रुक ने अपनी शोधों में इस बात का उल्लेख किया है कि अतीन्द्रिय क्षमता पुरुषों की अपेक्षा नारियों में कहीं अधिक होती है। दिव्य अनुभूतियों की अधिकता उन्हें ही क्यों मिलती इसका कारण वे नारी स्वभाव में कोमलता, सहृदयता जैसे सौम्य गुणों के आधिक्य को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में अध्यात्म क्षेत्र नारी को अपनी प्रकृति प्रदत्त विशेषताओं के कारण सहज ही अधिक सफलता मिलती रहती है।

बीज रूप में यह अलौकिक एवं अतीन्द्रिय क्षमता हर किसी में मौजूद है और यह सम्भावना हर किसी के सामने खुली पड़ी है कि उस दिव्य शक्ति को प्रयत्न पूर्वक विकसित करके न केवल अपना किन्तु दूसरों का भी भला कर सके।


श्री रामकृष्ण परमहंस (Kahani)

सायंकाल के समय श्री रामकृष्ण परमहंस एक नागा सन्त श्री तोतापुरी के साथ, उनकी धूनी के समीप बैठे आध्यात्मिक वार्तालाप कर रहे थे। वार्तालाप करते-करते दोनों महानुभाव अत्यन्त उच्च स्तर पर पहुँच गये थे। अद्वैत ज्ञान की चर्चा में दोनों तन्मय होकर ‘एकोब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ का आनन्द अपने अन्दर अनुभव कर रहे थे।

तभी बाग का एक नौकर अपनी चिलम लेकर आग की तलाश में आया और आग लेकर चिलम भरने लगा। तब तक बाबा को कुछ पता न चला। किन्तु नौकर के चिलम भर कर उठते ही बाबाजी की तन्द्रा भंग हो गई। नौकर की धृष्टता समझते ही वे उस पर बरस पड़े और नागाओं की विशेष भाषा में भला-बुरा कहने लगे। जब इससे भी क्रोध की संतुष्टि न हुई तो उठकर दो-चार चिमटे भी उसके जमा दिये।

इधर बाबाजी अपने इस काम में लगे हुए थे, उधर स्वामी रामकृष्ण परमहंस तोतापुरी जी को शाबाशी देते हुए हँसी से लोट-पोट हो रहे थे। तोतापुरी जी को स्वामी जी की उस हँसी और शाबाशी देने पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। नौकर को भगा देने के बाद उन्होंने स्वामी जी से पूछा- ‘आप इस प्रकार हँसते हुए मुझे शाबाशी क्यों दे रहे हैं। क्या आपने नहीं देखा कि उस नौकर ने कितनी बड़ी धृष्टता की। आप जानते ही हैं कि हम नागा लोग धूनी की आग को कितना पवित्र मानते हैं। उसे इस आग को छूकर अपवित्र करने का क्या अधिकार था?’

स्वामी जी और भी जोर से हँसकर बोले- ‘यह आज आपसे पता चल गया कि आग भी किसी के छूने से अपवित्र हो जाती है। इसके साथ आपके ब्रह्मज्ञान और अद्वैतवाद की वास्तविकता का भी पता चल गया। अभी आप कुछ क्षण पहले ‘एकोब्रह्म द्वितीय नास्ति’ की जोरदार घोषणा करते हुए कह रहे थे कि यह सम्पूर्ण अग-जग एक ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। संसार के जो भी प्राणी और पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं वे सब एक ब्रह्म के प्रकाश प्रतिबिम्ब के सिवाय और कुछ नहीं हैं। किन्तु दूसरे ही क्षण आप सारा ज्ञान भुलाकर उस आदमी को भला−बुरा कहने और मारने लगे। वास्तव में अहंकार का अस्तित्व बड़ा प्रबल होता है, उस पर विजय पा सकना सरल काम नहीं है। श्री तोतापुरी जी लज्जित हो गए। उन्होंने उसी समय से अहंकार और क्रोध का परित्याग कर देने की प्रतिज्ञा की और उसे आजीवन निभाया।


मानवी काया एक सशक्त सौरमण्डल

मानवी शरीर ज्यों हाड़माँस का पुतला भर प्रतीत होता है पर उसका विश्लेषण जितनी गहराई से किया जाय उतनी एक के बाद दूसरी परत अद्भुत दिखाई देती चल जाती है। प्रभु के हाथ की इस अनुपम कला-कृति में एक से एक बढ़कर रहस्य प्रकट होते चलते हैं।

काया के भीतर रहने वाले मन की शक्ति और संभावना का तो कहना ही क्या-शरीर की संरचना भी ऐसी ही है जिसकी बारीकियाँ अपने गर्भ में न जाने कितनी विशेषतायें धारण किये प्रतीत होती हैं। शरीर शास्त्र के आधार पर देखें तो प्रतीत होता है कि उनमें सात स्वतन्त्र तन्त्र काम कर रहे हैं। उनमें परस्पर सहयोग तो है पर साथ ही उनका क्रियाकलाप अपने आप में समग्र एवं सर्वांगपूर्ण भी है। जिस प्रकार शासन तन्त्र में गृह विभाग, अर्थ विभाग, निर्माण विभाग, संचार विभाग, विदेश विभाग, उद्योग विभाग, शिक्षा विभाग आदि अनेक उपतन्त्र होते हैं उसी प्रकार शरीर बाहर से एक दीखते हुए भी उसके भीतर सन्तरे के भीतर पाये जाने वाले स्वतंत्र घटकों की तरह सात शरीर पाये जाते हैं, उनकी विचित्रता इतनी भर है कि अपनी सीमित गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी परस्पर एक दूसरे के सहयोगी एवं पूरक बने रहते हैं।

इन सात शरीरों से काया के क्रियाकलापों का संचालन होता है सो तो है ही, साथ ही उनमें ऐसे शक्ति स्रोत भी सन्निहित हैं जिनके आधार पर मानवी व्यक्तित्व के विकास की अगणित संभावनायें मूर्तिमान होती रहती हैं। जिस प्रकार जड़ पदार्थों में भी एक आत्मा का अस्तित्व अध्यात्म दर्शन ने माना है उसी प्रकार इन सात शरीरों के भी सूक्ष्म शक्ति केन्द्र हैं। इन्हें षट्चक्र और सातवाँ सहस्र दल कमल- ब्रह्मरंध्र- कहते हैं। शरीर विज्ञानी जिस प्रकार प्रत्यक्ष सात काय-कलेवरों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं उसी प्रकार अध्यात्म विज्ञान में सूक्ष्म शरीर के साथ सघन घनिष्ठता के साथ जुड़े हुए सप्त शक्ति चक्रों का निरूपण किया है और उन्हें सप्तदीप, सप्तसागर, सप्त नाद, सप्तपर्वत, सप्तऋषि, सप्तलोक, सप्तव्याहृति, सप्तसत्ता, सप्तसाधना के रूप में विवेचना करते हुए समग्र आत्म विद्या का कलेवर खड़ा किया है।

ब्रह्मशरीर के अन्तर्हित व्यापक क्षेत्र में फैले हुए पदार्थ तत्व के सात भाग हैं। उन्हें ब्रह्माण्डव्यापी प्रकृति के सात शरीर भी कह सकते हैं (1) दैवीय-डिवाइन (2) सृष्टि के प्रथम जीव से संबद्ध-मोनडिक (3) परमाणु-एटम (4) आत्मिक-स्प्रिचुअल (5) मानसिक -मेन्टल (6) सूक्ष्म-आस्ट्रिल (7) भौतिक-फिजीकल। इन सातों के भीतर ही वे अगणित सिद्धियाँ समृद्धियाँ समाविष्ट हैं- जिनके लिए हम निरन्तर लालायित रहते हैं। ब्रह्माण्ड शरीर की भाँति ही मनुष्य शरीर के भीतर भी सात परतें हैं चाहें तो इन्हें सात शरीर भी कह सकते हैं। ब्रह्म शरीर के सात आवरणों की भाँति ही मनुष्य शरीर के सात विभेद भी परस्पर घनिष्ठता पूर्वक संबद्ध हैं।

मनुष्य शरीर यों एक मालूम पड़ता है पर उसका विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि उसमें ऐसी सात पृथक संरचनायें काम करती हैं, जिनकी अपने-अपने ढंग की कार्य पद्धति है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि सात पृथक रीति-नीति अपनाकर काम करने वाले शरीरों से मिलकर एक पूर्ण शरीर बना है। इनकी कार्य पद्धतियाँ पृथक हैं तो भी वे परस्पर एक दूसरे के पूरक और सहयोगी बनकर रहते हैं।

यह सातों शरीर इस प्रकार हैं (1) अस्थि शरीर- बोन बॉडी (2) माँस शरीर- मसल्स बॉडी (3) नाड़ी शरीर- नर्व बॉडी (4) संचरण शरीर- सर्कुलेटरी बॉडी (5) लसीका शरीर- लिम्फैटिक बॉडी (6) नलिकाकार शरीर- ट्यूबूलर बॉडी (7) चर्म शरीर- स्किन बॉडी। इनमें से प्रत्येक शरीर समग्र शरीर रचना में अपना अनोखा योगदान देता है।

शरीर यों एक ही- एक समान ही सदा दीखता है पर वस्तुतः इसमें द्रुतगति से परिवर्तन होता रहता है। यद्यपि बाहरी पहचान नहीं बदलती तो भी भीतर ही भीतर सब कुछ आँधी तूफान की तरह चलता बदलता रहता है। दार्शनिक हक्सले ने मानव शरीर की उछलते हुए फव्वारे से तुलना की है। चलता हुआ फव्वारा यद्यपि एक स्थिति में दीखता रहता है पर उसका पानी हर घड़ी निरन्तर चलता रहता है और एक क्षण पहले जो बूँद जहाँ थी वहाँ से बहुत दूर चली जाती है। कायगत कोश भी इसी तरह मरते जन्मते और चलते बदलते रहते हैं पर बाहर से यही प्रतीत होता रहता है कि शरीर ज्यों का त्यों स्थिर है।

षट्चक्र एक प्रकार से छह बिजली घर हैं जिनके केन्द्रों से विभिन्न स्तरों के आकर्षण और विकर्षण शक्ति सम्पन्न कम्पन निसृत होते हैं। विश्वव्यापी शक्तियों को खींचकर अपने में धारण करने और अपनी विशेषताओं को संसार में प्रसारित करने की क्षमता इनमें भरी रहती है। मस्तिष्क भी एक सातवाँ चक्र है, जिसका केन्द्र बिन्दु सहस्रदल कमल कहलाता है। उसकी विशेषता विचारों के आदान प्रदान की है। अन्तरिक्ष में भरे ज्ञान सागर में से अपने उपयोग के मोती ढूँढ़ निकालना मस्तिष्क का काम है, साथ ही वह यह भी करता है कि अपनी विचारणा चेतना को एक छोटी नदी के समान उस अनन्त ज्ञान सागर में समर्पित करता रहे। शेष चक्रों में इन अन्य सभी शक्तियों के प्रतिनिधि केन्द्र हैं जो इस विश्व के संचालन में विभिन्न प्रकार की भूमिकायें सम्पादित करती रहती हैं। आँखों से देखने से संसार के पदार्थ जड़ एवं स्थिर दिखाई पड़ते हैं, पर वैज्ञानिक तथ्य यह है कि स्थिरता नाम की कोई चीज कहीं नहीं है। हर वस्तु के भीतर प्रचण्ड आणविक हलचलें हो रही है और उन्हीं के आधार पर वस्तुएं, वनस्पतियाँ, जन्मती, बढ़ती, सन्तानोत्पादन करती, जीर्ण होती और मरती रहती हैं। इन गतिविधियों के पीछे परमाणुओं की निर्धारित हलचलों से लेकर अन्य अनेक ऐसे शक्तियाँ काम करती रहती हैं जिनका उद्गम अन्तर्ग्रहीय केन्द्र से रहता है। यह सब मिलकर ही संसार के विभिन्न पदार्थ अपना कार्य कर रहे हैं। इन सबके पीछे जो क्रिया-कलाप चल रहा है वही मनुष्य के भीतर भी है। पर उसमें विशेषता यह है कि चल रहे प्रवाह में से इच्छानुसार अपने लिए अतिरिक्त रूप से ग्रहण कर सकता है और चाहे तो बहुत कुछ दे भी सकता है। यह पूर्णतया ऐच्छिक है। यदि किसी व्यक्ति में यह आकर्षण विकर्षण की अतिरिक्त क्षमता विकसित न हो सके तो फिर अन्य पदार्थों या प्राणियों की तरह वह केवल नियति के प्रवाह से प्रभावित मात्र होता रहेगा। प्रकृति का क्रम वहाँ जहाँ भी धकेलेगा उधर ही बहता चलता रहेगा।

षट्चक्र साधना से मनुष्य की आन्तरिक क्षमता बढ़ सकती है और वह अपने को एक ऐसी प्रचण्ड इकाई के रूप में विकसित कर सकता है जो संसार के अजस्र वैभव में से इच्छानुसार बहुत कुछ अधिग्रहण कर सके। यह क्षमता कई बार प्रकृति प्रदत्त भी होती है और कई बार जन्म-जन्मान्तरों के संग्रहीत संस्कारों के कारण अनायास ही विकसित हो पड़ती है। पर इतना द्वार हर किसी के लिए खुला हुआ है वह चाहे तो अपनी मानव सत्ता के साथ जुड़ी हुई चमत्कारी विशेषताओं को चाहे जितनी ऊँचाई तक विकसित कर सकता है यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समतुल्य भी बन सकता है।


Quotation

इस युग की सबसे बड़ी माँग है एक ऐसा असम्प्रदायी नीति धर्म जो मानव समाज में दिव्य जीवन की प्रेरणा भर सके।

सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। इनमें एक केन्द्रीय सूर्य और एक हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित है। इन दो को छोड़ दे तो फिर अन्य ग्रह सात ही रह जाते हैं। अन्तरंग में अवस्थित ईश्वरीय सत्ता और जीव चेतना को सूर्य और पृथ्वी की संज्ञा दी जाय तो फिर काय कलेवर की सात आवरणों वाले- सात ग्रहों वाले- सौर मण्डल से तुलना की जा सकती है। यदि कायिक सौरमण्डल को नव ग्रह जैसा मानने का आग्रह हो तो आत्मा और परमात्मा की दो प्रतिमाओं को भी देह मन्दिर में स्थापित मानकर वह संख्या पूरी नौ भी हो सकती है। यह सप्तधा अथवा नवधा आत्मसत्ता सूक्ष्मतः चक्र संस्थान के रूप में अनुभव की जाती है और शरीर के सप्त तन्त्रों में विभक्त प्रत्यक्ष रूप से देखी जाती है।

वस्तुतः विश्व चेतना के अंतर्गत जो भी शक्ति समुद्र लहराता और चेतना प्रवाह उमड़ता है उस सबका बीज सूत्र मानवी सत्ता के अंतर्गत विद्यमान है। इसे गम्भीरतापूर्वक देखा समझाया जाय और समग्र प्रगति के महान प्रयोजन में उनका समुचित प्रयोग किया जाय, इसी विद्या को समझाने वाली प्रक्रिया का नाम आत्मविद्या है। जो आत्मविद्या का आधार अपनाकर अन्तर्निहित महत्ता को सजग कर सका, समझना चाहिए उसी ने जीवन लाभ पाया अन्यथा यह मानवी काया अन्य जीवधारियों की तुलना में कहीं अधिक दुर्बल ही सिद्ध होती है। आर्थिक दृष्टि से तो उसका मूल्य दो रुपये से भी कम है।

मनुष्य शरीर का रासायनिक विश्लेषण किया जाय तो उसकी संरचना में औसतन निम्न तत्व पाये जायेंगे।

ऑक्सीजन- 72 प्रतिशत

कार्बन- 13.60 प्रतिशत

हाइड्रोजन- 9.10 प्रतिशत

नाइट्रोजन- 2.50 प्रतिशत

कैल्शियम- 1.30 प्रतिशत

फास्फोरस- 1.25 प्रतिशत

कुछ स्वल्प मात्रा में निम्न पदार्थ भी मिलते हैं- गन्धक, लोहा, आर्गेनिक, सोडियम, मैग्नीशियम, ब्रोमीन, क्लोरीन सिलिकॉन, कोबाल्ट, फ्लोरीन, जस्ता, ताँबा, पोटेशियम, आयोडीन।

यह पदार्थ कितनी मात्रा में हैं और उनका क्या उपयोग हो सकता है। इसका विवेचन करते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि -’शक्कर’ इतनी है जिससे सौ कप चाय मीठी हो सके। चूना इतना है कि जिससे मुर्गी का एक छोटा दरबा पोता जा सके। लोहा इतना है जिससे एक इंच लम्बी कील बन सके। मैग्नीशियम इतना है कि जिसमें छह छोटी तस्वीरों में रंग भरा जा सके। पोटेशियम इतना जिससे बच्चों की बन्दूक का एक पटाखा बन सके। गंधक इतना जिससे एक कुत्ते की जूँ मारी जा सके। फास्फोरस इतना जिससे बीस माचिस बक्स बन जायें। चर्बी इतनी जिससे एक दर्जन साबुन के बार बनाये जा सकें। ताँबा इतना जिससे एक पैसा ढल सके। पानी इतना जिससे छोटे बच्चे को नहलाया जा सके।

इस महंगाई के जमाने में भी इस सारे सामान का मूल्य डेढ़ रुपये से अधिक का नहीं बैठता।

हम चाहें तो आत्म विद्या का सहारा लेकर अपने अस्तित्व को ईश्वरोपम शक्तिशाली सिद्ध कर सकते हैं अथवा वह मिट्टी का ऐसा टूटा-फूटा-नौ छेद वाला घड़ा मात्र है जिसका बाजारू मूल्य दो रुपये भी तो नहीं मिल सकता।


खलीफा उमर की प्रजा (Kahani)

खलीफा उमर वेश बदलकर प्रजा की स्थिति देखने के लिये जाया करते थे। वे एक दिन ऐसे गरीब घर पहुँचे, जहाँ एक स्त्री बीमार फर्श पर पड़ी थी, तीन छोटे बच्चे बिलख रहे थे, चूल्हे पर हाँड़ी चढ़ी थी।

खलीफा ने देखा हाँड़ी में खाली पानी उबल रहा है। बच्चे को बहला देने के लिए उसने भोजन बनने का यह बहाना हो रखा था, बच्चे भूख से खीज रहे थे। स्त्री बीमारी की वजह से कुछ कर सकने में असमर्थ थी।

इस दयनीय दशा को देखकर खलीफा ने उस स्त्री से पूछा-तुम अपनी कष्ट कथा कहने और सहायता माँगने खलीफा के पास क्यों नहीं गई?

बीमार महिला ने कहा-क्या मुझे ही जाना जरूरी है। जो खलीफा मेरे पति को लड़ाई में जान देने के लिए यहाँ आकर ले जा सकते थे क्या उनके लिए यह उचित नहीं था कि उसकी विधवा और बच्चों की खोज खबर रखें।

खलीफा का सिर शर्म से नीचे झुक गया और उन्होंने तुरन्त ही उस महिला के निर्वाह का उचित प्रबन्ध कर दिया।


माया मुक्त होने का मार्ग और उपाय

माया से मुक्त-अज्ञान बन्धन से छूटे हुए व्यक्ति की स्थिति का वर्णन करते हुए श्रीरामकृष्ण परमहंस ने कहा है-

‘पारस से छू ली गई तलवार सोने की बन जाने पर दीखती तो तलवार ही है पर वह इतनी मुलायम हो जाती है कि हिंसा का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकती। इसी प्रकार ज्ञानयुक्त व्यक्ति किसी का अनिष्ट नहीं कर सकता।’

‘चुम्बक पत्थर के पर्वत के समीप पहुँचने पर गोदी में भरे लोहे के कील, काँटे अनायास ही उड़कर पर्वत के पास चले जाते हैं और गोदी में रखा वह भार अनायास ही खाली हो जाता है, इसी प्रकार गुण, कर्म, स्वभाव में भरे हुए समस्त कषाय कल्मष ईश्वर विश्वास रूपी चुम्बक पर्वत खींच ले जाता है और मनुष्य निर्मल हृदय एवं पवित्र जीवन बन जाता है।’

“मिश्री का नाम लेते रहने से मुँह मीठा नहीं होता और न घी को देखने से शरीर पोषण होता है। मिश्री या घी खाने से ही लाभ मिलता है। ईश्वर का नाम रटने से ही काम नहीं चलता। उसे खाना, पचाना और आत्मसात करना होता है।”

‘ज्ञानी की वृत्ति अन्तर्मुखी होती है वह विघ्न, संकट और असफलता में भी निर्विकार बना रहता है और सम्पत्ति तथा सफलता पर अहंकार नहीं करता और न हर्षोन्मत होता है।’

‘ज्ञानी हठी होता है। जिसे वह सत्य एवं श्रेयस्कर मानता है, उसी को अपनाता है भले ही सारी दुनिया उसका विरोध, असहयोग करती रहे।’

‘काष्ठ में अग्नि है यह जान लेने भर से कुछ काम नहीं चलता। काष्ठ को जलाकर जिसे अग्नि प्रज्ज्वलित करना आता है वही भोजन पकाने का लाभ लेता है। ईश्वर सबमें समाया हुआ है यह जानने भर से कुछ काम नहीं चलता। ईश्वर के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए इसे समझकर जो वस्तुओं का सदुपयोग और व्यक्तियों से सद्व्यवहार करता है वह ब्रह्मज्ञानी है’।

‘सरल मन वाला बालक सब कुछ चेतन देखता है। जड़ में भी उसे एक हँसती, बोलती और कर्तव्यनिष्ठ सत्ता काम करती दिखाई पड़ती है। न उसमें अहंकार होता है न दुर्भाव। न कामना, न तृष्णा। लकड़ी के टुकड़े को घोड़ा मानकर मोद मनाता है और बालू का महल बनाकर हँसता, उछलता रहता है। जो सामने है-उपलब्ध है- उसी में से मोद मनाने लायक अवसर उत्पन्न कर लेना ब्रह्मज्ञानी का लक्षण है।’


ज्ञान और धन (Kahani)

ज्ञान और धन दोनों लड़के एक दिन अपने को बड़ा सिद्ध करते हुए झगड़ पड़े और फैसला कराने के लिए आत्मा के पास पहुँचे।

आत्मा ने दोनों को दुलारा और कहा अपने-अपने स्थान पर दोनों ही महत्वपूर्ण हो। पर हो अपूर्ण। विवेक द्वारा तुममें से जिसका भी उपयोग हो जाय वही बड़ा है और जो भी दुरुपयोग के पल्ले बँध जायेगा उसकी गरिमा ही नहीं गिरेगी, दुर्गति भी होगी। अपनी अपूर्णता समझकर दोनों ही शिर झुकाये वापिस लौट गये।

‘हाथों में तेल लगाकर कटहल काटा जाता है जिससे हाथ में दूध न चिपकने पाये। विवेक रूपी तेल को हृदय मन पर पोतकर संसार रूपी कटहल का प्रयोग करना जिसे आता है वह ज्ञानवान है।’

‘किसी धनी के घर काम करने वाली नौकरानी घर का सब काम-अपने काम की तरह मन लगाकर करती है। मालिक के लड़के को भैया-भैया भी कहती है पर मन में जानती है कि सब कुछ मालिक का है, वह तो नौकरानी है। इसी प्रकार ज्ञानवान यह समझता रहता है, यह संसार, परिवार, वैभव जो अपने आस-पास है, वह तो ईश्वर का है, खुद तो सेवक मात्र है’।


धर्म और विज्ञान को मिलकर चलना होगा।

खगोल की गतिविधियां, वस्तुओं तथा प्राणियों का इतिहास, आहार, व्यवहार, आदि की चर्चा करना तथा उनके संबंध में कुछ निर्णय करना भौतिक विज्ञान की गवेषणा से संबंधित है। इस प्रकार की जिज्ञासाओं को यदि धर्म, अध्यात्म आदि के माध्यम से हल किया जायेगा तो गलतियाँ होंगी ही, इसी प्रकार यदि आत्मानुभूतियों की श्रद्धा एवं भावना जन्य सामर्थ्य की खोज अध्यात्म विज्ञान की परिधि से बाहर की जायेगी, उनकी प्रामाणिकता के लिए प्रयोगशाला का आश्रय लिया जायेगा तो यथार्थता की तह तक नहीं पहुँचा जा सकेगा।

पिछली पीढ़ियों पर जो धार्मिक प्रभाव था अब वह धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। धर्म को अपनी खोई हुई पुरानी शक्ति तब तक प्राप्त नहीं हो सकती जब तक विज्ञान की भाँति वह भी परिवर्तनों का सामना करने के लिए न हिचकिचाये।

धर्म वस्तुतः एक नैतिक, भावनात्मक एवं सामाजिक परिष्कार की नियोजित प्रक्रिया है। इसका लाभ परलोक में मिलेगा इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। धर्म धारणा जहाँ भी होगी वहाँ आत्म संतोष और आत्म उल्लास की ऐसी शक्ति विद्यमान रहेगी जिसके सामने भौतिक दृष्टि से अभाव ग्रस्त समझा जाने वाला जीवन भी शान्ति और धैर्यपूर्वक, सरल एवं सुरम्य बनाया जा सके।

अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि धर्म से हमें क्या फायदा? क्या इससे गरीबों की गरीबी दूर हो जायेगी? मान लीजिए धर्म ऐसा नहीं कर सकता तो क्या इतने भर से वह निरुपयोगी हो जायेगा?

मान लीजिए आप किसी बच्चे को खगोल विद्या का स्वरूप समझा रहे हैं और बच्चा आपसे पूछता है कि इस जानकारी से क्या उसे टोपी मिल जायेगी? तो उसे यही जवाब देना पड़ेगा कि ‘नहीं इसमें टोपी नहीं मिल सकती’ बच्चा कह सकता है कि तब खगोल विद्या निरर्थक है उसे अपने ढंग से सोचते देखकर यह नहीं मान बैठना चाहिए कि टोपी और खगोल विद्या का परस्पर संगति मिलाने वाला बच्चे का तर्क सही है। भले ही टोपी न मिल सके पर खगोल विद्या की जानकारी की मानवी जीवन में उपयोगिता तो बनी ही रहेगी।

धर्म को पूजा प्रक्रिया तक और कर्म को शिल्प व्यवसाय तक सीमित रखा जाय तो दोनों की गरिमा बढ़ेगी नहीं गिरेगी ही। दोनों अपंग अधूरे रह जायेंगे। इन दोनों का परस्पर पूरक होकर रहना उचित ही नहीं आवश्यक है। पदार्थ में सौंदर्य निखारने का यही तरीका है। कारीगर कलाकार तब बनता है जब अपने क्रिया कलाप में भावपूर्ण मनोयोग को नियोजित करता है। भावपूर्ण मनोयोग तब कल्पना मात्र बनकर रह जायेगा जब उसमें श्रेष्ठ निष्ठा जुड़ी न होगी। इसी प्रकार मात्र श्रम की, कोल्हू के बैल से, भारवाही गधे से तुलना की जाती रहेगी। दोनों का समन्वय ही कर्म कौशल बनकर सामने आता है।

समग्र ज्ञान को दो भागों में बाँटा जा सकता है एक अन्तर्बोध पर आधारित अध्यात्म अथवा धर्म। दूसरा तर्क, परीक्षण अनुभव तथा बताये गये तथ्यों के आधार पर भौतिक जगत संबंधी निष्कर्ष। इनमें एक प्रथम को विद्या दूसरे को शिक्षा कहा जा सकता है प्रथम जानकारी को प्रज्ञा-दूसरी को बुद्धि कहते हैं। और भी स्पष्ट करें तो एक को ज्ञान दूसरे को विज्ञान। एक को धर्म और दूसरे को कर्म कहने से ही वस्तुस्थिति समझी जा सकती है। भ्रमवश यह समझा जाता रहा है कि इन दोनों का स्वरूप तथा कार्यक्षेत्र पृथक पृथक हैं। पर सही बात यह है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यदि उन्हें असंबद्ध होने दिया जाय तो स्थिति बहुत ही विद्रूप हो जायेगी।

गड़बड़ तब पड़ती है जब दोनों के कार्यक्षेत्र की भिन्नता पहचानने में भूल की जाती है और एक से दूसरे का काम लेने का प्रयास किया जाता है। मनुष्य और पशु एक दूसरे के पूरक हैं। पारस्परिक सहयोग से दोनों ही लाभान्वित होते हैं, किन्तु यदि मनुष्य का कार्य पशु को सौंपा जाय और पशु के कार्य मनुष्य से लिए जायँ तो इसका परिणाम अवाँछनीय ही होगा। धर्म का लक्ष्य है अन्तरात्मा में सन्निहित सत्प्रवृत्तियों को मनोविज्ञान सम्मत पद्धति से इतना समुन्नत करना कि वे व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत हो सकें। विज्ञान का लक्ष्य है प्रकृतिगत शक्तियों तथा पदार्थों के स्वरूप तथा क्रिया-कलाप की इतनी जानकारी देना कि उनका समुचित लाभ मानवी सुख सुविधाओं की अभिवृद्धि के लिए किया जा सके। दोनों का कार्यक्षेत्र प्रत्यक्षतः अलग है, जिसमें एक दूसरे को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। फिर भी वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं क्योंकि जीवन आत्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार के तत्वों से मिलकर बना है। जड़ चेतन के समन्वय से ही जीवन का स्वरूप अप्रत्यक्ष होता है इतने पर भी यह अन्तर रखना ही पड़ेगा कि हृदय और मस्तिष्क की तरह दोनों का कार्यक्षेत्र विभक्त हो। एक का कार्य दूसरे पर थोपने की गलती न की जाय। भौतिक तथ्यों की जानकारी में पदार्थ विज्ञान को प्रामाणिक माना जाय और आत्मिक आन्तरिक चिन्तन एवं भावनात्मक प्रसंग में श्रद्धा की आत्मानुभूति को मान्यता दी जाय।

लन्दन विश्वविद्यालय के एस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो. हर्वर्ट डिग्ले का कथन है-विज्ञान की एक सीमित परिधि है। पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का विश्लेषण करना उसका काम है। पदार्थ किसने बनाया? किस प्रकार बना? क्यों बना? इसका उत्तर दे सकना वर्तमान में संभव नहीं। इसके लिए विज्ञान की बहुत ऊंची एवं बहुत अद्भुत कक्षा में प्रवेश करना पड़ेगा। वह कक्षा लगभग उसी स्तर की होगी जैसी कि अध्यात्म के तत्वाँश को समझा जाता है।

दार्शनिक रेनाल्ड कहते हैं। -धर्मक्षेत्र को अपनी भावनात्मक मर्यादाओं में रहना चाहिए और व्यक्तिगत सदाचार एवं समाजगत सुव्यवस्था के लिए आचार व्यवहार की प्रक्रिया को परिष्कृत बनाये रखने में जुटा रहना चाहिए। इतनी बात भी कुछ कम नहीं है। यदि धर्म वेत्ता अपनी कल्पनाओं के आधार पर भौतिक पदार्थों की रीति नीति का निर्धारण करेंगे तो वे सत्य की कुसेवा ही करेंगे और ज्ञान के स्वरूप विकास में बाधक ही बनेंगे।

दार्शनिक पॉलिटिलिच ने कहा है धर्म और विज्ञान का मिलन दार्शनिक स्तर पर ही हो सकता है। दोनों के क्रियाकलाप एवं प्रतिपादन की दिशाएं अलग-अलग ही बनी रहेंगी। न तो धर्मशास्त्रों के आधार पर खगोल रसायन, पदार्थ विश्लेषण जैसे निष्कर्ष निकल सकता है और न भौतिक विज्ञान की प्रयोगशालाएं ईश्वर, आत्मा, कर्मफल, सदाचार, भावप्रवाह जैसे तथ्यों पर कुछ प्रामाणिक प्रकाश डाल सकती है। केवल दार्शनिक स्तर ही ऐसा है जहाँ यह दोनों धाराएं मिल सकती हैं।

ह्युमन डैस्टिनी ग्रन्थ के लेखक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लैकोम्टे डुन्वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आधुनिक बेचैनी मुख्य रूप से बुद्धिमानी की कमी के कारण है। इस अविवेक ने ही मानव समाज की दुर्गति की है। विज्ञान अभी तक पालने में पल रहा है। वह वस्तुओं के गुण-धर्म पर तो थोड़ा प्रकाश डालता है पर यह नहीं बताता कि दूरदर्शी बुद्धिमत्ता की घटोत्तरी को कैसे पूरा किया जाय। धर्म में वे बीज मौजूद हैं जिनके आधार पर चेतना में विवेकशीलता का अधिक समावेश हो सकता है पर दुर्भाग्य यहाँ भी जमा बैठा है, आज धर्म का जो स्वरूप है उसमें दुराग्रहों ने जड़ जमाली है और विवेकशील चिन्तन के द्वार अवरुद्ध कर दिये हैं। ऐसी दिशा में सूझ नहीं पड़ता कि बुद्धिमत्ता की कमी किस प्रकार पूरी की जाय?


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“नाणदंसणसंपन्नं संजमे य तवे रयं।

एवं गुण समाउत्तं संजयं साहुमालवे॥

ज्ञान और दर्शन से सम्पन्न, संयम और तप में रत इस प्रकार गुण समायुक्त संयमी को ही साधु कहें”

-भ. महावीर

विज्ञानी रुनेग्लोविश इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पृथ्वी दो ध्रुवों अथवा शीत ग्रीष्म ऋतु प्रवाह की तरह एक दूसरे से भिन्न दीखते हुए भी धर्म ओर विज्ञान वस्तुतः एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों में से एक के आधार पर जो भी निष्कर्ष निकाला जायेगा वह वस्तुतः अपूर्ण ही रहेगा। पदार्थ में चेतना का अस्तित्व और चेतना को सक्रिय रहने के लिए भौतिक पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। दोनों का समन्वय ही विश्व को वर्तमान स्वरूप प्रदान कर सकता है। यदि उन्हें सर्वथा पृथक कर दिया गया तो अधूरे और भटकाव भरे निष्कर्ष ही हाथ लगेंगे।

विज्ञान की प्रगति इसलिए होती गई कि उसने नये ज्ञान प्रकाश के लिए द्वार खुला रखा है और अपनी भूलों के समझने तथा सुधारने के लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखा। जबकि धर्म ने अपने द्वार नये प्रकाश के लिए बन्द कर लिये। पूर्ववर्ती व्यक्तियों तथा पुस्तकों द्वारा जो कुछ कहा लिखा गया उसी को अन्तिम मान लिया गया और येन केन प्रकारेण उसी को सत्य सिद्ध करने के लिए हठ किया जाता रहा है। इसी भिन्नता के कारण प्रगति की दौड़ में विज्ञान आगे निकल गया और धर्म पिछड़ गया। यदि शोध और सुधार का द्वार खुला रखा गया होता तो निस्संदेह धर्म को भी वैसी ही मान्यता मिलती जैसी कि विज्ञान को मिली है।

भावनात्मक प्रवाह विलक्षण रीति से बहते हैं। एक ही समय में विभिन्न देशों में एक ही प्रकार के महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए कतिपय महामानव अवतरित होते हैं और वे सूक्ष्म जगत में गतिशील प्रवाह को अग्रगामी बनाते हुए विश्वव्यापी हलचलों का सृजन करते हैं। धर्म क्षेत्र में प्रायः ऐसा ही होता रहा है। लूथर जर्मनी में, ज्विंगी स्विट्जरलैंड में, केल्विन फ्राँस में, जोन नोक्स स्काटलैंड में हुए। उन्हीं दिनों भारत में भी कई प्रख्यात सुधारकों ने जन्म लिया। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा ही होता रहा है। गैलीलियो इटली में, केपलर पोलैंड में, न्यूटन इंग्लैंड में एक ही समय हुए और उन्होंने पुराने ढर्रे को नई पटरी पर चलने के लिए विवश कर दिया।

भावनात्मक क्षेत्र में क्रान्तिकारी चिन्तन धारा प्रस्तुत करने वाले अनेक मनीषी एक ही समय में उत्पन्न हुए। भले ही वे विभिन्न देशों में जन्में हों। भले ही उनका परस्पर परिचय न रहा हो पर प्रतीत होता है कि एक ही प्रपात से उठने वाले बुद्बुदों की तरह वे ही समय की आवश्यकता पूरी करने में जुटे हुए थे।

धार्मिक एवं भावनात्मक क्षेत्र में अभिनव प्रकाश उत्पन्न करने वाले विद्वानों में टम्पिले ब्रेथ, ब्रुमनेर, वेरडयेव, औलेन, न्यैगरैन, वैल्लीज, नैवुहरक, वुल्टमान, फैरी, टिलिच आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन लोगों को चिंतन की परम्परागत शैली को मोड़ देने के लिए सदा सराहा जाता रहेगा।

वैज्ञानिक और आत्मवादी दोनों ही अन्तर्ज्ञान से प्रकाश की किरणें प्राप्त करते रहे हैं। आविष्कारकों को अकारण ही ऐसी सूझ उठी जिसके सहारे वे अपनी खोज का आधार खड़ा कर सके। पूर्व शृंखला न होने पर भी इस प्रकार का अनायास अन्तर्बोध यही सिद्ध करता है कि मानवी चेतना के पीछे कोई अलौकिक प्रवाह काम कर रहा था, जिसे अप्रकट को प्रकट करने की उतावली थी। विज्ञान की प्रधान धाराओं के मूल आविष्कर्ता इस तथ्य से सहमत हैं कि उन्हें अपने विषय की सूझ-बूझ अन्तःकरण में अकारण ही प्रस्फुटित हुई। यदि उस प्रकाश किरण के लिए कुछ साधारण से कारण भी थे तो भी उनमें कोई नवीनता नहीं थी। वह सब कुछ पहले से ही होता चला आया था। उमंग उठकर ठप्प नहीं हुई वरन् उसने एक के बाद एक कदम आगे बढ़ने का सहारा दिया और सूझ-बूझ की उस शृंखला में एक के बाद एक कड़ी जुड़ती चली गई। यदि ऐसा न होता तो शोध की उठी हुई इच्छा मार्ग न मिलने पर कुण्ठित ही रह जाती।

विज्ञान का क्षेत्र हो अथवा धर्म का, उसमें समुद्र मंथन करके कुछ रत्न प्राप्त कर सकने का श्रेय मनुष्य की रहस्यमय प्रवृत्तियों को ही है। वे स्वल्प मात्रा में कहीं भी पाई जा सकती हैं पर यदि किसी प्रकार उनको प्रखर किया जा सके तो उनकी परिणति असाधारण उपलब्धियों के रूप में ही होती है। इसी अवलम्बन के सहारे सामान्य ज्ञान को महद्ज्ञान और सामान्य व्यक्तित्व को महामानव बनने का श्रेय सौभाग्य प्राप्त होता है।

विज्ञान और धर्म की प्रगति में जो तथ्य सहायक रहे हैं उनमें से कुछ प्रमुख युग्म इस प्रकार हैं- (1) विवेक और औचित्य (2) विश्वास एवं श्रद्धा (3) तर्क एवं आशा (4) जिज्ञासा और जानकारी (5) सभ्यता और शालीनता (6) प्रेम और वफादारी (7) त्याग और सेवा (8) लगन और निष्ठा (9) धैर्य और साहस (10) पुरुषार्थ एवं मनोयोग। इनका अवलम्बन लेकर चलने वाले व्यक्तित्व इस संसार में कुछ बहुमूल्य रत्न प्राप्त करके ही रहते हैं धर्म हो अथवा विज्ञान हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियों का श्रेय अन्ततः कुछ विशिष्ट सत्प्रवृत्तियों पर ही निर्भर सिद्ध होता है। कहना न होगा कि वह अन्तःस्फुरणा जो प्रसुप्त दिव्य प्रवृत्तियों को जागृत कर सके किसी अज्ञात संकेत से ही उद्भूत होती है।

विद्वान व्हाइट हैड का यह कथन बहुत हद तक सही है कि- “धर्म के सिद्धान्त मानवता के अनुभवों में निहित सत्यता को संक्षेप में प्रदर्शित करने का एक प्रयास मात्र हैं। इसी प्रकार विज्ञान भी मानव की ज्ञानेन्द्रिय शक्ति में निहित सत्यों को संक्षेप में सूत्रीकरण करने का प्रयास मात्र है।”

दार्शनिक रैक्वे कहते हैं- मनुष्य ने विज्ञान द्वारा प्रकृति के अन्तराल को समझा है और धर्म के द्वारा अपनी महानता का आभास पाया है।

दार्शनिक पैट्टन का कथन है कि यदि धर्म मान्यताओं के लिए पक्षपात, पूर्वाग्रह और कट्टरता की दृष्टि रहे तो ऐसा मनुष्य घोर अनैतिक भी हो सकता है भले ही वह धार्मिक समझा जाता रहे।

श्री जेविन्स का कथन है कि जादू-टोने चमत्कार तथा रहस्यवाद के आधार पर जो धर्म अथवा धर्माधिकारी खड़े हैं उनकी जड़ें खोखली हैं। सिद्धान्तों और प्रेरणाओं की दृष्टि से जहाँ खोखलापन होगा वहीं लोगों को आकर्षित करने के लिए ऐसे हथकण्डे काम में लाये जायेंगे। धर्म तो अपने आप में इतना उपयोगी है कि उसका यथार्थ स्वरूप समझने पर वह स्वयं ही एक ऐसा जादू, चमत्कार प्रतीत होता है जिसके आधार पर व्यक्तित्व में क्रान्तिकारी परिष्कार एवं उसका सत्परिणाम प्रत्यक्ष देखा जा सके।


खूँखार व्हेल-जिसे स्नेह, सद्भाव ने पालतू बिल्ली बनाया।

भीमकाय जल दैत्य व्हेल की चर्चा जन्तु जीवन में अत्यन्त रोमाँच और कौतूहल के साथ ही की जाती है, वह कभी उद्धत हो उठे और आक्रमण कर बैठे तो उसके मार्ग में आने वाले बड़े-बड़े जहाज भी सहज ही जलमग्न हो सकते हैं। मामूली नावों को तो उसका एक हलका सा झटका ही रसातल को पहुँचा सकता है। दुस्साहसी शिकारी ही अपनी जान की बाजी लगाकर उसका पीछा करते हैं, उनका दाँव लग गया तो फिर एक ही व्हेल का तेल, माँस चमड़ा, अस्थिपंजर आदि की बहुमूल्य सम्पत्ति उन्हें मालामाल कर देती है। कोई-कोई व्हेल तो एक छोटे मोटे द्वीप जितनी विशालकाय पाई जाती है। उसकी सामर्थ्य का तो कहना ही क्या। सौ हाथियों की सम्मिलित शक्ति भी उसकी तुलना में तुच्छ होती है।

संसार के इतिहास में पहली बार जो घायल व्हेल जीवित स्थिति में किसी प्रकार पकड़ी गई थी वह मात्र 18 घन्टे जिन्दा रही। दूसरी बार यह विशालकाय व्हेल 16 जुलाई 1964 में सेटर्ता द्वीप के समीप पकड़ी गई और उसे कैद करके वैक्यूओबर सागर तट के निकट ‘ड्राइडाक’ जलयानों की मरम्मत के लिए बनाई गयी एक छोटी सी खाड़ी में रखा गया। ड्राईडाक कम्पनी ने इसके लिए उस स्थान को जल्दी खाली कर देने में जो शीघ्रता एवं तत्परता बरती और उसे व्हेल का उपयुक्त कैद खाना बना दिया वह भी एक स्मरणीय सफलता ही कही जायेगी।

सैम्युअल व्यूरिख कोई पेशेवर शिकारी नहीं था। वह एक माना हुआ मूर्तिकार, कलाकार था। वैक्यूओवर के सार्वजनिक मछली घर की ओर से उसे व्हेल मछली की मूर्ति बनाने का काम सौंपा गया था। वे मात्र कल्पना के आधार पर नहीं व्हेल की यथार्थ आकृति को देखकर तदनुसार कलाकृति विनिर्मित करने का उनका मन था। इसी प्रयोजन के लिए वे व्हेल का शिकार करने के लिए आवश्यक नौका, सज्जा एवं अस्त्र शस्त्रों के साथ समुद्र में उतरे और जहाँ व्हेल रहती थी, उस क्षेत्र की ओर चल पड़े।

कई दिनों की ढूंढ़ खोज के बाद आखिर उन्हें सफलता मिल ही गई। एक विशालकाय व्हेल समुद्र की लहरों को चीरती हुई मुँह से पानी के ऊँचे फव्वारे उड़ाती हुई तूफानी गति से सामने ही दौड़ती हुई दिखाई दी। स्याह मूसा पत्थर से बनी काली चिकनी मूर्ति की तरह वह मृत्युदूत जैसी लगती थी। खोजी लोग एक बार तो उसे देखकर काँप गये, पर दूसरे ही क्षण उन्होंने साहस बटोरा और हारपून भाला उसे लक्ष्य करके चलाया। हवा में सनसनाता हुआ यह भाला उस जल दैत्य के दाहिने कन्धे में जा घुसा। एक मिनट के लिए श्मशान जैसी निस्तब्धता छाई, फिर थोड़ी ही देर में घायल मछली ऐसा क्रुद्ध कुहराम मचाने लगी मानो वह समुद्र को ही मथ डालेगी। घाव से रक्त की एक नाली सी बह रही थी और उसका बिखराव लहरों पर लाल रंग के झरने की तरह अपना प्रभाव छोड़ रहा था।

नाविकों ने ‘हारपून’ भाले की पूँछ में बँधे हुए रस्से को मजबूती से सँभाला। न जाने यह घायल मृत्युदूत इस क्रुद्ध स्थिति में क्या कर गुजरे, इसी आशंका से उस शिकारी नाव में बैठे सभी कर्मचारी काँप रहे थे।

तीन हजार पौण्ड भारी घायल व्हेल ने आक्रमणकारी नौका पर उलटकर प्रत्याक्रमण किया। अपने विकराल मुख को फाड़कर वह ऐसी झपटी मानो नाव और नाविकों का अस्तित्व इस समुद्र के गर्भ में ही विलीन करके रहेगी। प्रतिशोध और दर्द ने उसे रुद्र रूपधारी बना दिया था, ऐसी भयानकता को देखकर धैर्य भी अधीर हो सकता था।

दूसरे नाविक इस जीवन और मृत्यु की संधिवेला में अपने बचाव और आक्रमण को निरस्त करने के सम्भव उपाय बरत रहे थे। पर व्यूरिख ज्यों का ज्यों अविचल बैठा रहा। मानो उसकी पुतलियाँ दत्तचित हो व्हेल का चित्र स्मृतिपटल पर उतारने में कुशल कैमरा मैन की तरह तन्मय हो। यह क्षण बिजली की गति धारण किये हुये थे। आक्रमण का परिणाम कुछ ही मिनटों की अपेक्षा कर सकता था। नाविकों में से एक ने मछली की ओर मशीनगन दागनी आरम्भ की। दूसरे ने हारपून के रस्से को झटका ताकि घाव का दर्द बढ़कर उसे लौटने को विवश करे। तीसरा नाव को आक्रमण की दिशा से हटा रहा था। सभी अपने अपने ढंग के प्रयास कर रहे थे।

पर व्यूरिख को न जाने क्या हुआ। वह किसी भाव प्रवाह में बह रहा था। व्हेल में न जाने उसने कितना अद्भुत सौंदर्य देखा और यह उसकी कार्य संरचना पर एक प्रकार से मुग्ध हो ही गया। एक क्षण को उसे लगा कोई मत्स्य कन्या आकाश में उड़ रही है और अपने ऊपर अकारण हुए अन्याय का मर्मस्पर्शी उलाहना दे रही है। कलाकार की करुणा पिघल पड़ी, उसकी आँखों में से आँसू ढुलक पड़े उनमें न जाने कितनी आत्म ग्लानि भरी थी और कितनी मोह ममता। लगा हारपून उसी के कन्धे में चुभा हुआ है। एक बार वह कराह उठा। नाव में बैठे साथी चकित थे कि और नई विपत्ति क्या आई? व्यूरिख को अचानक यह क्या हो गया?

इस हलचल ने क्या नया मोड़ लिया। धावमान व्हेल की गति रुक गई। माना उसे व्यूरिख की भाव भरी अन्तर्व्यथा को समझा हो और दोष दुर्भाग्य को देती हुई वह भी इस कलाकार के प्रति अपना प्रेम प्रतिदान प्रस्तुत कर रही हो। हारपून उतना ही गहरा घुसा था। रक्त धारा उसी क्रम में बह रही थी पर उसका प्रत्याक्रमण और क्रोध मानो समाप्त हो गया था। नाविक समझे शायद वह मर रही है। अवसर से लाभ उठाकर वे नये शस्त्र चलाना चाहते थे पर व्यूरिख ने उनका हाथ रोक दिया।

व्हेल पूर्णतया जीवित और सजग थी, पर वह मन्त्रमुग्ध की तरह नौका के निकट चली आई। पानी में से उसकी चमकीली आँखें उस कलाकार की ओर इस प्रकार टकटकी लगाये टिकी हुई थी मानो वह अपनी मर्म कथा कवि जैसी संवेदनाओं के साथ व्यक्त कर रही है। व्यूरिख को वस्तुस्थिति समझने में देर न लगी। उसे विश्वास हो गया कि आक्रमण प्रत्याक्रमण का दौर समाप्त होकर भाव भरा आदान-प्रदान चल रहा है। घायल मछली पालतू कुत्ते की तरह नाव के इर्द गिर्द चक्कर लगा रही थी। इस स्थिति से डरे और घबराये हुए नाविक को कलाकार यही आश्वासन देता रहा भावना ने आक्रोश को जीत लिया, सद्भावना के प्रवाह में दुर्भावना बहकर चली गई। अब डरने की कोई जरूरत नहीं रह गई। दया ने अब घृणा का स्थान ग्रहण कर लिया है।

व्यूरिख ने नाव में लगे ट्रान्समीटर द्वारा वैक्यूओवर के अधीक्षक न्यूमेन को सूचित किया कि घायल व्हेल को जीवित पकड़ लिया गया है अब उसके निवास की व्यवस्था की जाय। रेडियो सुनने वाले को विश्वास नहीं हुआ कि यह क्या कहा जा रहा है। कहीं जीवित व्हेल भी कैद की जा सकती है। बहुत समय पूर्व एक अति घायल मछली को मरणासन्न स्थिति में जीवित पकड़ा गया था वह भी सिर्फ 18 घंटे जीवित रही। क्या अब व्हेल को सचमुच ही जीवित पकड़कर उसे निकट से देखना और उस पर अनुसंधान करना स्वप्न न रहकर एक सचाई बनने जा रहा है?

न्यूमैन हवाई जहाज लेकर घटना स्थल की ओर दौड़े उन्होंने आसमान से देखा कि व्यूरिख की नाव के पीछे व्हेल शान्त चित्त चुपचाप पालतू बिल्ली की तरह चली आ रही है। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। पर जो दीख रहा था उससे इन्कार भी कैसे करते?

ड्राईडाक झील तक नाव के साथ साथ व्हेल चली आई। जहाँ यह अनुभव किया गया कि नाव के साथ जुड़ा हुआ हारपून का रस्सा व्हेल को किसी प्रकार का कष्ट पहुँचा रहा है उसके सुधार की उचित व्यवस्था की गई। नाव को इसी ख्याल से बहुत धीमे चलाया गया। कुछ ही घंटों में पूरी हो सकने वाली वह यात्रा 17 घण्टे में पूर्ण हुई। वैक्यूओवर तट पर इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए हजारों व्यक्ति खड़े हर्ष ध्वनि कर रहे थे। हर किसी को यह एक जादुई घटना प्रतीत हो रही थी।

बन्दी गृह के रूप में बनी हुई उस खाड़ी में व्हेल आ गई अब उसके शरीर में गहरे घुसे हुए हारपून भाले को निकालने का प्रश्न था ताकि उसे कष्ट मुक्त किया जा सके और जीवित रखा जा सके। इसके लिए एक बहुत बड़ा ऑपरेशन आवश्यक था। डॉ. पैट मेकमीर के नेतृत्व में डाक्टरों का एक दल जान हथेली पर रखकर इसके लिए तैयार हुआ। उन्हें लोहे के सन्दूक में बिठाकर व्हेल तक पहुँचाया गया। उन्होंने बड़ी फुर्ती से वह कई गज चौड़ा आपरेशन किया और गहरे घुसे हुए भाले को निकाला। लोग आश्चर्यचकित थे कि मछली किस शान्त भाव से किसी समझदार रोगी की तरह उस ऑपरेशन को बिना हिले डुले सम्पन्न करा रही है। घाव बहुत बड़ा था। उसके विषाक्त होने का खतरा था। इस जोखिम से बचने के लिए पेन्सलीन की एक बड़ी मात्रा बारह फीट लम्बे बाँस में भरकर उस जख्म में भरी गई।

इतना सब हो चुकने और कई दिन जी चुकने के बाद यह विश्वास कर लिया गया कि उसे व्हेल जीवन के विशाल अनुसंधान के लिए बहुत समय तक पालतू रखा जा सकता है। तब यह सोचा गया कि उसका नामकरण किया जाय और यह पता लगाया जाय कि वह नर है या मादा। काफी ढूंढ़ टटोल के बाद उसे मादा पाया गया। तदनुसार उसका नाम ‘माँबी डाल’ रखा गया। इस नामकरण के अवसर समारोह पर भारी वर्षा में पन्द्रह हजार लोग अनुमति पत्र पाकर उस मत्स्य कन्या को देखने आये और लाइन लगाकर बहुत समय में इस अपने ढंग की अनोखी विश्व सुन्दरी के दर्शन का लाभ ले सके।

‘माँवी डाल’ की गतिविधियों के अनुसंधान ने मानव जाति को व्हेल जीवन की दुर्लभ जानकारियाँ दी हैं। साथ ही एक और उच्च स्तर का सत्य सामने प्रस्तुत किया है कि सद्भावनाओं की शक्ति अपार है उनके आधार पर मृत्यु को अनुचरी बनाया जा सकता है और घृणा को ममता में परिवर्तित किया जा सकता है। यह प्रयोग न केवल मनुष्य-मनुष्य के बीच सफल होता है वरन् प्राणि जगत का कोई भी जीवधारी सद्भावनाओं की पकड़ से बाहर नहीं हो सकता, भले ही वह अविकसित मनोभूमि या क्रुद्ध प्रकृति का ही क्यों न हो। जादू की चर्चा बहुत होती रहती है पर स्नेह और सद्भावना से बढ़कर बिरानों को अपना बना सकने का शक्ति सम्पन्न जादू शायद ही और कोई कहीं हो।


सेवक बनने की इच्छा (Kahani)

सेवक बनने की इच्छा -

स्वामी रामतीर्थ को विद्यार्थी जीवन में अनेक कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं। कभी-कभी तो स्थिति इतनी विकट आ जाती थी कि दीपक के तेल के खर्च की पूर्ति के लिए भोजन में कटौती करनी पड़ती थी, फिर भी अध्ययन के प्रति उनकी रुचि बढ़ती ही रही।

लाहौर महाविद्यालय के प्राचार्य ने स्वामी रामतीर्थ के बुद्धि कौशल से प्रभावित होकर सिविल सर्विस की परीक्षा हेतु उनका नाम भेजने का निर्णय कर लिया था। जब इन्हें इस निर्णय की सूचना मिली तो वह दौड़े-दौड़े प्राचार्य के पास गये और बड़े नम्र शब्दों में बोले- ‘मैंने अपनी फसल इसलिए तैयार नहीं की है कि उससे लाभ कमाया जाये अथवा बेचकर आय में वृद्धि की जाये। मैं तो उसे मिल बाँटकर खाना चाहता हूँ और मेरे परिश्रम का उद्देश्य भी यही है। मैं अधिकारी बनने का स्वप्न नहीं देखता और न मेरी इच्छा ही है। मैं अपने को सेवक मानता हूँ क्योंकि सेवा करना मानव मात्र का धर्म है फिर मैं इस धर्म से विचलित कैसे हो सकता हूँ। मैं तो अध्यापक बनकर सेवा करना चाहता हूँ अतः आप सिविल सर्विस की परीक्षा हेतु मेरा नाम प्रस्तावित न कीजिए।’

प्राचार्य के खूब समझाने पर भी स्वामी जी ने अपना निर्णय नहीं बदला।


दर्शन की उपयोगिता विज्ञान से भी अधिक है।

हर्बर्ट स्पेन्सर कहते हैं विज्ञान दर्शन का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। विज्ञान मात्र प्रकृति के कुछ रहस्यों पर से पर्दा उठाता है किन्तु दर्शन विश्वचेतना के अनेक पक्षों पर प्रकाश डालता है, बताता है कि चिन्तन की धारायें किसी प्रकार परिष्कृत की जा सकती हैं। प्रकृति की क्षमतायें उपयोग में लाकर अनेक सुविधायें पाई जा सकती हैं पर उन सुविधाओं का समुचित उपभोग करने के लिए मनुष्य की चिन्तन प्रक्रिया का आधार क्या हो यह बताना दर्शन का काम है। दर्शन वृक्ष है और विज्ञान उसकी एक टहनी। विज्ञान वेत्ता की तुलना में दार्शनिक का कार्यक्षेत्र और उत्तरदायित्व अति विस्तृत है।

प्रो. मैक्समूलर और प्रो. पालडिपेजन भारतीय धर्म के गहन अध्ययन के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि भारत को धर्म और दर्शन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। फ्राँस के महान दार्शनिक विक्टरक जिनका कथन है कि- भारत में दर्शन का समस्त इतिहास बहुत संश्लिष्ट है। प्लेटो, सीनोजा, वर्कले, ह्यूम, कान्ट, हेगल, स्कोफेन्यूअर, स्पेन्सर, डार्विन आदि ने एक स्वर से भारतीय दर्शन को विश्व सत्य के अतीव निकट माना है- प्रो. हक्सले का कथन है प्रकृति के कानूनों का जैसा बुद्धिसंगत और विज्ञान सम्मत विवेचन भारतीय दर्शन में किया गया है वैसा विश्वभर में अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। मोनियर विलियम का कथन है। इस सहस्राब्दी के दार्शनिक केवल उन्हीं तथ्यों को अपने ढंग से ऊहापोह कर रहे हैं जिनका कि भारतीय तत्व वेत्ता चिरअतीत में सघन प्रतिपादन और विस्तृत विवेचन कर चुके हैं। प्रो. हिग्वे जेन ने लिखा है- ऋग्वेद में नृतत्व विज्ञान और प्रकृति विज्ञान का जैसा सुन्दर विश्लेषण है वैसा आधुनिक विज्ञान की समस्त धारायें मिलकर भी नहीं कर सकीं।

प्रो. हापकिन्स ने अपनी पुस्तक “रिलीजन आफ इण्डिया” नामक पुस्तक में विस्तारपूर्वक लिखा है कि हिन्दू धर्म की महत्वपूर्ण विशेषता सहिष्णु और समन्वयात्मक दृष्टिकोण है। भिन्न मान्यताओं को उसमें उदारतापूर्वक सम्मान दिया गया है। ईसा से 300 वर्ष पूर्व तक का जो इतिहास मिलता है उससे यही सिद्ध होता है कि धर्म के नाम पर भारत में कभी कोई विग्रह नहीं हुआ। अनेक विचारधारायें अपने अपने ढंग से फलती फूलती रहीं और उन सबका मन्थन करके सत्य के निकट पहुँचने में मानवी मस्तिष्क को बहुत सहायता मिली।

फेराड्रक स्वेलेजन की शोध यह प्रमाणित करती है कि विश्वदर्शन पर भारतीय तत्वज्ञान की अमिट छाप है। उसने कान्ट के दार्शनिक प्रतिपादन को भी भारतीय दर्शन के एक अंश की व्याख्या मात्र माना है। स्कोफेनर भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सहज ही न कर सकने वाली दार्शनिक मान्यतायें भारत की ही देन हैं।

दर्शन शास्त्र को प्रत्यक्षवादियों द्वारा शब्दाडम्बर वाग्विलास, कल्पना काव्य आदि व्यंग शब्दों से सम्बोधित किया है, पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं। विचार करने की अस्त-व्यस्त शैली को क्रमबद्ध और दिशाबद्ध करने का महान प्रयोजन दार्शनिक शैली से ही हो सकना संभव है। अन्यथा उच्छृंखल गति-विधियाँ और अनगढ़ मान्यताओं का मिला-जुला स्वरूप ऐसा विचित्र बन जायेगा जिसे अपनाकर कोई किसी लक्ष्य तक न पहुँच सकेगा। उसे अन्धड़ में इधर-उधर उड़ते फिरते रहने वाले तिनके की तरह कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में सफलता न मिलेगी। योजनाबद्ध कार्य करना जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार योजनाबद्ध चिन्तन की भी उपयोगिता है। वह कार्य दार्शनिक रीति-नीति से ही सम्भव हो सकता है। कहना न होगा कि यह प्रयोजन भारतीय दर्शन जितनी अच्छी तरह पूरा करता है उतना संसार का अन्य कोई दर्शन नहीं।


हम समुद्र जैसे गम्भीर और महान बनें।

समुद्र अपनी गौरवमयी भौतिक गरिमा और विशालता के साथ उन प्रेरणाओं को भी अपने में भरे हुए है जिन्हें यदि ध्यानपूर्वक देखा समझा जाय तो मनुष्य भी वैसी ही अगाध महानता से सम्पन्न हो सकता है।

परिवर्तनों के फलस्वरूप ही समुद्रों का निर्माण हुआ है और उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय उन उथल-पुथल को ही है जो देखने में अनावश्यक लगती हैं और कष्ट कर भी, किन्तु सर्वतोमुखी ऊहापोह के पश्चात् इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि बिना उथल पुथल के नवजीवन का संचार कहीं भी नहीं हो सकता। यथास्थिति में पड़े रहने से तो केवल श्मशान जैसी निस्तब्धता ही बनी रह सकती है।

जर्मन वैज्ञानिक एल्फ्रेड बैगनर ने विश्व के विभिन्न भागों में पाये जाने वाले प्राणि अवशेषों के विश्लेषणात्मक अध्ययन से पता लगाया है कि चिर अतीत से लेकर अब तक संसार की जलवायु में अत्यन्त विशाल परिवर्तन हुए हैं। ध्रुव प्रदेशों में ऐसे प्राणियों के अवशेष मिलते हैं जो इन दिनों ऊष्ण प्रदेशों में पाये जाते हैं। इसी प्रकार किसी समय में हिमाच्छादित प्रदेश आज कल हरे-भरे मैदान हैं और किसी समय के मैदान आज कल बर्फ से ढके हुए हैं। इसी प्रकार समुद्रों का स्थान घनी आबादी ने ले लिया है और किसी समय का प्राणधारियों का निवास क्षेत्र आजकल समुद्र बना हुआ है। इसी प्रकार बैगनर का यह भी कहना है कि सुदूर अतीत में एक ही महाद्वीप का भूभाग था और एक ही समुद्र था। पीछे उन्हीं के कटते फटते, टूटते-फूटते टुकड़े कई महाद्वीपों और समुद्रों में बदल गये। इसी प्रकार ध्रुव प्रदेश भी चलता फिरता रहा है कभी उत्तर ध्रुव 140 उत्तर अक्षाँश तथा 1240 पश्चिम देशाँश पर था पर अब वह 510 उत्तर अक्षाँश और 1530 देशाँश पर आ गया है। भविष्य में यह प्रदेश और भी आगे बढ़ेंगे और अब जहाँ हरी भरी उपजाऊ भूमि लहराती है वहाँ अगम्य हिम प्रदेश दिखाई देंगे। पिछले हिमयुग के बाद तो ऐसी उथल पुथल बहुत ही हुई है। वह बर्फ पिघलने से समुद्र तल लगभग 65 मीटर ऊँचा उठा, फलतः किसी समय का हरा-भरा भू भाग समुद्र गर्त में विलीन हो गया।

हिमयुग न आता तो जहाँ किसी समय निरुपयोगी स्थल थे वहाँ आज हरे-भरे मैदान और समुन्नत नगर कैसे दिखाई पड़ते। किसी भूमि का भाग सदा चमके और कुछ स्थान सदैव अन्धकारमय स्थिति में पड़े रहें तो सृष्टि में सर्वांगीण सुन्दरता कैसे गतिशील रहेगी। खण्ड प्रलय के रूप में चिर अतीत के साथ ऐसे हिमयुगों का इतिहास भी जुड़ा हुआ है जिन्होंने भूखण्डों की स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन करके रख दिया। कई बार हिम क्राँतियाँ भी आग्नेय क्रांतियों की अपेक्षा अधिक प्रभावी सिद्ध होती हैं। भूतकाल के हिमयुग इसी प्रकार के थे। उन्होंने न केवल भूखण्डों के भाग्य को उलटा पलटा वरन् प्राणियों की कमजोर नस्लों को भी समाप्त कर दिया।

पृथ्वी की अनुमानित आयु 200 करोड़ वर्ष है। जीवों के रहने लायक तथा उपलब्ध पदार्थों के लगभग वर्तमान रूप में पाये जाने का काल 10 लाख वर्ष पूर्व से आरम्भ होता है। भूगर्भ विद्या के अनुसार इससे पूर्व का समय वह है जो कि इस तप्त पिण्ड को ठंडा होने और जलवायु वनस्पति जैसे जीवनोपयोगी माध्यम उत्पन्न और विकसित करने में लगा।

भूगर्भीय भाषा में 10 लाख वर्ष पूर्व से आरम्भ होकर विगत 15 हजार वर्ष तक चला आने वाला युग ‘होलोसीन’ काल है, 15 हजार वर्ष पूर्व से अब तक चला आने वाला समय ‘प्लीस्टोसीन’ काल कहलाता है।

प्लीस्टोसीन काल के आरम्भिक दिनों में पृथ्वी पर शीतलता की अत्यधिक मात्रा बढ़ने लग गई थी। अस्तु अप्रत्याशित रूप से ‘हिम युग‘ आरम्भ हो गया। अमेरिका योरोप, एशिया तथा दक्षिणी ध्रुव प्रदेश हिमावरण से ढ़क गये। उत्तरी अमेरिका में तो यह हिमावरण एक बार नहीं चार-चार बार भिन्न-भिन्न समयों पर हुआ।

हिमयुग के अवतरण के कारण वैज्ञानिकों ने खोजे हैं और बताया है कि (1) साधारणतया सूर्य विकरण का एक अंश ही पृथ्वी को प्राप्त होता है। सूर्य में अनेक धब्बे हैं। सहस्रों वर्ष बाद जब कुछ धब्बे पृथ्वी के सम्मुख आ जाते हैं तब पृथ्वी को प्राप्त होने वाले आँशिक विकरण की मात्रा और कम हो जाती है। फलतः धरती का तापमान घट जाने से हिमयुग आरम्भ हो जाता है। (2) पृथ्वी अपनी कक्षा में एक निश्चित कोण पर झुकी स्थिति में सूर्य का परिभ्रमण करती है। जलवायु में आश्चर्यजनक परिवर्तन होते हैं। (3) प्राचीन काल में अमेरिका, अफ्रीका, भारत सहित एशिया, ऑस्ट्रेलिया समेत एक ही महाद्वीप था। प्राकृतिक शक्तियों की असाधारण हलचलों ने समुद्र में भारी हलचल उत्पन्न की और वह विशाल भूखण्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया, बहुत सी भूमि समुद्र में चली गयी और समुद्र तल भूमि के रूप में उभर आया। इसी हलचल में तापमान भी घट गया और हिमयुग आरम्भ हो गया। (4) जर्मन भूगर्भवेत्ता ने सिद्ध किया है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव 140 उत्तरी अक्षाँश पर था। कार्बोनीफरस काल में वह 36 डिग्री उत्तरी अक्षाँश तक बढ़ आया ओर मायोसीन काल में वह 51 डिग्री अक्षाँश पर आ पहुँचा। इस चल बदल से विश्व की जलवायु में विशाल परिवर्तन आ गया और हिमयुग प्रारम्भ हो गया (5) भूगर्भीय शक्तियों के कारण पृथ्वी का धरातल इतना ऊपर उठा दिया गया कि वह आकाश की हिम रेखा तक जा पहुँचा और बर्फ से ढ़क गया। कहा जाता है कि आजकल जहाँ हिमालय है वहाँ कभी ‘टिथिस’ सागर था। समुद्र गर्भ ने उस परिवर्तन से अपना स्थान हिमालय बना लिया। ऐसी उथल पुथल के दिनों में तापमान में भी अप्रत्याशित गिरावट उत्पन्न हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

जो हो यह निश्चित है कि प्लीस्टोन काल में पृथ्वी के अधिकाँश भाग पर हिम आवरण पड़ गया था। उसने 2 करोड़ 5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हिमाच्छादित कर लिया था। उत्तरी गोलार्ध में कहीं-कहीं बर्फ की मोटाई 615 मीटर तक जा पहुँची थी, दक्षिणी गोलार्ध अपेक्षाकृत कम क्षेत्र में हिमाच्छादित हुआ था।

जहाँ अपेक्षाकृत हलकी बर्फ थी और जीवन रक्षा के साधन शेष थे वहीं प्राणी जीवित रह सके अन्यथा हिम युग से पूर्व का जीव जगत एक प्रकार से समाप्त ही हो गया। इसमें भी एक विशेषता यह रही कि उस काल के विकसित जीव जिनमें विशाल कार्नीवोरस हाथियों की कितनी ही जातियाँ भी सम्मिलित हैं, एक प्रकार से लुप्त ही हो गये। हिमयुग से पूर्व के उनके शरीर तो पाये जाते हैं पर पीछे उनका वंश ही समाप्त हो गया। किन्तु कम विकसित जीव अपना अस्तित्व बनाये रहे और उनकी नस्लें हिमयुग से पूर्व की तरह अभी भी मौजूद हैं।

प्रकृति चाहती है कि दुर्बलताग्रस्तों का कूड़ा कचरा साफ होता रहे। कमजोर रोते कराहते सृष्टि का सौंदर्य बिगाड़ें यह उसे उपयुक्त नहीं लगता है। फसल के समय चतुर किसान अच्छे अनाज को बीज बोने के लिए सँभाल कर रख लेते हैं और शेष हलके गेहूं को चक्की में पिसने और पेट की आग का ईंधन बनने के लिए डाल देते हैं। प्रकृति भी समर्थ और बलवानों के अस्तित्व को बनाये रखकर अपने गौरव की वृद्धि करना चाहती है। इसके लिए वह समय-समय पर आकस्मिक विपत्तियाँ लाकर सामने खड़ी करती रहती है ताकि छाँट फटक का प्रयोजन पूरा हो जाय। हिमयुगों ने न केवल जल को थल में- थल को जल में बदला वरन् दुर्बल प्राणधारियों का सफाया करने की प्रक्रिया भी पूरी करली। मजबूत स्थिति के जीवों को तो इस हिम क्रान्ति में भी अपना अस्तित्व बनाये रहने का अवसर मिल गया।

स्थूल बुद्धि से दीखने पर धरती के वातावरण में जीवों की उत्पत्ति होती है और आहार के साधन भी धरती पर ही उगते प्रतीत होते हैं। पर बारीकी से देखा जाय तो समुद्र की उर्वरा शक्ति पृथ्वी से अधिक है और धरती जितने जीवों का निर्वाह करती है उससे कहीं अधिक को प्रश्रय समुद्र देती है। जीवन का आदि तत्व-प्रोटोप्लाज्म-आरम्भ में समुद्र से ही उत्पन्न हुआ था और सर्वप्रथम जल जीवों का ही अस्तित्व इस संसार में दृष्टिगोचर हुआ था।

समुद्री जीवों को तीन भागों में विभक्त किया गया है। (1) प्लैंकटन -जो स्वयं चल फिर नहीं सकते, लहरें धाराएं और ज्वार-भाटे इन्हें इधर-उधर घुमाते फिरते हैं समुद्री पौधे और बहुत छोटे कीड़े इसी वर्ग में आते हैं (2) नैक्टन-स्वतः चल फिर सकने में समर्थ (3) वेन्थस-समुद्र की गहराई में एक स्थान पर ही रहने वाले विचित्र बनावट वाले जल जन्तु। इनमें कितने ही ऐसे भी हैं जिनकी विचित्रता स्तब्ध कर देती है। हाथी की सी सूंड़ वाला जलदैत्य-भीमकाय व्हेल, शार्क जैसे आक्रमण कारी मगरमच्छ अपने ढंग के अलग हैं और छोटे अमीबा बैक्टीरिया सरीखे सहज ही न दिखाई देने वाले जन्तु भी कम नहीं हैं। संख्या की दृष्टि से थलचरों की तुलना में जलचर अनेक गुने अधिक होंगे। मछलियों का तो एक प्रकार से समुद्र में ऐसा ही साम्राज्य है जैसा धरती पर मनुष्यों का। आँख से जलराशि के भीतर की सम्पदा भले ही दीख न पड़े पर अनुभव बताता है कि आँख की जानकारी ही सब कुछ नहीं है- न दीखने वाली दुनिया की-विशालता और सम्पदा दृश्यमान की अपेक्षा कहीं अधिक है।

समुद्री कीड़ों में ‘प्रवाल’ अपने ढंग का अनोखा है। उनने विशाल महासागरों में सहस्रों द्वीपों का निर्माण कर दिया। आमतौर से वे 23 डिग्री- 29 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान पर क्रियाशील रहते हैं। जल मग्नता ही उन्हें पसन्द है। ज्वार की लहरें जितनी ऊपर उठती हैं यह प्रवाल कीट पर्वत भी उतने ही ऊँचे उठते हैं। वे समुद्र में पाई जाने वाली ‘चाक’ मिट्टी खाते हैं। उनके शरीरों से एक विशेष प्रकार का द्रव पदार्थ निकलता है उससे एक कड़ा आवरण बनता जाता है। वे उसी स्वनिर्मित भवन कलेवर के भीतर रहते हैं। यह कलेवर भी विचित्र हैं, केले की जड़ों में से अपने आप निकलते रहने वाले पौधों की तरह नये अंकुर उपजाना है और प्रवाल में से शाखा-प्रशाखाएं, बारहसिंगा के सींगों की तरह फूटने लगती हैं। उन्हीं में से नये प्रवाल कीड़े उत्पन्न होते हैं।

दक्षिण पश्चिम हिन्द महासागर में प्रवाल निर्मित एक शृंखला है। इस शृंखला की ऊँची चोटियों पर मालदीव, लंकादीव, चागोज, सिचेलीज, आर्कपेला गोज द्वीपमाला स्थित है।

कितने ही व्यक्ति प्रवाल कीड़ों की तरह शान्त चित से दृढ़ निश्चय और अनवरत श्रम के साथ अपने लक्ष्य में तन्मय रहते हैं। हलचलों की उथल पुथल को देखने वाले उन्हें निष्क्रिय कह सकते हैं पर समय बताता है कि कुछ क्षण उछल-कूद करके फिर हाथ पैर ढीले कर बैठने वालों की अपेक्षा धैर्य के साथ निरन्तर किया जाने वाला पुरुषार्थ समय पर कितना विशालकाय बनकर सामने आता है।

मिट्टी खाकर मूँगा पैदा करने वाले यह प्रवाल कीड़े मधुमक्खी को भी मात करते हैं जो फूलों को शहद में बदलने के लिए प्रसिद्ध है। सन्त, सज्जन समाज में न्यूनतम अनुदान लेकर बदले में एक से एक बढ़कर सेवासाधना के कार्य सम्पन्न करते रहते हैं। उनकी प्रतिभा, बुद्धि, सामर्थ्य, सम्पदा सब कुछ शाखा-प्रशाखा फोड़ती हैं। प्रवाल कीड़ों की यह विशेषता भी सज्जनों में पाई जाती है कि वे संकटों के सागर में डूबे रहते हुए भी अपना मस्तिष्क विक्षुब्ध न होने दें।

नदियाँ धरती का नमक लेकर समुद्र में ही फेंकती रहती हैं। समुद्र उसे पचा जाता है। अपने तक ही सीमित रहता है। बादलों को वह निर्मल, मधुर जल ही प्रदान करता है।

प्रति किलोग्राम सागर जल में प्रायः 35 ग्राम नमक घुला होता है। इसमें खाने योग्य नमक 27 ग्राम और अखाद्य नामक 8 ग्राम है। नदियों द्वारा भूखण्डों से जल प्रवाह के साथ लाये गये नमक समुद्रों में जमा होते चले जाते हैं। इस प्रकार यह मात्रा बढ़ती चली जाती है। उन लवणों में से तो कुछ तो समुद्री जीव अपनी शरीर रचना और आहार की पूर्ति में खर्च कर लेते हैं फिर भी वह मात्रा बढ़ती ही रहती है।

यों नदियों ने खारापन ही समुद्र को दिया है पर उसका भी वह उपयोगी पदार्थ बनाकर लोगों को देता है। समुद्री नमक से लोग कितने ही उपयोगी पदार्थ बनाते हैं और उनमें कितनी सम्पदा उपार्जित करते हैं यह किसी से छिपा नहीं। समुद्र की तरह ही सज्जन भी अपनी हर सम्पदा को लोकोपयोगी बनाने में तत्पर रहते हैं।

समुद्र की गहराई में जितना नीचे उतरा जाय उतना ही उसका तापमान घटा हुआ मिलेगा। 200 मीटर गहराई में 16 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान पाया जाता है पर वह 600 मीटर पर 7 डिग्री, 1200 पर 3, 1800 पर 2 और 3000 मीटर पर 1.8 डिग्री रह जाता है। आर्कटिक महासागर के दक्षिण में स्थित महासागरीय तलियों में तापमान शून्य सेन्टीग्रेड अर्थात् जल जमने जितना पाया जाता है। इसी प्रकार ऊँचा तापमान प्रशान्त द्वीपों के समीप सागर तली में 21 सेन्टीग्रेड लगभग पीने के पानी तुल्य तापमान का रहता है। 5850 मीटर से नीचे तो सर्वत्र ही शून्य तापमान पाया जाता है।

वाह्य जीवन की विभिन्नता एवं विक्षोभकारी परिस्थितियों से साधारणतया हर किसी को उद्विग्नता होती है और उस उत्तेजना में समस्याओं के समाधान का हल निकलता है फिर भी वे महापुरुष जिनका व्यक्तित्व समुद्र जैसा विशाल है अपने अन्तःक्षेत्र की गहराई में बर्फ जैसी शीतलता भी भरे रहते हैं। वस्तुतः न तो वे उद्विग्न होते हैं और न क्रुद्ध। क्रिया-कलाप से, विपन्नता से निपटने वाला आवेश भले ही हो पर वे मानसिक सन्तुलन की दृष्टि से सदा शाँत और शीतल ही पाये जाते हैं।

समुद्र भौतिक दृष्टि से जो भी हो आत्मिक दृष्टि से हमें बहुत कुछ शिक्षा और प्रेरणा दे सकने में समर्थ है। यदि हम उन पर ध्यान दें तो निस्सन्देह समुद्र जैसे ही गम्भीर और महान बन सकते हैं।


धर्मराज युधिष्ठिर की तीर्थयात्रा (Kahani)

महाभारत समाप्त होने के उपरान्त धर्मराज युधिष्ठिर ने तीर्थयात्रा करने का निश्चय किया। साथ में चारों भाई अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी भी थीं। प्रस्थान करने से पूर्व वह भगवान कृष्ण के पास भी गये और उनसे साथ चलने के लिये आग्रह किया। कृष्ण को उस समय कुछ आवश्यक कार्य थे। अतः तीर्थयात्रा में साथ न जा सके। पर सुखद यात्रा की कामना करते हुए उन्होंने अपना कमण्डल अवश्य दे दिया और यह कहा ‘जहाँ जहाँ तीर्थ स्थानों में, नदियों और सरोवरों में स्नान करने का आपको अवसर मिले, वहाँ वहाँ इस कमण्डल को भी उनमें डुबा लेना।’ युधिष्ठिर कमण्डल लेकर सपरिवार तीर्थयात्रा को चल पड़े। काफी दिनों के बाद वह वापिस लौटे और कृष्ण को उनका कमण्डल देते हुये कहा ‘आपकी आज्ञानुसार जहाँ मैंने स्नान किया वहाँ इसे भी पानी में डुबोया है’।

‘यही तो मैं चाहता था।’ इतना कहकर कृष्ण ने उस कमण्डल को जमीन में पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिये और प्रसाद रूप में एक-एक टुकड़ा वहाँ उपस्थित सभी लोगों में वितरित कर दिया। जिसने भी वह प्रसाद चखा उसका मुँह खराब हो गया। लोगों को थूकते हुये तथा मुँह बनाते हुये देखकर कृष्ण ने धर्मराज से पूछा- ‘जब यह इतने तीर्थों में घूमकर आ रहा है और अनेक स्थानों पर स्नान भी किया है फिर भी इसका कड़वापन दूर क्यों नहीं हुआ?’

‘आप भी कैसी अजीब बात करते हैं कृष्ण। कहीं धोने मात्र से कमण्डल का कड़वापन निकल सकता है?’ धर्मराज ने उत्तर दिया।

‘यदि ऐसा है तो विभिन्न तीर्थों में जाने और अनेकानेक नदियों में स्नान करने पर आपके पाप कैसे धुल सकते हैं? मैं तो यह समझता हूँ कि यदि हृदय से अपनी भूलों को स्वीकार किया जाये और पश्चाताप अनुभव कर भविष्य में भूल न हो इसके लिये सावधानी रखी जाये तभी हृदय शुद्ध होता है और पाप से मुक्ति मिलती है। सच्ची तीर्थयात्रा तो यही है। केवल शरीर को धोने से काम नहीं चलता। धोना तो मन को चाहिए, शुद्ध तो हृदय को करना है।’

अब धर्मराज के पास कहने के लिये कुछ भी शेष न रह गया था।


प्रार्थना और मनोकामनाओं की पूर्ति

कामनाओं की पूर्ति के लिए प्रयत्न या प्रार्थना करने से पूर्व उनकी उपयुक्तता और वाँछनीयता की परख होनी चाहिए अन्यथा उसकी पूर्ति के लिए किया गया प्रयत्न व्यर्थ ही न जायेगा वरन् अनर्थ भी उपस्थित हो जायेगा।

कृषि कर्म अच्छा है पर बीज बोने से पहले यह देख लेना चाहिए कि यह किस अन्न का बीज है और सड़ा घुना तो नहीं है। गेहूँ की फसल उगाने वाले यदि कंटेली बो दें तो अन्न राशि मिलना तो दूर उलटे भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जायेगी और उन कंटीले विष वृक्षों से केवल अहित ही सम्पन्न होगा। कृषि करना-बीज बोना-कुछ भी बोना ऐसा अन्धेर ठीक नहीं।

कामनाएं अपने मस्तिष्क की उपज और दूसरों के सिर पर चमकती लगने के कारण सभी अच्छी लगती हैं। पर वर्गीकरण करने पर बहुत सी ऐसी होती हैं जो देखने भर की ही सुन्दर लगती हैं। भीतर उनके विष ही भरा रहता है। कंटेली का फल पीला, सुनहरा और सुन्दर होता है पर उपयोग में वह घोर कड़ुई और विषैली होने से दुखदायक ही सिद्ध होती है। कामनाओं में से भी कितनी ऐसी ही ‘कंटेली’ सदृश होती हैं।

गुजारे की व्यवस्था ठीक प्रकार चल रही है पर अमीरी चाहिए दौलत का कोष मिलना चाहिए। पति-पत्नी भले चंगे मौज करते हैं। निश्चिन्त निर्द्वंद्व हँसते खेलते हैं पर बच्चे चाहिए। शत्रुओं का नाश होना चाहिए भले ही वह शत्रुता अपने ही दोष दुर्गुणों के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हो। मुकदमे में विजय होनी चाहिए भले ही अपना पक्ष अनीति युक्त हो। परीक्षा में उच्च श्रेणी की सफलता मिलनी चाहिए भले ही पढ़ने में बिल्कुल ध्यान न दिया गया हो, पुत्र आज्ञाकारी होना चाहिए भले ही खुद उच्छृंखलता का आचरण करके उसे वैसी ही उद्दण्ड प्रेरणा देते हों, पत्नी पतिव्रता होनी चाहिए भले ही स्वयं दुराचारी हों।

कामनाएं एक पक्षीय होती हैं उनका एक पहलू ही लोग देखते हैं। यह नहीं देखते इनमें से कितनी नैतिक और कितनी उचित हैं। जिसका गुजारा ठीक चल रहा है वह अमीर बनकर ईर्ष्या, द्वेष, व्यसन अहंकार की ही वृद्धि करेगा, अमीरी असमानता जन्य अनेकों अनाचार पैदा करती है। वह होनी ही चाहिए इसकी क्या आवश्यकता है? बढ़ी हुई जनसंख्या को देखते हुए आज की स्थिति में बच्चे पैदा करना विशुद्ध समाज द्रोह है। बालकों को सुसंस्कारी बनाने की न अपनी योग्यता है न परिस्थिति। गुण्डागर्दी की सेना में कुछ और तस्करों की वृद्धि कर जाने से सिर पर पाप ही बढ़ेगा। स्वर्ग ले जाने वाले पिण्डदान की कल्पना तो मिथ्या ही सिद्ध होगी। जो धन समाज के उपयोगी कामों में लगाया जाने पर आदर्श उपस्थित कर सकता था उसे बेटे के लिए हराम की कमाई खाने के लिए छोड़ जाना किस प्रकार बुद्धिमानी है। इस युग में उस पर ईश्वर की कृपा है जिसके सन्तान नहीं। संतान है तो बेटियाँ ही हैं। इस सौभाग्य को दुर्भाग्य मान कर बेटे के लिए रट लगाने वाले और उसके लिए दुखी रहने वाले कभी यह सोचते ही नहीं कि उनकी कामना उचित है या अनुचित। कामना कैसी भी क्यों न हो उसका परिणाम कुछ भी हो-मनोकामना सिद्ध होनी चाहिए।

भगवान यदि अनैतिक कामनाएं पूरी किया करें देवता यदि अन्याय को भी बढ़ावा दिया करें आप तथा कथित भक्त की कामना पूर्ण किया करें तो फिर वे समदर्शी कैसे रह जायेंगे? फिर उन्हें पक्षपाती क्यों न कहा जायेगा? गलतियाँ अपनी नाश शत्रु का हो। चोरी डकैती खुद ने की मुकदमा देवता छुड़ा दें। सट्टे जुए में बिना कमाई का धन मिल जाय भले ही देवी दो बकरों की बलि ले ले। रिश्वत का प्रलोभन देकर देवताओं से अनैतिक काम कराने की प्रार्थना करना और फिर मनोकामना पूर्ति के लिए जाल बिछाना। इच्छा पूर्ण न हो तो देवता को गाली देना, यह आज के पूजा पाठ का स्तर रह गया है। बेईमान भक्त की मनोकामनाएं बेईमान भगवान ही पूरी कर सकता है। प्रार्थना करने से पहले भगवान से यह पूछ लेना चाहिए कि आपको हमारी ही तरह का बेईमान होना मंजूर है या नहीं। यदि न हो तो पूजा प्रार्थना के झंझट में क्यों पड़ें?

बिना परिश्रम बिना पात्रता के मनमानी उपलब्धियाँ प्राप्त करने के दाव-घात भी इसी श्रेणी में आते हैं। पढ़ने से कतराना और हनुमानजी को प्रसाद का लालच देकर प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के सपने देखना। यह किस प्रकार उचित है। यदि हनुमान ऐसे ही अन्धेर किया करें तो फिर कोई विद्यार्थी पढ़ने का परिश्रम क्यों करेगा? फिर प्रसाद चढ़ाने की सस्ती तरकीब ही सब क्यों नहीं अपना लेंगे। ऊँची सफलताएं प्राप्त करने के लिए जिस योग्यता का अभिवर्धन आवश्यक है फिर उसे कोई क्यों सम्पादित करेगा। फिर पुरुषार्थ और अध्यवसाय की क्या आवश्यकता रह जायेगी।

भौतिक कामनाएँ मनुष्य की योग्यता और चेष्टा से संबंधित हैं, पुरुषार्थ के मूल्य पर ही उन्हें खरीदा जा सकता है। ऐसी कामनाओं के लिए देवताओं का दरवाजा नहीं खटखटाना चाहिए।

अनैतिक पक्ष की सफलता के लिए प्रार्थना करके-भक्त को भक्ति का और भगवान का स्तर नहीं गिरना चाहिए। तृष्णाओं और वासनाओं को नियंत्रित संयमित और परिष्कृत करने की आवश्यकता है न कि उनकी पूर्ति के लिए लालायित रहकर बहुमूल्य मानव जीवन को निरर्थक क्रियाकलापों में बरबाद करने का आग्रह करने की।

मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंत्र, देवता या भगवान को विवश करना अवाँछनीय है, अर्वाचीन अथवा प्राचीन कर्मों का फल भोगने के लिए साहसपूर्वक तैयार रहना चाहिए। दुष्कर्मों के दुखद फल से छुटकारे के लिए नहीं वरन् दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति का परित्याग कर सकने के लिए साहस और पराक्रम माँगना चाहिए।

कामनाओं को औचित्य को परखने से प्रतीत होता है कि हमारी अधिकाँश कामनाएं अनैतिक, अवाँछनीय और अनावश्यक होती हैं, पुरुषार्थ और शौर्य के अभाव में हमें जो असफलताएं एवं व्यथाएं भोगनी पड़ती हैं उनसे बचने के लिए देवता का पल्ला पकड़ते हैं। देवता किसी प्रकार प्रसन्न होते हैं तो मनुष्य को श्रेय पथ पर चलने की प्रेरणा करते हैं और सदुद्देश्य पर सुदृढ़ रहने का साहस प्रदान करते हैं। दैवी सम्पदायें नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियाँ हैं।

परिष्कृत व्यक्तित्व यदि परिष्कृत कामना करे तो उसे दैवी सहायता अवश्य प्राप्त होती है। ऐसी प्रार्थना ईश्वर सुनता है और उसे पूरी करने में भरपूर सहायता भी देता है। महामानवों ने अनेक कठिनाइयों के रहते हुए जो आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त कीं, उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे उसके पीछे दैवी सहायता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सुयोग्य और साधन सम्पन्न व्यक्ति जहाँ लौकिक प्रयोजनों में असफल होते रहते हैं और मात खाते रहते हैं वहाँ साधनहीन व्यक्तियों द्वारा उच्च उद्देश्य की दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकना ईश्वरीय सहायता के बिना कैसे संभव हो सकता है।


Quotation

परोपकारी महात्मा लोग ईश्वर के नजदीकी सम्बन्धी हैं और दूसरे, संसारी हैं, मनुष्य तो उसके केवल उत्पन्न किये प्राणी मात्र हैं।

-रामकृष्ण परमहंस

सदुद्देश्य प्रार्थना की आवश्यक शर्त है। कामना पूर्ति में दैवी सहयोग मिलने की आशा तभी की जा सकती है जब कामनाएं उच्च कोटि की हों उनमें आत्म कल्याण और लोक मंगल का उच्च प्रयोजन सन्निहित है।

निकृष्ट स्वार्थ की पूर्ति के लिए वासना और तृष्णा का मनोरथ पूरा करने के लिए अयोग्य, कुपात्र और अनैतिक व्यक्तित्वों द्वारा की गई प्रार्थना हवा के झोंके के साथ उड़ते हुए सूखे पत्तों की तरह ऐसे ही आकाश में उड़कर अस्त व्यस्त हो जाती है। वे ईश्वर के कान तक पहुँचती तक नहीं। देवतत्व उन जल्पनाओं पर ध्यान नहीं देते और कामना पूर्ति की रट लगाने वाले ऐसे ही इधर उधर टकराते हुए असफल होकर घर बैठ जाते हैं। ईश्वर के दरबार में केवल उन्हीं प्रार्थनाओं पर ध्यान दिया जाता है जिनमें उच्च उद्देश्य और श्रेष्ठ आदर्श का समावेश हो।


जीवन जीना- एक श्रेष्ठ कला

एक कुशल चित्रकार साधारण रंगों के समन्वय से जब चित्र बनाता है, जिसमें जीवन बोल रहा जान पड़ता है, तब हम आश्चर्य मुग्ध हो उठते हैं। एक सामान्य पत्थर से कुशल मूर्तिकार देवताओं की सृष्टि करता है। एक संगीतज्ञ शब्दों के भीतर छिपे अनन्त माधुर्य, आनन्द और रहस्य को उद्भासित कर देता है। अव्यक्त सौंदर्य को व्यक्त करना ही कला का लक्ष्य है। जीवन भी एक कला है। महात्मा गान्धी के शब्दों में तो- ‘जीवन समस्त कलाओं से श्रेष्ठ है, जो अच्छी तरह जीना जानता है, वह सच्चा कलाकार है।’

जैसे समस्त कलाएं अदृश्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति करती हैं वैसे ही जीवन सत्य, शिव और सुन्दर के प्रच्छन्न रहस्यों की अनुभूति और प्रकाशन करता है। जैसे चित्रकार को रंग और कूची, मूर्तिकार को पत्थर और छेनी, संगीतकार को शब्द, सुर, ताल और लय के साधन प्राप्त हैं, वैसे ही मनुष्य को जीवन-कला के चित्रण और प्रकाशन के लिए शरीर, मन और बुद्धि की समृद्धियाँ प्राप्त हैं।

जो अच्छी तरह जीना जानता है, वही सच्चा कलाकार है। हमारी सम्पूर्ण विद्या, हमारा ज्ञान, हमारा धन, हमारे अगणित दावे सब निरर्थक हैं, यदि हमें सुव्यवस्थित ढंग से जीना नहीं आया, यदि हमें जीवन की कला नहीं आई। क्या केवल जन्म लेना, पेट भरना और एक दिन मर जाना ही जीवन है? क्या अपनी हजारों वर्ष की सभ्यता और संस्कृति की यात्रा में मनुष्य ने इतना ही सीखा है? जिस जीवन में अच्छी तरह जीने की क्षमता नहीं, वह जीवन नहीं। अच्छी तरह जीना क्या है? शरीर, मन, बुद्धि और इन सबके द्वारा आत्मा की शक्तियों का अनुभव और उनका अपने तथा जगत के कल्याण के लिए सदुपयोग।

शरीर को लें तो अन्तिम काल तक वह शक्तिमान और समर्थ रहे, श्रेष्ठ कार्यों में उसका उपयोग हो, थकावट और आलस्य पास न फटके, निरोग रहे, रोग लड़ने और उस पर विजय पाने की शक्ति से भरा रहे। मस्तिष्क सक्षम, आँखें प्रकाश से भरी, मुख तेज पूर्ण, दाँत दृढ़ और स्वच्छ, जिह्वा मितभाषी और मधुर बोलने वाली, उभरा हुआ सीना, विकसित पुट्ठेदार बाँहें तथा सबल हाथ शक्तिमान और सब कुछ हजम करने वाला पेट तथा मजबूत पाँव, जो जीवन की लम्बी यात्रा के बोझ से विचलित न हों। यह शरीर को अच्छा रखना है।

मन वह, जिसमें अच्छे विचार आयें, ऊँचे आदर्श की कल्पना हो, जो जीवन को उचित मार्ग पर चलने की दृढ़ता प्रदान करे, जिसमें स्वार्थ की भावना इतनी प्रबल न हो जाय कि दूसरों के हित और कल्याण का ध्यान न रहे, जो शरीर में उत्साह की तरंगें बहाये, जिसमें ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अन्याय का मैल न हो। यह है स्वस्थ मन के लक्षण।

बुद्धि वह, जो विचारों को लक्ष्य की ओर संचारित करें, जो बुराई भलाई का विश्लेषण कर मन को श्रेय की ओर प्रेरित करे, जिसमें समस्याओं के मूल में पैठने की सूझ-बूझ हो, जो जीवन को अन्धकार से निकालकर प्रकाश के मार्ग पर अग्रसर करे। जो अपने और दूसरों के हितों के समन्वय साधे और व्यक्ति तथा समाज के पारस्परिक सम्बन्धों का उचित ढंग से विकास करे।

स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और श्रेष्ठ बुद्धि का मस्तिष्क इन तीनों का जब सहयोग होता है, तब जीवन कला प्रकट होती है, तब कुत्सित और भद्दी वस्तुयें सुन्दर लगने लगती हैं, स्वार्थ का स्थान त्याग लेता है, अनुदार दृष्टि में उदारता का भाव उत्पन्न होता है। दूसरों के प्रति हम अधिक सहिष्णु, अधिक उदार, अधिक सहानुभूति पूर्ण एवं अधिक आत्मीय बन जाते हैं।

आज जब हम संसार की ओर नजर डालते हैं तो हमें यह देखकर आश्चर्य और दुःख होता है कि असीम सुविधाओं और हानि के अगणित नवीनतम साधनों के बाद भी मानव अशान्त है और मानव की जीवन दृष्टि भी वही पुरानी है। जीवन बदल गया है, दुनिया बदल गई है पर जीवन पर, संसार की समस्याओं पर विचार की दृष्टि पुरानी ही बनी हुई है। आज भी बलवान दुर्बल को, अमीर गरीब को, साधन-सम्पन्न साधनहीन को, शक्तिमान राष्ट्र शक्तिहीन राष्ट्र को, बड़े छोटों को निगल कर ही जीवित रहना चाहते हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस इस धारणा और जीवन दृष्टि को लेकर ही आज भी मानव चल रहा है। हजारों वर्ष के इतिहास में मानव संस्कृति अपने प्रच्छन्न देवत्व को मूर्तिमान करने में प्रयत्नशील रही है। जिस परिमाण में पशुता दबती गई है, उसी परिमाण में सभ्यता का विकास होता गया है। पर जब-जब महान अवसर आये है सभ्यता कसौटी पर कसी गई है, तब तब अन्दर की दबी पशुता ऊपर आ गई। उसने मानवता के सम्पूर्ण प्रयत्नों को विफल कर दिया है। इनका कारण क्या है?

इस असफलता का एकमात्र कारण यही है कि व्यक्ति की जीवन दृष्टि अब भी पुरानी बनी हुई है। अब भी वह प्रेम की अपेक्षा बल प्रयोग पर, हार्दिकता की अपेक्षा आतंक और प्रभुत्व पर अधिक आस्था रखता है। इसीलिए देखने में सरल और निरीह मनुष्य संकट काल में अपना मानसिक सन्तुलन खोकर पागल के समान हो जाते हैं, एक दूसरे का गला काटने लगते हैं, मानव मानव के विरुद्ध खड़ा होता है, सामूहिक हत्यायें युद्ध के नाम से पुकारी जाती हैं, विभिन्न देशों के बची शत्रुता की भावना का प्रचार देश भक्ति समझा जाता है। जीवन में स्वार्थ, प्रतिद्वन्द्विता और जोर-जबर्दस्ती ने सदाचरण, प्रेम और उत्सर्ग का स्थान छीन लिया है।

आधुनिक जीवन का सन्तुलन बिगड़ जाने का कारण यह है कि मानव-प्रकृति का भौतिक पक्ष उसके नैतिक पक्ष से कहीं अधिक विकसित हो गया है। जीवन के भौतिक क्षेत्रों में जो आश्चर्यजनक प्रगति और क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये हैं, नैतिक क्षेत्र में उनके समानान्तर प्रगति और परिवर्तन नहीं हो पाये हैं। दोनों के बीच एक अन्तर, एक खाई आ गई है और पिछले सौ वर्षों में वह तेजी से बढ़ती गई है।

भौतिक जगत की आश्चर्यजनक प्रगति को देखते हुए मानव-समाज के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में अथवा भाव-जगत् में बहुत ही कम प्रगति हुई है। पिछले सौ वर्षों में मनुष्य की बौद्धिक शक्तियाँ अत्यन्त वेग से बढ़ी हैं परन्तु आध्यात्मिक विकास के क्षेत्र में मनुष्य बहुत पिछड़ गया है- इतना कि उसमें एक प्रबल निराशा, विवशता और विफलता की भावना घर कर गई है।

जीवन की भौतिक समृद्धि और सुविधाओं में असीम वृद्धि के कारण वासना और भोग-विलास के प्रति प्रलोभन अधिक बढ़ गया है। मनुष्य में अपनी इच्छाओं एवं उपभोगों पर नियन्त्रण रखने की, संयम की शक्ति क्षीण हो गई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने शारीरिक भोग-विलासों एवं स्वार्थ भावनाओं पर अंकुश रखने तथा लोक मंगल के लिए त्याग भावना एवं आत्मोत्सर्ग की भावना को विकसित कर नये स्वर्ण युग का निर्माण करें। हमें नूतन जगत के लिए नूतन मनुष्य चाहिए, वे जो जीवन के कला की चुनौती का उत्तर देने को तत्पर हों, वे जो नूतन युग के निर्माण के लिए नूतन जीवन दृष्टि धारण करें और अभी तक चली आ रही जीवन की अन्ध परम्परा का त्यागकर नया वास्तविक विशुद्ध जीवन बिताने का निश्चय करें। जब तक व्यक्तियों का जीवन शुद्ध न होगा और उनमें आत्म शोधन, आत्म परिष्कार और आत्मोत्सर्ग का दृढ़ संकल्प एवं संस्कार उद्भूत और विकसित न होगा, तब तक नये स्वर्णिम युग का अवतरण कैसे सम्भव हो सकता है?

मानव-जीवन के गहरे तल में असीम शक्तियाँ पड़ी हुई हैं। हमारा शरीर, मन, बुद्धि अस्वस्थ हैं। इसलिए जीवन की सच्ची कला का उदय नहीं हो पा रहा है। जिस दिन हम जीर्ण जीवन तथा विचार प्रणाली के बन्धनों से अपने मानस को मुक्त करके एक सर्वथा नवीन युग के निर्माण के लिये, नींव देने के रूप में नवीन जीवन-दृष्टि ग्रहण करेंगे और एक नये जीवन के बिताने का निश्चय ही नहीं, आरम्भ कर देंगे, उस दिन हमें एक नूतन मुक्ति, एक नूतन विजय, एक नवीन साहस, एक नवीन स्फूर्ति, एक नई शक्ति, एक नवीन आनन्द और एक नवीन शक्ति का अनोखा, अनिर्वचनीय आनन्द अनुभव होगा।


मंत्रशक्ति ही देवमाता- कामधेनु है।

श्रुति कहती है-

देवी वाचमजनयन्त देवास्ताँ,

विश्वरुपाः पशवो वदन्ति।

सा नो मंद्रेष्षमूर्गं दुहाना,

धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुवैतु॥

परावाक् देवी है। विश्व रूपिणी है। देवताओं की जननी है। देवता मन्त्रात्मक ही है। यही विज्ञान है। इस कामधेनु वाक् की शक्ति से हम जीवित हैं। उसी के कारण हम बोलते और जानते हैं।

शब्द के दो रूप हैं एक जो जीभ से बोला जाय है। कान से सुना जाता है। जिससे अर्थ का बोध होता है। एवं उस शब्द के साथ जुड़ा हुआ रूप या प्रसंग स्मृति पटल पर प्रस्तुत होता है। वैसे उच्चारित शब्दों को बैखरी संज्ञा दी जाती है। लोक प्रयोजन में वाणी का यही व्यवहार होता है।

दूसरा वह जिसे परावाक् कहते हैं। यह अन्तःकरण में भावना के ज्ञान एवं इच्छा के रूप में अवस्थित रहती है। यह शक्ति रूप में है। इसमें प्रेरणा भरी पड़ी है। बुद्धि इसी की अनुचरी है, मन इसी का सेवक चित्त इसी का पार्षद है। अन्तरंग मर्मस्थल में जो भाव उमड़ते हैं, उन्हें साकार करने के लिए-साधन जुटाने के लिए मन और बुद्धि को लगा रहना पड़ता है। जिसमें कि अन्तरंग में अवस्थित परावाक् की प्रेरणा से मन और बुद्धि दिशा ग्रहण करते हैं। मनुष्य जो कुछ सोचता है- करता है- बनाता है- पाता है उसे परावाक् का ही प्रसाद कहना चाहिए।

शरीर को, आहार विहार को स्वस्थ समुन्नत बनाया जाता है। मन, मस्तिष्क, अध्ययन, सान्निध्य, चिन्तन एवं अनुभव के आधार पर विकसित होता है। अन्तःकरण की अभिव्यंजना परावाक् को स्वस्थ, शुद्ध समुन्नत एवं सशक्त बनाने के लिए साधना करनी पड़ती है। साधना शारीरिक बलवर्धन के लिए भी होती है और मस्तिष्क को विकसित करने के लिए भी। व्यायाम, अध्ययन आदि को शरीर एवं मन की साधना कह सकते हैं। यदि इनका अवलम्बन न लिया जाय तो वे दोनों अविकसित पड़े रहेंगे। भगवान ने अनेक क्षमताओं से सम्पन्न शरीर और अनेक सम्भावनाओं से युक्त मन हमें दिया है पर यदि उन्हें व्यवस्थित एवं समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न न किया जाय तो वे अवाँछनीय दिशा में चलकर विकृत, भ्रष्ट एवं अधःपतित भी हो सकते हैं। रोग शोक से घिरे सकते हैं। इसी प्रकार अन्तःकरण को उसकी ऊर्जा-परावाक् को परिष्कृत न किया जाय तो वह अधोगामी ही असुरता ग्रस्त हो सकती है। जिस प्रकार आलसी और प्रमादी अन्तःकरण को सुसंस्कृत, परिष्कृत, समुन्नत बनाने का प्रयास छोड़ देने से मनुष्य पशु एवं पिशाच जैसी स्थिति में जा पहुँचता है। असुरता से आच्छादित अन्तःकरण दुर्भावनाओं से- दुर्बुद्धि एवं दुष्प्रवृत्तियों से भरा रहता है। स्वयं उद्विग्न रहता और दूसरों को कष्ट देता है।

शरीर और मन को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए किये जाने वाले विविध विध प्रयासों से भी अधिक आवश्यकता अन्तःकरण के सुधार परिष्कार की है। यही प्रयोजन परावाक् साधना से पूरा होता है। मन्त्र विज्ञान का यही प्रयोजन है। उससे परावाक् के मर्मस्थल का स्पर्श किया जाता है और परिष्कार का साधन जुटाया जाता है।

श्रुति कहती है -

पाक्का नः सरस्वती वाजभिर,

वाजिनीवती, धोनामवित्र्यवतु।

तप से पवित्र हुई वाक् पवित्रता, पुष्टि, प्रतिभा, प्रज्ञा तथा प्रेरणा प्रदान करती है। परावाक् के तप प्रयोजन को ही मन्त्र साधन कहते हैं। स्थूल बैखरी वाणी से उच्चारित और मध्यमा से ध्यान सम्बद्ध सूक्ष्म परा पश्यंती वाणियों को जागृत करता है। इस प्रकार जब चारों वाणियाँ सक्रिय हो उठती हैं और उर्ध्वगामी बनती हैं तो जीव ही ब्रह्म बन जाता है। ब्रह्म देवता के चार मुख हैं। उन्होंने चारों वेदों का सृजन प्रवचन किया। यह चतुर्धा प्रकटीकरण वस्तुतः बैखरी, मध्यमा, परा और पश्यंती वाणियों का ऊर्ध्वगामी उभार मात्र है। यह ब्रह्म देवता के लिए भी सम्भव है और आत्म देवता के लिए भी पुराणों में कथा है कि विष्णु की नाभि में उत्पन्न कमल नाल पर ब्रह्मा जी कई बार उतरे और चढ़े। मन्त्र साधन में यही होता है। स्थूल शब्द उच्चारित होकर अन्तःकरण के मर्म स्थल की गहराई में उतरता है और उस शक्ति स्रोत की ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऊपर आता है। जब वह ऊपर आता है तो बैखरी में पश्यंती का वैसा ही प्रभाव होता है जैसा बिजली के संपर्क में धातु के तार में। वह मन्त्रपूत शब्द समस्त सृष्टि में हलचल उत्पन्न करता है, सूक्ष्म जगत को स्पन्दित करता है और व्यक्ति को व्यक्ति मात्र न रखकर उसे देवी शक्ति सम्पन्न बना देता है।

हम सब गायत्री का जप करते हैं पर यह स्थूल बैखरी वाणी का स्पन्दन मात्र होकर रह जाता है। फलतः उसका वह प्रभाव नहीं होता जो होना चाहिए। महर्षि विश्वामित्र ने इसी गायत्री मन्त्र की साधना की। उस शक्ति का साक्षात्कार किया और वैसी ही सामर्थ्य से सम्पन्न हो गये जैसी कि इस महाशक्ति के महात्म्य में बताई गई है। मन्त्र साधना वाणी का तप है। स्थूल की सूक्ष्म में परिणति है। अंतर्दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करना है। कुँए में घड़ा फाँसना और खींचना तप है। जल भरा हुआ घड़ा फाँसना और खींचना तप है। जल भरा हुआ घड़ा हाथ में आता है तब वह सिद्धि है। साधना और सिद्धि का यही अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। मन्त्र साध्य को मन्त्र साध्य मनाने की इस अनूठी प्रक्रिया का रहस्य जो जानते हैं वे भौतिक उपकरणों के -साधनों को मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा जो पाया जाना सम्भव है, उसे माँत्रिक साधना पद्धति से प्राप्त कर लेते हैं। उनका साधना तप ही लौटकर सिद्धि भाण्डागार के रूप में परिलक्षित होता है।

शब्द को ‘ब्रह्म’ कहा गया है। यह शब्द ब्रह्म परावाक् का मर्मस्थल है। यह प्रायः क्षीर सागर में प्रसुप्त पड़ा रहता है पर जब जागृत होता है तो उसके स्पन्दन से यह सारा विश्व गतिशील हो उठता है। श्रुति वाक् को हृदयस्पर्शी बताती है। यह हृदयस्पर्शी स्वरूप स्वर्ग, मुक्ति तथा ब्रह्म निर्वाण है। यह स्पर्श अनुभव की संभूति ऋद्धि सिद्धियों का भण्डार है। यह रूप अनुभव देवताओं का साक्षात्कार अनुग्रह एवं वरदान है। यह सब वाक् शक्ति की ही प्रतिक्रिया-प्रतिध्वनि है।

वाक् , रूप, रस गंध, स्पर्श का अनुभव करता है। शब्द रूपी आकाश से ही वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी तत्व का आविर्भाव हुआ है, इसी से वाक् को विश्व रूपिणी बहु रूपिणी और देव शक्तियों की उसे अधिष्ठात्री कहा जाता है। अग्नि भू लोक है। वायु-भुवः लोक और वरुण स्वः लोक। बैखरी जब मन्त्र साधन द्वारा सूक्ष्म होती चलती है तो तीनों लोकों पर उसका अधिकार होता चला जाता है। लोक लोकान्तर में जो कुछ विद्यमान है उसके सम्बन्धित होती है- प्रभावित करती, नियन्त्रण रखती है और संचालन करती है परिष्कृत परावाक्। जिह्वा से उच्चारित बकवास में प्रयुक्त होती रहने वाली प्रक्रिया जब उलट कर मन्त्र साधना में लगती है तब वह शक्ति रूप होती है। शक्ति भी ऐसी जिसकी परिधि में वह सब कुछ आ जाता है जिसे अद्भुत एवं महान कह सकते हैं।

यह परिष्कृत वाक् जब यज्ञाग्नि से संयुक्त होती है तब उसी प्रचण्ड शक्ति को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। घृत को अग्नि में डालते ही उसकी परिणति ज्वाला के रूप में होती है। परावाक् जब यज्ञ कर्मों में जुटती है तो उसकी दीप्ति से अन्धकार में भटकता हुआ जगत दिव्य आलोक का लाभ प्राप्त करता है और शोक संतापों से छूटकर श्री, समृद्धि, शान्ति और प्रगति की ओर अग्रसर होता है। यज्ञ का सूक्ष्म रूप है- परमार्थ लोक मंगल। जब साधना संतप्त वाक् को परमार्थ प्रयोजन में लगाया जाय तो सच्चे अर्थों में उसे ब्रह्मयज्ञ कहना चाहिए। ब्रह्म अग्नि में ब्रह्म हवि देने की चर्चा गीता में इस संदर्भ में की गई है। ऐसे ब्रह्म यज्ञ से सुख शान्ति भर पर्जन्य बरसते हैं। चरु यज्ञों द्वारा भौतिक प्रयोजन पूरे होते हैं- भौतिक समृद्धि के मेघ भी बरसते हैं पर श्रुति ने जिस पर्जन्य वर्षा की और संकेत किया है उसे विश्व शान्ति और लोक कल्याण की उपलब्धियों के रूप में ही देखा समझा जाना चाहिए।

विश्वव्यापी स्थूल ऊर्जा विद्युत, चुम्बक, गर्मी प्रकाश आदि के रूप में देखी जा सकती है। शक्ति के कम्पन परमाणु को प्रभावित करते हैं और उसके कारण दृश्य जगत की विभिन्न हलचलों का क्रिया-कलाप चलता है जीवाणु भी किन्हीं दिव्य विद्युत शक्तियों से प्रभावित होते हैं। मानवी चेतना में जो दीप्तिमान अंश है उसे दिव्य सत्ता का स्पन्दन कहना चाहिए। यह स्पन्दन ब्रह्म सत्ता प्रवाहित भी होते हैं और आत्म सत्ता प्रवाहित भी ईश्वर की इच्छा से यहाँ सब कुछ होता है। यह कहते हुए हमें यह भी समझना होगा कि आत्म सत्ता का परिष्कृत रूप ब्रह्म सत्ता ही है। निर्विकार साक्षी और दृष्टा ब्रह्म संसार में इच्छा बनकर जो कुछ करता है वस्तुतः वह उसके समतुल्य आत्म सत्ता का ही प्रवाह होता है। मन्त्र तप से साधित परावाक् अपनी विशुद्धता एवं प्रखरता के कारण ब्रह्म इच्छा ही बन जाती है। उसके स्पन्दन जगत के जीवाणुओं को स्पन्दित करते हैं। तदनुसार लोक प्रवाह की दिशा बदल जाती है। देवदूत, अवतारी महामानव यही करते हैं। इनके कर्तव्य ईश्वर की इच्छा या इनकी इच्छा से ईश्वर का विधान जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। सिद्ध तपस्वियों की यही स्थिति होती है। उनकी परावाक् उच्चारण का ही नहीं संचालन और नियन्त्रण का भी प्रयोजन पूरा करती है।

जिस तरह ब्रह्माण्ड का बीज पिण्डाण्ड है, उसी प्रकार व्यष्टि का विराट् रूप समष्टि भी है। व्यक्ति की सत्ता को ब्रह्माण्ड की परिस्थितियों द्वारा विनिर्मित माना जाता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि बीज जैसा पिंड विकसित रूप में ब्रह्मांड बन जाता है। दोनों के बीच वृक्ष और बीज जैसा सम्बन्ध है। यह ठीक है कि बीज से वृक्ष बनता है पर यह भी गलत नहीं कि वृक्ष पर बीज उत्पन्न होता है, ब्रह्माण्ड की परिस्थितियों ने व्यक्ति को बनाया है पर व्यक्ति का चरम विकास भी विराट् ब्रह्माण्ड होता है। छोटा गुब्बारा फूलकर बड़ा बनता है। परावाक् उसी वायु का नाम है जो व्यक्ति जैसे छोटे गुब्बारे को फुलाकर विराट् बना देती है और ब्रह्मा की तुलना में ला खड़ा करती है। परमाणु की शक्ति बड़ी है पर जीवाणु की शक्ति उससे भी बड़ी है। इंजन बड़ा है पर ड्राइवर उससे भी बड़ा है। परमाणु जिन शक्तियों से स्पन्दित होते हैं उन्हें स्पन्दन करने की क्षमता उस चेतनशक्ति में सन्निहित है जिसे जीवाणु की विराट्सत्ता कहा जा सकता है। श्रुति कहती है -

विष्णुमुखा वै देवाइछन्दोभि रिमान्लोकानन पजप्यमभ्यजपन्।

देवता विष्णु मुख हैं। वे छन्द रूप हैं। उन्होंने न हटाया जा सकने वाला हटाया है और न जीता जा सकने वाला जीता है। यह मन्त्रात्मा और विश्वात्मा की एकता प्रकट करने वाला प्रतिपादन है।

मन्त्रों के शब्दार्थ से उनकी महत्ता सम्बन्धित नहीं। कोई अति शक्तिशाली मन्त्र अर्थ की दृष्टि से अति सामान्य हो सकता है। कोई भाषा गीत ऐसी अभिव्यक्ति युक्त हो सकता है जो मन्त्रों में दृष्टिगोचर नहीं होती हो। पर इससे मन्त्र का महत्व कम नहीं होता। अभिव्यक्ति नहीं, मन्त्र की महत्ता उसकी शक्ति संरचना से समाविष्ट है। मन्त्रों को स्वर शास्त्र या ध्वनि शास्त्र माना जाना चाहिए उसके उच्चारण से जो स्पन्दन गतिशील होते हैं उन्हीं में उनकी महिमा समाई हुई है। विभिन्न धर्मों में उनके परम्परागत मन्त्रों से ही उपासनायें तथा कर्मकाँडात्मक प्रक्रियायें सम्पन्न होती हैं। इसमें शब्द विन्यास की ही प्रधानता है। अर्थ की दृष्टि से, उस शब्दावली को सामान्य अथवा स्वल्प सार भी कह सकते हैं।

मंत्रों में चार शक्तियाँ मानी गई हैं (1) प्रामाण्य शक्ति (2) फल प्रदान शक्ति (3) बहुलीकरण शक्ति (4) आयातयामता शक्ति। इसका विवेचन महर्षि जैमिनी ने पूर्व मीमाँसा में किया है। उनके कथानुसार मन्त्रों की प्रामाण्य शक्ति वह है जिसके अनुसार शिक्षा, सम्बोधन आदेश का समावेश रहता है। इसे शब्दार्थों से सम्बन्धित कह सकते हैं।

कुण्ड समिध, पात्र पीठ, आज्य चरु, हवि, पीठ आदि को अभिमन्त्रित करके उनके सूक्ष्म प्राणों को प्रखर करने का विधान, मन्त्रोच्चार, कर्मकाँड, न्यास, ऋत्विजों को मनोयोग, ब्रह्मचर्य तप आहार, आदि विधि-विधान से मन्त्र की फलदायिनी शक्ति सजग होती है। सकाम कर्मों में मन्त्र की यह शक्ति विभिन्न क्रिया कृत्यों के सहारे सजग होती है और अभीष्ट प्रयोजन पूरे करती है।

तीसरी शक्ति है ‘बहुलीकरण’ अर्थात् थोड़े को बहुत बनाना। यज्ञ में होमा हुआ जरा-सा पदार्थ वायुभूत होकर समस्त विश्व में फैल जाता है। पानी के ऊपर जरा सा तेल डाल देने से पानी की सारी सतह पर फैल जाता है तनिक सा विष सारे शरीर में फैल जाता है। उसी प्रकार साधक का शरीर, मंत्रोच्चार एवं साधन में काम आने वाले अंग जरा से होते हैं पर उनके घर्षण से उत्पन्न शक्ति, दियासलाई से निकलने वाली चिनगारी की तरह नगण्य होते हुए भी दावानल बन जाने की सामर्थ्य से ओतप्रोत रहती है। एक व्यक्ति की मन्त्र साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो वह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।

चौथी आयातयामता शक्ति किसी विशेष क्षमता सम्पन्न व्यक्ति द्वारा विशेष स्थान पर विशेष व्यक्ति की सहायता से, विशेष उपकरणों के सहारे विशेष विधि विधान के साथ मन्त्रोपासना करने पर विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। विश्वामित्र और परशुराम ने गायत्री मन्त्र की साधना, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष विधि विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का पुत्रेष्टि यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब शृंगी ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया, यह शृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।

मन्त्र साधक का शरीर संयमी और मन एकाग्र होना चाहिए। बिखरती शक्तियों वाला साधक छूँछ होता है और वह मन्त्र तेज को अपने गर्भ में धारण नहीं कर सकता। रुग्ण स्त्री को गर्भपात होते रहते हैं वह स्वस्थ बालक को जन्म नहीं दे पाती यही गति असंयमी साधक की होती है। महाभारत की कथा है कि अश्वत्थामा और अर्जुन ने मन्त्र चालित ‘सन्धान अस्त्र’ छोड़े। उनकी भयंकरता को देखकर व्यासजी बीच में आ खड़े हुए और दोनों से अपने अस्त्र वापिस कर लेने को कहा। अर्जुन ने ब्रह्मचारी होने के कारण वापिस कर लिया पर अश्वत्थामा असंयमी होने के कारण असफल रहा।

शतपथ का एक उपाख्यान है नृमेध और यरुच्छेप में विवाद हुआ कि दोनों में कौन सफल माँत्रिक है। नृमेध के कण्ठ में धुँआ भर निकला पर यरुच्छेप ने मन्त्रोच्चार करके गीली लकड़ी में अग्नि प्रकट कर दी। उस पर यरुच्छेप ने कहा तू मन्त्रोच्चार भर जानता है मैंने उसकी आत्मा का साक्षात्कार किया है।

कौत्स मुनि ने मन्त्रों को अनर्थक माना है। अनर्थक का अर्थ यह है उनके अर्थ को नहीं ध्वनि प्रवाह को, शब्द गुन्थन को महत्व दिया जाना चाहिए। ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं आदि बीज मन्त्रों के अर्थ से नहीं ध्वनि से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। नैषध चरित्र के 13 वें सर्ग में उसके लेखक ने इस रहस्य का और भी स्पष्ट उद्घाटन किया है। संगीत का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर जो असाधारण प्रभाव पड़ता है उससे समस्त विज्ञान जगत परिचित है। एक नियत गति से शीशे के गिलास के पास ध्वनि की जाय तो वह टूट जायेगा। पुलों पर चलते हुए सैनिकों को कदम मिलाकर चलने की ध्वनि नहीं करने दी जाती उस तालबद्ध ध्वनि से पुल गिर सकता है। इंडेन में ‘स्टोन हैव्ज’ के पुराने अवशेष मध्यम स्वर बजने पर काँपने लगते हैं। इसलिये वहाँ न केवल बजाना वरन् गाना भी निषिद्ध है क्योंकि वह तालबद्धता उन अवशेषों को गिरा सकती है। इसी ध्वनि विज्ञान के आधार पर मन्त्रों की रचना हुई है। उनके अर्थों का उतना महत्व नहीं इसी से कौत्स मुनि ने उन्हें अनर्थक बताया है।

अग्नि शक्ति का केन्द्र है। अग्नि का प्रयोग सीखकर ही मनुष्य इतना समर्थ बना है। अग्नि के भय से हिंसक सिंह, व्याघ्र तक भागते हैं। अग्नि से रेल चलती है, जहाज उड़ते हैं, कारखाने चलते हैं, अस्त्र चलते हैं, भोजन पकता है, बिजली बनती है, यदि अग्नि का अस्तित्व न हो तो जीवन ही न रहे। अग्नि का ही दूसरा नाम जीवन है। इसलिए मन्त्र साधना में अग्नि का उपचार सम्बद्ध किया जाता है। यज्ञशालाओं में अखण्ड अग्नि, जप में अखंड दीपक तथा अनुष्ठान की पूर्ति पर अनुपातिक यज्ञ करने का विधान है। विभिन्न पर्वों तथा धर्मानुष्ठानों के अवसर पर अग्निहोत्र की आवश्यकता इसीलिए है कि उस संदर्भ में प्रयुक्त होने वाली मंत्रशक्ति अपना समुचित चमत्कार दिखा सके।


उपलब्धियों का सदुपयोग किया जाय।

भगवान ने मनुष्य को बहुत कुछ देकर भेजा है। वह न तो निर्बल न निर्धन। न अभावग्रस्त न असहाय। जन्मजात रूप से सब कुछ न सही तो बहुत अवश्य है।

इसके अतिरिक्त उसे साधन सम्पन्न मनोबल मिला है। बुद्धि की चमत्कारी क्षमता उसके पास है। इस उपकरण के माध्यम से वह संसार में उपलब्ध अगणित विशेषताओं से सम्पन्न पदार्थों को अपने लिये प्रयुक्त किया जा सकने योग्य बनाने में समर्थ है। यह असीम साधन सम्पन्न संसार मानो उसी की सम्पदा-उपभोग सामग्री के रूप में विनिर्मित किया गया है।

बुद्धि कौशल से उसने ज्ञान विज्ञान की अनेक शाखाओं का निर्माण किया है और सुविधा सामग्री को असीम मात्रा में बढ़ाया है। हविस अभी पूरी नहीं हुई है। अधिकाधिक उपलब्धियाँ साधन सुविधायें प्राप्त करने के प्रयत्न अभी शिथिल नहीं हुए, प्रखर ही होते चले जा रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि अगले दिन मनुष्य और भी अधिक साधन सम्पन्न होगा।

जन्मजात शारीरिक, मानसिक विशेषताओं में बुद्धि कौशल से उपार्जित भौतिक साधनों की मात्रा और मिल जाने से निस्सन्देह मनुष्य का वैभव अतिशय बढ़ता चला जा रहा है। मनोवैज्ञानिक त्रुटि के कारण उपलब्धियों की उपेक्षा करना उन्हें नगण्य मानना और कल्पित अभाव से दुखी रहना। यह बात तो दूसरी है पर संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि विश्व के समस्त प्राणियों की तुलना में मनुष्य अधिक साधन सम्पन्न है। साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि प्रागैतिहासिक काल से लेकर अद्यावधि अधिक साधन प्राप्त करने की दिशा में प्रगति ही होती रही है। जो कुछ दैवी अनुग्रह के तथा मानवी पुरुषार्थ के रूप में अब तक प्राप्त किया जा सका है। वह असाधारण ही नहीं अद्भुत भी है।

प्रश्न इन उपलब्धियों के सदुपयोग का है। इसी स्थान पर भारी भूल होती रही है। जो मिला हुआ है उसका सही उपयोग क्या है यह न जान पाने के कारण इस तरह खर्च किया जा रहा है जिससे अपेक्षाकृत कष्ट और विनाश की ही विभीषिकायें प्रस्तुत होती हैं।

विज्ञान को आज असीम शक्ति प्राप्त है। यदि विज्ञान का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य के लिये किया जाय तो ऋतु प्रभावों के नियन्त्रण, आँधी तूफान की रोक, वर्षा और बाढ़ का सन्तुलन, समुद्र के खारेपन का निराकरण खाद्य वस्तुओं का अभिवर्धन, विद्युत शक्ति की प्रखरता, स्वल्प व्यय साध्य यातायात, रोग नियन्त्रण जैसे अनेक उपयोगी कार्य किये जा सकते हैं और इस दुनिया को अधिक सुखी, सुन्दर एवं समुन्नत बनाया जा सकता है।

शिक्षा, शिल्प, कला, धन, शस्त्र आदि विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन और अभिवर्धन की ही बात सोची जाती रही है। यह ध्यान नहीं दिया गया कि उन उपलब्धियों का श्रेष्ठतम सदुपयोग क्या हो सकता है और उन्हें किस प्रकार प्रयुक्त करके सुख शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ाई जा सकती हैं। यदि यह सदुपयोग की बात आगे भी उपेक्षित होती रही तो बड़ी-चढ़ी उपलब्धियाँ विनाश का कारण ही बनेंगी।

विज्ञान की प्रगति परमाणु रहस्यों को खोज लाने में समर्थ हुई और एक बड़ा शक्ति भंडार हाथ में आ गया। पर इसमें खुशी मनाने की बात सामने नहीं आई। अणुबम बना लिये गये और उसमें समस्त धरती को क्षण भर में जल-भुनकर भस्म हो जाने का संकट सामने आया गया।

बढ़ा हुआ धन विलासिता और शोषण उत्पीड़न के नये जाल बुनने में लग गया। कला ने पशु प्रवृत्तियों को भड़काकर उसे पतनोन्मुख कुमार्गगामी बना दिया शिक्षा ने अहंकार बढ़ाया, धूर्तता के हथियार तेज किये और जनसाधारण को दिग्भ्रांत करने की कुशलता प्राप्त कर ली।

शरीर शक्तिशाली ऐसी इन्द्रियों से सम्पन्न है कि यदि उनका सदुपयोग होता तो इसी काया में देवत्व झाँकता। मानसिक विशेषतायें अद्भुत हैं यदि उन्हें सृजनात्मक दिशा में सोचने और लोक मंगल के लिए कुछ करने में प्रवृत्त किया गया होता तो इस धरती की गरिमा तथाकथित स्वर्ग से भी बढ़ी-चढ़ी होती, पर इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय जो सदुपयोग की बात गले से नीचे ही नहीं उतरने देता।

लीग फॉर स्प्रिचुअल डिस्कवरी की इतालवी शाखा ने ‘अन्तःचेतना का विस्तार और उसकी अभिव्यक्ति’ पर एक शोध ग्रन्थ प्रकाशित किया है- उसमें अनेक तर्क प्रमाण और उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि अर्थ परायण स्वार्थपरता और इन्द्रिय परायण भोग लिप्सा यदि प्रबल रहेगी तो मनुष्य अन्तरंग समर्थता से वंचित ही रहेगा। इन दोनों प्रवृत्तियों में निम्न स्तरीय आकर्षण इतना अधिक है कि वह ऊँचा सोचने और ऊँचे आदर्शों को अपनाने का अवसर ही नहीं देती। आत्म परिष्कार और आत्म-बल की सम्पन्नता के लिए अन्तःचेतना को निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर प्रवृत्त किया जाना आवश्यक है। इसके लिये प्रथम चरण अर्थ लोलुपता और इन्द्रिय लिप्सा की ओर से विरत होना और आत्म विकास के महत्व को हृदयंगम करना ही हो सकता है।

मैटाफिजिक्स विज्ञान के अन्वेषी डॉ. टिमोडे लियरी का कथन है कि- ‘इन्द्रिय लिप्सा में संलग्न मनःचेतना का प्रवाह उच्चस्तरीय आस्थाओं पर केन्द्रित किया जा सकता है’। बौद्धिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि उच्च स्तर की प्रवृत्तियों में प्रगाढ़ अभिरुचि उत्पन्न की जाय। केवल चिन्तन और मनन ही काफी नहीं अभिरुचि की प्रगाढ़ता से आस्था बलवती होती है। उसी बलिष्ठता के बलबूते मनुष्य महान बनता है। पर अभिरुचि का आकर्षण आमतौर से इन्द्रिय लिप्सा और मानसिक समर्थता में से एक को प्रधान बनाना होता है। इनमें से जिस पर अभिरुचि केन्द्रित रहेगी प्रगति उसी दिशा में होगी।

समग्र इन्द्रिय अनुभूतियों में 83 प्रतिशत ज्ञान मनुष्य को नेत्र इन्द्रियों से प्राप्त होता है। इसके बाद कान का नम्बर आता है। नेत्र और कान हमारे ज्ञान की अभिवृद्धि करते हैं। तदनुसार मनः संस्थान का निर्माण होता है। व्यक्तित्व को ढालने में मुख्यतया इन दो इन्द्रियों का ही हाथ है।

रसानुभूति, उल्लास और इच्छा लिप्सा को उत्तेजित करने वाली और तृप्ति देने वाली इन्द्रियों में जननेन्द्रिय प्रथम और जिह्वा द्वितीय है। वयस्क होने से पूर्व रसना की प्रधानता रहती है। स्वाद बहुत प्रभावित करता है पर जब काम संस्थान विकसित हो जाते हैं तब उनका उफान प्रधान बन जाता है। वृद्धावस्था में जननेन्द्रिय की शक्ति क्षीण हो जाती है तो फिर रसना बलवती होने लगती है। बूढ़े लोगों को बालकों की तुलना में गिनने की उक्ति प्रचलित है उसमें दो ही कारण प्रधान मालूम पड़ते हैं एक शारीरिक दुर्बलता के कारण परावलम्बन और स्वाद के लिये मन का अधिक ललचाना। काम क्रीड़ा और स्वाद लिप्सा की आकाँक्षायें, इच्छा, तृष्णा, विकलता और तृप्ति के चढ़-उतारों के झूले में झुलाती हुई रसानुभूति को ही स्पर्श करती है। व्यक्तित्व के विकास एवं मानसिक निर्माण में उनमें कोई विशेष सहायता नहीं मिलती।

यदि इन इन्द्रियों का अन्तः चेतना का उपयोग तुच्छ प्रयोजन में करके उनकी महान शक्ति को बर्बाद होते रहने से रोका जा सके और उन्हें उद्देश्य युक्त दिशा में नियोजित किया जा सके तो अति साधारण स्थिति का मनुष्य भी अति उच्च स्थिति में पहुँच सकता है। बर्बादी को रोकने और उपलब्धियों को उच्च प्रयोजन में लगाने की बात न जाने क्यों किसी को सूझती ही नहीं?

धर्म, नीति, सदाचार, समाज का अति महत्वपूर्ण ढाँचा खड़ा तो किया गया पर उनमें भी संकीर्ण स्वार्थपरता और पक्षपात की इतनी मात्रा भर दी गई कि वे उपयोगी आधार एक प्रकार से अनुपयोगी बनते जा रहे हैं और न्याय के स्थान पर अन्याय का अभिवर्धन करते हैं।

मध्यकालीन सामन्तवादी परम्परायें इसी प्रकार की हैं। एक वर्ग दूसरे वर्ग को लूटने, मिटाने में अपनी बहादुरी मानता रहा है और इसी आधार पर समृद्ध ही नहीं प्रशंसित भी होता रहा है। सामन्ती इतिहास के पृष्ठ ऐसी ही मार काट से भरे पड़े हैं और उन आक्रमणकारियों को योद्धा, विजेता के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। वीरता का यह कैसा निर्मम उपहास है। अनीति को रोकने की अपेक्षा जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला जंगली कानून बलात् थोपने के लिये जो आक्रमण क्रूरता अपनाई जाय उसे वीरता का जामा पहनाया जाय। आततायियों का यशगान गाया जाय। इसे उपलब्धियों का अनाचार ही कहना चाहिए। यदि वह बहादुरी सदुद्देश्य के संरक्षण में प्रयुक्त हुई होती तो कैसा अच्छा होता?

धर्म और नीति का वर्ग विशेष के लिए पक्षपात पूर्ण प्रचलन करने में उनकी महत्ता बढ़ी नहीं घटी ही है पिछले दिनों दुमुँही नैतिकता का मापदण्ड चलता रहा है। अपनों के लिए और बिरानों के लिए और। तथाकथित धार्मिक और नैतिक प्रतिपादनों में ऐसी ही भर-मार है जिससे नीति, धर्म, उदारता, सहायता आदि का उपदेश तो है पर वह ‘अपनों’ तक ही सीमित रखा जा सकता है परायों में उस तरह के सद्व्यवहार की उतनी आवश्यकता नहीं मानी गई है। अपनी जाति, वेश, धर्म, से बाहर के लोगों को लूटा, सताया जाना उतना बुरा नहीं माना गया है। कई धर्मों में तो काफिरों-म्लेच्छों से दुर्व्यवहार करने की छूट है। यह काफिर या म्लेच्छ व्यक्तिगत दोष−दुर्गुणों के कारण नहीं वरन् अपने वर्ग सम्प्रदाय में भिन्न होने के कारण उन्हें वैसा घोषित किया जाता रहा है।

कुछ लोग सद्ज्ञान को पर्याप्त मानते हैं। सोचते हैं शिक्षा से आदमी सभ्य बन सकता है। कुछ का ख्याल है कि धर्म मान्यतायें मनुष्य को उदात्त बना सकती हैं पर यह मान्यता सही नहीं है। यह हो सकता है कि कोई मनुष्य दार्शनिक, धर्मोपदेशक, उपासना रत हो किन्तु उसके क्रिया-कलाप में स्वार्थपरता, संकीर्णता और दुष्टता भरी पड़ी हो। इसलिए चिन्तन को अपर्याप्त एकाँगी मानना होगा तथा ज्ञान और कर्म के समन्वय सन्तुलन पर जोर देना पड़ेगा।

आवश्यकता इस बात की है कि हम विशाल दृष्टिकोण लेकर विचार करें जो भूतकालीन परम्पराओं के प्रति दुराग्रही न रहकर तथ्यों पर विचार करें और यह देखें कि जो ज्ञान, प्रचलन एवं साधन उपलब्ध हैं उनका सदुपयोग हो रहा है या नहीं?

आज अलग-अलग वर्गों के स्वार्थों को अलग-अलग करके समस्याओं का हल नहीं ढूंढ़ा जा सकता। एक वर्ग का स्वार्थ सिद्ध होता हो और दूसरे को उससे क्षति पहुँचती हो तो बात बनेगी नहीं। इससे विग्रह खड़ा होगा और वह विग्रह एक पक्षीय स्वार्थ साधन करने वालों को लाभान्वित न होने देगा। यदि अमेरिका दक्षिण ध्रुव की बरफ पिघलाकर वहाँ अपने निवास, विस्तार के लिए क्षेत्र तैयार करे तो पिघली बरफ से समुद्र सतह ऊँची उठेगी और उससे हालैंड सरीखे नीची सतह के कई देश डूब जायेंगे। ऐसी दशा में एक वर्ग का ऐसा स्वार्थ जो दूसरों को हानि पहुँचाकर सम्पादित किया गया है विश्व परिवार को सहन न होगा और ऐसा विग्रह उठ खड़ा होगा जिसमें एक पक्षीय स्वार्थ साधन की बात सोचने के लाभ के स्थान पर हानि सहन करनी पड़े।


Quotation

जो शूरवीर समराँगण में युद्ध करते करते शरीर त्याग करते हैं अथवा जो दानवीर समाज और राष्ट्र के हितकारी कार्यों के लिए अपनी सम्पत्ति लोक हित के लिए देकर शरीर त्याग करते हैं, वे समान रूप से सद्गति को प्राप्त होते हैं।

-अथर्ववेद

अविकसित युग में कोई बुरा मनुष्य सीमित बुराई ही कर सकता था। पर अब वह सुविधा साधन उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से यदि वह चाहे तो असीम बुराई प्रस्तुत कर सकता है। यही बात अच्छाई के सम्बन्ध में भी है। साधन हीन अविकसित स्थिति के हमारे पूर्वज अपनी श्रेष्ठता को भी सीमित मात्रा में सीमित क्षेत्र में फैला सकते थे। पर अब वह अवसर है जबकि कोई साधन सम्पन्न श्रेष्ठ व्यक्ति श्रेष्ठता को प्रचुर मात्रा में। असीम क्षेत्र में विस्तृत कर सकता है।

अनाचार पूर्ण व्यवस्थायें और संकीर्णता पूर्ण मान्यतायें गये गुजरे जमाने की चीज हो गई। तब दुनिया बिखरी हुई थी और मनुष्य के साधन सीमित थे। उस समय के अवाँछनीय कार्य भी सीमित हानि पहुँचाते थे और अनुचित दृष्टिकोण की क्षति भी सीमित थी पर अब विज्ञान ने दुनिया को बहुत छोटा बना दिया है। संचार साधनों ने दूरी समाप्त कर दी और दुनिया के देश एक ही नगर के गली मुहल्लों की तरह बन गये हैं। जाति, धर्म, रंग, सम्प्रदाय के आधार पर वर्गीय स्वार्थों को अलग रखकर सोचना आज के युग में सम्भव नहीं। हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। विश्व को एक इकाई मानकर चलना होगा और जहाँ भी जो भी अवाँछनीयता जम गई है उसे उखाड़कर ऐसा प्रचलन करना होगा जिससे उपलब्धियों के सदुपयोग पर पूरा जोर दिया जाय।

सामर्थ्य की अधिकता पर प्रसन्न होने की कोई बात नहीं। यदि वह अनीति के अवाँछनीय मार्ग पर चलेगी तो शक्ति कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो प्रकृति के नियमों में बाधित होगी और स्वयं ही नष्ट हो जायेगी। सामर्थ्यता और सम्पदा बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील रहा जाय पर साथ ही सतर्कतापूर्वक यह भी देखा जाय कि उस उपार्जन का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है। इस दृष्टि से जब विचार करना आरम्भ किया जायेगा तो प्रतीत होगा परिवर्तन का बहुत बड़ा काम हाथ में लिया जाना है। साधनों के दुरुपयोग की वर्तमान परिपाटी को आमूलचूल परिवर्तन करने से ही काम चलेगा। अवाँछनीय दुरुपयोग तो शक्ति और शक्तिवान दोनों को ही विनष्ट करते हैं।

किसी जमाने में विशालकाय डायनोसौर जीवों ने अपनी हिंस्र वृत्ति बहुत अधिक विकसित करली थी। इनकी तीव्र इच्छा शक्ति के कारण बहुत से सींग उत्पन्न हो गये थे। अपने पराक्रम से भी सभी जीवों को आतंकित करते थे और किसी का भी अस्तित्व मिटा देते थे। तब एक प्रकार से उन्हीं का धरती पर राज था। पर प्रकृति की व्यवस्था देखिए। उसे यह अनाचार पसन्द नहीं आया। जीव-जन्तु तो उन आततायियों का मुकाबला न कर सके पर प्रकृति ने उन्हीं का अस्तित्व दुनिया में से मिटा दिया। अब डायनोसौर मात्र पुरातत्व वेत्ताओं की पुस्तक पृष्ठों तक सीमित हैं।

हम डायनोसौर जीवों के उदाहरण न बनें। शक्ति का दुरुपयोग ने करें वरन् सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाने का साहसिक प्रयास आरम्भ करें यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


घने जंगल में फसा व्यक्ति(Kahani)

घना जंगल। उसके मध्य में यात्रियों के लिये एक पगडण्डी पथिक। अपने गन्तव्य पर पहुँचने के लिये लम्बे-लम्बे कदम रखता हुआ बढ़ा जा रहा था। जंगली हाथी ने राह रोकी। पथिक पर झपटा। उसे जान प्यारी थी बचाव के लिये भागा और एक कुँए में जा गिरा।

कुँए के अन्दर की दीवार से निकला हुआ एक पीपल का वृक्ष। पथिक के हाथ में वृक्ष की एक शाखा आ गई। चलो कैसे भी जान तो बची यहाँ हाथी न आ पायेगा। अब नीचे की ओर दृष्टि गई तो काल के रूप में साक्षात् मगर ही मुँह खोले ऊपर से गिरने वाले पथिक की बाट जोह रहा था। डर के मारे दृष्टि नीचे से ऊपर करली।

ऊपर मधुमक्खी का छत्ता। छत्ते से टपकता हुआ बूँद-बूँद रस। पथिक को आनन्द आने लगा। नीचे मगर है-बिल्कुल भूल गया। कुछ समय बाद उसका ध्यान गया कि जिस डाल को वह पकड़े हुये है उसे दो चूहे कुतर रहे हैं एक का रंग काला है और दूसरे का सफेद।

यह सब स्थितियाँ जीवन के स्वरूप को प्रकट करती हैं। वह हाथी काल था। मगर मृत्यु। और टपकता हुआ मधु जीवन रस। दोनों चूहे दिन रात के प्रतीक थे, जो उस वृक्ष को काट रहे थे। इतने पर भी अज्ञानी पथिक भविष्य के अन्धकार से बचने का उपाय न सोचकर मात्र मधु बूँदों में ही व्यस्त और मस्त हो रहा था।


अन्तर्ग्रहीय आदान प्रदान के दिन दूर नहीं

क्या इस निखिल ब्रह्माण्ड में एकमात्र पृथ्वी ही मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणियों की क्रीड़ा स्थली है अथवा किसी अन्य ग्रह नक्षत्र में भी ऐसे ही जीवधारियों का अस्तित्व है? यदि है तो क्या उनका परस्पर मिलन एवं सहयोग सम्भव है? इस प्रश्न पर जितना अधिक विचार किया गया है उतना ही इस निष्कर्ष पर अधिक विश्वासपूर्वक पहुँचा गया है कि इस असीम ब्रह्माण्ड में पृथ्वी जैसे अनेक लोक विद्यमान हैं और उनमें मनुष्य जैसे ही नहीं वरन् उससे भी कहीं अधिक विकसित स्तर के जीवधारी मौजूद हैं।

जिस प्रकार पृथ्वी निवासी चन्द्रमा पर पहुँच चुके और सौरमण्डल के अन्यान्य ग्रहों की खोज में तत्पर हैं उसी प्रकार उन बुद्धिमान प्राणियों का भी यह प्रयास है कि वे विकसित जीवधारियों की दुनिया से संपर्क स्थापित करें और परस्पर आदान प्रदान के अनेक उपाय एवं मार्ग ढूंढ़ निकालें।

पृथ्वी पर कई प्रकार के ऐसे संकेत समय-समय पर मिलते रहते हैं जिनमें प्रतीत होता है कि अन्य लोकों के बुद्धिमान प्राणियों को पृथ्वी की सुविकसित स्थिति का भी ज्ञान है और वे मनुष्य जाति के साथ अपने सम्बन्ध स्थापित करने के लिये लालायित एवं प्रयत्नशील हैं। प्रकाश पुञ्जों के अवतरण के रूप में यह अनुभव पृथ्वी निवासियों को होते भी रहते हैं। पाश्चात्य जगत में इन्हें उड़न तश्तरियाँ नाम दिया जाता है।

कैलीफोर्निया के कार्निंग शहर में बैठे हुए लोगों ने आकाश में एक चमकदार अनोखी चीज देखी जो काफी नीचे उड़ रही थी और उसमें से चमकदार प्रकाश किरणें निकल रही थीं, वह एक विशाल धातु निर्मित सिगार जैसी थी जो 300 से 500 फीट की ऊँचाई पर उड़ रही थी और पैंदे में से हलकी नीली रोशनी फूट रही थी। फिर उसकी चाल बढ़ी और तेजी से आकाश में विलीन हो गई। इन दर्शकों में से कितनों ने ही कहा-’उड़न तश्तरियों की बात वे गप्प समझते थे पर आज उनने आँखों से देखकर यह विश्वास कर लिया कि वह वस्तुतः एक सच्चाई है।’

रूसी वैज्ञानिकों ने कुछ समय पूर्व यह घोषणा की थी कि उनने ब्रह्माण्ड के किन्हीं अन्य तारकों द्वारा भेजे गये संकेत सुने हैं, यह एक क्रमबद्ध टिमटिमाहट के साथ जुड़े हुए ज्योति संकेतों के रूप में हैं। वे कहते हैं कि ऐसा कर सकना किसी प्रबुद्ध स्तर के प्राणधारियों के लिये ही सम्भव हो सकता है।

आरम्भ में उनकी बात को ज्यादा महत्व नहीं मिला पर अब उसे एक तथ्य माना गया है। एक ‘क्वासर’ तारा-जिसे खगोल विद्या की भाषा में ‘सी.टी.ए.-102’ कहा जाता है निस्सन्देह पृथ्वी पर ऐसी टिमटिमाहट और रेडियो धाराएं भेज रहा है जिसे कर सकना किन्हीं विचारवान् प्राणियों के लिये ही सम्भव है।

ब्रिटेन के विज्ञानी लार्डस्नो ने वैज्ञानिक सम्मेलन में आशा प्रकट की थी अन्तरिक्ष से किसी प्रबुद्ध जाति के सन्देश प्राप्त करने का सुअवसर मनुष्य को निकट भविष्य में ही मिलेगा। यह आशा अकारण ही नहीं थी। अन्तरिक्ष संपर्क के लिये बढ़ते हुए मनुष्य के चरण क्रमशः इस आशा बिन्दु की समीपता का ही आभास देते हैं।

अमेरिका के रेडियो खगोल शास्त्री प्रो. कोनाल्ड व्रैस वैल ने ‘नेचर’ पत्रिका में एक लेख छपाकर यह सम्भावना व्यक्त की है कि हो सकता है उड़न तश्तरियाँ किसी विकसित सभ्यता वाले तारे से सूचना यान के रूप में आई और रह रही हों। सम्भव है वे यहाँ की स्थिति की जानकारी अपने उद्गम स्थान को रेडियो सन्देशों एवं टेलीविजन चित्रों के रूप में भेज रही हों।

अन्तरिक्ष भौतिकी के शोधकर्ता श्री वै वैलेस सलीवान ने अपनी पुस्तक- ‘वी आर नौट अलोन’ -हम अकेले नहीं है- पुस्तक में ब्रह्माण्डव्यापी संचार साधन के लिए एक नई पद्धति ‘वेव लेंग्थ’ की प्रस्तुति की है जिसके अनुसार प्रकाश की चाल इतनी ही पीछे रह जाती है जितनी हवाई जहाज की तुलना में पतंग की। यह तरीका ठीक 21 सेन्टीमीटर अथवा 1420 मेगा साइकिल वेव लेंग्थ के रेडियो कम्पनों पर आधारित है। अणु विकरण की यह स्वाभाविक कम्पन गति है। अन्तरिक्ष संचार व्यवस्था में इसी गति को अपनाने से ही अन्य लोकों के प्राणियों के साथ संपर्क साधा जा सकता है। यह पद्धति अन्य लोकवासी विकसित कर चुके हैं और जितनी दूरी पार करना हमें कठिन या असम्भव लगता है सम्भव है उनके लिए वह सरल हो गई हो।

एक फ्रान्सीसी खगोल विद्या विशारद ने खोजकर बताया कि यह उड़न तश्तरियाँ इन्हीं दिनों आने लगी हों ऐसी बात नहीं है, इनका आवागमन बहुत समय से चल रहा है। रोम में ईसा से 212 वर्ष पूर्व उड़न तश्तरी देखी गई थी। शेक्सपियर के ग्रन्थों में ही नहीं बाइबिल में भी उनका उल्लेख है। अमेरिका में उड़न तश्तरी अनुसंधान कार्य 1947 से ही चल रहा है जबकि प्रथम बार वायुयान चालक ‘कनिथ आर्नोल्ड’ ने माउण्ट रेनियर के निकट अपने विमान से उड़न तश्तरी देखी थी।

हिन्दी के प्रख्यात लेखक श्री इलाचन्द जोशी ने 23 जून 1963 के धर्मयुग में अपनी निज की एक अनुभूति छपाई थी। वे नैनीताल जिले के ताकुला गाँव के एक बँगले में ठहरे थे। रात्रि को उन्हें पास ही कहीं जाना था कि उस घोर अन्धकार में उनने देखा कि- ‘सहसा दक्षिण पश्चिम की ओर की पहाड़ी क्षितिज तीव्र प्रकाश से उद्भासित हो उठा। क्षण भर के लिये अभ्यास वश मैंने समझा कि बिजली कौंध उठी है। पर जब प्रकाश पूरे आठ सैकिण्ड तक स्थिर रहा और बिजली की तरह एक ही सैकिण्ड के बाद विलीन नहीं हुआ तब मैं चौंका और उसके बादी ही मैंने आश्चर्य से देखा कि जलते हुए बड़े बल्ले की तरह की कोई चीज बिना तनिक भी शब्द किये क्षितिज को लांघती हुई सीधे मेरे सिर के ऊपर से आकाश की ओर बड़ी तेजी से उड़ी जा रही है। उसकी पूँछ से तीव्रतम शुभ्र और श्वेत प्रकाश एक सर्च लाइट की तरह पीछे की ओर बिखर रहा था- और उसका धड़ पूरे का पूरा एक बहुत बड़ी चिता की सी पीली लपटों सा दहक रहा था। कुछ क्षणों के लिए मुझे लगा कि कोई भटका हुआ विमान जल गया है और क्षण भर में कहीं गिरना ही चाहता है। पर वह बड़ी तेज रफ्तार से बिना तनिक भी शब्द किये मेरे सिर के ऊपर से होता हुआ सीधा आगे की ओर निकलकर कुछ ही क्षणों बाद आँखों से ओझल हो गया। तब मैं हक्का बक्का रह गया।

इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों की अटकलें तरह-तरह की हैं- ‘साइन्स’ और ‘दी न्यू साइंटिस्ट’ पत्रों के स्तम्भ लेखकों ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यह उड़न तश्तरियाँ अन्य ग्रहों से आने वाले सन्देश वाहक हैं। वे पृथ्वी की खोज खबर लेने आते हैं। अन्य देशों में मनुष्य से भी विकसित किस्म के प्राणी हो सकते हैं और वे भी इस बात के इच्छुक हो सकते हैं कि प्रगतिशील प्राणियों के साथ संपर्क बढ़ाकर ब्रह्माण्ड में जहाँ संभव हो प्रगतिशीलता का अधिक संवर्धन किया जाय।

रूसी खगोल वेत्ता आई.एस. श्कलोव्स्सकी ने अपने ग्रन्थ ‘इन्टेलिजेन्ट लाइफ इन द युनिवर्स’ में विस्तारपूर्वक प्रतिपादित किया है कि- ‘पृथ्वी पर से सबसे पहली ऐसी शब्द ध्वनि अब से बीस वर्ष पूर्व अन्तरिक्ष में फेंकी गई थी जो अन्य ग्रहों के प्रगतिशील प्राणियों द्वारा सुनी या समझी जा सके। यदि वह ध्वनि बिना कोई व्यवधान पड़े बढ़ती चली जा रही होगी तो सौरमण्डल से बाहर के सबसे निकटवर्ती तारे तक पहुँचने में अभी सफल नहीं हुई होगी। शब्द की गति 11 हजार मील प्रति घण्टा है। पृथ्वी से निकटतम तारा ‘प्राक्सियाँ सेन्टरी’ है। इसकी दूरी 4.3 प्रकाश वर्ष है। प्रकाश वर्ष का अर्थ है छह की संख्या के आगे 18 शून्य रख देने पर जो संख्या बनती है- अर्थात् छह पद्म मील-इतनी दूर तक बीस वर्ष पूर्व फेंकी गई आवाज को पहुँचने में अभी मुद्दतों लगेंगे। वह आवाज सुनी जा सकी तो वे लोग पृथ्वी की उपयोगिता समझेंगे और यहाँ तक पहुँचने का रास्ता निकालेंगे। उनकी यात्रा को भी बहुत समय लगेगा तब कहीं उनका पृथ्वी से सम्बन्ध हो सकता है। इस धरती के निवासियों को कुछ कहने लायक वैज्ञानिक प्रगति में अभी मुश्किल से तीन वर्ष हुए हैं। इससे पहले तो भौतिक समृद्धि की दृष्टि से भी पृथ्वी के लिए बहुत पिछड़े हुए थे और विचार, आदर्श एवं व्यवस्था की दृष्टि से तो हजार के पीछे 999 व्यक्ति अभी भी फूहड़ जिन्दगी ही जी रहे हैं। ऐसी दशा में अन्य ग्रह निवासियों को यदि वे सचमुच प्रगतिशील होंगे तो उन्हें कुछ भी आकर्षण न होगा हम लोग गये गुजरे ही दीखेंगे। ऐसी दशा में वे क्यों इतना श्रम करेंगे। फिर यह कहना भी कठिन है कि सबसे निकटवर्ती तारे पर ही सभ्यता का विकास हो गया हो। यदि विकसित तारे और भी आगे हुए तो उनका आवागमन और भी अधिक समय साध्य होगा। ऐसी दशा में यदि यह भी मान लिया जाय कि किन्हीं तारों पर प्रगतिशीलता है तो उनके साथ संपर्क बनाना इतना सरल नहीं है। सौरमण्डल के ग्रहों और उपग्रहों की इतनी खोज तो पहले हो चुकी है कि उनमें से किसी पर भी किसी विकसित प्राणधारी के होने की सम्भावना नहीं है। जीवन का आरम्भिक चिह्न भले ही उनमें से किसी पर मिल जाय। अस्तु उड़न तश्तरियों की संगति अन्य लोक वासी प्राणियों के साथ नहीं मिलाई जानी चाहिए।

श्री सी.जी. जुंग का कथन है। ईश्वर अपनी सर्व व्यापकता, सर्वज्ञानी एवं सर्वशक्तिमान होने का आभास देने के लिये इस प्रकार चौंकाने वाले प्रदर्शन उपस्थित करता है।

बोस्टन के साईक्याट्रिस्ट श्री वेंजामिन साइमन का कथन है आत्माओं की अपूर्णता जब पूर्णता में परिणत होती है तब उसका विकास प्रकाश पुञ्ज के रूप में देखा जा सकता है।

अगले दिनों मनुष्य, देश, जाति और धर्मों की संकीर्ण परिधि में बँधा न रहेगा। पृथ्वी निवासी मनुष्यों की एक ही जाति बिरादरी होगी। विश्वराष्ट्र, विश्वधर्म, विश्वभाषा, विश्वसंस्कृति के आधार पर विश्व बन्धुत्व के आधार पर मनुष्य मनुष्य के बीच स्नेह सौहार्द्र के सम्बन्ध सुदृढ़ होंगे।

इतना ही नहीं विश्व ब्रह्माण्ड के सुविकसित प्राणी परस्पर एकता स्थापित करेंगे और आत्मीय भरे आदान प्रदान की रीति-नीति विकसित करेंगे। उस सुदिन के आगमन की घड़ी जल्दी आये इसके लिये हमें प्रार्थना और आशा करनी चाहिए, साथ ही चेष्टा भी।


संगीतकार गार्ल्फड (Kahani)

संगीतकार गार्ल्फड के पास उसकी एक शिष्या अपने मन की व्यथा कहने गई कि वह कुरूप होने के कारण संगीत मंच पर जाते ही यह सोचने लगती है कि दूसरी आकर्षक लड़कियों की तुलना में उसे दर्शक नापसन्द करेंगे और हँसी उड़ायेंगे। यह विचार आते ही वह सकपका जाती है और गाने को जो तैयारी घर से करके ले जाती है वह सब गड़बड़ा जाती है। घर पर वह मधुर गाती है, इतना मधुर जिसकी हर कोई प्रशंसा करे, पर मंच पर जाते ही न जाने उसे क्या हो जाता है कि हक्का-बक्का होकर वह अपनी सारी प्रतिभा गँवा बैठती है।

गार्ल्फड ने उसे एक बड़े शीशे के सामने खड़े होकर अपनी छवि देखते हुए गाने की सलाह दी और कहा- वस्तुतः वह कुरूप नहीं है जैसा कि उसकी मान्यता है। फिर स्वर की मधुरता और कुरूपता का कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। जब वह भाव विभोर होकर गाती है तब उसका आकर्षण बहुत बढ़ जाता है और उसमें कुरूपता की बात कोई सोच भी नहीं सकता। वह अपने मन में से हीनता की भावना निकाले। कुरूपता के अभाव को ही न सोचती रहे वरन् स्वर की मधुरता और भाव-विभोर होने की मुख मुद्रा से उत्पन्न आकर्षण पर विचार करे और अपना आत्म-विश्वास जगाये।

लड़की ने यही किया और आरम्भिक दिनों में जो सदा सकपकाई हुई रहती थी और कुछ आयोजनों में जाने के बाद एक प्रकार से हताश ही हो गई थी। नया साहस और उत्साह इकट्ठा करने पर उसने बहुत प्रगति की और फ्राँस की प्रख्यात गायिका ‘मेरी बुडनाल्ड’ के नाम से विख्यात हुई।


असुरता अपनाने वाले नृशंस नर कीटक

मनुष्य में देवता भी रहता है और असुर भी। उसकी प्रकृति में दोनों ही तत्व मौजूद हैं। जिस पक्ष को समर्थन, अवसर और पोषण मिलता है वही सुदृढ़ होता चला जाता है। सज्जनों की संगति, सद्विचारों का अवगाहन, सद्भावनाओं का अभ्यास मनुष्य को देवता बनाता है। सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने से, सत्कर्म करने से उसकी और भी पुष्टि होती जाती है और व्यक्ति नर से नारायण बनता है।

इसके विपरीत यदि वह दुष्ट संगति, निकृष्ट साहित्य, आसुरी क्रिया-कलाप और पाप प्रवृत्तियों में लिप्त रहे तो धीरे-धीरे निकृष्ट से निकृष्टतम बनता चला जाता है। पशु से भी आगे बढ़कर पिशाच का रूप धारण करता है और जघन्य कृत्य करके ही उसके भीतर बैठा हुआ दानव मोद मनाता है। ऐसे कुकृत्य जिन्हें सुनकर भी एक सहृदय व्यक्ति काँप उठे कुछ व्यक्तियों को बहुत भले लगते हैं और वे उस नृशंसता में ही अपने अहंकार की पूर्ति समझते हैं।

हिटलर ने एक ऐसा ही नर पिशाच पाल रखा था- नाम था उसका आइख मैन। उसने निरपराध यहूदियों को लाखों की संख्या में मौत के घाट इसलिये उतारा कि हिटलर को उस जाति के कुछ लोगों का व्यवहार बुरा लगा इसलिये उसने सारी यहूदी जाति की वंशनाश करने की बात ठानी और धरती को खून से रंग दिया।

अभी अभी बंगलादेश में पाकिस्तानी बंगालियों ने 30 लाख बंगालियों का इस तरह कत्ल किया जैसे किसान घास चारे की कुट्टी कूटता है। दया और मनुष्यता से अपरिचित इन बधिकों को किन शब्दों से अलंकृत किया जाय? ऐसे ही नृशंस असुर कृत्य इतिहास में पहले भी दृष्टिगोचर होते रहे हैं और मनुष्यता उन पिशाचों से पहले भी कलंकित होती रही है।

21 अक्टूबर सन् 1941 का दिन यूगोस्लाविया की जनता के लिए सबसे नृशंस दिन है। उस दिन सात हजार निरपराध नागरिकों और स्कूलों में पढ़ रहे बालकों को एक साथ मौत के घाट इस अपराध में उतारा था कि वे अपने देश को प्यार क्यों करते हैं, आक्रमणकारी नाजियों की सहायता क्यों नहीं करते।

29 नवम्बर 43 को नये यूगोस्लाविया की नींव पड़ी। उस दिन इस देश के निवासियों ने नाजियों के पंजे से मुक्ति पाकर अपने को स्वतन्त्र घोषित किया। क्रागुजेवर में शहीदों का समाधि स्थल बना है जहाँ हर वर्ष राष्ट्रीय दिवस पर वहाँ की जनता अपने शहीदों को भाव भरे अश्रुओं के साथ श्रद्धाँजलि अर्पित करती है।

वेनेडिक्ट कार्पजे सन् 1620 से 1666 तक लिपिजिंग (जर्मनी) के सेशन कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश रहा। वह बड़ी कठोर और क्रूर प्रकृति का था। छोटे से जुआ, उठाईगीरी, जादू-टोना जैसे अपराधों में भी वह मृत्यु दण्ड ही देता था। मानो इससे हलकी सजा की बात उसने पढ़ी ही न हो। उसने अपने 46 वर्ष के लम्बे कार्य काल में 30 हजार पुरुषों और 20 हजार स्त्रियों को फाँसी के तख्ते पर चढ़वाया। स्त्रियों में से तो अधिकाँश जादू-टोना करने के सन्देह में पकड़ी गई थीं।

कार्पजे फाँसी लगने का दृश्य देखने में बहुत रस लेता था और यह व्यवस्था देखने खुद जाता था कि मृतकों का माँस खाने के लिये रखे गये शिकारी कुत्ते तथा दूसरे जानवर यथासमय पहुँचे या नहीं। औसतन प्रतिदिन 5 व्यक्तियों को उसने फाँसी पर चढ़वाया। दया करना तो उसने सीखा ही नहीं था, उसकी कुरुचि ने असंख्य निर्दोषों को करुण विलाप करते हुए अकारण मृत्यु के मुख में धकेला।

आश्चर्य यह था कि यह निष्ठुर न्यायाध्यक्ष-नियमित रूप से गिरजाघर जाता था। प्रार्थना करता था। बाइबिल पढ़ता था और अपने को बड़े गर्व से ‘धार्मिक’ कहता था।

भारत ने कत्लेआम के हृदय विदारक दृश्य खून के आँसू भरी आँखों से शताब्दियों तक देखे हैं। जब आक्रमणकारी नगरों को एक सिरे से दूसरे सिरे तक रक्त रंजित कर देते थे। स्त्री, बच्चे तक उन नृशंसों द्वारा हाथ से गाजर मूली की तरह काट दिये जाते थे। चीनी चंगेजखाँ के बारे में दुनिया जानती है। चीन की दीवार और मिश्र के पिरामिडों में कितने श्रमिकों की अस्थियाँ और रक्तधारायें पिसी हैं यह एक करुण कहानी है। नादिरशाह और औरंगजेब को सहज ही इतिहास क्षमा नहीं करेगा।

व्यक्तिगत जीवन में भी यह नृशंसता समय-समय पर घुलती रहती है। मध्य प्रदेश के डाकुओं के कुकृत्य ऐसे ही हैं जिनसे उस प्रान्त की गरिमा का मस्तक लज्जा से नीचा झुका है। कानपुर का कनपटी मार बाबा इसी में आनन्द लेता था कि सड़क पर सोते हुए मजूर इस तरह उसके हथौड़े के चोट से तिलमिलाकर मरा करते थे। इस प्रकार कनपटी तोड़कर उसने सैकड़ों हत्यायें की थी। मनुष्यों और पशुओं पर समान रूप से आजीवन छुरी चलाने का व्यवसाय करने वालों की इस दुनिया में कमी नहीं है।

ऐसे लोग मरने के बाद भी प्रायः उस प्रकृति के बने रहते हैं और जिस प्रकार जीवनकाल में दुष्ट आचरण करते रहे वैसे ही प्रेत-पिशाच बनकर, मरने के बाद भी लोगों को सताते हैं।

इटली का तानाशाह मुसोलिनी कम्युनिस्ट क्रान्ति के उपरान्त अपनी जान बचाकर भागा। वह स्विट्जरलैंड की तरफ अपनी प्रेयसी क्लारा पैट्सी के साथ एक ट्रक में बैठकर गुप्त रूप से जा रहा था। अरबों रुपये की बहुमूल्य सम्पत्ति सोने की छड़ी-हीरे, जवाहरातों, पोण्ड, पेन्स और डॉलरों के रूप में उसके पास थी, पर उसका यह पलायन सफल नहीं हुआ, रास्ते में ही वह पकड़ा गया। दूसरे दिन कम्युनिस्टों ने उन दोनों को गोली से उड़ा दिया और उसकी सारी सम्पत्ति अपने कब्जे में ले ली। दोनों लाशों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया।

इसके बाद कहते हैं कि मुसोलिनी ने भयंकर प्रेत-पिशाच का रूप धारण कर लिया। वह अपने खजाने का लाभ किसी और को नहीं लेने देना चाहता था, खुद तो अशरीरी होने से उसका लाभ उठा ही क्या सकता था। कहा जाता है कि उसी ने प्रेत रूप में खुद खजाना छिपाया और खुद ही रखवाली की। जिनने उसका पता लगाने की कोशिश की उनके प्राण लेकर छोड़े, इतना ही नहीं जिनके प्रति उसके मन में प्रतिहिंसा की आग धधक रही थी, उन्हें भी उसने मारकर ही चैन लिया।

आश्चर्य यह हुआ कि वह विपुल सम्पदा रहस्यमय ढंग से कहीं गायब हो गई। गुप्तचर विभाग की सारी शक्ति उस धन को तलाश करने पर केन्द्रित कर दी गई। इसी बीच एक घटना और घटित हो गई कि गुप्तचर विभाग की जिन दो सुन्दरियों ने मुसोलिनो को पकड़वाने में सहायता की थी वे मरी पाई गई।

इसी प्रकार जिन लोगों को खजाने के बारे में कुछ जानकारी हो सकती थी ऐसे 75 व्यक्ति एक एक करके कुछ ही दिनों के भीतर मृत्यु के मुख में चले गये। जिस ट्रक में मुसोलिनी भाग रहा था उसका ड्राइवर गौरेवी की लाश क्षत विक्षत स्थिति में एक सड़क पर पड़ी पाई गई, उसके पास मुसोलिनी का फोटो मौजूद है।

खजाने से भी अधिक रहस्यमय यह था कि उस प्रसंग से सम्बन्ध रखने वाले सभी व्यक्ति एक-एक करके मरते चले जा रहे थे। सन्देह यह किया जा रहा था कि कोई संगठित गिरोह यह कार्य कर रहा होगा। पर यह बात इसलिये सहीं नहीं बैठ रही थी कि मरने वाले एकाध दिन पूर्व ही बेतरह आतंकित होते थे और मुसोलिनी की आत्मा द्वारा उन्हें चुनौती, चेतावनी दिये जाने की बात कहते थे। खोज-बीन में संलग्न अधिकारी गोना भी उस खजाने वाली झील के पास मरा पाया गया। दूसरे अधिकारी मोस्कोवी की लाश उसके स्नानागार में ही मिली जिसका सिर गायब था। लाश के पास ही एक पर्चा मिला जिस पर लिखा था- ‘मुसोलिनी का शरीर मर गया पर उसकी आत्मा प्रतिशोध लेने के लिये मौजूद है।’ गुप्तचर विभाग यह सोचता था शायद मुसोलिनी के साथी यह बदला लेने के लिए ऐसा कर रहे होंगे पर आश्चर्य यह था कि मुसोलिनी के दाँये हाथ समझे जाने वाले व्यक्ति भी इन्हीं मृतकों की सूची में शामिल थे। उसके विश्वस्त समझे जाने वाले साथी मेरिया की भी यही दुर्गति हुई। अन्धाधुन्ध कम्युनिस्टों से लेकर मुसोलिनी समर्थकों के बीच बिना भेद-भाव किये यह हत्या काण्ड आखिर किस उद्देश्य के लिये चल रहा है, उसे कौन चला रहा है उस रहस्य पर से पर्दा उठाये नहीं रहा था।

मिलान पत्र के सम्पादक ने एक सूचना छापी कि वह खजाने के बारे में कुछ जानकारी देगा। दूसरे ही दिन उसके सारे सम्बन्धित कागजात चोरी हो गये और वह मरा पाया गया। सर्वत्र आतंक छाया हुआ था और कोई गुपचुप भी उस खजाने के बारे में चर्चा करने की हिम्मत न करता था क्योंकि लोगों के मन पर यह आतंक जम गया था कि मुसोलिनी की आत्मा ने खजाना स्वयं कहीं छिपा लिया है और वह उसे छोड़ना नहीं चाहती। जो उसे तलाश करने में लगे हैं या जिन्हें उसकी गतिविधियों का थोड़ा भी पूर्वाभास है उन सबको वही आत्मा चुन-चुनकर समाप्त कर रही है।

इस कार्य के लिये अतिरिक्त रूप से नियुक्त वरिष्ठ खुफिया पुलिस अधिकारी बूबर और स्मिथ नियुक्त किये गये। उनने खजाने का पता लगाने का बीड़ा उठाया। यह स्पष्ट था कि वह धन कोमो झील के आस-पास ही होना चाहिए क्योंकि वहीं मुसोलिनी पकड़ा गया था। पकड़े जाते समय उसके पास वह खजाना था। गायब तो वह इसके बाद ही हुआ। इसलिये उसका वहीं कहीं छिपा होना सम्भव है। कम्युनिस्टों ने भी उसे वहीं कब्जे में ले लिया था और एक के बाद एक उनके बड़े अफसर भी जल्दी ही एकत्रित हो गये थे। इतने समूह द्वारा चुरा लिये जाने की बात भी सम्भव नहीं थी। फिर वे पकड़ने वाले कम्युनिस्ट भी तो उसी कुचक्र में मर रहे थे।

अपने खोज कार्य में बूबर और स्मिथ अपने दल सहित कोमो झील के समीप डेरा डाले पड़े थे। अचानक एक रात उनने मुसोलिनी को सामने खड़ा देखा। उसका पीछा करने के लिए वे दौड़े पर तब तक वह गायब हो चुका था, हाँ उसके पैरों के ताजा निशान ज्यों के ज्यों धूलि पर अंकित थे। गुप्तचर विभाग ने प्रमाणित किया वे निशान सचमुच मुसोलिनी के पद चिह्नों से पूरी तरह मिलते हुए हैं। वे दोनों अधिकारी दूसरे दिन से गायब हो गये और फिर उनका कहीं पता न चला।

इटली के मिनिस्टर की पत्नी मेरिया मतंक के कब्जे में भी मुसोलिनी का कुछ धन था। वह उसे लेकर स्विट्जरलैंड भागने के प्रयत्न कर रही थी कि चुंगी चौकी के पास अज्ञात स्थान से गोली चली, अधिकारी मारा गया और मेरिया गायब हो गई।

खजाने की बात तो पीछे रह गई, इन सनसनीखेज हत्याओं ने एक नई हलचल मचा दी। सरकार ने हत्याओं की खोज के लिए एक कमेटी बिठाई। इसके अध्यक्ष बनाये गये प्रधान जनरल लोइन जिंगेल। उनने प्रारम्भिक खोज के लिए जितने कागजात इकट्ठे किये थे एक दिन देखते देखते उनकी मेज से वे सभी गायब हो गये। कमेटी के एक सदस्य ऐजिली की मृत्यु हो गई। उसे आत्म हत्या या हत्या का केस बताया गया। इन परिस्थितियों में जाँच कार्य आगे चल सकना सम्भव न हो सका और खजाने की तथा उसी के सिलसिले में चल रही हत्याओं की खोज का कार्य बन्द कर देना पड़ा।

मनुष्य के भीतर अमृत भी है और विष भी। देवता भी है और असुर भी। वह स्वेच्छानुसार दोनों में से किसी की परिपुष्टि और किसी को भी तिरस्कृत कर सकता है। जिन्होंने देवता को सींचा वे स्वयं सन्तुष्ट रहे और संसार के लिये सुख शान्ति का पथ प्रशस्त किया। इसके विपरीत जिन्होंने असुरता पकड़ी और नृशंस गतिविधियाँ अपनाई, जाना तो उन्हें भी पड़ा पर अपने सामने और पीछे वे केवल एक ऐसी दुखद स्मृतियाँ छोड़ गये हैं जिन्हें सदा कोसा और धिक्कारा ही जाता रहेगा।


शरीर में सबसे उत्तम कौन से अंग हैं? (Kahani)

किसी जिज्ञासु ने एक ज्ञानी से पूछा शरीर में सबसे उत्तम कौन से अंग हैं?

ज्ञानी ने उत्तर दिया- दिल और जीभ। जिज्ञासु ने दूसरा प्रश्न पूछा - शरीर में सबसे निकृष्ट अंग कौन से हैं? ज्ञानी ने फिर वही उत्तर दिया- दिल और जीभ। जिज्ञासु के असमंजस को दूर करते हुए ज्ञानी ने समझाया, जो दिल प्रेम भरा है और जो जीभ मीठी है वह जीवन की सर्वोत्तम निधि है पर यदि जुबान कड़ुई और दिल निष्ठुर हो तो उसे सबसे निकृष्ट समझना चाहिये।


प्रकाश की एक किरण का प्रभाव

गाँव में गौतम बुद्ध का दूसरी बार आगमन हो रहा था। राजा और धनवान व्यक्ति उनके स्वागत की तैयारी में लगे थे। पर छोटे तबके के व्यक्तियों को अपने गोरख बन्धे से ही समय नहीं मिल पाता जो ऐसे कार्यक्रमों में भाग ले सकें।

उसी गाँव में एक मोची रहता था, दिन भर मेहनत मजदूरी करता, शाम पड़े घर लौटकर आता, खाना खा पीकर थोड़ी देर बच्चों के साथ मनोरंजन करता और थका माँदा गहरी नींद में सो जाता। उसे पता ही नहीं चलता कि गाँव में कब और कौन सी गतिविधि होने वाली है।

एक दिन वह सुबह उठा। घर के पीछे के छोटे से गन्दे तालाब में उसे कमल का फूल खिला दिखाई दिया। बे मौसम के उस फूल ने मोची का ध्यान बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लिया। वह घुटनों तक के गन्दे पानी में घुसकर उस फूल को तोड़ लाया। सोचा इसका रुपया दो रुपया मिल जायेगा तो घर का काम चलेगा। फूल लेकर वह शहर की ओर दौड़ा।

रास्ते में नगर सेठ अपने रथ पर बैठे आ रहे थे उन्होंने मोची को फूल ले जाते देखा तो उसे रोककर सारथी से कहा इसे पाँच रुपये निकाल कर दे दो। आज नगर में बुद्ध का आगमन है उनके चरणों में अर्पित करने के काम आ जायेगा यह फूल। मोची भौंचक्का हो गया सोचने लगा रुपये दो रुपये की चीज के यह तो पाँच रुपये दे रहा है। सौदा निबट भी नहीं पाया था कि उसी मार्ग पर आते ही अश्वारोही राजमन्त्री ने कहा ‘इस फूल का सौदा हो गया। तुम बेचना मत। जितना पैसा यह धनी दे रहा होगा उसके पाँच गुने मैं दूँगा।’ एकदम 5 से 25 रुपये हो गये। जरूर इस फूल में कुछ कमाल है, तभी एक दम पाँच गुनी कीमत बढ़ रही है।

तभी राजा की सवारी उसी मार्ग से निकलते हुए उसी विवाद स्थल पर आ रुकी। राजा ने रथ में से झाँककर कहा ‘इस फूल को बेचने की आवश्यकता नहीं है। मैं राज्य कोष से मुँह माँगा दाम दूँगा। तुझे अब चमड़े के धन्धे से भी मुक्ति मिल जायेगी। तेरे परिवार की स्थिति सुधर जायेगी। मेहनत, मजदूरी के चक्कर में न पड़ना होगा। पूरा परिवार आसानी से खुशी खुशी अपने दिन व्यतीत कर सकेगा।’

नगण्य से फूल की कीमत हजारों रुपये हो गई। मोची चक्कर में पड़ गया। उसकी आंखें राजा की ओर फटी सी रह गई। ऐसा इस फूल में क्या हीरे, पन्ने, जड़े हुये हैं जो इसकी कीमत हजारों रुपये हो गई। आखिर बात क्या है? सम्राट! यह मोल भाव इतना बढ़-चढ़कर क्यों हो रहा है।

‘तू बड़ा भोला है। तुझे शायद पता नहीं कि अपने गाँव में भगवान बुद्ध का शुभागमन होने वाला है। हमें भी उसके स्वागत के लिए जाना है। बेमौसम का यह फूल उनके चरणों में चढ़ायेंगे तो उन्हें भी आश्चर्य होगा कि यह कहाँ से आ गया और हमें भी अद्भुत वस्तु चढ़ाने में गौरव का अनुभव होगा।’

नगर सेठ ने राजा की बात सुनकर मोची से कहा ‘भैया! यह न होगा यह फूल मैंने पहले देखा था। मोल भाव पहले मैं कर रहा था। अतः इस वस्तु पर पहला दावा मेरा है, नियमानुसार मुझे ही मिलना चाहिए।’

मोची ने कहा अच्छा! यह बात है तो आप सभी लोग मुझे क्षमा कीजिए। जब भगवान के चरण अपने ही गाँव को पवित्र करने वाले हैं तो मैं ही उनके चरणों में यह पुष्प चढ़ा दूँगा। मैं फूल बेचना नहीं चाहता। इसकी उपयोगिता मुझे आप सबके द्वारा मालूम पड़ गई है।

शाम को व्यक्तिगत चर्चा के समय बुद्ध को नगर सेठ, मन्त्री तथा राजा ने दिन में घटी वह घटना सुनाई। ‘एक निर्धन मोची, जिसे दो समय भरपेट खाने को भोजन नहीं मिलता, लाखों रुपये पर ठोकर मारकर फूल बेचने से इन्कार कर देता है।’

बुद्ध को सारी घटना समझने में देर न लगी। तब तक वह मोची भी दर्शनार्थियों की भीड़ में दिखाई दिया। आगे बढ़कर उसने पुष्प चढ़ाया, चरणों में माथा झुकाकर हाथ जोड़े दूर एक ओर खड़ा हो गया।

बुद्ध ने कहा ‘आज इस फूल के तेरे पास कई ग्राहक थे और मुँह माँगा दाम देने को तैयार थे। फिर तो यह फूल बेच देना चाहिए था।’

‘भगवान्! संसार में धन सम्पत्ति ही सब कुछ नहीं है। इससे भी बढ़कर कुछ और है जो आपके दर्शन तथा सत्संग से अभी मिल गया। यह लाभ सम्पत्ति के द्वारा तो प्राप्त नहीं किया जा सकता।’

बुद्ध ने सम्बोधन करते हुए कहा ‘भिक्षुओं! देखो इस साधारण से चमार को। जिसके पास सुबह खाने को जुट जाये तो शाम को खाना मिल सकेगा इसका भी भरोसा नहीं रहता। उस व्यक्ति में परमात्मा के प्रकाश की किरणें कितना परिवर्तन कर सकती हैं। कितना प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न हो सकती है। मैं तो कितने ही वर्षों से गाँव-गाँव, नगर-नगर विहार कर रहा हूँ पर इस जैसा प्रेमी और श्रद्धालु व्यक्ति अभी तक नहीं मिल सका। कौन व्यक्ति छोटा है और कौन बड़ा? इसका निर्णय करना भी आसान कार्य नहीं। बाहर से देखने में सभी बीज एक से लगते हैं पर कौन सा बीज बड़ा फल देगा, फूल देगा? इसे कोई नहीं जानता सिवाय ईश्वर के।’


शिष्य परमार्थ (Kahani)

कुछ शिष्य परमार्थ को अधिक महत्व दे रहे थे, कुछ का कहना था स्वार्थपूर्ति के बिना जीवन निरर्थक है। दोनों वर्ग प्रतिपक्षी से सन्तुष्ट न हो पा रहे थे तब मामला एक सन्त के पास ले जाया गया।

सन्त ने उन सबको बैठा लिया और बिल्कुल ही नया प्रसंग छेड़कर उनसे बातें करने लगे। इसी बीच एक सज्जन आये अपने साथ फल व मिठाई भी प्रसाद  में लाये थे। सन्त ने प्रसाद ले लिया और बिना किसी से कुछ कहे पूछे सारा प्रसाद स्वयं भक्षण कर लिया। कुछ देर में एक अन्य जिज्ञासु पधारे वह भी भेंट में मिष्ठान , मेवे लाये थे। महात्मा ने उन्हें हाथ में लिया और खिड़की से बाहर फेंक दिया। इसके बाद आगन्तुक से कुशल मंगल पूछते और मीठी मीठी बातें करते रहे पर आगन्तुक सारी वार्ता उखड़ा-उखड़ा रहा और थोड़ी ही देर में उठकर घर चला गया।

तभी एक और भी सज्जन पधारे , वे भी अपने साथ फल-फूल लाये थे, महात्मा ने उस प्रसाद को उपस्थित सब लोगों को बाँटा, अपना हिस्सा भी लिया और फिर उनसे खूब अच्छी-अच्छी बातें करते रहे।

तीनों के जाने के बाद संत ने अलग-अलग तीनों के यहाँ एक-एक व्यक्ति यह पता लगाने भेजा-आया संत का उनके प्रति आचरण उचित था या अनुचित? कुछ देर बाद पता लगाकर तीनों व्यक्ति लौट आये। पहले ने बताया महाराज! वह आदमी तो आप पर बहुत रुष्ट है, कह रहे थे संत महास्वार्थी है अपना ही पेट भरता है,। ‘और दूसरा भी नाराज है’- दूसरा व्यक्ति बोला- कह रहे थे कि मैं इतने प्रेम से प्रसाद ले गया मुझसे तो मीठी-मीठी बातें की पर प्रसाद बाहर फेंक दिया। दम्भी कहीं का।

तीसरे ने कहा-महाराज! तीसरा व्यक्ति आप से बहुत प्रसन्न है कह रहा था- सचमुच महाराज संत हैं जो पाया सबको बाँट दिया- जो आया सबसे प्रेमपूर्वक भेंट की।

अब महात्मा बोले- तात! संसार में रहने का यही तरीका सर्वोत्तम है, परमात्मा की दी हुई वस्तुओं का उपयोग मिल-जुलकर करो और सबके साथ विनम्र व्यवहार करो। एकाँगी न तो स्वार्थ ही उचित है और न परमार्थ-पुण्य।


गरिमा सत्य वचन की नहीं -सत्यनिष्ठा की है।

सत्य की बड़ी महिमा धर्मशास्त्रों में गाई गई है। पर वह सत्य केवल जीभ से सच बोलने तक सीमित नहीं है। जो भीतर है वही बाहर प्रकट किया जाय, छल रहित निष्कपट रहा जाय, सत्य का स्थूल रूप यह है। जीवन लक्ष्य सत्य पर, धर्म पर, परमेश्वर पर उच्च उद्देश्यों एवं आदर्शों पर केन्द्रित रहे, यह भी सत्य निष्ठा है। इस विवेकपूर्ण एवं सत्यपरिणाम प्रवृत्तक सत्य की वह महिमा है जिसका प्रतिपादन शास्त्रों ने नये पग-पग पर किया है। सत्य वचन बोलने तक वह पुण्य प्रक्रिया सीमित नहीं रखी गई है क्योंकि सदुद्देश्य पूर्वक भी विशेष परिस्थितियों में यथार्थ उच्चारण की उपेक्षा आवश्यक हो जाती है।

सत्य की गरिमा और उसके वास्तविक स्वरूप की झाँकी नीचे देखिये-

सत्यमेव जयति नानृतं

सत्येन पन्था विततो देवयानः।

येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा

यत्र तत सत्यस्य परमंनिधानम् ॥ 6॥

-मुण्ड उपनिषद्

जहाँ सत्य स्वरूप परमेश्वर का श्रेष्ठ निवास स्थान है उनके समीप वहीं ऋषिगण देवयान मार्ग से पहुँचते हैं, जिनकी कोई कामना शेष नहीं रह गई है। यह मार्ग सत्य से परिपूर्ण है क्योंकि सत्य की ही सदा विजय होती है, झूठ की नहीं होती ॥ 6॥

सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठिता भवति

शत. 14 । 6। 9। 24

जिसने सत्य को हृदयंगम कर लिया उसकी दीक्षा हो गई।

सत्य का अवलम्बन आवश्यक है। वचनों की यथार्थता अनिवार्य नहीं। परिस्थिति विशेष में सदुद्देश्य के लिए असत्य बोलना भी सत्य के समान ही आवश्यक एवं उपयुक्त होता है। सेना में गुप्तचर विभाग में काम करने वाले लोग देश रक्षा एवं लोकहित के लिए यथार्थता को छिपाये रहते हैं। इससे वे कुछ पाप नहीं करते वरन् उससे धर्म एवं कर्त्तव्य की रक्षा ही होती है अस्तु उसे हेय नहीं माना गया है। सत्यनिष्ठा को महत्व देना अनिवार्य है। सत्यवचन और सत्यनिष्ठा में अन्तर आता हो तो वचन को गौण और निष्ठा को प्रधान मानकर चला जा सकता है।

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।

यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम ॥

-महाभारत शान्ति पर्व

सत्य बोलना उत्तम है। पर वह भी ऐसा बोलना चाहिये जो सब प्राणियों को लिए वस्तुतः श्रेयस्कर हो जिससे लोक का हित होता हो वही वस्तुतः सत्य है।

नापृष्टः कस्यचिद् ब्रू यान्न चान्यायेन पृच्छतः।

जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥

मनुस्मृति 2-120

दुष्ट दुरात्मा कोई प्रश्न न करे तो कुछ बोले ही नहीं। यदि वह अनाचारी बताने को विवश करे तो वस्तुस्थिति जानते हुए भी ऐसे ही कुछ हाँ हूँ कहकर पागल की तरह टाट टोल कर दें।

महाभारत के कर्ण पर्व में इस तथ्य पर और भी अधिक विस्तृत प्रकाश डाला गया है। भगवान कृष्ण ने गीता की तरह सत्य का तथ्य भी पाण्डवों को इस प्रकार समझाया।

सत्यस्य वदिता साधुर्न सत्याद्विद्यते परम्।

तत्वेनैव सदुर्ज्ञेयं पश्य सत्यमनुष्ठितम् ॥ 31॥

भवेत्सत्यमवक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत्।

यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेन् ॥ 32॥

सर्वस्वस्यापहारे तु वक्तव्यमनृतं भवेत्

तत्रानृतं भवेत्सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥

तादृशं पश्यते बालो यस्य सत्यमनुष्टितम्॥ 34॥

भवेत्सत्यमवक्तव्यं न वक्तव्यमनुष्ठितम्।

सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित्॥ 35॥

श्रुतेर्धर्म इति ह्येके वदन्ति बहवो जनाः।

तत्ते न प्रत्यसूयामि न च सर्वं विधीयते॥55॥

ये न्यायेनजिहीर्षन्तो धर्ममिच्छन्ति कर्हिचित्।

अकूजनेन मोक्षं वा नानुकूजेत् कथंचन॥ 59॥

अवश्यं कूजितव्ये वा शंकेरन्नयकूजितः।

श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुँ तत्सत्यमविचारितम्॥60॥

श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुँ तत्सत्यमविचारितम्।

न च तेभ्यो धनं देयं शक्ये सति कथंचन॥ 64॥

पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत्।

तस्माद् धर्भार्थमनृतमुक्तवा नानृतभाग् भवेत् ॥65॥

-महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 69

सत्य श्रेष्ठ है। सत्य बोलने वाला साधु है पर सत्य के दुर्विजेय तथ्य को भी समझना चाहिए ॥31॥

जहाँ झूठ सच हो रहा हो और सच झूठ बन रहा हो वहाँ सत्य बोलना अधर्म और झूठ बोलना धर्म है॥ 32॥

दुष्टों द्वारा सर्वस्व अपहरण किया जा रहा हो तो झूठ बोलना ही उचित है, ऐसे अवसर पर झूठ सत्य और सत्य झूठ हो जाता है। सत्य की गहराई में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु को कहना चाहिए कि यदि कहीं सत्य का न कहना उचित हो तो उसे नहीं ही कहना चाहिए गम्भीरतापूर्वक सत्य और असत्य के तत्व को समझना चाहिए॥ 34-35॥

लोग कहते हैं कि श्रुति से ही धर्म का ज्ञान होता है मैं इसका खण्डन नहीं करता पर यह भी सत्य है कि श्रुति से ही सब कुछ निश्चय नहीं होता ॥55॥

न्याय की रक्षा ही धर्म का लक्षण है। यदि कहीं चुप रहना उचित हो तो कभी न बोले। यदि बोलना आवश्यक ही हो जाय और बिना बोले काम न चले तो न्याय की रक्षा के लिए झूठ बोलने में ही श्रेय है। ऐसा असत्य भी सत्य ही कहलाता है॥ 59-60॥

चोरों के साथ पाला पड़ने पर यदि झूठ बोलकर छुटकारा पाले तो धर्म तत्व के ज्ञाता इसे अधर्म नहीं कहते॥ 64॥

जिस प्रकार पापियों को दिया हुआ दान दाता को भी दुख देता है, वैसे ही दुष्टों के समर्थन में बोला गया सत्य भी वक्ता के लिए अनुपयुक्त ही है॥ 65॥


रामकृष्ण परमहंस का भगवान के प्रति भोग (Kahani)

रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में पुजारी का स्थान मिल गया। ईश्वर भक्त को ईश्वर की पूजा उपासना के अतिरिक्त और चाह ही क्या होती है? गुजारे के लिये बीस रुपये बाँधे गये जो पर्याप्त थे।

पन्द्रह दिन तो तब बीते जब मन्दिर कमेटी के सम्मुख उनकी पेशी हो गई और कैफियत देने के लिये कहा गया। एक के बाद एक कितनी ही शिकायतें उनके विरुद्ध पहुँच चुकी थीं। किसी ने कहा कि यह पुजारी कैसा? स्वयं चखकर भगवान को भोग लगता है, फूल सूँघकर भगवान के चरणों में अर्पित करता है। पूजा के इस ढंग पर कमेटी के सदस्यों को भी आश्चर्य हुआ, आखिर उन्होंने एक दिन बुलाकर पूछ ही लिया ‘क्यों रामकृष्ण इसमें कहाँ तक सत्यता है कि तुम फूल सूँघकर देवता पर चढ़ाते हो?’

‘मैं बिना सूँघे भगवान पर फूल क्यों चढाऊं? पहले देख लेता हूँ कि उस फूल में कुछ सुगन्ध भी आ रही है या नहीं’ रामकृष्ण ने सफाई देते हुए कहा। ‘फिर तो दूसरी शिकायत भी सत्य होगी भगवान को भोग लगाने से पहले अपना भोग लगा लेते हो’ यह दूसरा प्रश्न था।

‘मैं अपना भोग तो नहीं लगाता।’ पर मुझे अपनी माँ की याद है कि वे भी ऐसा ही करती थीं जब कोई चीज बनातीं तो चखकर देख लेती थीं और तब मुझे खाने को देती थीं। मैं भी चखकर देखता हूँ पता नहीं जो चीज किसी भक्त ने भोग के लिए लाकर रखी है या मैंने ही बनाई है वह भगवान के देने योग्य है भी या नहीं।’ रामकृष्ण परमहंस का सीधा उत्तर था।


शरीर क्षेत्र में कनिष्ठ होते हुए भी, नारी भाव क्षेत्र में वरिष्ठ है।

नर और नारी यों दोनों ही अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। दोनों का अपना महत्व और स्तर है। दोनों के परस्पर सम्मिश्रण सहयोग से ही अपूर्णता का पूर्णता में विकास होता है।

पिछले दिनों यह मान्यता चली आ रही कि नर वरिष्ठ और नारी कनिष्ठ है। यह बात कठोर शारीरिक श्रम की क्षमता के क्षेत्र में ही सही उतरती है। बाकी 99 प्रतिशत क्षेत्रों में गलत है। नारी की प्रजनन गरिमा के कारण उसका शारीरिक दृष्टि से थोड़ा दुर्बल होना स्वाभाविक है। मासिक धर्म में उसे हर महीने अपने शरीर में से कुछ घटाना पड़ता है। गर्भधारण और दूध पिलाने में भी उसका शरीर निचुड़ता है। पुरुष को इस प्रकार खर्च नहीं करना पड़ता, इसलिए वह शारीरिक दृष्टि से मजबूत बना रहता है। नारी अपने शरीर का एक अंश सृष्टि संचालन के लिए निरन्तर समर्पित करती रहती है उसके इस त्याग-बलिदान ने ही सृष्टि क्रम को जीवित रखा है। दानी अपेक्षाकृत निर्धन ही रहता है। ऋषि और सन्त लेते कम और देते ज्यादा थे, इसलिए उनके शरीर दुर्बल रहते थे। तपस्वियों की काया नहीं आत्मा बलिष्ठ होती है नारी की गणना इसी वर्ग में आती है। उसकी शारीरिक दुर्बलता के पीछे जो महान कारण सन्निहित हैं, उन्हें देखते हुए उसकी पुरुष की तुलना में थोड़ी कमजोरी रहना वन्दनीय, प्रशंसनीय है। उस स्तर का त्याग करने का अवसर न मिलने से पुरुष धनी, सम्पन्न लोगों की तरह भले ही थोड़ा बलिष्ठ बना रहे पर कारणों को देखते हुए श्रद्धाभिवन्दन नारी का ही किया जायेगा। पुरुष अपनी शारीरिक बलिष्ठता से कायिक भौतिक लाभ उठाता रहे, इतना ही उसके लिए क्या कम है।

स्त्री और पुरुष के शरीर की संरचना में प्रकृति ने थोड़ा अन्तर रखा है। भावना प्रधान होने के कारण सम्भवतः कठोर कार्य करने का भार उस पर न पड़े इस दृष्टि से यह प्रकृति का कोई पक्षपात या अन्याय नहीं है। वरन् यह प्रयोजन है कि जिसका जो क्षेत्र है वह उसी अनुपात में आवश्यक सामग्री प्राप्त करे। पुरुष को कठोर शारीरिक परिश्रम करने के लिए प्रकृति ने उपयुक्त समझा है इसलिए उसकी शरीर रचना में उसी प्रकार की विशेषतायें भरी गई हैं। पुरुष श्रम प्रधान-नारी भावना प्रधान बनाकर प्रकृति ने दोनों के समन्वय से अपूर्णता को पूर्णता में बदलने का प्रयत्न किया है, पारस्परिक निर्भरता भी उसका एक कारण हो सकती है। दोनों अपने को अपूर्ण समझें और मिलकर पूर्णता प्राप्त करें अथवा दोनों अपने को एक अतिरिक्त सम्पदा का धनी मानकर एक दूसरे को कृपा पूर्वक उससे लाभान्वित करने का गर्व गौरव अनुभव करें। वैसे आवश्यकता इसकी भी नहीं है। न कोई अपने को अभाव ग्रस्त समझे न गर्व करे। परस्पर आत्म समर्पण का आनन्द लेने के लिए स्वेच्छा से विवशता से अथवा प्रकृति प्रेरणा से दोनों समन्वयात्मक जीवन जियें, भिन्नता के सम्मिश्रण की एक अभिनव प्रक्रिया अपनाकर दोनों आनन्द उल्लास भरे सर्वांगपूर्ण जीवनक्रम अपनाएं, यह भी इस भिन्नता का प्रयोजन हो सकता है।

शरीर की दृष्टि से नारी नर की तुलना में कुछ हलकी पड़ती है पर भावना की दृष्टि से इतनी भारी है कि उसकी तोल में दस नरों की भाव सम्पदा मिलकर भी हलकी पड़ेगी।

मृत शरीर के अस्थि पिंजर को देखकर नर नारी की परख आसानी से की जा सकती है। क्योंकि उनकी बनावट में थोड़ा अन्तर प्रकृति ने ही रख छोड़ा है। नारी की हड्डियाँ पुरुष की अपेक्षा छोटी, चिकनी और सरल होती हैं। मस्तक की ऊंचाई कम, नीचे का जबड़ा हलका दाँत छोटे, ठोड़ी ऊँची, सीने की बीच की हड्डी (स्टर नम) छोटी तथा टेढ़ी, छाती पतली, रीढ़ की हड्डियों के गुटके गहरे, देखकर नारी का अस्थिपंजर पहचाना जा सकता है। लम्बाई भी पुरुष की तुलना में कम होती है। माथे की हड्डियाँ अपेक्षाकृत कम मजबूत और कम कड़ी होती हैं। आँखें के गड्ढे अण्डाकृति, गहराई कम, वक्षस्थल की अस्थि दीवार पुरुष की अपेक्षा कुछ अधिक फैली होती है। गले के नीचे वक्षस्थल से थोड़ा ऊपर दोनों पार्श्वों में दो ‘क्लेविकल’ हड्डियाँ होती हैं। वे भी अपेक्षाकृत चिकनी, पतली तथा टेढ़ी होती हैं।

स्त्रियों के हाथ पुरुष की तुलना में छोटे होते हैं किन्तु तर्जनी लम्बी और अँगूठा छोटा होता है। सन्धियाँ छोटी होती हैं। मेरुदण्ड पुरुष का प्रायः 2 फुट 4 इंच होता है जबकि औसत स्त्री का 2 फुट ही पाया जाता है।

स्त्रियों का वस्ति गह्वर 90-100 होता है जबकि पुरुष का 70-75 ही पाया जाता है। उरु अस्थि पुरुष की 47-3 और नारी की 41-3 होती है। पैर की अस्थि (टीबिया) पुरुष की 78-5 और नारी की 67-8 होती है। पैर कुछ छोटे होते हैं। पैर की मध्यमा उँगली तो निश्चित रूप से छोटी और सीधी होती है। पेट का फैलाव इसलिए अधिक रहता है कि उसमें भ्रूण का निर्वाह ठीक तरह हो सके।

नारी की माँस पेशियों में जल का अंश अधिक रहता है और वे कोमल होती हैं। मस्तिष्कीय पदार्थ पुरुष का 49 औंस और नारी का 44 औंस पाया जाता है। छोटा मस्तिष्क पुरुष में 1 औंस 8॥ ड्राम और स्त्रियों का 1 औंस 8। ड्राम होता है। हृदय पिण्ड पुरुष का 10 से 12 औंस और स्त्रियों का 8 से 10 औंस होता है। फेफड़े का वजन पुरुष का 1400 ग्राम और स्त्री का 1260 ग्राम अनुपात में पाया गया है। गुर्दे पुरुष के 4॥ से 6 औंस तक और नारी के 4 से 5॥ औंस तक होते हैं। पुरुष की मूत्र नली 8-9 इंच लम्बी और स्त्रियों की 1॥ इंच भर होती है।

आहार अपेक्षाकृत वे एक चौथाई कम करती हैं। शरीर का ताप पुरुष से अधिक होता है। 30 वर्षीय प्रौढ़ नारी में 17 वर्ष के किशोर लड़के की बराबर बल होता है। नाड़ी स्पन्दन प्रति मिनट नर का 70 और नारी का 80 रहता है। श्वास नर के 15 मिनट और नारी के 17 चलते हैं। माँस पेशियों का वजन पुरुष में 400 और स्त्रियों में 350 होता है। स्वप्न भी वे ही अधिक देखती हैं। ऋतु प्रभाव वे कम सहन कर पाती हैं और मानसिक दबाव अधिक पड़ने पर हिस्टेरिया की शिकार हो जाती हैं, पुरुषों में यह रोग कम होता है।

नारी के यौवन के उभार का अधिक प्रभाव उसकी थाइराइड ग्लेण्ड पर अधिक पड़ता है। उसके यौवन अंगों में तेजी से उभार आता है। इस ग्रन्थि के विकास पर ‘नारीत्व’ की प्रवृत्ति बहुत कुछ अवलम्बित रहती है। यह विकसित न हो तो उसे गृहस्थ की बात सुहाती ही नहीं।

स्वस्थ पुरुष में रक्त का वजन 1060 और स्त्रियों में 1050 पाया जाता है। रक्त कणों का औसत पुरुषों में 50 लाख और स्त्रियों में 45 लाख पाया गया है। स्वर यन्त्र पुरुषों का बड़ा और कड़ा होता है नारी का छोटा और कोमल।

यह अन्तर इसलिए भी है कि दोनों का परस्पर घनिष्ठ सहयोग रहते हुए भी कार्यक्षेत्र पृथक पृथक बना रहे। नारी विश्व का- व्यक्ति का- भावनात्मक उत्कर्ष बनाये और बढ़ाये रहे। नर सम्पदा एवं सुविधा उपार्जन करता है। नारी की वरिष्ठता अध्यात्म क्षेत्र में है वह भाव स्तर का नेतृत्व करती है पुरुष की कठोरता उसे भौतिक क्षेत्र संभालने की सुविधा देती है।

वस्तुतः सन्त, ब्राह्मण, गुरु अध्यात्म क्षेत्र में और अन्य क्षेत्रों में भी दार्शनिक नेतृत्व का पद नारी को ही दिया जाना चाहिए। क्योंकि जिसके पास भावनाओं का बाहुल्य हो वही उन्हें दूसरों को प्रदान भी कर सकता है। जिसके पास जो पूँजी स्वतः ही स्वल्प है वह उसे देगा कहाँ से और कैसे?

शारीरिक अन्तर की प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था इसलिए भी है कि नारी कठोर श्रम के कार्यों में प्रवृत्त होकर अपनी विशेषतायें खोने न लगे। पुरुष को युद्ध, कूटनीति, दण्ड दमन, उपार्जन जैसे संघर्षात्मक कार्य करने पड़ते हैं। फलतः वह शरीर की दृष्टि से ही नहीं मन की दृष्टि से भी कठोर हो जाता है। यही अभिशाप नारी भी अपने कन्धों पर उठाने लगे तो उसकी अपनी गरिमा जो पुरुष के पौरुष या पोरुष्य से कहीं अधिक महत्व पूर्ण है, घटने लगेगी और विश्व को एक अपूरणीय क्षति उठानी पड़ेगी। नर को अपनी कठोरता एवं शारीरिक बलिष्ठता के आधार पर अपने को हर क्षेत्र में वरिष्ठ कहलवाने का अधिकार नहीं है। भावना क्षेत्र में तो उसी की गरिमा असंदिग्ध रूप से बढ़ी-चढ़ी है।

नारी के अन्तःकरण में कोमलता, करुणा, ममता सहृदयता एवं उदारता की पाँच देव प्रवृत्तियाँ सहज स्वाभाविक रूप से अधिक हैं। इसलिए उसे देवी शब्द अलंकार से सम्मानित किया जाता है। कमला देवी, दुर्गा देवी आदि नारी के भारतीय नामों में देवी अलंकार यथार्थ ही जुड़ा हुआ है। उसमें जन्म-जात रूप से यह देव तत्व पुरुष की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में विद्यमान है। यदि यह बाहुल्य न होता तो वह पत्नी का समर्पण परक, माता को जान जोखिम में डालने जैसी बलिदानी प्रक्रिया, बहिन और पुत्री की अन्तरात्मा को गुदगुदा देने वाली विशेषता कैसे सम्भव होती। उसके इन दैवी गुणों ने ही उसे इस प्रकार का परमार्थ परायण तपस्वी जीवन जी सकने की क्षमता प्रदान की है।

भौतिक विशेषतायें-नर में हो सकती हैं पर आत्मिक महानता की दिव्य सम्पदा में वह नारी से कहीं पीछे है। इसलिए जब कभी भाव परिवर्तन की आवश्यकता व्यक्तिगत अथवा सामूहिक जीवन में अनुभव की जाती है तब सदा उसी को आगे किया जाता है, उसका नेतृत्व स्वीकार किया जाता है। उसी का द्वार खटखटाया जाता है, उसका नेतृत्व स्वीकार किया जाता है। पौराणिक शक्ति गाथाओं में- कर्मकाण्ड परक शक्ति पूजा में, इस रहस्य में, तथ्य कूट-कूट कर भरा हुआ है। हमें नारी की गरिमा समझनी ही नहीं, विकसित भी करनी होगी और कार्यान्वित भी।


एंड्रयू कार्नेगी की सफलता की कहानी (Kahani)

घटना स्काटलैण्ड के डन फर्म लाइन की है। एक निर्धन बालक ने जन्म लिया। उसका पिता एक छोटा सा खोन्चा लेकर फेरी लगाया करता था और माँ घर पर केक बनाकर सड़क के नुक्कड़ पर बैठकर बेचा करती थी। उसने देखा कि इस गरीबी के वातावरण में यहाँ रहकर विकास नहीं हो सकता। इस वातावरण से वह ऊब गया और घर वालों से बिना कहे अमरीका चला गया।

वहाँ उसे एक इस्पात कम्पनी में चपरासी का पद मिल गया। काम बहुत थोड़ा था जब घंटी बजती तभी मैनेजिंग डाइरेक्टर के सामने हाजिर हो जाता और काम पूरा करके कार्यालय के बाहर रखे एक स्टूल पर बैठ जाता। उसे बेकार समय गुजारते अच्छा न लगता था। अतः मैनेजिंग डाइरेक्टर की अलमारी से कोई पुस्तक निकाल लाता और खाली समय में बैठे कर पढ़ता रहता।

एक दिन किसी बात पर डाइरेक्टरों में विवाद होने लगा। वह किसी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में न थे। वह चपरासी सभी चर्चा सुन रहा था अपने स्थान से उठा और अलमारी से एक पुस्तक निकाल कर उस पृष्ठ को खोलकर उनकी मेज पर रख दिया।, जिसमें उस प्रश्न का उत्तर था। एक स्वर से उसकी विद्वत्ता को सराहा गया। इसीलिए तो मिल्टन ने कहा था कि मन चाहे तो स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है। क्योंकि मन को संस्कारवान बनाने और व्यक्तिगत तथा सामाजिक समृद्धि को प्राप्त करने का उपाय है उद्देश्य पूर्ण ढंग से स्वाध्याय।

उस चपरासी ने उद्देश्य पूर्ण और योजनाबद्ध ढंग से स्वाध्याय करके यह दिखा दिया कि थोड़े समय में एक चपरासी भी मैनेजिंग डाइरेक्टर की योग्यता को प्राप्त कर सकता है। प्रगति के क्षेत्र में वह यहीं तक नहीं रुका रहा वरन् अपने परिश्रम, लगन और निरन्तर स्वाध्याय से करोड़पति बना, जिसका नाम एंड्रयू कार्नेगी था।


स्थूल से अधिक शक्ति ‘सूक्ष्म’ में भरी पड़ी है।

इस विश्व में जो कुछ दृश्यमान होता है वह अदृश्य की परिणिति है। इस विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ अदृश्य सूक्ष्म बिखरा पड़ा है लाख करोड़वाँ हिस्सा भी दृश्यमान नहीं होता है। पर जो कुछ अनुभव में आता है वह अनुभव से अगम्य-इन्द्रियातीत विराट् का एक नगण्य सा अंश मात्र ही होता है। विराट् ब्रह्माण्ड में जितना प्रचुर अग्नि तत्व भरा पड़ा है हमारा सूर्य उसका राई रत्ती जितना अंश ही है। उस सूर्य की भी दसों दिशाओं में जितनी ऊष्मा फैलती है उसका हम लोग पृथ्वी की ओर विकीर्ण होने वाली गर्मी में से भी एक तुच्छ अंश अनुभव कर पाते हैं।

शरीर में प्रत्यक्ष ऊष्णता के रूप में दीखने वाला बुखार वस्तुतः इन कोटि -कोटि अदृश्य रोग कीटाणुओं के उपद्रव की एक नन्ही झलक ही है। वे रोग कीट हजारों तरह के उपद्रवों की पृष्ठभूमि देह के भीतर रच रहे होते हैं, पर हमें उनमें से मात्र चमड़ी पर उभरने वाली गर्मी मात्र का ही अनुभव होता है। भीतर के अंगों में जो ताप या विग्रह उन रोग कीटों ने उत्पन्न किया होता है वह तो विदित ही नहीं होता। मनुष्य की काया को ही लीजिये इतना लम्बा चौड़ा शरीर वस्तुतः एक सूक्ष्म वीर्य कण और उसके भीतर रहने वाले ‘जीन्स’ न्यूक्लियस आदि अति सूक्ष्म तत्वों की परिणति मात्र होता है। वह अदृश्य सूक्ष्मता की काया के रूप में जितनी प्रकट होती है, उससे भी लाखों गुनी अधिक विशेषताएं फिर भी अनुभव में न आने पर भी विद्यमान रहती हैं।

विराट् ब्रह्माण्ड का वास्तविक स्वरूप उसका सूक्ष्म ‘शक्ति अंश’ ही है। जिसे परा और अपरा प्रकृति के नाम से जाना जाता है। उसके कर्तृत्व का नन्हा सा अंश ही स्वतः हमारी मनः चेतना की पकड़ में आता है। जो दृश्य है उसके इर्द -गिर्द अदृश्य शक्ति स्रोत की असीम प्रवाह धारा बहती रहती है। ग्रह नक्षत्रों से लेकर वन, पर्वत, सागर, सरिता तक सब पर यही बात लागू होती है। मानव शरीर और भी अधिक विचित्र है। उसकी संवेदनशीलता -चुम्बक क्षमता इतनी अधिक है कि वह अपनी कोमल ग्रहण शक्ति के कारण इस अदृश्य जगत की किन्हीं भी अद्भुत शक्तियों को अभीष्ट परिमाण में अपने अन्दर खींच सकता है- ग्रहण और धारण कर सकता है।

शरीर शास्त्री जितना अब तक देह के भीतरी और बाहरी अंगों के संबंध में प्राप्त कर चुके हैं उससे कहीं अधिक गंभीर ज्ञान हमें अपने सूक्ष्म और कारण शरीर के सम्बन्ध में प्राप्त करना चाहिए। जो शोधें प्राचीन काल में हो चुकीं हैं उससे आगे का सारा क्रम ही अवरुद्ध हो गया, जबकि आवश्यकता उसे निरन्तर जारी रखे जाने की थी। ज्ञान का अन्त नहीं, जो प्राचीन काल में जाना जा चुका वह समग्र नहीं। मानवीय सामर्थ्य और विराट् की अनन्तता की तुलना करते हुए यही उचित है कि उपलब्ध ज्ञान को पूर्ण न माना जाय और अन्वेषण कार्य जारी रखा जाय।

सूक्ष्म और कारण शरीरों की स्थिति, शक्ति, संभावना और उपयोग की प्रक्रिया समझने में भूत काल के साधन विज्ञानियों की जानकारियों से लाभ उठाया जाना चाहिए और अन्तरिक्ष के सूक्ष्म प्रवाह संचार में पिछले दिनों जो परिवर्तन हुए हैं- मनुष्य कलेवर के स्तर में जो भिन्नता आई है उसे ध्यान में रखते हुए हमें शोध कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए।

स्थूल दृश्य शरीर की गतिविधियाँ इस भूलोक तक सीमित हैं। सूक्ष्म शरीर-भुवः लोक तक। और कारण शरीर स्वः लोक तक अपनी सक्रियता फैलाये हुए हैं। इन भूः भुवः स्वः लोकों को ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, आदि समझने की आमतौर से भूल की जाती है। लोक और ग्रह सर्वथा भिन्न हैं। ग्रह हैं- लोक सूक्ष्म। इस दृश्यमान अनुभवगम्य भूलोक के भीतर अदृश्य स्थिति में दो अन्य लोक समाये हुए हैं। भुवः लोक और स्वः लोक। वहाँ की स्थिति भू लोक से भिन्न है। यहाँ पदार्थ का प्राधान्य है। जो कुछ भी सुख दुख हमें मिलते हैं वे सब अणु पदार्थों के माध्यम से मिलते हैं। यहाँ हम जो कुछ चाहते या उपलब्ध करते हैं वह पदार्थ ही होता है। स्थूल शरीर चूंकि स्वयं पदार्थों का बना है इसलिए उसकी दौड़ या पहुँच पदार्थ तक ही सीमित हो सकती है। भुवः लोक विचार प्रधान होने से उसकी अनुभूतियाँ, शक्तियाँ, क्षमतायें, संभावनायें सब कुछ इस बात पर निर्भर करती हैं कि व्यक्ति का बुद्धि संस्थान, विचार स्तर क्या था।

स्वः लोक भावना लोक है। यह भावना प्रधान है। भावनाओं में रस है। प्रेम का रस प्रख्यात है। माता और मित्र के बीच कितनी प्रगाढ़ता, घनिष्ठता, आत्मीयता होती है यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं। वे सुयोग में कितना सुख और वियोग में कितना दुख अनुभव करते हैं इसे कोई सहृदय व्यक्ति अपनी अनुभूतियों की तथा उन स्थितियों के ज्वार भाटे से प्रभावित लोगों की अन्तःस्थिति का अनुमान लगाकर वस्तुस्थिति की गहराई जान सकते हैं। यह भावसंवेदना इतनी सघन होती है कि शरीर और मन को किसी विशिष्ठ दिशा में घसीटती हुई कहीं से कहीं ले पहुँचती है। श्रद्धा और विश्वास के उपकरणों से देवताओं को विनिर्मित करना और उन पर अपना भावारोपण करके अभीष्ट वरदान प्राप्त कर लेना यह सब भाव संस्थान का चमत्कार है। देवता होते हैं या नहीं। उनमें वरदान देने की सामर्थ्य है या नहीं। इस तथ्य को समझने के लिये हमें मनुष्य की भाव सामर्थ्य की प्रचंडता को समझना पड़ेगा। उसकी श्रद्धा का बल असीम है। जिसकी जितनी श्रद्धा होगी, जिसका जितना गहरा विश्वास होगा, जिसने जितना प्रगाढ़ संकल्प कर रक्खा होगा, और जिसने जितनी गहरी भक्ति भावना के संवेदनात्मक बना रखा होगा देवता उसकी मान्यता के अनुरूप बनकर खड़ा हो जायगा। वह उतना ही शक्ति सम्पन्न होगा और उतने ही सच्चे वरदान देगा।

कहना न होगा कि हर चीज सूक्ष्म होने पर अधिक शक्तिशाली बनती चली जाती है। मिट्टी में वह बल नहीं जो उसके अति सूक्ष्म अंश अणु में है। हवा में वह सामर्थ्य नहीं जो ईथर में है, पानी में वह क्षमता नहीं जो भाप में है। स्थूल शरीर के गुण धर्म से हम परिचित हैं। वह सीमित कार्य ही अन्य जीव जन्तुओं की तरह पूरे कर सकता है। जो अतिरिक्त सामर्थ्य, अतिरिक्त प्रतिभा , अतिरिक्त प्रखरता मनुष्य के अन्दर देखी जाती है वह उसके सूक्ष्म और कारण शरीरों की ही है। बाहर से सब लोग लगभग एक से दीखने पर भी भीतरी स्थिति के कारण उनमें जमीन आसमान जितना अन्तर पाया जाता है यह रक्त माँस का फर्क नहीं वरन् सूक्ष्म शरीर की अन्तः चेतना में सन्निहित समर्थता और असमर्थता के कारण ही होता है। पंच भौतिक स्थूल काया को जिस प्रकार आहार, व्यायाम, चिकित्सा आदि उपायों से सामर्थ्यवान बनाया जाता है उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर को भी योग साधनों द्वारा परिपुष्ट बनाया जाता है। मनोबल और आत्मबल के कारण जो अद्भुत विशेषताएं लोगों में देखी जाती हैं उन्हें इन सूक्ष्म शरीरों की बलिष्ठता ही समझना चाहिए। साधन का उद्देश्य उसी बलिष्ठता को सम्पन्न करना है।

स्थूल शरीर की शोभा, तृप्ति और उन्नति के लिये हमारे प्रयत्न निरन्तर चलते रहते हैं। यदि सूक्ष्म शरीर और कारण शरीरों को उपेक्षित और विभुक्षित पड़े रहने देने की हानि को हम समझें और उन्हें भी स्थूल शरीर की ही तरह समुन्नत करने का प्रयत्न करें तो ऐसे असाधारण लाभ प्राप्त कर सकते हैं जिनके द्वारा जीवन कृत कृत्य हो सके। भूलोक में प्राप्त पदार्थ ‘सम्पदाओं’ से प्राप्त थोड़े सुख का हमें ज्ञान है अस्तु उसी की उधेड़ बुन में लगे रहते हैं। भुवः और स्वः लोकों की विभूतियों को भी जान सकें तो सच्चे अर्थों में सम्पन्न बन सकते हैं। योग साधना का प्रयोजन मनुष्य को ऐसी ही समग्र सम्पन्नता से लाभान्वित करता है।


हम सब यह साहित्य अपने घर रखें ही।

जन मानस का भावनात्मक परिष्कार करने के लिये युग निर्माण योजना द्वारा जो सत् साहित्य छापा गया है वह कितना तथ्यपूर्ण एवं प्रेरक है, इसे हम सभी जानते हैं। देश विदेश में मिशन के प्रति जो प्रगाढ़ श्रद्धा विकसित हुई है उसका श्रेय उस नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति के महान अभियान को है; जिसके आधार पर मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं स्पष्ट दीखने लगी हैं। कहना न होगा कि यह व्यापक प्रकाश युग निर्माण साहित्य द्वारा ही फैला है। यह चिनगारियाँ जहाँ भी गिरी हैं वहाँ ज्योतिर्मयी दावाग्नि धधकी है। करोड़ों व्यक्तियों के जीवन क्रम को इसी साहित्य ने मोड़ा मरोड़ा है। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न अब साकार होता दीख रहा है। इसके पीछे युग निर्माण साहित्य का ही मजबूत हाथ है। विज्ञ समाज में एक स्वर से इस साहित्य के युगान्तरकारी प्रभाव को समझा स्वीकारा जा रहा है।

युग-निर्माण के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि इस साहित्य को अधिकाधिक व्यापक बनाने के लिये प्राणपण से प्रयत्न करे। जिनके पास अखण्ड ज्योति युग -निर्माण पत्रिकायें पहुँचती हैं उनका कर्तव्य है कि कम से कम दस व्यक्ति एक प्रति को पढ़ें और अधिकाधिक नये ग्राहक बनाये। इसके लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहा जाय परिवार कि सदस्यता की फीस दस पैसा और एक घण्टा समय नित्य देना है। यह दोनों ही अनुदान अपने घर में ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय की स्थापना के लिये नियमित रूप से धन कि व्यवस्था रखने तथा नित्य जन संपर्क स्थापित करके उस साहित्य को पढ़ाने सुनाने के लिये ही है। हममें से प्रत्येक को इस प्रारम्भिक कर्तव्य पालन के लिये पूरी तरह जागरुक रहना चाहिए।

झोला पुस्तकालय और ज्ञान रथ, चल पुस्तकालय इसी साहित्य के चलने चाहिये। हम लोग पुस्तक विक्रेता नहीं वरन् एक विशेष मिशन के सृजन सेनानी हैं हमें अपना लक्ष्य पूरा कर सकने वाले साहित्य पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और उसका जिस प्रकार जितना अधिक प्रसार हो सकता हो उसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जहाँ भी शाखा संगठन हैं वहाँ चल पुस्तकालय के माध्यम से उसे पढ़ाने तथा बेचने का कार्य पूरे उत्साह के साथ चलाना चाहिये ताकि अभियान के प्रभाव क्षेत्र अधिकाधिक विस्तृत हो सकें।

युग निर्माण योजना द्वारा अब तक छपे साहित्य का विवरण इस प्रकार है। उसमें से जिनके पास जो पुस्तकें कम हैं उन्हें मँगाकर अपने घरेलू अथवा सार्वजनिक पुस्तकालयों की पूर्ति कर लेनी चाहिये।

जीवन - निर्माणकारी अमूल्य साहित्य

जीवन-निर्माण की दिशाएँ प्रेरणाएं देने वाला सशक्त साहित्य जिसे पढ़कर नया प्रकाश ही मिलता है। आकर्षक छपाई, मोटा रंगीन आवरण , मूल्य प्रत्येक का दो-दो रुपया।

1. ज्ञान क्रान्ति के अग्रदूत। 2. मानवता जिनकी ऋणी। 3. विश्व की महान विभूतियाँ। 4. विश्व की महान महिलाएं। 5. शौर्य और साहस के सुदृढ़ स्तम्भ 6. पीड़ित मानवता के अनन्य सेवक। 7. पुरुषार्थी और पराक्रमी व्यक्तित्व।8 राष्ट्र मन्दिर के कुशल शिल्पी। 9. परिस्थितियाँ बाधक थी पर वे रुके नहीं 10. धर्मोद्धारक और संस्कृति संरक्षक। 11. महापुरुषों के अविस्मरणीय संस्मरण। 12. स्मरण जो भुलाये न जा सकेंगे। 13. कर्तव्य धर्म की आख्यायिकाएं। 14. आत्मोत्कर्ष की गौरव गाथायें। 15. दिव्य अनुभूतियां और दिव्य संदेश। 16. गृहस्थ सुख की साधना। 17. तमसो मा ज्योतिर्गमय। 18. प्रेम ही परमेश्वर है। 19. अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय। 20. ईश्वर और उसकी अनुभूति। 21. मानव जीवन निरर्थक न चला जाय। 22. नियोजित परिवार। सुखी परिवार। 23. रुग्ण समाज और उसका कायाकल्प। 24. भारतीय संस्कृति की रूपरेखा। 25. महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया। 26. कल्प चिकित्सा। 27. प्रेरणाप्रद कथा-गाथाएं। 28. साहसी जीतता है। 29. जीवन की सर्वोत्तम आवश्यकता आत्मज्ञान। 30. हम उनकी जय गायें। 31. सुख का आधार सुसंस्कृत परिवार। 32. सेवा सौजन्यता के सन्देशवाहक। 33. प्रेरणा भरे पावन प्रसंग। 34. जागो प्रहरी। 35. युग-गायन। 36. सुख शान्ति की साधना। 37. सद्गृहस्थ की साधना। 38. नशेबाजी की दूषित दुष्प्रवृत्ति। 39. जागृति गान। 4. नेक बनें नेक की राह चलें 41. क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें? 42. अन्तरंग जीवन का देवासुर संग्राम। 43. भव्य समाज की नव्य रचना। 44. जिन्दगी जीने की कला। 45. अर्थ अनुशासन सीखिये। 46. सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति। 47. सुनसान के सहचर 48. नारी को सुशिक्षित एवं स्वावलम्बी बनाया जाय। 49. भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये। 50. सर्वोपयोगी सुलभ साधना। 51. अन्धविश्वास को उखाड़ फेंकिये। 52. आस्तिकता मानव-जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। 53. शौर्य और साहस के प्रसंग। 54. हम बदलें तो दुनिया बदले। 55. अविस्मरणीय संस्मरण। 56. काव्य कैलाश। 57. प्रगतिशील महिलाएँ। 58. धर्माचरण से ही कल्याण होगा। 59. प्रगति के पथ पर। 60. दीर्घ जीवन के रहस्य। 61. प्रेरक लघुकथाएँ। 62. हम समर्थ और सशक्त कैसे बनें। 63. चमत्कारों की जननी संकल्प शक्ति। 64. केवल अपने लिये ही न जियें। 65. मनुष्य में देवत्व का उदय। 66. युग की पुकार अनसुनी न करें 67. प्रेरक पौराणिक कथाएँ। 68. श्रद्धांजलि। 69. स्वस्थ और समर्थ जीवन। 7. मर्म -स्पर्शी संस्मरण। 71. विवाहोन्माद के असुर से जूझा जाय। 72. हृदय स्पर्शी भाव-कथाएँ। 73. विचारों की अपार अद्भुत शक्तियाँ। 74. प्रगति पथ के पथिक। 75. आदर्श विवाहों की रूपरेखा। 76. भावी पीढ़ी का नव निर्माण। 77. मन और उसकी प्रचण्ड शक्ति। 78. पर्व और त्यौहारों की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि। 79. मनोविकार और उनसे छुटकारा। 8. माता-पिता कर्तव्य और उत्तरदायित्व। 81. आसन और प्राणायाम। 82. कर्म योग और कर्म कौशल। 83. बालकों का भावनात्मक निर्माण। 84. सामूहिक चेतना की अनिवार्य आवश्यकता। 85. जो जियें वे जीने की कला सीखें।

नव निर्माण के अत्यन्त के सस्ते ट्रैक्ट

नव निर्माण के शतसूत्री कार्यक्रमों को व्यापक बनाने के लिए लागत मात्र मूल्य के अत्यन्त सस्ते, सुन्दर आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं, इन्हें स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना या सुनाना जन मानस को सुसंस्कृत एवं परिमार्जित करने के लिए आवश्यक है। मूल्य प्रत्येक का पच्चीस पैसा

आध्यात्मिक एवं साधनात्मक

1. प्रेम ही परमेश्वर है। 2. हम ईश्वर से विमुख न हों। 3. हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। 4. उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। 5. जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति। 6. जीवन लक्ष्य भुला न दिया जाय। 7. आन्तरिक सुख ही वास्तविक सुख। 8. ज्ञान योग की साधना। 9. कर्म योग की रीति-नीति। 10. भक्ति योग का वास्तविक स्वरूप। 11. मनुष्य में देवत्व। 12. अपूर्णता की ओर 13. मरने से डरना क्या। 14. उद्धरेदात्मनात्मानम्। 15. आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। 16. धर्म-रक्षा से आत्मा-रक्षा होगी। 17. मन की तुष्टि आत्मा की दुर्गति। 18. उत्कृष्ट और परिष्कृत जीवन। 19.अमृत और पारस। 20. जीवन श्रेष्ठ और सार्थक बने।

जीवन-निर्माण -

1. अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा। 2. चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण। 3. पहले अपने को सुधारें। 4. कलात्मक जीवन जियें। 5. सज्जनता की राह। 6. सद्गुण बढ़ायें- सुसंस्कृत बनें। 7. प्रतिष्ठायें प्राप्त करें। 8. अपना दृष्टिकोण बदलें। 9. स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय। 10. मनोबल की चमत्कारी शक्ति। 11. अति भावुकता से सावधान। 12. विचारों की उत्कृष्टता प्रगति का मूलमन्त्र। 13. समस्यायें अनेक- हल एक। 14. हम सुख शाँति से वंचित क्यों हैं? 15. सुखी इस तरह रहा जा सकता है। 16. हम सशक्त और साहसी बनें। 17. मन के हारे हार है मन के जीते जीत। 18. धैर्य सब सफलताओं का मूल है। 19. सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। 20. जिन्दगी हँसते-खेलते जियें। 21. सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। 22. अपना उत्साह शिथिल न होने दें। 23. निराशा को पास न फटकने दें। 24. आलस्य छोड़िये परिश्रमी बनिये। 25. आराम नहीं काम कीजिए। 26. ईमानदारी का परित्याग न करें। 27. अशिष्टता न कीजिये। 28 मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। 29. प्रतिकूल परिस्थितियों में उद्विग्न न हों। 30. स्वाध्याय में प्रमाद न करें। 31. झूठी आलोचनाओं से परेशान न रहें। 32. उतावली न करें- उद्विग्न न हों। 33. दूसरों के दोष दुर्गुण ही न देखा करें। 34. मत असन्तुष्ट रहिये, मत खिन्न हूजिये। 35. हम भाग्यवादी नहीं, कर्मवादी बनें 36. आवेशग्रस्त होने से अपार हानि 37. अहंकार में डूब मत जाइये। 38. असन्तोष की आग में न जलें। 39. कठिनाइयों से डरिये नहीं- लड़िये। 40. न डरिये न अशान्त हूजिये। 41. धरती पर स्वर्ग।

स्वास्थ्य-रक्षा -

1. शरीर को स्वच्छ रखें। 2. कपड़ों से जकड़े न रहिये। 3. श्वाँस सही तरीके से लीजिये। 4. आरोग्यता का आधार शारीरिक श्रम। 5. व्यायाम हमारी अनिवार्य आवश्यकता। 6. सर्वोपयोगी सरल व्यायाम। 7. आहार में असंयम न बरतें। 8. खाया कैसे जाय। 9. दूध पियें, तो इस तरह। 10. स्वस्थ रहना है, तो यह खाइये। 11. खाते समय इन बातों का ध्यान रखिये। 12. शाकाहारी व्यंजन। 13. कब्ज से कैसे बचें और कैसे छूटें। 14. हमारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता, संयम। 15. ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। 16. मानसिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव। 17. हम दुर्बल नहीं शक्तिशाली बनें। 18. सशक्त दीर्घजीवन का राजमार्ग। 19. शतायु जीवन का राजमार्ग। 20. हमारा स्वास्थ्य संकट और उसका समाधान, 21. तुलसी के चमत्कारी गुण। मू. 40 पै.

रचनात्मक प्रवृत्तियाँ -

1. समय का सदुपयोग करें। 2. बोलिये तो इस तरह 3. परोपकारी और सेवाभावी बनिये। 4. काम आयेंगे अपने ही हाथ। 5. मित्रता क्यों, कैसे और किससे? 6. मित्रता करें पर समझ बूझकर 7. जीतेंगे हिम्मत वाले। 8. दुर्दैव को चुनौती। 9. जो करें मन लगाकर करें। 10. विनोद और उल्लास की प्रवृत्तियाँ। 11. अपने दोषों को ढूंढ़ें और निकालें। 12. मनुष्य क्या पशुओं से भी गिरा रहेगा। 13. स्वच्छता मनुष्यता का प्रथम गुरु मन्त्र। 14. गंदगी की घृणित असभ्यता 15. अनर्थकारी गलतफहमियों से बचे रहें। 16. बुराइयों के अन्धकार में प्रकाश की किरणें 17. प्रशंसा की सृजन शक्ति से आश्चर्यजनक सुधार। 18. कामना और वासना की मर्यादा। 19. सन्तोषी सर्वदा सुखी। 20. बुढ़ापे से टक्कर लीजिए।

युग-निर्माण योजना -

1. हमारी शतसूत्री युग-निर्माण योजना। 2. हमारा युग निर्माण सत्संकल्प। 3. युग-निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण। 4. लोक निर्माण के लिये जन-गायन। 5. नव-निर्माण के लिये जन सम्मेलन। 6. सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाय। 7. ज्ञान-यज्ञ का उद्देश्य और स्वरूप। 8. उत्तर साहित्य से संपर्क स्थापित कीजिये। 9. पुस्तकालय सच्चे देवालय। 10. झोला पुस्तकालय-अमृत कलश। 11. गोरस बेचन हरि मिलन-एक पन्थ दो काज। 12. प्रबुद्ध व्यक्ति धर्म तन्त्र संभालें। 13. उनसे जो पचास के हो चले। 14. छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। 15. साधु की महान् परम्परा और जिम्मेदारी। 16. ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व संभालें। 17. मन्दिर जन-जागरण के केन्द्र बनें। 18. दर्शन तो करें पर इस तरह। 19. नारी को तिरस्कृत न किया जाये। 20. क्या नारी इसी दुर्दशा में पड़ी रहेगी? 21. नारी उत्थान के लिए महिलायें आगे आयें। 22. अन्धविश्वास से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। 23. अन्धविश्वासी नहीं विवेकशील बनिये। 24. टोना टोटका जन्तर मन्तर। 25.पक्षपात त्यागें औचित्य अपनायें। 26. व्यक्तिवाद नहीं- समूहवाद। 27 हरिजन उत्कर्ष के लिए बड़े कदम उठें। 28. निरक्षरता का कलंक धो दिया जाय। 29. विद्या की सम्पत्ति बढ़ाते ही चलें। 30. भिक्षा व्यवसाय देश-जाति का कलंक। 31. सन्तान की संख्या न बढ़ाइये। 32. खाद्य समस्या और उसका हल। 33. शाक उगायें अन्न बचायें। 34. वृक्षारोपण एक परम पुनीत पुण्य। 35 बाल-विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। 36. तम्बाकू एक भयानक दुर्व्यसन। 37. मृतकभोज की क्या आवश्यकता? 38. प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें। 39. पशु बलि हिन्दुओं का कलंक। 40. माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। 41. नया युग कब और कैसे? 42. युग परिवर्तन का सूत्रधार अथवा नया अवतार। 43. युग परिवर्तन एक सुनिश्चित सम्भावना। 44. युग पुरुष हमारे गुरुदेव। 45 युग निर्माण योजना एक परिचय, एक झाँकी। 46. युग निर्माण योजना का गायत्री यज्ञ अभियान।

विवाहान्दोलन-

1. तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद। 2. विवाह शादियों का असह्य अपव्यय। 3. विवाहोन्माद के लिये बुद्धि बेच क्यों दी जाय। 4. इस हृदयद्रावक स्थिति को कब तक सहा जायेगा? 5. यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेंगी। 6. विवाहों का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे। 7. विवाह के आदर्श और सिद्धान्त। 8. आदर्श विवाहों की रूपरेखा। 9. आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो? 10. प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता। 11. क्या विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध है? 12. उच्च शिक्षित कन्या की विवाह समस्या।

पारिवारिक समस्याएं -

1.सौभाग्य का द्वारा सम्मिलित परिवार। 2 संगठित परिवार स्वरूप और आदर्श। 3. आदर्श परिवार की मर्यादायें। 4. परिवार को सुसंस्कृत बनायें 5. परिवार को सुसंस्कृत कैसे बनायें? 6. परिवार का पालन ही नहीं निर्माण भी। 7. धन का उपार्जन व उपयोग 8. बचत ही आपकी असली आय है। 9. खर्च करना भी सीखिए। 10. अपनी आर्थिक स्थिति डगमगाइये मत। 11. कर्ज से छुटकारा पाना ही ठीक है। 12. अपव्यय का ओछापन। 13. गृहस्थ एक योग साधना। 14. धन्योगृहस्थाश्रमः 15. गृहस्थाश्रम एक कर्त्तव्य धर्म। 16. गृहस्थ ही नहीं सद्गृहस्थ बनें। 17. दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग का अवतरण। 18. सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन। 19. सुयोग्य नारी सुखी गृहस्थ। 20. यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते ......। 21. पतिव्रत की महिमा पत्नीव्रत की गरिमा। 22. तेजस्वी और मनस्वी सन्तति। 23. पुत्र की कामना से उद्विग्न क्यों? 24. छोटी उम्र में बड़े काम। 25. वे गरीब बच्चे कैसे महान् बनें? 26. बच्चों का भावनात्मक विकास। 27. बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला में। 28. बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। 29. बच्चों को बिगड़ने न दें। 3. बच्चों को सद्गुणी कैसे बनावें?

जीवन चरित्र ट्रैक्टमाला

युग-निर्माण योजना का उद्देश्य राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त, समर्थ और विचारवान बनाना है। यह तेजस्विता महापुरुषों की जीवन शैलियों के अनुसरण से सम्भव होती है। इन पुस्तकों का मूल्य चालीस-चालीस पैसा रखा गया है।

महापुरुष और सन्त -

1. महात्मा गौतम बुद्ध, 2. महापुरुष ईसा, 3. जगद्गुरु शंकराचार्य, 4. महाप्रभु चैतन्य, 5. महावीर स्वामी, 6. सन्त कबीर, 7. सन्त तुकाराम, 8. समर्थगुरु रामदास, 9. रामकृष्ण परमहंस, 10. स्वामी विवेकानन्द, 11. स्वामी रामतीर्थ, 12. प्रभु जगद्बन्धु, 13. ठाकुर दयानन्द, 14. गुरुनानक, 15. सन्त नामदेव।

समाज सुधारक और मार्ग दर्शक -

1. राजाराम मोहनराय, 2. स्वामी दयानन्द, 3. केशवचन्द्र सेन, 4. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, 5. महर्षि कर्वे, 6. ठक्कर बापा, 7. सर गंगाराम, 8. जुगल किशोर बिरला, 9. मास्टर प्रभुदयाल।

राष्ट्र नेता और देशभक्त -

1. दादाभाई नौरोजी, 2. महादेव गोविन्द रानाडे, 3. लोकमान्य तिलक, 4. महात्मा गाँधी, 5. गोपाल कृष्ण गोखले, 6. मदनमोहन मालवीय, 7. अरविन्द घोष, 8. ला. लाजपत राय, 9. सरदार पटेल, 10. बा. राजेन्द्र प्रसाद, 11. देशबन्धु चितरंजनदास 12. सुभाषचन्द्र बोस, 13. गणेश शंकर विद्यार्थी, 14. स्वामी श्रद्धानन्द, 15. विनोबा भावे, 16. जमनालाल बजाज, 17. पुरुषोत्तमदास टण्डन, 18. विश्वेश्वरैया, 19. वीर सावरकर, 20. महापुरुष एंड्रयूज, 21. प्रफुल्लचन्द्र राय, 22. सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, 23. बाबा राघवदास, 24. देशभक्त राधामोहन गोकुलजी 25. स्वामी केशवानन्द, 26. स्वामी सहजानन्द।

साहित्यिक और ऐतिहासिक महापुरुष -

1. रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 2. बंकिमचन्द्र चटर्जी, 3. वीर शिवाजी, 4. दुर्गादास, 4 गुरु गोविन्द सिंह।

महान् नारियाँ -

1. महारानी अहिल्याबाई, 2. रानी लक्ष्मीबाई 3 रानी दुर्गावती, 4. राष्ट्रमाता कस्तूरबा, 5. श्रीमती ऐनीबेसेंन्ट, 6. सरोजिनी नायडू, 7, सिस्टर निवेदिता, 8 अवन्तिकाबाई गोखले, 9. जानकीमैया।

विदेशी महापुरुष -

1. अब्राहम लिंकन 2. महापुरुष मेजिनी, 3. गैरी वाल्डी, 4. महर्षि कार्लमार्क्स, 5. ऋषि टॉलस्टाय, 6. महापुरुष लेनिन, 7. सन्त सुकरात, 8. महात्मा फ्राँसिस, 9. मार्टिन लूथर, 10. पवित्रात्मा बहा, 11. कर्मवीर कोलम्बस, 12. कमाल पाशा, 13. टोयोहिकी कागाबा, 14. बुकर टी. वाशिंगटन, 15. मार्टिन लूथर किंग, 16. फ्लोरेंस नाइटिंगेल, 17. डॉ. सनयात सेन, 18. गोल्डामेयर।

गीत और संगीत

रचनात्मक प्रेरणायें देने वाले गीत, रिकार्ड गीत तथा स्टेज पर खेले जाने वाले संगीत नाटिकायें। मूल प्रत्येक का अस्सी अस्सी पैसा।

1. भगवान राम 2. भगवान शिवशंकर 3. भगवान् श्रीकृष्ण 4. गंगावतरण 5. दहेज का दानव 6. महाराजा हरिश्चन्द्र 7. नवनिर्माण के रिकार्ड गीत।

सचित्र पुस्तकें

युग-निर्माण चित्रावली (प्रथम भाग)

सामाजिक कुरीतियों पर सचिवेचन प्रकाश डालने वाले, गायत्री चित्रावली की तरह के 24 तिरंगे चित्रों सहित-मूल्य 2 रुपया।

युग-निर्माण चित्रावली (द्वितीय भाग)

महापुरुषों के प्रेरक संस्मरणों तथा ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रों में प्रदर्शित कर नीति और सदाचार की भावनायें जागृत करने का सत्प्रयास। 24 तिरंगे चित्रों सहित- मूल्य 2 रुपये

गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1. गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग )10.50

प्रथम भाग- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधन-विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3 रु. 50

द्वितीय भाग- गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री-गीता, गायत्री-स्मृति, गायत्री-संहिता, गायत्री-उपनिषद्, गायत्री-पारायण, गायत्री-हृदय, गायत्री पंजर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3 रु. 50

तृतीय भाग- गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्-चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमयकोष, मनोमयकोष, प्राणमयकोष को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3 रु. 50

2. गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) 4 रु.

1. प्रथम भाग- गायत्री यज्ञ का विधान , लाभ एवं महत्व का तर्क , प्रमाण एवं शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन । मु. 2 रु.

2. द्वितीय भाग- सामूहिक गायत्री हवन - गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जल-यात्रा, मंडप-प्रवेश, वेदी-पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति-मंत्र पूर्णाहुति, वसोधरा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि-विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मु. 2 रु.

3. गायत्री चित्रावली- विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मु. 2 रु.

4. गायत्री मन्त्रार्थ- अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के किए हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मु. 1 रु. 50

5. गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य -

1- छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट- आकर्षक कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 40 पैसा- 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 6 रु. ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं-

1. गायत्री का स्वरूप और रहस्य। 2. गायत्री की गुप्त शक्ति। 3. सर्व सुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्त्रोत- सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पञ्चविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

2. संक्षिप्त गायत्री हवन- सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले, एक घंटे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। (मु. 20 पैसे)

3. दैनिक गायत्री साधना- नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। (मू. 20 पैसे) 4. गायत्री चालीसा (मू. 10 पैसे) 5. दैनिक आरती (मू. 5 पैसे) 6. युग निर्माण का सत्संकल्प (मू. 5 पैसे)

3. दैनिक गायत्री साधना- नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। (मू. 20 पैसे) 4. गायत्री चालीसा (मू. 10 पैसे) 5. दैनिक आरती (मू. 5 पैसे) 6. युग निर्माण का सत्संकल्प (मू. 5 पैसे)

गायत्री साहित्य अखण्ड-ज्योति संस्थान से ही माँगना चाहिये। अन्य पुस्तकें युग-निर्माण योजना के पते से मँगानी चाहिए।

गायत्री साहित्य अखण्ड-ज्योति संस्थान से ही माँगना चाहिये। अन्य पुस्तकें युग-निर्माण योजना के पते से मँगानी चाहिए।

धर्म मंच में नव निर्माण की प्रक्रिया

धार्मिक मंच से लोक-शिक्षण की जो व्यापक योजना बनाई गई है, उसके माध्यम से कोई भी भावनाशील धर्म-प्रेमी अपनी आजीविका बड़ी आसानी से चलाते हैं। प्रस्तुत योजना के अंतर्गत जो पुस्तकें छापी गई हैं उनका विवरण नीचे दिया जाता है-

1. गीता कथा- सात दिन में दोनों समय एक-एक गीता श्लोक की व्याख्या करने के लिए एक-एक स्वतन्त्र अध्याय है। प्रत्येक श्लोक की व्याख्या, विवेचना में ढेरों पौराणिक, ऐतिहासिक कथायें, दृष्टान्त एवं लघु कथाएँ जोड़ी गई हैं। साथ ही विषय की पुष्टि करने वाले संस्कृत श्लोक, दोहे, रामायण की चौपाइयाँ भी हैं, जिनके द्वारा कथा-वाचक, बाल-वृद्ध, शिक्षित अशिक्षित सभी के लिए आकर्षक एवं उपयोगी लोक-शिक्षण कर सकता है। मोटा ग्लेज कागज, बढ़िया जिल्द, मु. 6 रु. मात्र।

2. गीता पद्यानुवाद-गीता के समस्त श्लोक तथा उनका राधेश्याम रामायण तर्ज पर पद्यानुवाद इस पुस्तक में है। गीता सप्ताह धर्मानुष्ठान में प्रतिदिन आरम्भ में बाजे के साथ सामूहिक रूप से इसका पारायण करने पर कीर्तन जैसा आनन्द जाता है। कथा के साथ पारायण के लिए यह पुस्तक अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मोटा कागज, बढ़िया छपाई। मु. 3 रु. मात्र।

3. रामायण कथा - रामायण के प्रेरक प्रसंगों और उद्धरणों द्वारा वैयक्तिक, पारिवारिक एवं आध्यात्मिक जीवन में सुख-शान्ति और सफलता का मार्गदर्शन किया गया है। कथाकार इसके माध्यम से रामायण कथा के आयोजन बहुत ही सुन्दर ढंग से सम्पन्न कर सकते हैं। मोटा कागज, बढ़िया जिल्द, मु. 6 रु. मात्र।

4. संक्षिप्त रामायण - सात दिन में रामायण का एक सस्वर पारायण करने के लिए उसके कुछ मार्मिक प्रसंग लिये हैं। प्रत्येक दिन दो अध्याय और अन्तिम दिन एक अध्याय कुल 13 अध्याय इस दृष्टि से विभक्त किये गये हैं। मु. 1 रु.

5. पर्वों की प्रेरणा और पद्धति- पर्व हमारे प्रेरणा स्रोत हैं, उन्हें वैज्ञानिक ढंग से मनाने का विधान उनकी प्रेरणाएँ और शिक्षाओं का प्रतिपादन। मु. 2 रु.

6. अभिनव संस्कार पद्धति-जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त होने वाले पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ, जन्म-दिन, विवाह दिन, अंत्येष्टि आदि संस्कारों को करने का सरल एवं प्रभावोत्पादक विधान है। प्रत्येक संस्कार के साथ उसकी उपयोगिता, आवश्यकता एवं शिक्षा संस्कृत श्लोकों में बताई गई है। संस्कारों द्वारा जीवन निर्माण का यह पारिवारिक प्रशिक्षण साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। मु. 2 रु. 50

7. हमारी युग-निर्माण योजना -

प्रथम भाग- इस पुस्तक में योजना के सैद्धान्तिक पक्ष का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला गया है। सजिल्द मु. 3 रु.

द्वितीय भाग- इस खण्ड में योजना के कार्यक्रमों एवं कार्य-पद्धति को उसके स्वरूप को महत्ता सहित स्पष्ट किया गया है। सजिल्द मू. 3 रु.

8. धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण -

प्रथम भाग- धर्म तन्त्र द्वारा कितना प्रखर लोकशिक्षण कितनी कुशलता से किया जा सकता है इस पुस्तक से स्पष्ट होता है। सामूहिक यज्ञायोजन एवं पर्वायोजनों के उपयोगी कर्मकाण्ड तथा उनकी चुभती हुई व्याख्या सहित यह पुस्तक इस दिशा में कार्य करने के लिए परम उपयोगी है। सजिल्द मु. 3 रु.

द्वितीय भाग- धर्म तन्त्र के माध्यम से व्यक्ति और परिवार को सुसंस्कृत बनाने वाला प्रकरण विधि व्यवस्था एवं प्रभावपूर्ण व्याख्या सहित इस पुस्तक में है। सजिल्द मु. 3 रु.

9. सत्यनारायण व्रत कथा- प्रचलित कथा के मूल उपाख्यानों को ज्यों का ज्यों रखते हुए उनके पात्रों के संवाद इतने विचारोत्तेजक एवं प्रेरणाप्रद श्लोकों में बना दिये हैं, जिनके माध्यम से धर्म-शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरा होता है। इस कथा का प्रचार घर-घर में होने से जीवन-निर्माण का परिष्कृत रूप विकसित हो सकता है। मु. 75 रु. पैसे

10. सत्यनारायण पद्यानुवाद- तर्ज राधेश्याम में सत्यनारायण कथा का छन्दोबद्ध अनुवाद। मु. 40 पैसे

पुस्तकें मँगाने के नियम

(1) 5 रु. से कम की पुस्तकें वी.पी. द्वारा नहीं भेजी जातीं। यदि बहुत छोटा आर्डर हो तो पुस्तकों का मूल्य तथा डाक खर्च मिलाकर मनीआर्डर भेजना आवश्यक है।

(2) कमीशन देने की सुविधा पुस्तक मँगाने वालों को दी जाती है, जो इस प्रकार है - (अ) 10 रु. से कम की पुस्तकें लेने पर कुछ भी कमीशन नहीं (ब) 10 रु. से 99 रु. तक की पुस्तकें मँगाने पर 15 प्रतिशत कमीशन। (द) 100 रु. से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर 25 प्रतिशत कमीशन। इससे अधिक कमीशन के लिये व्यर्थ लिखा पढ़ी न करें। डाकव्यय मंगाने वाले को ही वहन करना होगा।

(3) अपना पूरा पता हिन्दी या अँग्रेजी में साफ अक्षरों में लिखना चाहिए। यदि रेल से पुस्तकें मँगानी हो तो पास के रेलवे स्टेशन का नाम भी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में रेलवे डिवीजन के सहित स्पष्ट लिखें।

पुस्तकें मँगाने का पता-

युग-निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

अपनो से अपनी बात-


युग परिवर्तन के लिए सात विभूतियों का आह्वान

यों सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र हैं जिनमें विशेष विभूतियाँ चमकती हैं- उन्हें ईश्वर के विशेष अंश को सम्पदा से सम्पन्न समझा जाना चाहिए। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान कृष्ण ने विशिष्ठ विभूतियों में अपना विशेष अंश होने की बात उदाहरणों समेत बताई है। यों जीवनयापन तो अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी करते हैं पर जिनके पास विशेष शक्तियाँ- विभूतियाँ-हैं, कुछ महत्वपूर्ण कार्य वे ही कर पाते हैं। इसलिए भावनात्मक नव-निर्माण जैसे युगान्तरकारी अभियानों में उनका विशेष हाथ रहना आवश्यक है।

विभूतियों को सात भागों में विभक्त कर सकते हैं 1. भावना 2. शिक्षा-सहित 3. कला 4. सत्ता 5. सम्पदा 6. भौतिकी 7. प्रतिभा। इन सातों के सदुपयोग से ही व्यक्ति और समाज का कल्याण होता है।

युग-निर्माण आन्दोलन का प्रथम प्रयास जन जागरण था अब अगला कदम विभूतियों को भी झकझोरना है और उन्हें उलझी हुई स्थिति से निकाल कर जीवन अथवा मरण में से एक को चुन लेने के लिए विवश करना है। अब तक अपना अभियान भारत तक - विशेषतया हिन्दू वर्ग के प्रगतिशील वर्ग तक सीमित रहा है अब इसकी परिधि विश्वव्यापी बनाई जा रही है। प्रथम चरण में मजबूती आ जाने पर यह दूसरा चरण उठाया जाना आवश्यक भी है।

गुरुदेव के जीवन ग्रन्थ का यह नया अध्याय है। प्रथम अध्याय में उनकी चौबीस वर्षीय तप साधना, द्वितीय अध्याय में सत्साहित्य निर्माण, तीसरे में संगठन आन्दोलन का क्रम चला है। उनके इस क्रिया-कलाप ने लाखों को प्रभावित और प्रेरित किया है। इन दिनों युग -निर्माण आन्दोलन का जो स्वरूप, विस्तार एवं प्रतिफल है उसे इन्हीं तीन चरणों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। अब चतुर्थ अध्याय में यह कार्य क्षेत्र बढ़कर विश्वव्यापी बना है- गुरुदेव की वर्तमान विश्वयात्रा इसी प्रयोजन के लिए है। प्रतिभाओं को जगाने और मोड़ने की ओर उनका भावी पुरुषार्थ हो रहा है।

अब तक प्रायः धर्म मञ्च के माध्यम से भारतवर्ष में हिन्दू समाज के प्रगतिशील वर्ग में ही उनकी गतिविधियाँ सीमित थी। साहित्य को प्रधान माध्यम बनाकर ही वे प्रायः जन जागरण का कार्य करते रहे हैं पर अब वह क्षेत्र अत्यधिक विशाल ही नहीं- अत्यधिक उच्चस्तरीय भी हो गया है। इतने जटिल किन्तु महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व वहन करके वे निस्सन्देह अपनी असाधारण क्षमता का ही परिचय दे रहे हैं, जिन सात विभूतियों को झकझोरने का जो कार्यक्रम उनके सामने है उसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

1- भावना (धर्म एवं अध्यात्म)

व्यक्तित्व को उत्कृष्ट और गतिविधियों को आदर्श बनाने की अन्तः प्रेरणा को भावना कहा जाता है। धर्म धारणा और अध्यात्म साधना के समस्त कलेवर को इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। पिछले दिनों कुछ कर्मकाण्डों- परम्पराओं एवं पूजा विधानों का पूरा कर लेना भर धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता समझी जाती रही है। युग-निर्माण योजना ने बताया है कि चरित्र गठन का नाम धर्म और अपनी क्षमताओं को लोक मंगल के लिये समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाओं को कल्पना लोक में नहीं उड़ते रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने तथा समाज के समग्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए। यही उनका वास्तविक प्रयोजन है भी।

धर्म की प्राचीनता और दार्शनिकता से प्रभावित लोगों को कहा जा रहा है कि अपने सम्प्रदाय की संख्या बढ़ाने - धर्म परिवर्तन के अति उत्साह में शक्तियों का अपव्यय न करें हमारा सतत प्रयास है- सब धर्मों में परस्पर सहिष्णुता और समन्वय की प्रवृत्ति उत्पन्न करना। वे अपने स्वरूप को भले ही बनाये रहें पर विश्वधर्म के एक घटक बनकर रहें और अपने प्रभाव को चरित्रगठन एवं परमार्थ प्रयोजन में ही नियोजित करें। प्रथा परम्पराओं वाले कलेवर को गौण समझें सभी धर्म सम्प्रदाय अपनी परम्पराओं में से उत्कृष्ट अंश अपनाकर विश्व एकता के, उत्कृष्ट मानवता और आदर्श समाज रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ें और एक ही केन्द्र पर केन्द्रित हों। धर्मों के जीवित रहने का- अपनी उपयोगिता बनाये रहने का- मात्र यही तरीका है।

धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में लगी प्रचुर पूँजी, जन शक्ति और प्रभावशीलता को भविष्य में निहित स्वार्थों के पोषण के लिये प्रयुक्त नहीं होते रहने देना चाहिए। राज तन्त्र की तुलना में ही धर्मतन्त्र है उसकी शक्ति सृजनात्मक दिशा में लगनी चाहिए भावनाशील लोग- न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति से सन्तुष्ट रहकर अपनी भौतिक एवं आत्मिक क्षमताओं का उपयोग मानव जाति के भविष्य निर्माण के लिये समर्पित करदें तो यह निस्संदेह सर्वोत्तम युग साधना होगी और सत्परिणाम प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा।

2- शिक्षा एवं साहित्य

व्यक्ति की समस्त गरिमा उसकी मनः स्थिति पर विचार प्रक्रिया पर निर्भर है इस जीवन प्राण के मर्म स्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के निर्माण में शिक्षा और साहित्य की महत्ता सर्वविदित है। युग परिवर्तन को घड़ियों में दो माध्यमों का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए।

सरकारों को अपने ढंग में काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही है उससे लाभ उठाना चाहिए किन्तु भाव परिष्कार की पूरक - धर्म शिक्षा-नैतिक शिक्षा-भावनात्मक नवनिर्माण की शिक्षा-पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं जनस्तर पर ही हल हो सकती हैं। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे यह आशा रखना व्यर्थ है। दृष्टिकोण परिष्कार आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष समाज संरचना की अगणित समस्यायें और हल विश्व परिवार के लिये बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के- जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है। इसके लिये सरकार से अनुदान नहीं माँगती तो फिर भावनात्मक नवनिर्माण की शिक्षा के लिये सरकार का मुँह तका जाय इसकी क्या आवश्यकता है।

हर जगह ऐसे सुशिक्षित भावनाशील लोग मौजूद हैं जिनके अन्दर परमार्थ के लिये आन्तरिक ज्योति चमकती रहती है। मार्ग न मिलने से वह अवरुद्ध रहती है। इन्हें इन विद्यालयों को चलाने के लिये अपना थोड़ा सा समय अवैतनिक रूप से अनुदान देने के लिये कहा जाय तो अवश्य ही अनेक जागृत आत्माएं आगे आवेंगी और लाखों शिक्षकों की आवश्यकता सहज ही पूरी हो जायगी। ढलती उम्र में लोग वानप्रस्थ परंपरा अपनाकर लोक मंगल के क्षेत्र में उतरने के लिये प्रोत्साहित किये जा सकें तो भी इस दिशा में बहुत काम हो सकता है।

लोकशिक्षण की महती आवश्यकता पूरी कर सकने वाले विद्यालय हर गाँव और हर मुहल्ले में स्थापित हो सकते हैं और सफलतापूर्वक चल सकते हैं। अब यह युग धर्म समझा जाना चाहिए और सोचने तक ही सीमित न रहकर इसकी स्थापना और संचालन के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। गुरुदेव अगले दिनों इसकी प्रचण्ड प्रेरणा सर्वत्र भरने के लिये अपने प्रखर आत्मबल का प्रयोग करने जा रहे हैं। कहना न होगा कि अगले ही दिनों इस संदर्भ में आशाजनक सफलता उत्पन्न होते हम सब अपनी इन्हीं आंखों से प्रत्यक्ष देखेंगे।

साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिये कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणत कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार, कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्रों में पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग 600 भाषाएं है। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त 24 भाषाएं हैं और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनूदित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिये पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं- प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग समन्वय से कुछ काम चलेगा। इस दिशा में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उपयुक्त व्यक्तियों को प्रेरणा दी जानी है, दी भी जा रही है। युग-निर्माण योजना ने जो शुभारम्भ मथुरा से किया है वह एक नमूना मात्र है। अभी सैकड़ों धारायें इस क्षेत्र में काम करने के लिये बाकी पड़ी हैं और उन्हें क्रियान्वित किया ही जाना चाहिए।

3. कला मञ्च से भाव स्पन्दन

कला मञ्च में चित्र, मूर्तियां, नाटक, अभिनय, संगीत आदि आते हैं। संगीत विद्यालय हर जगह खुलें। ध्वनियाँ सीमित हों, बाजे भी सीमित हों, सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम हों जो वर्षों में नहीं महीनों में सीखे जा सकें। प्रचण्ड प्रेरणा भरे गीतों का प्रचलन प्रसारण इन विद्यालयों द्वारा हो और प्रत्येक हर्षोत्सवों पर प्रेरक गायनों की ही प्रधानता रहे। अग्नि गीतों की पुस्तिकाएं सर्वत्र उपलब्ध रहें। संगीत सम्मेलन, संगीत गोष्ठियाँ, कीर्तन प्रवचन, सहगान क्रिया गान, नाटक, अभिनय, लोकनृत्य जैसे अगणित मञ्च मण्डप सर्वत्र बनें और वे लोकरञ्जन की आवश्यकता पूरी करें।

चित्र प्रकाशन अपने आपसे एक बड़ा काम है। कलेण्डर तथा दूसरे चित्र आज-कल खूब छपते बिकते हैं, उनमें प्रेरक प्रसंग को जोड़ा जा सके तो उससे जन मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए।

आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना सामने हो तो चित्रकार उस तरह की तसवीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे हैं जिनमें प्रतिभा-पूँजी सूझ-बूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही यह आवश्यकता पूरी जा सकती है।

पुस्तकालयों की-चल पुस्तकालयों की- झोला पुस्तकालयों की योजना एक छोटे रूप में अपना परिवार चला भी रहा है। इसे व्यापक और विस्तृत बनाया जाना चाहिए। स्थान स्थान पर पुस्तकालय को व्यावसायिक रूप मिल सकता है। जब शाक-भाजी तक ठेल ढकेल पर बेचने वाले हजारों व्यक्ति रोजी-रोटी कमाते हैं तो कोई कारण नहीं कि चल पुस्तकालय से भी हजारों व्यक्ति रोटी न कमाने लगें। पुस्तक विक्रय की दुकान खोलकर भी सत्साहित्य प्रसार का उद्देश्य पूरा होता है। आवश्यकता मार्गदर्शन और क्रिया संगठन की है। प्रतिभाएं यदि यह साधन जुटाने के लिए निकल पड़ें तो न जाने कितना बड़ा काम बौद्धिक क्रान्ति की दिशा में हो सकता है। इसी प्रकार कला मञ्च को भी व्यावसायिक रूप देकर आगे बढ़ाया जा सकता है।

यन्त्रीकरण के साथ कला समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेपरिकॉर्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए - प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते हैं उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग- नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।

4 - विज्ञान

विज्ञान की उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक हैं। उसने मानवी सुख सुविधाओं में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि की है। पर यह भी सही है कि उसके दुरुपयोग से होने वाली हानियाँ भी कम नहीं उठानी पड़ रही हैं। अस्त्रों के उत्पादन में - विशेषतया गैसें, किरणें एवं अणु विस्फोटजन्य अस्त्रों ने तो संसार के अस्तित्व को ही संकट में डालने की विभीषिका उत्पन्न करदी है। यदि यह शोध, आविष्कार सृजनात्मक प्रयोजनों तक ही सीमित रहे तो उसका प्रतिफल धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाये जा रहें। यदि उन्हें मानवी अभावों और शोक सन्तापों की निवृत्ति में लगा दिया जाय तो उसका प्रतिफल इस संसार को स्वर्गोपम बनाने में हो सकता है। समुद्र के खारी पानी से मीठा जल प्राप्त किया जा सकता है। जमीन के नीचे बहने वाली विशाल नदियों का जल धरती पर लाया जा सकता है और सारी दुनिया सचमुच शस्यश्यामला बन सकती है। कृषि, पशु-पालन, बागवानी, वन सम्पदा, स्वास्थ्य सम्वर्धन और मस्तिष्कीय विकास की दिशा में विज्ञान को अभी बहुत काम करना बाकी है। प्रकृति के प्रकोपों से लोहा लेने के साधन जुटाने में अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, भूकम्प, बाढ़ ,तूफान, शीत-ताप की असहनता का सामना करने योग्य शक्ति का उपार्जन हो सकता है। वाहनों को सरल एवं सस्ता बनाया जा सकता है, संचार साधनों के विस्तार की अभी बहुत गुंजाइश है।

सबसे बड़ा काम विज्ञान को यह करना है कि वह अध्यात्म के साथ अपनी संगति बिठाये और यह सिद्ध करे कि शक्ति का स्त्रोत जड़ पदार्थों की अणुसत्ता एवं ऊर्जा में नहीं वरन् चेतना के संकल्पों में, आत्मबल में सन्निहित है। विशालकाय यंत्र संस्थानों की तुलना में व्यक्ति का शरीर, मस्तिष्क और अन्तःकरण अधिक सशक्त है और उस क्षमता का सदुपयोग करके व्यक्ति को देवोपम और समाज को स्वर्गीय वातावरण से ओत प्रोत बनाया जा सकना नितान्त संभव है। इस सत्य को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना अविज्ञात को प्रत्यक्ष बनाना विज्ञान का काम है और यह उसे करना ही चाहिए, करना ही होगा। इसके लिए विज्ञान के उच्च क्षेत्र में काम करने वाले विज्ञानियों को आवश्यक प्रेरणा एवं दिशा मिलनी चाहिए। युग की यह माँग है और उसे पूरा करना ही पड़ेगा। पिछले दिनों अखण्ड ज्योति पत्रिका के माध्यम से विज्ञान और अध्यात्म का संबंध समन्वय प्रतिपादन किया भी जाता रहा है अब उसे और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष करना पड़ेगा।

5. शासन सत्ता

राज सत्ता जिनके हाथ में इन दिनों है अथवा अगले दिनों आने वाली है, उन्हें संकीर्ण राष्ट्रीयता के, अपने प्रिय क्षेत्र या वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर समस्त विश्व में समान रूप से सुख शान्ति की बात सोचनी होगी और समस्त संसार को एक परिवार बनाने की नीति अपनाकर प्रकृति प्रदत्त साधनों एवं मानवी उपार्जन को समान रूप से सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध करना होगा। युद्धों की भाषा में सोचना बन्द कर न्याय को आधार स्वीकार करना होगा। वर्ग भेद और वर्ण भेद की जड़े उखाड़नी होंगी।

अनीति, शोषण अपराध, रिश्वत, भ्रष्टाचार के वास्तविक शत्रु से जूझना सरकारों का काम है। बेकारी, बीमारी और गरीबी दूर करने की दिशा में भी वह बहुत कुछ कर सकती है। इसके लिए सत्ता संचालकों और शासकीय कर्मचारियों में बेतरह घुसी हुई स्वार्थ परता एवं अनैतिकता को जड़ मूल से उखाड़ना होगा। इसके लिए प्रजा तंत्री देशों के वोटरों को उनके कर्तव्य विशेष रूप से समझाने पड़ेंगे ताकि वे सुयोग्य प्रतिनिधि चुनने और श्रेष्ठ सरकार प्राप्त करने में सफल हो सकें।

6-सम्पदा

विभूतियों में इन दिनों सर्वोपरि मान्यता पूँजी को मिली है। धन का वर्चस्व सर्वविदित है। सम्पत्ति में स्वयं कोई दोष नहीं। उसके दुरुपयोग में है। व्यक्तिगत विलासिता में अहंता की वृद्धि में यदि उसका उपयोग होता है, संग्रह बढ़ता है एवं उसका लाभ बेटे पोतों तक ही रखने का प्रयत्न किया जाता है तो निस्संदेह ऐसा धन निन्दनीय है। अगले दिनों आर्थिक समता के आधार पर ही समाज व्यवस्था बनेगी। सामर्थ्य भर श्रम एवं आवश्यकता भर साधन प्राप्त करने के ही क्रम चलें भी, तब सम्पदा पर व्यक्ति का नहीं समाज का अधिकार होगा। न कोई गरीब दिखाई देगा, न अमीर। पर जब तक वह स्थिति नहीं बन जाती तब तक संग्रहीत पूँजी को लोक मंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता दिखाने के लिए धनपतियों को कहा जायगा। कहा ही नहीं इसके लिए उन्हें प्रभावित भी किया जायगा। उन्हें यह समझने का अवसर दिया जायगा कि समय बदल चुका है। पूँजी वाद, सामंतवाद, संग्रह वाद, अमीरी के दिन मर गए। उस सड़ी लाश से चिपके रहने में केवल घृणा एवं विपत्ति ही हाथ लगेगी।

दान न सही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि युग परिवर्तन का पथ प्रशस्त करने वाले प्रचारात्मक कार्यक्रमों में पूँजी की कमी न पड़े। भले ही अभी व्यक्तिगत लाभ की बात भी जुड़ी रहने दी जाय तो इतना तो भी होना ही चाहिए कि युग परिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने वाला विनियोग इस पूँजी का हो सके। पिछले पृष्ठों पर ऐसे कितने ही क्रियाकलापों की चर्चा की गई है, जिनमें पूँजी के रूप में भी यदि धन लग सके यदि उन क्रियाकलापों की व्यावसायिक रूप से खड़ा किया जा सके तो भी बहुत कुछ हो सकता है। 1. साहित्य प्रकाशन 2. चित्र प्रकाशन 3. अभिनय मंडलियाँ 4. ग्रामोफोन रिकार्ड 5. फिल्म निर्माण यह पाँच कार्य ऐसे हैं जिनके लिए विशालकाय अर्थशास्त्र खड़े किये जाने चाहिए और लोक मानस को परिष्कृत बनाने की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए।

धनवानों को इसके लिए कहा जायगा। साथ ही जनसाधारण के पास यदि थोड़ी सी भी बचत पूँजी हो, तो उसे इन लोकोपयोगी कार्यों में लगा देने के लिए कहा जायगा। कहना न होगा कि युग परिवर्तन का प्रवाह दैवी प्रेरणाओं के आधार पर चल रहा है। इसमें सहयोग देने वाले घाटे में नहीं नफे में ही रहेंगे। पूँजी डूबने जैसी आशंका किसी को भी नहीं करनी चाहिए। वह तो सुरक्षित ही रहने वाली है। बैंक आदि से अधिक ब्याज भी मिलने वाला है। साथ ही युग देवता की सेवा साधना का ऐसा अवसर भी मिलता है जिसके कारण असाधारण आत्म सन्तोष का वरदान भी अनन्त काल तक मिलता रहेगा। जन स्तर पर पूँजी इकट्ठी करने के लिए सरकारी समितियाँ लिमिटेड कम्पनियाँ बनाई जा सकती हैं उनमें बचत पूँजी लगाने के लिए हर भावनाशील व्यक्ति को अपनी संग्रहीत पूँजी लगाने के लिए कहा जा सकता है। अनावश्यक जमीन जायदाद जेवर जमा पूँजी बचत फण्ड आदि के रूप में कितना ही पैसा ऐसा पड़ा रहता है जिसकी साधारणतया कोई विशेष उपयोगिता नहीं होती पर यदि वह उपरोक्त आवश्यकता पूरी करने वाले अर्थ संस्थानों में लग जाये तो उससे आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत पूरी हो सकती है। पूँजी तो सुरक्षित रहती है साथ ही कुछ लाभ ब्याज भी कमाती है। इसके अतिरिक्त युग की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी करने का जो श्रेय मिलता है उसे तो हर दृष्टि से भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य ही कहा जायगा।

7-प्रतिभायें

प्रतिभा एक विशिष्ट और अतिरिक्त विभूति है। कुछ लोगों के व्यक्तित्व ऐसे साहसी, स्फूर्तिवान, सूक्ष्मदर्शी, मिलनसार, क्रियाकुशल और प्रभावशाली होते हैं कि वे जिस काम को भी हाथ में लें, उसी को अपने मनोयोग एवं व्यवहार कुशलता के आधार पर गतिशील बनाते चले जाते हैं और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। इस विशेषता को प्रतिभा कहते हैं। सूझ-बूझ आत्म विश्वास, कर्मठता जैसे अनेक सद्गुण उनमें भरे रहते हैं। आमतौर से ऐसे ही लोग महान कार्यों के संस्थापक एवं संचालक होते हैं। सफलताएं उनके पीछे छाया की तरह फिरती है क्योंकि उन्हें ज्ञान होता है कि कठिनाइयों से कैसे निपटा जाता है, उन्हें सरल कैसे बनाया जाता है।

प्रतिभाशाली व्यक्ति ही सफल संत, राजनेता, समाज सेवी, साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, व्यवस्थापक होते देखे गये हैं। प्रतिभाएँ ही डाकू, चोर, ठग जैसे दुस्साहस पूर्ण कार्य करते हैं। सेनानायकों के रूप में, लड़ाकू योद्धाओं के रूप में उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में देखा जाता है। क्रान्तिकारी भी इसी स्तर के लोग बनते हैं। युग निर्माण अभियान के हर पक्ष को प्रकाशवान बनाने के लिए ऐसे ही लोग चाहिएं। प्रतिभाशाली तत्व जहाँ कहीं भी चमक रहे हों वहाँ से उन्हें आमन्त्रित किया जा रहा है कि वे अपने ईश्वरीय अनुदान को निरर्थक विडंबनाओं में खर्च न करें वरन् उसे नव निर्माण के ऐसे महान प्रयोजन में नियोजित करदें जिसमें उनका, उनकी प्रतिभा का तथा समस्त संसार का हित साधन हो सके।

सातों विभूतियों के क्षेत्र में संसार की करोड़ों प्रतिभाएँ आती हैं। उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने का कार्य साधारण नहीं असाधारण है। पर है इतना महत्वपूर्ण कि उसे किये बिना लक्ष्य प्राप्ति के लिए और कोई मार्ग नहीं। जनसाधारण को उठाने का कार्य आरंभ से ही चल रहा है और अन्त तक चलता रहेगा। पर उतना पर्याप्त नहीं। युग परिवर्तन जैसे बड़े कार्यों का उत्तरदायित्व और भार सामर्थ्य सम्पन्न लोग ही संभाल सकते हैं। इसलिए इस महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए गुरुदेव ने अपना कार्यक्षेत्र व्यापक बनाया है। विश्व यात्रा पर भी निकले हैं। कितना बड़ा प्रयास करना होगा, इसका अनुमान लगा सकना भी सहज बुद्धि का काम नहीं। उसके विस्तार और महत्व को देखने समझने की जितनी गंभीरता पूर्वक चेष्टा की जाती है उतना ही अधिक आश्चर्यचकित, अवाक् रह जाना पड़ता है।

गुरुदेव के कार्यक्रम अगली निजी पञ्च वर्षीय योजना पाँच सूत्री है। 1. निजी विशिष्ठ साधना तपश्चर्या 2. मिशन को विश्वव्यापी बनाने के लिए विभूतियों की दिशा मोड़ना 3. प्राण प्रत्यावर्तन द्वारा एक सहस्र प्राणवान् युग निर्माता तैयार करना 4. नारी जागरण के विशेष प्रयास 5. विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का विशेष प्रयास। इन पाँचों को एक से एक बढ़कर विश्वमानव को दिया गया अनुदान माना जायगा। वर्तमान ढाई मास की विश्वयात्रा को इसी संदर्भ में उठाया गया प्रथम चरण माना जायगा। वे संत पर्व तक वापिस लौट आवेंगे और इन्हीं कार्यों में संलग्न रहेंगे।

इस संदर्भ में एक कार्य अपना भी है और वह हममें से प्रत्येक को करना ही चाहिए। उपरोक्त सात प्रतिभाओं से संपन्न प्रबुद्ध व्यक्ति अपने क्षेत्र में जितने भी हों उनका परिचय नोट कर लेना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि कम से कम अपने मिशन का परिचय तो उन्हें हो ही जाय। परिचित क्षेत्र को प्रभावित कर सकना, मोड़-मरोड़ सकना, अपरिचितों की अपेक्षा अधिक सरल होता है। अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन यदि चाहें तो उनके लिए यह कुछ भी कठिन नहीं कि अपने क्षेत्र के विभूतिवानों से संपर्क स्थापित करें और उन्हें यह बतायें कि इस युग का एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण अभियान किस प्रकार मानव जाति का भविष्य निर्माण करने के लिए सचेष्ट है और उसके साथ कदम मिलाकर चलना ही उनके लिए श्रेयस्कर है।


युग निर्माण मिशन का (Kahani)

सर्वसाधारण को युग निर्माण मिशन का संक्षिप्त किन्तु सार गर्भित परिचय कराने के लिए अभी-अभी छोटी चार पुस्तिकाएं छपी हैं। 1. युग परिवर्तन एक सुनिश्चित संभावना, 2. युग निर्माण योजना एक परिचय एक झाँकी 3. युग निर्माण योजना और गायत्री यज्ञ अभियान 4. युग पुरुष गुरुदेव, इन चारों पुस्तिकाओं का मूल्य एक रुपया और पोस्टेज पच्चीस पैसा है। एक सैट ही लेने वाले मनीआर्डर से पैसा भेजें। दस सैट एक साथ लेने वालों को पोस्टेज नहीं देना होगा। इन्हें युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि से मँगाया जा सकता है।

अखण्ड -ज्योति परिवार के प्रबुद्ध परिजन अपने क्षेत्र की सात विभूतियों से संपर्क स्थापित करने और उन्हें मिशन की गतिविधियों से परिचित करने के लिए इन चार पुस्तिकाओं को पढ़ाने का प्रयास करें। उनका यह योग दान छोटा भले ही हो पर उसी दिशा में होगा जिस पर कि इन दिनों गुरुदेव चल पड़े हैं। हममें से प्रत्येक को इस प्रकार का प्रयास एवं सहयोग करना ही चाहिए।


अखण्ड ज्योति के सदस्य स्वजनों से विशेष अनुरोध

(भगवती देवी शर्मा)

इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति के अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। नये वर्ष का चंदा यथासंभव जल्दी ही, हो सके तो दिसम्बर में ही भेजना चाहिए ताकि जनवरी का अंक उतनी ही संख्या में छपाया जाये जितने कि पत्रिका के स्थायी ग्राहक हों।

जिनका चंदा बीच के किसी महीने में समाप्त होना है, उन्हें दिसम्बर, 73 तक का हिसाब चुकता करने के लिए जितना पैसा और भेजना है उतना और भेज दें ताकि जनवरी से दिसम्बर तक का ही क्रम अन्य ग्राहकों की तरह उनका भी चल पड़े।

वी पी से अखण्ड ज्योति मँगाने में लगभग सवा रुपया अतिरिक्त डाकखर्च मंगाने वाले पर पड़ता है जो बिल्कुल निरर्थक है। चंदा जहाँ तक सम्भव हो पोस्टल आर्डर से ही भेजना चाहिए। अधिक ग्राहकों का चन्दा एक साथ भेजना हो तो बैंक ड्राफ्ट से भेजना जहाँ काफी सस्ता पड़ता है, वहाँ जल्दी पहुंचने के कारण पत्रिकाएं भी तुरन्त चालू हो जाती हैं,। मनीआर्डर तो इन दिनों काफी लेट पहुँचने लगे हैं।

जहाँ अधिक संख्या में पत्रिका जाती हैं वहाँ थोड़े अंक हों तो रजिस्ट्री से अधिक अंक हों तो रेलवे पार्सल से मंगाने चाहिए। और उनके वितरण की परस्पर व्यवस्था कर लेनी चाहिए , इससे अंकों के रास्ते में खोने का डर नहीं रहता।

हममें से हर एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि अखण्ड ज्योति गुरुदेव की वाणी है। अपनों से अपनी बात स्तम्भ के अतिरिक्त प्रायः सभी लेख उनकी लेखनी के रहते हैं। इस विचारधारा को स्वयं भावना पूर्वक हृदयंगम करना और अपने परिचय क्षेत्र में उसका प्रकाश अधिकाधिक व्यापक बनाना हममें से प्रत्येक का परम, पवित्र कर्तव्य है। पुराने ग्राहकों से चंदा वसूल करने और नये ग्राहक बनाने के अभियान पर टोली बना कर निकलने का अभियान हमें इन्हीं दिनों प्रारम्भ करना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए छपी हुई रसीद बहियाँ मँगा लेनी चाहिए। गतवर्ष की अपेक्षा इस वर्ष अपने क्षेत्र में अधिक अखण्ड ज्योति के सदस्य हों इसके लिए प्रत्येक परिजन को शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।

बसन्तपर्व गुरुदेव का युग निर्माण आन्दोलन का जन्मदिन है। उसे हम सब भाव भरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। उस अवसर पर सर्वोत्तम श्रद्धाँजली अखण्ड ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने के रूप में ही विश्वयात्रा का प्रथम चरण करके वापस लौटेंगे। इस बीच में हमें अपनी सक्रियता का एक प्रमाण इस रूप में विनिर्मित कर लेना चाहिए कि किसने उनकी वाणी अखण्ड ज्योति को अधिक व्यापक बनाने के लिए क्या प्रयत्न पुरुषार्थ किया। इस प्रयास के लिए टोली बनाकर निकलना अधिक सफल और कारगर तरीका है।

आशा है उपरोक्त अनुरोधों पर परिजन समुचित ध्यान देंगे।

-भगवती देवी


खुद को मिटाना जिन्दगी है (Kahani)

खुद को मिटाना जिन्दगी है!

दर्द का पीकर हलाहल , मुस्कराना जिन्दगी है।

बच सके कोई अगर-तो चोट खाना जिन्दगी है॥

है बड़ा उपकार- आशा के सुनहरे कण लुटाना।

औ किसी की पीर में हँसते हुए हिस्सा बँटाना ॥

जुड़ सके कोई हृदय, तो टूट जाना जिन्दगी है।

बच सके कोई अगर- तो चोट खाना जिन्दगी है॥

है बड़ा उपहार आस्था का- करुणा विक्षुब्ध मन को।

प्यार की विश्वास की है भेंट, सर्वोत्तम- स्वजन को॥

मुस्कुराये मीत- तो आँसू बहाना जिन्दगी है।

बच सके कोई अगर- तो चोट खाना जिन्दगी है॥

है सफल जीवन उसी का, जो पराये हित जिया है।

है अमर वह व्यक्ति- जिसने विश्वहित का व्रत लिया है।

बच सके नौका अगर- तो डूब जाना जिन्दगी है।

बच सके कोई अगर- तो चोट खाना जिन्दगी है॥

है ऋणी इतिहास उनका- रक्त जो निजदान करते।

बाँटते अमृत जगत को- खुद हलाहल पान करते ॥

विश्व के निर्माण में, खुद को मिटाना जिन्दगी है।

बच सके कोई अगर- तो चोट खाना जिन्दगी है॥

(माया वर्मा)

*समाप्त*