कर्म साधना की अनिवार्यता

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(रवीन्द्र नाथ टैगोर)

सामने जहाँ बस्ती दिखाई दे रही हैं, रंग-बिरंगे फूल खिल रहे हैं, सुन्दर क्यारियाँ और लता वितान झूम रहे हैं-वहाँ पहले एक बीहड़ जंगल था। यों कहिये जंगल की कुरूपता में उपवन और व्यवस्थित जीवन का सौंदर्य छिपा हुआ था उसे कर्म साधना द्वारा मुक्त कर लिया गया। समाज की उच्छृंखल और उन्मुक्त प्रवृत्तियों के बीच न्याय और नियम का स्वर्ग भी इसी प्रकार बसा हुआ है उसे मुक्त करने के लिये कल्याण-साधना आवश्यक है, अनिवार्य है।

मुक्ति हो या आनन्द, सत्य हो या सौंदर्य वह अपने आप प्रकट नहीं हो सकता। कुछ नियमों के द्वारा ही आनन्द प्रकाशित होता है। इसी प्रकार आत्मा भी कर्म द्वारा ही व्यक्त होता है। उन्मुक्त प्रकृति आत्मा का स्वरूप नहीं हो सकती, कर्म जो कि कल्याण की कामना से किया जाता है वही आत्मा का सत्य है। यदि कर्म से आनन्द की प्राप्ति न हुई होती तो आत्मा कभी भी किसी कर्म में प्रवृत्त न होती।

मुक्त आत्मायें कभी कर्म से बच निकलने का प्रयास नहीं करती वरन् कर्म बन्धनों को जान-बूझकर स्वीकार करती हैं। और इन बन्धनों के भीतर से ही उन्मुक्त आनन्द की प्राप्ति होती है। इसीलिये उपनिषद्कार ने बताया है - “ऐ मनुष्य! कर्म करते हुये सौ वर्ष तक जीने की इच्छा कर।” आत्म-ज्ञानी जीवन के कार्यों में संलग्न हुये और उनको सफल नहीं बना लिया तब तक छोड़ा नहीं। उन महान पुरुषों के जीवन-वृत्तान्त अब भी हमें उसी मार्ग का अनुसरण कर मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देते हैं।

-रवीन्द्र नाथ टैगोर

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धर्म एव सनातनो

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श्रावस्ती नरेश चन्द्र चूड़ आपका दर्शन करना चाहते हैं भगवन्! सुना है अनेक धर्म, अनेक सम्प्रदायों की परस्पर विरोधी मान्यताओं के कारण राजन अत्यधिक विभ्रमित हैं। कल्याणप्रद धर्म को जानने की जिज्ञासा ही उन्हें आपके दर्शनार्थ खींचकर लाई है आर्य! आदेश हो तो उन्हें आपके सम्मुख उपस्थित करूं?” एक भिक्षुक ने भगवान बुद्ध से निवेदन किया।

तब वे श्रावस्ती के एक सघन एकान्त में बने संघाराम में विश्राम कर रहे थे।

तथागत मुस्कराये और भिक्षुक की ओर एक खोजपूर्ण दृष्टि डालते हुए बोले-तात! चन्द्रचूड़ महान धर्मात्मा सम्राट हैं उन्हें शीघ्र ही यहाँ लेकर आओ।

भिक्षुक चला गया। थोड़ी ही देर में महाराज चन्द्रचूड़ तथागत भगवान बुद्ध के समीप आ पहुँचे। देवमूर्ति को मंगल प्रणाम निवेदन कर वे एक सामान्य अभ्यागत की भाँति एक ओर बैठ गये। जिज्ञासु की उपयुक्त श्रद्धा ही साधक के अन्तःकरण में सत्य का प्रकाश लाती है। श्रद्धा अर्थात् समर्पण-अपने मन को कोरा कागज बनाकर प्रस्तुत करना ताकि सत्य का प्रतिबिम्ब उसमें यथावत् झाँक सके। भगवान् महाराज की विनम्रता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। पर उन्हें इस बात का हार्दिक दुःख भी हुआ कि व्यक्ति की श्रद्धा का तथाकथित स्वार्थ और सम्प्रदायवादी साधु-सन्त किस तरह शोषण करते हैं। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है सन्देह नहीं किन्तु बुद्धिहीन श्रद्धा-जहर मिले दूध की तरह अभिशाप भी है जो शिष्य और मार्गदर्शक दोनों का ही अहित करती है।

बात थोड़ी टेड़ी थी। चन्द्रचूड़ का समाधान-सारी प्रजा का समाधान हो सकता था इसलिए बात इस ढंग से समझानी आवश्यक थी जिससे चन्द्रचूड़ को मतमतान्तरों का वितण्डावाद फिर विभ्रमित नहीं कर पाता और उनकी श्रद्धा का विनाश भी बच जाता। दिग्भ्रांत बुद्धि ही नास्तिकता है वे यह बात जानते थे। अतएव जिज्ञासु का समुचित समाधान आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी था।

तब तो उन्होंने महाराज के विश्राम की व्यवस्था कराई और सामान्य कुशल मंगल की चर्चा तक ही विचार-विमर्श सीमित रखा किन्तु जैसे ही प्रातःकाल हुई संघाराम ने निवास करने वाले स्नातक-अभ्यागत यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि -वहाँ प्रातःकाल से ही एक मोटा, बलवान हाथी खड़ा है और एक ओर श्रावस्ती के अनेक जात्यन्ध बैठे हुए कुछ चर्चा कर रहे हैं।

महाराज चन्द्रचूड़ को साथ लेकर तथागत वहाँ जा पहुँचे उन्होंने अन्धों से प्रश्न किया-बान्धव! आप लोगों ने हाथी देखा है क्या? “नहीं भगवन्”-सबने करबद्ध एक स्वर से निवेदन किया। ठीक है कहकर बुद्ध ने एक-एक अन्धे को हाथी दिखाया। हाथ से टटोलते हुए किसी-किसी ने हाथी की पीठ, किसी ने सूँड, किसी ने कान, दाँत तथा पाँव को देखकर ही उन्होंने उसी अंग को हाथी समझा तथा जानबूझकर बड़े प्रसन्न हुये कि आज उनकी हाथी से पहचान हो गई।

अब तथागत ने प्रश्न किया - बताइये हाथी कैसा होता है? एक ने उत्तर दिया खम्भे की तरह - उस बेचारे ने हाथी के पाँव स्पर्श किये थे - तो कान वाले ने हाथी की आकृति सूप जैसी बताई - पूँछ वाले ने उसे रज्जौयथा बताया सिर वाले ने पत्थर के समान। यह बस सुनते ही महाराज चन्द्रचूड़ हँस पड़े और बोले भगवन्! यह सब तो हाथी के किसी अंग भर की जानकारी दे रहे हैं हाथी तो इन सब जानकारियों से मिली-जुली आकृति का होता है। भगवान बुद्ध ने कहा-तात! धर्म का सनातन स्वरूप भी ऐसा ही है मत-मतान्तर एक-एक अंग की समीक्षा, प्रशंसा और प्रचार करते हैं उनसे घबड़ाने की आवश्यकता नहीं उन सबके समन्वय में ही धर्म का मर्म छिपा हुआ है, उठो अपनी विवेक बुद्धि से हर ग्रन्थ, हर पन्थ को टटोलो तो सत्य धर्म का स्वरूप अपने आप प्रकट हो जायेगा।

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प्रेम का प्रयोग केवल उच्चस्तर पर

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जिसे हम अपना समझते हैं उससे प्यार होता है। अपना आपा जिसमें न घुलाया जाय उससे प्यार हो ही नहीं सकता। दूसरे लोगों की अपेक्षा अपने भाई से प्रेम अधिक होता है क्योंकि वह अपना सहोदर है। भाई से भी अधिक प्यारा पुत्र होता है क्योंकि वह अपने ही अंश से पैदा हुआ है। पुत्र से भी अधिक स्त्री प्रिय होती है क्योंकि वह अर्धांगिनी है। अपनेपन का यह दायरा जितना सघन होता चला जायगा उसी अनुपात से यह संसार और उसके निवासी अपने लगने लगेंगे। कहना न होगा कि यह आत्मीयता ही आनन्द की निर्झरणी है। हमें निरन्तर इस आनन्द की अनुभूति करनी हो तो अपने को प्रेम योग ही आराधना में लगाना चाहिए।

प्रेम निर्मल और निर्लोभ होना चाहिए तभी उसका समुचित आनन्द मिल सकता है। लोभ की कीचड़ में सने हुए प्रेम का नाम तो मोह है। मोह में व्यक्ति पराधीन हो जाता है। यदि प्रेम पात्र ने अनुकूलता दिखाई तो सुख, यदि वह प्रतिकूल हो गया या उपेक्षा बरतने लगा तो दुःख, जिस प्रक्रिया से पराधीन होना पड़ता हो वह अध्यात्म नहीं हो सकता। प्रेम विशुद्ध अध्यात्म की उपलब्धि है, उसमें प्रेमी सर्वथा स्वाधीन रहता है। वह किसी की अपेक्षा नहीं करता। प्रिय पात्र की भी नहीं इसलिए वह शाश्वत कहा गया, लोभ युक्त मोह जहाँ होगा वहाँ साथी का दबाव अनुभव करना पड़ेगा। उसकी मर्जी पर चलना पड़ेगा यदि वह अनुचित होगी तो भी संकोचवश उसे मानने की विवशता रहेगी। किन्तु यदि वह निर्मल है, उच्च आदर्श और उद्देश्य के निमित्त किया गया है तो उसमें प्रेम को अक्षुब्ध बनाये रहने पर भी साथी की बात मानने से इनकार करने की भी गुंजाइश रहेगी। प्रेम का अर्थ अवाँछनीयता के आगे सिर झुका देना नहीं वरन् यह है कि प्रिय पात्र की अनुपयुक्त गतिविधियों को सुधारा जाय, न बन पड़े तो भी स्वयं उसमें सहमत सम्मिलित न होने की तो छूट रहनी ही चाहिए। प्रेम व्यवहार नर-नारी, बाल-वृद्ध, सबके बीच निर्बाध रूप से चलता रह सकता है पर उसमें मर्यादाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसा न हो कि घनिष्ठता की छूट में फिसलन पैदा करने वाली परिस्थितियाँ बनने लगें। यदि ऐसा हुआ तब तो प्रेम का मूल स्वरूप और प्रयोजन ही नष्ट हो जायेगा।


मनुष्य का सूत्र संचालन क्या अदृष्ट से होता है?

प्रकृति के अद्भुत रहस्यों में से कुछ को मनुष्य ने एक छोटी सीमा तक जाना है और उनको वैज्ञानिक शोधों एवं यन्त्र उपकरणों के माध्यम से उपयोग में लाकर लाभ भी उठाया है। आदिम कालीन मनुष्य का ज्ञान स्वल्प था-अन्य जीव-जन्तुओं की जानकारी कम है इसलिए उन्हें वे लाभ नहीं मिल पाये जो आज का अन्वेषक मनुष्य प्राप्त करके सुविधा साधन उपलब्ध कर रहा है।

प्रकृति का भण्डार इतना विशाल है कि उसे जितना खोजा जा सके उतना ही कम है।

भौतिक विज्ञान से बढ़कर चेतना विज्ञान है। जड़ शक्तियों की तुलना में चेतना शक्तियों की क्षमता एवं उत्कृष्टता का बाहुल्य स्वीकार करना ही पड़ेगा। इस दिशा में और भी खोज होनी चाहिए। अध्यात्म विज्ञान की शोध में ही हमारी दिलचस्पी और तत्परता और भी अधिक होनी चाहिए। प्राचीनकाल में ऋषि तपस्वियों ने बहुत कुछ खोज की थी पर वह उस समय भी परिस्थितियों के अनुकूल थी। उन शोधों के बाद अब कुछ ढूँढ़ना शेष नहीं रहा ऐसी बात नहीं है। फिर प्राचीन काल की उपलब्धियाँ भी तो लुप्त हो गईं। ऐसी दशा में उस दिशा में हमें वैज्ञानिक आत्म विज्ञान की शोधों में नये सिरे से तत्पर होना चाहिए।

मनुष्य का कर्तृत्व उसकी सफलताओं का कारण है यह तथ्य सर्वविदित है। पर यह मान्यता भी असीम है। इसके साथ एक कारण और भी जुड़ा हुआ प्रतीत होता है-निर्धारित नियति। भले ही वह अपने ही पूर्व सञ्चित कर्मों का फल ही हो या उसका संचालन किसी अदृष्ट से संबंधित हो।

संख्या के साथ व्यक्ति विशेष संबंध क्यों होता है? यह तो नहीं कहा जा सकता, पर होता अवश्य देखा गया है। घटनाओं पर आश्चर्य करना भर पर्याप्त नहीं, इसके आधार को भी जानना चाहिए। जिससे उस नियति शृंखला के अनुकूल चलकर लाभान्वित होना और प्रतिकूलता से बच निकलना सम्भव हो सके।

विश्व-विख्यात चित्रकार अल्मा-टाडमा के जीवन में “17” की संख्या का महत्व एक बड़े जादू की तरह था-यह बात वे स्वयं स्वीकार करते हुए बताया करते थे-”मैं 17 वर्ष की उम्र का था तब 17 तारीख को ही अपनी प्रिय पत्नी से मिला। मेरे पहले मकान का नम्बर 17 था और जब दुबारा मकान बनवाने की बात आई तो बहुत प्रयत्न करने पर भी वह 17 अगस्त से पहले प्रारम्भ नहीं हो सका। नवम्बर की 17 तारीख थी जब मैंने नूतन-गृह में प्रवेश किया। अपने लिये जब “सेन्ट जोन्स वुड में चित्रकारी के लिए कमरा लिया तो वह भी 17 नम्बर ही निकला।’

निःसन्देह “अक्षरों” की महत्ता बहुत अधिक है पर लगता है संसार का नियमन संख्या द्वारा हो रहा है। तभी तो कई बार ऐसे विचित्र साँख्यिकी संयोग उपस्थित हो जाते हैं कि गैलीलियो जैसे वैज्ञानिक तक को यह मानना पड़ा था कि संसार गणित की भाषा में बोल रहा है-विधाता संसार का हिसाब-किताब संख्या में रखता है। इस तथ्य की पुष्टि में सुप्रसिद्ध भविष्यवक्ता और ज्योतिषी कीरो ने आश्चर्यजनक घटनायें अपनी पुस्तक “फीरोज बुक ऑफ नम्बर्स में संकलित की हैं-प्रस्तुत घटनायें अधिकाँश उस पुस्तक का ही अंश हैं।”

ए0बी0 फ्रेंच के जीवन की घटनाओं में 7 संख्या का महत्व बताते हुए कीरो लिखते हैं कि - “उनका जन्म 7 वें महीने की 7 तारीख को हुआ था। अपनी 7 वर्ष की उम्र में वे कभी बीमार नहीं हुए। 7वीं कक्षा तक वे कभी फेल नहीं हुये। अपने विवाह के लिये उन्होंने 7वीं लड़की को चुना और यह एक विस्मय की बात थी कि उस लड़की के लिये भी फ्रेंच 7वें ही लड़के थे। उनके जीवन की अधिकाँश घटनायें 7 के ही साथ घटित हुई।

उनके एक चाचाजी थे उनकी धर्मपत्नी एक बार रेल यात्रा कर रही थी। रेलगाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जिस डिब्बे में बैठी थीं उसका नम्बर 8631 था, एक बार लाटरी खरीदी उसका नं0 8631 था। उसमें कुछ नहीं निकला, एक बार स्वयं भी एक ट्रक की चपेट में आ गये संयोग से उसका भी नम्बर 8631 ही था। उनके चार पुत्र हुये चारों मर गये। उन लड़कों की मृत्यु क्रमशः 8, 6, 3 और 1 वर्ष की आयु में हुई और इन संख्याओं को मिलाने से फिर वही 8631 संख्या बनती है जिसने दुर्भाग्य की दृष्टि से जीवन भर उनका पीछा नहीं छोड़ा।

लोगों का अनुमान है कि 13 की संख्या अशुभ होती है किन्तु कीरो की दृष्टि में यह कोई तर्क संगत बात नहीं है उन्होंने अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध किया है कि 13 की संख्या को जहाँ अशुभ माना जाता है वहाँ वह कितने ही लोगों के जीवन की सौभाग्यदायक संख्या सिद्ध हुई। उत्तरी बर्टन यार्क्स के डॉ0 रुड के जीवन में 13 की संख्या दुर्भाग्य सूचक के रूप में आई। 13 वर्ष की आयु में वे बीमार पड़े। 13 दिन तक घोर कष्ट में रहे। 13 तारीख को ही हृदय की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। गाँव के क्लब में जिसमें वे कुल 13 सप्ताह रहे, उन्हें फण्ड में उनकी मृत्यु के समय कुल 13 शिलिंग शेष थे। उनकी मृत्यु का दिन उनके सबसे छोटे बच्चे की 13 वीं वर्षगाँठ थी। उनके अन्तिम संस्कार के लिये 13 सौ मील की यात्रा करनी पड़ी। अन्तिम संस्कार के समय कुल 13 सदस्य उपस्थित हुये उनके परिवार के सदस्यों की संख्या भी 13 ही थी। उनके बड़े लड़के को नेवी में नौकरी मिली और साथ में जो नम्बर मिला वह भी 13 ही था। जिस जहाज में काम करना था उसका नम्बर भी 13 ही था। रुड का नाम फूवाह था जो कि बाइबिल के 13वें छन्द में आता है। उनकी मृत्यु के समय शोक सम्वेदना के जो तार आये उनकी संख्या भी 13 ही थी।

यह तो थी दुर्भाग्य की बात-13 जिसके साथ सौभाग्य जुड़ा हुआ है। डेनवर कोलराडो के धनाढ्य उद्योगपति शेरमैन का जन्म 13 तारीख को हुआ। सगाई 13 तारीख को हुई और विवाह भी 13 जून 1913 को हुआ उनकी पत्नी का जन्मदिन भी 13 ता0 का ही था। उनके विवाहोत्सव में भी कुछ 13 ही अतिथि थे। उन्हें जो फूल भेंट किये गये उनकी संख्या भी 13 थी। 13 की संख्या उनके जीवन में सदैव लाभदायक रही।

संख्या की विचित्रता का संसार बड़ा व्यापक है जन्म, मृत्यु और जीवन काल की घटनाओं को ध्यानपूर्वक देखें तो पता चलता है कि हर व्यक्ति के जीवन में जोड़, बाकी, गुणा, भाग काम करता है और यही तथ्य इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति जड़ नहीं है वरन् उसमें एक मस्तिष्कीय प्रक्रिया हर क्षण, हर घड़ी काम कर रही है।

इस तथ्य का प्रतिपादन संख्याओं की-गणित की यह विचित्रता प्रकट करती है। फ्रान्स के प्रथम सम्राट हेनरी 14 मई 1029 को सिंहासन पर बैठे जबकि वहाँ के आखिरी सम्राट का नाम भी हेनरी ही था 14 मई 1610 को उनकी हत्या कर दी गई थी। जिस तारीख को एक को सिंहासन मिला उसी को दूसरी 14 मई को मृत्यु का उपहार। इस बीच वहाँ के अन्य सभी राजाओं के जीवन में 14 की संख्या का सदैव महत्व बना रहा। हेनरी 14वें का पूरा नाम हेनरी डिबारबन था पूरे नाम में 14 अक्षर होते हैं। 14वीं शताब्दी में 14वीं 10 वर्षीय काल सारणी (डिकेड) में ईसा के जन्म में 14 वर्ष बाद हेनरी चतुर्थ का जन्म 14 वर्ष बाद हेनरी चतुर्थ का जन्म 14 मई को ही हुआ। सन् 1553 में जन्म हुआ यह सब अक्षर जोड़ने से भी 14 की ही संख्या आती है। 14 मई को ही हेनरी द्वितीय ने फ्राँस का राज्य विस्तार किया था। हेनरी चतुर्थ की पत्नी का जन्म भी 14 मई को हुआ। हेनरी तृतीय को 14 मई के दिन युद्ध के मोर्चे पर जाना पड़ा। हेनरी चतुर्थ ने आयवरी का युद्ध 14 मार्च 1590 को जीता। 14 मई 1590 में उनकी फौज की पेरिस के फाक्सवर्ग में हार हुई नवम्बर मास की 14 तारीख ही थी जिस दिन फ्रान्स के 16 बड़े व्यक्तियों ने हेनरी चतुर्थ की सेवा करते-करते मर जाने की ऐतिहासिक प्रतिज्ञा की थी। इसी के ठीक 2 वर्ष बाद 14 नवम्बर को फ्रान्स की पार्लियामेन्ट ने एक कानून पास कर पापलबुल को हेनरी के स्थान पर सत्ताधिकारी चुना। 14 दिसम्बर 1599 को सवाय के ड्यूक ने अपने आपको हेनरी को आत्मसमर्पण किया। 14 तारीख ही थी जिस दिन लार्ड डफिन ने लुई 13वें के रूप में बैपतिस्मा ग्रहण किया।

14 मई 1643 को हेनरी चतुर्थ के पुत्र लुई 13वें की मृत्यु हुई। लुई 14वें 1643 में सिंहासन पर बैठे इन चारों संख्याओं का योग भी 14 ही होता है। उन्होंने 77 वर्ष (7+7=14) तक का जीवन जिया और 1715 में मृत्यु हुई। यह चारों अक्षर जोड़ने पर भी 14 की ही संख्या आती है। लुई 15 वें ने कुल 14 वर्ष राज्य किया। इस प्रकार फ्रान्स के सिंहासन पर 14 का महत्व सदैव बना रहा।

जर्मनी के शासक चार्ल्स चौथे का विश्वास था कि उनके जीवन में चार की संख्या सौभाग्य सूचक है। उनने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चार को महत्व दिया। वह चार रंग की पोशाकें पहनते थे और दिन में चार बार पहनते थे। चार प्रकार का भोजन, चार मेजों पर दिन में चार बार करते थे, चार प्रकार की शराब पीते थे, उनके अंगरक्षक चार थे, बग्घी में चार पहिये, और चार ही घोड़े जुतते थे। उनके राज्य में चार गवर्नर नियुक्त थे, चार सेनापति, चार ड्यूक और कप्तान भी चार ही थे। उनके चार महल थे उनमें चार-चार ही दरवाजे थे। हर महल में चार-चार कमरे, हर कमरे में चार-चार खिड़कियाँ थी और यह एक संयोग ही था कि मृत्यु के समय चार डॉक्टर उपस्थित थे उन्होंने चार बार “गुड बाय” कहा और ठीक चार-बजकर चार मिनट पर इस संसार से विदा हो गये।


ईश्वर के दर्शन

ईश्वर के दर्शन -

‘ईश्वर की प्राप्ति कहाँ हो सकती है?’ युवक ने दीनबन्धु एण्ड्रूज से प्रश्न किया।

उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया ‘केवल स्थान बताने से ही क्या लाभ? आज शाम को मेरे साथ चलना, मैं तुम्हें साक्षात ईश्वर के दर्शन ही करा लाऊँगा। स्थान भी देख लोगे और आवश्यकतानुसार जा भी सकोगे।

वह युवक शाम की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करने लगा। शाम हुई और वह युवक दीनबन्धु के साथ भगवान के घर चल पड़ा। दीनबन्धु ने हरिजन बस्ती में एक वृद्ध हरिजन के घर ले जाकर उसे खड़ा कर दिया। टूटी-फूटी झोंपड़ी, जिसमें ऊपर की ओर मन्द-मन्द प्रकाश आ रहा था। तेल की ढिबरी के प्रकाश में उसके चेहरे की झुर्रियों को आसानी से पढ़ा जा सकता था।

टूटी खाट पर एक बोरा बिछाये दस वर्षीय मातृहीन बालक लेटा हुआ था। डाक्टरों ने उसे टी0बी0 रोग बताया था। वृद्ध उसी की सेवा में लगा रहता था। दीनबन्धु ने अपनी उंगली के इशारे से कहा ‘देख लो यही हैं भगवान।’

युवक को दीनबन्धु की बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उस रोगी बालक की शोचनीय स्थिति और वृद्ध को उसकी सेवा-सुश्रूषा में तल्लीनता देखकर उसमें उसने साक्षात ईश्वर दर्शन का अनुभव किया, उस दिन से युवक के जीवन की दिशा ही बदल गई। वह व्यापार में लगकर धनोपार्जन करने का उद्देश्य बनाये हुये था। पर अब उसने सुख और आराम की जिन्दगी बिताने का लक्ष्य छोड़कर अपना जीवन दुःखी मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। अब उसका पक्का विश्वास है कि पीड़ित मानवता की सेवा ही सच्ची ईश्वर आराधना है।


हम अपनी क्षुद्रता और मर्यादा भी समझें

यह विराट् ब्रह्माण्ड कितना विशाल है और उसकी तुलना में हमारी पृथ्वी कितनी छोटी बैठती है इसका थोड़ा सा भी अनुमान लगाने पर सिर चकराने लगता है कि किसी बड़े पहाड़ की तुलना में धूलि का कण जितना छोटा होता है उतनी ही ब्रह्माण्ड की तुलना में अपनी पृथ्वी है। उस पृथ्वी की विशालता का यदि एक मनुष्य से तुलना की जाय तो वह और भी तुच्छ रह जाता है। प्रभु की अनन्त सृष्टि में मनुष्य का कितना स्वरूप, कितना नगण्य सा स्थान है इसे यदि वह समझ सके तो जिस अहंता से वह इठलाता फिरता है उसका कोई कारण ही प्रतीत न हो।

निस्सन्देह मनुष्य महान भी है पर वह महानता भौतिक नहीं, आत्मिक है। भौतिक दृष्टि से ही वह अन्य जीव जन्तुओं और पशु-पक्षियों से भी गया बीता है। हाथी, सिंह, गोरिल्ला जैसी सामर्थ्य उसमें नहीं है। घोड़े, हिरन जैसे बड़े जानवर ही नहीं खरगोश और कुत्ते भी दौड़ में आगे हैं। रात्रि में देखने की सामर्थ्य बिल्ली जितनी भी नहीं। पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना और जलचरों की तरह पानी में रहना किस मनुष्य के लिए सम्भव है। सर्प और रीछ की तरह छः-छः महीने बिना खाये-पिये कौन निर्वाह कर सकता है?

प्रकृति प्रदत्त समर्थता को छोड़ दें तो भी शारीरिक, कायिक रोग और मानसिक उद्वेग से उसे जितना संतप्त व्यथित रहना पड़ता है उतना अन्य कोई प्राणी नहीं रहता। ऐसी दशा में उसकी भौतिक समर्थता का अहंकार सर्वथा मिथ्या ही कहा जायगा। ब्रह्माण्ड में अवस्थित असंख्य ग्रह-नक्षत्रों में अपनी पृथ्वी का स्थान राई भर है। इस पृथ्वी पर किसी मनुष्य का स्थान तो समस्त शरीर की तुलना में एक रक्त कण से भी स्वल्प बैठता है। इतनी छोटी हस्ती लेकर वह अहंता से मदोन्मत्त होकर उद्धत आचरण करने पर उतारू हो तो उसे मूर्खता के अतिरिक्त और क्या समझा जाये।

ब्रह्माण्ड और पृथ्वी की तुलना करना, अपनी चिन्तन परिधि से-कल्पना शक्ति से बाहर की चीज है। इसलिए उस कल्पना की तुक बिठाने के लिए सूर्य को एक मध्यवर्ती आधार मानकर चलो, उस तुलना के करने में थोड़ी सहायता मिलेगी, यद्यपि ब्रह्माण्ड में करोड़ों सूर्य अपने ग्रह-उपग्रह के साथ अपना-अपना सौर मण्डल बनाकर भ्रमण करते रहते हैं और किसी महा केन्द्र की परिक्रमा में संलग्न रहते हैं। तो भी अपने सौर मण्डल के केन्द्र सूर्य का ही ऊहापोह इतना विशाल हो जाता है कि उसकी कल्पना करने से ही मानवीय बुद्धि एक प्रकार से हताश होकर बैठ जाती है। फिर करोड़ों सूर्यों की सम्मिलित शक्ति एवं विशालता की कल्पना किस तरह की जाय?

अपने-ज्वलनशील गैसों के पिण्ड-सूर्य का व्यास पृथ्वी से 19 गुना बड़ा है। व्यास 865380 मील परिधि 2700000 मील और उसका क्षेत्र 3393000 अरब वर्ग मील है। यदि वह पृथ्वी से 93000000 मील की दूरी पर न होकर कुल 1000000 मील दूर होता तो हमें आकाश में एकमात्र सूर्य ही सूर्य दिखाई देता।

सूर्य की शक्ति का कोई वारापार नहीं। उसकी सतह का तापक्रम 600 डिग्री सेन्टीग्रेड है तो अन्दर का अनुमानित ताप 15000000 डिग्री सेन्टीग्रेड। 12 हजार अरब टन कोयला जलाने से जितनी गर्मी पैदा हो सकती है उतनी सूर्य एक सेकेंड में निकाल देता है। अनुमान है कि सूर्य का प्रत्येक वर्ग इंच क्षेत्र 60 अश्वों की शक्ति (हार्सपावर) के बराबर शक्ति उत्सर्जित करता है। उसके सम्पूर्ण 3393000000000000 वर्ग मील क्षेत्र में शक्ति का अनुमान करना हो तो इस गुणनखण्ड को हल करना चाहिये-3393000000000000&1760&3&12 इतने हार्स पावर की शक्ति न होती तो यह जो इतनी विशाल पृथ्वी और विराट सौर जगत आँखों के सम्मुख प्रस्तुत है वह अन्धकार के गर्त में बिना किसी अस्तित्व के डूबा पड़ा होता।

इस प्रचण्ड क्षमता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि 93000000 मील लम्बी और 880 गज मोटी बर्फ की सिल्ली के ऊपर उसको केन्द्रित (Focus) कर दिया जाये तो सारी बर्फ एक सेकिण्ड में गलकर बह निकलेगी। सूर्य के 1 वर्ग इंच में जिस ऊर्जा व प्रकाश की कल्पना की गई है वह 5 लाख मोमबत्तियों के एक साथ जलाने की शक्ति के बराबर होता है। यह सारी शक्ति एक साथ पृथ्वी पर फेंक दी जाती तो यहाँ की मिट्टी भी जलने लगती। जलने ही नहीं लगती यह भी एक प्रकार का सूर्य पिण्ड हो जाती जबकि सामान्य स्थिति में पृथ्वी को सूर्य-शक्ति का 220 करोड़वाँ हिस्सा ही मिलता है। 3 अरब आबादी मनुष्यों की 100 अरब आबादी पक्षियों की, 1000 अरब आबादी अन्य जीव जन्तुओं की और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विशाल वनस्पति जगत तथा ऋतु संचालन का सारा कार्य उस 220 करोड़वें हिस्से जितनी शक्ति से सम्पन्न हो रहा है। पूरी शक्ति जो सौर मण्डल के करोड़ों ग्रहों-उपग्रहों, क्षूद्र ग्रहों का नियमन करती है, प्रकाश और गर्मी देती है। अपने 19 करोड़ 98 लाख महाशंख भार को 200 मील प्रति सेकेंड की भयानक गति से 25 करोड़ वर्ष में पूरी होने वाली विराट आकाश की परिक्रमा भी वह अपनी इसी शक्ति से पूरी करता है। उस सम्पूर्ण शक्ति और सक्रियता को कूता जाना सम्भव नहीं है उसे भावनाओं में केवल मात्र उतारा जाना सम्भव है।

यह तो पृथ्वी से उसकी इतनी दूरी है जो जीव-जन्तुओं को हँसने फुदकने का अवसर दे रही है यदि यह दूरी घट जाये तो जीवन अग्नि रूप हो जाये अर्थात् जो चेतना अब दिखाई दे रही है वह सूर्य के गहरे कराल अग्नि ज्वाल में समा जाये। कदाचित किसी तेज से तेज रफ्तार वाली डाकगाड़ी या तूफान एक्सप्रेस से सूर्य तक जाना सम्भव हो जाय तो वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते एक मनुष्य को 85-85 वर्ष के दो जीवन धारण करने पड़ जायें। इसमें मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की निद्रा के 5 वर्ष अभी जोड़े ही नहीं गये। ध्वनि से भी तीव्र रफ्तार वाले जहाज को ही वहाँ पहुँचने तक 2 वर्ष लग सकते हैं और इस बीस वर्ष में तो सारी पृथ्वी का खाका ही बदल सकता है।

शक्ति की-विशालता की-कर्तृत्व की-वैभव की थोड़ी सी झाँकी अपने सूर्य के संबंध में ऊपर दी है। इससे भी हजारों गुने बड़े सूर्य-करोड़ों की संख्या में अपने सौर मण्डलों सहित उस ब्रह्माण्ड में घूम रहे हैं। उन सबकी गरिमा का लेखा-जोखा कैसे लिया जाय। पर देखते हैं कि वे समस्त शक्ति केन्द्र अपने-अपने कार्य में नियमितता व्यवस्था और मर्यादा लेकर चल रहे हैं। कहीं न उद्धतता है न उच्छृंखलता। निर्धारित कर्त्तव्य कर्म को अणु से लेकर महत तक सभी पालन कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड व्यवसाय एक क्षण भर में बिखर जाता। ग्रह नक्षत्र आपस में टकरा जाते या शक्ति का व्यतिक्रम करके सारी ईश्वरीय व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देते।

मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह प्रकृति की मर्यादाओं को तोड़कर अपने स्वास्थ्य को ही नष्ट कर लेगा। प्रकृति की व्यवस्था को बदल सकना और मर्यादा को बदलना उस जैसे क्षुद्र के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। नीति और सदाचार की-कर्तव्य और धर्म की मर्यादाओं का उल्लंघन करके वह अपने आतंक और अनाचार का परिचय दे सकता है पर इससे वह विश्व व्यवस्था को अपने अनुरूप बदलने में सफल नहीं हो सकता। इस उद्धत आचरण से वह अपनी मानसिक, सामाजिक और आन्तरिक समस्वरता ही नष्ट करेगा। उसे समझना चाहिए कि जो नियामक शक्ति इतने बड़े-ब्रह्माण्ड के-सूर्य को-शक्ति स्रोतों को मर्यादा में रहने वाले कर्त्तव्य पथ पर चलने के लिए विवश करती है वह इस क्षुद्र प्राणी के नगण्य से अस्तित्व को अपने ओछेपन पर इतराने ओर व्यवस्थायें बिगाड़ने की छूट देर तक कैसे दे सकती है?

अच्छा हो कि महा नियन्ता द्वारा कष्टकारक ब्रह्म दण्ड प्रयोग किये जाने से पूर्व ही हम सचेत हो जायें और अपनी मर्यादाओं में रहकर ब्रह्माण्ड की एक शिष्ट इकाई की तरह वह आचरण करें जिसे उचित एवं उपयुक्त कहा जा सके।


सौर परिवार जैसी रीति नीति, मानव परिवार भी अपनायें

समस्त ब्रह्माण्ड की कल्पना कर सकना तो कठिन है पर यदि हम अपने सौर मण्डल और उससे सम्बद्ध ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों पर दृष्टिपात करें तो न केवल विश्व की विशालता और उसके निर्माता की महानता समझने का अवसर मिले वरन् यह भी सूझ पड़े कि इस सारी क्रम-व्यवस्था का संचालन किस आधार पर हो रहा है?

समस्त ग्रह-नक्षत्र निरन्तर क्रियाशील हैं। इस गतिशीलता पर ही उनका जीवन निर्भर है। समस्त पिण्ड अपनी धुरी पर परिक्रमा करते हैं जिसके साथ वे जुड़े हुए हैं। जिससे शक्ति प्राप्त करते हैं और जिस परिवार में बँधे रहने के कारण उन्हें सुरक्षा एवं स्थिरता प्राप्त है। वे उस केन्द्र सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं।

इस प्रक्रिया पर ध्यान दिया जाय तो परम नियन्ता की उस इच्छा का आभास मिलेगा जिसका पालन करने के लिए सबको सहर्ष तत्पर रहना पड़ता है। ग्रह उपग्रह अपनी धुरी पर नियमित रूप से घूमते हैं। व्यक्तिगत जीवन की सुव्यवस्था, सतर्कता, नियमितता और क्रमबद्धता को ग्रहों के अपनी धुरी पर घूमने के सदृश्य समझना चाहिए, यदि यह गति न हो तो फिर उन्हें घोर दुर्गति में पड़ना पड़े। मनुष्य के लिए भी यही बात है यदि वह अकर्मण्य, अव्यवस्थित और अनियमित गतिविधियाँ अपनाये तो यह सृष्टा की इच्छा का उल्लंघन ही होगा और उसका दण्ड मिले बिना न रहेगा। क्षुद्र ग्रह कीटकों की एक ऐसी शृंखला भी इस ब्रह्माण्ड में मारी-मारी फिरती है जिन्होंने निर्धारित मर्यादा का उल्लंघन करने का दण्ड अपने अस्तित्व को छिन्न-भिन्न करने के रूप में भोगा है।

अपनी ही धुरी पर घूमते रहना-अपने ही गोरखधन्धे में उलझे रहना पर्याप्त नहीं। समाज रूपी केन्द्र का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। सभी ग्रह-अपने केन्द्र सूर्य की परिक्रमा में प्रमाद रहित तत्परता बरतते हैं। समाज के प्रति अपना कर्तव्य पालन करने के लिए भी मनुष्य को सजग और सक्रिय रहना चाहिए। सौर मण्डल के ग्रह सूर्य से बहुत कुछ प्राप्त करते हैं-यदि वह उपलब्धि बन्द हो जाय तो उन्हें मृत स्थिति में जाना पड़े। समाज का अनुदान बन्द हो जाय तो मनुष्य का एक दिन भी जीवित रहना कठिन है। सुख-सुविधायें व्यक्ति की एकाकी उपलब्धियाँ नहीं है। समाज के सहयोग से ही व्यक्ति का विकसित, सुखी और समृद्ध रह सकना सम्भव है। अस्तु उपलब्धियाँ प्राप्त करने के साथ-साथ उस केन्द्र के पोषण का उत्तरदायित्व भी उस पर आता है। सौर मण्डल का सहयोग न हो तो फिर सूर्य का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायगा। इसलिए नियति की व्यवस्था यही है कि ग्रह-सूर्य की परिक्रमा करके उसकी क्षमता बनाये रखे और सूर्य इन ग्रहों का अनेक अनुदान देकर पोषण करें। यह अन्योन्याश्रित प्रक्रिया ही सौर मण्डल की स्थिरता की रीढ़ है। जिसके टूटने का खतरा होने पर यह सारा सुन्दर सौर परिवार ही बिखर जायगा।

व्यक्ति और समाज के बीच ऐसी ही सुदृढ़ विधि व्यवस्था चलनी चाहिए। समाज का ढाँचा-व्यक्तियों को विकसित करने में समर्थ रहे और व्यक्ति समाज को प्रखर और सशक्त बनाने में निरन्तर योगदान करे। यही क्रम व्यवस्था मण्डल में चल रही है और यही क्रम व्यक्ति और समाज के संगठनों के ठीक तरह बरता जाना चाहिए।

हम कितने भाग्यशाली हैं कि चारों और बिखरी जीवनहीन या स्वल्प जीवन वाली-ऊबड़-खाबड़ ग्रह परिस्थितियों के बीच, अपनी इस सुन्दर पृथ्वी पर रह रहे हैं। जिसमें जीवन का अमृत ही हिलोरे नहीं ले रहा वरन् प्रकृति प्रदत्त ऐसी सुविधाओं का भी बाहुल्य है जो अन्य ग्रहों में उपलब्ध नहीं है। इसी पृथ्वी के वासी, सुख-सुविधाओं के उपभोक्ता होने के नाते हमारा और भी अधिक कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व हो जाता है कि अपने उदार एवं सहृदय निर्माता की इच्छा का पालन करते हुए व्यक्ति एवं समाज की महान मर्यादाओं को बनाये रखने में पूरा-पूरा सहयोग करें।

अब आइए अपनी धरती सूर्य तथा सौर परिवार के सदस्यों की गतिविधियों पर दृष्टिपात करें-

7900 मील व्यास वाली अपनी पृथ्वी लट्टू की तरह अपनी धुरी में अधर आकाश में लटकी तेजी से घूम रही है। 23 घण्टे 56 मिनट में वह अपनी धुरी पर एक परिक्रमा कर लेती है जिसके फलस्वरूप दिन और रात होते हैं। किन्तु हम हैं पृथ्वीवासी जो सिद्धान्ततः तो यह बात मानते हैं पर प्रायोगिक तौर पर पृथ्वी घूमते हुये देखने में आती नहीं। अतएव मानना पड़ेगा कि केवल दृष्टिगत व्यवहार ही सत्य नहीं है विवेक और विचार की कसौटी पर खरे उतरने वाले सिद्धान्तों की भी सत्यता स्वीकार करनी चाहिये।

संसार का अणु-अणु गतिमान है। गति केवल वहाँ नहीं होती जहाँ इच्छायें और अभिलाषायें जड़ और मृत हो जाती हैं फिर यदि संसार में हर वस्तु गति कर रही हो तो हमें उस अदृश्य सत्य के कारण और गन्तव्य की भी जान पहचान करनी ही होगी। पृथ्वी अपनी परिक्रमा करके ही सन्तुष्ट नहीं। वह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बँधी है और उसी के फलस्वरूप स्वयं नाचते हुये वह सूर्य की भी परिक्रमा करती है। दिन का 1/4 भाग परिक्रमा में अधिक लग जाने के कारण ही हर चौथा वर्ष लौंद वर्ष (लीप ईयर) मनाया जाता है जिसमें फरवरी 28 के बजाय 29 दिन की होती है।

यह थी अपनी पृथ्वी की बात अब और आगे चलते हैं तो सूर्य के सबसे समीप एक नवग्रह में सबसे छोटा 3000 मील वाला बुध दिखाई देता है। सूर्य से 36000000 मील दूर से सूर्य की परिक्रमा कर रहा है अपनी परिक्रमा वह 88 दिन में करता है थोड़ा सुस्त है न! अर्थात् बुध का दिन पृथ्वी के 44 दिनों के बराबर और रात भी 44 दिनों के अर्थात् 528 घण्टों के बराबर। हम एक परिस्थिति में रहने के आदी हो गये हैं इसलिये दूसरी परिस्थितियों को भी ध्यान में लायें तो इतनी लम्बी रात और इतने लम्बे दिन पर कौतूहल हुये बिना न रहे और फिर यह विचार भी उठे बिना न रहे कि क्या संसार में कोई ऐसा बिन्दु भी है जहाँ न कभी रात होती हो न कभी दिन-सम्पूर्णतः दृष्टा बिन्दु।

बुध की तरह शुक्र भी अन्तर्ग्रह है। अन्तर्ग्रह का अर्थ है जो सूर्य और पृथ्वी के मध्य स्थित है। शुक्र भी एक गतिशील पिण्ड है-रूढ़िवादी भारतीयों के समान वह अन्ध-परम्पराओं से बँधकर जीना नहीं चाहता। अपनी धुरी में 30 दिन की और अपने शक्तिदाता सूर्य की परिक्रमा वह पृथ्वी के पूरे 225 दिन में एक परिक्रमा करता है। कल्पना कीजिये वहाँ 112,1/2 दिनों की अर्थात् 3 माह 22,1/2 दिनों की रात कितनी भयंकर होती होगी भगवान ने पृथ्वी वासी के लिये कितना उपयुक्त वातावरण बनाया है प्राकृतिक सुविधायें दी हैं यह कल्पना करते ही श्रद्धा से सिर झुक जाता है बावरे तो वे लोग हैं जिनकी दृष्टि में सृष्टि की इस व्यापकता की कोई कल्पना नहीं वे अपने स्वार्थों से ही दबे मरे जा रहे हैं।

अब थोड़ा अपनी पृथ्वी से बाहर की ओर चलना चाहिये। कदाचित वहाँ में दूर तक उड़कर चलना सम्भव हो और आप सूर्य से विपरीत दिशा में उड़े तो पृथ्वी से 49000000 मील दूर एक ग्रह मिलेगा। इस ग्रह से कोई 1000 मील ऊपर ठहर जाइये तो आप देखेंगे कि वह भी घूम रहा है, अपनी धुरी पर। अपने आपकी परिक्रमा वह 24 घण्टा 37 मिनट में करता है। अर्थात् वहाँ के दिन व रातें लगभग पृथ्वी के ही समान हैं।

यह मंगल है जो सूर्य की प्रदक्षिणा 687 दिन में करता है। तो उससे आगे वाला भीमकाय ग्रह बृहस्पति जिसमें अपनी पृथ्वी की तरह की हजारों पृथ्वियाँ भरी जा सकती हैं सूर्य की परिक्रमा करने में योग 12 वर्ष का समय लेता है। इन 12 वर्षों में वहाँ का मौसम अर्थात् हरियाली रहती होगी तो पूरे 4 वर्ष तक गर्मी और 4 वर्ष तक घनघोर घटाओं की धूम। 4 वर्ष का जाड़ा सम्भव।

इतना भयानक ग्रह-पृथ्वी की इतनी परिक्रमा किन्तु स्वयं का उसका वेग कितना तीव्र होगा थोड़ा कल्पना करें कि वह कुल 9 घण्टे 5 मिनट में ही अपनी धुरी पर एक बार घूम जाता है। कुल 4 घण्टे 55 मिनट का दिन और इतने ही समय की रात। पर वह छोटी-सी रात भी कितनी विचित्र कि 12-13 चन्द्रमा एक साथ ही वहाँ उजाला फैलाते हैं।

शनि-बेचारा बुरा ग्रह माना जाता है पर सार्वभौमिक नियमों का पालन तो वह भी करता है। 10 घण्टा 14 मिनट में अपनी धुरी पर घूमने के अतिरिक्त वह 29, 1/2 वर्ष में सूर्य की भी परिक्रमा करता है। यूरेनस पृथ्वी की 84 वर्ष में तो अपनी निज की 10 घण्टा 48 मिनट में, नेपच्यून 165 वर्ष में एक बार सूर्य की प्रदक्षिणा करता है तो अपनी 15 घण्टा 48 मिनट में। प्लूटो अपनी परिक्रमा 6, 1/2 दिन में करता है तो उसकी गति कुछ ऐसी मन्द है कि अपने जीवनदाता की परिक्रमा करने में उसे पूरे 284 वर्ष लग जाते हैं।

इस महान सौर मण्डल के महान सदस्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसे क्षुद्र ग्रह भी हैं जो ओछे और छोटे होने का परिचय निरन्तर देते रहते हैं। कभी-कभी कक्ष बदलते हैं कभी गतिविधियाँ। नियम और मर्यादाओं के उल्लंघन की चेष्टा करने में इन्हें अपनी चतुरता अनुभव होती होगी पर पाया इनने क्या? अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित प्रतिक्रिया ही इन्हें भुगतनी पड़ती। उपहासास्पद बनते हैं और क्षुद्र कहलाते हैं। प्रकृति इन्हें भी रखती तो नियन्त्रण में ही है अन्यथा वे अपने को नष्ट करें और दूसरों को संकट पैदा करे। इसलिए उन्हें छूट भी एक सीमा तक ही मिलती है। इस उपलब्ध स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके ये क्षुद्र ग्रह किस तरह अपनी गरिमा खो चले। महानता से च्युत होकर क्षुद्र परिस्थितियों में रहने लगें। इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो मनुष्य महानता की गरिमा को ही स्वीकार करे और क्षुद्र ग्रहों जैसी दुर्दशा में पड़ने से बचा रह सके।

क्षुद्र ग्रहों की पहचान के लिये खगोल शास्त्रियों ने इनके नम्बर नियुक्त कर रखे हैं ये हैं भी वस्तुतः बहुत वाचाल, चंचल और शरारती। 433 नम्बर का क्षुद्र ग्रह ईरोस कई करोड़ मील पर है पर घूमते-घामते यह पृथ्वी के डेढ़ करोड़ मील पास तक चला आता है। 1566 नम्बर के इकारस-जिसने सन् 1968 में पृथ्वी में तहलका मचा दिया था-कहा जाता था कि उसके पृथ्वी से टकरा जाने की सम्भावना है-इस तरह का दुस्साहसी ग्रह है कि सूर्य और बुध के मध्य वाले अत्यन्त भीषण गर्म स्थान की भी परिक्रमा कर आता है।

हर्मेंस नामक ग्रह भी इकारस की तरह सन् 1937 में पृथ्वीवासियों को डरा गया था अब तो वह न जाने कहाँ चक्कर काट रहा होगा। वेस्टायों पृथ्वी से औसतन 22 करोड़ मील दूर का बौना ग्रह है पर वह भी शान्त नहीं-सूर्य की परिक्रमा करते हुये वह पृथ्वी के 10 करोड़ मील पास तक चला आता है। यह सूर्य भगवान् के आस-पास 3/1/2 वर्ष में चक्कर काट लेता है जबकि अपनी ही धुरी पर वह 10 घण्टे 45 मिनट में घूम लेता है। घूमने में हाइडाल्गों की अपनी शान है वह कभी-कभी 9 चन्द्रमा वाले शनि देवता से भी बिना डरे उनके आकाश तक घूम आता है। सूर्य स्वयं भी अपनी परिक्रमा कर अपने स्वत्व की रक्षा करता है साथ ही विराट परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा की अभिव्यक्ति के लिये वह अपने समस्त परिवार के साथ दण्डवती परिक्रमा के लिये निकला हुआ है। यह विराट की परिक्रमा वह 25 करोड़ वर्ष में पूरी करता है इसके लिए उसे प्रति सेकेंड दो सौ मील की गति से चलना पड़ रहा है जब कि वह अपनी धुरी का चक्कर भी 25 दिन 7 घण्टे और 48 मिनट में लगाता चल रहा है।

न केवल सूर्य वरन् विराट् ब्रह्माण्ड का हर पिण्ड गतिशील है। हमारा सूर्य जिस आकाश गंगा से जीवन ले रहा है वह और उससे दूर की आकाश गंगायें भी प्रकाश की सी भयंकर गति से कहीं जा रही हैं। समस्त सृष्टि का उद्गम किसी एक ही बिन्दु से हुआ वहीं अनन्त ब्रह्माण्ड की नाभि-होगी। विराट् चेतना भी उसी का अंश है उस सार्वभौमिक चेतना के दर्शन ही जब निर्जीव ग्रहों के लक्ष्य हैं तो मानवीय चेतना उसे जानने पहचानने की चेष्टा क्यों न करे?

आकाशस्थ ग्रह नक्षत्र मात्र हीरे, मोती जैसी शोभा सुषमा ही नहीं बखेरते वे महत्वपूर्ण शिक्षण भी देते हैं। यदि उस शिक्षण को हृदयंगम किया जा सके तो हम भी एक ज्योर्तिमय पिण्ड की तरह अपने अस्तित्व को सफल बना सकते हैं और नियन्ता की इच्छा पूरी कर सकते हैं।


सौंदर्य की पराजय

कलिंग देश का छोटा सा ग्राम पर्णियाँ-पर्णियाँ का एक अपना मूर्तिकार चुँक। उस सामान्य मूर्तिकार की अपूर्व सुन्दरी कन्या ‘देवसी’ की कीर्ति राज्य भर में इस तरह व्याप्त हो रही थी जिस तरह पूर्णिमा के चन्द्रमा का धवल प्रकाश समस्त भूमण्डल में छा जाता है।

धन मद शक्ति मद की तरह सौंदर्य का अहंकार भी मनुष्य को पागल कर देता है बेचारी छोटी सी देवसी भला उससे कैसे बच पाती? पर्णियाँ ग्राम कुशल कलाकारों की बस्ती थी भगवान ने इस ग्राम में अपनी भी कला को निखारा था। कई युवक भी सौम्य और सुन्दर थे पर देवसी के मन को एक भी युवक सन्तुष्ट न कर सका वह अपने आपको उर्वशी से बढ़कर मानती और किसी भी अर्जुन से कम के साथ विवाह करने को राजी न थी।

सौंदर्य के साथ यौवन का चढ़ाव, देवसी की कान्ति दिनोंदिन और भी द्युतिमान होती गई। नील ताल की शोभा उसके सम्मुख पानी भरती थी। कलिंग का अन्तःपुर और राजकुमारियाँ देवसी का नाम सुनते चौंकती थी-राज्य भर के श्रेष्ठि सामन्तों, सत्ताधारियों और राजकुमारों तक में देवसी को पाने की प्रतिस्पर्द्धा थी किन्तु देवसी किस-किस को दुत्कार कर भगा दे इसका कुछ ठिकाना नहीं था। अब तक सैकड़ों लोगों को उसने उँगली पर नचा कर दूर फेंक दिया था अब तो लोग उसका नाम सुनते भयभीत होते थे।

एक दिन की बात है गाँव से एक अनजान युवक निकला वह किसी कामना से नहीं निकला था सत्य की शोध उसका लक्ष्य था और गुरु की खोज में वह इधर-उधर भटक रहा था चलते-चलते शाम हो गई। थकावट से चूर युवक धनंजय ने पर्णियाँ में ही विश्राम के लिए डेरा डाल दिया। देवसी के पिता चुँक ने इस युवक को भी देवसी का हाथ माँगने वाला ही समझा सो उसने अपना परिचय देना प्रारम्भ किया। उधर उसकी रूपगर्विता कन्या युवक को जितनी बार देखती हँस देती और अपनी सहेलियों से कहती? काला-कलूटा भ्रमर सौरभवती कलिका को प्राप्त करने की इच्छा करे, है न यह हास्यास्पद बात?

वृद्ध मूर्तिकार धनंजय को अपनी एक मूर्ति के पास ले गया और उसे दिखाकर वह उसकी शोभा और मूर्तिकला की बारीकियों को समझाने लगा। धनंजय हँसे और बोले - तात! मूर्तिकारी तो बस उस कलाकार की ही निर्विकार है जिसने इस संसार को बनाया है उस जैसी विज्ञता और कलाकारिता मनुष्य में कहाँ जिसने आग, पानी, वायु, मिट्टी और आकाश को मिलाकर जीवन पैदा कर दिया।

वृद्ध कलाकार चोंका - पहला युवक था जिसके लिए कलाकार के मन में मोह जागृत हुआ था और तो सब रूप के प्यासे पुतले आते थे और देवसी की रूपाग्नि में झुलस कर चले जाते थे पर आज का अभ्यागत रूप से नहीं ज्ञान से प्रभावित होना वाला था सो कलाकार जान गया कि आज की पराजय प्रतिकूल भी हो सकती है।

कलाकार एक-एक मूर्ति, मूर्तिकला के उपकरण, राजाओं द्वारा प्राप्त अलंकार और पदवियाँ दिखाता हुआ धनंजय को घर ले गया। अपनी कन्या का परिचय कराते हुए वृद्ध ने कहा-तात! यही है वह मेरी रूपवती कन्या जिसके सौंदर्य के सम्मुख राज घराने का सौंदर्य भी प्रतिहत हो चुका है।

ओह! देवसी!! धनंजय ने उसके मुख मंडल पर दृष्टि डालते हुए कहा-मैंने सुना है कि तुमने कितने ही लोगों का मान भंग किया है देवी! किन्तु तुम नहीं जानती जिस सौंदर्य को तुम अपनी सम्पत्ति समझ रही हो वह चार दिन का ज्वर मात्र है भद्रे!

ऐसे स्थान पर रहना निरर्थक है। कहकर धनंजय ने अपनी लकुट कामर उठाई और अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा। देवसी का सौंदर्य अभिमान चूर-चूर हो गया। वह युवक को पाने के लिये तड़प उठी किन्तु जब तक वह कुछ कहे, धनंजय उसकी आँखों से ओझल हो चुका था।


प्रार्थना का मतलब चाहे जो माँगना नहीं है।

इंजील में एक जगह कहा गया है कि - “जो तुम माँगते हो सो पाते नहीं-क्योंकि तुम गलत माँगते हो।” सचमुच माँगना भी एक कला है और उसमें भी समझदारी की आवश्यकता है। अन्यथा बिना विचारे किये गये अन्य कामों की तरह हमारी प्रार्थना याचना भी निष्फल चली जायगी। यदि माँगना ही हो तो पहले यह देख लेना चाहिए कि किससे क्या माँगना चाहिए और किस शर्त पर माँगना चाहिए। डाकखाने में जाकर आप जलेबी माँगे तो उपहास के अलावा क्या हाथ लगेगा। दर्जी की दुकान पर किताबें माँगी जायें तो निराश ही होना पड़ेगा। भिक्षुओं को भी याचना के साथ कारण बताना पड़ता है। शारीरिक असमर्थता या किसी आकस्मिक विपत्ति की चर्चा न की जाय और कोई तन्दुरुस्त व्यक्ति ऐसे ही भिक्षा माँगने लगे तो उसे कोई बिरला ही कुछ देगा।

ईश्वर दयालु और दाता तो है, पर देते समय वह भी विवेक से काम लेता है और पात्रता परखते हुए ही देने वाली मुट्ठी खोलता है। जहाँ तक सहज अनुदान का प्रश्न है वहाँ उसने सबको बहुमूल्य शरीर एक से एक उपयोगी अंग बुद्धि, सुन्दर दुनिया तथा सुविधाजनक परिस्थितियाँ प्रदान की हैं। एकाकी तो हम एक मक्खी भी नहीं बना सकते और उसकी प्रदत्त सामग्री न हो तो अन्न का एक दाना भी उगा सकना सम्भव नहीं। आदमी के पुरुषार्थ और बुद्धि का बहुत मूल्य है पर वह तभी कुछ कर सकने और पा सकने में सफल हो सकती है। जब आवश्यक साधन और सुविधायें उपलब्ध हों। कहना न होगा कि वस्तुएँ तथा सुविधाएँ इस संसार में भगवान ने ही उपलब्ध की हैं। मनुष्य तो उनमें थोड़ा हेर-फेर कर लेता या उपयोग उपभोग में अपनी चतुरता का ताल-मेल बिठा लेता है। उसके पुरुषार्थ और बुद्धि वैभव का दायरा इतना ही सीमित है। मूल उत्पादन और अनुदान तो सर्वत्र परमात्मा का ही बिखरा पड़ा है।

यह समस्त उपलब्धियाँ भगवान ने आरम्भ से ही मनुष्य को दे दी हैं और उसे इस लायक बना दिया है कि दैनिक जीवन की अपनी आवश्यकताओं को अपने कौशल से स्वयं पूरा कर लिया करे। इसके अतिरिक्त परिस्थितियों को अनुकूल बनाने, परस्पर सद्भाव, सहयोग बनाये रहने तथा प्रगति के लिए साधन जुटाने के लिए इतना बुद्धि कौशल दिया है कि आये दिन सामने आती रहने वाली उलझनों को सुलझाया जा सके। धैर्य, साहस, पुरुषार्थ, पराक्रम, विवेक, स्नेह आदि विशेषताओं से सम्पन्न ऐसा मन बनाया है जो प्रतिकूलता में अनुकूलता उत्पन्न कर सके और अपनी हँसी-खुशी को हर स्थिति में अक्षुण्य रख सके। हर दिशा में प्रगति की इतनी सम्भावनायें प्रस्तुत करके रखी गई है कि यदि बुद्धिमानी से काम लिया जाय तो अभाव और असुविधा सहने का कोई अवसर ही न आये, आ भी जाय तो इतना मनोबल दिया गया है जिससे विपत्तियों के सहने तथा उन्हें बदलने की चेष्टा करते हुए जीवन क्रम की सरसता को अक्षुण्य बनाये रहा जा सकें।

यह सब ईश्वर प्रदत्त अनुदान इतने बड़े हैं और इतनी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं कि उसे महान दयालु और महान दानी कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जीवनयापन की आवश्यक सुविधा, साधन देकर भगवान ने सब प्राणियों को भेजा है। फिर मनुष्य को तो वाणी, समझ तथा कुशलता का अनुदान अतिरिक्त रूप से भी दिया है जिसके आधार पर अन्य जीवों की तुलना में असंख्य गुना सुविधा सम्पन्न जीवन जी सकता है। इतने पर भी यदि कोई दुःखी या अभावग्रस्त रहता है, शोक-सन्ताप सहता है तो यही कहा जायगा कि उसने उपलब्ध साधनों तथा परिस्थितियों का ठीक से उपयोग करना एवं लाभ उठाना नहीं सीखा। इस नासमझी का दण्ड यदि उसे मिलता और अपने को विपन्न स्थिति में पड़ा पाता है तो उसमें दोष उसी का है। इसके लिए किसी अन्य को यहाँ तक कि भगवान को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। थाली सामने परसी रखी हो पर यदि कोई उसे ठुकरा दे और खाना ही न चाहे तो उस आमन्त्रित कठिनाई से कोई क्योंकर किसी को बचा सकता है?

नब्बे प्रतिशत कठिनाइयाँ ऐसी हैं जो न भाग्य से उत्पन्न हुई हैं और न किसी दूसरे ने पैदा की हैं वरन् उनका कारण मात्र नासमझी या कर्तृत्व की दोषपूर्ण पद्धति है। इन्हें सुधार लिया जाय तो मनुष्य हँसी-खुशी का-शान्त और सन्तुष्ट जीवन जी सकता है। मनुष्य की वास्तविक आवश्यकतायें बहुत स्वल्प हैं। उसका आहार अन्य पशुओं से कम है। भोजन, वस्त्र, मकान आदि के साधन जुटा लेना इस महँगाई के जमाने में भी बहुत कठिन नहीं है। शिष्टता, सादगी, व्यवस्था और सज्जनता से रहना आता हो तो मिल-जुलकर शान्ति और स्नेहपूर्वक रहने का वातावरण बना रह सकता है। आहार-विहार का संयम हो तो रोगी बनने की भी नौबत न आवे। परिस्थितियों के अनुरूप चिन्तन को ढालने, मोड़ने का मानसिक लोच बना रहे तो आवेश, उद्वेग और शोक-सन्ताप भी सहन न करने पड़े। संग्रह और स्वामित्व का अहंकार अमीरी और आतंक की अभिलाषा न हो तो न असंतोष की आग में जलना पड़े और न पाप, अपराध करने की आवश्यकता पड़े। वासनाओं और तृष्णाओं को काबू में रखा जा सके तो इस सुन्दर से भगवान के संसार-उद्यान में हँसते खेलते दिन बिताये जा सकते हैं। मनुष्य का जीवन अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविधा सम्पन्न है उसे पाकर आदमी को भलमनसाहत आती हो तो सन्तोष और शान्ति के साथ स्वयं जी सकता है और दूसरों को जीवित रहने दे सकता है।

पर हम देखते हैं कि मनुष्य को जितनी सुविधायें मिली हैं उतना ही ज्यादा वह दुःखी तथा उलझा हुआ है। इसका कारण वस्तुओं की कमी नहीं, वरन् उनके सदुपयोग की क्षमता का अभाव है। इसका कारण परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं वरन् उनके अनुकूल ढलने या उन्हें अपने अनुकूल ढालने वाले कलात्मक दृष्टिकोण की कमी है। यदि इन अपनी त्रुटियों को दूर कर लिया जाय तो न अभाव ग्रस्तता अनुभव होगी और न उसकी पूर्ति के लिए किसी से प्रार्थना करनी पड़ेगी। न अपने ऊपर संकट की घटायें घिरी दीखेंगी और न किसी का सहारा तकना पड़ेगा।

भगवान से माँगने योग्य वस्तुयें श्रद्धा, हिम्मत, श्रमनिष्ठा, सच्चरित्रता, करुणा, ममता, पवित्रता और विवेकशीलता जैसी वे सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियां हैं जो विपन्नता को सम्पन्नता में बदल देती हैं और अभाव रहते हुए जिनके कारण विपुल सम्पन्नता का सुख अनुभव होता रहता है। प्रगति और सफलता का सारा आधार सद्गुणों पर अवलम्बित है। उनके बिना अकस्मात किसी प्रकार कोई लाभ मिल भी जाय तो उसे सँभालना और स्थिर रखना असम्भव होगा। सदुपयोग केवल उस वस्तु का किया जा सकता है जो उचित मूल्य देकर उपार्जित की गई है। अनायास बिना परिश्रम के मिली हुई सम्पत्ति का अपव्यय ही होता है और उससे अनेक व्यसन और उद्वेग पैदा होते हैं जिनके कारण वह उपलब्धि सुखदायक न होकर अनेक विपत्तियाँ और विकृतियाँ उत्पन्न करने का कारण बन जाती है।

भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे सद्गुणों का उपहार देते हैं क्योंकि वे अपने आप में इतने महान है कि यदि साधन सम्पन्नता न भी हो तो भी केवल उन सद्गुणों की सम्पदा के आधार पर मनुष्य सुखी, समुन्नत और सम्मानित जीवन जी सकता है। यही दिव्य सम्पदायें भगवान से माँगनी चाहिये। यही है वे विभूतियाँ हैं जिन्हें वे अपने भक्तों को दिया करते हैं।


Quotation

वर्षा का परिणाम शरीर पर और उसके द्वारा मन पर होता है; प्रार्थना का परिणाम हृदय के द्वारा आत्मा पर होता है। -विनोबा

भौतिक सुख, सम्पदाओं का जितना अपना हक था उतना जन्मते ही मिल चुका अब अपने पुरुषार्थ और प्रयत्न की बात रह जाती है जितनी योग्यता संग्रह करेंगे, जितनी कुशलता का परिचय देंगे और जितना मनोयोग पूर्वक श्रम करने की आदत डालेंगे उतने ही सुख-साधन मिलते जायेंगे। इसमें परमात्मा से माँगने की क्या बात है। जो हम अपने पुरुषार्थ से प्राप्त कर सकते हैं उसके लिए हाथ पसारने की क्या जरूरत? शरीर रोगी है तो आहार-विहार का संयम, आरोग्य के नियम पालन में कड़ाई और उपयुक्त चिकित्सा परिचर्या की व्यवस्था करनी चाहिए। पैसों की तंगी पड़ती है तो उपार्जन के लिए अधिक पुरुषार्थ, योग्यता की अभिवृद्धि तथा खर्च में कमी करने वाली सादगी अपनानी चाहिए और उस संकट को पार करना चाहिए। यदि आरोग्य, धन जैसी वस्तुओं को माँगे, परीक्षा में उत्तीर्ण होने की अथवा मुकदमा जीतने की योजना करें, और माँगने मात्र से भगवान उन कामनाओं को पूरी कर दें तो फिर योग्यता एवं पात्रता बढ़ाने की क्या आवश्यकता रह जायगी। फिर वे घाटे में रहेंगे जो पराक्रम करने में जुटे हुए हैं। जब सरलतापूर्वक प्रार्थना मात्र से अभीष्ट सफलतायें मिल सकती हैं और मनोकामनायें पूर्ण हो सकती हैं तो फिर कर्मफल का सिद्धान्त ही गलत हो जायगा और लोग कर्मनिष्ठ बनने की अपेक्षा प्रार्थना परायण बनना पसंद करेंगे। क्योंकि सरलता उसी में है। इसी प्रवृत्ति ने अपने देश में भिक्षुओं की संख्या 56 लाख बढ़ा ही है। यह परावलम्बन देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दुर्बल कर रहा है। प्रार्थना के साथ भौतिक सुख-सुविधाओं की याचना जोड़ देने से अध्यात्म तत्व की महत्ता गिर गई। उस क्षेत्र में अब आत्म-बल सम्पन्न महामानव नहीं दिखते वरन् दीनता भरी गिड़गिड़ाने की वाणियाँ मात्र सुनाई पड़ती है।

क्या माँगने मात्र से अभीष्ट प्रयोजन पूरे हो सकते हैं? क्या सुख-सुविधाओं का उपहार याचना मात्र से मिल सकता है? उत्तर नहीं में ही मिलेगा। इंजील ने ठीक ही कहा है-’जो तुम माँगते हो सो पाते नहीं-क्योंकि गलत माँगते हो।’ गलत जगह पर गलत चीज माँगने से उसका मिलना कैसे सम्भव हो सकता है। भौतिक सफलतायें हमें अपनी भुजाओं और कलाइयों से माँगनी चाहिए। अपनी अकल को तेज करना चाहिए और सूझबूझ से काम लेना चाहिए। अवरोध उत्पन्न करने वाली त्रुटियों को सुधारना चाहिए। सफलता का द्वारा खुल जायगा। नास्तिक लोग जो कभी पूजा, प्रार्थना नहीं करते, भौतिक उन्नति के पर्याप्त साधन जुटा लेते हैं इसके विपरित जो पूजा प्रार्थना में ही लगे रहते हैं, वे अभाव, दारिद्रय की, निराशा और असफलता की परिस्थितियों से घिरे रहते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि जो चीज जहाँ से माँगी जानी चाहिए थी वहाँ नहीं माँगी गई। पराक्रम से जो माँगा जाना चाहिए था वह भगवान से माँगा गया। जो भगवान से माँगा जा सकता था उसकी आवश्यकता ही अनुभव नहीं हुई। इस भ्रमग्रस्त दशा में मनोरथ पूरे हों भी कैसे?

भगवान स्वयं अपनी विधि-व्यवस्था में बँधे हुए हैं। उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने आप के साथ तक कोई रिआयत नहीं की, अपने सगे सम्बन्धियों तक को छूट नहीं दी। कर्म-फल की व्यवस्था को ही सर्वत्र प्रधान रखा। ऐसा न होता तो कोई पुरुषार्थ करने के लिए तैयार ही क्यों होता और कुकर्मों से बचने के लिए किसी को आवश्यकता ही क्या पड़ती। प्रार्थना मात्र से सारी सुविधायें मिल जाती तो फिर कठोर, कर्मठता के लिए कटिबद्ध होने की इच्छा ही क्यों होगी।

दशरथ जी ने श्रवण कुमार को क्यों मारा - मृतक के पिता ने शाप दिया कि मेरे पुत्र को मारने वाले को इसी प्रकार पुत्र के शोक में बिलख कर मरना पड़ेगा। दशरथ जी की मृत्यु उसी प्रकार हुई। भगवान राम अपने पिताजी को कर्मफल भोगने की अनिवार्यता से छुटकारा न दिला सके। त्रेता में रामचन्द्र जी ने छिपकर बालि का बाण मारा - द्वापर में बालि ने बहेलिया बनकर भगवान कृष्ण के पैर में तीर मारा। मृत्यु के समय कृष्ण जी ने कर्मफल की अनिवार्यता का इस घटना को प्रमाण बताया। अर्जुन पुत्र - अभिमन्यु श्री कृष्ण की बहिन का पुत्र था, मृत्यु का विधान और प्रारब्ध को टाल सकने की अपनी असमर्थता को ही भगवान व्यक्त करते रहे। उन्होंने ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ की उक्ति को विश्व के व्यवस्था, संचालन का प्रधान तथ्य माना है। सो उसे प्रार्थना के बदले रिआयत के रूप में भी टाला जा सकना सम्भव नहीं है। भगवान की भक्ति और प्रार्थना का स्वरूप व्यावहारिक जीवन में कर्मनिष्ठा के रूप में होना चाहिए। उन सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने के रूप में होना चाहिए जो परिस्थितियों को बदलने या उनका धैर्य और साहस के साथ सामना करने की क्षमता प्रदान करती है। वह विवेक प्रार्थना का उपहार ही कहा जायगा जो हर परिस्थिति में हँसते-मुस्कराते हुए हलका-फुलका जीवन जी सकने की क्षमता प्रदान करता है।

कुछ तो कामनायें ही ऐसी होती हैं जिनकी कोई उपयोगिता नहीं, फिर भी उन्हें अकारण चाहते हैं। जैसे संतान का न होना आज की परिस्थिति में भारत जैसे गरीब देश में एक सौभाग्य ही है; पर कितने ही बुद्धिहीन लोग इस सौभाग्य को दुर्भाग्य मानते हैं और दुःखी रहते हैं तथा उस दुर्भाग्य की याचना के लिए प्रार्थना करते हैं। ऐसे लोग न प्रार्थना का स्वरूप समझते है और न उपयोग। जो भी जी में आया सो मुफ्त की लूट मानकर माँगने के लिए हाथ पसारने लगे। ऐसे लोगों की कामनायें यदि भगवान यों ही स्तुति, प्रार्थना से प्रभावित होकर पूरी करने लगें तो फिर इस संसार में कर्म, पुरुषार्थ-पात्रता और विवेकशीलता की कुछ आवश्यकता ही न रह जायगी फिर यहाँ “अन्धेर नगरी बेबूझ राजा” की उक्ति ही सर्वत्र चरितार्थ होती दिखाई देगी। वस्तुतः ऐसा होता नहीं, न हो ही सकता है। उपलब्धियों के लिए पात्रता आवश्यक है। पात्रता की अभिवृद्धि के लिए आत्मबल प्राप्त करना ही प्रार्थना का प्रयोजन है। ऐसी सार्थक प्रार्थना ही सफल होती है और उन्हें ही सफल होना भी चाहिए।


वास्तविक धर्मात्मा

जरूरी नहीं जो लोग धर्म की लम्बी चौड़ी बातें करते हैं, वे वास्तव में धर्मात्मा ही हों।

यह भी जरूरी नहीं कि जो धर्म चर्चा में शामिल नहीं होते या पूजा पाठ नहीं करते है वे अधार्मिक ही ठहराये जायें।

धर्म की जानकारी उपयोगी हो सकती है पर उसका वास्तविक लाभ तभी है-जब उसे आचरण में उतारने की प्रेरणा मिले।

धर्म की जानकारी और धार्मिक कर्मकाण्डों में प्रवृत्ति क्या वस्तुतः मनुष्य को धर्मात्मा बनाती है? इस सम्बन्ध में अमेरिका की “इन्स्टीट्यूट फॉर सोशल एण्ड रिलीजस रिसर्च” संस्था ने विस्तृत शोध कार्य किया। यह शोध व्यापक क्षेत्र में की गई। पाँच वर्ष लगे और एक लाख डालर खर्च आया। इस शोध का विषय था - “करेक्टर एजुकेशन इनक्वारी”।

शोध के निष्कर्षों का उल्लेख ‘स्टडीज इन डिसीट’ नाम से प्रकाशित किया गया है। उसमें प्रतिपादन यह है धर्म चर्चा की बहुत जानकारी होने पर भी आवश्यक नहीं कि उसके आधार पर लोग उसे आचरण में लाने की भी आवश्यकता समझते हों। कितने ही भ्रष्ट, अनाचारी और अपराधी ऐसे पाये गये, जिनकी धर्म चर्चा और धर्म क्रिया में बहुत रुचि थी पर उन्होंने उतने को ही धर्माचरण माना और उसे पर्याप्त समझा, धर्म के आवश्यक अंगों को भी कभी उन्होंने जीवन में ढालने का प्रयत्न नहीं किया, वरन् वे अधर्माचरण में ही जीवन भर निरत रहे “जबकि दूसरे लोग सदाचारी जीवन को एक आवश्यक तथ्य मानते -समझते रहे और बिना धर्म कथा सुने ही, श्रेष्ठ आचरण का आदर्श प्रस्तुत किया।

शोध का बल इस बात पर है कि धर्म को आचरण में उतारने की प्रेरणा से भरा हुआ धर्म कलेवर ही व्यक्ति और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसके बिना तो वह आडम्बर मात्र ही बनकर रह जायगा।


ब्रह्माण्ड में कान लगाइये मनोवाँछित खबरें पाइये

उस समय की बात है जब सिकन्दर पंजाब की सीमा पर आ पहुँचा था एक दिन, रात को उसने अपने पहरेदारों को बुलाया और पूछा - यह गाने की आवाज कहाँ से आ रही है? पहरेदारों ने बहुत ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की पर उन्हें तो झींगुर की भी आवाज सुनाई न दी। भौचक्के पहरेदार एक दूसरे का मुँह देखने लगे, बोले-महाराज! हमें तो कहीं से भी गाने की आवाज सुनाई नहीं दे रही।

दूसरे दिन सिकन्दर को फिर वही ध्वनि सुनाई दी, उसने अपने सेनापति को बुलाकर कहा-देखो जी! किसी के गाने की आवाज से मेरी नींद टूट जाती है। पता तो लगाना यह रात को कौन गाता है। सेनापति ने भी बहुतेरा ध्यान से सुनने का प्रयत्न किया किन्तु उसे भी कहीं से कोई आवाज सुनाई नहीं दी। मन में तो आया कि कह दें आपको भ्रम हो रहा है पर सिकन्दर का भय क्या कम था, धीरे से बोला - महाराज! बहुत प्रयत्न करने पर भी कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा, लेकिन अभी सैनिकों को आपकी बताई दिशा में भेजता हूँ अभी पता लगाकर लाते हैं कौन गा रहा है।

चुस्त घुड़सवार दौड़ाये गये। जिस दिशा से सिकन्दर ने आवाज का आना बताया था-घुड़सवार सैनिक उधर ही बढ़ते गये बहुत पास जाने पर उन्हें एक ग्रामीण के गाने का स्वर सुनाई पड़ा पता चला कि वह स्थान सिकन्दर के राज प्रासाद से 10 मील दूर है। इतनी दूर की आवाज सिकन्दर ने कैसे सुन ली सैनिक-सेनापति सभी इस बात के लिये स्तब्ध थे। ग्रामीण एक निर्जन स्थान की झोंपड़ी से गाता था और आवाज इतना लम्बा मार्ग तय करके सिकन्दर तक पहुँच जाती थी। प्रश्न है कि सिकन्दर इतनी दूर की आवाज कैसे सुन लेता था दूसरे लोग क्यों नहीं सुन पाते थे? सेनापति ने स्वीकार किया कि सचमुच ही अपनी ज्ञानेन्द्रियों को सन्तुष्ट करना केवल वही सत्य है नहीं कहा जा सकता है अतीन्द्रिय सत्य भी संसार में है उन्हें पहचाने बिना मनुष्य जीवन की कोई उपयोगिता नहीं।

दूर की आवाज सुनना विज्ञान के वर्तमान युग में कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है ‘रेडियो डिटेक्शन एण्ड रेन्जिग‘ अर्थात् ‘राडार’ नाम जिन लोगों ने सुना है वे यह भी जानते होंगे कि यह एक ऐसा यंत्र है जो सैंकड़ों मील दूर से आ रही आवाज, आवाज ही नहीं वस्तु की तस्वीर का भी पता दे देता है। हवाई जहाज उड़ते हैं तब उनके आवश्यक निर्देश, संवाद और मौसम आदि की जानकारियाँ ‘राडार’ द्वारा ही भेजी जाती हैं और उनके संदेश राडार द्वारा ही प्राप्त होते हैं। बादल छाये हैं, कोहरा घना हो रहा है, हवाई पट्टी में धुआँ छाया है राडार की आँख उसे भी बेध कर देख सकती है और जहाज को रास्ता बताकर उसे कुशलतापूर्वक हवाई अड्डे पर उतारा जा सकता है। छोटे राडार 150 मील तक की आवाज सुन सकते हैं। जापान ने 500 मील तक की आवाज सुन सकने वाले राडार बनाये हैं। अमेरिका के पास तो ऐसे भी राडार है जो ‘ह्यूस्टन’ के चन्द्र वैज्ञानिकों को चन्द्रमा में उतरे हुए यात्रियों तक से बातचीत करा देते हैं। राडार यंत्र की इस क्षमता पर और उसकी खोज व निर्माण करने वाले वैज्ञानिकों के बुद्धि कौशल पर जितना ही आश्चर्य किया जाय कम है।

किसी विज्ञान जानने वाले विद्यार्थी से यह बात कही जाये तो वह हँस कर कहेगा भाई साहब इसमें आश्चर्य की क्या बात-साधारण सा रेडियो-तरंगों का सिद्धान्त है। जब ध्वनि लहरियाँ किसी माध्यम से टकराती हैं तो वे फिर वापस लौट आती हैं उस स्थान वस्तु आदि का पता दे देती हैं। हवाई जहाज की ध्वनि को रेडियो तरंगों द्वारा पकड़ कर यह पता लगा लिया जाता है कि वे किस दिशा में कितनी दूरी पर हैं। यह कार्य प्रकाश की गति अर्थात् 186000 मील प्रति सैकिण्ड की गति से होता है। रेडियो तरंगों की भी यही गति होती है तात्पर्य यह है कि यदि उपयुक्त संवेदनशीलता वाला राडार जैसा कोई यन्त्र हो तो बड़ी से भी बड़ी दूरी की आवाज को सेकेंडों में सुना जा सकता है। देखा जा सकता है। प्रकाश से भी तीव्रगामी तत्वों की खोज ने तो अब इस सम्भावना को और भी बढ़ा दिया है और अब सारे ब्रह्माण्ड को भी कान लगा कर सुने जाने की बात को भी कोई बड़ा आश्चर्य नहीं माना जाता।

मुश्किल इतनी ही है कि कोई भी यंत्र इतने संवेदनशील नहीं बन पाते कि दशों दिशाओं से आने वाली करोड़ों आवाजों में से किसी भी पतली से पतली आवाज को जान सकें और भयंकर से भी भयंकर निनाद में भी टूटने-फूटने के भय से बची रहें। राडार इतना उपयोगी है पर इतना भारी भरकम कि उसे एक स्थान पर स्थापित करने में वर्षों लग जाते हैं। सैकड़ों फुट ऊँचे एण्टीना, ट्रान्समीटर, रिसीवर, बहुत अधिक कम्पन वाली (सुपर फ्रीक्वेन्सी) रेडियो ऊर्जा, इंडिकेटर, आस्मीलेटर, माडुलेटर, सिंकोनाइजर आदि अनेकों यंत्र प्रणालियाँ मिलकर एक राडार काम करने योग्य हो पाता है। उस पर भी अनेक कर्मचारी काम करते हैं, लाखों रुपयों का खर्च आता है, तब कहीं वह काम करने योग्य हो पाता है। कहीं बिजली का बहुत तेज धमाका हो जाये तो यह ‘राडार’ बेकार भी हो जाते हैं और जहाज यदि ऐसे हों जो अपनी ध्वनि को बाहर फैलने ही न दें तो ‘राडार’ उनको पहचान भी नहीं सके। यह सब देखकर इतने भारी मानवीय प्रयत्न और मानवीय बुद्धि कौशल तुच्छ और नगण्य ही दिखाई देते हैं।

दूसरी तरफ एक दूसरा राडार-मनुष्य का छोटा सा कान एक सर्वशक्तिमान कलाकार-विधाता की याद दिलाता है जिसकी बराबरी का राडार संभवतः मनुष्य कभी भी बना न पाये। कान हलकी से हलकी आवाज को भी सुन और भयंकर घोष को भी बर्दास्त कर सकते हैं। प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि कानों की मदद से मनुष्य लगभग 5 लाख आवाजें सुनकर पहचान सकता है जबकि राडार का उपयोग अभी तक सीमित ही है।

कान के भीतरी भाग में, जो संदेशों को मस्तिष्क में पहुँचाने का काम करता है 30500 रोयें पाये जाते हैं। यह रोयें जिस श्रवण झिल्ली से जुड़े होते हैं वह तो 1/25000000000000000 इंच से भी छोटा अर्थात् इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप से भी मुश्किल से दिखाई दे सकने वाला होता है। वैज्ञानिकों का भी अनुमान है कि इतने सूक्ष्म व संवेदनशील यंत्र को बनाने में मनुष्य जाति एक बार पूरी तरह सभ्य होकर नष्ट हो जाने के बाद फिर नये सिरे से जन्म लेकर विज्ञान की दिशा में प्रगति करे तो ही हो सकती है (अर्थात् मानवीय क्षमता से परे की बात है) इस झिल्ली का यदि पूर्ण उपयोग संभव हो सके तो संसार की सूक्ष्म से सूक्ष्म हलचलों को, लाखों मील दूर की आवाज को भी ऐसे सुना जा सकता है मानों वह यहीं कहीं अपने पास ही हों या पास बैठे मित्र से ही बातचीत हो रही हो महर्षि पातञ्जलि ने लिखा है-

श्रोभाकाशयोः संबंध संयाद्दिव्यं श्रोत्रम्

(पयो सूत्र 40)

अर्थात् - श्रवणेन्द्रिय (कानों) तथा आकाश के संबंध पर संयम करने से दिव्य ध्वनियों को सुनने की शक्ति प्राप्त होती है।

यह बात अब विभिन्न प्रयोगों से भी सिद्ध हो गई है। सामान्यतः हम 6 फुट की दूरी की आवाज का भी अधिकतम 1/3000000वाँ हिस्सा ही सुन पाते हैं शेष कितनी ही मंद ध्वनि क्यों न हो वायुभूत हो जाती है संसार के प्रत्येक पदार्थ से ऊर्जा विद्यमान है और चूँकि कोई भी स्थान ऊर्जा से रिक्त नहीं अतएव प्रत्येक ध्वनि कुछ ही समय में सारे ब्रह्माण्ड में उसी प्रकार फैल जाती है जिस प्रकार जल में फेंके गये कंकड़ से उत्पन्न लहरें जहाँ तक जल होता है वहाँ तक चली जाती हैं।

न्यूजर्सी अमेरिका की बेल टेलेफोन प्रयोगशाला के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने एक ऐसे ‘भवन’ का निर्माण किया जो पूरी तरह शब्द प्रूफ था अर्थात् उसके अन्दर बैठने वाले को बाहर की कैसी भी कोई भी ध्वनि सुनाई नहीं पड़ सकती थी। वैज्ञानिकों को अनुमान था कि उस समय निस्तब्ध, नीरवता का आभास होगा पर जब एक व्यक्ति को प्रयोग के तौर पर उसके अन्दर बैठाया गया तो उसे यह सुनकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ उसके कानों में गूँजने लगी।

एक ध्वनि किसी के सीटी बजाने की थी, एक ध्वनि प्रेस मशीन चलने की तरह धड़-धड़ की थी, एक ध्वनि चट-चट चटखने की सी। पहले तो वह व्यक्ति डरा पर पीछे ध्यान देने पर मालूम हुआ कि सीटी की आवाज नसों में दौड़ने वाले रक्त प्रवाह की ध्वनि थी। आमाशय में पाचन रसों की चट-चट और हड्डियों की कड़कड़ाहट की ध्वनियाँ भी अलग-अलग सुनाई पड़ने लगीं मानो शरीर न हो पूरा कारखाना ही हो।

सामान्यतः यह ध्वनि हर व्यक्ति के शरीर से होती है पर अपने कानों की बाह्यमुखी संवेदनशीलता और एकाग्रता की कमी के कारण कोई भी उन्हें सुन नहीं पाता। पर यदि अभ्यास किया जाये और सूक्ष्म कानों की शक्ति जगाई जा सके अनन्त ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल पृथ्वी के चलने की आवाज, सौर घोष, उल्काओं की टक्कर के भीषण निनाद मन्दाकिनियों के बहने का स्वर, जीव जन्तुओं के कलरव सब कुछ किसी भी स्थान में बैठकर उसी प्रकार सुने जा सकते हैं जिस प्रकार बेल टेलेफोन, लैबोरेटरी के प्रयोग के समय।

योगी पातञ्जलि ने लिखा है- ‘ततः प्रतिभ श्रावण जायन्ते’ अर्थात् ‘स्वार्थ संयम के अभ्यास से प्रतिभ अर्थात् भूत और भविष्य ज्ञान दिव्य और दूरस्थ शब्द सुनने की सिद्धि प्राप्त होती है।’ योग विभूति में लिखा है-

‘शब्दार्थ प्रत्ययानामितरेताध्यासात् संकरस्त- स्प्रतिभाग संयमात् सर्व भूतरुतज्ञानम्’।17॥

अर्थात् शब्द अर्थ और ज्ञान के अभ्यास से अभेद भासता है और उसके विभाग में संयम करने से सभी प्राणियों के शब्दों में निहित भावनाओं का भी ज्ञान होता है।’ -यह सूत्र सिद्धान्त सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय की महान महत्ता का प्रतिपादन करते हैं और बताते हैं कि जब तक मनुष्य के पास ऐसा क्षमता सम्पन्न शरीर है उसे भौतिक शक्तियों की ओर आकर्षित होने की आवश्यकता नहीं सिकन्दर 10 मील तक सुन सकता था योगी तो अपने कान लगाकर सारे ब्रह्माण्ड को सुन सकता है। यह बात अब विज्ञान भी स्वीकार करता है कान की बनावट की नकल करके वैज्ञानिक ऐसे राडार बनाने के प्रयत्न में हैं जो शुक्र मंगल और उससे आगे की भी गतिविधियों का पता लगा सकें। यह संभव हो जायगा पर कान का मुकाबला बेचारे यंत्र क्या कर सकेंगे। कानों से तो सारे ब्रह्माण्ड को सुना जा सकता है।


आचार्य की वेश-भूषा भी आचार्यत्व की द्योतक हों

विश्वविख्यात भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक कहोल साहब सदैव धोती-कुर्ता पहन कर ही महाविद्यालय जाया करते थे। उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था। अतः उनके वेश पर किसी को उंगली उठने का साहस नहीं होता था। आखिर विद्यार्थी कब मानने वाले थे। एक दिन गपशप में पूछ ही लिया - ‘प्रोफेसर साहब! आप कभी पेन्ट नहीं पहनते क्या?’ सदा धोती ही प्रयोग करते हैं। अथवा यदा कदा किसी अवसर पर पैंट भी धारण कर लेते हैं।

‘मुझे किसी भी वेश से घृणा नहीं। पर जब मैं आचार्य के रूप में आप लोगों को पढ़ाने आता हूँ तब ढीले-ढीले वस्त्र पहन कर आना ही मुझे रुचिकर लगता है। प्राचीन काल में भी आचार्य चाहे वह किसी भी देश के रहे हों ढीले वस्त्र पहन कर ही आते थे। फिर भारतवर्ष की तो अपनी परम्परा ही यह रही है कि आचार्य की वेश-भूषा भी आचार्यत्व की द्योतक हों।

आचार्य अरस्तू और सुकरात के चित्र आपने देखे होंगे। वे सदैव ढीली पोशाक पहनना पसन्द करते थे। हाँ जब कभी मुझे कोई शारीरिक श्रम का कार्य जैसे सफाई करने या कपड़े धोने की आवश्यकता पड़ती है तब मैं पैंट भी पहन लेता हूँ।’


शरीर एक विद्युत संस्थान

स्थूल दृष्टि से केवल हाथ, पैर, कान, नाक, मुँह और शरीर के अन्दर माँस के लोथड़े दिखाई देने पर भी शरीर पूर्णतया स्थूल नहीं है। इसमें चेतन शक्तियों का स्थान मुख्य है और वहीं शक्तियाँ ही शारीरिक गतिविधियों का संचालन करती हैं। यह शक्ति अन्य शक्तियों यथा ताप-ध्वनि विद्युत, प्रकाश की भाँति परस्पर एक दूसरे में बदली जा सकती है। सिद्धियाँ इन्हीं शक्तियों के प्रयोग का ज्ञान मात्र है।

यह एक सैद्धान्तिक बात हुई आमतौर पर प्रत्यक्ष प्रमाण पाये बिना बहुत कम लोग इस तथ्य पर विश्वास करेंगे कि शरीर में वस्तुतः ऐसी कोई जबरदस्त शक्ति है। यहाँ एक घटना प्रस्तुत की जा रही है जो उपर्युक्त सत्य का सम्पादन और समर्थन करती है। घटना आबू नगर जिला सिरोही (राज) के एक होटल मालिक श्री अनन्तराय नान जी भाई मेहता से संबंध रखती है।

एक दिन श्री मेहता जी ने बड़े स्नेह से एक बच्चे को छूने का प्रयत्न किया तभी बच्चे के शरीर में जोरदार झटका लगा बच्चा ढाई फुट परे जा गिरा। मेहता जी परेशान हुये आखिर बात क्या है? तभी उनकी धर्मपत्नी एक बर्तन में उन्हें पीने का पानी देने आई अभी गिलास उनके हाथ में ही था कि मेहता जी ने लेने के लिये उसे पकड़ा और बस गजब हो गया। धर्मपत्नी के हाथ को 12 वोल्ट बिजली का जोरदार करंट लगा। बेचारी गिरते-गिरते बचीं। उन्होंने ही बताया देखो जी तुम्हारे शरीर में बिजली है।

बात आगे बढ़ी, मुहल्ले पड़ोस के लोग आये किन्हीं ने उनके शरीर को छूकर अनुभव किया किसी ने उनके हाथ में धातु का कोई टुकड़ा देकर। धातुएं पकड़ते ही उससे चिनगारियाँ (Sparking) प्रारम्भ हो जाती हैं। लोग हैरतअंगेज रह गये आखिर मेहता जी के शरीर में बिजली कहाँ से आ गई।

विज्ञान के विद्यार्थी और अध्यापकों ने भी जाँच की और माना कि शरीर में कोई ऐसी शक्ति है शरीर की किसी विशेष परिस्थिति में अर्थात् विद्युत वाहिनी नाड़ियों में कोई अव्यवस्था उत्पन्न हो जाने के कारण वह शक्ति विद्युत शक्ति में बदल जाती है।

मेहता जी के शरीर में दिन में बारह बार विद्युत आवेश उभरता है और हर दूसरे दिन उभरता है। यह करेंट 12 वोल्ट ताकत के बराबर होती है। यह अनुभूति उन्हें पिछले दिनों लगातार डेढ़ माह तक होती रही तब भुज से निकलने वाले ‘कच्छ मित्र’ के संवाद दाता ने स्वयं जाकर उनका परीक्षण किया और सत्य पाया। यह विवरण 17 अप्रैल सन् 1971 के कच्छ मित्र में छपा भी था। अन्य स्थानीय डॉक्टरों ने भी उनकी जाँच की पर वे


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‘गलती न करने वाली मशीन’ और ‘गलती करने वाले मनुष्य’-इन दोनों में से किसी एक को पसन्द करना पड़े तो मनुष्य को ही पसन्द करना पड़ेगा। गलतफहमी से बहुधा मनुष्य का जन्म होता है, पर मशीन से किसी भी दशा में मनुष्य नहीं निकल सकता।

-टैगोर

बिजली कहाँ उत्पन्न होती है यह जान नहीं पाये। श्री मेहता जी का कथन है कि उनके शरीर में जब-जब करेंट आती है उन्हें कोई परेशानी महसूस नहीं होती वरन् स्फूर्ति और चैतन्यता की अनुभूति होती है।

श्री मेहता जामखभ्यालिया के रहने वाले हैं 1964 से पूर्व वे पूर्व अफ्रीका में रहे हैं। अपने इस अजूबे का कारण वे स्वयं भी नहीं जानते पर वे इतना अवश्य मानते हैं कि विद्युत का कारण कोई बाह्य उपकरण या कारण ने होकर मेरे शरीर के अन्दर ही कहीं है। क्या इस उदाहरण से लोग शरीर में छिपी अदृश्य शक्तियों की बात मानेंगे और उनकी शोध के लिये तत्पर होंगे यह देखने वाली बात है।


बिना आँखों के भी देखा जा सकता है।

भारतीय अध्यात्म वेत्ता चिरकाल से यह तथ्य प्रमाणित करते रहे हैं कि मानव शरीर में देखने की क्षमता का प्रयोजन केवल आँखें ही पूरा नहीं करती, वरन् दूसरे अवयव भी ऐसे हैं जो देखने का उद्देश्य पूरा करते हैं।

भ्रूमध्य भाग में भीतर एक ग्रन्थि होती है जिसे आज्ञाचक्र या तृतीय नेत्र कहा जाता है। शिव और पार्वती के चित्रों में उनका एक पौराणिक तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। कथा के अनुसार शंकर भगवान ने इसी नेत्र को खोलकर उसमें से निकलने वाली अग्नि से कामदेव को भस्म किया था। यह दिव्य दृष्टि का केन्द्र है। इससे टेलीविजन जैसा कार्य लिया जा सकता है। दूर-दर्शन का दिव्य यन्त्र यहीं लगा हुआ है। महाभारत के सारे दृश्य संजय ने इसी के माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र को सुनाये। चित्रलेखा द्वारा प्रद्युम्न प्रणय इस दिव्य दर्शन का ही परिणाम था।

यह तीसरा नेत्र अति प्रभावशाली है इससे दूरदर्शन ही नहीं; अदृश्य और अप्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है। एक्सरे किरणें जिस तरह ठोस पदार्थों में होकर भी पार चली जाती हैं और आँखों से न दीख पड़ने वाली वस्तुओं के भी चित्र खींचती हैं, उसी प्रकार यह आज्ञाचक्र का कैमरा अदृश्य को देख सकता है। इसके माध्यम से न केवल पदार्थों को देखने का प्रयोजन पूरा होता है वरन् जीवित प्राणियों की मनःस्थिति को समझना भी सम्भव होता है। देखने समझने से ही बात पूरी नहीं होती आज्ञाचक्र की क्षमता इससे भी आगे है वह दूसरों को प्रभावित परिवर्तित भी कर सकती है। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म में इसी दिव्य क्षमता को स्थूल नेत्रों के माध्यम से प्रयोग किया जाता है।

सूक्ष्म और कारण शरीर की दिव्य दृष्टि की मर्यादा और क्षमता बहुत बढ़ी-चढ़ी है। उसे समझने, विकसित करने और प्रयोग करने की क्षमता योगाभ्यास से उपलब्ध होती है। पर स्थूल शरीर में भी यह शक्ति बहुत व्यापक है। आँखों से ही सब कुछ नहीं देखा जाता उसके अतिरिक्त अंगों में भी देखने समझने की क्षमता मौजूद है। मस्तिष्क, नेत्र गोलकों का फोटोग्राफी कैमरे जैसा प्रयोग करता है और पदार्थों के जो चित्र आँखों की पुतलियों के लैंस से खींचता है वे मस्तिष्क में जमा होते हैं। इनकी प्रतिक्रिया के आधार पर मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु जो निष्कर्ष निकालते हैं उसी का नाम ‘दर्शन’ है। आँख इसके लिए सबसे उपयुक्त माध्यम है। मस्तिष्क के रूप दर्शन केन्द्र के साथ नेत्र गोलकों के ज्ञान तन्तुओं का सीधा और समीपवर्ती संबंध है इसलिए आमतौर से हम नेत्रों से ही देखने का काम लेते हैं और मस्तिष्क उन्हीं के आधार पर अपनी निरीक्षण क्रिया को गतिशील देखता है।

पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि दृष्टि शक्ति केवल नेत्रों तक ही सीमित है। अन्य अंगों के मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए ज्ञान तन्तुओं को विकसित करके भी मस्तिष्क बहुत हद तक उस प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। समस्त विश्व का हर पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत किरणें संजोये हुए है। वे कम्पन लहरियों के साथ इस निखिल विश्व में अपना प्रवाह फैलाती हैं। ईथर तत्व के द्वारा वे दूर-दूर तक जा पहुँचती हैं। और यदि उन्हें ठीक तरह से पकड़ा जा सके तो जो दृश्य बहुत दूरी पर अवस्थित हैं-जो घटनाएं सुदूर क्षेत्रों में घटित हो रही हैं। उन्हें निकटवर्ती वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है। इन दृश्य किरणों को पकड़ने के लिए नेत्र उपयुक्त हैं। समीपवर्ती दृश्य वही देखते हैं। और दूरवर्ती दृश्य देखने के लिए-तृतीय नेत्र को भ्रूमध्य में अवस्थित आज्ञाचक्र को प्रयुक्त किया जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि रूप तत्व का - संबंध नेत्रों से ही है। अग्नि तत्व की प्रधानता से ‘रूप’ कम्पन उत्पन्न होते हैं। शरीर में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व नेत्र करते हैं, पर ऐसा नहीं मानना चाहिए कि अग्नि तत्व अन्यत्र शरीर के अन्य अंगों में नहीं है। समस्त शरीर पंच-तत्वों के गुम्फन से बना है। यदि किसी अन्य अंग का अग्नि तत्व अनायास ही विकसित हो जायगा या साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा विकसित कर लिया जाय तो नेत्रों की बहुत आवश्यकता उनके माध्यम से भी पूरी हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों के कार्य एक सीमा तक दूसरे अंग कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये पौहारी बाबा प्रत्यक्षतः वायु ही ग्रहण करते थे, अन्न, जल सेवन नहीं करते थे पर शरीर के अन्य अंगों द्वारा अदृश्य जगत से सूक्ष्म आहार बराबर मिलता रहता था इसके बिना किसी के लिए भी जीवन धारण किये रहना असम्भव है।

क्या नेत्रों का प्रयोजन अन्य अंग पूरा कर सकते हैं? अतीन्द्रिय क्षेत्र की इस सम्भावना के कितने ही प्रमाण समय-समय पर मिलते रहते हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व एक रूसी कुमारिका ‘रोजा कुलेशोवा’ ने अपनी उँगलियों के छोरों से नेत्र-शक्ति का प्रयोजन पूरा करके वहाँ के वैज्ञानिकों को आश्चर्य में डाल दिया। सभी जानते हैं कि रूस में नास्तिक सरकार है। वहाँ सिद्धि चमत्कार के नाम पर भारत की तरह छल-प्रपंच रचता-जनता को भ्रम में डालता पाया जाय तो उसे मृत्युदण्ड तक मिल सकता है। फिर वह बेचारी किशोरी ऐसा करती भी क्यों?

कुलेशोवा अन्धों के संघ में काम करती थी। उसकी ड्यूटी उन्हीं के बीच थी। न जाने क्या अचम्भा हुआ कि उसे उंगलियों की सहायता से बहुत कुछ पढ़ लेने देख लेने की क्षमता प्राप्त हो गई। वह दाँये हाथ की तीसरी और चौथी उंगलियाँ अखबार पर फिरा कर पढ़ने में समर्थ हो गई। आँखों से पट्टी बाँधकर उसने अपना यह करतब अनेकों को दिखाया।

बात आगे बढ़ी। उसे वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला में उपस्थित होना पड़ा। ‘निजनी टैमिल शैक्षणिक संस्थान मास्को में उसे लाया गया और वैज्ञानिकों की एक समिति ने उसकी कड़ी परीक्षा ली और तथ्यों को जानने का बारीकी के साथ प्रयत्न किया। हर परीक्षण में ‘कुलेशोवा’ उत्तीर्ण रही। आँखों पर कड़ी पट्टी के साथ कई तरह के अन्य अवरोधक इसलिए चढ़ाये गये कि कहीं से उसे देख सकने की गुंजाइश न मिल जाय फिर भी उसने उंगलियों के पोरों के सहारे पुस्तक पढ़कर सुनाई। इतना ही नहीं उसने रंग भी पहचाने और डाक टिकटों पर छोटे चित्रों की बारीकियाँ भी बताई, इस विलक्षणता को देखते हुए इसमें किसी प्रकार का सन्देह करने की गुंजाइश नहीं रह गई कि नेत्रों का काम कुलेशोवा की उंगलियाँ करती हैं।

परीक्षकों ने आगे की बात जाननी चाही यह देखा कि क्या यह शक्ति उसकी दो उंगलियों में ही है या किसी अन्य अंग में भी है। लड़की को स्वयं भी यह मालूम नहीं था कि यह अद्भुत क्षमता उसके किसी अन्य अंग में भी होगी। परीक्षण ने सिद्ध किया कि वह शक्ति उसके अन्य कई अंगों में भी मौजूद है। बाँये हाथ की उंगलियों से दायें पैर के टखने से तथा जीभ से भी वह इस प्रयोजन को पूरा कर सकती है।

रूसी वैज्ञानिकों के लिए यह लड़की एक अध्ययन और परीक्षण का विषय बन गई। इस कार्य के लिए डॉ0 नोबोमीस्को की अध्यक्षता में वैज्ञानिकों का एक बोर्ड बना जो इस अतीन्द्रिय क्षमता के कारणों की शोध करने में संलग्न हो गया।

इसी बीच ठीक ऐसी ही एक और घटना सामने आई। वह अमेरिका की थी। बर्नार्ड कॉलेज न्यूयार्क के मनोविज्ञान प्राध्यापक डॉ0 रिचार्ड यूटस् को ऐसी ही एक अमेरिकन महिला पोद्दोशया के अध्ययन परीक्षण में लगाना पड़ा। वह महिला घोर अन्धकार में भी आँखों से पट्टी बाँध कर रंगों को पहचान लेती थी।

इस अतीन्द्रिय स्थिति के कई कारण सोचे गये एक यह था प्रत्येक रंग से अलग तरह की ताप किरणें निकलती हैं। किसी के शरीर में उन तरंगों का अन्तर समझने की क्षमता हो सकती है और उस आधार पर यह पहचान सम्भव है। कुलेशोवा की उंगलियों पर ऐसे यन्त्र लगाये गये जो रंगों की किरणों को सोख लेते थे। इसके बावजूद भी लड़की ने रंगों को ठीक तरह से पहचान लिया। इसलिए वह अनुमान गलत माना गया उसने बिना रिबिन के टाइप किये हुए अक्षर पढ़कर सुनाये। इसमें रंग का प्रश्न भी नहीं था। बिना रिबिन के टाइपराइटर से कागज पर थोड़े निशान ही बन सकते हैं, रंग तो उसमें था ही नहीं। रंगों की ताप किरणों वाली बात इससे भी कट गई।

रूस ही नहीं संसार के अन्य देशों के विज्ञान वेत्ताओं ने भी इस विलक्षणता को समझने की कोशिश की है। इनमें से चैकोस्लोवाकिया के परा मनोविज्ञान वेत्ता ‘मैलिन रिज्ल’ और लेनिन ग्राड विश्व विद्यालय के प्राध्यापक मि0 बेसिलियेव इस विलक्षणता को मनुष्य के अन्दर रहने वाली अतीन्द्रिय क्षमता की पृष्ठभूमि में देखते हैं। दूसरे वैज्ञानिक दूसरी तरह के भौतिक निष्कर्ष निकाल रहे हैं पर वे अभी किसी निश्चय समाधान पर पहुँच नहीं सके हैं। उनके लिये यह पहेली जहाँ की तहाँ है।

उपरोक्त रूस की कुलेशोवा और अमेरिकी पोद्देशिया स्टेनले की दो घटनाएं ही मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता को प्रमाणित करती हों सो बात नहीं है। इससे पहले भी ऐसे ही अनेक प्रामाणिक उदाहरण उपलब्ध होते रहे हैं। तन्त्र विद्या के विश्वकोश ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ दी ऑकल्ट’ में एन्टीन मेसयर के अनुयायियों का ऐसा वर्णन है जिसमें वे पेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष वस्तुओं का विवरण बताने में समर्थ होते थे।

प्रो0 फोन्टान ने एक फ्रान्सीसी नाविक का ऐसा ही उल्लेख किया है। वह अन्धा व्यक्ति उंगलियों से छूकर ऐसे विवरण बताता था जो साधारणतया आँखों के बिना नहीं बताये जा सकते। कनाडा की एक अन्धी लड़की हाथ की कुहनियों के माध्यम से ऐसा ही अदृश्य दर्शन कर सकने में समर्थ थी ऐसे प्रमाण मिले हैं।

फ्रान्सीसी कवि-जूल्स रोमेन्स की उन दिनों परोक्ष दृष्टि विज्ञान में बड़ी दिलचस्पी थी उसने अपने साहित्यकायों के साथ-साथ इस विषय में भी शोध की थी और बताया है कि त्वचा में अगणित ‘कीट नेत्र’ विद्यमान है जो स्पर्श संवेदना के द्वारा निकटवर्ती वस्तुओं के बारे में निरन्तर जानकारी संग्रहीत करते रहते हैं। आँखों की तरह ये छोटे नेत्र वस्तुओं की आकृति भले ही स्पष्ट रूप से न जान सकें पर उनकी प्रकृति के संबंध में नेत्र गोलकों से भी अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

प्रसिद्ध जादूगर गोगिया पाशा और प्रो0 सरकार नेत्रों से कड़ी पट्टी बँधवाकर घनी आबादी की भीड़ भरी सड़कों पर मोटर साइकिल दौड़ाने के अपने करतब दिखा चुके हैं। इस प्रदर्शन में आँखों से देखने की गुंजाइश तो नहीं रही है इसलिए पट्टी बाँधने से लेकर उसकी जाँच करने तक का काम ऐसे कार्यों की जानकारी रखने वाले प्रामाणिक लोगों को सौंपा गया था। उन लोगों की मोटर साइकिलें मोड़ और बचाव की सही व्यवस्था बनाती हुई निर्धारित लक्ष्य पर ठीक प्रकार जा पहुँची तो दर्शकों को यह विश्वास करना पड़ा कि बिना आँखों की सहायता के भी दूसरे माध्यमों से देखने का कार्य किया जा सकना सम्भव है। स्वामी माधवानन्दजी ने राजस्थान में जल रहित प्रदेशों में कई जगह अपनी दिव्य दृष्टि से जल स्रोतों


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=कोटेशन=============================

सामाजिक व्याधि को हम बाहरी प्रयत्नों से दूर नहीं कर सकते। सुधार तो मन के ऊपर प्रभाव डालने से ही हो सकता है। शिक्षा द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से उसके लिए प्रयत्न करना होगा। आन्दोलन द्वारा सनसनी फैलाकर कर किसी सामाजिक बुराई को दूर करने की कोशिश से कोई लाभ नहीं हो सकता।

-स्वामी विवेकानन्द

की जानकारी दी थी और वहाँ कुआँ खोदने पर सचमुच यथा स्थान पानी निकला।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का भण्डार है। यदा-कदा उसकी यह अविज्ञात क्षमताएं उभर आती हैं तो उसे अद्भुत और आश्चर्यजनक माना जाने लगता है। वस्तुतः ब्रह्माण्ड का एक छोटा नमूना पिण्ड अपने भीतर विश्व के समस्त सामर्थ्य बीज रूप से छिपाये बैठा है। साधना द्वारा उन प्रसुप्त शक्ति स्रोतों का प्रकटीकरण किया जा सकता है। यदाकदा उन अतीन्द्रिय शक्तियों का आभास मिलता रहता है वे उदाहरण यही सिद्ध करते हैं कि मानवीय अविज्ञान सामर्थ्य की विशालता और महानता के अस्तित्व पर अविश्वास न किया जाय वरन् उन्हें ढूँढ़ने, जगाने और उपयोग में लाने के प्रयास में लगा जाय।


साहसी ही श्रेय, सम्मान के अधिकारी

वत्स! मैंने केवल तुम्हें ही नहीं पाला, भीम को भी मैंने ही स्तनपान कराया है मुझे ज्ञात है कि वह कायर नहीं-निर्वीर्य भी नहीं है मेरा भीम। अपने सम्मुख अन्याय और अत्याचार होता रहे और उसका प्रतिरोध न हो यह आर्य-परम्परा के प्रतिकूल है तात! सो तुम भीम को रोको मत बक राक्षस को मारने के लिए और राष्ट्र को असुरत्व से बचाने के लिये उसे जाना ही चाहिये’-माँ कुन्ती ने दृढ़ स्वर में भीम की बात का समर्थन किया।

युधिष्ठिर बोले! अम्बे! हम आपका प्रतिवाद नहीं करते! भीम की शक्ति साहस का पता है, मुझे यह भी मालूम है कि अन्याय से संघर्ष करने की इच्छा वीर्यवान पुरुष ही किया करते हैं नपुंसक नहीं। भीम में वह सारी क्षमताएं है यह भी भली प्रकार जानता हूँ किन्तु आप ही सोचिये अम्बे! कल जब सारी दुनिया को बकासुर वध का समाचार मिलेगा तो क्या लोग यह नहीं जान जाएंगे कि यह कृत्य सिवाय भीम के और किसी का नहीं हो सकता। हम लोग एक वर्ष का अज्ञातवास कर रहे हैं यदि किसी को वस्तु स्थिति का पता चल गया तो संकल्प पत्र के अनुसार हम सबको फिर 13 वर्ष का वनवास भुगतना पड़ेगा।’

कुन्ती कुछ कहें-इससे पूर्व ही भीम बोल पड़े-तात! आपने ही तो कहा था कि न्याय और औचित्य के समर्थन, अन्याय और अवाँछनीयता के प्रतिकार के लिये जो बड़े से बड़ा कष्ट सहने के लिये तैयार रहता है वही सच्चा धर्मनिष्ठ और वही सच्चा मनुष्य होता है। आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें बकासुर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता अधर्म कभी धर्म से जीता नहीं-अन्याय आत्महीनता के क्षेत्र में फलता-फूलता है आत्मविश्वास को तो देखते ही उसके प्राण सूख जाते हैं सौ विजय आप सुनिश्चित समझिये रही अज्ञातवास की बात सो एक रात में किसी और प्रदेश में चले जाएंगे ऐसे तो सारा जीवन ही कष्ट और संघर्षों से भरा है उनकी चिन्ता में दुबके पड़ा रहा जाये तो समझिये संसार में न न्याय रह सकता है नीति और न सदाचार। आज्ञा दीजिये देर हो गई-वह देखिये ब्राह्मण बालक खाद्यान्न लेकर आ पहुँचा।’

युधिष्ठिर ने, कुन्ती और समस्त पाण्डवों ने जय मंगल ध्वनि की और भीम को विदा कर दिया। बकासुर का नियम था प्रतिदिन नगर से एक व्यक्ति भोजन लेकर जाता था। राक्षस उस भोजन के साथ उस व्यक्ति का भी वध कर खा जाता था। आज उस ब्राह्मण बालक की बारी थी। कुन्ती को इस बात का पता चला तो उन्होंने ही भीम को अन्याय से प्रतिकार के लिये उकसाया और ललकारा था। भीम ने भोजन सामग्री अपने हाथ में ली और बालक


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मनुष्य के सभी गुणों में साहस सबसे पहला गुण है, क्योंकि यह सभी गुणों की जिम्मेदारी वहन करता है।

-चर्चिल

के स्थान पर स्वयं जा पहुँचे बकासुर के पास। भोजन रास्ते में स्वयं ही कर लिया था। खाली हाथ देखकर राक्षस के क्रोध का पारावार न रहा। वह देर से आने से भीम को अपशब्द बकने लगा। साहसी भीम दुष्ट पर टूट पड़े। अत्याचारी राक्षस का अब तक किसी से सामना नहीं हुआ था इसीलिये वह अहंकार में डूबा बैठा था पर जैसे ही भीम ने उस पर प्रहार किया उसे अपनी दुर्बलता का ज्ञान हो गया। भीम को भी पता चल गया कि दुष्टता केवल दिखावे में शक्तिशाली होती है भीतर से तो वह खोखली ही होती है। थोड़ी ही देर में उन्होंने धराशायी कर दिया बकासुर को। और यह सिद्ध कर दिया कि जो लोग अन्याय और अत्याचार से लड़ने से डरते नहीं वही उनका अन्त करने का श्रेय व सम्मान प्राप्त करते हैं।


अध्यात्म विज्ञान और उसका महान प्रयोजन

अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। मनुष्य अपने उच्च स्तर से अपनी दुर्बलताओं के कारण ही अधःपतित होता है और दुःख, क्लेश भरा नरक भोगता है। मनुष्य को इस विश्व के साथ संपर्क बनाकर सुखानुभूति प्राप्त करने के तीन उपकरण मिले हुए हैं। यदि वह उनका ठीक तरह उपयोग जान सके तो उसे पग-पग पर यह अनुभव हो कि यह संसार कितना सुन्दर और जीवन कितना मधुर है। इस तीन उपकरणों के नाम हैं। (1) अन्तरात्मा (2) मन (3) इन्द्रिय समूह।

इन्द्रियों की बनावट ऐसी अद्भुत है कि दैनिक जीवन को सामान्य प्रक्रिया में ही उन्हें पग-पग पर असाधारण सरसता अनुभव होती है। पेट भरने के लिए भोजन करना स्वाभाविक है। भगवान की कैसी महिमा है कि उसने दैनिक जीवन की शरीर यात्रा भर की नितान्त स्वाभाविक प्रक्रिया को कितना सरस बना दिया है। उपयुक्त भोजन करते हुए जीव को कितना रस मिलता है और चित्त को उस अनुभूति से कैसी प्रसन्नता होती है।

आँख का साधारण काम है वस्तुओं का देखना ताकि हमारी जीवन यात्रा ठीक तरह चलती रह सके। पर आँखों में कितनी अद्भुत विशेषता भर दी है कि वह रूप, सौंदर्य, कौतुक, कौतूहल जैसी रस भरी अनुभूतियाँ ग्रहण करके चित्त को प्रफुल्लित बनाती हैं। संसार में उत्पादन, परिपुष्टि, विनाश का क्रम नितान्त स्वाभाविक है। मध्यवर्ती स्थिति में हर चीज तरुण होती है और सुन्दर लगती है। क्या पुण्य क्या मनुष्य हर किसी को तीनों स्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है। मध्यकाल सौंदर्य लगता है। वस्तुतः यह तीनों ही स्थितियाँ अपने क्रम, अपने स्थान और अपने समय पर सुन्दर हैं। पर आँखों को सुन्दर-असुन्दर का भेद करके मध्य स्थिति को सुन्दर समझने की कुछ अद्भुत विशेषता मिली है। फलस्वरूप जो कुछ उभरता हुआ विकसित, परिपुष्ट दीखता है सो सुन्दर लगता है। सुन्दर-असुन्दर का तात्विक दृष्टि से यहाँ कुछ भी अस्तित्व नहीं है। पर हमारी अद्भुत आँखें ही हैं जो अपनी सौन्दर्यानुभूति वाली विशेषता के कारण हमारे दैनिक जीवन से संबंधित समीपवर्ती वस्तुओं में से सौंदर्य वाला भाग देखतीं, आनन्द अनुभव करतीं, उल्लसित और पुलकित होती हैं। चित्त को प्रसन्न करती हैं।

इसी प्रकार जननेन्द्रिय की प्रक्रिया है। प्रजनन मक्खी, मच्छरों, कीट-पतंगों, बीज अंकुरों में भी चलता रहता है। यह सृष्टि का सरल स्वाभाविक क्रम है पर हमारी जननेन्द्रिय में कैसा अजीब उल्लास रसावोर कर दिया है कि संभोग के क्षण ही नहीं-उसकी कल्पना भी मन के कोने-कोने में सिहरन, पुलकन, उमंग और आतुरता भर देती है। तत्वतः बात कुछ भी नहीं है। दो शरीरों के दो अवयवों का स्पर्श-इसमें क्या अनोखापन है? क्या अद्भुतता है? क्या उपलब्धि है? फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किसलिए चित्त को बेचैन करने वाली ललक पैदा होनी चाहिए? बात कुछ भी नहीं है। मात्र जननेन्द्रिय की बनावट में एक अद्भुत प्रकार की सरसता का समावेश मात्र है जो हमें सामान्य स्वाभाविक दाम्पत्य-जीवन के वास्तविक या काल्पनिक प्रत्यक्ष और परोक्ष-क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार की रसानुभूति उत्पन्न करके-जीने भर के लिए प्रयुक्त हो सकने वाले जीवन को निरन्तर उमंगों से भरता रहता है।

ऊपर जीभ, आँख और जननेन्द्रिय की चर्चा हुई, कान और नाक के बारे में भी इसी प्रकार समझना चाहिए। यहाँ पान भाग वाला इन्द्रिय समूह अपने साथ रसानुभूति की विलक्षणता इसलिए धारण किये हुए है कि सरस, स्वाभाविक सामान्य जीवन क्रम ऐसे ही नीरस ढर्रे का जीने भर के लिए मिला हुआ प्रतीत न हो वरन् उसमें हर घड़ी उत्साह, उल्लास, रस, आनन्द बना रहे और उसे उपलब्ध करते रहने के लिए जीवन की उपयोगिता, सार्थकता और सरसता का भान होता रहे। इन्द्रिय समूह हमें इसी प्रयोजन के लिए उपलब्ध है। यदि उनका उचित, संयमित, विवेकपूर्ण व्यवस्थापूर्वक उपयोग किया जा सके तो हमारा भौतिक साँसारिक जीवन पग-पग पर सरसता, आनन्द उपलब्ध करता रह सकता है।

दूसरा उपकरण मन इसलिए मिला है कि संसार में जो कुछ चेतन है उसके साथ अपनी चेतना का स्पर्श करके और भी ऊँचे स्तर की आनन्दानुभूति प्राप्त करे। इन्द्रियाँ जड़ शरीर से संबंधित हैं। जड़ पदार्थों को स्पर्श करके उस संसर्ग का सुख लूटती है। जड़ का जड़ से स्पर्श भी कितना सुखद हो सकता है, इस विचित्रता का अनुभव हमें इन्द्रियों के माध्यम से होता है। चेतन का चेतन के साथ, जीवधारी का जीवधारी के साथ स्पर्श-संपर्क होने से मित्रता, ममता, मोह, स्नेह, सद्भाव, घनिष्ठता, दया, करुणा, मुदिता जैसी अनुभूतियाँ होती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में द्वेष, घृणा जैसे भाव भी उत्पन्न होते हैं पर उसका अस्तित्व है इसीलिए कि मित्रता के वातावरण में संपर्क, संसर्ग का आनन्द बिखरता रहे, यदि अन्धकार न हो तो प्रकाश की विशेषता ही नष्ट हो जाय। वस्तुतः मन की बनावट दूसरों के संपर्क, सहयोग, स्नेह भावों के आदान-प्रदान का सुख करने में है। मेले-ठेलों में सभा सम्मेलनों में जाने की इच्छा इसीलिए उठती है उन जन संकुल स्थानों से व्यक्तियों की घनिष्ठता न सही समीपता का अदृश्य सुख तो अनायास मिलता ही है।

चूँकि इन्द्रिय सुख और जनसंपर्क की घनिष्ठता में सहायक एक और नया माध्यम सभ्यता के विकास के साथ-साथ बनकर खड़ा हो गया है इसलिए अब प्रिय वह भी लगने लगा है-इस तीसरे मनुष्य कृत-आकर्षण तत्व का नाम है-धन। धन में स्वभावतः कोई आकर्षण नहीं। इसमें इन्द्रिय समूह या मन को पुलकित करने वाली कोई सीधी क्षमता नहीं है। धातु के सिक्के या कागज के टुकड़े भला आदमी के लिए प्रत्यक्षतः क्यों आकर्षक हो सकते हैं। पर चूँकि वर्तमान समाज व्यवस्था के अनुसार धन के द्वारा इन्द्रिय सुख के साधन प्राप्त होते हैं। मैत्री भी सम्भव होती है। इसलिए धन भी प्रकारान्तर रूप से मन का प्रिय विषय बन गया। अस्तु धन की गणना भी सुखदायक माध्यमों से जोड़ ली गई है।

तीन शरीरों को जीवात्मा धारण किये हुए है तीनों की तीन रसानुभूतियाँ हैं। ऊपर दो की चर्चा हो चुकी। स्थूल शरीर की सरसता-इन्द्रिय समूह के साथ जुड़ी हुई है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन जैसे सुख इन्द्रियों द्वारा ही मिलते हैं। सूक्ष्म शरीर का प्रतीक मन है। मन की सरसता मैत्री पर-जनसंपर्क पर अवलम्बित है। परिवार मोह से लेकर समाज संबंध, नेतृत्व, सम्मिलन, उत्सव, आयोजन जैसे संपर्क परक अवसर मन को सुख देते हैं। घटित होने वाली घटनाओं को अपने ऊपर घटित होने की सूक्ष्म सम्वेदना उत्पन्न करके वह समाज की अनेक हलचलों से भी अपने को बाँध लेता है और उन घटनाक्रमों में खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ उपलब्ध करता है। उपन्यास, सिनेमा, अखबार, रेडियो आदि मन को इसी आधार पर आकर्षित करते और प्रिय लगते हैं।

तीसरा रसानुभूति उपकरण है-अन्तरात्मा उसका कार्य क्षेत्र ‘कारण शरीर’ है। उसमें उत्कृष्टता, उत्कर्ष, प्रगति, गौरव की प्रवृत्ति रहती है जो उच्च भावनाओं के माध्यम से चरितार्थ होती है। मनुष्य की श्रेष्ठता और सन्मार्गगामिता प्रखर होती है इसके लिए उसमें भी एक रसानुभूति विद्यमान है-उसका नाम है वर्चस्व, यश, कामना, नेतृत्व, गौरव प्रदर्शन। उस आकाँक्षा से प्रेरित होकर मनुष्य अगणित प्रकार की सफलतायें प्राप्त करता है ताकि वह स्वयं दूसरों की तुलना में अपने आपको श्रेष्ठ, पुरुषार्थी, पराक्रमी, बुद्धिमान अनुभव करके सुख प्राप्त करे और दूसरे लोग भी उसकी विशेषताओं, विभूतियों से प्रभावित होकर उसे यश, मान, प्रदान करे।

संक्षेप में यह मनुष्य के तीन शरीरों की-तीन रसानुभूतियों की चर्चा हुई। हमारी अगणित योजनायें-इच्छा, आकाँक्षायें-गतिविधियाँ इन्हीं तीन मूल प्रवृत्तियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जो कुछ मनुष्य सोचता और करता है उसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। भगवान ने यह तीन उपहार जीवन को सरसता से भरा-पूरा रखने के लिए दिये हैं। साथ ही उनका अस्तित्व इसलिए भी है कि व्यक्ति निरन्तर सक्रिय बना रहे। इन सुखानुभूतियों को प्राप्त करने के लिए उसके तीनों शरीर निरन्तर जुटे रहें। आलस्य, अवसाद की उदासीनता, नीरसता की स्थिति सामने आकर खड़ी न हो जाय और जीवन को आनन्द रहित भार रूप न बना दें। सक्रियता के आधार पर चल रहे सृष्टि क्रम को अवरुद्ध न कर दे। अन्तरात्मा, मन और इन्द्रिय समूह को यदि सही मार्ग पर चलने का अवसर मिलता रहे तो जीवन हर्षोल्लास के साथ व्यतीत हो सकता है।

भूल मनुष्य की तब आरम्भ होती है जब वह इन तीनों रसानुभूतियों को अमर्यादित होकर-अनावश्यक मात्रा में-अतिशीघ्र, बिना उचित मूल्य चुकाये प्राप्त करने के लिए आकुल, आतुर हो उठता है और लूट-खसोट की मनोवृत्ति अपनाकर अवाँछनीय गतिविधियाँ अपना लेता है। विग्रह इसी से उत्पन्न होता है। पाप का कारण यही उतावली है। जीवन में अव्यवस्था और अस्त-व्यस्तता इसी से उत्पन्न होती। पतन इसी भूल का परिणाम है। अपराधी, दुष्ट और घृणित बनने का कारण उन उपलब्धियों के लिए अनुचित मार्ग को अपनाना ही है। उतावला व्यक्ति आतुरता में विवेक खो बैठता है और औचित्य को भूलकर बहुत जल्दी-अधिक मात्रा में उपरोक्त सुखों को पाने के लिए असन्तुष्ट होकर एक प्रकार से उच्छृंखल हो उठता है। यह अमर्यादित स्थिति उसके लिए विपत्ति बनकर सामने आती है। सरल स्वाभाविक रीति से जो शान्तिपूर्वक मिल रहा था-मिलता रह सकता था-वह भी हाथ से चला जाता है और शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग-सामाजिक तिरस्कार, आर्थिक अभाव, आत्मिक अशान्ति के संकटों से घिरा हुआ जीवन नरक बन जाता है। अधिक के लिए उतावला मनुष्य सरल स्वाभाविक को भी खोकर उलटा शोक-संताप, कष्ट-क्लेश एवं अभाव, दारिद्रय में फँस जाता है। आमतौर से मनुष्य यह भूल करते हैं। इसी भूल को माया, अज्ञान, अविद्या नामों से पुकारते हैं। यह भूल ही ईश्वर प्रदत्त पग-पग पर मिलती रहने वाली सरसता से वञ्चित करती है और इसी के कारण जीव ऊँचा उठने के स्थान पर नीचे गिरता है।

अध्यात्म विद्या का उद्देश्य मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व को अमर्यादित न होने देने-अवाँछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करता है। मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को, व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शक करना-इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।

स्थूल शरीर का ठीक तरह उपयोग कैसे किया जाय? इन्द्रिय समूह को व्यवस्थित और सन्तुलित कैसे रखा जाय? पारस्परिक संबंधों में औचित्य की, मर्यादा की रक्षा करते हुए अधिकाधिक स्नेह सद्भाव कैसे प्राप्त किया जाय? आत्मोत्कर्ष की प्रगति और श्रेष्ठता की स्थिति कैसे प्राप्त हो? इन सब प्रश्नों का समाधान ढूँढ़ने के लिए आत्म विज्ञान की ही सहायता लेनी पड़ती है। अन्तरात्मा मन और इन्द्रिय समूह का प्रयोजन और उपभोग इसी विज्ञान के आधार पर जाना जा सकता है। साँसारिक वस्तुओं का समुचित उपयोग कर सकने की जितनी अधिक और जितनी सही जानकारी होगी उतनी भौतिक जीवन में सुविधा रहेगी पर जो जीतना अनजान होगा वह उतना ही अभावग्रस्त, आपत्तिग्रस्त और असफल रहेगा। ठीक इसी प्रकार सुखी, संतुष्ट और समुन्नत जीवन जीने के लिए सही आत्म विज्ञान की सही जानकारी का होना आवश्यक है। इसके बिना हमारा चेतन तत्व खिन्न-पतित और दुर्गति की स्थिति में ही पड़ा रहेगा।


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“कठोर काम में अनवरत लगे रहने का अभ्यास डालो। पढ़ते समय सारी दुनिया को एक ओर रख दो और पुस्तकों में लेखक की विचारधारा में-डूब जाओ। यही तुम्हारी समाधि है। यही तुम्हारी उपासना है और तुम्हारी पूजा है। कठिन परिश्रम करना सीखो। खूब गढ़कर, जमकर मेहनत करो और अपने उच्च और पवित्र आदर्श को कभी मत भूलो। शास्त्र और शस्त्र, बुद्धिबल और बाहुबल, दोनों का उपार्जन करो।” -मालवीय जी


शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन पर निर्भर है।

कोलम्बिया विश्वविद्यालय के जीव-विज्ञानी डॉ0 एच॰ सिक्स ने अपने अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि शरीर को रासायनिक दोषों से और जैव व्याधियों से मुक्त रखा जा सके तो मनुष्य आसानी से आठ सौ वर्ष जी सकता है। वे कहते हैं अधिक सक्रियता, दौड़-धूप, उत्तेजना और गर्मी शरीर को संतप्त करके उसकी जीवनी शक्ति के भण्डार को बेतरह खर्च करती है। यदि भीतरी अवयवों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े और उन्हें स्वाभाविक सरल रीति से काम करने दिया जाय तो वे इतने समर्थ रह सकते हैं कि क्षति-पूर्ति का क्रम आसानी से चलता रहे। नशेबाजी से लेकर वासना, क्रोध, चिन्ता आदि के आवेशों तक कितने ही ऐसे कारण हैं जो जितने अनावश्यक उससे ज्यादा हानिकारक हैं। शान्त, सरल सन्तुष्ट और प्रसन्न जीवन जीने से निरर्थक उत्तेजना से बचा जा सकता है और जीवनी-शक्ति के क्षरण को बचाकर लम्बा जीवन जिया जा सकता है।

उत्तेजित आहार और उद्विग्न चिन्तन स्नायु संस्थान को संतप्त करके मनुष्य को दुर्बल बनाता है और पूरी आयु भोगने से वंचित रखता है। इस अवाँछनीय ताप से बचा जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु के प्रभाव से बचने का मार्ग खोजा जा सकता है। निवास के स्थान यदि शीत प्रवेश में न हों तो उन्हें ठण्डा रखने के लिए सम्भव प्रयत्न किया जा सकता है।

मानव शरीर का तापमान प्रायः 98.6 अंश फारेनहाइट होता है। इसे कम करके आधा अर्थात् 49 किया जा सके तो आयुष्य में आशातीत वृद्धि हो सकती है और लगभग दो हजार वर्ष जिया जा सकता है। डॉक्टर लूबे की नई खोज यह है कि शरीर के जीव कोषों की क्षतिपूर्ति 98 तापमान रहने पर जिस क्रम से होती है-तापमान आधा होने पर उससे बीस गुनी अधिक क्षति-पूर्ति हो सकती है। उससे आयुष्य का बढ़ना सुनिश्चित है। मृत्यु-जीव कोषों के समूचे क्षय को ही कहते हैं। जीव कोष पुराने मरते और नये जन्मते रहते हैं। यह क्षति-पूर्ति जब तक होती रहेगी मृत्यु की आशंका न रहेगी। दीर्घ -जीवन का मूल आधार यही हो सकता है कि जीव-कोषों में दुर्बलता न आने पाये, उनकी क्षति स्वल्प हो और नवीन कोषों के उत्पन्न होने के क्रम में शिथिलता न आने पाये। यह व्यवस्था बाह्य ताप और आन्तरिक सन्ताप को घटाकर की जा सकती है और अब की अपेक्षा कई गुनी अवधि तक जिया जा सकना सम्भव हो सकता है।

अमेरिका के राकले फर इन्स्टीट्यूट के जीव-विज्ञान विभाग में पिछले लम्बे समय से जीवाणुओं की जीवनचर्या जानने का प्रयास चल रहा है। ‘अमीबा और पैराथीशियम जीवाणुओं को उनका आहार तो पहुँचाया जाता रहा पर दबाव पड़ने और नष्ट होने का अवसर न आने दिया गया। फलतः एक कोष 900 पीढ़ियाँ जन्म दे चुका पर उसका जीवन अक्षुण्य बना रहा। यदि आवश्यक सुविधाएँ मिल सकें तो यह कोष और भी अधिक समय तक बिना क्षतिग्रस्त हुए जीवित रखे जा सकते हैं ऐसी दशा में मनुष्य अति दीर्घकालीन आयुष्य प्राप्त कर सकता है और लगभग अमरता की स्थिति में पहुँच सकता है।

भारतीय योग शास्त्र इस तथ्य को सदा से स्वीकार करता रहा है। सिद्ध पुरुष निराहार रह कर भी दीर्घ जीवन प्राप्त करते रहे हैं-

नाश्नन्ति ददुराः शीते, फणिनः पवनाशनाः।

शीतकाल में मेढ़क कुछ भी नहीं खाते, साँप वायु सेवन करके रह जाते हैं। कछुए अंग छिपाये पड़े रहते हैं। योगी भी ऐसा कर सकते हैं।

रीछ बर्फीले तूफानों के दिनों में अपनी माँद में जा छिपता है और ऋतु परिवर्तन होने पर ही आहार की तलाश में बाहर आता है। ऐसे ही उदाहरण अजगर आदि के भी हैं। इतना तो निश्चित है कि शीत की प्रधानता और विश्राम की बहुलता होने पर जीव कोषों का क्षय बन्द हो जाता है और उनकी क्षति-पूर्ति के लिए भूख आदि भी नहीं लगती।

स्वस्थ, परिपुष्ट और आयुष्यवान जीवन जीने के लिए आहार तालिकाओं को ढूंढ़ते रहना, पौष्टिक भोजन का ताना-बाना बुनते रहना और डाक्टरों केमिस्टों के परामर्श को वेदवाक्य मानकर चलना ही काफी नहीं है वरन् इसके लिए कुछ और अधिक गहराई में जाने की जरूरत पड़ेगी, और उस मर्म को समझना पड़ेगा जिसके ऊपर निरोग जीवन की आधारशिला रखी हुई है।

यदि मात्र आहार और दवाओं पर स्वास्थ्य निर्भर रहा होता तो कोई भी अमीर आदमी न तो कमजोर दिखाई पड़ता न बीमार और न वह अधूरी आयु में ही काल कवलित होता। उनके पास धन के प्रचुर साधन मौजूद हैं। कितनी ही कीमती चीजें कितनी ही अधिक मात्रा में उपलब्ध करने और खाने की उन्हें पूरी सुविधा है। वे चाहें तो सोना भी खाते रह सकते हैं। यदि आहार पर स्वास्थ्य निर्भर रहा होता तो ये साधन सम्पन्न लोग बहुमूल्य डॉक्टरों द्वारा अनुमोदित, बढ़िया चीजें खाकर प्रचुर शरीर सुख भोगते और निर्धन लोग जिनके लिए रूखा-सुखा खाकर भी पेट भरना कठिन पड़ता है वे रुग्ण दुर्बल दीखते। पर होता ठीक उलटा है। टॉनिक, विटामिन, मिनिरल, संतुलित आहार, पुष्टाई बेचने वाले-दूसरों को बलवान पहलवान बनाने का दावा करने वाले, औषधि विक्रेता और चिकित्सक ही नहीं उन तथाकथित संजीवनी बूटियों को बनाने वाले तो अवश्य ही निरोग रहे होते पर यदि उन्हीं लोगों को जाँचा जाय तो डॉक्टर लोग तथा उनका परिवार अन्य मरीजों की अपेक्षा अच्छी स्थिति में नहीं मिलेंगे वरन् और भी अधिक दुर्दशा-ग्रस्त हो रहे होंगे।

यही बात उन अमीर लोगों की है जिनके फैमिली डॉक्टर सामने ही बैठे रहते हैं और पानी भी उन्हें पूछकर ही पिया जाता है। अपनी समझ से वे अमृत के अतिरिक्त और जो कुछ दुनिया में है सो सब कुछ पाप पुण्य खाते हैं पर न अस्वस्थता पिण्ड छोड़ती है न दुर्बलता। दवाओं के आधार पर ही उनकी जिन्दगी की गाड़ी किसी प्रकार आगे धकेली जाती रहती है।

यहाँ न पौष्टिक सन्तुलित आहार की निन्दा की जा रही है न दवादारु को निरर्थक बताया जा रहा है। समय पर एक सीमा तक उनकी भी उपयोगिता हो सकती है पर यह तथ्य हमें समझ ही लेना चाहिए कि स्वास्थ्य का आधार इतना उथला नहीं है। उसे बनाये रखने और बढ़ाने के लिए उन बालों पर ध्यान दिया जान चाहिए जो अन्तरंग जीवन से संबंधित हैं। वस्तुतः जो कुछ हम बाहर देखते हैं वह अन्तःस्थिति की प्रतिक्रिया मात्र होती है।

अन्तःचेतना का जो स्तर होता है उसी के अनुरूप मन, मस्तिष्क, नाड़ी संस्थान एवं अवयवों के क्रिया-कलाप का ढाँचा विनिर्मित होता है और ढर्रा चलता है। आन्तरिक उद्वेग की ऊष्मा सारे ढाँचे को प्रभावित करती है और इतना ताप पैदा कर देती है जिससे जीवन तत्व भाड़ में भुनने वाले चने की तरह अपनी कोमलता और सरसता से वंचित होते रहें। मनोविकार एक प्रकार की ऐसी आग भीतर ही भीतर जलाये रखते हैं जिससे स्वास्थ्य के लिए उत्तरदायी तत्व स्वतः ही विनष्ट होते चले जायें। इन्द्रिय भोगों की लपक और संग्रह स्वामित्व की ललक इन्हें वासना और तृष्णा कहा जाता है यह न बुझने वाली अग्नि शिखायें जिनके भीतर जल रही होंगी वे अपनी शान्ति और समस्वरता निरन्तर खोते चले जायेंगे।

जिन्हें चिन्ता, भय, क्रोध, असन्तोष, सवार रहते हैं, जो निराश और अवसादग्रस्त बैठे रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध कपट और मत्सर की दुष्प्रवृत्तियाँ जिन पर सवार रहती हैं उनका अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न रहता है। मन में तनिक भी सन्तोष समाधान नहीं होता। यह उद्विग्नता सारी अन्तः स्थिति में ज्वारभाटा उठाती और उसे बेतरह मथती रहती है तो इस विषम स्थिति में ग्रस्त किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य संतुलित नहीं रह सकता।

अत्यधिक श्रम, निरन्तर की उछलकूद शक्ति कोषों का अनावश्यक क्षरण करती रहती हैं। अनियमित और अव्यवस्थित दिनचर्या का भी ऐसा ही कुप्रभाव पड़ता है। शरीर की स्थिरता का भी ऐसा ही कुप्रभाव पड़ता है। शरीर की स्थिरता रखने वाली अन्तरंग प्रणाली जब एक ढर्रे को अपना लेती है तो सब कुछ ठीक से चलने लगता है। पर यदि हर दिन नई-नई दिनचर्या, क्रम व्यवस्था और रीति-नीति बदलें तो उस स्थिति में भीतर भी कोई प्रणाली निर्धारित नहीं हो पाती और उस अव्यवस्था से पाचन प्रणाली से लेकर स्नायु संस्थान की सुरक्षा के लिए नियमित और निर्धारित दिनचर्या आवश्यक है।

अनावश्यक ताप पैदा करने वाले मनोविकार-विक्षोभ एवं उद्देश्यों से बचने और शान्ति सन्तुलित, सन्तुष्ट और हँसी-खुशी का नियमित जीवन जीने का प्रयत्न करना चाहिए। आहार सीमित और समय पर हो। सादा और अनुत्तेजक साथ ही भूख से कम मात्रा में। ऐसी सावधानी बरतने से पेट में वह ताप उत्पन्न नहीं होता जिसके कारण तीन चौथाई मनुष्यों को अपनी जीवनी-शक्ति से बुरी तरह हाथ धोना पड़ता है।

अन्तरंग में बढ़ी हुई उत्तेजना श्वास-प्रश्वास की गति को तीव्र करती है। क्रोध की स्थिति में नाड़ी की, हृदय की गति बहुत बढ़ जाती है। काम-सेवन के समय भी यह चाल बहुत तेज हो जाती है। बढ़े हुए श्वास आमतौर से जीव की शक्ति का क्षरण ही करते हैं। प्राणायाम-व्यायाम के द्वारा फेफड़ों की कसरत करके उन्हें परिपुष्ट रखने की प्रक्रिया उत्तम है पर यह सीमित प्रयोजन के लिए सीमित समय तक ही होना चाहिए। यदि अधिक समय शरीर को उत्तेजित स्थिति में रखा जायगा और श्वास की गति बढ़ी रहे तो उसको अनावश्यक ताप उत्पन्न होगा और उसका परिणाम अस्वस्थता बन कर सामने आयेगा। मन की ही नहीं हमारे शरीर की स्थिति भी अधिकतर सन्तुलित ही रहनी चाहिए। स्वास्थ्य की स्थिरता के लिए इसका ध्यान रखा जाना भी आवश्यक है।

श्वास-प्रश्वास क्रिया के तीव्र और मन्द रहने का भी आयुष्य से बड़ा संबंध है। जो जीव हाँफते रहते हैं जिनके श्वास तेज चलते है वे अधिक समय नहीं जीतें। इनकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त जिनकी साँस मन्द चलती है वे अधिक दिन जीवित रहते हैं। इस संदर्भ में कुछ प्राणियों की प्रति मिनट श्वास-प्रक्रिया की दर और आयुष्य की तालिका इस प्रकार है-

जीव- श्वास प्रति मिनट- आयुष्य

कछुआ 5 150

साँप 7 120

हाथी 12 100

मनुष्य 12 100

घोड़ा 18 50

बिल्ली 25 12

बकरी 25 12

कुत्ता 26 13

कबूतर 36 9

खरगोश 32 8

कितने ही सिद्ध पुरुष अभी भी दीर्घजीवी पाये जाते हैं और उनकी आयु कई सौ वर्षों की प्रमाणित होती हैं।


Quotation

जीवन और मृत्यु, शुभ और अशुभ ज्ञान और अज्ञान का मिश्रण ही माया अथवा जगत् प्रपञ्च कहलाता है। तुम इस जाल के भीतर अनन्तकाल तक सुख ढूँढ़ते रहो तुम्हें उसमें सुख के साथ बहुत दुःख तथा अशुभ भी मिलेगा। यह कहना कि मैं केवल शुभ ही लूँगा अशुभ नहीं, निरा लड़कपन है यह असम्भव है।

-स्वामी विवेकानन्द

इसका एक ही कारण है उनका शीत प्रदेश में निवास, मनःसंस्थान में शान्ति सन्तुलन, अनावश्यक श्रम सन्ताप से बचतः वे अपना रहन-सहन इसी ढाँचे में ढालते हैं और प्राणायाम विद्या द्वारा श्वास प्रणाली पर नियन्त्रण स्थापित करके उसकी गति उतनी बना लेते हैं जिससे जीवित रहने भर का काम तो चल जाय पर अनावश्यक शक्तिक्षय की तनिक भी गुंजाइश न रहे।

निरोग, सशक्त और दीर्घजीवी शारीरिक स्थिति बनाये रखने के लिए आहार-विहार के सन्तुलन का ध्यान रखने के अतिरिक्त इस तथ्य को भी स्मरण रखना चाहिए कि आन्तरिक शान्ति और समस्वरता का आरोग्य के साथ अविच्छिन्न संबंध है। मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने पर ही शारीरिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।


दयानिधान भगवान के महान अनुदान

भगवान को दया निधान, करुणा सिन्धु, अजस्र दानी कहा गया है। उसका कितना अधिक अनुदान मनुष्य को मिला है उसे यदि समझा जा सके तो उस करुणा सागर की-अनुकम्पा के प्रति हृदय कृतज्ञता से भर जाय। और इसके लिए भावना उमड़े कि ऐसे उपकारी अभिभावक के अनुशासन में रहना, निर्देशित रीति-नीति का पालन करना ही उचित है। मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता सर्वविदित है। इस श्रेष्ठता को प्राप्त करने के साथ-साथ उस पर यह उत्तरदायित्व भी आया कि भगवान की सृष्टि को सुन्दर, समुन्नत और सुरभित बनाने के लिए काम करे। और ईश्वर की उस इच्छा, आशा को पूरी करने करे जो मनुष्य को विशेष अनुदान देते समय उसने अपने मन में रखी थी।

भगवान मनुष्य के लिए ही नहीं अपने सभी पुत्रों के प्रति उदार है। प्रत्येक जीव को उसने उनकी स्थिति एवं आवश्यकता के अनुरूप क्षमतायें और विशेषतायें दी हैं। यदि प्राणियों को शरीर ही मिले होते कुछ अतिरिक्त विशेषता न मिली होती तो उनका जीवन ही दुर्लभ हो जाता।

परमेश्वर की प्राणियों से सम्बन्धित शक्ति, जिसे प्रकृति कहते हैं-अतिशय उदार है। उसने मुक्त हस्त से प्राणियों को बहुत कुछ दिया है। जीवन धारण करने और सुख-सुविधा के साथ जीने के लिए ही नहीं-आत्म-रक्षा के लिए भी वे विशेषतायें दी हैं जिनके आधार पर वे आगत विपत्ति एवं कठिनाई का मुकाबला करते हुए अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकें।

किसी भी प्राणी पर दृष्टिपात करें, उसे भी प्रकृति का प्यार, संरक्षण और अनुदान प्राप्त हुआ है। ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है। जन्मदात्री प्रकृति ‘कुमाता’ नहीं हो सकती उसका असीम स्नेह तो सब पर बरसता है। अन्य प्राणी उसका सदुपयोग करते हैं और दुर्बल, असमर्थ प्रतीत होते हुए भी अपने अस्तित्व की रक्षा कर लेते हैं।

दक्षिणी अमेरिका में एक पक्षी पाया जाता है उसका नाम है ‘स्लाथ’ यह संसार के सबसे अधिक आलसी जीव के रूप में विख्यात है। अपना अधिकाँश जीवन का वह पेड़ पर उल्टा लटके-लटके ही काट देता है। अपना आस-पास की टहनियाँ और हरे पत्ते की उसका भोजन है। वर्षा ऋतु आती है पानी बरसता है किन्तु वह अपनी शीर्षासन मुद्रा का परित्याग नहीं करता। यह प्रकृति के ज्ञान और उसकी महान् कृपा का ही फल कहना चाहिए कि उसके रोयें सीधे न होकर उलटे बनायें गये हैं जिससे उसके शरीर पर आया सारा पानी टपक जाता है अन्यथा उसका नाम अब तक लुप्त प्रायः जीवों की सारणी में आ गया होता।

व्हेल मछली संसार का सबसे बड़ा जानवर है। बाइबिल में इसे ‘महामत्स्य’ लिखा गया है और सचमुच ही उसका मीलों लम्बा दैत्याकार इस सम्बोधन के सर्वथा अनुरूप है। जब वह साँस छोड़ती है तो ऐसा लगता है जैसे समुद्र के नीचे से फव्वारे छूट रहे हों। एक बार अटलांटिक महासागर में व्हेल का शिकार किया गया। साँघातिक चोट खाये मत्स्यराज का पेट चीरा गया तो उसके पेट के भीतर से पूरे 6 फीट लम्बा और 4 फीट चौड़ा एक कटल मछली का टुकड़ा निकला। 18 फीट लम्बा एक अस्थि पिंजर जो तब तक पच नहीं सका था और शार्क मछली का था उसके पेट से निकला।

इतनी बड़ी मछली जो पचासों हाथियों को भी तौल सकती है समुद्र के सारे जीवों को साफ कर गई होती यदि प्रकृति ने उसका मुँह छोटा न बनाया होता। इसका जबड़ा इतना छोटा होता है कि हेटिंग नामक समुद्री मछली उसके गले में फँसकर श्वाँस की गति में बाधा उत्पन्न कर सकती। इस प्रकार प्रकृति अन्य समुद्री जीवों की रक्षा करती है।

उड़ने से लेकर मौसम के हर उतार-चढ़ावों को बर्दाश्त करने की जितनी क्षमता चिड़िया के पंखों में होती है वैज्ञानिक यह मानते है कि प्रकृति की उस रचना के समकक्ष आज तक कोई भी आविष्कार मनुष्य नहीं कर सका।

दक्षिण अमेरिका का उत्तरी कार्डिलरा प्रदेश सूखा अनुपजाऊ पहाड़ी क्षेत्र है न तो कोई पैदावार, न दूध देने वाले पशुओं की व्यवस्था। वृक्ष भी सूखी पत्तियों वाले पाये जाते हैं। प्रकृति को “कुमाता भवति” मान लिया जाता यदि उसने इस सुखे प्रदेश में जीवन की रक्षा का प्रबन्ध न किया होता। दया दर्शायी उसने और यह एक पौधा पैदा किया-गोवृक्ष (काऊ ट्री)। देखने में इसकी शाखायें मृत और सूखी जान पड़ती हैं पर जब इसका तना कुरेदा जाता है तो उसमें एक प्रकार का दूध निकलता है जो मीठा और पौष्टिक ही नहीं होता वरन् अन्न और तरकारियों में पाये जाने वाले सारे तत्व भी उसमें पाये जाते हैं। प्रातःकाल भूख लगती है और प्रातःकाल सूर्योदय के समय ही यह इतना दूध दे देता है कि वहाँ के नीग्रो दिन भर अपना काम चलाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस दूध की जाँच की तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि इस दूध और पशुओं द्वारा प्राप्त दूध में बहुत घनिष्ठ एकता है।

शायद प्रकृति को मालूम था कि सहारा जैसे रेगिस्तान में ऊँट को ही एकमात्र वाहन बनना पड़ेगा। वहाँ मनुष्य को तो जल मिलता नहीं ऊँट को कौन पानी पिलायेगा इसकी चिन्ता उसने स्वतः की और उसको वह क्षमता प्रदान की जिससे वह एक बार में पूरे 90 लीटर तक पानी पी लेता है और उससे सप्ताहों तक कड़ी धूप में भी अपना गुजारा कर लेता है।

शेर यों तो किसी का भी शिकार कर डालता है किन्तु यदि उसे 5 मील की दूरी तक एक जिराफ दिखाई दे जाये तो इससे कम दूरी पर अन्य जानवर तो भी वह कितना भी परिश्रम करना पड़े जिराफ को ही मारने की कोशिश करता है। एक प्रकार का गुलाब जामुन है जिराफ शेर के लिए। फिर अब तक जिराफ की नस्ल बची क्यों है उत्तर फिर वही मिलेगा-प्रकृति की दया और ममता के कारण। उसने जिराफ की खाल ऐसी बनाई है कि वह पेड़ों के बीच खड़ा हो जाता है तो बहुत पास पहुँचकर भी उसे पहचानना कठिन हो जाता है।

साँप-अच्छा हुआ कि प्रकृति ने उसे पृथ्वी के अन्दर छिपा रहने वाला जीव बनाया वरना एक साँप का जहर हजार व्यक्तियों को मार सकता है। जावा और मलेशिया में एक प्रकार के सर्प पाये जाते हैं जिनके पंख होते हैं और वह उड़ते भी हैं। वे अधिकाँश एक पेड़ से दूसरे पर उड़कर ही जाते हैं उड़ते समय गोलाकार होते हुए उतरते हैं। इस प्रकार उन्हें आहार प्राप्त करने की, आत्मरक्षा की तथा क्रीड़ा-कल्लोल की त्रिविध सुविधायें मिली हुई हैं।

पहलवान पहले अपने घरेलू अखाड़ों में कुश्ती का अभ्यास करते हैं तब कहीं बाहरी दंगलों में दाँव-पेच दिखाने का साहस करते हैं। विदेशी सैनिकों से लड़ने के पहले देशी फौजें अपने आपको दो हिस्सों में बाँटकर युद्ध


Quotation

पक्षियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सानों की तरह धरती पर चलना सीखना है।

-राधाकृष्णन

का नकली अभ्यास करती हैं। ऐसा न किया जाये तो असली युद्ध लड़ना मुश्किल पड़ जाये। इस तरह का सूक्ष्म ज्ञान तक प्रकृति ने अपने नन्हें-नन्हें मनुष्येत्तर जीवों को प्रदान किया है।

घरों में पाई जाने वाली गौरैया जितनी सीधी और सरल होती है उतनी ही लड़ाकू पर शत्रु से लड़ने के लिए जवाँमर्दी, वह नकली युद्धाभ्यास करके पैदा करती है। उसकी यह नकली लड़ाइयाँ देखते ही बनती है ऐसे दायें-बायें से आक्रमण और बचाव करती हैं मानो, वियतनाम और वियतकाँग का गोरिल्ला युद्ध चल रहा हो।

नर भुनगा आक्रमण करने में कोई ज्यादा चतुर नहीं होता वह दुश्मन को हरा भी नहीं सकता फिर बेचारा अपनी जीवन रक्षा कैसे करता? उसे प्रकृति ने धमकाने और डराकर शत्रु को भगाने की विद्या सिखाई कोई शत्रु आता है तो वह अपने जबड़े ऐसे फैलाता है मानो कच्चा ही निगल जायेगा। आक्रमणकारी डरकर भाग जाता है तो भुनगा मौज से दूसरी तरफ चल देता है इसे प्रकृति का प्रशिक्षण न कहा जाये तो और क्या कहा जाये?

कार्बोनिक एसिड एक जहरीला रसायन है इसे खाकर कोई जिन्दा नहीं रह सकता। उसकी मात्रा अपने स्वाभाविक विकास दर से बढ़ती रहती तो सारा संसार विषमय हो जाता। फिर बात क्या है जो अभी तक पृथ्वी अमृतत्व से ओत-प्रोत है। प्रोफेसर पी0जी0गे नामक अंग्रेज वैज्ञानिक ने इसकी शोध की तो पाया कि मिट्टी में कुछ ऐसे कीटाणु होते हैं जो इस जगह को भी बड़े चाव से खा पी लेते हैं और इस तरह वे धरती माता को विषाक्त होने से बचा लेते हैं। ऐसे कीटाणु एक दो नहीं 200 के लगभग तो अब तक खोजे भी जा चुके हैं।

एक यह नन्हें कीटाणु हैं जो सामान्य होते हुए भी असामान्य कार्य करते हैं-भगवान् शिव के समान। एक है इन्सान जो संसार का विष-मानवता पर छाये विषैले वातावरण को मिटाने के लिए एक इंच भी आगे नहीं बढ़ता भगवान् द्वारा प्रदत्त अपनी असामान्यता को कलंकित करता है। प्रकृति प्रदत्त विशेषताओं का मनुष्य ने यदि सदुपयोग किया होता तो निस्सन्देह यह धरती तथाकथित स्वर्ग से कम नहीं वरन् अधिक ही साधन-सुविधाओं और सुख-शान्ति की प्रचुरताओं से भरी-पूरी दीखती।


आदमी का संकल्प-बल महान है

बचपन में मैं बहुत दुबला था। जरा सी मेहनत करने पर चक्कर आते थे। पेचिश की बीमारी सदा घेरे रहती थी। भोजन न पचता था न अच्छा लगता था। कोई तन्दुरुस्त व्यक्ति सामने से निकलता तो ईर्ष्या होती। सोचता काश, मुझे भी भगवान ने ऐसा ही निरोग बनाया होता।

शीशे में अपना शरीर देखता तो लज्जा से सिर नीचा हो जाता। उदासी छा जाती। मन रो उठता। सोचता ऐसी बेकार जिन्दगी भी किस काम की। 21 वर्ष की आयु में गाँव के एक स्कूल में नौकरी मिल गई। मास्टर हो गया, अस्सी रुपये महीने का ड्राईंग मास्टर हुआ। जीवन इसी परिधि में घिर गया दीखा।

न जाने कैसे आत्म विश्वास जागृत हुआ। मन कहने लगा आदमी का संकल्प-बल महान है। वह कुछ महत्वपूर्ण निश्चय करे और उसे पूरा करने के लिए निष्ठापूर्वक जुट जाय तो प्रगति की ऊँची मंजिल तक पहुँच सकता है।

बस मैंने अपना स्वास्थ्य सुधारने की सोची। व्यायाम की जानकारी प्राप्त की और उसे अपनाने के लिए जुट गया। लोग हँसते-देखना यह मरियल मास्टर अब पहलवान बनने चला है।

लोग हँसते रहे और मैं अपनी धुन में लगा रहा। सौभाग्यवश एक मार्गदर्शक भी मिल गये। उनने मन लगाकर मुझे कसरत सिखाई और पहलवानी के दाव-पेंच भी। प्रयत्न तो सभी अपने-अपने कामों में करते हैं और शरीर और मन से एक होकर-कार्य को लक्ष्य बनाकर उसी में तन्मय कोई बिरले ही होते हैं। मेरा व्यायाम-मेरी पहलवानी कुछ इसी किस्म की थी। सो सफल मनोरथ उसी एकात्म निष्ठा ने बनाया।

राष्ट्रीय व्यायाम विजेता, भारत केशरी जो कुछ भी कहा जाय उस सारी सफलता का श्रेय उस संकल्प बल को है। जिसे मैंने कल्पना, आकाँक्षा तक सीमित नहीं रखा वरन् समग्र कर्म निष्ठा में समाविष्ट कर लिया।

-हिन्द केशरी मास्टर चंदगी राम के साथ चर्चा प्रसंग।


कवि भी राष्ट्र-प्रहरी

सम्राट भोज राज-कवि का चुनाव करेंगे-यह घोषणा सम्पूर्ण राज्य में फैल गई। एक से एक धुरंधर कवि धारानगरी पहुँचने लगे। महाराज ने उन सब के स्वागत, निवास आदि का अच्छे से प्रबन्ध किया। आकर सभी कविगण अपने-अपने लिये नियत तम्बुओं में ठहरने लगे। नगर कवियों के कोलाहल से इस तरह भर गया मानों साँझ के समय पखेरू अपने-अपने कोटरों में तरह-तरह की ध्वनि में चहचहा रहे हों।

दूसरे दिन पहला कवि दरबार लगा। सरस्वती के एक से एक बाँके पुत्र सम्पूर्ण साज-सज्जा के साथ रंग-मंच पर ऐसे जा विराजे मानों वे कविता पाठ के लिए नहीं विवाह रचने आयें हों? कवियों की वह सज-धज, बाँकी और परस्पर रसीली वार्तायें देखते और सुनते ही बनती थी?

महामन्त्री बैताल ने सभा के प्रयोजन की घोषणा की कलामंच प्रजा के मन को व्यवस्थित और अनुशासित रखने वाला उन्हें प्रेरणाएं और प्रकाश देने वाला सबसे श्रेष्ठ साधन है! महाराज चाहते हैं कि उस मंच को चलाने, नियंत्रित और संगठित करने वाला कोई उस विद्या का ज्ञाता ही हो इसी उद्देश्य से यह कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है। ‘राजकवि’ की पदवी किसे दी जाये इसका निर्णय महाराज श्री स्वयं करेंगे।

और तब प्रारम्भ हुआ काव्य सम्मेलन। एक-एक कवि मंच पर आते और अपनी कविता का पाठ कर उपस्थित प्रजाजनों पर अपनी विद्वता की छाप डालने को कोशिश करते पर धारानगरी के नागरिक पागल नहीं थे जो हर कवि की विचारधारा से प्रभावित हो जाते?

नायिका भेद, विप्रलम्भ, विरह गीत, अभिसार कथाओं के ऐसे-ऐसे रंगीन गीत कवियों ने एक से एक बढ़-चढ़ कर सुनाये कि कवि दरबार में शृंगार रस मूर्तिमान हो उठा। एक कवि आये और अपनी कविता में सारी शक्ति नारी के नख-शिख वर्णन में लगाकर चले गये। दूसरे ने आकर उसके काम अंगों और काम-भावनाओं का ऐसा सुरम्य किन्तु स्पष्ट वर्णन किया मानों वे एक-एक कील को जोड़कर आभूषण बनाने वाले स्वर्णकार रहे हैं। किसी कवि ने नारी के परिधानों को उपमाओं और अलंकारों से सजा डाला तो किसी ने उसे साक्षात् रति के रूप में ही गढ़ डाला। शृंगार-वादी कवियों की ही बाढ़ देखकर महाराज भोज को लगा मानो कला मर गई और यह सब उसका मुर्दा ढो रहे हों? तथापि वे कुछ बोले नहीं।

तभी आया एक युवक कलाकार रंगमंच पर। सभी कवि एक साथ चिहुँक उठे-कल का छोकरा क्या जाने काव्य किसे कहते हैं? किन्तु उसके उदात्त स्वर और आदर्शवादी काव्य प्रेरणाओं ने एक बार फिर से महाराज को आश्वस्त कर दिया कि कला के सच्चे उपासक अभी नितान्त समाप्त नहीं हुए भले ही चारणों की कितनी ही वंश वृद्धि क्यों न हो गई हो।

इतने पर भी राजकवि का चुनाव नहीं हो पाया। कविगण अपने-अपने आवासों में चले गये। उनके लिये उत्तम स्वाद युक्त भोजन, मदिरा और न जाने क्या-क्या राज भोग उपस्थित थे वे सब उन पर टूट पड़े और सुरा-सुन्दरी के ताप से झुलस-झुलस कर थोड़ी ही देर में ढेर हो गये। एक युवक कवि दीवट जलाये बैठा है। उसकी लेखनी चल रही है, उसे पता ही नहीं चला कब अर्द्धरात्रि आ पहुँची। प्रहरी ने टोका आर्य! रात्रि काफी बीत चुकी है अब आपको विश्राम करना चाहिए। युवक ने प्रहरी की ओर देखा और कहा तात! तुम क्यों नहीं सो रहे हो? इसलिए कि-प्रहरी ने उत्तर दिया-कहीं ऐसा न हो कि शत्रु अचानक हमला कर दें और राष्ट्र पराधीन हो जाये? बस यही उत्तरदायित्व मेरा भी है तात!

प्रहरी कोई उत्तर दे इससे पूर्व ही महाराज ने आगे बढ़कर कहा - तात! मुझे जिसकी खोज थी वह तुम मिल गये। आज से तुम मेरे राजकवि हो-राजकवि भास्कर।


माँसाहार की बढ़ती हुई प्रवृत्ति हर दृष्टि से घातक

भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ 80 प्रतिशत लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है। कृषि के साथ पशुपालन भी जुड़ा हुआ है। इस देश की निर्धन स्थिति तथा छोटे जीवों को देखते हुए यहाँ बड़े पैमाने पर मशीनों से खेती नहीं हो सकती। बैल कृषि का मूल आधार है। दूध पर मनुष्यों की स्वास्थ्य रक्षा निर्भर है। यह दोनों कार्य पशुपालन पर निर्भर हैं। पशु धन यदि पर्याप्त मात्रा में रहें तो ही उपरोक्त दोनों प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं।

पशुधन में गौ ही इस देश के लिए सर्वोपरि महत्व की है। भैंस तथा भेड़-बकरियों के बच्चे कृषि के प्रयोजन को पूरा नहीं कर सकते और न उसका दूध ही गाय के दूध की तुलना में पौष्टिक एवं स्फूर्तिदायक है। गाय में सात्विकता की मात्रा अधिक रहने से गोरस का सेवन बुद्धि वृद्धि एवं सौम्य प्रकृति को लाभ भी देता है। अन्य पशुओं के दूध में यह विशेषता नहीं है। इन कारणों को देखते हुए यहाँ गौ को माता के सम्मान से सम्मानित किया गया है। भारतवासी गाय के अनुदानों का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उसे गौ माता कहकर सम्मानित करते हैं जो सब प्रकार उचित ही है।

पशुधन की-विशेषतया - गौधन की रक्षा भारतवर्ष की कृषि व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था को देखते हुए नितान्त आवश्यक है। मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाय तो भी पशु हमारे छोटे भाई हैं। मनुष्य बुद्धि तथा पुरुषार्थ में बड़ा है अतः उसे अपना बड़प्पन अपने से छोटे पशु-पक्षियों की रक्षा में प्रयुक्त करना चाहिए। बुद्धि के अतिरिक्त उसकी एक और मानवीय विशेषता दया है। दूसरों को कष्ट पीड़ित देखकर स्वयं करुणा से द्रवित हो उठना, पराया कष्ट अपना कष्ट मानकर और अपने स्वार्थ के लिए किसी को कष्ट न देना यह तो धर्म भावना है। जिसका हर धर्म में समर्थन किया गया है। जिस भारत ने संसार को प्रेम, करुणा और अहिंसा का सन्देश सुनाया था और भविष्य में भी मानवी करुणा का पुनर्जागरण इसी के हिस्से में आने वाला है। अपनी प्राचीन परम्पराओं और भावी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए हम भारतीयों के लिए यह आवश्यक है कि अपने यहाँ पशुधन की - गौधन की रक्षा में विशेष रूप से दिलचस्पी लें। देश की कृषि व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को देखते हुए तो यह और भी अधिक आवश्यक है।

दुर्भाग्य से इन दिनों अपने देश में पशु धन का ह्रास बुरी तरह हो रहा है। कृषि के लिए बैल और दूध के लिए गायों को निरन्तर कमी होती जा रही है। माँसाहार की बढ़ती हुई प्रवृत्ति जहाँ अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल रही है वहाँ हमारे प्रेम, करुणा, सहृदयता जैसे उच्च गुणों को भी घटाती जा रही है। दया और न्याय केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं रखे जाने चाहिए। वरन् यदि वे आदर्श सच्चे हैं तो उनका प्रयोग पशु धन तक भी व्यापक बनाया जाना चाहिए। माँसाहार का प्रचलन बढ़ने से हमारी जो भावनात्मक क्षति होगी उसका दुष्परिणाम परस्पर निर्दयता बरतने के रूप में भी सामने आवेगा। पशु वध और माँसाहार की वर्तमान स्थिति ऐसी है जिससे हमारा भविष्य अन्धकार मय ही बनेगा।

दस वर्ष पूर्व की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 43, 92, 35000 थी और देश में कुल मिला कर 17, 56, 71, 841 गोवंश तथा 5, 12, 37, 279 पशु थे। भैंस वंश अर्थात् 22, 68, 09, 120 पशु थे। देश में कुल कृषि योग्य भूमि, 42, 15, 21000 एकड़ थी। खाद्य विशेष समिति की रिपोर्ट के अनुसार आठ एकड़ जमीन के लिए एक जोड़ी बैल चाहिए। इस हिसाब से वर्तमान कृषि योग्य भूमि के लिए 10, 53, 80, 250, बैलों की आवश्यकता पड़ेगी। और तेल के कोल्हू, गाड़ियों तथा बोझा ढोने के लिए 15, 65000 की और आवश्यकता पड़ेगी। इस प्रकार कृषि तथा भार वाहन के लिए 10, 69, 45, 250 पशुओं की जरूरत हुई। इस प्रयोजन के लिए बैल, गाय और भैंसे, भैंस दोनों ही जोड़ लिए जायें तो गणना के अनुसार बैलों की संख्या 6, 86, 01, 614 तथा गायों की संख्या 21, 77, 169 नर भैंसे 66, 05, 250 तथा मादा भैंसे 4, 97, 534 हैं। इस प्रकार गाय, बैल, भैंसे, भैंसे जो कृषि और बोझ ढोने के काम में आ सकते हैं कुल मिला कर 7, 98, 81, 467 होते हैं। स्मरण रहे भारत में कहीं-कहीं गायें तथा मादा भैंसे भी कृषि एवं बोझ ढोने के काम में प्रयुक्त होते हैं। तब भी आज की कृषि एवं बोझ ढोने की आवश्यकता पूरी करने में 2,90,63,783 पशुओं की कमी रह जाती है।

असली घी और दूध का उत्पादन तेजी से गिर रहा है और नकली घी की उत्पत्ति तथा खपत जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखकर आश्चर्य होता है। पशुवध की वृद्धि के कारण विदेशों को चमड़ा, माँस आदि की जो वृद्धि हुई है उसके आँकड़ों को देखते हुए दुःख तथा निराशा ही हो सकती है। केवल विदेशी मुद्रा कमाने का लाभ ही ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए वरन् यह भी देखा जाना चाहिए कि पशु धन घटने से कृषि उत्पादन तथा दूध, घी के अभाव से स्वास्थ्य की कितनी हानि होगी।

पशु विशेषज्ञ डॉक्टर राइट ने मन्दी के दिनों में हिसाब लगाकर भारत को गोवंश से मिलने वाली आमदनी 11 अरब रुपया वार्षिक बताई थी। अब उस समय से कम से कम 8 गुनी वृद्धि हुई है। इस हिसाब से उस आय का अनुमान 88 अरब रुपया होना चाहिए। यह समस्त राष्ट्रीय आय का लगभग एक चौथाई होता है। देश के इतने बड़े उद्योग की ओर आंखें बन्द किये रहना या उपेक्षा बरतना किसी भी दृष्टि से समझदारी नहीं है।

इसके विपरीत माँस उत्पादन पर ही जोर दिया जा रहा है। पिछले दिनों की सरकारी सूचना के अनुसार देश में सरकारी 1314 और गैर सरकारी 770 अर्थात् कुल 2084 बड़े कसाई खाने हैं। जिनमें 45649 सुअर, 277970 भैंसे, 4234828 भेड़ें, 4502578 बकरी तथा 315512 अन्य पशु कटते हैं।

राष्ट्र-संघ की ‘फूड एण्ड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन’ और ‘वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन’ तथा माँस बाजार की रिपोर्ट तथा सिफारिशों से प्रभावित होकर भारत सरकार माँस उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष रूप से प्रयत्नशील है। उसके अनुसार सन् 81 तक वार्षिक गो माँस उत्पादन 192062500 मन तथा साधारण माँस 154650000 मन बढ़ाने की तजबीज है।

इस योजना के अनुसार मद्रास, दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता में दो-दो करोड़ रुपये की पूँजी से चार बड़े कसाई खाने चलाये जाते हैं। इनमें से प्रत्येक में प्रतिदिन 6000 भेड़, बकरे, 300 गाय, बैल, 100 सुअर छः घण्टे में काटे जा सकेंगे। यह एक पाली की बात हुई। जरूरत के अनुसार इसकी दूसरी पाली भी चलाई जा सकेगी और इन्हीं कारखानों में दुगुना पशुवध किया जा सकेगा।

कुछ दिन पूर्व बम्बई में विश्व शाकाहारी सम्मेलन हुआ था। उसमें संसार भर में आये हुए प्रतिनिधियों में से बहुतों ने भारत भ्रमण किया और यहाँ की परिस्थितियों को देखकर कहा था- “जहाँ माँस की अनुपयुक्तता को समझकर यूरोप के देश तेजी से शाकाहारी होते चले जा रहे हैं वहाँ दुर्भाग्य से भारत में माँसाहार की प्रवृत्ति बढ़ रही है।”

योरोपीय देश में अण्डा प्रयोग के स्थान पर ‘अधिक दूध पियो’ आन्दोलन को सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर बढ़ाया जा रहा है और इसके लिए साधन उत्पन्न किये जा रहे हैं पर अपने यहाँ दूध उत्पादन की उपेक्षा माँस व्यवसाय एवं अण्डा उत्पादन पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

औषधियों के नाम पर जो जीव हिंसा बढ़ रही है वह भी कम चिन्ताजनक नहीं है। अन्य जीवों को इस प्रकार उत्पीड़न देकर जो दवायें बनाई जा रही हैं वे सेवनकर्त्ता के शरीर को भले ही क्षणिक लाभ पहुँचा दें उसकी आत्मिक स्थिति को दुर्बल ही करेंगे। दूसरों को सताकर जो अपने सुख प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें निराश ही होना पड़ेगा। इस बढ़ती हुई हिंसा को रोकने के लिए यदि प्रयत्न न किया गया तो हमारी भौतिक समस्यायें तो हल हो ही नहीं सकेंगी अपना रहा बचा आत्मिक स्तर भी खो बैठेंगे।


‘कोलाहल’ एक भयावह जीवन संकट

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जहाँ अवाँछनीय आहार-विहार से गन्दगी और रोग कृमियों से बचना आवश्यक है उतना ही आवश्यक कोलाहल से बचना भी है। इस तथ्य को भारत में चिरकाल से जाना जाता रहा है। शान्त मनःस्थिति के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण अपनाने पर हमारे पूर्वज जोर देते रहे हैं और साथ ही यह भी कहते रहे हैं कि सुविकसित जीवन के लिए शान्त वातावरण भी नितान्त आवश्यक है।

प्राचीन काल में बड़े नगर नहीं थे। जो थे वे भी सघन बसे हुए नहीं थे, उनमें काफी छिरछिरापन था। सटाकर घर बनाना-कई-कई मंजिल की इमारतें खड़ी करना न कलात्मक समझा जाता था न सुखद। स्वच्छ वायु-खुला सूर्य प्रकाश और शान्त वातावरण इन तीनों को अन्न-जल और वस्त्रों की तरह ही आवश्यक माना जाता था। यह इसलिए था कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ठीक बनाये रखने की आरम्भिक आवश्यकता को पहले पूरा किया जाना चाहिए। धन, वैभव, ऐश्वर्य, यश, पद, विलास आदि तो पीछे की चीजें हैं, यदि शरीर और मन रुग्ण रहे तो फिर अन्य सफलताएँ और उपलब्धियाँ दुर्बल काया से किस प्रकार प्राप्त की जा सकेंगी? यदि प्राप्त कर भी ली गई तो उनका संरक्षण या उपयोग कैसे सम्भव होगा? स्वस्थ और समर्थ व्यक्ति स्वल्प साधनों से भी सुखी रह सकता है जबकि दुर्बल एवं रुग्ण व्यक्ति के लिए विपुल सम्पदा भी निरर्थक कष्टकारक और भार रूप ही सिद्ध होती है।

तथाकथित बुद्धि, विलास, वैज्ञानिक विकास, सभ्यता वृद्धि और सम्पदा बाहुल्य ने इन दिनों बड़े शहरों की भारी बढ़ोतरी है। देखते-देखते विगत दस वर्षों में बम्बई, दिल्ली, कानपुर, अहमदाबाद जैसे नगरों की आबादी दूनी हो गई। द्रुत गति से उसमें वृद्धि होती चली जा रही है। सघन बस्तियों में गगनचुम्बी अनेक मंजिलों के मकान बनते चले जा रहे हैं। रोशनी और हवा की भारी कमी पड़ती चली जा रही है। आधे से अधिक मकान ऐसे होते हैं जिसमें सूर्य की किरणों का कभी भी प्रवेश नहीं होता। स्वच्छ हवा की तो गुंजाइश ही कहाँ? बिजली की बत्तियाँ और पंखे ही सूर्य भगवान और पवन देवता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस पर भी कोलाहल की भरमार। जो वायु और प्रकाश के अभाव की अपेक्षा कुछ कम नहीं अधिक ही भयावह होता है।

शहरी सभ्यता-बड़े शहरों में रहने की प्रवृत्ति गरीब और मध्यम श्रेणी के लोगों के लिए एक प्रकार से प्राणघातक ही है। अमीर लोग तो साधनों के बल पर अपना बहुत कुछ बचाव कर भी लेते हैं। पर गरीबों के लिए तो यह चमकीले-भड़कीले बड़े नगर सड़-सड़ कर मरने के लिए एक प्रकार के नरक ही हैं। नई पीढ़ी के युवक इस बाहरी चकाचौंध से आकर्षित होकर शहरों में छुट-पुट नौकरी या धन्धा करने भागते हैं और अपने शान्त सरल देहाती जीवन का तिरस्कार करते हैं इस मनोवृत्ति को दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कहा जाय?

नगरों में बढ़ता हुआ कोलाहल धीरे-धीरे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अभिशाप ही बनता जा रहा है। कल कारखाने, मोटरें, लाउडस्पीकर, रेलें, भगदड़, वार्तालाप, आदि अनेक कारणों से कोलाहल की मात्रा बढ़ती ही चली जा रही है और वह प्रचलित बीमारियों में सबसे बड़ी सिद्ध हो रही है।

ध्वनि का माप करने की ईकाई ‘वेल’ कहलाती है। वेल की दशाँश को ‘डेली वेल’ कहते हैं। अन्तरिक्ष में 25 डेसी वेल कोलाहल ही मनुष्य के लिए पर्याप्त हैं। यह बढ़ने लगे तो संकट उत्पन्न होगा। 120 से 130 तक यह कोलाहल बढ़ जाय तो कानों में दर्द होने लगेगा। 140 से 150 तक पहुँचने पर उसे कुछ ही देर सुनने वाला कुछ समय के लिए बहरा ही हो जाता है।

रूस के ध्वनिवेत्ता ‘ब्लादीमिर चदनोव’ का कथन है कुछ समय पूर्व बड़े नगरों की सड़कों पर भी 60 डेसीबल से ज्यादा शोर नहीं होता था पर अब तो उसका औसत 100 से भी आगे बढ़ने लगा है। रात को भी वह 72 से नीचे नहीं घटती। जबकि स्वाभाविक निद्रा आने के लिए 25-30 से अधिक शोर नहीं होना चाहिए। बढ़े हुए शोर में रहने से उसका उत्तेजक प्रभाव नाड़ी संस्थान को धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त करता रहता है। फलतः स्नायु संस्थान, रक्त वाहिनियाँ, हृदय, मस्तिष्क सभी का संतुलन गड़बड़ाता है और उन प्रमुख अवयवों में कितने प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं।

आस्ट्रिया के शब्द वेत्ता-डॉ0 ग्रिफिथ ने बड़े शहरों का स्वास्थ्य सर्वेक्षण करके यह पाया कि यहाँ के 3 प्रतिशत लोगों को असमय में ही बुढ़ापा आ घेरता है। यहाँ के निवासियों की आयु औसतन आठ वर्ष घट जाती है। इस समय से पूर्व की अकाल मृत्यु का कारण शहरी वातावरण में बढ़ा कोलाहल ही होता है। श्रमिकों की क्षमता 4 प्रतिशत कम हो जाती है वे थके हुए रहते हैं और साधारण स्वस्थ मनुष्य की तुलना में 6 प्रतिशत ही काम कर पाते हैं। उनके काम में गलतियों की संख्या अनुभव एवं अभ्यास से घटते चलने की अपेक्षा बढ़ती ही जाती है और पुराने श्रमिक अपेक्षाकृत अधिक गलती करते हैं। वह जानबूझ कर नहीं होता, शोर के कारण उत्पन्न हुई उनकी स्नायविक दुर्बलता से ही ऐसा होता है।

अमेरिका में यान्त्रिक विकास सबसे अधिक है। वहाँ के 45 लाख कारखाना मजदूरों में से दस लाख के कान खराब पाये गये। इंग्लैण्ड में बड़े नगरों के सर्वेक्षण की रिपोर्ट है कि वहाँ एक तिहाई स्त्रियाँ और एक चौथाई पुरुष न्यूरोसिस (अर्ध विक्षिप्तता) के शिकार बने हुए हैं। फ्राँस की औद्योगिक बस्तियों के पागल खाने बताते हैं कि हर पाँच पीछे एक पागल कोलाहल की उत्तेजना से अपना दिमाग खो बैठा है। पूरी निद्रा न ले सकने वाले जब तेज सवारियाँ चलाते हैं तो सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में बेतरह अभिवृद्धि होती है।

साइन्स डाइजेस्ट के एक लेख में कुछ समय पूर्व बताया गया था कि कनाडा की मान्ट्रियल विश्व-विद्यालय में शोर के प्रभाव का चूहों पर परीक्षण किया गया। कोलाहल में रहने के कारण उन सभी के स्नायु संस्थान गड़बड़ा गये। शोधकर्ताओं का कथन है कि ऐसे उत्तेजित वातावरण के कारण मनुष्यों को अक्सर, ग्रन्थि-क्षय, गुर्दे की खराबी, हृदय की धड़कन जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं। कोलाहल से प्रभावित रोगियों की चिकित्सा में संलग्न डॉक्टर सेक्यूएल रोजेन का कथन है हम कोलाहल को क्षमा कर सकते हैं पर कोलाहल हमें कभी क्षमा नहीं करता। उसके संपर्क में आकर हमें बहुत कुछ खोना पड़ता है।”

शोर विशेषज्ञ उस रोजेन ने अपने विषय की शोध के सिलसिले में सूडान (अफ्रीका) का भी दौरा किया और वे ‘माबान’ कबीले के ऐसे लोगों के साथ रहे जिन्हें गाजे-बाजे तक का शौक नहीं था और शान्तिप्रिय वातावरण में रहने के आदी थे, उनमें से एक भी रक्तचाप, हृदय रोग, अनिद्रा सरीखी बीमारियों का मरीज नहीं था। रूस के 85 वर्षीय नागरिकों को इतनी श्रवण शक्ति पाई गई जितनी कि औसत 65 वर्ष के अमेरिकी की होती है। इस कारण वातावरण में शोर की न्यूनाधिकता ही है। डॉ0 रोजेन के प्रयोगों से शोर में रहने वाली चुहिया के बच्चे अधूरे और अस्त व्यस्त जन्मे और चूहों में से 80 प्रतिशत नसों की ऐंठन के शिकार हो गये।

संसार में आजकल लगभग 20 करोड़ से अधिक मोटरें दौड़ती है। ब्रिटेन के अर्थशास्त्री बार्बरा वार्ड का कथन है कि शहरों की असली निवासिनी यह कारें ही हैं और वे परमाणु बमों जितनी ही भयावह हैं। अन्तर इतना ही है कि बम तुरन्त मार डालते हैं और ये रगड़-रगड़ कर मारती हैं।

हवाई जहाज इस संकट को बढ़ाने में सबसे आगे हैं। अमेरिका के सुपर मगनक सोनिक जैट जहाज से उठने वाली ध्वनि तरंगों से केन्योन की कुछ प्राचीन गुफाएं दरार देकर मुँह फाड़ गईं। उन विमानों की ध्वनि तरंगें 50 मील का क्षेत्र प्रभावित करती चलती हैं। प्रभाव लगभग बिजली गिरने जैसी प्रतिक्रिया पैदा करता है। ब्रिटेन और फ्रान्स के सहयोग से बने कनवार्ड जैट की ध्वनि तरंगों से लन्दन के सेन्ट पाल गिरजे को तथा पार्लियामेन्ट भवन को खतरा उत्पन्न हो गया तो उसकी उड़ानें रोकी गईं। वैज्ञानिकों ने आगाह किया था कि इस विमान के रास्ते में 100 मील तक के दोनों और हृदय रोगियों का जीवन संकट में पड़ जायगा। समय-समय पर कोलाहल की वृद्धि के खतरे के संबंध में अन्य विशेषज्ञ भी चेतावनी देते रहे हैं। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के विज्ञान अधिकारी डॉक्टर वर्न नुडसन ने कहा है कि - जिस गति से आकाश में शोर बढ़ रहा है उसी तरह बढ़ता रहा तो कुछ ही समय में संक्रामक और संघात्मक रोग के कारणों में एक और आधार ‘शोर’ जुड़ जायगा। वह विषाक्त वायु की तरह ही प्राणघातक सिद्ध होगा। अमेरिका के चिकित्सक संघ के अधिकारी डॉक्टर गेराल्ड डोर मेन ने चेतावनी दी है कि-जहरीली गैसों की तरह ही कोलाहल हमारे वातावरण को विषाक्त करता चला जा रहा है। इससे जल, वायु, वनस्पति, जमीन और प्राणियों का बुरी तरह विनाश होगा। जीवाणु वेत्ता नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ0 राबर्ट कोच ने कहा है कि अगले दिनों हमें स्वास्थ्य के निर्मम शत्रु ‘कोलाहल’ से भी जूझना पड़ेगा। उसे परास्त किये बिना मनुष्य का जीवन संकट में पड़ जायगा। डॉक्टर रोस युएन, डॉक्टर मार्क्स जान्सन, डॉक्टर फ्लूगार्थ ने तो यहाँ तक कहा है कि शोर की वर्तमान अभिवृद्धि अगले दिनों बधिरों की ऐसी पीढ़ी पैदा करेगी जो तीस वर्ष के होते-होते आधी श्रवण शक्ति खो बैठेगी।

इस बढ़ते हुए कोलाहल के विरुद्ध सजग जनसमाज द्वारा आवाज भी उठाई जा रही है। अमेरिका में जनस्तर पर इसके लिए आन्दोलन भी खड़ा हुआ है। न्यूयार्क के कोलाहल निवारक आन्दोलन के अध्यक्ष श्री एलेक्स बैरन का कथन है कि - जनता को कोलाहल से होने वाली हानियों की यदि पूरी जानकारी मिल जाय तो वह सरकार पर वैसा ही दबाव डालेगी जैसा कि बुरे से बुरे संकट के निवारण के लिए डाला जाता है।

इस संकट से सरकारें भी परिचित हैं और वे उससे बचने के लिए कुछ उपकरण बनाने की-कुछ बन्धन प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। कई देशों में ऐसा कुछ-कुछ हो भी रहा है। कितने ही देशों में जन-स्तर पर इसके लिए आन्दोलन खड़े किये गये हैं और शोर करने वालों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा सर्वसाधारण को इस संदर्भ में प्रशिक्षित करने में यह आन्दोलन अपने ढंग से कुछ-कुछ कर भी रहे हैं।

सरकारी स्तर पर-जन-स्तर पर कोलाहल के समाधान के लिए प्रयत्न होने ही चाहिए। पर साथ ही व्यक्तिगत रूप से भी इस संदर्भ में ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें यह समझ कर चलना चाहिए कि औद्योगिक प्रगति के नाम पर अन्धाधुन्ध बढ़ते चले जा रहे कल-कारखानों की आगे वृद्धि ही होगी। सम्पन्नता के साथ-साथ मोटरें रेलें भी बढ़ेगी। छोटी मोटर बनने वाली है अनुमान है कि इसके बनते ही मोटरों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। सिनेमा, लाउडस्पीकर अपनी गतिविधियाँ कब कम करने वाले हैं। जनसंख्या की वृद्धि रुक नहीं रही है फलतः कारखाने यातायात के साथ यह भाग-दौड़


Quotation

शान्ति की कल्पना में तत्पर रहना, जबकि संघर्ष आवश्यक हो; निश्चित रूप से शान्ति मिटाना है। शान्ति के लिए भी संघर्ष आवश्यक है।

का बढ़ना भी स्वाभाविक है अब उसका परिणाम कोलाहलों की अधिकाधिक वृद्धि के रूप में ही सामने आयेगा और आज के बड़े नगर कल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट बन कर उभरेंगे।

परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए शहरों से पीछे हटकर देहातों में बसने की बात सोचनी चाहिए। अधिक कमाई-अधिक चमकीले चकाचौंध के आकर्षण में अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गँवा बैठना न बुद्धिमानी है न दूरदर्शिता।

प्राचीन काल में इस संकट को भली-भाँति समझा गया था इसलिए उस जमाने में शिक्षण संस्थाएं, शोध संस्थान, चिकित्सा केन्द्र, साधना स्थल, सुदूर देहातों में एकान्त एवं अन्य प्रदेशों में बनाये गये थे। जिसमें कोलाहल रहित वातावरण में शान्त संतुलित, स्वस्थ, सुखी और सुन्दर जीवन जिया जा सके, हमारे लिए भी उसी राह को अपनाना श्रेयस्कर होगा।


शाश्वत सौंदर्य की शोध

मगधराज बिम्बिसार के लिये आज का दिन बड़े हर्ष और गौरव का दिन है। भगवान बुद्ध लोक यश को निस्सार बताते हैं। वे चाहते है ऊँच-नीच छोटे-बड़े का भेद संसार में न रहें, जीव मात्र परस्पर समता, ममता और शुचिता का जीवन यापन करते हुए सुखपूर्वक रहें, वे छोटे बन कर रहना पसन्द करते हैं इसीलिए राजकीय अतिथि भवन में ठहरने की अपेक्षा उन्होंने बेलवन को अपना विश्राम-स्थल चुना है तथापि अतिथि वे सम्राट बिम्बिसार के ही हैं।

एक सामान्य परिचारिका से लेकर मगध नरेश तक की, आज की सज-धज राज्याभिषेक पर्व को फीका कर रही थी। समस्त स्वागत साज तैयार है किन्तु मगध साम्राज्ञी क्षेमा अब तक अन्यमनस्क है। अन्तःपुर के स्वाध्याय कक्ष में वे आचार्य धर्मपाल का जीवन-दर्शन पढ़ रही हैं। सागल नरेश भगवान् बुद्ध के परम निष्ठावान शिष्य थे उन्हीं की राज-कन्या क्षेमा के अन्तःकरण में तथागत के प्रति उपेक्षा का यह भाव खटकने वाला तो था ही। स्वयं नरेश उपस्थित हुए और पूछा-प्रियतमे समस्त राज-प्रासाद तथागत की अगवानी के लिये तैयार हैं किन्तु आपने अभी तक अपने परिधान भी बदले नहीं। राज-कुल अतिथि की यह अवमानना अच्छी नहीं- उठो और स्वागत हेतु शीघ्र तैयार हो जाओ।

करवट के साथ पुस्तक का प्रस्तुत पृष्ठ बदलते हुए साम्राज्ञी बोली - महाराज! जिस व्यक्ति के लिए संसार निस्सार हो, सौंदर्य निस्सार हो उस व्यक्ति के सम्मुख जाकर संसारी जीव क्या करे? वहाँ जाऊँगी तो उनका प्रवचन यही तो होगा-यह संसार भ्रम है, साँसारिक सुख मिथ्या है और मिथ्या है सौंदर्य जिनके आधार पर ही हम अपने जीवन को सजाते सँवारते और सुख की कल्पना करते हैं?

‘आखिर गृही हो या विरक्त’-बिम्बसार बोले-जाना तो एक न एक दिन सब को ही पड़ेगा इसलिए पारलौकिक लक्ष्य की तैयारी जाने से पूर्व किया जाना ठीक है। यदि इस तरह का ज्ञान और मार्गदर्शन किसी योग्य पथ-प्रदर्शक से मिलता है तो इसमें बुरा क्या? इसे तो अपना सौभाग्य मानना चाहिए प्रिये! साम्राज्ञी ने कोई उत्साह प्रदर्शित नहीं किया। इसी बीच तथागत वहाँ आ पहुँचे। समस्त राज-परिवार उनके स्वागत में दौड़ पड़ा। स्वयं महाराज भी उपस्थित हुए किन्तु क्षेमा नहीं आई। भगवान् बुद्ध ने क्षेमा जब कन्या ही थी तभी सागल में उसे देखा था इन्होंने क्षेमा की कुशल क्षेम पूछी और साथ ही समय भी गये कि उसका सौंदर्य अहंकार ही उसे यहाँ आने में बाधक बना है।

इधर वे अन्य सब लोगों से बातचीत कर रहे थे उधर उनके योग प्रभाव से क्षेमा को योग निद्रा आ गई। उसने देखा एक अत्यन्त सौंदर्यवती अप्सरा भगवान बुद्ध को चँवर डुला रही है। कुछ ही निमिष के स्वप्न में उन्होंने अप्सरा की बाल्यावस्था, यौवन और जरा तीनों अवस्थाएं देखीं। उसका शिथिल जर्जर गात, पके बाल, धँसी आँखें देखते ही क्षेमा का अंतर्मन व्याकुल हो उठा-कहाँ गया उसका यौवन, कहाँ गया वह सौंदर्य जो अंग-अंग से काम-भाव टपका रहा था। नींद टूट गई और उसके साथ ही उनकी मोह निद्रा भी। मनुष्य जीवन कितना निस्सार है मनुष्य अपने आपको कितना सजाता सँवारता है पर अन्त में विनाश के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं आता-आज सारी भौतिकता बालू के ढेर की भाँति ढह गई। क्षेमा दूसरे क्षण तथागत के चरणों में पड़ी क्षमा माँग रही थी और पूछ रही थी ‘आत्मोद्धार का मार्ग’?

तथागत मुस्कराये और बोले-बेटी क्षेम! आत्मोद्धार और आत्म-कल्याण का मार्ग मिलेगा अवश्य - तुम अपने बाह्य सौंदर्य को भूलकर भीतरी सौंदर्य की तलाश करो तुम्हारी जिज्ञासा जितनी प्रबल होती जायेगी लक्ष्य उतनी ही तेजी से अपने आप पास आता चला जायेगा।


आत्मिक प्रगति का आधार-संवेदना, सहानुभूति

अपने शरीर के किसी एक अंग में पीड़ा होती है तो सारा शरीर ही बेचैन हो जाता है। पैर में चोट लगी-आँखों में आँसू आ गये। हाथ में फोड़ा उठा-सिर की नींद गायब। शत्रु ने लाठी पीठ पर मारने का उपक्रम किया बचाने को हाथ आगे आये। एक अंग दुखी हो तो शरीर की सारी मशीन काम करती है और उसका निवारण करने के लिए जिससे जो उपाय बन पड़ता है करने लगता है। इसे कहते हैं सहानुभूति। साथियों की जैसी भी सुख-दुःख भरी स्थिति है, उसमें अपने को भी साझीदार मानना-यही आत्म विकास या आत्म विस्तार है। आत्मा की उन्नतिशील स्थिति की पहचान यही है कि अपना आत्म भाव कितना विस्तृत हो गया। दूसरों के साथ अपने को कितनी घनिष्ठता के साथ जोड़ लिया। अपने और पराये के जोड़ को ही योग कहते हैं। जो अपने को दूसरों के साथ जितना अधिक जुड़ा हुआ मानता है-वह उतना ही बड़ा योगी है। योगी का अपनापन अलग रहता ही नहीं, वह परायेपन के साथ इतना अधिक जुड़ जाता है कि या तो सब पराये कहे जाने वाले अपने हो जाते हैं, या फिर अपना आपा भी पराया लगने लगता है।

समाज व्यवस्था के अनुसार चोर वह है-जो किसी की वस्तु बिना उसे पूछे, छिपाकर अपने लिए प्राप्त करता है। इस परिभाषा के अंतर्गत जिसने चोरी की है वह पकड़ा जाता है और राजदण्ड का भागी बनता है। यह चोरी की मोटी व्याख्या हुई और उसका प्रभाव केवल समाज में गड़बड़ी न होने देने, अपने उपार्जन का लाभ अपने को मिलने में कोई अड़चन उत्पन्न न हो इस दृष्टि से है। अध्यात्म के क्षेत्र में चोरी का अर्थ और भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है। श्रुति कहती है जो अकेला खाता है सो चोर है-(केवला द्यो भवति केवलादि) गीता कहती है-जो आप ही कमाता है और आप ही खाता है सो पाप खाता है, (भुञ्जन्ते त्वद्यं पाया ये पचन्त्यात्म करणात्) मोटी दृष्टि से विचार करने पर यह व्याख्या अजीब लगती है। अपनी कमाई आप खाने में चोरी कैसे हुई। अपना कमाया आप खाया तो उसमें पाप क्यों लगा?

बात यह है कि अध्यात्म का तत्व ज्ञान आत्म-भाव के विस्तार से ही आरम्भ होता है वह जितना विकसित है उतनी ही आत्मोन्नति मानी जाती है। जिसका अहं भाव जितना सीमित और संकीर्ण है वह उस क्षेत्र में उतना ही पिछड़ा हुआ माना जाता है। पूजा-पाठ-कथा सत्संग तो इस वृत्ति को विकसित करने के साधन मात्र हैं। साध्य तो आत्म विस्तार है। जिन साधनों से साध्य की प्राप्ति होती हो उन्हीं की सार्थकता है। भजन, पूजन से यदि आत्म-विस्तार में सहायता मिलती हो तो ही उनका कुछ अर्थ है। वस्तुतः धर्म और अध्यात्म का सारा कलेवर केवल एक ही प्रयोजन के लिए खड़ा हुआ है कि व्यक्ति अपनी मलीनता और संकीर्णता को घटाते हुए अन्तःचेतना को निरन्तर व्यापक बनाता चले और यह विस्तार इतना अधिक होना चाहिए कि इस विश्व का कण-कण अपना दिखाई पड़ने लगे। अपनी आत्मा सब में ओत-प्रोत लगे। हर घर अपना ही घर दीखे और हर शरीर में अपने ही प्राण पिरोये हुए अनुभव हों। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अनुभूति तथा ‘विश्व बन्धुत्व’ के व्यवहार के इर्द-गिर्द ही अध्यात्म का समस्त तत्व ज्ञान घूमता है।

जिसका अन्तःकरण इस प्रकार अपनी अहंता विकसित कर रहा होगा उसे दूसरों की अनुभूतियाँ अपनी लगेंगी। दूसरों के कष्ट देखकर अपने कष्ट जैसी व्यथा होगी, दूसरों का पिछड़ापन अपने पिछड़ेपन की तरह ही असह्य लगेगा। दूसरों की अभावग्रस्तता देखकर अपने लिए चैन से बैठ सकना सम्भव न होगा। यह वृत्ति आत्म-विस्तार के साथ स्वाभाविक और अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है। इसे सहानुभूति-सम्वेदना या जो कुछ भी कहें -आत्मवेत्ता में विकसित होनी ही चाहिए। दूसरों की आँखों से बहते हुए आँसू अपनी आँखों को सजल न कर सकें तो समझना चाहिए यह निष्ठुरता आत्मिक दृष्टि से पिछड़ापन ही प्रकट करती है।

“सन्त हृदय नवनीत समाना” की रामायण व्याख्या में सन्त सज्जनों का हृदय मक्खन जैसा कोमल होना प्रतिपादित किया गया है। सच तो यह है कि वह मक्खन से भी अधिक कोमल होता है। मक्खन तो अपने ऊपर गर्मी का प्रकोप होने पर पिघलता है पर सन्त दूसरों की व्यथा को अपनी ही व्यथा समझकर पिघलने लगते हैं। कहा गया है-’दया बिनु सन्त कसाई’ जिसमें दयालुता और करुणा का विकास न हुआ हो उस निष्ठुर मन वाले को कसाई की श्रेणी में रखा गया है भले ही वह बाहर से सन्त जैसे कर्मकाण्ड करते या आवरण धारण करते दीखें। सन्त का अर्थ है सज्जन। सज्जनता के साथ सहानुभूति अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। “दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करना चाहिए जैसा कि हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं।” इस नैतिक आदर्श को भले ही शिष्टाचार, सामाजिकता, सज्जनता कहा जाय वस्तुतः यह आत्मविकास की प्रथम सीढ़ी है जिस पर चढ़े बिना कोई ऊँचा नहीं चढ़ सकता ऊपर नहीं उठ सकता।

वाल्मीकि डाकू का परिवर्तन सन्त के रूप में उस दिन हुआ जिस दिन की क्रौञ्च पक्षी को बाण विद्ध देखकर उसके साथी का विलाप उसे द्रवित करने में समर्थ हो गया। क्रौञ्च का वियोग डाकू को अपने जोड़े के वियोग जैसा लगा और सम्वेदना से उसकी छाती भर आई और आँखें बरसने लगी। जिस घड़ी निष्ठुर डाकू के अन्तःकरण में यह सम्वेदना उत्पन्न हुई उसी क्षण वह सन्त के रूप में परिवर्तित हो गया। सन्त तुकाराम की थाली में से कुत्ता रोटी लेकर भागा वे उसकी पीछे घी की कटोरी लेकर चले कि देव, मुझे घी से चुपड़ी रोटी भाती है आप रूखी क्यों खाते हैं, यह घी भी लेते जाइए। सन्त रामकृष्ण परमहंस ने एक कुत्ते को पिटते देखा, उनकी पीठ पर पिटाई के तीनों निशान उठ आये, जिसे वे कई दिनों तक कराहते हुए सहते रहे। कस्तूरबा ने जब यह सूचना दी कि जिस गाँव में महिलाओं को वे स्वच्छ रहने का आदेश देने गई थीं वहाँ की महिलाओं के पास तो एक-एक धोती ही है और वे उसी को आधी-आधी करके पहनती, धोती, सुखाती, रहती हैं ऐसी दशा में वे वस्त्रों को स्वच्छ कैसे रखें? गान्धी जी का जी पिघल पड़ा उनने कहा जिस देश में इतनी निर्धनता हो उसमें रहने वाले अन्य लोगों का अमीरी का जीवन जीना निष्ठुरता ही होगी। उन्होंने पूरे वस्त्र पहनने छोड़ दिये और आधी धोती पहनने तथा आधी ओढ़ने के लिए रखी। वस्त्रों से जो बचत हुई उसे उन्होंने उन निर्धनों की सहायता के लिए दे दिया जो अधिक अभावग्रस्त थे। सहानुभूति का तकाजा यही है। आत्मविस्तार की स्थिति में अन्तःकरण की यही स्थिति हो जाती है और उस कोमलता के लिए दूसरों के कष्ट कठोरता पूर्वक देखते रहना सम्भव ही नहीं होता।

अब यह बात आसानी से समझ में आ सकती है कि अकेला खाने वाले को चोर क्यों कहा गया? यहाँ चोर से मतलब संकीर्ण, स्वार्थी या निष्ठुर से है। जिसे स्वयं विलास, वैभव का उपभोग करते हुए अपने समीपवर्ती दीन-दुखियों का ध्यान नहीं आता उसे सज्जन और सहृदय कैसे कहा जाएगा और जो आत्म-विस्तार की इस पहली सीढ़ी पर भी नहीं चढ़ सके उसे भक्त या ज्ञानी कैसे कहा जायगा? निष्ठुरता की मोटी परिभाषा में दूसरों का शोषण या उत्पीड़न आता है। पर अध्यात्म की परिभाषा में निष्ठुर उसे कहा जायगा जिसे अपने लिए सुविधा-साधन जुटाते हुए यह अनुभूति नहीं होती कि अपने खर्च में किफायत करके उसे बचत से न जाने किस दुखिया का कष्ट हलका किया जा सकता था। जिसके मन में यह भाव उपजेंगे वह अपनी विभूतियों को-जिसमें धन ही नहीं, ज्ञान, समय, श्रम के प्रभाव आदि भी आते हैं-अपने लिए न्यूनतम मात्रा में ही खर्च कर सकता है बाकी तो वह उनके लिए प्रस्तुत करेगा जो उससे भी अधिक अभावग्रस्त हैं। इसलिए सज्जन सदा सादगी का जीवन जीते हैं-उनके खर्च न्यूनतम ही होते हैं। अपने लिए वे धन ही कम खर्च नहीं करते, समय और मन को भी निज की सुविधायें जुटाने तथा इच्छायें पूर्ण करने की अपेक्षा दूसरों की समस्यायें हल करने में लगाये रहते हैं। आत्मिक-प्रगति होने के साथ-साथ सम्वेदना अनिवार्य रूप से बढ़ती है और उसे चरितार्थ करने के लिए अपने साथ कठोरता और दूसरों के साथ उदारता बरतने का क्रम स्वयमेव चलने लगता है। इसके लिए किसी को किसी से कहना नहीं पड़ता पर अन्तःप्रेरणा ही इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे रोक सकना ही सम्भव नहीं रहता।

स्वार्थी और विलासी व्यक्ति अध्यात्म की परिभाषा में निष्ठुर ही कहा जायगा। छोटे बालक मुँह की ओर लालसा भरी दृष्टि से ताकते रहें और घर का बड़ा कहलाने वाला अकेला मिष्ठान्न पकवान खाता रहे तो उसे भावना क्षेत्र में निष्ठुर ही कहा जायगा और धिक्कारा ही जायगा। यों सामूहिक और राजकीय कानून इस बात के लिए बाधित नहीं करते कि अपनी कमाई का पैसा उस घर के तथा कथित ‘बड़े’ को मिष्ठान्न या पकवान के रूप में नहीं खाना चाहिए। पर अध्यात्म कानूनों से ऊँचा है इसलिए उसकी व्याख्याएँ भी सूक्ष्म हैं। यदि निष्ठुरता और संकीर्णता पर अंकुश न लगाया जा सका और आत्मानुभूति को विस्तृत न किया जा सका तो फिर इन तथाकथित धर्म धारणाओं और भक्ति भावनाओं के कलेवर का प्रयोजन ही क्या रह गया?

सम्वेदना का दूसरा पहलू है सुखियों को देखकर सुख अनुभव करना, श्रेष्ठ पुरुषों से-उद्योगी और पुरुषार्थियों से प्रेरणा ग्रहण करना। और भी स्पष्ट समझना हो तो यों कह सकते हैं कि अपने द्वारा जिन दूसरों के सुखों को बढ़ाया गया हो, उस सुखद अनुभूति को अपनी सुख-सुविधा की तरह ही प्रसन्नता दायक मानना। देवता उन्हें कहते हैं जो देने की प्रवृत्ति में तल्लीन रहते हैं। देने से दूसरों को जो सुख मिलता है उसे अपने लाभ या सुख के बराबर समझ लेने से यह दान किसी से कुछ ग्रहण करने की अपेक्षा अधिक आनन्द देता है। माता अपने बच्चे को छाती से दूध पिलाते हुए कितनी प्रसन्न होती है। यद्यपि उस दुग्ध दान से उसे अपनी शारीरिक शक्ति और सौंदर्य में प्रत्यक्ष घाटा ही है पर घाटे को खुशी-खुशी माता इसलिए उठाती है कि उस पयपान से बालक की भूख मिटती है और उसके विकास में सहायता मिलती है। ऐसी ही मातृभावना जब दूसरों के लिए विकसित होने लगे तो मातृत्व-देवत्व अथवा अध्यात्म का विकास चरितार्थ होने लगा।

जिस समाज में हम पैदा हुए हैं उसके पिछड़ेपन की ओर अपना ध्यान जाना चाहिए। उसे दूर करने के लिए कुछ प्रयत्न करना चाहिए। अपना शरीर रुग्ण हो-अपना बच्चा बीमार हो तो क्या हम उपेक्षा बरतते हुए हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे। ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। हमें अपने आपे का विस्तार शरीर और घर, परिवार तक सीमित न रखकर अधिक व्यापक बनाना चाहिए। वह भी क्या जीवन जो पेट के लिए जिया जाय, वह भी क्या आदमी जो अपने वैभव, विलास के ही साधन जुटाता रहे। वह भी क्या धर्मात्मा जिसे अपने नैतिक कर्त्तव्यों की प्रेरणा न मिले। वह भी कैसा ईश्वर भक्त जो दरिद्र नारायण के रूप में खड़े हुए भगवान की सहायता करने से इनकार कर दे।

धर्म का आवरण ओढ़ने से काम न चलेगा उसे अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए। ईश्वर-ईश्वर कहने से काम न चलेगा उसके सर्वव्यापी स्वरूप से अधिक सुन्दर और सुगन्धित बनाने के लिए-लोक मंगल के लिए बढ़-चढ़कर अनुदान प्रस्तुत करना चाहिए। आत्मा को परमात्मा से मिलाने की यही राह है कि हम अपनी संकीर्णता को-विशालता में और निष्ठुरता को उदारता में परिणत कर दें। सम्वेदना और सहानुभूति के साथ आत्मिक प्रगति का ‘अन्योन्याश्रय’ संबंध है।


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“जो पैदा करता है और दान करता है वह पवित्र जीवन के उपायों को जानता है। जो सम्पत्ति जमा करके रखी जाती है वह उसी प्रकार मूल्यहीन है जैसे गहरे भूगर्भ में छिपा सोना। मनुष्यों के प्रयोग में लगाओ, क्योंकि जो धन पैदा करते हैं वे जानते हैं कि उसका सदुपयोग कैसे किया जा सकता है और जो लोग धन पा जाते हैं वे उसे उड़ाना ही जानते हैं।

-गुरु नानक


दुर्व्यवहार-दुरुपयोगकर्त्ता के ही प्राण लेता है।

दुरुपयोग यदि नन्हीं सी वस्तु का भी किया जाय तो वह तुच्छ दीखने वाला पदार्थ कितना घातक-कितना खूँखार हो जाता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम अणु विस्फोट के रूप में देखते हैं।

यह सारी सृष्टि अणु परमाणुओं की बनी है। हर जगह कोटि-कोटि कण बिखरे पड़े हैं। उन्हीं के समूह का एक भी कण तो पदार्थों के रूप में दीखता है। इस संसार की सबसे छोटी सबसे तुच्छ इकाई परमाणु ही तो है। उसका मूल्यांकन मोटी दृष्टि से करें तो कुछ भी तो नहीं बैठता। जिसका आकार अस्तित्व देखने समझने तक में न आये आखिर उसका मूल्यांकन भी कैसे और कितना किया जाय।

सामान्य क्रम से यह परमाणु अपने निर्धारित क्रियाकलाप में लगे रहते हैं सृष्टि क्रम चलाने में-मनुष्य की सुविधा बढ़ाने में सहायता ही करते हैं। उनके स्वाभाविक क्रम में व्यतिरेक न होने पर वे अनन्तकाल तक अपनी उपयोगिता से शोभा और सुविधा ही बढ़ाते रहेंगे।

दुरुपयोग का-व्यतिरेक का कदम जहाँ भी उठाया जायगा वहीं विग्रह उत्पन्न होगा। कर्तव्यों और मर्यादाओं का व्यतिरेक करके मनुष्य अपने लिए और सबके लिए संकट उत्पन्न करता है। उद्धत और उच्छृंखल बनकर अतिरिक्त लाभ उठाने की बात सोची तो जाती है पर वह पार नहीं पड़ती। अपराध और अनाचार दूसरों को तो हानि पहुँचाते ही हैं उनका कर्त्ता भी अछूता नहीं बचता। मर्यादाओं के व्यतिरेक का अर्थ विनाश ही होता है। यह तथ्य अणु परमाणु जैसी छोटी इकाई के साथ विग्रह, व्यतिरेक उत्पन्न करके उसका दुष्परिणाम प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

6 अगस्त 1945 को जापान के नागासाकी और हिरोशिमा पर जो दो परमाणु बम अमेरिका ने गिराये उनसे सारी दुनिया दहल गई। इस महाविनाश को देखकर जापान हक्का-बक्का हो गया और उसने हथियार डाल दिये। सेना से सेना लड़ सकती है पर सर्वनाशी काल से कौन लड़े। एक ही क्षण में अणु विस्फोट ने हिरोशिमा के 78000 नर−नारी भून डाले और 56000 अर्द्धमृत घायल कर दिये। नागासाकी में 74000 मनुष्य मरे और 77000 घायल हुए। इस प्रकार लगभग 30 लाख व्यक्तियों के अस्तित्व निरर्थक बन गये। लगभग 15 मील का घेरा पूर्णतया भस्म हो गया। इसके अतिरिक्त उन लोगों की संख्या और भी बड़ी - कई गुनी है - जो इस विस्फोट से निकली हुई गामा किरणों के कारण तिलतिल करके-रोते कलपते-धीरे-धीरे मरने के विवश हो गये।

तब से लेकर अब तक इन सत्ताईस वर्षों में इन अणु आयुधों के निर्माण का उनके परीक्षणों का सिलसिला चलता ही रहा है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फाँस, चीन आदि देशों ने इस बीच अणु विस्फोट के सर्वनाशी महादैत्य को पाल-पोस कर बहुत मोटा तगड़ा बना लिया है। और अब वह इस स्थिति में हैं कि एक सनकी का आवेश एक सैकिंड में इस सारी सुन्दर दुनिया को बारूद की तरह भड़का कर नष्ट कर सकता है और यह सारी पृथ्वी धूलि बनकर अन्तरिक्ष में विलीन हो सकती है।

सन् 54 में विकीनका जिस हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया वह जापान पर गिराये गये बमों से 600 गुना अधिक विनाशकारी था। 30 अक्टूबर 61 में इससे भी बड़ा परीक्षण हुआ वह 56 मेगाटन का उससे भी सैकड़ों गुना बड़ा था। अब तक कुल मिलाकर 400 से अधिक परमाणु बम और हाइड्रोजन बमों का विस्फोट परीक्षण हो चुका है।

इन परीक्षणों में अब तक जो रेडियो विकरण फैल चुका है उसकी विभीषिका से भी मानव जाति को भारी क्षति उठानी पड़ेगी। यदि विधिवत युद्ध में यह शक्ति काम में आई तो उसका परिणाम संक्षेप में इस विश्व की सामूहिक आत्महत्या ही, कहा जा सकता है उस सर्वनाश के बाद कहाँ क्या कुछ बना रहेगा यह कहा नहीं जा सकता।

एक आणविक विस्फोट से पैदा होने वाला धुआँ-75000 मनुष्यों को मार डालने के लिए पर्याप्त है। यह विनाश तो तात्कालिक है। इसके बाद जो ‘न्यूक्लीय विकरण’ फैलता है उससे 50 मील के लोगों पर ऐसा अदृश्य प्रभाव पड़ता है जिससे वे कराहते हुए मरने के अतिरिक्त और किसी काम के नहीं रह जाते। समस्त वायुमण्डल में जो ‘रेडियेशन’ फैलता है उसके परिणाम तो मन्द विष की तरह और भी अधिक भयानक होते हैं। उसका प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता है किन्तु बहुत समय तक चलता रहता है। उससे मनुष्य की सारी विशेषताएँ नष्ट होती जाती हैं और वह शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से अपंग बनने के लिए विवश होता है। पीढ़ी दर पीढ़ी इसका प्रभाव चलेगा और भावी संतानें अंग-भंग अर्द्ध-विक्षिप्त, कुरूप, रोगग्रस्त एवं ऐसी विलक्षण आकृति-प्रकृति की होंगी कि उनसे केवल धरती का भार ही बढ़ेगा संकट ही उत्पन्न होंगे।

अणु बमों का विस्फोट शक्ति प्लूटोनियम 239 और यूरेनियम 235 के विखण्डन से उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया को ‘न्यूक्लीय विखण्डन’ कहा जाता है। इससे प्रायः 400 प्रकार के रेडियोधर्मी तत्व निकलते हैं। हाइड्रोजन बम ही भागों में विभक्त होता है। पहला-केन्द्र स्थल जहाँ विशुद्ध परमाणु बम रहता है। दूसरा-जहाँ संलयन मिश्रण भरा जाता। तीसरा-जहाँ यूरेनियम तथा दूसरे विखण्डनीय पदार्थ भरे रहते हैं। संलयन मिश्रण दो प्रकार का होता है। (1) भारी सम स्थानिक ड्यूटीनियम तथा ट्रीशियम का (2) इनके साथ लीथियम ड्यूटेटाइड मिश्रण का। संलयन मिश्रण क्रिया उत्पन्न करने के लिए लाखों डिग्री का तापमान अपेक्षित होता है इसे मध्यवर्ती परमाणु बम का विस्फोट करके उत्पन्न किया जाता है। इस ताप से बड़ी संख्या में तीव्र न्यूट्रोन निकलते हैं। वे तीसरे खंड का विस्फोट करके अधिक शक्ति उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार प्रायः आधी शक्ति मूल अणु बम से और आधी शक्ति शेष सम्बद्ध पदार्थों से निकलती है। विस्फोट के उपरान्त इन बमों से कितने ही प्रकार के हानिकारक तत्व वायुमण्डल में फैलते हैं। इनमें स्टानशियम 90, सीजियम 137, आइडीन 131, कार्बन 14 तथा ट्रीशियम मुख्य हैं। इन्हें अति भयावह मारक किन्तु मन्द विष ही कहना चाहिए। इनके घातक प्रभाव को सहकर मरने की अपेक्षा एक बारगी आत्महत्या करना सरल पड़ सकता है।

इस रेडियेशन का प्रभाव एक उदाहरण से जाना जा सकता है-”मेक्सिको (अमेरिका) की एक कैमिस्ट महिला अपने पति से पीछा छुड़ाने पर उतारू हो गई। उसने उसके लिए ‘रेडियेशन’ का विषाक्त प्रयोग किया। वह जरा सा ‘यूरेनियम’ अपने पति के भोजन के निकट रख देती। इससे वह भोजन रेडियोएक्टिव हो जाता। वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगा और बीमार पड़ गया। डॉक्टरों को कुछ पता न चला कि आखिर मर्ज क्या है। परीक्षणों में कहीं कोई विष आदि भी नहीं मिला। मरने के बाद उसकी लाश की परीक्षा से पता चला कि उसके स्नायु तन्तु किसी प्रकार ‘रेडियो एक्टिव’ हो गये थे। जो कार्य उपरोक्त महिला ने अपने पति के साथ किया वही व्यवहार जब सारा वायुमण्डल सब लोगों के साथ करेगा तो जन साधारण की क्या दुर्गति होगी इसका अनुमान लगा लेना कुछ कठिन नहीं होना चाहिए।

यह तो वह हानि है जो अब तक के 400 परीक्षणों से हो चुकी है। इसी को भुगतना सरल नहीं है। फिर आगे जो परीक्षणों का सिलसिला चल रहा है उसके क्या परिणाम होंगे? अथवा युद्ध खड़ा हो गया तो उसका प्रभाव मनुष्य जाति पर क्या पड़ेगा उसकी कल्पना भर कर सकना भी कठिन है।

स्टॉक होम अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति अनुसंधान संस्थान (सिपरी) द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ “विश्व शस्त्र भण्डार और निरस्त्रीकरण का अब्दकोश” (ईयर बुक ऑफ वर्ल्ड आर्मामेन्टस एण्ड डिसआर्मामेन्ट) में जो आँकड़े दिये हैं। उसे देखकर मनुष्य की अबुद्धिमत्ता और अदूरदर्शिता पर भारी खेद होता है। सरकारें चलाने वाले मूर्धन्य व्यक्ति अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को प्रधानता देते हुए किस प्रकार विश्व विनाश के संकट को बढ़ा रहे हैं यह देखते हुए हैरत होती है।

नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता श्रीफिलिप नोएल बेकर ने अन्य मूर्धन्य बुद्धिजीवियों के साथ समस्त विश्व के राज्य नेताओं और सचेतन मनुष्यों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि यदि ‘अणु आयुधों’ की दौड़ को रोक कर पीछे न लौटाया गया तो इसके परिणामों की भयानकता कल्पनातीत होगी, प्रख्यात दार्शनिक वर्नेड रसेल ने भी विश्व जनमत को जागृत करने के लिए अपील की है। यह सब अपने स्थान पर हो रहा है पर राजनेता अभी भी बाज नहीं आ रहे हैं। चीन के विस्फोट अभी कुछ महीने पूर्व ही हुए थे कि अमेरिका ने एक भूमिगत विस्फोट अभी-अभी प्रस्तुत किया है। अणु विस्फोट चाहे हवा में किये जायें अथवा जमीन या समुद्र में-उनसे कुछ बहुत अन्तर नहीं पड़ता। विष चाहे हवा में उड़ाया जाय चाहे पानी में घोला जाय अथवा भूमि में मिलाया जाय, लौट पलट कर उसका प्रभाव जीवधारियों पर पड़ेगा ही। समुद्र का जल लेकर बादल बरसेंगे ही। जमीन से वनस्पतियों तथा धातुओं को लेना ही पड़ेगा। हवा में साँस ग्रहण की ही जायेगी। घुमा-फिरा कर कहीं भी किया गया विस्फोट मनुष्यों के, पशुओं के शरीर में प्रवेश करेगा। वनस्पतियाँ-पशु और मनुष्य अब एक ही परिवार के हो गये हैं। उनका आदान-प्रदान एक दूसरे के साथ रहता है। रेडियो धर्मी विकरण उन तीनों में से किसी एक को भी प्रभावित करें दूसरे दो को भी उसकी चपेट में आना पड़ेगा।

सरकार हथियारों पर हर व्यक्ति पीछे एक डॉलर खर्च कर रही है जबकि स्वास्थ्य पर केवल 30 सेन्ट का औसत आता है, जो युद्ध साधनों में खर्च होने वाले धन की तुलना में तीस गुनी है। निर्माण के लिए जितनी धन और जनशक्ति लगी है उसकी तुलना में विनाश के साधनों पर 10 गुना अधिक खर्च किया जा रहा है। जितना बुद्धिबल विनाश के उपाय सोचने और साधन ढूँढ़ने में खर्च हो रहा है उससे आधा चौथाई भी यदि शान्ति की सम्भावना और उत्कर्ष के साधन ढूँढ़ने में लगाया जा सका होता तो भविष्य की विभीषिकाओं और आशंकाओं से काँपती हुई दुनिया ने सन्तोष की साँस ली होती और मनुष्य आकृति के प्राणों पर सवार पिशाच का आतंक हलका हो सका होता।

दुर्व्यवहार अणु जैसे तुच्छ पदार्थ से भी किया जाय तो वह ऐसी विभीषिका उत्पन्न कर सकता है जैसी कि आज के अणु-अस्त्र उत्पन्न कर रहे हैं। दुरुपयोग छोटी वस्तु का भी करने से विनाश का संकट प्रस्तुत होता है। धन का, बुद्धि का, समय का, साधनों का दुरुपयोग करने वाले तत्काल कुछ चमत्कारी लाभ प्राप्त करने की बात सोचते हैं। अपराधियों, उत्पातियों और दुरात्माओं की यही मान्यता होती है। वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति का नियम क्या है। उच्चारण किये हुए शब्द समस्त विश्व में घूमने के बाद शब्दबेधी बाण की तरह वहीं लौट आते हैं जहाँ से उन्हें छोड़ा गया था। दुर्बुद्धि, दुष्प्रवृत्ति और दुर्व्यवहार दुरुपयोग ऐसे ही शस्त्र हैं जिन्हें दूसरों पर प्रयोग करके लाभान्वित होने की बात सोचने वालों को पश्चाताप ही करना पड़ता है। अपनी खोदी खाई में उन्हें स्वयं की गिरना पड़ता है-अपनी जलाई आग अपने को ही जलाती है। यह बात मर्यादाओं का उल्लंघन करने वालों पर पूर्णतया लागू होती है।

नगण्य सी इकाई परमाणु के साथ बरता गया दुर्व्यवहार दुरुपयोग कितना भयावह सिद्ध हो रहा है इस तथ्य को समझते हुए हम अपनी उपलब्धियों के- शारीरिक, मानसिक, आर्थिक क्षमताओं के सदुपयोग की बात ही सोचें, इसी में कल्याण है।


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पानी से सरल और नम्र कौन है? पर वह पहाड़ों को घिसने और चट्टानों को गलाने में समर्थ है। कठोर को मुलायम घिस सकता है। कमजोर बलवान को जीत सकता हैं। जो सहन कर सकता है वह स्थायी है। जो दूसरों के दुख में साथी है वह राजा है। सत्य देखने में कठिन लगता है पर असल में वही सबसे सरल है।

-ताओ तेह किंग


परिजनों ने गुरुदेव को जैसा देखा पाया

गुरुदेव के संपर्क में आने वाले न केवल उनका स्नेह, सद्भाव, मार्गदर्शन, आशीर्वाद और सहयोग ही प्राप्त करते रहे हैं वरन् आत्मशोधन और लोकमंगल के लिए अचूक प्रयत्न करने की प्रेरणा भी पाते रहे हैं। नीचे केवल गुरुदेव के अनुदानों की चर्चा है। शिष्यों ने प्रतिदान में समाज के लिये क्या दिया उसके वर्णन आगे कभी प्रस्तुत किये जायेंगे।

मार्गदर्शन ही नहीं अंशदान भी

साधना मार्ग पर मेरी रुचि 20 साल की उम्र में उत्पन्न हुई थी। आज 55 साल का हूँ। इन 35 वर्षों में सैकड़ों साधना ग्रन्थ पढ़े, और अनगिनत साधकों से मार्ग पूछे। जितना पूछता गया उतना ही परस्पर विरोधी बातें बताये जाने के कारण उलझता गया। बहुत तरह की साधनाएँ की पर न किसी में मन लगा और न सफलता मिली ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह सब कहीं जाल-जंजाल ही तो नहीं है।

तीन वर्ष पूर्व गुरुदेव से संपर्क बना। इसे दुर्भाग्य भी कहा जा सकता है और सौभाग्य भी। दुर्भाग्य इसलिए कि आरम्भ से ही ऐसे महापुरुष के संपर्क में आया होता तो इतना समय खराब क्यों होता। सौभाग्य इस माने से कि थोड़े दिन पहले ही सही पर रास्ता तो सही मिल गया। तीन वर्षों में जो प्रगति हुई है उससे मुझे अति सन्तोष है। तीन शरीर, पाँच कोष, षट्चक्र, तीन ग्रन्थियाँ, कुण्डलिनी और ब्रह्मरंध्र की वस्तुस्थिति ठीक तरह समझ ली है। तीन वर्षों में इतनी उपलब्धियाँ मिल गई हैं कि बाहरी जीवन की अपेक्षा भीतर भरा हुआ खजाना लाख गुना मूल्यवान दीखता है। वहाँ से मिलता है उसका प्रभाव बाहरी जीवन की समृद्धि पर प्रत्यक्ष दीखता है। सच्चा आत्मबल मिलने पर भौतिक प्रगति भी सामने उपस्थित रहती है। यह तथ्य मैं इन तीन वर्षों में हर रोज देखता रहा हूँ। सही राह मिल गई तो अब लक्ष्य तक पहुँचना भी असम्भव नहीं रहा।

प्रस्तुत सफलता का सारा श्रेय गुरुदेव के प्रत्यक्ष अनुदानों को है। उस मार्ग पर बढ़ने के लिए मात्र मार्गदर्शन, परामर्श काफी नहीं वरन् ऐसा शक्तिशाली अवलम्बन चाहिये जो अपनी कमाई में से कुछ अंशदान भी दे। इस मार्ग पर सफलता का यही रहस्य है। भाग्य से अन्तिम समय ही सही मैंने गुरुदेव की सहायता का लाभ प्राप्त कर ही लिया और धन्य हो गया-

-विद्यानन्द गिरि-नन्द प्रयाग

जो देखा उससे नेत्र धन्य हो गये

गायत्री तपोभूमि गया था-वहाँ कुछ शिक्षा प्राप्त की और लौट आया। इन दिनों मैंने जो देखा वह ऐसा है कि कभी भुलाया न जा सकेगा। जो देखा वह मेरे रोम-रोम में उतर गया है।

मैंने गुरुदेव को एक सच्चे मनुष्य के रूप में देखा। ऐसा मनुष्य जिसमें-आदर्श गृहस्थ, दार्शनिक, लेखक, वक्ता, शिक्षा सुधारक, देश भक्त, निर्मल चरित्र, निस्पृह त्यागी, सच्चा ऋषि और बालकों जैसे निर्मल हृदय का अद्भुत समन्वय हुआ है। यों देखा मैंने दुनिया में बहुत है पर ऐसा समग्र दर्शन कहीं अन्यत्र आज तक नहीं हो सका।

-सोचता हूँ-ऐसी स्थिति में संपर्क बनने के बाद मुझे आज प्रोफेसर ही नहीं कहना चाहिये।

-प्रो0 डाह्या भाई पटेल, खेतीवाड़ी आणन्द

तीन अलौकिकतायें-जो छिपा रखी गई

20 जून सन् 53 में गायत्री तपोभूमि का स्थापना उत्सव था। गुरुदेव ने 24 दिन केवल गंगाजल लेकर उस स्थापना की आत्म-शुद्धि के लिये उपवास किया था। उनका वजन 117 पौण्ड से घटकर 93 पौण्ड रह गया। 24 पौण्ड भार घट गया। तपोभूमि के वे इन दिनों तख्त पर पड़े रहते थे। किसी से कुछ कहना होता पास बुलाकर धीमी आवाज में या इशारों से कहते।

सौभाग्य से मुझे उनके पास रहने और उनके आवश्यक काम करते रहने का अवसर मिला। उन्हें अधिक निकटता से देखा-समझा, उनकी आध्यात्मिक गरिमा के सम्बन्ध में तो क्या कहा जाय पर शारीरिक तीन विशेषतायें विशेष रूप से अनुभव कीं। 1-शरीर में से गुलाब जैसी तीव्र सुगन्ध महकती थी, छूते ही झटका लगता था और रोमाँच हो आते थे। खुली आँख से किसी को देखें तो वह सकपका जाता था। इन तीनों विशेषताओं को छिपाने के लिए उन्होंने पूरा प्रबन्ध कर रखा था। भरी गर्मियों में पूरे शरीर को कम्बल से लपेटे रहते थे आँखों पर काला चश्मा चढ़ा रहता था। किसी को पैर नहीं छूने देने देते थे।

इससे पहले भी उनसे कई बार मिला था पर काला चश्मा, पूरा शरीर कम्बल से लपेटा तथा पैर आदि छूने की मनाही जैसे बन्धन नहीं थे। पूछने पर माता जी ने बताया कि जब कभी वे उग्र तपश्चर्या की स्थिति में होते हैं तब-दिव्य तत्वों की मात्रा अधिक बढ़ जाने से यह तीनों ही विशेषतायें उनके शरीर में अक्सर पैदा हो जाती हैं। इन दिनों भी यही स्थिति है। इसका पता वे किसी को चलने देना नहीं चाहते सो किसी से कहना मत। मैंने इस बात को आज पहली बार प्रकट किया है।

-राधाकान्त पाराशर रामनगर

लड़की को नेत्र ज्योति मिली

सन् 1953 की बात है मेरी लड़की की आँखों में अचानक ऐसा रोग उठा कि कुछ ही समय में वह बिल्कुल अन्धी हो गई। उसे लिये दूर-दूर तक आँखों में मशहूर डॉक्टर जहाँ भी सुने वहीं पहुँचा। कलकत्ता में ठहरे हुए विश्व विख्यात अंग्रेज नेत्र विशेषज्ञ के पास भी गया। पैसा और समय जितना खर्च करना अपने बस में था सब कर लिया। निराशा सामने थी। दिन-रात खून सूखता कि हे भगवान इस अन्धी लड़की का आगे क्या होगा।

मेरे मित्र मणि भाई पटील अक्सर मिला करते थे। वे गुरुदेव के बारे में बहुत जानते थे और बहुत बताते थे। मैंने उन तक अपनी पुकार पहुँचाने की ठानी। 100 रु0 कर्ज लिये और किराये का प्रबन्ध करके मथुरा चल दिया। अपनी बात को कही पर विश्वास न होता था कि मामूली गृहस्थ में कोई सिद्धि विशेषता हो सकती है।

आशीर्वाद लेकर आया और लड़की की आँखों में रोशनी लौटने लगी। धीरे-धीरे उसकी आँखें पूरी तरह ठीक हो गईं। उतना ही नहीं उसने पढ़ना चालू कर दिया अब वह एम0ए॰ कर चुकी और अध्यापिका है।

-ठाकुरदत्त कपलिस, इन्द्र नगर-जमशेदपुर

दो लड़कियाँ डॉक्टर बनीं

आचार्य जी को पहली बार मैंने बीना में देखा। पहली ही दृष्टि में ऐसा लगा। मानों वे मेरे लिये ही यहाँ आये हों। एक ओर सादगी, सरलता, आत्मीयता और बालकों जैसी निर्मलता, दूसरी और ज्ञान की गरिमा, साधना का पुञ्ज, क्रान्तिकारी प्रवृत्ति इन दोनों का समन्वय गंगा जमुना के संगम जैसा लगा। मैं श्रद्धा से नत हो गया। उन्होंने मुझे गायत्री साधना के मार्ग पर लगाया।

सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ के स्वरूप, उद्देश्य और फलितार्थ को देखकर दंग रह गया। उतनी महान प्रक्रिया का संचालन कोई अद्भुत व्यक्ति ही कर सकता है। आचार्य जी को निस्सन्देह अलौकिक कहा जा सकता है। उनके संपर्क में क्या आया? उसका भौतिक और आत्मिक विवरण इतना विस्तृत है कि ठीक से कुछ कहते न बन पड़ेगा। एक शब्द में इतना ही कह सकता हूँ कि जो पाया है उसे बचा लिया तो सब कुछ सार्थक हो जायगा।

घर के सब लोग मेरी देखा-देखी उसी मार्ग चले। पुत्र के बिना वह उदास रहती थी उसकी इच्छा पूरी हो गई। बीना में हायर सैकेण्डरी स्कूल है। लड़कियाँ आगे पढ़ना चाहती थी पर बाहर भेजना मुझ जैसे रेलवे कर्मचारी के लिए अर्थाभाव के कारण असम्भव है। श्रद्धा उपासना और गुरुदेव की कृपा का पूरा लाभ तो उनने उठाया। चि0 उर्मिला, चि0 शशि प्रथम श्रेणी मेरिट में पास हुई। छात्रवृत्ति मिली वे दोनों अब एम0बी0बी0एस॰ का कोर्स पूरा कर रही हैं जो सभी लोगों के लिए आश्चर्य का कारण बना हुआ है।

-गौरीशंकर श्रीवास्तव-बीना

बीस वर्ष की व्याधि से छुटकारा

मेरी पत्नी तारादेवी को विचित्र रोग था जो भी खाती थी उसकी तुरन्त उल्टी हो जाती। कुछ भी न पचता। जीवित कैसे थी यही आश्चर्य था। उसे लेकर गुरुदेव के पास गया उन्होंने पूरी बात सुनी और चाय देते हुये कहा-ले पीले। पत्नी ने कहा तुरन्त उल्टी हो जायगी। कैसे पिऊँ आपके समीप गन्दगी फैले यह अच्छा नहीं। आचार्य जी ने मुस्कराते हुये कहा-पियो उलटी नहीं होगी चाय पी ली और उल्टी नहीं हुई। साथ ही वह 20 वर्ष पुराना कष्ट भी उसी क्षण समाप्त हो गया गुरुदेव की यह कृपा हम लोग कभी भी नहीं भूल सकेंगे।

-चन्दूलाल त्रिवेदी, अहमदाबाद

प्रत्यक्ष मार्गदर्शन, प्रत्यक्ष प्रकाश

लम्बे समय से यों तो गुरुदेव मुझे राह बताते ही रहे हैं। पर उस दिन तो उन्होंने प्रत्यक्ष ही रास्ता बताया। यह जंगली प्रदेश है। गाँव से आ रहा था कि रास्ता भटक गया। बरसात की रात का भयंकर अन्धकार, साँप-बिच्छू या जंगली जानवर तथा खाई, खड्डों का भय। दिशा तक का पता नहीं चल रहा था कि पाँव किधर चल रहे हैं। रास्ता सुनसान- आदमी का नाम नहीं प्रकाश का कोई सहारा नहीं। इस स्थिति में बेतरह घबरा उठा।

इतने में क्या देखता हूँ कि प्रकाश हाथ में सँजोये कोई मनुष्य कुछ ही दूरी पर आगे चल रहा है। मैं उसके पीछे-पीछे चलता रहा। भय से उसका परिचय भी न पूछा जा सका। घर के समीप तक वह मार्गदर्शक आया और फिर वह प्रकाश भी लुप्त हो गया और मार्ग दर्शक भी। इसे गुरुदेव के सूक्ष्म शरीर के अतिरिक्त और क्या कहूँ।

-विश्वनाथ प्रसाद वैकुण्ठपुर-सरगुजा

मनुष्य शरीर में भगवान की झाँकी

गायत्री, तपोभूमि में गुरुदेव से भेंट करने देश के राजनैतिक, धार्मिक नेताओं का आगमन सदा ही बना रहता था। देश के मूर्धन्य लोगों में से प्रायः सभी से उनका सम्बन्ध था।

उन दिनों श्री विश्वनाथ दास उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। तपोभूमि में पधारे। उन्होंने मथुरा के सम्भ्राँत नागरिकों की उपस्थिति में कहा-”मैं मथुरा भगवान के दर्शन करने आया था वह तो न हो सके पर आचार्य जी के रूप में भगवान की झाँकी पाई। उनने देश सेवा की चर्चा करते हुए कहा-जितना कार्य हम सबने मिलकर किया है उतना अकेले आचार्य जी ने किया है।”

यह भाव भरी और सारगर्भित अभिव्यक्ति देश के प्रमुख अखबारों में भी छपी लोग दंग रह गये कि जिन्हें सादा रहन-सहन के कारण हम सामान्य व्यक्ति समझते हैं। उनका व्यक्तित्व समझदार लोगों की दृष्टि में कितना बढ़ा-चढ़ा है।

-बलराम सिंह परिहार, मथुरा

पहरेदार गुरुदेव

सहस्र कुण्डी यज्ञ में मथुरा गया था, सम्मेलन तो और भी बड़े देखे हैं पर वहाँ तो हर बात अद्भुत थी। मानो मनुष्य लोक के व्यवहार की अपेक्षा सब कुछ दूसरे ही ढंग से चल रहा हो। अलौकिकता से मुग्ध मन लेकर घर वापिस आया। ताला खोलकर देखा तो सारा सामान कोठों से बाहर निकला पड़ा है। सँभाला तो सभी चीजें मौजूद थीं। कितनी चीजें भी थीं पर गया उसमें से कुछ भी नहीं था। भारी आश्चर्य की किसी ने जब इतना परिश्रम करके बाहर ही निकाला तो लिया कुछ क्यों नहीं?

जल्दी ही चोर का पता लग गया। उसने स्वयं ही लोगों को बताया कि घर का सामान ढो ले जाने की उसकी योजना थी। सामान आँगन में जमा कर लिया तो कोई देवता आया ओर बोला रामचन्द्र हमारे यज्ञ में है और तू पीछे उसकी चोरी कर रहा है। हम यहाँ मौजूद हैं। जल्दी भाग जा नहीं अभी अक्ल ठिकाने होती है। चोर उल्टे पाँवों भागा। पीछे वह हमारे सत्संग में आने लगा और गायत्री उपासक बन गया।

-रामचन्द्र गुप्ता पेंशनर सीसवाली कोटा

भयंकर दुर्घटना से बाल-बाल बचे

जिस बस से भाई हेमचन्द्र सौ0 विमला और चि0 पिंकी मथुरा से दिल्ली आ रहे थे उसी बस की भयंकर टक्कर पलवल के पास एक ट्रक से हो गई। टक्कर ऐसी वीभत्स थी कि लेखनी से नहीं उतारी जा सकती। दोनों के ड्राइवर तथा कितने ही व्यक्ति तत्काल मर गये। घायल तो सभी सवारियाँ भयंकर रूप से हुई। बस का चूरा हो गया। परन्तु ये तीनों ही सकुशल बचे रहे। उन्होंने अनुभव किया गुरुदेव उन्हें गोदी में उठाए बचा रहे हैं। ऐसे असम्भव को सम्भव में परिणत करने वाले अनेकों अनुभव हमारे परिवार को होते रहे हैं।

-शिवशंकर गुप्त बी0ए0एल0बी0 देहली

घातक कैन्सर से प्राण बचे

जाँच करने पर गर्भाशय का कैन्सर निकला। खून तो महीने भर से जा रहा था। पर इतनी बड़ी आशंका न थी। कैन्सर का अर्थ मृत्यु। दो छोटे बच्चे अनाथ हो जायेंगे। 130 मासिक की अस्पताल में नौकरी है। इलाज भी अच्छा नहीं हो सकता जीवित थी पर मौत ही चारों ओर घूम रही थी।

गुरुदेव आगरा जा रहे थे। गई तो दर्शनों को थी पर मन न माना जबरदस्ती उनकी मोटर में घुस गई और आगरा तक साथ रही। अपनी व्यथा सुनाई रक्त उस समय भी बुरी तरह जा रहा था। गुरुदेव ने एक ही शब्द कहा-’मरने न देंगे, इलाज करा ले।’

इन्दौर अस्पताल में भर्ती हुई वार्ड में सभी कैन्सर के रोगी थे। एक-एक करके सभी दुसह्य दुख सहते हुए मर गये। मैं अकेली ही जीवित रही और अच्छी होकर निकली। इलाज डॉक्टर करते रहे मैं हर समय गुरुदेव का ध्यान किये ही पड़ी रहती और यही कहती पिताजी अबकी बार बचा लो सचमुच उनने बचा ही लिया जब तब जीती रहूँगी उन्हीं का दिया जीवन मानूँगी।

-शारदा देवी दुबे, बड़नगर

आशीर्वाद से पुत्र प्राप्ति

गुरुदेव नागदा पधारे अन्य परिजनों की तरह हमारे घर भी आये। घर में दो ही प्राणी देखकर पूछा- “कोई बच्चा नहीं है” एक हुआ तो था मर गया। ढलती आयु में अब क्या आशा रही।

गुरुदेव कई बार मौज और मजाक के मूड में भी होते हैं। हँसते हुए कहा-अच्छा तो अगले वर्ष वही बच्चा वापिस आ जाएगा। यदि तेरे भाग्य में न भी होगा तो भी भगवान के घर में रात को घुसकर एक बच्चा तेरे लिये जरूर चुरा लाऊँगा।

अगले वर्ष बच्चा घर में आ गया जैसा गया था ठीक उसी शक्ल सूरत का। गुरुदेव चुरा कर लाये, माँगकर लाये या अपने पास से दे गये यह रहस्य तो वे ही जानें।

-नागूलाल शर्मा, नागदा

पेड़ के सहारे बेल भी ऊँची बढ़ी

ऊँचे पेड़ के सहारे जमीन पर पड़ी बेल कहाँ से कहाँ चढ़ जाती है यह सभी ने देखा है। मैंने यह देखा है कि महामानवों के सहारे सामान्य मनुष्य किस तरह आगे बढ़ सकता है।

इन दिनों शारीरिक मानसिक और आर्थिक आपत्तियों से इतना ग्रस्त था कि कभी-कभी आत्महत्या कर लेने को जी करता। एकमात्र अवलम्ब हेतु चाचाजी के दिवंगत होते ही उनकी सम्पत्ति प्राप्ति हेतु पारिवारिक कलह, अपनी तथा पत्नी की रुग्णता, अध्ययन के खर्चे का न जुट पाना आदि के कितने ही कारण थे जिनने सारा सन्तुलन बिगाड़ रखा था। कानून की कक्षाओं में उपस्थित न रह सका अर्थाभाव के कारण पुस्तकें न खरीद सका। होटल वाले का दो महीने का पैसा बकाया परीक्षाओं के 20 दिन शेष परीक्षा के लिये 25-30 पुस्तकों का कम से कम उलटना तो आवश्यक था। इन परिस्थितियों ने किंकर्त्तव्यविमूढ़ कर रखा था।

उन्हीं दिनों देवयोग से गुरुदेव के साथ संपर्क बना। अपनी करुण कथा उन्हें लिखी। स्नेह और प्रोत्साहन भरा उत्तर मिला। कहा “हिम्मत न हारो, सहायता करेंगे।” आँखों में आशा की ज्योति चमकी। गुरुदेव के बारे में जितना अधिक जाना उतना ही उनके आश्वासन पर विश्वास बढ़ता गया।

अप्रत्याशित रूप से एक कृपालु स्नेही का 188) का मनीऑर्डर आ गया। पुस्तकें खरीदी, होटल का बिल चुकाया साथ ही बताई हुई विधि से गायत्री मन्त्र की उपासना

भी करने लगा। दो सप्ताह की तैयारी जादू जैसी सिद्ध हुई। 80 प्रतिशत नम्बरों से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ।

वकालत आरम्भ की साथ ही लोकसेवा की भावना भी उमड़ी। लोगों ने नगरपालिका की अध्यक्षता का चुनाव लड़ने को उकसाया कहाँ मैं नौसिखिया वकील कहाँ धन और प्रभाव से सम्पन्न प्रतियोगी दिग्गज। सफलता कैसे मिलेगी। इसका निर्णय भी गुरुदेव पर छोड़ा। स्थिति लिखी। जब उनका चुनाव लड़ने का आदेश और सफलता का आश्वासन आ गया तो मैंने नामाँकन पत्र भर दिया। मेरी सफलता को सभी ने आश्चर्य माना। 11 वर्षों तक नगरपालिका का अध्यक्ष निर्वाचित होता रहा।

विरोधी ईर्ष्यालुओं ने मुझे एक मुकदमे में उलझा दिया। गुरुदेव ने राजीनामे का इशारा किया। दोनों ही पक्षों में काफी जोश था। राजीनामे की कोई सूरत न थी फिर भी अनायास प्रतिपक्ष की ओर से राजीनामे का प्रस्ताव आया मैंने स्वीकार कर लिया और गुरुदेव का आदेश अनायास ही पूरा हो गया।

पत्नी का जटिल ऑपरेशन, मेरी स्वयं की हृदय और मस्तिष्क संबंधी बीमारी, लड़के का परीक्षा संबंधी अवरोध और भी न जाने कितने संकट आये और गुरुदेव की कृपा से हल हुये हैं। वकालत के आरम्भ में 25) मासिक की भी आमदनी न होती थी, पीछे वह ऐसी चमकी कि आजकल मेरे पास 4 बँगले, मोटर, लम्बी-चौड़ी कृषि तथा और भी बहुत कुछ है जिसे मैंने अपने श्रम से नहीं गुरुदेव की आशीर्वाद से अर्जित किया है। उनके चले जाने पर सारी दुनिया सुनी लगती है। मानो आज मेरा कुछ रहा ही नहीं।

-विष्णुदत्त गुप्त एडवोकेट, वैकुण्ठपुर सरगुजा

विपत्ति से छूटा मजिस्ट्रेट बना

कितने ही व्यक्ति ज्ञान और आत्म-कल्याण का उद्देश्य लेकर भी गुरुदेव के संपर्क में आते हैं पर मैंने तो मुसीबत में उनका पल्ला पकड़ा और उन्होंने गोदी में ही उठा लिया।

आई0ए0एस॰ का छात्र था। कुछ ऐसा मानसिक आघात लगा कि विक्षिप्त सा हो गया। एक पर्चा देकर ही परीक्षा से उठ आया। उम्मीद जाती रही। दिमाग में हर समय अशान्ति, उद्विग्नता, विकलता, निराशा और आत्महत्या की इच्छा उठती रहती। स्वास्थ्य बुरी तरह गिरने लगा सूखकर काँटा हो गया। हाथ देखकर एक ज्योतिषी ने कह दिया-जीवन रेखा कटी हुई है जो उठती उम्र में ही मौत हो जायेगी। चारों तरफ मौत ही दिखती।

श्री रामनन्दन प्रसाद सिंह ने गुरुदेव का परिचय कराया उन्हें पत्र लिखा। उत्तर बहुत ही सान्त्वना भरा हुआ और जल्दी ही ठीक होने का पक्का आश्वासन था। पत्र पाते ही स्थिति सुधरनी शुरू हुई और भला-चंगा होकर अपने कार्य में लग गया।

पत्र-व्यवहार चलता रहा। पढ़ाई करता रहा। बी0ए॰ ऑनर्स बी0टी0 सफलता पूर्वक पास की। अध्यापकों और परीक्षकों को सराहा, नौकरी के आरम्भ में 60 रुपये मासिक पाने वाला प्राइवेट स्कूल का मास्टर था। गुरुदेव का अनुग्रह ही है कि अब 650 रुपये पाने वाला मजिस्ट्रेट हूँ।

सन् 54 का वह दिन भूलता नहीं जब प्रातः पूजा में बैठा था। अचानक एक अति विचित्र अद्भुत अलौकिक अनुभूति हुई। मेरा रोम-रोम प्रकाश से भर गया। लगा गुरुदेव प्रकाश बनकर मेरे रोम-रोम में प्रवेश कर गये हैं। फूट-फूट कर रोया। हर्ष और आवेश में आँसू घण्टों झरते रहे। जीवन को नवीन दिशा देने वाला इसे मैं शक्तिपात ही मानता हूँ। तब से मेरी श्रद्धा निरन्तर बढ़ती ही गई है।

मेरी अलौकिक अनुभूतियाँ

गुरुदेव से मैंने संपर्क ही नहीं बनाया वरन् गहराई तक गया। उन्हें अपना-मार्गदर्शक ही बना लिया।

मथुरा गया तो मेरे सिर पर हाथ रखकर आज्ञा चक्र जगा दिया। ऐसा दिव्य प्रकाश भीतर अनुभव होता कि उसे आंखें बन्द करके देखते ही रहा जाय। आनन्द इतना आता कि वर्णन नहीं हो सकता। यह स्थिति बहुत दिन रही, गुरुदेव का स्पर्श मेरे रोम-रोम को झनझना देते रहे। स्वप्न में और अर्धजागृत अवस्था में उनके दर्शन प्रायः मुझे होते रहते हैं। सोते में देर हो जाय तो हाथ पकड़ कर बैठा देते हैं।

एक बार पैसे की तंगी से उदास था आश्वासन मिला कुछ अच्छा प्रबन्ध कर देंगे। तब की अपेक्षा अब चार गुनी तनख्वाह मिलती है और वह संकट टल गया।

एक बार बिना सूचना के अकस्मात मथुरा पहुँचा रात के 10:30 बजे थे। गुरुदेव आठ बजे सो जाते हैं। पर घीयामंडी पहुँचकर देखा वे 10:30 बजे दरवाजे पर खड़े हैं। जाते ही बोले तुम्हारे इन्तजार में हम लोग अभी सोये नहीं। चलो थाली पर सी रखी है रोटी खा लो और चारपाई बिछी है उस पर सो जाओ। चुपचाप घर गया। भोजन किया और सो गया अभी भी यह एक रहस्य ही है कि मेरी बिना सूचना के उन्होंने मेरे पहुँचने का समय कैसे जाना और भोजन विश्राम का पूर्व प्रबन्ध करके कैसे रखा।

- कन्हैयालाल मिश्र, जोधपुर

दिव्य अनुभूतियों की शृंखला

विगत 30 वर्षों से हमारा परिवार गुरुदेव के संपर्क में है, उनकी प्रेरणा से इस परिवार के प्रत्येक सदस्य में ब्राह्मण वृत्तियों का बाहुल्य है। कुमार्ग पर चलने की हिम्मत करना तो दूर कोई उस संबंध में सोचता भी नहीं है। इस जमाने में ऐसे परिवार कहाँ दीखते हैं। यह उनके आशीर्वाद की सबसे बड़ी अनुभूति है।

इसके अतिरिक्त छोटे-मोटे लाभ तो हम उनके अनुग्रह के पग-पग पर उठाते हैं। छोटी लड़की चि0 कृष्णा के लिए अच्छा घर वर ढूँढ़ने में बहुत दौड़ धूप कर रहे थे किन्तु ऐसा आश्चर्य हुआ कि एक अच्छी स्थिति के सज्जन ने रिश्ता बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया और दान-दहेज का कोई प्रश्न सामने नहीं आया।

ग्यारह वर्ष पूर्व चि0 कृष्णा का बड़ा लड़का ऐसा बीमार हुआ कि उसके बचने की आशा ही नहीं रही। पुतलियाँ एक महीने तक ऊपर चढ़ी रहीं, शरीर में ऐंठन बेहोशी, मोतीझरा, आदि न जाने कितनी ही बीमारियाँ इकट्ठी होकर आईं। तब भी गुरुदेव की सहायता माँगी और वह बच्चा बचा।

बड़ी लड़की को विवाह से 15 वर्ष तक कोई सन्तान न हुई तो उसने अपनी इच्छा गुरुदेव तक पहुँचाई। आशीर्वाद आने के ठीक एक वर्ष बाद लड़का हुआ।

सबसे छोटा लड़का जब उनकी गोद में दिया तो बोले इसे डॉक्टर बनायेंगे और मिलिट्री में देश सेवा के लिये भेजेंगे। आश्चर्य कि वह एम0बी0बी0एस॰ बन गया और सेना के अस्पताल में महत्वपूर्ण देश सेवा कर रहा है।

हम लोग गुरुदेव को घर में लगा हुआ कल्प-वृक्ष मानते हैं और जब चाहते हैं उससे फल-फूल तोड़ लेते हैं।

-कन्हैयालाल मिश्र वैद्य, चन्द्रभागा, इन्दौर

पूर्व आभास की दिव्य-शक्ति

अक्टूबर 70 के शिविर में पत्नी और बच्चों समेत गया। प्रवचन प्रशिक्षण के अतिरिक्त निजी बातें भी हुई। मैंने स्थानीय वकील तथा संस्था के प्रमुख श्री उमाकान्त झा से चर्चा की। गुरुदेव ने खिन्न होकर कहा-आज तो उनका समय समाप्त हो रहा है।

मैं उस समय उसका अर्थ कुछ भी न समझ सका। क्योंकि ‘झा’ को ठीक स्थिति में छोड़कर आया था। घर आने पर मालूम पड़ा कि जिस दिन जिस तारीख को गुरुदेव ने कहा था ठीक उसी दिन उनका स्वर्गवास हो गया। अदृश्य को देखने की कैसी अद्भुत शक्ति थी गुरुदेव में।

-रामकृष्ण सिंह एडवोकेट, बेतिया

पर्वत जैसी कठिनाई राई बनी

अनेक समस्याओं से घिरा हुआ पत्नी समेत जून 64 के शिविर में गुरुदेव की शरण में आया था। उनने पर्वत जैसी समस्याएं राई बना दीं। मेरी हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी चली गई। पत्नी का असाध्य हृदय रोग जिससे डॉक्टर हार मान चुके थे ठीक हुआ। छोटा लड़का डॉक्टर बन गया। लड़की की शादी बहुत अच्छे परिवार में हो गई। सरकार के साथ झमेले में पड़ा हुआ सात हजार रुपया मिल गया। मकान के केस का अपने पक्ष में फैसला हुआ। इस प्रकार से मुझे प्राप्त हुए कितने ही लाभ हैं। मेरी ही तरह कितनों ने ही गुरुदेव की कृपा से बहुत कुछ पाया है। आध्यात्मिक प्रगति का लाभ तो साथ-साथ है ही।

-इन्द्रराज व्यास, नागौर, राजस्थान

कहाँ से कहाँ आ पहुँचा

पिताजी जसीडीह (बिहार) में एक छोटे मन्दिर के पुजारी थी। मुश्किल से गुजर होती थी। वे भी चल बसे मैं बालक था। कुछ दिन उसी मन्दिर में काम करता हुआ दिन काटता रहा। इसी बीच गायत्री साहित्य पढ़ा और गुरुदेव के साथ बँध गया।

अध्ययन की इच्छा जगी और वह पूरी हुई। प्राइवेट ही पढ़ता-पढ़ाता बी0ए॰ तक पहुँचा। बिड़ला कम्पनी में 150 रुपये की नौकरी कर ली। तरक्की भी हुई और शादी भी हो गई। बिड़ला कम्पनी से कुछ झंझट हुआ तो एल्युमिनियम खदान में एक लीज होल्डर की ‘सब लेशी’ ले ली। माइन्स होल्डर बन गया। अब अपने पास 60 आदमियों का साथ है। अब जो स्थिति और इज्जत है उसे अनहोनी घटना ही कहना चाहिए।

कहाँ से कहाँ पहुँचने की लम्बी मंजिल से गुरुदेव का सहारा पग-पग पर लिया है। वे ही रास्ता बताते और रास्ता खोजने के दोनों काम करते रहे थे।

अभी-अभी 500 टन का एक नया आर्डर। रेलवे द्वारा किये गये 8000 रुपये जुर्माने की माफी जैसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिनके कारण प्रगति के इतने साधन जुट सके।

गुरुदेव का हूँ। उन्हीं के रास्ते पर चलता हूँ जब तक जीवित हूँ-उन्हीं के इशारे पर चलता रहूँगा।

-भगवती प्रसाद मिश्र, लोहरदगा (राँची)

पत्र और उत्तर एक ही समय लिखे गये।

सन् 63 में पत्नी को सन्निपात ज्वर हुआ। तापमान 107 से नीचे ही न उतरता था। स्थिति बिगड़ती ही जा रही थी। डॉक्टर लाचारी प्रकट कर देते थे। छोटे चार बच्चे, पत्नी को कुछ हुआ तो इनका पालन कैसे होगा।

व्याकुलता सीमा के बाहर बढ़ गई तो गुरुदेव को पत्र लिखा, उत्तर तीसरे दिन आ गया तो प्रसन्नता के अतिरिक्त आश्चर्य भी कम नहीं हुआ। ता0 18 मार्च का मैंने पत्र लिखा था। उत्तर के लिफाफे पर भी 18 मार्च की मुहर थी। पत्र पहुँचने में 3 दिन लगते हैं। उसी दिन तो तार भी नहीं पहुँचता। सवेरे की डाक में मैंने पत्र डाला था। सवेरे 10 बजे की ही मुहर मथुरा डाकखाने की थी। जिस समय मैं पत्र लिखूँ ठीक उसकी समय उत्तर भी लिख जाय। यह कैसी अद्भुत बात? पत्नी अच्छी हो गई उसे लेकर छः महीने बाद मथुरा गया। पत्र वाला रहस्य पूछा। तो मुस्करा दिये। यही कहा तुम्हारी परेशानी को देखते हुए जल्दी पत्र पहुँचाया था।

-उमाशरण निचल, शिलाँग (आसाम)

सहायता नीति के दो अन्य कारण

अपना तप बल खर्च करके लोगों की भौतिक सहायता करते रहने की उपयोगिता के संबंध में एक दिन पूछा तो गुरुदेव ने कहा-इसके दो कारण हैं-एक तो समर्थ व्यक्ति दूसरों की सहायता करे इसमें कुछ भी अनुचित नहीं। दूसरे आजकल अध्यात्म का केवल ज्ञान पक्ष ही सजीव दिखता है धर्मोपदेश ही चलता रहता है। विज्ञान भाग लुप्त हो चला। अध्यात्म की सहायता से आत्मिक उन्नति के साथ भौतिक प्रगति भी हो सकती है। इस तथ्य की प्रामाणिकता इन दिनों नहीं मिलती। यह तथ्य स्पष्ट हो जाय तो लोक रुचि इस ओर मुड़ेगी और लोग गम्भीरतापूर्वक इस मार्ग को अपना लेंगे। लोगों की सहायता करते रहने से इस विश्वास को परिपक्व करना भी एक बड़ा कारण है।

-गिरिराज किशोर पाराशर, मिर्जापुर

आपत्तियाँ इस तरह टलीं

कई वर्ष पूर्व पेट ऐसा खराब हुआ कि एक पाव दूध तक हजम होना कठिन हो गया पेट पत्थर जैसा-वैद्य, डॉक्टरों ने भयंकर मर्ज बताया जीवन की आशा न रही तब गुरुदेव को पुकारा और बिना दवा के अच्छा हुआ। सन् 51 में ऐसा दर्द उठा कि पेट में सिर देकर बैठ गया। उठना तक सम्भव न रहा। तभी उन्हीं के सहारे बचा।

मेरा चौथा लड़का चि0 पदमसिंह बीमार पड़ा टी0बी0 अस्पताल में भर्ती हुआ तीन दिन लगातार मुँह से खून की उल्टी होती रही। उसे भी गुरुदेव ने बचाया तीन महीने में अस्पताल से छुट्टी मिल गई जबकि मरीजों को एक वर्ष भर्ती रहना पड़ता है।

मेरे भतीजे पर कत्ल केस चला तथा निर्दोष भाई साहब को भी उसमें फँसा दिया। जमानत न होती थी प्रतिपक्षी पुलिस वाले थे उनकी हिमायत सिफारिश भी बड़ी थी। गुरुदेव के सामने वस्तु स्थिति बताई तो उनकी कृपा से केस छूट गया। सब लोग बरी हो गये।

सन् 65 में पाकिस्तानी जहाजों ने जोधपुर में भारी बम वर्षा की। हम घबराये। गुरुदेव का पत्र आया-युग निर्माण परिवार के हर व्यक्ति से जाकर कह आना वे पूर्ण निश्चिन्त रहें। कितनी ही बमबारी क्यों न हों अपने लोगों में से किसी का कुछ न बिगड़ेगा। 200 बम गिरे पर परिवार के किसी भी व्यक्ति का बाल-बाँका न हुआ न कुछ आर्थिक क्षति हुई।

सन् 56 में शतकुण्डी यज्ञ में मथुरा गया। छः हजार व्यक्ति आसाम मद्रास तक से आये थे। गुरुदेव इतने व्यस्त थे कि आगन्तुकों को देख भर लेते थे कुशलता पूछ न पाते थे। मैंने बहुत लोगों से पूछा आप इतनी दूर से इतना खर्च करके आये हैं-यहाँ तो आप गुरुजी से बात भी नहीं कर पाते आने का क्या लाभ हुआ? कितनों ने एक ही उत्तर दिया। लाभ तो कभी का उठा चुके अब दर्शन भर करना शेष था सो उसी कमी को पूरा करने आये हैं।

-मानसिंह टाँक, जोधपुर

स्पर्श का अद्भुत अनुभव

मथुरा से बहुत दूर इस वन्य प्रदेश में पड़ा हुआ यह स्वप्न मुद्दतों से देख रहा था कि किसी प्रकार कम से कम एक बार गुरुदेव के दर्शन अवश्य करूंगा, पर इच्छा पूरी होने का सुयोग ही नहीं बन रहा था। शरीर की रुग्णता ने बेतरह जकड़ रखा था। पैसे की तंगी। और भी न जाने क्या-क्या अवरोध थे, पर एक दिन अजीब तरह की बेचैनी उठी तो मैं पत्नी और बच्चा सहित मथुरा चल ही पड़ा।

मथुरा पहुँचते-पहुँचते मुद्दतों से पल्ले बँधी हुई बीमारी अपने आप मुझे छोड़कर चली गयी। शिविर का क्रम चला। नौ दिन की साधना की। कितनी ही शंकायें और समस्यायें लेकर गया था कागज पर नोट थी। दैनिक प्रवचनों में मेरी ही शंकाओं के उत्तर होते थे। पूरा शिविर होने तक मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर मिल गया। लगता मानो मेरा ही समाधान करने के लिये प्रवचन होते हों। कई बार मैंने ऐसा देखा कि उनका पार्थिव शरीर लुप्त हो गया और उसके स्थान पर कोई तेज पुञ्ज देवता विराजमान हैं। हो सकता है यह मेरा भावावेश हो पर एक नहीं अनेक बार ऐसी अनुभूति मैंने पाई।

शिविर से विदा होने लगा तथा चरण स्पर्श किये तो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख दिया- हाथ रखना था कि नख से शिर तक एक बिजली जैसा झटका लगा। मैं काँप गया। उस झटके ने मेरे भीतर कितना परिवर्तन कर दिया और कितना अद्भुत बल दिया इसे मैं इतने दिन बाद भी हर घड़ी अनुभव करता हूँ।

-जगदीश प्रसाद मिश्र, नागपुर सरगुजा

सम्मानित उच्च पद तक पहुँचा

पिताजी के स्वर्गवास के बाद कठिनाइयों का आसमान मेरे ऊपर टूट पड़ा। पढ़ने की इच्छा होते हुए भी परिस्थितियों ने अध्ययन छोड़ने को मजबूर कर दिया। अध्यापक की नौकरी मिली 59) मासिक।

ऐसे कैसे काम चलेगा शिक्षा आगे न बढ़ी तो गुजारा कैसे होगा गृहस्थ कैसे चलेगा। यही चिन्ता खाए जा रही थी। इतने में गुरुदेव धर्मपिता के रूप में मिल गये और वे मुझे कहीं से कहीं घसीट ले गये। बी0ए॰ किया एम0ए॰ किया एल0एल0बी0 किया और अब आडीटर के सम्मानित पद पर हूँ। पहली सन्तान लड़का था। वह चल बसा पत्नी बहुत दुखी रहने लगी। गुरुदेव ने सान्त्वना दी और वही बालक उसी रूप में उसकी गोदी में आ गया। ऐसे भौतिक अनुभव अनेक हैं पिता अपने बच्चे को क्या नहीं देता। मुझे अब तक निरन्तर गुरुदेव से मिला है। जीवन की लक्ष्य पूर्ति का वरदान भी उनसे प्राप्त करके रहूँगा।


Quotation

गुरुदेव के संपर्क में आने पर प्राप्त हुए प्रकाश के संबंध में परिजन अपनी अनुभूतियाँ आगे भी भेज सकते हैं उन्हें पुस्तकाकार छापने की बात सोची गई है।

जाते हैं। पर इनमें से अधिकाँश ऐसे होते हैं जो उत्पन्न हुई श्रद्धा को लोक मंगल के लिये प्रयुक्त करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा आधा काम लोगों की व्यक्तिगत सहायता करना और आधा काम उत्पन्न हुई श्रद्धा को लोक मंगल में लगा देना है। दोनों काम पूरे होने पर मैं इस सेवा या संपर्क को पूरा मानता हूँ। इसी पद्धति से उन्हें 50 लाख व्यक्तियों को संपर्क में लाने उन्हें श्रद्धालु बनाने और अन्ततः नव-निर्माण का सक्रिय कार्यकर्ता बनाने में सफलता मिली है।

गुरुदेव की इस विचित्र शैली का महत्व समझा और मान गया कि उनकी तप साधना व्यक्तिगत सहायता ही लोक मंगल के लिये है।

-गुरुशरण दत्त वाधे-बर्द्धवान


गुरुदेव और उनकी दिव्य अनुभूतियाँ

सन् 59 के एक वर्ष वाले अज्ञातवास से जब गुरुदेव लौटे तो हम सब आश्चर्यचकित रह गये। उन दिनों हम लोगों का उनसे सीधा संपर्क भी था। आरम्भ के एक महीने ही वे हिमालय के हृदय-’चेतना के ध्रुव प्रदेश’ में रहे थे। इसके बाद गंगोत्री, उत्तरकाशी ही उनके साधना केन्द्र रहे। गंगोत्री में वे केवल पत्तियों पर रहे। खाद्य प्रबन्ध न हो सकने अथवा जो भी कारण हों उन्हें पालक, बथुआ जैसी जंगली शाक वनस्पतियों को उबाल कर उसी पर निर्वाह करना पड़ा। आरम्भ में पतले दस्त होने लगे थे। पीछे वे पत्तियाँ जैसे-तैसे हजम होने लगीं थीं।

उत्तरकाशी में वे शकरकन्द, गाजर जैसे शाक लेते थे सप्ताह में एक दिन खिचड़ी आदि। दूध गंगोत्री में तो था ही नहीं। उत्तर काशी में एक पाव प्रतिदिन का प्रबन्ध हो सका। सो कई बार वनस्पतियों की चाय के रूप में काम आ जाता। घी, मेवे फल आदि वे यहाँ भी कहाँ लेते हैं, वहाँ तो इन चीजों को छुआ तक नहीं। ऐसी दशा में यही आशंका की जा रही थी कि वे लौटेंगे तो बहुत दुबले होंगे।

आशंका के विपरीत उनका वजन 18 पौण्ड बढ़ा हुआ था। चेहरे पर लालिमा झलकने लगी थी और झुर्रियाँ आधी से ज्यादा मिट गईं थीं। लोकाचार किसी के अच्छे स्वास्थ्य पर आश्चर्य प्रकट करने का नहीं है। सो आरम्भ में कुछ भी नहीं कहा पर अवसर पाकर मैंने एक दिन इस सुधार का कारण पूछ ही लिया।

अमानत जो केवल दिव्य प्रयोजनों के लिये मिली है

उन्होंने उत्तर दिया-मात्र आहार पर ही शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर नहीं रहता। जलवायु, मनःस्थिति और संयम-नियम पर भी बहुत हद तक अवलम्बित है हिमालय का शीत प्रधान वातावरण, निरन्तर गंगा जल का उपयोग हर काम में समय की नियमित व्यवस्था, भूख से कम खाने से पाचन सही होना, चित्त का दिव्य चिन्तन में निरत रहना, मानसिक विक्षोभ और उद्वेग का अवसर न आना यह ऐसे आधार हैं जिनका मूल्य पौष्टिक आहार से हजार गुना ज्यादा है। तपस्वी लोग सुविधा साधनों का, आहार का अभाव रहने पर भी दीर्घजीवी, पुष्ट और सशक्त रहते हैं उसका कारण उपरोक्त है जिसका महत्व आमतौर से नहीं समझा जाता।

हिमालय पिता की गोदी में जब भी वे गये। अपने शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य में अद्भुत अभिवृद्धि करके ही वापस आये। सूनेपन की हानिकारक प्रक्रिया बताते हुए वे अक्सर अपने स्वतन्त्रता संग्राम के जेल जीवन की यह बात सुनाया करते जिसमें उन्हें एक मास की काल कोठरी भुगतनी पड़ी थी। एक मास के सूनेपन ने उनके शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तुलन को बुरी तरह बिगाड़ दिया था।

इसके विपरीत एक बार सन् 62 में तीन महीने के लिये वे हिमालय गये और सर्वथा एकाकी सघन वन प्रदेश में रहे तो आश्चर्यजनक मनोदशा लेकर आये। वे अत्यधिक प्रसन्न, प्रफुल्लित और सन्तुष्ट दिखाई देने लगे। आशंका उन दिनों भी यही थी कि कहीं जेल जीवन की तरह यह तीन महीने भी उन्हें कष्टकारक सिद्ध न हों, पर उलटे जब आँखों में नई चमक देखी तो इस बार भी विचित्रता का कारण पूछना पड़ा।

उनने बताया हिमालय के दिव्य वातावरण में उनके शरीर को ही नहीं मन को भी एक दिव्य स्फुरण मिलता है। इस बार एक नया प्रकाश मिला। पशु-पक्षी, छोटे जीव-जन्तु यहाँ तक कि वृक्ष और पौधों में भी आत्मा की चेतना की उपस्थिति प्रत्यक्ष परिलक्षित हुई। पुस्तकों में तो आत्मा के सर्वव्यापी होने की बात पढ़ते रहते थे पर उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति इसी बार हुई। लगता रहा-मानो इस सघन वन प्रदेश में रहने वाले सभी जीवधारी मनुष्यों के समान ही हैं। बोलना और सोचना कम जानते हैं-उससे क्या? अनेक तपस्वी भी तो मौन धारण किये रहते हैं, और ध्यानावस्थित स्थिति में भी तो सोचना बन्द हो जाता है। इस क्षेत्र के निवासियों को मौन साधक और ध्यानावस्थित समझा जाय तो क्या हर्ज है। यह विचार मान्यता में बदला-निष्ठा बना, फिर प्रायः वैसी ही अनुभूति होने लगी।

कितने ही शाकाहारी और माँसाहारी पशु वहाँ फिरा करते थे। पहले उनसे डर लगता था। अब नई दृष्टि से वे एक ही गाँव, मुहल्ले में रहने वाले साथी सहचर से दीखने लगे। डरने की बात छूटी विश्वास बढ़ा, परिचय के साथ ममत्व भी विकसित हुआ। जिनके निवास समीप थे-उनसे घनिष्ठता बढ़ी। नाम रख लिये। यह देखा कि जिस आकृति वाले पशु को जो नाम दिया था वह उसने बिना सिखाए-पढ़ाये जाने लिया। अक्सर आवाज देकर बुलाने पर वही पशु समीप आ जाता जिसका नाम लिया गया था। इस तरह छः सप्ताह व्यतीत होते-होते सारा पशु परिवार मनुष्य जैसा घनिष्ठ हो गया। वे आते घण्टों पास बैठे रहते, धूप सेंकते रहते उन्हें खुजलाने, सहलाने, नहाने में सहयोग दिया तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। हिंस्र पशु भी आने लगे। एक मादा रीछ तो बहुत ही हिल गई। वह अपने छोटे बच्चों को झोंपड़ी के पास छोड़कर आहार की तलाश में चली जाती। बच्चे अपने पास खेलते उछलते रहते। पहले उस क्षेत्र में माँसाहारी पशु, शाकाहारियों को आये दिन मारते खाते रहते थे पर जितने दिन अपना रहना उधर हुआ एक भी ऐसी घटना नहीं हुई। लगा कि उन सबने हमारे साथ ही नहीं परस्पर भी कौटुम्बिकता और सद्भावनाओं को अपना लिया है।

पक्षियों के प्रति भी यही दृष्टि विकसित हुई तो वे भी छोटे बच्चों की तरह वहीं आस-पास फुदकने लगे दूर रहने वालों ने अपने घोंसले पास की झाड़ियों में बना लिये। झोंपड़ी घोंसलों से भर गई। रात को उसमें दर्जनों पक्षी विश्राम करते। खरगोश, लोमड़ी जैसे छोटे जानवरों ने तो मानों इसे अपना घर ही मान लिया हो। रात को वे उसी में घुस पड़ते और शीत से बचने के लिए परस्पर ही सटकर बैठते।

पशु-पक्षियों तक ही यह दृष्टि सीमित न रही वरन् मेंढक, गिरगिट, गिलहरी, चींटी, झींगुर, तितली जैसे छोटे जीवों ने भी इस आत्मीयता के दृष्टिकोण को पहचाना और स्वीकार किया। वे पास बैठते और इर्द−गिर्द चक्कर लगाने में प्रसन्नता अनुभव करते।

पीछे तो वृक्ष और झाड़ियां भी भाई-भतीजे जैसे लगने लगे। वे अपने स्थान पर से हट तो नहीं सकते थे पर दीखते ऐसे थे मानो हमारी सुरक्षा के प्रहरी तथा शुभ चिन्तक के रूप में खड़े ड्यूटी दे रहे हैं। सद्भावना उनमें भी प्रतिध्वनित होती देखी। झरने के पास जब बैठते तो तरह-तरह की भावुकता भरी दिव्य संवेदनाएं अनायास ही मन में उठती और लगता मानों वे कभी सन्त, तपस्वी, ब्रह्मज्ञानी की तरह अपनी मूक वाणी से हमें-अन्तःकरण को पुलकित करने की कवित्व जैसी संवेदनाएँ प्रदान कर रहे हैं। उन स्थानों से उठने को जी न करता।

दृष्टिकोण के इस नये परिवर्तन से सारा वन्य प्रदेश सुनसान न रहकर कोलाहल भरा प्राणी संकुल दीखने लगा। यह एक नया ही लोक था। मनुष्यों में पाई जाने वाली धूर्त्तता और दुष्टता का जहाँ नाम निशान नहीं। सभी प्राणधारी वाणी और विचारों के मात्र निर्धारित कर्त्तव्य के लिए प्रयोग करते प्रतीत हुए। सूनेपन के कारण जो भय पहले लगा करता था इस बार तनिक भी नहीं लगा। वरन् यह प्रतीत होता है-दुष्ट मनुष्य की तुलना में यह वन्य लोक कहीं अधिक शान्त, सात्विक एवं उत्कृष्ट है।

यह गाथा पुरानी है कि बालक भरत सिंहनी के बच्चों को खिलाने के लिए पकड़ ले जाता था। शिवाजी ने सिंहनी का दूध दुहा था। सन्त ज्ञानेश्वर ने भैंसे से वेद मन्त्र उच्चारण कराये थे। ऋषियों के आश्रमों में गाय और सिंह एक ही घाट पर पानी पीते थे। नई अनुभूति गुरुदेव की है कि यदि अपनी आत्मा में भय, शंका, अविश्वास, द्वेष, परायापन न हो, आत्मीयता की निष्ठा अति प्रगाढ़ हो तो मनुष्य जैसे संवेदनशील प्राणी द्वारा अविकसित पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं में भी कौटुम्बिकता विकसित की जा सकती है।

उन दिनों जब वे लौटे मथुरा में भी यही कौतुक हजारों ने देखा। उनकी थाली में चिड़िया, चुहिया, गिलहरियाँ भोजन साथ-साथ करतीं। जहाँ उन्होंने आवाज लगाई कि यह सारा जन्तु परिवार एकत्रित हुआ, एक सज्जन साथ बैठे थे। छोटी चुहिया उन्हीं की थाली में घुस पड़ी। उनने चुहिया को तो नहीं भगाया पर रोटी हाथ में लेने के लिए ऊपर उठाई। चुहिया रोटी से लटक गई पर रोटी नहीं छोड़ी। इतनी निर्भयता और आत्मीयता तो उनने घरेलू प्राणियों में पैदा कर ली थी। वन में भी उन्हें वैसा ही कौटुंबिक वातावरण जीव-जन्तुओं के साथ मिला इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। आत्मीयता का उत्कृष्ट प्रवाह अपने साथ किसी को वहीं बहा ले चलने में समर्थ हो सकता है फिर भले ही वे पशु-पक्षी या कीट पतंग ही क्यों न हों।

यह हिमालय पिता का ही अनुदान था जिसने ज्ञान चक्षु खोले और आत्मा के सर्वव्यापी होने का आभास कराया। इस आभास के कारण सर्वत्र आत्मीयता बिखरी और उसकी प्रतिक्रिया समस्त चेतन जगत की सद्भावना अपने प्रति बरसने लगी इससे आन्तरिक आनन्द एवं सन्तोष असंख्य गुना बढ़ गया और साथ ही अवलम्बन भी विकसित होता चला गया।

यह आत्मीयता का विकास ही है जिसने लाखों व्यक्तियों को मजबूत रस्सी के साथ जकड़ कर उनके साथ बाँध दिया है। विद्वता, प्रतिभा, भाषण, लेखन, संगठन, आन्दोलन, प्रतिपादन आदि बहुत छोटे आधार हैं। यह कला दूसरों को भी अच्छी तरह आती है पर वे उतना सघन कुटुम्ब कहाँ बना पाते हैं? ऐसे व्यक्तित्व किसी को घनिष्ठ आत्मीयता में बाँध लेने और किसी से कोई साहसपूर्ण कार्य करा सकने में समर्थ नहीं होते। गुरुदेव ने हिमालय के वातावरण में अन्तर्मुखी होकर प्रकृति के कण-कण में सन्निहित दिव्यता को पढ़ा, समझा और असली शिक्षा जिसने उन्हें मात्र विद्वान ही नहीं बना रहने दिया वरन् तत्वदर्शी के स्तर पर पहुँचा दिया।

हिमालय को वे जड़ नहीं चेतन मानते हैं। उमा, महेश से लेकर अन्य देवताओं की सघनता उस क्षेत्र में विद्यमान है ऐसा वे अनुभव करते हैं। जब-जब वे वहाँ जाते हैं कुछ ऐसे विचित्र अनुभव सुनाते हैं जिससे वहाँ देव सत्ता की प्रत्यक्ष उपस्थिति पर विश्वास करना पड़ता है।

एक बार कुछ जड़ी-बूटियों की खोज में रास्ता भटक गये और अपने स्थान से बहुत दूर सम्भवतः 20 मील आगे निकल गये। रात हो गई। हिंस्र पशुओं की आवाज गूँजने लगी। ऐसे समय में एक मनुष्य जैसा शरीर उन्हें हाथ पकड़ कर आधे घण्टे में ही यथा स्थान पहुँचा गया। एक बार वर्षा के पानी से उनका निवास सब ओर से घिर गया। खाद्य पदार्थ समाप्त। इसी समय एक मनुष्य का दीखना और हाथ के इशारे से जमीन खोदने का इशारा करना। खोदा जाना और वहाँ से बीस सेर भारी एक ऐसे मीठे और स्वादिष्ट कन्द का निकलना जिस पर भली प्रकार निर्वाह किया जा सके। हिंस्र जन्तुओं से आये दिन मुकाबला होते रहना पर कुछ दुर्घटना न घटना। एक बार विपत्तिग्रस्त को सारे पैसे दे दिये। पास में कुछ भी न रहा। दूसरे दिन सिरहाने काम चलाऊ धन मिल जाना उस क्षेत्र में निवास करने वाली दिव्य आत्माओं का आभास और उनसे भेंट करने का सुयोग आदि एक से बढ़कर एक ऐसे अद्भुत अनुभवों की शृंखला उस हिमप्रदेश की है-जिसे सुनते जादू तिलिस्म जैसी कथा प्रसंग का रस आता है; पर उसमें अत्युक्ति की बात तनिक भी नहीं उनका उच्च व्यक्तित्व, कौतुहल वर्धक गाथाएँ गढ़कर किसी को भ्रमित करने की चेष्टा करेगा यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी वे प्रसंग उन्होंने किसी को बताएं भी तो नहीं। वे सिर्फ उन्हें ही विदित थे जिनमें से कुछ की एक हल्की सी झाँकी इसलिए प्रस्तुत करनी पड़ी की हिमालय की दिव्यता को समझा जा सके और उस खदान से बहुमूल्य रत्नों को उत्खनन करने का अन्य आत्मविद्या प्रेमियों को भी लाभ मिल सके।

इन दिनों वे फिर इसी क्षेत्र में हैं। लगता है वे भविष्य में भी वहीं से निरन्तर दिव्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने और सर्वसाधारण तक पहुँचाने का कार्य करेंगे। प्रतिबन्धित अवधि तो वसन्त पर्व तक की थी। इसके बाद उनका उभय पक्षी कार्यक्रम कब से चलेगा यह तो कहा नहीं जा सकता पर भावी क्रम यही है बादलों की तरह समुद्र से पानी लाना और खेतों पर बरसाना। हरिद्वार का मध्य केन्द्र उनके इस ध्येय को पूरा करते रहने के लिए ही तो बना है। वे हर बसन्त पर बहुत कुछ प्राप्त करते रहे हैं और आगे के लिए अधिक दुस्साहस पूर्ण कदम बढ़ाते रहे हैं। उनका यह वसन्त पिछले 42 वसन्तों से अधिक महत्वपूर्ण होगा। ऐसी आशा हम लोग सहज की कर सकते हैं। उन्हें अपने पिता पर- हिमालय पर कितना गर्व-कितना विश्वास और कितना अवलम्बन है इसे समझने पर ही उनकी पितृभक्ति की हिमालय प्रीति का अनुमान लगा सकना सम्भव हो सकता है।

गुरुदेव के व्यक्तित्व में जो कुछ शालीनता, उत्कृष्टता, गम्भीरता, शीतलता, पवित्रता, दृढ़ता दीख पड़ती है। उसे हिमालय पिता का अनुदान ही माना जाना चाहिए, उसकी सार्वभौमिक क्षमता उनके गुरुदेव का वरदान है। वे जन्मजात विद्वान नहीं हैं। आर्ष ग्रन्थों में सुलभता का उनका कार्य अद्भुत है। इसीलिए उनका लेखा-जोखा लेने वाले उन्हें दूसरा व्यास कहते हैं। अन्य उनके छोटे-बड़े कितने ग्रन्थ हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिदान को देखते हुए लोग उन्हें ज्ञान-विज्ञान का मूर्तिमान कोष कह उठते हैं और कार्ल मार्क्स के अध्यवसाय से उनके श्रम की तुलना करते हैं। पर उनकी निकटवर्ती होने के नाते मैं जानती हूँ कि यह सब विशुद्ध उधार का अनुदान है जो इनके मार्गदर्शक द्वारा ऐसे ही लिखाया जाता है जैसे पौराणिक कथा के अनुसार व्यास बोलते गये थे और महाभारत को गणेश जी लिखते गये थे। जब हम लोग अकेले में होते हैं और साहित्य सृजन की चर्चा चल पड़ती है तो वे मजाक में यही कहते हैं-पुरानी शैली में हम बिना सूँड़ के गणेश और नई शैली में स्टेनो टाइपिस्ट भर हैं।

सार्वजनिक जीवन में उनकी जितनी भी अद्भुत सफलताएँ हैं वे लगती ऐसी हैं मानों घोर परिश्रम से उनने की हों। पर सच तो यह है कि उन्हें वे चुपचाप धरोहर की तरह मिली है। नव निर्माण आन्दोलन का विस्तार आँधी तूफान की तरह होता चला जा रहा है। पर्दे के पीछे उसे कौन चला रहा है उसका पता सर्वसाधारण को कहाँ है। यदि मार्गदर्शक के दिव्य अनुदान बन्द हो जायें तो उनकी स्वतंत्र प्रतिभा नगण्य सी ही सिद्ध होगी।

मुझे उन दिनों की याद है जब सहस्र कुण्डी यज्ञ उन पर थोपा गया था। मार्गदर्शक का आदेश हुआ कि देशभर की सुसंस्कारी आत्माओं को एकत्रित करके उन्हें नव-निर्माण में तत्पर होने की प्रेरणा दी जाये। युग परिवर्तन अभियान का श्रीगणेश करने के लिए सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ किया जाये। उनकी जो रूप-रेखा बताई गई वह अति विशाल थी। (1) चार लाख संस्कारी व्यक्तियों को ढूँढ़ना और उन्हें बुलाना (2) इतने व्यक्तियों के निवास, भोजन आदि की निःशुल्क व्यवस्था करना। (3) सहस्र कुण्डी यज्ञ के साधन उपकरण जुटाना (4) आगन्तुकों में हर एक के साथ विचार-विमर्श करके उनकी स्थिति के अनुरूप काम बाँटना। यह चारों ही काम कहने-सुनने में भले ही सरल लगते हों पर उनकी बारीकियों पर विचार किया गया और उनकी रूपरेखा तथा आवश्यकता का ढाँचा खड़ा किया गया, साधनों का अनुमान लगाया गया तो उन्हें पसीना आ गया। कहाँ अपनी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति और कहाँ यह आयोजन। मात्र उत्सव भी तो नहीं था जो धन के आधार पर कर लिया जाय? चार लाख व्यक्ति कहाँ से तलाश किये जायें? फिर वे अपरिचित के आमन्त्रण पर इतना समय और पैसा खर्च करके आने को क्यों तैयार होंगे? आ भी गये तो चार लाख व्यक्तियों की पाँच दिन की व्यवस्था में जो खर्च पड़ेगा वह कहाँ से आयेगा। लोग आ भी गये, खर्च का साधन बन भी गया तो सबसे संपर्क, विचार-विमर्श और कार्य विभाजन तो सर्वथा असम्भव है। असम्भव को सम्भव कैसे बनाया जा सकता है। इसी अन्धकार में उनका सिर घूमने लगा। लगा कि वे कार्य को पूरा कर सकना तो दूर वे उसकी विशालता सोचने मात्र से सन्तुलन खो बैठे हैं।

फिर उन्हें नया प्रकाश मिला और बताया गया-वे अपनी वस्तुस्थिति को न भूलें। अदृश्य मार्गदर्शक ने उन्हें मात्र दृश्य माध्यम बनाया है। कार्य जिसका है उत्तरदायित्व भी उसी का है। पूरा भी वही करेगा-व्यवस्था तथा साधन भी वही जुटाएगा। उन्हें तो दृश्य प्रतीक की तरह हाथ-पांव चलाते भर रहना है। भ्रम दूर हुआ तो हँस-हँस कर पूरी निश्चिन्तता के साथ काम करने लगे लोगों को अचम्भा होता था। काम इतना बड़ा साधन नगण्य। आमतौर से उन दिनों उन्हें सनकी और विक्षिप्त समझा गया था। और किसी भी समझदार ने उनका साथ देने से इनकार कर दिया था। रीछ-वानरों की सेना इकट्ठी करके ही वे कुछ महीनों पहले से इस कार्य की औंधी-सीधी रूपरेखा और व्यवस्था जुटाने का कार्य करते रहते हैं। समीक्षा करने वालों को यह सिर्फ पागलपन ही लग रहा था। नियत समय पर हर कार्य इस तरह होता चला गया मानों सब कुछ पहले से ही सुनिश्चित करके रखा गया हो। सब कुछ जादू जैसा हुआ। निमन्त्रण पत्र कुछ हजार ही छपे थे और कुछ हजार पतों पर भेजने के अतिरिक्त यह सूझ ही नहीं पड़ा कि शेष को कहाँ भेजे? पर लगभग चार लाख व्यक्ति ही आये और उनमें से हर एक ने अपना यही अनुभव बताया कि उन्हें आमन्त्रण ही नहीं ऐसा आन्तरिक दबाव भी अनुभव हुआ कि उसमें सम्मिलित हुए बिना छुटकारा नहीं।

निवास के लिए कुल पाँच हजार डेरे-तम्बू जुटाए जा सके थे। खाद्य पदार्थ एक हजार मन खरीदा जा सका था। यह तो कुछ हजार व्यक्तियों के लिये ही अपर्याप्त था। पर इतने में भी सब कुछ निपट गया। बिना मूल्य भोजन भण्डार चलता रहा और अन्त में पाँच सौ मन बचा हुआ खाद्य पदार्थ वितरण करना पड़ा। पैसा दान पेटियों में एक लाख से कम ही निकला था। जिसमें तम्बू और बिजली के ठेकेदारों को निपटाया जाना भी कठिन था। खर्च की मदें तो सैंकड़ों थी और हर मद में हजारों लाखों ही चुकाए जाने थे। चन्दा करना नहीं था। कोई धनी मानी भी साथ नहीं। अपनी गुंजाइश नहीं। निर्धारित पेटी को वे स्वयं ही खोलते बन्द करते रहते थे। पेटी वह अब भी मौजूद है पर उन दिनों तो उसने कुबेर के अक्षय भण्डार का रूप धारण कर लिया था। सब कार्य सानन्द हो गये। हजारों कर्मचारी, हजारों स्वयं सेवक व्यवस्था में जुटे रहे। किसी की एक सुई तक चोरी नहीं गई, किसी का सिर तक नहीं दुखा, किसी को ठोकर तक नहीं लगी-जबकि इतने बड़े आयोजन में सहज ही दुर्घटनायें हो सकती हैं। सरकारी अफसर हैजा आदि फूट पड़ने के भय से चिन्तित थे। सूचना तो उन्हें थी पर सम्भावना पर विश्वास न था सो वे कुछ प्रबन्ध भी न कर सके। यकायक प्रबन्ध हो भी नहीं सकता था। उनकी चिन्ता दूर करते हुए पूरा पक्का विश्वास यह दिलाया कि वे चिन्ता जरा भी न करें उन्हें बदनाम न होना पड़ेगा सो ही हुआ भी। दर्शक यही कहते रहे, यह उनके जीवन का अनुपम दृश्य था। इतना बड़ा धर्मानुष्ठान वस्तुतः हजारों वर्षों से न देखा गया न सुना गया। सर्वथा साधनहीन व्यक्ति द्वारा इतना बड़ा कार्य हो सकता है सामान्य बुद्धि इसे किसी प्रकार स्वीकार नहीं कर सकती पर प्रत्यक्ष तो क्या कहा जाय? जो सामने मौजूद था, जो आँखों ने देखा उससे इनकार कैसे किया जाय?

दृश्य आयोजन से भी बड़ी बातें वह थीं, जो अदृश्य रूप से चलती रहीं और जिनका स्वरूप और महत्व समझ सकना हर किसी के लिए सहज सम्भव भी नहीं है सर्वथा अपरिचित लोगों को सम्मानित होने की प्रबल अन्तःप्रेरणा और उनका अनेक कठिनाईयों के रहते हुए भी आ पहुँचना और आगन्तुकों में कुछ दर्शकों को छोड़कर शेष का उच्च व्यक्तित्व, सम्पन्न स्तर का होना। यह एक अनोखापन ही है इसका कोई प्रत्यक्ष आधार तलाश नहीं किया जा सकता।

चार लाख आगन्तुक, दर्शकों की भीड़ उससे भी अधिक। इस जन समुद्र में एक व्यक्ति क्या करे क्या न करे? सो कुछ गुरुदेव को सूझा नहीं। वे प्रातः से सायं काल तक आगन्तुकों का अभिवादन करने के लिये एक तखत पर खड़े रहते। मुझे भी उनके साथ खड़ा रहना पड़ता। बस हम लोगों का इतना ही काम था। पूरे पाँच दिन 5-5 चुल्लू गंगाजल पीकर हम लोगों ने उपवास किया और खड़े रहे। रात में नित्यकर्म। व्यक्तिगत संपर्क तो व्यवस्थापकों से भी न हो पा रहा था फिर आगन्तुकों से परामर्श की बात तो सम्भव ही कहाँ थी? आकर्षण का केन्द्र बना एक व्यक्ति उस स्थिति में परामर्श तो क्या कुछ भी नहीं कर सकता था, लाखों आँखें उसी पर लगी थीं।

रिपोर्ट यह है कि आगन्तुकों में से अधिकाँश ने यह अनुभव किया कि आचार्यजी से उनकी व्यक्तिगत भेंट हुई परामर्श हुआ और भावी रीति-नीति के संबंध में प्रेरणायें दी गई। बुद्धि इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकती। पर तथ्यों से भी इनकार कैसे किया जाय। परिवार का संगठन उन्हीं पाँच दिनों में हुआ 2400 यज्ञ आयोजनों द्वारा जन जागृति की व्यापक लहर उत्पन्न करने और शत-सूत्री कार्यक्रमों को, युग-निर्माण योजना को कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व यहीं बाँटा गया। यह हर दिन एक भाषण से सम्भव नहीं था हर एक की योग्यता मनोभूमि एवं परिस्थिति भिन्न है सो कोई भी भिन्न हो सकते हैं इसके लिए व्यक्तिगत परामर्श के बिना काम नहीं चल सकता। यदि वह सम्भव न हुआ होता तो सहस्र कुण्डी यज्ञ आयोजन दूसरे लोगों के धर्मानुष्ठानों की तरह एक क्रिया कृत्य मात्र रहकर समाप्त हो गया होता। एक महान् क्रान्ति का शुभारम्भ उससे कैसे होता?

परामर्श करके और निर्देश लेकर ही वे आगन्तुक वापस नहीं चले गये वरन् उन्होंने अपेक्षित तत्परता और निष्ठा के साथ काम भी किया। उसी का परिणाम है जो अब बारह वर्ष बाद अपनी अनुपम गरिमा को प्रदर्शित कर रहा है। सचमुच वह आयोजन हर दृष्टि से ऐसा अद्भुत था कि जो देखा गया उसकी संगति मिलाने में बुद्धि चकराती है। कितने ही जेबकटों और उचक्कों ने बताया कि वे सारे हिन्दुस्तान से सैकड़ों की संख्या में अच्छी कमाई करने की आशा में आये थे पर यहाँ उनके हाथ-पाँव बँध गये। मन ऐसा बदला कि उस धर्मानुष्ठान में दूसरों की तरह भावनापूर्वक संलग्न रहने के अतिरिक्त और कुछ उनसे बन ही नहीं पड़ा। मार्ग के व्यय से अधिक जो उनके पास था, उसे दान पेटियों में डालकर खाली हाथ घर पहुँचे और वह धन्धा एक प्रकार से सदा के लिये ही छूट गया।

उन्हीं स्मृतियों में से एक यही भी है कि जिनके समान खो गये थे, गिर गये थे या गुम गये थे वे उन्हें अपने घर पर पहुँचने पर मिल गये। इन सूचना देने वालों का कहना है कि हमने अपना सामान मथुरा में भली प्रकार देख लिया था कि कोई चीज कहीं इसी में उलझी, लिपटी तो नहीं है। फिर घर पहुँचने पर वे चीजें हम यात्रा वाले बिस्तर या सामान में नहीं उससे बाहर रखी मिली। इसका कारण क्या हो सकता है? बौद्धिक कोई समाधान नहीं। मनगढ़न्त बात लगती है-पर जिनने कहा वे अविश्वस्त नहीं थे और न वे सूचनाएं मुझे देने से उनका कोई स्वार्थ सिद्ध होता था। इन घटनाओं की चर्चा पर जबकि प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब तो उसकी अत्युक्तियाँ मनगढ़न्त और भी निरर्थक हो जाती हैं। जो हो, उस आयोजन के साथ एक नहीं अनेकों स्मृतियाँ ऐसी हैं जिससे उसे अलौकिक या अति मानवीय कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। यहाँ चर्चा सहस्र कुण्डी यज्ञ की की गयी है। पर एक नहीं गुरुदेव के सार्वजनिक जीवन की लोक-मंगल के लिये किये गये अनेक प्रयत्नों की अगणित क्या, प्रायः सभी घटनायें ऐसी हैं जिनकी सफलतायें साधनविहीन स्थिति की तुलना करते हुए अवाक् कर देने वाली हैं। भविष्य में क्या किया जाने वाला है-उसकी कभी-कभी वे चर्चा करते हैं। रूपरेखा बताते हैं तो उसे बाहर का व्यक्ति सुनकर शेखचिल्ली की उड़ानें ही कह सकता है। हनुमान के समुद्र लाँघने, अंगद के पैर जमाने, नल, नील के समुद्र पर पुल बाँधने, अगस्त्य के समुद्र सोखने जैसी योजनायें क्या सचमुच सम्भव हो सकती हैं, इस सन्देह का आज कुछ उत्तर दिया जा सकना सम्भव नहीं। उसकी यथार्थता जानने के लिए कल की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जिस महान सत्ता के साथ उनका अविच्छिन्न संबंध है उसका महान अनुदान गुरुदेव की दुर्बल काया से कुछ भी करा सकता है। इस पर कम से कम मुझे तो पूरा विश्वास है। लोक-मंगल के लिये दिव्य सत्ता की चेष्टाएं काम करती समझी जा सकें तो इस कठपुतली को नाचते देखकर किसी को भी न हैरत में पड़ने की जरूरत होगी न अविश्वास करने की।

तीसरी है उनकी सगी माँ-पेट में नौ महीने रख कर जन्म देने वाली और छाती का दूध पिलाने, दुलार की वर्षा करने वाली भौतिक माता से अधिक करुणा ममता एवं वात्सल्य बिखेरने वाली सच्ची माता के रूप में वे वेदमाता की उपासना करते हैं। उपासना क्या भावना की हिलोरों में आत्म-विभोरता की स्थिति ही उसे कहना चाहिये। सुना है मीरा के साथ कृष्ण नाचते थे। सुना है, रामकृष्ण परमहंस काली को अपने हाथ से भोजन कराते थे। सुना है चैतन्य महाप्रभु के साथ भगवान खेलते थे, सुना है अन्धे सूरदास की लाठी पकड़कर कृष्ण उन्हें ले जाते थे। पता नहीं वे घटनायें कहाँ तक सत्य हैं। पर यहाँ आँखों से देखा गया है कि वे अपने अस्तित्व का पृथक अनुभव ही नहीं करते। चौबीस पुरश्चरणों में उनके निर्धारित कर्मकाण्ड चले थे। अब तो उनकी ध्यान भूमिका ही प्रखर है-जिसे तादात्म्य भाव की संज्ञा दी जा सकती है। बदले में क्या मिलता है-उसे उनके ब्रह्मवर्चस के रूप में सभी ने देखा है।

मनुष्य के त्रिविधि कलेवर और पंच-विधि आवरण में सब कुछ बीज रूप में विद्यमान है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर के त्रिविधि कलेवर तीनों लोक कहलाते हैं और इनके आधि भौतिक, आधि दैविक, आध्यात्मिक सम्पदाओं के रत्न भण्डार छिपे बताए जाते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश में पाँचों प्रधान देवताओं का निवास कहा गया है। षट्चक्रों में छः विश्वव्यापी महान शक्तियों का संबंध सूत्र जुड़ा बताया जाता है। कुण्डलिनी को अग्नि और सहस्रार को सोम कहा गया है। अग्नि में परा, अपरा प्रकृति की द्विविधि जड़ चेतन शक्तियाँ ओत-प्रोत हैं। कुण्डलिनी उसी महा अग्नि का प्रतीक है। ब्रह्मरन्ध्र से सहस्रार कमल को विष्णु का क्षीर-सागर, शिव का कैलाश और ब्रह्मा का ब्रह्म लोक बताया जाता है। सोम का निर्झर अमृत का कलश यही है। तीसरा लोक आज्ञाचक्र, दिव्य-दृष्टि सम्पन्न है-आदि रहस्यों का वर्णन योग साधना के अंतर्गत आता है। और कहा गया है कि यह मानवी सत्ता अद्भुत एवं अलौकिक है। साधना तपश्चर्या से उस बीज रूप में विद्यमान दिव्य सत्ता का उत्थान होता है। गुरुदेव की गायत्री साधना से उनका समग्र अतः क्षेत्र इस प्रकार जागृत हो चुका है कि जो कुछ भी मानवी पिण्ड में विद्यमान होगा वह उन्हें उपलब्ध होकर रहेगा।

कष्ट पीड़ितों और अभावग्रस्तों को उनका अनुदान सदा मिलता रहा है। यह सहायतायें करते रह सकना उपासना की उपलब्धियों द्वारा ही सम्भव हो सका है। परिवार के अगणित सदस्य उसका सम्भव लाभ सदा उठाते रहेंगे। रोतों को हँसाने में उन्हें मजा आता है, उसे उनका सबसे बड़ा चाव, विनोद या व्यसन कहा जा सकता है। जिन्हें वे कुछ ऊँचा उठा देखते हैं, उनकी कामनाओं और तृष्णाओं को तृप्त नहीं समाप्त करते हैं और उन्हें बड़प्पन से छुड़ाकर महानता में संलग्न करते हैं। उनके साथ भी तो यही बीता है। जिन्हें और भी ऊँचा समझते हैं उन्हें और भी ऊँचा उपहार देते हैं-अहंता और तृष्णा छोड़े बिना ब्रह्मवर्चस मिलता नहीं, सो जिसे सबसे अधिक प्यार करते हैं उसकी तृष्णा अहंता छीनकर अपने सदृश बनाने का जाल फैलाते हैं। पखेरू फँसते तो विरले ही हैं पर आंतरिक निष्ठा और अभिलाषा रहती उनकी यही है। त्रिविध अनुदान देने की राजा कर्ण जैसी-वाजिश्रवा जैसी उनकी ललक जो निरन्तर बढ़ती दिखती है और जिससे असंख्य लोग आशाजनक लाभ उठाते हैं वह गायत्री माता का ही अनुदान है। उनकी उछल-कूद उसी उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पदा के बलबूते पर चलती रहती है। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न उन्होंने उसी आधार पर देखा है कि स्वर्ग की ज्ञान-गंगा को धरती पर लाने के प्रयास में वे भागीरथ की तरह जूझते रहेंगे और गायत्री माता की दिव्य सत्ता उन्हें मुक्त हस्त से सहायता प्रदान करेगी।

गुरुदेव को तीन अभिभावकों के तीन अनुदान उपलब्ध होते रहे हैं। हिमालय पिता से प्रखर, पवित्र व्यक्तित्व। मार्गदर्शक गुरु से लोग मंगल के लिये अभीष्ट सामर्थ्य। गायत्री माता से देवत्व युक्त ब्रह्मवर्चस। यह तीनों ही उनकी उधार ली हुई अनुदान में प्राप्त विभूतियाँ हैं। वे इस शर्त पर मिली हैं कि उनका एक-एक कण भी अपने लोभ मोह के लिए स्वार्थ साधन के लिए खर्च न किया जाय, सो उन्होंने इस प्रतिबन्ध का सदा पूरा-पूरा ध्यान रखा है। हम दोनों में से कोई अस्वस्थ हो जाता है तो दवादारु का ही सहारा लेते हैं। दूसरों को दी जाने वाली दिव्य सहायता में से एक कण भी अपने लिए प्रयोग नहीं करते, जिन्हें वे अपना अति घनिष्ठ मानते हैं उनके प्रति भी ऐसी ही कठोरता बरतते हैं। घनिष्ठ आत्मीयता के साथ उनके दिव्य अनुदान ही जुड़े होते हैं-भौतिक आशीर्वाद नहीं। भौतिक आवश्यकतायें समाप्त ही कर लीं हैं- इच्छा-आकाँक्षाओं का उन्माद कब का हवा में उड़ गया। यदि कहीं कुछ रह भी गया तो उसे अपने निजी पुरुषार्थ से पूरा करते हैं या फिर सहते हैं। उसमें इस अमानत का एक कण भी खर्च नहीं किया जाता जो लोक मंगल के लिये धरोहर के रूप में ली गयी अथवा दी गयी है। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि विभूति कामनाएं सभी कुछ उनके लिये निरर्थक हैं। बार-बार जन्म लेना-बार-बार मरना और निरन्तर सर्वतोभावेन इस परमसत्ता के इशारों पर चलते रहना ही उनका लक्ष्य है जिसने दिव्य माता, दिव्य पिता और दिव्य गुरु की महान उपलब्धियाँ देकर अनाथ से सनाथ बनाया है। वे दूसरों से भी यही कहते रहते हैं - दिव्य अनुदान, दिव्य प्रयोजन के लिये माँगे जायें तो उत्कृष्टता दिव्य सत्ता को द्रवित कर सकती है और सहायता के लिये वाँछित भी।


Kavita

परम पूज्य वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगदृष्टा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के प्रति


श्रद्धा-सुमन


श्रद्धा-सुमन (Kavita)

धन्य-धन्य आदर्श तुम्हारा, आत्मा का शृंगार किया।

आत्म-शुद्धि के महा यज्ञ में, तन-मन जीवन वार दिया॥

दिव्य “अखण्ड-ज्योति दी तुमने, घर-घर फैला उजियारा।

“युग-निर्माण” लक्ष्य जीवन का, सत्संकल्प तुम्हें प्यारा॥

परम शान्ति, संतोष कोष से, तुमने मानव मन जीता।

तम बल के रावण से छीनी, परम पुनीता सत सीता॥

श्रीराम ने श्रीराम का, मृदु सपना साकार किया।

धर्म-कर्म के महा यज्ञ में, अपना सब कुछ वार दिया॥1॥

जीवित साँसों के मन्त्रों का, तुमने जादू दिखलाया।

सूने मन-मंदिर में सहसा, सुख का सागर लहराया॥

जन गण मन के नव जीवन तुम, जन-जन की जीवित भाषा।

धर्म-प्राण तुम तपोनिष्ठ तुम, जीवन दर्शन परिभाषा॥

योग साधना के उन्नायक, वेद पुराणों के ज्ञाता।

सदाचार समता के पोषक, राष्ट्र धर्म के निर्माता॥

भूली भटकी मानवता को, सविता का आधार दिया।

यज्ञ-ज्योति घर-घर फैलाई, मानव का उपकार किया॥2॥

आँधी पानी तूफानों से, लड़ना तुमने सिखलाया।

पशुता के आँगन में तुमने, महा यज्ञ ध्वज फहराया॥

ऐसी कठिन साधना तुमने, अपने जीवन में साधी।

असुरों की दुर्धर्ष शाहियाँ, अपनी मुट्ठी में बाँधी॥

प्राण प्रतिष्ठा, जीवन निष्ठा, सीखी सत पथ राही से।

लिखा दिव्य जीवन पृष्ठों को, सदाचार की स्याही से॥

तुमने गीता कर्म योग को, जीवन में साकार किया।

अपने प्राणों की ऊष्मा से, नव जीवन संचार किया॥3॥

धुआँ उगलता आसमान है, घुटन भरी है साँसों में।

जीवन की बीहड़ घाटी में, आग लगी विश्वासों में॥

तुम्हें साधना, हमें यातना, कैसा खेल विधाता का।

किस दर्पण में कहाँ निहारें, प्रियदर्शी मुख, त्राता का॥

मन अधीर कुण्ठित है वाणी, याद तुम्हारी कलपाती।

लेते नाम विदा का गुरुवर, जन-जन की फटती छाती॥

जीवन यज्ञ अभी है बाकी, असमय में मुँह मोड़ चले।

आकर प्राण कंठ में अटके, राम अयोध्या छोड़ चले॥

-बाबूलाल जैन ‘जलज’

*समाप्त*