बनाने की सोचिये, बिगाड़ने की नहीं

बया दूर-दूर तक जाती है एक-एक तिनका खोजकर घोंसला बनाती है। उसका पल-पल का परिश्रम, उसकी लगन और उसका मनोयोग ही एकाकार होकर घोंसले के रूप में प्रस्तुत होते हैं जिसे देखकर हर किसी को प्रेरणा मिलती है, प्रसन्नता होती है। प्रेरणायें और प्रसन्नतायें सृष्टि की हर रचना में विद्यमान हैं। स्पष्ट है सृष्टा ने बड़ा भारी परिश्रम किया होगा-अपनी सारी शक्ति लगाई होगी तब इस भव्य जगत का निर्माण सम्भव हुआ।

नन्हे से पक्षी बया के घोंसले को नष्ट कर देने वाला बिलाव हर किसी की निंदा का पात्र बनता है तब फिर परमपिता परमात्मा द्वारा रचित इस संसार को बिगाड़ना उसे नष्ट करना कोई अच्छी बात है? हर वस्तु हमारी भलाई के लिये बनी है, हर जीव हमारे कल्याण के लिये बना है, हर मनुष्य हमारी आकाँक्षाओं की पूर्ति में सहयोग देने वाला बनाया गया है तब फिर किसी को सताना, कष्ट पहुँचाना और ईश्वरीय कृति को विनष्ट करना क्या शोभा की बात है। हम बना नहीं सकते तो बिगाड़ने का ही क्या अधिकार?

आइये आज से, अभी से परमात्मा के बनाये हुए इस संसार को बनाने की बात सोचें-सोचें ही नहीं लग जायें-बिगाड़ने की तो कभी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए।

-बट्रैण्ड रसेल


संगीत की महिमा

सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामन्त्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामन्त्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया-सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की-सौम्यता सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।

उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि-मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट् चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमन्त्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ-ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट् किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपने स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं-एक ही दाँव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिये स्वामी-ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

तोते का मालिक-अरण्यजैत का खूँखार दस्यु नायक-महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता-चुप न रहा-फिर बोला-आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

सम्राट् चमूपति-रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुये थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया-उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिये” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान् रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी-आज के मंगलमूर्ति अतिथि-आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। साश्चर्य महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था।

महाराज! ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी-सम्राट् बोले-तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा-तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा ही सगा भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

महाराज बोले-वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हें शुक ने उत्तर दिया - महाराज! सब संगति का फल है मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो मुझे ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज-श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया - सत्संगति।


प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

प्रेम किसी पदार्थ या व्यक्ति से आरम्भ हो सकता है पर उस तक सीमित नहीं रह सकता। जब सीमाबद्ध हो जाय तो उसे मोह कहा जायगा। आरम्भ का मोह आगे चलकर प्रेम के रूप में विकसित हो यह उचित है, पर यदि उतने ही दायरे में सीमित रह गया तो उसे बौना या कुबड़ा कहा जायगा। बौने मनुष्य वे होते हैं जिनके हाथ-पैर बढ़ते नहीं, जिनकी शरीर स्थिति बड़े होने पर भी बालकों जितनी रह जाय उन्हें हास्यास्पद ही समझा जाता है। माँ के पेट से बालक छोटा सा उत्पन्न हुआ था, उस समय उसकी वह स्थिति ठीक थी पर सदा उतना ही वजन तथा आकार बना रहे तो यह ऐसा शिशु चिन्ता का कारण ही बनेगा। प्रेम के अंकुर व्यक्ति या पदार्थ के माध्यम से उत्पन्न हों सो ठीक है पर वे अंकुर उतने ही बड़े रह जायें, आगे न बढ़ें-वृक्ष रूप में परिणत न हों तो उनकी क्या सार्थकता रही?

परिवार बढ़ाने में विवाह से लेकर सन्तानोत्पादन तक में प्रेम भावना की अभिवृद्धि का सरल स्वाभाविक अभ्यास शुरू कराया जाता है, किशोर को अपने ही शौक-मौज की, खाने-खेलने की इच्छा रहती है। वह अपने लिए कई सुविधायें तथा वस्तुयें प्राप्त करने के लिए अभिभावकों से लड़ता-झगड़ता रहता है, तब उसके मन में पाने ही पाने की आकाँक्षा रहती है। पर जब थोड़ा बड़ा होता है और विवाह हो जाता है तो पत्नी के लिए उपहार देने या साधन जुटाने में मन मुड़ जाता है। अपनी शौक-मौज अपने शरीर में नहीं पत्नी के शरीर में पूरा होते देखना चाहता है और इस संदर्भ में वह जितना कर पाता है उतना ही प्रसन्न होता है। तब पत्नी की प्रसन्नता उसकी अपनी प्रसन्नता बन जाती है। आगे चलकर बच्चे होते हैं, तब पत्नी तक प्रेम की परिधि सीमित न रहकर बच्चों में फैल जाती है और बच्चों की प्रसन्नता तथा प्रगति के लिए निरन्तर चेष्टा की जाती रहती है। उस प्रयत्न में अपने आपे को क्रमशः खोया और भुलाया जाने लगता है। अपने को दूध न मिले कोई शिकायत नहीं, बच्चों को मिलना ही चाहिये। खुद सस्ते, फटे-पुराने कपड़े पहनकर काम चलालें बच्चों की फीस और पुस्तकों का खर्च जुटना ही चाहिए। बच्चों की आवश्यकता पूर्ण होने पर बड़ा सन्तोष मिलता है तब अपने अभावों की बात ध्यान में भी नहीं आती। परिवार को आत्म विस्तार की - प्रेम प्रशिक्षण की छोटी सी पाठशाला कहा जाय तो यह उपयुक्त ही होगा।

किन्तु कोई व्यक्ति जीवन भर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो उसे बाल बुद्धि ही कहा जायगा। प्रेम का प्रशिक्षण घर परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से आरम्भ हो उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जायगा आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी। जो प्यार सीमाबद्ध होकर रह जाता है उसे मोह कहते हैं, मोह में पक्षपात जुड़ जाता है। औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन् उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है। इससे प्रेम की महत्ता ही नष्ट हो जाती है। प्रेम गंगा जल है जिसे जहाँ छिड़का जाय वहीं पवित्रता पैदा करे पर यदि वह गन्दे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खोदे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जायगा। प्रेम पात्र लगाव का नहीं है-और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन सहयोग का। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श विहीन प्यार को मोह कहेंगे। मोह अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है तब उसकी ऊँचा उठाने की क्षमता नष्ट हो जाती है और गंगाजल का गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठने जैसा उदाहरण बन जाता है। मोह को प्रेम की विकृति ही कह सकते हैं इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है। प्रेम देवतत्व है उसका घुलन देवत्व के साथ ही हो सकता है। प्रेम एक उत्कृष्टता है जिसका आदर्शों के साथ ही तालमेल बैठ सकता है। आदर्शों का उल्लंघन करके जो मैत्री स्थापित होती है उसे हल्के दर्जे की दोस्ती भर कर सकते हैं। ऐसी दोस्ती किन्हीं भौतिक स्वार्थों या आकर्षणों पर टिकी होती है। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दूसरे का स्वार्थ पूरा करने के लिए रजामन्द रहना यह एक घटिया दर्जे का मानसिक व्यापार है। इसमें प्रेम की महानता कहाँ रही। जिसमें महानता के प्रति आस्था जुड़ी न हो वह कैसा प्रेम?

अवाँछनीयता के साथ मोह समझौता कर सकता है, प्रेम नहीं। प्रेम तो पवित्रता की गंगा है उसके संपर्क में जो भी आवेगा उसे पवित्रता, शीतलता और शाँति ही प्रदान करेगी। जो मलीनता को धोने की शक्ति से रहित हो वह कैसा गंगाजल? यदि हम किसी वस्तु से प्रेम करते हैं तो स्वभावतः उसे स्वच्छ, सुन्दर एवं सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते हैं यों ही अस्त-व्यस्त या मलीन स्थिति में नहीं पड़ा रहने देते। फिर जिस व्यक्ति से प्रेम किया जाय उसकी श्रेष्ठता को अक्षुण्य रखने या बढ़ाने का प्रयत्न क्यों नहीं किया जाना चाहिए? मैत्री आत्मा से की जाती है, व्यक्ति की महानता, उत्कृष्टता, सद्भावना एवं प्रगति से की जाती है, न कि उसकी मलीनताओं और निकृष्टताओं से।

प्रेम आगे बढ़ाता है और जो आगे बढ़ाता है, वह प्रगतिशील है प्रतिगामी नहीं। सूर्य पूर्व से उदय होता है पर उसका प्रकाश समस्त दिशाओं को उपलब्ध होता है। बादल समुद्र में से निकलते हैं पर बरसते सब जगह हैं। प्रेम का आरम्भ देव प्रतिमा से लेकर अपने मित्र परिवार से आरम्भ किया जा सकता है पर उसे उतने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् नगर, राष्ट्र, विश्व की सीमाओं में विकसित होना चाहिए और देश, धर्म, समाज संस्कृति की श्रेष्ठता अभिवर्धन करने वाले क्षेत्रों में अग्रसर होते हुए विश्व मानव की-समस्त संसार की सेवा साधना में निरत होना चाहिए। आदर्शों के अभिवर्धन में ही प्रेम की सार्थकता है। ऐसी मैत्री तो प्रेम तत्व को कलंकित ही कर सकती है जो पतन के गर्त से प्रेमी को न निकाल सके और न स्वयं ही उससे निकल सके। सघन मित्रता एवं सद्भाव रखते हुए प्रेमी की अवाँछनीयता को स्वीकार करने और उसमें सहयोग देने से इनकार किया जा सकता है और यदि इतने भर से मित्रता टूटती हो तो उस कच्चे आधार पर टिकी हुई मानकर टूटने का खतरा भी उठाया जा सकता है। आदर्श तो प्रेम का प्राण है यदि आदर्श ही चला गया तो प्रेम की सड़ी हुई लाश को छाती से बाँधे फिरने से क्या लाभ?

प्रेम कभी असफल नहीं होता क्योंकि उसकी सफलता सामने वाले के प्रतिदान पर टिकी नहीं रहती। देव प्रतिमायें कुछ भी प्रतिदान नहीं देती। हमारी नित्य की पूजा अर्चा, शृंगार, सज्जा के बदले कभी धन्यवाद तक नहीं कहती। हमारे बिलखने पर भी उनकी आंखें सजल नहीं होती फिर भी हमारी आराधना चलती ही रहती है और प्रतिदान के अभाव में भी आस्था ज्यों की त्यों बनी रहती है। प्रेमी ने हमारे प्रेम का प्रत्युत्तर क्या दिया, इसे देखने की फुरसत ही कहाँ होती है? न इसकी आवश्यकता ही अनुभव होती है। प्रेम अपने आप में पूर्ण है, वह एकाँगी एक पक्षी होकर भी यथा स्थान पर अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है। दूरवासी प्रेमी को चित्र की निकटता जैसा आनन्द प्रदान कर सकता है। जहाँ कुछ पाने की लालसा नहीं वहाँ असंतोष या असफलता का कोई कारण ही शेष नहीं रह जाता। ईश्वर कि यदि निष्काम भक्ति की जाय और प्रतिदान की आशा न की रखी जाय तो वह भक्ति भावना शाश्वत बनी रह सकती है। उनमें न चढ़ाव-उतार आता है और न असन्तोष का कोई अवसर प्रस्तुत होता है।

जहाँ देना ही देना है, लेने की इच्छा ही नहीं वहाँ असफलता क्या होनी है? प्रेमी की जीत उसकी मुट्ठी में सुरक्षित रहती है। क्योंकि उसे प्रेम के साथ सेवा और सहायता ही करनी है। जहाँ कुछ पाना हो वहाँ खीज और दुःख हो सकते हैं पर जहाँ देना ही देना रहा वहाँ उस प्रयास को कौन रोक सकेगा? इसमें व्यवधान वह निर्धारित प्रेमपात्र भी नहीं कर सकता। वह विमुखता या रुखाई दिखाये तो भी प्रेम के प्रवाह में कुछ अन्तर नहीं आता क्योंकि वह अपने आपमें पूर्ण है और आदर्शों पर टिका हुआ है। आदर्शों से प्रेम ही-प्रेम की परिणति है और उस स्तर पर पहुँचा हुआ प्रेम ही ईश्वर का प्रतीक बनकर सर्वत्र सुख-शाँति की वर्षा करता है।


दिव्य दृष्टि का बहुमूल्य संयंत्र - आज्ञाचक्र

चमड़े की आँखों से जो दीखता है जो देखा जा सकता है वह बहुत स्वल्प है। यदि इतनी ही परिधि तक देख सकना सम्भव हो सके तो उसे बहुत ही नगण्य उपलब्धि कहा जा सकेगा।

यों देखने का काम आँखों के लेन्स ही करते हैं। पर उनकी सीमा बहुत छोटी है। कुछ ही दूरी पर उनकी सीमा समाप्त हो जाती है। स्पष्ट दीखने वाली वस्तुयें ही उनकी परख पकड़ में आती है पर यह संसार बहुत विस्तृत है। सब पदार्थों के स्वरूप दृश्यमान नहीं है। जो दीखता है उससे अनदेखा बहुत ज्यादा है। अणुओं की गतिविधियों को ही लें, वे आकाशस्थ ग्रह-नक्षत्रों से भी अधिक संख्या में हैं और उनसे भी अधिक सक्रिय हैं। अपने शरीर में काम करने वाले परमाणुओं, जीवाणुओं, शक्तिघर के विद्युत प्रवाहों एवं क्रिया-कलापों को देख सकना, समझ सकना, सम्भव हो सके तो वह इतना ही विस्तृत, अद्भुत एवं अन्वेषण योग्य प्रतीत होगा जितना कि यह विराट् विश्व ब्रह्माण्ड। आँखें वह सब कहाँ देख पाती हैं।

प्रत्यक्ष जगत में भी-दृश्य पदार्थों में भी हमारी दृष्टि में एक छोटा सा क्षेत्र ही आता है। जाननी तो आगे की बातें भी पड़ती हैं। वह प्रयोजन चिट्ठियों से, अखबारों, तार, टेलीफोन, रेडियो आदि से पूरा होता है। आँखों की क्षमता से काम चलता न देखकर हमें जानकारी के क्षेत्र दूसरे साधनों से बढ़ाने पड़ते हैं। जिसके पास यह साधन जितने अधिक होते हैं वह उतना ही अधिक लाभान्वित होता है।

स्थूल दृष्टि की ससीमता से आगे असीम तक विस्तृत होने वाला एक और नेत्र हमारे पास है जिसे सूक्ष्म दृष्टि या दिव्य दृष्टि कहते हैं। योग साधना द्वारा कोई चाहे तो इस नेत्र को विकसित कर सकता है और चर्म चक्षुओं की परिधि से बहुत आगे की परिस्थितियों एवं घटनाओं को भली प्रकार देख सकने में समर्थ हो सकता है।

टेलीफोन के माध्यम से आवाज को सुदूर प्रदेशों तक पहुँचाने की विद्या बहुत पहले ज्ञात हो गई थी। इसके बाद रेडियो प्रणाली से परस्पर बैठे हुए व्यक्तियों का-बिना तार के ही-केवल ध्वनि कम्पनों की सहायता से वार्तालाप करना सम्भव हुआ। टेलीविजन प्रणाली में चित्रों को दूर-दूर तक भेजना सम्भव हुआ। अब उसमें एक कदम और आगे बढ़ा है। फोटोग्राफी भी इसी संचार प्रक्रिया के साथ जुड़ गई है। इसे ऐसे मानना चाहिए जैसे दर्पण और फोटो कैमरा, दर्पण के सामने खड़े होने पर चित्र दीखता है पर हटते ही वह चित्र गायब हो जाता है। कैमरे की बात दूसरी है। उसके सामने खड़े होकर फोटो उतारा जाय तो वह स्थायी बना रहेगा। टेलीविजन को दर्पण कहा जाय तो तो इस ‘विद्युत आवृत्ति संचार व्यवस्था’ को कैमरे की फोटोग्राफी मानना पड़ेगा जो क्षण भर में एक स्थान का फोटो पृथ्वी के इस छोर से उस छोर पर भेज देती है।

आज-कल अखबारों में जो विश्वभर की महत्वपूर्ण घटनाओं के फोटो दूसरे ही दिन आते हैं इसका कारण यही प्रणाली है। ‘टैलिक्स’ प्रणाली से भी यह अधिक बारीकियों से भरी हुई है। भारत में ऐसा संचार केन्द्र पूना के पास ‘आर्वी’ में छोटी पहाड़ियों के बीच बना हुआ है। इसे ‘इंटेल्साट-3’ कहते हैं। इनकी संचार तरंगें बम्बई के स्टील टावर में पहुँचती है। वहाँ फ्लोरा फाउण्डेशन के निकट बना हुआ अठारह मंजिल वाला संचार भवन उन तरंगों को ग्रहण करता है और फिर शक्तिशाली उपकरणों के माध्यम से अभीष्ट स्थानों पर भेज देता है। प्रेषण जैसी ही ग्रहण व्यवस्था भी इन ‘संयन्त्रों’ में है। विदेशों से आने वाले फोटो यहीं ग्रहण किये जाते हैं और उनकी अनेक प्रतियाँ छपकर तत्काल अखबारों को अथवा सम्बन्धित सरकारी विभागों को भेज दिये जाते हैं। फोटो ही नहीं-महत्वपूर्ण नक्शे, कागजात, पत्र आदि भी तत्काल इसी पद्धति के माध्यम से भेजे और ग्रहण किये जाते हैं। अन्यत्र भेजे जाने वाले फोटो एक बड़े बेलन पर चिपका दिये जाते है। यह बेलन 6 चक्कर प्रति मिनट के हिसाब से घूमता है। साथ ही प्रति इंच 100 रेखायें भी गतिशील करता है। प्रकाश का एक केन्द्रित पुञ्ज उस फोटो पर डाला जाता है, परावर्तित प्रकाश एक लेंस की सहायता से प्रकाश कोशिका पर केन्द्रित होता है। यहाँ प्रकाश की विविधता-विविध विद्युत कम्पनों में बदल जाती है। रंगों के उतार-चढ़ाव के हिसाब से इन विद्युत कम्पनों में अन्तर हो जाता है। सफेद रंग के लिए 15 साइकल, काले रंग के लिए 23 भूरे रंग के लिए, 18 साइकल प्रति सेकिण्ड आवृत्ति होती है। अब इन कम्पनों को दुनिया के किसी भी कोने में रेडियो संचार प्रणाली के अनुसार विश्व के किसी भी कोने पर भेज दिया जा सकता है। जहाँ इन चित्रों को पकड़ा जाता है वहाँ भी रेडियो ध्वनि ग्रहण करने जैसे यन्त्र लगे रहते हैं वे यन्त्र उन विद्युत कम्पनों को पकड़ कर उन्हें चित्र रूप में पुनः परावर्तित कर लेते हैं। अपने देश में ऐसे 24 रेडियो फोटो चैनल है, जिनका सम्बन्ध संसार के 34 प्रमुख देशों से हैं।

इस संचार उपग्रह पद्धति की रूसी प्रणाली ‘डार्विटा’ कहलाती है। अमेरिका की अपनी प्रणाली है। सन् 69 से लेकर अब तक अमेरिका ने लगभग 600 से अधिक अन्तरिक्ष यान छोड़े जिनमें से 550 से अधिक अभी भी पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में घूम रहे हैं। रूस हर साल 50 और 100 के बीच इस प्रकार के उपग्रह भेजते रहे हैं। यह कृत्रिम अन्तरिक्ष उपग्रह मौसम शोध से लेकर खगोलीय परिस्थितियों की जानकारी अपने मूल केन्द्र में भेजते रहते हैं। ऐसे ही उपग्रह इस रेडियो फोटो संचार पद्धति को संचालित रखने में सहायता करते हैं। इस ‘इंटेसाल्ट उपग्रह पद्धति का विकास करके शब्द संचार की तरह चित्र संचार की सुविधा भी सरल बनाई जा सकती है और हम घर बैठे विश्व की महत्वपूर्ण घटनाओं को सिनेमा के पर्दे पर देखी जाने वाली फिल्मों की तरह प्रत्यक्ष देख सकते हैं। टेलीविजन में अभी जो छोटे दायरे से ही काम करने की कठिनाई है वह भी इस प्रणाली से दूर की जा सकती है।

यह दूरदर्शन का कार्य टेलीविजन यन्त्र करते हैं। चित्रों को दूर तक भेजने वाली यह रेडियो फोटोग्राफी भी काम में आ रही है। टेलिस्कोप, माइक्रोचिप आदि सूक्ष्मदर्शी और सुदूरदर्शी यन्त्र भी नेत्र शक्ति की ससीमता को बढ़ाकर विस्तृत और व्यापक बनाते हैं। यह साधन जिनके पास हैं वे इन यन्त्रों की मर्यादा के अनुरूप लाभ उठा लेते हैं।

भगवान का दिया हुआ एक ऐसा ही यन्त्र मनुष्य के पास भी है जिसे दृष्टिवर्धन के अद्यावधि आविष्कारों की सम्मिलित उपलब्धियों से भी कहीं अधिक समर्थ और व्यापक कहा जा सकता है। न इसे खरीदना पड़ता है और न इसके संचालन की कोई बड़ी शिक्षा लेनी पड़ती है। भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञा चक्र अपना तीसरा नेत्र है। इसे खोलने की साधना करने से वह अन्तर्ज्योति विकसित


बनाने की सोचिये, बिगाड़ने की नहीं

बया दूर-दूर तक जाती है एक-एक तिनका खोजकर घोंसला बनाती है। उसका पल-पल का परिश्रम, उसकी लगन और उसका मनोयोग ही एकाकार होकर घोंसले के रूप में प्रस्तुत होते हैं जिसे देखकर हर किसी को प्रेरणा मिलती है, प्रसन्नता होती है। प्रेरणायें और प्रसन्नतायें सृष्टि की हर रचना में विद्यमान हैं। स्पष्ट है सृष्टा ने बड़ा भारी परिश्रम किया होगा-अपनी सारी शक्ति लगाई होगी तब इस भव्य जगत का निर्माण सम्भव हुआ।

नन्हे से पक्षी बया के घोंसले को नष्ट कर देने वाला बिलाव हर किसी की निंदा का पात्र बनता है तब फिर परमपिता परमात्मा द्वारा रचित इस संसार को बिगाड़ना उसे नष्ट करना कोई अच्छी बात है? हर वस्तु हमारी भलाई के लिये बनी है, हर जीव हमारे कल्याण के लिये बना है, हर मनुष्य हमारी आकाँक्षाओं की पूर्ति में सहयोग देने वाला बनाया गया है तब फिर किसी को सताना, कष्ट पहुँचाना और ईश्वरीय कृति को विनष्ट करना क्या शोभा की बात है। हम बना नहीं सकते तो बिगाड़ने का ही क्या अधिकार?

आइये आज से, अभी से परमात्मा के बनाये हुए इस संसार को बनाने की बात सोचें-सोचें ही नहीं लग जायें-बिगाड़ने की तो कभी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए।

-बट्रैण्ड रसेल


संगीत की महिमा

सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामन्त्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामन्त्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया-सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की-सौम्यता सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।

उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि-मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट् चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमन्त्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ-ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट् किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपने स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं-एक ही दाँव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिये स्वामी-ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

तोते का मालिक-अरण्यजैत का खूँखार दस्यु नायक-महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता-चुप न रहा-फिर बोला-आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

सम्राट् चमूपति-रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुये थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया-उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिये” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान् रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी-आज के मंगलमूर्ति अतिथि-आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। साश्चर्य महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था।

महाराज! ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी-सम्राट् बोले-तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा-तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा ही सगा भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

महाराज बोले-वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हें शुक ने उत्तर दिया - महाराज! सब संगति का फल है मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो मुझे ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज-श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया - सत्संगति।


प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

प्रेम किसी पदार्थ या व्यक्ति से आरम्भ हो सकता है पर उस तक सीमित नहीं रह सकता। जब सीमाबद्ध हो जाय तो उसे मोह कहा जायगा। आरम्भ का मोह आगे चलकर प्रेम के रूप में विकसित हो यह उचित है, पर यदि उतने ही दायरे में सीमित रह गया तो उसे बौना या कुबड़ा कहा जायगा। बौने मनुष्य वे होते हैं जिनके हाथ-पैर बढ़ते नहीं, जिनकी शरीर स्थिति बड़े होने पर भी बालकों जितनी रह जाय उन्हें हास्यास्पद ही समझा जाता है। माँ के पेट से बालक छोटा सा उत्पन्न हुआ था, उस समय उसकी वह स्थिति ठीक थी पर सदा उतना ही वजन तथा आकार बना रहे तो यह ऐसा शिशु चिन्ता का कारण ही बनेगा। प्रेम के अंकुर व्यक्ति या पदार्थ के माध्यम से उत्पन्न हों सो ठीक है पर वे अंकुर उतने ही बड़े रह जायें, आगे न बढ़ें-वृक्ष रूप में परिणत न हों तो उनकी क्या सार्थकता रही?

परिवार बढ़ाने में विवाह से लेकर सन्तानोत्पादन तक में प्रेम भावना की अभिवृद्धि का सरल स्वाभाविक अभ्यास शुरू कराया जाता है, किशोर को अपने ही शौक-मौज की, खाने-खेलने की इच्छा रहती है। वह अपने लिए कई सुविधायें तथा वस्तुयें प्राप्त करने के लिए अभिभावकों से लड़ता-झगड़ता रहता है, तब उसके मन में पाने ही पाने की आकाँक्षा रहती है। पर जब थोड़ा बड़ा होता है और विवाह हो जाता है तो पत्नी के लिए उपहार देने या साधन जुटाने में मन मुड़ जाता है। अपनी शौक-मौज अपने शरीर में नहीं पत्नी के शरीर में पूरा होते देखना चाहता है और इस संदर्भ में वह जितना कर पाता है उतना ही प्रसन्न होता है। तब पत्नी की प्रसन्नता उसकी अपनी प्रसन्नता बन जाती है। आगे चलकर बच्चे होते हैं, तब पत्नी तक प्रेम की परिधि सीमित न रहकर बच्चों में फैल जाती है और बच्चों की प्रसन्नता तथा प्रगति के लिए निरन्तर चेष्टा की जाती रहती है। उस प्रयत्न में अपने आपे को क्रमशः खोया और भुलाया जाने लगता है। अपने को दूध न मिले कोई शिकायत नहीं, बच्चों को मिलना ही चाहिये। खुद सस्ते, फटे-पुराने कपड़े पहनकर काम चलालें बच्चों की फीस और पुस्तकों का खर्च जुटना ही चाहिए। बच्चों की आवश्यकता पूर्ण होने पर बड़ा सन्तोष मिलता है तब अपने अभावों की बात ध्यान में भी नहीं आती। परिवार को आत्म विस्तार की - प्रेम प्रशिक्षण की छोटी सी पाठशाला कहा जाय तो यह उपयुक्त ही होगा।

किन्तु कोई व्यक्ति जीवन भर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो उसे बाल बुद्धि ही कहा जायगा। प्रेम का प्रशिक्षण घर परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से आरम्भ हो उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जायगा आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी। जो प्यार सीमाबद्ध होकर रह जाता है उसे मोह कहते हैं, मोह में पक्षपात जुड़ जाता है। औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन् उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है। इससे प्रेम की महत्ता ही नष्ट हो जाती है। प्रेम गंगा जल है जिसे जहाँ छिड़का जाय वहीं पवित्रता पैदा करे पर यदि वह गन्दे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खोदे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जायगा। प्रेम पात्र लगाव का नहीं है-और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन सहयोग का। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श विहीन प्यार को मोह कहेंगे। मोह अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है तब उसकी ऊँचा उठाने की क्षमता नष्ट हो जाती है और गंगाजल का गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठने जैसा उदाहरण बन जाता है। मोह को प्रेम की विकृति ही कह सकते हैं इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है। प्रेम देवतत्व है उसका घुलन देवत्व के साथ ही हो सकता है। प्रेम एक उत्कृष्टता है जिसका आदर्शों के साथ ही तालमेल बैठ सकता है। आदर्शों का उल्लंघन करके जो मैत्री स्थापित होती है उसे हल्के दर्जे की दोस्ती भर कर सकते हैं। ऐसी दोस्ती किन्हीं भौतिक स्वार्थों या आकर्षणों पर टिकी होती है। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दूसरे का स्वार्थ पूरा करने के लिए रजामन्द रहना यह एक घटिया दर्जे का मानसिक व्यापार है। इसमें प्रेम की महानता कहाँ रही। जिसमें महानता के प्रति आस्था जुड़ी न हो वह कैसा प्रेम?

अवाँछनीयता के साथ मोह समझौता कर सकता है, प्रेम नहीं। प्रेम तो पवित्रता की गंगा है उसके संपर्क में जो भी आवेगा उसे पवित्रता, शीतलता और शाँति ही प्रदान करेगी। जो मलीनता को धोने की शक्ति से रहित हो वह कैसा गंगाजल? यदि हम किसी वस्तु से प्रेम करते हैं तो स्वभावतः उसे स्वच्छ, सुन्दर एवं सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते हैं यों ही अस्त-व्यस्त या मलीन स्थिति में नहीं पड़ा रहने देते। फिर जिस व्यक्ति से प्रेम किया जाय उसकी श्रेष्ठता को अक्षुण्य रखने या बढ़ाने का प्रयत्न क्यों नहीं किया जाना चाहिए? मैत्री आत्मा से की जाती है, व्यक्ति की महानता, उत्कृष्टता, सद्भावना एवं प्रगति से की जाती है, न कि उसकी मलीनताओं और निकृष्टताओं से।

प्रेम आगे बढ़ाता है और जो आगे बढ़ाता है, वह प्रगतिशील है प्रतिगामी नहीं। सूर्य पूर्व से उदय होता है पर उसका प्रकाश समस्त दिशाओं को उपलब्ध होता है। बादल समुद्र में से निकलते हैं पर बरसते सब जगह हैं। प्रेम का आरम्भ देव प्रतिमा से लेकर अपने मित्र परिवार से आरम्भ किया जा सकता है पर उसे उतने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् नगर, राष्ट्र, विश्व की सीमाओं में विकसित होना चाहिए और देश, धर्म, समाज संस्कृति की श्रेष्ठता अभिवर्धन करने वाले क्षेत्रों में अग्रसर होते हुए विश्व मानव की-समस्त संसार की सेवा साधना में निरत होना चाहिए। आदर्शों के अभिवर्धन में ही प्रेम की सार्थकता है। ऐसी मैत्री तो प्रेम तत्व को कलंकित ही कर सकती है जो पतन के गर्त से प्रेमी को न निकाल सके और न स्वयं ही उससे निकल सके। सघन मित्रता एवं सद्भाव रखते हुए प्रेमी की अवाँछनीयता को स्वीकार करने और उसमें सहयोग देने से इनकार किया जा सकता है और यदि इतने भर से मित्रता टूटती हो तो उस कच्चे आधार पर टिकी हुई मानकर टूटने का खतरा भी उठाया जा सकता है। आदर्श तो प्रेम का प्राण है यदि आदर्श ही चला गया तो प्रेम की सड़ी हुई लाश को छाती से बाँधे फिरने से क्या लाभ?

प्रेम कभी असफल नहीं होता क्योंकि उसकी सफलता सामने वाले के प्रतिदान पर टिकी नहीं रहती। देव प्रतिमायें कुछ भी प्रतिदान नहीं देती। हमारी नित्य की पूजा अर्चा, शृंगार, सज्जा के बदले कभी धन्यवाद तक नहीं कहती। हमारे बिलखने पर भी उनकी आंखें सजल नहीं होती फिर भी हमारी आराधना चलती ही रहती है और प्रतिदान के अभाव में भी आस्था ज्यों की त्यों बनी रहती है। प्रेमी ने हमारे प्रेम का प्रत्युत्तर क्या दिया, इसे देखने की फुरसत ही कहाँ होती है? न इसकी आवश्यकता ही अनुभव होती है। प्रेम अपने आप में पूर्ण है, वह एकाँगी एक पक्षी होकर भी यथा स्थान पर अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है। दूरवासी प्रेमी को चित्र की निकटता जैसा आनन्द प्रदान कर सकता है। जहाँ कुछ पाने की लालसा नहीं वहाँ असंतोष या असफलता का कोई कारण ही शेष नहीं रह जाता। ईश्वर कि यदि निष्काम भक्ति की जाय और प्रतिदान की आशा न की रखी जाय तो वह भक्ति भावना शाश्वत बनी रह सकती है। उनमें न चढ़ाव-उतार आता है और न असन्तोष का कोई अवसर प्रस्तुत होता है।

जहाँ देना ही देना है, लेने की इच्छा ही नहीं वहाँ असफलता क्या होनी है? प्रेमी की जीत उसकी मुट्ठी में सुरक्षित रहती है। क्योंकि उसे प्रेम के साथ सेवा और सहायता ही करनी है। जहाँ कुछ पाना हो वहाँ खीज और दुःख हो सकते हैं पर जहाँ देना ही देना रहा वहाँ उस प्रयास को कौन रोक सकेगा? इसमें व्यवधान वह निर्धारित प्रेमपात्र भी नहीं कर सकता। वह विमुखता या रुखाई दिखाये तो भी प्रेम के प्रवाह में कुछ अन्तर नहीं आता क्योंकि वह अपने आपमें पूर्ण है और आदर्शों पर टिका हुआ है। आदर्शों से प्रेम ही-प्रेम की परिणति है और उस स्तर पर पहुँचा हुआ प्रेम ही ईश्वर का प्रतीक बनकर सर्वत्र सुख-शाँति की वर्षा करता है।


दिव्य दृष्टि का बहुमूल्य संयंत्र - आज्ञाचक्र

चमड़े की आँखों से जो दीखता है जो देखा जा सकता है वह बहुत स्वल्प है। यदि इतनी ही परिधि तक देख सकना सम्भव हो सके तो उसे बहुत ही नगण्य उपलब्धि कहा जा सकेगा।

यों देखने का काम आँखों के लेन्स ही करते हैं। पर उनकी सीमा बहुत छोटी है। कुछ ही दूरी पर उनकी सीमा समाप्त हो जाती है। स्पष्ट दीखने वाली वस्तुयें ही उनकी परख पकड़ में आती है पर यह संसार बहुत विस्तृत है। सब पदार्थों के स्वरूप दृश्यमान नहीं है। जो दीखता है उससे अनदेखा बहुत ज्यादा है। अणुओं की गतिविधियों को ही लें, वे आकाशस्थ ग्रह-नक्षत्रों से भी अधिक संख्या में हैं और उनसे भी अधिक सक्रिय हैं। अपने शरीर में काम करने वाले परमाणुओं, जीवाणुओं, शक्तिघर के विद्युत प्रवाहों एवं क्रिया-कलापों को देख सकना, समझ सकना, सम्भव हो सके तो वह इतना ही विस्तृत, अद्भुत एवं अन्वेषण योग्य प्रतीत होगा जितना कि यह विराट् विश्व ब्रह्माण्ड। आँखें वह सब कहाँ देख पाती हैं।

प्रत्यक्ष जगत में भी-दृश्य पदार्थों में भी हमारी दृष्टि में एक छोटा सा क्षेत्र ही आता है। जाननी तो आगे की बातें भी पड़ती हैं। वह प्रयोजन चिट्ठियों से, अखबारों, तार, टेलीफोन, रेडियो आदि से पूरा होता है। आँखों की क्षमता से काम चलता न देखकर हमें जानकारी के क्षेत्र दूसरे साधनों से बढ़ाने पड़ते हैं। जिसके पास यह साधन जितने अधिक होते हैं वह उतना ही अधिक लाभान्वित होता है।

स्थूल दृष्टि की ससीमता से आगे असीम तक विस्तृत होने वाला एक और नेत्र हमारे पास है जिसे सूक्ष्म दृष्टि या दिव्य दृष्टि कहते हैं। योग साधना द्वारा कोई चाहे तो इस नेत्र को विकसित कर सकता है और चर्म चक्षुओं की परिधि से बहुत आगे की परिस्थितियों एवं घटनाओं को भली प्रकार देख सकने में समर्थ हो सकता है।

टेलीफोन के माध्यम से आवाज को सुदूर प्रदेशों तक पहुँचाने की विद्या बहुत पहले ज्ञात हो गई थी। इसके बाद रेडियो प्रणाली से परस्पर बैठे हुए व्यक्तियों का-बिना तार के ही-केवल ध्वनि कम्पनों की सहायता से वार्तालाप करना सम्भव हुआ। टेलीविजन प्रणाली में चित्रों को दूर-दूर तक भेजना सम्भव हुआ। अब उसमें एक कदम और आगे बढ़ा है। फोटोग्राफी भी इसी संचार प्रक्रिया के साथ जुड़ गई है। इसे ऐसे मानना चाहिए जैसे दर्पण और फोटो कैमरा, दर्पण के सामने खड़े होने पर चित्र दीखता है पर हटते ही वह चित्र गायब हो जाता है। कैमरे की बात दूसरी है। उसके सामने खड़े होकर फोटो उतारा जाय तो वह स्थायी बना रहेगा। टेलीविजन को दर्पण कहा जाय तो तो इस ‘विद्युत आवृत्ति संचार व्यवस्था’ को कैमरे की फोटोग्राफी मानना पड़ेगा जो क्षण भर में एक स्थान का फोटो पृथ्वी के इस छोर से उस छोर पर भेज देती है।

आज-कल अखबारों में जो विश्वभर की महत्वपूर्ण घटनाओं के फोटो दूसरे ही दिन आते हैं इसका कारण यही प्रणाली है। ‘टैलिक्स’ प्रणाली से भी यह अधिक बारीकियों से भरी हुई है। भारत में ऐसा संचार केन्द्र पूना के पास ‘आर्वी’ में छोटी पहाड़ियों के बीच बना हुआ है। इसे ‘इंटेल्साट-3’ कहते हैं। इनकी संचार तरंगें बम्बई के स्टील टावर में पहुँचती है। वहाँ फ्लोरा फाउण्डेशन के निकट बना हुआ अठारह मंजिल वाला संचार भवन उन तरंगों को ग्रहण करता है और फिर शक्तिशाली उपकरणों के माध्यम से अभीष्ट स्थानों पर भेज देता है। प्रेषण जैसी ही ग्रहण व्यवस्था भी इन ‘संयन्त्रों’ में है। विदेशों से आने वाले फोटो यहीं ग्रहण किये जाते हैं और उनकी अनेक प्रतियाँ छपकर तत्काल अखबारों को अथवा सम्बन्धित सरकारी विभागों को भेज दिये जाते हैं। फोटो ही नहीं-महत्वपूर्ण नक्शे, कागजात, पत्र आदि भी तत्काल इसी पद्धति के माध्यम से भेजे और ग्रहण किये जाते हैं। अन्यत्र भेजे जाने वाले फोटो एक बड़े बेलन पर चिपका दिये जाते है। यह बेलन 6 चक्कर प्रति मिनट के हिसाब से घूमता है। साथ ही प्रति इंच 100 रेखायें भी गतिशील करता है। प्रकाश का एक केन्द्रित पुञ्ज उस फोटो पर डाला जाता है, परावर्तित प्रकाश एक लेंस की सहायता से प्रकाश कोशिका पर केन्द्रित होता है। यहाँ प्रकाश की विविधता-विविध विद्युत कम्पनों में बदल जाती है। रंगों के उतार-चढ़ाव के हिसाब से इन विद्युत कम्पनों में अन्तर हो जाता है। सफेद रंग के लिए 15 साइकल, काले रंग के लिए 23 भूरे रंग के लिए, 18 साइकल प्रति सेकिण्ड आवृत्ति होती है। अब इन कम्पनों को दुनिया के किसी भी कोने में रेडियो संचार प्रणाली के अनुसार विश्व के किसी भी कोने पर भेज दिया जा सकता है। जहाँ इन चित्रों को पकड़ा जाता है वहाँ भी रेडियो ध्वनि ग्रहण करने जैसे यन्त्र लगे रहते हैं वे यन्त्र उन विद्युत कम्पनों को पकड़ कर उन्हें चित्र रूप में पुनः परावर्तित कर लेते हैं। अपने देश में ऐसे 24 रेडियो फोटो चैनल है, जिनका सम्बन्ध संसार के 34 प्रमुख देशों से हैं।

इस संचार उपग्रह पद्धति की रूसी प्रणाली ‘डार्विटा’ कहलाती है। अमेरिका की अपनी प्रणाली है। सन् 69 से लेकर अब तक अमेरिका ने लगभग 600 से अधिक अन्तरिक्ष यान छोड़े जिनमें से 550 से अधिक अभी भी पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में घूम रहे हैं। रूस हर साल 50 और 100 के बीच इस प्रकार के उपग्रह भेजते रहे हैं। यह कृत्रिम अन्तरिक्ष उपग्रह मौसम शोध से लेकर खगोलीय परिस्थितियों की जानकारी अपने मूल केन्द्र में भेजते रहते हैं। ऐसे ही उपग्रह इस रेडियो फोटो संचार पद्धति को संचालित रखने में सहायता करते हैं। इस ‘इंटेसाल्ट उपग्रह पद्धति का विकास करके शब्द संचार की तरह चित्र संचार की सुविधा भी सरल बनाई जा सकती है और हम घर बैठे विश्व की महत्वपूर्ण घटनाओं को सिनेमा के पर्दे पर देखी जाने वाली फिल्मों की तरह प्रत्यक्ष देख सकते हैं। टेलीविजन में अभी जो छोटे दायरे से ही काम करने की कठिनाई है वह भी इस प्रणाली से दूर की जा सकती है।

यह दूरदर्शन का कार्य टेलीविजन यन्त्र करते हैं। चित्रों को दूर तक भेजने वाली यह रेडियो फोटोग्राफी भी काम में आ रही है। टेलिस्कोप, माइक्रोचिप आदि सूक्ष्मदर्शी और सुदूरदर्शी यन्त्र भी नेत्र शक्ति की ससीमता को बढ़ाकर विस्तृत और व्यापक बनाते हैं। यह साधन जिनके पास हैं वे इन यन्त्रों की मर्यादा के अनुरूप लाभ उठा लेते हैं।

भगवान का दिया हुआ एक ऐसा ही यन्त्र मनुष्य के पास भी है जिसे दृष्टिवर्धन के अद्यावधि आविष्कारों की सम्मिलित उपलब्धियों से भी कहीं अधिक समर्थ और व्यापक कहा जा सकता है। न इसे खरीदना पड़ता है और न इसके संचालन की कोई बड़ी शिक्षा लेनी पड़ती है। भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञा चक्र अपना तीसरा नेत्र है। इसे खोलने की साधना करने से वह अन्तर्ज्योति विकसित


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आध्यात्मिक महत्वाकाँक्षा की, आत्म गौरव की भूख, शारीरिक भूख की अपेक्षा कई गुनी तीव्र, आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। -अज्ञात

हो सकती है जिसके माध्यम से लोक-लोकान्तरों की-भूगर्भ की-पञ्च भौतिक परिस्थितियों को देखा और समझा जा सके। इतना ही नहीं इस तीसरे नेत्र में वह शक्ति भी है कि जीवित प्राणियों की मनःस्थिति, भावना, कल्पना, योजना, इच्छा, आस्था एवं प्रकृति को भी समझा जा सके। इस आज्ञाचक्र को विकसित करने की साधना हमें दृष्टि की प्रखरता और व्यापकता का अनुपम उपहार दे सकती है। यह उपहार न केवल वर्तमान का ही परिचय प्राप्त करने में समर्थ है वरन् चिर अतीत में जो घटित हो चुका और निकट भविष्य में जो होने जा रहा है उसका पूर्वाभास भी जाना जा सकता है।

भौतिक उपलब्धियों के लिए जितना प्रयत्न किया जाता है उतना ही यदि आत्मिक विभूतियों के लिए किया जा सके और उनका महत्व समझा जा सके तो हम वर्तमान ससीमता के घेरे को लाँघकर अपना कार्यक्षेत्र असीम तक - विराट् तक-विस्तृत कर सकते हैं।


मंत्रविद्या और उसकी सुनिश्चित सामर्थ्य

मन्त्र विद्या में दो तत्वों का समावेश है। (1) शब्द शक्ति का सूक्ष्म चेतना विज्ञान के आधार पर उपयोग (2) व्यक्ति क्षमता का समन्वय। इन दोनों के मिलन से एक तीसरी ऐसी अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है जो कितने ही बड़े भौतिक साधनों से उपलब्ध नहीं हो सकती।

मशीनें टूटती-फूटती रहती हैं। उनकी साज-सँभाल के लिए कुशल कारीगर नियुक्त करने पड़ते हैं। ईंधन के बिना उन यन्त्रों का चलना सम्भव नहीं। पर मनुष्य-शरीर का यन्त्र जितना सशक्त है उतना ही सरल भी। इसके चलाने के लिए न कारीगर की जरूरत है न रोटी-पानी की स्वाभाविक प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी विशेष ईंधन की। उसे खरीदने को पूँजी चाहिए न लगाने जमाने के लिए फैक्टरी। वह जितना सस्ता और सरल है उतना तुच्छ नहीं। महत्तायें, सिद्धियाँ, और विभूतियाँ उसके रोम-रोम में भरी पड़ी हैं। इस यन्त्र का भौतिक उपयोग सभी जानते हैं। आहार, निद्रा, भय, मैथुन जैसे प्रयोजनों के लिए पशुओं की तरह मनुष्य भी उसका उपयोग करते हैं। पर आत्मिक उपयोग कोई विरले ही जानते हैं। इसे न जानने के कारण इस मानव काया का नगण्य सा ही उपयोग हो पाता है। जो कुछ दिव्य है उस अधिकाँश का तो न ज्ञान होता है न उपयोग। योग विद्या इस हानि से बचाने के प्रक्रिया का ही नाम है।

साधारणतया वाणी का उपयोग बात-चीत करने के-ज्ञान वृद्धि के-एवं जानकारियों के आदान-प्रदान के लिए होता है। यह उसका अति स्थूल प्रयोग है। शक्ति की सूक्ष्म शक्ति और उसके उपयोग की विधि को जाना जा सके तो उसका जितना लाभ आमतौर से उठाया जा सकता है उससे असंख्य गुना उठाया जा सकना सम्भव हो सकता है। मन्त्र विद्या को वाणी की सूक्ष्म शक्ति का उपयोग करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए।

शब्द कितना समर्थ है? वाणी की क्षमता कितनी अद्भुत प्रयोजन पूरे करती है? उसके साथ जुड़ा हुआ विद्युत प्रवाह कितना प्रचण्ड है। इसे पदार्थ विज्ञान वेत्ता जानते हैं और उस ज्ञान के आधार पर रेडियो, टेलीविजन, राडार आदि यन्त्रों का निर्माण, संचालन करते हैं। मनुष्य के शरीर की विचारणा की भाव स्थिति की त्रिविधि क्षमताओं का समन्वय करके जो विद्युत प्रवाह प्रस्तुत होता है उसकी क्षमता को अध्यात्म तत्ववेत्ताओं ने समझा और उसी आधार पर मन्त्र-विद्या का आविष्कार किया।

आवाज को मुँह से निकलने वाली ‘हवा’ मात्र न समझा जाये। वह एक शक्तिशाली पदार्थ की तरह है जिससे कितने ही तरह के प्रयोजन पूरे किया जा सकते है।

अन्य पदार्थों की तरह आवाज भी एक ऐसा पदार्थ सिद्ध हो गया है जिसकी नाप-तौल की जा सकती है और तस्वीर खींची जा सकती है। प्लेट रिकार्डों और टेप रिकार्डों के द्वारा मनुष्य की आवाज को अंकित कर लेना और उसे बार-बार सुनाते, दुहराते रहना तो रोज ही देखा जाता है। लाउडस्पीकर और टेपरिकॉर्डर किन्हीं गीत वाद्यों सम्बन्धी रिकार्ड की हुई ध्वनियों को आये दिन सुनते रहते हैं।

अब आवाज की किसी के अभिभाषण के प्रमाण रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे पहले ऐसी बात न थी। टेप रिकार्ड अदालतों में प्रामाणिक नहीं माने जाते हैं। उनकी गवाही को मान्यता नहीं मिलती थी। क्योंकि अभियुक्त अक्सर उस आवाज को अपनी मानने से मुकर जाते थे। कोई दूसरे की आवाज की नकल भी कर सकता है। इस सन्देह में उन रिकार्डों को प्रामाणिक नहीं माना जाता था।

अँगूठे की और उँगलियों की छाप ही अब तक पूर्ण प्रामाणिक मानी जाती थी क्योंकि संसार में किन्हीं दो व्यक्तियों के अँगूठे की रेखायें एक सी नहीं होती। दस्तखत तो जाली बन सकते है पर अँगूठा की छाप की नकल असम्भव है। इसी प्रकार संसार में दो व्यक्तियों की आवाज भी एक सी नहीं होती अब ध्वनि अंकन को भी वही मान्यता प्राप्त हो गई है। यह आविष्कार डॉ. कर्स्टा न्यू जर्सी के ब्वायस प्रिन्ट प्रयोगशाला ने किया है। इस पद्धति के अनुसार आवाज को तीन कोणों से अंकन किया जाता है। आड़ा अंकन समय की लम्बाई बताता है। खड़ा - ध्वनि की गति और बुलन्दी का अंकन नक्शे जैसी रेखाओं के रूप में होता है। इस प्रक्रिया के आविष्कर्त्ता डॉ. कर्स्टा का कथन है कि बच्चा जब बोलना सीखता है तब उसके होंठ, दाँत, जीभ, तालु, जबड़ा, कण्ठ आदि की माँसपेशियों के सिकुड़ने फैलने का ढंग दूसरों से सर्वथा नहीं मिलता। उसमें कुछ भिन्नता विशेषता रह जाती है। इसलिए हर व्यक्ति की आवाज में दूसरों की अपेक्षा अन्तर रहता है इस अन्तर को अंकित करके आवाज की अपने ढंग की एक तस्वीर ही बन सकती है।

इस आविष्कार के आधार पर कितने अभियुक्तों को पकड़ा जा सका है और कितने ही अपराधी दण्ड के भागी हुए हैं जिस प्रकार अँगूठे की छाप या अपने फोटो से कोई इनकार नहीं कर सकता उसी प्रकार अपनी आवाज के अंकन से इनकार करना भी अब सम्भव नहीं रहा। अब यह प्रमाणित हो गया है कि ध्वनि तरंगों के रूप में फैलती रहने वाली आवाजों को भी स्वरूप एवं पदार्थ के रूप में परिणत किया जा सकता है।

आवाज निस्सन्देह एक पदार्थ है। वाणी दूसरों पर प्रभाव डालती है। विद्यालयों में ज्ञान वृद्धि का माध्यम वाणी ही है। भावनाओं को उभारने और तरंगित करने का काम संगीत कितनी अच्छी तरह करता है यह सभी को विदित है। अपमान सूचक शब्द प्रयोग करने से दूसरों को कैसा क्रोध आता है और फलस्वरूप कितना अनर्थ होता है उसका उदाहरण द्रौपदी द्वारा थोड़े से अपमानजनक शब्द कह देने से महाभारत का होना प्रसिद्ध है। यह रोज ही देखा जाता है कि कटुवचन से मित्रों को शत्रु और मधुर वाणी से शत्रुओं को मित्र बनाया जा सकना सम्भव होता है। दुःखद, शोक-संताप की घटना सुनकर कैसा बुरा हाल हो जाता है। शब्दों की भावोत्तेजक क्षमता स्पष्ट है।

इतना ही नहीं उनमें वह सामर्थ्य भी विद्यमान है जो अपने आपको-दूसरों को और समस्त सूक्ष्म जगत को प्रभावित कर सके। मन्त्र विज्ञान द्वारा यही सम्भव होता है। सितार के तारों पर क्रमबद्ध उँगलियाँ रखने से जिस प्रकार विभिन्न प्रकार की स्वर लहरियाँ निकलती हैं उसी प्रकार शब्दों के उच्चारण का एक लयबद्ध क्रम रहने से उसमें भी एक विशेष प्रकार के - विशेष शक्तिशाली - और विशेष प्रभावोत्पादक कंपन उत्पन्न होते हैं। मन्त्रों में केवल शब्दार्थ का ही महत्व नहीं है। शिक्षा तो गद्य-पद्य से और भी अच्छी तरह दी जा सकती है। मन्त्रों में अक्षरों के क्रम का तथा उनके उच्चारण की विशेष विधि व्यवस्था का ही अधिक महत्व है। कण्ठ, तालु, दाँत, ओठ, मूर्धा आदि जिन स्थानों से शब्दोच्चारण होता है उनका सीधा सम्बन्ध मानव-शरीर के सूक्ष्म संस्थानों से है। षट् चक्र, उपात्मक एवं दिव्य वादियों, ग्रन्थियों का सूक्ष्म शरीर संस्थान अपने आपमें अद्भुत है। इन दिव्य अंगों के साथ हमारे मुख यन्त्र के तार जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार टाइपराइटर की चाबियाँ दबाते चलने से ऊपर अक्षर टाइप होते चलते हैं ठीक उसी प्रकार मुख से उच्चारण किये हुए-विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ विनिर्मित मन्त्र गुम्फन का सीधा प्रभाव उपरोक्त संस्थानों पर पड़ता है और वहाँ तत्काल एक अतिरिक्त शक्ति तरंगों का प्रवाह चल पड़ता है। यह प्रवाह मन्त्र विज्ञानी को स्वयं लाभान्वित करता है। उसकी प्रस्तुत क्षमताओं को जगाता है। भीतर गूँजते हुए वे मन्त्र कम्पन यही काम करते हैं और जब वे बाहर निकलते हैं तो वातावरण को प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म जगत में अभीष्ट परिस्थितियों की संभावनाओं का सृजन करते हैं और यदि किसी व्यक्ति विशेष को प्रभावित करना है तो उस पर भी असर डालते हैं। मन्त्र विद्या इन तीनों प्रयोजनों को पूरा करती है।

राडार (रेडियो डिक्टेशन एण्ड रेंजिंग) शब्द का संक्षिप्त नामकरण है। ध्वनि तरंगें ठोस वस्तुओं द्वारा परावर्तित होती हैं। प्रत्येक ध्वनि प्रतिध्वनि उत्पन्न करती है देखा जाता है कि किसी बड़ी इमारत, गुम्बज, पक्का कुँआ आदि की तरफ मुँह करके जोर की आवाज की जाय तो उसकी प्रतिध्वनि होती है और कुछ देर बाद वह वहीं लौट आती है जहाँ से कि वह उत्पन्न हुई थी, इस ध्वनि के उच्चारण और वापिस के समय का अन्तर यदि ठीक प्रकार ज्ञात हो सके तो दूरी की गणना हो सकती है। इस प्रकार वेग, प्रतिध्वनि के उतार-चढ़ाव के आधार पर उस पदार्थ के स्वरूप एवं अन्तराल को जाना जा सकता है जिससे टकरा कर वह वापिस आई। रेडियो तरंगें भी तरंगों की तरह ही परावर्तित होती है। इनके आधार पर ‘राडार’ यन्त्र का आविष्कार हुआ है।

एक सैकिण्ड के दस लाखवें भाग को माइक्रो सैकिण्ड कहते हैं। वायुमण्डल एवं शून्य आकाश में रेडियो तरंगें लगभग 2,95, किलो मीटर प्रति सैकिण्ड की चाल से दौड़ती हैं। रेडियो प्रेषित ध्वनि तरंगें-बहुत दूरी पर भी अपने लक्ष्य तक पहुँच कर कुछ ही माइक्रो सैकिण्डों में वापिस आ जाती हैं। इसलिए आकाश में उड़ने वाले वायुयान आदि की दूरी-चाल, स्थिति का पता आसानी से लगा लिया जाता है और यदि वह शत्रु का हो तो उससे निपटना भी सम्भव हो जाता है। इसी प्रकार इस प्रणाली से जलयानों की भी सही स्थिति का पता चल जाता है। राडार पद्धति बिना संपर्क साधे ही दूसरे जहाजों के सन्देश संकेत प्राप्त करने में, समुद्री तूफानों का पता लगाने में, ऋतु परिवर्तन, खगोल विद्या आदि कितने ही महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी उपयोगी भूमिका प्रस्तुत कर रही है।

राडार हमारे शरीर में भी विद्यमान है और वह भी यन्त्रों द्वारा बने हुए राडार की तरह काम करता है। उसे जागृत, सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए मन्त्र विद्या का उपयोग किया जाता है। शब्द विद्या के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मन्त्रों के अक्षरों का चयन होता है। मन्त्र रचना कविता या शिक्षा नहीं है। शिक्षा भी उनमें हो सकती है पर वह गौण है। कविता की दृष्टि से भी मन्त्रों का महत्व गौण है। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में 23 ही अक्षर हैं। जबकि छन्द शास्त्र के अनुसार उसमें 24 होने चाहिए। इस दृष्टि से उसे साहित्य कसौटी पर दोषयुक्त भी ठहराया जा सकता है। पर शक्ति तत्व का जहाँ तक सम्बन्ध है वह सौ टंच खरा है। उसकी सामर्थ्य का कोई वारापार नहीं।

शब्द मन्त्र विज्ञान में केवल जप उच्चारण ही पर्याप्त नहीं। उनकी शब्द शक्ति को ही सर्वांगपूर्ण नहीं मान लेना चाहिए। वरन् उसमें दूसरा पूरक तत्व और भी अधिक महत्वपूर्ण है। इतना अधिक महत्वपूर्ण कि उसके बिना अध्यात्म विद्या की गरिमा प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकती। वह तथ्य है मन्त्र साधक की मनोभूमि तथा आन्तरिक स्थिति। मनुष्य के तीन शरीर हैं - स्थूल-सूक्ष्म और कारण। इन तीनों का ही समन्वय होने से मन्त्र शक्ति का समुचित उद्भव होता है। स्थूल शरीर से जप, अनुष्ठान, पूजा, उपचारपरक, कर्मकाण्ड सम्पन्न किये जाते हैं। आहार-विहार, उपवास, ब्रह्मचर्य आदि की बाह्य तपश्चर्या स्थूल शरीर से होती है। यह मन्त्र विद्या का पहला आधार हुआ। दूसरा आधार है-सूक्ष्म शरीर, मन, मस्तिष्क। साधक का दृष्टिकोण उच्च और पवित्र होना चाहिए। उसकी विचारणा, आदर्शवादिता, संयमशीलता, चरित्रनिष्ठा, उदारता, सेवा बुद्धि उत्कृष्ट होनी चाहिए। सूक्ष्म शरीर के शब्द का उद्भव इसी तरह होता है। तीसरी शक्ति तीसरे शरीर से-कारण शरीर से उत्पन्न होती है। अंतःकरण से,


Quotation

मन्त्र के प्रभाव व प्रेरणा से मनुष्य का जीवन तदनुरूप अपने आप बनता है।

-विनोबा

यह क्षेत्र भावना भूमि है। साधक की भावनाओं में श्रद्धा, विश्वास, भक्ति और तन्मयता का गहरा पुट होना चाहिए। अविश्वासी, व्यग्र, अश्रद्धालु, भावना रहित ऐसे ही उद्धत मन से बेगार टालने की तरह उपेक्षापूर्वक उपासना की जाय तो समझना चाहिए कि साधना का एक महत्वपूर्ण अंग छूट गया। ऐसी दशा में सफलता भी संदिग्ध रहेगी।

ऊपर शब्द शक्ति के अतिरिक्त मन्त्र विद्या का दूसरा आधार साधक का व्यक्तित्व बताया गया है। यदि स्थूल शरीर से निर्धारित कर्मकाण्ड सूक्ष्म शरीर में सद्विचार और सदाचरण, कारण शरीर से भाव भरी श्रद्धा तन्मयता का त्रिविधि समावेश किया जा सके तो साधना के उपयुक्त व्यक्तित्व तैयार हो गया और उसका अभीष्ट परिणाम निश्चित रूप से होकर रहेगा।

बढ़िया बन्दूक में- बढ़िया किस्म का कारतूस लगाकर ही कुशल निशानेबाज लक्ष्य बेध कर सकता है। मन्त्र विद्या की स्थिति भी यही है। अन्तःकरण की भावनायें, मस्तिष्क की नीति निष्ठायें, शरीर की विधि-व्यवस्थायें मिलकर साधना के उपयुक्त व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। उसे बढ़िया बन्दूक कह सकते हैं। शब्द शास्त्र के अनुरूप तत्व ज्ञानियों द्वारा सृजन किया हुआ अनुभूत मन्त्र बढ़िया कारतूस है। इसे यदि मन्त्र साधक विश्वास और तत्परता के साथ प्रयोग कर सके तो असफलता का कोई कारण नहीं। मन्त्र शक्ति-यन्त्र शक्ति की तरह ही सुनिश्चित विज्ञान के आधार पर विनिर्मित है उसका ठीक तरह प्रयोग किया जा सके तो असफलता का कोई कारण नहीं है।

अध्यात्म शब्द विद्या को मन्त्र विद्या को तत्व ज्ञानियों ने ‘वाक्’ कहा है। यह वाक् अध्यात्म शक्तिशाली और महत्वपूर्ण है। इसकी विवेचना करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है -

प्रावीविपद्वाच ऊर्मि न सिन्धुः।

-ऋग् 9/96/7

जिस प्रकार समुद्र से तरंगें उठती हैं उसी प्रकार वाक् की तरंगें भी कंपन के सहित गति करती हैं।

प्रजापतिर्वा इदमेक आधीतस्य वागेव स्तमासीत् वाग द्वितीया स एक्षते मामेव वाच विसृजा। इयं वा इदं सर्वं विभवव्त्येष्यतीति।

-ताण्डय ब्रा. 20/14/2

प्रजापति अकेले थे। उनके अतिरिक्त वाक् ही उनकी अपनी सम्पत्ति थी। उनने इच्छा की कि मैं इस वाक् का सर्जन करूं। यह वाक् ही सब कुछ हो जायगी।

तद्यत किञ्चार्वाचीनं ब्रह्मणस्तद् वागेव सर्वम्।

-जै. उ. 1/13/1/3

ब्रह्म के पश्चात जो कुछ हे सो वाक् ही है।

वाग् वै त्वष्टा।

ऐत. 2/4

वाक् ही त्वष्टा देवता है।

वाक् वैविश्वकर्मर्षिः वाचाहीद सर्वं कृतम्।

-शतपथ 8/1/2/1

यह वाक् ही विश्वकर्मा ऋषि है। इसी से यह सारा संसार रचा गया।

यो वै ताँ वाचं वेद यस्मा एव विकारः स सम्प्रतिविदकारी वै सर्वा वाक्।

-ऐ.ब्रा. 2/3/6

जो उस आदिमूल वाक् को जानता है वह सम्पतिविद् सिद्ध पुरुष कहलाता है।

मन्त्र विद्या की महान् सामर्थ्य को यदि ठीक तरह समझा जा सके और उसका समुचित प्रयोग किया जा सके तो यह आध्यात्मिक प्रयास किसी भी भौतिक उन्नति के प्रयास के कम महत्वपूर्ण और कम लाभदायक सिद्ध नहीं हो सकता।


याद रखो

याद रखो, सम्पूर्ण जगत् एक शरीर है। तुम्हारे शरीर में हाथ, नख एवं उँगली की तरह ही एक महत्वपूर्ण अवयव है। यदि हाथ उँगली या नाक शरीर से प्रथक होकर अलग कट जाते हैं तो फिर उनका सारा महत्व ही नष्ट हो जाता है। आत्मा तभी सच्चे अर्थों में आत्मा है, जब वह अपने को परमात्मा का एक अंश अनुभव करे। विराट् विश्व का एक कण ही तो मनुष्य है।

अखिल विश्व की आत्मा से हम अपने को प्रथक न समझें। हाथ का कल्याण इसी में है कि वह अपना हित समस्त शरीर के हित के साथ जुड़ा रखे। किसी भी अंग को अभाव या कष्ट हो तो उसके निराकरण का उपाय करे। यदि हाथ अपना कर्त्तव्य छोड़ दे और कलाई तक ही अपने को सीमित कर ले तो वह स्वयं भी नष्ट होगा और सारे शरीर को नष्ट करेगा। संकीर्णता ही पतन और विशालता ही उत्थान है। कोई विराना नहीं, सब अपने ही हैं। सबके कल्याण में अपना कल्याण समाया हुआ है। यही शिक्षाएं अध्यात्म का सार हैं - स्वामी रामतीर्थ


योग विद्या का वैज्ञानिक विश्लेषण

चेतन मस्तिष्क के चमत्कार सर्वसाधारण को विदित हैं। विद्वान लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यवसायी आदि अनेकों वर्ग के बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक चेतना के बल पर अपना तथा दूसरों का कितना हित साधन करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। बौद्धिक चेतना का महत्व समझते हुए ही विद्यालयों की स्थापना होती है और उस विद्या अनुष्ठान में अगणित छात्र एवं अध्यापक संलग्न रहते हैं। बौद्धिक सम्पदा को एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

अचेतन मस्तिष्क इससे भी अधिक रहस्यपूर्ण है। उस क्रिया-कलाप का केवल सात प्रतिशत ही मनोविज्ञानी तथा नृतत्त्ववेत्ता जान सके हैं। शरीर यात्रा की स्वसंचालित गतिविधियों का संचालन, नियन्त्रण, परिवर्तन अचेतन मस्तिष्क द्वारा होता रहता है। हमारी अभिरुचि, प्रकृति और आदतें बहुत कर इसी अविकसित मस्तिष्क में जड़े जमायें रहती है मोटे तौर पर इतना ही जाना जा सकता है। पर अब इस संबंध में मैटाफिजिक्स, पैरासाइकोलॉजी अतीन्द्रिय विज्ञान आदि विज्ञान की कितनी ही धाराओं ने अचेतन मस्तिष्क के बारे में खोज शुरू की है और पाया है कि यह संसार का सबसे अधिक रहस्यमय, अद्भुत और शक्तिशाली तन्त्र है, यदि अचेतन मस्तिष्क में सन्निहित सम्भावनाओं को पूरी तरह समझा जा सके और उन्हें कार्यान्वित किया जा सके तो इतना बड़ा चमत्कार उत्पन्न हो सकता है जितना कि पदार्थ विज्ञान की अब तक की प्रगति से भी सम्भव नहीं हुआ है।

अप्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय-इस मानव जीवन में और इस विश्व में बहुत कुछ है। विराट् ब्रह्माण्ड को खोज करके अब तक बहुत कुछ प्राप्त किया जा चुका है-जो प्राप्त किया जाता है कहीं उससे भी अधिक शेष है। लेकिन मानवीय शरीर अभी तक बहुत कम खोजा जा सका। एनाटॉमी और फिजियोलॉजी के आधार पर ज्ञान बहुत ही मोटा और भोंड़ा है। ऊतक, कोशिकाओं, जीन्स, हारमोन्स आदि कितने अतिसूक्ष्म किन्तु अति समर्थ अवयवों की विचित्र शक्ति का रहस्योद्घाटन होता चलता है कि रुग्णता-आरोग्यता के आधार आमाशय गुर्दे आदि नहीं वरन् उनके भीतर काम करने वाले यही छोटे तत्व हैं। मस्तिष्क विद्या न्यूरोलॉजी-साइकोलॉजी से आगे की अतीन्द्रिय विद्या है जो अचेतन मस्तिष्क से सम्बन्ध रखती है। यदि इस शक्ति केन्द्र को समझा सँभाला जा सके तो यहाँ सब कुछ देवताओं के अद्भुत वर्णन चित्रण जैसा दिखाई पड़ सकता है। अति महत्वपूर्ण यन्त्रों से हो सकने वाले क्रिया-कलाप तब मानवीय अचेतन क्षमता के माध्यम से ही सम्पन्न हो सकते हैं।

अतीन्द्रिय विद्या के शोधकर्ताओं का कथन है कि चेतन मस्तिष्क की सक्रियता-अचेतन की क्षमता तरंगों को काटती है इसलिए उसे अविकसित स्थिति में पड़ा रहना पड़ता है। यदि बौद्धिक संस्थान की गतिविधियाँ मन्द से शिथिल की जा सकें तो उसी अनुपात से अचेतन केन्द्र जागृत हो सकता है और उसके माध्यम से अविज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। योग विद्या के आचार्य बहुत पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं और उन्होंने प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाओं के माध्यम से चेतन मस्तिष्क को शिथिल निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाने की सफलता प्राप्त की। यह सफलता की अनेक चमत्कारी सिद्धियों की जननी है। दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, विचार-प्रेरणा, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि कितनी ही ऐसी विशेषतायें प्राप्त की जा सकती हैं जो साधारणतया मनुष्यों में होती नहीं।

बौद्धिक मस्तिष्क को शिथिल करके इच्छा शक्ति, प्राण शक्ति यदि अचेतन को विकसित करने में लगाई जा सके तो व्यक्ति अपने शरीर में कायाकल्प जैसे परिवर्तन कर सकता है-अति दीर्घजीवी हो सकता है-अदृश्य जगत का ज्ञान प्राप्त करके उसमें चल रही हलचलों को मन्द शिथिल एवं परिवर्तित कर सकता है। इन सम्भावनाओं को योग साधना द्वारा प्रत्यक्ष किया जाता रहा है। अब भी उनके प्रत्यक्ष और प्रमाणित किये जाने की पूरी गुंजाइश है।

योग-साधना का मूल सिद्धान्त ‘चित्त वृत्तियों का निरोध’ है। इसका तात्पर्य है मस्तिष्कीय अतिशय सक्रियता को नियन्त्रित करके चेतनात्मक शक्ति के अपव्यय को बचा लेना और उस बचे हुए प्राण-प्रवाह को अचेतन के विकसित करने में नियोजित कर देना। निःसंदेह यह एक पूर्ण विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। इसके लाभ अलौकिक उपलब्धियों के रूप में देखे जा सकते हैं। समाधि स्थिति तक पहुँचा हुआ व्यक्ति त्रिकालदर्शी और विश्व की जड़−चेतन सत्ता को प्रभावित कर सकने में समर्थ बन जाय तो इसमें कुछ भी अचम्भे की बात नहीं है।

विश्व के अगणित जीव-जंतुओं में विविध प्रकार की ऐसी अद्भुत क्षमतायें पाई जाती हैं जिनसे मनुष्य वंचित है। इसका एक ही कारण है मनुष्य के बौद्धिक संस्थान को अति सक्रिय होने से उसकी ऊष्मा अचेतन को दबा लेती है और उससे शरीर संचालन भर की गतिविधियाँ पूरी हो पाती हैं। अलौकिक और अद्भुत प्रयोजन पूरे कर सकने वाला माद्दा तो एक प्रकार से कुण्ठित हुआ ही पड़ा रहता है।

कीड़े-मकोड़े और जीव जन्तु बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं। उनका चिन्तन और चेतन शिथिल रहता है इसका लाभ उनके अचेतन को मिलता है और वे योगियों जैसे कितने ही अद्भुत कार्य कर सकते हैं। कुत्तों की घ्राण शक्ति अति सूक्ष्म होती है। वे व्यक्तियों की शारीरिक गंध में रहने वाली भिन्नता को पहचान लेते है और जन-संकुल भीड़ में उसी गंध के आधार पर खोजते हुए अपने मालिक को तलाश लेते हैं। चोरों का पता लगाने में प्रशिक्षित कुत्ते अब बहुत कारगर सिद्ध हो रहे हैं। वे जिस आधार पर चोरी का, चोरी के माल का पता लगाते हैं वह उनके अधिक विकसित अचेतन मस्तिष्क से संबंधित घ्राण शक्ति ही है। प्रयत्न करने से मनुष्य भी उस क्षमता को विकसित कर सकता है जो बुद्धिहीन कुत्ते करते हैं इस कार्य को मनुष्य और भी अच्छी तरह कर सकता है।

चमगादड़ के ज्ञानतन्तु राडार क्षमता से सम्पन्न होते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क अपने साधारण से शरीर के आधार पर विभिन्न वस्तुओं से निकलने वाली रेडियो तरंगों को भलीभाँति पहचान लेता है और घोर अन्धेरे में भी अपने आस-पास की वस्तुओं का स्वरूप एवं स्थान को समझ कर अपने उड़ने का क्रम बिना किसी से टकराये हुए जारी रख सकता है।

समुद्री मछली ‘डाल्फिन’ अपने शरीर से एक प्रकार की रेडियो तरंगें निकालती है। पानी के भीतर ही वे दूर तक फैलती हैं और उस क्षेत्र के जीव-जन्तुओं से टकरा कर उसी के पास वापिस लौट आती है। अचेतन मस्तिष्क क्षणभर में यह जान लेता है कि कौन जीव किस आकृति-प्रकृति का कितनी दूर है। उसी आधार पर वह अपने बचाव तथा आक्रमण की योजनाबद्ध तैयारी करती है।

बहुत से जीव जन्तुओं के अचेतन मन ने अपनी इच्छा और आवश्यकतानुसार शरीरों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कर ली हैं जो आरम्भ में नहीं थी। गोताखोरों की तरह मेढ़क ने जल में प्रवेश करने पर आँखों पर चढ़ाया जा सकने वाला एक विशेष प्रकार का चश्मा विकसित कर लिया है जो चिर अतीत में नहीं था। रावन प्लान्ट और ग्रेट मुलर पौधों ने पशुओं द्वारा चरे जाने से आत्मरक्षा के लिए नोकदार काँटे विकसित किये हैं। तितलियों के बच्चे और रेशम के कीड़े अपने शरीर से रस निकाल कर उस पर पत्तियाँ चिपका लेते हैं और आत्म-रक्षा की सुविधा उत्पन्न करते हैं। कछुए ने मगरमच्छों से अपने स्वादिष्ट माँस को बचाने के लिए चमड़ी को मोटा किया है। व्हेल मछली ने पनडुब्बियों की सारी खास-खास विशेषतायें अपने शरीर में उपस्थित कर रखी हैं। लगता है मनुष्य ने शायद व्हेल की शरीर रचना देखकर ही पनडुब्बियों का विकास किया हो। मगरमच्छ अपने दाँत साफ कराने के लिए मुँह खोल कर धूप में पड़े रहते हैं। चिड़ियाँ निर्भय होकर उसके मुँह में भीतर तक अपनी गर्दन प्रवेश करती है सफाई में लगी रहती हैं। वे जानती है कि माँसाहारी होने पर भी इस समय मगर की इच्छा क्या है और उसे पूरा करते समय उनके जीवन को संकट उत्पन्न होने की आशंका नहीं। गिलहरी ने अपने गालों में दो जेबें विकसित की है ताकि वह उनमें उपलब्ध खाद्य सामग्री जल्दी से जमा कर सके। बन्दर के गले में भी ऐसी ही थैलियाँ होती हैं। कंगारू के पेट में भी एक ऐसी ही जेब होती है ताकि वह उसमें अपने बच्चे रख सके।

गर्मी-सर्दी का सही पता हमें थर्मामीटर के आधार पर लगता है पर छोटे कीड़ों का अचेतन उन्हें स्थिति का ज्ञान उसी सामान्य शरीर से करा देता है। 40 डिग्री फारेनहाइट पर सभी कीटाणु अपना काम बन्द कर देते। 50 डिग्री ताप पर मक्खी अपने लिए सुरक्षित स्थान ढूँढ़ कर वहाँ छिप जाती है। 55 डिग्री पर चींटियां और मधुमक्खियाँ अपने घरों में घुस जाती हैं। शहद की मक्खियाँ तभी काम पर निकलती है जब 85 डिग्री तापमान हो जाता है। 95 डिग्री पर टिड्डों का संगीत शुरू होता है। आहार उपलब्धि की दृष्टि से असुविधा का समय समीप आते ही चींटियां तथा दूसरे कीड़े अपने लिए आहार जमा करने लग जाते हैं। उनका भविष्य ज्ञान बिल्कुल सही होता है। दीमक और चींटियों के झुण्डों की लड़ाई देखने ही योग्य है। उनकी मोर्चेबन्दी, आक्रमण तथा बचाव की प्रक्रिया से मनुष्य योद्धाओं के लिए बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।

अफ्रीका का ‘काटन रेल’ जाति का खरगोश हिंसक जन्तुओं का खतरा देखकर अपनी पिछली टाँगें एक खास तरीके से जमीन में मारता है, उससे एक विद्युतधारा पैदा होती है व उस भूमि के ऊपर वाले परत पर दूर तक फैल जाती है। दूसरे खरगोश उस टेलीफोन को तुरन्त सुन लेते हैं और सजग होकर अपने बचाव की तैयारी करने लगते हैं। खरगोश ही नहीं दूसरे छोटे जानवर भी इस टेलीफोन से लाभ उठाते और बचने की व्यवस्था बना लेते हैं। जेट विमान की हूबहू प्रणाली के आधार पर समुद्री झींगे ‘सीएरे’ का शरीर रचना है। द्रुतगति से दौड़ने की यह प्रणाली उसके अद्भुत अचेतन की अनोखी देन है।

उत्तरी अमेरिका की नदियों में पाई जाने वाली ‘ईल’ मछली अपने आप में एक अच्छा खासा डायनेमो है। घरों की बत्तियाँ 22 वोल्ट पर जलती हैं पर उसके शरीर से 500 से भी अधिक वोल्ट की बिजली उत्पन्न होती देखी गई है। एन्टीना तितली के सींग रेडियो और टेलीविजन की जरूरत पूरी करते हैं। नर झींगुर अपनी काम तृप्ति के लिए एक विशेष प्रकार की तान छेड़ता है और उसके आकर्षण से मादाएं उसके समीप एकत्रित होती हैं। ‘निर्गर’ मछली के गले में एक छुरी छिपी रहती है जिससे वह अपनी शिकार को हलाल करती है और कोई बड़ा जानवर उसे निगल ले तो इसी छुरी से उसका पेट चीर कर बाहर निकल आती है।

वर्षा की सम्भावना निकट आते ही मकड़ी अपना जाला खुली जगहों में से समेट कर बचाव की जगह पर चली जाती है। गिरने वाले मकान में से बिल्ली अपने बच्चों को लेकर कुछ ही समय पूर्व सुरक्षा के लिए प्रयाण करती देखी गई है। कछुआ अण्डे बालू में देता और अपनी मानसिक चेतना से उन्हें सेता पकाता है। अनुकूल ऋतु की तलाश में पक्षी हजारों मील उड़ कर समुद्र और पर्वतों को लाँघते हुए कहीं से कहीं चले जाते हैं और फिर सुविधा की ऋतु आने पर फिर इतनी लम्बी यात्रा बिना भूले भटके पार करके वापिस आ जाते है। कई मछलियाँ अण्डे देने के लिए अपनी पूर्व जानकारी के उपयुक्त स्थान पर पहुँचने के लिए हजारों मील की यात्रा करती हैं और फिर वापिस आती हैं। बया पक्षी का घोंसला कितना मजबूत होता है। रेशम के कीड़े अपने लिए कैसा अच्छा खोल बनाते हैं।

यह सब क्रियाकलाप इन छोटे जीव-जन्तुओं का अचेतन मन कराता है। यदि अचेतन मन की सामान्य शक्ति को चेतन मस्तिष्क की उत्तेजित ऊष्मा नष्ट न किया करे तो अन्य जीवों की तुलना में हजारों गुना अधिक विकसित मानवीय मस्तिष्क इतने अधिक दिव्य कर्तव्य सम्पन्न कर सकता है कि जितने में समस्त जीव-जन्तुओं की सम्मिलित अचेतन सत्ता से भी सम्भव नहीं हो सके।

योग-साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। वह विद्या विलास या बौद्धिक विकास पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। मानसिक उत्कर्ष, विद्याध्ययन, कला-कौशल और व्यवस्थापक शिक्षा की उसमें पूरी छूट है। प्रतिबन्ध केवल इस बात का है कि मनः क्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अशान्त न होने दिया जाय। गीता, योगवशिष्ठ तथा दूसरे अध्यात्म ग्रन्थों में शम, दम, तितीक्षा आदि का उपदेश दिया है। अनासक्ति और स्थित प्रज्ञता पर जोर दिया है। समत्व का प्रतिपादन किया है। इसका तात्पर्य यह है कि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती ही रहने वाली हैं। उत्तेजना पैदा करने वाली स्थिति घटित होते रहना स्वाभाविक है। संस्थाओं समाज और व्यक्ति का निर्माण ही कुछ ऐसे ढंग से हुआ है कि पारस्परिक मिलन से प्रिय-अप्रिय संवेदनाएँ उत्पन्न हों और मन को प्रसन्नता या अप्रसन्नता के ज्वार-भाटे की तरह आन्दोलित करें। प्रकृति का क्रम भी सदा मनुष्य की इच्छानुकूल नहीं रहता। ऋतु प्रभाव की तीव्रता, सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, ईति-भीति, जरा-मरण जैसे परिवर्तनशील घटनाक्रम आये दिन उलटते-पलटते रहते हैं। इनसे क्षुब्ध न होने और चित्त को अनुग्रहित बनाये रहने के लिए यदि मन को साध लिया जाय तो वह समत्व की स्थिति जहाँ अधिक बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रगति पथ पर चलने का द्वार खोलती है वहाँ अचेतन मस्तिष्क की दिव्यता की काट करने वाली उथल-पुथल भरी मानसिक ऊष्मा को भी बढ़ने नहीं देती। फलतः व्यक्ति इस सन्तुलन के कारण बौद्धिक क्षमता को भी अधिकाधिक विकसित करने का लाभ उठाता है और अचेतन मन को भी अस्त-व्यस्त एवं दुर्बल नहीं होने देता।

योग का प्रथम चरण यही ‘मानसिक सन्तुलन’ है। दूसरा चरण है कुछ समय के लिए चेतन मस्तिष्क की गतिविधियों को रोककर उस संस्थान में काम करने वाली विद्युत शक्ति को-अचेतन मस्तिष्क को विकसित करने के लिए नियोजित करने की क्षमता प्राप्त करना। इस साधना में एकाग्रता के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। मन में उठने वाले विभिन्न संकल्पों को रोककर उसे एक केन्द्र पर स्थिर रहने के लिए साधना सिखानी पड़ती है। बहुमुखी चिन्तन की अपेक्षा एक सीमित परिधि में चिन्तन है तो अस्त-व्यस्तता में बिखरती रहने वाली चेतना केन्द्रित होने लगती है। छोटे से आतिशी शीशे पर पड़ने वाली सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित करली जाती हैं तो वहाँ आग जला सकने वाला ताप उत्पन्न हो जाता है। विचारों का एकत्रीकरण भी ऐसी ही मानसिक क्षमता उत्पन्न करता है। एकाग्रता एक अद्भुत मानसिक समर्थता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म इसी एकाग्रता इच्छा शक्ति और चक्षु तेजस सम्मेलन का छोटा किन्तु प्रत्यक्ष चमत्कार है।

एकाग्रता को आगे बढ़ाते हुए चित्त को जागृत अवस्था में ही संकल्पपूर्वक लय कर देना समाधि है। इसके लिए प्रत्याहार, धारणा, ध्यान की भूमिकाएँ पार करनी पड़ती हैं। इन साधनाओं के द्वारा, सचेतन बुद्धि संस्थान की चिन्तन और संकल्प क्षमता को शिथिल करके वहाँ लगे हुए तेजस् को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी वे दिव्यताएं जो अद्भुत और अनुपम हैं सजग और सक्षम होना शुरू कर देती हैं। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है।

हठ योगियों ने इस दिशा में कुछ पगडंडियां दूसरी भी निकाली हैं। किन्हीं वनस्पतियों की सहायता से सचेतन केन्द्र को प्रसुप्त करना ऐसी ही एक पगडंडी है। कहते हैं कि चिर अतीत में योगी लोग सोमपान करते थे और मध्यकाल में गाँजा जैसी वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता था सम्भवतः यह इसलिये किया गया होगा कि मन को विवेकपूर्वक अभ्यास और वैराग्य के द्वारा साधने में देर लगती थी, परिश्रम पड़ता था और दृष्टिकोण तथा क्रिया कलाप में हेर-फेर करना पड़ता था। यह कष्ट साध्य, श्रम साध्य और समय साध्य प्रक्रिया अपनाने की अपेक्षा लोग सरल मार्ग ढूँढ़ने लगे होंगे। हो सकता है कि तात्कालिक कुछ लाभ भी इस प्रकार होता हो और चेतन मस्तिष्क को शून्य करके उसे चेतना को बचाने और उसे अचेतन में लगाने की सफलता किसी अंश में मिल जाती हो। पर यह रास्ता पूर्णतया गलत है। नशे द्वारा चेतन मस्तिष्क को यदि तन्द्राग्रस्त कर भी लिया जाय तो उस अनिश्चित स्थिति में ऐसा संकल्प बल संजोये रखना कठिन है जिससे उस बची हुई चेतना को विधिवत् अचेतन में लगाया जा सके वह अस्त-व्यस्त भी हो सकती है। साथ ही नशेबाजों से शारीरिक, मानसिक क्षतियों का होना तो स्वयंसिद्ध है।

योग का सर्वमान्य सिद्धान्त यही है कि बौद्धिक चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करके अचेतन को दबाने से रोकना और सहायता के रूप में नियुक्त करना। इन प्रयोगों को यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके तो निःसंदेह मनुष्य साधारण न रह कर असाधारण ही बन सकता है।


प्रार्थना का स्वरूप, स्तर और प्रभाव

प्रार्थना ईश्वर के बहाने अपने आप से ही की जाती है। ईश्वर सर्वव्यापी और परमदयालु है, उसे हर किसी की आवश्यकता तथा इच्छा की जानकारी है। यह परमपिता और परम दयालु होने के नाते हमारे मनोरथ पूरे भी करना चाहता है। कोई सामान्य स्तर का सामान्य दयालु पिता भी अपने बच्चों की इच्छा आवश्यकता पूरी करने के लिए उत्सुक एवं तत्पर रहता है। फिर परमपिता और परम दयालु होने पर वह क्यों हमारी आवश्यकता को जानेगा नहीं। वह कहने पर ही हमारी बात जाने और प्रार्थना करने पर ही कठिनाई को समझे, यह तो ईश्वर के स्तर को गिराने वाली बात हुई। जब वह कीड़े-मकोड़ों और पशु-पक्षियों की अयाचित आवश्यकता भी पूरी करता है तब अपने परम प्रिय युवराज मनुष्य का ध्यान क्यों न रखेगा? वस्तुतः प्रार्थना का अर्थ याचना है ही नहीं। याचना अपने आपमें हेय है क्योंकि वह दीनता, असमर्थता और परावलम्बन की प्रवृत्ति उसमें जुड़ी हुई है जो आत्मा का गौरव बढ़ाती नहीं घटाती ही है। चाहे व्यक्ति के सामने हाथ पसारा जाय या भगवान के सामने झोली फैलाई जाय, बात एक ही है। चाहे चोरी किसी मनुष्य के घर में की जाय चाहे भगवान के घर मन्दिर में-बुरी बात तो बुरी ही रहेगी। स्वावलम्बन और स्वाभिमान को आघात पहुँचाने वाली प्रक्रिया-चाहे उसका नाम प्रार्थना ही क्यों न हो मनुष्य जैसे समर्थ तत्व के लिए शोभा नहीं देती।

वस्तुतः प्रार्थना का प्रयोजन अपने आत्मा को ही परमात्मा का प्रतीक मानकर स्वयं को समझाना है कि वह इसका पात्र बने कि आवश्यक विभूतियाँ उसे उसकी योग्यता के अनुरूप सहज ही मिल सकें। यह अपने मन की खुशामद है। मन को मनाना है। आपे को बुहारना है। आत्म-जागरण है। आत्मा से प्रार्थना द्वारा कहा जाता है, हे शक्ति पुँज तू जागृत क्यों नहीं होता अपने गुण, कर्म स्वभाव को प्रगति के पथ पर अग्रसर क्यों नहीं करता। तू सँभल जाय तो सारी दुनिया सँभल जाय। तू निर्मल बने तो सारे संसार की निर्मलता खिंचती हुई अपने पास चली आये। अपनी सामर्थ्य का विकास करने में तत्पर और उपलब्धियों का सदुपयोग करने में संलग्न हो जाय तो दीन-हीन अभावग्रस्तों की पंक्ति में क्यों बैठना पड़े। फिर समर्थ और दानी देवताओं से अपना स्थान नीचा क्यों रहे।

प्रार्थना के माध्यम से हम विश्वव्यापी महानता के साथ अपना घनिष्ठ संपर्क स्थापित करते हैं। आदर्शों की, भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में अनुभव करते हैं और उसके साथ जुड़ जाने की भाव विह्वलता को सजग करते हैं। तमसाच्छन्न मनोभूमि में अज्ञान और आलस्य ने जड़ जमा ली है। आत्म विस्मृति ने अपना स्वरूप एवं स्तर ही हेय बना लिया है। जीवन में संव्याप्त इस कुत्सा और कुण्ठा का निराकरण करने के लिये अपने प्रसुप्त अन्तःकरण से प्रार्थना की जाय कि यदि तन्द्रा और मूर्छा छोड़कर तू सजग हो जाय और मनुष्य को जो सोचना चाहिए वह सोचने लगे, जो करना चाहिए सो करने लगे तो अपना बेड़ा ही पार हो जाय। अन्तःज्योति की एक किरण उग पड़े तो पग-पग पर ठोकर लगने के निमित्त बने हुए इस अन्धकार से छुटकारा ही मिल जाय जिसने शोक-संताप की विडम्बनाओं को सब ओर से आवृत्त कर रखा है।

‘परमेश्वर यों साक्षी, दृष्टा, नियामक, उत्पादक, संचालक सब कुछ है। पर उसके जिस अंश की हम उपासना प्रार्थना करते हैं वह सर्वात्मा एवं पवित्रात्मा ही समझा जाना चाहिए। व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने और पेट तथा प्रजनन के लिए ही सीमाबद्ध रखने वाली वासना तृष्णा भरी मूढ़ता को ही माया कहते हैं। इस भव बन्धन से मोह, ममता से छुड़ाकर आत्म-विस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना यही आत्मोद्धार है। इसी को आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। प्रार्थना में अपने उच्च आत्म-स्तर से परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करे और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करे जिससे सर्वत्र दीख पड़ने वाला अन्धकार-दिव्य प्रकाश के रूप में परिणत हो सके।

लघुता को विशालता में-तुच्छता को महानता में समर्पित कर देने की उत्कण्ठा का नाम प्रार्थना है। नर को नारायण-पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का संकल्प प्रार्थना कहलाता है। आत्मा को आबद्ध करने वाली संकीर्णता जब विशाल व्यापक बनकर परमात्मा के रूप में प्रकट होती है तब समझना चाहिए प्रार्थना का प्रभाव दीख पड़ा, नर-पशु के स्तर से ऊँचा उठकर जब मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होने लगे तो उसे प्रार्थना की गहराई का प्रतीक और चमत्कार माना जा सकता है। आत्म-समर्पण को प्रार्थना का आवश्यक अंग माना गया है। किसी के होकर ही हम किसी से कुछ प्राप्त कर सकते हैं। अपने को समर्पण करना ही ईश्वर के हमारे प्रति समर्पित होने की विवशता का एक मात्र तरीका है। ‘शरणागति’ भक्ति का प्रधान लक्षण माना गया है। गीता में भगवान ने आश्वासन दिया है कि जो सच्चे मन से मेरी शरण में आता है उसके योग क्षेम की - सुख-शान्ति और प्रगति की जिम्मेदारी मैं उठाता हूँ। सच्चे मन और झूँठे मन की शरणागति का अन्तर स्पष्ट है। प्रार्थना के समय तन, मन, धन सब कुछ भगवान के चरणों में समर्पित करने की लच्छेदार भाषा का उपयोग करना और जब वैसा करने का अवसर आवे तो पल्ला झाड़कर अलग हो जाना झूठे मन की प्रार्थना है। आज इसी का फैशन है। जिस तरह व्यभिचारी किसी भोली लड़की को फँसाने के लिए लम्बे-चौड़े सब्ज-बाग दिखाता है और यह जानते हुए भी कि यह आश्वासन मुझे पुरे करने नहीं है, बढ़े-चढ़े विश्वास दिलाता है, कसमें खाता है। उसी प्रकार झूठे मन से की हुई प्रार्थना ईश्वर को ठगने बहकाने के लिए होती है। समर्पण शरणागति जैसे दिव्य स्तर का जो अर्थ समझता होगा वह इतना भी जानता होगा कि उसका तात्पर्य अपनी लिप्साओं को भगवान की इच्छाओं में परिणत कर देने-गतिविधियों को तृष्णा, विचारणा तथा आदर्शवादी क्रिया की इच्छानुसार उत्कृष्ट विचारणा तथा आदर्शवादी क्रिया पद्धति से अपने वर्तमान ढाँचे को बदलना ही होता है। जो इसके लिए तैयार होकर समर्पण शरणागति की बात करे उसी को सच्चे मन से प्रार्थना करने वाला कहा जायगा।

एक शराबी ने नशे में धुत होकर किसी के हाथों अपना मकान सस्ते दाम में बेच डाला होश आया तो अदालत में अर्जी दी कि नशे में होश-हवास ठीक न होने के कारण वह बिक्री की थी। अब होश में आने पर उस इकरारनामे से इनकार करता हूँ। पूजा, प्रार्थना के समय लोग न जाने क्या-क्या स्तुति, प्रार्थना करते हैं। मैं तेरी शरण में आया हूँ, तेरा ही हूँ, तेरे चरणों में पड़ा हुआ हूँ, मेरा तो तू ही है। तेरे सिवा मेरा कौन है।” आदि-आदि। वे इन शब्दों का अर्थ भी नहीं समझते और न फलितार्थ। जो शब्द कहे जा रहे हैं यदि वे समझ-बूझकर-होश-हवास में कहे गये होते तो जरूर उस स्थिति के अनुरूप जीवन क्रम ढालने और विचारों तथा कार्यों में उनका समावेश करने का प्रयत्न किया गया होता। पूजा स्थल से निकलते ही-जब उस प्रार्थना कथन को कार्यान्वित होने की आवश्यकता अनुभव होती है तब सब कुछ बहुत कठिन प्रतीत होता है। होश में आये हुए शराबी की तरह तब उस कथनी को करनी में परिणत न कर सकने की हिम्मत होने से यही कहना पड़ता है उस इकरारनामे से इनकार करता हूँ जो पूजा के समय सब कुछ भगवान को समर्पण करने वाली शब्दावली के साथ कहा गया था।

प्रार्थना में यही कामना जुड़ी रहनी चाहिए कि परमात्मा हमें इस लायक बनाये कि उसके सच्चे भक्त अनुयायी एवं पुत्र कहला सकने का गौरव प्राप्त करें। परमेश्वर हमें वह शक्ति प्रदान करे जिसके आधार पर भय और प्रलोभन से मुक्त होकर-विवेकसम्मत कर्त्तव्य-पथ पर साहसपूर्वक चल सकें और इस मार्ग में जो भी अवरोध आवें उनकी उपेक्षा करने में अटल रह सकें। कर्मों के फल अनिवार्य हैं। अपने प्रारब्ध भोग जब उपस्थित हों तो उन्हें धैर्य पूर्वक सह सकने और प्रगति के लिए परम पुरुषार्थ करते हुए कभी निराश न होने वाली मनःस्थिति बनाये रह सकें। भगवान हमारे मन को ऐसा निर्मल बना दें कि कुकर्म की ओर प्रवृत्ति ही उत्पन्न न हो और हो भी तो उसे चरितार्थ होने का अवसर न मिल पाये। मनुष्य-जीवन की सफलता के लिए गतिशील रहने की पैरों में शक्ति बनी रहे ऐसी उच्च स्तरीय प्रार्थना को ही सच्ची प्रार्थना के रूप में पुकारा जा सकता है, जिसमें धन, सन्तान, स्वास्थ्य, सफलता आदि की याचना की गई हो और जिसमें अपने पुरुषार्थ कर्त्तव्य के अभिवर्धन का स्मरण न हो ऐसी प्रार्थना को याचना मात्र कहा जायगा। ऐसी याचनाओं का सफल होना प्रायः संदिग्ध ही रहता है।

परा मनोविज्ञान वेत्ता डॉ. एमेली केडी ने लिखा है प्रार्थना, मात्र ईश्वर को धन्यवाद देने या उससे कुछ याचना करने की प्रक्रिया का नाम नहीं है। वरन् यह वह मनःस्थिति है जिससे व्यक्ति शंका और सन्देहों के जंजाल में से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है। अहंकार को खोकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। जिसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनाकर जिया जायगा। ऐसी गहन अन्तस्तल से निकली हुई प्रार्थना जिसमें आत्म-परिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो भगवान का सिंहासन हिला देती है। ऐसी प्रार्थना के परिणाम ऐसे अद्भुत होते हैं जिन्हें चमत्कार कहने में कुछ हर्ज नहीं है।

चिकित्सा शास्त्र पर नोबेल पुरस्कार विजेता एवं फ्रान्स के लियो विश्व विद्यालय के प्राध्यापक डॉ. कैरल ने अपनी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वर की अनुकम्पा को छिपा हुआ देखा है। वे कहते थे तुच्छ मानव-प्राणी उन्नति के उस स्तर पर नहीं पहुँच सकता जहाँ साधारण लोग आमतौर से नहीं पहुँचते। इन विशिष्ट साधन, विशिष्ट परिस्थितियों और विशेष सूझ-बूझ के पीछे उन्होंने सदा यही कहा-यह वाहन अन्तरंग से निकलने वाली भाव भरी प्रार्थना की प्रतिक्रिया है उन्होंने अपनी चिकित्सा पद्धति के साथ औषधियों से अधिक प्रार्थना को महत्व दिया। वे हर रोगी से कहते थे सच्चे मन से प्रार्थना करो- अपनी भूलों के लिए पश्चाताप और भविष्य में निर्मल जीवन जीने की प्रतिज्ञा के साथ यदि प्रार्थना करोगे तो वह जरूर सुनी जायगी। सच्चा इलाज तो पश्चाताप है और ईश्वर के चरणों में अपना समर्पण, जो ऐसा कर सकेगा वह शारीरिक ही नहीं आन्तरिक रोगों से भी छुटकारा पा लेगा।

महात्मा गाँधी ने अपने एक मित्र को लिखा था - “राम नाम मेरे लिए जीवन अवलम्बन है जो हर विपत्ति से पार कराता है।” जब तुम्हारी वासनायें तुम पर सवार हो रही हों तो नम्रता पूर्वक भगवान को सहायता के लिए पुकारो, तुम्हें सहायता मिलेगी।”

जब मन दुर्बल हो रहा हो-मनोविकार बढ़ रहे हों और लगता हो कि पैर अब फिसला। तो सच्चे मन से प्रभु को पुकारना चाहिए। गज को ग्राह के चंगुल से छुड़ाने वाले भगवान-पतन से परित्राण पाने के लिए व्याकुल आर्त भक्त की पुकार अनसुनी नहीं करते हैं और उस मनोबल के रूप में अन्तःकरण में उतरते हैं जिसे गरुड़ कह सकते हैं और जो पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों के सर्पों को उदरस्थ करते रहने का अभ्यासी है।

भगवान को आत्म-समर्पण करने की स्थिति में जीव कहता है-तस्यैवाहम् (मैं उसी का हूँ) तवैवाहम् (मैं तो तेरा ही हूँ) यह कहते कहते उसी में इतना तन्मय हो जाता है-इतना घुल-मिल जाता है कि अपने आपे का विसर्जन, विस्मरण ही कर बैठता है और अपने को परमात्मा का स्वरूप ही समझने लगता है। तब वह कहता है-त्वमेवाहन् (मैं तो तू ही हूँ) शिवोऽहम् (मैं ही शिव हूँ) ब्रह्माऽस्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ)।

भगवान को अपने में और अपने को भगवान में समाया होने की अनुभूति, की जब इतनी प्रबलता उत्पन्न हो जाय कि उसे कार्य रूप में परिणत किये बिना रहा ही न जा सके तो समझना चाहिए कि समर्पण का भाव सचमुच सजग हो उठा। ऐसी शरणागति व्यक्ति को द्रुतगति से देवत्व की ओर अग्रसर करती है और यह गतिशीलता इतनी प्रभावकारी होती है कि भगवान को अपनी समस्त दिव्यता समेत भक्त के चरणों में शरणागत होना पड़ता है। यों बड़ा तो भगवान ही है पर जहाँ तक प्रार्थना, समर्पण और शरणागति की साधनात्मक प्रक्रिया का संबंध है इस क्षेत्र में भक्त को बड़ा और भगवान को छोटा माना जायगा क्योंकि अक्सर भक्त के संकेतों पर भगवान को चलते देखा गया है।


आयु नहीं योग्यता

इसमें मन्त्रणा की क्या आवश्यकता महाराज! महामन्त्री बोधायन ने काँची नरेश देवमित्र से नीति स्पष्ट की-राज-परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ राजकुमार को ही आपके बाद राजगद्दी का उत्तराधिकारी होना चाहिये।

सो तो ठीक है महामन्त्री किन्तु हर परम्परा विवेक की कसौटी पर खरी सिद्ध हो यह आवश्यक नहीं। शास्त्र यह भी तो कहता है कि देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार परम्पराओं को बदलते और उन्हें बुद्धि संगत स्वरूप देते रहना चाहिये, सत्ता हर किसी को नहीं सौंपी जा सकती।

तत्पश्चात् सम्राट देव मित्र और महामन्त्री बोधायन मन्त्रणा करने लगे। देर तक विचार-विमर्श हुआ। दूसरे दिन प्रातःकाल होने के साथ ही ज्येष्ठ राजकुमार सुकेश को बिना राज्याभिषेक के ही राजगद्दी सौंप दी गई। प्रजा चकित थी न कोई उत्सव न अभिषेक यह कैसा राज्याभिषेक? किन्तु महाराज के निर्णय को कौन टाल सकता था। अभी राजगद्दी धारण किये हुये कुल पाँच घण्टे ही हुये थे कि एक ग्रामीण ने आकर दुहाई दी - महाराज न्याय कीजिये, आज स्वयं राजमाता ने हम गरीबों के झोंपड़े जलवा दिये। पहले ही दिन यह अन्याय ! महाराज न्याय कीजिये।

सुकेश ने पूरी बात सुनी तो, किन्तु उन्होंने वृद्ध ग्रामीण को न्याय देने की अपेक्षा डाँट लगाई और कहा दुष्ट! राजमाता के खिलाफ फिर कुछ कहा तो तेरी खाल उधेड़ दी जायेगी। ग्रामीण सहम गया और चुपचाप घर वापिस लौट आया। यह समाचार राज्य में फैला हो या नहीं पर दूसरे दिन ही यह खबर फैली कि नीति निर्मात्री परिषद ने राजकुमार सुरेश को गद्दी से उतार दिया है और उनके स्थान पर मझले राजकुमार विरथ को राज्यासीन किया गया है। लोग इन आकस्मिक परिवर्तनों पर आश्चर्यचकित थे कुछ समझ नहीं पा रहे थे बात क्या है।

दूसरे ही दिन फिर वही स्थिति! कि महामन्त्री ने मेरी समस्त कलाकृतियाँ पानी में यह कहकर फिंकवा दी कि इस देश में केवल सम्राट की मूर्तियाँ लग सकती है, देवी-देवताओं की नहीं। यह अन्याय है कला का अपमान है राजकुमार ! न्याय कीजिये।

राजकुमार विरथ का महामन्त्री के विरुद्ध अभियोग चलाने का साहस नहीं हुआ पर उन्होंने मूर्तिकार को मूर्तियों का मूल्य चुका दिया और खबर कहीं भी न फैलाने का आदेश देकर वहाँ से भगा दिया।

तीसरे दिन विरथ भी गद्दी से उतार दिये गये। और तीसरे राजकुमार प्रताप गद्दी पर बैठाये गये। उसी दिन एक और पीड़ित ने पुकार लगाई महाराज! यह क्या अन्धेर है जब हमने एक बार राज्य कर अदा कर दिया तो महाराज जो अब राजगद्दी पर भी नहीं है देवमित्र ने हमसे कर क्यों माँगा? न देने पर इन्होंने हमें कोड़ों से क्यों पिटवाया?

राजकुमार प्रताप तड़प उठे-मेरी प्रजा के साथ अन्याय! कोई भी क्यों न हो वह मेरे दण्ड से बच नहीं सकता। सैनिकों जाओ और अपराधी देवमित्र को पकड़ कर कैद में डाल दो। कल सुनवाई होगी। महामन्त्री बोधायन ने टोका-राजकुमार आप अपने पिता के लिये ऐसा कहते है। प्रताप ने उत्तर दिया - शासनाध्यक्ष के समक्ष प्रजा का न्याय बड़ा है पिता नहीं - पिता शारीरिक सेवा के अधिकारी हैं न्याय से बच निकलने के लिये।

प्रातःकाल सम्राट देवमित्र! दरबार में उपस्थित किये गये-बन्दी की, वेशभूषा में-सारा अभियोग सुनने के बाद प्रताप ने कहा-जितने कोड़े इस निर्धन किसान की पीठ पर लगाये गये हैं उतने कोड़े देवमित्र को लगाये जायें। सजा समाप्त होने के साथ ही राजकुमार प्रताप गद्दी से उतर आये और महामन्त्री से बोले-महामन्त्री मुझे अपने ही पिता को दण्ड देना पड़ा ऐसा सिंहासन मुझे नहीं चाहिये।

किन्तु तभी महाराज देवमित्र! हँसते हुए आगे आये और बोले बेटा यह तो परीक्षा थी राज्य के सच्चे अधिकारी तुम्हीं हो।


हमारे आदर्शवादी उपदेष्टा एवं सद्गुरु ऐंजाइम

अन्तरंग जीवन की विचित्रताएं इतनी अधिक हैं जिन्हें देखने समझने में बुद्धि चकराती है। उसमें जो कुछ देखना ढूँढ़ना चाहें, सब कुछ मिल जायगा।

अपने इस शरीर में ऐसे सन्त और ऋषि भी विद्यमान हैं जो एक प्रकार से अपना सर्वस्व समर्पण करके ही इस काया को इस योग्य बनाये रख रहे हैं कि वह जीवित और समर्थ कहीं जा सके। पर बदले में कुछ भी लेने की न उनकी इच्छा होती है न लेते ही हैं।

उन ऋषियों का नाम रसायन शास्त्रियों की परिभाषा के अनुसार ‘ऐंजाइम’ है। यों मोटे तौर से समझा यह जाता है कि हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, मस्तिष्क, वृक, यकृत आदि अवयवों के क्रिया-कलाप पर जीवन निर्भर है। महत्व और श्रेय इन्हें ही मिलता है। और इनकी खुराक जुटाने के लिए अन्न, जल, श्वास, विश्वास, आच्छादन आदि के साधन जुटाने पड़ते हैं। यह साधन न मिलें तो पारिश्रमिक न मिलने पर नौकरी छोड़ देने वाले मजदूरों की तरह वे भी हड़ताल कर सकते हैं और जिन्दगी का सरंजाम देखते-देखते बिखर सकता है।

दूसरी और वे ‘ऐंजाइम’ घटक हैं जो कभी किसी प्रकार की खुराक ग्रहण नहीं करते। दूसरों पर तनिक भी निर्भर नहीं है, आत्मबल से ही अपनी सत्ता टिकाये हुए हैं। इनकी जानकारी भी मोटे तौर पर सब शरीर रचना जानने वालों को नहीं होती। यश और श्रेय की न उन्हें आकाँक्षा है और न मिलता ही है। मात्र कर्त्तव्य ही इनके सामने सब कुछ है। थकने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। जबकि जीवाणु, कोशिकाएं, ऊतक निरन्तर मरते-जाते रहते हैं तब यह मृत्युंजयी देवताओं की तरह अपने स्वरूप में अवस्थित रह कर बिना परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव किये निरन्तर एकनिष्ठ भाव से अपने कर्तव्य की दीपशिखा यथावत् संजोये रहते हैं।

भौतिक विज्ञान की परिभाषा के अनुसार जीवन और कुछ नहीं शरीर की भीतरी रासायनिक प्रक्रियाओं का खेल मात्र है। यों देह के भीतर मुँह आमाशय, आंतें, हृदय, फुफ्फुस, वृक्क, यकृत आदि अवयव ही मोटे तौर पर काम करते दिखाई देते हैं। रक्त संचार, श्वास, प्रश्वास, आकुँचन, प्रकुँचन-तन्तु, चेतना, जैसे सूक्ष्म क्रिया-कलापों को भी देखा समझा जाता है। विभिन्न अवयवों से स्रवित होने वाले पाचक रस, हारमोन ग्रन्थियों से टपकने वाले स्राव, रक्त के सम्मिश्रित जीवाणु ऊतक कोशिकायें आदि भी अपना-अपना कार्य करके जीवन की स्थिरता में सहायता पहुँचाते हैं। इस सारे क्रिया-कलाप को शक्ति देने वाले एक और प्रकार के घटक काम करते हैं जिनके संबंध में अभी बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो सकी है। इन घटकों के नाम है-ऐंजाइम।

इन्हें ब्रह्म की तरह कहा जा सकता है जो जीवन से परे होते हुए भी जीवन प्रदान करने में समर्थ है। हमारी रासायनिक क्रियाओं को सतेज रखने में इनका पूरा-पूरा सहयोग हस्तक्षेप रहता है। यदि इनकी गतिविधियाँ लड़खड़ाने लगें तो शरीर में सब कुछ रहने पर भी जीवन की स्थिरता नहीं रह सकती। कहते हैं कि सृष्टि के आदि में इस धरती पर केवल रासायनिक पदार्थ ही बिखरे पड़े थे। उन्हीं के सम्मिश्रण से जीवन उत्पन्न हुआ और जीवधारी हरकत में आये। वे मूल रासायनिक तत्व जो जीवन का सृजन करने में सफल रहे अभी भी हमारे भीतर ‘ऐंजाइमों’ के रूप में विद्यमान हैं। इन्हें जीवन के जनक कहना चाहिए। आश्चर्य इस बात का है इनमें स्वयं जीवन नहीं है। इन्हें निर्जीव कहा जा सकता है तो भी वह जीवन का सृजन ही नहीं संचालन भी करते हैं। न केवल मानव शरीर वरन् पशु-पक्षी कीड़े-मकोड़े यहाँ तक की वृक्ष वनस्पति भी इन्हीं घटकों की उपस्थिति से जीवन धारण करते हैं।

सूक्ष्म-दर्शक यन्त्र से ही दीख पड़ने वाले जीवाणु, बैक्टीरिया-भी इन एन्जाइमों के बलबूते ही जीवित रह रहे हैं। इन घटकों के अतिरिक्त शरीर का हर पदार्थ घटता-बढ़ता रहता है पर यह अपनी स्थिरता अक्षुण्य ही बनाये रहते हैं। कोशिकाओं को ऑक्सीजन न मिले तो वे जीवित नहीं रह सकतीं। पर एक यह, संत ऐंजाइम हैं कि निरन्तर सेवा संलग्न रहते हुए भी आहार तो दूर इस काय कलेवर में साँस तक का एक कण भी स्वीकार नहीं करते। यह कई जाति के होते हैं। हर जाति अपनी निर्धारित कार्य-पद्धति में ही संलग्न रहती है। कोई वर्ग किसी दूसरे के काम पर हाथ नहीं डालता। वर्ण धर्म की तरह इन्हें अपना निर्धारित कार्य ही प्रिय है। जहाँ अन्य जीवाणुओं में परिवर्तन प्रत्यावर्तन होता रहता है वहाँ इनकी सीमा-मर्यादा में कभी राई-रत्ती अन्तर नहीं आता।

जो भोजन पेट में जाता है उसे वर्गीकृत करके पाचन-योग्य यह ऐंजाइम ही बनाते हैं। यदि यह न होते तो रोटी और पत्थर के टुकड़े में कोई अन्तर न रहता। तब हम पत्थर की तरह रोटी भी हजम नहीं कर सकते थे। जो अवयव इन घटकों की प्रेरणा से पाचन रस उत्पन्न करते हैं उन्हें पैंक्रियाज-जठराग्नि कहते हैं-अध्यात्म भाषा में इन्हें वैश्वानर कहा जाता है। मुख की लार में ‘टायलिन’ आमाशय में ‘पेप्सिन’ और ‘रेनिन’ जैसे पाचक-तत्वों के रूप में इन ऐंजाइमों का अस्तित्व देखा जा सकता है। खाद्य-पदार्थों को शरीर में घुल मिल जाने योग्य बनाने का कार्य इन्हीं का है। आमाशय में तीन ऐंजाइम होते हैं (1) ट्रिप्सिन (2) अमाइलीप्सिन (3) लाइपेस। इनके द्वारा किया गया परिवर्तन अन्न को रस रक्त में बदलने की क्रिया को यदि कोई बारीकी से देख समझ सके तो उसे आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।

सस्ते वाले अन्न का बहुमूल्य रक्त में बदल जाना कितना अद्भुत है। लाल रंग का पानी रक्त विकसित होते-होते ‘ओजस्’ के मेधा और प्रज्ञा का रूप धारण कर लेता है यह प्रक्रिया आश्चर्यचकित करने वाली है। पर उसे सम्पन्न कौन करता है। इस परिवर्तन के आधार कहाँ है? यह ढूँढ़ने के लिए हमें इन ‘ऐंजाइमों’ के सामने ही नतमस्तक होना पड़ेगा, जिनके अनुग्रह से तुच्छ वस्तुयें महान बनती चली जाती हैं, वे पूर्णता प्राप्त तत्वदर्शियों की तरह अपनी प्रगति की बात नहीं सोचते वरन् दूसरों का उन्नयन, अभिवर्धन ही उनका लक्ष्य है और उस प्रक्रिया को सम्पन्न करते हुए-दूसरों को विकसित देखते हुए-वे इतने ही सन्तुष्ट रहते हैं मानो सब कुछ उन्हें ही मिल रहा हो, उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म की तरह यह साक्षी, दृष्टा निर्विकार रहते हुए भी लोक-मंगल के कर्त्तव्य का अथक परिश्रम के साथ निर्वाह करते हैं।

इस घटकों की सक्रियता चेहरे पर तेजस्विता होकर चमकती है। यह शिथिल पड़ते हैं तो सारा शरीर शिथिल तेजहीन व हारा थका-सा दीखता है। भीतरी और बाहरी अंग अवयव अपना काम ठीक तरह नहीं कर पाते और पग-पग पर लड़खड़ाते दीखते हैं। इनकी कमी माँसपेशियों में ऐसी ऐंठन उत्पन्न करती है जिसका अभी कोई इलाज नहीं निकल सका।

इन घटकों के सहायक सेक्रेटरी भी होते हैं। जिन्हें ‘फास्फेट योगिक’ कहते हैं। विटामिनों को इसी वर्ग में रखा जा सकता है। त्रस्त और मौलिव्द्रीनम का सहारा मिल जाय तो ये अधिक समर्थ हो जाते हैं और पारा साइनाइड जैसे विष इनका हनन भी कर देते हैं। इनकी अनुपस्थिति में जीवन रक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मानव जीवन जैसे अद्भुत संस्थान की जितना महत्ता है उससे भी अधिक इन ऐंजाइम घटकों की है स्वयं निर्जीव होते हुए भी ये प्रभावी जीवन संचार कर सकने में समर्थ हैं।

शिक्षा, उपदेश, मार्गदर्शन, करने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं। सद्गुरु कितने ही रूप में हमारे काय कलेवर में विराजमान हैं और अपना प्रशिक्षण निरन्तर जारी रख रहे हैं। उचित और अनुचित का भेद करने वाला परमार्थ अपना अन्तरात्मा निरन्तर देता रहता है। सत्कर्म करते हुए आत्म-सन्तोष, दुष्कर्म करते हुए आत्मधिक्कार की जो भावना उठती रहती है उसे ईश्वर प्रशिक्षण अन्तरात्मा का उपदेश कहा जा सकता है। काश, हम कुछ सुनने सीखने की-ग्रहण करने-अपनाने की स्थिति में रहे होते तो हेय जीवन न जीते तब महानता ही हमारी गतिविधियों से ओत-प्रोत होती और नर नारायण जैसी स्थिति में रह रहे होते।


छिपा हुआ धन-नया प्रमाण सनातन दर्शन

“4 वर्ष का एक नन्हा बालक अपने पिता से बोला-पिता जी मुझे बन्दूक खरीद दीजिये शिकार खेलने का मन करता है।” पिता ने सोचा लड़के ने किसी को ऐसा कहते हुये सुना होगा। बच्चे अनुकरणशील होते हैं बात याद रही आयी होगी सो उसने बन्दूक की माँग कर दी। स्नेह में आकर-कुछ बहलाने की दृष्टि से कह दिया-बेटा! मेरे पास इतने रुपये कहाँ है? जो तुम्हें बन्दूक खरीद दूँ।

लड़के ने पहले जैसी स्वाभाविक मुद्रा में कहा-पिताजी! पैसों की चिन्ता मत कीजिये मैंने बहुत से रुपये जमीन के अन्दर छिपाकर रखे हैं आप चाहें तो मेरे साथ पिलखाना गाँव चलें-वहाँ मैं अपने गढ़े रुपये निकालकर दे सकता हूँ।

घटना शाहजहाँपुर (उ.प्र.) जिले की और वहाँ से 12 मील दूर एक छोटे-से गाँव गाहरा की है जो कुछ समय पूर्व अखबारों में भी प्रकाश में आई थी और जो पुनर्जन्म की वास्तविकता से संबंध रखती है और गीता के “वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय...............” अर्थात् जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर उसी प्रकार नया चोला धारण करती रहती है जैसे कोई मनुष्य पुराने कपड़े उतार कर फेंक देता है और नये सिले-सिलाये कपड़े पहन लेता है”-वाले सनातन दर्शन का प्रत्यक्ष प्रतिपादन करती है।

यह कोई नई बात नहीं थी। गाहरा ग्राम का यह लड़का अपने पिता पुत्तूलाल पासी को पहले भी कई बार कह चुका था कि पिताजी मैं तो पिलखाना का लोहार हूँ मेरी स्त्री है, बच्ची हैं, मेरे भाई का नाम दुर्गा है मेरी ससुराल काँजा गाँव में है। पिता अपने बेटे की बात सुनता और भारतीय मान्यताओं के अनुरूप अनुभव भी करता कि बच्चा हो सकता है पूर्व जन्म में सचमुच ही पिलखाना में रहा हो। इस घटना से उसे यह सीख मिलनी चाहिये थी कि जब आत्मा अमर है तब फिर नाशवान् शरीर की सुविधाओं तक ही जीवन के बहुमूल्य क्षणों को क्यों केन्द्रित किया जाये। सर्व समर्थ आत्मा को प्राप्त करने की साधनायें क्यों न की जायें किन्तु पुत्तूलाल पासी ठहरा अनपढ़-अशिक्षित ग्रामीण उसमें इतना विवेक कहाँ से आये जबकि आज के इतने बुद्धिमान लोग ही शरीर की क्रियाओं आवश्यकताओं से भिन्न अतिवाहिक क्रियाओं, आवश्यकताओं की स्पष्ट अनुभूति करते हैं फिर भी न तो आत्म-सत्ता को मानते ही हैं न उसे प्राप्त करने का प्रयत्न ही करते हैं जो जानते और मानते भी हैं वह आत्म-विश्वास और आत्म-निर्माण के झूठे और परम्परावादी कोरे कर्म-काण्ड से हटकर योग साधनाओं की वैज्ञानिक प्रक्रियायें अपनाने का साहस भी तो नहीं कर पाते तब फिर पुत्तूलाल को ही दोष क्यों दिया जाये। वह हमेशा बच्चे की पुरानी स्मृतियों को टालता ही रहा।

किन्तु जब उसने धन गढ़े होने की बात कही तो कौतूहल वश कहिये या लालच में वह बच्चे को पिलखाना ले गया। वहाँ उसने अपनी पत्नी को पहचान लिया, पुत्री को पहचान लिया। यद्यपि घर का कई स्थानों पर पुनर्निर्माण हो चुका है तथापि वह अपने कमरे में गया और वह धन जो उसने पूर्व जन्म में गाड़ा था बता दिया। उसके पूर्व जन्म के भाई दुर्गा ने वहीं सबके सामने खोदा और सचमुच ही गड़ा हुआ धन पाकर आश्चर्यचकित हो गया। बच्चे से कई प्रश्न पूछे गये जो उसने सच-सच बता दिये यह प्रमाणित हो गया कि वह दुर्गा का भाई ही है पर इससे अधिक किसी ने प्रेरणा ली क्या? दुर्गा और उसके परिवार वालों को छिपा धन मिल गया, पुत्तूलाल और दूसरों को दिलचस्प तमाशा देखने को मिल गया और बच्चा था जो उसी तरह तड़फड़ा कर रह गया जिस तरह हर अज्ञानग्रस्त आत्मा शरीर नष्ट हो जाने के समय बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही व्यर्थ गँवा देने के लिये तड़फड़ाती हुई संसार से विदा हो जाती है।

बच्चे ने अन्य रिश्तेदारों के पते भी बताये, नाम बताये वह सब सच पाये गये। उसने कहा - जब मैं बीमार था तब मेरे लिये एक नई धोती और एक नया कुर्ता आया था वह मैं पहन नहीं पाया था वह अमुक बक्से में रखे थे। घर वालों ने वह बक्सा खोला तो सचमुच जैसी उसने बताई थी वैसी धोती और वैसा ही नया कुर्ता रखा हुआ मिल गया। पर उस बेचारे को वह नया कुर्ता भी नहीं मिल सका, मिल भी जाता तो बेचारा उनका उपयोग भी तो नहीं कर पाता। उसी तरह खाली हाथ अपनी उस नई जन्मभूमि में लौट आया जिस तरह जिन्दगी भी कहीं से भी छल-कपट और अनीतिपूर्वक बटोरने वाले लोग मृत्यु के समय खाली हाथ लौट जाते हैं संचित कमाई की एक पाई भी तो साथ नहीं जाती, हाँ पाप-की, कुसंस्कारों की गठरी अवश्य लद जाती है सिर पर, और जीवात्मा इसी प्रकार बोझ ढोती फिरती रहती है। अपने शाश्वत और सनातन लक्ष्य सच्चिदानन्द की प्राप्ति वाले लक्ष्य से विमुख सारा संसार ही पुत्तूलाल पासी के लड़के की भाँति अज्ञान में भटक रहा है और सब कुछ देखकर भी कुछ समझता नहीं कि किसलिए संसार में आये थे और कर क्या रहे हैं।


दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्ची ईश्वर उपासना है

काशी विश्वनाथ के मन्दिर में एक बार शिवरात्रि के दिन आकाश से एक सोने का थाल उतरा। उसमें लिखा था कि ‘शंकर भगवान में जिसका सच्चा प्रेम होगा, उसी को यह थाल मिलेगा।’ काशीराज ने ढिंढोरा पिटवा कर बहुतेरे लोगों को इकट्ठा किया और सच्चे प्रेम का आह्वान किया।

सर्वप्रथम एक शास्त्री जी सामने आये। उन्होंने कहा-’मैं नित्य रुद्राभिषेक करता हूँ और दर्शन करने के बाद ही भोजन करता हूँ। अतएव थाल मेरे हाथ में दीजिये।’ थाल शास्त्री जी के हाथ में आते ही पीतल का हो गया। इससे शास्त्री जी लजा गये। इसके बाद काशिराज स्वयं आये और कहने लगे - ‘मैंने विश्वनाथ जी पर सोने का कलश सच्चे प्रेम से चढ़ाया था और शिवरात्रि को दर्शन करने के लिये सच्चे भाव से आया हूँ।’ राजा के हाथ में रखने पर थाल लोहे का हो गया। इससे वे भी शरमा गये। तदनन्तर एक बड़े सेठजी आये और कहा - ‘विश्वनाथ जी की जलधारी मैंने ही बनवायी है। फर्श पर रुपये मैंने ही जड़वाये हैं और हजारों कोस की दूरी से प्रेमवश मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए थाल का वास्तविक अधिकारी मैं हूँ।’ उसे देने पर भी थाल का वही हाल हुआ।

उसी समय एक किसान-जो बहुत समय से श्री विश्वनाथ जी के दर्शन का इच्छुक था, किन्तु पास पैसा न होने से प्रायः खेतों के काम पर लगा रहता, इसलिए नहीं आ सकता था। लेकिन आज वह बड़े परिश्रम से कुछ पैसा बचा और खाने के लिए सत्तू बाँधकर यहाँ आ रहा था। रास्ते में एक जगह भूख-प्यास से तरसता एक मनुष्य पड़ा था, उसकी और किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा था। क्योंकि बहुत से लोगों को सोने का थाल लेना था, तब भला उस दरिद्रनारायण को कौन पूछता? इस किसान ने उस गरीब को लोटे से पानी पिलाया, सत्तू खाने को दिया और पास की धर्मशाला में पहुँचा आया। इसके बाद वह किसान काशी विश्वनाथ के मंदिर में गया। महादेव जी की पूजा करके जब वह बाहर निकल रहा था, तब किसी ने हँसकर कहा - ‘महादेव जी का यह सच्चा भक्त आया। इसलिए थाल इसी को दे दो।’

उसके ऐसा कहते ही थाल पुजारी के हाथ से सरका और उस किसान के हाथ में जाकर सुवर्ण रंग में चमकने लगा। शास्त्री, राजा, सेठ, पुजारियों को आश्चर्य हुआ। वे सब कहने लगे कि दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्ची ईश्वर उपासना है।


तीसरी आँख लेकर परकाया प्रवेश तक

प्रस्तुत घटना एक ऐसे व्यक्ति से संबंधित है जिसको “तीसरी आँख” (आज्ञा चक्र) प्राप्त थी। तृतीय नेत्र शल्य-क्रिया (ऑपरेशन) से खुला था पहला शरीर जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर उसने एक मृत अमेरिकन के शरीर में प्रवेश कर सारे अमरीका के तथाकथित विज्ञानवादियों के सम्मुख एक प्रश्न उपस्थित कर दिया कि स्थूल शरीर की कल्पना भ्रम या अन्धविश्वास नहीं है। प्राप्त विवरण इस बात के प्रमाण हैं कि शरीर नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व चिरकाल तक बना रहता है।

सन् 1909 में तिब्बत के एक धर्मनिष्ठ परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया। 1926 तक ल्हासा से विभिन्न विषयों का अध्ययन करने के बाद इस बालक ने चीन की यात्रा की और वहाँ के चुकिंग मेडिकल कॉलेज से सर्जन की डिग्री प्राप्त कर ली। डॉक्टर बनने के बावजूद युवक की रुचि सदैव हवा में उड़ने की हुआ करती सो उसने वायुसेना में कमीशन प्राप्त करने का प्रयास किया-उसमें सफलता भी मिली और वह “फ्लाइंग डॉक्टर” बन भी गया। 1937 के युद्ध में वह जापान द्वारा बन्दी बना लिया गया। बन्दी जीवन में उसने भरपूर यातनायें झेली पर निराश होना तो उसने सीखा ही नहीं था-एक दिन चुपचाप जापानियों की कैद से निकल भागा और यहीं से इस युवक के एक विचित्र जीवन की शुरुआत हो गई।

अनेक योरोपीय देशों का भ्रमण करने के बाद युवक पुनः तिब्बत लौट आया। साँसारिक यातनाओं से थके व्यक्ति को भगवान् की याद आती है और तब वह अपने आपको एक नये आध्यात्मिक वातावरण में अनुभव करता है, इससे उसकी सूक्ष्म एवं अदृश्य अतिमानसिक शक्तियों का विकास होता है। स्वामी नारायणनन्द ने कुण्डलिनी शक्ति के जागरण की साधनाओं का उल्लेख करते हुये लिखा है कि यदि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में केवल सत्य बोलने का प्रण कर ले, गुरु में इतनी निष्ठा जम जाये कि वह अपना शरीर माँगे तो वह भी देते हुये हिचक न आये तो ऐसे व्यक्तियों की कुण्डलिनी शक्ति का अनायास जागरण हो जाता है। शक्ति संस्थान के जागरण के इन कारणों में अत्यधिक यातना से पीड़ित होना भी शामिल है सम्भवतः अध्यात्मवादी इसी कारण केवल दुःख की कामना करते हैं क्योंकि उससे आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने वाली शक्ति रेखा का आचरण सम्भव हो जाता है। इस युवक के साथ प्रत्यक्षतः कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी सुषुम्ना नाड़ी प्रायः दिनभर चलती रहती जिससे उसमें आध्यात्मिक विचारों की एक न टूटने वाली धारा बहने लगी। और इसी सतत् आध्यात्मिकता ने उसमें कठिन योग साधनाओं का साहस पैदा कर दिया।

तिब्बत योग साधनाओं, सिद्धि चमत्कारों का गढ़ माना जाता है। तिब्बत के ज्योतिषी और योगी विश्व विख्यात हैं। यह युवक जब बच्चा ही था अनेक ज्योतिषियों ने उसके बारे में घोषणा की कि वह लामा-अवतार है, एक दिन प्रसिद्ध योगी बनेगा और पश्चिम में जाकर वहाँ की छिन्न-भिन्न धार्मिक आस्थाओं को नया जीवन देगा और उन्हें पूर्वीय दर्शन की ओर मोड़ने में समर्थ होगा। तिब्बत लौटने पर जब उसने शक्ति जागरण की कठिन साधनायें प्रारम्भ की तभी से उसके संबंध में की गई भविष्यवाणियाँ सच होने लगीं। यह युवक और कोई नहीं सुप्रसिद्ध योगी और अतीन्द्रिय दृष्टा श्री टू जडे लोबसाँग रम्पा हैं जो इन दिनों मान्ट्रियल में निवास करते हैं और जहाँ उनके अनुयायियों की संख्या हजारों तक है।

शक्ति-साधनाओं के लिये जहाँ साधक का मनोबल आवश्यक होता है वहाँ उसकी शारीरिक क्षमताओं का भी प्रौढ़ एवं परिपुष्ट होना भी आवश्यक है आग के पास ठण्डे जल के अन्दर, तेज हवा के प्रवाह में अथवा जमीन के अन्दर गढ़कर शरीर एक निश्चित बर्दास्त की सीमा तक ही स्थिर रह सकता है फिर यदि शक्तियाँ शरीर के अन्दर जागृत हो रही हों-और उन्हें सीखने के लिये शरीर के सूक्ष्म कोश तैयार न हों तो वह महत्वपूर्ण शक्तियाँ अपने लिये ही घातक बन जाती हैं इसीलिये रोगी शरीर के लिये योग साधनायें निषिद्ध हैं। साधना के क्रम में यही अड़चन श्री रम्पा के सम्मुख भी आई। उनके साधना गुरु ने स्पष्ट कह दिया कि अब आपका शरीर उच्च स्तरीय योग साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।

प्राणायाम के विभिन्न प्रकार के अभ्यास द्वारा श्री रम्पा अब तक प्राणों पर नियन्त्रण करना सीख चुके थे। ठीक उसी समय उनके लामा गुरु ने उनकी तीसरी आँख का आपरेशन किया मस्तिष्क के अग्रभाग में जहाँ दो हड्डियाँ मिलकर आट्टिक कैजमा बनाती हैं उसके ठीक सामने दोनों भौंहों के मध्य एक विशेष प्रकार का द्विदल चक्र होता है इसके जाग जाने पर योगी संसार के किसी भी भूभाग की हलचल को ऐसे ही देख, सुन सकता है जैसे वह किसी सिनेमा के पर्दे पर चित्र देख रहा हो। लामा मिंग्यार डोंडुप की कृपा से प्राप्त इस दिव्य दृष्टि ने उन्हें टूटे-फूट शरीर द्वारा शक्तियों को धारण किये रहने की कठिनाई से दूर कर दिया। वे अपने भौतिक शरीर से निकल कर सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाले और अतीन्द्रिय ज्ञान अर्जित करने में निष्णात हो गये। अपनी इन दिव्य शक्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक- “तीसरी आँख” (ञ्जद्धद्बह्स्रस्त्र श्वब्द्ग) और “अमर आत्मा” (ब्शह्व स्नशह्द्गक्द्गह्) में विस्तार से किया है। दोनों पुस्तकें कोर्गी बुक्स, ट्राँस-वर्ल्ड पब्लिशर्स लिमिटेड, बैशले रोड, लन्दन एन डब्ल्यू 90 - ने प्रकाशित की हैं-कोर्गी बुक्स ने इनकी कुल मिलाकर 10 पुस्तकें छापी है जिनकी कई लाख प्रतियाँ सारे संसार में प्रसारित हो चुकी हैं।

एक दिन की बात है श्री लोबसाँग रम्पा अपने सूक्ष्म शरीर से आकाश में परिभ्रमण कर रहे थे। इंग्लैण्ड के टेक्स डिटन नगर का एक अंगरेज कलाकार उस दिन एक पेड़ की डाल पर बैठा कागज पर सीनरी उतार रहा था। उसका नाम था “साइरिन होस्किंस”। होस्किंस बेखबर चित्र बना रहा था तभी पेड़ की शाखा फट गई और वह धड़ाम से नीचे जमीन पर जा गिरा। जमीन पर गिरते ही उसके प्राण-पखेरू शरीर छोड़कर चलते बने। हृदय में आकस्मिक धक्का लगने से प्राणों ने क्षुब्ध होकर अपना स्थान छोड़ अवश्य दिया पर होस्किंस के शरीर में कोई विशेष खराबी नहीं आई। योगी लोबसाँग रम्पा ने इस स्थिति का लाभ उठाया। योग-बल से अपने जीर्ण-शीर्ण शरीर से उन्होंने प्राणों को निकाल लिया और उन्हें होस्किंस के शरीर में प्रवेश करा दिया। 6 घण्टे के बाद “होस्किंस” का शव फिर हिलने-डुलने लगा जबकि पहले के लोबसाँग रम्पा का शरीर ठण्डा पड़ गया। कुछ समय बाद उसकी दाह क्रिया कर दी गई।

होस्किंस के मृतक शरीर में जीवन का एकाएक संचार हो जाने से घर वाले विस्मित रह गये। मुहल्ले वाले बहुत घबड़ाये पर जब उस शरीर वाले मुख ने अपने आपको होस्किंस के स्थान पर लोबसाँग रम्पा बताना प्रारम्भ कर दिया तो लोगों का भय गहरे कौतूहल में बदल गया। कुछ दिन तक तो लोगों का अनुमान यह बना रहा कि होस्किंस चोट खाकर मरने के बाद जिया है इसी से उसका मस्तिष्क विकृत हो गया है पर जब रम्पा ने अपने विगत जीवन का शृंखलाबद्ध इतिहास बताना शुरू किया और खोज करने पर न केवल पिछली बातें सच पाई गई वरन् उसका पिछला शव भी मिल गया तो लोगों का अविश्वास विश्वास में बदलने लगा। इसका एक कारण और भी था वह श्री लोबसाँग रम्पा का ‘तृतीय नेत्र’। अपने सूक्ष्म ज्ञान द्वारा जब उन्होंने कितने ही लोगों का भविष्य अक्षरशः सत्य पढ़ दिया तो लोगों को विश्वास हो गया कि प्राण-परिवर्तन और शरीर में दिव्य यौगिक शक्तियों जैसी मान्यताओं का कुछ न कुछ वैज्ञानिक आधार है ही। भले ही विज्ञान अभी तक उन बारीकियों तक पहुँच न पाया हो। विज्ञान की खोजों का जो क्रम चल रहा है वह भी उसकी अपूर्णता और अज्ञात में छिपे किसी न किसी रहस्य का ही प्रतिपादन करता है प्राण विद्या और आत्म विद्या के यह रहस्य ही मानव-जीवन को सही दिशायें दे पाते हैं इसी कारण भारतीय तत्व वेत्ताओं ने जितना जोर तत्व दर्शन पर दिया उतना भौतिकवाद पर नहीं। अब श्री रम्पा अतीन्द्रिय विज्ञान पर शोध कर अपने अनुभवों से जिज्ञासुओं को लाभान्वित कर रहे हैं।


धर्मनिष्ठा आज की सर्वोपरि आवश्यकता

कटुता, भ्रान्ति, सन्देह, भय और संघर्षों से भरे आज के इस संसार का भविष्य अनिश्चित और अन्धकारमय ही दीख रहा है। विज्ञान ने जिन अस्त्रों का आविष्कार किया है वे पृथ्वी की-चिर संचित मानव-सभ्यता को बात की बात में नष्ट करने में समर्थ हैं। कच्चे धागे में बँधी लटकती तलवार की तरह कभी भी कोई विपत्ति आ सकती है और कोई भी पागल राजनेता अपनी एक छोटी सी सनक में इस सुन्दर धरती को ऐसी कुरूप और निरर्थक बना सकता है जिसमें मनुष्य क्या किसी भी प्राणी का जीवन असम्भव हो जाय।

इस सर्वनाशी विनाश से कम कष्टकारक वह स्थिति भी नहीं है जिसमें बौद्धिक अन्धकार, नैतिक बर्बरता की काली घटनायें तिल-तिल जलने और रोने, सिसकने की परिस्थितियों से सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न किये हुए हैं। संसार एक अचेतन मूर्छना के गर्त में दिन-दिन गहरा उतरता जाता है। हमारा आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन मानो ऐसी शून्यता की ओर चल रहा है जिसका न कोई लक्ष्य है न प्रयोजन। पथ भटके बनजारे की तरह हम चल तो तेजी से रहे हैं पर उसका कुछ परिणाम नहीं निकल रहा है। कई बार तो लगता है, प्रगति के नाम पर अगति की ओर पीछे लौट रहे हैं और उस आदिम युग की ओर उलट पड़े हैं जहाँ से कि सभ्यता का आरम्भ हुआ था।

कई व्यक्ति सोचते हैं कि इस व्यापक भ्रष्टाचार का अन्त बड़े युद्धों द्वारा होगा। आज जिन लोगों के हाथ में राजनैतिक, बौद्धिक तथा आर्थिक सत्ता है यदि वे अपने छोटे स्वार्थों के लिए समाज के विनाश की अपनी वर्तमान गतिविधियों को रोकते नहीं है और अपने प्रभाव तथा साधनों का दुरुपयोग करते ही चले जाते हैं तो उन्हें बलात् पदच्युत किया जाना चाहिए। इसके लिये चाहे सशस्त्र क्रान्ति या युद्ध ही क्यों न करना पड़े।

इस प्रकार सोचने वालों की बेचैनी और व्यथा तो समझ में आती है पर जिस उपाय से वे सुधार करना चाहते हैं वह संदिग्ध है। कल्पना करें कि आज के प्रभावशाली लोग-समाज बदलने के लिए अपने को बदलने की नीति अंगीकार नहीं करते और उन्हें युद्ध या शस्त्रों की सहायता से हटाया जाता है तो यही क्या गारण्टी है कि शस्त्रों से जिस सत्ता को हटाया गया है उसी को वे नये शस्त्रधारी न हथिया लेंगे। मध्य पूर्व और पाकिस्तान में सैनिक क्रान्तियों का सिलसिला चल रहा है। नये शासन से भी हर बार वैसी ही थोड़े हेर-फेर के साथ शिकायतें शुरू हो गई जैसी पहले वालों से थी। सत्ता और साधनों में कोई त्रुटि नहीं है, दोष उनके प्रयोगकर्त्ताओं का है। तो हमें ऐसे प्रयोगकर्त्ताओं का निर्माण करना चाहिए जो शक्ति का उपयोग स्वार्थ की परिधि से बाहर रखकर लोक मंगल के लिए प्रयुक्त कर सकने के लिए विश्वस्त एवं प्रामाणिक सिद्ध हो सकें।

आज की समस्याओं का यही सबसे सही समाधान है कि ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़े जो निजी स्वार्थों की अपेक्षा सार्वजनिक स्वार्थों को प्रधानता दें और इस संदर्भ में अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए वैसी जीवन प्रक्रिया जीकर दिखायें जिसे सत्ताधारियों के लिए आदर्श माना जा सके। यह कार्य आज की स्थिति में भी हर कोई कर सकता है। यह गुंजाइश प्रत्येक के लिए खुली पड़ी है कि वह अपनी वर्तमान सुविधाओं एवं उपलब्धियों को व्यक्तिगत कार्यों से बचाकर लोक मंगल के लिए प्रयुक्त करना आरम्भ करे। भावनाओं की प्रबलता के अनुसार परिस्थितियाँ सहज ही बन जाती हैं। यदि लोगों में समाज के हित साधन की उतनी ही ललक हो जितनी अपने शरीर या परिवार के लिए रहती है तो कोई कारण नहीं कि गई-गुजरी स्थिति का व्यक्ति भी कुछ ऐसे प्रयत्न करने में सफल न हो सके जो लोगों में समाज हित के लिए कुछ त्याग एवं श्रम करने की अनुकरणीय चेतना न उत्पन्न कर सकें। व्यक्तिगत जीवन-क्रम के बारे में भी यही बात लागू होती है। विचारणीय है कि क्या जिन बातों को हम सत्य मानते हैं उन्हें आचरण में लाते हैं और जिन्हें अनुचित समझते हैं उन्हें अपने चिन्तन तथा कर्तव्य में से अलग हटाते हैं। इस प्रकार की दुर्बलता आज व्यापक हो गई है कि उचित की उपेक्षा और अनुचित से सहमति का अवाँछनीय ढर्रा चलता रहता है और उसे बदलने की हिम्मत इकट्ठी नहीं की जाती। यदि सच्चाई को अपनाने के लिए बहादुरी और हिम्मत इकट्ठी की जाने लगे तो हर किसी को अपने जीवन-क्रम में भारी परिवर्तन लाने की गुंजाइश दिखाई पड़ेगी। यदि उस गुंजाइश को पूरी करने के लिए साहसपूर्वक कदम उठाये जायें तो आज नगण्य जैसा दिखने वाला व्यक्ति कल ही अति प्रभावशाली प्रतिष्ठित और प्रशंसित सज्जनों की श्रेणी में बैठ सकता है और उसके इस प्रयास से अगणितों को आत्म-सुधार की प्रेरणा मिल सकती है।

शक्ति से शक्ति को हटा देना उतना कठिन नहीं है जितना कि यह प्रबन्ध कर लेना कि उस रिक्त स्थान की पूर्ति कौन करेगा? मध्यकाल में शासकों के बीच अगणित छोटी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई हैं और उनमें से प्रत्येक आक्रमणकारी ने कोई न कोई कारण ऐसा जरूर बताया है कि अमुक बुरी बात को-या अमुक व्यक्ति को हटाकर सुव्यवस्था लाने के लिए उसने युद्ध आरम्भ किया। उस समय यह कथन प्रतिपादन उचित भी लगा पर देखा गया कि विजेता बनने के बाद उसने उस पराजित से भी अधिक अनाचार आरम्भ कर दिया, जिसे कि अनाचारी होने पर अपराध में आक्रमण का शिकार बनाया गया था। मूल कठिनाई यही है। इस तथ्य में सन्देह नहीं कि प्रभावशाली पदों पर अवाँछनीय व्यक्तियों का अधिकार बढ़ता चला जाता है। यह भी ठीक है कि यदि वे चाहते हैं तो अपनी कुशलता का उपयोग विघातक न होने देकर मनुष्य जाति को सुखी, समुन्नत बनाने के लिए रचनात्मक दिशा में कर सकते थे और उनके दृष्टिकोण एवं कार्यक्रम में उपयुक्त परिवर्तन हो जाने से आज की विपन्नता को बहुत कुछ सुधारा जा सकता है; पर सत्ता और लालच का दुरुपयोग रुक नहीं रहा है। इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय? इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यदि उन्हें किसी प्रकार पदच्युत भी कर दिया जाय तो उनके स्थान की पूर्ति कौन करेगा?

आज जो लोग आलोचना करते हैं और अपने को इस लायक बनाते हैं कि उस स्थान की पूर्ति कर सकते हैं तो उन पर भी भरोसा कैसे किया जाय? वचन और प्रतिपादन अब एक फैशन जैसे हो गये हैं, समय से पूर्व बढ़-चढ़कर बातें बनाना और जब परीक्षा की घड़ी आये तो फिसल जाना यह एक आम-रिवाज जैसा हो गया है। पहले जमाने में जब लोग वचन के धनी होते थे तब प्रतिपादन और प्रामाणिकता दोनों एक ही बात मानी जाती थी पर अब वे दो पृथक बातें बन गई हैं और एक से दूसरी का निश्चयात्मक सम्बन्ध नहीं माना जाता।

विभिन्न क्षेत्रों में सत्ताधारी बने हुए अवाँछनीय व्यक्तियों को पदच्युत करने की बात ठीक है। जिनने अपने उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग किया वे इसी लायक हैं कि उनकी कलंक कालिमा को जनसाधारण के सामने इस प्रकार लाया जाय कि वे लोक घृणा से दबकर अपने आपको कुँभी पाक नरक में घिरा और वैतरणी नदी की कीचड़ में धँसा इसी जीवन में पायें और जो लाभ उठाया उससे हजार गुनी धिक्कार की प्रताड़ना सहें। यह प्रताड़ना और बहिष्कृति इसलिये भी आवश्यक है कि दूसरे लोग उस घृणित मार्ग का अवलम्बन न करें। समाज को संकट में डाल देने वाले राजनेता, साहित्यकार, कलाकार, धर्माधिकारी, विद्वान, विचारक, धनपति आदि के प्रति आज के आकर्षण और सम्मान का अन्त किया ही जाना चाहिए और उनके द्वारा किस प्रकार मानव-जाति को संकट में फँसा दिया गया उसका नंगा चित्र सबकी आँखें में लाया ही जाना चाहिए।

पर इतने से भी काम न चलेगा। इन स्थानों की पूर्ति के लिए ऐसे व्यक्तित्व तैयार करने होंगे जो प्रतिपादन से आगे बढ़कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर चुके हैं। ऑपरेशन करने में जितना समय, श्रम, मनोयोग और कौशल लगता है उससे अधिक घाव को भरने और अच्छा करने की अभीष्ट होता है। मुख्य समस्या यही है। समाज को प्रभावित करने वाले विभिन्न वर्गों के सत्ताधिकारी बलपूर्वक ही हटाये जाएं यह आवश्यक नहीं। हर क्षेत्र में उनकी प्रतिद्वंद्विता करने वाले सुयोग्य व्यक्ति खड़े हो जायें तो जनता तुलनात्मक दृष्टि से देखना और सोचना आरम्भ करेगी और अवाँछनीय, जन-सहयोग के अभाव और जन तिरस्कार के दबाव में अपनी मौत आप ही मर जायेंगे। श्रेष्ठता को सदा सम्मान और सहयोग मिला है। यदि श्रेष्ठता विकसित की जा सके तो निष्कृष्टता को बलपूर्वक हटाने या अपनी मौत मरने देने में से जो भी सरल हो उसे क्रियान्वित होने दिया जा सकता है।

संसार का भविष्य अन्धकार में धकेलने वाली प्रवृत्तियों का प्रतिरोध आवश्यक है। वर्तमान सर्वनाशी दुर्दशा पर कोई भावनाशील व्यक्ति विचार करेगा तो उसे सहसा इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इह विपन्नता को उत्पन्न करने वाले तथा उसे बनाये रखने के लिए जो भी तत्व उत्तरदायी हैं उन्हें हटाया जाय। जिन प्रवृत्तियों पर इस दुरवस्था की जिम्मेदारी है उनका उन्मूलन किया जाय। व्यक्ति एवं समाज को विनाश से बचाने के लिए इस प्रकार के प्रयास जितने विशाल, जितने व्यापक, जितने समर्थ और जितनी जल्दी हों उतने ही अच्छे हैं। पर यह ध्यान रहे एकाँगी प्रयत्न पर्याप्त न होंगे। अनुपयुक्त का स्थान ग्रहण कर सकने वाले उपयुक्त को समुन्नत करने की आवश्यकता और भी अधिक है। सो यह प्रयत्न किये जाने चाहिए कि सृजन की आवश्यकता पूर्ण कर सकने वाले और बदलते हुए अभिनव विश्व की जिम्मेदारियाँ सँभालने के लिए मजबूत कन्धे वाले और बड़े दिल वाले व्यक्तियों का निर्माण द्रुतगति से आरम्भ कर दिया जाय। वस्तुतः यही बड़ा काम है। यदि इस प्रयोजन की पूर्ति कर ली जाती है तो अशुभ का निराकरण बिना संघर्ष के भी सम्पन्न हो जायगा। प्रकाश का उदय होने पर अंधेरा ठहर कहाँ पाता है।

परिवर्तन के बिना कोई गति नहीं। यह जीवन-मरण का प्रश्न है, जिसे हल करना ही होगा। इस निश्चय के साथ ही हमें इस प्रयोजन के लिए सर्वप्रधान और सर्वप्रथम उपाय के रूप में धर्मनिष्ठा को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के कार्य को भी हाथ में लेना होगा। इस अध्यात्म, सदाचार, नेकी, सज्जनता, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, मानवता, कर्त्तव्यपरायणता आदि किसी भी नाम से पुकारें इस शब्द भेद से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मूल प्रयोजन यदि पूरा हो सके तो शब्दों में उलझने की जरूरत नहीं रहेगी। इस भावना को व्यक्त करने के लिए चिर-परिचित और सर्वमान्य शब्द ‘धर्मनिष्ठा’ को ही यथावत् चलने दिया जाय तो हर्ज नहीं। बात इतनी भर है कि प्राण का स्थान परिधान को न मिले। साम्प्रदायिक आचार-व्यवहार और रीतिरिवाज एवं प्रथा-परम्परा के आवरण ऐच्छिक रखे जायें, उनमें से कौन किसका अनुसरण करता है इस संदर्भ को व्यक्तिगत अभिरुचि का विषय मान लिया जाय। अनिवार्य तो धर्मनिष्ठा मानी जानी चाहिए जिसका सीधा संबंध आन्तरिक जीवन की चरित्र निष्ठा और बाह्य जीवन की समाज निष्ठा में जोड़ा जाय। जो व्यक्तिगत जीवन में उत्कृष्ट विचारणा एवं पवित्र जीवन


Quotation

जिस समाज में अधिकाँश अच्छे लोग रहते हैं उसे सभ्य समाज कहा जाता है। पर मेरी दृष्टि में उससे भी सभ्य वे लोग हैं जो बुरे लोगों को भी निबाह लेते हैं और प्रेमपूर्वक उन्हें अच्छा बनाने का प्रयत्न करते रहते हैं।

-अब्राहम लिंकन

की सज्जनता का समुचित समावेश कर सकें और सामूहिक स्वार्थों से अधिक महत्ता दें उसी को धर्मनिष्ठा माना जाय।

जन-जीवन में धर्मनिष्ठा की प्रतिष्ठापनाएँ सदा ही श्रेयस्कर थीं और रहेंगी, पर आज की परिस्थितियों में तो उसे व्यक्ति की सुख-शान्ति और समाज की सुरक्षा समृद्धि की दृष्टि से इतनी अधिक आवश्यक हो गई हैं कि उसकी उपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया प्रयत्न वस्तुतः मानव जाति की महानतम सेवा एवं विश्व को विनाश से बचाने की महती सेवा-साधना मानी जायेगी। हमारा ध्यान इस दिशा में जितना अधिक और जितनी जल्दी जा सके उतना ही उत्तम है।


अन्धविश्वास-सृजेता को भी खाता है।

अमेरिका में तब तक गोरे लोगों का पदार्पण नहीं हुआ था। मूल निवासी ही वहाँ रहते थे।

सन् 1533 के करीब दक्षिणी अमेरिका के सुविस्तृत क्षेत्र में-जहाँ आजकल पेरु, इक्वाडोर, चिली, अर्जेन्टाइना हैं-एक राजा राज्य करता था उसका नाम था-’अताहुआल्या’ राज्य का नाम था-’तवानतिन मुदू’ यह राज्य कोई 3500 मील के परिधि में फैला हुआ है।

राजा के पूर्वज ‘इन्का’ कहे जाते थे। राज्य सम्पदा का कोई ठिकाना न था। सोने की लंका का जैसा वर्णन किया जाता है, वैसी ही कुछ उस राजा की निजी सम्पत्ति तथा भवन, उद्यान, विलास साधनों के बारे में कहा जाय तो कुछ बहुत अत्युक्ति न होगी।

प्रजा नितान्त अशिक्षित थी। प्रजाजनों में से कोई फूटा अक्षर भी न जानता था, पर थे सभी कठोर परिश्रमी भोले और ईमानदार। जो कमाते थे उसमें से गुजारे भर को रखकर शेष सारी बचत राज्यकोष में जमा करनी पड़ती थी।

राज्य परिवार ने प्रजा में एक किंवदंती प्रचलित कर रखी थी कि उनका यह राजवंश सूर्य भगवान का अंश है। इसकी पीठ पर सूर्य देवता है। जो राज्य परिवार का विरोध करेगा उसका सूर्यदेव प्राण हरण कर लेंगे और कठोर दण्ड देंगे। भोली प्रजा ने यह बात अक्षरशः सत्य मानी और उस पर पूरी निष्ठा के साथ अमल किया। राजा जो कुछ भी उचित-अनुचित कहे या करे उसे ईश्वर की आज्ञा ही मानकर चला जाता था। प्रजा प्राणपण से अपने राजा की इच्छा पूरी करती थी। राजा के कुपित होने के भय से कहीं चोरी चाण्डाली भी नहीं होती थी। गरीब होते हुए भी यह रैड इण्डियन लोगों की प्रजा राजाज्ञा का पालन प्राण-पण से करती थी।

स्पेन के सामन्तों को इस राज्य की विपुल सम्पदा का पता चला तो पिंडारी नाम का एक स्पेनी सरदार अपने साथ कुल दो सौ सिपाही लेकर चढ़ दौड़ा और बेखबर राजा को बात की बात में गिरफ्तार कर लिया। सरदार पूरी स्थिति की जानकारी प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने राज्य भर में राजा की ओर से मुनादी करा दी कि मुझे पिंडारी सरदार ने गिरफ्तार कर लिया है। कोई उस सरदार को छेड़े नहीं अन्यथा मैं मारा जाऊँगा और सूर्य देव छेड़ने वालों को ही नहीं - सारी प्रजा को ही भस्म कर देंगे।

प्रजाजन क्या करते। चुप बैठने और प्रतीक्षा करने के सिवाय कोई रास्ता उनके पास नहीं था। पिंडारी अपने सैनिकों के साथ समस्त राज्य में शान से घूमा और सारी राज्य सम्पदा पर कब्जा कर लिया।

यह धन भी सरदार को कम प्रतीत हुआ। उसने राजा के दूतों द्वारा समस्त राज्य में राजाज्ञा कहकर घोषणा कराई कि जिसके पास जो सोना, चाँदी, कीमती वस्तुयें हैं वह राज्य के कोष में जमा करें। आनाकानी करने वालों को सूर्यदेव भस्म कर देंगे। भोली प्रजा के पास जो कुछ था राई-रत्ती भी स्पेनी सरदार के सामने लाकर रख दिया।

पिंडारी ने राजा के इच्छित धन मिल जाने पर उसे छोड़ देने का वचन दिया था पर जब उसे यह मालूम हुआ कि अभी उसके पास और भी छिपा हुआ धन है तो उसने उसकी भी माँग की। राजा ने आनाकानी की तो उसे फाँसी लगवा दी। और जो धन हाथ लगा उसे स्पेन ले आया।

छिपे धन को पिंडारी के साथियों ने ढूँढ़ निकाला और उसे कहीं अन्यत्र छिपा दिया। कहते हैं कि वह विपुल सम्पदा अभी भी कहीं जमीन में छिपी पड़ी है।

अन्ध-विश्वास फैलाकर राजा ने प्रजा का शोषण किया जरूर पर वही अन्ध-विश्वास उसके विनाश का कारण बना। भ्रम-जंजाल फैलाने वाले शिक्षा लें कि भ्रम में डालकर शोषण करने की दुधारी तलवार उलट कर अपने ही ऊपर पड़ती है।


शीत हमारा मित्र है - ताप शत्रु

सर्दी मनुष्य के लिए कितनी उपयोगी है, इसे बहुत कम लोग जानते हैं। आमतौर से लोग ठण्ड से बचने के लिए कपड़ों के लबादे लादे रहते हैं। ठण्ड लगने से जुकाम, निमोनिया आदि हो जाने के भय से डरते रहते हैं। वस्तुतः शीत लाभदायक है-हानिकारक नहीं। हानिकारक उनके लिए है जिन्होंने अमीरी के चोंचले में फँसकर अपनी त्वचा को ऋतु प्रभाव से बचाते हुए उसकी सहन-शक्ति को नष्ट कर दिया है। दुर्बल के लिए तो दैव भी घातक हो जाता है। सर्दी-गर्मी तो क्या रोटी, पानी भी उनके लिए विपत्ति सिद्ध हो सकती है। ऐसे अपवादों को छोड़ दें तो शीत के उपयोगी प्रभाव को ही स्वीकार करना पड़ेगा।

ठण्डे देशों के निवासी गरम प्रदेशों के निवासियों की तुलना में अधिक स्वस्थ, सुन्दर और दीर्घजीवी होते हैं। उत्तरी ध्रुव के निवासी नितान्त हिमाच्छादित प्रदेशों में स्वल्प साधनों से निर्वाह करते हैं और साधन सम्पन्नों की अपेक्षा अधिक जीवनी-शक्ति युक्त पाये जाते हैं। शीत ऋतु में अपेक्षाकृत भूख अधिक लगती है, पाचन अच्छा रहता है और गिरा हुआ स्वास्थ्य भी सँभल जाता है।

सिद्ध पुरुषों की तप-साधना सदा हिमालय में होती रही है। प्राचीन काल में सप्त ऋषियों की तथा अन्यान्य तपस्वियों की तपश्चर्यायें वहीं होती थी। योगेश्वर शिव का स्थान हिमाच्छादित कैलाश है। देवताओं का निवास सुमेरु पर्वत पर बताया गया है यह सुमेरु गंगोत्री, गोमुखी से 200 मील आगे है। देव उद्यान-नन्दन वन-गंगा के उद्गम गौमुख से थोड़ा ही आगे है। पाण्डवों ने जिस स्थान पर स्वर्गारोहण किया था-व्यास जी को त्वरा लेखक बनाकर गणेश जी ने जिस स्थान पर महाभारत लिखा था वह व्यास गुफा वसोधरा बद्रीनारायण से आगे है। श्रीकृष्ण भगवान ने रुक्मिणी सहित तपश्चर्या बद्रीनारायण तीर्थ में की थी। भगवान राम अयोध्या का राज्य लव-कुश को देकर स्वयं देव प्रयाग तप करने के लिए चले गये थे। यह सब स्थान हिमालय में ही है। आध्यात्मिक तपश्चर्याओं का तीन चौथाई इतिहास हिमालय की शीत प्रधान भूमि से ही सम्बन्धित है।

मन की एकाग्रता, अन्तःकरण की पवित्रता, इन्द्रियों का निग्रह, समाधि की तन्मयता, दिव्य प्रकाश की प्रखरता जैसे लाभ हिमालय में जितनी सुविधापूर्वक सम्भव हैं उतने अन्यत्र नहीं। वहाँ अभी भी आश्चर्यजनक आयुष्य वाले सिद्ध योगी पाये जाते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व गंगोत्री में स्वामी कृष्णाश्रम जी का स्वर्गवास हुआ है। उनकी आयु के सम्बन्ध में संपर्क वाले व्यक्ति 200 वर्ष से अधिक बताते हैं। नग्न और मौन स्थिति में वे इस हिमाच्छादित प्रदेश में ही रहा करते थे। ऐसे विदित योगी कई हैं। अविज्ञात सिद्ध पुरुष तो कितने ही उस क्षेत्र में अत्यधिक आयुष्य वाले हैं। हिमालय की तपश्चर्या आत्म-शक्ति, दिव्य दृष्टि जैसी सिद्ध विभूतियाँ ही नहीं अक्षय स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन भी प्रदान करती हैं। हिमालय विश्व चेतना का हृदय है। जिस प्रकार पृथ्वी के केन्द्र ध्रुव हैं उसी प्रकार भूलोक के इस उत्तरायण वर्ग का चेतना ध्रुव हिमालय है। यहाँ वे लाभ सहज ही मिल जाते हैं जो अन्यत्र तप साधना करने वालों को दीर्घकाल में भी मिल सकने कठिन हैं।

हिमालय की विशेषता अन्य सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक कारण तो हैं ही। प्रत्यक्ष कारणों में उसकी शीत प्रधानता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विज्ञान अब इस निष्कर्ष पर जा पहुँचा है कि शीत की सहायता से कायाकल्प भी सम्भव है। और शरीर सहित हजारों वर्ष तक जीवित रहा जा सकता है।

कुछ समय पूर्व नोबेल पुरस्कार लब्धकर्त्ता डॉक्टर कैरल ने यह प्रतिपादित किया था कि शीत की सहायता से मानवीय आयुष्य में आशातीत वृद्धि की जा सकती है। इस संदर्भ में प्रयोग निरन्तर चलते रहे और अब यह प्रमाणित कर दिया गया है कि प्राणियों को बर्फ की तरह जमाकर सुरक्षित रखकर न केवल उनके शरीर को वरन् प्राणों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

उत्तरी ध्रुव की खोज में गये हुए अन्वेषकों के मृत शरीर सैकड़ों वर्ष बाद ज्यों के त्यों बिना किसी विकृति के इस स्थिति में पाये गये मानों अभी जल्दी ही उनकी मृत्यु हुई है। अन्य हिम प्रदेशों में मृत शरीर चिरकाल तक सुरक्षित रहने की बात तो लोगों को पहले से ही विदित थी। पर अब यह भी सम्भव हो गया है कि न केवल शरीर को वरन् प्राण को भी शीत में जमाया जा सकता है और फिर सुविधानुसार सजीव एवं सक्रिय किया जा सकता है।

शुक्राणु शीत में जमा दिये जाते हैं और तब उनकी हरकत बन्द हो जाती है पर जब गर्मी पहुँचाई जाती है तो वे सन्तानोत्पादन के उपयुक्त बन जाते हैं। यह तथ्य अब चिकित्सा शास्त्र के सभी विद्यार्थी जानते हैं। म्यूनिख विश्वविद्यालय के वे प्रयोग भी अब पुराने हो गये जिनमें चींटियों का एक समूह जमा दिया गया था और वे दस दिन बाद पिघलाये जाने पर फिर जीवित होकर सामान्य जीवन जीने लगीं।

कुछ दिन पूर्व यह घटना समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी कि मिस अंग को शीत की सहायता से नव-जीवन प्रदान किया गया। उक्त महिला ने आत्म-हत्या की। उसने विष खा लिया। डॉक्टरों ने उसके प्रधान अवयव निष्क्रिय पाये। यकृत बेकार हो चुका था। गुर्दे घुलकर बह चले थे। हृदय में नाम मात्र का स्पन्दन था। इस मरणासन्न लाश को उच्च विज्ञान वेत्ता लेम्पेल ने शीत में जमा दिया और एक काँच के बर्तन में बयालीस दिन तक सुरक्षित रखा। इसके बाद गर्मी दी गई तो उनमें सजीवता के चिह्न दीखे। उपचार के बाद उनका शरीर आत्महत्या से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा हो गया। उनमें नवयौवन फूट पड़ा और उस अधेड़ महिला को अपना विवाह करने के लिए विवश होना पड़ा।

इस सफलता के बाद उपरोक्त उच्च वैज्ञानिक ने दावा किया है कि कायाकल्प का यह प्रामाणिक उपाय है। कुछ समय के यदि मनुष्य को शीत में जमा दिया जाय तो उसके थके हुए अंग-प्रत्यंगों को पूर्ण विश्राम मिल सकता है और इस विभिन्न से शरीर नवजात बालक की तरह फिर तरोताजा एवं जीवनी शक्ति से भरपूर हो सकता है। इस प्रकार हर पचास वर्ष बाद कुछ दिन का शीत विश्राम दिया जाता रहे तो मनुष्य दो हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है।

डॉक्टर लेम्पेल का तर्क है कि सृष्टि के समस्त जीव जितना समय बचपन से लेकर युवा होने में लगाते हैं उससे प्रायः पन्द्रह गुना पूर्ण जीवन माना जाता है। गाय दो वर्ष में युवा होती है उसकी पूर्ण आयु तीस-पैंतीस वर्ष मानी जाती है। मनुष्य यदि 25 वर्ष में तरुण होता है तो उसे स्वभावतः लगभग 400 वर्ष जीना चाहिए। यदि इससे कम आयु में मरना पड़े तो समझना चाहिए कि जीने की विधि व्यवस्था में कोई भारी भूल रह गई। उसी से अकाल मृत्यु का ग्रास होना पड़ा। उनकी शोधों का निष्कर्ष यह है कि शीत जीवन का मित्र है और ताप शत्रु। ताप से जितना बचा जा सके और शीत से जितना सान्निध्य रखा जा सके उतनी ही शरीर की सुरक्षा बनी रहेगी।

यह प्रयोग पशु शरीरों पर जारी है। साधारणतया 98 डिग्री से तापमान घटने पर शरीर के कल-पुर्जे शिथिल होने लगते हैं पर बछड़ों के भीतरी अवयवों को एक सीरम रसायन से उत्तेजित किया गया और उस उत्तेजित स्थिति में ही उसे जमा दिया गया। इस स्थिति में आरम्भ से जीवन एक दिन तक ही रह सका पर पीछे प्रयोग करते-करते वह अवधि एक महीने तक बढ़ गई है। इस प्रकार विश्राम प्राप्त जानवर न तो बीमार पड़ता है न कमजोर होता है वरन् पहले से भी अधिक स्वस्थ रहने लगता है।

अन्तरिक्ष अनुसंधान की सुविस्तृत योजना अमरीकी वैज्ञानिकों ने मनुष्य सहित अन्तरिक्ष यान प्लूटो ग्रह पर भेजने की बनाई है। अनुमान है कि चन्द्रयान वाली चाल के रॉकेट को वहाँ तक पहुँचने में 2 वर्ष लगेंगे। इतना ही समय लौटने में भी चाहिए। इतने दिन मनुष्य जीवित कैसे रहेगा। इसका समाधान इसी प्रकार ढूंढ़ा गया है कि प्लूटो यान के यात्री को शीत से जमा दिया जाय। यान के यन्त्र निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचा कर जमे हुए यात्री को गरम कर दें। वह सक्रिय होकर अपनी खोज करे और फिर वापसी में निर्धारित यन्त्र की सहायता से स्वयं जम जाय और पृथ्वी पर अपनी नींद खोले?

योग समाधि में लगभग यही प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। उसमें शीतल वातावरण तो सहायक होता है इसलिए इस तरह की साधनायें हिमालय में अधिक सफल होती हैं। फिर भी उसमें शीत के द्वारा शरीर को जमा देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संकल्प बल और प्राण शक्ति की सहायता से भीतरी अवयवों को बन्द या मन्द कर दिया जाता है। फलतः श्वास-प्रश्वास रक्ताभिषरण, पाचन-क्रिया, मल विसर्जन आदि सारे आन्तरिक क्रिया-कलाप बन्द हो जाते हैं। मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमता अचेतन केन्द्र में लय हो जाती है। समाधि कितने समय की लेनी है इसका प्रमाण सन्देश अचेतन चित्त को दे दिया जाता है। चित्त आज्ञाकारी सेवक की तरह उस आदेश का पालन करता है और समाधि नियत अवधि पर खुल जाती है। इस समाधि क्रिया का वही लाभ होता है जो उच्च वैज्ञानिक के शीत परीक्षण द्वारा मरणासन्न महिला तथा कई जानवरों पर प्रयोग करके सम्पन्न किया गया है।

मनोबल, आत्म-बल, साधना, तपश्चर्या की अपनी शक्ति है। हिमालय-चेतना उद्गम का हृदय-ध्रुव-होने से इन प्रयोगों प्रयोजनों के लिए अति उपयोगी है। यह आध्यात्मिक प्रयोग हुआ। साधारणतया सामान्य जीवन में भी शीत की उपयोगिता समझी और स्वीकारी जानी चाहिए। अमीर लोग ग्रीष्म ऋतु में काश्मीर आदि शीत प्रधान स्थान में चले जाते हैं और स्वास्थ्य लाभ करते हैं। यह अमीरी की बात हुई। हम गरीब लोग भी शीत ऋतु का लाभ उठाने के लिए-शीत वातावरण में आवास-निवास सम्भव बनाने के लिए-शीतल प्रदेशों की तीर्थ यात्रा या वहाँ कुछ समय रहने की बात सोचें वैसी व्यवस्था बनायें तो यह स्वास्थ्य सुधार की दृष्टि से बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। मानसिक लाभ उठाने की साधना भी यदि उसमें जुड़ी रहे तो फिर उसे सोना और सुगन्ध की उपमा दी जा सकेगी।


चीन के महान तत्वदर्शी कन्फ्यूशियस

-चीन के महान तत्वदर्शी कन्फ्यूशियस के मरने का समय आ पहुँचा। अन्तिम दर्शन के लिए उनके अनेकों शिष्य समीप खड़े थे। उनकी जिज्ञासा थी, गुरुदेव हमें कुछ उपदेश देकर जायें।

कन्फ्यूशियस ने शिष्यों को पास बुलाकर पूछा देखना मेरे मुँह में जीभ है या नहीं? और उन्होंने मुँह फाड़ दिया। जीभ मुँह में थी ही। होनी भी चाहिए। शिष्यों को आश्चर्य हुआ कि यह क्या बेतुका सवाल पूछा जा रहा है? फिर भी शिष्टता वश उन्होंने यही कहा-’है’।

अब दूसरा प्रश्न पूछा गया-बताओ मेरे मुँह में दाँत हैं-या नहीं? इस बार भी उन्होंने पूरा मुँह खोला। दाँत नहीं थे। आयु के हिसाब से वे पहले ही झड़ चुके थे। शिष्यों को इस प्रश्न पर भी वैसा ही अचम्भा हुआ। फिर उन्होंने यही कहा-दाँत तो गुरुदेव एक भी नहीं है। कन्फ्यूशियस ने तीसरा प्रश्न किया। बच्चों जीभ तो मेरे जन्म से पहले ही मौजूद थी, और दाँत बाद में निकले। फिर यह क्या हुआ कि पीछे जन्मने वाले पहले चले गये और जो पहले पैदा हुई वह पीछे भी मौजूद है। शिष्य क्या उत्तर देते। उनके कुछ कहते न बन पड़ा। सब चुप खड़े थे। एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे।

स्तब्धता तोड़ते हुए कन्फ्यूशियस ने कहा-बच्चों, जीभ कोमल है और सरस। दाँत कठोर, क्रूर और निर्मम। सो दाँत टूट गये और जीभ का अस्तित्व अन्त तक बना हुआ है।

इस प्रकार इस महान दार्शनिक ने अपनी अन्तिम और अति महत्वपूर्ण शिक्षा शिष्यों को दी और अपनी आँखें बन्द कर लीं।


मधु वर्षा किसने की?

सन् 1858 भारतवर्ष में प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (गदर) के नाम से विख्यात है। यही वर्ष कैलीफोर्निया की नापाकाउन्टी स्टेट में एक ऐसे आश्चर्य के लिए विख्यात है जिसने देववाद की यथार्थता का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत कर लाखों लोगों को विस्मृत कर दिया।

27 अगस्त। कई दिन से बादल घुमड़ रहे थे पर वर्षा नहीं हो रही थी और तब एकाएक बूंदें गिरनी प्रारम्भ हुई। वर्षा से बचाव के लिए लोग जल्दी-जल्दी घरों में छिपने लगे। तो भी कुछ लोग जो बाहर जंगल में काम कर रहे थे वे जल्दी ही घर नहीं पहुँच सके घर तो पहुँचे पर देर से भीगते हुए पहुँचे।

बरसात का पानी सिर से पाँव तक बह रहा था कुछ बूंदें एक चरवाहे के ओठों पर लगी पानी क्या था पूरा शर्बत अब उसने अपनी हथेली आगे कर दी और पूरा चुल्लू पानी इकट्ठा कर पिया-तो आश्चर्य में डूब गया क्योंकि वह पानी नहीं वास्तव में शर्बत था। ठीक वैसा ही जैसा कि चीनी घोल कर शर्बत बनाया जाता है।

एक चरवाहे को ही नहीं, कई किसानों, कुछ अध्यापकों और शहर के अनेक लोगों को भी एक साथ ही अनुभव हुआ कि आज जो पानी बरस रहा है वह सामान्य वर्षा से बिल्कुल भिन्न है अर्थात् पूरे नापाकाउन्टी क्षेत्र में बरसे जल में भरी-पूरी मिठास थी ऐसा नहीं कोई हलका मीठापन रहा हो।

बात की बात में चर्चा सारे क्षेत्र में फैल गई। जो जहाँ था उसने वहीं वर्षा का जल पीया और पाया कि उस दिन की बरसात में मिश्री घोली हुई थी।

पुराणों में ऐसी कथाएँ बहुतायत में पढ़ने को मिलती हैं जिनमें यह बताया गया होता है कि किसी देवता ने किसी भूखे-प्यासे व्यक्ति को आकाश से भोजन भेजा, सवारी भेजी, वाहन भेजे, सहायताएं प्रस्तुत की। भूखे-प्यासे, उत्तेक को देवराज इन्द्र ने अन्न-जल दिया था अश्विनी कुमार आकाश मार्ग से देव औषधि लेकर च्यवन ऋषि के पास आये थे और उन्हें अच्छा किया था ग्राह से गज की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र भगवान की अदृश्य सहायता के रूप में उतरा था, भगवान राम को ‘विरथ’ देख इन्द्र ने अपने रथ भेजा था, द्रौपदी की सहायतार्थ कृष्ण भगवान ने उसकी साड़ी को योजनों लम्बा कर दिया था। बाईबल में ऐसे वर्णन आते हैं जब महाप्रभु ईसा को देवताओं ने देव भोग भेजे थे। इन कथाओं में बहुत सा अंधविश्वास भी हो सकता है पर विज्ञान और तथ्य भी कम नहीं हो सकता। प्रस्तुत घटना इस बात का प्रमाण है कि विशाल ब्रह्माण्ड में ऐसी शक्तियों का अस्तित्व असंभव नहीं जो पदार्थ के परमाणुओं को अदृश्य सहायता के रूप में प्रकट कर देने की क्षमता न रखती हों। योग सिद्धियों का मूल सिद्धान्त भी यही है कि जो कुछ व्यक्त है, दृश्य है, वह सब सूक्ष्म अव्यक्त से एक क्रम व्यवस्था द्वारा उभर रहा है संकल्प सत्ता में वह शक्ति है जो उस क्रमिक नियम को भी बदल सकती है और उसके स्थान पर आश्चर्य-अजूबे प्रस्तुत कर सकती है।


Quotation

अमृत भी-उसमें जहर पड़ने से जहर बन जाता है।

यह घटना उसी का प्रमाण थी। कई दिन लोगों ने बरसात के स्टोर किये जल का शर्बत के रूप में प्रयोग किया। नापाकाउन्टी के वैज्ञानिकों ने उस जल के परीक्षण किये। कई लोगों ने घरों में जल को सुखाया और उसमें घुली हुई मिश्री को अलग किया। बरसात के साथ घुली हुई इस मिश्री को जब स्टोरों में जमा मिश्री के साथ रासायनिक तुलना की गई तो पाया गया कि दोनों के कण एक ही तरह के हैं, मिठास एक ही तरह का है।

बरसात में यह मिश्री कहाँ से आई वैज्ञानिक इस बात का आज तक कोई उत्तर नहीं दे सके जबकि वे इस बात को मानते हैं कि गन्ने के रूप में खेतों से मिलने वाली शक्कर के कण मिट्टी में नहीं आकाश में ही हैं।


रोगी न मारा जाय केवल रोग ही मरे

विज्ञान की प्रगति ने निस्सन्देह ऐसे तथ्यों को खोज निकाला है जो अब तक अविज्ञात थे। इन आविष्कारों ने मनुष्य के लिए अनेक सुविधायें प्रस्तुत की हैं और अनेक कठिनाइयों का हल निकाला है। इस दृष्टि से इन आविष्कारों-उनके आविष्कर्ताओं तथा व्यापक बनाने के प्रयत्नों की जितनी सराहना की जाय कम है।

पर इस वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर कुछ ऐसे अवैज्ञानिक कार्य भी हुए हैं जिनका बाह्य स्वरूप ही विज्ञान की प्रक्रिया से ताल-मेल खाता है, गहराई से देखने पर प्रतीत होता है कि वे कार्य मूल प्रयोजन को भुलाकर किये गये हैं इसलिए उन प्रयत्नों से लाभ के स्थान पर हानि ही हुई है। ऐसे ही प्रयत्नों में एक ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान भी है।

चिकित्सा का मूल प्रयोजन केवल तात्कालिक कष्ट निवारण ही नहीं, वरन् रोग के मूल कारण को ढूँढ़ना और निराकरण होना चाहिए। प्राकृतिक चिकित्सा विधि तथा आयुर्वेद का आरम्भिक प्रयास इसी दिशा में चलता है। संसार के समस्त जीव-जन्तु जब अस्वस्थ होते हैं तब प्रकृति भी रोग निवारक शक्ति की सहायता करने वाले छुटपुट प्रयत्न करती है और तब जीव सरलता पूर्वक अपना कष्ट निवारण कर लेते हैं। मनुष्य के लिए भी वह राजमार्ग खुला हुआ है।

ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के मूल में ही कुछ दोष रह गया है और उस मूल दोष का निवारण किये बिना-गलत आधार पर चिकित्सा विज्ञान को अग्रसर किया जा रहा है। अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी अन्वेषणों और आविष्कारों की धूम है। पर परिणाम प्रतिकूल ही सिद्ध होता चला जा रहा है। तत्काल कुछ समय के लिए कष्ट कम देना मात्र चिकित्सा विज्ञान की सफलता नहीं है, ऐसा तो कोई बेरोजगार, जादूगर भी कर सकता है। पीड़ित स्थान को सुन्न करके या दिमाग को पीड़ा अनुभव करने की क्षमता से वंचित करने वाले मादक पदार्थों के आधार पर तुरन्त कष्ट कम करने का प्रयोजन पूरा हो सकता है पर इससे लाभ क्या हुआ? बीमारी दूसरे रूप में फूट पड़ी और अधिक चिरस्थायी बन गई तो ऐसा इलाज किस काम का रहा?

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान रोग के मूल कारण असंयम को रोकने तथा स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की शिक्षा तथा व्यवस्था पर जोर देने की अपेक्षा ऐसी दवायें प्रस्तुत करने में लगा हुआ है जो बीमारी के कीटाणुओं को मारने के साथ-साथ जीवन रक्षक स्वस्थ कणों को भी समान रूप से मारती हैं। ऐसी विषाक्त औषधियाँ बन रही हैं जिनके कारण नया रोग उत्पन्न हो जाने से लगता है मानो पुराना रोग चला गया हो। भेड़िया भगाने के लिए शेर को लाकर बिठा देना यह क्या उपचार हुआ? इससे तो यह झूठी सान्त्वना ही मिली कि भेड़िया चला गया। शेर के उस स्थान पर आ धमकने से भयातुर को राहत कहाँ मिली।

औषधि अन्वेषण क्षेत्र में इन्हीं आधारों को लेकर नई-नई खोजें हो रही है और नित नये इन्जेक्शन, कैप्सूल निकलते चले आ रहे हैं। औषधि विक्रेताओं को गहरा नफा होता है और रोगी की तात्कालिक दिल जमई कराने में अपना धन्धा चमकता देखने वाले डॉक्टर भी उस प्रयत्न को प्रोत्साहित करते हैं। घाटे में बेचारा रोगी रहता है जिसका पैसा भी जाता है, शरीर भी खराब होता है और इलाज की आशा से नई व्यवस्थाओं के जंजाल में जकड़ जाता है। जादू की तरह कुछ समय को कष्ट हलका कर देने के लालच में उसे जो चिर स्थायी हानि उठानी पड़ती है, उसे दूरदर्शिता के साथ देखा, समझा जाय तो प्रतीत होता है कि यह क्या कुछ चिकित्सा रही? इससे स्वास्थ्य लाभ का मूल प्रयोजन कहाँ सिद्ध हुआ?

जहाँ अन्धाधुन्ध आविष्कार नित नई दवाओं के हो रहे हैं वहाँ उनके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। समय आ गया है कि इस संदर्भ में फिर नये सिरे से विचार किया जाय। प्रस्तुत औषधियों से होने वाली हानियों को भी ध्यान में रखना ऐसे विचार के समय आवश्यक है।

तपेदिक के टीके वी.सी.जी. की इन दिनों बहुत धूम है। तपेदिक से बचने के लिए इसका अन्धाधुन्ध प्रयोग हो रहा है। पर अभी इस बात का निष्कर्ष नहीं निकल सका कि तपेदिक का टीका लगने के बाद उसका न होना निश्चित है। अँधेरे में टटोलने की तरह ही प्रयोग चल रहे हैं। सो भी इस प्रयोग को हानि रहित नहीं कहा जा सकता। इंग्लैण्ड के स्वास्थ्य मन्त्रालय के मेडीकल मेमोरेडण्म नं. 324 में यह स्पष्ट कहा गया है। वी.सी.जी. के टीके के हानि रहित होने की कोई गारन्टी नहीं है। इसी औषधि के विशेषज्ञ डॉक्टर के नोविल इरविन ने अपनी पुस्तक वी.सी.जी. वेक्सिनेशन थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस पुस्तक में अनेक प्रयोगों का नतीजा लिखते हुए बताया है कि इसके फलस्वरूप कितनों को ही गाँठें उभर आना, घाव हो जाना, भीतरी फोड़ा निकलना जैसी दुखद प्रतिक्रियायें देखी गई। उनने चेचक के टीके के बारे में भी लिखा है कि इसे लगाने के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि चेचक फिर न होगी।

एक जर्मन कम्पनी ने सुख-शान्ति की नींद सुलाने वाली दवा ‘थैलिडो माइल’ बनाई। उसका खूब विज्ञापन हुआ और यह भी कहा गया कि इसकी ज्यादा मात्रा खा लेने पर भी कोई नुकसान नहीं होता। दवा खूब चली। एक महीने में केवल जर्मनी में ही डेढ़ करोड़ गोलियाँ बिकने लगीं। देखते-देखते सारे संसार में लगभग 50 विभिन्न नाम और लेबलों से यह दवा बिकने लगी।

दवा का प्रभाव यह हुआ कि सेवन करने वाली महिलाओं को विकलाँग सन्तानें पैदा होने लगी। इन बालकों में से अधिकाँश ‘फोकी भेलिया’ रोग के शिकार थे। इस रोग में हाथ या पैर बुरी तरह मुड़े जुड़े जन्म से ही पैदा होते थे। यह कुप्रभाव उस दवा में रहने वाले ग्लेटेनिक ऐसिड के कारण होता है। इसके व्यापक परिणाम जब बड़े पैमाने पर सामने आये तो जाँच पड़ताल की गई और इंग्लैण्ड तथा कनाडा में उसकी बिक्री को तुरन्त बन्द कर दिया गया। अमेरिकी प्रशासन को पहले से ही इस दवा के बारे में शक हो गया था सो उसने ‘केवाडोन’ नाम से इस दवा का लाइसेन्स प्राप्त करने वाली कम्पनी की अर्जी रोके रखी और खतरनाक प्रमाण सामने आने पर उस अर्जी को रद्द कर दिया। जर्मनी के अतिरिक्त आस्ट्रेलिया, स्काटलैण्ड, स्वीडन, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, लेबनान, इसराइल, रूस आदि अनेक देशों में इस दवा के कारण जो उत्पात खड़ा हुआ उससे औषधि जगत में एक तहलका ही मच गया।

अमेरिका में ‘डाइएथिलीन ग्लाइकोज’ नामक दवा ने 100 से भी अधिक आदमी मार डाले तब सरकार ने ‘फेडरल फूड ड्रग एण्ड कॉस्मेटिक एक्ट बनाया और इस तरह के नुस्खों पर रोक लगाई गई। फ्राँस में ‘डाइ आयडोएथिल’ नामक दवा के सेवन से - एकत्रित सबूतों के अनुसार 12 आदमी मरे तब उसे भी रोका गया। अमेरिका में केन्सर की दवा ‘कैविओ जेन’ को जब हानिकारक पाया गया तब उसका लाइसेन्स रद्द किया गया।

पिछली बार फ्लू का जब व्यापक फैलाव हुआ तब उसके लिए एक नये निरोधक टीके का आविष्कार हुआ और उसका तेजी से निर्माण भी हुआ और प्रयोग भी। इसकी प्रतिक्रिया जाँचने के लिए जो कोई बैठा उसके विशेषज्ञों की एक मीटिंग सेन्फ्रांसिस्को में हुई। बोर्ड के अधिकारी डॉक्टर रानज ने कहा कि ‘फ्लू’ से जितने लोग मरेंगे उससे ज्यादा इस टीके के कारण मर जायेंगे। संस्था के अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा-इस टीके का अन्धाधुन्ध प्रयोग एक प्रकार से उन्मादियों जैसी करतूत है। इसी की पुष्टि में ‘जनरल ऑफ अमेरिकन मेडीकल ऐसोसिएशन’ ने भी डॉक्टरों को चेतावनी दी कि इसके अन्धाधुन्ध प्रयोग से जनता पर हानिकर प्रतिक्रिया की ही अधिक सम्भावना है।’

एस्पिरिन और पेन्सलिन का इन दिनों जो अन्धाधुन्ध व्यवहार किया जा रहा है उसके परिणामों से ब्रिटिश मेडीकल ऐसोसिएशन के सदस्यों ने चिन्ता व्यक्त की है। डॉक्टर हेचिन्स ने तो झल्लाकर यहाँ तक कहा है - नित नये नामों से निकलने वाली इस अवाँछनीय दवाओं को रोकने के लिए क्या कुछ नहीं किया जा सकता।

डॉक्टरी पत्रिका ‘लान्सेट’ में एक समाचार छपा है - किसी किसान ने अपनी गाय को रोग मुक्त रखने के लिए पेन्सलीन के इन्जेक्शन दो वर्ष देते रहने के फलस्वरूप उसका दूध पीने वालों को चर्म रोग हो गये।

‘ब्रिटिश मेडीकल जनरल’ में एक अनुभवी वैज्ञानिक का अनुभव छपा है कि टेट्रासाइक्लीन वर्ग को एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से एक बार कुछ रोगियों की जीभ पर बाल उग आये। उनने लिखा है इस प्रकार के और भी कुछ उपद्रव इन दवाओं से खड़े हो सकते हैं।

फिलाडेल्फिया के डॉक्टर राबर्ट वाइज इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि सल्फाड्रग और एण्टी बायोटिक दवाओं से केवल साधारण श्रेणी के कीटाणु नष्ट होते हैं। उनके प्रयोग से स्टेफिलीकोक्स जाति के खतरनाक कीटाणु उत्तेजित होकर और अधिक बलवान बन जाते हैं और पहले से भी अधिक हानि पहुँचाते हैं।

पोलियो का इंजेक्शन बनाने के लिए टोरोन्टो (कनाडा) यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में लगभग 18 हजार बन्दरों का प्रयोग किया गया। उनके मूत्र पिण्डों से डॉ. साल्फ द्वारा अनेक रासायनिक क्रियाओं द्वारा जो आविष्कार किया जाना था उसका विज्ञापन तो बहुत हुआ पर काम की चीज कुछ हाथ न लगी। इससे पहले डॉ. लेण्डस्टीनर और पोपर भी रक्त जल - सीरम द्वारा ऐसे ही प्रयोग कर चुके थे। इसके बाद घोड़े चिंपैंजी और मुर्गी के बच्चे पर प्रयोग करके ऐसी चेष्टा की गई कि पोलियो का कोई कारगर इंजेक्शन निकल आवे। फल तो कुछ न निकला, बेचारे निरीह जीवों की निरीह हत्याओं से मनुष्यता कलंकित जरूर होती रही।

डॉक्टर मेलविल कीथ की पुस्तक ‘नरक जाने का सीधा रास्ता’ पुस्तक में प्रमाणों सहित इस सम्भावना का प्रतिपादन किया है कि पीढ़ी दर पीढ़ी हम अधिक अविकसित, पंगु, अन्धी-गूँगी, बहरी, नपुँसक और विकृत मस्तिष्क सन्तानें पैदा करते चले जायेंगे। सौ वर्ष बाद हमारे वंशजों की आकृति, प्रकृति और शारीरिक, मानसिक स्थिति कितनी भयावह होगी आज हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। क्योंकि आज हम जो खाते, पीते हैं तथा जिस वायु में साँस लेते हैं वह क्रमशः अधिकाधिक विषाक्त होती चली जा रही है।

बाजार में बिकने वाले अन्न, फल, शक, दूध, चीनी आदि पदार्थों को कीटाणु रहित बनाने के लिए उन पर भी दवायें छिड़की जाती हैं। इस विषाक्त छिड़काव की मात्रा थोड़ी होने पर भी धीरे-धीरे वे मनुष्य शरीर में अनेक विकृतियां उत्पन्न करती हैं और इन्हें बिना छिड़के जो हानि हो सकती थी उससे भी अधिक हानिकर परिणाम उत्पन्न करती हैं।

न्यूज क्रानिकल के सम्पादकीय स्तम्भों में इस बात की विस्तृत चर्चा की गई है कि खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के उन्माद में उन्हें विषाक्त बनाने का जो उपक्रम चल रहा है उसे रोका जाय। जर्मनी (म्यूनिख) की फेडरल फूड लेबोरेटरी के अध्यक्ष प्रो. वाल्टर ससी तथा अन्य डाक्टरों का कथन है कि इस रासायनिक सम्मिश्रण का परिणाम ऐसी अद्भुत बीमारियाँ उत्पन्न होने के रूप में सामने आ सकता है जिनका निदान और कारण समझ सकना ही असम्भव हो जाय। माँस वृद्धि के लिए पशुओं के शरीर में जो इन्जेक्शन लगाये जाते हैं उस


Quotation

अपनी बुद्धि से मानसिक क्लेशों को और वनस्पति निर्मित दवाओं से शारीरिक दुःखों को दूर करो। मनुष्य के विज्ञान की यही सामर्थ्य है। इस राह को छोड़कर बालकों के से काम मत करो।

माँस का प्रभाव नपुँसकता सरीखी नई समस्याओं के रूप में सामने आता है। ऐसी अनेक घटनाओं के समाचार कनाडा के ‘वाटर नर किचनर’ तथा इंग्लैण्ड के ‘रायटर’ तथा ‘डेली एक्सप्रेस’ में विस्तार सहित छप चुके हैं।

यह थोड़े से विवरण उन अगणित चिन्ताजनक निष्कर्षों में से कुछ हैं जो आये दिन वर्तमान औषधि विद्या के फलस्वरूप बड़ी मात्रा में उपस्थित हो रहे हैं। आधुनिक औषधि विद्या के अनन्य भक्तों को इन दुष्परिणामों को भी ध्यान में रखना चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो इन दवाओं से बचते हुए प्राकृतिक जीवनचर्या अपनाकर ही अपने को रोगमुक्त एवं स्वस्थ रखने का प्रयत्न करना चाहिए।


एक हाथ में माला-एक हाथ में भाला के मंत्र दाता

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म उन दिनों हुआ जिन दिनों विदेशी आक्रमणकारी यहाँ शासक बन कर बैठ गये थे। और भयंकर शोषण तथा उत्पीड़न से प्रजा को बेतरह पीस रहे थे।

अवसाद की कुछ ऐसी घड़ियाँ थी वे संगठित विरोध किधर से भी बन नहीं पड़ रहा था। कितने राजा सामन्त इन शोषकों के साथ मिलकर अपना स्वार्थ साध रहे थे। असंगठित विरोध कब तक ठहरता। सन्त महात्मा अपनी ढपली अलग ही बजा रहे थे। उन्हें भक्ति और कीर्तनों की पड़ी थी। चेले मूँड़ने और मतमतान्तर चलाने की भी घात ऐसे में ही लग सकती थी। हारी हुई व्यथित हृदय जनता ने ‘हारे को हरिनाम’ सँभाला। धार्मिक नेता ऐसी ही सान्त्वना सहानुभूति से लोगों के मन बहला रहे थे।

ऐसे विषम काल में गुरु गोविन्द सिंह का अवतरण हुआ। सिख धर्म भक्ति-भावना प्रधान धर्म है, पर उसे गुरुजी ने एक नई दिशा दी। अन्याय का प्रतिरोध भी उन्होंने भगवत् भक्ति का आधार बताया और आततायी के विरुद्ध हिंसा अपनाने में भी उन्होंने अहिंसा सिद्ध की। अपने अनुयायियों को-शिष्यों को उन्होंने मात्र नाम जप ही नहीं सिखाया वरन् एक हाथ में माला एक हाथ में भाला देकर उन्हें कर्म क्षेत्र में उतारा और अध्यात्म को प्रखर-शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। ‘एक हाथ में माला-एक हाथ में भाला देकर उन्होंने बड़ी संख्या में धर्म-प्रेमियों को धर्म-युद्ध के मोर्चे पर ला खड़ा किया। युद्ध कला से अपरिचित इस सेना को देख कर जब लोग सन्देह करते तब वे सैन्य कला की नहीं प्रचण्ड भावना की महत्ता का बल समझाते और गर्व के साथ कहते -

“चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ।

तभी गोविन्दसिंह नाम कहाऊँ॥”

खालसा सेना में युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले तथा सेवा पंथी दो प्रकार के लोग थे। कोमल हृदय वालों को उन्होंने सेवा कार्य सौंपे और साहसी लोगों के हाथ में तलवार थमाई। आपका धर्मयुद्ध किसी धर्म सम्प्रदाय के विरुद्ध नहीं वरन् अत्याचार, बलात्कार के विरुद्ध था। यही कारण था कि कितने ही विचारशील मुसलमान भी उनके साथ युद्धों में सम्मिलित रहते थे।

आनन्दपुर, मुक्तसर, चमकौर, सिरसा तट आदि की महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ उनने लड़ी। चालीस हजार बादशाही सेना से डेढ़ दो हजार शिष्यों से ही उन्होंने बहादुरी की लड़ाई लड़ी। उनके दो नवयुवक पुत्र जुझार सिंह और अमरसिंह उसी लड़ाई में काम आये। उनके दो छोटे बच्चे जोरावर सिंह और फतेसिंह आततायियों ने दीवार में चिनवाकर नृशंसतापूर्वक मरवा डाले।

इस निरन्तर संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपने उपासना क्रम और धर्म साहित्य के सृजन का काम जारी रखा। उनकी रचनाओं का संग्रह ‘विद्या सागर’ नाम से विख्यात है। इन्हीं दिनों उन्होंने कितने ही धर्म स्थानों की भी स्थापना की।

औरंगजेब जब दक्षिण में फँसा हुआ मौत की घड़ियाँ गिन रहा था तो उसके जी में उन महापुरुष से मिलने और पश्चाताप प्रकट करने की इच्छा उपजी। उसने गुरुजी को पत्र लिखा और मिलने की प्रार्थना की। वे तुरन्त मिलने के लिए चल दिये। किन्तु रास्ते में ही उन्हें औरंगजेब के मरने और उसके बेटों में सिंहासन के लिए युद्ध ठन जाने का समाचार मिला। इस युद्ध में उन्होंने बहादुरशाह का समर्थन किया और उसे विजयी बनाया।

उनके एक मुसलमान शिष्य ने एक दिन सोते हुए पर छुरे से हमला किया। घाव गहरे थे सो कुछ समय पश्चात् उसी के कारण उनका स्वर्गवास हो गया।

मात्र 42 वर्ष की आयु उन्हें मिली। पर इतने थोड़े समय में ही उन्होंने वह पुरुषार्थ कर दिखाया जिसे महामानवों के इतिहास में सदा स्मरण किया जाता रहेगा।


श्रेष्ठता अपनाएं-प्रशंसा के योग्य बनें

मनुष्य को अपना मूल्य स्वयं मालूम नहीं होता, इसलिए वह दूसरों से अपनी बाबत पूछता रहता है। औरों की राय जानना चाहता है। और जब वे निन्दा करने लगते हैं तब बुरा प्रतीत होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि उसकी अपने बारे में अपनी कुछ राय नहीं है और है तो उसकी कुछ कीमत नहीं है। दूसरे लोगों ने जिन्हें कि उसके बारे में बाहरी, अधूरी और सुनी सुनाई बातों के आधार पर जो राय कायम की है वह उतनी सही या महत्वपूर्ण नहीं हो सकती कि उसे वजनदार माना जाय और किसी ने जो कुछ जल्दबाजी में कह दिया उसी को सही मानकर प्रसन्न हुआ जाय या अप्रसन्नता व्यक्त की जाय।

हमें अपने बारे में अपनी राय आप करनी चाहिए और उसी को सही तथा वजनदार मानना चाहिए। यदि हम अच्छे हैं नीयत के साफ हैं, और सही राह पर चल रहे हैं तो फिर कोई कारण नहीं कि किसी अजनबी या दूरवर्ती की - ना समझी से की हुई निन्दा का दुख माना जाय। इसी प्रकार यदि हम बुरे हैं, बुरे विचारों से ग्रसित हैं, ईमान गँवा चुके हैं और गलत रास्ते पर चल रहे हैं तो उन चापलूस या गुमराह लोगों की क्या कीमत हो सकती है जो इतने पर भी प्रशंसा करते हैं। ऐसे प्रशंसकों की कीमत धूलि की बराबर भी नहीं समझी जानी चाहिए जिन्होंने या तो किसी बहकावे में आकर हमारी असलियत को पहचान नहीं पाया या फिर कोई मतलब गाँठने के लिए स्याह को सफेद कहने की धूर्तता कर रहे हैं। ऐसे लोगों की प्रशंसा की भी क्या कीमत जो बिना सचाई को तलाश किये ऐसे ही चाहे जो मानने लगते हैं या चाहे जो कहने लगते हैं।

बात का वजन उसकी का होता है जो स्वयं वजनदार हो। सौ मूर्खों की प्रशंसा की अपेक्षा समझदार की निंदा अच्छी, जिसने बात को गहराई तक समझा और तब अपनी राय कायम की। इसी प्रकार सौ मूर्खों की निन्दा की परवा न करके उस एक समझदार आदमी की प्रशंसा को महत्व देना चाहिए जो वास्तविकता का पता लगाता है और विचार व्यक्त करने से पहले इंसाफ और सचाई को ध्यान में रखकर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। ऐसे आदमी दुनिया में कम हैं, जिनमें वास्तविकता समझने की तीक्ष्ण बुद्धि हो। ऐसे लोग भी कितने हैं जो जैसा समझते हैं वैसा ही कहने का साहस कर सकें? होता यह है कि विरोध मोल न लेने की कायरता या भय से कड़ुई सच्चाई को कहने से डरते हैं और बुरे को बुरा कहने को तैयार नहीं होते, जबकि असफल व्यक्ति का मजाक कोई भी उड़ा सकता है और उसे बेवकूफ बना सकता है। भले ही वह असफलता उसकी गलती से नहीं, परिस्थितियों की पेचीदगी से तथा लोगों की दगाबाजी से उपस्थित हुई है। झूठे को झूठ कहने वाले कम हैं। अपना उल्लू सीधा होता दीखे तो लोगों को सच के लिए झूठ और झूठ के लिए सच कहने में देर नहीं लगती। जब ऐसे कमजोर लोगों से दुनिया भरी पड़ी हो तब किसी की राय की कीमत ही क्या हो सकती है।

हमें दूसरों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनने के लिए उत्सुक नहीं रहना चाहिए और न किसी के द्वारा व्यक्त की गई निन्दा से दुःख मानना चाहिए। अपने बारे में अपनी राय कायम करना ठीक है। क्योंकि उसी से वास्तविकता होती है। अपने बारे में जितना हम स्वयं जानते हैं उतना और कौन जान सकता है? किसी के मन की बात किसी दूसरे को क्या पता है? किये हुए भले-बुरे कामों में से हर एक की किसे जानकारी होती है। कोई किसी की पूरी बातें जानने के लिए समय कहाँ से लाये? और क्यों किसी को अपना कच्चा चिट्ठा बताने के लिए सिर खपाये? फिर भला काम किस छिपी हुई बुराई की पूर्ति के लिए किया गया? या दीखने में बुरी लगने वाली बात किस अच्छे उद्देश्य के लिए करनी पड़ी, इसका अंदाज बाहर वाले ठीक तरह लगा ही नहीं सकते। जिनकी परिस्थिति ही सही बात जानने की नहीं है। उनकी राय को महत्व देना बेकार है।

हमें यह मानकर चलना चाहिए कि दुनिया ऐसी ही आधी-अधूरी जानकारी के सहारे अपनी राय बनाया करती है। फिर जैसा जान लिया गया है उतना ही कहने का साहस किसमें है? इन तथ्यों को समझते हुए बाहरी लोगों से निन्दा-स्तुति सुनने की अपनी इच्छा को बचकानापन मानकर उसकी ओर मुँह मोड़ ही लेना चाहिए कि आखिर हम स्वयं क्या हैं? और अपनी आंखें अपने को किस नजर से देखती है। आत्मा की अदालत में इन्साफ की तराजू पर तोले जायें तो हमारा पलड़ा बुराई की ओर झुकता है या भलाई की ओर। यदि हम अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं तो गुमराह लोग जो भी चाहे कहते रहें हमें इसकी जरा भी परवाह न करनी चाहिए। किन्तु यदि अपनी आत्मा के सामने हम खोटे सिद्ध होते हैं, तो सारी दुनिया के प्रशंसा करते रहने पर भी सन्तोष नहीं करना चाहिए।

हम अपने को जानने की कोशिश करें और सुधारने की भी। आमतौर से लोग दूसरों की कमियाँ और बुराइयाँ आसानी से ढूँढ़ निकालते हैं, छोटी को बड़ी बताकर कहने में मजा लेते हैं। पर अपनी जाँच करने के लिए कोई बिरला ही तैयार होता है। सबसे बड़ी हिम्मत का काम यह है कि हम अपनी बुराइयों और कमजोरियों को ढूंढ़ें और उन्हें स्वीकार करें। अपना मन आमतौर से अपने साथ पक्षपात किया करता है, अपनी गलती-तो-गलती ही नहीं लगती। पक्षपाती मन सदा अपने को निर्दोष बताता रहता है और जो गलतियाँ हम करते हैं उनका कारण दूसरे को बताने और उनका कसूर किसी दूसरे पर थोप देने की तरकीबें लड़ाता रहता है। ऐसे पक्षपाती मन के रहते कोई अपनी बुराइयाँ समझ ही कहाँ पावेगा? और जो बात समझी ही नहीं गई उसे सुधारा कैसे जायगा?

प्रशंसा का सबसे बड़ा कदम यह है कि आदमी अपनी समीक्षा करना सीखे, अपनी गलतियों को समझे-स्वीकार करें और इससे अगला कदम यह उठाये कि अपने को सुधारने के लिए अपनी आदतों से लड़ा जायगा और उन्हें हटाकर रहा जायगा। जिसने इतनी हिम्मत इकट्ठी कर ली, जो धीरे-धीरे सुधारे के रास्तों पर ही चलेगा वह एक दिन इतना नेक बन जायगा कि अपने आप अपनी भरपूर प्रशंसा की जा सके। यह प्रशंसा ही सच्ची प्रशंसा कही जा सकेगी और उसे सुनकर ही अन्तःकरण में शान्ति तथा सन्तोष का अनुभव किया जा सकेगा। फिर भले ही इस प्रशंसा करने के लिए बाहर का एक आदमी भी आगे न आये पर अनुभव यही होगा कि सारा संसार अपनी प्रशंसा कर रहा है।

दूसरों की आँखों में धूल डालकर अपने बुरे होते हुए भी अच्छाई की छाप डाल देना, चतुरता का चिन्ह माना जाता है और आजकल लोग करते भी ऐसा ही हैं। झूठी और नकली बातें अफवाहों के रूप में इस तरह फैला देते हैं कि लोग धोखा खा जाते हैं और बुरे को भी अच्छा कहने लगते हैं। ऐसे बहके हुए लोगों को बहकी बातों को सुनकर थोड़ी देर का बाहरी मनोरंजन भले ही कर लिया जाय पर उससे शान्ति कभी भी नहीं हो सकती। आत्मा तो असलियत जानना ही है और वह धिक्कारता ही रहेगा। कि फरेब और जालसाजी से इस तरह की तारीफ लूटी जा रही है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है।

लोगों के हाथों हमें अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुःखी हो चले? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निन्दा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनायें सच्ची प्रशंसा पाने का सही तरीका एक ही है कि अपने को दिन-दिन सुधारते चले जायँ और भावना तथा क्रिया की दृष्टि से उस स्तर पर जा पहुँचें जिस पर पहुँचने से आत्म-सन्तोष होता है और आन्तरिक उल्लास प्रस्फुटित होता है। अपनी दृष्टि में अपना प्रशंसित होना सारे संसार के मुँह में गाई जाने वाली प्रशंसा की अपेक्षा कहीं बेहतर है।


सभ्यता और फैशन के नाम पर विषाक्त भोजन

अमेरिका में अधिकतर खाद्य पदार्थ पैक बन्द डिब्बों या एयर टाइट बोतलों में मिलते हैं। अधिक देर तक खराब न होने और धूलि आदि का प्रभाव न पड़ने तथा लाने ले जाने में सुविधा की दृष्टि से ऐसा किया जाता है। सुन्दर और सुसज्जित कलेवर का भोजन शायद आँखों को अच्छा लगने से मन को भी भाता हो, जो हो, अमेरिका में अधिकाँश खाद्य पदार्थ सुन्दर पैकिंग किये हुए बन्द कलेवरों में ही मिलते हैं।

इन पदार्थों में बहुत से मिठाई मिश्रित भी होते हैं। शक्कर का वजन घटाने और मिठास बढ़ाने की दृष्टि से वहाँ चीनी का सत समझे जाने वाले सैक्रीन जैसे पदार्थ मिलाये जाने का रिवाज है। कैमिस्टों की भाषा में उन्हें ‘साइक्लेमेट्स’ कहते है। आम लोग भले ही उसे चीनी का सत समझें वस्तुतः वह एक विषैला पदार्थ होता है जो थोड़ा-थोड़ा पेट में पहुँचते रहने पर भी अन्ततः स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करने का कारण बनता है। अमरीकी सरकार ने खोज-बीन के बाद ऐसे 172 प्रकार के खाद्य पदार्थों पर कानूनी बन्दिश लगाई है जिनमें यह नकली मिठास-साइक्लेमेट्स मिले रहते थे। इन प्रतिबन्धित पदार्थों में दो करोड़ पौण्ड मीठा विष मिलाया जाता है। इसे 15 करोड़ व्यक्ति खाते थे और इन्हें बनाने वाली कम्पनियाँ साबडडडडड अरब डालर का मुनाफा कमाती थी। इतनी बड़ी कमाई के कारण वे उस नकली मिठास का गुणगान खूब करती थी। असली शक्कर से भी इसे अच्छा बताती थी और विज्ञापनबाजी का ऐसा जाल फैलाती थी, जिससे आम जनता इसे ही वरदान समझे और इसके मुकाबले असली शक्कर का छूना भी अपनी बेइज्जती समझे। इतना मुनाफा जिन्हें होता हो, वे यदि जनता को भ्रम-जंजाल में फँसाने के लिए विज्ञापनबाजी द्वारा मिल को पहाड़ बना दे तो इसमें आश्चर्य ही क्या?

यह कानूनी बन्दिश की पकड़ में आया हुआ नकली मिठास - साइक्लेमेट्स आखिर है क्या? यह जानना मजेदार है। आरम्भ में कारखाने के गरमी उत्पन्न करने वाले बायलरों में उनके जल्दी खराब न होने की सुरक्षा के लिए इस रसायन को पोतने के काम में लाया जाता था। सन् 1937 में शिकागो विश्वविद्यालय के एक छात्र ने संयोगवश इसे चख लिया। उससे पूर्व यह गन्दा और विषैला पदार्थ चखने की किसी की भी इच्छा भी नहीं हुई थी। छात्र की जीभ से यह पदार्थ जरा सा छुआ था कि उसकी तेज मिठास दिन भर मुँह में बनी रही। इसके बाद लोग इस पर टूट पड़े और पिछले बीस वर्षों से अमेरिका ही नहीं अन्य देशों में भी इसका भरपूर प्रयोग होता रहा।

इसके सेवन से उत्पन्न होने वाली शिकायतों की ओर डॉक्टरों का ध्यान गया तो इसकी जाँच-पड़ताल आरम्भ हुई। ‘साइन्स न्यूज’ पत्रिका में एक शोध पूर्ण लेख में सिद्ध किया कि इस मीठे जहर से पेट का सत्यानाश होता है और रक्त इतना विषैला हो जाता है कि उस पर तेज ‘एंटीबायोटिक’ दवाओं तक का कोई असर नहीं होता। कृषि विभाग की शोध रिपोर्ट में छपा है कि इसकी एक प्रतिशत शरीर में उपस्थित होने से केन्सर होने की आशंका उत्पन्न हो जाती है। चूहे, मुर्गी, खरगोश आदि छोटे जीवों पर लगातार प्रयोग करने के बाद जो निष्कर्ष निकले उन्हें देखते हुए स्वास्थ्य विज्ञानियों ने इसे ‘अखाद्य’ घोषित करने की प्रबल माँग की। फलस्वरूप कानून बना और प्रतिबन्ध लगाया गया। अब ‘साइक्लेमेट्स’ को रासायनिक शब्द कोश में विषैला पदार्थ छापा जाने लगा है। इससे पूर्व वह साधारण खाद्य पदार्थ था।

मीठा जहर तो दुर्भाग्यवश पकड़ और चपेट में आ गया। ऐसे-ऐसे ढेरों पदार्थ अभी और इसी स्तर की हानि पहुँचा रहे हैं जिन्हें सभ्यता के नाम पर - सुन्दर संगठित मजेदार बनाने के नाम पर धड़ल्ले के साथ प्रयोग किया जा रहा है। डबल रोटी, बिस्कुट, केक आदि का प्रचलन दिन-दिन बढ़ रहा है। चौके, चूल्हे के झंझट से बचने के लिए लोग सुन्दर पैकिंगों में मिलने वाले इन्हीं पदार्थों से दैनिक भूख बुझाने के लिए निर्भर होते जा रहे हैं। इनमें खमीर पैदा करने के लिए सोडा बाई कार्ब सरीखे रासायनिक तत्व मिलाये जाते हैं। इनमें अण्डा, मक्खन, दूध के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले सस्ते रासायनिक पदार्थ भी खूब प्रयोग हो रहे हैं। एक डबल रोटी बनाने वाली अमेरिकन कम्पनी के निर्माण की जाँच करने पर पता चला कि वह पौष्टिक खाद्य डालने की अपेक्षा सस्ते ‘एमल्सीफायर’ मिलाती है, जिससे देखने, खाने में तो वह निर्माण भी भला लगता है पर गुणों में बिल्कुल भिन्नता रहती है। अमेरिका के ‘हाउस से प्रोप्रियेशन कमेटी’ की रिपोर्ट है कि खाद्य पदार्थों में इन दिनों लगभग 5 रासायनिक तत्व मिलाये जाते हैं। इनमें से अधिकाँश ऐसे होते है जिनकी प्रतिक्रिया को ठीक तरह जाँचा नहीं गया है। इन प्रामाणिक रसायनों का खाद्य पदार्थों में जैसा बेहिसाब सम्मिश्रण हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि यह मिलावट सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनकर रहेगी और मानव-जीवन के लिए खतरा उत्पन्न करेगी।

‘बच्चों के लिए पौष्टिक खुराक’ के नाम पर विज्ञापित पदार्थों में आमतौर से ‘मोनो सोडियम ग्लोटायेट’ मिलाया जाता रहा है। और उसे आरम्भ से ही हानिरहित समझा जाता रहा है। अब परीक्षणों ने प्रमाणित किया है कि यह मानसिक सन्तुलन बिगाड़ने वाला भयावह पदार्थ है। परीक्षण किये गये कितने ही जानवर उससे पागल हो गये। अब इस सम्मिश्रण का उत्पादन करने वाली कम्पनियों को उपरोक्त निर्माण बन्द करना पड़ा है।

पेय पदार्थों में मिलाया जाने वाला नारंगी रंग का सत रसायन इसी प्रकार हानिकारक ठहराया और बन्द किया गया जबकि पहले उसे आकर्षक, सुगन्धित, पौष्टिक, मजेदार आदि न जाने क्या-क्या कहा जाता था।

नारवे के डॉक्टर एलैप्सटीन ने बीमार भेड़ों की जिगर खराबी जानते हुए पता लगाया कि उनमें ‘नाईट्रेट्स की मात्रा बढ़ जाने से यह बीमारी फैली। इस खोज से यह भी पता चला कि सामान्य भोजन में रहने वाले साइक्लोहैना इलामीन तत्व जब ‘नाइट्रेट्स’ में मिल जाते हैं तो ‘नाइट्रोसेमीन’ नाम का एक नया तत्व पैदा करते हैं जो मानव शरीर में घातक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं और केन्सर तक की सम्भावना बन जाती है। इन दिनों खाद्य पदार्थों के डिब्बों और बोतलों को सुरक्षित रखने के लिए प्रचुर मात्रा में नाइट्रेट्स प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग चुपके-चुपके क्या अनिष्ट पैदा कर रहा होगा इसे समय ही बतायेगा।

अन्न को सुरक्षित रखने - उसे कीड़ों से बचाने के लिए खेतों तथा गोदामों में वेंजोन, निकिल, डी.डी.टी., हाइक्सीकिनीलोन कार्बोक्सी-मिथाइल, आरसोनेट, स्टिलवेस्ट्रील आदि रसायन प्रयुक्त होते हैं। यह कीड़ों को ही नहीं मारते, भोजन के साथ पेट में पहुँच कर मनुष्य को भी मारते हैं। चूँकि मनुष्य कीड़ों से बड़ा है इसलिए उसकी मौत भी धीरे-धीरे होती है अन्तर सिर्फ इतना ही है।

‘छिपे बधिक’ नामक पुस्तक में बूथमुनी ने सभ्यता के नाम पर प्रयुक्त होने वाले इन रसायनों का खतरा संसार के सामने प्रस्तुत किया है और लिखा है कि यदि समय रहते चेता न गया, नवीनता की चमक-दमक के पीछे अन्धी होकर दौड़ने वाली दुनिया को अपने हाथों विषपान करके मरने वाली मूर्खता अपनाने का दण्ड भुगतना पड़ेगा।

गरीब देशों के पिछड़े हुए लोगों का गन्दगी पसन्द, अवैज्ञानिक और खाद्य पदार्थों में जीवन तत्वों की तालिका न जानने जैसी नासमझियों के कारण उपहासास्पद समझा जाता था। उनको मूर्खता के लिए तिरस्कृत किया जाता था पर इन सभ्यताभिमानियों को क्या कहा जाय तो दूसरी किस्म का अन्ध विश्वास अपनाकर उन पिछड़े हुए लोगों से भी कहीं अधिक आत्म-घात करने पर तुले हुए हैं।

विटामिनों और मिनिरल की - पुष्टाई की दवायें और खुराकों की-जहाँ आँधी तूफान जैसी बाढ़ आ रही हो वहाँ भी यदि स्वास्थ्य संकट खड़ा रहे तो समझना चाहिए कि कोई बड़ी और भयंकर भूल हो रही है। सुविधाओं और जानकारियों की दृष्टि से संसार का अग्रणी माना जाने वाले अमेरिका में यदि हर साल पाँच लाख व्यक्ति केन्सर जैसे भयानक रोग से तड़प-तड़प कर मरें तो समझना चाहिए कि भूल छोटी नहीं बड़ी ही है।

सभ्यता की चकाचौंध फैशन, ठाट-बाठ तक रहे तो सह्य है पर जब उसकी पहुँच खाद्य पदार्थों तक जा पहुँचे तब तो ईश्वर ही रक्षक है। धीरे-धीरे भूल को पहचानने की दिशा में लोगों का दिमाग लौटा है और देखभाल आरम्भ की है तो पता चलता जाता है कि रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग जिस गति से खाद्य पदार्थों में होने लगा है उससे हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए संकट भरी विभीषिका ही उत्पन्न होती और बढ़ती चली जा रही है। सरकारें सतर्क भी होने लगी हैं। प्रतिबन्धों की बात सोची जा रही है। कई योरोपीय देशों ने डिब्बों में बन्द फलों को निषिद्ध ठहराया है।

राष्ट्रपति जॉनसन ने एक बार जनता को चेतावनी देते हुए कहा था-’खाद्य पदार्थों को सुन्दर और सुगन्धित बनाने का फैशन जनता के पेट में ऐसी चीजें पहुँचा रहा है जो खाई जाने योग्य है और जिनके कारण स्वास्थ्य संकट बढ़ेगा। अच्छा यह है कि स्वाभाविक और सादगी की ओर मुड़ें और भोजन की कृत्रिमता से परहेज करें।’

भूत-प्रेतों का अन्ध-विश्वास अब पुराना हो चला - उसमें समझदार लोग नहीं फँसते पर अब नये किस्म के अन्ध विश्वास ऐसे चल पड़े हैं जो तथाकथित सुशिक्षित और सभ्य लोगों पर आसानी से सवार होते हैं। विज्ञान के नाम पर जो भी बात कही जाती है उसे आँख बन्द करके अपनाने लगना - अन्धविश्वास ही कहा जा सकता है। दवा-दारु, टॉनिक, पौष्टिक आहार के नाम पर लोग ऐसी चीजें खाते चले जा रहे हैं जो स्वास्थ्य सम्वर्धन में रत्तीभर भी सहायता नहीं करती - वरन् जादू जैसी क्षणिक चमक दिखाकर शरीरों को एक प्रकार से ऐसा अशक्त बना देती हैं जो पीछे बिना दवाओं के सहारे खड़ा ही न रह सके। दुर्बलों को सबलता मिलने का आश्वासन देकर निकम्मी कौड़ी मोल की चीजों के बदले अशर्फियाँ वसूल की जाती हैं। झाड़-फूँक करने वाले भूत-प्रेतों के बहाने भोले लोगों को ठगा करते थे। अब दवायें, टानिक और पौष्टिक आहार बनाने वाली कम्पनियाँ न केवल रद्दी चीजें बेचकर लोगों को मूँड़ती हैं वरन् ऐसी चीजें भी उनमें मिला देती हैं जो सुन्दरता, स्वाद, सुगन्ध तो पैदा करती हैं पर साथ ही अपने विषैलेपन से सार्वजनिक स्वास्थ्य को हानि भी कम नहीं पहुँचाती।

प्रकृति की ओर वापिस लौटना ही श्रेयस्कर है। सरल और स्वाभाविक भोजन सस्ता होते हुए भी कृत्रिम और कीमती, भड़कीले खाद्यों से कहीं अधिक उत्तम है। आहार-विहार के संयम से आरोग्य की जितनी सुरक्षा हो सकती है उतनी हजारों रुपये की दवाओं से भी सम्भव नहीं। यह तथ्य जितनी जल्दी हम स्वीकार कर सकें उतना ही उत्तम है।


तुम्हारी जड़ें ही खोखली हो गई थी

आँधी का तेज झोंका आया और वृक्ष को जड़ से उखाड़ कर नीचे गिरा दिया। वृक्ष को धरती पर बड़ा गुस्सा आया। बड़बड़ाते हुए बोला ‘आज जो मेरी दुर्गति हुई है उसके लिए तू ही उत्तरदायी है। तूने मेरी खुराक बन्द कर दी। मैं भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर सूख गया और तूने मेरे साथ यह निर्दयता दिखाई। अब भूमि पर पड़ा देखकर तेरा कलेजा ठण्डा हो गया होगा।’

वृक्ष की यह जली-कटी बातें सुनकर धरती बड़ी दुःखी हुई। वह बोली ‘भला माँ अपने बच्चे की दुर्गति देखकर कभी खुश हो सकती है। मैं तो तुम सभी के लिए अपने अन्तर में जल तथा अन्य पौष्टिक तत्वों को समेट-समेट कर रखती हूँ। जिस प्रकार तुम फलों का उपयोग अपने लिये न कर दूसरों को बाँटते रहते हो, वैसे ही एकत्रित खुराक को मैं भी तुम सबके लिये ही रखती हूँ और सबकी आवश्यकतानुसार देती रहती हूँ। तुम्हारी जड़ें ही खोखली हो गई थी इसके लिए मैं क्या करती।’


रासायनिक खाद बनाम भूमि की बरबादी

कृषि-भूमि का स्वाभाविक आहार पत्तियों का खरपतवार का सड़ा हुआ स्वरूप है। जो वनस्पतियाँ जमीन में से पैदा होती हैं वे ही सूखने पर उसी भूमि का पुनः आहार बन जाती हैं जो पशु भूमि पर घास चरते हैं वे ही अपने गोबर से उसकी खुराक पुनः वापिस कर देते हैं। इस प्रकार भूमि के उर्वर बने रहने की प्रक्रिया सहज ही चलती रहती है। यदि उसमें मनुष्य कुछ अड़चन पैदा न करे तो उसकी उत्पादक शक्ति अनन्त काल तक अक्षुण्य बनी रह सकती है।

खरपतवार की - सनई, रिजका आदि की ऐसी हरी फसलें उगाई और जोतकर जमीन में मिलाई जा सकती हैं जो जमीन की उर्वरा शक्ति की रक्षा करती रह सकें। पशु-धन नष्ट न किया जाय और उसके गोबर को उपले आदि बनाकर नष्ट करने की अपेक्षा यदि खाद्य के रूप में ही उसे पुनः वापिस कर दिया जाय तो यह प्रश्न उत्पन्न ही न होगा कि जमीन कमजोर हो गई और उसकी पैदावार घट गई।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिस प्रकार आहार-विहार को सुसंयत रखकर स्वास्थ्य रक्षा के सीधे उपाय को छोड़कर लोगों की समझ में यह आ गया है कि अप्राकृतिक और उच्छृंखल जीवन-क्रम बनाकर मनमानी की जाय और उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिये दवाओं की शरण ली जाय। उसी प्रकार भूमि के बारे में भी यही नीति अपनाई गई है। उसे खरपतवार और गोबर की खाद से वंचित किया जा रहा है। पशु धन घटता चला जा रहा है और उसके गोबर का दूसरा उपयोग हो रहा है। जो घास-पात खेत से ली जाती है वह प्रकारान्तर से उसे वापिस नहीं मिलती। ऐसी दशा में जमीन यदि कम उपज देने लगे तो यह स्वाभाविक ही है।

इस कमी की पूर्ति के लिये आज ही सभ्यताभिमानी उद्धत बुद्धि कोई जल्दी पहुँचने वाली पगडंडी ढूँढ़ती है। दवाओं के आधार पर स्वास्थ्य संरक्षण एवं रोग निवारण की जो सनक कार्यान्वित हो रही है वही तरीका भूमि के लिए भी अपनाया जा रहा है। रासायनिक खादों से भूमि को उत्तेजित करके उससे अधिक कमाई करने की रीति-नीति अपनाई जा रही है। सोचा जा रहा है इस तरह अधिक पैदावार का लाभ उठाया जा सकेगा। पर यह आशा अन्ततः दुराशा मात्र ही सिद्ध होगी। तथाकथित स्वास्थ्य बढ़ाने वाली दवाओं की भरमार से बाजार भरा पड़ा है। लोग उन्हें खरीदते और खाते भी बहुत हैं पर देखा जाता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य दिन-दिन गिरता ही जाता है और औषधि खाद्य खाने वाले अपेक्षाकृत और भी अधिक दुर्बल होते चले जाते हैं। रोगों के निवारण करने के लिए जितनी तीक्ष्ण, तीव्र, उत्तेजक और विघातक औषधियाँ बनी हैं उसी अनुपात से रोग वृद्धि का सिलसिला भी अग्रगामी ही होता चला जा रहा है। यही प्रयोग अब जमीन के शरीर पर भी किया जा रहा है। आशायें बहुत दिलाई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि रासायनिक खाद हमारी भूमि को अधिक उत्पादन दिला सकने में समर्थ होंगे। आरम्भ में ऐसा होता भी है। नशा पीकर बलवान बने फिरने वाले शराबी की तरह कुछ दिनों तक यह प्रयोग लाभदायक दीखता है, पर अन्ततः जिस प्रकार नशा उतरने पर शराबी पहले से भी अधिक अशक्त हो जाता है। वही हाल इस अन्धाधुन्ध रासायनिक खादों के प्रयोग का भी होने वाला है। हो भी रहा है।

जो प्रयोग हम आज करने चले हैं, उसे अमेरिका में बहुत पहले आजमाया जा चुका है। “जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक लाभ उठाने की नीति अपनाकर उन्होंने रासायनिक खादों का अन्धाधुन्ध उपयोग किया कुछ समय तक उसके लाभ भी मिले पर अन्त में उस भूमि का अधिकाँश भाग अपनी उर्वरा शक्ति खोकर बेकार हो गया।

अमेरिका के कृषि विभाग की भूमि संरक्षक संस्था ने ‘हमारी बची हुई भूमि’ नामक एक पुस्तक छापकर उसमें रासायनिक खादों के द्वारा भूमि पर पड़ने वाले कुप्रभावों का विस्तृत वर्णन किया था। उसमें बहुत भयंकर आँकड़े थे। लगता है रासायनिक खादों के उत्पादनकर्ताओं के दबाव या अन्य किसी कारण से उस पुस्तक के दुबारा छपने का अवसर नहीं आया।

उपरोक्त पुस्तक के तथ्यों की भयंकरता को घटाते हुए उस पुस्तक का एक सरल संस्करण ‘हमारी उपजाऊ भूमि’ के नाम से छपाया। यह पुस्तक एग्रीकल्चर इन्फॉर्मेशन बुलेटिन संख्या 16 के क्रम में प्रकाशित है और 1 सेन्ट मूल्य से गवर्नमेंट प्रिटिंग ऑफिस 25 डी.सी. से खरीद कर पढ़ी जा सकती है।

इस पुस्तक में लिखित उद्धरणों से विदित होता है कि रासायनिक खादों के प्रभाव से अमेरिका की 28 करोड़ एकड़ जमीन बर्बाद हो गई। जो कि उस देश के इलीनाय, आइयोवा, मिसूरी, कन्सास, नेव्रास्का और वायोमिंग राज्यों की कुल जमीन के बराबर होती है। इसके अतिरिक्त कृषि योग्य, चरागाह तथा जंगली 77 करोड़ 5 लाख एकड़ भूमि और ऐसी है जिसका बहुत कुछ अंश बर्बाद हो चुका है।’ पुस्तिका में वर्णन है कि केवल 46 करोड़ एकड़ उपयोगी जमीन अमेरिका के पास बची है। पेट भरने के लिए तो इतनी भी काफी है पर यदि इसे सँभालकर नहीं रखा गया और पिछली गलतियाँ दुहराई जाती रहीं तो हर साल आगे भी 5 लाख एकड़ जमीन बर्बाद होती चली जायगी।

कुछ समय पूर्व राथम स्टेट ऐग्रीकल्चरल एक्स- पैरिमेन्टल स्टेशन के डायरेक्टर खादों की उपयोगिता का समर्थन करते हुए अपने भाषण में बहुत सी प्रशंसात्मक बातें कही थी। लोगों ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा अमेरिका की जो 28 करोड़ एकड़ जमीन इन रासायनिक खादों ने बर्बाद की है उसमें से कुछ एकड़ जमीन लेकर आप प्रयोग करें कि बर्बाद जमीन को क्या अब आपके कथानुसार ठीक किया जा सकता है। वे इस चुनौती का कुछ सन्तोषजनक उत्तर न दे सके। और उनका प्रतिपादन लड़खड़ाता सा ही रह गया।

लियानार्ड विकेण्डन ने अपने अखबार ‘कनेक्टी 28 लेटर नेचर फ्रूड एण्ड फर्मिंग‘ में जान स्टीरक की पुस्तक ‘दी वेब आफ लाइफ’ का एक उद्धरण छापा है। उसमें बताया गया है कि दक्षिण ऐरिजोना के सरकारी कृषि फार्म में पहले जहाँ घनी ऊँची घास उगा करती थी, जितनी जमीन में 20 गायें घास चरकर पेट भर लेती थीं उतनी में एक गाय का पेट भरना भी मुश्किल है। अब उस जमीन में बेहिसाब पोटाश, फास्फोरस, केलि, मैग्नीशियम आदि पदार्थ भरे पड़े हैं। अब वह उपजाऊ इलाका एक प्रकार से रेगिस्तान है। जिसमें अखाद्य, सूखी, जली-भुनी सी निकम्मी घास ही जहाँ-तहाँ दिखाई देती है।

भूमि में भरा हुआ कार्बन एवं भू-तत्वों के साथ पलने वाले नन्हे-नन्हे जीवाणु हमारी फसल और पौधों को विकसित करने में महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। रासायनिक खाद एक प्रकार से भूमि को नशीली उत्तेजना देकर कुछ समय के लिए उसमें से अधिक उत्पादन तो जरूर करा लेते हैं पर साथ ही इससे धरती के स्वाभाविक कार्बन तथा उत्पादक जीवाणुओं को हानि भी पहुँचती है फलस्वरूप जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट होती जाती है और फिर अन्ततः जमीन निकम्मी हो जाती है। रोज एक सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर सारे अण्डे एक साथ निकालने वाले लालची की तरह हम अधिक उत्पादन के आवेश में भूमि का मूल सत्व तत्व भी गँवा बैठें तो यह कहाँ की बुद्धिमानी होगी?

रासायनिक खादों के नाम पर भूमि को विषाक्त और अनुत्पादक बनाने के साथ-साथ फसलों के छोटे रोग कीटाणुओं को नष्ट करने तथा दीमक, चूहे एवं पक्षियों से उसे बचाने के लिए विषैली दवाओं के घोल छिड़कने का प्रयोग चल रहा है। उसका परिणाम भी ऐसा ही निराशाजनक हो रहा है। जितना लाभ फसल को बर्बादी से बचाने के नाम पर उठाया जा रहा है उससे अधिक हानि उस अन्न से मनुष्यों और चारे से पालतू पशुओं के स्वास्थ्य की बर्बादी के द्वारा उत्पन्न की जा रही है। जितना लाभ उससे अनेक गुनी हानि करने वाली बुद्धिमता की किस तरह प्रशंसा की जाय।

फसल पर फुहारे की तरह पानी छिड़क कर सिंचाई करने का तरीका फसलों को जीवाणुओं से बचाने के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इसी प्रकार अन्य हानि रहित तरीके भी फसल की रक्षा तथा उसकी वृद्धि के लिए सोचे जा सकते हैं। वर्तमान विष सिंचन से तो थोड़ी पैदावार कम रहने का घाटा भी बुरा नहीं है।

फसलों पर कीटाणुनाशक घोलों के छिड़के जाने से कीटाणुओं तथा पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों से होने वाली हानि को बचाने की बात सोची जाती है और यह अनुमान किया जाता है कि उससे फसल की बर्बादी बचेगी। इस प्रयोजन के लिए ऐसे विषाक्त कीटाणु नाशक रसायनों का उत्पादन भी तेजी से किया जा रहा है। डी.डी.टी. तथा दूसरे रसायनों की वृद्धि तेजी से हो भी रही है। पारायियन सरीखे विष इसी प्रयोजन के लिए उत्पन्न किये जा रहे हैं। इसमें से कुछ औषधियाँ तो ‘नर्व गैस’ सरीखी युद्ध में काम आने वाली भयंकर गैसों जैसी घातक होती हैं। पर हम यह भूल जाते हैं कि फसल, अन्न, फल आदि खाद्य पदार्थों पर छिड़के हुए यह विष उन खाद्यों में ही समाविष्ट हो जाते हैं और अन्ततः मनुष्य के पेट में ही जा पहुँचते हैं। यह विषैलापन मात्रा में कितना ही न्यून क्यों न हो आखिर कुछ तो असर डालता है और थोड़ा-थोड़ा करके भी वह इतना अधिक हो जाता है कि उससे सामान्य स्वास्थ्य पर असर पड़ना नितान्त स्वाभाविक है।

अमेरिकन कृषि विभाग के अंतर्गत ‘ऐन्टोमोलोजी रिसर्च’ शाखा ने इन कीटाणु नाशक विषों की प्रतिक्रिया की जाँच कराई तो मालूम हुआ कि दस साल के लगातार इस विष सिंचन से 6 इंच गहराई तक की भूमि में डी.डी.टी., वी.एच.सी. और लिन्डेन तथा आलोरीन के अंश खतरनाक मात्रा में मिले हुए थे। इलीनाय, जर्जिया, न्यूजर्सी राज्यों की जमीनें भी ऐसी ही विषाक्त पाई गई विचारशील लोग यह अनुमान लगा रहे हैं कि भूमि में बढ़ाई हुई विषाक्तता ही बनाकर रहेगी और उसके परिणाम उसे भुगतने पड़ेंगे।

डॉक्टर डब्ल्यू कोडा मार्टिन ने गहरे अनुसंधान के बाद यह अनुरोध किया है कि - ‘जनता के स्वास्थ्य की जिम्मेदार सरकार को कृषि में प्रयुक्त हो रहे इस विषाक्त प्रयोग पर रोक लगानी चाहिए।’

अमेरिकन पब्लिक स्वास्थ्य सेवा संस्थान ने बाजार में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की जाँच की और पाया कि उनमें फसल पर छिड़के जाने वाले विषों का एक अंश विद्यमान है। यों अमुक मात्रा तक इस विष का बहुत बुरा प्रभाव नहीं पड़ता, यह माना गया है पर मात्रा बढ़ नहीं रही है, अथवा कोमल शरीर वाले शिशुओं पर भी उसका कुछ बुरा असर न पड़ेगा यह नहीं कहा जा सकता। भोजन और विष संस्थान के एक उच्च अधिकारी डॉक्टर ए.जे. लोमन ने तो ‘क्लारडेन’ नामक विष को खाद्यों में उपस्थित देखकर उसे अखाद्य घोषित किये जाने की सिफारिश की है।

खाद्य पदार्थों पर आमतौर से छिड़के जाने वाले विष घोल ‘डी.डी.टी. के सम्बन्ध में गहरी खोज करके डॉक्टर मार्टिन ने पाया है कि उसके प्रयोग में केन्सर तक की सम्भावनायें विद्यमान हैं। अमेरिका में प्रति 15 मिनट बाद एक विकलांग बच्चा जन्म लेता है, कहा जाता है कि गर्भवती माताओं द्वारा बाजारू खाद्यों के उपयोग से गर्भस्थ बालकों पर जो प्रभाव पड़ता है उसी से यह विकलांग


Quotation

अमीरी प्राप्त करने के लिए भी त्याग और परिश्रम की आवश्यकता होती है। परन्तु वह त्याग और परिश्रम व्यक्तिगत लाभ, प्रतिष्ठा और स्वार्थ के हेतु किए जाते हैं, इसलिये वे समाज-विघातक सिद्ध होते हैं।

-दादा धर्माधिकारी

शिशुओं की जन्म संख्या बढ़ रही है। इस प्रकार की शाक-भाजियाँ बेस्वाद मालूम पड़ती है और उबालने पर उनका पानी काले रंग का हो जाता है। इंग्लैण्ड के ‘डेली एक्सप्रेस’ पत्र में इसी की पुष्टि के विवरण से समाचार छपे हैं। जर्मनी के एक खेत में अधिक डी.डी.टी. का प्रयोग हो जाने के कारण उस खेत में चरने वाले 12 जानवर, हजारों पक्षी और ढेरों मधु मक्खियों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

उचित यही है कि हम जोश के साथ होश को भी कायम रखें और अधिक उत्पादन के लालच में इतने अधिक व्यग्र न हो जायें कि उत्पादन का मूल आधार ही हाथ से निकल जाय।


भारतीय संस्कृति ही विश्व संस्कृति है।

भारतीय संस्कृति एक ऐसी विश्व-संस्कृति है जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की क्षमता से ओत-प्रोत है। वह उच्चस्तरीय विचारणा जिससे व्यक्ति अपने आप में सन्तोष और उल्लास भरी अन्तः स्थिति पाकर सुख और शान्ति से भरा-पूरा जीवन जी सके भारतीय तत्व ज्ञान में कूट-कूट कर भरी है। वह आदर्शवादी क्रिया-पद्धति जो सामूहिक जीवन में आत्मीयता, उदारता, सेवा, स्नेह-भावना, सहिष्णुता और सहकारिता का वातावरण उत्पन्न करती है -भारतीय संस्कृति के शिक्षण की मूलधारा है। इस महान तत्व ज्ञान का अवगाहन भारतीय प्रजा चिरकाल तक करती रही और उसके फलितार्थ इस रूप में सामने आये कि यहाँ के नागरिकों को समस्त संसार में देव पुरुष कहा गया और जिस भूमि में ऐसे महामानव उत्पन्न होते हैं उसे स्वर्ग के नाम से संबोधित किया गया।

यहाँ के तैंतीस कोटि नागरिकों को विश्व में तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से पुकारा जाता था और जब भी भारत भूमि का स्मरण किया जाता था उसे ‘स्वर्गादपि गरियसी’ ही कहा जाता था। यहाँ के निवासी प्रेम, सदाचरण, सुव्यवस्था और समृद्धि का सन्देश और मार्गदर्शन लेकर विश्व के कोने-कोने में पहुँचे तथा शान्ति और प्रगति के साधन जुटाने का नेतृत्व करते रहे। इतिहासकार इस तथ्य को भुला न सकेंगे कि भारत ने न केवल अपने देश को समुन्नत बनाया वरन् समस्त विश्व को शान्ति और प्रगति के लिए सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया। इस देश के नागरिकों की यह उच्च भूमिका इसीलिए संभव हो सकी कि उन्होंने महान भारतीय संस्कृति को हृदयंगम किया था। उसका महत्व समझा था, और स्वीकार किया था कि यही दार्शनिक पथ प्रदर्शन मानव-जीवन के लिए श्रेष्ठतम है। इस आस्था को क्रियान्वित करने की सुदृढ़ निष्ठा ही हमारी ऐतिहासिक महिमा तथा गरिमा का एकमात्र कारण है।

भारतीय संस्कृति किसी वर्ग, सम्प्रदाय या देश, जाति की संकीर्ण परिधियों में बँधी हुई साम्प्रदायिक मान्यता नहीं है। न किसी व्यक्ति विशेष या शास्त्र विशेष को आधार मानकर उसकी रचना की गई है। सार्वभौम्य मानवीय आदर्शों के अनुरूप उसका सृजन हुआ है और देशकाल पात्र के अवरोध से उसमें हेर-फेर करना पड़े ऐसी त्रुटि नहीं रखी गई है। उसे निःसंकोच सार्वभौम, सर्वकालीन और शाश्वत कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में भारतीय संस्कृति को हम विश्व मानव के सदैव प्रयोग में आ सकने योग्य चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्यपद्धति भी कह सकते है। इस स्वरूप के कारण ही उसे भूतकाल में समस्त संसार ने देखा, सराहा और स्वीकार किया था। भविष्य में भी जब इस अनैतिक भगदड़ से दुखी होकर मानव जाति को किसी असन्तुलित दर्शन की आवश्यकता पड़ेगी तो उस आवश्यकता की पूर्ति केवल भारतीय संस्कृति ही कर सकेगी।

‘संस्कृति का अर्थ है वह कृति-कार्य पद्धति जो संस्कार सम्पन्न हो, ऊबड़-खाबड़ पेड़-पौधों को जिस प्रकार काट-छाँट कर उन्हें सुरम्य और सुशोभित बनाया जाता है, वही कार्य-व्यक्ति की उच्छृंखल मनोवृत्तियों पर नियन्त्रण स्थापित करके संस्कृति द्वारा सम्पन्न किया जाता है। किसान जैसे भूमि को खाद, पानी, जुताई आदि से उर्वर बनाता है और बीज बोने से लेकर फसल तैयार होने तक उन पौधों को सींचने, सँभालने, निराने, रखाने की अनेक प्रक्रियाएं सम्पन्न करता है, वहीं कार्य संस्कृति द्वारा मानवीय मनोभूमि को उर्वर एवं फलित बनाने के लिए किया जाता है। अंग्रेजी में संस्कृति के लिए ‘कलचर’ शब्द आता है। उसका शब्दार्थ भी उसी ध्वनि को प्रकट करता है। अस्त-व्यस्तता के निराकरण और व्यवस्था के निर्माण के लिए-जो प्रयत्न किये जायें, उन्हें कलचर कहा जा सकता है। संस्कृति का भी यही प्रयोजन है।

‘संस्कृति’ के साथ ‘भारतीय’ शब्द जोड़ कर उसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह मात्र भारतीयों के लिए ही उपयोगी है। अन्वेषण का श्रेय देने के लिए कई बार नामकरण उसके कर्ताओं को दे दिया जाता है। कई ग्रह नक्षत्रों की अभी-अभी नई शोध हुई है। उनके नाम उन शोधकर्ताओं के नाम पर रख दिये गये हैं। पहाड़ों की जिन ऊँची चोटियों पर जो यात्री पहले पहुँचे इनके नाम भी उन साहसियों के नाम पर रख दिये गये। धर्म सम्प्रदायों के संबंध में ही ऐसा ही होता रहा है। उनके आचार्यों संस्थापकों का नाम स्मरण बना रहे इसलिए उनके नाम से भी वे सम्प्रदाय पुकारे जाते हैं। इसका अर्थ उन पदार्थों या मान्यताओं को उन्हीं की सम्पत्ति मान लेना नहीं है जिनका कि नाम जोड़ दिया गया है। हिन्दुस्तान में ‘वर्जीनिया’ तम्बाकू पैदा होती है। उसका आरम्भिक उत्पादन ‘वर्जीनिया’ में हुआ था इस लिए नामकरण उसी आधार पर हो गया। यह प्रतिबन्ध लगाने की बात कोई सोच भी नहीं सकता कि उस तम्बाकू का उपयोग या उत्पादन मात्र वर्जीनिया के लिए ही सीमित रखा जाय। भारतीय संस्कृति का उद्भव, विकास, प्रयोग, पोषण एवं विस्तार भारत से हुआ इसलिये उसे उस नाम से पुकारा जाता है तो यह उचित ही है पर इसका अर्थ यह नहीं माना जाना चाहिए कि उसका प्रयोग इसी देश में निवासियों तक सीमित था अथवा रहना चाहिए।

यजुर्वेद 4/14 में एक पद आता है-”सा प्रथमा संस्कृति विश्व धारा” अर्थात् यह प्रथम संस्कृति है जो विश्व व्यापी है। सृष्टि के आरम्भ से सम्भव है ऐसी छुटपुट संस्कृतियों का भी उदय हुआ हो जो वर्ग विशेष काल विशेष या क्षेत्र विशेष के लिये ही उपयोगी रही हों। उन सब को पीछे छोड़कर यह भारतीय संस्कृति ही प्रथम बार इस रूप में प्रस्तुत हुई कि उसे ‘विश्व संस्कृति’ कहा जा सके। हुआ भी यही-जब उसका स्वरूप सर्वसाधारण को विदित हुआ तो उसकी सर्वश्रेष्ठता को सर्वत्र स्वीकार ही किया जाता रहा और सर्वोच्च भी। फलस्वरूप वह विश्वव्यापी होती चली गई। इसी स्थिति का उपरोक्त मन्त्र भाग में संकेत है। इतिहास न भी माने तो भी तथ्य के रूप में स्वीकार करना ही होगा कि विश्व संस्कृति माने जाने योग्य समस्त विशेषताएं इस भारतीय संस्कृति में समग्र रूप से विद्यमान हैं।

‘विश्ववारा’ शब्द का अर्थ होता है- ‘विश्ववंकृणो-तीति-विश्व वारा’ अर्थात् जो समस्त संसार द्वारा वरण की जा सके-स्वीकार की जा सके वह ‘विश्व बारा’ दूसरे शब्दों में इसे ‘सार्वभौम’ भी कह सकते हैं। संस्कृति के लिए दूसरा शब्द ब्राह्मण ग्रन्थों में ‘सोम’ आता है। सोम क्या है? अमृतम् वै सोमः (शतपथ) अर्थात् अमृत ही सोम है। अमृत क्या है-ज्ञान और तप से उत्पन्न हुआ आनन्द। इस प्रकार भारतीय संस्कृति का तात्पर्य उस श्रद्धा से है जो ज्ञान और तप की, विवेक युक्त सत्प्रयत्नों की-और हमारी भावना और क्रियाशीलता को अग्रसर करती है। इस संस्कृति को जब, जहाँ जितनी मात्रा में अपनाया गया है वहाँ उतना ही भौतिक समृद्धि और आत्मिक विभूति का अनुभव आस्वादन किया गया है।

आवश्यकता इस बात की थी कि राजनैतिक गुलामी से मुक्त होकर हम साँस्कृतिक दासता से भी मुक्त होने का प्रयत्न करते पर इस दिशा में कुछ किया ही नहीं जा सका इसे अपना दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। विदेशी आक्रमण के दिनों में यह स्वाभाविक था कि शासक लोग अपने पराधीनता पाश को चिरस्थायी बनाये रहने के लिए राजनैतिक साम, दाम, दण्ड, भेद से अधिक प्रयत्न भावनात्मक दासता स्वीकार करने के लिए करते। ऐसा हुआ भी है। अपने तत्व-दर्शन को भ्रष्ट, विकृत और अनुपयोगी बनाने के लिए मुसलमानी समय में पण्डितों और साधुओं द्वारा अनेक प्रकार की ऐसी भ्रान्तियाँ जोड़ी गई जो व्यक्ति को दिशा भ्रम ही करा सकती थी। सोचा यह गया होगा कि अनाचार के विरुद्ध संगठित विद्रोह न उठ खड़ा हो-इसलिए भाग्यवाद, सन्तोष की महत्ता, ईश्वर इच्छा, पलायन वाद, मायावाद, कर्म संन्यास जैसे तथ्यों में मिला कर जनमानस को मूर्छित और कायर बना दिया जाय। इसी प्रकार अंग्रेजी शासन काल में भारतीयों को काले अंग्रेज बनाने के लिए अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी संस्कृति को भी घुला दिया गया। ताकि भारतीय संस्कृति की महानता कहीं इन देशवासियों में फिर स्फुरणा पैदा न कर दे। और चंगुल में आई शिकार फिर पंजे से छूट कर न भाग जाय। लार्ड मेकाले का वह शिक्षा षड़यन्त्र सर्वविदित है जिसके अनुसार उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार करने में यही दृष्टि प्रधान रखी थी कि भारतीय प्रकारान्तर से अंग्रेजियत का वर्चस्व शिरोधार्य कर लें और अंग्रेजी शासन चले जाने पर भी यहाँ के निवासी अपने आदर्शों का उद्गम अंग्रेजी सभ्यता को ही मान कर उसके समर्थक तथा अनुयायी बने रहें। समय बीत गया अब हमें चेतना चाहिए था, पर उस जागृति की ओर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा जो समस्त जागृतियों का मूलभूत स्त्रोत है।

भारतीय संस्कृति की अपनी अनोखी विशेषताएं है। सच तो यह है कि ‘संस्कृति’ शब्द के साथ जुड़ी हुई विशेषताओं को पूरा कर सकने में-समस्त कसौटियों पर कसे जाने पर, खरी सिद्ध होने में एक भारतीय संस्कृति ही समर्थ है। अन्य संस्कृतियाँ तो मात्र ‘सभ्यता’ है। सभ्यता किसी देश, काल एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विनिर्मित की जाती हैं, और उसकी सीमा उतने ही दायरे में सीमित रहती है। हर परिस्थिति और देश काल के लिए समान रूप से उसका उपयोग नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें सैद्धान्तिक कम और व्यावहारिक तथ्य अधिक होते हैं। व्यवहार तो ऋतुओं के परिवर्तन के साथ ही बदल जाता है, आयु का हेर-फेर भी व्यवहार बदलने को विवश कर देता है। ऐसी दशा में व्यवहार व्यवस्थाओं की प्रधानता के आधार पर बनी हुई ‘सभ्यताएं’ सार्वदेशिक अथवा सर्वकालीन हो ही कैसे सकती हैं। अंग्रेजी सभ्यता भारत के लिए उपयुक्त बैठ सकती है इसमें पूरा सन्देह है।

भारतीय संस्कृति महान ही नहीं वरन् वह बेजोड़ भी है। उसके आचरण व्यवहारों के विशुद्ध रूप को देखें - मध्यकालीन विकृतियों की घुसपैठ को उसमें से हटा दें तो निस्सन्देह वह व्यवहार व्यवस्था भी उतनी उच्च कोटि की सिद्ध होगी कि वैयक्तिक व्यवहार और सामाजिक संगठन की परिष्कृत शैली सामने आ जाय। और हम उन जंजालों से बच जायें जो व्यष्टि और समष्टि को उद्विग्न-उन्मत्त बनाकर विनाश की ओर धकेलती चली जा रही है। संस्कृति की उत्कृष्टता का तो कहना ही क्या-उसे मानवीय ही नहीं दैवी संस्कृति कह सकते हैं। नर-पशु को नर-नारायण के रूप में विकसित कर सकने की सारी संभावनाएं इस दार्शनिक ढाँचे के अंतर्गत विद्यमान हैं जिन्हें किसी समय भारतीय संस्कृति के नाम से पुकारा जाता था - और अब यदि वह शब्द किसी को अरुचि कर हो तो उसका नाम ‘विश्व-संस्कृति’ भी दिया जा सकता है।

धर्म, अध्यात्म, ईश्वर, जीव, प्रकृति, परलोक पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक, कर्म, अकर्म, प्रारब्ध, पुरुषार्थ, नीति, सदाचरण, प्रथा, परम्परा, शास्त्र, दर्शन आदि मान्यताओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति मनुष्य को चरित्रवान संयमी कर्तव्य परायण, सज्जन, विवेकवान्, उदार और न्यायशील बनने की प्रेरणा करती है। सबमें अपनी आत्मा समाया देखकर सब के साथ अपनी पसन्दगी जैसा सौम्य सज्जनता भरा व्यवहार करना सिखाती है और बताती है कि भौतिक सफलताएं तथा उपलब्धियाँ न मिलने पर भी विचार एवं कर्म की उत्कृष्टता के साथ जुड़ी हुई दिव्य अनुभूति मात्र का अवलम्बन करके अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी आनन्दित रहा जा सकता है। अधिकार की अपेक्षा कर्तव्य की प्राथमिकता - आलस्य और अवसाद का अन्त और प्रचण्ड पुरुषार्थ में निष्ठा - अपने लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा, यही तो भारतीय संस्कृति के मूल आधार हैं जिन्हें शास्त्र और पुराणों के विभिन्न कथोपकथनों द्वारा अनेक पृष्ठ-भूमियों में प्रतिपादित किया गया है। यह मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनाने की एक नेतृत्व विज्ञान, मनोविज्ञान, नीति शास्त्र और समाज विज्ञान की एक परिष्कृत एवं समन्वित चिन्तन प्रक्रिया है जिसे भारतीय संस्कृति के नाम से जाना पहचाना जाता है।

व्यक्ति और समाज की विश्वव्यापी समस्याओं का समाधान करने के लिए उस संस्कृति का आश्रय लिए बिना और कोई मार्ग नहीं, जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता रहा है और दूसरे शब्दों में उसे विश्व संस्कृति भी कह सकते हैं।


सनातन सभ्यता का अभ्युदय अत्यन्त सन्निकट

पश्चिमी सभ्यता देखने में अपने चरमोत्कर्ष पर है, पर यह उसकी-वृद्धावस्था है; उसका अन्त बहुत समीप है।

-ओस्वाल्ट स्पेंगुलर

एक नई सभ्यता उदय होने जा रही है जो चिरकाल तक धरती के लोगों को देश, धर्म, वर्ण, सम्प्रदाय से ऊपर एक आत्मा के मानवीय सिद्धान्तों पर आबद्ध रखेगी।

-प्रो0 कीरी

मुझे विश्वास है भारतवर्ष एक बार फिर सारे विश्व को ज्ञान का प्रकाश देगा।

-रीम्या रोलाँ

शीघ्र ही युद्ध होगा और युद्ध के बाद सत्य, धर्म, नीति, सदाचार पर आधारित नई सभ्यता का सारे विश्व में प्रसार होगा।

-पादरी वाल्टर वेन

(मिस्र के एक शिलालेख के आधार पर)

जब जीवन दायिनी गैसें दूषित हो जायेगी तब प्राकृतिक प्रकोप उग्रतम रूप धारण करेंगे। उसके बाद संसार को सुखी बनाने और वायुमण्डल को शुद्ध करने वाली सभ्यता का विस्तार और विकास होगा।

-जी0 वेजीलेटिन

सुप्रसिद्ध जर्मनी दार्शनिक “ओस्वाल्ट स्पेंगुलर” की पुस्तक “पश्चिमी सभ्यता का अन्त” (दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट) ने पश्चिमी देशों में एक बार तहलका मचा दिया। उसके यह शब्द-”पश्चिमी सभ्यता अब बुढ़ापे के दौर से गुजर रही है। उसने संसार में कूटनीति और युद्ध का जो रंगमंच तैयार कर दिया है वह वास्तव में विनाश नदी की ऐसी कगार है जो अब और एक भी बाढ़ बर्दास्त नहीं कर पायेगी। तृतीय युद्ध अवश्य होगा और उसके बाद ही पश्चिमी सभ्यता का सदा के लिये अन्त हो जायेगा” अभी भी पश्चिमी कूटनीतिज्ञों के लिये सिर दर्द बने हुये हैं। स्पेंगुलर ने उपरोक्त पुस्तक में अपने कथन के समर्थन में जो तर्क प्रस्तुत किये हैं वह अकाट्य है ऐसा पश्चिम का हर विचारक मानता है।

स्पेंगुलर ने जो तर्क प्रस्तुत किये हैं वे जीवाश्मों की विस्तृत गवेषणा पर आधारित हैं दूसरी ओर सन्त रोम्याँ रोलाँ की भविष्यवाणी - “मुझे विश्वास है भारतवर्ष एक बार फिर सारे विश्व को ज्ञान का प्रकाश देगा-पश्चिमी सभ्यता के अन्त के साथ पूर्वी सभ्यता का उदय भी निश्चित है-निर्मल आत्मा की पूर्वानुभूती पर आधारित थी। किन्तु इन्हीं दिनों एक और भविष्यवक्ता ने इसी तरह की भविष्यवाणी की जिसने लोगों को सबसे अधिक प्रभावित किया क्योंकि उसकी भविष्यवाणियाँ ठोस ज्योतिष-गणित पर आधारित थी। यह भविष्यवाणी इंग्लैण्ड के प्रो0 कीरो की है जिसे पश्चिम में ज्योतिष का जादूगर कहा जाता है।

प्रोफेसर कीरो ने भविष्यवाणी की थी-”यूरोप की ईसाई जातियाँ एक बार फिर से यहूदियों को पैलेस्टाइन में बसायेगी जिसके कारण अरब राष्ट्र और उनके इस्लामी मित्र भड़क उठेंगे। वे बार-बार इंग्लैण्ड, अमेरिका के विरुद्ध उत्तेजक नारे बुलन्द करेंगे, यहूदियों से उनकी टक्कर भी होगी इस सबके बावजूद यहूदियों की शक्ति बढ़ेगी। कम संख्या में होते हुए भी ईश्वरीय चमत्कार के सहारे यहूदी अरबों को पीटेंगे और उनका बहुत सा प्रदेश अपने कब्जे में कर लेंगे। 1970 के बाद कभी भी एक बार बहुत भी भयानक टक्कर होगी जिसमें अरब राष्ट्र बुरी तरह तहस-नहस होंगे। यह विनाश पूर्ण होने के बाद एक नई सनातन सभ्यता का अभ्युदय और सारे विश्व में प्रसार होगा। यह सब सन् 2000 के पूर्व ही होगा।

यह भविष्यवाणी हुई तब इजरायल कल्पना में भी नहीं आया था किन्तु कुछ ही दिनों में दुनिया भर में यहूदी फिर से पैलेस्टाइन में आये सचमुच ईसाइयों ने उन्हें मदद दी और इस तरह एक छोटा सा किन्तु बाघ और बाज की तरह इजरायल एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उठ खड़ा हुआ और एक ही धमाके में उसने जहाँ जोर्डन की कमर तोड़ दी, वहाँ मिश्र का पूरा सिनाई प्रान्त ही हड़प लिया। प्रो0 कीरो ने कहा था-अरबों की नील (नदी) यहूदियों का आदाब बजायेगी” सो भी सच हुआ और अब उस भविष्यवाणी के उत्तरार्ध की प्रतीक्षा की जा रही है। अरबों की खस्ता हालत देखकर यह स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है कि यदि इस बार युद्ध हुआ तो इजरायल अरबों को सचमुच ही कहीं बिल्कुल ठिकाने न लगा दे।

प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड ज्योति का जनवरी अंक उठा कर देखें। पेज नं. 23 में लिखा है-”इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फसाद से भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फसाद से भारत तबाह हो जायेगा यहाँ तक कि हिन्दू बौद्ध और मुसलमानों में बराबर-बराबर विभक्त हो जायेगा” जिन दिनों यह भविष्यवाणी छपी थी वह दिन वरतानी दमन चक्र के दिन थे। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भारत स्वतन्त्र होगा पर प्रो. कीरी का कथन था-”भारतवर्ष का सूर्य ग्रह बलवान है और कुम्भ राशि पर है उसका अभ्युदय संसार की कोई ताकत नहीं रोक सकती” सो सच ही होकर रहा। पर दूसरी भविष्यवाणी जिसमें इस देश के बँट जाने की बात थी उस पर तो किसी का कतई विश्वास नहीं था पर सारी दुनिया ने देखा कि भारत के ही बहुत से बौद्ध मतावलम्बी राज्य अलग हो गये पाकिस्तान बना और आज तक सिर-दर्द पैदा कर रहा है।

किन्तु भारतवर्ष के अति उज्ज्वल भविष्य के प्रति श्री कीरो बहुत अधिक आशावान् थे - उनका कथन है कि विशुद्ध धर्मावलम्बी नीति के एक सशक्त व्यक्ति के भारतवर्ष में जन्म लेने का योग है यह व्यक्ति सारे देश को जगाकर रख देगा। उसकी आध्यात्मिक शक्ति दुनिया भर की तमाम भौतिक शक्तियों से समर्थ होगी, बृहस्पति का योग होने के कारण ज्ञान-क्रान्ति की सम्भावना है जिसका असर सारी दुनिया में पड़े बिना रहेगा नहीं।”

प्रो0 कीरो की भविष्यवाणी की तरह ही एक भविष्यवाणी मिश्र की एक बहुत प्राचीन मीनार में अंकित है उसमें 14 वीं सदी में (अब इस्लामिक हिजरी सन् के हिसाब से चौदहवीं सदी प्रारम्भ है) कयामत (भीषण विनाश और संघर्ष) की बात लिखी है-वहाँ यह भी लिखा है कि शीघ्र ही ऐसा युग आ रहा है जिसमें सत्य ही धर्म होगा- न्याय ही कानून होगा, सारी पृथ्वी के लोग एक परिवार की तरह होंगे, कोई किसी से वैर भाव नहीं रखेगा। सब ओर सुख-शान्ति बरसेगी पर इससे पहले भयंकर युद्ध अकाल और प्राकृतिक प्रकोप इतने सघन होंगे कि संसार की आबादी का बड़ा भाग नष्ट हो जायेगा। नये जगत की शुरुआत बहुत थोड़े लोग करेंगे।”


Quotation

बुद्धिमता इसी में है कि हम उस खुदा की बातें कम करें, जिसे हम समझ नहीं सकते, उन इन्सानों की बातें अधिक करें जो हमारे निकटतम हैं तथा जिन्हें हम समझ सकते हैं।

-खलील जिब्रान

स्पेन से छपने वाले - साइन्स वेस्ट मिनिस्टर के 1926 के एक अंक में भी इसी तरह जी0 वेजीलेटिन नामक भविष्यवक्ता का लेख छपा था जिसमें बताया गया था-56 वर्ष बाद वायुमण्डल की जीवनदायी गैसें विषाक्त हो जायेंगी तब प्रकृति का उग्रतम रूप देखने को मिलेगा यह उग्रता सन् 71 से 81 तक क्रमशः बढ़ती चली जायेगी। प्रकृति का इतना भयंकर कोप मनुष्य ने पहले कभी नहीं देखा होगा। उसमें अतिवृष्टि और अनावृष्टि से लेकर उल्कापात तथा ज्वालामुखी के विस्फोट से लेकर चुम्बकीय तूफानों के कारण समुद्री प्रलय तक के भीषण दृश्य दिखाई देंगे। कई स्थानों पर पृथ्वी फट सकती है। समुद्र के कई टापू निकलेंगे। मित्र जैसे लगने वाले अनेक देशों में युद्ध होगा। एक बार तो सारे संसार की स्थिति प्रलय जैसी हो जायेगी-उसके बाद एक नई सभ्यता और संस्कृति का उदय होगा जो पूर्व के देश (भारतवर्ष) की होगी। उससे ही वायुमण्डल शुद्ध होगा, बीमारियाँ दूर होंगी आपसी कलह शान्त होंगे और संसार में फिर से अमन चैन कायम होगा। लोग भाई-भाई की तरह प्रेमपूर्वक रहने लगेंगे।

संसार के अन्य भविष्यदर्शियों की भाँति ही श्री जी0 वेजीलेटिन ने भी यह स्वीकार किया है कि 1930 से सन् 2000 तक का समय ही विश्व के नये उद्धारक का कार्यकाल होगा। शरीर में होते हुये भी उसकी विचार शक्ति इतनी तीक्ष्ण होगी कि दुनिया के तीन चौथाई नास्तिकों को तो वह अपने जीवनकाल में ही बदल देगा। उसके सहायक के रूप में न केवल उसके देशवासी अपितु सारे संसार के लोग शरीर धन, परिवार सब का मोह त्याग कर कूद पड़ेंगे। भीतर ही भीतर दीर्घकाल तक सुलगने वाली उसकी क्रान्ति के सम्मुख संसार के बुद्धिमान से भी बुद्धिमान व्यक्ति हतप्रभ हो जायेंगे।

संसार की तेजी से बदलती हुई परिस्थितियाँ यह बताती हैं। ऊपर के भविष्य वक्ताओं ने महासंग्राम और नई सभ्यता की पुनर्स्थापना का जो समय दिया है वह अब लगभग समीप आ गया है। इन संकेतों को समझा जाना चाहिये और अपना जातीय गौरव स्थापित करने वाली अपनी संस्कृति के स्वागत की तैयारी करनी चाहिये।


सच्ची हज

हज यात्रा पूरी करके एक दिन अब्दुल्ला बिन मबारिक काबा में सोये हुए थे।

सपने में उनने दो फरिश्तों को आपस में बातें करते देखा। एक ने दूसरे से पूछा-इस साल हज के लिए कितने आदमी आये और उनमें से कितनों की दुआ कबूल हुई?

जवाब में दूसरे फरिश्ते ने कहा-यों हज करने को 40 लाख आये थे। पर इनमें से दुआ किसी की कबूल नहीं हुई। एक साथ सिर्फ एक की कबूल हुई है-और वह भी ऐसा है जो यहाँ नहीं आया।

पहले फरिश्ते को बहुत अचम्भा हुआ। उसने पूछा-भला वह कौन खुशनसीब है जो यहाँ आया भी नहीं, पर उसकी हज कबूल हो गई?

दूसरे फरिश्ते ने पहले को बताया-वह है-दमिश्क का मोची-अली बिन मूफिक।

अब्दुल्ला की आंखें खुलीं। सपना उन्हें बेचैन कर रहा था। उस पाक हस्ती को देखा तो जाय, जिस अकेले की ही हज मंजूर हुई।

अब्दुल्ला बिन मुबारिक अगले ही दिन दमिश्क के लिए चल पड़े और वहाँ उन्होंने मोची मूफिक का घर ढूँढ़ निकाला।

पूछा-क्या तुम हज को गये थे?

मूफिक की आँखों में आँसू भर आये और सिर हिलाते हुए कहा-मेरा मुकद्दर ऐसा कहाँ जो हज जा पाता। जिन्दगी भर की मेहनत से 700 दिरम उस यात्रा के लिए जमा किये थे। पर एक दिन मैंने देखा पड़ौस के गरीब लोग पेट की ज्वाला बुझाने के लिए वह चीजें खा रहे हैं जिन्हें खाया नहीं जा सकता उनकी बेबसी ने मेरा दिल हिला दिया और हज के लिए जो रकम जमा की थी सो उन मुफलिसों को बाँट दी।

अब्दुल्ला की समझ में आ गया कि जिस्म से की जाने वाली हज और रहम दिली की कारगुजारी में कितना फर्क होता है।


देश रक्षा के लिये कर्त्तव्यनिष्ठा की आवश्यकता

प्रियदर्शी सम्राट अशोक के विशाल साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र। और गंगा का मनोरम तट, जहाँ सम्राट अपने मन्त्रियों, सेनापतियों तथा पुरोहितों सहित उसके जल के उतार-चढ़ाव को देख रहे थे। गंगा का जल खतरे के चिह्न से ऊपर बढ़ता जा रहा था विकराल वेग को देखकर सम्राट आशंकित थे। हो सकता है थोड़ी ही देर बार विपुल जल राशि किनारों की उपेक्षा कर राजधानी को अपने में समेटने के लिए उतावली हो जाये। सम्राट के चेहरे पर बनती-बिगड़ती रेखाओं को देखकर यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था कि वह विनाश लीला की कल्पना मात्र से ही कितने चिंतित हैं।

बाढ़ के सनसनाते हुए जल को उन्होंने एक बार देखा और दूसरी बार उनकी दृष्टि पास में खड़े महामन्त्री के चेहरे से टकराई। उन्होंने मन्त्री की आँखों में आंखें डालकर अपनी चिन्ता व्यक्त करनी चाही और समस्या का समाधान भी। सम्राट ने बड़े दुःखी स्वर में कहा ‘क्या अपने साम्राज्य में ऐसी कोई पुण्य आत्मा नहीं जो इस भीषण बाढ़ पर काबू पा सके? मेरी अपेक्षा तुम्हारा जनता से अधिक और सीधा संपर्क रहता है। शायद तुम्हारी दृष्टि में ऐसी कोई आकृति हो।’

यह प्रश्न अकेले महामन्त्री से ही नहीं था वरन् साम्राज्य के लाखों नागरिकों के लिए चुनौती भरा कथन था। सम्राट के दाँये-बाँये सहस्रों नगर और गाँव वासियों का जमघट था। सभी इस समस्या से अपने-अपने ढंग से लड़ने के लिये सोच रहे थे, तैयारी कर रहे थे।

तभी भीड़ को चीरते हुए एक महिला आगे बढ़ी सभी की दृष्टि उस ओर जम गयी। उसे देखकर आशा के स्थान पर निराशा ही हाथ लगने वाली थी। कितने ही व्यक्तियों ने उसकी शकल देखकर नाक भी सिकोड़ने शुरू कर दिये। यह सब कुछ स्वाभाविक था आखिर वह बिन्दुमती नामक वैश्या जो थी। एक वैश्या साम्राज्य की समस्या के लिए कुछ हल प्रस्तुत कर सकेगी, ऐसा किसी को विश्वास ही नहीं था।

बिन्दुमती बोल पड़ी ‘मैं हूँ अपना रूप, सौंदर्य और यौवन बेचकर जीविका चलाने वाली एक वेश्या। मेरा पेशा घृणित है इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते पर मैं आज अपने को पाटलिपुत्र की वीराँगना समझती हूँ।’

‘वीराँगना’ शब्द पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने और ध्यान देकर उसकी बात को सुनने का यत्न किया।

भयंकर गर्जना के स्वर में नदी की ओर हाथ उठाते हुए बिन्दुमती ने कहा ‘यदि मेरे पाप कर्मों के बीच पुण्य कर्मों के तनिक भी संस्कार रहे हों, यदि मैं अपने जीवन में सत्यनिष्ठ रही हूँ तो गंगा का यह उफनता हुआ जल शान्त हो जाये।’

अरे उसके मुख से इस ललकार का निकलना था कि जैसे गंगा की भीषण बाढ़ भी उस गर्जना से सहमकर इधर-उधर बगलें झाँकने लगी हो, जैसे वह अपनी भूल पर पश्चाताप करने को आतुर हो उठी हो और कुछ क्षण बाद ही पीछे से आने वाले जल की मात्रा कम होने लगी, उसका उफान शान्त होने लगा।

सम्राट को आश्चर्य हुआ और उसके साथ वहाँ खड़े हजारों नर-नारियों को भी। सबके मन में एक ही प्रश्न उठ रहा था, क्या वैश्या की शक्ति से भी गंगा की बाढ़ का जल थम सकता है? क्या उसके घृणित जीवन में सत्कार्यों के लिये भी कहीं स्थान हो सकता है?

सम्राट ने बिन्दुमती को अपने पास बुलाना उचित न समझा वह अपनी जिज्ञासा का समाधान करने स्वयं उसके पास जा खड़े हुये और अपने अन्तर में उमड़ते हुए कई प्रश्न एक ही साथ उपस्थित कर दिये। ‘भद्रे! तू वैश्या है, तेरा कार्य घृणित है, लोगों को बिगाड़ने वाला है, तू कामान्ध व्यक्तियों को गुमराह करती है, उनकी जेब से पैसे निकाल कर अपने पेट की भूख और ग्राहकों की वासना की भूख तेरे द्वारा शान्त होती है। तू नगण्य सी ओछी औरत तेरे प्रभाव में गंगा की यह बाढ़ कैसे शान्त हो गयी?’

‘राजन! आपकी प्रत्येक बात सत्य है। पर मैं धन, जाति, शिक्षा, कुल और रूप के आधार पर तनिक भी पक्षपात नहीं करती। मैं आने वाले प्रत्येक ब्राह्मण, क्षत्रिय और शुद्र, धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित, छोटे और बड़े में किसी प्रकार का भेद न कर अपना ग्राहक समझ, अतिथि समझ बड़े सम्मान के साथ आवभगत करती हूँ मेरे मन में किसी के प्रति अवज्ञा या उपेक्षा का भाव नहीं आता। प्रत्येक ग्राहक मेरे द्वार से सन्तुष्ट होकर जाये इस बात के लिये मेरा प्रयत्न रहता है। इसे ही आप मेरी सत्यनिष्ठा, धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपालन और ईमानदारी कह सकते हैं। और मेरे इसी आचरण ने गंगा को रुकने के लिये विवश किया है।

सम्राट ने कहा ‘तुम भले ही किसी के लिये वैश्या हो पर आज मेरे लिए देवी के समान हो और तुम्हारा कथन सत्य के बिल्कुल निकट है। मेरी समझ में निष्ठा के साथ अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति धर्मात्मा होता है और संकट के क्षणों में कर्त्तव्य के प्रति ईमानदार रहने वाले व्यक्ति ही देश के काम आते हैं।’


ईश्वर पर विश्वास

महाराष्ट्र में अकाल की स्थिति। पानी के अभाव में मनुष्य और बेचैन होने लगे। कितने ही किसानों ने गाँव छोड़ दिये और अपने पशुओं को लेकर पानी और घास के लिए इधर-उधर निकल पड़े।

देश पर आई हुई इस आकस्मिक विपत्ति से सभी लोग अत्यन्त दुःखी और चिन्तित हो रहे थे, किस प्रकार इस विपत्ति से छुटकारा मिले देश भक्तों को यही चिन्ता थी, आखिर सबने मिलकर कोई कारगर युक्ति सोचने का निश्चय किया -

काफी सोच-विचार के बाद निश्चय हुआ कि यदि पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और भक्तिपूर्वक सामूहिक रूप से उस परम पिता परमात्मा की प्रार्थना करें तो अवश्य इस प्रयत्न से सफलता मिल सकती है।

लोग एक स्थान पर प्रार्थना के लिए एकत्रित हुए। प्रार्थना प्रारम्भ हुई। उसी समय एक बालक जूता पहने और छाता लगाये हुए वहाँ पर आया। उसे छाता लगाये देख सभी लोग हँसने लगे।

किसी ने कहा ‘पानी कहाँ बरस रहा है, तू व्यर्थ में ही छाता लगाकर आया।

बालक ने कहा ‘जब आप सब लोग एकत्रित होकर वर्षा के लिए प्रार्थना करने आये हैं तो भला पानी क्यों न बरसेगा? और जब पानी बरसेगा तो यहाँ खड़े लोग भीग न जायेंगे।’ जब साधारण सा व्यक्ति माँगने पर कुछ न कुछ दे देता है फिर सर्वशक्ति सम्पन्न ईश्वर इतने व्यक्तियों की प्रार्थना को कैसे ठुकरा सकता है? सच्चे हृदय से की गई सामूहिक प्रार्थना कदापि व्यर्थ नहीं जा सकती, आप लोग विश्वास रक्खें, सर्वांतर्यामी वह परमपिता प्रार्थना पूर्ण होते ही अभिलाषित वर्षा अवश्य करेगा।

बालक को ईश्वर पर विश्वास था। भगवान ने उसी समय खूब जल बरसाया। बाकी सब लोग पानी में भीग गये और बालक खुशी-खुशी छाता लगाकर अपने घर चला गया।


कुण्डलिनी और गायत्री साधना परस्पर पूरक

गायत्री शक्ति और गायत्री विद्या को भारतीय धर्म में सर्वोपरि स्थान दिया गया है। उसे वेदमाता, भारतीय धर्म और संस्कृति की जननी-उद्गम गंगोत्री, कहा गया है। उस चौबीस अक्षर वाले छोटे से मन्त्र के शीर्ष समेत चार चरणों का व्याख्यान चार वेदों के रूप में हुआ। वेद भारतीय तत्व ज्ञान-धर्म और अध्यात्म के मूल हैं। गायत्री उपासना की भी विशाल परिधि है। पंचमुखी गायत्री के द्वारा पंच तत्वों के अधिपति पाँच देवताओं का-पंच कोषों का अनावरण किया जाता है और उसके द्वारा पंच रत्न जैसे पाँच दिव्य अनुदान प्राप्त किये जाते हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए गायत्री विद्या और उपासना का प्रशिक्षण अब तक दिया भी जाता रहा है?

अब कुण्डलिनी की शिक्षा किसलिए? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इसका उत्तर हमें इस प्रकार प्राप्त करना होगा कि समग्र स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आहार-विहार की उत्कृष्टता आवश्यक है। यह एक सामान्य और व्यापक नियम है पर यदि किसी का घूंसेबाज़ी की-लम्बी, ऊँची कूद की-वजन उठाने की विशेषता भी प्राप्त करनी हो तो उसे आहार-विहार की सुव्यवस्था रखते हुए भी उपयुक्त अंगों के लिए विशेष व्यायाम, विशेष अभ्यास भी आवश्यक होगा।

बिजली की फिटिंग, मीटर, मेन लाइन से सम्बन्ध, यह पहली आवश्यकता है। इतना काम बनने के बाद हीटर, कूलर, पंखा, रेडियो, रेफ्रिजरेटर आदि की सुविधायें आवश्यक हों तो उन यन्त्रों का खरीदना और प्रयुक्त करना भी जानना चाहिए। बिजली की फिटिंग करा देने और लाइन चालू करा देने भर से काम नहीं चलता। यह विशेष उपकरण भी काम में लाने पड़ेंगे।

इन दो उदाहरणों की समता गायत्री महाशक्ति की सर्वांगीणता के साथ कुण्डलिनी की एक अतिरिक्त विशेषता को समझना सुगम पड़ेगा। कहा जा चुका है कि इस बाह्य जगत में दो ध्रुव हैं। इसी प्रकार अंतर्जगत के भी दो ध्रुव हैं एक ज्ञान बीज एक काम-बीज। मस्तिष्क के अवस्थित ज्ञान-बीज से हमारी समस्त चेतना प्रभावित होती है। ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध मिलाने का माध्यम वही केन्द्र है। चेतन सत्ता-परा प्रकृति-का सम्बन्ध ब्रह्मरंध्र से ही मिलता है। गायत्री को ब्राह्मी शक्ति कहा गया है। उसका सीधा सम्बन्ध-इसी ज्ञान चेतना से है। चेतना के अभाव में जीवन ही सम्भव नहीं। गायत्री ब्राह्मी चेतना की देवी है। उसे ब्रह्माणी-ब्रह्मा की पत्नी-ब्रह्म की दिव्य चेतना से है। इसकी उपयोगिता सर्वोपरि है। इसे आत्मा का आहार कहा जा सकता है। इसे बिजली की लाइन चालू होना कह सकते हैं। इसकी आवश्यकता और उपयोगिता सर्वोपरि है।

पौराणिक प्रतिपादन के अनुसार ब्रह्मा की दो पत्नियाँ हैं। एक का नाम गायत्री दूसरी का सावित्री। इस अलंकार से तत्व दर्शन के रूप में ये समझना चाहिए कि परब्रह्म की दो शक्तियाँ हैं एक भाव चेतना-परा प्रकृति। दूसरी पदार्थ चेतना-अपरा प्रकृति। परा प्रकृति के अंतर्गत व्यक्ति संपर्क से उसे मन, बुद्धि, चित्त, ऋतम्भरा, भूमा आदि के नाम से समझा जाता है। समष्टि रूप में वही ‘महत्तत्व’ के रूप में विराट् ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। दूसरी अपरा प्रकृति - पदार्थ चेतना - जड़ प्रकृति कहलाती है। पदार्थों की समस्त हलचलें, गतिविधियाँ उसी पर निर्भर है। परमाणुओं का अपनी धुरी पर घूमना, विविध विधि क्रिया-कलापों का संचालन होना उसी शक्ति पर निर्भर है। विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व, रसायन, ईश्वर उसी के विभाग हैं। पदार्थ विज्ञान इन्हीं शक्तियों को काम में लाकर अगणित आविष्कार करने और यान्त्रिक सुविधा, साधन उत्पन्न करने में लगा हुआ है। इस अपरा प्रकृति को सावित्री कहा गया है। कुण्डलिनी इसी दूसरी शक्ति का नाम है।

मस्तिष्क की सिद्धियों का वारापार नहीं, विद्वान, विज्ञानी, कलाकार, आत्मवेत्ता, महामानव इसी शक्ति का उपयोग करके अपने वर्चस्व की प्रखर बनाते हैं। ज्ञान शक्ति के चमत्कारों से कौन अपरिचित है। मस्तिष्क का महत्व किसे मालूम नहीं? उसके विकास के लिये स्कूली प्रशिक्षण से लेकर स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रयोग किये जाते रहते हैं। इस व्यावहारिक क्षेत्र को गायत्री उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।

दूसरी क्षमता है, क्रिया शक्ति। अपरा प्रकृति। शरीरगत अवयवों का सारा क्रिया-कलाप इसी से चलता है। श्वास-प्रश्वास, रक्त संचार, निद्रा, जागृति, मलों का विसर्जन, ऊष्मा, ज्ञान तत्व, विद्युत प्रवाह आदि अगणित प्रकार के क्रिया-कलाप शरीर में चलते रहते हैं। उन्हें अपरा प्रकृति का कर्तृत्व कहना चाहिए इसे जड़ पदार्थों को गतिशील रखने वाली ‘क्रिया शक्ति’ कहना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन में इसका महत्व भी कम नहीं। आरोग्य, दीर्घ जीवन, बलिष्ठता, स्फूर्ति-साहसिकता, सौंदर्य आदि कितनी ही शरीरगत विशेषतायें इसी पर निर्भर हैं। इसे व्यावहारिक रूप से कुण्डलिनी शक्ति कहना चाहिए। आहार, व्यायाम, विश्राम आदि द्वारा साधारणतया इसी शक्ति की साधना, उपासना की जाती है।

यों प्रधान तो मस्तिष्क स्थित दिव्य चेतना ही है। वह बिखर जाय तो तत्काल मृत्यु आ खड़ी होगी। पर कम उपयोगिता शरीरगत पदार्थ चेतना की भी नहीं है। उसकी कमी होने से मनुष्य दुर्बल, रुग्ण, अकर्मण्य, निस्तेज कुरूप और कायर बनकर रह जायगा। निरर्थक, निरुपयोगी-भार भूत जिन्दगी की लाश ही ढोता रहेगा।

सामान्य जीवन में परा और अपरा प्रकृति का क्या उपयोग है। उसकी मोटी जानकारी और उनकी भिन्नता तथा परस्पर एक दूसरे के साथ सम्बद्धता की स्थिति का ज्ञान हो गया होगा। इन दोनों शक्तियों का हम सब बहुत ही सीमित और स्थूल प्रयोग कर पाते हैं और जितना कुछ अपने भीतर भरा पड़ा है उसका हजारवाँ हिस्सा ही कार्यान्वित करके उतना भर लाभ उठा पाते हैं। जो कुछ दबा छिपा-अज्ञात और प्रसुप्त पड़ा है उसे जगाने और उपयोग में लाने के विशेष प्रयत्न, पुरुषार्थ का नाम ही ‘साधना’ है। साधना के द्वारा हम वह अतिरिक्त शक्ति जागृत और उपार्जित करते हैं जिससे सामान्यतया सर्वसाधारण को वंचित ही रहना पड़ता है। संक्षेप में गायत्री साधना का उद्देश्य मानसिक चेतनाओं का जागरण और कुण्डलिनी साधना का प्रयोजन पदार्थगत सक्रियताओं का अभिवर्धन है। दोनों एक दूसरे की पूरक है। समर्थ शरीर और समर्थ मस्तिष्क परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें गाड़ी के दो पहिये कहना चाहिये। एक के बिना दूसरा निरर्थक रहता है। रुग्ण रहने वाला तत्व ज्ञानी और मूढ़ मति नर-पशु दोनों ही अधूरे हैं। आवश्यकता दोनों के समन्वय की है। यों वरिष्ठ और कनिष्ठ का चुनाव करना है तो प्राथमिकता मानसिक चेतना को ही मिलेगी।

गायत्री और कुण्डलिनी को अधिक स्पष्टता से समझना चाहिए और गायत्री की ज्ञान शक्ति एवं कुण्डलिनी की क्रिया शक्ति को समझ लेना चाहिए। गायत्री साधना चेतनात्मक रहस्यों का, दिव्य विभूतियों का अनुदान प्रस्तुत करती है और कुण्डलिनी भौतिक सिद्धियों के लिए आवश्यक पथ-प्रशस्त करती है। एकाँगी प्रगति अपर्याप्त है। उत्कर्ष उभय पक्षीय होना चाहिए। इसलिए प्रथम गायत्री साधना का शिक्षण प्रारम्भ कराने के उपरान्त यदि कुण्डलिनी साधना की उपयोगिता बताई, सिखाई जाने लगे तो इसे विरोधाभास की दृष्टि से नहीं वरन् पूरक प्रक्रिया का समारम्भ ही समझना चाहिए।

आहार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर काम पानी के बिना भी नहीं चल सकता। पगड़ी की अपनी कान है पर काम जूते के बिना भी नहीं चलता। अक्षर ज्ञान साक्षरता की प्रथम आवश्यकता है पर सीखा तो अंक गणित भी जाना चाहिए। कागज के बिना लिखने-पढ़ने का काम नहीं चलता पर आवश्यकता तो कलम की भी है। नर की महत्ता भले ही हो पर नारी के बिना सृष्टि का क्रम कैसे चले? इन युग्मों को परस्पर पूरक कहा जाता है। प्राथमिकता और महत्ता की दृष्टि से किसी को प्रथम किसी को द्वितीय स्थान दिया जा सकता है। गायत्री और कुण्डलिनी का युग्म ऐसा ही है। ब्रह्मा की यह दोनों पत्नियाँ साथ-साथ रहें तभी पारिवारिक शान्ति रहे। एक रुष्ट दूसरी तुष्ट बैठी रहे तो लँगड़ा, काना, नकटा, टोंटा, शरीर कुरूप, दुर्बल और अपूर्ण बनकर ही रहेगा। स्वस्थ और सुन्दर शरीर में दोनों कान, दोनों आंखें, दोनों नथुने, दोनों जबड़े, दोनों गुर्दे, दोनों फेफड़े, दोनों हाथ, दोनों पैर आवश्यक हैं। साधना क्षेत्र में भी यह उभयपक्षी क्रिया-कलाप अनादि काल से चला आ रहा है।

अध्यात्म क्षेत्र में ज्ञान भाग को दक्षिण मार्ग कहते हैं और इस विद्या को निगम-राजयोग-वेद के अंतर्गत समाविष्ट करते हैं। क्रिया भाग को वाम मार्ग आगम-तन्त्र, हठ योग की परिधि से ले जाते हैं। दोनों को यदि एक दूसरे से पृथक कर दिया जायगा तो अभीष्ट लाभ न मिल सकेगा वरन् निरन्तर विग्रह ही उत्पन्न होता रहेगा और एकाँगी अपूर्णता असमंजस ही उत्पन्न करेगी। देव और दानव सत्ता एक दूसरे से सर्वथा पृथक और असम्बद्ध रहे तो विग्रह ही खड़ा होगा। देवासुर संग्राम ही बनेगा। दोनों को इकट्ठा कर दिया जाय तो वह स्वल्प कालीन सहयोग का समुद्र मंथन का दृश्य उपस्थित करेगा और दोनों के सहयोग से देखते-देखते 14 अनुपम रत्न उपलब्ध होने वाली पौराणिक गाथा के अनुरूप अपने जीवन क्रम में भी चौदह नहीं-उससे अनेक गुने-महत्वपूर्ण रत्न उपलब्ध हो सकेंगे।

समन्वयात्मक साधना का जितना महत्व है उतना एकाँगी का-असम्बद्ध का नहीं। प्रायः साधना क्षेत्र में इन दिनों यही भूल होती रही है। ज्ञान मार्गी - राजयोगी - भक्ति परक साधना तक सीमित रह जाते हैं और हठयोगी, कर्मकाण्डी-तप साधनाओं में निमग्न रहते हैं। उपयोगिता दोनों की है। महत्ता किसी की भी कम नहीं (पर उनका एकाँगीपन उचित नहीं) दोनों का जोड़ा और मिलाया जाना चाहिए। यह शिव पार्वती विवाह की गणेश जैसा भावनात्मक वरदान और कार्तिकेय जैसे पदार्थात्मक अनुदानों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।

समन्वयात्मक साधना की उपयोगिता मानते रहे हैं और उसी का प्रयोग अपने लिए करते हुए दूसरों का मार्गदर्शन करते रहे हैं। वैदिक योग साधना के साथ-साथ तान्त्रिक प्रयोगों को भी महत्व दिया है। गायत्री साधना को प्रमुखता देते हुए भी कुण्डलिनी जागरण की उपयोगिता को माना है। यही कारण है कि प्रथम पाठ पढ़ाने के बाद अब दूसरे पाठ की भी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। इसे प्रकारान्तर न समझा जाय - इसमें विरोधाभास न ढूँढ़ा जाय। यह इकलौती सन्तान के बड़े होने पर उसका जोड़ा मिलाने-विवाह करने का प्रयत्न मात्र है। यों गायत्री के देवता सविता को विष्णु या शिव मानते हैं और उनकी पत्नी अग्नि-लक्ष्मी काली को कुण्डलिनी का प्रतीक माना गया है इस प्रकार यह सुगम युग्म - एक प्रकार से नर नारी का - शिव पार्वती का विवाह ही हुआ। धनुष तोड़ने की प्रक्रिया पूरी करने इसे सिया स्वयंवर-राम जानकी का विवाह सम्पन्न करना कहा जा सकता है। पर यदि कोई कुण्डलिनी और गायत्री में भाषा की दृष्टि से-एक ही लिंग देखता हो तो भी उसे कुछ अचम्भा नहीं करना चाहिए। अभी पिछले ही दिनों में दो नारियों ने परस्पर कानूनी विवाह किया है। कुछ दिन पूर्व में दो पुरुष भी ये समलिंगी विवाह कर चुके हैं।

जीव और ब्रह्म दो पुल्लिंग होते हुए भी परस्पर विवाह करते हैं। साक्षी दृष्टा ब्रह्म निष्क्रिय है उसकी परा-अपरा प्रकृतियाँ - दोनों परस्पर मिलजुलकर ही अपने संयोग-संभोग से इस समस्त सृष्टि का सृजन कर संचालन कर रही है। यह कथन अलंकार भर है। वस्तुतः नर-नारी जैसा लिंग भेद सूक्ष्म जगत में कहीं है ही नहीं। गायत्री या कुण्डलिनी को स्त्री और ब्रह्म, शिव को पुरुष मानना अपनी बात चेतना को उदाहरण देकर समझाना भर है। तत्वतः इस उच्च शक्ति क्षेत्र में नर-नारी जैसा कोई भेद है ही नहीं। इस जगत में भी जिन ब्रह्म वादियों को तत्व ज्ञान हो जाता है वे नर-नारी के शरीर भेदों के अन्तर को भी सर्वथा भुला ही देते हैं। उन्हें सभी में एक लिंग एक तत्व दिखाई पड़ता है। उनकी दृष्टि में न कोई नर है न नारी। अद्वैत ज्ञान में भेद बुद्धि समाप्त होते ही नर-नारी की भिन्नता भी समाप्त हो जाती है। कुण्डलिनी और गायत्री विद्याओं के संबंध में यदि विवाह, संयोग, समन्वय जैसी चर्चा आलंकारिक रूप से आ पड़े तो उसमें कुछ विस्मय न किया जाय इसीलिए यह पंक्तियाँ लिखी गई हैं।

तत्व-दर्शियों ने गायत्री और कुण्डलिनी को परस्पर पूरक माना है और एकात्म भाव में देखा है। इसके कुछ प्रकरण आगे देखिये - कुण्डलिनी साधना के अंतर्गत षट्चक्र वेधन प्रक्रिया मुख्य है। यही इस साधना का प्रधान आधार है। गायत्री शक्ति भी वही प्रयोजन पूरा करती है। इस प्रकार मूलतः वे दोनों एक ही छड़ के दो सिरों की तरह अभिन्न ही हैं। षट्चक्र जागरण में कुण्डलिनी शक्ति को गायत्री का सहकार प्राप्त हो जाता है।

“गायत्री-मन्त्र का ‘भूःकार’ भू-तत्व या पृथ्वी-तत्व है। साधना के मार्ग में वह मूलाधार चक्र है। फिर जगन्माता के निम्नतर ब्राह्मी या इच्छाशक्ति-महायोनि-पीठ में सृष्टि-तत्व है। ‘भुवः’ भुवर्लोक या अन्तरिक्ष-तत्व। साधना की दृष्टि से यह विशुद्ध-चक्र है और महाशक्ति के मध्य स्तर में, पीनोन्नत पयोधर में, वैष्णवी या क्रिया-शक्ति पालन या सृष्टि तत्व है। ‘स्वःकार’ सुरलोक या स्वर्ग तत्व। साधना के पथ में सहस्रार निर्दिष्ट चक्र एवं आद्यशक्ति के ऊर्ध्व या उच्चस्तर में गौरी या ज्ञान-शक्ति, संहार या लय तत्व है। यहीं वेदमाता गायत्री का स्वरूप तथा स्थान रहस्य है।”

यों ज्ञान चेतना समस्त शरीर में संव्याप्त है पर इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है। यों क्रिया शक्ति सम्पूर्ण शरीर में फैली पड़ी है। पर उसका केन्द्र स्थल जननेन्द्रिय है। नपुँसक व्यक्ति प्रायः सभी उच्च गुणों के आयवर्धन और साहस भरे पुरुषार्थों के सम्पादन में असमर्थ रहते हैं। किसी को नपुँसक क्लीव कहना उसकी अन्तः क्षमता हो अपमानित करने वाली गाली है। शरीर के अन्य अंग दुर्बल हों तो उसके बिना प्रगति रुकेगी नहीं पर नपुँसक से कुछ महत्वपूर्ण कार्य बन पड़ना कठिन है। सरकारी नौकरियों में भर्ती करते समय डॉक्टरी जाँच में यह भी परीक्षा की जाती है कि वह व्यक्ति नपुँसक तो नहीं है। शारीरिक विशेषताओं और क्षमताओं का केन्द्र इसीलिए जननेन्द्रिय गह्वर के मर्म स्थल योनि कंद को माना गया है।

साधना के यही दो मर्म स्थल हैं। इन्हें ही कायपिण्ड के दो ध्रुव कहते हैं। यों विद्युत-शक्ति एक ही है पर उसे दो भागों में विभाजित किया गया है एक धन (पाजेटिव) दूसरे ऋण (नेगेटिव) मानवीय चेतना की धन विद्युत ज्ञान केन्द्र मस्तिष्क के मध्य में केन्द्रित है-इस स्थल को अध्यात्म की भाषा में ‘सहस्रार’ कहते हैं। दूसरी ऋण विद्युतकाय केन्द्र जननेन्द्रिय मूल में है - जिसे ‘मूलाधार’ कहते हैं। इन दो केन्द्रों में से ज्ञान केन्द्र को गायत्री का और काम केन्द्र को कुण्डलिनी का उद्गम केन्द्र कहा गया है। भौतिक क्षमताएं, समृद्धियाँ, सिद्धियाँ, कुण्डलिनी में प्रादुर्भूत होती हैं और आध्यात्मिक दिव्य विभूतियाँ, ऋद्धियाँ गायत्री के द्वारा विकसित होती हैं। दोनों का सम्मिश्रण साधक को समृद्धियों और विभूतियों से ऋद्धियों और सिद्धियों से ज्ञान और क्रिया से सुसम्पन्न बनाता है। इसलिए दोनों की सम्मिश्रित साधना का अवलम्बन करना ही समन्वयात्मक प्रवृत्ति के साधकों के लिए उपयुक्त हैं।

सहस्रार कमल को ब्रह्म केन्द्र के रूप में गायत्री के ज्ञान गह्वर के रूप में-विष्णु के क्षीर सागर या शिव के कैलाश के रूप में चित्रित किया गया है। इसके प्रमाण इस प्रकार मिलते हैं।

ब्रह्मरन्ध्रसरसीरुहोदरे नित्यलग्नमवदात्मद्भुतम्।

कुण्डली विवरकाण्ड मंडितं द्वादशार्ण सरसीरुहं भजे।

-पादुका पेचक्र

मस्तक के मध्य अधोमुख सहस्र दल कमल है। उसके उदर में अद्भुत पथ गामिनी नाड़ी है। उसे कुण्डलिनी कहते हैं।

इदं स्थानं ज्ञात्वा नियतनिजचित्तो नरवरो,

न भूयात् संसारे पुनरपि न बद्धस्त्रिभुवने।

समग्रा शक्तिः स्यान्नियतमनसस्तस्य कृतिनः,

सदा कर्तुं हर्तुं खगतिरपि वाणी सुविमला॥

-षट्चक्र निरुपणम् 46

इस सहस्रार कमल की साधना से योगी चित्त को स्थिर कर आत्मभाव में लीन हो जाता है। भवबन्धन से छूट जाता है। समग्र शक्तियों से सम्पन्न होता है। स्वच्छन्द विचरता है और उसकी वाणी विमल हो जाती ॥46॥

शिरःकपालविवरे ध्यायेद्दुग्धमहोदधिम्।

तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्मे चन्द्रं विचिन्तयेत्॥49॥

शिव संहिता 5/179

कपाल की गुफा में क्षीर सागर समुद्र का तथा सहस्र दल कमल में चन्द्रमा जैसे प्रकाश का ध्यान करें।

सहस्रार चन्द्र की कैलाश पर्वत से तुलना करते हुए वहाँ की दिव्य परिस्थितियों का मत्स्य पुराण में वर्णन किया गया है। यह वर्णन तिब्बत स्थित कैलाश पहाड़ का नहीं वरन् विशुद्ध रूप से ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित सहस्रार ज्ञान केन्द्र का ही है। संवर्तक बड़वानल विद्युत का वहीं निवास है। महासर्पों का सरोवर उसी केन्द्र में है। साधना की सिद्धि इसी केन्द्र में तीव्रगति से होती है। यह तथ्य कैलाश पहाड़ पर लागू नहीं हो सकते।

परस्परेण द्विगुणा धर्म्मतः कामतोऽर्थतः।

हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणाँ तत्सरःस्मृतम॥

सरस्वतीं प्रभवति तस्माज ज्योतिष्यती तु या।

इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।

छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥

-मत्स्य पुराण

कैलाश पर्वत पर की हुई साधना से दूनी सिद्धि होती है। धर्म, अर्थ, काम तीनों ही प्राप्त होते हैं। वह हेम कूट पर्वत का सरोवर सर्पों का बनाया हुआ है। ज्योतिर्मयी प्रज्ञा वहीं उत्पन्न होती है।

वहाँ संवर्तक नामक महा भयानक अग्नि जलता रहता है। वह उस सरोवर के जल को पी जाता है। यह अग्नि समुद्र को भी सुखा देने वाला बड़वा मुख है।

मूलाधार को शक्ति का केन्द्र माना गया है। इसे अग्नि कुण्ड-शक्ति उद्गम-काली पीठ तथा क्रिया शक्ति को अधिष्ठात्री कुण्डलिनी के रूप में चित्रित किया गया है। इसका संकेत आध्यात्म शास्त्र में इस प्रकार मिलता है-

आदेहमध्यकट्यन्तमग्निस्थानमुदाहृतम्।

तत्र सिन्दूरवर्णाऽग्निर्ज्वलनं दशपञ्च च ॥137

-त्रिशिखा

कटि से निम्न भाग में अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रंग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोक कर अग्नि की साधना करनी चाहिए।

नाभेस्तिर्यगधोर्ध्वं कुण्डलिनीस्थानम्। अष्टप्रकृति रुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति। यथावद्वायुसंचारं जलान्नादीनि पंरितः स्कन्धपाश्वषु निरुध्यैनं मुखेनैषसमोवष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रं योगकालेऽपानेनाग्निना च स्फुरित।

शांडिल्योपनिषद् 7/6

नाभि से नीचे कुण्डलिनी का निवास है। यह आठ प्रकृति वाली है। इसके आठ कुण्डल हैं। यह प्राण वायु को यथावत करती है। अन्न और जल को व्यवस्थित करती है। मुख तथा ब्रह्मरन्ध्र की अग्नि को प्रकाशित करती है।

तडिल्लेखा तन्वी तपन शशि वैश्वानर मयी।

तडिल्लता समरुचिर्बिद्युल्लेखेन भास्वती॥

बिजली की बेल के समान, तपते हुए चन्द्रमा के समान, अग्निमयी वह शक्ति दृष्टिगोचर होती है।

इस सब तथ्यों पर दृष्टिपात करते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि गायत्री ज्ञान शक्ति का और कुण्डलिनी क्रिया शक्ति का परस्पर अन्योन्याश्रय संबंध है। दोनों के मिलने से ही परिपूर्ण एवं समग्र उत्कर्ष


Quotation

विश्व में एक मूल्यवान वस्तु केवल आत्मा है।

की सम्भावना मूर्तिमान होती है। इन दोनों साधनाओं में विरोधाभास नहीं माना जाना चाहिए और प्रकारान्तर में यही समझना चाहिए कि साधना-क्रम में दोनों का समन्वय होने से भौतिक और आत्मिक दोनों ही सफलताओं का पथ प्रशस्त होता है। यह समन्वयात्मक साधना भक्ति और मुक्ति दोनों प्रयोजनों को पूरा करती है। इसीलिए साधना विज्ञान के तत्ववेत्ता एकाँगी सांत्वना की अपूर्णता को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करते रहे हैं। वही यहाँ भी किया जा रहा है।

या देवता भोग करीसा मोक्षायन कल्पते।

मोक्षदा नहि भोगाय त्रिपुरा तु द्वय प्रदा॥

-त्रिपुरा तन्त्र

जो देवता भोग देते हैं वे मोक्ष नहीं देते जो मोक्ष देते हैं वे भोग नहीं देते। पर कुण्डलिनी दोनों प्रदान करती है।


गुरुदेव और उनकी दिव्य अनुभूतियाँ


मनुष्य जीवन में सुख-दुःख

मनुष्य जीवन में सुख-दुःख, प्रसन्नता, उदासीनता सभी उनकी मनःस्थिति के परिणाम हैं। मन में इतनी क्षमतायें विद्यमान हैं कि चाहे जैसी परिस्थिति उत्पन्न की जा सकती है। यह एक उपजाऊ खेत कहा जा सकता है जिसमें अच्छी फसलें भी पैदा की जाती हैं और खरपतवार तथा काँटे भी असावधानीवश उग आते हैं। हमारा अच्छा दृष्टिकोण सोचने, विचारने कार्य करने का होगा। इसीलिए इस मन को कल्पवृक्ष कहा गया है। इसे कामधेनु भी कहा जाता है। इससे दृढ़ता पूर्वक, पूर्ण आत्म-विश्वास के साथ जिस वस्तु की माँग करेंगे, उसी को ला उपस्थित कर देगा। इससे माँगने की कला सीखें।


साँस का सन्देशा


साँस का सन्देशा (Kavita)

साँस बोली मनुज से, कि सुन लो जरा!

“मैं सतत चल रही, चल रही यह धरा!!

है नियम सृष्टि का अनवरत घूमना।

ध्येय में प्राण अपने सतत फूँकना॥

फिर न क्यों तुम उभरते, मचलते मनुज?

यह तुम्हारा बदन क्यों उदासी भरा?” मैं सतत चल रही....

धीरता से उठाई अलस सृष्टि तब।

“मैं रुका, तो रुकी नित भ्रमित सृष्टि कब?”

“तुम रुके तो मनुज! रुक गई कर्मगति।”

अनवरत चल रही साँस से स्वर झरा॥ मैं सतत चल रही....

चल रही ये सरित, प्राणशत प्राण की।

चल रही वायु नित, वन सुरभि घ्राण की॥

चल रहे चाँद तारे-सतत-भानु भी।

दिव्य आलोक इनका जगत में भरा॥” मैं सतत चल रही....

चल रही बात का कुछ हुआ तो असर।

त्याग तन्द्रा उठा वह तभी चेत कर॥

था अभी तक पड़ा-अर्ध जागृत बना।

अब सुना साँस का वह सन्देशा जरा॥ मैं सतत चल रही....

साँस कहती रही “ओ उनींदे पुरुष!

प्राण देती तुम्हें नित्य मैं ही पुरुष!

अब न सोचो अधिक! कर्ण खोलो!! सुनो!!!

है व्यथित यह बहुत ही तुम्हारी धरा॥ मैं सतत चल रही....

ताप है, शाप है, अन्ध विश्वास है।

आज बस इस धरा पर अविश्वास है॥

मानवी शक्तियाँ रो रही हैं पड़ीं।

धर्म जाकर छिपा पुस्तकों में डरा॥ मैं सतत चल रही....

तब तड़पने लगी दिव्य मनुजात्मा।

मैं कहाँ खो गया था, ओ परमात्मा!

बन्दिनी है सुमाता सदृश संस्कृति।

प्राण में क्यों रहा आज तक मद घिरा? मैं सतत चल रही....

आज युग धर्म मेरा बनी गति स्वयं।

ज्योति बनकर अखण्डित जलेगा अहं॥

आज गति ही चरण-आज गति ही मरण।

मैं ज्वलित पिण्ड हूँ-सूर्य से जो झरा॥

मैं सतत चल रही, चल रही यह धरा!!

-माया वर्मा

*समाप्त*