धरती अन्न उपजाती है। अन्न और वनस्पति उगाकर वह समस्त प्राणियों का पेट भरती है पर यह नहीं सोचती कि मेरा भण्डार खाली हो जायगा। उसकी यह उदारता सृष्टि क्रम के अनुसार लौटकर उसी के पास वापिस आ जाती है। प्राणी- पृथ्वी के अनुदान का उपभोग तो करते हैं पर प्रकारान्तर से उसकी निधि उसी को वापिस कर देते हैं। मल-मूत्र, खाद, कूड़ा, मृत शरीर यह सब लौट कर धरती के पास आते हैं और उसी में समा जाते हैं।
पर्वत के उच्च शिखर पर निवास करने वाली चट्टान किसी को कुछ देती नहीं। वह अपनी सम्पदा अपने पास ही समेटे बैठी रहती है। अपनी विभूतियाँ किसी को क्यों दे, यह सोचकर रेतीली मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़, समर्थ शोभायमान चट्टान निष्ठुरता बरतती है और कृपण बनी रहती है, वर्षा होती है, विपुल जलधार बरसती है मृत्तिका आर्द्र हो उठती है उसकी तृषा तृप्त हो जाती है पर चट्टान को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। भीतर तो एक बूँद घुसती ही नहीं बाहर जो नमी आती है उसे भी पवन एक झोंके में सुखा देता है। जबकि खेत की मृतिका बाहर भी देर से सूखती है और भीतर तो सरसता का सुखद आनन्द चिरकाल तक लेती रहती है। मिट्टी ने कुछ खोया नहीं, चट्टान ने कुछ पाया नहीं। उदारता अपनाकर मृत्तिका वरुण देव के स्नेह से अनायास ही सिक्त हो गई और चट्टान को सूर्य का कोप सदा संतप्त ही करता रहा।
बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, उसे लोग पीते हैं और नहाते हैं। गड्ढे में रुका पानी सड़ जाता है पीने के योग्य वह नहीं रहता। कृपणता- रुके हुए गड्ढ़े की तरह है उसका संचय सड़ कर दुर्गन्ध ही उत्पन्न करता है। गड्ढ़े की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है।
महा प्रभु ईसा ने अपने शिष्यों से कहा- तुम मुझे प्रभु कहते हो-मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकाँक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्म समर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता- वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है। दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और कोई को नहीं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरत कर अपने आपके साथ ही दुष्ट दुर्व्यवहार किया जाता है।
दूसरों को प्रसन्न करना अपने आप को प्रसन्न करने का ही क्रिया कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँस पेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है। गेंद को उछाल कर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि खेलना बन्द कर दिया जाय तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।
ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए अपने आप से ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।
गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूलों को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए-उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।
प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है भक्ति में जो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है।
ईश्वर का विश्वास, सत्कर्मों की कसौटी पर ही परखा जा सकता है। जो भगवान पर भरोसा करेगा वह उसके विधान और निर्देश को भी अंगीकार करेगा भक्ति और अवज्ञा का ताल-मेल बैठता कहाँ है?
हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया जिसके चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा; जो दीपक की तरह जल कर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।
जीवन की उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस सृष्टि में ऐसी व्यवस्था है कि वे सरलता पूर्वक पूरी हो जाया करें। साँस लिये बिना एक ही क्षण भी काम नहीं चल सकता सो प्राण वायु प्रचुर मात्रा में सर्वत्र मौजूद है। जल का उसके बाद नंबर आता है वह भी थोड़ा प्रयत्न करने पर हर जगह मिल जाता है। अन्न की आवश्यकता उसके पश्चात् है, उसके लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है और खर्च भी, इसी क्रम से जो आवश्यकताएं अपेक्षाकृत हलकी होती जाती हैं उन्हीं का मिलना श्रम साध्य होता जाता है।
जीवन धारण की प्रक्रिया को देखिए। भ्रूण अति दुर्बल होता है उसे वातानुकूलित और सर्व सुविधा सम्पन्न निवास चाहिए। माता का गर्भाशय उसके लिये अतिशय सुविधा पूर्ण है। उतने दुर्बल और अपूर्ण प्राणी के लिये इतना साधन सम्पन्न स्थान संसार में अन्यत्र कहीं हो ही नहीं सकता। सो हर प्राणी को सरलता पूर्वक मिल जाता है। जितने समय भ्रूण पकता नहीं उतने समय निवास की वहाँ समुचित व्यवस्था है। यदि यह सब सरलता पूर्वक उपलब्ध न हुआ होता तो प्राणी की सर्व प्रथम और सर्वोपरि महत्व की आवश्यकता पूरी न हो सकने के कारण जन्म ही सम्भव न होता।
इसके पश्चात जन्म लेने के बाद सुपाच्य सुसन्तुलित आहार की आवश्यकता होती है और एक सहायक संरक्षक सेवक की जो उस नवजात असमर्थ शिशु की न केवल सारी आवश्यकता पूरी करे वरन् उसे पर्याप्त स्नेह प्रदान कर मानसिक विकास भी सम्भव बनाये। इन सारी आवश्यकताओं को माता पूरा करती है। नवजात शिशु के लिए माता का दूध ही अमृत है। इससे बढ़िया खुराक इस धरती पर हो ही नहीं सकती। माता से बढ़कर स्नेही- सहायक- संरक्षक-सेवक भला और कहाँ मिलेगा? अरक्षित, असमर्थ और असहाय शिशु के लिए पालन-पोषण की आवश्यकता पूरी होना अनिवार्य है। इसके बिना जीवन धारण किये रहना कठिन है।
जन्म तो हो जाय पर माता की सहायता न मिले तो बालक की कैसी दुर्गति होती है इसकी कल्पना कठिन नहीं। अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य के बालक को तो और भी अधिक मात्रा में- गहरी तथा लम्बे समय तक चलने वाली मातृ सहायता अपेक्षित होती है। पर प्रकृति से ऐसा प्रबन्ध सभी प्राणियों के लिए किया हुआ है। असली माता तो प्रकृति ही है। प्राणी को संसार में भेजती है तो उसकी व्यवस्थाएं भी आदि से अन्त तक बनाना उसी का काम है।
बालक बड़ा होता है। उसकी कोमलता सभी का जी हुलसाती है और उससे आकर्षित होकर हर कोई उस कोमल बालक की सहायता करना चाहता है। असमर्थता की पूर्ति इस उदार सहायता से ही पूरी होती है। दूसरों के बालक पास खेलते हों तो जी हुलसता है। उन्हें गोदी में लेने की-खिलाने की-प्यार करने की और पास की कुछ वस्तु देने की हो तो देने को जी करता है। माता-पिता, परिवार, पड़ौस, सम्बन्धी सज्जनों से इस प्रकार की सद्भावनाएं और सहायताएं उसे सर्वत्र मिलती हैं। गुरुजनों का अनुग्रह रहता है। अध्यापक उनसे क्षमा और उदारता का व्यवहार करते हैं। बड़ों के साथ जैसा बराबरी का- कठोरता का व्यवहार किया जाता है, वैसा कोई गुरुजन उनसे नहीं करता। बड़े आदमी की गलती- अशिष्टता पर क्रोध आता है और दंड प्रतिशोध के कदम उठते हैं पर बालकों की पग-पग पर होने वाली गलतियाँ ऐसे ही हँसी, मुसकराहट के बीच भुला दी जाती हैं। कई बार तो उन गलतियों में रस भी लिया जाता है।
सरकार बाल-कल्याण विभाग चलाती है। प्रौढ़ कल्याण-वृद्ध कल्याण की उपेक्षा करके भी उसका ध्यान बालकों पर रहता है। सामाजिक संस्थाएँ भी इधर ही बहुत ध्यान देती हैं। सबकी स्वाभाविक सहानुभूति बालकों की ओर अनायास ही खिंची रहना- प्रकृति की उसी प्रेरणा के अनुसार जिसमें उन्हें अपनी अविकसित स्थिति में सब ओर से अधिक सहायता एवं उदारता अपेक्षित है। यह सारी व्यवस्था मनुष्य के स्वभाव में पहले से ही सम्मिलित है। मनुष्य ही क्यों अन्य प्राणियों में भी अपने ही नहीं बिराने बच्चों के प्रति अधिक कोमल और उदार भावनाएं पाई जाती हैं।
जीवन विकास की क्रमिक यात्रा में यौवन आता है। पितृत्व की इच्छा कामवासना के रूप में जगती है। जोड़ी मिलाने की आवश्यकता अनुभव होती है। समयानुसार यह भी सहज ही बन जाता है। एक ऐसी उमंग महक उठती है जिसमें हर नर मादा अपने विपरीत लिंग वाले प्राणी को खोजने और आकर्षित करने में सफल हो जाता है। मनुष्य को तो बहुत सुविधाएं प्राप्त हैं। बिना साधन, सुविधा वाले कीड़े-मकोड़े, पतंगे, जलचर, पशु, पक्षी सभी को काम तृप्ति का अवसर मिलता है और सभी गर्भाधान प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं। मनुष्यों के लिये भी यह सुविधा बन ही जाती है। प्रकृति की दयालुता तो देखिए कि वास्तविक आवश्यकताओं का समाधान कितनी सरलता और सुन्दरता के साथ जुटाती है। इसके लिये उसने अपनी क्रम व्यवस्था बड़ी सरल और सुविधाजनक बनाकर रखी है और उसका प्रवाह अनादि काल से बहता चला आता है।
रोग निरोध की जन्म जात शक्ति रक्त कणों में विद्यमान रहती है। असली चिकित्सक भीतर मौजूद है। बाहर के डॉक्टर तो उन भीतरी चिकित्सकों की थोड़ी सहायता भर कर देते हैं। मरण से पूर्व मूर्छा आ जाती है और वह अति कष्ट साध्य आपरेशन बिना कष्ट के सम्पन्न हो जाता है। मरने के बाद शरीर की दुर्गति न हो इसलिए उसे खाने के लिए कृमि उसी में तत्काल पैदा हो जाते हैं, कौए, गिद्ध, चील, स्यार, कुत्ते आदि प्राणी मृत शरीर की गन्ध पाते ही उस गन्दगी को साफ करने दौड़ पड़ते हैं। सभ्य समाज में तो मुर्दे को जलाने, गाढ़ने या बहाने की प्रथा पहले से ही प्रचलित है। जीवन विकास का यह अन्तिम अध्याय भी ठीक तरह सम्पन्न हो जाय इसके लिये प्रकृति ने समुचित व्यवस्था जुटा कर रखी है।
जो आवश्यक है वह यहाँ प्रचुर मात्रा में विद्यमान है और स्वल्प प्रयत्न से मिल सकता है। जो अनावश्यक है हानिकारक है उसी का मिलना दुर्लभ है। फल उपयोगी हैं वे सरलता से प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। विष अनावश्यक और हानिकारक है; उसे प्राप्त करना हो तो बहुत ढूंढ़ खोज करनी पड़ेगी पैसा और श्रम खर्च करना पड़ेगा तब यत्र-तत्र किंचित मात्रा में विष मिलेगा। गाय, घोड़ा, भेड़ बकरी आदि उपयोगी पशु-सरलता पूर्वक उपलब्ध हैं। पर सिंह, व्याघ्र, चीता, रीछ आदि के दर्शन भी दुर्लभ हैं। वे दूरवर्ती सघन वनों में स्वल्प संख्या में ही होते हैं। अनुपयोगिता के कारण प्रकृति ने उन्हें ऐसी ही स्थिति में रखा है। उनकी संतान भी अधिक नहीं बढ़ती जबकि उपयोगी पशु अपनी संख्या वृद्धि निरन्तर करते रहते हैं।
प्राणियों के लिए उपयोगी वनस्पति-घास, पौधे वृक्ष स्वतः ही उगते बढ़ते हैं और फलते-फूलते रहते हैं। इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ आवश्यक है, वह इस संसार में सरलता पूर्वक उपलब्ध है। दिन में सूरज की रोशनी जलती है, रात को चन्द्रमा चमकता है ताकि हमें अन्धकार में न भटकना पड़े। प्रकृति माता के इन अनुदानों को कहाँ तक गिनाया जाय जीवन की हर आवश्यकता और सुविधा को जुटाने में उसने कहीं कुछ भी कसर नहीं छोड़ी है।
यह अनुदान शरीर यात्रा तक ही सीमित नहीं है। सामाजिक-मानसिक-आर्थिक और नैतिक क्षेत्र में भी ऐसी विधि व्यवस्था इस विश्व में विद्यमान है कि प्रगति की हर उचित आवश्यकता सरलता पूर्वक पूरी हो सके। इच्छा हो और उसे पूरा करने के लिये पुरुषार्थ जुटा दिया जाय तो लगभग हर उचित आवश्यकता पूरी होती चली जायेगी उसमें कोई बड़ा विघ्न न आवेगा। विघ्न यदि हैं भी तो वे बाहर नहीं भीतर हैं। मनुष्य के अपने दोष दुर्गुण ही उसकी प्रगति में बाधक होते हैं। आलस्य, प्रमाद, अनियमितता, असंयम, आवेश, अति स्वार्थ जैसे कारण ही असफलताओं और विपत्तियों के कारण बनते हैं। अन्यथा सद्गुण, सत्कर्म और सत्स्वभाव से मनोभूमि परिष्कृत कर लेने पर- परिष्कृत दृष्टिकोण और व्यवस्थित क्रिया-कलाप के आधार पर किसी भी क्षेत्र में सफलता पाई जा सकती है। किसी भी क्षेत्र में साधन सम्पन्न बना जा सकता है। जिस दिशा में भी कदम उठाले उधर ही प्रगति हो सकती है।
बाधक बाह्य जगत नहीं- अवरोध प्रकृति गत नहीं स्वनिर्मित हैं- और ऐसे कि यदि उनकी हानियों को समझ लिया जाय और निरस्त करने के लिए कटिबद्ध हो जाया जाय तो उनका एक क्षण भर भी ठहरना नहीं हो सकता। आन्तरिक शत्रु लगते भर बलिष्ठ हैं, संकल्प शक्ति की एक चिनगारी उन्हें नष्ट करके रख सकती है। आज घोर दुर्गुणी दीखने वाला व्यक्ति कल पूर्ण परिष्कृत मनुष्य बन सकता है। व्यक्तित्व के विकास और मनः क्षेत्र से सम्बन्धित समस्त क्षेत्रों की प्रगति के लिये प्रकृति ने अपने सभी द्वार खुले रखे हैं। कोई चलना ही न चाहे या उलटा चले तो इसमें विश्व व्यवस्था क्रम का नहीं आदमी के अपने औंधे और ओछे कर्तृत्व का ही दोष है। सुधारना चाहें तो उसका परिमार्जन भी अति सरल है। इतिहास में अगणित उदाहरण ऐसे विद्यमान हैं जिनमें संकल्प बल से अपनी हेय स्थिति को आमूल चूल परिवर्तन करके लोगों ने आशाजनक और आश्चर्यजनक परिवर्तन प्रस्तुत किये हैं।
आत्मिक क्षेत्र सबसे ऊंचा है। उसमें भी प्रगति के लिए द्वार खुला पड़ा है और उसमें प्रवेश करना अति सरल है। ईश्वर हमारे चारों ओर घिरा हुआ है। हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। मछली के भीतर और बाहर पानी ही पानी भरा रहता है अपने अन्दर और बाहर ब्रह्म चेतना का भरा पूरा समुद्र ही लहलहा रहा है जो इतना समीप हो- इतना प्रचुर हो-उसे प्राप्त करने में क्या कठिनाई हो सकती है?
पिता और पुत्र का सामीप्य दुरूह कैसे हो सकता है? माता और बच्चे के सान्निध्य में अवरोध क्या होगा? पति और पत्नी के मिलने में क्या बाधा? प्रकृति -गत अवरोध इस प्रसंग में रत्ती भर भी बाधक नहीं है। आत्मा और परमात्मा के बीच-पिता, पुत्र, माता, शिशु, भाई-भाई और पति पत्नी के लौकिक रिश्तों की अपेक्षा भी कहीं अधिक सघन स्वच्छ और प्रखर सम्बन्ध हैं। साँसारिक रिश्तों में दो स्वतंत्र व्यक्तियों की बात रहने से कुछ भिन्नता और पृथकता भी रह सकती है। पर आत्मा और परमात्मा तो अंश और अंशी हैं। उनमें तो अग्नि और चिनगारी जैसा ही भेद है। कमल और उसकी पंखुरियों की-पदार्थ और उसके परमाणुओं की- सूर्य और उसकी किरणों की पृथकता आँकी भले ही जाय वस्तुतः वे तादात्म्य हैं। ईश्वर और जीव इतने ही घनिष्ठ हैं- आत्मा और परमात्मा के बीच ऐसा कोई व्यवधान नहीं है जिसे दूर करने के लिये- चिन्तित, दुखी, खिन्न, उद्विग्न या हताश होने की आवश्यकता हो। यह मिलन प्रक्रिया अति सरल है। ईश्वर प्राप्ति से अधिक आसान कार्य और दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
शरीर और मन परस्पर ओत-प्रोत हैं। शरीर और मन को मिलाने के लिए कुछ बड़ा काम नहीं करना पड़ता। करना पड़ता है तो इतना ही कि जो नशा पी लिया था, उसे उतर जाने दिया जाय और फिर दुबारा न पिया जाय। नशा पीने से ही शरीर और मन का सम्बन्ध लड़खड़ा जाता है। चलना, करना, बोलना, सोचना- अनियन्त्रित हो जाने की उपहासास्पद स्थिति इसलिए बनती है कि नशे की खुमारी शरीर और मन का सम्बन्ध गड़बड़ा देती है। दोनों अलग-अलग दिशा में जाते- स्वच्छन्द विचरते दीखते हैं। उसमें दोष नशे का है, यदि नशे का परित्याग कर दिया जाय तो शरीर और मन की एकसूत्रता- एकरूपता में कोई अन्तर दिखाई न पड़ेगा। ईश्वर और जीव के बीच में माया का नशा ही प्रधान रूप से बाधक है। यह पर्दा हटा कि उसकी आड़ में बैठे भगवान के दर्शन हुए। बाधक तो यह झीना सा पर्दा ही है।
निद्रा ग्रस्त हो जाने पर शरीर और मन के सम्बन्ध गड़बड़ा जाते हैं। शरीर कहीं पड़ा रहता है- मन कहीं घूमता है। विलगाव को देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि शरीर और मन दूर हैं। असम्बद्ध हैं। इन्हें इकट्ठा करने के लिये कोई बहुत भारी प्रयास पुरुषार्थ करना पड़ेगा। दोनों की एकता अविच्छिन्न है। अन्तर तो निद्रा ने डाला है। शरीर को मृतक जैसा उसी ने बनाया है। मन को देह से असम्बद्ध करने के लिए यह निद्रा ही कारण है। यदि उसे हटा दिया जाय तो जागते ही दोनों की एकता फिर यथावत हो जायगी। शरीर और मन दोनों परस्पर घुले मिले- और साथ-साथ मिल जुलकर काम करते दिखाई देंगे।
आत्मा और परमात्मा दोनों अभिन्न हैं। भिन्नता तो अविद्या रूपी निद्रा ने उत्पन्न की है। इसे हटाना भगाना ही इस दुखदायी वियोग के अन्त करने का एकमात्र उपाय है।
ईश्वर प्राप्ति अति सरल है। क्योंकि वह जीवन की महती आवश्यकता है। उसकी साधना सर्वथा सुगम है उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जिसके लिए भारी दौड़-धूप करने और सरंजाम जुटाने की जरूरत पड़े। तपश्चर्या, योगसाधना, योग प्रक्रिया का मात्र प्रयोजन इतना है कि नशे की खुमारी और निद्रा की मूर्छना को हटा दिया जाय। जो साधना इस प्रयोजन को पूरा कर सकेगी उसी से ईश्वर प्राप्ति का सरल प्रयोजन सुगमता पूर्वक पूरा हो जायगा।
व्यवधान केवल एक है- इसे सरल भी कह सकते हैं कठिन भी। वस्तुतः वह साहसी के लिए अति सरल है और असमंजस ग्रस्त भीरु व्यक्ति के लिए अति कठिन। करना सिर्फ इतना भर है कि हम अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व को शरीर न मानें- सुखों की खोज बाहर के पदार्थों में ढूँढ़ना बन्द कर दें। बहिर्मुखी दृष्टिकोण को अन्तर्मुखी बनायें। अपने को आत्मा मानें। आत्मा का हित साधन प्रमुख मानें। उसी में रुचि लें- उसी की इच्छा करें और उसी की व्यवस्था बनायें- अपना चिन्तन इसी लक्ष्य पर नियोजित करें और कार्यक्रम का पुनर्निर्धारण इस दृष्टि से करें कि यह जीवन परमेश्वर का है। परमेश्वर के लिए है और वही कार्य किये जायेंगे जो परमेश्वर द्वारा अपने लिये नियत निर्धारित किये गये है। पदार्थों में सुख खोजने की अपेक्षा प्रवृत्तियों में उत्कृष्टता आनन्द तलाश करना पड़ेगा। यह परिवर्तन जितना स्पष्ट होता जायगा ईश्वर उसी अनुपात में अपने समीप प्रस्तुत दिखाई देगा।
चिर संचित कुसंस्कारों से दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से जूझना यही एक कठिन प्रसंग है। इसी मोर्चे पर हारने से साधना असफल होती है। तपस्वी का विजय ध्वज इसी शिखर पर गढ़ा हुआ है कि वह अज्ञानान्धकार में भटकने वाली भेड़ों का अन्धानुकरण छोड़कर स्वतन्त्र चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तृत्व अपनाने में समर्थ हुआ या नहीं। अपना रास्ता आप बनाने की तपस्या- अपनी राह पर आप चलने की साधना को कर सका- बहिर्मुखी दृष्टि को अन्तर्मुखी बना सका- भीतर के आकर्षण प्रलोभन और बाहर के उपहास प्रतिरोध का जो सामना कर सका- इस उत्कृष्टता पर आरुढ़ योद्धा की सर्वत्र विजय है। जिसने अपने को जीत लिया समझना चाहिए उसने ईश्वर को जीत लिया यह सरलतम है और कठिनतम भी।
सब इन्द्रियों को वश में रखकर, सर्वत्र समत्व का पालन करके जो दृढ़, अचल और अचिन्त्य, सर्वव्यापी, अवर्णनीय, अविनाशी स्वरूप की उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए सुख ही पाते हैं।
-भगवान् कृष्ण
भगवान के दर्शनों की चिर आकाङ्क्षा तृप्त हुई, पर अभी भक्त के मन में कोई एक कौतूहल झाँक रहा था जिसे वह व्यक्त नहीं कर पा रहा था। भगवान् ताड़ गये। उन्होंने पूछा- वत्स तुम जो भी चाहो निःसंकोच पूछ सकते हो।
रुँधे गले को साफ करते हुए भक्त ने पूछा- भगवन् आप सारी सृष्टि के स्वामी है फिर भी दुनिया भर से छिपकर क्यों रहते हैं?
भगवान् हँसे और बोले-तात ! छिपे रहने में ही मेरा कल्याण है- तुम नहीं जानते दुनिया का हर व्यक्ति मुझसे कुछ न कुछ चाहता है, यदि मैं प्रकट हो जाऊँ तो अपनी कामनाओं के लिये लोग मुझे जिन्दा नोंच डालें, इसीलिये अपना काम छुपकर चला रहा हूँ।
मंत्र साधना भी यन्त्र साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यन्त्रों के सिद्धान्त, निर्माण, संचालन, सुधार में दक्षता प्रस्तुत करना ही यन्त्र विद्या का आधार है। यह प्रक्रिया ठीक रहे तो यन्त्रों की क्षमता से समुचित लाभ उठाया जा सकता है। पर यदि इन प्रकरणों में त्रुटि रहे तो मशीनें समय और धन की बर्बादी ही करती हैं। ठीक इसी प्रकार मन्त्र साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हों तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
भौतिक विज्ञान बाह्य जगत को प्रभावित करता है और जड़ प्रकृति में सन्निहित शक्तियों को उपयोग योग्य बनाकर लाभकारी परिणाम उपस्थित करता है। अध्यात्म विज्ञान अन्तरंग क्षेत्र को प्रभावित करता है और चेतन प्रकृति को प्रदीप्त कर उससे सर्वसमर्थ व्यक्तित्व का निर्माण करता है। भौतिक विज्ञान सुख साधनों का उत्पादन करता है। शरीर को अधिक सुविधाजनक स्थिति में रखने के आधार जुटाता है। यही उसकी परिधि है। अन्तःचेतना तक न तो उसकी पहुँच है और न उस स्तर की क्षमता ही वह उत्पन्न कर सकता है।
यह जगत जड़ और चेतन का सम्मिश्रण है। प्राण धारियों के भीतर चेतना रहती है और बाहर पञ्च भौतिक कलेवर चढ़ा होता है। दोनों के सम्मिश्रण से ही प्राणि जगत की विविध हलचलें दिखाई पड़ती हैं। नदी, पर्वत जैसे सर्वथा जड़ पदार्थों की बात अलग है- जहाँ चेतना है वहाँ इस बात की भी आवश्यकता अनुभव की जाती है कि वस्तुओं और शरीरों की तरह ही चेतना को भी स्वच्छ स्वस्थ और सुविकसित रखा जाय। इसी क्रिया कलाप को अध्यात्म कहते हैं।
जड़ प्रकृति की शक्तियों का अधिकाधिक परिचय भौतिक विज्ञान ने सर्व साधारण के लिए सुलभ किया है। अग्नि, विद्युत, ईथर, अणु-शक्ति तरंगें, चुम्बक आदि भौतिक शक्तियों का उपयोग कितना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है यह सर्वविदित है। चेतन प्रकृति का स्तर और भी ऊँचा है। वस्तुतः चेतन का ही जड़ के ऊपर अधिकार है। जलयान कितना ही बड़ा क्यों न हो चेतन संचालक के बिना कुछ कर न सकेगा। अन्तरिक्ष में मानव रहित राकेट स्वसञ्चालित लगते भर हैं वस्तुतः उन्हें भी धरती पर बैठे हुए वैज्ञानिक ही दिशा देते और नियन्त्रण करते हैं। रेलगाड़ी कितनी ही कीमती क्यों न हो, जीवित ड्राइवर के बिना वह टूटी चट्टान की तरह निरर्थक है। प्राण के बिना शरीर का क्या उपभोग? उपभोक्ता रहित सम्पदा तो समुद्र तल और भूगर्भ में न जाने कितनी दबी पड़ी है। महत्व उतनी का ही है जितनी कि चेतन प्राणी उसका उपयोग कर सके। जड़ पदार्थों की तरह जड़ विज्ञान भी तभी उपयोगी हो सकता है जब उसका चेतन प्राणी द्वारा नियन्त्रण एवं उपयोग किया जाय। तात्पर्य यह है कि जड़ की तुलना में चेतन का मूल्य महत्व अत्यधिक है। इसी अनुपात से भौतिक विज्ञान की महत्ता एवं उपयोगिता बढ़ी चढ़ी है।
भौतिक विज्ञान के प्रत्यक्षीकरण में प्रयुक्त होने वाले उपकरण ‘यन्त्र’ कहलाते हैं और आत्म विज्ञान से लाभान्वित होने के माध्यम ‘मन्त्र’ कहे जाते हैं। यन्त्रों के बिना वैज्ञानिक तथ्यों से लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। इसी प्रकार मन्त्र रहित अध्यात्म सिद्धान्त मात्र बनकर रह जायगा उसे प्रत्यक्ष न किया जा सकेगा।
समग्र विज्ञान को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- एक पिण्डव्यापी दूसरा ब्रह्माण्डव्यापी। एक अन्तरंग दूसरा बहिरंग। जिस प्रकार थ्योरी और प्रैक्टिस के आधार पर बहिरंग शिक्षा पद्धति चलती है उसी प्रकार अध्यात्म प्रगति के लिए आस्था और साधना दो माध्यम हैं। आस्था के अंतर्गत नीति, धर्म, दर्शन, आत्म-ज्ञान, ब्रह्म एवं सूक्ष्म जगत का वर्णन विवेचन आता है। शास्त्रों में उसी का वर्णन है। आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिन्तन परिष्कार को अध्यात्म ‘निष्ठा’ पक्ष में लिया जायगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधन प्रभृति क्रियाकलापों को साधना माना जायगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जायगी। ज्ञान कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। तत्व दर्शन के बिना तपस्या और तप साधना के बिना तत्व दर्शन के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। तत्व दर्शन के बिना तपस्या और तप साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकते।
विश्वव्यापी ब्रह्म चेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित सम्बन्ध है। पर उसमें मल आवरण विक्षेप जैसे अवरोधों ने एक प्रकार से विच्छेद जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। बिजली घर और कमरे के पंखे के बीच लगे हुए तारों में यदि कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो पंखा और बिजली घर दोनों ही अपने-अपने स्थान पर वहीं रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। पंखा चलेगा नहीं निःचेष्ट पड़ा रहेगा। इन अवरोधों को साफ करना ही मन्त्र साधना का उद्देश्य है। नाली के प्रवाह में कोई रोड़ा आ जाय तो पानी इधर-उधर फैलेगा और नाली सूखी पड़ी रहेगी। यही बात हमारे जीवन प्रवाह में भी दृष्टिगोचर होती है। अन्न, जल पर जीवित रहने वाला शरीर तो अपना आहार प्राप्त करके गतिशील बना रहता है पर अन्तःचेतना की खुराक न मिलने से वह दिन-दिन दुर्बल एवं मरणासन्न होती चली जाती है। यही है हम सबकी आन्तरिक दयनीय दुर्दशा का कारण।
नवजात शिशु माता के दूध पर अवलम्बित रहता है। आत्मा का पोषण परमात्मा के साथ प्रत्यावर्तन बने रहने पर ही होता है। बादल तभी बरसते हैं जब समुद्र से उन्हें भरपूर पानी मिले। यदि समुद्र से सम्बन्ध टूट जाय तो बादलों का बरसना तो दूर उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जायगा। तब केवल धूलिकण ही यदाकदा बदली बनकर घूमते दृष्टिगोचर होंगे। परमात्मा से सम्बन्ध टूट जाने पर आत्मा अपना वर्चस्व खो बैठती है, आत्म बल के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते, महानता तिरोहित हो जाती है केवल काय कलेवर ही छिपकली की कटी हुई पूँछ की तरह उछल कूद करता रहता है। हममें से अधिकाँश को शरीर मात्र बनकर जीना पड़ रहा है। आत्मा की गरिमा के वर्णित कोई चिह्न अपने में दीखते नहीं। इसे आत्मा और परमात्मा के बीच गतिरोध ही समझा जाना चाहिए। परित्यक्ता पत्नी की भाँति उस पर उदासीनता ही छाई रहती है।
साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति है। मन्त्र साधन उसका कर्म पक्ष है। यों आत्म ज्ञान भी कम महत्व का नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है। फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी, दार्शनिक, शास्त्रज्ञ, वेदान्ती होने भर से आत्मबल सम्पन्न नहीं हो सकता। इसके लिए उसे साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग है। मन्त्र साधन इसी राज मार्ग की तरह समझा जाना चाहिए।
मन्त्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध- लयबद्ध और वृत्रकार। एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्द विन्यास का उच्चारण किया जाता रहे तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। तब शब्द तरंगें सीधी चलने की अपेक्षा वृत्ताकार घूमने लगती हैं। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाय तो उसके दो परिणाम होंगे एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दीखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदलकर गतिशील चक्र के रूप में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाय तो उसकी जान ले सकता है। इसी प्रकार यदि उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जायगा॥ मन्त्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस, एक स्वर, एक लय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें- सीधी या साधारण नहीं रह जातीं। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अन्तरंग पिण्ड में तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मन्त्र का चमत्कार कहा जा सकता है।
मन्त्रों का शब्द चयन योग विद्या में निष्णात तत्ववेत्ताओं से दिव्य चेतना एवं सघन अनुभूतियों के आधार पर किया होता है। यों उस शब्द विन्यास में कुछ प्रेरणाप्रद अर्थ और सन्देश भी होते हैं पर उनकी महत्ता उतनी नहीं, जितनी शब्द गुन्थन को। अर्थ की दृष्टि से भी उनसे भी अधिक भाव पूर्ण कविताएं हैं और हो सकती हैं। फिर सूत्र जैसे छोटे मन्त्रों में उतनी विस्तृत भाव शृंखला भरी भी नहीं जा सकती जितनी मनःक्षेत्र को प्रभावित करने के लिए आवश्यक है। वस्तुतः मन्त्र की महत्ता उसके ‘स्फोट’ में है। स्फोट का अर्थ है ईश्वर तत्व में होने वाला ध्वनि विशेष का असाधारण प्रभाव। तालाब में छोटा ढेला फेंकने से थोड़ी और छोटी लहरें उत्पन्न होती हैं पर यदि बहुत ऊँचाई से बहुत जोर से कोई बहुत बड़ा पत्थर पटका जाय तो उसका शब्द और स्पन्दन दोनों ही अपेक्षाकृत बड़े होंगे और उसकी प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि भी बड़ी लहरों के साथ दिखाई देगी। मन्त्र विद्या के संदर्भ में इसी को स्फोट कहा जाता है। इसकी तुलना बारूद, कारतूस, विस्फोट से उत्पन्न ध्वनि के साथ, अथवा अणुबम फटने के साथ की जा सकती है। मन्त्र साधक को यह जानना और जताना पड़ता है कि स्पोट की कितनी मात्रा अभीष्ट है। असन्तुलित विस्फोट बन्दूक या तोप तक को फाड़ सकता है। असंगत साधना से लक्ष्य प्राप्त होना तो दूर उलटा अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है।
मन्त्र की तीसरी धारा है लय। उसे किस स्वर में- किस प्रवाह में- उच्चारित किया जा रहा है इसे लय कहते हैं-साधारणतया मानसिक वाचिक और उपाँशु नाम से लय की न्यूनाधिकता का वर्गीकरण किया जाता है। वेद मन्त्रों में इसे उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहते हैं। साम गान में सप्त स्वरों तथा उनके आरोह अवरोह को ध्यान में रखा जाता है। यह लय क्रम ही संगीत का मूल आधार है इसकी व्याख्या ‘शब्द ब्रह्म’ कह कर की जाती है। जानकारों को पता है कि शास्त्र सम्मत संगीत का शरीर और मन पर ही नहीं बाह्य वस्तुओं और परिस्थितियों पर भी प्रभाव पड़ता है। दीपक राग से बुझे दीपक जलने मेघ राग से वर्षा होने की कथा गाथाएं सर्वथा अविश्वस्त नहीं हैं। संगीत के वृक्ष, वनस्पतियों, फसलों और दुधारू पशुओं पर होने वाले प्रभाव को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है। रोगों की निवृत्ति में संगीत की भूमिका निकट भविष्य में और भी अधिक मिलेगी और उसे चिकित्सा में प्रमुख स्थान मिलेगा। वैदिक और ताँत्रिक मन्त्रों का सारा वाङ्मय लय तथ्य को अपने गर्भ में छिपाये बैठा है। किसी भी रीति से -किसी भी ध्वनि से मन्त्र साधना भावात्मक आकाँक्षा भले ही पूरी करे उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।
चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है लकड़ी को नहीं। बिजली का प्रवाह भी धातु के तारों के सहारे ही चलता है। रबड़ आदि अधातु पदार्थों में बिजली नहीं दौड़ सकती। इसी प्रकार मन्त्र साधक को अपनी शारीरिक और मानसिक स्वच्छता एवं समर्थता के लिए प्रयास करते हुए अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाना पड़ता है कि अन्तरिक्ष से अवतरित होने वाला शक्ति प्रवाह धारण कर सकना सम्भव हो सके। राज योग में यम नियमों की साधना मानसिक परिष्कार के लिए और आसन प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरम्भिक चरणों को पूरा न किया जाय तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्च स्तरीय साधना सम्भव ही न होगी। आहार-विहार के प्रतिबन्ध-व्रत, संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही है। स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवन क्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे तो फिर मन्त्र साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
इसके अतिरिक्त पाँचवीं शर्त है- भाव भरी मनः स्थिति। इसे दूसरे शब्दों में श्रद्धा कह सकते हैं। जिस प्रकार भौतिक जगत की प्रमुख शक्तियों में विद्युत अगण्य है उसी प्रकार आत्मिक जगत में सशक्त उपलब्धियाँ श्रद्धा की उत्कृष्टता पर निर्भर हैं। मनोविज्ञान वेत्ता विचारों की क्षमता और संकल्प शक्ति का गुण गान मुक्त कण्ठ से करते रहे हैं। मनुष्य को उठाने गिराने और बनाने में निष्ठा एवं आस्था का महत्व असाधारण है। आत्मबल और मनोबल का चमत्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव के रूप में परिणत कर देने में समर्थ होता है। संसार की महान घटनाओं की पृष्ठभूमि प्रचुर साधनों पर नहीं प्रचण्ड संकल्प शक्ति पर ही रखी गई है। सफलताओं का समग्र इतिहास दृढ़ निश्चय के साथ जुड़े हुए प्रचण्ड पुरुषार्थ की लेखनी से ही लिखा गया है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, क्लेरो वायेन्स, टेलीपैथी, आदि योग विद्या के छुटपुट खेल संकल्प शक्ति की ही फुलझड़ियाँ हैं। इसी तथ्य को साधना का प्राण कह सकते हैं।
अविश्वासी और अन्यमनस्क व्यक्ति उपेक्षा और उदासीनता के साथ कोई साधन करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्ट साध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ न होगा। किन्तु यदि भाव भरी मनोभूमि में थोड़ा भी साधन विधान अटूट श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न किया जाय तो उसका परिणाम तत्काल दृष्टिगोचर होगा। संदिग्ध और आशंका ग्रस्त मनोभूमि मानसिक धरातल को बहुत ही उथला बनाये रखती है उससे कोई बड़े दैवी अनुदान सँजोये नहीं जा सकते। साधनात्मक विधि विज्ञान का अपना महत्व है पर यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ‘प्राण’ ही माना जायेगा। प्राण रहित शरीर को कितना ही सँजोया सँभाला जाय उससे कुछ काम न बनेगा। भावना रहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है। अस्तु साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा सिक्त ही बनाना पड़ता है।
अध्यात्म विज्ञान की गरिमा भौतिक विज्ञान से असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है। यन्त्र बहुमूल्य हो सकते हैं पर मन्त्रों की महत्ता से उन्हें तोला नहीं जा सकता है। संसार की सम्पदाएं-आत्मिक विभूतियों की तुलना में नगण्य हैं। जड़ और चेतन की गरिमा में जमीन आसमान जितना अन्तर है। इसे ध्यान में रखा जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि हमें भौतिक सम्पदाओं के लिए ही लालायित नहीं रहना चाहिए वरन् आत्मिक विभूतियों को भी उपार्जित करना चाहिए। आत्मबल संग्रह करने के लिए कदम बढ़ाना सूर्य की ओर मुँह करके चलने की बराबर है। इससे सम्पत्ति रूपी छाया पीछे-पीछे चलेगी। किन्तु यदि छाया की ओर मुँह करके दौड़ा जाय तो वह पकड़ में नहीं आयेगी और जितनी तेज दौड़ होगी वह भी आगे उतनी ही तेजी के साथ दौड़ती चली जायगी। विभूति-वान सम्पत्ति का लाभ अनायास ही उठा लेते हैं जबकि सम्पत्तिवानों को भौतिक विक्षोभ और आत्मिक असन्तोष की दुहरी हानि उठानी पड़ती है।
हम आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ें। आत्म विज्ञान की सहायता लें। आत्मबोध से दृष्टिकोण परिष्कृत करें और साधना निरत रह कर विभूतियों के अधिकारी बनें। इस संदर्भ में मन्त्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
(अपूर्ण)
एक दिन किशोरीलाल मश्रूवाला ने गान्धी जी से कहा- मैं आपका अनुयायी नहीं, आपके साथ चलने का प्रयत्न करता हूँ। आपको जिस सत्य की पहचान है उसी को अपने विवेक के आधार पर मैं भी समझने के लिए सचेष्ट हूँ।
उनका आशय यह था कि अनुयायी बनकर पीछे चलने से वे स्वतन्त्र चिन्तन न कर सकेंगे। किसी महापुरुष के पीछे चलने पर हम उसकी पीठ भर देख सकेंगे। मुँह नहीं। इससे उसके चले जाने के बाद दिशा भूल जाने का खतरा रहेगा। साथ चलने से उसके चले जाने के बाद भी अपने को सहाय एवं अपंग अनुभव न करेंगे क्योंकि तब सत्य हमारा अपना सत्य भी बन चुका होगा।
इस पृथ्वी को दो तिहाई भाग जल में डूबा हुआ है और एक तिहाई पर थल दिखाई पड़ता है। थल में जो जीवन सौंदर्य और वैभव दिखाई पड़ता है वह भी जल का ही अनुदान है। समुद्री पानी भाप बनकर बादलों की तरह आकाश में उड़ता है और फिर वही बरस कर वृक्ष वनस्पति, अन्न, फल आदि उत्पन्न करता है। जीव उसी पर जीवित है। जल देवता का यह अनुग्रह यदि थल पर न हो, पानी न बरसे तो सर्वत्र श्मशान जैसी भयंकरता दीख पड़े, फिर न कहीं पेड़ पौधे घास पास दिखाई पड़े और न जीव जन्तु। तवे की तरह जलती हुई जमीन तब केवल रेतीले आँधी तूफानों की गर्द गुबार से ही भरी रहे।
समुद्र में अपार सम्पदा भरी पड़ी है। जितना सोना, चाँदी, रत्न राशि धातुएँ, रसायनें पृथ्वी पर दिखाई पड़ती हैं उनसे सैंकड़ों गुनी अधिक सागर तल में दबी पड़ी हैं। मनुष्य उन्हें जानता नहीं, या अभी ढूंढ़ नहीं पाया इससे उस अपार सम्पत्ति भण्डार की गरिमा कम नहीं होती।
इस पृथ्वी पर जितना पेट्रोलियम है उसका 40 प्रतिशत भाग समुद्र के गर्भ में है। उसे निकालने का थोड़ा सा प्रयत्न अभी सिर्फ कम्यूनिस्ट देशों में आरम्भ हुआ है। वह जब बड़े पैमाने पर निकाला जाने लगेगा तो पैट्रोल की कोई कमी नहीं रहेगी। लगभग 40 प्रकार के उपयोगी खनिज एवं रसायन समुद्र में प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं उन्हें जब बाहर लाया जायगा तो उनसे भी सम्पत्ति एवं सुविधाएं बढ़ाने में बड़ी सहायता मिलेगी।
शोध कर्ताओं के अनुसार अकेले प्रशान्त महासागर में ही 10 अरब टन सोना, 50 करोड़ टन चाँदी 20 अरब टन यूरेनियम और अरबों टन मैग्नीज भरा पड़ा है। इन सम्पदाओं के भण्डार में हर वर्ष करोड़ों टन की वृद्धि हो जाती है। यह आँकड़े तो एक समुद्र के हैं संसार के अन्य समुद्रों का भी लेखा-जोखा लिया जाए तो प्रतीत होगा कि इस समुन्नत कही जाने वाली परिस्थिति में भी धरती की सम्पदा की तुलना में समुद्र का वैभव कहीं अधिक है।
बढ़ती हुई आबादी को खुराक देने के लिए अब समुद्र का द्वार खटखटाने की तैयारी की जा रही है। लाँक्डीह एयर क्राफ्ट कार्पोरेशन के अध्यक्ष श्री ए.कार्ल कोशियन का कथन है अगले दिनों धरती मनुष्य की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकने में असमर्थ हो जायेगी। तब जीवित रहने के लिये समुद्र का आश्रय लेने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहेगा।
जो समुद्री अनुसंधान इन दिनों चल रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि समुद्र से मीठा पानी प्राप्त करने के-खाद्य सामग्री उगाने के-खनिज तथा बिजली प्राप्त करने के इतने उपाय अगले दस वर्षों में खोज निकाले जायेंगे जिनके आधार पर भावी पीढ़ी को जीवन निर्वाह की आवश्यकता साधन सामग्री उपलब्ध हो सके।
यदि जनसंख्या वर्तमान क्रम से बढ़ती रही और उसे जीवित रखना भी आवश्यक प्रतीत हुआ तो खाद्य समस्या का हल समुद्रीय वनस्पतियों से ही निकलेगा। अन्न की तो वर्तमान आबादी के लिये भी कमी पड़ती है। रासायनिक खादों, जल व्यवस्थाओं एवं यन्त्रों द्वारा समुन्नत कृषि करने पर भी खाद्य उत्पादन में इस क्रम से वृद्धि नहीं हो सकती है जिस क्रम से कि जनसंख्या बढ़ रही है। इस अन्न संकट को दूर करने के लिये समुद्र की शरण में जाने के अतिरिक्त और कहीं आश्रय नहीं मिल सकता।
समुद्र से लेकर छोटे से छोटे पोखर जोहड़ों तक में कई प्रकार की-वनस्पतियाँ उगती हैं। काई को हर कोई जानता है पर एक काई ही नहीं, जल में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का व्यापक क्षेत्र है, जिनके अंतर्गत उनके लाखों आकार प्रकार और वंश वर्ग आते हैं। आमतौर से वह जलचरों का आहार रही है। मनुष्य के लिये धरती पर उपजने वाली वनस्पतियाँ ही काफी थीं, वह उन्हीं से गुजारा कर लेता था तो उन जल वनस्पतियों की बात क्यों सोचता। पर अब तो स्थिति ही बदल गई। जनसंख्या की वृद्धि ने नये आधार खोजने के लिये विवश कर दिया है इस विवशता में वरुण देवता का दरवाजा खटखटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
जल वनस्पतियों में मनुष्य के खाये जाने योग्य सबसे उपयुक्त वनस्पति ढूंढ़ निकाली है- नाम है उसका- क्लोरेला। यह बहुत छोटे प्रकार की एक काई की ही किस्म है पर तो तत्व पाये जाते हैं वे मनुष्य ही नहीं अन्य थलचरों की-पशु पक्षियों की भी खुराक बन सकने योग्य है। क्लोरेला में - प्रोटीन 50 प्रतिशत, चिकनाई 7 प्रतिशत होती है। पके नीबू की तुलना में विटामिन और उपयोगी किस्म के कार्बोहाइड्रेट उसमें पर्याप्त मात्रा में होते हैं।
भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संसार के प्रमुख दस देशों ने इसकी कृषि करनी आरम्भ की है। बड़े पैमाने पर इस प्रयोग को हाथ में लेने वालों में अमेरिका, जापान, हालैण्ड, जर्मनी और इसराइल मुख्य हैं। यह कृषि बड़ी सरल है और कम खर्च की है। एक किसान बिना किसी मदद के अकेला ही 100 एकड़ कृषि की देखभाल तथा बुवाई, कटाई कर सकता है। इसकी वृद्धि आश्चर्यजनक है 12 घंटे में इसका वजन चौगुना हो जाता है। एक एकड़ में- एक साल में 40 टन फसल काटी जा सकती है। इसके लिए खादें तैयार की जा रही है ताकि इस काई को और भी अधिक गुणकारी बनाया जा सके।
वनस्पति शास्त्री डॉ. सिडनी ग्रीन फील्ड का कथन है कि अन्तरिक्ष यात्रियों के लिये क्लोरेला आदर्श खुराक की तरह काम में लाई जा सकती है, वह यान में रखे पानी के टैंक में रोज उगाई और रोज खाई जा सकती है। उसकी कृषि अन्तरिक्ष यानों में भी हो सकती है। उसे खाद आदि की सहायता से और भी उन्नत किस्म की बनाया जा सकता है।
समष्टि जगती का आधार जिस प्रकार समुद्र है उसी प्रकार व्यक्ति की निजी सत्ता का अस्तित्व एक निजी सागर पर ठहरा हुआ है। यह सागर रक्त के रूप में हमारे समस्त शरीर में व्याप्त है। मोटी आँख से देखने पर यह लाल पानी भर दीखता है पर बारीकी से देखने पर उसमें वे समस्त विशेषताएं और सम्पदाएं मौजूद हैं जो दृश्यमान सागर में दिखाई पड़ती हैं। प्राणि जगत का जीवनाधार सागर जल है और जीवधारा का व्यक्तिगत अस्तित्व उसके रक्त पर निर्भर है। जीवात्मा एक प्रकार की हेल मछली है जो रक्त रूपी शरीर में स्वच्छन्द विचरण करती है और उसी से अपने लिये सभी सुविधा सामग्री प्राप्त करती है। रक्त की महत्ता यदि हम समझें उसे शुद्ध और सशक्त बनाये रहें तो शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं आत्मिक प्रगति की दृष्टि से भी हम उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं।
हमारे शरीर में पानी की मात्रा अत्यधिक है। देह के पूरे वजन में दो तिहाई भाग पानी और एक तिहाई में दूसरी चीजें हैं। रक्त मुख्य रूप से पानी ही है। शरीर में प्रायः 5 लीटर रक्त होता है, उसमें 90 प्रतिशत तो पानी ही होता है। अन्य तत्व तो उसमें बहुत कम ही रहते हैं। ठोस और कठोर दीखने वाली हड्डी में भी पानी की काफी मात्रा रहती है।
औसतन हर मनुष्य को ढाई तीन लीटर पानी हर रोज पीना पड़ता है। अधिक मेहनत करने वाले- अधिक और बैठे ठाले लोग कम पीते हैं। गर्मी में प्यास अधिक लगती है और सर्दियों में कम। गर्मी के कारण शरीर का बहुत सा पानी पसीना तथा भाप बनकर बाहर निकल जाता है। इसी की पूर्ति के लिये उन दिनों अधिक प्यास लगती है। पेशाब और साँस में होकर भी पानी बाहर निकलता रहता है। साँस द्वारा प्रायः 250 ग्राम पानी बाहर निकलता है। यह निकासी अंदरूनी सफाई के लिये ही नहीं- शरीर को शीतल रखने की दृष्टि से भी आवश्यक है।
स्वस्थ मनुष्य के शरीर में उसके वजन का चौदहवाँ भाग वजन रक्त का रहता है। इसे डेढ़ गैलन माना जा सकता है। स्त्रियों में मासिक धर्म तथा प्रजनन के कारण उसकी मात्रा कुछ कम रहती है। औसत महिला में एक गैलन से कुछ कम ही खून होता है। रक्त में जल की मात्रा 70 प्रतिशत रहती है।
यों ठोस दीखने वाली भी कोई वस्तु ऐसी नहीं जिसमें पानी का अंश न हो। हड्डियों तक में 25 प्रतिशत पानी होता है। चर्बी में कोषों में जरूर जलाँश 20 प्रतिशत रहता है। बाकी सर्वत्र उसका बाहुल्य है। गुर्दों में 81 प्रतिशत और मस्तिष्क में उसकी मात्रा 85 प्रतिशत रहती है।
रक्त का एक महत्वपूर्ण भाग है- प्लाज्मा। यह मटमैले पीले से रंग का एक तरल पदार्थ है। रक्त का 55 प्रतिशत आयतन प्लाज्मा से और 45 प्रतिशत अन्य कणों से भरा रहता है। प्लाज्मा में तैरते रहने वाले तैराकों को रक्त के लाल कण, सफेद कण तथा सफेद पपड़ियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
रक्त के मुख्य कार्य पाँच हैं-
(1) विभिन्न अवयवों के तन्तु कोषों तक उपयुक्त आहार पहुँचाना तथा उन कोषों में उत्पन्न मल को उस स्थान से हटाना।
(2) विभिन्न अवयवों में जल तथा अम्ल की मात्रा का नियन्त्रण तथा शारीरिक तापमान की स्थिरता रखना।
(3) हारमोन आदि ग्रन्थियों में उत्पन्न अतिरिक्त रसों को अपने में मिलाकर उनका लाभ समस्त शरीर को-तथा उनकी अपेक्षा रखने वाले अंग विशेष तक को-पहुँचाना।
(4) प्रत्येक कोष को ऑक्सीजन पहुँचाना और वहाँ से उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालना।
(5) रोग कीटाणुओं से लड़कर शरीर की सुरक्षा का प्रबन्ध रखना।
रक्त में उपस्थित कणों पर लाल रंग चढ़ा होता है। इस रंग को ‘हीमोग्लोबिन’ कहते है। यह प्रोटीन जैसा पदार्थ है। इसके एक अण्ड में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन के कितने ही परमाणुओं के साथ-साथ एक लौह कण भी रहता है। लाल रंग इस लौह कण के कारण ही होता है। समुद्री जीव जन्तुओं में रक्त नीले रंग का होता है। क्योंकि उनके रक्त कणों में लोहा न होकर ताँबा रहता है। नीले रक्त का नाम शरीर शास्त्र में- हेमोस्यनिक दिया गया है।
प्लाज्मा में तैरने वाले ठोस कणों को ही - रक्त का सार भाग माना जाता है। उन्हीं के द्वारा शरीर के कोषों को ऑक्सीजन तथा आहार मिलता है। इन लाल कणों की बनावट गोल चपटी तश्तरी जैसे होती है। किनारे मोटे बीच का भाग पतला और व्यास 7.2 माइक्रोन होता है।
यों रक्त का भण्डार हृदय माना गया है पर इन लाल कणों की उत्पत्ति का केन्द्र शिर की हड्डी के खोखले भाग में और रीढ़ की हड्डी में होता है। हाथ पाँव की हड्डियों के अन्तिम छोरों पर भी यह लाल कण बनते हैं। इन लाल कणों की औसत आयु 125 दिन है। इसके बाद वे मरने लगते हैं। मृतकों की यह लाश ‘हेमोकोमिया’ कहलाती है। इन लाशों को हटाने का काम तिल्ली के जिम्मे है। तिल्ली में प्रचुर संख्या में मैकरोफ्लेजेज कोशिकाएं होती हैं। इनका काम है मृत लाल कणों की लाशों को जलाकर उस राख को अपने में आत्मसात कर लेना।
साधारणतया यह लाल कण प्रति सेकेंड 23,00,0000 की संख्या में मरते रहते हैं। सन्तोष की बात इतनी ही है कि बुढ़ापे और बीमारी की स्थिति को छोड़कर उनकी जन्म संख्या, मृत्यु संख्या की तुलना में कुछ अधिक ही रहती है।
रक्त में अशुद्धि अभक्ष्य आहार से उत्पन्न होती है। रोगों का प्रारम्भ यहीं से होता है। मिर्च, मसाले, माँस मदिरा, तले भुने तामसिक पदार्थ एक तो पचते ही कठिनाई से हैं, फिर वे पच भी जायें तो अशुद्ध रक्त ही उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार गन्दगी डालने से स्वच्छ सरोवरों का जल भी दुर्गन्ध युक्त हो जाता है उसी प्रकार अभक्ष्य भोजन से उत्पन्न अशुद्ध रक्त अनेक रोगों का केन्द्र बना रहता है। मनोविकार भी रक्त को विषैला बनाते हैं। क्रोध, भय, शोक, चिन्ता, निराशा जैसी मनः स्थिति का प्रभाव धीरे-धीरे रक्त में सन्निहित जीवनी शक्ति को नष्ट करता चला जाता है और उसकी दुर्बलता देखकर कितनी ही बीमारियाँ चढ़ाई कर देती हैं।
रक्त केवल रंगीन पानी नहीं है। उसमें चेतना के कण कोशिकाओं के रूप में भर पड़े हैं। इन्हीं की सम्मिलित शक्ति हमारी वैयक्तिक चैतन्य सत्ता के रूप में दृष्टि गोचर होती है। यह रक्त के चेतन कण उस आहार और संपर्क से प्रभावित होते हैं जो खाया या अपनाया जाता है। यदि अनीति उपार्जित, दुष्ट प्रकृति वालों के द्वारा पकाया या परोसा हुआ होगा तो उसके साथ जुड़े हुए संस्कार रक्त कणों को प्रभावित करेंगे और मनुष्य की मनः स्थिति वैसे ही दुष्टता और निष्कृष्टता से घिरती भरती चली जायगी। संपर्क का अर्थ है समीपता। जैसे लोगों के साथ या समीप रहा जाता है। उसकी विद्युत चेतना भी अपना प्रभाव छोड़ती है। शारीरिक या मानसिक घनिष्ठता जितनी गहरी होगी यह प्रभाव भी उतना ही गहरा पड़ेगा। नर-नारी का यौन संपर्क तो पारस्परिक चेतना का अत्यन्त सघन प्रत्यावर्तन करता है। इसलिये जहाँ कुसंग से बचने दुष्टों से दूर रहने के लिये कहा जाता है वहाँ रक्त की उच्च स्तरीय सशक्तता की रक्षा के लिए निकृष्ट स्तर के व्यक्तियों से दाम्पत्य सम्बन्ध नहीं स्थापित करना चाहिए। विवाह सम्बन्ध में यदि ऐसा ध्यान न रखा जाय काम सेवन का कुत्सित स्तर अपनाया जाय तो न केवल घृणित मूत्र रोग उठ खड़े होते हैं वरन् चेतना स्तर की उत्कृष्टता को भी भारी आघात पहुँचता है। इसलिए साथी के चुनाव में रंग रूप का नहीं वरन् उसके चेतनात्मक स्तर का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अन्यथा कुसंग से प्रभावित रक्त अपनी आत्मिक विशिष्टता और प्रतिभा सम्पदा को गँवा बैठेगा।
ब्रह्मचर्य से रक्त कणों में चैतन्यता और ऊर्जा अक्षुण्य बनी रहती है, यही शक्ति एकत्रित होकर चेहरे पर ओजस् मस्तिष्क में कुशाग्रता, व्यक्तित्व में प्रतिभा, वाणी में प्रखरता और अन्तःकरण में महानता के रूप में प्रतिबिम्बित होती है। कामसेवन में अति रुचि रखने वाले एवं अश्लील चिन्तन में निरत रहने वाले शारीरिक, मानसिक सम्भोग से क्षति उठाते रहते हैं।
समुद्र के गर्भ में छिपी हुई सम्पदा की तरह रक्तकणों में रत्न मणियों से अधिक वैभव छिपा हुआ है। जिस तरह उपलब्ध करने का ज्ञान और साधन न होने के कारण समुद्र जैसे महान भाण्डागार के समीप रहकर भी बच्चे कुछ लाभ नहीं उठा पाते, खेलने के लिये सीप घोंघे भर बटोरते रहते हैं वैसे ही हम रक्त रूपी चेतना के समुद्र में निवास करते हुए उन सम्पदाओं से लाभान्वित हो नहीं पाते जिनसे सिद्ध योगी और तपस्वी सम्पत्तिवान बनते हैं।
गरम करके सस्ती और विषैली पारा-धातु को कुशल चिकित्सक मकरध्वज जैसी संजीवनी रसायन में बदल देते हैं। तपस्वी लोग तितीक्षा और साधना की योगाग्नि में अपनी रक्त सम्पदा को प्रचण्ड विद्युत शक्ति सम्पन्न बना लेते हैं और इस हाड़ माँस के शरीर से प्रचण्ड विद्युत शक्ति संवाहक यन्त्र का प्रयोजन पूरा करते हैं। हमारे रक्त सागर में अपार सम्पदाएं दबी पड़ी हैं। साधना विज्ञान की क्रिया-पद्धति यही सिखाती है उस अविज्ञात को कैसे जाना जाय और उस अनुपलब्ध को कैसे प्राप्त किया जाय जो हमें दिव्य सम्पदाओं से सुसम्पन्न बना सकता है। बाहर भटकने की अपेक्षा यदि हम अपने भीतर ही तलाश करें तो विभूतियों भरा ‘आपा’ हमें वह सब कुछ प्रदान कर सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है और उन सब समस्याओं को हल कर सकता है जिनके कारण हम उद्विग्न हैं।
धन की तीन गति हैं- दान, भोग और नाश। जो न देता है, भोगता है, उसकी तीसरी गति होती है।
-भर्तृहरि
अतीत एक तथ्य है, वर्तमान अस्थिर है और भविष्य अज्ञात। अज्ञात से कुछ लोगों को डर लगता है- इसलिये वे वर्तमान से चिपके रहना चाहते हैं या बीते को वापस लाना चाहते हैं, किन्तु प्रकृति के नियम और काल के क्रम के विपरीत काम करने वाले सफल नहीं हो सकते।
भविष्य से डरिये मत, बल्कि उसके निर्माण में रुचि लीजिये। सँजोये सपनों को सँवारिये, कल्पना को कर्म से गढ़िये और योजना को युक्ति से पूरा कीजिए।
-दीनदयाल उपाध्याय
अहंकार और अहंभाव देखने में एक जैसे लगते हैं और उनको निन्दास्पद समझा जाता है पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। दोनों में से केवल अहंकार ही निन्दनीय है। अहंभाव तो जीवन का मेरुदण्ड है, यदि वह न हो तो सीधा खड़ा रहना ही कठिन हो जाय।
अहंकार कहते हैं- भौतिक वस्तुओं और शारीरिक क्षमता पर इतराने को- इन कारणों से अपनों को दूसरों से श्रेष्ठ समझने को- अपनी इस उपलब्धि का ऐसा भौंड़ा प्रदर्शन करने को जिससे औरों पर अपने बड़प्पन की छाप पड़े। यह प्रवृत्ति यह जताती है कि यह व्यक्ति सम्पदाओं को हजम नहीं कर पा रहा है और वे ओछेपन के रूप में फूट कर निकल रही हैं।
अन्न जब पचता नहीं तो उलटी और दस्त के रूप में फूटता है। अन्न श्रेष्ठ था पर जब वह इस प्रकार घिनौना होकर बाहर निकलता है तो देखने वाले का जी बिगड़ता है और उस रोगी को भी कष्ट होता है। अन्न बुरा नहीं है और न उसका खाया जाना है। चिन्ता का विषय ‘हैजा’ है। सम्पदाएं बुरी नहीं, उनका होना हेय नहीं, पर उनका नशा बुरा है- जिसे अहंकार कहते हैं।
चावल, जौ, गुड़ इनमें से कोई भी बुरा नहीं। इन्हें हविष्यान्न कहते हैं। पर इन्हें सड़ा कर जब शराब बनाई जाती है तो वह अहितकर और अवाँछनीय बन जाती है। सम्पदा जब विकृत होकर किसी व्यक्ति के मन पर छाती है तो वह नशे जैसा प्रभाव करती है और मनुष्य उन्मत्त होकर उद्धत आचरण करने लगता है। सम्पदाओं की जब ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है तो उसे अहंकार कहा जाता है।
अहंकारी व्यक्ति इस भ्रम में पड़ जाता है कि वह उपलब्धियों के कारण दूसरों से बहुत बड़ा हो गया। उसकी तुलना में और सब तुच्छ हैं। सबको उसकी सम्पदाओं का विवरण जानना चाहिए और उस आधार पर उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करके सम्मान प्रदान करना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए वह विविध विधि ऐसे आचरण करता-ऐसे प्रदर्शन करता है जिससे लोग उसका बड़प्पन भूल न जायें। भूल गये हों तो फिर याद कर लें। उसके वार्तालाप में आधे से अधिक भाग आत्म प्रशंसा का होता है। बात-बात में अपने वैभव, पराक्रम और बुद्धिमत्ता की चर्चा करता है और अपने को सफल सिद्ध करता है। यद्यपि ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
शारीरिक बलिष्ठता गुण्डागर्दी में उभरती है। इसमें यही प्रवृत्ति काम करती है कि लोग उसके बल पर अपना ध्यान केन्द्रित करें, उसे सराहें। यह प्रयोजन अच्छे-सत्कार्य करके भी पूरा किया जा सकता था पर ओछे मनुष्य का दृष्टिकोण उतना परिष्कृत होता कहाँ है? उसे यह बात सूझती कब है। उसमें उस प्रकार की योग्यता भी कब रहती है। सरल उद्दण्डता पड़ती है। किसी का अपमान कर देना, सताना, तोड़ फोड़, अपशब्द, अवज्ञा, उच्छृंखलता, मर्यादाओं का व्यतिक्रम यही बातें ओछे व्यक्ति आसानी से कर सकते हैं। सो ही वे करते हैं। यह विकृत अहंकार ही गुण्डागर्दी के रूप में फूटता है।
किसी का रंग गोरा हो- छवि सुन्दर हो, तो उसके इतराने के लिये यह भी बहुत है। फिर उसके नखरे देखते ही बनते हैं। छवि को सजाने में ऐसा लगा रहता है मानो शृंगार का देवता वही हो। अन्य लोग उसे अष्टावक्र की तरह काले कुरूप दीखते हैं और कामदेव का अवतार अपने में ही उतरा दीखता है। उसकी इस विशेषता को लोग देखें तो- समझें तो-सराहें तो यही धुन हर घड़ी लगी रहती है। तरह तरह के वेश विन्यास, शृंगार सज्जा की ही उधेड़बुन छाई रहती है। दर्पण को क्षण भर के लिए छोड़ने को भी जी नहीं करता। यह रूप का प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति भिन्न लिंग वालों को आकर्षित करने की ओर बढ़ती है। पुरुष स्त्रियों के सामने और स्त्रियाँ पुरुषों के सामने इस तरह बन-ठन कर निकलते हैं जिससे उन्हें ललचाई आँखों से देखा जाय। वर्तमान शृंगारिकता इसी ओछेपन को लेकर बढ़ रही है और उसकी प्रतिक्रिया मानसिक व्यभिचार से आरम्भ होकर शारीरिक व्यभिचार में परिणत हो रही है। अहंकार की यह रूप परक प्रवृत्ति उस सुसज्जा शृंगारी को ऐसे जाल-जंजाल में फँसा देती है जिससे वह अपनी प्रतिष्ठा और शालीनता गँवाकर विपत्ति ही मोल लेता है।
धन का अहंकार ऐसे ठाट-बाट खड़े करता है जिससे उसकी अमीरी सबको विदित हो। मोटर, बँगले, जेवर, वस्त्र ठाट-बाट का इतना बवण्डर जमा कर लिया जाता है जिसके बिना आसानी से काम चलता रह सकता था। विवाह शादियों में लोग अन्धाधुन्ध पैसा फूँकते हैं। उसके पीछे अपनी अमीरी का विज्ञापन करने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता। महँगी चीजें सुरुचि के नाम पर अनावश्यक मात्रा में खरीदी जाती हैं पर वस्तुतः उसका कारण अमीरी की छाप डालना ही होता है। कई व्यक्ति दान पुण्य का ढोंग भी बनाते हैं। यद्यपि उदारता और परमार्थ का नाम भी उनके भीतर नहीं होता पर लोग उनकी अमीरी की बात जानें यह प्रयोजन जिनसे पूरा होता है- उन्हीं दान पुण्यों को अपनाते हैं। ऐसे लोगों का आधा धन प्रायः इन्हीं विडम्बनाओं में खर्च हो जाता है इस प्रकार उस अहंकार की पूर्ति का वे महँगा मूल्य चुकाते रहते हैं।
विद्या का अभिमान और भी अधिक विचित्र है। विद्या का फल ‘विनय’ होना चाहिए। पर यदि विद्वान अविनय शील हो जाय। पग-पग पर अपना सम्मान माँगे और चाहे, उसमें कहीं रत्ती भर कमी दीखे तो पारा चढ़ जाय इस विचित्र मनःस्थिति में ही आज के विद्वान कलाकार देखे जाते हैं। कहीं बुलायें जायें तो ऊँचे दर्जे के वाहन, महँगे निवास, कीमती व्यवस्था की शर्त पहले लगाते हैं। उन्हें सम्मानित स्थान मिला कि नहीं, पुरस्कार उनके गौरव जैसा हुआ कि नहीं, आदि नखरे देखते ही बनते हैं परस्पर कुढ़ते और एक दूसरे की काट करते हैं- इसलिए कि उनका बड़प्पन, सम्मान कहीं दूसरे दर्जे पर न आ जाए। जिन्हें सभा सम्मेलनों में कभी ऐसे लोग बुलाने पड़ते हैं वे देखते हैं कि जो बाहर से विद्वान कलाकार दीखते थे, भीतर अहंकार से ग्रस्त होने से वस्तुतः वे कितने छोटे हो गये हैं। विद्वानों का संगठन इसी कारण बन पाता है, न टिक पाता है, न चल पाता है। अहंकार की ऐंठ में वे सहयोगी बन ही नहीं पाते- प्रतिद्वन्द्वी ही रहते हैं।
सत्ता का मद पहले से ही बहुत था, ओछापन जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है वह अहंकार और भी बढ़ रहा है। ऐसे सरकारी कर्मचारी जो जनता का हित अहित कर सकते हैं- जिनके हाथ में लोगों को सुविधा देना या असुविधा बढ़ाना है उनकी शान और नाक देखते ही बनती है। बेकार मनुष्य समय गँवाते रहेंगे पर लोगों की बात सुनने में व्यस्तता का बहाना करेंगे। सीधे मुँह बोलेंगे नहीं। बात अकड़ कर और अपमानजनक ढंग से करेंगे। इस ऐंठ से आतंकित जनता अपना काम पूरा न होते देखकर रिश्वत के लिये विवश होती है। शासन में या अन्यत्र बड़े संस्थानों में बड़े पदों पर अवस्थित लोगों का रूखा, असहानुभूति पूर्ण और निष्ठुर व्यवहार देखकर उन पर छाये हुए अहंकार के पद का कितना प्रभाव छाया हुआ है इसे भली प्रकार देखा जा सकता है।
सन्त तपस्वियों तक में यह अहंकार उन्माद भरपूर देखा जा सकता है। अपने घरों पर अपने लिये ऊंची गद्दी बिछाते हैं और दूसरे आगन्तुकों को नीचे बैठने की व्यवस्था रखते हैं। यह कैसा अशिष्ट और असामाजिक तरीका है। दूसरे के घर में जायें और वहाँ वे लोग ऊँचे आसन पर बिठायें- खुद नीचे बैठें तो बात कुछ समझ में भी आती है। पर अपने घर आया हुआ अतिथि तो देव है, उसे अपने से नीचा आसन नहीं देना चाहिए। बड़प्पन का अर्थ दूसरों को छोटा समझना या असम्मानित करना नहीं है। आज कल सन्त महन्त, योगी, यती, गद्दी धारी, अखाड़े बाज किसी भी तथाकथित धर्म नेता या अध्यात्म वेत्ता के पास जाइये उनके यहाँ यही अशिष्ट व्यवस्था मिलेगी कोई चरण स्पर्श न करे तो मुँह से भले ही कुछ न कहें, भीतर ही भीतर बेतरह कुढ़ेंगे।
एक सन्त दूसरे सन्त के यहाँ जाने में अपनी हेठी समझाता है। मैं क्यों उसके यहाँ जाऊँ- वह मेरे यहाँ क्यों नहीं आये? उसके आश्रम में मेरा आश्रम क्यों छोटा रहे? जैसी अहंमन्यता की अति वहाँ भी कम नहीं होती है दूर से देखने पर जो सन्त योगी दीखते थे, पास जाने और बारीकी से देखने पर वे भी अहंकार से बेतरह ग्रस्त रोगी की तरह ही दीखते हैं।
यह अहंकार ओछेपन का चिह्न है। अन्न हजम न होने पर मुँह से खट्टी डकारें बार-बार निकलती हैं और सड़ा हुआ बदबूदार अपान वायु शब्द करता हुआ निकलता है। ठीक इसी प्रकार वाणी से आत्म प्रशंसा-शेखीखोरी अपना बखान करने की भरमार यह बताती है कि पेट में अपच है और यह खट्टी डकारें मुँह से निकल रही हैं।
चकाचौंध उत्पन्न करने वाला ठाट-बाट जमाने में कितना समय, श्रम और धन नष्ट होता है, अपनी महत्ता का ढोल पीटने के लिये कितना निरर्थक सरंजाम इकट्ठा किया जाता है इसे देखकर यह समझा जा सकता है कि अपच अपान वायु के रूप में ढोल पीटने और ढिंढोरा करने की विडम्बना रच रहा है।
विभिन्न वर्ग और विभिन्न स्तर के लोग अपनी भौतिक सम्पदाओं का भौंड़ा प्रदर्शन अपने-अपने ढंग से करते रहते हैं उसमें उनकी आन्तरिक तुच्छता आत्मश्लाघा की खिड़की में से झाँकती दीखती है। श्रेष्ठ व्यक्ति सम्पदा को पचा जाते हैं हजम किया हुआ अन्न रक्त बन जाता है। सज्जनों की सम्पदा उनके व्यक्तित्व को श्रेष्ठतम बनाने के लिए प्रयुक्त होती है और उसका लाभ समाज को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में मिलता है। विवेकवान लोग सम्पत्ति को ईश्वर की अमानत मानते हैं और बैंक के खजाञ्ची की तरह अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हुए उसे सत्प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करते रहते हैं। पराई अमानत कुछ समय के लिये सँभालने के लिए चौकीदार का काम मिल जाय या बाँटने-वितरण करने की, गिनने की, ड्यूटी लग जाय तो इसमें अहंकार की क्या बात है? इस तथ्य को शालीनता समझती है। अस्तु वह बरसाती नदियों की तरह उफनती नहीं- समुद्र की तरह मर्यादा में रहती है।
अहंभाव इस अहंकार से सर्वथा विपरीत है। विवेकवान अहं का अर्थ ‘आत्मा’ लेते हैं। अपने को आत्मा मानते हैं। आत्मा का गौरव गिरने न पाये, उससे कोई ऐसा काम न बन पड़े जिससे आत्मा के स्तर को, गौरव को ठेस लगती हो इसका वे सदा ध्यान रखते हैं और कुमार्ग पर एक कदम भी नहीं धरते। ईश्वर का परम प्रतिष्ठित पुत्र मनुष्य अपनी गरिमा को गिराये और पिता को लजाये इतनी बड़ी भूल कैसे की जा सकती है? वह इस संदर्भ में पूरी तरह सतर्क रहता है।
उसके विचार उस स्तर के उत्कृष्ट होने जैसे परम पवित्र ‘आत्मा’ के लिए उपयुक्त हैं। उसके कार्य ऐसे होते हैं- जिनसे देवत्व की महिमा टपकती हो। आत्मा के ऊपर आच्छादित हो सकने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का आवरण ही अहंभाव स्वीकार करता है और इस बात का ध्यान रखता है कि वह प्रकाश स्वरूप है उसकी ज्योति इतनी शुभ्र होनी चाहिए कि समीपवर्ती लोगों के नेत्रों में चमक उत्पन्न हो और सही मार्ग पाने में वस्तुस्थिति समझने में सुविधा मिले। अहं भाव इसी परिधि में सक्रिय रहता है उसके साथ सज्जनता, शालीनता और नम्रता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहती है।
यदि तुम्हारा अहंकार चला गया है तो किसी भी धर्म पुस्तक की एक पंक्ति बाँचे बगैर व किसी भी मन्दिर में पैर रखे बगैर तुमको जहाँ बैठे हो वहीं मोक्ष प्राप्त हो जायगा।
-विवेकानन्द
वंशी से किसी ने पूछा- ‘कृष्ण तुम्हें बहुत प्यार करते हैं, चाहते हैं आखिर बात क्या है?’
वंशी का साधारण सा उत्तर था- मैँने अपने अन्दर का सारा द्रव्य निकाल कर उसे शून्य बना लिया है। अब गन्दगी के नाम पर मेरे अन्दर कुछ नहीं रहा। शायद इसी विशेषता के कारण कृष्ण का प्रेम मुझे प्राप्त है।
कलकत्ता के लिए अनेक लोग अनेक रास्तों से आते हैं। उसी प्रकार ईश्वर को प्राप्त करने के लिये अनेक भक्त साधक अनेक साधन विधान अपनाते हैं। यदि लक्ष्य निश्चित हो और चलने का क्रम ठीक बना रहे तो सभी को सफलता मिल जाती है।
भगवान के साथ भगवान का समर्पण भाव रहना चाहिए। मैं को मिटाकर तू में लीन होना चाहिए। इस संबन्ध में साँसारिक दृष्टि से किसी भी स्तर का माना जा सकता है। पिता, पुत्र, माता, बहिन, सहायक, स्वामी, सेवक, सखा, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्ता उससे माने इससे कुछ अन्तर नहीं आता। दूध को-दही, छाछ, रबड़ी, खोया आदि कुछ भी बनाकर खाया जा सकता है।
-सूर्य बहुत बड़ा है पर जरा सी बदली उसका प्रकाश हम तक आना रोक देती है। इसी प्रकार ईश्वर अति विशाल और सर्वसमर्थ है पर अज्ञान की अँधियारी उसका अनुग्रह हम तक आने का मार्ग अवरुद्ध कर देती है।
-माया ऐसी है जैसी पानी पर तैरने वाली काई। काई को हटा देने पर तुरन्त तो वह हट जाती है पर थोड़ी ही देर में फिर जमा हो जाती है। उसी प्रकार स्वाध्याय, सत्संग और मनन चिन्तन से वह कुछ समय को हट जाती है पर अवसर पाते ही वह फिर जमा हो जाती है। एक बार के ज्ञानोदय को पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए।
-पानी जब तक गन्दा रहता है तब तक उसमें सूर्य चन्द्र तक का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता, पर जब वह निर्मल हो जाता है तो जल तल में पड़ी वस्तुओं से लेकर अपनी छाया तक सब कुछ दीखने लगता है। मन की मलीनता नष्ट होने पर निर्वाण और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है।
-दीपक की अपनी महिमा है सो वह हर स्थिति में अक्षुण्य रहेगी। कोई उसके प्रकाश में पूजा करे, भोजन बनाये अथवा चोरी , हत्या करे। यह कर्ता की इच्छा के ऊपर है। ईश्वर एक प्रकाश है। उससे शक्ति और बुद्धि मिलती है। इसका उपयोग भले या बुरे कामों में करना मनुष्य के अपने हाथ में है। पर कर्त्तव्य के फल से वह बच नहीं सकता।
-शीत से जल बरफ बनकर जम जाता है और गर्मी से पिघल कर वहीं प्रवाही बन जाता है। भक्ति भावना से ईश्वर साकार बन जाता है और तत्व दर्शन से निराकार। सो अपनी मनःस्थिति के अनुसार हम ईश्वर को साकार भी देख सकते हैं और निराकार भी अनुभव कर सकते हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस बीमार थे। उनके गले में व्रण निकला था। चिकित्सा कुछ काम नहीं आ रही थी।
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भक्त जानते थे कि उनके अनुग्रह से कितने ही मृत्यु के मुख में से निकल कर जीवन प्राप्त कर चुके हैं। उनने परमहंस जी से अनुरोध किया कि आप अपने कष्ट की निवृत्ति के लिये भगवान से प्रार्थना करें तो अवश्य अच्छे हो सकते हैं।
परमहंस जी ने उत्तर दिया, मन तो मैं कब का भगवान को दे चुका अब उसे वापिस लेकर उस तुच्छ शरीर के लिए उसे कैसे लगाऊँ ?
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क्षति पूर्ति का एक तरीका सोचा जा रहा है - हिम समाधि। बर्फ की तरह यदि जीवित मनुष्य शरीर को जमा दिया जाय तो उसका क्षरण क्रम उतने समय तक रुका रह सकता है और थके हुए जीवाणु विश्राम पाकर पुनः सशक्त हो सकते है। इस प्रकार मौत और बुढ़ापे का मुकाबला किया जा सकता है। यह भी एक सम्भावना वैज्ञानिकों के दिमाग में है। इस दिशा में एक आशा की किरण उस समय झलकी जब हिम समाधि में मरे हुए एक रूसी ट्रैक्टर ड्राइवर को मृत्यु से वापिस लौटा कर जीवित बनाया गया। सन 1960 में वह ड्राइवर बर्फीले तूफान में गिर पड़ा और वहीं अकड़ गया। काफी समय बाद उसे अस्पताल पहुँचाया जा सका। उस निर्जीव दीखने वाले शरीर पर प्रयत्न किया गया और वह पुनः जीवित हो उठा। यह एक आकस्मिक घटना थी। इसी आधार पर अन्य प्रयोग चले। रूसी शरीर वैज्ञानिकों में से ए॰ कुल्यास्की, एफ0आन्द्रीपेफ, और प्रो0वी0 नैगोबकी ने हिम समाधि के कितने ही प्रयोग अनेक जीवों पर किये हैं और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि थके हुए अशक्त शरीरों को कुछ समय इस प्रकार का पूर्ण विश्राम दिया जा सके तो उसकी थकी हारी कोशिकाएं नये उत्साह से नव जीवन प्रारम्भ कर सकती हैं और बुढ़ापे को आगे धकेलने में सफलता मिल सकती है।
जो कार्य हिम समाधि से किया जा सकता है उसका एक दूसरा तरीका किसी प्रकार शरीर को सुषुप्तावस्था में पहुँचा देना भी हो सकता है। चेतन मस्तिष्क तो रात में सो लेता है पर उससे थोड़ी सी थकान ही उतरती है। असली काम तो अचेतन को करना पड़ता है वह बिना सुस्ताये अहर्निशि कार्यरत रहता है। न करे तो रक्ताभिषरण श्वास प्रश्वास, आकुञ्चन प्रकुञ्चन जैसी शरीर को जीवित रखने वाली क्रियाएं ही बन्द हो जायं। अचेतन के कार्य बन्द कर देने का ही दूसरा नाम मृत्यु है। इस अचेतन की थकान ही बुढ़ापे के रूप में सामने आती है और वह थकता निरन्तर काम करने से है। बीच में यदि उसे विश्राम मिल जाता तो जरूर वह भी रात में सोने वाले चेतन मस्तिष्क की तरह नई स्फूर्ति से काम कर सकने में जुट सकता था और मौत बुढ़ापे का संकट बहुत हद तक टल सकता था। देखा गया है कि हिम प्रयोगों की सुषुप्तावस्था में हृदय की गति एक मिनट में तीन बार और साँस तीन मिनट में एक बार तक मन्द हो जाती है। यदि यह स्थिति हिम समाधि के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार उत्पन्न की जा सके तो उससे भी वैसा ही लाभ हो सकता है।
मंगल और बृहस्पति ग्रहों पर भेजे जाने वाले अन्तरिक्ष यात्रियों के बारे में यही सोचा गया है कि इतनी दूर जाने और लौटने में जो लम्बी अवधि लगेगी उसमें मौत बुढ़ापे का ही नहीं, अन्न जल का प्रबन्ध करना भी अशक्य हो जायगा। उसका उपाय नियत समय पर सुषुप्तावस्था करना और नियत समय पर जाग्रत कर देने की प्रक्रिया का अपनाया जाना ही हो सकता है। ‘प्रोफाइल्स आफ द फ्यूचर’ पुस्तक के लेखक डॉ0 आर्थर क्लार्क का कथन है कि सुषुप्तावस्था उत्पन्न करने के सरल तरीके इस शताब्दी का अन्त होने तक ढूँढ़ निकाले जा सकेंगे।
गुण सूत्रों को बदलने की- डी0एन0ए॰ में हेर-फेर करके मानवी जोन्स का स्वरूप ही बदल देने की बात सोची जा रही है। मानव सत्ता का वर्तमान शारीरिक और मानसिक ढाँचा बदल कर उसे अधिक समय तक जीवित रखने की सम्भावना पर भी वैज्ञानिक क्षेत्रों में विचार चल रहा है। अगले दिनों उसे भी प्रयोग क्षेत्र में कार्यान्वित किया जाने वाला है।
कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान प्राध्यापक डॉ0 जेम्स वेडफोर्ड की मृत्यु कुछ समय पूर्व 73 वर्ष की आयु में हुई है। उन्होंने अपनी संपत्ति की वसीयत यह की है कि उनके मृत शरीर को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयोग किये जायं। पूर्ण सफलता भले ही न मिले पर उससे आगे का रास्ता खुला तो भी एक बड़ी बात होगी।
उनकी घोषित मृत्यु के बाद डाक्टरों ने उनके मस्तिष्क और हृदय के कोषों को कृत्रिम रीति से जीवन दिया और लाश को नाइट्रोजन घोल में जमा दिया। उस 220 डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान वाले एक बक्से में सुरक्षित रखा गया है। समयानुसार उस पर अन्य प्रयोग किये जाएंगे।
लाइफ एक्स टेनशन सोसाइटी (जीवन वृद्धि संस्थान) के वैज्ञानिक सदस्य इस आधार पर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं कि कोष विघटन प्रक्रिया को रोकने के लिए शरीर को अति शीत से जमा दिया जाय। इससे कोष विश्राम प्राप्त करके- विघटन के विनाश प्रवाह से छुटकारा पाने में समर्थ हो जायेंगे। इसके उपरान्त उन्हें नव जीवन जैसी गति विधि अपनाने के लिए भी सधाया जा सकेगा।
इस प्रयोग के संदर्भ में कुछ चूहे 5 डिग्री सेण्टीग्रेड ताप पर जमाये गये। जमने पर वे काँच की तरह कड़े हो गये। जिनका कोई अंग कड़क से टूट सकता था। इसके बाद भी उन्हें सामान्य ताप देकर पुनः जीवित किया जा सका। कुत्ते और बिल्लियों पर भी यह प्रयोग किये गये और 203 दिन बाद उन्हें पुनर्जीवित किया गया। इस जमाने वाली प्रक्रिया में एक प्रमुख कठिनाई यह है कि ऑक्सीजन के अभाव में मृत्यु के तुरन्त बाद ‘जीवन कोष’ विघटित होने लगते हैं। अर्ध मृत व्यक्ति पर प्रयोग कैसे किया जाय? मृत्यु और जमाव के समय में न्यूनतम अन्तर रहे तभी प्रयोग की सफलता सम्भव होगी।
यही प्रक्रिया भारतीय योग साधना में सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के नाम पर प्रतिपादित की गई है। जो कार्य वैज्ञानिक तापमान घटाकर यान्त्रिक पद्धति से करना चाहते हैं वह प्रयोजन समाधि अवस्था में बिना किसी झंझट के पूरा हो जाता है। संकल्प बल की सामर्थ्य संसार में अद्भुत है। मनोबल की तुलना यन्त्र बल नहीं कर सकता। विशेषतया अपने शरीर के सम्बंध में - अपने संकल्प के प्रभाव का आश्चर्य जनक परिणाम तो असंदिग्ध ही है। स्व संकेत साधना के अनुसार पाश्चात्य देशों में रोग निवारण से लेकर अपरोक्षानुभूति तक के प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जा रहे हैं। योग साधना का तो मूल आधार ही वह है। स्व संकेतों द्वारा - आत्म सम्मोहन की प्रक्रिया अपनाकर समाधि स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। इस प्रयोग में भी लगभग वही स्थिति पैदा हो जाती है जो ‘हिम समाधि ‘ द्वारा उत्पन्न की जायगी। समाधि स्थिति में शरीर के जीवाणुओं को विश्राम मिल जाता है और अचेतन मन की निरन्तर काम करते रहने की थकान दूर होती है। जिस प्रकार रात को सो लेने पर सवेरे ताजा मस्तिष्क और स्फूर्तिवान शरीर नये उत्साह से काम करता है ठीक उसी प्रकार समाधि अवस्था में शारीरिक और मानसिक विश्राम की व्यवस्था बन जाती है और उससे जगने के बाद नया स्फूर्तिवान शरीर एवं मन लेकर एक प्रकार से नया जीवन ही आरंभ किया जाता है।
औषधि उपचार में जो कायाकल्प प्रयोग किये जाते हैं उनमें शारीरिक जीवाणुओं को ही विश्राम मिलता है। मानसिक विश्राम के लिए उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती पर समाधि अवस्था में हिम समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। और मन की भाग दौड़ बन्द हो जाने के कारण उसे भी नई शक्ति संचय कर लेने का अवकाश मिल जाता है। हिम समाधि में मन का स्तर जैसा कुछ था वैसा ही बना रहता है और उठने के बाद सक्रियता एवं चेतनता तो आ जाती है पर स्तर वही पुराना बना रहता है समाधि में मन को जब विश्राम दिया जाता है तो उसे उच्च कोटि के संकल्पों से भर कर तुरीयावस्था में भेजा जाता है। विश्राम अवधि में वह उन्हीं संकल्पों में डूबा रहता है और जब उठता है तो उसी रंग में रँगा हुआ- बदला हुआ होता है।
हिम समाधि में सुलाये हुए व्यक्ति को जगाने के लिए- इस विद्या के कुशल वैज्ञानिकों का सहयोग आवश्यक है किन्तु समाधि में जिस समय के जागरण के लिए संकल्प दिया गया था, ठीक उसी समय अपने आप जागृत अवस्था आ जाती है। हिम समाधि के प्रयोग और अन्वेषण में जितना प्रयत्न किया जा रहा है। उससे आधा भी यदि समाधि शोध के लिए लगता है तो मनुष्य जाति को कृत-कृत्य हो जाने का अवसर मिलता।
प्लेटो, जेनोफेन, प्लुटार्क आदि विद्वानों ने सुकरात के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है। उन सभी ने स्वीकार किया है कि- सुकरात ने अनेकों बार यह कहा मेरे भीतर एक रहस्यमय देवता ‘डेमन’ निवास करता है और वह समय समय पर मुझे पूर्व सूचनाएं दिया करता है। इस तथ्य की यथार्थता के अनेक प्रमाण उद्धरण भी उपरोक्त लेखकों ने प्रस्तुत किये हैं।
प्लुटार्क ने अपनी पुस्तक दी जेनियो सोक्रिटिस में एक घटना दी है- एक बार सुकरात अपने कई मित्रों के साथ एक रास्ते जा रहे थे। सहसा वे रुक गये और कहा इस रास्ते हमें नहीं चलना चाहिये -खतरा है। कइयों ने उसकी बात मान ली और वह रास्ता छोड़ दिया पर कई इस साफ सुथरे रास्ते को छोड़ने के लिये तैयार न हुये। वे सुकरात की सनक को बेकार सिद्ध करना चाहते थे। वे कुछ ही दूर गये होंगे कि जंगली सुअरों का एक झुण्ड कहीं से आ धमका और उनमें से कइयों को बुरी तरह घायल कर दिया।
प्लेटो ने अपनी पुस्तक थीवीज में एक प्रसंग दिया है- एक दिन एक तिमार्कस नामक युवक सुकरात के पास आया। कुछ खाया पिया। जब चलने लगा तो सुकरात ने उसे रोका और कहा अभी तुम जाना मत, तुम्हारे ऊपर खतरा मंडरा रहा है। तीन बार उसने जाने की चेष्टा की पर तीनों बार सुकरात ने उसे पकड़ कर बल पूर्वक रोक लिया। पीछे वह नहीं ही माना और हाथ छुड़ा कर चला गया। दूसरे ही दिन उसने एक खून कर डाला और फाँसी पर चढ़ाया गया। ऐसी ही अन्य कितनी ही घटनाएँ हैं जिनमें सुकरात को उसके सहचर देवता डेमन द्वारा पूर्वाभास दिये जाने तथा सहायता करने के प्रमाण मिलते हैं।
सुकरात पर जब मुकदमा चला और प्राण दण्ड मिला तब उसके पास ऐसे प्रमाण और साधन थे जिनसे उनका बचाव हो सकता था। सफाई में प्रस्तुत किये जा सकने योग्य मजबूत प्रमाण उसके पास थे। ऐथेंस की जेल से उसे उसके मित्र और शिष्य भगा ले जाने के लिये पूरी तैयारी कर चुके थे, पर उनने इस सबसे सर्वथा इन्कार दिया और बचाव के प्रयत्नों में कोई सहयोग नहीं दिया। भरे न्यायालय में उनने स्वीकार किया- अभी अभी मेरा देवता डेमन मेरे कानों में कहकर गया है कि- मृत्यु दण्ड मिलेगा, उससे डरने की कोई बात नहीं है, ऐसी मृत्यु मनुष्य के लिये श्रेयस्कर ही होती है।
परामनोविज्ञान के अतीन्द्रिय विश्लेषण में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि संकल्प शक्ति से निर्जीव वस्तुओं को अथवा सजीव प्राणियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया ले जाया जा सकता है। इस क्रिया को ‘एपोर्ट’ कहते हैं। यह कैसे होता है। संकल्प शक्ति वस्तु अथवा प्राणी को किस प्रकार प्रभावित करती है और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के बीच किस प्रकार क्या भौतिक प्रक्रिया कार्यान्वित होती है, उसे जानना अभी बाकी है। पर प्रमाणों और तथ्यों ने इस निष्कर्ष पर पहुँचा दिया है कि ऐसा हो सकता है और होता है।
डॉक्टर जी0 पी0 विल्लोट ने पैरिस में हुई एक आध्यात्मिक गोष्ठी का विवरण प्रकाशित कराया है। उन्होंने एक अन्धी महिला के द्वारा बन्द कमरे में फाख्ता बुलाने के अद्भुत दृश्य की चर्चा करते हुए लिखा है-अन्धी महिला ने कहा- यह रही बर्फ जैसी सफेद फाख्ता। यह अपनी चोंच में कागज का एक टुकड़ा दबाये हुए उड़ रही है। देखो अब यह कागज का टुकड़ा मदान जे0 के0 के पैरों में गिर पड़ा। और सचमुच वैसा ही हुआ। इसी महिला ने एक दिन डॉक्टर विल्लाट को आकाश से फूल मँगाकर दिये थे। ऐसी ही एक घटना कैन्थन (मैसाच्युसेट्स) निवासी डॉ0 लाकिने के सामने आई। मेरी जेन नामक लड़की के माध्यम से एक भारी लोहे का चुम्बकीय टुकड़ा रसोई घर में आ गया। पीछे वह मेरी की प्रार्थना पर अन्तर्धान भी हो गया।
न्यू एरा में वोस्टन के दी आलिब ब्राँच आफ पीस केन्द्र में हुए एक प्रयोग की रिपोर्ट छपी है एक कमरे को चौबीस घण्टे पूर्व पूरी तरह बन्द कर दिया गया था और उसमें कहीं कोई ऐसा स्थान नहीं रहने दिया गया था जहाँ कोई चीज छिपने या छिपाने की गुंजाइश हो। उस कमरे में उपस्थित लोगों ने प्रयोग के समय एक सफेद फाख्ता को प्रकट होते हुए देखा। इस घटना का तथा ऐसी ही अन्य कई घटनाओं का विवरण देते हुए एमा हार्डिज ने अपनी पुस्तक माईन अमेरिकन स्प्रिचुअलिज्म पुस्तक में लिखा है- पदार्थों के प्रकट और अन्तर्धान होने - एक स्थान से दूसरे स्थान तक हस्तान्तरण होने की क्षमता, मनुष्य के संकल्प बल में है इसके कितने ही प्रमाण मिलते हैं। यह तथ्य आज की बुद्धि सीमा में नहीं आते पर इससे यथार्थता में कोई अन्तर नहीं आता।
मन का कार्य केवल इच्छा,कल्पना और निर्णय जैसे सामान्य स्तर तक ही सीमित नहीं है। उसमें कुछ विलक्षण शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, ऐसी जिनसे जड़ वस्तुओं को प्रभावित किया जा सके। अतीन्द्रिय विज्ञानी इस शक्ति को साइको काइनेसिस नाम देते हैं। इस क्षेत्र में चल रही शोध यह बताती है कि ऐसी अनुभूतियों की साक्षी प्रचुर परिमाण में उपलब्ध है जिनसे मनुष्य की अन्तः चेतना में एक्स्ट्रा सेन्सरी पर्सेप्शन की जड़ पदार्थों को भी प्रभावित करने की क्षमता का होना सिद्ध होता है। मन से मन को प्रभावित करना और भावना से उत्तेजित करना तो स्पष्ट तथ्य सर्व विदित और सर्वमान्य ही है।
मनोविज्ञान शास्त्र के जन्मदाता फेडरिक मायर्स ने अन्तःचेतना का एक विशेष स्तर स्वीकार किया है- सुप्रालिमिनल सेल्फ की व्याख्या करते हुये उन्होंने लिखा है- इस स्तर का विकास मनुष्य की अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कर सकती हैं। जो सर्व विदित नहीं हैं ऐसे रहस्यों को जान सकने की क्षमता मस्तिष्क के उस परिचेतना में बीज रूप से मौजूद रहती है जिसे सब लिमिनल सेल्फ कहते हैं। उन्होंने अपने निज के अनुभवों की चर्चा की है और मनुष्य सचेतना के भीतर एक ऐसा तत्व है जिसके आधार पर दूरवर्ती छिपी हुई तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी मिल सकती है। अप्रकट रहस्यों के प्रकटी कारण और अशरीरी आत्माओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने की सम्भावना इस चेतना स्तर में होने की बात उन्होंने स्वीकार की है।
अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व और उनके द्वारा मनुष्य को सहयोग यह एक तथ्य है। डरावनी या घिनौनी प्रकृति के भूत प्रेत कम ही होते हैं। साधारणतया उच्च आत्माएं मनुष्यों की सहायता ही करती हैं और अपनी उच्च प्रवृत्ति के कारण दूसरों को आगे बढ़ाने तथा खतरों से बचाने के लिये पूर्व संकेत भी करती हैं। जिस प्रकार उदार मनुष्य अकारण दूसरों की सेवा सहायता करने के लिये तैयार रहते हैं वैसे ही सूक्ष्म शरीर धारी आत्माएं लोगों को उपयोगी ज्ञान देने अथवा आत्मा का अस्तित्व शरीर न रहने पर भी बना रहता है यह विश्वास दिलाने के लिये कुछ व्यावहारिक सहयोग देती रहती हैं।
मनुष्य इसी लोक - इसी शरीर को सब कुछ मान बैठता है और तात्कालिक सुखोपभोग के लिये दूरवर्ती भविष्य को अन्धकारमय बनाने में लगा रहता है। इसका एक कारण परलोक सम्बंधी - मरणोत्तर जीवन सम्बंधी अज्ञान भी है यदि गहराई के साथ यह विचार किया जाय कि मरने के बाद भी शरीर बना रहेगा और उस स्थिति में शुभ अशुभ विचार एवं कार्य ही सुख दुख देने के आधार होंगे तो निस्सन्देह मनुष्य के पैर कुमार्ग पर चलने से रुकें और सन्मार्ग पर चलने का उत्साह बढ़े। परलोक सम्बंधी ज्ञान एवं विश्वास का परिणाम मनुष्य के दृष्टिकोण एवं आचरण को परिष्कृत बनाने में सहायक होता है। इस दृष्टि से अशरीरी आत्माएं अकसर लोगों को अपना परिचय देती रहती हैं साथ ही समय समय पर उनकी ऐसी सहायता भी करती रहती हैं जिससे परोक्ष जीवन के प्रति सर्व साधारण की निष्ठा का विकास हो सके।
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारी एक बार एक होटल में ठहरा था। होटल के मालिक को मरे हुये थोड़े ही दिन हुये थे, उसके लड़कों में सम्पत्ति के बारे में बहुत झगड़ा चल रहा था बाप की लिखी वसीयत मिल नहीं रही थी इससे गुत्थी और भी उलझ गई थी। नेवारो ने भी यह सारा वृत्तान्त सुना, पर वह बेचारा आखिर क्या कर सकता था परदेशी जो ठहरा।
नेवारो ने उसी रात सपना देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति बार-बार उसके कमरे में आकर अलमारी को लाठी से ठोंकता है। एक दो बार तो उसने चूहा आदि समझा पर बार-बार वही सपना - वही आवाज। वह उठा होटल की उस अलमारी को खोल डाला। उलट-पुलट कर देखा तो उसी में वह वसीयत रखी हुई थी जिसके न मिलने पर दोनों भाई लड़ रहे थे। जिसके न मिलने पर दोनों भाई लड़ रहे थे। दूसरे दिन नेवारो ने वह वसीयत उन्हें सौंपी और झगड़ा आसानी से निपट गया।
फ्राँस के सम्राट हेनरी चतुर्थ की हत्या से कुछ समय पूर्व अदृश्य आत्मा ने उससे स्वप्न में आकर कहा था- अब तुम्हारा अन्तिम समय अति निकट आ पहुँचा।
यह बात जब सम्राट ने दरबारियों को बताई तो उनने इतना ही कहा यह निरर्थक है। इन दिनों ऐसी कोई आशंका भी नहीं हैं। पर जब सचमुच कुछ समय बाद हेनरी की हत्या हो गई तो उस पूर्वाभास को सभी ने सही माना।
स्काटलैण्ड का राजा जेम्स चतुर्थ अक्सर इंग्लैण्ड पर आक्रमण कर बैठता था। अन्तिम आक्रमण के बाद उसे एक अदृश्य आत्मा दिखाई पड़ी। उसने कहा यदि भविष्य में तुमने कोई और आक्रमण किया तो याद रखना तुम्हारी जान की खैर नहीं। राजा ने उस चेतावनी को अनसुनी कर दिया। जब उसने अगला आक्रमण किया तो युद्ध स्थल में ही उसकी मृत्यु हो गई।
सर आर्लिवर लाज, डॉ0 पील, सर आर्थर केनन डायल,डॉ0 आकाल्ट आदि परलोक वक्ताओं ने मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में काफी छान बीन की और पाया कि मरने के बाद भी मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता जीवित रहती है। भारत में इन्दौर के भूतपूर्व सैशन जज श्री वी0डी0 ऋषि ने अपनी स्वर्गीय पत्नी की आत्मा से अदृश्य रहस्यों का उद्घाटन किया। लन्दन के ‘दी होल्डस’ पत्र के संपादक मोरिस वारवोनिल ने मृतात्माओं के अस्तित्व सिद्ध करने वाले अपने कई अनुभव छापे थे। ब्रिटेन के एयर मार्शल लार्ड डार्डिंग ने भी अपने अनुभव में आई प्रेतात्माओं के कुछ विवरण प्रकाशित कराये थे। सिसरो, पैथागोरस, प्लेटो, एक्यूलियम प्रभृति दार्शनिकों ने प्रेतात्माओं के अस्तित्व को असंदिग्ध रूप से स्वीकार किया है।
नया नेतृत्व उदय होने की भविष्य वाणी-
भारत के भूतपूर्व फौजी जनरल, राजनीति वेत्ता तथा अनटोल्ड स्टोरी नामक राज नैतिक पुस्तक के प्रणेता जनरल कौल से देश की वर्तमान परिस्थितियों के सम्बन्ध में दैनिक हिन्दुस्तान इसी 7 जुलाई के अंक में एक मुलाकात छपी है - उसमें उनने कहा है-
भारत में लोग काम और परिश्रम के बदले तर्क और अधिकारों में अधिक रुचि रखते हैं। व्यावहारिकता की अपेक्षा आदर्शों और भावनाओं की अधिक दुहाई देते हैं। तथा देश की अपेक्षा निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देते हैं। हमारे देश में हर स्तर पर भ्रष्टाचार , कामचोरी और पलायन वाद का बोलबाला है। ऊपर के भ्रष्ट लोगों का अनुकरण यदि नये लोग करते हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य करने की बात नहीं है। देश में भ्रष्टाचार अनिश्चितता तथा भावुकता कब तक पनपती रहेगी। इसके सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।
स्थिति एक ऐसी सीमा तक पहुँचेगी कि जन-मानस के द्वारा इसका व्यापक प्रतिकार होगा। मैं यह भविष्य वाणी कर सकता हूँ कि उस अराजक स्थिति में ऐसा नया प्रेरणाजनक नेतृत्व उदय होगा जो देश को बिखरने और नष्ट होने से बचा लेगा।
गुरु बाहर रहते हैं और वे सद्गुरु तक पहुँचने का रास्ता बताकर वहाँ तक पहुँचाकर अपना कर्तव्य पूरा कर देते हैं। इसके बाद ‘सद्गुरु’ का कार्य आरम्भ होता है, उसका परामर्श और प्रकाश ही परम-लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ होता है।
सद्गुरु अन्तः करण में निवास करता है। इसे निर्मल आत्मा या प्रकाश स्वरूप परमात्मा कह सकते हैं। प्रकाश का अर्थ रोशनी नहीं- सन्मार्ग गामिनी प्रेरणा है। उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा भी कहते हैं। सद्गुरु का उपदेश इसी वाणी - इसी भाषा और इसी परिधि में होता है। उनका परामर्श और मार्ग दर्शन हमें निरन्तर उपलब्ध रहता है।
बाहर के गुरु अनेक विषयों पर बात कर सकते हैं- पर सद्गुरु की शिक्षा एक ही होती है अन्धकार से प्रकाश की ओर - मृत्यु से अमृत की ओर- असत से सत की ओर- चलो। बाहर के गुरु जब तब ही मिलते हैं- उनका ज्ञान सीमित होता है और उनका उपदेश भ्रान्त भी हो सकता है। पर अन्तरात्मा में विद्यमान सद्गुरु हर समय हमारे पास और साथ उपस्थित रहता है। उसका परामर्श हमें हर समय उपलब्ध रहता है।
जब कोई बुरा काम करते हैं तो हृदय काँपता है, मुँह सूखता है, पैर थरथराते हैं, भीतर ही भीतर कोई कोंचता रहता है। कोई देख तो नहीं रहा है - कोई सुन तो नहीं रहा - किसी को पता तो नहीं चल रहा- इन आशंकाओं के बीच वे दुष्कर्म किये जाते हैं। मानो सद्गुरु बराबर रोक रहा है- समझा रहा है और धिक्कार रहा है। यह नीति निर्देशक अन्तरात्मा ही सद्गुरु है।
जब कोई सत्कर्म किया जाता है तो आन्तरिक संतोष अनुभव होता है। किसी भूखे को अपनी रोटी देकर उसकी क्षुधा बुझाई जाय -किसी असहाय रोगी की चिकित्सा व्यवस्था में कुछ समय या धन लगा दिया जाए, अनीति को रोकने में स्वयं आक्रमण सह लिया जाय तो बाहर से हर्ज और कष्ट उठाते हुए भी भीतर से इतना सन्तोष उल्लास अनुभव होता है कि उसकी तुलना में वह भौतिक क्षति नगण्य ही प्रतीत होगी। यह प्रोत्साहन समर्थन और वरदान अन्तरात्मा का है इसी को सद्गुरु का आशीर्वाद कहना चाहिए।
एक हूक एक कसक टीस उठती रहती है कि - आगे बढ़ा जाय, ऊँचा उठा जाया। यह प्रेरणा इतनी प्रबल होती है कि रोके नहीं रुकती। जब अपना देव सोया रहता है तब उस अमृत को दैत्य हरण कर ले जाते हैं। यह इच्छा धन, ऐश्वर्य, इन्द्रिय भोग, पर सत्ता अहंता बढ़ाने के लिए मुड़ जाती है और मनुष्य इसी बड़प्पन के जंजाल में उलझ कर रह जाता है। पर जब सद्गुरु समर्थ होता है तो प्रवाह को अवाँछनीयता की ओर से मोड़कर वाँछनीयता की दिशा में नियोजित करता है। तब प्रगति की आकाँक्षा महानता के अभिवर्धन में लगती है। सद्भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की सम्पदा ही महानता की पूँजी है। गुण कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता इतनी आनन्ददायक और इतनी समर्थ है कि उसे पाकर मनुष्य को स्वर्ग मैं स्थित देवताओं से बढ़कर अपने आप पर सन्तोष होता है।
सद्गुरु कुमार्गगामिता से रोकता है। अनर्थमूलक चिन्तन नहीं करने देता। कुसंग में अरुचि उत्पन्न करता है। कुत्सित विचारों और भ्रष्ट व्यक्तियों के संपर्क से अरुचि ही नहीं होती वरन् घृणा भी बढ़ती है। शक्तियों के निरर्थक कामों में अपव्यय करने वाला हास-परिहास का मनमौजी सिलसिला रुक जाता है। समय का एक-एक क्षण बहुमूल्य प्रतीत होता है और उसके सदुपयोग की निरन्तर तत्परता बनी रहती है। जब ऐसा परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे तो समझना चाहिए कि सद्गुरु के सच्चे शिष्य हम हो गये। गुरु का कार्य है- मार्ग दर्शन। शिष्य का कर्तव्य है उसका परिपालन। साँसारिक गुरुओं में स्वार्थ और अज्ञान भी बहुत होता है इसलिए उनकी सब बात नहीं मानी जा सकती, पर सद्गुरु का तो हर आदेश शिरोधार्य ही होना चाहिए।
साधना का उद्देश्य किसी के सामने गिड़गिड़ाना - झोली पसारना या नाक रगड़ना नहीं है। दीनता न आत्मा को शोभनीय है न परमात्मा को प्रिय। परमात्मा न खुशामद का भूखा है और न है उसे प्रशंसा की आवश्यकता। उसकी महानता अपने आप में अपनी प्रशंसा है। मनुष्यों की वाणी न उसमें कुछ वृद्धि कर सकती है और न कमी। अपने ही बालक के मुख से प्रशंसा कराना किसी मनुष्य को भी अच्छा नहीं लगता फिर परमात्मा जैसे महान के लिए तो उसमें क्या आकर्षण हो सकता है। प्रशंसा करके किसी से कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न ओछे दर्जे का कृत्य माना जाता है उस चंगुल में ओछे लोग ही फंसते हैं और उसे करने के लिए ओछापन ही तैयार होता है। खुशामद व चापलूसी का गोरख-धन्धा उन्हें पसन्द आता है, जो वस्तुतः प्रशंसा के पात्र नहीं। वे अपने चापलूसों के मुँह से अपनी बड़ाई सुनकर खुशी मना लेते हैं। असली न मिलने पर उस आवश्यकता को नकली से पूरा कर लेते हैं भक्त और भगवान के बीच यदि यही खुशामद चापलूसी का धंधा चले तो फिर समझना चाहिए दोनों की गरिमा गिर गई।
माँगना बुरा व्यवसाय है। चोरी से भी बुरा। चोर दुस्साहस करता है और खतरा मोल लेता है तब कहीं कुछ पाता है। पर भिखारी उतना भी तो नहीं करता। वह बिना कुछ किये ही पाना चाहता है। कर्म विज्ञान को एक प्रकार से वह झुठलाना ही चाहता है। संसार के स्वाभिमानी अपंग और असमर्थ भी स्वाभिमानी होते हैं। कोढ़ी और अन्धे भी कुछ कर लेते हैं। समाज उन्हें कर्तृत्व के साधन तो देता है पर मुफ्त में बिठा कर नहीं खिलाता। इसमें देने वाले की उदारता भले ही हो पर लेने वाले को ऋण के भार से दबना पड़ता है और दीन बन कर समग्र स्वाभिमान का हनन करना पड़ता है। यह हानि उस लाभ से बुरी है जो किसी दान से कुछ प्राप्त करके उपलब्ध किया जाता है।
दानी, दान और दानपात्र की भी एक आचार संहिता है। किसे दिया जाय? क्यों दिया जाय? कितना दिया जाय? किस आधार पर दिया जाय? इन कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही भौतिक पदार्थों को देने और लेने की सार्थकता हो सकती है कोई कुछ भी किसी भी स्थिति में किसी भी प्रयोजन के लिए माँगे और देने वाला बिना गुण-दोष विचारे देता ही चला जाय तो समझना चाहिए कि वह अन्धेर देने वाले का, लेने वाले का और आचार व्यवहार का सर्वनाश करेगा। ईश्वर ऐसा दानी नहीं है कि हर माँगने वाले की मनोकामना फिर चाहे वह अज्ञानजन्य और अवाँछनीय ही क्यों न हो पूरी ही करता चला जाय। यदि उसे ऐसा ही करना होता तो कर्म और उसके फल के सिद्धान्त को आरम्भ से ही ताक पर उठा कर रख देता। उस प्रक्रिया का ऐसा उपहास क्यों बनने देता -जैसा कि औघड़दानी कह कर बमभोला को मूर्ख समझते हुए भक्त मंडली द्वारा बनाया जा रहा है।
साधना निश्चित रूप से याचना नहीं है। वह विशुद्ध रूप से आत्म-परिष्कार जीवन-शोधन और पात्रता के विकास की सुनियोजित प्रक्रिया है। तपश्चर्या की आग में हम अपने कलुष-कषायों को जलाते हैं कर्मफल की व्यवस्था सृष्टि का कठोर और अपरिवर्तनीय नियम है। उसे यदि ईश्वर बदलने लगे तो फिर उसे अपनी सारी क्रम व्यवस्था ही बदलनी पड़ेगी। सच्चा न्यायाधीश अपने बेटे को भी अपराध का दंड देकर न्याय की रक्षा करता है। ईश्वर का न्यायालय भक्त-अभक्त का अन्तर नहीं। भक्ति के दूसरे परिणाम हो सकते हैं पर उसका प्रयोजन यह नहीं हो सकता कि उस न्यायशील परमेश्वर को अन्याय या पक्षपात करने के लिए विवश किया जाय।
भक्ति हमें भविष्य में दुष्कर्म न करने की प्रेरणा देती है। अपने स्वभाव में धंसे हुए अविवेक और अनाचार उन्मूलन में सहायता करती है। निष्पाप और निर्मल बन कर हम प्रारब्ध कर्मों को भी धैर्य और शान्ति पूर्वक - साहस और संतोष के साथ सहन कर सकने में समर्थ हो सकते हैं और इस प्रकार प्रारब्ध भोग की आधी व्यथा हलकी कर सकते हैं। दुष्कर्मों और कुविचारों को तिलाँजलि देकर अपना भविष्य तो उज्ज्वल कर ही सकते हैं। साधना का यह लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
संचित कर्मों के छुटकारे का एक ही सनातन मार्ग और विधान है प्रायश्चित्य। पिछली भूलों पर खेद प्रकट कर देने या क्षमा माँग लेने की औपचारिकता पूरी करने से काम नहीं चलता। समाज को क्षति पहुँचाई है उतना अनुदान देकर उस गड्ढ़े को पाटना पड़ेगा। मन को कुकर्म के द्वारा जितना कलुषित किया है उतना ही सत्कर्म के उल्लास से उसका सन्तुलन बनाना पड़ेगा। अनाचार की जिन अवाँछनीय लहरों से वातावरण को क्षुब्ध किया था उसका समाधान पुण्य और परमार्थ की प्रक्रिया अपनाकर करना होगा। इतना साहस भक्त में उदय होता है और वह अपनी सदाशयता सिद्ध करने के लिए न्याय के कटघरे में खड़े होने से पूर्व स्वयं ही उपस्थित होकर अपनी भूल स्वीकारने और उसकी क्षति पूर्ति करने की बहादुरी दिखाता है।
साधना की प्रतिक्रिया साधक को अपने पापों का प्रायश्चित्य करने का शौर्य प्रदान करती है और भविष्य में निर्मल जीवन जीने का साहस। यह सत्परिणाम हैं जो साधना यदि सच्ची हो तो उसके फलस्वरूप साधक को तुरन्त प्राप्त होते हैं।
आत्म ज्ञान के अभाव में ही ईश्वर और जीव का वियोग है। अज्ञान का अन्धकार का पर्दा जितना चौड़ा है उतनी ही दूर परमेश्वर है। भगवान् का दर्शन और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए सिर्फ छोटी सी मंजिल पार करनी पड़ती है और वह आत्म - बोध। जिस घड़ी हम इन्द्रियों की गुलामी -वासना से मन की दासता-तृष्णा से इनकार कर देते हैं और अपने को आत्मा मानकर आत्मकल्याण के पथ पर कदम बढ़ाते हैं उसी क्षण ईश्वर की समीपता स्पष्ट हो जाती है और हृदय की हर धड़कन में उसके दर्शन होने लगते हैं।
ईश्वर भक्त केवल ईश्वर के शासन में रहता है और उसी के निर्देश पर चलता है मन की गुलामी उसे छोड़नी पड़ती है। जो मन का गुलाम है वह ईश्वर भक्त नहीं हो सकता। जो ईश्वर भक्त है उसे मन की गुलामी न स्वीकार हो सकती है न सहन।
साधना का प्रयोजन अपने अज्ञान और अविवेक का निराकरण करना है अपनी कामनाओं का परिशोधन और निराकरण करना है अपने कर्तृत्व में देवता का समावेश करना और कुत्साओं, कुण्ठाओं को जड़-मूल से उखाड़ फेंकना है। साधना एक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मबल बढ़ाया जाता है और देवपक्ष की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्मपरिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाभी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रक्त भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है।
बिना साधना ईश्वर नहीं मिल सकता।
- रा0कृ0परमहंस
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साधना हमारा दृष्टिकोण परिष्कृत कर देती है और अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है जिससे अपने स्वस्थ, लक्ष्य और कर्तव्य को समझ सकें। साधना वह शक्ति प्रदान करती है जिससे आत्मबल विकसित हो और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना साहस उपलब्ध कराती है जिसके आधार पर प्रलोभनों और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़ता पूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न-बाधा का कष्ट-कठिनाई का धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं, तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता। ईश्वर से भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है इतना अधिक कि उससे अपने को, अपने संसार को और अपने परमेश्वर को संतुष्ट किया जा सके।
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मनुष्य की मनुष्यता इसलिए प्रशंसित और सम्मानित है कि उसमें उच्च भावनाओं का समावेश है। एक दूसरे के दुःख-सुख में सम्मिलित होने की - दया,करुणा ,प्रेम सेवा सहानुभूति की कोमल सम्वेदनाओं के आधार पर भी किसी के आन्तरिक विकास का मूल्याँकन किया जा सकता है।
प्रेम भावना में अपने प्रियपात्र के समीप रहने की इच्छा प्रबल रहती है, इसमें उसे सुख मिलता है और संतोष। मनुष्यों में से जिनमें यह वृत्ति जितनी निर्मल, निस्वार्थ और प्रबल है समझना चाहिए उसके अन्तःकरण का स्तर उतना ही ऊँचा उठ गया। जो रूखा, नीरस, स्वार्थी पल भर में आँखें बदल लेने वाला है उसे इस निष्ठुरता के आधार पर उतना ही गया गुजरा मानना चाहिए।
जर्मनी का साइकोशिया प्रान्त- वतज्लो कस्बा-वहाँ अब से कोई 200 वर्ष पूर्व एक गरीब कुम्हार परिवार रहता था। उस परिवार की एक युवा लड़की का पड़ौस के युवक कुम्हार से प्रेम हो गया दोनों शादी करने के इच्छुक थे, पर लड़की का पिता इस पर सहमत न हुआ। वह अपनी लड़की को बहुत प्यार करता था और ऐसे लड़के से विवाह करना चाहता था जो बहुत ही पुरुषार्थी हो। इस कसौटी पर उसे वह लड़का कुछ जंच नहीं रहा था। सो उसने विवाह की स्वीकृति नहीं दी और कोई दूसरा पुरुषार्थी ढूँढ़ता रहा।
यह बात उस युवक को चुभ गई। उसने समझ लिया, प्रेम की भले ही अपनी विशेषता हो पर उसमें आकर्षण तभी आ सकता है जब उस पर पुरुषार्थ की खराद चढ़ी हुई हो। शादी के लिये प्रेमी होना ही पर्याप्त नहीं, उस उत्तरदायित्व को निवाहने के लिए पुरुषार्थ भी असाधारण ही होना चाहिए। सो उसने निश्चय किया कि वह एक ऐसा बर्तन बनायेगा जो उसके प्रेम का ही नहीं पुरुषार्थ का भी प्रमाण प्रस्तुत कर सके। यह बर्तन एक विशालकाय घड़ा था, जो दस वर्षों में बनकर तैयार हुआ। इस बीच न प्रेमी ने कहीं मन डुलाया और न प्रेमिका ने दूसरा घोंसला ढूँढ़ा। घड़ा - मजबूती की दृष्टि से ही नहीं उसे कला की दृष्टि से भी सर्वांग सुन्दर बनाया गया था। उस पर जो कलात्मक खुदाई और चिताई की गई उससे प्रतीत होता है कि- कितने मनोयोग का उसमें समावेश किया गया है। यह घड़ा सन 1753 में बनकर तैयार हुआ। उसमें जर्मनी माप के अनुसार 3 वशेल्स (लगभग 25 मन) अनाज भरा जा सकता था॥
पुरुषार्थ और प्रेम का प्रतीक यह घड़ा न केवल उन युगल प्रेमियों को विवाह सूत्र में बाँधने में सफल हुआ वरन् उसने राष्ट्रीय ख्याति भी प्राप्त की। कुम्हार ने अपनी कसौटी पर युवक को खरा पाया और इतनी लम्बी और कड़ी परीक्षा में सफल होने के उपहार में अपनी लड़की का उससे विवाह कर दिया। तब से वह महाघट राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है और ‘प्यार का बर्तन’ कहलाता है। उसे हजारों दर्शक देखने दूर-दूर से आते रहते हैं।
आयरलैण्ड के कुक हेवेन नगर में दो बालक एक ही घर में एक ही समय पैदा हुए। एक का नाम था पैट्रिक दूसरे का एलेनर ग्रेडी। अलग परिवार के होते हुए भी उनमें अद्भुत समता थी -दोनों की आकृति ही नहीं प्रकृति भी एक थी। उनकी शादियाँ अलग-अलग स्थानों पर हुई पर हुई एक ही दिन एक ही समय। आश्चर्य की वे बीमार भी एक दिन पड़े और दोनों अलग-अलग स्थानों पर रहते हुए भी 96-96 वर्ष के होकर ठीक एक ही दिन और एक ही समय मर गये।
दोनों में प्रेम भावना असाधारण थी। जब पास-पास रहते तो एक साथ खाते सोते। अलग रहना पड़ता तो भी एक दूसरे की बात सोचते रहते। आश्चर्य यह कि उनमें से किसी पर कुछ दुःख -सुख आता तो दूसरा उसकी अनुभूति तुरन्त अपने भीतर करता।
यह प्रेम भावना, पशु पक्षियों में भी कम नहीं होती। यदि उन्हें कहीं सच्चा प्यार मिल जाता है तो हिंसक पशु भी अपने प्रियपात्र के गुलाम हो जाते हैं। यह आकर्षण सच्चे प्रेम में ही है। बहुधा पशु पक्षी अपने मालिकों को उतना प्यार नहीं करते। इसका कारण उन मनुष्यों की निष्ठुर प्रवृत्ति ही है। एक आत्मा की वास्तविकता को परखने- पहचानने में दूसरी आत्मा को कुछ भी कठिनाई नहीं होती। मस्तिष्क धोखा खा सकता है हृदय नहीं। जो लोग माँस के लिए- देवी पर बलि चढ़ाने के लिए या बूढ़े हो जाने पर कसाई के हाथों बेच डालने जैसी निष्ठुरता के साथ पशु पालन करते हैं उनकी कपटी वृति को पहचानने में भी उन्हें देर नहीं लगती। ऐसे लोगों से वे भी रूखे और खिंचे -खिंचे रहते हैं पर जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी यहाँ तक कि हिंस्र जन्तु भी सघन प्रेम भावना एवं आत्मीयता का परिचय देते हैं।
‘जन्तु और मानव’ पुस्तक के लेखक काल हैगेनवैक ने अपने निजी अनुभव की चर्चा करते हुए लिखा है- एक बार उनने एक युवा बाघ का जोड़ा खरीदा वह बीमार पड़ा तो उनने स्वयं उसके पास जाकर चिकित्सा और परिचर्या की। यह जोड़ा उनसे इतना हिल मिल गया था कि नजदीक आने पर प्यार से विह्वल हो उठता और प्यार से घुरघुराता। पीछे उन्होंने उस जोड़े को बर्लिन की जन्तुशाला को दे दिया। जब कभी वे उससे मिलने जाते तो यह बाघ जोड़ा उनसे पहले की तरह ही प्यार करता और लिपटने की कोशिश करता।
एक कुवियर ने एक पालतू भेड़िये की चर्चा करते हुए लिखा है बचपन में उसे एक व्यक्ति ने पाला था पर बड़ा होने पर उसे जन्तुशाला को दे दिया। वह व्यक्ति जब भी जन्तुशाला में गया तो भेड़िये ने उससे मिलने की आतुरता दिखाई और यदि पास आने का तनिक भी अवसर मिला तो उसने भरपूर प्रेम प्रदर्शित करने की चेष्टा की।
न्यूयार्क हैराल्ड में जेम्स एस॰ मिचेल ने एक स्वामी-भक्त कुत्ते के विचित्र साहस का विवरण छपाया है। कुत्ता आयरलैण्ड का था, एक अमेरिकी स्त्री वहाँ से उसे अपने साथ पानी के जहाज से ले गई। उसने अपने साथ हिलाने के लिए उसे बाँधकर रखा, एक दिन अवसर पाते ही कुत्ता गायब हो गया। अमेरिका के गली-कूचे छानता हुआ वह बन्दरगाह पर आ गया। और जिस जहाज से उसे लाया गया था, उसका इन्तजार करता रहा। पीछे जब वही मैजेस्टिक जहाज आया और आयरलैण्ड लौटने लगा तो चुपके से उसी पर चढ़ गया। मुसाफिरों में हिल-मिल गया लम्बी समुद्री यात्रा उसने बिना टिकट कर ली और आयरलैण्ड पहुँचकर के क्वीनन्स टाउन बन्दरगाह पर उत्तर गया। वहाँ से क्लोन मेल कस्बा एक सौ मील से अधिक है। रास्ता भी ऊबड़-खाबड़ है। इसे पार करता हुआ वह पुराने मालिक के पास पहुँचा। इस लम्बी और दुस्साहसपूर्ण यात्रा में उसे भारी कष्ट और जोखिम उठाने पड़े। पैरों में जख्म हो गये थे। कुत्तों ने काटकर उसके कन्धों पर घाव कर दिये थे, पूँछ कट गई थी और एक आँख बैठ गई थी। इतना सब होते हुए भी अपने पुराने मालिक के पास वह पहुँच ही गया और लिपट कर खूब रोया।
‘जंतुओं की कथा’ पुस्तक में एन्ड्रयू लैग ने उस बढ़ई का विवरण छापा है जिसने एक बाघ के बच्चे को पाला था और बड़ा होने पर उसे चिड़िया घर को दे दिया था। एक बार वह बढ़ई चिड़िया घर गया तो उसने बड़े प्रयत्न पूर्वक यह स्वीकृति प्राप्त की कि वह कटघरे में अपने पूर्व परिचित बाघ के पास जा सके। वह गया तो बाघ ने उसके हाथों को चाटा, अपना सिर उसके कन्धों से रगड़ा कई घण्टे उसके साथ रहा और बढ़ई जब कटहरे से बाहर जाने लगा तो उसने उसे बार-बार जाने से रोका।
जन्तुओं के मित्र पत्रिका में आडाऊ (ब्रिटेन) के कप्तान वाटसन ने अपने घोड़े की और एस0एन0पेज ने एक राजहंस की कथा छापी है जिन्होंने मनुष्यों से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही अपनी प्रेम भावना का परिचय दिया था।
यदि हम अपने भीतर सच्ची प्रेम भावना पैदा करे तो देखेंगे कि उसके प्रकाश में हर कोई अपना प्रियपात्र बनता चला रहा है और हर ओर से प्रेम की वर्षा हो रही है।
मनोविज्ञान शास्त्री फ्राइड का यह बहुचर्चित प्रतिपादन सर्वविदित है कि- काम वासना की अतृप्त इच्छाएं ही मनोविकारों को उत्पन्न करती हैं और उस अवरोध से प्रतिभा कुण्ठित होती है। मानसिक ही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है और व्यक्तित्व दब जाता है। वे कहते रहे हैं मनुष्य इंजन है और कामवासना उसमें बनती-बढ़ती भाप। यदि इस भाप को निकलने का अवसर न मिले तो विस्फोट होगा और व्यक्तित्व बिखर जायेगा। उनने उन्मुक्त काम सेवन की वकालत की है और उस पर लगे प्रतिबन्धों को हानिकारक बताया है।
उस प्रतिपादन ने यौन सदाचार पर बुरा प्रभाव डाला है और लोगों को जितना विश्वास फ्राइड के प्रतिपादन पर जमा है उतना ही असंयम और व्यभिचार को प्रोत्साहन मिला है। सुशिक्षित वर्ग में इस तथाकथित मनोविज्ञान के आधार पर यह मान्यता जड़ जमाती जा रही है कि कामेच्छा की पूर्ति आवश्यक है। उसे स्वच्छन्द उपभोग का अवसर मिलना चाहिए। संयम से शारीरिक और मानसिक हानि होती है। इस प्रतिपादन का कुप्रभाव नर-नारी के बीच पावन सम्बन्धों की समाज व्यवस्था परक सुव्यवस्था एवं पवित्रता पर पड़ रहा है। दाम्पत्य जीवन में यदि कुछ अतृप्ति रह जाती है, तो उसे बाहर पूरा करने में भय, लज्जा, संकोच अनुभव नहीं करता वरन् उस उक्त आचरण को शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक मानता है। यह व्यभिचार का खुला समर्थन है। दाम्पत्य मर्यादाओं को फिर कैसे स्थिर रखा जा सकेगा। अविवाहित या विधुर यदि व्यभिचार पथ पर प्रवृत्त होते हैं तो उन्हें किस तर्क से समझाया जा सकेगा। फिर जो छेड़छाड़ और गुण्डागर्दी की अश्लील शर्मनाक घटनाएं आये दिन होती रहती हैं उन्हें अवाँछनीय या अनावश्यक कैसे ठहराया जा सकेगा। फ्राइड का शास्त्र दूसरे शब्दों में व्यभिचार शास्त्र ही है जिसे मनोविज्ञान में दार्शनिक मान्यता देकर समाज व्यवस्था पर कुठाराघात ही किया जा रहा है। एक तो वैसे ही पशु प्रवृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहन करती थीं- सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती थीं, इस पर उस प्रवृत्ति को वैज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे तब तो ब्रह्मचर्य और दाम्पत्य जीवन की पवित्रता का ईश्वर ही रक्षक है।
फ्राइड कहते हैं ‘मनुष्य बचपन से ही’ ईडिफुस कम्प्लेक्स’ में यौन आकाँक्षा अथवा यौन ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौन आकाँक्षा अथवा यौन ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौनाकाँक्षा से प्रेरित होता है और लड़की बाप के प्रति आकर्षित होती है। तीन वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने के लिए व्याकुल रहता है। एकाध साल बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा सम्बन्ध पहले से ही है तो उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जग पड़ती है। यह विद्वेष उसकी अवचेतना में आजीवन बना रहता है। इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है। इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की मानसिक प्रगति रुक जाती है और ‘ईडिफस कम्प्लेक्स’ उसके सामने तरह तरह के अवरोध खड़े करता है। यह स्थिति अपवाद नहीं वरन् साधारणतया प्रायः यही होता है।’
यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है। छोटा बच्चा यौन आकाँक्षाओं से पीड़ित होगा सो भी अपनी माँ के साथ, यह बात समझ में नहीं आती। पशु-पक्षियों के शरीरों में भी वासना तब उठती है, जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ़ हो जाते हैं। पर मनुष्य बालक को वह वृत्ति इतनी छोटी आयु में ही कैसे पैदा हो जाती है और फिर माँ के साथ वैसी तृप्ति करने की उसकी शारीरिक मानसिक स्थिति भी तो नहीं होती। फिर तीन वर्ष के बालक को काम प्रयोग और उनमें माँ बाप के संलग्न होने की जानकारी कहाँ से हो जाती है। फिर वह यह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए। यह ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं जिसके लिए भर्त्सना ही की जानी चाहिए पर दुर्भाग्य यह है कि उन्हीं विचारों को मनोविज्ञान शास्त्र का आधार मान लिया गया है और उन्हें ही पढ़ने पढ़ाने की बात शिक्षा क्षेत्र में बिना किसी ननुनच के स्वीकार करली गई है।
फ्राइड ने अपनी तराजू पर सारी दुनिया को तोलने की गलती की है। उनका निज का जीवन क्रम अवश्य कुछ ऐसे ही बेतुके क्रम से विकसित हुआ। फ्राइड की माता अमेलिया असाधारण सुन्दरी थी। उसने योकोव के साथ अपना दूसरा विवाह किया था। जब फ्राइड जन्मा तब वह इक्कीस वर्ष की थी। बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी। सम्भव है कुछ समझ आने पर फ्राइड की उसके रूप में यौनाकाँक्षा भड़की हो और उसने माँ के प्यार को ‘प्रणय’ माना हो। वह जन्म से ही उद्दण्ड और ईर्ष्यालु था। एक दिन वह माता-पिता के सोने के कमरे में घुस गया ओर उन दोनों को विचित्र परिस्थिति में डालकर हड़बड़ा दिया। हो सकता है उसे इस स्थिति में ईर्ष्या उत्पन्न हुई हो। सात साल का था तो एक दिन बाप की ओर मुँह बनाकर चिढ़ाने लगा। बाप ने उसे डाँटा और कहा यह छोकरा जिद्दी और निकम्मा बनता जाता है।
यह घटनाएं फ्राइड ने स्वयं लिखी हैं। उस पर, सम्भव है अपने माँ बाप के सम्बन्ध में वैसी ही छाप पड़ी हो, जैसी कि उसने प्रतिपादित की है पर यह एक विशेष मनःस्थिति के विशेष लड़के की ही बात कही जा सकती है। इसे सर्वसाधारण पर घटित नहीं किया जा सकता है। साधारणतया बालक अपने माता-पिता के प्रति भाव भरे रहते हैं। उसके प्रति श्रद्धा, ममता और आदर का भाव रखते हैं। उनके साथ रहने के लिए प्रसन्नता अनुभव करते हैं। बाप को देखकर ईर्ष्या की आग में जल मरने वाले और माता से यौन सम्बन्ध स्थापित करने के इच्छुक तो कोई विरले ही होते होंगे। यदि सभी ऐसे होते तो लड़कियाँ अपनी माँ को और लड़के बाप को मार डालने का प्रयत्न करते और बड़े होने पर वह अचेतन वृत्ति बाप बेटी और माँ बेटे से ही शादी करा देती। तब विवाह सम्बन्ध ढूँढ़ने का झंझट ही दूर हो जाता।
इस प्रकार के प्रतिपादन का उत्साह सम्भवतः फ्राइड को पाश्चात्य धर्म मान्यताओं से भी मिला होगा। क्योंकि उनका तत्वदर्शन कुछ ऐसा ही झटापटा है।
यहूदी और ईसाई धर्म मान्यताओं के अनुसार मनुष्य जन्मजात पापी है। वह पाप वृत्तियाँ लेकर अवतरित हुआ है। उसकी प्रकृति पापमूलक है। इस ‘ओरीजिनल सिन’- को ही सम्भवतः फ्राइड ने मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्ति माना है। जो कुछ वह सोचता है, करता है उसमें पाप ही प्रधान होना चाहिए। पापों में से प्रधानता किसे दी जाये। फ्रायड को इसके लिए सबसे सरल और आकर्षक सेक्स ही जँचा और उसने यह मान्यता गढ़ डाली कि मनुष्य की स्थिरता एवं प्रगति सेक्स पर अवलम्बित है। उसकी निरन्तर इच्छानुरूप- स्वच्छन्द पूर्ति न हो सकेगी तो मन में कांप्लेक्स-ग्रन्थियाँ बनेंगी। मनोविकार उत्पन्न करेंगी, बीमारी लायेंगी और न जाने क्या-क्या करेंगी। इसलिए उन समस्त उपद्रवों और हानियों से बचने का एक ही आकर्षक तरीका है कि स्वच्छन्द काम सेवन की सुविधा प्राप्त की जाय। इस दिशा में लगे हुए प्रतिबन्धों और मर्यादाओं को अमान्य किया जाय। स्वेच्छाचार और स्वच्छन्दतावाद सम्भवतः इसलिए उन्हें उचित प्रतीत हुआ क्योंकि वह उस दर्शन में- जिसमें फ्रायड पले यह माना जाता है कि मनुष्य जन्मजात पापी है। पाप उसकी प्रकृति है। जब ऐसा ही है तो उस मूल प्रवृत्ति को क्यों रोका जाय ? यही है फ्राइड का अधूरा और बेतुका चिन्तन जिसे न जाने क्यों विचारशील लोगों ने आँखें बन्द करके स्वीकार कर लिया है।
मनुष्य की प्रकृति में कामुकता का भी एक स्थान है, पर वह है सीमित, उसे मान्यता मिली है, उसे हर्षोल्लास के विकास की दृष्टि से प्रयुक्त भी होने दिया जाता है, पर उसकी दिशा ऊँची रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि वह ऊर्ध्वगामी होकर विकसित हो। विवाह के समय पत्नी प्रियतमा व प्रेयसी होती है, रस रंग में सहायक होती है, पर उसकी इस स्थिति की अवधि बहुत स्वल्प है। जल्दी ही वह माँ बन जाती है और फिर पति भी-पत्नी भी अपने उत्तरदायित्वों और गृहस्थ के कर्तव्यों को देखते हुए-बालकों पर पड़ने वाले प्रभाव का ध्यान रखते हुए उस प्रणय प्रवृत्ति को जल्दी ही शालीनता में परिणत करने लगते हैं। आरम्भिक दिनों में चन्द्र वदनी, मृगनयनी आदि कहा जाता था पर थोड़े ही दिनों बाद वह मुन्नी की मम्मी, श्याम की माँ कहकर पुकारी जाती है। फिर परस्पर सम्बोधन बच्चों के नाम पर उनकी माता जी या उनके पिताजी कहकर किये जाते हैं। वासनात्मक दृष्टिकोण बदलकर अभिभावकों का- बुजुर्गों का- बन जाता है। यह स्वस्थ दृष्टिकोण है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की चार उपलब्धियों में एक गणना काम की भी है, पर उसकी प्रधानता नहीं तीसरा नम्बर है। पहले धर्म कर्त्तव्य- इसके बाद अर्थ पुरुषार्थ- तब कहीं काम- सो भी तुरन्त छुटकारे से- मोक्ष से- तनिक ही पूर्व सूर्य चन्द्र पर ग्रहण लगता तो पर उसका मोक्ष काल भी जल्दी ही आ जाता है। यही है तथ्यपूर्ण काम मर्यादा।
माना कि पशु प्रवृत्तियाँ भी मनुष्य के भीतर हैं पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि उन्हें खुलकर खेलने के लिए छुट्टल कर दिया जाय। उनका उदात्तीकरण ही तो ‘संस्कृति’ है। बालों को काट-छाँट कर साज-संभाल कर ही तो उन्हें सुन्दर बनाया जाता है। यदि उन्हें मूल रूप में ही बढ़ने दिया जाय तो फिर मनुष्य की शकल आदम मानव जैसी कुरूप बन जायेगी। बगीचे की कटाई, छंटाई, खुदाई-निराई न की जाय तो वह झाड़-झंखाड़ के रूप में कुरूप बना खड़ा होगा। पशु प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण ही तो ‘कला’ है। कला रहित को सींग, पूँछ रहित पशु कहा गया है। ‘काम’ को भारतीय दर्शन में भी उसके मूल स्वरूप में स्वीकार किया गया है और उसका सम्मान भी किया गया है। उसे ‘पाप’ नहीं माना गया वरन् हर्षोल्लास, विनोद, कौतुक के भावान्दोलन का लाभ लेकर उसे श्रद्धा सिक्त अभ्यास की दिशा में उन्मुख कर दिया गया है। शिव लिंग की प्रतिमाएं देव मन्दिरों में पूजी जाती हैं यह नर नारी की जननेन्द्रियाँ ही हैं। उन्हें सृष्टि बीज-चेतना केन्द्र के रूप में श्रद्धासिक्त दृष्टि से देखा जाता है और अर्चना अभ्यर्थना के उच्च स्तर पर उन्हें बिठाकर वन्दन अभिनन्दन किया जाता है। उच्छृंखल उन्माद के लिए- कोमल भावनाओं के रूप में उन्हें मृदुल रस धारा बनाकर जीवन मरुभूमि में प्रवाहित करना ही ललित कलाओं का उद्देश्य है। शिव द्वारा काम दहन के पौराणिक कथानक ने स्थूल काम सेवन को विक्षोभकारी, असन्तुलन उत्पादन का अपराधी ठहरा कर विवेक के तृतीय नेत्र से उसे भस्म कराया है। साथ ही उसे अशरीरी बनकर अजर-अमर रहने का वरदान भी मिला है और उसे देवताओं की पंक्ति में बिठाया गया है। यही है काम सम्बन्धी परिष्कृत दृष्टिकोण।
पर सन्तोष इस बात का है कि आरम्भ में फ्रायड को जैसा समर्थन मिला था और नवीन सभ्यताभिमानियों ने हर स्तर पर जिस उत्साह से उसकी हाँ में हाँ मिलाई थी, अब वैसी बात नहीं रही। वह जोश ठण्डा पड़ता जा रहा है और संयम सदाचार को वैसा ही उपयोगी माना जाने लगा है जैसा कि प्राचीन काल से माना जाता आ रहा है। विज्ञानवेत्ताओं की नवीनतम शोधें फ्राइड का समर्थन नहीं करतीं वरन् उसे झुठलाती हैं।
लीसेस्टर विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान प्राध्यापक डॉ. डेविड राइट ने अपने शोध पर्यवेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला है कि काम वासना मनुष्य की स्वाभाविक एवं जन्मजात प्रवृत्ति नहीं है, वरन् वह सामाजिक जीवन के प्रचलन द्वारा आरोपित है। उनने पशुओं पर किये गये अपने परीक्षणों से सिद्ध किया है कि काम सेवन के अभाव में कोई जन्तु हिंसक या समाज विरोधी नहीं बनता वरन् वह अपेक्षाकृत अधिक सौम्य हो जाता है। बंध्य बनाये गये, बैल, भैंसे, घोड़े, बकरे, गधे आदि उन्मुक्त काम सेवन करने वाले अपने सजातियों की तुलना में अधिक शान्त प्रकृति के होते हैं जबकि फ्राइड का कहना यह है कि यदि मनुष्य को काम सेवन की छूट न मिले तो वह समाज विरोधी बन जायेगा। यह बात उन्हीं लोगों के लिए सही हो सकती है जो उच्छृंखल वातावरण में रह रहे हैं। साधु प्रकृति के संयमी, सदाचारी और ब्रह्मचारी काम सेवन का अवसर न रहने पर भी न तो हिंस्र बनते हैं और न समाज विरोधी।
श्री राइट ने अनेकों उदाहरणों से यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि यदि कामुकतापूर्ण वातावरण एवं चिन्तन से दूर रहा जाये तो वह प्रवृत्ति स्वयमेव शिथिल या समाप्त हो जाती है। द्वितीय महायुद्ध में पकड़े गये बन्दी सैनिकों तथा साइबेरिया के श्रम शिविरों में बन्द लोगों का पर्यवेक्षण करने पर निष्कर्ष है कि उनकी न केवल रति क्षमता वरन् वह इच्छा भी घट गई अथवा समाप्त हो गई। इसी प्रकार उन्होंने किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों में मनोयोगपूर्वक लगे हुए व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि उन्हें अपने चिन्तन की व्यस्तता में काम सेवन की न तो इच्छा होती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है। सेनानायक, नाविक, पर्वतारोही, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अध्ययन परायण व्यक्तियों की कामेच्छा बहुत स्वल्प होती है और वह भी तब तक जाग्रत नहीं होती जब तक कि वातावरण, संवाद अथवा स्वचिन्तन से ही उस तरह की अतिरिक्त उत्तेजना न मिले।
भारत के नैतिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य संगठन दिल्ली के एक शोध अध्ययन से पता चला है कि काम सेवन की न्यूनता से नहीं वरन् उसकी अति से पारिवारिक कलह उत्पन्न होते हैं। इस दिशा में अधिक आतुर, उत्सुक रहने वाले न केवल शारीरिक दुर्बलताग्रस्त होते हैं वरन् मानसिक सन्तुलन खोकर चिड़चिड़े भी हो जाते हैं और उस अति को अपने ऊपर अत्याचार मानकर विरोध विद्रोह भी करते हैं। पारिवारिक कलह एवं मनोमालिन्य की घटनाओं में इस विग्रह का बहुत बड़ा हाथ पाया गया है। जो लोग मर्यादाओं में रहते हैं उन्हें एक दूसरे से शिकायत होना तो दूर उलटे विश्वास, सम्मान, सन्तोष और सहयोग की मात्रा बढ़ी-चढ़ी रहती हैं।
कामुकता केवल क्रीड़ा कौतुक की तृप्ति तक सीमित नहीं रहती वरन् उसकी मर्यादायें तोड़ कर चलने से अनेक यौन रोग भी पैदा होते हैं। उपरोक्त संगठन ने दिल्ली की 232 वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं की जाँच कराई तो उनमें 212 को यौन रोग निकले और उनके संपर्क में आने वाले हजारों को वह गर्मी, सुजाक जैसी बीमारियाँ लगीं। एक ही विद्यालय में इस प्रकार की छूट से ग्रसित 37 छात्र पाये गये। इसी से मिलती जुलती रिपोर्ट अन्य नगरों की भी हैं। आवश्यक नहीं कि गन्दी सोहबत से ही यह संक्रामक रोग होते हैं। विशुद्ध रूप से पति पत्नी के बीच अमर्यादित काम सेवन चलने से भी इस प्रकार की बीमारियाँ स्वयं में उठ खड़ी होती हैं और फिर उनका दुख बुरी तरह भोगना पड़ता है।
आश्चर्य इस बात की नहीं कि फ्राइड ने ऐसा बेतुका- अविश्वस्त और अप्रमाणित प्रतिपादन कैसे किया। आदमी कुछ भी सोच और कुछ भी कर सकता है। तेज अकल किसी उलटी और औंधी बात को भी सही सिद्ध कर सकती है। अकल एक जादू है उसे जिधर भी जुटा दिया जाय उधर ही चमत्कार उत्पन्न करेगी। तरस उन लोगों की बुद्धि पर आता है जिनने इस बात को आँखें बन्द करके सही मान लिया और इससे भी आगे कदम यह बढ़ाया कि उसे शिक्षा पद्धति में स्थान देकर कच्ची बुद्धि के बालकों को वैसा ही कुछ सोचने के अनैतिक पथ पर धकेल दिया।
एक अमीर ने किसी सन्त की बहुत सेवा की। सन्त का जी आया और वे वहाँ से चलने लगे। अमीर ने प्रार्थना की कुछ ऐसी सौगात देते जाइये जिसके सहारे मैं भगवान तक पहुँच सकूँ। सन्त ने उसे तीन चीजें दीं (1) मोम (2) सुई (3) थोड़े से बाल, और कहा इन्हें गाँठ में बाँध लो। अमीर ने इन चीजों को देखा और अचम्भे से पूछा-इनके सहारे मैं कैसे भगवान से मिल सकूँगा ?
सन्त ने कहा-मोमबत्ती की तरह खुद जलो और दूसरों के लिए रोशनी पैदा करो। सुई की तरह अपने को उघारा रखो पर दूसरों के छेद बन्द कर दो। बालों की तरह मुलायम और लचीले रहो। यह तीन ही सहारे भगवान तक पहुँचने के हैं, सो इन्हें गिरह बाँध लो तो भगवान तक पहुँच जाओगे।
मनः स्थिति की दृष्टि से मनुष्यों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक सृष्टा दूसरे दृष्टा।
सृष्टा वे हैं जो कुछ बनने और बनाने की योजना लेकर चलते हैं और अपनी शारीरिक मानसिक एवं भौतिक शक्तियों को योजनाबद्ध रूप से व्यवस्था पूर्वक नियोजित करते हैं।
दृष्टा वे हैं जो दुनिया की हलचलों, मन की हरकतों और शरीर की गतिविधियों को देखते भर रहते हैं और उनमें से अनुकूलता, प्रतिकूलता के आधार पर- प्रिय अप्रिय का- सुख-दुख का अनुभव करते रहते हैं। देखते रहना ही उन्हें पर्याप्त होता है। इतने में ही उनका सन्तोष समाधान हो जाता है। प्रिय दर्शन की इच्छा से ही वे इधर उधर आते जाते और कुछ करते धरते दीखते हैं। निर्माण में उनकी रुचि नहीं होती।
सृष्टा होने की प्रतिभा कम ही लोगों में पाई जाती है। यद्यपि वह होती सभी में है और अनुकूल परिस्थितियों में विकसित की जा सकती है, पर इस सृजन क्षमता का उपयोग कोई-कोई ही करते हैँ। आमतौर से दृष्टा बनना सरल पड़ता है उसके लिये कोई उत्तरदायित्व नहीं उठाना पड़ता और न कर्तव्य निर्धारित करना पड़ता है। जो हो रहा है उसी से संपर्क बनाने से काम चल जाता है। मनोरंजन की परिस्थितियाँ भी इस संसार में कम नहीं हैं। उन्हें पास ले आना या उनके पास पहुँच जाना कुछ बहुत कठिन नहीं है। यों उसमें भी विनोद के पास खिसक जाना सरल पड़ता है। उसे अपने पास बुलाने में भी तो झंझट उठाना पड़ता है और प्रयत्न करना पड़ता है।
कितने ही व्यक्ति अपने अवकाश का समय, सिनेमा, नाटक, नाच गाने, खेलकूद, सैर सपाटे, गपशप, ताश, शतरंज जैसे कार्यों में व्यतीत करते हैं। कुछ नहीं हुआ तो रेडियो से हलके फुलके गाने सुनते रहते हैँ। इस कार्य में एकाकी रहने में मजा नहीं आता- साथियों के संग अच्छा रंग जमता है इसलिये ऐसे लोग अपनी ही प्रकृति के और लोग भी तलाश करते रहते हैं। पास नहीं मिलता तो दूर जाते हैं। अथवा ऐसा प्रयत्न करते हैं कि अपने पास-पड़ौस में ही अपनी जैसी मनमौजी प्रकृति के दूसरे लोग ढाले बनाये जायँ। इसके लिये वे तरह तरह के प्रयत्न करते हैं। दोस्ती गाँठते हैं, सज्जनता बरतते हैं, दरवाजों पर चक्कर लगाते हैं, गाँठ से खर्च भी करते हैं और तब तक उस प्रयास में लगे ही रहते हैं जब तक के शिकार भी उन्हीं जैसा मनचला नहीं बन जाता। इस प्रकार यह प्रवृत्ति छूत की बीमारी की तरह यारवासी के साथ-साथ बढ़ती रहते है।
ऐसे लोगों के सामने कोई उद्देश्य नहीं होता, भविष्य की उन्हें कुछ चिन्ता नहीं होती, पारिवारिक तथा सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर उनका कोई ध्यान नहीं जाता, प्रगति और उन्नति की कभी-कभी कल्पना तो करते हैं पर उत्कंठा उसकी भी नहीं होती। हलकी फुलकी दिनचर्या बनाकर बिना बोझ और उत्तरदायित्व का मनमौजी ढर्रा ही उनके अभ्यास में जुड़ जाता है।
ऐसे हलके फुलके ढर्रे पर चलने वाले-उसमें रस लेने वाले लोग या तो ओछे स्तर के होते हैं या बन जाते हैं। क्योंकि प्रतिभा सम्पन्न और प्रगतिशील लोग सदा अपने कामों में व्यस्त रहते हैं। जिनके सामने कुछ बड़ी बात नहीं वे ही इस मटर गश्ती में मस्त रहते हैं। धीरे-धीरे उनमें दोष पनपते हैं और ऐसे वातावरण में दोष दुर्गुण ही भर जाते हैं। मनोरंजन के वातावरण में वे लोग भी घुस पड़ते हैं जो इन अस्त व्यस्त लोगों से लाभ उठायें। नशा जुआ, चोरी-व्यभिचार जैसी कितनी ही बुराइयाँ स्वभावतः ऐसे वातावरण में पलती और पनपती हैं। मनमौजी लोगों का उनमें फँस जाना सरल भी है और स्वाभाविक भी। अस्तु बात शुद्ध मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। अस्तु बात शुद्ध मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। इस स्तर के लोग जब अगला कदम बढ़ाते हैं तो वह अनैतिकता और अवाँछनीयता का ही होता है। इस प्रकार दृष्टा की आरम्भ में हलकी फुलकी जिन्दगी क्रमशः भारी और जटिल होती चली जाती है। अपराधों की और दोष दुर्गुणों की शृंखला सीमित नहीं रहती-उसमें एक के बाद दूसरी कड़ी जुड़ती ही चली जाती है।
कल्पना-उठती उमर ऐसे ही अल्हड़पन को लेकर आती है। नया उत्साह होता है और दुनिया के प्रति नया कौतूहल। तब कुछ करने या बनने की अपने कुछ देखने और कुछ चखने की उत्कंठा प्रबल होती है। उस उभार को दिशा देने का उपयुक्त साधन न हो तो फिर पानी नीचे की ओर ही बहता है। तब मनमौजी बनने का और ऐसी ही चौकड़ी में फँस जाने का ही द्वार खुलता है। समय कटता जाता है और पूँजी चुकती जाती है। तन, मन और धन का जो कोष पास में था वह क्रमशः घटता ही चला जाता है और जब आँख खुलती है तब जिम्मेदारियों को बोझ इतना भारी हो जाता है कि उसे ढोते हुए किसी महत्वपूर्ण दिशा में प्रगति कर सकना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है।
सृष्टा के सामने लक्ष्य रहता है और वह एक दिशा और कार्य पद्धति निर्धारित करता है। उसी संदर्भ में सोचता है और सहयोग दे सकने वालों से संपर्क बढ़ाता है। इस दुनिया में ऐसे सुन्दर व्यवस्था है कि सहयोगी हर क्षेत्र में मिल जाते हैं। नशेबाज, जुआरी, व्यसनी, चोर, व्यभिचारी ही हर जगह फैले नहीं पड़े हैं। सज्जनों और सद्गुणों की भी कमी नहीं। अपना मन हो तो वे भी मिल जाते हैं और सहयोग उस क्षेत्र में भी सम्भव हो जाता है। एक-एक कदम बढ़ाते चलने से लम्बी यात्रा पूरी की जा सकती है। एक-एक बूँद संग्रह करने से घड़ा भर जाता है। लक्ष्य और प्रयत्न यदि जुड़े रहें तो प्रगति निश्चित रूप से होगी भले ही वह परिस्थितिवश धीमी और कष्ट साध्य क्यों न बनी रहे।
मनमौजी लोग प्रगतिशील लोगों के साथ जब अपनी तुलना करते हैं, तो उन्हें जमीन आसमान जितना अन्तर दीखता है। स्कूल में साथ पढ़ने वाले फिसड्डी और गरीब लड़के अब कहाँ पहुँच गये- कितने आगे बढ़ गये जब कि अपने पास सुविधा-साधन रहने पर भी कुछ बन नहीं सका। उठना तो दूर उलटे नीचे ही खिसकते चले गये। और स्थिति में इतना अन्तर पड़ गया जिसे देखकर आश्चर्य होता है।
इस अन्तर की ठीक से समीक्षा न कर सकने वाले लोग सरल सा समाधान भाग्यवाद को ढूंढ़ लेते हैं। वे प्रशंसा या निंदा भाग्य की करते हैं और उसे ही इस उतार चढ़ाव का कारण मानते हैं। पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। मनुष्य के सृष्टा और दृष्टा क्षेत्र में से एक की पसन्दगी ही वह आधार है जिसे अपनाने पर ऊँचे चढ़ना या नीचे गिरना संभव होता है।
दृष्टा मनोरंजन के स्थान और अवसर ढूँढ़ने के लिये मारा-मारा फिरता है। नवीनता जब तक रहती है। तब तक मौज अच्छी लगती है। पुरानी होने पर वही बात नीरस और अप्रिय लगने लगती है। हर रोज एक ही सिनेमा देखना एक ही मिठाई खाना-एक ही गाना सुनना कौन पसन्द करता है। नवीन के बिना मनोरंजन में रस ही नहीं रहता। नये अवसर कहाँ तक आयें, नई विनोद सामग्री कहाँ तक मिले ? मन में अतृप्ति ही बनी रहती है। समय, श्रम, मनोयोग, धन की प्रचुर मात्रा खर्च करते रहने पर भी अभाव, असन्तोष और अतृप्ति का ही अनुभव होता है उतने साधनों का सदुपयोग करके जो कहने लायक प्रगति हो सकती थी उसका घाटा प्रत्यक्ष ही है। दृष्टा प्रवृत्ति जिस प्रसन्नता और तृप्ति को लक्ष्य मानकर मुखरित हुई थी उससे सदा उसे वंचित ही रहना पड़ता है। जो मिलता है वह आकाँक्षा की तुलना में अति स्वल्प ही ठहरता है और असन्तोष ही बना रहता है।
सृष्टा का मनोरंजन उसका कार्य, प्रयत्न पुरुषार्थ, साहस और लक्ष्य स्वयं ही बन जाता है। उसे अपनी चेष्टा में स्वयं ही रस आता है। उज्ज्वल भविष्य के सपने उत्साह भरते हैं और उसी जैसे अन्य प्रगतिशील साथियों का संपर्क सहयोग नया प्रकाश देता रहता है। सृष्टा देखता है कि उसने न केवल स्वयं ही प्रगति की वरन् अपने संपर्क और प्रभाव में आने वाले लोगों को प्रगतिशीलता के लिये प्रकाश प्रोत्साहन भी प्रदान किया, यह संतोष उतना गहरा और स्थायी होता है कि उसकी सुगन्ध देर तक बनी रहती है और ऊँचे दर्जे का संतोष समाधान मिलता रहता है।
यह सोचना सही नहीं कि प्रगतिशील और कार्य व्यस्त लोग मनोविनोद से वंचित रह जाते हैं और रूखा और नीरस जीवन जीते हैं। यदि ऐसा होता तो वे अपना काम लम्बे समय तक तन्मयता के साथ कर ही नहीं सकते थे। मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि अरुचिकर कार्य देर तक नहीं किया जा सकता, उसमें जल्दी ही थकान आती है, जी ऊबता है और सफलता का स्तर गया गुजरा रहता है। जिसमें रस न आए ऐसा काम छोड़ते ही बनता है कोई लम्बे समय से तत्परता और रुचि पूर्वक किसी काम को कर रहा है इसका तात्पर्य निश्चित रूप से यह है कि उसे उसमें मनोरंजन के तत्व मिल गये।
काम का वर्गीकरण करके कुछ-कुछ देर बाद उस प्रक्रिया में थोड़ा हेरफेर करते रहने की पद्धति सभी कार्यनिष्ठ लोग जानते हैं फलतः उन्हें न थकान की शिकायत होती है न मनोरंजन की कमी अखरती है।
मनोरंजन के साधन बाहर तलाश करने के लिये मारे-मारे फिरना दृष्टा वर्ग को ही पसन्द आता है। सृष्टा मनोरंजन के पीछे नहीं भागता वरन् उसे अपने क्रिया कलाप में से स्वयं ही उत्पन्न करता है।
सृष्टा और दृष्टा के वर्गीकृत क्षेत्रों में से अपने लिये कौन-सा उपयुक्त पड़ेगा इस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए और यदि सृष्टा पक्ष भारी लगता है तो सारी हिम्मत बटोर कर अपने मानसिक क्रिया कलाप को उसी ढाँचे में ढालने के लिये उठ खड़ा होना चाहिए।
तीन दिन से पत्नी और बच्चों को भोजन न मिला था। गृह-स्वामी प्रयत्न करने पर भी एक समय का भोजन न जुटा सका। अन्ततः वह निराश हो गया उसे अपना जीवन बेकार लगने लगा। वह अपने घर से चला आया और आत्म-हत्या करने की तैयारी पर विचार करने लगा कुछ क्षण बाद वह व्यक्ति संसार से विदा होने को था।
पीछे से किसी ने कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-मित्र ! इस मूल्यवान जीवन को खोकर तुम्हें क्या मिलेगा? निराश होने से तो कोई लाभ नहीं। मैं मानता हूँ कि तुम्हारे जीवन में आई हुई विपत्तियाँ ऐसे करने के लिए विवश कर रही हैं, क्या तुम इन विपत्तियों को हँसते हँसते पीछे नहीं ढकेल सकते?
आत्मीयता से परिपूर्ण शब्दों को सुनकर वह युवक रो पड़ा। सिसकियाँ भरकर अपनी मजबूरी की सारी कहानी सुना दी। अब तो सुनने वाले व्यक्ति की आँखों में आँसू थे। यह सहृदय व्यक्ति जापान का प्रसिद्ध कवि शिनीची इगुची था।
उस युवक की परेशानियों ने भावुक कवि शिनीची को प्रभावित किया। उसने वहीं संकल्प किया कि मैं अपनी कमाई का अधिक से अधिक भाग उन व्यक्तियों की सेवाओं में लगाया करूंगा जो अभावग्रस्त हैं। उस समय कवि शिनीची ने युवक के परिवार की भोजन व्यवस्था हेतु कुछ धनराशि दे दी पर घर लौटकर उसने एक गुप्त दान पेटी बनाई और मुख्य चौराहे पर लगवा दी।
उस पेटी के ऊपर लिखा गया ‘जिन सज्जनों को सचमुच धन की आवश्यकता हो वह इस पेटी से निकाल कर अपना काम चला सकते हैं यह धन यदि कतिपय अभावग्रस्त व्यक्तियों की सहायता में लग सका तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। धन्यवाद !’ उस पेटी पर नाम किसी व्यक्ति का न था। क्योंकि शिनीची की कर्म और सेवा में आस्था थी वह लोकेषणा से बहुत दूर थे।
सम्राट ब्रह्मदत्त के पुत्र को दक्षिणाँग पक्षाघात हो गया। दाहिने हाथ, पैर, दाहिनी आँख, दाहिने कान—शरीर के समस्त दक्षिण पार्श्व ने अपनी क्षमतायें खो दीं। इस आकस्मिक संकट के कारण सम्राट के शोक का पारावार न रहा।
समस्त पाँचाल प्रदेश के वैद्यों ने जाँच की। राजधानी काम्पिल्य एक से एक गुणी और चतुर वैद्यों से भर गई पर न तो कोई इस संकट के कारण की ही खोज कर सका और न उसका निराकरण ही। वे यह अनुभव कर रहे थे कि यह कष्ट पूर्व जन्मों के दुष्कृतों का प्रतिफल है। अतएव उसका उपचार भी कोई ऐसा पण्डित ही कर सकता है जो जीवन की सूक्ष्म अन्तरंग विद्या का ज्ञाता हो। वैद्य लोग तो हार मान-मानकर अपने घर वापस लौट गये।
राज प्रासाद के कीर्ति शिखर पर पूजनी पक्षी का एक घोंसला भी था उसमें बैठी चिड़िया इस सारे दृश्य को बड़े ध्यान से देख रही थी—उसका एक कारण यह भी था कि उसके दो बच्चों में से एक बच्चे को भी ठीक राजकुमार के समान ही पक्षाघात हो गया था। पूजनी उस रहस्य को जानती थी कि उसके बच्चे के रूप में और राजकुमार के रूप में यह जो दो आत्माएं प्रकारान्तर से एक ही भवन में एक ही समय- एक ही प्रकार से रोग ग्रस्त हुई हैं वह मनोमय जगत की एक सुनिश्चित विज्ञान—प्रक्रिया के अंतर्गत है-मन की भी तरंगें होती हैं, हर विचार-हर कर्म की प्रतिक्रिया जब एक निश्चित दूरी पार कर लौटती है तब तक जीवात्मा भले ही अपना चोला बदल चुकी हो पर वह उसके प्राण-तत्व में प्रतिध्वनित होकर कर्मफल के रूप में प्रकट होती है। अनेक आधि-व्याधियाँ जिनका कारण मनुष्य नहीं खोज पाता वह सब पूर्वकृत कर्मों का ही परिणाम होती हैं और उनका उपचार भी कोई सर्वज्ञ या प्रायश्चित प्रक्रिया ही कर सकती है, यह बात पूजनी खूब अच्छी तरह समझती थी-पर पक्षी योनि में होने और मनुष्य जैसी वाणी उपलब्ध न होने के कारण वह कुछ कह—बता नहीं सकती थी।
पूजनी का बच्चा और राजकुमार दोनों ही पूर्व जन्म में मित्र थे, एक बार वन में भ्रमण करते समय उन्होंने एक मृग के बच्चे के शरीर के दक्षिणी भाग में प्रहार कर मार डाला था। उसी पाप का फल उन्हें अब भुगतान पड़ रहा था; यद्यपि देखने में वे निर्दोष जैसे लगते थे। मनुष्य जाति के साथ चिरकाल से यही होता चला आ रहा है। भगवान् अपनी इस व्यवस्था के लिये विवश है, भले ही उसे कोई कितना ही कठोर क्यों न कहे।
पूजनी चिड़िया उड़ी और समुद्र के किनारे-किनारे दूर तक घूमी—वहाँ से वह दो अमृत के समान मीठे फल लाई—एक उसने अपने बच्चे को खिलाया एक राजकुमार को। बच्चा भी स्वस्थ हो गया और राजकुमार भी। पूजनी की इस अनुकंपा ने उसके बच्चों को सारे परिवार का स्नेह भाजन बना दिया। राजकुमार इन बच्चों के साथ ही खेला करता किन्तु अपने पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण एक दिन उसने उस चिड़िया के बच्चे को ही मार डाला पूजनी को यह देखकर बड़ा दुःख हुआ। शोकाकुल पूजनी विलाप करती हुई अपने दूसरे बच्चे को लेकर वहाँ से चलने लगी तो सम्राट् ब्रह्मदत्त बहुत दुःखी हुये। अपने उपकारी के प्रति कृतज्ञता के भाव व्यक्त करते हुये उन्होंने पक्षी से घर न छोड़ने का आग्रह किया।
पूजनी बोली तात! आपकी इस सौजन्यता का आभार मानती हूँ किन्तु नीति यह कहती है कि जिससे एक बार शत्रुता हो जाये ऐसे कुसंस्कारी—व्यक्ति का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। अभी तो मेरा एक ही पुत्र नहीं रहा पीछे आपका दुष्ट बालक मेरा सर्वनाश ही कर सकता है। अतः समय रहते मुझे आपका गृह-त्याग कर ही देना चाहिए।
यह कहकर उड़ गई और फिर वह कभी वहाँ लौटकर नहीं आई।
किसी समय अमेरिका के सुन्दर झरने जो अपनी प्राकृतिक छटा के कारण प्रकृति प्रेमियों का मन ललचाते थे और लोग वहाँ कुछ समय बिताकर शाँति प्राप्त करने के लिये जाया करते थे; अब उनके किनारों पर बड़े-बड़े सूचना बोर्ड लगे हैं—डेन्जर, पोल्यूटेड वाटर, नो स्विमिंग, खबरदार, पानी जहरीला है, इसमें तैरिये मत! औद्योगिक नगरों के निकटवर्ती सरोवर एक प्रकार से मृतक संज्ञा में गिने जाते हैं। उनका पानी किसी के उपयोग में नहीं आता। नदियाँ अब गंदगी बहाने वाली गटरें भर रह गई हैं। ह्वाइन नदी को योरोप की गटर कहा जाता है।
स्वीडन सरकार ने डिडेलालबेन नदी को अपना प्राकृतिक रूप बनाये रहने के लिए सुरक्षित घोषित कर दिया है। यह इसलिए किया गया कि बढ़ती हुई औद्योगिक प्रगति कुछ दिनों में इस संसार की जल राशि की शुद्धता को नष्ट कर देगी, पानी में सर्वत्र विष भरा होगा। मजबूरी में पीना तो उसे ही पड़ेगा और उसके दुष्परिणाम भी कष्टकर असाध्य रोगों के रूप में सहने ही होंगे। तब भावी पीढ़ियाँ यह जानना चाहेंगी कि शुद्ध जल कैसा होता है? इसके लिए कम से कम जल देवता का एक तीर्थ तो रहना ही चाहिए जहाँ उसे अपने असली रूप में देखा जा सके। पुरातत्व संग्रहालय इसी लिए बनाये जाते हैं कि भूतकाल की झाँकी देख सकना संभव हो सके। अगले दिनों भी यह नदी शुद्ध जल ही प्रवाहित करती रहे और एक दर्शनीय स्थान समझी जाय इसलिए इसमें मल मूत्र अथवा कारखानों की गन्दगी डालने पर प्रतिबंधित रखा गया है।
ऐरिजोना के प्रोफेसरों की एक समिति ने जनता की ओर से ताँबा बनाने वाली छह फैक्ट्रियों पर दो अरब डालर का दावा किया है। वादियों का कहना है कि इन कम्पनियों ने जनता की जान-माल की जो अपार क्षति की है उसके बदले इन्हें इतना हरजाना तो देना ही चाहिए।
ऐसा ही एक मुकदमा जनता की ओर से न्यूयार्क की प्रमुख महिलाओं ने डी0डी0टी0 बनाने वाली 3 कम्पनियों के विरुद्ध दायर किया है और 3 अरब डालर की इस आधार पर माँग की है कि उनके उत्पादन ने जन स्वास्थ्य को भारी हानि पहुँचाई है।
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड की सरकार को चेतावनी दी है कि यदि वायु प्रदूषण घटाने के कारगर उपाय न किये गए तो यह खतरा लन्दन के लिये तबाही ही खड़ी कर देंगे।
विशेषज्ञों की यह भी कल्पना है कि यदि प्रदूषण की रोक थाम न हुई और औद्योगिक प्रगति बढ़ती चली गई तो जलवायु में बढ़ी हुई विषाक्तता मनुष्य के वर्तमान स्वरूप में ही ऐसा परिवर्तन कर सकती है जो विष ही खाये, विष ही पिये और उसकी आकृति प्रकृति सब कुछ बदल कर विषधर सर्प के स्तर की बन जाय।
रसायन विशेषज्ञ नारवल्ड डफिमराइट ने नार्वे की सेन्ट फ्लेयर झील से पकड़ी गई मछलियों का रासायनिक विश्लेषण किया तो पारे की खतरनाक मात्रा पाई गई। मछलियों में पारा कहाँ से आया? अधिक बारीकी से पता लगाया तो मालूम हुआ कि औद्योगिक रसायनों में पारे की भी एक बड़ी मात्रा होती है और वह गन्दगी के रूप में बहती हुई झीलों में पहुँचती है। सोचा यह गया था यह पारा भारी होने के कारण जल की तली में बैठ जायगा। कुछ मछलियाँ यदि पारे से मर भी गई तो कुछ विशेष हानि न होगी। पर वह अनुमान गलत निकला।
शोधों ने बताया कि जल में पहुँच कर पारे की रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। उसकी सूक्ष्म मात्रा जीव कणों में प्रवेश कर जाती है। इन्हें छोटे कीड़े खाते हैं और वे मछलियों की खुराक बनते हैं इस प्रकार पारे की रासायनिक प्रतिक्रिया मछली के माँस में एक इकाई बनकर बस जाती है। विश्लेषण कर्त्ताओं ने बताया है कि इस प्रकार की पारा प्रभावित मछलियों को खाने वाले मनुष्य अन्धे या पागल हो सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में तो वे मर भी सकते हैं।
इस वैज्ञानिक निष्कर्ष के उपरान्त उद्योगों में पारे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाये गये हैं। इस प्रकार के उद्योगों में कागज निर्माण और समुद्री जल में से क्लोरीन निकालने वाले कारखाने अग्रणी थे।
इस निष्कर्ष ने अमेरिका को भी चौकन्ना किया है उसने भी अब पारे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाया है फलतः उसमें 86 प्रतिशत कमी तत्काल कर दी गई है। फिर भी यह प्रश्न तो है ही कि पारे की जो मात्रा जल में चली गई उसका प्रभाव अभी कम से कम 50 वर्ष तक तो बना ही रहेगा। उसके द्वारा होने वाली हानियों से कैसे बचा जाय?
पारे की ही भाँति कुछ और भी ऐसे ही रसायन हैं जिनका खतरा कम नहीं कुछ ज्यादा ही है। उन्हें भी उद्योगों में भरपूर मात्रा में प्रयोग किया जाता है और उनका कचरा भी जल दूषण में अग्रणी ही रहता है। डार्ट माउथ मेडीकल कालेज के डॉक्टर हैनरी श्रुडर ने अमेरिकी प्रशासन को चेतावनी दी है कि सीसा, कैडमियम, निकिल कार्वोनिला जैसे पदार्थ भी कम घातक नहीं हैं। इनका प्रयोग इन दिनों बहुत चल पड़ा है। इनकी अति सूक्ष्म मात्रा भी रक्तचाप एवं फेफड़े का केन्सर उत्पन्न कर सकती है।
अमेरिका में कचरा वृद्धि का एक और कारण है। वहाँ 48 अरब डिब्बे, 28 अरब बोतलें, 10 करोड़ टायर, 70 लाख मोटर गाड़ियाँ हर साल कचरा बन जाती हैं। इसी तरह की और भी बहुत सी चीजें हैं जिनको रद्दी हो जाने के बाद कचरा ही बनना पड़ता है और फिर उसे समुद्र में पटक दिया जाता है। फलतः यह कूड़ा समुद्र तट के किनारे को खतरा बनाता जा रहा है। इस कचरे में गन्दगी जड़ जमाती है। थोड़ा इस्तेमाल करो। ‘फेंक दो और नया खरीदो’ का नारा उस देश की विलासिता और समृद्धि बढ़ाने में कितना सहायक सिद्ध हुआ यह तो समय ही बतायेगा पर उससे कचरे में असाधारण वृद्धि हुई है। लोग अपनी पुरानी मोटरों के प्लेट उतार कर कहीं यों ही छोड़ जाते है। कारों के कब्रिस्तान हर जगह मौजूद मिलेंगे, डिब्बे और बोतलों को कोई उठाता तक नहीं। इस समस्या से क्षुब्ध जनता ने ‘अर्थ डे’ मनाया और यह कचरा उनके बनाने वाली फैक्ट्रियों के दरवाजे पर पटक कर पहाड़ लगा दिये और माँग की बनाने के साथ-साथ इनके रद्दी होने पर इनका कचरा उठाने की जिम्मेदारी भी वे ही लें।
पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाने और विषाक्त तत्वों के बढ़ जाने से वहाँ वृक्ष वनस्पति विषैले होकर मर रहे हैं। बादलों में भी यह विष मिल जाता है और फिर जहरीली वर्षों के रूप में बरसता है, उससे पक्षी और पौधे दोनों ही झुलसते देखे गये हैं। मछलियाँ मरती घटती जा रही हैं। जो उन्हें खाते हैं वे बीमार पड़ते हैं। अब वहाँ जहरीली मछलियों की एक नई जाति विकसित हो रही है जिसे ‘कार्प’ कहते हैं। इसने जहर भरे पानी में रहना और जीना तो सीख लिया है पर मच्छीमारों के लिए तो ये किसी काम की नहीं रहीं।
अमेरिका में हर साल 70 लाख मोटरें तथा 10 करोड़ टायर कचरा बन जाते हैं। वहाँ 20 करोड़ लोगों के पीछे साढ़े आठ करोड़ मोटर हैं। अकेले लॉसएंजेल्स नगर में ही 20 लाख आबादी में 10 लाख मोटरें हैं। वहाँ नई मोटर 300 डालर की मिल जाती है। ऐसी दशा में पुरानी गाड़ियों की मरम्मत महंगी पड़ती है। पुरानी होते ही उन्हें कूड़े में फेंक दिया जाता है। यही हाल मोटर साइकिलों तथा दूसरी मशीनों का है। यह कचरा कहाँ फेंका जाता रहेगा यह प्रश्न उस देश की सरकार के लिए सिर दर्द बना हुआ है। फिलहाल तो यह कबाड़ समुद्र में गिराया जा रहा है पर वह भी तो यह पहाड़ गिरते-गिरते पटने की लगेगी। समुद्र तटों का तो अभी भी बुरा हाल है। वहाँ इस कचरे की सड़ाँद निकट भविष्य में किसी बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।
सागर अन्तराल के शोधकर्त्ता जैक्वीस वाइवस ने समुद्र में बढ़ती हुई अशुद्धता को शोचनीय स्थिति में पाया है और जल दूषण से समुद्रों की उपयोगिता नष्ट होने की आशंका व्यक्त की है। उनने तेल कणों तथा दूसरे विषाक्त रसायनों की मात्रा बढ़ जाने के फलस्वरूप विगत 20 वर्षों में 40 प्रतिशत जल जन्तुओं के मर जाने का हिसाब लगाया है। उनका कथन है कि मछलियाँ ही नहीं वनस्पतियाँ भी समुद्र तल से गायब होती चली जा रही हैं।
कीटाणु नाशक दवाओं में क्लोरीन जैसे पदार्थों का उत्पादन इन दिनों 50 लाख टन से अधिक है। उसकी स्वल्प मात्रा से ही चूहे जैसे छोटे जीव तत्काल मर जाते हैं। वह विष पदार्थ जलवायु में मिलकर इतना व्यापक होता जा रहा है कि ध्रुव प्रदेशों के निवासी मनुष्यों और पक्षियों तक के शरीर में वह तत्व पाया गया है।
कारखानों की गन्दगी घूम फिरकर—नदी नालों में होती हुई अन्ततः समुद्र में जा पहुँचती है। वृक्ष वनस्पतियों पर छिड़के जाने वाले कृमिनाशक विष भी वर्षा जल के साथ समुद्र में ही जा पहुँचते हैं। अणु भट्टियों की राख को भी समुद्र में ही प्रश्रय मिलता है। समुद्र विशाल भले ही हो असीम नहीं है। विष को पचाने की उसकी भी एक सीमा है। वह मात्रा जब बढ़ रही हो तो समुद्र का विषाक्त होना स्वाभाविक है। जमीन की तरह उस जल राशि में भी वनस्पतियाँ हैं, इन तैरने वाली वनस्पतियों से जल जगत के लिये आवश्यक प्राण वायु उपलब्ध होती है। पृथ्वी पर फैली पड़ी प्राण वायु का एक बहुत बड़ा अंश इन जल वनस्पतियों—फिटो प्लैंकटीन—से ही मिलता है, समुद्र का जल जैसे-जैसे विषाक्त होता जाता है इन वनस्पतियों का नाश होता जाता है और फलस्वरूप जल जन्तुओं के लिये ही नहीं धरती पर रहने वालों के लिये भी प्राण संकट उत्पन्न हो रहा है।
समुद्र का जल ही बादल बनकर सर्वत्र बरसता है। बादलों में वह विष घुला रहता है और विषैली वर्षा का जल पीकर उगी हुई वनस्पति भी वैसी ही बनती जाती है। उस घास पर पलने वाले पशुओं का दूध और माँस दोनों ही अभक्ष स्तर के बनने लगे हैं। अन्न और शाक फलों में वे अवाँछनीय तत्व बढ़कर मानव शरीरों में भी वे आरोग्य नष्ट करने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं।
डी0डी0टी0 सरीखे विषाक्त छिड़कावों तथा रासायनिक खादों का प्रचलन घुमा फिराकर मनुष्य शरीर में ही प्रवेश करता है। जहाँ यह प्रचलन अधिक है वहाँ पशुओं के तथा नारियों के दूध में विषाक्तता की मात्रा काफी बढ़ी चढ़ी पाई गई है। इसे पीने वाले बालकों तथा बड़ों को इसका परिणाम भुगतना ही पड़ता होगा।
किसी समय दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में विशालकाय एक गेंडा जैसा पशु रहता था। नाम था उसका—हिपोपोटमस। मनुष्य ने उसे निरुपयोगी समझा और खाल के लोभ में अन्धा-धुन्ध शिकार करके उसका वंश मिटाया। उस समय इसे बुद्धिमत्ता समझा गया था पर पीछे वह भारी मूर्खता सिद्ध हुई। इस जन्तु से जो लाभ होता था उससे वंचित रहना पड़ा और उस क्षेत्र में दूसरे प्रकार की भारी हानियाँ उत्पन्न हुई। हिपो नदियों में घूमता और उसके वजन से उनकी गहराई सम्भलती रहती थी। बेचारा समाप्त कर दिया गया तो नदियों में मिट्टी जमने लगी, वे उथली हो गई और बाढ़ से भारी नुकसान उठाना पड़ा। हिपो के चलने के कुछ रास्ते होते थे वे वजन से नाले जैसे बन जाते थे और नदियों का पानी उनमें होकर दूर-दूर तक पहुँचता था। इस प्रकार वह प्राकृतिक नहरें बनाया करता था और प्यासी जमीन तथा उस क्षेत्र की आबादी के लिए जल सुलभ किया करता था। वह मर गया तो नई नहरें बनना तो दूर वे पुरानी भी बन्द हो गई और जमीन तथा आबादी प्यासी मरने लगी। नदियों की बाढ़ से मलेरिया, हैजा जैसे रोग फैले सो अलग।
शोर और कोलाहल की मात्रा बढ़ जाना कम घातक नहीं। मोटरों की दौड़, कारखानों की मशीनें, जहाजों की भर्राहट, लाउडस्पीकर की चिल्लाहट, बात-चीत का शोरगुल मिलकर इतना विघातक बन जाता है कि उस वातावरण में रहने वाले लोग रक्तचाप, हृदय की तेज धड़कन, अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित हो जाते हैं बड़े कारखाने में काम करने वाले लोग बहरे, चिड़चिड़े थके हुए और मानसिक रोगों से ग्रसित रहने लगते हैं। यहाँ तक कि गर्भस्थ बालक भी इस वातावरण से प्रभावित होकर कई तरह की जन्मजात बीमारियाँ लेकर उत्पन्न होते हैं।
टालमटोल, विस्मृति, सुस्ती और निद्रा ये चार उन लोगों के खुशी मनाने के बजड़े हैं कि जिनके भाग्य में नष्ट होना बदा है। —तिरुवल्लुवर
लोभ और मोह को हम जितना ही पकड़ते हैं, उतना ही उनके बन्धनों में बँधते जाते हैं। सम्पदा को अपने अधिकार में करना चाहते हैं पर होता ठीक उलटा है। हम उलटे सम्पदा के कब्जे में चले जाते हैं, उसी के गुलाम बनकर जीते हैं। परिवार पर अपनी मोह-ममता केन्द्रित करते हैं, उन्हें अपना मानते हैं पर सच तो यह है कि हम उन्हीं के होकर रह जाते हैं। पदार्थों और व्यक्तियों को पकड़ने का नहीं—अपने को छुड़ाने का ही प्रयत्न करना उचित है। संसार को बाँधने में नहीं उसकी शोभा देख कर प्रमुदित रहने और उपलब्धियों का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने में ही बुद्धिमत्ता है।
प्रकाश की ओर से मुँह मोड़ कर छाया के पीछे भागने से छाया आगे बढ़ती जाती है और पकड़ में नहीं आती। लालसा अतृप्त ही रहती है। छाया को बाँधने का प्रयास सफल नहीं होता। पर जब छाया की ओर से मुँह मोड़ कर प्रकाश की ओर चलना आरम्भ करते हैं तो छाया अनुगामिनी बनकर पीछे-पीछे चलने लगती है। भगाने पर भी नहीं भागती। हटाने पर भी नहीं हटती। माया छाया की तरह है। सम्पन्न बनने के प्रयास जितने तीव्र होते हैं तृष्णा उतनी ही बढ़ती है और जो मिला था वह स्वल्प लगता है। आकाँक्षा की तुलना में उपलब्धि की मात्रा स्वल्प रहेगी और अभाव घेरे रहेंगे। पर जब हम उत्कृष्टता का वरण करते हैं, आदर्शों की ओर चलते हैं तो आवश्यकताओं की पूर्ति सरल बन जाती है, न कोई अभाव रहता है न असन्तोष।
उदारता में हानि दीखती है और कृपणता में लाभ प्रतीत होता है पर वस्तुतः यह मान्यता अत्यधिक भ्रम पूर्ण है। त्याग के बिना मिलने का कोई नियम ही इस संसार में नहीं है। मल त्याग न करें तो नया आहार ग्रहण करना संभव ही न होगा। साँस न छोड़ी जाय तो नई प्राण वायु भीतर कैसे जायगी? बीज न गले तो वह वृक्ष कैसे बनेगा? वृक्ष यदि अपने पुष्प न झड़ने दे तो उस डाली पर फल कैसे आवेंगे? फल यदि डाली पर ही चिपके रहें तो अगले वर्ष नये फल वहाँ कैसे लगेंगे?
भेड़ ऊन देती है। प्रकृति उसकी क्षति पूर्ति करती रहती है। रीछ अपने बाल किसी को भी छूने नहीं देता सो उसके बाल जितने थे उससे अधिक नहीं बढ़ते। कृपणता से रुष्ट होकर प्रकृति भी अपना अनुदान बन्द कर देती है। रीछ बनने में नहीं, भेड़ बनने में दूरदर्शिता है।
समस्त विश्व को हम अपनी सम्पदा कह सकते हैं। उपयोग के लिए ललचायें नहीं—अधिकार जमायें नहीं, शोभा देखकर संतुष्ट रहें तो फिर हमारे विश्व स्वामित्व को कोई चुनौती नहीं दे सकता। प्रत्येक जड़ चेतन के साथ अपनी ममता, आत्मीयता जोड़ने का मनुष्य को पूरा-पूरा अधिकार है। इस स्थिति में मनोभूमि को पहुँचा कर ही चिरस्थायी सन्तोष मिल सकता है।
थोड़े से स्त्री, पुत्र, मित्र, कुटुम्बियों को, पदार्थों को ही अपना बताने और उन्हें इच्छानुकूल चलाने की मोह-ममता हमें दुख देगी और निराश करेगी। उनके साथ जुड़े हुए विशेष उत्तरदायित्व के कारण विशेष कर्त्तव्य निवाहें इतना ही पर्याप्त है। आत्मीयता को उस छोटी सीमा में कैद न करें वरन् उन्मुक्त आकाश में उसे स्वच्छन्द विचरण करने का अवसर दें।
संसार में सुख कम नहीं—शोभा, सौंदर्य, सत्कर्म, सद्ज्ञान, सद्भाव, सज्जनता सब कुछ प्रचुर मात्रा में भरे पड़े हैं। करुणा, दया, प्रेम, ममता, सेवा, सहायता जैसी सद् प्रवृत्तियाँ गंगा, यमुना की तरह बहती हैं। उनकी शोभा, सुषमा निरखते हुए उनकी निर्मलता में स्नान करते हुए उतनी ही शान्ति, शीतलता और तृप्ति अनुभव होती है।
पक्षी को पिंजड़े में कष्ट होता है। कैदी बन्दीगृह में पड़ा तड़पता है। पशु का रस्सी तुड़ाकर स्वच्छन्द विचरण करने के लिए मन रहता है। स्वार्थ भरी संकीर्णता की जञ्जीरों में जकड़ा हुआ आत्मा भी निरन्तर क्षुब्ध रहता है। उसे असीम बनने का जब भी अवसर मिलेगा स्वर्गीय शान्ति और जीवन मुक्ति को अपने सामने प्रस्तुत देखेगा।
बुढ़ापा देर तक रोका जा सकता है और मृत्यु को काफी अरसे तक टाला जा सकता है। यह सत्य है। जो जन्मा है उसे जरा और मृत्यु के पाश में भी बँधना पड़ेगा। जिसका आदि है उसका अन्त भी, पर यदि शरीर की समुचित साज सँभाल रखी जाय तो वह निस्संदेह बहुत समय तक नीरोग रह सकता है, दृढ़ता और युवावस्था बनाये रह सकता है और अकाल मृत्यु से बच सकता है। वस्तुतः यह एक बहुत बड़ा लाभ है। इस लाभ से वंचित रहने का, लगभग आधी जिन्दगी बीमारी और अकाल मृत्यु को भेंट कर देने का एक ही कारण है-शरीर के सम्बन्ध में बरती जाने वाली उपेक्षा। यदि इस ओर सतर्कता बरती जाय-तो प्रकृति द्वारा की गई मनुष्य की संरचना को देखते हुए यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि आमतौर से लोग जितनी जल्दी बूढ़े होते और मरते हैं उसमें काफी सुधार किया जा सकता है।
शरीर रचना जिन सूक्ष्म परमाणुओं से हुई है उन्हें ‘जीव कोश’ कहते हैं। जीव कोशों से भरा हुआ कलल जीवन रस (प्रोटोप्लाज्म) कहलाता है। यह रस तेईस मौलिक तत्वों से बना है। इसी को जीवन का मूल आधार समझना चाहिए। मोटे तौर पर यह तत्व आहार से मिलते हैं पर यह प्रतिपादन भी अपूर्ण है क्योंकि जो तत्व आहार में होते ही नहीं वे फिर जीवन रस को कैसे प्राप्त होंगे? आश्चर्य यह है कि वे सभी तत्व जीवन रस को उपलब्ध होते रहते हैं, भले ही आहार में उनका अभाव रहता हो।
जीव कोश बढ़ते हैं और फिर एक से दो होते रहते हैं। जब तक यह वृद्धि और उत्पत्ति का क्रम चलता रहेगा तब तक शरीर भी बढ़ता रहेगा। यह वृद्धि उत्पत्ति रुकते ही शरीर की अभिवृद्धि रुक जाती है। इस प्रक्रिया में जब निर्बलता या गड़बड़ी उत्पन्न होती है तो उसी क्रम से शरीर भी कमजोर या बीमार पड़ता है। इस अन्तरंग कोशीय जीवन पर ही हमारा बाह्य जीवन मरण निर्भर है। जैसे जैसे हमारी आयु बढ़ती है, अवयवों की थकान, घिसट या विकृति भी बढ़ती है, इसका प्रभाव कोशों पर पड़ता है उनकी बाहरी शकल तो यथावत बनी रहती है पर भीतर का ‘जीवन रस’ घटता और सूखता जाता है, उसकी ताजगी और सशक्तता भी घट जाती है यही बुढ़ापे का कारण है। जब जीवन रस अधिक घट जाता है या निकम्मा हो जाता है तो जीव कोश मरने लगते हैं यही मृत्यु का कारण है। देर में या जल्दी जब भी मौत होगी-किसी भी कारण से होगी शरीर के भीतर यही स्थिति पाई जायगी।
कई बार मृत्यु घोषित कर देने पर भी पूर्ण मृत्यु नहीं होती। जीव कोशों में जब तक जीवन रस मौजूद है-भले ही वह न्यून मात्रा में हो-जीवन वापिस लौट आने की सम्भावना बनी रहेगी। कई बार तो वे मौत के 120 घण्टे बाद तक जीवित पाये गये हैं। मरे हुए मनुष्यों के कुछ घण्टे बाद जीवित हो उठने के समाचार यदाकदा मिलते हैं, इनमें यही कारण होता है कि जीवन रस की मात्रा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई होती और उसके सजग हो उठने पर कोश भी काम करने लगते हैं और मृत्यु का स्थान जीवन ले लेता है। यह पुनर्जीवन क्षणिक हो या स्थायी यह भी कोशों की स्थिति और उनमें भरे जीवन रस की स्थिति पर ही निर्भर करता है।
यदि जीव कोषों की—उनमें भरे जीवन रस की विकृति रोकी जा सके। उन्हें पुनः पोषण दिया जा सके तो मनुष्य अति दीर्घजीवी हो सकता है। यह कार्य सिद्धाँततः न तो कठिन है न असम्भव। क्योंकि जीव कोश और जीवन रस को तत्वतः अमर माना गया है। वे अमुक शरीर में ही मरते हैं-उस ढाँचे के ही अनुपयुक्त होते हैं। वस्तुतः उनका विनाश नहीं होता। शरीर के मर जाने पर भी वे अपना मूल अस्तित्व बनाये रहते हैं और किसी अन्य रूप में परिवर्तित होकर अपनी नवीन कार्य पद्धति का पुनः आरम्भ करते हैं। आत्मा की तरह यह जीव कोश भी अमर ही कहे जा सकते हैं।
इन्हें जीर्ण या विकृत होने से जितनी अधिक देर रोका जा सकेगा उतनी ही लम्बी जिन्दगी सम्भव हो जायगी। मृत्यु के बाद जिस तरह वे नया जन्म धारण करके नई जिन्दगी आरम्भ करते हैं उसी तरह की प्रक्रिया यदि पुराने शरीर में आरम्भ कराई जा सके तो उसी काया के रहते पुनर्जीवन आरम्भ हो सकता है। इसे अध्यात्म की भाषा में कायाकल्प कहते हैं। योग और आयुर्वेद की सम्मिलित प्रक्रिया इस प्रयोजन को पूरा करने में कभी सफल भी रही है। च्यवन ऋषि का वृद्ध शरीर अश्विनी कुमार की चिकित्सा से नव यौवन सम्पन्न हुआ था। राजा ययाति ने भी वृद्धावस्था से लौटकर पुनः यौवन प्राप्त किया था।
बुढ़ापा रोकने की इच्छा—चिरकालीन यौवन उपभोग की आकाँक्षा अनुचित नहीं है। भूतकाल में भी इसके लिए प्रयोग और प्रयत्न होते रहे हैं और वे अभी भी चल रहे हैं।
कीव के इन्स्टीट्यूट आफ जिरेंटोलाजी में पिछले दिनों वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी सम्पन्न हुई थी और उन कारणों के जानने पर विचार विमर्श हुआ था जिनके कारण बुढ़ापा आ धमकता है। कारणों का निश्चय हो जाने पर ही उनका निराकरण ढूँढ़ा जा सकता है।
तीस वर्ष तक हमारा शरीर निरन्तर बढ़ता है। इसके बाद वह क्रमशः घटता चला जाता है। यह घटोत्तरी ही अन्ततः हमारी मृत्यु का कारण बनती है। संचित कोश जब खतम हो जायें तो दिवालिया बनने के अतिरिक्त और क्या मार्ग रह जाता है। 30 से लेकर 90 वर्ष की आयु की अवधि में हमारी माँस पेशियों का भार लगभग एक तिहाई कम हो जाता है। उसी के अनुपात से शक्ति घटती चलती है। तन्त्रिका तन्तु इस बीच तीन चौथाई समाप्त होकर एक चौथाई ही बचते हैं। इसलिए मस्तिष्क का शरीर पर उतना नियंत्रण नहीं रह जाता जितना कि आवश्यक है। दिमाग स्वयं एक तिहाई खराब हो जाता है। उसका वजन 3.3 पौण्ड से घटकर 2.22 पौण्ड रह जाता है। गुर्दों में मूत्र साफ करने वाले ‘नेफ्रोन’ घटकर आधे रह जाते हैं जिससे वह पूरी तरह साफ नहीं हो पाता और रक्त में उस अशुद्धता की मात्रा बढ़ती जाती है। काम करते थक और घिस जाने के कारण ज्ञानेन्द्रियाँ अपना आवश्यक उत्तरदायित्व वहन नहीं कर पातीं, उन्हें पोषक तत्व भी शुद्ध तथा उपयुक्त मात्रा में मिल नहीं पाते इसलिए उनकी घिसट की क्षति पूर्ति भी नहीं हो पाती।
25 साल के युवक की तुलना में 80 साल के बूढ़े का दिल प्रायः आधी मात्रा में खून पम्प कर पाता है। यही हालत फेफड़ों की होती है, साँस की सफाई करने में वे अपनी ड्यूटी आधी ही दे पाते हैं। तन्त्रिका तन्तुओं में विद्युत आवेग की दौड़ 20 प्रतिशत शिथिल हो जाती है इसलिए शरीर द्वारा मस्तिष्क को सूचना पहुँचाने में और वहाँ का सन्देश अंगों के लिए लाने में देर लग जाती है। स्थिति के अनुरूप तुरन्त निर्णय लेने या कदम उठाने में बुढ़ापा धीरे-धीरे शिथिलता ही उत्पन्न करता चला जाता है। यही सब कारण हैं जिनसे हम ढलती आयु में क्रमशः मृत्यु के निकट घिसटते चले जाते हैं। शक्ति की कमी, कल पुर्जों का घिस जाना, संचित पूँजी का खर्च, नये उत्पादन में शिथिलता एवं मलों का बढ़ते जाना स्वभावतः शरीर के लिए मरण ही प्रस्तुत करेगा। बुढ़ापा जीवन को मृत्यु के पथ पर धकेलते ले चलने वाली एक ऐसी निर्मम प्रक्रिया हे जिससे बच सकना कठिन दीखता है। बुढ़ापा न टला तो मृत्यु कैसे टलेगी। दोनों एक दूसरे के सगे सहोदर जो हैं।
कोशिकाओं में चलती रहने वाली रासायनिक क्रिया में विषाक्त पदार्थों का अनुपात बढ़ते जाने और प्रोटीन का चालीस प्रतिशत भाग कोलाजेन में बदल जाने से जीवन संकट बढ़ता ही जाता है। त्वचा के नीचे का कोलाजेन कठोर होता जाता है। फलस्वरूप चमड़ी पर झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं। दाँतों का गिरना, बालों का झड़ना यह प्रकट करता है कि भीतर की पकड़ ढीली होती जा रही है।
शारीरिक और मानसिक शक्तियों के अनावश्यक अपव्यय को रोकने के लिए सीधा, सरल, सौम्य और हलका फुलका जीवन जिया जाना चाहिए इसके लिए पौष्टिक औषधियों की तलाश बेकार है। सबसे बड़ी औषधि एक ही है कि जीवन को भारी, बोझिल और कृत्रिम न बनने दिया जाय। अपव्यय को रोका जा सका तो लम्बे समय तक युवावस्था को भी सुरक्षित बनाये रखा जा सकता है।
केवल दीर्घ जीवन ही संभव नहीं वरन् यह भी संभव है कि ढलती आयु में भी सशक्त यौवन को स्थिर रखा जा सके। शरीर में आयु की वृद्धि के साथ कुछ तो परिवर्तन होते हैं पर यह मानवी प्रयत्नों पर निर्भर है कि वह शिथिलता से अपने को बचाये रहे और वृद्ध होते हुए भी अशक्त न बने।
वारजन विवारेस निवासी पियर डिफोरवेल 129 वर्ष का होकर सन् 1809 तक जीवित रहा। मरते समय उसका स्वास्थ्य ठीक था और उसकी सभी इन्द्रियाँ अपना काम ठीक तरह करती थीं। उसने तीन विवाह किये और कितने ही बच्चे पैदा हुए उनमें से तीन बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें तीन पृथक शताब्दियों में पैदा हुआ कहा जाता है। एक बच्चा 1699 में दूसरा 1738 में तीसरा 1801 में जन्मा। यों यह अन्तर लगभग सौ वर्ष ही होता है पर शताब्दियों के हिसाब से इसे तीन शताब्दियों में भी गिना जा सकता है और साहित्यिक शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि उसका एक बच्चा 16 वीं शताब्दी में, दूसरा 17वीं में और तीसरा अठारहवीं में जन्मा। उसकी तीसरी पत्नी 19 वर्ष की थी जबकि डिफोरवेल 120 वर्ष का। यह तीसरा दाम्पत्य जीवन भी उसने प्रसन्नता पूर्वक बिताया। पत्नी को इसमें कोई कमी दिखाई न दी। यह विवाह नौ वर्ष तक सुख पूर्वक चला और उसमें कई बच्चे हुए।
उपरोक्त तीन शताब्दियों में जन्मे तीन बच्चों की जन्म तिथियाँ उनके प्रमाण पत्रों समेत सन् 1877 के ‘मेगासिन पिटारेस्क’ में छपी हैं। जो घटना क्रम की यथार्थता प्रकट करते हुए भी सिद्ध करती हैं कि दीर्घ जीवन ही नहीं यौवन को भी अक्षुण्य बनाये रहना संभव है—असंभव नहीं।
बहुत दिन से यह सोचा जा रहा है कि आयुवृद्धि के साथ-साथ हारमोन उत्पादन में जो असंतुलन उत्पन्न हो जाता है उसकी पूर्ति कर देने से संभवतः शरीर की क्षरण प्रक्रिया रुक सकती है और अधिक समय तक जिया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रयोग और परीक्षण भी चले हैं। ब्रिटेन के विज्ञानी सर बिन्सेण्ट विगल वर्थ ने रोड नियस नामक एक छोटे कीड़े पर यह प्रयोग किया। उन्होंने उसी जाति के एक युवा कीड़े की एक्डायो सोन हार्मोन उत्पन्न करने वाली ग्रन्थि एक दूसरे बूढ़े कीड़े के शरीर में लगा दीं। इससे उसका बुढ़ापा रुक गया। जब भी शिथिलता के लक्षण दिखाई पड़ते तभी नई ग्रन्थि लगा दी जाती, इस प्रकार उसकी वृद्धि और जवानी का क्रम काफी लम्बे समय तक बनाये रखने में सफलता पाई गई।
मनुष्य शरीर में आयु वृद्धि के साथ घटने वाले एक हारमोन समूह को ‘स्टेरोइड’ कहते हैं। इसकी क्षति पूर्ति अन्यत्र से की जाय तो संभव है मनुष्य की जवानी बनी रहे। इस प्रकार ‘टेस्टोस्टेरीन’ हारमोन का किसी प्रकार प्रवेश अथवा परिवर्धन किया जा सके तो आदमी जवान बना रह सकता है। इन संभावनाओं को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक तरह तरह के अनुसंधान कर रहे हैं।
वैज्ञानिक एक प्राणी की हारमोन ग्रंथियां दूसरे के लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनका प्रभाव स्वल्प कालीन होता है। यौवन को अक्षुण्य बनाये रहने वाले हारमोन बिना एक दूसरे के अंग प्रत्यारोपण के भी विकसित किये जा सकते हैं। इसके लिए योगाभ्यास की वही परिपाटी उपयुक्त है जिसे ऋषि-महर्षि काया कल्प के नाम से प्रयोग करते थे और शताब्दियों तक जीवित रहते थे।
आत्मा-प्रतिष्ठा, आत्म-ज्ञान, और आत्म-दमन केवल इन्हीं तीनों से जीवन को अपार शक्ति प्राप्त होती है, केवल शक्ति ही नहीं क्योंकि शक्ति तो स्वयं ही बिना बुलाये चली आयेगी, किन्तु नियम से रहना भी आ जायेगा, और बिना भय के, जिस नियम से हम रहते हैं, वही नियम हम बनाते हैं, और चूँकि ठीक बात ही ठीक होना-अनुसरण करना बुद्धिमत्ता है-परिणाम को तुच्छ समझते हुए।
-टेनीसन
भारत के राष्ट्रपति श्री वी0 वी0 गिरि से लम्बी उम्र में भी उनका स्वास्थ्य अच्छा रहने और पर्याप्त चुस्त दीखने का कारण पूछा गया तो उनने उस सूत्र को प्रकट किया जिनको अपनाकर वे इस सत्तर से ऊपर की आयु में भी युवकों की तरह काम करते रह सकने में समर्थ हैं। उनने बताया ‘कम खाओ और अधिक काम करो।’ इसी सिद्धाँत को व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित करके वे अपना स्वास्थ्य सुरक्षित रख सके हैं।
कार्नल विश्व विद्यालय में सन् 1930 में एक प्रयोग किया गया था। कुछ चूहों को खाने की मनमौजी छूट दी गई। कुछ को इतना खिलाया गया कि वे जीवित रह सकें प्रयोग कर्त्ता सी0 एम॰ मैक ने घोषित किया कि अधिक खाने वालों की तुलना में कम खाने वाले चूहे दूने दिन जिये।
शिकागो में भी आहार की कमी और वेशी के संबंध में भी चूहों पर प्रयोग चले। प्रो0 ए॰ जे0 कालेमन और फ्रेडरिक होलजेल ने अपने प्रयोग के आधे चूहों को हर दिन बिना नागा भोजन दिया और आधे चूहों को एक दिन भोजन एक दिन उपवास के क्रम से खाना दिया। निष्कर्ष यह निकला कि उपवास करने वाले चूहे 20 प्रतिशत अधिक समय तक जिये। इस परिणाम से उपरोक्त दोनों प्रयोगकर्त्ता इतने अधिक प्रभावित और उत्साहित हुए कि उन्होंने स्वयं भी एक दिन उपवास एक दिन भोजन का क्रम अपना लिया।
आहार में सात्विकता का यदि समुचित ध्यान रखा जाय, उसमें तामसिकता की मात्रा न बढ़ने दी जाय तो उन रोगों से सहज ही बचाव हो सकता है जिनकी चिकित्सा में बहुत धन खर्च करना पड़ता है और बहुत कष्ट सहन करना पड़ता है। वनवासी अनेक असुविधाओं के रहते हुए भी केवल इसी एक आधार पर स्वस्थ और सबल बने रहते है कि उन्हें चटोरेपन की बुरी आदत नहीं होती और कुपथ्य नहीं करते। जीभ पर काबू रखना, रोगों के आक्रमण से सुरक्षित रहने का सबसे अच्छा और सबसे सस्ता तरीका है।
अमेरिका स्वास्थ्य विभाग ने उस देश की जनता में बढ़ते हुए हृदय रोगों का प्रधान कारण कुपथ्य घोषित किया है। शराब, सिगरेट, चाय काफी की भरमार से रक्त में जो अतिरिक्त उत्तेजना उत्पन्न होती है उससे मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है और अनिद्रा का रोग लग जाता है। चिन्ता और उद्वेग की परिस्थितियाँ वहाँ के विलासी और स्वार्थरत जीवनक्रम ने पैदा की हैं। उससे रक्तचाप बढ़ा है। एक दूसरे के प्रति मैत्री और वफादारी शिथिल पड़ गई है इससे जीवन में आई नीरसता ने व्यक्ति को मानसिक रूप से शून्यताग्रस्त कर दिया है यह मनोदशा क्रमशः सनक, शक्कीपन और अर्ध विक्षिप्त स्थिति तक ले पहुँचती है। इस तरह के मानसिक रोगों की बढ़ोतरी वहाँ तेजी से होती चली जा रही है। इस पर कुपथ्य का प्रचलन तो और भी दुहरी विपत्ति उत्पन्न कर रहा है।
हृदय रोगियों के आहार का निष्कर्ष यह निकला कि 40 से 50 वर्ष की आयु वाले लोगों में जो चिकनाई और चीनी कम सेवन करते थे उनमें से लाख पीछे 196 को हलके दौरे पड़े जबकि उसी आयु के अधिक चीनी और अधिक चिकनाई खाने वालों में से लाख पीछे 642 को हृदय के दौरे पड़ते थे और वह भी तेज कष्ट साध्य।
50 से ऊपर की आयु में वहाँ हृदय रोग अधिक होता है पर उसमें भी उपरोक्त दो वस्तुएं कम खाने वालों में से लाख पीछे 379 को तथा अधिक खाने वालों में से 1331 को इस प्रकार के दौरे पड़ते हैं।
सात्विक, सुपाच्य, स्वल्प और स्वच्छ आहार करने की यदि नीति अपनाई जाय, भूख से कम और नियत समय पर खाया जाय और निरन्तर श्रम संलग्न रहा जाय, हँसते खेलते दिन बिताया जाय—तो निस्संदेह हम निरोग दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद—लाखों, करोड़ों वर्ष पश्चात्—यह सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर मिलता है। इतना सुविधा सम्पन्न—काय कलेवर किसी भी जीव को नहीं मिला। मनुष्य को यह विशेष अनुदान भगवान ने विशेष प्रयोजन के लिये दिया है। अपना जीवन उत्कृष्ट बनाते हुए आत्मबल का अभिवर्धन आत्मशान्ति का रसास्वादन, उदारता और सेवा भावना द्वारा लोक-मंगल में योगदान यही मानव जीवन का प्रधान उद्देश्य है।
दुःख और दुर्भाग्य की बात ही है कि-जीवन लक्ष्य को पूर्णतया विस्मरण करके मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी-पेट और प्रजनन को ही प्रधान माने और उन्हीं पशु प्रवृत्तियों में जीवन रत्न को गँवाने की मूर्खता का परिचय दे।
यह भूल नये खून, नये जोश में प्रतीत नहीं होती तब महत्वाकाँक्षाओं का नशा सवार रहता है। हजारों, लाखों वर्ष जीना है ऐसा लगता है, पर जब वृद्धावस्था आ जाती है—अंग शिथिल हो जाते हैं, मौत सामने खड़ी दीखती है। आकाँक्षाएं अतृप्त रहती हैं, कुटुम्बी सहयोगी निरर्थक मानकर अवज्ञा करने लगते हैं तब प्रतीत होता है कि जीवन का दुरुपयोग करके भारी भूल की गई। तब केवल पश्चाताप से हाथ मलना ही शेष रह जाता है। उस दयनीय स्थिति का मार्मिक चित्रण करते हुए शास्त्रकारों ने उद्बोधन दिया है कि पश्चात्ताप की घड़ी आने से पूर्व ही सजग हो सका जाय और कर्तव्य पथ का अवलम्बन ग्रहण कर लिया जाय तो अधिक उत्तम है।
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम्।
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरभिः कालो न विज्ञायते॥
दृष्ट्वा जन्मजरा विपत्तिमरणं त्रासश्चनोत्पद्यते।
पीत्वा मोहमयी प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥ —भर्तृहरि
सूर्य के उदय और अस्त होने के साथ-साथ आयु भी दिन-दिन घटती जाती है तथा व्यापारादि से चित्त नहीं भरता और जन्म, वृद्धापन तथा मृत्यु होते हुए देखकर भी मनुष्यों को चेत नहीं होता। इससे मालूम होता है कि संसार प्रमाद-रूपी मदिरा पीकर मत्त हो रहा है।
योग वशिष्ठ में जीवन के अन्तिम चरण का दुःखद चित्रण इस प्रकार किया है
शत्रवश्चेन्द्रियाण्येव सत्यं यातमसत्यताम्।
प्रहरत्यात्मनैवात्मा मनसैव मनो रिपुः॥
अपनी इन्द्रियाँ ही अपनी शत्रु बन रही हैं। सत्य को असत्यता प्राप्त हो गयी है आत्मा ही आत्मा को खाये जा रही है। मन ही मन का बैरी बना हुआ है।
वस्त्ववस्तुतया ज्ञातं दत्तं चित्तमहंकृतौ।
अभाववेधिना भावा भावान्तो नाधिगम्यते॥
वस्तुएं कुछ की कुछ दीखती हैं। अहंकार में मन रम गया है। जो पर्याप्त है उसका अभाव दीखता है। जो है उसका प्रयोजन क्या है, कुछ सूझ नहीं पड़ता।
पातः पक्वफलस्यैव मरणं दुर्निवारणम्।
आयुर्गलत्यविरतं जलं करतलादिव॥
शैलनद्यारय इव संप्रयात्येव यौवनम्।
इन्द्रजालमिवासत्यं जीवनं जीर्णसंस्थितिः॥
बुद्बुदः प्रावृषीवाप्सु शरीरं क्षणभंगुरम्।
रम्भागर्भ इवासारो व्यवहारो विचारगः॥
पका फल जिस तरह पेड़ से गिर ही पड़ता है उसी तरह शरीर का मरण निश्चित है। हथेली पर रखा पानी जैसे ढुलक जाता है वैसे ही आयु घटती चली जा रही है।
पहाड़ी नाले के पानी की तरह यौवन भागता चला जा रहा है। यह बाजीगर के इन्द्रजाल जैसी माया सब ओर फैली पड़ी है।
पानी के बबूले की तरह यह जीवन अब तक फूटने ही वाला है। केले के खम्भे में लगे पत्तों की तरह यहाँ सब कुछ असार ही दीख पड़ता है।
दृष्टदैन्यो हतस्वान्तो हतौजा याति नीचताम्।
मुह्यते रौति पतति तृष्णयाभिहतो जनः॥
तृष्णा द्वारा पटक-पटक कर मारा हुआ मनुष्य दीन, हृदय हीन, निस्तेज हो जाता है। मोहग्रस्त होकर रोता है, और पतन के गर्त में गिर जाता है।
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
क्षीयते जीयते सर्व तृष्णैका हि न जीर्यते॥
वृद्ध होने पर मनुष्य के केश, दाँत समेत सारी काया जीर्ण हो जाती है, पर तृष्णा तो भी तरुण ही बनी रहती है।
घोरेऽस्मिन् हतसंसारे नित्यं सततघातिनाम्।
कदलीस्तम्भनिः सारे संसारे सारमार्गणम्॥
यः करोति स सम्म्ढ़ो जलबुद्बुदसन्निभे। —मनु
निरन्तर घात करने वालों से घिरा हुआ यह घोर संसार केले के खम्भे के समान निस्सार है। पानी के बबूले की तरह पोला और क्षणिक है। जो इसमें सार ढूँढ़ता है वह महामूर्ख है।
शेषे कलत्रचिन्ताऽऽर्तः कि करोति नराधमाः।
सतोऽसता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणाँ मूध्त्यरक्ष्यता।
सुखानाँ मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं सश्रयाम्यहम्॥ —महोपनिषद्
बचपन अज्ञान से घिरा रहता है, युवावस्था में वासना तृष्णा के आकर्षण बाँधे रहते हैं। बुढ़ापे में परिवार की चिन्ता सताती है। ऐसा चिन्ताग्रस्त अधम जीव अपना क्या उपकार करेगा? सत के ऊपर असत् का शासन है। शोभा पर कुरूपता चढ़ी बैठी है। सुख के ऊपर दुःख घिर रहा है। अब किसी शरण जाया जाय?
शिव गीता में यह वर्णन इस प्रकार आता है—
नीयते मृत्युना जन्तुः परिष्वक्तोऽपि बन्धुभिः।
सागरार्न्तजलगतो गरुड़ेनेव पन्नगः॥
बन्धुओं से घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्र में प्राप्त हुए सर्प को गरुड़ ले जाता है।
हा कान्ते हा धनं पुत्राः क्रन्दमानः सुदारुणम्।
मण्डूक इव सर्पेण मृत्युना नीयते नरः॥
हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुष को मृत्यु इस प्रकार ले जाती है जैसे सर्प मेंढक को ले जाता है।
संजायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धते तथा।
क्षीयते नश्यतीत्येते षड्भावा वपुषः स्मृताः॥
अब शरीर की अवस्था वर्णन करते इसी निस्सारता प्रतिपादन करते हैं उत्पत्ति (होना) अस्ति परिपक्वता वृद्धि क्षय और नाश, यह छः अवस्था इस शरीर की हैं।
देहेऽस्मिन्नभिमानेन नमहोपायबुद्धयः।
अहंकारेण पापेन क्रियन्ते हंस साँप्रतम् ॥
इस देह को प्राप्त होकर पाप बुद्धि पुरुष महा अभिमान करते हैं, और अहंकार रूप पाप से मुख्यानन्द मोक्ष का कुछ भी उपाय नहीं करते, यह महा शोच की बात है।
धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहार कर्मसु।
अतृप्ताः प्राणिनस्सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च॥ —चाणक्य नीति
धनों में, जीवन में, स्त्रियों में और भोजन में, अतृप्त होकर सब प्राणी गये, जायेंगे और जाते हैं।
अच्छा हो—समय से पूर्व चेता जाय अपनी गतिविधियाँ बदली जायं और पश्चात्ताप का अवसर न आने दिया जाय।
जिन क्रिया-कलापों—गतिविधियों में मनुष्य व्यस्त रहता है—जिन तृष्णा वासनाओं में निरन्तर निमग्न रहता है वे कितनी व्यर्थ और निरर्थक हैं उसका पता विवेक के सहारे भी लग जाता है दूसरों की दुर्दशा देखकर भी वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है। यह जीवन पर्यवेक्षण यदि गम्भीरता पूर्वक किया जाय तो विवेक की आँख खुल सकती है और मोह की मदान्ध स्थिति से छुटकारा पाकर उस मार्ग पर चल सकता है जिससे जीवनोद्देश्य की पूर्ति सम्भव होती है। मोहान्ध व्यक्ति यदि आत्म निरीक्षण करें तो उन्हें प्रतीत होगा कि—
भगवन्निदं शरीरं मैथुनादेवोद्भूतं संविध्ययेतं निरय एव मूत्रद्वारेण निष्कान्तमस्थिभिश्चतं माँसेनानुलिप्तं चर्मणावबद्धं विण्मूत्रवातपित्तकफमज्जामेदोवसाभिरन्यैश्च मलैर्बहुभिः परिपूर्णम्। एतादृशे शरीरे वर्तमानस्य भगवंस्त्वं नो गतिरिति॥
—मैत्रेय्युपनिषत्
मैथुन जैसे घृणित कर्म से उत्पन्न हुआ यह घृणित शरीर मूत्र द्वार से निकला है। हड्डियों से चिना गया है।
माँस से लपेटा गया है। चमड़े से मढ़ा गया है। विष्ठा, मूत्र, कफ, मज्जा आदि मलीन पदार्थ इसमें भरे हैं। ऐसी अपवित्र देह यदि ज्ञान रहित होकर जिये तो फिर साक्षात् नरक ही मानना चाहिये।
इति में दोषदावाग्निदग्धे संपति चेतसि।
स्फुरन्ति हि नभोगाशा मृगतृष्णासरः स्वति॥ —महोपनिषद्
मेरे चित्त की सम्पदा दोष रूपी दावानल में जल रही है। मृगतृष्णा की तरह लालसाओं में भटकता हुआ मैं कुछ भी पा नहीं सका।
योग वसिष्ठ में इस मोहान्ध स्थिति की और भी स्पष्ट विवेचना की है। उन पर विचार किया जाय तो सहज ही वैराग्य भाव उत्पन्न होता है—
आपदाः सम्पदः सर्वाः सुखं दुःखाय केवलम्।
जीवितं मरणायैव बत माया विजृम्भितम्॥
सम्पदा आपदा के लिये, सुख केवल दुःख के लिये, जीवन मरण के लिये, माया तेरी यह कैसी विचित्र विडम्बना है।
न केनचिच्च विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः।
बत मूढ़ा वयं सर्वे जानाना अपि शाम्बरम्॥
किसी में हमें बेचा नहीं है। तो भी हम बिके हुओं की तरह माया के दास होकर मूढ़ता का जीवन जी रहे हैं।
इयं संसारसरणिर्वहत्यज्ञप्रमादतः।
अज्ञस्योग्राणि दुःखानि सुखान्यपि दृढ़ानि च ॥ —योग वसिष्ठ
मूर्खता के कारण ही लोग इस माया चक्र में नाचते हैं। अज्ञानी ही दुःख भोगते हैं।
संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमापदाम्।
अज्ञं संमोहयेन्नित्यं मौर्ख्यं यत्नेन नाशयेत्॥
अज्ञान के लिये ही यह संसार विष वृक्ष है। उसी पर आपत्तियाँ आती हैं और वही दुख पाता है।
आगमापायिनो भावा भावना भवबन्धनी।
नीयते केवलं क्वापि नित्यं भूतपरम्परा॥
विषय वासना ने सबको बुरी तरह जकड़ रखा है। कोई न जाने कहाँ इन सबको बाँधकर घसीटे लिये जा रहा है।
सर्व एव नरा मोहाद्दुराशापाशपाशिनः।
दोषगुल्मकसारंगा विशीर्णा जन्मजंगले॥ —योग वशिष्ठ
लोग मोह और तृष्णा की फाँसी पर टँगे हुए, दोष रूपी झाड़ियों में उलझे हुए, इस जीवन जंगल में मृगों के समान नष्ट हो रहे हैं।
तृष्णालताकाननचारिणोऽमी शाखाशतं काममहीरुहेषु
परिभ्रमन्तः क्षपयन्ति कालं मनोमृगा नो फलमाप्नुवन्ति ।
मन रूपी मृग तृष्णाओं की लताओं में भटकता है। मरकट की तरह वह काम रूपी वृक्ष की शाखा प्रशाखाओं पर उछल कूद करता है पर फल कहीं नहीं पाता।
पर्णानि जीर्णानि यथा तरुणाँ समेत्य जन्माशु लयं प्रयान्ति।
तथैव लोकाः स्वविवेकहीनाः समेत्य गच्छन्ति कुतोऽप्यहोभिः॥
जिस प्रकार वृक्षों पर लगे पत्ते पक कर झड़ जाते हैं। उसी प्रकार विवेक हीन लोग यहाँ आते हैं, जन्मते और मर जाते हैं।
सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि मर्ध्नि रम्येष्वरम्यता।
सुखेसु मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम॥
सुन्दर दीखने वाले पदार्थों के शिर पर कुरूपता सवार है। सुखों की आड़ में दुःख छिपे बैठे हैं। मैं किसकी शरण में कहाँ जाऊँ?
आपातमधुरारम्भा भंगुरा भवहेतवः।
अचिरेण विकारिण्यो भीषणा भोगभूमयः॥
आरम्भ में मधुर दीखने वाले ये भोग क्षण भर भी तो नहीं ठहरते। देखते-देखते दारुण दुख देकर विदा हो जाते है।
उपरोक्त चिन्तन अप्रिय और भयानक लग सकता है। पर यही वह वास्तविकता है जिसे समय रहते समझ लिया जाय तो वह अवसर ही न आवेगा जिसमें अप्रियता और भयानकता अनुभव करनी पड़े।
जरामरणदुःखानामेकारत्नसमुद्रिका।
आधिव्याधिविलासानाँ नित्यं मत्ता विलासिनी॥
दृष्टदैन्यो हतस्वान्तो हतौजा याति नीचताम्।
मुह्यते रौति पतति तृष्णयाभिहतो जनः॥
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
क्षीयते जीर्यते सर्वं तृष्णैवैका न जीर्यते॥ —योग वशिष्ठ
तृष्णा से ही मनुष्य जरा जीर्ण दुखी और रोगी होता है। अगणित आधि व्याधि तृष्णाग्रस्त को ही घेरती हैं। तृष्णा का मारा मनुष्य दीन-हीन, कृपण, दुर्बल, निस्तेज, होकर दुर्गति के गर्त में गिरता है। हर समय रोता, चिल्लाता है और पग-पग पतित होता है। शरीर बूढ़ा हो जाने पर भी यह पापिन तृष्णा जवान ही बनी रहती है।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वाऽस्य न वा कृतम्।
क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम्॥
वृकीवारेणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।
न कालस्य प्रियः कश्चिद्द्वेष्यश्चास्य नविद्यते॥
आयुध्ये कर्मणि दीक्षे प्रसह्य हरते जनम्। —अग्नि पुराण
मृत्यु यह नहीं देखती कि उसने अपने काम पूरे कर लिये या नहीं। यह धर्म कृत्य में लगा है या प्रपंच के जाल जंजालों में। भेड़िये के से पेट वाली इस मृत्यु को किसी पर भी दया नहीं आती वह चाहे जिस को चाहे जब उठाकर चल देती है। आयु और कर्म समाप्त हो जाने पर मनुष्य मृत्यु के मुख में बलात् घसीटे हुए घुसते चले जाते हैं।
न श्रीः सुखाय भगवन्दुःखायैव हि वर्धते।
गुप्ता विनाशनं धत्ते मृति विषलता यथा ॥
मनोरमा कर्षति चित्तवृत्तिं कदर्थसाध्या क्षणभंगुरा च।
व्यालावलीगात्रविवृत्तदेहाश्चभ्रोत्थिता पुष्पलतेव लक्ष्मीः ॥ —योग वशिष्ठ
पैसे की बढ़ोतरी सुख के लिये नहीं, केवल दुख के लिये ही होती है। पाली-पोसी विषलता जिस तरह मृत्यु का कारण बनती है, वैसे ही जमा की हुई सम्पदा भी विनाश ही उत्पन्न करती है।
कुलटा स्त्री के समान यह दौलत भी मोहक रूप बना कर चित्त को भ्रमाती है। दुष्ट कर्मों में प्रवृत्ति कराती है और स्वयं भग जाती है। सर्पिणी की तरह यह चमकती दीखती है पर इसका विष नहीं दीखता। कुएं में उत्पन्न फूलों की बेल की ओर जो आकर्षित होता है वह गर्त में ही गिरता है।
न तदस्तीह यदयंकालः सकलघस्मरः।
ग्रसते तज्जगज्जातं प्रोत्थाब्धिमिव वाडवः॥
किं श्रिया किं च राज्येन किं देहेन किमीहितैः।
दिनैः कतिपयैरेव कालः सर्वे निकृन्तति॥
ग्रसतेऽविरतं भूतजालं सर्प इवानिलम्।
कृतान्तः कर्कशाचारो जराँ नीत्वाऽजरं वपुः॥ —योग वशिष्ठ
प्रलय की अग्नि जैसे समुद्र को जला डालती है वैसे ही यह सर्वभक्षी महाकाल सबको खा जाता है। लक्ष्मी से क्या? सत्ता से क्या? रूप यौवन से क्या? तृष्णाओं से क्या? थोड़े समय में काल इन सबको जड़ मूल से उखाड़ कर रख देगा। यह महा क्रूर काल तरुण शरीरों को बुढ़ापे से पका पकाकर स्वाद पूर्वक खाया करता है।
तत्त्व के विकास के लिए माता-पिता, स्त्री, पुत्र भाई-बन्धु सभी उपलब्ध होते हैं। उनका प्यार मिलता है अपना भी देना होता है। कभी कटुता का अवसर मिलता है कभी सरसता का। कटु अनुभवों से अपने साहस, धैर्य, परिश्रमशीलता, तत्परता और आत्म-विश्वास का विकास करने का अवसर प्राप्त होता है और सरसता तथा मधुर मिलन में, प्रेम, दया, वात्सल्य, उदारता, करुणा, स्नेह, सौहार्द, निष्ठा, श्रद्धा और आत्म-विश्वास के विकास की सचमुच भगवान की परिवार व्यवस्था आत्म विकास की एक रम्य वाटिका है।
मस्तिष्क विद्या विशारद डॉ0 विल्डर पेनफील्ड ने मस्तिष्क के भीतर एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है जो स्मरण शक्ति का मूलभूत आधार है। देखे, सुने और सोचे हुए सभी विचार जो मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं उन्हें उस पट्टी में होकर ही गुजरना पड़ता है अस्तु वे स्मृतियाँ अति सूक्ष्म फिल्मों की तरह अथवा टेपरिकॉर्डर में भरी आवाज की तरह जम जाती हैं और एक कोने में पड़ी रहती हैं। साधारणतया वे स्मृति पटल पर नहीं आतीं पर यदि विशेष प्रयत्न किया जाय तो उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी, सुनी या सोची हुई बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती हैं।
स्मरण प्रक्रिया सँभालने वाली यह काले रंग की दो पट्टियाँ हैं जो लम्बाई में लगभग 25 वर्ग इञ्च और मुटाई में एक इञ्च के दसवें भाग के बराबर हैं। मस्तिष्क के भीतर यह चारों ओर लिपटी हुई हैं। कनपटियों से नीचे इन्होंने एक प्रकार से सारे मस्तिष्क का घेरा ही डाला हुआ है। इन्हें ‘टेम्पेरिल कोर टैक्स’ कहते हैं।
डॉक्टर पेनफील्ड ने विद्युत धारा का स्पर्श कराके इस पट्टी के विभिन्न स्थल सजग किए तो वह उन स्थानों में अंकित पुरानी घटनाएं और बातें ज्यों की त्यों स्मरण हो आई। किन्तु जैसे ही वह विद्युत स्पर्श हटाया गया वैसे ही वे बातें पुनः विस्मृत हो गई। ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करके उपरोक्त वैज्ञानिक ने सिद्ध किया है कि मनुष्य के पास उसके सारे स्मरण यथास्थान सुरक्षित रिकार्डों की तरह संग्रहीत रहते हैं। हाँ वे हर समय स्मरण नहीं आते। प्रयत्नपूर्वक उन्हें उभारा जा सकता है और किसी भी विस्मृत बात को स्मृति पटल पर लाया जा सकता है।
मस्तिष्क 25 वर्ग इञ्च की देखने में एक छोटी सी पुस्तक है, जिसकी 20 कोशिकायें उसके बीस हजार पृष्ठ हैं। इनमें से प्रत्येक पृष्ठ पर ग्रामोफोन रिकार्डों की रेखाओं की तरह अगणित सचित्र स्मृतियाँ और ध्वनियाँ ऐसी अमिट स्याही से लिखी गई हैं कि उन्हें आवश्यकतानुसार कभी पढ़ा, सुना या देखा जा सकता है। आँखें औसतन 5 लाख चित्र हर दिन उतारती हैं। इसके साथ-साथ ध्वनियों, गन्धों, स्पर्शों, स्वादों एवं विचारों का समुद्र हर घड़ी लहराता रहता है। यह सारा तूफान मस्तिष्क में टकराता है, वह उसे समझता और निष्कर्ष निकालता है। इसके बाद भी उसे निरर्थक समझ कर हटा नहीं देता वरन् सँभाल सँजोकर अपने रिकार्ड दफ्तर में जमा कर देता है ताकि आवश्यकतानुसार उन अनुभूतियों को फिर कभी प्रयुक्त किया जा सके।
यों पुरानी बातें हम भूल जाते हैं। इतनी बातें याद कर सकना सम्भव भी नहीं। इसलिए स्मरण-विस्मरण का क्रम साधारणतया चलता रहता है किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दैनिक जीवन में काम आने वाले समस्त घटना क्रम की एक अति सूक्ष्म साउण्ड फिल्म बनती रहती है, जिसे आवश्यकतानुसार कभी भी प्रोजेक्ट किया जा सके।
दैनिक अनुभूतियों में कुछ बहुत ही कटु और सामान्यक्रम के विपरीत होती हैं। वे दूसरों के ऊपर क्रोध व्यक्त करती हुई पैर में गहराई तक चुभे हुए काँटे की तरह दर्द करती रहती हैं। किसी ने अपने साथ दुर्व्यवहार किया है तो यह विक्षोभ दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष को क्रोध प्रतिरोध के रूप में उभारता है और यदि स्वयं कोई पाप, अपराध, छल या अनैतिक कार्य किया है तो उसकी क्षुब्ध प्रतिक्रिया आत्म-धिक्कार के रूप में अपने ही ऊपर बरसती रहेगी, दोनों ही परिस्थितियों में ज्वालामुखी की तरह रह रह कर फूटते रहने वाला उद्वेग मनःस्थिति को अशान्त किये रहता है और ज्वरग्रस्त शरीर की तरह उद्वेगग्रस्त मस्तिष्क भी दिन-दिन दुर्बल होता जाता है।
स्मृतियों का भण्डार हर मनुष्य के भीतर सुरक्षित रहता है। पर उन्हें ढूँढ़ने और सामने लाने वाले यन्त्र कुण्ठित हो जाते हैं। इसलिए वे अपने ही दफ्तर की फाइल को आप ढूँढ़ निकालने में असमर्थ हो जाते हैं, यही विस्मृति है। यदि ढूँढ़ निकालने वाले पुर्जों को तेज रखा जाय और उस कार्य में दिलचस्पी एवं फुर्ती बनी रहे तो स्मरण शक्ति तीव्र रखी जा सकती है। कई व्यक्तियों में तीव्र स्मरण की विशेषता जन्मजात होती है पर यह हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है कि प्रयत्नपूर्वक उसे अधिक तीव्र और सक्षम बना ले। स्मरण शक्ति के धनी कितने ही व्यक्तियों ने ऐसा ही किया है उनमें यह विशेषता जन्मजात नहीं थी। अभ्यास और मनोयोग के समन्वय से उनने उसे बढ़ाया और आश्चर्य की तरह देखे जाने वाले स्मृति के धनियों में अपना नाम लिखाया।
जापान निवासी हनावा होकाइशी सन् 1722 में जन्मा और पूरे 101 वर्ष जीकर 1823 में मरा। वह सात वर्ष की आयु में अन्धा हो गया था। पर इससे क्या उसने बिना नेत्रों के ही दूसरों से सुनकर अपनी ज्ञान वृद्धि आरम्भ कर दी। जो सुना—उसे पूरे मनोयोग के साथ सुना और ध्यान में रखा, फलस्वरूप उसके ज्ञान का कोश इतना बढ़ गया कि उसे एक अद्भुत आश्चर्य माना जाता है। हनावा होकाइशी द्वारा नोट कराये गये ज्ञान भण्डार को जापान में 2820 खण्डों के एक अनुपम विशाल ग्रन्थ के रूप में छापा गया है। यह अब तक का संसार का सबसे बड़ा ग्रन्थ है।
लिथवानियाँ निवासी कैवी ऐलिजा ने दो हजार से अधिक पुस्तकें याद कर रखी थीं, पूछने पर वह उनका कोई भी पृष्ठ बिना पुस्तक देखे सुना देता था। फ्रेंच राजनीतिज्ञ लिआन गैम्बटा भी इसी श्रेणी में आते हैं। उनकी तुलना ऐलिजा से की जाती थी उन्होंने हजारों पृष्ठ विभिन्न पुस्तकों के याद कर रखे थे। ग्रीक विद्वान रिचाड़े पोरसन को भी चलता फिरता विश्वकोश कहा जाता था उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी।
नेलसन पिल्सवरी को शतरंज का जादूगर कहा जाता था। वह एक साथ बीस शतरंजों को बिछाकर बीस खिलाड़ियों के साथ चालें चलता था और सभी पर उसका पूरा ध्यान रहता था। कई बार तो वह शतरंजों के साथ-साथ कई खिलाड़ियों के साथ ताश खेलना भी आरम्भ कर देता था।
प्रसा (जर्मनी) का पुस्तकाध्यक्ष मैथुरिन बेसिरे एक बार जो शब्द सुन लेता था उसे ज्यों का त्यों याद रखता था। एक बार बारह राजदूतों ने उसकी परीक्षा ली। उनकी भाषाओं से मैथुरिन सर्वथा अपरिचित था। एक-एक करके बारहों ने अपनी-अपनी भाषा में बारह वाक्य कहे। उन्हें सुनने के बाद उसने उन शब्दों को क्रमशः ज्यों का त्यों दुहरा दिया। अन्तर तनिक भी नहीं पाया गया।
वरमाँट निवासी आठ वर्षीय बालक जेरा कोलवर्न ने बिना गणित का क्रमबद्ध अध्ययन किये—और बिना कागज कलम की सहायता के दिमागी आधार पर कठिन प्रश्नों के उत्तर देने की जो क्षमता दिखाई उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ चकित रह गये। जिन कठिन सवालों को केवल अच्छे गणित ज्ञाता ही काफी समय लगाकर हल कर सकते थे उसने उन्हें बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर दिया इसे देखकर सब लोग दंग रह जाते थे। आश्चर्य यह था कि पुस्तकीय आधार पर उसे गणित के सामान्य नियम भी ज्ञात न थे।
गणित शास्त्री जेडिडिया वाक्सटन बहुत समय से एक गणित समस्या में उलझे हुए थे, हल निकल नहीं रहा था, एक दिन उनकी भेंट स्मरण शक्ति के धनी जान मार्टिन डेस से हुई। उसने उनका हल मिनटों में बता दिया। गणित सम्बन्धी उलझनों को सुलझाने के लिए डेस अपने समय में दूर-दूर तक प्रख्यात था।
सर जान फील्डिंग इंग्लैण्ड के जज थे। वे अन्धे थे। पर उनके कान इतने सक्षम थे कि अपने जीवन काल में जिन 3000 अपराधियों से उन्हें वास्ता पड़ा था उन सब की आवाज वे ठीक तरह पहचान सकते थे और उसका नाम बता सकते थे। मुकदमों के मुद्दतों बाद वे लोग कभी उनसे मिलने आते तो नेत्र न रहने पर भी केवल स्मरण शक्ति के आधार पर उसका नाम और मुकदमे का संदर्भ बता देते थे। उनकी यह अद्भुत स्मरण शक्ति चिरकाल तक चर्चा का विषय बनी रही।
फान्सिस्को मैरिया ग्रापाल्डे नामक एक प्रसिद्ध कवि चौदहवीं शताब्दी के अन्त में हुआ है। वह परमा इटली का निवासी था। उसकी विलक्षण प्रतिभा यह थी कि दोनों हाथों से दो कवितायें एक साथ लिखता जाता था। इनमें एक लैटिन भाषा में होती थी और दूसरी पुरातन ग्रीक भाषा में।
कैन्टरवरी के प्रधान पादरी टामस क्रेकर ने तीन महीने में पूरी बाइबिल जबानी याद कर डालने का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया।
सन् 1724 में जन्मा और 1812 में मरा स्काटलैंड का प्रख्यात डंकन मैक इन्टायर उन दिनों अपनी कविताओं के लिए अपने देश ही नहीं सारे योरोप में प्रसिद्ध था। पर वह न पढ़ना जानता था न लिखना, अपनी सारी प्रतिभा उसने सुन-समझ कर ही विकसित की थी।
ग्रीक पोरसन नामक व्यक्ति को मिल्टन की प्रायः सभी रचनायें याद थीं और वह उन्हें सीधी ही नहीं उलटी करके भी सुना सकता था।
लाक्रोज ने अपनी स्मरण शक्ति का एक अनोखा प्रदर्शन करके दर्शकों को चकित कर दिया। उसने अपरिचित 12 भाषाओं की 12 कवितायें सुनीं और दूसरे ही क्षण उसने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।
विक्टर ह्यूगो की रचनायें अति प्रिय लगने और उन्हें बार-बार मनोयोगपूर्वक पढ़ते रहने के कारण गमवेटारुथ ने उन्हें ज्यों का त्यों याद कर लिया था और पूछे जाने पर वह पुस्तक के किसी भी पृष्ठ को आरम्भ करके कितने ही पन्ने सुना देता था।
म्युनिख की राष्ट्रीय लाइब्रेरी के सञ्चालक जोसेफ बर्न हार्ड डकन अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे। उन्होंने 9 भाषायें सीखी ही नहीं थीं उनमें पारंगत भी बने थे। इसके अतिरिक्त उनकी उस विशेषता को देखकर दंग रह जाना पड़ता था जबकि वे 9 भाषाओं के अपने स्टेनोग्राफरों को एक साथ बिठाकर उन सभी को उन्हीं की भाषा में लेख नोट कराते थे। इतना मस्तिष्कीय सन्तुलन, अथाह ज्ञान और विकसित स्मरण शक्ति का प्रमाण कदाचित ही कहीं कभी देखने को मिलता है।
स्मृति का धनी होना न कोई जादू है और न वरदान। यह किसी कार्य में गहरी अभिरुचि रखने, सावधानी के साथ समझने और मनोयोग पूर्वक उसे मस्तिष्क में सँभाल कर रखने की पद्धति भर है। ढूँढ़ निकालने का अभ्यास भी कुछ अधिक मुश्किल नहीं है। सरकस में काम करने वालों को जितना परिश्रम अपने शरीर और जानवर सधाने में करना पड़ता है उतना ही प्रयत्न यदि मस्तिष्क को सधाने में किया जाय तो कोई मन्द बुद्धि भी कवि कालिदास की तरह बौद्धिक प्रतिभा का धनी हो सकता है।
बात सन् 1914 की है। एक दिन गुरु देव टैगोर ने सी0 एफ॰ एण्ड्रूज से कहा-’विवाह जीवन की पूर्णता है। प्रगति के मार्ग में पत्नी से पूरी-पूरी सहायता मिलती है और दोनों के सहयोग से विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। सच्चा जीवन जीने के लिये मनुष्य को विवाह अवश्य करना चाहिए और आपने विवाह न करके बड़ी भारी भूल की है।’
दीनबंधु एण्ड्रूज ने सहज भाव से उत्तर दिया ‘हाँ! आपकी बात बिलकुल सत्य है। मैं भी अनुभव करता हूँ कि विवाह के बिना पवित्र प्रेम तथा पिता और पति के मोहक कर्त्तव्यों से मैं वंचित रहूँगा और मेरे जीवन का विकास भी अवरुद्ध हो जायेगा। पर दाम्पत्य-जीवन के सुख की जब मैं कल्पना करता हूँ तो मेरा मन मुझे एक अन्य दिशा की ओर ले जाना चाहता है।’
वह कहता है ‘तुम अपनी सेवायें राष्ट्रीय आन्दोलन को समर्पित कर चुके हो। जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता तब तक तुम्हारा कुछ नहीं सब कुछ राष्ट्र का ही होगा। तुम मिशन में सर्विस करते हो उसका क्या भरोसा? फिर नौकरी छूट जाने पर घर-गृहस्थी के बोझ को सम्हालने के लिये नौकरी की तलाश करोगे या राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लोगे।’ और मेरे मन में उठने वाले यही विचार दाम्पत्य-जीवन के रेशमी सूत्र में नहीं बँधने देते। दीनबन्धु एण्ड्रूज आजीवन अविवाहित रहकर भारतवासियों को देशभक्ति का सन्देश देते रहे।
खेत में जिस प्रकार का बीज बोया जायगा उसी तरह के पौधे उगेंगे और वैसी ही फसल उगेगी। किसान जो फसल उगाना चाहता है उसके लिए उसी प्रकार के बीज की व्यवस्था करता है। साथ ही यह भी ध्यान रखता है कि वह बीज ‘सड़ा, घुना, छोटा, पुराना, कमजोर न हो।
जीवन एक खेत है। उसमें प्रगति और सफलता की फसल उगाई जानी है तो ऐसे विचारों का मनःक्षेत्र में आरोपण करना चाहिए जो प्रगति के लिए आवश्यक शक्ति का उद्भव कर सकें। साहस और पुरुषार्थ के बिना किसी का आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं। आलस्य और अनियमितता का अवरोध रहते कोई व्यक्ति किसी प्रयोजन में सफल नहीं हो सकता। इन दुर्बलताओं को हटाने के लिये खेत में खर-पतवार उखाड़ने जोतने की तरह हमें किसान का अनुकरण करना होगा।
विचार बीज है। जीवन का स्वरूप उसी की लहराती हुई हरी-भरी फसल है। आशा है अन्न की राशि। मनःक्षेत्र में किन विचारों को स्थान मिले इसके लिये अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है। कुछ भी—कैसा ही—बीज बो देने से कुछ भी उग सकता है और उपलब्धि कैसी भी हो सकती है। बीज की ओर से उपेक्षा बरतने वाला किसान अभीष्ट फसल काटने में सफल मनोरथ कैसे होगा?
प्रगति के लिये प्रयास बहुत किये जाते हैं पर यह भुला दिया जाता है कि निर्धारित दिशा में प्रेरणा देने वाले और पथ प्रशस्त करने वाले समर्थ विचारों की अभीष्ट मात्रा संकलित कर ली गई या नहीं?
वैयक्तिक दोष दुर्गुणों की कँटीली झाड़ियाँ प्रगति के पथ को अवरुद्ध और दुरूह बनाती हैं। यह दुर्गुण और कुछ नहीं उन विचारों के प्रतीक प्रतिनिधि हैं, जिन्हें बहुत समय से—ज्ञात या अविज्ञात रूप में मनःक्षेत्र में सँजोये जमाये रखा गया है। सर्प के काटने पर उसका विष एक बूँद ही रक्त में प्रवेश करता है। पर वह कुछ ही देर में समस्त शरीर में फैल जाता है और अपना असर दिखाता है। कुविचार सर्प-दंश की तरह हैं—वे ही अपना विस्तार करके दोष-दुर्गुणों के रूप में फैल जाते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आन्तरिक शत्रु-मनोविकार-बाहर के शस्त्रधारी शत्रुओं की अपेक्षा हजार गुने अधिक बलिष्ठ और घातक होते हैं। दूर रहने वाले बाहरी शत्रुओं से बचने और उन्हें निरस्त करने के अनेक उपाय हो सकते हैं पर अहर्निशि सामने रहने वाले इन घर के भेदियों को क्या कहा जाय? आस्तीन के साँप की तरह वे सदा विघातक ही सिद्ध होते हैं।
क्षयग्रस्त दुर्बल और मरणासन्न शरीर वस्तुतः उस रोग के विषाणुओं का ही खाया हुआ होता है। घुन का कीड़ा चुपचाप लगा रहता है और विशाल शहतीर को खोखला कर देता है। कुविचार विषाणुओं से अधिक घातक और घुन से अधिक अदृश्य होते हैं। वे भीतर जमकर बैठ जाते हैं और गुण, कर्म, स्वभाव की सारी सम्पदा को खोखली और विषाक्त बना देते हैं।
ओछे स्वभाव के—आदर्श रहित और लक्ष्य विहीन व्यक्ति जीवन की लाश ढोते रहते हैं। उनके मनोरथ सफल हो ही नहीं सकते। क्योंकि प्रगति के लिए-प्रखर व्यक्तित्व की आवश्यकता है।
सफल जीवन जीने की आकाँक्षा आदि साकार करनी हो तो पहला कदम आत्म-निरीक्षण में उठाया जाना चाहिए। अपने विचारों—मान्यताओं—आस्थाओं और अभिमान की समीक्षा करनी चाहिए और उनमें जितने भी अवाँछनीय तत्व हों उन्हें उन्मूलन करने के लिए जुट जाना चाहिए। यह तभी संभव है? जब उनकी स्थान पूर्ति के लिए सद्विचारों के आरोपण की व्यवस्था बना ली जाय। कहना न होगा कि विचार-परिवर्तन के चार ही आधार हैं स्वाध्याय, सत्संग—मनन और चिन्तन। इन्हें अपनाया जा सके तो जीवन का स्वरूप बदलेगा और अवसाद उत्कर्ष में परिणत होगा।
कुण्डलिनी महाशक्ति को ‘काम कला’ कहा गया है। उसका वर्णन कतिपय स्थलों में ऐसा प्रतीत होता है मानो यह कोई सामान्य काम सेवन की चर्चा की जा रही हो। कुण्डलिनी का स्थान जननेन्द्रिय मूल में रहने से भी उसकी परिणति काम शक्ति के उभार के लिये प्रयुक्त होती प्रतीत होती है।
इस तत्व को समझने के लिये हमें अधिक गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा और अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखना पड़ेगा। नर-नारी के बीच चलने वाली ‘काम क्रीड़ा’ और कुण्डलिनी साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभय लिंग विद्यमान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्धनारी नटेश्वर भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित रूप चित्रों में दृष्टि गोचर होता है। पति-पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह इस चित्रण का स्थूल वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति के भीतर उभय लिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसकी रुझान उसी ओर ढुलकने लगती है। उसकी चेष्टाएं उसी तरह की बन जाती हैं। कितने की पुरुषों में नारी जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई नारियों में पुरुषों जैसी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन हो सकता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुँसक जैसी स्थिति बन सकती है।
नारी लिंग का सूक्ष्म स्थल जननेन्द्रिय मूल है। इसे ‘योनि’ कहते हैं। मस्तिष्क का मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र—’लिंग‘ है। इसका प्रतीक प्रतिनिधि सुमेरु —मूलाधार चक्र के योनि गह्वर में ही ‘काम बीज के रूप में अवस्थित है।’ अर्थात् एक ही स्थान पर वे दोनों विद्यमान हैं। पर प्रसुप्त पड़े हैं। उनके जागरण को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। इन दोनों के संयोग की साधना ‘काम कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन—इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास की छाया है।
आन्तरिक काम शक्ति को दूसरे शब्दों में महाशक्ति—महाकाली कह सकते हैं। एकाकी नर या नारी भौतिक जीवन में अस्त-व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभय पक्षी विद्युत शक्ति का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता दिखाई पड़ती है। इसे दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिए कुण्डलिनी साधना की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहाँ उल्लेख किया है वहाँ काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि-व्यवस्था सन्निहित है—
स्वयंभु लिंग तन्मध्ये सरन्ध्रं यश्चिमावलम्।
ध्यायेञ्च परमेशानि शिवं श्यामल सुन्दरम्॥ — शाक्तानन्द तरंगिणी
उसके मध्य रन्ध्र सहित महालिंग है। वह स्वयंभु और अधोमुख, श्यामल है सुन्दर है। उसका ध्यान करे।
तत्रस्थितो महालिंग स्वयंभुः सर्वदा सुखी।
अधोमुखः क्रियावाँक्ष्य काम बीजे न चालितः॥ —काली कुलामृत
वहाँ ब्रह्मरन्ध्र में —वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभु और सुख स्वरूप है। उसका मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा चालित है।
आत्मसंस्थं शिवं त्यक्त्वा बहिःस्थं यः समर्चयेत्।
हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया॥
आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दिने दने।
तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्नात्र कार्या विचरणा॥ —शिव संहिता
अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर बाहर पूजते फिरते हैं। वे हाथ के भोजन को छोड़ कर इधर-उधर से प्राप्त करने के लिए भटकने वाले लोगों में से हैं।
आलस्य त्याग कर ‘आत्म-लिंग‘—शिव—की पूजा करे। इसी से समस्त सफलताएं मिलती हैं।
नमो महाबिन्दुमुखी चन्द्र कार्य स्तन द्वया।
सुमेरु द्दार्घ कलया शोभमाना मही पदा॥
काम राज कला रुपा जागर्ति स चराचरा।
एतत कामकला व्याप्तं गुह्माद गुह्यतरं महत्॥ —रुद्रयामल तंत्र
महाबिन्दु उसका मुख है। सूर्य चन्द्र दोनों स्तन हैं, सुमेरु उसकी अर्ध कला है, पृथ्वी उसकी शोभा है। चर-अचर सब में काम कला के रूप में जगती है। सबमें काम कला होकर व्याप्त है। यह गुह्य से भी गुह्य है।
जननेन्द्रिय मूल-मूलाधार चक्र में योनि स्थान बताया गया है।
मूलाधारे हि यत् पद्मं चतुष्पत्रं व्यवस्थितम्।
तत्र कन्देऽस्ति या योनिस्तस्याँ सूर्यो व्यवस्थितः। —शिव संहिता
चार पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के कन्द भाग में जो प्रकाशवान् योनि है।
तस्मिन्नाधार पद्मे च कर्णिकायाँ सुशोभना।
त्रिकोणा वर्तते योनिः सर्वतंमेषु गोपिका॥ —शिव संहिता
उस आधार पद्म की कर्णिका में अर्थात् दण्डी में त्रिकोण योनि है। यह योनि सब तन्त्रों करके गोपित है।
यत्तद्गुह्यमिति प्रोक्तं देवयोनिस्तु सोच्यते।
अस्याँ यो जायते वह्निः स कल्याणप्रदुच्यते॥ —कात्यायन स्मृति
यह गुह्य नामक स्थान देव योनि है। उसी में जो वह्नि उत्पन्न होती है वह परम कल्याणकारिणी है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनि स्थानं द्वयोर्मध्ये कामरुपं निगद्यहे॥ —गोरक्ष पद्धति
पहले मूलाधार एवं दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र के बीच में योनि स्थान है, यही काम रूप पीठ है।
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्ध वंदिता॥
गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल विख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वन्दना समस्त सिद्धजन करते हैं, पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती है।
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम्।
तिस्मन दृष्टे महायोगे याता यातात्र विन्दते॥ —गोरक्ष पद्धति
इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम ज्योति प्रकट होती है वही कालाग्नि रूप है जब योगी ध्यान, धारण, समाधि—द्वारा उक्त ज्योति देखने लगता है तब उसका जन्म मरण नहीं होता।
इन दोनों का परस्पर अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह सम्बन्ध जब मिला रहता है तो आत्म-बल समुन्नत होता चला जाता है और आत्मशक्ति सिद्धियों के रूप में विकसित होती चलती है। जब उनका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य दीन-दुर्बल, असहाय-असमर्थ एवं असफल जीवन जीता है। कुण्डलिनी रूपी योनि और सहस्रार रूपी लिंग का संयोग मनुष्य की आन्तरिक अपूर्णता को पूर्ण करता है। साधना का उद्देश्य इसी महान प्रयोजन की पूर्ति करना है। इसी को शिव शक्ति का संयोग एवं आत्मा से परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस संयोग का वर्णन साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।
भगः शक्तिर्भगवान् काम ईश उया दातार विह सौभमानाम्।
सम प्रधानौ समसत्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्व योनिः॥ —त्रिपुरोपनिषद
भग शक्ति है। काम रूप ईश्वर भगवान है। दोनों सौभाग्य देने वाले हैं। दोनों की प्रधानता समान है। दोनों की सत्ता समान है। दोनों समान ओजस्वी हैं। उनकी अजरा शक्ति विश्व का निमित्त कारण है।
शिव और शक्ति के सम्मिश्रण को शक्ति का उद्भव आधार माना गया है। इन्हें बिजली के ‘धन और ऋण’ भाग माना जाना चाहिये। बिजली इन दोनों वर्गों के सम्मिश्रण से उत्पन्न होती है। अध्यात्म विद्युत के उत्पन्न होने का आधार भी इन दोनों शक्ति केन्द्रों का संयोग ही है। शिव पूजा में इसी आध्यात्मिक योनि लिंग का संयोग प्रतीक रूप से लिया गया है।
लिंगवेदी उमा देवी लिंगं साक्षान्महेश्वरः। —लिंग पुराण
‘लिंग वेदी’ (योनि) देवी उमा है और लिंग साक्षात् महेश्वर हैं।
सा भगाख्या जगद्धात्री लिंगमूर्तेस्त्रिवेदिका।
लिंगस्तु भगवान्द्वाभ्याँ जगत्सृाष्टर्द्विजोत्तमाः॥
लिंगमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः। —लिंग पुराण
वह महादेवी भग संज्ञा वाली और इस जगत् की धात्री है तथा लिंग रूप वाले शिव की त्रिगुणा प्रकृति रूप वाली है। हे द्विजोत्तमो! लिंग रूप वाले भगवान् शिव नित्य ही भग से युक्त रहा करते हैं और इन्हीं दोनों से इस जगत् की सृष्टि होती है। लिंग स्वरूप शिव स्वतः प्रकाश रूप वाले हैं और यह माया के तिमिर से ऊपर विद्यमान रहा करते हैं।
ध्यायेत् कुण्डलिनीं देवीं स्वयंभु लिंग वेष्टिनीम्।
श्यामाँ सूक्ष्माँ सृष्टि रुपाँ सृष्टि स्थिति लयात्मिकम्।
विश्वातीताँ ज्ञान रुपाँ चिन्तयेद ऊर्ध्ववाहिनीम्। —षट्चक्र निरुपणम्
स्वयंभू लिंग से लिपटी हुई कुँडलिनी महाशक्ति का ध्यान श्यामा, सूक्ष्मा सृष्टि रूपा, विश्व को उत्पन्न और लय करने वाली, विश्वातीत, ज्ञान रूप ऊर्ध्ववाहिनी के रूप में करे।
यह उभय लिंग एक ही स्थान पर प्रतिष्ठापित है। जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में सूक्ष्म योनि गह्वर है। उसे ऋण विद्युत कह सकते हैं। उसी के बीचों बीच सहस्रार चक्र का प्रतिनिधि एक छोटा सा उभार है जिसे ‘सुमेर’ कहा जाता है। देवताओं का निवास सुमेरु पर्वत पर माना गया है। समुद्र मंथन में इसी पर्वत का वर्णन आता है। साढ़े तीन चक्र लपटा हुआ शेष नाग इसी स्थान पर है। इस उभार केन्द्र को ‘काम बीज’ भी कहा गया है। एक ही स्थान पर दोनों का संयोग होने से साधक का ‘आत्मरति’ प्रयोजन सहज ही पूरा हो जाता है। कुण्डलिनी साधना इस प्रकार आत्मा के उभय पक्षी लिंगों का समन्वय सम्मिश्रण ही है। इसकी जब जागृति होती है तो रोम-रोम में अन्तः क्षेत्र के प्रत्येक प्रसुप्त केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र—काम बीज का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
योनि मध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखस्थितम्।
मस्तके मणिबद्बिम्बं यो जानाति स योगवित्॥ —गोरक्ष पद्धति
त्रिकोणाकार योनि में सुषुम्ना द्वार के सम्मुख स्वयंभू नायक महालिंग है उसके सिर में मणि के समान देदीप्यमान बिम्ब है यही कुण्डलिनी जीवाधार मोक्ष द्वार है इसे जो सम्यक् प्रकार से जानता है उसे योगविद् कहते हैं।
तप्तचामी कराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्।
त्रिकोणं तत्परं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम्॥ —गोरक्ष पद्धति
मेढ्र (लिंग स्थान) से नीचे मूलाधार कर्णिका में तपे हुए स्वर्ण के वर्ण के समान वाला एवं बिजली के समान चमक-दमक वाला जो त्रिकोण है वही कालाग्नि का स्थान है।
पूर्वाक्ता डाकिनी तत्र कर्णिकायाँ त्रिकोणकम्।
यन्मध्ये विवरं सूक्ष्मं रक्ताभं काम वीजकम्।
तत्र स्वयंभु लिंग स्नाधो मुखारक्तक प्रभुमू। —शक्ति तंत्र
वहीं ब्रह्म डाकिनी शक्ति है। कर्णिका में त्रिकोण है। इसके मध्य में एक सूक्ष्म विवर है। रक्त आभा वाला काम बीज स्वयंभू अधोमुख महालिंग यहीं है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरुपं निगद्यते॥
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता॥
योनिमध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखस्थितम्।
मस्तके मणिवद्बिम्बं यो जानाति स योगवित्॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्।
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम्॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम्।
तिस्मन् दृष्टे महायोगे यातायातान्न विन्दते॥ —गोरक्ष पद्धति
मूलाधार और स्वाधिष्ठान इन दो चक्रों के बीच जो योनि स्थान है वही ‘काम रूप’ पीठ है।
चौदह पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के मध्य में त्रिकोणाकार योनि है इसे ‘कामाख्या’ पीठ कहते हैं। यह सिद्धों द्वारा अभिवंदित है।
इस योनि के मध्य पश्चिम की ओर अभिमुख ‘महालिंग‘ है। उसके मस्तक में मणि की तरह प्रकाशवान बिम्ब है। जो इस तथ्य को जानता है वही योगविद् है।
लिंग स्थान से नीचे, मूलाधार कर्णिका में अवस्थित तपे सोने के समान आभा वाला, विद्युत जैसी चमक से युक्त जो त्रिकोण है उसी को ‘कालाग्नि’ कहते हैं।
इसी विश्वव्यापी परम ज्योति में तन्मय होने में महायोग की समाधि प्राप्त होती है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है।
तत्र बन्धूक पुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम्।
कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररुपिणम्॥
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो बीजं तत्र वरं स्थितम्।
शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम्॥
सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम्।
एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी।
बीजसंज्ञं परं तेजस्तदेव परिकीर्तितम्॥
क्रियाविज्ञानशक्तिभ्याँ युतं यत्परितो भ्रमत्।
उत्तिष्ठद्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।
योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयम्भूलिंगसंज्ञितम्॥ —शिव संहिता
जिस स्थान पर कुण्डलिनी है उसी स्थान पर पुष्प के समान स्वर्ण आभा जैसा चमकता हुआ रक्त वर्ण काम-बीज है।
कुण्डलिनी, सुषुम्ना और काम बीज यह सूर्य चन्द्रमा की तरह प्रकाशवान हैं। इन तीनों के मिलने को त्रिपुर भैरवी कहते हैं। इस तेजस्वी तत्व की ‘बीज’ संज्ञा है।
यह ‘बीज’ ज्ञान और क्रिया शक्ति से संयुक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और ऊर्ध्वगामी होता है। इस परम तेजस्वी अग्नि का योनि स्थान है और उसे ‘स्वयंभू लिंग‘ कहते हैं।
क्रिया विज्ञान शक्तिभ्याँ युतं यत्परितो भ्रमत्।
उत्तिष्ठ द्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।
योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयम्भू लिंग संज्ञितम्। —शिव संहिता
अर्थ-वह बीज क्रिया शक्ति एवं ज्ञान शक्ति से युक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी जल में प्रवेश करता है और सूक्ष्म प्रज्वलित अग्नि के समान शिखा युत परम तेज वीर्य की स्थिति योनि स्थान में है स्वयम्भू लिंग संज्ञा है।
तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम्।
कलहेम समं योगे प्रयुक्ताक्षर रुपिणम्। —शिव संहिता
अर्थ-जिस स्थान में कुण्डलिनी है उसी स्थान में बन्धूक पुष्प के समान रक्त वर्ण काम बीज की स्थिति कही गई है। वह काम बीज तप्त स्वर्ण के समान स्वरूप योग युक्त द्वारा चिन्तनीय है।
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो बीजं तत्र वरं स्थितम्।
शरच्चंद्र तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम्॥
सूर्य कोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम्। —शिव संहिता
अर्थ-जिस स्थान में कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्ना उसी स्थान में काम बीज के साथ स्थित है और वह बीज शरच्चन्द्र के समान प्रकाशमान तेज है और वह आप ही कोटि सूर्य के समान प्रकाश और कोटि चन्द्र के समान शीतल है।
स्थूल शरीर में नारी का प्रजनन द्रव ‘रज’ कहलाता है। नर का उत्पादक रस ‘वीर्य’ है। सूक्ष्म शरीर में इन दोनों की प्रचुर मात्रा एक ही शरीर में विद्यमान है। उनके स्थान निर्धारित हैं। इन दोनों के पृथक रहने के कारण जीवन में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती। पर जब इनका संयोग होता है तो जीवन पुष्प का पराग मकरन्द परस्पर मिलकर फलित होने लगता है और सफल जीवन की अगणित सम्भावनाएं प्रस्फुटित होती हैं। एक ही शरीर में विद्यमान इन ‘उभय’ रसों का वर्णन साधना विज्ञानियों ने इस प्रकार किया है—
योनिस्थाने महाक्षेत्रे जपा बन्धूकसन्निभम्।
रजो वर्सात जंतूनाँ देवीतत्वं समाहितम्॥
रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः। —योग शिखोपनिषद
योनि स्थान रूपी मूलाधार महा क्षेत्र में, जवा कुसुम के वर्ण का रज हर एक जीवधारी के शरीर में रहता है। उसको ‘देवी तत्व’ कहते हैं। उस रज और वीर्य के योग से राजयोग की प्राप्ति होती है अर्थात् इन दोनों के योग का फल राजयोग है।
गुदा और उपस्थ के मध्य में सीवनी के ऊपर त्रिकोणाकृति गुह्य-गह्वर है, जिसको ‘योनि-स्थान’ कहते हैं।
गलितोपि यदा बिन्दुः संप्रप्ति योनिमण्डले।
ज्वलितोपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम्॥
ब्रजत्पूर्ध्वं दृढ़ाच्छक्त्या निबद्धो योनिभुदया।
स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा॥
पाण्डुरं शुक्रभित्याहु र्लोंहितारथं महारजः।
विद्रुमद्रुम संकाराँ योनिस्थाने स्थितं रजः॥
शीशस्थाने बसेद्विदुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्। —ध्यान बिन्दु उपनिषत्
सहस्रार से क्षरित गलित होने पर जब वीर्य योनि स्थान पर ले जाया जाता है तो वहाँ कुण्डलिनी अग्नि कुण्ड में गिरकर जलता हुआ वह वीर्य योनि मुद्रा के अभ्यास से हठात् ऊपर चढ़ा लिया जाता है और प्रचण्ड तेज के रूप में परिणत होता है यही आध्यात्मिक काम सेवन एवं गर्भ धारण है।
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा।
पाण्डुरः शुक्रमित्या हुर्लोहिताख्यो महारजः॥ —गोरक्ष पद्धति
बिन्दु दो प्रकार का होता है—एक तो पाण्डु वर्ण जिसे शुक्र कहते हैं और दूसरा (लोहित) रक्त वर्ण जिसे महारज कहते हैं।
सिन्दूरद्रव सकाश नाभिस्थाने स्थित रजः।
शशिस्थाने स्थितो बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्॥ —गोरक्ष पद्धति
तैल मिले सिन्दूर के द्रव (रस) के समान रज सूर्य स्थान नाभि मण्डल में रहता है तथा बिन्दु (वीर्य) चन्द्रमा के स्थान कण्ठ देश षोडशाधर चक्र में स्थिर रहता है। इन दोनों का ऐक्य अत्यन्त दुर्लभ है।
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिश्चन्दो बिन्दु रजो रविः।
अनयोः संगमादेव प्राप्यते परमं पद्म॥ —गोरक्ष पद्धति
बिन्दु शिव रस शक्ति है। इनके एक होने से योग सिद्धि एवं परम पद प्राप्त होता है। चन्द्रमा सूर्य का ऐक्य करना ही योग है।
वायुना शक्ति चारेण प्रेरितं तु यदा रजः।
याति बिन्दोः सहकत्वं भवेद्दिव्यं वपुस्ततः॥ —गोरक्ष पद्धति
शक्तिचालिनी विधि से वायु द्वारा जब रज-बिन्दु के साथ ऐक्य को प्राप्त होता है तब शरीर दिव्य हो जाता है।
अपने शरीरस्था रज-वीर्य एकता सिद्धिदायक,
स बिन्दुस्त दजश्चैव एकीभूत स्वदेहगौ।
वज्रोल्पभ्यास योगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः॥ —ह॰ योग प्रदीपिका
अपने देह स्थित रज व वीर्य वज्रोली के अभ्यास के योग से सब सिद्धियों को देने वाले हो जाते हैं।
शारीरिक काम सेवन की तुलना में आत्मिक काम सेवन असंख्य आनन्ददायक है। शारीरिक काम-क्रीड़ा को विषयानन्द और आत्मरति को ब्रह्मानन्द कहा गया है। विषयानन्द से ब्रह्मानन्द का आनन्द और प्रतिफल कोटि गुना है। शारीरिक संयोग से शरीर धारी सन्तान उत्पन्न होती है। आत्मिक संयोग प्रचण्ड आत्मबल और विशुद्ध विवेक को उत्पन्न करता है। उमा महेश विवाह के उपराँत दो पुत्र प्राप्त हुए थे। एक स्कन्द (आत्मबल) दूसरा गणेश (प्रज्ञा प्रकाश) कुण्डलिनी साधक इन्हीं दोनों को अपने आत्म लोक में जन्मा बढ़ा और परिपुष्ट हुआ देखता है।
स्थूल काम सेवन की ओर से विमुख होकर यह आत्मरति अधिक सफलता पूर्वक सम्पन्न हो सकती है। इसलिए इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है और वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। शिवजी द्वारा तृतीय नेत्र तत्व विवेक द्वारा स्थूल काम सेवन को भस्म करना—उसके सूक्ष्म शरीर को अजर-अमर बनाना इसी तथ्य का आलंकारिक वर्णन है कि शारीरिक काम सेवन से विरत होने की और आत्म रति में संलग्न होने की प्रेरणा है। काम दहन के पश्चात् उसकी पत्नी रति की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को अशरीरी रूप से जीवित रहने का वरदान दिया था और रति को विधवा नहीं होने दिया था उसे आत्म रति बना दिया था। वासनात्मक अग्नि का आह्य-डडडडडड अग्नि-कालाग्नि के रूप में परिणत होने का प्रयोजन भी यही है—
भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निना।
तस्मिन्प्रविष्टे जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः॥ —शिव पुराण
शिवजी के तृतीय नेत्र की प्रदीप्त अग्नि की ज्वाला से जब कामदेव भस्म हो गया और वह अग्नि समुद्र में प्रवेश कर गई इसके पश्चात् क्या हुआ ?
ताँ च ज्ञात्वा तथाभूताँ तृतीयेनेक्षणेन वै।
ससर्ज कालीं कामारिः कालकंठीं कपर्दिनीम्॥ —लिंग पुराण
उस देवी को उस स्थिति में जानकर काम के मर्दन करने वाले शिव ने काल कण्ठी कमर्दिनी का सृजन किया था।
ईरानी शहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। नाम था—मुहम्मद अलीबेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर जवाबी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुये और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आये।
मुहम्मद अलीबेग राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था फिर भी इतनी धन दौलत को देखकर उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी।
शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राज सिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिये कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिये अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।
शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। उसके जीवन में बड़ी सादगी थी। जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश होकर लौटने लगा तो खोजों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बन्द कमरे की ओर गई। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला था। उन्होंने पूछा—’इसमें ऐसा क्या है जिसके लिये इतने मजबूत ताले लगाये हैं।’
‘इसमें हीरे मोतियों से भी मूल्यवान वस्तुएँ है शाह! पर उन पर मेरा अधिकार है।’
‘भले ही आपका अधिकार हो पर शासक उन वस्तुओं को देख तो सकता है?’
तुरन्त ताले खोल दिये गये शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कम्बल देखे। मुहम्मद ने कहा-’जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाये थे उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं।’
मुहम्मद की ईमानदारी तथा निःस्वार्थता देख शाह को कुछ कहते न बना। वह मन ही मन पछता रहा था।
प्रगति का मूल है—पात्रता। मात्र दूसरों के अनुदान पर कभी कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं होता। वह कथा प्रख्यात है जिसमें किसी सिद्ध पुरुष की कुटी में रहने वाले चूहे को शत्रु के डर से बचाने के लिए उसने क्रमशः चूहे से बिल्ली, बिल्ली से कुत्ता, कुत्ते से शेर बनाया था, पर जब वह हर स्थिति में शत्रु के डर की शिकायत ही करता रहा तो सिद्ध पुरुष ने झुँझलाकर उसे फिर चूहे का चूहा बना दिया था। हर क्षेत्र में यही सिद्धान्त लागू होता है। आत्मिक प्रगति के बारे में भी—आत्मबल की महान उपलब्धि प्राप्त करने के बारे में भी।
गुरु देव ने गायत्री माता का, हिमालय पिता का और समर्थ मार्गदर्शक का—अजस्र अनुदान प्राप्त किया है— उसी के आधार पर वे तुच्छ से महान बने। यह अनुदान उन्हें भाग्यवश, किसी के उपकार से नहीं मिले वरन् अपनी पात्रता के बलबूते पर खरीदे हैं। ईश्वरीय अनुदान प्राप्त करने वाले—दैवी वरदान से लाभान्वित होने वाले—प्रायः सभी महामानवों ने जो कुछ पाया है वह उनकी आत्म-साधना का ही परिणाम था। भगवान को —देवताओं को—सिद्ध पुरुषों को न कोई प्रिय है—न अप्रिय। न उन्हें किसी के साथ पक्षपात होता है न द्वेष न वे प्रशंसा से प्रसन्न होते हैं न निन्दा से अप्रसन्न। उनका स्तर बहुत ऊँचा होता है। उनकी आँखें बहुत पैनी होती हैं। पात्रता का एक मात्र वह आधार होता है जिसे पाकर उनकी अनुकम्पा सहज ही बरस पड़ती है। भगवान का प्यार और अनुग्रह पात्रता अभिवर्धन के प्रयास किये बिना आज तक कभी किसी ने प्राप्त नहीं किया है।
प्रत्यावर्तन अनुदान का क्रम अगले दिनों आरम्भ होने जा रहा है। गाय दिन भर घास चरती है और उससे बनने वाला दूध शाम को घर आकर अपने बछड़े को दस मिनट में पिला देती है। बछड़ा उसे पीकर पुष्ट और तृप्त होता है। पर यह सम्भव तभी है जब बछड़ा उसी गाय का हो। भैंस का कटरा, कुतिया का पिल्ला यदि गाय के थनों से लगा दिया जाय तो बेकार का विग्रह ही खड़ा होगा। न दूध स्रवित होगा न पीने के इच्छुक की आकाँक्षा पूरी होगी। प्रत्यावर्तन का लाभ प्राप्त करने के लिये उस प्रकार की एकता आवश्यक है जिसमें दाता और ग्रहीता एक स्तर पर खड़े हो सकें। यदि असाधारण भिन्नता रही तो फिर कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
गत मई और जून के अंक में सारा जोर इसी तथ्य पर दिया गया है। गुरुदेव अब इस स्थिति में हैं कि वे अपने तप की एक प्रखर चिनगारी देकर अधिकारी आत्माओं को ज्योतिर्मय बना सकें। इस प्रकार का अनुदान दोनों पक्षों के लिए अति आनन्द का कारण बनता है। दाता गृहीता के और गृहीता दाता के प्रति उपकृत होता है। बछड़ा अनुग्रहीत होता है कि उसे माता का स्नेह और दूध अनायास ही मिला। गाय प्रसन्न होती है कि उसके थनों का तनाव दूर हुआ। प्रेम पात्र के आधार पर अपना आन्तरिक उल्लास विकसित कर लेता है। पुत्र को पिता से लाभ है और पिता की तृप्ति पुत्र से होती है। पत्नी को पति चाहिए और पति के बिना पत्नी अधूरी रहती है।
इस पारस्परिक प्रत्यावर्तन में एक ही प्रधान अवरोध है सजातीयता का अभाव। विजातीय पदार्थ एक दूसरे से मिलते नहीं। रक्त दान तभी सफल होता है जब गृहीता और दान का रक्त एक ही वर्ग का हो। भिन्न वर्ग के रक्त का प्रत्यावर्तन तो उलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है।
रामकृष्ण परमहंस के अनेक शिष्य थे। अपने को अनुयायी—सेवक, भक्त, शिष्य कहने वालों की संख्या हजारों तक पहुँच गई थी। पर कहने भर से कुछ काम नहीं चला। परमहंस निरन्तर व्याकुल रहे कि कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा मिल जाय जिसे अपनी कमाई हस्तान्तरित करके जी में सन्तोष किया जा सके। बड़ी कठिनाई से वे एक विवेकानन्द ढूँढ़ सकने में सफल हुए। जब सत्पात्र मिल गया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। शिष्य को कुछ कहने माँगने की आवश्यकता न पड़ी। गुरु का अजस्र अनुदान बरसता ही चला गया। छत्रपति शिवाजी को समर्थ गुरु रामदास ने भोलेपन में या मस्ती की लहर में ही अपना सञ्चित तप उड़ेल नहीं दिया था वरन् अपने हजारों शिष्यों में से ढूँढ़ते-ढूंढ़ते इस हीरे को पाया और जब उनकी मर्जी का पत्थर मिल गया तो ऐसी प्रतिमा गढ़नी आरम्भ कर दी कि उसे देखने वाले अवाक् रह गये। शिवाजी की मूर्ति गढ़ने में रामदास को कितनी प्रसन्नता हुई होगी इसका अन्दाज अनुमान कोई बिरला ही लगा सकता है।
लाटरी पाने के इच्छुक कितने ही रहते हैं, किसी अमीर के दत्तक पुत्र बनने की कितनों की ही इच्छा आकाँक्षा रहती है, धनीमानी के घर जन्मने वाले बच्चे भाग्यवान माने जाते हैं क्योंकि उन्हें सहज ही उतना बड़ा उत्तराधिकार, सम्पदा मिल जाती है जितने का उपार्जन सम्भवतः वे कठोर श्रम करते हुए भी जिन्दगी भर में कमा न पाते। अध्यात्म क्षेत्र में भी इस प्रकार के सुख-सुविधा भरे अनुदान की पूरी-पूरी गुंजाइश है।
पर यह उपलब्धियाँ अनायास ही नहीं मिल जातीं। इनके लिए तप करना पड़ता है। अन्न से कोठे भर लेने में सफलता प्राप्त करने वाले किसान को एक वर्ष तक सर्दी-गर्मी, वर्षा का प्रहार, प्रकोप सहते रहने की—रात और दिन में अन्तर न करने की—कठोर श्रम से स्वेद बिन्दु बहाने की साधना करनी पड़ती है। इस तप साधना के वरदान स्वरूप ही उसे अन्न, धन से सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी सारा मनोयोग समेट कर पाठ्य पुस्तकों में तन्मय हो जाता है। दस वर्ष तक उसी लक्ष्यवेध में एकाग्र रहता है, तब कहीं स्नातक बनने का सम्मान और उस आधार पर उच्च पद प्राप्त करता है। फल और फलों से लदा बगीचा देखने में माली लम्बी अवधि तक अपने प्रयास में जुटा रहता है। वरदान प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली लम्बी अवधि तक तप करते हैं। इस सनातन प्रक्रिया का और कोई विकल्प नहीं। पात्रता की परीक्षा दिये बिना विभूतियों का वरदान जो प्राप्त कर सका हो, ऐसा व्यक्ति कहीं भी—कोई भी—कभी भी नहीं हुआ।
जिस प्रत्यावर्तन अनुदान की चर्चा पिछले अंकों में हुई है वह साधारण नहीं असाधारण है। इसे गुरुदेव की आकाँक्षा, अभिलाषाओं का सार तत्व कहना चाहिए। वे अपने वर्तमान कार्य क्षेत्र से ऊँचे उठकर अधिक व्यापक अधिक महत्वपूर्ण—स्तर के उत्तरदायित्व वहन करने के लिये अन्यत्र घसीट लिये जा रहे हैं। जो कार्य अब तक वे स्वयं करते रहे हैं उसकी जिम्मेदारियाँ दूसरों के कन्धों पर डालना आवश्यक हो गया है, पर यह सम्भव तभी हो सकता है, जब उसी स्तर के दूसरे व्यक्ति सामने आयें, जिसके वे स्वयं थे। हाथी का हौदा हाथी ही उठा सकता है, गुरु देव जितने बड़े कार्य कर सके वह उनके व्यक्तित्व की गरिमा के कारण ही सम्भव हो सका। हलके स्तर के लोग उतने बोझ से चरमरा जाते। आगे जो उतना बोझा उठा सके, उसका स्तर भी गुरु देव जितना ही होना चाहिए। यह कैसे सम्भव हो, वे इसी के लिये बेतरह बेचैन थे। उनकी एक ही महत्वाकाँक्षा थी कि अपने जैसे 100 व्यक्ति पीछे छोड़कर जायें। ताकि वह प्रवाह और भी अधिक तीव्र गति से बह चले जिसे वे भागीरथ जैसे तप करके गहन गह्वर से छोटे रूप में बहा कर यहाँ तक लाये।
इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिये दो आधार थे। एक दाता की क्षमता दूसरी गृहीता की पात्रता। बिजली के दो तार मिलने से ही शक्ति उत्पन्न होती है। एक पक्ष अधूरा है। नर-नारी को युग्म से ही दाम्पत्य-जीवन का उल्लास विकसित होता है। गाड़ी के दो पहिये ही गति उत्पन्न करते हैं। एक पंख वाला पक्षी आकाश में नहीं उड़ सकता। प्रत्यावर्तन के लिए भी दोनों पक्षों की उपयोगिता समान रूप से है।
इससे पूर्व कभी इस अनुदान पर जोर नहीं दिया गया। कारण कि गुरु देव स्वयं प्रेरित प्रयोजनों में संलग्न थे। युग-निर्माण परिवार का संगठन और जन-जागरण की बहुमुखी गति-विधियों का सञ्चालन यही उन्हें सौंपा गया प्रधान कार्य था। उसके भेद, उपभेद, क्रिया-कलाप अनेक थे, उन्हीं को पूरा करते हुए वे बहुमुखी कार्यक्रमों में व्यस्त दिखाई पड़ते थे। साथियों को खड़े पाँवों रखने के लिए उनकी भौतिक सहायता भी आवश्यक होती थी, उन दिनों उसी में उनकी साधना उपासना का उपार्जित पुण्य फल खर्च हो जाता था। प्रत्यावर्तन के लिए जिस उच्चकोटि की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राप्त करने में उग्र तपश्चर्या करनी पड़ती है। वह उन दिनों सम्भव नहीं थी, फिर दाता और गृहीता का अन्तरंग मर्म स्थल जिस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह उन दिनों न गुरु देव के लिए सम्भव था न दूसरे साधकों के लिए। स्थान की अनुपयुक्तता जैसे कितने ही अभाव ऐसे थे जिनसे वह प्रयोजन उन दिनों पूरे नहीं हो सकते थे। अस्तु कभी उस तरह का प्रयास भी नहीं किया गया। यद्यपि समर्थ उत्तराधिकारियों की आवश्यकता-तलाश-उन दिनों भी इतनी ही तत्परता पूर्वक की जाती रही है। पर सुयोग बन ही नहीं सका।
अब वह अवसर आया है। गुरु देव ने अपने पक्ष की तैयारी पूरी कर ली। स्थान और वातावरण की जो उपयुक्तता आवश्यक थी वह भी बन गई। सात ऋषियों की वह तपस्थली जिसकी अक्षुण्णता बनाये रखने के लिए भगवती भागीरथी को सात धाराओं में विभक्त होना पड़ा अपनी महिमा और महत्ता अभी भी अक्षुण्य बनाये हुए है। ऐसे स्थान पर बना हुआ शान्ति कुञ्ज अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सर्वथा समर्थ है। आवश्यकता, उपयुक्तता, समर्थता के तीन पक्ष अपने प्रखर रूप में विद्यमान हैं। कमी केवल एक ही रह गई है वह गृहीता की पात्रता। यदि यह पक्ष पूरा हो जाय तो समझना चाहिए कि जो कमी थी वह पूरी हो गई और सभी के लिए आनन्द भर देने वाली परिस्थितियाँ बन गई।
प्रत्यावर्तन अनुदान के लिये जिन लोगों ने अपने नाम नोट कराये हैं, उनके लिये हरिद्वार यात्रा भर, करने की तैयारी पर्याप्त नहीं मानी जायगी। उन्हें अपनी मनोभूमि का ऐसा परिष्कार करना पड़ेगा जिसमें बोये हुए बीज ठीक तरह अंकुरित हो सकें।
यह एक तथ्य है कि जिसकी जितनी भौतिक महत्वाकाँक्षी होगी वह उतना ही आत्मिक प्रगति से वंचित रहेगा। लोभ-मोह के आकर्षण इतने जटिल होते हैं कि उसके बन्धन सारी मानसिक और भावनात्मक क्षमता अपने ही इर्द-गिर्द समेटे रहते हैं। उस स्थिति में आत्मिक क्रिया-कलाप-मात्र लकीर पीटने की चिह्न पूजा बनकर रह जाते हैं। जब तक व्यक्ति इस आस्था की हठ न करे कि शरीर और मन उनके वाहन उपकरण मात्र हैं और उन्हें उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए जितनी उन्हें सक्रिय सक्षम बनाये रहने के लिए नितान्त आवश्यक है। यह आस्था जब गहरी हो जाती है तभी यह आकाँक्षा उदय होती है कि आत्म-कल्याण के लिए कुछ कारगर प्रयत्न किया जाय। स्पष्ट है कि शरीर के भरण-पोषण के लिए जितना श्रम, मनोयोग और साधन जुटाया जाता है उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आत्मिक प्रगति के लिए अभीष्ट होता है। दस पाँच मिनट की पूजा-पत्री उस महान प्रयोजन के लिए ‘ऊँट की दाढ़ में जीरा’ जितनी स्वल्प होती है।
यदि कोई यह सोचता है कि जप, ध्यान, प्राणायाम जैसे क्रिया-कलाप किसी का आत्मबल बढ़ा सकने के लिए- आत्मिक तथ्य प्राप्त कर सकने के लिए-पर्याप्त हैं तो यह उसकी भारी भूल है। चम्मच, तश्तरी जुटा लेना पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं। ये उपकरण भोजन करने में सहायक तो हैं पर पेट नहीं भर सकते। पेट भरने के लिए तो रोटी साग चाहिए। पूजा-पाठ चम्मच तश्तरी की बराबर है और दृष्टिकोण का परिष्कार-आन्तरिक स्तर- दाल-रोटी की तरह। हम देखते हैं कि पूजा-उपासना में सब प्रकार चौकस व्यक्ति भी जब सर्वथा खाली हाथ दीखते हैं तो उसका एक मात्र कारण इतना ही होता है कि उन्होंने अन्तःकरण के परिष्कार-और दृष्टिकोण को उदात्त बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की। उस ओर कदम नहीं बढ़ाये।
जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा है उनसे सदा एक ही बात कही जाती रही है कि अपने को शरीर नहीं आत्मा मानें। शरीरगत तृष्णाओं की पूर्ति पर अपना सर्वस्व निछावर न करें। आत्मा की भूख और आकाँक्षा को भी कुछ समझें और उसके लिए भी कम से कम उतना प्रयास तो करें ही जितना कि अपने वाहन शरीर और मन को सुखी सन्तुष्ट बनाने के लिए करते हैं। इसके लिए रोली, चन्दन, पुष्प, धूप काफी नहीं इसके लिए समय, श्रम, मनोयोग, धन आदि जो कुछ महत्व पूर्ण अपने पास है उसका अधिक से अधिक भाग आत्म-कल्याण के लिए—आत्मिक प्रगति के लिए लगाया जाना चाहिए। शरीर और आत्मा का मूल्यांकन जिस तुलनात्मक अनुपात से किया जाय उसी अनुपात से यह निर्णय किया जाय कि शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति में जितना किया जा रहा है उसकी अपेक्षा आत्मा की आवश्यकता पूरी करने के लिए कितना किया जाय?
गुरु देव इसी कसौटी को लेकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करते रहे हैं। उनकी प्रतिभा, विद्या, शारीरिक मानसिक क्षमता, सम्पदा, आकाँक्षा का जितना भाग शरीर परिवार के लिए खर्च हुआ उसकी तुलना में आत्मा की भूख बुझाने के लिए हजार गुना अनुदान अर्पित किया है। यही है उनकी असली जीवन साधना जिसकी पृष्ठभूमि पर गायत्री महापुरश्चरणों का बीजारोपण कल्पवृक्ष की तरह उगा और फला-फूला। वही राजमार्ग सबके लिए है। भौतिक स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में आकण्ठ मग्न लोग सिर पर चन्दन और गले में रुद्राक्ष धारण करके यदि आत्मिक प्रकाश का स्वप्न देखते हों तो यह उनकी मृग तृष्णा मात्र ही सिद्ध होगी।
आध्यात्मिक पात्रत्व की कसौटी यही है कि व्यक्ति की आकाँक्षाएं—अभिलाषाएं, योजनाएं, गति-विधियाँ आदर्शवादी उत्कृष्टता की ओर चल रही हैं या नहीं। मनुष्य अपने पुरुषार्थ की कमाई का लाभ अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं के रूप में उठा सकता है। दैवी अनुकम्पा का प्रयोजन तो मात्र लोक मंगल होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ साधनों के लिए यदि कोई दैवी अनुग्रह को खर्च कर डाले तो वह ‘अमानत में खयानत’ जैसी बात हो जायगी। महामानव भगवान से बहुत कुछ पाते हैं पर उसकी एक-एक बूँद परमार्थ प्रयोजनों में ही खर्च करते हैं। गुरु देव ने अपने गुरु के अनुदान में से ईश्वरीय वरदान में से कभी एक कण भी अपने या अपने परिवार के लिए खर्च नहीं किया। यदि वे उन उपलब्धियों को अपने स्वार्थ साधनों में खर्च करते तो स्पष्ट है कि दूसरों की तरह वे भी खाली हाथ ही रह गये होते।
पात्रता की परिभाषा में इतना कुछ कहा गया है उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा समझा और मनन किया जाना चाहिए उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और अपनाया जानी चाहिए। शब्दाडम्बर के रूप में नहीं सचाई के साथ गहरी आस्था के रूप में ऐसा आसानी से किया जा सकता है। इसमें न तो कोई कठिनाई है न अड़चन, यह आशंका भी व्यर्थ है कि आदर्श वादी जीवन कठिनाइयों से भरा है। सादगी को अपनाने भर से सारा काम सहज ही चल जाता है और दृष्टि कोण में अन्तर आते ही सामान्य भौतिक गति-विधियाँ सरलता पूर्वक चलते हुए आत्मिक प्रगति का क्रम भली प्रकार चलता रह सकता है। गुरु देव इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने साधारण गृहस्थ का सामान्य जीवन जिया पर उच्च आदर्श अपनाये रह कर उच्चस्तरीय आत्मिक प्रगति का लक्ष्य भी पूरा कर लिया। यह रास्ता उन सबके लिए खुला पड़ा है जिनमें वस्तुतः आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा जग पड़ी हो।
युग-निर्माण अभियान यों एक आन्दोलन सरीखा दीखता है पर वस्तुतः वह युग साधना है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखा जाय तो उसे विशुद्ध योग साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। और भी अधिक गंभीरता से देखा जाय तो उसे सामान्य उपासना साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
कोई समय था जब सभी लोग उत्कृष्ट स्तर के होते थे। किसी की सेवा सहायता करने की न तो आवश्यकता पड़ती थी और न गुंजाइश रहती थी। तब लोग व्यक्तिगत स्तर बढ़ाने के लिए साधनाएं करते थे। पर आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। यह आपत्ति काल है। अनाचार और अज्ञान ने तूफान भूकम्प जैसी स्थिति पैदा कर रखी है। दुर्बुद्धि महामारी की तरह फैल पड़ी है; ऐसे विषम समय में व्यक्ति वादी साधनाएं हेय ही ठहराई जायेंगी वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी साधना के ही उपयुक्त हो सकती है जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो। युग निर्माण योजना की गतिविधियों को दूसरे शब्दों में आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की संमिश्रित युग साधना कह सकते हैं इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्च स्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
अपने परिजनों में से प्रत्येक से यह आशा की गई है कि उसे समय, श्रम और साधनों में से एक अंश अनिवार्य रूप से लोक मानस के भावनात्मक नव निर्माण में लगाना चाहिए। यह लकीर पीटने के लिए अत्यन्त श्रद्धा भावना से किया जाना चाहिए। आरम्भ स्वल्प से भले ही किया जाय पर लक्ष्य अधिकाधिक उत्सर्ग का रहना चाहिए। निष्ठा सच्ची होगी तो परिस्थितियाँ भी बन जाएगी। और फुरसत न मिलने, अमुक अड़चन रहने जैसे बहाने ढूंढ़ने की भी आवश्यकता न पड़ेगी। दैनिक भौतिक कार्य क्रमों के बीच ही युग परिवर्तन का कार्य क्रम भी सरलता पूर्वक चलाया जाता रहेगा स्वार्थों पर थोड़ा नियन्त्रण जरूर करना पड़ेगा। शरीर को ही सब कुछ मान बैठने और भौतिक आवश्यकताओं को ही सर्वोपरि महत्व देने की प्रवृत्ति पर अंकुश रखना पड़ेगा। यहीं से आत्म निग्रह शुरू हो जाता है। विवेक के जागरण की कसौटी यह है कि तथाकथित प्रियजनों की इच्छा पर कठपुतली बनकर नाचते रहा जा रहा है या स्वतन्त्र चिन्तन द्वारा आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के महान उत्तर दायित्व को भी अपनी गतिविधियों में सम्मिलित किया जा रहा है।
जिनके दृष्टि कोण में उपरोक्त स्तर का परिवर्तन आया हो समझना चाहिए वे गुरु देव के साथी सहचरों में गिने जाने योग्य बन गये। प्रत्यावर्तन अनुदान के लिए उनकी पात्रता विकसित हो चली। उन्हें जो पाना है भौतिक स्वार्थ के लिए नहीं परमार्थ प्रयोजन में खर्च होगा ऐसी मनः स्थिति से ही दाता और ग्रहीता कृतकृत्य होता है और दैवी अनुग्रह का सदुपयोग बन पड़ता है।
जिन्होंने अपने नाम नोट कराये हैं उन्हें जब अवसर होगा तब हरिद्वार आने के लिये कहा जायगा पर उसकी पात्रत्व विकसित करने वाली साधना अभी से विकसित करनी आरम्भ कर देनी चाहिये। अपने परिवार के सदस्यों में एक व्यक्ति युग-निर्माण अभियान को गिन लेना चाहिए घर में पाँच सदस्य हों तो छटा गुरु देव को उनके मिशन को जोड़ लेना चाहिये। अपने परिवार के एक सदस्य के लिये जितना समय, मनोयोग, स्नेह, चिन्तन, धन खर्च किया जाता है कम से कम उतना तो युग साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये पर बढ़े हुए काम इस स्तर के तो हों कि कुटुम्ब के एक सदस्य जितना समय, स्नेह और साधन तो उस पर लगता ही रहे। यह आग्रह यों हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं पर अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय। गुरु देव को उसी प्रकार विवश किया गया और उनने बिना आगा-पीछा सोचे-बिना बहाने बाजी किये अपने मार्ग दर्शक के संकेतों पर चलना आरम्भ कर दिया। प्रत्यावर्तन की पृष्ठभूमि यही है। केवल प्राप्त करने की लालसा उग्र रहे और देने को कृपणता बनी रहे तो उससे कुछ काम चलने वाला नहीं है।
युग साधना का स्वरूप क्या हो, इसकी एक झाँकी मई अंक में प्रस्तुत है उसमें उन्हीं आधारों की चर्चा है जिन्हें अपना कर गुरु देव इस स्थान तक पहुँचे। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा और गम्भीरता पूर्वक अपनाया है। साधना क्षेत्र में जिन्हें उतरना है उन्हें युग साधना अपनानी चाहिये।
इसका सुव्यवस्थित रूप उन तीन पुस्तकों में विद्यमान है जो ‘हमारी युग-निर्माण योजना’ के नाम से तीन खण्डों में अभी अभी छपी हैं। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के त्रिविध प्रयोजनों को कैसे पूरा किया जाय उसे इस पुस्तक में अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से सजा दिया गया है। विभिन्न समयों पर बिखरे रूप में नव निर्माण प्रयोजन के लिये जो कुछ कहा जाता रहा है उसे क्रमबद्ध रूप से इस एक ग्रन्थ में पाया जा सकता है। गायत्री तपोभूमि में इन दिनों चल रहे तीन-तीन महीने के शिक्षण शिविरों की पाठ्य पुस्तकें यही तीनों ग्रन्थ हैं। 9) मूल्य के यह तीनों ग्रन्थ सभी परिजनों को मँगा लेने चाहिएं। और उनके आधार पर युग साधना की दार्शनिक एवं व्यावहारिक रीति-नीति अपनानी चाहिये।
पिछले अंक में कहा गया था बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी के बड़प्पन के सपने देखना बेकार है। उस दिशा में जो जितना शिर खपायेगा उसे उतना ही पछताना पड़ेगा। अब समय महानता की गौरव गरिमा बढ़ने का आ गया। विचारशील लोगों के कदम उसी दिशा में बढ़ने चाहियें। इसे कार्य रूप में परिणत कैसे किया जाय इसी का मार्ग दर्शन युग साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है। चिन्तन और जीवन क्रम का स्वरूप जिस आधार पर बदला जा सके वही युग साधना हो सकती है। जिस कर्म-काण्ड में पूजा पत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे—आत्म परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा। गुरु देव इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और अपनी अनुभूतियों का ही सार निष्कर्ष परिजनों को बताते रहे। प्रत्यावर्तन और कुछ नहीं उसी मार्ग पर दूसरों को चलाने की पुनरावृत्ति है जिस पर वे स्वयं चले हैं, जो इस दिशा में चलने जितना साहस कर सकें, उन्हें उतनी ही प्रगति एवं उपलब्धि की आशा करनी चाहिये।
प्रत्यावर्तन आयोजन के लिये जिन्होंने नाम नोट कराये हैं उन्हें युग साधना में अपनी तत्परता बढ़ा देनी चाहिये ताकि समय पर वे अपनी बढ़ी हुई पात्रता के आधार पर अधिक महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त कर सकें। जिन्होंने अपने नाम नोट नहीं कराये हैं उन्हें भी मानव जीवन की सार्थकता जैसा कुछ लाभ प्राप्त करने के लिये इसी दिशा में अपने कदम बढ़ाने चाहियें। समझ में भले ही न आवे पर यह अनुपम और अभूतपूर्व अवसर है- जो यह समय ऐसे ही आलस उपेक्षा में निकाल देंगे पीछे पश्चाताप करते रहने के अतिरिक्त उनके हाथ और कुछ न लगेगा।
हरिद्वार पधारने वालों से विशेष अनुरोध
हरिद्वार अब पर्यटकों का बहुत बड़ा केन्द्र हो गया है। गर्मियों में प्रतिदिन लाखों ही यात्री यहाँ आते हैं। आने वालों में नित्य हजारों की संख्या युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की भी रहती है। उनको यह इच्छा होनी स्वाभाविक है कि शान्ति- कुञ्ज में ठहरा जाय।
पर यहाँ की स्थिति से उस इच्छा पूर्ति का ताल-मेल तनिक भी नहीं खाता। यहाँ धर्मशाला स्तर का ठहरने लायक स्थान तनिक भी नहीं बनाया गया है। यह स्थान हरिद्वार नगर से 7 मील दूर जंगल में है जहाँ भोजन आदि की न तो कोई दुकान है और न वापसी में कोई ताँगा, रिक्शा आदि सवारी मिलती है। भोजन, निवास और वाहन तीनों की दृष्टियों से यात्रियों को यहाँ घोर असुविधा है।
इस स्थिति से परिचित न होने के कारण कारण पर्यटक लोग यहाँ मई, जून में भारी संख्या में आते रहे। उनकी संख्या तीस-तीस चालीस-चालीस तक बनी रही। जहाँ एक ओर स्वजनों के आने की प्रसन्नता हुई वहाँ अपनी सामर्थ्य से बाहर का यह आतिथ्य अत्यन्त कष्टकारक भी रहा। दो के स्थान में बीस ठूँसने पड़े और भोजन बनाने का कार्य इतना जटिल हो गया कि उसे एक प्रकार से असह्य एवं असम्भव मानकर धृष्टता पूर्वक वापिस लौट जाने तक के लिये कहना पड़ा।
इन दिनों के अनुभव ने यह अनुरोध करने के लिए विवश कर दिया है कि शान्ति-कुञ्ज में ठहरने की सुविधा नहीं है। आगन्तुक लोग धर्मशाला में ठहरने के बाद ही यहाँ आयें। दोपहर को दो बजे बाद ही भेंट वार्तालाप का समय रखें। अपनी आज की स्थिति में यहाँ आगन्तुकों के निवास, भोजन आदि का इतने बड़े पैमाने पर प्रबन्ध कर सकना अपने लिए सर्वथा असम्भव है। अपनी सद्भावना के साथ-साथ हमारी कठिनाई को ध्यान में रखा जाना भी आवश्यक है।
—भगवती देवी शर्मा
सर्प की आकृति वाली ‘ईल’ मछली यों सदा से रहस्यमय मानी जाती रही है अपनी विशिष्ट आकृति ही नहीं प्रकृति के करण भी। ईसा से 300 वर्ष पूर्व यह दन्तकथा प्रचलित थी कि वह एक विशेष जाति के सर्प से ही विवाह रचती है। पर सत्रहवीं शताब्दी में जल-जन्तु शोध कर्त्ता फ्रांसिस्को रेडी ने ईल के बार में एक विचित्र बात देखी कि वह अगस्त में वर्षा आरम्भ होते ही अपना स्थान छोड़कर कहीं अन्यत्र चली जाती है और फिर जनवरी में बच्चों समेत अपने तालाबों में, नदियों में, पुराने स्थान पर फिर दीख पड़ती है। इतने दिन तक वह कहाँ रहती है और यकायक बच्चे कहाँ से आ जाते हैं यह एक रहस्य ही बना हुआ था जिसको फ्रांसिस्को महोदय ने ढूँढ़ निकाला।
ईल की कई जातियाँ हैं वे इंग्लैंड, आइसलेण्ड, उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलेण्ड, जापान, आस्ट्रेलिया, आकलेण्ड, न्यूजीलैंड आदि देशों के नदी, तालाबों में पाई जाती है। पर जब उसका ऋतुकाल आता है तो प्रणय के लिये एवं प्रजनन की प्रक्रियायें सम्पन्न करने के लिये समुद्र में जाने का रास्ता ढूँढ़ती है। नदी, नालों को पार करती हुई वह किसी न किसी प्रकार समुद्र में जा पहुँचती है। वहीं वह पत्नी पद ग्रहण करती है और वहीं माता बनती है। यदि उसे समुद्र में जाने का अवसर न मिले तो फिर आजीवन ब्रह्मचारिणी का कठोर व्रत पालन करके ही जिन्दगी काट लेती है।
डेनमार्क निवासी एक जन्तु वैज्ञानिक जौनेस सिमिट ने पता लगाया कि ईल समुद्र में ही नहीं वरन् एक विशिष्ट स्थान पर ही अपना गृहस्थ बनाती है। जहाँ-तहाँ वह प्रणय प्रजनन नहीं करने लगती। योरोप की ईलको अमेरिका तक पहुँचने की लम्बी और कष्ट साध्य यात्रा में कई बार डेढ़ वर्ष या ढाई वर्ष तक लग जाते हैं। यह ठीक समय पर चलती है और ठीक समय पर पहुँचती है। यदि वह समय चूक जाये तो वह एक वर्ष रुकना ही उचित समझती है, समय की पाबन्दी और चलने तथा पहुँचने का समय उसे रेलगाड़ी की तरह ही याद रहता है और उसमें वह चूक प्रायः नहीं ही करती।
यह बड़ी कठिन यात्रा है इसमें उसे अनुकूल आहार न मिलने पर भूखा रहना पड़ता है। समुद्री क्षारों के प्रभाव से उसकी चमड़ी का रंग पलट जाता है। उस पर भी माँसाहारी जल जन्तुओं से प्राण बचें तब वह अपने प्रियतम का घर ढूँढ़ पाती है। उसका विवाह समुद्र की तली में 200 से 400 मीटर नीचे होता है। वहीं वह अण्डे देती है। अण्डों से निकलने के बाद जब बच्चे चलने फिरने लायक हो जाते हैं तो उनके लालन-पालन का भार पति के कन्धों पर नहीं डालती वरन् अपने इन सब बाल-गोपालों को लेकर वह प्रदेश की ओर चल पड़ती है, जहाँ का अन्न-जल खाकर वह बड़ी हुई थी।
अविकसित समझी जाने वाली ईल मछली-मर्यादा पालन और शालीनता के सम्बन्ध में विकसित और बुद्धि मान समझे जाने वाले मनुष्य को बहुत कुछ सिखा सकती है, प्रणय और प्रजनन के लिये उपयुक्त पात्र और स्थान का वह चुनाव करती है और उसे क्रीड़ा-कौतुक भर नहीं मानती वरन् उसके लिए कष्ट साध्य तपस्या भी करती है।
मातृभूमि का प्यार उसे कितना अधिक है। लौटकर वहीं आती है और समुद्र जैसे विशाल साधन सम्पन्न के सहारे रहने की अपेक्षा अपने यहाँ की अन्न-जल प्रदान करने वाली मातृभूमि में ही दुःख-सुख के दिन काटती है। भारत के अन्न-जल से पले यहीं से शिक्षा पाये लड़के जब अधिक सुविधाओं के लालच में विदेशों के लिये भाग खड़े होते हैं और अपनी योग्यता से मातृभूमि को लाभान्वित करने के समय उसे धोखा देकर चले जाते हैं तब यही कहना पड़ता है इन सुशिक्षितों से अशिक्षित ‘ईल’ हजार गुनी अच्छी है।
धरती अन्न उपजाती है। अन्न और वनस्पति उगाकर वह समस्त प्राणियों का पेट भरती है पर यह नहीं सोचती कि मेरा भण्डार खाली हो जायगा। उसकी यह उदारता सृष्टि क्रम के अनुसार लौटकर उसी के पास वापिस आ जाती है। प्राणी- पृथ्वी के अनुदान का उपभोग तो करते हैं पर प्रकारान्तर से उसकी निधि उसी को वापिस कर देते हैं। मल-मूत्र, खाद, कूड़ा, मृत शरीर यह सब लौट कर धरती के पास आते हैं और उसी में समा जाते हैं।
पर्वत के उच्च शिखर पर निवास करने वाली चट्टान किसी को कुछ देती नहीं। वह अपनी सम्पदा अपने पास ही समेटे बैठी रहती है। अपनी विभूतियाँ किसी को क्यों दे, यह सोचकर रेतीली मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़, समर्थ शोभायमान चट्टान निष्ठुरता बरतती है और कृपण बनी रहती है, वर्षा होती है, विपुल जलधार बरसती है मृत्तिका आर्द्र हो उठती है उसकी तृषा तृप्त हो जाती है पर चट्टान को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। भीतर तो एक बूँद घुसती ही नहीं बाहर जो नमी आती है उसे भी पवन एक झोंके में सुखा देता है। जबकि खेत की मृतिका बाहर भी देर से सूखती है और भीतर तो सरसता का सुखद आनन्द चिरकाल तक लेती रहती है। मिट्टी ने कुछ खोया नहीं, चट्टान ने कुछ पाया नहीं। उदारता अपनाकर मृत्तिका वरुण देव के स्नेह से अनायास ही सिक्त हो गई और चट्टान को सूर्य का कोप सदा संतप्त ही करता रहा।
बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, उसे लोग पीते हैं और नहाते हैं। गड्ढे में रुका पानी सड़ जाता है पीने के योग्य वह नहीं रहता। कृपणता- रुके हुए गड्ढ़े की तरह है उसका संचय सड़ कर दुर्गन्ध ही उत्पन्न करता है। गड्ढ़े की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है।
महा प्रभु ईसा ने अपने शिष्यों से कहा- तुम मुझे प्रभु कहते हो-मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकाँक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्म समर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता- वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है। दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और कोई को नहीं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरत कर अपने आपके साथ ही दुष्ट दुर्व्यवहार किया जाता है।
दूसरों को प्रसन्न करना अपने आप को प्रसन्न करने का ही क्रिया कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँस पेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है। गेंद को उछाल कर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि खेलना बन्द कर दिया जाय तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।
ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए अपने आप से ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।
गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूलों को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए-उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।
प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है भक्ति में जो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है।
ईश्वर का विश्वास, सत्कर्मों की कसौटी पर ही परखा जा सकता है। जो भगवान पर भरोसा करेगा वह उसके विधान और निर्देश को भी अंगीकार करेगा भक्ति और अवज्ञा का ताल-मेल बैठता कहाँ है?
हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया जिसके चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा; जो दीपक की तरह जल कर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।
जीवन की उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस सृष्टि में ऐसी व्यवस्था है कि वे सरलता पूर्वक पूरी हो जाया करें। साँस लिये बिना एक ही क्षण भी काम नहीं चल सकता सो प्राण वायु प्रचुर मात्रा में सर्वत्र मौजूद है। जल का उसके बाद नंबर आता है वह भी थोड़ा प्रयत्न करने पर हर जगह मिल जाता है। अन्न की आवश्यकता उसके पश्चात् है, उसके लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है और खर्च भी, इसी क्रम से जो आवश्यकताएं अपेक्षाकृत हलकी होती जाती हैं उन्हीं का मिलना श्रम साध्य होता जाता है।
जीवन धारण की प्रक्रिया को देखिए। भ्रूण अति दुर्बल होता है उसे वातानुकूलित और सर्व सुविधा सम्पन्न निवास चाहिए। माता का गर्भाशय उसके लिये अतिशय सुविधा पूर्ण है। उतने दुर्बल और अपूर्ण प्राणी के लिये इतना साधन सम्पन्न स्थान संसार में अन्यत्र कहीं हो ही नहीं सकता। सो हर प्राणी को सरलता पूर्वक मिल जाता है। जितने समय भ्रूण पकता नहीं उतने समय निवास की वहाँ समुचित व्यवस्था है। यदि यह सब सरलता पूर्वक उपलब्ध न हुआ होता तो प्राणी की सर्व प्रथम और सर्वोपरि महत्व की आवश्यकता पूरी न हो सकने के कारण जन्म ही सम्भव न होता।
इसके पश्चात जन्म लेने के बाद सुपाच्य सुसन्तुलित आहार की आवश्यकता होती है और एक सहायक संरक्षक सेवक की जो उस नवजात असमर्थ शिशु की न केवल सारी आवश्यकता पूरी करे वरन् उसे पर्याप्त स्नेह प्रदान कर मानसिक विकास भी सम्भव बनाये। इन सारी आवश्यकताओं को माता पूरा करती है। नवजात शिशु के लिए माता का दूध ही अमृत है। इससे बढ़िया खुराक इस धरती पर हो ही नहीं सकती। माता से बढ़कर स्नेही- सहायक- संरक्षक-सेवक भला और कहाँ मिलेगा? अरक्षित, असमर्थ और असहाय शिशु के लिए पालन-पोषण की आवश्यकता पूरी होना अनिवार्य है। इसके बिना जीवन धारण किये रहना कठिन है।
जन्म तो हो जाय पर माता की सहायता न मिले तो बालक की कैसी दुर्गति होती है इसकी कल्पना कठिन नहीं। अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य के बालक को तो और भी अधिक मात्रा में- गहरी तथा लम्बे समय तक चलने वाली मातृ सहायता अपेक्षित होती है। पर प्रकृति से ऐसा प्रबन्ध सभी प्राणियों के लिए किया हुआ है। असली माता तो प्रकृति ही है। प्राणी को संसार में भेजती है तो उसकी व्यवस्थाएं भी आदि से अन्त तक बनाना उसी का काम है।
बालक बड़ा होता है। उसकी कोमलता सभी का जी हुलसाती है और उससे आकर्षित होकर हर कोई उस कोमल बालक की सहायता करना चाहता है। असमर्थता की पूर्ति इस उदार सहायता से ही पूरी होती है। दूसरों के बालक पास खेलते हों तो जी हुलसता है। उन्हें गोदी में लेने की-खिलाने की-प्यार करने की और पास की कुछ वस्तु देने की हो तो देने को जी करता है। माता-पिता, परिवार, पड़ौस, सम्बन्धी सज्जनों से इस प्रकार की सद्भावनाएं और सहायताएं उसे सर्वत्र मिलती हैं। गुरुजनों का अनुग्रह रहता है। अध्यापक उनसे क्षमा और उदारता का व्यवहार करते हैं। बड़ों के साथ जैसा बराबरी का- कठोरता का व्यवहार किया जाता है, वैसा कोई गुरुजन उनसे नहीं करता। बड़े आदमी की गलती- अशिष्टता पर क्रोध आता है और दंड प्रतिशोध के कदम उठते हैं पर बालकों की पग-पग पर होने वाली गलतियाँ ऐसे ही हँसी, मुसकराहट के बीच भुला दी जाती हैं। कई बार तो उन गलतियों में रस भी लिया जाता है।
सरकार बाल-कल्याण विभाग चलाती है। प्रौढ़ कल्याण-वृद्ध कल्याण की उपेक्षा करके भी उसका ध्यान बालकों पर रहता है। सामाजिक संस्थाएँ भी इधर ही बहुत ध्यान देती हैं। सबकी स्वाभाविक सहानुभूति बालकों की ओर अनायास ही खिंची रहना- प्रकृति की उसी प्रेरणा के अनुसार जिसमें उन्हें अपनी अविकसित स्थिति में सब ओर से अधिक सहायता एवं उदारता अपेक्षित है। यह सारी व्यवस्था मनुष्य के स्वभाव में पहले से ही सम्मिलित है। मनुष्य ही क्यों अन्य प्राणियों में भी अपने ही नहीं बिराने बच्चों के प्रति अधिक कोमल और उदार भावनाएं पाई जाती हैं।
जीवन विकास की क्रमिक यात्रा में यौवन आता है। पितृत्व की इच्छा कामवासना के रूप में जगती है। जोड़ी मिलाने की आवश्यकता अनुभव होती है। समयानुसार यह भी सहज ही बन जाता है। एक ऐसी उमंग महक उठती है जिसमें हर नर मादा अपने विपरीत लिंग वाले प्राणी को खोजने और आकर्षित करने में सफल हो जाता है। मनुष्य को तो बहुत सुविधाएं प्राप्त हैं। बिना साधन, सुविधा वाले कीड़े-मकोड़े, पतंगे, जलचर, पशु, पक्षी सभी को काम तृप्ति का अवसर मिलता है और सभी गर्भाधान प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं। मनुष्यों के लिये भी यह सुविधा बन ही जाती है। प्रकृति की दयालुता तो देखिए कि वास्तविक आवश्यकताओं का समाधान कितनी सरलता और सुन्दरता के साथ जुटाती है। इसके लिये उसने अपनी क्रम व्यवस्था बड़ी सरल और सुविधाजनक बनाकर रखी है और उसका प्रवाह अनादि काल से बहता चला आता है।
रोग निरोध की जन्म जात शक्ति रक्त कणों में विद्यमान रहती है। असली चिकित्सक भीतर मौजूद है। बाहर के डॉक्टर तो उन भीतरी चिकित्सकों की थोड़ी सहायता भर कर देते हैं। मरण से पूर्व मूर्छा आ जाती है और वह अति कष्ट साध्य आपरेशन बिना कष्ट के सम्पन्न हो जाता है। मरने के बाद शरीर की दुर्गति न हो इसलिए उसे खाने के लिए कृमि उसी में तत्काल पैदा हो जाते हैं, कौए, गिद्ध, चील, स्यार, कुत्ते आदि प्राणी मृत शरीर की गन्ध पाते ही उस गन्दगी को साफ करने दौड़ पड़ते हैं। सभ्य समाज में तो मुर्दे को जलाने, गाढ़ने या बहाने की प्रथा पहले से ही प्रचलित है। जीवन विकास का यह अन्तिम अध्याय भी ठीक तरह सम्पन्न हो जाय इसके लिये प्रकृति ने समुचित व्यवस्था जुटा कर रखी है।
जो आवश्यक है वह यहाँ प्रचुर मात्रा में विद्यमान है और स्वल्प प्रयत्न से मिल सकता है। जो अनावश्यक है हानिकारक है उसी का मिलना दुर्लभ है। फल उपयोगी हैं वे सरलता से प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। विष अनावश्यक और हानिकारक है; उसे प्राप्त करना हो तो बहुत ढूंढ़ खोज करनी पड़ेगी पैसा और श्रम खर्च करना पड़ेगा तब यत्र-तत्र किंचित मात्रा में विष मिलेगा। गाय, घोड़ा, भेड़ बकरी आदि उपयोगी पशु-सरलता पूर्वक उपलब्ध हैं। पर सिंह, व्याघ्र, चीता, रीछ आदि के दर्शन भी दुर्लभ हैं। वे दूरवर्ती सघन वनों में स्वल्प संख्या में ही होते हैं। अनुपयोगिता के कारण प्रकृति ने उन्हें ऐसी ही स्थिति में रखा है। उनकी संतान भी अधिक नहीं बढ़ती जबकि उपयोगी पशु अपनी संख्या वृद्धि निरन्तर करते रहते हैं।
प्राणियों के लिए उपयोगी वनस्पति-घास, पौधे वृक्ष स्वतः ही उगते बढ़ते हैं और फलते-फूलते रहते हैं। इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ आवश्यक है, वह इस संसार में सरलता पूर्वक उपलब्ध है। दिन में सूरज की रोशनी जलती है, रात को चन्द्रमा चमकता है ताकि हमें अन्धकार में न भटकना पड़े। प्रकृति माता के इन अनुदानों को कहाँ तक गिनाया जाय जीवन की हर आवश्यकता और सुविधा को जुटाने में उसने कहीं कुछ भी कसर नहीं छोड़ी है।
यह अनुदान शरीर यात्रा तक ही सीमित नहीं है। सामाजिक-मानसिक-आर्थिक और नैतिक क्षेत्र में भी ऐसी विधि व्यवस्था इस विश्व में विद्यमान है कि प्रगति की हर उचित आवश्यकता सरलता पूर्वक पूरी हो सके। इच्छा हो और उसे पूरा करने के लिये पुरुषार्थ जुटा दिया जाय तो लगभग हर उचित आवश्यकता पूरी होती चली जायेगी उसमें कोई बड़ा विघ्न न आवेगा। विघ्न यदि हैं भी तो वे बाहर नहीं भीतर हैं। मनुष्य के अपने दोष दुर्गुण ही उसकी प्रगति में बाधक होते हैं। आलस्य, प्रमाद, अनियमितता, असंयम, आवेश, अति स्वार्थ जैसे कारण ही असफलताओं और विपत्तियों के कारण बनते हैं। अन्यथा सद्गुण, सत्कर्म और सत्स्वभाव से मनोभूमि परिष्कृत कर लेने पर- परिष्कृत दृष्टिकोण और व्यवस्थित क्रिया-कलाप के आधार पर किसी भी क्षेत्र में सफलता पाई जा सकती है। किसी भी क्षेत्र में साधन सम्पन्न बना जा सकता है। जिस दिशा में भी कदम उठाले उधर ही प्रगति हो सकती है।
बाधक बाह्य जगत नहीं- अवरोध प्रकृति गत नहीं स्वनिर्मित हैं- और ऐसे कि यदि उनकी हानियों को समझ लिया जाय और निरस्त करने के लिए कटिबद्ध हो जाया जाय तो उनका एक क्षण भर भी ठहरना नहीं हो सकता। आन्तरिक शत्रु लगते भर बलिष्ठ हैं, संकल्प शक्ति की एक चिनगारी उन्हें नष्ट करके रख सकती है। आज घोर दुर्गुणी दीखने वाला व्यक्ति कल पूर्ण परिष्कृत मनुष्य बन सकता है। व्यक्तित्व के विकास और मनः क्षेत्र से सम्बन्धित समस्त क्षेत्रों की प्रगति के लिये प्रकृति ने अपने सभी द्वार खुले रखे हैं। कोई चलना ही न चाहे या उलटा चले तो इसमें विश्व व्यवस्था क्रम का नहीं आदमी के अपने औंधे और ओछे कर्तृत्व का ही दोष है। सुधारना चाहें तो उसका परिमार्जन भी अति सरल है। इतिहास में अगणित उदाहरण ऐसे विद्यमान हैं जिनमें संकल्प बल से अपनी हेय स्थिति को आमूल चूल परिवर्तन करके लोगों ने आशाजनक और आश्चर्यजनक परिवर्तन प्रस्तुत किये हैं।
आत्मिक क्षेत्र सबसे ऊंचा है। उसमें भी प्रगति के लिए द्वार खुला पड़ा है और उसमें प्रवेश करना अति सरल है। ईश्वर हमारे चारों ओर घिरा हुआ है। हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। मछली के भीतर और बाहर पानी ही पानी भरा रहता है अपने अन्दर और बाहर ब्रह्म चेतना का भरा पूरा समुद्र ही लहलहा रहा है जो इतना समीप हो- इतना प्रचुर हो-उसे प्राप्त करने में क्या कठिनाई हो सकती है?
पिता और पुत्र का सामीप्य दुरूह कैसे हो सकता है? माता और बच्चे के सान्निध्य में अवरोध क्या होगा? पति और पत्नी के मिलने में क्या बाधा? प्रकृति -गत अवरोध इस प्रसंग में रत्ती भर भी बाधक नहीं है। आत्मा और परमात्मा के बीच-पिता, पुत्र, माता, शिशु, भाई-भाई और पति पत्नी के लौकिक रिश्तों की अपेक्षा भी कहीं अधिक सघन स्वच्छ और प्रखर सम्बन्ध हैं। साँसारिक रिश्तों में दो स्वतंत्र व्यक्तियों की बात रहने से कुछ भिन्नता और पृथकता भी रह सकती है। पर आत्मा और परमात्मा तो अंश और अंशी हैं। उनमें तो अग्नि और चिनगारी जैसा ही भेद है। कमल और उसकी पंखुरियों की-पदार्थ और उसके परमाणुओं की- सूर्य और उसकी किरणों की पृथकता आँकी भले ही जाय वस्तुतः वे तादात्म्य हैं। ईश्वर और जीव इतने ही घनिष्ठ हैं- आत्मा और परमात्मा के बीच ऐसा कोई व्यवधान नहीं है जिसे दूर करने के लिये- चिन्तित, दुखी, खिन्न, उद्विग्न या हताश होने की आवश्यकता हो। यह मिलन प्रक्रिया अति सरल है। ईश्वर प्राप्ति से अधिक आसान कार्य और दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
शरीर और मन परस्पर ओत-प्रोत हैं। शरीर और मन को मिलाने के लिए कुछ बड़ा काम नहीं करना पड़ता। करना पड़ता है तो इतना ही कि जो नशा पी लिया था, उसे उतर जाने दिया जाय और फिर दुबारा न पिया जाय। नशा पीने से ही शरीर और मन का सम्बन्ध लड़खड़ा जाता है। चलना, करना, बोलना, सोचना- अनियन्त्रित हो जाने की उपहासास्पद स्थिति इसलिए बनती है कि नशे की खुमारी शरीर और मन का सम्बन्ध गड़बड़ा देती है। दोनों अलग-अलग दिशा में जाते- स्वच्छन्द विचरते दीखते हैं। उसमें दोष नशे का है, यदि नशे का परित्याग कर दिया जाय तो शरीर और मन की एकसूत्रता- एकरूपता में कोई अन्तर दिखाई न पड़ेगा। ईश्वर और जीव के बीच में माया का नशा ही प्रधान रूप से बाधक है। यह पर्दा हटा कि उसकी आड़ में बैठे भगवान के दर्शन हुए। बाधक तो यह झीना सा पर्दा ही है।
निद्रा ग्रस्त हो जाने पर शरीर और मन के सम्बन्ध गड़बड़ा जाते हैं। शरीर कहीं पड़ा रहता है- मन कहीं घूमता है। विलगाव को देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि शरीर और मन दूर हैं। असम्बद्ध हैं। इन्हें इकट्ठा करने के लिये कोई बहुत भारी प्रयास पुरुषार्थ करना पड़ेगा। दोनों की एकता अविच्छिन्न है। अन्तर तो निद्रा ने डाला है। शरीर को मृतक जैसा उसी ने बनाया है। मन को देह से असम्बद्ध करने के लिए यह निद्रा ही कारण है। यदि उसे हटा दिया जाय तो जागते ही दोनों की एकता फिर यथावत हो जायगी। शरीर और मन दोनों परस्पर घुले मिले- और साथ-साथ मिल जुलकर काम करते दिखाई देंगे।
आत्मा और परमात्मा दोनों अभिन्न हैं। भिन्नता तो अविद्या रूपी निद्रा ने उत्पन्न की है। इसे हटाना भगाना ही इस दुखदायी वियोग के अन्त करने का एकमात्र उपाय है।
ईश्वर प्राप्ति अति सरल है। क्योंकि वह जीवन की महती आवश्यकता है। उसकी साधना सर्वथा सुगम है उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जिसके लिए भारी दौड़-धूप करने और सरंजाम जुटाने की जरूरत पड़े। तपश्चर्या, योगसाधना, योग प्रक्रिया का मात्र प्रयोजन इतना है कि नशे की खुमारी और निद्रा की मूर्छना को हटा दिया जाय। जो साधना इस प्रयोजन को पूरा कर सकेगी उसी से ईश्वर प्राप्ति का सरल प्रयोजन सुगमता पूर्वक पूरा हो जायगा।
व्यवधान केवल एक है- इसे सरल भी कह सकते हैं कठिन भी। वस्तुतः वह साहसी के लिए अति सरल है और असमंजस ग्रस्त भीरु व्यक्ति के लिए अति कठिन। करना सिर्फ इतना भर है कि हम अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व को शरीर न मानें- सुखों की खोज बाहर के पदार्थों में ढूँढ़ना बन्द कर दें। बहिर्मुखी दृष्टिकोण को अन्तर्मुखी बनायें। अपने को आत्मा मानें। आत्मा का हित साधन प्रमुख मानें। उसी में रुचि लें- उसी की इच्छा करें और उसी की व्यवस्था बनायें- अपना चिन्तन इसी लक्ष्य पर नियोजित करें और कार्यक्रम का पुनर्निर्धारण इस दृष्टि से करें कि यह जीवन परमेश्वर का है। परमेश्वर के लिए है और वही कार्य किये जायेंगे जो परमेश्वर द्वारा अपने लिये नियत निर्धारित किये गये है। पदार्थों में सुख खोजने की अपेक्षा प्रवृत्तियों में उत्कृष्टता आनन्द तलाश करना पड़ेगा। यह परिवर्तन जितना स्पष्ट होता जायगा ईश्वर उसी अनुपात में अपने समीप प्रस्तुत दिखाई देगा।
चिर संचित कुसंस्कारों से दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से जूझना यही एक कठिन प्रसंग है। इसी मोर्चे पर हारने से साधना असफल होती है। तपस्वी का विजय ध्वज इसी शिखर पर गढ़ा हुआ है कि वह अज्ञानान्धकार में भटकने वाली भेड़ों का अन्धानुकरण छोड़कर स्वतन्त्र चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तृत्व अपनाने में समर्थ हुआ या नहीं। अपना रास्ता आप बनाने की तपस्या- अपनी राह पर आप चलने की साधना को कर सका- बहिर्मुखी दृष्टि को अन्तर्मुखी बना सका- भीतर के आकर्षण प्रलोभन और बाहर के उपहास प्रतिरोध का जो सामना कर सका- इस उत्कृष्टता पर आरुढ़ योद्धा की सर्वत्र विजय है। जिसने अपने को जीत लिया समझना चाहिए उसने ईश्वर को जीत लिया यह सरलतम है और कठिनतम भी।
सब इन्द्रियों को वश में रखकर, सर्वत्र समत्व का पालन करके जो दृढ़, अचल और अचिन्त्य, सर्वव्यापी, अवर्णनीय, अविनाशी स्वरूप की उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए सुख ही पाते हैं।
-भगवान् कृष्ण
भगवान के दर्शनों की चिर आकाङ्क्षा तृप्त हुई, पर अभी भक्त के मन में कोई एक कौतूहल झाँक रहा था जिसे वह व्यक्त नहीं कर पा रहा था। भगवान् ताड़ गये। उन्होंने पूछा- वत्स तुम जो भी चाहो निःसंकोच पूछ सकते हो।
रुँधे गले को साफ करते हुए भक्त ने पूछा- भगवन् आप सारी सृष्टि के स्वामी है फिर भी दुनिया भर से छिपकर क्यों रहते हैं?
भगवान् हँसे और बोले-तात ! छिपे रहने में ही मेरा कल्याण है- तुम नहीं जानते दुनिया का हर व्यक्ति मुझसे कुछ न कुछ चाहता है, यदि मैं प्रकट हो जाऊँ तो अपनी कामनाओं के लिये लोग मुझे जिन्दा नोंच डालें, इसीलिये अपना काम छुपकर चला रहा हूँ।
मंत्र साधना भी यन्त्र साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यन्त्रों के सिद्धान्त, निर्माण, संचालन, सुधार में दक्षता प्रस्तुत करना ही यन्त्र विद्या का आधार है। यह प्रक्रिया ठीक रहे तो यन्त्रों की क्षमता से समुचित लाभ उठाया जा सकता है। पर यदि इन प्रकरणों में त्रुटि रहे तो मशीनें समय और धन की बर्बादी ही करती हैं। ठीक इसी प्रकार मन्त्र साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हों तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
भौतिक विज्ञान बाह्य जगत को प्रभावित करता है और जड़ प्रकृति में सन्निहित शक्तियों को उपयोग योग्य बनाकर लाभकारी परिणाम उपस्थित करता है। अध्यात्म विज्ञान अन्तरंग क्षेत्र को प्रभावित करता है और चेतन प्रकृति को प्रदीप्त कर उससे सर्वसमर्थ व्यक्तित्व का निर्माण करता है। भौतिक विज्ञान सुख साधनों का उत्पादन करता है। शरीर को अधिक सुविधाजनक स्थिति में रखने के आधार जुटाता है। यही उसकी परिधि है। अन्तःचेतना तक न तो उसकी पहुँच है और न उस स्तर की क्षमता ही वह उत्पन्न कर सकता है।
यह जगत जड़ और चेतन का सम्मिश्रण है। प्राण धारियों के भीतर चेतना रहती है और बाहर पञ्च भौतिक कलेवर चढ़ा होता है। दोनों के सम्मिश्रण से ही प्राणि जगत की विविध हलचलें दिखाई पड़ती हैं। नदी, पर्वत जैसे सर्वथा जड़ पदार्थों की बात अलग है- जहाँ चेतना है वहाँ इस बात की भी आवश्यकता अनुभव की जाती है कि वस्तुओं और शरीरों की तरह ही चेतना को भी स्वच्छ स्वस्थ और सुविकसित रखा जाय। इसी क्रिया कलाप को अध्यात्म कहते हैं।
जड़ प्रकृति की शक्तियों का अधिकाधिक परिचय भौतिक विज्ञान ने सर्व साधारण के लिए सुलभ किया है। अग्नि, विद्युत, ईथर, अणु-शक्ति तरंगें, चुम्बक आदि भौतिक शक्तियों का उपयोग कितना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है यह सर्वविदित है। चेतन प्रकृति का स्तर और भी ऊँचा है। वस्तुतः चेतन का ही जड़ के ऊपर अधिकार है। जलयान कितना ही बड़ा क्यों न हो चेतन संचालक के बिना कुछ कर न सकेगा। अन्तरिक्ष में मानव रहित राकेट स्वसञ्चालित लगते भर हैं वस्तुतः उन्हें भी धरती पर बैठे हुए वैज्ञानिक ही दिशा देते और नियन्त्रण करते हैं। रेलगाड़ी कितनी ही कीमती क्यों न हो, जीवित ड्राइवर के बिना वह टूटी चट्टान की तरह निरर्थक है। प्राण के बिना शरीर का क्या उपभोग? उपभोक्ता रहित सम्पदा तो समुद्र तल और भूगर्भ में न जाने कितनी दबी पड़ी है। महत्व उतनी का ही है जितनी कि चेतन प्राणी उसका उपयोग कर सके। जड़ पदार्थों की तरह जड़ विज्ञान भी तभी उपयोगी हो सकता है जब उसका चेतन प्राणी द्वारा नियन्त्रण एवं उपयोग किया जाय। तात्पर्य यह है कि जड़ की तुलना में चेतन का मूल्य महत्व अत्यधिक है। इसी अनुपात से भौतिक विज्ञान की महत्ता एवं उपयोगिता बढ़ी चढ़ी है।
भौतिक विज्ञान के प्रत्यक्षीकरण में प्रयुक्त होने वाले उपकरण ‘यन्त्र’ कहलाते हैं और आत्म विज्ञान से लाभान्वित होने के माध्यम ‘मन्त्र’ कहे जाते हैं। यन्त्रों के बिना वैज्ञानिक तथ्यों से लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। इसी प्रकार मन्त्र रहित अध्यात्म सिद्धान्त मात्र बनकर रह जायगा उसे प्रत्यक्ष न किया जा सकेगा।
समग्र विज्ञान को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- एक पिण्डव्यापी दूसरा ब्रह्माण्डव्यापी। एक अन्तरंग दूसरा बहिरंग। जिस प्रकार थ्योरी और प्रैक्टिस के आधार पर बहिरंग शिक्षा पद्धति चलती है उसी प्रकार अध्यात्म प्रगति के लिए आस्था और साधना दो माध्यम हैं। आस्था के अंतर्गत नीति, धर्म, दर्शन, आत्म-ज्ञान, ब्रह्म एवं सूक्ष्म जगत का वर्णन विवेचन आता है। शास्त्रों में उसी का वर्णन है। आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिन्तन परिष्कार को अध्यात्म ‘निष्ठा’ पक्ष में लिया जायगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधन प्रभृति क्रियाकलापों को साधना माना जायगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जायगी। ज्ञान कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। तत्व दर्शन के बिना तपस्या और तप साधना के बिना तत्व दर्शन के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। तत्व दर्शन के बिना तपस्या और तप साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकते।
विश्वव्यापी ब्रह्म चेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित सम्बन्ध है। पर उसमें मल आवरण विक्षेप जैसे अवरोधों ने एक प्रकार से विच्छेद जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। बिजली घर और कमरे के पंखे के बीच लगे हुए तारों में यदि कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो पंखा और बिजली घर दोनों ही अपने-अपने स्थान पर वहीं रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। पंखा चलेगा नहीं निःचेष्ट पड़ा रहेगा। इन अवरोधों को साफ करना ही मन्त्र साधना का उद्देश्य है। नाली के प्रवाह में कोई रोड़ा आ जाय तो पानी इधर-उधर फैलेगा और नाली सूखी पड़ी रहेगी। यही बात हमारे जीवन प्रवाह में भी दृष्टिगोचर होती है। अन्न, जल पर जीवित रहने वाला शरीर तो अपना आहार प्राप्त करके गतिशील बना रहता है पर अन्तःचेतना की खुराक न मिलने से वह दिन-दिन दुर्बल एवं मरणासन्न होती चली जाती है। यही है हम सबकी आन्तरिक दयनीय दुर्दशा का कारण।
नवजात शिशु माता के दूध पर अवलम्बित रहता है। आत्मा का पोषण परमात्मा के साथ प्रत्यावर्तन बने रहने पर ही होता है। बादल तभी बरसते हैं जब समुद्र से उन्हें भरपूर पानी मिले। यदि समुद्र से सम्बन्ध टूट जाय तो बादलों का बरसना तो दूर उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जायगा। तब केवल धूलिकण ही यदाकदा बदली बनकर घूमते दृष्टिगोचर होंगे। परमात्मा से सम्बन्ध टूट जाने पर आत्मा अपना वर्चस्व खो बैठती है, आत्म बल के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते, महानता तिरोहित हो जाती है केवल काय कलेवर ही छिपकली की कटी हुई पूँछ की तरह उछल कूद करता रहता है। हममें से अधिकाँश को शरीर मात्र बनकर जीना पड़ रहा है। आत्मा की गरिमा के वर्णित कोई चिह्न अपने में दीखते नहीं। इसे आत्मा और परमात्मा के बीच गतिरोध ही समझा जाना चाहिए। परित्यक्ता पत्नी की भाँति उस पर उदासीनता ही छाई रहती है।
साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति है। मन्त्र साधन उसका कर्म पक्ष है। यों आत्म ज्ञान भी कम महत्व का नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है। फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी, दार्शनिक, शास्त्रज्ञ, वेदान्ती होने भर से आत्मबल सम्पन्न नहीं हो सकता। इसके लिए उसे साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग है। मन्त्र साधन इसी राज मार्ग की तरह समझा जाना चाहिए।
मन्त्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध- लयबद्ध और वृत्रकार। एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्द विन्यास का उच्चारण किया जाता रहे तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। तब शब्द तरंगें सीधी चलने की अपेक्षा वृत्ताकार घूमने लगती हैं। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाय तो उसके दो परिणाम होंगे एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दीखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदलकर गतिशील चक्र के रूप में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाय तो उसकी जान ले सकता है। इसी प्रकार यदि उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जायगा॥ मन्त्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस, एक स्वर, एक लय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें- सीधी या साधारण नहीं रह जातीं। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अन्तरंग पिण्ड में तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मन्त्र का चमत्कार कहा जा सकता है।
मन्त्रों का शब्द चयन योग विद्या में निष्णात तत्ववेत्ताओं से दिव्य चेतना एवं सघन अनुभूतियों के आधार पर किया होता है। यों उस शब्द विन्यास में कुछ प्रेरणाप्रद अर्थ और सन्देश भी होते हैं पर उनकी महत्ता उतनी नहीं, जितनी शब्द गुन्थन को। अर्थ की दृष्टि से भी उनसे भी अधिक भाव पूर्ण कविताएं हैं और हो सकती हैं। फिर सूत्र जैसे छोटे मन्त्रों में उतनी विस्तृत भाव शृंखला भरी भी नहीं जा सकती जितनी मनःक्षेत्र को प्रभावित करने के लिए आवश्यक है। वस्तुतः मन्त्र की महत्ता उसके ‘स्फोट’ में है। स्फोट का अर्थ है ईश्वर तत्व में होने वाला ध्वनि विशेष का असाधारण प्रभाव। तालाब में छोटा ढेला फेंकने से थोड़ी और छोटी लहरें उत्पन्न होती हैं पर यदि बहुत ऊँचाई से बहुत जोर से कोई बहुत बड़ा पत्थर पटका जाय तो उसका शब्द और स्पन्दन दोनों ही अपेक्षाकृत बड़े होंगे और उसकी प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि भी बड़ी लहरों के साथ दिखाई देगी। मन्त्र विद्या के संदर्भ में इसी को स्फोट कहा जाता है। इसकी तुलना बारूद, कारतूस, विस्फोट से उत्पन्न ध्वनि के साथ, अथवा अणुबम फटने के साथ की जा सकती है। मन्त्र साधक को यह जानना और जताना पड़ता है कि स्पोट की कितनी मात्रा अभीष्ट है। असन्तुलित विस्फोट बन्दूक या तोप तक को फाड़ सकता है। असंगत साधना से लक्ष्य प्राप्त होना तो दूर उलटा अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है।
मन्त्र की तीसरी धारा है लय। उसे किस स्वर में- किस प्रवाह में- उच्चारित किया जा रहा है इसे लय कहते हैं-साधारणतया मानसिक वाचिक और उपाँशु नाम से लय की न्यूनाधिकता का वर्गीकरण किया जाता है। वेद मन्त्रों में इसे उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहते हैं। साम गान में सप्त स्वरों तथा उनके आरोह अवरोह को ध्यान में रखा जाता है। यह लय क्रम ही संगीत का मूल आधार है इसकी व्याख्या ‘शब्द ब्रह्म’ कह कर की जाती है। जानकारों को पता है कि शास्त्र सम्मत संगीत का शरीर और मन पर ही नहीं बाह्य वस्तुओं और परिस्थितियों पर भी प्रभाव पड़ता है। दीपक राग से बुझे दीपक जलने मेघ राग से वर्षा होने की कथा गाथाएं सर्वथा अविश्वस्त नहीं हैं। संगीत के वृक्ष, वनस्पतियों, फसलों और दुधारू पशुओं पर होने वाले प्रभाव को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है। रोगों की निवृत्ति में संगीत की भूमिका निकट भविष्य में और भी अधिक मिलेगी और उसे चिकित्सा में प्रमुख स्थान मिलेगा। वैदिक और ताँत्रिक मन्त्रों का सारा वाङ्मय लय तथ्य को अपने गर्भ में छिपाये बैठा है। किसी भी रीति से -किसी भी ध्वनि से मन्त्र साधना भावात्मक आकाँक्षा भले ही पूरी करे उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।
चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है लकड़ी को नहीं। बिजली का प्रवाह भी धातु के तारों के सहारे ही चलता है। रबड़ आदि अधातु पदार्थों में बिजली नहीं दौड़ सकती। इसी प्रकार मन्त्र साधक को अपनी शारीरिक और मानसिक स्वच्छता एवं समर्थता के लिए प्रयास करते हुए अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाना पड़ता है कि अन्तरिक्ष से अवतरित होने वाला शक्ति प्रवाह धारण कर सकना सम्भव हो सके। राज योग में यम नियमों की साधना मानसिक परिष्कार के लिए और आसन प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरम्भिक चरणों को पूरा न किया जाय तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्च स्तरीय साधना सम्भव ही न होगी। आहार-विहार के प्रतिबन्ध-व्रत, संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही है। स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवन क्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे तो फिर मन्त्र साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
इसके अतिरिक्त पाँचवीं शर्त है- भाव भरी मनः स्थिति। इसे दूसरे शब्दों में श्रद्धा कह सकते हैं। जिस प्रकार भौतिक जगत की प्रमुख शक्तियों में विद्युत अगण्य है उसी प्रकार आत्मिक जगत में सशक्त उपलब्धियाँ श्रद्धा की उत्कृष्टता पर निर्भर हैं। मनोविज्ञान वेत्ता विचारों की क्षमता और संकल्प शक्ति का गुण गान मुक्त कण्ठ से करते रहे हैं। मनुष्य को उठाने गिराने और बनाने में निष्ठा एवं आस्था का महत्व असाधारण है। आत्मबल और मनोबल का चमत्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव के रूप में परिणत कर देने में समर्थ होता है। संसार की महान घटनाओं की पृष्ठभूमि प्रचुर साधनों पर नहीं प्रचण्ड संकल्प शक्ति पर ही रखी गई है। सफलताओं का समग्र इतिहास दृढ़ निश्चय के साथ जुड़े हुए प्रचण्ड पुरुषार्थ की लेखनी से ही लिखा गया है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, क्लेरो वायेन्स, टेलीपैथी, आदि योग विद्या के छुटपुट खेल संकल्प शक्ति की ही फुलझड़ियाँ हैं। इसी तथ्य को साधना का प्राण कह सकते हैं।
अविश्वासी और अन्यमनस्क व्यक्ति उपेक्षा और उदासीनता के साथ कोई साधन करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्ट साध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ न होगा। किन्तु यदि भाव भरी मनोभूमि में थोड़ा भी साधन विधान अटूट श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न किया जाय तो उसका परिणाम तत्काल दृष्टिगोचर होगा। संदिग्ध और आशंका ग्रस्त मनोभूमि मानसिक धरातल को बहुत ही उथला बनाये रखती है उससे कोई बड़े दैवी अनुदान सँजोये नहीं जा सकते। साधनात्मक विधि विज्ञान का अपना महत्व है पर यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ‘प्राण’ ही माना जायेगा। प्राण रहित शरीर को कितना ही सँजोया सँभाला जाय उससे कुछ काम न बनेगा। भावना रहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है। अस्तु साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा सिक्त ही बनाना पड़ता है।
अध्यात्म विज्ञान की गरिमा भौतिक विज्ञान से असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है। यन्त्र बहुमूल्य हो सकते हैं पर मन्त्रों की महत्ता से उन्हें तोला नहीं जा सकता है। संसार की सम्पदाएं-आत्मिक विभूतियों की तुलना में नगण्य हैं। जड़ और चेतन की गरिमा में जमीन आसमान जितना अन्तर है। इसे ध्यान में रखा जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि हमें भौतिक सम्पदाओं के लिए ही लालायित नहीं रहना चाहिए वरन् आत्मिक विभूतियों को भी उपार्जित करना चाहिए। आत्मबल संग्रह करने के लिए कदम बढ़ाना सूर्य की ओर मुँह करके चलने की बराबर है। इससे सम्पत्ति रूपी छाया पीछे-पीछे चलेगी। किन्तु यदि छाया की ओर मुँह करके दौड़ा जाय तो वह पकड़ में नहीं आयेगी और जितनी तेज दौड़ होगी वह भी आगे उतनी ही तेजी के साथ दौड़ती चली जायगी। विभूति-वान सम्पत्ति का लाभ अनायास ही उठा लेते हैं जबकि सम्पत्तिवानों को भौतिक विक्षोभ और आत्मिक असन्तोष की दुहरी हानि उठानी पड़ती है।
हम आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ें। आत्म विज्ञान की सहायता लें। आत्मबोध से दृष्टिकोण परिष्कृत करें और साधना निरत रह कर विभूतियों के अधिकारी बनें। इस संदर्भ में मन्त्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
(अपूर्ण)
एक दिन किशोरीलाल मश्रूवाला ने गान्धी जी से कहा- मैं आपका अनुयायी नहीं, आपके साथ चलने का प्रयत्न करता हूँ। आपको जिस सत्य की पहचान है उसी को अपने विवेक के आधार पर मैं भी समझने के लिए सचेष्ट हूँ।
उनका आशय यह था कि अनुयायी बनकर पीछे चलने से वे स्वतन्त्र चिन्तन न कर सकेंगे। किसी महापुरुष के पीछे चलने पर हम उसकी पीठ भर देख सकेंगे। मुँह नहीं। इससे उसके चले जाने के बाद दिशा भूल जाने का खतरा रहेगा। साथ चलने से उसके चले जाने के बाद भी अपने को सहाय एवं अपंग अनुभव न करेंगे क्योंकि तब सत्य हमारा अपना सत्य भी बन चुका होगा।
इस पृथ्वी को दो तिहाई भाग जल में डूबा हुआ है और एक तिहाई पर थल दिखाई पड़ता है। थल में जो जीवन सौंदर्य और वैभव दिखाई पड़ता है वह भी जल का ही अनुदान है। समुद्री पानी भाप बनकर बादलों की तरह आकाश में उड़ता है और फिर वही बरस कर वृक्ष वनस्पति, अन्न, फल आदि उत्पन्न करता है। जीव उसी पर जीवित है। जल देवता का यह अनुग्रह यदि थल पर न हो, पानी न बरसे तो सर्वत्र श्मशान जैसी भयंकरता दीख पड़े, फिर न कहीं पेड़ पौधे घास पास दिखाई पड़े और न जीव जन्तु। तवे की तरह जलती हुई जमीन तब केवल रेतीले आँधी तूफानों की गर्द गुबार से ही भरी रहे।
समुद्र में अपार सम्पदा भरी पड़ी है। जितना सोना, चाँदी, रत्न राशि धातुएँ, रसायनें पृथ्वी पर दिखाई पड़ती हैं उनसे सैंकड़ों गुनी अधिक सागर तल में दबी पड़ी हैं। मनुष्य उन्हें जानता नहीं, या अभी ढूंढ़ नहीं पाया इससे उस अपार सम्पत्ति भण्डार की गरिमा कम नहीं होती।
इस पृथ्वी पर जितना पेट्रोलियम है उसका 40 प्रतिशत भाग समुद्र के गर्भ में है। उसे निकालने का थोड़ा सा प्रयत्न अभी सिर्फ कम्यूनिस्ट देशों में आरम्भ हुआ है। वह जब बड़े पैमाने पर निकाला जाने लगेगा तो पैट्रोल की कोई कमी नहीं रहेगी। लगभग 40 प्रकार के उपयोगी खनिज एवं रसायन समुद्र में प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं उन्हें जब बाहर लाया जायगा तो उनसे भी सम्पत्ति एवं सुविधाएं बढ़ाने में बड़ी सहायता मिलेगी।
शोध कर्ताओं के अनुसार अकेले प्रशान्त महासागर में ही 10 अरब टन सोना, 50 करोड़ टन चाँदी 20 अरब टन यूरेनियम और अरबों टन मैग्नीज भरा पड़ा है। इन सम्पदाओं के भण्डार में हर वर्ष करोड़ों टन की वृद्धि हो जाती है। यह आँकड़े तो एक समुद्र के हैं संसार के अन्य समुद्रों का भी लेखा-जोखा लिया जाए तो प्रतीत होगा कि इस समुन्नत कही जाने वाली परिस्थिति में भी धरती की सम्पदा की तुलना में समुद्र का वैभव कहीं अधिक है।
बढ़ती हुई आबादी को खुराक देने के लिए अब समुद्र का द्वार खटखटाने की तैयारी की जा रही है। लाँक्डीह एयर क्राफ्ट कार्पोरेशन के अध्यक्ष श्री ए.कार्ल कोशियन का कथन है अगले दिनों धरती मनुष्य की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकने में असमर्थ हो जायेगी। तब जीवित रहने के लिये समुद्र का आश्रय लेने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहेगा।
जो समुद्री अनुसंधान इन दिनों चल रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि समुद्र से मीठा पानी प्राप्त करने के-खाद्य सामग्री उगाने के-खनिज तथा बिजली प्राप्त करने के इतने उपाय अगले दस वर्षों में खोज निकाले जायेंगे जिनके आधार पर भावी पीढ़ी को जीवन निर्वाह की आवश्यकता साधन सामग्री उपलब्ध हो सके।
यदि जनसंख्या वर्तमान क्रम से बढ़ती रही और उसे जीवित रखना भी आवश्यक प्रतीत हुआ तो खाद्य समस्या का हल समुद्रीय वनस्पतियों से ही निकलेगा। अन्न की तो वर्तमान आबादी के लिये भी कमी पड़ती है। रासायनिक खादों, जल व्यवस्थाओं एवं यन्त्रों द्वारा समुन्नत कृषि करने पर भी खाद्य उत्पादन में इस क्रम से वृद्धि नहीं हो सकती है जिस क्रम से कि जनसंख्या बढ़ रही है। इस अन्न संकट को दूर करने के लिये समुद्र की शरण में जाने के अतिरिक्त और कहीं आश्रय नहीं मिल सकता।
समुद्र से लेकर छोटे से छोटे पोखर जोहड़ों तक में कई प्रकार की-वनस्पतियाँ उगती हैं। काई को हर कोई जानता है पर एक काई ही नहीं, जल में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का व्यापक क्षेत्र है, जिनके अंतर्गत उनके लाखों आकार प्रकार और वंश वर्ग आते हैं। आमतौर से वह जलचरों का आहार रही है। मनुष्य के लिये धरती पर उपजने वाली वनस्पतियाँ ही काफी थीं, वह उन्हीं से गुजारा कर लेता था तो उन जल वनस्पतियों की बात क्यों सोचता। पर अब तो स्थिति ही बदल गई। जनसंख्या की वृद्धि ने नये आधार खोजने के लिये विवश कर दिया है इस विवशता में वरुण देवता का दरवाजा खटखटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
जल वनस्पतियों में मनुष्य के खाये जाने योग्य सबसे उपयुक्त वनस्पति ढूंढ़ निकाली है- नाम है उसका- क्लोरेला। यह बहुत छोटे प्रकार की एक काई की ही किस्म है पर तो तत्व पाये जाते हैं वे मनुष्य ही नहीं अन्य थलचरों की-पशु पक्षियों की भी खुराक बन सकने योग्य है। क्लोरेला में - प्रोटीन 50 प्रतिशत, चिकनाई 7 प्रतिशत होती है। पके नीबू की तुलना में विटामिन और उपयोगी किस्म के कार्बोहाइड्रेट उसमें पर्याप्त मात्रा में होते हैं।
भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संसार के प्रमुख दस देशों ने इसकी कृषि करनी आरम्भ की है। बड़े पैमाने पर इस प्रयोग को हाथ में लेने वालों में अमेरिका, जापान, हालैण्ड, जर्मनी और इसराइल मुख्य हैं। यह कृषि बड़ी सरल है और कम खर्च की है। एक किसान बिना किसी मदद के अकेला ही 100 एकड़ कृषि की देखभाल तथा बुवाई, कटाई कर सकता है। इसकी वृद्धि आश्चर्यजनक है 12 घंटे में इसका वजन चौगुना हो जाता है। एक एकड़ में- एक साल में 40 टन फसल काटी जा सकती है। इसके लिए खादें तैयार की जा रही है ताकि इस काई को और भी अधिक गुणकारी बनाया जा सके।
वनस्पति शास्त्री डॉ. सिडनी ग्रीन फील्ड का कथन है कि अन्तरिक्ष यात्रियों के लिये क्लोरेला आदर्श खुराक की तरह काम में लाई जा सकती है, वह यान में रखे पानी के टैंक में रोज उगाई और रोज खाई जा सकती है। उसकी कृषि अन्तरिक्ष यानों में भी हो सकती है। उसे खाद आदि की सहायता से और भी उन्नत किस्म की बनाया जा सकता है।
समष्टि जगती का आधार जिस प्रकार समुद्र है उसी प्रकार व्यक्ति की निजी सत्ता का अस्तित्व एक निजी सागर पर ठहरा हुआ है। यह सागर रक्त के रूप में हमारे समस्त शरीर में व्याप्त है। मोटी आँख से देखने पर यह लाल पानी भर दीखता है पर बारीकी से देखने पर उसमें वे समस्त विशेषताएं और सम्पदाएं मौजूद हैं जो दृश्यमान सागर में दिखाई पड़ती हैं। प्राणि जगत का जीवनाधार सागर जल है और जीवधारा का व्यक्तिगत अस्तित्व उसके रक्त पर निर्भर है। जीवात्मा एक प्रकार की हेल मछली है जो रक्त रूपी शरीर में स्वच्छन्द विचरण करती है और उसी से अपने लिये सभी सुविधा सामग्री प्राप्त करती है। रक्त की महत्ता यदि हम समझें उसे शुद्ध और सशक्त बनाये रहें तो शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं आत्मिक प्रगति की दृष्टि से भी हम उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं।
हमारे शरीर में पानी की मात्रा अत्यधिक है। देह के पूरे वजन में दो तिहाई भाग पानी और एक तिहाई में दूसरी चीजें हैं। रक्त मुख्य रूप से पानी ही है। शरीर में प्रायः 5 लीटर रक्त होता है, उसमें 90 प्रतिशत तो पानी ही होता है। अन्य तत्व तो उसमें बहुत कम ही रहते हैं। ठोस और कठोर दीखने वाली हड्डी में भी पानी की काफी मात्रा रहती है।
औसतन हर मनुष्य को ढाई तीन लीटर पानी हर रोज पीना पड़ता है। अधिक मेहनत करने वाले- अधिक और बैठे ठाले लोग कम पीते हैं। गर्मी में प्यास अधिक लगती है और सर्दियों में कम। गर्मी के कारण शरीर का बहुत सा पानी पसीना तथा भाप बनकर बाहर निकल जाता है। इसी की पूर्ति के लिये उन दिनों अधिक प्यास लगती है। पेशाब और साँस में होकर भी पानी बाहर निकलता रहता है। साँस द्वारा प्रायः 250 ग्राम पानी बाहर निकलता है। यह निकासी अंदरूनी सफाई के लिये ही नहीं- शरीर को शीतल रखने की दृष्टि से भी आवश्यक है।
स्वस्थ मनुष्य के शरीर में उसके वजन का चौदहवाँ भाग वजन रक्त का रहता है। इसे डेढ़ गैलन माना जा सकता है। स्त्रियों में मासिक धर्म तथा प्रजनन के कारण उसकी मात्रा कुछ कम रहती है। औसत महिला में एक गैलन से कुछ कम ही खून होता है। रक्त में जल की मात्रा 70 प्रतिशत रहती है।
यों ठोस दीखने वाली भी कोई वस्तु ऐसी नहीं जिसमें पानी का अंश न हो। हड्डियों तक में 25 प्रतिशत पानी होता है। चर्बी में कोषों में जरूर जलाँश 20 प्रतिशत रहता है। बाकी सर्वत्र उसका बाहुल्य है। गुर्दों में 81 प्रतिशत और मस्तिष्क में उसकी मात्रा 85 प्रतिशत रहती है।
रक्त का एक महत्वपूर्ण भाग है- प्लाज्मा। यह मटमैले पीले से रंग का एक तरल पदार्थ है। रक्त का 55 प्रतिशत आयतन प्लाज्मा से और 45 प्रतिशत अन्य कणों से भरा रहता है। प्लाज्मा में तैरते रहने वाले तैराकों को रक्त के लाल कण, सफेद कण तथा सफेद पपड़ियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
रक्त के मुख्य कार्य पाँच हैं-
(1) विभिन्न अवयवों के तन्तु कोषों तक उपयुक्त आहार पहुँचाना तथा उन कोषों में उत्पन्न मल को उस स्थान से हटाना।
(2) विभिन्न अवयवों में जल तथा अम्ल की मात्रा का नियन्त्रण तथा शारीरिक तापमान की स्थिरता रखना।
(3) हारमोन आदि ग्रन्थियों में उत्पन्न अतिरिक्त रसों को अपने में मिलाकर उनका लाभ समस्त शरीर को-तथा उनकी अपेक्षा रखने वाले अंग विशेष तक को-पहुँचाना।
(4) प्रत्येक कोष को ऑक्सीजन पहुँचाना और वहाँ से उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालना।
(5) रोग कीटाणुओं से लड़कर शरीर की सुरक्षा का प्रबन्ध रखना।
रक्त में उपस्थित कणों पर लाल रंग चढ़ा होता है। इस रंग को ‘हीमोग्लोबिन’ कहते है। यह प्रोटीन जैसा पदार्थ है। इसके एक अण्ड में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन के कितने ही परमाणुओं के साथ-साथ एक लौह कण भी रहता है। लाल रंग इस लौह कण के कारण ही होता है। समुद्री जीव जन्तुओं में रक्त नीले रंग का होता है। क्योंकि उनके रक्त कणों में लोहा न होकर ताँबा रहता है। नीले रक्त का नाम शरीर शास्त्र में- हेमोस्यनिक दिया गया है।
प्लाज्मा में तैरने वाले ठोस कणों को ही - रक्त का सार भाग माना जाता है। उन्हीं के द्वारा शरीर के कोषों को ऑक्सीजन तथा आहार मिलता है। इन लाल कणों की बनावट गोल चपटी तश्तरी जैसे होती है। किनारे मोटे बीच का भाग पतला और व्यास 7.2 माइक्रोन होता है।
यों रक्त का भण्डार हृदय माना गया है पर इन लाल कणों की उत्पत्ति का केन्द्र शिर की हड्डी के खोखले भाग में और रीढ़ की हड्डी में होता है। हाथ पाँव की हड्डियों के अन्तिम छोरों पर भी यह लाल कण बनते हैं। इन लाल कणों की औसत आयु 125 दिन है। इसके बाद वे मरने लगते हैं। मृतकों की यह लाश ‘हेमोकोमिया’ कहलाती है। इन लाशों को हटाने का काम तिल्ली के जिम्मे है। तिल्ली में प्रचुर संख्या में मैकरोफ्लेजेज कोशिकाएं होती हैं। इनका काम है मृत लाल कणों की लाशों को जलाकर उस राख को अपने में आत्मसात कर लेना।
साधारणतया यह लाल कण प्रति सेकेंड 23,00,0000 की संख्या में मरते रहते हैं। सन्तोष की बात इतनी ही है कि बुढ़ापे और बीमारी की स्थिति को छोड़कर उनकी जन्म संख्या, मृत्यु संख्या की तुलना में कुछ अधिक ही रहती है।
रक्त में अशुद्धि अभक्ष्य आहार से उत्पन्न होती है। रोगों का प्रारम्भ यहीं से होता है। मिर्च, मसाले, माँस मदिरा, तले भुने तामसिक पदार्थ एक तो पचते ही कठिनाई से हैं, फिर वे पच भी जायें तो अशुद्ध रक्त ही उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार गन्दगी डालने से स्वच्छ सरोवरों का जल भी दुर्गन्ध युक्त हो जाता है उसी प्रकार अभक्ष्य भोजन से उत्पन्न अशुद्ध रक्त अनेक रोगों का केन्द्र बना रहता है। मनोविकार भी रक्त को विषैला बनाते हैं। क्रोध, भय, शोक, चिन्ता, निराशा जैसी मनः स्थिति का प्रभाव धीरे-धीरे रक्त में सन्निहित जीवनी शक्ति को नष्ट करता चला जाता है और उसकी दुर्बलता देखकर कितनी ही बीमारियाँ चढ़ाई कर देती हैं।
रक्त केवल रंगीन पानी नहीं है। उसमें चेतना के कण कोशिकाओं के रूप में भर पड़े हैं। इन्हीं की सम्मिलित शक्ति हमारी वैयक्तिक चैतन्य सत्ता के रूप में दृष्टि गोचर होती है। यह रक्त के चेतन कण उस आहार और संपर्क से प्रभावित होते हैं जो खाया या अपनाया जाता है। यदि अनीति उपार्जित, दुष्ट प्रकृति वालों के द्वारा पकाया या परोसा हुआ होगा तो उसके साथ जुड़े हुए संस्कार रक्त कणों को प्रभावित करेंगे और मनुष्य की मनः स्थिति वैसे ही दुष्टता और निष्कृष्टता से घिरती भरती चली जायगी। संपर्क का अर्थ है समीपता। जैसे लोगों के साथ या समीप रहा जाता है। उसकी विद्युत चेतना भी अपना प्रभाव छोड़ती है। शारीरिक या मानसिक घनिष्ठता जितनी गहरी होगी यह प्रभाव भी उतना ही गहरा पड़ेगा। नर-नारी का यौन संपर्क तो पारस्परिक चेतना का अत्यन्त सघन प्रत्यावर्तन करता है। इसलिये जहाँ कुसंग से बचने दुष्टों से दूर रहने के लिये कहा जाता है वहाँ रक्त की उच्च स्तरीय सशक्तता की रक्षा के लिए निकृष्ट स्तर के व्यक्तियों से दाम्पत्य सम्बन्ध नहीं स्थापित करना चाहिए। विवाह सम्बन्ध में यदि ऐसा ध्यान न रखा जाय काम सेवन का कुत्सित स्तर अपनाया जाय तो न केवल घृणित मूत्र रोग उठ खड़े होते हैं वरन् चेतना स्तर की उत्कृष्टता को भी भारी आघात पहुँचता है। इसलिए साथी के चुनाव में रंग रूप का नहीं वरन् उसके चेतनात्मक स्तर का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अन्यथा कुसंग से प्रभावित रक्त अपनी आत्मिक विशिष्टता और प्रतिभा सम्पदा को गँवा बैठेगा।
ब्रह्मचर्य से रक्त कणों में चैतन्यता और ऊर्जा अक्षुण्य बनी रहती है, यही शक्ति एकत्रित होकर चेहरे पर ओजस् मस्तिष्क में कुशाग्रता, व्यक्तित्व में प्रतिभा, वाणी में प्रखरता और अन्तःकरण में महानता के रूप में प्रतिबिम्बित होती है। कामसेवन में अति रुचि रखने वाले एवं अश्लील चिन्तन में निरत रहने वाले शारीरिक, मानसिक सम्भोग से क्षति उठाते रहते हैं।
समुद्र के गर्भ में छिपी हुई सम्पदा की तरह रक्तकणों में रत्न मणियों से अधिक वैभव छिपा हुआ है। जिस तरह उपलब्ध करने का ज्ञान और साधन न होने के कारण समुद्र जैसे महान भाण्डागार के समीप रहकर भी बच्चे कुछ लाभ नहीं उठा पाते, खेलने के लिये सीप घोंघे भर बटोरते रहते हैं वैसे ही हम रक्त रूपी चेतना के समुद्र में निवास करते हुए उन सम्पदाओं से लाभान्वित हो नहीं पाते जिनसे सिद्ध योगी और तपस्वी सम्पत्तिवान बनते हैं।
गरम करके सस्ती और विषैली पारा-धातु को कुशल चिकित्सक मकरध्वज जैसी संजीवनी रसायन में बदल देते हैं। तपस्वी लोग तितीक्षा और साधना की योगाग्नि में अपनी रक्त सम्पदा को प्रचण्ड विद्युत शक्ति सम्पन्न बना लेते हैं और इस हाड़ माँस के शरीर से प्रचण्ड विद्युत शक्ति संवाहक यन्त्र का प्रयोजन पूरा करते हैं। हमारे रक्त सागर में अपार सम्पदाएं दबी पड़ी हैं। साधना विज्ञान की क्रिया-पद्धति यही सिखाती है उस अविज्ञात को कैसे जाना जाय और उस अनुपलब्ध को कैसे प्राप्त किया जाय जो हमें दिव्य सम्पदाओं से सुसम्पन्न बना सकता है। बाहर भटकने की अपेक्षा यदि हम अपने भीतर ही तलाश करें तो विभूतियों भरा ‘आपा’ हमें वह सब कुछ प्रदान कर सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है और उन सब समस्याओं को हल कर सकता है जिनके कारण हम उद्विग्न हैं।
धन की तीन गति हैं- दान, भोग और नाश। जो न देता है, भोगता है, उसकी तीसरी गति होती है।
-भर्तृहरि
अतीत एक तथ्य है, वर्तमान अस्थिर है और भविष्य अज्ञात। अज्ञात से कुछ लोगों को डर लगता है- इसलिये वे वर्तमान से चिपके रहना चाहते हैं या बीते को वापस लाना चाहते हैं, किन्तु प्रकृति के नियम और काल के क्रम के विपरीत काम करने वाले सफल नहीं हो सकते।
भविष्य से डरिये मत, बल्कि उसके निर्माण में रुचि लीजिये। सँजोये सपनों को सँवारिये, कल्पना को कर्म से गढ़िये और योजना को युक्ति से पूरा कीजिए।
-दीनदयाल उपाध्याय
अहंकार और अहंभाव देखने में एक जैसे लगते हैं और उनको निन्दास्पद समझा जाता है पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। दोनों में से केवल अहंकार ही निन्दनीय है। अहंभाव तो जीवन का मेरुदण्ड है, यदि वह न हो तो सीधा खड़ा रहना ही कठिन हो जाय।
अहंकार कहते हैं- भौतिक वस्तुओं और शारीरिक क्षमता पर इतराने को- इन कारणों से अपनों को दूसरों से श्रेष्ठ समझने को- अपनी इस उपलब्धि का ऐसा भौंड़ा प्रदर्शन करने को जिससे औरों पर अपने बड़प्पन की छाप पड़े। यह प्रवृत्ति यह जताती है कि यह व्यक्ति सम्पदाओं को हजम नहीं कर पा रहा है और वे ओछेपन के रूप में फूट कर निकल रही हैं।
अन्न जब पचता नहीं तो उलटी और दस्त के रूप में फूटता है। अन्न श्रेष्ठ था पर जब वह इस प्रकार घिनौना होकर बाहर निकलता है तो देखने वाले का जी बिगड़ता है और उस रोगी को भी कष्ट होता है। अन्न बुरा नहीं है और न उसका खाया जाना है। चिन्ता का विषय ‘हैजा’ है। सम्पदाएं बुरी नहीं, उनका होना हेय नहीं, पर उनका नशा बुरा है- जिसे अहंकार कहते हैं।
चावल, जौ, गुड़ इनमें से कोई भी बुरा नहीं। इन्हें हविष्यान्न कहते हैं। पर इन्हें सड़ा कर जब शराब बनाई जाती है तो वह अहितकर और अवाँछनीय बन जाती है। सम्पदा जब विकृत होकर किसी व्यक्ति के मन पर छाती है तो वह नशे जैसा प्रभाव करती है और मनुष्य उन्मत्त होकर उद्धत आचरण करने लगता है। सम्पदाओं की जब ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है तो उसे अहंकार कहा जाता है।
अहंकारी व्यक्ति इस भ्रम में पड़ जाता है कि वह उपलब्धियों के कारण दूसरों से बहुत बड़ा हो गया। उसकी तुलना में और सब तुच्छ हैं। सबको उसकी सम्पदाओं का विवरण जानना चाहिए और उस आधार पर उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करके सम्मान प्रदान करना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए वह विविध विधि ऐसे आचरण करता-ऐसे प्रदर्शन करता है जिससे लोग उसका बड़प्पन भूल न जायें। भूल गये हों तो फिर याद कर लें। उसके वार्तालाप में आधे से अधिक भाग आत्म प्रशंसा का होता है। बात-बात में अपने वैभव, पराक्रम और बुद्धिमत्ता की चर्चा करता है और अपने को सफल सिद्ध करता है। यद्यपि ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
शारीरिक बलिष्ठता गुण्डागर्दी में उभरती है। इसमें यही प्रवृत्ति काम करती है कि लोग उसके बल पर अपना ध्यान केन्द्रित करें, उसे सराहें। यह प्रयोजन अच्छे-सत्कार्य करके भी पूरा किया जा सकता था पर ओछे मनुष्य का दृष्टिकोण उतना परिष्कृत होता कहाँ है? उसे यह बात सूझती कब है। उसमें उस प्रकार की योग्यता भी कब रहती है। सरल उद्दण्डता पड़ती है। किसी का अपमान कर देना, सताना, तोड़ फोड़, अपशब्द, अवज्ञा, उच्छृंखलता, मर्यादाओं का व्यतिक्रम यही बातें ओछे व्यक्ति आसानी से कर सकते हैं। सो ही वे करते हैं। यह विकृत अहंकार ही गुण्डागर्दी के रूप में फूटता है।
किसी का रंग गोरा हो- छवि सुन्दर हो, तो उसके इतराने के लिये यह भी बहुत है। फिर उसके नखरे देखते ही बनते हैं। छवि को सजाने में ऐसा लगा रहता है मानो शृंगार का देवता वही हो। अन्य लोग उसे अष्टावक्र की तरह काले कुरूप दीखते हैं और कामदेव का अवतार अपने में ही उतरा दीखता है। उसकी इस विशेषता को लोग देखें तो- समझें तो-सराहें तो यही धुन हर घड़ी लगी रहती है। तरह तरह के वेश विन्यास, शृंगार सज्जा की ही उधेड़बुन छाई रहती है। दर्पण को क्षण भर के लिए छोड़ने को भी जी नहीं करता। यह रूप का प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति भिन्न लिंग वालों को आकर्षित करने की ओर बढ़ती है। पुरुष स्त्रियों के सामने और स्त्रियाँ पुरुषों के सामने इस तरह बन-ठन कर निकलते हैं जिससे उन्हें ललचाई आँखों से देखा जाय। वर्तमान शृंगारिकता इसी ओछेपन को लेकर बढ़ रही है और उसकी प्रतिक्रिया मानसिक व्यभिचार से आरम्भ होकर शारीरिक व्यभिचार में परिणत हो रही है। अहंकार की यह रूप परक प्रवृत्ति उस सुसज्जा शृंगारी को ऐसे जाल-जंजाल में फँसा देती है जिससे वह अपनी प्रतिष्ठा और शालीनता गँवाकर विपत्ति ही मोल लेता है।
धन का अहंकार ऐसे ठाट-बाट खड़े करता है जिससे उसकी अमीरी सबको विदित हो। मोटर, बँगले, जेवर, वस्त्र ठाट-बाट का इतना बवण्डर जमा कर लिया जाता है जिसके बिना आसानी से काम चलता रह सकता था। विवाह शादियों में लोग अन्धाधुन्ध पैसा फूँकते हैं। उसके पीछे अपनी अमीरी का विज्ञापन करने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता। महँगी चीजें सुरुचि के नाम पर अनावश्यक मात्रा में खरीदी जाती हैं पर वस्तुतः उसका कारण अमीरी की छाप डालना ही होता है। कई व्यक्ति दान पुण्य का ढोंग भी बनाते हैं। यद्यपि उदारता और परमार्थ का नाम भी उनके भीतर नहीं होता पर लोग उनकी अमीरी की बात जानें यह प्रयोजन जिनसे पूरा होता है- उन्हीं दान पुण्यों को अपनाते हैं। ऐसे लोगों का आधा धन प्रायः इन्हीं विडम्बनाओं में खर्च हो जाता है इस प्रकार उस अहंकार की पूर्ति का वे महँगा मूल्य चुकाते रहते हैं।
विद्या का अभिमान और भी अधिक विचित्र है। विद्या का फल ‘विनय’ होना चाहिए। पर यदि विद्वान अविनय शील हो जाय। पग-पग पर अपना सम्मान माँगे और चाहे, उसमें कहीं रत्ती भर कमी दीखे तो पारा चढ़ जाय इस विचित्र मनःस्थिति में ही आज के विद्वान कलाकार देखे जाते हैं। कहीं बुलायें जायें तो ऊँचे दर्जे के वाहन, महँगे निवास, कीमती व्यवस्था की शर्त पहले लगाते हैं। उन्हें सम्मानित स्थान मिला कि नहीं, पुरस्कार उनके गौरव जैसा हुआ कि नहीं, आदि नखरे देखते ही बनते हैं परस्पर कुढ़ते और एक दूसरे की काट करते हैं- इसलिए कि उनका बड़प्पन, सम्मान कहीं दूसरे दर्जे पर न आ जाए। जिन्हें सभा सम्मेलनों में कभी ऐसे लोग बुलाने पड़ते हैं वे देखते हैं कि जो बाहर से विद्वान कलाकार दीखते थे, भीतर अहंकार से ग्रस्त होने से वस्तुतः वे कितने छोटे हो गये हैं। विद्वानों का संगठन इसी कारण बन पाता है, न टिक पाता है, न चल पाता है। अहंकार की ऐंठ में वे सहयोगी बन ही नहीं पाते- प्रतिद्वन्द्वी ही रहते हैं।
सत्ता का मद पहले से ही बहुत था, ओछापन जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है वह अहंकार और भी बढ़ रहा है। ऐसे सरकारी कर्मचारी जो जनता का हित अहित कर सकते हैं- जिनके हाथ में लोगों को सुविधा देना या असुविधा बढ़ाना है उनकी शान और नाक देखते ही बनती है। बेकार मनुष्य समय गँवाते रहेंगे पर लोगों की बात सुनने में व्यस्तता का बहाना करेंगे। सीधे मुँह बोलेंगे नहीं। बात अकड़ कर और अपमानजनक ढंग से करेंगे। इस ऐंठ से आतंकित जनता अपना काम पूरा न होते देखकर रिश्वत के लिये विवश होती है। शासन में या अन्यत्र बड़े संस्थानों में बड़े पदों पर अवस्थित लोगों का रूखा, असहानुभूति पूर्ण और निष्ठुर व्यवहार देखकर उन पर छाये हुए अहंकार के पद का कितना प्रभाव छाया हुआ है इसे भली प्रकार देखा जा सकता है।
सन्त तपस्वियों तक में यह अहंकार उन्माद भरपूर देखा जा सकता है। अपने घरों पर अपने लिये ऊंची गद्दी बिछाते हैं और दूसरे आगन्तुकों को नीचे बैठने की व्यवस्था रखते हैं। यह कैसा अशिष्ट और असामाजिक तरीका है। दूसरे के घर में जायें और वहाँ वे लोग ऊँचे आसन पर बिठायें- खुद नीचे बैठें तो बात कुछ समझ में भी आती है। पर अपने घर आया हुआ अतिथि तो देव है, उसे अपने से नीचा आसन नहीं देना चाहिए। बड़प्पन का अर्थ दूसरों को छोटा समझना या असम्मानित करना नहीं है। आज कल सन्त महन्त, योगी, यती, गद्दी धारी, अखाड़े बाज किसी भी तथाकथित धर्म नेता या अध्यात्म वेत्ता के पास जाइये उनके यहाँ यही अशिष्ट व्यवस्था मिलेगी कोई चरण स्पर्श न करे तो मुँह से भले ही कुछ न कहें, भीतर ही भीतर बेतरह कुढ़ेंगे।
एक सन्त दूसरे सन्त के यहाँ जाने में अपनी हेठी समझाता है। मैं क्यों उसके यहाँ जाऊँ- वह मेरे यहाँ क्यों नहीं आये? उसके आश्रम में मेरा आश्रम क्यों छोटा रहे? जैसी अहंमन्यता की अति वहाँ भी कम नहीं होती है दूर से देखने पर जो सन्त योगी दीखते थे, पास जाने और बारीकी से देखने पर वे भी अहंकार से बेतरह ग्रस्त रोगी की तरह ही दीखते हैं।
यह अहंकार ओछेपन का चिह्न है। अन्न हजम न होने पर मुँह से खट्टी डकारें बार-बार निकलती हैं और सड़ा हुआ बदबूदार अपान वायु शब्द करता हुआ निकलता है। ठीक इसी प्रकार वाणी से आत्म प्रशंसा-शेखीखोरी अपना बखान करने की भरमार यह बताती है कि पेट में अपच है और यह खट्टी डकारें मुँह से निकल रही हैं।
चकाचौंध उत्पन्न करने वाला ठाट-बाट जमाने में कितना समय, श्रम और धन नष्ट होता है, अपनी महत्ता का ढोल पीटने के लिये कितना निरर्थक सरंजाम इकट्ठा किया जाता है इसे देखकर यह समझा जा सकता है कि अपच अपान वायु के रूप में ढोल पीटने और ढिंढोरा करने की विडम्बना रच रहा है।
विभिन्न वर्ग और विभिन्न स्तर के लोग अपनी भौतिक सम्पदाओं का भौंड़ा प्रदर्शन अपने-अपने ढंग से करते रहते हैं उसमें उनकी आन्तरिक तुच्छता आत्मश्लाघा की खिड़की में से झाँकती दीखती है। श्रेष्ठ व्यक्ति सम्पदा को पचा जाते हैं हजम किया हुआ अन्न रक्त बन जाता है। सज्जनों की सम्पदा उनके व्यक्तित्व को श्रेष्ठतम बनाने के लिए प्रयुक्त होती है और उसका लाभ समाज को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में मिलता है। विवेकवान लोग सम्पत्ति को ईश्वर की अमानत मानते हैं और बैंक के खजाञ्ची की तरह अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हुए उसे सत्प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करते रहते हैं। पराई अमानत कुछ समय के लिये सँभालने के लिए चौकीदार का काम मिल जाय या बाँटने-वितरण करने की, गिनने की, ड्यूटी लग जाय तो इसमें अहंकार की क्या बात है? इस तथ्य को शालीनता समझती है। अस्तु वह बरसाती नदियों की तरह उफनती नहीं- समुद्र की तरह मर्यादा में रहती है।
अहंभाव इस अहंकार से सर्वथा विपरीत है। विवेकवान अहं का अर्थ ‘आत्मा’ लेते हैं। अपने को आत्मा मानते हैं। आत्मा का गौरव गिरने न पाये, उससे कोई ऐसा काम न बन पड़े जिससे आत्मा के स्तर को, गौरव को ठेस लगती हो इसका वे सदा ध्यान रखते हैं और कुमार्ग पर एक कदम भी नहीं धरते। ईश्वर का परम प्रतिष्ठित पुत्र मनुष्य अपनी गरिमा को गिराये और पिता को लजाये इतनी बड़ी भूल कैसे की जा सकती है? वह इस संदर्भ में पूरी तरह सतर्क रहता है।
उसके विचार उस स्तर के उत्कृष्ट होने जैसे परम पवित्र ‘आत्मा’ के लिए उपयुक्त हैं। उसके कार्य ऐसे होते हैं- जिनसे देवत्व की महिमा टपकती हो। आत्मा के ऊपर आच्छादित हो सकने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का आवरण ही अहंभाव स्वीकार करता है और इस बात का ध्यान रखता है कि वह प्रकाश स्वरूप है उसकी ज्योति इतनी शुभ्र होनी चाहिए कि समीपवर्ती लोगों के नेत्रों में चमक उत्पन्न हो और सही मार्ग पाने में वस्तुस्थिति समझने में सुविधा मिले। अहं भाव इसी परिधि में सक्रिय रहता है उसके साथ सज्जनता, शालीनता और नम्रता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहती है।
यदि तुम्हारा अहंकार चला गया है तो किसी भी धर्म पुस्तक की एक पंक्ति बाँचे बगैर व किसी भी मन्दिर में पैर रखे बगैर तुमको जहाँ बैठे हो वहीं मोक्ष प्राप्त हो जायगा।
-विवेकानन्द
वंशी से किसी ने पूछा- ‘कृष्ण तुम्हें बहुत प्यार करते हैं, चाहते हैं आखिर बात क्या है?’
वंशी का साधारण सा उत्तर था- मैँने अपने अन्दर का सारा द्रव्य निकाल कर उसे शून्य बना लिया है। अब गन्दगी के नाम पर मेरे अन्दर कुछ नहीं रहा। शायद इसी विशेषता के कारण कृष्ण का प्रेम मुझे प्राप्त है।
कलकत्ता के लिए अनेक लोग अनेक रास्तों से आते हैं। उसी प्रकार ईश्वर को प्राप्त करने के लिये अनेक भक्त साधक अनेक साधन विधान अपनाते हैं। यदि लक्ष्य निश्चित हो और चलने का क्रम ठीक बना रहे तो सभी को सफलता मिल जाती है।
भगवान के साथ भगवान का समर्पण भाव रहना चाहिए। मैं को मिटाकर तू में लीन होना चाहिए। इस संबन्ध में साँसारिक दृष्टि से किसी भी स्तर का माना जा सकता है। पिता, पुत्र, माता, बहिन, सहायक, स्वामी, सेवक, सखा, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्ता उससे माने इससे कुछ अन्तर नहीं आता। दूध को-दही, छाछ, रबड़ी, खोया आदि कुछ भी बनाकर खाया जा सकता है।
-सूर्य बहुत बड़ा है पर जरा सी बदली उसका प्रकाश हम तक आना रोक देती है। इसी प्रकार ईश्वर अति विशाल और सर्वसमर्थ है पर अज्ञान की अँधियारी उसका अनुग्रह हम तक आने का मार्ग अवरुद्ध कर देती है।
-माया ऐसी है जैसी पानी पर तैरने वाली काई। काई को हटा देने पर तुरन्त तो वह हट जाती है पर थोड़ी ही देर में फिर जमा हो जाती है। उसी प्रकार स्वाध्याय, सत्संग और मनन चिन्तन से वह कुछ समय को हट जाती है पर अवसर पाते ही वह फिर जमा हो जाती है। एक बार के ज्ञानोदय को पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए।
-पानी जब तक गन्दा रहता है तब तक उसमें सूर्य चन्द्र तक का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता, पर जब वह निर्मल हो जाता है तो जल तल में पड़ी वस्तुओं से लेकर अपनी छाया तक सब कुछ दीखने लगता है। मन की मलीनता नष्ट होने पर निर्वाण और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है।
-दीपक की अपनी महिमा है सो वह हर स्थिति में अक्षुण्य रहेगी। कोई उसके प्रकाश में पूजा करे, भोजन बनाये अथवा चोरी , हत्या करे। यह कर्ता की इच्छा के ऊपर है। ईश्वर एक प्रकाश है। उससे शक्ति और बुद्धि मिलती है। इसका उपयोग भले या बुरे कामों में करना मनुष्य के अपने हाथ में है। पर कर्त्तव्य के फल से वह बच नहीं सकता।
-शीत से जल बरफ बनकर जम जाता है और गर्मी से पिघल कर वहीं प्रवाही बन जाता है। भक्ति भावना से ईश्वर साकार बन जाता है और तत्व दर्शन से निराकार। सो अपनी मनःस्थिति के अनुसार हम ईश्वर को साकार भी देख सकते हैं और निराकार भी अनुभव कर सकते हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस बीमार थे। उनके गले में व्रण निकला था। चिकित्सा कुछ काम नहीं आ रही थी।
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भक्त जानते थे कि उनके अनुग्रह से कितने ही मृत्यु के मुख में से निकल कर जीवन प्राप्त कर चुके हैं। उनने परमहंस जी से अनुरोध किया कि आप अपने कष्ट की निवृत्ति के लिये भगवान से प्रार्थना करें तो अवश्य अच्छे हो सकते हैं।
परमहंस जी ने उत्तर दिया, मन तो मैं कब का भगवान को दे चुका अब उसे वापिस लेकर उस तुच्छ शरीर के लिए उसे कैसे लगाऊँ ?
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क्षति पूर्ति का एक तरीका सोचा जा रहा है - हिम समाधि। बर्फ की तरह यदि जीवित मनुष्य शरीर को जमा दिया जाय तो उसका क्षरण क्रम उतने समय तक रुका रह सकता है और थके हुए जीवाणु विश्राम पाकर पुनः सशक्त हो सकते है। इस प्रकार मौत और बुढ़ापे का मुकाबला किया जा सकता है। यह भी एक सम्भावना वैज्ञानिकों के दिमाग में है। इस दिशा में एक आशा की किरण उस समय झलकी जब हिम समाधि में मरे हुए एक रूसी ट्रैक्टर ड्राइवर को मृत्यु से वापिस लौटा कर जीवित बनाया गया। सन 1960 में वह ड्राइवर बर्फीले तूफान में गिर पड़ा और वहीं अकड़ गया। काफी समय बाद उसे अस्पताल पहुँचाया जा सका। उस निर्जीव दीखने वाले शरीर पर प्रयत्न किया गया और वह पुनः जीवित हो उठा। यह एक आकस्मिक घटना थी। इसी आधार पर अन्य प्रयोग चले। रूसी शरीर वैज्ञानिकों में से ए॰ कुल्यास्की, एफ0आन्द्रीपेफ, और प्रो0वी0 नैगोबकी ने हिम समाधि के कितने ही प्रयोग अनेक जीवों पर किये हैं और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि थके हुए अशक्त शरीरों को कुछ समय इस प्रकार का पूर्ण विश्राम दिया जा सके तो उसकी थकी हारी कोशिकाएं नये उत्साह से नव जीवन प्रारम्भ कर सकती हैं और बुढ़ापे को आगे धकेलने में सफलता मिल सकती है।
जो कार्य हिम समाधि से किया जा सकता है उसका एक दूसरा तरीका किसी प्रकार शरीर को सुषुप्तावस्था में पहुँचा देना भी हो सकता है। चेतन मस्तिष्क तो रात में सो लेता है पर उससे थोड़ी सी थकान ही उतरती है। असली काम तो अचेतन को करना पड़ता है वह बिना सुस्ताये अहर्निशि कार्यरत रहता है। न करे तो रक्ताभिषरण श्वास प्रश्वास, आकुञ्चन प्रकुञ्चन जैसी शरीर को जीवित रखने वाली क्रियाएं ही बन्द हो जायं। अचेतन के कार्य बन्द कर देने का ही दूसरा नाम मृत्यु है। इस अचेतन की थकान ही बुढ़ापे के रूप में सामने आती है और वह थकता निरन्तर काम करने से है। बीच में यदि उसे विश्राम मिल जाता तो जरूर वह भी रात में सोने वाले चेतन मस्तिष्क की तरह नई स्फूर्ति से काम कर सकने में जुट सकता था और मौत बुढ़ापे का संकट बहुत हद तक टल सकता था। देखा गया है कि हिम प्रयोगों की सुषुप्तावस्था में हृदय की गति एक मिनट में तीन बार और साँस तीन मिनट में एक बार तक मन्द हो जाती है। यदि यह स्थिति हिम समाधि के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार उत्पन्न की जा सके तो उससे भी वैसा ही लाभ हो सकता है।
मंगल और बृहस्पति ग्रहों पर भेजे जाने वाले अन्तरिक्ष यात्रियों के बारे में यही सोचा गया है कि इतनी दूर जाने और लौटने में जो लम्बी अवधि लगेगी उसमें मौत बुढ़ापे का ही नहीं, अन्न जल का प्रबन्ध करना भी अशक्य हो जायगा। उसका उपाय नियत समय पर सुषुप्तावस्था करना और नियत समय पर जाग्रत कर देने की प्रक्रिया का अपनाया जाना ही हो सकता है। ‘प्रोफाइल्स आफ द फ्यूचर’ पुस्तक के लेखक डॉ0 आर्थर क्लार्क का कथन है कि सुषुप्तावस्था उत्पन्न करने के सरल तरीके इस शताब्दी का अन्त होने तक ढूँढ़ निकाले जा सकेंगे।
गुण सूत्रों को बदलने की- डी0एन0ए॰ में हेर-फेर करके मानवी जोन्स का स्वरूप ही बदल देने की बात सोची जा रही है। मानव सत्ता का वर्तमान शारीरिक और मानसिक ढाँचा बदल कर उसे अधिक समय तक जीवित रखने की सम्भावना पर भी वैज्ञानिक क्षेत्रों में विचार चल रहा है। अगले दिनों उसे भी प्रयोग क्षेत्र में कार्यान्वित किया जाने वाला है।
कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान प्राध्यापक डॉ0 जेम्स वेडफोर्ड की मृत्यु कुछ समय पूर्व 73 वर्ष की आयु में हुई है। उन्होंने अपनी संपत्ति की वसीयत यह की है कि उनके मृत शरीर को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयोग किये जायं। पूर्ण सफलता भले ही न मिले पर उससे आगे का रास्ता खुला तो भी एक बड़ी बात होगी।
उनकी घोषित मृत्यु के बाद डाक्टरों ने उनके मस्तिष्क और हृदय के कोषों को कृत्रिम रीति से जीवन दिया और लाश को नाइट्रोजन घोल में जमा दिया। उस 220 डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान वाले एक बक्से में सुरक्षित रखा गया है। समयानुसार उस पर अन्य प्रयोग किये जाएंगे।
लाइफ एक्स टेनशन सोसाइटी (जीवन वृद्धि संस्थान) के वैज्ञानिक सदस्य इस आधार पर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं कि कोष विघटन प्रक्रिया को रोकने के लिए शरीर को अति शीत से जमा दिया जाय। इससे कोष विश्राम प्राप्त करके- विघटन के विनाश प्रवाह से छुटकारा पाने में समर्थ हो जायेंगे। इसके उपरान्त उन्हें नव जीवन जैसी गति विधि अपनाने के लिए भी सधाया जा सकेगा।
इस प्रयोग के संदर्भ में कुछ चूहे 5 डिग्री सेण्टीग्रेड ताप पर जमाये गये। जमने पर वे काँच की तरह कड़े हो गये। जिनका कोई अंग कड़क से टूट सकता था। इसके बाद भी उन्हें सामान्य ताप देकर पुनः जीवित किया जा सका। कुत्ते और बिल्लियों पर भी यह प्रयोग किये गये और 203 दिन बाद उन्हें पुनर्जीवित किया गया। इस जमाने वाली प्रक्रिया में एक प्रमुख कठिनाई यह है कि ऑक्सीजन के अभाव में मृत्यु के तुरन्त बाद ‘जीवन कोष’ विघटित होने लगते हैं। अर्ध मृत व्यक्ति पर प्रयोग कैसे किया जाय? मृत्यु और जमाव के समय में न्यूनतम अन्तर रहे तभी प्रयोग की सफलता सम्भव होगी।
यही प्रक्रिया भारतीय योग साधना में सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के नाम पर प्रतिपादित की गई है। जो कार्य वैज्ञानिक तापमान घटाकर यान्त्रिक पद्धति से करना चाहते हैं वह प्रयोजन समाधि अवस्था में बिना किसी झंझट के पूरा हो जाता है। संकल्प बल की सामर्थ्य संसार में अद्भुत है। मनोबल की तुलना यन्त्र बल नहीं कर सकता। विशेषतया अपने शरीर के सम्बंध में - अपने संकल्प के प्रभाव का आश्चर्य जनक परिणाम तो असंदिग्ध ही है। स्व संकेत साधना के अनुसार पाश्चात्य देशों में रोग निवारण से लेकर अपरोक्षानुभूति तक के प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जा रहे हैं। योग साधना का तो मूल आधार ही वह है। स्व संकेतों द्वारा - आत्म सम्मोहन की प्रक्रिया अपनाकर समाधि स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। इस प्रयोग में भी लगभग वही स्थिति पैदा हो जाती है जो ‘हिम समाधि ‘ द्वारा उत्पन्न की जायगी। समाधि स्थिति में शरीर के जीवाणुओं को विश्राम मिल जाता है और अचेतन मन की निरन्तर काम करते रहने की थकान दूर होती है। जिस प्रकार रात को सो लेने पर सवेरे ताजा मस्तिष्क और स्फूर्तिवान शरीर नये उत्साह से काम करता है ठीक उसी प्रकार समाधि अवस्था में शारीरिक और मानसिक विश्राम की व्यवस्था बन जाती है और उससे जगने के बाद नया स्फूर्तिवान शरीर एवं मन लेकर एक प्रकार से नया जीवन ही आरंभ किया जाता है।
औषधि उपचार में जो कायाकल्प प्रयोग किये जाते हैं उनमें शारीरिक जीवाणुओं को ही विश्राम मिलता है। मानसिक विश्राम के लिए उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती पर समाधि अवस्था में हिम समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। और मन की भाग दौड़ बन्द हो जाने के कारण उसे भी नई शक्ति संचय कर लेने का अवकाश मिल जाता है। हिम समाधि में मन का स्तर जैसा कुछ था वैसा ही बना रहता है और उठने के बाद सक्रियता एवं चेतनता तो आ जाती है पर स्तर वही पुराना बना रहता है समाधि में मन को जब विश्राम दिया जाता है तो उसे उच्च कोटि के संकल्पों से भर कर तुरीयावस्था में भेजा जाता है। विश्राम अवधि में वह उन्हीं संकल्पों में डूबा रहता है और जब उठता है तो उसी रंग में रँगा हुआ- बदला हुआ होता है।
हिम समाधि में सुलाये हुए व्यक्ति को जगाने के लिए- इस विद्या के कुशल वैज्ञानिकों का सहयोग आवश्यक है किन्तु समाधि में जिस समय के जागरण के लिए संकल्प दिया गया था, ठीक उसी समय अपने आप जागृत अवस्था आ जाती है। हिम समाधि के प्रयोग और अन्वेषण में जितना प्रयत्न किया जा रहा है। उससे आधा भी यदि समाधि शोध के लिए लगता है तो मनुष्य जाति को कृत-कृत्य हो जाने का अवसर मिलता।
प्लेटो, जेनोफेन, प्लुटार्क आदि विद्वानों ने सुकरात के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है। उन सभी ने स्वीकार किया है कि- सुकरात ने अनेकों बार यह कहा मेरे भीतर एक रहस्यमय देवता ‘डेमन’ निवास करता है और वह समय समय पर मुझे पूर्व सूचनाएं दिया करता है। इस तथ्य की यथार्थता के अनेक प्रमाण उद्धरण भी उपरोक्त लेखकों ने प्रस्तुत किये हैं।
प्लुटार्क ने अपनी पुस्तक दी जेनियो सोक्रिटिस में एक घटना दी है- एक बार सुकरात अपने कई मित्रों के साथ एक रास्ते जा रहे थे। सहसा वे रुक गये और कहा इस रास्ते हमें नहीं चलना चाहिये -खतरा है। कइयों ने उसकी बात मान ली और वह रास्ता छोड़ दिया पर कई इस साफ सुथरे रास्ते को छोड़ने के लिये तैयार न हुये। वे सुकरात की सनक को बेकार सिद्ध करना चाहते थे। वे कुछ ही दूर गये होंगे कि जंगली सुअरों का एक झुण्ड कहीं से आ धमका और उनमें से कइयों को बुरी तरह घायल कर दिया।
प्लेटो ने अपनी पुस्तक थीवीज में एक प्रसंग दिया है- एक दिन एक तिमार्कस नामक युवक सुकरात के पास आया। कुछ खाया पिया। जब चलने लगा तो सुकरात ने उसे रोका और कहा अभी तुम जाना मत, तुम्हारे ऊपर खतरा मंडरा रहा है। तीन बार उसने जाने की चेष्टा की पर तीनों बार सुकरात ने उसे पकड़ कर बल पूर्वक रोक लिया। पीछे वह नहीं ही माना और हाथ छुड़ा कर चला गया। दूसरे ही दिन उसने एक खून कर डाला और फाँसी पर चढ़ाया गया। ऐसी ही अन्य कितनी ही घटनाएँ हैं जिनमें सुकरात को उसके सहचर देवता डेमन द्वारा पूर्वाभास दिये जाने तथा सहायता करने के प्रमाण मिलते हैं।
सुकरात पर जब मुकदमा चला और प्राण दण्ड मिला तब उसके पास ऐसे प्रमाण और साधन थे जिनसे उनका बचाव हो सकता था। सफाई में प्रस्तुत किये जा सकने योग्य मजबूत प्रमाण उसके पास थे। ऐथेंस की जेल से उसे उसके मित्र और शिष्य भगा ले जाने के लिये पूरी तैयारी कर चुके थे, पर उनने इस सबसे सर्वथा इन्कार दिया और बचाव के प्रयत्नों में कोई सहयोग नहीं दिया। भरे न्यायालय में उनने स्वीकार किया- अभी अभी मेरा देवता डेमन मेरे कानों में कहकर गया है कि- मृत्यु दण्ड मिलेगा, उससे डरने की कोई बात नहीं है, ऐसी मृत्यु मनुष्य के लिये श्रेयस्कर ही होती है।
परामनोविज्ञान के अतीन्द्रिय विश्लेषण में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि संकल्प शक्ति से निर्जीव वस्तुओं को अथवा सजीव प्राणियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया ले जाया जा सकता है। इस क्रिया को ‘एपोर्ट’ कहते हैं। यह कैसे होता है। संकल्प शक्ति वस्तु अथवा प्राणी को किस प्रकार प्रभावित करती है और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के बीच किस प्रकार क्या भौतिक प्रक्रिया कार्यान्वित होती है, उसे जानना अभी बाकी है। पर प्रमाणों और तथ्यों ने इस निष्कर्ष पर पहुँचा दिया है कि ऐसा हो सकता है और होता है।
डॉक्टर जी0 पी0 विल्लोट ने पैरिस में हुई एक आध्यात्मिक गोष्ठी का विवरण प्रकाशित कराया है। उन्होंने एक अन्धी महिला के द्वारा बन्द कमरे में फाख्ता बुलाने के अद्भुत दृश्य की चर्चा करते हुए लिखा है-अन्धी महिला ने कहा- यह रही बर्फ जैसी सफेद फाख्ता। यह अपनी चोंच में कागज का एक टुकड़ा दबाये हुए उड़ रही है। देखो अब यह कागज का टुकड़ा मदान जे0 के0 के पैरों में गिर पड़ा। और सचमुच वैसा ही हुआ। इसी महिला ने एक दिन डॉक्टर विल्लाट को आकाश से फूल मँगाकर दिये थे। ऐसी ही एक घटना कैन्थन (मैसाच्युसेट्स) निवासी डॉ0 लाकिने के सामने आई। मेरी जेन नामक लड़की के माध्यम से एक भारी लोहे का चुम्बकीय टुकड़ा रसोई घर में आ गया। पीछे वह मेरी की प्रार्थना पर अन्तर्धान भी हो गया।
न्यू एरा में वोस्टन के दी आलिब ब्राँच आफ पीस केन्द्र में हुए एक प्रयोग की रिपोर्ट छपी है एक कमरे को चौबीस घण्टे पूर्व पूरी तरह बन्द कर दिया गया था और उसमें कहीं कोई ऐसा स्थान नहीं रहने दिया गया था जहाँ कोई चीज छिपने या छिपाने की गुंजाइश हो। उस कमरे में उपस्थित लोगों ने प्रयोग के समय एक सफेद फाख्ता को प्रकट होते हुए देखा। इस घटना का तथा ऐसी ही अन्य कई घटनाओं का विवरण देते हुए एमा हार्डिज ने अपनी पुस्तक माईन अमेरिकन स्प्रिचुअलिज्म पुस्तक में लिखा है- पदार्थों के प्रकट और अन्तर्धान होने - एक स्थान से दूसरे स्थान तक हस्तान्तरण होने की क्षमता, मनुष्य के संकल्प बल में है इसके कितने ही प्रमाण मिलते हैं। यह तथ्य आज की बुद्धि सीमा में नहीं आते पर इससे यथार्थता में कोई अन्तर नहीं आता।
मन का कार्य केवल इच्छा,कल्पना और निर्णय जैसे सामान्य स्तर तक ही सीमित नहीं है। उसमें कुछ विलक्षण शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, ऐसी जिनसे जड़ वस्तुओं को प्रभावित किया जा सके। अतीन्द्रिय विज्ञानी इस शक्ति को साइको काइनेसिस नाम देते हैं। इस क्षेत्र में चल रही शोध यह बताती है कि ऐसी अनुभूतियों की साक्षी प्रचुर परिमाण में उपलब्ध है जिनसे मनुष्य की अन्तः चेतना में एक्स्ट्रा सेन्सरी पर्सेप्शन की जड़ पदार्थों को भी प्रभावित करने की क्षमता का होना सिद्ध होता है। मन से मन को प्रभावित करना और भावना से उत्तेजित करना तो स्पष्ट तथ्य सर्व विदित और सर्वमान्य ही है।
मनोविज्ञान शास्त्र के जन्मदाता फेडरिक मायर्स ने अन्तःचेतना का एक विशेष स्तर स्वीकार किया है- सुप्रालिमिनल सेल्फ की व्याख्या करते हुये उन्होंने लिखा है- इस स्तर का विकास मनुष्य की अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कर सकती हैं। जो सर्व विदित नहीं हैं ऐसे रहस्यों को जान सकने की क्षमता मस्तिष्क के उस परिचेतना में बीज रूप से मौजूद रहती है जिसे सब लिमिनल सेल्फ कहते हैं। उन्होंने अपने निज के अनुभवों की चर्चा की है और मनुष्य सचेतना के भीतर एक ऐसा तत्व है जिसके आधार पर दूरवर्ती छिपी हुई तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी मिल सकती है। अप्रकट रहस्यों के प्रकटी कारण और अशरीरी आत्माओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने की सम्भावना इस चेतना स्तर में होने की बात उन्होंने स्वीकार की है।
अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व और उनके द्वारा मनुष्य को सहयोग यह एक तथ्य है। डरावनी या घिनौनी प्रकृति के भूत प्रेत कम ही होते हैं। साधारणतया उच्च आत्माएं मनुष्यों की सहायता ही करती हैं और अपनी उच्च प्रवृत्ति के कारण दूसरों को आगे बढ़ाने तथा खतरों से बचाने के लिये पूर्व संकेत भी करती हैं। जिस प्रकार उदार मनुष्य अकारण दूसरों की सेवा सहायता करने के लिये तैयार रहते हैं वैसे ही सूक्ष्म शरीर धारी आत्माएं लोगों को उपयोगी ज्ञान देने अथवा आत्मा का अस्तित्व शरीर न रहने पर भी बना रहता है यह विश्वास दिलाने के लिये कुछ व्यावहारिक सहयोग देती रहती हैं।
मनुष्य इसी लोक - इसी शरीर को सब कुछ मान बैठता है और तात्कालिक सुखोपभोग के लिये दूरवर्ती भविष्य को अन्धकारमय बनाने में लगा रहता है। इसका एक कारण परलोक सम्बंधी - मरणोत्तर जीवन सम्बंधी अज्ञान भी है यदि गहराई के साथ यह विचार किया जाय कि मरने के बाद भी शरीर बना रहेगा और उस स्थिति में शुभ अशुभ विचार एवं कार्य ही सुख दुख देने के आधार होंगे तो निस्सन्देह मनुष्य के पैर कुमार्ग पर चलने से रुकें और सन्मार्ग पर चलने का उत्साह बढ़े। परलोक सम्बंधी ज्ञान एवं विश्वास का परिणाम मनुष्य के दृष्टिकोण एवं आचरण को परिष्कृत बनाने में सहायक होता है। इस दृष्टि से अशरीरी आत्माएं अकसर लोगों को अपना परिचय देती रहती हैं साथ ही समय समय पर उनकी ऐसी सहायता भी करती रहती हैं जिससे परोक्ष जीवन के प्रति सर्व साधारण की निष्ठा का विकास हो सके।
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारी एक बार एक होटल में ठहरा था। होटल के मालिक को मरे हुये थोड़े ही दिन हुये थे, उसके लड़कों में सम्पत्ति के बारे में बहुत झगड़ा चल रहा था बाप की लिखी वसीयत मिल नहीं रही थी इससे गुत्थी और भी उलझ गई थी। नेवारो ने भी यह सारा वृत्तान्त सुना, पर वह बेचारा आखिर क्या कर सकता था परदेशी जो ठहरा।
नेवारो ने उसी रात सपना देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति बार-बार उसके कमरे में आकर अलमारी को लाठी से ठोंकता है। एक दो बार तो उसने चूहा आदि समझा पर बार-बार वही सपना - वही आवाज। वह उठा होटल की उस अलमारी को खोल डाला। उलट-पुलट कर देखा तो उसी में वह वसीयत रखी हुई थी जिसके न मिलने पर दोनों भाई लड़ रहे थे। जिसके न मिलने पर दोनों भाई लड़ रहे थे। दूसरे दिन नेवारो ने वह वसीयत उन्हें सौंपी और झगड़ा आसानी से निपट गया।
फ्राँस के सम्राट हेनरी चतुर्थ की हत्या से कुछ समय पूर्व अदृश्य आत्मा ने उससे स्वप्न में आकर कहा था- अब तुम्हारा अन्तिम समय अति निकट आ पहुँचा।
यह बात जब सम्राट ने दरबारियों को बताई तो उनने इतना ही कहा यह निरर्थक है। इन दिनों ऐसी कोई आशंका भी नहीं हैं। पर जब सचमुच कुछ समय बाद हेनरी की हत्या हो गई तो उस पूर्वाभास को सभी ने सही माना।
स्काटलैण्ड का राजा जेम्स चतुर्थ अक्सर इंग्लैण्ड पर आक्रमण कर बैठता था। अन्तिम आक्रमण के बाद उसे एक अदृश्य आत्मा दिखाई पड़ी। उसने कहा यदि भविष्य में तुमने कोई और आक्रमण किया तो याद रखना तुम्हारी जान की खैर नहीं। राजा ने उस चेतावनी को अनसुनी कर दिया। जब उसने अगला आक्रमण किया तो युद्ध स्थल में ही उसकी मृत्यु हो गई।
सर आर्लिवर लाज, डॉ0 पील, सर आर्थर केनन डायल,डॉ0 आकाल्ट आदि परलोक वक्ताओं ने मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में काफी छान बीन की और पाया कि मरने के बाद भी मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता जीवित रहती है। भारत में इन्दौर के भूतपूर्व सैशन जज श्री वी0डी0 ऋषि ने अपनी स्वर्गीय पत्नी की आत्मा से अदृश्य रहस्यों का उद्घाटन किया। लन्दन के ‘दी होल्डस’ पत्र के संपादक मोरिस वारवोनिल ने मृतात्माओं के अस्तित्व सिद्ध करने वाले अपने कई अनुभव छापे थे। ब्रिटेन के एयर मार्शल लार्ड डार्डिंग ने भी अपने अनुभव में आई प्रेतात्माओं के कुछ विवरण प्रकाशित कराये थे। सिसरो, पैथागोरस, प्लेटो, एक्यूलियम प्रभृति दार्शनिकों ने प्रेतात्माओं के अस्तित्व को असंदिग्ध रूप से स्वीकार किया है।
नया नेतृत्व उदय होने की भविष्य वाणी-
भारत के भूतपूर्व फौजी जनरल, राजनीति वेत्ता तथा अनटोल्ड स्टोरी नामक राज नैतिक पुस्तक के प्रणेता जनरल कौल से देश की वर्तमान परिस्थितियों के सम्बन्ध में दैनिक हिन्दुस्तान इसी 7 जुलाई के अंक में एक मुलाकात छपी है - उसमें उनने कहा है-
भारत में लोग काम और परिश्रम के बदले तर्क और अधिकारों में अधिक रुचि रखते हैं। व्यावहारिकता की अपेक्षा आदर्शों और भावनाओं की अधिक दुहाई देते हैं। तथा देश की अपेक्षा निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देते हैं। हमारे देश में हर स्तर पर भ्रष्टाचार , कामचोरी और पलायन वाद का बोलबाला है। ऊपर के भ्रष्ट लोगों का अनुकरण यदि नये लोग करते हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य करने की बात नहीं है। देश में भ्रष्टाचार अनिश्चितता तथा भावुकता कब तक पनपती रहेगी। इसके सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।
स्थिति एक ऐसी सीमा तक पहुँचेगी कि जन-मानस के द्वारा इसका व्यापक प्रतिकार होगा। मैं यह भविष्य वाणी कर सकता हूँ कि उस अराजक स्थिति में ऐसा नया प्रेरणाजनक नेतृत्व उदय होगा जो देश को बिखरने और नष्ट होने से बचा लेगा।
गुरु बाहर रहते हैं और वे सद्गुरु तक पहुँचने का रास्ता बताकर वहाँ तक पहुँचाकर अपना कर्तव्य पूरा कर देते हैं। इसके बाद ‘सद्गुरु’ का कार्य आरम्भ होता है, उसका परामर्श और प्रकाश ही परम-लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ होता है।
सद्गुरु अन्तः करण में निवास करता है। इसे निर्मल आत्मा या प्रकाश स्वरूप परमात्मा कह सकते हैं। प्रकाश का अर्थ रोशनी नहीं- सन्मार्ग गामिनी प्रेरणा है। उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा भी कहते हैं। सद्गुरु का उपदेश इसी वाणी - इसी भाषा और इसी परिधि में होता है। उनका परामर्श और मार्ग दर्शन हमें निरन्तर उपलब्ध रहता है।
बाहर के गुरु अनेक विषयों पर बात कर सकते हैं- पर सद्गुरु की शिक्षा एक ही होती है अन्धकार से प्रकाश की ओर - मृत्यु से अमृत की ओर- असत से सत की ओर- चलो। बाहर के गुरु जब तब ही मिलते हैं- उनका ज्ञान सीमित होता है और उनका उपदेश भ्रान्त भी हो सकता है। पर अन्तरात्मा में विद्यमान सद्गुरु हर समय हमारे पास और साथ उपस्थित रहता है। उसका परामर्श हमें हर समय उपलब्ध रहता है।
जब कोई बुरा काम करते हैं तो हृदय काँपता है, मुँह सूखता है, पैर थरथराते हैं, भीतर ही भीतर कोई कोंचता रहता है। कोई देख तो नहीं रहा है - कोई सुन तो नहीं रहा - किसी को पता तो नहीं चल रहा- इन आशंकाओं के बीच वे दुष्कर्म किये जाते हैं। मानो सद्गुरु बराबर रोक रहा है- समझा रहा है और धिक्कार रहा है। यह नीति निर्देशक अन्तरात्मा ही सद्गुरु है।
जब कोई सत्कर्म किया जाता है तो आन्तरिक संतोष अनुभव होता है। किसी भूखे को अपनी रोटी देकर उसकी क्षुधा बुझाई जाय -किसी असहाय रोगी की चिकित्सा व्यवस्था में कुछ समय या धन लगा दिया जाए, अनीति को रोकने में स्वयं आक्रमण सह लिया जाय तो बाहर से हर्ज और कष्ट उठाते हुए भी भीतर से इतना सन्तोष उल्लास अनुभव होता है कि उसकी तुलना में वह भौतिक क्षति नगण्य ही प्रतीत होगी। यह प्रोत्साहन समर्थन और वरदान अन्तरात्मा का है इसी को सद्गुरु का आशीर्वाद कहना चाहिए।
एक हूक एक कसक टीस उठती रहती है कि - आगे बढ़ा जाय, ऊँचा उठा जाया। यह प्रेरणा इतनी प्रबल होती है कि रोके नहीं रुकती। जब अपना देव सोया रहता है तब उस अमृत को दैत्य हरण कर ले जाते हैं। यह इच्छा धन, ऐश्वर्य, इन्द्रिय भोग, पर सत्ता अहंता बढ़ाने के लिए मुड़ जाती है और मनुष्य इसी बड़प्पन के जंजाल में उलझ कर रह जाता है। पर जब सद्गुरु समर्थ होता है तो प्रवाह को अवाँछनीयता की ओर से मोड़कर वाँछनीयता की दिशा में नियोजित करता है। तब प्रगति की आकाँक्षा महानता के अभिवर्धन में लगती है। सद्भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की सम्पदा ही महानता की पूँजी है। गुण कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता इतनी आनन्ददायक और इतनी समर्थ है कि उसे पाकर मनुष्य को स्वर्ग मैं स्थित देवताओं से बढ़कर अपने आप पर सन्तोष होता है।
सद्गुरु कुमार्गगामिता से रोकता है। अनर्थमूलक चिन्तन नहीं करने देता। कुसंग में अरुचि उत्पन्न करता है। कुत्सित विचारों और भ्रष्ट व्यक्तियों के संपर्क से अरुचि ही नहीं होती वरन् घृणा भी बढ़ती है। शक्तियों के निरर्थक कामों में अपव्यय करने वाला हास-परिहास का मनमौजी सिलसिला रुक जाता है। समय का एक-एक क्षण बहुमूल्य प्रतीत होता है और उसके सदुपयोग की निरन्तर तत्परता बनी रहती है। जब ऐसा परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे तो समझना चाहिए कि सद्गुरु के सच्चे शिष्य हम हो गये। गुरु का कार्य है- मार्ग दर्शन। शिष्य का कर्तव्य है उसका परिपालन। साँसारिक गुरुओं में स्वार्थ और अज्ञान भी बहुत होता है इसलिए उनकी सब बात नहीं मानी जा सकती, पर सद्गुरु का तो हर आदेश शिरोधार्य ही होना चाहिए।
साधना का उद्देश्य किसी के सामने गिड़गिड़ाना - झोली पसारना या नाक रगड़ना नहीं है। दीनता न आत्मा को शोभनीय है न परमात्मा को प्रिय। परमात्मा न खुशामद का भूखा है और न है उसे प्रशंसा की आवश्यकता। उसकी महानता अपने आप में अपनी प्रशंसा है। मनुष्यों की वाणी न उसमें कुछ वृद्धि कर सकती है और न कमी। अपने ही बालक के मुख से प्रशंसा कराना किसी मनुष्य को भी अच्छा नहीं लगता फिर परमात्मा जैसे महान के लिए तो उसमें क्या आकर्षण हो सकता है। प्रशंसा करके किसी से कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न ओछे दर्जे का कृत्य माना जाता है उस चंगुल में ओछे लोग ही फंसते हैं और उसे करने के लिए ओछापन ही तैयार होता है। खुशामद व चापलूसी का गोरख-धन्धा उन्हें पसन्द आता है, जो वस्तुतः प्रशंसा के पात्र नहीं। वे अपने चापलूसों के मुँह से अपनी बड़ाई सुनकर खुशी मना लेते हैं। असली न मिलने पर उस आवश्यकता को नकली से पूरा कर लेते हैं भक्त और भगवान के बीच यदि यही खुशामद चापलूसी का धंधा चले तो फिर समझना चाहिए दोनों की गरिमा गिर गई।
माँगना बुरा व्यवसाय है। चोरी से भी बुरा। चोर दुस्साहस करता है और खतरा मोल लेता है तब कहीं कुछ पाता है। पर भिखारी उतना भी तो नहीं करता। वह बिना कुछ किये ही पाना चाहता है। कर्म विज्ञान को एक प्रकार से वह झुठलाना ही चाहता है। संसार के स्वाभिमानी अपंग और असमर्थ भी स्वाभिमानी होते हैं। कोढ़ी और अन्धे भी कुछ कर लेते हैं। समाज उन्हें कर्तृत्व के साधन तो देता है पर मुफ्त में बिठा कर नहीं खिलाता। इसमें देने वाले की उदारता भले ही हो पर लेने वाले को ऋण के भार से दबना पड़ता है और दीन बन कर समग्र स्वाभिमान का हनन करना पड़ता है। यह हानि उस लाभ से बुरी है जो किसी दान से कुछ प्राप्त करके उपलब्ध किया जाता है।
दानी, दान और दानपात्र की भी एक आचार संहिता है। किसे दिया जाय? क्यों दिया जाय? कितना दिया जाय? किस आधार पर दिया जाय? इन कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही भौतिक पदार्थों को देने और लेने की सार्थकता हो सकती है कोई कुछ भी किसी भी स्थिति में किसी भी प्रयोजन के लिए माँगे और देने वाला बिना गुण-दोष विचारे देता ही चला जाय तो समझना चाहिए कि वह अन्धेर देने वाले का, लेने वाले का और आचार व्यवहार का सर्वनाश करेगा। ईश्वर ऐसा दानी नहीं है कि हर माँगने वाले की मनोकामना फिर चाहे वह अज्ञानजन्य और अवाँछनीय ही क्यों न हो पूरी ही करता चला जाय। यदि उसे ऐसा ही करना होता तो कर्म और उसके फल के सिद्धान्त को आरम्भ से ही ताक पर उठा कर रख देता। उस प्रक्रिया का ऐसा उपहास क्यों बनने देता -जैसा कि औघड़दानी कह कर बमभोला को मूर्ख समझते हुए भक्त मंडली द्वारा बनाया जा रहा है।
साधना निश्चित रूप से याचना नहीं है। वह विशुद्ध रूप से आत्म-परिष्कार जीवन-शोधन और पात्रता के विकास की सुनियोजित प्रक्रिया है। तपश्चर्या की आग में हम अपने कलुष-कषायों को जलाते हैं कर्मफल की व्यवस्था सृष्टि का कठोर और अपरिवर्तनीय नियम है। उसे यदि ईश्वर बदलने लगे तो फिर उसे अपनी सारी क्रम व्यवस्था ही बदलनी पड़ेगी। सच्चा न्यायाधीश अपने बेटे को भी अपराध का दंड देकर न्याय की रक्षा करता है। ईश्वर का न्यायालय भक्त-अभक्त का अन्तर नहीं। भक्ति के दूसरे परिणाम हो सकते हैं पर उसका प्रयोजन यह नहीं हो सकता कि उस न्यायशील परमेश्वर को अन्याय या पक्षपात करने के लिए विवश किया जाय।
भक्ति हमें भविष्य में दुष्कर्म न करने की प्रेरणा देती है। अपने स्वभाव में धंसे हुए अविवेक और अनाचार उन्मूलन में सहायता करती है। निष्पाप और निर्मल बन कर हम प्रारब्ध कर्मों को भी धैर्य और शान्ति पूर्वक - साहस और संतोष के साथ सहन कर सकने में समर्थ हो सकते हैं और इस प्रकार प्रारब्ध भोग की आधी व्यथा हलकी कर सकते हैं। दुष्कर्मों और कुविचारों को तिलाँजलि देकर अपना भविष्य तो उज्ज्वल कर ही सकते हैं। साधना का यह लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
संचित कर्मों के छुटकारे का एक ही सनातन मार्ग और विधान है प्रायश्चित्य। पिछली भूलों पर खेद प्रकट कर देने या क्षमा माँग लेने की औपचारिकता पूरी करने से काम नहीं चलता। समाज को क्षति पहुँचाई है उतना अनुदान देकर उस गड्ढ़े को पाटना पड़ेगा। मन को कुकर्म के द्वारा जितना कलुषित किया है उतना ही सत्कर्म के उल्लास से उसका सन्तुलन बनाना पड़ेगा। अनाचार की जिन अवाँछनीय लहरों से वातावरण को क्षुब्ध किया था उसका समाधान पुण्य और परमार्थ की प्रक्रिया अपनाकर करना होगा। इतना साहस भक्त में उदय होता है और वह अपनी सदाशयता सिद्ध करने के लिए न्याय के कटघरे में खड़े होने से पूर्व स्वयं ही उपस्थित होकर अपनी भूल स्वीकारने और उसकी क्षति पूर्ति करने की बहादुरी दिखाता है।
साधना की प्रतिक्रिया साधक को अपने पापों का प्रायश्चित्य करने का शौर्य प्रदान करती है और भविष्य में निर्मल जीवन जीने का साहस। यह सत्परिणाम हैं जो साधना यदि सच्ची हो तो उसके फलस्वरूप साधक को तुरन्त प्राप्त होते हैं।
आत्म ज्ञान के अभाव में ही ईश्वर और जीव का वियोग है। अज्ञान का अन्धकार का पर्दा जितना चौड़ा है उतनी ही दूर परमेश्वर है। भगवान् का दर्शन और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए सिर्फ छोटी सी मंजिल पार करनी पड़ती है और वह आत्म - बोध। जिस घड़ी हम इन्द्रियों की गुलामी -वासना से मन की दासता-तृष्णा से इनकार कर देते हैं और अपने को आत्मा मानकर आत्मकल्याण के पथ पर कदम बढ़ाते हैं उसी क्षण ईश्वर की समीपता स्पष्ट हो जाती है और हृदय की हर धड़कन में उसके दर्शन होने लगते हैं।
ईश्वर भक्त केवल ईश्वर के शासन में रहता है और उसी के निर्देश पर चलता है मन की गुलामी उसे छोड़नी पड़ती है। जो मन का गुलाम है वह ईश्वर भक्त नहीं हो सकता। जो ईश्वर भक्त है उसे मन की गुलामी न स्वीकार हो सकती है न सहन।
साधना का प्रयोजन अपने अज्ञान और अविवेक का निराकरण करना है अपनी कामनाओं का परिशोधन और निराकरण करना है अपने कर्तृत्व में देवता का समावेश करना और कुत्साओं, कुण्ठाओं को जड़-मूल से उखाड़ फेंकना है। साधना एक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मबल बढ़ाया जाता है और देवपक्ष की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्मपरिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाभी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रक्त भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है।
बिना साधना ईश्वर नहीं मिल सकता।
- रा0कृ0परमहंस
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साधना हमारा दृष्टिकोण परिष्कृत कर देती है और अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है जिससे अपने स्वस्थ, लक्ष्य और कर्तव्य को समझ सकें। साधना वह शक्ति प्रदान करती है जिससे आत्मबल विकसित हो और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना साहस उपलब्ध कराती है जिसके आधार पर प्रलोभनों और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़ता पूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न-बाधा का कष्ट-कठिनाई का धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं, तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता। ईश्वर से भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है इतना अधिक कि उससे अपने को, अपने संसार को और अपने परमेश्वर को संतुष्ट किया जा सके।
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मनुष्य की मनुष्यता इसलिए प्रशंसित और सम्मानित है कि उसमें उच्च भावनाओं का समावेश है। एक दूसरे के दुःख-सुख में सम्मिलित होने की - दया,करुणा ,प्रेम सेवा सहानुभूति की कोमल सम्वेदनाओं के आधार पर भी किसी के आन्तरिक विकास का मूल्याँकन किया जा सकता है।
प्रेम भावना में अपने प्रियपात्र के समीप रहने की इच्छा प्रबल रहती है, इसमें उसे सुख मिलता है और संतोष। मनुष्यों में से जिनमें यह वृत्ति जितनी निर्मल, निस्वार्थ और प्रबल है समझना चाहिए उसके अन्तःकरण का स्तर उतना ही ऊँचा उठ गया। जो रूखा, नीरस, स्वार्थी पल भर में आँखें बदल लेने वाला है उसे इस निष्ठुरता के आधार पर उतना ही गया गुजरा मानना चाहिए।
जर्मनी का साइकोशिया प्रान्त- वतज्लो कस्बा-वहाँ अब से कोई 200 वर्ष पूर्व एक गरीब कुम्हार परिवार रहता था। उस परिवार की एक युवा लड़की का पड़ौस के युवक कुम्हार से प्रेम हो गया दोनों शादी करने के इच्छुक थे, पर लड़की का पिता इस पर सहमत न हुआ। वह अपनी लड़की को बहुत प्यार करता था और ऐसे लड़के से विवाह करना चाहता था जो बहुत ही पुरुषार्थी हो। इस कसौटी पर उसे वह लड़का कुछ जंच नहीं रहा था। सो उसने विवाह की स्वीकृति नहीं दी और कोई दूसरा पुरुषार्थी ढूँढ़ता रहा।
यह बात उस युवक को चुभ गई। उसने समझ लिया, प्रेम की भले ही अपनी विशेषता हो पर उसमें आकर्षण तभी आ सकता है जब उस पर पुरुषार्थ की खराद चढ़ी हुई हो। शादी के लिये प्रेमी होना ही पर्याप्त नहीं, उस उत्तरदायित्व को निवाहने के लिए पुरुषार्थ भी असाधारण ही होना चाहिए। सो उसने निश्चय किया कि वह एक ऐसा बर्तन बनायेगा जो उसके प्रेम का ही नहीं पुरुषार्थ का भी प्रमाण प्रस्तुत कर सके। यह बर्तन एक विशालकाय घड़ा था, जो दस वर्षों में बनकर तैयार हुआ। इस बीच न प्रेमी ने कहीं मन डुलाया और न प्रेमिका ने दूसरा घोंसला ढूँढ़ा। घड़ा - मजबूती की दृष्टि से ही नहीं उसे कला की दृष्टि से भी सर्वांग सुन्दर बनाया गया था। उस पर जो कलात्मक खुदाई और चिताई की गई उससे प्रतीत होता है कि- कितने मनोयोग का उसमें समावेश किया गया है। यह घड़ा सन 1753 में बनकर तैयार हुआ। उसमें जर्मनी माप के अनुसार 3 वशेल्स (लगभग 25 मन) अनाज भरा जा सकता था॥
पुरुषार्थ और प्रेम का प्रतीक यह घड़ा न केवल उन युगल प्रेमियों को विवाह सूत्र में बाँधने में सफल हुआ वरन् उसने राष्ट्रीय ख्याति भी प्राप्त की। कुम्हार ने अपनी कसौटी पर युवक को खरा पाया और इतनी लम्बी और कड़ी परीक्षा में सफल होने के उपहार में अपनी लड़की का उससे विवाह कर दिया। तब से वह महाघट राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है और ‘प्यार का बर्तन’ कहलाता है। उसे हजारों दर्शक देखने दूर-दूर से आते रहते हैं।
आयरलैण्ड के कुक हेवेन नगर में दो बालक एक ही घर में एक ही समय पैदा हुए। एक का नाम था पैट्रिक दूसरे का एलेनर ग्रेडी। अलग परिवार के होते हुए भी उनमें अद्भुत समता थी -दोनों की आकृति ही नहीं प्रकृति भी एक थी। उनकी शादियाँ अलग-अलग स्थानों पर हुई पर हुई एक ही दिन एक ही समय। आश्चर्य की वे बीमार भी एक दिन पड़े और दोनों अलग-अलग स्थानों पर रहते हुए भी 96-96 वर्ष के होकर ठीक एक ही दिन और एक ही समय मर गये।
दोनों में प्रेम भावना असाधारण थी। जब पास-पास रहते तो एक साथ खाते सोते। अलग रहना पड़ता तो भी एक दूसरे की बात सोचते रहते। आश्चर्य यह कि उनमें से किसी पर कुछ दुःख -सुख आता तो दूसरा उसकी अनुभूति तुरन्त अपने भीतर करता।
यह प्रेम भावना, पशु पक्षियों में भी कम नहीं होती। यदि उन्हें कहीं सच्चा प्यार मिल जाता है तो हिंसक पशु भी अपने प्रियपात्र के गुलाम हो जाते हैं। यह आकर्षण सच्चे प्रेम में ही है। बहुधा पशु पक्षी अपने मालिकों को उतना प्यार नहीं करते। इसका कारण उन मनुष्यों की निष्ठुर प्रवृत्ति ही है। एक आत्मा की वास्तविकता को परखने- पहचानने में दूसरी आत्मा को कुछ भी कठिनाई नहीं होती। मस्तिष्क धोखा खा सकता है हृदय नहीं। जो लोग माँस के लिए- देवी पर बलि चढ़ाने के लिए या बूढ़े हो जाने पर कसाई के हाथों बेच डालने जैसी निष्ठुरता के साथ पशु पालन करते हैं उनकी कपटी वृति को पहचानने में भी उन्हें देर नहीं लगती। ऐसे लोगों से वे भी रूखे और खिंचे -खिंचे रहते हैं पर जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी यहाँ तक कि हिंस्र जन्तु भी सघन प्रेम भावना एवं आत्मीयता का परिचय देते हैं।
‘जन्तु और मानव’ पुस्तक के लेखक काल हैगेनवैक ने अपने निजी अनुभव की चर्चा करते हुए लिखा है- एक बार उनने एक युवा बाघ का जोड़ा खरीदा वह बीमार पड़ा तो उनने स्वयं उसके पास जाकर चिकित्सा और परिचर्या की। यह जोड़ा उनसे इतना हिल मिल गया था कि नजदीक आने पर प्यार से विह्वल हो उठता और प्यार से घुरघुराता। पीछे उन्होंने उस जोड़े को बर्लिन की जन्तुशाला को दे दिया। जब कभी वे उससे मिलने जाते तो यह बाघ जोड़ा उनसे पहले की तरह ही प्यार करता और लिपटने की कोशिश करता।
एक कुवियर ने एक पालतू भेड़िये की चर्चा करते हुए लिखा है बचपन में उसे एक व्यक्ति ने पाला था पर बड़ा होने पर उसे जन्तुशाला को दे दिया। वह व्यक्ति जब भी जन्तुशाला में गया तो भेड़िये ने उससे मिलने की आतुरता दिखाई और यदि पास आने का तनिक भी अवसर मिला तो उसने भरपूर प्रेम प्रदर्शित करने की चेष्टा की।
न्यूयार्क हैराल्ड में जेम्स एस॰ मिचेल ने एक स्वामी-भक्त कुत्ते के विचित्र साहस का विवरण छपाया है। कुत्ता आयरलैण्ड का था, एक अमेरिकी स्त्री वहाँ से उसे अपने साथ पानी के जहाज से ले गई। उसने अपने साथ हिलाने के लिए उसे बाँधकर रखा, एक दिन अवसर पाते ही कुत्ता गायब हो गया। अमेरिका के गली-कूचे छानता हुआ वह बन्दरगाह पर आ गया। और जिस जहाज से उसे लाया गया था, उसका इन्तजार करता रहा। पीछे जब वही मैजेस्टिक जहाज आया और आयरलैण्ड लौटने लगा तो चुपके से उसी पर चढ़ गया। मुसाफिरों में हिल-मिल गया लम्बी समुद्री यात्रा उसने बिना टिकट कर ली और आयरलैण्ड पहुँचकर के क्वीनन्स टाउन बन्दरगाह पर उत्तर गया। वहाँ से क्लोन मेल कस्बा एक सौ मील से अधिक है। रास्ता भी ऊबड़-खाबड़ है। इसे पार करता हुआ वह पुराने मालिक के पास पहुँचा। इस लम्बी और दुस्साहसपूर्ण यात्रा में उसे भारी कष्ट और जोखिम उठाने पड़े। पैरों में जख्म हो गये थे। कुत्तों ने काटकर उसके कन्धों पर घाव कर दिये थे, पूँछ कट गई थी और एक आँख बैठ गई थी। इतना सब होते हुए भी अपने पुराने मालिक के पास वह पहुँच ही गया और लिपट कर खूब रोया।
‘जंतुओं की कथा’ पुस्तक में एन्ड्रयू लैग ने उस बढ़ई का विवरण छापा है जिसने एक बाघ के बच्चे को पाला था और बड़ा होने पर उसे चिड़िया घर को दे दिया था। एक बार वह बढ़ई चिड़िया घर गया तो उसने बड़े प्रयत्न पूर्वक यह स्वीकृति प्राप्त की कि वह कटघरे में अपने पूर्व परिचित बाघ के पास जा सके। वह गया तो बाघ ने उसके हाथों को चाटा, अपना सिर उसके कन्धों से रगड़ा कई घण्टे उसके साथ रहा और बढ़ई जब कटहरे से बाहर जाने लगा तो उसने उसे बार-बार जाने से रोका।
जन्तुओं के मित्र पत्रिका में आडाऊ (ब्रिटेन) के कप्तान वाटसन ने अपने घोड़े की और एस0एन0पेज ने एक राजहंस की कथा छापी है जिन्होंने मनुष्यों से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही अपनी प्रेम भावना का परिचय दिया था।
यदि हम अपने भीतर सच्ची प्रेम भावना पैदा करे तो देखेंगे कि उसके प्रकाश में हर कोई अपना प्रियपात्र बनता चला रहा है और हर ओर से प्रेम की वर्षा हो रही है।
मनोविज्ञान शास्त्री फ्राइड का यह बहुचर्चित प्रतिपादन सर्वविदित है कि- काम वासना की अतृप्त इच्छाएं ही मनोविकारों को उत्पन्न करती हैं और उस अवरोध से प्रतिभा कुण्ठित होती है। मानसिक ही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है और व्यक्तित्व दब जाता है। वे कहते रहे हैं मनुष्य इंजन है और कामवासना उसमें बनती-बढ़ती भाप। यदि इस भाप को निकलने का अवसर न मिले तो विस्फोट होगा और व्यक्तित्व बिखर जायेगा। उनने उन्मुक्त काम सेवन की वकालत की है और उस पर लगे प्रतिबन्धों को हानिकारक बताया है।
उस प्रतिपादन ने यौन सदाचार पर बुरा प्रभाव डाला है और लोगों को जितना विश्वास फ्राइड के प्रतिपादन पर जमा है उतना ही असंयम और व्यभिचार को प्रोत्साहन मिला है। सुशिक्षित वर्ग में इस तथाकथित मनोविज्ञान के आधार पर यह मान्यता जड़ जमाती जा रही है कि कामेच्छा की पूर्ति आवश्यक है। उसे स्वच्छन्द उपभोग का अवसर मिलना चाहिए। संयम से शारीरिक और मानसिक हानि होती है। इस प्रतिपादन का कुप्रभाव नर-नारी के बीच पावन सम्बन्धों की समाज व्यवस्था परक सुव्यवस्था एवं पवित्रता पर पड़ रहा है। दाम्पत्य जीवन में यदि कुछ अतृप्ति रह जाती है, तो उसे बाहर पूरा करने में भय, लज्जा, संकोच अनुभव नहीं करता वरन् उस उक्त आचरण को शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक मानता है। यह व्यभिचार का खुला समर्थन है। दाम्पत्य मर्यादाओं को फिर कैसे स्थिर रखा जा सकेगा। अविवाहित या विधुर यदि व्यभिचार पथ पर प्रवृत्त होते हैं तो उन्हें किस तर्क से समझाया जा सकेगा। फिर जो छेड़छाड़ और गुण्डागर्दी की अश्लील शर्मनाक घटनाएं आये दिन होती रहती हैं उन्हें अवाँछनीय या अनावश्यक कैसे ठहराया जा सकेगा। फ्राइड का शास्त्र दूसरे शब्दों में व्यभिचार शास्त्र ही है जिसे मनोविज्ञान में दार्शनिक मान्यता देकर समाज व्यवस्था पर कुठाराघात ही किया जा रहा है। एक तो वैसे ही पशु प्रवृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहन करती थीं- सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती थीं, इस पर उस प्रवृत्ति को वैज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे तब तो ब्रह्मचर्य और दाम्पत्य जीवन की पवित्रता का ईश्वर ही रक्षक है।
फ्राइड कहते हैं ‘मनुष्य बचपन से ही’ ईडिफुस कम्प्लेक्स’ में यौन आकाँक्षा अथवा यौन ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौन आकाँक्षा अथवा यौन ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौनाकाँक्षा से प्रेरित होता है और लड़की बाप के प्रति आकर्षित होती है। तीन वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने के लिए व्याकुल रहता है। एकाध साल बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा सम्बन्ध पहले से ही है तो उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जग पड़ती है। यह विद्वेष उसकी अवचेतना में आजीवन बना रहता है। इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है। इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की मानसिक प्रगति रुक जाती है और ‘ईडिफस कम्प्लेक्स’ उसके सामने तरह तरह के अवरोध खड़े करता है। यह स्थिति अपवाद नहीं वरन् साधारणतया प्रायः यही होता है।’
यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है। छोटा बच्चा यौन आकाँक्षाओं से पीड़ित होगा सो भी अपनी माँ के साथ, यह बात समझ में नहीं आती। पशु-पक्षियों के शरीरों में भी वासना तब उठती है, जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ़ हो जाते हैं। पर मनुष्य बालक को वह वृत्ति इतनी छोटी आयु में ही कैसे पैदा हो जाती है और फिर माँ के साथ वैसी तृप्ति करने की उसकी शारीरिक मानसिक स्थिति भी तो नहीं होती। फिर तीन वर्ष के बालक को काम प्रयोग और उनमें माँ बाप के संलग्न होने की जानकारी कहाँ से हो जाती है। फिर वह यह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए। यह ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं जिसके लिए भर्त्सना ही की जानी चाहिए पर दुर्भाग्य यह है कि उन्हीं विचारों को मनोविज्ञान शास्त्र का आधार मान लिया गया है और उन्हें ही पढ़ने पढ़ाने की बात शिक्षा क्षेत्र में बिना किसी ननुनच के स्वीकार करली गई है।
फ्राइड ने अपनी तराजू पर सारी दुनिया को तोलने की गलती की है। उनका निज का जीवन क्रम अवश्य कुछ ऐसे ही बेतुके क्रम से विकसित हुआ। फ्राइड की माता अमेलिया असाधारण सुन्दरी थी। उसने योकोव के साथ अपना दूसरा विवाह किया था। जब फ्राइड जन्मा तब वह इक्कीस वर्ष की थी। बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी। सम्भव है कुछ समझ आने पर फ्राइड की उसके रूप में यौनाकाँक्षा भड़की हो और उसने माँ के प्यार को ‘प्रणय’ माना हो। वह जन्म से ही उद्दण्ड और ईर्ष्यालु था। एक दिन वह माता-पिता के सोने के कमरे में घुस गया ओर उन दोनों को विचित्र परिस्थिति में डालकर हड़बड़ा दिया। हो सकता है उसे इस स्थिति में ईर्ष्या उत्पन्न हुई हो। सात साल का था तो एक दिन बाप की ओर मुँह बनाकर चिढ़ाने लगा। बाप ने उसे डाँटा और कहा यह छोकरा जिद्दी और निकम्मा बनता जाता है।
यह घटनाएं फ्राइड ने स्वयं लिखी हैं। उस पर, सम्भव है अपने माँ बाप के सम्बन्ध में वैसी ही छाप पड़ी हो, जैसी कि उसने प्रतिपादित की है पर यह एक विशेष मनःस्थिति के विशेष लड़के की ही बात कही जा सकती है। इसे सर्वसाधारण पर घटित नहीं किया जा सकता है। साधारणतया बालक अपने माता-पिता के प्रति भाव भरे रहते हैं। उसके प्रति श्रद्धा, ममता और आदर का भाव रखते हैं। उनके साथ रहने के लिए प्रसन्नता अनुभव करते हैं। बाप को देखकर ईर्ष्या की आग में जल मरने वाले और माता से यौन सम्बन्ध स्थापित करने के इच्छुक तो कोई विरले ही होते होंगे। यदि सभी ऐसे होते तो लड़कियाँ अपनी माँ को और लड़के बाप को मार डालने का प्रयत्न करते और बड़े होने पर वह अचेतन वृत्ति बाप बेटी और माँ बेटे से ही शादी करा देती। तब विवाह सम्बन्ध ढूँढ़ने का झंझट ही दूर हो जाता।
इस प्रकार के प्रतिपादन का उत्साह सम्भवतः फ्राइड को पाश्चात्य धर्म मान्यताओं से भी मिला होगा। क्योंकि उनका तत्वदर्शन कुछ ऐसा ही झटापटा है।
यहूदी और ईसाई धर्म मान्यताओं के अनुसार मनुष्य जन्मजात पापी है। वह पाप वृत्तियाँ लेकर अवतरित हुआ है। उसकी प्रकृति पापमूलक है। इस ‘ओरीजिनल सिन’- को ही सम्भवतः फ्राइड ने मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्ति माना है। जो कुछ वह सोचता है, करता है उसमें पाप ही प्रधान होना चाहिए। पापों में से प्रधानता किसे दी जाये। फ्रायड को इसके लिए सबसे सरल और आकर्षक सेक्स ही जँचा और उसने यह मान्यता गढ़ डाली कि मनुष्य की स्थिरता एवं प्रगति सेक्स पर अवलम्बित है। उसकी निरन्तर इच्छानुरूप- स्वच्छन्द पूर्ति न हो सकेगी तो मन में कांप्लेक्स-ग्रन्थियाँ बनेंगी। मनोविकार उत्पन्न करेंगी, बीमारी लायेंगी और न जाने क्या-क्या करेंगी। इसलिए उन समस्त उपद्रवों और हानियों से बचने का एक ही आकर्षक तरीका है कि स्वच्छन्द काम सेवन की सुविधा प्राप्त की जाय। इस दिशा में लगे हुए प्रतिबन्धों और मर्यादाओं को अमान्य किया जाय। स्वेच्छाचार और स्वच्छन्दतावाद सम्भवतः इसलिए उन्हें उचित प्रतीत हुआ क्योंकि वह उस दर्शन में- जिसमें फ्रायड पले यह माना जाता है कि मनुष्य जन्मजात पापी है। पाप उसकी प्रकृति है। जब ऐसा ही है तो उस मूल प्रवृत्ति को क्यों रोका जाय ? यही है फ्राइड का अधूरा और बेतुका चिन्तन जिसे न जाने क्यों विचारशील लोगों ने आँखें बन्द करके स्वीकार कर लिया है।
मनुष्य की प्रकृति में कामुकता का भी एक स्थान है, पर वह है सीमित, उसे मान्यता मिली है, उसे हर्षोल्लास के विकास की दृष्टि से प्रयुक्त भी होने दिया जाता है, पर उसकी दिशा ऊँची रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि वह ऊर्ध्वगामी होकर विकसित हो। विवाह के समय पत्नी प्रियतमा व प्रेयसी होती है, रस रंग में सहायक होती है, पर उसकी इस स्थिति की अवधि बहुत स्वल्प है। जल्दी ही वह माँ बन जाती है और फिर पति भी-पत्नी भी अपने उत्तरदायित्वों और गृहस्थ के कर्तव्यों को देखते हुए-बालकों पर पड़ने वाले प्रभाव का ध्यान रखते हुए उस प्रणय प्रवृत्ति को जल्दी ही शालीनता में परिणत करने लगते हैं। आरम्भिक दिनों में चन्द्र वदनी, मृगनयनी आदि कहा जाता था पर थोड़े ही दिनों बाद वह मुन्नी की मम्मी, श्याम की माँ कहकर पुकारी जाती है। फिर परस्पर सम्बोधन बच्चों के नाम पर उनकी माता जी या उनके पिताजी कहकर किये जाते हैं। वासनात्मक दृष्टिकोण बदलकर अभिभावकों का- बुजुर्गों का- बन जाता है। यह स्वस्थ दृष्टिकोण है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की चार उपलब्धियों में एक गणना काम की भी है, पर उसकी प्रधानता नहीं तीसरा नम्बर है। पहले धर्म कर्त्तव्य- इसके बाद अर्थ पुरुषार्थ- तब कहीं काम- सो भी तुरन्त छुटकारे से- मोक्ष से- तनिक ही पूर्व सूर्य चन्द्र पर ग्रहण लगता तो पर उसका मोक्ष काल भी जल्दी ही आ जाता है। यही है तथ्यपूर्ण काम मर्यादा।
माना कि पशु प्रवृत्तियाँ भी मनुष्य के भीतर हैं पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि उन्हें खुलकर खेलने के लिए छुट्टल कर दिया जाय। उनका उदात्तीकरण ही तो ‘संस्कृति’ है। बालों को काट-छाँट कर साज-संभाल कर ही तो उन्हें सुन्दर बनाया जाता है। यदि उन्हें मूल रूप में ही बढ़ने दिया जाय तो फिर मनुष्य की शकल आदम मानव जैसी कुरूप बन जायेगी। बगीचे की कटाई, छंटाई, खुदाई-निराई न की जाय तो वह झाड़-झंखाड़ के रूप में कुरूप बना खड़ा होगा। पशु प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण ही तो ‘कला’ है। कला रहित को सींग, पूँछ रहित पशु कहा गया है। ‘काम’ को भारतीय दर्शन में भी उसके मूल स्वरूप में स्वीकार किया गया है और उसका सम्मान भी किया गया है। उसे ‘पाप’ नहीं माना गया वरन् हर्षोल्लास, विनोद, कौतुक के भावान्दोलन का लाभ लेकर उसे श्रद्धा सिक्त अभ्यास की दिशा में उन्मुख कर दिया गया है। शिव लिंग की प्रतिमाएं देव मन्दिरों में पूजी जाती हैं यह नर नारी की जननेन्द्रियाँ ही हैं। उन्हें सृष्टि बीज-चेतना केन्द्र के रूप में श्रद्धासिक्त दृष्टि से देखा जाता है और अर्चना अभ्यर्थना के उच्च स्तर पर उन्हें बिठाकर वन्दन अभिनन्दन किया जाता है। उच्छृंखल उन्माद के लिए- कोमल भावनाओं के रूप में उन्हें मृदुल रस धारा बनाकर जीवन मरुभूमि में प्रवाहित करना ही ललित कलाओं का उद्देश्य है। शिव द्वारा काम दहन के पौराणिक कथानक ने स्थूल काम सेवन को विक्षोभकारी, असन्तुलन उत्पादन का अपराधी ठहरा कर विवेक के तृतीय नेत्र से उसे भस्म कराया है। साथ ही उसे अशरीरी बनकर अजर-अमर रहने का वरदान भी मिला है और उसे देवताओं की पंक्ति में बिठाया गया है। यही है काम सम्बन्धी परिष्कृत दृष्टिकोण।
पर सन्तोष इस बात का है कि आरम्भ में फ्रायड को जैसा समर्थन मिला था और नवीन सभ्यताभिमानियों ने हर स्तर पर जिस उत्साह से उसकी हाँ में हाँ मिलाई थी, अब वैसी बात नहीं रही। वह जोश ठण्डा पड़ता जा रहा है और संयम सदाचार को वैसा ही उपयोगी माना जाने लगा है जैसा कि प्राचीन काल से माना जाता आ रहा है। विज्ञानवेत्ताओं की नवीनतम शोधें फ्राइड का समर्थन नहीं करतीं वरन् उसे झुठलाती हैं।
लीसेस्टर विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान प्राध्यापक डॉ. डेविड राइट ने अपने शोध पर्यवेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला है कि काम वासना मनुष्य की स्वाभाविक एवं जन्मजात प्रवृत्ति नहीं है, वरन् वह सामाजिक जीवन के प्रचलन द्वारा आरोपित है। उनने पशुओं पर किये गये अपने परीक्षणों से सिद्ध किया है कि काम सेवन के अभाव में कोई जन्तु हिंसक या समाज विरोधी नहीं बनता वरन् वह अपेक्षाकृत अधिक सौम्य हो जाता है। बंध्य बनाये गये, बैल, भैंसे, घोड़े, बकरे, गधे आदि उन्मुक्त काम सेवन करने वाले अपने सजातियों की तुलना में अधिक शान्त प्रकृति के होते हैं जबकि फ्राइड का कहना यह है कि यदि मनुष्य को काम सेवन की छूट न मिले तो वह समाज विरोधी बन जायेगा। यह बात उन्हीं लोगों के लिए सही हो सकती है जो उच्छृंखल वातावरण में रह रहे हैं। साधु प्रकृति के संयमी, सदाचारी और ब्रह्मचारी काम सेवन का अवसर न रहने पर भी न तो हिंस्र बनते हैं और न समाज विरोधी।
श्री राइट ने अनेकों उदाहरणों से यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि यदि कामुकतापूर्ण वातावरण एवं चिन्तन से दूर रहा जाये तो वह प्रवृत्ति स्वयमेव शिथिल या समाप्त हो जाती है। द्वितीय महायुद्ध में पकड़े गये बन्दी सैनिकों तथा साइबेरिया के श्रम शिविरों में बन्द लोगों का पर्यवेक्षण करने पर निष्कर्ष है कि उनकी न केवल रति क्षमता वरन् वह इच्छा भी घट गई अथवा समाप्त हो गई। इसी प्रकार उन्होंने किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों में मनोयोगपूर्वक लगे हुए व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि उन्हें अपने चिन्तन की व्यस्तता में काम सेवन की न तो इच्छा होती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है। सेनानायक, नाविक, पर्वतारोही, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अध्ययन परायण व्यक्तियों की कामेच्छा बहुत स्वल्प होती है और वह भी तब तक जाग्रत नहीं होती जब तक कि वातावरण, संवाद अथवा स्वचिन्तन से ही उस तरह की अतिरिक्त उत्तेजना न मिले।
भारत के नैतिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य संगठन दिल्ली के एक शोध अध्ययन से पता चला है कि काम सेवन की न्यूनता से नहीं वरन् उसकी अति से पारिवारिक कलह उत्पन्न होते हैं। इस दिशा में अधिक आतुर, उत्सुक रहने वाले न केवल शारीरिक दुर्बलताग्रस्त होते हैं वरन् मानसिक सन्तुलन खोकर चिड़चिड़े भी हो जाते हैं और उस अति को अपने ऊपर अत्याचार मानकर विरोध विद्रोह भी करते हैं। पारिवारिक कलह एवं मनोमालिन्य की घटनाओं में इस विग्रह का बहुत बड़ा हाथ पाया गया है। जो लोग मर्यादाओं में रहते हैं उन्हें एक दूसरे से शिकायत होना तो दूर उलटे विश्वास, सम्मान, सन्तोष और सहयोग की मात्रा बढ़ी-चढ़ी रहती हैं।
कामुकता केवल क्रीड़ा कौतुक की तृप्ति तक सीमित नहीं रहती वरन् उसकी मर्यादायें तोड़ कर चलने से अनेक यौन रोग भी पैदा होते हैं। उपरोक्त संगठन ने दिल्ली की 232 वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं की जाँच कराई तो उनमें 212 को यौन रोग निकले और उनके संपर्क में आने वाले हजारों को वह गर्मी, सुजाक जैसी बीमारियाँ लगीं। एक ही विद्यालय में इस प्रकार की छूट से ग्रसित 37 छात्र पाये गये। इसी से मिलती जुलती रिपोर्ट अन्य नगरों की भी हैं। आवश्यक नहीं कि गन्दी सोहबत से ही यह संक्रामक रोग होते हैं। विशुद्ध रूप से पति पत्नी के बीच अमर्यादित काम सेवन चलने से भी इस प्रकार की बीमारियाँ स्वयं में उठ खड़ी होती हैं और फिर उनका दुख बुरी तरह भोगना पड़ता है।
आश्चर्य इस बात की नहीं कि फ्राइड ने ऐसा बेतुका- अविश्वस्त और अप्रमाणित प्रतिपादन कैसे किया। आदमी कुछ भी सोच और कुछ भी कर सकता है। तेज अकल किसी उलटी और औंधी बात को भी सही सिद्ध कर सकती है। अकल एक जादू है उसे जिधर भी जुटा दिया जाय उधर ही चमत्कार उत्पन्न करेगी। तरस उन लोगों की बुद्धि पर आता है जिनने इस बात को आँखें बन्द करके सही मान लिया और इससे भी आगे कदम यह बढ़ाया कि उसे शिक्षा पद्धति में स्थान देकर कच्ची बुद्धि के बालकों को वैसा ही कुछ सोचने के अनैतिक पथ पर धकेल दिया।
एक अमीर ने किसी सन्त की बहुत सेवा की। सन्त का जी आया और वे वहाँ से चलने लगे। अमीर ने प्रार्थना की कुछ ऐसी सौगात देते जाइये जिसके सहारे मैं भगवान तक पहुँच सकूँ। सन्त ने उसे तीन चीजें दीं (1) मोम (2) सुई (3) थोड़े से बाल, और कहा इन्हें गाँठ में बाँध लो। अमीर ने इन चीजों को देखा और अचम्भे से पूछा-इनके सहारे मैं कैसे भगवान से मिल सकूँगा ?
सन्त ने कहा-मोमबत्ती की तरह खुद जलो और दूसरों के लिए रोशनी पैदा करो। सुई की तरह अपने को उघारा रखो पर दूसरों के छेद बन्द कर दो। बालों की तरह मुलायम और लचीले रहो। यह तीन ही सहारे भगवान तक पहुँचने के हैं, सो इन्हें गिरह बाँध लो तो भगवान तक पहुँच जाओगे।
मनः स्थिति की दृष्टि से मनुष्यों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक सृष्टा दूसरे दृष्टा।
सृष्टा वे हैं जो कुछ बनने और बनाने की योजना लेकर चलते हैं और अपनी शारीरिक मानसिक एवं भौतिक शक्तियों को योजनाबद्ध रूप से व्यवस्था पूर्वक नियोजित करते हैं।
दृष्टा वे हैं जो दुनिया की हलचलों, मन की हरकतों और शरीर की गतिविधियों को देखते भर रहते हैं और उनमें से अनुकूलता, प्रतिकूलता के आधार पर- प्रिय अप्रिय का- सुख-दुख का अनुभव करते रहते हैं। देखते रहना ही उन्हें पर्याप्त होता है। इतने में ही उनका सन्तोष समाधान हो जाता है। प्रिय दर्शन की इच्छा से ही वे इधर उधर आते जाते और कुछ करते धरते दीखते हैं। निर्माण में उनकी रुचि नहीं होती।
सृष्टा होने की प्रतिभा कम ही लोगों में पाई जाती है। यद्यपि वह होती सभी में है और अनुकूल परिस्थितियों में विकसित की जा सकती है, पर इस सृजन क्षमता का उपयोग कोई-कोई ही करते हैँ। आमतौर से दृष्टा बनना सरल पड़ता है उसके लिये कोई उत्तरदायित्व नहीं उठाना पड़ता और न कर्तव्य निर्धारित करना पड़ता है। जो हो रहा है उसी से संपर्क बनाने से काम चल जाता है। मनोरंजन की परिस्थितियाँ भी इस संसार में कम नहीं हैं। उन्हें पास ले आना या उनके पास पहुँच जाना कुछ बहुत कठिन नहीं है। यों उसमें भी विनोद के पास खिसक जाना सरल पड़ता है। उसे अपने पास बुलाने में भी तो झंझट उठाना पड़ता है और प्रयत्न करना पड़ता है।
कितने ही व्यक्ति अपने अवकाश का समय, सिनेमा, नाटक, नाच गाने, खेलकूद, सैर सपाटे, गपशप, ताश, शतरंज जैसे कार्यों में व्यतीत करते हैं। कुछ नहीं हुआ तो रेडियो से हलके फुलके गाने सुनते रहते हैँ। इस कार्य में एकाकी रहने में मजा नहीं आता- साथियों के संग अच्छा रंग जमता है इसलिये ऐसे लोग अपनी ही प्रकृति के और लोग भी तलाश करते रहते हैं। पास नहीं मिलता तो दूर जाते हैं। अथवा ऐसा प्रयत्न करते हैं कि अपने पास-पड़ौस में ही अपनी जैसी मनमौजी प्रकृति के दूसरे लोग ढाले बनाये जायँ। इसके लिये वे तरह तरह के प्रयत्न करते हैं। दोस्ती गाँठते हैं, सज्जनता बरतते हैं, दरवाजों पर चक्कर लगाते हैं, गाँठ से खर्च भी करते हैं और तब तक उस प्रयास में लगे ही रहते हैं जब तक के शिकार भी उन्हीं जैसा मनचला नहीं बन जाता। इस प्रकार यह प्रवृत्ति छूत की बीमारी की तरह यारवासी के साथ-साथ बढ़ती रहते है।
ऐसे लोगों के सामने कोई उद्देश्य नहीं होता, भविष्य की उन्हें कुछ चिन्ता नहीं होती, पारिवारिक तथा सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर उनका कोई ध्यान नहीं जाता, प्रगति और उन्नति की कभी-कभी कल्पना तो करते हैं पर उत्कंठा उसकी भी नहीं होती। हलकी फुलकी दिनचर्या बनाकर बिना बोझ और उत्तरदायित्व का मनमौजी ढर्रा ही उनके अभ्यास में जुड़ जाता है।
ऐसे हलके फुलके ढर्रे पर चलने वाले-उसमें रस लेने वाले लोग या तो ओछे स्तर के होते हैं या बन जाते हैं। क्योंकि प्रतिभा सम्पन्न और प्रगतिशील लोग सदा अपने कामों में व्यस्त रहते हैं। जिनके सामने कुछ बड़ी बात नहीं वे ही इस मटर गश्ती में मस्त रहते हैं। धीरे-धीरे उनमें दोष पनपते हैं और ऐसे वातावरण में दोष दुर्गुण ही भर जाते हैं। मनोरंजन के वातावरण में वे लोग भी घुस पड़ते हैं जो इन अस्त व्यस्त लोगों से लाभ उठायें। नशा जुआ, चोरी-व्यभिचार जैसी कितनी ही बुराइयाँ स्वभावतः ऐसे वातावरण में पलती और पनपती हैं। मनमौजी लोगों का उनमें फँस जाना सरल भी है और स्वाभाविक भी। अस्तु बात शुद्ध मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। अस्तु बात शुद्ध मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। इस स्तर के लोग जब अगला कदम बढ़ाते हैं तो वह अनैतिकता और अवाँछनीयता का ही होता है। इस प्रकार दृष्टा की आरम्भ में हलकी फुलकी जिन्दगी क्रमशः भारी और जटिल होती चली जाती है। अपराधों की और दोष दुर्गुणों की शृंखला सीमित नहीं रहती-उसमें एक के बाद दूसरी कड़ी जुड़ती ही चली जाती है।
कल्पना-उठती उमर ऐसे ही अल्हड़पन को लेकर आती है। नया उत्साह होता है और दुनिया के प्रति नया कौतूहल। तब कुछ करने या बनने की अपने कुछ देखने और कुछ चखने की उत्कंठा प्रबल होती है। उस उभार को दिशा देने का उपयुक्त साधन न हो तो फिर पानी नीचे की ओर ही बहता है। तब मनमौजी बनने का और ऐसी ही चौकड़ी में फँस जाने का ही द्वार खुलता है। समय कटता जाता है और पूँजी चुकती जाती है। तन, मन और धन का जो कोष पास में था वह क्रमशः घटता ही चला जाता है और जब आँख खुलती है तब जिम्मेदारियों को बोझ इतना भारी हो जाता है कि उसे ढोते हुए किसी महत्वपूर्ण दिशा में प्रगति कर सकना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है।
सृष्टा के सामने लक्ष्य रहता है और वह एक दिशा और कार्य पद्धति निर्धारित करता है। उसी संदर्भ में सोचता है और सहयोग दे सकने वालों से संपर्क बढ़ाता है। इस दुनिया में ऐसे सुन्दर व्यवस्था है कि सहयोगी हर क्षेत्र में मिल जाते हैं। नशेबाज, जुआरी, व्यसनी, चोर, व्यभिचारी ही हर जगह फैले नहीं पड़े हैं। सज्जनों और सद्गुणों की भी कमी नहीं। अपना मन हो तो वे भी मिल जाते हैं और सहयोग उस क्षेत्र में भी सम्भव हो जाता है। एक-एक कदम बढ़ाते चलने से लम्बी यात्रा पूरी की जा सकती है। एक-एक बूँद संग्रह करने से घड़ा भर जाता है। लक्ष्य और प्रयत्न यदि जुड़े रहें तो प्रगति निश्चित रूप से होगी भले ही वह परिस्थितिवश धीमी और कष्ट साध्य क्यों न बनी रहे।
मनमौजी लोग प्रगतिशील लोगों के साथ जब अपनी तुलना करते हैं, तो उन्हें जमीन आसमान जितना अन्तर दीखता है। स्कूल में साथ पढ़ने वाले फिसड्डी और गरीब लड़के अब कहाँ पहुँच गये- कितने आगे बढ़ गये जब कि अपने पास सुविधा-साधन रहने पर भी कुछ बन नहीं सका। उठना तो दूर उलटे नीचे ही खिसकते चले गये। और स्थिति में इतना अन्तर पड़ गया जिसे देखकर आश्चर्य होता है।
इस अन्तर की ठीक से समीक्षा न कर सकने वाले लोग सरल सा समाधान भाग्यवाद को ढूंढ़ लेते हैं। वे प्रशंसा या निंदा भाग्य की करते हैं और उसे ही इस उतार चढ़ाव का कारण मानते हैं। पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। मनुष्य के सृष्टा और दृष्टा क्षेत्र में से एक की पसन्दगी ही वह आधार है जिसे अपनाने पर ऊँचे चढ़ना या नीचे गिरना संभव होता है।
दृष्टा मनोरंजन के स्थान और अवसर ढूँढ़ने के लिये मारा-मारा फिरता है। नवीनता जब तक रहती है। तब तक मौज अच्छी लगती है। पुरानी होने पर वही बात नीरस और अप्रिय लगने लगती है। हर रोज एक ही सिनेमा देखना एक ही मिठाई खाना-एक ही गाना सुनना कौन पसन्द करता है। नवीन के बिना मनोरंजन में रस ही नहीं रहता। नये अवसर कहाँ तक आयें, नई विनोद सामग्री कहाँ तक मिले ? मन में अतृप्ति ही बनी रहती है। समय, श्रम, मनोयोग, धन की प्रचुर मात्रा खर्च करते रहने पर भी अभाव, असन्तोष और अतृप्ति का ही अनुभव होता है उतने साधनों का सदुपयोग करके जो कहने लायक प्रगति हो सकती थी उसका घाटा प्रत्यक्ष ही है। दृष्टा प्रवृत्ति जिस प्रसन्नता और तृप्ति को लक्ष्य मानकर मुखरित हुई थी उससे सदा उसे वंचित ही रहना पड़ता है। जो मिलता है वह आकाँक्षा की तुलना में अति स्वल्प ही ठहरता है और असन्तोष ही बना रहता है।
सृष्टा का मनोरंजन उसका कार्य, प्रयत्न पुरुषार्थ, साहस और लक्ष्य स्वयं ही बन जाता है। उसे अपनी चेष्टा में स्वयं ही रस आता है। उज्ज्वल भविष्य के सपने उत्साह भरते हैं और उसी जैसे अन्य प्रगतिशील साथियों का संपर्क सहयोग नया प्रकाश देता रहता है। सृष्टा देखता है कि उसने न केवल स्वयं ही प्रगति की वरन् अपने संपर्क और प्रभाव में आने वाले लोगों को प्रगतिशीलता के लिये प्रकाश प्रोत्साहन भी प्रदान किया, यह संतोष उतना गहरा और स्थायी होता है कि उसकी सुगन्ध देर तक बनी रहती है और ऊँचे दर्जे का संतोष समाधान मिलता रहता है।
यह सोचना सही नहीं कि प्रगतिशील और कार्य व्यस्त लोग मनोविनोद से वंचित रह जाते हैं और रूखा और नीरस जीवन जीते हैं। यदि ऐसा होता तो वे अपना काम लम्बे समय तक तन्मयता के साथ कर ही नहीं सकते थे। मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि अरुचिकर कार्य देर तक नहीं किया जा सकता, उसमें जल्दी ही थकान आती है, जी ऊबता है और सफलता का स्तर गया गुजरा रहता है। जिसमें रस न आए ऐसा काम छोड़ते ही बनता है कोई लम्बे समय से तत्परता और रुचि पूर्वक किसी काम को कर रहा है इसका तात्पर्य निश्चित रूप से यह है कि उसे उसमें मनोरंजन के तत्व मिल गये।
काम का वर्गीकरण करके कुछ-कुछ देर बाद उस प्रक्रिया में थोड़ा हेरफेर करते रहने की पद्धति सभी कार्यनिष्ठ लोग जानते हैं फलतः उन्हें न थकान की शिकायत होती है न मनोरंजन की कमी अखरती है।
मनोरंजन के साधन बाहर तलाश करने के लिये मारे-मारे फिरना दृष्टा वर्ग को ही पसन्द आता है। सृष्टा मनोरंजन के पीछे नहीं भागता वरन् उसे अपने क्रिया कलाप में से स्वयं ही उत्पन्न करता है।
सृष्टा और दृष्टा के वर्गीकृत क्षेत्रों में से अपने लिये कौन-सा उपयुक्त पड़ेगा इस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए और यदि सृष्टा पक्ष भारी लगता है तो सारी हिम्मत बटोर कर अपने मानसिक क्रिया कलाप को उसी ढाँचे में ढालने के लिये उठ खड़ा होना चाहिए।
तीन दिन से पत्नी और बच्चों को भोजन न मिला था। गृह-स्वामी प्रयत्न करने पर भी एक समय का भोजन न जुटा सका। अन्ततः वह निराश हो गया उसे अपना जीवन बेकार लगने लगा। वह अपने घर से चला आया और आत्म-हत्या करने की तैयारी पर विचार करने लगा कुछ क्षण बाद वह व्यक्ति संसार से विदा होने को था।
पीछे से किसी ने कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-मित्र ! इस मूल्यवान जीवन को खोकर तुम्हें क्या मिलेगा? निराश होने से तो कोई लाभ नहीं। मैं मानता हूँ कि तुम्हारे जीवन में आई हुई विपत्तियाँ ऐसे करने के लिए विवश कर रही हैं, क्या तुम इन विपत्तियों को हँसते हँसते पीछे नहीं ढकेल सकते?
आत्मीयता से परिपूर्ण शब्दों को सुनकर वह युवक रो पड़ा। सिसकियाँ भरकर अपनी मजबूरी की सारी कहानी सुना दी। अब तो सुनने वाले व्यक्ति की आँखों में आँसू थे। यह सहृदय व्यक्ति जापान का प्रसिद्ध कवि शिनीची इगुची था।
उस युवक की परेशानियों ने भावुक कवि शिनीची को प्रभावित किया। उसने वहीं संकल्प किया कि मैं अपनी कमाई का अधिक से अधिक भाग उन व्यक्तियों की सेवाओं में लगाया करूंगा जो अभावग्रस्त हैं। उस समय कवि शिनीची ने युवक के परिवार की भोजन व्यवस्था हेतु कुछ धनराशि दे दी पर घर लौटकर उसने एक गुप्त दान पेटी बनाई और मुख्य चौराहे पर लगवा दी।
उस पेटी के ऊपर लिखा गया ‘जिन सज्जनों को सचमुच धन की आवश्यकता हो वह इस पेटी से निकाल कर अपना काम चला सकते हैं यह धन यदि कतिपय अभावग्रस्त व्यक्तियों की सहायता में लग सका तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। धन्यवाद !’ उस पेटी पर नाम किसी व्यक्ति का न था। क्योंकि शिनीची की कर्म और सेवा में आस्था थी वह लोकेषणा से बहुत दूर थे।
सम्राट ब्रह्मदत्त के पुत्र को दक्षिणाँग पक्षाघात हो गया। दाहिने हाथ, पैर, दाहिनी आँख, दाहिने कान—शरीर के समस्त दक्षिण पार्श्व ने अपनी क्षमतायें खो दीं। इस आकस्मिक संकट के कारण सम्राट के शोक का पारावार न रहा।
समस्त पाँचाल प्रदेश के वैद्यों ने जाँच की। राजधानी काम्पिल्य एक से एक गुणी और चतुर वैद्यों से भर गई पर न तो कोई इस संकट के कारण की ही खोज कर सका और न उसका निराकरण ही। वे यह अनुभव कर रहे थे कि यह कष्ट पूर्व जन्मों के दुष्कृतों का प्रतिफल है। अतएव उसका उपचार भी कोई ऐसा पण्डित ही कर सकता है जो जीवन की सूक्ष्म अन्तरंग विद्या का ज्ञाता हो। वैद्य लोग तो हार मान-मानकर अपने घर वापस लौट गये।
राज प्रासाद के कीर्ति शिखर पर पूजनी पक्षी का एक घोंसला भी था उसमें बैठी चिड़िया इस सारे दृश्य को बड़े ध्यान से देख रही थी—उसका एक कारण यह भी था कि उसके दो बच्चों में से एक बच्चे को भी ठीक राजकुमार के समान ही पक्षाघात हो गया था। पूजनी उस रहस्य को जानती थी कि उसके बच्चे के रूप में और राजकुमार के रूप में यह जो दो आत्माएं प्रकारान्तर से एक ही भवन में एक ही समय- एक ही प्रकार से रोग ग्रस्त हुई हैं वह मनोमय जगत की एक सुनिश्चित विज्ञान—प्रक्रिया के अंतर्गत है-मन की भी तरंगें होती हैं, हर विचार-हर कर्म की प्रतिक्रिया जब एक निश्चित दूरी पार कर लौटती है तब तक जीवात्मा भले ही अपना चोला बदल चुकी हो पर वह उसके प्राण-तत्व में प्रतिध्वनित होकर कर्मफल के रूप में प्रकट होती है। अनेक आधि-व्याधियाँ जिनका कारण मनुष्य नहीं खोज पाता वह सब पूर्वकृत कर्मों का ही परिणाम होती हैं और उनका उपचार भी कोई सर्वज्ञ या प्रायश्चित प्रक्रिया ही कर सकती है, यह बात पूजनी खूब अच्छी तरह समझती थी-पर पक्षी योनि में होने और मनुष्य जैसी वाणी उपलब्ध न होने के कारण वह कुछ कह—बता नहीं सकती थी।
पूजनी का बच्चा और राजकुमार दोनों ही पूर्व जन्म में मित्र थे, एक बार वन में भ्रमण करते समय उन्होंने एक मृग के बच्चे के शरीर के दक्षिणी भाग में प्रहार कर मार डाला था। उसी पाप का फल उन्हें अब भुगतान पड़ रहा था; यद्यपि देखने में वे निर्दोष जैसे लगते थे। मनुष्य जाति के साथ चिरकाल से यही होता चला आ रहा है। भगवान् अपनी इस व्यवस्था के लिये विवश है, भले ही उसे कोई कितना ही कठोर क्यों न कहे।
पूजनी चिड़िया उड़ी और समुद्र के किनारे-किनारे दूर तक घूमी—वहाँ से वह दो अमृत के समान मीठे फल लाई—एक उसने अपने बच्चे को खिलाया एक राजकुमार को। बच्चा भी स्वस्थ हो गया और राजकुमार भी। पूजनी की इस अनुकंपा ने उसके बच्चों को सारे परिवार का स्नेह भाजन बना दिया। राजकुमार इन बच्चों के साथ ही खेला करता किन्तु अपने पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण एक दिन उसने उस चिड़िया के बच्चे को ही मार डाला पूजनी को यह देखकर बड़ा दुःख हुआ। शोकाकुल पूजनी विलाप करती हुई अपने दूसरे बच्चे को लेकर वहाँ से चलने लगी तो सम्राट् ब्रह्मदत्त बहुत दुःखी हुये। अपने उपकारी के प्रति कृतज्ञता के भाव व्यक्त करते हुये उन्होंने पक्षी से घर न छोड़ने का आग्रह किया।
पूजनी बोली तात! आपकी इस सौजन्यता का आभार मानती हूँ किन्तु नीति यह कहती है कि जिससे एक बार शत्रुता हो जाये ऐसे कुसंस्कारी—व्यक्ति का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। अभी तो मेरा एक ही पुत्र नहीं रहा पीछे आपका दुष्ट बालक मेरा सर्वनाश ही कर सकता है। अतः समय रहते मुझे आपका गृह-त्याग कर ही देना चाहिए।
यह कहकर उड़ गई और फिर वह कभी वहाँ लौटकर नहीं आई।
किसी समय अमेरिका के सुन्दर झरने जो अपनी प्राकृतिक छटा के कारण प्रकृति प्रेमियों का मन ललचाते थे और लोग वहाँ कुछ समय बिताकर शाँति प्राप्त करने के लिये जाया करते थे; अब उनके किनारों पर बड़े-बड़े सूचना बोर्ड लगे हैं—डेन्जर, पोल्यूटेड वाटर, नो स्विमिंग, खबरदार, पानी जहरीला है, इसमें तैरिये मत! औद्योगिक नगरों के निकटवर्ती सरोवर एक प्रकार से मृतक संज्ञा में गिने जाते हैं। उनका पानी किसी के उपयोग में नहीं आता। नदियाँ अब गंदगी बहाने वाली गटरें भर रह गई हैं। ह्वाइन नदी को योरोप की गटर कहा जाता है।
स्वीडन सरकार ने डिडेलालबेन नदी को अपना प्राकृतिक रूप बनाये रहने के लिए सुरक्षित घोषित कर दिया है। यह इसलिए किया गया कि बढ़ती हुई औद्योगिक प्रगति कुछ दिनों में इस संसार की जल राशि की शुद्धता को नष्ट कर देगी, पानी में सर्वत्र विष भरा होगा। मजबूरी में पीना तो उसे ही पड़ेगा और उसके दुष्परिणाम भी कष्टकर असाध्य रोगों के रूप में सहने ही होंगे। तब भावी पीढ़ियाँ यह जानना चाहेंगी कि शुद्ध जल कैसा होता है? इसके लिए कम से कम जल देवता का एक तीर्थ तो रहना ही चाहिए जहाँ उसे अपने असली रूप में देखा जा सके। पुरातत्व संग्रहालय इसी लिए बनाये जाते हैं कि भूतकाल की झाँकी देख सकना संभव हो सके। अगले दिनों भी यह नदी शुद्ध जल ही प्रवाहित करती रहे और एक दर्शनीय स्थान समझी जाय इसलिए इसमें मल मूत्र अथवा कारखानों की गन्दगी डालने पर प्रतिबंधित रखा गया है।
ऐरिजोना के प्रोफेसरों की एक समिति ने जनता की ओर से ताँबा बनाने वाली छह फैक्ट्रियों पर दो अरब डालर का दावा किया है। वादियों का कहना है कि इन कम्पनियों ने जनता की जान-माल की जो अपार क्षति की है उसके बदले इन्हें इतना हरजाना तो देना ही चाहिए।
ऐसा ही एक मुकदमा जनता की ओर से न्यूयार्क की प्रमुख महिलाओं ने डी0डी0टी0 बनाने वाली 3 कम्पनियों के विरुद्ध दायर किया है और 3 अरब डालर की इस आधार पर माँग की है कि उनके उत्पादन ने जन स्वास्थ्य को भारी हानि पहुँचाई है।
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड की सरकार को चेतावनी दी है कि यदि वायु प्रदूषण घटाने के कारगर उपाय न किये गए तो यह खतरा लन्दन के लिये तबाही ही खड़ी कर देंगे।
विशेषज्ञों की यह भी कल्पना है कि यदि प्रदूषण की रोक थाम न हुई और औद्योगिक प्रगति बढ़ती चली गई तो जलवायु में बढ़ी हुई विषाक्तता मनुष्य के वर्तमान स्वरूप में ही ऐसा परिवर्तन कर सकती है जो विष ही खाये, विष ही पिये और उसकी आकृति प्रकृति सब कुछ बदल कर विषधर सर्प के स्तर की बन जाय।
रसायन विशेषज्ञ नारवल्ड डफिमराइट ने नार्वे की सेन्ट फ्लेयर झील से पकड़ी गई मछलियों का रासायनिक विश्लेषण किया तो पारे की खतरनाक मात्रा पाई गई। मछलियों में पारा कहाँ से आया? अधिक बारीकी से पता लगाया तो मालूम हुआ कि औद्योगिक रसायनों में पारे की भी एक बड़ी मात्रा होती है और वह गन्दगी के रूप में बहती हुई झीलों में पहुँचती है। सोचा यह गया था यह पारा भारी होने के कारण जल की तली में बैठ जायगा। कुछ मछलियाँ यदि पारे से मर भी गई तो कुछ विशेष हानि न होगी। पर वह अनुमान गलत निकला।
शोधों ने बताया कि जल में पहुँच कर पारे की रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। उसकी सूक्ष्म मात्रा जीव कणों में प्रवेश कर जाती है। इन्हें छोटे कीड़े खाते हैं और वे मछलियों की खुराक बनते हैं इस प्रकार पारे की रासायनिक प्रतिक्रिया मछली के माँस में एक इकाई बनकर बस जाती है। विश्लेषण कर्त्ताओं ने बताया है कि इस प्रकार की पारा प्रभावित मछलियों को खाने वाले मनुष्य अन्धे या पागल हो सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में तो वे मर भी सकते हैं।
इस वैज्ञानिक निष्कर्ष के उपरान्त उद्योगों में पारे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाये गये हैं। इस प्रकार के उद्योगों में कागज निर्माण और समुद्री जल में से क्लोरीन निकालने वाले कारखाने अग्रणी थे।
इस निष्कर्ष ने अमेरिका को भी चौकन्ना किया है उसने भी अब पारे के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाया है फलतः उसमें 86 प्रतिशत कमी तत्काल कर दी गई है। फिर भी यह प्रश्न तो है ही कि पारे की जो मात्रा जल में चली गई उसका प्रभाव अभी कम से कम 50 वर्ष तक तो बना ही रहेगा। उसके द्वारा होने वाली हानियों से कैसे बचा जाय?
पारे की ही भाँति कुछ और भी ऐसे ही रसायन हैं जिनका खतरा कम नहीं कुछ ज्यादा ही है। उन्हें भी उद्योगों में भरपूर मात्रा में प्रयोग किया जाता है और उनका कचरा भी जल दूषण में अग्रणी ही रहता है। डार्ट माउथ मेडीकल कालेज के डॉक्टर हैनरी श्रुडर ने अमेरिकी प्रशासन को चेतावनी दी है कि सीसा, कैडमियम, निकिल कार्वोनिला जैसे पदार्थ भी कम घातक नहीं हैं। इनका प्रयोग इन दिनों बहुत चल पड़ा है। इनकी अति सूक्ष्म मात्रा भी रक्तचाप एवं फेफड़े का केन्सर उत्पन्न कर सकती है।
अमेरिका में कचरा वृद्धि का एक और कारण है। वहाँ 48 अरब डिब्बे, 28 अरब बोतलें, 10 करोड़ टायर, 70 लाख मोटर गाड़ियाँ हर साल कचरा बन जाती हैं। इसी तरह की और भी बहुत सी चीजें हैं जिनको रद्दी हो जाने के बाद कचरा ही बनना पड़ता है और फिर उसे समुद्र में पटक दिया जाता है। फलतः यह कूड़ा समुद्र तट के किनारे को खतरा बनाता जा रहा है। इस कचरे में गन्दगी जड़ जमाती है। थोड़ा इस्तेमाल करो। ‘फेंक दो और नया खरीदो’ का नारा उस देश की विलासिता और समृद्धि बढ़ाने में कितना सहायक सिद्ध हुआ यह तो समय ही बतायेगा पर उससे कचरे में असाधारण वृद्धि हुई है। लोग अपनी पुरानी मोटरों के प्लेट उतार कर कहीं यों ही छोड़ जाते है। कारों के कब्रिस्तान हर जगह मौजूद मिलेंगे, डिब्बे और बोतलों को कोई उठाता तक नहीं। इस समस्या से क्षुब्ध जनता ने ‘अर्थ डे’ मनाया और यह कचरा उनके बनाने वाली फैक्ट्रियों के दरवाजे पर पटक कर पहाड़ लगा दिये और माँग की बनाने के साथ-साथ इनके रद्दी होने पर इनका कचरा उठाने की जिम्मेदारी भी वे ही लें।
पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाने और विषाक्त तत्वों के बढ़ जाने से वहाँ वृक्ष वनस्पति विषैले होकर मर रहे हैं। बादलों में भी यह विष मिल जाता है और फिर जहरीली वर्षों के रूप में बरसता है, उससे पक्षी और पौधे दोनों ही झुलसते देखे गये हैं। मछलियाँ मरती घटती जा रही हैं। जो उन्हें खाते हैं वे बीमार पड़ते हैं। अब वहाँ जहरीली मछलियों की एक नई जाति विकसित हो रही है जिसे ‘कार्प’ कहते हैं। इसने जहर भरे पानी में रहना और जीना तो सीख लिया है पर मच्छीमारों के लिए तो ये किसी काम की नहीं रहीं।
अमेरिका में हर साल 70 लाख मोटरें तथा 10 करोड़ टायर कचरा बन जाते हैं। वहाँ 20 करोड़ लोगों के पीछे साढ़े आठ करोड़ मोटर हैं। अकेले लॉसएंजेल्स नगर में ही 20 लाख आबादी में 10 लाख मोटरें हैं। वहाँ नई मोटर 300 डालर की मिल जाती है। ऐसी दशा में पुरानी गाड़ियों की मरम्मत महंगी पड़ती है। पुरानी होते ही उन्हें कूड़े में फेंक दिया जाता है। यही हाल मोटर साइकिलों तथा दूसरी मशीनों का है। यह कचरा कहाँ फेंका जाता रहेगा यह प्रश्न उस देश की सरकार के लिए सिर दर्द बना हुआ है। फिलहाल तो यह कबाड़ समुद्र में गिराया जा रहा है पर वह भी तो यह पहाड़ गिरते-गिरते पटने की लगेगी। समुद्र तटों का तो अभी भी बुरा हाल है। वहाँ इस कचरे की सड़ाँद निकट भविष्य में किसी बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।
सागर अन्तराल के शोधकर्त्ता जैक्वीस वाइवस ने समुद्र में बढ़ती हुई अशुद्धता को शोचनीय स्थिति में पाया है और जल दूषण से समुद्रों की उपयोगिता नष्ट होने की आशंका व्यक्त की है। उनने तेल कणों तथा दूसरे विषाक्त रसायनों की मात्रा बढ़ जाने के फलस्वरूप विगत 20 वर्षों में 40 प्रतिशत जल जन्तुओं के मर जाने का हिसाब लगाया है। उनका कथन है कि मछलियाँ ही नहीं वनस्पतियाँ भी समुद्र तल से गायब होती चली जा रही हैं।
कीटाणु नाशक दवाओं में क्लोरीन जैसे पदार्थों का उत्पादन इन दिनों 50 लाख टन से अधिक है। उसकी स्वल्प मात्रा से ही चूहे जैसे छोटे जीव तत्काल मर जाते हैं। वह विष पदार्थ जलवायु में मिलकर इतना व्यापक होता जा रहा है कि ध्रुव प्रदेशों के निवासी मनुष्यों और पक्षियों तक के शरीर में वह तत्व पाया गया है।
कारखानों की गन्दगी घूम फिरकर—नदी नालों में होती हुई अन्ततः समुद्र में जा पहुँचती है। वृक्ष वनस्पतियों पर छिड़के जाने वाले कृमिनाशक विष भी वर्षा जल के साथ समुद्र में ही जा पहुँचते हैं। अणु भट्टियों की राख को भी समुद्र में ही प्रश्रय मिलता है। समुद्र विशाल भले ही हो असीम नहीं है। विष को पचाने की उसकी भी एक सीमा है। वह मात्रा जब बढ़ रही हो तो समुद्र का विषाक्त होना स्वाभाविक है। जमीन की तरह उस जल राशि में भी वनस्पतियाँ हैं, इन तैरने वाली वनस्पतियों से जल जगत के लिये आवश्यक प्राण वायु उपलब्ध होती है। पृथ्वी पर फैली पड़ी प्राण वायु का एक बहुत बड़ा अंश इन जल वनस्पतियों—फिटो प्लैंकटीन—से ही मिलता है, समुद्र का जल जैसे-जैसे विषाक्त होता जाता है इन वनस्पतियों का नाश होता जाता है और फलस्वरूप जल जन्तुओं के लिये ही नहीं धरती पर रहने वालों के लिये भी प्राण संकट उत्पन्न हो रहा है।
समुद्र का जल ही बादल बनकर सर्वत्र बरसता है। बादलों में वह विष घुला रहता है और विषैली वर्षा का जल पीकर उगी हुई वनस्पति भी वैसी ही बनती जाती है। उस घास पर पलने वाले पशुओं का दूध और माँस दोनों ही अभक्ष स्तर के बनने लगे हैं। अन्न और शाक फलों में वे अवाँछनीय तत्व बढ़कर मानव शरीरों में भी वे आरोग्य नष्ट करने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं।
डी0डी0टी0 सरीखे विषाक्त छिड़कावों तथा रासायनिक खादों का प्रचलन घुमा फिराकर मनुष्य शरीर में ही प्रवेश करता है। जहाँ यह प्रचलन अधिक है वहाँ पशुओं के तथा नारियों के दूध में विषाक्तता की मात्रा काफी बढ़ी चढ़ी पाई गई है। इसे पीने वाले बालकों तथा बड़ों को इसका परिणाम भुगतना ही पड़ता होगा।
किसी समय दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में विशालकाय एक गेंडा जैसा पशु रहता था। नाम था उसका—हिपोपोटमस। मनुष्य ने उसे निरुपयोगी समझा और खाल के लोभ में अन्धा-धुन्ध शिकार करके उसका वंश मिटाया। उस समय इसे बुद्धिमत्ता समझा गया था पर पीछे वह भारी मूर्खता सिद्ध हुई। इस जन्तु से जो लाभ होता था उससे वंचित रहना पड़ा और उस क्षेत्र में दूसरे प्रकार की भारी हानियाँ उत्पन्न हुई। हिपो नदियों में घूमता और उसके वजन से उनकी गहराई सम्भलती रहती थी। बेचारा समाप्त कर दिया गया तो नदियों में मिट्टी जमने लगी, वे उथली हो गई और बाढ़ से भारी नुकसान उठाना पड़ा। हिपो के चलने के कुछ रास्ते होते थे वे वजन से नाले जैसे बन जाते थे और नदियों का पानी उनमें होकर दूर-दूर तक पहुँचता था। इस प्रकार वह प्राकृतिक नहरें बनाया करता था और प्यासी जमीन तथा उस क्षेत्र की आबादी के लिए जल सुलभ किया करता था। वह मर गया तो नई नहरें बनना तो दूर वे पुरानी भी बन्द हो गई और जमीन तथा आबादी प्यासी मरने लगी। नदियों की बाढ़ से मलेरिया, हैजा जैसे रोग फैले सो अलग।
शोर और कोलाहल की मात्रा बढ़ जाना कम घातक नहीं। मोटरों की दौड़, कारखानों की मशीनें, जहाजों की भर्राहट, लाउडस्पीकर की चिल्लाहट, बात-चीत का शोरगुल मिलकर इतना विघातक बन जाता है कि उस वातावरण में रहने वाले लोग रक्तचाप, हृदय की तेज धड़कन, अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित हो जाते हैं बड़े कारखाने में काम करने वाले लोग बहरे, चिड़चिड़े थके हुए और मानसिक रोगों से ग्रसित रहने लगते हैं। यहाँ तक कि गर्भस्थ बालक भी इस वातावरण से प्रभावित होकर कई तरह की जन्मजात बीमारियाँ लेकर उत्पन्न होते हैं।
टालमटोल, विस्मृति, सुस्ती और निद्रा ये चार उन लोगों के खुशी मनाने के बजड़े हैं कि जिनके भाग्य में नष्ट होना बदा है। —तिरुवल्लुवर
लोभ और मोह को हम जितना ही पकड़ते हैं, उतना ही उनके बन्धनों में बँधते जाते हैं। सम्पदा को अपने अधिकार में करना चाहते हैं पर होता ठीक उलटा है। हम उलटे सम्पदा के कब्जे में चले जाते हैं, उसी के गुलाम बनकर जीते हैं। परिवार पर अपनी मोह-ममता केन्द्रित करते हैं, उन्हें अपना मानते हैं पर सच तो यह है कि हम उन्हीं के होकर रह जाते हैं। पदार्थों और व्यक्तियों को पकड़ने का नहीं—अपने को छुड़ाने का ही प्रयत्न करना उचित है। संसार को बाँधने में नहीं उसकी शोभा देख कर प्रमुदित रहने और उपलब्धियों का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने में ही बुद्धिमत्ता है।
प्रकाश की ओर से मुँह मोड़ कर छाया के पीछे भागने से छाया आगे बढ़ती जाती है और पकड़ में नहीं आती। लालसा अतृप्त ही रहती है। छाया को बाँधने का प्रयास सफल नहीं होता। पर जब छाया की ओर से मुँह मोड़ कर प्रकाश की ओर चलना आरम्भ करते हैं तो छाया अनुगामिनी बनकर पीछे-पीछे चलने लगती है। भगाने पर भी नहीं भागती। हटाने पर भी नहीं हटती। माया छाया की तरह है। सम्पन्न बनने के प्रयास जितने तीव्र होते हैं तृष्णा उतनी ही बढ़ती है और जो मिला था वह स्वल्प लगता है। आकाँक्षा की तुलना में उपलब्धि की मात्रा स्वल्प रहेगी और अभाव घेरे रहेंगे। पर जब हम उत्कृष्टता का वरण करते हैं, आदर्शों की ओर चलते हैं तो आवश्यकताओं की पूर्ति सरल बन जाती है, न कोई अभाव रहता है न असन्तोष।
उदारता में हानि दीखती है और कृपणता में लाभ प्रतीत होता है पर वस्तुतः यह मान्यता अत्यधिक भ्रम पूर्ण है। त्याग के बिना मिलने का कोई नियम ही इस संसार में नहीं है। मल त्याग न करें तो नया आहार ग्रहण करना संभव ही न होगा। साँस न छोड़ी जाय तो नई प्राण वायु भीतर कैसे जायगी? बीज न गले तो वह वृक्ष कैसे बनेगा? वृक्ष यदि अपने पुष्प न झड़ने दे तो उस डाली पर फल कैसे आवेंगे? फल यदि डाली पर ही चिपके रहें तो अगले वर्ष नये फल वहाँ कैसे लगेंगे?
भेड़ ऊन देती है। प्रकृति उसकी क्षति पूर्ति करती रहती है। रीछ अपने बाल किसी को भी छूने नहीं देता सो उसके बाल जितने थे उससे अधिक नहीं बढ़ते। कृपणता से रुष्ट होकर प्रकृति भी अपना अनुदान बन्द कर देती है। रीछ बनने में नहीं, भेड़ बनने में दूरदर्शिता है।
समस्त विश्व को हम अपनी सम्पदा कह सकते हैं। उपयोग के लिए ललचायें नहीं—अधिकार जमायें नहीं, शोभा देखकर संतुष्ट रहें तो फिर हमारे विश्व स्वामित्व को कोई चुनौती नहीं दे सकता। प्रत्येक जड़ चेतन के साथ अपनी ममता, आत्मीयता जोड़ने का मनुष्य को पूरा-पूरा अधिकार है। इस स्थिति में मनोभूमि को पहुँचा कर ही चिरस्थायी सन्तोष मिल सकता है।
थोड़े से स्त्री, पुत्र, मित्र, कुटुम्बियों को, पदार्थों को ही अपना बताने और उन्हें इच्छानुकूल चलाने की मोह-ममता हमें दुख देगी और निराश करेगी। उनके साथ जुड़े हुए विशेष उत्तरदायित्व के कारण विशेष कर्त्तव्य निवाहें इतना ही पर्याप्त है। आत्मीयता को उस छोटी सीमा में कैद न करें वरन् उन्मुक्त आकाश में उसे स्वच्छन्द विचरण करने का अवसर दें।
संसार में सुख कम नहीं—शोभा, सौंदर्य, सत्कर्म, सद्ज्ञान, सद्भाव, सज्जनता सब कुछ प्रचुर मात्रा में भरे पड़े हैं। करुणा, दया, प्रेम, ममता, सेवा, सहायता जैसी सद् प्रवृत्तियाँ गंगा, यमुना की तरह बहती हैं। उनकी शोभा, सुषमा निरखते हुए उनकी निर्मलता में स्नान करते हुए उतनी ही शान्ति, शीतलता और तृप्ति अनुभव होती है।
पक्षी को पिंजड़े में कष्ट होता है। कैदी बन्दीगृह में पड़ा तड़पता है। पशु का रस्सी तुड़ाकर स्वच्छन्द विचरण करने के लिए मन रहता है। स्वार्थ भरी संकीर्णता की जञ्जीरों में जकड़ा हुआ आत्मा भी निरन्तर क्षुब्ध रहता है। उसे असीम बनने का जब भी अवसर मिलेगा स्वर्गीय शान्ति और जीवन मुक्ति को अपने सामने प्रस्तुत देखेगा।
बुढ़ापा देर तक रोका जा सकता है और मृत्यु को काफी अरसे तक टाला जा सकता है। यह सत्य है। जो जन्मा है उसे जरा और मृत्यु के पाश में भी बँधना पड़ेगा। जिसका आदि है उसका अन्त भी, पर यदि शरीर की समुचित साज सँभाल रखी जाय तो वह निस्संदेह बहुत समय तक नीरोग रह सकता है, दृढ़ता और युवावस्था बनाये रह सकता है और अकाल मृत्यु से बच सकता है। वस्तुतः यह एक बहुत बड़ा लाभ है। इस लाभ से वंचित रहने का, लगभग आधी जिन्दगी बीमारी और अकाल मृत्यु को भेंट कर देने का एक ही कारण है-शरीर के सम्बन्ध में बरती जाने वाली उपेक्षा। यदि इस ओर सतर्कता बरती जाय-तो प्रकृति द्वारा की गई मनुष्य की संरचना को देखते हुए यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि आमतौर से लोग जितनी जल्दी बूढ़े होते और मरते हैं उसमें काफी सुधार किया जा सकता है।
शरीर रचना जिन सूक्ष्म परमाणुओं से हुई है उन्हें ‘जीव कोश’ कहते हैं। जीव कोशों से भरा हुआ कलल जीवन रस (प्रोटोप्लाज्म) कहलाता है। यह रस तेईस मौलिक तत्वों से बना है। इसी को जीवन का मूल आधार समझना चाहिए। मोटे तौर पर यह तत्व आहार से मिलते हैं पर यह प्रतिपादन भी अपूर्ण है क्योंकि जो तत्व आहार में होते ही नहीं वे फिर जीवन रस को कैसे प्राप्त होंगे? आश्चर्य यह है कि वे सभी तत्व जीवन रस को उपलब्ध होते रहते हैं, भले ही आहार में उनका अभाव रहता हो।
जीव कोश बढ़ते हैं और फिर एक से दो होते रहते हैं। जब तक यह वृद्धि और उत्पत्ति का क्रम चलता रहेगा तब तक शरीर भी बढ़ता रहेगा। यह वृद्धि उत्पत्ति रुकते ही शरीर की अभिवृद्धि रुक जाती है। इस प्रक्रिया में जब निर्बलता या गड़बड़ी उत्पन्न होती है तो उसी क्रम से शरीर भी कमजोर या बीमार पड़ता है। इस अन्तरंग कोशीय जीवन पर ही हमारा बाह्य जीवन मरण निर्भर है। जैसे जैसे हमारी आयु बढ़ती है, अवयवों की थकान, घिसट या विकृति भी बढ़ती है, इसका प्रभाव कोशों पर पड़ता है उनकी बाहरी शकल तो यथावत बनी रहती है पर भीतर का ‘जीवन रस’ घटता और सूखता जाता है, उसकी ताजगी और सशक्तता भी घट जाती है यही बुढ़ापे का कारण है। जब जीवन रस अधिक घट जाता है या निकम्मा हो जाता है तो जीव कोश मरने लगते हैं यही मृत्यु का कारण है। देर में या जल्दी जब भी मौत होगी-किसी भी कारण से होगी शरीर के भीतर यही स्थिति पाई जायगी।
कई बार मृत्यु घोषित कर देने पर भी पूर्ण मृत्यु नहीं होती। जीव कोशों में जब तक जीवन रस मौजूद है-भले ही वह न्यून मात्रा में हो-जीवन वापिस लौट आने की सम्भावना बनी रहेगी। कई बार तो वे मौत के 120 घण्टे बाद तक जीवित पाये गये हैं। मरे हुए मनुष्यों के कुछ घण्टे बाद जीवित हो उठने के समाचार यदाकदा मिलते हैं, इनमें यही कारण होता है कि जीवन रस की मात्रा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई होती और उसके सजग हो उठने पर कोश भी काम करने लगते हैं और मृत्यु का स्थान जीवन ले लेता है। यह पुनर्जीवन क्षणिक हो या स्थायी यह भी कोशों की स्थिति और उनमें भरे जीवन रस की स्थिति पर ही निर्भर करता है।
यदि जीव कोषों की—उनमें भरे जीवन रस की विकृति रोकी जा सके। उन्हें पुनः पोषण दिया जा सके तो मनुष्य अति दीर्घजीवी हो सकता है। यह कार्य सिद्धाँततः न तो कठिन है न असम्भव। क्योंकि जीव कोश और जीवन रस को तत्वतः अमर माना गया है। वे अमुक शरीर में ही मरते हैं-उस ढाँचे के ही अनुपयुक्त होते हैं। वस्तुतः उनका विनाश नहीं होता। शरीर के मर जाने पर भी वे अपना मूल अस्तित्व बनाये रहते हैं और किसी अन्य रूप में परिवर्तित होकर अपनी नवीन कार्य पद्धति का पुनः आरम्भ करते हैं। आत्मा की तरह यह जीव कोश भी अमर ही कहे जा सकते हैं।
इन्हें जीर्ण या विकृत होने से जितनी अधिक देर रोका जा सकेगा उतनी ही लम्बी जिन्दगी सम्भव हो जायगी। मृत्यु के बाद जिस तरह वे नया जन्म धारण करके नई जिन्दगी आरम्भ करते हैं उसी तरह की प्रक्रिया यदि पुराने शरीर में आरम्भ कराई जा सके तो उसी काया के रहते पुनर्जीवन आरम्भ हो सकता है। इसे अध्यात्म की भाषा में कायाकल्प कहते हैं। योग और आयुर्वेद की सम्मिलित प्रक्रिया इस प्रयोजन को पूरा करने में कभी सफल भी रही है। च्यवन ऋषि का वृद्ध शरीर अश्विनी कुमार की चिकित्सा से नव यौवन सम्पन्न हुआ था। राजा ययाति ने भी वृद्धावस्था से लौटकर पुनः यौवन प्राप्त किया था।
बुढ़ापा रोकने की इच्छा—चिरकालीन यौवन उपभोग की आकाँक्षा अनुचित नहीं है। भूतकाल में भी इसके लिए प्रयोग और प्रयत्न होते रहे हैं और वे अभी भी चल रहे हैं।
कीव के इन्स्टीट्यूट आफ जिरेंटोलाजी में पिछले दिनों वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी सम्पन्न हुई थी और उन कारणों के जानने पर विचार विमर्श हुआ था जिनके कारण बुढ़ापा आ धमकता है। कारणों का निश्चय हो जाने पर ही उनका निराकरण ढूँढ़ा जा सकता है।
तीस वर्ष तक हमारा शरीर निरन्तर बढ़ता है। इसके बाद वह क्रमशः घटता चला जाता है। यह घटोत्तरी ही अन्ततः हमारी मृत्यु का कारण बनती है। संचित कोश जब खतम हो जायें तो दिवालिया बनने के अतिरिक्त और क्या मार्ग रह जाता है। 30 से लेकर 90 वर्ष की आयु की अवधि में हमारी माँस पेशियों का भार लगभग एक तिहाई कम हो जाता है। उसी के अनुपात से शक्ति घटती चलती है। तन्त्रिका तन्तु इस बीच तीन चौथाई समाप्त होकर एक चौथाई ही बचते हैं। इसलिए मस्तिष्क का शरीर पर उतना नियंत्रण नहीं रह जाता जितना कि आवश्यक है। दिमाग स्वयं एक तिहाई खराब हो जाता है। उसका वजन 3.3 पौण्ड से घटकर 2.22 पौण्ड रह जाता है। गुर्दों में मूत्र साफ करने वाले ‘नेफ्रोन’ घटकर आधे रह जाते हैं जिससे वह पूरी तरह साफ नहीं हो पाता और रक्त में उस अशुद्धता की मात्रा बढ़ती जाती है। काम करते थक और घिस जाने के कारण ज्ञानेन्द्रियाँ अपना आवश्यक उत्तरदायित्व वहन नहीं कर पातीं, उन्हें पोषक तत्व भी शुद्ध तथा उपयुक्त मात्रा में मिल नहीं पाते इसलिए उनकी घिसट की क्षति पूर्ति भी नहीं हो पाती।
25 साल के युवक की तुलना में 80 साल के बूढ़े का दिल प्रायः आधी मात्रा में खून पम्प कर पाता है। यही हालत फेफड़ों की होती है, साँस की सफाई करने में वे अपनी ड्यूटी आधी ही दे पाते हैं। तन्त्रिका तन्तुओं में विद्युत आवेग की दौड़ 20 प्रतिशत शिथिल हो जाती है इसलिए शरीर द्वारा मस्तिष्क को सूचना पहुँचाने में और वहाँ का सन्देश अंगों के लिए लाने में देर लग जाती है। स्थिति के अनुरूप तुरन्त निर्णय लेने या कदम उठाने में बुढ़ापा धीरे-धीरे शिथिलता ही उत्पन्न करता चला जाता है। यही सब कारण हैं जिनसे हम ढलती आयु में क्रमशः मृत्यु के निकट घिसटते चले जाते हैं। शक्ति की कमी, कल पुर्जों का घिस जाना, संचित पूँजी का खर्च, नये उत्पादन में शिथिलता एवं मलों का बढ़ते जाना स्वभावतः शरीर के लिए मरण ही प्रस्तुत करेगा। बुढ़ापा जीवन को मृत्यु के पथ पर धकेलते ले चलने वाली एक ऐसी निर्मम प्रक्रिया हे जिससे बच सकना कठिन दीखता है। बुढ़ापा न टला तो मृत्यु कैसे टलेगी। दोनों एक दूसरे के सगे सहोदर जो हैं।
कोशिकाओं में चलती रहने वाली रासायनिक क्रिया में विषाक्त पदार्थों का अनुपात बढ़ते जाने और प्रोटीन का चालीस प्रतिशत भाग कोलाजेन में बदल जाने से जीवन संकट बढ़ता ही जाता है। त्वचा के नीचे का कोलाजेन कठोर होता जाता है। फलस्वरूप चमड़ी पर झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं। दाँतों का गिरना, बालों का झड़ना यह प्रकट करता है कि भीतर की पकड़ ढीली होती जा रही है।
शारीरिक और मानसिक शक्तियों के अनावश्यक अपव्यय को रोकने के लिए सीधा, सरल, सौम्य और हलका फुलका जीवन जिया जाना चाहिए इसके लिए पौष्टिक औषधियों की तलाश बेकार है। सबसे बड़ी औषधि एक ही है कि जीवन को भारी, बोझिल और कृत्रिम न बनने दिया जाय। अपव्यय को रोका जा सका तो लम्बे समय तक युवावस्था को भी सुरक्षित बनाये रखा जा सकता है।
केवल दीर्घ जीवन ही संभव नहीं वरन् यह भी संभव है कि ढलती आयु में भी सशक्त यौवन को स्थिर रखा जा सके। शरीर में आयु की वृद्धि के साथ कुछ तो परिवर्तन होते हैं पर यह मानवी प्रयत्नों पर निर्भर है कि वह शिथिलता से अपने को बचाये रहे और वृद्ध होते हुए भी अशक्त न बने।
वारजन विवारेस निवासी पियर डिफोरवेल 129 वर्ष का होकर सन् 1809 तक जीवित रहा। मरते समय उसका स्वास्थ्य ठीक था और उसकी सभी इन्द्रियाँ अपना काम ठीक तरह करती थीं। उसने तीन विवाह किये और कितने ही बच्चे पैदा हुए उनमें से तीन बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें तीन पृथक शताब्दियों में पैदा हुआ कहा जाता है। एक बच्चा 1699 में दूसरा 1738 में तीसरा 1801 में जन्मा। यों यह अन्तर लगभग सौ वर्ष ही होता है पर शताब्दियों के हिसाब से इसे तीन शताब्दियों में भी गिना जा सकता है और साहित्यिक शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि उसका एक बच्चा 16 वीं शताब्दी में, दूसरा 17वीं में और तीसरा अठारहवीं में जन्मा। उसकी तीसरी पत्नी 19 वर्ष की थी जबकि डिफोरवेल 120 वर्ष का। यह तीसरा दाम्पत्य जीवन भी उसने प्रसन्नता पूर्वक बिताया। पत्नी को इसमें कोई कमी दिखाई न दी। यह विवाह नौ वर्ष तक सुख पूर्वक चला और उसमें कई बच्चे हुए।
उपरोक्त तीन शताब्दियों में जन्मे तीन बच्चों की जन्म तिथियाँ उनके प्रमाण पत्रों समेत सन् 1877 के ‘मेगासिन पिटारेस्क’ में छपी हैं। जो घटना क्रम की यथार्थता प्रकट करते हुए भी सिद्ध करती हैं कि दीर्घ जीवन ही नहीं यौवन को भी अक्षुण्य बनाये रहना संभव है—असंभव नहीं।
बहुत दिन से यह सोचा जा रहा है कि आयुवृद्धि के साथ-साथ हारमोन उत्पादन में जो असंतुलन उत्पन्न हो जाता है उसकी पूर्ति कर देने से संभवतः शरीर की क्षरण प्रक्रिया रुक सकती है और अधिक समय तक जिया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रयोग और परीक्षण भी चले हैं। ब्रिटेन के विज्ञानी सर बिन्सेण्ट विगल वर्थ ने रोड नियस नामक एक छोटे कीड़े पर यह प्रयोग किया। उन्होंने उसी जाति के एक युवा कीड़े की एक्डायो सोन हार्मोन उत्पन्न करने वाली ग्रन्थि एक दूसरे बूढ़े कीड़े के शरीर में लगा दीं। इससे उसका बुढ़ापा रुक गया। जब भी शिथिलता के लक्षण दिखाई पड़ते तभी नई ग्रन्थि लगा दी जाती, इस प्रकार उसकी वृद्धि और जवानी का क्रम काफी लम्बे समय तक बनाये रखने में सफलता पाई गई।
मनुष्य शरीर में आयु वृद्धि के साथ घटने वाले एक हारमोन समूह को ‘स्टेरोइड’ कहते हैं। इसकी क्षति पूर्ति अन्यत्र से की जाय तो संभव है मनुष्य की जवानी बनी रहे। इस प्रकार ‘टेस्टोस्टेरीन’ हारमोन का किसी प्रकार प्रवेश अथवा परिवर्धन किया जा सके तो आदमी जवान बना रह सकता है। इन संभावनाओं को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक तरह तरह के अनुसंधान कर रहे हैं।
वैज्ञानिक एक प्राणी की हारमोन ग्रंथियां दूसरे के लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनका प्रभाव स्वल्प कालीन होता है। यौवन को अक्षुण्य बनाये रहने वाले हारमोन बिना एक दूसरे के अंग प्रत्यारोपण के भी विकसित किये जा सकते हैं। इसके लिए योगाभ्यास की वही परिपाटी उपयुक्त है जिसे ऋषि-महर्षि काया कल्प के नाम से प्रयोग करते थे और शताब्दियों तक जीवित रहते थे।
आत्मा-प्रतिष्ठा, आत्म-ज्ञान, और आत्म-दमन केवल इन्हीं तीनों से जीवन को अपार शक्ति प्राप्त होती है, केवल शक्ति ही नहीं क्योंकि शक्ति तो स्वयं ही बिना बुलाये चली आयेगी, किन्तु नियम से रहना भी आ जायेगा, और बिना भय के, जिस नियम से हम रहते हैं, वही नियम हम बनाते हैं, और चूँकि ठीक बात ही ठीक होना-अनुसरण करना बुद्धिमत्ता है-परिणाम को तुच्छ समझते हुए।
-टेनीसन
भारत के राष्ट्रपति श्री वी0 वी0 गिरि से लम्बी उम्र में भी उनका स्वास्थ्य अच्छा रहने और पर्याप्त चुस्त दीखने का कारण पूछा गया तो उनने उस सूत्र को प्रकट किया जिनको अपनाकर वे इस सत्तर से ऊपर की आयु में भी युवकों की तरह काम करते रह सकने में समर्थ हैं। उनने बताया ‘कम खाओ और अधिक काम करो।’ इसी सिद्धाँत को व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित करके वे अपना स्वास्थ्य सुरक्षित रख सके हैं।
कार्नल विश्व विद्यालय में सन् 1930 में एक प्रयोग किया गया था। कुछ चूहों को खाने की मनमौजी छूट दी गई। कुछ को इतना खिलाया गया कि वे जीवित रह सकें प्रयोग कर्त्ता सी0 एम॰ मैक ने घोषित किया कि अधिक खाने वालों की तुलना में कम खाने वाले चूहे दूने दिन जिये।
शिकागो में भी आहार की कमी और वेशी के संबंध में भी चूहों पर प्रयोग चले। प्रो0 ए॰ जे0 कालेमन और फ्रेडरिक होलजेल ने अपने प्रयोग के आधे चूहों को हर दिन बिना नागा भोजन दिया और आधे चूहों को एक दिन भोजन एक दिन उपवास के क्रम से खाना दिया। निष्कर्ष यह निकला कि उपवास करने वाले चूहे 20 प्रतिशत अधिक समय तक जिये। इस परिणाम से उपरोक्त दोनों प्रयोगकर्त्ता इतने अधिक प्रभावित और उत्साहित हुए कि उन्होंने स्वयं भी एक दिन उपवास एक दिन भोजन का क्रम अपना लिया।
आहार में सात्विकता का यदि समुचित ध्यान रखा जाय, उसमें तामसिकता की मात्रा न बढ़ने दी जाय तो उन रोगों से सहज ही बचाव हो सकता है जिनकी चिकित्सा में बहुत धन खर्च करना पड़ता है और बहुत कष्ट सहन करना पड़ता है। वनवासी अनेक असुविधाओं के रहते हुए भी केवल इसी एक आधार पर स्वस्थ और सबल बने रहते है कि उन्हें चटोरेपन की बुरी आदत नहीं होती और कुपथ्य नहीं करते। जीभ पर काबू रखना, रोगों के आक्रमण से सुरक्षित रहने का सबसे अच्छा और सबसे सस्ता तरीका है।
अमेरिका स्वास्थ्य विभाग ने उस देश की जनता में बढ़ते हुए हृदय रोगों का प्रधान कारण कुपथ्य घोषित किया है। शराब, सिगरेट, चाय काफी की भरमार से रक्त में जो अतिरिक्त उत्तेजना उत्पन्न होती है उससे मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है और अनिद्रा का रोग लग जाता है। चिन्ता और उद्वेग की परिस्थितियाँ वहाँ के विलासी और स्वार्थरत जीवनक्रम ने पैदा की हैं। उससे रक्तचाप बढ़ा है। एक दूसरे के प्रति मैत्री और वफादारी शिथिल पड़ गई है इससे जीवन में आई नीरसता ने व्यक्ति को मानसिक रूप से शून्यताग्रस्त कर दिया है यह मनोदशा क्रमशः सनक, शक्कीपन और अर्ध विक्षिप्त स्थिति तक ले पहुँचती है। इस तरह के मानसिक रोगों की बढ़ोतरी वहाँ तेजी से होती चली जा रही है। इस पर कुपथ्य का प्रचलन तो और भी दुहरी विपत्ति उत्पन्न कर रहा है।
हृदय रोगियों के आहार का निष्कर्ष यह निकला कि 40 से 50 वर्ष की आयु वाले लोगों में जो चिकनाई और चीनी कम सेवन करते थे उनमें से लाख पीछे 196 को हलके दौरे पड़े जबकि उसी आयु के अधिक चीनी और अधिक चिकनाई खाने वालों में से लाख पीछे 642 को हृदय के दौरे पड़ते थे और वह भी तेज कष्ट साध्य।
50 से ऊपर की आयु में वहाँ हृदय रोग अधिक होता है पर उसमें भी उपरोक्त दो वस्तुएं कम खाने वालों में से लाख पीछे 379 को तथा अधिक खाने वालों में से 1331 को इस प्रकार के दौरे पड़ते हैं।
सात्विक, सुपाच्य, स्वल्प और स्वच्छ आहार करने की यदि नीति अपनाई जाय, भूख से कम और नियत समय पर खाया जाय और निरन्तर श्रम संलग्न रहा जाय, हँसते खेलते दिन बिताया जाय—तो निस्संदेह हम निरोग दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद—लाखों, करोड़ों वर्ष पश्चात्—यह सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर मिलता है। इतना सुविधा सम्पन्न—काय कलेवर किसी भी जीव को नहीं मिला। मनुष्य को यह विशेष अनुदान भगवान ने विशेष प्रयोजन के लिये दिया है। अपना जीवन उत्कृष्ट बनाते हुए आत्मबल का अभिवर्धन आत्मशान्ति का रसास्वादन, उदारता और सेवा भावना द्वारा लोक-मंगल में योगदान यही मानव जीवन का प्रधान उद्देश्य है।
दुःख और दुर्भाग्य की बात ही है कि-जीवन लक्ष्य को पूर्णतया विस्मरण करके मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी-पेट और प्रजनन को ही प्रधान माने और उन्हीं पशु प्रवृत्तियों में जीवन रत्न को गँवाने की मूर्खता का परिचय दे।
यह भूल नये खून, नये जोश में प्रतीत नहीं होती तब महत्वाकाँक्षाओं का नशा सवार रहता है। हजारों, लाखों वर्ष जीना है ऐसा लगता है, पर जब वृद्धावस्था आ जाती है—अंग शिथिल हो जाते हैं, मौत सामने खड़ी दीखती है। आकाँक्षाएं अतृप्त रहती हैं, कुटुम्बी सहयोगी निरर्थक मानकर अवज्ञा करने लगते हैं तब प्रतीत होता है कि जीवन का दुरुपयोग करके भारी भूल की गई। तब केवल पश्चाताप से हाथ मलना ही शेष रह जाता है। उस दयनीय स्थिति का मार्मिक चित्रण करते हुए शास्त्रकारों ने उद्बोधन दिया है कि पश्चात्ताप की घड़ी आने से पूर्व ही सजग हो सका जाय और कर्तव्य पथ का अवलम्बन ग्रहण कर लिया जाय तो अधिक उत्तम है।
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम्।
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरभिः कालो न विज्ञायते॥
दृष्ट्वा जन्मजरा विपत्तिमरणं त्रासश्चनोत्पद्यते।
पीत्वा मोहमयी प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥ —भर्तृहरि
सूर्य के उदय और अस्त होने के साथ-साथ आयु भी दिन-दिन घटती जाती है तथा व्यापारादि से चित्त नहीं भरता और जन्म, वृद्धापन तथा मृत्यु होते हुए देखकर भी मनुष्यों को चेत नहीं होता। इससे मालूम होता है कि संसार प्रमाद-रूपी मदिरा पीकर मत्त हो रहा है।
योग वशिष्ठ में जीवन के अन्तिम चरण का दुःखद चित्रण इस प्रकार किया है
शत्रवश्चेन्द्रियाण्येव सत्यं यातमसत्यताम्।
प्रहरत्यात्मनैवात्मा मनसैव मनो रिपुः॥
अपनी इन्द्रियाँ ही अपनी शत्रु बन रही हैं। सत्य को असत्यता प्राप्त हो गयी है आत्मा ही आत्मा को खाये जा रही है। मन ही मन का बैरी बना हुआ है।
वस्त्ववस्तुतया ज्ञातं दत्तं चित्तमहंकृतौ।
अभाववेधिना भावा भावान्तो नाधिगम्यते॥
वस्तुएं कुछ की कुछ दीखती हैं। अहंकार में मन रम गया है। जो पर्याप्त है उसका अभाव दीखता है। जो है उसका प्रयोजन क्या है, कुछ सूझ नहीं पड़ता।
पातः पक्वफलस्यैव मरणं दुर्निवारणम्।
आयुर्गलत्यविरतं जलं करतलादिव॥
शैलनद्यारय इव संप्रयात्येव यौवनम्।
इन्द्रजालमिवासत्यं जीवनं जीर्णसंस्थितिः॥
बुद्बुदः प्रावृषीवाप्सु शरीरं क्षणभंगुरम्।
रम्भागर्भ इवासारो व्यवहारो विचारगः॥
पका फल जिस तरह पेड़ से गिर ही पड़ता है उसी तरह शरीर का मरण निश्चित है। हथेली पर रखा पानी जैसे ढुलक जाता है वैसे ही आयु घटती चली जा रही है।
पहाड़ी नाले के पानी की तरह यौवन भागता चला जा रहा है। यह बाजीगर के इन्द्रजाल जैसी माया सब ओर फैली पड़ी है।
पानी के बबूले की तरह यह जीवन अब तक फूटने ही वाला है। केले के खम्भे में लगे पत्तों की तरह यहाँ सब कुछ असार ही दीख पड़ता है।
दृष्टदैन्यो हतस्वान्तो हतौजा याति नीचताम्।
मुह्यते रौति पतति तृष्णयाभिहतो जनः॥
तृष्णा द्वारा पटक-पटक कर मारा हुआ मनुष्य दीन, हृदय हीन, निस्तेज हो जाता है। मोहग्रस्त होकर रोता है, और पतन के गर्त में गिर जाता है।
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
क्षीयते जीयते सर्व तृष्णैका हि न जीर्यते॥
वृद्ध होने पर मनुष्य के केश, दाँत समेत सारी काया जीर्ण हो जाती है, पर तृष्णा तो भी तरुण ही बनी रहती है।
घोरेऽस्मिन् हतसंसारे नित्यं सततघातिनाम्।
कदलीस्तम्भनिः सारे संसारे सारमार्गणम्॥
यः करोति स सम्म्ढ़ो जलबुद्बुदसन्निभे। —मनु
निरन्तर घात करने वालों से घिरा हुआ यह घोर संसार केले के खम्भे के समान निस्सार है। पानी के बबूले की तरह पोला और क्षणिक है। जो इसमें सार ढूँढ़ता है वह महामूर्ख है।
शेषे कलत्रचिन्ताऽऽर्तः कि करोति नराधमाः।
सतोऽसता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणाँ मूध्त्यरक्ष्यता।
सुखानाँ मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं सश्रयाम्यहम्॥ —महोपनिषद्
बचपन अज्ञान से घिरा रहता है, युवावस्था में वासना तृष्णा के आकर्षण बाँधे रहते हैं। बुढ़ापे में परिवार की चिन्ता सताती है। ऐसा चिन्ताग्रस्त अधम जीव अपना क्या उपकार करेगा? सत के ऊपर असत् का शासन है। शोभा पर कुरूपता चढ़ी बैठी है। सुख के ऊपर दुःख घिर रहा है। अब किसी शरण जाया जाय?
शिव गीता में यह वर्णन इस प्रकार आता है—
नीयते मृत्युना जन्तुः परिष्वक्तोऽपि बन्धुभिः।
सागरार्न्तजलगतो गरुड़ेनेव पन्नगः॥
बन्धुओं से घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्र में प्राप्त हुए सर्प को गरुड़ ले जाता है।
हा कान्ते हा धनं पुत्राः क्रन्दमानः सुदारुणम्।
मण्डूक इव सर्पेण मृत्युना नीयते नरः॥
हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुष को मृत्यु इस प्रकार ले जाती है जैसे सर्प मेंढक को ले जाता है।
संजायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धते तथा।
क्षीयते नश्यतीत्येते षड्भावा वपुषः स्मृताः॥
अब शरीर की अवस्था वर्णन करते इसी निस्सारता प्रतिपादन करते हैं उत्पत्ति (होना) अस्ति परिपक्वता वृद्धि क्षय और नाश, यह छः अवस्था इस शरीर की हैं।
देहेऽस्मिन्नभिमानेन नमहोपायबुद्धयः।
अहंकारेण पापेन क्रियन्ते हंस साँप्रतम् ॥
इस देह को प्राप्त होकर पाप बुद्धि पुरुष महा अभिमान करते हैं, और अहंकार रूप पाप से मुख्यानन्द मोक्ष का कुछ भी उपाय नहीं करते, यह महा शोच की बात है।
धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहार कर्मसु।
अतृप्ताः प्राणिनस्सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च॥ —चाणक्य नीति
धनों में, जीवन में, स्त्रियों में और भोजन में, अतृप्त होकर सब प्राणी गये, जायेंगे और जाते हैं।
अच्छा हो—समय से पूर्व चेता जाय अपनी गतिविधियाँ बदली जायं और पश्चात्ताप का अवसर न आने दिया जाय।
जिन क्रिया-कलापों—गतिविधियों में मनुष्य व्यस्त रहता है—जिन तृष्णा वासनाओं में निरन्तर निमग्न रहता है वे कितनी व्यर्थ और निरर्थक हैं उसका पता विवेक के सहारे भी लग जाता है दूसरों की दुर्दशा देखकर भी वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है। यह जीवन पर्यवेक्षण यदि गम्भीरता पूर्वक किया जाय तो विवेक की आँख खुल सकती है और मोह की मदान्ध स्थिति से छुटकारा पाकर उस मार्ग पर चल सकता है जिससे जीवनोद्देश्य की पूर्ति सम्भव होती है। मोहान्ध व्यक्ति यदि आत्म निरीक्षण करें तो उन्हें प्रतीत होगा कि—
भगवन्निदं शरीरं मैथुनादेवोद्भूतं संविध्ययेतं निरय एव मूत्रद्वारेण निष्कान्तमस्थिभिश्चतं माँसेनानुलिप्तं चर्मणावबद्धं विण्मूत्रवातपित्तकफमज्जामेदोवसाभिरन्यैश्च मलैर्बहुभिः परिपूर्णम्। एतादृशे शरीरे वर्तमानस्य भगवंस्त्वं नो गतिरिति॥
—मैत्रेय्युपनिषत्
मैथुन जैसे घृणित कर्म से उत्पन्न हुआ यह घृणित शरीर मूत्र द्वार से निकला है। हड्डियों से चिना गया है।
माँस से लपेटा गया है। चमड़े से मढ़ा गया है। विष्ठा, मूत्र, कफ, मज्जा आदि मलीन पदार्थ इसमें भरे हैं। ऐसी अपवित्र देह यदि ज्ञान रहित होकर जिये तो फिर साक्षात् नरक ही मानना चाहिये।
इति में दोषदावाग्निदग्धे संपति चेतसि।
स्फुरन्ति हि नभोगाशा मृगतृष्णासरः स्वति॥ —महोपनिषद्
मेरे चित्त की सम्पदा दोष रूपी दावानल में जल रही है। मृगतृष्णा की तरह लालसाओं में भटकता हुआ मैं कुछ भी पा नहीं सका।
योग वसिष्ठ में इस मोहान्ध स्थिति की और भी स्पष्ट विवेचना की है। उन पर विचार किया जाय तो सहज ही वैराग्य भाव उत्पन्न होता है—
आपदाः सम्पदः सर्वाः सुखं दुःखाय केवलम्।
जीवितं मरणायैव बत माया विजृम्भितम्॥
सम्पदा आपदा के लिये, सुख केवल दुःख के लिये, जीवन मरण के लिये, माया तेरी यह कैसी विचित्र विडम्बना है।
न केनचिच्च विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः।
बत मूढ़ा वयं सर्वे जानाना अपि शाम्बरम्॥
किसी में हमें बेचा नहीं है। तो भी हम बिके हुओं की तरह माया के दास होकर मूढ़ता का जीवन जी रहे हैं।
इयं संसारसरणिर्वहत्यज्ञप्रमादतः।
अज्ञस्योग्राणि दुःखानि सुखान्यपि दृढ़ानि च ॥ —योग वसिष्ठ
मूर्खता के कारण ही लोग इस माया चक्र में नाचते हैं। अज्ञानी ही दुःख भोगते हैं।
संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमापदाम्।
अज्ञं संमोहयेन्नित्यं मौर्ख्यं यत्नेन नाशयेत्॥
अज्ञान के लिये ही यह संसार विष वृक्ष है। उसी पर आपत्तियाँ आती हैं और वही दुख पाता है।
आगमापायिनो भावा भावना भवबन्धनी।
नीयते केवलं क्वापि नित्यं भूतपरम्परा॥
विषय वासना ने सबको बुरी तरह जकड़ रखा है। कोई न जाने कहाँ इन सबको बाँधकर घसीटे लिये जा रहा है।
सर्व एव नरा मोहाद्दुराशापाशपाशिनः।
दोषगुल्मकसारंगा विशीर्णा जन्मजंगले॥ —योग वशिष्ठ
लोग मोह और तृष्णा की फाँसी पर टँगे हुए, दोष रूपी झाड़ियों में उलझे हुए, इस जीवन जंगल में मृगों के समान नष्ट हो रहे हैं।
तृष्णालताकाननचारिणोऽमी शाखाशतं काममहीरुहेषु
परिभ्रमन्तः क्षपयन्ति कालं मनोमृगा नो फलमाप्नुवन्ति ।
मन रूपी मृग तृष्णाओं की लताओं में भटकता है। मरकट की तरह वह काम रूपी वृक्ष की शाखा प्रशाखाओं पर उछल कूद करता है पर फल कहीं नहीं पाता।
पर्णानि जीर्णानि यथा तरुणाँ समेत्य जन्माशु लयं प्रयान्ति।
तथैव लोकाः स्वविवेकहीनाः समेत्य गच्छन्ति कुतोऽप्यहोभिः॥
जिस प्रकार वृक्षों पर लगे पत्ते पक कर झड़ जाते हैं। उसी प्रकार विवेक हीन लोग यहाँ आते हैं, जन्मते और मर जाते हैं।
सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि मर्ध्नि रम्येष्वरम्यता।
सुखेसु मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम॥
सुन्दर दीखने वाले पदार्थों के शिर पर कुरूपता सवार है। सुखों की आड़ में दुःख छिपे बैठे हैं। मैं किसकी शरण में कहाँ जाऊँ?
आपातमधुरारम्भा भंगुरा भवहेतवः।
अचिरेण विकारिण्यो भीषणा भोगभूमयः॥
आरम्भ में मधुर दीखने वाले ये भोग क्षण भर भी तो नहीं ठहरते। देखते-देखते दारुण दुख देकर विदा हो जाते है।
उपरोक्त चिन्तन अप्रिय और भयानक लग सकता है। पर यही वह वास्तविकता है जिसे समय रहते समझ लिया जाय तो वह अवसर ही न आवेगा जिसमें अप्रियता और भयानकता अनुभव करनी पड़े।
जरामरणदुःखानामेकारत्नसमुद्रिका।
आधिव्याधिविलासानाँ नित्यं मत्ता विलासिनी॥
दृष्टदैन्यो हतस्वान्तो हतौजा याति नीचताम्।
मुह्यते रौति पतति तृष्णयाभिहतो जनः॥
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
क्षीयते जीर्यते सर्वं तृष्णैवैका न जीर्यते॥ —योग वशिष्ठ
तृष्णा से ही मनुष्य जरा जीर्ण दुखी और रोगी होता है। अगणित आधि व्याधि तृष्णाग्रस्त को ही घेरती हैं। तृष्णा का मारा मनुष्य दीन-हीन, कृपण, दुर्बल, निस्तेज, होकर दुर्गति के गर्त में गिरता है। हर समय रोता, चिल्लाता है और पग-पग पतित होता है। शरीर बूढ़ा हो जाने पर भी यह पापिन तृष्णा जवान ही बनी रहती है।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वाऽस्य न वा कृतम्।
क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम्॥
वृकीवारेणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।
न कालस्य प्रियः कश्चिद्द्वेष्यश्चास्य नविद्यते॥
आयुध्ये कर्मणि दीक्षे प्रसह्य हरते जनम्। —अग्नि पुराण
मृत्यु यह नहीं देखती कि उसने अपने काम पूरे कर लिये या नहीं। यह धर्म कृत्य में लगा है या प्रपंच के जाल जंजालों में। भेड़िये के से पेट वाली इस मृत्यु को किसी पर भी दया नहीं आती वह चाहे जिस को चाहे जब उठाकर चल देती है। आयु और कर्म समाप्त हो जाने पर मनुष्य मृत्यु के मुख में बलात् घसीटे हुए घुसते चले जाते हैं।
न श्रीः सुखाय भगवन्दुःखायैव हि वर्धते।
गुप्ता विनाशनं धत्ते मृति विषलता यथा ॥
मनोरमा कर्षति चित्तवृत्तिं कदर्थसाध्या क्षणभंगुरा च।
व्यालावलीगात्रविवृत्तदेहाश्चभ्रोत्थिता पुष्पलतेव लक्ष्मीः ॥ —योग वशिष्ठ
पैसे की बढ़ोतरी सुख के लिये नहीं, केवल दुख के लिये ही होती है। पाली-पोसी विषलता जिस तरह मृत्यु का कारण बनती है, वैसे ही जमा की हुई सम्पदा भी विनाश ही उत्पन्न करती है।
कुलटा स्त्री के समान यह दौलत भी मोहक रूप बना कर चित्त को भ्रमाती है। दुष्ट कर्मों में प्रवृत्ति कराती है और स्वयं भग जाती है। सर्पिणी की तरह यह चमकती दीखती है पर इसका विष नहीं दीखता। कुएं में उत्पन्न फूलों की बेल की ओर जो आकर्षित होता है वह गर्त में ही गिरता है।
न तदस्तीह यदयंकालः सकलघस्मरः।
ग्रसते तज्जगज्जातं प्रोत्थाब्धिमिव वाडवः॥
किं श्रिया किं च राज्येन किं देहेन किमीहितैः।
दिनैः कतिपयैरेव कालः सर्वे निकृन्तति॥
ग्रसतेऽविरतं भूतजालं सर्प इवानिलम्।
कृतान्तः कर्कशाचारो जराँ नीत्वाऽजरं वपुः॥ —योग वशिष्ठ
प्रलय की अग्नि जैसे समुद्र को जला डालती है वैसे ही यह सर्वभक्षी महाकाल सबको खा जाता है। लक्ष्मी से क्या? सत्ता से क्या? रूप यौवन से क्या? तृष्णाओं से क्या? थोड़े समय में काल इन सबको जड़ मूल से उखाड़ कर रख देगा। यह महा क्रूर काल तरुण शरीरों को बुढ़ापे से पका पकाकर स्वाद पूर्वक खाया करता है।
तत्त्व के विकास के लिए माता-पिता, स्त्री, पुत्र भाई-बन्धु सभी उपलब्ध होते हैं। उनका प्यार मिलता है अपना भी देना होता है। कभी कटुता का अवसर मिलता है कभी सरसता का। कटु अनुभवों से अपने साहस, धैर्य, परिश्रमशीलता, तत्परता और आत्म-विश्वास का विकास करने का अवसर प्राप्त होता है और सरसता तथा मधुर मिलन में, प्रेम, दया, वात्सल्य, उदारता, करुणा, स्नेह, सौहार्द, निष्ठा, श्रद्धा और आत्म-विश्वास के विकास की सचमुच भगवान की परिवार व्यवस्था आत्म विकास की एक रम्य वाटिका है।
मस्तिष्क विद्या विशारद डॉ0 विल्डर पेनफील्ड ने मस्तिष्क के भीतर एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है जो स्मरण शक्ति का मूलभूत आधार है। देखे, सुने और सोचे हुए सभी विचार जो मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं उन्हें उस पट्टी में होकर ही गुजरना पड़ता है अस्तु वे स्मृतियाँ अति सूक्ष्म फिल्मों की तरह अथवा टेपरिकॉर्डर में भरी आवाज की तरह जम जाती हैं और एक कोने में पड़ी रहती हैं। साधारणतया वे स्मृति पटल पर नहीं आतीं पर यदि विशेष प्रयत्न किया जाय तो उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी, सुनी या सोची हुई बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती हैं।
स्मरण प्रक्रिया सँभालने वाली यह काले रंग की दो पट्टियाँ हैं जो लम्बाई में लगभग 25 वर्ग इञ्च और मुटाई में एक इञ्च के दसवें भाग के बराबर हैं। मस्तिष्क के भीतर यह चारों ओर लिपटी हुई हैं। कनपटियों से नीचे इन्होंने एक प्रकार से सारे मस्तिष्क का घेरा ही डाला हुआ है। इन्हें ‘टेम्पेरिल कोर टैक्स’ कहते हैं।
डॉक्टर पेनफील्ड ने विद्युत धारा का स्पर्श कराके इस पट्टी के विभिन्न स्थल सजग किए तो वह उन स्थानों में अंकित पुरानी घटनाएं और बातें ज्यों की त्यों स्मरण हो आई। किन्तु जैसे ही वह विद्युत स्पर्श हटाया गया वैसे ही वे बातें पुनः विस्मृत हो गई। ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करके उपरोक्त वैज्ञानिक ने सिद्ध किया है कि मनुष्य के पास उसके सारे स्मरण यथास्थान सुरक्षित रिकार्डों की तरह संग्रहीत रहते हैं। हाँ वे हर समय स्मरण नहीं आते। प्रयत्नपूर्वक उन्हें उभारा जा सकता है और किसी भी विस्मृत बात को स्मृति पटल पर लाया जा सकता है।
मस्तिष्क 25 वर्ग इञ्च की देखने में एक छोटी सी पुस्तक है, जिसकी 20 कोशिकायें उसके बीस हजार पृष्ठ हैं। इनमें से प्रत्येक पृष्ठ पर ग्रामोफोन रिकार्डों की रेखाओं की तरह अगणित सचित्र स्मृतियाँ और ध्वनियाँ ऐसी अमिट स्याही से लिखी गई हैं कि उन्हें आवश्यकतानुसार कभी पढ़ा, सुना या देखा जा सकता है। आँखें औसतन 5 लाख चित्र हर दिन उतारती हैं। इसके साथ-साथ ध्वनियों, गन्धों, स्पर्शों, स्वादों एवं विचारों का समुद्र हर घड़ी लहराता रहता है। यह सारा तूफान मस्तिष्क में टकराता है, वह उसे समझता और निष्कर्ष निकालता है। इसके बाद भी उसे निरर्थक समझ कर हटा नहीं देता वरन् सँभाल सँजोकर अपने रिकार्ड दफ्तर में जमा कर देता है ताकि आवश्यकतानुसार उन अनुभूतियों को फिर कभी प्रयुक्त किया जा सके।
यों पुरानी बातें हम भूल जाते हैं। इतनी बातें याद कर सकना सम्भव भी नहीं। इसलिए स्मरण-विस्मरण का क्रम साधारणतया चलता रहता है किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दैनिक जीवन में काम आने वाले समस्त घटना क्रम की एक अति सूक्ष्म साउण्ड फिल्म बनती रहती है, जिसे आवश्यकतानुसार कभी भी प्रोजेक्ट किया जा सके।
दैनिक अनुभूतियों में कुछ बहुत ही कटु और सामान्यक्रम के विपरीत होती हैं। वे दूसरों के ऊपर क्रोध व्यक्त करती हुई पैर में गहराई तक चुभे हुए काँटे की तरह दर्द करती रहती हैं। किसी ने अपने साथ दुर्व्यवहार किया है तो यह विक्षोभ दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष को क्रोध प्रतिरोध के रूप में उभारता है और यदि स्वयं कोई पाप, अपराध, छल या अनैतिक कार्य किया है तो उसकी क्षुब्ध प्रतिक्रिया आत्म-धिक्कार के रूप में अपने ही ऊपर बरसती रहेगी, दोनों ही परिस्थितियों में ज्वालामुखी की तरह रह रह कर फूटते रहने वाला उद्वेग मनःस्थिति को अशान्त किये रहता है और ज्वरग्रस्त शरीर की तरह उद्वेगग्रस्त मस्तिष्क भी दिन-दिन दुर्बल होता जाता है।
स्मृतियों का भण्डार हर मनुष्य के भीतर सुरक्षित रहता है। पर उन्हें ढूँढ़ने और सामने लाने वाले यन्त्र कुण्ठित हो जाते हैं। इसलिए वे अपने ही दफ्तर की फाइल को आप ढूँढ़ निकालने में असमर्थ हो जाते हैं, यही विस्मृति है। यदि ढूँढ़ निकालने वाले पुर्जों को तेज रखा जाय और उस कार्य में दिलचस्पी एवं फुर्ती बनी रहे तो स्मरण शक्ति तीव्र रखी जा सकती है। कई व्यक्तियों में तीव्र स्मरण की विशेषता जन्मजात होती है पर यह हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है कि प्रयत्नपूर्वक उसे अधिक तीव्र और सक्षम बना ले। स्मरण शक्ति के धनी कितने ही व्यक्तियों ने ऐसा ही किया है उनमें यह विशेषता जन्मजात नहीं थी। अभ्यास और मनोयोग के समन्वय से उनने उसे बढ़ाया और आश्चर्य की तरह देखे जाने वाले स्मृति के धनियों में अपना नाम लिखाया।
जापान निवासी हनावा होकाइशी सन् 1722 में जन्मा और पूरे 101 वर्ष जीकर 1823 में मरा। वह सात वर्ष की आयु में अन्धा हो गया था। पर इससे क्या उसने बिना नेत्रों के ही दूसरों से सुनकर अपनी ज्ञान वृद्धि आरम्भ कर दी। जो सुना—उसे पूरे मनोयोग के साथ सुना और ध्यान में रखा, फलस्वरूप उसके ज्ञान का कोश इतना बढ़ गया कि उसे एक अद्भुत आश्चर्य माना जाता है। हनावा होकाइशी द्वारा नोट कराये गये ज्ञान भण्डार को जापान में 2820 खण्डों के एक अनुपम विशाल ग्रन्थ के रूप में छापा गया है। यह अब तक का संसार का सबसे बड़ा ग्रन्थ है।
लिथवानियाँ निवासी कैवी ऐलिजा ने दो हजार से अधिक पुस्तकें याद कर रखी थीं, पूछने पर वह उनका कोई भी पृष्ठ बिना पुस्तक देखे सुना देता था। फ्रेंच राजनीतिज्ञ लिआन गैम्बटा भी इसी श्रेणी में आते हैं। उनकी तुलना ऐलिजा से की जाती थी उन्होंने हजारों पृष्ठ विभिन्न पुस्तकों के याद कर रखे थे। ग्रीक विद्वान रिचाड़े पोरसन को भी चलता फिरता विश्वकोश कहा जाता था उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी।
नेलसन पिल्सवरी को शतरंज का जादूगर कहा जाता था। वह एक साथ बीस शतरंजों को बिछाकर बीस खिलाड़ियों के साथ चालें चलता था और सभी पर उसका पूरा ध्यान रहता था। कई बार तो वह शतरंजों के साथ-साथ कई खिलाड़ियों के साथ ताश खेलना भी आरम्भ कर देता था।
प्रसा (जर्मनी) का पुस्तकाध्यक्ष मैथुरिन बेसिरे एक बार जो शब्द सुन लेता था उसे ज्यों का त्यों याद रखता था। एक बार बारह राजदूतों ने उसकी परीक्षा ली। उनकी भाषाओं से मैथुरिन सर्वथा अपरिचित था। एक-एक करके बारहों ने अपनी-अपनी भाषा में बारह वाक्य कहे। उन्हें सुनने के बाद उसने उन शब्दों को क्रमशः ज्यों का त्यों दुहरा दिया। अन्तर तनिक भी नहीं पाया गया।
वरमाँट निवासी आठ वर्षीय बालक जेरा कोलवर्न ने बिना गणित का क्रमबद्ध अध्ययन किये—और बिना कागज कलम की सहायता के दिमागी आधार पर कठिन प्रश्नों के उत्तर देने की जो क्षमता दिखाई उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ चकित रह गये। जिन कठिन सवालों को केवल अच्छे गणित ज्ञाता ही काफी समय लगाकर हल कर सकते थे उसने उन्हें बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर दिया इसे देखकर सब लोग दंग रह जाते थे। आश्चर्य यह था कि पुस्तकीय आधार पर उसे गणित के सामान्य नियम भी ज्ञात न थे।
गणित शास्त्री जेडिडिया वाक्सटन बहुत समय से एक गणित समस्या में उलझे हुए थे, हल निकल नहीं रहा था, एक दिन उनकी भेंट स्मरण शक्ति के धनी जान मार्टिन डेस से हुई। उसने उनका हल मिनटों में बता दिया। गणित सम्बन्धी उलझनों को सुलझाने के लिए डेस अपने समय में दूर-दूर तक प्रख्यात था।
सर जान फील्डिंग इंग्लैण्ड के जज थे। वे अन्धे थे। पर उनके कान इतने सक्षम थे कि अपने जीवन काल में जिन 3000 अपराधियों से उन्हें वास्ता पड़ा था उन सब की आवाज वे ठीक तरह पहचान सकते थे और उसका नाम बता सकते थे। मुकदमों के मुद्दतों बाद वे लोग कभी उनसे मिलने आते तो नेत्र न रहने पर भी केवल स्मरण शक्ति के आधार पर उसका नाम और मुकदमे का संदर्भ बता देते थे। उनकी यह अद्भुत स्मरण शक्ति चिरकाल तक चर्चा का विषय बनी रही।
फान्सिस्को मैरिया ग्रापाल्डे नामक एक प्रसिद्ध कवि चौदहवीं शताब्दी के अन्त में हुआ है। वह परमा इटली का निवासी था। उसकी विलक्षण प्रतिभा यह थी कि दोनों हाथों से दो कवितायें एक साथ लिखता जाता था। इनमें एक लैटिन भाषा में होती थी और दूसरी पुरातन ग्रीक भाषा में।
कैन्टरवरी के प्रधान पादरी टामस क्रेकर ने तीन महीने में पूरी बाइबिल जबानी याद कर डालने का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया।
सन् 1724 में जन्मा और 1812 में मरा स्काटलैंड का प्रख्यात डंकन मैक इन्टायर उन दिनों अपनी कविताओं के लिए अपने देश ही नहीं सारे योरोप में प्रसिद्ध था। पर वह न पढ़ना जानता था न लिखना, अपनी सारी प्रतिभा उसने सुन-समझ कर ही विकसित की थी।
ग्रीक पोरसन नामक व्यक्ति को मिल्टन की प्रायः सभी रचनायें याद थीं और वह उन्हें सीधी ही नहीं उलटी करके भी सुना सकता था।
लाक्रोज ने अपनी स्मरण शक्ति का एक अनोखा प्रदर्शन करके दर्शकों को चकित कर दिया। उसने अपरिचित 12 भाषाओं की 12 कवितायें सुनीं और दूसरे ही क्षण उसने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।
विक्टर ह्यूगो की रचनायें अति प्रिय लगने और उन्हें बार-बार मनोयोगपूर्वक पढ़ते रहने के कारण गमवेटारुथ ने उन्हें ज्यों का त्यों याद कर लिया था और पूछे जाने पर वह पुस्तक के किसी भी पृष्ठ को आरम्भ करके कितने ही पन्ने सुना देता था।
म्युनिख की राष्ट्रीय लाइब्रेरी के सञ्चालक जोसेफ बर्न हार्ड डकन अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे। उन्होंने 9 भाषायें सीखी ही नहीं थीं उनमें पारंगत भी बने थे। इसके अतिरिक्त उनकी उस विशेषता को देखकर दंग रह जाना पड़ता था जबकि वे 9 भाषाओं के अपने स्टेनोग्राफरों को एक साथ बिठाकर उन सभी को उन्हीं की भाषा में लेख नोट कराते थे। इतना मस्तिष्कीय सन्तुलन, अथाह ज्ञान और विकसित स्मरण शक्ति का प्रमाण कदाचित ही कहीं कभी देखने को मिलता है।
स्मृति का धनी होना न कोई जादू है और न वरदान। यह किसी कार्य में गहरी अभिरुचि रखने, सावधानी के साथ समझने और मनोयोग पूर्वक उसे मस्तिष्क में सँभाल कर रखने की पद्धति भर है। ढूँढ़ निकालने का अभ्यास भी कुछ अधिक मुश्किल नहीं है। सरकस में काम करने वालों को जितना परिश्रम अपने शरीर और जानवर सधाने में करना पड़ता है उतना ही प्रयत्न यदि मस्तिष्क को सधाने में किया जाय तो कोई मन्द बुद्धि भी कवि कालिदास की तरह बौद्धिक प्रतिभा का धनी हो सकता है।
बात सन् 1914 की है। एक दिन गुरु देव टैगोर ने सी0 एफ॰ एण्ड्रूज से कहा-’विवाह जीवन की पूर्णता है। प्रगति के मार्ग में पत्नी से पूरी-पूरी सहायता मिलती है और दोनों के सहयोग से विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। सच्चा जीवन जीने के लिये मनुष्य को विवाह अवश्य करना चाहिए और आपने विवाह न करके बड़ी भारी भूल की है।’
दीनबंधु एण्ड्रूज ने सहज भाव से उत्तर दिया ‘हाँ! आपकी बात बिलकुल सत्य है। मैं भी अनुभव करता हूँ कि विवाह के बिना पवित्र प्रेम तथा पिता और पति के मोहक कर्त्तव्यों से मैं वंचित रहूँगा और मेरे जीवन का विकास भी अवरुद्ध हो जायेगा। पर दाम्पत्य-जीवन के सुख की जब मैं कल्पना करता हूँ तो मेरा मन मुझे एक अन्य दिशा की ओर ले जाना चाहता है।’
वह कहता है ‘तुम अपनी सेवायें राष्ट्रीय आन्दोलन को समर्पित कर चुके हो। जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता तब तक तुम्हारा कुछ नहीं सब कुछ राष्ट्र का ही होगा। तुम मिशन में सर्विस करते हो उसका क्या भरोसा? फिर नौकरी छूट जाने पर घर-गृहस्थी के बोझ को सम्हालने के लिये नौकरी की तलाश करोगे या राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लोगे।’ और मेरे मन में उठने वाले यही विचार दाम्पत्य-जीवन के रेशमी सूत्र में नहीं बँधने देते। दीनबन्धु एण्ड्रूज आजीवन अविवाहित रहकर भारतवासियों को देशभक्ति का सन्देश देते रहे।
खेत में जिस प्रकार का बीज बोया जायगा उसी तरह के पौधे उगेंगे और वैसी ही फसल उगेगी। किसान जो फसल उगाना चाहता है उसके लिए उसी प्रकार के बीज की व्यवस्था करता है। साथ ही यह भी ध्यान रखता है कि वह बीज ‘सड़ा, घुना, छोटा, पुराना, कमजोर न हो।
जीवन एक खेत है। उसमें प्रगति और सफलता की फसल उगाई जानी है तो ऐसे विचारों का मनःक्षेत्र में आरोपण करना चाहिए जो प्रगति के लिए आवश्यक शक्ति का उद्भव कर सकें। साहस और पुरुषार्थ के बिना किसी का आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं। आलस्य और अनियमितता का अवरोध रहते कोई व्यक्ति किसी प्रयोजन में सफल नहीं हो सकता। इन दुर्बलताओं को हटाने के लिये खेत में खर-पतवार उखाड़ने जोतने की तरह हमें किसान का अनुकरण करना होगा।
विचार बीज है। जीवन का स्वरूप उसी की लहराती हुई हरी-भरी फसल है। आशा है अन्न की राशि। मनःक्षेत्र में किन विचारों को स्थान मिले इसके लिये अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है। कुछ भी—कैसा ही—बीज बो देने से कुछ भी उग सकता है और उपलब्धि कैसी भी हो सकती है। बीज की ओर से उपेक्षा बरतने वाला किसान अभीष्ट फसल काटने में सफल मनोरथ कैसे होगा?
प्रगति के लिये प्रयास बहुत किये जाते हैं पर यह भुला दिया जाता है कि निर्धारित दिशा में प्रेरणा देने वाले और पथ प्रशस्त करने वाले समर्थ विचारों की अभीष्ट मात्रा संकलित कर ली गई या नहीं?
वैयक्तिक दोष दुर्गुणों की कँटीली झाड़ियाँ प्रगति के पथ को अवरुद्ध और दुरूह बनाती हैं। यह दुर्गुण और कुछ नहीं उन विचारों के प्रतीक प्रतिनिधि हैं, जिन्हें बहुत समय से—ज्ञात या अविज्ञात रूप में मनःक्षेत्र में सँजोये जमाये रखा गया है। सर्प के काटने पर उसका विष एक बूँद ही रक्त में प्रवेश करता है। पर वह कुछ ही देर में समस्त शरीर में फैल जाता है और अपना असर दिखाता है। कुविचार सर्प-दंश की तरह हैं—वे ही अपना विस्तार करके दोष-दुर्गुणों के रूप में फैल जाते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आन्तरिक शत्रु-मनोविकार-बाहर के शस्त्रधारी शत्रुओं की अपेक्षा हजार गुने अधिक बलिष्ठ और घातक होते हैं। दूर रहने वाले बाहरी शत्रुओं से बचने और उन्हें निरस्त करने के अनेक उपाय हो सकते हैं पर अहर्निशि सामने रहने वाले इन घर के भेदियों को क्या कहा जाय? आस्तीन के साँप की तरह वे सदा विघातक ही सिद्ध होते हैं।
क्षयग्रस्त दुर्बल और मरणासन्न शरीर वस्तुतः उस रोग के विषाणुओं का ही खाया हुआ होता है। घुन का कीड़ा चुपचाप लगा रहता है और विशाल शहतीर को खोखला कर देता है। कुविचार विषाणुओं से अधिक घातक और घुन से अधिक अदृश्य होते हैं। वे भीतर जमकर बैठ जाते हैं और गुण, कर्म, स्वभाव की सारी सम्पदा को खोखली और विषाक्त बना देते हैं।
ओछे स्वभाव के—आदर्श रहित और लक्ष्य विहीन व्यक्ति जीवन की लाश ढोते रहते हैं। उनके मनोरथ सफल हो ही नहीं सकते। क्योंकि प्रगति के लिए-प्रखर व्यक्तित्व की आवश्यकता है।
सफल जीवन जीने की आकाँक्षा आदि साकार करनी हो तो पहला कदम आत्म-निरीक्षण में उठाया जाना चाहिए। अपने विचारों—मान्यताओं—आस्थाओं और अभिमान की समीक्षा करनी चाहिए और उनमें जितने भी अवाँछनीय तत्व हों उन्हें उन्मूलन करने के लिए जुट जाना चाहिए। यह तभी संभव है? जब उनकी स्थान पूर्ति के लिए सद्विचारों के आरोपण की व्यवस्था बना ली जाय। कहना न होगा कि विचार-परिवर्तन के चार ही आधार हैं स्वाध्याय, सत्संग—मनन और चिन्तन। इन्हें अपनाया जा सके तो जीवन का स्वरूप बदलेगा और अवसाद उत्कर्ष में परिणत होगा।
कुण्डलिनी महाशक्ति को ‘काम कला’ कहा गया है। उसका वर्णन कतिपय स्थलों में ऐसा प्रतीत होता है मानो यह कोई सामान्य काम सेवन की चर्चा की जा रही हो। कुण्डलिनी का स्थान जननेन्द्रिय मूल में रहने से भी उसकी परिणति काम शक्ति के उभार के लिये प्रयुक्त होती प्रतीत होती है।
इस तत्व को समझने के लिये हमें अधिक गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा और अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखना पड़ेगा। नर-नारी के बीच चलने वाली ‘काम क्रीड़ा’ और कुण्डलिनी साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभय लिंग विद्यमान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्धनारी नटेश्वर भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित रूप चित्रों में दृष्टि गोचर होता है। पति-पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह इस चित्रण का स्थूल वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति के भीतर उभय लिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसकी रुझान उसी ओर ढुलकने लगती है। उसकी चेष्टाएं उसी तरह की बन जाती हैं। कितने की पुरुषों में नारी जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई नारियों में पुरुषों जैसी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन हो सकता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुँसक जैसी स्थिति बन सकती है।
नारी लिंग का सूक्ष्म स्थल जननेन्द्रिय मूल है। इसे ‘योनि’ कहते हैं। मस्तिष्क का मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र—’लिंग‘ है। इसका प्रतीक प्रतिनिधि सुमेरु —मूलाधार चक्र के योनि गह्वर में ही ‘काम बीज के रूप में अवस्थित है।’ अर्थात् एक ही स्थान पर वे दोनों विद्यमान हैं। पर प्रसुप्त पड़े हैं। उनके जागरण को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। इन दोनों के संयोग की साधना ‘काम कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन—इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास की छाया है।
आन्तरिक काम शक्ति को दूसरे शब्दों में महाशक्ति—महाकाली कह सकते हैं। एकाकी नर या नारी भौतिक जीवन में अस्त-व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभय पक्षी विद्युत शक्ति का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता दिखाई पड़ती है। इसे दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिए कुण्डलिनी साधना की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहाँ उल्लेख किया है वहाँ काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि-व्यवस्था सन्निहित है—
स्वयंभु लिंग तन्मध्ये सरन्ध्रं यश्चिमावलम्।
ध्यायेञ्च परमेशानि शिवं श्यामल सुन्दरम्॥ — शाक्तानन्द तरंगिणी
उसके मध्य रन्ध्र सहित महालिंग है। वह स्वयंभु और अधोमुख, श्यामल है सुन्दर है। उसका ध्यान करे।
तत्रस्थितो महालिंग स्वयंभुः सर्वदा सुखी।
अधोमुखः क्रियावाँक्ष्य काम बीजे न चालितः॥ —काली कुलामृत
वहाँ ब्रह्मरन्ध्र में —वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभु और सुख स्वरूप है। उसका मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा चालित है।
आत्मसंस्थं शिवं त्यक्त्वा बहिःस्थं यः समर्चयेत्।
हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया॥
आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दिने दने।
तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्नात्र कार्या विचरणा॥ —शिव संहिता
अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर बाहर पूजते फिरते हैं। वे हाथ के भोजन को छोड़ कर इधर-उधर से प्राप्त करने के लिए भटकने वाले लोगों में से हैं।
आलस्य त्याग कर ‘आत्म-लिंग‘—शिव—की पूजा करे। इसी से समस्त सफलताएं मिलती हैं।
नमो महाबिन्दुमुखी चन्द्र कार्य स्तन द्वया।
सुमेरु द्दार्घ कलया शोभमाना मही पदा॥
काम राज कला रुपा जागर्ति स चराचरा।
एतत कामकला व्याप्तं गुह्माद गुह्यतरं महत्॥ —रुद्रयामल तंत्र
महाबिन्दु उसका मुख है। सूर्य चन्द्र दोनों स्तन हैं, सुमेरु उसकी अर्ध कला है, पृथ्वी उसकी शोभा है। चर-अचर सब में काम कला के रूप में जगती है। सबमें काम कला होकर व्याप्त है। यह गुह्य से भी गुह्य है।
जननेन्द्रिय मूल-मूलाधार चक्र में योनि स्थान बताया गया है।
मूलाधारे हि यत् पद्मं चतुष्पत्रं व्यवस्थितम्।
तत्र कन्देऽस्ति या योनिस्तस्याँ सूर्यो व्यवस्थितः। —शिव संहिता
चार पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के कन्द भाग में जो प्रकाशवान् योनि है।
तस्मिन्नाधार पद्मे च कर्णिकायाँ सुशोभना।
त्रिकोणा वर्तते योनिः सर्वतंमेषु गोपिका॥ —शिव संहिता
उस आधार पद्म की कर्णिका में अर्थात् दण्डी में त्रिकोण योनि है। यह योनि सब तन्त्रों करके गोपित है।
यत्तद्गुह्यमिति प्रोक्तं देवयोनिस्तु सोच्यते।
अस्याँ यो जायते वह्निः स कल्याणप्रदुच्यते॥ —कात्यायन स्मृति
यह गुह्य नामक स्थान देव योनि है। उसी में जो वह्नि उत्पन्न होती है वह परम कल्याणकारिणी है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनि स्थानं द्वयोर्मध्ये कामरुपं निगद्यहे॥ —गोरक्ष पद्धति
पहले मूलाधार एवं दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र के बीच में योनि स्थान है, यही काम रूप पीठ है।
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्ध वंदिता॥
गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल विख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वन्दना समस्त सिद्धजन करते हैं, पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती है।
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम्।
तिस्मन दृष्टे महायोगे याता यातात्र विन्दते॥ —गोरक्ष पद्धति
इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम ज्योति प्रकट होती है वही कालाग्नि रूप है जब योगी ध्यान, धारण, समाधि—द्वारा उक्त ज्योति देखने लगता है तब उसका जन्म मरण नहीं होता।
इन दोनों का परस्पर अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह सम्बन्ध जब मिला रहता है तो आत्म-बल समुन्नत होता चला जाता है और आत्मशक्ति सिद्धियों के रूप में विकसित होती चलती है। जब उनका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य दीन-दुर्बल, असहाय-असमर्थ एवं असफल जीवन जीता है। कुण्डलिनी रूपी योनि और सहस्रार रूपी लिंग का संयोग मनुष्य की आन्तरिक अपूर्णता को पूर्ण करता है। साधना का उद्देश्य इसी महान प्रयोजन की पूर्ति करना है। इसी को शिव शक्ति का संयोग एवं आत्मा से परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस संयोग का वर्णन साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।
भगः शक्तिर्भगवान् काम ईश उया दातार विह सौभमानाम्।
सम प्रधानौ समसत्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्व योनिः॥ —त्रिपुरोपनिषद
भग शक्ति है। काम रूप ईश्वर भगवान है। दोनों सौभाग्य देने वाले हैं। दोनों की प्रधानता समान है। दोनों की सत्ता समान है। दोनों समान ओजस्वी हैं। उनकी अजरा शक्ति विश्व का निमित्त कारण है।
शिव और शक्ति के सम्मिश्रण को शक्ति का उद्भव आधार माना गया है। इन्हें बिजली के ‘धन और ऋण’ भाग माना जाना चाहिये। बिजली इन दोनों वर्गों के सम्मिश्रण से उत्पन्न होती है। अध्यात्म विद्युत के उत्पन्न होने का आधार भी इन दोनों शक्ति केन्द्रों का संयोग ही है। शिव पूजा में इसी आध्यात्मिक योनि लिंग का संयोग प्रतीक रूप से लिया गया है।
लिंगवेदी उमा देवी लिंगं साक्षान्महेश्वरः। —लिंग पुराण
‘लिंग वेदी’ (योनि) देवी उमा है और लिंग साक्षात् महेश्वर हैं।
सा भगाख्या जगद्धात्री लिंगमूर्तेस्त्रिवेदिका।
लिंगस्तु भगवान्द्वाभ्याँ जगत्सृाष्टर्द्विजोत्तमाः॥
लिंगमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः। —लिंग पुराण
वह महादेवी भग संज्ञा वाली और इस जगत् की धात्री है तथा लिंग रूप वाले शिव की त्रिगुणा प्रकृति रूप वाली है। हे द्विजोत्तमो! लिंग रूप वाले भगवान् शिव नित्य ही भग से युक्त रहा करते हैं और इन्हीं दोनों से इस जगत् की सृष्टि होती है। लिंग स्वरूप शिव स्वतः प्रकाश रूप वाले हैं और यह माया के तिमिर से ऊपर विद्यमान रहा करते हैं।
ध्यायेत् कुण्डलिनीं देवीं स्वयंभु लिंग वेष्टिनीम्।
श्यामाँ सूक्ष्माँ सृष्टि रुपाँ सृष्टि स्थिति लयात्मिकम्।
विश्वातीताँ ज्ञान रुपाँ चिन्तयेद ऊर्ध्ववाहिनीम्। —षट्चक्र निरुपणम्
स्वयंभू लिंग से लिपटी हुई कुँडलिनी महाशक्ति का ध्यान श्यामा, सूक्ष्मा सृष्टि रूपा, विश्व को उत्पन्न और लय करने वाली, विश्वातीत, ज्ञान रूप ऊर्ध्ववाहिनी के रूप में करे।
यह उभय लिंग एक ही स्थान पर प्रतिष्ठापित है। जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में सूक्ष्म योनि गह्वर है। उसे ऋण विद्युत कह सकते हैं। उसी के बीचों बीच सहस्रार चक्र का प्रतिनिधि एक छोटा सा उभार है जिसे ‘सुमेर’ कहा जाता है। देवताओं का निवास सुमेरु पर्वत पर माना गया है। समुद्र मंथन में इसी पर्वत का वर्णन आता है। साढ़े तीन चक्र लपटा हुआ शेष नाग इसी स्थान पर है। इस उभार केन्द्र को ‘काम बीज’ भी कहा गया है। एक ही स्थान पर दोनों का संयोग होने से साधक का ‘आत्मरति’ प्रयोजन सहज ही पूरा हो जाता है। कुण्डलिनी साधना इस प्रकार आत्मा के उभय पक्षी लिंगों का समन्वय सम्मिश्रण ही है। इसकी जब जागृति होती है तो रोम-रोम में अन्तः क्षेत्र के प्रत्येक प्रसुप्त केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र—काम बीज का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
योनि मध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखस्थितम्।
मस्तके मणिबद्बिम्बं यो जानाति स योगवित्॥ —गोरक्ष पद्धति
त्रिकोणाकार योनि में सुषुम्ना द्वार के सम्मुख स्वयंभू नायक महालिंग है उसके सिर में मणि के समान देदीप्यमान बिम्ब है यही कुण्डलिनी जीवाधार मोक्ष द्वार है इसे जो सम्यक् प्रकार से जानता है उसे योगविद् कहते हैं।
तप्तचामी कराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्।
त्रिकोणं तत्परं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम्॥ —गोरक्ष पद्धति
मेढ्र (लिंग स्थान) से नीचे मूलाधार कर्णिका में तपे हुए स्वर्ण के वर्ण के समान वाला एवं बिजली के समान चमक-दमक वाला जो त्रिकोण है वही कालाग्नि का स्थान है।
पूर्वाक्ता डाकिनी तत्र कर्णिकायाँ त्रिकोणकम्।
यन्मध्ये विवरं सूक्ष्मं रक्ताभं काम वीजकम्।
तत्र स्वयंभु लिंग स्नाधो मुखारक्तक प्रभुमू। —शक्ति तंत्र
वहीं ब्रह्म डाकिनी शक्ति है। कर्णिका में त्रिकोण है। इसके मध्य में एक सूक्ष्म विवर है। रक्त आभा वाला काम बीज स्वयंभू अधोमुख महालिंग यहीं है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरुपं निगद्यते॥
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता॥
योनिमध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखस्थितम्।
मस्तके मणिवद्बिम्बं यो जानाति स योगवित्॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्।
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम्॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम्।
तिस्मन् दृष्टे महायोगे यातायातान्न विन्दते॥ —गोरक्ष पद्धति
मूलाधार और स्वाधिष्ठान इन दो चक्रों के बीच जो योनि स्थान है वही ‘काम रूप’ पीठ है।
चौदह पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के मध्य में त्रिकोणाकार योनि है इसे ‘कामाख्या’ पीठ कहते हैं। यह सिद्धों द्वारा अभिवंदित है।
इस योनि के मध्य पश्चिम की ओर अभिमुख ‘महालिंग‘ है। उसके मस्तक में मणि की तरह प्रकाशवान बिम्ब है। जो इस तथ्य को जानता है वही योगविद् है।
लिंग स्थान से नीचे, मूलाधार कर्णिका में अवस्थित तपे सोने के समान आभा वाला, विद्युत जैसी चमक से युक्त जो त्रिकोण है उसी को ‘कालाग्नि’ कहते हैं।
इसी विश्वव्यापी परम ज्योति में तन्मय होने में महायोग की समाधि प्राप्त होती है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है।
तत्र बन्धूक पुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम्।
कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररुपिणम्॥
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो बीजं तत्र वरं स्थितम्।
शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम्॥
सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम्।
एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी।
बीजसंज्ञं परं तेजस्तदेव परिकीर्तितम्॥
क्रियाविज्ञानशक्तिभ्याँ युतं यत्परितो भ्रमत्।
उत्तिष्ठद्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।
योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयम्भूलिंगसंज्ञितम्॥ —शिव संहिता
जिस स्थान पर कुण्डलिनी है उसी स्थान पर पुष्प के समान स्वर्ण आभा जैसा चमकता हुआ रक्त वर्ण काम-बीज है।
कुण्डलिनी, सुषुम्ना और काम बीज यह सूर्य चन्द्रमा की तरह प्रकाशवान हैं। इन तीनों के मिलने को त्रिपुर भैरवी कहते हैं। इस तेजस्वी तत्व की ‘बीज’ संज्ञा है।
यह ‘बीज’ ज्ञान और क्रिया शक्ति से संयुक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और ऊर्ध्वगामी होता है। इस परम तेजस्वी अग्नि का योनि स्थान है और उसे ‘स्वयंभू लिंग‘ कहते हैं।
क्रिया विज्ञान शक्तिभ्याँ युतं यत्परितो भ्रमत्।
उत्तिष्ठ द्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।
योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयम्भू लिंग संज्ञितम्। —शिव संहिता
अर्थ-वह बीज क्रिया शक्ति एवं ज्ञान शक्ति से युक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी जल में प्रवेश करता है और सूक्ष्म प्रज्वलित अग्नि के समान शिखा युत परम तेज वीर्य की स्थिति योनि स्थान में है स्वयम्भू लिंग संज्ञा है।
तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम्।
कलहेम समं योगे प्रयुक्ताक्षर रुपिणम्। —शिव संहिता
अर्थ-जिस स्थान में कुण्डलिनी है उसी स्थान में बन्धूक पुष्प के समान रक्त वर्ण काम बीज की स्थिति कही गई है। वह काम बीज तप्त स्वर्ण के समान स्वरूप योग युक्त द्वारा चिन्तनीय है।
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो बीजं तत्र वरं स्थितम्।
शरच्चंद्र तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम्॥
सूर्य कोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम्। —शिव संहिता
अर्थ-जिस स्थान में कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्ना उसी स्थान में काम बीज के साथ स्थित है और वह बीज शरच्चन्द्र के समान प्रकाशमान तेज है और वह आप ही कोटि सूर्य के समान प्रकाश और कोटि चन्द्र के समान शीतल है।
स्थूल शरीर में नारी का प्रजनन द्रव ‘रज’ कहलाता है। नर का उत्पादक रस ‘वीर्य’ है। सूक्ष्म शरीर में इन दोनों की प्रचुर मात्रा एक ही शरीर में विद्यमान है। उनके स्थान निर्धारित हैं। इन दोनों के पृथक रहने के कारण जीवन में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती। पर जब इनका संयोग होता है तो जीवन पुष्प का पराग मकरन्द परस्पर मिलकर फलित होने लगता है और सफल जीवन की अगणित सम्भावनाएं प्रस्फुटित होती हैं। एक ही शरीर में विद्यमान इन ‘उभय’ रसों का वर्णन साधना विज्ञानियों ने इस प्रकार किया है—
योनिस्थाने महाक्षेत्रे जपा बन्धूकसन्निभम्।
रजो वर्सात जंतूनाँ देवीतत्वं समाहितम्॥
रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः। —योग शिखोपनिषद
योनि स्थान रूपी मूलाधार महा क्षेत्र में, जवा कुसुम के वर्ण का रज हर एक जीवधारी के शरीर में रहता है। उसको ‘देवी तत्व’ कहते हैं। उस रज और वीर्य के योग से राजयोग की प्राप्ति होती है अर्थात् इन दोनों के योग का फल राजयोग है।
गुदा और उपस्थ के मध्य में सीवनी के ऊपर त्रिकोणाकृति गुह्य-गह्वर है, जिसको ‘योनि-स्थान’ कहते हैं।
गलितोपि यदा बिन्दुः संप्रप्ति योनिमण्डले।
ज्वलितोपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम्॥
ब्रजत्पूर्ध्वं दृढ़ाच्छक्त्या निबद्धो योनिभुदया।
स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा॥
पाण्डुरं शुक्रभित्याहु र्लोंहितारथं महारजः।
विद्रुमद्रुम संकाराँ योनिस्थाने स्थितं रजः॥
शीशस्थाने बसेद्विदुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्। —ध्यान बिन्दु उपनिषत्
सहस्रार से क्षरित गलित होने पर जब वीर्य योनि स्थान पर ले जाया जाता है तो वहाँ कुण्डलिनी अग्नि कुण्ड में गिरकर जलता हुआ वह वीर्य योनि मुद्रा के अभ्यास से हठात् ऊपर चढ़ा लिया जाता है और प्रचण्ड तेज के रूप में परिणत होता है यही आध्यात्मिक काम सेवन एवं गर्भ धारण है।
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा।
पाण्डुरः शुक्रमित्या हुर्लोहिताख्यो महारजः॥ —गोरक्ष पद्धति
बिन्दु दो प्रकार का होता है—एक तो पाण्डु वर्ण जिसे शुक्र कहते हैं और दूसरा (लोहित) रक्त वर्ण जिसे महारज कहते हैं।
सिन्दूरद्रव सकाश नाभिस्थाने स्थित रजः।
शशिस्थाने स्थितो बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्॥ —गोरक्ष पद्धति
तैल मिले सिन्दूर के द्रव (रस) के समान रज सूर्य स्थान नाभि मण्डल में रहता है तथा बिन्दु (वीर्य) चन्द्रमा के स्थान कण्ठ देश षोडशाधर चक्र में स्थिर रहता है। इन दोनों का ऐक्य अत्यन्त दुर्लभ है।
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिश्चन्दो बिन्दु रजो रविः।
अनयोः संगमादेव प्राप्यते परमं पद्म॥ —गोरक्ष पद्धति
बिन्दु शिव रस शक्ति है। इनके एक होने से योग सिद्धि एवं परम पद प्राप्त होता है। चन्द्रमा सूर्य का ऐक्य करना ही योग है।
वायुना शक्ति चारेण प्रेरितं तु यदा रजः।
याति बिन्दोः सहकत्वं भवेद्दिव्यं वपुस्ततः॥ —गोरक्ष पद्धति
शक्तिचालिनी विधि से वायु द्वारा जब रज-बिन्दु के साथ ऐक्य को प्राप्त होता है तब शरीर दिव्य हो जाता है।
अपने शरीरस्था रज-वीर्य एकता सिद्धिदायक,
स बिन्दुस्त दजश्चैव एकीभूत स्वदेहगौ।
वज्रोल्पभ्यास योगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः॥ —ह॰ योग प्रदीपिका
अपने देह स्थित रज व वीर्य वज्रोली के अभ्यास के योग से सब सिद्धियों को देने वाले हो जाते हैं।
शारीरिक काम सेवन की तुलना में आत्मिक काम सेवन असंख्य आनन्ददायक है। शारीरिक काम-क्रीड़ा को विषयानन्द और आत्मरति को ब्रह्मानन्द कहा गया है। विषयानन्द से ब्रह्मानन्द का आनन्द और प्रतिफल कोटि गुना है। शारीरिक संयोग से शरीर धारी सन्तान उत्पन्न होती है। आत्मिक संयोग प्रचण्ड आत्मबल और विशुद्ध विवेक को उत्पन्न करता है। उमा महेश विवाह के उपराँत दो पुत्र प्राप्त हुए थे। एक स्कन्द (आत्मबल) दूसरा गणेश (प्रज्ञा प्रकाश) कुण्डलिनी साधक इन्हीं दोनों को अपने आत्म लोक में जन्मा बढ़ा और परिपुष्ट हुआ देखता है।
स्थूल काम सेवन की ओर से विमुख होकर यह आत्मरति अधिक सफलता पूर्वक सम्पन्न हो सकती है। इसलिए इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है और वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। शिवजी द्वारा तृतीय नेत्र तत्व विवेक द्वारा स्थूल काम सेवन को भस्म करना—उसके सूक्ष्म शरीर को अजर-अमर बनाना इसी तथ्य का आलंकारिक वर्णन है कि शारीरिक काम सेवन से विरत होने की और आत्म रति में संलग्न होने की प्रेरणा है। काम दहन के पश्चात् उसकी पत्नी रति की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को अशरीरी रूप से जीवित रहने का वरदान दिया था और रति को विधवा नहीं होने दिया था उसे आत्म रति बना दिया था। वासनात्मक अग्नि का आह्य-डडडडडड अग्नि-कालाग्नि के रूप में परिणत होने का प्रयोजन भी यही है—
भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निना।
तस्मिन्प्रविष्टे जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः॥ —शिव पुराण
शिवजी के तृतीय नेत्र की प्रदीप्त अग्नि की ज्वाला से जब कामदेव भस्म हो गया और वह अग्नि समुद्र में प्रवेश कर गई इसके पश्चात् क्या हुआ ?
ताँ च ज्ञात्वा तथाभूताँ तृतीयेनेक्षणेन वै।
ससर्ज कालीं कामारिः कालकंठीं कपर्दिनीम्॥ —लिंग पुराण
उस देवी को उस स्थिति में जानकर काम के मर्दन करने वाले शिव ने काल कण्ठी कमर्दिनी का सृजन किया था।
ईरानी शहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। नाम था—मुहम्मद अलीबेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर जवाबी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुये और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आये।
मुहम्मद अलीबेग राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था फिर भी इतनी धन दौलत को देखकर उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी।
शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राज सिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिये कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिये अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।
शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। उसके जीवन में बड़ी सादगी थी। जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश होकर लौटने लगा तो खोजों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बन्द कमरे की ओर गई। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला था। उन्होंने पूछा—’इसमें ऐसा क्या है जिसके लिये इतने मजबूत ताले लगाये हैं।’
‘इसमें हीरे मोतियों से भी मूल्यवान वस्तुएँ है शाह! पर उन पर मेरा अधिकार है।’
‘भले ही आपका अधिकार हो पर शासक उन वस्तुओं को देख तो सकता है?’
तुरन्त ताले खोल दिये गये शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कम्बल देखे। मुहम्मद ने कहा-’जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाये थे उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं।’
मुहम्मद की ईमानदारी तथा निःस्वार्थता देख शाह को कुछ कहते न बना। वह मन ही मन पछता रहा था।
प्रगति का मूल है—पात्रता। मात्र दूसरों के अनुदान पर कभी कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं होता। वह कथा प्रख्यात है जिसमें किसी सिद्ध पुरुष की कुटी में रहने वाले चूहे को शत्रु के डर से बचाने के लिए उसने क्रमशः चूहे से बिल्ली, बिल्ली से कुत्ता, कुत्ते से शेर बनाया था, पर जब वह हर स्थिति में शत्रु के डर की शिकायत ही करता रहा तो सिद्ध पुरुष ने झुँझलाकर उसे फिर चूहे का चूहा बना दिया था। हर क्षेत्र में यही सिद्धान्त लागू होता है। आत्मिक प्रगति के बारे में भी—आत्मबल की महान उपलब्धि प्राप्त करने के बारे में भी।
गुरु देव ने गायत्री माता का, हिमालय पिता का और समर्थ मार्गदर्शक का—अजस्र अनुदान प्राप्त किया है— उसी के आधार पर वे तुच्छ से महान बने। यह अनुदान उन्हें भाग्यवश, किसी के उपकार से नहीं मिले वरन् अपनी पात्रता के बलबूते पर खरीदे हैं। ईश्वरीय अनुदान प्राप्त करने वाले—दैवी वरदान से लाभान्वित होने वाले—प्रायः सभी महामानवों ने जो कुछ पाया है वह उनकी आत्म-साधना का ही परिणाम था। भगवान को —देवताओं को—सिद्ध पुरुषों को न कोई प्रिय है—न अप्रिय। न उन्हें किसी के साथ पक्षपात होता है न द्वेष न वे प्रशंसा से प्रसन्न होते हैं न निन्दा से अप्रसन्न। उनका स्तर बहुत ऊँचा होता है। उनकी आँखें बहुत पैनी होती हैं। पात्रता का एक मात्र वह आधार होता है जिसे पाकर उनकी अनुकम्पा सहज ही बरस पड़ती है। भगवान का प्यार और अनुग्रह पात्रता अभिवर्धन के प्रयास किये बिना आज तक कभी किसी ने प्राप्त नहीं किया है।
प्रत्यावर्तन अनुदान का क्रम अगले दिनों आरम्भ होने जा रहा है। गाय दिन भर घास चरती है और उससे बनने वाला दूध शाम को घर आकर अपने बछड़े को दस मिनट में पिला देती है। बछड़ा उसे पीकर पुष्ट और तृप्त होता है। पर यह सम्भव तभी है जब बछड़ा उसी गाय का हो। भैंस का कटरा, कुतिया का पिल्ला यदि गाय के थनों से लगा दिया जाय तो बेकार का विग्रह ही खड़ा होगा। न दूध स्रवित होगा न पीने के इच्छुक की आकाँक्षा पूरी होगी। प्रत्यावर्तन का लाभ प्राप्त करने के लिये उस प्रकार की एकता आवश्यक है जिसमें दाता और ग्रहीता एक स्तर पर खड़े हो सकें। यदि असाधारण भिन्नता रही तो फिर कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
गत मई और जून के अंक में सारा जोर इसी तथ्य पर दिया गया है। गुरुदेव अब इस स्थिति में हैं कि वे अपने तप की एक प्रखर चिनगारी देकर अधिकारी आत्माओं को ज्योतिर्मय बना सकें। इस प्रकार का अनुदान दोनों पक्षों के लिए अति आनन्द का कारण बनता है। दाता गृहीता के और गृहीता दाता के प्रति उपकृत होता है। बछड़ा अनुग्रहीत होता है कि उसे माता का स्नेह और दूध अनायास ही मिला। गाय प्रसन्न होती है कि उसके थनों का तनाव दूर हुआ। प्रेम पात्र के आधार पर अपना आन्तरिक उल्लास विकसित कर लेता है। पुत्र को पिता से लाभ है और पिता की तृप्ति पुत्र से होती है। पत्नी को पति चाहिए और पति के बिना पत्नी अधूरी रहती है।
इस पारस्परिक प्रत्यावर्तन में एक ही प्रधान अवरोध है सजातीयता का अभाव। विजातीय पदार्थ एक दूसरे से मिलते नहीं। रक्त दान तभी सफल होता है जब गृहीता और दान का रक्त एक ही वर्ग का हो। भिन्न वर्ग के रक्त का प्रत्यावर्तन तो उलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है।
रामकृष्ण परमहंस के अनेक शिष्य थे। अपने को अनुयायी—सेवक, भक्त, शिष्य कहने वालों की संख्या हजारों तक पहुँच गई थी। पर कहने भर से कुछ काम नहीं चला। परमहंस निरन्तर व्याकुल रहे कि कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा मिल जाय जिसे अपनी कमाई हस्तान्तरित करके जी में सन्तोष किया जा सके। बड़ी कठिनाई से वे एक विवेकानन्द ढूँढ़ सकने में सफल हुए। जब सत्पात्र मिल गया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। शिष्य को कुछ कहने माँगने की आवश्यकता न पड़ी। गुरु का अजस्र अनुदान बरसता ही चला गया। छत्रपति शिवाजी को समर्थ गुरु रामदास ने भोलेपन में या मस्ती की लहर में ही अपना सञ्चित तप उड़ेल नहीं दिया था वरन् अपने हजारों शिष्यों में से ढूँढ़ते-ढूंढ़ते इस हीरे को पाया और जब उनकी मर्जी का पत्थर मिल गया तो ऐसी प्रतिमा गढ़नी आरम्भ कर दी कि उसे देखने वाले अवाक् रह गये। शिवाजी की मूर्ति गढ़ने में रामदास को कितनी प्रसन्नता हुई होगी इसका अन्दाज अनुमान कोई बिरला ही लगा सकता है।
लाटरी पाने के इच्छुक कितने ही रहते हैं, किसी अमीर के दत्तक पुत्र बनने की कितनों की ही इच्छा आकाँक्षा रहती है, धनीमानी के घर जन्मने वाले बच्चे भाग्यवान माने जाते हैं क्योंकि उन्हें सहज ही उतना बड़ा उत्तराधिकार, सम्पदा मिल जाती है जितने का उपार्जन सम्भवतः वे कठोर श्रम करते हुए भी जिन्दगी भर में कमा न पाते। अध्यात्म क्षेत्र में भी इस प्रकार के सुख-सुविधा भरे अनुदान की पूरी-पूरी गुंजाइश है।
पर यह उपलब्धियाँ अनायास ही नहीं मिल जातीं। इनके लिए तप करना पड़ता है। अन्न से कोठे भर लेने में सफलता प्राप्त करने वाले किसान को एक वर्ष तक सर्दी-गर्मी, वर्षा का प्रहार, प्रकोप सहते रहने की—रात और दिन में अन्तर न करने की—कठोर श्रम से स्वेद बिन्दु बहाने की साधना करनी पड़ती है। इस तप साधना के वरदान स्वरूप ही उसे अन्न, धन से सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी सारा मनोयोग समेट कर पाठ्य पुस्तकों में तन्मय हो जाता है। दस वर्ष तक उसी लक्ष्यवेध में एकाग्र रहता है, तब कहीं स्नातक बनने का सम्मान और उस आधार पर उच्च पद प्राप्त करता है। फल और फलों से लदा बगीचा देखने में माली लम्बी अवधि तक अपने प्रयास में जुटा रहता है। वरदान प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली लम्बी अवधि तक तप करते हैं। इस सनातन प्रक्रिया का और कोई विकल्प नहीं। पात्रता की परीक्षा दिये बिना विभूतियों का वरदान जो प्राप्त कर सका हो, ऐसा व्यक्ति कहीं भी—कोई भी—कभी भी नहीं हुआ।
जिस प्रत्यावर्तन अनुदान की चर्चा पिछले अंकों में हुई है वह साधारण नहीं असाधारण है। इसे गुरुदेव की आकाँक्षा, अभिलाषाओं का सार तत्व कहना चाहिए। वे अपने वर्तमान कार्य क्षेत्र से ऊँचे उठकर अधिक व्यापक अधिक महत्वपूर्ण—स्तर के उत्तरदायित्व वहन करने के लिये अन्यत्र घसीट लिये जा रहे हैं। जो कार्य अब तक वे स्वयं करते रहे हैं उसकी जिम्मेदारियाँ दूसरों के कन्धों पर डालना आवश्यक हो गया है, पर यह सम्भव तभी हो सकता है, जब उसी स्तर के दूसरे व्यक्ति सामने आयें, जिसके वे स्वयं थे। हाथी का हौदा हाथी ही उठा सकता है, गुरु देव जितने बड़े कार्य कर सके वह उनके व्यक्तित्व की गरिमा के कारण ही सम्भव हो सका। हलके स्तर के लोग उतने बोझ से चरमरा जाते। आगे जो उतना बोझा उठा सके, उसका स्तर भी गुरु देव जितना ही होना चाहिए। यह कैसे सम्भव हो, वे इसी के लिये बेतरह बेचैन थे। उनकी एक ही महत्वाकाँक्षा थी कि अपने जैसे 100 व्यक्ति पीछे छोड़कर जायें। ताकि वह प्रवाह और भी अधिक तीव्र गति से बह चले जिसे वे भागीरथ जैसे तप करके गहन गह्वर से छोटे रूप में बहा कर यहाँ तक लाये।
इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिये दो आधार थे। एक दाता की क्षमता दूसरी गृहीता की पात्रता। बिजली के दो तार मिलने से ही शक्ति उत्पन्न होती है। एक पक्ष अधूरा है। नर-नारी को युग्म से ही दाम्पत्य-जीवन का उल्लास विकसित होता है। गाड़ी के दो पहिये ही गति उत्पन्न करते हैं। एक पंख वाला पक्षी आकाश में नहीं उड़ सकता। प्रत्यावर्तन के लिए भी दोनों पक्षों की उपयोगिता समान रूप से है।
इससे पूर्व कभी इस अनुदान पर जोर नहीं दिया गया। कारण कि गुरु देव स्वयं प्रेरित प्रयोजनों में संलग्न थे। युग-निर्माण परिवार का संगठन और जन-जागरण की बहुमुखी गति-विधियों का सञ्चालन यही उन्हें सौंपा गया प्रधान कार्य था। उसके भेद, उपभेद, क्रिया-कलाप अनेक थे, उन्हीं को पूरा करते हुए वे बहुमुखी कार्यक्रमों में व्यस्त दिखाई पड़ते थे। साथियों को खड़े पाँवों रखने के लिए उनकी भौतिक सहायता भी आवश्यक होती थी, उन दिनों उसी में उनकी साधना उपासना का उपार्जित पुण्य फल खर्च हो जाता था। प्रत्यावर्तन के लिए जिस उच्चकोटि की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राप्त करने में उग्र तपश्चर्या करनी पड़ती है। वह उन दिनों सम्भव नहीं थी, फिर दाता और गृहीता का अन्तरंग मर्म स्थल जिस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह उन दिनों न गुरु देव के लिए सम्भव था न दूसरे साधकों के लिए। स्थान की अनुपयुक्तता जैसे कितने ही अभाव ऐसे थे जिनसे वह प्रयोजन उन दिनों पूरे नहीं हो सकते थे। अस्तु कभी उस तरह का प्रयास भी नहीं किया गया। यद्यपि समर्थ उत्तराधिकारियों की आवश्यकता-तलाश-उन दिनों भी इतनी ही तत्परता पूर्वक की जाती रही है। पर सुयोग बन ही नहीं सका।
अब वह अवसर आया है। गुरु देव ने अपने पक्ष की तैयारी पूरी कर ली। स्थान और वातावरण की जो उपयुक्तता आवश्यक थी वह भी बन गई। सात ऋषियों की वह तपस्थली जिसकी अक्षुण्णता बनाये रखने के लिए भगवती भागीरथी को सात धाराओं में विभक्त होना पड़ा अपनी महिमा और महत्ता अभी भी अक्षुण्य बनाये हुए है। ऐसे स्थान पर बना हुआ शान्ति कुञ्ज अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सर्वथा समर्थ है। आवश्यकता, उपयुक्तता, समर्थता के तीन पक्ष अपने प्रखर रूप में विद्यमान हैं। कमी केवल एक ही रह गई है वह गृहीता की पात्रता। यदि यह पक्ष पूरा हो जाय तो समझना चाहिए कि जो कमी थी वह पूरी हो गई और सभी के लिए आनन्द भर देने वाली परिस्थितियाँ बन गई।
प्रत्यावर्तन अनुदान के लिये जिन लोगों ने अपने नाम नोट कराये हैं, उनके लिये हरिद्वार यात्रा भर, करने की तैयारी पर्याप्त नहीं मानी जायगी। उन्हें अपनी मनोभूमि का ऐसा परिष्कार करना पड़ेगा जिसमें बोये हुए बीज ठीक तरह अंकुरित हो सकें।
यह एक तथ्य है कि जिसकी जितनी भौतिक महत्वाकाँक्षी होगी वह उतना ही आत्मिक प्रगति से वंचित रहेगा। लोभ-मोह के आकर्षण इतने जटिल होते हैं कि उसके बन्धन सारी मानसिक और भावनात्मक क्षमता अपने ही इर्द-गिर्द समेटे रहते हैं। उस स्थिति में आत्मिक क्रिया-कलाप-मात्र लकीर पीटने की चिह्न पूजा बनकर रह जाते हैं। जब तक व्यक्ति इस आस्था की हठ न करे कि शरीर और मन उनके वाहन उपकरण मात्र हैं और उन्हें उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए जितनी उन्हें सक्रिय सक्षम बनाये रहने के लिए नितान्त आवश्यक है। यह आस्था जब गहरी हो जाती है तभी यह आकाँक्षा उदय होती है कि आत्म-कल्याण के लिए कुछ कारगर प्रयत्न किया जाय। स्पष्ट है कि शरीर के भरण-पोषण के लिए जितना श्रम, मनोयोग और साधन जुटाया जाता है उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आत्मिक प्रगति के लिए अभीष्ट होता है। दस पाँच मिनट की पूजा-पत्री उस महान प्रयोजन के लिए ‘ऊँट की दाढ़ में जीरा’ जितनी स्वल्प होती है।
यदि कोई यह सोचता है कि जप, ध्यान, प्राणायाम जैसे क्रिया-कलाप किसी का आत्मबल बढ़ा सकने के लिए- आत्मिक तथ्य प्राप्त कर सकने के लिए-पर्याप्त हैं तो यह उसकी भारी भूल है। चम्मच, तश्तरी जुटा लेना पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं। ये उपकरण भोजन करने में सहायक तो हैं पर पेट नहीं भर सकते। पेट भरने के लिए तो रोटी साग चाहिए। पूजा-पाठ चम्मच तश्तरी की बराबर है और दृष्टिकोण का परिष्कार-आन्तरिक स्तर- दाल-रोटी की तरह। हम देखते हैं कि पूजा-उपासना में सब प्रकार चौकस व्यक्ति भी जब सर्वथा खाली हाथ दीखते हैं तो उसका एक मात्र कारण इतना ही होता है कि उन्होंने अन्तःकरण के परिष्कार-और दृष्टिकोण को उदात्त बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की। उस ओर कदम नहीं बढ़ाये।
जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा है उनसे सदा एक ही बात कही जाती रही है कि अपने को शरीर नहीं आत्मा मानें। शरीरगत तृष्णाओं की पूर्ति पर अपना सर्वस्व निछावर न करें। आत्मा की भूख और आकाँक्षा को भी कुछ समझें और उसके लिए भी कम से कम उतना प्रयास तो करें ही जितना कि अपने वाहन शरीर और मन को सुखी सन्तुष्ट बनाने के लिए करते हैं। इसके लिए रोली, चन्दन, पुष्प, धूप काफी नहीं इसके लिए समय, श्रम, मनोयोग, धन आदि जो कुछ महत्व पूर्ण अपने पास है उसका अधिक से अधिक भाग आत्म-कल्याण के लिए—आत्मिक प्रगति के लिए लगाया जाना चाहिए। शरीर और आत्मा का मूल्यांकन जिस तुलनात्मक अनुपात से किया जाय उसी अनुपात से यह निर्णय किया जाय कि शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति में जितना किया जा रहा है उसकी अपेक्षा आत्मा की आवश्यकता पूरी करने के लिए कितना किया जाय?
गुरु देव इसी कसौटी को लेकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करते रहे हैं। उनकी प्रतिभा, विद्या, शारीरिक मानसिक क्षमता, सम्पदा, आकाँक्षा का जितना भाग शरीर परिवार के लिए खर्च हुआ उसकी तुलना में आत्मा की भूख बुझाने के लिए हजार गुना अनुदान अर्पित किया है। यही है उनकी असली जीवन साधना जिसकी पृष्ठभूमि पर गायत्री महापुरश्चरणों का बीजारोपण कल्पवृक्ष की तरह उगा और फला-फूला। वही राजमार्ग सबके लिए है। भौतिक स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में आकण्ठ मग्न लोग सिर पर चन्दन और गले में रुद्राक्ष धारण करके यदि आत्मिक प्रकाश का स्वप्न देखते हों तो यह उनकी मृग तृष्णा मात्र ही सिद्ध होगी।
आध्यात्मिक पात्रत्व की कसौटी यही है कि व्यक्ति की आकाँक्षाएं—अभिलाषाएं, योजनाएं, गति-विधियाँ आदर्शवादी उत्कृष्टता की ओर चल रही हैं या नहीं। मनुष्य अपने पुरुषार्थ की कमाई का लाभ अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं के रूप में उठा सकता है। दैवी अनुकम्पा का प्रयोजन तो मात्र लोक मंगल होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ साधनों के लिए यदि कोई दैवी अनुग्रह को खर्च कर डाले तो वह ‘अमानत में खयानत’ जैसी बात हो जायगी। महामानव भगवान से बहुत कुछ पाते हैं पर उसकी एक-एक बूँद परमार्थ प्रयोजनों में ही खर्च करते हैं। गुरु देव ने अपने गुरु के अनुदान में से ईश्वरीय वरदान में से कभी एक कण भी अपने या अपने परिवार के लिए खर्च नहीं किया। यदि वे उन उपलब्धियों को अपने स्वार्थ साधनों में खर्च करते तो स्पष्ट है कि दूसरों की तरह वे भी खाली हाथ ही रह गये होते।
पात्रता की परिभाषा में इतना कुछ कहा गया है उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा समझा और मनन किया जाना चाहिए उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और अपनाया जानी चाहिए। शब्दाडम्बर के रूप में नहीं सचाई के साथ गहरी आस्था के रूप में ऐसा आसानी से किया जा सकता है। इसमें न तो कोई कठिनाई है न अड़चन, यह आशंका भी व्यर्थ है कि आदर्श वादी जीवन कठिनाइयों से भरा है। सादगी को अपनाने भर से सारा काम सहज ही चल जाता है और दृष्टि कोण में अन्तर आते ही सामान्य भौतिक गति-विधियाँ सरलता पूर्वक चलते हुए आत्मिक प्रगति का क्रम भली प्रकार चलता रह सकता है। गुरु देव इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने साधारण गृहस्थ का सामान्य जीवन जिया पर उच्च आदर्श अपनाये रह कर उच्चस्तरीय आत्मिक प्रगति का लक्ष्य भी पूरा कर लिया। यह रास्ता उन सबके लिए खुला पड़ा है जिनमें वस्तुतः आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा जग पड़ी हो।
युग-निर्माण अभियान यों एक आन्दोलन सरीखा दीखता है पर वस्तुतः वह युग साधना है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखा जाय तो उसे विशुद्ध योग साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। और भी अधिक गंभीरता से देखा जाय तो उसे सामान्य उपासना साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
कोई समय था जब सभी लोग उत्कृष्ट स्तर के होते थे। किसी की सेवा सहायता करने की न तो आवश्यकता पड़ती थी और न गुंजाइश रहती थी। तब लोग व्यक्तिगत स्तर बढ़ाने के लिए साधनाएं करते थे। पर आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। यह आपत्ति काल है। अनाचार और अज्ञान ने तूफान भूकम्प जैसी स्थिति पैदा कर रखी है। दुर्बुद्धि महामारी की तरह फैल पड़ी है; ऐसे विषम समय में व्यक्ति वादी साधनाएं हेय ही ठहराई जायेंगी वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी साधना के ही उपयुक्त हो सकती है जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो। युग निर्माण योजना की गतिविधियों को दूसरे शब्दों में आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की संमिश्रित युग साधना कह सकते हैं इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्च स्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
अपने परिजनों में से प्रत्येक से यह आशा की गई है कि उसे समय, श्रम और साधनों में से एक अंश अनिवार्य रूप से लोक मानस के भावनात्मक नव निर्माण में लगाना चाहिए। यह लकीर पीटने के लिए अत्यन्त श्रद्धा भावना से किया जाना चाहिए। आरम्भ स्वल्प से भले ही किया जाय पर लक्ष्य अधिकाधिक उत्सर्ग का रहना चाहिए। निष्ठा सच्ची होगी तो परिस्थितियाँ भी बन जाएगी। और फुरसत न मिलने, अमुक अड़चन रहने जैसे बहाने ढूंढ़ने की भी आवश्यकता न पड़ेगी। दैनिक भौतिक कार्य क्रमों के बीच ही युग परिवर्तन का कार्य क्रम भी सरलता पूर्वक चलाया जाता रहेगा स्वार्थों पर थोड़ा नियन्त्रण जरूर करना पड़ेगा। शरीर को ही सब कुछ मान बैठने और भौतिक आवश्यकताओं को ही सर्वोपरि महत्व देने की प्रवृत्ति पर अंकुश रखना पड़ेगा। यहीं से आत्म निग्रह शुरू हो जाता है। विवेक के जागरण की कसौटी यह है कि तथाकथित प्रियजनों की इच्छा पर कठपुतली बनकर नाचते रहा जा रहा है या स्वतन्त्र चिन्तन द्वारा आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के महान उत्तर दायित्व को भी अपनी गतिविधियों में सम्मिलित किया जा रहा है।
जिनके दृष्टि कोण में उपरोक्त स्तर का परिवर्तन आया हो समझना चाहिए वे गुरु देव के साथी सहचरों में गिने जाने योग्य बन गये। प्रत्यावर्तन अनुदान के लिए उनकी पात्रता विकसित हो चली। उन्हें जो पाना है भौतिक स्वार्थ के लिए नहीं परमार्थ प्रयोजन में खर्च होगा ऐसी मनः स्थिति से ही दाता और ग्रहीता कृतकृत्य होता है और दैवी अनुग्रह का सदुपयोग बन पड़ता है।
जिन्होंने अपने नाम नोट कराये हैं उन्हें जब अवसर होगा तब हरिद्वार आने के लिये कहा जायगा पर उसकी पात्रत्व विकसित करने वाली साधना अभी से विकसित करनी आरम्भ कर देनी चाहिये। अपने परिवार के सदस्यों में एक व्यक्ति युग-निर्माण अभियान को गिन लेना चाहिए घर में पाँच सदस्य हों तो छटा गुरु देव को उनके मिशन को जोड़ लेना चाहिये। अपने परिवार के एक सदस्य के लिये जितना समय, मनोयोग, स्नेह, चिन्तन, धन खर्च किया जाता है कम से कम उतना तो युग साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये पर बढ़े हुए काम इस स्तर के तो हों कि कुटुम्ब के एक सदस्य जितना समय, स्नेह और साधन तो उस पर लगता ही रहे। यह आग्रह यों हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं पर अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय। गुरु देव को उसी प्रकार विवश किया गया और उनने बिना आगा-पीछा सोचे-बिना बहाने बाजी किये अपने मार्ग दर्शक के संकेतों पर चलना आरम्भ कर दिया। प्रत्यावर्तन की पृष्ठभूमि यही है। केवल प्राप्त करने की लालसा उग्र रहे और देने को कृपणता बनी रहे तो उससे कुछ काम चलने वाला नहीं है।
युग साधना का स्वरूप क्या हो, इसकी एक झाँकी मई अंक में प्रस्तुत है उसमें उन्हीं आधारों की चर्चा है जिन्हें अपना कर गुरु देव इस स्थान तक पहुँचे। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा और गम्भीरता पूर्वक अपनाया है। साधना क्षेत्र में जिन्हें उतरना है उन्हें युग साधना अपनानी चाहिये।
इसका सुव्यवस्थित रूप उन तीन पुस्तकों में विद्यमान है जो ‘हमारी युग-निर्माण योजना’ के नाम से तीन खण्डों में अभी अभी छपी हैं। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के त्रिविध प्रयोजनों को कैसे पूरा किया जाय उसे इस पुस्तक में अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से सजा दिया गया है। विभिन्न समयों पर बिखरे रूप में नव निर्माण प्रयोजन के लिये जो कुछ कहा जाता रहा है उसे क्रमबद्ध रूप से इस एक ग्रन्थ में पाया जा सकता है। गायत्री तपोभूमि में इन दिनों चल रहे तीन-तीन महीने के शिक्षण शिविरों की पाठ्य पुस्तकें यही तीनों ग्रन्थ हैं। 9) मूल्य के यह तीनों ग्रन्थ सभी परिजनों को मँगा लेने चाहिएं। और उनके आधार पर युग साधना की दार्शनिक एवं व्यावहारिक रीति-नीति अपनानी चाहिये।
पिछले अंक में कहा गया था बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी के बड़प्पन के सपने देखना बेकार है। उस दिशा में जो जितना शिर खपायेगा उसे उतना ही पछताना पड़ेगा। अब समय महानता की गौरव गरिमा बढ़ने का आ गया। विचारशील लोगों के कदम उसी दिशा में बढ़ने चाहियें। इसे कार्य रूप में परिणत कैसे किया जाय इसी का मार्ग दर्शन युग साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है। चिन्तन और जीवन क्रम का स्वरूप जिस आधार पर बदला जा सके वही युग साधना हो सकती है। जिस कर्म-काण्ड में पूजा पत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे—आत्म परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा। गुरु देव इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और अपनी अनुभूतियों का ही सार निष्कर्ष परिजनों को बताते रहे। प्रत्यावर्तन और कुछ नहीं उसी मार्ग पर दूसरों को चलाने की पुनरावृत्ति है जिस पर वे स्वयं चले हैं, जो इस दिशा में चलने जितना साहस कर सकें, उन्हें उतनी ही प्रगति एवं उपलब्धि की आशा करनी चाहिये।
प्रत्यावर्तन आयोजन के लिये जिन्होंने नाम नोट कराये हैं उन्हें युग साधना में अपनी तत्परता बढ़ा देनी चाहिये ताकि समय पर वे अपनी बढ़ी हुई पात्रता के आधार पर अधिक महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त कर सकें। जिन्होंने अपने नाम नोट नहीं कराये हैं उन्हें भी मानव जीवन की सार्थकता जैसा कुछ लाभ प्राप्त करने के लिये इसी दिशा में अपने कदम बढ़ाने चाहियें। समझ में भले ही न आवे पर यह अनुपम और अभूतपूर्व अवसर है- जो यह समय ऐसे ही आलस उपेक्षा में निकाल देंगे पीछे पश्चाताप करते रहने के अतिरिक्त उनके हाथ और कुछ न लगेगा।
हरिद्वार पधारने वालों से विशेष अनुरोध
हरिद्वार अब पर्यटकों का बहुत बड़ा केन्द्र हो गया है। गर्मियों में प्रतिदिन लाखों ही यात्री यहाँ आते हैं। आने वालों में नित्य हजारों की संख्या युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की भी रहती है। उनको यह इच्छा होनी स्वाभाविक है कि शान्ति- कुञ्ज में ठहरा जाय।
पर यहाँ की स्थिति से उस इच्छा पूर्ति का ताल-मेल तनिक भी नहीं खाता। यहाँ धर्मशाला स्तर का ठहरने लायक स्थान तनिक भी नहीं बनाया गया है। यह स्थान हरिद्वार नगर से 7 मील दूर जंगल में है जहाँ भोजन आदि की न तो कोई दुकान है और न वापसी में कोई ताँगा, रिक्शा आदि सवारी मिलती है। भोजन, निवास और वाहन तीनों की दृष्टियों से यात्रियों को यहाँ घोर असुविधा है।
इस स्थिति से परिचित न होने के कारण कारण पर्यटक लोग यहाँ मई, जून में भारी संख्या में आते रहे। उनकी संख्या तीस-तीस चालीस-चालीस तक बनी रही। जहाँ एक ओर स्वजनों के आने की प्रसन्नता हुई वहाँ अपनी सामर्थ्य से बाहर का यह आतिथ्य अत्यन्त कष्टकारक भी रहा। दो के स्थान में बीस ठूँसने पड़े और भोजन बनाने का कार्य इतना जटिल हो गया कि उसे एक प्रकार से असह्य एवं असम्भव मानकर धृष्टता पूर्वक वापिस लौट जाने तक के लिये कहना पड़ा।
इन दिनों के अनुभव ने यह अनुरोध करने के लिए विवश कर दिया है कि शान्ति-कुञ्ज में ठहरने की सुविधा नहीं है। आगन्तुक लोग धर्मशाला में ठहरने के बाद ही यहाँ आयें। दोपहर को दो बजे बाद ही भेंट वार्तालाप का समय रखें। अपनी आज की स्थिति में यहाँ आगन्तुकों के निवास, भोजन आदि का इतने बड़े पैमाने पर प्रबन्ध कर सकना अपने लिए सर्वथा असम्भव है। अपनी सद्भावना के साथ-साथ हमारी कठिनाई को ध्यान में रखा जाना भी आवश्यक है।
—भगवती देवी शर्मा
सर्प की आकृति वाली ‘ईल’ मछली यों सदा से रहस्यमय मानी जाती रही है अपनी विशिष्ट आकृति ही नहीं प्रकृति के करण भी। ईसा से 300 वर्ष पूर्व यह दन्तकथा प्रचलित थी कि वह एक विशेष जाति के सर्प से ही विवाह रचती है। पर सत्रहवीं शताब्दी में जल-जन्तु शोध कर्त्ता फ्रांसिस्को रेडी ने ईल के बार में एक विचित्र बात देखी कि वह अगस्त में वर्षा आरम्भ होते ही अपना स्थान छोड़कर कहीं अन्यत्र चली जाती है और फिर जनवरी में बच्चों समेत अपने तालाबों में, नदियों में, पुराने स्थान पर फिर दीख पड़ती है। इतने दिन तक वह कहाँ रहती है और यकायक बच्चे कहाँ से आ जाते हैं यह एक रहस्य ही बना हुआ था जिसको फ्रांसिस्को महोदय ने ढूँढ़ निकाला।
ईल की कई जातियाँ हैं वे इंग्लैंड, आइसलेण्ड, उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलेण्ड, जापान, आस्ट्रेलिया, आकलेण्ड, न्यूजीलैंड आदि देशों के नदी, तालाबों में पाई जाती है। पर जब उसका ऋतुकाल आता है तो प्रणय के लिये एवं प्रजनन की प्रक्रियायें सम्पन्न करने के लिये समुद्र में जाने का रास्ता ढूँढ़ती है। नदी, नालों को पार करती हुई वह किसी न किसी प्रकार समुद्र में जा पहुँचती है। वहीं वह पत्नी पद ग्रहण करती है और वहीं माता बनती है। यदि उसे समुद्र में जाने का अवसर न मिले तो फिर आजीवन ब्रह्मचारिणी का कठोर व्रत पालन करके ही जिन्दगी काट लेती है।
डेनमार्क निवासी एक जन्तु वैज्ञानिक जौनेस सिमिट ने पता लगाया कि ईल समुद्र में ही नहीं वरन् एक विशिष्ट स्थान पर ही अपना गृहस्थ बनाती है। जहाँ-तहाँ वह प्रणय प्रजनन नहीं करने लगती। योरोप की ईलको अमेरिका तक पहुँचने की लम्बी और कष्ट साध्य यात्रा में कई बार डेढ़ वर्ष या ढाई वर्ष तक लग जाते हैं। यह ठीक समय पर चलती है और ठीक समय पर पहुँचती है। यदि वह समय चूक जाये तो वह एक वर्ष रुकना ही उचित समझती है, समय की पाबन्दी और चलने तथा पहुँचने का समय उसे रेलगाड़ी की तरह ही याद रहता है और उसमें वह चूक प्रायः नहीं ही करती।
यह बड़ी कठिन यात्रा है इसमें उसे अनुकूल आहार न मिलने पर भूखा रहना पड़ता है। समुद्री क्षारों के प्रभाव से उसकी चमड़ी का रंग पलट जाता है। उस पर भी माँसाहारी जल जन्तुओं से प्राण बचें तब वह अपने प्रियतम का घर ढूँढ़ पाती है। उसका विवाह समुद्र की तली में 200 से 400 मीटर नीचे होता है। वहीं वह अण्डे देती है। अण्डों से निकलने के बाद जब बच्चे चलने फिरने लायक हो जाते हैं तो उनके लालन-पालन का भार पति के कन्धों पर नहीं डालती वरन् अपने इन सब बाल-गोपालों को लेकर वह प्रदेश की ओर चल पड़ती है, जहाँ का अन्न-जल खाकर वह बड़ी हुई थी।
अविकसित समझी जाने वाली ईल मछली-मर्यादा पालन और शालीनता के सम्बन्ध में विकसित और बुद्धि मान समझे जाने वाले मनुष्य को बहुत कुछ सिखा सकती है, प्रणय और प्रजनन के लिये उपयुक्त पात्र और स्थान का वह चुनाव करती है और उसे क्रीड़ा-कौतुक भर नहीं मानती वरन् उसके लिए कष्ट साध्य तपस्या भी करती है।
मातृभूमि का प्यार उसे कितना अधिक है। लौटकर वहीं आती है और समुद्र जैसे विशाल साधन सम्पन्न के सहारे रहने की अपेक्षा अपने यहाँ की अन्न-जल प्रदान करने वाली मातृभूमि में ही दुःख-सुख के दिन काटती है। भारत के अन्न-जल से पले यहीं से शिक्षा पाये लड़के जब अधिक सुविधाओं के लालच में विदेशों के लिये भाग खड़े होते हैं और अपनी योग्यता से मातृभूमि को लाभान्वित करने के समय उसे धोखा देकर चले जाते हैं तब यही कहना पड़ता है इन सुशिक्षितों से अशिक्षित ‘ईल’ हजार गुनी अच्छी है।