संसार को आलोकित रखने में सूर्यदेव निरंतर गतिमान रहते हैं। मेघों का अभाव अवृष्टि का कारण न बने, उसके लिए समुद्र सतत बड़वानल में जला करते हैं। सितारे रोज चमकते हैं, ताकि मनुष्य अपनी अहंता में ही न पड़ा रहकर विराट ब्रह्म की प्रेरणाओं से पूरित बना रहे। अपनी श्वास-प्रश्वासक्रिया द्वारा संसार का विष पीने और अमृत उड़ेलने का पुण्य-पुरुषार्थ वृक्षों ने कभी बंद नहीं किया। कर्म का परोपकार में अर्पण सृष्टि की मूल प्रेरणा है। जिस दिन यह प्रक्रिया बंद हो जाए, उस दिन विनाश ही विनाश, शून्य ही शून्य, अंधकार के अतिरिक्त कुछ भी तो न रह जाए?
पवन नित्य चलती है और प्राणदीपों को सजग बनाए रखने का कर्त्तव्यपालन करती है, फूल हँसते और मुस्कराकर कहते हैं— "काँटों की चिंता न करके संसार सौंदर्य बढ़ाते रहने में ही जीवन की शोभा है।" कोयल कूकती है तो उसके पीछे जो आभा प्रतिध्वनि होती है, उसमें संसार में माधुर्य बनाए रखने का शांत सरगम गूँजता प्रतीत होता है। अपने नन्हें से बच्चे की चोंच में दाना डालकर चिड़िया अपने वंश का पोषण ही नहीं करती, अपितु असमर्थ और अनाश्रितों को आश्रय देने की परंपरा पर भी प्रकाश डालती है।
जीवन की मूल प्रेरणा है— परमार्थ और लोक-कल्याण के लिए कर्त्तव्य कर्म का निरंतर पालन। जब सृष्टि का प्रत्येक कण इस पुण्यपरंपरा का आदर करने में लगा हुआ है तब मनुष्य अपनी सृष्टि का सौंदर्य निखारने का प्रयत्न न करे, इससे बढ़कर लज्जा और आपत्ति की बात उसके लिए और क्या हो सकती है?
— महर्षि अरविंद
“मेरे अंतःकरण में पाप की भावना नहीं थी, गुरुदेव! लक्षा दूसरों की दृष्टि में वेश्या होगी; पर मेरी दृष्टि में वह विश्वव्यापी अंतश्चेतना का ही एक अंग— एक आत्मा है। लक्षा की जीवनचर्या क्या है? शारीरिक सौंदर्य पर आत्मा के प्रकाश को बुझा देने वाले कीट-पतंगों की मनुहारें देखने की जिज्ञासा मुझे खींचकर वहाँ ले गई। लक्षा का सौंदर्य वर्णनातीत है, आर्यश्रेष्ठ! किंतु उसमें मेरा किंचितमात्र आकर्षण नहीं था। प्रमादवश सुरापात्र को मैंने जलपात्र समझकर सुरापान कर लिया— इतना भर मेरा दोष है, सो उसके लिए शास्त्रनिर्धारित प्रायश्चित्त करने के लिए मैं तैयार हूँ।”
परावसु के इस संवाद को सुन सारा गुरुकुल स्तब्ध रह गया। अब आचार्य देवधर उठे और बोले— "शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार वेश्यागमन और सुरापान के पाप का प्रायश्चित्त यह है कि पिघला हुआ स्वर्ण पिलाया जाए और तदनंतर स्नातक परावसु वाराणसी की पदयात्रा करें और भगवती गंगा के जल का मज्जन और पान करें, तभी इस पाप से मुक्ति हो सकती है।"
अनेक पंडितों तथा आचार्यों ने अपनी-अपनी सम्मतियाँ व्यक्त कीं। उन सबका आशय ऐसे प्रायश्चित्त का प्रतिपादन था, जो या तो परावसु के प्राण ले लेता या उसे जीवन भर के लिए अपंग बना देता। परावसु धर्मनिष्ठ स्नातक थे। वे धार्मिक मान्यताओं की रक्षा के लिए वैसा करने के लिए तैयार भी थे; किंतु अंधी परंपराओं का प्रतिपादन उनका स्वभाव नहीं था। परावसु ने ओजभरी वाणी में कहा— "भूल से पाँव पानी की अपेक्षा आग में गिर जाने का कर्मफल अपने आप मिल जाता है, मेरे प्रमाद का फल मुझे उदरशूल और मूर्छा के रूप में पहले ही मिल चुका है। सामान्य भूल के लिए प्राण लेने की परंपरा धर्म के पतन का कारण हो सकती है। अतएव विद्वज्जनों को इन प्रतिपादनों पर फिर से विचार करना चाहिए और आचार संहिता को विवेकसम्मत तथा उदार बनाना चाहिए। हाँ! मेरी पवित्रता की परीक्षा ली जाए तो बेशक मैं उसके लिए तैयार हूँ।
परावसु का तर्क अकाट्य था। उसका प्रतिवाद किसी ने नहीं किया। महामात्य भतृयज्ञ भी वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने खड़े होकर कहा— "यदि परावसु वस्तुतः हृदय से पवित्र हैं तो इन्हें आज संपूर्ण सभा के मध्य अपनी पवित्रता सिद्ध करनी होगी। लक्षा को यहीं बुलाया जाए। उसे अभिसार के समस्त परिधान और आभूषणों से अलंकृत किया जाए। उस समय परावसु लक्षा का स्तनपान करें। यदि इनकी आत्मपवित्रता लक्षा में मातृ-भावना आरोपित कर दे और उसके मन में वासना के स्थान पर वात्सल्य उमड़ पड़े तो यह माना जाएगा— परावसु शुद्ध हैं; अन्यथा इन्हें शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार ही दंड का भागी बनना पड़ेगा।"
"किंतु इस बात की यथार्थता कैसे सिद्ध होगी?"— आचार्य देवधर ने प्रश्न किया। भतृयज्ञ ने समाधान किया— "उस समय लक्षा के स्तनों में दूध आ जाएगा और उस दूध से अशुद्ध हुआ परावसु का मुख तत्काल शुद्ध हो जाएगा।"
ऐसा ही किया गया। इक्कीस वर्ष की अनिंद्य सुंदरी लक्षा और २४ वर्ष के प्रलंबबाहु परावसु— विलक्षण परीक्षा थी। लक्षा ने राजसी वेशभूषा में सभामंडप में प्रवेश किया। सारा वातावरण अर्धरात्रि की नीरवता के समान स्तब्ध हो गया। परावसु ने चिरकल्याणी भगवती सरस्वती का आवाह्न किया, संपूर्ण जगत ही उन्हें कला की देवी— जगज्जननी के रूप में दिखाई देने लगा। एक नन्हें से बच्चे की भावना लिए वे आगे बढ़े और भावविभोर होकर उन्होंने लक्षा के अंक में बैठकर उसका दक्षिण स्तन मुँह में डाल लिया। लक्षा ने परावसु के कोमल बालों पर उँगली फेरी और उसके उरोज से पयधारा फूट पड़ी। परावसु का मुख पय से पूरित हो गया। साधुवाद! से सारी सभा गूँज उठी। परावसु की पवित्रता को स्वीकार कर लिया गया।
स्नातक परावसु जैसी चरित्रनिष्ठा की तुलना आज कौन कर सकता है?
लगता है सचमुच किसी ने हमें जकड़कर बाँध रखा है और इच्छानुसार एक भी काम नहीं कर सकते। एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब भी इच्छानुसार किसी दिशा में चलने का प्रयत्न करते हैं तो हाथों में पड़ी हथकड़ियाँ, पैरों में बँधी बेड़ियाँ कड़ी हो जाती हैं और विवश करती हैं कि हम एक कदम भी आगे न बढ़ें। जहाँ हैं, वहीं रहकर संतोष करें।
आत्मा अपना स्वरूप जानती न हो, ऐसी बात नहीं है। शास्त्रों में, सत्संगों में यही तो पढ़ते-सुनते हैं कि हम आत्मा हैं। आत्मकल्याण के लिए जीवन मिला हुआ है। उसी के लिए प्रयत्न करना अभीष्ट लक्ष्य है। शरीर और मन अपने दो वाहन हैं। सेवा-सहायता करने के लिए सेवकों के रूप में मिले हुए हैं। इंद्रियाँ ज्ञानवृद्धि, इच्छापूर्ति और क्रियाकलाप को संपन्न करने के उपकरण हैं। परिवार एक प्रयोगशाला, व्यायामशाला है, जिसके माध्यम से आत्मोन्नति के सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का प्रयास किया जाता है। अपनेपन का क्षेत्र बढ़ाते चलना, सज्जनता और उदारता को विकसित करते चलना— यही आत्मविकास है और यही अभीष्ट।
आत्मज्ञान की परिधि इतनी ही है और इसे हमने एक बार नहीं, हजार बार सुना-समझा है। कितनी ही बार तीव्र आकांक्षा भी उठी है कि जीवन-संपदा का सदुपयोग होना चाहिए। इच्छा तो सदा ही किसी-न-किसी रूप में बनी रही है कि कुछ तो परमार्थ के लिए— आत्मकल्याण के लिए— जीवन के लक्ष्य की पूर्ति के लिए होना ही चाहिए। कितनी ही बार तो इस दिशा में कुछ भी न बन पड़ने से भारी पश्चात्ताप होता है। मृत्यु की घड़ी— परमात्मा के न्यायालय में उपस्थित— कर्मफल की अनिवार्यता की सच्चाइयाँ जब विवेकबुद्धि देखती है तो थरथरी आती है— कँपकँपी छूटती है। इन तीनों तथ्यों का सामना करना पड़ेगा। उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। इन तीनों ही कसौटियों पर खरे सिद्ध होने की अपनी कोई तैयारी नहीं है। हर परख पर खोटापन ही साबित होगा। तब कितनी दुर्गति का सामना करना पड़ेगा; उसका भयानक स्वरूप आँखों के सामने आता है तो रोमांच खड़े हो जाते हैं।
आज की गतिविधियाँ संतोषजनक कहाँ हैं? जिया तो जा रहा है, पर इसमें तथ्य कहाँ है? लक्ष्य कहाँ है? दिशा कहाँ है? निरर्थक ही समय व्यतीत हो रहा है। अनर्थमूलक क्रियाकलाप चल रहे हैं। जिधर चलना था ठीक उससे उलटी दिशा में कदम बढ़ रहे हैं। लक्ष्य की समीपता निकट आने की अपेक्षा निरंतर अधिक दूर हटती जा रही है।
इस वस्तुस्थिति को हम जानते न हों—ऐसी बात नहीं। मानते नहीं, सो भी नहीं। तथ्य को भूल न जाएँ, इसलिए स्वाध्याय, सत्संग, कथा-कीर्तन, पूजा-पाठ की प्रक्रिया को भी चलाते रहते हैं। आस्तिकता का दर्शन और उपासना का कर्मकांड बनाया ही इस प्रयोजन के लिए गया है कि मनुष्य विस्मृति के गर्त में न गिर पड़े। आत्मज्ञान को ‘प्रकाश’ के नाम से संबोधन इसलिए किया जाता है कि उसके सहारे सही दिशा विदित होती रहे। दिग्भ्रम की भूल-भुलैयों में भटकने से बचा जा सके। यह प्रकाश मिलता रहता है और दिशा सूझती रहती है। उसपर चलने को जी भी करता है और कभी-कभी आकुलता भी रहती है, पर कुछ बन नहीं पड़ता। सहसा समेटते हैं— कुछ करना चाहते हैं, पर सब निरर्थक ही चला जाता है। कल्पना करते रहे तब तक तो कोई रोकता नहीं— केवल देर तक उस विषय पर सोचने से मन उचट भर जाता है, पर जब कभी कुछ करने को उत्साहित होते हैं और सक्रियता अपनाना चाहते हैं तो बेड़ियाँ कस जाती हैं। हाथ की कड़ियाँ जकड़ जाती हैं। बंधन कड़े हो जाते हैं और कहते हैं बस! आगे नहीं बढ़ा जा सकता। सोचने भर की स्वाधीनता है— करने की नहीं। तुम स्वतंत्र नहीं दास हो। मालिक की मर्जी के बिना बंदी क्या कर सकता है। अपनी स्थिति समझो और जहाँ के तहाँ बने रहो।
मन मारकर चुप ही रह जाना पड़ता है। विवशता में कुछ कर सकना संभव भी कैसे हो सकता है? आकांक्षा अवश्य आगे बढ़ने की थी , पर निविड़बंधन की जटिलता कहाँ कुछ करने दे सकती हैं? कितने कष्टकारक हैं यह बंधन। कितनी भयंकर हैं यह जंजीरें, जिनके रहते प्रकाश की ओर एक कदम भी बढ़ाना संभव नहीं। अंधकार से तनिक भी छूटने की गुंजाइश नहीं।
नशे में गंदी नाली में पड़ा हुआ शराबी भी बहिश्त के मजे लेता रहता है, पर जब होश आता है तब उसे अपनी दयनीय दशा का पता चलता है। बंधनकारी तत्त्व यह जानते हैं कि कैदी बंधन तुड़ाने का प्रयत्न कर सकता है, इसलिए नशा पिलाते रहने की उन्होंने पूरी व्यवस्था रखी है; ताकि बंधन कष्टकारक दीखने की अपेक्षा और भी अधिक मनोरम लगने लगें। हाय रे! हम नशा पीते और बंधनों को सराहते इन बहुमूल्य क्षणों को ऐसे ही गुजारे दे रहे हैं।
बंधन जिनने जीवन का प्रयोजन ही भ्रष्ट कर दिया। आखिर है क्या? गंभीर विचारपरायणता ही इसका हल निकाल सकती है। बंधन दीखते तो हैं नहीं? हाथ-पाँव तो खुले हैं— जेल या बाड़े में भी बंद नहीं। चमड़े की आँखें तो इन बंधनों को देख भी नहीं पातीं। सूक्ष्मदृष्टि ही इन अदृश्य बंधनों को देख-समझ सकती है।
मोहमई मदिरा ही है जिसने हमारी प्रज्ञा को कुंठितकर इन बंधनों को स्वीकार करने के लिए सहमत किया है। मोह-माया-ममता-वासना-तृष्णा-अहंता— कितनी आकर्षक, कितनी रूपवान मंडली है यह। देखने में अप्सरा-सी लगने वाली इन विषकन्याओं का जब नृत्य होता है तो उस रंगस्थली से उठने को जी नहीं करता। लगता है— देखते ही रहें, इन्हीं में तन्मय हो जाएँ, इन्हीं को आत्मसात कर लें। बंधन बँधते ही चले जाते हैं।
सपेरे यही तो करते हैं। बधिकों का यही तो धंधा है। बीन की मधुरता पर मुग्ध होकर— बेचारे सर्प अपने सुखद घर को छोड़कर कुछ अतिरिक्त आनंद पाने के लिए बाहर आते हैं और सपेरों के बंदी बन जाते हैं। मृग इसी कुचक्र में मारे जाते हैं। बधिक की बीन उन्हें बड़ी आकर्षक लगती है। अपने झुंड को भूल जाते हैं, चौकड़ी बंदकर देते हैं और मोहग्रस्त होकर जाल में फँस जाते हैं। होश तब आता है, जब बीन बंद होती है। तब वे अपने को निविड़बंधनों में कसा हुआ देखते हैं। तब उन्हें भयंकर भविष्य का बोध होता है। यही दशा तो अपनी है।
हम इन्हीं बंधनों में बँध गए हैं। शास्त्र कहता है— इन बंधनों से बढ़कर और कोई दुख नहीं। समस्त शोक-संतापों के कारण यही हैं। प्रगति का अवरोध इन्होंने कर रखा है। जब तक यह खुलेंगे नहीं— टूटेंगे नहीं— दुर्गति का अंत नहीं होगा। इन्हें काटो— इन्हें तोड़ो। यही परम पुरुषार्थ है। मुक्ति की ओर चलो। यही इस जीवन की परम उपलब्धि है। वारुणी को फेंको— होश में आओ। अपना स्वरूप समझो— अपनी स्थिति को जानो और क्या करना अभीष्ट है, इसका शांतचित्त से निर्धारण करो। यही महान जागरण है। मूर्छना से जग जाना— स्वप्नलोक का परित्यागकर जागृतों की तरह देखना— विचारवानों की तरह सोचना। यही देव वरदान है। इसे प्राप्त करो और धन्य हो जाओ।
बंधन क्या? मुक्ति क्या? बंधन— अर्थात अज्ञानजन्य व्यामोह। अपने को शरीर और मन समझना है। इंद्रियों की रसानुभूति में रम जाना। वस्तुओं के संग्रह में अहंता की तृप्ति देखना। सेवा के लिए मिले परिवार को अपनी संपदा मानना। अंधी भेड़ों का अनुगमन करना। स्वतंत्र चिंतन छोड़ बैठना। इसी मनः स्थिति का नाम बंधन है। यद्यपि यह सब रचित है, पर कितने निविड़ और कितने कठिन हैं कि इनके रहते जीवन के लक्ष्य की दिशा में— आत्मकल्याण के पथ पर एक कदम चलना संभव नहीं होता।
मकड़ी अपने पेट में से रस निकालकर जाला बुनती है और उसी में रम जाती है। रेशम का कीड़ा अपना आवरण आप बढ़ाता है और उसी में जकड़कर प्राण दे देता है। नशा स्वयं ही पिया जाता है और अपनी दुर्गति का पथ स्वयं ही प्रशस्त किया जाता है। दाने के लोभ में चिड़िया, आटे के लालच में मछली, टुकड़े के प्रलोभन में चुहिया— पाती कम और खोती ज्यादा है। आनंद ढूँढ़ने चली थी, पर बेचारी जाल-जंजाल में फँस गई। हमारी विवेक-बुद्धि ने भी इसी भूल को अपनाया है।
इंद्रियभोगों में तृप्ति कहाँ? कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है और जबड़ों से निकलने वाले रक्त के स्वाद को हड्डी का स्वाद मानता है। इंद्रियभोग अपनी शक्ति और सामर्थ्य को फुलझड़ी की तरह— होली की तरह जलाने की बालक्रीड़ा है। वासना में पाना क्या— केवल गँवाना ही गँवाना है। क्षणिक से आवेश की आड़ में बैठे हुए अनर्थ को न देख पाना बुद्धिमत्ता कहाँ है?
पदार्थ सृष्टि के आदि में थे, और अनंतकाल तक यही रहेगा। भूमि, धातु आदि के रूप में जो संपदाएँ आज दोनों हाथ से समेटने में लाभ ही लाभ गिना जा रहा है। वह भ्रममात्र है। अधिकार जमाने से भी सूरज, चाँद, तारे, बादल अपने नहीं हो सकते। यह प्रकृति की संपदा केवल देखने और उपयोग करने भर के लिए है। स्वामित्व जताने के लिए, सात पीढ़ी तक बैठकर खाने के लिए जमा की जाने वाली अमीरी कितनी उपहासास्पद है। समुद्र की लहरों का बाँधना बालपन के अतिरिक्त और क्या है? प्रकृति की संपदा पर अपनेपन का अधिकार जमाना— संग्रह करना— सदुपयोग की बात भूल जाना— यह तृष्णा ही है जो बंधन बनकर हमें बालक्रीड़ा में उलझाए रहती है और लक्ष्य की दिशा में बढ़ने में अवरोध बनकर खड़ी होती है।
कुटुंबियों की सेवा-सहायता करना कर्त्तव्य है। उस उपवन के माली भर रहना पर्याप्त है। वे ही हमारे हैं— हम उन्हीं के हैं— इस संकीर्णता में बँधा हुआ जीवन उन थोड़े लोगों तक ही सीमित हो जाता है। उनके लिए भी सुसंस्कार और सद्गुणों की संपदा नहीं जुटती, केवल सुविधा और विलासिता के साधन सौंपे जाते हैं। इससे उन बेचारों की आदतें बिगड़ जाती हैं और पीछे दुःख पाते हैं। इस संसार में अज्ञानियों का बाहुल्य है। रास्ते पर चलने वाले कम और भटकने वाले ज्यादा हैं। भटकने वालों के परामर्श को, सुझाव को मानकर, अंधी भेड़ों का अनुकरण करने में आँख वाली भेड़ को भी खड्ड में ही गिरना पड़ेगा। लोग क्या कहते हैं— लोग क्या चाहते हैं, जो उस फेर में पड़ेंगे उन्हें उन्हीं की तरह उलटे रास्ते पर चलना पड़ेगा और उन्हीं के जैसा हेय जीवन जीना पड़ेगा। दुनिया वालों का नेतृत्त्व स्वीकार करके हम बंधन में ही बँधेंगे और दिन-दिन अधिक कसते चले जाएँगे।
बंधनों की जंजीरें यही हैं। यदि विवेक और साहस का छैनी-हथोड़ा लेकर पिल पड़े तो यह जंजीरें फौलाद की नहीं, राँगे की सिद्ध होंगी और एक ही चोट में कटकर गिर पड़ेंगी।
मुक्ति का अर्थ है— शरीर और मन के रुचिकर मोह-मदिरा का परित्याग। तृष्णा और वासना से छुटकारा— अहंता और ममता का निवारण। विवेक के नेतृत्त्व में आत्मकल्याण के पथ पर साहसपूर्वक चल पड़ने में सफलता प्राप्त कर लेना— इसी का नाम है मुक्ति।
बंधन समस्त दुखों के निमित्त हैं। मुक्ति ही सुखों की जननी है। पतन से विरत होकर उत्थान के पथ पर चलने का उपाय यही है कि हम बंधनों को काटें और मुक्ति प्राप्त करें।
"मैं भूखा था, तुमने खाना दिया। मैं प्यासा था, तुमने पानी दिया। मैं निराश्रित था, तुमने स्थान दिया। मैं नंगा था, तुमने कपड़े पहनाए। मैं बीमार था, तुमने सेवा की। मैं संकटों में जकड़ा पड़ा था, तुमने मुझे सहायता पहुँचाई। चलो मेरे स्वर्ग में।" — ऐसा ईशु ने धर्मात्माओं से कहा।
धर्मात्माओं ने पूछा— " हमने कब आपको भोजन, पानी, आश्रय, वस्त्र आदि दिए और कब सेवा-सहायता की?"
ईशु ने उत्तर दिया— " मैं तुम से सच कहता हूँ— जो कुछ दीन-दुखियों के लिए किया गया है वह मेरे लिए ही है।"
—बाइबल
ईश्वर की पूजा-प्रार्थना अध्यात्म की आरंभिक-प्रक्रिया है। इसका प्रयोजन यह है कि हम जिस ईश्वर को एक प्रकार से सर्वथा भुला चुके हैं, उसे स्मरण करें और स्मरण के साथ-साथ यह देखें कि मनुष्य जीवन के साथ उसका संबंध है। इस संबंध को ठीक तरह समझ लेने और उसका निर्वाह करने की ललक जागृत करना— यह अध्यात्म का मूलभूत प्रयोजन है। इसी की पूर्ति के लिए उपासना की— कीर्तन, भजन, तप, स्तवन आदि की— आवश्यकता समझी गई है।
यों ईश्वर के बारे में हमने बहुत कुछ सुना-पढ़ा है। मंदिरों में उसके दर्शन भी किए हैं और कृपाप्राप्त करने के लिए पूजा-पाठ भी, पर सच तो यह है कि अभी तक उसे ठीक तरह समझा भी नहीं जा सका। यदि इतनी भर सफलता मिल जाती तो उपासना भी ठीक तरह बन पड़ती और उसका लाभ भी प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता।
लोग इतना भर जानते हैं कि ईश्वर किसी अन्य लोक में रहने वाले ऐसे देवता का नाम है जो पूजा-अर्चा का भूखा और स्तुति-प्रार्थना का प्यासा बैठा रहता है। जो कोई उसे यह चीजें दे दे, उसे निहाल कर देता है। उसे पापों का दंड नहीं देता और जो पूजा-प्रार्थना नहीं करता, उससे रुष्ट रहता है और कष्ट पहुँचाता है। यदि यह मान्यता सही हो तो नैतिकता और न्याय की कसौटी पर ऐसा ईश्वर सर्वथा ओछा और खोटा सिद्ध होगा। तब उसकी व्यवस्था में किसी सिद्धांत, आदर्श, नियम या व्यवस्था की कैसे आशा की जाएगी और उसके प्रति किसी विवेकवान व्यक्ति के मन में श्रद्धा क्यों कर उत्पन्न होगी?
सच्चाई प्रचलित मान्यता से सर्वथा भिन्न है। ईश्वर सर्वव्यापी दिव्यचेतना को कहते हैं, जो श्रेष्ठता के रूप में मानव अंतःकरण को विकसित करती है। ईश्वर एक प्रेरणा है, जो हमें उत्कृष्ट जीवनयापन करने और आदर्श क्रियाकलाप अपनाने की ओर अग्रसर करती है। ईश्वर एक प्रकाश है, जो हमें न्यायनिष्ठ, विवेकशील और कर्त्तव्यनिष्ठ बनने के लिए मार्गदर्शन करता है।
सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के रूप में मनुष्य के अंतःकरण में— सबसे निकट यह ईश्वर विद्यमान रहता है, पर दुर्भाग्यवश हम उससे विमुख होकर आसुरी, ईश्वरविरोधी और नास्तिकवादी रीति-नीति अपनाते हैं। हमारी चेतना में स्वार्थ भरी संकीर्णता समाई रहती है। वासना और तृष्णा के लिए अंतःकरण लालाइत रहता है। वह प्रक्रिया विशुद्धरूप से ईश्वरविरोधी है। नियति के निर्धारित चक्र का व्यतिक्रम करके कोई चैन से नहीं बैठ सकता। नास्तिक को न शांति मिलती है, न संतोष। वह सदा पतित और व्यथित ही दिखाई पड़ता है।
उपासना इसलिए की जाती है। देवदर्शन, पाठ, जप, ध्यान, पूजन आदि का प्रयोजन यह है कि ईश्वर हमें याद आए। मानसिक चिंतन और शारीरिक कर्तृत्व में ईश्वरीय महत्ता को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता अनुभव होती रहे, साथ ही इस बात का भी भान रहे कि ईश्वर और जीव यदि मिल-जुलकर, एक होकर रहें तो उससे हर्ष और आनंद का विस्तार होगा। ईश्वर संतुष्ट होगा कि उसने मनुष्य के निर्माण पर जो श्रम किया था, वह निरर्थक नहीं गया। जीव आनंद अनुभव करेगा कि उसने सर्वशक्तिमान सत्ता के संकेतों पर चलना स्वीकार करके उसका स्नेह-सद्भाव और अनुग्रह प्राप्त कर लिया।
पूजा-उपासना को साधना कहते हैं। साधन की चेष्टा जुटाना— साधना। साधन अर्थात प्रयत्न, उपकरण, क्रियाकलाप। साध्य— ईश्वर की अनुकंपा की— प्रसन्नता और सहायता की प्राप्ति। साधना एक उपाय भर है। प्रार्थना, स्तुति, पूजा, जप उस कर्त्तव्य का स्मरण दिलाता है, जो हमें ईश्वरप्राप्ति के लिए करना है। आत्मपरिष्कार— लोक-मंगल, परमार्थ से युक्त मनोभूमि और क्रियापद्धति ही वह मार्ग है, जिस पर चलकर ईश्वरप्राप्ति होती है। पूजा-उपासना इस कर्त्तव्य से विमुख न होने— इसके लिए निरंतर सचेष्ट रहने की प्रेरणा करती है; इसलिए उसे भी प्रथम चरण के रूप में आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी माना गया है।
खगोल विद्या के अनुसार यह ब्रह्मांड निरंतर बढ़ और फैल रहा है। विराट की पोल में प्रत्यक्ष ग्रह-नक्षत्र किसी असीम-अनंत की दिशा में द्रुतगति से भागते चले जा रहे हैं। यों यह पिंड अपनी धुरी और कक्षा में भी घूमते हैं, पर हो यह रहा है कि वह कक्षा, धुरी और मंडली तीनों ही असीम की ओर दौड़ रहे हैं। सौरमंडल एकदुसरे से दूर होते जा रहे हैं। यह दौड़ प्रकाश की गति से भी कहीं अधिक है; जो तारे कुछ समय पूर्व दीखते थे वे अब अधिक दूरी पर चले जाने के कारण अदृश्य हो गए।
इसे विस्तार भी कह सकते हैं, विघटन भी और यह भी कह सकते हैं कि इसका अंत एकता में होगा। गोलाई का सिद्धांत अकाट्य है। प्रत्येक गतिशील वस्तु गोल हो जाती है। स्वयं ग्रह-नक्षत्र इसी सिद्धांत के अनुसार चौकोर, तिकोने, आयताकार न होकर गोल हुए हैं। यह ब्रह्मांड भी गोल है। नक्षत्रों की कक्षाएँ भी गोल हैं। इस गोलवृत्त की लपेट में आगे यह दौड़ अंत में किसी न किसी बिंदु पर पहुँचकर मिल ही जाएगी और इस वियोग-प्रक्रिया को संयोग में परिणत होना पड़ेगा।
सौरमंडल इसलिए व्यवस्थित, जीवित और गतिशील है कि वहाँ प्रत्येक ग्रह अपनी मर्यादाओं में चल रहा है और एकदूसरे के साथ अदृश्य बंधनों में बँधा हुआ है। यदि यह प्रकृति इन ग्रहों की न होती तो वह न जाने कब का बिखर गया होता और टूट-फूटकर नष्ट हो गया होता।
मानव समाज को सौरमंडल से ऊर्जा ही नहीं, प्रेरणा भी ग्रहण करनी चाहिए। हम सब अपनी मर्यादाओं में रहें। कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों को समझें और उस तरह का उद्धत आचरण न करें, जिससे दूसरों के साथ अन्याय होता हो या उनके उचित अधिकारों का हनन होता हो।
स्वार्थवादी अलगाव की वृत्ति मोटी दृष्टि से लाभदायक प्रतीत होती है। क्यों हम किसी के प्रति स्नेह-सद्भाव रखें, क्यों हम किसी की सेवा-सहायता की बात सोचें, क्यों अपना समय और ध्यान दूसरों के हितचिंतन में लगाएँ? अपनी योग्यता का लाभ स्वयं ही क्यों न उठाएँ? यह सोचना अदूरदर्शितापूर्ण है, क्योंकि इससे उस परंपरा का व्यतिरेक होता है जिसको अपनाकर मनुष्य जाति को इतना आगे बढ़ सकने का अवसर मिला है। हम सब स्वार्थरत रहें और दूसरे लोग हमारे प्रति सहयोग-सद्भाव रखें, यह कैसे होगा? क्रिया की प्रतिक्रिया नितांत स्वाभाविक है। हम जितने स्वार्थी होते जाएँगे, उसका असर समीपवर्ती लोगों पर सुनिश्चित रूप से पड़ेगा। वे भी इसी प्रकार की संकीर्णता का परिचय देंगे और अपने लिए किसी का सहयोग-सद्भाव प्राप्त कर सकना संभव न रहेगा। मनुष्य कितना ही बुद्धिमान या सक्षम क्यों न हो, उसकी भौतिक प्रगति और आंतरिक प्रसन्नता दूसरों के सहयोग के बिना एक कदम भी आगे चल नहीं सकती। स्वार्थपरायण होने में अपनी शक्ति दूसरों के लिए खर्च न करने का जितना लाभ है उससे हजारगुनी हानि दूसरों के सहयोग और सद्भाव से वंचित हो जाने की है, इसलिए यदि विशुद्ध गणित के आधार पर लौकिक दृष्टि रखकर ही विचार करें तो भी स्वार्थपरायणता की रीति-नीति अपनाना प्रत्यक्ष घाटे का सौदा है। आत्मिक प्रगति तो निश्चित रूप से मर्यादापालन और उदार दृष्टिकोण पर पूर्णतया अवलंबित है। अपने आप की दृष्टि में और दूसरों की दृष्टि में केवल उदात्त रीति-नीति अपनाने वाला ही सम्मानास्पद हो सकता है। जड़ दीखने वाले ग्रहों में भी चेतन जगत में प्रयुक्त होने वाले आदर्श विद्यमान हैं। ऐसा न हो तो वे इतनी विशालता लेकर विशाल ब्रह्मांड में शांति और स्वच्छंदतापूर्वक विचरण न कर सकते।
सौर परिवार अतिविशाल है। सूर्य की गरिमा अद्भुत है। सौर परिवार के समस्त ग्रह-उपग्रहों के सम्मिलित वजन से उसका वजन 750 गुना अधिक है। नौ ग्रहों के अतिरिक्त उसके 3 हजार क्षुद्र ग्रह भी हैं। कई हजार धूमकेतु और असंख्य उल्का समूह इस परिवार में सम्मिलित हैं।
सौर परिवार के ग्रहों को यदि दूरी के हिसाब से क्रमबद्ध किया जाए तो उस शृंखला में क्रमशः बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो को बिठाना पड़ेगा। इसमें बुध सबसे छोटा है और बृहस्पति सबसे बड़ा। बुध पृथ्वी से एक तिहाई है और बृहस्पति 11 गुना बड़ा है।
बुध 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करता है। उसका सूर्य के सम्मुख रहने वाला भाग पृथ्वी से नौगुना अधिक गरम रहता है और पृष्ठभाग अत्यधिक शीतल। पृथ्वी के सबसे समीप शुक्र है। उसका वर्ष 225 दिन का होता है।
पृथ्वी सूर्य से 9 करोड़ 30 लाख मील दूर है। पृथ्वी का लगभग 84 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा है और 16 प्रतिशत जमीन है। पृथ्वी के चारों ओर वायुमंडल है जो ऊपर उठते-उठते झीना होता जाता है। दो हजार मील ऊपर जाकर तो नाममात्र की वायु ही शेष रह जाती है।
मंगल का वर्ष 687 दिन का होता है। उसका व्यास पृथ्वी से आधा है और सूर्य से दूरी 14 करोड़ 20 लाख मील।
बृहस्पति सूर्य की परिक्रमा 12 वर्ष में पूरी करता है, पर उसकी अपनी धुरी पर घूमने की चाल बहुत तेज है। 10 घंटे में ही उसका एक चक्कर पूरा हो जाता है। यह ग्रह बहुत ठंडा है। हिमांक से भी 20 डिग्री कम उसका तापमान है। पृथ्वी की अपेक्षा बृहस्पति का गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक है। अपने यहाँ की 18 किलो भारी वस्तु का वजन बृहस्पति पर 420 किलो बैठेगा। उसके 12 चंद्रमा हैं।
शनि को सूर्य की परिक्रमा करने में साढ़े उनतीस वर्ष लगते हैं; अपनी धुरी पर डेढ़ घंटे में चक्कर पूरा कर लेता है। सूर्य से 88 करोड़ 70 लाख मील दूर है। यह भी बहुत अधिक ठंडा है, शनि के आस-पास तीन छल्ले घूमते हैं। यह छोटे पत्थरों, धूलि-कणों, बर्फ के टुकड़ों से बने हैं। इन छल्लों की मुटाई 20 मील से ज्यादा नहीं, पर व्यास 1 लाख 70 हजार मील है। शनि पर 9 चंद्रमा उदय होते हैं।
यूरेनस की सूर्य-परिक्रमा 84 वर्ष में पूरी होती है। उसके 5 चंद्रमा हैं। वरुण 165 वर्ष में परिक्रमा करता है और 2 चंद्रमा हैं।
प्लूटो पृथ्वी से आधा है, पर सूर्य से बहुत दूर 3 अरब 67 करोड़ मील होने के कारण उसकी परिक्रमा 248॥ वर्ष में पूरी होती है।
ब्रह्मांड के विस्तार और दूरी की चर्चा ऊपर हुई। अब समय की दृष्टि से जरा विचार करें। उपलब्ध दूरबीनों से जो दूरस्थ नक्षत्र देखे जा सके हैं उनका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में 50 करोड़ वर्ष लगते हैं। वह दूरवर्ती तारा आज हमें उस रूप में दीख रहा है जैसा कि वह 50 करोड़ वर्ष पहले था।
इतना विशाल सौर परिवार कैसे बन गया? यह आत्मविस्तार की ही प्रक्रिया है। एक से अनेक बनने की— अपनी क्षुद्रता को महानता में विकसित करने की हलचल ने ही इस ग्रह परिवार को इतना विशाल बनाकर खड़ा कर दिया। चिर अतीत में सूर्य एकाकी था। उसे अपने अहं’ को एकाकी रहना सहन न हुआ। सोचा ‘मैं’ नहीं ‘हम सब’ में आनंद और उल्लास सन्निहित है, इसलिए अपनी सत्ता को केंद्रित-संग्रहीत नहीं रखा जाना चाहिए, वरन उसे बिखेर देना चाहिए। सूर्य में विस्फोट हुआ— वह टुकड़े-टुकड़े छितर गया। मोटी आँख वालों के अनुसार, इसे सूर्य की क्षति और अबुद्धिमत्ता कहा जा सकता है। अपने वैभव को उसने बिखेरा क्यों? तात्त्विक दृष्टि से देखने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि यह सूर्य की बुद्धिमत्ता थी। सौरमंडल का सुशोभित, सराहनीय और सुविस्तृत क्षेत्र पर अधिकार किए हुए जो स्वरूप आज है, वह सूर्य के स्वार्थी बने रहने पर कदापि संभव न हो सका होता।
सूर्य ही क्यों— सारा ब्रह्मांड इसी आधार पर बना और विकसित हुआ है। ब्रह्मांड के प्रारंभ में एक ही पिंड था। उसमें विस्फोट होने से आकाशगंगाओं और ग्रह-नक्षत्रों का सृजन हुआ। यह फैलाव अभी भी चल रहा है। हर ग्रह-नक्षत्र प्रगति के पथ पर बढ़ रहा है,विस्तार कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। लगता है, उनकी दूरी फैल रही है और अनंत में अज्ञात लक्ष्य की ओर वे दौड़े जा रहे हैं। यह अज्ञात लक्ष्य एकता ही है। जितना ही हम स्वार्थ की परिधि से आगे बढ़ते हैं उतना ही ऐक्य का,प्रेम का और स्नेह-सहयोग का लक्ष्य समीप आता चला जाता है।
सृष्टि-निर्माण के कारणों पर प्रकाश डालने वाले अनेक सिद्धांतों में से आज दो को ही मान्यता प्राप्त है। एक है— जार्ज गैमोव का ‘महाविस्फोट सिद्धांत’। जिसमें कहा गया है कि 10 अरब वर्ष पूर्व एक विशाल अग्निपिंड का विस्फोट हुआ। उसके मलबे से छितरकर आकाशगंगाएँ, ग्रह-नक्षत्र , गैस, मेघ आदि बनकर तैयार हो गए। दूसरा प्रतिपादन है— प्रो. फ्रेड हायल का ‘सतत सृष्टि सिद्धांत’। जिसमें उन्होंने सिद्ध किया है कि यह ब्रह्मांड अनादिकाल से ऐसा ही था और अनंतकाल तक वैसा ही बना रहेगा। तारकों का जन्म-मरण होता रहता है, पर इससे स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आता। नष्ट स्वार्थ होता है। जहाँ परमार्थ की प्रवृत्ति विद्यमान है वहाँ अमृत और अमरत्व का ही बोल-बाला रहेगा। ब्रह्मांड की आत्मविस्तार प्रवृत्ति उसे अजर-अमर ही बनाए रहेगी।
बड़ों का बड़प्पन इस बात पर निर्भर है किव वे छोटों को भी सँजोये-सँभाले रहें। क्षुद्र ग्रहों की भी एक बड़ी शृंखला अपने सौरमंडल में विद्यमान है। इन बालकों को मंगल और बृहस्पति ने अपने अंचल में सँभाल कर रखा है, वे उनकी साज-सँभाल यथावत् रखते हैं। सौरमंडल केवल विशाल ग्रह और उपग्रहों का ही सुसंपन्न परिवार नहीं है, उसमें छोटे और नगण्य समझे जाने वाले क्षुद्र ग्रहों का अस्तित्व भी अक्षुण्ण है और उन्हें भी समान सम्मान एवं सुविधाएँ उपलब्ध है। मानव समाज का कल्याण भी उसी राह पर चलने में है। यह क्षुद्र ग्रह बने कैसे? बात मोटी-सी थी। दो समर्थ ग्रह परस्पर टकरा गए। टकराहट किसी को लाभांवित नहीं होने देती। उसमें दोनों का ही विनाश होता है। विजेता का भी और पराजित का भी। यह विश्व आपसी सहयोग पर टिका हुआ है, संघर्ष पर नहीं। संघर्ष की उद्धत-नीति अपनाकर बड़े समझे जाने वाले भी क्षुद्रता से पतित होते हैं। ये क्षुद्र ग्रह यह बताते रहते हैं कि हम कभी महान थे, पर संघर्ष के उद्धत आचरण ने हमें इस दुर्गति के गर्त्त में पटक दिया।
मंगल और बृहस्पति के बीच करोड़ों मील खाली जगह में क्षुद्र ग्रहों की एक बहुत बड़ी सेना घूमती रहती है। सीरिस, पैलास, हाइडाल्गो, हर्मेस, वेस्ट, ईरास आदि बड़े हैं। छोटों को मिलाकर इनकी संख्या 44 हजार आँकी गई है। इनमें कुछ 427 मील व्यास तक के बड़े हैं और कुछ पचास मील से भी कम है।
कहा जाता है कि कभी मंगल और बृहस्पति के बीच कोई ग्रह आपस में टकरा गए हैं और उनका चूरा इन क्षुद्र ग्रहों के रूप में घूम रहा है। यह बात भी कुछ कम समझ में आती है, क्योंकि इन सारे क्षुद्र ग्रहों को इकट्ठा कर लिया जाए तो भी वह मसाला चंद्रमा से छोटा बैठेगा। दो ग्रहों के टूटने का इतना कम मलबा कैसे? एक कल्पना यह है कि सौरमंडल बनते समय का बचा-खुचा फालतू मसाला इस तरह बिखरा पड़ा है और घूम रहा है।
वैज्ञानिकों का इन क्षुद्र ग्रहों पर बड़ा दाँव है। एक योजना यह है कि इनमें से जो कीमती हैं उनको पकड़कर धरती पर लाया जाए और उनमें से धातुएँ निकाली जाएँ। एक योजना यह है कि इनमें से कइयों को पकड़कर एक साथ बाँध दिया जाए ताकि अंतर्ग्रही यात्रा के लिए जाने वाले यानों के लिए उस पर विश्रामस्थल बनाया जा सके।
विशाल ग्रह-उपग्रहों से धातुएँ निकालने, उनको पुल के पत्थरों की तरह प्रयोग करने या जंगली हाथियों की तरह पकड़कर घसीट लाने की कोई वैज्ञानिक योजना नहीं है। किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं कि शनि या बृहस्पति को पकड़कर धरती के किसी अजायबघर में रखा जाना चाहिए, पर बेचारे क्षुद्र ग्रहों के लिए कितने ही तरह के जाल बुने जा रहे हैं। क्षुद्रता एक प्रकार की विपत्ति ही है, हमें आत्मविस्तार की बात सोचनी चाहिए। व्यक्तिवाद की, निजी लाभ की, स्वार्थ भरी संकीर्णता की परिधि छोड़कर आत्मविस्तार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। निखिल विश्व में यही क्रम चल रहा है। ग्रह-नक्षत्र इसी रीति-नीति का अनुसरण कर रहे हैं। क्यों न हम भी इसी श्रेयपथ पर चलने के लिए कदम बढ़ाएँ?
नदी के इस तट पर प्रकृति के सुरम्य वातावरण में आचार्य वशिष्ठ का आश्रम था। आचार्य श्री अपनी पत्नी अरुंधती के साथ गृहस्थ जीवन की मर्यादाओं का पालन करते हुए तपस्या में लीन थे। सूर्यवंशी राजाओं के पुरोहित के रूप में विख्यात थे।
और थोड़ी ही दूर नदी के उस किनारे पर तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र का पवित्र आश्रम था। ऋषि यद्यपि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे थे, किंतु आवश्यकता पड़ने पर नूतन सृष्टि का सृजन भी कर सकते थे।
वशिष्ठ एकाकी जीवन की कठिनाइयों से भली-भाँति परिचित थे। वह अच्छी तरह जानते थे कि अकेले व्यक्ति को स्वयं अपने लिए भोजन जुटाने में काफी समय लग जाता है और ऐसे समय में जबकि उसका एक-एक क्षण लोकोपकार में बीत रहा हो तब तो वह सचमुच कठिनाई अनुभव करता होगा।
वशिष्ठ ने विश्वामित्र के लिए भोजन की व्यवस्था अपने आश्रम में ही कर रखी थी। भोजन अपने संस्कार मानव के मन पर छोड़ता है, इस बात को विश्वामित्र भली-भाँति जानते थे। ऋषिपत्नी अरुंधती के बनाए भोजन में किसी भी प्रकार के कुसंस्कार का प्रश्न भी नहीं उठता। विचारों की सात्विकता और मन की पवित्रता तो अरुंधती के जीवन की मुख्य विशेषताएँ थीं। वह नित्य समय पर भोजन निर्मितकर, भगवान का भोग लगाकर विश्वामित्र के आश्रम में पहुँचाया करती थीं।
वर्षा ऋतु की वह पहाड़ी नदी, 5-6 घंटे निरंतर जोर का पानी गिरा कि घमंड में इतराकर चलने लगी। पानी इतना बढ़ गया कि उसे पार करना कठिन। अरुंधती को चिंता हुई, मुनि भोजन की प्रतीक्षा में होंगे। उन्होंने अपनी कठिनाई वशिष्ठ को बताई। उन्होंने कहा— "देवी! तुम नदी से निवेदन करो कि यदि तुम निराहारी ऋषि की सेवा में भोजन लेकर जा रही हो तो वह तुम्हें मार्ग प्रदान करें।"
अरुंधती ने वैसा ही किया। उन्होंने नदी से विनम्र स्वर में राह माँगी और उसने अपने को दो भागों में विभाजितकर राह दे दी। सूखा मार्ग बन गया। ऋषिपत्नी को जाने में बड़ी सुविधा हुई।
विश्वामित्र को भोजन देकर वह चलने लगीं तो नदी के पूर्ववत् प्रचंड-रूप को देखकर पार करने का साहस न हुआ। उन्होंने विश्वामित्र से कहा— "मुनिवर! ऐसा प्रतीत होता है कि आज तो कुछ घंटे यहीं पर रुकना होगा।"
‘नहीं! नहीं! रुकने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम जाओ। नदी के किनारे पर खड़ी होकर उससे कहो— "मैं आजन्म ब्रह्मचारी वशिष्ठ की सेवा में जा रही हूँ तो वह मार्ग प्रदान करे।"
विश्वामित्र की आज्ञा पाकर अरुंधती चल दीं पहले की तरह नदीतट पर। उनके आग्रह पर नदी को पुनः मार्ग बनाना पड़ा और वह पार होकर अपने पति के पास पहुँच गई, पर उन्हें आश्चर्य अवश्य हुआ। दोनों ओर से नदी पार की गई, पर निकलने का तरीका एक ही। वह सोचने लगी कि मैं स्वयं विश्वामित्र को अपने हाथों से भोजन करा रही हूँ फिर वह निराहारी कैसे? और मेरे पति ब्रह्मचारी कैसे? वह भी आजन्म, जबकि मैं उनके ही सौ पुत्रों की माता बन चुकी हूँ।
अरुंधती को यह रहस्य लगा। वे जिज्ञासु की तरह पति से पूछ बैठीं, उन दोनों प्रश्नों के उत्तर। वशिष्ठ बोले— "जिस प्रकार कमल पानी में रहते हुए भी पानी से दूर रहता है। इसी प्रकार जो मनीषी केवल जीवन-रक्षा के लिए भोजन को ग्रहण करता है और कर्म की साधना में रत रहता है, वह सदा निराहारी ही है। जो अपने ज्ञानवंश की वृद्धि के लिए ही निष्काम भाव से अपनी पत्नी से संबंध स्थापित करता है, वह आजन्म ब्रह्मचारी है। वह दोनों कमलवत् निर्लिप्त स्थिति में हैं।" अब अरुंधती की जिज्ञासा पूर्णतया शांत हो गई।
सामान्य शरीर विज्ञान के अनुसार यह जाना-माना जाता है कि देह के इंजन को चलाने के लिए हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, आँतें, जिगर, गुर्दे, वृक्क, मस्तिष्क आदि अंगों का क्रियाकलाप ही प्रमुख उत्तरदायित्व वहन करता है। उनकी बनावट और क्रियापद्धति शवविच्छेद आदि द्वारा समझी-समझाई जाती है और बीमार पड़ने पर इनमे कहीं खराबी-कमजोरी तलाश की जाती है। रक्त की गतिशीलता एवं शुद्धता इन्हीं प्रमुख अंगों की स्थिति पर निर्भर रहती है। ज्वर, खाँसी, दस्त, व्रण, दर्द, सूजन, शिथिलता, अशक्तता आदि रोगों के बाह्य लक्षण भीतरी अवयवों में विकार आने के फलस्वरूप ही दृष्टिगोचर होते हैं।
विज्ञान के अन्य क्षेत्रों की भाँति शरीर विज्ञान के अंतरंग में जितनी गहराई के साथ प्रवेश किया जाता है, उतने ही अधिक महत्त्वपूर्ण रहस्य प्रकट होते चले जाते हैं। प्राचीनकाल में पंचतत्त्वों को सृष्टि का आदिकारण माना जाता था; पर नवीन शोधें परमाणु, प्रकाश, चुंबक, ईथर, गैस, ताप आदि तत्त्वों के कण-कंपनों को पदार्थ का मूल कारण सिद्ध करती हं। स्थूल पंचतत्त्व तो इन्हीं सूक्ष्मतत्त्वों के मिश्रण मात्र हैं। उनका अब कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता।
शरीर विज्ञान अब हृदय, आमाशय आदि को यंत्र, इंजन आदि मानता है। उसके मूल संचालन में दूसरे तत्त्वों एवं सूक्ष्म अवयवों का हाथ बताया जाता है। इन्हीं पर हमारे स्वास्थ्य का बहुत कुछ आधार निर्भर रहता है।
सूक्ष्म अवयवों में ‘हारमोन’ अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी सक्रियता अथवा निष्क्रियता का हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति पर भारी प्रभाव पड़ता है।
शरीर में दो प्रकार की ग्रंथियाँ हैं। एक प्रकार की ग्रंथियाँ पसीना आदि मलों के विसर्जन की प्रक्रिया संपन्न करती हैं। दूसरी प्रकार की एकरस विशेष का स्राव करती हैं जो रक्त में मिलकर समस्त शरीर को प्रभावित करता है। यह रस विशेष ही हारमोन है।
शरीर की आकृति कैसी ही हो, उसकी प्रकृति के निर्माण में इन हारमोन रसों का भारी हस्तक्षेप रहता है। कई बार तो वे मनःस्थिति, स्वभाव, रुचि को आश्चर्यजनक रीति से प्रभावित करते हैं। स्वसंचालित नाड़ी-संस्थान की गतिशीलता तक में इनकी स्थिति के कारण भारी हेर-फेर उत्पन्न होते हैं। इन हारमोन रसों को जीवन-रस कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।
हारमोन प्रवाहित करने वाली ग्रंथियाँ यों कितनी ही हैं, पर उनमें पाँच मुख्य हैं। यथा—
(1) थायराइड (चुल्लिका)—यह ग्रंथि गले की घंटी के पास स्थित है। इसका वजन आधी छटाँक से भी कम होता है। इससे निकलने वाले रस को थराइक्सन कहते हैं। इसमें 65 प्रतिशत आयोडीन रहता है। इसके अतिरिक्त हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन आदि भी रहते हैं।
इसका विकास बचपन में ही रुक जाए तो शरीर और मन का पर्याप्त विकास नहीं होता है। प्रौढ़ावस्था में विकास रुक जाने पर चुस्ती और स्फूर्ति रुक जाती है। शरीर की गिरावट होने लगती है। वृद्धावस्था में विकास रुक जाने पर मनुष्य का शरीर एकदम गिर जाता है और मृत्यु जल्दी ही आ जाती है। इस ग्रंथि का रस इंजेक्शन द्वारा देने पर इसका अभाव दूर हो जाता है। भेड़ की ग्रंथि खिलाने पर तो शरीर तेजी से बढ़ने लगता है।
इसी ग्रंथि पर मनुष्य की कार्यक्षमता निर्भर करती है। यदि यह ग्रंथि तेजी से काम करने लगे तो कार्यक्षमता में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। इतना ही नहीं तेजी, क्रोध, चिड़चिड़ापन, जल्दबाजी, भागदौड़ की वृत्ति अधिक बढ़ जाती है। यदि यह थोड़ा अधिक कार्य करे तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। इससे गंभीरता, मस्ती, कार्यशीलता और प्रसन्नता प्राप्त होती है।
(2) पिट्यूटरी—यह प्रमुख ग्रंथि है जो अन्य सभी ग्रंथियों पर शासन करती है। यह अंगूर की शक्ल की मस्तिष्क के नीचे एक नली से लटकी रहती है। इसकी स्वस्थता पर ही अस्थि-पंजर की वृद्धि और शरीर का विकास निर्भर करता है। इसकी विकृति से पीलापन समय के पूर्व बुढ़ापा, अस्थि-पंजर की कमजोरी आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं।
(3) पीनियल—यह मस्तिष्क के पिछले भाग में स्थित होती है। इसकी तेजी पर अवस्था से पहले काम-वासना की तीव्रता और असाधारण प्रतिभा का होना निर्भर करता है।
(4) अड्रिनल्स—गुर्दों के ऊपरी सिरों पर दो ग्रंथियाँ स्थित होती हैं। इनसे कार्टन नाम का रस निःसृत होता है। इस रस के नष्ट हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। इन ग्रंथियों की बाह्य प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पुरुषत्व की वृद्धि होती है। आंतरिक क्षेत्र में भय, क्रोध, चिंता आदि का संबंध इसी ग्रंथि से होता है। इन ग्रंथियों पर प्रतिक्रिया होने से रक्तचाप बढ़ जाता है। स्नायुओं में तेजी आ जाती है। भय, क्रोध और उत्तेजना की अवस्था में सामर्थ्य से अधिक काम कर बैठना, ऊँचे से कूद जाना, घातक हमला कर देना अथवा तेजी से दौड़ना इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होता है। इसका रस एड्रीनलीन इंजेक्शन से देने पर उत्तेजना पैदा हो जाती है।
(5) गोनेड—यह लिंग संबंधी प्रमुख ग्रंथि है। इसके ऊपर लिंग संबंधी विकास निर्भर करता है। यदि विपरीतलिंगी रस दिया जाए तो वैसी ही प्रतिक्रिया होने लगती है। वैज्ञानिकों ने परीक्षण के तौर पर मुर्गे की गोनेड ग्रंथि का रस एक मुर्गी के शरीर में छोड़ा। कुछ ही समय बाद मुर्गी ने अंडे देना बंद कर दिया और मुर्गे की तरह बाँग देना शुरू कर दिया। लिंग-परिवर्तन के मूल कारण में इस ग्रंथि का परिवर्तन भी मुख्य होता है। जिन स्त्रियों में यह ग्रंथि अधिक विकसित होने लगती है उनमें पुरुषत्व के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
इस तरह की शरीर में अनेकों ग्रंथियाँ होती हैं, किंतु प्रमुख ग्रंथियाँ ये ही हैं जिनके आधार पर शरीर की स्थिति निर्भर करती है।
हारमोनस्रावों के संबंध में विशेष अनुसंधानकर्ता डॉ. क्रुक शेंक ने इन्हें जादुई रेंड कहा है और बताया है कि बाहर की शारीरिक बनावट या स्थिति कैसी ही क्यों न प्रतीत हो, उनकी वास्तविक स्थिति जाननी हो तो इन स्रावों के संतुलन और क्रियाकलाप का परीक्षण करके ही यह जाना जा सकेगा कि मनुष्य का वास्तविक स्तर और व्यक्तित्व क्या है? हारमोन न केवल अंग-प्रत्यंगों की समर्थता-असमर्थता के आधार हेतु हैं, वरन व्यक्तित्व के निर्माण में भी उनका गहरा हाथ है।
मनःशास्त्री एडलर ने कामप्रवृत्ति की शोध करते हुए बड़े विलक्षण तथ्य प्राप्त किए। बाहर से अत्यधिक सुंदर, आकर्षक और कमनीयता की मूर्ति दीखते हुए भी कई महिलाओं को उन्होंने कामशक्ति से सर्वथा रहित पाया। न उनमें रमणीप्रवृत्ति थी, न नारीसुलभ उमंग। उन्हें दांपत्य स्रोलडे जैसे दुर्बलकाय खिलाड़ी, ग्लामेविजउड जैसी बोनी नर्तकी की इन विशेषताओं के रहस्य का आधार उनके हारमोन रसों में सन्निहित मिला। कितने ही अपौष्टिक आहार मिलने पर भी स्थूलकाय देखे जाते हैं और कितनों की मक्खन, मलाई का बाहुल्य रहने पर भी देह पतली ही बनी रहती है। कुछ लोग रोगों के दबाव को इतना सह लेते हैं कि जितने में सामान्यतः मृत्यु हो ही जानी चाहिए। इसके विपरीत कुछ भीतरी खोखलेपन के कारण जरा-सी अवस्था में ही बोल जाते हैं। बौनापन अथवा लंबा होना इन हारमोन रसों पर निर्भर रहता है।
मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो आकाश-पाताल जैसा अंतर पाया जाता है। उसका कारण उनका आहार-विहार, संस्कार, वातावरण, शिक्षण-संकल्प भी हो सकता है, पर अनजाने और अनचाहे प्रवाह में मनुष्य को कहीं से कहीं बहा ले जाने और कुछ से कुछ बना देने का श्रेय इस जीवन की न उमंग थी, न क्षमता। इसी प्रकार उन्होंने कितने ही युवकों को देखा जिनकी शारीरिक स्थिति मर्दानगी और वैवाहिक जीवन की आवश्यकता प्रतिपादित करती थी, पर वे वस्तुतः नपुंसक थे। न उनके मन में उमंग थी, न जननेंद्रिय में उत्तेजना। इसका कारण तलाश करने पर कामतत्त्व को प्रभावित करने वाले हारमोन रस का ही अभाव पाया गया। इसके विपरीत उन्हें ऐसे नर-नारी भी मिले जो अल्पवयस्क एवं वयोवृद्ध होते हुए भी कामपीड़ित रहते थे। शरीर से रुग्ण रहने पर भी कितने ही व्यक्ति ऐसे पाए गए जो अतिशय कामसेवन में प्रवृत्त थे। इसके बिना उन्हें असह्य बेचैनी अनुभव होती थी। इस विचित्र असंतुलन का कारण उन्हें हारमोन ग्रंथियों के स्राव में अवांछनीय हेर-फेर होना ही प्रतीत हुआ।
बीथोवन जैसे बहरे प्रखर संगीतज्ञ, डीमास्थनीज जैसे हकलाने वाले धुरंधर वक्ता, डेनियल बोर्न जैसे मंददृष्टि चित्रकार, विशेष रसस्राव की मात्रा पर ही निर्भर हैं। नर से नारी और नारी से नर बनने के जो कितने ही उदाहरण सामने आए हैं, इन लिंग-परिवर्तन की स्थिति हारमोन की गतिशीलता में मोड़ आ जाने के कारण ही, बनी बताई गई है।
स्वसंचालित नाड़ी-संस्थान की सक्रियता मनुष्य के नियंत्रण से बाहर बताई जाती है। अचेतन मस्तिष्क के क्रियाकलापों को जीवनकोषों के परंपरागत विकासक्रम से संचालित बताया जाता है। यह भी मानवी प्रयत्नों से अप्रभावित संस्थान समझा जाता है। हारमोन रसों के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है कि उनकी न्यूनाधिकता को घटाया बढ़ाया-जाना कठिन है। प्राणिज हारमोन निकालकर उनके इंजेक्शनों द्वारा उस कमी-बेशी को संतुलित करने का प्रयत्न किया जा रहा है, पर वह उधार का अनुदान क्षणिक लाभ देकर समाप्त हो जाता है। अपने निज के हारमोनस्राव उत्तेजित या शिथिल करने में स्थायी प्रभाव उत्पन्न करने वाले उपचारों में अभी चिकित्सा विज्ञान को यत्किंचित ही सफलता मिली है। हारमोनस्राव इतने महत्त्वपूर्ण, किंतु इतने अनियंत्रित होने के कारण मनुष्य के लिए अभी भी एक पहेली बने हुए हैं।
सूक्ष्मविज्ञान वहाँ से आरंभ होता है, जहाँ स्थूल की समाप्ति होती है। भौतिक प्रयत्न जहाँ तक काम दे सकें उसी को भौतिक क्षेत्र माना जाता है। इससे आगे की परिधि को समाप्त समझ लेना उचित नहीं है। आधिभौतिक से आगे भी दो विशालकाय क्षेत्र पड़े है—आध्यात्मिक और आधिदैविक। इन क्षेत्रों में संव्याप्त विज्ञान—आधिभौतिक क्षेत्र में उपलब्ध सामर्थ्य एवं सफलता से किसी भी प्रकार कम नहीं है।
हारमोनस्राव सर्वथा स्वेच्छाचारी है, उन पर मानव चेतना का कोई अधिकार नहीं, यह मान बैठना ठीक नहीं। औषधिविद्या और शल्यक्रिया की शायद वहाँ तक पहुँच नहीं, पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि शरीर के क्षेत्र में चल रही गतिविधियों पर शरीरपति आत्मा का कोई नियंत्रण या हस्तक्षेप नहीं है। आत्मिक शक्ति बढ़ाकर हृदय जैसे यंत्र को रोक देना और फिर इच्छानुसार संचालित कर देना योगविद्या द्वारा संभव हो गया है। इसे वैज्ञानिक परीक्षणों में प्रमाणित किया जा चुका है। स्वसंचालित नाड़ी-संस्थान को मंद, बंद या तीव्र करने में प्राचीनकाल के योगाभ्यासी तो निष्णात थे ही, अब भी सिद्धांत के प्रतिपादन की दृष्टि से उसे प्रमाणित किया जा चुका है। हर हारमोन रसों में ही क्या अनोखापन है जो आत्मबल के प्रहार से उन्हें घटाया-बढ़ाया जाना संभव न हो सके।
शरीर पर सर्वतोभावेन नियंत्रण शासन-संचालन करने की क्षमता जब मनुष्य योगाभ्यास द्वारा प्राप्त कर लेगा तब हारमोन रसों जैसे अद्भुत स्रावों का सदुपयोग करके व्यक्तित्व को इच्छानुसार ढालना, बदलना, सुधारना संभव हो जाएगा। ऐसी अगणित विशेषताओं से संपन्न ग्रंथिसमूह, चक्र, उपचक्र, प्रतिविग्रह, उन्मेष, इसी शरीर में विद्यमान हैं जो हारमोन रसों में भी अधिक अद्भुत और शक्तिसंपन्न हैं। आत्मसाधना का विज्ञान अपनी ज्ञात और अज्ञात क्षमताओं के नियंत्रण और संचालन का ही विधान है। इस क्षेत्र में आगे बढ़कर हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता में परिणत कर सकते हैं।
यदि जीवन में बुद्धिमानी की कोई बात है तो वह एकाग्रता है, और यदि कोई खराब बात है तो वह है— अपनी शक्तियों को बिखेर देना। बहुचित्तता कैसी भी हो, इससे क्या। वह चीज अच्छी है जो सारे खिलवाड़ और भ्रम की चीजों को दूर कर देती है और हमें हृदय से अपने काम करने के लिए भेजती है।
— एक राही
भौतिक सिद्धियाँ तो उन कीड़े-मकोड़ों में भी पाई जाती हैं, जो चलते समय पैर के नीचे दबकर मर जाते हैं। मक्खी आकाश में उड़ सकती है, बतख पानी पर चल सकती है, मछली जल में रह सकती है, गीध दूर तक देख सकता है, मकड़ी को वर्षा का भविष्यज्ञान रहता है, जुगनू का तेज चमकता है और सर्पदंश से क्षण भर में मृत्यु होती है। कहते हैं कि नीलकंठ पक्षी के दर्शन से लक्ष्मी मिलती है। दर्द बंद करने में छिपकली का तेल काम आता है। गिरगिट कई तरह के रूप बदलता है। यदि इन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए साधना की जाए तो सफलता के अंतिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा जा सकता है, जहाँ यह कीड़े-मकोड़े पहले से ही पहुँचे हुए हैं।
लोगों को कौतूहल दिखाकर अपनी विशेषताएँ सिद्ध करने की आत्मश्लाघा पूरी करने की ही यदि हविस हो तो इसके लिए इतनी कष्टसाध्य गतिविधि अपनाने और सामान्य सुख-सुविधाएँ छोड़ने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। लोगों को अचंभे में डालने का काम बाजीगर बड़ी अच्छी तरह करते हैं। वे इतनी अलौकिकताएँ दिखाते हैं कि आश्चर्यचकित होना पड़ता है। वहाँ ‘कला’ कुछ भी मुश्किल नहीं है। हाथ की सफाई का अभ्यास थोड़े दिनों में हो जाता है और बाजीगरी सिखाने वाले उन रहस्यों को सिखा भी सकते हैं। देखना यह है कि इससे अपना क्या लाभ हुआ और दूसरों का क्या हित साधा। दस पैसे नाववाले को देकर आवश्यकता के समय नदी पार हो सकती है। रोज तो कोई पानी पर चलता नहीं, हर जगह पुल हैं। नावें मौजूद हैं। इस सिद्धि को कोई व्यक्ति बहुत कष्ट सहकर प्राप्त कर ले तो उसे दस पैसे नाववाले को न देने भर की ही बचत हुई। बीमार को अच्छा करने में सिद्धपुरुष जितना लाभ पहुँचाते हैं, उससे हजारों गुने अधिक रोगी एक डॉक्टर अच्छे करता है। योगी कितने अंधों को आँखें देगा, पर आँख के डॉक्टर तो अपनी जिंदगी में हजारों अंधों को अच्छा करते हैं। योगी बनने की अपेक्षा डॉक्टर बनना क्या बुरा है। उसमें कष्ट भी कम— लाभ भी अधिक। भारत से इंग्लैंड उड़कर जाने की सिद्धि बहुत तप के बाद मिलेगी, पर हवाई जहाज से थोड़ा-सा किराया देने पर वह कार्य आसानी से हो सकता है। दूरदर्शन, दूरश्रवण के लिए जब टेलीफोन, रेडियो और टेलीविजन मौजूद हैं तो फिर उन सिद्धियों को प्राप्त करने की क्या जरूरत रह गई।
साधना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही प्रयोजन है— अपने अंतःकरण में प्रसुप्त अगणित सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावनाओं का उन्नयन, दृष्टिकोण का परिष्कार और कर्त्तृत्व में देवत्व के समावेश का अभ्यास। सिद्धियों की उत्कृष्टता इसी कटौती पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है और इसी से संसार का।
आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना, अंतःकरण को प्रेम से लबालब भर लेना, निश्छल निर्मलता विकसित करना और लोक-मंगल के लिए आत्मोत्सर्ग करना— यह सिद्धियाँ जिसके पास हैं, असल में वही सच्चा और उच्चकोटि का सिद्धपुरुष है।
संत दादू अपने गृहस्थ जीवन में दुकान चलाते थे। एक दिन वे हिसाब में व्यस्त थे। वर्षा हो रही थी। थोड़ी देर में जब सिर उठाया तो उनने अपने गुरुदेव को दुकान के सामने पानी में भीगते हुए खड़ा देखा।
दादू जी हड़बड़ाकर उठे, दुकान में भीतर लाए और उनकी ओर ध्यान न जाने के लिए क्षमा माँगी। गुरुदेव ने कहा—"बेटा! तूने मुझे तो देखा, भगवान तो कब से तेरे दरवाजे पर खड़ा है। तू उसे क्यों भीतर नहीं बुलाया?" बात चुभ गई। दादू संत बने और उनने गुरुदेव की तरह भगवान को भी अपने घर में बुलाकर दम लिया।
सद्भावनाओं का, प्रेमपूर्ण अंतःकरण का मनुष्यों पर ही नहीं, पशुओं पर भी प्रभाव पड़ता है— इस तथ्य को प्रतिपादित करने में इंग्लैंड के एक सामान्य व्यक्ति ने न केवल तर्क प्रस्तुत किए, वरन प्रामाणिकता की प्रतिमा बनकर स्वयं ही खड़ा हो गया। उसने न केवल सामान्य पशुओं पर प्रेम की प्रतिक्रिया का प्रदर्शन किया, वरन यह भी साबित कर दिया कि खूँखार, उद्दंड और जंगली जानवरों को भी सभ्य और मृदुल बनाया जा सकता है। इस व्यक्ति का नाम था— 'जान सोलेमन रेरी'।
उसके पिता ओहियो प्रदेश के फ्रेंकलिन गाँव में रहते थे। नाम था— 'एडम रेरी'। उनने एक घोड़ा खरीदा। घोड़ा जितना शानदार था, उतना ही सस्ता भी। एडम ने सोचा कि इसे सधा लेंगे, पर वह बहुत ही खूँखार था। उसे सिखाने-सधाने के लिए दूर-दूर से क्रमशः एक दर्जन से भी अधिक घुड़सवार बुलाए गए, पर वे सभी असफल रहे। घोड़ा किसी के काबू में न आया। एडम ने स्वयं उसे काबू में लाने की कोशिश की और कोड़े मारे। क्रुद्ध घोड़े ने रस्सों से बँधे होते हुए भी उन्हें ऐसा पछाड़ा कि टाँग टूट गई। उन्हें अस्पताल भिजवाया गया। घोड़ा छूट निकला। उसे खतरनाक समझकर पुलिस द्वारा उसे मरवा देने का निश्चय किया गया।
बालक जान रेरी उन दिनों सिर्फ 12 वर्ष का था। उसने सारी स्थिति समझी और सीधा उस जंगल में चला गया जहाँ घोड़ा-चौकड़ियाँ भर रहा था। लोगों को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ जब उन्होंने देखा कि लड़का बिना लगाम और जीन के उस घोड़े की पीठ पर बैठा हुआ घर आ रहा है। पूछने पर उसने बताया कि, "यह कोई जादू नहीं है। मुहब्बत यदि गहरी और सच्ची हो तो खूँखार पशुओं को भी वशवर्त्ती बनाया जा सकता है।"
बालक की ख्याति घोड़ों के शिक्षक के रूप में फैल गई। लोग अपने-अपने उद्दंड घोड़े ठीक कराने उसके पास लाने लगे। सिलसिला घोड़ों का चल पड़ा तो उसने वही काम हाथ में ले लिया। कई वर्ष तक उसे यही काम करना पड़ा। बीस वर्ष का होते-होते वह सरकस के लिए घोड़े सधाने की कला में निष्णात हो गया। उसने उन्हें ऐसे-ऐसे विचित्र खेल सिखाए, जो उससे पहले सरकसों में कहीं भी नहीं दिखाए जाते थे। इससे पहले घोड़े सधाने की कला उन्हें पीटने, भूखा रखने, पैरों में कीलें ठोकने जैसे निर्दयतापूर्ण तरीकों पर अवलंबित थी। रेरी ने सिद्ध किया कि उससे कहीं अधिक कारगर प्यार-मुहब्बत का तरीका है। वह कहता था कि, "यदि जानवरों को प्यार मिले तो न केवल पालतू प्रकृति के पशु, वरन नितांत जंगली और मनुष्य से सर्वथा अपरिचित जानवर भी वशवर्त्ती, सहयोगी एवं सरल प्रकृति के बन सकते हैं।" यह उसने सिर्फ कहा ही नहीं, वरन करके भी दिखाया।
जब घोड़े ही उसके पल्ले बँधने लगे तो उसने उनकी आदतें समझने के लिए कई महीने जंगली घोड़ों के साथ रहने की व्यवस्था बनाई। उनकी रुचि और प्रकृति को समझा। उन्हें बदलने एवं सधाने के आधार ढूंढ़े और अपने विषय में पारंगत हो गया। रेरी ने चुनौती दी कि कोई कितना ही भयंकर घोड़ा क्यों न हो वह उसे कुछ ही दिनों में, कुछ ही घंटों में वशवर्त्ती बना सकता है। पत्रों में छपी इस चुनौती ने घोड़ेवालों में भारी दिलचस्पी पैदाकर दी। अब से लगभग 125 वर्ष पूर्व घोड़े ही युद्ध और यातायात के प्रमुख माध्यम थे। मोटरें तो तब थी नहीं। बड़े लोग घोड़े ही पालते थे। कृषि और वाहन प्रयोजनों के लिए उन्हें ही काम में लाया जाता था। बड़े और बिगड़े घोड़ों की संख्या भी कम नहीं थी। वे मालिकों के लिए सिरदर्द बने हुए थे। कीमती होने के कारण उन्हें न मारा जा सकता था और न भगाया जा सकता था। उन्हें कोई खरीदता भी नहीं था। उन पर होने वाले खर्च तो बेकार थे ही, साथ ही जान-जोखिम की आशंका भी बनी रहती थी। ऐसे घोड़े आए दिन रेरी के पास आते और उन्हें अनुशासित बनाया जाता था।
छपी चुनौती से प्रभावित होकर लार्ड डारचेस्टर ने रेरी का द्वार खटखटाया। उसने 15 हजार डालर से घुड़दौड़ में बाजी जीतने के लिए एक बलिष्ठ घोड़ा खरीदा था। कुछ दिन तो वह ठीक रहा, पर पीछे वह बेकाबू हो गया। लोहे की जंजीरें तोड़ देता, जंगले उखाड़ देता और कभी-कभी गुस्से से अपनी ही अगली टाँगें काट लेता। उसके लिये ईंटों की कालकोठरी बनानी पड़ी। उसी में चारा-दाना दिया जाता। पूरे चार वर्ष उसे उसी कोठरी में बंद रहते हो गए थे। ढेरों खर्चीले उपाय कर लिए गए थे, पर वह किसी तरह काबू में नहीं आया। उसे अंधा बनाने की बात सोची जा रही थी ताकि कम खतरनाक रह जाए और उसे दौड़ाने में काम लाया जा सके। उसका नाम था— क्रूजर।
लार्ड डारचेस्टर ने उस घोड़े को ठीक करने की चुनौती दी। रेरी ने उसे स्वीकार कर लिया। उसे ही यूरेल्स ग्रीन जाना पड़ा, क्योंकि घोड़ा लंदन तो आ नहीं सकता था। उस समय घोड़ा अत्यंत क्रुद्ध था। कोठरी के दरवाजे तोड़ने में लगा हुआ था। उसकी भयंकर स्थिति देखकर लोगों ने समझाया कि वह इसे सुधारने के झंझट में न पड़े और वापिस चला जाए, पर रेरी अपनी बात पर अड़ा ही रहा। उसे विश्वास था कि वह किसी भी भयंकर जानवर को— इस घोड़े को भी अनुशासित कर सकता है।
रेरी सीधा घोड़े की कोठरी में निहत्था घुस गया। उसने उसकी पीठ और गरदन सहलाई और तीन घंटे तक उसके साथ बातें करता हुआ दुलारता रहा। जब वह घोड़े के साथ उसकी गरदन के बाल पकड़े कोठरी से बाहर आया तो दर्शकों ने उसे जादूगर कहा, पर वह यही कहता रहा कि, "यदि प्रेम को जादू कहा जाए तो ही उसे जादूगर कहलाना मंजूर है। उसके पास कोई मंत्र-तंत्र नहीं है।"
लार्ड डारचेस्टर इस सफलता पर भावविभोर हो गए। उनने घोड़े को उपहारस्वरूप रेरी को भेंट किया और साथ ही एक बड़ी धनराशि भी दी। विदाई के अवसर पर लार्ड महोदय ने कहा—”यदि रेरी की नीति मनुष्य जाति ने अपनाई होती, तो उसके ईसाई धर्म का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो जाता।”
महारानी विक्टोरिया ने रेरी की ख्याति सुनी तो उनने भी उसकी कला देखने की इच्छा प्रकट की। शाही निमंत्रण देकर उसे बुलाया गया। प्रदर्शन में रेरी के सामने एक ऐसा घोड़ा प्रस्तुत किया गया जो पहले तीन घुड़सवारों का कचूमर निकाल चुका था। रेरी उसकी कोठरी में निर्भयतापूर्वक घुस गया और सोलह मिनट बाद उस पर सवार होकर बाहर आया। दूसरे घोड़े को तो उसने दस मिनट में ही वशवर्त्ती कर लिया।
अब उसे एक अत्यंत खतरनाक ऐसे घोड़े का सामना करना था जिसने दो घुड़सवारों की पहले ही जान ले ली थी। रेरी घुड़साल में भीतर गया और भीतर से कुंडी बंद कर ली। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि, "जब तक वह कहे नहीं तब तक कोई उसे छेड़ने या दरवाजा खोलने की कोशिश न करे।"
घोड़ा अत्यधिक भयंकर था। महारानी सहित प्रतिष्ठित दर्शक रेरी के निहत्थे और एकाकी भीतर घुसने से बहुत चिंतित थे, पर वह घुसा सो घुसा ही रहा। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था अधीरता बढ़ती जा रही थी। जब पूरे तीन घंटे बीत गए और भीतर से कोई हलचल सुनाई न दी तो यही समझ लिया गया कि घोड़े ने रेरी को मार डाला। निदानस्वरुप, दरवाजा तोड़ने का आदेश हुआ। भीतर जो कुछ देखा गया उससे सभी स्तब्ध रह गए। घोड़ा फूस के ढेर पर सोया हुआ था और उसकी टाँग का तकिया लगाए रेरी भी खर्राटे भर रहा था। दोनों की नींद खुली। वे परम मित्र की तरह साथ-साथ अस्तबल से बाहर आए तो महारानी विक्टोरिया को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। वे यह न समझ सकीं कि इतना खूँखार घोड़ा किस प्रकार इतनी जल्दी इतना नम्र बन सकता है।
रेरी ने अपनी कला का प्रदर्शन टैक्सास में किया। जिसमें दूर-दूर से दर्शक और पत्रकार आए थे। उसके सामने चार ऐसे घोड़े पेश किए गए जो जंजीरों से कसे रहते थे और चारों ही अपने मालिकों का खून कर चुके थे। रेरी पौने तीन घंटे सींखचे वाली कोठरियों में अकेला उनके साथ रहा और फिर चारों को अपने साथ खुले मैदान में ले आया। उसने घोड़ों को लेटने का आदेश दिया तो वे बिल्ली की तरह लेट गए। दर्शकों ने भारी हर्षध्वनि की।
एक बार तो उसने जंगली बारहसिंगों के एक जोड़े को पालतू कुत्तों जैसा बना लिया और वह उन्हें साथ लेकर प्रेम, दया और आत्मीयता के इस प्रत्यक्ष प्रभाव का प्रदर्शन करता हुआ गाँव-गाँव घूमा।
यों लोग उसे घोड़ों का शिक्षक या जादूगर भर मानते थे, पर वस्तुतः वह प्रेम का प्रयोक्तामात्र था। जो कुछ उसने किया, वह सिर्फ इसलिए कि सर्वसाधारण को आत्मीयता की शक्ति का थोड़ा-सा आभास मिल सके। इस महान मंतव्य की शिक्षा देने के लिए वह देश-देश में घूमा और उसने सर्वसाधारण को यही समझाया कि यदि प्रेम और करुणा की नीति को अपनाया जा सके तो न केवल सच्चे अर्थों में धर्मात्मा बना जा सकता है, वरन पारस्परिक विग्रह की समस्त समस्याओं को देखते-देखते सुलझाया जा सकता है।
रेरी अपने मिशन का प्रचार करने के लिये स्वीडन प्रशिया, मिश्र, फ्रांस, रूस, अमेरिका आदि अनेक देशों में गया और उसने वहाँ घोड़ों पर किए गए अपने प्रयोगों की चर्चा करते हुए प्रेम के परिणाम को जानने और उसे व्यावहारिक जीवन में अधिकाधिक मात्रा में प्रयुक्त करने की प्रेरणा दी। वह जहाँ भी गया, जनता ने उसका भरपूर स्वागत किया।
फ्रांस सरकार ने उसके कर्तृत्व की शोध करने और उसका निष्कर्ष निकालने के लिए एक आयोग नियुक्त किया। अमेरिका के राष्ट्रपति वुकेनन ने उसकी शिक्षापद्धति के नोट्स लेकर ऐसी पुस्तक लिखाई जिससे घोड़ों को सिखाने-सधाने में सहायता मिले। अश्व विज्ञान की वह पुस्तक अब भी बड़ी प्रामाणिक मानी जाती है।
राल्फ एमर्सन ने कहा था—"प्रेम की महत्ता के लिए विनिर्मित ईसाई धर्म के मूल सिद्धांत को रेरी ने जिस अनोखे ढंग से प्रतिपादित किया है, उससे सभ्यता के इतिहास में एक नए अध्याय का आरंभ हुआ है।"
एक अधेड़ दंपत्ति रात को आँधी-तूफान और मूसलाधार वर्षा के बीच फिलाडेल्फिया के एक होटल में पहुँचे और ठहरने के लिए स्थान माँगा। होटल पूरा भरा हुआ था। कहीं तिल रखने की जगह नहीं थी। मालिक ने अपनी असमर्थता प्रकट करके छुट्टी ले ली। घोर शीत और वर्षा की इस भयानक रात में दंपत्ति एक कोने में सिकुड़े हुए खड़े थे। रात कहाँ कटे, कुछ सूझ नहीं पड़ रहा था।
होटल के एक कर्मचारी ने बिस्तर में पड़े-पड़े यह दृश्य देखा। वह बाहर निकला और उस दंपत्ति को अपनी छोटी-सी कोठरी में टिका दिया। स्वयं किसी प्रकार इधर-उधर खड़ा, टहलता रात काटता रहा।
सवेरा हुआ तो दंपत्ति उस कर्मचारी की उदार सज्जनता के लिये धन्यवाद देते हुए चले गए। इस कृपा का पुरस्कार देने का भी उनने प्रयत्न किया, पर उस कर्मचारी ने इसे मनुष्यता का फर्ज बताया और उसका मूल्य लेने से इनकार कर दिया।
कुछ ही दिन बाद उस कर्मचारी को न्यूयार्क से बुलावा आया। चिट्ठी के साथ हवाई जहाज का टिकट भी था। कर्मचारी पहुँचा, हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए वह दंपत्ति खड़े थे, जिन्हें उसने अपनी कोठरी में टिकाया था। वे थे— न्यूयार्क के करोड़पति ‘विलियम वालडोर्फ’।
उन्होंने एक नया शानदार होटल बनाया था। उसका बड़ा मैनेजर उस कर्मचारी को नियुक्त किया गया। वालडोर्फ ने कहा—"आपकी जैसी सज्जनता से संपन्न व्यक्ति ही बड़े जनसंपर्क वाले कार्य को सँभालने के सच्चे अधिकारी हो सकते हैं।"
साम्राज्ञी समुद्रा के सम्मुख अपनी मनोव्यथा व्यक्त करते हुए अनर्त नरेश जरुत्कार ने कहा— "समुद्रे ! आप जानती हैं। सम्राट पुलकेशिन ने वाजपेय यज्ञ आयोजित किया है। एक बार अनर्तवासी प्रजाजन के बौद्धिक उत्कर्ष के लिए मैंने भी वाजपेय आयोजित किया था। उस समय सम्राट पुलकेशिन स्वयं ही पधारे थे और महारानी भी उनके साथ थीं। आज जब उन्होंने वाजपेय आयोजित किया है तो नियमानुसार राजकुल के ही किसी प्रतिनिधि को उसमें भाग लेना चाहिए।"
अपनी विवशता को स्पष्ट करते हुए महाराज ने आगे कहा— "मैं सांतापन कर रहा हूँ और पूर्णाहुति में आपको मेरे साथ रहना चाहिए। अपने कोई पुत्र भी नहीं है। ऐसी स्थिति में, इस यज्ञ में किसे भेजा जाए? यही तो असमंजस है।"
महाराज का वाक्य अभी पूरा हुआ ही था कि राजकुमारी रत्नावती बोल उठीं— "महाराज! स्मृत्यर्थ सार में बताया गया है कि कोई यजमान किसी अनुष्ठान में भाग न ले सकता हो तो उसकी पत्नी, पुत्र अथवा पुत्री भाग ले सकते हैं। स्पष्ट शास्त्रीय आदेश के बाद भी असमंजस। आर्यश्रेष्ठ! मुझे आज्ञा दीजिए। महाराज पुलकेशिन के इस यज्ञ में अनर्त का प्रतिनिधित्व आपकी कन्या रत्नावती करेगी और यह दिखा देगी कि नारियाँ गृहस्थ संस्था का ही नहीं, धर्ममंच का भी संपादन सफलतापूर्वक कर सकती हैं।"
पुत्री रत्नवती के शीश पर हाथ फिराते हुए महाराज श्री, किंचित रूखी हँसी हँसे और बोले— "मैं जानता हूँ रत्नावती! तू योग्य है। तूने शास्त्राध्ययन ही नहीं किया, तेरे पास विचारों की पूँजी भी है। जनसमाज को जागृत करने की प्रतिभा का तुझमें अभाव नहीं है, तथापि.......।" महाराज कुछ रुके फिर स्वयं ही बोले— "तू नहीं जानती रत्ना! भारतीय कन्या का संबंध निश्चित हो जाने के बाद उसके माता-पिता के अधिकार गौण हो जाते हैं। राजकुमार वृहद्बल की आज्ञा प्राप्त किए बिना तुझे इस यज्ञ में भेजना संभव नहीं है और उनसे स्वीकृति प्राप्त करने के लिए यथेष्ट समय भी नहीं है।”
राजकुमारी ने कहा— "इसमें स्वीकृति की क्या आवश्यकता— महाराज! यह तो अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकता है। संसार के किसी भाग की धर्मविमुखता, मदांधता और अज्ञानता का प्रतिफल समूचे विश्व के विनाश का कारण हो सकता है। पड़ोस में लगी आग की लपटें कब अपने घर आ जाएँ, कहा नहीं जा सकता; इसलिए विज्ञजन इसे अपना स्वार्थ समझकर दूसरों के घर लगी आग बुझाने दौड़ते हैं। लोक-मंगल के पुण्य-परमार्थ के लिए आप आज्ञा लेने की बात कहते हैं। यदि ऐसे पवित्र कार्यों में विघ्न-बाधा उपस्थित करने वाला कोई अपना सगा-संबंधी हो तो उसकी अवज्ञा या उपेक्षा ही नहीं, प्रतिरोध भी किया जाना चाहिए।"
जरुत्कार ने पुत्री की दृढ़ता देख उसे यज्ञ में भाग लेने की अनुमति दे दी। रत्नावती ने यज्ञ में भाग लेने के साथ ही जनजागृति अभियान का निपुणतापूर्वक संचालन किया। सारा राष्ट्र जाग उठा और साथ ही राजकुमारी का यश भी चारों ओर फैल गया।
राजकुमार वृहद्बल को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने रत्नावती का संबंध ठुकरा दिया। महाराज जरुत्कार ने दूसरा संबंध ढूंढ़ने का प्रयास किया; किंतु रत्नावती ने दूसरा संबंध नहीं स्वीकारा। उन्होंने आत्मसाक्षात्कार के लिए कठोर तप किए। उनकी साधना के संवाद वृहद्बल तक भी पहुँचे। एक दिन वे स्वतः राजकुमारी के पास जाकर अपनी भूल के लिए क्षमा माँगने लगे, पर राजकुमारी ने विवाह करने से इनकार करते हुए कहा— "इस देश की कोई भी कन्या अन्याय के सम्मुख घुटने न टेके। मैं इसकी प्रेरणास्वरूप आजीवन कुमारी ही रहूँगी।"
रत्नावती ने सुख और वैभव का जीवन त्याग दिया और जीवन की अंतिम साँस तक लोक-मंगल का कार्य किया।
पुष्प-वाटिका में भी गोबर का कीड़ा अपनी रुचि के अनुरूप गंदगी ही तलाश करता है और उसी में लिपटा रहता है। मधुमक्खी फूलों को ढूँढ़ती है और पराग चूसकर शहद जमा करती है। ओछी प्रकृति के मनुष्य संसार की गंदगी को ही देखते-सोचते हैं और उसी में उलझे रहते हैं, पर अच्छे लोग श्रेष्ठता देखते, श्रेष्ठता सोचते और श्रेष्ठता में ही निमग्न रहते हैं।
प्याज खाने वाले के मुँह से निकलने वाली गंध को सूँघकर यह बताया जाता है कि उसने प्याज खाई है। निकृष्ट वचन बोलने वाले के भीतर दुर्बुद्धि भरी है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
सूर्य की किरणें यों सभी जगह चमकती हैं, पर दर्पण पर उनका प्रतिबिंब विशेष रूप से दमकता है। ईश्वर की सत्ता यों सर्वत्र विद्यमान है, पर उसका विशेष वैभव संतों में ही दृष्टिगोचर होता है।
जल को वरुण देवता कहते हैं, पर हर जगह का जल पीने के योग्य नहीं होता। कहीं का जल पीते हैं तो किसी जगह का सिर्फ धोने के काम आता है और कहीं ऐसा जल भी होता है, जिसे छूते तक नहीं। इसी प्रकार आत्मा हर किसी में है, पर वह सभी की समान रूप से पूजा या विश्वास के योग्य नहीं है।
हाथी चला आ रहा था। रास्ते में खड़े लड़के को देखकर महावत चिल्लाया— "ऐ लड़के हट, हाथी आ रहा है।" लड़का बोला—"हाथी में भी नारायण हैं, फिर मैं क्यों डरूँ, क्यों हटूँ?" लड़का हटा नहीं। हाथी आया और उसे सूँड से पकड़कर एक ओर धकेल दिया। थोड़ी चोट लग गई। लड़का रोता हुआ उन महात्मा जी के पास पहुँचा, जिनने सब में नारायण होने की बात कही थी। उसने पूछा—"यदि हाथी में भी नारायण थे, तो उसने मुझे मारा क्यों?" संत ने कहा—"बेटा! महावत में भी तो नारायण था। तूने उसका कहना क्यों नहीं माना?" सबमें नारायण मानने का अर्थ यथोचित क्रियाकलाप करने की विवेक-बुद्धि को त्याग देना नहीं है।
सज्जनों का क्रोध ऐसा होता है जैसे पानी पर खींची गई लकीर। जब खींचते हैं तभी वह दीखती है, इसके बाद तुरंत मिट जाती है। इसी प्रकार सज्जन यदि कारणवश क्रोध भी करें तो वह दूसरे क्षण ही समाप्त हो जाता है, उनके मन में राग-द्वेष नहीं जमता।
भगवान अपने भक्तों का खरा-खोटापन परखते हैं। जो खरा होता है, उसे ही उनका प्यार मिलता है। यह कसौटी है— मनुष्य की स्वार्थपरता और परमार्थपरायणता। वे स्वार्थी को खोटा और परमार्थी को खरा मानते हैं।
चित्त में उद्विग्नता तभी तक रहती है जब तक तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। भौंरा तब तक गूँजता और चक्कर काटता रहता है जब तक कि फूल पर बैठता नहीं। जैसे ही वह फूल पर बैठा और रसपान का स्वाद मिला कि वह पूरी शांति और तन्मयता के साथ उसी आनंद में निमग्न हो जाता है, फिर उसके न गुँजन करने की आवश्यकता होती है, न चक्कर लगाने की।
चिकित्साग्रंथ में ज्वर की औषधि लिखी थी। एक अंधश्रद्धालु रोगी ने पुस्तक में ज्वर की औषधि वाला पन्ना फाड़ा और खा लिया। तब भी ज्वर अच्छा नहीं हुआ। शास्त्र में लिखी बात झूठी क्यों हो गई? ऋषिवचनों से नीरोग क्यों न हुआ? वह इसी असमंजस में पड़ा था। इतने में एक विज्ञ व्यक्ति आए। रोगी ने अपना असमंजस सुनाया। उनने यही कहा—"पुस्तक में जो औषधि लिखी थी। उसे प्राप्त करके खाने से ज्वर दूर होता। पुस्तक तो मार्गदर्शन कर सकती है, पर उसमें रोग दूर करने की शक्ति नहीं है।"
कितने ही व्यक्ति धर्मग्रंथों का पाठ-पारायण इसी दृष्टि से करते हैं कि इन्हें पढ़ने-दुहराने से ही कल्याण हो जाएगा। वे यह भूल जाते हैं कि धर्मग्रंथों में जो राह बताई है, उस पर चलने से ही कुछ काम बनेगा।
दो मित्र एक बगीचे में गए। माली से उन्होंने एक घंटे वहाँ रहने और इच्छित फल खाने की स्वीकृति प्राप्त कर ली। एक व्यक्ति बहुत तार्किक था, वह बगीचे का मूल्य, पेड़ों की संख्या, फलों की किस्में, हर साल का नफा-नुकसान आदि की खोज-बीन करने में लगा रहा। दूसरे ने इस झंझट में पड़ना व्यर्थ समझा और मीठे फल ढूँढ़-ढूँढ़कर खाने में लग गया। एक घंटा समाप्त होने पर माली ने दोनों को विदा कर दिया। एक का पेट भर गया था और दूसरा खाली हाथ लौटा।
लोग ईश्वर, जीव, प्रकृति, द्वैत-अद्वैत की दार्शनिक गुत्थियों में तो उलझे रहते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का श्रेष्ठतम उपयोग जिस प्रकार किया जा सकता है, उसी रीति-नीति को कार्यान्वित करने का प्रयत्न अधिक आवश्यक है।
एक ब्रह्मचारी परमहंस जी के पास बैठकर शिवोऽहं, सच्चिदानंदोऽहं की रट लगाने लगा। उसे टोकते हुए परमहंस जी ने कहा—"भाई! पहले शिव और सच्चिदानंद बनने का प्रयत्न करो। जब वैसे बन जाओ तो घोषणा करना कि मैं शिव या सच्चिदानंद हूँ। राज्य न होने पर भी कोई व्यक्ति अपने को राजा-राजा कहता फिरे तो उसे और उसकी समझ को संदेह की दृष्टि से ही देखा जाएगा।
स्त्रियाँ धान कूटती हैं। एक हाथ से कूटने की क्रिया करती हैं और दूसरे से गोद के बच्चे को सँभालते हुए उसे दूध पिलाती हैं। इसी प्रकार, शरीर से सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन और मन से भगवान का स्मरण दोनों काम साथ-साथ चल सकते हैं।
आदमी सिर पर बोझ लादे हुए मुँह से साथी से बातचीत करता चलता है; इसी प्रकार मनुष्य सांसारिक कर्त्तव्यों का बोझ वहन करते हुए भी मन से प्रभुपरायण रह सकता है।
जिस ओर ज्यादा वजन होता है, तराजू का वही पलड़ा नीचे हो जाता है। जिसमें सज्जनता और गंभीरता का वजन होता है, वह नम्र बनकर चलता है और जो ओछे होते हैं, वे ऊपर उठे हुए पलड़े की तरह अपना बड़प्पन बघारते फिरते हैं।
दो किसानों के खेत पास-पास थे। वर्षा खूब हुई। एक किसान के खेत में पानी भरा रहा तो फसल अच्छी हुई। दूसरे के खेत का पानी सूख गया और बीज नहीं जमा। अपने दुर्भाग्य पर पछताते हुए उस भुलक्कड़ को सांत्वना देते हुए चतुर किसान ने समझाया कि, "चूहों के बिल बंद न करने की असावधानी से तुम्हें यह हानि उठानी पड़ी। आगे यह दुर्भाग्य फिर न देखना चाहो तो चूहों के बिल बंद कर दो अन्यथा उनमें होकर खेत का पानी फिर निकल जाएगा।" लोभ-मोहरूपी चूहों के बिल मनुष्य की सारी श्रेष्ठता को बहा देते हैं और जीवन का खेत सूखा—ऊसर रह जाता है।
सिखाया हुआ तोता यों तो राधा- कृष्ण, राधा-कृष्ण कहता रहता है, पर बिल्ली को देखते ही अपनी असली बोली ‘टें-टें’ बोलने लगता है। लोग मनोरंजन के लिए तो धर्म-कर्म की बातें करते हैं, पर जब प्रलोभन सामने आते हैं तो कुकर्म में फिसल जाते हैं।
नाव पानी में चले तो हर्ज नहीं; पर यदि पानी नाव में घुस जाए तो संकट ही समझना चाहिए। मनुष्य संसार में रहे तो कोई हर्ज नहीं; पर यदि संसार मन में घुस जाए तो फिर अनर्थ ही होकर रहेगा।
दूध में थोड़ा पानी हो तो थोड़ी लकड़ी में जल्दी ही ‘खोया’ बन जाता है, पर यदि पानी बहुत और दूध जरा-सा हो तो घंटों आग जलाने पर उतना 'खोया' नहीं मिलता, जितनी की लकड़ी जल गई। जीवनरूपी दूध में थोड़ी सी तृष्णा हो तो भजन का लाभ मिल सकता है, पर यदि दुर्बुद्धि ही समा रही हो तो फिर बहुत साधना से भी कुछ विशेष परिणाम नहीं निकलता।
प्रेमी का हृदय दीनों का भवन है और भगवान का हृदय प्रेमी का वासस्थान है। प्रेमी के हृद्देश में दरिद्र नारायण ही एकमात्र प्रेमपात्र है। दरिद्र सेवा ही सच्ची ईश्वरसेवा है। दीन-दुखियों के दर्द का मर्मी ही महात्मा है। गरीबों की पीर जानने वाला ही सच्चा पीर है।
— कबीर
थोड़ा-सा रक्तदान बड़े आपरेशनों के समय अक्सर दिया जाता है। शल्यक्रिया के समय इतना रक्त निकल जाता है कि शेष थोड़े खून से शरीर का काम नहीं चल पाता है। ऐसी दशा में, किसी अन्य व्यक्ति का रक्त रोगी के शरीर में चढ़ाना पड़ता है।
लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अशुद्ध रक्त को पूरी तरह निकाल दिया जाए, उसकी एक बूँद भी शेष न रहने दी जाए और उसके स्थान पर शुद्ध रक्त को पूरे शरीर में भर दिया जाए। ऐसी आवश्यकता शल्यक्रिया के अवसर पर नहीं, वरन तब पड़ती है जब पैतृक रक्त बच्चे के रक्त से तालमेल नहीं खाता। यह पारस्परिक संघर्ष यदि यथावत् चलने दिया जाए तो बच्चे का जीवन ही संकट में पड़ जाता है। इस स्थिति में, कुशल चिकित्सक यही उपाय करते हैं कि वंश-परंपरा से उपलब्ध रक्त को पूरी तरह निकालकर बालक की नाड़ियों में किसी स्वस्थ मनुष्य का ऐसा रक्त भर दें, जो उसकी प्रकृति के अनुरूप पड़ता हो। इस रक्त-परिवर्तन की क्रिया को चिकित्सकों की भाषा में—‘एक्सचेंज ब्लड ट्रांसफ्यूजंशन’ कहते हैं।
साधारणतया वंश-परंपरा के अनुरूप शिशु की रक्तसंरचना भी होती है, पर कभी-कभी इसका अपवाद भी देखा जाता है। ऐसा भी होता है कि पैतृक रक्त बालक के लिए जीवनदाता होने के स्थान पर प्राणघातक सिद्ध हो। जब ऐसा विग्रह होता है तो परंपरागत रक्त का मोह नहीं किया जाता; वरन उसके परित्याग के लिए बेझिझक कदम बढ़ाया जाता है।
‘जो पुराना सो अच्छा’, 'जो पुरखे दे गए हैं सो सही’— यह मान्यता विवेकसंगत नहीं, रूढ़िवादी है। लकीर का फकीर बने रहने से पुरातन मोह की कट्टरता भर सिद्ध होती है। ऐसे आग्रह को न उपयोगी कहा जा सकता है और न दूरदर्शितापूर्ण। ऐसा विग्रह उत्पन्न होने पर बुद्धिमान चिकित्सक और विवेकशील अभिभावक रक्त-परिवर्तन का ही समर्थन करते हैं।
चेतना-क्षेत्र में भी कई बार ऐसे विग्रह उत्पन्न होते रहते हैं। साधारणतया पैतृक परंपरा के अनुरूप ही बालकों की रुचि और प्रकृति होती है। कई बार सुसंस्कारी आत्माएँ ऐसे घरों में आ जाती हैं, जहाँ की अधोमुखी परंपराएँ उनके अनुकूल नहीं पड़तीं। यदि उसी स्थिति में रहकर आत्महनन करते रहने के लिए उन्हें विवश किया जाए तो एक प्रकार से उनकी आध्यात्मिक मृत्यु ही हो जाती है। यह स्थिति और भी अधिक दुखद है।
प्रहलाद ऐसे परिवार में जन्मे, जहाँ की परंपराएँ उनके प्रतिकूल पड़ीं। शंकराचार्य के अभिभावक उन्हें कुछ और भी देखना चाहते थे। जवाहरलाल नेहरू के माता-पिता उन्हें सत्याग्रही नहीं देखना चाहते थे। बुद्ध को उनके घरवाले विरक्त देखने के लिए तैयार न थे। नानक के पिता भी सहमत न थे। विभीषण के भाई को यह पसंद न था कि वह भक्त बनकर जिए। सदन कसाई और अजामिल की परंपराएँ परमार्थप्रेरक न थीं। घरवालों ने अंतिम समय तक प्रतिरोध किया और उन्हें परंपरागत मार्ग से पृथक न होने के लिए रोका। उच्च आत्माएँ यदि ऐसे तुच्छ स्वार्थों से प्रेरित परिवारी आग्रह को मान लें तो उनकी जन्म-जन्मांतरों की संग्रहीत महानता नष्ट हो जाएगी और उसी सड़ी कीचड़ में कीड़े की तरह बिलबिलाते हुए मरना पड़ेगा। ऐसी स्थिति स्वीकार करना एक प्रकार से श्रेष्ठ आत्माओं की जीवित ही मृत्यु कही जाएगी। इससे बचने के लिए उन्हें भी रक्त-परिवर्तन की चेतनात्मक प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है। यह कार्य उठती उम्र में जितनी अच्छी तरह हो सकता है, बड़े हो जाने पर उन कुसंस्कारों की अभ्यस्त स्थिति में परिवर्तन कठिन ही पड़ता है।
छोटी उम्र में रक्त का बदल दिया जाना संभव है। जैसे-जैसे आयु बड़ी होती जाती है वैसे-वैसे यह कार्य कठिन होता जाता है।
माता के रक्त से कभी-कभी गर्भस्थ शिशु के रक्त में कुछ घातक तत्त्व मिल जाते हैं और वे शिशु के लाल रक्ताणुओं (रेड ब्लड सेल्स) को नष्ट करने लग जाते हैं। यदि यह प्रक्रिया कुछ समय चलती रहे तो बालक सूखकर काँटा होने लग जाएगा, पागल या विकलांग हो जाएगा और यदि विनाश की गति तेज रही तो वह मर ही जाएगा। बाहरी कोई रोग न होने पर भी अंतर की यह प्रक्रिया इतनी घातक होती है कि बच्चे की जिंदगी दूभर कर दे। कई बार कई स्त्रियों की संतान होती और इसी प्रकार मरती रहती है। बाहर का तीर-तुक्का इलाज होता रहता है, पर भीतर के इस माता और शिशु के रक्त में चलने वाले संघर्ष का कुछ पता ही नहीं लगता।
इस विभीषिका का उपयुक्त इलाज यह है कि बालक का सारा रक्त निकाल दिया जाए और उसके स्थान पर स्वस्थ रक्त का प्रवेश करा दिया जाए। जो रक्त दिया जाए, उसमें समानता होनी चाहिए। मोटी आँख से देखने में सभी का रक्त लाल और पतला होता है, पर उनमें चार तरह के भेद पाए जाते हैं। चार वर्ण,चार आश्रम,चार दिशा और चार पुरुषार्थ की तरह रक्त के भी चार भेद हैं। अपने गुण-कर्म-स्वभाव का रक्त ही अपनी जाति वाले में ठीक ‘फिट’ बैठता है। भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में पटरी नहीं बैठती और न भिन्न वर्गों के रक्त आपस में घुलते-मिलते हैं। उलटे देवासुर संग्राम खड़ा कर देते हैं, इसलिए किसी के शरीर में रक्त चढ़ाया जाना हो तो यह प्रबंध करते हैं कि समान जाति का रक्त मिल जाए।
रक्त की इस जाति-विभाजन के आविष्कारक हैं— विज्ञानी 'लैंड स्टीनर'। उन्होंने अपने प्रयोगों में यह पाया कि लाल रक्ताणुओं में कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जो ‘सीरम’ के कुछ तत्त्वों से प्रतिघाती समानता करते हैं। इस वर्ग के रक्ताणु ‘एग्ल्युटिनो जींस’ कहलाते हैं और ऐसे सीरम को ‘एग्ल्यूटिनिंस’ कहते हैं। खून में से लाल रक्त कणों को पृथक कर लिया जाए तो बचा हुआ हिस्सा ‘सीरम’ कहा जाएगा।
रक्त की चार जातियाँ हैं। डाॅक्टरों की भाषा में उनके नाम हैं— (1) अ, (2) ब, (3) अ-ब, और (4)ओ। 'अ' वर्ग में किसी एक प्रकार के हानिकारक ‘एग्ल्यूटिनो जींस’ का असर होता है। 'ब' वर्ग में दूसरे प्रकार वालों का। 'अ-ब' में दोनों प्रकार के असर होते हैं और ‘ओ’ वर्ग में किसी प्रकार का असर नहीं होता। इसी प्रकार 'अ' और' 'ब' वर्ग के सीरम में ‘एग्ल्यूटिनिंग‘ रहता है। ‘अ-ब’ वर्ग में किसी प्रकार का नहीं और 'ओ' वर्ग में दोनों प्रकार का रहता है। एक ही प्रकार के एग्ल्युटिनिस वर्ग में उसी प्रकार के एग्ल्युटिनो जींस की समानता रहती है। यदि शरीर में प्रतिद्वंद्वी प्रकार का ‘एग्ल्यूटिनिन’ होगा तो रक्त नहीं होगा, किंतु यदि विपरीत स्थिति हुई तो प्रतिक्रिया होगी और हानि पहुँचेगी।
इसी आधार पर रक्त के दो समूह बने— (1) रीसस पाजेटिव और (2) रीसस नेगेटिव। यदि गर्भावस्था में भ्रूण और माता के रक्त का तालमेल न बैठा तो प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी और बालक के लिए संकट खड़ा हो जाएगा।
यहाँ यह जान लेना आवश्यक है। भ्रूण केवल माता की ही प्रतिकृति नहीं है, उसमें पिता के जींस भी माता के जींस की तरह मिश्रित हैं। फलतः किसी एक से कुछ मिलता-जुलता होने पर भी उस मिश्रण के आधार पर शिशु का सारा ढाँचा अलग से ही बनता है। वह पूर्णतया माता या पिता किसी से भी नहीं मिलता। यद्यपि दोनों की विशेषताएँ भी उसमें मौजूद रहती है। रक्त के बारे में भी यही बात है। बालक का रक्त माता से भिन्न ही नहीं, प्रतिरोधी भी हो सकता है और उसका सम्मिश्रण घातक परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। ऐसी ही गड़बड़ी को डॉक्टर लोग ‘विलिरुवित’ कहते हैं। जब यह स्थिति हो तो रक्त-परिवर्तन—एक्सचेंज ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही कारगर उपाय रह जाता है।
उच्च आत्माओं के उपयुक्त शुद्ध रक्त— तपस्वी तत्त्वज्ञानी और महापुरुषों का होता है। यह नसों में बहने वाले लाल पानी की बात नहीं, अंतःकरण की चैतन्यभाव कलिकाओं में बहने वाले उल्लास की है। किन्हीं में यह बहुत प्रखर होता है, किंतु उनकी पैतृक परंपराएँ ओछे और घटिया स्तर का जीवन जीने की— स्वार्थी और संकीर्ण रीति-नीति अपनाए रहने की होती हैं। वे उसी के अभ्यस्त होते हैं। उच्चसंस्कारी आत्माएँ उस स्थिति में रहकर अंतर्द्वंद्व में फँस जाती हैं। उनके दोनों ही द्वार रुक जाते हैं। पैतृक निकृष्टता उनकी आत्मा स्वीकार नहीं करती। जो अंतरात्मा चाहती है, उसे पारिवारिक बंधन सफल नहीं होने देते। इस संघर्ष में वे कुंठाग्रस्त आत्माएँ घुट-घुटकर बेमौत मरती हैं और जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहती हैं।
पैतृक न होकर कई बार अपने कुसंस्कार भी इतने प्रबल होते हैं कि आत्मा की उच्च आकांक्षाओं को फलवती होने में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न करते रहते हैं। भावना उठती है कि मनुष्य जीवन के सुरदुर्लभ अवसर का श्रेष्ठतम उपयोग करना चाहिए और ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिससे भविष्य उज्ज्वल हो और दूसरों को अनुकरण का प्रकाश मिले। यह आकांक्षा निरंतर उठती रहती है, पर जब कुछ कदम बढ़ाने का अवसर आता है तो लोभ, मोह, संकोच, डर आदि कितने ही कारण इकट्ठे होकर मार्ग रोक देते हैं। ऐसी दुर्बल मनोभूमि में भी यदि बाहरी रक्त मिल जाए, किसी महामानव का संपर्क अथवा अनुग्रह सध जाए तो ऐसे साहसपूर्ण कदम उठाने की शक्ति मिल जाती है, जिसके आधार पर अंधकार को प्रकाश में बदला जा सके।
पारिवारिक अवरोध एवं स्वभावजन्य दुर्बलता की विपन्न आंतरिक जटिल परिस्थिति में बाहर का रक्त मिलना ही आवश्यक है। रक्त-परिवर्तन का उपचार ही अभीष्ट है। महामानवों का स्नेह-मार्गदर्शन ही नहीं, उनका शक्ति-अनुदान भी जब मिलता है, तब नया रक्त मिलने पर वह प्रयोजन पूरा होता है। नारद जी ने बाल्मीक, प्रह्लाद, पार्वती, सावित्री आदि कितनों का ही रक्त-परिवर्तन कर दिया। ऐसा सुयोग जिन सुसंस्कारी आत्माओं को मिल जाए, उन्हें सौभाग्यशाली ही कहना चाहिए।
प्रजापति एक दिन बहुत उदास बैठे थे। लगता था कि उनसे कोई भूल हो गई है, जिसका पश्चात्ताप उन्हें दुःख दे रहा है।
इंद्र ने पूछा—"भगवन! आखिर हुआ क्या?"
प्रजापति ने कहा—"मैंने मनुष्य की रचना बड़े अरमानों के साथ की थी और उसे बुद्धि का उपहार तथा कर्म की छूट यह सोचकर दी थी कि वह इनका उपयोग जिम्मेदारी के साथ करेगा। अब जो समाचार मिल रहे हैं, उनसे पता चलता है कि इन अनुदानों का मनुष्य दुरुपयोग कर रहा है और उच्छृंखलता बरत रहा है। यह दोनों अनुदान इस कुपात्र मनुष्य को देकर मैंने भूल की।"
यमराज पास ही बैठे थे। उनने बात काटते हुए कहा—"मनुष्य पर आपका दोषारोपण ठीक नहीं। जब वह मेरे सामने आता है तो बहुत ही नम्र और दीन होता है। फिर भला वह उद्धत कैसे हो सकता है?"
इंद्र ने कहा—"आपका पाला मरे मनुष्य से पड़ता है। यदि जिंदे के साथ व्यवहार करना पड़ता तो आप भी चक्कर में पड़ जाते।"
प्रजापति को एक नया प्रकाश मिला। नारद जी को बुलाकर उन्होंने कहा— "मृत्युलोक में जाकर हर मनुष्य को हर घड़ी मृत्यु की संभावना का बोध कराओ। इस भय से वह नम्र और सज्जन रह सकेगा।"
तब से नारद जी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मनुष्यों को जीवन की नश्वरता समझाने में लगे है। जो उनकी बात सुन-समझ लेते हैं, उतने तो सज्जनता अपना ही लेते हैं। इस प्रकार प्रजापति की व्यथा कुछ तो हलकी होती ही है।
मरते समय शारीरिक पीड़ा प्रायः नहीं के बराबर होती है। बीमारी में जितना कष्ट सहना पड़ता है, मरते समय उतना भी नहीं होता। अतः मरने से इस आधार पर डरने की जरूरत नहीं है कि उस समय अधिक कष्ट होगा।
दाँत में कीड़ा लगने या उखड़ने के दिनों में बहुत दर्द होता रहता है, पर जब कुशल डॉक्टर उसे निकालता है तो सुई लगाकर उसे सुन्न कर देता है और यह पता भी नहीं चलता कि कब उखड़ गया। अस्पताल में किसी चोट या व्रण का ऑपरेशन कराने के लिए भर्ती होना पड़ता है। चोट या दर्द में बहुत दर्द होता रहता है, पर जब डॉक्टर आपरेशन करता है तो बेहोशी की दवा सुँघाकर या सुई लगाकर सुन्न कर देता है। रोगी के साथ डॉक्टर की सद्भावना रहती है, इसलिए वह बिना कष्ट पहुँचाए ही अपना प्रयोजन पूरा कर देता है।
मृत्यु का समय आने से पूर्व कुछ दिन बीमार रहना पड़ता है। बीमारी में स्नायुमंडल और नाड़ीमंडल दुर्बल हो जाता है और अनुभूति की क्षमता शिथिल पड़ जाती है। जैसे-जैसे मरने का समय निकट आता जाता है वैसे-वैसे यह शिथिलता और बढ़ती जाती है। मस्तिष्क अपना काम समाप्त करता जाता है। प्रायः मरने से पूर्व हर व्यक्ति अचेत हो जाता है। उसकी चेतना लुप्त हो जाती है। कुटुंबियों तक को पहचानने की शक्ति नहीं रहती। जीभ बोलना बंद कर देती है और कान, आँख आदि खुले रहने पर भी अपना काम नहीं करते। अनुभव करने की शक्ति धीरे-धीरे अधिकाधिक शिथिल होती चली जाती है और मरने की घड़ी आने से पूर्व ही वह अचेतन अवस्था इतनी घनी हो जाती है कि प्राण त्यागने के समय प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट अनुभव नहीं होता।
मृत्यु के समय अधिकतर लोग बहुत व्यथित और उद्विग्न पाए जाते हैं। इसका कारण शारीरिक नहीं, मानसिक है। एक तो मनुष्य मोह, ममता के बंधन में बेतरह जकड़ जाता है और उन्हें तोड़ते हुए कष्ट होता है। ढीली हथकड़ी अथवा बेड़ी आसानी से कट जाती है, पर यदि वह शरीर में बहुत कसकर बँधी हों तो काटने में कष्ट होगा। पैसा मेरा, घर मेरा,कुटुम्ब मेरा— यह ‘मेरा’ जितना गहरा और कड़ा होगा, उसका टूटना मानसिक दृष्टि से उतना ही भारी पड़ेगा। यदि पहले से ही मनुष्य यह सोचता रहे कि धन-संपदा समाज या परमेश्वर की है, उसको कार्यों में प्रयुक्त करने वाला कर्मचारी भर हूँ और स्वामित्व मेरा किसी पर नहीं है। इससे वस्तुओं का मोह न बढ़ेगा और वे छूटते समय कष्ट न देंगी। इसी प्रकार सब जीवों को ईश्वर का अंश और पुत्र समझकर स्वतंत्र इकाई माना जाए। उनके साथ रास्ता चलते पथिक जैसा संयोग माना जाए। परिवाररूपी उद्यान का अपने को माली भर समझा जाए तो फिर कुटुंबियों से ममता न बढ़ेगी। स्नेह-सद्भाव के निर्वाह और कर्त्तव्यपालन भर में संतोष और आनंद होता रहेगा। उनके वियोग में वैसी पीड़ा न होगी, जैसी आमतौर से अज्ञानग्रस्त लोगों को होती है।
मरने के समय दूसरा कष्टदायक कारण है— जीवन को निरर्थक एवं अनर्थ जैसे कार्यों में बर्बाद कर देना, पाप की गठरी सिर पर लादकर ले चलना और भविष्य में कुकर्मों के फलस्वरूप दुखद परिस्थितियों में पड़ने की संभावना का आँखों के सामने मूर्तिमान होना। उस समय पश्चात्ताप की आग बेतरह जलाती है और कर्मफल के दंड का भय लगता है। यह कष्ट वास्तविक है। यह होता उन्हीं को है, जिनने सुरदुर्लभ मानव शरीर के बहुमूल्य क्षण निरर्थक गँवाए। जीवनोद्देश्य को नहीं समझा। धर्म और कर्त्तव्य से विमुख रहे और आत्मकल्याण तथा लोककल्याण के लिए भी कुछ करना है, इस बात को भूले रहे। मृत्यु की अनिवार्यता हमें ध्यान में रखनी चाहिए। उस समय शरीरगत कष्ट से तो डरने की आवश्यकता नहीं है, पर मानसिक पश्चात्ताप और मोह-ममता के कारण व्यथित न होना पड़े। इसके लिए अपना दृष्टिकोण और कर्त्तव्य ऐसा बनाना चाहिए, जिससे मृत्यु को शांति, धैर्य और साहसपूर्वक स्वीकार किया जा सके।
भूमध्यसागर में ट्रीनडाड से 280 मील उत्तर की ओर 45 मील लंबा और 20 मील चौड़ा एक द्वीप है— 'मार्टीनीक'। यह द्वीप ऊँचे पर्वतों और सघन वनों से घिरा हुआ है। इनमें से एक सबसे ऊँचे पर्वत शिखर माउंट पेली के उत्तरी सिरे पर एक ज्वालामुखी बहुत दिनों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है। ज्वालामुखी का नाम है— 'ला मांतोन।' इस द्वीप का प्रमुख नगर है— 'सेंट पियरे'।
यह ज्वालामुखी अठारहवीं सदी में प्रकट हुआ था। सन् 1851 के छोटे विस्फोट की भी लोगों को याद थी। उसमें गर्जन-तर्जन ही दिखाया था। कभी कोई बड़ी हानि नहीं पहुँचाई थी, पर सत्तर वर्ष पूर्व तो ऐसा मचला कि एक प्रकार से उस क्षेत्र के लिए प्रलय ही उपस्थित कर दी।
23 अप्रैल को अचानक ला मांतोन सक्रिय हुआ। माउंट पेली के पश्चिमी और दक्षिणी ढलान पर राख और अंगारे बरसने शुरू हुए। भूकंप जैसे झटके लगे। दो दिन बाद ज्वालामुखी उग्र हो उठा। चट्टानें लाल पड़ गईं। आग का भयंकर गुब्बारा फूट पड़ा। राख की दूर-दूर तक वर्षा होने लगी। सेंट पियरे नगर के निवासी गर्मी से अकुलाने लगे, पर वे सोचते रहे कि यह कोई सामयिक घटना है। दो-चार दिन में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।
दो सप्ताह तक ऐसी ही गड़बड़ चलती रही। 7 मई को प्रभात होने भी न पाया था कि माउंट पेली ने भयंकर रूप से गर्जन आरंभ कर दिया और ज्वालामुखी से रंग-बिरंगी ज्योति-किरणें चमकने लगीं। समुद्र में भारी तूफान आया। चट्टानें और मिट्टी उछल-उछलकर चारों ओर बिखर गए। समुद्रतट पर हजारों टन मछलियों की लाशें जमा हो गई।
इस स्थिति में नागरिक चिंतित तो थे, पर यह किसी को आशा न थी कि स्थिति कुछ असाधारण या अप्रत्याशित हो उठेगी। देहात से ग्रामीण जनता भागकर शहर को आ रही थी। उसका ख्याल था कि शहर अधिक सुरक्षित होते हैं। स्थिति बिगड़ती देखकर तत्कालीन गवर्नर मौट्टेत ने स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक समिति नियुक्त की। उसने भी यह निष्कर्ष निकाला कि बड़े खतरे जैसी कोई बात नहीं है।
सवेरे के आठ बजे ज्वालामुखी का मुँह फटा। घनी काली भाप, तोप जैसी कर्णबेधी ध्वनि के साथ निकली और आकाश में दूर-दूर तक छा गई। काली छतरी की तरह अंधकार उत्पन्न करती हुई, वह गिलगिली भाप तेजी से उठी और उसने एक प्रकार से अपनी चादर में सारा क्षेत्र ढक लिया। लोग हक्का-बक्का हो गए। क्या हो रहा है, क्या होने वाला है और क्या किया जाए? किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।
उबलती हुई भाप ने जलप्रलय जैसा रूप बनाया और वह इस तरह दौड़ी मानो नगर को निगल जाना ही उसका लक्ष्य हो। आगे-आगे धूल उड़ रही थी और पीछे धुँआ उमड़ रहा था। उससे आग की लपटें और रंग-बिरंगी बिजली-सी चमक उठ रही थी। उसके पीछे भाप का तूफान लहराता चला आ रहा था। देखते-देखते उसने सारे नगर को अपनी कुंडली में कस लिया। भट्टी में पड़े हुए लकड़ी के टुकड़े की तरह सारा नगर अपनी शोभा-सुषमा खोकर अग्निमय हो गया।
तूफान की भयानकता रोमांचकारी थी। बंदरगाह पर खड़े जहाज उलटकर डूब गए। जो डूबने से बच गए, उनने अपने लंगर खोल दिए और लड़खड़ाते हुए खुले समुद्र में किसी भी ओर भागे। जो तट से दूर थे, उन्होंने अपने कदम पीछे मोड़ लिए।
विस्फोट इतना तीव्र और इतना आकस्मिक था कि उस द्वीप के निवासी कई घंटों तक यह समझ ही न सके कि कहाँ क्या हो रहा है? गवर्नर ने गश्ती जहाज को स्थिति का पता लगाने भेजा तो जलते हुए सेंट पियरे तक पहुँच सकना उसके लिए संभव न हो सका। शक्तिशाली दूरबीनों से सिर्फ इतना देखा, जाना जा सका कि नगर एक चिता की तरह जलकर बुझने की स्थिति में मुरझाता जा रहा था। राडडम जहाज का कप्तान अपने जहाज को भगाकर पड़ौस के द्वीप सेंट लूशिया के कैस्त्रीज बंदरगाह के लिए ले जाने लगा तो गर्मी से उसके हाथों का माँस लटक गया, बाईस नाविक तो डेक पर ही झुलसकर मर गए।
तूफान में जब हलकापन आया और स्थिति का लेखा-जोखा लिया गया तो पता चला कि तीस हजार की आबादी में तीन व्यक्ति जले-भुने सिसकते मिले, जो कुछ ही घंटे बाद मर गए।
इस समस्त नगर में एक ही व्यक्ति जीवित बचा। वह था— जेल में कैद पच्चीस वर्षीय 'आगस्त सिल्वेयरिस'। उसे यातनापूर्ण कैद की सजा मिली थी और जमीन के नीचे एक कोठरी में बंद करके रखा गया था। इस कोठरी में हवा के लिए एक छोटा सा छेद दरवाजे के पास था। तीन दिन बाद जब नगर की खोज-खबर लेना संभव हुआ तो जेलखाने के खंडहरों में से किसी के कराहने की आवाज आई। मलबा खोदकर निकाला गया तो ‘आगस्त’ जीवित बचा हुआ पाया गया।
विस्फोट ने सेंट पियरे नगर को पूरी तरह निगल लिया। इसके आगे वाले क्षेत्र में भी जीवित प्राणी कोई नहीं बचा, पर वहाँ तक प्रवाह हलका हो जाने से संपत्ति की हानि उतनी नहीं हुई। इसके बाद में वृक्ष-वनस्पति जल गए, पर मनुष्यों ने भागकर अपनी जान बचा ली। मृत्यु का प्रवाह कुछ ऐसा विचित्र बहा कि जहाँ एक सीमा रेखा का सब कुछ नष्ट हो गया, वहाँ उसके पास की सीमा रेखा में किसी का कुछ भी नहीं बिगड़ा। अनुमान किया जाता है कि उस विस्फोट में कम से कम 2000 डिग्री फारेनहाइट गर्मी थी। भाप और धुएँ के साथ इतने घातक और विषैले पदार्थ भरे थे कि उनकी चपेट में जो भी आया, बच न सका। विस्फोट की गैस ने उस क्षेत्र के अधिकांश लोगों के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डाला और वे बहुत दिनों तक बीमारियों के ग्रास बने कराहते रहे।
मनुष्य अकेला नहीं है। उसके साथ उसका भगवान भी है। जिसे वह बचाना चाहता है, उसे किसी तरह भी बचा लेता है। जैसे— इस प्रलयंकारी तूफान में समस्त नगर जल जाने पर भी सेंट पियरे का जमींदोज दी बच गया। मनुष्य ने उसके मारने में कमी न रखी। जिस स्थिति में उसे कैद रखा गया था, उसमें बहुत दिन जीवित नहीं रह सकता था। जब भगवान को बचाना हुआ तो इस तरह बच गया, जिसे देखकर भौतिक नियमों को ही सब कुछ मानने वाले लोगों को चकित रह जाना पड़ता है।
प्रहलाद का जीवनक्रम ऐसा ही है। उसका पिता हिरण्यकश्यप तथा उसकी बुआ होलिका उसे मार डालने के लिए हर क्षण प्रयत्न करते रहे, पर बचाने वाले ने बताया कि मनुष्य से भगवान की शक्ति अधिक है। मारने वाला ही सब कुछ नहीं— बचाने वाला भी ‘कुछ’ है। कुम्हार के धधकते हुए अवे में से जब बिल्ली के बच्चे जीवित निकले तो प्रहलाद को विश्वास हो गया कि भौतिक नियमों से ऊपर भी कोई दिव्य नियम-व्यवस्था मौजूद है। यदि यह सहायक हो तो बड़ी से बड़ी आपत्तियों का शमन हो सकता है।
संत कबीर ने इस सत्य को अधिक गहराई के साथ जाना था, और उनने हर किसी से कहा था— "संसार के विरोध और अवरोध की चिंता न करके उस परम शक्तिशाली को पकड़ा जाए, जिसके अनुकूल रहने पर संसार की समस्त प्रतिकूलताएँ निरस्त हो जाती हैं।" कबीर का एक दोहा याद रखने के ही योग्य है—
'जाको राखै साइयाँ, मार न सकता कोय।
बाल न बाँका कर सके जो जग बैरी होय॥'
सेंट पियरे की उस रोमांचकारी दुर्घटना में सब कुछ दुखदायक दुर्घटना भरा चित्रण ही है, वहाँ एक प्रकाश की किरण भी विद्यमान है। वह यह की कोई समर्थ सत्ता ऐसी है, जो चाहे तो घोर विभीषिकाओं के प्रस्तुत रहते भी किसी को उबार सकती है।
हम ऐसी महान सत्ता का मजबूती से पल्ला पकड़ें तो उसमें अपना ही हितसाधन है।
मानव मानवता से छोटा है। —थेडोर पार्कर
ताप की शक्ति बहुत दिनों से विदित है। अग्नि के आविष्कार ने मानव जीवन को जो सुविधाएँ प्रदान की हैं। वे अब एक-एक कदम आगे बढ़ती चली जा रही हैं। अग्नि के बाद बिजली और बिजली के बाद अणुशक्ति, किंतु इसके बाद अंतिम शक्ति का स्रोत क्या होगा? इस तथ्य पर विचार करते हुए वैज्ञानिकों की दुनिया यह सोच रही है कि मानव जिस सत्ता को हाथ में लेकर सर्वसत्तासंपन्न हो जाएगा। उसका नाम है— 'शीत'।
शीत भी कोई शक्ति है। यह कहने और सुनने में आश्चर्यजनक लगता है, पर वस्तुतः बात ऐसी ही है। जिस प्रकार अग्नि, विद्युत, अणु आदि शक्तियों का इन दिनों उपयोग करके आदिम मनुष्य की तुलना में आज का सभ्य मनुष्य कहाँ से कहाँ पहुँच गया। उसी प्रकार आज की तुलना में भावी शीतयुग का प्राणी दैवी अथवा दानवी या न जाने किस नाम से पुकारी जाने वाली अद्भुत शक्ति का स्वामी बनकर रहेगा।
जब शून्य से सौ डिग्री नीचे की शीत उत्पन्न करने और उसके उपयोग करने की क्षमता विज्ञानी मनुष्य के हाथ में होगी तो हवा को धातुपिंड की तरह जमाया जा सकेगा और आज जिस तरह अनेकों उपकरण धातुओं से बनाए जाते हैं। उस समय जमी हुई हवा से वह सब वस्तुएँ विनिर्मित की जा सकेंगी।
सीसा धातु में बिजली की संवहनक्षमता अद्भुत है। बिजली गुजरते ही वह लाल पड़ जाता है। इससे हीटर, टोस्टर, इस्तरी आदि यंत्रों में सीसे के तार लपेटे जाते हैं और वे तुरंत गरम हो जाते हैं। सामान्य तापमान में बहुत ही विद्युतशक्ति ऐसे ही बिखर जाती है। अभीष्ट शीतल वातावरण में सीसे के किसी छल्ले में जरा-सा बिजली का करेंट लगा दिया जाए तो उसमें बिजली अपने आप अनंतकाल तक पैदा होती रहेगी और बिजली घर बनाने की जरूरत न रहेगी। वह एक बार का करेंट एक स्थायी विद्युतभंडार का काम देता रहेगा।
शीत विज्ञान पर इन दिनों अत्यंत गहन अध्ययन चल रहे हैं। इसे ‘क्रियोजेनिक्स’ नाम दिया गया है। इसका इन दिनों प्रधान लक्ष्य है— मनुष्य को जमाकर चिरकाल के लिए सुरक्षित कर देना। अंतर्ग्रही यात्रा के लिए जाने वाले यान वर्तमान कल्पना के अधिकतम वेग से चलने पर भी अभीष्ट ग्रह-नक्षत्रों तक पहुँचने-लौटने में कई सौ वर्ष लगा लिया करेंगे। इतने दिनों में सामान्य आयुष्य का मनुष्य तो मर ही जाएगा और उसके लिए भोजन आदि दैनिक उपयोग की वस्तुएँ इतनी अधिक चाहिए, जो यान से भी ज्यादा भारी हों। यह संभव नहीं है। ऐसी दशा में यही युक्ति काम करेगी कि मनुष्य को शीत में जमा दिया जाए। जमा हुआ प्राणी हजारों वर्ष तक शून्य स्थिति में पड़ा रह सकता है। आवश्यकता पड़ने पर स्वसंचालित यान अभीष्ट तापमान उत्पन्न करके मनुष्य को जीवित कर लिया करेगा। निर्दिष्ट ग्रह पर अपना काम पूरा करके पृथ्वी की ओर लौटते समय यात्री स्वसंचालित विधि से अपने आपको तब तक के लिए ठंडा कर लेगा, जब तक कि पृथ्वी पर लौट न आए।
यह कल्पना असंभव लगती भर है, पर वस्तुतः इस सिद्धांत की भली प्रकार पुष्टि हो चुकी है और उसे प्रमाणों और परीक्षणों की कसौटी पर सही घोषित कर दिया गया है।
तरल नाइट्रोजन में अभी भी वस्तुएँ चिरकाल तक सुरक्षित रखी जाती हैं। डिब्बों में फल, भोजन आदि बहुत दिनों तक सुरक्षित रखने में यही प्रयोग इन दिनों चलता है। अगले दिनों तरल नाइट्रोजन को पलक मारते हिमांक (फ्रीजिंग प्वाइंट) दिया जा सकेगा। इससे चलता-दौड़ता खून बिना किसी विकार के पूरी तरह जम जाएगा और उसे अनिश्चितकाल तक जीवित रखा जा सकेगा। इन दिनों तरल नाइट्रोजन में मेंढक आदि को डुबाकर रख दिया जाता है। उस समय वे सर्वथा निष्प्राण लगते हैं; पर जब उन्हें गरमी दी जाती है तो फिर तुरंत सजीव होकर पूर्ववत् विचरण करने लगते हैं। इस सुषुप्तिकाल में उनके शरीर को कोई क्षति नहीं पहुँचती।
इन दिनों एक व्यक्ति का रक्त अथवा नेत्र, हृदय आदि कोई अंग किसी दूसरे को दिया जाता है तो यथासंभव तुरंत ही उसकी अदला-बदली होती है। लंबे समय तक उन्हें सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, किंतु भविष्य में शरीर का कोई भी अंग चिरकाल के लिए सुरक्षित रखा जाना संभव हो जाएगा। इस विश्रामकाल में शरीर अपनी खोई हुई क्षमता पुनः प्राप्त कर सकता है, इसलिए हर विश्राम के बाद नई शक्तिसंचय करते रहने का क्रम जारी रखकर व्यक्ति अपना आयुष्य भी हजारों वर्षों का कर सकेगा।
चुंबकशक्ति कल-कारखानों में बहुत काम आती है। उनके बनाने और क्षमता स्थिर रखने का झंझट बहुत बड़ा है। भावी शीतयुग में कुछ पदार्थों को तरल हीलियम की सहायता से ‘क्रियो चुंबक’ बना दिया जाएगा और फिर वे चिरकाल तक अपना काम करते रहेंगे। इसके लिए टिन के मिश्रण से बनने वाली ‘नोवियम’ धातु अधिक उपयोगी सिद्ध हो रही है। यह क्रियो चुंबक— साधारण चुंबक की अपेक्षा बारह हजारगुना अधिक शक्तिशाली होंगे। अणुबमों से या दूसरे अणु प्रयोगों से उत्पन्न होने वाली रेडियो-सक्रियता से बचने के लिए अभी बहुत दुर्बल साधन ढूंढ़े जा सके हैं; पर जब क्रियो चुंबकों का युग आ जाएगा तो रेडियो-सक्रियता से डरने की कोई आवश्यकता न रह जाएगी।
एक और अतिआश्चर्य से ओत-प्रोत संभावना ‘क्रियोजेनिक्स’ विज्ञान की यह है कि एक 452 डिग्री में शीत की अदृश्य 'बोतल' बनेगी। यह आकाश में लटकी रहकर एक ऐसा ‘प्लाज्मा’ उत्पन्न करेगी, जो लगभग सूर्य की सतह जितना गरम होगा। इस गरमी से वे सारे काम लिए जा सकेंगे, जिन्हें अब तक आग, बिजली और भाप आदि से किया जाता रहा है। इससे अणुभट्टी बनाने की बात पुरानी और बेकार हो जाएगी। जितने तापमान की आवश्यकता होगी, उतना बिना किसी खरच के उपरोक्त ‘प्लाज्मा’ द्वारा प्राप्त कर लिया जाया करेगा। डॉ.सैन फोर्ड ब्राउन ने यह प्लाज्मा प्रयोगशाला में बनाकर दिखा भी दिया है। वह समय दूर नहीं, जब सार्वजनीन ताप के आवश्यकता की पूर्ति इन बिना खरच वाले माध्यम से ही होती रहा करेगी।
‘क्रियोजेनिक्स’ विज्ञान का कार्यक्षेत्र शून्य से 150 डिग्री ठंडक होने से आरंभ होता है और अभी उसकी अंतिम संभावना 460 डिग्री आँकी गई है। इस एब्सोल्यूट जीरो (अंतिम शून्य) से प्रभावित पदार्थों के मालेक्यूल्स अर्थात कण अपनी चिरंतन गतिशीलता त्यागकर स्थिर हो जाया करेंगे। ऐसी दशा में उन्हें अन्य किसी पदार्थ में बदल दिया जा सकना संभव हो सकेगा। तब लोहा सोने में भी परिवर्तित हो सकेगा और पारस पत्थर की दंंतकथा प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती रहेगी।
शीत विज्ञान नया नहीं है। इसके प्रयोग बहुत दिनों से चल रहे हैं, पर अब उसकी व्यापक संभावनाएँ अधिक विश्वस्त हो चली हैं। गैसों का शीतलीकरण भली प्रकार होने लगा है। ठंडक पाकर वे तरल हो जाते हैं। शून्य से 297 डिग्री पर अभिजन, 302 पर आरगान, 320 पर हाइड्रोजन और 452 पर हीलियम द्रव रूप में बदल जाती है। यह द्रविभूत गैस अनंतशक्ति की निर्झरिणी है। उसका स्पर्श होते ही बर्फ की सिल्ली देखते-देखते उबलने लगती है। इन गैसों में इतनी प्रचंड तापोत्पादक क्षमता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी ने लंदन पर बी-2 राकेट बरसाए थे। वे जहाँ गिरते थे, गजब ढाते थे। वे राकेट तरल ऑक्सीजन, अल्कोहल और दूसरे रसायनो से मिलाकर बनाए गए थे।
मनुष्य के स्वभाव के अलावे व्यवहार में ताप का उपयोग अधिक होता रहा है। इससे खरच अधिक हुआ और लाभ कम रहा। अब दृष्टिकोण में परिवर्तन करने का समय आ गया। हमें शीत की उपयोगिता समझनी चाहिए और उसकी शक्ति को अपने क्रियाकलाप में सम्मिलित करना चाहिए।
स्वभाव में आमतौर से जोशीले और सक्रिय व्यक्ति आवेश, उत्तेजना और क्रोध करने के आदी देखे गए हैं। जल्दबाज लोग अपनी इच्छानुकूल स्थिति न होने पर बेतरह झल्लाते, खीजते और उद्विग्न होते हैं। दूसरों को खिन्न, अपमानित और उत्तेजित करते हैं और अपना संतुलन बिगाड़कर शरीर और मस्तिष्क में अनावश्यक ताप उत्पन्न कर लेते हैं। इससे रक्त में विषैला माद्दा बढ़ता है और जीवनशक्ति का पोषक भाग जलता है।
आवेशग्रस्त स्वभाव के कारण गुत्थियाँ सुलझती नहीं, उलझती हैं। हो चुकी हानि की पूर्ति क्रोध से किसी भी प्रकार नहीं हो सकती, वरन वह क्षति अपना और दूसरों का मानसिक संतुलन बिगड़ जाने से और भी अधिक बढ़ जाती है। यदि उस क्षति की पुनरावृत्ति रोकनी हो तो शांतचित्त से वास्तविक कारण तलाश करना चाहिए। इसके बाद निवारण के लिए धैर्यपूर्वक और शांतचित्त से प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयोजन शांति और क्षोभरहित स्थिति में ही ठीक तरह पूरा किया जा सकता है। अपने स्वभाव में यदि तापतत्त्व बढ़ा-चढ़ा हो तो उसे घटाने का अविलंब प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए। शीतलता बढ़ने से अपना व्यक्तित्व उतना ही प्रभावशाली, चिंतनशील और दूरदर्शितापूर्ण होता चला जाएगा। आहार में से उष्णतावर्द्धक तत्त्वों को हटाना चाहिए। गरम-गरम चाय, काफी, सिगरेट, नशे, मिर्च-मसाले, स्वाद में भले ही अच्छे लगते हैं,पर उनकी प्रतिक्रिया शरीर पर ही नहीं, मन पर भी बुरी होती है। तामसिक भोजन इसलिए हानिकारक बताया गया है कि वह ऊष्मा की अनावश्यक मात्रा बढ़ाकर अवांछनीय उत्तेजना पैदा करता है। गरमी हर चीज को सुखाती है। आहार की उष्णता हमें सुखाती और पिघलाती है। इससे पुष्टि और दृढ़ता बनाए रखने वाले तत्त्व घटते जाते हैं और असमय ही मृत्यु के मुख में जाना पड़ता है।
ऋषि-मुनियों की तपश्चर्या— तप-साधनाएँ शीतप्रधान हिमालय में होती थीं। ठंड से हानि नहीं, लाभ होता है। खाँसी, जुकाम, निमोनिया आदि सरदी के प्रकोप नहीं, वरन भीतर भरे हुए विकारों को शीत के प्रयोग से बाहर करने का उपाय है जो उस वातावरण में थोड़े दिन रहने पर सहज ही ठीक हो जाता है। गरम रहन-सहन की आदत बदलते समय थोड़ी प्रतिक्रिया हो सकती है, पर कुछ ही दिन में यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरदी सहने के लिए शरीर खुशी-खुशी तैयार है। नाक के भीतरी भाग सबसे कोमल हैं। आँखें भी कम कोमल नहीं हैं। गाल, होंठ आदि चेहरे का सारा कलेवर नंगा रहता है। उस पर कोई ऊनी या सूती वस्त्र नहीं पहनाया जाता है। चेहरे के सभी कोमल अंग पूर्णतया नंगे रहकर शीत को सहते हैं और किसी प्रकार की असुविधा अनुभव नहीं करते। यदि संभव हो तो अपना निवासस्थान शीतप्रधान क्षेत्रों में विनिर्मित करना चाहिए। बीच-बीच में कुछ समय के लिए उधर जाते रहना चाहिए। अन्यथा जहाँ भी रहना पड़े, वहाँ अपेक्षाकृत शीतल वातावरण बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। सघन वृक्षों की छाया, नदीतट, कच्ची मिट्टी या फूस से बने घर शीतल रहते हैं और लाभ पहुँचाते हैं।
उष्णप्रदेश में रहने वालों की अपेक्षा शीत प्रकृति के क्षेत्रों में रहने वालों का स्वास्थ्य और सौंदर्य सदा अच्छा पाया जाएगा। यह शीत का ही महात्म्य है। कपड़ों से लदे और कसे रहने से त्वचा पीली पड़ जाती है और उसकी सहनशक्ति नष्ट हो जाती है। ऐसे लोग बार-बार और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं। स्वस्थ रहना हो तो कम से कम कपड़े पहनने चाहिए, सो भी ढीले और हवादार। भारतीय प्राचीन पोशाक में धोती-दुपट्टा दो ही पुरुषों के वस्त्र थे। शरीर को खुली हवा और रोशनी समुचित मात्रा में मिलती रहे। वायुसंपर्क से शीतलता मिलती रहे; इसीलिए अपने शरीर आच्छादन की यह प्रक्रिया बनाई गई थी।
शीत छूने में ही ठंडा लगता है। वस्तुतः उसमें वास्तविक और उपयोगी उष्णता पैदा करने की पूरी-पूरी सामर्थ्य विद्यमान है। गरम वस्तुएँ छूने में उत्तेजक प्रतीत होती हैं, परिणाम में शिथिलता और अशक्तता ही उत्पन्न करती हैं।
इस तथ्य को समझने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि शारीरिक और मानसिक क्षेत्र को अनावश्यक ताप से बचाकर उपयुक्त शीतलता के संपर्क में रखना ही श्रेयस्कर है।
दूसरों से हमें प्यार करना चाहिए, पर उस प्रेम-परिधि से अपने को अलग नहीं रखना चाहिए। सेवा-सहायता दूसरों की भी करनी चाहिए, पर उससे वंचित अपने को भी नहीं रखना चाहिए।
वस्तुतः हम दूसरों से प्यार और अपने से शत्रुता बरतते रहते हैं। वस्त्रों को साफ-सुथरा रखते हैं, पर शरीर को रोगों से ग्रसित और फटा-टूटा ही बनाए रहते हैं। वस्त्र भी अपने हैं, उनकी साज-सँभाल रखनी चाहिए। उन्हें प्रभावोत्पादक और करीने का होना चाहिए, पर कम से कम उतना ही ध्यान शरीर का भी तो रखा जाए। वस्त्र संबंधी सतर्कता और सुरुचि के साथ शरीर को भी विकसित किया गया होता तो जरूर आहार-विहार की व्यवस्था पर ध्यान जाता। जिससे काया ऐसी जीर्ण-शीर्ण और मैली-कुचैली न होती, जैसी कि इन दिनों हो रही है।
पुत्र और पुत्री को सुखी, समुन्नत और सम्मानित रखने के लिए आवश्यक साधन जुटाना ठीक है। जिन्हें हम प्यार करें, उनकी सेवा-सहायता भी करनी चाहिए और उनकी अच्छी स्थिति से संतुष्ट होना चाहिए। इस दृष्टि से पुत्र और पत्नी के लिए किए गए प्रयत्नों को उचित ही कहा जाएगा। ध्यातव्य यह है कि मनरूपी पुत्र और बुद्धिरूपी पत्नी दयनीय स्थिति में रहे एवं दुख पाए। वे असम्मानित, अभावग्रस्त और असंतुष्ट रहें,पर उनकी ओर ध्यान न जाए। इस उपेक्षा को क्यों स्वीकार किया जाए?
पुत्र को आवारागरदी से रोकते हैं, कुसंग से बचाते हैं और सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं, पर क्या वे ही प्रयत्न हमने मन के लिए किए? पुत्र इसी जन्म का साथी है। अतः उसकी वफादारी संदिग्ध है, पर मन तो जन्म-जन्मांतरों का अभिन्न साथी, मित्र और पुत्र है। उसकी आवारागरदी, कुसंगति क्यों सहन की जाती है? उसे रोकने का प्रयत्न क्यों नहीं किया जाता?
बुद्धि से बढ़कर अर्द्धांगिनी और कौन हो सकती है। शरीर न रहने पर पत्नी बिछुड़ जाती है। निरंतर साथ रहने वाली और अपनी समग्र चेष्टा एक ही केंद्र पर नियोजित करने वाली पत्नी किसकी है। स्त्री को अपने बच्चे, शरीर, परिवार और भविष्य को भी देखना पड़ता है। इसके साथ ही वह पति की सुविधा सँजोती है, पर बुद्धिरूपी पत्नी की तो समस्त चेष्टाएँ अपने लिए ही समर्पित हैं। वह हर जन्म में साथ सती होती है और सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी होकर रहती है। उसे सुयोग्य, सुसंस्कृत, सन्मार्गगामिनी, सशक्त और सुविधासंपन्न बनाने के लिए जिस स्वाध्याय और सत्संग आदि जुटाने की आवश्यकता थी, वह विद्या की व्यवस्था कहाँ की? बुद्धि का पोषण जिस विद्या से होता है, उसके लिए हमारा प्रयास कितना है? शरीर की पत्नी के लिए बहुमूल्य उपहार मिले, यह ठीक है और बुद्धिरूपी अर्द्धांगिनी को दीन-दुखी, भूखी-प्यासी, निर्वस्त्र, रुग्ण, चिंतित रहने और जहाँ-तहाँ भटकने दिया जाए, यह भी तो शोभनीय नहीं। प्यार से उस बेचारी को वंचित क्यों रखा जाए?
अहंकार की तृप्ति के लिए सारा सरंजाम खड़ा किया गया। बड़ा-सा ठाठ-बाट रोपा गया, पर आत्मा एक कोने में पड़ी सिसकती रही। उसकी इच्छा-आवश्यकता को कभी सुना या पूछा ही नहीं गया। गधे को शाही-सज्जा के साथ सजाया गया, पर गाय प्यासी मर गई। यह पक्षपात क्यों? यह एकांगी असंतुलन क्यों?
लोक में यश-वैभव पाने के लिए भारी दौड़-धूप की जाती रही, पर परलोक की बात कभी सोची भी नहीं गई। सराय पर दौलत निछावर कर दी, पर घर की टूटी झोंपड़ी पर छप्पर तक न बना। वर्तमान ही सामने रहा, भविष्य तो आँखों से ओझल ही बना रहा।
बाहर प्यार बिखेरे और भीतर निष्ठुरता बनी रहे तो बात कुछ बनेगी नहीं? बाहर वालों की मनुहार और अपनों की उपेक्षा की यह रीति-नीति कुछ जँचेगी नहीं?
मानव मस्तिष्क का एक और भाग है, जिसकी ओर अभी बहुत कम ध्यान दिया गया है और जिसकी खोज का कार्य अभी नितांत आरंभिक अवस्था में ही माना जा सकता है। यह भाग है— 'भावनात्मक मस्तिष्क'।
मस्तिष्क के भीतर मोटी और काफी लंबाई तक फैली हुई अंतस् त्वचा के भीतर विशिष्ट प्रकार की तंत्रिकाएँ फैली हुई हैं। यद्यपि यह मस्तिष्क के प्रचलित वर्गीकरण में कोई महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं कर सकी हैं, पर यह देखा जाता है कि सुख-दुख, भय, हर्ष, क्रोध, आवेश, करुणा, सेवा-स्नेह, कामुकता, उदारता, संकीर्णता, छल, प्रेम, द्वेष आदि भावनाओं का इसी स्थान से संबंध है। ये भावनाएँ ही हैं जो चेतन ही नहीं, अचेतन मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं और इच्छा से और अनिच्छा से संचालित केंद्रों में भारी उलट-पुलट प्रस्तुत करती हैं।
कुछ दिन पहले शारीरिक आवश्यकतानुसार मानसिक क्रियाकलाप की गतिविधियों का चलना माना जाता था। भूख लगती है तो पेट भरने की चिंता मस्तिष्क को होती है और पैर वैसी सुविधा वाले स्थान तक पहुँचते हैं। हाथ खाद्य पदार्थों को प्राप्त करते हैं। मुँह चबाता है और पेट पचाता है। इसी प्रकार आहार के उपरांत विश्राम या निद्रा के लिए छाया, शैया, बिस्तर, घर, निवास आदि की आवश्यकता अनुभव होती है। आत्मरक्षा के लिए वस्त्र, छाता, शस्त्र आदि संग्रह करने पड़ते हैं। कामक्रीड़ा के लिए जोड़ीदार ढूंढ़ना पड़ता है और फिर सृष्टि-संचालन के लिए संतानप्रेम की प्रेरणा से अन्य काम करने पड़ते हैं। इंद्रियरसनाएँ भी शारीरिक इच्छा-आवश्यकता की श्रेणी में आती हैं। काया की ऐसी ही आवश्यकताओं के अनुरूप मस्तिष्क की उधेड़बुन चलती रहती है।
अचेतन मन शरीर को जीवित रखने के लिए निरंतर चलने वाले क्रियाकलापों का संचालन करता है। सोते-जागते जो कार्य अनवरत रूप से होने आवश्यक हैं, उन्हें सँभालना उसी के द्वारा होता है। रक्तसंचार, श्वास-प्रश्वास, हृदय की धड़कन, आकुंचन-प्रकुंचन, पाचन-विसर्जन आदि अनेक कार्य अचेतन मस्तिष्क अपने आप करता-कराता रहता है और हमें पता भी नहीं लगता। जागते में पलक झपकने की और सोते में करवट बदलने की क्रिया सहज ही होती रहती है।
मस्तिष्क संबंधी मोटी जानकारी इतनी ही है। प्रियप्राप्ति पर हर्ष, अप्रिय प्रसंगों पर विषाद, भय, क्रोध, प्रेम प्रसंग, छल, संघर्ष जैसी मानसिक क्रियाओं को भी सामाजिक एवं चेतनात्मक आधार पर विकसित माना जाता रहा है, पर भूल उसके भी शरीर पर पड़ने वाले वर्तमान एवं भावी प्रभाव को ही समझा गया है। शरीरशास्त्रियों की दृष्टि से मस्तिष्क भी शरीर में शारीरिक प्रयोजनों की पूर्ति करने वाला एक अवयव ही है। मुँह में ग्रास जाने पर सहज प्रक्रिया के अनुसार ग्रंथियों से रसस्राव आरंभ हो जाता है। दाँत, जीभ आदि अपना काम सहज प्रेरणा से ही आरंभ कर देते हैं। उसी प्रकार समझा जाता रहा है कि शरीर से संबद्ध समस्याओं को हल करने का उपाय ढूंढ़ने और उसकी व्यवस्था बनाने का कार्य मस्तिष्क करता है। विभिन्न अवयवों पर उसका नियंत्रण तो है, पर क्यों है? किस प्रयोजन के लिए है? उसका उत्तर यही दिया जाता रहा है कि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मस्तिष्क का अस्तित्व है।
पर भावनात्मक प्रसंगों का जब सिलसिला आरंभ होता है और उनका प्रभाव इतना अधिक होता है कि शारीरिक और मानसिक समस्त चेष्टाएँ उसी पर केंद्रित हो जाएँ। यहाँ तक कि शरीर जैसे प्रियपात्र को त्यागने में भी संकोच न हो तो उस भाव-प्रवाह का विश्लेषण करना कठिन क्यों हो जाता है? जब हर चिंतन और प्रयत्न शरीर की सुविधा के लिए ही नियोजित होना चाहिए तो फिर उन भावों का अस्तित्व कहाँ से आ गया? जिनका शारीरिक लाभ से कोई संबंध तो नहीं है, वरन और उलटी हानि होती है। तब मस्तिष्क शारीरिक लाभ को, अपनी मर्यादा को छोड़कर हानि की संभावनाओं का समर्थन क्यों करता है? इस प्रश्न का उत्तर दे सकना भौतिक मनःशास्त्र के लिए अभी भी संभव नहीं हो सका है।
दूसरों को दुखी देखकर दया क्यों आती है? किसी की सेवा करने के लिए रात भर जागने को तैयार क्यों हो जाते हैं? अपने सुविधा-साधनों का दान-पुण्य क्यों किया जाता है? प्रेमपात्र के मिलने पर उल्लास और वियोग में वेदना क्यों होती है? समाज, देश और विश्व की समस्याएँ क्यों प्रभावित करती हैं? धर्मरक्षा के लिए त्याग और बलिदान का साहस क्यों होता है? व्रत, संयम, ब्रह्मचर्य, तप, तितीक्षा, जैसे कष्टकर आचरण अपनाने के लिए उत्साह और संतोष क्यों होता है? भक्तिभावना में आनंद की क्या बात है? इस प्रकार के भावनात्मक प्रयोजन, जिनके साथ शारीरिक आवश्यकता एवं अभाव की पूर्ति का कोई संबंध नहीं है। मनुष्य द्वारा क्यों अंगीकार किए जाते हैं और मस्तिष्क उनकी पूर्ति के लिए क्यों क्रियाशील हो उठता है?
भावनाएँ क्रियाशीलता उत्पन्न करती हों,सो ही नहीं। कई बार वे इतनी प्रबल होती हैं कि आँधी-तूफान की तरह शरीर और मन की सामान्य क्रिया को ही अस्त-व्यस्त कर देती हैं। किसी प्रियपात्र की मृत्यु का इतना आघात लग सकता है कि हृदय की गति ही रुक जाए या मस्तिष्क विकृत हो जाए। किसी नृशंस कृत्य को देखकर भयभीत मनुष्य मूर्च्छित हो सकता है। आत्महत्या करने वालों की संख्या कम नहीं और वे भावोत्तेजना में ही वैसा करते हैं । ये भावनाएँ मात्र शारीरिक आवश्यकता को लेकर ही नहीं उभरी होतीं।
चिंता, भय, शोक, क्रोध, निराशा आदि आवेशों के द्वारा होने वाली निषेधात्मक हानियों से सभी परिचित हैं। वे शारीरिक रोगों से भी भयावह सिद्ध होती हैं। चिंता को चिता से बढ़कर बताया जाता है और कहा जाता है कि चिता मरने पर जलाती है, किंतु चिंता जीवित को ही जलाकर रख देती है। यह भावना निषेधात्मक दिशा में गतिशील होने पर क्यों संकट उत्पन्न करती है और विधेयात्मक मार्ग पर चलकर क्यों अद्भुत परिणाम प्रस्तुत करती है? हमारे शरीर और मस्तिष्क क्यों उन्हें स्वीकार करते हैं: जबकि प्रत्यक्षतः उनके साथ शरीर की आवश्यकताओं या सुविधाओं का कोई सीधा संबंध भी तो नहीं है।
इस प्रश्न का उत्तर खोजते-खोजते विज्ञान ने अब मस्तिष्क का भावचेतनाकेंद्र तलाश किया है। उसकी स्वल्प जानकारी अभी इतनी मिली है कि मस्तिष्क के भीतर मोटी और लंबाई में फैली हुई अंतस् त्वचा की तंत्रिकाएँ अपने में कुछ ऐसे रहस्य छिपाए बैठी हैं, जो कारणवश भावनाओं को उद्दीप्त करती हैं अथवा उनसे प्रभावित होकर उद्दीप्त होती हैं। इस संस्थान को ‘भावनात्मक मस्तिष्क’ नाम दिया गया है।
अमेरिका के 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्था' के डॉ. पाल मैकलीन, येल विश्वविद्यालय के डॉ. जोसे डेलगेडी प्रभृति वैज्ञानिकों ने मनःशास्त्र के गहन विश्लेषण के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है कि शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक प्रखरता की कुंजी इस भावनात्मक मस्तिष्क में ही केंद्रीभूत है। आहार-विहार का अपना महत्त्व है, पर उतनी व्यवस्था ठीक रखने पर भी यह निश्चित नहीं कि स्वास्थ्य ठीक ही बना रहेगा। इसी प्रकार शिक्षा एवं संगति का मस्तिष्कीय विकास से संबंध अवश्य है, पर यह निश्चित नहीं कि वैसी सुविधायें मिलने पर कोई व्यक्ति मनोविकारों से रहित और स्वस्थ मस्तिष्कसंपन्न होगा ही। उन्होंने भावनाओं का महत्त्व सर्वोपरि माना है और कहा है कि, "सद्भावसंपन्न मनुष्य शारीरिक सुविधाएँ और मानसिक अनुकूलताएँ न होने पर भी समग्र रूप से स्वस्थ हो सकता है। मनोविकारों से छुटकारा पाने से दीर्घजीवी बन सकता है और रोगमुक्त्त रह सकता है।"
कहना न होगा कि स्वास्थ्य को नष्ट करने में मनोविकारों का हाथ विषाणुओं से भी अधिक है। साथ ही समग्र स्वास्थ्य के संपादन में भावनात्मक उत्कृष्टता का असाधारण योगदान है। अतः भावनात्मक मस्तिष्क की गरिमा मानवीय सत्ता में सर्वोपरि सिद्ध होती है। अध्यात्म विज्ञान इसी को अमृतघट मानता है और उसी के परिष्कार-अभिवर्द्धन की प्रक्रिया प्रस्तुत करता है।
जीभ और हृदय का कोई सीधा तारतम्य शरीरशास्त्र की दृष्टि से मालूम नहीं पड़ता। यों तो सभी अंग एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। मस्तिष्क सभी अंगों को चेतना देता है तो हृदय रक्त, फेफड़े वायु और आमाशय रस। इस प्रकार यह चारों ही संस्थान महत्त्वपूर्ण हुए और परस्पर एकदूसरे का संबंध भी बना, पर जहाँ तक अतिनिकटता और सघनता का संबंध है, जीभ और हृदय के बीच कोई असाधारण एवं अतिरिक्त घनिष्ठता नहीं है।
पर आत्म विज्ञान की दृष्टि से इनमें अत्यधिक संबंध है। शब्द विज्ञान की गहनशक्ति इन दोनों के समन्वय से ही उत्पन्न होती है। यों जीभ स्वादेंद्रिय भी है और शब्दोच्चारण का प्रयोजन भी पूरा करती है, पर उसमें एक विशेष क्षमता है— शब्दों के साथ जुड़े हुए असामान्य प्रभाव की। यदि वह तत्त्व न हो तो फिर वह ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह केवल जानकारी देने भर का ही काम दे सकती है और उससे किसी व्यक्ति को अथवा व्यापक अंतरिक्षीय वातावरण को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
शारीरिक विज्ञान जिह्वा की मोटी जानकारी देकर और मोटी मांसल परिभाषा प्रस्तुत करके चुप ही हो जाता है। उसकी थोड़ी-सी जानकारी यह है कि जीभ स्वादेंद्रिय और वाणी दोनों का काम करती है; पर वह एकाकी नहीं है— अनेक घटकों का समूह है। जीभ एक परिवार है। जिसके अनेक विभाग हैं और वे सब परस्पर मिल-जुलकर काम करते हैं, तभी जिह्वा अपना प्रयोजन पूरा कर पाती है।
जीभ की नोंक पर कोई चीज रख दी जाए तो वह उसके स्वाद का पता न लगा सकेगी। इस जाँच-पड़ताल में उसे अपने अन्य सहायकों का सहयोग लेना पड़ता है। पदार्थ के साथ मुँह की लार का सम्मिश्रण होता है। वह गीला पदार्थ स्वादकलिकाओं को स्पर्श करता है और वे अपनी प्रतिक्रिया मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। इतना हो चुकने के बाद ही यह पता चलता है कि जो पदार्थ मुँह में है, वह किस स्वाद का है। यदि लार का मिश्रण न हो और सूखी वस्तु जीभ पर रखी रहे तो उसके स्वाद का कुछ भी पता न चल सकेगा। स्वाद अनेक होते हुए भी वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार वे केवल चार हैं— (1) मीठा, (2) खट्टा, (3) कडुआ और (4) खारा। इन्हें परखने के स्थान भी मुँह में अलग-अलग स्थानों पर हैं। जीभ के अग्रभाग में मीठा, पिछले भाग में कडुआ, दोनों पार्श्वों में खट्टा और खारा परखने के संवेदक तंतु हैं।
नासिका और जिह्वा के संवेदक तंतुओं में परस्पर घना संबंध है। जुकाम हो जाने पर मुँह का जायका बिगड़ जाता है और वस्तुओं का स्वाद ठीक से पहचानने में नहीं आता। स्वादिष्ट व्यंजनों की गंध जीभ को प्रभावित करती है। मुँह में पानी भर आता है और पता चलता है कि किस स्वाद के व्यंजन कितनी दूरी पर बन रहे हैं। मिर्च-मसालों के छोंक-बघार नासिका की गंधशक्ति द्वारा मुँह को उनके स्वाद का परिचय कराते हैं। खरबूजा, आम आदि फलों को सूँघकर उनके खट्टे-मीठे होने का निर्णय किया जा सकता है। यह नासिका और जिह्वा के संवेदकों में परस्पर घनिष्ठता होने का ही प्रमाण है।
जीभ की संरचना का यदि वर्गीकरण किया जाए तो उसे लंब पेशियाँ, जीनियो ग्लोसस पेशियाँ, जिह्वा ग्रंथि, जिह्वावरण, लेपेक्स, तंत्रिकाएँ, स्वादकलिकाएँ, स्वादकोशिकाएँ, स्पिंडल कोशिकाओं के विभागों में विभक्त किया जा सकता है। इन सबका सहयोग ही जीभ को अपना काम ठीक तरह से करते रह सकने के योग्य बनाता है।
जीभ का यह भौतिक परिचय हुआ। उसका आत्मिक परिचय भगवती सरस्वती के प्रतीक रूप में है। जिह्वा शब्दोच्चारण करती है और उस उच्चारण के पीछे मनुष्य के मस्तिष्क और अंतःकरण को ही नहीं, शरीर को भी प्रभावित करने की शक्ति रहती है। इससे भी आगे बढ़कर वह शक्ति वस्तुओं को भी प्रभावित करती है। इसी रहस्यमय शक्ति को चमत्कारी ढंग से प्रयुक्त करने के विधान का नाम मंत्रशास्त्र है। सामान्य जानकारी का आदान-प्रदान तो वाणी से होता ही रहता है, पर जब वह एकाग्र, समग्र और शब्दशास्त्र के अनुसार कुछ विशेष शब्दों का विशेष स्वर-साधना के साथ उच्चारण करती है तो उस शब्दसमूह को ‘मंत्र’ कहते हैं। मंत्रों की चमत्कारी शक्ति से अध्यात्म विज्ञान का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। जप के बिना किसी भी धर्म-संप्रदाय की कोई साधना नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति-संवर्द्धन का आधारभूत स्रोत माना गया है।
जहाँ तक मंत्रोच्चारण का संबंध है, यह कह सकते हैं कि जिह्वातंतुओं का संबंध जिन चक्रों, उपत्यिकाओं, मातृकाओं से है। वे इस उच्चारण के साथ वैसे ही प्रभावित होती हैं, जैसे— टाइप राइटर की कुंजियाँ दबाने से उससे संबंधित तीलियाँ उछलती हैं और कागज पर अक्षर छप जाता है। शरीर के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न सूक्ष्मशक्तियों के भंडार दबे पड़े हैं। वाणी का प्रभाव बाहर ही नहीं निकलता, भीतर भी चलता है। शब्दोच्चारण के साथ-साथ जिह्वा की नस-नाड़ियाँ और ध्वनिलहरियाँ उन प्रसुप्त संस्थानों को जगाती हैं। क्रम विशेष से सितार के तारों को बजाने से उसमें से विभिन्न स्वरलहरियाँ निकलती हैं। इसी प्रकार शब्दों का उच्चारण तथा स्वरक्रम मिलकर एक ऐसी गूँज उत्पन्न करते हैं, जिससे शरीरगत सूक्ष्मसंस्थान में हलचल मच जाती है और जो मंत्र जिस प्रयोजन के लिए निर्धारित है, उसके अनुकूल ध्वनि कंपनों का— ऊर्जा-तरंगों का निर्माण होता है। इस प्रकार मंत्रशक्ति अपना काम करती है। मंत्रोच्चारण के अवसर पर सारा स्वर-संस्थान एक शक्तिस्रोत के रूप में परिणत हो जाता है और अपने भीतर लक्ष्य किए हुए मनुष्य या देवता के ऊपर अथवा अनंत आकाश में एक प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे शास्त्रोक्त अभीष्ट परिणाम उत्पन्न होने की संभावना बन जाए।
पर उतना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। इस मंत्रोच्चारण की शब्दशृंखला के पीछे हृदयगत ऊर्जा का प्रचंड-शक्तिधाराओं का सम्मिश्रण भी होना चाहिए। हृदय का अर्थ दो प्रकार का होता है। जिह्वा की तरह वह भी दो प्रयोजन पूरे करता है। एक तो रक्ताभिषरण का केंद्रबिंदु होने से वहाँ उत्पन्न होने वाली प्रचंड ऊर्जा का वह भंडार बना होता है, दूसरे उसे भाव संस्थान का केंद्रबिंदु भी माना गया है। धड़कन से उत्पन्न ऊर्जा और श्रद्धा, निष्ठा, भक्ति, एवं विश्वास की समन्वयात्मक भाव गरिमा— इन दोनों का समन्वय ही मंत्र का प्राण है। उच्चारण को मंत्र का कलेवर और भावनाओं को उनका प्राण कहा गया है। इस प्रकार जहाँ तक आत्मसाधना के विज्ञान का संबंध है, जिह्वा और हृदय दोनों को एक ही रथ के दो पहिए माना गया है। मंत्र-साधना में दोनों का सहयोगात्मक समन्वय समान रूप से रहने पर ही अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से जिह्वा की तरह ही थोड़ा परिचय यह है—
हृदय को शरीर नगर की जल-व्यवस्था— रक्तसंचार-प्रणाली को सुचारु रूप से व्यवस्थित रखने वाला ‘पंपिंग स्टेशन’ कहना चाहिए। हृदय का फेंका हुआ रक्त समस्त शरीर के अंग-प्रत्यंगों में धमनियों द्वारा भ्रमण करता है। वायु एवं पोषण से उन अंगों को पुष्ट करता हुआ वहाँ की विकृतियों को भी अपने साथ समेटता लाता है और वापिस हृदय में आ जाता है। फेफड़े उस संग्रहीत कूड़े-कचरे को साँस के द्वारा बाहर निकालकर उसमें ऑक्सीजन— प्राणवायु घोल देते हैं। इसके बाद रक्त का वही भ्रमणक्रम फिर चल पड़ता है। हृदय इसी रक्तसंचार-प्रक्रिया का निर्वाह करते रहने वाला प्रधान अंग है।
यों हृदय में रक्त सदा ही भरा रहता है, पर वह उसमें से सीधा एक बूँद भी ग्रहण नहीं करता। उसे जो मिलता है, वह एक कायदे-कानून— प्रथा-प्रक्रिया के अनुसार मिलता है। इसके लिए हृदय की मांस-पेशियों को खुराक देने वाली छोटी-छोटी धमनियाँ अलग से विनिर्मित हैं। वस्तुतः वे ही हृदय की धाय हैं, उन्हीं के माध्यम से उसे पोषण मिलता है। ये किसी प्रकार थक जाएँ या गड़बड़ा जाएँ तो हृदय को या उसके किसी भाग को खुराक मिलनी बंद हो जाती है या कम पड़ जाती है। इस थोड़े से अवरोध का प्रभाव बहुत भयंकर होता है। हृदय को या उसके किसी भाग को ही उस कमी से कष्ट नहीं होता, वरन शरीर के अन्य भागों को भी खुराक मिलनी बंद हो जाती है। मस्तिष्क को तो यह कमी तनिक भी बर्दाश्त नहीं होती और सारे शरीर में भयंकर हलचल मच जाती है। इसका नाम हृदय का दौरा है। यदि यह अवरोध 1 मिनट भी बना रहे तो मरण निश्चित ही समझना चाहिए। इस भयंकर आपत्ति के समय हृदय— ग्राह के मुख में पड़े हुए गज की तरह करुण क्रंदन करता हुआ चिल्लाता है। इसी को हृदय का दर्द कहा जाता है।
हृदय क्या है? साढ़े तीन इंच चौड़ी-पाँच इंच लंबी पान के पत्ते जैसे आकार की 12॥ ओंस भारी छाती की बाँई ओर पाँचवीं और छठवीं पसली के बीच की एक मांसल थैली, जो सदा धड़कती रहती है। यह चार कोष्ठों में विभाजित है। दो ऊपर वाले भाग आरीकिल (अलिंद) कहलाते हैं। नीचे के दो भाग वेंट्रीकिल (निलय) कहे जाते हैं। शरीर में रक्त का संचार और नियंत्रण उनका काम है।
बंद मुट्ठी जैसी आकृति के इस नरम और मुलायम हृदय की धड़कन हर मिनट में 70-75 बार होती है। हर सेकेंड में प्रायः 1 से 2 बार धड़कन होती है। इस प्रकार वह एक साल में प्रायः तीन करोड़ सत्तर लाख बार धड़क लेता है। नवजात शिशु के हृदय की धड़कन प्रतिमिनट 120 से 140 बार तक होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, यह धड़कन घटती जाती है और अंत में प्रायः 60-70 तक रह जाती है। इसका कारण आयुवृद्धि के साथ-साथ ऑक्सीजनयुक्त नीले खून वाली शिराओं की लचक घटते जाना है। उनकी दीवारें मोटी होती जाती हैं। जिससे धमनियों के फैलने-सिकुड़ने की क्षमता घटती जाती है। तदनुसार धड़कन का क्रम भी कम होता चला जाता है।
अपने आकार और वजन को देखते हुए शरीर के अन्य अवयवों की तुलना में हृदय को कहीं अधिक काम करना पड़ता है। वह एक मिनट में 72 बार धड़कता है— वर्ष में 3 करोड़ 70 लाख बार। यदि कोई व्यक्ति 60 वर्ष जीवित रहे तो उसका हृदय 220 करोड़ बार धड़क चुका होगा। 18000 टन रक्त बहा चुका होगा। 62000 मील रक्तनलिकाओं की सड़क-पगडंडियों पर चल चुका होगा। यह लंबाई समस्त पृथ्वी की परिक्रमा से ढाईगुनी अधिक है। इस कार्य में उसे इतनी शक्ति खरच करनी पड़ती है, जितने में संसार का सबसे भारी युद्धपोत धरती से पाँच गज ऊँचा उठाकर अधर में टाँगा जा सकता है। मनुष्य की बनाई अब तक की कोई मशीन इतने लंबे समय तक— बिना टूट-फूट— बिना विश्राम लिए चल सके, ऐसी नहीं बनी है।
यों यह कर्तृत्व भी इस छोटी-सी मांसथैली का आश्चर्यजनक है, पर बात इतनी-सी ही नहीं है। अपने आकार को देखते हुए हृदय जितना काम करता है, उसके अनुपात को देखते हुए उसकी कार्यक्षमता की तुलना में संसार का कोई यंत्र नहीं बैठता। आकार और साधन स्वल्प होते हुए वह जितना बड़ा उत्तरदायित्व सँभालता है, निस्संदेह उसी अनुपात का मनुष्यकृत यंत्र बन सकना, अभी तक संभव नहीं हुआ। इतनी प्रचंड ऊर्जा का योगदान मंत्रशक्ति से मिल जाता है तो उसकी शक्ति को करोड़ों गुना अधिक बढ़ना ही चाहिए।
आकाशवाणी से उच्चारण किए हुए शब्द इसलिए प्रखर हो उठते हैं कि उनमें विद्युतशक्ति का सम्मिश्रण किया जाता है। उसी के अभाव में हमारी आवाज हजार गज पर भी नहीं सुनी जाती, जबकि रेडियो की आवाज सारा संसार सुनता है। ठीक मंत्रोच्चारण को प्रचंड और व्यापक बनाने के लिए हृदय की विद्युतधारा का उपयोग करना पड़ता है। साथ ही श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का समन्वय करके उसी जप शब्दावली को इतना प्रखर बनाना पड़ता है कि वह साधारण उच्चारण न रहकर एक शक्ति-प्रवाह के रूप में प्रादुर्भूत होकर अपना अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सके।
आत्मिक-क्षेत्र में हृदय का सूक्ष्म अर्थ ‘सहृदयता’ लिया गया है। निष्ठुर प्रकृति के दुष्ट-दुराचारियों को ‘हृदयहीन’ कहा जाता है। इसका अर्थ खून फेंकने वाली थैली का होना या न होना नहीं, वरन यह है कि उच्चस्तरीय संयम, सदाचार, निर्मलता, निष्कपटता, ममता, आत्मीयता, उदारता जैसी सद्भावनाओं का उद्गमकेंद्र है या नहीं। यदि वह परिप्लावित हो तो अन्य आत्मिक शक्तियाँ भी उगेंगी, फलेंगी और फूलेंगी। यदि श्मशान जैसी निष्ठुरता और प्रेत-पिशाचों जैसी दुष्टता भर रही होगी तो उस मरघट की जली हुई भूमि में कोई भी आत्मिक विभूति पल्लवित और फलित न होगी। इसके अतिरिक्त उच्चसत्ता पर— आत्मा की महत्ता पर— साधन-प्रक्रिया तथा उसकी परिणति पर गहन श्रद्धा-विश्वास का होना भी हृदयवान होने का चिह्न है। इन विशेषताओं से जो संपन्न हो उनकी हृदयगत भावशक्ति— जिह्वागत स्वरशक्ति को सम्मिश्रित करके समग्र मंत्रशक्ति उत्पन्न करेगी और उसका प्रभाव-परिणाम निश्चित रूप से आशाजनक होगा।
हृदय को शिव और जिह्वा को शक्ति कहते हैं। हृदय प्राण और जिह्वा रयि है। हृदय को अग्नि और जिह्वा को सोम कहते हैं। दोनों का समन्वय धन और ऋण विद्युतधाराओं के मिलने से जो शक्ति-प्रवाह उत्पन्न करता है, वही मंत्र के चमत्कार के रूप में देखा जा सकता है।
मंत्र की एक प्रकट ध्वनि होती है, एक अप्रकट। शब्दोच्चार के साथ-साथ एक प्रतिध्वनि और उत्पन्न होती है, जो प्रत्यक्ष उच्चारण से अधिक सूक्ष्म होने के कारण और भी अधिक बलवती होती है। कान की पकड़ में न आने वाली ध्वनियों को आजकल वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा पकड़ा और प्रयुक्त किया जा रहा है। उनकी अद्भुत सामर्थ्य ने विज्ञान जगत को आश्चर्यान्वित कर दिया है।
आवाज उतनी ही नहीं है, जितनी कानों से सुनी जाती है। कानों की एक सीमित मर्यादा है। वे अपनी पकड़ में आने वाली आवाजों को ही सुन पाते हैं। ऐसा नहीं समझना चाहिए कि जो हम सुन सके, उतनी ही ध्वनि होती है। शब्द-तरंगों का बहुत बड़ा भाग कानों की पकड़ में नहीं आता, पर वह इस आकाश में चलता निरंतर रहता है। रेडियो-तरंगों के साथ मिली हुई आवाजें आकाश में हर घड़ी गूँजती रहती हैं। हम उन्हें सुन तभी पाते हैं, जब रेडियो यंत्र पास में हो और उस कानों की पकड़ से बाहर की आवाज को बिजली के सहारे तीव्र करें। शब्द-तरंगों की अपनी स्वतंत्र सत्ता है। वे इस संसार में चल रही अनेक हलचलों के कारण जो ध्वनियाँ होती हैं, उन्हें इधर से उधर लाती— ले जाती रहती हैं। योगाभ्यास में ‘नादानुसंधान’ की पद्धति से इन्हीं ध्वनियों को सुना-अपनाया जाता है।
ध्वनि-तरंगें केवल आवाज को कान तक पहुँचाकर उसके द्वारा जानकारी बढ़ाने का ही काम नहीं करतीं, उनमें एक प्रचंड बिजली भी भरी रहती है और वह इतनी सामर्थ्यवान होती है कि डाइनामाइट जैसी पुल और किले उड़ा देने वाली बारूद को पीछे छोड़ दें। अब इस ध्वनि-तरंगों का वह प्रवाह भी वैज्ञानिकों की पकड़ में आ गया है, जो कानों द्वारा सुने जाने की मर्यादा से कहीं अधिक सूक्ष्म है। उनका उपयोग सुनने के लिए नहीं, वरन उन कार्यों के लिए सफलतापूर्वक किया जा रहा है जो बिजली की सामर्थ्य से भी कहीं अधिक गहरी शक्ति की अपेक्षा करते हैं। अभी इनके प्रयोग का प्रथम चरण है। आगे चलकर सोचा यह जा रहा है कि इन तरंगों द्वारा संसार की शक्ति की आवश्यकता, सस्तेपन और सरलता के साथ संपन्न की जाए।
जिन कर्ण-कुहरों से आगे की ध्वनि-तरंगों की यहाँ चर्चा हो रही है, उन्हें विज्ञान की भाषा में ‘अतिस्वन’ कहा जाता है। इन्हें छिटपुट अनेक उद्योगों में प्रयुक्त किया जा रहा है। कपड़ों को धोना, सुखाना, सफाई, तेल निकालना, कागज बनाना जैसे छोटे-मोटे उद्योगों में इनका सफल प्रयोग किया गया है। जर्मनी में उन्हें धातुओं की ढलाई के काम में लाया जा रहा है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने धागे के संबंध में उनका प्रयोग किया है। बी.एफ. गुडरिच कंपनी का अनुसंधान विभाग इस अन्वेषण में लगा हुआ है कि इन ध्वनि-तरंगों को किस उद्योग में किस प्रकार काम में लगाया जा सकता है। रेथ्यान कंपनी का बना होमोजिनाइजिंग यंत्र दुग्ध-साधनों के लिए इसी आधार पर बना है और हजारों की संख्या में बिक रहा है।
ध्वनि-तरंगें— कंपन के रूप में होती हैं। वे गैसों, द्रवों एवं ठोस पदार्थों में वास्तविक धड़कनों की तरह हैं।
रेडियो-तरंगों में और इनमें मुख्य अंतर यह है कि रेडियो-तरंगें शून्य में यात्रा करती हैं, पर ये ध्वनि-तरंगें वैसा नहीं करतीं। इन दिनों तीन प्रकार के ध्वनि-तरंग यंत्र बने हैं। एक वे उच्च दबाव पर वायु के उपयोग से उच्च आवृत्ति के कंपन उत्पन्न करते हैं। दो किस्म की शक्ति के लिए विद्युत-ऊर्जा का उपयोग करते हैं। अमेरिका की अल्ट्रासोनिक कार्पोरेशन गैसों के लिए साइरन औद्योगिक स्तर पर उत्पादन करता है। इन तरंगों के उपकरण अल्ट्रासोनिक (अतिस्वन) और सुपरसोनिक (महास्वन) नाम से पुकारे जाते हैं। वैज्ञानिकों ने खोज तो निकाला है, पर इनसे इनकी गौरव-गरिमा के उपयुक्त काम लिया जा सके, यह प्रयोग करना शेष है।
मंत्रविद्या के महान विज्ञान को यदि ठीक से समझा जा सके, शब्द ब्रह्म की भावनापूर्वक साधना की जा सके, तो अदृश्य और अप्रत्यक्ष विभूतियों को हम सामने खड़ी दृश्य और प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं।
मंत्र के प्रभाव व प्रेरणा से मनुष्य का जीवन तदनुरूप अपने आप बनता है।—विनोबा
मनुष्य की समझदारी जितनी बढ़ी-चढ़ी है। नासमझी की मात्रा उससे कम नहीं है। अन्न खाते-खाते पीढ़ियाँ बीत गईं, पर यह तमीज अभी भी नहीं आई है कि उसमें खाने योग्य कौन-सा भाग है और फेंक देने योग्य कौन-सा?
आमतौर से छना हुआ आटा काम में लाया जाता है। भूसी फेंक दी जाती है और बारीक आटा, मैदा, सूजी आदि खाने में काम आती है। उसे बुद्धिमान आदमी की मूर्खता का अनोखा उदाहरण कहना चाहिए।
अन्न का सार भाग उसकी भूसी में है, सारे उपयोगी तत्त्व उसी में हैं। यदि भूसी और आटे में से एक को फेंकना हो तो कोई विज्ञानवेत्ता यही कह सकता है कि ‘आटा’ फेंक दिया जाए और भूसी को खाया जाए।
अनाज की 90 प्रतिशत पौष्टिकता तो हम ऐसे ही कूड़े में फेंक देते है। चक्की में पीसते समय सबसे पहले ऊपर का छिलका भूसी के रूप में अलग कर दिया जाता है। सबसे पौष्टिक अंश यही है जिसे हम छानकर आटे से अलग कर देते हैं। खाते उस भाग को हैं, जो एक प्रकार से तत्त्वरहित और मरा हुआ है। संपूर्ण दाने का एक-ढाई प्रतिशत ही पौष्टिक भाग इस महीन पिसे आटे में शेष रह जाता है। प्रोटीन, विटामिन बी कांपलेक्स, विटामिन ई, लौह तत्त्व, कैल्शियम जैसे अतिमहत्त्वपूर्ण तत्त्व उस भूसी में ही चले जाते हैं, जिसे व्यर्थ समझकर फेंक दिया जाता है। कैल्शियम तो अति उपयोगी है, उसकी पूर्ति के लिए वैज्ञानिकों ने यह अनुरोध किया है कि बारीक और छना हुआ आटा ही काम में लाना हो तो कम से कम 100 पौंड आटे के पीछे 5 ओंस कैल्शियम तो उसमें मिला ही लिया जाए।
इसे आश्चर्य ही कहना चाहिए कि मनुष्य इस मोटी बात को जानते हुए भी अनजान ही बना हुआ है। छने हुए आटे का स्वाद और शोभा उसे भाती है, पर भूसी के गुणों की ओर से आँखें बंद करके उसके रंग-रूप से भड़क उठता है। हानि-लाभ तक का अंतर न समझ पाने की इस प्रथा-परंपरा को क्या कहा जाए?
आटे और भूसी वाली गलती वह जीवन के हर क्षेत्र में ही कर रहा है। जीवनोद्देश्य को भूलकर लिप्सा में भटक पड़ना ऐसी ही भूसी-आटे जैसी और भी बढ़ी-चढ़ी भूल है। समझदार कहे जाने वाले आदमी की यह नासमझियाँ कैसी दुखद और अद्भुत हैं।
गधे के पेट से गधा पैदा होता है और बंदर के पेट से बंदर। गेहूँ बोया जाएगा तो गेहूँ उगेगा और चना बोए तो चने की फसल सामने आएगी। आम की गुठली आम का ही पौधा पैदा करती है और बबूल का बीज काँटे वाला बबूल। हम जो बोते हैं, वही काटते हैं।
कर्म बीज है और सुख-दुःख उसके फल। बुरे कर्म दुःख और दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं और सत्कर्मों के प्रतिफल सुख एवं अन्य सत्परिणामों के रूप में सामने आते हैं। समय में अंतर हो सकता है, पर परिणाम अन्यथा होने की कोई गुंजाइश नहीं है। सरसों का बीज दो दिन में अंकुरित होता है और ताड़ वृक्ष के बीज का अंकुर एक वर्ष में फूटता है। किस कर्म का फल मिलने में कितना समय लगेगा, यह निश्चित नहीं; पर इसे संदेहरहित ही मानना चाहिए कि कर्मों का फल मिलकर रहता है।
कल का दूध आज दही है। कल वह पतला और मीठा था, आज उसका स्वरूप गाढ़ा और खट्टा है। नाम भी बदल गया। कल उसे दूध के नाम से पुकारा जाता था, आज उसका परिवर्तित नाम दही है। कल के कर्म आज सुख या दुःख के रूप में प्रस्तुत हैं अथवा अगले दिन वे फलित होकर उपस्थित होंगे।
यह विश्व-व्यवस्था कर्म और उसके फल के परस्पर अन्योन्याश्रित होने के कारण ही टिकी हुई है। यदि ऐसा न होता तो कोई दुष्कर्मों के तात्कालिक लाभ को छोड़ता नहीं और न सत्कर्मों में जो उचित लाभ मिलता है, उतने से ही कोई संतुष्ट होता। दूरगामी परिणामों की सुनिश्चितता ही वह आधार है, जिसने मनुष्य को मर्यादा में रहने और कर्त्तव्य को अपनाए रहने के लिए सहमत किया है।
यह हो सकता है कि कभी सत्कर्मों के परिणाम देर से मिले और यह भी संभव है कि कुकर्मी सफलताएँ एवं समृद्धियाँ प्राप्त करते चले जाएँ। ऐसे प्रसंगों में कालचक्र का हेर-फेर ही समझा जा सकता है। नशा पीते ही तुरंत खुमारी नहीं आती। थोड़ी देर लगती है। पिया हुआ नशा अपना असर दिमाग तक पहुँचाए, तब तक यही प्रतीत होता है कि नशे का कोई असर नहीं हुआ। जानकार जानते हैं कि थोड़ा समय लग जाने के कारण यह नहीं कहा जाता कि नशे का असर होता ही नहीं।
कर्मफल तुरंत न मिलकर थोड़ी देर से मिलने की व्यवस्था इसलिए है कि मनुष्य के निजी विवेक और चरित्र की परीक्षा हो सके और आत्मसंयम तथा दूरदर्शिता की कसौटी पर उसे परखा जा सके। स्वतंत्र कर्तृत्व की सुविधा देकर भगवान ने मनुष्य को अपने उत्थान और पतन की छूट दी है। यह मनुष्य को गौरव दिया गया है, उत्तरदायित्व सौंपा गया है और प्रामाणिक समझा गया है कि वह इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करेगा। अन्यथा कर्मफल की तुरंत व्यवस्था होती तो मनुष्य यंत्रवत् रह जाता। उसकी स्वतंत्र चेतना को न सम्मान मिलता, न उत्कृष्टता सिद्ध करने का अवसर। झूठ बोलते ही जीभ कट जाती तो लोग डरकर झूठ तो न बोलते, पर अपनी स्वतंत्र गरिमा सिद्ध करने का अवसर ही हाथ से चला जाता। उस यांत्रिक व्यवस्था में श्रेष्ठता और निकृष्टता की परख और प्रतिस्पर्धा ही न रहती।
कर्मफलों से छूटने के लिए मनौती मनाना या पूजा-पत्री के कर्मकांडों का सहारा लेना निरर्थक है। ऐसी सस्ती व्यवस्था यहाँ यदि होती तो लोग दोनों हाथों से पाप कमाते और चट-पट उसे माफ कराने की टंट-घंट करके निपट जाते। तब इस संसार में न न्याय रहता और न व्यवस्था, हर कोई पाप तो करता, पर उसके फल से बच निकलने की सस्ती तरकीबें अपना लेता।
हमें दुष्कर्मों से बचना चाहिए। सत्कर्मों में प्रवृत्त रहना चाहिए। जो कर चुके हैं, उसे साहस और धैर्यपूर्वक भोगना चाहिए। संभव हो तो स्वेच्छापूर्वक आत्मदंड स्वीकार करने को—प्रायश्चित्त-व्यवस्था अपनाकर प्रखर आत्मबल का परिचय देना चाहिए।
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यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो हर मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे अनेकों उदाहरण मिलेंगे कि एक बार का किया हुआ काम बड़ा सुंदर होता है और दूसरी बार वही काम बिगड़ जाता है। एक ही काम, एक ही कर्त्ता और एक ही समय, फिर भला कार्य की यह निकृष्टता या उत्कृष्टता क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि पहली बार जब उसने काम को सुंदरतापूर्वक किया तब उसकी योग्यता अधिक थी और दूसरी बार जब काम बिगड़ता है तब उसकी योग्यता कुछ कम हो गई थी। पहली बार की अपेक्षा अभ्यास और अनुभव के कारण योग्यता में बढ़ोत्तरी ही होनी चाहिए थी, न कि कमी।
एक ही काम में लगे दो समान व्यक्तियों को देख लीजिए, एक अधिक दक्ष है तो दूसरा नहीं। एक ही कक्षा के एक ही विषय के दो विद्यार्थियों को ले लीजिए, एक अधिक अंक लाता है तो दूसरा कम। कलाकार, कवि, शिल्पी, वैज्ञानिक, विद्वान, लेखक, दार्शनिक किन्हीं को भी क्यों न ले लीजिए, अनेकों में उन्नीस-बीस का अंतर मिलेगा ही। एक की कृतियाँ दूसरे की अपेक्षा कुछ-न-कुछ न्यूनाधिक सुंदर होंगी।
इस अंतर का एकमात्र कारण एकाग्रता, तल्लीनता एवं तन्मयता ही है। जो जिस समय अपने काम में जितना अधिक एकाग्र, तल्लीन और तन्मय होगा, उसका काम उस समय उतना ही सुचारु एवं सुंदर होगा और जो जितनी अधिक एकाग्रता से चिंतन करेगा, उसके विचार उतने ही स्पष्ट एवं उन्नत होंगे। तन्मयता दक्षता का मूलमंत्र है।
तन्मयता जितनी तीव्र, तल्लीनता जितनी स्थाई और एकाग्रता जितनी सूक्ष्म होगी, कार्य का संपादन उतना ही शीघ्र और सुंदर होगा। किसी कला-कौशल अथवा कार्य के सीखने में दो आदमियों के समय और सीमा में जो अंतर रहता है, वह भी इस एकाग्रता की मात्रा का ही अंतर होता है। वैसे सामान्यतः एक ही क्षेत्र में रुचि रखने वालों की योग्यता में कोई विशेष अंतर नहीं होता।
मन की स्थिरता, केंद्रीयता एवं समाविष्टि को ही एकाग्रता, तन्मयता तथा तल्लीनता कहा जाता है। संसार की समग्र क्रियाओं का वास्तविक कर्त्ता तो मन है। शरीर तो साधनमात्र, उपादान भर ही है। बहुत बार देखा जा सकता है कि एक शरीर से हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ एवं संपन्न व्यक्ति किसी कार्य को उस खूबी के साथ नहीं कर पाता, जिस खूबी से एक दुबला-पतला और निर्बल दीखने वाला व्यक्ति कर दिखाता है। यदि शरीर ही वास्तविक कर्त्ता होता तो शारीरिक संपन्नता वाले व्यक्ति का कार्य दूसरे दुर्बल शरीर वाले व्यक्ति से अवश्य ही सुघड़ एवं सुंदर होना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं होने का कारण यही है कि एक का वास्तविक कर्त्ता मन स्वस्थ एवं सशक्त है और दूसरे का नहीं।
संसार की समस्त सफलताएँ वास्तविक कर्त्ता मन की क्षमताओं पर निर्भर करती हैं और मन की शक्ति है उसकी— 'एकाग्रता'। जिस समय मन तन्मय होकर किसी कार्य में नियोजित होता है, तब असंभव को भी संभव करके रख देता है। मनुष्य की मनमंजूषा में क्या लौकिक और क्या पारलौकिक, सारी शक्तियाँ सुरक्षित रहती हैं। मन की स्थिरता का अर्थ है— सब प्रकार की शक्तियों की उपस्थिति; और शक्तियों की उपस्थिति का अर्थ है— सफलता। मन के परिभ्रमण का अर्थ है— शक्तियों की अनुपस्थिति। जिसका अर्थ है— असफलता।
संसार का प्रत्येक व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलताओं के दर्शन चाहता है। क्या आर्थिक, क्या पारिवारिक, क्या सामाजिक, क्या सार्वजनिक, क्या बौद्धिक, क्या भौतिक और क्या आत्मिक: ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें मनुष्य सफलता का आकांक्षी न हो। बहुत से सफलता पाते भी हैं और बहुत से असफल रह जाते हैं।
जीवन में निश्चित सफलता पाने के लिए मन में एकाग्रता का स्वभाव उत्पन्न करना बहुत आवश्यक है। मन की वृत्ति कुछ उलटी होती है। वह जितना ही मुक्त, निर्भार एवं निर्विकार होता है, उतना ही स्थिर रहता है और जितना ही यह बोझिल एवं बंधित होता है, उतना ही चंचल एवं प्रमथनशील रहता है। मन को स्थिर एवं शक्तिशाली बनाने के लिए आवश्यक है कि उसे हर प्रकार से मुक्त और निर्भार रखा जाए।
जिस प्रकार स्थिरता के संबंध में मन की वृत्ति कुछ उलटी-सी है, उसी प्रकार चंचलता के विषय में कुछ अनुकूल-सी है। आप जिस दिशा में इसको संकेत कर देंगे, यह उसी दिशा में दौड़ जाएगा। जिस विषय से परिचय करा देंगे, उससे घनिष्ठता पैदा कर लेगा। विषय विशेषों की ओर एक बार मार्ग दिखा देने भर से फिर यह सजातीय हजारों विषयों का मार्ग स्वयं खोज लेता है और फिर बिना प्रेरणा के ही विषय-पथ पर दौड़ा-दौड़ा फिरता है। थोड़ी-सी भी छूट पाने पर यह उच्छृंखल ही नहीं, निरंकुश हो जाता है और तब मनमानी करता हुआ जल्दी हाथ नहीं आता।
बेहाथ हुआ मन भयानक प्रेत की तरह मनुष्य को लग जाता है और उसे एक असहाय की तरह पतन के गर्तों में गिराता और कष्ट देता रहता है। उसकी विवेक-बुद्धि को ग्रसितकर विपरीत बना देता है, जिससे ईश्वर अंश का सगुणस्वरूप मनुष्य नारकीय यंत्रणाओं को भोगा करता है। मन की दो ही गतियाँ हैं— या तो यह मनुष्य का स्वयं दास बनकर उसका आज्ञाकारी रहेगा अथवा मनुष्य को अपना दास बनाकर उस पर विविध अत्याचार करेगा। निरंकुश मन के वशीभूत मनुष्य की वही दशा होती है, जैसे— भागते हुए घोड़े की दुम में बँधे किसी अपराधी की। घोड़ा बुरी तरह ऊँचे-नीचे, कंकड़ीले-पथरीले, सँकरे, गंदे मार्गों को लाँघता-कूदता चला जाता है और दुम में बँधा मनुष्य, घिसटता-खिंचता और मरता-मिटता दुःसह कष्ट पाता रहता है।
जिसने मन को स्वाधीन बना लिया है, उसने मानो त्रिलोक की सुख-संपत्ति अपनी मुट्ठी में बंद कर ली है। जब मन निर्विकार होकर स्थिर हो जाता है तो अपने दिव्य चमत्कारों की पिटारी खोलता है। एक-से-एक सुंदर स्वर्गों की रचना करके मनुष्य को सुख-शांति से परिपूर्ण कर देता है।
निर्बल मन क्षण-क्षण पर भले-बुरे मनोरथ करता रहता है, किंतु अधिकतर वह जाता बुराई की तरफ ही है। इसका कारण उसकी वह दुर्बलता है, जो उसे सुंदर और पवित्र जीवन का आकर्षण ही उत्पन्न नहीं होने देती।
मन में ईश्वर ने एक प्रचंड-शक्ति भर दी है। जो स्फुरित होते ही सारे संसार को प्रभावित कर सकती है। बड़े-बड़े आंदोलनों का संचालन तथा जननेतृत्व मनोबल से ही किए जाते हैं। मन को अपने कार्यों एवं इच्छाओं के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना होता। स्वयं ही वह इच्छाएँ कर लेता है और स्वयं ही अपनी आकर्षणशक्ति से उसकी पूर्ति के साधन जुटा लेता है।
जीवन में अभ्युदय की इच्छा रखने वालों को कुछ और न करके पहले अपने मन की महान शक्तियों का उद्घाटन करना चाहिए। मन की शक्तियों का उद्घाटन करने के लिए उसे अपने अनुकूल बनाना बहुत आवश्यक है। मन के अनुकूल होते ही उसकी सारी शक्तियाँ कल्याणकरी कार्यों की ओर लग जाती हैं और मनुष्य के जीवन में एक से एक बढ़कर फल लाती हैं।
मन को अनुकूल बनाने का एक ही उपाय है कि उसे बुरी भावनाओं, अवांछनीय इच्छाओं और अकल्याणकरी मनोरथों से बचाए रखा जाए। विषय-वासनाओं तथा भोग-विलास की प्रमादी प्रवृत्तियों का बोझ इस पर न डाला जाए। विकारों से थका हुआ मन विद्रोही होकर अनिष्टकारी दिशाओं में ही भागता है। उसकी सत्चेतना का ह्रास हो जाता है और वह एक बदहवास मद्यप की तरह बनकर मनुष्य का घोरतम अहित किया करता है।
अधिक कामनाएँ, लिप्साएँ एवं तृष्णाएँ मनुष्य के मन को जर्जर कर डालती हैं, जिससे उसकी शक्ति स्वयं मनुष्य पर आक्रमण करके उसे हानि पहुँचाया करती है।
संयम एवं साधना का सहारा लेकर मनुष्य को अपने मन का परिष्कार करना चाहिए। यह एक महान तप है। जिसने इस तप की सिद्धि कर ली, मन को मुट्ठी में कर लिया, मानो उसने संसार की समस्त सफलताओं एवं उन्नतियों की कुंजी ही पा ली।
मनुष्य की आत्मशक्ति का अंत नहीं है। ईश्वर की समस्त शक्तियाँ और विशेषताएँ उसके अंश अथवा पुत्र समझे जाने वाले मनुष्य में बीजरूप से विद्यमान हैं। वह चाहे तो उन्हें विकसित कर सकता है और ईश्वर की हर कृति में, जो उसका अद्भुत चमत्कार दीख पड़ता है, उसी प्रकार उसके कर्तृत्व भी एक से एक बढ़कर सराहनीय, अभिनंदनीय और अनुकरणीय हो सकते हैं।
ऋषि, योगी, तपस्वी, ज्ञानी, सिद्धपुरुष और महामानव इसी चमत्कारी स्तर के हुए हैं। उनका जीवनक्रम इतनी उच्चकोटि का रहा है कि उसे सामान्य नर-पशुओं की तुलना में उच्चकोटि का कह सकते हैं। उनने मानव जाति के लिए जो त्याग और बलिदान किए हैं और अनुदान छोड़े हैं, उसका स्मरण करके उनके देवोपम अस्तित्व के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। आदर्शवादिता अपनाए रहने एवं कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए भी उत्कृष्टता की राह पर अड़े रहने को एक चमत्कार ही कह सकते हैं। बुद्ध, महावीर, गाँधी, समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, अरविंद आदि महामानवों को चमत्कारी सिद्धपुरुष ही कहा जाएगा। उच्चस्तरीय महापुरुषों के कर्तृत्व के पीछे उच्चस्तरीय परंपराएँ ही सन्निहित रहती हैं।
असल की नकल बनाने में कुशल इस दुनिया में बहुत हैं। नकली दाँत, नकली आँख, नकली घी, नकली हीरा, नकली सोना, जो चाहिए सो मिल जाएगा। असली चीज महँगी और कष्टसाध्य होती है, पर नकल आसानी से उतारी जा सकती है। असली गाय आठ सौ रुपए की आती है, पर मिट्टी की गाय दस पैसे की मिल जाती है। बालबुद्धि के लोग अक्सर सस्ते से ही मन बहलाना चाहते हैं। इस मानवी दुर्बलता को चतुर लोग जानते हैं और नकली चीजों से बाजार पाट देते हैं, वे बिकती भी खूब हैं।
नकली अध्यात्म भी बहुत फैला पड़ा है। असली हीरे जितने बिकते हैं, उससे हजारों गुने अधिक नकली बिकते हैं। असली आत्मबल कठिनाई से संचित होता है, उसके लिए संयम, तप-साधना और व्यक्ति का समग्र निर्माण जैसे कठिन मार्ग पर चलना पड़ता है। चतुर लोग इस झंझट में पड़कर अपनी विलासी और महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति कैसे छोड़ सकते हैं? वे नकलीपन का आश्रय लेते हैं। ऐसे संत-महात्मा और सिद्धयोगियों की कमी नहीं, जो हाथ ऊपर करके आसमान में से इलायची मँगाते और भक्त और दर्शकों को खिलाते हैं। यह जादूगरों द्वारा रुपया बनाने जैसे खेलों की भोंड़ी नकल है। संत का बाना पहने होने के कारण लोग उन्हें बाजीगर नहीं मानते, उस अचंभे जैसी बाजीगरी को सिद्धि या चमत्कार मान लेते हैं और उन धूर्तों द्वारा बेतरह ठगे जाते हैं।
यदि लोग थोड़ी समझदारी से काम लें तो वह इस तथ्य पर विचार कर सकते हैं कि इस प्रकार चमत्कार दिखाने की इन्हें फुरसत कैसे मिली और आवश्यकता क्या प्रतीत हुई? जिनमें आत्मबल होता है, वे उसके महत्त्व को समझते और उसका भोंड़ा प्रदर्शन नहीं करते। नोटों की गड्डी और जेवर, जवाहरातों की पोटली कोई बाजार में उछालता नहीं फिरता और न यह ढोल पीटता है कि लोगों! आओ, देखो मेरे पास कितनी दौलत है। संपन्न व्यक्ति अपने धन को सुरक्षित रखते हैं और उसे मजबूत तिजोरी में रखते हैं। अविश्वस्त व्यक्तियों को उसका विवरण भी नहीं बताते। पूछने पर चुप हो जाते हैं या टाल देते हैं। कारण स्पष्ट है— बहुमूल्य उपलब्धियाँ यदि खुली पड़ी रहें तो उनके खोने अथवा चोरी जाने का पूरा खतरा है। वास्तविक आत्मबलसंपन्न न कभी अपना विज्ञापन कर सकते हैं और न चमत्कारों का प्रदर्शन। वे उसे केवल आत्मकल्याण और लोकमंगल जैसे महान प्रयोजनों में ही प्रयुक्त कर रहे हैं।
जहाँ अलौकिक चमत्कारों का विज्ञापन और प्रदर्शन किया जा रहा है, वहाँ पूरा खतरा है। यह हर समझदार आदमी को जान लेना चाहिए। ऐसे प्रसंगों में ढोंग, चालाकी और हाथ की सफाई के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। जो इनके फेर में पड़ेगा, वह बुरी तरह पछताएगा। चमत्कारी लोगों के वेश में अक्सर ठग और जेबकट ही इस प्रकार के प्रदर्शन करते हैं।
बाजीगरी में अपेक्षाकृत ईमानदारी है। वे संत या बाबाओं की तरह अनैतिक प्रतिपादन नहीं करते। वे अपनी चतुरता का ही दावा करते हैं और हाथ की सफाई की बात कहकर अपना गुजारा करते हैं। यह मनोरंजक व्यवसाय है। जादूगर को ‘चतुर’ भर कहा जा सकता है, उसे ठग कहने की गुंजाइश नहीं है। जहाँ कोई अपनी अलौकिकता की बात करे, समझना चाहिए कि यहीं ठगी आरंभ हो गई।
यद्यपि आमतौर से जादूगर अपने कार्यों में चतुराई भर होने की बात स्पष्ट कर देते हैं, पर लोग उनके खेलों के पीछे कोई अलौकिकता, सिद्धि या चमत्कार होने की बात सोचते रहते हैं। जब तक बात प्रकट नहीं होती तब तक ऐसी ही रहस्यवादी चर्चाएँ होती रहती हैं और लोग आश्चर्य अनुभव करते रहते हैं। कई बार कुछ गलती हो जाने से उनकी चतुरता का भेद खुल भी जाता है। कई बार खतरनाक खेलो में उन्हें भारी संकट सहना पड़ता है। तब कहीं लोग असलियत समझते हैं और अनुभव करते हैं कि सिद्धियों की बात निरर्थक है। जहाँ सिद्धि है, वहाँ प्रदर्शन पर कठोर प्रतिबंध रहता है। जहाँ बाजीगरी है, वहाँ चालाकी भर है। बुद्धिभ्रम उत्पन्न कर देने का नाम ही जादू है। जो इस तथ्य को समझते हैं, वे चमत्कारों की बात से ही अपने मन को विरत कर लेते हैं। उन्हें विवेक की कसौटी पर असली और नकली वाली सिद्धि में भेद करना कुछ भी कठिन प्रतीत नहीं होता।
जादू के चमत्कारों की पोल खोलने वाली कुछ घटनाएँ इस प्रकार है—
सन् 1918 की बात है। उन दिनों चीनी जादूगर ‘चुँग लिंग शू’ की सारे इंग्लैंड में धूम थी। वह ऐसे अद्भुत जादू के खेल दिखाता था कि एक ही प्रकार के खेलों को देखने के लिए दर्शक बार-बार आने का लोभसंवरण न कर पाते थे। उसके खेल वस्तुतः ऐसे ही थे।
चुँग अपनी पत्नी को एक विशाल समुद्री सीप के मुँह में धकेलकर उसे बंद कर देता। खोलने पर वह गायब हो जाती और फिर दर्शकों की गैलरी में हँसती हुई प्रकट होती थी। इसी प्रकार वह स्टेज पर एक बड़ी तोप मँगाकर उसमें अपनी पत्नी को ठूँस देता था। नीचे बारूद, ऊपर लोहे का गोला और बीच में चुँग की पत्नी सुई सीन।, तोप चलती, पर गोला दूर न जाकर स्टेज पर ही लौट आता और सुई अन्यत्र प्रकट होती थी।
बंदूक की गोली चलाई जाती, जो सुई की छाती को चीरती हुई पार निकलती और सुई मर जाती। पीछे वह फिर जी उठती थी।
काँटा-बाँशी लेकर वह हवा में से जीवित मछलियाँ पकड़कर दिखाता। इसी तरह उसका एक खेल था— छाती पर चीनी की प्लेट रखना और उस पर बंदूक की गोली रोकना।
23 मार्च 1918 की रात को वह यही प्लेट पर गोली रोकने का खेल दिखा रहा था कि गोलियाँ उसके सीने में पार निकल गईं और वह स्टेज पर ही ढेर हो गया।
भूतों के करिश्मे दिखाने में पारंगत अमेरिकी जादूगर राबिनसन ऐसे करतब दिखाता था, जिनमें भूतों के अस्तित्व और क्रियाकलाप को प्रत्यक्ष देखा जा सके। अंत में वह बता भी देता था कि यह विशुद्ध बाजीगरी है और उसके खेलों का असली भूतों से तनिक भी संबंध नहीं है।
पेरिस में जादूगर ‘चिंग लिंग फू’ का प्रसिद्ध खेल था— शून्य आकाश में से पानी का भरा घड़ा उत्पन्न करना तथा पक्षियों को पकड़ना। वस्तुतः घड़ा उसकी लंबाई में पीछे की ओर छिपा रहता था और उसी में पक्षी भी दबे रहते थे। उस दिन गलती से घड़ा फूट गया और भीगे हुए पक्षी बेतरह चिल्लाने लगे। जादूगर की खिल्ली उड़ गई। खेल कई दिन चलने का प्रोग्राम था, पर हाल के मैनेजर ने उसे दूसरे ही दिन भगा दिया।
30 अक्टूबर 1966 के ‘धर्मयुग‘ में श्री तिलकचंद श्रीवास्तव का एक विवरण छपा है। वे एक बार अपने गाँव गए तो वहाँ देखा कि दूरस्थ पीपल के पेड़ पर से आग के अंगारे झर रहे हैं और सारा गाँव उसे भूत-प्रेतों की करतूत समझकर भय और आश्चर्य से उस दृश्य को देख रहा है।
इस कौतूहल को गाँव में बाहर से आए हुए एक हट्टे-कट्टे अतिथि ने आश्चर्यजनक ढंग से भंग कर दिया। वे सज्जन इस तरह की घटनाओं के पीछे प्रेतविद्या के नाम पर उल्लू सीधा करने वाले ओझाओं की करतूत से परिचित थे। वे टार्च हाथ में लेकर उस पेड़ के पास जाकर निर्भयतापुर्वक ऊपर चढ़ गए और आग बरसाने वाले भूत को पकड़कर साथ ले आए।
किया यह गया था कि डेढ़ फीट लंबी तथा दो इंच चौड़ी कपड़े की एक पतली थैली बनाई गई थी। उसमें एक तह बालू की और एक तह लकड़ी के बुरादे की जमाकर भर दी गई थी। उसे मिट्टी के तेल में भिगोया गया था और थैली के निचले सिरे में आग लगाकर उसे पेड़ की ऊँची डाली पर टाँग दिया गया था। मिट्टी के तेल में डूबा हुआ बुरादा जलता और नीचे गिरता। बालू के परत कुछ देर के लिए उस अग्नि-वर्षा को रोक देते और जैसे ही बालू नीचे गिर जाती फिर बुरादे का परत नीचे गिरने लगता और अग्नि-वर्षा दिखाई पड़ती।
लोगों ने इस करतूत को भली प्रकार देखा और समझा कि प्रेतविद्या के नाम पर लोगों को डराने और पैसा ऐंठने वाले लोग भोले लोगों को किस प्रकार भ्रम में डालकर अपना व्यवसाय चलाते हैं।
जादूगर डेविड डेवांट की उन दिनों इंग्लैंड में बहुत ख्याति थी। रुपये बनाने वाले जादूगर के रूप में उसे बच्चा-बच्चा जानता था। जब वह खेल दिखाता तो देखने वाले हैरत में रह जाते। हवा में हाथ मारता और रुपया पकड़ लेता। इस तरह वह डिब्बे भर-भरकर रुपये बनाता और देखने वालों को स्तब्ध कर देता।
एक दिन डेवांट कहीं चले जा रहे थे। रास्ते में अकेले पाकर उन्हें एक हट्टे-कट्टे आदमी ने पकड़ लिया और कहा— "आजकल मैं बहुत तंगी में हूँ। मेरी टोपी रुपयों से भर दीजिए; इतने से ही मेरा काम चल जाएगा।"
डेवांट ने उसे टालने-बहलाने की कोशिश की, पर वह तो अड़ ही गया और मरने-मारने पर उतारू हो गया। उस मुस्टंडे ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि, "यदि रुपये न दिए गए तो उनकी जान ही चली जाएगी।"
जादूगर महोदय सिटपिटाए। उनने यह कभी सोचा तक न था कि वह कला कभी उनके लिए इस प्रकार प्राणघातक भी बन सकती है। कुछ सूझ न पड़ रहा था कि क्या किया जाए? उनकी जेब में सिर्फ छः शिलिंग थे। एक शिलिंग बनाकर देते और फिर उसे बातों में उलझा देते। इस प्रकार उनने पाँच शिलिंग बनाकर दे दिए। एक ही बचा था, वे इस ताक-झाँक में थे कि उधर से कोई मुसाफिर आ निकले तो उसकी सहायता से अपने प्राण बचाएँ। छठा शिलिंग बनाकर देने को ही थे कि उधर से राहगीरों का एक जत्था आ गया। मालूम पड़ा कि वे घर से भागे हुए इसी विक्षिप्त को खोज रहे थे। वे उसे पकड़कर ले गए और इस प्रकार डेवांट की जान जाते-जाते बची।
फ्रांसीसी जादूगर ‘वूय तिये दे कोलता’ ने कपड़े से ढँककर वस्तुएँ गायब करने का जादू चलाया था। उसी विधि को अंग्रेज जादूगर चार्ल्स कारट्राम ने विकसित किया। वे भरी सभा में कपड़े से ढँककर एक समूची महिला को गायब कर देते थे।
डेविड ने भी यही कला सीखी। एक दिन वे महिला उड़ाने का खेल दिखा चुके तो उनके घर एक व्यक्ति आया और कान के पास मुँह ले जाकर बोला— "आप मेरी बताई एक महिला को इस तरह उड़ा दीजिए कि वह फिर कभी प्रकट न हो। आपको मुँह-माँगी फीस दूँगा।" डेविड ने मुसकराते हुए कहा— "मेरा जादू उड़ाने भर में समर्थ है। उड़ाई हुई महिला को वापिस न आने की गारंटी नहीं कर सकता, पर आप बताइए कि आखिर वह महिला कौन है?" उस व्यक्ति ने गंभीर स्वर में दीनता प्रकट करते हुए कहा— "वह है मेरी अक्खड़ सास, जो मुझे आए दिन सताती है और तरह-तरह की धमकी देती है।"
जादूगर जहाँ अपनी चतुरता से लोगों को चकित करके वाहवाही लूटने तथा धन कमाने का लाभ प्राप्त करते हैं, वहाँ कई बार उनकी यह चतुरता खतरनाक खेल दिखाते समय उनके लिए जीवन-संकट भी उत्पन्न कर देती है। बंदूक से चली हुई गोली पकड़ने का खेल ऐसा ही है, जिसे दिखाने के उत्साह में कई बाजीगरों को जान से हाथ धोना पड़ा है।
सन् 1785 में जादूगर फिलिप यस्टली की एक पुस्तक प्रकाशित हुई— ‘नेचुरल मैजिक’। इसमें उनने गोली चलने पर भी मृत्यु न होने के प्रयोग का वर्णन किया है। उन दिनों लोग शत्रुता होने पर एकदूसरे को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारते थे और जो चुनौती स्वीकार न करे, उसे कायर मानते थे। किसी प्रसंग पर दो सैनिकों ने ऐसे ही द्वन्द्वयुद्ध की परस्पर चुनौती दे डाली। उसे रोका तो नहीं जा सका, पर उपरोक्त जादूगर ने वह चतुरता बरती, जिससे एकदूसरे पर गोली दाग देने पर भी किसी की मृत्यु नहीं हुई। हुआ यह था कि गोली भरते समय जादूगर उपस्थित था और उसने असली गोलियों की जगह नकली गोलियाँ बदल दी। वे ही बंदूकों में भरी गई और आवाज मात्र होकर बात समाप्त हो गई, कोई मरा नहीं। तब से यह खेल दूसरे जादूगरों ने भी अपनाया। उससे जहाँ बहुतों ने बहुत धन और यश कमाया, वहाँ कइयों ने अपनी जान भी गँवाई।
रामस्वामी संप्रदाय के एक भारतीय जादूगर ने योगविद्या के नाम पर लंदन में इस खेल से धूम मचा दी। सन् 1818 में वे डबलिन (आयरलैंड) में यह खेल दिखाने गए। दाँत से छूटी हुई बंदूक की गोली पकड़ने वाला जादू यहाँ असफल रहा और जादूगर की स्टेज पर ही मृत्यु हो गई। नकली गोली पकड़ने के स्थान पर असली गोली का उपयोग हो जाने से यह दुर्घटना घटी।
पोलैंड के जादूगर देलिंस्की ने यह खेल आर्चस्टाउट के युवराज के राजदरबार में दिखाने का आयोजन किया। इसमें सफलता प्राप्त करने पर उन्हें बहुत धन और सम्मान मिलने वाला था। जादूगर की पत्नी मदाम लिंस्की को स्टेज पर खड़ा होना था। युवराज के छः अंगरक्षकों को एक साथ उन पर गोली चलानी थी। मदाम को यह छहों गोलियाँ हाथ से पकड़कर दिखानी थीं। यहाँ भी नकली कारतूसों की जगह एक कारतूस असली ही चढ़ गया और उसने उस सुकोमल महिला की रंगमंच पर ही जान ले ली।
फ्रांसीसी जादूगर रवेयार उदयाँ को स्ट्रास वर्ग नगर के एक कलामंच पर अपना जादू दिखाना था। लड़का जिडमानि एक सेब दाँतों के बीच दबाकर रखता था। सामने से पिस्तौल की गोली चलती थी और वह सेब के बीच में ही अटकी रह जाती थी। धातुओं के चूरे से बनी गोली देखने में असली जैसी लगती थी, पर वह चूरा पिस्तौल दागते ही इधर-उधर बिखर जाता था और सेब में पहले से ही ठूँसी हुई गोली निकालकर दिखा दी जाती थी। यहाँ भी वही भूल हो गई और नकली-असली का अंतर उस झमेले में विस्मृत हो गया। लड़का आर्त्तनाद के साथ गोली खाकर गिर पड़ा और एक-दो बार छटपटाकर वहीं ढेर हो गया। अपने ही पुत्र की मृत्यु का कारण बनने में जादूगर को कितनी मार्मिक वेदना हुई होगी, इसका उल्लेख शब्दों में नहीं हो सकता।
कलकत्ता के जादूगर राजा बोस को एक दिन हरीसन रोड पर एक ऐसे ही चमत्कारी से पाला पड़ गया जो साधु के वेश में रहता था और करिश्मे दिखाकर लोगों को ठगता था। साधु ने बोस को कोई खाता-पीता नागरिक समझा, इसलिए उसे रोका और कहा— "बेटा! लो सिगरेट पीते जाओ। यह कहकर उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और सिगरेट निकालकर दे दी। इसके बाद कुछ और दूसरी चीजें भी दाढ़ी में से निकालकर दीं। बोस कुछ देर तो चुप रहे। पीछे उनने भी साधु के विभिन्न अंगों में से कितने ही पैसे निकालकर उसे दे दिए और जितना सामान साधु ने दिया था, उसका मूल्य चुका दिया। साधु झेंपता हुआ एक ओर चला गया।
सिद्धि और चमत्कारों के पीछे दौड़ने वालों की आँखें उपरोक्त उदाहरणों से खुल जानी चाहिए। बुद्धिमत्ता का एक ही निष्कर्ष है कि मनुष्य की आंतरिक महानता ही उसकी चमत्कारिता है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलता है और उसके जैसा बनता है। वही ईश्वरोपम गरिमा का अधिकारी बनता है। यदि चमत्कारों की बात में कुछ तथ्य है तो इतना ही है।
सच्चे हृदय से कार्य किए जाओ, किंतु यह मत सोचो कि तुम्हारा मार्ग ही सत्य है और सब असत्य।
— अनाम
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एक हत्यारे की गोली से मारे गए थे। उनके बाबा भी उसी तरह राजनैतिक कारणों से मारे गए थे।
बाबा का नाम भी अब्राहम था। दोनों की पत्नियों का नाम एक ही था— 'मेरी'। दोनों मेरियों के छोटे बच्चों का बचपन का नाम एक ही था— 'टामस'।
मानवी मस्तिष्क के स्नायुकोश— नर्व सैल्स— लगभग 10 अरब की संख्या में हैं। संसार में इन दिनों मनुष्यों की आबादी चार अरब के करीब है। इस प्रकार समस्त संसार के मनुष्यों की तुलना में हमारे मस्तिष्क में बैठे हुए यह कोश ढाई गुने हैं। छोटे होते हुए भी इनकी क्षमता अपनी दक्षता के अनुरूप किसी परिपूर्ण मनुष्य से कम नहीं है। इस प्रकार इस मस्तिष्करूपी संसार में संसार भर के मनुष्यों से कई गुनी अधिक आबादी बसी हुई है। मनुष्य लापरवाह और ढीले-पोले हो सकते हैं, पर यह स्नायुकोश अपने क्रियाकलाप में तनिक भी शिथिलता नहीं बरतते।
इन दस अरब कोशों को अद्भुत विशेषताओं से संपन्न देव या दानव कहा जा सकता है। इनमें से कुछ में तो माइक्रोफिल्मों की तरह न जाने कब-कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। मोटे तौर पर जिन बातों को हम भूल चुके होते हैं, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन एक कोने में छिपी पड़ी रहती हैं। जब अवसर पाती हैं तो वर्षा की घास की तरह उभरकर ऊपर आ जाती हैं। केनेडा के स्नायुविशेषज्ञ डॉ.पेनफील्ड ने एक व्यक्ति का एक स्मृतिकोश विद्युतधारा के स्पर्श से उत्तेजित किया। उसने बीस वर्ष पहले देखी हुई फिल्मों के कथानक और गाने ऐसे सुनाए मानो अभी-अभी देखकर आया हो।
इन कोशों से संबंधित नाड़ीतंतु समस्त शरीर में फैले पड़े हैं। इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है— 1) सेंसरी नर्वज— संज्ञा वाहक और 2) मोटर नर्वज— गति वाहक। संज्ञा वाहक तंतुओं का संबंध ज्ञानेंद्रियों से होता है। जो कुछ हम देखते, सुनते, चखते, सूँघते और स्पर्शानुभव करते हैं, वह इन संज्ञा वाहकों के माध्यम से संपन्न होता है और चलना, फिरना, खाना, नहाना, पढ़ना-लिखना आदि गतिवाहकों द्वारा, वे कर्मेंद्रियों को नियंत्रित एवं संचालित करते हैं।
यह मस्तिष्क सामान्य इंद्रियगम्य ज्ञान की जानकारियों तक सीमित है। ऐसा शरीरविज्ञानियों द्वारा कहा जाता रहा है, पर अब न्यूरोलोजी, पैरा साइकोलोजी, मैटाफिजिक्स विज्ञान के जानकार यह स्वीकार करने लगे हैं कि मानवी मन, विराट विश्व के मन का ही एक अंश है और जो कुछ उस विराट विश्व-ब्रह्मांड में हो रहा है या निकट भविष्य में होने जा रहा है, उसकी संवेदनाएँ मानवी मन को भी मिल सकती हैं।
पिछले दिनों क्या-क्या हो चुका, इस समय कहाँ, क्या हो रहा है और निकट भविष्य में क्या होने की संभावनाएँ बन गई हैं। उसे जान लेना किसी परिष्कृत मस्तिष्क के लिए संभव है। सामान्यतया यह अतींद्रिय अनुभूति प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। केवल वर्तमान से संबंधित प्रत्यक्ष का ही अधिक ज्ञान रहता है। भूतकाल की निज से संबंधित घटनाएँ जब विस्मृत हो जाती हैं तो अन्यत्र होने वाली घटनाओं की जानकारी कैसे रहे? यह बात केवल सामान्य स्तर के मस्तिष्कों पर लागू होती है। परिष्कृत मस्तिष्क इससे कहीं ऊँचे उठे हुए होते हैं और वे त्रिकालज्ञ की भूमिका प्रस्तुत कर सकते हैं।
भौतिक जानकारी संग्रह करने वाले चेतन मस्तिष्क और स्वसंचालित नाड़ी-संस्थान को प्रभावित करने वाले अचेतन मस्तिष्क तक का ही ज्ञान अभी विज्ञानक्षेत्र की परिधि में आया है, पर अब अतींद्रिय मस्तिष्क के अस्तित्व को भी स्वीकारा जा रहा है। इसका कारण यह है कि बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं, जिनसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलने और उसके अक्षरशः सही उतरने के प्रमाण मिलते हैं। यह प्रमाण इतने स्पष्ट और इतने प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किए गए होते हैं कि उनमें किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती।
अतींद्रिय चेतना का मानवसत्ता में अस्तित्व स्वीकार किए बिना इन भविष्यवाणियों का और कोई कारण नहीं रह जाता। योगी और सिद्धपुरुष जिस दिव्यचेतना को अपनी तप-साधना के माध्यम से विकसित करते हैं, वह कई बार कई व्यक्तियों में अनायास और जन्मजात स्तर पर भी पाई जाती है। इस सत्ता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बंधन काटकर असीम के साथ अपने संबंध मिला सकता है और अपनी ज्ञान-परिधि को उतनी ही विस्तृत बना सकता है। समय-समय पर इस प्रकार के जो प्रमाण मिलते रहते हैं, उनसे उस संभावना को और भी अधिक बल मिलता है कि आत्मविकास के प्रयत्न मनुष्य को कहीं-से-कहीं पहुँचा सकने में समर्थ हैं।
अतींद्रिय ज्ञान के संबंध में कई प्रामाणिक ग्रंथ पाए जाते हैं। उनमें कुछ यह हैं— (1) टीन लोब सैंगरंपाकृत— 'थर्ड आई' (2) सुग्र अल जहीर द्वारा लिखित— 'मठभूमि की आध्यात्मिक यात्रा' और (3) डेनियल बारे लिखित— 'दी मेका आफ हैवनली ट्राडजर्स'। इन पुस्तकों में लेखकों ने अपनी निजी दिव्य अनुभूतियों के वे वर्णन लिखे हैं, जो उन्होंने आज्ञाचक्र स्थित तीसरे नेत्र से देखे और परीक्षा की कसौटी पर पूर्णतया खरे उतरे। भ्रू-मध्य भाग में अवस्थित तीसरा नेत्र देवी-देवताओं के ही नहीं,मनुष्य के भी होता है और वह उसे विकसित करके दिव्यदर्शी बन सकता है।
गेटे ने अपनी आत्मकथा में लिखा है— "एक बार वह अपने निवासस्थान वाइम्नर में था तो अचानक तीव्र अनुभूति हुई कि वहाँ से हजारों मील दूर सिसली में एक भयंकर भूकंप आया है। यह बात उसने अपने मित्रों को बताई तो किसी को विश्वास न हुआ कि बिना किसी आधार के इतनी दूर की बात इस प्रकार कैसे मालूम हो सकती है, पर कुछ दिन बाद आए समाचारों से पता चला कि ठीक उसी समय वैसा ही भूकंप सिसली में आया था जैसा कि उसने अपने मित्रों का बताया था।"
प्रसिद्ध लेखक जानेथन स्विफ्ट ने अपनी पुस्तक ‘गुलिवर भ्रमणकथा’ में यह लिखा है कि— ”मंगल ग्रह के चारों ओर दो चंद्रमा परिक्रमा करते हैं। इसमें एक की चाल दूसरे से दूनी है।” उस समय यह बात कपोल-कल्पना मानी गई थी; क्योंकि तब इस बात का किसी को तनिक भी आभास न था कि मंगल के इर्द-गिर्द घूमने वाले चंद्रमा भी हो सकते हैं। पीछे डेढ़ सौ वर्ष बाद सन् 1877 में वाशिंगटन की नेवल आवजरवेटरी में एक शक्तिशाली दूरबीन के सहारे यह देख लिया गया कि वास्तव में मंगल ग्रह के दो चंद्रमा हैं और एक की चाल दूसरे से दूनी है तो लोग आश्चर्यचकित रह गए कि उस साधनहीन जमाने में जब इस तरह की कल्पना कर सकना भी संभव न था तो किस प्रकार स्विफ्ट ने मंगल ग्रह की स्थिति बताई।
फिल्म अभिनेता स्वर्गीय चंद्रमोहन सेन ने एक दिन पूर्व स्वप्न देखा कि उनका रेस का घोड़ा दौड़ते हुए एक गड्ढे में गिरकर मर गया। जागने पर उनने घोड़े को सही स्थिति में पाया और स्वप्न को निरर्थक समझा, पर तीसरे ही दिन वह भवितव्यता होकर रही। घोड़ा ठीक उसी स्थिति में उसी स्थान पर मरा जैसा कि उनने स्वप्न में देखा था।
पुरातत्ववेत्ता प्रो.ह्विल प्रिक्ट एक प्राचीन शिलालेख का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे, पर बहुत दिन माथा-पच्ची करने पर भी कुछ अर्थ-संगति नहीं बैठ रही थी। एक दिन उनने स्वप्न में देखा कि बेबीलोन का कोई पुरोहित उस लेख का अर्थ समझा रहा है। वे हड़बड़ाकर उठे और वह अर्थ नोट कर दिया। दूसरे दिन उनने संगति मिलाई तो अर्थ बिलकुल सही निकला और उनकी गुत्थी सुलझ गई।
बाणभट्ट की प्रसिद्ध पुस्तक ‘कादम्बरी’ की रूपरेखा उन्हें स्वप्न में ही मिली। रवींद्रनाथ टैगोर को अपनी गीतांजलि पुस्तक की कई कविताओं का आभास स्वप्न में मिला था।
जे0 डब्ल्यू डने की पुस्तक ‘एन एक्सपेरीमेंट विद टाइम’ में ऐसे स्वप्न की चर्चा है जो मात्र सपना न रहकर यथार्थ के रूप में सामने आए। उनका निज का एक स्वप्न, जिसमें उन्होंने क्रेस्टोआ द्वीप में भयंकर ज्वालामुखी फटते हुए देखा था, कुछ दिन बाद एक घटना ही बन गया।
स्पेन की सर्वश्रेष्ठ समझी जाने वाली इमारत ‘इस्को-पियल’ कुख्यात राजा फिलिप द्वितीय ने बनवाई थी। इसे उसने अपनी पत्नी मेरी ट्यूडार की स्मृति में बनवाया। इसके एक कक्ष में यह व्यवस्था भी की गई थी कि स्पेन के राजाओं की मृत्यु के बाद उनके शव उसी में गाड़े जाया करें और उनके स्मारक बना दिए जाया करें।
फिलिप को एक भविष्यवक्ता ने कहा था— "स्पेन का राजवंश 24 पीढ़ियों तक चलेगा।" उसे इस पर पूरा विश्वास था, इसलिए उसने चौबीस कब्रें ही पूर्वनियोजित ढंग से बनाकर रखी थीं।
सन् 1929 में स्पेन की रानी मैरिया क्रिस्टिना की मृत्यु हुई। उसका मृतशरीर 23 वें गड्ढे में गाड़ा गया। आश्चर्य यह कि वह शताब्दियों पूर्वघोषित भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य हुई। इसके बाद अलफोनो राजगद्दी पर बैठा। उसे दो वर्ष बाद ही गद्दी छोड़नी पड़ी और साथ ही राजतंत्र का भी अंत हो गया। इसके बाद स्पेन में गणतंत्र स्थापित हुआ और अलफोनो स्पेन का चौबीसवाँ और अंतिम राजा सिद्ध हुआ।
दैनिक हिन्दुस्तान के रविवारीय अंक में श्री परिपूर्णानंद वर्मा का एक लेख छपा है। जिसमें उन्होंने एक अंग्रेज वृद्धा की पूर्वाभास करने की शक्ति का अद्भुत वर्णन किया है। यह महिला श्रीमती सरोजनी नायडू के घनिष्ठ परिचय में थी। एक दिन श्रीमती नायडू के घर मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी नवविवाहिता पारसी पत्नी आए। अंग्रेज वृद्धा आदि से अंत तक उन्हें आँखें फाड़कर देखती रही। जब वे चले गए तो श्रीमती नायडू ने उस अशिष्टता के लिए बुरा-भला कहा कि किसी मेहमान की ओर इस तरह घूरकर देखते रहना असभ्यता है।
अंग्रेज महिला ने कहा— "मुझे इनमें कुछ आश्चर्य दीखा। यह परम सुंदरी महिला तीन वर्ष में आत्महत्या कर लेगी और मि. जिन्ना बादशाह बनेंगे। यह मैंने इन लोगों का भविष्य देखा है। इसी तथ्य को मैं उनके चेहरे पर पढ़ रही थी।"
उपस्थित सभी लोग हँसे और उन दोनों बातों को असंभव बताया। उस परम सुंदरी पारसी महिला पर जिन्ना बेतरह आसक्त थे। सब प्रकार के सुखों के होते हुए वह आत्महत्या क्यों करेगी? उसी प्रकार उन दिनों किसी की कल्पना तक न थी कि पाकिस्तान की माँग जोर पकड़ेगी और वह किसी दिन एक वास्तविकता बनेगी तथा जिन्ना उसके अध्यक्ष बनेंगे। दोनों ही बातें बुद्धिसंगत न थीं; इसलिए उस महिला की बात को निरर्थक माना गया।
पर कुछ दिन बाद दोनों ही बातें सच हो गई। उस नवयुवती पत्नी को आत्महत्या करनी पड़ी। पाकिस्तान बना और जिन्ना उसके अध्यक्ष— बादशाह हुए।
अलीगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति जैदी को इस भविष्यवाणी की काफी जानकारी थी। पाकिस्तान बनने के पाँच-छह वर्ष बाद श्री जैदी को लंदन जाना पड़ा। उन्हें उस अंग्रेज महिला की याद आई। पता उनकी डायरी में नोट था। वे उसके घर गए। उनने उस महिला से भारत तथा पाकिस्तान के भविष्य के बारे में पूछा तो उसने इतना ही कहा— "पूर्वी पाकिस्तान टूटकर अलग हो जाएगा। समय कितना लगेगा, कह नहीं सकती।" उन दिनों पाकिस्तान के इस प्रकार विभाजन होने की कोई आशंका नहीं थी; इसलिए वह कथन अविश्वस्त जँचा। यह समय ने बताया कि बात सच हो गई और उस अंग्रेज महिला की पुरानी भविष्यवाणी अक्षरशः सच निकली।
प्रयत्न करने पर इस प्रकार की अतींद्रिय दिव्यशक्ति कोई भी व्यक्ति अपने में विकसित कर सकता है। योग-साधना ऐसी ही संभावनाओं के पथ-प्रशस्त करती है।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एक हत्यारे की गोली से मारे गये थे। उनके बाबा भी उसी तरह राजनैतिक कारणों से मारे गये थे।
बाबा का नाम भी अब्राहम था। दोनों की पत्नियों का नाम एक ही था—’मेरी’। दोनों मेरियों के छोटे बच्चों का बचपन का नाम एक ही था—टामस।
आज के संबंध में सत्तर्क रहना चाहिए और उसे अच्छा बनाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए, पर कल की संभावना तथा आवश्यकता को भूल नहीं जाना चाहिए। ओछी दृष्टि को आज की या अभी की ही बात सूझती है। कल की संभावना को एक प्रकार से भुला ही दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि आज के हास-विलास के पीछे न तो कल की आवश्यकता ध्यान में रहती है और न उस उपेक्षा के कारण उत्पन्न होने वाली भावी कठिनाइयों का ध्यान रहता है।
जो विद्यार्थी आज की मटरगश्ती में व्यस्त रहे और यार-दोस्तों के क्रीड़ा-विनोद में उलझे रहे। पढ़ने की बात भूल जाए तो उसे परीक्षा के समय निराश होना पड़ेगा। एक वर्ष मारा जाएगा। पाठशाला में नीची नजर रहेगी। अभिभावक दुखी होंगे और इसका प्रभाव उस छात्र के ऊपर भी अच्छा न पड़ेगा। मटरगश्ती में जो खुशी मिली थी, वह हलकी थी और उसकी तुलना में परीक्षा में असफल रहने की क्षति भारी है। तुलनात्मक विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि तुरंत की तुच्छ प्रसन्नता के ऊपर भविष्य की महान प्रसन्नता का बलिदान करके भूल ही की गई। उस समय वह खेल-कूद ही सब कुछ दीखता था— दूरदृष्टि उस समय कुंठित थी। यदि आगे के परिणाम को देखा और समझा जा सका होता, उसका अनुमान लगाया गया होता तो वह भूल न की जाती। थोड़ा हास-विनोद पर्याप्त मान लिया जाता और साथ ही पढ़ने के नियत समय पर अध्ययन के लिए परिश्रम किया गया होता। दूरदर्शिता का अभाव ही उस विद्यार्थी के प्रगति-पथ में अवरोध बनकर खड़ा हो गया।
किसान बीज बोने के दिनों को इधर-उधर आलस में गँवा दे तो उसके खेत उजड़े ही पड़े रहेंगे। साल भर भूखा मरना पड़ेगा और सबके ताने सहने पड़ेंगे, कर्ज चढ़ेगा सो अलग। उस चटोरे व्यक्ति को क्या कहा जाए जो स्वाद ही स्वाद में गरिष्ठ और तीखे पदार्थ खाता चला जाता है और पीछे पेट के दरद, उलटी एवं दस्त से ग्रसित होकर दुख पाता है। उस नशेबाज को क्या कहा जाए, जो एक आवेश की तृप्ति के लिए अपना सब कुछ खोकर दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है।
यह मनुष्य जीवन अमृतफल प्राप्त करने के लिए है। इसे ठीक तरह सोचा जाए तो यह कल्पवृक्ष के रूप में परिणत हो सकता है। इसे ऐसे ही विषय-विकारों की फुलझड़ी में जलाकर भी समाप्त किया जा सकता है। समय और श्रम की संपदा को सही दिशा देकर एक से एक बड़े अनुदान-वरदान प्राप्त किए जा सकते हैं। महामानव—प्रकाश-स्तंभ—अजर-अमर और देवोपम श्रद्धास्पद बना जा सकता है। यदि उसका दुरुपयोग किया जाए तो इस जीवन में निंदित, घृणित, असफल, भारभूत और दुख-दरिद्रता से ग्रस्त बनकर नारकीय स्थिति में भी रहा जा सकता है।
प्रश्न केवल दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता का है। अदूरदर्शी व्यक्ति क्षणिक आकर्षणों पर ही निछावर हो जाते हैं। भविष्य उन्हें न दीखता है, न सूझता है। मछली आटे को देखती है, काँटे को नहीं— चिड़िया दाने को देखती है, जाल को नहीं—अदूरदर्शी यही करते हैं। उनकी सारी समझ और सारी चेष्टा आज के अधिकाधिक लाभ और सुख पर केंद्रित रहती है। इस ओर उनका ध्यान जाता ही नहीं कि इसका परिणाम क्या होगा?
कल परमेश्वर के न्यायालय में उपस्थित होना ही पड़ेगा। जन्म-जन्मांतरों के भविष्य को अंधकारमय बनाने में लगी हुई आज की अपनी दुर्बुद्धि से अभी कुछ दोष नहीं दीखता, पर कल विदित होगा कि इस अदूरदर्शी बुद्धिमत्ता ने कैसा धोखा दिया और कैसे वह मूर्खता से भी बदत्तर सिद्ध हुई।
अज्ञानता एक ऐसी रात्रि है, जिसमें चाँद है न तारे।
यह समस्त विश्व एक शरीर की तरह है। इसमें मनुष्य का स्थान एक उँगली के बराबर समझा जा सकता है। उँगली का महत्त्व तभी तक है, जब तक कि वह शरीर के साथ जुड़ी हुई है।
असंख्य आत्माओं में जगमगाने वाली चेतना की ज्योति का केंद्र एक ही है। पानी की प्रत्येक लहर पर एक अलग सूर्य चमकता है, पर वस्तुतः वह एक ही सूर्य की अनेक प्रतिच्छवियाँ हैं। समुद्र की हर लहर का अस्तित्व भिन्न दिखाई पड़ने पर भी वस्तुतः वे विशाल सागर की हिलोरे ही हैं। इस समस्त विश्व में केवल एक ही समष्टि आत्मा है— जिसे परमात्मा के नाम से पुकारते हैं। सबमें वही प्रतिभाषित हो रहा है। वह माला की मणियों के मध्य पिरोए हुए धागे की तरह पृथक दीखने वाले प्राणियों को परस्पर एक ही सूत्र में बाँधे हुए है।
इस बंधन में बँधे रहना ही श्रेयस्कर है। समग्र का परित्यागकर जब हम पृथक होते हैं, अपने अहंकार की पूर्ति के लिए अपना वर्चस्व प्रकट करने और अलग रह कर अधिक सुविधा प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं तो हम भारी भूल करते हैं। पाते कुछ नहीं, पर खोते बहुत हैं। समग्रता के वैभव से लाभान्वित होने की सुविधा खो बैठते है और एकाकीपन के साथ मिलने वाली तुच्छता— हर दृष्टि से अपर्याप्त सिद्ध होती है।
उँगली हाथ से अलग रहने की तैयारी करते समय यह सोचती है कि मैं क्यों सारे दिन हाथ का आदाब बजाऊँ, क्यों उसके इशारे पर नाचूँ। इसमें मेरा क्या लाभ? मेरे परिश्रम और वर्चस्व का लाभ मुझे क्यों न मिले? यह अलग रहकर ही हो सकता है, इसलिए अलग ही रहना चाहिए। अपने श्रम और उपार्जन का लाभ स्वयं ही उठाना चाहिए। ऐसी सोच के कारण हाथ से कटने के बाद अलग रहकर उँगली कुछ ही समय में देखती है कि उसका अनुमान गलत था। शरीर के साथ जुड़े रहने पर उसे जो जीवनदाता रक्त मिलता था, वह मिलना बंद हो गया। उसके अभाव में वह सूखकर सड़ गई। उस सड़े टुकड़े को छूने में भी लोगों ने परहेज किया; जबकि हाथ के साथ जुड़े रहने पर वह भगवान का पूजन करती थी। हाथ मिलाते समय बड़ों के स्पर्श का आनंद लेती थी। महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखती थी। बड़े काम करने का श्रेय प्राप्त करती थी। पृथक होने के साथ-साथ वह सारी सुविधाएँ भी समाप्त हो गईं। उँगली नफे में नहीं, घाटे में रही।
फूल का अपना अलग भी महत्त्व है; पर वह नहीं, जो माला में गुँथे रहने पर होता है। एकाकी फूल किसी महापुरुष या देवता के गले में नहीं लिपट सकता। यह आकांक्षा तो सूत्रात्मा को आत्मसमर्पण के बाद माला में गुँथने के बाद ही पूरी हो सकती है। व्यक्तिवादी, एकाकी, स्वार्थी, संकीर्ण मनुष्य, समूहगत चेतना से अपने को अलग रखने की सोच सकता है। अपने ही लाभ में निमग्न रह सकता है, दूसरों की उपेक्षा भी कर सकता है। उन्हें क्षति पहुँचा सकता है और इस प्रकार अपने उपार्जन को— शोषणात्मक उपलब्धियों को अपने लिए अधिक मात्रा में संग्रह कर सकता है, पर अंततः यह दृष्टिकोण अदूरदर्शितापूर्ण सिद्ध होता है। पृथकता के साथ जुड़ी हुई दुर्बलता उसे उन सब लाभों से वंचित कर देती है, जो समूह का अंग बनकर रहने से ही मिल सकते थे।
समुद्र की हर लहर अपना सरंजाम अलग खड़ा करे तो वे तनिक से जल के रूप में बिखर जाएँगी और ज्वार-भाटे के समय उनका जो गौरव देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे, उससे उन्हें वंचित ही रहना पड़ेगा। नौकाओं को पलट देने की शक्ति— गरजती हुई ध्वनि, फिर उनमें कहाँ रहेगी। किसी गड्ढे में पड़ी सूख जाएगी। अपने स्वरूप को भी स्थिर न रख सकेंगी। सूखने के बाद उनका अस्तित्व उनकी सरसता की चर्चा का अस्तित्व भी मिटा देगा। वहाँ सूखा नमक भर श्मशान की राख की तरह पड़ा होगा? लहरें समुद्र से पृथक अपने अस्तित्व का स्वतंत्र निर्माण करने की— एषणा महत्त्वाकांक्षा के आवेश में भटकने का ही उपक्रम करती हैं। लाभ के लोभ में घाटा ही वरण करती हैं।
ईंटों के समन्वय से भवन बनते हैं। बूँदों के मिश्रण से बादल बनते हैं। परमाणुओं का सहयोग पदार्थ की रचना करता है। अवयवों का संगठितरूप शरीर है। पुर्जों की घनिष्ठता मशीन के रूप में परिणत होती है। पंचतत्वों से मिलकर यह विश्व सृजा है। पंचप्राण इस काया को जीवित रख रहे हैं। दलबद्ध योद्धा ही समर्थ सेना है। कर्मचारियों का गठित समूह ही सरकार चलाता है। यदि इन संघटकों में अलगाववादी प्रवृत्ति पनपे और डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग-अलग पकने लगे तो जो कुछ महान दिखाई पड़ता है, तुच्छ में बदल जाएगा।
तुच्छता अपना अस्तित्व तक बनाए रखने में असमर्थ है। प्रगति भी पारस्परिक सहयोग पर निर्भर है। दूसरों को पीछे छोड़कर एकाकी आगे बढ़ जाने की बात सोचने वाले, उन संकटों से अपरिचित रहते हैं, जो एकाकी के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकते हैं। उँगली हाथ से कटकर अलग से अपने बलबूते पर प्रगति करने की कल्पना भर कर सकती है। व्यावहारिक क्षेत्र में उतरने पर कड़वी सचाई सामने आती है कि पृथकता लाभदायक दीखती भर है, पर वस्तुतः लाभदायक तो सामूहिकता ही है।
एक ही आत्मा सबमें समाया हुआ है। इस तथ्य को गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और एक ही सूर्य की असंख्य लहरों पर चमकने के पीछे सन्निहित वस्तुस्थिति पर ध्यान देना चाहिए। हम सब परस्पर सघनतापूर्वक एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। मानवीय प्रगति का गौरवशाली इतिहास उसकी समूहवादी प्रवृत्ति का ही सत्परिणाम है। बुद्धि का विकास भी सामूहिक चेतना के फलस्वरूप ही संभव हुआ है। बुद्धि ने सामूहिकता विकसित नहीं की, सहयोग की वृत्ति ने बुद्धि का विकास संभव किया है।
हमें समूह का एक अंग होकर रहना चाहिए। अपने को समाज का एक घटक अनुभव करना चाहिए। प्रगति एकाकी नहीं हो सकती। सुविधाओं का उपभोग एकाकी किया जाए तो उससे अगणित विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। बाहर ईर्ष्या-द्वेष बढ़ेगा, आक्रमणकारी बढ़ेंगे और व्यसनों की भरमार आ धमकेगी। अंतर का चोर जैसी आत्मग्लानि खाने लगेगी और परिवार में आपा-धापी पैदा होगी। व्यक्तिगत बड़प्पन के प्रयत्नों को ही तो ‘स्वार्थ’ कहा जाता है। स्वार्थी सम्मान नहीं, तिरस्कार प्राप्त करता है। उस मार्ग पर चलते हुए उत्थान नहीं, पतन ही हाथ लगता है। संकीर्णता की परिधि में आबद्ध पोखर का जल सड़ेगा और सूखेगा ही। स्वच्छता और सजीवता तो प्रवाह के साथ जुड़ी हुई है। बहता हुआ जल ही सराहा जाता रहा है।
हम पृथकतावादी न बनें। व्यक्तिगत बड़प्पन के फेर में न पड़ें। अपनी अलग से प्रतिभा चमकाने का झंझट मोल न लें। समूह के अंग बनकर रहें। सबकी उन्नति में अपनी उन्नति देखें और सबके सुख में अपना सुख खोजें।
यह मानकर चलें कि उपलब्ध प्रतिभा, संपदा एवं गरिमा समाज का अनुदान है और उसका श्रेष्ठतम उपयोग समाज को सज्जनतापूर्वक लौटा देने में ही है।
समुद्र बादलों को देता है। बादल जमीन को देता है। जमीन नदियों के द्वारा उस जल को पुनः समुद्र में पहुँचा देती है। यही क्रम विश्व की स्थिरता और हरीतिमा, शांति और शीतलता का आधार है। हम अपने को विस्तृत करें। सबको अपने में और अपने को सब में देखें। आत्माओं में चमकती हुई परमात्मा की सत्ता को समझें। यदि ऐसा कर सके तो हमें व्यक्तिवाद की तुच्छता छोड़कर समूहवाद की महानता ही वरण करनी पड़ेगी।
ग्रह-नक्षत्रों तक दौड़ने की अपेक्षा मेरी राय में हमें अपना घर सँभालना और धरती की उलझनों को सुलझाना ज्यादा जरूरी है। अब तक हम अपनी मूर्खताओं के कारण इस धरती को नरक बनाए हुए हैं और अब उन्हीं मूर्खताओं को अन्य ग्रह-नक्षत्रों पर फैलाने के लिए बढ़ें तो उसमें खुशी मनाने की बात क्या है?
—बट्रेंड रसेल
नर शारीरिक दृष्टि से नारी की तुलना में बलिष्ठ भले ही हो, पर इसके अतिरिक्त हर क्षेत्र में नारी की गरिमा बढ़ी-चढ़ी है। भावनात्मक उत्कृष्टता के क्षेत्र में तो वह निस्संदेह पुरुष की तुलना में कहीं आगे है।
अभी विज्ञान की कसौटी पर नारी की गरिमा का एक तथ्य और भी स्पष्ट हुआ है— नारी के द्वारा एकाकी संतानोत्पादन। पुरूष के संयोग के बिना भी उसके लिए संतानोत्पादन संभव है। पुरुष के लिए यह सर्वथा असंभव है। इस दृष्टि से पुरुष अपूर्ण हुआ और नारी पूर्ण ठहरी। यदि सृष्टि-संचालन की बात का ही भौतिक मूल्यांकन किया जाए तो एक एकड़ भूमि का मूल्य दस हजार और उसमें प्रयुक्त होने वाले पच्चीस किलो बीज का मूल्य पच्चीस रुपया होता है। संतानोत्पादन का श्रेय यदि दिया जाना हो तो वह नारी को ही मिल सकता है। नर तो उस महान प्रक्रिया में मात्र एक स्वल्प सहयोग भर प्रदान करता है। सो भी इतना कम कि उसके बिना भी काम चल सकता है।
यदि किसी कारणवश ऐसी स्थिति आ जाए कि नर और नारी में से इस सृष्टि में एक ही वर्ग शेष रह जाए और दूसरा समाप्त हो जाए तो नारी में वह क्षमता है कि वह अकेले भी सृष्टिक्रम को संचालित रख सकती है; किंतु पुरुष के लिये ऐसा कर सकना सर्वथा असंभव है। उसके पास वे यंत्र-उपकरण ही नहीं हैं, जिनसे गर्भधारण संभव होता है।
अब तक यही माना जाता था कि नर-संयोग के बिना अकेली नारी प्रजनन में असमर्थ है, पर विज्ञान ने सिद्ध किया है कि इस क्षेत्र में भी नारी संपूर्ण है। उसमें यह संभावना भी विद्यमान है कि यदि वह चाहे तो स्वावलंबी रहकर सृष्टि-संचालन कर सकती है। अभी विज्ञान इतना ही सिद्ध कर सका है कि नारी केवल कन्याओं को ही जन्म दे सकती है। पुत्र के जन्म के लिए पुरुष का सहयोग अपेक्षित है। आज अनुभव की जाने वाली इस कमी का समाधान भी अगले दिनों मिल सकता है।
विज्ञान का हर विद्यार्थी जानता है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर उभयलिंगों का अस्तित्व विद्यमान रहता है। नारी के भीतर भी नर का अस्तित्व रहता है। इस अंतर्नर को ऐनिमस कहते हैं और हर नर के भीतर नारी की सूक्ष्मसत्ता विद्यमान रहती है। इस अंतर्नारी को ऐनिमा कहते हैं। कोई मनुष्य न पूर्णतया नर है, न नारी। स्तन नारी के विकसित होते हैं, पर उनका अस्तित्व नर के भीतर भी रहता है। उसी प्रकार प्रजनन अंगों के गह्वर में विपरित लिंग का अस्तित्व भली प्रकार देखा जा सकता है। शरीरशास्त्र का कोई भी छात्र इसे सहज ही समझ सकता है। इतना ही नहीं, स्वभाव और प्रवृत्तियों में भी बहुत-सी बातें नर में नारी का और नारी में नर का अस्तित्व प्रदर्शित करती हैं।
अविकसित जीवों में नर-मादा का संयोग बिना हुए भी संतानोत्पत्ति का क्रम चलता रहता है। बहुत से पौधे ऐसे हैं, जिनकी टहनियाँ काटकर जमीन में गाड़ दी जाएँ तो वे उगती हैं और एक स्वतंत्र पेड़ बन जाता है। ईख इसी किस्म का पौधा है। गाजर की हर कोशिका से एक नया गाजर का पौधा उगाकर अमेरिका के वनस्पतिविज्ञानी प्रो.स्टीवर्ड ने दिखाया है। हाइड्रा नामक एक सूक्ष्मप्राणी के शरीर का कोई टुकड़ा गिर जाए तो वह एक स्वतंत्र हाइड्रा बन जाता है। बैक्टीरिया भी इसी तरह दो खंडों में बँटते और अपनी वंशवृद्धि करते हैं। हर वनस्पति की भिन्नलिंगी पराग या बीज में उभयपक्षी लिंगभेद हो ही, यह आवश्यक नहीं।
पेड़-पौधों के प्रजनन में भी जीवधारियों की तरह परागण क्रिया ही मूल कारण होती है। रज-वीर्य की तरह इनमें भी स्त्रीकेशर और पुंकेसर तत्त्व होते हैं और इनके मिलन पर ही फल एवं बीज की उत्पत्ति होती है और यहीं से वंशवृद्धि का आधार बनता है।
कुछ पौधों में दोनों तत्त्व पाए जाते हैं और हवा के साथ उड़कर अथवा मधुमक्खियों, तितलियों अथवा अन्य छोटे कीड़ों द्वारा अपने पंख या पैरों के सहारे इधर-उधर किया जाता है और जब भिन्नलिंगी पराग का परस्पर सम्मिश्रण होता है तो वे गर्भधारण करते हैं। यह भ्रूण ही फल हैं। फल के अंदर बीज उसकी अगली पीढ़ी की तैयारी समझी जानी चाहिए।
बहुत से पेड़-पौधे एकलिंगी होते है। इस प्रकार के मादा पौधे किसी अन्य पेड़ से पुंकेशर प्राप्त कर सकें तो वे फलित नहीं होंगे। विज्ञान ने इन पौधों में भी कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रिया आरंभ की है। समर्थ पुंकेसर का संयोग हलकी जाति के स्त्रीकेशर से कराने से पौधों के स्तर को अधिक विकसित करने का सफल प्रयोग इन दिनों बहुत चल रहा है।
अच्छी जाति के बीज कठिनाई से मिलते हैं। फसल के समय जो बीज अच्छा होता है, वह भी ऋतु-परिवर्तन या छूत के कीड़े चिपक जाने से अपना प्रभाव खो बैठता है और अच्छा दीखने वाला बीज भी घटिया सिद्ध होता है। अतः एक नई विधि यह निकाली गई है कि गन्ना आदि की तरह पेड़ के टुकड़े काटकर उन्हें बोने को ही ऐसा योग कर दिया जाए कि अन्य पौधे भी उसी प्रकार बिना बीज के उगने और बढ़ने लगें। टहनियाँ काटकर बोने और उसी से पौधा उत्पन्न हो जाने की विधि अब तक कुछ खास किस्म के पौधों तक ही सीमित थी, पर अब यह प्रयत्न किया जा रहा है कि अधिकांश पौधों में यह सुधार कर दिया जाए कि वे संयोग अथवा परागण के बाहरी बीज की प्रतीक्षा किए बिना अपने आप में ही वह प्रयोजन पूरा कर लिया करें और परागण की प्रतीक्षा किए बिना ही टहनियों के द्वारा ही अपनी वंशवृद्धि जारी रख सकें।
पर प्राणि-जगत में यह बात आश्चर्य की समझी जाती थी। निर्जीव अंडा देने वाली मुर्गियाँ बिना नर के संयोग के अंडे तो दे लेती हैं, पर उनसे बच्चे नहीं हो सकते। मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के लिए तो यह और भी कठिन है।
पुराणों में ऐसी कथा मिलती हैं, जिनमें यह बताया गया है कि विपरीतलिंगी संपर्क के बिना बच्चे हो सकते हैं। लंका-दहन के पश्चात हनुमान समुद्र में नहाए। उनका पसीना मछली पी गई और उससे मकरध्वज का जन्म हुआ। देवताओं और ऋषियों के बारे में भी ऐसा वर्णन मिलता है, पर उन्हें अलंकारिक माना जाता है। पीछे के इतिहासकाल में भी जब इस प्रकार की घटनाएँ देखने को मिलती हैं तो यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या यह संभव है कि बिना संयोग के संतान उत्पन्न हो सके। वृद्ध दशरथ जी की तीन रानियों की संतानें यज्ञचरु से हुई थीं। व्यासजी ने वंशनाश के संकट को बचाने के लिए राजा विचित्रवीर्य की रानियों को नग्न देखा भर था और उन्हें पांडु, धृतराष्ट्र तथा विदुर के रूप में तीन संतानें मिलीं। इस दिशा में खोज करने पर और भी उदाहरण मिलते हैं। कुंती ने कर्ण को कुमारी अवस्था में ही उत्पन्न किया था। कर्ण ही नहीं, धर्मराज से युधिष्ठिर की, इंद्र से अर्जुन की और पवन से भीम की उत्पत्ति मानी जाती है। क्या अशरीरी देवशक्तियों का आवेश नारीदेहधारियों से संतानोत्पन्न कर सकता है? इस शृंखला में तब एक कड़ी और जुड़ जाती है, जब हम कुमारी मरियम के पेट से ईसामसीह के जन्म की बात पढ़ते हैं।
पुराने उदाहरणों के संबंध में कई तरह की आशंकाएँ की जा सकती हैं और यह कहा जा सकता है कि नर-संयोग को उन दिनों लोक-लाजवश देव आवेश कहकर छिपाया गया होगा। अब वे घटनाएँ बहुत पुरानी हो गईं और अब उनका परीक्षण-विवेचन करने का समय नहीं रहा, इसलिए इन उदाहरणों को लेकर इस निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है कि ईख और गुलाब की तरह टहनियों से अथवा हाइड्रा और बैक्टीरिया जैसे जीवों की तरह क्या मनुष्य भी बिना संयोग के सन्तानोत्पादन कर सकता है। केला केवल मादा अंडाशय का ही परिष्कृत रूप है। प्रकृति में तो यह एकलिंगी प्रजनन— पार्थनोवेनेसिस चिरकाल से चला आ रहा है। प्रश्न केवल मनुष्य के संबंध में है। बात असंभव-सी लगती है, पर विज्ञान के बढ़ते हुए चरणों ने इस संभावना को एक सच्चाई के रूप में प्रस्तुत कर दिया है कि बिना नर की सहायता के नारी द्वारा अपने कौमार्य और ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हुए संतानोत्पन्न कर सकना संभव है। नर के लिए ऐसा कर सकना कठिन दीखता है। वस्तुतः उसके पास भ्रूणधारण करने के वे अवयव नहीं होते, जो नारी को उपलब्ध हैं।
कुछ समय पूर्व जीवविज्ञानी प्रो.हाल्डेन की सहयोगिनी-सहधर्मिणी डॉ. हेलेन पर्व ने यह दावा किया था कि, ”किसी असंदिग्ध कुमारी के गर्भवती होने की उतनी ही संभावना है, जितनी एक साथ कई बच्चे किसी स्त्री के पेट से पैदा होने की। दोनों ही बातें अपवाद हैं, पर असंभव नहीं। एक साथ कई बच्चे हर स्त्री के नहीं होते, पर उनका होना असंभव नहीं। इसी प्रकार यदि कोई कुमारी बिना नर की सहायता के गर्भधारण करे तो इसे असाधारण भर कहा जाना चाहिए, असंभव नहीं।”
इस दावे को लेकर पाश्चात्य देशों में एक बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ। दावे को सिद्ध करने की चुनौती दी गई। अतः डॉ.पर्व ने ब्रिटिश समाचारपत्रों में विज्ञापन छपाया कि जो महिलाएँ अपनी संतान की पिता भी स्वयं ही बनना चाहती हों ,वे वैज्ञानिक परीक्षा के लिए आगे आएँ।
इस विज्ञापन के आधार पर लगभग 100 महिलाओं ने इसके लिए अपने को प्रस्तुत किया। उनमें से प्राथमिक परीक्षा में 86 उत्तीर्ण हुई। इस प्रयोग की परीक्षा के लिए सुप्रसिद्ध जीवशास्त्रियों की डॉ. स्टेनली वाल्फेर लिन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। इनके दल में सम्मिलित सदस्य थे— प्रख्यात डॉक्टर वर्नाडे केंबर, डॉ. सिडनी और डॉ. डेविड बिन विलियम्स।
प्रयोग के लिए सबसे उपयुक्त शरीर पाया गया— श्रीमती ऐमी मोरी जोंस का। प्रयोग सफल हुआ। श्रीमती जोंस ने एक लड़की को जन्म दिया। इसमें कहीं किसी चालाकी की गुंजाइश न रहे, इस दृष्टि से प्रतिबंधों की सारी व्यवस्था पूरी कर ली गई और पूरे गर्भकाल में चिकित्सकमंडली की निरंतर देख-भाल रही। नियत समय पर कन्या को जन्म देकर श्रीमती जोंस ने उस असंभव मानी जाने वाली बात को संभव करके दिखा दिया, जिसमें सृष्टि-संचालन के लिए नर से नारी का संपर्क आवश्यक कहा जाता था।
इस प्रजनन से यह तथ्य स्पष्ट हो गया कि प्रत्येक पानी के पूँछदार कीड़ों की तरह शुक्रकीटकों के सिर में 23 गुणसूत्र और पूँछ में माइटोकोंड्रिया नामक पिंड होते हैं। यह पिंड ही शुक्राणुओं को गतिशील होने की शक्ति प्रदान करते हैं। अंडकों का उद्दीपन और विभाजन आमतौर से शुक्राणु करते हें, पर यह अनिवार्य नहीं है। यह उत्तेजना दूसरे प्रकार से भी उत्पन्न की जा सके तो नारी स्वयं ही प्रजनन करने में सफल हो सकती है, क्योंकि उसके अंड में उत्पादन के सारे तत्त्व मौजूद हैं। नारी के अंड में 23 गुणसूत्र होते हैं। वे 46 हो जाएँ तो भ्रूणधारण हो सकता है। यह कार्य नारी के दो अंडों को मिला देने की वैज्ञानिक पद्धति से भी संभव हो गया और श्रीमती जोंस ने कन्या को जन्म दिया। नर का शुक्राणु रहने से यह लाभ था कि संतान में पिता की वंश-परंपरा और माता की वंश-परंपरा आपस में मिलकर संतान को मिश्रितधर्मी बना सकती थी, पर यदि वैसा नहीं हुआ है तो केवल माता के स्वरूप और स्वभाव की ही संतान उत्पन्न होगी। यह मिश्रण तो संभव नहीं, पर अंडाणु को उत्तेजित करना और उसके गुणसूत्रों को द्विगुणित कर देना विज्ञान की पकड़ में है। यदि नर का इस धरती पर से किसी कारणवश लोप हो जाए तो नारी अपने बलबूते पर सृष्टि उत्पन्न करती रह सकती है। हाँ! वर्तमान उपलब्धियों के आधार पर वह केवल कन्याएँ ही उत्पन्न कर सकती है। प्रकृति तो कुछ भी कर सकती है। उसके लिए मरियम के पेट से ईसा और कुंती के गर्भ से कर्ण का जन्म उनकी कुमारी माताओं द्वारा पूर्णतया संभव है, पर विज्ञान अभी वहाँ तक नहीं पहुँचा। वह नारी के पेट से कन्या उत्पन्न कर सका है। अभी नारी केवल कन्या की पिता बन सकी है। आगे पुत्र की संभावना के लिए विज्ञान के अगले चरणों की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
श्रीमती जोंस के गर्भ से उत्पन्न ‘मोनका’ नाम की लड़की अब किशोरावस्था में है। वह वैज्ञानिकों के लिए कौतूहलपूर्ण शोध का विषय बनी हुई है। इन माँ-बेटी के शरीर में इतना साम्य है कि किसी भी परीक्षण में उन दोनों की शरीररचना में कोई अंतर दिखाई नहीं पड़ता। रंग-रूप और अंगों की बनावट में इतनी समता है कि देखने वाले बड़ी उम्र की जोंस को छोटी उम्र की जोंस में बदली हुई ही कहने लगते हैं। बच्ची को ट्रू कापी अर्थात सत्य प्रतिलिपि के रूप में देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
नारी पर किया गया उपरोक्त प्रयोग अब वैज्ञानिकों के लिए एक उत्साह और आशा का विषय बन गया है। जो पशु केवल दूध के काम आते हैं, उनके नर बच्चे बेकार सिद्ध होते हैं और खाल-मांस के लिए उन्हें मौत के घाट उतारना पड़ता है। बकरे और भैंसे जितना खाते हैं और जगह घेरते हैं। उसकी तुलना में लाभ कम देते हैं; इसलिए उन्हें कसाई के हवाले ही किया जाता है। यदि वे दुधारू पशु केवल मादाएँ ही जनने लगें तो फिर दूध की भी कमी न रहे और मार-काट भी उतनी न मचानी पड़े, इसलिए पशुओं पर तथा दूसरे जंतुओं पर यह प्रयोग किए जा रहे हैं कि मादा प्रजनन के संबंध में नर की आश्रित न रहकर अपने पैरों पर आप खड़ी हो सके। इसके लिए केवल उस विधि को व्यापक भर बनाना है, जिसके अनुसार मादा का अंड उत्तेजित और एकत्रित हो सके। यह कार्य अब असंभव नहीं रहा। केवल यह कष्टसाध्य भर रह गया है। उसी को सरल बनाने के प्रयत्न बहुत जोरों से चल रहे हैं।
फ्रांस के जीवविज्ञानी विग्यूर ने ‘सी अचिन’ नामक समुद्री जंतु पर संयोगरहित प्रजनन के सफल प्रयोग किए हैं। डॉ.ए. स्टाल्क भी ऐसी ही सफलता ट्रुथ स्कार्प मछलियों पर प्राप्त कर चुके हैं। अब अन्य पक्षियों और पशुओं पर यह परीक्षण हो रहे हैं। संग्रहीत अनुभवों के आधार पर मनुष्य की काया को यह सिद्ध करने के लिए हाथ में लिया जाएगा कि नर-नारी का संपर्क दूसरी दृष्टि से भले ही उपयुक्त हो, पर संतानोत्पादन का क्रम तो उसके बिना भी चल सकता है। अब उन प्राचीन-पौराणिक उपाख्यान की सत्यता से इनकार नहीं किया जा सकता, जिनमें बिना नर-संयोग के संतानजन्म का वर्णन है।
कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में तपस्यारत ऋषि मुद्गल के आदर्श धर्माचरण, आराधन और बीजोच्छवृत्ति द्वारा जीवन-निर्वाह थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीज बीनकर चावल एकत्र करते और दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथियोँ के सत्कार में व्यय कर देते थे। ऋषिश्रेष्ठ दुर्वासा छह हजार शिष्यों सहित मुद्गल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर गए और निस्पृह मुद्गल ने उन्हें हर बार आतिथ्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।
दुर्वासा ऋषि मुद्गल पर कृपालु हुए। उन्होंने कुरुक्षेत्र के इस तपस्वी को स्वर्गप्राप्ति का वरदान दिया। देवदूत ऋषि मुद्गल को स्वर्ग ले जाने के लिए आए तो तपस्वी ने पूछा— ”दूत ! पहले स्वर्ग निवासियों के गुण, वहाँ के सुख और दुःखों का वर्णन करो, तभी मैं वहाँ चलने के विषय में विचार करूँगा।” देवदूत ने नम्र स्वर में कहा— "तपस्वीश्रेष्ठ! आप जैसे धर्मात्मा, जितेंद्रिय और दानी ही स्वर्ग के अधिकारी हैं। वहाँ शोक का नाम नहीं, मात्र सुख ही सुख है। दोष यह है कि वह भोगभूमि है; अतएव वहाँ कर्म का कोई स्थान नहीं। वहाँ मृत्युलोक में किए शुभकर्मों का फल ही भोगा जाता है, नया कर्म नहीं किया जा सकता।”
मुद्गल ने गंभीर स्वर में कहा— "हे दूत! खेद है, तुम्हें एकाकी स्वर्ग लौटना पड़ेगा। मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगा। जिस लोक में कर्म नहीं, वहाँ केवल भोग हेतु जाना मुझे पसंद नहीं। तुम्हारे स्वर्ग की अपेक्षा मुझे अपना यह मृत्युलोक प्रिय है, जहाँ कर्म और साधन द्वारा मैं निर्वाण प्राप्त कर सकता हूँ।”
तपस्वी मुद्गल ने मृत्युलोक में ही लोक-मंगल के लिए चिरसाधना करते हुए अविरत कर्मयोग द्वारा आवागमन से परे निर्वाण को प्राप्त किया।
पौराणिक उपाख्यान में पुरुषार्थ का प्रतीक और शक्ति का पुत्र कार्तिकेय स्कंद को माना गया है। यह यों शक्ति पार्वती के पुत्र हैं, पर शिवपुराण के अनुसार उन्हें छः कृत्तिकाओं ने पाला। अग्नि ने उन्हें गर्भ में धारण किया। शिव का रेतस् अग्नि के रूप में ही स्फुरित हुआ और उसे वैश्वानर ने नारी के रूप में ग्रहण करके अपने भीतर ही परिपक्व किया। अगणित व्यवधानों के प्रतीक यातुधानो ने देव जीवन को दुर्लभ बना रखा था। उसका निराकरण इन कार्तिकेय स्कंद द्वारा ही संपन्न हुआ। इन शक्तिपुत्र के छह मुख थे।
इस स्कंद-अवतरण को कुंडलिनी महाशक्ति से संबंधित षट्चक्र समूह और उसके प्रभाव का वर्णन ही समझना चाहिए। जननेंद्रिय-मूल में अवस्थित आधार अग्नि का नाम ही कुंडलिनी है। शिवरूप सहस्रार के जागृत— प्रफुल्लित होने पर उसका जो पराग मकरंद निर्झरित हुआ, उसे शिव का रेतस् कहना चाहिए। कुंडलिनी अर्थात आधार अग्नि ने उसे ग्रहण किया। छह कृत्तिकाओं ने उसे परिपक्व किया। यह छह कृत्तिकाएँ छह चक्र ही हैं। शिव और शक्ति का यह समन्वय-संयोग स्कंदरूपी महापराक्रम के रूप में प्रकट होता है। इसके छह मुख थे। छह कृत्तिकाओं द्वारा परिपोषित छह मुख वाले कार्तिकेय को अलंकार के रूप में षट्चक्रों का प्रभाव-परिणाम ही माना जाए।
षट्चक्र क्या हैं? कहाँ हैं? क्यों हैं? किस स्थिति में हैं? उनका क्या प्रयोजन है? इन प्रश्नों की यहाँ प्रारंभिक जानकारी ही प्राप्त कर लेनी चाहिए। जब उनके प्रयोग-उपयोग का शिक्षण होगा, विस्तृत चर्चा उसी समय होगी। जननेंद्रिय के मूल में मेरुदंड का जहाँ अंत होता है। उसके बीच में जितना पोला स्थान है, उसे साधनात्मक भाषा में योनि कंद कहते हैं। स्थूलशरीरशास्त्र के अनुसार वहाँ सुषुम्ना नाड़ीगुच्छक भर है ,पर सूक्ष्मशरीर-रचना विज्ञान के अनुसार यहाँ एक विशेष अवयव है, जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। इसके नीचे की पीठ कछुए जैसी है। इसे कूर्म कहते हैं। इसके ऊपर एक छोटा मेरुदंड है, उसे सुमेरु कहते हैं। इसके चारों ओर साढ़े-तीन फेरे लगाए हुए एक शक्तिसूत्र विद्यमान है। बस यही मूलाधार है। इसे सब मिलाकर एक कुंड गह्वर में अवस्थित गेद अथवा कंद की समता देकर समझाया जा सकता है। पहला चक्र यही है। कुंडलिनी का मूल स्थान यही है। ईंधन न मिलने से जैसे अग्निकुंड में आग तो बुझ-सी जाती है, पर वहाँ गर्मी बनी रहती है। यही स्थिति सामान्यतया सभी साधारण व्यक्तियों की होती है। प्रयत्न करने से अर्थात प्राणरूपी ईंधन देने से यह प्रदीप्त होती है। उसकी लौ ऊपर उठती है।
मूलाधार से ऊपर मेरुदंड के सहारे क्रमशः ऊपर उठते हुए छह चक्र हैं। ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सातवाँ चक्र ‘सहस्रार’ है। इसे भी गिनें तो चक्रों की संख्या सात हो जाती है। इसे लक्ष्यबिंदु मानें और चक्र शृंखला में न गिनें तो उनकी संख्या छह रह जाती है। गणक इन्हें दोनों ही तरह से गिनते रहे हैं। किसी ने छह कहा है तो किसी ने सात। प्रतिपादन दोनों के ही ठीक हैं। इससे वस्तुस्थिति में कोई अंतर नहीं है। दोनों पक्षों के कथनानुसार स्थिति बिलकुल एक है। गिनती समझने भर के लिए है।
जागृत कुंडलिनी की अग्निशिखा जैसे-जैसे अधिक तीव्र होती जाती है, वह ऊपर उठती है और इन छहों को ऊष्ण करती हुई उनमें हलचल उत्पन्न करती है। इसके फलस्वरूप जो शक्तितत्त्व उनके भीतर प्रसुप्त स्थिति में— बीजरूप में दबे पड़े थे, वे जागृत एवं सक्रिय होने लगते हैं। इन चक्रों को विश्वव्यापी विराट शक्तितत्त्व के संबंध स्थापित करने वाले मर्मस्थल कहना चाहिए। जागृत अवस्था में इन्हीं के माध्यम से विश्वव्यापी समग्र चेतना के साथ संबंध स्थापित किया जा सकता है और उस सामर्थ्य-सागर में से अपनी अभीष्ट वस्तुओं को अभीष्ट मात्रा में ग्रहण किया जा सकता है।
सूक्ष्मशरीर में अवस्थित छह चक्रों को छह ट्रांसफार्मर (Transformer) कहना चाहिए। जिनका काम निखिल आकाश में भरे प्राणतत्त्व में से अभीष्ट मात्रा ग्रहण करना है। अपनी ग्राहकशक्ति के कारण वे चक्र स्वयं गतिशील और मनुष्य की समग्र गतिशीलता को चलाते रहने का प्रयोजन पूरा करते हैं। इन चक्रों की स्वस्थता और समर्थता पर हमारे सूक्ष्मशरीर की समर्थता निर्भर रहती है। इनमें से कोई अशक्त या विकारग्रस्त हो जाए तो उसका वैसा ही प्रभाव अंतरंग शरीर पर पड़ेगा। जैसे— हृदय, मस्तिष्क, आमाशय, फुफ्फुस, यकृत, वृक्क आदि के क्षतिग्रस्त हो जाने से सूक्ष्मशरीर पर पड़ता है। यदि ये चक्र ठीक काम करते रहें तो व्यक्ति की मनस्विता विधिवत् काम करती रहती है। यदि उन्हें अधिक परिपुष्ट बना लिया जाए तो जिस तरह पहलवान व्यक्ति अपनी परिपुष्ट काया के द्वारा अपना और दूसरों का बहुत भला कर सकता है, इसी प्रकार इन चक्रों को समर्थ बनाने की साधना का मार्ग अपनाकर निज की सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं समर्थता को विकसित किया जा सकता है और उससे आत्मकल्याण तथा विश्वकल्याण के दोनों प्रयोजन पूरे किए जा सकते हैं। छह चक्र प्रसिद्ध हैं। सातवाँ चक्र सहस्रार है। इन सातों का एक समन्वय शक्तिपुंज (Logos) भी है। जिससे दृश्य सूर्य के समान ही, किंतु अपने अलग ढंग की रश्मियाँ निकलती हैं। सूर्यकिरणों में सात रंग अथवा ऐसी विशेषताएँ होती हैं, जिनका स्वरूप, विस्तार और कार्यक्षेत्र सीमित है, पर इस आत्मतत्त्व के सूर्य का प्रभाव और विस्तार बहुत व्यापक है। वह प्रकृति के प्रत्येक अणु को नियंत्रित एवं गतिशील रखता है, साथ ही चेतन संसार की विधि-व्यवस्था को सँभालता-सँजोता है। इसे पाश्चात्य तत्त्ववेत्ता संस आफ फोतह (Sons of fotah) कहते हैं और प्रतिपादित करते हैं कि विश्वव्यापी शक्तियों का मानवीकरण (Grozs mauifestation) इसी केंद्रसंस्थान द्वारा हो सका है।
सामान्य शक्तिधाराओं में प्रधान गिनी जाने वाली ये सात हैं— (1) गति, (2) शब्द, (3) ऊष्मा, (4) प्रकाश, (5) संयोग, (6) विद्युत और (7) चुंबक। इन्हें सात चक्रों का प्रतीक ही मानना चाहिए।
कुंडलिनीशक्ति को कई विज्ञानवेत्ता विद्युतीय द्रव (Electric Fluid) या नाड़ीशक्ति (Nerve fluid) कहते हैं।
इस निखिल विश्व-ब्रहमांड में संव्याप्त परमात्मा की छह चेतनशक्तियों का अनुभव हमें होता है। यों शक्तिपुंज पर ब्रह्म की अगणित शक्तिधाराओं का पता पा सकना, मनुष्य की सीमित बुद्धि के लिए असंभव है। फिर भी हमारे दैनिक जीवन में जिनका प्रत्यक्ष संपर्क-संयोग रहता है, उनमें प्रमुख ये हैं— (१) पराशक्ति, (2) ज्ञानशक्ति, (3) इच्छाशक्ति, (4) क्रियाशक्ति, (5) कुंडलिनीशक्ति, (6) मातृकाशक्ति और (7) गुह्य। इन सबका सम्मिलित शक्तिपुंज ईश्वरीय प्रकाश (Light of lhgos) अथवा सूक्ष्मप्रकाश (Astral light) कहा जाता है। यह सातवीं शक्ति है। कोई चाहे तो इस शक्तिपुंज को उपरोक्त छह शक्तियों का उद्गम भी कह सकता है। इन सबको हम चेतनसत्ताएँ कह सकते हैं। उसे पवित्र अग्नि (Sacred fire) के रूप में भी कई जगह वर्णित किया गया है और कहा गया है कि उसमें से आग-ऊष्मा नहीं, प्रकाश-किरणें निकलती हैं। वे शरीर में विद्यमान ग्रंथियों (Glaudz) , केंद्रों (Centres), और गुच्छकों (Ganglion) को असाधारण रूप से प्रभावित करती हैं। इससे मात्र शरीर या मस्तिष्क को ही बल नहीं मिलता, वरन समग्र व्यक्तित्व की महान संभावना को और अग्रसर करती है।
इन सात चक्रों में अवस्थित सात उपरोक्त शक्तियों का उल्लेख साधना ग्रंथों में अलंकारिक रूप में हुआ है। उन्हें सात लोक, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात ऋषि आदि नामों से चित्रित किया गया है। इस चित्रण में यह संकेत है कि इन चक्रों में किन-किन स्तर के विराट शक्ति-स्रोतों के साथ संबंध हैं। बीजरूप से कौन महान सामर्थ्य इन चक्रों में विद्यमान है और जागृत होने पर उन चक्र-संस्थानों के माध्यम से मनुष्य का व्यक्तित्व छोटे से कितना विराट और कितना विशाल हो सकता है। टोकरी भर बीज से लंबा-चौड़ा खेत हरा-भरा हो सकता है। अपने बीजभंडार में सात टोकरी भरा हुआ सात किस्म का अनाज सुरक्षित रखा है। चक्र एक प्रकार के शीतकृत गोदाम— कोल्ड स्टोर हैं और इन पर ताला जड़ा हुआ है। इन सात तालों की एक ही ताली है और उसका नाम है— ‘कुंडलिनी'। जब उसके जागरण की साधना की जाती है तो यह ताले खुलते हैं। बीज बाहर लाया जाता है। शरीररूपी साढ़े तीन एकड़ के खेत में वह बोया जाता है। यह छोटा खेत अपनी सुसंपन्नता को अत्यधिक व्यापक बना देता है। पुराणकथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था। भगवान ने वामनरूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भिक्षा माँगी। बलि तैयार हो गए। तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया। हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लंबा है। चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान अर्थात अणु से विभु कर लिया जाए तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लंबाई या साढ़े तीन एकड़ जमीन न रहकर लोक-लोकांतरों तक विस्तृत हो सकती है और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान वामन के रूप में हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं। सात चक्रों में सन्निहित शक्ति-स्रोतों की तुलना किन भौतिक संस्थानों से— संपदाओं से— चेतनाओं से की जा सकती है। इसका तुलनात्मक अलंकारिक उल्लेख साधना ग्रंथों में इस प्रकार मिलता है—
महीस्थतीर्थे विमले जले मुदा।
मूलाम्बुजे स्नाति स मुक्तिभाग्भवेत्॥
— महायोग विज्ञान
अर्थात पृथ्वी के समस्त तीर्थ मूलाधार चक्र में निवास करते हैं। उसमें जो स्नान करता है, मुक्त हो जाता है।
स्वर्गस्थं यावता तीर्थं स्वाधिष्ठाने सुपङ्कजे।
मनो निधाय योगीन्द्रः स्नाति गङ्गाजले तथा॥
मणिपूरे देवतीर्थं पञ्चकुण्ड सरोवरम्॥
तत्र श्रीकामना तीर्थं स्नाति यो मुक्तिमिच्छति॥
अनाहते सर्व तीर्थं सूर्यमंडलमध्यगम्।
विभाय सर्वतीर्थाणि स्नाति यो मुक्तिमिच्छति॥
— महायोग विज्ञान
स्वर्गस्थ तीर्थ स्वाधिष्ठान चक्र में विद्यमान है। यहाँ निवास करने वाली देवगंगा में योगी लोग स्नान करते हैं। मणिपूरचक्र देवतीर्थ है, उसमें पंचकुंड सरोवर है। वहाँ श्री कामतीर्थ है। अनाहतचक्र में सूर्यमंडल में वर्तमान समस्त तीर्थ का निवास है। इनमें स्नान करने वाले उन पुण्यलोकों के अधिकारी होते हैं।
मूलाधारेतु भूर्लोको स्वाधिष्ठाने भुवस्ततः।
स्वर्लोको नाभिदेशे च हृदये तु महस्तथा॥
जनलोकं कण्ठदेशे तपोलोकं ललाटके।
सत्यलोकं महारन्ध्रे इति लोकाः पृथक् पृथक्॥
लम्पादाङ्गष्ठतले तस्योपरि तलातलम्।
महातलं गुल्फमध्ये गुल्फोपरि रसातलम्॥
सुतलं जङ्घयोर्मध्ये वितलं जानुमध्यगम्।
ऊर्वोर्मध्ये तलम्प्रोक्तं सप्तपातालमीरितम्॥
— महायोग विज्ञान
मूलाधार चक्र में भूःलोक, स्वाधिष्ठान में भुवःलोक, नाभि में स्वःलोक, हृदय में महःलोक, कंठ में जनःलोक, ललाट में तपःलोक और ब्रह्मरंध्र में सत्यलोक है। इस प्रकार नीचे के भाग में सात पाताललोक हैं। पैरों के तले में तललोक, पाँव के ऊपर भाग में तलातललोक, गुल्फ के बीच महातल, गुल्फ के ऊपर रसातल, जंघाओं के मध्य वितल और उरुओं के मध्य पाताल है। इस प्रकार कटि से ऊपर सात और नीचे सात कुल चौदह भुवन इसी शरीर में विद्यमान हैं, जो इस तथ्य को जानता है वह दुःखों से छूटकर परम सुखी हो जाता है।
इसी शरीर में सुमेरु सातों द्वीप, समस्त नदियाँ, सागर, पर्वत, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि-मुनि, नक्षत्र, ग्रह, तीर्थ, पीठ, पीठदेवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, समस्त प्राणी और जो कुछ संसार में है, सो सब इस सुमेरु (कुंडलिनीस्थित मेरु अथवा मेरुदंड) से लिपटे बैठे हैं और अपने-अपने कार्य कर रहे हैं। जो इन सबको जानता है, वही योगी है।
देहेऽस्मिन् वर्त्ततो मेरुः सप्तद्वीपसमन्वितः।
सरितः सागराः शैलाः क्षेत्राणि क्षेत्रपालकाः॥
ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।
पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्त्तन्ते पीठदेवताः॥
सृष्टिसंहारकर्त्तारौ भ्रमन्तौ शशिभास्करौ।
नभो वायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च॥
त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्व्वाणि देहतः।
मेरुं संवेष्ट्य सर्व्वत्र व्यवहारः प्रवर्त्तते॥
जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः।
— महायोग विज्ञान
उपरोक्त प्रतिपादन से स्पष्ट होता है कि यह शरीर मात्र सप्तधातुओं का ही बना नहीं है; उसमें (1) रस, (2) रक्त, (3) मांस, (4) मज्जा, (5) अस्थि, (6) मेद और (7) वीर्य ही नहीं, वरन उनके भीतर और भी दिव्य तत्त्व हैं। यह सातों धातुएँ सात चक्रों से प्रभावित होती हैं और हमारा शरीर अविज्ञात रूप से उन्हीं के द्वारा स्वस्थ-अस्वस्थ होता रहता है। आहार-व्यायाम ही नहीं, चक्रों से संबंधित अंतरंग की गुह्य स्थिति यदि ठीक प्रकार संचारित होती रहे तो आरोग्य और दीर्घ जीवन की संभावनाएँ प्रखर हो सकती हैं। गुह्य स्थिति अस्त-व्यस्त रहे तो पौष्टिक आहार और बहुत साज-सँभालकर रखने पर भी शरीर दुर्बल एवं अस्वस्थ ही बना रहेगा। यही बात मनःसंस्थान की है। चेतना के विभिन्न स्तर इन चक्रों से प्रभावित होते है और चेतन-अचेतन मस्तिष्क के अवसाद को चेतना के उत्कर्ष में परिणत किया जा सकता है। ऋद्धियों-सिद्धियों का जो चमत्कारी वर्णन साधना ग्रंथों में मिलता है, उतना ही नहीं; वरन उससे भी अधिक उपलब्धियाँ अपने भीतर भरे शक्तिभंडार के साधना विज्ञान के आधार पर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने योग्य बनाया जा सकता है।
जीवन एक यज्ञ है। मात्र हवनकुंडों में संपन्न होने वाले अग्निहोत्र ही यज्ञ नहीं हैं। शरीररूपी पिंड और विराट ब्रह्मांड में उनके स्तर के अनुरूप छोटे और बड़े रूप से यह सूक्ष्मयज्ञ चलता रहता है। चक्रों को सात कुंड कहा जा सकता है। उनमें सात अग्नियों की स्थापना, सात ऋषियों का पौरोहित्य, सात देवताओं का आह्वान, सात चरु, सात परिणाम भी यह साधना-यज्ञ के होते हैं, जिससे कुंडलिनी विद्या के अंतर्गत चक्रों के जागरण की प्रक्रिया द्वारा संपन्न किया जाता है—
सप्त प्राणाः प्रमवन्ति तस्मात्
सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा।
गुहाशया निहिताः सप्त सप्त॥८॥
—मुण्डक 2।1।8
सप्तप्राण उसी से उत्पन्न हुए। अग्नि की सात ज्वालाएँ, सप्तसमिधाएँ, सात यज्ञ, सात लोक, यह सभी उस परमेश्वर से उत्पन्न हुए।
भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री शौकधारिणी।
भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः।12।
महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि।
तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक्।13।
— देवी भागवत
सात लोकों में आप सात शक्ति होकर विद्यमान हैं और उनका संचालन करती हैं। (1) भूःलोक में— धरित्री, (2) भुवःलोक में— वायु, (3) स्वःलोक में— तेजपुंज, (4) महःलोक में— महासिद्धि, (5) जनःलोक में— जननशक्ति, (6) तपःलोक में— तपस्विनी और (7) सत्यलोक में— सत्यवाक्।
कुंडलिनी विज्ञान उस विराट ब्रह्मांड और लघु अंड-पिंड के वियोग को दूरकर परस्पर संबद्ध करने और मूर्च्छना को निरस्तकर प्रखरता उत्पन्न करने की सांगोपांग विद्या है। इसके माध्यम से साधक अपनी लघुता को महानता में विकसित कर सकता है।
मनुष्य सो गया है। उसे जगाया जाना जरूरी है। वह सोया ही नहीं, पशुत्व की ओर वापिस भी लौट रहा है। उस पर ऐसा चाबुक बरसाने की जरूरत है कि एक बार चीख उठे। इसके बाद उसे प्रेम से सराबोर चुंबन भी दिए जाने चाहिए। डरना नहीं चाहिए कि उसे चोट लगेगी। अगर यह चाबुक प्रेम में सने होंगे तो वह उनके निशानों को देखकर अनुभव और स्वीकार करेगा कि वह इसी के लायक था।
जब वह लज्जित और दुखी हो तो उस पर चुंबनों की वर्षा की जानी चाहिए। इसी प्रकार उनका पुनर्जन्म होगा।
—गोर्की
बड़प्पन का मौसम चला गया। बरसाती फसल बोए और उगाए जाने की फसल चली गई। अब बैसाखी रबी की फसल बोई जानी है। अब गेहूँ, जौ और चना ही बोया और उगाया जाएगा। बरसाती अनाज मक्का आदि जिस मौसम में बोए, उगाए और काटे जाते हैं, वह अब रहा नहीं। किसी को वे फसलें अब नहीं बोनी चाहिए, जो झर बादल के दिनों में ही आनन-फानन में तैयार होती थीं। अब लंबी सर्दियाँ सामने आ रही हैं और पानी बरसने की आशा भी कम है। ऐसी परिस्थितियों को सहन कर सके, अब उन्हीं फसलों को बोया-उगाया जाना चाहिए।
एक समय था, जब थोड़ी-सी चतुराई के बल पर आसानी से बड़ा आदमी बना जा सकता था। भोले लोगों को उलझाकर किसी भी स्तर पर पैसा बनाया जा सकता था और अपने को भाग्यवान, पुण्यवान, दैवी कृपापात्र सिद्ध किया जा सकता था। भगवान का एकाध बड़ा मंदिर बना देना और रामनामी ओढ़ लेने से लोग डर जाते थे कि देवता इनके वश में है। ये जो चाहे सो कर या करा सकते हैं। उन दिनों एक ओर आतंक, एक ओर निराशा थी, इसलिए आतंकवादी और भोलेपन की संगति में चतुराई, बड़प्पन का आधार खड़ाकर देती थी। उस अमीरी को देखकर अनेक अभावग्रस्त चापलूस पीछे-पीछे फिरते थे। उनकी सहायता से मनमानी करना और भी सरल हो जाता था और इस सरंजाम को खड़ा कर लेने वाला सहज ही ठाठ-बाट का बड़ा आदमी बन जाता था।
अब वह समय बिलकुल चला गया। जहाँ ध्वंसावशेष खड़े हैं और बालू के किले रच दिए गए हैं, वे आजकल में ढहने ही वाले हैं। जनता काफी सजग और चतुर हो गई है। जिन्हें कुछ मतलब निकालना हो, उनकी बात अलग है। साधारणतया बड़ा आदमी हर किसी की आँख में खटकता है और ईर्ष्या-द्वेष का शिकार बनता है। जनसाधारण की तुलना में बहुत ऊँचा स्तर बना लेना अब निष्ठुर, चोर या डाकू लोगों की तुलना में गिना जाता है; भले ही वह अन्य न्यायानुमोदित ही क्यों न कमाया गया हो। इस कटु आलोचना में इतना तो तथ्य भी है कि जिस आपत्तिकाल में युग की पुकार एक-एक पैसे एवं एक-एक श्रमबिंदु के लिए थी, उन दिनों ये तथाकथित बड़े आदमी अपना वैभव बटोरने में लगे रहे और विश्वमानव की आवश्यकता को समझने में उपेक्षा, निष्ठुरता एवं कृपणता दिखाई।
जो हो, अब हर दूरदर्शी का दृष्टिकोण बदलना चाहिए। उसे बड़ा आदमी बनने की महत्त्वाकांक्षाएँ छोड़नी चाहिए और महान बनने की राह पकड़नी चाहिए। आज समझदारी का तकाजा इसी परिवर्तन की अपेक्षा करता है। महानता का मार्ग घाटे का नहीं, वरन दुहरे लाभ का है। उसमें आत्मसंतोष के साथ लोक-मंगल की वे संभावनाएँ भी जुड़ी हुई हैं, जिनके कारण इतिहास बदलता है और व्यक्ति को ‘हीरो’ बनने का अवसर मिलता है। आमतौर से इसे घाटे का रास्ता समझा जाता है। यह भ्रांति है। महानता के पीछे-पीछे बड़प्पन भी छाया की तरह जुड़ा रहता है। गाँधी, बुद्ध, नेहरू, पटेल, तिलक, मालवीय, राजेंद्र आदि ने विशेष रूप से महानता के पथ पर ही चरण बढ़ाए थे, पर उन्हें बड़प्पन की उपलब्धियाँ भी कहाँ कम मिलीं। बड़े आदमी एक कोठी-बँगला भर बना पाते हैं, पर महामानव जनता के हृदय में चिरकाल तक अपना भाव भरा घर बनाए रहते हैं।
गुरुदेव अपने प्रियजनों के लिए महानता की उपलब्धियाँ प्रस्तुत करने के लिए आकुल और आतुर रहे हैं। जौहरी का धंधा उन्होंने किया है और उसी को अपने अनुयाइयों को सिखाना चाहते हैं। यह दुर्भाग्य ही है कि लोग तुच्छ भौतिक लाभों को लेकर उससे प्राप्त होनेवाले बड़प्पन की कीचड़ से बाहर निकलने को तैयार नहीं होते। छोटे लोगों की छोटी कामनाओं में जो छोटापन भरा रहता है, उसे भी वे जुटाते रहते हैं, पर इससे उन्हें न संतोष होता है और न उत्साह मिलता है। सारी दुनिया भी यदि बड़े आदमियों से भर जाए तो उनसे न उन व्यक्तियों का कुछ लाभ होने वाला है और न लोकहित सधने वाला है। अधिक खा-पहन लें और सुख-सुविधाओं की परिस्थिति प्राप्त कर लें तो इतने भर से किसी का क्या बना? शरीर से संबंधित भौतिक सुख क्षणिक गुदगुदी पैदा करते हैं और अपने साथ उतनी उलझनें लाते हैं, जिन्हें समेटना-सुलझाना उस क्षणिक गुदगुदी की तुलना में कहीं अधिक भारी पड़ता है। दूरदर्शिता केवल महानता का वरण करने में है। यह शिक्षा और दिशा गुरुदेव को उनके मार्गदर्शक से मिली और वे उस मार्ग पर चलते हुए उस स्थिति में पहुँचे, जहाँ उनके चुनाव को अबुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। इस मार्ग पर न चलकर दूसरों की तरह बड़प्पन के ‘थूक-बिलोना’ में लगे रहते तो कितना पाते और अब शौर्य, साहस, विवेक और आदर्श की राह अपनाकर वे कहाँ जा पहुँचे। इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि बड़प्पन का नहीं, महानता का चयन दूरदर्शितापूर्ण है; विशेषतया इन परिस्थितियों में जबकि बड़प्पन उगाने-बोने का मौसम बिलकुल चला गया। बदलती हुई परिस्थिति में कोई घृणा, निंदा और ईर्ष्या-द्वेष की आग में जलने का जोखिम उठाकर ही बड़प्पन की राह पर चलने का दुस्साहस कर सकता है।
गत फरवरी में कुछ समय के लिए मेरी बीमारी के सिलसिले में वे आए और समय-समय पर उनके जो विचार सुनने-समझने को मिले, उनका उल्लेख मई अंक में कर दिया गया है। उस कथनोपकथन में उनकी एक ही लालसा उभरी पड़ रही है कि उनके प्रियजन महानता का वरण करें। उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलें और उस लक्ष्य तक पहुँचें, जहाँ मानव जीवन सार्थक एवं कृतकृत्य होता है। वार्ता के बीच-बीच में निराशा, क्षोभ, दुःख के भाव भी उनके चेहरे पर झलकते दिखाई पड़े। इसके पीछे एक ही व्यथा थी कि हर आधार पर समझाने के साथ अपना निज का उदाहरण प्रस्तुत करने पर भी उनके प्रियजन उस मार्ग पर चलने के लिए क्यों तैयार नहीं होते? अपनी पात्रता में वृद्धि क्यों नहीं करते? उनकी सहायता के लिए लालाइत देवशक्तियाँ जो उनका दरवाजा कब से खटखटा रही हैं, उनके लिए रास्ता क्यों नहीं खोलते?
वे चाहते थे कि उनके प्रियजन महानता का मार्ग अपनाएँ। उसके लिए पात्रता का चयन करें और ऐसा चिंतन अपनाएँ, जिसे धारणा, ध्यान, प्रत्याहार और समाधि की संज्ञा दी जा सके। यह चिंतन वही हो सकता है , जो व्यक्ति निर्माण-प्रक्रिया के अंतर्गत गुरुदेव आए दिन समझाते रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके हर साथी को इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का पग-पग पर भरपूर आनंद मिले। इसके लिए कोई मंत्रानुष्ठान पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए लोक-मंगल की वह साधना अपने कर्तृत्व में सम्मिलित करनी पड़ती है, जिसे उन्होंने शतसूत्री युगनिर्माण योजना के नाम पर अनेकों बार अनेकों ढंग से कहा है। उस पुराने कथनोपकथन को साररूप में दुहरा देने और उसे चिरंतन अथवा नवीनतम संदेश के रूप में परिजनों तक पहुँचा देने के लिए उन्होंने आदेश दिया था, सो उसी का पालन करते हुए मई अंक की लेखमाला उस संदर्भ में लिख दी गई।
पर मेरा लिख देना और पाठकों का पढ़ लेना ही पर्याप्त न होगा, आवश्यकता उसे समझने, हृदयंगम करने और कार्यान्वित करने की है। उन संदेश-निर्देशों को यदि कार्यरूप में परिणत किया जा सके तो वह क्रियाकलाप एक उच्चतम युग-साधना की आवश्यकता पूरी करेगा। देशकाल और पात्र के अनुरूप सदा ही साधना-विधानों में हेर-फेर होता रहा है और उसका संदेश लेकर तत्कालीन अग्रदूत इस पृथ्वी पर आते रहे। आज की स्थिति में व्यक्तिगत महानता के अभिवर्द्धन और लोक-मंगल के अनुष्ठान की दृष्टि से वही प्रक्रिया सर्वोत्तम रहेगी, जिसे मई के अंक में संक्षिप्त रूप से बताया गया है। आशा है, उसे पढ़-समझ लिया गया होगा।
उस परामर्श, चिंतन एवं निर्देश के बारे में हर परिजन की प्रतिक्रिया जानने की आवश्यकता अनुभव की गई थी, सो गत अंक में अनुरोध किया गया था कि प्रस्तुत विचारधारा से कौन-कितना सहमत और किस अंश से असहमत है? उसमें सुधार के लिए किसका क्या परामर्श है? कौन उस परामर्श को कार्यान्वित करने के लिए क्या सोच रहा है, क्या कर रहा है और क्या करने जा रहा है? यह जानने की उत्सुकता हम लोगों को होनी नितांत स्वाभाविक है। स्वजनों की गतिविधियाँ अपनी निज की प्रतीत होती हैं और उनकी सहज ही गहरी रुचि जुड़ी रहती है। किसका भविष्य क्या बन सकता है, इसका अनुमान किसी के कर्तृत्व और चिंतन को देखकर ही किया जा सकता है। इसी को सच्चा हस्तरेखा विज्ञान और सच्ची जन्मकुंडली निरीक्षण कह सकते हैं। प्रतिक्रिया पूछने का यही प्रयोजन था। अधिकांश परिजनों की प्रतिक्रिया पत्ररूप में प्राप्त हो गई है। जिनकी अभी नहीं आई है, उन सबकी भी गायत्री जयंती से पूर्व आ जाएगी, ऐसा विश्वास है। पूर्वसूचना के अनुसार वे सभी पत्र गुरुदेव के पास भेज दिए जाएँगे या निकट भविष्य में इधर आने वाले हुए तो यहीं देख जाएँगे। यह सर्वविदित है कि गुरुदेव की भावी साधना-तपश्चर्या का आधार युग-परिवर्तन की संभावनाओं को प्रबल करने के लिए सूक्ष्मजगत में असाधारण हलचल उत्पन्न करना है। नवयुग का आगमन एक सुनिश्चित तथ्य है। इस मेहमान की आगमन-व्यवस्था करने के लिए वे स्वागत अधिकारी की तरह अपनी भूमिका निभा रहे हैं। उनका इन दिनों महत्त्वपूर्ण उपार्जन चल रहा है। जमा करना तो उनकी प्रवृत्ति में ही नहीं। आने से पहले बाँटने की धुन ही उन पर सदा सवार रही है। इस एक वर्ष में जो कमाया गया है। उसे किसे, कितना, किस प्रकार बाँट दें, इसी उधेड़बुन में वे लगे हैं। अधिक कमाई की बात भी चल रही है, पर उपार्जन से अधिक ध्यान वे सदा वितरण को देते रहे। अतः अब भी उसी स्तर पर सोच रहे हैं। फरवरी में जितने दिनों वे हरिद्वार रहे, इसी की योजना बनाते रहे। यह प्रसंग उन्होंने कितनी ही बार दुहराया कि अब बड़प्पन का मौसम चला गया। जो ऋतु के प्रतिकूल प्रयास करेगा, वह तो असफल ही रहेगा और जितना कमाएगा, उससे ज्यादा विपत्तिमोल लेगा। वह संपदा रह भी न सकेगी। अपनी कुपात्र संतानें, समाज के विद्रोहीतत्त्व तथा सरकारी कानून उसे संग्रहीत न रहने देंगे। उपार्जन में इन दिनों की असाधारण प्रतिद्वंद्विता, अत्यधिक लोभ की पूर्ति के लिए अपनाई गई अवांछनीयता को तप-साधना जैसा कष्ट उठाकर सहन भी किया जाए तो उसके बेतरह नष्ट होने का दुःख और भी विकट होगा। अगले दिनों हर किसी को निर्वाह भर मिलेगा और शक्ति भर अनिवार्य रूप से काम करना पड़ेगा।
इस अवश्यंभावी भवितव्यता की आगाही यदि लोगों को मिल जाए तो संभव है कि जो लिप्सा बेतरह व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में लगी हुई है, वह कुछ शिथिल हो। उससे बचे हुए समय, मनोयोग एवं धन की मात्रा संभव है कि लोक-मंगल की आज की आपत्तिकालीन आवश्यकता की पूर्ति में लग सके। ऐसा मानसिक परिवर्तन आने पर ही महानता के पथ पर चलने के लिए किसी को साहस जुटा सकना संभव होगा। आज की लिप्सा और ललक शिथिल पड़े तो कुछ नवनिर्माण के करते— देते— बचे। इस तथ्य को वे बहुत बार बहुत गंभीरता से कहते और बताते रहे कि, "जिन पर अपना थोड़ा-सा भी प्रभाव हो या जिनमें महानता की दिशा में चलने की तनिक भी वास्तविक आकांक्षा हो, उन्हें सबसे पहला मंत्र यही दिया जाना चाहिए कि बड़प्पन का मौसम चला गया। अब उस दिशा में पैर पीटने से लाभ कम और हानि अधिक है। जीवन कृतकृत्य बनाने और ईश्वरीय प्रवाह में बहते हुए रीछ-वानरों की भूमिका प्रस्तुत करने का ठीक यही अवसर है।" हर परिजन में महानता प्राप्त करने की व्याकुल तड़पन उठनी चाहिए। इस प्रथम चरण के बाद ही आगे की कुछ बात बनेगी। उन्होंने जो कहा था— उसी को इन पंक्तियों में फिर अधिक जोर देकर कह दिया गया है। जिन्हें यह तथ्य उचित लगा हो, वे इतना साहस और करें कि इस दृष्टिकोण को व्यावहारिक गतिविधियों में परिणत करने के लिए कदम बढ़ाएँ। केवल पठन-पाठन और सोच-विचार करते रहने से बहुमूल्य समय ऐसे ही बीतता चला जाएगा, जैसे कि अब तक का जीवन बालक्रीड़ाओं में बीत गया।
गुरुदेव ने कहा था कि, "आज की परिस्थितियों में सर्वोत्तम तप-साधना वही हो सकती है, जो स्वयं उन्हें करनी पड़ी। उनकी साधना का बाह्यस्वरूप भर देखना पर्याप्त न होगा। चौबीस लाख के चौबीस पुरश्चरणों की जप संख्या को नहीं, महत्त्वपूर्ण उस तथ्य को मानना चाहिए जिसके अनुसार हर मंत्रजप के साथ-साथ ऋतंभरा प्रज्ञा का प्रकाश अपने रोम-रोम में भरने और उसी प्रकाश का अनुगमन करते हुए अपनी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को एक विशेष दिशा में लगाए रहने का साहस कर दिखाया। उन दिनों की उनकी एकांत साधना को जनकोलाहलरहित सूनेपन की विशेषता नहीं माननी चाहिए, वरन आकर्षणों-साधनों से सर्वथा मुक्त एकाकी ब्रह्मवर्चस के महासमुद्र में विचरण करने वाले आत्मबोध के अभ्यासरूप में ही उसे देखना चाहिए। आत्मचेतना को मनुष्यों तक सीमित न रखकर प्रत्येक जड़-चेतन में अपनी आत्मा का प्रकाश जगमगाते हुए देखने की दिव्य अनुभूति का इसे एक प्रयोग माना जाना चाहिए।"
उनके समस्त जीवन की साधना-तपश्चर्या का निष्कर्ष दो शब्दों में निकाला जा सकता है— (1) आत्मपरिष्कार और (2) लोक-मंगल का निरंतर प्रयास। यह साधना-पद्धति आज की युग-साधना है, जो उसे कर सके, समझना चाहिए कि परिपूर्ण साधना और समग्र तपश्चर्या का सही रास्ता उसे मिल गया। गुरुदेव का साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव देखकर वापिस लौट जाती हैं।
गुरुदेव की पिछली तप-संपदा भी कम नहीं थी। कम होती तो वे लाखों व्यक्तियों को नवनिर्माण के रूखे प्रयोजन में लगाने का उत्साहपूर्ण वातावरण कैसे उत्पन्न कर सके होते? कैसे विविध क्षेत्रों में आश्चर्यजनक सफलताएँ उपस्थित हुई होतीं? कैसे परिजनों की व्यक्तिगत कठिनाइयों के अद्भुत समाधान वे दे सके होते? किस आधार पर उनका व्यक्तित्व जादू जैसे प्रभाव से ओत-प्रोत रहा होता? यह पिछले दिनों की बात है। इन दिनों तो उनकी सारी एकाग्रता आतिशी शीशे में सूर्य की किरणें इकट्ठी होने की तरह एक बिंदु पर केंद्रीभूत हो गई हैं। स्वभावतः उनकी पूँजी इस अवधि में बढ़ी ही है। इस अतिरिक्त लाभ को वे अतिरिक्त बोनस के रूप में अपने सहचरों-अनुचरों को बाँटने के लिए आतुर थे।
‘प्रत्यावर्तन’ अनुदान की चर्चा पिछले अंक में की गई है। वे जब हरिद्वार आया करेंगे तो इस उपक्रम से पात्रतासंपन्न परिजनों को लाभान्वित किया करेंगे। यह कोई साधना-अनुष्ठान नहीं है। केवल उन दिनों ग्रहण करने के अनुकूल मनःस्थिति बनाए रखना भर पर्याप्त होगा। अपने को हर दृष्टि से विचारों से रिक्त रखने, कुछ भी न सोचने और चाहने की मनःस्थिति बनाए रखकर उसमें शक्तिपात के लिए द्वार खुला रहने भर के लिए आगंतुकों को कहा जाएगा। शरीर और मन को अनिवार्य नित्य क्रिया करने के अतिरिक्त पूर्ण विश्राम करने के लिए कहा जाएगा। इस मनःस्थिति में आदान-प्रदान सफल और संभव हो जाता है। यही वे आगंतुकों से कराएँगे और बीजारोपण कर देंगे। इस बीज को वृक्ष बनाने के लिए बहुत प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। यही परंपरा उन्हें स्वयं मिली भी है। 15 वर्ष की आयु में उन्हें अपने मार्गदर्शक का सान्निध्य चार घंटे का मिला। 24 वर्ष की तपश्चर्या के उपरांत सन् 59 में एक वर्ष के अज्ञातवास के लिए गए। उस समय भी चार दिन का अवसर उन्हें अपने मार्गदर्शक के समीप रहने का मिला। इस बार भी उन्हें 4 दिन की ही समीपता मिली है और शेष समय अन्यत्र बिताने का निर्देशपालन करना पड़ा है।
बीज एक दिन में ही बो दिया जाता है, पर उसे सींचने-सँभालने में ही समय लगता है। गर्भधारण की क्रिया कुछ मिनटों में ही हो जाती है। नौ मास तक गर्भवती उस भ्रूण को विकसित भर करती है। गुरुदेव अपने मार्गदर्शक के अनुदान और अपने कर्त्तव्य को इसी भोंड़ी मिसाल के साथ अक्सर समझाया करते हैं। उन्हें स्वयं भी आगे इसी परंपरा को अग्रसर करना पड़ेगा। परिजनों को वे लंबी कष्ट-तपश्चर्या में नहीं उलझाना चाहते हैं। उस प्रयोजन की पूर्ति वे अपने अनुदान से स्वयं ही पूरी कर देंगे, जैसी कि उनकी खुद की पूर्ति की गई। उनकी निज की साधना तो सिंचन-पोषण भर है। वस्तुतः जितना उनने पाया है, उसका 90 प्रतिशत भाग प्रदत्त अनुदान ही कहना चाहिए। यदि ऐसा न होता तो लोक-मंगल की दिशा में इतना जो कार्य बन पड़ा, वह कैसे बन पड़ा होता। सारा समय जप-तप में ही लग जाता तो फिर ईश्वरीय निर्देश और मार्गदर्शक के आदेश को पालन करते हुए नवयुग की संभावनाओं को साकार करने में इतनी तत्परता के साथ लगा रहना कैसे संभव होता?
नचिकेता थोड़े ही समय में आचार्य यम से पंचाग्नि विद्या सीखकर आ गए थे। विवेकानंद और छत्रपति शिवाजी को ऐसे ही कुछ ही समय में बहुत कुछ मिल गया था। स्वयं रामकृष्ण परमहंस ने इसी प्रकार का अनुदान स्वल्पकाल में उपलब्ध किया था। यही प्रत्यावर्तनक्रम है। जिसे यदा-कदा— जिस-तिस के लिए गुरुदेव प्रयुक्त किया करेंगे। अभी तो इस प्रकार के इच्छुकों के नाम भर नोट कर लिए हैं। ताकि जब, जैसी संभावना हो, वैसा उन्हें सूचित किया जा सके। इसके लिए अभी तो हरिद्वार में निवास-आवास आदि का प्रबंध करना है, क्योंकि उस प्रत्यावर्तन अवधि में साधकों को एकाकी रहना पड़ेगा। भोजन जो दिया जाएगा, वही खाना पड़ेगा। जिस तरह रखा जाएगा, उसी तरह रहना पड़ेगा। यह झंझट भरा क्रियाकलाप अनेक व्यवस्थाएँ बनाने के लिए कहता है, सो अगले कुछ दिनों में बनेंगी। इसके उपरांत ही गुरुदेव के हरिद्वार आगमन के अवसर पर वह आदान-प्रदान अर्थात प्रत्यावर्तन संभव हुआ करेगा। एक समय में कुछ ही व्यक्ति बुलाए जाया करेंगे, ताकि सीमित शक्ति का सीमित लोगों में समुचित वितरण संभव हो सके। हरिद्वार में तपोभूमि जैसे शिविर नहीं लगेंगे। उँगलियों पर गिनने जितनी संख्या में ही एक समय में कुछ व्यक्ति बुलाए जाया करेंगे और उन्हें 4-5 दिन भर रोककर वापिस कर दिया जाया करेगा। इस अनुदान से कौन-क्या प्राप्त कर सकेगा, कितना ऊँचा उठ सकेगा और कितना आगे बढ़ सकेगा? इसकी समय से पूर्व चर्चा अनुपयुक्त ही होगी। संक्षेप में एक ही शब्द पर्याप्त होगा कि गुरुदेव को अविस्मरणीय अनुदान अपने मार्गदर्शक से मिलेंगे, वे भी जिसे-जो कुछ यह विशेष उपहार देंगे, वह चिरस्मरणीय तो रहेगा ही।
इसके लिए भी भेड़ियाधसान का क्रम नहीं है। जो चाहे वही घर दौड़े। ऐसा संभव न होगा। इच्छामात्र से क्या कुछ होता है। चाहने भर से कलक्टर कौन बन सका है। इसके लिए पात्रता की दीर्घकालीन साधना अनिवार्य रहती है वह पुष्पहार, दंडवत् प्रणाम या फल-उपहार जितनी सस्ती नहीं है और न किसी मंत्र की कुछ मालाएँ घुमा-फिरा देने जितनी सरल हैं। मँहगी उपलब्धियाँ सदा मँहगे मूल्य पर मिलती हैं। गुरुदेव ने स्वयं समुचित मूल्य चुकाकर ही अपने मार्गदर्शक का— अपने परमेश्वर का— अनुग्रह खरीदा है। दूसरों के लिए भी यही हाट खुली है। खाली हाथ ऐसे ही बहुत कुछ पा लेने की लालसा लेकर हाट में जाने वालों को खाली हाथ ही लौटना पड़ता है। उनके पल्ले निराशा ही बँधती है।
अपने निज के प्रबल पुरुषार्थ से लेकर किसी दिव्य सत्ता के अनुग्रह-अनुदान तक में एक तथ्य अनिवार्य रूप से प्रस्तुत रहता है कि व्यक्ति अपनी पात्रता और प्रामाणिकता सिद्ध करे। यह कल्पना की उड़ानें उड़ने से नहीं, व्यावहारिक जीवन को साधनामय बनाने से ही वह उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसी एक अड़चन ने इस प्रक्रिया को आबद्ध कर दिया है। इस आधार पर आत्मवादी परिजन भी उसी प्रकार लाभान्वित हो सकते थे, जिस प्रकार गुरुदेव स्वयं हुए। इस अड़चन को दूर करना ही होगा। इस श्रमसाध्य राजमार्ग को छोड़कर कोई सीधी-सरल पगडंडी नहीं है। परिजनों को युग-साधना को अपनाना ही चाहिए। उस दिशा में कदम बढ़ाना ही चाहिए। कहना न होगा कि व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की त्रिविधि साधना-पद्धति को नवनिर्माण की युग-साधना त्रिवेणी कहना चाहिए। निश्चित रूप से यह एक योग-साधना और तपश्चर्या है। एकांत में प्राणायाम करना ही एकमात्र योगाभ्यास नहीं है। गीता में कहे गए कर्मयोग का यह श्रेष्ठतम और सामयिक स्वरूप है। इस युग-साधना में जहाँ व्यक्ति के निज का अंतःकरण योगियों जैसा निर्मल होता है, वहाँ उनकी तप-साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार करने का लाभ मिलता है। इस प्रकार यह दुहरा लाभ प्रस्तुत करने वाली आध्यात्मिक-साधना का ही प्रयोजन पूरा करती है।
प्रत्यावर्तन वर्ग के अग्रगामी आत्मीयजनों को युग-साधना में नियमित साधनारत होना ही चाहिए। अन्य परिजनों को भी आत्मविकास की दृष्टि से या युगधर्म की पूर्ति की दृष्टि से दिव्य तत्त्वों का अनुग्रह उनपर बरसने में जो अड़चन उपस्थित है, उसे दूर करने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि वे युग-साधना के साधक बनें। उसे पढ़ते-सुनते ही न रहें। चर्चा और कल्पना का ही विषय न बनाए रहें, वरन उसे व्यावहारिक जीवन में उतारने और कार्यरूप में परिणत करने का भी प्रयत्न करें। यही है— प्रथम चरण वास्तविक प्रगति का, विभूतिवान बनने का, आत्मसंपदाओं से परिपूर्ण होने का और महानता के वरण करने का। इसके लिए बड़प्पन की आकुल अभिलाषाओं से थोड़ा मुँह मोड़ना ही चाहिए और उस विमुखता को नवनिर्माण के प्रति प्रतीति में नियोजित करना ही चाहिए। इसी के लिए गुरुदेव गत फरवरी मास में यह चिंता व्यक्त करते रहे कि यदि परिजन प्रथम चरण की उपेक्षा-अवज्ञा किए बैठे रहे तो वे कुछ भी महत्त्वपूर्ण पा नहीं सकेंगे। उन्हें कुछ दिया जा सकना संभव न हो सकेगा। बड़प्पन की निरर्थकता और महानता की गरिमा को समझाने के लिए व्याकुल थे। कहते थे— "किसी प्रकार मैं अपना कलेजा, हृदय और मस्तिष्क चीरकर उखाड़ सकूँ और उसे परिजनों के भीतर ‘फिट’ कर सकूँ तो उन्हें बुद्धिमत्ता का लाभदायक मार्ग एक ही दिखाई पड़ेगा कि निर्वाह भर के भौतिक साधनों से संतुष्ट रहकर अपने भीतर जो कुछ असाधारण है, उस समस्त को समान रूप से महानता प्राप्त करने के लिए नियोजित कर दिया जाए।" उनका कलेजा, हृदय और मस्तिष्क तो दूसरों में ‘फिट’ किया जा सकना कठिन है, पर कम-से-कम इतना तो आवश्यक है कि उस प्रक्रिया को उपेक्षा के गर्त्त में पड़ा न रहने दिया जाए। किसी-न -किसी रूप में अनेक आवश्यक कार्यों की तरह उसे भी आवश्यक कार्यों में सम्मिलित रखा जाए और जितना कुछ न्यूनाधिक बन पड़े, उतना उस प्रयास को निरंतर करते रहा जाए। ऐसा करने से आत्मनिर्माण और लोक-मंगल की, स्वार्थ और परमार्थ की पूर्ति जहाँ होगी, वहाँ वह भी अड़चन दूर होगी; जिसके कारण गुरुदेव अपने प्रियजनों को कुछ न दे सकने की व्यथा से उदास, चिंचित और दुखी रहते हैं। पात्रता के अभाव में किसी को भी कुछ दे सकना उनके हाथ की बात भी तो नहीं है। आखिर उनके हाथ भी तो किसी उच्चसत्ता ने बाँध ही रखे हैं। यह अड़चन दूर हो सके तो परिजन जितने लाभान्वित होंगे, गुरुदेव उससे हजारगुने संतुष्ट और प्रसन्न होंगे। मार्ग की बहुत बड़ी बाधा अथवा कठिनाई दूर हुई, अनुभव करेंगे।
युग-साधना—युगनिर्माण योजना की, आत्मनिर्माण और समाज निर्माण की विधि-व्यवस्था अपनाकर ही की जा सकती है। युगनिर्माण योजना की चर्चा समय-समय पर पत्रिकाओं में लेखों द्वारा और उनके प्रवचनों द्वारा होती रही है। उनकी रूपरेखा छपी भी है, पर उनमें यह कमी है कि किस कार्य को किस प्रकार किया जाए, इसका स्वरूप निर्धारण और व्यावहारिक मार्गदर्शन नहीं हुआ है। अब वह कमी दूर कर दी गई है। युगनिर्माण योजना की सांगोपांग क्रमबद्ध रूपरेखा और उसे कार्यान्वित करने की शैली को इन्हीं दिनों पुस्तकाकार छापा गया है। तीन-तीन रुपये मूल्य के तीन खंडों में ‘हमारी युगनिर्माण योजना’ नाम से यह ग्रंथ छप रहा है। 30 जून तक छपकर तैयार हो जायगा। नौ रुपया मूल्य और पोस्टेज देकर वह गायत्री तपोभूमि, मथुरा से मँगाया जा सकता है।
अनुरोध है कि अखंड ज्योति का प्रत्येक सदस्य इस ग्रंथ को मँगा ले और ध्यानपूर्वक कई बार उसे पढ़े। पढ़कर यह देखे कि उसमें से कितना अंश आज की स्थिति में वह कार्यान्वित कर सकता है। जितना संभव हो, उसका शुभारंभ अविलंब किया जाना चाहिए। हममें से एक भी ऐसा न रहे, जिसे मात्र पत्रिका का पाठक भर कहकर चुप रहा जा सके। विचारों की सार्थकता तब है, जब वे कार्यरूप में परिणत होने की दिशा में अग्रसर हो सकें। अखंड ज्योति के लेखों का परिजनों की मनोभूमि को अब इस कसौटी पर कसे जाने का अवसर आ गया। हमारे यह दोनों ही पक्ष तभी खरे कहे जा सकते हैं, जब उनमें सक्रियता का दर्शन हो सके।
नवीन प्रकाशित तीन खंडों वाला ग्रंथ ‘हमारी युगनिर्माण योजना’ को किसने पढ़ा, किसने समझा और किसने उसे कार्यान्वित किया? इसके संबंध में एक प्रश्नपत्र अक्टूबर की अखंड ज्योति में छापा जाएगा। उसके उत्तर माँगे जाएँगे। जिससे पता चल सके कि कौन कितनी गहराई में उतर सका। आगामी विजयादशमी का पर्व आश्विन सुदी 10 तदनुसार 17 अक्टूबर का है। उस अवसर पर उस ग्रंथ के संदर्भ में कितनी ही पूछताछ की जाएगी। उन उत्तरों के आधारों पर वर्तमान परिजनों की प्रामाणिकता एवं पात्रता सुनिश्चित की जायगी। आरंभिक परिजन तो कोई भी हो सकता है, पर अंतरंग स्तर का उन्हें ही माना जाएगा जो युगनिर्माण योजना के आदेश, उद्देश्य, स्वरूप एवं क्रियाकलाप को पूरी तरह समझ सके होंगे। समझ ही नहीं, उसे कार्यान्वित करने के लिए भी कुछ कदम बढ़ा चुके होंगे। इस पत्र में अंतरंग सदस्यों का एक वर्ग दूध औटाने पर ऊपर तैरने वाली मलाई की तरह ऊपर आ जाएगा और उनको लेकर गुरुदेव अपनी प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया तथा उसकी सूक्ष्म उपलब्धियों को कार्यान्वित कर सकेंगे।
प्रायः सभी युगनिर्माण शाखाएँ पिछले दिनों युगनिर्माण विद्यालय चलाती आ रही हैं और उनका शिक्षा-परीक्षाक्रम अपने ढर्रे पर चलता आ रहा है। इस बार उसमें एक सामयिक अतिरिक्त परिवर्तन यह कर लिया जाए कि 1 जुलाई से 30 सितम्बर तक का 3 महीने का विशेष शिक्षण सत्र चलाया जाय। इसमें नवीन प्रकाशित ‘हमारी युगनिर्माण योजना’ के तीन खंड पढ़ाए जाएँ। हर दिन क्लास चलाने में जहाँ कठिनाई हो, वहाँ ऐसा भी किया जा सकता है कि सप्ताह में एक दिन रविवार को अगले सप्ताह के पाठ्य पृष्ठ निर्धारित कर दिए जाया करें। अगले रविवार को उनके संबंध में प्रश्नोत्तर कर लिए जाया करें। जो बात समझ में न आई हो, उसे समझा दिया जाया करे और फिर पीछे की तरह अपने घर पर ही एक सप्ताह तक अगला पाठ्यक्रम पढ़ते, समझते और उनमें से आवश्यक नोटसंग्रह करते रहने के लिए कह दिया जाया करे। इस प्रकार हर सप्ताह का क्रम चलता रहे। 3 महीने के 12 सप्ताह में उपरोक्त ग्रंथ के तीन खंड पूरे कर लिए जाएँ। 1 अक्टूबर की अखंड ज्योति में छपने वाले प्रश्नपत्रों के उत्तर वे सब लोग लिखें, जिन्होंने पाठ्यक्रम पूरा किया हो। इस प्रकार इस बार की विशेष शिक्षा और विशेष परीक्षा नवीन प्रकाशित ग्रंथ के आधार पर संपन्न हो सकेगी और उत्तीर्ण शिक्षार्थियों को युगनिर्माण योजना परिवार के अंतरंग सदस्यों में सम्मिलित करके उसका प्रमाणपत्र भी दिया जा सकेगा। इस प्रकार प्रशिक्षित और सक्रिय परिजनों को विशेष रूप से आगे बढ़ाया जा सकना और उन्हें महानता के लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकना संभव होगा। गुरुदेव इस संदर्भ में विशेष सहायता करने के लिए आतुर हैं। अब पात्रता विकसित करने के लिए एक ठोस कदम आगे बढ़ाना प्रिय परिजनों का काम है।
युगनिर्माण योजना के सक्रिय सदस्यों, कर्मठ कार्यकर्त्ताओं एवं कर्मयोगी वानप्रस्थों को कार्यक्षेत्र में उतरकर सफलता प्राप्त करने की व्यावहारिक शिक्षा देने का प्रबंध किया गया है। इसमें सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों पक्ष डायलॉग-रिहर्सल पद्धति से सिखाए जाएँगे। आवश्यक संगीतशिक्षा, वक्तृत्व कला, विविध कर्मकांडों का क्रियाकलाप, संगठन-सूत्र आयोजनों की व्यवस्था आदि की यह व्यावहारिक शिक्षाप्राप्त कार्यकर्त्ता योजनाओं की गतिविधियों का सर्वत्र सफल संचालन कर सकेंगे। यह प्रशिक्षण तीन-तीन महीने का होगा। पहला शिविर 1 जुलाई से 30 सितंबर तक है। भोजन व्यय स्वयं उठाना होगा। जिन्हें आना हो, पूर्वस्वीकृति प्राप्त कर लें।
युगनिर्माण आंदोलन की गतिविधियों की जानकारी—भावी योजनाएंँ, निर्देश एवं सूचनाएँ, शाखाओं के समाचार, अभियान की गतिविधियाँ, सफलताएँ आदि समस्त विवरण पाक्षिक ‘युगनिर्माण योजना’ में छपते हैं। आंदोलन में अभिरुचि रखने वालों को इसे पढ़ते रहना आवश्यक है,वार्षिक चंदा 10) मात्र है।
1 जुलाई से आरंभ होने वाले शिक्षण-शिविर में सम्मिलित होने तथा पाक्षिक पत्रिका के सदस्य बनने का अखंड ज्योति के पाठकों से विशेष अनुरोध है।
उपरोक्त दोनों प्रयोजनों के लिए ‘युगनिर्माण योजना’ गायत्री तपोभूमि, मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार करना चाहिए।
दिव्यसत्ता की झाँकी!
अंतस्तल में विश्वास जगाओ गहरा।
ईश्वर की सत्ता व्याप रही कण-कण में॥
वह ब्रह्म विश्व का सृष्टा और नियन्ता।
उसने ही खेल रचाया है यह अद्भुत॥
ब्रह्मांड बनाया इतना लंबा-चौड़ा।
है बुद्धि कल्पना करके ही अतिविस्मित॥
वह कारण है प्रत्येक संचेत-क्रिया का।
है छाया उसकी ही जड़ में—चेतन में॥ ईश्वर की.
बन विष्णु तुम्हारा पालन वह करता है।
उसकी इस पोषक सत्ता को पहचानो॥
दीं, खनिज, वनस्पति, जल-प्रपात अतिसुंदर।
गुणधर्म प्रकृति के शाश्वत हैं यह जानो॥
यह मिलन प्राण-रयि का बन ओजस्-तेजस्।
भरता रहता है चेतनता—तन-मन में॥ ईश्वर की.
वह रुद्ररूप भी कभी-कभी रखता है।
जब हम सत्पथ से विचलित हो जाते हैं॥
तजते हैं- सात्विकता-समरसता नियमन।
तब दंड कड़ा भी हम उससे पाते हैं॥
वह शक्ति, मेटकर तब विकार इस जग के।
तत्पर होती सत्-शिव-सौंदर्य सृजन में॥ ईश्वर की.
वह परमात्मा तो प्रबल न्यायकारी है।
जो जैसा करता वैसा ही फल पाता॥
इसलिए कर्म के माध्यम से होता है।
मानव सदैव ही अपना भाग्यविधाता ॥
दुष्कर्म करो तो— उस प्रभु का भय मानो।
चातुर्य तुम्हारा— है सद्पथ चयन में॥ ईश्वर की.
ईश्वर अदृश्य है— किंतु शक्तियाँ उसकी।
प्रतिक्षण रहती हैं कार्यनिरत इस जग में॥
समझो! पहचानो!! इस व्यापक सत्ता को।
जो प्रतिक्षण साथ तुम्हारे जीवन मग में॥
आरती प्रेम की— और भक्ति का चंदन।
भावना मूर्ति गढ़ लो निज आत्मभवन में॥
ईश्वर की सत्ता व्याप रही कण-कण में॥
(माया वर्मा)
*समाप्त*