ललचा मत-आगे बढ़

राहगीर यहाँ ललचाई आँखों से मत देख। यह सराय है। तेरा घर तो बहुत दूर है। लम्बी मंजिल चल कर ही वहाँ तक पहुँचेगा।

यह सराय एक रात विश्राम के लिए है। सो यहाँ भले मानस की तरह प्रवेश कर-शालीनता के साथ रह और सज्जनता के साथ अपना रास्ता पकड़।

भूल गया-भुलक्कड़। ऐसी कितनी सरायों में ठहर चुका और आगे लम्बी मंजिल पार करने में अभी और कितनी ऐसी ही सरायों में ठहरना पड़ेगा। ललचाने की आदत छोड़। मुसाफिर यदि ठहरने की सुविधा को ही पर्याप्त न मान कर सराय पर अधिकार जताने लगे तो उस मूर्खता की भर्त्सना ही होगी। कुछ हाथ थोड़े ही लगेगा।

सराय वाले को धन्यवाद दे कि जिसने एक रात ठहरने के लिए तेरे लिये व्यवस्था बनाई। सुविधापूर्वक रहा-चैन की नींद सोया, सुविधाओं को भोगा, सेवकों से सहायता प्राप्त की। इतना मिल गया, बहुत है। सन्तोष कर, प्रसन्न हो, कृतज्ञ बन और शान्ति के साथ अगले पड़ाव की तैयारी कर।

गड़बड़ मत फैला, पलंग मेरा, कमरा मेरा, रसोई घर मेरा, बर्तन मेरे, कर्मचारी मेरे, सराय मेरी, मालकी मेरी। मैं ही सबका मालिक, यह सारी मेरी सम्पत्ति। इस पागलपन को छोड़। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? रातभर ठहरने वाला मुसाफिर सराय पर अपनी मालिकी जताता है। समझाने पर मानता नहीं। मेरी-मेरी ही कहे चला जाता है। सराय तेरी कैसे हो सकती है। यह बनाने वाले की है। यहाँ के कर्मचारी तेरी सम्पत्ति कैसे हो सकते हैं। इनका अपना अस्तित्व है। इन्हें खिलाने सँभालने वाला दूसरा है। मूर्ख, बेकार की बकवास मत कर, सुनने वाले सुन लेंगे तो तेरी बुरी दुर्गति बनायेंगे।

बगीचा देख लिया सो ठीक, फूल, सूँघ लिये तो ठीक, पर यह तेरे नहीं है, तेरे लिए नहीं है। दूसरों की तरह तू भी देखले, सूँघले और इतनी देर तक मोद मनाने के सौभाग्य को सराहता हुआ आगे बढ़।

तेरा घर दूर है। उसकी मंजिल लम्बी है। अपनी मंजिल के मील गिन-चलने को कमर कस, रास्ते का जल-पान का प्रबन्ध कर और हल्का-फुल्का होकर चल। सराय की चीजें उठा कर चलेगा तो उसके बोझ से तेरी गरदन-टूट जायेगी, फिर कोई ले जाने भी क्यों देगा।

नेक मुसाफिर की तरह यहाँ रह-जब तक ठहरना है भलमनसाहत बरत-हँस और हँसा। प्यार दे और ले। छोड़ सके तो एक ऐसी याद छोड़ जा जो सराहना के साथ पीछे वालों के मन में उठती रहे। ले जा सके तो यहाँ वालों की श्रद्धा और सद्भावना लेता जा। लेने और छोड़ने को इतना ही काफी हैं। परदेशी मोह का जाल मत बुन। यहाँ न कोई तेरा है-न तू किसी का। रेन-बसेरे में कितने आते हैं-रात ठहरते हैं-दूसरे दिन चले जाते हैं। रातभर हँस बोल लिए-मिलजुल कर रह लिये, यही क्या कम है। मैं उसका वह मेरा-इस ममता में बँधेगा तो रोना और रुलाना ही पल्ले बँधेगा। मत रो, मत रुला, हँसते हुए जा-हँसाता हुआ जा-इसी में तेरी गरिमा है।

मोह नहीं-प्यार का। मोह में बंधन है-प्यार में मुक्ति। मोह अधिकार माँगता है-प्यार कर्तव्य तक संतुष्ट रहता है। असंतोष छोड़ सन्तोष कर।

मन चले, मचलना छोड़। जिस दुकान पर खिलौने देखे वहीं मचल गये। जिस दुकान पर मिठाई देखी अड़ गये, इस बचपन से क्या बनेगा। यह मेला है। यहाँ सब कुछ अनोखा ही अनोखा है। देख और मोद मनाता हुआ घर की राह ले। यह जलपरी का बगीचा है-एक से एक बढ़कर फूल खिले हैं। देखने और खुश होने के लिए हैं।

छूना और तोड़ना सख्त मना है। गलती करने वाले को सख्त सजा भुगतनी पड़ती है। मुसाफिर अपनी मंजिल को याद रख-सफर के उद्देश्य को मत भूल। सरायों में ठहरता हुआ आगे बढ़ता चल। लालच किया और अधिकार जमाया तो बुरी तरह मारा जायगा।


वसन्त प्रेरणा पर्व और उसके बाद

वसन्त पर्व जिस उत्साह से इस बार मनाया गया उसे सराहनीय और सन्तोषजनक ही कहा जा सकता है। आयोजन के साथ मिली प्रेरणा को शिथिल न हो जाने दिया जाय, वरन् उसे अधिक श्रद्धा और तत्परता के साथ विकसित किया जाय।

वसन्त अपना नया वर्ष है। पिछले कार्य का लेखा-जोखा लेने और आगामी कार्य पद्धति निर्धारित करने के रूप में ही इस पर्व का गुरुदेव ने अवलम्बन लिया था। और अब वही परम्परा हम लोगों की है।

हमें आगे के लिये अपने परिवार को अधिक विस्तृत, अधिक संगठित एवं अधिक प्रशंसित करने का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाना चाहिये। क्योंकि उस समर्थ संघ शक्ति के आधार पर ही नव-निर्माण के, मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लक्ष्य को पूरा कर सकना सम्भव होगा।

युग निर्माण परिवार के सक्रिय सदस्य वे हैं जो एक घंटा समय और दस पैसा ज्ञान यज्ञ के लिए नियमित रूप से देते रहने का व्रत लेते हैं, यह क्रम अनवरत रूप से चलता रहे, इसलिये इस प्रयोजन के लिए ज्ञान घटों की स्थापना उनके लिए अनिवार्य कर दी गई है। ऐसे सदस्य जहाँ दो चार होते हैं वहाँ भी शाखा तो बना दी जाती है पर उसे पौधा ही माना जाता है। कुछ कहने लायक काम होने की आशा तो उन्हीं से की जा सकती है, जहाँ कम से कम 10 सक्रिय सदस्य हों। 24 सदस्य होने पर समर्थ शाखा मानी जाती है। यह संगठन अगले वर्ष हमें पूरे उत्साह से आगे बढ़ाना है और अगला वसन्त आने तक परिवार का कम से कम दूना कर देने के प्रयास में उत्साहपूर्वक लग जाना चाहिए। अगले वर्ष की यह प्रमुख योजना है।

बिहार प्रान्त में एक किसान था-हजारी। उसने अपने खेतों में आम्र वृक्ष लगाये। दूसरों को प्रोत्साहन तथा सहयोग देकर गाँव-गाँव बाग लगवाये। उस क्षेत्र में दस वर्ष के भीतर एक हजार बाग लग गये। इन वृक्षों की लकड़ी, छाया, प्राणवायु, हरीतिमा, पल्लव, पुष्प एवं फूलों से असंख्य मनुष्यों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों ने भारी लाभ उठाया। हजारों किसानों की प्रेरणा से लगे हजार बागों की सर्वत्र सराहना हुई और उस इलाके को ‘हजारी बाग‘ नाम दिया गया। उस किसान का यह ऐसा स्मारक है जिस पर हजार ताज महल निछावर किये जा सकते हैं।

हम में से प्रत्येक को हजारी का अनुकरण करना चाहिए और युग-निर्माण परिवार के सक्रिय सदस्यों रूपी कल्पवृक्ष लगाने चाहिए। आम्र वृक्ष केवल भौतिक शरीरों को ही सुख पहुँचाते हैं पर युग-निर्माण विचारणा से प्रभावित परिजन तो असंख्य मनुष्यों का भावनात्मक कायाकल्प करके उन्हें नर-रत्न बनाते हैं। स्वयं अपने प्रकाश से दूर-दूर तक का क्षेत्र प्रकाशित करते हैं। स्वयं तरते हैं और दूसरों को तारते हैं। इन्हें कल्प-वृक्ष ही कहना तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।

हम टोलियाँ बनाकर निकलें। वसन्त पर्व पर जिनने भी उत्साह दिखाया हो उनसे मिले। नया जन-संपर्क बढ़ायें। मिशन का उद्देश्य और स्वरूप समझायें। जहाँ युग-निर्माण परिवार का संगठन नहीं है वहाँ बनायें। जहाँ कम सदस्य हैं वहाँ दस पूरे करें। जहाँ अधिक है वहाँ 24 सदस्यों की समर्थ शाखा बनायें। दस सदस्यों वाली शाखा उपवन (बगीची) चौबीस सदस्यों वाली शाखा उद्यान (बाग) मानी जायगी। ‘हजारी’ की तरह हम जुट पड़ें तो कुछ ही दिनों में कल्पवृक्ष के पौधे, उपवन और उद्यान लगाकर दिखाये जा सकते हैं। वसन्त पर्व के बाद अब इसी के लिए हमारी भावना, श्रद्धा एवं तत्परता नियोजित होनी चाहिए।


संकीर्णता के सीमा बन्धन से छुटकारा पायें

(पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य)

आत्मा का विकास परमात्मा के समान विस्तृत होने में है। जो सीमित है संकीर्ण है वह क्षुद्र है-जिसने अपनी परिधि बढ़ा ली है वही महान है। हम क्षुद्र न रहें-महान बनें। असन्तोष-सीमित अधिकार से दूर नहीं होता। थोड़ा मिल जाय तो अधिक पाने की इच्छा रहती है। सुरसा के मुख की तरह तृष्णा अधिक पाने के लिए मुँह फाड़ती चली जाती है। आग में घी डालने से वह बुझती कहाँ है अधिक ही बढ़ती है। तृप्ति तब मिलेगी जब इस संसार में जो कुछ है सब पा लिया जाय। यह हँसी नहीं-कल्पना नहीं। समग्र को पा सकना-स्वल्प पाने की अपेक्षा सरल है।

मान्यता को विस्तृत कीजिये यह सारा विश्व मेरा है। नीला विशाल आकाश मेरा। हीरे मोतियों की तरह झाड़ फानूसों की तरह जगमगाते हुए सितारे मेरे-सातों समुद्र मेरी सम्पदा, हिमालय मेरा-गंगा मेरी-पवन देवता मेरे-बादल मेरी सम्पत्ति। इस मान्यता में कोई बाधा नहीं किसी को रोक नहीं। समुद्र में तैरिये, गंगा में नहाइये-पर्वत पर चढ़िये, पवन का आनन्द लूटिये, प्रकृति की सुषमा देखकर उल्लसित हूजिये। कोई बन्धन नहीं-कोई प्रतिरोध नहीं। सभी मनुष्य मेरे-सभी प्राणी मेरे। ‘मेरे’ की परिधि इतनी विस्तृत करनी चाहिए समस्त चेतन जगत उसमें समा जाय। अपनी सीमित पीड़ा से कराहेंगे तो कष्ट होगा और दुःख। पर जब मानवता की व्यथा को अपनी व्यथा मान लेंगे और लोक पीड़ा की कसक अपने भीतर अनुभव करेंगे तो मनुष्य नहीं, ऋषि, देवता और भगवान जैसी अपनी अन्तःस्थिति हो जायगी। अपना कष्ट दूर करने का जैसा प्रयत्न किया जाता है वैसी ही तत्परता विश्व व्यथा के निवारण में जुट पड़ेगी। इस चेष्टा में लगे हुए व्यक्ति को ही तो महामानव और देवदूत कहते हैं। ईश्वर का अनुग्रह और सिद्धियों का अनुदान ऐसी ही उदात्त आत्माओं के चरणों में लोटता है।


क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं?

मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? इस छोटे से प्रश्न का सही समाधान न कर सकने के कारण ‘मैं’ को कितनी विषम विडम्बनाओं में उलझना पड़ता है और विभीषिकाओं में संत्रस्त होना पड़ता है, यदि यह समय रहते समझा जा सके तो हम वह न रहें, जो आज हैं। वह न सोचें जो आज सोचते हैं। वह न करें जो आज करते हैं।

हम कितने बुद्धिमान हैं कि धरती आकाश का चप्पा-चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया। इस बुद्धिमत्ता की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम और अपने आपके बारे में जितनी उपेक्षा बरती गई उसकी जितनी निन्दा की जाय वह भी कम ही है।

जिस काया को शरीर समझा जाता है क्या यही मैं हूँ? क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत, आतप आदि से पग-पग पर व्याकुल होने वाला अपनी सहायता के लिए बजाज दर्जी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही मैं हूँ? दूसरों की सहायता के बिना जिसके लिए जीवन धारण कर सकना कठिन हो-जिसकी सारी हँसी-खुशी और प्रगति दूसरों की कृपा पर निर्भर हो, क्या वही असहाय, असमर्थ, मैं हूँ? मेरी आत्म निर्भरता क्या कुछ भी नहीं है? यदि शरीर ही मैं हूँ तो निस्सन्देह अपने को सर्वथा पराश्रित और दीन, दुर्बल ही माना जाना चाहिए।

परसों पैदा हुआ, खेल-कूद, पढ़ने-लिखने में बचपन चला गया। कल जवानी आई थी। नशीले उन्माद की तरह आँखों में, दिमाग में छाई रही। चञ्चलता और अतृप्ति से बेचैन बनाये रही। आज ढलती उम्र आ गई। शरीर ढलने गलने लगा। इन्द्रियाँ जवाब देने लगी। सत्ता, बेटे, पोतों के हाथ चली गई। लगता है एक उपेक्षित और निरर्थक जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है। आँखों में मोतियाबिन्द, कमर-घुटनों में दर्द, खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियाँ, घायल गधे पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही हैं। अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के लिए भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है रोम-रोम काँपने लगता है? पर उस अवश्यंभावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। क्या यही मैं हूँ? क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिए ही ‘मैं’ जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है? मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?

आत्म चिन्तन कहेगा-नहीं-नहीं-नहीं। आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा-मक्खी, मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर-मात्र जीने के लिए मैं जन्मा। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न सन्तोष। यदि आत्मा-सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला हो ही नहीं सकता। या तो मैं हूँ ही नहीं। नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक ‘भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ। या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा-गर्व और गौरव जैसा-कोई तत्व नहीं है। यदि मैं शरीर हूँ तो-हेय हूँ। अपने लिए और इस धरती के लिए भारभूत। पवित्र अन्न को खाकर घृणित मल में परिवर्तन करते रहने वाले-कोटि-कोटि छिद्रों वाले इस कलेवर से दुर्गन्ध और मलीनता निसृत करते रहने वाला-अस्पर्श्य-घिनौना हूँ ‘मैं’। यदि शरीर हूँ तो इससे अधिक मेरी सत्ता होगी भी क्या?

मैं यदि शरीर हूँ तो उसका अन्त क्या है? लक्ष्य क्या है? परिणाम क्या है? मृत्यु-मृत्यु-मृत्यु। कल नहीं तो परसों वह दिन तेजी से आँधी तूफान की तरह उड़ता उमड़ता चला आ रहा है, जिसमें आज की मेरी यह सुन्दर सी काया-जिसे मैंने अत्यधिक प्यार किया-प्यार क्या जिसमें पूरी तरह समर्पित हो गया-घुल गया। अब वह मुझसे विलग हो जायगी। विलग ही नहीं अस्तित्व भी गँवा बैठेगी। काया में घुला हुआ ‘मैं’-मौत के एक ही थपेड़े में कितना कुरूप-कितना विकृत-कितना निरर्थक-कितना घृणित हो जायगा कि उसे प्रिय परिजन तक-कुछ समय और उसी घर में रहने देने के लिए सहमत न होंगे जिसे मैंने ही कितने अरमानों के साथ-कितने कष्ट सहकर बनाया था। क्या यही मेरे परिजन हैं? जिन्हें लाड़-चाव से पाला था। अब ये मेरी इस काया को-घर में से हटा देने के लिए-उसका अस्तित्व सदा के लिए मिटा देने के लिए क्यों आतुर हैं? कल वाला ही तो मैं हूँ।

मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया-हिलती डुलती भी नहीं-बोलती, सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय, यह कैसी मलीन, दयनीय, घिनौनी बनी जमीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने तक का अधिकार खो बैठी। कुशाओं बान से ढकी-गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने को तैयार नहीं। कोई बेटा, पोता गोदी में नहीं आता। पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा-मेरा वैभव-मेरा सम्मान हाय रे! सब छिन गया-हार से मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही-मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहें हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त-यही था मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि। जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किये थे-क्या उसका निष्कर्ष यही है? यही हूँ मैं-जो मुर्दा बना पड़ा हूँ-और लकड़ियों की चिता में जल कर अगले ही क्षण अपना अस्तित्व सदा के लिए खोने जा रहा हूँ।

लो अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर-जिसे सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों शृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जगह पर। लकड़ियों का ढेर-उसके बीच दबाया हुआ मैं। लो यह लगी आग। लो, अब मैं जला। अरे मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत, हड्डियों में मैं अभी और रहना चाहता हूँ, मेरे अरमान बहुत हैं, इच्छायें तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो, प्रियजनों का वियोग मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयतापूर्वक मत जलाओ। अरे स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों-इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे यह क्या-बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझमें आग लगा रहे हो। नहीं-नहीं, मुझे जलाओ मत-मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था-तुम मेरे थे-आज ही क्या हो गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया? इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गये? मैं और मेरा संसार क्या इस चिता की आग में ही समाप्त हुआ? सपनों का अन्त-अरमानों का विनाश-हाय री चिता-हत्यारी चिता-तू मुझे छोड़। मरने का जलने का मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गये?

लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो ही गया। स्मृतियाँ भी धुँधली हो चलीं। कुछ दिन चित्र फोटो जिये। श्राद्ध तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो तीन पीढ़ी तक बेटे पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाये कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में ‘मैं’ पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत सँजोया, सँभाला था, उसके लिए बहुत कुछ जिया था, पर वह सारी दौड़, धूप ऐसे ही निरर्थक चली गई। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया-जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुख को अपना सुख और जिसके दुःख को अपना दुःख समझा। सच तो यह है कि मैं ही काया था-और काया ही मैं था हम दोनों की हस्ती एक हो गई थी; पर यह क्या अचम्भा हुआ, मैं अभी भी मौजूद हूँ।

वायुभूत हुआ आकाश में मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर वह मेरी अभिन्न सहचरी लगने वाली काया न जाने कहाँ चली गई। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या? उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था, रह नहीं सकता था, पर हाय री निर्दय नियति। तूने यह क्या कर डाला। काया चली गई। माया चली गई। मैं अकेला ही वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी-नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवारी भी क्या याद रखते-क्यों याद रखते? याद रखे भी रहे हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है?

मैं काया हूँ। यह जन्म के दिन से लेकर-मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा पुराणों की चर्चा में आत्मा काया की पृथकता की चर्चा आये दिन सुनते रहने पर भी गले से नीचे नहीं उतरती थी। शरीर ही तो मैं हूँ-उससे अलग मेरी सत्ता भला किस प्रकार हो सकती है? शरीर के सुख-दुख के अतिरिक्त मेरा सुख-दुख अलग क्योंकर होगा? शरीर के लाभ और मेरे लाभ में अन्तर कैसे माना जाय? यह बातें न तो समझ में आती थीं और न उन पर विश्वास जमता था। परोक्ष पर प्रत्यक्ष कैसे झुठलाया जाय? काया प्रत्यक्ष है-आत्मा अलग है, उसके स्वार्थ, सुख-दुःख अलग हैं, यह बातें कहने सुनने भर की ही हो सकती हैं। सो रामायण गीता वाले प्रवचनों की हाँ में हाँ तो मिलाता रहा पर उसे वास्तविकता के रूप में कभी स्वीकार न किया।

पर आज देखता हूँ कि वह सचाई थी जो समझ में नहीं आई और वह झुठाई थी जो सिर पर हर घड़ी सवार रही। शरीर ही मैं हूँ। यही मान्यता-शराब की खुमारी की तरह नस-नस में भरी रही। बोतल पर बोतल छानता रहा तो वह खुमारी उतरती भी कैसे? पर आज आकाश में उड़ता हुआ वायुभूत-एकाकी-’मैं’ सोचता हूँ। झूठा जीवन जिया गया। झूठ के लिए जिया गया, झूठे बनकर जिया गया। सचाई आँखों से ओझल ही बनी रही। मैं एकाकी हूँ, शरीर से भिन्न हूँ। आत्मा हूँ। यह सुनता जरूर रहा पर मानने का अवसर ही नहीं आया। यदि उस तथ्य को जाना ही नहीं-माना भी होता तो वह अलभ्य अवसर जो हाथ से चला गया, इस बुरी तरह न जाता। जीवन जिस मूर्खता पूर्ण रीति-नीति से जिया गया वैसा न जिया जाता।

शरीर मेरा है-मेरे लिए है, मैं शरीर नहीं हूँ। यह छोटी-सी सच्चाई यदि समय रहते समझ में आ गई होती तो कितना अच्छा होता। तब मनुष्य जीवन जैसे सुर-दुर्लभ सौभाग्य का लाभ लिया गया होता, पर अब क्या हो सकता है। अब तो पश्चाताप ही शेष है। भूल भरी मूर्खता के लिए न जाने कितने लम्बे समय तक रुदन करना पड़ेगा?


हजरत मूसा बीमार पड़े

हजरत मूसा बीमार पड़े। उनने अल्लाह से नजात के लिए दुआ माँगी। अल्लाह ने उनकी दुआ सुनी और अच्छा कर दिया।

मूसा फिर बीमार पड़े और उनने फिर दुआ माँगी।

अब की बार अल्लाह ने सन्देश भेजा कि -हकीम ‘बू अली सोना’ के पास जा और उससे इलाज करा।

मूसा गिड़गिड़ाये और कहने लगे आप सर्वशक्तिमान हैं। आप ही अच्छा क्यों नहीं कर देते।

अल्लाह ने कहा-मूसा, मैं हर काम खुद नहीं करता। हकीम मैंने इसीलिए बनाये हैं कि तुम जैसे मरीजों का इलाज करें।


प्रेम में न शिकायत की गुंजाइश है, न असफलता की

भगवान् बुद्ध अपने शिष्यों समेत परिव्रज्या पर जा रहे थे। रास्ते में एक शिष्य ने पूछा - हम, लोगों के साथ सदा सद्भाव भरा व्यवहार करते हैं पर बदले में हमें उपेक्षा ही मिलती है-भन्ते, इसका क्या कारण है।

तथागत ने कुछ उत्तर न दिया। यात्रा आगे बढ़ती रही। मध्याह्न हो गया और प्यास लगी। एक कुँआ मिला। उस पर डोल भी पड़ा था और रस्सी भी। पानी खींचा गया। पर भरा हुआ डोल ऊपर तक आते-आते खाली हो गया, श्रम निरर्थक जाने पर खींचने वाले को दुःख हुआ। संयोगवश वह प्रश्नकर्ता ही पानी भी खींच रहा था। उसे यहाँ भी असफलताजन्य खिन्नता कष्ट दे रही थी।

भगवान बुद्ध ने कहा-तात् इस डोल में छेद हैं। सो कुँआ, रस्सी, श्रम आदि सब साधन होने पर भी पानी छेदों में होकर बह जाता है और तृप्ति लाभ से वंचित होना पड़ता है। प्रतिफल की इच्छा के छेदों के रहते मनुष्य की सेवा साधना और प्रेम प्रवृत्ति भी सन्तोष दायक परिणाम उत्पन्न नहीं करती।

देखा यही जाता है कि सेवा सहायता-या स्नेह सद्भाव का प्रयोक्ता आरम्भ में ही अपने उस अनुदान के लम्बे-चौड़े प्रतिफल का स्वप्न देखता है। और उसकी उतनी पूर्ति नहीं हो पाती तो खिन्नता और खीज से भरी निराशा व्यक्त करता है। आशा के अनुरूप दूसरों की प्रशंसा या प्रतिदान मिलने की आकाँक्षा लेकर उदारता या आत्मीयता बरती जाय तो उसे छेद वाले डोल की तरह ही समझना चाहिए। जिसका अभीष्ट परिणाम मिल सकना कठिन है।

व्यवहार और प्रेम के अन्तर को समझ लेना आवश्यक है। व्यवहार प्रतिदान के ऊपर अवलम्बित रहता है। उसे व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते हैं। संसार के सभी कारोबार इसी आधार पर चलते हैं। मजदूर काम करता है, मालिक उसका पारिश्रमिक चुकाता है। आज घर आने पर मित्र को चाय पिलाई, कल उसके घर जाने पर हम चाय की अपेक्षा कर सकते हैं। यह व्यवसाय है। मधुर व्यवहार भी प्रतिफल पर आधारित होते हैं। वैश्या और मछुए के बीच प्रेमालाप में कमी नहीं रहती। पर चूँकि वह ढर्रा अनुदान प्रदान के आधार पर चल रहा है। मूल आधार में कमी आते ही उपेक्षा या विरोध के रूप में परिस्थिति बदल जायगी।

इस प्रकार की मधुरता या घनिष्ठता को प्रेम नहीं कहा जा सकता। जिसमें परिणाम प्रतिदान की अपेक्षा की गई हो। वस्तुओं की तरह व्यवहार का भी आदान-प्रदान होता है। व्यवसाय में लाभ और हानि के लिए तैयार रहना पड़ता है। अपनी सद्भावना को उतनी ही सद्भावना के रूप में प्रत्युत्तर मिला तो जमा खर्च बराबर। ज्यादा मिला तो नफा। कम मिला तो घाटा। यह तो धन्धे में चलता ही रहता है। इसमें खिन्न होने या शिकायत करने की क्या आवश्यकता।

प्रेम इससे ऊँची चीज है। वह न किसी पर अहसान करने के लिए किया जाता है और न प्रतिदान के लिए। अपने अन्तःकरण में भरे अमृत का अवरुद्ध स्रोत खोलने के लिए किन्हीं औजारों की जरूरत पड़ती है। जिन व्यक्तियों पर आरोपित करके अपनी प्रेम प्रवृत्ति को विकसित किया जाता है उन्हें धन्यवाद ही देना चाहिए कि उतने अंशों में-उतने समय तक हमारी प्रेम साधना को विकसित होने देने में क्या कम था जो हम उनसे और अधिक अपेक्षा करें? कुआँ खोदने के लिए गेंती, फावड़े प्रयुक्त होते हैं। पानी तो कुँए में से निकालना है, यदि फावड़े में से पानी नहीं निकलता तो उस जड़ माध्यम पर क्यों खीजा जाय?

प्रेम अपने अन्तरंग में से निकलता है और उसी के उभार से आत्म-तृप्ति मिलती है। इस दुनिया में ऐसे लोग कम हैं जो प्रेम का मूल्य वस्तुतः समझते हों। उससे भी कम वे हैं जिनका आन्तरिक विकास उस महान अनुदान का प्रतिदान दे सकने योग्य हो चुका हो। आमतौर से रूखे और नीरस लोग ही सर्वत्र भरे पड़े हैं। लम्बे-चौड़े वायदे करते रहना-प्रेमी के अनुदान से लाभ उठाते रहने की कला को चतुर लोग भली प्रकार जानते हैं। उन आश्वासनों को सही मानकर जिनने प्रेम किया उन्हें दुहरा घाटा रहेगा। समय पर खोटे सिक्के की तरह जब प्रेमास्पद तोताचश्मी करेगा तब अपने को बुरा लगेगा। दूसरे उस खीज की प्रतिक्रिया से अपने विश्वासों की नींव हल जायगी और प्रेम प्रवृत्ति की आत्म-साधना को असफलता का मुँह देखना पड़ेगा। इसलिए वस्तु स्थिति आरम्भ से ही समझ लेनी चाहिए। मूर्ति-पूजा में पाषाण प्रतिमा से कुछ भी प्रत्यक्ष लाभ न दीखते हुए भी जिस श्रद्धा के साथ भक्ति भावना की जाती है, लोगों को भी -मित्र कुटुम्बियों को भी उसी स्तर का मानकर न मात्र अपने आन्तरिक विकास के लिए प्रेम प्रवृत्ति के आत्म-वर्द्धन का अभ्यास करने के लिए-किसी को प्रेमास्पद चुनना चाहिए। और बदले की अपेक्षा से आरम्भ से ही विरत रहना चाहिए। इस प्रकार भले ही सीमित प्रेम-प्रदर्शित हो सके पर वह सही होगा। भावातिरेक में किसी से अपनी जितनी ही घनिष्ठ आत्मीयता की आशा लेकर चलना ऐसी भूल है जिसमें अन्ततः पश्चाताप ही हाथ लगता है। कोई पहलवान अपने व्यायाम उपकरणों से यह आशा रखें कि वह भी बदले में उतना ही साथ देंगे तो यह आशा व्यर्थ है। संसार में जड़ता का ही बाहुल्य है। प्रेम-पथ के पथिक को यह समझकर ही चलना चाहिए। अन्यथा उसको धोखे की आशंका बनी ही रहेगी।

प्रेम वस्तुतः आदर्शों से किया जाता है। मनुष्य उसके माध्यम हो सकते हैं और वे बदले भी जा सकते हैं। दुखियों की सहायता करना-सज्जनता को सहयोग देना, कर्तव्य के लिए कष्ट सहना जैसे आदर्शों से प्रेम किया जाना चाहिए, इसी को ईश्वर प्रेम या भक्ति साधना कहते हैं। इसमें असफलता का कभी कोई कारण उत्पन्न नहीं हो सकता, किसी वृद्ध बीमार को सड़क पर असहाय पड़ा देखा और उसकी सेवा सहायता में उदारता बरती। अपने लिए संतोष और उल्लास के लिए इतना सा कर्तव्य पालन पर्याप्त है। लोक-मंगल की चल रही प्रवृत्तियों में जुट पड़े उसमें अपना जितना अनुदान बन पड़ा लगा दिया इतने भर से अपना अन्तःकरण पुलकित हो जायगा। यदि उस वृद्ध बीमार से बदला चुकाने की या लोक-सेवा में यश मिलने की कामना रहेगी तो वे दोनों ही प्रयोजन न तो कुछ सन्तोष प्रदान करेंगे न उल्लास। उल्टे बदला न मिलने के कारण दुनिया को कोसने की जलन उठेगी उससे अपना सन्तुलन नष्ट होगा। यह घाटा सेवा न करने की हानि से भी महँगा पड़ेगा।

व्यवहार-व्यवसाय अलग चीज है उसे उसी तरह नाप-तौल कर व्यापार बुद्धि से करना चाहिए। ऐसी ‘दोस्ती’ घटाई-बढ़ाई, तोड़ी-जोड़ी जाती रहती है। प्रयोजन जब जिससे जितना सधे तब उसे उतनी मूल्य की घनिष्ठता बता कर दिखा दी। इस कला को चतुरता कहा जाता है। लोग उसकी जरूरत समझते भी हैं और उसे अपने-अपने दाव घात के अनुसार प्रयोग भी करते हैं। जिसे जरूरत हो वह उसका उपयोग करे। इसमें दिव्य प्रेम को कुछ लेना देना नहीं है। रंग एक जैसा होने से बगुले और हंस-कोयल और कौए एक नहीं हो सके। उदारता और घनिष्ठता भरा दीखने वाला मधुर व्यवहार उस श्रेणी में नहीं आता जिसे दिव्य प्रेम कहा जाता है-जिसके आधार पर आत्म-विकास होता है और समाज में उच्च परम्पराओं की प्रतिष्ठापना होती है। ऐसा प्रेम तो निस्वार्थ ही हो सकता है और आदर्शों पर अवलम्बित। उसमें न सफलता की गुंजाइश है न शिकायत का प्रश्न।

अभिलाषाओं और आकर्षणों से गुथे हुए ‘छाया प्रेम’ में प्रेमी की इच्छा पूर्ति आवश्यक हो जाती है चाहे वह उचित हो अथवा अनुचित। उसमें साथी के दबाव, आग्रह या अनुरोध को अपनी कोमलता सहन स्वीकार कर लेती है और अनैतिक आचरण में भी सहयोगी बनती है। आदर्श उसमें बाधक नहीं बनते। प्रेमी की खुशी के लिए वह भी किया जाता है जिसे अन्तरात्मा प्रत्यक्ष ही अनुचित कहती है। ऐसा ‘प्रेम’ दोनों पक्षों में से किसी के लिए भी हित सिद्ध नहीं होता। प्रेम-व्यवहार उच्च-आध्यात्मिक भूमिका है। उसमें अनौचित्य का सम्मिश्रण नहीं हो सकता। जो कुमार्ग पर चलने के लिए दबाता है।

वह दुष्ट और जो दबता है उसे कायर ही कहा जायगा। जहाँ दुष्टता और कायरता जैसे अनात्म तत्व उफन रहे हैं वहाँ सच्चे प्रेम का अस्तित्व कहाँ रहेगा, वह भावुकता अन्ततः महंगी ही पड़ेगी और घाटे का सौदा सिद्ध होगी जबकि सच्चे प्रेम में इस प्रकार के अनर्थ की कोई गुंजाइश नहीं है।

सच्चे प्रेम की घनिष्ठता में प्रेमी को उच्च आदर्शों की ओर घसीट ले चलने की निष्ठा ओतप्रोत रहती है। इच्छाओं की पूर्ति नहीं, इच्छाओं का परिष्कार इष्ट रहता है। प्रेम उठाता है, गिराता नहीं। आत्महत्या करते हुए भाई को बलपूर्वक घसीट कर उस दुष्कर्म से विरत किया जाता है भले ही इस प्रयत्न में लड़ने-झगड़ने या पिटने-पीटने की नौबत ही क्यों न आ जाय। सामयिक प्रसन्नता-अप्रसन्नता को सच्चे प्रेम में स्थान नहीं दिया जाता वरन् दूरगामी भविष्य एवं आत्यन्तिक परिणाम देखा जाता है। जो इस कसौटी पर खरा उतरे वही सच्चा प्रेम। अत्यन्त भावुकता भरी अन्धी घनिष्ठता को ‘भ्रान्ति’ ही कहा जायगा। ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करने वाले अन्ततः प्रेम को कोसते ही देखे गये हैं।

आत्मा की प्यास बुझाने के लिए अन्तःकरण को पवित्र करने के लिए-आत्मबल बढ़ाने के लिए-प्रेम साधना की अनिवार्य आवश्यकता है। रूखा, नीरस, एकाकी स्वार्थी मनुष्य कितना ही वैभव सम्पन्न क्यों न हो अध्यात्म की दृष्टि से उसे नर-पशु ही कहा जायगा। जो किसी का नहीं, जिसका कोई नहीं। ऐसा मनुष्य कुछ भी अनर्थ कर सकता है। उसे अपने आप से डर लगेगा और अपनी जलन में जीवित मृतक की तरह झुलसेगा। प्रेम-रहित नीरस जीवन घृणित है वह मनुष्य जैसे विकासवान प्राणी के लिए हर दृष्टि से हेय है। सामाजिक दृष्टि से व्यक्तिवाद हर कसौटी पर हेय सिद्ध होता है। जो जितना सामाजिक है वह उतना ही अच्छा विश्व नागरिक माना जायेगा। समूह निष्ठा की उदार आदर्शवादिता उसी कोमल संवेदना की परिणति है जिसे प्रेम भावना के नाम से संबोधित किया जाता है।

मनुष्य का वास्तविक और आन्तरिक उत्कर्ष उसकी प्रेम-भावना की न्यूनता और अधिकता से ही किया जाना चाहिए। समाज की प्रगति, स्थिरता, शान्ति, समृद्धि का आधार नागरिकों का पारस्परिक सहायता सद्भावना से ही आँका जाना चाहिए। प्रेम इस धरती का अमृत है और मनुष्य का प्राण, यह जितना ही विकसित होगा उतनी ही सुख शान्ति की सम्भावना साकार होगी।


प्रधानमंत्री सुन शू आओ

राजा क्वाग ने अपने राज्य का प्रधानमंत्री सुन शू आओ को तीन बार बनाया और तीन बार निकाला, फिर भी उनके चेहरे पर न कभी खुशी देखी गई न उदासी। वे शान्त चित्त से अपने कामों में लगे रहे।

विद्वान कीन बू ने इस अपरिवर्तनशीलता का कारण पूछा।

शू आओ ने कहा-इसमें मेरा क्या बना-बिगड़ा जो मैं उत्तेजित होता।

जब मुझे मंत्री बनने को कहा गया-तो मैंने सोचा उसे अस्वीकार करना ठीक नहीं।

-जब वह पद छिना तो मैंने सोचा जहाँ जरूरत नहीं वहाँ चिपके रहना बेकार है।

-मन्त्री पद ने मेरा कुछ बनाया नहीं उसके न रहने से मेरा कुछ बिगड़ा नहीं। मैं जहाँ था वहाँ का वहीं मौजूद हूँ। - फिर वह सम्मान जो मिला, मेरा था या कुर्सी का?

-यदि कुर्सी का था तो उससे मुझे क्या लेना देना?

यदि वह मेरा सम्मान था तो उसमें कुर्सी के रहने न रहने से क्या अन्तर पाया?

कीन बू का समाधान हो गया। और वे समझ गये कि किस मनःस्थिति का मनुष्य हर हालत में खुश रह सकता है।


मानवी काया काँच की नहीं-अष्ट धातु से बनी है।

सन् 65 की घटना है। अमेरिका का एक हवाई जहाज समुद्र पर ऊपर उड़ते हुए, आग लगने के कारण जल गया। पायलट समुद्र में कूद पड़ा। उसे बहुत चोट लगी। फिर भी वह तैरता रहा और लगातार 40 घण्टे से अधिक परिश्रम के बाद वह किनारे पर पहुँचा। बुखार, निमोनिया, भूख, थकान, दर्द, चोट से पीड़ित बदहवासी की स्थिति में उसे अस्पताल पहुँचाया गया। हालत इतनी गम्भीर थी कि डॉक्टर उसके अब तक बचे रहने पर आश्चर्य करते रहे।

पायलट मरा नहीं, उसकी जीवनी शक्ति ने उसका साथ दिया और वह धीरे-धीरे अच्छा होता चला गया।

पोर्टलैण्ड में एक आठ वर्षीय बालक सड़क कूटने वाले तीन टन भारी इंजन के नीचे आ गया। उसकी कमर से नीचे का भाग बुरी तरह पिस गया। किसी को उसके बचने की आशा न थी, पर जीवनी शक्ति ने काम किया और एक वर्ष तक अस्पताल में रहकर वह अच्छा हो गया पैर चलने लायक तो न हो सके पर जीवन रक्षा तो हो ही गई।

न्यूयार्क की पन्द्रह मंजिल ऊँची इमारत से एक दो वर्ष का नन्हा टामी पेइवा गिरा। उसकी हड्डियाँ टूट गई फिर भी वह मरा नहीं।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के भौतिकी प्राध्यापक डॉक्टर क्रेग टेलर ने स्वयं अपने ऊपर प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि संसार के सबसे अधिक गरम क्षेत्र में रह कर भी औसत स्वास्थ्य वाला आदमी 100 दिन तक जी सकता है। यदि स्नायु संस्थान अपेक्षाकृत अधिक समर्थ हों तो 200 दिन तक जिया जा सकता है। आमतौर से अत्यधिक गर्मी वाले स्थान के बारे में अब तक यह मान्यता प्रचलित है कि वहाँ कोई 24 घण्टे से अधिक नहीं जी सकता। डॉक्टर टेलर ने 220 डिग्री तक की गर्मी देर तक सहन करके दिखाई और वे 250 डिग्री तापमान को भी 14 मिनट तक सहन करने में सफल रहे।

कितना शीत मनुष्य शरीर सह सकता है इसका परीक्षण मेजर डोनमल्ड ने बर्फीले पानी की शीत एक घण्टे तक सह कर दिखाया। वे कहते हैं यदि शीत रक्षक सूट पहन रखा हो तो, शीत से मृत्यु नहीं हो सकती।

इंग्लैण्ड का एक विमान चालक टेड ग्रीन वे को, द्वितीय महायुद्ध के दौरान विपत्ति में फँस गया। उसके दो और साथी भी थे। भयंकर शीत प्रदेश के बर्फीले प्रदेश में उसे भूखे-प्यासे 10 दिन गुजारने पड़े। कपड़े भी गरम न थे। इतनी विपत्ति का सामना करते हुए उस प्रदेश को पास करते हुए वे लोग बच सकने की स्थिति में पहुँचे।

अमेरिका के युद्ध रोमाञ्च इतिहास में यह घटना जुड़ी हुई है कि उसकी एक सैनिक टुकड़ी ग्रीनलैण्ड के बर्फ से ढके क्षेत्र में फँस गई और नितान्त सादे कपड़े, 88 दिन बिताकर बाहर आ सकने में सफल हुई। 10 दिन तो उस टुकड़ी को बिना भोजन के रहना पड़ा।

मनुष्य के शरीर का तापमान 98.6 डिग्री होता है। यदि वह 19 डिग्री घट जाय अर्थात् 79 के करीब रह जाय तो जीवन संकट उत्पन्न हो जायगा। इसी तरह 9 डिग्री बढ़ जाय अर्थात् तापमान 107 डिग्री पर जा पहुँचे तो मृत्यु हो जायगी। बुखार में तापमान अधिक न बढ़ने पाये इससे इसके लिए डॉक्टर सिर पर बर्फ रखते हैं। इस प्रतिपादन को झुठलाने वाली नर्स है जिसने 110 डिग्री बुखार से कई दिनों तक लड़ाई लड़ी और आखिर वह अच्छी हो गई। डॉक्टर कह चुके थे कि इसका बचना सम्भव नहीं। यदि बच भी गई तो इतनी गर्मी उसके दिमाग को विक्षिप्त अवश्य कर देगी। पर नर्स ने न मौत को अपने पास फटकने दिया न पागलपन को। अमेरिका के ब्रकुलिंस पुशावक नामक अस्पताल की इस नर्स ने मानवी जीवनी शक्ति को मृत्युञ्जयी सिद्ध करते हुए नया प्रतिपादन प्रस्तुत किया कि मृत्यु से जीवन अधिक सामर्थ्यवान है।

आयरिश स्वाधीनता यज्ञ के उद्गाता टेरेन्स मेकस्विनी ने जेल में अनशन किया और तिहत्तर दिन तक निराहार रहकर मौत से जूझते रहे। भारतीय स्वाधीनता के सेनानी यतीन्द्रनाथ दास बिना आहार किये 68 दिन की लम्बी अवधि तक मौत से लड़ते रहे।

आपरेशनों के दरम्यान कितने ही लोगों का एक फेफड़ा, एक गुर्दा, जिगर का एक भाग, आँतों का बड़ा भाग आदि काट कर अलग कर दिये जाते हैं पर जो शेष बचा रहता है उतने से ही शरीर अपना काम चलाता रहता है और जीवित रहता है।

सामान्य मनुष्य शरीर का तापमान 36.6 अंश शताँश होता है। खून में शक्कर की मात्रा 0.1 होती है। रक्त चाप साधारण स्थिति में 100-140 मिली मीटर - मर्कयुरी कीलम - रहता है।

यह 36.6 तापमान भीतर के अवयवों का ही होता है। ठण्ड के दिनों में हाथ पैरों का ताप तो 33 से भी कम रहता है। फिर भी सारा कार्य यथावत चलता रहता है। पर इससे अधिक भीतरी गर्मी नहीं गिरनी चाहिए और वह 45 से आगे भी नहीं बढ़नी चाहिए। अन्यथा जीवन संकट उत्पन्न हो जायगा।

परिस्थितिवश यदि ताप घटता-बढ़ता है तो उसका नियंत्रण करने के लिए शरीर के भीतर ही हीटर एवं कूलर जैसी व्यवस्था मौजूद है। अपना सचेतन नाड़ी संस्थान तापमान को सन्तुलित रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। माँस पेशियाँ ऊष्मा उत्पन्न करने का काम करती हैं। उन्हीं में ऊष्मा बनती, पकती और बढ़ती है। इनके अतिरिक्त हृदय, फुफ्फुस, वृक्क, यकृत, आंतें आदि अंग भी एक प्रकार से भट्टी की तरह जलते और गर्मी पैदा करते हैं।

शरीर दिन-रात में 160 से लेकर 180 लाख कैलोरी ऊष्मा नित्य बाहर फेंकने का क्रम चलाता है। बिजली के घरेलू हीटर भी प्रायः इतना ही ताप उत्पन्न करते हैं। जब कभी गर्मी कम पड़ती है-तो ठण्ड लगने लगती है। दाँत किटकिटाते हैं, अंग काँपते है, यह अतिरिक्त क्रियाकलाप प्रकृति द्वारा अतिरिक्त गर्मी उत्पन्न करने के लिए घर्षणात्मक हलचल पैदा करने के लिए आरम्भ किया जाता है।

हमारा रक्त एक अच्छा ऊष्मा वाहक है। ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए रक्त संचार पद्धति की द्रुतगामिता ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा करती है। यह रक्त दौड़ता न हो तो गर्मी जहाँ बनती है वहीं बनी रहती। ताप उत्पन्न करने वाले अवयव जलने लगते और शेष को शीत निवारण कठिन पड़ जाता। रक्त दौड़ने का ही काम नहीं करता वह स्वयं गर्मी भी पैदा करता और गरम भी रहता है। उसकी यह विशेषता हीटर और कूलर के दोनों प्रयोजन पूरे करती है। जब देह को गर्मी लगती है तो रक्त की दौड़ शरीर से गर्मी बाहर फेंकने लग जाती है और जब ठण्ड प्रतीत होती है तो यह गर्मी में पसीना निकलना शीतलता उत्पन्न करता है। शीत में ताप सञ्चय का क्रम चलता है और अपना रक्त ही आवश्यक गर्मी की व्यवस्था बना देता है।

शरीर का ऊष्मा सञ्चालन केन्द्र मस्तिष्क नहीं वरन् रीढ़ की हड्डी के ऊपर मस्तिष्क के नीचे स्थित है। यह स्व संचालित है। रक्त निरन्तर इसके चारों और बहता रहता है। रक्त प्रवाह का नियंत्रण भी यहीं से होता है। किस अंग को कितना रक्त आवश्यक है उसका लेखा जोखा और वितरण प्रबन्ध करना इसी केन्द्र का काम है। बाहरी सर्दी-गर्मी बढ़ने पर यह ताप नियन्त्रण केन्द्र विशेष रूप से सक्रिय होता है और परिस्थिति के अनुरूप अपने को ढालकर सारे शरीर की स्थिति ऐसी बना देता है जिसके आधार पर शीत ताप की घट-बढ़ का सामना किया जा सके। सारे शरीर में फैले हुए - त्वचा के साथ गुँथे हुए - पतले रेशों जैसे सचेतन ज्ञान तन्तु-इस केन्द्र को शीत ताप की स्थिति की जानकारी निरन्तर पहुँचाते रहते हैं। वह निर्णय करता है कि परिस्थिति का सामना करने के लिए किस अवयव को क्या करना चाहिए। इसका निर्देश सेना सञ्चालक की तरह होता है जिसे अवयव तत्काल शिरोधार्य करते हैं। सचेतन मस्तिष्क को अन्तरंग की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का पता भी नहीं चलता पर अचेतन निरन्तर वह व्यवस्था जुटाता रहता है जिससे जीवन सञ्चार की सारी गतिविधियाँ भली प्रकार सम्पन्न होती रहें।

यह ऊष्मा सञ्चालक नाड़ी संस्थान इतना संवेदनशील है कि डॉक्टर लोग आपरेशन के समय रीढ़ की हड्डी में सुई लगाकर इसे किञ्चित अचेत कर देते हैं बस बात की बात में देह सुन्न हो जाती है। प्रयोगशालाओं में इस केन्द्र की छेड़छाड़ से कैसी जादू जैसी प्रतिक्रियायें हो सकती हैं यह दिखाया जाता है। किसी पशु का यह केन्द्र विद्युत सञ्चार करके तनिक सा उत्तेजित कर दिया जाय तो वह घोर शीत की स्थिति में भी गर्मी से व्याकुल हो उठेगा। इसके विपरीत यदि प्रचण्ड गर्मी की स्थिति में उस केन्द्र को शिथिल कर दिया जाय तो प्राणी ठण्ड से काँपने लगेगा।

मनुष्य शरीर सामर्थ्यों का पुञ्ज है। उसमें प्रगति की समस्त सम्भावनायें विद्यमान हैं। यदि उन शक्ति स्रोतों को समझ लिया जाय और प्रयत्नपूर्वक आत्मोन्नति के लिए कटिबद्ध हुआ जाय तो प्रतीत होगा कि प्रगति के लिए आवश्यक वे सभी विशेषतायें अपने भीतर विद्यमान हैं जिनका पहले अभाव प्रतीत होता था।

विचारशील लोग प्रगति के साधन बाहर नहीं ढूंढ़ते वरन् भीतर खोजते हैं। उनके दोष, दुर्गुण सुधारते हैं और अस्त-व्यस्त स्वभाव एवं समय क्रम को इस प्रकार क्रम बद्ध करते हैं कि अभीष्ट दिशा में बढ़ चलने का सहज ही पथ-प्रशस्त होता चला जाय। भाग्योदय की समस्त सम्भावना मनुष्य के परिष्कृत व्यक्तित्व में सन्निहित रहती हैं। जिसने इस तथ्य की वास्तविकता समझ ली उसे सबसे पहले अपने को सँभालने, सुधारने पर ध्यान करना पड़ता है।

जहाँ प्रगति की अगणित सम्भावनायें अपने भीतर विद्यमान हैं वहाँ यह भी एक भारी रहस्य है कि अवरोधों को-प्रतिकूलताओं को सहन करने की भी अपने में अनन्त सामर्थ्य मौजूद है। शरीर और मन की बनावट कुछ ऐसी विचित्र है कि उसे साधारण आघात अवरोध झुका नहीं सकते। हिम्मत के धनी और धैर्यवान व्यक्ति मानसिक सन्तुलन बनाये रहते हैं और आगत संकटों से दिल्लगी मजाक करते हुए आगे का रास्ता बनाते रहते हैं। मनस्वी व्यक्ति को कोई विपत्ति झुका नहीं सकती। संकट सभी पर आते हैं। वे सदा जमे ही नहीं रहते वरन् उड़ते हुए बादलों की तरह टलते बदलते रहते हैं। आज जो विपत्ति आई है कल उसका हल भी सामने आयेगा जिनका यह विश्वास है उन्हें देर तक प्रतिकूलताओं से खिन्न नहीं रहना पड़ता। एक रास्ता बन्द होने पर वे दूसरी राह खोज निकालते हैं।

मन की तरह शरीर की रचना भी ऐसी ही है कि साधारण बीमारियाँ या दुर्घटनायें कुछ बहुत अनर्थ नहीं कर सकतीं। तितीक्षा शक्ति अपनी काया में इतनी अधिक सँजोई हुई है कि मृत्यु जैसा संकट उत्पन्न होने पर भी जीवन रक्षा की आशा की जा सकती है। विधाता ने यह काया काँच की नहीं बनाई जो जरा-सा आघात लगने पर टूट-फूट जाय। सच तो यह है कि अष्ट धातु की बनी है और इस अन्दाज में विनिर्मित हुई है कि बड़े से बड़े आघात सह सके। हमें विपत्तियाँ नहीं मारती, मारती है बुज़दिली और पश्त हिम्मती। जो डरते हैं वे मरते हैं। घबराहट का प्रभाव पेट में छुरा घोंपे जाने से अधिक बुरा होता है। छूरेबाजी के शिकार दर्जनों घावों को सहन करके अस्पताल से हँसते-कूदते बाहर निकलते हैं जबकि घबराने वाले को एक फुन्सी ही भय और आतंक का कारण बन जाती है और प्राण लेकर हटती है।

तितीक्षा शक्ति बढ़ाने पर भारतीय धर्म में बहुत जोर दिया गया है। तप साधनाओं में अधिकतर का उद्देश्य तितीक्षा ही है। कष्ट की स्थिति आने पर भी मन को असन्तुलित न होने देने का अभ्यास ही तप साधना का मूलभूत प्रयोजन है। व्रत, उपवास, माघ स्नान, धूनी तपना, मौन, कठोर आसन, रात्रि जागरण आदि के पीछे इस अभ्यास की परिपक्वता ही प्रयोजन है जिसके द्वारा कठिन समय आने पर हिम्मत न हारने का मनोबल यथा स्थान बना रहे।

दुर्बलता शरीर में नहीं मन में है। यदि मन को सँभाले-सँजोये रहा जाय तो शरीर के बारे में यह निश्चित कहा जा सकता है कि वह सहज ही टूटने के लिए नहीं बनाया गया है वह कठोरतम परिस्थितियों को सहन कर सकने में सक्षम है। यदि मन की साहसिकता बनी रहे तो मानवी काया की समर्थता अपने ढंग की अनोखी ही पाई जायगी।

भगवान ने हमें इतना समर्थ और सहन शक्ति सम्पन्न शरीर दिया है यह अपना काम है कि उसकी सुरक्षा को अनुपयुक्त आहार-विहार से नष्ट करने पर उतारू न हों। यह अपना काम है कि अवरोधों से लड़ने की क्षमता को अक्षुण्य बनाये रहने के लिए तितीक्षा परक तप−साधनाएं करते रहें। यह अपना काम है कि मनोबल ऊँचा रखें, हिम्मत न हारें, निराशा को पास न फटकने दें और एक रास्ता बन्द होने पर दूसरा रास्ता खोजें, खोलें और यदि मानसिक दुर्बलता से बचा रहा जाय तो शरीर हारी, बीमारियों से लड़ते-झगड़ते लम्बी जिन्दगी जी सकता है और अवरोधों से दिल्लगी मजाक करते हुए सफल और समर्थ जीवन की दिशा में बढ़ता रह सकता है।


अपना निर्माण अपने द्वारा

अपना निर्माण अपने द्वारा

तीर्थंकर महावीर साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच-बीच में बैल देख लिया करेंगे तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।

महावीर ध्यानस्थ थे। बैल चरते-चरते दूर निकल गये। ग्वाला लौट कर आया तो महावीर पर बहुत नाराज हुआ। वह समझा कि यह कोई चोर है और इसी की हरकत से बैल कहीं चले गये हैं। वह महावीर को ताड़ना देने लगा। रस्सी के एक टुकड़े से सपासप उनकी पिटाई शुरू कर दी। उनके शरीर पर इस निर्मम प्रहार के कई निशान पड़ गये।

देवराज इन्द्र से ग्वाला की यह ताड़ना न देखी गई उन्होंने तीर्थंकर से आकर प्रार्थना की भगवन्! यह ग्वाला अज्ञानी है, आपके अलौकिक माहात्म्य से पूरी तरह अनभिज्ञ है। मेरी इच्छा सदैव आपके साथ रहने की है ताकि आने वाले कष्टों का निवारण करता रहूँ। आप मुझे सतत सेवा में उपस्थित रहने की आज्ञा दीजिये।

महावीर ने जो उत्तर दिया वह जैन साहित्य की अमूल्य निधि है और निराश व्यक्तियों को सैंकड़ों वर्षों से प्रेरणा देता रहा है।

“स्ववीर्येणैव गच्छन्ति जिनेन्द्रा परमाँ गतिम्”

किसी दूसरे के सहारे रह कर अथवा दूसरे के पुरुषार्थ के भरोसे बैठकर आज तक कोई आत्मा बोधि लाभ प्राप्त नहीं कर सकी। अपने पुरुषार्थ से ही अपना निर्माण किया जा सकता है। अपने भाग्य को बनाने वाला कोई दूसरा नहीं वरन् उसका पुरुषार्थ ही होता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुरुषार्थ का स्थान ही सर्वोपरि है।


युग परिवर्तन को असम्भव न माना जाय

अमेरिका का प्रसिद्ध पत्र ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अन्तरिक्ष विज्ञानी स्वर्गीय राबर्ट गोगार्ड से अपनी उस टिप्पणी के लिए माफी माँगी जो उसने सन् 1920 में छापी थी।

गोगार्ड उन दिनों अन्तरिक्ष विज्ञान की शोध कर रहे थे। उन्होंने प्रतिपादित किया था कि ‘शून्य आकाश में राकेटों का चलाया जाना सम्भव है और उस आधार पर अन्तर्ग्रहीय यात्राएं की जा सकेंगी।’

इस प्रतिपादन पर व्यंग करते हुए न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा था-”गोगार्ड महाशय विज्ञान की लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं पर वे जानते उतना भी नहीं जितना कि स्कूली बच्चे पढ़ते हैं। जिन्हें पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान होगा वह कैसे कह सकता है कि राकेट उस आवरण को बेध कर ऊपर निकल जायेंगे और अन्य ग्रहों की यात्रा करेंगे।”

उस टिप्पणी के 49 वर्ष बाद गोगार्ड का प्रतिपादन सही सिद्ध हुआ। कैप केनेडी रॉकेट में सवार होकर नील आर्मस्ट्रांग और उसके साथी चन्द्रमा पर पहुँचे। इस पर न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी 49 वर्ष पूर्व की टिप्पणी के लिए स्वर्गीय गोगार्ड से क्षमा माँगी कि उन्हीं का प्रतिपादन सही था और टिप्पणीकर्ता गलती पर।

नया युग बढ़ता हुआ चला आ रहा है। मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियां छोड़नी पड़ेंगी और उसे अपने सोचने तथा करने की रीति-नीति में परिवर्तन करना पड़ेगा। यह बात आज असम्भव लगती है। मर्यादाओं के बन्धन जिस बुरी तरह टूटते चले जा रहे हैं। एक आदमी दूसरे को ठगने के लिए जिस बेहयाई के साथ उतारू है। सुधार का बाना ओढ़ने वाले भी आवरण के भीतर क्या-क्या कुकृत्य कर रहे हैं इसकी तह में जाने से सहज ही आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगता है और प्रतीत होता है कि अभी दिल्ली दूर है, विकृतियाँ पूरी प्रौढ़ता पर हैं और उन्हें चुनौती देने के लिए उपयुक्त मोर्चे बन नहीं रहे हैं। जो सुधार और निर्माण की बातें करते हैं, उनकी कथनी और करनी में भारी अन्तर है। ऐसी दशा में यह प्रतीत नहीं होता कि परिस्थितियाँ जल्दी ही बदल जायेंगी।

पर वर्तमान स्थिति देखकर भविष्य का सुनिश्चित निर्णय नहीं किया जा सकता। उसे दूरदर्शी देखते हैं-जिनकी आँखें निकट का ही देख पाती हैं उनके लिए उन परिवर्तनों की कल्पना कठिन ही लगती है जो आज की स्थिति से तालमेल नहीं खाते। गोगार्ड का प्रतिपादन न्यूयार्क टाइम्स को ऐसा ही भोंड़ा लगा था। पर समय ने बताया कि आज जो बात असम्भव लगती है कल सम्भव भी हो सकती है।

जलयानों की सम्भावना भी किसी समय अवास्तविक लगती थी। नैपोलियन बोनापार्ट इंग्लैण्ड पर हमले की तैयारी कर रहा था। इसी समय एक इंजीनियर राबर्ट फुल्टन यह योजना लेकर पहुँचा कि किस प्रकार भाप से चलने वाले जलयान बन सकते हैं और उनसे शत्रु जहाजों के दाँत कैसे खट्टे किये जा सकते हैं।

नैपोलियन झल्ला पड़ा-क्या बकवास कर रहे हैं आप आग पर पानी गरम करके उससे हवा के रुख और पानी की धार काटते हुए जहाज चल सकते हैं। ऐसी बेतुकी सनक सुनने की मुझे फुरसत नहीं है।

बेचारा इंजीनियर चला गया, जलयान बनने और चलने लगे तो भी बुद्धिमान कहलाने वालों ने इस प्रयास का उपहास ही उड़ाया। डबलिन के रायल सोसाइटी के सामने अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए प्रो0 लाडेस्कर ने कहा-ये मामूली मनोरंजन कर सकते हैं पर इन जलयानों से अटलांटिक पार करने की कल्पना बेहूदा है।

वह बेहूदा कल्पना आज कितनी सार्थक और साकार सिद्ध हो रही है इसे हर कोई देख सकता है। पानी के जहाज परिवहन, यातायात और युद्धों में कैसी भूमिका प्रस्तुत कर रहा है। इसे समझने में नैपोलियन जैसे ‘समझदार’ असफल रहे। साधन सम्पन्न इंजीनियरों को यह कल्पना निरर्थक लग रही थी, पर आखिर वह साकार ही हो गई।

मनुष्य की पशु संस्कारों से ग्रसित बुद्धि और आदत को मर्यादा में चलने के लिए सधाया जा सकेगा। ध्वंस और विघटन मैं लगे हुए तत्व अपनी प्रतिभा सृजन में नियोजित करेंगे। स्वार्थों के पीछे अन्धा बना हुआ जमाना परमार्थ को प्रधानता देने की प्रवृत्ति अपनायेगा। यह बात आज असम्भव लगती है, पर किसी इंजीनियर को इन परिस्थितियों में भी पक्का विश्वास है कि यह परिवर्तन भले ही आज असम्भव लगता हो पर कल सम्भव होकर रहेगा।

आविष्कारों के क्षेत्र में सदा यही होता रहा है कि आरम्भ में उस कल्पना और चेष्टा को सनक बताया गया और असम्भाव्य कहा गया। टैंक बनाने की योजना जब सामने लाई गई तो इंग्लैण्ड के सेनापति ने कहा-लोहे की गाड़ियाँ घुड़सवारों के स्थान ग्रहण कर सकती हैं यह कल्पना नितान्त मूर्खतापूर्ण है।

रूस ने जब प्रथम अन्तरिक्ष यान ‘स्पूतनिक’ आकाश में भेजा तो अमेरिका के तत्कालीन सेनापति और पीछे के राष्ट्रपति आइजन होवर ने उसका मजाक उड़ाया और कहा-’रूसियों द्वारा आसमान में उछाली गई एक छोटी-सी गेंद युद्ध समस्या को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है? इसका कोई महत्व मेरी समझ में नहीं आता।’

उस समय वे बातें बेकार मालूम पड़ती थीं पर आज टैंकों का अपना स्थान है और उन्होंने घुड़सवार सेना को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। अन्तरिक्ष यान आज अन्तिम युद्ध में सब से महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते दीखते हैं और उसी प्रतिद्वन्द्विता में अरबों रुपया खर्च हो रहा है।

विचार क्रान्ति की बात सुनकर आज भी हँसी उड़ाई जा सकती है। सोचने भर से दुनिया की परिस्थितियाँ और आदमी की आदतें कैसे बदली जा सकती हैं, यह समझ सकना समझदारों के लिए भी कठिन पड़ रहा है। विचार दिमाग तक सीमित हैं। क्रिया परिस्थितियों से संबंध रखती है। विचार परिस्थितियों को कैसे बदल सकते हैं और बिना मजबूरी सामने आये कोई सचाई के कष्ट साध्य रास्ते पर क्योंकर चल सकता है। निहित स्वार्थों को विचारों की प्रेरणा भर से कैसे अपने स्वार्थ छोड़ने के लिए सहमत किया जा सकता है, यह बात जटिल और पेचीदा प्रतीत होती है, पर वह दिन दूर नहीं जब यह स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ेगा कि संसार में मानव-जीवन की सबसे बड़ी शक्ति विचार ही है और उनके बरताव से व्यक्ति और समाज का सारा ढाँचा ही बदला जा सकता है। मार्कोनी का रेडियो आविष्कार सामने आया तो कौतूहल से उसे देखा गया। पर जब यह कहा गया कि उससे अटलांटिक पार भी सन्देश भेजे जा सकते हैं, तो तत्कालीन वैज्ञानिकों ने उसे नामुमकिन बताते हुए दलील दी कि ऐसा तभी हो सकता है जब अमेरिका द्वीप जितना विशाल रेडियो स्टेशन खड़ा किया जा सके।

अणु विस्फोट के आविष्कार के बाद लार्ड रदर फोर्ड ने कहा इस खोज की कोई उपयोगिता मुझे दिखाई नहीं पड़ती।

युद्ध उपकरणों की खोज को आगे जारी रखने को निरर्थक बताते हुए रोम के बड़े सैनिक इंजीनियर जुलियस फोन्टिनस ने कहा था-अब इन प्रयत्नों को बन्द कर देना चाहिए क्योंकि युद्ध उपकरणों के संबंध में जितने आविष्कार सम्भव थे वे चरम सीमा पर पहुँच गये हैं। इसी प्रकार सन् 1899 में अमरीकी आविष्कार पेटेन्ट विभाग के डायरेक्टर ने तत्कालीन राष्ट्रपति मैककिल्ले को सलाह दी थी कि अब इस विभाग को बन्द कर दिया जाय। क्योंकि जितने आविष्कार अब तक हो चुके हैं उनसे आगे और कोई आविष्कार होने की गुंजाइश नहीं रही। पर हम देखते हैं कि इसके बाद पिछली पौन शताब्दी में कितने अधिक आविष्कार हुए और पेटेन्ट डायरेक्टर का अनुमान कितना गलत निकला।

अब तक कितने धर्म सम्प्रदाय निकल चुके, आचार संहिताएं बन चुकीं, योग और अध्यात्म की खोज हो चुकी अब इससे आगे कुछ सोचने करने को बाकी नहीं रह गया-यह आज भले ही माना जाता हो, पर कल बतायेगा कि प्रगति की सम्भावना अभी और भी बहुत कुछ विद्यमान है। समस्त विश्व का एक धर्म, एक आचार, एक शास्त्र, एक राष्ट्र, एक भाषा, एक लक्ष्य होना आज भले ही समझ में न आये पर कल यह नया आविष्कार होने ही वाला है। और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’-कृष्वन्तोविश्व आर्षम् की प्राचीन कल्पना को अगले दिनों साकार होना है आज असम्भव दीखने वाला यह भविष्य कल प्रत्यक्ष हो चले तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए इस दुनिया में न कुछ सम्भव है न आश्चर्य।

अब से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व विज्ञानी यह मानते थे कि हवा से भारी वजन की चीजों का आसमान में उड़ जाना कभी भी सम्भव न होगा। जब पहला हवाई जहाज बना और उसके आसमान में उड़ने की सूचना अखबारों को दी गई तो उन्होंने उसे ‘गप्प’ कह कर छापने से इनकार कर दिया। पहली बार बिना आदमी बिठाये जहाज उड़ा दूसरी बार आदमी बिठा कर उसने उड़ान की। तब ‘पापुलर साइन्स’ अखबार ने बड़ी बेरुखी के साथ सिर्फ इतना छापा-’यह खेल-तमाशे जैसे छुट-पुट काम ही कर सकेगा। किसी बड़े प्रयोजन में इसके आ सकने की आशा नहीं करनी चाहिए।

जब हवाई जहाज अपनी प्रौढ़ावस्था में आ गये, भारी बोझ लेकर वे द्रुतगति से बढ़ने लगे तो वैज्ञानिकों ने भावी महत्वाकाँक्षाओं का निषेध किया। शब्द की गति से अधिक तीव्रता लाया जाना सर्वथा अशक्य है, एक स्वर से वैज्ञानिकों ने यही कहा। शब्द की गति प्रति घण्टा 660 मील है। इससे अधिक गति वायुयान की हो सकती है इसे मानने के लिए कोई तैयार न था। पर प्रगति होती रही। बोइंग 707 की चाल 550 मील हुई। इसके बाद वी0सी0 10 ने 600 मील की चाल बढ़ा दी। जब ‘ग्लैमरस ग्लेसिस प्रति घण्टा 670 मील की चाल से उड़ा और उसने शब्द की गति का अतिक्रमण कर लिया तो वैज्ञानिकों को पिछली भूल सुधारनी पड़ी और कहना पड़ा ‘गति’ को कितना ही अधिक बढ़ाया जा सकता है। भविष्य में कर्न्कड वायुयान 1500 मील की चाल से उड़ेंगे। अन्तरिक्ष यान अभी भी 25 हजार मील की चाल से उड़ रहे हैं। भविष्य में उनकी चाल 50 हजार मील हो जायगी। योजना तो 6 लाख मील प्रति घण्टे चलने वाले अन्तरिक्ष यानों की भी है।

चिरकाल से एक ढर्रे पर मन्थर गति से लुढ़कती चली आ रही समाज व्यवस्था में अब कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, उसे द्रुतगामी नहीं बनाया जा सकता; यह सोचना ठीक नहीं। नये समाज के आधार और सिद्धान्त अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं। मनुष्य के सोचने और करने का प्रतिगामी ढर्रा बदल सकता है। स्वार्थ भरी संकीर्णता एवं अवाँछनीय ध्वंसात्मक प्रवृत्ति का परिशोधन करके उन्हें सुरुचि सम्पन्न बनाया जा सकता है। खारी समुद्र के जल को अणु ऊर्जा से उबाल कर मीठे पानी के रूप में बदल देने की योजना यदि सही है तो नव-निर्माण की यह योजना गलत कैसे हो सकती है कि जन-मानस में इन दिनों भरा हुआ कड़ुआ पन-खारी पन भी सौजन्य के मिठास से बदल दिया जायगा।

खगोलवेत्ता चिरकाल से यह मानते चले आ रहे थे कि-कभी कोई व्यक्ति भूमध्य रेखा पार न कर सकेगा। क्योंकि उस क्षेत्र में सूर्य की किरणें सीधी पड़ने के कारण इतनी गर्मी होगी कि समुद्र भी खौले। इस क्षेत्र में यदि कोई जहाज निकलेगा तो जलकर खाक हो जायेगा। खगोल विद्या के इस सनातन प्रतिपादन को पुर्तगाल के हेनरी ने भूमध्य रेखा को पार करके असत्य सिद्ध कर दिया।


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एक ऐसे मनुष्य समुदाय की अपेक्षा जिसमें कि सभी व्यक्ति एक विचार के न हों तथा उन पर किसी एक शक्ति का नियन्त्रण न हो, भेड़ियों का समूह अधिक शान्त तथा समभाव का होता है।

असुरता अभेद्य है। शैतान का पंजा फौलादी है। उसे अब तक नहीं तोड़ा जा सका यह सोच कर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मानवीय प्रकृति और संसार की परिस्थितियों में परिवर्तन हो सकता है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो सकता है। इस मान्यता एवं चेष्टा को असंभाव्य मानने की आवश्यकता नहीं है।


पंचशील

पञ्चनद की प्रजा में कलह, अव्यवस्था, अनुशासनहीनता देखकर नरेश बहुत दुखी हुये उन्होंने आचार्य देवधर को कुरु जाने और वहाँ की प्रजा के जीवन का अध्ययन करके आने को कहा ताकि वह व्यवस्थायें अपने यहाँ भी लागू की जा सकें और प्रजा को सुखी बनाया जा सके।

आचार्य देवधर कुरु देश में राजपुरोहित नन्द पंडित के पास गये और उनसे धर्मोपदेश करने की याचना की। नन्द पंडित ने कहा-तात! राज्य का राजस्व विभाग मैं सँभालता हूँ। एक बार एक कृषक की जमीन नाप रहा था। नापते समय बीच में एक गढ्ढा आ गया। उसमें एक नन्हा सा जीव बैठा था। मेरे सामने समस्या आ खड़ी हुई यदि मापदण्ड को गड्ढे से आगे बढ़ाकर रखता तो एक किसान को जमीन कम मिलती। असमंजस में पड़ा था तभी वह जीव गड्ढे के एक बिल में घुस गया मैंने मापक दण्ड टेक दिया तभी जीव के चिंचियाने की आवाज आई कह नहीं सकता कि उसने अकारण आवाज की या मुझसे हिंसा हुई तब से मन खट्टा रहता है आप मेरे सारथी के पास चले जाइये वह दया, धर्म का पालन करता है और उपदेश का अधिकारी है।

आचार्य सारथी के पास गये और वही प्रार्थना की-सारथी ने बताया आर्य! मैंने एक बार वर्षा से बचाव के लिये अपने घोड़ों को चाबुक दिखा दी, घोड़े डर कर तेज दौड़ने लगे पर मुझे लगता है कि उस दिन मेरा दया बरतने का शील नष्ट हो गया आप सेठ सारिपुत्र के पास चले जाइये वह आपका काम कर देंगे।

आचार्य सारिपुत्र के पास गये। सारिपुत्र ने बताया-आर्य श्रेष्ठ! मैं वणिक-व्यापार करता हूँ एक बार मैंने एक कृषक के धान मोल लिये धान महाराज के सुरक्षित अन्न भण्डार के लिये खरीदे गये थे। खरीदते समय एक ऐसी ढेरी आ गई जो तौली जा चुकी थी पर मुझे यह स्मरण नहीं रहा कि यह राजा के हिस्से की है या कृषक के-घर जाने की जल्दी थी सो उसे राजा के हिस्से में मिलवा दिया-लगता है इससे मेरी वणिक नीति अपराधी हो गई आप बताइये अब मैं किस प्रकार धर्मोपदेश करूं। आप द्वारपाल पुण्ण के पास चले जाइये वे आपको धर्म का मर्म समझाएंगे।

देवधर अब पुण्ण के पास गये द्वारपाल ने बताया-श्रीमान जी मैं दुर्ग का रक्षक हूँ। एक दिन जब कोटद्वार बन्द करने का समय हुआ तब मैंने एक पुरुष को सुन्दरी युवती के साथ कुछ विलम्ब से आते देखा। पास आने पर मैंने उसे डाँटा तुम इतने समय तक रस-विहार करते हो समय पर अन्दर क्यों नहीं आते। लेकिन जब मुझे मालुम पड़ा कि युवती आगन्तुक की बहन थी और वह अपनी ससुराल से आ रही थी तो मुझे बड़ा पश्चाताप हुआ दृष्टि दोष के कारण मैं अपने क्षात्र धर्म से च्युत हो गया हूँ। आप उत्पल वर्णा वैश्या के पास जाइये वह आपको उपदेश देगी।

आचार्य उत्पलवर्णा के पास गये और अपना मन्तव्य कहा-उत्पल बोली-आचार्य श्रेष्ठ! एक बार राजकुमार चन्द्रसेन मेरे पास आये। मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं अपना शरीर केवल तुम्हें ही समर्पित करूंगी। वे बोले मैं बाहर जा रहा हूँ तीन वर्ष मेरी प्रतीक्षा करना। यदि न आऊँ तो किसी भी पुरुष को वरण करने को स्वतन्त्र होओगी। तीन वर्ष पश्चात् भी वे न आये तो मैंने न्यायाधीश से आज्ञा प्राप्त कर पेट-पालन के लिये दूसरे पुरुष का आश्रय लेने का निश्चय किया। मैं एक व्यक्ति से अभी बातें कर ही रही थी कि चन्द्रसेन आ गये। मैं तबसे अपने आप को अपराधिनी सी पाती हूँ। बताइये कैसे उपदेश करूं।

आचार्य देवधर को धर्म का मर्म मालूम हो गया। पंचशील-उन्होंने विचार किया-जिस देश की प्रजा पञ्चशील

का तत्परतापूर्वक पालन करती है वह सुखी रहती है यह निश्चय कर वे पञ्चनद लौट आये और पञ्चशील धर्म का उपदेश करने लगे जिससे वहाँ की प्रजा फिर सुखी हो गई-पञ्चशील अर्थात् अहिंसा, दया, न्याय, सुदृष्टि और सच्चरित्रता।


अनास्था हमें प्रेत-पिशाच बना देगी

धर्म अध्यात्म का परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने और धार्मिक जीवन जीने से परलोक से सद्गति प्राप्त होती है और आत्मा को शान्ति मिलती है। इतना ही नहीं वरन् व्यावहारिक जीवन में भी उसकी बड़ी उपयोगिता है, व्यक्ति को सुखी और समाज को समुन्नत बनाने में अध्यात्म दर्शन की कम उपयोगिता नहीं है।

कर्मफल, संयम, सदाचार, परोपकार, प्रेम, उदारता, कर्तव्यपालन जैसे अनेक विश्वास का सौर-मण्डल धर्मरूपी सूर्य के इर्द-गिर्द घूमता है। अध्यात्म सर्वथा एकाकी नहीं है। आस्तिकता का मतलब, मात्र ईश्वर की पूजा-पत्री कर देना नहीं वरन् यह भी है कि ईश्वर की इच्छा और विधि व्यवस्था को समझें और तदनुकूल अपने जीवन की रीति-नीति ढालने के लिए प्रयत्न करें। स्वर्ग, नरक और परलोक की मान्यता मानवी अन्तःकरण को देर-सवेर से कर्मफल मिलने का विश्वास दिलाती है। इससे आस्थावान व्यक्ति पुण्य का श्रेय या पाप का दण्ड तत्काल न मिलने पर भी उस ओर से निश्चिन्त नहीं हो जाता वरन् यह विश्वास रखे रहता है कि आज नहीं तो कल-यहाँ-नहीं तो वहाँ भले-बुरे कर्मों का फल मिल कर ही रहेगा। इस आस्था को बनाये रहना मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व में अवाँछनीयता न बढ़ने देने के लिए एक अति प्रभावशाली अंकुश है। अध्यात्म की मान्यता व्यक्ति को सदाचरण और आदर्शवादी कर्तव्य पालन के लिए घाटा उठाने तक के लिए प्रोत्साहित करती है। यही वे प्रवृत्तियां हैं जिन पर व्यक्ति का स्तर और समाज का गठन सुव्यवस्थित और समुन्नत रखा जा सकता है।

उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति यदि आस्थायें लड़खड़ाने लगें तो हर व्यक्ति स्वार्थपरायण होने की दिशा में अधिकाधिक तेजी के साथ बढ़ेगा। फलतः पारस्परिक स्नेह सद्भाव की-सहयोग और उदारता की उन सभी प्रवृत्तियों का अन्त हो जायगा जिनमें मनुष्य को कुछ त्याग करना पड़ता है और कष्ट उठाना पड़ता है।

समाज का ऋण हमारे ऊपर है, उसे चुकाने के लिए हमें समाज सेवा का अनुदान प्रस्तुत करने चाहिए। माता-पिता तथा गुरुजनों की सहायता से हम पले, बड़े हुए तथा स्वावलम्बी बने हैं, इस पितृऋण को चुकाने के लिए हमें तत्पर रहना चाहिए। पति-पत्नी में से किसी के अरुचिकर हो जाने पर भी उसकी पिछली सद्भावना के लिए ऋणी रहने तथा निबाहने को तत्पर रहना चाहिए। सबमें अपनी जैसी आत्मा समझ कर न्याय और ईमानदारी पर दृढ़ रहना चाहिए। यह शिक्षाएं धर्म ही दे सकता है। स्वार्थ नियन्त्रण और परमार्थ उत्साह की प्रेरणा अध्यात्म आदर्शों को अपनाने से ही मिल सकती है।

यदि इन आभारों को अस्त-व्यस्त कर दिया जाय तो मनुष्य जाति को ऐसी क्षति उठानी पड़ेगी जिसकी कभी भी पूर्ति न हो सके। आस्थाएं बड़ी कठिनाई से बनती और जमती हैं। उन्हें उखाड़ देना सरल है। पेड़ को छायादार होने में लम्बी साधना करनी पड़ती है पर यदि उखाड़ना हो तो कुछ घण्टे की काट-छाँट ही पर्याप्त है। धार्मिकता को कल्याणकारी वृक्ष बौने-उगाने और बढ़ाने में लाखों वर्ष लगे हैं। अनास्था का प्रतिपादन करके उसे उखाड़ देना कुछ बहुत कठिन नहीं है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे दुबारा लगाया जाना सम्भव न होगा। विश्वासी को अविश्वासी बनाने के उपरान्त फिर दुबारा उसी स्थान पर लौटा कर ले आना कठिन है।

तर्क एक अन्धा तीर है। उसे किसी भी दिशा में छोड़ा जा सकता है। कई वकील लोग अपने मुवक्किल के पक्ष में धुँआधार दलील देते और बहस करते हैं। उनकी तर्क शैली प्रखर होती है। वस्तुस्थिति जानने पर वे जोर नहीं देते। वादी या प्रतिवादी जो भी सामने आ जाय तो उसी के पक्ष में तर्क दलील या प्रमाण उपस्थित करते हैं। मस्तिष्क ऐसा ही बेपेंदी का लोटा है। वह रुचि के पीछे चलता है। जो भी बात पसन्द हो उसी के समर्थन में बहुत कुछ कहा जा सकता है। दलील भी दी जा सकती है।और प्रमाण उदाहरण भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं। धर्म एवं अध्यात्म के विरुद्ध बहुत कुछ कह सकना कुछ बहुत कठिन नहीं है। तेज दिमाग के लिए यह बाँये हाथ का खेल है।

देखना यह है कि क्या अनास्था उत्पन्न करने से व्यक्ति या समाज को कुछ लाभ भी मिलेगा? इस दिशा में जितना अधिक चिन्तन किया जाय उतना ही स्पष्ट होता जायगा कि उसमें लाभ की तुलना में हानि अधिक है।

आस्तिकता मात्र पूजा पाठ तक सीमित नहीं है उसके शाखा पल्लव सदाचार, कर्तव्य पालन और उदार व्यवहार तक फैले हुए हैं। जड़ के उखाड़ने से वह सभी उखड़ जायेंगे। क्योंकि भौतिकवादी दर्शन में स्वार्थ साधन ही मुख्य है। मांसाहार के पक्ष में यही दलील है कि स्वादिष्ट भोजन के अपने लाभ के लिए दूसरे को प्राण देने का भयानक कष्ट सहना पड़ता है तो उसकी हम चिन्ता क्यों करें? स्वार्थ प्रधान हो गया तो दूसरों की सुविधा-असुविधा अथवा न्याय-अन्याय की बात क्यों सोची जायगी?

अनास्था का जितना विस्तार हो रहा है उसी अनुपात से आदर्शवादिता का सारा ढाँचा लड़खड़ाने लगा है। जब ईश्वर नहीं, धर्म नहीं, परलोक नहीं, कर्म-फल नहीं, आत्मा नहीं तो फिर कर्तव्य पालन भी नहीं, स्वार्थों पर नियमन भी नहीं, आदर्शों के झमेले में पड़कर स्वयं असुविधा उठाने की भी आवश्यकता नहीं। यह ‘नहीं’ व्यक्ति की पशुता को बढ़ायेगी और समाज की मूलभूत आधार-उदार व्यवहार का अन्त करेगी। जैसे-जैसे अनास्था परिव्याप्त और प्रबल होती जायगी वैसे-वैसे उच्छृंखल आचरण, सिद्धान्त ही जीवन और अपराधी प्रवृत्तियों के उद्भव को आँधी, तूफान की तरह बढ़ता हुआ देखा जा सकेगा। ऐसा समाज किस के लिए? कितना? किस प्रकार सुविधाजनक होगा उसकी बहुत कुछ झाँकी इन दिनों की परिस्थितियों में भी जहाँ-तहाँ की जा सकती है।

इंग्लैण्ड के प्रख्यात पत्र ‘स्पेक्टेटर’ में कुछ समय पूर्व एक लेख उस देश के वृद्ध व्यक्तियों की दयनीय दशा की विवेचना के संदर्भ में छपा था सन्तान की ओर से पूरी तरह उपेक्षित इन असमर्थ व्यक्तियों को उस संतान का रत्ती भर भी सहयोग नहीं मिलता, जिनके लालन-पालन और स्वावलम्बन में उन्होंने भावनापूर्वक उदार सेवा की थी। लेखक ने इन दुखियों की मनोदशा का चित्रण करते हुए लिखा है-इस देश के अधिकाँश वृद्धजन अपनी असमर्थ स्थिति में सन्तान की रत्ती भर भी सेवा सहानुभूति नहीं पाते तो यह करुण विलाप करते हैं कि हे भगवान! किसी तरह मौत आ जाये तो चैन मिले। पर उनकी पुकार कोई भी नहीं सुनता। दुखियारे वृद्धों का यह वर्ग द्रुतगति से बढ़ता ही जाता है।

कोरोनर (लन्दन) के डॉक्टर मिलन को पिछले दिनों 700 दुर्घटनाग्रस्त मृत शवों का विश्लेषण करना पड़ा। उनमें एक तिहाई आत्महत्या के कारण मरे थे इन आत्महत्या वालों में अधिकाँश ऐसे बूढ़े लोग थे, जिन्हें बिना किसी सहायता के जीवन यापन भारी पड़ रहा था और उनने इस तरह घिस-घिस कर मरने की अपेक्षा नींद


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मानव का अन्तःकरण ही ईश्वर की वाणी है।

-वायरन

की अधिक गोलियाँ खाकर मरना अधिक अच्छा समझा। इन आत्महत्या करने वालों में दो-चार को छोड़ कर सभी सन्तान वाले थे। किन्तु वयस्क होने के बाद सन्तान ने उनकी ओर मुँह मोड़ कर भी नहीं देखा था।

बूढ़े अभिभावकों की ही यह दुर्गति हो रही हो सो बात नहीं। पाश्चात्य जगत में बच्चों की भी एक विपत्ति में गणना होने लगी है। माँ-बाप उन्हें अभिशाप मानते हैं और बच्चे सहमे सिसके किसी तरह अनाथालय की तरह अपनी अल्पवयस्कता की अवधि पूरी करते हैं। पति-पत्नी मिलन जब विशुद्ध रूप से कामुक प्रयोजन के लिए ही रहा तो उसी की प्रधानता रहनी चाहिए। बच्चे जब पेट में आते हैं या जन्म लेते हैं तो अपनी माँ को पिताजी की इच्छापूर्ति में उतनी उपयुक्त नहीं रहने देते। यह पिता के लिए भी क्रोध की बात है और माता के लिए भी। प्रजनन-निरोध कृत्य वहाँ का अति लोकप्रिय प्रचलन है फिर भी कभी-कभी बच्चों की विपत्ति सिर पर आ टपकती है। उन जन्मे हुए बच्चों से कब किस प्रकार पीछा छूटे यह चिन्ता अभिभावकों को रहती है।

सौंदर्य को हानि न पहुँचे इसलिए बच्चों को माता का नहीं बोतल का दूध पीना पड़ता है। अधिकाँश बच्चे-पालन गृहों में पलते हैं। पैसा दे दिया जंजाल से छुट्टी। घूमने-फिरने हँसने-खेलने की सुविधा। जैसे ही बच्चा कमाऊ हुआ कि माता-पिता से उसका कोई संबंध नहीं रहता। पशु-पक्षियों में भी तो यही प्रथा है। उड़ने चरने लायक न हों तभी तक माता उनकी सहायता करती है। बाप तो उस स्थिति में भी ध्यान नहीं देता। प्रकृति ने बच्चों की जीवन रक्षा के लिए यदि माता के हृदय में स्वाभाविक ममता उत्पन्न न की होती तो अनास्थावान मातायें भी बच्चों की साज-सँभाल करने में रुचि न लेती और माता की निगाह बदलने पर बाप तो उनकी ओर आँख उठाकर भी न देखता।

अनास्थावान मनोभूमि वाले माता-पिता के दृष्टिकोण का बच्चों के प्रति बेरुखा हो जाना स्वाभाविक है। और ऐसी दशा में यदि वे बुढ़ापे में अभिभावकों की कोई सहायता नहीं करते और उन्हें कुत्ते की मौत मरने के लिए छोड़ देते हैं तो उन्हें कुछ बहुत दोष भी नहीं दिया जा सकता। आखिर वे भी तो बूढ़े होंगे और उन्हें अपने बच्चों का नीरस बुढ़ापा बिताने की बात ही सोचते हैं। ऐसी दशा में मौत के दिन गिनने वाले बूढ़े माता-पिता की वे उपेक्षा अवज्ञा करते हैं तो उन्हें दोष भी कैसे दिया जाय?

अभिभावकों और बच्चों के बीच आदर्शहीनता ने दीवार खड़ी कर दी है। उससे भी बड़ी विडम्बना पति-पत्नी के बची खड़ी है। वेश्या जिस तरह शरीर सौंदर्य से लेकर वाक्जाल तक के रस्सों से भड़ुए को बाँधे रहने की चाल चलती रहती है, वही नीति औसत पत्नी को अपने पति के साथ बरतनी पड़ती है। तथ्य से वह परिचित है। कामुकता की तृप्ति ही विवाह का उद्देश्य है। जब तक वह प्रयोजन खूबसूरती से सधेगा तभी तह विवाह चलेगा। आर्थिक सुविधा का दूसरा पहलू भी विवाह के साथ जुड़ गया है। इन स्वार्थों की शतरंज ही दांपत्य जीवन है। जो बाजी हार जाता है उसे भागना पड़ता है। एक घर में रहते हुए भी-एक बिस्तर पर सोते हुए भी-दोनों एक दूसरे को आस्तीन का साँप समझते रहते हैं और बारीकी से यह पता लगाते रहते हैं कि साथी के द्वारा उसके शरीर में डंक चुभोये जाने में कितनी देर है। प्रेम-पत्र और लम्बे-चौड़े वायदे तथा हाव-भावों का आकर्षण वहाँ एक ‘टेकनीक’ मात्र रह गये हैं। उस विडम्बना की निस्सारता समझते हुए भी बंधन में बँधने से पूर्व जो दौर उनका चलता था विवाह के बाद भी चलाते रहना पड़ता है। ताकि साथी को भ्रम में रखा जा सके। साथ ही दूसरा घोंसला बनाने दूसरी चिड़िया फँसाने का भी अपना-अपना ताना-बाना बुनते रहते हैं।

इन दाम्पत्य जीवनों का जो ढाँचा खड़ा रहता है और जिस प्रकार अन्त होता है उससे निराशा और दुख ही हाथ लगता है। बाहर आदमी कैसी ही तड़क-भड़क बनाये फिर, पर पारिवारिक जीवन में भी विश्वास, निष्ठा, आत्मीयता का अभाव रहने पर मनुष्य अपने आपको सर्वथा एकाकी और असहाय अनुभव करता रहता है। न कोई उसका न वह किसी का, वास्तविकता सामने रहती है। छल और दिखावे का ताना-बाना यदि स्त्री-बच्चों के साथ भी बुनते रहना पड़े तो मन कितना भारी, कितना उदास और कितना क्षुब्ध और कितना उखड़ा-उखड़ा रह सकता है, इसकी कल्पना करने से भी कष्ट होता है। फिर जिन लोगों को सारा जीवन इसी वातावरण से भरे पारिवारिक जीवन में बिताना पड़ता है-उनकी क्या गति होगी, उसे अनास्थावान भौतिकवादी पश्चिम के देशों में जाकर प्रत्यक्ष ही देखना चाहिए।

बाहरी ठाठ-बाट शौक-मौज के मन-बहलाव से क्या बनता है, आन्तरिक निराशा हर घड़ी खाती रहती है। नशे पीकर गम गलत करते रहते हैं और आन्तरिक उद्वेगों की आग में मरघट की चिता बनकर जलते रहते हैं।

इंग्लैण्ड के डॉक्टरी पत्र ‘ब्रिटिश मेडीकल जनरल’ में उस देश में बढ़ते हुए पागलपन का विस्तृत विवरण छपा है। उसमें लिखा है-इस देश में पागलों, अर्ध-विक्षिप्तों और सनकियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अस्पताल में जितने रोगी भरती होते हैं, उनमें से प्रायः आधे मानसिक रोगों से पीड़ित होते हैं। गत पाँच वर्षों में यह संख्या प्रायः दस गुनी हो गई है।

नींद की गोलियाँ खाये बिना किन्हीं विरले को ही सोना नसीब होता है। मानसिक तनाव से उत्पन्न अनिद्रा वहाँ का एक सभ्य रोग है। शराब पिये बिना चैन नहीं। आखिर भीतरी उद्वेग को दबाने के लिए नशे के अतिरिक्त और किस का सहारा लिया जाय?

ईश्वर से, धर्म से, बच्चों पर से, स्त्री से, अभिभावकों से, समाज से, अपने आप पर से विश्वास खोकर अनास्थावान व्यक्ति सब कुछ खोया-पीया ही अनुभव करता है। जब आत्मा कोई अस्तित्व नहीं, मरणोत्तर जीवन की आशा नहीं और शरीर के साथ ही अपने अस्तित्व का अन्त होने वाला है तो फिर थके हारे, बूढ़े, घिसे व्यक्ति की आँखों में आशा की चमक कहाँ से आ सकती है? जवानी में भी मनुष्य जो कुछ देखता है सब कुछ निरर्थक, निरुद्देश्य, नीरस पाता है। ऐसी दशा में वह निरर्थकतावादी बन जाय तो आश्चर्य ही क्या है? हिप्पीवाद इसी नीरस निरर्थक जीवन की निरंकुश अभिव्यक्ति है। अभी इसका आरम्भ है। अनास्था जितनी ही प्रखर होगी यह क्रम उतना ही उग्र होता चला जायगा। इसका अन्त कहाँ होगा यह सोचते हुए भी सिर चकराता है। हो सकता है इसी आग में झुलस कर सभ्यता और संस्कृति का अस्तित्व भी समाप्त हो जाय।

धर्म-विरोधी विचारधारा के प्रचारक और प्रख्यात दार्शनिक लार्ड वेवरिज ने मृत्यु से कुछ समय पूर्व अपने मित्र इटली के प्रोफेसर बलडी को एक मार्मिक पत्र लिखा। उसमें उनने कहा-”धर्म ध्वजियों के अनाचार से क्षुब्ध होकर मैंने धर्म विरोधी प्रतिपादन किया था पर उस आवेश में यह ध्यान न रहा कि-अनास्था फैल जाने पर लोग साधारण मानवीय कर्त्तव्य की भी उपेक्षा करने पर उतारू हो जायेंगे। मेरा प्रयत्न वास्तविकता प्रकट करने का था, इस अंश में वह प्रतिपादन अभी भी सही है कि धर्म को जिस रूप में इन दिनों समझा जा रहा है वह भ्रान्त है। फिर भी मूल धर्म प्रवृत्ति का उन्मूलन उचित नहीं। उसके कारण उत्पन्न नैतिक उच्छृंखलता व्यक्ति और समाज के लिए घातक ही सिद्ध होती है। अनास्थावान व्यक्तियों की गतिविधियों को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वे धर्म व्यवसायियों एवं धर्म भीरुओं की अपेक्षा कम नहीं-अधिक बुरे सिद्ध हो रहे हैं।”


दुःखी वे रहते हैं जो अज्ञान ग्रस्त हैं

‘लू’ नगर की एक पिछड़ी बस्ती में रहते थे, दार्शनिक ‘युआन सीन’ फूँस की झोपड़ी, टूटा छप्पर, गीला फर्श, मटकों से बनी खिड़की। ऐसे टूटे-फूटे घर में वे रहते थे और फुरसत के वक्त मस्ती से भरे हुए एक तारा बजाया करते थे।

अमीर ‘त्सी कुँग‘ अपनी शानदार बग्घी में बैठकर उनसे मिलने गये। गली इतनी छोटी थी कि बग्घी उसमें घुस न सकी। उन्हें पैदल जाना पड़ा।

युआन सील अतिथि का स्वागत करने दरवाजे पर आये। फटा जूता, पत्तों की टोपी, पुराने कपड़े पहने उन्हें देख कर कुँग ने कहा - ओह, सन्त आप दुखी, दरिद्र, संकटग्रस्त।

युआन मुसकराये और बोले - मैंने सुना है - धन के अभाव में मनुष्य गरीब भर रहता है। दुःखी वे, रहते हैं जो अज्ञान ग्रस्त हैं। बताओ तो-मैं गरीब हुआ या दुःखी?

त्सी कुँग सिटपिटाये से एक कोने में खड़े थे।


शारीरिक विद्युत और उसका अद्भुत उपयोग

नृतत्व विज्ञानियों को यह बात बहुत दिन से मालूम थी कि शरीर में जाल की तरह फैले हुए ज्ञान तन्तु मस्तिष्क तक कायगत जानकारियाँ पहुँचाते हैं और मस्तिष्क स्थिति को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक निर्देश देता है तदनुसार अवयव अपना-अपना काम करते हैं। पर यह सब होता किस पद्धति से है इस रहस्य पर पर्दा ही पड़ा हुआ था। ज्ञान तन्तु का स्पर्शानुभव के क्षणभर में मस्तिष्क तक पहुँचना किस आधार पर सम्भव होता है इसका कुछ पता नहीं चल पा रहा था।

पिछले 40 साल से इस संदर्भ में बहुत प्रयोग चल रहे थे। बीस वर्ष से तो जीव भौतिकी की इस शाखा पर और भी अधिक ध्यान दिया गया। अन्त में बहुत लम्बे प्रयोग परीक्षणों के उपरान्त इस रहस्य पर से पर्दा उठाने में तीन वैज्ञानिक सफल हो गये और उन्हें इस शोध के उपलक्ष में चिकित्सा शास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला, इन तीनों के नाम हैं (1) हाजकिन (2) हक्सले (3) एकल्स।

इस त्रिगुट ने ज्ञान तन्तुओं में एक विद्युत आवेग (इंपल्स) की खोज की है और बताया कि यह बिजली किस तरह तन्तुओं और मस्तिष्कीय कोषों के बीच दौड़ती है और टेलीफोन की तरह स्थिति का संवाद संकेत पहुँचाती-लाती है। ज्ञान तन्तु एक प्रकार के बिजली के तार हैं जिन पर विद्युत आवेगों के साथ सन्देश दौड़ते हैं। एक-एक तन्तु की लम्बाई कई-कई फुट होती है। सब मिलाकर पूरे शरीर में इनकी लम्बाई एक लाख मील से भी अधिक होती है। इनकी मोटाई एक इंच के सौवें भाग से भी कम होती है।

हमारे मस्तिष्क में लगभग 10 अरब नस कोष्ट (न्यूरान) हैं। उनमें से हर एक का संपर्क लगभग 25 हजार अन्य नस कोष्ठों के साथ रहता है। इतनी छोटी सी खोपड़ी में इतना बड़ा कारखाना किस प्रकार सँजोया जमाया हुआ है इसे देखकर बनाने वाले की कारीगरी पर चकित रह जाना पड़ता है। यदि मनुष्य इतना साधन सम्पन्न इलेक्ट्रानिक मस्तिष्क बनाकर खड़ा करना चाहे तो प्रस्तुत विद्युत उपकरणों के आधार पर इस कारखाने के लिए इस धरती जितनी जगह घेरने की आवश्यकता पड़ेगी।

ज्ञान तन्तुओं से प्रवाहित होने वाले विद्युत आवेग एक सैकिण्ड में 300 फुट सैकिण्ड के हिसाब से दौड़ते हैं। यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस मानवीय विद्युत की चाल इतनी कम क्यों है जब कि टेलीफोन व्यवस्था के अनुसार शुद्ध बिजली प्रति सैकिण्ड 1,86,000 मील के हिसाब से दौड़ती है। इसका उत्तर यह है कि टेलीफोन में विशुद्ध बिजली रहती है जबकि ज्ञान तन्तुओं में एकाकी विद्युत संचार नहीं-उसके साथ रासायनिक क्रिया-कलाप भी जुड़ा रहता है।

आवेग नस संपर्क (साइनेप्स) अगले कोष्ठीय भाग के बीच की खाली जगह को लाँघकर सामने के कोष्ठीय भाग तक-आवेग उत्तेजन के क्रम से आगे बढ़ता है। इन आवेग अवरोधों को अन्तर्वाधन (इह्निविशन) कहते हैं। नस रेशों के अन्दर ऋण विद्युत रहती है उसके बाहर योग विद्युत है। इनमें सोडियम और पोटेशियम की विद्यमान मात्रा रासायनिक उपयुक्तता बनाये रहती है। इसी प्रक्रिया से संबद्ध एक ऐसा रासायनिक पदार्थ है-ट्राँसमिशन सब्स्टेंस। विद्युत कणों और रासायनिक पदार्थों की सम्मिश्रित प्रक्रिया ही इस कायगत सञ्चार व्यवस्था को गतिशील बनाये हुए हैं। इस तथ्य के रहस्योद्घाटन से वैज्ञानिकों की कैथोड के-आसिलोग्राफ-आइसोटोप टेक्निक तथा अन्य कतिपय प्रक्रियाओं को अपनाना पड़ा। अब ज्ञान तन्तुओं से प्रवाहित विद्युत आवेगों की यथार्थता और उनकी गति-विधियों के बारे में इतनी जानकारी उपलब्ध है जिसे शंका का समाधान कहकर सन्तोष किया जा सके। निस्सन्देह मनुष्य एक जीता-जागता बिजली घर है। झटका मारने वाली और बत्ती जलाने वाली स्थूल बिजली की अपेक्षा वह असंख्य गुनी परिष्कृत और संवेदनशील है। जड़ और चेतन बिजली का भावनाओं से कोई संबंध नहीं वह कसाई और सन्त का भेद नहीं करती, जो भी उससे काम ले सके उसकी विधि व्यवस्था पूरी कर सके उसका उत्तेजन पूरा करने लगती है। उचित अनुचित का भेदभाव कर सकने लायक सम्वेदना उसमें हैं ही नहीं।

मानव शरीर में संव्याप्त विद्युत में चेतना और सम्वेदना के दोनों तत्व विद्यमान हैं। इसलिए उसे मात्र नाड़ी जाल समुत्पन्न या संव्याप्त ही कहकर सीमित नहीं कर सकते। भले ही वह ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से समस्त शरीर पर शासन करती हो, भले ही उसका प्रत्यक्ष केन्द्र मस्तिष्क में अवस्थित प्रतीत होता है पर सही बात यह कि वह आत्मा की प्राण प्रतिभा है और उसकी भावनात्मक स्थिति से प्रभावित होती है। मनुष्य का अन्तरंग जैसा भी कुछ होता है उसके अनुरूप इस चेतन विद्युत की दुर्बलता-सशक्तता दृष्टिगोचर होती है।

किसी के शरीर को छूने से प्रत्यक्ष झटका लगे इस स्तर का अनुभव इस कायिक विद्युत का नहीं होता, इसलिए मोटे विद्युत उपकरणों से वह देखी समझी नहीं जाती उसका भौतिक स्वरूप जानना हो तो उन उपकरणों की आवश्यकता पड़ेगी जो नोबेल पुरस्कार विजेता हाजकिन प्रभृति वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में प्रयुक्त किये थे। पर भावनात्मक स्पर्श से इसका प्रभाव दूसरे लोग भी अनुभव कर सकते हैं। किसी उच्च मनोभूमि के व्यक्ति के पास बैठने से अपनी मनोभूमि में उसी तरह की हलचल उत्पन्न होती है और दुष्ट दुराचारियों की संगति में मन, बुद्धि तथा इन्द्रिय संवेदनाओं में उसी प्रकार का उत्तेजन आरम्भ हो जाता है। व्यभिचारियों के सान्निध्य में बैठने से अकारण ही दुराचार का आकर्षण मन में उठने लगता है। सत्संग की महत्ता को जो प्रतिपादन अध्यात्म शास्त्र में किया गया है उसका कारण मात्र शिक्षा प्राप्ति नहीं है, वरन् यह भी है कि उन महापुरुषों के शरीर से निकलने वाले और समीपवर्ती क्षेत्र में फैलने वाले विद्युत प्रवाह की ऊर्जा से लाभ उठाया जाय।

चरण स्पर्श करने की प्रथा के पीछे यही रहस्य है कि तेजस्वी व्यक्तियों के शरीर को स्पर्श करके उनके विद्युत का एक अंश ग्रहण किया जाय। ताप का मोटा नियम यह है कि अधिक ताप अपने संस्पर्श में आने वाले न्यून ताप उपकरण की ओर दौड़ जाता है। एक गरम एक ठण्डा लौह खण्ड सटा दिया जाय तो ठण्डा गरम होने लगेगा और गरम ठण्डा। वे परस्पर अपने शीत ताप का आदान-प्रदान करने लगेंगे। ऐसा ही लाभ चरण स्पर्श से होता है। अधिक सामर्थ्यवानों का लाभ स्वल्प सामर्थ्यवानों को मिलने में शरीर स्पर्श की प्रक्रिया बहुत कारगर होती है।

गुरुजनों का स्नेह से छोटों के सिर पर हाथ फिराना पीठ थपथपाना जैसा वात्सल्य प्रदर्शन यों भावनात्मक ही दीखता है पर इसमें भी वह विद्युत सञ्चार की क्रिया-प्रक्रिया सम्मिलित है। इस प्रकार बड़े अपने से छोटों को एक महत्वपूर्ण अनुदान देते रहते हैं।

चिड़िया अपने अण्डे को छाती के नीचे रख कर सेती है। उसमें केवल गर्मी पहुँचाना ही नहीं-परम्परागत प्रवृत्तियां उत्पन्न करना भी एक प्रयोजन है। चिड़िया की शारीरिक विद्युत अण्डे बच्चों में जाकर उन्हें पैतृक संस्कारों से युक्त करती है। मशीन से अण्डे गरम करके भी उसमें से बच्चा निकल सकता है, पर उसमें कितनी ही संस्कारजन्य कमियाँ रह जाती है। जिन बच्चों को धाय पालती और दूध पिलाती है, माता का दूध, लाड़, दुलार, गोदी में खिलाना, पास सुलाना जैसा अनुदान नहीं मिलता वे बालक भी मानसिक दृष्टि से बहुत त्रुटि पूर्ण रह जाते हैं। समर्थ विद्युत भी दुर्बल क्षमता वालों का बहुत कुछ पोषण करती है।

साधनाकाल में रह रहे साधक अपना चरण स्पर्श किसी को नहीं करने देते, वे आशीर्वाद रूप से किसी के सिर पर हाथ भी नहीं रखते। इससे उनकी स्वल्प शक्ति का एक अंश दूसरों के पास चले जाने और अपने लिए घाटा पड़ने वाली आशंका ही सन्निहित है।

ब्रह्मचर्य, पतिव्रत, पत्नीव्रत आदि के पीछे सामाजिक, पारिवारिक कारणों के अतिरिक्त आध्यात्मिक कारण भी है। शारीरिक विद्युत आवेग नेत्रों में-वाणी में, हाथ की उँगलियों में अधिक पाया जाता है और वहाँ से वह बाहर फैलता है। सूक्ष्म रूप से मस्तिष्क में और स्थूल रूप से यह विद्युत जननेन्द्रिय में अत्यधिक मात्रा में पाई जाती है। मस्तिष्क में सन्निहित बिजली तो अध्ययन, चिन्तन, ध्यान आदि मनोयोग सम्बन्धित कार्यों में लगती है, पर जननेन्द्रिय विद्युत तो स्पर्श के माध्यम से बहिर्गमन के लिए व्याकुल रहती है। यही कामोत्तेजना का वैज्ञानिक स्वरूप है।

महापुरुष ब्रह्मचर्य का अत्यधिक ध्यान इसलिए रखते हैं कि वे कामोपभोग जैसे क्षणिक सुख में अपने महत्वपूर्ण उपार्जन को खो न बैठे। इससे दुर्बल पक्ष लाभान्वित हो सकता है। पर सबल पक्ष की हानि तो प्रत्यक्ष है। तपस्या के अनेक विघ्नों में एक बड़ा विघ्न यह है कि मानवी अथवा दैवी ‘रयि तत्व’ जननेन्द्रिय के माध्यम से उनकी शक्ति का लाभ लेने की चेष्टा करता है। विश्वामित्र, पाराशर, व्यास आदि की तप साधना के बीच काम स्खलन इसी खींच-तान का प्रमाण है। भगवान बुद्ध के चित्रों में ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में अनेक अप्सरायें उनके समीप नृत्य, परिहास करती दिखाई जाती हैं। इसके पीछे यही संकेत है। आत्म विद्युत सम्पन्न पति पत्नी अति उच्च कोटि की सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं। भगवान कृष्ण ने रुक्मिणी सहित तीव्र तप बद्रीनारायण में करने के उपरान्त एक ही पुत्र पैदा किया था-प्रद्युम्न जो कृष्ण के समान ही रूप, गुण आदि विशेषताओं से सम्पन्न था। लोग पहचान तक न पाते थे कि इनमें कौन सा कृष्ण है। तपस्वियों की ऋषि सन्तानें अपने जनक-जननी के समतुल्य ही प्रभावशाली होते रहे है।

महापुरुष इस सञ्चित विद्युत भण्डार को काम कौतुक में खर्च करने की अपेक्षा उस क्षमता को मस्तिष्क तथा अन्य ज्ञानेन्द्रिय द्वारा असंख्य व्यक्तियों की सेवा करने में बुद्धिमत्ता अनुभव करते हैं और ब्रह्मचारी रहते हैं। यही बात महिलाओं के संबंध में है तेजस्वी और मनस्वी बनने के लिए उन्हें भी ब्रह्मचर्य द्वारा शक्ति सञ्चय के मार्ग पर चलना होता है।

कायिक विद्युत दूसरों का हित साधन करती है, अपना भी। प्रश्न सदुपयोग की सूझ-बूझ और योग्यता का है। यह बिजली यों ही शरीर और मन से खर्च होती रहती है और अस्त-व्यस्त बिखरती रहती है। यदि इसे केन्द्रित कर लिया जाय और शारीरिक-मानसिक एवं आत्मिक उत्कर्ष के लिए प्रयुक्त किया जाय तो हर क्षेत्र में आशाजनक प्रगति हो सकती है। बिजली घर में विद्युत उत्पादन का समुचित लाभ उसे किसी प्रयोजन के लिए नियोजित करके ही उठाया जा सकता है। साधारणतया यह कायिक विद्युत भण्डार दैनिक जीवन यापन में ही थोड़ा बहुत काम आता है और शेष ऐसे ही बिखर जाता है। साधना विज्ञान के आधार पर यदि उसका सदुपयोग सीखा जाय और अभीष्ट प्रयोजन के लिए उसे नियोजित करने का क्रिया-कलाप समझा जाय, तो अपने निज के इस सम्पत्ति कोष से मनुष्य सर्वांगीण समृद्धि से सुसम्पन्न हो सकता है। सफल जीवन जी सकता है।


हृदय में सेवा और उदारता का भाव

हसन जब सुलतान बन गये तो उनसे किसी ने पूछा-’आपके पास न तो पर्याप्त धन था और न दूसरों पर आक्रमण करने के लिए सैन्य बल। फिर बादशाह बनने का यह अपूर्व अवसर कैसे हाथ लग गया।

‘हाँ! इन वस्तुओं का तो अवश्य मेरे पास अभाव था पर मानव मात्र के प्रति हृदय में सेवा और उदारता का भाव क्या किसी सैन्य और धन बल से कम है?’ हसन का सीधा सादा उत्तर था।


हरीतिमा और सूर्य किरणों में जीवन तत्व

सूर्य किरणों में जीवन तत्व भरा पड़ा है। खुली हवा में सूर्य प्रकाश में रहकर हम पौष्टिक आहार की तुलना में भी कुछ अधिक ही प्राप्त कर लेते हैं कम नहीं।

बन्द कमरे, पंखे की हवा, बिजली की रोशनी से भी लोग काम चलाते हैं और उसे सम्पन्नता, सभ्यता तथा सौभाग्य का चिह्न भी मानते हैं पर सच बात यह है कि सूर्य का प्रकाश और उससे उत्पन्न हरीतिमा दोनों ही हमारे स्वास्थ्य संरक्षण, बल, वीर्य और दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक हैं।

वनस्पति का विकास हरे रंग को अपनाने के कारण होता है। वनस्पतियाँ हरी होने के कारण शोभायमान ही नहीं जीवित भी हैं। हरा रंग अपने भीतर स्वतः जीवन तत्व की प्रचुर मात्रा भरे हुए हैं।

सूर्य किरणों में उपलब्ध सात रंगों में से एक हरा रंग ही ऐसा है जिसमें जीवन के मूल तत्व का पोषण करने की शक्ति है। पौधे इसी रंग के माध्यम से सूर्य से अपने लिए आवश्यक तत्व प्राप्त करते और कार्बन डाइ- ऑक्साइड का सृजन करते हैं। इस क्रिया के बीच उनका ऑक्सीजन छोड़ने का काम भी चलता रहता है यही मनुष्यों की साँस के काम आती है।

यदि वनस्पति में हरा रंग न हो तो वह क्लोरोफिल के अभाव में सूर्य से अपनी खुराक प्राप्त न कर सके तब फिर इस संसार में वनस्पति रहेगी भी या नहीं यह संदिग्ध है। यदि वह रही भी तो इस योग्य होगी कि शाकाहारी प्राणी उसे खाकर जीवित रहें। क्लोरोफिल के रूप में हरा रंग उस विशाल विश्व में शोभा और शान्ति की हरीतिमा ही नहीं फैलाता प्राणियों का जीवन आधार भी सिद्ध होता है।

हम हरी वनस्पतियों के संपर्क में रहें। खेतों और बगीचों में काम करें, सघन वनों की सैर करें, अपने घरों को फूल-पौधों और बेलों से हरा-भरा रखें तो हरीतिमा का यह संपर्क हमें अधिक जीवन तत्व प्रदान कर सकता है और स्वास्थ्य संवर्धन में लाभ मिल सकता है।

सूर्य के प्रकाश का संपर्क हमारी सुदृढ़ता, स्फूर्ति को बढ़ाता है और प्रजनन में समर्थ बल-वीर्य की वृद्धि होती है। संतान रहित और दुर्बल संतान वाले व्यक्ति सूर्य के संपर्क में रहें तो वे कष्ट मुक्त हो सकते हैं। दिलीप को सन्तान प्राप्ति के लिये गुरु वशिष्ठ ने उन्हें खुली हरीतिमा में दिन-भर घूमते हुए गौएं चराने का उपचार बताया था। किसान और वनवासी लोग अपेक्षाकृत कम ही बीमार पड़ते हैं और उन्हें प्रजनन संबंध कष्ट अवरोध भी नहीं होता।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राणि शास्त्री डॉक्टर वी0 आई॰ सुन्दराज ने मछली पर प्रजनन संबंधी प्रयोग करके यह सिद्ध किया है कि उसे वर्ष में पाँच बार गर्भ धारण के लिए उत्तेजित किया जा सकता है जबकि वह सामान्यतया वर्ष में एक बार ही - जुलाई-अगस्त के बीच प्रसव करती है।

उपरोक्त विज्ञानी ने अध्ययन किया कि अधिक प्रकाश प्राप्त करने का अवसर जब भी मछली को मिलता है तभी वह ऋतुमयी होती है। ग्रीष्म ऋतु में दिन भी लम्बे होते हैं और सूर्य का प्रकाश भी तेज रहता है इसलिये मछली का शरीर प्रकाश का प्रभाव अधिक मात्रा में ग्रहण कर लेता है। और उन हारमोनों को उत्तेजित करता है जो प्रजनन की स्थिति उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।

इस आधार पर उन्होंने सूर्य जैसी विशेषताओं से सम्पन्न विद्युत प्रकाश की व्यवस्था की और अनुपयुक्त ऋतुओं में भी मछली को उसके अंतर्गत रखा। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने गर्भधारण केय और साल में एक बार की अपेक्षा पाँच बार प्रसव करने के लिए तत्पर हो गई। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक सन्तुलन और पौरुष को सुदृढ़ रखने की दृष्टि से सूर्य प्रकाश और हरीतिमा का संपर्क रखा जाना आवश्यक है। जीवन तत्व के अधिक सञ्चय का यह सरल उपाय है।


भूतकालीन प्रतिपादनों के लिए दुराग्रह न करें

काल में जो माना जाता रहा है वह भविष्य में भी माना जायगा या माना जाना चाहिए ऐसा सोचना व्यर्थ है। हमारे ज्ञान की सीमा बढ़ रही है और परिस्थितियाँ बदल रही हैं तदनुसार ज्ञान के आधार भी बदलते जा रहे हैं। विकास का तथ्य स्वीकार किया जाना चाहिए। सत्य अति विशाल है, उसकी परतें धीरे-धीरे खुलती चली जा रही हैं, इस विकासोन्मुख सत्य को स्वीकार करने के लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।

जो भूतकाल में कहा गया वह पूर्ण सत्य था, उसमें हेर-फेर की गुंजाइश नहीं ऐसा दुराग्रह हमें सत्य के नवीनतम प्रकाश से वञ्चित कर देगा और हम दकियानूसी कूप मंडूक बन कर रह जायेंगे। सत्य किसी सीमा बन्धन में बँधा हुआ नहीं है। मनुष्य सर्वांगपूर्ण नहीं है और न उसके मस्तिष्क की परिधि ही इतनी बड़ी है कि इस विशाल विश्व में संव्याप्त सत्य की समस्त किरणों का एक ही समय-अन्तिम रूप से अवगाहन कर सके।

इस विश्व का क्रमिक विकास हुआ है। धरती किसी समय में वायुभूत अग्नि पुँज मात्र थी। ठण्डी होने पर वह प्राणियों के रहने योग्य हुई, एक कोषीय जीवों से विकसित होते-होते प्राणियों की अनेक जातियाँ बनीं और उनने बौद्धिक एवं शारीरिक स्थिति पार करते हुए वह स्थिति प्राप्त की जो आज है। मानव प्राणी ने भी अपना विकास यकायक नहीं कर लिया उसे वर्तमान स्थिति तक पहुँचने में लाखों वर्ष लगे हैं। ज्ञान का विस्तार भी इसी क्रम में हुआ है। भूतकाल की अनेक मान्यतायें अब झुठला दी गई। विज्ञान ने सत्य की नई परतें खोलीं और उन्हें स्वीकार करना पड़ा। पूर्व मान्यताओं के लिए दुराग्रह किये रहना बुद्धिमत्ता नहीं है।

पूर्ण सत्य तक पहुँचने की मंजिल क्रमशः ही पार की जायगी। चलने वाला पथिक अभी एक स्थान पर पैर रखे है, अभी दूसरा पग दूसरी जगह रखेगा। जो स्थान अभी पैरों के नीचे हैं, जो दृश्य अभी आँखों के सामने है वह अगले क्षण बदल जायगा। यात्रा क्रम में ऐसा होना स्वाभाविक है। इस परिवर्तन पर अप्रसन्नता व्यक्त करना उचित नहीं। बचपन में जो वस्त्र पहने जाते थे उन्हें युवावस्था में भी पहना जाय यह आग्रह असंगत और अनुचित ही कहा जायगा।

मान्यतायें पत्थर की लकीर नहीं है। आज जिस आधार पर हम एक बात को सत्य मानते हैं कल आधार बदल जाने पर परिभाषा बदल जायगी और पुराने प्रतिपादन को छोड़ने के लिए विवश होना पड़ेगा। इसमें भूतकाल के प्रतिपादन कर्ताओं का अपमान नहीं है। उनने अपने समय की परिस्थितियों के अनुरूप जो सर्वोत्तम सत्य समझा उसे कहा। पर किसी ने भी यह नहीं कहा कि जो उनके द्वारा कहा जा रहा है वह अन्तिम है या पूर्ण सत्य है। ‘नेति-नेति’ का घोष करते हुए तत्वदर्शियों ने सदा यह कहा है कि जो बताया जा रहा है वह अन्तिम नहीं है, पूर्ण नहीं है। ‘स्याद्वाद’ दर्शन में इसी तथ्य को स्वीकार किया गया है और भावी अन्वेषण एवं विचार परिवर्तन के लिए पूरी गुंजाइश रखी गई है।

भूतकालीन मान्यताओं को ही पूर्ण सत्य मान बैठना दुराग्रह है। सत्याग्रह में यह गुंजाइश रखी जाती है कि सत्य का प्रामाणिक और तथ्यों के आधार पर परिष्कृत रूप सामने आवेगा तो उसे सहर्ष स्वीकार करेंगे। ज्ञान के विकास का क्षेत्र खुला रखा जाना चाहिए और मान्यताओं को तथ्यों के आधार पर बदलने का उदात्त दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

चन्द्रमा के संबंध में मनुष्य ने न जाने कब-कब से-क्या-क्या स्वप्न सँजो कर रखे थे। कितनी मधुर कल्पनायें उसके साथ जोड़ कर रखी थीं। विज्ञान ने उन्हें अस्त-व्यस्त करके रख दिया।

पाश्चात्य साहित्य में उसे चन्द्रमुखी महिला के रूप में चित्रित किया गया है। राहु के आक्रमण से पड़ने वाला चन्द्रग्रहण हमारे लिए चिन्ता का विषय था और उसे विपत्ति से छुड़ाने के लिए जप, दान किये जाते थे।

चन्द्रमा अमृत का घट है। उसकी चन्द्रिका अमृत बरसाती है। चन्द्रप्रकाश में शीतल किया हुआ दूध-शान्तिदायक होता है। शरद पूर्णिमा के चन्द्रप्रकाश में खीर का भोजन करते हुए उसमें अमृत मिश्रण की आशा की जाती है। किसान शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा को साक्षी बनाकर बीज बोते हैं। चन्द्रमुखी का ज्यों-ज्यों रूप निखरता है त्यों-त्यों समुद्र कोटि-कोटि हाथ पसारकर उसे अपने अंक में आबद्ध करने के लिए व्याकुल होता है। ज्वार-भाटे की यही साहित्यिक कल्पना है। स्त्रियों के मासिक धर्म की चन्द्र कलाओं के साथ संगति बिठाई जाती है।

पौराणिक गाथा के अनुसार चन्द्रमा की उत्पत्ति समुद्र मन्थन से उत्पन्न रत्नों के रूप में हुई। उसे शिवजी के मस्तक पर निवास करते रहने का स्थान मिला। दक्ष प्रजापति की 27 कन्यायें चन्द्रमा को विवाही गईं। इनमें से रोहिणी को अधिक प्यार करने से रुष्ट अन्य 26 पत्नियों ने जब अपने पिता से शिकायत की तो इस पक्षपात के लिए उसे दक्ष के शाप से कलंकी होना पड़ा। इन्द्र के द्वारा अहिल्या के साथ छल करने में सहयोग करने के कारण गौतम ऋषि के शाप से उसे कलंकी बनना पड़ा। मणि चुराने के अभियोग में शाप लगने के कारण भाद्र पक्ष शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन हेय घोषित किया गया। स्त्रियाँ गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन के उपरान्त ही कुछ खाती हैं और चन्द्र देवता से सुहाग वरदान माँगती हैं। रजनी पति निशा नाथ चन्द्रमा को काम उमंग उत्पन्न करने वाला बताया गया है। प्रेयसी की चन्द्र मुख से तुलना कवि न जाने कब से करते रहे हैं।

मुसलमान ईद का चाँद देखकर अपना व्रत उपवास पूर्ण करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा एक पूर्ण ग्रह है। उसे शास्त्राधार का मध्य बिन्दु मानकर ग्रह गणित आगे चलता है। यात्रा मुहूर्तों में चन्द्रमा की दिशा स्थिति को ध्यान में रखा जाता है। मनुष्यों पर जब चन्द्र दशा आती है अथवा जब अन्तर-प्रत्यन्तर आते हैं तब शुभ लाभ का फलित बताया जाता है। सप्ताह का एक दिन चन्द्रमा के नाम पर ही निर्धारित है उस दिन को मंगलमय माना गया है। बच्चे उसे चन्दा मामा मानते रहे हैं और मातायें उस चन्द्र खिलौने को ला देने का आश्वासन न जाने कब से अपने नन्हें शिशुओं को देती रही है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार चन्द्रमा 2000 मील व्यास का एक वर्तुलाकार निर्जीव पिण्ड है। जो सूर्य के प्रकाश से चमकता है। उसका बोझ पृथ्वी की तुलना में 81वाँ अंश ही है। उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के छठे भाग के बराबर है। वहाँ न पानी है न हवा। न कोई जीव, न वनस्पति। शब्द का सर्वथा अभाव। नीरव निस्तब्धता का साम्राज्य। विश्व किरणों की, उल्काओं की-अणु किरणों की-निरन्तर वर्षा होती रहने से वहाँ की चट्टानें धूल बन गई हैं। उसकी परतों में नाइट्रोजन, गन्धक, फास्फोरस, कार्बन डाई ऑक्साइड तथा कतिपय धातुयें विद्यमान हैं। रात को वहाँ अतिशीत होता है और दिन को अति ताप। वह पृथ्वी की परिक्रमा 240000 मील दूर रहकर करता है।

चन्द्रमा के संबंध में अब तक मान्यतायें प्रतिपादित और प्रचलित रही हैं। डार्विन का कथन है-पुरातन में पृथ्वी तप्त द्रव थी। उसमें अनेक विस्फोट होते थे। वह तप्त रस सूर्य की परिक्रमा कर रहा था। इसी बीच पृथ्वी के विस्फोट और सूर्य के आकर्षण से पृथ्वी का एक टुकड़ा उचट कर अलग हो गया और स्वतन्त्र रूप से घूमने लगा यही चन्द्रमा है। पृथ्वी के जिस स्थान से यह टुकड़ा टूटा वहाँ प्रशान्त महासागर का गड्ढा बन गया।

डॉ0 वाईज ने भी थोड़े हेर-फेर के साथ इसी मत की पुष्टि की। उनने धूमकेतु, विश्व किरणें तथा अणुशक्ति आघातों के कारण चन्द्रमा में अनेक खड्ड बन जाने की बात कही।

जेम्स जीव्कस और डॉ0 वफुन्स का मत है कि-कभी कोई विशाल तारा सूर्य के समीप होकर गुजरा। उसके और सूर्य के गुरुत्वाकर्षणों में रस्साकशी हुई। इस संघर्ष में सूर्य का एक बड़ा भाग महाभयंकर विस्फोट के साथ टूट गया। उस टूटे भाग से सौर मण्डल के अन्य ग्रह बने और उसी मलबे में से चन्द्रमा बन गया। चन्द्रमा पृथ्वी के समीप होने के कारण धरती के गुरुत्वाकर्षण में जकड़ गया और उसी की परिक्रमा करने लगा।

डॉ0 फेड हायल का कथन है-अनन्त आकाश में प्रचण्ड ज्योति को फेंके हुए वायु कणों को सूर्याकर्षण ने खींचा और वह धूलि, सघन होकर चन्द्रमा बन गई।

अब चन्द्रमा के संबंध में यह नये तथ्य स्वीकार कर लिये गये। प्राचीन मान्यताओं की साहित्य में चर्चा भले ही होती रहे पर उन्हीं को सही मानने के लिए कोई आग्रह नहीं करता। यही उचित भी है।

यूनान का खगोल वेत्ता अनेग्जागोरस बड़े दावे के साथ कहता था कि सूर्य का विस्तार इतना है जितना यूनान का दक्षिण भाग। उन दिनों यह प्रतिपादन पूरी तरह गप्प माना गया था। जरा सा सूरज भला कहीं यूनान के दक्षिण भाग जितना बड़ा हो सकता है?

पीछे दूसरे खगोल वेत्ता और भी आगे बढ़े। उन्होंने हिसाब लगा कर बताया कि सूर्य का विस्तार पृथ्वी से भी बड़ा है। सुनने वालों ने इसे और भी बड़ी अतिश्योक्ति माना। यह ग्रह गणित आगे भी जारी रहा और ज्योतिर्विद् पोसिडोनियस ने सूर्य का विस्तार और भी बड़ा बताया उसका प्रतिपादन वर्तमान मान्यता से लगभग आधा था।

मध्य काल में ब्रह्माण्ड की सुविकसित कल्पना करने वाला पुराना दैवज्ञ ‘दान्ते’ है। उसने अपनी पुस्तक ‘पैराडाइसो’ में कहा है-सूर्य, चन्द्र, स्वर्ग, स्थिर नक्षत्र इन सबका एक केन्द्र मण्डल है। चौबीस घण्टे में उसका एक चक्कर पूरा होता है। आज की ब्रह्माण्ड मान्यता की तुलना में उसे बचपन की कल्पना ही कहा जा सकता है।

अब ब्रह्माण्ड के विस्तार की मान्यता पुरातन की अपेक्षा बहुत आगे और बहुत विस्तृत है। तारे आसमान की छत में लटके हुए अब झाड़ फानूस नहीं रहे। वर्तमान खगोल विद्या के अनुसार सबसे निकट दीखने वाला तारा भी सूर्य से बहुत बड़ा और बहुत दूर है। सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक आठ मिनट में आ जाता है। पर उस निकटवर्ती तारे का प्रकाश हम तक आने में लगभग चार साल लगते हैं। खुली आँखों से जितने तारे हमें दीखते हैं वे सब अपनी आकाश गंगा ‘मन्दाकिनी’ के ही अण्डे बच्चे हैं और उसी से बँधे हैं उसी की गोद में खेलते हैं। हमारी मंदाकिनी आकाश गंगा की तरह ब्रह्माण्ड में करोड़ों आकाश गंगायें हैं।

अपनी आकाश गंगा में लगभग 3 अरब तारे हैं। इनमें निकटवर्ती नक्षत्र की दूरी 250 खरब मील है। ऐसी ऐसी आकाश गंगाएं करोड़ों हैं और वे एक दूसरे से इतनी दूर हैं कि एक का प्रकाश दूसरी तक पहुँचने में 2 करोड़ वर्ष लगते हैं।

सूर्य का वजन 2 अरब टन है। अपनी आकाश गंगा अपने सूर्य से 60 अरब गुनी भारी है। ऐसी-ऐसी करोड़ों आकाश गंगाओं के तारा मण्डल ने जो जगह घेर रखी है उसे सिर में एक बाल के बराबर ही समझना चाहिए। शेष ब्रह्माण्ड तो बिल्कुल पोला-सूना-खाली-नीरव ही पड़ा हुआ है।


Quotation

हमें कल्पना शक्ति प्रकृति प्रदत्त है और इसी शक्ति से हम दृश्य जगत के अन्धकार को प्रकाशमय बना सकते हैं। बद्ध एवं चिन्तन से मिश्रित कल्पना भौतिक अन्वेषणकर्ता का सर्वाधिक शक्तिशाली यन्त्र है।

-जे0 टिन्डल

अपना सूर्य, अपनी मन्दाकिनी आकाश गंगा का एक छोटा सा तारा है। ऐसे लगभग 1 खरब तारे उसमें गुँथे हुए हैं और अपने सूर्य की तुलना में 60 हजार गुने तक बड़े हैं। इनकी दूरी का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यदि कोई प्रकाश की गति से-एक सैकिण्ड में 1,86,000 मील की चाल से-चले तो उसे अपनी आकाश गंगा में सबसे निकटतम तारे पर पहुँचने के लिए प्रकाश गति से 4 वर्ष लगेंगे और दूर वाले पर पहुँचने के लिए 80 हजार वर्ष चलना पड़ेगा। ऐसी-ऐसी असंख्य आकाश गंगाएं इस अनन्त ब्रह्माण्ड में बिखरी पड़ी हैं। उनकी परिधि और सीमा की कल्पना कर सकना भी मानवी बुद्धि से बाहर की बात है।

कोई समय था जब समझा जाता था कि सृष्टि का केन्द्र यह पृथ्वी ही है। यह स्थिर है और सूर्य चन्द्र तथा तारे इसके आस-पास घूमते हैं। तब धरती को चौकोर या चपटी समझा जाता था। कुछ इसे स्वर्गादपि गरीयसी मानते रहे। कुछ ने माना उसे जन्म-मरण के कुचक्र में बाँधने वाला भव सागर।

दार्शनिक फिरसौदी ने उसे असीम सौंदर्य की देवी कहा और बताया है कि यदि स्वर्ग कहीं है तो इस धरती पर ही है।

वैज्ञानिक भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह धरती अन्य ग्रह नक्षत्रों की तुलना में अत्यधिक सौभाग्यशाली है। इसकी सूर्य से दूरी तथा कला इतनी उपयुक्त है कि उससे प्राणियों का जन्म, ऋतु अनुकूलता तथा अगणित शोभा, सुविधा का सृजन सम्भव हो सका। यह स्थिति अन्य ग्रह नक्षत्रों की नहीं है। उनका तापमान, शीतमान इतना भयंकर है कि जीवन की सम्भावना का कोई लक्षण नहीं दीखता।

चूँकि हम इस धरती पर रहते हैं और निकटवर्ती वस्तु की शोभा, उपयोगिता न दीख पड़ती है, न समझ में आती है। उसे देखने समझने के लिए दूरी का अन्तर होना चाहिए। अपोलो 11 अन्तरिक्ष यान के यात्रियों ने दूर से इस धरती की शोभा को देखा तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने उस सौंदर्य की अभिव्यक्ति को अनिर्वचनीय और अकल्पनीय बताया।

अब पृथ्वी भूतकाल के ज्योतिषियों की मान्यता के अनुरूप स्थिर नहीं है। वह एक नहीं कई चाल चलती है। पृथ्वी की कुछ चालें पहले से ही विदित थी। पृथ्वी सूर्य मण्डल की परिक्रमा एक वर्ष में पूरी करती है। वह अपनी धुरी पर 24 घण्टे में घूम लेती है। सूर्य-पृथ्वी समेत अपने सौर मण्डल को साथ लिये-महासूर्य की परिक्रमा के लिए दौड़ा जा रहा है। इनके अतिरिक्त पृथ्वी की एक और गति का पता चला है। जिसे ‘थिरकन’ कह सकते हैं।

पृथ्वी की अक्ष और उसके सिरे अपने स्थान में फेर बदल करते रहते हैं। 14 मास में यह विचलन 72 फीट तक होता रहता है।

पिछली शताब्दियों के खगोल वेत्ता जेम्स ब्रंडले और मौलीनो ने यह आशंका व्यक्त की थी कि ध्रुव अपना स्थान बदलते हैं उसका कारण पृथ्वी की एक गति ‘थिरकन’ भी हो सकती है।

ऐसा क्यों होता है, इसके कारणों की खोज करते हुए कई तथ्य सामने आये हैं। अक्ष की विस्थापना, ध्रुव प्रदेशों में बर्फ का पिघलना, समुद्रों की विशाल जल राशि का भटकाव भूगर्भ के तप्त लावे का उद्वेलन और पुनर्वितरण जैसे कारण इस थिरकन के सोचे गये हैं।

तथ्यों का सही निरूपण करने के लिए इंटर नेशनल पोलर योशन सर्विस (अन्तर्राष्ट्रीय ध्रुव चलन सेवा) की ओर से उत्तरी ध्रुव के चारों और 4 डिग्री अक्षाँश पर पाँच वेधशालाएं स्थापित की गई हैं। और उनमें व्यवस्थित रूप से शोध कार्य हो रहा है। यह वेधशालाएं (1) भिजुसावा (जापान) में (2) समर कन्द के निकट ‘केताब’ में (3) इटली के निकट सार्डीनिया के कार्लोफोर्ते में (4) अमेरिका के गैदर्जवर्ग तथा (5) यूक्रिबा स्थानों में कार्य संलग्न हैं। रात्रि के छः घण्टे आकाश निरीक्षण के आधार पर इनमें कार्य होता है और निष्कर्ष भिजुसावा केन्द्र में भेज दिया जाता है। इन सभी वेधशालाओं के यन्त्रों की सम्वेदनशीलता में कोई दोष उत्पन्न न होने देने के लिए


Quotation

सद्गुण स्वास्थ्य है और दुर्व्यसन रोग।

-पेट्रार्च

वहाँ का तापमान न बढ़ने देने की कठोर व्यवस्था है। रात्रि में अति मन्द रोशनी, सर्दियों में हीटर तक न जलाना, खिड़कियाँ खुली छोड़ना, कार्यकर्त्ताओं की शारीरिक गर्मी तक बाहर न आने देने जैसी अनेकों सावधानियाँ बरती जाती हैं।

सोचा जाता है कि जिस प्रकार शारीरिक हलचलों का प्रभाव मन पर पड़ता है ऐसे ही पृथ्वी की स्थूल हलचलों का प्रभाव उसकी मनःस्थिति पर पड़ता होगा और उसका हृदय आन्दोलन इस प्रकार थिरकने की गति धारण करता होगा।

ब्रह्माण्ड विस्तार की तरह मनुष्य की चिन्तन परिधि बढ़ती जा रही है। उसकी क्षमताओं का विकास हो रहा है। संपर्क, संबंध, अपनत्व और उत्तरदायित्व भी इसी प्रकार बढ़ रहा है। हमें उसे समझना चाहिए और अपने मनः क्षेत्र को उस विस्तार को स्वीकार कर सकने योग्य उदात्त दृष्टिकोण से युक्त करना चाहिए।


समाज का ऋण चुकाना ही श्रेयस्कर

मनुष्य की निजी आवश्यकताएं और इच्छाएं हैं। उनकी पूर्ति के लिए वह प्रयत्न करता है। और प्रयत्न करने पर अभीष्ट की प्राप्ति भी होती है। पर जो कुछ पाता है वह उसका अपना उपार्जन ही नहीं होता उसे जुटाने में समाज का भारी योगदान रहता है। यदि वह न रहे तो एकाकी मनुष्य पेट भरने और तन ढकने की आवश्यकता भी शायद ही पूरी कर पावे। बुद्धि तो उसमें बहुत है पर शरीर इतना अशक्त है कि वह बिना दूसरों के सहयोग के अपनी बढ़ी-चढ़ी इच्छाओं की पूर्ति किसी भी प्रकार नहीं कर सकता। इस दृष्टि से वह अन्य जीवों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ है।

गाय, हिरन, लोमड़ी, खरगोश, आदि के बच्चे जन्म लेने के कुछ ही देर बाद अपने पाँवों खड़े हो जाते हैं। माता का दूध अपने प्रयत्न से पीने लगते हैं और कुछ ही दिनों में चल-फिर कर घास आदि ढूँढ़ने और पेट भरने लगते हैं। मनुष्य के बच्चे में यह योग्यता बहुत वर्ष बीतने पर भी नहीं आती। माता दूध न पिलाये तो वह भूखा ही मर जायगा। अपने पुरुषार्थ से माता को या उसके स्तन को ढूंढ़ने में समर्थ न होगा, सोने, खाने, नहाने, मल-मूत्र विसर्जन जैसे छोटे कामों के लिए भी बहुत दिनों तक उसे अपने अभिभावकों पर निर्भर रहना होता है। अपने पैरों पर खड़े होने की, अपना गुजारा आप करने की योग्यता तो कहीं पन्द्रह सोलह वर्षों में आती है।

आजीवन साथ रहने के लिए प्रस्तुत सुयोग्य पत्नी-मनुष्य का अपना उपार्जन नहीं होती। माँ-बाप उस लड़की को सुयोग्य बनाते और उदारतापूर्वक ब्याह कर देते हैं। यह सामाजिक योगदान है। अन्य प्राणी कामोद्देश्य के लिए क्षणिक दाम्पत्य-जीवन बनाते और बिछुड़ जाते हैं। मनुष्य को जो सुव्यवस्थित दाम्पत्य जीवन मिला है उसमें समाज का अनुग्रह ही मुख्य है। भोजन के लिए अन्न, पहने के लिए वस्त्र, निवास के लिए घर, शिक्षा के लिए विद्यालय, आजीविका के लिए उद्योग, यात्रा के लिए वाहन, बीमारी की दवा, क्या यह सब उपलब्धियाँ मनुष्य की निजी कमाई है, यदि समाज का सहयोग प्राप्त न हो तो कितना ही परिश्रम करके उस स्तर की वस्तुएं प्राप्त नहीं हो सकती जितनी कि हममें से प्रत्येक को मिलती हैं। बोलना, लिखना, पढ़ना जो मनुष्य ने सीखा है उसमें माँ, संगी-साथियों का ही नहीं असंख्य पीढ़ी के पूर्वजों का योगदान है। सामाजिक, शासकीय, वैज्ञानिक, बौद्धिक सुविधाओं से जो असाधारण लाभ प्राप्त किया जा सका है और जिनके बल पर मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि बना है वह सब कुछ एक प्रकार से समाज का ही अनुदान है। निजी पुरुषार्थ तो उन उपलब्धियों में नगण्य ही समझा जाना चाहिए।

जिस समाज का इतना उपकार और अनुदान लेकर मनुष्य सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है, उसका वह ऋणी है। इस ऋण को चुकाना कृतज्ञता की प्रत्युपकार की और सामाजिक शृंखला परम्परा बनाये रखने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। यदि लोग समाज के कोष से लेते तो रहें पर उसका भण्डार भरने की बात न सोचें तो वह सामूहिक कोष खाली हो जायगा। समाज खोखला और दुर्बल हो जायगा उसमें व्यक्तियों की सुविधा बढ़ाने एवं सहायता करने की क्षमता न रहेगी फलतः मानवीय प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जायगा। प्राप्त तो करें पर उसे लौटायें नहीं की नीति अपना ली जाय तो बैंक दिवालिये हो जायेंगे, सरकार खोखली रह जायगी, जमीन का उपार्जन बन्द हो जायगा, व्यापार की शृंखला ही बिगड़ जायगी। इस संसार में ‘लो और दो’ की नीति पर सारी व्यवस्था चल रही है। ‘लो’ के लिए तैयार-’दो’ के लिए इनकार, की परम्परा यदि चल पड़े तो सारा क्रम ही उलट जायगा, तब हमें असामाजिक आदिम युग की ओर वापिस लौटना पड़ेगा।

मनुष्य की बुद्धि और श्रमशीलता का आधा भाग और आधा भाग सामाजिक अनुदान का माना गया है। तदनुसार तत्वदर्शियों ने यह व्यवस्था बनाई है कि उसे अपनी जीवन सम्पदा का आधा भाग अपनी शरीर यात्रा के लिए रखना चाहिए और आधा सामाजिक उत्कर्ष के लिए लगा देना चाहिए। पेट भरना, तन ढकना, निवास, शिक्षा, चिकित्सा, गृहस्थ, उपार्जन, मनोरंजन आदि वैयक्तिक सुविधा साधनों के लिए उसकी क्षमता का आधे से अधिक भाग खर्च न होना चाहिए आया तो समाज सेवा के लिए सुरक्षित ही रहना चाहिए।

आश्रम धर्म की व्यवस्था भारतीय संस्कृति में इसी दृष्टि से की गई है। आयुष्य का एक चौथाई भाग खेल-कूद तथा ज्ञान और शरीर की वृद्धि के लिए यह ब्रह्मचर्य हुआ, एक चौथाई विवाह सन्तान, परिवार उपार्जन, यश, वैभव, मनोरंजन आदि के लिए यह गृहस्थ हुआ। इतना भाग निजी सुख-सुविधा के लिए है। शेष आधा वानप्रस्थ और संन्यास के रूप में लोक-मंगल के लिए आत्मिक उत्कृष्टता अभिवर्धन के लिए नियुक्त होना चाहिए। जीवन सम्पदा का यही श्रेष्ठतम विभाजन है। भारतीय धर्म और संस्कृति की यह एक अति महत्वपूर्ण व्यवस्था है जिस पर उसकी महान सामाजिक व्यवस्था की आदर्श परिपाटी निर्भर रही है।

सामाजिक उत्कृष्टताओं के अभिवर्धन, सत्परम्पराओं के संचालन और विकृतियों के निवारण के लिए निरन्तर प्रयत्न किया जाना आवश्यक है। यह प्रयोजन, सुयोग्य, अनुभवी और निस्पृह लोगों के द्वारा ही पूरा हो सकता है। अनेक सत्प्रवृत्तियों के गतिशील रहने से ही समाज की श्रेष्ठता और महानता सुदृढ़ रह सकती है। इस कार्य के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को अपना जीवन समर्पित करना चाहिए। उसे उदारता, दान, परमार्थ, धर्म पुण्य कुछ भी कहा जा सकता है। ऋण चुकाना या कर्त्तव्यपालन भी इसे कह सकते हैं। कहा कुछ भी जाय, यह है नितान्त आवश्यक। यह परम्परा चलते रहने से ही सुयोग्य समाज सेवियों की आवश्यकता पूरी हो सकती है और सामाजिक महानता अक्षुण्ण रह सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को शास्त्र मर्यादा या ईश्वरीय आज्ञा के रूप में ढलती आयु में ‘वानप्रस्थ’ ग्रहण करके अपना श्रम, समय और मनोयोग लोक कल्याण के लिए लगाने का निर्देश किया गया है।

शास्त्रकारों और आप्त पुरुषों ने पग-पग पर इस परम्परा के पालन का निर्देश किया है। धर्म ग्रन्थों में रह जगह इसी प्रकार के निर्देश की भरमार है।

गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः।

अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत्॥1॥

(शखस्मृति)

जब गृहस्थ का भार बड़ा लड़का सँभाल ले, बाल सफेद होने लगें, तब मनुष्य को वानप्रस्थ में प्रवेश करना चाहिए।

उषित्वैवं गृहे विप्रोद्वितीयादाश्रमात् परम्।

वलीपलितसंयुक्तस्तृतीयन्तु समाश्रयेत्॥97

(सम्वर्त स्मृति 97)

जब गृहस्थ पालन करने के उपरान्त चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जायें, बाल सफेद होने लगें तो तीसरे पन में वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।

एवं वनाश्रमे तिष्ठन् पातश्यचैव किल्विषम्।

चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् सन्यासविधिना द्विजः॥2

(हरीत स्मृति 6/2)

गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ ग्रहण करना चाहिए। इससे समस्त मनोविकार दूर होते हैं और वह निर्मलता आती है जो संन्यास के लिए आवश्यक है।

महर्षिपितृदेवानाँ गत्वाऽऽनृण्यं यथाविधि।

पुत्रे सर्वं समास्जय वसेन्माध्यस्थ्यमास्थितः॥

(मनु.4/257)

ढलती आयु में पुत्र को गृहस्थ का उत्तरदायित्व सौंप दें। वानप्रस्थ ग्रहण करे और देव, पितर तथा ऋषियों का ऋण चुकावे।

उत्पाद्य पुत्राननृणाँश्य कृत्वा

वृतिं तेभ्योऽनुविधाय काँचित्।

स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा

अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्बुभूषेत्॥

(महा0 उद्योग 37/39)

पुत्रों को उत्पन्न कर उन्हें ऋण के भार से मुक्त करके उनके लिए किसी जीविका का प्रबन्ध कर दे, अपनी सभी कन्याओं का योग्य वर के साथ विवाह कर दे तत्पश्चात् वन में मुनिवृत्ति से रहने की इच्छा करे।

अपत्यसंततिदृष्ट्वाप्राज्ञोदेहस्यचानतिम्।

वानप्रस्थाश्रमगच्छेदात्मनः शुद्धिकारणात्॥24

इत्येषपापशुद्धर्य्थमात्मनश्चोपकारकः।

वानप्रस्थाश्रमस्तमाद्भिक्षोस्तुचरमोपरः॥27

(मार्कण्डेय पुराण)

दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता इसमें है कि सन्तान के समर्थ होने पर अपने शरीर के क्षरण पर भी विचार करे और ढलती आयु में वानप्रस्थ ग्रहण करे। आत्म शुद्धि के लिए यह कदम बढ़ाना आवश्यक है। पापों का शोधन ऋणों से मुक्ति और आत्म कल्याण का प्रयोजन पूरा करने के लिए वानप्रस्थ ग्रहण करना ही चाहिए।

गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन् दृष्ट्वा पलितमात्मनः।

भार्य्या पुत्रेषु निःनिक्षिप्य सह् वा प्रविशेद्वनम्॥2

तपो ही यः सेवित वन्यवासः

समाधियुक्तः प्रयतान्तरात्मा।

विमुक्तपापो विमलः प्रशान्तः

स याति दिव्यं पुरुषं पुराणम्॥1

(हरीत स्मृति)

जब बाल सफेद होने लगें और पुत्र घर सँभालने योग्य हो जाये तो वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए।

ढलती आयु में तपश्चर्या आरम्भ कर देनी चाहिए। इससे पाप और ऋण धुलते हैं, आत्मा को शान्ति मिलती है और दिव्य पुरुष की स्थिति प्राप्त होती है।

ततोगार्हस्थ्यमास्थायचेष्ट्वायज्ञाननुत्तमान्।

वनस्थश्यचततोवत्सपरिव्राड्निष्परिग्रहः।

इष्टमुत्पादयापत्यमाश्रयेधावनंततः॥12

(मार्कण्डेय पुराण)

गृहस्थ के आवश्यक उत्तरदायित्वों को पूरा करके-पुत्र को काम-काज सौंप दे और वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे। वानप्रस्थ परिपक्व होने के पश्चात् ही संन्यास लिया जाता है।

बालोमनोनन्दयबान्धववानाँगुरोस्तथाज्ञाकरणैःकुमारः। स्त्रीणाँयुवासत्कुलभूषणानाँवृद्धोवनेवत्सवने चरणाम्॥61

(मार्कण्डेय पुराण)

बाल्यकाल में परिवार को हँसाना विनोद देना, किशोर अवस्था में माता-पिता की सेवा करना, युवावस्था में पत्नी वृद्धजनों तथा आश्रितों की सहायता करना और अन्त में वानप्रस्थ लेकर विश्वकल्याण के परमार्थ प्रयोजन में जीवन व्यतीत करना।

वयः परिणतो राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी।

पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गछेत्सहैव वा॥18

(विष्णु पुराण)

जब गृहस्थ धर्म का पालन करते-करते अवस्था ढल जाय, तब अपनी स्त्री के पालन का भार पुत्रों को सौंप या उसे भी अपने साथ लेकर वन को प्रस्थान करे।

अथ जनको ह वैदेही याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच। भगवन्संन्यासमनुब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यः। ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्।

(जावालोपनिषत् 3/1)

एक दिन राजा जनक महर्षि याज्ञवलक्य के पास गये और कहा भगवन् संन्यास की शिक्षा दीजिए। इस पर याज्ञवलक्य ने कहा-पहले ब्रह्मचर्य आश्रम, फिर गृहस्थाश्रम इसके बाद वानप्रस्थ होना चाहिए इसके उपरान्त ही संन्यास है।

यदिमद्वचनंतातश्रद्दधास्यविशकितः।

तत्परित्यज्यगार्हस्थ्यं वानप्रस्थमनाभव॥3

तमनुष्ठाया विधिवद्विहायाग्निपरिग्रहम्।

आत्मन्यात्मानमाधायनिर्द्वद्वोनिष्परिग्रहः॥4

एकाँतशीलोवश्यात्माभवभिक्षुरतंद्रितः।

तत्रयोगपरोभूत्वावाह्यर्स्पश विवर्जितः॥5

ततःप्राप्स्यसितंयोगंदुःखसंयोगभेषजम्।

मुक्तिहेतुमनौपम्यमनाख्येयमसंज्ञितम्॥6

(मार्कण्डेय पुराण /3/4/5/6)

पुत्र ने अपने पिता से कहा-तात्, आप संकल्प-विकल्प छोड़कर मेरा अनुरोध मानिये। गृहस्थ धर्म पूरा हो गया अब वानप्रस्थ ग्रहण कीजिए। परिग्रह, लोभ और मोह की लिप्सा छोड़िये। मन को वश में कीजिए। आलस्य छोड़िये और मन को साँसारिक लालसाओं से हटाइए। जब आप योग साधन करेंगे तभी दुख द्वंद्वों से छूटेंगे।

जब तक इस वानप्रस्थ परम्परा का निर्वाह भारतीय समाज में ठीक तरह होता रहा, तब तक यहाँ की सामाजिक स्थिति अति उच्चकोटि की बनी रही, और उससे प्रभावित होकर घर-घर में नर रत्न उत्पन्न होते रहे, जिन्होंने समस्त विश्व में श्रेष्ठता की मर्यादाओं को स्थापित करने में महान योगदान दिया।

जब से हम संकीर्ण और स्वार्थी होते चले गये। समाज का ऋण भार लेने की निर्लज्जता अपना बैठे। मरते समय तक पैसा और बेटे पोतों की ही बात सोचने वाले क्षुद्र स्तर पर आ गये फिर समाज को सुयोग्य और निस्वार्थ प्रतिभाएं मिलती ही कहाँ से। और उनके बिना सामाजिक स्तर ऊँचा रहता ही कैसे? इस अभाव की पूर्ति के बिना कोई राष्ट्र और समाज प्रखर और महान रह ही नहीं सकता।

इस अभाव की पूर्ति की जानी चाहिए। जनसाधारण का दृष्टिकोण बदला जाना चाहिए। सारा जीवन पैसे और परिवार के लिए ही लगाया जाना सामाजिक अपराध घोषित किया जाना चाहिए। हर व्यक्ति को यह अनुभव कराना चाहिए कि आधा जीवन ‘गौ ग्रास’ है। वह समाज सेवा की अवधि है। उसका अपहरण करके निजी सम्पदा बढ़ाते रहना माँ-बेटे पोतों की टहल चाकरी करते रहना गौ के मुख से ग्रास को छीन कर गधे को खिलाने के बराबर है।


उपकारी के प्रति कृतार्थ होना ही चाहिये

आँसू ढुलक पड़े। आँखों को बड़ा बुरा लगा। वह सोचने लगीं जिन आँसुओं को हमने अपनी कोख से जन्म दिया, उनके पालन-पोषण में हमने इतना श्रम किया, फिर भी उसके बदले में मिली केवल उपेक्षा।

नेकी कर कुँए में डाल वाली कहावत किसी ने सत्य ही कही है। इन पर इतना भी नहीं बना कि जाते समय कम से कम सूचित तो कर देते।

आँखें इसी ऊहापोह में पड़ी रहीं। साहस करके उन्होंने आँसुओं से बाहर जाने का कारण पूछ ही लिया।

‘पराधीनता का जीवन जीते-जीते हम तंग आ गये थे। संत तुलसी तक कह गये हैं कि पराधीन जीवन को स्वप्न में भी सुख की कामना नहीं करनी चाहिए। बहुत दिनों से इच्छा हो रही थी कि बाहर की ताजी हवा का भी आनन्द लिया जाये।’

आँखों ने बहुत समझाया ‘तुम तो हमारे दुःख-सुख के साथी रहे हो अतः अब छोड़ कर क्यों जा रहे हो?

आँसू ने रुकते-रुकते कहा ‘तुम क्या जानो पराधीनता में हमारा दम घुटने लगा था। अब हमारा स्वाभिमान जाग उठा है, तुम्हारे बंधन में रहने को तैयार नहीं।’

‘अच्छा! यदि तुम जा ही रहे हो तो जाओ, तुम पर हमारा क्या अधिकार। जबरन तो तुम्हें बाँधकर रखा नहीं जा सकता। पर एक बात का ध्यान रखना कि यह स्वतन्त्रता तुम्हें बहुत महंगी पड़ेगी, हो सकता है तुम्हारे अस्तित्व को ही खतरे में डाल दे। हवा के झोंके या तो तुम्हें सुखा देंगे अथवा धरती चूस कर अपने में मिला देगी। स्वजनों से प्रेम न करने वालों के साथ यही होता है। इसी प्रकार का दण्ड भुगतना पड़ता है और अपने अस्तित्व से हाथ धोना पड़ता है।’ उपकारी के प्रति कृतार्थ तो होना ही चाहिये।


मृतात्माओं का संपर्क सान्निध्य-एक तथ्य

इंग्लैण्ड के राज परिवार में अशरीरी प्रेतात्माओं के अस्तित्व का चिरकाल तक अनुभव किया जाता रहा। इस संबंध में डॉ0 लीज की लिखी तीन पुस्तकें न केवल मरणोत्तर जीवन पर प्रकाश डालती हैं-वरन् राज परिवार को इस प्रकार की क्या अनुभूतियाँ होती रहीं, इसकी भी चर्चा करती हैं।

उन दिनों राज्य सिंहासन पर पंचम जार्ज अवस्थित थे। उनकी बहिन राजकुमारी ‘लुईस’ सुहाग के बहुत थोड़े दिन देख पाई और विधवा हो गई। लुईस को अपने पति ‘ड्यूक ऑफ फिफ’ के प्रति गहरी अनुरक्ति थी वह उनके दिवंगत हो जाने के उपरान्त भी बनी रही और यह संबंध सूत्र बनाये रखना दिवंगत आत्मा ने भी स्वीकार कर दिया वे प्रेम रूप में लुईस के पास बराबर आते रहे और उससे संपर्क बनाये रहे। लुईस भी बहुत दिन जीवित नहीं रही। उसकी मृत्यु के उपरान्त राजकुमारी की सचिव एलिजाबेथ गोर्डन ने विस्तारपूर्वक प्रकट किया-जिससे उस घटनाक्रम पर प्रकाश पड़ता है जिसके अनुसार लुईस और उनके स्वर्गीय पति का मिलन-संभाषण, सान्निध्य का क्रम कितनी घनिष्ठता पूर्वक चलता रहा मानो शरीर न रहने पर भी ड्यूक का अस्तित्व यथावत बना रहा हो।

इससे पूर्व की एक और घटना है जो प्रेतात्माओं के अस्तित्व को और भी अच्छी तरह प्रमाणित करती है। सम्राट एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी एलेग्जेण्ड्रा प्रेम विद्या पर विश्वास करती थी और जब तब मृतात्माओं के आह्वान का प्रयोग किया करती थी। एक बार ऐसे ही प्रयोग-सेयाँस से इन्हें ऐसा सन्देश मिला, जिसे एक तरह का विस्फोट ही कहना चाहिए। उन्हें प्रेत द्वारा सूचना दी गई कि - ‘सम्राट एडवर्ड अब कुछ ही दिन जीवित रह सकेंगे उनकी उसी कोवे में मृत्यु होगी जिसमें कि वे जन्मे थे।’

महारानी उन दिनों ‘विंडसर प्रासाद में थीं। उन्हें समाचार मिला कि सम्राट कुछ साधारण से अस्वस्थ हैं पर चिन्ता जैसी कोई बात जरा भी नहीं है। तो भी महारानी का समाधान न हुआ। वे दौड़ती हुई पहुँची और देखा कि एडवर्ड बेहोश पड़े हैं। रानी को देखने के लिए उन्होंने आँखें खोली और प्राण त्याग दिये।

एडवर्ड की आत्मा का अस्तित्व मृत्यु के बाद भी अनुभव किया जाता रहा। उनकी एक अन्तरंग मित्र थी-लेडी वारविक। कुछ दिन प्रेत विद्या विशारद ‘एटाराइट’ के माध्यम से वे लेडी वारविक पर अपना अस्तित्व प्रकट करते रहे। इसके बाद उनने सीधा संपर्क स्थापित कर लिया। वे अक्सर अपनी प्रेयसी के पास आते और जर्मन भाषा में वारविक के साथ अपनी अतृप्त प्रणय आकाँक्षायें व्यक्त करते।

‘स्प्रिच्युअललिस्ट एलायन्स’ में अभी भी एक ऐसी घड़ी ऐतिहासिक सुरक्षा के साथ रखी हुई है जो मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व की मान्यता पर राज्य परिवार की स्वीकृति का प्रमाण देती है। यह घड़ी महारानी विक्टोरिया ने इस चक्र की सदस्या कुमारी जार्जियाना ईगल को-उनके प्रेत आह्वान की यथार्थता अनुभव करके भेंट में दी गई थी। कुमारी ईगल ने महारानी विक्टोरिया के सम्मुख प्रेतों के अस्तित्व और आह्वान की प्रामाणिकता के ऐसे अनेक सबूत पेश किये थे जिनके कारण विक्टोरिया को इस तथ्य पर पूरी तरह विश्वास जम गया था। सन् 1901 में महारानी विक्टोरिया की भी मृत्यु हो गई। प्रेत आह्वान संस्थान ने उनके साथ भी संपर्क बनाया। संस्थान की सञ्चालिका ऐटा राइट ने एक दिन स्वर्गीय महारानी की आवाज प्रत्यक्ष सुनवाई तो सभी सुनने वाले अवाक् रह गये।

महारानी विक्टोरिया का मरणोत्तर जीवन पर प्रगाढ़ विश्वास प्रख्यात है। वे 1819 में जन्मीं। 18 वर्ष की आयु में सन् 1837 में राजगद्दी पर बैठीं। तीन वर्ष बाद 1840 में उनका विवाह हुआ और कुछ वर्ष बाद ही वे विधवा हो गईं। महारानी ने अपने स्वर्गीय पति प्रिंस अलबर्ट से संबंध स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली। इस कार्य में उन्हें आर0डी0 लीज और जान ब्राउन नामक दो प्रेत विद्या विशारदों से बड़ी सहायता मिली। स्वर्गीय अलबर्ट जीवन काल की तरह मरने के उपरान्त भी महारानी को प्रत्येक कार्य में परामर्श और सहयोग प्रदान करते रहे। विधवा रहते हुए भी उन्हें सर्वथा एकाकीपन अनुभव न होने देने के लिए स्वर्गीय आत्मा उनके साथ घनिष्ठ संबंध बनाये रही।

अलबर्ट अपनी सूक्ष्म सत्ता को स्थूल रूप से प्रकट करने के लिए डी0 ब्राउन के शरीर का सहारा लेते थे। जो कहना होता वे उन्हीं के शरीर में प्रवेश करके कहते। महारानी मि0 लीज के प्रति बहुत कृतज्ञ थीं। जिनने ब्राउन के रूप में एक अधिकारी माध्यम लाकर उन्हें दिया था। प्रेतात्माएं हर शरीर के माध्यम से अपना अस्तित्व प्रकट नहीं कर सकती। उसके लिए उन्हें अधिकारी व्यक्ति चाहिए। इसके लिए मि0 ब्राउन सर्वथा उपयुक्त प्रमाणित हुए। लीज द्वारा उपयुक्त माध्यम की व्यवस्था की थी। सो इस सहायता के बदले में उच्च राज्य पद देने का प्रस्ताव कई बार किया पर लीज ने उसे सदा यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि-”आत्मिक जिम्मेदारियों का बोझ इतना अधिक होता है कि उसे वहन करते हुए लौकिक कार्यों को ठीक प्रकार नहीं किया जा सकता है। दोनों में से एक कार्य ही प्रमुख रह सकता है।” राज्य पद न लेने के इस तर्क को महारानी ने उचित समझा और उनसे इसी स्तर का सहयोग लेती रहीं।

महारानी विक्टोरिया को अपने स्वर्गीय पति का सहयोग हर कार्य में अभीष्ट प्रतीत होता था, उनके परामर्श की उन्हें निरन्तर आवश्यकता अनुभव होने लगी। परोक्ष सन्देशों के अधूरेपन और सन्देश की आशंका रहती थी। अस्तु ब्राउन के शरीर माध्यम से प्रत्यक्ष सन्देशों के आदान-प्रदान की आवश्यकता अनुभव की गई। इसके लिए ब्राउन के शरीर और अलबर्ट की आत्मा का समन्वय ऐसा उपयुक्त सिद्ध हुआ कि महारानी के दुखी जीवन में उपयुक्त सहारा मिल गया और वे इतने से भी बहुत हद तक अपने भार में हलकापन अनुभव करने लगी।

ईश्वर की इच्छा प्रबल ठहरी ब्राउन का भी स्वर्गवास हो गया। महारानी विक्टोरिया को इससे बड़ा आघात लगा मानो उनका दाहिना हाथ ही टूट गया हो। जान ब्राउन की सुन्दर सी कब्र पर महारानी विक्टोरिया के यह उद्गार लिखे हुए हैं-

‘मुझ वियोगिनी और व्यथिता के लिए-वरदान स्वरूप एक विलक्षण व्यक्ति की स्मृति।’ महारानी ने उनके प्रति अपने कथित भावनाएं व्यक्त करते हुए ‘स्वामिभक्त साथी और विश्वस्त मित्र के रूप में सम्बोधित करते हुए सम्वेदना व्यक्त की।’

ब्राउन के स्वर्गवास से महारानी को आघात लगा। उसे व्यक्त करते हुए उनके निजी सचिव सर हैनरी पौन सोनवी का एक वक्तव्य ‘टाइम्स’ पत्र में प्रकाशित हुआ। उन्होंने कहा-स्वर्गीय ब्राउन की सहायता महारानी को


Quotation

स्वर्गीय चितरंजन दास ने महात्मा गान्धी की प्रेरणा से अपनी बहुत भारी आमदनी की वकालत छोड़ दी और देश का काम करने लगे।

एक दिन बापू ने उन्हें सिगरेट पीना छोड़ देने का भी इशारा किया तो उन्होंने तत्काल उस गहरी जमी आदत को भी छोड़ दिया और कहा-बापू, मैं आपका कच्चा शिष्य नहीं। सिगरेट तो क्या आपके इशारे पर प्राण भी छोड़ सकता हूँ।

निरन्तर रहती थी। उनके स्वर्गवास पर साम्राज्ञी को भारी पीड़ा हुई है। इस आघात से इन दिनों वे बहुत दुर्बल हो गई हैं।

शरीर त्याग के बाद भी आत्माओं का अस्तित्व बना रहता है। यदि संपर्क का उपयुक्त माध्यम बन सके तो उनके साथ घनिष्ठ संपर्क ही नहीं वरन् आशाजनक सहयोग भी प्राप्त किया जा सकता है। इस तथ्य की प्रामाणिकता में असंख्य उदाहरणों के साथ ब्रिटेन के राज्य परिवार का विश्वास भी एक कड़ी की तरह जुड़ा हुआ है।


श्रवणशक्ति की दिव्य क्षमता और उसका विकास

संसार का सबसे संवेदनशील ‘राडार’ मनुष्य का कान है। ध्वनि कम्पनों को वह कितने अच्छे भेद-प्रभेद के साथ पकड़ता है इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि कोलाहल रहित स्थान में मक्खी की भिनभिनाहट जैसी बारीक आवाज छः फुट दूरी से सुनी जा सकती है।

न्यूजर्सी की टेलीफोन प्रयोगशाला में एक कमरा इस तरह का बनाया गया कि उसमें कोई बाहरी आवाज तनिक भी प्रवेश न कर सके। इसमें प्रवेश करने पर कुछ ही समय में मनुष्य को सीटी बजने, रेल चलने, झरने गिरने, आग जलने, पानी बरसने के समय होने वाली आवाजों जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती थी। इस प्रयोग को कितने ही मनुष्यों ने अनुभव किया, बात यह थी कि शरीर के भीतर जो विविध क्रिया-कलाप होते रहते हैं उससे ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। वे इतनी हलकी होती हैं कि बाहर होते रहने वाले ध्वनि प्रवाह में वे एक प्रकार से खो जाती हैं। नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह यह भीतरी अवयवों की ध्वनियाँ कानों तक नहीं पहुँच पाती, पहुँचती हैं तो वायुमण्डल में चल रहे शब्द कम्पनों की तुलना में अपनी लघुता के कारण उनका स्वल्प अस्तित्व अनुभव न होता हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पर जब बाहर की आवाज रोक दी गई और केवल भीतर की ध्वनियों को मुखरित होने का अवसर मिला तो वे इतनी स्पष्ट सुनाई देने लगीं मानों वे अंग अपनी गतिविधियों की सूचना चिल्ला-चिल्ला कर दे रहे हों।

रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन, ग्रहण-विसर्जन, स्थगन-परिभ्रमण, विश्राम, स्फुरणा, शीत-ताप जैसे परस्पर विरोधी अथवा पूरक अगणित क्रिया-कलाप शरीर के अंग-अवयवों में निरन्तर होते रहते हैं। हर हलचल ध्वनि तरंगें उत्पन्न करती है। ऐसी दशा में उनका शब्द प्रवाह उपयुक्त स्थिति में कानों तक पहुँच ही सकता है और संवेदनशील कर्णेन्द्रिय उन्हें भली प्रकार सुन भी सकती है।

कान जैसा कोई इलेक्ट्रानिक मनुष्य द्वारा बन सकना सम्भव नहीं। क्योंकि कान में ऐसी सम्वेदनशील झिल्ली लगाई गई है जिसकी मोटाई एक इञ्च का 2500 बिलियन (एक बिलियन बराबर दस लाख) है। इतनी हलकी साथ ही इतनी संवेदनशील ध्वनि ग्राहक वस्तु बन सकना मानवीय कर्तृत्व से बाहर की बात है। सुनने के प्रयोजन में काम आने वाले मानव निर्मित यन्त्रों की तुलना में कान की संवेदनशीलता दस हजार गुनी है। हमारे कान लगभग 4 लाख प्रकार की आवाज पहचान सकते हैं और उनके भेद प्रकार का परिचय पा सकते हैं। सौ वाद्य यंत्रों के समन्वय से बजने वाला आर्केस्ट्रा सुन कर उनसे निकलने वाली ध्वनियों का विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले कान कितने ही संगीतज्ञों के देखे गये हैं। शतावधानी लोग सौ शब्द श्रृंखलाओं के क्रमबद्ध रूप से सुनने और उन्हें मस्तिष्क में धारण कर सकने में समर्थ होते हैं। कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान ने घण्टे पर पड़ी हुई चोट को सुनकर उसकी दूरी की स्थिति विदित कर ली थी।

कानों की झिल्ली आवाज की बिखरी लहरों को एक स्थान पर केन्द्रित करके भीतर की नली में भेजती है। वहाँ वे तरंगें विद्युत कणों में बदलती हैं। इसी केन्द्र में तीन छोटी किन्तु अति सम्वेदनशील हड्डियाँ जुड़ती है; वे परस्पर मिलकर एक पिस्टन का काम करती हैं। इसके आगे लसिका युक्त घोंघे की आकृति वाले गह्वर में पहुँचते-पहुँचते आवाज का स्वरूप फिर स्पष्ट हो जाता है। इस तीसरे भाग की झिल्ली का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है। कान के बाहरी पर्दे पर टकराने वाली आवाज को लगभग 3500 कणिकाओं द्वारा आगे धकेला जाता है और मस्तिष्क तक पहुँचने में उसे सैकिण्ड के हजार वें भाग से भी कम समय लगता है। मस्तिष्क उसे स्मरण शक्ति के कोष्ठकों में वितरित विभाजित करता है। वह स्मरण शक्ति पूर्व अनुभवों की आवाज पर भी यह निर्णय करती है कि यह आवाज तुरही की है या घड़ियाल की। सुनने की प्रक्रिया को अन्तिम रूप यहीं आकर एक बहुत बड़ी-किन्तु स्वल्प समय में पूरी होने वाली प्रक्रिया के उपरान्त मिलता है।

कितने ही जीवों में मनुष्य की अपेक्षा अधिक दूर की आवाजें सुनने की शक्ति है। घोड़े को ही लें, उसके कानों के बाहरी परदे में 17 पेशियाँ होती हैं जबकि मनुष्य में उनकी संख्या 9 है। इसी अनुपात से घोड़ा मनुष्य की अपेक्षा अधिक दूरी की और अधिक हलकी आवाजें सुन सकता है।

नेपोलियन बोनापार्ट की स्मरण शक्ति बहुत तीव्र थी। अपनी सेना के प्रायः हर सिपाही का नाम उसे याद रहता था और आवाज सुनने भर से बिना देखे वह यह बता देता था कि कौन बोल रहा है। इसी प्रकार सिकन्दर की श्रवण शक्ति विलक्षण थी। एक बार रात को उसने एक गाना सुना। निस्तब्ध नीरवता में वह गीत बहुत दूर से आ रहा था पर सिकन्दर ने उसे सुन ही नहीं याद भी कर लिया। कई दिन वह संगीत प्रवाह उसी तरह उसी समय पर सुनाई पड़ता रहा। सिकन्दर ने अपने कर्मचारियों को उस गायक की दिशा और दूरी बताकर बुला लाने के लिए भेजा। पाँच मील दूरी पर नीरव जंगल में वही व्यक्ति गाया करता था जिसकी आवाज सिकन्दर ने सुनी।

मस्तिष्क के साथ नाक, कान, आँख, जीभ, इन्द्रियाँ जुड़ी हैं। उन सभी के कार्यों का सञ्चालन सन्तुलन रखने में मस्तिष्क की शक्ति विभक्त रहती है और खर्च होती है। यदि इनमें से कोई एक इन्द्रिय कुण्ठित हो जाय तो उस पर होने वाली क्षमता अन्य इन्द्रियों पर या इन्द्रिय विशेष पर लग जाती है। इसी कारण अन्धों में विशिष्ट प्रतिभा विकसित देखी जाती है। अन्य इन्द्रियों के कुण्ठित होने का भी दूसरी इन्द्रियों को शक्ति बढ़ने का लाभ होता है पर चूँकि नेत्रों में सबसे अधिक शक्ति नियोजित है इसलिए अन्धों में गायन, स्मरण आदि की विशेषताएं अधिक मात्रा में विकसित देखी जाती है।

अभ्यास से दुर्बल व्यक्ति भी पहलवान बन जाते हैं। कालिदास मूर्ख थे पर विद्याध्ययन में निरन्तर श्रम संलग्न रहने से वे उच्च कोटि के कवि और विद्वान बन गये। इन्द्रियों की शक्ति का यदि अभिवर्धन अभ्यास किया जाय तो उनकी क्षमता में असाधारण और आश्चर्यजनक वृद्धि हो सकती है। कर्णेन्द्रिय का विकास इतना अधिक हो सकता है कि वह सिकन्दर की तरह दूरगामी, हल्की आवाजें भी अच्छी तरह सुन ले। भीड़ के चहल-पहल के सम्मिश्रित शब्द घोष में से। अपने परिचितों की आवाज छाँट और पकड़ लें। घुसफुस की-कानाफूसी की आवाजों को भी कर्णेन्द्रिय की प्रखरता को तीव्र बनाने पर सुना जा सकता है। ऐसी विशेषताएं कइयों में जन्म-जात होती है किन्हीं में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने से विकसित होती हैं।

यह तो स्थूल कर्णेन्द्रिय के निकटवर्ती उच्चारणों को सुनने, समझने की बात हुई। इससे भी बढ़कर बात यह है कि सूक्ष्म और कारण शरीरों में सन्निहित श्रवण शक्ति को यदि विकसित किया जा सके तो अन्तरिक्ष में निरन्तर प्रवाहित होने वाली उन ध्वनियों को भी सुना जा सकता है जो चमड़े से बने कानों की पकड़ से बाहर हैं।

सूक्ष्म जगत की हलचलों का आभास इन ध्वनियों के आधार पर हो सकता है। कराहने की आवाज सुनकर किसी के शोक ग्रस्त होने, दर्द से छटपटाने, सताये जाने आदि की स्थिति का-दूरी का-नर-नारी का-बाल-वृद्ध का अनुमान लगा लिया जाता है उसी प्रकार कर्णेन्द्रिय की पकड़ से बाहर की सूक्ष्म ध्वनियों को यदि सुना जा सके तो विश्व में विभिन्न स्थानों पर विभिन्न स्तर की घटित होने वाली घटनाओं का विवरण जाना जा सकता है, सम्भावनाओं का पता लगाया जा सकता है तथा लोक-लोकान्तरों में हो रही हलचलों को समझा जा सकता है। सर्वसाधारण के लिए अविज्ञात जानकारियाँ सूक्ष्म शरीर की कर्णेन्द्रिय के विकास द्वारा नितान्त सम्भव है।

तन्त्र विद्या में ‘कर्ण पिशाचिनी’ साधना का महत्वपूर्ण प्रकरण है। रेडियो, टेलीफोन तो निर्धारित स्थान से निर्धारित स्थान पर ही सन्देश पहुँचाते हैं उन्हें विशेष यन्त्रों द्वारा ही प्रेषित किया जाता है और विशेष यन्त्र ही सुनते हैं। कर्ण पिशाचिनी विद्या से कहीं पर भी हो रहे शब्द प्रवाह को सुना जा सकता है। स्थूल शब्दों के अतिरिक्त अन्य घटनाक्रमों की हलचलें विद्युत के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहती हैं, उन किरणों को प्रकाश रूप में देखा जा सकता है और शब्द रूप में सुना जा सकता है। ताँत्रिक साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।

नाद योग सूक्ष्म शब्द प्रवाह को सुनने की क्षमता विकसित करने का साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उनमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईश्वर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग की अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, वीणा, नफीरी, नूपुर जैसी आवाजें होती हैं और बादल गरजने, झरना झरने, आग जलने झींगुर बोलने जैसी क्रमबद्ध ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ती हैं। आरम्भ में यह शरीर के अन्तरंग में हो रही हलचलों की ही प्रतिक्रिया होती है पर पीछे दूरवर्ती घटनाक्रमों के संकेत प्रकट करने वाली अधिक सूक्ष्म आवाजें भी पकड़ में आती हैं। अनुभव के आधार पर उनका वर्गीकरण करके यह भी जाना जा सकता है कि इन ध्वनि संकेतों के साथ कहाँ किस प्रकार का-किस काल का घटनाक्रम सम्बद्ध है। आरम्भिक अभ्यासी भी अपने शरीरगत अवयवों की हलचल, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, पाचन संस्थान आदि की जानकारी उसी भाँति प्राप्त कर सकता है जिस तरह की डॉक्टर लोग स्टेथिस्कोप आदि उपकरणों से हृदय की गति, रक्त चाप आदि का पता लगाते हैं अपने ही नहीं दूसरों के शरीर की स्थिति का विश्लेषण इस आधार पर हो सकता है और तदनुकूल सही निदान विदित होने पर सही उपचार का प्रबन्ध हो सकता है।

सूक्ष्म शरीर की कर्णेंद्रिय को विकसित करके संसार में घटित होने वाले घटनाक्रम को जाना जा सकता है। कारण शरीर का सम्बन्ध चेतना जगत से है। लोगों की मनःस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली अदृश्य ध्वनियाँ जिसकी समझ में आने लगें वह मानव प्राणी की-पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं की मनःस्थिति का परिचय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार बिना उच्चारण के एक मन से दूसरे मन का परिचय, आदान-प्रदान होता रह सकता है। विचार सञ्चालन विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि मनःस्थिति के अनुसार भावनाओं के उतार-चढ़ाव में एक विचित्र प्रकार की ध्वनि निसृत करते हैं और उसे सुनने की सामर्थ्य होने पर मौन रहकर ही दूसरों की बात अन्तःकरण के पर्दे पर उतरती हुई अनुभव की जा सकती हैं और अपनी बात दूसरों तक पहुँचाई जा सकती है।

कारण शरीर की कर्णेन्द्रिय साधना, देवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान-प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का-आत्म साधना का उद्देश्य है।


हितोपदेश

“इस संसार में स्वभाव से कोई भी पुरुष किसी भी पुरुष के प्रति न तो उदार होता है, न कोई किसी के प्रति दुष्ट होता है। संसार में मनुष्य के अपने कार्य ही उसको गुरुता अथवा लघुता पर पहुँचा देते हैं। (अर्थात्) उत्तम कार्यों से ही मनुष्य महान बन जाता है, और अधम तथा निकृष्ट कार्यों से लघु बन जाता है। जो जैसा कार्य करता है वैसा बन जाता है।”

-हितोपदेश


अपने दोषों को स्वीकारें और सुधारें

दोषों को ढूँढ़ना-समझना, उनका विरोध करना और हटाना यह अच्छा काम है। पर है तब जब अपने से आरम्भ किया जाय। हम अपने दोषों को औरों की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह ढूँढ़ सकते हैं। जितना पता हमें अपने आपके बारे में हैं उतना दूसरों को कैसे हो सकता है उन्हें तो उतनी ही जानकारी है जितनी कि देखी या सुनी है। देखने और सुनने से भी बहुत कुछ बच जाता है। लोग अपनी अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ा कर बताने के और बुराइयों को छिपा लेने के आदी हैं। सो इस छिपाव की आड़ में कितने ही अपने दोष दूसरों की जानकारी में नहीं आते।

अपनी असलियत हम जितनी अच्छी तरह जान सकते हैं, दूसरे उतनी नहीं। सो दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की चेष्टा हमें अपने आप से आरम्भ करनी चाहिए, क्योंकि अपने निकटतम समीपवर्ती हम स्वयं ही हैं। अपने ऊपर अपना जितना प्रभाव और दबाव है उतना और किसी पर नहीं। इसलिए यदि सुधारने का काम आरम्भ करना हो तो ऐसे व्यक्ति से आरम्भ करना चाहिए जो अपने अधिकतम निकट और अधिकतम प्रभाव दबाव में हो। ऐसा व्यक्ति हम स्वयं ही हो सकते हैं।

सबसे बड़ी हिम्मत का काम है अपनी वास्तविकता समझना और अपने दोषों तथा दुर्बलताओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लेना। इसी स्वीकृति के बाद लगेगा कि जिसे दुर्बलताओं से छुड़ाने और पापों से बचाने की जरूरत है वह प्रथम व्यक्ति-हम स्वयं ही हैं। अपनी कुरूपता स्वीकार करने में जिसे डर नहीं लगता, और अपनी असलियत को बिना छिपाये प्रकट करता है असल में सबसे बहादुर शूरवीर उसे ही कहना चाहिए, योद्धा का काम लड़ना ही है। अनाचार ने हर योद्धा को चुनौती दी है कि वह लड़ने के लिए खम ठोंके और आगे आये। ऐसा धर्म-युद्ध आरम्भ करने के लिए हमारा अपना मन और जीवन ही सबसे बड़ा कुरुक्षेत्र-युद्ध मोर्चा हो सकता है।

दोषों और दुर्बलताओं को छिपाने में हम जितना मनोयोग लगाते हैं उससे आधा भी यदि उनके परिष्कार में लगा दें तो सरलतापूर्वक निर्मल और निष्पाप गतिविधियाँ अपनाने में सफलता मिल सकती है।

मित्रों में उन्हें सम्मिलित करना चाहिए जो हमारे दोष दर्शा सकें और कुमार्ग से हटाने का साहस उत्पन्न कर सकें। आमतौर से होता यह है कि चापलूसी भाती है और दोषों की चर्चा करने वाला शत्रु लगता है। हम चोरी का धन्धा करते हों और कोई चोर कह दे, बेईमानी करते हो और कोई बेईमान कह दे तो बहुत बुरा लगता है और उससे लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं। इसे कायरता ही कहना चाहिए कि वस्तु-स्थिति को बताने वाले दर्पण में अपनी कुरूपता देखना हमें सहन नहीं होता और अपने अपराध का दण्ड उस दर्पण को तोड़ने के रूप में देना चाहते हैं। कई बार ऐसे तर्क प्रस्तुत करके हम अपना बचाव करते हैं। हमीं अकेले तो नहीं है। दुनिया में और भी तो बहुत लोग यह कर रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं रोकते?

अपने दोषों की समीक्षा के लिए हमें ही स्वयं आगे आना चाहिए ताकि किसी दूसरे को वैसा करने का कष्ट न करना पड़े। चर्चा या निन्दा करना उतना आवश्यक नहीं जितना कि सुधार के लिए प्रयत्न करना। निन्दा करने मात्र से पाप भाग नहीं जायगा। भ्रष्टाचार का अन्त करने के लिए मात्र चीख पुकार काफी नहीं। उसके लिए कुछ ठोक कदम उठाने पड़ेंगे। और उनमें सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली काम यह हो सकता है कि हम अपने दोषों को साहसपूर्वक स्वीकार करें और साथ ही अपनी दुर्बलताओं को उखाड़ फेंकने के लिए वह पराक्रम पुरुषार्थ दिखायें जो सच्चे बहादुर और सच्चे योद्धा ही दिखाया करते हैं। अपने आपसे लड़ना और अपने को शुद्ध बना लेना बाहर की दुनिया को निर्मल निष्पाप बना सकने की सबसे बड़ी योग्यता और वीरता की सबसे बड़ी निशानी है।


चुम्बकत्व व्यक्ति और विश्व का आधार

एक दूसरे का आकर्षण ही मनुष्य समाज को परस्पर बाँधे हुए हैं और उसे समुन्नत बनाने में सहयोग कर रहा है। व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति आकर्षण ही प्रेम के रूप में बदलता रहता है और सहयोग का पथ-प्रशस्त करता है। सच्ची मित्रता जहाँ लौकिक दृष्टि से हर दृष्टि से उपयोगी और पारस्परिक अपूर्णताओं को पूर्णता में बदलने वाली होती है वहाँ उसका आत्मिक लाभ भी है। आत्माओं का गहन स्तर पर मिलन एक ऐसे आह्लाद का सृजन करता है जिसकी तुलना संसार की किसी भी सुविधा के कारण मिली हुई प्रसन्नता के साथ नहीं की जा सकती। प्रेम को मानव-जीवन का रस और सार कहा है। उल्लास इस तत्व के अतिरिक्त और कहीं है ही नहीं। पदार्थों में भी यदि कभी कुछ प्रिय लगता है तो वैसा तभी होता है जब उसके साथ ममत्व जुड़ जाय। परायाधन या उपेक्षा भाव रहने से कोई वस्तु कितनी ही अच्छी क्यों न हो अपने लिए तनिक भी उत्साह प्रदान न कर सकेगी।

भावनात्मक क्षेत्र में जिस आकर्षण को ‘प्रेम’ कहते हैं वही प्रकारांतर से समस्त जड़ चेतन में संव्याप्त है। सौर मण्डल के ग्रह उपग्रह सूर्य के साथ उसकी चुम्बकीय शक्ति से बँधे हैं। आकाश गंगा के साथ सौर मण्डल बँधा है। महासूर्य का ध्रुव केन्द्र समस्त आकाश गंगाओं को अपने साथ जोड़े हुए है। सारा ब्रह्माण्ड परस्पर मजबूत रस्सों से बंधा है, उसे चुम्बकत्व ही कहना चाहिए। मानव समाज ही नहीं ब्रह्माण्ड व्यापी ग्रह नक्षत्रों को भी आकर्षण विशेष की शृंखलाओं में प्रकृति ने जकड़ कर रखा है तभी वह यथास्थान टिका हुआ है और यथाक्रम चल रहा है।

जिस धरती पर हम रहते हैं उसके अन्तरंग और बहिरंग समस्त क्रियाकलाप उसके कण-कण में सन्निहित आकर्षण शक्ति पर ही अवलम्बित हैं। पृथ्वी एक बड़ा चुम्बक है। उसकी चुम्बकीय किरणें निरन्तर हर जड़-चेतन को प्रभावित करती रहती है। समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटों के पीछे इसी शक्ति का आकर्षण विकर्षण काम करता है। शरीर के कोषाणुओं का निर्माण, परिवर्तन और क्रिया-कलाप गतिशील रखने में यह पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति ही प्रेरक है। इतना ही नहीं हमारा प्रत्येक कीटाणु एक छोटा चुम्बक है जो वायुमण्डल में लहराते हुए शक्ति तत्व की फ्रीक्वेन्सी (आकृति) ग्रहण करते हैं। उनके वाइब्रेट और आसीलेट क्रिया-कलाप इस चुम्बकीय क्षमता के कारण ही चलते हैं। मनुष्य शरीर में इस चुम्बकीय शक्ति का परिचय कहीं भी अनुभव किया जा सकता है। बालों में कंघी कीजिए उस कंघी को लोहे की पिन से स्पर्श कराइये। चुम्बकीय गुण तत्काल प्रत्यक्ष होगा।

यों यह चुम्बक तत्व न्यूनाधिक मात्रा में समस्त भूमण्डल के दृश्य और अदृश्य पदार्थों में भरा पड़ा है पर उसको अधिक स्पष्ट और सशक्त चुम्बक के नाम से पहचाने जाने वाले पत्थर से लोहे में देखा जाता है। प्राकृतिक रूप से वह शिला खण्डों में यत्र-तत्र पाया जाता है। लोहे में विद्युतधारा का प्रवेश कराने से कृत्रिम चुम्बक भी बन जाता है। शोधकर्ताओं का कथन है कि सर्वप्रथम अब से ढाई हजार वर्ष पूर्व-किसी मैगनस नामक गड़रिये के नाम पर उसे ‘मैगनेट’ कहा जाने लगा।

जो हो ‘चुम्बक’ एक अति उपयोगी शक्ति है। कल-कारखानों यन्त्रों में उसकी उपयोगिता अत्यधिक बढ़ती जाती है। यदि चुम्बक का प्रयोग शक्य न रहे तो लगभग आधे कल-कारखाने बन्द करने पड़ें और रेडियो ट्राँजिस्टरों का तो अस्तित्व ही शेष न रहें।

चुम्बक की आवश्यकता जहाँ यन्त्र उपकरणों में है वहाँ उसकी उपयोगिता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण में भी कम नहीं है जिस प्रकार आयुर्वेद के हिसाब से शारीरिक संतुलन वात, पित्त, कफ के ऊपर टिका हुआ है। तिब्वी में जिस प्रकार आबी, वादी, खाकी का बोल बाला है, उसी प्रकार विद्युत विज्ञान वेत्ता शरीरगत चुम्बकीय क्रिया-कलाप को देखते हुए यह कहते रहे हैं कि अंग विशेष में इस चुम्बकीय तत्व की न्यूनाधिकता हो जाने से रोगों की उत्पत्ति होती है और यदि उसके अभाव की पूर्ति एवं विकृति की निवृत्ति कर दी जाय तो रुग्णता से छुटकारा पाया जा सकता है। बायोकेमिकल विज्ञान में बारह लवणों की कमीवेशी से रोगों की उत्पत्ति मानी जाती है और उन क्षारों को देह में पहुँचाकर चिकित्सा की जाती है ठीक उसी प्रकार चुम्बक विज्ञान के ज्ञाताओं का कथन है कि शरीर का सारा क्रिया-कलाप ‘विद्युतमय’ है। उसकी सक्रियता चुम्बकीय आधार पर खड़ी है। वही जीवन का सबसे बड़ा आधार है। रुग्णता का कारण इस विद्युत प्रवाह में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाना ही है। रोगों का निवृत्ति में चुम्बकीय उपचार-दवादारु से कहीं अधिक कारगर हो सकता है। इसी आधार पर इलेक्ट्रोपैथी का एक स्वतन्त्र चिकित्सा विज्ञान खड़ा किया गया है।

शोधकर्ता चुम्बकीय चिकित्सा पद्धति को नवीन आविष्कार नहीं मानते वे कहते हैं यह विधान प्राचीन लोगों को भली प्रकार मालूम था और वे इसे रोग निवारण के लिए चिरकाल से प्रयुक्त करते रहते हैं। यूनान के चिकित्सा साहित्य में इस उपचार की विस्तृत प्रक्रिया मौजूद है। पन्द्रहवीं शताब्दी में स्विट्जरलैण्ड के चिकित्सक फिलिप्स आरोलस पेरासेल संस ने चुम्बकीय उपचार से कष्ट साध्य रोगों की चिकित्सा करने में भारी सफलता और ख्याति प्राप्त की थी। मिश्र, चीन, यूनान आदि देशों में भी इसी प्रकार के प्रयोगों का प्रचलन रहा है।

मनुष्य का आन्तरिक चुम्बकत्व प्रेम, शिथिल पड़ जाने पर सारा संसार रूखा, नीरस, स्वार्थी, कर्कश और बेतुका प्रतीत होता है उसे छोड़कर कहीं नीरव सुनसान में भाग जाने को मन करता है। और यहाँ सब कुछ ऐसा उलझा बेतुका लगता है कि आत्महत्या करने को जी करता है। आस्था खोकर-हिप्पी दर्शन अपनाने के लिए कदम उठाते हैं-न कोई अपना न हम किसी के वाली दृष्टि तभी उपजती है जब अन्तःकरण में प्रेम का निर्झर सूख जाता है। यह स्थिति मानव-जीवन में कितनी विषम और कितनी भयंकर है इसे प्रेम शून्य हृदयरूपी मरघट की एक झाँकी निकट से लेने पर ही जाना जा सकता है। अगणित मनोविकार तो इस स्थिति में उठ खड़े होते ही हैं। शारीरिक रुग्णता भी धर दबोचने में पीछे नहीं रहती।

बीमारियों के उपचार में परिचर्या और चिकित्सा का भी स्थान है। पर यदि चुम्बक चिकित्सा की व्यवस्था हो जाय, उस प्रयोजन को पूरा करने वाले अस्पताल खुल जायँ तो संसार में से आधी शारीरिक और मानसिक रुग्णता समाप्त होने में देर न लगे। प्रेम, सहानुभूति, सद्भाव, ममत्व की कुछ बूँद पाने पर किसी को भी नव-जीवन संचार का अनुभव हो सकता है। अमृत की चर्चा बहुत होती रहती है। धरती पर यदि अमृत का रसास्वादन करना हो तो सच्चे हृदय से निकली हुई गहरी सहानुभूति ही अमृत का प्रयोजन पूरा करती दिखाई पड़ेगी। उसे पाकर मृतक को जीवन मिल सकता है और सूखे पर हरियाली छा सकती है। रोगों का बहुत बड़ा कारण स्नेह, सहानुभूति से वंचित जीवन ही है। विटामिनों और प्रोटीनों का अभाव नहीं। यदि स्नेह सद्भाव की चुम्बक चिकित्सा का प्रबन्ध इस दुनिया में हो सका होता तो न जाने कितने कराहते व्यक्तियों के चेहरों में मुसकान अठखेलियाँ करती दिखाई देतीं।

पृथ्वी की तरह चुम्बक में भी दो ध्रुव होते हैं। शरीर भी एक मैगनेट ही है उसमें भी दो ध्रुव हैं। मस्तिष्क में उत्तर ध्रुव का काम-जीवाणु क्रिया का नियन्त्रण और दक्षिणी ध्रुव का काम शक्ति परीक्षण करना है। दोनों के सम्मिलन से विविध शक्तिधाराओं का प्रादुर्भाव होता है और फिर उसका प्रभाव विविध विधि काम-क्रिया कलापों को गतिशील करता है।

जब कहीं इस चुम्बकीय क्षमता में न्यूनता, दुर्बलता अथवा विकृति उत्पन्न होती है और अवयवों की संचार व्यवस्था गड़बड़ा जाती है-जिस प्रकार बत्ती, पंखे, रेडियो में करेण्ट कम पड़ जाने से वे मन्द या बन्द हो जाते हैं वही गति शारीरिक अवयवों की होती हैं। कहीं तार ‘शाट’ हो जाय तो वहाँ चिनगारियाँ उड़ने लगती हैं और यदि उन्हें देर तक सम्भाला न जाय तो अग्निकाण्ड जैसी विभीषिका उत्पन्न होती है। उसी प्रकार यह विद्युतीय विकृति शरीर में असह्य एवं कष्ट-साध्य पीड़ाएं उत्पन्न कर देती है और मृत्यु का कारण बन जाती है।

प्रकृतिगत चुम्बकीय प्रवाहों की प्रतिक्रिया भी शरीरों को प्रभावित कर सकती है और भीतरी गड़बड़ न होने पर भी बाहर के प्रभाव स्वास्थ्य को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं यह भी उनका कहना है।

रोगों के घटाने-बढ़ाने में चुम्बकीय शक्ति का कितना हाथ हो सकता है इस संदर्भ में पिछले दिनों शरीर शास्त्री बहुत प्रयोग करते रहे हैं। अमेरिका के डॉक्टर हैराल्ड एस॰ एलेक्जेंडर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चुम्बकीय उपचार से कैंसर सरीखे भयावह रोगों पर नियन्त्रण किया जा सकता है, हंगरी के डॉक्टर जीन वारनोथी ने भी चुम्बकीय उपचार पर लम्बी शोध की है। उनका यह शोधकार्य “बायोमैग्नेटिक रिसर्च फाउण्डेशन” के तत्वावधान में चला और परिणामों की विस्तृत रिपोर्ट ‘मेडीकल वर्ल्ड न्यूज’ में प्रकाशित हुई। इसमें कितने ही ऐसे मनुष्य और पशु रोगियों की चर्चा है जिन पर किये गये वह मैगनेटिक उपचार आशाजनक रीति से सफल हुए। इस प्रक्रिया में चुम्बक के उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के हेर-फेर से उत्पन्न परिणामों का वर्णन किया गया है और बताया गया है कि स्थिति के अनुरूप इस ध्रुवीय सामर्थ्य का उचित नियोजन ही अभीष्ट सफलता प्रदान करता है।

अब तक आहार व्यवहार को ही आरोग्य का एकमात्र आधार माना जाता था। मिनिरल, विटामिन, प्रोटीन आदि को ही स्वास्थ्य के उत्थान-पतन का कारण माना जाता था पर अब शोधें यह प्रमाणित कर रही हैं कि कुछ सूक्ष्म कारण भी ऐसे हैं जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी प्रत्यक्ष पोषणों से कहीं अधिक उपयोगी एवं आवश्यक हैं इनमें चुम्बकत्व की पोषक शक्ति को अब अधिक महत्व मिलने लगा है। अविवाहित युवा लड़कियों को मूर्छा मृगी सरीखे मानसिक रोग हो जाते हैं। इनमें उनकी शारीरिक और मानसिक चुम्बकीय भूख ही प्रधान कारण होती है।

युवा लड़कों में खीज, आवेश, उद्दण्डता, आक्रोश, अवज्ञा जैसे मनोविकार फूटते हैं। शरीर में भी युवा और युवतियों में कई तरह के रोग उठते देखे गये हैं। यह उनकी उसी अदृश्य भूख और अतृप्ति के कारण होते हैं जिसे साथी सहचर की आवश्यकता कह सकते हैं। दाम्पत्य जीवन में शारीरिक और मानसिक चुम्बकत्व का जो आदान-प्रदान होता है उसके कारण अस्वस्थता से बचने और स्वास्थ्य संवर्धन का पथ प्रशस्त होता है। काम-सेवन की नहीं-सान्निध्य सामीप्य और सहानुभूति की महत्ता है।

अभीष्ट प्रकार का यह चुम्बकत्व जिसे भी उपलब्ध होगा वह न केवल शारीरिक वरन् मानसिक दृष्टि से भी परिपुष्ट होता चला जायगा। रोगी की चिकित्सा में दवा-दारु उतना काम नहीं करती जितना चिकित्सक का व्यक्तित्व। चरित्रवान सहृदय, उदार और सद्भाव सम्पन्न चिकित्सक अपनी मधुरता बखेर कर ही रोगी का आधा कष्ट दूर कर देते हैं। साधु-सन्त धूनी की राख भस्म देकर कई बार कीमती दवाओं से भी अधिक अच्छी चिकित्सा कर देते हैं यह उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व और सद्भाव सम्पन्न अन्तःकरण का ही प्रभाव होता है।

अमेरिका की ‘फेट’ पत्रिका के जुलाई 64 अंक में-जोसेफ एफ गुडवेज का एक लेख छपा है जिसमें चुम्बकीय उपचार में निष्णात डॉ0 मेकलीन द्वारा असाध्य रोगों को अच्छा करने के अनेक उदाहरणों का उल्लेख है। चिकित्सक महोदय 64 वर्ष के होते हुए भी 45 वर्ष से अधिक के नहीं लगते। वे प्रतिदिन 3600 गाँस चुम्बकीय शक्ति का लाभ अपने शरीर को देते हैं।

हार्वर्ड डी0 स्टेंगल ने चुम्बकीय शक्ति के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी सर्वसाधारण तक पहुँचाने पर बहुत बल दिया है। उन्होंने कितने ही लेख लिखकर स्वास्थ्य संवर्धन में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति को चुम्बकीय क्षमता से परिचित होने का आह्वान किया है। डॉक्टर फ्रंगनिस विक्टर ब्रोसाइस का अस्पताल यों ऐलोपैथी के आधार पर था पर वे चुम्बक उपचार पर ही अधिक ध्यान देते थे और कहते थे यह पद्धति हानि रहित भी है और शीघ्र फलदायक भी।

मानसिक रोगों के उपचार में यह पद्धति अभी भी सर्वोत्तम सिद्ध हुई है, पागलों और अर्ध विक्षिप्तों के मस्तिष्क में ‘इलेक्ट्रिक शाक देने की व्यवस्था प्रायः सभी मस्तिष्कीय अस्पतालों में मौजूद है। हलके मानसिक रोगों में चुम्बकीय छड़ के दक्षिणी ध्रुव को भ्रू मध्य भाग में रखने से लाभ होते देखा गया है। इससे नींद न आने की व्यथा में भी लाभ होता है। स्मरण शक्ति को तेज करना और एकाग्रता का बढ़ना भी इन प्रयोगों द्वारा सम्भव है। हृदय की धड़कन घटाने-बढ़ाने में भी यह प्रयोग कारगर सिद्ध होते हैं। रक्तचाप भी इन प्रयोगों से वैज्ञानिक परीक्षण के समक्ष सिद्ध करके डॉक्टर के हेलाल ने चिकित्सा शास्त्रियों का ध्यान विशेष रूप से उस ओर आकर्षित किया है।

डॉक्टर मैस्कर अपने मैस्मरेजम विज्ञान को एक स्वतन्त्र शास्त्र ही बना गये हैं। उनने प्रतिपादित किया है कि चुम्बकीय शक्ति न केवल शारीरिक मानसिक रोगों को दूर कर सकती है बल्कि प्रसुप्त ‘अतीन्द्रिय’ क्षमता को प्रशस्त करने में भी समर्थ है। उसके आधार पर मनुष्य परोक्षानुभूतियों की दिव्य-शक्तियों से सम्पन्न हो सकता है और मानसिक संस्थान को न केवल रोग मुक्त वरन् प्रतिभा सम्पन्न भी बना सकता है। उन्होंने पाषाण अथवा धातुगत चुम्बक की अपेक्षा मानवीय शरीर में विद्यमान विद्युत शक्ति को अधिक स्वच्छ, प्रभावी और अन्तःस्तल की गहराई तक प्रवेश कर सकने वाली सिद्ध किया है।

चुम्बक उपचार की महत्ता शरीर शास्त्री प्रतिपादित कर रहे हैं, वे इस प्रयोजन के लिये बिजली के उपकरणों में आगे बढ़ रहे हैं। इससे रोग निवारण में अपेक्षाकृत अधिक सफलता मिलने की आशा की जाती है। यह तथ्य सही है। सम्भावना यही है कि अगले दिनों चिकित्सा क्षेत्र में चुम्बक एक नया और प्रभावशाली तत्व बनकर प्रवेश करेगा।

मानसोपचार की दृष्टि से केवल झटका देने वाली बिजली का ही उपयोग पर्याप्त नहीं उसमें इस सद्भावना सम्पन्न और उच्च व्यक्तित्व के साथ सम्बद्ध सचेतन विद्युत चुम्बक का भी समावेश होना चाहिए। स्नेह और सहानुभूति का विद्युत प्रवाह जब पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होगा और उसकी पर्याप्त मात्रा हर किसी को मिलने लगेगी तब न केवल शारीरिक और मानसिक विकृतियाँ समाप्त होंगी वरन् सामाजिक वातावरण भी ऐसा बनेगा जिसमें सर्वत्र स्नेह, और सहयोग की गतिविधियाँ बिखरी पड़ी रहेंगी और हर कोई उल्लास और उत्साह से भरा होगा।

चुम्बकत्व ग्रह नक्षत्रों को बाँधे हुए है। धरती के सारे क्रिया-कलापों का संचार कर रहा है। आरोग्य का आधार है, यह चुम्बकत्व यदि स्नेह सद्भाव की भावनात्मक परिधि में प्रवेश कर सका तो इसी धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ समुत्पन्न होंगी।


परमार्थी कलाकार कृष्णन

केरल के प्रसिद्ध कलाकार कृष्णन के पड़ौस में एक मुसलमान के घर आग लगी। दो छोटे बालक प्रचण्ड आग में घिर गये। माता-पिता बचाने की पुकार लगाते हुए खड़े चीत्कार कर रहे थे। कृष्णन आग में कूदे और बच्चों को सुरक्षित वापस निकाल आये। पर वे इतने झुलस गये कि स्वयं अस्पताल में जाकर चल बसे।

कृष्णन के पीछे उनकी विधवा पत्नी, माँ, दो बच्चे थे। गुजारे का कोई सहारा न रहा। इस परमार्थी कलाकार के परिवार की सहायता के लिए काली कट के समाचार पत्र मातृभूमि ने सार्वजनिक सहायता की अपील छापी। तदनुसार बीस हजार रुपये इकट्ठे हो गये।

मातृभूमि के संचालक इस धन को लेकर कृष्णन की विधवा के पास गये। तो उसने वह धन उस पड़ौसी मुसलमान का जला हुआ घर बनाने तथा आजीविका के साधन जुटाने के लिए दिला दिया। और स्वयं मेहनत मजूरी करके अपना परिवार पालने लगी।


हम अन्य प्राणियों को भी बौद्धिक उत्कर्ष में सहयोग प्रदान करें

ज्ञान अनायास ही किसी को प्राप्त नहीं हो जाता। प्रयत्न, परिश्रम, इच्छा और परिस्थिति के आधार पर उसे पाया और बढ़ाया जाता है। मनुष्य को बुद्धिमान कहा जाता है; पर यह बुद्धिमता सापेक्ष है। ग्रहण करने का-समझने का तन्त्र दूसरे प्राणियों की अपेक्षा विकसित भले ही हो पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि ज्ञान पर उसी का पूर्ण अधिकार है। यदि दूसरे प्राणियों को भी अवसर और साधन मिलें तो वे भी विकासोन्मुख हो सकते हैं और क्रमशः आगे बढ़ते हुए आज की अपेक्षा कहीं आगे पहुँच सकते हैं।

कुत्ते को अपनी श्रेणी के दूसरे जानवरों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान माना जाता है। उसने यह स्थिति अकस्मात ही प्राप्त नहीं कर ली। मुद्दतों से वह मनुष्य का साथी बनकर रहता चला आया है। कुछ तो मनुष्य ने अपनी आदतों और आवश्यकताओं के अनुरूप उसे ढाला है। कुछ वह अपने अन्नदाता का अनुग्रह पाने के लिए स्वयं ढला है। संयोग और परस्पर आदान-प्रदान ने उसे इस स्थिति में पहुँचाया है। जंगली कुत्ते अभी भी योरोप के कई देशों में झुण्ड के झुण्ड पाये जाते हैं। नस्ल उनकी भी लगभग वैसी ही है पर स्वभाव में जमीन आसमान जितना अन्तर। पालतू और जंगली कुत्तों की शकल भले ही मिलती-जुलती है आदतों में जरा भी साम्य नहीं होता। पालतू बिल्ली और जंगली बिल्ली में भी यही अन्तर मिलेगा। पालतू बिल्ली ने मनुष्यों की आदतों को पहचान कर अपने को बहुत कुछ अनुकूलता के ढाँचे में ढाला है। जबकि जंगली बिल्ली बिल्कुल जंगली ही बनी हुई है। इसे शिक्षण प्रक्रिया का श्रेय कहना चाहिए।

भारत के अतिरिक्त अफ्रीका आदि देशों में ऐसे कई बालक भेड़ियों की माँद में पाये गये हैं जो उन्होंने खाये नहीं, पाल लिये। इन बालकों को जब बड़ी उम्र में पकड़ा गया तो उनमें मनुष्य जैसी कोई प्रवृत्ति न थी। वे चारों हाथ-पैरों से भेड़ियों की तरह चलते थे। कच्चे माँस के अतिरिक्त और कुछ खाते न थे, आवाज भी उनकी अपने पालन करने वालों ही जैसी थी। अन्य आदतों में भी उन्हीं के समान। ज्ञान ग्रहण का माद्दा बेशक उनमें रहा होगा पर परिस्थितियों की अनुकूलता के अभाव में उसका विकास सम्भव ही न हो सका।

दूसरी और अल्प विकसित पशु-पक्षी समुचित शिक्षण प्राप्त करके ऐसे करतब दिखाते हैं जिन्हें देख कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। मदारी लोग रीछ, बन्दरों को सिखाते हैं और उनके तमाशे गली, मुहल्लों में दिखाकर लोगों का मनोरंजन करते हुए अपनी जीविका कमाते हैं, सरकसों में सिखाये-सधाये शेर, हाथी, घोड़े, ऊँट, बकरे, रीछ, बन्दर आदि ऐसे कौतुक करते हैं जैसे मनुष्य भी कठिनाई से ही कर सके। इससे यही सिद्ध होता है कि शिक्षा का-शिक्षक का-शिक्षा पद्धति का महत्व असाधारण है। उसके द्वारा अल्प बुद्धि या बुद्धिहीन तथा उपयोगी बनाया जा सकता है और जंगली आदतों वाले जानवरों को सभ्यता अनुशासन तथा जानकारी की दिशा में अधिक शिक्षित किया जा सकता है। लगभग हर प्राणी में ज्ञान प्राप्त कर सकने की मूल प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं मनुष्य का कर्त्तव्य है कि उन्हें भी अपना छोटा भाई माने और बौद्धिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने में सहयोग प्रदान करें।

प्रसन्नता की बात है कि इस दिशा में अब अधिक ध्यान दिया जा रहा है और विभिन्न पशु-पक्षियों को इस योग्य बनाने में प्रयत्न किया जा रहा है कि वे अधिक बुद्धिमान बन सकें और मनुष्य के लिए अधिक सहायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकें। जर्मनी के मुन्स्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रेन्स तथा उनकी सहयोगी कुमारी उकर इस विषय में बहुत दिनों से अनुसन्धान कर रहे हैं और पशुओं को प्रशिक्षित करने की विधियों का आविष्कार करने में निरत हैं।

मलाया में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की बिल्ली ‘सियेट’ तथा ‘मंगूस’ नाम के एक अन्य पशु को उन लोगों ने प्रशिक्षित करने में बड़ी सफलता पाई। वे रंगों की भिन्नता तथा दूसरी कई बातों में प्रवीण हो गये।

कोहलर ने पक्षियों को गिनती सिखाने तथा वस्तुओं की भिन्नता स्मरण रखने में शिक्षित कर लिया। वे शब्दों का भावार्थ भी समझने लगे।

प्रोफेसर सन्स की छात्रा ‘सियेट’ निरन्तर रुचिपूर्वक पढ़ती रही और करीब 30 प्रकार के पाठ पढ़ कर उत्तीर्ण होती रही। उससे 34 हजार बार प्रयोग कराये गये जिसमें वह 70 से लेकर 84 प्रतिशत तक सफल होती रही। प्रोफेसर महोदय ने अपनी पुस्तक में उपरोक्त बिल्ली को पढ़ाने और उसकी भूल सुधारने की विधियों पर विस्तृत प्रकाश डाला है।

हाथी को दिखाई देने वाली वस्तु और सुनाई देने वाली ध्वनियों का सही तरीके से विश्लेषण करना नहीं आता पर वह इशारे समझने में बहुत प्रवीण है। संकेतों के आधार पर उसे भविष्य में बहुत आगे तक प्रशिक्षित किया जा सकेगा और उसे मनुष्य का उपयोगी साथी, सहायक बनाया जा सकेगा। बन्दर के बारे में भी ऐसी ही आशा की जा सकती है। उसकी चञ्चल प्रकृति और अस्थिर मति को सुधारा जा सकता है और मानव परिवार में कुत्ते की तरह, उपयोगी जीव की तरह सम्मिलित किया जा सकता है।

कुत्ते का भौंकना सुनकर उसका मालिक यह आसानी से बता सकता है कि उसके चिल्लाने का मतलब क्या है। भूख, प्यास, थकावट, शीत, गुस्सा, चेतावनी आदि कारणों को लेकर भौंकने के स्वर तथा स्तर में जो अन्तर रहता है उसे पहचान लेना कुछ कठिन नहीं है। कुत्ते की भाषा मनुष्य समझता हो सो बात ही नहीं है। कुत्ते भी मनुष्य की भाषा समझ सकते हैं। अभ्यास कराने पर उन्हें 100 शब्दों तक का ज्ञान कराया जा सकता है और उन आदर्शों के आधार पर उन्हें काम करने के लिए अभ्यस्त किया जा सकता है। 60 शब्द समझने तक में तो अभी भी कई कुत्ते सफलता प्राप्त कर चुके हैं। शब्द के साथ-साथ उसके कहने का विशेष ढंग और भाव मुद्रा का स्वरूप मालिक को भी सीखना पड़ता है। कानों से बहरे लोग सामने वाले के होठों का सञ्चालन तथा मुखाकृति का उतार-चढ़ाव देखकर लगभग आधी बात पकड़ लेते हैं। उसी प्रकार कुत्ते को आदेश देते समय, मात्र शब्दों का उच्चारण ही काफी नहीं वरन् मालिक को अपना लहजा, अदा और तरीका भी शब्द के साथ मिश्रित करके आदेश की एक नई शैली का आविष्कार करना पड़ता है। कुत्ते को ऐसी ही भाव और शब्द मिश्रित भाषा से ही आज्ञानुवर्ती बनाया जा सकता है।

कुत्ते रास्ता चलते बीच-बीच में पेड़-पौधे, खम्भे आदि पर बार-बार पेशाब करते चलते देख गये हैं। इस आधार पर वे अन्य साथियों को उस मार्ग से गुजरने की सूचना देते हैं। यह मूत्र गन्ध उस क्षेत्र पर उस कुत्ते के आधिपत्य की सूचना देती है और लौटते समय उसी रास्ते का संकेत देती है।

लन्दन चिड़ियाघर के अधिकारी डॉ0 डंसमंड मारिस का कथन है कि कुत्ते का दुम हिलाना, उसके मनोभावों के प्रकटीकरण से संबंधित है। विभिन्न मनःस्थितियों में उसकी पूँछ अलग-अलग ढंग से हिलती है। उसे समझा जा सके तो स्काउटों की ‘झण्डी संकेत पद्धति’ के अनुसार कुत्ते के मनोभावों को समझा जा सकता है।

कुत्ते में एक अद्भुत क्षमता निकटवर्ती भविष्य ज्ञान की है। वे ऋतु परिवर्तन की पूर्व सूचना दे सकते हैं और कई बार तो दैवी विपत्तियों की पूर्व सूचना भी देते हैं। कुछ समय पूर्व लिन मॉडल के डेवन प्रदेश में विनाशकारी बाढ़ आई थी। जिसमें भारी धन जन की हानि हुई। दुर्घटना से 4 घण्टे पूर्व सारे नगर के कुत्तों ने इकट्ठे होकर इस बुरी तरह रोना शुरू किया कि लोग दंग रह गये और तंग आ गये। जब बाढ़ आ धमकी तब समझा गया कि कुत्तों का इस प्रकार सामूहिक रूप से रोना विपत्ति की पूर्व सूचना के लिए था।

बिल्लियाँ भी कुत्तों से पीछे नहीं। मस्तिष्कीय सक्षमता की दृष्टि से वे कई बातों में और भी आगे हैं। उन्हें सिखा पढ़ाकर उपयोगी बनाया जाना अन्य छोटे पशुओं की अपेक्षा अधिक सरल है।

पशुओं में ज्ञान के मूल तत्व ही विद्यमान नहीं हैं वरन् उनमें भावों की अभिव्यक्ति का भी माद्दा है। टूटी-फूटी उनकी भाषा भी है, जिसके आधार पर वे अपनी जाति वालों के साथ विचार-विनिमय कर सकते हैं। इस भाषा को और अधिक विकसित किया जा सकता है। इस विकास के आधार पर मनुष्य के साथ अन्य प्राणियों के विचार विनिमय का द्वार भी खुल सकता है।

वैटजेल नामक एक प्राणी प्रेमी ने सन् 1801 में कुत्ते, बिल्ली तथा कई पक्षियों की भाषा का एक शब्द कोष बनाया था। फ्राँस निवासी द्यूपो नेमर्स ने कौओं की आवाज पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी। योरोप के कई विश्वविद्यालय इस सम्बन्ध में अपना अनुसन्धान कार्य कर रहे हैं इनमें केम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एक ‘शब्दकोष’ तो लगभग तैयार भी हो चला है।

‘चिंपैंजी इंटेलीजेंस एण्ड इट्ज वोकल एक्सप्रेशन’ पुस्तक लेखक द्वय श्री ईयर्कस और श्रीमती लर्नेड ने चिंपैंजी बन्दरों की लगभग 30 ध्वनियों का संग्रह और विश्लेषण करके एक प्रकार से उनका भाषा विज्ञान ही रच दिया है।

हर हर मन फ्रेबुर्ग ने अपनी पुस्तक ‘आउट ऑफ अफ्रीका’ में ऐसे अनेक संस्मरण लिखे हैं जिसमें गोरिल्ला और मनुष्य के बीच बात-चीत-भावों का आदान-प्रदान और सहयोग संघर्ष का विस्तृत परिचय मिलता है। साधारणतया जानवर अपनी ही जाति के लोगों से विचार विनिमय कर पाते हैं पर यदि सिखाया जाय तो न केवल मनुष्य के साथ हिलमिल सकते हैं वरन् एक जाति का दूसरी जाति वाले अन्य जीवों के साथ भी व्यवहार-संपर्क बनाया और बढ़ाया जा सकता है।

जानवरों का भाषा कोष तैयार करने में कई संस्थाओं ने बहुत काम किया है और कितने ही अन्वेषक निरत हैं। कैंब्रिज की ‘दी एशियाटिक प्राइमेट एक्स पेडीशन’ संस्था ने इस सम्बन्ध में बहुत खोज की है। इस संस्था के शोधकर्त्ता विश्व भर में घूमे हैं और विभिन्न पशुओं की आवाजें रिकॉर्ड की हैं। मोटे तौर पर यह आवाज कम होती है पर बारीकी से उनके भेद-प्रभेद करने पर वे इतनी अधिक हो जाती है कि उनके सहारे उन जीवों के दैनिक जीवन की-पारस्परिक सहयोग के लिए आवश्यक बहुत सी जरूरतें पूरी हो सकें। पैरिस के प्रो0 चेरोन्ड और अमेरिका के डॉ0 गार्नर ने अपनी जिन्दगी का अधिकाँश भाग इसी शोधकार्य में लगाया है।

बन्दरों की भाव भंगिमा उनकी मनःस्थिति को अच्छी तरह प्रकट करती है। जरा गम्भीरता से उसके चेहरे पर दृष्टि जमाई जाय तो सहज ही पता चल जायगा कि वह इस समय किस ‘मूड’ में है। उसके डरने, प्रसन्न होने, क्रोध करने, थक जाने, दुःख व्यक्त करने, साथियों को बुलाने आदि के स्वर ही नहीं भाव भी होते हैं जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।

चिंपैंजी बन्दर तो हँस भी सकता है। बच्चों के वियोग में चिंपैंजी मादा रोती देखी गई है। नीचे वाला होठ आगे निकला हुआ देखकर-आँखों को ढके बैठी हुई मादा चिंपैंजी को शोकग्रस्त समझा जा सकता है। इस स्थिति में उससे सहानुभूति प्रकट करने वाले दूसरे साथी भी इकट्ठे हो जाते हैं और संवेदना प्रकट करते हैं।

गोरिल्ला अपने क्रोध की अच्छी अभिव्यक्ति कर सकता है। गिब्बन बन्दर सवेरे ही उठकर शोर करते हैं जिसका मतलब है कि यह सारा क्षेत्र हमारा है। कोई दूसरे इस क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयत्न न करें।

अन्य प्राणियों को उपेक्षा के गर्त में पड़ा रहने देने या उनके शोषण करते रहने में मनुष्यता का गौरव बढ़ता नहीं। अपनी प्रगति से ही सन्तुष्ट न रहकर हमारा यह भी प्रयत्न होना चाहिए कि अन्य प्राणियों के बौद्धिक उत्कर्ष में समुचित ध्यान दें और सहयोग प्रदान करें।


श्री रामकृष्ण परमहंस की सारगर्भित शिक्षायें

-गीला, कच्चा बाँस आसानी से मोड़ा या घुमाया जा सकता है पर सूख जाने पर वह मुड़ता नहीं टूट जाता है। उठती आयु में मन को सँभाला सुधारा जा सकता है। बुढ़ापे में तो जड़ता जकड़ लेती है सो न आदतें बदलती हैं न इच्छायें सुधरती हैं।

-वासना रहित मन सूखी दियासलाई की तरह है जिसे एक बार घिसने पर ही आग पैदा हो जाती है। मनोरथों में डूबा मन गीली दियासलाई की तरह है जिसे बार-बार घिसने पर भी कुछ काम नहीं चलता है। भजन की सफलता के लिए मन को साँसारिक तृष्णाओं की नमी से बचाना चाहिए।

-पत्थर वर्षों तक नदी में पड़ा रहे तो भी उसके भीतर नमी नहीं पहुँचती। तोड़ने पर सूखा ही निकलता है किन्तु मिट्टी का ढेला जरा सा पानी पड़ने पर भी उसे सोख लेता है और गीला हो जाता है। भावनाशील हृदय थोड़े से उपदेश को भी हृदयंगम कर लेता है पर धर्माडम्बर में डूबे रहने वालों का ज्ञान जीभ तक ही सीमित रहता है। वे उसे भीतर नहीं उतारते। फलतः बकवादी भर रह जाते हैं।

-मेंढक के छोटे बच्चे की दुम जब तक नहीं झड़ती तब तक वह पानी में ही रहता है। पर बड़ा होने पर जब दुम झड़ जाती है तब पानी के भीतर भी रहता है और बाहर भी। मनुष्य की लिप्सा जब तक प्रबल रहती है तब तक भौतिक स्वार्थों में ही मन डूबा रहता है पर जब वासना रूपी पूँछ झड़ जाती है तब भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में भली प्रकार तत्पर रहा जा सकता है।

-गीली मिट्टी से ही खिलौने, बर्तन आदि बनते हैं। पकाई हुई मिट्टी से कुछ भी नहीं बनता। लिप्सा की आग में जिसकी भावना रूपी मिट्टी जल गई उसका न भक्त बनना सम्भव है न धर्मात्मा।

-बालू मिली शक्कर में से चींटी केवल शक्कर ही खाती है और बालू छोड़ देती है। इस भलाई-बुराई मय संसार में से सज्जन केवल भलाई ग्रहण करते हैं और बुराई की उपेक्षा करते हैं।

-धागे में गाँठ लगी हो तो वह सुई की नोंक में नहीं घुस सकता और उससे सिलाई नहीं हो सकती। मन में स्वार्थ भरी संकीर्णता की गाँठ लगी हो तो वह ईश्वर में नहीं लग सकता और जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।

-साँप के मुँह में जहर रहता है पैरों में नहीं। तरुणी स्त्रियों का चेहरा नहीं उनके चरण देखने चाहिए इससे मन में विकार उत्पन्न नहीं होता।

पतंगे को दीपक का प्रकाश मिल जाय तो फिर वह अँधेरे में नहीं लौटता भले ही उसे दीपक के साथ प्राण गँवाने पड़ें। जिन्हें आत्म बोध का प्रकाश मिल जाता है। वे अविद्या के अन्धकार में नहीं भटकते। भले ही उन्हें धर्म के मार्ग में अपना सर्वस्व समाप्त करना पड़े।

-बेटा नहीं, धन नहीं, स्वास्थ्य नहीं का रोना-रोते बहुत लोग देखे जाते है पर ऐसे रोने कोई विरले ही रोते हैं कि-प्रकाश नहीं, भगवान नहीं, सत्कर्म नहीं। यदि इनके लिए लोग रोने लगें तो उन्हें किसी बात की कमी न रह जाय।

-बच्चा गन्दगी में लिपटने का कितना ही प्रयत्न करे, माता उसकी मर्जी नहीं चलने देती और बलपूर्वक पकड़ कर स्नान करा देती है भले ही बच्चा रोता चिल्लाता रहे। भगवान भक्त को मलीनता से छुड़ाकर निर्मल बनाते हैं। इसमें भले ही भक्त अपनी इच्छा में अवरोध उत्पन्न हुआ देखकर रोता चिल्लाता रहे।

-चुम्बक पत्थर पानी में पड़ा रहे तो भी उसका लोहा पकड़ने और रगड़ते ही आग निकलने का गुण नष्ट नहीं होता। विषम परिस्थिति में घिरे रहने पर भी सज्जन अपनी आदर्शवादिता नहीं छोड़ते।


शिक्षा ही नहीं विद्या भी परिष्कृत की जाय

भौतिक जीवन को समर्थ और सुविकसित बनाने का पथ-प्रशस्त करना स्कूली शिक्षा पद्धति का प्रयोजन होना चाहिए। छात्रों के मस्तिष्क पर अनावश्यक भार बने रहने का उसका वर्तमान स्वरूप बदला जाना चाहिए। किसी विषय के विशेषज्ञ बनने वाले के लिए विशेष शिक्षा का प्रबन्ध रहना उचित है, पर सर्वसाधारण को ऐसी पढ़ाई के लिये विवश नहीं करना चाहिए-जिसका व्यावहारिक जीवन में कभी कोई उपयोग नहीं होता। इन दिनों जो पढ़ाया जाता है उसे सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में संग्रहीत किया जा सकता है। बहुमुखी जानकारी के लिए सामान्य ज्ञान के विषय को थोड़ा विस्तृत किया जा सकता है और उसमें विविध विषयों की काम चलाऊ जानकारी को स्थान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पूरा शिक्षण वह होना चाहिए जिससे छात्र को सुयोग्य एवं स्वावलंबी नागरिक बनने का न केवल किताबी वरन् व्यावहारिक ज्ञान भी मिल जाय।

संसार के सभी विकासोन्मुख राष्ट्रों ने राष्ट्रीय उत्कर्ष को-वैयक्तिक विकास को ध्यान में रखते हुए ऐसी ही शिक्षा प्रणाली विकसित की। हम इस दिशा में कुछ मौलिक चिन्तन न कर सके। अँग्रेजों के समय से चले आ रह ढर्रे को ही चलाते रहे। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी हम आगे बढ़ नहीं पाये, इसका कम से कम आधा दोष तो वर्तमान निरुद्देश्य शिक्षा पद्धति को दिया ही जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है शिक्षा प्रक्रिया में क्रान्तिकारी सुधार होना चाहिए। सरकार इस आवश्यकता को अनुभव न करे तो जनता को-बुद्धिजीवियों को इसके लिए ऐसे प्रबल प्रयत्न करने चाहिएं जिससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके ।

जन स्तर पर अनेक विद्यालय चलते हैं। कितने ही दानी मानी-उदारतावश अथवा यश कामना से नये विद्यालयों का आरम्भ कराते हैं। कितनी ही संस्थाएं छात्रों को देशभक्त, धर्मनिष्ठ नागरिक बनाने के उद्देश्य से नये शिक्षा संस्थान खड़े करती हैं और उनके सत् परिणामों के लम्बे-चौड़े स्वप्न देखती-दिखाती हैं। यह सब होता है पर भूल वे भी यह जाती हैं कि दोषयुक्त शिक्षा पद्धति के रहते किसी चमत्कारी परिणाम के स्वप्न देखना सर्वथा अवास्तविक है। यदि गैर सरकारी क्षेत्र में कुछ किया ही जाना हो तो उन्हें स्वावलम्बी और सुयोग्य नागरिक ढालने वाली शिक्षा पद्धति की मौलिक कल्पना करनी चाहिए और उसकी सार्थकता सिद्ध करने वाली व्यवस्था बनानी चाहिए। सरकारी प्रमाण पत्र पाने के लिए-सरकारी शिक्षा पद्धति अपनाने से सरकारी ढर्रे के ही परिणाम निकलेंगे। इसके लिए व्यक्तिगत रूप से माथा-पच्ची करना बेकार है। प्रचलित शिक्षा पद्धति ही यदि पर्याप्त है तो सरकारी शिक्षा विभागों की सहायता करना ही पर्याप्त है। अलग-अलग ढाई चावल की खिचड़ी पकाने और लम्बे-चौड़े स्वप्न देखने की बात बेतुकी है।

गैर सरकारी क्षेत्र में यदि सार्थक शिक्षा पद्धति का प्रयोग किया जाना हो तो ही जन स्तर के स्वतन्त्र स्कूलों की आवश्यकता है। ऐसे विद्यालयों को आरम्भ से ही सरकारी मान्यता प्राप्त करने और सरकारी प्रमाण पत्र प्राप्त करने के व्यामोह से बचना चाहिएं। छात्र थोड़े रहें तो हर्ज नहीं पर प्रयोग में कुछ मौलिक तथ्य रहने चाहिएं और वे तथ्य यही हो सकते हैं कि सार्थक शिक्षा पद्धति की संरचना करके उसकी व्यावहारिकता और श्रेष्ठता प्रमाणित की जाय। गायत्री तपोभूमि, मथुरा में अवस्थित युग-निर्माण विद्यालय को ऐसा ही मौलिक प्रयोग कह सकते हैं। अन्यत्र भी यदि इसी स्तर के प्रयोग परीक्षण खड़े किये जा सकें-तो सार्थक शिक्षा पद्धति के उपयोग समझने और वर्तमान ढर्रे में मौलिक परिवर्तन करने की बात जनता और सरकार को-शिक्षा शास्त्री और बुद्धि जीवियों को अधिक अच्छी तरह समझाई जा सकती है। जन स्तर पर चल रही या आरम्भ होने वाली शिक्षा संस्थाओं को यदि इस स्वतन्त्र चिन्तन का प्रकाश मिल सके तो सचमुच उनका प्रयास शिक्षा परिवर्तन की प्रेरणा उत्पन्न करने की दृष्टि से अतीव उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

शिक्षण का दूसरा क्षेत्र है-आत्मज्ञान, धर्म, अध्यात्म। इसे विद्या के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है। शिक्षा और विद्या में मौलिक अन्तर है। शिक्षा उसे कहते हैं जो जीवन के बाह्य प्रयोजनों को पूर्ण करने में सुयोग्य मार्गदर्शन करती है। साहित्य, शिल्प, कला, विज्ञान, उद्योग, स्वास्थ्य, समाज आदि विषय इसी शिक्षा परिधि में आते हैं। विद्या का क्षेत्र इससे आगे का है-आत्मबोध, आत्मनिर्माण, कर्त्तव्यनिष्ठा, सदाचरण, समाज निष्ठा आदि वे सभी विषय विद्या कहे जाते हैं जो व्यैक्तिक चिन्तन, दृष्टिकोण एवं सम्मान में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों, स्वार्थपरता को घटाते और लोक निष्ठा को बढ़ाते हों। धर्म और अध्यात्म का सारा ढाँचा मात्र इसी प्रयोजन के लिए तत्वदर्शियों ने खड़ा किया है।

ईश्वर भक्ति, उपासना, योग-साधना, धर्मानुष्ठान, कथा कीर्तन, स्वाध्याय, सत्संग, दान, पुण्य आदि का जो जितना कुछ भी धर्म कलेवर खड़ा है; इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य है मनुष्य व्यक्तिवादी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाये और समाजनिष्ठा के परमार्थ मार्ग को अपनाकर उदार एवं लोकसेवी प्रक्रिया अपनाये। इस मूल प्रयोजन की ओर मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए अनेक कथा पुराण बनाये गये-धर्म शास्त्र रचे गये, साधन विधान बनाये गये-स्वर्ग-नरक के भय प्रलोभन प्रस्तुत किये गये। अदृश्य जगत के, लोक-लोकान्तरों के, देव-दानवों के प्रतिपादन किये गये। मत-मतान्तरों के बीच इन प्रतिपादनों में भारी अन्तर पाया जाता है पर मूल प्रयोजन सबका एक है-मनुष्य की पशु प्रवृत्ति को व्यक्तिवादी स्वार्थपरता को समाजनिष्ठ परमार्थ को धर्म धारणा में विकसित करना।

इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि शिक्षा क्षेत्र की तरह विद्या क्षेत्र में भी रूढ़िवादिता का साम्राज्य है। धर्म पुरोहित अब केवल आवरण की प्रतिष्ठा कर रहे हैं और मूल उद्देश्य को भुला रहे हैं। अमुक धर्मानुष्ठान का कर्मकाण्ड पूरा कर देने से, कथा कीर्तन के श्रवण, नदी के सरोवर के स्नान, तीर्थ, मन्दिर दर्शन, जप-तप मात्र को, स्वर्ग मुक्ति का आधार घोषित कर दिया गया है। आन्तरिक दृष्टि से मनुष्य घोर व्यक्तिवादी, समाज विरोधी रह कर भी इस धर्मावरण की सहायता से सद्गति प्राप्त कर सकता है, ईश्वर का कृपापात्र बन सकता है। आज इसी प्रतिपादन की धूम है। इस ज्ञान के नाम पर अज्ञान का प्रसार ही कहना चाहिए। प्राण रहित लाश की तरह धर्म का आवरण भर खड़ा रखा जा रहा है और यह भुलाया जा रहा है कि यह विशाल आवरण आखिर खड़ा किसलिए किया गया था।

आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के साथ-साथ विद्या के क्षेत्र में भी क्रान्ति उपस्थित की जाय। ढर्रे की शिक्षा भार-भूत है। भौतिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाने की क्षमता जो शिक्षा हमें प्रदान न कर सके उसे उपयोगी कैसे कहा जा सकता है? इसी प्रकार जो विद्या मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समावेश न करे-व्यक्तिवादी स्वार्थपरता से विरत कर समूहवादी परमार्थ में संलग्न न करे-उसे भी भार-भूत ही कहना चाहिए। इस निष्प्राण धर्म कलेवर से केवल धर्म व्यवसायियों का लाभ हो सकता है। जन साधारण को तो उलटे अज्ञान में भटकते हुए अपने धन और समय की बर्बादी का घाटा ही उठाना पड़ेगा। विद्या क्षेत्र की इस विडम्बना का भी अब अन्त ही किया जाना चाहिए। दिवा स्वप्नों में भटकने-भटकाने की प्रवृत्ति को आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए।

आत्म विद्या को-धर्म धारणा का स्वरूप सार्थक और सोद्देश्य होना चाहिए। कथा पुराण एवं धर्मानुष्ठान भले ही किसी रूप में हो पर उनका लक्ष्य उतने भर से आत्म-लाभ मिल जाने के प्रतिपादन से ऊँचा उठकर यह रहना चाहिये कि विश्व मानव को भगवान मानकर उसकी स्थिति ऊँची उठाने में योगदान देकर सच्ची भक्ति भावना का परिचय दिया जाय। प्रेरणायुक्त धर्म कलेवर की उपयोगिता ही मानवीय विवेक को स्वीकार हो सकती है। अनास्था के वातावरण को बदलकर आस्तिकता की ओर जन मानस को तभी मोड़ा जा सकता है जब आत्म विद्या का-धर्म धारणा का स्वरूप रूढ़िवादी न रह कर मनुष्य के आन्तरिक उत्कर्ष में सहायक सिद्ध हो सके। चिर अतीत में तत्वदर्शियों ने इस समस्त प्रक्रिया का सृजन इसी प्रयोजन के लिए किया था, बहुत भटक लेने के बाद अब हमें बदलना चाहिए और धर्म धारणा को परमार्थ प्रयोजन पर केन्द्रित करना चाहिए।

धर्म के आधार पर विकसित होने वाली परमार्थ प्रवृत्ति को लोक मंगल में नियोजित करना आत्म विद्या का मूलभूत प्रयोजन है। उसे इन दिनों पूरी तत्परता के साथ इसी भूल सुधार में लगना चाहिए। पिछले दिनों के भटकाव को सुधारना ही इन दिनों धर्म क्षेत्र के लिए सर्वोत्तम प्रायश्चित होगा। खोई हुई आस्था और प्रतिष्ठा को वह इसी आधार पर पुनः वापिस लाने में समर्थ होगा।

जिन्हें सचमुच विद्या से प्रेम है उन्हें वर्तमान धर्म शिक्षा में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने के लिए आगे आना चाहिए। बुद्धि, प्रतिभा, समय, श्रम और धन का जो जितना बड़ा अंश लोक मंगल के लिए नियोजित कर सके उसे उतना ही बड़ा धर्मात्मा माना जाय। पिछले अन्धकार युग की सामाजिक एवं बौद्धिक विकृतियाँ इतनी अधिक अभी भी भरी हुई हैं कि उनकी सफाई में भारी प्रयत्न करने की आवश्यकता है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्शवादी कर्तृत्व को जन साधारण के दृष्टिकोण, स्वभाव एवं अभ्यास में ध्यान दिलाने के लिए घनघोर प्रयास करने होंगे। इसके लिए प्रत्येक धर्म प्रेमी को सामयिक कर्त्तव्य समझकर सर्वतोभावेन संलग्न होना चाहिए। धर्म शिक्षा का, आत्म विद्या का प्रशिक्षण इन दिनों इसी केन्द्र पर केन्द्रित रहना चाहिए- इसी प्रयास को आत्म-कल्याण-स्वर्ग-मुक्ति एवं ईश्वर प्राप्ति की सर्वोत्तम युग साधना बनाया जाना चाहिए। धर्म और ईश्वर के नाम पर खर्च होने वाला प्रत्येक पैसा और समय का प्रत्येक क्षण इसी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाना चाहिए।

वानप्रस्थ परम्परा इसीलिए थी कि अधेड़ होने तक मनुष्य अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो ले और जीवन का उत्तरार्ध लोक मंगल के लिए उत्सर्ग करे। इस परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है ताकि सुयोग्य, अवैतनिक, भावनाशील, अनुभवी सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओं की सेना का उद्भव फिर शुरू हो जाय और उसके द्वारा सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति की-सर्वतोमुखी नव निर्माण की आवश्यकता को पूरा किया जाना सहज ही सम्भव हो सके।

शिक्षा और विद्या में परिवर्तन और सुधार ही मानवीय प्रगति का मूलभूत आधार है। विश्व कल्याण और विश्वशान्ति के उभयपक्षी प्रयोजन शिक्षा और विद्या के परिष्कार पर अवलम्बित है। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।


अन्दर से अच्छा बनना ही वास्तव में कुछ बनना है

अन्दर से अच्छा बनना ही वास्तव में कुछ बनना है। अन्तर को घटाकर जीवन को बाहर से बनाना, सजाना ठीक उसी प्रकार की क्रिया है जैसे कोई विद्यार्थी किसी प्रश्न के मूल उत्तर को छोड़कर उसकी भूमिका के बल पर परीक्षा पास करना चाहता है।

मनुष्य जीवन की बाह्य बनावट उसे कब तक साथ देगी। जो कपड़े अथवा जो प्रसाधन यौवन में सुन्दर लगते हैं, यौवन ढलने पर वे ही उपहासास्पद दीखने लगते हैं। मनुष्य को जीवन का शृंगार ऐसे उपादानों से करना चाहिए जो आदि से अन्त तक सुन्दर बने रहें और मनुष्य को आकर्षक बनाये रहें।

मनुष्य जीवन का वह अक्षय शृंगार है, आन्तरिक विकास। हृदय की पवित्रता एक ऐसा प्रसाधन है जो मनुष्य को बाहर भीतर से एक ऐसी सुन्दरता से ओत-प्रोत कर देता है जिसका आकर्षण न केवल जीवन पर्यन्त अपितु जन्म-जन्मान्तरों तक सर्वदा एक सा बना रहता है।

-अश्विनीकुमार दत्त


साधुवेश की मर्यादा

बहरूपिया राजा के दरबार में पहुँचा ‘राजा की जय-जय कार हो! अन्नदाता की यश पताका आकाश में सदैव फहराती रहे। सारी प्रजा सुखी और सम्पन्न रहे। बस पाँच रुपये के एक नोट का सवाल है, महाराज से। और बहरूपिया कुछ नहीं चाहता।’

मैं कला का पारखी हूँ। कलाकार का सम्मान करना राज्य का नैतिक कर्तव्य है। मैं तुम्हारी कला पर प्रसन्न होकर पाँच रुपये का पुरस्कार दे सकता हूँ पर दान के लिए मजबूर हूँ।’ राजा ने कहा

‘कोई बात नहीं। मैं आपके सिद्धान्त को तोड़ना नहीं चाहता। मुझे अपना दूसरा स्वाँग दिखाने के लिए तीन दिन का समय तो दीजिये।’ इतना कहकर बहरूपिया चला गया।

दूसरे दिन नगर के बाहर एक टीले के ऊपर समाधि मुद्रा में एक साधु दिखाई दिया। मेरुदण्ड सीधा, नेत्र बन्द, तेजस्वी चेहरा और लम्बी जटाएं। इधर-उधर पशु चराने वाले चरवाहों ने उस साधु को देखा। वह उत्सुकतावश उसके पास पहुँचे।

तपस्वी मृग छाला पर ध्यानावस्थित था। उसे पता ही नहीं चला कि सामने कौन खड़ा है।

‘स्वामी जी! आपका आगमन कहाँ से हुआ हैं?’

कुछ क्षण रुक कर फिर दूसरा प्रश्न ‘क्या आपके लिए कुछ फल, दूध और मेवा आदि की व्यवस्था की जाए?

मुख से किसी शब्द का निकलना तो दूर की बात रही उसका शरीर भी रंच मात्र न हिला।

शाम को सभी चरवाहे अपने पशुओं को लेकर नगर वापिस आये। उनके द्वारा घर-घर में तपस्वी संत की चर्चा होने लगी। दूसरे दिन सुबह ही नगर के अनेक सभ्य शिक्षित नागरिक, दरबारी, धनिक तथा श्रद्धालु व्यक्ति अपने-अपने वाहन लेकर नगर से बाहर की ओर दौड़ पड़े किसी की थाली में मेवा ‘फल’ और मिष्ठान थे, कोई साबूदाना और मखाने की खीर ले गया, किसी की बाल्टी दूध से भरी थी और कोई नाना प्रकार के पकवानों से अपने थाल भर कर ले गया था। बस सबका यही आग्रह था कि उसमें से एक ग्रास लेकर श्रद्धालु भक्तों को कृतार्थ किया जाए।

सबके आग्रह व्यर्थ गये साधु ने आँख तक न खोली। वह तो अविचलित रूप से वहीं बैठा रहा। संत के त्याग की यह कहानी प्रधानमंत्री के आफिस तक पहुँच गई। वह अनेक प्रकार की स्वर्ण और रजत मुद्राएं रथ में भर कर उस टीले पर पहुँचा। मुद्राओं का ढेर लगा दिया संत के आस-पास। संत से बड़े विनम्र स्वर में निवेदन करते हुये प्रधान मंत्री ने कहा ‘बस! एक बार नेत्र खोलकर कृतार्थ कीजिये। मैं किसी भौतिक लालसा से आपको परेशान करने नहीं आया हूँ।

प्रधानमन्त्री का निवेदन भी बेकार गया! अब उसे निश्चय हो गया कि यह संत अवश्य पहुँचा हुआ है राग-विराग, लोभ-मोह सभी से मुक्त है तभी तो इतने बड़े-बड़े उपहारों की ओर दृष्टि उठाकर नहीं देखता।

प्रधानमंत्री ने राजा के महल में जाकर सारी वस्तु स्थिति से अवगत कराया। राजा को सोचते देर न लगी। वह मन ही मन पछताने लगे। जब मेरे राज्य में इतने बड़े तपस्वी का आगमन हुआ है तो मुझे अवश्य उनकी अगवानी करने जाना था। उन्होंने दूसरे ही दिन सुबह उस तपस्वी के दर्शन करने जाने का निश्चय किया। गाँव भर में यह खबर बिजली की तरह फैल गई। जिस मार्ग से राजा की सवारी निकलने वाली थी वह मार्ग साफ करा दिये गये। रास्ते में पुलिस की व्यवस्था कर दी गई।

राजा ने तपस्वी के चरणों में एक लाख अशर्फी का ढेर लगा दिया और अपना मस्तक उनके चरणों में टेक कर आशीर्वाद की कामना करने लगे पर तपस्वी विचलित नहीं हुआ। अब तो प्रत्येक व्यक्ति को यह निश्चय हो गया कि तपस्वी बहुत त्यागी और पहुँचा हुआ है साँसारिक वस्तुओं से उसका तनिक भी लगाव नहीं है।

चौथे दिन बहरूपिया फिर दरबार में पहुँचा, हाथ जोड़कर बोला ‘राजन्! अब तो आपने मेरा स्वाँग देख लिया होगा और पसन्द भी आया होगा अब तो मेरी कला पर प्रसन्न होकर अधिक नहीं तो पाँच रुपये का पुरस्कार दीजिए ताकि परिवार के पालन पोषण हेतु आटा दाल की व्यवस्था कर सकूँ।’

‘छिःछिः तुझ जैसा मूर्ख व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा जब सम्पूर्ण राज्य की जनता अपना सर्वस्व लुटाने के लिए तेरे चरणों के पास आतुर खड़ी थी तब तूने धन दौलत के उस ढेर पर दृष्टि तक नहीं डाली और अब पाँच रुपये के लिए ऐसे चिरौरी करता है।’

बहरूपिये ने कहा ‘राजन् उस समय एक तपस्वी की मर्यादा का प्रश्न था। एक साधु के वेश की लाज रखने की बात थी। भले ही साधु के रूप में बहरूपिया हो, पर था तो एक साधु ही फिर वह धन दौलत की ओर दृष्टि उठाकर कैसे देख सकता था उस समय सारे वैभव तुच्छ थे। और अब पेट की ज्वाला को शान्त करने के लिये अपने श्रम के पारिश्रमिक और पुरस्कार की माँग है आपके सामने।’


अल्लाह की मर्जी से ऊपर अपनी मर्जी नहीं रखनी चाहिए

कारुँ को अल्लाह ने बहुत बड़ा खजाना दिया और कहा इस दौलत को वह नेकी में खर्च करे।

कारुँ इस दौलत को पाकर फूला न समाया, उसने बिरादरी वालों से कहा-देखो मेरा हुनर मैं हूँ जो कमाता हूँ और उड़ाता हूँ।

लोग क्या कह सकते हैं, कारुँ उस दौलत को वे हिसाब उड़ाता रहा और राग रंग करता रहा।

बहुत दिन बीत गये। खजाना खर्च होता रहा। अल्लाह ने उसे देखा और बहुत दुःख माना।

ऐसा हुआ कि जमीन हिली और कारुँ का मकान मय बची दौलत के उसमें धँस गया। बेचारा चिल्लाया बहुत पर उसे कहीं से मदद न मिल सकी। और खुदा के कहर से निजात न पा सका।

कारुँ की तरह हुनरमन्द बनने की उधेड़ बुन में लगे हुए लोगों ने अपना इरादा बदल दिया और कस्द किया कि हमें अल्लाह की मर्जी से ऊपर अपनी मर्जी नहीं रखनी चाहिए।


हवा में महल और आधी रात में सूर्य

श्री श्यामाचरण लाहिड़ी प्रसिद्ध योगी और सन्त तब दानापुर कैन्ट (पटना) में एकाउंटेन्ट थे सन् 1861 की बात है उन्हें सरकारी तार मिला जिसमें आदेश मिला था रानीखेत ट्रान्सफर का। ट्रान्सफर की कोई सम्भावना न थी पर जब वह हो ही गया तो श्री लाहिड़ी वहाँ से चल कर रानीखेत जा पहुँचे।

जिस ऑफिस में वे काम करते थे उसके सम्मुख ही द्रोण पर्वत है। काम के बीच रह रहकर उन्हें एक आवाज सी सुनाई पड़ा करती। लगता उन्हें कोई उस पहाड़ी की ओर आकर्षित कर रहा है। दो दिन तक तो वे उन अज्ञात प्रेरणाओं को दबाते रहे पर तीसरे दिन उन्हें चलना ही पड़ा।

अभी रात होने को देर थी पर भगवान सूर्य अस्ताचल के समीप जा पहुँचे थे। द्रोण पर्वत पर पहुँचकर श्री लाहिड़ी ने चारों ओर दृष्टि घुमाकर प्रकृति के मनोरम दृश्य देखे बड़ी देर तक सृष्टा की अनुपम कारीगरी को निहारते और सोचते रहे मनुष्य को एक छोटा सा उद्यान लगाने में कितना परिश्रम जुटाना पड़ता है फिर जिसने सारी पृथ्वी को ही एक मनोरम उद्यान के रूप में बनाया, जो इस उपवन की निरन्तर काट-छाँट खाद-पानी-किया करता है वह कितनी सर्वशक्तिमान सत्ता होगी।

यह विचार करते हुए वे घर लौटने के लिए मुड़ना ही चाहते थे तभी एक ओर से हलकी मधुर आवाज सुनाई दी-वत्स! ठहरो! लाहिड़ी ने पीछे मुड़कर देखा भगवान भास्कर तो अस्त हो चुके थे। पर उसी दिशा में कुछ सौ गज के फासले पर ही एक चाँदी के रुपये जितना गोल दिव्य प्रकाश छिटक रहा था मानो आज ध्रुव धरती पर उतर आया था। इस तेज-बिन्दु से किरणों की सी आभा छिटक रही थी। लाहिड़ी महाशय ने एक दो बार पुकारने वाले को ढूँढ़ना चाहा पर और तो कोई दिखाई न दिया हाँ दृष्टि उस तेजोवलय पर टिककर अवश्य रह गई अब तक स्पष्ट हो चुका शब्दवत आदेश उस प्रकाश से ही आ रहे थे।

श्री लाहिड़ी ने कभी पढ़ा था-

अयं होता प्रथमः पश्यतेममिदं ज्योतिरमृतं मृर्ष्येषु।

अयं सजज्ञे ध्रुव आ निषत्तोऽमर्त्य स्तन्वा वर्धमानः।

ध्रुव ज्योतिर्निंहितं दृशये कं मनो जवष्ठिं-

पतयत्स्वन्तः।

विश्वे देवाः समनसः सकेता एकं क्रतुमभि-

वि यन्ति साधु॥

-ऋग्वेद 6/9/4-5

अर्थात्-नाशवान शरीर के साथ बढ़ने वाला यह अमर आत्मा प्रकट हुआ। यह जीव (चेतना) है वह ज्योति रूप-तेजोमय है। साँसारिक सुखोपभोग की तृष्णा में यह तेज नष्ट हुआ पतन का करण बनता है जबकि परमात्मा को धारण करने से वह बढ़ता है और अदृश्य एवं अद्भुत क्षमतायें विकसित करता है।

इस तत्व दर्शन को समझना आज प्रत्यक्ष सम्भव हुआ प्रकाश एक शक्ति है, शब्द भी एक शक्ति है दोनों परस्पर परिवर्तनीय हैं दोनों आत्मा के लक्षण हैं पर अभी तक शरीर से प्रथक आत्म चेतना की अनुभूति सम्भव नहीं हुई थी सो श्री लाहिड़ी को यह अनुभूति आज सम्भव हुई। योगीराज अपनी चेतना को शरीर से पृथक कर किस प्रकार अतीन्द्रिय विहार करते होंगे यह आज समझना सम्भव हुआ। पर सब कुछ था विस्मय बोधक ही श्री लाहिड़ी कुछ ठगे से खड़े थे।

तभी उस प्रकाश पुञ्ज से पुनः पुकार आई। तात! तुम्हारा दानापुर से स्थानान्तर हुआ नहीं कराया गया, इस पर्वत शिखर तक तुम आये नहीं कराया गया, इस पर्वत शिखर तक तुम आये नहीं लाये गये अब मेरे साथ आओ और मैंने तुम्हें जिस हेतु बुलाया है उस प्रयोजन को पूरा करो।

बिल्ली को देखकर भयभीत चूहे अपने आप उसकी ओर बढ़ जाते हैं, घने जंगलों में पाये जाने वाले अजगरों में एक वीभत्स सम्मोहन शक्ति होती है उसे देखते ही शिकार अपने आप मुँह में दौड़े चले आते हैं ऐसे ही सम्मोहित श्री लाहिड़ी उस प्रकाश पुँज के पीछे-पीछे चल पड़े। प्रकाश पुँज एक गुफा के समीप जाकर रुका। श्री लाहिड़ी ने देखा-प्रकाश तो अन्तर्धान हो चुका है-एक साधु वहाँ खड़े मुस्करा रहे हैं। उन्होंने पुकारा-श्यामाचरण डरो नहीं आओ मेरे पास आओ।

एक अजनबी को अपना नाम लेते सुनकर श्री लाहिड़ी का विस्मय और भी बढ़ गया। उन्होंने पूछ ही तो लिया आप कौन हैं, मुझे यहाँ क्यों लाया गया, यहाँ मुझे कब तक ठहरना पड़ेगा?

यह प्रश्न पूछने की अपेक्षा-तुम यह पूछते-मैं कौन हूँ तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती तात! यह साँसारिक नियम है कि लोग दुनिया भर का ज्ञान तो अर्जित करते हैं एक दूसरे के बारे में चढ़ बढ़कर बातें भी कर लेते हैं किन्तु आत्म तत्व के बारे में तथाकथित प्रबुद्ध व्यक्ति भी नहीं जानते कि वे कहाँ से आये? क्यों आये? और जब यह शरीर नहीं रहेगा तो इस अपने “अहंभाव” का क्या होगा? मैंने तो तुम्हें इसीलिए बुलाया है कि तुम्हें आत्मबोध हो ताकि पीछे जो एक महत्वपूर्ण काम कराना है, अध्यात्म का जो व्रत रखने का भार तुम पर डालना है-उस क्षमता का विकास भी हो सके।

तो भी तुम जानना चाहते हो वह भी तुम्हें जानने को मिलेगा। मुझे पता है कि तुमको दानापुर से यहाँ आने में कष्ट हुआ। यहाँ ऑफिस में तुम्हारा बहुत सा काम बाकी पड़ा है जिसे तुम रात में करते हो-पर यह काम उससे भी आवश्यक था इसलिए मैंने ही तुम्हारे ऑफिसर के मन में तुम्हारे ट्रान्सफर का भाव पैदा किया, मेरा ही आकर्षण था जो तुम्हें यहाँ तक लाया गया, तुम मुझे भूल गये, इस स्थान को भी भूल गये लो अब मैं फिर से याद दिलाता हूँ यह कहते-कहते योगीराज समीप आ गये और उन्होंने पास आते ही अपना दाहिना हाथ श्री लाहिड़ी के सिर में रख दिया-मानो वे ताँत्रिक प्रयोग करना चाहते थे। श्री लाहिड़ी अभी तक की बातों पर चिन्तन कर रहे थे और सोच रहे थे-क्या जिस प्रकार रेडियो एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर लगाये जाने पर केवल उसी फ्रीक्वेंसी पर प्रसारित रेडियो स्टेशन की खबरें ग्रहण करता है-ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क को भी मानसिक शक्तियों द्वारा विचार और सन्देश भेजे जा सकते हैं? अभी यहीं समाधान नहीं हो पा रहा था कि साधु के हाथ का एक विलक्षण झटका सा लगा और ऐसा लगा कि शरीर में बिजली की सी एक कोई शक्ति भरने लगी। शरीर धीरे-धीरे कोमल हो चला, तन्द्रायें जाग उठीं, मन का अन्धकार घुलने लगा, ऋतम्भरा प्रज्ञायें जागने लगीं। सब कुछ अलौकिक था। उससे भी अलौकिक थीं वह अनुभूतियाँ जो उस सम्मोहित अवस्था में स्वप्न की नाईं मस्तिष्क में स्पष्ट उभरने लगीं।

श्री लाहिड़ी ने देखा मैं पूर्व जन्म में योगी था-यह साधु मेरे गुरु हैं हजारों वर्ष की आयु हो जाने पर भी वे शरीर को अपनी योग क्रियाओं द्वारा धारण किये हुए हैं उन्हें याद आया कि पिछले जन्म में वे योगाभ्यास तो करते रहे पर मन की सुबोध भोग की वासनायें नष्ट नहीं हुई।

साधु ने अपना हाथ कब हटा लिया यह उन्हें पता ही नहीं चल पाया-मानसिक कल्पना के दृश्य और भी गहरे होते जा रहे थे जिनमें उनके अनेक जन्मों की स्मृतियाँ साकार होती चली जा रही थीं। उन्होंने जगमगाते हुए सूर्य को देखा और उस दिव्य प्रकाश में अलंकृत भव्य महल जिसमें सुख के हर एक साधन विद्यमान थे। मन हर वस्तु का रसास्वादन करता था पर किसी से तृप्ति नहीं हो रही थी। इस तरह श्री लाहिड़ी ने अपने पिछले अनेक जन्मों के दृश्यों से लेकर वहाँ पहुँचने तक का सारा वर्णन चलचित्र की भाँति देख लिया तब कही सम्मोहन टूटा। वे विस्मय के साथ आत्म-बोध से भर चुके थे और योगिराज सम्मुख खड़े मुस्करा रहे थे।

उन्होंने कहा-बेटे भूखे होंगे देखा वह बर्तन रखा है उसमें से जो भी लेकर खाली-आज का काम समाप्त हुआ, तुमने अपने आपको पहचान लिया-अब मैं तुम्हें क्रिया-योग की दीक्षा दूँगा-जिससे तुम भारतीय योग धर्म और दर्शन को जिन्दा रखने वाला ज्ञान और क्षमता सम्पादित कर सको।

श्री लाहिड़ी ने मिट्टी के उस बर्तन से वह वस्तुएं निकाल कर खाई जो वहाँ तो क्या वहाँ से सैकड़ों मील दूर तक भी उपलब्ध नहीं थी। चेतना और योग की शक्ति के उस प्रथम परिचय ने उनकी निष्ठा दृढ़ कर दी। पूर्व जन्मों के संस्कार भी जाग उठे थे। और अब वे अपने आपको योगाभ्यास के लिए पूर्ण सुनिश्चित और खाली अनुभव कर रहे थे। अपने गुरुदेव को पहचान कर उन्होंने बारम्बार प्रणाम किया और आवश्यक तैयारियों के लिए वापस लौट पड़े।

यह घटना श्री लाहिड़ी के प्रशिष्ठा श्री स्वामी योगानन्द ने भी अपनी पुस्तक “ऑटोबाईग्राफी ऑफ ए योगी” में दी है। श्री लाहिड़ी ने एक बार रानी खेत से लौटते हुए मुरादाबाद में अपने कुछ मित्रों को भी सुनाई। स्थूल वादी पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित उन मित्रों ने श्री लाहिड़ी का इस बात को लेकर खूब उपहास किया। इस पर दुःखी होकर श्री लाहिड़ी ने अपने गुरु का आवाहन किया। एक प्रकाश पुँज के मध्य छाया-शरीर से उपस्थित होकर गुरु ने उन मित्रों की भ्राँति का निवारण तो कर दिया पर साथ ही उन्होंने श्री लाहिड़ी को भी डाँटा और कहा-योग शक्तियों का उद्देश्य प्रदर्शन नहीं आत्म-कल्याण और लोक मंगल की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है फिर कभी ऐसे प्रदर्शन में मत फँसना अन्यथा फिर पहले जैसी योग भ्रष्टता के भागी बनोगे। श्री लाहिड़ी को अपनी भूल का बड़ा पश्चाताप हुआ उसके बाद से ही उन्होंने योग शक्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन की बात का परित्याग कर दिया और क्रिया योग के अभ्यास में जुट गये।


ईर्ष्या से बहुत बड़ा अनर्थ

विश्वामित्र बहुत बड़े तपस्वी थे, एक बार उनके मन में उत्पन्न हुये ईर्ष्या के भाव ने बहुत बड़ा अनर्थ करा दिया। उन्होंने वसिष्ठ के पुत्रों को मार डाला। फिर भी वसिष्ठ मन में प्रतिहिंसा या प्रतिशोध की भावना उत्पन्न नहीं हुई। उन्हें तनिक भी क्रोध नहीं आया और न उन्होंने प्रत्यक्ष रूप में कोई शोक-सन्ताप ही प्रकट किया।

छल-कपट, ईर्ष्या और द्वेषादि विकार जिस हृदय में अपना अड्डा जमा लेते हैं ये उसकी दूरदर्शिता को भी पंगु बना देते हैं। वसिष्ठ की यह सहनशीलता देखकर विश्वामित्र में सहानुभूति उत्पन्न होनी चाहिए थी पर यहाँ उल्टा प्रभाव ही हुआ। वसिष्ठ के अहिंसक भाव का अर्थ यह निकाला गया कि इनमें बदला लेने की शक्ति नहीं है। अतः क्यों न इनकी भी हत्या कर दी जाये।

रात के समय विश्वामित्र इसी उद्देश्य से वसिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। चाँदनी छिटकी हुई थी। वसिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती का वार्तालाप चल रहा था। विश्वामित्र ने दबे पाँव उनका भेद लेना चाहा। वह चुपचाप खड़े होकर उनकी बात सुनने लगे।

अरुंधती ने कहा-’देखिये, आज की चाँदनी कितनी सुन्दर और मोहक छिटकी हुई है।’ वसिष्ठ ने उत्तर दिया-’हाँ! हाँ!! प्रिये चाँदनी की शीतलता और सुन्दरता विश्वामित्र की तपस्या के समान दूसरों को सुख और आनन्द देने वाली है।’

विश्वामित्र ने वसिष्ठ के मन के इस सात्विक व पवित्र अंश को देखा तो उनका दुष्ट भाव न जाने कहाँ तिरोहित हो गया। उनका हृदय मोम की तरह पिघल गया। वह अपने को अब अधिक समय तक छिपाये न रख सके। सामने आकर वह वसिष्ठ के चरणों में झुक गये।

वसिष्ठ ने उन्हें एकदम ऊपर उठाकर अपने हृदय से लगाते हुए कहा-’ब्रह्मर्षि! आज आप क्या कर रहे हैं? इससे पूर्व वसिष्ठ के मुँह से कभी भी ब्रह्मर्षि शब्द का प्रयोग नहीं हुआ था। विश्वामित्र की विनम्रता देखकर अनायास ही उनके मुख से यह निकला था। उनकी इस आकस्मिक विनम्रता से वसिष्ठ अत्यन्त ही प्रभावित हुए, उनका हृदय द्रवित हो गया तथा अनायास ही हृदय का भाव वाणी से इस प्रकार फूट पड़ा।


तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है।

कठिनाइयों से डर कर यदि हिम्मत हार बैठा जाय बात दूसरी है अन्यथा प्राणधारी की अदम्य जीवनेच्छा इतनी प्रबल है कि वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में जीवित ही नहीं-फलता-फूलता भी रह सकता है।

उत्तरी ध्रुव पर ‘एस्किमो’ नामक मनुष्य जाति चिरकाल से रहती है। वहाँ घोर शीत रहता है। सदा बर्फ जमी रहती है। कृषि तथा वनस्पतियों की कोई सम्भावना नहीं। सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधनों में से कोई नहीं फिर भी वे जीवित हैं। जीवित ही नहीं परिपुष्ट भी हैं। परिपुष्ट ही नहीं सुखी भी हैं। हम अपने को जितना सुखी मानते हैं वे उससे कम नहीं कुछ अधिक ही सुखी मानते हैं और सन्तोषपूर्वक जीवन यापन करते हैं। जरा सी ठण्ड हमें परेशान कर देती है पर एस्किमो घोर शीत में आजीवन रहकर भी शीत से प्रभावित नहीं होते।

जीवनेच्छा जब तितीक्षा के रूप में विकसित होती है और कष्ट साध्य समझी जाने वाली परिस्थितियों से भी जूझने के लिए खड़ी हो जाती है तो मानसिक ढाँचे के साथ-साथ शारीरिक क्षमता भी बदल जाती है और प्रकृति में ऐसा हेर-फेर हो जाता है कि कठिन समझी जाने वाली परिस्थितियाँ सरल प्रतीत होने लगें। वन्य प्रदेशों के निवासी-सभ्य शहरी लोगों की तुलना में जितने अभाव ग्रस्त हैं उतने ही सुदृढ़ भी रहते हैं। परिस्थिति को अनुकूल बनाने का प्रयत्न तो करना चाहिए पर परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढालने की मनस्विता एवं तितीक्षा के लिए भी तत्पर रहना चाहिए।

जीव जगत में यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनाई गई है वहाँ दृढ़ता बढ़ी है। पौधों में भी ऐसे साहसी मौजूद हैं जिन्होंने घोर विपरीतता से जूझ कर न केवल अपना अस्तित्व कायम रखा है वरन् शोभा, सौंदर्य की सम्पदा का स्थान भी पाया है।

घोर विपरीत परिस्थितियों में स्वावलम्बी जीवन जीने वाले पौधे वहाँ पैदा होते हैं जहाँ पानी का अभाव रहता है। उनकी आत्म निर्भरता यह सिद्ध करती है कि जीवन यदि अपनी पर उतर आये-तन तक खड़ा हो जाये तो विपरीत परिस्थितियों के आगे भी उसे पराजित नहीं होना पड़ता।

अमेरिका के मरुस्थल में और दक्षिणी अफ्रीका में पाये जाने वाले कैक्टस इसी प्रकार के हैं। वे जल के अभाव में जीवित रहते हैं। रेतीली जमीन में हरे-भरे रहते हैं और सब को सुखा-जला डालने वाली गर्मी के साथ अठखेलियाँ करते हुए अपनी हरियाली बनाये रहते हैं।

विकट परिस्थितियों के बीच रहने के कारण कुरूप भी नहीं होते वरन् बाग उद्यानों में रहने वाले शोभा गुल्मों की अपेक्षा कुछ अधिक ही सुन्दर लगते हैं। रेशम जैसे मुलायम, ऊन के गोले जैसे दर्शनीय, गेंद, मुद्गर, सर्प, स्तम्भ, ऊँट, कछुआ, साही, तीतर, खरगोश, अखरोट, कुकुरमुत्ते से मिलती-जुलती उनको कितनी ही जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें वनस्पति प्रेमी अपने यहाँ आरोपित करने में गर्व अनुभव करते हैं। पत्तियाँ इनमें नहीं के बराबर होती हैं, प्रायः तने ही बढ़ते हैं पर उनकी ऊपरी नोंक पर ऐसे सुन्दर फूल आते हैं कि प्रकृति के इस अनुदान पर आश्चर्य होता है जो उसने इस उपेक्षित वनस्पति को प्रदान किया है।

पथरीली और रेतीली भूमि में-असह्य सूर्य ताप के बीच, पानी का घोर अभाव सहते हुए भी यह पौधे जीवित रहते और हरे-भरे बने रहते हैं। इन्हें रेगिस्तान का राजा कहा जाता है। पथरीली भूमि में दूसरे पौधे जीवित नहीं रह पाते क्योंकि वहाँ मिट्टी तो होती नहीं। पौधों के लिए आवश्यक पानी कैसे ठहरे? पानी के बिना पौधे कैसे जियें?

कैक्टस पौधों की सचेतना ऐसी है कि वे पानी के लिए जमीन पर निर्भर नहीं रहते। जब वर्षा होती है तब सीधे इन्द्र भगवान से अपनी आवश्यकता भर का पानी माँग लेते हैं और अपनी कोशिकाओं में भर लेते हैं।

प्रधानतया तो यह जल भण्डार तने में ही रहता है पर यदि उस जाति में पत्ते निकले तो उसमें भी उसी तरह की जल संग्राहक कोशिकाएं रहेंगी। यह तने पत्तियों की आवश्यकता भी स्वयं ही पूरी कर लेते हैं। सूर्य नारायण से आवश्यक प्रकाश प्राप्त करते रहने की क्षमता भी अपने में बनाये रहते हैं। तने में भरा हुआ जल भण्डार इतना प्रचुर होता है कि यदि लगातार छह वर्षों तक पानी न बरसे, इन्द्र देव रूठे रहें तो भी उनका एक तिहाई पानी ही मुश्किल से चुक पाता है।

सूर्य का ताप उनकी तरलता को भाप बना कर उड़ा न ले जाय इसके लिए उनका सुरक्षा आवरण बहुत मजबूत होता है। तनों का बाह्यावरण मोटा ही नहीं मजबूत भी होता है और उसमें ऐसे एक मार्गी छेद होते हैं जो सूर्य से प्रकाश तो ग्रहण करते हैं पर अपनी तरलता बाहर नहीं निकलने देते।

कैक्टस जानते हैं कि अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध ताप किये बिना गुजारा नहीं। इस दुनिया में उनकी कमी नहीं जो दूसरों का उन्मूलन करके ही अपना काम चलाते हैं। इनके सामने नम्र सरल बनकर रहा जाय तो वे उस सज्जनता को मूर्खता ही कहेंगे और अनुचित लाभ उठायेंगे। भोले कहे जाने वालों का शोषण इसी प्रकार होता रहा है। वे इस तथ्य से अवगत प्रतीत होते हैं। तभी तो अपनी सुरक्षा के लिए-आक्रमणकारियों के दाँत खट्टे करने के लिए उनने उचित व्यवस्था की हुई है। दूसरों पर आक्रमण भले ही न किया जाय पर अपनी सुरक्षा का इन्तजाम रखने और आक्रमणकारियों को बैरंग वापिस लौटाने की व्यवस्था तो करनी ही चाहिए। कैक्टस यह प्रबन्ध कर सकने के कारण ही इस दुरंगी दुनिया के बीच जीवित है।

कैक्टस के तनों पर नुकीले काँटे होते हैं। वनस्पति चर जाने के लालची पशु उनकी हरियाली देखकर दौड़े आते हैं पर जब काँटों की किलेबन्दी देखते हैं तो चुपचाप वापिस लौट जाते हैं।

इन पौधों की रंग-बिरंगी विभिन्न आकृति-प्रकृति की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से फिना मैरी गोल्ड, मिल्क वीड, ओपाईन, पर्सलेन, र्स्पज, जिकेनियम, डंजी मुख्य हैं। इनमें से कितने ही ऐसे होते हैं जिनकी आकृति सुन्दर प्रस्तर खण्डों जैसी लगती है।

यह पौधे अब सब जगह शोभा सज्जा के काम आते हैं। राजकीय उद्यानों में, श्रीमन्तों के राजमहलों में, कला प्रेमियों में इनका बहुत मान है। इन्हें लगाये बिना कोई साधारण वनस्पति उद्यान अधूरा ही माना जाता है। सर्वसाधारण में भी इनकी लोकप्रियता बढ़ी है और हर जगह उन्हें मँगाया सजाया जा रहा है।

सम्भवतः यह इनका दृढ़ता, कठोरता, स्वावलम्बिता और तितीक्षा जैसी विशेषताओं का ही सम्मान है।

मनुष्य जितना नाजुक बनता जायगा उतना ही दुर्बल बनेगा और परिस्थितियाँ उस पर हावी होंगी। किन्तु यदि दृढ़ता, तितीक्षा, कष्ट सहिष्णुता और साहसिकता अपनाये रहे तो न केवल शरीर वरन् मन भी इतना सुदृढ़ होगा जिसके सहारे हर विपन्नता का सामना किया जा सके।


Quotation

कठोर श्रम में अनवरत लगे रहने का अभ्यास डालो। पढ़ते समय सारी दुनिया को एक ओर रख दो और पुस्तकों में लेखक की विचारधारा में डूब जाओ। यही तुम्हारी समाधि है। यही तुम्हारी उपासना है और तुम्हारी पूजा है।

कठिन परिश्रम करना सीखो। खूब गड़कर, जमकर मेहनत करो और अपने उच्च तथा पवित्र आदर्श को कभी मत भूलो। शास्त्र और शस्त्र, बुद्धिबल और बाहुबल, दोनों का उपार्जन करो।

-मालवीय जी


कुण्डलिनी दो शक्तिशाली ध्रुव केन्द्रों की अधिष्ठात्री

विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि परमाणु भी पदार्थ (मैटर) की अविभाज्य इकाई नहीं है। वह भी अनेक खण्डों में बँटा हुआ है। और अपने सहयोगी-इलेक्ट्रोन-प्रोट्रॉन-न्यूट्रोन-आदि सहयोगियों के साथ अपना सामूहिक क्रिया-कलाप चला रहा है। इलेक्ट्रान सिद्धाँत के अनुसार अणु भी एक छोटे आकार का ब्रह्माण्ड है। जिसकी तुलना बड़े रूप में सौर मण्डल से की जा सकती है। इस परमाणु पद्धति (ऐटेमिक सिस्टम) के केन्द्र से धनात्मक बिजली (पाजेटिव इलेक्ट्रिसिटी) चार्ज होती रहती है। जिससे चारों तरफ ऋणात्मक बादल समूह को शक्ति मिलती रहती है। इसे इलेक्ट्रान रिवाल्व (Electrone Rovolv) कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भी एक धनात्मक चार्ज केन्द्र में स्थिर रहता है और ऋणात्मक चार्ज उस केन्द्र के चारों ओर गतिशील रहते हैं। जो बात अणु के ऊपर लागू होती है वही सारे ब्रह्माण्ड और समष्टि पद्धति (Cosmic Systeeu) पर भी लागू होती है। विश्व पद्धति के सारे ग्रह नक्षत्र सूर्य के चारों और चक्कर लगाते हैं और यह पूर्ण सौर मण्डल किसी दूसरे महा केन्द्र के चक्कर काटता होगा। अन्त में सारे असंख्य सौर मण्डल किसी एक महा महान स्थिर केन्द्र का चक्कर काट रहे होंगे। वही समस्त ब्रह्माण्डों का केन्द्र ब्रह्म बिन्दु इस सारे महा प्रसार को बाँधे हुए है और अनुशासन में रख रहा है। इसी प्रकार इस समस्त शरीर के समस्त जीव कोषों को एक केन्द्र विन्दु साधे सँभाले हुए हैं। उसे महा प्राण कह सकते हैं। इस महा प्राण के दो ध्रुव हैं। (1) एनाबोलिक (Anabolic) (2) केटा बोलिक (Ketabolic) इन्हें आध्यात्मिक भाषा में सहस्रार चक्र और मूलाधार चक्र कह सकते हैं। इसी के आधार पर हमारी गतिशीलता और चेतना टिकी हुई है। इन दोनों को उपासनात्मक प्रयोजन के लिए शिव और शक्ति भी कहा जाता है। इन दोनों का समन्वय जिस सूत्र द्वारा होता है उसे ही कुण्डलिनी समझना चाहिए।

कुंडलिनी के दो शक्ति स्रोत हैं, इसीलिए दो भागों में विभक्त भी करते हैं एक सूर्य धारा दूसरी पृथ्वी धारा। सूर्य धारा को धन विद्युत (पाजेटिव) और पृथ्वी धारा को ऋण विद्युत (नैगेटिव) कह सकते हैं। दोनों ध्रुवों पर यह दो शक्तियाँ संव्याप्त है और एक दूसरे को परस्पर खींचती, बाँधती तथा सहायता करती हैं। दोनों के बीच जो संबंध सूत्र है उसे शक्ति दण्ड कहते हैं। यह संसार इसी शक्ति बंधन में बँधा हुआ नियत प्रयोजन के लिए प्रयुक्त हो रहा है। मनुष्य शरीर की रचना भी भूलोक की तरह ही है। उसके भी दो ध्रुव हैं। उत्तर ध्रुव मस्तिष्क का मध्य बिन्दु-सहस्रार चक्र और दक्षिण ध्रुव काम-बीज मूलाधार चक्र इन दोनों को मेरुदण्ड ने कसकर बाँधा हुआ है। आँख से दिखाई पड़ने वाले स्थूल मेरुदण्ड की सूक्ष्म शक्ति का नाम ब्रह्म नाड़ी है उसी के भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान इस शक्तिधारा के तीन क्रियाकलाप हैं (1) इड़ा (2) पिंगला (3) सुषुम्ना। इन तीनों को मेरुदण्ड स्थिर रखने वाली ब्रह्म नाड़ी की अन्तरंग, सहायिका अथवा उप शक्तियाँ कहना चाहिए।

दोनों ध्रुवों को परस्पर संबंध सूत्र में बाँधे रहने वाली भौतिक शक्ति दण्ड को वैज्ञानिक भाषा में ‘कडूमस’ कहते हैं। शरीर के ध्रुवों से सम्बद्ध रखने का कार्य कुण्डलिनी करती है। यह धारा क्षीण है यदि जितना सम्बन्ध आवश्यक है उतना नहीं होगा तो संसार का ढाँचा ढिलमिलाने लगेगा। अन्न उत्पादन से लेकर सामान्य स्वास्थ्य, प्रकृति सन्तुलन तथा प्राणियों की मनोदशा में अनायास ही गिरावट आ जायगी। इसी प्रकार मेरुदण्ड में स्थूल अस्थि घटकों तथा स्नायु तन्तुओं में गड़बड़ी पैदा हो जाय तो शरीर में अनेक बीमारियाँ तथा खामियाँ पैदा हो जायेंगी। इस स्थान पर अवस्थित सूक्ष्म शक्तियाँ जिन्हें ब्रह्मनाड़ी और उसकी सहयोगिनियों का समूह कह सकते हैं यदि दुर्बल पड़ जायें तो मनुष्य का शारीरिक और मानसिक स्तर बेतरह गिरने लगेगा। इस प्रकार की गिरावट को रोकने और उस संस्थान की समर्थता बढ़ाकर जीवन क्रम में सर्वांगीण प्रगति की सम्भावना उत्पन्न करना भी कुण्डलिनी योग का एक प्रयोजन है।

आत्म विद्या के विद्यार्थियों को यह तो विदित ही रहता है कि यह मानवीय पिण्ड (शरीर) विश्व ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा नमूना मात्र है। सूर्य चलता है और सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। ठीक इसी प्रकार परमाणु भी अकेला नहीं होता, उसके साथ इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन, न्यूट्रोन आदि की एक मंडली रहती है जो ‘न्यूक्लियस’ से प्रभावित होकर अपना कार्य उसी तरह चलाती है जिस तरह सौर मण्डल के साथ। विशाल वृक्ष का सारा ढाँचा छोटे से बीज के भीतर पूरी तरह विद्यमान रहता है। मनुष्य का शरीर ही नहीं उसका स्वभाव, बुद्धि, अन्तःकरण आदि महत्वपूर्ण सूक्ष्म चेतना संस्थान भी अति सूक्ष्म रज वीर्य में पूरी तरह “जीन्स” रूप में विद्यमान रहता है। ब्रह्माण्ड की विशाल व्यापकता को यदि हम बीज रूप में देखना चाहें तो उसे मानव शरीर की सूक्ष्मता का विश्लेषण करते हुए भली प्रकार जान सकते हैं। जान ही नहीं सकते उस व्यक्तिगत सूक्ष्मता का विश्व गरिमा के साथ जुड़े हुए अविच्छिन्न सम्बन्ध का लाभ भी उठा सकते हैं। यह संबंध सूत्र यदि प्रसुप्त न रहकर जागृत हो जाय, दुर्बल न रहकर परिपक्व हो जायें तो विश्वव्यापी शक्ति भण्डार से अपने लिए आवश्यक वस्तुयें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध आकर्षित कर सकता है इतना ही नहीं-अपनी दुर्बल इकाई को समर्थ बनाकर उससे विराट विश्व के जड़ चेतना संस्थान को प्रभावित कर सकता है।

साधना और तपश्चर्या वस्तुतः इसी अति महत्वपूर्ण विज्ञान का नाम है। प्राचीन काल में तप साधना के द्वारा जिनने जो वरदान पाये थे उनके इतिहास, पुराण विस्तारपूर्वक हम पढ़ते सुनते हैं। इन दिनों वैसी उपलब्धियाँ प्रत्यक्ष न होने से वे बातें कपोल कल्पना जैसी लगती हैं पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। यदि ठीक विधि से-ठीक उपकरणों द्वारा उस विज्ञान को कार्यान्वित किया जाय तो पूर्व काल की कपोल कल्पना समझी जाने वाली बातों को आज भी प्रत्यक्ष किया जाना सम्भव है।

तपस्वियों द्वारा साधना के फलस्वरूप प्राप्त किये वरदान और कुछ नहीं विराट विश्व की अन्तरंग शक्तियों में से कुछ का इच्छानुकूल उपयोग कर सकने की क्षमता ही समझी जानी चाहिए इसी प्रकार शाप वरदान दे सकने की क्षमता को अपनी व्यक्तिगत इकाई को इतना प्रबल बना लेना ही समझना चाहिए जिससे मनुष्यों या पदार्थों को अपनी संकल्प शक्ति के प्रहार से अभीष्ट दिशा में मुड़ने के लिए विवश किया जा सके। देवताओं का अस्तित्व इस विराट विश्व में उनकी विशालता के अनुरूप व्यापक भी हो सकता है। पर हमसे देवताओं के जिस अंश का प्रत्यक्ष और सीधा सम्बन्ध है वह अंश अपने भीतर ही ‘शक्ति बीजों’ के रूप में विद्यमान रहता है। साधना का प्रयोजन इन्हीं शक्ति बीजों को जागृत और समर्थ बनाना है। समष्टिगत देवताओं का आशीर्वाद, वायु, वर्षा, धूप, शीत, दुर्भिक्ष, सुर्भिक्ष आदि के रूप में समग्र रूप से बरसता है और उससे सबको समान लाभ मिलता है। व्यक्तिगत वरदान आशीर्वाद देने वाले देवता अपने शरीर में ही विद्यमान रहते हैं। विविध-विधि साधनाओं द्वारा उन्हीं को स्वयं समर्थ बनाया जाता है और अपनी पात्रता एवं तपस्या के अनुरूप उन्हीं से लाभ पाया जाता है जिसे ‘अलौकिक’ चमत्कारी, देव प्रदत्त, वरदान के रूप में आश्चर्य के साथ सुना और देखा जाता है।

ऐसे मानवीय पिण्ड के अंतर्गत इस प्रकार के मूल शक्ति संस्थान दो हैं। उन्हें उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की समता दी जा सकती है। इन्हीं को अग्नि और सोम प्राण और रयि-स्वाहा और स्वधा कहा जाता है। इनमें से एक को सूर्य दूसरे को चन्द्र कह सकते हैं। ‘सहस्रार’-को उत्तरी ध्रुव-सूर्य केन्द्र माना जाता और ‘आधार’ को चन्द्र। एक को शिव कह सकते हैं दूसरे को शक्ति। यों इन दोनों को ही जीवन अग्नि कह सकते हैं और परस्पर सम्बद्ध मान सकते हैं। सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित होता है। कारण जो भी हो चन्द्रमा तल पर प्रकाश के समय ज्वलन्त ऊष्मा और अन्धकार के समय शून्य तापमान जैसी शीतलता रहती है। ‘आधार’ में भी कम अग्नि नहीं है। इसलिए वहाँ भी अग्नि कुण्ड माना गया है। सहस्रार तो सहस्र किरणों वाला प्रत्यक्ष सूर्य है ही। आकाशस्थ सूर्य में सात रंग की सात किरणें, सात शक्तियाँ, सात अग्नियाँ मानी जाती हैं पर सहस्रार में हजार किरणों-हजार अग्नियों-हजार शक्तियों का अंकन किया गया है। उनकी संख्या और भी अधिक हो सकती है। इन्हीं किरणों को शरीरगत और मनोगत आत्म-शक्तियों के रूप में आत्मविद्या के साथ जानने ओर उनके साथ संबंधित होने का प्रयत्न करते हैं।

उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव यों परस्पर बहुत दूर हैं पर वस्तुतः उनके बीच एक सुदृढ़ संबंध सूत्र विद्यमान है। इसी सूत्र के आधार पर उन दोनों में सन्निहित अनन्त शक्ति भण्डार का परस्पर आदान-प्रदान होता रहता है। पिण्ड जगत में भी ठीक यही स्थिति है। उत्तरी ध्रुव के शक्ति स्रोत का प्रवाह दक्षिणी ध्रुव तक-सहस्रार से मूलाधार तक-पहुँचाने वाले सूत्र को ‘इड़ा’ कहते हैं। और जननेन्द्रिय मूल-मूलाधार से-दक्षिण ध्रुव से उत्तर ध्रुव तक शक्ति प्रवाह पहुँचाने वाले सूत्र को पिंगला कहते हैं। जहाँ इन दोनों का सम्मिश्रण है उसे सुषुम्ना कहते हैं। मोटे तौर से यों समझा जाय कि बिजली के तारों में धन विद्युत पिंगला और ऋण विद्युत ‘इड़ा’ कहते हैं। वे दोनों तार जहाँ भी मिलकर स्फुल्लिंग तरंग ‘उत्पन्न करते हैं उसे ‘सुषुम्ना’ माना जाय।

इडा पिंगला और सुषुम्ना का कुण्डलिनी विद्या के अंतर्गत जो बार-बार उल्लेख किया जाता है उसे इस शक्ति प्रवाह को दौड़ाने वाली ‘फ्रीक्वेन्सी’ के रूप में जाना जाय। इन्हें रक्त वाहिनी धमनियाँ न समझा जाय। मेरुदण्ड में उनका उल्लेख इसी रूप से हुआ है कि वे शक्तियाँ इस आधार के साथ अपना प्रवाह जारी रखती हैं। और भी मोटे रूप से समझना हो तो मस्तिष्क को उत्तरी ध्रुव (पिंगला) कहिये। जननेन्द्रिय को ‘इडा’ और इन दोनों को आपस में जोड़कर रखने वाली हड्डी मेरुदण्ड को (सुषुम्ना) रीढ़ की हड्डी। एक दीखते हुए भी उसमें छोटे-छोटे कई टुकड़े परस्पर जुड़े हुए हैं। इन जोड़ों से जो ज्ञान तन्तु निकलते हैं वे शरीर के विभिन्न अवयवों से सम्बद्ध हैं और उन्हें प्रभावित करते हैं। रीढ़ की हड्डी एक प्रकार से सारे शरीर में ही चेतना सञ्चार करती है। उसमें सुई लगा देने पर सारा शरीर सुन्न हो जाता है और उस चेतना हीन अवस्था में बड़े-बड़े आपरेशन बिना रोगी का कुछ अनुभव हुए-होते रहते हैं। सुषुम्ना को मोटे रूप में इस तरह भी जाना जा सकता है। अध्यात्म शास्त्र में इन तीन नाड़ियों का और उनसे सम्बन्धित अन्य छोटी नाड़ियों का वर्णन इस प्रकार हुआ है-

इडा वामे च विज्ञेया पिंगला दक्षिणे स्मृता।

इडा नाडी स्थिता वामा ततो व्यस्ता च पिंगला।

इडायाँ तु स्थितश्चन्द्रः पिंगलायाँ च भास्करः॥

इडा वाम भाग में पिंगला दक्षिण भाग में है। इडा नाडी वामावर्त से स्थित है और पिंगला उससे व्यस्त (विपरीत) दक्षिणावर्त से स्थित है। इडा में चन्द्रमा और पिंगला में सूर्य स्थित है।

वामे चामृतरुपा स्याज्जगदाप्यायनं परम्।

दक्षिणे चरभागेन जगदुत्पादयेत्सदा॥

वाम भाग की नाडी इडा अमृत रूपा है और सम्पूर्ण जगत का पोषण करती है तथा दक्षिण में चर भाग से स्थित पिंगला नाड़ी सदैव जगत को पैदा करती है।

शक्तिरुपः स्थितश्चन्द्रों वामनाडीप्रवाहकः।

दक्षनाडीप्रवाहश्च शंभुरुपो दिवाकरः॥

वाम नाडी का प्रवाहक चन्द्रमा शक्ति रूप से स्थित है और दक्षिण नाडी का प्रवाहक सूर्य शम्भु रूप से स्थित है।

तासाँ मध्ये दश श्रेष्ठा दशानाँ तिस्र उत्तमाः।

इडा च पंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयका॥

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी।

अलंबुषा कुहुश्चैव शंखिनी दशमी तथा॥

उन सब नाडियों में दस श्रेष्ठ हैं और उन दसों में ये तीन उत्तम हैं-(1) इडा (2) पिंगला और (3) सुषुम्ना (4) गान्धारी (5) हस्ति जिह्वा (6) पूषा (7) यशस्विनी (8) अलंबुषा (9) कुहू और (1) शंखिनी है।

ऊर्ध्वं मेढ्रादधोनाभेः कन्दो योनिः खगाण्डवत्।

तत्र नाडय़ः समुत्पन्नाः सहस्राणाँ द्विसप्ततिः॥

तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्तति रुदाहृताः।

प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृता॥

इडा च पिंगल चैव सुषम्णा च तृतीयका।

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी॥

अलम्बुषा कुहूश्चैव शंखिनी दशमी स्मृता।

एतन्नाडीमयंचक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा॥

-गोरक्ष पं. 25 से 28

लिंग मूल से ऊपर नाभि से नीचे-कन्द से सदृश नाडियों का मूल उत्पत्ति स्थान पक्षी के अण्डे जैसे आकार वाला है। वहाँ से 72 हजार नाड़ियाँ निकली हैं और वे समस्त शरीर में व्याप्त हैं ॥ 25॥

उन 72 हजार नाडियों में 72 ही मुख्य हैं। इनमें भी प्राण वाहिनी नाड़ियां दस ही हैं॥ 26॥

इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्ति, जिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलंबुषा, कुहू, शंखिनी यह मुख्य दस नाड़ियाँ हैं। यह नाडी चक्र योगियों को जानना ही चाहिए।

भूतत्व वेत्ताओं और विश्व विद्युत विद्याओं के अन्वेषक का प्रतिपादन है कि पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति के बारे में अभी तक वैज्ञानिक बहुत थोड़ी जानकारियाँ उपलब्ध कर सके हैं पर जितना ज्ञात हो सका है वह प्रकृति की अपार शक्ति और उसके आश्चर्यजनक स्वरूप का प्रतिपादन करता है। अनुमान है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र पृथ्वी तल की गहराई में एक प्रकार के तरल पदार्थ में प्रवाहित विद्युत धाराओं के बहाव के कारण पैदा होता है। उत्तर से दक्षिण ध्रुव की ओर एक सीधी पट्टी चली गई है यही पृथ्वी का जीवन तत्व, उसकी ऊष्मा और सक्रियता का स्रोत है। यदि यह आग ठंडी पड़ जाये और विद्युत प्रवाह नष्ट हो जाये तो पृथ्वी में दिखाई दे रहा सारा जीवन ही नष्ट भ्रष्ट हो जाये।

विद्युत धाराओं की उत्पत्ति का कारण वहाँ पाई जाने वाली धातुयें हैं। इन धातुओं के विद्युत गुण धर्म और तापमान भिन्न-भिन्न होते हैं और उनके मिलने से ही विद्युत धारा प्रवाहित होती है। पृथ्वी के अपनी ही धुरी पर निरन्तर घूमने के कारण तरल क्षेत्र की यह ऊर्जा ही विद्युत आवेश के रूप में परिवर्तित हो जाती है।

जीवन सत्ता भी प्राणमय (अग्नि मय), तापयुक्त, प्रकाश कणों के समान सूक्ष्म किन्तु तेजस्वी और विद्युत चुम्बकीय आवेश के रूप में है इस दृष्टि से पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की जीवनी सत्ता से तुलना करें तो अध्यात्म विज्ञान दर्शन के सिद्धान्त की पुष्टि हो जाती है।

जीवन सत्ता, प्राण अग्नि, आत्म तेज एवं ब्रह्मवर्चस की इसी स्थिति में समझा जाना चाहिए। मस्तिष्क और जननेन्द्रिय के दो ध्रुव परस्पर संबंध रह कर ही शरीरगत और मनोगति सारे क्रिया-कलाप को गतिशील रखते हैं।

इस स्थिति में परिवर्तन भी होता रहता है। पृथ्वी की स्थिति में अन्तर आने पर इन ध्रुवों का स्वरूप स्थान और क्रिया-कलाप भी बदल जाता है फिर अतीत में दोनों ध्रुव जहाँ थे अब वहाँ नहीं है। उनने अपना स्थान छोड़ दिया है और इस स्थान परिवर्तन ने भू लोक की सारी स्थिति को प्रभावित किया है। जैसी शारीरिक-मानसिक स्थिति प्राणियों की पूर्व काल में थी वह अब नहीं है। और पदार्थों को आकृति से लेकर प्रकृति तक में असाधारण अन्तर पाया है। ठीक इसी प्रकार मानव-विश्व के पिण्ड ब्रह्माण्ड में भी जब स्थान परिवर्तन हो जाता है तो उसकी स्थिति काफी बदल जाती है। जागृत ‘सहस्रार’ और ‘आधार’ जब यथा स्थान थे तब सतयुग के दिव्य व्यक्तित्व और महान व्यक्तित्व दृष्टिगोचर होते थे। पर अब उनके स्थान भ्रष्ट हो जाने से स्थिति भी बदल गई और प्राचीन गौरव गरिमा में भारी अवसाद उत्पन्न हो गया। पृथ्वी के ध्रुवों का यथा स्थान लगना परमात्मा के हाथ है। वह युग परिवर्तन के समय पर ऐसा हेरफेर करता भी है। पर हम यदि चाहें तो अपनी धरती के अपनी काया के ध्रुवों को बदल कर जीवन की सारी परिस्थिति में ही हेरफेर कर सकते हैं। कुण्डलिनी साधना का प्रयोजन इन ध्रुव केन्द्रों को यथा स्थान व्यवस्थित करना और उनकी अस्तव्यस्तता को दूर करना भी है।

भू गर्भ विज्ञान स्वयं ही स्वीकार करता है कि ध्रुव अपना स्थान बदलते रहते हैं। आज के ध्रुवों की स्थिति पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुवों से लग-भग एक हजार मील दूर है। चिर अतीत वाले भौगोलिक ध्रुव अक्रिय क्षेत्र हैं जबकि वर्तमान चुम्बकीय क्षमता वाले ध्रुव अत्यन्त तीव्र हल-चल वाले हैं।

पृथ्वी के वह भाग जो आजकल बहुत अधिक गर्म हैं उनके नीचे की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं के विश्लेषण के बाद भूगर्भ शास्त्रियों ने पाया कि वह स्थान कभी हिमनद थे आज के ध्रुव जहाँ स्थित हैं उनके नीचे पाये जाने वाले अस्थि-अवशेष तथा पेड़ पौधों के विश्लेषण से भी इस बात की पुष्टि होती है कि वे कभी अत्यन्त गर्म स्थान थे। इससे निश्चित है कि भले ही भौगोलिक ध्रुवों से ध्रुवों की स्थिति समान ही क्यों न रहता हो पर वे अनादि काल से बदलते आ रहे हैं और उनके बदलने के साथ-साथ ही पृथ्वी के जलवायु क्षेत्र में भी परिवर्तन हुए हैं। ग्रह गणित के आधार पर भारतीय ज्योतिर्विदों ने काल को चतुर्थ युगी में बाँट कर जो भिन्न-भिन्न युगों की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों का निरूपण किया है वह भी इस बात का प्रमाण है कि एक प्रलय से लेकर दूसरी प्रलय तक पृथ्वी के लोगों की मनःस्थिति से लेकर शारीरिक स्थिति तक जो परिवर्तन होते हैं वह इस चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन के कारण ही होते हैं। उत्तरी ध्रुव धीरे-धीरे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ रहा है और दक्षिणी उत्तरी की ओर। अमरीकी वैज्ञानिक डॉ0 ब्रुस सी-हीजन और नील उपडाइक ने महासागरों की तलहटी से प्राप्त सामग्री का विश्लेषण करने पर ज्ञात किया कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व ध्रुवों के पारस्परिक परिवर्तन की यह क्रिया सम्पन्न हुई।

पृथ्वी की इस स्थिति से मानवीय शरीर की तुलना करने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यदि शरीरगत ध्रुवों की स्थिति में परिवर्तन लाया जा सकें। सहस्रार और ‘आधार’ को यदि शून्य तापमान कर आज की स्थिति में न रहने देकर उन्हें साधना की ऊष्मा से उष्ण किया जा सके तो निश्चय ही वे अपने मूल स्थान पर आ सकते हैं और वही स्थिति पुनः उत्पन्न हो सकती है जो उस चिर अतीत काल में थी उसे देव युग-स्वर्ण युग-प्रकाश युग या सतयुग के नाम से पुकारते हैं। समस्त विश्व का युग परिवर्तन बड़ी शक्तियों के द्वारा ही सम्भव हो सकता है पर विश्व में आवश्यक हेर-फेर लाया जाना व्यक्तिगत साधना से भी संभव हो सकता है। कुण्डलिनी साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। उस माध्यम से उत्पन्न आन्तरिक ऊष्मा उस सिकुड़न को दूर करती है जो उस प्राणाग्नि के लग-भग बुझ जाने के कारण उत्पन्न हुई है। शीत से हर चीज सिकुड़ती है। गर्मी से फैलती। तपश्चर्या की अग्नि अन्तरंग के प्रत्येक अवयव और शक्ति निर्झर को यथा स्थान यथावत् बनाये रहती है। पर आलसी और विलासी व्यक्ति जब साधना की ऊष्मा को बुझा देता है तो उनकी सिकुड़न सब कुछ कुरूप और विकृत बना देती है। जाड़े के दिनों में पैर की बिवाई फट जाती और उनमें दर्द होता है। चलने में अड़चन पड़ती है और पैर कुरूप दीखते हैं। गर्मी की ऋतु आने पर यह शिकायत अपने आप दूर हो जाती है। हमारी वर्तमान स्थिति को फटी हुई ‘बिवाई’ कहा जा सकता है। यदि हम अपने जीवन क्रम में साधनात्मक पुरुषार्थ से ग्रीष्म ऋतु पैदा कर लें तो बिवाई फटने जैसी वर्तमान दुर्दशा से छुटकारा प्राप्त करने में तनिक भी विलम्ब न लगे।

आज से कोई 2 करोड़ वर्ष पूर्व ऐसी स्थिति आई थी तभी ‘रेडियो लारिया’ नामक एक कोशीय जीव एकाएक अस्तित्व में आया पर उसकी अनेक किस्मों का एकाएक लोप हो गया। इसी प्रकार अब 2 हजार वर्ष बाद फिर से वह स्थिति आ सकती है जबकि मानवीय गुण सूत्रों (जीन्स) में अब की अपेक्षा हजारों गुने परिवर्तित बिल्कुल ही भिन्न कोटि के गुणसूत्रों का प्रादुर्भाव हो सकता है अर्थात् तब मनुष्य अब की अपेक्षा बिलकुल ही भिन्न किस्म का होगा। यह प्रलय वैज्ञानिक क्षेत्रों में चुम्बकीय प्रलय कही जाती है वह सब जीवन तत्व के उत्परिवर्तन की क्रीड़ा है।

इस परिवर्तन का कारण ब्रह्माण्ड किरणें (कॉस्मिक रेज) हैं। ब्रह्माण्ड किरणों का एक सशक्त प्रवाह ब्रह्माण्ड के किसी अज्ञात स्थान से दौड़ा चला आ रहा है। यह उत्तरी ध्रुव से पृथ्वी के भीतर घुसना चाहता है पृथ्वी की अपनी गति या चुम्बकीय क्षेत्र उन किरणें को दाहिने बाएं मोड़ देता है। यह भी संभव है कि यह सशक्त किरणें पृथ्वी की मूलाधार रेखा में प्रविष्ट कर चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण करती हों। यह किरणें यदि सीधी पड़ें तो मनुष्य जाति क्या सारी पृथ्वी जलभुन कर राख हो जाये। अतएव उसकी एक पट्टी पर यह प्रवाह दक्षिण ध्रुव तक जाता है। 3960 मील का वह क्षेत्र इतनी अधिक तीक्ष्ण गर्मी वाला क्षेत्र है कि वहाँ कोई भी वस्तु ठोस स्थिति में रह ही नहीं सकती। इसका तापमान और सूर्य के केन्द्र का तापमान एक बराबर 8000 सेन्टीग्रेड होता है। इस क्षेत्र का परिवर्तन ही पृथ्वी में पशु-पक्षी पेड़-पौधे और मनुष्य जीवन में परिवर्तन का आधार होता है। दोनों वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि 200 वर्ष बाद जब यह परिवर्तन करोड़ों वर्ष पूर्व की स्थिति में आयेंगे तब पृथ्वी में विलक्षण आकृति-प्रकृति वाले दैत्याकार देवाकार, अष्ट मुखी, दस मुखी, सहस्र बाहु ऐसे लोग पैदा होने लगेंगे यह सारी बातें उन तथ्यों को भी सत्य सिद्ध करती हैं जिनको भारतीय वांग्मय का अतिरंजन कह कर इन दिनों उपेक्षित कर दिया जाता है पर जीवन सत्ता का यह विश्लेषण यह बताता है कि पृथ्वी पर निस्संदेह यह सारी विलक्षणतायें रही हैं और आगे भी पैदा होती रहेंगी।

पृथ्वी के रासायनिक विश्लेषण की जानकारी इतनी अद्भुत नहीं थी जितनी की नवीनतम शोधों के अनुसार उसके विद्युत संस्थान की गतिविधियाँ परम विस्मयजनक लगती हैं। शरीर की जो रासायनिक जानकारी शरीर शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र के आधार पर प्राप्त की गई है वह बहुत स्थूल है। बारीकी जानने का अवसर जबकि मिलना शुरू हुआ है तो वैज्ञानिकों को इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ रहा है कि इस लोक की समस्त दृश्य और अदृश्य हलचलों का कारण वह विद्युत संस्थान ही है जो हमें सब ओर से आवृत्त किये हुए है। यह प्रवाह कहाँ से आता है? क्यों आता है? उसमें हेर-फेर क्यों होता है? उस हेर-फेर से विश्व के पदार्थों, जीवधारियों, परिस्थितियों में अद्भुत अन्तर क्यों होता है? कौन करता है? इसका उत्तर अनीश्वरवादी विज्ञान वेत्ताओं को मिल नहीं रहा है? मिल भी नहीं सकता। वे अपने यन्त्र उपकरणों की पहुँच-उस अविज्ञात शक्ति केन्द्र तक ले जा सकने की बात सोच भी नहीं सकते जिसके इशारे पर इस भू विश्व का भाग्य पूरी तरह अवलम्बित है।

आत्म-विद्या के पथिक अपने शरीर विश्व पर चारों और आच्छादित शक्ति प्रवाह के मूल तत्व को समझते हैं। और आत्मा की इस सामर्थ्य से परिचित हैं कि अपने ‘पिंड’ में आवश्यक हेर-फेर स्वयं कर सकें और अवसाद के अन्धकार को हटाकर आवश्यक प्रकाश उत्पन्न कर सकें, आत्मा की ही पहुँच परमात्मा तक होती है, यही यन्त्र उपकरण है जो विराट-विश्व को प्रभावित करने वाले अविज्ञात व्यक्ति शक्ति प्रवाह में हेर-फेर करा सकता है और विश्व के भाग्य परिवर्तन की भी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। आत्म विद्या की सम्भावनायें-वहाँ से प्रारम्भ होती हैं जहाँ कि भौतिक विद्या की पहुँच की समाप्ति का अन्तिम सिरा होता है।

पिण्ड (शरीर) के जागृत ध्रुव उतने ही शक्ति सम्पन्न हो सकते हैं जितने पृथ्वी के ध्रुव। धरती के ध्रुव लकड़ी के जहाज में लगी मजबूत कीलों का अनायास ही उखाड़ कर उड़ा ले जाते हैं। मनुष्य के ध्रुव केन्द्र समस्त अवरोधों को उखाड़ सकते हैं और समस्त दिव्य सम्भावनाओं को अपने चुम्बकत्व से खींचने, जमा करने में समर्थ हो सकते हैं जो नर को नारायण स्तर का बनाकर दिखा सकते हैं। कुण्डलिनी साधना से यही पथ-प्रशस्त होता है। इसलिये उसकी सफल साधना का महत्व बताते हुए कहा है-

उद्धाटयेत्कपाटं तु तथा कुञ्चिकया हठात्।

कुण्डलिन्या तथा योगी मौक्षद्वारं प्रभेदयेत॥

-गोरक्ष प॰ 1/51

जैसे ताले में ताली लगाकर द्वार खोलते हैं उसी प्रकार समस्त बन्धन अवरोधों से छुटकारे का मार्ग कुण्डलिनी साधना द्वारा खोलना चाहिए।

यदा भवति सा संविद्विगुणीकृतविग्रहा।

सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्द ब्रह्ममयी विभुः॥

शक्ति ततो ध्वनितस्मान्नादस्तस्मान्निबोधिका।

ततोऽर्धेन्दुस्ततो बिन्दुम्तस्मादसीत्परा ततः॥

पश्यन्ती मध्यमा वाणी वैखरी सर्ग जन्मभूः।

इच्छा ज्ञान-क्रियात्मासौ तेजोरुपा गुणात्मिका॥

क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम॥

-महामन्त्र

जागृत हुई कुण्डलिनी असीम शक्ति का प्रसव करती है। उससे नाद जागृत होता है फिर बिन्दु। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी यह चारों वाणियाँ प्रखर होती हैं। इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति में उभार आता है और वर्ण मालिका की शृंखला से सम्बद्ध अनेक शारीरिक मानसिक शक्तियों का विकास होता है।


अपनों से अपनी बात

गुरुदेव का सुनिश्चित एवं पूर्व निर्धारित प्रधान कार्यक्रम यह है कि वे भावी जीवन में अधिक कठोर साधन तपश्चर्या करके ऐसी शक्ति सम्पादित करेंगे जिसके सहारे जागृत आत्माओं का नव निर्माण की महत्व पूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकना सम्भव हो सके।

अध्यात्म का ज्ञान पक्ष ही अब सर्वसाधारण की जानकारी में है। कथा, पुराण, स्वाध्याय, सत्संग तक ही धर्म मञ्च की कार्य पद्धति सीमित है। विज्ञान पक्ष जिसके अनुसार सूक्ष्म शक्तियों का उत्पादन तथा प्रयोग सम्भव होता है वह एक प्रकार से लुप्तप्राय ही है। विज्ञान के बिना ज्ञान एकाँगी है। शक्ति के बिना धर्म की रक्षा कहाँ होती है? प्राचीन काल में अध्यात्म की गरिमा के सम्मुख समस्त विश्व नतमस्तक था। इसका कारण, मात्र ज्ञान ही नहीं-उपार्जित विज्ञान भी था यदि आज वह हमारे हाथ होता तो आज जन समाज का मार्गदर्शन ही नहीं विश्व प्रवाह को मोड़ सकना भी शक्य रहा होता। इस बड़े अभाव के कारण अध्यात्म मणिहीन सर्प की तरह निस्तेज एवं निर्बल हो रहा है। इस कमी को कैसे पूरा किया जाय। इस शोध के लिये गुरुदेव की भावी तपश्चर्या का क्रम निर्धारण हुआ है।

गुरुदेव संबंधी कुछ ध्यान रखने योग्य ज्ञातव्य

स्थूल प्रचार साधनों, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों द्वारा युग-निर्माण योजना का प्रत्यक्ष संगठन कार्य कर रहा है। विचार क्राँति, नैतिक क्रान्ति, सामाजिक क्रान्ति का प्रचण्ड अभियान चल रहा है। पर इसके अग्रगामी और फलित होने के लिये सहायक सूक्ष्म पृष्ठभूमि भी चाहियें वातावरण में अनुकूलता के तत्व भी चाहिये। इस पक्ष को गुरुदेव ने स्वयं सँभाला और बाकी कार्य युग-निर्माण योजना के हम सब कार्यकर्त्ताओं के जिम्मे सौंप दिया। इस तरह एक सुव्यवस्थित कार्य विभाजन की रूप रेखा निश्चित हो गई। इसी के अनुसार उन्हें विदाई लेनी पड़ी और अध्यात्म के अग्रगामी क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ा।

उनकी तप साधना के उपरोक्त तीन प्रयोजन ही प्रधान थे। आत्म शुद्धि की बात तो एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करने भर के लिये वे कहते भर थे। वस्तुतः इस प्रयोजन को वे चिरकाल पूर्व ही पूरा कर चुके हैं।

फिर भी उनके कार्यक्रम की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने स्थूल और सूक्ष्म, आत्मिक और प्रत्यक्ष कार्यक्रमों को सर्वथा एक दूसरे से पूर्णतया जुड़ा रखा है। इस जोड़ का केन्द्र बिन्दु उन्होंने भगवती भागीरथी के पुण्य तट पर सप्त ऋषियों की तपस्थली और हिमालय के प्रवेशद्वार सप्त सरोवर हरिद्वार में शाँतिकुँज की स्थापना की। यह आश्रम किन्हीं गतिविधियों के सञ्चालन के लिये नहीं-वरन् लोक मंगल की रचनात्मक प्रवृत्तियों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के उभयपक्षी तालमेल-आदान-प्रदान के लिए ही बनाया। यहाँ की सारी गतिविधियाँ इसी प्रयोजन के लिये केन्द्रित हैं।

शान्तिकुँज में गोघृत के अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री जप के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की एक शृंखला चल रही है। इन दिनों 10 कन्याओं द्वारा यह क्रम चल रहा है। छः वर्ष में 24 महापुरश्चरण पुरे होंगे। इनका प्रयोजन (1) नव निर्माण की प्रवृत्तियों में गति उत्पन्न करना (2) उसमें संलग्न कार्यकर्त्ताओं की भौतिक एवं आत्मिक सहायता करना (3) गुरुदेव की तपश्चर्या का पथ प्रशस्त करना है। इस महापुरश्चरण प्रक्रिया से जो शक्ति उत्पन्न होती है, उसका एक अंश जप करने वाली कन्याओं के भविष्य निर्माण तथा उनके व्यवस्था संदर्भ में लग जाता है। शेष के उपरोक्त तीन कामों में खर्च कर दिया जाता है। चौथे प्रयोजन सामयिक भी आते रहते हैं। बँगलादेश की अति उलझी हुई गुत्थी के संबंध में गुरुदेव चिंतित थे। इन दिनों उनने भी अपना साधना लक्ष्य इसी बिन्दु पर केन्द्रित किया और शान्तिकुँज की साधना भी इधर ही लगती रही। अभी भी उस संदर्भ में काफी उलझनें शेष हैं सो कुछ महीने अपनी साधना प्रक्रिया उसी से जुड़ी रहेगी। इस प्रकार की सामयिक परिस्थितियाँ सामने आने पर उन्हें भी प्राथमिकता देनी पड़ती है। बाकी साधना की सुनिश्चित दिशा तो वही है जिसका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है।

विगत आठ महीनों में चल रहे साधनात्मक प्रकरण की यही सूचना और उपलब्धि है। इस बीच आपत्तिग्रस्तों की सहायता करने की, स्वजनों के अवरुद्ध प्रगति पथ को प्रशस्त करने की, हम लोगों की परम्परागत कार्यपद्धति भी यथावत चलती रही है। उसे बन्द कर सकना न अपनी प्रकृति के अनुकूल है न परिस्थिति के। अस्तु उसे चलना भी था और चला भी। इन दिनों कुछ ऐसा असन्तुलन बना कि खर्च अधिक आमदनी कम वाले लोग जिस तरह संकट में फँसते हैं उसी तरह की अड़चन अपने सामने भी आ गई और मुझे वह संकट अस्वस्थता के रूप में सताने लगा। इसे संभालना, देखना आवश्यक था साथ ही कुछ आवश्यक प्रकाश परामर्श भी हम लोगों के लिये, समाज और साधकों के लिये उन्हें देना था। सो गुरुदेव ने अनुभव किया कि जिस प्रयोजन के लिए शान्तिकुँज का निर्माण किया गया उसका उपयोग करना चाहिये। यही उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रिया-कलापों के पारस्परिक संपर्क एवं आदान-प्रदान का केन्द्र है। अस्तु उन्होंने गत महीने अपना वह निर्धारित क्रम आरम्भ भी कर दिया।

कुछ समय के लिये वे यहाँ आये और फिर वापिस चले गये। अब वे सुविधा और आवश्यकतानुसार यहाँ आते जाते रहेंगे। नितान्त एकाकी साधना जितने दिन के लिये आवश्यक थी वह अवधि पूरी हो गई। अब वे समन्वयात्मक प्रक्रिया चलायेंगे। अपनी तपश्चर्या यथावत जारी रखेंगे और शाँतिकुँज के माध्यम से प्रत्यक्ष परामर्श प्रकाश भी प्रदान करेंगे। पर वह प्रक्रिया मेरे माध्यम से ही चलेगी। जन संपर्क बढ़ाने का उनका तनिक भी मन नहीं है। स्वभावतः अपना विशाल परिवार उनसे मिलने दर्शन करने को आतुर होगा। यदि उसे छूट मिले तो यहाँ आने के थोड़े से दिन उसी में निकल जायेंगे प्रत्यक्ष है। उन्हें विदाई के बाद 20 जून से 30 जून तक शान्तिकुँज में रहना था। यह दस दिन यहाँ की कार्य पद्धति का निर्धारण करने तथा 40 भाषण टेप कराने के लिए थे। पर उन्हीं दस दिनों में लगभग 5 हजार स्वजन परिजन यहाँ भी आ गये और उनसे थोड़ी-थोड़ी बात करने-निवास, भोजन आदि का प्रबन्ध करने में वे 10 दिन भी निकल गये और जिस काम के लिए वे 10 दिन रखे गये थे वह नगण्य जितना ही हो सका।


Quotation

कर्म में रहकर ही हम कर्म से महान हो सकते हैं। परित्याग करके या पलायन करके किसी प्रकार भी यह सम्भव नहीं है।

-टैगोर

आगे भी वह क्रम न चल पड़े और उनके यहाँ आने का थोड़ा सा किन्तु अति महत्वपूर्ण समय ऐसे ही व्यतीत न हो जाय। इसलिये पिछले अनुभवों के आधार पर उन्होंने इस संदर्भ में प्रतिबन्ध अति कठोर कर दिये हैं। वे कब आयेंगे और कब चले जायेंगे इसकी पूर्व जानकारी उपलब्ध न रहेगी। यहाँ आने पर भी वे एकान्त कक्ष में ही रहेंगे। यह कक्ष लगभग उसी व्यवस्था के अनुरूप बना है जो योगीराज अरविन्द की थी। जब तक वे वहाँ रहेंगे प्रायः पूरे समय उसी में रहेंगे। 18 घण्टे तो उनके साधना क्रम में ही चले जाते हैं। दो चार घण्टे ही उन्होंने लोक मंगल के प्रयोजनों के लिये रखे हैं सो उसका उपयोग हम लोग भी करेंगे। जनसंपर्क एक प्रकार से सम्भव ही न होगा।

अस्तु हम सबको गम्भीर एवं जिम्मेदार लोगों की तरह आचरण करना है। उनके दर्शन को महत्व न देकर उनके निर्देशों पर ही ध्यान केन्द्रित करना है। उनकी इच्छा तथा व्यवस्था में व्यतिक्रम उत्पन्न नहीं करना है भले ही अपनी प्रबल भावुकता पर अंकुश लगाना पड़े। गुरुदेव का समय-उनका तप साधन विशुद्ध रूप से लोक मंगल के लिये नियोजित है। उसमें से जितना अंश हम अपने व्यक्तिगत प्रयोजन के लिये खर्च करायेंगे उतनी ही क्षति विश्वकल्याण के अभीष्ट प्रयोजनों की होगी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए किसी को भी उनके साधना स्थान का पता लगाने या मिलने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। ऐसे प्रयत्नकर्ताओं के असफल होने पर हमें, उन्हें तथा गुरुदेव को कष्ट ही हो सकता है। इसीलिये जब तक उनका नया निर्देश न हो-जब तक वे किसी को स्वयं ही न बुलायें, तब तक उनसे मिलने के लिये किसी को भी चेष्टा न करनी चाहिये। “दिव्य अनुभूतियाँ” स्तम्भ भी उनके आदेशानुसार अब अखण्ड-ज्योति में नहीं छपेगा।

अखण्ड जप और कन्यायें

शान्तिकुँज में अखण्ड दीपक पर 24 गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला अखण्ड जब के रूप में चल रही है। उसे कुमारी कन्याओं द्वारा चलाया जा रहा है।

कन्यायें डेढ़ घण्टा दिन में और एक घण्टा रात में अर्थात् प्रतिदिन ढाई घण्टा जप करती हैं। शेष समय में मैं उन्हें पढ़ाती थी। संगीत तथा सिलाई सिखाती थी ताकि वे यहाँ से जाने पर हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे सकें, सफल स्वावलम्बी एवं लोकोपयोगी जीवन जी सकें।

अब प्रक्रिया को और भी अधिक सुव्यवस्थित किया जा रहा है। लड़कियों के लिये अति उपयोगी प्रशिक्षण गृह-उद्योग, सिलाई, संगीत आदि की शिक्षा व्यवस्था बनाई है। इसके लिये विद्यालय हाल बनाया जा रहा है। अभी तक वे छात्रावास में ही रहती, पढ़ती थी। एक ऐसी सहायिका की आवश्यकता भी छापी गई है जो मेरा हाथ बँटा सके । संगीत, सिलाई आदि जानती हो। पारिवारिक उत्तर-दायित्वों से मुक्त हो। उसके लिये कुमारी होने की शर्त नहीं है। विधवा परित्यक्ता भी उसके लिये उपयुक्त हो सकती है।

विद्यालय हाल बनने एवं सहायक अध्यापिका की व्यवस्था दो तीन महीने में ही हो जायगी। अभी तो जप करने वाली लड़कियाँ मिल-जुल कर ही अपना भोजन बनाती हैं। आगे उस कार्य के लिये भी सेविका रहेगी ताकि उन्हें अधिक से अधिक समय शिक्षा के लिये मिल सके।

पिछली लड़कियों में से कई छह महीने के लिये ही आयी हैं, उन्हें जून में वापिस भेज दिया जायगा। अगले

शान्तिकुँज के लिये आवश्यकता

1-जप करने वाली कन्याओं की शिक्षा व्यवस्था में मेरी सहायता कर सकने वाली एक ऐसी वयस्क महिला की जिसे संगीत एवं सिलाई का भी सामान्य ज्ञान हो, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होनी चाहिये, कुमारी होना आवश्यक नहीं।

2-भोजन बना सकने में कुशल परिश्रमी महिला की। शिक्षित होना आवश्यक नहीं।

जिन्हें उपरोक्त कार्यों में उत्साह हो, हरिद्वार रह सकें वे अपनी स्थिति का विस्तृत विवरण लिखते हुये पत्र व्यवहार कर लें।

-माता भगवती देवी शर्मा

शान्तिकुँज पो0 सप्तसरोवर,

हरिद्वार।

हरिद्वार।

वर्षों के लिये जो लड़कियाँ आना चाहें अभी से पत्र-व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लें। 24 महापुरश्चरणों का यह अखण्ड जप पूरा होने में अभी पाँच वर्ष का समय है। अच्छा तो यह है कि 5 वर्ष के लिये ही कन्याएं आयें ताकि वे कुछ योग्य बनकर भी जा सकें। कम से कम एक दो वर्ष की बात तो सोचकर ही आना चाहिये। आगे से किसी को भी छः महीने की स्वीकृति नहीं मिलेगी।


उगते सूरज की आवाज


उगते सूरज की आवाज (Kavita)

उठो! सुनो!! प्राची से उगते सूरज की आवाज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज॥

देश की जिसने सबसे पहले जीवन ज्योति जगाई।

और ज्ञान की किरणें सारी दुनिया में पहुँचाई॥

मोह निशा में फँसे विश्व को बन्धन मुक्त कराया।

भ्रातृ-भावना का प्रकाश सारे जग में फैलाया॥

अगणित बार बचाई इसने मानवता की लाज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज॥

इतना प्रेम की पशु-पक्षी तक प्राणों से भी प्यारे।

इतनी दया की जीव मात्र सब परिजन सखा हमारे॥

श्रद्धा अपरम्पार की पत्थर में भी प्रीति जगाई।

रिपु को लगा हृदय से अद्भुत शरणागति है पाई॥

क्षमा उन्हें भी किया दुष्टता से न रहे जो बाज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज।

मानवता के लिये हड्डियाँ तक हमने दे डालीं।

माताओं ने करीं अनेकों बार गोदियाँ खाली॥

पर न अन्याय के आगे किंचित अपना शीश झुकाया।

चोटी नहीं कटाई हमने हँस-हँस शीश कटाया॥

रहा शिवाजी अर्जुन को निज दृढ़ चरित्र पर नाज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज॥

देह सुखा डाली न पुण्य से तन-मन जिनके रीते।

गीध गिलहरी तक न रहे थे परमारथ से पीछे॥

इसी भूमि में शोभा पाते आये वेद-पुराण।

जन्म अनेकों बार यहीं लेते आये भगवान्॥

नव जागृति का सदा यहीं से गूँजा स्वागत-साज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज॥

सोये स्वाभिमान को आओ सब मिल पुनः जगायें।

नव-जागृति के आदर्शों को दुनिया में पहुँचायें॥

ज्ञान-यज्ञ की यह मशाल हर लेगी युग-तम सारा।

“हम बदलेंगे-युग बदलेगा”-आज लगाओ नारा॥

उठो! सुनो!! प्राची से उगते सूरज की आवाज।

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज॥

-बलराम सिंह परिहार

*समाप्त*