सत्य की प्राप्ति-तपस्वी ही कर सकता है। शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से बचने में जिस तितीक्षा और कष्ट सहिष्णुता की-धैर्य और संयम की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा लेने का नाम ही तप है। अकारण शरीर के सताने का नाम ही तप नहीं है। सताना तो किसी का भी बुरा है फिर शरीर को व्यथित और संतप्त करने से ही क्या हित साधन हो सकता है। तपस्या वह है जो सत्यमय जीवन लक्ष्य निर्धारित करने के कारण सीमित उपार्जन से निर्वाह करने की स्थिति में- गरीबी अथवा मितव्ययिता अपनानी पड़ती है। इसे प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार और शिरोधार्य करने का नाम तप साधना ही है।
सत्य रूप नारायण को प्राप्त करने का मूल्य है वैराग्य। वैराग्य का अर्थ घर परिवार को छोड़, विचित्र वेश बनाना या भिक्षाटन करना नहीं है वरन् यह है कि जिस राग-द्वेष की धूप छाँह में सारा जगत हँसता, रोता, अशान्त और उद्विग्न रहता है उस विडम्बना से बचते हुए महान लक्ष्य की ओर अनवरत गति से चलते जाना। सत्य निष्ठ व्यक्ति इस असत्य मग्न संसार को एक विचित्र प्राणी लगता है। उसे भी अज्ञान के अन्धकार में भटकती दुनिया दयनीय लगती है। दोनों का तालमेल नहीं बैठता। यह विसंगति कहीं कटुता उत्पन्न करती है, कहीं तिरस्कार उलीचती है, कहीं अवरोध उत्पन्न करती है, कहीं त्रास देती है। इसे उपेक्षापूर्वक देखना वैराग्य है और इस पर भी जो त्रास सहने पड़े उन्हें सन्तोष पूर्वक सहने का नाम तप है।
वैराग्य और पत के डाँडों के सहारे विवेकवान व्यक्ति अपनी साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।
शान्तिकुँज की स्थापना गुरुदेव ने श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अंतर्गत इसलिए की कि वे इस केन्द्र पर स्वयं आकर और संस्कारी आत्माओं को बुलाकर प्रकाश परामर्श एवं स्नेह सहयोग प्रदान करते रह सकें। अफसर दौरे पर जाते हैं, उनके लिये उपयुक्त परिस्थिति वाले डाक बंगले बने होते हैं। जितनी आवश्यकता होती है। उतनी देर ठहर कर अफसर अन्यत्र चले जाते हैं। शान्ति कुंज गुरुदेव का डाक बँगला है।
भावी जीवन वे तप साधना तो क्या कहना चाहिए- दिव्य संपर्क में लगायेंगे। वहाँ से जो मिलेगा उसे वितरण करने के लिये इस केन्द्र पर आयेंगे। कोई श्रमिक परदेश में मजूरी करता है। महीने में जो कमाता है उसे डाकखाने में जाकर घर वालों के लिये मनीआर्डर कर देता है। शान्ति कुञ्ज गुरुदेव का डाकखाना है। वे आवश्यकतानुसार यहाँ मनीआर्डर करने ही आया करेंगे।
कब आयेंगे और कब चले जायेंगे इसकी उनने पूर्व सूचना न देने का निश्चय किया है। आवागमन तो वे बनाये रखेंगे पर उसकी तिथियों का निश्चय नहीं हो रहा करेगा। बसन्त पर्व तक का प्रतिबन्ध था सो वह अवधि पूरी होने पर यहाँ आये भी और कुछ समय ठहर कर अभीष्ट प्रयोजन पूरा होते ही वे चले भी गये। अब कब आयेंगे यह अनिश्चित है पर यह स्पष्ट है कि प्रतिबन्ध की जो थोड़ी अवधि थी वह पूरी हो गई। भविष्य में वे कभी भी आ या जा सकते हैं।
प्रत्यक्ष और तात्कालिक कारण इस समय यह था कि मेरी दशा अचानक चिन्ताजनक हो गई। हृदयरोग के भयानक तीन दौरे पड़े। डाक्टरों को आश्चर्य था कि इतने तीव्र दौरे से भी कोई कैसे बच सकता है। स्थिति की विषमता मेरे सामने भी स्पष्ट थी। संकोच तो हुआ कि अपने निजी काम के लिये उनके क्रिया कलाप में व्यवधान क्यों उत्पन्न करूं? पर दूसरे ही क्षण यह भी ध्यान आया कि मेरी सत्ता भी अब अपनी नहीं रही। विश्व मानव के चरणों पर उन्हीं के द्वारा समर्पित एक फूल भर हूँ। ऐसी दशा में अगले जन्म के लिये उपयुक्त आधार प्राप्त करने के लिये कुछ अनुरोध करूं तो अनुचित न होगा। इस विपत्ति की घड़ी में यही सूझा और यही उपयुक्त लगा। सो उन्हें पुकारा और कहा-यदि यह जा ही रहा है तो इसे अपने हाथों ठिकाने लगा जाये और अन्तिम समय आँखों के आगे रहें। इसे मेरा सौभाग्य ही कहना चाहिए कि वे दौड़े आये। कुछ समय रहे और जीवन दान देकर चले गये।
पिछले दिनों होता यह रहा है कि उनके सौंपे हुए प्रयोजनों को पूरा करते हुए- उपार्जित पूँजी की अपेक्षा खर्च बहुत अधिक होता रहा है। ऐसी दशा में जो दुर्गति होनी चाहिए वह अपनी भी हुई। राम कृष्ण परमहंस की गले के केन्सर से मृत्यु, जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य का भगन्दर व्रण के कारण देहावसान, भगवान बुद्ध का उदरशूल, जैसी घटनाएं महामानवों के साथ भी घटती रही है। उनमें उनके पाप प्रारब्ध या असंयम कारण नहीं वरन् तप की संग्रहीत पूँजी की तुलना में व्यक्तियों की सहायता और समाज की सेवा में खर्च की मात्रा अधिक बढ़ जाना ही उस भोग का कारण था। प्रकृति किसी को भी क्षमा नहीं करती। आमदनी और खर्च में जब भी व्यतिक्रम होगा वहीं गड़बड़ी उत्पन्न होगी। इसमें साधु असाधु का भी प्रकृति के निष्ठुर नियम अन्तर नहीं करते। अपने ऊपर कुछ इसी तरह की बीती। कुमारी कन्याओं द्वारा शान्ति कुञ्ज में अखण्ड दीपक पर अखण्ड जप ही इन दिनों अपना एक मात्र उपार्जन है। थोड़ा बहुत स्वयं भी कर लेती हूँ। शेष समय तो इतने बड़े परिवार को समुचित स्नेह और प्रकाश देने का उत्तरदायित्व वहन करने में ही लग जाता है। उपार्जन कम और खर्च अधिक होने के कारण कोई भी दुर्गतिग्रस्त हो सकता है अपने को भी होना पड़े तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं। सच पूछा जाय तो हम लोगों की अन्तिम इच्छा भी यही है कि कृमि कीटकों की तरह नहीं मरना पड़े तो एक आदर्श के साथ मरें। गुरुदेव ने अपने अंग प्रत्यंगों का दान कष्ट पीड़ितों के लिए पहले ही वसीयत के रूप में कर दिया है। मेरा रक्त उतना शुद्ध नहीं इसलिये वैसे अनुदान की तो अधिकारिणी न बन सकी पर इतनी तो अभिलाषा रहती ही है कि किन्हीं कष्ट पीड़ितों की सहायता करते हुए- उनका कष्ट भार अपने ऊपर उठाते हुए इस शरीर का समापन हो। गत जनवरी में ऐसा ही अवसर आ गया था। तब न मरने का डर था, न विषाद, न काया का मोह, न जीने का लोभ। इच्छा केवल इतनी ही थी कि जिस वृक्ष पर चढ़ कर अमर बेल की तरह ऊंची और सुनहरी दिखाई पड़ी। जिसका स्नेह रस पीकर विकसित हुई उसी की सत्ता में अपनी सत्ता सूक्ष्म रूप से तो मिला चुकी पर मरण काल में भी उस प्रकार की समीपता का लाभ और भी मिल जाय तो अच्छा। पुकारा इसी दृष्टि से था वे आये भी और चले भी गये। जीवन मरण अब अपने को एक ही लगता है। उनके दर्शन इतने दिनों बाद हुए इसका आनन्द इतना अधिक रहा जिसकी तुलना में तात्कालिक कष्ट की निवृत्ति की प्रसन्नता स्वल्प ही लग रही है।
जब तक वे शान्ति कुञ्ज रहे, कुछ न कुछ वार्तालाप भी चलता रहा। कुछ तो अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ ऐसी हैं जो समय से पूर्व प्रकाशित नहीं की जा सकतीं। पर उनमें लोकोपयोगी अंश भी कम नहीं हैं। ऐसे प्रश्न मैं पूछती ही रही जो परिजनों की दिलचस्पी के थे। वे उत्तर भी देते रहे। उनमें से बहुत-सा भाग ऐसा है जो सर्व साधारण के हित में ही होगा, मैंने पूछे भी इसी दृष्टि से थे। यों वे इन्हीं बातों को समय-समय पर दूसरे ढंग से कहते लिखते भी रहे हैं। पर चूँकि बात ताजी है। इन्हीं दिनों- इन्हीं परिस्थितियों में उनने कही बताई हैं इसलिये उसका महत्व घटता नहीं बढ़ ही जाता है, गुरुदेव सबकी दिलचस्पी के केन्द्र हैं। उन्हें देखने को करोड़ों आँखें लालायित रहती हैं और करोड़ों कान व्याकुल रहते हैं। ऐसी दशा में मेरे साथ जो बाते होती रहीं उन्हें समस्त विश्व के लिए- प्रबुद्ध परिजनों के लिए ही कहा, सुना समझा जाना चाहिए। अस्तु उनका प्रकाश में लाना और सर्व साधारण तक पहुँचाना ही उपयुक्त समझा गया। इसलिये वार्तालाप के महत्व पूर्ण अंश नोट कर लिये गये थे। अब इस अंक में उन्हें ठीक ढंग से लिखा और छापा जा रहा है। यह पूरा अंक उसी का-वार्ता विवरण का प्रकटीकरण समझा जाना चाहिए। मथुरा से 20 जून को हम लोग शान्तिकुञ्ज आ गये थे। 10 दिन गुरुदेव यहाँ रहे और 1 जुलाई को अपने निर्धारित स्थान को चले गये। पूरे सात मास वे अपने साधनात्मक प्रयोजन में लगे रहे। यह अवधि उन्हें विश्व के भविष्य की विशेषतया भारतीय राष्ट्र की स्थिति को अन्धकार में धकेल सकने वाली काली घटाओं को हटाने में जूझते रहना पड़ा। बँगला देश की स्थिति उन महीनों में अत्यन्त नाजुक दौर से गुजरती रही है। चीन और अमेरिका ने प्रत्यक्ष से भी अधिक परोक्ष रूप में ऐसी दुरभि सन्धि युक्त योजना बनाई हुई थी जो यदि सफल हो जाती तो भारत की स्थिति दयनीय हुए बिना न रहती और पाकिस्तान की दुष्टता अबकी अपेक्षा हजार गुनी बढ़ जाती। भारत हारता तो उसकी प्रतिक्रिया समस्त संसार में प्रगतिशील शक्तियों के विरुद्ध ही पड़ती। बँगला देश उन दिनों 30 लाख प्रबुद्ध और समर्थ लोगों की बलि चढ़ाकर- 1 करोड़ विस्थापित बाहर भेजकर दयनीय स्थिति में पड़ गया था मुक्ति वाहिनी अधूरे साधनों से नाम मात्र की लड़ाई लड़ रही थी। सैन्य स्थिति से भी और कूटनीति की स्थिति से भी उनका पक्ष दुर्बल पड़ता जा रहा था। संसार के इस अभूतपूर्व नर संहार पर संसार का कोई देश मुँह तक नहीं खोल रहा था। राष्ट्र संघ में प्रश्न आया तो वहाँ भी पाकिस्तान का ही समर्थन किया गया। इन परिस्थितियों में सर्वत्र चिन्ता ही चिन्ता संव्याप्त होना स्वाभाविक था।
कहना न होगा कि परिस्थितियों ने जिस तरह पलटा खाया, बाजी जिस तरह उलटी हुई- उससे समस्त संसार आश्चर्य चकित रह गया। विश्व कूटनीति के परिचितों में से किसी को भी यह आशा न थी कि परिस्थितियाँ इस तरह करवट लेंगी और बंगला देश की मुक्ति इस रूप में सम्भव होगी एवं भारत का वर्चस्व एक बार फिर मूर्धन्य स्तर तक पहुँचेगा। इस सफलता का प्रत्यक्ष श्रेय निस्संदेह हमारे राजनेताओं की सूझ-बूझ और सेना के त्याग बलिदान को मिलना चाहिए। वे ही इस श्रेय के अधिकारी भी हैं; पर जो सूक्ष्म जगत की हलचलों में विश्वास करते हो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि प्रत्यक्ष घटना क्रम ही सब कुछ नहीं है कुछ अप्रत्यक्ष भी होता रहा है। और वह हलका नहीं काफी वजनदार है। जब गुरुदेव 1 जुलाई को गये थे तब कुछ और ही वातावरण था और जब जनवरी में लौटे तो परिस्थिति बिलकुल दूसरी थी इन सात महीनों में बहुत करके इसी मोर्चे पर अपने ढंग से जूझते रहे हैं।
बसन्त पर्व पर परिजनों को अतिरिक्त प्रेरणा और प्रकाश देने का वचन देकर वे गये थे। उसे भी निबाहना था। इन सात महीनों में उपरोक्त काली घटाओं को निरस्त करने के अतिरिक्त जो शक्ति बची उसे उन्होंने परिवार के प्रबुद्ध परिजनों को आवश्यक प्रकाश प्रदान करने में लगा दिया। धागे में पिरोये हुए मोतियों की तरह उन्होंने इतना परिवार अपने साथ प्रेम बन्धनों में जकड़ कर बाँध रखा है। उसकी प्रगति अवनति उनकी अपनी समस्या है। यदि युग-निर्माण परिवार के सदस्य ऐसे ही लोभ मोह में ग्रस्त-पेट और प्रजनन में व्यस्त-वासना और तृष्णा के पशु जीवन भर जीकर मर जाते हैं तो यह गुरुदेव के लिए भी कलंक की बात है इस परिवार के लिये भी लज्जा की। हाथी के बच्चे बकरों की शक्ल में दीखें इसमें उपहास हाथी का भी है और बच्चों का भी। परिवार यदि बन ही गया तो शोभा उसी में है कि उसका स्तर भी कुलपति के अनुरूप हो। हर अभिभावक की अपनी सन्तान के प्रति ऐसी ही इच्छा रहती है। उनकी भी है। युग-निर्माण परिवार का प्रत्येक सदस्य महामानवों की ऐतिहासिक भूमिका निभा सके- इसी उधेड़ बुन में वे लगे रहते हैं। अपना तप पुण्य देकर आरम्भिक लालच भी इसीलिए पूरा करते हैं कि आगे चलकर सम्भवतः यह बालक उनके आदेशों को अपनाने का साहस करेंगे। बसन्त पर्व पर उन्हें कुछ ऐसी ही प्रेरणायें देनी थीं। इसके लिए तप शक्ति भी अभीष्ट थी सो उन्होंने इन दिनों के उपार्जन में से जितना कुछ बचा खुचा था इसी निमित्त लगा दिया। अधिकाँश परिजनों ने बसन्त पर्व पर उनका प्रकाश अपने इर्द-गिर्द एवं अन्तरंग में प्रस्तुत देखा भी है। इन अनुभूतियों में कल्पना-भावुकता कम और यथार्थता अधिक रही है। गत सात मास की तप साधना की आमदनी और खर्च का यही लेखा-जोखा है जो उन्होंने मुझे बताया।
भविष्य में वे कब शान्ति कुञ्ज आयेंगे? उनका भावी कार्यक्रम क्या रहेगा? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए उनने कहा। जब वितरण कर सकने योग्य कुछ मसाला- इस एकान्त साधना के द्वारा संग्रहीत हो जाया करेगा तब उसके वितरण के निमित्त ही आया करेंगे। यह परिस्थितियों पर निर्भर है कि कुछ संचित संग्रहीत होता है या नहीं जिसे युग-निर्माण परिवार के सदस्यों को प्रदान किया जा सके- पिछले सात मास उपरोक्त दो तीन प्रयोजनों में लग गये। (1) बँगलादेश से सम्बन्धित विभीषिका (2) बसन्त पर्व (3) मेरी बीमारी। जो कमाया था वह खर्च हो गया अब शान्ति कुञ्ज रहने का कुछ तुक नहीं रहा। समय ही बतायेगा कि आगे भी कोई ऐसी ही विश्व विभीषिका तो उत्पन्न नहीं हो जाती है और उससे जूझने में ही तो नहीं जुटना पड़ता है। इसके अतिरिक्त उनके मार्ग दर्शन का आदेश संकेत भी प्रधान है। उनकी इच्छा आज्ञा के बिना वे एक कदम भी कहीं नहीं रखते। दोनों प्रकार की अनुकूलता होने पर जमा पूँजी का वितरण करना ही यहाँ आने का उद्देश्य होगा। चूँकि उनके आने के साथ अनेक अगर-मगर जुड़े हुए हैं। वे स्वयं सर्वतंत्र स्वतंत्र नहीं हैं। उच्च सत्ताओं के-पराधीन हैं। अपनी उनकी कुछ इच्छा भी नहीं, हो तो उसे बिना उस आदेश के कार्यान्वित नहीं करते। यही कारण है कि वे फिर कब आयेंगे यह बताने की स्थिति में वे थे ही नहीं।
कब आ सकेंगे- कब चले जायेंगे- कब तक रुकेंगे- यह निर्णय उनके अपने करने के नहीं, दूसरों के- तथा परिस्थितियों के हाथों में है। इसलिए उस पर सदा पर्दा ही पड़ा रहेगा। एक मोटा कारण जो उनने तो नहीं बताया पर मेरी समझ में आता है कि परिजन भावावेश में उनके दर्शनों के लिए दौड़ पड़ते हैं। इसमें जहाँ उनके प्रेम की-मोह ममता की-स्नेह सौजन्य की प्रशंसा की जायेगी, वहाँ उनके विवेक को उथला भी माना जायेगा। हर कोई अपने प्रियजन से मिलना चाहता है। गुरुदेव का अन्तःकरण प्रेम और ममता से लबालब भरा है वे यों समस्त संसार को अपना मानते हैं और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत रहते हैं। पर परिष्कृत अन्तःकरण के आत्मीय जनों के प्रति तो उनकी ममता और भी प्रगाढ़ है। कोई संसारी व्यक्ति अपने स्त्री बच्चों को जितना प्यार कर सकता है उससे कम नहीं अधिक ही प्यार युग निर्माण परिवार के सदस्यों को करते हैं। ऐसी दशा में प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है और यह उचित ही है कि परिजन उन्हें उतना ही प्यार करें। यह भी स्पष्ट ही है कि प्यार के उभार में उफान होता है और उस उमंग में मिलन लालसा उत्कृष्ट हो उठती है। यही कारण है कि जब वे कहीं जाते थे तब लाखों व्यक्ति उनसे भेंट करने के लिए दौड़ पड़ते थे। उनके प्रवचनों में जितना प्रभाव है उससे हजार गुना अधिक आकर्षक उनका व्यक्तित्व है। अस्तु आत्मीय जनों की मिलने की इच्छा उचित भी है। विशेषतया तब जबकि वे कष्टकर कठिन परिस्थितियों में बहुत दिन उपरान्त वापिस लौटे हों।
इसका एक उदाहरण तब देखा गया जब वे 21 से 30 जून तक दस दिन शान्ति कुञ्ज रहकर 100 प्रवचन टेप कराने वाले थे और कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रशिक्षण मुझे देने वाले थे। किन्तु विदाई सम्मेलन के उपरान्त भी प्रिय परिजन अपनी मोह ममता कम न कर सके और उन्हीं दिनों एक हजार से अधिक व्यक्ति दर्शन के लिए हरिद्वार आ गये। योजनायें पीछे रह गई। भेंट मिलन प्रधान बन गया और वे दस अत्यन्त महत्वपूर्ण दिन ऐसे ही भावावेश की पूर्ति में चले गये। मेरी बीमारी के दिनों में भी ऐसा ही हुआ। वे इन थोड़े से दिनों को आवश्यक प्रयोजनों में लगाना चाहते थे पर जिन्हें पता चला वे भावावेश में दौड़ पड़े और आवश्यकता से कहीं अधिक समय तक उन्हें यहाँ रुकना पड़ा।
हो सकता है भविष्य में इस प्रकार की भावावेश पूर्ण पुनरावृत्तियाँ न होने देने लिये भी यह उचित समझा हो कि अपने आने और चले जाने का समय अनिश्चित रखें। यों यहाँ उन्होंने अपना एकान्त कक्ष बना लिया है। जब तक यहाँ रहेंगे उसी में रहेंगे और आवश्यक प्रयोजनों के लिए निर्धारित समय तक ही मिलने के लिए नीचे उतरेंगे। अधिकाँश समय तो यहाँ भी एकान्त में ही रहेंगे। दर्शनार्थियों से अकारण मिलते रहना उनके लिए संभव न होगा। यों पहले भी वे लोक मंगल की जीवन साधना में ही निरत थे पर अब तो उस क्रम का स्तर असंख्य गुना बढ़ गया है। अस्तु उनका एक-एक क्षण विश्व मानव की बहुमूल्य निधि है। उसमें भावावेश के कारण व्यतिरेक उत्पन्न करना समस्त संसार को उस लाभ से वंचित करना है जिस पर कि मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की संभावनायें निर्भर हैं।
वे जिन्हें बुलायें उन्हें ही आना चाहिए। अथवा जिन्हें मिलना नितान्त अभीष्ट हो उन्हें पहले से ही मुझे अपना नाम और प्रयोजन नोट करा देना चाहिए। यदि उचित समझा जायेगा तो उन्हें सुविधानुसार बुला लिया जायेगा। ऐसे अनुरोधों में एक ही बात ध्यान में रखने की है कि सकाम कार्यों के लिए आशीर्वाद प्राप्त करना इस मिलन का प्रयोजन नहीं होना चाहिए। जो बहुमूल्य समय लिया जाय उसमें आत्मोत्सर्ग की परमार्थ प्रयोजनों की ही चर्चा की जाय। शाखा संगठन- आशीर्वाद अनुदान जैसे काम जो मुझे सौंप दिये गये हैं उन्हीं के लिए उन्हें कष्ट देना उचित नहीं।
यह तो स्पष्ट है कि उनके आगमन का अन्तिम स्थान हरिद्वार ही है। हिमालय और गंगा तट ही उनके भावी जीवन का क्रिया क्षेत्र रहेगा। अन्यत्र उनके जाने का विचार नहीं है। इसमें अपवाद व विदेश यात्रा है जिसके लिये वे पहले से ही वचनबद्ध हो चुके हैं। अध्यात्म का प्रभाव भौतिक पदार्थों पर होता है इस तथ्य को विज्ञान नहीं मानता। उनका कहना है कि विचार विचारों को प्रभावित कर सकते हैं और भावना भावनाओं को। विचार का प्रभाव वस्तुओं पर नहीं पड़ सकता। इस मान्यता को गलत सिद्ध करने के लिये और विचारों के वस्तुओं पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रत्यक्ष करने के लिए उन्हें विदेश जाना होगा। प्रवासी भारतीयों का भी आग्रह इसी प्रकार का है जो सम्भवतः कभी पूरा करना पड़े। इन दोनों प्रयोजनों के लिये विदेश यात्रा की तिथि अभी निश्चित नहीं है पर कभी न कभी जाना पड़ सकता है। इस अपवाद के अतिरिक्त सप्त ऋषियों की तपस्थली जहाँ गंगा ने उनकी सुविधा के लिए अपनी सात धारायें चीर दी थीं- वहीं अवस्थित शान्ति कुञ्ज उनका अन्तिम आवागमन स्थल रहेगा। वहीं से उनने कुछ पाया है अस्तु उसी खदान में से कुछ और बहुमूल्य रत्न खोज निकालने के लिए वे लगे ही रहेंगे।
युग परिवर्तन के साथ-साथ परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। पृथ्वी सौर मण्डल के साथ अनन्त आकाश में भ्रमण करती रहती है। अपनी कक्षा में घूमते हुए भी वह सौर मण्डल के साथ कहीं से कहीं चली जाती है। इस परिभ्रमण में ब्रह्माण्ड किरणों की न्यूनाधिकता से मानव शरीर और मन की सूक्ष्म स्थिति में भारी अंतर पड़ जाता है। साँसारिक परिस्थितियाँ और भौतिक हलचलें- सामाजिक विधि- व्यवस्थायें भी मानव जीवन की मूलभूत स्थिति में भारी अन्तर प्रस्तुत कर देती हैं। इस परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए ही युग साधना का स्वरूप समय-समय पर निर्धारित करना पड़ता है। प्राचीन काल की साधना विधियाँ उस समय के मानव शरीरों की स्थिति के अनुरूप थीं परिवर्तन के साथ साधन क्रम भी बदलेंगे। यदि हेरफेर न किया जाय तो प्राचीन काल में सफल होने वाली साधनाएँ अब सर्वथा निरर्थक और निष्फल सिद्ध होती रहेंगी।
इस प्रकार का शोध कार्य अब नितान्त आवश्यक हो गया है। अन्यथा साधकों की यह शिकायत बनी ही रहेगी कि हमने ग्रन्थों के लिये अनुसार तप साधन किया पर उसका कुछ परिणाम न निकला, गुरुदेव भौतिक विज्ञान की ही तरह अध्यात्म विज्ञान को भी प्रत्यक्ष करना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि इसके बिना सर्व साधारण की अभिरुचि आत्म-विज्ञान की ओर हो नहीं सकेगी। गुरुदेव के वर्तमान साधना क्रम को इसी स्तर का शोध कार्य समझा जाना चाहिए। समय, मन और शरीर की शक्तियों को उपरोक्त प्रयोजनों में लगाये रहने की दृष्टि से ही वे प्रिय परिजनों से पृथक रहने का साहस कर सके हैं। यों इस वियोग का कष्ट उन्हें भी कम नहीं है पर उत्तरदायित्व को देखते हुए परिजनों की तरह उन्हें भी मन मसोस कर अपने निर्धारित कर्त्तव्य में संलग्न रहने को विवश रहना पड़ता है।
सूर्य देवता एक दिन अपने अनवरत सेवा कार्य के सम्बन्ध में लोगों की क्या मान्यता है यह जानने के लिये जन समूह में वेष बदल कर जा मिले।
एक कह रहा था, बेचारे को छुट्टी भी नहीं मिलती। दूसरे ने कहा अभागे को एक दिन की जिन्दगी मिलती है रोज जीता और रोज मरता है। तीसरे ने उन्हें आग उगलने वाला निर्जीव पिण्ड मात्र बताया। लोगों की जैसी आदत है। निन्दा करने की-दोष ढूंढ़ने की सो ही वे सूर्य के सम्बन्ध में भी चरितार्थ कर रहे हैं, प्रशंसा करने वाला एकाध ही मिला। बहुत तो निन्दा करने वाले ही थे। सूर्य नारायण को इस कृतघ्नता पर बहुत दुख हुआ जिनके लिये इतना कष्ट सहते हैं और निस्वार्थ सेवा में लगे रहते हैं, उनके मुख से दो शब्द प्रशंसा के भी न निकले। ऐसे लोगों की सेवा करना व्यर्थ है। उन्होंने दूसरे दिन उदय होने से इन्कार कर दिया।
उनकी पत्नी शची ने जब पति देव के कर्म विमुख होने का समाचार पाया तो उनके पास पहुँची और विनीत होकर कहा- क्षुद्रता का काम ढेला फेंकना और महानता का काम उन्हें झेलना है। कोई कितने ही ढेले फेंके समुद्र में वे डूबते ही चले जाते हैं। सहन शीलता उन्हें उदरस्थ करती जाती है। ढेले का प्रहार तो घड़े नहीं सह पाते वे एक ही चोट में टूट जाते हैं। नाथ, आप समुद्र हैं, घड़े का अनुकरण क्यों करते हैं। सूर्य देव ने अपनी गरिमा को समझा और अपने रथ पर सवार होकर नित्य की तरह अपनी यात्रा पर चल दिये।
आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अनेक व्यक्ति एक ही मन्त्र से-एक ही पूजा विधान से-एक जितने समय तक ही उपासना करते हैं पर उनमें से कोई सफल होता है कोई असफल। किसी को तुरन्त परिणाम दिखाई पड़ता है किसी को मुद्दतें बीत जाने पर भी कोई सफलता दृष्टि-गोचर नहीं होती। इसका क्या कारण है? यह मैंने गुरुदेव से और भी स्पष्ट रूप से पूछा। कारण कि इन दिनों मुझे ही डाक का उत्तर देना पड़ता है और उनमें ऐसे पत्र भी कम नहीं होते जो बताये हुए विधान से उपासना करते हुए बहुत दिन हो जाने पर भी कुछ परिणाम न मिलने से असन्तुष्ट है। इस कठिनाई का उत्तर गुरुदेव के मुख से जो निकला उसका साराँश नीचे की पंक्तियों में प्रस्तुत किया जाता है।
‘आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान उन कुसंस्कारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो दुर्भावों और दुष्कर्मों के रूप में मनोभूमि पर छाये रहते हैं। आकाश में बादल छाये हों तो फिर मध्याह्न काल का सूर्य यथावत् उदय रहते हुए भी अन्धकार ही छाया रहेगा। जप-तप करते हुए भी आध्यात्मिक सफलता न मिलने कारण एक ही है- मनोभूमि का कुसंस्कारी होना। साधना का थोड़ा-सा गंगाजल इस गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठता है- नाले को शुद्ध कर सकना सम्भव नहीं होता। बेशक तीव्र गंगा प्रवाह में थोड़ी-सी गन्दगी भी शुद्धता में परिणत हो जाती है। पर साथ ही यह भी सच है कि सड़ांद भरी गन्दी गटर को थोड़ा-सा गंगा जल शुद्ध कर सकने में असमर्थ असफल रहेगा।
सफलता की अपनी महिमा और महत्ता है उसे गंगा-जल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गंगा जल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस शुद्ध नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त का गंगा जल का भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गंगा जल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत बनी रहे इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह उपकरण एवं स्थान की पवित्रता भी अक्षुण्य बनी रहे।
रंगरेज कपड़ा रंगने की प्रक्रिया उसकी धुलाई से आरम्भ करता है। यदि मैला कपड़ा रंगने के लिए दिया जाये तो पहले उसे धोवेगा। धुले हुए कपड़े पर ही रंग चढ़ना या चढ़ाया जाना सम्भव होता है। उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ-बूझ भी भोंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया हुआ श्रम भी सार्थक न रहेगा।
आत्मिक प्रगति के पथिक आमतौर से यही भूल करते रहते हैं और असफलता का दोष उस पुण्य प्रक्रिया को देते हैं जिसे सही ढंग से अपनाने वाले सदा कृतकृत्य होते हैं। वस्तुतः यह भूल पथिकों की नहीं उनके मार्ग-दर्शकों की है जिन्होंने बहुमूल्य महंगी वस्तु को सस्ती बताकर लोगों को आकर्षित करने भर का ध्यान रखा और यह भूल गये कि अभीष्ट प्रतिफल न मिलने पर जो निराशा और अविश्वास भरी प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी उसका क्या परिणाम होगा। सस्ते प्रलोभनों से भ्रमाया व्यक्ति आरम्भ में अति उत्साही हो सकता है पर उसकी निराशाजनक प्रतिक्रिया नास्तिकता के रूप में ही परिणत होकर रहेगी।
अध्यात्म तत्वज्ञान के मूल आधार से अपरिचित किन्तु उसकी ध्वजा उड़ाने वाले तथाकथित गुरु लोग औंधी सीधी पुस्तकें रचकर यह मिथ्या मान्यता फैलाते रहे हैं कि अमुक पूजा अर्चा करने से उन्हें पाप फल के दण्ड भुगतने की छूट मिल जायेगी। यह प्रतिपादन लोगों को बहुत ही आकर्षक लगता है। क्योंकि अनाचार अपनाने वाले प्रत्यक्षतः सदाचार परायण लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक भौतिक सुख सुविधायें प्राप्त कर लेते हैं। छल-छद्म का परिणाम अन्ततः बुरा ही क्यों न हो पर तत्काल तो उन हथकण्डों से लाभ मिल ही जाता है। पाप-पथ अपनाने वाले असुर-देवताओं से अधिक बलिष्ठ रहे हैं यह स्पष्ट है। पीछे भले ही उनकी दुर्गति हुई हो पर आरम्भिक लाभ तो उन्हें ही मिलता है। देवत्व प्राप्ति का आरम्भिक कार्य तप साधना की कष्टकर प्रक्रिया से आरम्भ होता है। लम्बी दूर तक उस मार्ग पर चलने के बाद ही देव पुरुष आनन्द उल्लास प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में तात्कालिक लाभ को प्रधानता देने वाले-अदूरदर्शी लोग कुमार्गगामिता के सहारे तुरन्त लाभान्वित होने की रीति-नीति अपनाते हैं, पर उन्हें यह खुटका बना रहता है कि कभी न कभी इन कुकर्मों का कष्टकारक प्रतिफल भोगना पड़ेगा।
इस चिन्ता से तथाकथित धर्म गुरुओं के रचे भोंडे फूहड़ ग्रन्थ मुक्ति दिला देते हैं। उनका कहना है अमुक माला जपने वाले या अमुक पूजा अर्चा करने वाले को पाप कर्मों के दण्ड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है। यह बहुत बड़ी बात है। यदि दण्ड का भय न रहे तो फिर पाप कर्मों द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों को छोड़ने को कोई कारण ही नहीं रह जाता। इस प्रकार उपरोक्त आश्वासनों पर विश्वास करने वाले यह मान बैठते हैं कि उनके पाप कट गये। अब वे कुकर्मों के दण्ड से पूर्णतया छुटकारा पा चुके। भूतकाल में किये हुये या भविष्य में किये जाने वाले पापों के दण्ड से वह देवता या मन्त्र बचा लेगा कि जिसे थोड़ा-सा जप, स्तवन, पूजन आदि करके या किसी दूसरे से कराके सहज ही बहकाया, फुसलाया और अनुकूल बनाया जा सकता है।
इस मिथ्या मान्यता का आज बहुत प्रचलन है। हर कोई इसी सस्ते नुस्खे को दुहराता है। मतवादी यही ढोल पीटते हैं कि हमारे सम्प्रदाय में भर्ती हो जाने पर हमारा खुदा सारे गुनाह माफ कर देगा। इस बहकावे में आये बाहर से बताते हुए ‘कर्मकाण्ड’ करते रहते हैं और भीतर से पाप कर्मों में निर्भय होकर प्रवृत्त रहते हैं। धर्म के नाम पर प्रस्तुत की गई मिथ्या मान्यताओं ने आज सर्वत्र यही स्थिति उत्पन्न कर दी है और सच्चा विश्लेषण करने पर पूजा-पाठ न करने वालों की अपेक्षा उस प्रक्रिया में निरत लोग अधिक अनैतिक और अवाँछनीय गतिविधियों में प्रवृत्त पाये जाते हैं। ऐसी स्थिति में आत्मिक प्रगति सर्वथा असम्भव है। जब साधना का प्रथम चरण ही पूरा नहीं किया गया तो उपासना का दूसरा चरण कैसे उठेगा। जब पहली मंजिल ही बन कर तैयार नहीं हुई तो भवन की दूसरी मंजिल बनाने की योजना कैसे पूर्ण होगी।
उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनसे सतर्कता पूर्वक विरत हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप-कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप-कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटबांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वन्द्व निश्चिन्त रह सकते हैं दैव दण्ड ही एक मात्र बंधन था सो इन धर्मध्वजियों ने उड़ा दिया। अब असुरता को स्वच्छंद रूप से फलने-फूलने और फैलने का पूरा-पूरा अवसर मिल गया। पाप कर्मों के दण्ड से मुक्ति दिलाने का आश्वासन पूजा-पाठ की कीमत पर जिनने भी दिया है उनने मानवीय आदर्शों और अध्यात्म के मूलभूत आधारों के साथ व्यभिचार किया है।
पाप और पुण्य का उचित और अनुचित का अन्तर उनका दंड पुरस्कार ही मानव-समाज के भौतिक मेरुदंड को सीधा रखे हुए है। यदि उसे ही तोड़ दिया जाय तो फिर व्यक्ति और समाज की आचार संहिता का ईश्वर ही रक्षक है। पूजा उपासना का प्रयोजन मनुष्य को ईश्वर- विश्वासी अर्थात् धर्म मर्यादाओं का पालन करने के लिए व्रत-बन्ध धारण किये रहने वाला है। यदि पूजा पाप-दंड से मुक्ति दिलाती है तो फिर यही कहना पड़ेगा कि वह नैतिक, मानवीय धार्मिक और आत्मिक मूलभूत आधारों को ही नष्ट करेगी। ऐसी दशा में यह पूजा वस्तुतः नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी, पिछले दिनों यही हुआ है यही बताया सिखाया गया है। कथा-वार्ताओं में हम यही सुनने पढ़ते हैं, गुरु लोगों के पास यही सबसे बड़ा आकर्षण अपने मंत्र के पक्ष में है। भोले लोग सस्ते मोल में परमदंड की बहुत बड़ी विपत्ति से बचने के लिए फंसते हैं और दुहरी हानि भुगतते हैं। ईश्वरीय अकाट्य नियम इतने सरल नहीं है कि तनिक सी पूजा से छुई-मुई होकर सूख जायें। वे अत्यन्त कठोर हैं। विश्व का कण-कण उनकी पकड़ में जकड़ा हुआ है। ईश्वर को कोई पूजे या गाली दे, विश्व-व्यवस्था कर्मफल की अपरिहार्य प्रक्रिया में तनिक भी ढील करने वाली नहीं है। ऐसी दशा में पूजा जिस प्रलोभन से की गई थी, ईश्वर की प्रसन्नता की जिस आधार पर आशा बाँधी गई थी, वह बालू के महल की तरह ढह जाता है।
उपासना की सफलता का एक मात्र कारण है आत्मिक प्रगति की पहली मंजिल ‘साधना’ की उपेक्षा। गुण-कर्म स्वभाव का परिष्कार साधना का मूलभूत उद्देश्य है। उसका स्वरूप है आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है। निराकार निर्विकार परमेश्वर की साकार प्रतिमा उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन के पंच विधि पूजा उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। इस देवार्पण के पीछे जीवन साधना की ओर इंगित करने वाला गहन तत्वज्ञान सन्निहित है। उसे यदि न समझा जाए और मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
उपासना की पूर्व भूमिका जीवन साधना से आरम्भ होती है। तपश्चर्या का प्रयोजन मनोभूमि पर छाये हुए कुसंस्कारों का निराकरण है। एक बार समझ लेना चाहिए कि साधना ‘सर्फ’ पाउडर है और उपासना ‘टिनोपाल’ कपड़े को जर्क-वर्क धुला हुआ बनाना हो तो दोनों का उपयोग करना चाहिए। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे उपेक्षित विस्मृत कर दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
आत्मिक प्रगति के लिए उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम क्रिया प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि की छह मंजिली इमारत बनानी ही चाहिए पर उससे पहले यम नियम का ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए। मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।
ओछी मनोभूमि के व्यक्ति यदि किसी प्रकार किसी तन्त्र-विधि से कुछ लाभ वरदान प्राप्त भी करलें तो भी वह अन्ततः उनके लिए विपत्ति ही सिद्ध होगी। आमाशय में अर्बुद और आंतों में व्रण से संत्रस्त रोगी यदि मिष्ठान पकवान खा भी लें उसके लिए वे बहुमूल्य और पौष्टिक होते हुए भी कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे। जबकि पेट से स्वस्थ सबल होने पर ज्वार, बाजरा भी पुष्टिकर सिद्ध होते हैं। रहस्यमय अनुष्ठान साधनों की मन्त्र प्रक्रिया एवं साधना विधि की गरिमा इन पंक्तियों में कम नहीं की जा रही है और न उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
अच्छी उपज लेने के लिए केवल अच्छा बीज ही पर्याप्त नहीं, अच्छी भूमि भी होनी चाहिए। पूजा विधान बीज है और साधक की मनोभूमि खेत। किसान भूमि जोतने, सींचने, संभालने में छह महीने लगाता है और बीज बोने में एक दिन। यदि अन्तःकरण निर्मल बना लिया जाय तो थोड़ा सा मंत्र साधन की शबरी जैसे अनजान साधकों को भी सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। इसके विपरीत कर्म-काण्ड में पारंगत कठोर प्रयत्न रत होने पर भी मिली हुई सफलता उल्टी विनाशकारी होती है। दूषित मनोवृत्ति बनाये रहने के कारण रावण, कुम्भ-करण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि को दुर्गति के गर्त में गिरना पड़ा। वह तप तथा वरदान उनके अहंकार और अनाचार को बढ़ाने में- सर्प को दूध पिलाने की तरह अनर्थ मूलक ही सिद्ध हुए।
उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है। वास्तविक लाभ न अपना हो सकता है और न दूसरों का।
अस्तु आत्मबल से संबंधित सिद्धियाँ और आत्म-कल्याण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने के लिए जो वस्तुतः निष्ठावान हों उन्हें अपने गुण-कर्म स्वभाव पर गहरी दृष्टि डालनी चाहिए और जहाँ कहीं छिद्र हों उन्हें बन्द करना चाहिए। फूटे हुए बर्तन में जल भरा नहीं रह सकता- छेद वाली नाव तैर नहीं सकती, दुर्बुद्धि और दुश्चरित्र व्यक्ति इन छिद्रों में अपना सारा उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसे छूँछ बनकर खाली हाथ रहना पड़ता है।
हर दिन नया जन्म हर रात नई मौत वाली साधना इस दृष्टि से अति उपयोगी सिद्ध होती है। प्रातःकाल उठते ही यह अनुभव करना कि अब से लेकर सोते समय तक के लिए ही आज का नया जन्म मिला है। इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है। इस आधार पर दिन भर की पूरी दिनचर्या निर्धारित कर ली जाय। समय जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक कण भी बर्बाद होने की उसमें गुंजाइश न रहे। एक भी अनाचार बन पड़ने की ढील न रखी जाय। निकृष्ट स्तर पर सोचने और हेय कर्म करने पर पूरा प्रतिबन्ध लगाया जाय। इस प्रकार नित्य कर्म से लेकर आजीविका उपार्जन तक संभाषण से लेकर कर्तृत्व तक जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। रात को सोते समय लेखा-जोखा लिया जाय कि आज उत्कृष्टता और निकृष्टता में से किस का उपार्जन ज्यादा हुआ। पाप अधिक बना या पुण्य। भूलें प्रबल रहीं या सतर्कता जीती। इस प्रकार आत्म निरीक्षण करने के उपरान्त दूसरे दिन और भी अधिक सतर्क रहने- और भी उत्तम दिनचर्या बनाने की तैयारी करते हुए निद्रा माता को मृत्यु समझ कर उसकी गोद में शान्ति-पूर्वक जाना चाहिए। यह क्रम निरन्तर जारी रखा जाय तो जीवन में क्रमशः अधिकाधिक पवित्रता का समावेश होता चला जाता है और तदनुरूप आत्मिक प्रगति तीव्र होती चली जाती है।
खलीफा हारुँ रसीद ने सन्त फलीज बिन अयाज की बड़ी प्रशंसा सुनी। वे उनसे मिलने गये। जैसा गुना था वैसा ही उन्हें पाया।
सत्संग का लाभ लेकर जब खलीफा चलने लगे तो उन्होंने भेंट स्वरूप एक हजार दीनार पेश किये।
सन्त फलीज ने मुसकराते हुए उन्हें लौटा दिया और कहा- मैंने आपको जन्नत में जाने की राह बताई बदले में आप मुझे दोजख जाने के लिए क्यों धकेलते हैं।
गुरुदेव की साधन सफलता के उनने दो कारण बताये एक अन्तः भूमिका का ऐसा परिमार्जन जिसमें दिव्य विभूतियों का अवतरण सम्भव हो सके तथा जहाँ वह स्थिर रूप से निवास कर सकें। दूसरा समर्थ मार्गदर्शक की उपलब्धि। इन दोनों उपलब्धियों को जो कोई भी प्राप्त कर लेगा वह उन्हीं की तरह आत्मिक प्रगति के पथ पर सुनिश्चित गति से सरलता और सफलता पूर्वक पहुँच सकेगा।
गुरु शिष्य की भूमिका को उन्होंने अध्यात्म मार्ग का सघन सहयोग बताया और अन्ध पंगु के समन्वय से नदी पार करने जैसी स्थिति बताया। जहाँ शिष्य समर्थ गुरु की सहायता से आगे बढ़ता है वहाँ गुरु भी अपने ऋण से उऋण होता है।
पारस्परिक सहयोग की अविच्छित प्रक्रिया ही विकास का ही नहीं आनन्द का भी आधार है। भौतिक जगत में पग पग पर इस तथ्य को अनुभव किया जा सकता है। परमाणु जिसे सबसे छोटी इकाई माना जाता है एकाकी नहीं वरन् न्यूट्रोन प्रोटोन आदि अपने सहयोगियों के आधार पर ही सृष्टि का क्रिया कलाप संचालित किये रह सकने में समर्थ होता है। आकाश में ग्रह नक्षत्र पारस्परिक आकर्षण में जकड़े रहने के कारण ही आकाश में अधर लटके हुए है। पंच तत्वों का सम्मिश्रण यदि न हो तो इस विश्व का अस्तित्व ही प्रकाश में न आये। हर कोई जानता है कि विवाह बन्धन के साथ कितने उत्तरदायित्व, बन्धन और कर्त्तव्य जुड़े हुए हैं। उन्हें निवाहते निवाहते आदमी का कचूमर निकल जाता है। नारी को प्रसव की विकट पीड़ा, शिशु पालन का कठिन-तम कार्य और पति तथा ससुराल वालों को प्रसन्न रखने में लगभग आत्म समर्पण जैसी तपस्या करनी पड़ती है। नर को भी कम भार वहन नहीं करना पड़ता। इन कठिनाइयों से परिचित होते हुए भी हर कोई विवाह की आशा लगाये बैठा रहता है और वैसा अवसर आते ही हर्षोल्लास अनुभव करता है। जिन दाम्पत्य जीवन में सघन आत्मीयता विकसित होती है उन्हें वह पारस्परिक सान्निध्य स्वर्गोपम प्रतीत होता है। अगणित कठिनाईयों को वहन करते हुए भी हर घड़ी आनन्द उमड़ता रहता है यह सब देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्तियों की आत्मिक घनिष्ठता कितनी तृप्ति और कितनी शाँति प्रदान करती है।
पति पत्नी का तो ऊपर उदाहरण मात्र दिया गया है। रिश्ते कुछ भी क्यों न हों- पुरुष पुरुष-और नारी नारी के बीच भी ऐसी आन्तरिक सघनता हो सकती है। उस मित्रता को किसी भी रिश्ते का नाम दिया जा सकता है और बिना रिश्ते के केवल आत्मीय माना जा सकता है। यही ‘प्रेम’ है। प्रकृति के अनुरूप व्यक्तियों से आरम्भ होकर यह मनुष्य समाज- प्राणि मात्र और तदनन्तर विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त जड़ चेतन में प्रेम फैलता विकसित होता चला जाता है। आनन्द का उद्भव और विस्तार यहीं से होता है। अन्तःकरण की कोमलता, मृदुलता, सरलता और सरसता ही वस्तुतः मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है, जो स्नेह सिक्त है, जो प्रेमी है, जो सहृदय और उदार है उसे ही आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न सिद्ध पुरुष कहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति ही महा मानव, देवदूत और दिव्य सत्ता सम्पन्न कहलाता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जिसे प्राप्त हो गया, समझना चाहिए कि उसने पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया। अभाव तो एकाकीपन में ही है।
अध्यात्म साधना के क्षेत्र में प्रगति करने के लिये भी यह सहयोग नितान्त आवश्यक है। राम और लक्ष्मण का युग्म ही लंका विजय में समर्थ हुआ है। महाभारत की सफलता कृष्ण और अर्जुन के मिलन ने सम्भव की थी। छात्र कितना ही परिश्रम करे बिना शिक्षक के मौखिक या लिखित ज्ञान दान के बिना उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकने में समर्थ नहीं होता। कला, शिल्प, विज्ञान, चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण विषयों के विद्यार्थी मात्र मौखिक ही नहीं क्रियात्मक व्यावहारिक शिक्षा भी प्राप्त करते हैं। इसके बिना वे अपने विषय में निष्णात पारंगत नहीं हो सकते।
गुरु और शिष्य मिलकर यही प्रयोजन करते हैं। कान में मन्त्र फूँक देना या कर्मकाण्ड विधि विधान बता देने से काम नहीं चल सकता। उन्हें अपनी शक्ति का एक अंश भी देना पड़ता है। इस अनुदान के बिना आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता। पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है। छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का अवलम्बन चाहिए। यही प्रयोजन आत्मिक प्रगति के पथ पर चलने वाले पथिक के लिए उसका मार्ग दर्शक-एवं साथी सहयोगी पूरी करता है। गुरु की आवश्यकता इसी प्रयोजन को पूर्ण करने के लिये पड़ती है।
माता के उदर में रखे बिना, अपना रक्त, माँस दिये बिना, दूध पिलाये और पालन किये बिना भ्रूण की जीवन प्रक्रिया गतिशील नहीं हो सकती। बालक भोजन, वस्त्र, आदि की सुविधायें स्वयं उपार्जित नहीं कर सकता उसे इसके लिये अभिभावकों की सहायता अभीष्ट होती है। छात्र अपने आप पढ़ सकता है पर उसे पुस्तक, फीस आदि का खर्च पिता से और शिक्षण सहयोग अध्यापक से प्राप्त करना पड़ता है इसके बिना उसका शिक्षा क्रम मात्र एकाकी पुरुषार्थ से नहीं चल सकता। माता-पिता अपनी सन्तान का पालन-पोषण करते हैं वे बच्चे बड़े हो जाने पर अपने बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी उठाते हैं। यही क्रमानुगत परम्परा चलती रहती है। अध्यात्म मार्ग की प्रगति प्रक्रिया भी इसी प्रकार चलती है। गुरु अपने शिष्य को अपनी तप पूँजी प्रदान करता है। तदुपराँत शिष्य भी उसे अपने लिये दाब कर नहीं बैठ जाता वरन् उस परम्परा को अग्रगामी रखते हुए अपने छात्रों की सहायता करता है।
यों धर्म के दस लक्षणों और यम नियम के दस योग आधारों का पालन करते हुए कोई भी व्यक्ति सहज सरल रीति-नीति से जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। न इसमें किसी गुरु की आवश्यकता है न शिष्य की। राजमार्ग पर सही पैरों से चल पड़ने वाला व्यक्ति-मील के पत्थरों को देखते गिनते यथा स्थान पहुँच सकता है पर जिसे उस यात्रा के समीपवर्ती अद्भुत स्थलों को देखना जानना और वहाँ मिलने वाली उपलब्धियों से लाभाँवित होना हो उसे उस क्षेत्र से परिचित और उपलब्ध हो सकने वाली वस्तुओं को देने दिलाने में कुशल किसी अनुभवी सहयोगी की आवश्यकता पड़ती है। यदि यह सुयोग न मिल सके तो फिर यात्रा चलती रहती है पर वह नीरस एवं अतिरिक्त उपलब्धियों से रहित एक गति शीलता मात्र ही रह जाती है। अध्यात्म पक्ष में प्रगति करते हुए- उस यात्रा से सम्बन्धित विभूतियों को प्राप्त करते हुए हर्षोल्लास का आनन्द लेते चलना हो तो फिर कुशल सहयोगी की सहायता अनिवार्य ही हो जायेगी। गुरु शिष्य का सम्मिलन सम्मिश्रण उसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।
मेडीकल कालेज में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में वह सब कुछ लिखा है जो वहाँ पढ़ाया जाता है अथवा
यदि जीवन में बुद्धिमानी की कोई बात है जो वह एकाग्रता है और यदि कोई खराब बात है तो वह है अपनी शक्तियों को बिखेर देना। बहुचित्तता कैसी भी हो, इससे क्या।
-इमर्सन
डॉक्टर बनने के लिये जो जानना चाहिए किन्तु सर्जरी में कोई छात्र तब तक निष्णात नहीं हो सकता जब तक कि उसे उस तरह की व्यावहारिक शिक्षा-कुशल सर्जन के तत्वावधान में न मिले। यों ऑपरेशन की सारी प्रणाली चित्रों सहित पुस्तकों में लिखी रहती है फिर भी प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन की आवश्यकता बनी ही रहती है। इंजीनियरिंग, कला, संगीत, युद्ध विद्या, रसायन आदि के बारे में भी यही बात है। ऊँची कक्षाओं की बात छोड़िये बाल कक्षा के बालकों के हाथ सचित्र बाल पोथी थमा देने पर भी वे अक्षर और अंक तब तक नहीं याद कर पाते जब तक कि अध्यापक का प्रत्यक्ष सहयोग उन्हें प्राप्त न हो। फिर आत्मिक प्रगति जैसे अप्रत्यक्ष अप्रचलित और दुरूह विषय का प्रशिक्षण तो एकाकी बन ही कैसे पड़ेगा?
श्रद्धा तत्व का विकास करते हुए आत्मिक प्रगति को तीव्र बनाने की दृष्टि से शिष्य का गुरु के प्रति श्रद्धावान और विनम्र होना उचित है। इससे अनुशासन, निष्ठा बनाये और क्रमबद्धता बनाये रहने में सुविधा होती है पर इसमें गुरु के लिये अहंकार करने, अपने को बड़ा मानने या अहसान जताने जैसी कोई बात नहीं है। यह एक क्रियागत प्रक्रिया है। अभिभावक अपनी सन्तान को सृष्टि के अनादि काल से पालते चले आ रहे हैं। प्रकृति से हर प्रजनन कर्म के साथ शिशु पालन की प्रवृत्ति भी जोड़कर रखी है। ऐसी दशा में कोई सन्तान पालन को परमार्थ क्यों माने? वह प्रकृति का स्वाभाविक क्रम है जिसे पालन किया ही जाना चाहिए। जो उसे पतित करेगा वह दोषी बनेगा। कोई प्रजनन में तत्पर रहे और फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली सन्तान के प्रति उपेक्षा क्रूरता बरते, उससे विमुख हो जाय तो सामाजिक, राजकीय और ईश्वरीय दण्ड का भागी बनेगा। यही बात गुरु शिष्य के बारे में भी है। जब किसी की सहायता से गुरु को भी कुछ मिला है तो उसे उस क्रम को आगे बढ़ाने के लिये दूसरों की- अपने छात्रों की सहायता पवित्र कर्त्तव्य मानकर करनी चाहिए। इसमें न अहसान जताने की आवश्यकता है न अहंकार करने की। सच तो यह है कि यदि कोई छिपाता है और अनुदान में आना कानी करता है तो वह अपनी महानता ही खो बैठता है। शिष्य अपनी पात्रता सिद्ध करे श्रद्धालु और अनुशासित रहे यह उसी के पक्ष में- उसी को लाभान्वित करने वाली अलग बात है।
रामकृष्ण परमहंस बनने के लिये जन्म जन्मान्तरों की कठोर साधना अभीष्ट है पर विवेकानन्द बनना सरल है। समुद्र बनना कठिन है पर उसका पानी लेकर आकाश में बादल की तरह उड़ने लगना सरल है। समर्थगुरु रामदास बनने के लिये जन्म की गति कठिन और तलवार की धार पर चलने जैसी साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाले बालक को विकसित हो जाना भी सरल है। पारसमणि बनना कठिन है पर लोहे पर उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व कर सकने वाली सत्ता बन सकना हर किसी का काम नहीं। पर एक दासी पुत्र का दिग्विजयी सम्राट बनकर सफल होना सरल है। बुद्ध जैसी प्रतिभाएं कभी-कभी ही-ईश्वरीय इच्छानुसार अवतरित होती हैं पर उनकी छाया से अशोक, आनन्द, अंगुलिमाल, आवकाली आदि असंख्य व्यक्ति लघुता की परिधि लांघते हुए महत्ता का वरण कर सकते हैं। गाँधी कभी-कभी ही उत्पन्न हो सकते हैं पर उनका अनुगमन करने वाले व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक नेता और ऐतिहासिक महापुरुषों की पंक्ति में अपनी गणना सहज ही करा सकते हैं।
आत्मिक प्रगति की उपलब्धियों-भौतिक प्रगति की तुलना में असंख्य गुनी सामर्थ्य सम्पन्न और हर्षोल्लासमय है। उन्हें प्राप्त कर सकना मानव जीवन की सबसे बड़ी और सबसे महान सफलता है। जो इस दिशा में बढ़ सका समझना चाहिए हर दृष्टि से कृतकृत्य हो गया। प्रचलित और प्रत्यक्ष मान्यतायें भौतिक सफलताओं को सर्वोपरि मानती हैं पर यदि विवेक युक्त दूरदृष्टि से विचार किया जाये तो प्रतीत होगा कि यह मान्यता सही नहीं है। आत्मबल सम्पन्न महामानवों का जीवन विश्लेषण करें- उनके द्वारा उपार्जित आन्तरिक आनन्द और बाह्य अनुदानों का मूल्याँकन करें तो प्रतीत होगा कि संसार का बड़े से बड़ा सुसम्पन्न व्यक्ति भी उस तुलना में अत्यन्त पिछड़ा हुआ है। सम्पन्नता के साथ जुड़े हुए मतिभ्रम और क्लेश, द्वेष दुर्भाव को भी समझा जाय तो प्रतीत होगा कि सम्पन्नता जन्य सुख मात्र दृष्टि भ्रम और कल्पना जञ्जाल भर है। सुखी बनने के लिए सम्पदाएं नहीं- विभूतियाँ आवश्यक हैं जो आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए भी प्राप्त की जा सकती हैं।
इस मार्ग पर चलने के इच्छुक साधक को अनुभवी और सही मार्ग दर्शक की आवश्यकता अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ती है। साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कोई विदूषक गुरु पद का प्रहसन रचे न बैठा हो और अपने साथ-साथ अनुगमन कर्त्ता को भी न डुबा रहा हो। सही मार्ग दर्शन की तलाश में निकले हुए आत्म पथ के पथिक को जहाँ श्रद्धालु होना चाहिए वहाँ सतर्क भी अन्यथा इस धूर्तता के युग में किसी अहेरी के जाल में फँसकर प्रगति तो दूर जो पास में था उसे भी गँवा बैठेगा।
गुरुदेव जीवन लक्ष्य की ओर जिस सुव्यवस्थित नीति से आगे बढ़ते चले गये उस पर दृष्टिपात करने से हमें इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँचना पड़ता है कि आत्मिक प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए एक ऐसे जीवन साथी की आवश्यकता है जो सामयिक आवश्यकता ही पूरी न करे वरन् अन्त तक साथ निभाने के लिए निष्ठावान और पथ प्रदर्शन के लिए सामर्थ्यवान हो। उन्हें ऐसे ही मार्ग दर्शक प्राप्त हुए फलतः कठिन यात्रा इतनी सार्थक और सफल हुई कि उनके साथी चकित रह जाते हैं।
यह सर्वविदित है कि 15 वर्ष की आयु में उन्हें एक समर्थ सिद्ध पुरुष का अनुग्रह प्राप्त हुआ था और वह अब तक यथावत् अनवरत एवं अविच्छिन्न रूप से यथावत् बना और बँधा चला आता है। ओछे व्यक्ति पग-पग पर मन डुलाते हैं, इसे छोड़ उधर पकड़ की उछल-कूद मचाते हैं पर स्थिर चित्त व्यक्ति किसी मार्ग को पकड़ते हैं तो बहुत सोच विचार कर, पर जब पकड़ लेते हैं तो उसे अन्त तक निभाते हैं। गुरुदेव के मार्ग दर्शक ने इस नव विकसित पुरुष की गहन श्रद्धा और अटल कर्मठता की गन्ध पाई और वे उसे सुविकसित करने के लिए टूट पड़े। श्रेय समर्थ अनुग्रह कर्त्ता मार्ग दर्शक को ही मिलना चाहिए पर प्रशंसनीय वह व्यक्तित्व भी है जिसने जन्म जन्मान्तरों से अपनी पात्रता विकसित करने की साधना की और अपने को इस योग्य बनाया कि कोई समर्थ देवदूत उसे प्रसन्नता पूर्वक अपना सके।
खोटे, ओछे, उथले और छिछोरे व्यक्ति भी महापुरुषों के आशीर्वाद का लाभ कभी-कभी प्राप्त कर लेते हैं पर वह तो ऐसा ही है जैसे किसी विवाह शादी के अवसर बच्चे कागज के खिलौने-फूल पट्टी लूटते जाते हैं। दुलहन के ऊपर निछावर में पैसे बिखेरे जाते हैं- फूल फेंके जाते हैं छोटे बालक उन्हें ले भागते हैं। यह कोई ठोस उपलब्धि नहीं हुई। कटी पतंग को लूट लेने में क्या पुरुषार्थ है माँग कर तो भिखारी भी पेट भर लेते हैं पर वह प्रशंसनीय थोड़े ही है। दर्शन करके अपनी दीनता प्रकट करके-और सेवा पूजा का प्रलोभन देकर कुछ प्राप्त करने की तरकीबें ओछे लोग निकालते रहते हैं। जो ईश्वर और आत्मा तक को देख सकता है ऐसा तत्व ज्ञानी इस बाल क्रीड़ा जैसे प्रहसन को न समझता हो ऐसी बात नहीं- फिर भी वे अपनी सहज उदारता से द्वार पर आये अतिथि देव का सत्कार करने की दृष्टि से उसे कुछ न कुछ देकर ही विदा करते हैं। इसमें महिमा दाता की है। गृहीता की नहीं। ग्रहण करने वाला वह प्रशंसनीय है जो अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का परिचय देकर समर्थ आत्माओं को विशिष्ट अनुकम्पा करने के लिये विवश करता है।
मात्र भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए नहीं- आत्म-कल्याण के लिए जो लालायित है उसे पात्र कहा जायेगा। जिसे अपना अन्तःकरण निर्मल निस्पृह और उत्कृष्ट बनाने में रुचि है वह सत्पात्र है और जिसने लोकेषणा, पुत्रेषणा, वित्तेषणा से विमुख होकर विश्व मानव के लिये अपने आपको समर्पित करने का संकल्प किया वह महापात्र है। पात्र को देवी सहायता मिलती है। सत्पात्र श्रेय और स्नेह प्राप्त करने का अधिकारी है पर महापात्र पर तो देव सत्ताएं अपने आपको निछावर ही कर देती हैं।
सुना है विक्रमादित्य के पास वेताल नाम की एक सहायिका दिव्य आत्मा थी और समय-समय पर उसके
श्रेय के लिए, मनुष्य को सब त्याग करना चाहिए।
कठिन प्रयोजन पूरे करती थी। सुना है अलादीन के पास जादुई चिराग था और उसके सहारे अनेक भूत-प्रेत उसकी सहायता करने तैयार रहते थे। हनुमान ने शक्ति राम से पाई थी और अर्जुन ने कृष्ण से। ऐसी ही शक्ति गुरुदेव ने अपने मार्ग दर्शक से प्राप्त की, अभी भी कर रहे हैं और जब तक ईश्वरीय प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता है तब तक करते भी रहेंगे। इसका कारण और कुछ नहीं केवल एक है वे अपने को पात्र, सत्पात्र और महापात्र बनाने में तत्पर रहें। गुरु की खोज उन्होंने कभी नहीं की। फूल जब भौंरे और मधु मक्खी, तितली तलाश करने नहीं जाता तो शिष्य ही गुरु की तलाश करने क्यों जाय? गुरुदेव अपने जिम्मे सौंपा हुआ काम करते रहते हैं। अपने मार्गदर्शक के पास भी तब जाते हैं-उतने दिन के लिए जाते हैं- जितने समय के लिए जब उन्हें पुकारा बुलाया जाता है। वे सदा यही कहते हैं पात्रता का विकास ही गुरु कृपा का ईश्वरीय अनुकम्पा का मूलभूत आधार है।
गुरुदेव जब कभी शान्ति कुञ्ज आया करेंगे, उस समय का उपयोग वे परिजनों में शक्ति का हस्तान्तरण करने के लिए किया करेंगे। विचार तो साहित्य के माध्यम से भी दूर-दूर तक पहुँच सकते हैं और मरने के बाद भी दूसरों को प्रभावित करते रह सकते हैं। विचार शक्ति से भी बढ़कर है- प्राण शक्ति। वह व्यक्ति के साथ ही जुड़ी रहती है और एक सीमित क्षेत्र में ही गरमी फैला सकती है और समीपवर्ती लोगों को भी लाभ पहुँचा सकती है। प्राण-शक्ति ऐसा ही तत्व है जो समीपता ही नहीं निकटता से भी संबंधित है। ऋषियों के आश्रयों में सिंह और गाय एक घाट पानी पीते हैं पर वहाँ से दूर जाकर वे फिर अपनी दुष्प्रवृत्तियों पर उतर आते हैं। गुरुदेव का हरिद्वार आगमन इसी प्रयोजन के लिए होगा।
स्वभावतः इसके लिए जनसंपर्क बनेगा। पर वह सीमित और परिष्कृत होगा। वैखरी वाणी का प्रयोग आवश्यक नहीं। मौन रह कर भी मध्यम या पश्यन्ति वाणियों का प्रयोग हो सकता है और उनमें से भी इतना ज्ञान, प्रकाश एवं बल मिल सकता है जितना महीनों और सालों के प्रवचनों से भी सम्भव नहीं। नारद जी कहीं पर भी ढाई घड़ी-एक घण्टा से अधिक नहीं ठहरते थे पर इतने में ही उतना अनुदान दे जाते थे कि ध्रुव, प्रह्लाद जैसे बालकों को बाल्मीक जैसे डाकुओं को काया-कल्प जैसी प्रेरणा मिल सके। बौद्धिक-विचार विनिमय के लिए घण्टों चाहिएं पर आत्मिक समाधान के लिए कुछ क्षण ही पर्याप्त हैं। इसी आधार पर जब कभी वे शान्ति कुञ्ज आवेंगे अपना अनुदान वितरण करेंगे। लम्बे सत्संग या परामर्श की उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। थोड़े में ही बहुत प्रयोजन पूरा हो जाय तो बहुमूल्य समय की बर्बादी क्यों हो?
स्वाभाविक है कि गुरुदेव के प्राण प्रिय लाखों परिजन उनके आगमन के अवसर पर मिलने के लिए आतुर हों और अनियन्त्रित रूप से बहुत बड़ी संख्या में चल पड़ें। ऐसी दशा में वह अव्यवस्था कुछ दिन पूर्व इलाहाबाद कुम्भ में सैंकड़ों व्यक्ति भीड़ के पैरों तले कुचल जाने जैसी गड़बड़ी उत्पन्न करेगी। गत 21 से 30 जून तक के दिन ऐसे ही बीते। किसी से भी ढंग की बात न हो सकी और गुरुदेव का प्रयोजन भी नष्ट हो गया। भविष्य में यह भूल कभी भी नहीं दुहराई जायेगी। मिलन दर्शन के लिए बहुत पहले से ही तिथि तथा समय की स्वीकृति प्राप्त करनी होगी। यहाँ आने पर भी वे प्रायः 20 घंटे अपनी एकान्त साधना में निरत रहेंगे। हर दिन एक सीमित समय ही संपर्क के लिए निर्धारित रहेगा। उतने में भी कई व्यक्ति मिलने होंगे। सम्भवतः हर व्यक्ति के हिस्से में अधिक से अधिक आधा घण्टा ही आवेगा। इतने से ही हर किसी को सन्तोष करना होगा। यों उनके प्रेम और अमृत तुल्य सान्निध्य से विरत रहने को किसी की इच्छा न होगी। प्रत्येक परिजन अधिक से अधिक समय किसी भी बहाने उनके साथ रहने में सुख अनुभव करेगा। पर अब उनके कंधों पर जो महान उत्तरदायित्व है उसे देखते हुए वैसी सम्भावना है नहीं।
साधारण तथा उनके निर्देशों पर चलना, उनके मस्तिष्क और हृदय के साथ जुड़े रहना ही सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त है पर यदि किन्हीं को कुछ विशेष प्रयोजन हो तो उसके लिए मुझे नाम और प्रयोजन नोट करा देना चाहिए। सुविधानुसार उन्हें बुला लिया जायेगा। जिन्हें वे स्वयं बुलाना चाहेंगे उन्हें स्वयं सूचना भेज दिया करूंगी शान्ति कुञ्ज में ठहरने की स्वल्प व्यवस्था और गुरुदेव का मिलन समय स्वल्प रहने के कारण इस प्रकार का प्रतिबन्ध अप्रिय लगते हुए भी अनिवार्य रूप से आवश्यक हो गया है। यह विवशता भरी लाचारी है। किसी की उपेक्षा अवज्ञा नहीं। तथ्य को न समझा गया और स्वयं ही अधिक समय मिलने का आग्रह किया गया तो इसका स्पष्ट अर्थ दूसरों को इस लाभ से वंचित करना ही होगा। मोह वश ऐसी आकुलता अवाँछनीय ही मानी जायेगी।
गुरुदेव को जो मिला है वह उनके मार्ग-दर्शक का अनुदान है। वह परम्परा आगे भी बढ़ाने का अवसर आ गया। गुरुदेव को अपनी उपार्जित विभूतियाँ दूसरों को देनी हैं। अन्यथा गुरु ऋण से मुक्ति कैसे मिलेगी? समर्थ आत्मवेत्ता का कर्तव्य कैसे पूरा होगा? अनुदान देने से पूर्व पात्रता की परख नितान्त आवश्यक है। याचना बात अलग है पात्रता अलग। याचक के बहुत विनय करने पर भी स्वल्प सा मिलता है किन्तु पात्रता के ऊपर बहुत कुछ निछावर करने के लिए देवताओं को भी उलटी मनुहार करनी पड़ती है। अपने लिए नहीं- दूसरों के लिए। जो सोचते और चाहते हैं वे अध्यात्म क्षेत्र में सत्पात्र गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की दीपक लेकर खोज की जाती रहती है। वे सिद्ध पुरुषों के पास नहीं जाते। दिव्य-शक्तियाँ उन्हीं का द्वार खटखटाती हैं। गुरुदेव का द्वार ऐसी ही एक दिव्य शक्ति ने खटखटाया था। अब उनकी बारी है वे ऐसे ही सत्पात्रों के द्वार-द्वार पर उनकी मनुहार करते हुए फिरते हुए- दृष्टि गोचर होंगे।
शान्ति कुञ्ज में बुलाकर जिन्हें वे परामर्श अनुदान दिया करेंगे उनमें ऐसे ही लोगों की संख्या प्रधान रूप से होगी। यों उनका यह क्रम सूक्ष्म शरीर से ही चलता रहता पर कभी कुछ अतिरिक्त प्रकाश देना अभीष्ट होगा तो उसके लिए उन्हें बुलाना भी पड़ेगा। अब वे लम्बी बातें किसी से नहीं करेंगे, न विचार-विनिमय न शंका समाधान। केवल उस प्रकाश की चिनगारियाँ देंगे जिसके प्रकाश में समस्याओं को सुलझाया जाना, शंकाओं का समाधान और दुर्बलताओं का निराकरण स्वयंमेव हो सके। ऐसे प्रशिक्षण की प्रक्रिया उनने समाप्त कर ली। वाणी से जितना कहना आवश्यक था कह चुके हैं। भाषण बहुत हो गये। विचार गोष्ठियाँ और शंका समाधान में उनने कुछ कमी नहीं रखी है। लिखना भी कम नहीं हुआ, उनके विनिर्मित ग्रन्थ उनके शरीर से अधिक भारी हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर अखण्ड-ज्योति के माध्यम से निकट भविष्य में निकलते रहने वाले लेख अभी वर्षों के लिए पहले से ही लिखे रखे हैं। अब वे अपना अनुभव लिखने के लिए ही आवश्यकतानुसार लेखनी उठाया करेंगे और प्रेरणायें अन्तःकरणों में उतारने के लिए ही वाणी का उपयोग किया करेंगे। पिछले दिनों जो किया जाता रहा है उसे ही आगे भी दुहराते रहना- पिसे को पीसने के बराबर है। उस प्रचार कार्य को करते रहने के लिए उन्होंने हजारों वक्ता, हजारों लेखक, हजारों प्रचारक और हजारों संगठन कर्त्ता खड़े कर दिये हैं, वे स्वयं भी अब क्यों उसी पृष्ठ पोषण में लगे रहें?
प्रशिक्षण की प्रक्रिया जितनी उनके कंधों पर रखी गई थी वह पूरी कर ली। अब ‘प्रत्यावर्तन’ का क्रम शेष है। अगले दिनों उसी को पूरा करेंगे। प्रशिक्षण उसे कहते हैं जो कान या आँख के माध्यम से ग्रहण किया जाता है और मस्तिष्क जिससे प्रभाव ग्रहण करता है। उसे विचार विनिमय भी कह सकते हैं। प्रत्यावर्तन इससे कहीं ऊँची चीज है। वह अन्तःकरण से दी जाती है और सीधी अन्तःकरण में प्रवेश करती है। इसके लिए लेखनी या वाणी का प्रयोग नहीं करना पड़ता और कानों को, नेत्रों को उसे ग्रहण करने का कष्ट उठाना पड़ता है। पत्र-व्यवहार की भी इस स्तर पर पहुँचने के बाद आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रत्यावर्तन वस्तुतः अपनी शक्ति को दूसरे में सीधे प्रविष्ट करा देने की प्रक्रिया है।
डॉक्टर इन्जेक्शन लगाते हैं। और मुख से औषधि खाने, पेट में पचाने के उपरान्त रक्त में मिलने की लम्बी प्रक्रिया को सरल कर देते हैं। इंजेक्शन द्वारा प्रवेश की गई दवा क्षण भर में समस्त शरीर की नस नाड़ियों में फैलती और रक्त में मिलती है। इसे चिकित्सा क्षेत्र का प्रत्यावर्तन कह सकते हैं। किसी दुर्बल रोगी को बाहर का रक्त देना पड़ता है इसे भी उसे संज्ञा में गिन सकते हैं। गर्भाधान क्रिया भी इसी श्रेणी में आती है। कोई धनी अपना धन किसी को देकर उसे भी अपने समान ही धनवान बना सकता है यह सम्पत्ति परक प्रत्यावर्तन है। अपनी उपलब्धियाँ दूसरों को हस्तान्तरित की जा सकती हैं। विवेकानन्द, शिवाजी, चन्द्रगुप्त आदि कितने ही महापुरुष इसी प्रकार का लाभ प्राप्त करके आगे बढ़े हैं, स्वयं गुरुदेव की कथा भी ठीक ऐसी ही है, उनकी जीवन साधना और नैष्ठिक उपासना सराहनीय है पर उसका जितना प्रतिफल हो सकता था उससे सहस्रों गुना अनुदान प्रत्यावर्तन के रूप में मिला है यह भी सर्वथा सत्य है।
अधिकतर लोगों के लिए स्वल्प कालीन मौन सत्संग ही निकटवर्ती सान्निध्य ही इतना पर्याप्त होगा कि उसे पचाने में बहुत समय लगेगा। गुरुदेव के मार्ग-दर्शक ने उन्हें पिछले अज्ञातवास के समय केवल चार दिन अपने पास रखा। इसके बाद अभ्यास के लिए अन्यत्र भेज दिया, इस बार भी वह सामीप्य चार दिन का ही था। इसके बाद उन्हें अन्यत्र रहना पड़ा। दो बार में चार-चार दिन का अवसर मिला कुल आठ दिन का। अभी एक दिन और बाकी है। माता नौ मास पेट में रखती है गुरु यदि सच्चा गुरु हो तो उसके उदर में नौ दिन रहने से ही जीवन का काया-कल्प हो सकता है। एक दिन ही और गुरुदेव को अपने मार्ग दर्शक का सान्निध्य मिलना शेष है। इतनी अवधि में ही वे अपना प्रत्यावर्तन प्रयोजन पूरा कर लेंगे। इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि समर्थ समीपता अधिक लम्बी हो यह आवश्यक नहीं थोड़े समय में भी बहुत प्रयोजन पूरा हो सकता है।
गुरुदेव कुछ ऐसा भी संकेत कर रहे थे कि कुछ लोगों को तीन या पाँच दिन के लिए अपने समीप रखना होगा। समीप से मतलब शान्ति कुञ्ज की इमारत में एकान्त साधना के लिए निवास। साधना का स्वरूप होगा- एकान्त सेवन-एकाकी निवास-मौन-मस्तिष्क विचार रहित-शरीर क्रिया रहित। शल्य क्रिया के समय रोगी को निःचेष्ट रहना पड़ता है। उसे हिलने डुलने नहीं दिया जाता। यह प्रत्यावर्तन साधना क्रम भी लगभग उसी स्तर का होगा। दुर्बल रोगी के शरीर में जिस प्रकार नस में ग्लूकोस या नया रक्त प्रवेश करके उसे सामर्थ्य प्रदान की जाती है उसी प्रकार का यह साधना उपचार भी होगा।
सामान्य संपर्क सान्निध्य में आधा घन्टा से अधिक अवसर किसी को नहीं मिलेगा। समय पर जोर देना व्यर्थ है। महत्ता समय की नहीं वस्तु की उत्कृष्टता की है। एक एक पैसा करके एक महीने भर तक निरन्तर देते रहा जाय तो मुश्किल से हजार रुपये दिये जा सकेंगे। इसके विपरीत पाँच मिनट में भी दस लाख का चैक दिया जा सकता है। समय का आग्रह नहीं किया जाना चाहिए। अनुदान की उत्कृष्टता परखी जानी चाहिए।
जिन्हें अधिक समय साधना करनी है उन्हें तीन दिन उस मिट्टी की तरह बने रहना होगा जिस पर पानी बरसता रहता है और वह उसे पीकर गीली होती रहती है। एक दो दिन हरिद्वार ऋषिकेश आदि घूमने फिरने को मिलें और तीन दिन साधना रत रहना पड़े तो वे पाँच दिन पर्याप्त होंगे। बालक नचिकेता आचार्य यम के दरवाजे पर तीन दिन भूखा पड़ा रहा था और पंचाग्नि विद्यायें सीखकर आया था। इस साधना में किसी के शरीर को भूखा नहीं रखा जायेगा। जो मुझसे बन पड़ेगा अपने हाथों बनाकर खिलाया करूंगी। पर आत्मिक क्षुधा जागृत ही रखनी चाहिए। आत्म-कल्याण की उत्कृष्ट अभिलाषा न हो तो कुछ काम बनने वाला नहीं है। नचिकेता जैसी पेट की नहीं आत्मिक क्षुधा लेकर जो आयेंगे वे उपरोक्त साधना से तृप्त होकर जायेंगे।
यह साधना क्रम कब चलेगा कितने लोग एक साथ उसमें भाग ले सकेंगे अभी इसकी स्पष्ट रूप रेखा उनने नहीं बताई। इस विषय का स्पष्टीकरण अभी अनुपलब्ध है। संभवतः वह छपेगा भी नहीं। व्यक्तिगत सूचनाओं का आदान-प्रदान ही उस साधना संदर्भ का माध्यम रहेगा।
स्वल्प सान्निध्य की अथवा तीन पाँच दिन वाली साधना प्रक्रिया के साथ एक और भी अति महत्वपूर्ण प्रकरण जुड़ा हुआ है। वह है- इस जीवन में जानबूझ कर हुए पापों का प्रायश्चित पूर्व जन्मों के संग्रहीत पाप जो प्रारब्ध बन चुके उन्हें सरलता पूर्वक भोगा जा सके ऐसा मार्ग निकाला जायेगा और इस जन्म में बन पड़े दुष्कृत्यों का प्रायश्चित द्वारा निराकरण किया जायेगा।
कहा जा चुका है कि कर्मफल अनिवार्य है। वे न क्षमा माँगने से छूटते हैं और न किसी मन्त्र-तन्त्र से इनकी निवृत्ति सम्भव है। बालि को छिपकर मारने का कर्मफल भगवान् राम को कृष्ण जन्म में भुगतना पड़ा। बालि ने बहेलिया बनकर उनके पैर में तीर मारा और प्राण हरण किया, श्रवण कुमार को तीर मारने के फलस्वरूप दशरथ जी को उसी तरह पुत्र शोक में बिलख-बिलख कर मरना पड़ा। पुत्र होते हुए भी भगवान राम अपने पिता का वह कर्मफल भोग मिटा न सके। भारतीय धर्म शास्त्रों में सर्वत्र पाप के फल से बचने के लिए ‘प्रायश्चित्य’ विधान का वर्णन किया है। ईश्वरीय विधान द्वारा दण्ड मिले इससे अच्छा यही है कि साहस पूर्वक अपनी भूल को प्रकट करके उसके लिए निर्धारित दण्ड भुगत लें। दूसरों को क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति समाज में सत्प्रवृत्तियों को बढ़ा कर की जा सकती है। पापों की तुलना में पुण्य का पलड़ा बराबर करके भी उद्धार पाया जा सकता है। भगवान् परशुराम ने अत्याचारी राजाओं के शिर काट दिये तो उन्हें प्रायश्चित करना पड़ा कि जितनी हत्यायें की हों उतने ही उद्यान लगायें। वे वध प्रक्रिया की अपेक्षा हजार गुने समय तक- उस सृजन काल में संलग्न रह कर पाप का प्रायश्चित करते रहें।
आत्म शोधन के लिए जहाँ भावी जीवन की गतिविधियाँ शुद्ध करने की आवश्यकता है वहाँ भूतकाल में हुई भूलों के लिए प्रायश्चित करना भी आवश्यक है। इस अन्तःशुद्धि की प्रक्रिया को अपनाये बिना साधना का समुचित लाभ न मिल सकेगा। अस्तु इसी अवधि में आत्म लाभ के लिये आने वाले आगंतुकों से उनके इस जन्म की भूलें सुनकर तदनुरूप प्रायश्चित भी बता दिया जायेगा। जीवन-मुक्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक है। क्योंकि पिछले जन्मों के कर्म इस जन्म में प्रारब्ध बन कर भुगतने पड़े और जन्म लेना पड़ा। यदि इस जन्म के पाप यथावत बने रहे उनका प्रायश्चित निराकरण न हुआ तो अगले जन्म के लिए वे प्रारब्ध बन जायेंगे। और उन्हें भुगतने के लिए न जाने किस स्थिति का जन्म लेना पड़ेगा, यदि इस स्थिति में अनुपयुक्त वातावरण मिला तो फिर अधःपतन का पथ और भी प्रशस्त होता जायेगा और क्रमशः अधिक पतित स्थिति के गर्त में गिरना पड़ेगा। इस विपत्ति से बचने के लिए यही उपयुक्त है कि इन्हीं दिनों इस जन्म के पापों का प्रायश्चित करके भविष्य के लिए निश्चिन्त हो जाया जाय। जन्म मरण के बन्धनों से मुक्ति पाने के लिए ही नहीं- साधना का रंग पवित्र अन्तःकरण ही बढ़ सकने वाली बात को ध्यान में रखते हुए भी यह किया जाना नितान्त आवश्यक है। यह भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए कि तप साधना का प्रयोजन जहाँ आत्म-शक्ति का विकास करना है वहाँ पापों का प्रायश्चित भी है। इसे अलग रख कर केवल पूजा उपासना भर से किसी बड़ी आत्मिक सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
गुरुदेव द्वारा मिले संकेतों से प्रतीत होता है कि वे आत्मबल संग्रह करने और आत्म-कल्याण के लिए ऊँचे हृदय से इच्छुक परिजनों को शान्ति कुञ्ज आने का अवसर देंगे और उन्हें स्वल्प कालीन सान्निध्य अथवा पाँच दिवसीय प्रत्यावर्तन साधना का लाभ देंगे, उसी के साथ प्रायश्चित द्वारा आत्म शोधन की तप साधना का निर्धारण भी जुड़ा हुआ होगा।
सन्त दाऊद को बाप की विरासत में तीस दीनार मिले। उन्होंने उसी से जिन्दगी के तीस वर्ष काटे और उतने से ही अपना खर्च चलाया। लोगों ने सहायता करनी चाही तो उन्होंने सदा इनकार किया और कहा- गुजारे के लिए जो मिला हुआ मौजूद है तो ज्यादा की हविस क्यों करूं?
वे सत्तू घोल कर पीते थे। किसी ने पूछा- रोटी क्यों नहीं बना लेते? जवाब दिया जितनी देर में रोटी बनाऊँ उतनी देर में पचास आयतों का पाठ क्यों न करूं?
पीने का पानी धूप में रखा था। किसी ने कहा-इसे छाया में क्यों नहीं रख लेते। दाऊद ने कहा-इतनी सुविधा के लिए भगवान् के लिए लगने वाला समय अपने लिये खर्च करूं?
मानव जीवन में अध्ययन तत्वज्ञान का समावेश कैसे किया जाय इस विषय पर चर्चा करते हुए एक दिन गुरु देव ने निम्न तथ्यों पर प्रकाश डाला-
हर कोई जानता है कि शरीर अनेक सुख सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा रसास्वादन और कर्मेन्द्रियों के द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही साँसारिक हर्षोल्लास प्राप्त करने का माध्यम है। इसलिए उसे स्वस्थ, सुन्दर, सुसज्जित, एवं समुन्नत स्थिति में रखा जाना चाहिए। इस तथ्य से सभी अवगत हैं अस्तु सभी यह अपनी अपनी सुविधा और समझ के अनुसार प्रयत्न करते है कि शरीर की साज संभाल में कुछ उठा न रखा जाय। उत्तम आहार विहार इसी दृष्टि से जुटाया जाता है। तनिक सा रोग कष्ट होते ही चिकित्सा की सहायता ली जाती है। स्पष्ट है कि यदि शरीर दुर्बल रुग्ण एवं मलीन रखा जायगा तो भौतिक जीवन का सारा आनन्द ही चला जायेगा।
शरीर की ज्योति ही मस्तिष्क की उपयोगिता है। आत्मा की चेतना और शरीर की गतिशीलता का भौतिक व आत्मिक समन्वय का प्रतीक है यह मन मस्तिष्क। इसकी अपनी उपयोगिता है। मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय, चित्त की आकाँक्षा और अहंता की प्रवृत्ति इन चारों से मिलकर अन्तः करण चतुष्टय बना है। यह चिन्तन संस्थान मस्तिष्क गह्वर के कलेवर में आबद्ध है यों उसका नियन्त्रण और क्रिया कलाप समस्त शरीर के अंग प्रत्यंगों में देखा जा सकता है।
सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, दीक्षा द्वारा मस्तिष्क को विकसित एवं परिष्कृत करने के लिए हमारी चेष्टा निरन्तर रहती है क्योंकि भौतिक जगत में उच्चस्तरीय विकास एवं आनन्द उसी के माध्यम से संभव है। सुशिक्षित व्यक्ति ही नेता, कलाकार, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, शिल्पी, वैज्ञानिक, साहित्यकार, ज्ञानी, व्यवसायी आदि सम्मानित पद प्राप्त कर सकते हैं। सभ्य और संस्कृत समझे जा सकते हैं। अशिक्षित एवं मस्तिष्कीय दृष्टि से अविकसित व्यक्ति आजीवन हेय स्थिति में पड़े रहते हैं उन्हें प्रगति की घुड़ दौड़ में पिछड़ा हुआ ही पड़े रहना होता है। इस तथ्य को समझने के कारण हर कोई अपने ढंग से ज्ञान वृद्धि का मानसिक विकास का प्रयत्न करता है।
शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिक आहार की- सुसज्जा साधनों की- व्यायाम विनियोग की चिकित्सा की- विनोद आनन्द की अगणित व्यथाएं की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कालेज, प्रशिक्षण केन्द्र, गोष्ठियाँ सभाएं विद्यमान हैं पुस्तकें, पत्रिकाएं, रेडियो फिल्म, कलाकृतियाँ, संग्रहालय आदि न जाने कितने उपकरणों का सृजन किया गया है कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े और विनोद आनन्द की अधिक मात्रा उपलब्ध हो सके। देखते हैं कि मानवीय चिन्तन और कर्तृत्व का अधिकाँश भाग उपरोक्त दो प्रयोजनों की पूर्ति में ही नियोजित है। आदमी जो सोचता है जो करता है उसके पीछे शारीरिक और मानसिक लाभ ही प्रधान होते हैं। सामाजिक कर्तृत्व उन दिनों की सुविधा के लिए ही वहन किये जाते हैं। गृहस्थ जीवन में प्रवेश, विवाह, संतानोत्पादन, परिवार व्यवस्था, आजीविका, मैत्री, यशोपार्जन, पद, नेतृत्व आदि जनसंपर्क एवं समाज सम्बन्ध के लिए मनुष्य शरीर और मन की सुविधा को ध्यान में रख कर ही प्रवृत्त होता है। यही सब तो हम अपने चारों ओर होता हुआ देखते हैं। इसके अतिरिक्त और कुछ कहीं है ही नहीं, ऐसा लगता है। प्रगति की परिभाषा इन्हीं क्षेत्र में हो रहे विकास तक सीमा बद्ध है। कारण कि जीवन का प्रत्यक्ष भाग इतना ही है। मनुष्य का स्थूल कलेवर शरीर और मन के रूप में ही जाना समझा जा सकता है। सो उन्हीं के लिए सुविधा साधन जुटाने में हर कोई जुटा है। यह उचित भी है। इस जगत के जड़ साधनों और चेतन हलचलों को यदि मानवी सुविधा एवं सन्तोष के लिए नियोजित किया जाता है और उसके लिए उत्साह वर्धक प्रयास जुटाया जाता है तो इसमें अनुचित भी क्या है?
मनुष्य द्वारा जो कुछ किया जा रहा है- संसार में जो हो रहा है, उसे स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए। यहाँ उसकी निन्दा प्रशंसा नहीं की जा रही। ध्यान उस तथ्य की ओर आकर्षित किया जा रहा है जो एक प्रकार से भुला ही दिया गया। समझ यह लिया गया है कि मनुष्य जो कुछ है वह शरीर और मन तक ही सीमित है। इससे आगे इससे ऊपर और कोई हस्ती नहीं। यदि इससे आगे ऊपर भी कुछ समझा गया होता तो उसके लिए भी जीवन क्रम में वैसा ही स्थान मिलता वैसा ही प्रयास होता जैसा शरीर और मन के लिए होता है। पर हम देखते हैं वह तीसरी सत्ता जो इन दोनों से लाखों करोड़ों गुनी अधिक महत्वपूर्ण है, एक प्रकार से उपेक्षित विस्मृत ही पड़ी है। और वह लाभ और आनन्द जो अत्यन्त सुखद एवं समर्थ है एक प्रकार से अनुपलब्ध ही रह रहा है।
रोज ही यह कहा और सुना जाता है कि हम शरीर और मन से ऊपर ‘आत्मा’ हैं सत्संग और स्वाध्याय के नाम पर यह प्रतिपादन आये दिन आँखों और कानों के पर्दों पर टकराते हैं पर वह सब एक ऐसी विडम्बना बन कर रह जाता है जो मानों कहने सुनने और पढ़ने लिखने के लिए खड़ी की गई है। यदि ऐसा न होता ‘आत्मा’ को सचमुच ही महत्वपूर्ण माना गया होता, कम से कम शरीर मन जितने स्तर का समझा गया होता तो उसके लिये उतना श्रम एवं चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता जितना कायिक मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।
यथार्थता यह है कि आत्मा के सम्बन्ध में बढ़−चढ़ कर बातें कहने सुनने में प्रवीण होने पर भी उस संबंध में एक प्रकार से अपरिचित ही बने हुए हैं यदि ऐसा न होता दिनचर्या में आत्मिक उन्नति के लिए कुछ स्थान नियत रहा होता। श्रम और मनोयोग में उसके लिए भी जगह होती उपलब्धियों को जिन कार्यों में नियोजित किया जाता है- धन को जिन प्रयोजनों के लिए खर्च किया जाता है उनमें एक मद आत्म विकास के लिए भी रखी गई होती। पर देखा यह जाता है कि उन संबन्ध में सर्वत्र घोर उपेक्षा ही संव्याप्त है। जो कुछ होता भी है उसे विदूषकों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले प्रहसनों की ही संज्ञा दी जा सकती है।
आत्मा की बात जो कुछ अधिक ध्यान से सुनते हैं वे अधिक से अधिक इतना कर लेते हैं कि थोड़ी ईश्वर प्रार्थना या पूजा परक कर्मकाण्डों की उलटी पुलटी प्रक्रिया को उथले मन से उलट पुलट लें। उतने से ही उस प्रयोजन की पूर्ति और कर्त्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। यह देखा नहीं जाता कि जब शरीर को सजीव और समर्थ रखने के लिए इतना श्रम करना पड़ता है- जब मन मस्तिष्क के परिष्कार में इतनी तत्परता बरतनी पड़ी है तो आत्मा जैसे महान तत्व की आवश्यकता पूर्ति एवं प्रगति की व्यवस्था इतने स्वल्प साधनों से कैसे हो सकती है? अनावश्यक और महत्वहीन समझा जाने वाला पथ ही उपेक्षित रहता है इस दृष्टि से यदि कहा जाय कि हम आत्मा के स्वरूप और महत्व से अपरिचित हैं तो कुछ अत्युक्ति न होगी इन अपरिचितों में पूजा पाठ करने और न करने वाले लोग समान रूप से सम्मिलित हैं। इसे अपने आपके साथ एक निर्मम उपहास ही कहना चाहिए कि हम अपने अस्तित्व को ही भूल गये हैं उसकी गरिमा उपयोगिता से नाता ही तोड़ बैठे हैं।
थोड़ी गहराई से यदि विचार किया गया होता तो प्रतीत होता कि शरीर से बढ़कर मन और मन से बढ़कर आत्मा है। इन दोनों का सम्मिश्रण ही हम हैं। शरीर श्रम का उपार्जन सीमित और स्वल्प है पर परिष्कृत मस्तिष्क तो असीम कमाई कर सकता है। शरीर का एक अंग नष्ट हो जाये तो भी काम चलता रह सकता है पर मस्तिष्क का एक पेंच भी ढीला हो जाय पागलपन तनिक सा भी झलकने लगे तो आदमी अपने लिए और दूसरों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है सुन्दर और स्वस्थ शरीर वाला जितना यशस्वी होता है ज्ञान बान उससे असंख्य गुना और चिरस्थायी सम्मान प्राप्त करता है। इस खुले रहस्य को हर कोई जानता है। यदि शत्रु का सिर पर लाठी प्रहार हो तो हाथ अनायास ही ऊपर उठ जाते हैं और चोट अपने ऊपर लेकर मस्तिष्क को बचाने का प्रयत्न करते हैं। हमारी अन्तः चेतना जानती है कि हाथों का टूटना और शिर का टूटना इन दोनों में किसका महत्व ज्यादा है।
इस संदर्भ में एक कदम और आगे बढ़ने पर पता चल सकता है कि आत्मा का स्थान शरीर और मन से कम नहीं वरन् कहीं अधिक है। सच पूछा जाय तो मनुष्य का अस्तित्व आत्मा ही है। शरीर और मन उसके परिधान, वाहन, उपकरण मात्र हैं। शरीर के रुग्ण और मस्तिष्क के विकृत होने पर भी जीवन बना रह सकता है पर आत्मा के प्रयाण करने के बाद काय कलेवर की कुछ उपयोगिता नहीं रह जाती। उस मरी लाश को सड़न और दुर्गन्ध से बचाने के लिये जल्दी से जल्दी ठिकाने लगाने का प्रबन्ध किया जाता है। शरीर मरते रहते हैं- मन बदलते रहते हैं पर आत्मा अनादि काल से अनन्त काल तक एक रस ही बना रहता है। हम वस्तुतः वही अविनाशी आत्मा हैं। आत्मस्वरूप को भूल कर- अपने को शरीर और मन समझा जाने लगा है। जिस प्रयोजन के लिए यह दोनों उपकरण मिले हैं उस तथ्य को विस्मृत कर दिया गया है और यह मानकर चला जा रहा है कि शरीर एवं मन तक ही हमारी सत्ता सीमित है और उन्हीं के लिये सुख-साधन जुटाने में निरत रहना है। इसी उपहासास्पद अज्ञान का नाम ‘माया’ है। इस भटकाव में पड़ा हुआ प्राणी अपना लक्ष्य भूल जाता है और उन लाभों-आनन्दों एवं उपलब्धियों से वञ्चित रह जाता है जो ‘आत्म बोध’ होने की स्थिति में प्राप्त हो सकते थे।
शरीर बल का अपना स्थान है और बुद्धि बल का अपना महत्व, पर इन दोनों की तुलना में करोड़ गुना अधिक महत्वपूर्ण है आत्मबल। जड़ पञ्च तत्वों से बने इस कलेवर का मूल्य नगण्य है। बुढ़ापा, बीमारी और मौत इस कलेवर को पानी के बुलबुले की तरह गला देता है। समुद्र की लहरों की तरह वह उठता है और नष्ट होता रहता है। वस्त्रों की तरह वह जल्दी जल्दी फटता और जीर्ण होता रहता है। घिसे हुए औजार की तरह बार-बार उसे बदलना होता है। ऐसे कलेवर की सुसज्जा को ही लक्ष्य बना लिया जाय और आत्मोत्कर्ष के-आत्म-कल्याण के- आत्मानन्द के उद्देश्य को विस्मृत कर दिया जाय तो वह बुद्धिमान कहे जाने वाले मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता ही होगी। खेद इसी बात का है कि लगभग समस्त मानव समाज इस आत्म प्रवञ्चना में सम्मोहित हुआ- मूर्छित बना पड़ा है।
दूरदर्शिता का तकाजा यह है कि हम अपने स्वरूप और जीवन के प्रयोजन को समझें। शरीर और मन रूपी उपकरणों का उपयोग जानें और उन प्रयोजनों में तत्पर रहें जिनके लिए प्राणि जगत का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर- सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है। उसकी मूल प्रवृत्तियाँ वही हैं जो ईश्वर की। परमात्मा परम पवित्र है। श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। उसका समस्त क्रिया कलाप लोक मंगल के लिए है। वह लेने की आकाँक्षा से दूर- देने की-प्रेम की-उदात्त भावना से परिपूर्ण है। आत्मा को इसी स्तर का होना चाहिए और उसके क्रिया कलापों में उसी प्रकार की गतिविधियों का समावेश होना चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित और समुन्नत बनाने में सहयोगी की तरह योगदान करने के लिये मानव प्राणी को अपने प्रतिनिधि के रूप में सृजा है उसका चिन्तन और कर्त्तव्य इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिए। यही है आत्मबोध यही है आत्मिक जीवन क्रम। इसी को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।
यह सर्वथा अवाँछनीय है कि हम अपने को शरीर एवं मन मान बैठें और इन्हीं की सुख-सुविधा और मर्जी जुटाने के लिए अनुचित मार्ग तक अपनाने में न हिचकें। पेट और प्रजनन में प्रवृत्त पशु जीवन ही हो सकता है। वासना और तृष्णा की पूर्ति, ललक लिप्सा में डूबा हुआ मनुष्य असुर ही कहा जायेगा। जिसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं, उसे मोहान्ध और जिसे लक्ष्य में रुचि नहीं उसे विक्षिप्त नहीं तो और कहा जाय? हम सब इन दिनों इसी दयनीय स्थिति में रह रहे हैं और नारकीय शोक सन्ताप सहन करते हुए जीवन की शव यात्रा संजो रहे हैं। शरीरगत क्षणिक सुख के लिये-मनोगत हास-परिहास के लिये जीवन सम्पदा को फुलझड़ी की तरह जलाने का बाल कौतुक किसी दूरदर्शी के लिए शोभा नहीं देता। व्यर्थ और अनर्थ जैसे क्रिया कलापों में संलग्न रहकर चिर भविष्य को अन्धकारमय बना लेना समझदारी का चिह्न कैसे हो सकता है। वाहन और उपकरणों में तन्मय होकर अपने सर्वनाश को जो सँजो रहा है उसे क्या कहा जाय? शरीर और मन की प्रसन्नता के लिये जिसने आत्म प्रयोजन का बलिदान कर दिया उससे बढ़ कर अभागा एवं दुर्बुद्धि और कौन हो सकता है?
मूर्छितों की बात अलग है। यदि सचमुच कोई जीवित जागृत हो तो उसे अपनी गतिविधियों पर पुनर्विचार करना ही पड़ेगा और अन्धी भेड़ों की तरह जन समूह जिन पथ भ्रष्ट गतिविधियों को अपनाये हुए है उनसे विरत होना ही पड़ेगा। आत्मावलम्बी विवेक को अपना आधार बनाता है और दूरदर्शिता को सम्बल। वह दूसरों के पीछे नहीं चलता। अन्तःकरण ही उसका मार्गदर्शक होता है। ओछे लोग जिसे लाभ समझते हैं यह यदि विवेक की कसौटी पर हानि सिद्ध होती है तो विवेकवान व्यक्ति एकाकी निर्णय करता है और सत्पथ पर एकाकी चल पड़ता है। भले ही उन्मादियों की भीड़ उसका उपहास, असहयोग या विरोध करती रहें। ऐसा साहसवान शूरवीर ही पानी की धार को चीर कर चल सकने वाली मछली की तरह अपने भाग्य का आप निर्माण करता है वहाँ जा पहुँचता है जहाँ पहुँचने के लिए आत्मा का अवतरण इस धरती पर हुआ है।
शरीर बल और मनोबल का अपना स्थान है। पर आत्मबल की गरिमा तो अनुपम है। आत्मबल अर्थात् ईश्वरीय बल। ईश्वरीय बल अर्थात् परमेश्वर की परिधि में आने वाली समस्त शक्तियों और वस्तुओं पर आधिपत्य। जिसने आत्मबल उपार्जित कर लिया उसे समग्र शक्ति का अवतार ही कहना चाहिए। सिद्ध पुरुषों की-ऋषियों की-ईश्वर भक्तों की-महामानवों की युग युगान्तर तक जीवित रहने वाली गुण गाथायें गाकर हम धन्य होते हैं। उनके चमत्कार हृदय को हुलसित कर देते हैं। उनके प्रकाश से अप्रकाशित और उनकी नाव में चढ़कर पार हुए असंख्य प्राणियों के उद्धार की बात जब सामने आती है तब प्रतीत होता है कि ऐसे ही जीवन धन्य हैं। उन्हीं का अवतरण सार्थक है। मनुष्यता ऐसे ही आत्मबल सम्पन्न महामानवों से कृत कृत्य होती है।
यह आत्मबल उस साहसिकता की पृष्ठभूमि पर विकसित होता है जिसमें अपने दोष-दुर्गुणों को खोज निकालने और उन्हें बहिष्कृत करने की उमंग उठती है। शारीरिक क्रिया कलापों में- मनोगत लिप्साओं में स्वभाव गत कुत्साओं में जितना भी अवाँछनीय तत्व है उसका उन्मूलन करने के लिए जो शौर्य सक्रिय होता है उसे आत्मबल का प्रादुर्भाव ही समझा जाना चाहिए। मनोगत दुर्भावनायें और शरीर गत दुष्प्रवृत्तियों का जितना परिशोधन होता चलता है उसी अनुपात से आत्म तेज निखरता चला जाता है। कहना न होगा कि यह ब्रह्मतेज- आकाश में चमकने वाले सूर्य के प्रकाश से कम नहीं अधिक ही प्रभावशाली होता है। उससे उस तेजस्वी आत्मा का ही नहीं- समस्त संसार का भी कल्याण होता है।
आत्मबल अभिवृद्धि का दूसरा चिह्न वहाँ देखा जा सकता है, जहाँ कोई व्यक्ति मोहान्ध जन समूह के परामर्शों और उदाहरणों को उपेक्षा के गर्त में पटकता हुआ आदर्शवादी रीति-नीति अपनाने के लिए एकाकी चल पड़ता है। उत्कृष्टता का वरण करने के लिये सोचते ललचाते तो कितने ही रहते हैं पर आत्मबल के अभाव में न किसी निर्णय पर पहुँचते हैं और न कोई कदम बढ़ाने की हिम्मत करते हैं- स्वप्न भर देखते रहते हैं और दिन बिताते हुए, असफल मनोरथ रहते हुए- हाथ मलते हुए- प्रयाण करते हैं। आत्मबल सम्पन्न इस दयनीय दुर्गति से अपने आपको ऊँचा उठाता है और वह कर गुजरता है जिसे करने के लिए उसका अन्तरात्मा कहता, पुकारता, बुलाता और ललकारता है।
यह भली भाँति समझा जाना चाहिए कि आत्मा-परमात्मा का राज पुत्र है। उसके सम्मुख वे सभी सम्भावनायें प्रस्तुत हैं जो ईश्वर के हाथ में हो सकती है। दोनों का सम्बन्ध विच्छेद जिस अज्ञानान्धकार के मायिक कलेवर ने किया है उसी का अन्त करना ‘साधना’ है। साधना का प्रयोजन ईश्वर का स्तवन उसकी खुशामद करना या पूजा की रिश्वत देकर फुसलाना नहीं वरन्- उन कुत्साओं और कुण्ठाओं की जञ्जीरों को काट डालना है जो जीव और ईश्वर के मिलने में एक मात्रा बाधा बनकर अड़ी खड़ी हैं।
आत्मबल को प्रखर करने के लिये जो तपश्चर्यायें की जाती हैं उनका प्रयत्न, जन्म जन्मान्तरों से सञ्चित पशु प्रवृत्तियों का निराकरण और देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ प्रशस्त करता है। मनुष्य में वे सभी दिव्य सत्ताएं बीज रूप में विद्यमान हैं जो इस ब्रह्माण्ड में कहीं भी किसी भी रूप में विद्यमान हैं। यह दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं। वे हट जायें तो मनुष्य में अनायास ही ईश्वर की झाँकी हो सकती है। और वह अपने आपको नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा के रूप में विकसित हुआ प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है। आत्मकल्याण के साथ विश्व कल्याण का भी लक्ष्य पूर्ण कर सकता है। ऋद्धि सिद्धियों की बात तुच्छ है। जो ईश्वरीय परिधि को छू सका- उस सत्ता के साथ अपने सम्बन्ध बना सके उसे न अपने लिए कुछ अभाव असन्तोष रहता है और न दूसरों को मुक्त हस्त से बहुत कुछ दे सकने में असमर्थ रहता है।
साधना का उद्देश्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं आत्म शोधन है। जो आत्म शोधन कर सका उस पर ईश्वर अनायास ही अनुग्रह करेगा। उससे वञ्चित तो वे लोग रहते हैं जो अपनी निकृष्टता यथावत् बनाये रहना चाहते हैं और लोभ-मोह की पूर्ति के लिए अपने पुरुषार्थ को जगाने की अपेक्षा ईश्वर को फुसलाने का जाल बिछाते हैं। तपश्चर्या का अर्थ है- जीवन क्रम परिष्कार, पिछले दिनों किये गये दुष्कर्मों का प्रायश्चित। इस स्तर की प्रखर साधना कर सकना जिनसे बन पड़े उन्हें सच्चे अर्थों में सौभाग्यवान मानना चाहिए।
हमारा व्यक्तित्व भौतिक और आत्मिक सत्ताओं का सम्मिश्रण है। शरीर विशुद्ध रूप से जड़ है। आत्मा विशुद्ध रूप से चेतन। दोनों का सम्मिश्रण अर्ध जड़ अर्ध चेतन मन है। इन तीनों को ही विकसित एवं बलिष्ठ होना चाहिए। शरीर स्वस्थ रहे- मन स्वच्छ रहे- समाज व्यवहार में सभ्यता का समावेश रखा जाय साथ ही यह न भुला दिया जाय कि आत्मा सर्वोपरि है। आत्मबल की गरिमा सर्वोत्कृष्ट है। उसे प्राप्त कर सकने पर ही हम सच्चे अर्थों में सुखी और सफल कहला सकते हैं।
एक अन्धा था। लोग कह रहे थे- दोपहर हो गया। प्रकाश फैल रहा है।
अन्धे ने उनकी बात को झुठलाया और कहा- अगर प्रकाश है तो मेरे हाथ में थमा दो। अन्यथा मैं कैसे मानूँ कि तुम सच कहते हो।
लोगों ने कई तरह से प्रकाश की उपस्थिति समझाई। पर अन्धा न माना। यही कहता रहा- मैं प्रत्यक्ष वादी हूँ। प्रकाश को जब तक पकड़ न लूँगा उसका अस्तित्व स्वीकार न करूंगा।
बहस बढ़ रही थी और व्यर्थ का वितंडा चल रहा था। एक विद्वान उधर से निकले। उन्होंने कहा- झगड़ा मत करो, प्रत्यक्ष वादी को तर्क कहाँ स्वीकार हो सकता है।
बात समाप्त हो गई। विद्वान ने अन्धे को अस्पताल में भर्ती करा दिया, सौभाग्य की बात अन्धे की रोशनी लौट आई। उसने मध्याह्न का प्रकाश देखा। उसे माना भी और सराहा भी।
विद्वान ने एक दिन अनास्थावादियों को अन्धे का उदाहरण सुनाया और कहा- ईश्वर का अस्तित्व प्रकाश को पकड़ने की तरह जाना नहीं जा सकता। उसके लिये विवेक के चक्षु खोलने के लिए आत्मानुभूति की चिकित्सा का सहारा लेना पड़ेगा।
भौतिक बड़प्पन और आत्मिक वर्चस्व की विवेचना करते हुए गुरुदेव ने कहा-लोग बड़प्पन के पीछे अन्धी दौड़ लगा रहे हैं और महानता की गरिमा भूलते चले जा रहे हैं। अहंता का पोषण करने वाले साधन जुटाने में जितनी रुचि दीख पड़ती उतनी यदि दिव्यता के अभिवर्धन में लगी होती तो नर पशु से ऊँचा उठकर मनुष्य ने नर-रत्न और नर नारायण का पद प्राप्त कर लिया होता।
निर्वाह के लिये धन की आवश्यकता उचित है। पर जिनके पास गुजारे के लिये साधन मौजूद हैं वे संग्रह के पीछे क्यों पड़े हैं? जिनके पास पूर्व संग्रह आजीवन निर्वाह कर सकने जितना मौजूद है फिर भी वे अधिक कमाई की हविस में जुटे हैं, यदि वे इस दिशा में लगी अपनी क्षमता को लोक कल्याण में लगा सके होते तो कितना अच्छा होता। गुजारे भर के लिये उपार्जन-संग्रह अनावश्यक-बची शक्तियों का विश्व मानव के चरणों में समर्पण की नीति अपना कर चला गया होता तो मनुष्य संतुष्ट भी रहता-अनाचार भी न करता और लोक कल्याण की दिशा में बहुत कुछ हो सका होता।
परिवार पालन एक बात है और परिवार तक ही सीमित हो जाना उनके लिए नीति अनीति अपना कर बैठे खाते रहने जैसी पूँजी जुटाने में लगे रहना दूसरी बात। परिवार को सुसंस्कृत और स्वावलम्बी बनाना एक बात है और लाड़ दुलार में उनकी हर इच्छा पूरी करना दूसरी बात। माली की दृष्टि रख कर भगवान का बगीचा परिवार- हम सँभाले सजायें इतना ही बहुत है। इन्हीं चंद लोगों पर जीवन सम्पदा को केन्द्रित और निछावर कर देना दूसरी बात है। परिवार के सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण उलझा हुआ नहीं वरन् सुलझा हुआ स्पष्ट होना चाहिए।
ईश्वर व्यक्ति नहीं है। जिसे कुछ खिला पिलाकर-दे दिला कर-कह सुन कर प्रसन्न किया जा सके। विश्व मानव विश्व वसुधा को ही भगवान का साकार रूप माना जाय और ईश्वर अर्पण, ईश्वर पूजन का व्यावहारिक स्वरूप लोक मंगल के लिए बढ़−चढ़ कर अनुदान देने के रूप में प्रस्तुत किया जाय। अपने को अपने साधनों को ईश्वर का समझना ईश्वरार्पण करना- इसका सीधा साधा अर्थ है अपने को समाज की अविच्छिन्न एक इकाई भर मानना और जो कुछ योग्यता तथा सम्पदा है उसे संसार को अधिक समुन्नत बनाने के लिए प्रत्यक्षतः समर्पण करना है। मन ही मन सब कुछ भगवान को समर्पण करना और व्यवहार में पूरे कृपण कंजूस बने रहना यह ढोंग आत्मवादी को नहीं आत्म प्रवंचक को ही शोभा देता है। ईश्वर पूजन अर्थात् उत्कृष्टता के अभिवर्धन में किया गया त्याग बलिदान है संकीर्णता और लिप्सा को नियंत्रित किये बिना सेवा और परमार्थ का व्रत लिए बिना सच्ची ईश्वर भक्ति न किसी के लिए संभव हुई है न आगे होगी। ईश्वर को एक प्राणी मान कर उसे बहलाने फुसलाने के ढोंग रचते रहने वाले न भक्ति का स्वरूप समझते हैं और न उसका प्रतिफल प्राप्त करते हैं।
भौतिक सम्पदाओं की इतनी भर आवश्यकता है। जिससे अपना और अपने परिवार का पोषण हो सके दूसरों पर आतंक जमाने आकर्षित करने और उन पर अपनी दृश्य मान विशेषताओं की छाप डालने की बाल क्रीड़ा भावात्मक बचपन की निशानी है। रूप, शृंगार, कौशल, वैभव पद का प्रदर्शन करके केवल हेय अहंता का पोषण होता है।
आत्म कल्याण और ईश्वर प्राप्त के लिए देवत्व की महानता उपलब्ध करने के लिए अन्यमनस्क भाव से कुछ पूजा पत्री कर लेना पर्याप्त न होगा वरन् उनके लिए मनोयोग वैभव और वर्चस्व का सर्वोत्तम अंश नियोजित करना पड़ेगा।
बड़प्पन के आकाँक्षी महानता प्राप्त नहीं कर सकते हैं महानता के उपासकों को बड़प्पन की अभिलाषा को नियंत्रित ही रख कर चलना होता है।
देश और समाज को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने के संदर्भ में गुरुदेव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि- “व्यक्तिगत जीवन में सन्तोष उल्लास और उत्कर्ष की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए अध्यात्म का आवेश कितना आवश्यक है। तत्व-दर्शन के अवलम्बन से ही दृष्टिकोण का विकास होता है, चिन्तन में प्रखरता आती है। इसी पृष्ठ भूमि में गुण-कर्म और स्वभाव की परिष्कृत परिपक्वता का समावेश होता है। संयमी, सदाचारी, संतुष्ट, कर्मठ, कर्तव्य परायण व्यक्ति अध्यात्म विचारणा के आधार पर ही विनिर्मित और विकसित होता है। आन्तरिक परिपक्वता ही जीवन-क्रम को सरल और सुखद बनाती है। उसी स्तर का व्यक्ति चैन से रहने और संबंधित व्यक्तियों को चैन से रहने देने की स्थिति में होता है। चिन्तन में शालीनता, व्यवहार में सहृदयता और गतिविधियों में प्रखरता उच्चस्तरीय चिन्तन के बिना आ ही नहीं सकती। यदि यह अभाव दूर न हो सके तो कोई व्यक्ति सम्मान और श्रद्धा का भाजन न बन सकेगा। सच्चा सहयोग और स्नेह किसी का भी उपलब्ध न कर सकेगा। इन जटिलताओं से ग्रसित व्यक्ति किसी भी दिशा में ठोस उन्नति नहीं कर सकता। तब या तो उसे अविकसित पशु-जीवन जीना पड़ता है या महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति उद्धत आचरण से करनी पड़ती है।
व्यक्ति का विकास ‘कला’ नहीं विद्या है, इस प्रकार के कला-कौशल में छली और पाखंडी निष्ठागत होते हैं, उनका व्यवसाय ही इस हथकण्डे पर चलता है कि आरम्भ में मधुर सम्भाषण और प्रामाणिक आचरण का परिचय देकर कैसे किसी को आकर्षित करें और फिर उसके प्रिय विश्वास पात्र बन कर कैसे विश्वासघाती छुरी चलायें। यह कला अब कोई छिपा रहस्य नहीं रही। इन हथकंडों को किसी भी छल व्यवसायी को पास से देखकर सहज ही जाना जा सकता है। पाश्चात्य जगत में इस विषय की ढेरों पुस्तकें छप रही हैं। नर-नारी को-नारी-नर को झूठे प्रणय में बाँधकर अपना उल्लू सीधा करने के लिए किस प्रकार संभाषण, पत्र-व्यवहार एवं हावभाव तथा गतिविधियाँ अपनायें, यह कला पाश्चात्य जगत का एक महत्वपूर्ण शास्त्र बन गया है। इससे अपरिचित भोले भाले नर-नारी वहाँ बेमौत मारे जाते हैं। इस प्रकार आर्थिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किस प्रकार दूसरों की चापलूसी, प्रशंसा की जाय, कैसे आश्वासन प्रलोभन या झाँसा दिया जाय इस प्रकार की ढेरों पुस्तकें बाजार में बिकती हैं। यह लोकप्रिय कला-अध्यात्म के उच्च आदर्शों की विडम्बना भर है। भ्रम में डाल कर किसी को हीरे के बदले काँच भी चपेका जा सकता है पर यह छद्म भी होता असली हीरे की दुहाई देकर ही है।
अध्यात्म असली हीरा है। जिसने उसे अपनी विचारणा और गतिविधियों में समाविष्ट कर लिया सचमुच वह हीरा ही हो गया। हीरा ही नहीं उसे तो पारस भी कहा जा सकता है। ऐसा व्यक्ति अटूट लोक श्रद्धा का भाजन बनता है। कहना न होगा जिसके पीछे लोक श्रद्धा का बल है उसके लिए संसार की किसी भी दिशा में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करते चले जाना तनिक भी कठिन नहीं है। अन्तःकरण की तुष्टि भी आन्तरिक गरिमा से ही होती है। तीन चौथाई शान्ति को खा जाने वाले मनोविकारों से भी इसी आधार पर बचा जा सकता है। पग-पग पर खड़ी दीखने वाली अड़चनें और उलझनें भी परिष्कृत दृष्टिकोण ही सुलझाता सरल बनाता है। आधि-व्याधि भरे शोक-संताप-कष्ट क्लेश, दुख-दारिद्रय, से सुरक्षित केवल वे ही रह सकते हैं जिन्होंने अध्यात्म की छत्रछाया का आश्रय ग्रहण कर रखा है। मानव-जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए अध्यात्म अवलम्बन के अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं।
इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि अध्यात्म की संजीवन विद्या आज विकृत और उपहासास्पद रूप में प्रस्तुत हो रही है। धर्म व्यवसायियों ने उसे कैसा विकृत कुरूप एवं दुरूह बनाया है इसे देखकर रोना आता है। भोले लोग किस प्रकार उस आडम्बरी जंजाल में उलझ कर अपना समय, धन और मनोयोग नष्ट कर रहे हैं यह कथा और भी अधिक करुणाजनक है। इन दिनों की इस दुर्गति के रहते हुए भी यथार्थता के तत्व-ज्ञान में कोई अन्तर नहीं आता। प्राचीन काल की तरह आज भी यदि कोई उसके वास्तविक स्वरूप को समझने और अपनाने का साहस करे तो दिखेगा कि यह व्यक्तित्व के समग्र विकास की-प्रगति के सर्वतोमुखी आधार की अत्यन्त महत्वपूर्ण और अति प्रत्यक्ष प्रक्रिया है। सच्चा अध्यात्मवादी ही सच्ची प्रगति का चिरस्थायी आनन्द उपलब्ध कर सकता है।
व्यक्तिगत जीवन के अतिरिक्त सामूहिक जीवन का- समाज-व्यवस्था का क्षेत्र आता है। किसी देश समाज या राष्ट्र को किस प्रकार समर्थ समुन्नत बनाया जा सकता है इसके लिए विविध स्तरों पर विविध प्रकार के चिन्तन एवं प्रयोग किये जा रहे हैं। सो उचित भी है। क्योंकि व्यक्ति की तरह समाज भी बहुमुखी है और उसकी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक साधनों को जुटाना ही पड़ेगा। शासन सैन्य उद्योग, व्यवसाय, नियन्त्रण, शिक्षा, कला, विज्ञान, कृषि, पशु पालन, चिकित्सा, विनोद प्रभृति अगणित आवश्यकतायें समाज की हैं और उनकी पूर्ति यथावत की ही जानी चाहिए। पर साथ ही यह भूल नहीं जाना चाहिए कि किसी भी समाज या राष्ट्र की समर्थता का-प्रगति का-प्रधान कारण उसका चरित्र एवं चिन्तन ही होता है। यदि यह घटिया और ओछा रहा तो तात्कालिक प्रगति के लक्षण भले ही चकाचौंध पैदा कर दें। भावनात्मक खोखला पन रहने पर तथा-कथित प्रगति बालू के महल की तरह तनिक-सा आघात लगने पर ढह जायेगी।
इस संदर्भ में विश्व इतिहास के पृष्ठ उलटने पर यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि जिन शासकों ने- जिन नेताओं ने अनैतिक आचरण अपना कर अपने वर्ग को लाभान्वित करने का- अपने समाज या राष्ट्र को समुन्नत बनाने का प्रयास किया वे क्षणिक उछाला लेकर सदा के लिए पतन के गर्त में विलीन हो गये। इसी प्रकार जो समाज नैतिक मर्यादाओं में उपेक्षा एवं अनास्था व्यक्त करने लगा वह विलासी भर बन कर रह गया। अनैतिक और उच्छृंखल आचरण अपना कर वह सुखी नहीं बन सका। अव्यवस्थित और अस्त-व्यस्त होकर दुर्बल ही बनता चलता गया। नीति सदाचार की मर्यादायें शिथिल होते ही अपराधी प्रवृत्तियाँ अराजक हो उठती हैं और उस आन्तरिक विद्रोह में कोई राष्ट्र बाह्य आक्रमण से भी अधिक जर्जर हो जाता है।
सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रगति के अनेक पक्ष हैं और वे सभी कार्यान्वित किये जाने चाहिएं। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि मूलभूत राष्ट्रीय सम्पदा उस देश के नागरिकों की भावनात्मक एवं कर्मात्मक उत्कृष्टता ही है। इसके रहते कोई निर्धन समाज भी अपनी गौरव गरिमा बनाये रह सकता है। अपनी स्वतन्त्रता सुरक्षित रख सकता है। यदि इस सम्पदा में कमी आदि हो तो विशाल क्षेत्रफल विशाल जनसंख्या-विशाल सेना और विशाल साधनों वाले देश को भी अंतर्द्वंद्वों से जर्जरित दीन-दुर्बल एवं परमुखापेक्षी होकर रहना पड़ेगा।
पूर्वकाल में साधन अति स्वल्प थे, सम्पत्ति भी कम ही थी पर आन्तरिक स्तर ऊँचा रहने के कारण लोग उतने से ही स्वर्गोपम सुख-शान्ति पाते थे और देवोपम जीवन जीते थे। आज भौतिक दृष्टि से हम पूर्वकाल की अपेक्षा हजार गुने सुसम्पन्न हैं पर भावनात्मक हीनता के कारण वह समस्त प्रगति सुख के स्थान पर दुख को ही बढ़ा रही है। भेड़ियों की तरह मनुष्य एक दूसरे के रक्त पिपासु बने हुए हैं ऐसा साधनों के अभाव में नहीं-भावनात्मक स्तर की निकृष्टता के कारण हुआ है। ओछा मनुष्य, उपलब्ध, धन, ज्ञान, कौशल बल एवं साधन को पशु-प्रवृत्तियों के भड़काने में लगाये हुए हैं। फलतः बढ़ती हुई असुर वृत्ति पग-पग पर नरक के दृश्य उपस्थित करा रही है। उसका प्रभाव राष्ट्र को समर्थ नहीं दुर्बल ही बना रहा है।
राज सत्ता एवं अर्थ सत्ता विश्व की भौतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। विज्ञान की प्रगति सुख सुविधायें बढ़ाने वाले उपकरण प्रस्तुत कर सकती है। बौद्धिक शिक्षा की प्रगति से मनुष्य की मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ सकती है। पर इन सब साधनों का समन्वय हो जाने पर भी व्यक्ति का अन्तःकरण समुन्नत नहीं बनाया जा सकता। और यह भी असंदिग्ध है कि जब तक अन्तःभूमिका परिष्कृत न होगी तब तक न तो चिन्तन उत्कृष्ट बनेगा और न कर्तृत्व श्रेष्ठ बनेगा। यह न हो सका तो व्यक्ति ओछा-निकृष्ट ही बना रहेगा। ऐसी दशा में उसका आन्तरिक पिछड़ापन-असीम सुख-साधनों के रहते हुए भी उसे शोक-संताप ग्रस्त बनाये रहेगा। न वह स्वयं चैन से रहेगा न दूसरों को चैन से रहने देगा। दूध पीने पर सर्प का विष बढ़ने की तरह आन्तरिक दुष्टता साधनों की वृद्धि के साथ-साथ और भी अधिक भयंकर बनेगी। विनाश को सर्वनाश की दिशा में अग्रसर करेगी।
पूँजीवादी देश धन के अभिवर्धन को और साम्यवादी देश धन के वितरण को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। दोनों वर्ग घुड़दौड़ में आगे निकलने की ओर जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं, विज्ञान के क्षेत्र में भी यही बाजी लगी हुई है। बुद्धि तन्त्र विकसित करने के लिए शिक्षा संस्थान भी कुछ उठा नहीं रख रहे हैं। जन-स्तर पर कला, शिल्प, विनोद, आरोग्य जैसे साधनों को अभिवर्धन पूरे उत्साह से चल रहा है। शुद्ध तन्त्र अपनी चरम सीमा को छू रहा है। इतने विकट प्रयास प्रगति के नाम पर ही हो रहे हैं।
इनका यदि सूक्ष्म विश्लेषण विवेचन किया जाय और प्रतिक्रिया को जाना जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि व्यक्ति की आन्तरिक उत्कृष्टता में वृद्धि न हो सकने के कारण यह समस्त भौतिक प्रगति व्यक्ति एवं समाज के अधःपतन में ही योगदान दे रही है। सुख-चैन, संतोष, उल्लास और स्नेह सद्भाव का क्रमशः अन्त ही होता चला जा रहा है। कारण कि मानवी अन्तः चेतना, उपलब्ध साधनों को निष्कृष्ट प्रयोजनों में ही प्रयुक्त कर रही है फलतः सर्वत्र अशान्ति की ही वृद्धि हो रही है।
कानून, कचहरी, पुलिस, जेल की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो यह निश्चित है कि नैतिक मूल्यों के प्रति अनास्थावान नागरिकों को अपराधी गतिविधियां अपनाये रहने से पूर्णतया रोका नहीं जा सकता। व्यसन और अपव्यय के अभ्यस्त व्यक्ति कितनी ही बड़ी आजीविका रहने पर भी आर्थिक तंगी से मुक्त नहीं हो सकते। असंयमी के लिए आरोग्य दुर्लभ है भले ही वह निरन्तर पौष्टिक औषधियाँ खाता रहे। कटुभाषी के मित्र देर तक नहीं रहेंगे भले ही वह उन पर कितना ही खर्च करता रहे। कुकर्मी की सन्तान सुसंस्कृत न बन सकेगी। भ्रष्टाचारी और कामचोर कर्मचारियों के रहते कोई शासन जन कल्याण नहीं कर सकता। पशु प्रवृत्तियाँ भड़काने वाले साहित्यकार कलाकार जिस देश में बढ़ेंगे वहाँ प्रजाजनों की दुष्टता पर नियन्त्रण न किया जा सकेगा।
शासन तंत्र ही सब कुछ नहीं है। धन की अभिवृद्धि ही सुख-शान्ति का आधार नहीं है। शिक्षा ही सदाचरण की मूल नहीं है। हमें गहराई तक विचार करना होगा कि जिन तथा कथित समुन्नत देशों में विज्ञान, शिक्षा, धन और साधनों का बाहुल्य है वहाँ के प्रजाजन क्यों दुष्प्रवृत्तियों में अधिकाधिक ग्रसित होकर क्यों सर्वनाश की ओर जा रहे हैं क्यों अपना और अपने राष्ट्र का भविष्य अन्धकार मय बना रहे हैं? खोज हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचायेगी कि वैयक्तिक चरित्र को राष्ट्रीय प्रगति का अंग न मानकर भारी भूल की गई। व्यक्तिगत जीवन में कुछ के करने की छूट-सामाजिक हस्तक्षेप से निजी जीवन को पृथक रखने का नारा हिप्पीवाद को जन्म दे रहा है उस नैतिक अराजकता को जन्म दे रहा है जो समाज-व्यवस्था का सर्वनाश करके रहेगी।
मनुष्य मशीन नहीं, उसे मात्र भौतिक साधनों के आधार पर ही सुसंचालित नहीं रखा जा सकता। उसमें चेतन भी है और उस चेतना को उत्कृष्ट चिन्तन एवं परिष्कृत वातावरण का पोषण न मिलेगा तो निश्चय ही मानवीय उत्कृष्टता समाप्त होती चलेगी और उस समाज की भी जड़ें खोखली करेगी।
राष्ट्र या समाज को सुस्थिर सुदृढ़ और समुन्नत रखने के इच्छुकों को भौतिक उन्नति की ही रट नहीं लगाये रहना चाहिए वरन् यह भी देखना चाहिए कि वैयक्तिक उत्कृष्टता को पोषण देने वाले आधार विकसित हो रहे हैं या नहीं। यदि उस ओर अपेक्षा बरती जा रही है तो समझना चाहिए प्रगति थोथी, खोटी और उथली है। उस प्रवंचना से मिथ्या मनबहलाव भले ही किया जाता रहे राष्ट्रीय उत्कर्ष का ठोस आधार न बनेगा। विचारशील समाज सेविका, दूरदर्शी देश भक्तों- और मानवता प्रेमी विश्व नागरिकों का कर्त्तव्य है कि वे आत्मिक प्रगति की बात सोचें। चरित्र निर्माण के आधार स्थापित करें और पत्ते धोने की अपेक्षा जड़ सींचने की बात को महत्व दें।
भावनाओं को प्रभावित करने वाले समस्त साधनों और आधारों को अवाँछनीय हाथों से निकाल कर उन उत्तरदायी हाथों में सौंपा जाना चाहिए जो उनका उपयोग विवेक शीलता एवं उत्कृष्टता की दिशा में नियोजित कर सकें। प्रजातन्त्र में नागरिक आजादी होती है सो सही; पर वह आजादी “आग लगाने और विष खिलाने की आत्म हत्या की” नहीं होनी चाहिए। यदि प्रजातन्त्र के साथ- नागरिक अधिकारों के साथ ऐसी सर्वनाशी आजादी जुड़ गई है तो उसे विचार और सुधारा जाना चाहिए। आज का साहित्यकार क्या रच रहा है, प्रकाशक क्या छाप रहा है, गायक क्या गा रहा है, अभिनय और रंग-मञ्च जन मानस पर क्या छाप छोड़ रहा है, चित्रकार द्वारा क्या चित्रित किया जा रहा है इसकी ओर से आँखें बन्द किये रहना भेड़ियों को छूट देकर शिशुओं के लिए प्राण संकट उत्पन्न करने की तरह है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि विचारों को प्रभावित करने वाले साधनों को उच्छृंखलता की दिशा में खुली छूट देकर व्यक्ति और समाज का भविष्य अन्धकार मय बनाने की प्रक्रिया को मूक दर्शक की तरह देखा जा रहा है और उसे रोकने के लिये अपंग असमर्थों की तरह मौन रहा जा रहा है।
धर्म और अध्यात्म के नाम पर जो कूड़ा-करकट जन मानस के गले उतारा जा रहा है उससे आत्मा, परमात्मा, लोक परलोक किसी की कुछ सेवा होना तो दूर उलटे अज्ञान, अन्धविश्वास और प्रपञ्च, पाखण्ड को प्रोत्साहन मिल रहा है। उचित यह था कि जन मानस को प्रभावित करने में समर्थ इस धर्म मञ्च को हाथ में लेने के लिये प्रगतिशील लोग आते और उलूक शृंगालों को विडंबनाएं फैलाने से रोकने के लिये जनता को प्रशिक्षित करते। पर अपने देश में तो राजनीति से लाभान्वित होने की हर किसी को आपाधापी पड़ी है। हर कोई उसी भीड़ में घुसने के लिए व्याकुल है। मानो देशसेवा का और कोई क्षेत्र बना ही नहीं। कितना अच्छा होता यदि राजनैतिक धक्का-मुक्की में घुस कर विग्रह उत्पन्न करने के स्थान पर कुछ सच्चे लोक सेवी जन मानस को भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत करने को अपना कार्य क्षेत्र बनाते और उसी में अपने को खपा देते।
युग-निर्माण योजना के शत सूत्री कार्यक्रमों के अंतर्गत ऐसे अनेक आधार हैं जिन्हें अपनाकर लोकचिन्तन की दिशा मोड़ी जा सकती है। भ्रष्ट साधनों से लोक मानस को दूषित करने में संलग्न दुष्प्रवृत्तियों से झगड़ना ही काफी नहीं वरन् उनकी तुलना में हर क्षेत्र में उत्कृष्टता विकसित करने वाले साधन खड़े करने होंगे। श्रेष्ठता के अभाव में लोग निकृष्टता अपनाते हैं। निकृष्टता की निन्दा करना ही काफी नहीं वरन् उसका सही विधायक तरीका यह है कि उत्कृष्ट आधारों को विकसित करने में सृजनात्मक शक्तियाँ इस प्रकार जुट जायें कि जनता को भले-बुरे का अन्तर पहचानने- दोनों में से किसी एक का वरण करने का अवसर मिल सके। जब तक भ्रष्टता ही स्वच्छन्द विचरण करती है, जन मानस को प्रभावित करने की सारी क्षमता उसी के हाथ है तब तक अपकर्ष ही जीतता रहेगा। उत्कर्ष को असफल, असहाय ही रहना पड़ेगा।
समाज निर्माण के लिये- राष्ट्रीय उत्कर्ष के लिए आवश्यक है कि जन मानस उत्कृष्टता के आरोपण और पोषण के समुचित साधन जुटाने में दत्त चित्त हो। भौतिक प्रगति की सार्थकता इसके बिना संदिग्ध ही रहेगी।
सन्त राविया बीमार पड़ी थीं। उन्हें देखने के लिए सन्त सफियान आये। बीमारी को देखकर दुखी हुए और अच्छा होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगे।
राविया ने उन्हें रोका और कहा- खुदा की दी हुई हर चीज मुझे बहुत प्यारी है- यह बीमारी भी। आप इसे दूर करके खुदा के उपहार से मुझे वंचित न करें।
युग परिवर्तन की निकटतम सम्भावना के सम्बन्ध में गुरुदेव ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये-
निकट भविष्य में ही युग परिवर्तन प्रस्तुत होने वाला है इसमें किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए। जिन्हें दूरदर्शी आँखें प्राप्त हों वे इसके लिये द्रुत गति से जुटते चले जा रहे साधनों को बारीकी से देखें और समझें कि यह एक सुनिश्चित भवितव्यता है जो किसी प्रकार टल नहीं सकेगी।
इन आधारों में एक प्रबल कारण है कि ईश्वरेच्छा- सूक्ष्म जगत की परिस्थितियाँ। खगोल विद्या के अनुसार विशाल ब्रह्माण्ड में कॉस्मिक किरणों- रेडियो किरणों जैसी अदृश्य किन्तु अति सबल शक्तियों में प्रवाह बहते हैं इनका प्रवाह उस क्षेत्र से गुजरने वाले ग्रह नक्षत्रों पर असाधारण रूप से पड़ता है। हमें यह जानना चाहिए कि पृथ्वी समेत समस्त सौर मण्डल ध्रुव तारे की परिक्रमा करने के लिए दौड़ा चला जा रहा है और वह ध्रुव तारा भी ऐसे ऐसे असंख्य सौर मण्डलों को अपनी रस्सी में बाँधे महाध्रुव की परिक्रमा में निरत है। इस प्रक्रिया के अनुसार पृथ्वी अन्तरिक्ष के जिस स्थान पर है वहाँ लौट कर अरबों खरबों वर्ष में ही आ सकती है। आगे तो उसे विशाल आकाश में आगे आगे ही दौड़ना पड़ेगा और पीछे का स्थल छूटता चला जायेगा।
इस घुड़ दौड़ में पृथ्वी पर अन्तर्ग्रहीय किरणों की वर्षा में न्यूनाधिकता आती चली जाती है। और उसका प्रभाव न केवल पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों पर पड़ता है वरन् प्राणियों की अन्तःचेतना भी उससे प्रभावित होती है। सूर्य की किरणों का जो अन्तर पृथ्वी पर आता है उसका प्रभाव भौतिक और मानसिक स्थिति पर पड़ते हुए हम निरन्तर देखते हैं। सर्दी, गर्मी, वर्षा के परिवर्तन पृथ्वी की परिस्थितियों में कितना अन्तर उपस्थित करते हैं, इतना ही नहीं बसंत ऋतु का उल्लास और ग्रीष्म में थकान की उदासी का बाहुल्य प्राणियों की चेतना में अनायास ही परिलक्षित होता है। यह सूर्य किरणों की बात हुई। ऐसी असंख्य किरणें असंख्य ग्रह नक्षत्रों से बरसती हैं और उनकी समीपता तथा मात्रा के घटते बढ़ते रहने से पृथ्वी की भौतिक व चेतन स्थिति में भारी अन्तर आता है। मनुष्य भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। सतयुग की श्रेष्ठता और कलियुग की निकृष्टता का उल्लेख इन अन्तर्ग्रही सूक्ष्म किरणों के प्रभाव में परिवर्तन आते रहने के आधार पर ही सूक्ष्मदर्शी तत्वज्ञानी करते रहे हैं। स्थूल ज्योतिष केवल सौर मण्डल के अंतर्गत घटित होने वाले क्रम का ही विवेचन करती है सूक्ष्म ज्योतिष इससे कहीं ऊपर है वह ध्रुव, महाध्रुव के भ्रमण पथ में आने वाली परिस्थितियों में प्रभाव को देखती है। ऐसे ही तत्व दर्शियों का कथन है कि पृथ्वी अगले दिनों उस स्थान पर होगी जहाँ की अन्तर्ग्रही भौतिक एवं चेतन सूक्ष्म किरणें पृथ्वी निवासियों को अनोखे ढंग से प्रभावित करेंगी और अपनी इस धरती की परिस्थितियों में भारी हेर-फेर प्रस्तुत करेंगी। इस हेर-फेर से मनुष्यों के भावना स्तर में-चिन्तन और क्रिया कलाप में भी असाधारण अन्तर प्रस्तुत होगा। यह अन्तर विनाशात्मक नहीं सृजनात्मक आने वाला है। उससे निकृष्टता घटने और उत्कृष्टता बढ़ने की पूरी-पूरी संभावना है। सूक्ष्मदर्शी-तत्वज्ञानी-इन दिनों परा प्रकृति और अपरा प्रकृति में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तनों को बारीकी से देख रहे हैं और सुनिश्चित पूर्व सूचना दे रहे हैं कि युग परिवर्तन का समय अब अति निकट आ गया।
दूसरा कारण है ईश्वरेच्छा। माता बच्चों को स्वतन्त्र रूप से खेलने तो देती है पर साथ ही यह ध्यान भी रखती है कि वे कहीं इस खेल खेल के बीच विपत्ति में तो फँसने नहीं जा रहे हैं। जब कुछ गड़बड़ देखती है तो वह दौड़कर उन्हें सँभालती है। ईश्वर ने मनुष्य को काफी स्वतंत्रता दी है। भले-बुरे कर्म करते हुए सुख-दुख पाते रहने की स्वसंचालित प्रक्रिया में प्राणी भ्रमण करते रहते हैं। दृष्टा उसे साक्षी रूप में देखता रहता है, इसमें हस्तक्षेप नहीं करता। पर जब जन समूह की दिशा ही बदल जाय और विनाश की ओर बहु संख्यक समुदाय चल पड़े, उच्छृंखलता असीम और अनियन्त्रित हो चले तो उसे बदलने सुधारने के लिए अवतरित होना पड़ता है। समय-समय पर ऐसा होता भी रहा है। सुधारकों देवदूतों और अवतारों को समय-समय पर इसी प्रयोजन के लिए भेजा जाता रहा है। जो रोग मामूली दवादारु की परिधि से आगे बढ़ जाता है उसके लिए कुशल सर्जन स्वयं चीर-फाड़ करते हैं। मामूली चोरी, उठाईगीरी की पुलिस सिपाही पकड़-धकड़ करते रहते हैं पर जब विप्लव खड़ा हो जाय तो रिजर्व फोर्स सरकार को भेजनी पड़ती है। असुरता की, अधर्म की अतिशय वृद्धि होने पर- अधर्म को निरस्त करने एवं धर्म को प्रतिष्ठित करने के लिए अवतार लेने का ईश्वरीय आश्वासन निरर्थक नहीं सार्थक है। इतिहास इसका साक्षी है। जब जब ऐसा लगा है कि सन्तुलन लड़खड़ाने लगा। अनीति की शक्तियाँ अनियन्त्रित हो उठीं, मानवी प्रयत्न उसे संभालने में सफल नहीं हो पा रहे तो दैवी प्रवाह की आँधी आती है और कूड़े करकट को उड़ा कर कहीं से कहीं पहुँचा देती है। इसका नाम अवतार प्रक्रिया है। इसे दूसरे शब्दों में युग का परिवर्तन या प्रत्यावर्तन कह सकते हैं। समयानुसार महाकाल इसकी व्यवस्था करता रहा है आज उसका इसी प्रकार का प्रयास प्रबल हो चला है।
कारण स्पष्ट है मनुष्य जाति का भावना प्रवाह पिछले दिनों अवाँछनीयता की ओर ही बहा है और उसमें दिन-दिन तेजी आई है साधारण समय में आसुरी अनैतिकता कोई-कोई उद्दण्ड ही अपनाते थे, समाज उन अपराधियों को दण्ड देकर रास्ते पर लाता था। अब तो विचित्र स्थिति है। कुएँ में भाँग पड़ने पर उस पानी को पीने वाले सभी उन्मत्त हो उठते हैं, आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है। ओछे और निकृष्ट स्तर के लोग अनाचार बरतें तो बात समझ में आती पर जब सुरक्षा दल ही उस स्तर पर उतर आये। मेंड़ खेत को खाने लगे तब फिर रखवाली कैसे सम्भव हो। समाज को नीति नियन्त्रण में रखने के लिए आदर्श गति विधियाँ अपनाने की जिम्मेदारी प्रबुद्ध वर्ग की है पर जब ग्वाला ही भेड़ें मारने लगे-रक्षक ही भक्षक बन जाय तब समझना चाहिए-खैर नहीं।
आज बारीकी से देखा जाय तो राजतन्त्र, धर्मतन्त्र समाज तन्त्र, अर्थ तन्त्र, बुद्धि तन्त्र, कला तन्त्र के क्षेत्रों में नेतृत्व करने वाली प्रतिभाएं बुरी तरह अपने कर्त्तव्य से च्युत हो रही हैं। मुख से बकवास करते रहने का कोई मूल्य नहीं, प्रभाव पड़ता है आस्थाओं का और कृतियों का। वे छिपाये छिपती भी नहीं। यदि उनका स्तर अवाँछनीय है तो मोटे तौर से कोई जाने या न जाने पर सूक्ष्मजगत में उसका भारी प्रभाव पड़ेगा। समर्थ प्रतिभाएं जहाँ अपने वर्चस्व से लोक मानस को अपने समान उत्कृष्ट बना सकती है वहाँ उनकी निकृष्टता व्यापक रूप से अवाँछनीयता का भी विस्तार कर सकती है। सर्वसाधारण की गतिविधियों में गिरावट आ जाना उतना चिन्ताजनक नहीं जितना प्रतिभाओं का नैतिक अधःपतन। आज यही विश्व संकट का प्रधान केन्द्र बिन्दु है। यही क्रम चलता रहा तो समस्त संसार के लिए आत्मघाती संकट कुछ ही दिनों में प्रस्तुत हो सकता है।
किसी का नाम लेने की जरूरत नहीं है और न किसी पर कीचड़ उछालने की आवश्यकता है। हम अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ा कर देखें और ढूँढ़ें कि कृषि कार्य से पेट भर के निस्वार्थ शासन करते राजा जनक, अर्ध वस्त्र पहन कर पैदल चलने और कुटिया में रहने वाले चाणक्य जैसे मंत्री, व्यास और बाल्मीकि जैसे साहित्यकार, नारद जैसे गायक, शंकराचार्य जैसे साधु, वशिष्ठ जैसे धर्म नेता, बुद्ध जैसे तपस्वी, भामाशाह जैसे धनी, शुकदेव जैसी ज्ञानी, आज किस क्षेत्र में कितने हैं। मस्तिष्क विकृत होगा तो समस्त शरीर की गतिविधियाँ बेतुकी दीखेंगी। प्रबुद्धता का उत्तरदायित्व यह है कि उपलब्ध प्रतिभा एवं सम्पदा को अधिक साहस के लिए लोक मंगल में नियोजित करे अपेक्षाकृत अधिक आदर्श और अनुकरणीय बने ताकि जन साधारण को उनके पद चिह्नों पर चलने का अवसर मिले और लोक व्यवस्था सही बनी रहे। उच्च वर्ग भ्रष्ट होगा तो जन साधारण को भी भ्रष्टता ही सरल स्वाभाविक और उचित उपयुक्त लगेंगी फलस्वरूप सर्वत्र पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियाँ भड़केंगी और उसका प्रतिफल अगणित आपत्तियों के रूप में भुगतान पड़ेगा।
आज धन, शिक्षा, और साधनों की प्रचुर मात्रा में अभिवृद्धि हुई है। यदि उसका सदुपयोग सम्भव हुआ होता तो इतनी साधन सम्पन्न जनता स्वर्गीय सुख का आनन्द ले रही होती, पर ठीक उलटा हो रहा है। बढ़ती हुई सम्पदा-विपत्ति का कारण ही बनती चली जा रही है और मानव जीवन का हर पक्ष समाज का हर क्षेत्र इतना कलुषित हो रहा है कि घुटन में प्राण ही निकल रहे हैं। बाहर जितना वैभव भीतर उतना ही दारिद्र्य। बाहर जितना ज्ञान भीतर उतना ही अन्धकार। इतना छद्म और इतना पाखण्ड शायद ही इतिहास में कभी आया हो। मानवी महानता तो एक प्रकार से पलायन ही करती चली जा रही है उसके स्थान पर जाल में फँसाने का अहेरी धन्धा पनप रहा है। अब नैतिकता की-मानवता की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले लोग दीपक लेकर ही तलाश किये जा सकते हैं। लगता है नैतिक मूल्यों की समाप्ति का दिन आ पहुँचा। इन परिस्थितियों में यह सर्वत्र रोष, आक्रोश, असन्तोष, विक्षोभ, दुख, दारिद्र्य, रोग, शोक, क्लेश, कलह का दुर्भाग्य पूर्ण वातावरण छाया दीखे तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।
विज्ञान की प्रगति इस युग की अभूतपूर्व उपलब्धि है। प्रकृति की शक्तियों को हाथ में लेने की क्षमता शायद ही कभी इतनी बड़ी मात्रा में मनुष्य के हाथ आई हो। यह दुधारी तलवार है। इससे जहाँ स्वर्गोपम सुख-शान्ति की प्राप्ति की जा सकती है वहाँ ब्रह्माण्ड के इस अप्रतिम सुन्दर-ग्रह को-पृथ्वी को-चूर्ण विचूर्ण करके भी रखा जा सकता है। दुष्ट मानव उसी दिशा में बढ़ रहा है। हाइड्रोजन और एटम अस्त्रों की इतनी बड़ी मात्रा उसने सर्वनाश के लिए सँजोई है। प्रस्तुत दुर्बुद्धि के बाहुल्य को देखते हुए यह असम्भव नहीं कि इस बारूद में कोई उन्मादी किसी भी क्षण आग लगा दे और यह ईश्वरीय अरमानों से सँजोई सींची हुई दुनिया क्षण भर में धूलि कण बनकर किसी निहारिका के इर्द−गिर्द चक्कर लगाने लगे। विश्व का ऐसा दुखद अन्त काल्पनिक नहीं, वर्तमान परिस्थितियों में उस स्तर का खतरा पूरी तरह मौजूद है। यदि सर्वनाश न भी हो तो जिस दर्शन को अपनाकर मूर्धन्य, प्रबुद्ध एवं नेतृत्व कर सकने योग्य व्यक्ति चल रहे हैं उससे दिन-दिन अधिक दारुण दुख ही उत्पन्न होंगे। तब जीवित रहते हुए भी इस धरती के निवासी दिन-दिन अधिक दयनीय दुर्दशा से- नारकीय जलन में रुदन क्रन्दन करने भर के लिये शेष रहेंगे।
ईश्वर को यह किसी प्रकार मंजूर नहीं। बच्चों को बारूद से खेलने की छूट नहीं दी जा सकती। महाकाल ने इस अवस्था को व्यवस्था में पलटने के लिए अपना शस्त्र उठा लिया है। उसकी प्रत्यावर्तन प्रक्रिया चल पड़ी है। हम साँस रोक कर देखें कि अगले दिनों क्या होता है। प्रबल कैसे बदलता है। दुनिया कैसे उलटती है। असम्भव लगने वाला प्रसंग कैसे सम्भव बनता है। मनुष्य को बदलना ही पड़ेगा। इच्छा से भी और अनिच्छा से भी। यह रीति-नीति देर तक नहीं चल सकती। युग परिवर्तन एक निश्चित तथ्य है। उसके बिना और कोई गति नहीं। इस हेर-फेर के लिए अब अधिक समय प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इन दिनों अन्तरिक्ष में चल रही हलचलें अगले ही दिनों साकार रूप धारण करेंगी और हम एक ऐसी महाक्रान्ति का इन्हीं आँखों से दर्शन करेंगे जिसमें सब कुछ उलट-पुलट करने की सामर्थ्य भरी होगी।
व्यष्टि-व्यक्ति-मनुष्य की तरह समष्टि आत्मा- विश्वात्मा भी एक जीवंत तथ्य है। उसमें अपना भला-बुरा सोचने की सामर्थ्य है। इन दिनों विश्व मानव को गम्भीरता पूर्वक सोचना पड़ रहा है कि ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में बढ़ते हुए उसके चरण किस दिशा में अग्रसर किये जायें? निस्सन्देह इसका उत्तर विनाश नहीं विकास ही हो सकता है। भौतिक विकास से लाभान्वित होना तभी सम्भव है जब आत्मिक विकास की आवश्यकता पूर्ण की जाय। आज उत्कृष्ट वर्ग का चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है। जिनकी चेतना में दिव्यता का तनिक भी प्रकाश उगा है उन सब महामानवों के भीतर एक ही स्तर की विचार तरंगें उमड़ रही हैं। घटायें घुमड़ रही हैं, बिजली चमक रही है अब घनघोर वर्षा में अधिक विलम्ब नहीं है। विश्व मानव का उत्कृष्ट चिंतन जब सक्रिय रूप धारण करेगा- सृजन मेघ बनकर बरसेगा तो आज की तपन कल जल थल को एक करने वाले सुषमा-शीतलता और हरीतिमा का दृश्य ही चारों को बिखरा दिखाई देगा। इस परिवर्तन के लिए अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
भावनात्मक स्तर पर बदला हुआ मनुष्य-प्रस्तुत परिस्थितियों में समग्र परिवर्तन उपस्थित करेगा। देखने में शरीर, मकान, नदी, पर्वत, यही सब रहेंगे पर इन कलेवरों के अंतर्गत प्राण दूसरा ही होगा। तब लोग अपने दुख से पड़ौसी के दुख को और अपने सुख से दूसरों के सुख को कम नहीं अधिक ही मानेंगे। तब संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए चिन्तन में कोई स्थान न होगा, हर व्यक्ति यही सोचेगा कि जिस समाज के अनुदान से उसका व्यक्तित्व विनिर्मित और विकसित हुआ है उसे सुविकसित समुन्नत बनाने के लिए अधिक से अधिक योगदान करना चाहिए। ऐसी मनःस्थिति में हर मनुष्य स्नेह और सौजन्य का प्रतीक होकर रहेगा। शालीनता और सज्जनता उसकी नीति होगी। अपने लिए कम दूसरों के लिए अधिक की प्रतिस्पर्द्धा में लोग अधिकार के लिए नहीं लड़ेंगे वरन् कर्त्तव्य पालन में कौन अग्रणी रहा इसकी प्रतिस्पर्द्धा करेंगे। तब मनुष्य मनुष्य का शत्रु नहीं मित्र बनकर रहेगा। एक दूसरे को सन्देह, अविश्वास और आशंका की दृष्टि से नहीं देखेंगे। एक दूसरे पर विश्वास करके चलेंगे भी और उस मान्यता की यथार्थता भी सिद्ध करेंगे। न कटुता की आवश्यकता पड़ेगी न कर्कशता की। न्याय और विवेक की प्रधानता के कारण न कहीं अनैतिकता दिखाई देगी और न कहीं भ्रम छद्म के लिए स्थान रहेगा। लोग सीधा-सादा सरल और हर्षोल्लास भरा जीवन जियेंगे।
आज मनुष्य की तीन चौथाई शक्तियाँ ध्वंस के साधन एकत्रित करने में लगी हैं। असन्तोष और अविश्वास के कारण जन सहयोग जुट नहीं पा रहा, आशंका और आत्म-रक्षा की चिन्ता फूँक-फूँक कर कदम धरने को कहती है। इन जाल जञ्जालों में जकड़ा हुआ मनुष्य कुछ कर नहीं पाता। साधनों को सृजन में लगाया जा सकना सम्भव ही नहीं होता जब वैसी कठिनाईयाँ न रहेंगी तो आज का ज्ञान विज्ञान सृजन में लगेगा। सुख-सुविधाओं के साधन बढ़ायेगा। प्रकृति के गर्भ में विपुल सम्पदा भरी पड़ी है यदि मानवी पुरुषार्थ उसका सदुपयोग सीख ले तो कोई कारण नहीं कि हर मनुष्य को-हर प्राणी को-सुख-शान्ति के साथ रह सकने योग्य विपुल साधन उपलब्ध न हो जायें।
जब युद्ध उपकरणों में लगे हुए विपुल साधन सामग्री प्रचुर सम्पदा, प्रखर बुद्धि और कोटि-कोटि मानवों की प्रचण्ड शक्ति उस निरर्थक झंझट का परित्याग कर सुख संवर्धन की दिशा में प्रयुक्त होगी तो न अभावों का अस्तित्व ही रहेगा न दारिद्र्य के दर्शन होंगे। चिन्ता और विक्षोभों की जलन से जब बुद्धि को छुटकारा मिलेगा तो वह उस स्तर पर सोचेगी जिससे मनुष्य की गरिमा में चार चाँद लगें। जब 350 करोड़ इस धरती के निवासी परस्पर स्नेह सहयोग के साथ रहेंगे और उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व में संलग्न रहेंगे तो कोई कारण नहीं कि कल्पित स्वर्ग से बढ़कर सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस धरती पर दृष्टिगोचर न होने लगें।
इन परिस्थितियों को समीप लाने के लिए मानवी और अति मानवी शक्तियाँ इन दिनों जिस तत्परता के साथ सक्रिय हो रही हैं, उन्हें देखते हुए यह विश्वास किया ही जाना चाहिए कि नवयुग के अवतरण में न तो अविश्वास का कोई कारण है और न देर तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता।
आप बहुत सोये हैं। अब उतना ही जागेंगे भी। अब सोने का युग बीत गया। अन्धविश्वास, पुराने रीति-रिवाज अब धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं। बुद्धि और विवेक जाग रहे हैं। आलस्य उड़ता जा रहा है। आगे बढ़ने, सफलता पाने की क्रियाशीलता और चेतना के सभी ओर दर्शन होने लगे हैं। बुराइयों के स्थान पर अच्छाइयों का बढ़ना मंगलमय भविष्य का प्रतीक है।
सूर्योदय पूर्व दिशा से होता है। उषा काल की लालिमा उसकी पूर्व सूचना लेकर आती है। कुक्कुट उस पुण्य वेला की अग्रिम सूचना देने लगते हैं। तारों की चमक और निशा कालिमा की सघनता कम हो जाती है। इन्हीं लक्षणों से जाना जाता है कि प्रभात काल समीप आ गया और अब सूर्योदय होने ही वाला है।
नव जागरण का-युग परिवर्तन का सूर्योदय भी इसी क्रम से होगा। यह सार्वभौम प्रश्न है, विश्व मानव से संबन्धित समस्या है एक देश या एक जाति की नहीं। फिर भी उदय का क्रम पूर्व से ही चलेगा। कुछ चिरन्तन विशेष परम्परा ऐसी चली आती है कि विश्व मानव ने जब करवट ली है तब उसका सूत्र संचालन सूर्योदय की भाँति ही पूर्व दिशा से हुआ है। यों पाश्चात्य देश वासी भारत को ‘पूर्व’ मानते हैं पर जहाँ तक आध्यात्मिक चेतना का प्रश्न है निस्संदेह यह श्रेय सौभाग्य इसी देश को मिला है, वह विश्व की चेतनात्मक हलचलों का उत्तर दायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर वहन करे, इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। युग परिवर्तन का प्रकाश इसी पुण्य भूमि से आरम्भ हो चुका अब वह कुछ ही समय में विश्वव्यापी बनने जा रहा है।
विश्व जड़ और चेतन दो भागों में विभक्त है। जड़ प्रकृति से संबन्धित प्रगति को सम्पदा के रूप में देखा जा सकता है और चेतना प्रकृति के विकास को विचरणा एवं भावना के रूप में समझा जायेगा। सुविधा और सम्पदा की अभिवृद्धि भौतिक प्रगति कहलाती है और चेतना की उत्कृष्टता को आत्मिक उत्कर्ष कहा जाता है, जहाँ तक भौतिक प्रगति का सम्बन्ध है वहाँ तक उसके लिए राजतंत्र, अर्थ तंत्र, विज्ञान तंत्र और शिक्षा तंत्र का उत्तर दायित्व है कि वे अधिकाधिक सुविधा एवं सम्पदा उत्पन्न करके सुख साधनों को आगे बढ़ायें।
आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञान तंत्र उत्तरदायी है। इसे दूसरे शब्दों में दर्शन, धर्म, अध्यात्म एवं कला के नाम से जाना जा सकता है। चेतना की भूख इन्हीं से बुझती है, उसे इन्हीं से दिशा और प्रेरणा मिलती है। परिवर्तन एवं उत्कर्ष भी इन्हीं आधारों को लेकर संभव होता है। अस्तु यह अनिवार्य है कि यह चेतनात्मक प्रगति आवश्यक हो तो ज्ञानतंत्र को प्रखर बनाना पड़ेगा। सच तो यह है जब कभी ज्ञान तंत्र शिथिल पड़ता है, विकृत होता है तभी व्यक्ति का स्तर लड़खड़ाता है और उस अस्त व्यस्तता में भौतिक जगत की समस्त गति विधियाँ उलझ जाती हैं। तत्व दर्शी सदा से यह कहते रहे हैं कि सम्पदा नहीं विचरणा प्रमुख है। यदि विचरणा सही रही तो सम्पदा छाया की तरह पीछे-पीछे फिरेगी पर यदि सम्पदा को ही सब कुछ माना गया और चेतना स्तर की उत्कृष्टता उपेक्षित की गई तो बढ़ी हुई सम्पदा दूध पीकर परिपुष्ट हुए सर्प की तरह सर्वनाश करने पर उतारू हो जायेगी। यह शाश्वत तथ्य है इसे इतिहास ने लाखों बार आजमाया है और करोड़ों बार आजमाया जा सकता है।
युग परिवर्तन के जिस अभियान में हमें दिलचस्पी है वह चेतनात्मक उत्कर्ष ही है। इसके लिए ज्ञान तंत्र को समर्थ और परिष्कृत करना पड़ेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि भौतिक प्रगति व्यर्थ है। वह भी आवश्यक है, पर वह दूसरे लोगों का काम है; जिसे वे शक्ति भर सम्पन्न कर भी रहे हैं। सरकारें पंचवर्षीय योजनाएं बनाती हैं। वैज्ञानिक शोध कार्यों में जुटे हुए हैं, अर्थशास्त्री व्यवसाय उत्पादन और वितरण का ताना बाना बुन रहे हैं। सैन्य तंत्र आयुधों के निर्माण और योद्धाओं के प्रशिक्षण में लगा है। शिक्षा शास्त्री बौद्धिक क्षमता के अभिवर्धन में लगे हैं। उपेक्षित तो ज्ञान तंत्र ही पड़ा है उसके नाम पर जो खड़ा है उसे तो विदूषकों जैसी विडम्बना ही कहा जा सकता है। धर्म के नाम पर जो कहा और किया जा रहा है उससे ऐसी आस्तिकता की अपेक्षा नास्तिकता भली प्रतीत होती है। ज्ञान तंत्र यदि मानवीय सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की अपेक्षा कर्मकाण्डों में ही उलझाये रहे और सातवें आसमान के सपने दिखाते रहे, कर्म को व्यर्थ और भक्ति को प्रधान कहता रहे तो उससे मानव समाज का, विश्व का कोई हित साधन न हो सकेगा। धर्म व्यवसायियों की आजीविका भले ही चलती रहे।
नव निर्माण के अवतरण की किरणें अगले दिनों प्रबुद्ध एवं जीवंत आत्माओं पर बरसेंगी, वे व्यक्तिगत लाभ में संलग्न रहने की लिप्सा को लोक मंगल के लिए उत्सर्ग करने की आन्तरिक पुकार सुनेंगे। यह पुकार इतनी तीव्र होगी कि चाहने पर भी वे संकीर्ण स्वार्थ परता भरा व्यक्तिवादी जीवन ही न सकेंगे। लोभ और मोह की जटिल जंजीरें वैसी ही टूटती दीखेंगी जैसे कृष्ण जन्म के समय बन्दी गृह के ताले अनायास ही खुल गये थे। यों माया बद्ध नर कीटकों के लिए वासना और तृष्णा की परिधि तोड़ कर परमार्थ के क्षेत्र में कदम बढ़ाना लगभग असंभव जैसे लगता है। पेट और प्रजनन की विडम्बनाओं के अतिरिक्त वे क्या आगे की और कुछ बात सोच या कर सकेंगे? पर समय ही बतायेगा कि इसी जाल जंजाल में पकड़े हुए वर्गों में से कितनी प्रबुद्ध आत्माएँ उछल कर आगे आती हैं और सामान्य स्थिति में रहते हुए कितने ऐसे अद्भुत क्रिया कलाप सम्पन्न करती हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा। जन्म जात रूप से तुच्छ स्थिति में जकड़े हुए व्यक्ति अगले दिनों जब महा मानवों की भूमिका प्रस्तुत करते दिखाई पड़ें तो समझना चाहिए युग परिवर्तन का प्रकाश एवं चमत्कार सर्व साधारण को प्रत्यक्ष हो चला।
निस्संदेह युग परिवर्तन का प्रधान आधार भावनात्मक नव निर्माण ही होगा। जन मानस में इन दिनों झूठी मान्यताओं की भरमार है। सोचने की सही पद्धति एक प्रकार से विस्मृत ही हो गयी है। स्थिति का सही मूल्याँकन कर सकने वाला दृष्टिकोण हाथ से चला गया है। उसके स्थान पर भ्रान्तियों की चमगादड़ें विचार भवन के गुम्बदों में उलटी लटक पड़ी हैं। इस सारे कूड़े-करकट को एक बार झाड़ बुहार कर साफ करना होगा और चिन्तन की इस परिष्कृत प्रक्रिया को जल मानस में प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। किसी धर्म सम्प्रदाय, सन्त या ग्रन्थ को बुद्धि बेच कर किसी का भी अन्धानुकरण न करने की बात हर किसी के मन में घुसती चली जायेगी और जो न्याय, विवेक, सत्य एवं तथ्य की कसौटियों पर खरा सिद्ध होगा उसी को स्वीकारने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। इस आधार के प्रबल होते ही न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जायेगा और न झूठी मान्यताओं के लिए। निर्मल और निष्पक्ष चिन्तन किसी भी देश धर्म या वर्ग के व्यक्ति को उसी स्थान पर पहुँचा देगा जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादि काल से अंगुलि निर्देश करता रहा है।
यह हलचलें जन-जन में दृष्टि गोचर होंगी। समुन्नत आत्मा निजी सुख सुविधाओं को तिलाञ्जलि देकर विश्व के भावनात्मक नव निर्माण को इस युग की सर्वोत्तम साधना उपासना तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जागृत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़ कर न्याय और विवेक के आधार पर प्रतिपादित उचित को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार उभय पक्षीय सुयोग संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जायेगा जो युग परिवर्तन का मूल भूत आधार है।
आज की स्थिति को देखते हुए यह दोनों ही कार्य कठिन दीखते हैं। धर्म विडम्बना के सस्ते प्रलोभनों को तिरस्कृत कर धर्म प्रेमी लोग कष्ट साध्य परमार्थ में प्रवेश करेंगे यह कठिन है। बुद्धिजीवी अपनी अच्छी खासी सुविधाओं का परित्याग कर लोक मंगल के लिए दर-दर ठोकरें खायेंगे यह भी कठिन ही दीखता है। पर समय यह भी कराके छोड़ेगा। रीछ बानर अपने प्राण हथेली पर रख मौत से लड़ने गये थे। बुद्ध के ढाई लाख अनुयायी यौवन की उमंगों को कुचलते हुए भिक्षु भिक्षुणी बनने की जटिल प्रक्रिया स्वीकार करने को सहमत हुए थे। गान्धी की पुकार पर लाखों ने अपनी बर्बादी को स्वीकार किया था। उसी प्रकरण को यदि इतिहास फिर दुहराये तो इसे न कठिन मानना चाहिए और न असंभव। जो भूत काल में होता रहा है उसकी पुनरावृत्ति को कठिन या जटिल मानने का कोई कारण नहीं। समय की पुकार इस कष्ट साध्य प्रक्रिया को भी पूरी करके रहेगी। जीवंत और जागृत आत्माओं का एक बड़ा वर्ग निकट भविष्य में ही आगे आवेगा और ज्ञान तंत्र का ऐसा विशाल काय शस्त्रागार खड़ा करेगा जिसकी सहायता से अनाचार की लंका को ध्वस्त किया जा सके।
आज का जन मानस मूढ़ता और दुष्टता की असुर प्रवृत्तियों में बेतरह चिपका दीखता है। नैतिकता को उपहासास्पद मूर्खता माना जाता है। स्वेच्छाचार और अनाचार का बोलबाला है। नीति और न्याय की धर्म और ईश्वर की बातें तो बहुत सुनी जाती हैं पर व्यवहार में उन्हें उतारना असंभव कहा जाता है। आज की यह कठोरता कल बदलेगी और सर्व साधारण को सही सोचने और सही अपनाने की ललक उठेगी यह उभार लोक मानस में आने ही वाला है। उस स्थिति में भावनात्मक नव निर्माण उतना कठिन न रहेगा जितना कि आज दीखता है। ज्ञान तंत्र का उपहास नहीं उड़ाया जायेगा वरन् उसका स्वागत समर्थन आशातीत रूप में देखने को मिलेगा।
धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होगा। उस के प्रसार प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जायेगा। सम्प्रदाय वादियों के डेरे उखड़ जायेंगे, उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दीखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपना कर भले मानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। तब उत्कृष्ट चरित्र, परिष्कृत ज्ञान एवं लोक मंगल के लिए प्रस्तुत किया गया अनुदान ही किसी सम्मानित या श्रद्धास्पद बना सकेगा पाखण्ड पूजा के बल पर जीने वाले उलूक उस दिवा प्रकाश से भौंचक होकर देखेंगे और किसी कोंटर में बैठे दिन गुजारेंगे। अज्ञानान्धकार में जो पौ बारह रहती थी उन अतीत की स्मृतियों को वे ललचाई दृष्टि से सोचते चाहते तो रहेंगे पर फिर समय लौटकर कभी आ न सकेगा।
अगले दिनों ज्ञानतंत्र ही धर्म तंत्र होगा। चरित्र निर्माण और लोक मंगल की गति विधियाँ धार्मिक कर्म काण्डों का स्थान ग्रहण करेंगी। तब लोग प्रतिमा पूजक देव मन्दिर बनाने की तुलना में पुस्तकालय विद्यालय जैसे ज्ञान मंदिर बनाने को महत्व देंगे तीर्थ-यात्राओं और ब्रह्मभोजों में लगने वाला धन लोक शिक्षण की भाव भरी सत्प्रवृत्तियों के लिए अर्पित किया जायगा। कथा पुराणों की कहानियाँ तब उतनी आवश्यक न मानी जाएंगी जितनी जीवन समस्याओं को सुलझाने वाली प्रेरणाप्रद अभिव्यंजनाएं। धर्म अपने असली स्वरूप में निखर कर आयेगा और उसके ऊपर चढ़ी हुई सड़ी गली केंचुली उतर कर कूड़े करकट के ढेर में जा गिरेगी।
ज्ञान तन्त्र वाणी और लेखनी तक ही सीमित न रहेगा वरन् उसे प्रचारात्मक रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों के साथ बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रयुक्त किया जायगा। साहित्य, संगीत, कला के विभिन्न पक्ष विविध प्रकार से लोक शिक्षण का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करेंगे। जिनके पास प्रतिभा है जिनके पास सम्पदा है वे उससे स्वयं लाभान्वित होने के स्थान पर समस्त समाज को समुन्नत करने के लिए समर्पित करेंगे।
(1) एकता (2) समता (3) ममता और (4) शुचिता नव निर्माण के चार भावनात्मक आधार होंगे।
एक विश्व, एक राष्ट्र एक भाषा, एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति के आधार पर समस्त मानव प्राणी एकता के रूप में बँधेंगे। विश्व बन्धुत्व की भावना उभरेगी और वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श सामने रहेगा। तब देश, धर्म भाषा वर्ण आदि के नाम पर मनुष्य मनुष्य के बीच दीवारें खड़ी न की जा सकेंगी। अपने वर्ग के लिए नहीं समस्त विश्व के हित साधन की दृष्टि से ही समस्याओं पर विचार किया जायगा।
जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे छूत अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले काले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। गुण कर्म स्वभाव सेवा एवं बलिदान ही किसी के सम्मानित होने के आधार बनेंगे जाति या वंश नहीं। इसी प्रकार नारी से नर श्रेष्ठ है उसे अधिक अधिकार प्राप्त है ऐसी मान्यता हट जायगी। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक होंगे। प्रति बन्ध या मर्यादायें दोनों पर समान स्तर की लागू होंगी। प्राकृतिक सम्पदाओं पर सब का अधिकार होगा। पूँजी समाज की होगी। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसमें से प्राप्त करेंगे और सामर्थ्यानुसार काम करेंगे। न कोई धनपति होगा न निर्धन। मृतक उत्तराधिकार में केवल परिवार के असमर्थ सदस्य ही गुजारा प्राप्त कर सकेंगे। हट्टे-कट्टे और कमाऊ बेटे बाप के उपार्जन के दावेदार न बन सकेंगे, वह बचत राष्ट्र की सम्पदा होगी इस प्रकार धनी और निर्धन के बीच का भेद समाप्त करने वाली समाज वादी व्यवस्था समस्त विश्व में लागू होगी। हराम खोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। व्यापार सहकारी समितियों के हाथ में होगा, ममता केवल कुटुम्ब तक सीमित न रहेगी वरन् वह मानव मात्र की परिधि लाँघते हुए प्राणिमात्र तक विकसित होगी। अपना और दूसरों का दुख सुख एक जैसा अनुभव होगा। तब न तो माँसाहार की छूट रहेगी और न पशु−पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बन्धनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे।
शरीर, मन, वस्त्र, उपकरण सभी को स्वच्छ रखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। शुचिता का सर्वांगीण विकास होगा। गंदगी को मानवता का कलंक माना जायेगा। न किसी का शरीर मैला कुचेला रहेगा न वस्त्र । घरों को गंदा गलीज न रहने दिया जायगा। मनुष्य और पशुओं के मल मूत्र को पूरी तरह खाद के लिए प्रयुक्त किया जायगा। वस्तुएं यथा स्थान, यथा क्रम और स्वच्छ रखने की आदत डाली जायगी। मन में कोई छल कपट, द्वेष दुर्भाव जैसी मलीनता न रखेगा।
एकता, समता, ममता और शुचिता इन चार मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर विभिन्न आचार संहिताएं, रीति नीति, विधि व्यवस्थाएं, मर्यादाएं और परंपराएं बनाई जा सकती हैं। भौगोलिक तथा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उनमें हेर फेर भी यत्किंचित् होते रह सकते हैं। पर आधार उनके यही रहेंगे।
यह ध्यान रखने की बात है कि संसार की दो ही प्रमुख शक्तियाँ हैं-एक राज तंत्र दूसरी धर्म तन्त्र। राज सत्ता में भौतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता है और धर्म सत्ता में अन्तः चेतना को। दोनों को कदम से कदम मिलाकर एक दूसरे की पूरक होकर रहना होगा। यह चारा थोथा है कि राजनीति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। सच्ची बात यह है कि एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। कर्तव्यनिष्ठ और सदाचारी नागरिकों के बिना कोई राज्य समर्थ समुन्नत नहीं हो सकता और राज सत्ता यदि धर्म सत्ता को उखाड़ने की ठान ले तो फिर उसके लिए भी कुछ अधिक कर सकना कठिन है। राम राज्य तभी सफल रह सका जब उस पर वशिष्ठ का नियन्त्रण था। चन्द्रगुप्त की शासन गरिमा का श्रेय चाणक्य के मार्ग दर्शन को ही दिया जा सकता है। प्राचीन काल की यह परम्परा आगे भी चलेगी। धर्म सत्ता का स्थान पहला है इसलिए राज सत्ता को उसका समर्थक और सहायक ही बन कर रहना चाहिए।
धर्मों के वर्तमान स्वरूप प्रभाव और कलेवर की सहायता लेकर हमें वर्तमान जन-मानस को परिष्कृत करते चलना चाहिए। जमे हुए ढाँचे को न तो उखाड़ने की जरूरत है और न उसकी उपेक्षा करने की। चूँकि आधार आगे भी धर्म ही रहना है इसलिए उपयुक्त यही है कि
क्राँति की गति और समय के विषय में भविष्यवाणी करना असंभव है यह स्वयं अपने नियमों से शासित होती है किन्तु जब यह फूटती है तो सब बाधाओं को ठुकराती चली जाती है। -लेनिन
युग-निर्माण आन्दोलन की सृजन सेना धर्म तंत्र में प्रवेश करे और परम्परा गत श्रद्धा को, उन मूल-भूत आदर्शों को कार्यान्वित करने में प्रयुक्त करे जिनके लिये कि तत्व दर्शियों ने यह धर्म कलेवर खड़ा किया था। इस प्रकार धर्म तंत्र के साधनों के सृजनात्मक प्रयोजन में लगाकर उसे लोक श्रद्धा का विषय बनाये रखा जा सकेगा।
नव निर्माण की पृष्ठ भूमि धर्म मूलक ‘ज्ञान’ होगा। इसी के लिए ज्ञानतन्त्र खड़ा किया गया है और ज्ञान यज्ञ का महान अभियान चलाया गया है। स्वल्प साधनों से भी वह जिस द्रुतगति के साथ बढ़ता चला जा रहा है उसे देखते हुए पूर्व से सूर्योदय होने के और उसका प्रकाश सर्वत्र फैलने की बात पर सहज ही विश्वास किया जा सकता है।
शरीर को नित्य स्नान कराना पड़ता है, वस्त्र नित्य धोने पड़ते हैं, कमरे में बुहारी रोज लगानी पड़ती है और बर्तन रोज ही माँजने पड़ते हैं। कारण यह है कि मलीनता की उत्पत्ति भी अन्य बातों की तरह रोज ही होती है। एक बार की सफाई सदा का काम नहीं चला सकती। मन को एक बार स्वाध्याय, सत्संग चिन्तन, मनन आदि से शुद्ध कर दिया जाय तो समाधान होने के बाद भी वह सदा उसी स्थिति में बना रहेगा ऐसी आशा नहीं की जानी चाहिए।
अभी आकाश साफ है अभी उस पर धूलि,आँधी,कुहरा, बादल छाने लगें तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं। एक बार का समझा-समझाया हुआ मन सदा उसी निर्मल स्थिति में बना रहेगा इसका कोई भरोसा नहीं। मलीनता शरीर, वस्त्र, बर्तन, कमरे आदि को ही आये दिन गन्दा नहीं करती मन को भी प्रभावित आच्छादित करती है इसलिये यह आवश्यक समझा गया है कि अन्य सब मलीनताओं के निवारण की तरह मन पर छाने वाली मलीनता का भी नित्य परिष्कार आवश्यक एवं अनिवार्य मानकर चला जाय और उस परिशोधन को नित्य कर्मों में स्थान दिया जाय। उपासना का यही प्रयोजन है।
यह समझना भूल है कि पूजा करना ईश्वर पर ऐसा अहसान करना है जिसके बदले में उसे हमारी उचित अनुचित मनोकामनायें पूरी करनी चाहियें। ओछे स्तर के लोग ऐसा ही सोचते हैं और इसी प्रलोभन से पूजा-पत्री का औंधा-सीधा ठाठा रोपते हैं। आधार ही गलत हो तो बात कैसे बने - पार कैसे पड़े? पूजा करने वालों से दोस्ती और न करने वालों से ‘कुट्टी’। यदि ऐसी रीति नीति अपनाने लगे तो फिर ईश्वर को समदर्शी कैसे कहा जा सकेगा? फिर संसार में कर्तव्य और पुरुषार्थ की आवश्यकता क्या रहेगी? यदि पूजा द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके मनोकामनाएं पूर्ण की जा सकती हैं तो फिर इतने सस्ते और सरल मार्ग को छोड़कर क्यों कोई कष्ट साध्य गति-विधियाँ अपनाने को तैयार होगा? यदि यह तथ्य सही होता तो मन्दिरों के पुजारी सर्व मनोरथ सम्पन्न हो गये होते और साधु पण्डित जो ईश्वर का ही झण्डा उठाये फिरते हैं सर्व कामना सम्पन्न रहे होते। फिर उन्हें अभाव असन्तोष क्यों सताता? प्रत्यक्ष है कि यह वर्ग और भी अधिक दयनीय स्थिति में है। कारण कि उपासना को कामना पूर्ति का माध्यम समझा गया और आवश्यक कर्म निष्ठा से मुँह मोड़ लिया गया। इस गलत आधार को मान्यता मिल जाने से आस्तिकता का उपकार नहीं हुआ वरन् उसे असत्य और संदिग्ध मानने की अनास्था ही बढ़ी।
प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को मन की-जीवन की स्वच्छता को अत्यधिक महत्व पूर्ण मानना चाहिए और उसका साधन जुटाने के लिये उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। मन असीम क्षमताओं का भंडार है वह यदि मलीनताओं से भर जाय तो हमें अपार क्षति उठानी पड़ेगी। दाँत साफ न किये जायें तो उनमें कीड़ा लग जायगा और मुँह से बदबू आयेगी। शरीर को स्नान न करायें तो चमड़ी पर जमा हुआ मैल अनेक बीमारियाँ पैदा करेगा। मशीनों की सफाई न की जाय तो पुर्जों में जमा हुआ कीचड़ उनका ठीक तरह से काम करना ही असम्भव कर देगा। सफाई अपने आप में एक आवश्यक कर्म है। मेहतर, धोबी, कहार जैसे अनेक वर्ग इन्हीं कामों में जुटे रहते हैं। साबुन, फिनायल बनाने की फैक्ट्रियों से लेकर दन्त मञ्जनों तक के विशालकाय कारखाने गन्दगी के निराकरण के साधन बनाने में ही लगे रहते हैं। मन इन सबसे ऊपर है यदि उस पर निरन्तर चढ़ते रहने वाली मलीनता की उपेक्षा की गई तो वह बढ़ते चढ़ते इतनी अधिक हो जायगी कि हमारा अन्तरंग ही नहीं बहिरंग जीवन भी अव्यवस्थाओं और अवाँछनीयता से भरा-घिरा दीखेगा।
उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित करने की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि आन्तरिक स्वच्छता का क्रम बिना व्यवधान के निर्बाध गति से चलता रहे। नित्य का अभ्यास ही किसी महत्व पूर्ण विषय में स्थिरता और प्रखरता बनाये रह सकता है। यदि पहलवान लोग नित्य का व्यायाम छोड़ दें, फौजी सैनिक परेड की उपेक्षा कर दें तो फिर उनकी प्रवीणता कुछ ही दिन में अस्त-व्यस्त हो जायगी। स्कूली पढ़ाई छोड़ने के बाद जिन्हें फिर कभी पुस्तकें उलटने का अवसर नहीं मिलता वे उस समय के सारे प्रशिक्षण को भूल जाते हैं। याद केवल उतना ही अंश रहता है जितना काम में आता रहता है। मन की भी यही स्थिति है, वह पशु प्रवृत्तियों के निम्नगामी प्रवाह में तो अनायास ही बहता रहता है, पर यदि उसे उच्च स्तर पर बनाये चढ़ाये रहना हो तो पतंग उड़ाने वालों की तरह बहुत कुछ पुरुषार्थ करना होता है। पानी को कुँए से निकालने टंकी तक पहुँचाने में नित्य ही प्रयत्न करना पड़ता है पर नालियाँ अपने आप चलती रहती हैं। गिरा हुआ पानी अपने आप नीचे ढुलकता जाता है और उसको बिना किसी यन्त्र मशीन या प्रयास के नालियाँ बहाती रहती हैं। निकृष्ट बनना हो तो संचित पशु प्रवृत्ति को स्वच्छन्द छोड़ देना पर्याप्त है वे जीवन वृक्ष पर अमर बेल की तरह छा जायेंगी पर यदि उत्कृष्टता का उद्यान लगाना हो तो उसके लिए चतुर माली जैसा कला कौशल एवं मनोयोग नियोजित करना पड़ेगा। उपासना मनःक्षेत्र को सुरभित उद्यान की तरह फल फूलों से सदा लदा हुआ बनाने के कुशल पुरुषार्थ की तरह ही समझी जानी चाहिए। वस्तुतः मनोकामनायें पूर्ण करने का यह विवेक संगत एवं यथार्थ मार्ग है मन देवताओं का भी देवता है। यदि उसे साध सँभाल लिया जाय तो वह कल्पवृक्ष से कम नहीं अधिक ही उपयोगी एवं वरदानी सिद्ध होता है। उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था का ही नाम है।
आत्मोत्कर्ष में अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उपासना को अपने नित्य क्रम में सम्मिलित करना ही चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि हम ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं फिर उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने योजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी-जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार-बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है। यदि यह भोथरा होने लगे तो फिर कर्तृत्व का स्तर भी गिरने लगेगा इसलिए जहाँ अन्य अन्य अनेक कार्यों में समय लगाया जाता है वहाँ मन की मलीनता को स्वच्छ करने और उसे प्रखर बनाने के प्रयास को भी नित्य का एक आवश्यक कर्तव्य माना जाना चाहिए। पेट की भूख बुझाने के लिए बार-बार भोजन करना पड़ता है। आत्मा की भूख बुझाने के लिये भी उसे उपासना का आहार बार-बार नित्य ही- दिया जाना आवश्यक है।
गुरुदेव ने स्वयं अपने जीवन क्रम में उपासना को सर्वोच्च स्थान दिया। वे कहते थे पुरुषार्थ की प्रखरता में उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पर लौकिक पुरुषार्थ में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियमित रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिनोपाल लगा देने से-लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुए भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्म काण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
अपने संपर्क क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति से गुरु देव सदा यह आग्रह करते रहे-परामर्श देते रहे कि वे उपासना को अपने जीवन क्रम में एक नियमित नित्य कर्म को स्थान अवश्य दें। इस बार भी जब वे आये तो यह कहना न भूले कि सम्बद्ध परिजनों को उपासना क्रम में व्यवधान उत्पन्न न होने देने के लिए सचेत करते रहा जाय। जिनने अभी तक यथाक्रम उसे अपनाया नहीं है उनसे उस ओर कदम बढ़ाने के लिये अनुरोध किया जाय। हर विचारशील को समझाया जाय कि यह समय की बर्बादी नहीं वरन् उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की महत्व पूर्ण प्रक्रिया है।
अधिक प्रभावशाली साधनायें-तपश्चर्याएं अनेक हैं। उन्हें कार्यान्वित एवं फलित करने की सम्भावना तभी रहेगी जब प्रारम्भिक उपासना क्रम ठीक से चलने जमने लगे। एक दम उछल कर चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, समाधि, ईश्वर दर्शन जैसे प्रसंगों के लिए लालायित होना मञ्जिल पार करने का राजमार्ग है। यदि ऐसा न होता तो स्वयं गुरु देव को क्यों पैंतालीस वर्ष पापड़ बेलने पड़ते और अब इस वृद्धावस्था में भी क्यों अपने को इस तरह धुनते। कोई जादू ही तुर्त-फुर्त चमत्कार दिखा सकता है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जल्दबाजी का जादू अस्थिर होता है। बाजीगर दस मिनट में झोली में से गुठली से आम का पौधा और उस पौधे पर फल लगा देता है पर वह छलावा भर होता है यदि वह बात वास्तविक होती तो बाजीगर पैसे-पैसे को हाथ न फैलाता-अब तक आमों का विशाल व्यापार करके लखपति करोड़पति बन गया होता।
कतिपय बहुमूल्य परामर्श गुरु देव समय-समय पर सम्बन्धित व्यक्तियों को देते रहे हैं। इस बार उन्होंने फिर उस परामर्श को दुहराया और कहा जिन पर अपना कुछ प्रभाव हो उनसे अनुरोध ही नहीं आग्रह स्तर पर भी उपासना में नियमितता बनाये रखने या आरम्भ करने के लिए कहा जाय। जो कर रहें हैं उनसे कहा जाय कि भले ही वे अपनी पूजा विधि के बाहरी स्वरूप को अपनी रुचि और परम्परा के अनुसार बनाये रहें पर उसमें भावना का प्राण अवश्य जोड़ें। अनेक मत मतान्तरों की पूजा प्रक्रिया भिन्न हो सकती है। पर उनके भीतर भावनात्मक तथ्य तो समुचित मात्रा में रहना ही चाहिए। जब तक गायत्री परिवार के संगठन का- गायत्री के महामंत्र के प्रचार विस्तार का उत्तरदायित्व का कार्य उनके कंधों पर था तब तक वे केवल गायत्री मन्त्र की महिमा और विधि ही बताया करते थे पर अब जबकि विश्वव्यापी भावनात्मक नव निर्माण का उच्च स्तरीय कार्य उन्हें सौंपा गया है तो उन्होंने विभिन्न रुचियों और मान्यताओं के अनुरूप चली आ रही परम्पराओं के समन्वय में कुछ कहना बन्द कर दिया है। उनका स्वयं का अटूट विश्वास एवं साधना क्रम अभी भी गायत्री मन्त्र ही है क्योंकि इससे बढ़कर समर्थ माध्यम उन्हें दूसरा दीखता नहीं। फिर वे दूसरों को अपनी रुचि पर चलने में भी बाधक नहीं बनते और कहते हैं कि यदि भावना की मात्रा अभीष्ट मात्रा में जुड़ी रहे तो कोई भी विधि व्यवस्था मानसिक परिष्कार में सहायक हो सकती है।
उपासना क्रम के अभ्यासियों को उच्चस्तरीय अनुदान भी साधना क्षेत्र में मिल सकते हैं। सम्भव है अगले दिनों उन्हें अपने तप अंश का कुछ प्रत्यावर्तन जीवन्त आत्माओं में करना पड़े इस बीज बोने का ठीक परिणाम निकले। इसके लिये यह आवश्यक है भूमि जोतने और उसमें नमी रखने का प्रयास पहले से ही चलता रहा हो। जो भूमि न जोती गई है-न जिसमें खाद पानी की मात्रा है उसमें बहुमूल्य बीज या पौधे का आरोपण भी निरर्थक चला जायगा। इसलिए आवश्यक है कि इस दिशा में प्रगति की सच्चे मन से आकाँक्षा करने वाले अपने नित्य कर्म में उपासना की प्रक्रिया को सम्मिलित कर लें।
मुक्ति प्राप्त करने में वेशभूषा बाधक नहीं। वेश चाहे साधु का हो या गृहस्थ का, वास्तविकता तो यह है कि अन्तरात्मा में साधुत्व आना चाहिए। कोई मनुष्य यह सोचकर कि गृहस्थाश्रम में मुक्ति होती ही नहीं, साधना न करे, धर्म-क्रिया न करे तो वह उसकी निरी मूर्खता है। आत्म-विकास और साधना के लिए तो हर पल उपयुक्त है। गृहस्थ के लिए भी साधना-पथ और आत्म-उज्ज्वलता के द्वार उसी तरह से खुले हैं, जिस तरह से साधु, साध्वियों के लिये। वह अपनी आत्मा को साधना पथ में लगाकर कर्मफल को भस्मीभूत कर दे। -आचार्य श्रीतुलसी
सार्वभौम और सर्वजनीय उपासना में कर्म काण्ड परक स्वेच्छा की भिन्नता रह सकती है पर उसके भाव पक्ष में एक रूपता रखनी ही होगी। अस्तु हमें उसी दृष्टिकोण को अपनाकर चलना चाहिए।
भजन, चिन्तन, मनन और समापन इन चार भागों में हमें अपनी उपासना पद्धति को विभाजित कर लेना चाहिए।
भजन का अर्थ है ईश्वर की समीपता-उसे अपने में और अपने को उसमें ओत-प्रोत होने की समर्पण अथवा अवतरण परक ध्यान धारणा।
चिन्तन का अर्थ है अपने स्वरूप का-लक्ष्य तथा कर्त्तव्य का स्पष्ट चित्र मनोभूमि में प्रखर करना।
मनन का अर्थ है-जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट आदर्शों का अपने जीवन क्रम में-गुण कर्म स्वभाव में कितना समन्वय को सका इसका विश्लेषण और जो न हो सका उसकी पूर्ति के लिए आयोजन-नियोजन।
समापन का अर्थ है- हर समय अपने मानसिक चिन्तन और शारीरिक कर्तृत्व पर पर्यवेक्षक अफसर-अधिकारी की तरह निरीक्षण, नियन्त्रण तथा अव्यवस्था का तत्काल निराकरण।
इन चार आधारों का व्यावहारिक रूप यह हो सकता है कि जब भी शरीर शुद्धि के उपरान्त भजन के लिए बैठा जाय तो अपना निर्धारित कर्म काण्ड करते समय इस भावना को प्रबल किया जाय कि हम और ईश्वर दोनों अति समीप और अति घनिष्ठ बन कर बैठने वाले हैं और दोनों की द्वैत सत्ता के एकीकरण का आधार जुटाया जा रहा है। शरीर शुद्धि इसलिये आवश्यक है कि उसके साथ मन की शुद्धि का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। मलीन स्थान, मलीन काया, मलीन वस्त्र मलीन उपकरण, यदि पूजा के अवसर पर भी बने रहें तो मन में भी मलीनता की ही घटा छाई रहेगी। इसलिये न केवल शरीर ही शुद्ध करना चाहिए वरन् पूजा के स्थान एवं उपकरणों को भी अधिक से अधिक स्वच्छ करने का प्रयत्न करना चाहिए।
बूढ़े, बीमार, कमजोर व्यक्तियों को स्नान सम्बन्धी छूट मिल सकती है। जिन्हें शीत ऋतु का प्रभाव सहन न होता हो वे बिना स्नान के भी उपासना कर सकते हैं। गुरु देव को भी कभी-कभी जब बर्फीले तूफान आते हैं तब स्नान की सुविधा न होने से उसका व्यतिक्रम करना पड़ा पर इससे उपासना क्रम को भी छोड़ बैठना उचित नहीं समझा गया। हाँ मल मूत्र का त्याग-हाथ, पैर, मुख आदि की शुद्धि और शुद्ध वस्त्र धारण जैसी व्यवस्था तो बना ही लेनी चाहिए।
अपने किसी परम प्रिय और सम्मानित स्नेही के घर पर पधारते समय जो स्वच्छता सतर्कता बरती जाती है लगभग वैसी ही तैयारियाँ पूजा अवसर पर करनी चाहियें। और भी आगे बढ़ें तो पत्नी जिस तरह स्वच्छ सुसज्जित होकर सुहाग रात को पति के पास जाती है लगभग वैसी ही शारीरिक मानसिक स्थिति में पूजा के स्थल पर बैठना चाहिए। पूजा उपकरण भले ही थोड़े हों, सस्ते हों पर उन्हें स्वच्छ और सुसज्जित रखने में कसर नहीं उठा रखनी चाहिए। भजन, जप, पूजन इसी भावना के साथ करना चाहिए कि सचमुच परम सत्ता का विशेष अवतरण अपने समीप हो गया और उसका शिष्टाचार परक स्वागत सम्मान सम्पन्न किया जा रहा है। बहुत आगे चलकर यह भजन क्रम विशुद्ध मानसिक भी हो सकता है तब किसी वस्तु या क्रिया कलाप की आवश्यकता नहीं रहती पर आरम्भिक साधकों को तो पूजा के सभी साधन जुटाने चाहिएं और निर्धारित विधि विधान के साथ जप, पाठ, पूजन आदि सम्पन्न करने चाहिएं। गायत्री उपासकों के लिए गायत्री महाविज्ञान में तथा समय पर लेखों में सारा विधान बताया जा चुका है उसी की पुनरावृत्ति यहाँ आवश्यक नहीं।
पूजा परक कर्म काण्डात्मक विधान ईश्वर की समीपता का और उनके स्वागत सम्मान का प्रयोजन पूरा करता है। इसके बाद द्वितीय चरण ध्यान का है। गुरु देव का परम प्रिय और अनुभूत ध्यान यह है कि-अपने आपे को ईश्वर में समर्पित कर दिया गया और दिव्य सत्ता अपने में ओत-प्रोत हो गई। बिजली का करेंट जब हीटर के तारों में आता है तो वे लाल हो जाते हैं। उसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता के अपने भीतर अवतरण होने से अपना रोम-रोम उसी से भर गया और हीटर के तारों की तरह लाल हो गया। जैसे घी अग्नि में डालने पर वह अपना पूर्व स्वरूप खो बैठता है और मात्र लपट के रूप में दीखता है। उसी प्रकार यह अनुभूति होनी चाहिए कि अपना आपा पूर्णतया ईश्वरीय सत्ता में समर्पित कर दिया, अहंता समाप्त हो गई और जो कुछ है वह अग्नि की लपट के रूप में ईश्वर की सत्ता के रूप में है। यह ध्यान बहुत ही महत्वपूर्ण है। अपने दोष दुर्गुणों के ईश्वरीय अग्नि में जल जाने और दिव्य तत्वों के अपने शरीर, मन तथा अन्तःकरण में भर जाने की मान्यता इस ध्यान से निरन्तर पुष्ट और प्रत्यक्ष होती चलती है।
साकार उपासक ईश्वर के किसी रूप की कल्पना कर सकते हैं और उसके साथ मानवी रिश्तों में से कोई भी रिश्ता जोड़ कर घनिष्ठता, समीपता और प्रेम भावना से भरी पूरी उमंगों की उस स्तर के क्रिया कलाप की-अनुभूति कर सकते हैं। जप के साथ भी इस तरह का ध्यान किया जा सकता है और बिना जप के भी। अपनी मनोभूमि के अनुसार जो भी ठीक पड़ता हो उसी क्रम को अपना लेना चाहिए।
भगवान को आकाश में सूर्य की तरह चमकते हुए और उसके प्रकाश एवं ऊष्मा से अपने शरीर मन एवं अन्तःकरण को ज्योतिर्मय होने का ध्यान भी कई साधकों को अधिक रुचिकर लगता है।
यह ध्यान, जप के साथ भी हो सकता है और अलग भी। पाठ पूजन में चूँकि मन उन क्रिया कलापों से बँधा रहता है इसलिये उनके साथ तो समीपता स्वागत जैसा भाव ही रहता है पर जप के साथ ध्यान चल सकता है। माला यदि ध्यान में व्यवधान उत्पन्न करे तो समय की नियमितता के लिए घड़ी से भी काम चल सकता है। जप पूजन में पन्द्रह मिनट और ध्यान में पन्द्रह मिनट कम से कम आधा घण्टा तो उपासना में लगाना ही चाहिए। इससे अधिक जिससे जितना बन पड़े-कर सकते हैं। दिन में कई बार किया जा सकता है। ध्यान की यह प्रक्रिया तो ऐसी है कि मानसिक जप की तरह उसे कभी भी सुविधा और अवकाश के समय किया जा सकता है।
चिन्तन और मनन की एक ही प्रक्रिया समझी जा सकती है। उसे दो खण्डों में विभक्त माना जा सकता है। इसके लिए सर्वोत्तम समय वह है जब प्रातःकाल आँख खुल जाती है और शैया त्यागने की तैयारी में थोड़ी देर करवटें बदली जाती हैं। आमतौर से लोग आँख खुलते ही शैया त्याग नहीं कर देते वरन् कुछ समय ऐसे ही उनींदे पड़े रहते हैं। यह समय सुविधा का है। मल-मूत्र त्यागने के बाद भी कुछ समय एकाँत में बैठकर या बिस्तर में लेट कर यह चिन्तन-मनन की प्रक्रिया चलाई जा सकती है। कम से कम पन्द्रह मिनट तो इसमें भी लगाने चाहियें। चिन्तन करना चाहिये कि अपना आपा-ईश्वर का अंश पुत्र और प्रतिनिधि, शुद्ध, निर्विकल्प दिव्य चेतना एवं दिव्य क्षमताओं से परिपूर्ण है। अपना शुद्ध स्वरूप यही है, शरीर और मन अपने दो औजार-वाहन हैं। इन्हें अपने से पृथक रखकर दो सेवकों के रूप में देखने समझने की मान्यता विकसित करनी चाहिए। चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ सुर-दुर्लभ कलेवर प्रदान करने का ईश्वरीय प्रयोजन, एक आदर्श मनुष्य का उदाहरण प्रस्तुत करना समझा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अपनी सृष्टि को सुन्दर सुविकसित, समुन्नत एवं सुव्यवस्थित करने के लिए उसे अपने सहायक प्रतिनिधि के रूप में इस संसार में भेजा है। जीवन की सार्थकता, आत्मिक पवित्रता और लोक मंगल में तत्परता बढ़ाते रहने से ही सम्भव हो सकती है। इस तथ्य को गहराई तक हृदयंगम करने की विचारणा को ही चिन्तन माना जाना चाहिए। इसे आत्म-बोध या आत्म-जागरण साधना भी कह सकते हैं।
मनन इसी चिन्तन प्रवाह का पूरक है। अपनी मानसिक गति-विधियों और शारीरिक क्रिया कलापों का शवच्छेद विश्लेषण करना चाहिए और देखना चाहिए कि मनुष्यता के आदर्शों में से कितना अंश गुण, कर्म, स्वभाव में सम्मिलित हो गया। उपलब्धियों पर सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और जो कमी दिखाई पड़े उन्हें पूरा करने के लिये क्या किया जाय? कैसे किया जाया? कब किया जाय? इस पर विचार करना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि आदर्शों का धर्म मान्यताओं का कहना, सुनना, पढ़ना, जानना ही पर्याप्त नहीं वरन् उन्हें क्रिया कलाप में भी समन्वित किया जाना चाहिए। लोभ, मोह, कायरता जैसी कौन कमजोरियाँ हैं जो जीवन को आदर्श बनाने में अड़चन उत्पन्न करती हैं; उन दुष्प्रवृत्तियों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानना और उनके उन्मूलन के लिये आत्मबल जगाना मनन का महत्व पूर्ण अंग है। विचारणा के इन क्षणों में यह योजना बनानी चाहिए कि अपनी हेय गति विधियों को कैसे छोड़ा जा सकता है। आदर्श महा मानव बनने के लिए क्या कदम उठाया जा सकता है? इस परिवर्तन का आरम्भ कैसे किया जाय और अन्त कहाँ किया जाय? इस प्रकार योजनायें बनाना और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए मन को वैसा ही उद्बोधन देना चाहिए जैसा कि जामवन्त ने समुद्र लाँघने के लिये हनुमान को दिया था। चिंतन की प्रक्रिया को प्रगति पथ पर बढ़ चलने की योजना व्यवस्था भी कह सकते हैं। इसे प्रातः काल चारपाई पर पड़े या एकान्त में बैठे, लेटे तो नित्यकर्म के रूप में करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब भी एकान्त हो-मन खाली हो तब उसी दिशा में उधेड़-बुन आरम्भ कर देनी चाहिए।
समापन जागने से लेकर सोने तक निरन्तर चलते रहने वाले निरीक्षण नियंत्रण एवं निराकरण का क्रम है। जिसे प्रत्येक शारीरिक और मानसिक क्रिया कलाप के साथ जोड़ कर रखना चाहिए। समझना चाहिए शरीर और मन हमारे दो नौकर हैं, हम उनके ऊपर निरीक्षक नियंत्रण कर्त्ता, उनकी प्रत्येक हरकत पर कड़ी नजर रखनी चाहिये और देखना चाहिए कि वे हरामखोरी या बदमाशी तो नहीं कर रहे हैं। मस्तिष्क में अशुभ चिन्तन तो नहीं चल रहा- शरीर असुर कर्म तो नहीं कर रहा। ऑटोमेटिक मशीनें अपने आप चलती रहती हैं और उनके निरीक्षक मशीन की गति विधियों को सतर्कता पूर्वक बैठे देखते रहते हैं। जहाँ तनिक सी भी कोई गड़बड़ी दिखाई पड़ती है तुरन्त सुधारते हैं। अपनी जिम्मेदारी समझते हैं कि यदि मशीनों ने गड़बड़ की तो उस निरीक्षक के कान खींचे जायेंगे। ठीक यही दृष्टि जागृति के प्रत्येक क्षण में बनाये रखनी चाहिये और असुर चिन्तन अथवा अशुभ कर्म का आरम्भ होते ही उसे प्रचण्ड विरोध करके निरस्त करना चाहिए।
समापन का अर्थ अनुचित को निरस्त करना ही नहीं वरन् उचित को प्रोत्साहित एवं योजना बद्ध बनाना भी है। हर दिन सावधानी के साथ सवेरे ही दिनचर्या बना लेनी चाहिए और समय का एक क्षण भी व्यर्थ न जाने पाये तथा इन दोनों सेवकों को उपयुक्त कर्तव्य में जुटाये रखा जाय यह भी आवश्यक है। ‘हर दिन नया जन्म-हर रात नई मौत’ के सूत्र को व्यवहार में कार्यान्वित करते हुए हर नया दिन पिछले दिनों की अपेक्षा अधिक संतोषजनक उपलब्धियों से भरा हुआ रहे इसका प्रयत्न करना चाहिये। रात्रि को सोते समय दिन भर के क्रिया कलापों का लेख-जोखा लेना चाहिए और अगले दिनों भूलों को सुधारने तथा सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने का संकल्प लेकर सोना चाहिए।
भजन, मनन, चिन्तन और समापन की गतिविधि उपासना पद्धति गुरु देव के प्रत्येक परिचित और संपर्क में रहने वाले को आरम्भ कर देनी चाहिए। इस प्रकार जोती हुई भूमि में उनके लिए उन विभूति वृक्षों का आरोपण सम्भव होगा जिनकी कि इन दिनों वे पौध तैयार कर रहे हैं।
महाभाग कौत्स कठोर तप साधना में संलग्न थे। देवराज इन्द्र उनके पास गये और पूछा-किस प्रयोजन के लिए आपका तप है भगवन्, मुझे आज्ञा दीजिये कि आपका अभीष्ट प्रस्तुत करूं। कौत्स ने कहा-देव, केवल आत्म-शुद्धि के लिए तप कर रहा हूँ। यह आन्तरिक अशुद्धि ही अभावों और कामनाओं से जीव को संतप्त करती है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम संदेश देते हुए गुरु देव ने कहा-प्रत्येक परिजन को पेट और प्रजनन की पशु प्रक्रिया से ऊँचे उठकर उन्हें दिव्य जीवन की भूमिका सम्पादित करने के लिये कुछ सक्रिय कदम बढ़ाने चाहिएं। मात्र सोचते विचारते रहा जाय और कुछ किया न जाय तो काम न चलेगा। हममें से प्रत्येक को अधिक ऊँचा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और कर्तव्य में ऐसा हेर-फेर करना चाहिए जिसके आधार में परमार्थ प्रयोजनों को अधिकाधिक स्थान मिल सके। उपलब्ध विभूतियों और सम्पदाओं को अपने शरीर और अपने परिवार के लिए सीमित नहीं कर लेना चाहिए वरन् उनका एक महत्व पूर्ण अंश लोक मंगल के लिये नियोजित करना चाहिए।
हर एक को यह समझ लेना चाहिए कि दृष्टिकोण के परिष्कार गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता और परमार्थ प्रयोजनों में तत्परता अपनाये बिना कभी किसी की आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं। ईश्वर उपासना और साधनात्मक गति विधियाँ अपनाने का प्रभाव परिणाम भी इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का विकास होना चाहिए अन्यथा वह जप भजन भी एक चिह्न पूजा बनकर रह जायगा और उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
उपासना एवं जीवन साधना का श्रेष्ठ किन्तु सरल रूप क्या हो सकता है इसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। उस दिशा में एक-एक कदम हर किसी को उठाना चाहिये और ‘इन दोनों गति विधियों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित कर लेना चाहिए।
गुरु देव ने कहा-प्रत्येक जागृत आत्मा को क्रमबद्ध रूप से इस संगठन सूत्र में आबद्ध हो जाना चाहिए। युग-निर्माण परिवार की नियमित सदस्यता स्वीकार कर लेनी चाहिए और भावनात्मक नव निर्माण के लिए एक घण्टा समय और दस पैसा जैसे प्रतीकात्मक अनुदान को नियमित रूप से बिना किसी ढील-पोल के आरम्भ कर देना चाहिए। इस क्रम में व्यतिरेक न आने पाये इसलिए ‘ज्ञान घट’ की स्थापना आवश्यक है। उस बन्धन के सहारे नियमितता टूटने नहीं पायेगी और परिवार की सदस्यता के साथ आत्मिक प्रगति का क्रम यथावत् चलता रहेगा।
जहाँ एक पत्रिका अखण्ड-ज्योति ही मँगाई जाती है वहाँ प्रयत्न करके पाक्षिक युग निर्माण मँगाना भी आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि युग परिवर्तन के महान अभियान का मार्ग दर्शन एवं स्वरूप उसी के प्रकाश में जाना जा सकता है । जो मँगाते नहीं हैं उन्हें भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि कहीं से माँग कर पढ़ लें। अब उस की उपयोगिता भी अखण्ड -ज्योति जितनी हो गई है।
जो पचास वर्ष के हो गये । जिनके बड़े बच्चे अपने छोटे भाई बहिनों का उत्तरदायित्व संभालने में समर्थ हो गये अथवा जिनके पास गुजारे के लिए दूसरे साधन मौजूद हैं उन्हें अधिक कमाने और बेटे पोतों के लिये अधिक संग्रह करने की ललक छोड़ देनी चाहिए। यह लिप्सा अब बहुत पीछे युग की बात रह गई। समाजवाद का युग बिलकुल निकट आ गया। संग्रहीत पूँजी का लाभ कोई न उठा सकेगा। हर किसी को रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना पड़ेगा। अमीरी अब गये गुजरे जमाने की बात हो चली। राजाओं के राज गये-जमींदारों की जमींदारी-महन्तों की महन्ती भर रही है। समानता की लहरें आकाश-चूम रही हैं। धनी और हरामखोर व्यक्ति अगले दिनों सम्मान नहीं तिरस्कार प्राप्त करेंगे। घृणित समझे जायेंगे और बुरी तरह मरेंगे। इसीलिए समय रहते उस विपत्ति भरी कुरुचि को समय से पूर्व ही छोड़ देना चाहिए और जो समय लोभ एवं मोह की पूर्ति में लगाया जा रहा है, उसे लोक मंगल के लिये नियोजित करने की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता दिखानी चाहिए। समर्थ व्यक्तियों को ऐसी ही हिम्मत दिखाने की आवश्यकता है।
जहाँ कला, प्रतिभा, बुद्धि, कुशलता, सम्पदा जैसी ईश्वर प्रदत्त अतिरिक्त विभूतियाँ हैं उनकी जिम्मेदारी और भी अधिक है। इस ईश्वरीय अमानत को वे गुलछर्रे उड़ाने के लिए नहीं विश्व मानव को सुविकसित समुन्नत बनाने के लिये पवित्र धरोहर समझें और उसका उसी रूप में प्रयोग करें। न करेंगे तो सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा ऐसे विभूतिवान व्यक्ति ईश्वर के दरबार में अधिक बड़े अपराधी ठहराये जायेंगे और अधिक दण्ड के भागी बनेंगे। भावी पीढ़ियाँ भी उन्हें घृणास्पद ही मानेंगी।
समाज को ईश्वर की प्रत्यक्ष प्रतिमा मानना चाहिए और अपने पुण्य परमार्थ की सत्प्रवृत्ति को भावनात्मक नव निर्माण की श्रेष्ठतम युग साधना में नियोजित करना चाहिये। न्यूनतम समय एक घण्टा और न्यूनतम राशि - ही इस कार्य के लिए अनिवार्य मानी गई है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि 8 घण्टे सोने 8 घण्टे आजीविका उपार्जन और 4 घण्टा फुटकर कामों में खर्च करने के उपरान्त 4 घण्टा प्रतिदिन लोक मंगल के लिए लगाये जायें और महीने में एक एक दिन की आमदनी नव निर्माण के लिए लगाने के उदारता दिखाई जाय।
जहाँ थोड़े भी परिवार हैं वहाँ उन्हें संगठित हो जाना चाहिए। युग निर्माण परिवार बना लेना चाहिए और यदि न्यूनतम संख्या ही है तो भी उन्हें टोली बनाकर जन संपर्क के लिये निकलना चाहिये और नये युग की विचारणा एवं प्रक्रिया से सर्व साधारण को परिचित कराने के लिये निकलना चाहिये।
शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।
एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।
यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’
राविया से किसी ने पूछा किस सूरत में खुदा बन्दे से राजी होता है? उनने जवाब दिया-जब वह अपनी मेहनत पर सब्र करता है जो खुदा देता है उसे शुकर के साथ कबूल करता है।
किसी ने पूछा-अल्लाह की राह पर किस तरह चला जाय। राविया ने कहा-यह मंजिल दिल पर सवार होकर पूरी की जाती है। हाथ-पैरों की उस राह में कोई पहुँच नहीं है।
तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।
परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।
विश्वव्यापी परिवर्तन की यथार्थता का एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि युग-निर्माण परिवार का उत्साह अब समुद्र की तरह हिलोरें ले रहा है। हर सदस्य सक्रिय हो उठा है और हर कार्यकर्त्ता में कर्मठता का असाधारण समावेश हुआ है। जिसके लिए बार-बार आग्रह अनुरोध किया जाता था अब वह इतना स्वाभाविक, इतना सरल और इतना अभ्यस्त हो गया है कि उसे बिना किये किसी को चैन नहीं पड़ता। यह शुभ चिह्न है। थर्मामीटर में पारे की रेखा चढ़ी हुई देखकर रोगी के शरीर का तापमान जान लिया जाता है। समाज में कितना परिवर्तन आ रहा है- नव निर्माण की कितनी सुनिश्चित पृष्ठभूमि बन रही है इसका अनुमान परिवार के सदस्यों और कार्यकर्त्ताओं में फूटी पड़ रही उमंगों और हिलोरों को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है।
जिस प्रकार नशा, जुआ आदि व्यसनों में ग्रस्त लोगों को अपनी लत पूरी किये बिना चैन नहीं पड़ता, उससे भी अधिक बेचैनी इन नव निर्माण कल्पवृक्ष के ‘अमर फलों’ में दीख पड़ रही है। पचास वर्ष से अधिक आयु के अपने बच्चों के उत्तरदायित्व पूरे करके अब वानप्रस्थ परम्परा को मूर्तिमान करने के ला आगे बढ़ते चले आ रहे हैं। स्वजन सेना की बढ़ती हुई संख्या एवं तत्परता को देखकर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब युग-निर्माण योजना एक यथार्थता बनकर युग परिवर्तन के रूप में सामने खड़ी दिखाई देगी।
इस सृजन सेना को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। बन्दूक चलाने, कवायद करने और पोजीशन लेने की शिक्षा पाये बिना बहादुर सैनिक भी युद्ध मोर्चे पर जौहर नहीं दिखा सकते। रेल मोटर जैसे यन्त्र चलाने की ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। फिर सृजन सेना का काम बिना साँगोपाँग शिक्षण के कैसे चलेगा। अब यह आवश्यकता इतनी प्रचण्ड हो गई है कि उसकी पूर्ति किये बिना और कोई चारा नहीं।
बाल-विवाह, अनमेल विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय जैसे सामाजिक अनाचारों का उन्मूलन करने के लिए प्रचण्ड संघर्ष करना होगा और उनके स्थान पर आदर्श विवाहों की - सामूहिक विवाहों की व्यापक लहर चलानी होगी। मृत्यु भोज, पशु बलि जैसी कुप्रथायें हिन्दू धर्म को कलंकित करती हैं। भिक्षा व्यवसाय से यह पुरुषार्थियों की कर्मभूमि भिखमंगों से भर गई है। नारी के रूप में भारत की आधी जनता पिंजड़े में बन्द कैदी की तरह अपंग और असहाय बनी हुई है। जाति-पाति ने राष्ट्र को खण्ड-खण्ड करके रख दिया है। छुआछूत ने मनुष्य के जन्मजात नागरिक अधिकारों का हनन करके एक बहुत बड़े वर्ग को पिछड़ी पददलित स्थिति में पटक दिया है। अस्वच्छता हमारी आदत बन गई है। बेईमानी, भ्रष्टाचार, अनाचार का हर क्षेत्र में बोलबाला है। राजनीति, धर्म, व्यापार, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में अन्धेर मचा हुआ है। इस व्यापक असुरता के विरुद्ध लोहा लेने वाली ‘सृजन सेना’ खड़ी तो हो गई पर उसको शस्त्र संचालन और मोर्चा सँभालना भी तो सिखाना ही पड़ेगा। अब इसी की व्यवस्था की जा रही है।
प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक त्रिविधि क्रिया कलापों की शत सूत्री योजनाओं को कार्यान्वित करने नव निर्माण के मार्ग में आने वाले व्यवधानों से निपटने का क्रिया कलाप पूरी तरह सैन्य शिक्षा स्तर का है। इसके लिए कार्यकर्त्ताओं के व्यक्तित्व को उभारना भी शामिल है ताकि वे अपने चुम्बकत्व से जन मानस को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो सकें। यह प्रशिक्षण सुविस्तृत, गम्भीर तथ्यों से परिपूर्ण है। इसके लिये सामान्यतया एक वर्ष की शिक्षा होनी चाहिए। बच्चों को पढ़ाने वाले अध्यापकों तक की ट्रेनिंग एक दो वर्ष की होती है तब जन मानस को प्रशिक्षित करने-लोक नेतृत्व का उत्तरदायित्व वहन करने वालों की शिक्षा भी कम से कम एक वर्ष की होनी चाहिए। तैयारी उसी के लिए करनी होगी। पर समय की माँग इतनी विकट है और - शिक्षार्थियों की संख्या इतनी अधिक है एवं शिक्षण साधन इतने कम हैं कि उस प्रशिक्षण काल में फिलहाल भारी कटौती करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहा। आपत्ति कालीन स्थिति में सैन्य शिक्षा की अवधि भी घटा दी जाती है। फिलहाल हमें भी इसी मार्ग को अपनाना होगा। निश्चय यह किया गया है कि कार्यकर्त्ताओं के शिक्षण शिविर वर्ष में चार बार हुआ करेंगे। प्रत्येक की अवधि तीन-तीन महीना होगी। पहला शिविर जुलाई, अगस्त, सितम्बर। दूसरा अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर। तीसरा जनवरी, फरवरी, मार्च। चौथा अप्रैल, मई, जून। इस प्रकार तीन-तीन महीने के चार शिविर गायत्री तपोभूमि में चला करेंगे। एक वर्षीय पाठ्य-क्रम की व्यवस्था पीछे की जायगी फिलहाल शिविर पद्धति अपनाकर तात्कालिक आवश्यकता ही पूरी करनी पड़ेगी।
हर कार्यकर्त्ता को बहुत कुछ करना है। हर शाखा को अपना समीपवर्ती क्षेत्र सँभालना है। हर कार्यकर्त्ता को जन नेतृत्व का भार उठाना है। सृजन सेना के हर सैनिक को असुरता के विरुद्ध हर मोर्चे पर लड़ना है। यह सब कैसे हो इसकी सैद्धान्तिक शिक्षा समय-समय पर मौखिक और लिखित रूप से छुट-पुट करके ही दी जाती रही है।
अब समय की माँग है वह सब क्रमबद्ध रूप से-व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष क्रिया कलाप के साथ सिखाया समझाया और अभ्यस्त कराया जाय। प्रस्तुत योजना के अनुसार इसी आवश्यकता की पूर्ति की जायगी।
इस तीन मास के प्रशिक्षण में शिक्षार्थियों को अतिव्यस्त रहकर लगभग उसी स्तर का श्रम करना पड़ेगा जिस तरह का कि विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में करते हैं। इसी तत्परता को लेकर शिक्षार्थियों को आना चाहिए अन्यथा एक वर्ष वाली शिक्षा वे तीन मास जितने स्वल्प काल में कैसे हृदयंगम कर सकेंगे।
शिक्षण प्रक्रिया में प्रायः सभी महत्व पूर्ण विषयों का समावेश किया गया है। जहाँ विश्व सम्पदाओं के स्वरूप उनके परिणाम और प्रभाव का परिचय कराया जायगा वहाँ उनके समाधान का व्यापक हल भी समझाया जायगा ताकि वे अन्य लोगों को प्रस्तुत योजना से प्रभावित एवं आकर्षित कर सकें। नव निर्माण के जो आधार युग परिवर्तन के लिए प्रयुक्त किये जा रहे हैं वे ही क्यों सर्वोपरि महत्व के समझे गये इसकी तात्विक जानकारी शिक्षार्थियों को मिलेगी, बौद्धिक दृष्टि से परिपक्व होकर ही लोक नेतृत्व के क्षेत्र में सफल प्रवेश किया जा सकता है।
जन मानस को प्रभावित करने के लिए आवश्यक उपकरणों के प्रयोग की आवश्यक शिक्षा दी जायगी। प्रकाश चित्र यन्त्र (स्लाइड प्रोजेक्टर) लोक रञ्जन के साथ लोक शिक्षण का सस्ता अति प्रभावशाली एवं आकर्षक माध्यम सिद्ध हो चुका है। इसे किस प्रकार प्रयोग किया जाय यह इस शिक्षा का महत्व पूर्ण विषय है। लाउडस्पीकर प्रायः हर सम्मेलन आयोजन की आवश्यकता बन गये हैं उनका प्रयोग-टेपरिकार्डरों के माध्यम से गुरु देव का सन्देश जन-जन तक पहुँचाना, ग्रामोफोन रिकार्डों से प्रेरक संगीत की धारा प्रवाहित करना-आवश्यक है। इसके लिये इन कार्यों में प्रयोग होने वाले (1) स्लाइड प्रोजेक्टर (2) लाउडस्पीकर (3) टेप रिकॉर्डर (4) रिकार्ड प्लेयर यन्त्रों के प्रयोग करने की यान्त्रिक जानकारी दी जायेगी साथ ही गीता-कथा, रामायण कथा, कीर्तन तथा युग-निर्माण योजना के चुने हुए प्रमुख गीतों की धुनें बजा सकने योग्य संगीत सिखाया जायगा।
भाषण कला की प्रवीणता, इन्हीं दिनों के अभ्यास से उत्पन्न की जायगी। अगले दिनों युग-निर्माण सम्मेलनों की, पर्व आयोजनों की, विचार गोष्ठियों की बाढ़ आने वाली है, इन माध्यमों का उपयोग करके प्रभावशाली लोक शिक्षण कैसे किया जाय इसकी महत्वपूर्ण बारीकियाँ इन्हीं दिनों समझा दी जायेंगी 7-7 दिन के रामायण सप्ताह गीता सप्ताह समारोह मनाये जाने हैं उनका आयोजन कैसे किया जाये इससे शिक्षार्थियों में प्रवीणता उत्पन्न की जायगी। युग-निर्माण विद्यालय का संचालन, महत्ता, संगठन, व्यायामशालायें, पुस्तकालय बोलती दीवारें, हस्ताक्षर अभियान, हरियाली उत्पादन से लेकर विचार क्रान्ति—नैतिक क्रान्ति एवं बौद्धिक क्रान्ति के प्रायः सभी पक्ष किस प्रकार व्यवहार में लाये जायें यह इन शिविरों में सिखा दिया जायगा।
हर सक्रिय कार्यकर्त्ता को इसमें सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए। शाखाओं को अपने प्रतिनिधि भेजने चाहिएं। जिन्हें 1 जुलाई से आरम्भ होने वाले प्रशिक्षण शिविर में सम्मिलित होना हो उन्हें गायत्री तपोभूमि, मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। भोजन व्यय जो लगभग 40 रु0 मासिक होगा। शिक्षार्थियों को स्वयं ही वहन करना होगा।
भारतीय धर्म और संस्कृति की गरिमा अपनी परम्पराओं और मान्यताओं के अनुरूप होने के कारण प्रतिपादित नहीं की जा रही है, वरन् उसे इसलिये महत्व दिया जा रहा है कि उसमें समस्त मानव-जाति की भावनात्मक उत्कृष्टता बनाने और बढ़ाने की सार्वभौम क्षमता विद्यमान है। भारतीय उसे इसी दृष्टि से कहा जा सकता है कि उसका उद्भव भारत में हुआ अन्यथा उसका स्वरूप और प्रयोजन मानवीय स्वभाव संस्कार को परिष्कृत करना ही पाया जायगा। अगले दिनों थोड़े हेर-फेर के साथ विश्व धर्म और विश्व संस्कृति की आवश्यकता इसी आधार को लेकर पूर्ण की जाने वाली है।
अस्तु उसे सर्व साधारण के परिचय में लाया ही जाना चाहिए। इसका प्रारम्भ अपने ही देश में किया जाया क्योंकि अगले दिनों किसी प्रतिपादन को मात्र उसकी व्याख्या विवेचना से ही मान्यता न मिलेगी वरन् उसके व्यावहारिक परिणामों को भी देख जायगा। भारतीय संस्कृति—अगले दिनों विश्व संस्कृति का रूप ले सकती है या नहीं इसका मूल्यांकन इस दृष्टि से किया जायगा कि जिन लोगों ने उसे अपनाया उन पर उसका क्या प्रभाव पड़ा। कहना न होगा कि पिछले दिनों अज्ञानान्धकार युग ने अपने धर्म और संस्कृति का स्वरूप विकृतियों और मूढ़ मान्यताओं से भर दिया है। जिससे न केवल अपना समाज दुर्बल ही हुआ है वरन् विश्व के विचारशील वर्ग के समक्ष उपहासास्पद भी बना है। इतनी ऊँची संस्कृति रहते हुए भी भारतीय जनता की यह दुर्दशा? इस उलझी पहेली के पीछे धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियाँ ही हैं। इनका निराकरण करना ही होगा अन्यथा उसे विश्व संस्कृति का गौरव प्राप्त होना तो दूर अपने ही देश में उसकी उपेक्षा अवज्ञा होने लगेगी।
भारतीय धर्म, दर्शन, आचार तथा लक्ष्य को अध्यात्म तत्व ज्ञान से ओत-प्रोत होने के कारण समस्त विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाना होगा। इसके लिये दो हजार वर्ष पूर्व हुए ढाई लाख बौद्ध भिक्षुओं के प्रयास से प्रेरणा लेनी होगी जिन्होंने यातायात के साधन न होने पर भी संसार के कोने-कोने में फैलकर उन दिनों धरती की आधी जनता को उस प्रतिपादन से दीक्षित किया था। इन दिनों ईसाई धर्म भी यही कर रहा है। ईसाई दर्शन को आज की बौद्धिक स्थिति के अनुरूप प्रस्तुत करके उसे विचारशीलों के समझने योग्य बनाया गया है। साथ ही बड़ी संख्या में ईसाई मिशनरी अपनी सुख-सुविधायें छोड़कर संसार के कोने-कोने में प्रचार कार्य करने के लिये निकल पड़े हैं। इसी का परिणाम है कि संसार की लगभग एक तिहाई जनता आज ईसाई धर्म में दीक्षित हो गई। विश्व की आबादी इन दिनों साढ़े तीन अरब है इसमें इसाइयों की संख्या एक अरब से अधिक है। दूसरी ओर हम हैं—जिनकी संख्या तेजी से घटती चली जा रही है लोग अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में धड़ाधड़ प्रवेश कर रहे हैं। इसका कारण दार्शनिक दुर्बलता नहीं वरन् उसके व्यावहारिक स्वरूप में विकृतियों की भरमार हो जाना ही है इसका निराकरण करना ही होगा। तभी उसका परिष्कृत स्वरूप उपयोगी और आकर्षक सिद्ध होगा। उसी को बुद्धि जीवी वर्ग की—विश्व लोक मत की मान्यता मिलेगी।
भारतीय अध्यात्म, धर्म, दर्शन, तत्वज्ञान, आचार एवं साँस्कृतिक आधार का शुद्ध रूप प्रस्तुत करने के लिये युग-निर्माण योजना के अंतर्गत क्रमबद्ध और अत्यन्त ठोस कार्य होता रहा है। प्राचीन आर्ष ग्रन्थों को सर्वसुलभ बनाने में उनके भाष्य और प्रकाशन में—अद्भुत प्रयत्न किया गया है। उन्हीं आधारों को सरल एवं सुबोध भाषा में साधारण पुस्तकों द्वारा भी प्रस्तुत किया गया है। पाँच भाषाओं में छपने वाली पत्रिकायें भी यही छापती हैं। ट्रैक्ट और विज्ञप्तियों में भी यही आधार भरा पड़ा होता है। जहाँ तक इस महान तत्व ज्ञान का सामयिक परिस्थितियों से ताल-मेल बिठाते हुए प्रेरणाप्रद शैली में प्रतिपादित करने का प्रश्न है वहाँ तक स्वल्प साधनों को देखते हुए शब्द में ‘बहुत कुछ’ कहा जा सकता है। वह अब इतनी मात्रा में अवश्य है कि उससे काम चलाऊ आवश्यकता पूरी की जा सके।
आवश्यकता उसे जन समाज तक पहुँचाने और जन मानस में उतारने की रह जाती है। इसके लिये झोला पुस्तकालयों, चल पुस्तकालयों द्वारा थोड़ा प्रयास तो हो रहा है पर वह शिक्षित वर्ग में एक विशेष रुचि के लोगों तक ही सीमित है, जब कि आवश्यक यह है कि उस प्रकाश को जन-जन तक पहुँचाया जाय। इस देश के नागरिकों को न केवल अपने उत्कृष्ट तत्व दर्शन का वास्तविक स्वरूप समझने की ही सुविधा मिले वरन् उसे इस का व्यावहारिक मार्ग दर्शन भी उपलब्ध हो, तभी इस दर्शन से अपना देश लाभान्वित हो सकता है और उसका प्रभाव समस्त विश्व पर पड़ सकता है।
कठिनाई यह है कि अपने देश में 77 प्रतिशत जनता अशिक्षित है और 5 प्रतिशत लोग ऐसे छोटे देहातों में रहते हैं जहाँ विद्वानों, प्रचारकों का पहुँच सकना और प्रशिक्षण परक आयोजनों का बन पड़ना सम्भव नहीं। फिर एक बार के भाषण से भी काम चलने वाला नहीं। शिक्षण क्रम बार-बार दुहराया जाता रहे तभी उसे व्यवहार में स्थान मिलता है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये प्राचीन मनीषियों की वह बहुमूल्य एवं दूरदर्शिता पूर्ण विधि-व्यवस्था ही उपयोगी लगी जो उन्होंने विशेष रूप से इसी कठिनाई के समाधान के लिए विनिर्मित की थी।
पर्व और त्यौहारों की प्रेरणाप्रद पद्धति से मनाये जाने का प्रचलन यदि गतिशील हो उठे तो निस्सन्देह उससे लोक शिक्षण की एक महती आवश्यकता पूर्ण ही जा सकती है। महामना मदन मोहन मालवीय सदा इस बात पर बहुत जोर देते रहे पर उन दिनों राजनैतिक आन्दोलनों के प्रवाह में यह संभव न हो सका, आज इसके लिए उपयुक्त अवसर है। होना यह चाहिये कि कुछ महत्वपूर्ण पर्व दो-दो महीने के अन्तर का ध्यान रखकर चुन लिये जायें और उन्हें सामूहिक रूप से—धार्मिक वातावरण में—लोक शिक्षण का प्रयोजन पूरा कर सकने वाले सम्मेलनों के रूप में मनाया जाय। यह कार्य कठिन नहीं सरल है। लोग पर्व त्यौहार मनाते तो हैं ही, पर उन दिनों पूड़ी पकवान बनाने, पूजा-पत्री करने या कुछ और सम्बंधित कर्म काण्ड निभाने में ही वह लकीर पिट जाती है। इसमें सुधार होना चाहिए और प्रयास यह होना चाहिए और प्रयास यह होना चाहिए कि उस गाँव, नगर, मुहल्ला या क्षेत्र के व्यक्ति एक स्थान पर एकत्रित होकर प्रेरणाप्रद पद्धति से उसे मनायें।
इससे जहाँ सामूहिकता—एक रूपता, संगठनात्मक प्रयोजन की पूर्ति होगी वहाँ उस महान धर्म एवं दर्शन का स्वरूप भी समझने को मिलेगा। कर्मकाण्ड के नाम पर छोटा हवन, उस पर्व के प्रतीक का सामूहिक पूजन, सामूहिक भजन कीर्तन, दीप दान जैसे आकर्षक किन्तु कम खर्चीले ऐसे कार्यक्रम रखे जा सकते हैं जिनमें उपस्थित सभी लोग भाग ले सकें। इसकी विस्तृत रूप रेखा पाक्षिक युग निर्माण में पिछले दिनों छपती रही है। अधिक जोर सम्मेलन पर दिया जाना चाहिए उपस्थिति अधिक संख्या में हो उसके लिए टोलियाँ बनाकर घर-घर घूमा जाना और उपस्थित होने के लिए आग्रह पूर्वक आमन्त्रण देना ही सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली तरीका है। जहाँ भी यह प्रयत्न किया जायगा वहाँ सहज ही अच्छी संख्या में जनता इकट्ठी हो जायगी। विशेषतया पर्व त्यौहारों की परम्परा एवं प्रेरणा समझाने से ही भारतीय जनता को सहज ही आकर्षक उत्सुकता हो सकती है। युग-निर्माण शाखाओं के अनुभव यह बताते हैं कि यहाँ भी इस स्तर के प्रयास किये गये बहुत ही सफल रहे। गत वसन्त पर्व पर यही आधार अपनाया गया था और उससे लगभग 50 लाख जनता को नव निर्माण मिशन का—भारतीय तत्व दर्शन का स्वरूप समझने और प्रभावित करने में आश्चर्यजनक सफलता मिली। वह प्रयोग अब आगे और भी अधिक उत्साह के साथ दुहराया जाना चाहिए।
दो महीने के अन्तर से छह पर्व आते हैं (1) वसन्त पञ्चमी—माघ सुदी पञ्चमी (2) राम नवमी—चैत्र सुदी नवमी (3) गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा—जेष्ठ सुदी दशमी (4) श्रावणी—श्रावण सुदी पूर्णिमा (5) विजया दशमी—आश्विन सुदी दशमी (6) गीता जयन्ती—मार्ग—शीर्ष सुदी एकादशी इनमें से वर्षा होने पर श्रावणी पर तो कभी-कभी सम्मेलन की व्यवस्था अस्त-व्यस्त भी हो सकती है पर शेष पाँच पर्व, बड़ी शान और सफलता के साथ—भावना पूर्ण वातावरण में प्रेरणाप्रद प्रयोजनों के साथ मनाये जा सकते हैं। गायक और प्रवचन कर्त्ता कहीं बाहर से बुलाने की जरूरत नहीं पड़ा करेगी। युग-निर्माण प्रकाशन के अंतर्गत कविताओं, गीतों की पाँच छह पुस्तकें छप चुकी हैं उन्हीं में से स्थानीय गायक कुछ दिन पूर्व तैयारी करके गाने सुनाने की व्यवस्था बना सकते हैं। पाक्षिक युगनिर्माण में वे लेख छपते रहते हैं जिनमें किस पर्व पर किस संदर्भ तथा परम्परा के साथ तालमेल बिठाते हुए क्या-क्या कहा जा सकता है। इन संकेतों पर कोई भी सामान्य सूझ बूझ का, प्रवचन कला से परिचित व्यक्ति ऐसे भाषण दे सकने में समर्थ हो सकता है जो सुनने वालों को मौलिक ही नहीं अतीव आकर्षक भी लगें और उनमें न केवल भारतीय तत्व ज्ञान का स्वरूप ही सन्निहित हो वरन् आज की अगणित वैयक्तिक एवं सामाजिक उलझी हुई समस्याओं का समाधान भी समाविष्ट हो। वस्तुतः हर पर्व पर—उसके ऐतिहासिक आधार के साथ ताल मेल बिठाते हुए वह सब कुछ कहा जा सकता है जो नव निर्माण की बहुमुखी दिशाओं को ध्यान में रख कर कहा जाना चाहिए।
लोक शिक्षण की यह अनुपम प्रक्रिया है। युग निर्माण शाखाओं ने इसका परीक्षण किया है और अनुमान से कहीं अधिक व्यावहारिक एवं सफल पाया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इसे बड़े पैमाने पर सर्वत्र कार्यान्वित किया जाय। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस दिशा में थोड़ा सा प्रयास करें तो वे स्वयं आश्चर्यचकित रह जायेंगे कि कितना सरल किन्तु कितना प्रभावी लोक शिक्षण का आधार उनके हाथ लग गया और अपने अशिक्षित, छोटे देहातों में फैले हुए देश में नव जीवन संचार करने के लिए किस प्रकार द्वार खुल गया और किस प्रकार एक कठिन समस्या का सरल समाधान निकल गया। इस पद्धति का अधिक व्यावहारिक स्वरूप समझने के लिए पिछले तीन-चार महीने के युग-निर्माण पाक्षिक पढ़ लेना पर्याप्त होगा। उस आधार पर यह सरल शैली हर किसी की समझ में आ जायगी।
इस प्रयास के पीछे एक और महती संभावना सन्निहित है। अगले दिनों सर्वतोमुखी नव निर्माण के लिए अनेकों जन आन्दोलन खड़े करने पड़ेंगे। अन्य देशों में तो समस्त जनता शिक्षित और साधन सम्पन्न होने से वह कार्य अखबार भी कर देते हैं पर भारत में—पिछड़े देशों में तो यह कार्य गोष्ठियों और सम्मेलनों द्वारा ही पूरा किया जा सकेगा। इसके लिए यदा-कदा यत्र-तत्र-किन्हीं संगठनों या विशिष्ट वक्ताओं द्वारा छुट-पुट प्रयास करने से काम चलेगा। स्थिति को देखते हुए जिन तीव्र आन्दोलनों की आवश्यकता पड़ेगी; उनके लिये नियमित और निरन्तर गतिशील प्रचार तन्त्र की आवश्यकता पड़ेगी। यह कार्य वर्ष में पाँच छः सम्मेलन हर जगह होने की प्रथा चल पड़े और उसका मार्ग दर्शन एवं सूत्र संचालन क्रमबद्ध ढंग से होने लगे तो समझना चाहिए कि लोक शिक्षण की महती आवश्यकता पूरी करने में आश्चर्यजनक सफलता का द्वार खुल गया।
वसन्त पर्व पर युग-निर्माण परिवार की चार हजार शाखाओं ने यही प्रयास करके 50 लाख व्यक्तियों तक नव निर्माण मिशन का प्रकाश फैलाया और सहस्रों को दिशा देकर कार्य क्षेत्र में उतारा इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। यह तो पिछले दिनों से चले आ रहे शाखा संगठनों के प्रयास की बात हुई। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य तो इस संगठन की अपेक्षा अत्यधिक संख्या में हैं वे सब भी यदि इस प्रयास में लग जायें तो अगला गायत्री जयन्ती पर्व—गंगा दशहरा दस हजार स्थानों पर आसानी से मनाया जा सकता है और आश्चर्य नहीं कि उससे एक करोड़ जनता को भी प्रशिक्षित प्रभावित किया जा सके।
पर्वों की प्रेरणाप्रद पद्धति भावी जन आन्दोलनों की पाठशाला कही जा सकती है। इससे सभा सम्मेलनों का सहज क्रम विकसित होता है और जनता उसमें उत्साह पूर्वक भाग लेना सीखती है। कठिन लगने वाली सभा सम्मेलनों की पद्धति अनुभव में आ जाने के कारण सरल बनती है। सबसे बड़ी बात यह है कि वक्ताओं और गायकों की एक विशाल काय सेना बिना प्रयास, प्रशिक्षण एवं खर्च की विशेष व्यवस्था किये सहज ही विनिर्मित होती है।
पिछले दिनों गायत्री तपोभूमि से यज्ञ सम्मेलनों में वक्ता, गायक, प्रचारक भेजे जाया करते थे। वसन्त पर्व इतना व्यापक मनाया गया कि उसके लिए मथुरा से उतने प्रचारक भेज सकना किसी भी प्रकार संभव न था। लोगों ने रास्ता ढूँढ़ा। स्थानीय क्षेत्र में भाषण कर सकने और गा सकने वाले लोग ढूँढ़े गये। उन्हें मिशन का साहित्य तथा पर्व का छपा प्रयोजन देकर आयोजन के दिन तैयार होकर आने का अनुरोध किया। यह प्रयोग पूर्ण सफल रहा। प्रत्येक सम्मेलन में प्रायः चार-पाँच वक्ता गायकों ने भाग लिया। इस प्रकार लगभग 20 हजार ऐसे लोग ढूँढ़ निकाले गये तो समय-समय पर अपने क्षेत्र में ऐसे आयोजनों में लोक शिक्षण की आवश्यकता पूरी कर सकते हों। बेशक उन्हें पूर्व तैयारी के लिये आवश्यक साहित्य, सुझाव और मार्ग दर्शन देना पड़ेगा। अन्यथा मिशन के अनुरूप बोल या गा कैसे सकेंगे। केन्द्र इसकी व्यवस्था पाक्षिक पत्रिका द्वारा जुटा रहा है और युग-निर्माण शाखायें इसी वर्ष लगभग 20 हजार प्रचारक विनिर्मित करने में सफल हो रही हैं। स्थानीय लोगों का प्रभाव कम पड़े तो एक शाखा के सदस्य दूसरी में जाकर अजनबी के प्रति अधिक आकर्षण वाली लोक रुचि को भी पूरा कर सकते हैं। दूर के ढोल सुहावने वाला प्रयोजन भी पूरा हो सकता है।
यह बहुत बड़ा आधार है। युग-निर्माण शाखाओं ने प्रेरणाप्रद पद्धति से पर्व मनाने की सम्भावनाओं का उद्घाटन एवं प्रयोग प्रस्तुत किया है। अब उसे अधिक गति मिलनी चाहिए और अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा इस दिशा में कुछ अधिक प्रयत्न करना चाहिए। इससे न केवल लोकशिक्षण के लिये मंच ही मिलेगा वरन् प्रशिक्षण कर्त्ताओं की, अनुभवी कार्यकर्त्ताओं की—एक बड़ी सेना भी खड़ी होगी और वह युग परिवर्तन के—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के पुण्य प्रयोजन को द्रुतगति से अग्रगामी बनाने की महत्व पूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकने में समर्थ एवं सफल भी होगी। ऐसा गुरु देव का कथन था।
मैं उत्कटता पूर्वक चाहता हूँ कि भारतीय संस्कृति निर्दोष बने, बढ़ती रहे और तेजस्वी रूप धारण करे। यह संस्कृति ज्ञानमय है, संग्राहक है, कर्ममय है। यह संस्कृति सबको अपने निकट लेगी, नये-नये प्रयोग करेगी, अविरत उद्योग करती रहेगी। भारतीय संस्कृति का अर्थ है, सर्वांगीण विकास, सबका विकास। भारतीय संस्कृति की आत्मा छुआछूत को मानती नहीं, हिन्दू-मुसलमान को जानती नहीं। यह प्रेम पूर्वक और विश्वास पूर्वक सबका आलिंगन करके, ज्ञानमय और भक्तिमय कर्म का अखण्ड आधार लेकर माँगल्य-सागर की ओर सच्चे मोक्ष—सिन्धु की ओर जाने वाली संस्कृति है।
भगवान् की इच्छा है कि हम सब उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुचित बनाने में उसका हाथ बंटायें। अपनी बुद्धि, क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुये जीवों की सुविधा का सृजन करें और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरतें जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।
भारतीय संस्कृति के उपासकों की महान यात्रा अनादि काल से आरम्भ हुई है। व्यास—वाल्मीकि, बुद्ध—महावीर, शंकराचार्य—रामानुज, ज्ञानेश्वर—तुकाराम, नानक—कबीर एवं महात्मा गाँधी, महर्षि अरविन्द जैसी महान विभूतियों ने इस यात्रा को आगे बढ़ाया है।
आइए, हम छोटे-बड़े सब इस पावन—यात्रा में सम्मिलित हों। आइए, आइए, सब कोई आइए। आज भारतीय संस्कृति के ये सारे सत्पुत्र हम सबको पुकार रहे हैं। यह पुकार जिसके हृदय तक पहुँचेगी वह धन्य होगा।
—साने गुरुजी
अपने देश का दुर्भाग्य ही है कि लोग सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश तो करना चाहते हैं पर उनका दृष्टिकोण अति संकीर्ण होता है। राजनीति को ही सब कुछ समझा जाने लगा है। विधान सभाओं के चुनावों में जितने स्थान थे उन पर जितने प्रत्याशी खड़े हुए उसे देखते हुए उस वर्ग की अभिरुचि का सहज ही पता चल जाता है। दूसरे देशों में दो तीन से अधिक उम्मीदवार कहीं नहीं होते और वे भी संगठित संस्थाओं के मंच पर ही चुनाव लड़ते हैं। उनके पीछे कुछ आदर्श होता है कुछ कार्यक्रम, पर अपने देश में तो ऐसे ही भेड़ियाधसान में घुस पड़ने के लिये कोई भी उम्मीदवार खड़ा हो जाता है और मत दाताओं में मति भ्रम पैदा करके उपयुक्त प्रत्याशियों का भी मार्ग अवरुद्ध करता है।
इन्हीं विधान सभा के चुनावों पर दृष्टिपात करें और उसका लेखा-जोखा लें तो प्रतीत होगा कि असफल हजारों प्रत्याशी ऐसे थे जो राजनीति के वर्चस्व में प्रवेश करने की लालसा से एड़ी चोटी का पसीना एक कर रहे थे, उनका करोड़ों रुपया भी इस प्रयास में खर्च हुआ। इतनी लालसा, दौड़-धूप और खर्चीली राह क्यों अपनाई गई। इस संदर्भ में किसी की शान में कुछ कहना उचित न होगा। हो सकता है उनमें से बहुत से विशुद्ध देश सेवा के लिए ही राजनेता बनने के लिए उत्सुक हों। हो सकता है उनमें कुछ यश, प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए खड़े हुए हों। ऐसे कुछ ही होंगे जिन्होंने यह सट्टा इसलिये खेला हो कि सफल होने पर ऐसे दाव-घात अपनायेंगे जिनसे एक के बदले दस कमाने का अवसर मिल जाय। कुछ के मन में तो बड़ी लालसा रही होगी पर परिस्थिति वश मन मारकर बैठना पड़ा होगा।
जो हो, इतना तो स्पष्ट है कि कितने ही प्रतिभाशाली लोगों की लालसा सार्वजनिक क्षेत्र में आने के लिये—लोक नेता बनने—यश सम्मान पाने या सेवा साधन का कोई भी प्रयोजन हो सकता है या इन सबका मिला जुला स्वरूप भी ऐसा हो सकता है जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए लालसा उत्पन्न करे। यह उभरता हुआ तथ्य हम उन लोगों के बीच भी देख सकते हैं जो संस्थाओं के भीतर पदों की प्राप्ति के लिए धक्का मुक्की करते हुए अवाँछनीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह संख्या कम नहीं है। लोक सेवा का आवरण ओढ़े हुए अधिकाँश लोग इसी बीमारी से ग्रसित हैं। फलतः सार्वजनिक जीवन की पवित्रता नष्ट होती चली जाती है और धक्का-मुक्की करने वाले लोग भी हर दृष्टि से असफल रह रहे हैं। न उन्हें यश मिल रहा है न श्रेय। लोक सेवा तो उस ओछी मनःस्थिति में बन ही कैसे पड़ेगी? वस्तुतः लोकसेवा के क्षेत्र में जिन्हें उतरना है उनके लिए गुरु देव का सुझाव था कि वे सामाजिक क्षेत्र में उतरें और उन कार्यों को हाथ में लें जो राजनीति की अपेक्षा अधिक ठोस और अधिक स्थायी हैं। यश और सम्मान की दृष्टि से भी राजनीति का क्षेत्र बड़ा अस्थिर और कुटिल है। जब तक एम॰ एल॰ ए0—एम॰ पी0 या मिनिस्टर हैं तब तक लोग बन्दगी करते हैं और जैसे ही वह टोपी उतरी कि सड़क चलते मुसाफिरों से अधिक कुछ इज्जत नहीं रह जाती। उस स्वल्प कालीन सम्मान या पद को प्राप्त करने के लिये—आगे बनाये रहने के लिए किन्हीं किन्हीं को ऐसे प्रपञ्च भी करने पड़ते हैं जिनसे उनकी आत्मा दिन-दिन कलुषित होती चली जाय और ईश्वर के दरबार में वह तथाकथित लोक सेवा द्रोह से भी बुरी ठहराई जाय।
राजनीति में वर्चस्व प्राप्त करने के लिए लोगों की भीड़ और धक्का-मुक्की अत्यधिक है। घुसने वालों को भीतर बैठे हुए लोग रोकते हैं। भीड़ वाली गाड़ी में पायदान पर लटकते हुए चलने का जोखिम उठाने की अपेक्षा यह अच्छा है कि कम भीड़ वाला वाहन पकड़ा जाय भले ही वह देर में पहुँचे, भारत का सामाजिक क्षेत्र ऐसा है जिसमें लोक-मंगल के लिये बहुत कुछ करने को पड़ा है और जिसमें काम करने की बहुत गुंजाइश है। उस क्षेत्र में बिना प्रतिस्पर्धा के सच्ची लोक सेवा की जा सकती है और उस मार्ग पर चलते हुए सच्ची और चिरस्थायी यश कामना भी पूर्ण हो सकती है।
सच तो यह है कि अपने देश का पिछड़ापन दूर करने में राजसत्ता उतनी सफल नहीं हो सकती जितनी कि सामाजिक क्षेत्र में की गई सेवा साधना। हजार वर्ष की गुलामी से अपना सब कुछ खो बैठने वाले समाज में संव्याप्त नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर किया जाना सबसे बड़ा काम है और उसे राजनीति द्वारा नहीं—सामाजिक सत्प्रवृत्तियों द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।
निरक्षरता की समस्या पिछड़ेपन का प्रधान चिह्न है। सरकारी स्कूलों में नगण्य सी बाल-संख्या शिक्षण पा रही है। प्रौढ़ और महिलाओं को मरने तक ऐसे ही निरक्षर रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार वर्तमान स्कूलों को चलाने में ही चरमरा रही है। प्रौढ़ों को प्रशिक्षित करने में सरकारी खर्चीली योजनाओं इतने टैक्स लगा देंगी कि उसे वहन करने से तो निरक्षर रहना ही पसंद करेंगे। यह कार्य शिक्षितों में सेवा भावना उत्पन्न करके गली-गली, गाँव-गाँव, मुहल्ले-मुहल्ले प्रौढ़ पाठशालायें चला कर ही पूरा किया जा सकता है। काम धन्धे में लगे हुए लोग अवकाश के समय में अपनी शिक्षा वृद्धि कर सकें इसके लिए रात्रि कालीन तथा प्रभात कालीन स्कूलों की हर जगह भारी आवश्यकता है।
खर्चीली विवाह शादियाँ समाज की आर्थिक तथा नैतिक दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण है। औसत हर शादी में दो हजार भी खर्च पड़ें और हर परिवार को एक पीढ़ी में चार शादियाँ भी करनी पड़ें तो उस मद में आठ हजार खर्च हुआ ऐसे सात लाख परिवार इस देश में हैं। इसमें शादियों पर आने वाला कुल खर्चा अरबों खरबों हो जाता है। यह धन औसत भारतीय को या तो बेईमानी से जुटाना पड़ता है या रोटी, कपड़े, दवा, शिक्षा जैसे जरूरी कामों में कमी करके। जो कर्ज लेते हैं वे और भी अधिक दुर्दशा ग्रस्त होते हैं। हजारों लड़कियाँ अविवाहित रह जाती हैं, बूढ़ों को ब्याही जाती हैं या फिर आत्महत्या करती हैं। खर्चीली शादियों की कुरीति मिटाने से जो पैसा बचेगा उसे यदि कृषि, उद्योग आदि में लगाया जा सके तो अपने देश की सम्पन्नता अमेरिका से भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती है।
आमदनी बढ़ने का तभी कुछ लाभ है जब अपव्यय रोके जा सके। अन्यथा आर्थिक तंगी यथावत् बनी रहेगी। शादियों में होने वाला वर्तमान अवाँछनीय खर्च यदि न रुका तो देश को चिरकाल तक ऐसी ही आर्थिक तंगी में पड़ा रहना होगा भले ही आमदनी कितनी ही क्यों न बढ़ जाय।
नशों को ही लीजिये। केवल तमाखू दो करोड़ रुपया प्रतिदिन का पिया जाता है। शराब, भाँग, अफीम आदि मिलाकर तो वह पाँच करोड़ प्रतिदिन अर्थात् वर्ष में 1800 करोड़ रुपया नष्ट होता है। यदि यह बचाया जा सके तो उतने धन से स्वास्थ्य, शिक्षा आदि की न जाने कितनी समस्याएं हल हो सकती हैं और स्वास्थ्य बिगड़ना पैसे की तंगी रहना, गृह कलह, अपराधी प्रवृत्ति जैसी उसके साथ जुड़ी हुई बुराइयों से बचा जा सकता है।
पर्दा प्रथा के कारण नारी वर्ग की आधी जनसंख्या अपंग अपाहिज जैसी बनाकर रख दी गई है। इस कुरीति को यदि मिटाया जा सके तो दूनी श्रम शक्ति, बुद्धि शक्ति तथा दूनी प्रतिभा राष्ट्रीय प्रगति में योगदान दे सकती है। उपार्जन बढ़ सकता है और समुन्नत वातावरण बन सकता है।
छुआ-छूत ने जन समाज के एक बड़े भाग को मानवी अधिकारों से वंचित करके उन्हें पिछड़ी स्थिति में पड़े रहने के लिए विवश कर रखा है। उनका असन्तोष और पिछड़ापन दोनों ही राष्ट्रीय प्रगति में भारी बाधक हैं। अपने समाज पर लगे हुए इस कलंक को धोया जाना आवश्यक है। जाति-पाँति के नाम पर हजारों टुकड़ों में बँटे बिखरे अपने अगणित समाज को फिर एकता और समता के सूत्र में बाँधने की आवश्यकता है। सरकारी कानून तो हर बुरे काम के विरुद्ध बने पड़े हैं पर उनके रहते हुए भी सब कुछ होता रहता है। छुआछूत और ऊँच-नीच का भेद-भाव मिटाने के लिये कानून बन जाना ही सब कुछ नहीं उसके लिये अभी वातावरण बनाने के लिए बहुत काम करना होगा।
गृह उद्योगों के अभाव में महिलायें तथा वृद्ध लोग सर्वथा अनुत्पादक बन कर जीते हैं उन्हें कुछ काम मिले तो आर्थिक स्थिति सुधरे और बच्चों की शिक्षा तथा पौष्टिक आहार के साधन जुटें। इस दिशा में आवश्यक नहीं कि सरकार ही सब कुछ करे, सामाजिक क्षेत्र में भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
गौरक्षा आदि सचमुच करनी हो तो गौ दुग्ध की वरिष्ठता तथा उपयोगिता से सर्वसाधारण को परिचित करना पड़ेगा और जो लोग गोरस लेना चाहते हैं उनके लिए उपलब्ध कराने का एक विशाल तन्त्र खड़ा करना पड़ेगा। उन्हें गाय की उपयोगिता बता देने पर एक ठोस आर्थिक कारण बन जायगा गौरक्षा सम्भव हो जायगी।
साहित्य क्षेत्र में आज कूड़ा-करकट ही लिखा, छापा और बेचा जा रहा है। इसे निरस्त करने के लिए उसके स्थान पर ऐसा साहित्य सर्व साधारण के लिए उपलब्ध कराना होगा जो प्रगतिवादी दृष्टिकोण विकसित कर सके। चित्र और पुस्तकों में भरी अश्लीलता पर कुठाराघात किया जाना नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिये नितान्त आवश्यक है। इस दिशा में सृजनात्मक वस्तुएं उपलब्ध करने की वास्तविक प्रगति को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक आवश्यकता है। बाल-साहित्य, नारी साहित्य तो ऐसा अभी लिखा ही नहीं गया जो नई पीढ़ी को—महिलाओं को आवश्यक प्रकाश दे सकने में समर्थ हो। ऐसी पत्रिकायें भी कहाँ हैं? सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व करने वाले प्रभाव शाली पत्रों का भी एक प्रकार से अभाव ही है। राजनीति का ढोल पीटने वाले अखबारों की ही भरमार है। जबकि इस देश में सामाजिक आन्दोलनों को प्रोत्साहित करने की राजनीति से भी हजार गुनी अधिक आवश्यकता है। समय की पुकार है कि इस आवश्यकता को पूरा किया जाय।
सिनेमा आज का सर्व प्रिय मनोरंजन है। देश के 7 हजार सिनेमाओं में हर रोज लाखों आदमी देखने जाते हैं। उनमें से अधिकाँश फिल्में दर्शकों पर अवाँछनीय प्रभाव छोड़ती हैं और इससे नैतिक तथा सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है। इसे कोसने से काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्म बनाये जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नव निर्माण में बहुत सहायता मिल सकती है और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति का पथ प्रशस्त हो सकता है।
व्यायामशालाएं गाँव-गाँव खोले जाने की आवश्यकता है। अपराधी तत्वों से निपटने के लिये सुरक्षा दल गठित किया जाना चाहिए और नागरिकों को परेड करना शस्त्र चलाना आना चाहिए। खेल-कूदों की शिक्षा एवं प्रतियोगिता स्वास्थ्य संवर्धन में सहायक हो सकती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण के लिए व्यायाम आन्दोलन व्यापक बनाये जाने की नितान्त आवश्यकता है।
अन्न की कमी-पौष्टिक आहार की न्यूनता को देखते हुए शाक और फलों का उत्पादन आज की एक महती आवश्यकता है। सप्ताह में एक समय शाकाहार की परम्परा चल पड़े तो उससे स्वास्थ्य लाभ के अतिरिक्त अन्न की बचत भी हो सकती है। बड़ी दावतें और अनाप-शनाप जूठन छोड़ने के विरुद्ध आन्दोलन करके भी अन्न की बर्बादी का एक बड़ा भाग बचाया जा सकता है। घर आँगन में फूल एवं शाक उगाने की प्रथा चल पड़े तो उससे जहाँ सृजनात्मक प्रवृत्ति बढ़ेगी वहाँ घरों की शोभा और शाक खरीदने की बचत भी होगी। गाँव में मल-मूत्र तथा गोबर कूड़े का सदुपयोग सीखा सिखाया जा सके तो स्वच्छता की वृद्धि तथा उपलब्ध खाद से अन्न का उत्पादन बढ़ सकता है। ऐसे छोटे किन्तु महत्व पूर्ण कार्य राष्ट्रीय प्रगति में भारी सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
पुस्तकालय शिक्षित वर्ग की ज्ञान वृद्धि के लिए अति उपयोगी माध्यम है। हर व्यक्ति सभी जीवनोपयोगी पुस्तकें खरीदने की व्यवस्था नहीं जुटा सकता। पुस्तकालयों से इस अभाव की पूर्ति होती है। विचारोत्तेजक साहित्य वाले पुस्तकालय तथा चल पुस्तकालय लोक चिन्तन में प्रखरता लाने के आवश्यकता पूरी करेंगे।
भिक्षा वृत्ति के 56 लाख साधु बाबाजी निठल्ले बना दिये हैं और काम कर सकने योग्य व्यक्ति भी थोड़ी सी शारीरिक कमी होने पर भीख माँगने का व्यवसाय अपनाने पर उतारू हो जाते हैं। उन्हें काम करने के लिए विवश किया जाना चाहिए। समर्थ लोगों की भिक्षावृत्ति को चोरी, उठाईगीरी जैसे अपराधों में गिना जाना चाहिए। लोक सेवी तथा असमर्थ व्यक्ति दान पर जीवन यापन करें तो बात समझ में आती है पर समर्थ लोगों का अकारण हाथ पसारते फिरना या फिर प्रपंच करके रोटी कमाना, राष्ट्रीय चरित्र पर भारी आघात और मानवी स्वाभिमान का पतन है। अपंग, असमर्थों के निर्वाह की व्यवस्था करना समाज का कर्त्तव्य है पर भिक्षा व्यवसाय की छूट नहीं होनी चाहिए।
निरर्थक आभूषणों से विलासिता और फैशन में अपव्यय रोकने और उस बचत को उपयोगी कामों में लगाने के लिए वातावरण तैयार किया जा सकता है। बालविवाह—वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय पशुओं के साथ बरती जाने वाली निर्दयता आदि अनेक सामाजिक बुराइयां ऐसी हैं जिन्हें रोकने के लिये सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ किया जा सकता है।
ऊपर की पंक्तियों में उन थोड़ी सी आवश्यकताओं की ओर ध्यान दिलाया गया है ऐसे अनेक कार्य करने को पड़े हैं जिन्हें हाथ में लेकर व्यक्ति एवं समाज की सर्वांगीण उन्नति में बहुत बड़ा योगदान दिया जा सकता है। ऐसे आन्दोलनों को—रचनात्मक कार्यक्रमों को—हाथ में लेने के लिए आदि संगठित प्रयास किये जायें तो निस्सन्देह सच्ची लोक सेवा हो सकती है।
राजनीति क्षेत्र में घुसी बुराइयों को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक कि मतदाता हित अनहित में अन्तर करना नहीं सीख लेता है वोट को राष्ट्र की परम पवित्र धरोहर समझ कर उसे सही व्यक्तियों को देने के लिए सजग नहीं हो जाता। इसके लिए व्यापक लोक शिक्षण की आवश्यकता है। प्रजातन्त्र में राजसत्ता की कुञ्जी मत दाता के हाथ में रहती है। भ्रष्ट राज नेताओं से भी सामाजिक रूप से लड़ा जा सकता है पर उसका आध्यात्मिक समाधान मतदाता के—जनता के हाथ में ही है। सो उसी को जागृत किया जाना चाहिए।
जन जागरण का प्रयोजन वे कर सकते हैं जो अपने उज्ज्वल चरित्र एवं निस्वार्थ सेवा साधना से लोक मानस में अपने लिए गहरा सम्मान और स्थान बना लें। जो इसके लिए साहस कर सकते हैं, लोक श्रद्धा और यशस्विता उन्हीं के गले पड़ती है और वे ही सच्चे नेता कहलाने के अधिकारी बनते हैं।
इन्हीं रचनात्मक कार्यक्रमों को लेकर युग निर्माण योजना चल रही है। सच्ची सेवा, साधना के इच्छुक व्यक्तियों को उसका विशाल कार्य क्षेत्र तैयार किया हुआ है। उसका आधार भारतीय धर्म और संस्कृति के अनुरूप तथा युग की पुकार से ओत-प्रोत रहने के कारण जनता ने उसे सराहा ही नहीं स्वीकार भी किया है। राजनैतिक वर्चस्व प्राप्त करने के लिये लालायित लोग यदि लोक मंगल की सेवा साधना, सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती है। यदि लोक सेवा में निरत रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती। पर यों ही उछल कूद के आधार पर यदि राजनेता बन भी जाया जाय तो उसमें स्थिरता कहाँ रहती है?
जिस राष्ट्र मन्दिर का निर्माण इतने दिनों से अनेक आत्म विजयी, ऋषि−मुनि दिग्विजयी सम्राट, कवि, कलाकार, साहित्यकार, स्मृतिकार, पुराणों के रचयिता तथा धर्म शास्त्रों के प्रणेता करते चले आ रहे हैं, आज उस मन्दिर में राष्ट्र पुरुष की मूर्ति स्थापित करके उसे अभिमन्त्रित करना है। भगवान को धन्यवाद दें कि यह सौभाग्य हमको प्राप्त हुआ। इस मंदिर के प्रथम पुजारी बने। ऐसा प्रबन्ध कर चलें कि पीछे आने वाली पीढ़ियाँ इस मन्दिर में अनन्त काल तक पूजा कर सकें ।
—दीनदयाल उपाध्याय
शाखा संगठनों को उन्होंने निर्देश दिया कि वे राहुल और अशोक की भूमिका सम्पादित करने में लग जायें। गौतम बुद्ध को जिस ‘बोधि वट वृक्ष’ के नीचे आत्म-ज्ञान प्राप्त हुआ था उसकी डालियाँ शाखायें काटकर बुद्ध के शिष्य राहुल, आनन्द और अशोक के नेतृत्व में एशिया के प्रायः समस्त देशों में ले गये थे और वहाँ आरोपण किया था, फलतः उन शाखाओं से उन देशों में भी विशाल ‘बोधि वट वृक्ष’ उग पड़े और उनने असंख्यों में श्रद्धा का सञ्चार किया।
हर शाखा अपने को बोधि वट वृक्ष की शाखा माने और यह सोचकर चले कि उसे स्वतन्त्र रूप से विशाल वट वृक्ष के रूप में परिणत होना है। स्थापना को शिथिल करके—अपने को—अपने संस्थापक को—उपहासास्पद नहीं बनाना है। मिशन में वे सभी तत्व मौजूद हैं जिनके कारण मनुष्यों के प्रत्येक वर्ग में—समाज के प्रत्येक पक्ष में—उसका स्वागत किया जाय। समय की माँग पूरी करने, उलझी हुई समग्र समस्याओं को हल करने तथा मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल बनाने की समग्र सम्भावनायें इस योजना में सन्निहित हैं। अस्तु आरम्भ में कोई स्वल्प साधनों से इतना बड़ा कार्य होने की कठिनाई अवश्य व्यक्त कर सकता है पर मिशन के किसी पक्ष से असहमति या विरोध नहीं कर सकता। इसे जिस दूरदर्शी युग चिन्तन के आधार पर विनिर्मित किया गया है उसे जो कोई गम्भीरता पूर्वक समझने की चेष्टा करेगा उसे यह सर्वांग सुन्दर और शक्य संभव ही दिखाई देगी।
प्रश्न यह नहीं कि जनता उसे स्वीकार करेगी या नहीं—सहयोग देगी या नहीं—उसमें कमी होने की तो कोई आशंका ही नहीं है। सन्देह का कारण केवल कार्यकर्त्ताओं की शिथिलता ही हो सकता है जिसके कारण यह अंकुर प्यासा रह कर सूख जाय। गुरुदेव का संदेश शाखाओं के लिए यह था कि जहाँ भी स्थापना हुई है वहाँ उसे कार्यकर्त्ता अपने स्वेद बिन्दुओं से सींचते रहें, उसे मरने न दें। मरी हुई शाखा उन्हें उतनी ही कष्ट कर होगी जितनी किसी पिता को अपनी प्यारी और छोटी सन्तान की मृत्यु कष्ट कारक हो सकती है। यदि सींचना बन्द न किया जाय तो कोई शाखा कभी भी — किसी भी स्थिति में न तो मुरझाने पायेगी और न उसके ऊपर उदासी छायेगी।
बिहार के हजारी किसान की प्रेरणा प्रत्येक शाखा संगठन के ऊपर छाई रहनी चाहिए। एक अनपढ़ और साधनहीन किसान की लगन एवं तत्परता ने हजार आम के बगीचे लगाकर खड़े कर दिये और अपने नाम को हजारी बाग जिले के साथ जोड़कर अमर बना गया, वह लगन शाखा संचालकों में—परिवार के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं में सजग और सजीव रहनी ही चाहिए। जो भी समाज का ऋण चुकाने की—युग की आवश्यकता पूरी करने में अपने योगदान की आवश्यकता अनुभव करेगा उसे दैनिक नित्य कर्मों में नव निर्माण के लिए भी कुछ करते रहने की प्रक्रिया को स्थान देना होगा। जो पेट और प्रजनन की क्षुद्रता में निमग्न हैं उन्हें वासना तृष्णा से आगे परमार्थ प्रयोजन सूझता ही नहीं, केवल वे ही फुरसत न मिलने या आर्थिक तंगी से घिर जाने का बहाना बना सकते हैं। मनुष्य जिस कार्य को महत्व देता है उसे सबसे पहले स्थान पर रखता है—टालमटोल तो उन बातों की की जाती है जो बेकार—बेगार—प्रतीत होती हैं। नव निर्माण अभियान को यदि निरर्थक नहीं समझा गया है उसके प्रति सच्ची लगन है तो घोर व्यस्तता के बीच भी उसके लिए समय निकलता रहेगा और घोर कठिनाइयों के बीच भी मिशन को सींचते रहना शक्य रहेगा। शाखा सदस्य इस कसौटी पर खरे ही उतरेंगे ऐसी विश्वास पूर्वक आशा की गई है।
इस वर्ष कुछ अधिक काम किया जाना चाहिए। गर्मी के दिनों में अध्यापक, किसान, व्यापारी प्रायः सभी अपेक्षाकृत कुछ फुरसत में रहते हैं इस फुरसत को मिशन का कार्य क्षेत्र और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लगाया जाना चाहिए। पत्रिकाएं जहाँ भी जाती है उन्हें कम से कम दस व्यक्ति अवश्य पढ़ें या सुनें तभी उसकी सार्थकता समझी जानी चाहिए। आन्दोलन का मार्ग दर्शन एवं प्रसार पाक्षिक युग-निर्माण योजना पत्रिका के द्वारा होता है, उसे अधिक लोग मँगायें—पढ़ें इस पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
चल पुस्तकालय हर शाखा की सजीवता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वह कुछ भी कठिन नहीं है। हलके पहियों वाली धकेल गाड़ी कहीं भी मिल या बन सकती है। उसमें बहुत लागत नहीं आती। लगभग 100 रुपये में नई बन जाती है। इस पर तीन ओर सुन्दर बोर्ड लटका कर—ज्ञान रथ सजाया जा सकता है। पुरानी अखण्ड-ज्योति युग-निर्माण पत्रिकायें—ट्रैक्ट मोटे कागज के कवर चिपका कर इस गाड़ी पर रख लिये जायें और दो कर्मठ कार्यकर्त्ता अपने अवकाश के समय उसे अपने गाँव, नगर में घुमाने—जन संपर्क बनाने, मिशन का प्रयोजन समझाने और विज्ञप्तियाँ अथवा अंक पढ़ने देने पीछे वापिस लेने का क्रम चलाने लगें तो समझना चाहिए अपना कार्य क्षेत्र विस्तृत होने का द्वार खुल गया।
बड़े रूप में यह चल पुस्तकालय सुन्दर, सुसज्जित गाड़ी और पढ़ाने तथा बेचने के लिए समुचित साहित्य मँगाने पर एक हजार रुपये लागत आयेगी। पर प्रारम्भ तो नई 100 रुपये या पुरानी 50 रुपये की गाड़ी लेकर भी किया जा सकता है अंक तथा ट्रैक्ट अन्य सदस्यों से माँगकर संग्रह किये जा सकते हैं। जैसे भी हो हर शाखा को अपने यहाँ समर्थ या दुर्बल चल पुस्तकालय खड़े कर ही लेने चाहिएं और उन्हें भले ही अवकाश के समय या छुट्टी के दिन चलाया जाया करे—भले ही एक ही व्यक्ति लिये फिरे पर उसका आरम्भ तथा सञ्चालन अवश्य ही होना चाहिए।
युग-निर्माण शाखा के सभी सक्रिय सदस्यों को अपने वहाँ ज्ञानघट स्थापित कर लेने चाहिएं। इससे नियमितता रहती है और अपने कर्त्तव्य का नित्य स्मरण रखने का अवसर मिलता है जहाँ दस सदस्य हैं उस शाखा को हजारी आन्दोलन के अंतर्गत उपवन की और जहाँ चौबीस सदस्य हैं उसे उद्यान की संज्ञा दी गई है। यों संगठन की स्थापना तो दो सदस्यों पर भी हो सकती है और वे दो भी टोली बनाकर—झोला पुस्तकालय चलाने के लिये, जन संपर्क के लिये प्रचार अभियान पर निकलते रह सकते हैं पर प्रयत्न यही रहना चाहिए कि हर शाखा में दस सक्रिय सदस्य तो हो ही जायें। इस संख्या में जो कमी रह गई हो उसे इन्हीं गर्मियों में पूरा कर लेना चाहिए।
जहाँ अपनी विचार धारा का विस्तार, सम्मान तो बहुत है। पर संगठन नहीं बना है वहाँ यह प्रयत्न किया जाना चाहिए कि सम्बद्ध व्यक्ति शाखा सूत्र में आबद्ध होकर संगठित हो जायें कहना न होगा कि यह संगठन का युग है, इसमें संघ शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। युग परिवर्तन के लिये इस चेतना को विकसित करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
‘बोलती दीवारें’ आँदोलन हर जगह बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुआ है उससे सहज ही अनेक व्यक्तियों को चेतना प्रेरणा एवं दिशा मिलती है। अवकाश के दिनों में प्रेरणाप्रद वाक्य दीवारों पर लिखने के लिए लग जाना चाहिये। इस संदर्भ में एक नया प्रयोग यह हुआ है कि दुरंगे छोटे पोस्टर छपाये गये हैं जो घर दुकानों की किवाड़ों पर, खंभों पर चिपकाये जा सकते हैं। यह उपक्रम दीवारों पर लिखने के समान ही आकर्षक एवं प्रभावशाली है। आवश्यकतानुसार यह पोस्टर मथुरा से मँगाये जा सकते हैं और उन्हें चिपका कर पूरा नगर मूक किन्तु प्रभावशाली उपदेशक के रूप में खड़ा किया जा सकता है। जिस प्रकार विविध संस्थाओं वाले लोग चन्दा माँगने निकलते हैं, उसी तरह परिजन टोलियाँ बनाकर सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने, दुष्प्रवृत्तियाँ छोड़ने का भावनात्मक धन संग्रह करने के लिये निकला करें। जन संपर्क बनायें और लोगों को समझायें। जो किसी बात से सहमत हो जायें उनसे उस प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करा लें और धन्यवाद की रसीद दे दें। यह प्रतिज्ञा फार्म और रसीदें मथुरा में उपलब्ध हैं उन्हें मँगाया जा सकता है और टोलियाँ बनाकर ‘भावना संग्रह’ के लिये निकला जा सकता है। धन संग्रह द्वारा सम्पन्न होने वाले परमार्थ प्रयोजनों की अपेक्षा यह बिना पैसा संग्रह का अभियान लोक मंगल की दृष्टि से कम नहीं वरन् अधिक ही उपयोगी है।
एक घण्टा समय देने की शर्त भी दस पैसे देने की तरह प्रायः सभी सदस्यों को पालन करनी पड़ती है। उस, समय-दान से सुशिक्षित व्यक्ति रात्रि को युग-निर्माण पाठशाला चला सकते हैं। यदि ऐसी महिलाएं भी परिवार में हैं तो वे अपने समय को तीसरे प्रहर महिलाओं की पाठशाला चलाने में लगा सकती हैं। इन पाठशालाओं की छपी पाठ्य पुस्तकों द्वारा प्रशिक्षित छात्र छः-छः महीने बाद परीक्षाएं देते हैं और उन्हें सुन्दर प्रमाण पत्र मिलते हैं। यह प्रशिक्षण क्रम प्रायः हर शाखा में चलाया जाना चाहिए।
जहाँ कम सदस्य हैं वहाँ तो नहीं, पर जहाँ अधिक सदस्य हैं वहाँ ज्ञानघटों का एक तिहाई धन ऐसे कार्यकर्त्ताओं के पारिश्रमिक के लिये भी रखा जा सकता है यह ज्ञान घट का धन एकत्रीकरण, बदले में साहित्य पहुँचाने, दीवारें लिखने, पाठशाला, चल पुस्तकालय आदि के कार्यों में लगाया करें। यदि मिशन से परिचित, सेवा भावी—कार्य कुशल कार्यकर्त्ता इस प्रकार कुछ पारिश्रमिक देकर रख लिया जाय तो उसकी नित्य की नियमित गति विधियाँ बहुत ही प्रभाव शाली सिद्ध हो सकती हैं, शाखा के कार्यक्रमों में आशाजनक गतिशीलता आ सकती है। वैसे यह कार्य सेवा भावी वानप्रस्थों और कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को अवैतनिक रूप से करने का है पर जहाँ वैसा प्रबन्ध न हो सके वहाँ कुछ न होने की अपेक्षा—पारिश्रमिक देकर भी कराना अच्छा है।
पिछली बार वसन्त पर्व जिस श्रद्धा और तत्परता से मनाया गया उसे परिवार के जीवन काल में बहुत ही सफल प्रयोग कहा जा सकता है। इन आयोजनों में प्रायः 50 लाख जनता ने मिशन की विचार धारा से निकट संपर्क बनाया और उसमें सहयोग देने की उत्सुकता प्रकट की। इन आयोजनों का क्रम आगे भी रखा जाना चाहिए। चुने हुए पर्वों को सामूहिक समारोह के रूप में उसी प्रकार प्रेरणाप्रद पद्धति से मनाया जाना चाहिए। (1) वसन्त पर्व (2) राम नवमी (3) गायत्री जयन्ती (4) श्रावणी (5) विजय दशमी (6) गीता जयन्ती। यह छः पर्व प्रायः दो-दो महीने के अन्तर से आते हैं इन्हें बसन्त पर्व जैसी तैयारी के साथ मनाया जाता रहे तो जन जागरण का महान प्रयोजन सहज ही सर्वत्र पूरा होने लगेगा। इससे अपने क्षेत्र में ही ऐसे वक्ता और गायक उत्पन्न किये जा सकेंगे जो समय-समय पर युग परिवर्तन सम्बन्धी विचार धारा को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकें। भविष्य में सर्वतोमुखी परिवर्तन लाने के लिए व्यापक रूप से जन आँदोलन खड़े करने पड़ेंगे। उनके लिए पर्व मनाने की प्रक्रिया एक पूर्व तैयारी और अनुभव एकत्रित करने की पाठशाला सिद्ध हो सकती है।
अगला पर्व गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा का— जेष्ठ सुदी दशमी तदनुसार ता0 21 जून को आ रहा है। उसे मनाने की अभी से तैयारी की जानी चाहिए। कुछ सप्ताह ही शेष हैं। इतने दिनों में यदि उत्साह पूर्वक तैयारी की जाय तो उसे वसन्त पर्व से घट कर नहीं वरन् बढ़ कर ही मनाया जा सकता है। प्रभात फेरी, सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, दीप दान की प्रक्रिया सामान्य है। गंगावतरण का चित्र बाजार से खरीद कर शीशे में मढ़ा लेना चाहिए गायत्री माता का चित्र तो प्रायः सभी शाखाओं में होगा। इन दोनों की एक चौकी पर स्थापना करके स्त्री सूक्ष्म मंत्रों से षोडशोपचार पूजन करें और अन्त में उपस्थित लोग फूलों की अथवा चन्दन, केशर से रंगे पीले चावलों की पुष्पाञ्जलि चढ़ाएं। कर्म काण्ड इतना भर है। इसका अनुभव सभी को है।
बात केवल संगीत प्रवचन की रह जाती है। सो उसके लिए भी स्थानीय क्षेत्र में इसकी ढूँढ़-तलाश करनी चाहिये। पत्रिकाओं के पीछे छपती रहने वाली तथा अपनी कविता पुस्तकों में प्रकाशित गायनों में से कोई गायन गायक तैयार कर सकते हैं। प्रवचन कर्त्ताओं के लिये इस पर्व पर दिये जाने वाले प्रवचनों के सूत्र संकेत युग-निर्माण पाक्षिक में पढ़ लेने चाहिएं। मंच, मण्डप, फर्श, लाउडस्पीकर आदि की व्यवस्था हर जगह आसानी से हो सकती है और टोली बनाकर घर-घर आमन्त्रण देने तथा बुलाने के लिये कार्यकर्त्ता निकल पड़ें तो उस आह्वान पर जनता की उपस्थिति भी आशाजनक हो सकती है। इस प्रकार जहाँ अभी से ध्यान दिया जायगा और प्रयत्न किया जायगा वहाँ गायत्री जयन्ती पर्व भी बहुत शान से सम्पन्न होगा। आशा की जानी चाहिये कि वसन्त पर्व की अपेक्षा कहीं अधिक जनता उस आयोजन से लाभाँवित होगी।
इससे आगे भी अन्य पर्व इसी क्रम से मनाये जाते रहें तो एक दो वर्ष में ही जनता उसकी अभ्यस्त हो जायगी और वह परम्परा अनायास ही अपने ढर्रे पर लुढ़कते हुए—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का—जन जागरण का पुण्य प्रयोजन पूरा करती रह सकती है।
इस वर्ष उपरोक्त सभी कार्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए और शाखा संगठन की गति विधियों में गति भरते रहना चाहिए। सक्रिय सदस्यों का—कर्मठ कार्य कर्त्ताओं का ध्यान इस ओर बना रहे तो उसकी थोड़ी सी भावना एवं तत्परता इन सहज सरल से कार्यों को बात की बात में पूरा करती रह सकती है। जहाँ अन्यमनस्कता उदासी एवं उपेक्षा होगी वहाँ कागजी शाखा ही बनी रहेगी काम कुछ भी दृष्टिगोचर न होगा।
विदाई समारोह में गुरु देव ने एक बात पर बहुत जोर दिया था कि शाखाओं में समर्थता विकसित करने के लिये गायत्री यज्ञों के आयोजन किये जायें। उसे बड़ी शाखाओं ने तो निभा लिया पर छोटी शाखाएं उतना साहस न कर सकीं। उनके लिए पर्व मनाने की प्रक्रिया को बड़े यज्ञ का विकल्प बना दिया गया है। छह पर्वों पर छह बार में मिला कर एक बड़े यज्ञ से कम नहीं वरन् अधिक ही कार्य होगा। सरल भी पड़ेगा। जहाँ पर्व मनाये जाने लगें वहाँ समझा जाना चाहिए कि विदाई समारोह के अवसर पर किया गया अनुरोध भली प्रकार पूरा कर लिया गया।
समर्थ शाखाओं के पास प्रचार उपकरण होने चाहिएं जिससे वे अपने क्षेत्र में व्यापक रूप से इस प्रकाश को फैला सकें। पूरी योजना में कई उपकरण रखे गये थे और कई हजार का खर्च था, अब शाखाओं की स्थिति देखते हुए उसे भी हलका कर दिया गया है। स्लाइड प्रोजेक्टर (रंगीन प्रकाश चित्र यंत्र सिनेमा) तीन दिन तक डेढ़ घंटा रोज इस सिनेमा को दिखा सकने योग्य 150 स्लाइडें तथा छोटा लाउडस्पीकर बैटरी मिलाकर लगभग एक हजार या उससे कुछ ही अधिक खर्च आयेगा। यह बिजली और बैटरी दोनों से चल सकेगा इसलिये इसकी उपयोगिता उन छोटे देहातों में भी होगी जहाँ बिजली नहीं है। यह सारे उपकरण एक साइकिल पर भले प्रकार ले जाये जा सकेंगे और वक्ता स्वयं भी उसी पर बैठकर एक रात को एक गाँव के क्रम से उस माध्यम से सारे क्षेत्र में मिशन का प्रकाश फैला सकेगा और उत्साह की नई उमंग पैदा कर सकेगा। यह उपकरण जल्दी ही बनकर तैयार हो रहे हैं। इनके लिये एक हजार रुपये की राशि की अभी से व्यवस्था सोचनी और करनी चाहिए।
आशा की गई है कि समस्त शाखा संगठन अपनी प्रखरता बनाये रहेंगे और उत्साह में कार्यक्रमों में किसी प्रकार की शिथिलता न आने देंगे।
सात ऋषियों की ऐतिहासिक तपोभूमि सप्त सरोवर वह स्थान है जहाँ तप करते हुए सातों ऋषियों की साधना में विघ्न उत्पन्न न होने देने के विचार से अवतरित हुई भगवती गंगा सात भागों में विभक्त हो गई थी। पुराणों में इस तथ्य का जगह-जगह वर्णन है। हरिद्वार-हिमालय का द्वार है, यहाँ से आगे उत्तराखण्ड आरम्भ हो जाता है। भगवान् राम ने इसी क्षेत्र में अपने भाइयों समेत वृद्धावस्था में तप साधना की थी। देवप्रयाग में भगवान राम, लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण जी, ऋषिकेश में भरत और मुनि की रेती में शत्रुघन के तप कुटीर थे। यह क्षेत्र गुरु देव को अधिक भाया। जीवन का अंतिम समय हिमालय पिता और गंगा माता की गोदी में खेलते हुए एकान्त तप साधना का आनन्द लेते हुए प्राचीन आश्रम व्यवस्था का पालन भी किया जा सकेगा और अपनी आकाँक्षा भी पूर्ण होगी। इस विचार को उनके मार्ग दर्शक का समर्थन भी मिला और उन्होंने यह स्थान चुन लिया।
शान्ति-कुञ्ज बना। इस आश्रम का निर्माण वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अंतर्गत हुआ। गत वर्ष हम लोग 20 जून को यहाँ आ गये। स्थानीय कार्यक्रम की दृष्टि से मेरे लिए यही आदेश हुआ कि जिस प्रकार गुरु देव ने 24 लक्ष गायत्री पुरश्चरण 24 की संख्या में पूरे किये थे वह मैं भी पूरे करूं। उनकी साधना व्यक्तिगत आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करने के लिए थी, इसलिए वह छः घण्टे क्रम से धीरे-धीरे 24 वर्ष तक उन्हीं के द्वारा चलती रही। पर मेरी अनुष्ठान शृंखला का उद्देश्य दूसरा था। विशाल युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की भौतिक एवं आत्मिक सहायताएं उपलब्ध करना, उसके लिए आवश्यक शक्ति और साधन जुटाना लक्ष्य था। उसमें बढ़े हुए खर्च को देखते हुए अधिक मात्रा में उत्पादन की आवश्यकता पड़ी इसलिए उस अनुष्ठान शृंखला को अखण्ड जप के रूप में परिणत करना पड़ा। इस प्रकार वह चौबीस वर्ष वाली साधना छह वर्ष में सम्पन्न करने की बात निश्चित हुई। अखण्ड दीपक अपना 46 वर्ष पूर्व से ही जलता चला आ रहा है। उसे भी कम से कम हम लोग अपने जीवन काल में तो जलने ही देना चाहते हैं। देखने में यह बाहरी प्रकाश देने वाला लगता है पर हम लोगों ने कितना अन्तः प्रकाश इसके माध्यम से पाया है, यह लिखा या बताया नहीं जा सकता।
कुमारी कन्याएं देवता स्वरूप मानी गई हैं। शास्त्रों में उन्हें प्रत्यक्ष देवी का स्थान दिया गया है। शक्ति साधना में कुमारी पूजा का अद्भुत महात्म्य वर्णित है। आज की परिस्थिति में तो उनका स्थान साधु ब्राह्मण से भी आगे है। क्योंकि वे तो अब केवल वेश और वश मात्र भर रह गये हैं, तात्विक महानता वे लोग लगभग गँवा ही बैठे। कुमारी कन्याओं में वे देवतत्व जन्म जात होते हैं। यों नर की तुलना में आत्मिक दृष्टि से नारी सदा ही आगे होती है पर कन्याओं में उनका भोला शैशव, सहज ब्रह्मचर्य जैसे कारणों से उनकी गरिमा और भी अधिक बढ़ जाती है। परम्परा कुछ भी रही हो तात्विक दृष्टि से देखा जाये तो आज की स्थिति में औसत कन्या औसत ब्राह्मण से कहीं आगे है। उनके द्वारा की हुई या कराई हुई साधना तथा-कथित ब्राह्मणों की तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही फलप्रद बैठती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर शान्ति-कुञ्ज में संकल्पित 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण 24 की संख्या में अखण्ड दीपक पर अखण्ड जप के रूप में सम्पन्न करने का जो निश्चय किया गया उसके लिए कन्याएं ही उपयुक्त माध्यम चुनी गईं। तदनुसार गत वर्ष से वह साधना चल पड़ी और बराबर निर्बाध गति से चल रही है, उससे उत्पन्न शक्ति अंश निरन्तर परिवार की भौतिक एवं आत्मिक सहायता के लिये वितरित किया जाता रहता है।
आरम्भ में छः कन्याओं से 4-4 घण्टे की दिन में दो घण्टा रात्रि में दो घण्टा ड्यूटी देकर अखण्ड जप करते रहने का विचार था। पीछे इतना वजन छोटी बच्चियों से उठता न दिखाई दिया तो उनकी संख्या 10 कर दी गई। इस संख्या में औसत ढाई-तीन घण्टे का आता है जिससे वे सहज प्रसन्नता के साथ रात्रि और दिन में विभाजित करके पूरा कर लेती हैं। नित्य गंगा से जल लाना उसी को पीना, आहार-विहार में संत जैसी विशेषताएं रखना, यह सब कार्य वे करती ही हैं। इस प्रकार उनकी तप साधना पार्वती की—मनु पुत्री इला की साधना से मेल खाती है। कुमारिकाएं आत्म-कल्याण की दृष्टि से भी इस प्रकार के अनुष्ठानों का आश्रय लेकर बहुत आगे बढ़ सकती हैं। मरियम और कुन्ती ने देवताओं को अपनी गोदी में खिलाने तक के लिये आह्वान कर लिया था। इस प्रयोजन में जो कन्या जितना समय लगा सके उतना लगा सकेगी, हर दृष्टि से वह उसके उज्ज्वल भविष्य के लिये एक संचित पूँजी ही सिद्ध होगी। इस दृष्टि से तपस्विनी कन्याएं आत्म-कल्याण और लोक-मंगल के दोनों प्रयोजन पूरा करती हैं।
कन्याओं का मात्र ढाई घण्टा जप के अतिरिक्त शेष समय भी पर्याप्त बचता था। उसके लिये यह सोचा गया कि उन्हें जीवनोपयोगी शिक्षा का इस बचे हुए समय में लाभ भी दिया जाए। यों पत्रिकाओं का सम्पादन, पत्र व्यवहार आगन्तुकों का अतिथि सत्कार—अपना निज का साधन क्रम, आश्रम व्यवस्था आदि काम तो कई रहते हैं पर इसके लिये भी समय निकाला और लड़कियों की शिक्षा व्यवस्था भी हाथ में ले ली। उन्हें नारी जीवन का लक्ष्य और सदुपयोग बौद्धिक दृष्टि से, संगीत उल्लास की दृष्टि से, और सिलाई गृह-उद्योग की दृष्टि से मैंने स्वयं ही सिखानी शुरू कर दी। इसका एक प्रयोजन यह भी था कि लड़कियाँ अपने परिवार को छोड़कर आई हैं उन्हें मेरी समीपता का अधिक समय मिले और वे अधिक स्नेह लाभ करती हुई, अधिक सन्तुष्ट रह सके। यह प्रयोग बहुत सफल रहा। बच्चियाँ इस बहाने मेरे साथ रहीं तो इतनी घुल−मिल और इतनी लिपट गईं कि उनके घर वाले जब बुलाने के लिए लिखते हैं तो रोने लगती हैं। कारण कि उन्होंने स्नेह अपने परिवार से यहाँ कम नहीं अधिक ही पाया है। आपस में हँसने खेलने का इतना सुन्दर क्रम चल पड़ा है कि उन्हें आनन्द, उल्लास की एक अनोखी दुनिया का ही अनुभव होता है। बस चले तो वे जीवन भर इस आश्रम के आनन्द को न छोड़ें पर परिस्थितियाँ उन्हें विवाह आदि के लिये विवश करेंगी तो उन्हें घर वापिस जाना ही होगा।
पिछले दिनों मुझे अस्वस्थ रहना पड़ा। यहाँ तक कि अनिष्ट को सँभालने के लिये स्वयं गुरुदेव को कुछ समय के लिये आना पड़ा। फिर भी पहले जैसा स्वास्थ्य अभी नहीं हो पाया है। लड़कियों की शिक्षा का क्रम इन दिनों छूटा ही रहा है; यों दिव्य संस्कार उनमें अभी भी निरन्तर आरोपित किये जा रहे हैं। यह पूँजी मस्तिष्कीय शिक्षा से कुछ कम नहीं अधिक ही बैठेगी।
गुरुदेव यहाँ आये तो शान्ति-कुञ्ज की भावी व्यवस्था के सम्बन्ध में भी विचार करते रहे। हम लोग इस आश्रम में सदा तो रहेंगे नहीं। पीछे यहाँ क्या प्रवृत्तियाँ चलें, इस पर विचार होता रहा। शान्ति-कुञ्ज गुरुदेव का तो डाक बँगला है वे जब कभी जन संपर्क की आवश्यकता समझेंगे उतने समय ही रुकेंगे। यह संपर्क क्रम भी संभवतः अधिक लम्बा न चले। उनकी बातों से ऐसा लगा कि जब तक आगामी पाँच वर्ष में यहाँ के अखण्ड जप की पुरश्चरण शृंखला पूरी होगी तभी तक वे अपना संपर्क क्रम रखेंगे। इसी अवधि में जिन्हें शक्ति का प्रत्यावर्तन मार्ग दर्शन, अनुदान देना होगा उसे दे लेकर उससे भी निवृत्त हो लेंगे? और पीछे अपने और भी ऊँचे कदम बढ़ा देंगे।
शान्ति-कुञ्ज की इमारत बड़ी बन गई। विचार तो थोड़ा ही छोटा ही बनाने का था—पर न जाने क्या ईश्वर इच्छा हुई कि उसका स्वरूप उतना बड़ा बन गया—बनता जा रहा है जितना कि इस छः वर्षीय कार्यक्रम के लिये आवश्यक था। कन्याओं का निवास आवास, भोजन व्यवस्था, उनका शिक्षण, खेलना, पढ़ना काफी स्थान माँगता है। सम्पादन और पत्र व्यवहार का दफ्तर भी चाहिए ही। गायों की सेवा और बगीचे को सँभालने के लिए भी कार्यकर्त्ता चाहिए। उनके निवास को भी स्थान चाहिए ही। इतने विशाल परिवार में से हर दिन दस पाँच आदमी यहाँ भावना वश या किसी प्रयोजन के लिए आते रहें तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं। उनके विश्राम आवास के लिये भी स्थान चाहिए ही। जब कभी गुरुदेव यहाँ रहेंगे तब तो प्रशिक्षण न सही—प्रत्यावर्तन और परामर्श ही सही—उनके लिए भी लोग यहाँ आवेंगे ही। उनके लिये भी जगह चाहिए। वस्तुतः गुरुदेव का व्यक्तित्व इतना विशाल है कि उसके लिये कलेवर की सहज ही आवश्यकता पड़ती और बढ़ती है। गायत्री तपोभूमि आरम्भ में छोटी सी बननी थी पर आवश्यकतानुसार उसकी भी विशालता बढ़ती गई। शान्ति-कुञ्ज छोटा जरूर सोचा गया था पर आवश्यकताओं ने उसे भी बड़ा बना दिया और वह आगे बढ़ने ही वाला है।
हम लोग यह सोचते रहे कि छह वर्ष के शान्ति-कुञ्ज वाले कार्यक्रम के उपरान्त पीछे इस आश्रम का क्या होगा? यहाँ सब कुछ सूना पड़ा रहे यह भी उचित न होगा। चिंतन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कन्याओं की जो शिक्षा इन दिनों छोटे रूप में आरम्भ की गई थी उसी को बड़ा बना दिया जाय और इससे एक बड़े अभाव की पूर्ति हो सकेगी। गायत्री तपोभूमि में यों पुरुषों के साथ महिलाएं भी आती थीं पर उनके प्रशिक्षण एवं स्थायी निवास के लिए प्रबन्ध नहीं था। इससे महिला जागृति में भारी अड़चन थी। इस कमी को गुरुदेव अनुभव करते थे पर वे परिवार के साथ बिना—नारी और नर के अधिक संपर्क में दूसरी बुराइयाँ उठ खड़ी होने की आशंका करते थे और कहते थे विकृत सेवा से उसे न करना अच्छा। वे सोचते थे नारी को भी प्रशिक्षित तो किया जाना चाहिए उसे परिवार और समाज में देवत्व उत्पन्न करने का ज्ञान तो कराया जाना चाहिए पर वह प्रशिक्षण पृथक से होना चाहिए। सहशिक्षा वह भी शिक्षा ही नहीं निवास में भी समीपता ही हो तो गड़बड़ ही पैदा करेगी अस्तु यदि उसका प्रबन्ध किया जाना हो तो उसमें इस प्रकार का नर नारी सम्मिश्रण नहीं होना चाहिये। नारी शिक्षा-उन्हीं के द्वारा और उन्हीं की परिधि में होनी चाहिये। वे अक्सर नारी संपर्क का जहाँ भी अवसर आता मुझे ही आगे ढकेलते थे। गुरु - देव की इस मनोवृत्ति के कारण ही अब तक अति महत्व पूर्ण एवं नितान्त आवश्यक होते हुए भी नारी प्रशिक्षण का कुछ काम न हो सका। इस बार सोचा गया कि शान्ति कुँज भविष्य में उस आवश्यकता की पूर्ति करने का माध्यम बने।
वर्तमान कन्याओं द्वारा अखण्ड जप वाले क्रम में नारी प्रशिक्षण का समावेश किया जाय और उसे धीरे-धीरे विकसित करते हुए इस स्तर तक पहुँचा दिया जाय कि उसके द्वारा नारी को समुन्नत बनाने की दिशा में विश्वव्यापी मार्ग दर्शन एवं प्रशिक्षण सम्पन्न किया जा सके। अस्तु इन्हीं दिनों यह निश्चय किया गया कि वर्तमान दस कन्याओं के प्रशिक्षण के लिये सुनिश्चित व्यवस्था की जाय और इसके लिये एक अध्यापिका की नियुक्ति कर दी जाय। पिछले दिनों लड़कियाँ अपनी रुचि का भोजन मिल-जुलकर बना लेती थीं। इसमें उन्हें पाक विद्या का व्यावहारिक ज्ञान देना भी उद्देश्य था। फिर बच्चों का नई चीजें खाने को अधिक मन रहता है। उनकी इच्छानुसार बदलती हुई चीजें बनती रहें तथा बनाने में वे कुशल होती रहें। पर इस मिल जुलकर बनाने में उनका समय कई घण्टे का चला जाता था। अब जबकि यह सोचा गया है कि उन्हें विशेष शिक्षण देना है तो समय की बचत आवश्यक हो गई और अब भोजन बनाने वाली एक महिला की स्थायी नियुक्ति कर दी गई है। प्रशिक्षण के लिये अध्यापिका की आवश्यकता भी सम्भवतः इसी महीने में पूरी हो लेगी। इस संदर्भ में पिछली अखण्ड-ज्योति में विज्ञापन भी छप चुका है।
नारी के व्यक्तित्व का समग्र विकास अपने आपमें एक अति महत्व पूर्ण विषय है। स्कूली शिक्षा से उसका उद्देश्य तनिक भी सिद्ध नहीं होता। उसमें नारी जीवन में कभी काम न आने वाले निरर्थक विषयों की ही भरमार है। पढ़ते-पढ़ते छात्रों का सिर खाली हो जाता है पर व्यावहारिक जीवन में काम आने वाला तथ्य उसमें नगण्य ही निकलता है। नौकरी पाने के अतिरिक्त यह शिक्षा और किसी काम की नहीं यदि यह कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं माननी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य ‘मुक्ति’ है। “सा विद्या या विमुक्तये” जो शिक्षा नौकरी के लिये गुलामी और बन्धन के लिए प्रोत्साहित करे वस्तुतः सच्चे अर्थ में विद्या कही ही नहीं जा सकती इसका उद्देश्य तो स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास एवं स्वावलम्बन ही होना चाहिए। गायत्री तपोभूमि में युग-निर्माण विद्यालय का स्वतन्त्र पाठ्य क्रम इसीलिए रखा गया। उसमें सरकारी शिक्षा पद्धति का कोई समावेश नहीं है। जब दृष्टिकोण ही दूसरा हो तो पाठ्य क्रम भी दूसरा ही रहना चाहिए। नौकरी के लिये पढ़ाई जिनका उद्देश्य हो वे न उस पढ़ाई में आते हैं और न उन्हें बुलाया जाता है।
शान्ति कुञ्ज में जिस नारी प्रशिक्षण का विकास किया जाना है उसका लक्ष्य होगा नारी जीवन की प्रतिभा का विकास एवं समस्याओं का समाधान। इस दृष्टिकोण से एक समान पाठ्य क्रम बनाया जा रहा है। उसका कोर्स एक वर्ष का रहेगा। यह पाठ्य क्रम गुरु देव स्वयं ही निर्धारित करने का वचन दे गये हैं। उसके साथ साथ ऐसे गृह उद्योगों का समावेश अवश्य रहेगा जिससे हर नारी अपने बचे हुए समय में कुछ अतिरिक्त उपार्जन कर सके। कभी विपत्ति की घड़ी आ खड़ी होने पर सारे परिवार के निर्वाह में समर्थ हो सकने योग्य उपार्जन की—आर्थिक स्वावलम्बन की क्षमता उसमें होनी ही चाहिए। गायत्री तपोभूमि के युग-निर्माण विद्यालय में भी ऐसी ही शिल्प शिक्षा का समावेश है; फिर नारी के लिये निर्धारित बौद्धिक पाठ्यक्रम की तरह यह शिल्प शिक्षा भी भिन्न होगी। उसमें यह ध्यान रखना होगा कि वे उद्योग घर रहकर ही चलाये जा सकें उनके लिये बाजार में दुकान खोलने की आवश्यकता न हो। ऐसे शिल्पों का जो घर पर चल सकें—अधिक उपार्जन करा सकें, क्या-क्या हो सकते हैं इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों से परामर्श किया जा रहा है। उनमें से कुछ तो अवश्य ही ऐसे होंगे जो बिजली की शक्ति से चलें, जिनमें शारीरिक श्रम अधिक न पड़े और उपार्जन भी एक परिवार के निर्वाह जितना हो सके। इस प्रकार के बौद्धिक एवं शिल्प सम्बंधी पाठ्य क्रम की रूप-रेखा सम्भवतः आगामी दो तीन महीने में ही बन जायगी। उसके लिये विशेषज्ञों से परामर्श आरम्भ कर दिये गये हैं। साथ में संगीत शिक्षा का समावेश रहना आवश्यक है। स्वान्तः सुखाय, पारिवारिक मनोरंजन और भावनाओं के जागरण के तीनों ही प्रयोजन संगीत पूरा करता है इसलिये उसमें नारी शिक्षा, उसका स्थान भी अनिवार्य रूप से रखा जायगा।
इस प्रशिक्षण के लिए स्वभावतः अधिक कन्याएं आना चाहेंगी पर अपने पास तो जप करने वाली कन्याओं के लिये ही भोजन आदि की सीमित व्यवस्था है। इस संख्या से आगे बढ़ा जायगा तो उसकी अर्थ व्यवस्था उनके अभिभावकों को ही करनी पड़ेगी। खाते-पीते मध्यम श्रेणी के परिवारों जैसे अच्छे भोजन में 50 रुपये मासिक से कम खर्च इस घोर महँगाई के जमाने में नहीं आ सकता। साल भर के लिये वस्त्र और उतने दिन के लिये भोजन प्रबन्ध के पैसे जो जुटा सकेंगे उनके लिए ही अतिरिक्त प्रबन्ध हो सकेगा। जप विभाग तो केवल नियत संख्या का ही भार वहन कर सकता है।
आगे चलकर सम्भवतः पाँच वर्ष बाद—जब अपना वर्तमान अखण्ड जप और शक्ति प्रत्यावर्तन का कार्य पूरा हो जायगा तो शाँति कुञ्ज में विवाहित नारियों के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की जायगी, उन्हें अधिक अवकाश न रहेगा इसलिए उनकी शिक्षा तीन महीने में ही पूरी करनी होगी उसी आधार पर उनका पृथक पाठ्य क्रम बनेगा। इस थोड़ी अवधि में ही वे इतना बौद्धिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगी कि अपने परिवार के लिए वरदान सिद्ध होकर रह सकें। यों ऐसी शिक्षा की आवश्यकता तो तुरन्त थी पर साधनों के अभाव में उसे पीछे ही आरम्भ किया जा सकेगा। अभी तो भावी योजना को ध्यान में रखने भर की—और तत्सम्बन्धी तैयारी करते रहने भर की है।
नारी जागरण एक स्वतन्त्र विषय है। नारी का अपना स्थान है और अपना कार्य क्षेत्र। उसे अलग ढंग से जागृत समर्थ और समाज के योगदान में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करने के लिए तैयार किया जायगा। इस आँदोलन की अपनी दिशा होगी और अपनी कार्य पद्धति। वह सर्वथा मौलिक होगी। इस संदर्भ में भी गुरु देव का चिन्तन स्पष्ट है, उसकी रूप-रेखा उनके सामने है पर चूँकि वह अभियान नारियों द्वारा ही चलाया जाना है—इसके लिए संगठन, प्रचार, आन्दोलन आदि को अपने हाथ में उन्हें ही लेना है। और वह कार्य लदे हुए बोझ को पूरा करने में ही चरमराने लगने वाली मैं उठा नहीं सकती थी अवसर और अवकाश भी नहीं था, इसलिए वह पिछले दिनों हो भी नहीं सका। सम्भवतः आगे उस योजना की रूप-रेखा स्पष्ट हो और नारी जागरण का—उसकी प्रतिभा को युग परिवर्तन में प्रयुक्त करने का—कोई सुनिश्चित अभियान खड़ा हो सकेगा। जब शाँतिकुञ्ज को नारी जागरण का केन्द्र ही बनना है तो वहीं से देशव्यापी-विश्वव्यापी, नारी उत्कर्ष का सर्वांग पूर्ण आन्दोलन भी सुसंचालित किया जा सकेगा।
जब वह योजना काम में आवेगी तब नारी संगठन का केन्द्र भी यही रहेगा और प्रचारिकाएं एवं प्रशिक्षिकाएं भी यहीं से तैयार की जायेंगी जो जगह-जगह जाकर इसी मिशन के अनुरूप विद्यालय खड़े करें और एक एक वर्ष के इसी प्रकार के पाठ्य-क्रम चलायें जैसा कि इस वर्ष कन्याओं के लिये यहाँ आरम्भ किया जा रहा है। तीन महीने में नारी शिविर भी वे प्रशिक्षिकाएं की चलायेंगी। तब तक आज की चार हजार शाखाएं—सम्भवतः चालीस हजार बन सकें, और सर्वत्र नारी शिक्षा के लिये विद्यालय खड़े करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगे ऐसी दशा में निष्णात प्रशिक्षिकाओं की सबसे पहली आवश्यकता पड़ेगी उसकी पूर्ति भी इसी अभियान के अंतर्गत शान्ति-कुञ्ज को ही करनी पड़ेगी।
तब एक सर्वांगपूर्ण नारी पत्रिका की—नारी साहित्य की—भी आवश्यकता अनुभव की जायगी और वह एक अतिरिक्त विभाग ही नारी जागरण योजना के अंतर्गत काम करेगा। अभी तो इस दृष्टि से देखा सोचा ही नहीं गया पर जब आवश्यकता अनुभव होगी तब इस आन्दोलन में अपने आपको खपा देने वाली जीवन्त महिलाएं भी आगे आ जायेंगी जैसे गायत्री तपोभूमि में सुयोग्य और सेवा भावी आत्म-दानी एकत्रित हो गये।
युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया में नारी का असाधारण योगदान होगा और वह भावी संसार का हर क्षेत्र में नेतृत्व करेगी। भावनात्मक वर्चस्व नारी में ही अधिक है। श्रम भले ही पुरुष अधिक कर सके। नव समाज की रचना भावनात्मक आधारों पर होती है। इस विशेषता की दृष्टि से नारी का स्थान सदा से आगे रहा है और अभी भी आगे है। अगले दिनों तो विश्व नेतृत्व का भार उसी के कन्धों पर आने वाला है। इस तथ्य को गुरु देव अनेक बार प्रकाश में ला चुके हैं। ईश्वर की इच्छा इसी दिशा में अनुकूलता उत्पन्न कर रही है। राजनीति के क्षेत्र को ही लें। इसराइल की प्रधान मन्त्री गोल्डा मेयर ऐसी महिला हैं जिन्होंने मदान्ध मध्य पूर्व के समस्त देशों की आक्रमणात्मक चुनौतियाँ स्वीकार की हैं और वे अपने छोटे से देश को कितनी समुन्नत एवं समर्थ स्थिति में रख रही हैं इसे देखकर लोगों को दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। भारत की प्रधान मन्त्री इन्दिरा गाँधी का उभरता हुआ नेतृत्व चमत्कार उत्पन्न कर रहा है। इन्दिरा की आँधी चुनावों की सफलता में ऐतिहासिक स्थान प्राप्त कर चुकी। लंका की प्रधान मन्त्री श्रीमती भण्डार नायके का नेतृत्व भी सहज भुला देने योग्य नहीं है। नारी जगत की यह उदीयमान तारिकाएं यह पूर्व संकेत करती हैं कि हवा का प्रवाह किधर बह चला। अगले दिनों इस दिशा में प्रगति और भी तेजी से होगी। परिवर्तन चक्र में नारी दिशा प्रदान करेगी—नेतृत्व सँभालेगी और नर को अपनी कर्मठता का सहयोग देकर उसे नव निर्माण के लिए अधिक कुछ करने में सफल समर्थ बना सकेगी।
यह कल्पना नहीं यथार्थता है जो अगले ही दिनों साकार होने जा रही है। उसकी विधिव्यवस्था का आत्मिक सूत्र−संचालन भी आवश्यक है। यह कार्य अगले दिनों शाँति कुञ्ज द्वारा सम्पादित हो सकेगा गुरु देव की ऐसी मान्यता है। कन्याओं को प्रशिक्षण—नारी जीवन को सफल बनाने वाली विद्या का विस्तार तो लोक कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है ही इससे भी बड़ी बात है—नारी प्रतिभा का जागरण और उसको साहित्य कला, राजनीति, समाज निर्माण आदि विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व उत्तरदायित्व उठा सकने में समर्थ बनाना। यह कार्य ऐसा ही आत्मबल सम्पन्न होने पर सँभाला जायेगा जैसा इन्दिरा गाँधी को उपलब्ध हुआ है। अगले दिनों हर क्षेत्र में ऐसी ही प्रतिभावान महिलाओं का उत्पादन आवश्यक होगा। इसके लिए परामर्श, प्रशिक्षण, आन्दोलन ही नहीं कुछ ऐसा ‘विशेष’ भी करना होगा जिससे उन्हें आत्म-बल सम्पन्न बनाया जा सके। शिक्षा या सम्पन्नता से वास्तविक प्रगति तो आत्मबल से होती है। अगले दिनों सर्वतोमुखी नेतृत्व जिसके कन्धों पर आने वाला है उस नारी के आत्मिक जागरण का कुछ विशेष प्रयास किया ही जाना चाहिए करना भी होगा। गुरु देव इस दिशा में आशावान् ही नहीं, प्रयत्नशील भी हैं।
शाँति कुञ्ज इस दिशा में कुछ महत्व पूर्ण भूमिका सम्पन्न कर सके इसी का श्रीगणेश कन्याओं द्वारा अखण्ड जप के माध्यम से किया गया है। अब इस बीज में अंकुर-प्रशिक्षण व्यवस्था के रूप में फूट रहा है। आशा की जानी चाहिए यह प्रगति क्रमशः अग्रगामी होगी और वट वृक्ष की तरह नारी जागृति का अभियान निरन्तर सुविस्तृत होता चला जायगा। ‘शाँति कुञ्ज’ अगले दिनों ‘शक्ति पुञ्ज’ के रूप में परिणत होगा और वह नव निर्माण की महान भूमिका सम्पादित करेगा। गुरु देव का ‘डाक बंगला’ यह स्थान अगले पाँच वर्ष तक अभी और भी बना रहेगा इसका कारण परिजनों का मार्ग दर्शन एवं शक्ति प्रत्यावर्तन ही नहीं, ‘शाँति कुञ्ज’ को ‘शक्ति पुञ्ज’ के रूप में परिणत करने की भव्य योजना का सूत्रपात आरम्भिक मार्ग दर्शन एवं गति प्रदान करना भी है। आशा की जानी चाहिए कि वह संस्थान अगले दिनों नारी जागरण की अभिनव भूमिका सम्पादित करेगा।
महिला जागरण के महान अभियान में यों पुरुष भी सहयोग देंगे पर प्रधान रूप से यह भार महिलाओं को अपने ही कन्धों पर उठाना पड़ेगा। आगे उन्हें ही आना होगा। अपने क्षेत्र में तो गृहस्थ महिलाएं ही थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर यह कार्य करेंगी, पर कुछ संचालिका वर्ग की प्रभावशाली महिलाएं भी अपने को इस कार्य में पूरी तरह खपा दें तभी यह आन्दोलन गति पकड़ेगा और देशव्यापी तथा विश्वव्यापी बनेगा। जिनके ऊपर गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ न हों तथा जिन्होंने लोभ-मोह एवं तृष्णा लालसा पर काबू पा लिया हो ऐसी शिक्षित महिलाओं को अपना पूरा जीवन ही इस कार्य के लिए अर्पण करना चाहिए ऐसी महिलाएं शाँति कुञ्ज हरिद्वार के पते पर पत्र व्यवहार कर लें।
शाँति कुञ्ज के भविष्य के बारे में ऐसी ही चर्चा गुरु देव से होती रही और लगा कि वे इस संदर्भ में गंभीर हैं। वर्तमान जप साधना, कन्या शिक्षण, शक्ति प्रत्यावर्तन तो मात्र पाँच वर्ष ही आगे और चलना है। उसके बाद शान्ति कुञ्ज को शक्ति केन्द्र के रूप में ही परिणत कर दिया जायगा। लगा कि गुरु देव इसी दिशा में सोच रहे हैं। कहना न होगा कि उनके संकल्प न तो अवास्तविक होते हैं और न अधूरे रहते हैं।
गुरु देव का शाँति कुञ्ज जितने समय ठहरना हुआ वे सामान्य कुशल क्षेम और चिकित्सा परिचर्या की साधारण सी बातों में कुछ ही क्षण लगाकर शेष सारा समय उसी प्रयोजन के लिये लगाते रहे, जिसके लिए कि उनका समस्त जीवन समर्पित है—और जिसको आगे भी गतिशील रखने के लिए हरिद्वार का यह आश्रम बनाया। वस्तुतः यह स्थान गुरुदेव और जन समाज की संपर्क व्यवस्था का माध्यम है। वे परिजनों के लिये—समस्त समाज के लिये क्या सोचते हैं—क्या करते हैं और क्या कराना चाहते हैं, इसी संदर्भ में उन दिनों चर्चाएं होती रहीं। पूछने और कहने के विषय भी अपने वैयक्तिक नहीं रहे। आकांक्षाएं ही नहीं अब तो जिज्ञासाएं भी लोक मंगल में पूरी तरह जुड़ गई हैं। व्यक्तित्व जब अपना रहा ही नहीं, तो अपनी कुछ समस्या ही क्या है, जिस पर कुछ पूछा बताया जाय?
नव निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में क्या सोच रहे हैं और अपने विशाल परिवार को—समस्त जन समाज को —वे क्या कहना चाहते हैं, यही प्रश्नोत्तर का प्रधान विषय रहा। जब जी आता कुछ पूछ बैठती—जब उनका जी आता बिना पूछे ही अपने उद्गार प्रकट करने लगते। इसी प्रकार वार्तालाप होता रहा। नोट लिये जाते रहे। संक्षिप्त विवरण इस अंक में है।
गुरु देव के व्यक्तित्व और उनके चिन्तन में, मिशन में जिन्हें दिलचस्पी है उन्हें इन पृष्ठों को बहुत ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि उनके परामर्श निर्देश को यथा सम्भव अधिक से अधिक अपनाया जा सके।
इनमें किन विचारों से कौन कितना सहमत है, किसने इस दिशा में कितना चलना आरम्भ किया है, किसका क्या परामर्श और सुझाव है, और भविष्य में इस दिशा में क्या करने की तैयारी कर रहा है, इसका विवरण यदि मिल सके तो बहुत अच्छा हो। इससे परिजनों की मनःस्थिति और गतिविधियों का उन्हें भी पता चल जायगा जिस प्रकार उनने जो सन्देश दिये वे परिजनों तक इस अंक द्वारा पहुँचा कर मैं अपने कर्त्तव्य से निवृत्त हो गई उसी प्रकार परिजनों का चिन्तन तथा कर्तृत्व भी उन तक पहुँचाना मेरा काम है। आखिर मुझे सन्देश वाहक ही तो नियुक्त किया गया है। इधर की बात उधर और उधर की बातें इधर पहुँचाने के लिए ही यह शाँति कुञ्ज का माध्यम बनाया गया है। सामान्यतया हर परिजन से यह आशा करूंगी कि वे इस अंक में व्यक्त विचारों और निर्देशों के सम्बन्ध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें और उसे पत्र द्वारा मुझे लिख दें। वह समस्त अभिलेख जब वे इधर आयेंगे तब उनके सामने प्रस्तुत कर दूँगी।
अच्छे काम करने के लिए सम्पत्ति की आवश्यकता कम पड़ती है, अच्छे हृदय और संकल्प की अधिक। -मूर
अपनी ओर से जो मैं लिखती हूँ वस्तुतः वह उनका ही संकेत होता है। यदि कुछ विशेष बात गुरु देव को किन्हीं परिजन से कहनी होगी तो वह संकेत भी उनके पास यथा समय पहुँच जायगा।
पत्र व्यवहार में जवाबी पत्र भेजने का ध्यान परिजन रखते ही हैं, आगे और भी सतर्कता बरती जानी चाहिए। पोस्टेज अब बहुत बढ़ जाने से सब मिलाकर अपने लिए उसका भार उठाना कठिन पड़ता है इसलिये उत्तर की अपेक्षा हो तो जवाबी पत्र भेजने की बात भूलनी नहीं चाहिए।
गुरु देव का स्वास्थ्य सदा की तरह सामान्य था और वे साधारणतः प्रसन्न और सन्तुष्ट ही दीखते थे। मेरे द्वारा उन्होंने समस्त परिवार के लिए अपना हार्दिक स्नेह सद्भाव पहुँचाया है, सो इन पंक्तियों में लपेट कर भेज रही हूँ।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1. गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 10) 50
प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधन-विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू0 3)50
द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गीय ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री-गीता, गायत्री-स्मृति, गायत्री-संहिता, गायत्री-उपनिषद् गायत्री-पारायण, गायत्री-हृदय, गायत्री-पंजर, सहस्रनाम आदि का संग्रह । मू0 3)50
तृतीय भाग—गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्य-मार्ग का दिग्दर्शन। मू0 3)50
2. गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू0 4)
प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण-शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू0 2)
द्वितीय भाग (सामूहिक गायत्री हवन)—गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया जल यात्रा, मण्डप-प्रवेश, वेदी-पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि-विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू0 2)
3. गायत्री चित्रावली—
विविध प्रयोजनों के लिये गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू0 2)
4. गायत्री मन्त्रार्थ—
अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के किये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू0 1)50
5. गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य—
1-छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट-तिरंगे कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 40 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 6) रु.। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
1—गायत्री का स्वरूप और रहस्य 2-गायत्री की गुप्त शक्ति 3-सर्व सुलभ गायत्री साधना 4-गायत्री शक्ति का स्रोत-सविता देवता 5-गायत्री और उसकी प्राण-प्रक्रिया 6-गायत्री पंचमुखी और एकमुखी 7-गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना 8-गायत्री की विशेष साधना 9-गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10-गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11-गायत्री की सिद्धियाँ 12-गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14-गायत्री और यज्ञोपवीत 15-गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
2. संक्षिप्त गायत्री हवन—सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मूल्य 20 पैसे।
3. दैनिक गायत्री साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मूल्य 20 पैसे।
4. गायत्री चालीस मूल्य 6 पैसे।
5. युग-निर्माण का सत्संकल्प—मूल्य 2 पैसे।
संस्कृति का उद्धार करो रे मानव! बनकर ज्ञानी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय बलिदानी॥
असुर वृत्तियाँ पनपीं थीं तो ऋषि दधीचि बन जागे।
करने को संहार दैत्य का, अस्थि पुञ्ज तक त्यागे॥
था अकाल सात्विकता का तो शुनःशेप बन आये।
रचा नया नरमेध, विश्वहित अपने प्राण खपाये॥
अपनी क्षमता अरे न क्यों अब तक तुमने पहचानी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय विज्ञानी॥
प्यासी थी धरती तो तुमने स्रोत नवल सरसाये।
तोड़े दुर्गम बंध और सुरसरि भू पर ले आये॥
तुम्हीं भगीरथ बनकर तप सकते हो विश्वहितों में।
ज्ञान गंग की धारा भर सकते हो सगर सुतों में॥
भँवर बड़ा है नौका छोटी- लेकिन तुम्हें बचानी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय बलिदानी।
भूला मनुज सत्य की गरिमा और कर्म की भाषा।
एकबार तो बदल गयी थी जीवन की परिभाषा॥
तुमने कष्ट सहे दुःसह और नव आदर्श दिया था।
हरिश्चन्द्र बन पात्र गरल का जग के लिये पिया था॥
हर नारी में जीवित है अब भी शैव्या-सी रानी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय बलिदानी॥
भोग नहीं आदर्श तुम्हारा- तुम चिर साधु-विरागी।
करतल गत थी पूर्ण अयोध्या-लेकिन तुमने त्यागी॥
राजभोग तज वन जीवन का कटुव्रत लिया तुम्हीं ने।
महलों में वन जैसा जीवन वर्षों जिया तुम्हीं ने॥
राम बड़े है- या कि भरत? है मूक यहाँ पर वाणी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय बलिदानी॥
मिटा ‘धर्म’ का रूप- उसे फिर से निर्मल मन दे दो।
बनी मरुस्थल ‘कर्म’ भूमि उसको सावन घन दे दो।
‘अर्थ’ व्यवस्थाएँ बिगड़ीं, उनको दो नयी दिशाएँ।
और ‘मोक्ष’ के लिए जगाओ त्यागमयी आस्थाएँ॥
जागृत कर दो सुप्तप्राय वेदों की शाश्वत वाणी।
बता रहा इतिहास, कि तुम हो प्रज्ञामय बलिदानी॥
-माया वर्मा
*समाप्त*