प्रतिमाओं में देखे जाने वाले भगवान बोलते नहीं, पर अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बात करने के लिए भी व्याकुल दीखते हैं। यदि हमारे कान हों तो सुनें- वे एक ही बात कहते चले जायेंगे- “मेरे इस अनुपम उपहार-मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए- जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न गँवाना चाहिए-जैसे कि गँवाया जा रहा है। यह बड़े प्रयोजन के लिए ओछी रीति-नीति अपनाकर मेरे प्रयास अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।”
जब और भी बारीकी से उनकी भाव भंगिमा और मुखाकृति को देखें तो प्रतीत होगा वे विचार विनिमय करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो-इस जीवन सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और संभाषण को जारी रखना चाहते हैं।
अंतरंग में अवस्थित भगवान की झाँकी, दर्शन, संभाषण, परामर्श और पथ प्रदर्शन तक ही पर्याप्त नहीं है उसमें गाय बछड़े जैसा वात्सल्य भी विह्वल दीखता है। परमात्मा हमें अपना अमृत दुग्ध-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। आत्मसात् कर लेने की उनकी उत्कण्ठा कितनी प्रबल दृष्टिगोचर होती है।
हम ईश्वर के बनें, उसके रहें, उसके लिए जियें। अपने को इच्छा और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्म-समर्पण करदें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पायेंगे। ऐसा दर्शन कर सकें तो हम धन्य हो जायें।
-महर्षि अरविन्द
मानव-जीव एक बहुमूल्य निधि है। अनेकानेक योनियों में घूमने को पश्चात् यह दुर्लभ क्षण प्राप्त होता है। यह अत्यधिक सौभाग्य की बात है कि सृष्टि के प्रत्येक जीव को उपलब्ध न हो सकने वाले इस अवसर को प्राप्त कर हम मानव कहलायें। वस्तुतः ईश्वर ने मनुष्य को जो शक्ति-सामर्थ्य दी है- वह अन्य प्राणियों की तुलना में हजारों गुना अधिक है। अतएव यह हर मनुष्य का पूरा कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन को, अपनी शक्तियों को, समय को व्यर्थ न करे। उनका सही-सही और पूरा-पूरा उपयोग कर वह सच्चे अर्थों में मानव कहलाने का गौरव प्राप्त करे।
प्रायः देखा जाता है कि मनुष्य कुकामनाओं और कुवासनाओं की कीचड़-कुण्ठाओं में अपने जीवन को बरबाद कर देता है। वह न तो ईश्वर-प्रदत्त असामान्य क्षमताओं का महत्व ही जानता है और न जीवन का उपयोग। जीवन को भार समझकर वह नारकीय कीटों की भाँति कषाय-कल्मष युक्त जीवन व्यतीत करता है और मौत के दिन पूरे करता है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह बिरल-वरदान यों दुरुपयोग करने के लिए नहीं मिला वरन् इसलिये प्राप्त हुआ है कि इसका अधिकाधिक उपयोग कर सृष्टि के अन्य प्राणियों को लाभ पहुँचाया जा सके, ईश्वर के कार्यों में सहयोग दिया जा सके, सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं के अभिवर्धन में योगदान दिया जा सके। जो इस ईश्वरीय प्रयोजन को समझता तथा इसके अनुरूप कार्य करता है, वही ईश्वर का प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त करता है।
वस्तुतः जीवन जीना एक कला है। जिसे ठीक से जीना आ गया, उसे सब कुछ आ गया। वही सच्चा कलाकार है, वही सच्चा शिल्पी है।
‘हम जी रहे हैं’ मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं है। जीवन का भार ढोना एक पृथक बात है और जीवन का सदुपयोग करना भिन्न बात है। परिवार के भरण-पोषण के लिये आजीविका कमाना और बच्चे पैदा करना तो निम्न श्रेणी के मनुष्यों का कार्य है, शिश्नोदर जीवन तो पशु-पक्षी भी व्यतीत करते हैं। पेट और प्रजनन के लिये जीने वाले मनुष्यों को जैविक इच्छायें तृप्त करने वाला पशु-मात्र ही कहा जा सकता है।
जीवन का अर्थ है- आशा और प्रगति। जिसे सही अर्थों में जीवन जीना आ गया उसे पलभर को भी निराशा और दुःख की भावना उत्पीड़ित नहीं कर सकती। कठिन से कठिन परिस्थितियों में वह आशावादी व्यक्ति हँसते मुस्कराते जीता है और अन्ततः लक्ष्य पा ही लेता है। जीवन का अभिप्राय है-प्रगति अर्थात् प्रति क्षण अपने भाव संस्थान को-गुण-कर्म और स्वभाव को उत्कृष्ट बनाना। धन-वैभव तथा अन्य लौकिक ऐषणायें तो क्षणजीवी हैं, नश्वर हैं, कामनाओं और वासनाओं को अधिकाधिक बढ़ाने वाली हैं परन्तु जिसने अपनी आत्मा को निर्मल बना लिया, कषाय-कल्मषों से स्वयं को मुक्त कर लिया, वही सच्चा सुख प्राप्त करता है।
जिसे जीना आ गया है उसका जीवन स्वतः ही पुष्प जैसा स्मितिवान् चन्दन जैसा शीतल-सुगन्धित तथा दीपक जैसा प्रकाशवान- बन जाता है। वह पुष्प के सदृश हँसता-खिलता, सत्यं शिवं सुन्दरम् युक्त जीवन व्यतीत करता है। उस स्तर का व्यक्ति अपने पेट का मोह छोड़कर अपनी गरदन नुचवाता हुआ त्याग के मार्ग पर अग्रसर होता है। चन्दन के समान समीपवर्ती वातावरण को सुगन्धित बनाये रखता है तथा घिसे जाने पर भी रोष-विद्वेष की भावना मन में नहीं लाता। दीपक के सदृश वह तिल-तिल जलकर अन्धकार से लड़ता है तथा अन्तिम बूँद तक दूसरों को प्रकाश देता रहता है।
ऐसे व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में ईश्वर पुत्र कहलाने योग्य हैं। वह मानव न रहकर महामानव बन जाता है और अन्ततः ईश्वरीय सत्ता में समाहित हो जाता है।
नास्तिकों का कथन है कि ईश्वर में विश्वास रखना अन्धविश्वास मात्र है। जब विज्ञान द्वारा ईश्वरीय सत्ता सिद्ध ही नहीं होती तो उसे माना ही क्यों जाये? परन्तु यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हम केवल उन्हीं बातों पर विश्वास करते हैं कि जो विज्ञान की कसौटी पर प्रामाणिकता पा चुकी हों? उत्तर मिलता है नहीं। जीवन के कितने ही आदर्श ऐसे हैं जिनकी पुष्टि विज्ञान से नहीं अपितु अन्तरात्मा से होती है। नीति शास्त्र भी ऐसा ही विषय है जो विज्ञान की दृष्टि से निरर्थक ठहरता है, वस्तुतः जिसे विज्ञान कहा जाता है वह पदार्थ-विज्ञान है। इस पदार्थ-विज्ञान द्वारा द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म ईश्वरीय तत्वों तक कैसे पहुँच जा सकता है?
अनेकों बातें ऐसी हैं जो वैज्ञानिक दृष्टि से अर्थहीन हैं परन्तु सामाजिक अभ्युन्नति के लिए वे मेरुदण्ड के समान हैं। उदाहरणार्थ विज्ञान की दृष्टि में नर और मादा का यौन सम्पर्क अत्यन्त स्वाभाविक है। पशु-पक्षी भी ऐसा करते हैं। उनमें माता, बहन या पुत्री के सम्बन्ध का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता, लेकिन मानव-समाज में माता, बहिन या पुत्री के साथ यौनाचार नितान्त पापाचार है। परन्तु यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन-सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है तो क्या हम इसकी व्यर्थता को मानकर माता-बहिन तथा पुत्री की मर्यादा को छोड़ देंगे ?
विज्ञान के अनुसार जीव-जीव का भोजन है प्रत्येक प्राणी के लिए अपने स्वार्थ की पूर्ति-पेट और प्रजनन परक जीवन ही प्रधान है। स्वार्थ-परत तथा चार्वाकों जैसे स्वच्छन्द भोगवाद का विरोध विज्ञान के आधार पर नहीं किया जा सकता। हाँ, समर्थन अवश्य हो सकता है। परन्तु यदि परोपकार, करुणा, सहानुभूति, त्याग, सेवा, सहिष्णुता जैसी सत्प्रवृत्तियों को मानव जीवन में बहिष्कृत कर दिया जाये तो सामाजिक सुख-शान्ति स्वप्न मात्र ही रह जायेगी।
विज्ञान के अनुसार मृत्यु से डरना प्रत्येक प्राणी का स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म से आबद्ध मान लिया जाये तो मातृभूमि की बलिवेदी पर हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान देने वाले वीर सैनिक प्रकृति विरोधी एवं महामूर्ख ही कहे जायेंगे। वे जान-बूझकर मृत्युपाश को गले क्यों लगाते हैं, इसका उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। इस प्रकार यह सुस्पष्ट है कि अनेक प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास नहीं है और इसी प्रकार ईश्वर की सिद्धि असिद्धि में भी वह नितान्त असमर्थ है।
कुछ लोक कहते हैं कि प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर जिस वस्तु की सत्ता सिद्ध हो, उसे ही माना जाये। क्योंकि प्रत्यक्ष के आधार पर ईश्वरीय सत्ता सिद्ध नहीं होती अतएव उसे मानना रूढ़ि या परम्परा मात्र है। परन्तु यह तर्क भी उचित नहीं। प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर प्रत्येक वस्तु को सिद्ध नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा तो यह भी सिद्ध नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता कौन है। परन्तु माता की साक्षी को ही इसके लिए पर्याप्त मान लिया जाता है।
‘ईश्वर दिखलाई नहीं देता इसलिए उसे माना न जाये’ यह तर्क नितान्त सारहीन है। अनेकों वस्तुएँ ऐसी हैं जो दिखलाई नहीं पड़तीं परन्तु फिर भी उन्हें अनुभव किया तथा माना जाता है। उदाहरणतः अपने नेत्र में लगा अञ्जन अपने को ही कहाँ दिखाई पड़ता है? सरोवर में बादलों के क्रोड़ से गिरे जलबिन्दुओं को कोई देख पाता है ? यद्यपि तारकगणों की सत्ता दिन में भी होती है परन्तु सूर्य के प्रकाश से अभिभूत होने के कारण वे कहाँ दृष्टिगत आते हैं ? बहुत सूक्ष्म वस्तु भी कहाँ दिखाई देती है? आकाश में छाये जलकण कहाँ दिखलाई देते हैं ? दूध में यद्यपि मक्खन की सत्ता होती है परन्तु वह दिखलाई नहीं पड़ती। जल में नमक घुल जाता है तो दिखलाई नहीं पड़ता परन्तु जल में उसका अस्तित्व नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मित्र के घर जाने पर यदि वहाँ मित्र नहीं मिलता तो हम उसका अभाव नहीं मानते। इसी प्रकार वस्तु के प्रत्यक्षतः प्राप्त न होने से ही उसका सर्वथा अभाव नहीं मानना चाहिए।
ईश्वर के अस्तित्व से केवल इसलिये मना करना कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण तथा आज के अविकसित विज्ञान के आधार पर सिद्ध नहीं होता, कोई महत्वपूर्ण कारण नहीं है। मानव जीवन से सम्बन्धित अनेकों प्रश्नों का उत्तर पदार्थ विज्ञान से नहीं अपितु उस अध्यात्म-विज्ञान से सुलझता है, जिसे आज हम पदार्थवादी बनकर विस्मृत करते जा रहे हैं। ईश्वर का अस्तित्व भी अध्यात्म-विज्ञान से ही सिद्ध होता है। तपः पूत ऋषि जन अपनी दिव्य दृष्टि से उस दिव्य तत्व की अनुभूति करते हैं।
इस नाना नाम रूपात्मक सृष्टि को बनाने वाला परमपिता परमेश्वर है। बिना कर्ता के क्रिया हो ही नहीं सकती। रंग ब्रुश आदि सभी उपकरण उपस्थित रहने पर भी क्या बिना चित्रकार के चित्र बनेगा? सृष्टि के जड़ पदार्थों में चेतना भरने वाला तथा कोटि-कोटि जीवों को बनाने वाला वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्व शक्तिशाली कारीगर ही है। सारी प्रकृति उससे व्याप्त है। प्राणियों की चेतना उस विशाल चेतना का ही अंश है। विश्व की सुन्दरता और सौम्यता उसकी ही सुन्दरता और सौम्यता है। सृष्टि के कण-कण में वह किसी न किसी रूप में विद्यमान है। जिस प्रकार रजकण और पृथ्वी में कोई विभेद नहीं होता, वह उसका ही अंश होता है उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा में भी कोई अन्तर नहीं। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। परन्तु जिस प्रकार बादल-दल से सूर्य का प्रकाश अप्रतिहत हो जाता है उसी प्रकार अज्ञान से अप्रतिहत होने के कारण हम आत्मतत्व को अपने आपको भूल जाते हैं और लक्ष्य विमुख होकर भटकते रहते हैं।
संसार में हम देखते हैं कि कोई प्राणी तो स्वर्गोपम जीवन व्यतीत करता है परन्तु कोई नारकीय यन्त्रणाओं में फँसा तिलमिलाता है। सुख प्राप्ति की प्राणिमात्र की स्वाभाविक इच्छा होती है। परन्तु इसमें परवशता क्यों सहनी होती है? कोई गधा, बैल, सर्प और छिपकली बनता है तो कोई सुसम्पन्न, श्री समृद्धि युक्त परिवार में जन्म लेता है। इनका एकमात्र उत्तर यही है कि कोई ऐसा न्यायाधीश है जो हमारे कर्मों के अनुसार फल देता है- सुख दुःख भोगने को विवश करता है। समाज की आँखों में, पुलिस की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है परन्तु उस घट-घट वासी परमेश्वर की दृष्टि से हमारा कोई कार्य छिप नहीं सकता। हमारे कर्मों का अच्छा या बुरा फल वह हमें असम्भाव्य रूप से देता है। कर्मफल के आधार पर भी ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है।
तपोनिष्ठ आर्ष मुनियों ने मानव-जीवन में आस्तिकता को जो महत्वपूर्ण स्थान दिया है, वह उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। उनकी सूक्ष्म ग्राहिणी बुद्धि ने यह अनुमान लगा लिया था कि मनुष्य एक दिन अपनी बुद्धि एवं प्रकृति का दुरुपयोग कर कुमार्गगामी बन सकता है तथा शान्ति एवं सुव्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इस पथ भ्रष्टता से बचाने के लिए ही उन्होंने आस्तिकता को जीवन का प्रथम आधार बनाया। ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, उसकी दृष्टि से हमारा कोई भी कार्य छिप नहीं सकता, उसकी न्याय-व्यवस्था हर किसी के लिए समान है- ये मान्यताएँ पापों से बचाती हैं तथा सदाचार और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में सहायक बनती हैं। ईश्वरीय नियमों में विश्वास रखकर ही अब तक की मानव जाति की प्रगति सम्भव हुई है।
ईश्वरीय सत्ता के साथ तद्रूपता बनाये रखना न तो दुस्साध्य है, न असम्भाव्य। मनुष्य अपने दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को दूर करके, काम, क्रोध, लोभ, मोह, छल, प्रपंच, अहंमन्यता, संकीर्णता, स्वार्थपरता का त्याग करके ईश्वरीय तत्वों के समीप पहुँचता जाता है। जिस प्रकार से पर्वत के क्रोड़ से निकल कर बहती हुई सरिता सागर में स्वयं को समर्पित कर उसमें विलय हो जाती है, उसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सभी ईश्वर के चरणों में समर्पित कर, अपनी चेतना को उसमें एकाकार कर मनुष्य भी उसमें एक रूप हो सकता है। फिर उसमें और ईश्वर में कोई विभेद नहीं रह जाता। उसकी वाणी ईश्वर की वाणी होती है, उसका मार्ग-दर्शन ईश्वर का मार्ग-दर्शन होता है। श्रीकृष्ण, श्रीराम, गौतम बुद्ध, ईसामसीह, गुरुनानक आदि इसके उदाहरण हैं ।
इस विश्व में देव तत्व और असुर तत्व दोनों का अस्तित्व है। देवत्व का पोषण अभिवर्धन, और सम्मान किया जाना चाहिए साथ ही असुरता की दुरभि सन्धियों तथा आक्रमणों से अपना बचाव भी करना चाहिए।
सज्जनों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे अपने आदर्श और व्यवहार पर स्थिर रहते हैं। सज्जनता की रीति-नीति बदलते नहीं। परस्पर टकराते भी नहीं। कोई उनसे टकराये तो टूटते भी नहीं। अपनी दिव्य सत्ता को अक्षुण्ण रखते हैं और किसी अनात्म तत्व के सामने आत्म समर्पण नहीं करते। अपना स्वाभिमान और स्वावलम्बन हर भली-बुरी स्थिति में अक्षुण्ण बनाये रहते हैं।
देव तत्वों की तरह-सज्जनों की तरह परमाणु की मूल सत्ता होती है। यह अपनी शाश्वत और सनातन विशेषता को नष्ट नहीं होने देती।
यह परमाणु सृजन के काम में ही लगे रहते हैं। वे इकट्ठे होते हैं, जुड़ते हैं मिल-जुलकर रहते हैं। उनकी यह संगठन और सृजन की भावना ही विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती है। नींव के पत्थरों की तरह, अदृश्य और अविदित रहकर वे सृजन के कार्य में अथक रूप में से संलग्न हैं। इस सुन्दर विश्व में जो विशालता दीख पड़ती है वह इन छोटे परमाणुओं के पारमार्थिक क्रिया-कलाप का परिणाम ही है। इन्हें इस धरती के- सृजन कर्ता, पोषक और परिवर्तनकारी- ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
छोटे परमाणु एकाकी नहीं है। उनके भीतर और भी छोटा परिवार है। इसमें भले और बुरे दोनों तत्वों का निर्वाह होता है।
इलेक्ट्रोन एवं प्रोटोन के मूल कणों को विभक्त नहीं किया जा सकता। उनकी परस्पर टक्कर या सम्मिश्रण का परिणाम इतना भर हो सकता है कि वे परस्पर मिलकर अन्तः क्रिया, मिश्रित क्रिया द्वारा नवीन कणों या नवीन नाभिकों में परिणत हो जायं।
परमाणु विद्या के अन्वेषणों के अनुसार अब तक मूल कण लगभग 20 की संख्या में खोजे जा चुके हैं। फोटोन, इलेक्ट्रोन, प्रोटान, न्यूट्रॉन, पॉजीट्रान, न्यूट्रिनों, मेसान, न्यू मेसान, पाई मेसारन, के. मेसान, हाइपरान, ड्यूट्रान, जैसे कणों से ही यह सारा विश्व विनिर्मित हुआ है। इन्हें विश्व भवन की ईंटें ही कहना चाहिए।
इसी दैवी अणु शक्ति में एक प्रतिरोधी असुर तत्व भी मौजूद है। समय-समय पर यही रंग बदलता है, टूटता-फूटता है और विरोध विग्रह उत्पन्न करता है। कुचक्रों का यही शिकार होता है और अन्ततः विनाश जैसी दुर्गति भी इसी की होती है। इस संसार में देवत्व नहीं असुरत्व भी मौजूद है सम्भवतः यही परिचय देने के लिए यह प्रतिक्षण विद्यमान हो।
परमाणु के प्रत्येक मूल कण के साथ विपरीत प्रकृति का एक ‘प्रति कण’ भी रहता है। जैसे इलेक्ट्रान का प्रति कण पॉजीट्रान, प्रोटान का एन्टी प्रोटान, न्यूट्रॉन का एन्टी न्यूट्रॉन, न्यूट्रिनों का एन्टी न्यूट्रिनों है। मेसानों में भी यह विरोधी प्रति कण रहते हैं।
सभी प्रतिकण अल्प जीवी होते हैं। यह प्रतिकण जब अपने समान सामान्य कण से टकराते हैं तो दोनों एक दूसरे से भिड़ जाते हैं और भयंकर विस्फोट उत्पन्न होता है। उसी से विकरण उत्पन्न होता है और भयानक ऊर्जा फैलती है।
यह विरोधी प्रकृति के प्रति कण कहाँ से आते हैं? क्यों अवरोध उत्पन्न करते हैं ? कुछ समझ में नहीं आता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस ब्रह्माण्ड में शायद कोई अन्य विश्व ऐसा है जिसे सर्वथा विपरीत प्रति विश्व कहा जा सके। उसकी संरचना इन विपरीत प्रकृति के प्रतिकणों से ही हुई होगी। वहाँ सब कुछ यहाँ से उलटा ही होता होगा। इस लोक में सारा पदार्थ- एन्टी मैटर- होगा। वहाँ के नाभिक-एन्टी प्रोटान और एन्ट्री न्यूट्रॉन के बने होंगे। उन प्रति नाभिकों के इर्द गिर्द इलेक्ट्रान के स्थान पर पॉजीट्रान भ्रमण करते होंगे। वहीं से यह प्रति कणों का प्रवाह धरती पर आता होगा और यहाँ कि अणु रचना के साथ उसका सम्मिश्रण यह परस्पर विरोधी स्थिति उत्पन्न करता होगा। यह प्रतिविश्व कहाँ है यह ढूँढ़ा नहीं जा सका पर उसका अस्तित्व तो एक प्रकार से मान ही लिया गया है।
हमें अपने चिन्तन और व्यवहार में इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि इस विश्व में जहाँ देव सत्ता का वर्चस्व है वहाँ असुर सत्ता भी हर जगह मौजूद है। न कोई व्यक्ति या पदार्थ पूर्ण शुद्ध है न अशुद्ध। गुण, दोष की मात्रा सर्वत्र मौजूद है। हमें गुणों को देखना, समझना, ढूंढ़ना और बढ़ाना चाहिए क्योंकि वे ही स्थिर और सत् हैं। असुरत्व भी हर जगह मौजूद है, उससे सतर्क रहें, बचें। मनुष्य में यह कुशलता बनी रहे वह नीर-क्षीर, विवेक कर सकने में समर्थ रहे इस प्रशिक्षण के लिए भगवान ने संसार में असुरता का अंश रखा है। परमाणु में भी प्रतिकण अंश भेजा है। भेजने वाली असुर सत्ता सम्पन्न दुनिया भी कहीं है। वह बाहर भी है और भीतर भी। उससे सतर्क रहना भी उतना ही आवश्यक है जितना देवत्व का अवलम्बन।
अन्धे शिक्षक गोपाल शर्मा ने अपने जीवन द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है कि नेत्रहीन व्यक्ति अन्य नागरिकों की तरह राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। वह कुछ दिनों के लिये अमरीका की विश्वविख्यात अन्ध शिक्षण संस्था पारकीन में प्रशिक्षण प्राप्त करने गये थे। यह संस्था मेसाच्युसेट राज्य के एक नगर में स्थित है।
अमरीका में नेत्रहीन व्यक्ति ऐसे महत्वपूर्ण कार्य करते हैं कि हमें सोचकर आश्चर्य होता है कि कैसे करते होंगे। गोपा शर्मा ने उन्हें बड़ी चुस्ती के साथ प्रयोगशालाओं में कार्य करते हुये देखा। वहाँ का समाज नेत्रहीनों को समर्थ बनाने में पूरा पूरा प्रयत्न कर रहा है। वहाँ कोई व्यक्ति उन्हें हीन नहीं समझता। इसीलिये गोपाल शर्मा का यह कहना है कि हम लोगों के प्रति सामान्य नागरिकों को अपना रुख बदलना चाहिए। हम समाज पर भार बनकर नहीं रहना चाहते। यदि हम पर अधिक दया दिखाई जाती है तो उसका मतलब यह है कि लोगों को हमारी शक्ति पर विश्वास नहीं है।
उन्होंने तो भारत सरकार से बड़े आग्रह के साथ निवेदन किया है कि नेत्र हीन व्यक्तियों को स्वावलम्बी बनाने की दिशा में प्रयत्न किया जाना चाहिये।
गोपाल शर्मा का जन्म जोधपुर में हुआ था। जब वह कालेज के छात्र थे तब उनकी आँख चली गई। पर जीवन का रोना रोकर हाथ पर हाथ धर कर बैठ नहीं गये वरन् देहरादून के अन्ध प्रशिक्षण विद्यालय में अध्ययन हेतु चले गये। अब तक वह 3 ब्रेल पुस्तकों का अध्ययन कर चुके हैं। उन्होंने टाइपिंग में विशेष निपुणता प्राप्त कर ली है।
संगीत में गोपाल शर्मा की रुचि है। अमरीका से लौटने के बाद इंग्लैंड सरकार के विशेष निमंत्रण पर वह इंग्लैंड रुके और वहाँ की अंध शिक्षण संस्थाओं को भी देखा। सारी गतिविधियों से उनका परिचय कराया गया। इस समय वह पानीपत के अंध विद्यालय में वरिष्ठ अध्यापक हैं। इस विद्यालय में आठवीं कक्षा तक अध्ययन करने के बाद कोई भी विद्यार्थी दूसरे विद्यालयों में अध्ययन के लिये जा सकता है।
गोपाल शर्मा द्वारा नेत्रविहीन व्यक्तियों के लिये जो कार्य किया जा रहा है वह बड़ा सराहनीय है।
मनुष्य कलेवर भगवान की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इससे सुन्दर और सुव्यवस्थित शरीर और कोई हो नहीं सकता। भगवान के अधिकाँश अवतार भी इसी मनुष्य शरीर के माध्यम से होते रहे हैं।
अन्य विकसित लोकों में निवास करने वाले प्राणी कैसे होंगे? इस संदर्भ में कितने ही अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने कई तरह की सम्भावनायें व्यक्त की हैं फिर भी उन्हें विश्वास यही है कि प्राणी सुविधाजनक शारीरिक स्थिति प्राप्त करने के लिए विकसित लोकों के प्राणियों को लगभग मनुष्य जैसी ही इन्द्रियों से सुसम्पन्न शरीर मिला होगा।
‘मनुष्य के निवास योग्य ग्रह’ पुस्तक के लेखक स्टीफन एच. डॉल ने कुछ ठोस प्रमाणों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि हमारी मंदाकिनी आकाश गंगा में ग्रहों की संख्या साठ करोड़ है। इनमें से कम से कम पचास ग्रह ऐसे अवश्य हैं जिनमें मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणियों के निवास की परिस्थितियाँ मौजूद हैं। इतने ग्रह तो एक सौ प्रकाश वर्ष की दूरी के भीतर ही होने चाहिए।
फिर आकाश गंगाओं की संख्या भी अभी तक पूरी तरह नहीं जानी जा सकी और उनके साथ जुड़े बँधे ग्रह उपग्रह और नक्षत्रों का पूरा अनुमान कैसे हो सकता है। फिर भी वह संख्या बहुत बड़ी है। यदि ये और माना जाये कि प्रत्येक प्रकाश गंगा के करोड़ों ग्रहों में यह पचास-पचास भी जीवनधारी ग्रह हों तो उनकी संख्या मिलकर भी करोड़ों हो जाती है। जीवन अकेली पृथ्वी पर है अन्यत्र नहीं, यह सोचना गलत है। जिन परिस्थितियों ने पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न किया वे और भी अच्छी स्थिति में अन्य लोकों में हो सकती हैं और वहाँ के प्राणी और भी अधिक विकसित स्थिति में हो सकते हैं। शारीरिक दृष्टि से भी और मानसिक दृष्टि से भी।
अमेरिकी खगोल वेत्ता हारली पैपलो ने तथा स्टीफन ने उन अन्य लोकवासी जीवों की शारीरिक और मानसिक स्थिति की जो कल्पना की है उसके अनुसार यह आवश्यक नहीं कि उनकी आकृति प्रकृति मनुष्य जैसी ही हो। पर वे सोचते हैं कि किसी बुद्धिमान जीव को अपनी बुद्धिमत्ता और सक्रियता से यदि उपयुक्त काम लेना हो तो उसे अनुकूल शरीर जरूर चाहिए। यदि चेतना और आकाँक्षा प्रबल हुई तो अनागत क्रम की शरीर रचना में वे अभीष्ट परिवर्तन भी कर सकते हैं। जैसा कि धरती के मनुष्यों ने आदिम काल की तुलना में अब तक शरीरों में बहुत परिवर्तन कर लिया और विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ उसे और भी अधिक परिवर्तन करने होंगे।
आँखें ज्ञान उपार्जन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। यही बात दूसरी ज्ञानेन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। कान, जीभ, नाक भी जीवन व्यवस्था की दृष्टि से आवश्यक अंग हैं। इन्हें मस्तिष्क के पास ही होना चाहिए। यदि वे दूर होते हैं तो मस्तिष्क तक उनके ज्ञान तन्तुओं को समाचार पहुँचाने और संकेत प्राप्त करने में बहुत देर लग जायेगी और जीवन क्रम में भारी असुविधा उत्पन्न होगी।
यदि आँख, कान आदि इन्द्रियाँ घुटनों के पास हों तो अब मस्तिष्क को स्थिति समझने और सँभालने में जितनी देर लगती है उसकी अपेक्षा तीस गुनी देर लगा करे। फिर प्राणी की स्फूर्ति और तत्क्षण दृश्यमान होने वाली चेतना बहुत हलकी पड़ जाय और उसे मन्दचर की तरह काम करना पड़े। इसलिए अन्य ग्रह निवासियों की शरीर रचना में और कोई अन्तर हो सकता है पर सिर की स्थिति मनुष्यों जैसी ही होगी। हाँ विकसित जीवों के एक तीसरा नेत्र सिर के पिछले भाग में और हो सकता है जिससे वह ऊपर तथा पीछे की वस्तुओं को भी देख सकें और अचेतन मन को प्रसुप्त पड़े रहने देने की अपेक्षा वह उससे भी अधिक काम ले सकें।
यदि उस ग्रह का वायुमण्डल भारी होगा तो नथुने और मुंह के छेद छोटे होंगे ताकि अधिक मात्रा में हवा एक साथ प्रवेश कर पाये। हलका वायुमण्डल हुआ तो जीव बहुत लम्बे और पतले होंगे और भारी रहने पर वे ठिगने, चपटे तथा गेंडे जैसी मोटी चमड़ी के रहेंगे।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नेतृत्व वेत्ता विलियम हैकिल्ज का कथन है कि विकसित स्तर के प्राणियों के लिए किसी ग्रह पर चार परिस्थितियाँ आवश्यक हैं 1- सन्तुलित गुरुत्वाकर्षण 2-वायुमण्डल 3 तापमान 4-पानी और थल। यह चारों बातें जहाँ सन्तुलित होंगी वहाँ बुद्धिमान प्राणधारी का गुजारा हो सकेगा। यों जीवन मात्र तो सूर्य जैसे तापमान और प्लेटो जैसे अति शीत ग्रह पर भी पाया जा सकता है पर वह बुद्धियुक्त न होगा। बुद्धिमान जीवन के शरीर में अस्थि पिञ्जर, रक्त सञ्चार और नाड़ी संस्थान की अति आवश्यकता रहेगी भले ही उनका गठन मनुष्य की अपेक्षा दूसरे क्रम से हुआ हो। इन्द्रियों की शक्ति के बारे में भी भिन्नता हो सकती है। जैसे हम लोग शब्द ध्वनियों को सुनते भर हैं पर वे सुनने की अपेक्षा उन्हें देखें अथवा चमगादड़ की तरह छूकर अनुभव कर लिया करें। मस्तिष्क संरचना विकसित स्तर की होने पर ही प्राणी प्रगतिशील हो सकता है। इसी प्रकार सृजन प्रजनन की दृष्टि से लिंग भेद होना जरूरी नहीं जिस तरह पौधे पराग का प्रत्यावर्तन करके प्रजनन करते रहते हैं उसी प्रकार उन जीवों में बिना स्त्री पुरुष का झंझट हुए अन्य सरल विधियों से वंश परम्परा चलती रह सकती है ।
उन जीवों के हाथ-पैर जरूर होंगे क्योंकि इनके बिना कुछ महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सकते। उँगलियाँ भी जरूरी हैं। हो सकता है किन्हीं लोकों में चार हाथ वाले जीव हों और वे हम लोगों की अपेक्षा अधिक मात्रा में और अधिक तरह के काम एक साथ कर सकें। देवताओं के चार हाथ मानने का कारण यह है कि उनका कर्तृत्व सामान्य मनुष्यों की तुलना में कम से कम दूना तो होना ही है। विकसित प्राणी थलचर ही होंगे क्योंकि जलचरों की अधिकाँश शक्ति तैरने में और पक्षियों को उड़ने में खर्च हो जाती है फिर उसके पास इतना शक्ति कोप नहीं बचता कि जीवन विकास के लिए कोई बड़े कदम बढ़ा सकें। यदि उन लोकों में अमोनिया तत्व अधिक हों तो बिना पानी के भी काम चल सकता है। रसायन शास्त्री जे.वी.एस. हान्डेन के प्रयोगों से यह सिद्ध है कि पृथ्वी निवासी जीवों की शरीर रचना के विकल्प में एक दूसरी पद्धति भी हो सकती है कि सिलिकॉन और वोरोन नाइट्रोजन के संयोग से जीवाणुओं की संरचना हो और उनके लिए पानी की आवश्यकता तरल अमोनिया कर सकता है । पृथ्वी के आदि काल में यही स्थिति थी। तब नाइट्रोजन के अभाव में पानी की कमी की पूर्ति अमोनिया ही करता था ।
शरीर रचना की दृष्टि से मनुष्य में और अन्य लोक वासियों में भारी अन्तर हो सकता है। उनके आहार विहार और समाज गठन में भी अन्तर हो सकता है। पर एक समानता समस्त ब्रह्माण्ड वासियों में पाई जायगी वह है अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को समझना और दूसरों के साथ स्नेहसिक्त उदार व्यवहार करना।
लोकान्तर निवासी प्राणी यदि समुन्नत होंगे तो उन्हें मनुष्य जैसा शरीर मिला होगा और उन्हें मानवीय आदर्शों के अनुरूप अपनी गतिविधियों का निर्माण करना पड़ रहा होगा। इस मनुष्य लोक के निवासी भी यदि समुन्नत बनना चाहेंगे तो उन्हें भी इस सुविधाजनक शरीर के साथ जुड़े हुए आदर्शवादी दृष्टिकोण, क्रिया-कलाप और उत्तरदायित्व को भी अपनाना होगा।
राज्य तन्त्र क्रान्तिकारियों के हाथ में न रहकर प्रतिगामी नौकरशाही के हाथ में चला गया। नौकरशाही की बन आई और निरीह जनता विवश ही देखती रह गई।
सत्ता और सम्पत्ति के लोभ में जो लोग अन्धे हुए हैं- जब तक उनकी प्रतिष्ठा कायम है, देश की स्थिति नहीं सुधर सकती। सरकारी तन्त्र के नाग पाश से मुक्त लोकतन्त्र खड़ा करना जरूरी है। उसके लिए नैतिक क्रान्ति चाहिए।
-काका कालेलकर
ज्ञानेन्द्रियों के आधार पर हमारी अन्तः चेतना सुख दुःख, काम, क्रोध, आदि अनुभव करती है। इस चेतना को ही मन कहते हैं। मन को और अधिक स्पष्ट करें तो उसे विविध अनुभूतियों के आधार पर बनी हुई मानवी चेतना कह सकते हैं जो इतनी समर्थ भी होती है कि जिन कोषों की एकत्रित अनुभूतियों ने उसका निर्माण किया है उन पर नियन्त्रण भी रख सके। मस्तिष्कीय चेतना के विविध पक्षों को प्रभावित, नियन्त्रित और प्रोत्साहित कर सकने में समर्थ होने के कारण मन को अत्यधिक महत्व दिया गया है, उसे ही उत्थान पतन का कारण माना गया है और उसे ही शत्रु मित्र की संज्ञा दी गई है। परिष्कृत और सुव्यवस्थित होने पर वह सचमुच मित्र का काम करता है और व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली, सम्मानास्पद, सन्तोषप्रद बनाने के साथ-साथ भौतिक और आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करता है इसके विपरीत यदि वह अस्त-व्यस्त एवं असंस्कृत हो तो फिर वह दूसरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी एक संकट सिद्ध होता है। दुष्प्रवृत्तियों से ग्रस्त मन वाला मनुष्य सब की दृष्टि में अविश्वस्त और अप्रामाणिक रहता है अपने आपके लिए भी वह विक्षोभ और असन्तोष ही उत्पन्न करता है। ऐसे व्यक्ति पग-पग पर असफल और तिरस्कृत होते रहते हैं। अभाव और सन्तोष से घिरे रहते हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में धकेल देने वाले मन को यदि शत्रु कहा जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं है।
मस्तिष्क की भौतिक संरचना से ऊपर उठकर यदि उसकी चेतनात्मक संरचना का विवेचन किया जाय तो उसे तीन भागों में बाँटना पड़ेगा। (1) भावनात्मक, (2) क्रियात्मक, (3) ज्ञानात्मक। यों हर काम में इनमें से एक का बाहुल्य रहता है पर उनका समुचित समन्वय हर काम में रहना चाहिए अन्यथा वह कार्य भोंड़ा और बेतुका दीखने लगेगा और उस कार्य का वह परिणाम न निकलेगा जो सन्तुलित स्थिति में निकल सकता था।
भावना का आवेश मनुष्य को विक्षिप्त जैसी स्थिति में पटक देता है। प्रेम, श्रद्धा आदि भावनाओं का रंग कई बार ऐसा चढ़ जाता है कि बिना समझे परखे और आगे की बात सोचे अपने प्रेमी या श्रद्धास्पद पर सब कुछ निछावर कर देने का आवेश छाया रहता है। यदि प्रेम पात्र या श्रद्धास्पद उपयुक्त हुआ तो ठीक अन्यथा इस आवेश में खतरा ही खतरा है। भोली लड़कियों को कितने ही दुराचारी इसी प्रेम जाल में फँसा कर उनका भविष्य हर प्रकार अन्धकारमय बना देते हैं। अन्ध श्रद्धा के चंगुल में फँसे हुए देवी-देवताओं अथवा सन्त महन्त के माध्यम से इतनी क्षति उठाते हैं जो यदि सही दिशा में विवेकपूर्वक उठाई गई होती तो उससे अपना और दूसरों का बहुत बड़ा हित साधन होता।
अनियन्त्रित भावनाएं यदि कुमार्गगामी हो जायें तो पूरी विपत्ति बनकर ही सामने आती है। कामान्ध क्रोधान्ध लोभान्ध, मोहान्ध न जाने क्या क्या न करने लायक कर बैठते हैं और पीछे पछताते हैं। पेशेवर हत्यारों की बात छोड़ दें तो सामान्यतः हत्याएं और आत्म हत्याएं क्रोधान्ध स्थिति में ही होती हैं। उस समय विवेक पूर्णतया नष्ट हो जाता है और आवेश इस कदर मस्तिष्क पर छा जाता है कि परिणाम का, औचित्य का विचार कर सकने की गुंजाइश ही नहीं रहती। और तनिक से कारण को लेकर आवेशग्रस्त व्यक्ति हत्या या आत्म हत्या कर बैठता है, पीछे जब वह बुखार उतरता है तो दूसरों की तरह स्वयं ही अपने आपको धिक्कारते ही बनता है।
भावनाओं का स्तर परिष्कृत हो तो मनुष्य सन्त, सज्जन, दयालु, परोपकारी, सत्प्रवृत्ति से सुसम्पन्न होकर देवोपम जीवन जी सकता है और महामानवों की पंक्ति में खड़ा होकर ऐसे आदर्श उपस्थित कर सकता है जिससे असंख्यों को चिरकाल तक प्रेरणा मिलती रहे। सद्भावना सम्पन्न अन्तःकरण स्वयं सन्तुष्ट रहता है और उसके समीपवर्ती शान्ति और शीतलता अनुभव करते हैं। भावनाओं का सन्तुलन-उन्हें आवेशों से मुक्त रखकर सत्पथ गामिनी बनाये रहना मन का सच्चे अर्थों में सदुपयोग है, जो इसे कर सकें वे मनस्वी कहलाते हैं और उस मनोबल के कारण अपना और दूसरों का भारी हित साधन करते हैं।
मनः चेतना का क्रिया पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। शरीर के द्वारा- मस्तिष्क के द्वारा जो कुछ किया जाता है उसी के फलस्वरूप भली बुरी उपलब्धियाँ सामने आती हैं। परिणाम फल फूल है और उन पौधों के बीज हैं कर्म। अक्सर भले-बुरे परिणामों का कारण दूसरे लोगों या कारणों को समझा जाता है। इसमें बहुत थोड़ी सच्चाई है। वास्तविकता यह है कि अपनी खामियों के कारण परिस्थितियों का पाशा उलटा पड़ जाता है और जिनका व्यवहार अनुकूल रह सकता था, उनका प्रतिकूल हो जाता है। काम को पूरे मन से न करना, उसे खराब करने की बराबर है। लापरवाही से-अन्यमनस्क होकर कुछ किया जाय उससे तो न करना अच्छा। मनोयोग के अभाव में क्रिया त्रुटिपूर्ण रह जाती है और तत्काल एक काम पूरा किया दीखने पर भी परोक्ष रूप से उसमें इतनी कमी रह जाती है जिसके कारण उसे न करने से भी अधिक अपनों को या दूसरों को हानि उठानी पड़े।
क्रिया पक्ष यह चाहता है कि उसके साथ पूरा मनोयोग जुड़ा हो। जो किया जाय पूरी दिलचस्पी के साथ किया जाय। समग्र कुशलता का उसमें समावेश जुड़ा रहे। ऐसे काम ऐसे शानदार होते हैं कि उनसे अपना मन भी प्रसन्न हो और दूसरों की दृष्टि में उस कर्तव्य के आधार पर अपने व्यक्तित्व का मूल्य बढ़े। व्यवस्था बुद्धि कोई जन्म जात गुण नहीं है। पूरे मनोयोग से-अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर यदि हर काम को करने की आदत डाल ली जाय तो निस्सन्देह उसके द्वारा किये हुए काम ऐसे बढ़िया होंगे कि शत्रु भी उन हाथों को चूमना चाहेगा। छोटे कामों में अपनी यह प्रवृत्ति दिखाने वालों को दुनिया सिर आँखों पर उठाती है और फिर वे एक के बाद एक उन्नति की सीढ़ियाँ पार करते हुए प्रतिष्ठा एवं सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच जाते हैं।
अच्छी आदतें डालने में देर लगती है और अध्यवसाय से काम लेना पड़ता है। आत्म नियन्त्रण रखना पड़ता है। पर बुरी आदतें थोड़ा सा ही अवसर पाने पर स्वभाव का अंग बन जाती हैं और फिर मुश्किल से छूटती हैं। आलसी और प्रमादी स्वभाव के व्यक्ति अपना अधिकाँश समय ऐसे ही बर्बाद करते रहते हैं और सामर्थ्य की तुलना में दसवां अंश भी काम उनसे नहीं बन पड़ता। हरामखोरी की, कामचोरी की आदत आलस और प्रमाद के रूप में परिपक्व होकर जीवन की बर्बादी का कारण बनती है। ऐसे व्यक्ति कभी कुछ महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकते। नशेबाजी, जुआ आदि के व्यसन कइयों के पीछे पड़ जाते हैं। फिजूलखर्ची की कइयों की ऐसी बुरी आदत होती है कि वे उपयुक्त आजीविका होते हुए भी सदा ऋणग्रस्त और तंगदस्त रहते हैं। अपने क्रिया संस्थान पर मन का नियन्त्रण न होने से ही ऐसी अस्त-व्यस्तताएं पनपती हैं। यदि मनः चेतना प्रखर हो और मच्छर काटते ही जिस तरह उसे उड़ाने का, काटे हुए स्थान को खुजलाने का प्रबन्ध अचेतन मन करता है उसी तरह यदि सचेतन मन शरीर की समस्त क्रिया पद्धति पर नियन्त्रण रखे तो समय का हर क्षण, बुद्धि का हरण कर सप्रयोजन कामों का अभ्यस्त हो सकता है और प्रगति की दिशा में इतना आगे बढ़ा जा सकता है जिसे जादू या चमत्कार कहा जाय।
जैसे समुद्र में जाकर सारी नदियाँ एक हो जाती हैं, सब काष्ठ अग्नि में जलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही सब हृदय भगवान की भक्ति में विलीन होकर एक रूप हो जाते हैं।
मुगल साम्राज्य का जब अन्त हुआ तो कुछ दिन पहले केन्द्र का नियन्त्रण ढीला पड़ गया था और प्रान्तों के सूबेदार आजाद होकर अपना अलग-अलग राज्य बना बैठे थे। यही स्वेच्छाचार उस सत्ता के पतन का कारण बना। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय मन साम्राज्य की सूबेदार हैं यदि उन पर विवेक का नियन्त्रण न रहे वे स्वेच्छाचार बरतें तो समझना चाहिए जीवन साम्राज्य का अन्त मुगल साम्राज्य की तरह ही सन्निकट और सुनिश्चित है।
मन की तीसरी प्रवृत्ति है- ज्ञान। जानकारियों के आधार पर ही मनुष्य को सही सोचने और सही निष्कर्ष निकालने की क्षमता प्राप्त होती है। एकाँगी, अधूरा, अथवा उलटा ज्ञान होने से चिन्तन को सही दिशा नहीं मिलती और अविकसित मस्तिष्क बाल क्रीड़ाओं की तरह ऐसा कुछ सोचता और ऐसा कुछ करता रहता है जिसे उपहासास्पद ही कहा जाए।
भावात्मक, क्रियात्मक और ज्ञानात्मक त्रिविध प्रवृत्तियों को संतुलित, नियन्त्रित और व्यवस्थित रखने से ही मन की शक्ति का पूरा लाभ उठाया जा सकता है। अन्यथा वह अंतर्द्वंद्वों में ही उलझी हुई अपनी अद्भुत क्षमता को नष्ट भ्रष्ट करती रहती है और इतनी अद्भुत क्षमता से सम्पन्न होने पर भी मनुष्य उसके लाभों से वंचित रह जाता है।
आज ज्ञान और कर्म के विकास पर जो दिया जा रहा है पर भाव पक्ष को भुला ही दिया गया है। मनुष्य जड़ मशीन बनता चला जा रहा है। कम्प्यूटरों की तरह का ज्ञान और मशीनों की तरह का कर्म भौतिक साधन बढ़ा सकता है पर उससे मनुष्य की अन्तः चेतना को पोषण न मिल सकेगा। भाव स्तर यदि सूना, नीरस, शुष्क और निष्ठुर बना रहे तो भाव कोमलता के उस दिव्य आनन्द से सर्वथा वञ्चित ही रह जाना पड़ेगा जो आत्मा की भूख है। जड़ जीवन जीकर केवल इन्द्रियाँ तृप्ति की जा सकती है और अहंता के उन्माद की थोड़ी खुमारी अनुभव की जा सकती है। पर यदि भावना स्तर को सुविकसित करने की परिस्थितियाँ पैदा नहीं की गई तो संसार में सुख सामग्री कितनी ही बढ़ जाय आनन्द और उत्कृष्टता मर जायगी। केवल नर कंकाल ही जीवित रहेगा और उसमें प्रेत पिशाच का आसुरी अट्टहास ही देखने को मिलेगा ।
भाव स्तर की सरसता जिस प्रेम, दया, करुणा, ममता, स्नेह, आत्मीयता, सेवा आदि के रूप में विकसित देखी जाती है वह जीवन की श्रेष्ठतम मधुरिमा है। उसकी एक बूँद भी कहीं मिल जाय तो मनुष्य तो क्या छोटे जन्तुओं की आत्मा भी आनन्द विभोर हो जाती है।
क्वीन्स युनिवर्सिटी, आन्टोरिया, (कनाडा) ने प्रेम का प्राणियों पर भौतिक प्रभाव, विषय पर, एक नई खोज के परिणाम सामने आये। इस विश्वविद्यालय के फार्मा कौलौजी विभाग के प्राध्यापक डॉ. एल्डन बायड ने बताया कि उनके विभाग की एक महिला कर्मचारी चूहों वाले विभाग को सँभालती है। उसे स्वभावतः चूहों से बहुत प्रेम है। वह उन्हें दुलार भरी दृष्टि से देखती है, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखती है और यथासम्भव अपने व्यवहार में प्रेम प्रदर्शन भी करती है। इसका प्रभाव चूहों पर आश्चर्यजनक हुआ है। महिला ने चूहों के नाम रख छोड़े हैं और वह जिसे पुकारती है वही आगे आता है। जैसे ही वह पिंजड़ों के पास जाती है चूहे दौड़कर उसके पास इकट्ठे हो जाते हैं और एक टक ताकते रहते हैं। जो भी वह खिलाती है खुशी-खुशी खा लेते हैं, यद्यपि उनमें तरह-तरह की औषधि मिली रहने से वह भोजन उनकी रुचि और प्रकृति के प्रतिकूल होता है कई बार कष्टकर विधि से चूहों के शरीर में औषधियाँ पहुँचाई जाती हैं। अनुभव होने पर तो इसके लिए किसी चूहे को तैयार नहीं होना चाहिए पर वह महिला जिस चूहे को चाहती है उसे खुशी-खुशी इस प्रयोग के लिए सहयोग देने के लिए तैयार कर लेती है।
कई बार चूहे मारने की दवा का भी प्रयोग किया गया। एक ही किस्म की एक ही मात्रा में दवा दो महिलाओं द्वारा चूहों को खिलाई गई। इस प्रेम भावना युक्त महिला के हाथ से दवा खाने पर 20 प्रतिशत चूहे मरे जबकि उसी दवा को उतनी ही मात्रा में दूसरी महिला ने खिलाया तो 80 प्रतिशत मर गये।
इस विभाग के अध्यक्ष डॉ. बायड ने निष्कर्ष निकाला है कि चिकित्सा क्षेत्र में प्रेम भावनाओं का भी प्रयोग किया जाना चाहिए। चिकित्सकों का व्यवहार रोगी के साथ विश्वास, प्रेम पात्र जैसा होना चाहिए, साथ ही उन्हें अपने प्रियजनों के साथ रहने का भी अवसर देना चाहिए ताकि रोगियों को औषधि उपचार के अतिरिक्त प्रेम भावनाओं की औषधि से भी बढ़ चढ़कर गुणकारी सिद्ध होने वाली खुराक मिलती रह सके।
प्रगति और सुख सुविधा की बात सोचने वाले मनुष्य को भाव गरिमा की ओर भी ध्यान देना चाहिए और आत्मा की इस आकाँक्षा को पूरा करने के लिए भी कुछ सोचना करना चाहिए। ज्ञान कर्म के साथ भक्ति का भी समन्वय होना चाहिए।
मनुष्य विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। ईश्वर ने उसे अन्य जीवों की तुलना में बहुत अधिक शक्तियाँ तथा सुख सुविधाएं दी हैं इसका भी एकमात्र कारण यही है कि ईश्वर चाहता है हम आदर्शनिष्ठ जीवन जियें, अपनी शक्तियों का सदुपयोग करें। जिस मनुष्य की रचना में परमात्मा ने अपने समस्त स्नेह और ममत्व को उड़ेल दिया है, जिसके कारण में उसने अपना पूरा क्रिया-कौशल दिखाया है- वह भी यदि पशुओं के समान शिश्नोदर जीवन जीता है तो यही कहा जायेगा कि परमात्मा का श्रम व्यर्थ ही गया।
लाखों योनियों में भटकने के बाद प्राप्त हुई इस नर देह को पाकर हमें इसके गौरव के अनुरूप ही चलना चाहिए। यह शोभा नहीं देता कि हम मनुष्यता को कलंकित करने वाले कुकर्म करें। तुच्छ विषय-भोगों में फँसकर अपने जीवन लक्ष्य को भुला बैठें। हंस नीर-क्षीर विवेकी होता है, हमें भी न्याय और अन्याय का अन्तर कर नीति तथा न्याय के पथ का ही अवलम्बन करना चाहिए। मानी चातक कितना प्यास क्यों न हो, केवल स्वाति नक्षत्र का ही जल ग्रहण करता है। यदि हम में भी मनुष्यता का किंचित भी अभिमान हो तो यह व्रत लेना चाहिए कि चाहे अभावों भरा जीवन व्यतीत करना पड़े परन्तु अनीति और अन्याय से न तो धन अर्जित करेंगे और न ऐसे धन का उपयोग करेंगे। मधुमक्षिका पुष्पों के आस-पास मँडराती रहती है, उनका सार ग्रहण करती है। हम भी उसकी भाँति सज्जनों के समीप रहें तथा सद्विचारों को ग्रहण करें।
जो जीवन मक्खियों की भाँति स्वार्थ-संकीर्णता की कीचड़ के ऊपर भिनभिनाने में ही व्यतीत होता है उसे धिक्कार है। जो इन्द्रियों का दास बनकर रहता है, वह जीवन को व्यर्थ ही गँवा रहा है। इस देह की सार्थकता तभी है जब सात्विक तथा परोपकार की ज्योति से जगमगाता जीवन जीया जाये।
हम अपने जीवन को अनुकरणीय बनायें। सत्य और प्रेम हमारी साँस-साँस में रमे हों। दया, सौजन्य, संयम, सेवा, और सहानुभूति हमारे प्रत्येक आचार-विचार में पल्लवित पुष्पित हों-तभी सच्चे अर्थों में हम मानव कहलाने के योग्य हो सकते हैं।
हम शान्तिपूर्वक जियें और दूसरों को भी जीने दें। जो भूले भटके हैं, उन्हें जीवन का सही रास्ता दिखायें। उन्नति पथ पर जो चल रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने में सहयोग दें। स्वयं तो हम महान् बनें दूसरों को भी महान् बनायें।
यह समस्त विश्व परमात्मा का ही प्रतिरूप है। वही समस्त प्राणियों में समाया है। मैं-तू, अपना-पराया, यह जो वैयक्तिक सत्ता की प्रतीति है, भ्रममात्र है। जीवन का वास्तविक लक्ष्य है वैयक्तिक सत्ता का समष्टि -ईश सत्ता में मिल जाना। इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए विषय वस्तु का ग्रहण करना है। संसार में असंख्य प्राणी हैं और सबको ही अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करनी हैं। अतएव हमें भी अधिक का लोभ न करते हुए अपनी आवश्यकता के अनुरूप ही ग्रहण करना चाहिए। उससे अधिक लेना तो पाप है, अनधिकार चेष्टा है।
वस्तुतः लेने और देने, पाने और त्याग करने के विश्व नियम के अनुकरण में ही प्राणिमात्र का कल्याण सन्निहित है। त्याग ही प्राप्ति का आधार है। जो त्याग नहीं कर सकता उसे प्राप्ति का अधिकार भी नहीं। संसार की इस यज्ञशाला में त्याग की आहुति देकर हमें भी ईश्वरीय प्रयोजन में सहयोग देना चाहिए।
यह जीवन समुद्र यात्रा की भाँति है, जिसमें हम सभी एक ही संकुचित नौका में परस्पर मिलते हैं। मृत्यु तट पर पहुँचने के समान है, जहाँ हम सभी अपने-अपने लोक को चले जाते हैं।
-रवीन्द्र
मन हमारे शासक और सेवक के दोनों काम कर सकता है। यदि हम उसे ढीला छोड़ दें, स्वच्छन्द विचरने दें, उसके कहने पर चलें और अपना आत्म-समर्पण उसे करदें तो मन शासक है। इसके विपरित यदि हम उसे कसे रहें, नियन्त्रण में रखें, अभीष्ट मार्ग पर चलायें, आदेश दें और उसे उपकरण या वाहन की तरह इस्तेमाल करें तो वह सेवक है। शासक की दृष्टि से वह बुरा शासक है अपना भी नाश करता है और अपने प्रदेश-शरीर-प्रजा कायिक उपकरणों का भी सत्यानाश करके रख देता है। ऐसे चंचल मर्कट को शासक नियुक्त करने की जो भी भूल करेगा पछताएगा। पर वह सेवक के स्थान पर बहुत ही उपयुक्त, योग्य, सामर्थ्यवान् कुशल, सब कुछ है। इससे बढ़िया, सस्ता, अहर्निशि, साथ रहने वाला, वफादार नौकर इस दुनिया में और मिल ही नहीं सकता, हो ही नहीं सकता।
मन की खुराक दो हैं। आहार और विहार। जैसा हम अन्न खाते हैं उसका स्थूल रूप शरीर के उपयोग में आता है और सूक्ष्म भाग मन की खुराक बन जाता है। प्रोटीन, स्टार्च, शर्करा, खनिज, विटामिन, वसा, हाइड्रो कारर्बोट्रेट आदि तत्वों के सन्तुलन पर शारीरिक खुराक की उत्कृष्टता निकृष्टता रहती है। खराब भोजन हमें दुर्बल और रुग्ण करता है, अच्छा भोजन निरोग और बलिष्ठ। आहार का सूक्ष्म भाग उसके साथ अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई सात्विकता है। मिर्च, मसाले, तले, भुने, नशीले पदार्थ तामसिक हैं, यह गुण मन को प्रभावित करता है और ऐसा आहार करने वाले, क्रोधी तामसी, कामुक, चंचल और पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से घिर जाते हैं। बेईमानी से, दूसरों को दुःख या धोखा देकर, अनीति पूर्वक, बिना परिश्रम कमाया हुआ पैसा जब पेट में जाता है तो उससे मन अतीत उच्छृंखल, उद्दण्ड हो जाता है। तब वह न शास्त्र की बात मानता है और न सन्त की। अपनी तानाशाही चलाता है और सर्वनाश करने वाले नृशंस शासक का घिनौना उदाहरण प्रस्तुत करता है।
पोषण का दूसरा माध्यम है विहार। जल वायु, वस्त्र निवास, सोना, उठना, श्रम विनोद, संयम, स्वच्छता, संगति, परिस्थिति, वातावरण आदि की मिली-जुली व्यवस्था को विहार कहते हैं। इन बातों का शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अवाँछनीय विहार करने वाले उच्छृंखल लोग कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। अकेला आहार अच्छा होने से ही काम नहीं चलता, विहार भी ठीक होना चाहिए तभी गाड़ी के दोनों पहिये ठीक तरह लुढ़केंगे और स्वास्थ्य ठीक रहेगा।
विहार का सूक्ष्म रूप भी है जो मन का पोषण करता है। यह है काम करते समय रखा जाने वाला दृष्टिकोण। सामान्य जीवनयापन भी उच्च दृष्टिकोण युक्त हो सकता है और उसी को निकृष्ट भावना से किया जा सकता है। काम का बाहरी स्वरूप एक जैसा रहते हुए भी उसका सूक्ष्म प्रभाव सर्वथा, विपरीत होगा और मन का पोषण उसी एक जैसे काम से भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का मिलेगा।
काम सेवन-इन्द्रिय लिप्सा के लिए या समाज को सुयोग्य नागरिक प्रदान करने के लिए, इन दोनों दृष्टिकोण में जीवन आसमान का अन्तर है। पत्नी नौकरानी, चौकीदारिन, महाराजिन और काम पिपासा एवं मनोरंजन के लिए अथवा जीवन सहचरी, धर्म पत्नी का प्रयोजन पूरा करने के लिए? विवाह दाम्पत्य जीवन एक समान रहते हुए भी दोनों की दिशायें विपरीत हैं। एक दृष्टिकोण से किया गया विवाह मनुष्य को सदा असन्तोष और संताप ही देता रहेगा, दूसरे दृष्टिकोण से बनाया गया दाम्पत्य जीवन एक वरदान की तरह प्रतीत होगा।
जीवन के लिए भोजन अथवा भोजन के लिए जीवन इनकी प्रतिक्रिया सर्वथा भिन्न होती है। दो व्यक्ति एक साथ-एक समय एक जैसा भोजन करते हैं। पर उनके परिणाम मन ऊपर भिन्न प्रकार की छाप डालते हैं। भोजन सम्बन्धी रुचि और मर्यादा में अन्तर उपस्थित करते हैं। खाते समय जो छाप मन पर पड़ती है उससे भारी अन्तर रहता है। भोजन को औषधि, ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करने वाला व्यक्ति उसे अमृत समझकर श्रद्धा और प्रसन्नतापूर्वक उतनी मात्रा में खाता है जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। वस्तुओं के चुनाव में उसे पोषक तत्वों और गुणों का ध्यान रहता है। जबकि भोजन के लिए जीने वाला, स्वाद के पीछे पड़ा रहता है। मनचाहा स्वाद न मिलने पर आहार को फेंके-फेंके फिरता है, नाक भों सिकोड़ता है और स्वादिष्ट वस्तु मिलने पर पेट में अधिक ठूँसता चला जाता है। ऐसा आहर मन पर कुत्सित प्रभाव ही डालेगा, उसे कुसंस्कारी ही बनायेगा।
व्यापार, कृषि, नौकरी आदि आजीविका के माध्यमों में दृष्टिकोण की भिन्नता रहती है। एक व्यक्ति इन माध्यमों से बिना नीति अनीति का विचार किये जितना भी जैसे भी सम्भव हो अधिक उपार्जन का प्रयत्न करता है। ग्राहक के, मालिक के, साथियों के अधिकारों का अपहरण करता है और किसी भी सूरत से अपनी सम्पन्नता बटोरने में लगा रहता है। दूसरा व्यक्ति दूसरों का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए, फलस्वरूप निर्वाह की व्यवस्था रखने के लिए उपार्जन करता है। अपनी ही तरह वह उनके स्वार्थों का भी ध्यान रखता है जिनके माध्यम से वह आजीविका उपार्जित की गई। किसान है तो बैलों के, मजूरों के प्रति ईमानदारी और वफादारी बरतता है। व्यापारी है तो ग्राहक को ठगता नहीं, वरन् उसकी आवश्यकता का ध्यान रखते हुए अपने और दोनों के स्वार्थों में उचित समन्वय स्थापित करता है।
शिक्षा, विनोद, व्यायाम, मैत्री, खर्च, सम्भाषण, परामर्श, चिन्तन आदि सामान्य दैनिक कार्यों में वह औचित्य और मनुष्यत्व को बनाये रखता है। फलस्वरूप यही रोजमर्रा के काम एक प्रकार से योग साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल। वह उद्धत आचरण नहीं करता। जानता है मेरा अस्तित्व सेवा करना है। मुझे सेवक के रूप में बनाया गया है, मेरा कर्त्तव्य आत्मा की सहायता करना है। मुझे कोई ऐसा काम न करना चाहिए जिससे जीवात्मा के जीवन लक्ष्य में बाधा व्यवधान उत्पन्न होता है। ऐसा समझदार मन मर्यादा तोड़कर सेवक से शासक बनने का प्रयत्न स्वतः ही नहीं करता और उसके उच्छृंखल बनने की आशंका नहीं रहती।
मन पर देख-रेख न रखी जाय, उसे दुनिया की भेड़चाल में चलने दिया जाय तो वह भी अन्य चोर नौकरों की तरह भोले मालिकों की हजामत बनाने का ढर्रा अपना लेगा। यदि मालिक सावधान हो और यह जनता हो कि इस दुमुँहे सर्प को कैसे बरता जाय तो वह खतरे से बच जायेगा। सरकस और दर्शकों का मनोरंजन करता है पर यदि वह उजड्ड और अनियन्त्रित हो तो मालिकों से लेकर दर्शकों तक सभी के लिए संकट सिद्ध होगा। मन रूपी दुधारी तलवारों से जहाँ शत्रु को समाप्त किया जा सकता है वहाँ उलटा प्रयोग होने पर अपना भी सर्वनाश हो सकता है।
मन को साथ लिया जाय तो वह पारद से रसायन बनने की तरह उपयोगी भी अत्यधिक है। उसका कुसंस्कारी रूप तो विषैले पारे की तरह है जो जिस शरीर में भी जायेगा उसे तोड़-फोड़ कर बाहर निकलेगा। मन के निग्रह के लिए जहाँ उसे सत्परामर्श देना, समझाना बुझाना, मनन, चिंतन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय।
सतोगुणी, न्यायोपार्जित सज्जनों के सम्पर्क में बना हुआ आहार मन की सत्प्रवृत्तियों को उभारता है और हर कार्य में उदात्त दृष्टिकोण का समन्वय रखने से क्रिया कलाप की छाप मन पर ऐसी सुसंस्कार युक्त डालता है जिसे परिष्कृत विहार कहा जा सकेगा। शरीर को स्वस्थ रखने की तरह ही मन को सुसंस्कारी रखने के लिए भी उपयुक्त आहार-विहार की व्यवस्था रखी जानी चाहिए। तभी वह आत्मा का शासक बनने की कुचेष्टा न करके एक सदाचारी, सहयोगी की तरह सेवक बना रहने के लिए सहमत रह सकेगा।
सृष्टि का कौतूहल कौतुक देखते ही बनता है। यहाँ सब कुछ सीधा सरल ही नहीं चित्र विचित्र भी बहुत है। प्राणधारियों पर दृष्टिपात करें तो उनकी रचना और स्थिति में ऐसी विलक्षणतायें दीखती हैं कि आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। विनोदी विधाता बैठा ठाला क्या-क्या कौतूहल रचता रहता है उसे देखकर लगता है उसमें बचपन जैसी आँख मिचौनी करने, भूल भुलैया बनाने की उद्धत मनोवृत्ति कम नहीं है। बूढ़ा हो गया तो क्या बचपन फिर भी उसका बना ही हुआ है और ऐसे खेल करता है जिसमें न केवल उसी का मनोरंजन हो वरन् दूसरे भी उसके इस कर्तृत्व की विलक्षणता पर मुस्कराए बिना न रहें।
डॉ. एडवर्ड होम और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जीव शास्त्री डॉ. एच. काल्डवेल ने उस प्राणी पर गहरी गवेषणा की है। यह अण्डे देता है और बच्चों को दूध भी पिलाता है, पानी में डुबकी लगाता है, जमीन पर बिल बनाता है। पूँछ चपटी, त्वचा पर कोमल बाल, बतख जैसी जाल युक्त उंगलियाँ, कर्ण रहित, चिड़िया की चोंच जैसा मुँह, लम्बाई 50 से.मी., वजन एक किलो, दो बार नियत समय पर भोजन करने का अभ्यासी, एकान्त परिस्थितियों में प्रजनन का अभ्यासी, यह प्राणी निस्संदेह अद्भुत है। उसका वंश सुरक्षित रखने के लिए आस्ट्रेलिया सरकार ने इसे पकड़ने या मारने पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है। वह प्रतिकूल जलवायु में जीवित नहीं रहता फिर भी उसे न्यूयार्क में व्राक्स चिड़िया घर में 10 वर्ष तक जीवित रखने में सफलता प्राप्त की गई।
स्तन पायी और सरीसृप जाति के बीच का एक प्राणी है- प्लेटिपस। यह केवल आस्ट्रेलिया में ही पाया जाता है। सरीसृप वर्ग ने जब सृष्टि के आरम्भिक दिनों में प्रगति करते हुए स्तनपाई वर्ग में प्रवेश किया तो उस मध्यान्तर काल का यही एक प्राणी साक्षी अवशेष के रूप में विद्यमान है। यों इसी प्रकार का एक और जन्तु ‘इक्रिडना’ भी पाया जाता है पर वह इतना कम शेष रह गया है कि उसके संबंध में प्रकाश डाला जा सकना संभव नहीं। 5 करोड़ वर्ष से अपनी जाति का पृथक अस्तित्व बनाये रहने में समर्थ यह प्राणी यों अति स्वल्प मात्रा में ही शेष रह गया है फिर भी वह प्राणी वैज्ञानिकों के लिए एक आश्चर्य के रूप में विद्यमान है।
चमगादड़ का वर्गीकरण करना कठिन पड़ता है क्योंकि उसमें पशु और पक्षियों के दोनों चिन्ह पाये जाते हैं। उड़ती है इसलिये पक्षी है और स्तनपायी है अण्डे नहीं बच्चे देती है और घोंसला नहीं बनती है इसलिए पशु है। उसे उभय पक्षी कहकर सन्तोष करना पड़ता है। यही बात छिपकली के बारे में है, वैसे वह साँप की तरह रेंगने वाले वर्ग में गिनी जानी चाहिए पर चूँकि उसके पैर और पंजे होते हैं इसलिए उस वर्ग में भी कैसे गिना जाय?
छिपकली की सब से अद्भुत बात यह है कि उसकी पूँछ शरीर में जुड़ी हुई होते हुए भी एक स्वतंत्र उप अंग मात्र है। पूँछ से वह कई काम लेती है पर जब विपत्ति आती है कोई आक्रमण करता है तो अपने आप झटककर उसे तोड़कर अलग कर देती है। कटी हुई पूँछ देर तक हिलती जुलती और हरकत में रहती है। आक्रमण कारी उसे ही असली छिपकली समझ लेता है और उस पर झपट पड़ता है। इस अवसर का लाभ उठाकर वह नौ दो ग्यारह हो जाती है।
शरीर के टुकड़े करके अलग करने में प्रवीण एक और अद्भुत जीव है ‘पालोलो’। यह मलाया पालीनेशिया, फ्लोरिडा के तटवर्ती चट्टानों में पाया जाता है। रेंगने वाले जीवों में ही उसकी गणना है। वह अपने आप में ही नर है- अपने में ही मादा। वंश वृद्धि की दृष्टि से वह अपने आप में पूर्ण है। उसे किसी को साथी बनाने या ढूंढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। शरदऋतु में उसका प्रजनन काल होता है। तब वह चट्टानों से निकल कर समुद्र तट पर आ जाता है, उसका पिछला दो तिहाई भाग हरा और नीला होता चलता है। उस पर दाने दाने से उग आते हैं। अब अगले एक तिहाई भाग को नर और पिछले दो तिहाई भाग को मादा कह सकते हैं। गुप चुप भीतर ही भीतर न जाने क्या होता रहता है कि पूँछ गर्भवती हो जाती है और उगे हुए दाने अण्डों का रूप धारण कर लेते हैं। जब उसकी अभिन्न सहचरी मादा पूँछ प्रजनन की तैयारी में होती है तो ‘पालोलो’ उसे झटक कर अलग कर देता है झंझट से बचने के लिए खुद तो फिर चट्टान में आ छुपता है और बेचारी मादा समुद्र में अपने अण्डे बच्चों के साथ एकाकी अपनी जीवन नौका खेती है और अपना परिवार संभालती है। जिस तरह एक पत्नी के मरने के बाद मर्द दूसरा विवाह करके नई दुलहन ले आते हैं इसी तरह पालोलो की नई पूँछ निकलनी शुरू होती है, बढ़ती और पुष्ट होती है अगले वर्ष उसकी भी दुर्गति। पुराने सामन्त राजाओं का वही तरीका था जब तक पत्नी गर्भवती नहीं होती तब तक उसे साथ रखते थे। इसके बाद उसे रद्दी खाते का माल समझकर महल के एक कोने में पटक दिया जाता था। और नई दुलहन को साथ लगाया जाता था। लगता है ‘पालोलो’ ने इसी प्रकार की रीति-नीति अपना रखी है। फर्क इतना ही है उसे नई दुलहन तलाश नहीं करनी पड़ती, वह घर बैठे आ जाती है और अपने आप ही उसमें आत्मना होने का प्रयत्न करती है।
ठीक इसी तरह का एक और रेंगने वाला जीव है ‘माईरिआनीडा’ यह भी अपने आप में पूर्ण है। स्वयं ही नर, स्वयं ही मादा। मार्च में उसकी सफेद पूँछ लहराने लगती है और पीली होती जाती है। यही है उसका गर्भ धारण। जब यह अण्डों के भार से बोझिल हो जाती है तो वह भाग अलग हो जाता है और उसमें जन्मा परिवार स्वतंत्र रूप से अपना जीवन धारण करता है।
‘कुछ सेक्सलैस’ जीव मछली शक्ल के भी होते हैं वे बिना नर की सहायता के अपने शरीर में ही अण्डे उगाते रहते हैं और पके हुए अण्डे मूल शरीर से बाहर निकलकर स्वावलम्बी जीवन जीने लगते हैं।
फ्रान्स के जीव विज्ञानी बेलाफेकर ने बिच्छू के संबंध में भी बहुत खोजबीन की है। उसकी प्रेम-कथा और दाम्पत्य जीवन की परिणति जितनी विचित्र है उतनी ही दुखद भी। ऐसी अद्भुत रीति नीति शायद ही किसी अन्य प्राणी में पाई जाती हो।
अप्रैल, मई में बिच्छुओं का ऋतु काल आता है। नर मादा एक दूसरे को तलाश करते हैं। पटरी बैठती है या नहीं इसके लिए शीर्षासन की तरह सिर नीचे और पूँछ ऊपर करके उलटे खड़े हो जाते हैं। पूँछ मिलने पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उपयुक्त साथी मिला या नहीं। पूँछ हुक की तरह उलझ जायँ तो समझना चाहिए कि विवाह पक्का हो गया। अन्यथा वे दूसरी तलाश में बिछुड़ जाते हैं।
जोड़ी बन जाने पर दोनों मिलकर छोटा गड्ढा खोदने में लगते हैं। यही उनका अन्तः पुर होता है। इस खुदाई के बीच भी वे दोनों एक दूसरे का एक हाथ पकड़े रहते हैं। रात भर उसमें उनका विश्राम होता है और यहीं सुहाग रात मनाते हैं।
दूसरे दिन प्रातःकाल उस गड्ढे का दृश्य बहुत ही वीभत्स बन जाता है। नर बिच्छू के पंजे, डंक और कुछ अन्य अवशेष ही वहाँ इधर-उधर छितरे मिलते हैं। शेष कुछ गायब। मादा बिच्छु अपनी काम तृप्ति करने के उपरान्त स्वादिष्ट भोजन का आनन्द भी पति देव के शरीर से लेती है और उसे भोर होते ही खा पी कर समाप्त कर देती है।
इतने पर भी मादा बिच्छु अपने बच्चों के प्रति बड़ी सहृदय होती है। प्रायः 14 महीने उसे गर्भधारण किये रहना पड़ता है इसके बाद वह अण्डे देती है। उन्हें सेती है और कई सप्ताह तक बच्चे जब तक चलने फिरने लायक नहीं होते पीठ पर ही लादे फिरती है।
मनुष्य के दाँत दो बार निकलते हैं एक जन्म के समय दूसरे 5, 6 वर्ष की जिन्दगी में पर हाथी के दाँत उसकी 50-60 वर्ष की जिन्दगी में छह बार उखड़ते और निकलते हैं। उसे अपना बड़ा सा पेट भरने के लिये कड़े वृक्ष तोड़ने चबाने पड़ते हैं। फलतः दाँत जल्दी घिसते और टूटते हैं इसलिये प्रकृति ने उसके दाँत छह बार निकलने की व्यवस्था की है।
जीवधारी जगत की विचित्रताएँ उसके रचनाकार की महानता का ही नहीं उसकी विनोद प्रियता का भी परिचय देती हैं।
मन की देख-रेख और साज-सँभाल न करने से अक्सर वह बिगड़ैल घोड़े की तरह मनचाही दिशा में चलने का अभ्यस्त हो जाता है। फिर उसे अपनी ही बात सबसे सही मालूम पड़ती है। दूसरों के तर्क या सुझावों का अपरिष्कृत मन के सामने कोई मूल्य नहीं रहता। ऐसा तब होता है जब कोई दूसरा सुझाने, समझाने, रोकने, सँभालने वाला न हो, मनमर्जी चलने का अवसर मिलता रहे। अपने आप अपने मन के गुण, दोषों पर दृष्टि न रखने से भी ऐसा हो जाता है। जिनके अहंकार को निरन्तर पोषण मिलता रहता है, जो चापलूसों से घिरे रहते हैं और हर सही गलत बात का समर्थन पाते रहते हैं, उन्हें अपनी स्थिति की सर्वोत्कृष्टता का भ्रम हो जाता है और फिर वे अपनी मर्जी के आगे दूसरे किसी की सुनते ही नहीं। राजा महाराजाओं, रईस अमीरों का, सन्त महात्माओं का प्रायः यही हाल होता है वे चापलूस खुशामदियों से घिरे रहते हैं और अपनी हर सही गलत बात की प्रशंसा सुनते रहते हैं। उससे उनकी आत्म निरीक्षण वृत्ति कुण्ठित हो जाती है। विश्लेषण और विवेचन मादा नहीं रहता। फलतः वे एकपक्षीय, एकाँगी दृष्टिकोण के ही अभ्यस्त हो जाते हैं, काट-छाँट करके उचित अनुचित का भेद करने और यथार्थ ढूंढ़ निकालने की प्रतिभा ही वे खो बैठते हैं। ऐसे लोग आये दिन अपनी सनकों के शिकार होते रहते हैं, और उलटे परिणाम सामने आने पर हानि उठाते और पछताते रहते हैं।
अड़ियल अभिरुचि का एक निर्मम उदाहरण इतिहास के पृष्ठ पर यह भी है कि फ्राँस के राजा लुई सप्तम ने ईसाई धर्म के दो वर्गों में चल रहे धर्मयुद्ध के बाद अपने गलमुच्छे मुड़वा डाले। राजा चेहरे को साफ सुथरा रखना चाहता था, गलमुच्छे तो उसने युद्ध में आतंक पूर्ण आकृति बनाने के लिए ही रखाये थे पर ये रानी ऐलीनोर को बहुत भा गये। वह नहीं चाहती थी कि उसका पति-उसकी दृष्टि में सुन्दर लगने वाले इन गलमुच्छों को मुड़ाये। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे और जिद को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये रहे। धीरे-धीरे बात बढ़ती चली गई और अन्ततः रानी ने घोषणा करदी कि उसका प्रेम समाप्त हो गया है और वह तलाक लेकर अलग रहेगी। तलाक मंजूर हो गया।
रानी ऐलीनोर दक्षिणी फ्राँस के गिनी और पाइटो दो प्रान्त पिता के परिवार से दहेज में अपने साथ लाई थी। वह उसने वापिस माँगे और अपने पुनर्विवाहित पति इंग्लैंड के राजा हेनरी द्वितीय के नाम से लिख दिये। अब इन दिनों में युद्ध छिड़ गया और वह सन् 1152 से लेकर 1453 तक 301 वर्ष तक चला।
गलमुच्छे मुड़ाने या न मुड़ाने की तनिक सी बात को दुराग्रह ने कितना जटिल बना दिया और उसका दुष्परिणाम कितनों को कितना अधिक भुगतना पड़ा इसे इतिहास के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं।
बोरबारा का राज्य मंत्री फरीदएद्दीन 84 वर्ष जिया। वह सन् 870 में जन्मा और 954 में मरा। 17 वर्ष की आयु में वह एक दुर्घटना का शिकार हो गया जिससे उसका चेहरा बेतरह विकृत और कुरूप हो गया। उसे कुरूपता नापसन्द थी, अपनी भी। पर करता क्या? आखिर उसने एक सोने का मुखौटा बनवाया और मृत्यु समय तक उसे ही पहने रहा। दूसरों को अपना असली चेहरा दिखाना तो दूर कभी दर्पण में खुद भी उसने उसे नहीं देखा। यों वह बड़ा विद्वान और अनुभवी राजनीतिज्ञ था। उसे अपने जीवन काल में महत्वपूर्ण पद प्राप्त हुए पर चेहरा उसने न राजा को दिखाया न प्रजा को। जब उसकी मृत्यु हुई तो भी उसकी वसीयत के अनुसार उसे उस सोने के मुखौटे सहित ही दफनाया गया।
राजा सबसे बड़ा और सबसे पवित्र होता है यह मान्यता अपनाकर एक राजवंश ने अपने ऊपर विचित्र प्रतिबन्ध लगा लिये कि वह न जो जमीन पर पैर रखेगा और न मनुष्य के अतिरिक्त और किसी वाहन का प्रयोग करेगा। इस सनक ने उस राजवंश के लोगों को पराधीन जैसी कष्टकर स्थिति में डाले रखा पर वे अड़े अपनी ही बात पर रहे।
बेल्जियम के अफ्रीकी उपनिवेश काँगो में एक राज्य है कुन्डी। यहाँ का राजा वहाँ के धार्मिक विश्वासों के आधार पर अपने को देवता का अवतार मानता था और इतना पवित्र समझा जाता था कि वह कभी जमीन पर पैर न रखे अन्यथा जनता को दैवी प्रकोप सहना पड़ेगा। उसके लिए एक शाही भारवाहक नियत रहता था, उसी के कन्धे पर चढ़कर उसे जहाँ कहीं भी जाना होता-जाता। राज सिंहासन पर भी यह भार वाहक ही उसके लिये कुर्सी का काम देता।
साथ ही एक और भी प्रतिबन्ध यह रहता था कि राज सिंहासन पर बैठते समय जो भारवाहक राजा को मिलता केवल वह एक ही उसे मिलता और यदि किसी प्रकार उस भारवाहक की मृत्यु हो जाय तो राजा को भी सिंहासन छोड़ना पड़ता। इस भय से राजा को लादे फिरने वाले सेवक को सुविधायें भी भरपूर मिलती ताकि वह मोटा तगड़ा बना रहे, मरने न पाये।
एक महिला ऐसा पति ढूँढ़ना चाहती थी जो उसकी मर्जी के अनुसार बिलकुल फिट बैठ सके। जीवन भर वह ऐसा ही दूल्हा तलाश करती रही। उसने ढेरों को पटाया और पसन्द किया, सगाई भी हुई और शादी भी। पर जैसे ही साथ रहना आरम्भ हुआ कि उसमें मर्जी के विरुद्ध कुछ दोष दीख गया और उस रत्ती भर के अन्तर से वह शत्रु जैसा बुरा लगने लगा और क्षण भर में तलाक की बारी आ गई। इस प्रकार उसके सभी विवाह असफल हुए।
ब्रूग्स (बेल्जियम) की एक महिला एड्रीन कुयोत ने पति के साथ निर्वाह करने में सबसे अधिक अस्थिरता का रिकार्ड कायम किया है। उसने अपने यौवन के 23 वर्षों में 652 व्यक्तियों से सगाई पक्की की। किन्तु विवाह 53 से किया। बाकी तो विवाह से पूर्व ही दुत्कार दिये गये। इस प्रकार औसतन उसने प्रत्येक 12 दिन में एक बार पतियों के बारे में अपना विचार बदला और पुराने को छोड़कर नये को पकड़ने के लिए कदम उठाया।
मानसिक रोग उन्हें ही नहीं कहते जिसमें मनुष्य नंगा हो जाय, ईंट पत्थर फेंके या पागलखाने में बन्द करना पड़े। मन का कुसंस्कारी ही नहीं, एकाँकी, एक पक्षीय या सनकी शक्की होना भी एक प्रकार का मनोविकार है। ऐसे आदमी की किसी से पटरी नहीं बैठती। वह सबकी निन्दा करता है और हर जगह दोष देखता है। साथ ही किसी पर विश्वास करे या उदार हो जाये तो उस पर सब कुछ उड़ेल देने में भी कमी नहीं रखता। ऐसे अव्यवस्थित चित व्यक्ति भी मनोविकार ग्रस्त रोगियों में आते हैं। शारीरिक रोग पीड़ितों की तरह इनके भी उपचार की आवश्यकता है।
मन पर बुरा प्रभाव डालने वाली वे दुष्प्रवृत्तियाँ भी हैं जिन्हें अनैतिक आचरण या पाप कर्म कहते हैं। शरीर से कुकर्म करने की तरह मन से अपने लिए या दूसरों के लिए अशुभ चिन्तन करते रहने से अंतर्द्वंद्व खड़ा हो जाता है और अपने भीतर ही एक देवासुर संग्राम खड़ा हो जाता है। दो हाथी जिस क्षेत्र में लड़ते हैं उसे कुचल कर रख देते हैं। दुष्प्रवृत्तियों के उठने पर शाश्वत सत्प्रवृत्तियाँ उनसे लड़ने खड़ी होती हैं और फिर उनमें मल्लयुद्ध आरम्भ हो जाता है। इससे सामान्य चेतना क्रम लड़खड़ाने लगता है और उसका प्रभाव, परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में बाहर उभरकर आता है। यदि सीधा सरल, निर्मल और निश्चिन्त जीवन जिया जाय तो उन मानसिक रोगों से बचा जा सकता है जो शारीरिक रोगों से भी अधिक कष्टकारक होते हैं। इनसे छुटकारा अवाँछनीय विचारणाओं और गतिविधियों और गति विधियों का परित्याग करने पर ही मिलता है।
मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है, विषयासक्त मन बन्धन के लिये है और निर्विषय मन मुक्त माना जाता है।
-ब्रह्मबिंदु उप.
अमरीकी मनः चिकित्सा शास्त्री डॉक्टर वारमविन्सेन्ट पेले ने ‘अपने अनुभव’ पुस्तक में एक विवरण दिया- एक महिला जैसे ही गिरजे में जाती उसके सारे शरीर में बुरी तरह खुजली उभरती। अन्यत्र वह शान्त रहती। कई तरह से शारीरिक जाँच करने पर कुछ पता न चला तो मनः विश्लेषण किया गया। पता लगा कि वह महिला जहाँ नौकर थी उस फर्म में लगातार चोरी कर रही थी गिरजे में जाती तो उसे यह ध्यान आता कि ईश्वर के दरबार में पाप का दण्ड मिलेगा। बस उसे खुजली उभर आती, सारे शरीर में उसके लाल चकत्ते पड़े हुये थे।
मनः उपचारक की सलाह पर उस महिला ने फर्म के मालिक के सामने अपनी गलती प्रकट कर दी और चुराई हुई राशि वापस कर दी। मालिक उसकी इस आत्म-शोधन की वृति और गलती कबूल करने की हिम्मत पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने क्षमा कर दिया। इसके उपरान्त देखते-देखते उसकी वह खुजली अच्छी हो गई जो बहुत दिन में सुख रही थी और बहुत धन खर्च करने पर भी सुधरने में नहीं आ रही थी।
एक दूसरे मानसोपचारक डॉक्टर सी. डब्ल्यू. लेव ने अपने एक मरीज का अनुभव बताते हुए लिखा है- उसका एक मरीज हृदय रोग, रक्तचाप, सिरदर्द और अपच का पुराना मरीज था। औषधि चिकित्सा की दृष्टि से जो कुछ सम्भव था वह सब कुछ कर लिया गया पर बीमारी ने जरा भी घटने का नाम नहीं लिया। मानसिक स्थिति की खोज-बीन की गई तो पता लगा कि उसका बाप जो सम्पत्ति छोड़ मरा था, उसमें से उसने अपने छोटे भाई का बहुत सा हिस्सा हड़प लिया था। डॉक्टर ने वह धन लौटा देने की सलाह दी। पहले तो वह बदनामी की दृष्टि से तैयार न हुआ पर जब उसकी समझ में यह आ गया कि गलती को मंजूर कर लेना, सुधार लेना- बदनामी को धो डालने का बहुत ही अच्छा उपाय है तो वह रजामन्द हो गया और जितना पैसा भाई का लिया था वह वापिस करते हुए अपनी गलती पर दुख प्रकट किया। उसके बाद उसकी स्थिति तेजी से सुधरती चली गई और उसका रोग बिना दवा के ही अच्छा हो गया। आयुर्वेद शास्त्र का प्रतिपादन है कि ‘पूर्व जन्म के कृतं पापं व्याधि रूपेण पीड़ति।’ अर्थात् पूर्व जन्म के किये हुए पाप रोग रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ केवल पूर्व जन्म तक ही उस बात को सीमित नहीं समझना चाहिए वरन्- इस जन्म के कुविचारों और कुकर्मों का फल भी रोग रूप में प्रकट होने की बात सम्मिलित है। रोगों के संदर्भ में आहार बिहार की अस्त व्यस्तता और छूत आदि की उचित सतर्कता न बरतना भी पाप श्रेणी में लिया जा सकता है। नैतिक या सामाजिक पाप करने पर ही रोग उत्पन्न होते हों ऐसी बात नहीं, पर इतना अवश्य है कि उनके कारण भी शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
शरीर दानियों में कीर्तिमान न्यूयार्क निवासी 57 वर्षीय रिचार्ड ऐने का है। उसे शिर में घातक चोट लगी थी और पहले से शरीर कमजोर था। सोचा ऐसा शरीर यदि जीवित भी रहा तो उससे कुछ बनने वाला नहीं, फिर क्यों न इसके सक्रिय कल पुर्जे दूसरों को दान कर दूँ। यह विचार उसके मन में घर कर गया।
सही होश हवास की स्थिति में डाक्टरों और न्यायाधीश की साक्षी में वसीयत की कि वह स्वेच्छा पूर्वक बिना किसी दबाव, लोभ या भय के अपने दिल, लीवर, गुर्दे, आंखें, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंग अन्य रोगियों की आवश्यकता पूरी करने के लिये दान दे रहा है।
उसकी वसीयत स्वीकार करली गई। डाक्टरों ने साड़े चार घंटे के आपरेशन में वे सारे अंग निकाल लिये। इस दान से छह अन्य रोगियों को नव जीवन प्राप्त हुआ। यह अपने ढंग का प्रथम अंग दान कीर्तिमान है।
सामान्यतः देखा जाता है कि व्यक्ति 40-45 की आयु के बाद अपने को वृद्ध समझने लगते हैं। कुछ करने की, आगे बढ़ने की उनकी महत्वाकाँक्षायें बुझ सी जाती हैं। स्वास्थ्य और सामर्थ्य होने पर भी यह मानसिक धारणा कि ‘वे वृद्ध हो गये हैं’ उनकी शक्ति को पंगु बना डालती है। वस्तुतः देखा जाये तो विश्व के महापुरुषों ने अपने ख्याति प्राप्त कार्य 50-60 वर्ष की आयु के बाद ही किये हैं क्योंकि वर्षों का संचित अनुभव उनकी सहायता करता है, यौवन शारीरिक अवस्था मात्र नहीं है अपितु शक्ति और सामर्थ्य का आनन्द और उल्लास का, सृजन शक्ति का दूसरा नाम ही यौवन है। गेलार्ड हाजर का कथन है- ‘उम्र का सम्बन्ध आदमी के शरीर, आत्मा और मन से है। कैलेन्डर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।’
महापुरुषों के जीवन पर यदि हम दृष्टि डालें तो स्पष्ट हो जायेगा, कि आयु का बन्धन न मानने वाले व्यक्ति तथाकथित वृद्धावस्था में भी महान कार्य करते हैं। महात्मा गाँधी ने 63 वर्ष की आयु में, और उसके बाद भी अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। उनका कथन था- ‘मुझे’ तो ख्याल भी नहीं आता कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ। जिस आदमी को ऐसा लगता हो, वह क्या पाठशाला के एक विद्यार्थी की तरह उर्दू का अध्ययन करेगा? तामिल, तेलुगु और बंगला का अध्ययन करने के सपने देखेगा? और सचमुच ही उन्होंने वृद्धावस्था में भी इन लिपियों तथा भाषाओं का अध्ययन किया।
नोबेल पुरस्कार विजेता विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर 60 वर्ष की आयु तक निरन्तर साहित्य साधन में लगे रहे। परिणामतः वे श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ हमें देते रहे और विश्व वन्दनीय बने।
अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध कवि मिल्टन ने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति पैराडाइज लास्ट की रचना 50 वर्ष की आयु में तथा पैराडाइज रीगेन्ड की 62 वर्ष की अवस्था में की थी। जर्मन कवि गेटे ने 80 वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण कृति ‘फास्ट’ पूरी की थी। महान दार्शनिक बैनैदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की आयु में भी कठिन श्रम करते थे। वे प्रतिदिन 10 घंटे निश्चित रूप से कार्य करते थे। 82 वर्ष की आयु में भी उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। प्रसिद्ध चित्रकार टीटान ने 98 वर्ष की आयु में अपना ऐतिहासिक चित्र ‘बैटिल ऑफ लिमान्टो’ का अंकन किया था।
उद्योग के क्षेत्र में भी ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जबकि वृद्ध समझे जाने वाले व्यक्तियों ने युवकों से भी अधिक कार्य कुशलता तथा शक्ति का परिचय दिया। कौमोडोर वैन्डरबिट ने 70 से 80 की वर्ष की आयु के मध्य लगभग 10 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित कर युवकों को भी मात दे दी। विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने अपने पिता से जब कम्पनी का उत्तरदायित्व लिया तो वे 82 वर्ष के थे। इस आयु में भी जिस कुशलता से वे कार्य संचालन करते थे उसे देखकर कर्मचारी भी दंग रह जाते थे।
ब्रिटेन के प्रधान मन्त्री श्री विंस्टन चर्चिल 70-80 साल की आयु के उपरान्त भी शक्तिशाली डायनेमो के समान अपना कार्य करते रहे। अपनी क्रियाशीलता, अदम्य उत्साह तथा शक्ति के कारण वे इस आयु में भी ‘उज्ज्वल भविष्य वाले युवा’ कहे जाते थे।
तरुण बने रहने के लिये यह आवश्यक है कि सन्तुलित आहार-विहार अपनायें, खाद्य अखाद्य सभी कुछ पेट में भरकर शरीर के कोषाणुओं को शक्तिहीन न करें। शरीर को स्वस्थ रखें क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। व्यायाम तथा भ्रमण के द्वारा शरीर के प्रत्येक अवयव तथा माँसपेशी को शक्तिशाली बनायें। प्रसन्न रहने की आदत डालें तथा खिलखिला कर हँसे। साथ ही यह भी आवश्यक है कि सदैव किसी न किसी कार्य में लगे रहें, बेकार बैठने से हमारी शक्ति तथा प्रतिभाओं पर जंग लग जाती है।
विलियम जैम्स का कथन है कि सौ पीछे निन्यानवे बीमारी विक्षोभ के कारण उत्पन्न होती हैं और वे शरीर पर उभरती प्रकट होती हैं। साधारणतया शरीर की रचना ऐसे अच्छे ढंग से हुई है कि थोड़ी बहुत खराबी गड़बड़ी को तो वह ऐसे ही संभाल सुधार देता है। यदि मनुष्य मानसिक दृष्टि से निरोग रहे तो दुर्बल गठन का शरीर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकेगा। इसके विपरीत यदि मानसिक स्थिति विक्षोभ ग्रस्त रहेगी तो मस्तिष्कीय नियन्त्रण उस विक्षोभ से प्रत्येक रक्त कण और जीवाणु को प्रभावित करके उसे ऐसी विकृत स्थिति में डाल देगा कि किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ रोग उठ कर खड़ा होता रहे। ऐसे मनः क्षेत्र में जड़ जमाये हुए रोग दवा दारु कराने पर भी टस से मस नहीं होते। दवा तो शरीर पर ही असर करेगी, जब जड़ मन में है तो दवा वहाँ तक कैसे पहुँचे ? इस कठिनाई के कारण अच्छी चिकित्सा भी उन्हें रोग मुक्त कर सकने में सफल नहीं होती।
कनाडा के चिकित्सकों की एक समिति यह खोज करने के लिए डॉ. हाल्डैन कैवी की अध्यक्षता में नियुक्त की गई कि रोग निदान-जाँच पड़ताल परीक्षा और सही औषधियों का उपयोग करने पर भी रोग अच्छे क्यों नहीं होते। गलती कहाँ रह जाती है। इस समिति ने लगभग 3 हजार रोगियों के लम्बे रोगों का बारीकी से अध्ययन किया और उन्हें मनोविज्ञान वेत्ताओं के पास भेजा। पता चला कि उनमें दो तिहाई मरीज भयंकर मानसिक रोगों से ग्रसित थे। बाहर से पता नहीं चलता पर भीतर ही भीतर वे घुटन के रूप में शरीर को खाते खोखला करते रहते हैं। रोग की असली जड़ वहीं होती है। ऐसे रोगी मानसिक चिकित्सा के बिना अच्छे नहीं हो सकते। औषधि चिकित्सा उन्हें सान्त्वना भर देती रहती है। कई बार तो तेज औषधियाँ उलटे उस रोग को बढ़ाने का कारण बन जाती हैं और स्वयं नये किस्म के राग उत्पन्न करती हैं।
कई मरीज उन चिकित्सकों के इलाज से मामूली और बेतुकी दवा से अच्छे हो जाते हैं जिन पर उनका विश्वास होता है उसके विपरीत उच्च कोटि की दवादारु करने पर भी वे चिकित्सक कुछ लाभ नहीं पहुँचा पाते जिनके ऊपर रोगी का विश्वास न हो। निश्चित रूप से दवा की अपेक्षा विश्वास अधिक काम करता है। झाड़ फूँक करने वालों की भस्म भभूत कई बार इसी कारण जादू जैसा चमत्कार दिखाती देखी गई है कि उस पर रोगी का गहरा विश्वास जमा होता है। भूत का सारा अस्तित्व मरीज की मान्यता पर टिका हुआ है। भय भरी आशंका ही विश्वास के रूप में विकसित होकर भूत बन जाती है और ओझा स्याने अपने तन्त्र, मन्त्र द्वारा उन भूतों को बुलाने, कुछ कहलवाने और भगाने जैसे अटपटे काम करके रोगी को अच्छा कर देते हैं। यह विश्वास शक्ति के चमत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
विश्वास और औषधि दोनों की तुलना करते हुए अधिक प्रभावी विश्वास को ही पाया गया है। डॉक्टर जान शिंडलर ने अपने चिकित्सा अनुभवों का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘कई बार ऐसे रोगी आते हैं जिनका इलाज किसी दवा से नहीं हो सकता। तब मैं यह सोचता हूँ काश मुझे भी ओझाओं जैसी हरकतें करने की छूट रहती तो यह रोगी अच्छे किये जा सकते थे।’
किस जमाने में मानसिक विश्लेषण को एक अलग पद्धति माना जाता था। अब उसे समग्र उपचार का एक अभिन्न और आवश्यक अंग मान लिया गया है। केवल तापमान, रक्त चाप, मलमूत्र एवं रक्त विश्लेषण आदि शरीर परीक्षा के माध्यम से रोग का कारण जानने की बात अब अधूरी मानी जाती है और रोगी की मानसिक स्थिति का लेखा-जोखा लेना भी आवश्यक समझा जाता है और चिकित्सा में ऐसी प्रक्रिया का समावेश किया जाता है जिससे रोगी का अधिक विश्वास एवं सहयोग अर्जित किया जा सके। रोगी यदि चिकित्सक से या चिकित्सा पद्धति से रुष्ट असंतुष्ट रहा तो फिर कारगर औषधि उपचार से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा। अब शरीर शास्त्र और मनः शास्त्र के दोनों पहियों को समान रूप से महत्व देकर स्वास्थ्य समस्या के समाधान की बात सोची जा रही है। चिकित्सा विज्ञान के नये कदम अब इसी दिशा में उठ रहे हैं।
व्यक्तित्व का विकास बौद्धिक और भावनात्मक स्तर की उन्नति के साथ जुड़ा हुआ है। समुन्नत कहे जाने वाले लोग अपनी चिन्तन क्षमता बढ़ाते हैं। यह अच्छी बात है यदि दृष्टिकोण सुलझा हुआ रहे और विचार करने की कला के अनुरूप वह विकसित व्यक्तित्व की प्रक्रिया चलती रहे, तब तो निस्संदेह एक बड़े सौभाग्य के जीवन को सुख शान्ति से भर देने वाली उपलब्धि है पर यदि कहीं उनका अशुभ और अशुद्ध चिन्तन चल पड़े तो अंतर्द्वंद्व जन्य विपत्ति में भी वे ही अधिक फँसते हैं। अविकसित लोगों की न बुद्धि विकसित होती है न भावना। वे परिस्थितियों को बहुत हलकी दृष्टि से देखते हैं और भोजन वस्त्र प्राथमिक आवश्यकताओं के पूरा होते रहने पर संतुष्ट रहते हैं। उन्हें मान, अपमान, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध, आशा, महत्वाकाँक्षा, वासना, तृष्णा, लोभ, मोह, यश, सम्मान आदि की अनेक बातें प्रभावित करती हैं। इनमें जहाँ-जहाँ अवरोध रहते हैं वहीं उन्हें मानसिक उद्वेग आ घेरते हैं और उसका समाधान न ढूंढ़ सकने के कारण आरोग्य संतुलन खो बैठते हैं। सम्मान, शिक्षा, पद आर्थिक सुविधाएं रहते हुए भी आज पिछड़े कहलाने वालों की तुलना में वे लोग ही अधिक बीमार पड़ते हैं जिन्हें बुद्धिजीवी कहा जाता है।
क्रोध आवेश से आक्रान्त मनुष्य की आवाज काँपने लगती है, मुँह लाल पड़ जाता है, पुतली फैल जाती है, आँखों में लाल डोरे पड़ जाते हैं, मुट्ठियाँ भिंचती हैं, बांहें फड़कती हैं, होठ भिंचते हैं और शरीर थरथराने लगता है। यह सारे लक्षण इस बात के हैं कि शरीर की सामान्य क्रिया अस्त व्यस्त हो गई और किसी संभावित विपत्ति का सामना करने के लिए जीवनी शक्ति ने अपनी सारी क्षमता एकत्रित कर ली। जिस प्रकार कोई व्यक्ति संकट की स्थिति में अपना घर बार बेचकर भागना चाहता है और सामान असवाब के औने पौने पैसे इकट्ठे कर लेता है इसी प्रकार हमारा अचेतन क्रोध को एक भूकम्प विस्फोट जैसी विपत्ति मानता है और उस स्थिति का सामना करने के लिए अनेक उपयोगी कार्यों में लगी हुई सारी शक्ति को सब जगह से छुड़ाकर एक जगह इकट्ठी कर लेता है। क्रोध के समय मनुष्य में अतिरिक्त सामर्थ्य देखी जाती है। कमजोर आदमी भी बलवान पर आक्रमण कर बैठता है और उस आवेश ग्रस्त से डरकर बलवान को भी भागना पड़ता है। यह तो हुई सामयिक बात। पर जैसे सामान असवाब बेचकर फिर दुबारा खरीदने की व्यवस्था बनाने में उसे दुहरा घाटा उठाना पड़ता है उसी प्रकार क्रोध प्रयोजन के लिए अन्य कामों से हटाकर शक्ति का जमा करना और फिर उसे वितरण करना निश्चित रूप से घाटे का काम है। जिस प्रकार भट्ठी गरम करने में बहुत सा ईंधन जल जाता है उसी प्रकार क्रोध की स्थिति में जो शरीर रूपी भट्ठी गरम की जाती है इसमें ढेरों का ढेरों वह ईंधन जल जाता है जो स्वास्थ्य संतुलन के लिए नितान्त आवश्यक था। डॉ. कैनाल्ड के अनुसार आधा घन्टे के क्रोधावेश में तीन दिन तक बुखार आने की बराबर जीवनी शक्ति जल जाती है।
अपने विषय के पारंगत इंग्लैंड के अति प्रख्यात डॉक्टर जान हन्टर क्रोधी स्वभाव के थे। उनकी पत्नी झगड़ालू प्रकृति की थी। रोज की बकझक ने हन्टर के स्वभाव को चिड़चिड़ा बनाते बनाते अत्यन्त उग्र बना दिया था। वे बहुत क्रोधी हो गये थे और तनिक-तनिक सी बात पर आग बबूला हो जाते थे। वे इस बुराई को समझते थे और दिल से चाहते थे कि यह कुटेब छूट जाय पर वह आदत उन पर ऐसी हावी हो गई थी कि कुछ बन नहीं पड़ता था, जब आवेश आता तो उनके लिए अपने को संभाल सकना संभव ही न होता था।
डॉक्टर हण्टर ने भविष्यवाणी की कि मैं किसी दिन क्रोध के आवेश में ही अपने प्राण खो दूँगा। हुआ भी ऐसा ही डाक्टरों की एक गोष्ठी में किसी साधारण से विवाद पर उन्हें इतना आवेश आया कि वहीं उन्हें दिल का दौरा पड़ गया और उसी में वे चल बसे।
सामान्यतः रक्त का दबाव 130 रहता है पर क्रोध की स्थिति में वह 230 से भी ऊपर निकल जाता है हृदय की धड़कन यों 180 बार प्रतिमिनट होनी चाहिए पर क्रोध में वह 220 से भी आगे बढ़ जाती है। चोट लगने पर दर्द की वजह से रक्त में तत्काल थक्के बनना शुरू हो जाते हैं ताकि चोट के स्थान से अधिक रक्त न बहे और वह जम जाय। शरीर का अचेतन यह मान लेता है कि क्रोध का आवेश कुछ विपत्ति बुलायेगा, कहीं मरेगा पिटेगा। उस आशंका से रक्त पूर्व तैयारी करना शुरू कर देता है और खून में थक्के बनने शुरू हो जाते हैं। भयंकर विपत्ति के समय तात्कालिक आवश्यकता की बात अलग है, सामान्यतया रक्त में थक्के बनना चिन्ता का विषय है। वे थक्के हृदय में गतिरोध पैदा करके प्राण संकट उपस्थित कर सकते हैं।
क्रोध का सबसे बुरा प्रभाव आँतों पर पड़ता है। वे बेतरह ऐंठती और सिकुड़ती हैं, इस ऐंठन सिकुड़न का तात्कालिक प्रभाव तो अपच, पेट का भारी पन, भूख बन्द हो जाना, पेट में हलका दर्द होने लगना जैसे लक्षणों में दीख ही पड़ता है। बार-बार क्रोध करने पर आँतों को इसी तरह की आदत पड़ जाती है। फिर समय समय पर बिना क्रोध के भी वैसी ही सिकुड़न और ऐंठन होने लगती है। फलतः पाचन क्रिया का स्वाभाविक ढर्रा ही खराब हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों की आँतों की सूजन-कोलाइ विस और आत्माशय शोथ-अल्सर जैसी शिकायतें उठ खड़ी होती हैं।
लेखक विचारक, विद्वान, वकील, अध्यापक, नेता, प्रबन्धक आदि को अक्सर पेट में अल्सर की, मस्तिष्क में अनिद्रा की, पेशाब में शक्कर की, रक्त में उत्तेजना की, हृदय में अवरोध की शिकायतें अत्यधिक मात्रा में बढ़ती जा रही हैं। इसका कारण मोटी समझ से नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वैसे इन्हें श्रम कम करना पड़ता है। आराम अधिक मिलता है, खुराक अच्छी खाते हैं। स्वास्थ्य के नियम भी जानते हैं और अच्छी चिकित्सा के साधनों की भी कमी नहीं रहती। इस पर भी यह वर्ग रुग्ण क्यों रहता है जब कि इन सब सुविधाओं से रहित निर्धन और अशिक्षित वर्ग तुलनात्मक दृष्टि से कहीं अधिक निरोग पाया जाता है। इसका एकमात्र कारण उनकी मानसिक उलझनें, प्रतिस्पर्धा और महत्वाकाँक्षाएं जैसी असंतुष्ट एवं अतृप्त आकाँक्षाएं ही होती हैं। खोये-खोये रहते हैं और यह उद्विग्नता उन्हें रुग्णता के गर्त में धकेल देती है।
डॉ. शिडलर ने एक ऐसे मरीज का किस्सा लिखा है जिसे निरन्तर चक्कर आते थे। तीन महीने तक बढ़िया इलाज करने पर भी कुछ परिणाम न निकला तो उनसे उसके मनोवैज्ञानिक कारण जाने। मालूम हुआ कि कुछ दिन पूर्व उनकी प्यारी पत्नी की मृत्यु हो गई थी और उनने उसकी हर चीज संभाल कर रखी थी। घर आता तो एक चीज के साथ जुड़ी हुई स्मृतियों को याद करता और बिलख बिलख कर रोता। यही कारण चक्कर आने की बीमारी के रूप में परिवर्तित हो गया। डाक्टरों ने उसे मृत पत्नी का सामान हटा देने, मकान बदल देने और दूसरा विवाह करने की सलाह दी। उसने वैसा ही किया और धीरे-धीरे उस कष्ट साध्य रोग से मुक्त हो गया जो बहुत इलाज और खर्च करने पर भी अच्छा नहीं हो रहा था।
दूसरे के मन का भाव समझने में समय लगता है; परन्तु कभी-कभी यह बात अपने बारे में भी लागू हो जाती है। बहुत से लोग अपने मन का भाव भी नहीं समझ पाते।
-गोरा
अन्य मानसिक कारण जो मनुष्य को भीतर ही भीतर क्षुब्ध, असंतुष्ट किये रहते हैं, घृणा, ईर्ष्या, निराशा भरे रहते हैं, शोक संतप्त और उद्विग्न बनाये रहते हैं अवश्य ही आज नहीं तो कल किन्हीं ऐसे रोगों की शक्ल में फूटेंगे जिनका कोई कारण न तो डाक्टरों की समझ में आवेगा और न वे उपयुक्त इलाज ही कर सकेंगे। आत्म धिक्कार की भावना भी ऐसी ही है। अनैतिक कर्म करने वाले की अन्तः चेतना उन्हें हेय और पतित ठहराती रहती है; यह आत्म प्रताड़ना लाठियों से पिटने की तुलना में अधिक गहरी चोट पहुँचाती है और उनके दर्द की अनुभूति घुमाव दार रास्ते से इतनी अधिक होती रहती है कि जीवन दूभर हो जाता है। बाहर से सुखी दीखने और भीतर से घोर दुखी रहने वाले विडम्बना भरे व्यक्तित्व अब हर जगह प्रचुर मात्रा में देखे जा सकते हैं ।
यह क्या हैं ? कैसे बने ? और कुछ विशेष क्षेत्रों में ही बिखरे क्यों पाये जाते हैं ? पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले इस स्तर के पदार्थों की अपेक्षा इनकी संरचना सर्वथा भिन्न क्यों है ? आदि प्रश्नों के उत्तर में की गई खोज इस निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि यह किसी अन्य ग्रह का ही उपहार है जो पृथ्वी निवासियों के लिए इच्छा या अनिच्छा पूर्वक भेजा गया है।
विश्लेषण और शोध के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला गया है कि चूँकि इनकी संरचना चन्द्र धरातल के समतुल्य है। अन्तरिक्ष यात्रा से उत्पन्न होने वाले प्रभाव इनमें मौजूद हैं, उल्काओं में रहने वाले तत्वों का इनमें समावेश है, पृथ्वी पर इस प्रकार की संरचना संभव नहीं इसलिए यह अन्तर्ग्रही ही हैं और संभवतः यह चन्द्रमा से ही आते हैं।
पृथ्वी पर जहाँ-तहाँ विचित्र रचना प्रणाली के कुछ ऐसे विचित्र पिण्ड पाये जाते हैं जिनके अस्तित्व का सही विश्लेषण करने में विज्ञानवेत्ता अभी पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे हैं।
सामान्यतः वे हरे रंग के चपटे, गोल, दीर्घ, वृत्ताकार नाशपाती जैसे, बटन सदृश, तश्तरीनुमा तथा कई अन्य रंग के पाये पाये जाते हैं। इनका व्यास 3 इंच और वजन 16 ओंस तक होता है। देखने में वे पत्थर जैसे कठोर और छूने में काँच जैसे चिकने होते हैं। रासायनिक विश्लेषण से इनमें सिलीकॉन ऑक्साइड, एल्युमीनियम, लोहा, मैग्नीशियम, कैल्शियम, बंशश्रधे, सोडियम, पोटेशियम, ट्रायोलाइट, स्रेवर साइट, काया साइट, निकिल जैसे पदार्थ पाये जाते हैं।
लगता है चन्द्रमा पर गिरने वाली उल्काएं अपनी विशेषताओं को चन्द्रतल के पदार्थों से मिला जुला यह पदार्थ बनाती है। चन्द्र तल पर टकराने के बाद यह मलबा अन्तरिक्ष में बिखर जाता है और उसका बहुत सा भाग पृथ्वी की ओर चला आता है और उसकी संरचना में थोड़ा हेर फेर यह लम्बी यात्रा भी कर देती है।
यह चन्द्र उपहार धरती पर बार-बार क्यों आते हैं? इनका उत्तर वैज्ञानिक अपने ढंग से देंगे। उसके लिए शोधें चल रही हैं और निष्कर्ष निकलने तक तथ्यों की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। पर दार्शनिक समाधान स्पष्ट है। सौंदर्य और शोभा का देवता चन्द्रमा इन उपहारों के माध्यम से यह बताता है कि मिलन की घनिष्ठता ही चमक, चिकनाहट, शोभा, सौंदर्य और दृढ़ता का निर्माण करती है। इन उपहारों में लगभग धरती पर पाये जाने वाले जैसे ही धातु कण तथा रासायनिक पदार्थ मिले हुए हैं। पर वह मिलन अति घनिष्ठता पूर्वक हुआ है। पृथक अस्तित्व को मिटाकर वे सब एक इकाई के रूप में सघन हो गये हैं। इतनी भर प्रक्रिया अपनाने से उनमें वह चमक और कड़क आ गई है जिसे अद्भुत और आश्चर्य जनक समझा जा रहा है। हवा के साथ जूझते हुए वे दूर गामी यात्रा करके पृथ्वी पर आये हैं उस पुरुषार्थ और कष्ट सहन ने उन्हें गोल और चिकना बना दिया है। मनुष्य यदि अपने जीवन में दृढ़ता, चमक, शोभा, और सम्मान प्राप्त करने का इच्छुक हो तो उसे भी दूसरों के साथ घनिष्ठता और एकता की नीति बरतनी चाहिए और प्रगति के लम्बे पथ पर चलने तथा अवरोधों से जूझने की हिम्मत करनी चाहिए। संभवतः यही संदेश चन्द्रमा की मूक भाषा से लेकर यह उपहार धरती पर आते हैं।
धरती पर उपलब्ध काँच पारदर्शी होता है, दर्पण बनकर अपनी और दूसरों की शोभा बढ़ता है। उससे बने हुए बर्तन और उपकरण कैसे साफ सुथरे लगते हैं। पर यह काँच है कि भोंड़े और धुँधले से रासायनिक पदार्थों का सघन सम्मिश्रण विलगाव को एकता के रूप में परिणत करने की प्रक्रिया को अपनाकर ही वे पदार्थ काँच बनकर शोभायमान हुए हैं। मनुष्य जीवन में भी शोभा और सम्मान का एकमात्र मार्ग आत्मीयता और एकता का ही है।
वाणी से उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है पर वह सम्भव तभी होता है जब उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाती है और विकृत होने पर विष का काम करती है। शोधित वाणी को ही ‘वाक्’ कहा गया है।
यम नियमों द्वारा अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना साधना मार्ग का प्रथम प्रयास है। मात्र वाणी का संयम करने से भी उसे वाक् रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। मौन, सत्य, मधुर वचन, सप्रयोजन, सन्तुलित एवं स्वल्प सम्भाषण, जिह्वा साधना के आवश्यक बाह्योपचार हैं। अन्तः उपचार अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय करना ही है। प्याज, मूली, शराब, हींग, आदि खाने पर मुख से वैसी ही गन्ध आती है। अन्तःकरण में असन्तुलन भरा हो तो जिह्वा की रोक-बाँध में चूक होती ही रहेगी। वस्तुस्थिति उभर कर जिह्वा के माध्यम से प्रकट होती ही रहेगी। अस्तु वाणी साधना को मात्र शब्द साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उसको ‘अन्योन्याश्रय’ मानना चाहिए।
मन्त्र शक्ति असोम है। उसकी सामर्थ्य का वारापार नहीं। लोहे से बने, विद्युत संचालित यन्त्रों का करतब हम प्रत्यक्ष देखते हैं। पर वह होता तभी है जब वे यन्त्र सही लोहे के- सही पद्धति से निर्मित हों और उनमें सही शक्ति सञ्चार की व्यवस्था हो। बच्चों के खिलौने के रूप में रेल, मोटर, हवाई जहाज आदि बने होते हैं पर उनकी बाहरी शक्ल भर बनी होती है। निर्माण पद्धति का प्रयोग जैसा चाहिए वैसा न होने से वे खिलौने मात्र रह जाते हैं। वह काम नहीं कर सकते जो असली यन्त्र करते हैं। यन्त्र की तरह ही मन्त्र भी हैं। शब्द शृंखला को मन्त्र नहीं समझना चाहिए। वह समर्थ और सर्वांगपूर्ण तब होता है जब साधक का व्यक्तित्व अध्यात्म प्रक्रिया पद्धति को अपना लेता है। तभी वाणी का प्रत्यावर्तन ‘वाक्’ रूप में होता है और तभी उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल सार्थक होते हैं।
ऐसी वाक् शक्ति की शास्त्रों में पग-पग पर महिमा गाई गई है। कहा गया है -
बागक्षरं प्रथमजाऋतस्य वेदानाँ माताऽमृतस्य नाभिः।
-तै.ब्रा. 2।6।6।5
ऋतु का प्रथम सृजन अविनाशी ‘वाक्’ है। यही वेदों की माता है। यही अमृत की नाभि है।
क्ल यद्वाग्वदन्त्य विचेतनानि
राष्ट्री देवानाँ निषसाद मन्द्रा।
चतस्रव्र लर्ज्ज दुदुरे पयाँसि
क्व ल्विदस्याः परमं जगाम॥
-सरस्वती रहस्योपनिषद्
वाक् विश्व व्यापिनी है, समस्त प्राणियों में व्याप्त है। अल्प चेतनों में भी वह विद्यमान है। वह देवताओं का भी संचालन करती है। न जाने हम कब उसे जान सकेंगे।
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्- सा यदा मृत्यु मत्युमुच्यत सोऽग्निरभवत्- सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते।
-वृ.उ. 1. 3. 12।
‘वाक्’ देवता को प्राण ने मृत्यु से पार किया। यह वाक् अग्नि बनकर अमर हो गई और वह असीम शक्तियों से ओत-प्रोत होकर ज्योतिर्मय हो गई ।
मन्त्र की शक्ति का विकास जब से होता है। जितनी अधिक घिसाई पिसाई की जाती है, उतनी ही पदार्थ की शक्ति उभरती है। ढेले को तोड़ते उसे अणु की स्थिति में ले जाया जाय तो वह अणु-ढेले की तुलना में अत्यधिक सामर्थ्यवान होगा। घोटने और पीसने की प्रक्रिया बहुत समय चलते रहने पर ही आयुर्वेदिक दवायें गुणकारी होती हैं। बार-बार घिसने से गर्मी पैदा होती है। बार-बार रगड़ने से चमक उत्पन्न होती है। इस तथ्य को हर कोई जानता है। मन्त्र की शक्ति उसके क्रम बद्ध रूप से बहुत समय तक जप करने से उभरती है। अनुष्ठान एवं पुरश्चरण विज्ञान का यही रहस्य है। इसी लिए ‘जप’ की महिमा प्रतिपादित की जाती है।
यज्ञानाँ जप यज्ञोस्मि स्वावरणाँ हिमालयः॥
गीता. 10।25
यज्ञ में जप यज्ञ मैं हूँ और पर्वतों में हिमालय हूँ।
शक्तिपातानुसारेण शिष्योऽनुग्रहमर्हति।
यत्र शक्तिर्न पतति सिद्धिर्न जायते॥
“शक्तिपात’ न होने से सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकती। शक्तिपात के अनुसार ही तो शिष्य अनुग्रहित होता है।”
मननार्त्सव भावानाँ त्राणात्संसार सागरात्।
मन्त्ररूपा हि तच्छक्तिर्म ननत्राण रूपिणी॥
-प्रपञ्च सार तन्त्र
मन, मनन और भावनायें तथा समस्त जगत- का त्राण करने वाली शक्ति का नाम मन्त्र है। वह मूल में एक होते हुए भी प्रयोग में अनेक हो जाती है।
मनन त्राण धर्माणो मन्त्राः
-महार्थ मंजरी
मनन और त्राण की शक्ति से सम्पन्न शक्ति का नाम मन्त्र है।
देवस्य मंत्र रूपस्य मंत्र व्याप्तिम जानताम्।
कृताचंनादिक सर्वं व्यर्थ भवति शाम्भवि॥
देव मन्त्र स्वरूप भी होते हैं मन्त्रों का तत्व समझने से ही साधना सफल होती है।
मननात् प्राणनाञ्चैव मद्रू पस्याववोधनात् मन्त्र मित्युच्यते ब्रह्मन् यद्धिष्ठान तोपि वा।
-योग शिखोपनिषद- 2, 7
मनन किये जाने के कारण, प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के कारण मेरा अनुष्ठान किये जाने के कारण मन्त्र मन्त्र बनते हैं।
जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः।
तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः॥
-अग्नि पुराण
‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश। इन दोनों प्रयोजनों को पूरा करने वाली निष्पाप और जीवन मुक्त बनाने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं।
जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर ऊँचा होना चाहिए। जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं। यह केवल जानकारी के आदान-प्रदान से प्रयुक्त होती है। भावों के प्रत्यावर्तन में मध्यमा वाणी काम आती है। इसे भाव सम्पन्न व्यक्ति ही बोलते हैं। जीभ और कान के माध्यम से नहीं वरन्- हृदय से हृदय तक प्रवाह चलता है। भावनाशील व्यक्ति ही दूसरों की भावनायें उभार सकता है। यह बैखरी और मध्यमा वाणी मनुष्यों के बीच विचारों एवं भावों के बीच आदान-प्रदान का काम करती है।
इससे आगे दो और वाणियाँ हैं जिन्हें परा और पश्यन्ति कहते हैं। परा पिण्ड में और पश्यन्ति ब्रह्माण्ड क्षेत्र में काम करती है। आत्म निर्माण का-अपने भीतर दबी हुई शक्तियों को उभारने का काम ‘परा’ करती है। ईश्वर से- देव शक्तियों से- समस्त विश्व से- लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध, सम्पर्क बनाने में पश्यन्ति का प्रयोग किया जाता है। अस्तु इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।
ऐं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि
तानि विदुर्ब्राह्मणा यं मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति
तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥23॥
स उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्। उतो त्वस्मै तन्वाँ विसस्र जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥32॥
-सरस्वती रहस्योपनिषद्
वाणी के चार चारण हैं - (1) परा (2) पश्यन्ती (3) मध्यमा (4) वैखरी। इनमें से प्रथम तीन अन्तःकरण रूपी गुफा में छिपी रहती हैं। वैखरी ही बोलने में प्रयोग की जाती है ॥23॥
वाणी की रहस्यमयी शक्ति को कुछ लोग देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी नहीं सुनते, वे लोग बड़े भाग्यवान हैं जिनके सामने वाणी के नग्न स्वरूप का उद्घाटन होता है॥32॥
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदु र्ब्राह्मण ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति।
ऋक् 1। 22। 164। 40
यह वाणी चरण वाली होती है। उसे विद्वान ब्रह्मवेत्ता ही जानते हैं। इन वाणियों में से तीन तो गुफा में ही छिपी बैठी हैं। वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलतीं। चौथी वैखरी को ही मनुष्य बोलते हैं।
परायामंकुरी भूय पश्यन्त्याँ द्विदलीकृता॥18॥
मध्यमायाँ मुकुलिता वैखर्या विकसीकृता।
पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत्॥19॥
-योग कुण्डल्युपनिषद् 3।18-19
वाणी का उद्भव परा से होता है। पयन्ती में विकसित होकर उसकी दो शाखाएं फूटती हैं । मध्यमा में वह पुष्पों से लद जाती है और वैखरी में वह फलित होती है। जिस क्रम से उसका विकास होता है उसके उलटे क्रम से वह लय भी हो जाती है।
विधानात्मक कर्मकाण्ड की उपयोगिता भी है और महत्ता भी। पर उसे समग्र सर्वांगपूर्ण नहीं मानना चाहिए। उसके साथ जब भावनाओं का-वृत्तियों का-समन्वय होता है तभी उस कर्मकाण्ड से शक्ति उत्पन्न होती है।
बहिर्मुखस्य मन्त्रस्य वृत्तयो याः प्रकीर्तिताः।
ता एवान्तर्मुखस्यास्य शक्तयः परिकीर्त्तिताः॥
मन्त्र जब तक बहिर्मुख कर्मकाण्ड पूरक है तब तक उसे ‘वृत्ति’ कहा जाता है। पर जब वह अन्तर्मुख हो जाता है तो उसे शक्ति कहते हैं।
‘साम’ उसी प्रकार की भाव विभोर स्वर लहरी को कहते हैं। उत्कृष्ट व्यक्तित्व और उच्च भावनाओं के समन्वय के साथ किया गया मंत्रोच्चार स्वर है। वेद पाठ में शब्दों के उतार-चढ़ाव को भी ‘स्वर’ माना गया है पर वह तो भावाभिव्यक्ति की गायन कला मात्र है। वे भाव-जो हृदयतंत्री को झंकृत करते हैं- अन्तःकरण से ही उद्भूत होते हैं। अस्तु भाव संस्थान को ही साम और ‘वाक्’ द्वारा उच्चारित मन्त्र को ही आत्म विज्ञान में स्वर माना गया है। इसीलिये मन्त्र की सफलता स्वर पर निर्भर बताई गई है।
वेद मात्र ग्रन्थ ही नहीं हैं। ऋचायें मात्र शब्द शृंखलायें नहीं समझी जानी चाहिए। स्वर आरोह अवरोह तक सीमित नहीं है। शब्द ब्रह्म पठन-पाठन की सीमा में अवरुद्ध नहीं है। वेद ज्ञान का मूल आधार अन्तःकरण है। आन्तरिक परिष्कार-अन्तःकरण में आत्म साक्षात्कार की विधि व्यवस्था ही वास्तविक वेद ज्ञान है। उस ज्ञान को शब्द शृंखला में बाँधने का-पुस्तकाकार निर्माण करने का यही प्रयोजन है। इस तथ्य का स्थान-स्थान पर उद्घाटन भी हुआ है।
वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य ऐतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति।
-छान्दोग्य 1। 5
वाणी ही ऋचा है। प्राण ही साम है। ओंकार ही उद्गीथ है। ऋचा वाणी और साम प्राण की जोड़ी प्रख्यात है।
स्वरन्ति घोषं विततं ऋतायवः।
- ऋ. 5।5।4।12
इस विश्व ब्रह्माण्ड में सर्वत्र संव्याप्त दिव्य घोष को ऋतु की आकाँक्षा रखने वाले व्यक्ति स्वर युक्त करते रहते हैं।
व्यापिनीर्व्योम रूपाः स्युरन्नताः स्वर शक्तयः।
-गौतमीय तन्त्र 9-26
आकाश की तरह सर्वत्र संव्याप्त स्वर की शक्तियाँ असीम- अनन्त- हैं।
‘सा च अमश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्’
-बृहदारण्यक. 1।3।22
ऋक् के साथ स्वर का सम्मिश्रण होने से ही सामवेद की ‘साम विशेषता’ है।
का साम्नो गति रिति स्वर इति होवाच।
-छान्दोग्य 1।8।4
साम क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर है स्वर की गति।
तस्य हैतस्य साम्ना यः स्वं वेद। भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वम्।
-वृहदारण्यक 1।3।25
साम का रूप स्वर है। जो उस स्वर साम को जानता है वह उसे प्राप्त भी कर लेता है।
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः।
-ऋ. 8।332
भगवान्, अन्तःकरण में से बाहर निकलने के लिए भक्ति भरे स्वर के रूप में प्रस्फुटित होते हैं।
स्वरेण सन्धयेद् योगम् ।
-ब्रह्मबिन्दूपनिषद् 7
योग की साधना स्वर के माध्यम से करनी चाहिए।
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः।
-ऋग्. 8।33।2
उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील मनुष्य-भावना पूर्वक स्वर साधना करते हैं ।
स्वरेण सल्लयेद् योगी।
-त्रिपुरतापिन्युपनिषद् 5।7
स्वरेण सन्धयेद् योगम्
-ब्रह्मबिन्दूपनिषद् 7
अर्थात्- स्वर के माध्यम से योग साधना करनी चाहिए।
स्वरन्ति घोषं विततं ऋतायवः
-ऋग्. 5।54।12
इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र संव्याप्त ब्रह्मघोष की योगवेत्ता स्वर के रूप में परिणत करते हैं।
वाक् शक्ति को ही अग्नि भी कहा गया है। यह अग्नि सर्वत्र तेजस्विता, ऊर्जा, प्रखरता एवं आभा उत्पन्न करती है। इसलिए वाक् अग्नि भी है-
त्वाँ पूर्व ऋषयो गीर्भिरायन्
त्वा मध्वरेषु पुरुहूत विश्वे।
-ऋग्वेद 10।98।9
पूर्व काल में ऋषि वाणी द्वारा अग्नि को प्राप्त करते रहे हैं।
वैखरी, मध्यमा, परा और पश्यंति वाणियों के प्रभाव के अनुरूप उनके नाम वायु, सूर्य, दिग्पाल, चन्द्र नाम भी दिया गया है-
अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्........ चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् ।
-ऐतरेय ब्राह्मण 2।4।2
अग्नि ने वाक् बनकर मुख में प्रवेश किया। नाक में होकर वायु देवता-प्रविष्ट हुए। सूर्य ने नेत्रों में निवास किया। दिग्पाल कानों में प्रवेश कर गये। चन्द्रमा मन बनकर हृदय में समाया।
यदि हम देव, वेद मन्त्र, वाक्, जप, स्वर के तात्विक स्वरूप को समझ सके तो निस्सन्देह मन्त्र शक्ति के अद्भुत चमत्कार मूर्तिमान होकर सामने खड़े हो सकते हैं ।
बूँद समुद्र में मिल गई। पर उसे अपने आपका अन्त सहन न हुआ, वह फिर अलग रहने के लिए छटपटाने लगी।
समुद्र ने समझाया नादान छोकरी, अलग रहकर क्या करेगी। मैं इतना विशाल हूँ तुझ जैसी अनेक बूँदों के मिलने से ही तो बना हूँ। क्षुद्रता गँवाकर महानता पाने की ललक ही तो मेरी लहरों पर थिरकती है ? तेरा साथ रहने में क्या हर्ज है ?
पर बूँद मानी नहीं, उसे अकेलापन ही भाया और उसी के लिये जिद करने लगी। सूरज ने कहा, तो तू मेरी किरणों के साथ तप और धरती पर उतर, जिस आपे को पाकर तू सुखी रह सके वह उससे कम मूल्य पर नहीं मिल सकता। बूँद ने यही निष्कर्ष निकाला कि अलग रहने की बात व्यर्थ है, सही या तो समुद्र का बताया रास्ता है या सूरज का बताया।
दूसरों पर आक्रमण कर सकने में- बहुतों को मार गिराने में सफलता प्राप्त कर लेना वास्तविक शूरता नहीं है। यह कार्य तो कसाई भी करता रहता है। नित्य वह कितने प्राणी मारता है। हर आक्रमण में वही जीतता है उसका कोई बार खाली नहीं जाता। रक्त की नाली बहाने में उसे रोज ही सफलता मिलती है, क्या उसे शूरवीर कहें?
वीरता की परीक्षा-साहस की कसौटी पर होती है और साहस का स्तर आदर्श की आग में परखा जाता है। आदर्श रहित साहस तो अभिशाप है। उसी को असुरता या दानवी प्रवृत्ति कहते हैं। ऐसा साहस जो आदर्शों का परित्याग कर उद्धत उच्छृंखलता अपनाये, केवल आतंक ही उत्पन्न कर सकता है। उससे क्षोभ और विनाश ही उत्पन्न हो सकता है। ऐसे दुस्साहस से तो भीरुता अच्छी भीरु व्यक्ति अपने को ही कष्ट देता है पर दुष्ट दुस्साहसी अनेकों को त्रास देता है और भ्रष्ट परम्परा स्थापित करके अपने जैसे अन्य अनेक असुर पैदा करता है।
साहस की सराहना तब है जब वह आदर्शों के लिये प्रयुक्त हो। अवाँछनीयता को निरस्त करने के काम आये और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान दे। इस प्रकार की गतिविधियाँ अपनाने वाले सत्साहसी लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा जा सकता है।
भय और प्रलोभन जिसे कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकते वह सचमुच बहादुर है। जीवन में पग-पग पर ऐसा अवसर आते हैं जिनमें अनीति अपनाकर प्रलोभन पूरा करने को गुंजाइश रहती है। आकर्षण कितनों के ही पैर फिसला देता है। रूप यौवन को देखकर शील सदाचार से पैर उखड़ने लगते हैं। मर्यादायें डगमगाने लगती हैं। पैसे का प्रलोभन समाने आने पर अनीति बरतने में संकोच नहीं होता। कोई देख नहीं रहा हो- भेद खुलने की आशंका न हो तो कोई विरले हो कुकर्म करने से मिलने वाला लाभ उठाने से चूकते हैं। आदर्शों के प्रति यह शिथिलता अन्तरात्मा की सबसे बड़ी दुर्बलता है। लोकलाज के कारण दण्ड भय का ध्यान न रखते हुए अनीति मूलक प्रलोभन से बचे रहना- यह तो संयोग की बात हुई। रोटी न मिली तो उपवास। विवशता ने दुष्कर्म का अवसर नहीं दिया, यह भी अच्छा ही हुआ। प्रतिष्ठा गँवाने की तुलना में लालच छोड़ देना ठीक समझा गया, यह बुद्धिमता और दूरदर्शिता रही, क्षणिक और तुच्छ लाभ के लिये प्रतिष्ठा से सम्बन्धित दूरगामी सत्परिणामों से वंचित होना व्यवहार बुद्धि को सहन न हुआ यह अच्छा ही रहा। पर इसे वीरता नहीं कह सकते।
साहस उसका है जो प्रलोभन के अवसर रहने पर भी- भेद न खुलने की निश्चिन्तता मिलने पर भी अनीति मूलक प्रलोभनों को इसलिए अस्वीकार कर देता है कि वह अपनी कर्तव्यनिष्ठा और आदर्शवादिता को किसी भी मूल्य पर नहीं बेचेगा। जो अमीरी का अवसर गँवा सकता है और गरीबी के दिन काट सकता है पर ईमान गँवाने को तैयार नहीं, वही बहादुरी की कसौटी पर खरा सोना सिद्ध हुआ समझा जायेगा।
भय सामने आते हैं और बच निकलने के लिये अनीति मूलक रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। ऊँचे ऑफिसर दबाते हैं कि हमारी इच्छानुसार गलत काम करो अन्यथा तुम्हें तंग किया जायेगा। आतंकवादी गुण्डा तत्व धमकाते हैं कि उनका सहयोग करो-विरोध में मुँह न खोलो अन्यथा खतरा उठाओगे। अमुक अवाँछनीय अवसर छोड़ देने पर लाभ से वञ्चित रहने पर स्वजन सम्बन्धी रुष्ट होंगे। कन्या के विवाह आदि में कठिनाई आयेगी आदि अनेक भय सामने रहते हैं और वे विवश करते हैं कि झंझट में पड़ने की अपेक्षा अनीति के साथ समझौता कर लेना ठीक है। इस आतंकवादी दबाव को मानने से जो इनकार कर देता है, आत्म गौरव को-आदर्श को-गँवाने गिराने की अपेक्षा संकट को शिरोधार्य करता है वह बहादुर है। योद्धा वे हैं जो नम्र रहते हैं, उदारता और सज्जनता से भरे होते हैं पर अनीति के आगे झुकते नहीं, भय के दबाव से नरम नहीं पड़ते भले ही उन्हें टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाना पड़े।
जो अपने चरित्र रूपी दुर्ग को भय और प्रलोभन की आक्रमणकारी असुरता से बचाये रहता है, उस प्रहरी को सचमुच शूरवीर कहा जायेगा। जिसने आदर्शों की रक्षा की, जिसने कर्त्तव्य को प्रधानता दी-जिसने सच्चाई को ही स्वीकार किया उसी को योद्धा का सम्मान दिया जाना चाहिए। हथियारों की सहायता से एक आदमी दूसरे आदमी की जान ले ले यह कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि औचित्य की राज-सभा में मनुष्य अंगद की तरह पैर जमा दे और फिर कोई भी न उखाड़ सके भले ही वह रावण जैसा साधन सम्पन्न क्यों न हो।
अनीतिपूर्वक देश पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का प्राण हथेली पर रखकर सामना करने वाले सैनिक इसलिए सराहे जाते हैं कि वे आदर्श के लिए देश रक्षा के लिए लड़े। उनका युद्ध पराक्रम इसलिए सम्मानित हुआ कि उसमें आदर्श प्रधान था। उसी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित होकर कोई समूह कहीं अनीति पूर्वक चढ़ दौड़े और कितनों को ही मार गिराये तो बंगाल देश में बरती गई बर्बरता की तरह उस शस्त्र संचालन को भी निन्दनीय ही ठहराया जायेगा, डाकू भी तो शस्त्र ही चलाते हैं- साहस तो वे भी दिखाते हैं पर उस क्रिया के पीछे निष्कृष्ट स्वार्थपरता सन्निहित रहने के कारण सब और से धिक्कारा ही जाता है। उत्पीड़ित वर्ग, समाज, शासन, अन्तःकरण सभी ओर से उन पर लानत बरसती है। उसे योद्धा कौन कहेगा जिसके उद्देश्य को घृणित ठहराया जाय।
पानी के बहाव में हाथी बहते चले जाते हैं पर मछली उस तेज प्रवाह को चीरकर उलटी चल सकने में समर्थ होती है। लोक मान्यता और परम्परा में विवेक कम और रूढ़िवादिता के तत्व अधिक रहते हैं। इसमें से हंस की तरह नीर क्षीर का विवेक कौन करता रहता है। ‘सब धान बाईस पसेरी’ बिकते रहते हैं। भला-बुरा सब कुछ लोक प्रवाह में बहता रहता है। उसमें काट-छाँट करने का कष्ट कौन उठाता है। फिर जो अनुचित है उसका विरोध कौन करता है। लोक प्रवाह के विपरीत जाने में विरोध, उपहास, तिरस्कार का भय रहता है। ऐसी दशा में अवाँछनीय परम्पराओं का विरोध करने की हिम्मत कौन करता है। यह शूरवीरों का काम है जो सत्य की ध्वजा थामे अकेले ही खड़े रहे। शंकराचार्य, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानन्द, महात्मा गाँधी सरीखे साहसी कोई विरले ही निकलते हैं जो परम्पराओं और प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देकर केवल न्याय और औचित्य अपनाने का आग्रह करते हैं। ऐसे लोगों को ईसा, सुकरात, देवी, जॉन अब्राहम लिंकन आदि की तरह अपनी जाने भी गँवानी पड़ती हैं पर शूरवीर इसकी परवा कहाँ करते हैं। सत्य की वेदी पर प्राणों की श्रद्धाञ्जली समर्पित करते हुए उन्हें डर नहीं लगता वरन् प्रसन्नता ही होती है।
थोड़े से साहस के जमाव में काफी प्रतिभा संसार से खो जाती है। प्रत्येक दिन ऐसी अपरिचित व्यक्तियों को कब्र में भेजता है जिनकी कायरता ने उनको प्रथम प्रयास से वंचित रखा है।
-सिडनी स्मिथ
अनीति को मिटाने के लिए-अनाचार से जूझने के लिए-कोई शूरवीर ही खड़ा हो सकता है। असुरता- अवाँछनीय मार्ग पर चलकर आक्रमणकारी साधनों से सम्पन्न हो जाती है। उसके प्रहार बड़े क्रूर होते हैं। वह किसी पर भी- किसी भी बहाने कितना ही बड़ा अत्याचार कर सकती है। उससे सर्वत्र भय और आतंक छाया रहता है। जो विरोध के लिये उठता है वही पिसता है। ऐसे समय में अग्रणी बनकर अनाचार का प्रतिरोध करना सहज नहीं होता। उसके लिए सच्चा साहस चाहिए। आत्म रक्षा और आक्रमण के समुचित साधन पास में रहने पर लड़ सकना सरल है क्योंकि उसमें सुरक्षा और विजय की आशा बनी रहती है। पर जहाँ अपने साधन स्वल्प और विरोधी अति समर्थ हों, वहाँ तो संकट ही संकट सामने रहता है। इन विभीषिकाओं के बीच भी जो साहसपूर्वक आगे बढ़ सकता है। अनीति की चुनौती स्वीकार कर सकता है, उसे वीरता की कसौटी पर सही उतरा समझना चाहिए।
भारत के हजार वर्ष लम्बे स्वतंत्रता संग्राम में अगणित शूरवीरों ने अपने प्राण दिये। वे विजयी नहीं हुए- पराजित रहे पर उनकी वीरता को विजयी ही माना जाता- और कोई कोई विजेताओं पर निछावर किया जाता रहेगा। रावण की असुर सेना से लड़ने की हिम्मत जिन रीछ, वानरों ने दिखाई उन्हें संसार के अग्रगामी योद्धाओं की पंक्ति में रखते हुए अनन्त काल तक अभिनंदनीय माना जायेगा। प्रहलाद की तरह जिन्होंने सत्य को सर्वोत्तम शस्त्र माना उन्हीं की वीरता खरी है।
योद्धा का काम मात्र लड़ना-तोड़ना-बिगाड़ना ही नहीं, निर्माण करना भी है। तोड़ना सरल है बनाना कठिन है। एक लोहे की कील से किसी के प्राण लिये जा सकते हैं पर एक सुविकसित और सुसंस्कृत मनुष्य का निर्माण करना कठिन है। किसी बड़ी इमारत को थोड़े समय में स्वल्प प्रयत्नों से गिराया जा सकता है पर उसका निर्माण करने के साधन जुटाना कठिन है। कपास के गोदाम को एक दियासलाई जला सकती है पर उतनी कपास उगाने के लिए कितना श्रम और कितने साधन की आवश्यकता पड़ेगी ? किसी को कुमार्ग पर लटका देना सरल है पर कुमार्गगामी को सन्मार्ग की ओर उन्मुख करना कठिन है। पानी ऊपर से नीचे की ओर सहज ही बहता है पर नीचे से ऊपर चढ़ाने के लिए कितने साधन जुटाने पड़ते हैं। ध्वंस में नहीं सृजन में मनुष्य का शौर्य परखा जाता है।
उत्कर्ष के अभियान में जिसका जितना बड़ा योगदान है उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जायेगा। लड़ाई, क्रोध और आवेश में लड़ी जा सकती है। उत्तेजना तो नशे से भी पैदा हो सकती है। किसी का अहंकार भड़काकर अथवा विजय के बड़े लाभ का प्रलोभन देकर किसी को लड़ने के लिये आसानी से तैयार किया जा सकता है। पर सृजन के लिए बड़ी सूझ-बूझ की, सन्तुलित एवं निष्ठा सम्पन्न परिपक्व मनोभूमि की जरूरत पड़ती है। उस महत्ता की पौध पहले भीतर उगानी पड़ती है और जब वह जम जाती है तब उसे कार्यक्षेत्र में आरोपित किया जाता है। ऐसी निष्ठा शूरवीर में ही पाई जाती है। मित्रों के बीच विग्रह पैदा कर देना किसी भी धूर्त, चुगलखोर या षड्यंत्रकारी के लिए बाएं हाथ का खेल हो सकता है, पर शत्रुता मित्रता में परिणत कर देना किसी शालीन सज्जन और विवेकवान के लिए ही सम्भव हो सकता है।
बहादुर वह है जिसने अपनी अहन्ता, स्वार्थपरता और संकीर्णता पर विजय प्राप्त कर ली। जिसने संकीर्णता के सीमित दायरे को तोड़कर विशालता को वरण कर लिया। अपने ऊपर विजय प्राप्त करना विश्व विजय से बढ़कर है। जो वासना और तृष्णा की कीचड़ से निकल कर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की गतिविधि अपनाने में सफल हो गया उसे दिग्विजय का श्रेय दिया जायेगा जो अपने ऊपर शासन कर सकता है वह चक्रवर्ती शासक से बढ़कर है और जिसने नीति का समर्थन- अनीति का विरोध करने में कुछ भी कष्ट सहने का संकल्प कर लिया उसे शूरवीरों का शिरोमणि कहा जायेगा। ऐसे शूरवीरों का यश गान करते हुए ही इतिहास अपने को धन्य बनाता रहा है।
पाकिस्तान में कैद रहने के समय बँगला बंधु शेख मुजीबुर्रहमान रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक गीत निरन्तर गुनगुनाया करते थे ।
उस गीत का सार है- ‘जीत हम सचाई की राह पर चलने वालों की ही होगी। यह दुनिया मानवों के लिये बनाई गई है- दानवों के लिये नहीं।’
लोग समझते हैं कि थकान अधिक काम करने से आती है अथवा कम पौष्टिक भोजन मिलने से। यह दो बातें भी ठीक हो सकती हैं पर यह नहीं समझना चाहिए कि शक्ति की कमी- शिथिलता- थकान और उदासी के यही दो कारण हैं।
अनेक साधन सम्पन्न व्यक्ति-अमीर अफसर- या ऐसी स्थिति में होते हैं जिनके पास काम भी उतना नहीं होता और अच्छी खुराक प्राप्त करने में भी कोई असुविधा नहीं होती। फिर भी वे बुरी तरह थके रहते हैं। अपने अन्दर जीवनी शक्ति अथवा क्रिया शक्ति की कमी अनुभव करते हैं और जो करना चाहते हैं- कर सकते हैं- उसमें अपने को असमर्थ अनुभव करते हैं।
दूसरी ओर सामान्य स्तर के अथवा गरीब लोग-गई गुजरी स्थिति में रहने के कारण सुविधा सम्पन्न जीवन नहीं जी पाते। गुजारे के लिये कठोर काम करने पड़ते हैं। अधिक समय तब भी और अधिक दबाव डालने वाले भी । साथ ही गरीबी के कारण उन्हें बहुमूल्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भी नहीं मिल पाते। इतने पर भी वे बिना थके हँसी-खुशी का जीवन जीते हैं- तरोताजा रहते हैं और अपनी स्फूर्ति में कमी पड़ती नहीं देखते।
इससे स्पष्ट है कि काम की अधिकता या खुराक के स्तर की कमी ही थकान का मात्र कारण नहीं है वरन् कुछ दूसरी बातें भी हैं जो आराम और पुष्टि की प्रचुरता रहते हुए भी थकान उत्पन्न करती हैं और दुर्बलता बनाये रहती हैं।
अमेरिका इन दिनों संसार का सबसे अधिक साधन सम्पन्न देश है। वहाँ के लोग कंजूस भी नहीं होते। जो कमाते हैं उसे खर्च करने और हंसी खुशी का जीवन जीने के आदी हैं। ऐश आराम के साधन वहाँ बहुत हैं। सवारी के लिये कार, वातानुकूलित कमरे, शरीर का श्रम घटाने के लिए कारखाने में तथा घर में हर प्रयोजन के लिए बिजली से चलने वाले यन्त्रों की वहाँ भरमार है। श्रम और समय को बचाने के लिए आर्थिक उन्नति और वैज्ञानिक प्रगति का पूरा-पूरा उपयोग किया जाता है। आहार की भी वहाँ क्या कमी है। विटामिन, मिनिरल, प्रोटीन और दूसरे पौष्टिक तत्वों को भोजन में मिलाने का वहाँ आम रिवाज है। फलों के रस की बोतलें लोग पानी की तरह पीते रहते हैं। थकान से बचने और स्फूर्ति बनाये रहने पर ही विलासी जीवन जिया जा सकता है सो इसके लिये प्रख्यात दोनों कारणों पर वहाँ बहुत ध्यान दिया जाता है। श्रम सुविधा और खाद्य पौष्टिकता में कोई कुछ कमी नहीं रहने देता।
फिर भी वहाँ बुरा हाल है डाक्टरों के पास आधे मरीज ‘थकान’ रोग का इलाज कराने वाले होते हैं। इसके लिए प्रख्यात दवा “एम्फेटैमीन स्टीमुलैन्टस्” प्रयोग की जाती है। यह औषधि स्वल्प मात्रा में ली जाती है तो भी डाक्टरों के परिषद ने चिकित्सा प्रयोजन में हर साल काम ली जाने वाली इस दवा की मात्रा साड़े तीन हजार टन घोषित की है। एक टन-सत्ताईस मन के बराबर होता है। हिन्दुस्तानी हिसाब से यह 3500&27=94500 मन अर्थात् लगभग 1260000 किलो हुई। उस औषधि के निर्माताओं का रिपोर्ट अलग है। उत्पादकों और विक्रेताओं को हिसाब देखने से प्रतीत होता है कि डाक्टरों के परामर्श से इसका जितना सेवन होता है उसकी अपेक्षा तीन गुनी मात्रा लोग खुद ही बिना किसी की सलाह से अपने अनुभव के आधार पर स्वयं ही खरीदते खाते रहते हैं। इस प्रकार इसकी असली खपत चार गुनी मानी जानी चाहिए।
खुली, धूप, ताजी हवा और अंग संचालन के आवश्यक शारीरिक परिश्रम का अभाव साधन सम्पन्न लोगों की थकान का मुख्य कारण है। इसके लिये बाहर से बहुत आकर्षक लगने वाले दफ्तर वास्तव में बहुत ही खतरनाक हैं। वातानुकूलित करने जरा-सी गर्मी में पंखों की तेज चाल- कूलर- खश के पर्दे, बर्फ मिला पानी- जाड़े में हीटर- गरम चाय- ऊनी कपड़ों का कसाव देखने में बड़े आदमी होने का चिह्न लगाते हैं और तात्कालिक सुविधा भी देते हैं पर इनका परिणाम अन्ततः बहुत बुरा होता है। त्वचा अपनी सहन शक्ति खो बैठती है। अवयवों में प्रतिकूलता से लड़ने की क्षमता घट जाती है। फलस्वरूप ऋतु प्रभाव को सहन न कर पाने से आये दिन जुकाम, खाँसी, लू लगना, ताप, सिर दर्द, अनिद्रा, अपच जैसी शिकायतें समाने खड़ी रहती हैं। सूर्य की किरणें और स्वच्छ हवा में जो प्रचुर परिमाण में जीवन तत्व भरे पड़े हैं उनसे वञ्चित रहा जाय तो उसकी पूर्ति ‘विटामिन, मिनिरल और प्रोटीन’ भरे खाद्य पदार्थों की प्रचुर मात्रा भी नहीं कर सकती। साधन सम्पन्न लोग ही तात्कालिक सुविधा देखते हैं और दूरगामी क्षति को भूल जाते हैं। फलतः वह आरामतलबी का रवैया बहुत भारी पड़ता है और थकान तथा उससे उत्पन्न अनेक विग्रहों का सामना करना पड़ता है।
म्यूनिख (जर्मनी) की वावेरियन एकेडमी आफ लेवर एण्ड सोशल येडीशन संस्था की शोधों का निष्कर्ष यह है कि कठोर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की अपेक्षा दफ्तरों की बाबूगीरी स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक खतरनाक है।
स्वास्थ्य परीक्षण- तुलनात्मक अध्ययन आँकड़ों के निष्कर्ष और शरीर रचना तथ्यों को सामने रखकर शोध कार्य करने वाली इस संस्था के प्रमुख अधिकारी श्री एरिफ हाफमैन का कथन है कि कुर्सियों पर बैठे रहकर दिन गुजारना अन्य दृष्टियों से उपयोगी हो सकता है पर स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वथा हानिकारक है। इससे माँस पेशियों के ऊतकों एवं रक्त वाहिनियों को मिली हुई स्थिति में रहना पड़ता है, वे समुचित श्रम के अभाव में शिथिल होती चली जाती है फलतः उनमें थकान और दर्द की शिकायत उत्पन्न होती है। रक्त के नये उभार में, उठती उम्र में यह हानि उतनी अधिक प्रतीत नहीं होती पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे आन्तरिक थकान के लक्षण बाहर प्रकट होने लगते हैं और उन्हें कई बुरी बिमारियों के रूप में देखा जा सकता है। कमर का दर्द (लेवैगो), कूल्हे का दर्द (साइटिका) गर्दन मुड़ने में कंधा उचकाने में दर्द, शिरा स्फीति (वेरी कजोवेन्स), बवासीर, स्थायी कब्ज, आँतों के जख्म, दमा जैसी बीमारियों के मूल में माँस पेशियों और रक्त वाहिनियों की निर्बलता ही होती है, जो अंग सञ्चालन, खुली धूप और स्वच्छ हवा के अभाव में पैदा होती है। इन उभारों को पूर्व रूप की थकान समझा जा सकता है।
बिजली की तेज रोशनी में लगातार रहना, आँखों पर ही नहीं आन्तरिक अवयवों पर भी परोक्ष रूप से बुरा प्रभाव डालता है। आँखें एक सीमा तक ही प्रकाश की मात्रा को ग्रहण करने के हिसाब से बनी हैं। प्रकृति ने रात्रि के अन्धकार को आँखों की सुविधा के हिसाब से ही बनाया है। प्रातः सायं भी मन्द प्रकाश रहता है। उसमें तेजी सिर्फ मध्याह्न काल को ही आती है। सो भी लोग उससे टोप, छाया, छाता, मकान आदि के सहारे बचाव कर लेते हैं। आंखें सिर्फ देखने के ही काम नहीं आतीं वे प्रकाश की अति प्रबल शक्ति को भी उचित मात्रा में शरीर में भेजने की अनुचित मात्रा को रोकने का काम करती हैं। यह तभी सम्भव है जब उन पर प्रकाश का उचित दबाव रहे पर यदि दिन रात उन्हें तेज रोशनी में काम करना पड़े तो देखने की शक्ति में विकार उत्पन्न होना तो छोटी बात है। बड़ी हानि यह है कि प्रकाश की अनुचित मात्रा देह में भीतर जाकर ऐसी दुर्बलता पैदा करती है जिससे थकान ही नहीं कई अन्य प्रकार की तत्सम्बन्धित बीमारियाँ भी पैदा होती हैं।
जो कुछ सुन्दर और कल्याणमय है उसके साथ यदि हृदय की समीपता बढ़ाते रहें तो संसार सत्य और पवित्रता की ओर अग्रसर होगा।
-प्रसाद
कोलाहल और वायुप्रदूषण जीवनी शक्ति घटाने के दो और भी प्रबल कारण हैं जो धनी आबादी में रहने के कारण सामान्य संयमी, सन्तुलित जीवन जीने वालों पर भी अपना बुरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहते। सड़कों पर दौड़ने वाले द्रुतगामी वाहन, रेलें, कारखानों की मशीनें, वार्तालाप, लाउडस्पीकर इन सबसे मिलकर बड़े नगरों में कोलाहल का भयावह अम्बार आकाश में छाया रहता है। कान से प्रत्यक्ष सुनाई पड़ना ही आवश्यक नहीं, रेडियो सक्रियता की तरह खुले कान से या खुली आँख से अनुभव में न आने पर भी यह कोलाहल उत्तेजित ध्वनि कम्पनों के रूप में घुमड़ता है और मस्तिष्क के अन्तः तन्तुओं से टकराकर उन्हें उत्तेजित किये रहता है। यह अदृश्य उत्तेजना कई घण्टों शारीरिक श्रम करने के बराबर शक्ति खा जाती है और उसका बुरा प्रभाव शरीर से भी अधिक मस्तिष्क पर पड़ता है। कहना न होगा कि उत्तेजित और उद्विग्न मस्तिष्क मानसिक स्वास्थ्य को ही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य को भी नष्ट करने का एक बहुत बड़ा कारण है। यह शारीरिक मानसिक क्षति जो मोटे तौर पर ‘थकान’ के रूप में दीखती है, बड़े नगरों में कोलाहल पूर्ण वातावरण के कारण भी उत्पन्न होती है।
कोलाहल के अतिरिक्त दूसरा शहरी अभिशाप है-वायु दूषण -घुटन। इन दिनों औद्योगिक विकास के लिये लगे हुये बड़े बड़े कारखाने वायुमण्डल को बुरी तरह विषाक्त करते हैं। उनमें उड़ता हुआ धुआँ तो आँखों से भी देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त अदृश्य विषाक्त गैसें इतनी अधिक निकलती हैं जो धुएँ से भी अधिक खतरनाक और अधिक मात्रा में होती हैं। मोटरें और रेलें शोर ही नहीं करतीं उनमें जो तेल, कोयला जलता है वह वायुमण्डल के प्राणप्रद तत्वों को नष्ट और उसे विष से भर देने में विघातक सिद्ध होता है। वायु दूषण की घुटन आरम्भ में नाक और फेफड़ों को अनुभव होती है। पीछे अभ्यास में आ जाने पर उन्हें भी वह वातावरण अखरता नहीं। पर इससे क्या? प्रकृति की सूक्ष्म सम्वेदन शक्ति तो यथावत काम करेगी ही- उसे तो मजबूर नहीं किया जा सकता, कोलाहल और घुटन उत्पन्न तो मनुष्य कर सकता है पर उसके दुष्परिणामों से बचने में सर्वथा असहाय असमर्थ है। इसका दण्ड यदि उसे ‘थकान’ के रूप में भुगतान पड़े तो उसे अप्रत्याशित नहीं समझना चाहिए ।
बोस्टन की ‘मनोविज्ञान शोध संस्था’ के अधिकारी श्री एफ.एन. ऐलन का कथन है- ओछापन, संकीर्णता, खुदगर्जी और असामाजिक स्वभाव के लोग अपनी ही उधेड़ बुन में लगे रहते हैं। दूसरों के दुःख दर्द में हिस्सा नहीं बटाते-औरों की खुशी में सम्मिलित नहीं होते। अपने अभाव और दूसरे के दुर्व्यवहार का ही हिसाब लगाते रहते हैं। फलस्वरूप उनका मानसिक संस्थान अवसाद ग्रस्त हो जाता है। उस स्थिति को चिकित्सा शास्त्री ‘डिप्रेशन’ कहते हैं। थकान के कारण डिप्रेशन तो कठोर शारीरिक श्रम करने वालों को हो सकता है पर सरल और सुविधा की स्थिति रहने पर भी थकान आती है उसका बहुत बड़ा कारण मानसिक अवसाद-डिप्रेशन है। इन दिनों मनुष्य ओछा-स्वार्थी और संकीर्ण एवं असामाजिक होता जाता है। उसकी हँसी-खुशी का दायरा बहुत छोटा हो गया है फलस्वरूप वह अपने आपको एकाकी, असहाय, दुःखी, निराश एवं उद्विग्न अनुभव करता है। इसे उदात्त आध्यात्मिक दृष्टिकोण का, सामाजिकता का अभाव ही कहना चाहिए। यह मानसिक रुग्णता मनुष्य को नशा पीने- अपराध करने- या आत्म हत्या जैसे क्रूर कर्म करने के लिये प्रेरित करती है। ऐसे ही लोग नशा पीकर कुछ समय के लिये अपने आन्तरिक अवसाद से राहत पाने का रास्ता खोजते हैं। थकान तो उन पर छाई ही रहती है।
इस थकान जन्य विभीषिका से बचने के लिये सरल उपाय नहीं मिल सकता। दवादारु इस सम्बन्ध में कोई स्थाई हल नहीं दे सकती। शहरों की चकाचौंध भरी तथाकथित सभ्यता के आकर्षणों से मुँह मोड़कर हमें देहाती और सरल जीवन पद्धति अपनाने के लिये प्रकृति की ओर पीछे लौटना चाहिये। बाबूगीरी, अमीरी, साहबी के ऐयाशी, शान शौकत के भ्रम जञ्जाल में फँसकर अपनी मानसिक शान्ति और शारीरिक स्फूर्ति का बलिदान करने से इनकार कर देना चाहिए। स्फूर्ति को लेकर हर्षोल्लास भरा- सरल और शान्त- निरोग और लम्बा जीवन जिया जाय। सामाजिक और उदात्त दृष्टिकोण और नैतिक एवं लोकोपयोगी क्रियाकलाप अपनाया जाय।
चिंगारी की तरह चुपके चुपके सब कुछ जला डालने वाली थकान की बीमारी को छोटा न समझा जाय। उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये दवादारु की मृगतृष्णा में न भटका जाय वरन् जीवनयापन के क्रिया-कलाप में आमूलचूल परिवर्तन किया जाय, सुविधापूर्ण स्थिति में रहने वाले के लिए इसी में बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता है।
तनाव के दो कारण होते हैं- एक शारीरिक, दूसरा मानसिक। अधिक काम करने से, विश्राम न लेने से, नशे पीने या शीत ताप की अधिकता जैसे शरीर पर अतिरिक्त बोझ डालने वाले कारण से शरीर संस्थान उत्तेजित हो उठता है और प्यास, थकान, सिर दर्द, बेचैनी, नींद न आना, दाह जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
मानसिक कारणों में क्रोध, आवेश, उत्तेजना मुख्य हैं। चिन्ता, भय, शोक, उदासी, कुढ़न, ईर्ष्या आदि कारणों से भी तनाव बढ़ जाता है। कपटी, षड्यंत्रकारी और आतंकवादी व्यक्ति अपनी उद्धत गतिविधियों के कारण मन को बुरी तरह उत्तेजित कर देते हैं और तनाव बढ़ जाता है। यह मानसिक विकृतियाँ रक्त में अम्लता बढ़ाती हैं, पाचन क्रिया बिगाड़ती हैं और शरीर को रुग्ण बना देती हैं।
मानसिक उद्वेगों के कारण माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान के मिलन केन्द्रों पर एसिटिल कोलेन नामक पदार्थ बनने लगता है। यह अन्य पदार्थों के साथ मिलकर कार्बन और कोगल का निर्माण करता है। इसी स्थिति में लैक्टिक अम्ल भी बनने लगता है जिससे शरीर की मुलायमी चली जाती है और कड़ापन बढ़ने लगता है। यह कड़ापन रक्त प्रवाह और पेशी सञ्चालन में अवरोध उत्पन्न करती है। यहीं से कई प्रकार के रोग होना शुरू हो जाते हैं।
कैल्शियम और मैग्नेशियम फास्फोरस की कमी से जो शारीरिक तनाव उत्पन्न होता है उसकी पूर्ति दही, दूध, पनीर, विटामिन डी., पालक, चुकन्दर, गेहूँ, खजूर जैसे पदार्थ लेकर पूरी करली जाती है। इसी प्रकार आहार विहार की गड़बड़ी का सुधार एवं थकान को विश्राम से ठीक किया जा सकता है। कठिनाई उस तनाव को दूर करने में आती है जो मनोविकारों के कारण उत्पन्न होता है। यदि सोचने का ढंग सुधारा न जाय, प्रसन्न और भार मुक्त रहने का स्वभाव न बनाया जाय तो फिर ‘तनाव’ के कष्ट से छुटकारा पाना कठिन है। इस कष्ट से स्थायी मुक्ति तभी मिल सकती है जब अपने चिन्तन और स्वभाव में सज्जनता एवं शालीनता की मात्रा बढ़ाकर चित्त को हलका और उल्लसित रखा जाय।
मानसिक तनाव दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि सरल, निर्मल और निष्कपट जीवन जिया जाय। महत्वाकाँक्षाएं उतनी रखी जायें जो आज की स्थिति में सम्भव हों। अक्सर लोग ऐसी कल्पनाएं और आकाँक्षाएं गढ़ते रहते हैं जो साधन सम्पन्न स्थिति में ही सम्भव हैं। अभी से उनके लिए ललचाते रहने पर अकारण असन्तोष और उद्वेग उत्पन्न होता है और मानसिक तनाव बढ़ता है। उन्नति की योजनाएं तो बनानी चाहिए पर उनकी पूर्ति के लिए आतुर नहीं होना चाहिए विशेषतया तब, जबकि उस स्तर की सफलता प्राप्त करने के साधन अपने पास नहीं हैं। ऐसा मानसिक सन्तुलन गीता में ‘स्थिति प्रज्ञ’ स्थिति कही गई है। मानसिक तनाव से बचते हुए अधिक सफलता प्राप्त करने का यही उचित तरीका भी है।
क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, चिन्ता, भय का वास्तविक कारण बहुत स्वल्प होता है। यह मनोविकार कल्पनाशक्ति की अव्यवस्था और दृष्टिकोण उलझा हुआ होने के कारण ही उत्पन्न होते हैं। इन्हें अपनाकर मनुष्य अपनी विवेक बुद्धि खो बैठता है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर उलटे-पुलटे काम करता है, फलस्वरूप स्थिति और भी बिगड़ जाती है। ऐसे ही कारणों को लेकर आमतौर से लोग उद्विग्न रहते हैं और मानसिक तनाव से घिरे रहकर अपने स्वास्थ्य को अपार हानि पहुँचाते हैं। इस मनःस्थिति को साहसपूर्वक सुधारना-स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक है।
तनाव कम करने के उपचारों में सबसे सरल और उपयोगी शिथिलीकरण प्रक्रिया है। कुछ समय के लिये शरीर को, मन को अधिकाधिक निःचेष्ट बना देने से थकान में बड़ी कमी आती है। प्रकृति यह कार्य रात्रि को सोने का अवसर देकर सम्पन्न करती है। योगी लोग समाधि में यही कार्य करते हैं वे शरीर ही नहीं मन को भी चेष्टा रहित बना देते हैं। कायाकल्प की योग प्रक्रिया में भी यही होता है- कलेक्शेशन- शिथिलीकरण का उपयोग करके कितने ही प्राणी अपने क्षरण की पूर्ति करते हैं और आगे अधिक काम करने की क्षमता संग्रह कर लेते हैं।
शीत ऋतु में रीछ, साँप आदि कितने ही प्राणी चुपचाप इस तरह पड़ जाते हैं कि करवट बदलने की भी यदाकदा ही आवश्यकता पड़ती है। इस विश्राँति से शरीर की क्षति बची रहती है, फलतः बिना भोजन के भी काम चला लेते हैं। निराहार रहने के कारण जो दुर्बलता आनी चाहिए वह भी नहीं आती वरन् भोजन करते रहने के दिनों की अपेक्षा और भी अधिक स्फूर्तिवान होकर उठते हैं। लंघन के रोगी जब अच्छे होते हैं तो उनकी भूख बढ़ जाती है और शरीर की क्षतिपूर्ति जल्दी ही हो जाती है प्रसव के उपरान्त जच्चा को भी शिशुजन्म की थकान को दूर करने के लिये नई चेतना प्राप्त होती है। पर यह होता तभी है जब उसे इस बीच समुचित विश्राम मिल जाय। कुत्ते, बिल्ली आदि कई जानवर शरीर को पूरी तरह शिथिल करके पड़ जाते हैं और उतने से ही नींद की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं।
नींद और शिथिलीकरण में यह अन्तर है कि नींद में करवटें बदलने जैसा और स्वप्न देखने जैसा श्रम तो चलता ही रहता है। शिथिलीकरण में मनोयोगपूर्वक उसे भी बन्द कर दिया जाता है। शरीर और मन दोनों को ही पूरी तरह निःचेष्ट होकर कुछ समय के लिये विश्राम की स्थिति में पड़ा रहना ही शिथिलीकरण है, इससे तनाव घटाने और नई स्फूर्ति प्राप्त करने में बड़ी सहायता मिलती है।
योग साधना में इसे ‘शव आसन’ कहते हैं। बौद्ध सम्प्रदाय में यह क्रिया “अनापान स्रति” के नाम से प्रख्यात है।
आराम कुर्सी, पलंग, चटाई, गद्दी, दीवार के सहारे जहाँ भी सुविधा हो यह आसन किया जा सकता है। चित्त पीठ के बल लेट जाइये। हाथ पैर सीधे रखिये। शरीर ढीला छोड़िये। इतना ढीला-इतना ढीला मानो उसमें से प्राण ही निकल गया हो, सर्वथा निर्जीव स्थिति हो गई हो। इस भावना को अंग-प्रत्यंगों में उतारने में कुछ समय लगता है। आरम्भ में मन कम ही ढील छोड़ता है और अवयव भी अपना तनाव कम ही शिथिल करते हैं। पर प्रबल इच्छा शक्ति-मस्तिष्क के समर्थ निर्देश और भावना को श्रद्धा में परिणत करने की चेष्टा के संयुक्त प्रयत्न कुछ समय में सफल होने लगते हैं और शरीर सचमुच इतना ढीला लगने लगता है मानो वह पूर्णतया अशक्त हो गया हो। हिलने-डुलने तक की क्षमता खो बैठा हो। पैर के अंगूठे से लेकर सिर की चोटी तक मन को यह निरीक्षण एवं अनुभव करने देना चाहिए कि समस्त माँस पेशियाँ और रक्त वाहिनियाँ अपना काम बन्द करके पूर्ण विश्राम का आनन्द ले रही हैं और सर्वथा शिथिल पड़ी हैं।
शरीर के बाद मन का नम्बर आता है। जब देह में पूर्णतया शिथिलता अनुभव होने लगे तो उसी प्रकार विश्राम मन को देना चाहिए। मस्तिष्क मानों नींद में चला गया हो, गहरी निद्रा की मनः स्थिति बन गई हो चित्त जागृति और स्वप्न की स्थिति से आगे बढ़कर सुषुप्ति और तुर्या स्थिति में पड़ा हुआ पूर्ण शान्ति-विश्रान्ति का अनुभव कर रहा हो। न कोई चिन्ता, न इच्छा, न आकर्षण। पूर्ण निश्चिन्तता और निर्द्वन्दता की स्थिति विचारों से सर्वथा रहित मन।
शिथिलीकरण का प्रयोग किसी भी थके हुए क्षतिग्रस्त रोगी को अपनी जीवनी शक्ति पुनः अर्जित करने में बहुत सहायक सिद्ध होता है। मनः शास्त्री डॉक्टर विलियम ब्राउन ने द्वितीय महायुद्ध में मानसिक रुग्णता ग्रस्त अनेकों सैनिकों को इस उपचार से अपनी खोई हुई मानसिक क्षमता पुनः प्राप्त करने में सफल बनाया था। उसने मानसोपचार की दृष्टि से इसे बहुत ही सफल साधन बताया है।
प्रेम आत्मा की जागृति और उल्लास मय स्थिति का दृश्यमान स्वरूप है। जिसके अन्तःकरण में प्रेम की रस धारा का उद्भव नहीं हुआ, समझना चाहिए अभी वह भावना की दृष्टि से जड़ योनियों की स्थिति में ही पड़ा है। हलचल तो जड़ पदार्थों में भी होती है। पाषाण और धातुयें भी जन्म, यौवन और जरा के चक्र में बंधे रहते हैं पेड़ पौधे भी अनुकूल, प्रतिकूल परिस्थितियों में सुख-दुख अनुभव करते हैं। जड़ कहे जाने वाले पदार्थों में भी चेतना के चिह्न स्वल्प मात्रा में पाये जाते हैं। मनुष्यों में भी ऐसे ही ‘जड़’ हो सकते हैं जिनका शरीर और मन से बना काय कलेवर तो बहुत प्रकार की हलचलें करता हो पर भाव भूमिका प्रसुप्त, मूर्छित अथवा मृत अवस्था में पड़ी हो।
शरीर की दृष्टि से मृत वह कहा जायेगा जिसकी श्वास-प्रश्वास, रक्ताभिषरण, आकुञ्चन प्रकुञ्चन एवं धड़कन बन्द हो गई। किन्तु आत्मिक दृष्टि से मृत वह है जिसमें उच्चस्तरीय भावनाओं का अभाव है। इन्द्रियों के स्वाद, वासनात्मक अनुभूतियाँ शरीर को होती हैं। इन्हें प्राप्त करने की आतुरता में किन्हीं वस्तुओं की उपलब्धियाँ आवश्यक होती है और किन्हीं व्यक्तियों का सहयोग अपेक्षित होता है। इन्हें प्राप्त करने के लिये आतुरता का स्वरूप कई बार प्रेम जैसा दीखता है, पर वस्तुतः उस प्रयास में वैसा कुछ है नहीं।
प्रेम सदा आदर्शों के साथ जुड़ा होता है जबकि मोह जिसे दूसरे अर्थों में काय कलेवर की ललक लालसा भी कह सकते हैं, यह एक उफान मात्र है जो अभाव रहने तक ही उमड़ता है और प्राप्त होने के साथ ही तिरोहित हो जाता है। पर प्रेम अभाव और भाव दोनों ही स्थिति में एक समान बना रहता है। उसके व्यवहार स्वरूप तो बदलता है पर अन्तःस्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। प्रेम पात्र के न मिलने पर छटपटाहट दर्द जैसी अनुभूति होती है और मिल जाने पर समर्पण की लय की उत्कंठा उमंगती है। अपने लिए प्राप्ति की आकाँक्षा न अभाव की स्थिति में होती है और न भाव की स्थिति में।
देखते हैं जड़ जगत के जड़ जीव जिनमें नर-पशु भी सम्मिलित हैं, मात्र मोह लिप्सा में जलन भर अनुभव कर पाते हैं उन्हें प्रेम के अमृत की एक बूँद भी उपलब्ध नहीं होती। बहुत करके प्रेम शब्द का प्रयोग तरुण नर-नारियों के बीच उत्पन्न यौन आकर्षण की आतुर मनः स्थिति के लिए किया जाता है। यह एक जड़ आकर्षण है। प्रकृति ने अपनी सृष्टि परम्परा को क्रमबद्ध रखने के लिये उभयलिंगी जीवधारियों को यौन आकर्षण के बन्धनों में बाँधा है। दुर्बल शिशु के पालन और संरक्षण के लिए माता में वात्सल्य को संजोया है। यह दोनों ही सामयिक है। तभी तक स्वाभाविक रहते हैं जब तक प्रकृति को सृष्टि परम्परा को इनकी आवश्यकता रहती है। वह प्रयोजन पूरा होते ही क्रमशः उस आकर्षण में शिथिलता आती है और अन्ततः उसकी समाप्ति भी हो जाती है। प्रेम का अन्त इस प्रकार की दुर्गति के साथ नहीं होता वह अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करके ही दम लेता है।
ऋतु अवसर पर पशु नर मादाओं में जो आकर्षक आतुरता पाई जाती है वह समय निकलते ही समाप्त हो जाती है। छोटे बच्चे और मादा के बीच जो वात्सल्य रहता है वह बच्चे के बड़े होते ही दूसरा बच्चा सामने आते ही शिथिल एवं- समाप्त हो जाता है। नर-पशुओं में भी यह प्रवृत्ति उतनी क्षणिक तो नहीं होती पर उभार और शैथिल्य का क्रम निश्चित रूप से रहता ही है। प्रेयसी तभी तक अप्सरा लगती है, जब तक वह पत्नी नहीं बन जाती है। अभाव में उछल कूद करती हुई आतुरता भाव की उपलब्धि होते ही तिरोहित हो जाती है। उसमें ऐसे उफान आवेश भरे उतार-चढ़ाव आवें उसे प्रेम के पवित्र नाम से किसी भी प्रकार सम्बोधित नहीं किया जा सकता। उसे पशु प्रवृत्ति अब मोह, लिप्सा भर कहा जाना चाहिए।
प्रेम की चर्चा तरुण तरुणियों के बीच आकर्षण के आधार पर ही क्यों की जाय? दो वृद्ध पुरुषों में दो वृद्ध नारियों में, दो विवाहितों में- दो किशारों में भी तो प्रेम हो सकता है अथवा आयु की दृष्टि से असमान व्यक्तियों में भी वह परिलक्षित हो सकता है। तरुण और तरुणियों के बीच चलती हुई आकर्षण आतुरता में आमतौर से प्रकृति गत सृष्टि परम्परा जारी रखने की जैविक प्रेरणा भर रहती है, उसमें आत्मा के रस ‘प्रेम’ की झाँकी कभी कदाचित ही पाई जाती है। दुर्भाग्य यही है कि आज बेचारा ‘प्रेम’ शब्द इसी कीचड़ में पड़ा हुआ सड़ रहा है। फिल्म, उपन्यास, संगीत, शृंगार, नृत्य अभिनय से लेकर दैनिक व्यवहार में प्रेम की यही फूहड़ व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। यही क्रम चला तो सम्भवतः कुछ समय में लोग यथार्थ प्रेम के स्वरूप से भी अपरिचित हो जायेंगे।
समझा जाना चाहिए कि प्रेम आत्मा की विकसित स्थिति की उल्लास अनुभूति है। वह आदर्शों पर ही आधारित रहती है। भौतिक स्वार्थ साधन के लिए जहाँ व्यक्तियों के बीच घनिष्ठता उभर रही हो उसे विशुद्ध ‘मोह’ कहना चाहिए। ऐसा मोह धूप छाँह जैसा क्षणिक होता है। आज का घनिष्ठ मित्र कल उपेक्षित हो जाता है और परसों शत्रु लगने लगता है। इन उन्मादों में आज प्राण निछावर करने के आश्वासन देने वाला कल प्राण घातक भी बन सकता है। आये दिन समाचार पत्रों में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जिनमें प्रेमी प्रेमिकाओं के मधुर सम्बन्ध का पैशाचिक विश्वासघात के साथ अन्त हुआ। मित्र बनकर शत्रु का कार्य करने वाले छल प्रपञ्च भर घटना क्रम पग पग पर देखे, सुने जा सकते हैं। कुछ दिन तक इतनी गहरी दीखने वाली घनिष्ठता तनिक से कारण को लेकर इस स्तर की पैशाचिकता बन सकती है इस गुत्थी को सुलझाते हुए प्रेम एक पहेली बनकर सामने आता है और मैत्री में कभी भी कोई भयानक दुर्घटना की आशंका नहीं रहती।
प्रेम और मोह के अन्तर को समझने से ही यह गुत्थी सुलझेगी। काया और छाया में जो अन्तर होता है वह प्रेम और मोह में है। यह हजार बार समझा और याद रखा जाना चाहिए कि ‘प्रेम’ आदर्श के लिये- आदर्शवादी व्यक्तियों के बीच ही सम्भव है। धूर्त और स्वार्थी कभी घनिष्ठता का निर्वाह नहीं कर सकते। दाँत काटी रोटी वाले दूध शक्कर जैसे बने हुए चोर, डाकू तनिक सा दबाव पड़ते ही मुखबिर बन जाते हैं और साथियों को पकड़वा मरवा देने में तनिक भी संकोच अनुभव नहीं करते। वेश्या और भड़ुए जितने चोचले करते हैं उतने ही भीतर भीतर घोर घृणा से भी भरे रहते हैं। पतित व्यक्ति-पतित प्रयोजन के लिये कभी मित्रता साध रहे हैं तो उसमें धूर्तता ही प्रधान रहेगी। जो उस जञ्जाल में फँसकर कोई जोखिम उठावेगा वह बेतरह मारा जायेगा। मोह और प्रेम का अन्तर न समझने वाले भावुक लोगों में से इस अभिचार की चट्टान से टकराकर आये दिन अपना सर्वनाश करते रहते हैं।
प्रेम किसी भौतिक आकर्षण के कारण नहीं हो सकता। रंग, रूप, सौंदर्य, यौवन, प्रतिभा, मुस्कान, कला कौशल, पद, धन, सहयोग, आश्वासन, आशा आदि के आधार पर जो खिचाव उत्पन्न होता है वह विशुद्ध भौतिक है। उसमें प्रायः एकाँगी पागलपन ही भरा रहता है। फिल्मों के नट नर्तक नर-नारी बहुतों के लिये आराध्य बने रहते हैं, उनके चित्र छाती से चिपकाये रहते हैं, जन्म दिन पर बधाई सन्देश भेजते हैं, सोचते हैं कि इस प्रेम प्रदर्शन के आधार पर वे अपनी छाप उन पर छोड़ सकेंगे पर सही बात है कि इन प्रेमोन्मादियों की ओर आँख उठाकर देखने की भी उन्हें फुरसत नहीं होती इसी प्रकार प्रतिभा सम्पन्न लोग झूठे आश्वासन देकर लुभाते, ललचाते तो कितनों को ही रहते हैं पर जब कसौटी का समय आता है तब पल्ला झाड़कर अलग जा खड़े होते हैं। ऐसी एकांगी और छद्म प्रेम विडम्बनाएं भी कम देखने को नहीं मिलती। अपनी हवेली, तिजोरी, मोटर वाहवाही से भी कितनों को बड़ा प्यार होता है पर जब वे दूसरे के अधिकार में चली जाती हैं तो आँख उठाकर देखने जितना भी लगाव उनमें नहीं रह जाता। जिसमें स्थायित्व न हो वह प्रेम की परिभाषा में आ ही नहीं सकता। प्रेम आत्मा का स्वभाव है। आत्मा सत् है, चित् है, आनन्द है। उसकी अनुभूति में प्रेम में अवास्तविकता-अस्थिरता-अवाँछनीयता एवं असुखकर असमञ्जस भरी स्थिति उत्पन्न हो ही नहीं सकती।
आत्मा एक दिव्यसत्ता है- उसका प्रेम घनिष्ठता उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता जैसे भाव प्रवाह के साथ ही हो सकता है। इसका अभ्यास करने के लिये उस स्तर के व्यक्तियों को भी चुना जा सकता है। इष्टदेव वस्तुतः उत्कृष्ट स्तर का आत्मदेव ही है। इस दृष्टि से प्रमाणित है कि हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा, आस्था और वस्तुस्थिति के अनुरूप एक देवता या असुर है। उसी के पोषण का भला बुरा वरदान अनुदान हमें पग-पग पर मिलता रहता है। यह आत्म प्रेम हुआ। दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों से यदि कभी सच्चा प्रेम हो सकता है तो वह एक मात्र उच्च स्तरीय आदर्शवादिता ही हो सकती है। चरित्रवान एवं अनुकरणीय व्यक्तित्व ही सच्चे अर्थों में प्रेमपात्र की भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं। दुष्ट, दुराचारियों की घनिष्ठता न केवल प्रेमी का बेतरह शोषण करती है वरन् अन्ततः ऐसी चोट पहुँचाती है कि प्रेम तत्व के प्रति ही घोर अनास्था उत्पन्न हो जाती है। असफल प्रेमी एक प्रकार से उन्मादी विक्षिप्त की स्थिति में जा पहुँचता है। अपने उपार्जित अध्यात्म संस्कारों से भी वंचित हो जाता है।
प्रेम एक उच्च कोटि की आत्म सम्पदा है। मणि मुक्तकों से बढ़कर, रक्त भंडार को सुरक्षित बैंक या तिजोरी में ही रखा जाता है। प्रेम का प्रत्यारोपण ऐसे व्यक्ति के ऊपर किया जाना चाहिए जिसका बहिरंग एवं- अन्तरंग जीवन स्तर की उत्कृष्टता असंदिग्ध हो। ऐसा सत्पात्र यदि न खोजा जा सके तो सर्वसुलभ यही है मात्र आदर्शवादी भावनाओं और उत्कृष्ट विचार शृंखला को ही अपना प्रेमास्पद बनाया जाय। मानवता के उच्चतम स्वरूप को इष्टदेव या आत्मदेव मानकर उसके साथ अनन्य प्रेम की घनिष्ठ मैत्री को विकसित किया जाय।
निजी स्थूल काय कलेवर के साथ प्यार करने की बात का विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह स्नेह प्रवाह भी उसकी सूक्ष्म सत्ता से ही किया जा रहा है। प्रेमी की आत्मा का साथ छोड़कर बाहर निकले हुए उसी के मल-मूत्र, कफ, दाँत, बाल, नख, रक्त, माँस आदि से कोई प्रेम नहीं करता, जब तक यह वस्तुयें आत्मा के साथ जुड़ी थीं तभी तक प्रिय थीं। इससे सिद्ध है कि प्रेम कभी स्थूल पदार्थों से हो ही नहीं सकता-भले ही वह प्रेमी का काय कलेवर ही क्यों न हो। सूक्ष्म आत्मा अपनी आत्मीयता का विस्तार दूसरी अपने ही स्तर की सूक्ष्म आत्मा पर ही कर सकता है और आत्मा का स्वरूप जो अनुभव में आता है वह उच्चस्तरीय आस्थाओं एवं क्रियाकलापों के रूप में ही समझा, परखा और जाना जा सकता है। अस्तु निष्कर्ष यही निकला कि यदि प्रेम को निर्बाध गति से विकसित होते रहने देना हो, उसका आनन्द अनवरत रूप से उठाना हो तो आदर्शवाद को ही प्रेमास्पद बनाना चाहिये। भगवान की भक्ति इसी को कहते हैं।
प्रेम ऐसी तुच्छ वस्तु नहीं है कि धर्म को हटाकर उसके स्थान पर आप बैठे। प्रेम महान है, प्रेम उदार है। प्रेमियों को भी वह उदार और महान बनाता है। प्रेम का मुख्य अर्थ है ‘आत्मत्याग‘।
-जयशंकर प्रसाद
भगवद् भक्तों का भाव प्रत्यारोपण इसी केन्द्रबिन्दु पर होता है। कौन भक्त किस आकृति के इष्टदेव की कल्पना करता है इसका कोई अधिक महत्व नहीं। महत्व इस बात का है कि इष्टदेव को किस स्तर का गढ़ा गया। यदि भक्त ने मद्यप, माँसाहारी, पक्षपाती, खुशामदी, लोभी प्रमादी स्तर का इष्टदेव चुना होगा तो वहीं सारे दोष दुर्गुण लौटकर उपासना करने वाले पर गिरेंगे और उसे अभक्त से भी अधिक गये गुजरे स्तर का बना देंगे। अत्याचारी, आक्रमणकारी, दुरात्मा लोग अपने अवाँछनीय स्वार्थों की पूर्ति के लिये तान्त्रिक देवी देवताओं की वाम मार्गी पूजा करते, बलि चढ़ाते देखे जाते हैं। निश्चित रूप से ऐसे इष्टदेव उपासक को पतन के गर्त में धकेलने के ही माध्यम बनते हैं। कारण स्पष्ट है इष्टदेव सदा उपासक की मानसिक सन्तान भर होता है उसे जिस स्तर का गढ़ा गया है फल उसके भिन्न स्तर का हो ही नहीं सकता। यदि आत्मिक उत्कृष्टता अभीष्ट हो तो उपास्य-प्रेमास्पद की सत्ता आदर्शवादी सिद्धान्तों की आधारशिला पर खड़ी की गई होनी चाहिए। वस्तुतः उच्चतम मानवी स्तर ही उपासना में प्रयुक्त होने वाला भगवान है। प्रेमास्पद उसी को बनाया जा सकता है।
इसका अभ्यास व्यक्ति के रूप में भी किसी को प्रेमास्पद बनाकर भी किया जा सकता है, यह प्रयोग किया जा सकता है, पर यह प्रयोग आरम्भ करने से पूर्व हजार बार यह परख लेना चाहिए कि आदर्शों की कसौटी पर यह मनुष्य किस सीमा तक खरा उतरता है। इसके लिये उसके वचनों को नहीं अब तक के चरित्र को कसौटी मानना चाहिए। बिना बारीकी से किसी की चरित्रनिष्ठा को परखे-भावावेश में प्रेम करने लगना अपने आपको विपत्ति में फंसा लेने के बराबर है। दो प्रेमियों के बीच गुण, कर्म, स्वभाव एवं व्यक्तित्व का भी आदान-प्रदान होने लगता है। यदि प्रेमपात्र निकृष्ट स्तर है तो वह हेय प्रवृत्तियाँ अपने ऊपर भी लद पड़ेंगी।
प्रेम चाहे आदर्शों से किया जाये चाहे व्यक्तियों से उसमें कुछ पाने का नहीं, देने का ही भाव रहना चाहिए। भगवान के लिये अपनी उपलब्धियों का समर्पण उसके संकेतों पर अपने क्रिया-कलाप का निर्धारण जहाँ दृष्टिगोचर हो वहीं ईश्वर भक्ति का अस्तित्व देखा जा सकता है। जहाँ मनोकामनाओं की भरमार हो, भौतिक सुविधाओं के लिये ईश्वर को बाध्य किया जा रहा हो और न मिलने पर झुँझलाया जा रहा है, समझना चाहिए कि उपासना का- भक्ति का- क,ख,ग,घ भी अभी यहाँ आरम्भ नहीं हुआ। ढेरों पूजा पाठ करने वाला व्यक्ति भी अभक्त और आत्मिक प्रकाश-प्रेम से रहित हो सकता है। ऐसे ही तथाकथित भक्त, नामधारी आज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं और अपनी भाव शून्यता के कारण भक्ति के सत्यपरिणामों से सर्वथा वंचित रह रहे हैं।
व्यक्तियों के बीच यदि प्रेम तत्व का विकास किया जाना हो तो उसमें लेने की नहीं- देने की प्रतिस्पर्धा रहनी चाहिए। इससे पूर्व प्रेम साधना के लिये पात्र का चयन करते हुए यह देख लेना चाहिए कि उस व्यक्तित्व में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का कितना पुट है। आत्मा को आनन्द से विभोर रखने वाला और ऊंचा उठाने वाला प्रेम तत्व ऐसे ही वातावरण में पनपता और पल्लवित होता है।
न्यूजीलैण्ड के दो नन्हें जीव-त्यूआतूरा तथा श्यामा- हमारे सम्मुख-’अच्छे पड़ोसियों का आदर्श’ अत्यन्त सुन्दर व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करते हैं। त्यूआतूरा एक प्रकार की छिपकली होती है और श्यामा समुद्री चिड़िया। ये दोनों एक ही घोंसले में रहती हैं। त्यूआतूरा सारे दिन आहार की खोज में इधर-उधर घूमती रहती है और दिन ढले घोंसले में आती है। श्यामा का स्वभाव है कि वह दिन भर सोती है और त्यूआतूरा के आते ही भोजन की खोज में निकल जाती है। दोनों के इस मूक समझौते में कभी कोई व्यवधान नहीं आता।
इतना ही नहीं, ये दोनों एक दूसरे की सुविधाओं का भी ध्यान रखती हैं। त्यूआतूरा अन्य छिपकलियों की भाँति अधिक अण्डे नहीं देती तथा श्यामा भी सहेली का ध्यान रखते हुए बहुत कम अंडे देती है। परिणामतः आवास में कठिनाई नहीं पड़ती। इतना ही नहीं, जब एक घर से बाहर रहती है तो दूसरी उसके अंडे-बच्चों की देखभाल करती रहती है।
एक हम हैं जो मनुष्य-मनुष्य में भेद-भाव करते हैं। पड़ौसियों के साथ द्वेष, कटुता और मनोमालिन्य युक्त व्यवहार करते हैं। दूसरी ओर उपरोक्त दो भिन्न जातियों के प्राणी हैं जो परस्पर स्नेह, सहयोग का ऐसा आदर्श उपस्थित करते हैं।
अथर्ववेद 1। 2। 31, 32, 4। 37, 5। 23, 29 में अनेक प्रकार के रोगोत्पादक कृमियों का वर्णन आता है। वहाँ इन्हें यातुधान, क्रव्यात पिशाच, रक्षः आदि नामों से स्मरण किया गया है। ये श्वासवायु, भोजन, जल आदि द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होकर या मनुष्य को काटकर उसके शरीर में रोग उत्पन्न करके उसे यातना पहुँचाते हैं, अतः ये ‘यातुधान’ हैं। शरीर के माँस को खा जाने के कारण ये ‘क्रव्यात्’ या ‘पिशाच’ कहलाते हैं। इनसे मनुष्य को अपनी रक्षा करना आवश्यक होता है इसलिए ये ‘रक्षः’ या राक्षस हैं। यज्ञ द्वारा अग्नि में कृमि-विनाशक औषधियों की आहुति देकर इन रोग-कृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचाया जा सकता है।
देव सविता प्रसुव यज्ञं प्रसुवयज्ञपति भगाय।
दिव्योगर्न्धवः केतपूःकेतनःपुनातु वाचस्पतिर्वाच न स्वदतु॥
-यजु. 30-1॥
अर्थ- मन, वाणी, बुद्धि की उन्नति तब होगी जब यज्ञ एवं यज्ञपति की उपासना की जाय।
दिवि विष्णु व्यक्तिस्त जागनेत छंदसा।
ततो निर्भयोक्ता योऽस्यमान द्वेष्टि यंच वचं द्विष्मः।
अन्तरिक्षे विष्णुव्यक्रंस्त त्रैष्दुते छंदसाँ
सतो नर्भक्तो. ।
पृथिव्याँ विष्णुर्व्यंक्रस्तंगायणे छन्दसा।
सतोनिर्भक्तो. ।
अस्यादन्नात् । अस्ये प्रतिष्ठान्ये। अगन्य स्वः। संज्योतिषाभूम।
-यजु 2-25
अर्थ- अर्थात् अग्नि में प्रक्षिप्त जो रोगनाशक, पुष्टि प्रदायक और जलदिसंशोधक हवन सामग्री है, वह भस्म होकर वायु द्वारा बहुत दूर तक पहुँचती है और वहाँ पहुँचकर रोगादिजनक वस्तु को नष्ट कर देती है। इस हेतु वेद में कहा जाता है, जो वस्तु हम लोगों से द्वेष करती है एवं जिससे हम लोग द्वेष करते हैं वह वस्तु यज्ञ के द्वारा नष्ट हो जाती है। आगे भी यह भाव समझना चाहिए। अर्थात् यज्ञ से इहलौकिक और पारलौकिक दोनों कार्य सम्पन्न होते हैं।
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैन शपथको अश्नुते।
यं मेषजस्यं गुग्गुलोः सुरभिर्गन्धों अश्नुते॥
विष्वञ्चस्तस्माद् यक्षमा मृगाद्रश£ द्रवेरते। आदि
-अथर्व. का. 19 सू. 38 मं. 1,2
अर्थ- जिसके शरीर को रोग-नाशक गूगल का उत्तम गन्ध व्यापता है, उसको राज-यक्ष्मा की रोग पीड़ा नहीं होती। दूसरे का शपथ भी नहीं लगता। उससे सब प्रकार के यक्ष्मा-रोग शीघ्रगामी हरिणों के समान काँपते है, डर कर भागते हैं।
यदि क्षितायुर्यदि वा परे तो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एवं।
तमा हरामि निऋतेरूपस्थापस्पार्शमेनंशतशादराय॥
-अथर्व का. 3 सूक्त 11 मन्त्र 2॥
अर्थ- यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा इस संसार को सुखों से दूर हो, चाहे मृत्यु के निकट जा चुका हो, ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है।
जिस प्रकार शरीर में पाप, आलस्य, विषय विकार, रोग आदि भरे रहते हैं और मन को मल आवरण विशेष एवं कषाय−कल्मष दूषित करके उन्हें विकृत परिस्थितियों में डाले रहते हैं उसी प्रकार तामसी-आसुरी तक वनस्पति अन्न, फल आदि में प्रवेश कर जाते हैं। उन्हें खाने से पशु और मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ दुष्ट हो जाती हैं। पशुओं के दुग्ध घृत आदि द्वारा वही वनस्पतियों के दूषण मनुष्यों को प्रभावित करते हैं वैसे भी अन्न, शाक आदि लोग खाते ही हैं। सूक्ष्म वातावरण का प्रभाव इस वनस्पति आहार को दूषित करके मनुष्यों के अन्तःकरण चतुष्टय में दुष्प्रवृत्तियां भर देता है और लोग अनायास ही कष्ट क्लेशों से भरे शोक सन्तापों में फँसते चले जाते हैं। इस तथ्य को शतपथ ब्राह्मण में इस प्रकार कहा गया है-
ततोऽसुरा उभयीरोषधीर्याश्च मनुष्या उपजीवन्ति याश्च पशवः कृत्ययेव त्वत् विषेणेव प्रतिलिलिपुः उतैवं चिदेबानभि- भवेमेति, ततो मनुष्या आशुर्न पशव अलिलिशिरे ताहेमाः प्रजा अनाशकेन नोत्पराबभवुः।...... ते देवाहोचुर्हन्तेद मासामपिजिघाँसामेति, केनेति? यज्ञे नैवेति।
शतपथ 2। 4,3। 2-2।
असुरों ने उन समस्त औषधियों को मारक तत्व अथवा विष से मानो लिप्त कर दिया, जिसका उपयोग कर समस्त मानव व पशु अपना जीवन निर्वाह करते हैं, ऐसा करके उन्होंने यह सोचा, कि इस प्रकार हम देवों को परास्त कर लेंगे, पर उन औषधियों को उस अवस्था में पशुओं ने न चुगा, उनका उपयोग करने से समस्त प्रजा असुरों द्वारा पराजित न की जा सकी।
इन अन्न वनस्पतियों में प्रविष्ट हुई स्थूल और सूक्ष्म असुरता का- विकृति रुग्णता एवं दुष्टता का शमन करने के लिए यज्ञ अमोघ उपाय है। जिस प्रकार इस वनस्पति जगत में प्रविष्ट हुई अवाँछनीयता का निराकरण यज्ञ करता है। रक्त शोधक औषधियों की तरह यज्ञ विधान को भी वनस्पति जगत की शुद्धि और परिपुष्टि का आधार कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ने इस रहस्य का उल्लेख इस प्रकार किया है।
पृथ्वी का विषय गन्ध है। पृथ्वी सदा वायु से गन्धों का शोषण करके वायु को निर्गन्ध किया करती है। पृथ्वी के विकार रूप पशु, मनुष्य, वृक्षादि स्थिर अथवा चंचल वायु की गन्ध सदा खींचते हैं। सगन्ध वायु कुछ मीलों तक चलने पर स्वयं निर्गन्ध हो जाती है। गन्ध से भारी होने के कारण यह सदा पृथ्वी के धरातल पर ही बहता है। ऊपर आकाश का सूक्ष्म वायु निर्गन्ध होता है। इस प्रकार यज्ञ से हवन द्वारा बने अभीष्ट फलों के कारण व बीजरूप वाष्प, धुआँ व गन्ध को यज्ञ प्रदेश वाली पृथ्वी शोषण कर लेती है। पुनः अभीष्ट अन्न, फल, दुग्ध, सुख, प्रसाद आदि उत्पन्न कर उस प्रदेश को अर्पण करता है।
एतेन वै तज्ञेनेष्ट् वोभयीनामोषधीनाँ याश्च मनुष्या उपजीवन्ति याश्च पशवः कृत्यामिव त्वत् विषमिव त्वत् अपजध्नुः तत आश्नन् मनुष्या आलिशन्त पशवः।
इस यज्ञ के द्वारा ही उन समस्त औषधियों के स्वास्थ्यनाशक विष-प्रभाव को नष्ट कर दिया गया, जिनका उपयोग मनुष्य अथवा पशु करते हैं, परिणामस्वरूप मनुष्य उन अन्नादि औषधियों का उपयोग करने लगे और पशु भी चुगने लगे। यज्ञ के द्वारा वायु अथवा वातावरण की शुद्धि के लिए इससे अधिक और किस प्रमाण की आवश्यकता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इस प्रकार के प्रसंग अनेक स्थलों में हैं। इसके लिए आप गोपथ ब्राह्मण के उत्तर भाग (2।19) और औषीतकि ब्राह्मण (5।1) को देख सकते हैं।
प्रयुक्तया यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुराजिता।
ताँ वेद विहिता। मिष्टामारोग्यार्थी प्रयोजयेत्॥
-चरक चि.स्थान अ. 8 श्लोक 12
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था, आरोग्य चाहने वाले मनुष्य को उसी वेद-विहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए।**
गर्मी आई और धरती के जलबिन्दु भाप बनकर आकाश में उड़ गये। उनने अपने को बादल के रूप में पाया और इतराने लगे कि हम धरती वालों से बहुत ऊंचे हैं।
सर्दी आई और उसने बादलों को ओस और कुहरे के रूप में बदलकर धूलि में छितराने के लिए विवश कर दिया। जल बिन्दुओं की समझ में यथार्थता आई। बड़प्पन उनका नहीं सर्दी और गर्मी का था।
कर्मफल भोगने की प्रक्रिया शाश्वत है, विश्व की सारी क्रम व्यवस्था उसी आधार पर चल रही है। यदि कर्मफल संदिग्ध रहता तो फिर सत्कर्म करने का कष्ट सहने और दुष्कर्म से तात्कालिक लाभ प्राप्त करने का प्रलोभन छोड़ने को कोई कदापि तैयार न होता, फिर कर्म अकर्म के बीच भेद करने की आवश्यकता ही क्या रहती। स्वभावतः मनुष्य इतना उदार और महान नहीं है कि मात्र आदर्शों की रक्षा और लोक मंगल की बात सोचकर स्वार्थ, त्यागी और कर्त्तव्य परायण बना रहे। उसकी पशुता को नियन्त्रित करने में कर्मफल का विधान बहुत काम करता है।
पशु जब कुमार्ग पर चलता है तो पीठ पर डण्डा पड़ता है। उस भय से वह रास्ते पर आ जाता है। दुष्कर्मों का दण्ड विधान मनुष्यों को अवाँछनीय रीति-नीति न अपनाने के लिये बाध्य करता है। उसी प्रकार घास, चारे का लोभ देकर गधे को, रोटी का टुकड़ा दिखाकर कुत्ते को दूर तक ले जाया जा सकता है। शुभ कर्मों के सत्परिणाम भी ऐसे ही प्रलोभन हैं जिनकी आकाँक्षा से मनुष्य सन्मार्गगामी बनने और परमार्थ परायण रहने के लिए सहमत हो जाता है। मरणोत्तर जीवन में स्वर्ग-नरक की व्यवस्था इसी दृष्टि से भगवान ने की है और इस जीवन में कुकर्मी को विविध विधि प्रताड़नाएं सहने और सन्मार्गगामी को सम्मान, सहयोग पाने का जो विधान रखा है उससे संसार का क्रम ठीक बना रहने में बड़ी सहायता मिलती है। कर्मफल जैसी कोई व्यवस्था यदि न रहे तो फिर पशुता की पैशाचिकता का रूप धरण करने में देर न लगे। कभी-कभी ऐसी उच्छृंखलता वह बरतता है तो प्रकृति की कर्म विधान व्यवस्था उसे ठोक-पीटकर सही रास्ते पर ला देती है।
इस लोक में दुष्कर्मों का फल आधि-व्याधि के रूप में आता है, यह शास्त्र सम्मत भी है और विज्ञान सम्मत भी। इस संदर्भ में शास्त्र-वचन इस प्रकार है-
आत्मापराधवृक्षस्यं फलान्येतानि देहिनाम्।
दारिद्रयदःखरोगानि बन्धनव्यसनानि च॥2॥
-चाणक्य
मनुष्यों को अपने अपराध रूपी वृक्ष के दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन और विपत्ति आदि फल मिलते हैं।
-महाभारत, उद्योग पर्व ॥23॥
राजन्! धर्म और पाप दोनों के पृथक-पृथक फल होते हैं और उन दोनों का ही उपभोग करना पड़ता है।
आचराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः।
आचाराद्धमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः
दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥
-मनु. 4।156 से 157
श्रेष्ठ आचरण का जीवन जीने वाला, दीर्घजीवी होता है। श्रेष्ठ सन्तान पाता और सम्पन्नता प्राप्त करता है। बुरों को भी सुधार देता है।
दुराचारी निन्दित होता है। दुःख भोगता है। अल्पजीवी होता है। रोगी रहता है।
पुण्यापुण्येहिपुरुषःपर्यायेणसमश्नुते।
भुञ्जतश्चक्षययातिपापंपुध्यमथापिवा ॥16॥
नतुभोगादृतेपुण्यपापंवाकर्ममानवः।
परित्यजतिभोगाच्चपुण्यापुण्ये निबोधमे ॥17॥
दुर्भिक्षादेवदुर्भिक्षक्लेशात्क्लेशंभयाद्भयम्।
मृतेभ्य,प्रमृतायान्तिदरिद्राःपापकर्मिणः ॥18॥
गतिंनानाविधाँयान्तिजन्तवः कर्मबन्धनात्।
उत्सवादुत्सं यान्तिस्वर्गान्स्त्रर्गंसुखात्सुखम्॥19॥
-मार्कंडेय पुराण (कर्मफल)
अपने किये हुए पाप अथवा पुण्य के फल मनुष्यों को भोगने ही पड़ते हैं। भोगने से ही कर्मफल भुगता जाता है। भोगे बिना कोई रास्ता नहीं, भोग बिना शुद्धि नहीं होती और तभी कर्म बन्धन से छुटकारा मिलता है।
जो पापी हैं वे दरिद्र होते हैं। क्लेश, भय और संकट, संतापों से घिरे रहते हैं और बेमौत मरते हैं। पुण्यात्माओं के उनके शुभ कर्मों के सत्परिणाम अनेक सुख-साधनों के रूप में उपस्थित होते रहते हैं।
आधिक्षयेणाधिभवाः क्षीयन्ते व्याधयोऽप्यलम्।
शुद्धया पुण्यया साधे क्रियया साधुसेवया॥
मनः प्रयाति नैर्मल्यं निकषेणेव काञ्चनम्।
आनन्दो वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राधव॥
सत्वशुद्धया वहन्त्येते क्रमेण प्राणवायवः।
जरयन्ति तथान्नानि व्याधिस्तेन विनश्यति॥
-योग वशिष्ठ
शरीर के रोग ‘व्याधि’ और मन के रोग ‘आधि’ कहलाते हैं। इन दोनों के उत्पन्न होने का कारण विवेक की कमी और मूर्खता की प्रबलता ही है।
जब अविवेक के कारण मनुष्य का मन बेकाबू हो जाता है तो नाना प्रकार की तीव्र साधनाएं उठती हैं। उन्हें पूरा करने के लिये अखाद्य खाता है, अगम्य गमन (अनुचित काम सेवन) करता है। अनियमितता और अस्त-व्यस्तता बरतता है, दुष्ट संग करता है और मस्तिष्क में बुरे विचार भरे रहता है।
इससे उसकी नाड़ियाँ शिथिल हो जाती हैं, अंग काम करना छोड़ देते हैं। प्राण शक्ति का सञ्चार अस्त-व्यस्त हो जाता है। इन परिस्थितियों में शरीर की स्थिति गड़बड़ा जाती है और नाना प्रकार के दुखदायक रोग उत्पन्न होते हैं।
मानसिक विकारों से शरीर रुग्ण होता है। उन विकारों के दूर होने से शरीर निरोग हो जाता है।
पादन्यासकृतंदुःखंकण्टकोत्थंप्रयच्छति।
तत्प्रभूततरस्थूलशकुकीलकसम्भवम् ॥25॥
खंयच्छतितद्बच्चशिरोरोगादिदुःसहम्।
अपथ्याशनशीतोष्णश्रमतापादिकारकम् ॥26॥
-मार्कण्डेय पुराण (कर्मफल)
पैर में काँटा लगने पर तो एक ही जगह पीड़ा होती है पर पाप कर्मों के फल से तो शरीर और मन में निरन्तर शूल उत्पन्न होते रहते हैं।
पापों कर्मों के फलस्वरूप अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। शस्त्र पीड़ा, अग्नि दाह, रोग बन्धन आदि अगणित प्रकार के अप्रत्याशित दुःख सामने आ खड़े होते हैं।
जो कर्म इस जन्म में फल नहीं दे पाते वे आगे के लिए जीव के साथ जाते हैं। मरणोत्तर जीवन में नरक के रूप में अथवा नीच योनियों की स्थिति में जाकर मनुष्य दुष्कर्मों का फल भोगता है और सत्कर्मों के लिये उसे स्वर्ग एवं देव योनियों का आनन्द मिलता है। नशा पीने के कुछ देर बाद खुमारी आती है। इसी प्रकार कर्म का फल मिलने में कभी-कभी कुछ देर लग जाती है। देरी होने से छुटकारा जैसी बात नहीं सोचनी चाहिए। मरण होने के उपरान्त भी कर्म साथ जाते हैं और अपना फल देते हैं। इस सम्बन्ध में शास्त्र का अभिमत इस प्रकार है-
न तेऽत्र प्राणिनः संति ये न याँति यमक्षयमँ
अवश्यं हि कृतं भोक्तव्यं तद्विधारितम् ॥4॥
-भाव्य
यहाँ पर ऐसे कोई भी प्राणी नहीं हैं जो यमराज के घर में नहीं जाते हैं अर्थात् एक बार तो यहाँ सभी प्राणियों को जाना ही पड़ता है। उनका जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह अवश्य ही उन्हें भोगना ही पड़ता है।
न केचित्प्राणिनः सन्ति ये न यान्ति यमक्षयम्।
अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यं तद्विचार्य्यताम्॥
-शिव पुराण
अपना किया हुआ कर्म सभी को अवश्य ही भोगना पड़ता है। इसलिये ऐसे कोई भी प्राणी नहीं हैं जो यमराज के लोक को नहीं जाते हैं। शुभ-अशुभ कर्मों का निर्णय वहाँ पर ही होता है।
इदानीं कि प्रलप्यध्वं पीड़यमानाः स्वकर्मभिः।
भुज्यताँ स्वानि कर्माणि नास्ति दोषो ही कस्यचित्॥
शिव पुराण
यमदूतों ने पाप कर्मियों से कहा- इस समय तुम अपने ही कर्मों से उत्पीड़ित होते हुए क्यों रोते चिल्लाते हो? अब कर्मों के फलों को भोगो, इसमें अन्य किसी का कुछ भी दोष नहीं है।
स्वमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धास्यन्ति धावतः।
तत्र पापक्षयात्पापा नराः कर्मानुरूपतः॥
-शिवपुराण
धातुओं के मैल को हटाने के लिए जैसे उन्हें तीक्ष्ण अग्नि में रखते हैं उसी तरह पापी प्राणियों को पाप-नाश के उद्देश्य से ही अपने कर्मों के अनुसार ही नरकों में गिराया जाता है।
कलौ प्रेतत्वामप्नोति ताक्ष्याशुद्ध क्रिया परः।
रुतादौ द्वापरं यावन्न प्रेतौ नैव पीडनम्॥
-गरुड़ पुराण
कलियुग में मनुष्यों के रहन-सहन के अशुद्ध हो जाने से वे प्रेतत्व को प्राप्त होते हैं। सतयुग, द्वापर आदि में न कोई प्रेत बनता था न किसी की प्रेत सम्बन्धी पीड़ा होती थी।
यौनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्ये ऽनसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥
-गरुड़ पुराण
जिसने श्रवण-मनन द्वारा जैसा मनोभाव प्राप्त किया है उसी के आधार पर अपने-अपने कर्मों के अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्ष लता पर्वत आदि स्थलों पर पदार्थों के रूप को ग्रहण कर लेते हैं।
ज्ञानिनस्तु सदा मुक्ता स्वरूपानुभवेन हि।
अतस्ते पुत्र दत्तानाँ पिण्डानाँ नैव काँक्षिणः॥
-महाभारत
“ज्ञानी मनुष्य तो अपने सच्चे स्वरूप को समझकर और तद्नुसार आचरण करके सदा ही मुक्त होते हैं। उनको पुत्रों द्वारा किये गये पिण्डों की आकाँक्षा कभी नहीं होती है।”
यमनियमविधूतकल्मषाणामनुदिनमच्युत-सक्तमानसानाम्।
अपगतमदमानमत्सराणाँ त्यज भट दूर-तरेण मानवानाम्॥26॥
-विष्णु पुराण
जिनके पाप समूह यम नियमों के पालन से नष्ट हो गये हैं। जिन्होंने मत्सर ओर अहंकार छोड़ दिया है। उन सच्चे भगवत् भक्तों को हे यमराज नरक में मत ले जाना।
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयन्तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयन्तस्माद्विमुच्यते ॥9॥
-चाणक्य
जीव आप ही कर्म करता है, उसका फल भी आप ही भोगता है, आप ही संसार में भ्रमण करता है; और आप ही उससे मुक्त भी होता है इसमें उसका कोई साक्षी नहीं।
भगवान राम और कृष्ण कर्मफल भोग से न बच सके। वे अपने सम्बन्धियों को भी कर्मफल के प्रभाव से न बचा सके। बालि को छिपकर तीर मारने का फल राम को कृष्ण जन्म में मिला। बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारा और वे स्वर्गवासी हुए। राम के पिता को श्रवणकुमार का वध करने का प्रतिफल पुत्र शोक में प्राण त्यागने के रूप में मिला। कृष्ण अपने सखा अर्जुन को अभिमन्यु मरण के कारण उत्पन्न दुख से न बचा सके, कर्मफल अवश्यंभावी है।
जो मनुष्य अधिकारी व्यक्ति के सामने स्वेच्छापूर्वक अपने दोष शुद्ध हृदय से कह देता है, और फिर कभी न करने की प्रतिज्ञा करता है, वह मानो शुद्धतम प्रायश्चित करता है।
-महात्मा गाँधी
यह आशा करना बाल बुद्धि है कि छुट-पुट धार्मिक कर्मकांडों से, या क्षमा-प्रार्थना से पाप दूर हो जायेंगे। इतने सस्ते में यदि कर्मफल छूट जाया करते तब तो उनसे डरने की कोई बात न थी। ऐसा तो कोई भी कर लिया करे और कम दण्ड से बच जाया करे फिर इस विश्व में व्यवस्था क्या रहेगी। भगवान न्यायकारी कहाँ रहेगा। कर्मफल की अनिवार्यता का समर्थन शास्त्रों में पग-पग पर मिलता है-
यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम।
अवश्य तत् समाप्नोति पुरुषों नात्र संशय॥5॥
मनुष्य जो शुभ या अशुभ करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।
ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति।
यदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुदृश्योत्सृष्टवाणवत् ॥53॥
-अक्ष्युपनिषद 2।53
ज्ञान का उदय हो जाने पर भी पूर्वकृत कर्मों के प्रारब्ध भोग तो भोगने ही पड़ते हैं। उनका नाश नहीं होता। धनुष से छूटा हुआ तीर प्रहार करता ही है।
फिर क्या कर्मफल से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं है? है- और वह केवल एक ही है- प्रायश्चित्य। प्रायश्चित्य का अर्थ है- पाप का दण्ड स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार कर लेना। पुण्य से पाप को तोल कर बराबर कर देना। समाज को जो क्षति पहुंचाई है उसे पूरी कर देना, आत्मा पर जितना मैल चढ़ाया है उतना ही तप रूपी साबुन घिसकर उस मलीनता को स्वच्छ कर देना।
यह प्रयोजन यदि इसी जीवन में पूर्ण किया जा सके। यदि अपने इस जीवन के दुष्कर्मों को स्मरण कर उनका प्रायश्चित्य विधान इसी जन्म में पूरा कर लें तो भविष्य को अन्धकारमय होने से बचा सकते हैं। पापों का आच्छादन ही ईश्वर का प्रकाश हम तक पहुँचने देने में- आत्मबल के अभिवर्धन में- प्रधान रूप से बाधक होता है। यह बाधा प्रायश्चित्य प्रक्रिया से ही हट सकती है। आध्यात्मिक साधनाओं की सफलता के लिए तो सबसे प्रथम यही प्रयोग करना चाहिए। कपड़े को रंगने से पहले उसे धोना पड़ता है। ईश्वरीय रंग में आत्मा को रंगने से पूर्व प्रायश्चित्य रूपी भट्टी पर पहले उसके कषाय-कल्मषों को ही स्वच्छ किया जाना चाहिए।
सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को भलीभाँति समझता था। उसके दोनों नेत्र अच्छी वस्तुओं को देखने में ही व्यस्त रहते। किसी रमणी को देखता तो उसके मन में माता और बहन के भाव आते और मस्तक श्रद्धा से झुक जाता।
कान ईश्वर गुणगान तथा अच्छी बातें सुनने के ही अभ्यस्त थे। किसी की आलोचना सुनने का अवसर आता तो वह स्पष्ट कह देता ‘भाई! सर्वगुण सम्पन्न तो केवल ईश्वर होता है। हम लोग मनुष्य हैं,और मनुष्यों से भूल हो जाना स्वाभाविक है। किसी की आलोचना करने से तो अच्छा है अपनी आलोचना स्वयं की जाये अपने को समझने का प्रयत्न किया जाये। आत्मनिरीक्षण की वृत्ति मानवोचित गुणों का विकास करती है।’
और मनुष्य के दोनों हाथ श्रेष्ठ कर्म में रत रहते । गिरे हुये लोगों को उठाना, दूसरों की सहायता करना, दान देना ही मानो हाथों का कर्तव्य हो।
शैतान मन ही मन जलभुन रहा था। उसे अपनी योग्यता दिखाने का अवसर नहीं मिल रहा था अतः वह एक दिन वेश बदलकर गया और बोला ‘विधाता ने तुम्हें दो आँख, दो कान और दो हाथ दिये हैं इसका मतलब यह नहीं कि दोनों अंगों को अनावश्यक कष्ट दिया जाये। क्या तुम एक आँख, एक कान और एक हाथ से काम नहीं कर सकते!’
शैतान को अपनी बात मनुष्य के गले तक उतारने में सफलता मिल गई। मनुष्य भी सोचने लगा बात तो ठीक है और उसने एक ही आँख से देखना, एक कान से सुनना और एक हाथ से काम करना शुरू कर दिया। उसकी एक आँख, एक कान और एक हाथ पूर्ण विश्राम प्राप्त कर सर्वथा आलसी और निष्क्रिय बन गये।
शैतान इसी अवसर की ताक में था, उसने मनुष्य के उन अंगों पर अड्डे जमा लिये जो निष्क्रिय थे। और तभी से मनुष्य की आंखें भले के साथ बुरा भी देखने लगीं कान अच्छी बातों के साथ बुरी बातों, आलोचना तथा गाली सुनने में रस लेने लगे और भी सत् कार्यों के साथ दुष्कर्म करने लगे।
स्वप्न अपने समय की एक वास्तविकता है। उस समय जब कि स्वप्न देखा जाता है मनुष्य वस्तुतः अपने को उसी स्थिति में अनुभव करता है जो घटना क्रम उस समय चल रहा होगा। उससे समुचित रूप से प्रभावित भी होता है। कई बार तो यहाँ तक होता है कि किसी अन्य जीवधारी के रूप में अपने आपको देखा जाये, और उसी जैसी मनःस्थिति में अपने को अनुभव किया जाय, पर ऐसा होता कभी-कभी ही है। साधारणतया कलेवर कुछ भी बदल जाय, चेतना मनुष्य जैसी ही रहती है। इससे भी अधिक मात्रा ऐसे स्वप्नों की रहती है जिसमें अपनी तो वर्तमान शारीरिक, मानसिक स्थिति ही बनी रहे, किन्तु दृश्य ऐसे उपस्थित हों जिनका तात्कालिक स्थिति के साथ सीधा ताल-मेल बैठता हो।
वेदान्त ने जीवन को ही स्वप्न कहा है। मरणोत्तर जीवन में पहुँचकर हम वर्तमान जन्म को एक स्वप्न ही अनुभव करेंगे। जब तक जीवित हैं तब तक पता नहीं चलता पर मृत्यु के उपरान्त जब दूरगामी दृष्टि खुलती है तब प्रतीत होता है कि वह एक ही जन्म नहीं लिया गया वरन् ऐसे-ऐसे असंख्य जन्म-असंख्य योनियों में लिये जा चुके हैं। अगणित स्वजन, सम्बन्धी मिले और बिछुड़ चुके हैं। अनेक बार कमाया, जमा किया और दूसरों के लिये छोड़ा है। उस स्तर का विचार अपने आज के जीवन को एक स्वप्न के अतिरिक्त और क्या समझेगा? आत्मज्ञान होने पर भी वही स्थिति हो जाती है। मृत्यु के उपरान्त बहुत आगे और बहुत पीछे की बात देख समझ सकने वाली जो दृष्टि खुलती है, वही चेतना आदि जीवन काल में विकसित हो जाये और जीवन को स्वप्न अथवा धरोहर माना जाने लगे तो समझना चाहिए महान जागरण उपलब्ध हुआ। इसी को अज्ञानान्धकार से छुटकारा पाना अथवा भव बन्धनों से मुक्ति कहते हैं। तत्व ज्ञान की दृष्टि से जीवन एक बड़ा स्वप्न भर है।
जिस तरह यह स्थूल जीवन अनेक ज्ञान-विज्ञान की जटिलताओं से भरा है उसी तरह हमारा सूक्ष्म जीवन-सूक्ष्म शरीर अनेकों रहस्यों से ओत-प्रोत है। स्वप्नों का संसार ऐसा ही जटिल और उलझा हुआ है जैसा कि स्थूल जीवन। हमें जिन्दगी की समस्याएं सुलझाने के लिये संसार क्षेत्र में विचरण करना पड़ता है। अंतर्जगत की गुत्थियों का हल हमें स्वप्नों की भूल-भुलैयों में प्रवेश करके जानना और समझना सम्भव हो सकता है। प्राचीन काल में इस विद्या का बहुत विकास हुआ था, ऐसे अनेक मनीषी मौजूद थे जो स्वप्नों को ध्यानपूर्वक सुनकर उनमें सन्निहित शारीरिक एवं मानसिक तथ्यों का निरूपण करते थे। उन स्वप्नों को त्रिकाल दर्शन की विद्या कह सकते हैं। भूतकाल की स्मृतियाँ- वर्तमान की परिस्थितियाँ और भावी सम्भावनायें, स्वप्नों का विश्लेषण करके जान सकना सम्भव है।
देखते समय सपना सच लगता हो ऐसी ही बात नहीं है। वह वस्तुतः होता भी सच है। अगर केवल इतना ही है कि वह अलंकारिक रूप धारण करके सामने आते हैं और अपने रहस्यों को पर्दे में छिपाये रहते हैं। भूमि और अन्तरिक्ष में छिपी पड़ी अनेक सम्पदाओं और शक्तियों की तरह स्वप्नों की रहस्यवादिता भी हमारे लिये एक चुनौती है, जो शोध और श्रम की अपेक्षा करती है। जो उन्हें समझ सके वह अपनी ही नहीं- संसार की वर्तमान एवं भावी स्थिति से बहुत कुछ परिचित हो सकता है।
बुखार जाने से पहले अंगड़ाई आने लगती है। कै होने से पहले जी मिचलाता है, फल आने से पहले फूल आता है। प्रसव होने से पहले पेट दर्द होता है यह पूर्वाभास है। कोई घटना अपने दृश्य में आने से पहले ही अन्तरिक्ष में विकसित होने लगती है। शरीर यकायक ही बीमार नहीं हो जाता रोग कीटाणु काफी समय पहले देह में प्रवेश कर चुके होते हैं। भले ही सामान्य व्यक्ति को ज्ञान न हो पर विशेषज्ञ रक्त आदि की परीक्षा कर उस सम्भावित रोग के कुछ ही समय में प्रकट होने की पूर्व घोषणा कर सकते हैं। अस्त-व्यस्त स्वभाव के व्यक्ति के सम्बन्ध में यह भविष्यवाणी सहज ही की जा सकती है कि वह असफल रहेगा। चोर और डाकुओं में से अधिकाँश को जेल भुगतनी पड़ती है। इन कार्यों में लगे हुए व्यक्तियों के अन्धकार भरे भविष्य की यदि कोई भविष्यवाणी करता है तो सम्भावना यही रही है कि यह पूर्व कथन प्रायः सही ही निकलेगा।
सटोरियों का व्यवसाय आर्थिक सम्भावनाओं के सही अन्दाज लगाने पर ही निर्भर रहता है। दूरदर्शी राजनीतिज्ञ भावी राजनैतिक हलचलों का बहुत कुछ अनुमान लगा लेते हैं। पैनी दृष्टि और तीखी सूझबूझ वर्तमान घटनाक्रम के आधार पर भावी निष्कर्ष निकालने में प्रायः खरी ही उतरती है। यह स्थूल जगत की बात हुई। ठीक इसी तरह सूक्ष्म जगत में जो होने जा रहा है उसका आधार पहले से ही बन चुका होता है। उसे जो व्यक्ति या मन समझ सके उसके लिए भविष्यवाणियाँ करना- भावी सम्भावनाओं का समझना कुछ कठिन नहीं होता। भविष्य में घटना क्रम की झाँकी करने वाले सपने प्रायः उसी आधार पर आते हैं। अनेक अलौकिकताओं से भरापूरा मानवी अचेतन यदि थोड़ा परिष्कृत हो तो सूक्ष्म जगत में हो रही हलचलों और उनके फलस्वरूप निकट भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास प्राप्त कर सकता है, भविष्यवाणी कर सकता है।
कुछ दिव्य स्वप्न ऐसे भी होते हैं जो भावी घटना क्रम का स्पष्ट संकेत देते हैं। अभी जो सपना देखा गया- वह उस समय तो अटपटा और असम्भव लगता था पर कुछ ही समय में यह आश्चर्यपूर्वक देखा गया कि वह स्वप्न में देखा गया दृश्य आगे चलकर एक वास्तविकता बन गया। ऐसा वर्तमान स्थिति के बारे में भी होता है। दूरस्थ दो व्यक्ति यदि उनमें घनिष्ठता और आत्मीयता की समुचित मात्रा विद्यमान हो तो ऐसे आत्मीय बिना किसी पत्र, तार या सन्देश के अनायास ही पारस्परिक स्थिति जान लेते हैं। मृत्यु या आपत्ति जैसी अधिक महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में तो ऐसे आभास और भी अधिक सच निकलते हैं।
ऐसे पूर्वाभास वाले सपने प्रायः रात्रि के अन्तिम प्रहर में ही आते हैं। तब तक शारीरिक, मानसिक थकान दूर हो लेती है। ब्रह्ममुहूर्त की प्रभातकालीन ब्रह्मचेतना जीवन दायिनी वायु के साथ-साथ अदृश्य जगत की सूचनाओं का प्रवाह भी साथ ही लिये फिरती है। जिनका मन अपेक्षाकृत अधिक निर्मल है वे प्रायः ऐसे संकेतों को अनायास अनुभूतियों में अथवा स्वप्न संकेतों के रूप में समझ लेते हैं। जिन लोगों के बीच गहरी घनिष्ठता है उनकी तात्कालिक स्थिति का विवरण अपने मनोदर्पण में दूरदर्शी टेलीविजन की तरह देखा और दूरभाषी टेलीफोन की तरह सुना जा सकता है। उस प्रकार के यथार्थ परिचय संकेत देने वाले स्वप्नों को दिव्य कहा जा सकता है।
सच होने वाले सपनों की संख्या कम नहीं है। ऐसी घटनाएं समस्त विश्व में देखने, सुनने को मिल सकती हैं जिनसे सिद्ध होता है स्वप्न मन का विनोद ही नहीं वरन् उनमें भवितव्यताओं के संकेत भी रहते हैं।
स्वप्नों में मिले आभास की सत्यता सिद्ध करने वाले अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।
जो सोचता है, धन से सब कुछ किया जा सकता है। उस पर सन्देह किया जाना चाहिये कि यह धन के लिये कुछ भी कर सकता है।
-गेटे
लन्दन के एक नागरिक ए. जेरमन ने 10 नवम्बर 1974 की रात को सपना देखा कि लेसिस्टर नामक स्थान में होने वाली घुड़दौड़ में (टुवेन्टी-टुवेन्टी) घोड़ा जीतने वाला है। वह सवेरे उठते ही घुड़दौड़ की इनामी टिकट बेचने वाली केम्वल कम्पनी के डायरेक्टर श्री एम.वी. केम्वेल से मिले और बीस नंबर के घोड़े पर दाँव लगाने के लिये उन्हें धन प्रस्तुत किया।
वास्तव में इतने घोड़े दौड़ने वाले नहीं थे। उन्होंने कह दिया बीस नम्बर का घोड़ा कोई नहीं है। निराश जेरमन अपना धन वापिस लेकर लौट आये।
घुड़दौड़ यथासमय हुई और 17 नवम्बर के अखबारों में छपा कि- ‘टुवेन्टी-टुवेन्टी’ नामक घोड़ा जीता और उस पर दाँव लगाने वालों को पुरस्कार मिले।
जेरमन सिर धुन कर रह गया। उसने सपने के शब्दों को यथावत् न समझकर उसका अर्थ न समझकर उसका अर्थ ‘बीस’ लगाया और इस नम्बर को तलाश करने के चक्कर में घूमता रहा।
पैसा तो उसे नहीं मिला पर सपने की यथार्थता को प्रमाणित करते हुए केम्वेल कम्पनी ने यह प्रकाशित कराया कि वस्तुतः जेरमन का सपना सही था और उसने उस नम्बर के बारे में बहुत पूछ-ताछ और बहुत झंझट किया था। पर घोड़े के नाम और नम्बर का भ्रम खड़ा हो जाने से उसे टिकट प्राप्त न हो सका।
स्काटलैंड के एडेन स्मिथ नामक किशोर को एक सपना कई बार आया कि उसके मकान के देहरी के सामने सत्रहवीं शताब्दी में पहने जाने वाले पोशाक पहने हुए कोई व्यक्ति खुदाई करता है। लड़के ने अपने घर में यह बात कही ‘खुदाई’ कराई गई तो वहाँ ताँबे के एक बर्तन में 80 स्वर्ण मुद्रायें निकली जो सत्रहवीं शताब्दी की थीं।
स्पेन के एक रेलवे कर्मचारी की तीन लड़कियाँ थी। उनकी माँ उन्हें बहुत चाहती थी और भरपूर प्यार करती थी, परी उन्हें एक बुरा सपना बार-बार दीख पड़ता था कि उनकी माँ डायन हो गई और उन्हें खाने को दौड़ती है। पहले तो वे लड़कियाँ इसे बताने में ही संकोच करती रहीं पर पीछे जब कई बार तीनों ने एक ही सपना देखा एक ही समय देखने लगीं तो वे डर गई और उन्होंने उसकी चर्चा की। ऐसा कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं था, इसलिये उस स्वप्न को निरर्थक एवं ऊटपटाँग माना गया। पर कुछ समय बाद एक विचित्र बात हुई। उनकी माँ पागल हो गई और एक रात उसने सोती हुई तीनों लड़कियों को बुरी तरह घायल कर दिया।
ताशकन्द (रूस) से भेजा श्री उदय कुमार वर्मा का एक समाचार 2 अक्टूबर 66 के धर्मयुग में छपा है। उसमें बताया गया है कि श्री लालबहादुर शास्त्री जिन दिनों ताशकन्द आये थे तब वहाँ की एक ‘दोम अस्पीरान्तीव नामक स्नातकोत्तर छात्रा उन्हें देखने को बहुत उत्सुक थी। भारत के प्रति ही नहीं उसके प्रधानमन्त्री के प्रति भी उसको बहुत दिलचस्पी थी। उसने सपना देखा था कि वह श्मशान में खड़ी है और वहाँ शास्त्री जी का मृत शरीर रखा है। इस सपने को सच मानती थी और कहती थी कि यदि इस बार शास्त्री जी को उसने न देख पाया तो फिर कभी भी वह देख न पायेगी ता. 9 जनवरी 66 को ताशकन्द प्राच्य भाषा संस्थान में शास्त्री जी का भाषण हुआ और वह उन्हें देखकर सन्तुष्ट भी हुई।
उसी ता. 9 की रात को मैंने सपना देखा कि हम लोग शास्त्री जी को हवाई अड्डे पर विदा करने जाते हैं। इतने में यह छात्रा आ जाती है और कहती है शास्त्री जी तो मर चुके। अब मरी देही को विदा करने जाकर क्या करोगे।
ता. 10 को सवेरे वह लड़की फिर मिली। वह हमारी पड़ोसिन ही थी। मैंने उससे कहा- उसकी बात को मेरे अचेतन मन पर बुरा असर पड़ा और मैंने भी रात को तुम्हारे आगमन और शास्त्री जी की मृत्यु का सपना देखा।
ता. 11 को शास्त्री जी काबुल जाने वाले थे। हम ताशकन्द निवासी भारतीय उन्हें विदा करने हवाई अड्डे पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि डॉक्टर पाण्डेय ने आकर शास्त्री जी की मृत्यु का समाचार सुना दिया। सपनों के द्वारा इस प्रकार का अप्रत्याशित पूर्वाभास मिलने की बात ने हमें अचम्भे में डाल दिया।
मादरा (राजस्थान) में कुछ दिन पूर्व खुमान सिंह नामक लड़के की अन्ध विश्वासियों ने देवी पर बलि चढ़ा दी। यह दुर्घटना घटित होने से पूर्व उसकी माँ को यह पूर्वाभास हो रहा था कि उसके लड़के का कुछ अनिष्ट होने वाला है। वस्तु वह उसे काम पर जाने से रोज मना कर रही थी। लड़का मान नहीं रहा था। यद्यपि उसे 62 पैसा प्रतिदिन की मजदूरी मिलती थी फिर इतने पैसे भी उस गरीब परिवार की सहायता में कुछ न कुछ सहायक होते थे। काम पर जाने को माँ हर रोज मना करती थी और लड़का जिद करके जाता था। एक दिन तो माँ ने रोटी बनाने से इन्कार कर दिया तो वह उस दिन अपने हाथ से रोटी बनाकर काम पर गया। 9 दिन की इस माँ बेटे के बीच चली आ रही जद्दोजहद का अन्त तब हुआ जब बालक की बलि चढ़ गई और माँ का वह पूर्वाभास सच हो गया। जिसके अनुसार उसे अपने लड़के का अनिष्ट होना दिखाई पड़ता था।
नन्दगाँव (छतरपुर) निवासी श्री हुकमचन्द एक बार प्रवास में गये और मथुरा में उन्हें सर्प ने डस लिया। रामकृष्ण मिशन अस्पताल वृन्दावन में भरती हुए और पीछे वे अच्छे भी हो गये। इसी बीच उन्होंने एक सपना देखा जिसमें उन्हें एक स्थान पर भगवान पार्श्वनाथ की बहुमूल्य मूर्ति दबी होने का संकेत था।
स्वप्न के अनुरूप स्थान की खोज में वे बहुत दिन घूमते रहे पीछे वह स्थान मिल गया और तीन दिन की खुदाई के बाद वह मूर्ति निकाली गई। उस पर सम्वत् 189 लिखा था इस प्रकार वह लगभग दो हजार वर्ष पुरानी सिद्ध होती है। उसके प्राचीन होने में किसी को सन्देह नहीं था।
मथुरा के पुरातत्व विभाग ने उसे अपने कब्जे में ले लिया। पीछे राज्य सरकार की अनुमति से जुलाई सन् 62 में जैन समाज को सौंप दिया। यह मूर्ति ‘कसौटी’ पत्थर की बनी हुई और उसका मूल्य एक लाख पच्चीस हजार रुपया आँका गया है।
मूर्तियाँ गाढ़कर उसे सपने का संकेत बताकर खुदवाने और पीछे उस मूर्ति को चमत्कारी बताकर मन्दिर बनवाने तथा अन्य लाभ उठाने की जालसाजियाँ भी खूब चलती है फिर इस मूर्ति के बारे में वैसी बात नहीं हो सकती। इतनी बहुमूल्य और इतनी प्राचीन मूर्ति को प्राप्त करना और गाढ़ना कठिन है। फिर स्वप्न दृष्टा ने इसके लिये अलग मन्दिर न बनाकर मथुरा के चौरासी तीर्थ में ही स्थापित करा दिया।
इसका अर्थ यह न समझा जाय कि हर सपना सही ही होता है। उनमें से अधिकाँश असत्य निकलते हैं। कुछ समय पूर्व शोलपुर में एक कपड़े के व्यापारी ने स्वप्न देखा कि उसके मकान के नीचे विपुल सम्पदा दबी पड़ी है। उसने उसे सच माना और मकान का आँगन गहरा खुदवा डाला। खजाना तो नहीं मिला पर मकान गिर पड़ा और उसका मलबा उस खुदे हुए गड्ढे में समा गया। व्यापारी के हाथ पछतावे के अतिरिक्त और कुछ न लगा।
कहा जा चुका है कि अधिकाँश स्वप्न अलंकारिक और साँकेतिक भाषा में होते हैं, उनके रहस्यों को जानने के लिए स्वप्न विज्ञान के स्वतन्त्र विकास की आवश्यकता है। ज्यों के त्यों सही निकलने वाले सपने तो बहुत ही कम होते हैं।
स्वप्न विश्लेषण विद्या अध्यात्म विज्ञान का महत्व पूर्ण अंग है, यदि उसका विकास किया जा सके तो मनुष्य की अतींद्रिय चेतना के विकास में भारी सहायता मिल सकती है और उन रहस्यमय जानकारियों से अवगत हुआ जा सकता है जो मनुष्य के लिये हर दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
एक कुष्ठी भिक्षा माँग रहा था। उधर से जो कोई निकलता कुष्ठी अपना हाथ फैलाकर कहता ‘जो दे उसका भला और न दे उसका भी भला’। पाश्चात्य वेशभूषा से सज्जित एक युवक ने दो पैसे का सिक्का उसके हाथ पर डालते हुये पूछा- ‘क्यों भाई! तुम्हारा पूरा शरीर गला जा रहा है। हाथ और पैर की अंगुलियाँ तक अब ऐसी नहीं रही जो कुछ कार्य कर सकें। फिर इस कष्ट का जीवन जीने से क्या लाभ? यह तो जीवित अवस्था में भी लाश ढोने जैसी स्थिति है।’
कुष्ठी ने कहा- ‘मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो और कभी-कभी मेरे मन में भी इस प्रकार का प्रश्न उठता है, पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर इसलिये जीवित रखे हुये है कि लोग कम से कम मुझे देखकर यह समझ सकें मूर्ख, इस संसार में कभी तू भी मेरे जैसा हो सकता है अतः संसार में काया की सुन्दरता का घमण्ड करने से कोई लाभ नहीं है।’
मोटे तौर पर मनुष्य शरीर पंच तत्वों का -सप्त धातुओं का बना परिलक्षित होता है। अन्न जल पर उसका निर्वाह चलता प्रतीत होता है पर यदि तात्विक सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो उसमें विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त समस्त जड़ चेतना शक्तियों के बीज विद्यमान दिखाई देंगे। जो कुछ इस विराट् विश्व में है उसका छोटा रूप अपने भीतर बहुत ही सुव्यवस्थित रीति से सँजोया हुआ है। यदि उन बीजों का ठीक तरह सिंचन पोषण किया जा सके तो उसका विस्तार इतने बड़े विशाल वृक्ष के रूप में हो सकता है कि आश्चर्य चकित रह जाना पड़े।
अपने भीतर सभी देवता, सभी दिव्य लोक, सभी सिद्ध पुरुष, सभी ऋषि, सभी तीर्थ, सभी सिद्धियाँ तथा जो कुछ श्रेष्ठ उत्कृष्ट है उसके अंकुर यथास्थान बोये उगाये हुए मौजूद हैं। आवश्यक केवल उनमें खाद पानी देने की, अनुकूलता प्रस्तुत करने की है। देखते देखते वे विकसित, पल्लवित और फल-फूलों से सुसज्जित हो सकते हैं।
साधना का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना ही है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी देव शक्तियाँ विद्यमान हैं पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्य क्षेत्र नियत रहता है। व्यक्ति की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने- सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान हैं। सूर्य का अंश आँख में मौजूद है। यदि आंखें सही हों तो ही विराट् सूर्य के प्रकाश से लाभ उठाया जा सकता है। अपने कान ठीक हों तो ही बाहर के ध्वनि प्रवाह की कुछ उपयोगिता है। इसी प्रकार अपने भीतर के देव बीज यदि विकसित परिष्कृत हों तो उनके माध्यम से विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोड़ना, आकर्षित करना और उनका सहयोग अनुग्रह प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।
कुण्डलिनी जागरण की साधना पद्धति का प्रयोजन अपने भीतर के देव अंशों को विकसित और परिपुष्टि बनाना है। कैलाश पर्वत पर सर्पों का यज्ञोपवीत धारण करके विराजमान शिव और क्षीर सागर में शेष नाग पर सोये हुए विष्णु का बीजाँश हमारे मस्तिष्क मध्य केन्द्र-ब्रह्मरंध्र में यथावत् विद्यमान है। इस स्थान को ‘सहस्रार’ कहते हैं। महाकाली-अग्नि जिह्वा चामुण्डा का बीजाँश जननेन्द्रिय गह्वर-’मूलाधार’ में विद्यमान है। इन दो शक्तियों के असम्बन्ध बने रहने पर केवल उनकी उपस्थिति का आभास मात्र ही होता है पर जब उन दोनों का संगम समागम हो जाता है तो अजस्र शक्ति की एक ऐसी धारा प्रवाहित हो उठती है जिसे अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता है।
जब वर्षा ऋतु आती है तो सूखे बीहड़ भी हरियाली से भर जाते हैं। ग्रीष्म ऋतु में जिनका कोई अस्तित्व दृष्टि गोचर नहीं होता था, ऐसे दबे हुए बीज भी उपज पड़ते हैं और ऐसा लगता है कि मानो किसी चतुर माली ने विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ, पुष्प गुल्म, लता वल्लरियाँ विधिवत आरोपित की हैं। कुण्डलिनी साधना की सफलता को पावस का आगमन कह सकते हैं। मनुष्य शरीर एक विशाल उर्वर भूखण्ड कहा जा सकता है। इसमें एक से एक बहुमूल्य बीज दबे पड़े हैं। वर्षा न होने तक उनका अस्तित्व छिपा पड़ा था पर जैसे ही पानी बरसा कि वे सभी प्रकट होकर अपनी शोभा सुषमा दिखाने लगते हैं। साधारणतया जिन विशेषताओं और विभूतियों का किसी को भान भी नहीं होता वे इस पावस में अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगते हैं।
आत्म वेत्ताओं ने मानव काया के तीन परतों में- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में एक से एक अद्भुत देवाँश खोजा है। शक्ति बीजों की प्रचुर मात्रा उन्हें दृष्टि-गोचर हुई है। विराट् में सन्निहित सब कुछ उन्होंने इसी छोटे से कलेवर में सारभूत विद्यमान पाया है। इसलिए उन्होंने अपने अन्तरंग में ही देव साधना का विधान अधिक महत्वपूर्ण माना है। यों देव मन्दिरों में तथा लोक-लोकान्तरों में भी देव शक्तियाँ संव्याप्त हैं, पर जितनी समीप और जितनी सजीव अपने अन्तरंग में हैं-उतनी अन्यत्र नहीं। जितनी सुविधापूर्वक उन्हें अपने भीतर पाया जा सकता है-उतनी सरलता और सफलता अन्यत्र नहीं मिल सकती। कुण्डलिनी विद्या की साधना अन्तरंग क्षेत्र में ही करनी पड़ती है और उसकी सफलता जब मेघ मालाओं की तरह बरसती है तो अगणित दिव्य विभूतियाँ स्वयमेव प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं। अन्तरंग में कहाँ क्या है इसका वर्णन देखिए-
देहेऽस्मिन् वर्तते मेरुः सप्तद्वीपसमन्वितः।
सरितः सागराः शैला क्षेत्राणि क्षेत्रपालकाः॥
ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा।
पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्तन्ते पीठदेवता॥
-शिव संहिता 2।1।2
इसी शरीर में सुमेरु, सप्तद्वीप तथा समस्त सरिताएं, सागर, पर्वत, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि, मुनि, नक्षत्र, ग्रह, तीर्थ, पीठ, देवता, निवास करते हैं।
अस्थिस्थाने महेशानि जम्बुद्वीपो व्यवस्थितः।
माँसेषु च कुशद्वीपः क्रौञ्चद्वीपः शिरासु च॥
शाकद्वीपः स्मृतो रक्ते प्राणिनाँ सर्वसन्धिषुँ।
तदूर्ध्वं शाल्मलीद्वीपः प्लक्षश्च लोमसञ्चये॥
नाभौ च पुष्करद्वीपः सागरस्तदनन्तरम्।
लवणोदस्तथा मूत्रे शुक्रे क्षीरोदसागरः॥
मन्जा दधिसमुद्रश्च तदूर्ध्वं घृतसागरः।
वसापः सागरः प्रोक्त इक्षु स्यात्कटिशोणितम्॥
शोणिते च सुरासिन्धुः कथिताः सप्तसागराः।
-महायोग विज्ञान
अस्थि स्थान में जम्बूद्वीप, माँस में कुश द्वीप, शिराओं में क्रौञ्च द्वीप, रक्त में शाक द्वीप, त्वचा में शल्मिली द्वीप, लोभ समूह में प्लक्ष द्वीप, नाभि में पुष्कर यह सातों द्वीप इस शरीर में ही विद्यमान है।
इसी प्रकार इस काया में सात समुद्र भी हैं। मूत्र में लवण सागर, शुक्र में क्षीर सागर, मज्जा में दधि सागर, मेद में घृत सागर, नाभि में इक्षु सागर, रक्त में सुरा सागर अवस्थित हैं।
श्री पर्वतं शिरःस्थाने केदारं तु ललाटके।
वाराणसी महाप्राज्ञ भ्रु वोर्घ्राणस्य मध्यमे॥
कुरुक्षेत्रं कुचस्थाने प्रयागं हृत्सरोरुहे।
चिदम्बरं तु हृन्मध्ये आधारे कमलालयम्॥
आत्मतीर्थं समुत्सृज्य बहिस्तीर्थानि यो ब्रजेत्।
करस्थं स महारत्नं त्वक्त्वा काचं विमार्गते॥
भावतीर्थं परं तीर्थं प्रमाणं सर्वंकर्मसु।
-जावाल दर्शनोपनिषद् 4।48
इसी मनुष्य देह में सात तीर्थ हैं मस्तक में श्री शैल, ललाट में केदार, नासिका और भौंहों के बीच काशी, स्तनों में कुरुक्षेत्र, हृदय में प्रयाग, मूलाधार में कमलालय तीर्थ विद्यमान है। जो इन आत्म तीर्थों को छोड़कर बाह्य तीर्थों में भटकता है, वह रत्न छोड़कर काँच ढूँढ़ते फिरने वालों की तरह है।
गंगा सरस्वती गोदा नर्मदा यमुना तथा।
कावेरी चन्द्र भागा च वितस्ता च इरावती॥
द्विसप्तति सहस्रेषु नदी नद परिस्रवाः।
इतस्ततो देह मध्ये ऋक्षाश्च पंज विंशतिः॥
योगाश्च राशयश्चैव ग्रहाश्च तिथयस्तथा।
करणानि च वाराश्च सर्वेषाँ स्थापनं तथा॥
सर्वांगेषु च देवेशि समग्रमृक्षमण्डलम्।
त्रयास्त्रशत्कोटयस्तु निवसन्ति च देवताः॥
-महायोग विज्ञान
इसी शरीर में समस्त तीर्थ और देवताओं का निवास है। गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, चन्द्रभागा, वितस्ता, इरावती, यह प्रमुख नदियाँ तथा बहत्तर हजार छोटी नदियाँ यह बड़ी और छोटी नदियों के रूप में प्रवाहित हो रही हैं।
ऐसे ही इस शरीर में पन्द्रह तिथियाँ, सात बार, सत्ताईस नक्षत्र, बारह राशि, अट्ठाईस योग, सात करण, नवग्रह उनके उपग्रह, नक्षत्र मंडल तथा तेतीस कोटि देवता इसी शरीर में विराजमान हैं।
चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात्।
कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते॥
-शिव संहिता 4।46
प्राण वायु की ताड़ना से चक्रों के मध्य में अवस्थित देवता जागृत होते हैं और माया कुण्डलिनी कैलाश मस्तक में जा पहुँचती है।
ब्रह्मणो हृदसस्थानं कण्ठे विष्णुः समाश्रितः।
तालुमध्ये स्थितो रुद्रो ललाटस्थो महेश्वरः॥
ब्रह्मा का स्थान हृदय, विष्णु का कण्ठ और रुद्र का तालु में और ललाट में सर्वेश्वर का स्थान है।
मनुष्य के भीतर ही समस्त तीर्थ विद्यमान हैं। यदि कुण्डलिनी विद्या द्वारा आत्म साधना करली जाय तो यह काया ही समस्त तीर्थों का संगम बन सकती है और तीर्थ-यात्रा का जो माहात्म्य बताया है वह अनायास ही मिल सकता है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना की तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की उपमा दी है और पुण्य फल अनन्त बताया है।
इड़ायाँ यमुना देवी पिंगलायाँ सरस्वती।
सुषुम्णायाँ वसद् गंगा तास्तं योगस्त्रिधा भवेत्॥
संगता ध्वज भूले च विमुक्ता भ्रू वियोगतः।
त्रिवेणी योगः संप्रोक्ता तत्र स्नानं महाफलम्॥
-षट्चक्र निरूपणम्
इड़ा नाड़ी यमुना, पिंगला सरस्वती और सुषुम्ना गंगा है। यही योग त्रिवेणी है। उनका मूलाधार से और वियोजन मध्य में होता है। इस योग त्रिवेणी के संगम का महाफल है।
इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी।
इड़ापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्ना च सरस्वती॥
त्रिवेणी संगमो यत्र तीर्थराजः स उच्यते।
तासाँ तु संगमे स्नात्वा धन्यो याति पराँ गतिम्॥
इडासुषुम्णे शुभतीर्थकेऽस्मिन्,
ज्ञानाम्बुपूर्णा बहतः शरीरे॥
ब्रह्माम्बुभिः स्नातितयोः सदा,
यः किन्तस्य गांगैरपि पुष्करैर्वा॥
-महायोग विज्ञान
इड़ा गंगा और पिंगला यमुना के बीच सरस्वती रूपी जो सुषुम्ना बहती है, उनके संगम में स्नान करने वाला धन्य हो जाता है और परमगति पाता है।
इड़ा पिंगला और सुषुम्ना इनका संगम शिव तीर्थ है। इनके ज्ञान रूपी ब्रह्म जल में जो स्नान करते हैं। उनके लिए बाह्य नदी सरोवरों तथा तीर्थों का क्या प्रयोजन?
इड़ा हि पिंगला ख्याता वरणासीति होच्यते।
वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वनाथोऽत्र भाषितः॥
एतत् क्षेत्रस्य माहाम्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।
शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभाषितम्॥
-शिव संहिता 5।126-127
इड़ा नाड़ी को वरणा और पिंगला को असी कहते हैं। इन दोनों के बीच स्वयं विश्वनाथ विराजमान हैं। यही वाराणसी है।
इसी वाराणसी का महात्म्य तत्वदर्शी ऋषियों तथा शास्त्रों ने गाया है और उसे ही परम तत्व कहा है।
आज्ञापंकजदक्षाँसाद्वामनासापुटं गता।
उदग्वहेति तत्रेडा गंगेति समुदाहृता॥
-शिव संहिता 5।232
आज्ञा चक्र के दाहिने भाग में बाई ओर को जाने वाली इड़ा नाड़ी को ही गंगा कहते हैं।
‘कारण शरीर’ का देवता ब्रह्मा-’सूक्ष्म शरीर’ का अधिपति विष्णु और ‘स्थूल शरीर’ का अधिष्ठाता शिव है। यह अधिष्ठाता देव सामान्य व्यक्तियों के जीवन में गाँठ की तरह बँधे हुए एक कोने में पड़े रहते हैं। पर जब कुण्डलिनी जागरण की तीन अग्नियाँ प्रज्वलित होती हैं तो उनका प्रभाव तीनों शरीरों पर पहुँचता है और उनके प्रसुप्त तीनों देवता सजग, सक्षम, सक्रिय होकर अपना प्रकाश एवं प्रभाव प्रदर्शित करने लगते हैं। जिन तीन शरीरों का साधारणतया आभास अनुभव भी नहीं होता वे अपने अधिष्ठाता देवताओं के जागृत होने पर स्थूल शरीर से भी अधिक प्रत्यक्ष एवं समर्थ दिखाई देने लगते हैं। ब्रह्म ग्रन्थि-विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि के खुल जाने से समस्त अभावों और शोक सन्तापों के भव-बन्धनों से भी छुटकारा मिल जाता है और साधक की प्रतिभा में देवत्व का प्रकाश स्पष्ट परिलक्षित होता है।
यह शताब्दियाँ आजादी की शताब्दियाँ कही जा सकती हैं। इन में स्वतन्त्रता प्राप्ति की व्यापक लहर आई और उसे सफलता भी मिली। राजनैतिक क्षेत्र में स्वाधीनता की माँग उभरी, जनता द्वारा, जनता के लिए राज्य का नारा बुलन्द हुआ और वह सफलता के साथ आगे बढ़ता चला गया। अब राजतन्त्र और उपनिवेशवाद अपनी अन्तिम साँस गिन रहे हैं।
सामाजिक क्षेत्र में भी आजादी की लहर रंग लाई। दास दासी प्रथा वंश परम्परा के आधार पर ऊँच नीच की मान्यता, नारी प्रतिबन्धन जैसी अवाँछनीय परम्पराओं से समाज पर लगी कलंक कालिमा घुलती चली जा रही है। आर्थिक साम्राज्यवाद की, पूँजीवाद की जड़ें खोखली हो चली हैं। पूँजी का एकत्रीकरण करके सम्पन्न लोग जनसाधारण का प्रकारान्तर से अपना गुलाम बनाये हुए थे। समाजवादी अर्थ व्यवस्था ने स्थान ग्रहण करके अमीरी का वर्चस्व समाप्त करने में आशाजनक सफलता पाई है। बची खुची परतन्त्राएं निकट भविष्य में समाप्त होने जा रही हैं। स्वतन्त्रता की लहर अभी शिथिल नहीं हुई है उसकी प्रौढ़ता अवशेष बन्धनों को भी मोड़ती ही चली जायेगी। इसे उज्ज्वल भविष्य का शुभ चिन्ह ही कहना चाहिए।
स्वतन्त्रता मानवीय अन्तःकरण की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उसे उसकी प्राप्ति का अवसर मिलना ही चाहिए। इस दिशा में किये गये प्रयत्नों का समर्थन ही किया जाना चाहिए। सराहा ही जाना चाहिए।
पर साथ ही यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि व्यक्ति और समाज में दुष्प्रवृत्तियों की भी कमी नहीं। यदि उन्हें भी स्वतन्त्र कर दिया गया तो यह आजादी बहुत महँगी पड़ेगी। कुत्ता पाला जा सकता है बाँधा नहीं। यदि कुत्ते और बाघ के साथ एक जैसा व्यवहार किया गया, दोनों को भोजन दिया गया और समान रूप से सड़क पर घूमने की स्वतन्त्रता दी गई तो फिर उसका परिणाम घातक सिद्ध होगा।
सद्प्रवृत्तियों को सुविकसित होने के लिए उन्हें फैलने और बढ़ने की, आजादी मिलनी चाहिए पर साथ ही दुष्प्रवृत्तियों का नियन्त्रण और दमन भी उतना ही आवश्यक है। सच तो यह है कि इस नियन्त्रण की आवश्यकता और भी अधिक है क्योंकि व्यक्ति और समाज में बाहुल्य दुष्प्रवृत्तियों का है, सत्प्रवृत्तियों का नहीं।
आजादी का उज्ज्वल पक्ष सबके सामने है। उससे जनता को जो राहत मिली है उस पर हर किसी को संतोष और गर्व हो सकता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन ने एकाधिकार वाद को चुनौती दी और शासन व्यवस्था, सामाजिक उत्पीड़न तथा अर्थपाश से जिस हद तक जन साधारण को त्राण दिलाया उतने अंशों में उसे सराहा ही जायगा और जहाँ अभी भी पराधीनता विद्यमान है वहाँ उस लहर को पहुँचाया ही जायगा।
इस उत्साह के साथ-साथ और भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उस प्रभाव का लाभ उठाकर कहीं अवाँछनीय दुष्प्रवृत्तियाँ ही छुट्टल न हो जायँ। इस संबंध में सतर्कता न बरती गई तो वह स्वतन्त्रता आन्दोलन की सफलता उपलब्ध लाभ को उलटी हानि में बदल देगी।
विचारों की अभिव्यक्ति, लेखन भाषण की स्वतन्त्रता को स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य आधार माना गया है। सो उचित भी है। पर यह छूट अवाँछनीयता को नहीं मिलनी चाहिए जैसी कि इन दिनों मिल रही है। उदाहरण के लिए - लेखन की स्वतंत्रता सामने है। उसने जनता का कितना हित साधन किया इसका लेखा जोखा लिया जाना चाहिए। इसमें से अधिकाँश ऐसा है जो मनुष्य की पशुता को उभारता है, दुष्प्रवृत्तियों को भड़काता है, धूर्तता सिखाता है, भ्रमजंजाल में फँसाता है। इसका परिणाम सामने आ रहा है। लोक चिन्तन का स्तर गिरता चला जा रहा है, सोचने की दिशा विकृत होती चली जा रही है। चारित्रिक स्तर गिर रहा है-गतिविधियों में तेजी से अवांछनीयता प्रवेश कर रही है। पाप पुण्य का जैसा विश्लेषण हमारे साहित्यकार कर रहे हैं इसके आधार पर यह समझा जाने लगा है कि उचित अनुचित का भेद करना निरर्थक है। अपनी सुविधा और रुचि स्वतन्त्रता के आधार पर जो ठीक लगे सो कर गुजरना चाहिए।
लेखन व्यवसाय में संलग्न लोगों का श्रम और चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है क्योंकि प्रकाशन में जिनका पैसा लगता है वे तुरन्त और अच्छा लाभ चाहते हैं। यह तभी संभव है जब लोगों की माँग का शोषण किया जाय। कहना न होगा कि प्रचलित वातावरण में कुरुचि का बढ़ना स्वाभाविक है। कुरुचि को शोषण ही पसन्द किया जा सकता है। उसी की माँग और ख्याति हो सकती है। पूँजीपति के लिए यही रास्ता लाभदायक है कि वह जल्दी और अधिक कमाने के लिए कुरुचिपूर्ण उत्पादन करे। पैसे देकर वह लेखक का श्रम, दिमाग और सहयोग खरीदता है और गाड़ी आगे चल पड़ती है। बाजार में उपलब्ध आज का सारा साहित्य इकट्ठा करके उसका वर्गीकरण किया जाय और उपयोगिता अनुपयोगिता की कसौटी पर कसा जाय; तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि लेखन और प्रकाशन की स्वतन्त्रता का वैसा उपयोग नहीं हुआ जैसा कि होना चाहिए था। यह स्वतंत्रता लाभ कम और हानि अधिक कर रही है, इस निष्कर्ष पर कोई पहुँचता है तो गलत न कहा जा सकेगा। पत्र-पत्रिकाओं के पुस्तकों के माध्यम से इन दिनों जो दिशा जनसाधारण को मिल रही है उस पर संतोष ज्यादा नहीं किया जा सकता है। सुरुचिपूर्ण साहित्य की तुलना में कुरुचिपूर्ण लेखन और प्रकाशन ही बाजी मार रहा है।
विचारों की अभिव्यक्ति का दूसरा माध्यम वाणी है। धार्मिक मंच पर कथा प्रवचनों वाले पंडित बाबाजी जो बकवाद करते रहते हैं उसमें कितना विवेक, कितना सौंदर्य, कितना प्रकाश और कितना तथ्य रहता है उसका विश्लेषण करने पर किसी उत्साहवर्धक नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता। राजनैतिक मंच से अपनी पार्टी के हित को प्रधान रखने वाले धुँआधार भाषण सुनने को मिलते हैं। पिछड़े देश की जनता को जिस राष्ट्रीय कर्तव्य निष्ठा के आरम्भिक शिक्षण की जरूरत है, उसे कौन सिखाता है? भड़काने वाली, विग्रह उत्पन्न करने वाली गरम-गरम स्पीचें कहीं भी सुन लीजिए। सृजनात्मक प्रशिक्षण के अभाव में वक्ताओं की वाणी जनता का कितना हित कर सकती है इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
वाणी का दूसरा क्षेत्र है- रंग मंच। संगीत अभिनय को मनोरंजन की दृष्टि से प्रयोग में लाया जाता है पर उसमें छिपी हुई ऐसी क्षमता भी है जो मस्तिष्क और चरित्र को आश्चर्यजनक रीति से प्रभावित करती है। इसलिए उस अभिव्यक्ति को मात्र मनोरंजन करके महत्वहीन नहीं ठहराया जा सकता। यंत्रीकरण के इस युग में संगीत और अभिनय का केन्द्र ‘सिनेमा’ हो गया है। आठ हजार से अधिक सिनेमा घरों में लगभग डेढ़ करोड़ व्यक्ति हर दिन सिनेमा देखते हैं। उसमें क्या दिखाया सिखाया जाता है - और मनोरंजन के साथ वे दर्शक क्या प्रभाव लेकर लौटते हैं इसकी ओर गंभीरता से ध्यान किया जाना चाहिए। उसमें कितना सुरुचिपूर्ण अंश है और कितना कुरुचिपूर्ण उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। मनोरंजन की उपयोगिता आवश्यकता को समझा जा सकता है पर उसे विषाक्त करने की स्वतंत्रता क्यों मिलनी चाहिए?
जनता यदि इतनी प्रबुद्ध होती कि विष और अमृत का भेद कर सके और हंस की तरह दूध पीने और पानी छोड़ने में प्रवीण रह सके तब तो कहना ही क्या था। तब तो धर्मशास्त्र से लेकर राज्य शासन तक की भी आवश्यकता न पड़ती। जन-मानस की बालक जैसी सुरक्षा करना प्रबुद्ध नेतृत्व का कर्तव्य इसीलिए माना है कि दुष्प्रवृत्तियों के उभरने की परिस्थितियाँ उत्पन्न न होने पावें। रंग मंच में जो कुरुचि घुस पड़ी है उसे प्रस्तुत कर्ताओं की नागरिक स्वतन्त्रता के नाम पर समर्थन किया जाता है। अगले दिनों अश्लीलता का विष और अधिक मात्रा में घुलाने की छूट मिलने जा रही है। इसका प्रभाव मनुष्य की पशु प्रवृत्तियों को और भी अधिक चमकायेगा और उसका फल शारीरिक, और मानसिक विकृतियों के उभार में बेतरह भुगतना पड़ेगा। अभिव्यक्तियों की स्वतन्त्रता यदि इस प्रकार के अनर्थ संजोने लगे तो उससे वह नियन्त्रण बन्धन क्या बुरा है जो पराधीनता की स्थिति पैदा करके अवाँछनीय अभिव्यक्तियों को कड़ाई के साथ रोक दे।
मनुष्य को भौतिक अधिकारों के नाम पर न जाने क्या-क्या करने की छूट मिल चुकी और भविष्य में न जाने आगे वह और क्या-क्या करके रहेगा। हिप्पी संस्कृति इसी उच्छृंखल स्वाधीनता की परिणति है जहाँ तहाँ नवयुवक भोंड़े वेशभूषा बनाये नशे में धुत्त, शील और मर्यादाओं के घोर विरोधी बने हुए जहाँ तहाँ निरुद्देश्य घूमते दिखाई पड़ते हैं। इन्हें कुछ सिरफिरे लोग नहीं मान लेना चाहिए। यह एक संस्कृति है जो नई पीढ़ी के मस्तिष्कों पर ग्रहण की तरह आच्छादित होती चली जा रही है। स्वतन्त्रता तो पूरी स्वतन्त्रता। समाज नीति, धर्म, कर्तव्य, कानून, लोक-परलोक सभी से स्वतन्त्रता। बन्धन तोड़ने तो फिर पूरे तोड़ने। आजादी तो फिर पूरी आजादी। दाम्पत्य जीवन, परिवार व्यवस्था, योनि सदाचार जैसी परम्पराओं को पाश्चात्य देशों ने तिलांजलि दे दी है। गम गलत करने के लिए नशे के देवता की आराधना शुरू की है। अपराधों की स्वतंत्रता के लिए कदम बढ़ाये हैं। आरम्भ सभ्य लोगों ने किया है तो उसका अनुकरण कुछ दिन में असभ्य भी करने ही लगेंगे। प्रभाव डालने के सारे साधन जब ‘सभ्य’ लोगों के हाथों में चले गये तो ‘असभ्य’ लोगों को बौद्धिक पराधीनता की जंजीरों में जकड़े हुए उनके पीछे-पीछे चलना ही पड़ेगा।
अभिव्यक्तियों के प्रकटीकरण की स्वाधीनता उचित है। लेखनी वाणी का स्वेच्छापूर्वक उपयोग किया जाय सो ठीक है। पर अभिव्यक्तियों को असामाजिक उच्छृंखल नहीं होने देना चाहिए।
व्यक्तिगत जीवन में स्वेच्छापूर्वक गति विधियाँ अपनाने की छूट का समर्थन किया जाना चाहिए पर वह एक सीमा तक। व्यक्ति एकाकी नहीं है। उसका व्यक्तिगत जीवन भी समाज को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकता। व्यसन, व्यभिचार, नशे बाजी, उद्धत रहन सहन जैसी कुरुचिपूर्ण की छूट आज व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर मिली हुई है, सो लोग उसका पूरा-पूरा उपयोग कर रहे हैं क्या इसका प्रभाव उनके परिवार पर नहीं पड़ता? समाज की यह गतिविधियाँ बिना प्रभावित किये रहती हैं क्या? यह लक्ष्य समझा ही जाना चाहिए और इस समस्या पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए कि स्वतंत्रता के दूध में उच्छृंखलता का, असामाजिकता का विष कहीं इतना तो नहीं मिल रहा है कि वह खाद्य ही अखाद्य बन जाय?
आजादी के आन्दोलन चलने चाहिए पर साथ ही उन पर नियन्त्रण का अंकुश भी कठोरता के साथ प्रयुक्त होना चाहिए। यह भूलने की बात नहीं है कि पिछले दिनों जो वातावरण रहा है - इन दिनों जो परिस्थितियाँ हैं उनने मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को बहुत आगे तक परिपुष्ट कर दिया है। सत्प्रवृत्तियाँ अभी एक प्रकार से अविकसित स्थिति में पड़ी हैं। स्वतंत्रता सत्प्रवृत्तियों को मिले-दुष्प्रवृत्तियों को नहीं। इस तथ्य को यदि ध्यान में रखा गया तो इन शताब्दियों की बढ़ती हुई आजादी की लहर वह प्रयोजन पूरा कर सकेगी जो उसका उद्देश्य है। अवाँछनीयता को निरंकुश छोड़ने से आजादी की उपलब्धियाँ निराशाजनक बनकर ही सामने आयेंगी।
एक सन्त कह रहे थे- मनुष्यों में कुछ देवता कुछ मनुष्य पाये जाते हैं शेष तो नर पिशाच ही होते हैं।
जिज्ञासु ने पूछा- भला इन नर पिशाचों और मनुष्यों तथा देवताओं की पहचान क्या है?
संत ने कहा - मनुष्य देवता वे हैं जो दूसरे को लाभ पहुँचाने के लिए स्वयं हानि उठाने को तैयार रहते हैं, मनुष्य वे हैं जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी। नर पिशाच वे हैं जो दूसरों की हानि ही सोचते और करते हैं, भले ही इस प्रयास में भी उन्हें स्वयं भी हानि उठानी और सहनी पड़े।
दुर्बलता भी चोरी, झूठ, छल, हिंसा आदि की तरह एक पाप ही है और उसका दण्ड भी अन्य अपराधों की तरह मिलकर रहता है। दुष्कर्म करने वाले की निन्दा भी होती है और उसे राजदण्ड तथा समाज का असहयोग सहना पड़ता है। दुर्बलता समेट लेना भी इसी श्रेणी में आता है, और उस पाप के फलस्वरूप भी लगभग उसी स्तर की यातनायें सहनी पड़ती हैं।
आत्मा शक्ति सम्पन्न है उसे अशक्त नहीं बनाया गया है। मनुष्य का सृजन जिन तत्वों से सम्पन्न हुआ है वे ऐसे प्रखर हैं कि हर अभाव को दूर कर सकते हैं। हर अवरोध को हटा सकते हैं और हर दिशा में प्रगति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।
फिर भी मनुष्य यदि दीन दुर्बल अभावग्रस्त बना रहता है तो उसमें उसका शारीरिक और मानसिक आलस्य ही प्रधान कारण है। भीरु और संशयी प्रकृति के मनुष्य ही पिछड़े पड़े रहते हैं। प्रभु प्रदत्त प्रतिभा का प्रयोग न करना और आत्मा की आवश्यकता सशक्तता की प्राप्ति के लिये तत्पर न होना, कर्त्तव्य का प्रतिघात है। दूसरों की हत्या की तरह ही - आत्म-हत्या और कर्त्तव्य हत्या का अपराध माना गया है। आत्महत्या का प्रयास करने वाले पुलिस द्वारा पकड़े जाते हैं और न्यायालय द्वारा जेल भेजे जाते हैं। कर्त्तव्य में असावधानी करने वाले फौजी कोर्ट मार्शल की पकड़ में आते हैं और गोली से उड़ा दिये जाते हैं। दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करना ही पाप नहीं है- अपने प्रति अपराध करना भी उसी श्रेणी में आता है।
दुर्बल रहना- स्पष्टतः आत्महत्या और कर्त्तव्य हत्या है। अपंग, असाध्य रोगी और पागलों की बात दूसरी है, वे अपवाद हैं। उनके अतिरिक्त हर व्यक्ति में उस क्षमता की पर्याप्त मात्रा विद्यमान है जिसके आधार पर वह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, आत्मिक सभी क्षेत्रों में इतनी प्रगति कर सकता है कि अपना जीवन सुखपूर्वक जिये, अपने आश्रितों को सहारा दे और समाज को समुन्नत करने की भूमिका निबाहे। समय और श्रम का सदुपयोग करने वाले, चरित्र को उज्ज्वल रखने वाले और व्यवहार कुशलता अपनाने वाले व्यक्ति सहज ही मनुष्योचित समर्थता प्राप्त प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा प्रयत्न पुरुषार्थ निरन्तर करते रहना मानवीय कर्त्तव्यों की प्रथम पंक्ति में ही अंकित है।
समर्थता प्राप्त करने के लिए शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद बरतना प्रकृति को सर्वथा असह्य है। उसकी दृष्टि में ऐसे लोग अनावश्यक ही नहीं अवाँछनीय भी हैं। उसकी सुन्दर सृष्टि में कुरूपता फैलाने वाले कूड़ा-करकट को यदि वह झाड़-बुहार कर सड़ने के लिए एक ओर फेंक देती है तो उस पर निर्दयता का दोषारोपण नहीं किया जा सकता। माली अपने बगीचे में और किसान अपने खेतों में इसी रीति-नीति को अपनाते हैं। खर पतवार, झाड़-झंखाड़ वे बीनते, काटते, उखाड़ते रहते हैं, न उखाड़ें तो उनकी फसल ही चौपट हो जाय, बगीचा ही वीरान हो जाय।
देखा जाता है कि परिस्थितियाँ दुर्बलों पर ही बरसती हैं और समर्थों को सहारा देती हैं। तेज हवा दीपक को बुझा देती है और अग्नि को प्रज्ज्वलित करती है। आग में घी पड़ने से उसके ज्वलित होने की बात प्रसिद्ध है पर नन्हीं सी चिनगारी के लिए वह भी काल बन जाती है और बुझा कर रहती है। शीत ऋतु स्वास्थ्य वर्धक मानी जाती है। लोग जाड़े के दिनों में अपना स्वास्थ्य बना लेते हैं पर बूढ़े कमजोर उन्हीं दिनों काल के गाल में समा जाते हैं। ठण्ड उनके लिये मौत बनकर आती है। इसे दुर्बल पर दैव का प्रकोप ही कहना चाहिए।
रोगों के कीटाणु दुर्बल शरीरों में अड्डा जमाते हैं। सशक्तों से कतरा कर निकल जाते हैं। बेचारी बकरी को हिन्दू, मुसलमान, देव, दानव, भूत-पलीत, सिंह, व्याघ्र सभी खाने को तैयार रहते हैं। रीछ, भेड़िये, चीते कोई नहीं खाता। कबूतर का माँस हर किसी को पसन्द है। न कोई कौआ पकड़ता है न बाज। मछली सबको रुचिकर है घड़ियाल किसी को नहीं।
ठगी के शिकार भोले और विश्वासी लोग बनते हैं। चोर उनके घर में सेंध लगाते हैं जो असावधान रहते हैं। जेब उनकी कटती है जो लापरवाही बरतते हैं। सताये वे जाते हैं जिनमें प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं होती। आक्रमण के शिकार वे बनते हैं जो उसे देखकर डर जाते हैं। वनवासी लड़के हलकी सी कमान और बरछी लेकर एकाकी हिंस्र जन्तुओं से भरे जंगल में फिरते रहते हैं। उन्हीं से आँख मिचौनी खेलते हैं और देखते-देखते उन्हीं वनराजों को मारकर कन्धे पर टाँग लाते हैं जिन्हें देखकर हाथी भी चिंघाड़ते हैं।
दुर्बलता-दुष्टता को ललचाती है और उसे आक्रमणकारी होने के लिए प्रोत्साहित करती है। डरपोक आदमी अपने आपसे, अपनी दुर्बलता से डरता है- इसलिये उसे डराने के लिए हर कोई तैयार रहता है। बेबस बेकस जंगल की झाड़ी अँधेरे में दैत्य बनकर डरपोक को कँपा देती है। जले, गढ़े मुर्दे तब भूत-पलीत बनकर डराने के लिए तैयार हो जाते हैं। चुहिया की उछल-कूद उनकी धड़कन बढ़ा देने के लिये काफी है। मन में उठने वाली बेसिर पैर की कुकल्पनाएं-आशंकायें-विभीषिका बनकर प्राणघाती पिशाचिनी बन जाती हैं और कितने व्यक्ति इन्हीं को देखते, सोचते अधमरे हो जाते हैं। जब अस्तित्व रहित कल्पनाएं इतना त्रास दे सकती हैं तो अस्तित्व सम्पन्न जीवधारी तो उनके लिए यमदूत ही बन सकता है।
दीन दुर्बलों पर अत्याचार होने की बात हम सुनते हैं, स्वभावतः उनके कष्टों पर दया आती है और भावनायें उठती हैं कि किसी प्रकार उनके कष्ट दूर हों। इसके लिये तीन उपाय हैं। एक यह है कि हम स्वयं आगे बढ़ें और अनीति तथा व्यथा को दूर करने के लिए सक्रिय रूप से हाथ बटायें। मात्र दुख प्रकट करना और आँसू बहाना पर्याप्त नहीं। यदि सहानुभूति सच्ची है तो उसे सक्रिय भी होना चाहिए। हमें दुर्बलों को सबल बनाने और अनीति का प्रतिरोध करने में अपनी प्रतिभा और क्षमता का प्रयोग करना चाहिए।
दुष्ट दुरात्मा, शोषक और उत्पीड़कों की निष्ठुरता को करुणा में बदलना चाहिए, उन्हें मनुष्यता को कलंकित करने और पाप का घड़ा भरने से उत्पन्न परिणामों को स्मरण दिलाना, उनका विरोध करना और प्रतिरोध के लिए समर्थ संघर्ष खड़ा करना चाहिए। अनीति को दण्डित किये बिना-कुकृत्यों को लाभ रहित बनाये बिना रोका नहीं जा सकता। इसलिये उनका मार्ग अवरुद्ध करने के लिये कठोर उपाय करने चाहिए, भले ही उस संघर्ष में अपने को अथवा प्रतिरोधकों को चोट सहनी पड़े।
इससे भी अधिक आवश्यकता इस बात की है कि दुर्बल को अपनी दुर्बलता छोड़ने के लिए तैयार किया जाय। गरीबी को जब तक स्वतः उतारकर न फेंका जाय तब तक वह जाती नहीं है। दुर्बलता की जड़ें मन में जमी रहती हैं और उनकी बेल जीवन के हर पक्ष को दुर्बल बनाती रहती है। दूसरों की सहायता क्षणिक लाभ पहुँचाकर समाप्त हो जाती है। दूसरों का रक्त किसी के शरीर में चढ़ाया जाय तो उसकी शक्ति कुछ घण्टों तक ही काम देती है। जीवन धारण किये रहना तो अपने उत्पादित रक्त से ही सम्भव है।
जिस घर में साँप अधिक हों उस घर में रहने वाला मनुष्य जिस प्रकार बड़ा सावधान रहता हैं, उसी प्रकार संसार में रहने वाले मनुष्यों को विषय-वासना और लोभ में पड़ने से सावधान रहना चाहिए।
-रामकृष्ण परमहंस
दुर्बलों को स्वतः अपने पैरों खड़ा होना होगा- अनीति से स्वयं जूझना होगा। जिन कारणों से वे दुर्बल बने हैं उन्हें समझना और निरस्त करना पड़ेगा। जब वे समर्थता की उपासना के लिए-शक्ति सञ्चय के लिए पूरे पुरुषार्थ और मनोयोग के साथ खड़े होंगे तभी उस त्रास से त्राण मिलेगा जो प्रकृति की हर इकाई द्वारा दुर्बलों की सत्ता मिटाने के लिए दिया जाता है।
अपनों से अपनी बात-
यह अंक पाठकों के हाथ पहुँचने से एक महीने के भीतर गुरुदेव सम्भवतः अपनी पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार अपनी विश्व यात्रा पर निकल चुकेंगे। समस्त विश्व की यात्रा का पासपोर्ट इकट्ठा ही बनवा लिया गया है। यों यह यात्रा कई खण्डों में- कई टुकड़ों में पूरी होगी। एक साथ लम्बे समय के लिए बाहर जा सकना संभव भी नहीं था। निज की, सघन हिमालय की छाया में संपन्न होने वाली साधना से शान्ति-कुञ्ज में यदा-कदा आकर युग निर्माण आन्दोलन का परोक्ष सूत्र संचालन-प्राण प्रत्यावर्तन के सघन अनुदान-नारी जागरण का अभिनव सूत्रपात, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का भागीरथ प्रयास यह पाँचों ही कार्य उन्हें पाँच वर्ष तक चलाने हैं। उनकी निज की पञ्चवर्षीय योजना का यह निर्धारण विगत बसन्त पंचमी पर स्पष्ट रूप से हो चुका है और वे उसी दिन से मार्ग-दर्शक शक्ति के इशारे पर अपने कार्यक्रम में तत्पर हो गये हैं।
विश्व यात्रा की उनकी तैयारी यकायक ही नहीं हो गई है। उसके पीछे लम्बी पृष्ठभूमि है। यह निश्चय चार वर्ष पूर्व तभी कर लिया गया था जब विज्ञान और अध्यात्मवाद के समन्वय के लिए अखण्ड-ज्योति में विवेचनात्मक लेखमाला आरम्भ हुई थी। वस्तुतः यह इस युग की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बौद्धिक क्रान्ति है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। कहना न होगा कि यह प्रत्यक्षवादी और बुद्धिवादी युग है। इसमें ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ के आधार पर कुछ भोले लोग ही प्रभावित या सन्तुष्ट किये जा सकते हैं। हर विचारशील क्यों? और कैसे? का सहारा लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहता है। चूँकि चिरअतीत में ‘श्रद्धा’ को अपने आपमें एक भावनात्मक विज्ञान का आधार स्तम्भ माना जाता था अस्तु यह सोचकर चला गया था के श्रद्धा के आधार पर सर्वसाधारण को मार्ग-दर्शन किया जा सकेगा। शास्त्र वचनों और आप्त पुरुषों की साक्षियों को प्रमाण भूत मान लिया जायगा और उस आधार पर समाहित लोक-मानस को अध्यात्म तत्वज्ञान का स्वरूप एवं मार्ग समझाने में सफलता मिलती रहेगी। पर अब स्थिति बिल्कुल उल्टी हो गई। वैज्ञानिक, आर्थिक, बौद्धिक, यान्त्रिक और तत्सम्बन्धित अगणित दिशा धाराओं की आश्चर्यजनक प्रगति ने मनुष्य को बुद्धिवाद का- प्रत्यक्षवाद का आश्रय लेने के लिए सन्नद्ध कर दिया। अब किसी विचारशील को कोई बात हृदयंगम करानी हो तो उस प्रत्यक्षवादी आधारों के सहारे ही सन्तुष्ट कराना होगा।
अध्यात्म और धर्म जैसी मानवी चेतना के हृदय और मस्तिष्क की महत्ता असंदिग्ध है। उसके बिना व्यक्ति निर्मम नर पशु मात्र ही रह जाता है। उत्कृष्टता को बिना अपनाये न आत्मा का सत्य प्रकाश में आता है- न चेतना में शिव की अनुभूति होती है और न विश्व सौंदर्य को देख सकने का आधार हाथ लगता है। तत्व दर्शन की रसानुभूति के बिना मनुष्य की स्थिति प्रेत पिशाच जैसी ही रह सकती है इसलिए अन्न, जल और वायु से भी बढ़कर मानवी चेतना को जीवित रखने के लिए अध्यात्म दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है। इस युग का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही रहा कि बुद्धिवाद, प्रत्यक्षवाद, विज्ञानवाद का एकाँगी विस्तार हुआ। दृश्य पदार्थों का ही ऊहापोह उनके द्वारा हुआ। आत्मिक गवेषणा की दिशा में इस उद्देश्य में कुछ भी प्रयास नहीं हुआ। फलतः श्रद्धा विज्ञान के आधार पर प्रतिष्ठापित ‘अध्यात्म’ को बुद्धिवाद की कसौटी पर अप्रामाणिक ठहराया गया। आत्मा, परमात्मा, कर्मफल, परलोक, उत्कृष्टता जैसे तथ्य जैसे चूँकि प्रारम्भिक स्थिति में विकासमान अध्यात्म के आधार पर सिद्ध न हो सके इसलिए इसे कपोल कल्पना ही नहीं-अवाँछनीय, मूढ़ता, प्रतिगामिता भी ठहरा दिया गया।
दार्शनिक दृष्टि से कितने ही सिद्धान्तों का समर्थन खण्डन होता रहता है। पर आत्मवाद को उनमें से एक, नहीं ठहराया जा सकता है। शरीर में प्राण की जो स्थिति है वह जीव चेतना में अध्यात्म की है। उन्हें अलग कर दिया जाय तो फिर जो कुछ बच रहता है उसे घिनौना ही कहा, देखा और समझा जा सकता है। इस युग का यह एक महीन संकट था कि जनमानस को बुद्धिवाद से विरत करके श्रद्धा तुष्ट बनाया नहीं जा सकता था और बुद्धिवाद की कसौटियाँ अध्यात्म का अस्तित्व स्वीकार करने को तैयार न थी। इस गतिरोध को कैसे दूर किया जाय इसका न तो कोई उपाय दीखता था और न मार्ग सूझता था। इस गतिरोध को दूर करने के लिए यत्र-तत्र छुटपुट प्रयास भी होते रहे हैं। कहीं-कहीं से कुछ ढूँढ़ा, कहा, लिखा भी जाता रहा है पर वह था चंचु प्रवेश मात्र। जब तक अध्यात्म को विज्ञान के आधार पर प्रतिपादित करने की ठोस, विस्तृत और सर्वांग पूर्ण प्रक्रिया खड़ी न की जाय तब तक विज्ञान और अध्यात्म को एक दूसरे का पूरक समर्थक नहीं बनाया जा सकता और जब तक यह प्रकरण पूरा न हो जाय तब तक युग जिज्ञासा का वह समाधान नहीं हो सकता जिसके आधार पर पर बुद्धिजीवी वर्ग को उस आत्मिक तत्वज्ञान के प्रति निष्ठावान बनाया जा सकता है और व्यक्ति तथा समाज की अगणित समस्याओं का हल जिसके आधार पर निकल सकता है।
गुरुदेव ने युग की इस महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए जो कदम उठाया उसे युग परिवर्तन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण स्तम्भ कहा जा सकता है। यदि इस स्तर के प्रयास अग्रगामी न हों तो इन दिनों प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्ड-कथा कीर्तन-जप तप-उपहासास्पद ही बने रहेंगे और विज्ञ समाज का समर्थन न मिलने के कारण कुछ ही समय में अपना अस्तित्व खो बैठेंगे। विश्वास के आधार पर ही सुदृढ़ श्रद्धा जमती है और विश्वास से पूर्व मनः चेतना तथ्यों और तर्कों के सहारे यथार्थता जानना चाहती है। अध्यात्म को भी यह अग्नि परीक्षा देने के लिए तैयार रहना होगा। बचने के लिए बहाने ढूँढ़ते रहने से देर तक काम नहीं चल सकता। इस नग्न सत्य का सामना करने के लिए विज्ञान के - तर्क और तथ्य के - आधार पर अध्यात्म गरिमा का प्रतिपादन अखण्ड-ज्योति ने चार वर्ष पूर्व आरम्भ किया था। प्रसन्नता की बात है कि उससे विश्वभर के बुद्धिजीवी वर्ग में भारी दिलचस्पी, हलचल पैदा हुई है। अखण्ड-ज्योति का अनेक भाषाओं में प्रकाशित होना और ग्राहक संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ते जाना इस नये प्रतिपादन के प्रति लोक-मानस की उत्कट अभिरुचि का ही द्योतक है। आस्तिक वर्ग की निराशा को चीरते हुए एक अभिनव आशा की प्रभाव किरणें उपलब्ध हुई हैं और विश्वास हो चला है कि अगले दिनों बुद्धिवाद का रुख पलट जायगा और उसकी चपेट में आकर आस्तिकों को नास्तिक-बनने का खतरा न रहेगा वरन् नास्तिकों को आस्तिक बनकर अपनी भूल सुधारनी पड़े।
चमड़े की आँखों से देखने में यह इस प्रतिपादन का स्थूल रूप भले ही न दीखता हो पर जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि मिली है उन्हें स्वीकार करना होगा कि यह सृजन असाधारण है। उसे मार्क्स दर्शन, अणु विज्ञान, विद्युत आविष्कार-तार-बेतार से घटकर नहीं बढ़कर ही मान्यता मिलेगी। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय में अखण्ड-ज्योति मात्र लेख छापती रहे बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् उसे प्रयोगशाला में भी सही सिद्ध करना पड़ेगा। इसके लिए गुरुदेव अपनी इस हिमालय की एकान्त तप साधना में समुचित तैयारी करते रहते हैं। तर्क और प्रमाण दोनों ही आधारों को इतनी मात्रा में संग्रह कर लिया है कि बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद को उसके आधार पर एक सीमा तक सन्तुष्ट किया जा सके।
प्रस्तुत विश्व यात्रा का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि संसार के विज्ञान वेत्ताओं से मिलकर कुछ सीखा जाय और कुछ सिखाया जाय। जो आविष्कार हो चुके हैं उनकी जानकारी सभी को है पर जो शोध कार्य विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहा है वह भी इतना महत्वपूर्ण है कि भूतकालीन आविष्कार उसके सामने तुच्छ सिद्ध होंगे। इन शोध प्रयासों की दिशाएं एक विद्यार्थी की तरह जानना जहाँ गुरुदेव का उद्देश्य है, वहाँ एक लक्ष्य यह भी कि जो उनने जाना है उसका परिचय शोधकर्त्ताओं को दें और उन्हें वह दिशा बतायें जिसके आधार पर अगले दिनों विज्ञान और अध्यात्म को एक दूसरे का समर्थक पूरक-प्रयोगशाला में भी किया जा सके। यह महान प्रयोजन ऐसा था जिसके लिए विश्व यात्रा किये बिना काम चल नहीं सकता था। इसलिए यह व्यवस्था बनी और गुरुदेव अगले महीने उसके लिए जा रहे हैं। सर्वसाधारण में इसकी चर्चा पहले से नहीं की गई थी, पर यह सब बहुत पहले से ही निर्धारित निश्चित था। इस बार की गुरुदेव के निजी जीवन की-पंचवर्षीय योजना कुछ ऐसी ही है कि जिसकी चर्चा बहुत पहले नहीं ही करने की नीति निर्धारित की गई है, इसके पीछे बहुत ही ठोस कारण हैं।
विश्व यात्रा का दूसरा पक्ष यह है कि युग-निर्माण परिवार की शाखाएं विश्व के अधिकाँश देशों में हैं। उनके कार्यकर्ताओं में से अधिकाँश से कभी भी गुरुदेव का साक्षात्कार नहीं हुआ। उन्हें आवश्यक प्रेरणा, प्रकाश एवं दिशा देने के लिए यह आवश्यक था उनसे व्यक्तिगत परामर्श भी किया जाय और स्थानीय समस्याओं के अनुरूप मार्ग-दर्शन दिया जाय। इस संदर्भ में प्रथम कदम अफ्रीका महाद्वीप के देशों में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के सम्मेलन के रूप में होने जा रहा है।
इसके अतिरिक्त इस विश्व यात्रा में उन लोगों के साथ घनिष्ठ सम्पर्क बनाना है जो नव-निर्माण के विश्व व्यापी महा अभियान में अपने-अपने देश, धर्म, भाषा, संस्कृति के आधार पर एक और नेक बनने बनाने का प्रयास प्राणपण से कर रहे हैं। भारत में हिन्दू धर्म के माध्यम से युग-निर्माण योजना किस प्रकार अपनी क्रिया-प्रक्रिया चला रही है इसे हम सब जानते हैं। पर बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। संसार में अन्य धर्म भी हैं और उनके अनुयायियों को उसी परम्परा के आधार पर एक केन्द्र पर जा मिलने के लिए अग्रगामी बनाया जा रहा है। आरम्भ में सभी धर्मानुयायी एक हो जायँ यह उचित तो है पर वर्तमान स्थिति में सम्भव नहीं इसलिए एक लक्ष्य की ओर जो जहाँ है वहीं से चल पड़े यही व्यावहारिक समझा गया है। मुसलमान, ईसाई, पारसी, बौद्ध, यहूदी आदि कई धर्मों के अनुयायी अपने-अपने धर्मों, पर्वों, शास्त्रों तथा परम्पराओं को ऐसा स्वरूप दे सकते हैं जिसे अपनाकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। इस प्रयोजन के लिए विभिन्न धर्मानुयायी युग-निर्माण योजना के अंतर्गत अपने-अपने ढंग से-अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य संलग्न हैं। युग निर्माताओं की इस सृजन सेना में आन्तरिक दृष्टि से पूर्ण एकता, घनिष्ठता और समस्वरता है। इसे और भी अधिक स्पष्ट तथा प्रखर बनाने के लिए गुरुदेव की यह विश्वयात्रा आवश्यक हो गई थी। इसके परिणाम आज भले ही सर्वसाधारण की कल्पना में न हों पर जब समस्त विश्व को एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति के सहारे सच्चे अर्थों में विश्वमानव की महत्ता अपनाने में सफल हुआ पाया जायगा तब यह भी पता चलेगा कि इसके पीछे किन लोगों ने भागीरथ प्रयत्न किये थे और वे श्रेय दूसरों के देने के लिए स्वयं नींव के पत्थर भर बने रहे।
गुरुदेव की विश्वयात्रा का प्रमुख उद्देश्य है संसार की उन विभूतिमती आत्माओं से सम्पर्क स्थापित करना और दिशा प्रेरणा देना जिनके द्वारा युग परिवर्तन के लक्ष्य को अग्रगामी बनाया जा सकता है। राजनीति, धर्म, विज्ञान, साहित्य, अर्थ, कला, प्रतिभा के क्षेत्रों में एक से एक विभूतियाँ मौजूद हैं, उनके साथ इस यात्रा में सम्पर्क बनाकर यह प्रयास किया जायगा कि वे अपने-अपने ढंग से, अपने-अपने क्षेत्र में, अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार तत्परतापूर्वक जुट जायं और महाकाल के युग परिवर्तन प्रयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करें।
उपरोक्त लक्ष्यों के लिए गुरुदेव की विश्वयात्रा होगी पर उसे प्रकाशन विज्ञापन से पूर्णतया बचाया जायगा। कारण कि अगले दिनों अत्यधिक महत्वपूर्ण सम्भावनाएं प्रकाश में आने वाली हैं। उचित यही है कि उनका श्रेय अनेक व्यक्तियों को मिले। युग-निर्माण की विभिन्न भूमिकाएं-विभिन्न व्यक्तियों द्वारा निर्वाह की जाती दिखाई पड़ें इसी में शोभा और सुन्दरता है। अस्तु गुरुदेव का लक्ष्य अगले दिनों सम्पादित की जाने वाली एक से एक बढ़ी-चढ़ी भूमिकाओं में स्वयं पर्दे के पीछे रहने और आगे दूसरों को किये रहने की है। तदनुसार विश्व यात्रा के क्रिया-कलापों पर प्रायः पूरी तरह पर्दा ही पड़ा रहेगा। स्पष्ट है कि इन प्रयासों के पीछे वर्तमान उथली राजनीति के साथ दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक षड़यन्त्रों में धर्माध्यक्षों ने पिछले दिनों बड़ी फूहड़ भूमिका निबाही है और उन्हें संदिग्ध दृष्टि से समझे जाने और आशंका भरी दृष्टि से देखे जाने के कारण सामने आये हैं। अपना प्रयोजन स्फटिक की तरह स्वच्छ है। उसमें दुरभिसंधियों की गन्ध कोई सूँघना चाहे तो उसे वैसा कहीं कुछ भी न मिलेगा। जिस महान मिशन को लेकर गुरुदेव अग्रगामी हुए हैं उसमें इस प्रकार के ओछे हथकंडों के लिए राई रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है।
कहना न होगा कि विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का पथ-प्रशस्त करने वाला ऐसा सर्वतोमुखी साहित्य सृजा जायगा जो बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद की चुनौती स्वीकार कर सके और धर्म की गरिमा एवं उपयोगिता को असंदिग्ध सिद्ध कर सके। यह कार्य मेज पर बैठकर पूरा हो जाने वाला नहीं है वरन् इसके लिए भारी ढूँढ़ खोज की आवश्यकता पड़ेगी। विभिन्न देशों में उपलब्ध सामग्री का संचय करना पड़ेगा। तभी इस प्रयोजन को पूरा कर सकने वाला अपने ढंग का एक विश्व कोष तैयार हो सकेगा। नई पीढ़ी के लिए यह कार्लमार्क्स के ‘कैपिटल’ से अधिक आकर्षक, प्रामाणिक, सारगर्भित और उपयोगी सिद्ध होगी। आज के भौतिकवाद एवं स्वार्थवाद से लोहा लेने के लिए यदि इस समय उस साहित्य को अपने युग का अनुपम अनुदान सिद्ध करे तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। विश्वयात्रा में इसके लिए बहुमूल्य सामग्री खोजी और इकट्ठी की जा सकेगी ऐसी आशा की जानी चाहिए।
ऊपर की पंक्तियों में गुरुदेव की निजी पंचवर्षीय योजना के दो अंगों की चर्चा की गई है। विज्ञान और अध्यात्म के पूरक समर्थन सर्वतोमुखी साहित्य का निर्माण उस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से इस उद्देश्य के लिए सारगर्भित परामर्श, विचार विनिमय तथा आदान-प्रदान को एक कार्य माना जा सकता है। दूसरा है विभिन्न देशों और धर्मों में युग परिवर्तन प्रक्रिया में संलग्न लोकसेवियों को प्रकाश और प्रोत्साहन देना तथा युग-निर्माण शाखाओं को अधिक सक्रिय बनाना। विश्व के लिए समय-समय पर जाते रहा जायगा। चूँकि इस बीच और भी अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये जाने हैं इसलिये भारत में भी काफी समय देना पड़ेगा। इसलिए यात्रा लगातार नहीं हो सकती, वह खण्डों में ही चलती रहेगी।
अगले पाँच वर्ष ही गुरुदेव के प्रत्यक्ष कार्यक्रमों से संबद्ध समझे जाने चाहिए। इसके उपरान्त सम्भवतः उनकी कार्य पद्धति पूर्णतया सूक्ष्म हो जायगी और शरीर से नित्य कर्म के अतिरिक्त और कुछ करने की आवश्यकता न रहेगी। जो कार्य करने होंगे वे सूक्ष्म शरीर से ही सम्पन्न होते रहेंगे। उस समय दीखने वाली निष्क्रियता भी प्रचण्डतम सक्रियता से अधिक महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न करती रहेगी। इन पाँच वर्षों में एक कार्य है समय समय पर कुछ दिनों के लिए हिमालय अञ्चल में जाकर अपने हथियार तेज करना-शक्ति का संग्रह करना और उस उपार्जन से अधिक महत्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त करना। पिछले बीस वर्षों में भी उनके द्वारा जो कुछ कार्य हुआ है उसका श्रेय उनकी प्रतिभा एवं परिश्रमशीलता को नहीं मिल सकता वस्तुतः यह अब उनकी तप साधना की ही पूँजी थी जिसके बल पर एक व्यक्ति के प्रयास से सर्वथा असम्भव दिखने वाला क्रिया विस्तार सम्भव हो सका। 15 वर्ष की आयु से लेकर 60 वर्ष की आयु तक 45 वर्षों में जो कार्य उनने किया है; उसकी अपेक्षा अगले 5 वर्षों में सौ गुना काम उनके माध्यम से सम्पन्न होना है। इसके लिए आत्मबल की जितनी पूँजी अपेक्षित है उसका अंश उनकी मार्गदर्शक सत्ता अनुदान में देगी और एक अंश उन्हें स्वयं अपनी तप साधना से पूरा करना पड़ेगा। उसके लिए उपयुक्त स्थान और वातावरण भी उनने चुन लिया है। वह सर्वथा अज्ञात और कष्ट साध्य होते हुए भी अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त है। वे समय-समय पर वहाँ आते-जाते रहने के क्रम अगले पाँच वर्षों तक जारी रखेंगे। कितना समय, कब, कहाँ लगेगा इसका विवरण अनिश्चित और अप्रकाशित ही रहेगा। पूर्व चर्चा-पूर्व योजना का प्रकाश अगले दिनों प्रत्येक कार्य पद्धति के सम्बन्ध में अप्रकट ही रहा करेगा। यथासमय ही कोई बात जानी-जनाई जाय, इसी प्रकार अबकी बार का निश्चय है।
युग-निर्माण आन्दोलन की बागडोर यों प्रत्यक्षतः दूसरे हाथों में सौंप दी गई है पर परोक्ष रूप से उसके सूत्र संचालन का प्रयास अभी भी गुरुदेव ने छोड़ा नहीं है और अपने को उस उत्तरदायित्व से सर्वथा मुक्त नहीं माना है। यों विदाई सम्मेलन में हजारों अपने प्राण प्रिय अनुयायियों, उत्तराधिकारियों के हाथ में लाल मशाल सौंपी थी और यह आशा की थी कि अब एक दाना मथ कर हजार नये दाने उत्पन्न कर रहा है। एक आचार्य जी की जगह युग-निर्माण की मशाल को थामने वाले हजारों आचार्य जी पैदा हो रहे हैं। सो उनकी आशा ही सिद्ध हुई। मिशन का कार्य विस्तार जितना उनके सामने था उससे कई गुना अधिक बढ़ गया है और विश्वास है कि वह दिन-दिन आगे ही बढ़ता रहेगा, प्रत्यक्षतः इसका श्रेय गायत्री तपोभूमि के आत्मदानियों को- सक्रिय सदस्यों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को- मिल सकता है, मिलना चाहिए फिर भी यह भुलाया नहीं जा सकता कि इस विशालकाय संयन्त्रों को बिजली कहीं अन्यत्र से ही मिल रही है। अगले पाँच वर्ष तक प्रचुर परिमाण में अश्व शक्ति की यह बिजली उत्पन्न होती रहे और कर्मठ कार्यकर्तागण उसके सहारे आशातीत सफलता का श्रेय, उत्साह प्राप्त करते रहें यह प्रयत्न बराबर चलता रहेगा। गुरुदेव अपनी उस परोक्ष जिम्मेदारी का पाँच वर्ष की अवधि तक बराबर निर्वाह करते रहेंगे।
इसी शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी प्राण प्रत्यावर्तन सत्र है। इस योजना के अंतर्गत सजीव और संस्कारवान परिजनों को पाँच-पाँच दिन के लिए शान्ति-कुञ्ज बुलाया जाता रहेगा और संचित आत्मबल का एक अंश उन्हें अनुदान में देने का क्रम चलता रहेगा। उनका विचार पाँच वर्षों में कुल मिलाकर एक हजार ऐसी जागृत आत्माओं को समर्थता प्रदान करना है जो अर्जुन और हनुमान की भूमिका सम्पादित कर सकें अपने को ऐतिहासिक महामानव सिद्ध कर सकें और विश्व मानव का भविष्य उज्ज्वल बनाने के ईश्वरीय प्रयोजन में हाथ बटा सकें। व्यक्तिगत सुख स्वार्थ की समस्याएं लेकर उनके पास अगणित व्यक्ति सदा से आते रहे हैं और शायद यह क्रम उनके जीवित रहते बन्द भी नहीं पर प्रत्यावर्तन शिविरों में अत्यन्त कड़ा प्रतिबन्ध लगा दिया है कि क्षुद्र प्रयोजन लेकर इस विश्व के महानतम पवित्र यज्ञ का गौरव घटाने के लिए कोई ओछे व्यक्ति न आयें। ऐसे लोग मिलने भर के लिए स्वीकृति लेकर कभी आ भी सकेंगे पर प्रत्यावर्तन के लक्ष्य के साथ उन्हें निर्मम उपहास न करने दिया जाएगा। यह प्रवचन, सत्संग, अनुष्ठान जैसे आयोजन नहीं है इनमें मात्र आत्मिक गरिमा का आदान-प्रदान है इसलिए जिन्हें बुलाया जायगा उनसे यही कहा जाएगा कि भौतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए नहीं वरन् उच्च स्तरीय आत्मबल एवं दिव्य प्रकाश लेने के लिए अपनी मनोभूमि देवात्मा जैसी बनाकर ही इधर आवें।
गुरुदेव के सम्पर्क परिवार में शिष्य मण्डली में लाखों व्यक्तियों के नाम हैं, इनमें से केवल एक हजार को ही प्रत्यावर्तन का अवसर मिलेगा। पर आशा की जानी चाहिए कि जो भी इसमें आ सकेंगे वह गुरुदेव के अवतरण की महान शृंखला के महत्वपूर्ण घटक बनकर प्रकाशवान नक्षत्र की तरह युग-युगान्तरों तक चमकेंगे।
विश्व यात्रा और हिमालय साधना के बाद बचे हुए समय में वे शान्ति-कुञ्ज के अपने डाक बँगले में ठहरा करेंगे और उन्हीं दिनों प्रत्यावर्तन सत्र में थोड़े-थोड़े व्यक्तियों को बुलाया करेंगे। यह सत्र भी कब, कितने दिन चलेंगे उसका कुछ पूर्व निश्चय नहीं। समयानुसार ही सूचना देकर बुलाया जाया करेगा।
दस वर्ष पूर्व के एक वर्ष वाले अज्ञातवास का प्रायः सारा विवरण अखण्ड ज्योति में छपा था। वहाँ कइयों को बुलाया भी था और कइयों को पत्र भी लिखे थे पर अब की बार सब कुछ अप्रकट अविदित रखा गया है। कारण कि अब कि गतिविधियाँ पिछली बार की अपेक्षा अत्यधिक महत्वपूर्ण और अत्यधिक रहस्यपूर्ण हैं समय से पूर्व उनके प्रकट होने में लाभ की अपेक्षा सार्वजनिक हानि ही अधिक समझी गई है। इसलिए इस संदर्भ में अनावश्यक चर्चा पर जो प्रतिबन्ध है उसका कारण एवं उद्देश्य सहज ही समझा जा सकता है।
पाँचवाँ कार्य जो अगले पाँच वर्षों में सम्पन्न किया जाना है वह है शान्ति कुञ्ज (हरिद्वार) का शक्ति पुञ्ज में परिवर्तन। यह आश्रम सप्त ऋषियों की तपोभूमि सप्त सरोवर नामक क्षेत्र में इसीलिए बनाया गया है कि गुरुदेव की तप-स्थली तथा जन सम्पर्क प्रक्रिया के बीच वह एक शृंखला जैसा माध्यम बना रहे। यह गुरुदेव का ‘डाक बँगला’ है जिसमें वे यदा-कदा ठहरते हैं और प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप का-संचालन मार्ग-दर्शन करते हैं। पाँच वर्ष तक ही इस आश्रम की यह उपयोगिता है उसके बाद इस भव्य इमारत को महिला जागरण केन्द्र के रूप में पूरी तरह परिणत कर दिया जायगा।
स्पष्ट है कि नये विश्व का- नये युग का- नेतृत्व भार नारी के कन्धों पर ही जायगा। आत्मिक विशेषताओं में नर की अपेक्षा नारी स्वाभाविक रूप से आगे है। नये युग में शरीर बल नहीं- आत्मबल प्रमुख होगा। इसकी स्वाभाविक मात्रा नारी में अधिक रहने से अबकी पारी उसी की है। पुरुष की पारी पूरी हो चुकी। हर क्षेत्र का नेतृत्व नारी को ही संभालना है इसके लिए उनका जागरण उत्थान भविष्य की महती आवश्यकता है। इसे पूरी करने में शान्ति-कुञ्ज की भूमिका अनुपम होगी। इसे नारी गायत्री तपोभूमि के रूप में देखा जा सकेगा और यहाँ से उड़ी हुई चिनगारियों को व्यापक क्षेत्र में ज्योतिर्मय होता देखा जा सकेगा।
जिस प्रकार गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना के अवसर पर सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ, 2400 तीर्थों के जल, चौबीस करोड़ मन्त्र लेखन एवं अखण्ड यज्ञाग्नि से प्राणवान बनाया गया था। उसी प्रकार अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री महापुरश्चरण कुमारी कन्याओं के माध्यम से यहाँ भी सम्पन्न किये जा रहे हैं। गुरुदेव ने 24 वर्षों में जो साधना की थी उसी को यहाँ अखण्ड क्रम में छह वर्षों में पूरा कर दिया जायगा। इन दिनों इस प्रयोजन के लिए यहाँ 20 कन्याएं रहती हैं और तप साधना के अतिरिक्त महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त करती हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः बढ़ती चली जायगी। तीन-तीन महीने गृहस्थ महिलाएं भी गृहस्थ संचालन की शिक्षा प्राप्त करेंगी। कन्याओं का विद्यालय और भी अधिक व्यवस्थित हो जायगा। जिनके ऊपर गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ हैं, जिन्हें लोभ और मोह के बन्धन पाश से मुक्ति मिल चुकी है ऐसी जीवन्त महिलाओं को अपना जीवन महिला जागरण के लिए समर्पित करने को कहा जा रहा है, आशा है ऐसी ज्योतिर्मयी आत्माएं यहाँ इकट्ठी होती चली जायेंगी और विश्व व्यापी महिला आन्दोलन की शाखा प्रशाखाओं का संचालन करेंगी। पाँच वर्ष में इसके लिए आवश्यक इमारत तथा दूसरी तैयारी होती चली जायगी। इस आन्दोलन का संचालन कर सकने वाली सुयोग्य महिलाओं की एक टीम भी तब तक यहाँ खड़ी हो जायगी। इस महिला जागरण केन्द्र का एक स्पष्ट, सजीव और क्रियाशील स्वरूप इन पाँच वर्षों में ही बनकर खड़ा हो जायगा। तब कोई यह न कह सकेगा कि गुरुदेव ने नारी जागरण का अभियान खड़ा करने में उपेक्षा बरती।
इन दिनों कन्याओं को अखण्ड दीपक पर तप साधना इसलिए भी कराई जा रही है कि अगले दिनों अवतरित होने वाली- महान आत्माओं का तेज वे अपने गर्भ में धारण कर सकें। अञ्जनी, कौशल्या, देवकी, यशोदा, कुन्ती, मदालसा, द्रौपदी आदि महान महिलाओं ने पूर्व जन्मों में तप साधना करके ही वह शक्ति प्राप्त की थी कि अपनी गोदी में देवताओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। पार्वती के तप का ही प्रभाव था कि उनकी गोदी में समस्त देवताओं में पूजा अग्रणी गणेश का परिपोषण हो सका। महान आत्माएं उत्कृष्ट वातावरण में ही जन्म लेती हैं। ऐसा भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक वातावरण किसी व्यक्तित्व में घुला हुआ हो इसके लिए तप साधना की नितान्त आवश्यकता है।
इन दिनों शान्ति कुञ्ज में अखण्ड जप साधना में सम्मिलित होने वाली तपस्विनी कन्याओं को ऐसा ही सौभाग्य मिले तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। युग नेतृत्व के लिए जीवन मुक्त आत्माओं के अवतरण के लिए इस प्रकार की पृष्ठभूमि बनाई जानी आवश्यक भी है। शान्ति-कुञ्ज का अखण्ड दीपक पर चलने वाला महा पुरश्चरण जहाँ युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की कितनी ही कठिनाईयों को हल करने की शक्ति उत्पन्न कर रहा है, वहाँ कन्याओं की शिक्षा के अतिरिक्त उनमें उत्कृष्ट स्तर की क्षमता भी उत्पन्न कर रहा है। इस प्रयोजन के पीछे भी असाधारण दूरदर्शिता पूर्ण उद्देश्य छिपा पड़ा है।
गुरुदेव की वर्तमान क्रिया पद्धति की पंचवर्षीय योजना का संक्षिप्त परिचय उपरोक्त पंक्तियों में मिल सकता है। (1) विज्ञान और अध्यात्म के समग्र साहित्य निर्माण के लिए विश्व व्यापी खोजबीन, (2) वैज्ञानिकों, विचारकों, युग निर्माताओं एवं शाखा संगठनों से अति महत्वपूर्ण विचार विनिमय तथा आदान-प्रदान के लिए विश्व यात्रा, (3) हिमालय के सघन अञ्चल में चलने वाली तप साधना के क्रम (4) मिशन का सूत्र संचालन तथा प्राण प्रत्यावर्तन अनुदान, (5) नारी जागरण के लिए शान्ति-कुञ्ज का समग्र निर्माण निर्धारण। इन्हें वे इस थोड़ी अवधि में पूरा कर सकेंगे इस बात पर उन्हें अविश्वास न होगा जो आत्मबल की गरिमा समझते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के पाँच आवरण जागृत होने पर पाँच स्वतन्त्र व्यक्तियों जितना काम कर सकते हैं। स्पष्टतः गुरुदेव ने इन पाँचों को समर्थ सक्रिय बनाकर पिछले दिनों आश्चर्यजनक कार्य किया है। उन्हें अधिक समर्थ बनाकर वे अधिक कार्य भी कर सकेंगे और उपरोक्त पाँच वर्षीय योजना को पूरा कर लेंगे इसमें किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए।
श्वेतकेतु ने बारह वर्ष तक गुरुकुल में अध्ययन किया। आचार्य ने खुशी-खुशी श्वेतकेतु को विदा किया। दीर्घकाल के ज्ञानार्जन ने विनम्रता के स्थान पर अहंभाव को जन्म दिया। घर आने पर पिता ने पूछा - ‘वत्स! क्या तुमने आचार्य के सान्निध्य में वह विद्या प्राप्त की है जिससे अज्ञात का ज्ञान हो सके और अकल्पित के प्रति कल्पना दौड़ सके?’
श्वेतकेतु पिता का मुँह देखता रह गया, वह नहीं समझ पाया कि किस श्रेष्ठ ज्ञान की ओर संकेत किया जा रहा है। उसने सोचा हो सकता है मेरे आचार्य उस ज्ञान से अपरिचित हों और इसीलिए ब्रह्मचारियों को उसका उपदेश न दिया गया हो।
पिता ने अपने पुत्र को चकित देखकर कहा-’एक रजत खण्ड के ज्ञान से रजत का ज्ञान हो जाता है क्योंकि रजत के बने विभिन्न आभूषणों को भले ही किसी दूसरे नामों से पुकारा जाये पर उनमें यथार्थ रूप से तो रजत ही है, इसी प्रकार विभिन्न प्राणियों में भी एक शाश्वत सत्य के दर्शन होते हैं पर देखने के लिए आँखें चाहिए, यह चर्म चक्षु नहीं वरन् ‘ज्ञान चक्षु, विवेक चक्षु।’
बात को और सरल बनाने के लिए उन्होंने जल से भरा एक पात्र मँगाया उसमें नमक घोल दिया। पिता ने कहा- ‘बेटा! इसमें घुले नमक को बाहर निकालो।’ भला पानी में घुला नमक कहीं निकल सकता था? और न देखा ही जा सकता था?
अब उन्होंने उस जल पात्र को अपने पुत्र के ओठों से लगाते हुए कहा- ‘इसका एक घूँट पीकर देखो।
उसने एक घूँट भरा और कुल्ला कर दिया बिल्कुल नमकीन था। पिता ने फिर उस पात्र को घुमाकर दूसरी ओर से एक घूँट पीने के लिए कहा वह भी नमकीन था। नमक पड़े पानी का स्वाद नमकीन तो होगा ही भले ही एक ओर से पान किया जाये अथवा दूसरी ओर से।
पिता ने कहा - ‘अच्छा इस नमक की खोज कर सकते हो।’ श्वेतकेतु ने कहा- ‘पिताजी! मैं नमक नहीं देख रहा हूँ बल्कि मुझे इस पात्र में जल दिखाई दे रहा है।’
‘आयुष्मान्, ईश्वर भी संसार में समस्त प्राणियों में व्याप्त है पर उसके दर्शन नहीं होते। हाँ उसके अस्तित्व का अनुभव सभी को होता है। ईश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करने वाली इस आत्म विद्या के अभाव में सम्पूर्ण ज्ञान अधूरा रहता है।
आप कहें यह रात अँधेरी, मुझको लेकिन दिखता भोर।
दृष्टि आपकी है तारों पर, मेरी है पृथ्वी की ओर ॥
सत्ता की सीता जनमी थी, मिट्टी का मैलापन लेकर ।
जो मिट्टी के निकट रहे थे, उनको सत्ता गई न तजकर॥
बिछुड़ गये हैं जो सत्ता से, वे मिट्टी से कतराते हैं।
जो बन सकते धूल-धूसरित, युग के रथ पर चढ़ जाते हैं॥
यह रथ चलता जिधर, उधर ही, पथ ही पथ बनते जाते हैं।
पथ से हटकर चलें पथिक यदि, कभी न मञ्जिल वे पाते हैं॥
इस रथ की ध्वनि में, गति-गति में, जन-बल अपने गीत गा रहा।
जितने दूर रहोगे इससे यह स्वर उतना निकट आ रहा ॥
आप कहें यह कोलाहल, पर मिट्टी गूँथ रही है डोर।
आप हो रहे विचलित जिससे, वर्तमान का सत्य कठोर॥
सत्ता बिकती कभी नहीं है, सदा वरण की जाती है ।
इसे भोगते जो संयम से, उनकी ही जय-जय होती है॥
यह साधन की खुद जननी है, इसके स्वामी कभी न साधन।
समय स्वयं इसका प्रहरी है, जन-गण है इसका सिंहासन॥
जिनको यह आसन पाना है, उनको जनता तक जाना है।
जनता कामधेनु इस युग की, उसने सबको पहचाना है॥
यज्ञ-कुण्ड में जो जाते हैं, जलते रहते सौरभ बनने।
द्वार सभी के लिए खुले हैं, नहीं पराये कोई अपने॥
सत्ता सदा प्रज्ज्वलित रहती, तेजोमय करती नर नाहर।
किन्तु इसी की चिनगारी से जले, चले थे जो न सँभलकर॥
आप चाहते नहीं क्राँति पर, क्राँति सदा अनचाही होती ।
नए-नए युग-बोध उभरते, नए-नए यह सपने गोती ॥
आप कहें यह केवल आँधी, जन-मानस पर आत्मविभोर।
आप बँधे अपनी साया में, यह है परिवर्तन का दौर॥
आप कहें यह रात अँधेरी, मुझको लेकिन दिखता भोर।
दृष्टि आपकी है तारों पर, मेरी है पृथ्वी की ओर॥
(रामनिवास जाजू)
*समाप्त*