मनुष्य को सोचने और करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। उसका उपयोग भली या बुरी, सही या गलत किसी भी दिशा में वह स्वेच्छापूर्वक कर सकता है। भव बंधन में बँधना भी उसका स्वतन्त्र कर्तृत्व ही है। इसमें माया, प्रारब्ध, शैतान, ग्रह, नक्षत्र आदि किसी अन्य का कोई दोष या हस्तक्षेप नहीं है। जीवन के स्वरूप और उद्देश्य से अपरिचित व्यक्ति भौतिक लालसाओं और लिप्साओं में स्वतः आबद्ध होता है। वह चाहे तो अपनी मान्यता और दिशा बदल भी सकता है और जिस तरह बंधनों को अपने इर्द गिर्द लपेटा था उसी प्रकार उनसे मुक्त भी हो सकता है।
रेशम का कीड़ा अपना खोल आप बुनता है और उसी में बँधकर रह जाता है। मकड़ी को बंधन में बाँधने वाला जाल उसका अपना ही तना हुआ होता है। इसे उनकी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। जब रेशम का कीड़ा खोल में से निकलने की बात सोचता है तो बुनने की तरह उसे कुतर डालने में भी कुछ कठिनाई नहीं होती। मकड़ी अपने फैलाये जाले को जब चाहे तब समेट भी सकती है। इन्द्रिय लिप्साओं और ममता, अहंता को प्रधानता देकर मनुष्य शोक-सन्ताप की विपन्नता में ग्रस्त होता है। यदि वह अपनी दिशा पलट ले तो जीवन मुक्त स्थिति का आनन्द प्राप्त करने में भी उसे कोई अड़चन प्रतीत न होगी।
समस्त विभूतियों से सम्पन्न मानव जीवन का अनुदान और सर्व तन्त्र स्वतन्त्रता का उपहार देकर भगवान ने अपने अनुग्रह का अन्त कर दिया। अब मनुष्य की बारी है कि वह सिद्ध कर दिखाये कि उसका सदुपयोग वह कर सकता है जो उसे दिया गया।
भोगा मेधवितानस्थविद्युल्लेखेव चञ्चलाः।
आयुरप्यग्निसन्तप्तलोहस्थजलबिन्दुवत्॥
यथा व्यालगलस्थोऽपि भेको दंशानपेक्षते।
तथा कालाहिना ग्रस्तो लोको भोगानशाश्वतान्
पितृमातृसुतभ्रातृदारबन्ध्वादिसं् गमः।
प्रपायामिव जन्तूनाँ नद्याँ काष्ठोधवच्चलः॥
छायेव लक्ष्मीश्चपला प्रतीता-
तारुण्यमम्बूर्मिवदध्रुवं च।
स्वप्नोपमं स्त्रीसुखमायुरल्पं-
तथापि जन्तोरभिमान एषः॥
-अध्यात्म रामायण
जीवन के भोग मेघ रूपी वितान में चमकती हुई बिजली के समान चंचल हैं और आयु अग्नि में तपाये हुए लोहे पर पड़ी हुई जल बिन्दू के समान क्षणिक है। जिस प्रकार सर्प के मुँह में पड़ा हुआ भी मेंढक मच्छरों को ताकता रहता है; उसी प्रकार लोग काल रूप सर्प से ग्रस्त हुए भी अनित्य भोगों को चाहते रहते हैं। पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धु-बान्धवों का संयोग प्याऊ पर एकत्रित हुए जीवों अथवा नदी प्रवाह से इकट्ठी हुई लकड़ियों के समान चञ्चल और यौवन जल तरंग के समान अनित्य है; स्त्री सुख स्वप्न के समान मिथ्या और आयु अत्यन्त अल्प है, जिस पर भी प्राणियों का इनमें कितना अभिमान है?
श्री भर्तृहरि कहते हैं -
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो -
न तप्तं वयमेवतप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा-
न जीर्णा वरमेव जीर्णा॥
हमने विषयों को तो भोगा नहीं उल्टे विषय ही ने हमें भोग लिया, हम तप न तपे पर तप ने हमें तपा दिया और समय नहीं बीता परन्तु हमारी आयु अलबत्ता व्यतीत हो गई। परन्तु इतने पर भी तृष्णा बुड्ढी नहीं हुई, बल्कि हमीं वृद्ध हो गये।
यत्रानेकः क्वचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यथैको।
यत्राप्येकस्तदनु वहवस्तत्र चान्ते न चैकः॥
इत्थं चेमौरजनि दिवसौ दोलयन् द्वाविवाक्षौ।
कालः काल्या सह बहुकलः क्रीड़ति प्राणसारै॥
जिस घर में एक थे, वहाँ अनेक देख पड़ते हैं और जहाँ अनेक थे वहाँ अब एक है। मालूम होता है, काल रात-दिन के पासे संसार रूपी चौपड़ के खेल में प्राणियों की गोटी बनाकर अपनी कालतत्व शक्ति के साथ खेल रहा है।
बालिभिर्मुखमा क्रान्तं पलितैरंकितंशिरः।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णै का करुणायते॥
मुँह के चमड़े सिकुड़ गये, सिर के बाल पक गये और अंग शिथिल हो गये पर एक तृष्णा ही ऐसी है जो युवा होती जाती है।
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरा यौवनं।
हन्ताँगेषु गुणाश्च वन्धयफलता यातागुणज्ञैबिना॥
किं युक्तं सहसाभ्युपैति बलवान् कालः कृतान्तोऽक्षमी।
ह्याज्ञातंस्मरशासनाँघ्रियुगलं मुक्तास्तिनान्यागतिः॥
सभी मनोरथ हृदय में जीर्ण जीर्ण हो गये, कुछ सिद्ध न हुआ और जवानी बीत गई, मेरे सारे गुण बिना गुण ग्राहक के व्यर्थ हुए और सर्वनाशी भयंकर काल समीप आ रहा है; ऐसे समय में बिना शिवजी के चरण के कोई दूसरी गति नहीं है।
व्याघ्रीव तिष्ठित जरा परितर्जयन्ती।
रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम्॥
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो।
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्॥
बुढ़ापा बाघिनी सी डाँट रही है, रोग शत्रुओं के समान देह पर दण्ड प्रहार कर रहे हैं, आयु दिन दिन घटती जाती है, जैसे फूटे घड़े से जल निकलता जाता है, तिस पर भी वही काम करते हैं जिससे हमारा नुकसान हो।
मोह और प्रेम में वही अन्तर है जो काया और छाया में होता है। छाया तो काया से मिलती-जुलती तो होती है पर उसमें न तो जीवन होता है और न बल। फोटो देखकर आभास तो मूल मनुष्य का होता है पर उस कागज के टुकड़े से प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। मोह में जलन भर होती है पर वह प्रकाश और उल्लास नहीं होता जो प्रेम में पाया जाता है।
प्रेम में प्रेमास्पद की प्रसन्नता का ध्यान रखा जाता है। मोह में प्रेम को अपनी इच्छानुसार चलाने की ललक रहती है। मोह तब प्राप्त होता है जब मनोरथ की पूर्ति होती है, उसमें व्यवधान आने पर खीज और झूँझल का उद्वेग उमड़ता है इसके विपरीत प्रेम में चाहने का, पाने का कोई प्रश्न ही नहीं रहता। जिसमें प्रेमास्पद को सुविधा और प्रसन्नता अनुभव हो वही सोचना उचित लगता है और वही करने की आकाँक्षा उठती है। मोह में प्रेमास्पद पर यह दबाव डाला जाता है कि वह इच्छानुकूल कार्य करे पर प्रेम में अपने को ही उसके संकेतों पर चलने एवं ढलने के लिए उत्साह उमड़ता है।
मोह अन्धकार में भटकता है। उसमें भय, आशंका, असफलता की सम्भावना बनी रहती है पर प्रेम तो शाश्वत है उसमें सफलता के अतिरिक्त और कहीं कुछ भी नहीं। प्रेम एकाँगी होता है। वह अपने पक्ष में ही परिपूर्ण होता है। दूसरा उसे स्वीकार करता है या अस्वीकार इससे सच्चे प्रेमी की स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता।
मूर्ति पूजा-प्रेम योग साधना का एक उत्कृष्ट माध्यम है। भक्त इष्टदेव की प्रतिमा पर अपनी श्रद्धा भक्ति का आरोपण करता ही चला जाता है। वह यह नहीं देखता कि प्रतिमा ने प्रत्युत्तर दिया या नहीं। मूर्ति सदा मौन ही रहती है कभी बदले में प्रेम प्रदर्शित नहीं करती तो भक्त के मन पर उसकी कोई बुरी प्रतिक्रिया नहीं होती। वह अपने प्रेम पक्ष को अपने में पूर्ण मानता है और विश्वास करता है कि प्रतिमा का कोई प्रत्युत्तर न मिलने पर भी उसकी साधना की प्रगति में कोई अन्तर-आने वाला नहीं है। मीरा के “गिरधर गोपाल” एकांगी थे। पाषाण प्रतिमा में से जीवन्त कृष्ण का सृजन मीरा की एकांगी श्रद्धा ने ही सम्पन्न कर लिया था। एकलव्य की साधना में यह तथ्य और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है।
प्रेम अपने आप में आनन्द से ओत-प्रोत है। उसकी उपलब्धि के बाद और कुछ पाने योग्य रह ही नहीं जाता। प्रेम अपने अतिरिक्त और कुछ किसी को नहीं देता और वह प्रेमी की अहंता से कम कुछ मूल्य भी स्वीकार नहीं करता। कामनाओं के जाल में मोहासक्ति ही उलझी रहती है। जो चाहता है वह प्रेमी नहीं हो सकता। लेन-देन की यदि कुछ प्रेमी और प्रेमास्पद के बीच गुंजाइश भी है तो इतनी ही कि वह दिया हुआ दुःख शिरोधार्य करता है और अपने सुखों को निछावर करने से पीछे नहीं हटता। प्रियतम का दिया दुख लेकर तपस्वी बन जाता है और उसे अपना सुख देकर त्यागी की पंक्ति में बैठने की पात्रता प्राप्त होती है।
दिव्य प्रेम की परिणति आत्मदान में होती है। आत्मदान और दिव्य प्रेम को अन्योन्याश्रित समझा जाना चाहिये। परमेश्वर को देने के लिये मनुष्य के पास पवित्र प्रेम के अतिरिक्त और कुछ अपनी वस्तु है भी नहीं। पदार्थ तो प्रकृति के हैं, प्रकृति परमेश्वर की। कोई वस्तु ऐसी नहीं जिसे हम अपनी कह सकें और परमेश्वर को अर्पण कर सकें। यदि प्रेम रहित मनः स्थिति में अपने वैभव का थोड़ा सा अंश दे भी दें तो उतने से परमेश्वर को सन्तोष नहीं हो सकता। प्रियतम की तृप्ति आत्मदान से ओत-प्रोत दिव्य प्रेम के बिना हो ही नहीं सकती। जहाँ प्रेम और आत्मदान के साथ समग्र वैभव भी जुड़ा होता है वहाँ आत्मदानी का ऐसा कुछ बनता ही नहीं जो उसने प्रियतम के चरणों पर अर्पण न कर दिया हो, आत्मदानी के धन, यश, वैभव, विलास, मन, मस्तिष्क आदि का उपयोग परमेश्वर के लिए-उसके संकेतों पर निछावर करने के लिए ही सुरक्षित रहता है, इसमें कम में न प्रेम की पूर्णता होती है और न प्रेमास्पद को सन्तोष।
दिव्य प्रेम अनवरत होता है। उसके लिए अलग से समय निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस प्रकार अपने शरीर मन का क्रिया-कलाप हर घड़ी ध्यान में रहता है इसी प्रकार प्रेमी भी रोम-रोम में समाया रहता है, उसी के लिये सारी क्रियाएं होती हैं, उसी को प्रसन्न करने के लिये मस्तिष्क सोचता है। ऐसी दशा में हर घड़ी उसी का स्मरण भजन होता रहता है। सच्चा स्मरण वही है जिसमें और सब कुछ विस्मरण हो जाय यहाँ तक कि अपना आपा भी। जीवन, मरण, व्यय और संग्रह सब कुछ जिसमें प्रियतम के लिये होता रहे उसी को समर्पित जीवन कह सकते हैं। मोह से निवृत्ति पाने के लिए दिव्य प्रेम की आवश्यकता है। जहाँ सच्चा प्रेम होगा वहाँ मोह नहीं रहेगा और जहाँ मोह का साम्राज्य होगा वहाँ प्रेम का प्रकाश उदय न हो सकेगा।
प्रेमी न तो लोभ या भय दिखाकर प्रेमास्पद को आकर्षित करता है और न स्वयं इनके कारण उसकी और आकर्षित होता है। ईश्वर हमारी मनोकामना पूर्ण करे अथवा उसका अनुग्रह पाप कर्मों के दण्ड से बचा दे इस प्रकार भय और लोभ के कारण की जाने वाली भक्ति उपहासास्पद है उसमें वह उत्कृष्टता कहाँ रही सकती है जिससे आत्मा का अजस्र आनन्द और सन्तोष की उपलब्धि होती है। स्वर्ग का लोभ और नरक का भय भी जिसे प्रभावित न करे- जो अपने आप में सरल स्वाभाविक हो, आत्मोल्लास ही जिसका लक्ष्य हो, दिव्य प्रेम उसी को कहा जाना चाहिए। जिससे सिद्धियों की कामना हो उसे भी भक्ति की संज्ञा में नहीं गिनना चाहिए। प्रेम के उदय के साथ-साथ मिलन की जो उत्कंठा प्रबल होती है उसे द्वैत के अद्वैत में परिवर्तित होने की भावनात्मक तितीक्षा और तप साधना ही कहना चाहिए।
प्रेम का अभ्यास एक बिन्दू से आरम्भ किया जा सकता है पर उतने तक वह सीमित नहीं रह सकता, इष्टदेव को लक्ष्य बनाकर उसका शुभारम्भ श्रीगणेश किया जा सकता है। किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रेमास्पद वरण किया जा सकता है। पर दिव्य प्रेम उतनी छोटी परिधि में सीमाबद्ध नहीं रह सकता। बत्ती जलाकर प्रकाश उत्पन्न करने की प्रक्रिया सही है पर प्रकाश को बत्ती में ही सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता वह समीपवर्ती क्षेत्र में फैले बिना, बिखरे बिना रह ही नहीं सकता। प्रेम असीम है। जो उसका साधना करेगा वह किसी व्यक्ति या देवता तक अपने भाव विस्तार को सीमाबद्ध नहीं कर सकता। चन्दन वृक्ष से उद्भूत गन्ध की तरह प्रेम भावना निरन्तर विस्तृत होती रहती है और उसका रसास्वादन करने का उस क्षेत्र के प्रत्येक प्राणधारी को अवसर मिलता है। प्रेम का विस्तार सहृदयता, सज्जनता, सहानुभूति, उदारता, करुणा, सेवा और आत्मीयता की सद्भावनाओं में विस्तृत होता चला जाता है। प्रेमी की सहज प्रवृत्ति यह होती है कि दूसरों के दुखों को बाँट लेने के लिए अपने सुखों को वितरित करने के लिए आतुरता एवं अनुकूलता अनुभव करे।
ईश्वरीय कृपा मानवीय संकल्प के बिना कुछ नहीं कर सकती; न मानवीय संकल्प ईश्वरीय कृपा के बिना कुछ कर सकता है।
- सन्त जान क्राइसोस्टोम
परमेश्वर किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। न उसका कोई विशेष रूप स्थान है। यह विश्व ब्रह्माण्ड ही परमात्मा है। आत्माओं का समन्वित स्वरूप ही परमात्मा कहा जाता है। उसी से दिव्य प्रेम किया जा सकता है। समष्टि के अनुदान से ही व्यक्ति का जन्म और विकास होता है इसलिए उसी को पालनकर्ता माना जाता है। समाज के स्नेह सहयोग में ईश्वर की महिमा झाँकती हुई देखी जाती है और उस समष्टि आत्मा को प्रेमास्पद मानकर ही सार्थक भक्ति का परिचय दिया जाता है। स्वार्थ को परमार्थ पर उत्कर्ष करें। समाज की आवश्यकताओं पर अपनी विभूतियाँ निछावर करने की तैयारी करें तो समझना चाहिए दिव्य प्रेम को चरितार्थ करने की प्रक्रिया विदित हो गई। परमेश्वर की भक्ति कल्पना जगत में विचरण करने वाली भावुकता नहीं वरन् वह कठोर सचाई है, जिसमें मनुष्य व्यक्तिवाद का परित्याग कर समाजवादी बनता है। यही है ईश्वर भक्ति और प्रेम साधना का तत्व ज्ञान।
मोटी आँखों से जब हम अपने चारों ओर नजर उठाकर देखते हैं तो जमीन, पेड़, खेत, आसमान, सूरज, तारे जैसी मोटी वस्तुयें ही देखकर रह जाते हैं। जब बारीकी के साथ खोज-बीन करते हैं तब पता चलता है कि हम प्रचण्ड शक्ति से भरे पूरे एक ऐसे समुद्र में मछली की तरह तैर रहे हैं जिसके एक-एक कण को अद्भुत और आश्चर्यजनक कहा जा सकता है।
मिट्टी का एक ढेला, छदाम से भी कम कीमत का होता है। उसमें अणु परमाणुओं की एक अगणित संख्या रहती है, ऐसी दशा में मूल्य और महत्व की दृष्टि से उसकी कीमत नगण्य ही होगी। छोटे ढेले के प्रहार का परिणाम स्वल्प सा होता है, फिर हाथ से छूने और आँख से देखने तक में न आने वाले परमाणु की प्रतिक्रिया ही कितनी हो सकती है?
यह मोटी दृष्टि हुई। शक्ति के अनन्त भाण्डागार की प्रत्येक छोटी इकाई अपने आप में इतनी महत्ता संजोये बैठी है कि दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। जब एक कण का यह हाल है तो फिर इन अगणित इकाइयों के पुञ्ज की सत्ता और महत्ता को किस प्रकार समझा और आँका जाय।
अति लघु से अति विशाल कितना बड़ा है। इसकी गणना तो दूर, कल्पना कर सकना भी मानवी बुद्धि से बाहर की बात है। परमाणु भी अब सबसे छोटी इकाई नहीं रही। उनके भी भेद उपभेद हैं। वह भी एक सौरमण्डल है और इस सबसे छोटी इकाई की सूक्ष्मता के अंतर्गत अपना एक अलग संसार भरा और बसा पड़ा है। उसकी अद्भुतता विराट् ब्रह्माण्ड की विलक्षणता से कम रहस्यमय है।
फिर विराट् कितना बड़ा है? इसकी थोड़ी कल्पना करने के लिये पहले उस दूरी का नाप लेने के फीते का स्वरूप समझना चाहिए। प्रकाश एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील चलता है। यह प्रकाश समस्त पृथ्वी का एक चक्कर एक सेकिण्ड के सातवें हिस्से जैसे स्वल्प समय में लगा लेता है। पृथ्वी से चन्द्रमा तक पहुँचने में डेढ़ मिनट और सूर्य तक पहुँचने में आठ मिनट लगते हैं। यह है प्रकाश की चाल, इस चाल से चलते हुए एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तक पहुँच सके वह हुआ एक प्रकाश वर्ष। खगोल भौतिक में गणना का माप यह प्रकाश वर्ष ही है।
हमारे सबसे निकट का तारा प्रोक्सिमा सेन्टोरी चार प्रकाश वर्ष मील दूर है। ऐसे तारों में एक सूर्य भी है जिसके सौर परिवार में अपनी पृथ्वी जुड़ी हुई है। अपनी आकाश गंगा जिसमें ऐसे-ऐसे हजारों तारे हैं उसका नाम मन्दाकिनी है। मन्दाकिनी आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाश वर्ष है।
अपनी आकाश गंगा ध्रुव द्वीप की 19 आकाश गंगाओं में से एक है। पर ऐसे ध्रुव द्वीप भी विराट में असंख्य बिखरे पड़े हैं। माउण्ट पैलोमर पर लगी हुई 200 इंच व्यास के लेंस वाली संसार की सबसे बड़ी ‘हाले’ दूरबीन से पता लगाया गया है कि विराट् में कम से कम एक अरब आकाश गंगाएं हैं।
एक के ऊपर एक रखते हुए परमाणुओं की एक सीधी रेखा खड़ी की जाय तो मनुष्य की ऊँचाई तक पहुँचने में 10 अरब परमाणुओं की एक विशाल शृंखला होगी मनुष्य के शरीर में कुल मिलाकर 7 के ऊपर 20 शून्य लगा दिये जायें तो उसकी संख्या जितनी होती है उतने परमाणु होते हैं। जब एक मनुष्य का शरीर इतने परमाणुओं का समूह है तो धरती के सम्पूर्ण व्यास में कितने परमाणु होंगे इसकी गणना या कल्पना करना गणित शास्त्र की परिधि से आगे निकल जाता है। फिर प्रश्न पृथ्वी का ही कहाँ रहा। बात विराट् ब्रह्माण्ड की हो रही है। धरती सौरमण्डल का एक नन्हा सा ग्रह-सूर्य एक तारा-ऐसे तारों की लाखों की संख्या वाली अपनी आकाश गंगा और फिर एक अरब आकाश गंगाओं से भरा पूरा विराट् ब्रह्माण्ड। परमाणु के-उसके खण्डकों को सबसे छोटा मानें तो उसकी तुलना में यह विराट कितना बड़ा है यह गणित की अथवा कल्पना की परिधि में कैसे समा सकेगा।
विज्ञानी नीत्सेवोर कहते थे अस्तित्व के विशाल नाटक में हम ही अभिनेता हैं और हम ही दर्शक हैं। मनुष्य अपने आप में एक रहस्य है। मानवी कलेवर शरीर और मस्तिष्क उन्हीं तत्वों से बना है जिनसे कि वह ब्रह्माण्ड। अपने आपको खोज और ब्रह्माण्ड की खोज में असाधारण साम्य है। अणु की रचनात्मक शक्ति का अभी विकास नहीं किया गया और विनाशोन्मुख मानवी चित्त वृत्ति केवल ध्वंस सोचती है और उसी का उपक्रम खड़ा करती है। अस्तु अणु की शक्ति को अभी ध्वंसात्मक बमों की परिभाषा के अंतर्गत ही देखा समझा जाता है। उसकी सृजनात्मक शक्ति का जब सृजनोन्मुख मनुष्य उपयोग करेगा तब पता चलेगा कि उसकी सृजन सम्भावना ध्वंस से कम नहीं वरन् अधिक ही है।
अणु बम तथा हाइड्रोजन बम चार प्रकार की हानियाँ पहुँचाते हैं (1) धमक (2) ताप (3) आरम्भिक न्यूक्लीय अभिक्रिया (4) रेडियो सक्रिय विकरण। औसत बम की धमक से 6 मील के घेरे की वस्तुओं का पूर्ण विनाश, 12 मील तक भयंकर क्षति अति 25 मील तक आँशिक हानि होती है। ताप का प्रभाव 10 मील की परिधि में 95 प्रतिशत प्राणियों की तत्काल मृत्यु हो जाती है। 17 मील के घेरे में लोग भयंकर रूप से बीमार अथवा ऐसे अपंग हो जायेंगे जिनका जीना मरने से भी महंगा पड़ेगा। 30 राण्टजेन इकाई का रेडियो विकरण मनुष्य को घुला घुला कर मारता है और उन्हें जल्दी ही मौत के मुँह में धकेल देता है। यह विकरण वर्षा की तरह धूलि के रूप में बरसता है और 12 मील तक 5000 (र. शक्ति) से- 100 मील तक 2300 की शक्ति से 170 मील तक 500 की शक्ति से और 250 मील तक 30 र. की शक्ति से बरसता है। यह 30 र. शक्ति भी 250 मील के घेरे को ऐसा बना देती है जिसमें रहना प्राण संकट का खता मोल लेना है।
यह विकरण धूलि घूम फिरकर समुद्र में पहुँचती है। जल जन्तु उससे प्रभावित होकर बीमार पड़ते हैं जल और मरते हैं। वह जल बादल बनेगा और जमीन पर बरसेगा। यह विकरण प्रभाव उनमें भी प्रवेश करेगा। वर्षा का जल ही तो कुएँ, तालाब, नदी आदि के माध्यम से प्राणी पीते हैं। वर्षा का जल ही तो घास-पात और वृक्ष वनस्पतियों का जीवन है। अन्न शाक और फल वर्षा के कारण ही उगते, बढ़ते और फलते हैं। इन सबमें जब विषाक्तता हो जायेगी तो मनुष्य का शरीर ही नहीं-मन भी विषैला हो जायेगा और वह साँप की तरह अपनी साँस से विषाक्त फुसकारें छोड़ता हुआ एक दूसरे के प्राण हरण का प्रयास करेगा।
यदि इस शरीर में परमात्मा को जान लिया तो बहुत ही श्रेष्ठ है, यदि नहीं जाना तो महान अनिष्ट है, इस कारण बुद्धिमान पुरुष इस शरीर में घट घट वासी परब्रह्म को जानकर सदा के लिए अमर हो जाता है।
(केन. 2-5)
यह ध्वंसात्मक परिचय हुआ। सृजन की सम्भावनाओं में कितनी ही बातें ऐसी स्वीकार करली गईं हैं जो वैज्ञानिक प्रयासों में अगले ही दिनों साकार हो जायेंगी। सर्दी-गर्मी वर्षा ऋतुओं में हेर-फेर करना मानवीय इच्छा के अंतर्गत आ जायेगा। समुद्र की अथाह जल राशि से उसके खारेपन को विलग करके मीठा पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध किया जा सकेगा। मरुस्थल तथा ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी और अनुत्पादक भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकेगा। समुद्र में वनस्पतियाँ उगाकर आहार की समस्या का समाधान सम्भव होगा। मानुषी श्रम का बोझ बिजली संभाल लेगी और लोग केवल मनोरंजन जैसा श्रम करके गुजर कर लिया करेंगे। संसार के एक कौने में रहने वाले मनुष्यों का संपर्क दूसरे छोर पर रहने वाले के साथ क्षण भर में स्थापित हो सकेगा आदि आदि।
मौसम को मनुष्य की आवश्यकता के अनुरूप बनाया जा सके इसका आधार तो विदित हो गया है और इस सम्भावना को स्वीकार कर लिया गया है। प्रश्न खर्चे का है। यदि उतने साधन उपकरण जुटाये जा सकें तो निस्सन्देह मौसम को इच्छानुकूल बना लेना मनुष्य के हाथ में होगा। दुनिया में सारी हवा को इच्छानुसार बहाया जा सकता है। पर उसके लिए हर दिन इतनी शक्ति का प्रयोग करना होगा जितनी दस लाख परमाणु बमों के विस्फोट से उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में एक सेन्टीग्रेड तापमान बढ़ाना हो तो दो हजार परमाणु बम विस्फोट जितनी शक्ति चाहिए। मध्यम श्रेणी के तूफान को रोकने में मेगाटन अणु शक्ति खर्च करनी पड़ेगी।
इतनी शक्ति जुटाकर मौसम को सदा अनुकूल बनाये रखने के लायक शक्ति सम्पादित कर सकना, कम से कम इस शताब्दी में तो सम्भव नहीं ही हो सकेगा। इसलिए अभीष्ट ऋतु परिवर्तन की बात सोचने का अभी समय नहीं आया। अभी तो हमें इसी की तैयारी करनी चाहिए कि अपने को ऋतुओं के अनुकूल ढालें और उनके प्रभावों से कोई संकट उत्पन्न होने से पूर्व उसकी रोक-थाम कर लें। स्वास्थ्य रक्षा के लिए जिस प्रकार कपड़े, मकान, छाता, हीटर, कूलर आदि का प्रबन्ध करते हैं उसी तरह भूमि और वनस्पतियों पर पड़ने वाले ऋतु प्रभाव से कोई संकट उत्पन्न होता हो तो उसकी रोकथाम करें। भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि की पूर्व सूचनाएं यदि प्राप्त की जा सकें तो उस चेतावनी के आधार पर आपत्ति से बचाव के लिए बहुत कुछ सोचा-और बहुत कुछ किया जा सकता है। इसके लिए एन्टीना उपग्रह एक डेढ़ हजार किलोमीटर की ऊँचाई पर निरन्तर पृथ्वी की परिक्रमा करते रहने के लिए भेजे गये हैं, वे उपलब्ध सूचनाएं भेजकर धरती निवासियों को मौसम की तात्कालिक सम्भावनाओं से अवगत करते रहते हैं। इस उपग्रह में ऑटोमेटिक पिक्चर ट्रांसमिशन और फ्रीक्वेन्सी माडलेटेड ट्रान्समीटर लगे रहते हैं और उनके आधार पर इस प्रयोग के लिए संसार भर में स्थापित साठ वेधशालाओं में चित्र आते रहते हैं। उन्हीं के आधार पर मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ की जाती रहती हैं।
प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि मौसम को अनुकूल बनाने और बदलने में इतनी प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी तो अनागत क्रम से जो ऋतु परिवर्तन होते रहते हैं। वे अनायास ही क्यों होते होंगे? उनके लिये भी किसी अतिरिक्त शक्ति स्रोत की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती होगी? बात सही है। शक्ति के बिना कोई हलचल नहीं हो सकती। शरीर से लेकर संसार के किसी भी काम को देखा जा सकता है। हलचलें शक्ति की ही प्रतिक्रिया हैं। अशक्तता और गतिहीनता एक ही बात है। शक्ति बिना किसी भी स्तर की गति नहीं हो सकती है, फिर ऋतु परिवर्तन जैसी उलट-पुलट अनायास ही कैसे हो सकती है।
सूर्य द्वारा प्रतिक्षण, ताप एवं प्रकाश के रूप में प्रचण्ड ऊर्जा प्रवाहित होती है। उनका बहुत बड़ा विकरण अंश पृथ्वी के ऊपर की विरल परतों द्वारा सोख लिया जाता है और उस संग्रहीत विकिरण भण्डार में से छन छनकर जो ऊर्जा सघन वायुमण्डल में आती है उसी के आधार पर मौसम बदलता है। वायुमण्डल की सघन परत-ऊपर की विरल परत से जब, जितनी जिस प्रकार प्रभावित होगी ऋतु परिवर्तन का उतना ही स्वरूप सामने आवेगा। कहना न होगा कि सूर्य विकिरण से सञ्चित ऊर्जा विरल परत पर इतनी अधिक है कि यदि किसी प्रकार वह सघन परत को चीरकर ज्यों की ज्यों नीचे उतर आये तो इस धरती को क्षण भर में भून-भान कर रख दे।
यह कुछ थोड़ी-सी सम्भावनाएं हैं जो अणु शक्ति के सृजनात्मक सदुपयोग द्वारा अगले दिनों सहज ही उपलब्ध की जा सकेंगी। फिर यह भी याद रखना चाहिए कि केवल अणु शक्ति की विस्फोट परक ही एक नहीं है। अग्नि, जल, वायु, आकाश चार तत्वों की अनेक ऐसी प्रचण्ड शक्ति हैं जिनके माध्यम से इतना कुछ हो सकता है जिससे स्वर्ग की पौराणिक कल्पनाओं की तुलना में न्यून नहीं वरन् अधिक ही कहा जा सके।
मोटी आँख से देखने पर विश्व के दृश्यमान पदार्थों का मूल्याँकन अकिंचन ही ठहरता है पर गहन स्तर पर उतरने से उसकी क्षमता असामान्य सिद्ध होती है। ठीक इसी प्रकार हाड़-माँस का पुतला मनुष्य दीखता भर तुच्छ है, वस्तुतः इसकी महत्ता इतनी बड़ी है कि यह अपनी समग्र शक्ति का उपयोग कर सकने में समर्थ हो तो दूसरा परमेश्वर सिद्ध हो सकता है।
प्राचीन और अर्वाचीन की दीवार सत्य और असत्य के निर्णय में सहायक नहीं हो सकती। पुराना अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। जो नया है उसमें उपयुक्त भी है और अनुपयुक्त भी। यह परख विवेक एवं गुण अवगुण की कसौटी पर की जानी चाहिए। उसमें नये और पुराने का पक्षपात, नहीं रखा जाना चाहिए। जो पुराना सो अच्छा जो नया सा बुरा यह कोई तथ्य नहीं। इसके लिए दुराग्रह करने पर हम सत्य के निकट नहीं पहुँचते वरन् उससे दूर ही हटते जाते हैं।
पुराने समय के लोग सत्य की शोध में जितने सफल हुए उसे अन्तिम नहीं मान लेना चाहिए। वरन् यह समझकर चलना चाहिए सत्य के परम लक्ष्य तक पहुँचने में अभी लम्बी मंजिल पार करनी है और उस पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ही बढ़ते चलना पड़ेगा। जो निष्कर्ष पूर्वजों ने निकाले वे अन्तिम नहीं थे। उसने भावी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। यह मानकर नहीं चलना चाहिए। एक समय पर परिस्थिति में जो बात उपयुक्त जँचती है उसमें आगे चलकर सुधार करना पड़ सकता है। ऐसा विशाल दृष्टिकोण रखकर ही सत्य की शोध में प्रगति हो सकती है।
किसी जमाने में पृथ्वी को चपटी-ब्रह्माण्ड का केन्द्र, स्थिर माना जाता था। ग्रह गणित का खाँचा इस मान्यता पर भी फिट बैठ गया। पीछे उस ज्ञान में प्रगति हुई। पृथ्वी को गोल असंख्य सौर मण्डलों में से अपने आदित्य सूर्य का छोटा ग्रह पाँच गतियों में भ्रमण करने वाला माना गया। पुराने आग्रह पर अड़े रहना आवश्यक नहीं चन्द्रमा सौरमण्डल का स्वतंत्र ग्रह है इसी बात पर अड़े रहने से कुछ लाभ नहीं। चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है, इस तथ्य से इनकार करके यदि पुरातन वादी ही बने रहे तो सत्य से विमुख ही अपने को सिद्ध करेंगे।
अनेक प्राचीन सिद्धान्त सही हैं। वे प्राचीन जैसे काल में सत्य थे उपयोगी थे वैसे ही आज भी यथावत हैं। सत्य न्याय, प्रेम, समय, सद्व्यवहार की उपयोगिता भूतकाल की तरह वर्तमान में भी अक्षुण्ण है। सत्य के लिए काल का आग्रह उचित नहीं। तन ढ़कने की आवश्यकता प्राचीन काल में समझी गई थी वह तथ्य आज भी यथा स्थान है। पर पोशाक जिस तरह की पुराने लोग पहनते थे वैसी ही आज भी पहनी जाय यह आवश्यक नहीं।
सर्दी के दिनों में भारी और गर्मी में हलके वस्त्र पहनने पड़ते हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ वस्त्रों का स्तर बदल जाता है। बदली हुई परिस्थिति का ध्यान न रखकर यदि कोई व्यक्ति पूर्व परम्परा का पालन करे और एक ही तरह के वस्त्र हर ऋतु में पहनने के लिए अड़ा रहे तो उसे बुद्धिमान नहीं कहा जायेगा। भले ही वह अपने को पुरातन पंथी मानता रहे।
समयानुसार कितनी ही प्रथा परम्पराओं में भारी हेर फेर होता रहा है। सघन वन प्रदेशों में कृषि और पशु पालन के लिए भूमि और जल की व्यवस्था देखकर लोग किसी जमाने में बिखरे हुए छोटे गाँव बसा कर रहते थे। हिंसक पशुओं और दस्युओं से जूझने के लिए आजीविका के लिए बड़े कुटुम्ब की आवश्यकता पड़ती थी। उन दिनों बहु पत्नी प्रथा तथा अधिक सन्तान को सौभाग्य चिन्ह मानने का कारण था। तब उन्हें उचित समझा जाता था। आज के विकसित समाज में बहुपत्नी प्रथा अवाँछनीय हो गई और जनसंख्या बढ़ने से संतान निग्रह की आवश्यकता अनुभव हुई। पुरानी मान्यता को बदलने के लिए समय ने हमें विवश कर दिया है। अब पूर्वाग्रह के लिए अड़ने वाला परम्परावादी अदूरदर्शी ही माना जायेगा।
पुरानी रस-भस्में अच्छी मानी जाती हैं पर पुराना घी कोई नहीं खाता। एक समय की उपयोगी वस्तुएं समयानुसार निरर्थक हो जाती हैं तब उसे सुधारने या बदलने की आवश्यकता पड़ती है। मान्यताओं और परम्पराओं में भी हेर फेर होते रहने का क्रम अनादि काल से चल रहा है। उसके लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला हुआ ही रखना चाहिए।
असत्य और अनाचार के सामाजिक एवं शासकीय दण्ड से बचा जा सकता है। चतुरता के ऐसे अनेकों तरीके निकाल लिये जाते हैं, जिनसे अपराधी दुराचरण करने वाले का पता ही न चले। पता चल भी जाय तो पुलिस, कानून, अदालत को बहका देने और बच निकलने के भी हजार रास्ते बना लिये जाते हैं।
अनाचारी जीवन के प्रति बरतने वाली जनसाधारण की घृणा को हलका या निरस्त करने के लिए ऐसे लोग कभी-कभी कोई दान पुण्य जैसा बड़ा विज्ञापन खड़ा कर देते हैं। उससे लोगों की आँखें चौंधिया जाती है, निरन्तर किये गये कुकृत्य भुला दिये जाते हैं और वह एक पुण्य विज्ञापन लोगों की आँखों में छाया रहता है। भीतर से पापात्मा बाहर से धर्मात्मा बने रहने की कला भी अब बहुत विकसित हो गई है। सरकार की समाज की आँखों में धूल झोंकते हुए ज्ञान के साथ दुष्कर्म करते रहना बाहरी ढकोसला सज्जन का बनाये रहना अब व्यावहारिक चतुरता का एक अंग हो गया है। अपराधियों में से दस प्रतिशत भी नहीं पकड़े जाते, जो पकड़े जाते हैं उनमें से दस प्रतिशत भी समुचित दण्ड नहीं भुगतते। जिन्हें दण्ड मिलता है वे और भी अधिक ढीठ निर्लज्ज बनकर पूरी निर्भयता निश्चिन्तता के साथ वैसे ही कुकर्म करते हैं।
ऐसा अन्धेर चल पड़ने पर भी किसी को यह नहीं मान बैठना चाहिए कि पाप के दण्ड से पूर्णतया बचाव हो गया। भगवान के घर एक दिन जाना ही होगा और वहाँ न्याय की तुला पर तौला ही जायेगा। वहाँ चतुरता काम नहीं आती और कुकर्मी को कराहते हुए अपने कुकृत्यों का फल भोगना पड़ता है।
कुकृत्यों का लेखा-जोखा हमारा अचेतन मस्तिष्क भी नोट करता है। वहाँ ऐसी स्वसञ्चालित प्रक्रिया स्थापित है जो उन पाप अंकनों के आधार पर दुख दण्ड की व्यवस्थाएं यथावत् बनाती रहती है। शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में -स्वभाव की विकृति के कारण स्वजनों से मनोमालिन्य के रूप में अपने ही मनोविकारों से उत्पन्न विक्षेपों के रूप में अन्तः संस्थान बेतरह खिन्न उद्विग्न रहता है। बाहर के लोगों को प्रतीत भले ही न हो पर वह स्वयं अशान्त और बेचैन ही बना रहता है। नींद न आने से लेकर घबराहट भरी मनः स्थिति किसी नारकीय दण्ड से कम नहीं। जेलखानों में भी उतना शारीरिक कष्ट नहीं होता जितना मानसिक विक्षोभ। अपराधी प्रवृत्तियाँ अपने ही अचेतन मन के माध्यम से शारीरिक और मानसिक आधि व्याधियों से घेर देती हैं और कुकर्मी उस स्वसञ्चालित विधि विधान के आधार पर स्वयं ही दण्ड का भागी बनता रहता है।
क्रोध, आवेश, चिन्ता, भय, हर्षातिरेक, कामोत्तेजना आदि के अवसर पर नाड़ी संस्थान उत्तेजित हो उठता है। रक्तचाप बढ़ जाता है। श्वास की गति तीव्र हो जाती है। त्वचा की ऊष्णता में बढ़ोतरी होती है। यह सर्वविदित है।
ठीक इससे मिलता-जुलता एक अदृश्य आवेश्य उस समय होता है जब मनुष्य छिपाने का ठगने का, या झूठ बोलने, छल करने का प्रयत्न करता है। जानकारी को-मनःस्थिति को यथावत् प्रकट कर देने की प्रक्रिया सरल और सुगम है। उसमें किसी प्रकार का अतिरिक्त तनाव उत्पन्न नहीं होता। पर छिपाने में अपने सही व्यक्तित्व को दबाना पड़ता है। वास्तविकता को छिपाकर अन्य प्रकार की स्थिति प्रकट करने पर भीतर ही अन्तःसंघर्ष शुरू हो जाता है। स्वाभाविकता असली रूप में प्रकट होने के लिए प्रस्तुत रहती है। पर छल या दुराव के अवसर पर उस वास्तविकता को पूरी तरह दबाना पड़ता है और एक कल्पित स्थिति गढ़कर प्रकट करनी पड़ती है। इस गढ़ंत में बहुत मानसिक शक्ति खर्च होती है। उसमें भी ज्यादा दबाव तब पड़ता है जब अवास्तविकता को वास्तविकता जैसे ढंग से प्रकट करने का हाव-भाव, उच्चारण, कथन, उपक्रम एवं क्रम प्रवाह, इस तरह ढालना पड़ता है कि अभिनय खरा उतरे-पकड़ में न आवे। इस सारे क्रिया-कलाप में अन्तः चेतना को एक भारी सघन आन्तरिक संघर्ष में उलझना पड़ता है और इस उलझने का निश्चित रूप से चिन्तन केन्द्र पर भारी दबाव पड़ता है।
सच और झूठ का अन्तरंग स्थिति में इतना भारी अन्तर रहता है कि उसे पहचाना और पकड़ा जा सकता है। अभी-अभी विज्ञान ने इस प्रकार के मानसिक तनाव को अंकित करने के लिये एक अति सम्वेदनशील यन्त्र बनाया है- नाम है उसका ‘लाइ डिटेक्टर’। ब्लड प्रेशर हृदय गति नापने के यन्त्रों जैसा ही दीखता है मस्तिष्क पर टोपी की तरह इसके वाह्य उपकरण लग दिये जाते हैं और विचार प्रवाह की तरंगों का अंकन उस पर आरम्भ हो जाता है। झूँठ बोलने और न बोलने के बीच का अन्तर इन अंकनों के आधार पर स्पष्ट अंकित होता चलता है। फलतः यह जान लिया जाता है कि उस व्यक्ति ने जो उत्तर दिये वह गलत थे या सही।
अन्तर्द्वन्द्व और शारीरिक उत्तेजना से अथवा किसी मानसिक उत्तेजना से उत्पन्न तनाव में भौतिक अन्तर रहता है। अपराधी प्रश्नोत्तर के समय-अथवा इस मशीन के आतंक से घबरा भी सकता है और उसका मानसिक तनाव बढ़ सकता है पर वह बिल्कुल दूसरी तरह का होता है, झूँठ वाली स्थिति से सर्वथा भिन्न प्रकार का होता है।
झूँठ बोलने में चतुर व्यक्ति भी इस परीक्षण को झुठलाने में समर्थ नहीं हो सकता है। क्योंकि मस्तिष्क की बनावट के अनुसार सही जानकारी ही स्वाभाविक रीति से प्रकट हो सकती है। स्मृति केन्द्र यथावत् स्थिति में तभी काम कर सकते हैं जब जो कुछ जैसा है उसी रूप में कह दिया जाय। यथार्थता को तोड़ने मरोड़ने में मस्तिष्क को अतिरिक्त श्रम न करना पड़े यह हो ही नहीं सकता और उपरोक्त यन्त्र इतना सम्वेदनशील है कि उस मानसिक यथार्थता को मानसिक यथार्थता को पकड़े बिना रह ही नहीं सकता। इस माध्यम से मिथ्या साक्षी देने वाले अथवा छल-कपट का जाल रचने वालों की कलाई खुल जाना अब अधिक सरल हो सकेगा।
असत्य के बीच जब कभी सत्य स्थिति की चर्चा होती है तो मौन रहते हुए भी उस व्यक्ति के मनः क्षेत्र में एक अतिरिक्त हलकापन उभरता है। ऐसी दशा में कोई असत्य वादी यदि चुप रहकर सब कुछ छिपाये रहने का प्रयत्न करे तो भी उसकी चाल चलेगी नहीं। तब प्रश्नकर्त्ता स्वयं ही विभिन्न प्रकार के परस्पर विरोधी प्रश्न पूछता चला जायेगा और उन प्रश्नों को सुनकर मन की सहमति असहमति ‘लाइ डिटेक्टर’ पर अंकित होती जायगी। जैसे किसी व्यक्ति ने कानपुर के माल बाजार में चोरी की। तो अन्य बाजारों का नाम पूछते चलने पर चोर का मस्तिष्क अस्वीकृति अंकित करेगा पर जब माल बाजार कहा जायेगा तो अंकन बिल्कुल दूसरी तरह का होगा और उसमें स्वीकृति की सूचना होगी। इसी प्रकार साथियों के नाम चोरी का माल रखने का स्थान आदि भी कुशल प्रश्नकर्ता पूछता चला जाय और अपराधी चुप बैठा रहे तो मनः क्षेत्र की स्थिति और घटना क्रम की यथार्थता का भेद खुलता चला जायेगा।
जैसे लोहे का जंग उत्पन्न होकर उसी को खाता है, वैसे ही सदाचार का उल्लंघन करने वाले मनुष्य के अपने ही कर्म उसे दुर्गति को प्राप्त कराते हैं।
-धम्यपद
यन्त्र तो अब बना है। इससे पूर्व भी प्राचीन काल में इस तथ्य की जानकारी कुशल मनोविज्ञान वेत्ताओं को थी। बुखारा नगर में अब से कोई एक हजार वर्ष पूर्व अबूअलींइब्नसिना नामक दार्शनिक हुआ है। वह चिकित्सक भी था। उसकी विशेषता यह थी कि नाड़ी देखकर न केवल शरीर की वरन् मन की स्थिति भी प्रकट कर देता था। उसकी बातें आमतौर से सच ही निकलती थीं। एकबार उसने राजकुमार के अति रुग्ण हो जाने पर यह बता दिया था कि इसे अमुक स्थान की निवासी अमुक लड़की से प्यार है, उसके वियोग में ही उसकी यह दशा हुई है। जब वह कठिनाई दूर हो गई तो राजकुमार को अच्छा होने में देर न लगी। दूसरों को धोखा दे सकना सरल है पर अपने आपको धोखा कैसे दिया जा सकता है? अपने को तो अपनी वास्तविकता विदित होती है। अनुचित और अवाँछनीय कार्यों को छिपाना ही पड़ता है। छिपाया न जाय तो सामाजिक तिरस्कार और राज्य दण्ड का भागीदार बनना पड़ता है। वस्तु स्थिति से भिन्न तरह की बात प्रकट करने में दुहरा व्यक्तित्व बनता है। एक असली एक नकली दो आदमी एक ही शरीर मन में घुस बैठते हैं और एक म्यान में दो तलवार ठूँसने पर म्यान की जो दुर्गति होती है वही उस कुकर्मी की भी होती है।
सच्चा व्यक्ति दुष्टता की सारी गतिविधियों को जानता है यदि उसे काम करने दिया जाय तो सही बातें ही बाहर प्रकट करेगा। पर वैसा करने से तो सारा खेल बिगड़ता है। बाहर वालों को तो ऐसी जानकारी देनी है जिससे अपनी प्रामाणिकता और भलमनसाहत पर आँच न आती हो। उसके लिये एक झूँठ आदमी को अपने को अन्दर गढ़ना, बनाना पड़ता है। वह झूँठे विवरण सोचता है और उस पर रंग चढ़ाकर सचाई की तरह प्रकट करता है।
इतना होते हुए भी अचेतन मन वस्तुस्थिति से अवगत तो रहता ही है, दुराव, छल, पाखंड, प्रपञ्च की प्रतिक्रिया से स्वयं प्रभावित होता है, वह प्रतिक्रिया जब स्वसञ्चालित क्रम के अनुसार बीज से अंकुर की तरह फलित होती है तो वे शारीरिक, मानसिक विक्षोभ सामने आ खड़े होते हैं जिन्हें अनायास आगत माना जाता है। वस्तुतः अनायास, संयोगवश, भाग्य से, ईश्वर की इच्छानुसार यहाँ कुछ भी नहीं होता। जो भी होता है उसमें एक क्रम विधान ही जुड़ा रहता है।
छल और दुराव के साथ किये गये कुकृत्य अपने अन्तःकरण को कलुषित करते हैं और उसकी प्रतिक्रिया हुए बिना नहीं रहती, इस सचाई को वैज्ञानिक उपकरणों ने सिद्ध कर दिया है। आज इतना और सिद्ध करना बाकी है कि प्रत्येक कुकर्म अपने निर्धारित विधान के अनुसार कर्त्ता को दण्ड दिये बिना नहीं छोड़ता। वह सब किस क्रिया-प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होता है।
मुशाकी (जापान) में अब से ढाई सौ वर्ष पूर्व हवाना होकीची नामक एक बालक गरीब परिवार में जन्मा। उसे सात वर्ष की आयु में चेचक निकली और उसी में दोनों आँखों से अन्धा हो गया। अब उसके लिए कुछ भी देख सकना सम्भव न था। इस दुर्भाग्य भरे जीवन में अब अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ रह नहीं गया था। ऐसी स्थिति में लोग पराश्रित होकर जीते हैं। दूसरों की सहायता पर ही उनकी जीवन यात्रा चलती है।
पर होकीची हिम्मत नहीं हारा। एक-एक इंच की दो आंखें ही तो गई थीं। इतने बड़े शरीर के अन्य कलपुर्जे तो ज्यों के ज्यों थे, फिर वह क्यों यह माने कि उसका सब कुछ चला गया। 63 इंच लम्बे शरीर में से दो इंच घट जाने पर भी 61 इंच की काया तो यथावत थी ही।
होकीची 101 वर्ष जिया। 7 वर्ष बचपन के छोड़कर शेष 94 वर्ष उसने अनवरत रूप से ज्ञान की साधना की। किशोर अवस्था तक वह केवल पढ़ता रहा इसके बाद उसने पढ़ाने का कार्य अपना लिया। वह छात्रों को पढ़ाता और पढ़ाने के बदले में उनसे अपने काम की पुस्तकें पढ़वाकर अपने ज्ञान की वृद्धि करता। यह पढ़ने और पढ़ाने का क्रम उसने आजीवन जारी रखा और जापान ही नहीं समस्त संसार के अद्भुत स्मरण शक्ति सम्पन्न विद्वानों, की अग्रिम पंक्ति में अपना नाम लिखाया। वह एकबार जो सुन लेता उसे कभी भूलता न था।
उसके मस्तिष्क में संग्रहित अति उपयोगी ज्ञान को एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्था ने नोट कराया और उसके आधार पर (एक विश्व ज्ञान कोष) प्रकाशित किया गया जो 2820 खण्डों में प्रकाशित हुआ है। संसार के इतिहास में इससे बड़ी और इससे अधिक तथ्यपूर्ण पुस्तक अभी तक कोई भी नहीं छपी।
राजा ऋषभदेव यह नहीं चाहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद राजगद्दी के लिए सन्तानों में झगड़ा हो अथवा राज्य की जनता को किसी प्रकार का कष्ट उठाना पड़े। पुत्र दो चार होते तो समझा बुझाकर ठीक कर लेते। एक साथ सौ पुत्रों के पिता बनने का उन्हें सौभाग्य मिला था। अतः उन्होंने अपने जीवन में ही यह व्यवस्था कर दी कि ज्येष्ठ पुत्र भरत को राजगद्दी दी जाये और शेष 99 पुत्र गृह त्याग कर संन्यासी हो जायें।
पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर 98 पुत्रों ने संन्यास ले लिया। साधना और समाज सेवा उनके जीवन के अंग बन गये। बाहुबली नहीं चाहता था कि उसका अग्रज भरत राजसिंहासन पर इसलिए आसीन हो कि वह उम्र में बड़ा है। उम्र के साथ-साथ योग्यता में भी बड़ा होना चाहिए।
विवाद खड़ा हुआ दोनों अपनी-अपनी योग्यता के प्रमाण प्रस्तुत करने लगे। राजनीति, धर्म, अर्थ और शास्त्रज्ञान की प्रतियोगिताएं हुईं। भरत पराजित हुआ और बाहुबली को निर्णायकों ने श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। योग्य और गुणवान की सर्वत्र पूजा होती है। प्रजा भी बाहुबली के प्रति आकर्षित होने लगी। निर्णायकों के निर्णय सुनने के बाद उपस्थित नागरिकों ने बाहुबली की जय-जयकार करना प्रारम्भ कर दिया।
भरत के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वह किसी भी तरह बाहुबली को नीचा दिखाने का प्रयत्न करने लगा अपने मार्ग के इस काँटे को निकालने के लिये उसके प्रयत्न चलने लगे। राज्य के लोभ में आकर भरत ने बाहुबली पर प्राणघातक प्रहार कर दिया। किसी को यह आशा न थी कि राजगद्दी भाई-भाई के मध्य भेद की इतनी बड़ी दीवार खड़ी कर देगी और प्राणों के मूल्य पर उसकी सौदेबाजी होगी। राजमद जो कराये कम ही है।
बाहुबली भी किसी से कम न था, जैसा उसका नाम वैसी ही उसमें शक्ति थी। उस तेजस्वी ने प्रहार के लिए जैसे ही हाथ उठाया लोग समझ गये भरत का अन्त आ गया है, वह बाहुबली की एक मुष्टिका में ही धराशायी हो जायेगा।
बाहुबली के विवेक की किरणें अभी भी थीं जो उसके मस्तिष्क को ज्ञान से आलोकित कर रही थीं। उसमें जोश और होश दोनों ही थे। उसने सोचा यदि मेरा भाई राज्य के लोभ में विवेक शून्य तथा अधम बन सकता है तो मैं उसका प्रतिद्वन्द्वी क्यों बनूं। यदि मैंने अपने भाई के प्राण लेकर राजगद्दी संभाली तो राज्य की जनता यही कहेगी जो राजा पद के लिये अपने भाई का खून पी सकता है वह जनता की सेवा क्या करेगा?
दूसरे ही क्षण शक्ति से उठा हुआ हाथ वापिस आ गया। बाहुबली ने महत्वाकांक्षा को त्यागकर भरत को राजगद्दी सौंप दी और स्वयं विरक्ति को अपनाकर दुःखी मानवता के आँसू पोंछने के लिए चल पड़ा।
अणु बम की विनाशकारी शक्ति के बारे में बहुत कुछ कहा सुना जाता है। पर यह अणु की समग्र शक्ति नहीं है। अणु बमों में प्रयोग होने वाली शक्ति अणु की सम्पूर्ण शक्ति का एक हजारवाँ भाग ही है। शेष 999 भाग तो बिना प्रयुक्त हुए ही पड़ा रहता है।
मनुष्य की भी इतनी शक्ति प्रसुप्त पड़ी रहती और अस्त-व्यस्त होती रहती है। यदि उसको अपने में सन्निहित शक्ति का समग्र बोध हो सके और उसका सदुपयोग किया जा सके तो वह सामान्य की समग्र परिधियाँ तोड़कर असामान्य बन सकता है जैसा कि वस्तुतः वह है भी।
- विनोबा
त्वचा यद्यपि बाहर से देखने में आवरण मात्र लगती है पर गहराई से देखने में उसका कण-कण विशेषताओं से भरा है। शरीर शास्त्री उसे काया का संरक्षक आवरण मानते हैं। सौंदर्य शास्त्री उसी के आधार पर रंग रूप का लेखा-जोखा लेते हैं। आत्मवेत्ताओं की दृष्टि में वह सबसे प्रबल और सबसे विस्तृत इन्द्रिय है। आँख, कान, नाक आदि तो सीमित स्थान ही घेरे हैं पर त्वचा ने सारा शरीर ही आच्छादित कर रखा है। उसका शासन विस्तार एवं क्रियाकलाप सम्पूर्ण शरीर को प्रभावित करता है।
जननेन्द्रिय की गणना पृथक इन्द्रिय में न करके उसे स्पर्शेंद्रिय के रूप में त्वचा परिधि में ही गिना गया है। कारण कि इसी की संवेदनशीलता जननेन्द्रिय में एक विशेष स्पर्श संवेदन उत्पन्न करती है। कोमलता का आनन्द त्वचा ही लेती और देती है। स्नेह स्वजनों का स्पर्श चुम्बन आलिंगन त्वचा के माध्यम से होता है। उसकी संवेदनशीलता ही स्पर्श में अन्तःकरण को गुदगुदा देती है। भाव विभोर स्थिति में बिछुड़े हुए प्रियपात्र को अथवा सफल स्वजन को हर्षातिरेक में छाती से लगाये बिना चैन नहीं पड़ता। बालक और अभिभावकों को गोदी में लेना केवल शारीरिक कारणों से ही सुखद नहीं होता वरन् उस स्पर्श सुख में आन्तरिक आनन्द की चेतनात्मक अनुभूति भी जुड़ी होती है। त्वचा इन्द्रिय हमारे भाव संस्थान को कम प्रभावित नहीं करती। इसलिए उसे अवाँछनीय स्पर्श से बचाया जाता है और वाँछनीय स्पर्श के लिए प्रयत्नपूर्वक सचेष्ट रहा जाता है।
भारतीय संस्कृति में छूत-छात के तत्व मौजूद हैं। आज तो वह जाति-पाँति के आधार पर उलट गया। पर प्राचीन काल में यह सिद्धान्त वाँछनीयता और अवाँछनीयता की दृष्टि से प्रयुक्त होता था। दुष्ट दुराचारियों को अस्पर्श मानने का तात्पर्य था उनकी दुष्ट प्रकृति के साथ जुड़ी हुई सम्वेदना के आक्रमण से अपने को बचाना। गुरुजनों के चरण-स्पर्श करने उनके पैर दबाने की प्रक्रिया मात्र सम्मान सूचक ही नहीं वरन् इसमें उनकी महानता को अपने हाथों के माध्यम से ग्रहण करना भी है। शिष्य पुत्र आदि अपने गुरुजनों के अक्सर पैर छूते या पैर दबाते हैं। उसमें थकान मिटाना कारण नहीं वरन् जिस तरह गाय का दूध दुहा जाता है उस तरह उनके शक्ति प्रवाह को लेकर अपने अन्दर भरना ही प्रमुख लाभ है।
साधारणतया इतना ही समझा जाता है कि धूप वर्षा से बचाव करने के लिये जिस तरह छाता लगाया जाता है उसी तरह त्वचा के लिये बाहरी ऋतु प्रभावों से लेकर विकिरण विभवों तक को रोकती है। अपने ऊपर सहन करती है। वह एक सुसज्जित वस्त्र की तरह है जो आन्तरिक अवयवों को ढ़कने के अतिरिक्त बाहर की शोभा सुसज्जा भी रखता है। ईश्वर के दिये हुए इस परिधान से बढ़कर मनुष्य कृत कोई पोशाक हो ही नहीं सकती।
जहाँ तक सौंदर्य का प्रश्न है- उसे त्वचा का सौंदर्य ही कहना चाहिए। वस्त्र कितने ही कीमती और आकर्षक क्यों न हों वे तभी शोभा पाते हैं जब हाथ-पैर, मुख आदि अंगों के नग्न प्रदर्शन में अवरोध उत्पन्न करें। नारी अंगों को तो चित्रकार से लेकर मूर्तिकार तक यथासम्भव निर्वस्त्र रखने का प्रयत्न करते हैं। सिनेमा और नृत्यों में सबसे बड़ा आकर्षण त्वचा का अधिकाधिक भाग निर्वस्त्र देखने का होता है। मनुष्य स्वभाव में यह जुगुप्सा इतनी अधिक बढ़ी है कि अमर्यादित नग्नता को अश्लीलता के प्रतिबन्धों से जकड़ कर उसे कानून द्वारा अवाँछनीय घोषित करना पड़ा। निस्सन्देह तत्व के दर्पण से ही मनुष्य का सौंदर्य मुखरित होता है।
वस्त्रों से लादकर उसे दुर्बल बना दिया जाय यह बात दूसरी है अन्यथा वह शीत ताप से प्राणी की रक्षा करने में पूर्णतया समर्थ है। इस धरती के सभी जीव जन्तु, जलचर, थलचर, नभचर इसी पोशाक के बलबूते अपनी जिन्दगी मजे में काट लेते हैं। उन्हें अतिरिक्त वस्त्र पहनने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आदिम मनुष्य भी नंगे ही रहते थे। सभ्यता की बात चली तो नर-नारी जननेन्द्रिय ढ़कने तक की आवश्यकता अनुभव करने लगे। अभी भी वन्य प्रदेशों के निवासी न्यूनतम वस्त्र पहनते हैं। त्वचा ही उनके शरीर को ऋतु प्रभाव से बचाती है। कितने ही सन्त तपस्वी भी नंगे रहते हैं। बहुत हुआ तो मिट्टी या राख की एक परत और ऊपर से मल लेते हैं। इस दुहरे आवरण से वे और भी आसानी से ऋतु प्रभाव सहन कर लेते हैं।
चेहरे को सदा खुला ही रखा जाता है। हाथ पैरों में तो मोजे भी पहन लिये जाते हैं, पर नाक, मुँह, आँख गाल आदि पर तो कोई मोजे भी नहीं पहने जाते हैं। वहाँ की त्वचा खुली ही रहने की अभ्यस्त रहने से शीत ताप आदि की शिकायत नहीं करती-न वस्त्रों की माँग करती है, न ऋतु प्रभाव से प्रभावित होती है। अभ्यस्त त्वचा शरीर का संरक्षण कर सकने में पूरी तरह समर्थ है। वस्त्रों ने उनका कुछ उपकार नहीं किया वरन् दुर्बल और परावलम्बी ही बनाया है।
शरीर पर चमड़ी का क्षेत्रफल लगभग 250 वर्ग फुट होता है। वजन 6 पौण्ड। सबसे पतली वह पलकों पर होती है। .5 मिली मीटर। पैर के तलवों में सबसे मोटी होती है 6,00 मिली मीटर। साधारणतया उसकी मुटाई 0.3 से लेकर 300 मिली मीटर की होती है। उसमें बारीक-बारीक अगणित छेद होते हैं जो दूरबीन की सहायता से देखे जा सकते हैं। औसतन इन छेदों से दिन-रात में 10 छटाँक पसीना बाहर निकलता है। गर्मी पड़ने पर या अधिक परिश्रम करने पर जब शरीर का इञ्जन गरम हो उठता है तो उसे ठण्डा करने के लिए स्वेद ग्रन्थियाँ तेजी से पसीना बाहर निकालती हैं और बदन ठण्डा कर देती हैं। पर सर्दियों में शरीर को गरम रखने की जरूरत पड़ती है इसलिये वे छेद सिकुड़ जाते हैं। भीतर की गर्मी रुकी रहती है और ठण्ड से बचाव हो जाता है। इस तरह त्वचा की संरचना शरीर को ‘एयर कंडीशनर’ बनाये रहती है।
त्वचा छिद्र पसीना ही नहीं निकालते वे एक प्रकार से साँस भी लेते रहते हैं। वाष्प की तरह कुछ चीजें बाहर निकलती रहती हैं और जरूरत की चीजें भीतर घुसती रहती हैं। इस तरह यह छोटे छेद एक प्रकार से नाक के छोटे छेदों का भी काम करते हैं। यदि यह छेद सर्वथा बन्द हो जायें तो आदमी घुटकर मर जायेगा। पुराने जमाने में अपराधी को मौत की सजा देने का एक तरीका यह भी था कि उसके शरीर पर मोम पोत दिया जाय, हाथ बंधे होने से वह उसे हटा नहीं सकता था और त्वचा का श्वास बन्द हो जाने पर घुट-घुट कर मर जाता था। एकबार एक लड़के के शरीर पर शीरा पोत कर रुई चिपकाई गई और लंगूर का स्वाँग बनाया गया। त्वचा छिद्र बन्द हो जाने से लड़का थोड़ी ही देर में बेहोश हो गया और अस्पताल पहुँचते-पहुँचते मर गया। जो लोग स्नान की उपयोगिता नहीं समझते। चिह्न पूजा का स्नान करते हैं। चमड़ी पर मैल की परतें जमने देते हैं उन्हें जानना चाहिए कि यह गन्दी आदत स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही अहितकर है।
साँप की केंचुली सबने देखी है। मनुष्य की त्वचा भी केंचुली बदलती है पर उसका क्रम बहुत हलका और धीमा होने से दिखाई नहीं पड़ता। किसी बीमार के बहुत दिन तक चारपाई पर पड़े रहने के बाद उसकी चमड़ी पर से भूसी उतरती देखी जाती है। सिर में भी अक्सर भूसी जमती रहती है। शरीर को रगड़ने पर मैल की तरह से भी केंचुली के अंश रहते हैं। हमें दिखाई भले ही न दें पर चमड़ी की कोशिकाएं मरती रहती हैं और उनका स्थान नई ग्रहण करती रहती हैं। इस प्रकार केंचुली बदलने का क्रम चलता रहता है। साँप ही नहीं मनुष्य भी केंचुली बदलता है।
त्वचा के भीतर बिखरे हुए ज्ञान तन्तुओं की लम्बाई 45 मील कूती गई है। यह शरीर को स्पर्श होने वाले अनुभवों को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार के तन्तु भी हैं जो दृश्य, गन्ध, ध्वनि, दबाव, स्वाद, सर्दी-गर्मी की अनुभूतियाँ नाक, कान, आँख, जीभ आदि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विशिष्ठ प्रकार की अनुभूतियाँ कराने में योगदान करते हैं।
त्वचा में एक विशेष तेल रहता है जो ‘कोरियम’ कहलाता है। शरीर पर इसी चिकनाई की चमक रहने से सौंदर्य बढ़ता है और तेजस्विता झलकती है। इसी प्रकार त्वचा की रंजक कोशिकाएं- ‘मेलानिक’ नामक रंग उत्पन्न करती है। इन्हीं के कारण गोरा, काला गेहुँआ, पीला आदि रंग मनुष्य का होता है।
चोट लग जाने पर क्षत स्थल की पूर्ति करने के लिए समीपवर्ती पड़ौसी पदार्थ दौड़ पड़ते हैं और वह घाव जल्दी भर देते हैं। योगसाधना के षटचक्रों की तरह त्वचा की छह परतें हैं (1) स्ट्रेटम कोर्नियम-सबसे ऊपर की (2) स्ट्रेटम ल्यूसीडम-पारदर्शी (3) स्ट्रेटम-ग्रेन्यू लोसम- मूर्छित (4) स्ट्रेटम एस्यूलीटम-अपेक्षाकृत मोटी परत (5) स्ट्रेटम वेसेल-क्षति पूरक (6) कोरियम या डर्मिस सहायक। हाथ पैरों के पोरुवे हथेली तलवे आदि पर जहाँ तहाँ जो मोटी गद्दी सी पाई जाती है उसे पेपिली-कहते हैं।
त्वचा परतों में कितनी ही वस्तुएं विद्यमान हैं। (1) केश ग्रन्थि, (2) स्वेद ग्रन्थि, (3) तैल ग्रन्थि, (4) बाह्य त्वचा, अन्तः त्वचा (5) स्नायु, (6) मज्जा कोष, (7) रक्त नलियाँ इनमें से मुख्य है। इसके अतिरिक्त अधिक गहराई से जानने पर उनमें और भी बहुत कुछ मिलेगा।
यह त्वचा सम्बन्धी शारीरिक जानकारी हुई चेतनात्मक परिचय यह है कि वाह्य वस्तुओं को स्पर्श करके मस्तिष्क तक उसकी जानकारी पहुँचाने का अति महत्वपूर्ण कार्य त्वचा का ही है। संसार में व्यक्ति का संबंध बनाने-वस्तुओं को शरीर के साथ जोड़ने मिलाने का कार्य उसी के द्वारा सम्पन्न होता है। अतएव उसे अन्य समस्त इन्द्रियों से अधिक व्यापक और समर्थ बनाया गया है। त्वचा में इतनी अद्भुत शक्तियाँ भरी पड़ी हैं कि यदि उन्हें विकसित कर लिया जाय तो वह अन्य समस्त इन्द्रियों का काम कर सकती है। त्वचा से देखा जा सकता है, सुना जा सकता है, सूँघा जा सकता है, चखा जा सकता है। स्पर्श सुख तो उसका प्रधान कार्य है। मैथुन ही नहीं-काम स्पंदन के अन्य प्रकार भी लगभग उसी के द्वारा अनुभव होते हैं और हलचल मचाने वाली अन्तःस्थिति उत्पन्न करते हैं।
त्वचा अन्य इन्द्रियों का भी काम कर सकने में समर्थ है। मूलतया यह शक्ति उसमें पूरी तरह विद्यमान है। काम में न आने से वह प्रसुप्त पड़ी है। योग साधनाओं द्वारा यदि त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ाली जाय तो अन्य इन्द्रियों की शक्ति बचाकर त्वचा से ही काम चलाया जा सकता है। वह बची हुई अन्य इन्द्रियों की शक्ति अन्य उपयोगी कार्यों में खर्च हो सकती है। जिनकी कोई इन्द्रिय नष्ट हो गई है वे अभ्यास करके त्वचा से ही उस प्रयोजन को पूरा कर सकते हैं। नेत्रों का काम त्वचा कर सकने में समर्थ है। इस सम्बन्ध में रूस में लगातार कई उदाहरण सामने आये हैं और वहाँ इस सम्बन्ध में काफी खोज भी हो रही है।
त्वचा के पारदर्शी परत केवल आर-पार दिखाने वाले ही नहीं हैं वे ऐक्सरे का काम करते हैं। यदि उन्हें विकसित किया जा सके तो ऐक्सरे यन्त्र के स्थान पर अपनी त्वचा के संस्पर्श से ही अज्ञात और अदृश्य का एक बड़ा भाग हमारी जानकारी में आ सकता है।
कुछ समय पूर्व मास्को में एक टेलीविजन कार्यक्रम पर यह दिखाया गया था कि किस प्रकार बिना आँखों की सहायता के मात्र स्पर्श से देखने का काम लिया जाना सम्भव है। निझनी तगिन की 22 वर्षीया कुमारी रोजा कुलेशोवा ने अपने दाहिने हाथ की तीसरी चौथी उँगली में दृष्टि शक्ति की विद्यमानता का परिचय दिया। आँख से मजबूत पट्टी बँधवाकर वैज्ञानिकों की उपस्थिति में उसने इन दो उँगलियों के सहारे अखबार का एक पूरा लेख पढ़कर सुनाया और फोटो चित्रों को पहचाना। इससे रूसी वैज्ञानिकों की शरीर में संव्याप्त चेतना को बहुमुखी प्रयोजन पूरा कर सकने की क्षमता का ज्ञान हुआ और नेतृत्व विज्ञान की एक नई शोध करने की दिशा मिली।
जो अपनी रोटी बाँटकर खाता है, जिसे अपनी ही तरह दूसरे जरूरतमन्दों की भी चिन्ता रहती है, जिसे गिरे हुओं को उठाने में आनन्द आता है, वह संसार में रहते हुए भी परमात्मा की गोद में निवास करने का आनन्द पाता है।
अभी उस अध्याय में एक कड़ी और जुड़ी है। कितने ही लोगों ने तलाश किया कि क्या उनमें या उनके कुटुम्बियों में भी कोई इन्द्रियातीत शक्ति है। इस खोज में इस वर्ष एक 9 वर्षीय लड़की और प्रकाश में आई है जिसने रोजा कुलेशोवा की अपेक्षा और भी अधिक लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया।
संवाददाता निकोलाई स्वितेको के अनुसार खार्कोव की श्रीमती ओल्गा व्लिजनोवा ने अपनी 9 वर्षीय पुत्री में यह प्रतिभा और भी अधिक बढ़ी चढ़ी पाई तो उसने सोवियत विज्ञान अकादमी के सम्मुख उसे पेश किया और कई तरह के अद्भुत परीक्षण कराये। बिछी हुई शतरंज पर से उसने काली और सफेद गोटें छाँटकर अलग कर दीं। इसके बाद रंग बिरंगे कागजों की कतरने उसने तरतीब बार छाँटी। परिचित लोगों के फोटो पहचाने। बच्ची कम पढ़ी थी सो उसे बच्चों वाली रंगीन किताबें दी गईं और उसने उन्हें हाथ से छूकर ठीक तरह पढ़ दिया।
इसके बाद और भी कठिन परीक्षा शुरू हुई। उँगलियों के अतिरिक्त क्या शरीर के किसी अन्य भाग में भी ऐसी शक्ति है इसका परीक्षण किया गया तो वह बात भी सही निकली। उसने बाँह, कन्धा, पीठ, पैर आदि से छूकर भी वैसा ही अनुभव प्रस्तुत किया जैसा हाथ से छूकर करती थी। क्या चीजों को बिना छुये भी इस तरह की पहचान की जा सकती है? इस परीक्षण में पाँच सेन्टीमीटर दूर रखी चीजों तक को उसने उँगली के पोरवों की सहायता से पढ़ लिया। 9 महीने बाद उसने दूसरी तैयारी में और भी अधिक दूर पर रखी हुई चीजों को देखने और कागजों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की। इसी प्रकार उसने पैर की उँगलियों से छूकर कितनी ही वस्तुओं का सही सही परिचय बताया।
रूस के वैज्ञानिकों का ध्यान तब से इस दिशा में अधिक गया है और उन्होंने उस सम्बन्ध में लगातार शोध कार्य किया है।
मनोविज्ञान शाखा के वरिष्ठ शोधकर्ता प्रो. कोन्स्टाटिन प्लातोनोव ने कहा है- मानवीय चेतना विद्युत की व्यापकता को देखते हुए इस प्रकार की अनुभूति अप्रत्याशित नहीं है। नेत्रों में जो शक्ति काम करती है वही अन्यत्र ज्ञान तन्तुओं में विद्यमान है, उसे विकसित करने पर मस्तिष्क को वैसी ही जानकारी मिल सकती है जैसी आँखों से मिलती है।
प्रो. एलेक्जोदर स्मिर्नोव ने कहा है-यह कोई अलौकिक बात नहीं है। वरन् सामान्य विज्ञान सम्मत सिद्धान्तों का ही एक दिलचस्प प्रतिपादन है। एक अंग की चेतना दूसरे अंगों में भी काम कर सकती है।
निझोरी तागिल पैडागोगीकल इन्स्टीट्यूट की रीडर नोवोमोइस्की ने अपने अनेक छात्रों में इस तरह की विशेषता को ढूँढ़ा तो कुछ छात्राएं ऐसी मिल गई जिनमें एक सीमा तक इस तरह की शक्ति मौजूद है। उसे बढ़ाने पर सफलता की मात्रा अधिक बढ़ने की भी आशा की गई है। इस तरह की क्षमता अन्य अंगों की अपेक्षा दाहिने हाथ की उँगलियों में अधिक पाई गई है और लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में यह अतीन्द्रिय तत्व अधिक है। आयु बढ़ने के साथ जो कठोरता ज्ञान तन्तुओं में आती जाती है उसके कारण बड़ी उम्र में शरीर उतना सम्वेदनशील नहीं रह जाता, फलस्वरूप ऐसे अनुभव प्रौढ़ वर्ग में दृष्टिगोचर नहीं होते।
त्वचा का महत्व यदि समझा जाय तो वह अति महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध होगी। अन्य समस्त इन्द्रियों का तो वह कार्य कर सकने में समर्थ है ही साथ ही अंतः चेतना को विकसित एवं परिवर्तित करने में उसका और भी ऊँचा उपयोग है। साधना विज्ञान में तत्वा-त्वचा साधना को ‘स्पर्शास्पर्श योग‘ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
काहिरा में आयोजित एक प्रेस सम्मेलन में स्वर्गीय पं. जवाहरलाल नेहरू से संवाददाताओं ने पूछा- ढलती उम्र में भी आपका यौवन छलकता दीखने का क्या कारण है? उत्तर में पंडित नेहरू ने कहा- कठिन से कठिन प्रसंग आने पर भी मैं चिन्तित नहीं होता, धैर्य और सन्तुलन को हाथ से नहीं जाने देता। यही कारण है कि मैं अपनी उम्र के लोगों से बीस वर्ष छोटा दीखता हूँ और उतना ही सक्षम रहता हूँ।
प्राणियों में पशु पक्षियों और जीव जन्तुओं का ही स्थान नहीं, वनस्पति भी जीवधारियों में ही आती है। उनमें मस्तिष्क न होने से चिन्तनशील प्राणियों की तरह कष्टानुभूति न होने से उन्हें विकसित प्राणियों द्वारा खाया जाता है। हिंसा की बात तो वहाँ आरम्भ होती है जहाँ किसी सचेतन प्राणियों को अपने स्वाद के लिए हम हनन करते हैं। वनस्पति प्राणधारियों का स्वाभाविक आहार होते हुए भी वह भी सजीव वर्ग में ही है।
मनुष्य की सेवा सहायता पशु करते हैं। अब तो कुछ दिन से उनका श्रम मशीनें भी हलका करने लगी हैं, पहले जब वे नहीं बनी थीं तब तो मनुष्य का जीवन आधार एक प्रकार से पशुओं का श्रम ही था, वह स्वयं तो अपने दुर्बल शरीर से बहुत कम कर पाता था, जो करता था वह इतना नहीं होता था कि सुख सुविधा युक्त जीवन जी सके। पशुओं का श्रम दूध, बाल, चर्म आदि की सहायता से ही उसकी समृद्धि भूतकाल में बनी रही। आज भी विश्व का अर्थ उत्पादन पशुओं के माध्यम से इतना होता है जो विश्व उपार्जन का दो तिहाई है। एक तिहाई ही मशीनें उत्पन्न करती हैं।
जिस प्रकार पशु मनुष्य जाति के जीवनाधार रहे हैं उसी प्रकार वनस्पति न केवल मनुष्य की वरन् पशु−पक्षियों को जीवनाधार रही है। यहाँ तक की कीट पतंग भी उसी के अञ्चल में पलते पनपते हैं। विशाल दृष्टि से देखा जाय तो वनस्पति ही जीवन का मूल स्वरूप है। उसी को खाकर जीवधारी जीवित हैं। माँसाहारी कहे जाने वाले जीव भी शाकाहारी प्राणियों को ही खाते हैं। वे शाकाहारी वनस्पति की उपज हैं।
जल जीवों का जीवन क्रम भी यही है। समुद्र, सरोवरों में एक हलके किस्म की वनस्पति होती है, वहीं जल जीवों का मुख्य आधार है। अकेले पानी पर ही वे जीवित नहीं रह सकते, जीवन रक्षा के लिए उन्हें भी वनस्पति चाहिए और वह जिन जलाशयों में छोटे या बड़े रूप में होगी उसी में जल जीव, जन्मेंगे बढ़ेंगे। जल जीवों, में भी पशु पक्षियों की तरह माँसाहारी होते हैं पर वे भी शाकाहारी छोटे जलचरों को ही खाते हैं। कहा जा चुका है कि इस प्रकार घुमा फिरा कर जल जीवों को भी वनस्पति पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वनस्पति जगत का प्राणधारियों का अपना संसार है और वह इतना सुन्दर है कि उसका यदि विवेचन विश्लेषण किया जाय तो एक बहुत ही सौम्य, शालीन और सुन्दर लोक का दर्शन होता है।
वनस्पति जगत का सर्वप्रधान और सर्वत्र उपलब्ध पौधा है-घास। ये घास पैरों तले कुचलती रहती और तुच्छ नगण्य प्रतीत होती है पर उसकी गरिमा पर विचार करते हैं तो वह आश्चर्यजनक महत्व की प्रतीत होती है।
वनस्पति शास्त्रियों का कथन है कि घास धरती के पाँचवे हिस्से पर छाई हुई है। उसकी छह हजार जातियाँ अब तक ढूंढ़ी जा चुकी हैं। उसे एक प्रकार से जीवनधारियों का जीवन ही कहना चाहिए। पानी की बाढ़ रोकने के लिये बाँध जो काम करते हैं उससे लाखों गुना अधिक काम घास करती है। यदि घास न हो तो वर्षा का पानी इतनी तेजी से बहे कि नदियों में विकराल बाढ़ें आयें और जमीन का बहुत बड़ा भाग कटकर खड्ड बनने लगे और उपयोगी मिट्टी समुद्र में पहुँच कर उपजाऊ क्षेत्र घटा दें। वह मिट्टी समुद्र को उथला करके और भरा हुआ पानी बाहर फैलने से तटवर्ती स्थानों के डूबने का खतरा हो जाय। जमीन में पानी सोखने की शक्ति घास की जड़ों से ही पैदा होती है। यदि घास न हो तो सूखी मिट्टी ठोस या रेतीली पानी की अधिक मात्रा देर तक पचा सकने में समर्थ न हो।
हर मौसम और हर परिस्थिति में घास अपने आपको जीवित रखती है। घोर गर्मियों में जबकि वह सूख जाती है और जल गई प्रतीत होती है वह भी उसका जड़ वाला भाग गीला और जीवित रहता है। यही कारण है कि वर्षा होते ही वह देखते देखते उग आती है और चारों ओर हरियाली छा जाती है। पहाड़ मैदान, मरुस्थल, शीत प्रधान, अतिऊष्ण प्रदेशों में ही नहीं अथाह समुद्र की तली में भी उसका अस्तित्व पाया जाता है। ‘काई’ के रूप में वह जलाशयों में भी छाई रहती है। अमरबेल की तरह बिना जड़ के भी बिना जमीन की सहायता लिये हुए भी वह अपना अस्तित्व बनाये रह सकती है।
घास का सूक्ष्म रूप है उसका पराग। वह हवा के साथ चार हजार फुट की ऊँचाई तक उड़ जाता है और आँधी तूफानों के साथ हजारों मील की यात्रा करके कहीं से कहीं जा पहुँचता है। मनुष्य के समान तथा जानवरों के शरीरों के साथ लिपट कर भी वह छूत की बीमारी की तरह लम्बी यात्रायें करता है और जहाँ भी अवसर मिलता है वहीं अपनी वंशवृद्धि करने में लग जाता है। पुराने जमाने में अफ्रीका से आदिवासी, अमेरिका में मजूरी के लिए आये गये थे। घास के पराग भी उनके साथ चले आये और वह घास जो अफ्रीका में ही होती थी अमेरिका में भी उगने लगी।
हम गेहूं, जौ, चना, मक्का, आदि अन्न खाते हैं। यह सब क्या है घास के बीज ही तो हैं। पालक, बथुआ, धनिया, पोदीना, मेथी आदि छोटी घास हैं। बड़ी घास शाक भाजियों और खीरा, ककड़ी खरबूज, तरबूज आदि के रूप में फलती है। ईख एक बड़े किस्म की घास ही तो है। चीनी की मिठास वस्तुतः घास का ही अनुदान है।
कीड़े, मकोड़े, पशु-पक्षी, सब घास पर ही जीवित रहते हैं। पौधों पर चिपकने वाले कृमि कीटकों से लेकर कीड़े-मकोड़ों तक की संख्या इस पृथ्वी के जीव जगत का नो बटे दसवाँ भाग है। पशु, पक्षी, मनुष्य और बड़े जलचरों की संख्या एक बटे दस ही है। इनमें से अधिकाँश का अधिकाँश जीवन घास पर ही निर्भर है। पशु तो घास पर ही जीवित हैं। प्रकारान्तर से और सबका भोजन भी उसी पर निर्भर रहता है। छोटे कीड़े मकोड़े घास की पत्तियाँ जड़े आदि खाते हैं। उन्हें चिड़ियाँ खा जाती हैं। चिड़ियाँ या पशु माँसाहारियों के पेट में चले जाते हैं। इस प्रकार माँस भक्षी जीवों का घुमा फिरा कर मूल भोजन घास ही है। इसलिए उसे जीव धारियों का मूलभूत आधार कहा गया है। जड़ी बूटियों के रूप में औषधियों का प्रयोजन भी उन्हीं से पूरा होता है। मनुष्य शरीर भी भौतिक शास्त्रियों की दृष्टि से एक प्रकार वृक्ष ही है। उसकी सारी आवश्यकता भूमि द्वारा उत्पन्न वनस्पतियों से ही पूरी होती है। हवा और जल को छोड़कर मुख से खाये जाने वाले पदार्थों में वनस्पति ही एकमात्र वह आधार है जिसे ‘अन्न’ या आहार कहते हैं। उसके बिना किसी का भी निर्वाह नहीं हो सकता।
घास हर जगह उपलब्ध होने से उसे सस्ती समझकर उपेक्षणीय समझा भर जाता है पर वस्तुतः उसका महत्व किसी भी बहुमूल्य पदार्थ से कम नहीं है। एक पौण्ड घास में इतनी कैलोरी शक्ति रहती है कि आदमी उतने से ही डेढ़ घण्टे तक लकड़ी काट सके। बीजों में इससे चार गुनी अधिक शक्ति होती है। इसलिए आध सेर अन्न खाने वाला यदि दो सेर घास खाले तो उसे उतनी ही शक्ति मिल सकती है। समझा यह जाता है कि दाल, दूध, अण्डा, माँस से ही प्रोटीन प्राप्त होती है पर यह भूल जाते हैं कि घास में प्रोटीन की मात्रा कम नहीं है और वह अपने ढंग की सबसे निर्दोष प्रोटीन है। टूटी-फूटी माँस पेशियों की मरम्मत का उसमें अनुपम गुण है।
घास ऊपर जितनी लम्बी दीखती है उसकी जड़ें जमीन के अन्दर उससे कहीं अधिक लम्बी होती हैं। यही कारण है कि मिट्टी को बाँधे रहती है, उसे पोला रखती है। जिससे वह पानी, खाद और हवा सोख कर उत्पादक बनी रह सके। मिट्टी से जितना जीवन वह लेती हैं उससे भी ज्यादा उसे प्रदान भी करती हैं। जमीन का उपजाऊपन घास पर ही निर्भर है। जहाँ घास नहीं जमेगी वह जमीन अनुत्पादक और वीरान जैसी रहेगी।
संसार में आय के साधन कारखाने व्यापार आदि को समझा जाता है पर सच बात यह है कि मनुष्य जाति का आय का सबसे बड़ा साधन पशु है और वे घास पर निर्भर रहते हैं। इस प्रकार घास को आर्थिक दृष्टि से संसार का सबसे बड़ा आय-साधन भी माना जा सकता है। साफ सुथरी जमीन को घास की ही देन कह सकते हैं यदि वह न हो तो सर्वत्र धूलि ही-धूलि उड़ती दिखाई पड़े या फिर चट्टानों जैसी निर्जीव स्थिति दीख पड़े।
मकान, किवाड़, फर्नीचर, फल, चूल्हा, चटाई, कपड़े कागज, जिधर भी नजर उठाकर देखें घास, वृक्ष और वनस्पति का ही वरदान, अनुदान बिखरा पड़ा है। वह मनुष्य की लकड़दादी है। सृष्टि के निर्माण काल में सबसे पहले वनस्पति का ही उद्भव हुआ था। एक कोषीय बहुकोषीय जीव तो उसके बहुत बाद में बने और मनुष्य तो उन प्राणधारियों की शृंखला से हजारों पीढ़ी पश्चात जन्मा है।
घास का ही विकसित रूप है वृक्ष। गुल्म झाड़ियों, पौधे और विशाल वृक्ष उसी प्रकार छोटे बड़े हैं जिस प्रकार चतुष्पदों में छोटी चुहिया और विशालकाय हाथी, छोटा मच्छर और बड़ा सारस। इनके आकार प्रकार बड़े छोटे हैं पर वर्गीकरण तो उसी स्तर पर होगा वनस्पति में छोटी घास और बड़े विशालकाय वृक्ष गिने जा सकते हैं। उन सबकी अपनी विशेषताएं ऐसी हैं जो सृष्टि की सुन्दरता और सन्तुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं।
कैलीफोर्निया में पाया जाने वाला डगलस वृक्ष 300 से 400 फुट तक लम्बा होता है इसका तना 50 फुट व्यास तक का पाया जाता है। ‘फर’ नामक वृक्ष की आयु हजारों वर्ष मानी जाती है। यदि इन विशाल वृक्षों का तना खोखला कर दिया जाय तो उसमें 200 बच्चों को पढ़ाने जैसा एक स्कूल आसानी से बन सकता है। अमेरिका में कई ऐसे फर के वृक्ष हैं जिनके तने को खोखला करके उनमें बीच में से सड़क निकाल दी गई है। सड़क बनाने में उनके काटने की अपेक्षा यह तरीका अधिक अच्छा समझा गया।
सन्त, ब्राह्मण, दानी, परोपकारी मनुष्य ही नहीं होते गाय जैसे पशु भी उसी स्तर के वन्दनीय वर्ग में आते हैं। वृक्षों में भी कुछ वृक्ष ऐसे ही हैं जिन्हें सन्त या दानवीर की उपाधि दी जा सकती है।
उत्तरी आस्ट्रेलिया में एक विशालकाय गोरख इमली का वृक्ष है। यह पेड़ दो हजार वर्ष पुराना है। इसका खोखला तना किसी समय नगर जेल की तरह काम में लाया जाता था।
ऐडीनियम वृक्षों के तनों में पानी भरा होता है और यह कई वर्षों तक सूखा पड़ने पर भी हरे ही बने रहते हैं। दक्षिण अमेरिका के ब्राजील और पेरु के जंगलों में एक ऐसा वृक्ष होता है जिसके तने से दूध जैसा तरल पदार्थ निकलता है जो मीठा भी होता है और स्वादिष्ट भी। वनवासी उसे देवताओं की कामधेनु समझते हैं और बड़े चाव से उसका दूध पीते हैं।
इन्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में और अमेरिका के चिली देश में एक ऐसा वृक्ष पाया जाता है जिससे पानी टपकता रहता है और उसके नीचे एक छोटा गड्ढा उस पानी से भरा रहता है। यह पेड़ अपनी पत्तियों द्वारा हवा में उड़ती हुई भाप बड़ी मात्रा में सोखता है और फिर अपनी आवश्यकता जितना जल पास में रखकर शेष बूँदों के रूप में बरसा देता है।
अफ्रीका में एक ऐसा पेड़ पाया जाता है जिसकी छाल को आटे की तरह पीसकर रोटी बनाई जाती है। यह अन्न की तरह ही पौष्टिक और स्वादिष्ट होती है।
वनस्पतियों का विकसित रूप ही सचेतन जन्तुओं में परिणत हुआ है। विकास क्रम की शृंखला यही बताती है कि सृष्टि के आदि में जीवन वनस्पति के रूप में था फिर वह क्रमशः सचेतन प्राणियों के रूप में उन्नति करता चला गया। इसका प्रमाण अभी भी समुद्रों में उपलब्ध है। कुछ ऐसे पौधे अभी भी पाये जाते हैं जो वनस्पति भी कहे जा सकते हैं और प्राणधारी भी। उनमें दोनों ही गुण विद्यमान हैं।
वनस्पति और जीवधारियों के बीच की कुछ जातियाँ समुद्र में पाई जाती हैं। एस्पेरिआपसिस जीव सड़ी लकड़ी से उगने वाले कुकुरमुत्ते की तरह का होता है। यह पीले, भूरे हरे रंग का- लगभग तीन इंच व्यास का होता है। अमेरिका के पूर्वी तट पर यह लगभग 20 प्रकार की जातियों में पाया जाता है।
हाइड्रा देखने में तैरती हुई सूखी डाली जैसा लगता है। पर छेड़ते ही उसमें हरकत शुरू हो जाती है। इसके कई मुँह होते हैं। हर मुँह पर बाल उगे होते हैं जिनकी संख्या छह से दस तक होती है। इन बालों को वह सिकोड़ और फैला लेता है। असल में यह ही उसके हाथ हैं जिनकी सहायता से वह आहार पकड़ता और मुँह में डालता है। तैरने में यह बाल उसके लिए पैरों का काम देते हैं। समुद्री जन्तु ‘कैरोपहोलिया’ दूर से देखने में ऐसा लगता है मानो पत्थर पर सुन्दर गुलाबी फूल खिला हो। जब जँभाई लेता है तो उस फूल जैसे मुँह को खुलते और बन्द होते देखा जा सकता है। यह पीले, हरे और भूरे होते हैं। मुँह पर छोटी-छोटी कई जीभें उभरी होती हैं इन्हीं से वे अपना आहार पकड़ते हैं। फ्लोराइड, वेस्टइंडीज, कैलीफोर्निया की खाड़ी में यह कैरोपहोलिया आसानी से पाया जाता है।
प्रायः छह इंच लम्बा एल्कोनियम नन्हें असंख्य फूलों से लदी किसी सुन्दर डाली जैसा लगता है। उसके सहस्रों मुख होते हैं। तने जैसा मोटा पेट बीच में होता है। वेस्टइंडीज तथा उत्तरी अटलाँटिक में यह पाया जाता है।
आस्ट्रेलिया के वैरियर रीफ नामक क्षेत्र में रंग-बिरंगी घास जैसा एक जल जन्तु होता है एक्टोनेरिया। इसके हाथ पैर सदा हिलते रहते हैं और हर घड़ी कुछ पाने पकड़ने और खाने में ही लगा रहता है।
वनस्पति की जीवधारियों के रूप में विकसित होने की परम्परा यह संकेत करती है कि मनुष्य भी वर्तमान स्तर पर नहीं रह सकता, उसे देवत्व में विकसित होना पड़ेगा।
वनस्पति जगत पर दृष्टिपात करने से उसकी परोपकार वृत्ति, सहनशीलता, शोभा-सुषमा, सरसता,
कोमलता, पुष्पों की कमनीयता, फलों की गुण गरिमा जैसे असंख्य पक्ष ऐसे हैं जिन्हें देखकर यह प्रतीत होता है कि मनुष्य बौद्धिक क्षेत्र में विकसित हो गया तो क्या-महानता की गरिमा में वह वृक्ष वनस्पति की दुनिया की तुलना करने पर बहुत पिछड़ा हुआ ही पड़ा है।
अमरबेल जिस पेड़ पर चढ़ती है उसे चूसना शुरू करती है यह धीरे धीरे उसे सुखाती जाती है। पेड़ की खुराक पर जीवित रहने वाली इस परजीवी बल की जीव पद्धति शोषण पर ही निर्भर है। स्वयं का उत्पादन कुछ होता नहीं। उसकी सारी चेष्टा पेड़ के शोषण पर ही लगी रहती है। उसकी डालियों में अपने पंजे फंसा देती है और धीरे धीरे उसी से रस चूसती हुई स्वयं पुष्ट होती है।
ऐसे ही अनेक शोषक व्यक्ति भी पाये जाते हैं। जिनका अपना ऐसा कोई उत्पादन नहीं होता जिससे अपने और दूसरों के विकास की आवश्यकता पूरी हो। वे शोषण को ही अपना व्यवसाय बनाते हैं। कुकर्मी लोगों की यह शैली रहती है। चोरी, ठगी के ही वे अभ्यस्त बन जाते हैं और ठगने फँसाने के जाल बुनते रहते हैं।
अमर बेल की स्थिति न सुखकर होती है न सन्तोषजनक। उस पर न पत्ते आते हैं न फूल न फल। एक प्रकार से वन्ध्या ही बनी रहती है। जिसने दूसरे के फलने फूलने में व्यवधान उत्पन्न किया वह स्वयं भी कैसे फल फूल सकता है।
अमरबेल सदा पतली रहती है- पतले हाल पीली रहती है। पीलिया रोग के रोगी जैसे उसके चेहरे पर कभी गुलाब जैसी लालिमा आ ही नहीं सकती, पेड़ को सुखाती हुई यह सोचती है कि मैंने अपना काम बना लिया। पर करनी का फल सामने आया बिना रहता नहीं। पेड़ को सुखाने के उपरान्त -आहार के अभाव में उसे स्वयं भी सूखना पड़ता है। शोषकों का अन्त ऐसा ही दुखद होता है।
स्वप्न हमारी अन्तःचेतना और प्रकट चेतना का पारस्परिक संवाद संभाषण है जो साँकेतिक भाषा में रहस्यमय लिपि में सम्पन्न किया जाता है। राजनीतिक दूतावासों में सेना में प्रायः रहस्यमय संवाद इस रहस्यमय ढंग से भेजे जाते हैं कि वाँछनीय व्यक्तियों के अतिरिक्त कोई बाहर का आदमी उसे सुन समझ न सके। टेलीग्राम की डैमी खटकती रहती है, सामान्य बुद्धि के लिए वह खट-खट मात्र की ध्वनि, पर उस कला को जानने वाले लम्बे चौड़े संवादों का प्रसंग और पारस्परिक वार्तालाप उसी आधार पर कर लेते हैं। सीने पर स्टेथिस्कोप लगाकर डॉक्टर लोग हृदय क्या कह रहा है यह सुन लेते हैं। वैद्य लोग नब्ज़ पर हाथ रखकर रोग का निदान किया करते हैं। सर्वसाधारण के लिए यह जानकारी सुलभ नहीं, पर विशेषज्ञों के लिए यह साँकेतिक भाषा बहुत कुछ बातें बता देती है।
स्वप्नों की भाषा भी ऐसी है। उन्हें निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए। जिस प्रकार दर्पण के सहारे हम अपना चेहरा देख सकते हैं उसी प्रकार स्वप्नों के आधार पर शरीर और मन की भीतरी परत किसी स्थिति में है उसकी झाँकी कर सकते हैं। मोटी परख तो उथली जानकारियाँ दे पाती है उनके आधार पर सामान्य स्वास्थ्य, प्रत्यक्ष कष्ट, हर्ष, शोक जैसे प्रत्यक्ष विवरण ही विदित होते हैं। पर इतना ही सब कुछ नहीं है। सूक्ष्म भी बहुत कुछ है, और वह इतना है कि स्थूल से भी भारी समझा जा सकता है। इसे सही स्थिति में जानकर भावी स्वास्थ्य संकट और मानसिक विग्रह से सहज ही बचा जा सकता है। स्वप्नों का विश्लेषण यदि किया जा सके और उनके आधार पर निकलने वाले निष्कर्षों से अवगत रहा जा सके तो आत्म-ज्ञान की इसे एक महत्वपूर्ण सीढ़ी ही कहा जायेगा।
स्टेम्फोर्ड विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान प्राध्यापक श्री चार्ल्स टी.टार्ट के स्वप्न प्रक्रिया सम्बन्धी शोध में भी यही निष्कर्ष निकाला है कि स्वप्न सर्वथा स्वच्छन्द नहीं होते, और न वे अकारण आते हैं। उनके पीछे कुछ ठोस कारण विद्यमान रहते हैं। हाँ, वे सीधे साधे तरीके से नहीं वरन् ‘पहेली बुझोअल’ की तरह कुछ विचित्र वेश बनाकर आते हैं और हमारी बुद्धि को चुनौती देते हैं कि उनकी रहस्यमयी गतिविधियों को समझें और सन्निहित कारणों को समझकर अपनी शारीरिक, मानसिक गतिविधियों के मोड़-तोड़ का परिचय प्राप्त करें।
रूस की ‘सोवियत स्काया रशिया’ पत्रिका में डॉक्टर कत्सफिन का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने लिखा है कि मस्तिष्क में ऐसी अद्भुत शक्ति है कि वह शरीर में भीतर चल रही रुग्ण गतिविधियों को पहले से ही जान लेता है और स्वप्नों के आधार पर यह संकेत देता है कि स्वास्थ्य की स्थिति इन दिनों कैसी चल रही है और उसका मोड़ किधर जा रहा है। वे कहते हैं- स्वप्न न आना अस्वस्थता की निशानी है। जब शरीर की नाड़ियाँ अपनी अन्तःप्रक्रिया की बारीक रिपोर्ट मस्तिष्क को देना बन्द कर देती है तभी सपने दीखना बन्द हो जाता है।
निद्रा केवल शारीरिक विश्राम ही नहीं वरन् कुछ और भी है। स्वप्न मात्र मनोवैज्ञानिक हलचल ही नहीं वरन् इसके अतिरिक्त भी उनमें कुछ अन्य तथ्य विद्यमान हैं।
यदि किसी को सोने न दिया जाय, निरन्तर जागृत रखा जाय तो वह कुछ ही दिन में पागल होकर मर जायेगा। इसलिए निद्रा-जिसमें हम जीवन का एक तिहाई भाग खर्च करते हैं। जीवन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। निद्रा दो भागों में विभक्त है। एक वह जिसमें मनुष्य पूरी तरह सो जाता है और दूसरा वह जिसे अल्प निद्रा कह सकते हैं, स्वप्न इस दूसरी स्थिति में ही आते हैं। जागृत अवस्था की तरह निद्रा की महत्ता भी हमारे ध्यान में रहनी चाहिए। गहरी नींद शारीरिक और मानसिक विश्राम की आवश्यकता पूरी करती है, यदि वह ठीक तरह आ जाय तो शरीर और मस्तिष्क की सारी थकान दूर हो जाती है और एक नई ताजगी का अनुभव होता है। अल्प निद्रा का महत्व और भी अधिक है क्योंकि उसमें अचेतन मन को क्रीड़ा कल्लोल करने का- अपनी दबी अनुभूतियाँ ऊपर उभारने का अवसर मिलता है। जागृत मस्तिष्क तो अपनी संवेदनाओं को ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की सहायता से चरितार्थ कर लेता है पर अचेतन मन का अपनी आकाँक्षाएं एवं अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से ही साकार करने और अपने द्वारा रचे हुए उस स्वप्न दर्पण में अपना मुँह देखकर सन्तोष करने का अवसर मिलता है, इस प्रकार यह स्थिति भी उपेक्षणीय नहीं वरन् उपयोगी है।
निद्रावस्था में मानवीय शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। नाड़ी की गति, रक्त का परिभ्रमण, इन्द्रियों की क्रियाशीलता, विचारों की गति धीमी पड़ जाती है। यद्यपि हृदय, फेफड़े, आमाशय, गुर्दे आदि अपना काम करते रहते हैं। जागृत और निद्रा की मध्यवर्ती स्थिति में स्वप्न दीखते हैं।
नशे में पड़ा हुआ अथवा भय एवं भ्रम ग्रसित व्यक्ति जिस प्रकार कुछ का कुछ देखने लगता है वही बात स्वप्नों में भी होती है। अनुभूति विकृत भले ही हो उसका कुछ आधार तो होता ही है। रस्सी का सर्प झाड़ी का भूत दीखना भ्रमग्रस्त स्थिति में सम्भव है पर उसमें सादृश्य का कुछ आधार हुआ ही, मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि भूतकाल की घटनाएं और जागृत अवस्था के अनुभव दोनों मिलकर स्वप्नों की चित्रकला का सृजन करते हैं।
कोलोरेडी विश्वविद्यालय ने कुमारी डोरोवी मार्टिन और फ्रान्सिस स्ट्रिविक के तत्वावधान में 30000 स्वप्न दर्शियों द्वारा देखे गये स्वप्नों का एक वर्ष तक निरन्तर विश्लेषण किया। इस प्रयोग में करीब 300 विश्लेषणकर्त्ता मनोविज्ञानी नियुक्त किये गये।
ऐसे ही प्रयोग डॉ. लुसीन वारनेर के तत्वाधान में हुए और उसमें 250 स्वप्न दर्शियों ने भाग लिया विश्लेषण कर्त्ता के रूप में मनोविज्ञानी महिला मिलडर्ड फेविला ने भाग लिया। यद्यपि देखे गये स्वप्नों में से एक तिहाई के ही कुछ निष्कर्ष निकाले जा सके पर उससे इस नतीजे पर जरूर पहुँच जाया गया कि प्रयत्न करने पर अधिकाँश स्वप्नों के आधार को ढूँढ़ा निकाला जा सकता है और उससे मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का सही पता लगाया जा सकता है। जिस प्रकार शरीर शास्त्री मल, मूत्र, थूक, रक्त आदि का ऐक्सरे फोटो विश्लेषण करके रोगी की स्थिति का पता लगाते हैं ठीक उसी प्रकार स्वप्नों के माध्यम से मनुष्य की अविज्ञात सूक्ष्म परिस्थितियों को जाना जा सकता है। विशेषतया मानसिक विश्लेषण में तो उससे बहुत अधिक सहायता मिल सकती है।
निद्रावस्था में निःचेष्ट शरीर पर पड़ने वाले छोटे-छोटे प्रभाव कई बार उस घटना को अति विस्तार देकर स्वप्न बन जाते हैं। जैसे सपने में बर्फीले पहाड़ या ठण्डे तूफान में फँस जाने का स्वप्न इस कारण भी हो सकता है कि शरीर पर से कंबल खिसक जाये और ठण्डी हवा का झोंका शरीर पर अपना प्रभाव डाल रहा हो। घर में चुहिया की खड़बड़ कानों को सुनाई पड़े और हो सकता है वह बादल गरजने की तरह सपना बन जाय। असुविधाजनक बिस्तर पर सोना, खटमल, पिस्सुओं और मच्छरों का काटना, अधिक भोजन कर लेने से पेट पर पड़ने वाला दबाव गहरी निद्रा में रुकावट डालते हैं और अधूरी एवं उचटी हुई नींद में असुविधाजनक कष्टकर दृश्य दिखाने वाले सपने दीख सकते हैं।
मन पर जो चिन्ता, भय, निराशा या वियोग व्यथा सवार हो वही उलट-पुलट कर सपना बन सकती है। कोई किसी स्वजन सम्बन्धी की मृत्यु ने यदि मन पर गहरा प्रभाव डाला है तो वह बार-बार सपने में दिखाई पड़ सकता है। ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और आत्महीनता की भावना के कारण जो असन्तोष रहता है उसकी तृप्ति अपनी या अपने किसी सम्बन्धी की विजय एवं उन्नति के रूप में दीख पड़े तो समझना चाहिए- अपना समाधान आप करने के लिए अचेतन मन सपने की सुनहरी नगरी बसाकर अपने को बहलाने का प्रयत्न कर रहा है। किसी शत्रु को हानि पहुँचाना या आशंकित आपत्ति का किसी डरावने रूप में आ खड़े होना जैसे सपने अपनी ही मकड़ी के बुने हुए जाले या ताने-बाने हैं।
अतृप्त इच्छाएं भी कई बार सपने में पूरी होती हैं जैसे किसी ब्रह्मचारी संन्यासी, भूले-भटके परिचित व्यक्तियों की आकृतियाँ भी स्मृति पटल पर उभर आती हैं और उनसे सम्बन्धित सपने दीखते हैं।
मनोविज्ञान वेत्ताओं की शोध यहीं तक सीमित है। इससे आगे अतीन्द्रिय विज्ञान का क्षेत्र आरम्भ होता है परा मनोविज्ञान- पैरा साइकोलॉजी, मैटाफिजिक्स जैसी विज्ञान शाखाएं यह स्वीकार करती चली जा रही हैं कि अचेतन मन की सत्ता शरीर तक ही सीमित नहीं, वरन् उसका घनिष्ठ सम्बन्ध ब्रह्माण्ड व्यापी विश्व चेतना-विराट् मन से भी है।
जो कुछ इस विश्व में हो चुका है या होने जा रहा है वह सब भी उसी प्रकार स्वप्नावस्था में दृष्टिगोचर हो सकता है जैसा कि अपने आपे से सम्बन्धित परिस्थितियों के दृश्य दिखाई पड़ा करते हैं। भूतकाल की विराट् मन पर अंकित ऐतिहासिक घटनाएं यदि स्वप्न में दीखती हैं तो उनके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि जो पढ़ा होगा या सुना होगा वही दीखा होगा पर भविष्य से सम्बन्धित घटनाएं जब स्वप्न में दीखती हैं और यथार्थ सिद्ध होती हैं तब उस पूर्वाभास के पीछे विराट् मन के साथ व्यक्ति के मन की सुसंबद्धता मानकर ही उसका समाधान किया जा सकता है।
पोलैंड का एक सैनिक स्टैनिस्लास भी प्रथम महायुद्ध में अन्य हजारों सैनिकों की तरह लापता था उसकी प्रेमिका मेरिना को यह बार-बार आभास होता कि वह अभी मरा नहीं है। उसकी तलाश करने के लिये वह अपने जेकनैक पुलिस थाने में जाती और प्रार्थना करती कि उसके प्रेमी की तलाश करने में वह मदद करें। अधिकारियों के पास तलाश करने की कोई युक्ति न थी, वे क्या कर सकते थे, इस लड़की को वे सनकी कहकर चुप हो जाते।
मेरिना के विश्वास का कारण वे सपने थे जो उसे अक्सर आया करते थे। अक्टूबर, 1918 में मेरिना ने पहला भयानक सपना देखा कि उसका प्रेमी किसी अँधेरी सुरंग में बन्द और वहाँ से बाहर निकलने का रास्ता तलाश कर रहा है। मोमबत्ती जल रही है और वह दरवाजे के पत्थरों को हटाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है पर उसमें सफलता नहीं मिल रही। निराश होकर वह घुटनों पर सिर रखे आँसू बहा रहा है। मेरिना ने इस सपने को कई दिन देखा।
दस महीने बाद स्वप्न के इस क्रम में कुछ हेर-फेर हुआ। उसने देखा किसी पहाड़ी पर एक छोटा सा किला है। वह विस्मार पड़ा है। मेरिना वहाँ पहुँचती है और मलबे के भीतर से उसके प्रेमी की आवाज आती है। वह सहायता के लिये उसे पुकारता है। वह पत्थर हटाने की कोशिश करती है पर वे बहुत भारी होने के कारण हटते नहीं। मेरिना थक जाती है और सपना टूट जाता है। लगभग यही सपना उसे बार-बार आता रहा।
मेरिना यही यकीन करती थी कि उसका प्रेमी जीवित है और उसी स्थिति में है जिसमें कि स्वप्न बताते हैं। वह पुलिस के पास जाती। भूगोल वेत्ताओं से राज्याधिकारियों से अपने सपने वाले किले के निशान बताकर उसका अता-पता पूछती। पर कोई कुछ बता नहीं सका क्योंकि पोलैंड में उस तरह के हजारों किले थे जो युद्ध के दरम्यान तथा उससे पहले ही खंडहरों के रूप में बदल चुके थे। लोगों ने लड़की से सहानुभूति तो दिखाई पर कोई मदद करने के लिये तैयार न हुआ।
आखिर भावुक लड़की उस स्थान की तलाश में अज्ञान दिशा की ओर निकल पड़ी। न पास में पैसा था और न कोई साधन। किसी अज्ञात दिशा में उसके पैरों को कोई घसीटे लिये जा रहा था और उसे लगता था कि वह सही दिशा में चल रही है। रात को सड़क के किनारे पड़ी रहती कोई दयालु व्यक्ति उसे कुछ खाने को दे देता उसे खा लेती। जो उसकी कहानी सुनते वे दुखी तो जरूर होते पर उसकी सहायता कर सकने में अपने को असमर्थ पाते।
चलते चलते 25 अप्रैल, 1920 को वह दक्षिण पूर्व पोलैंड के ज्लोटा गाँव के पास एक पहाड़ी पर जा पहुँची। उसके ठीक सपनों की तरह का दृश्य वहाँ देख और खुशी में चिल्ला उठी-ढूंढ़ लिया मैंने अपने पति को। यही है वह स्थान जहाँ स्टेनिप्लास जीवित मौजूद है। भीड़ इकट्ठी हुई। पुलिस भी आई। मेरिना ने बताया वह यहाँ दबा पड़ा है। वह स्वयं पत्थर हटाने लगी पर वे बहुत भारी थे। कौतूहल में सम्मिलित लोगों ने भी सहानुभूतिवश उसकी मदद की और कुछ पत्थर हटाये भी गये। अब एक छेद में से मनुष्य की हलकी आवाज सुनाई पड़ने लगी। लोगों को विश्वास हो गया कि मेरिना के सपने सच हैं और फिर पूरे प्रयत्न से मलबा हटाया और दो दिन में वह प्रवेश द्वारा खुल गया, जिसमें होकर खण्डहर के भीतर जाया जा सकता था।
स्टैनिस्लास बाहर निकाला गया उसका बुरा हाल था। दो वर्ष इस एकाकी कैद में वह वन मानुस जैसा दीखता था। हुआ यह कि लड़ाई का एक मोर्चा इस पहाड़ी किले पर जमा था। शत्रुओं की तोपें उस पर गोलाबारी कर रही थी। तभी एक गोला किले के द्वार पर गिरा और उसके गिरने से निकलने का रास्ता बन्द हो गया। उस बन्द खण्डहर में कुछ मोमबत्तियाँ, पनीर बियर, तथा पानी की एक हौदी आदि जो सैनिकों की रसद जमा थी उसी के आधार पर उसने दो वर्ष गुजारे कभी प्रयत्न करता, कभी प्रार्थना, कभी मेरिना की याद करता, कभी मौत की। इसी तरह उसने यह लम्बी अवधि काटी।
मेरिना का सपना सच सिद्ध हुआ। जिस शक्ति ने उसे यह आभास दिया था वह उसे उस किले तक भी ले पहुँची और अन्ततः अपने प्रेमी को पाने में इसी आधार पर सफल हुई।
इतिहास के पृष्ठ स्वप्नों की सत्यता वाले सन्दर्भों से भरे पड़े हैं-
सीजर की पत्नी कलपोर्निया ने एक सपना देखा जिसमें फव्वारे से खून झरता था, उसमें सीजर स्नान करता दिखाई पड़ा। वह इस सपने से बहुत भयभीत हुई और सीजर को बाहर जाने से रोका भी। उसे आशंका थी कि कोई दुर्घटना घटित न हो जाय। पर सीजर माना नहीं। बाहर चला गया और वहीं उसकी हत्या कर दी गई।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की पत्नी ने अपने पति की हत्या किये जाने का स्वप्न देखा। एक दिन तो वे पत्नी के कहने पर घर ही रहे पर दूसरे दिन जब वे थियेटर गये तो स्वप्न के अनुरूप ही उनकी हत्या हो गई।
अमेरिका में 28 फरवरी, 1844 को जलयानों में फिट की गई नई किस्म की तोपों का प्रदर्शन करने के लिये एक बड़ा समारोह मनाया गया। वाशिंगटन में प्रमुख नेताओं तथा अफसरों को उसमें आमंत्रित किया गया। आमन्त्रितों में जनरल गार्डिनर तथा उनकी दो पुत्री और जल सेना के मन्त्री थामस और उनकी पत्नी सेनी भी थीं।
उपरोक्त दोनों महिलाओं ने आयोजन से एक दिन पूर्व ठीक एक ही तरह का सपना देखा। दो घोड़ों पर सवार दो नर कंकाल उस जहाज की ओर दौड़े चले आ रहे हैं। उनने कइयों को खा डाला। इनमें से एक जनरल गार्डिनर भी थे; और सेनी के पति भी शामिल थे।
यह सपना उनने सुनाया और भावी विपत्ति की आशंका से उस समारोह में न जाने की बार-बार विनय की पर कोई माना नहीं। सपने को मजाक में टाल दिया गया। नियत समय पर सब लोग पहुँच ही गये।
नियत समय वह विशाल तोप दागी गई। ज्यों ही घोड़ा दागा कि तोप फट गई और कई अन्य व्यक्तियों के साथ गार्डिनर और थामस भी उस दुर्घटना में मृत्यु के ग्रास बन गये।
मनुष्य तो केवल प्राकृतिक नहीं है, वह मानसिक है, इसी से मनुष्य विश्व पर अहोरात्र अपने मन का प्रयोग करता रहता है; वस्तुतः विश्व के साथ वह अपने मन का सामंजस्य करता रहता है।
-रवीन्द्र
मोटे तौर पर यह समझा जाता है कि आहार से रक्त बनता है और रक्त की शक्ति से शरीर में गर्मी तथा शक्ति बनी रहती है। पर बारीकी से देखने पर विदित होता है कि आहार को रक्त में परिणत करने वाली एक प्रणाली और भी है और वही अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण भी है। स्वसंचालित नाड़ी संस्थान तथा चेतन अचेतन द्वारा उनके नियंत्रण संचालन की बात भी अब मोटी बात ही रह गई है। मस्तिष्क अचेतन नाड़ी संस्थान को दिशा प्रेरणा और सामर्थ्य देने वाले केन्द्र और भी सूक्ष्म हैं; और उनके निरीक्षण से पता चला है कि शक्ति और अशक्ति के मूल आधार और भी अधिक गहराई में छिपे हुए हैं और वे पिछले दिनों प्रायः अविज्ञात ही बने रहे हैं। घी दूध जैसे मोटा बनाने वाले पदार्थों से वंचित व्यक्ति भी जब मोटे होते चले जाते हैं और चिकनाई तथा पौष्टिक आहार में डूबे रहने वाले भी जब दुबले पतले रहते हैं तो आहार का स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव गलत सिद्ध होता है। इसी प्रकार शरीर में चुस्ती, थकान, सर्दी, गर्मी का बाहुल्य, कद का बहुत छोटा या बहुत बड़ा होना, मन्द और तीव्र बुद्धि, हिम्मत और भीरुता, सौंदर्य और कुरूपता जैसी बातें जब स्वास्थ्य के सामान्य नियमों का उल्लंघन करते हुए घटने या बढ़ने लगती हैं तब भी आश्चर्य होता है कि समुचित सावधानी बरतने पर भी यह अकस्मात् ही क्या और क्यों होने लगता है।
यह आधार वे ग्रन्थियाँ हैं जो ‘हारमोन’ नामक रसों को प्रवाहित करती रहती हैं और वह रस रक्त में मिलकर संजीवन का काम करते हैं। इन रसों के उत्पादन या प्रवाह में तनिक भी व्यतिक्रम या अवरोध उत्पन्न हो जाय तो शरीर का ही नहीं, मन का भी सारा ढाँचा लड़खड़ाने लगता है।
गले के पास थाइराइड नामक एक ग्रन्थि है। इसमें थायराक्सिन नामक हारमोन रस निकलता और रक्त में सम्मिलित होता रहता है। यदि इसकी कमी हो जाय तो पाचन क्रिया बिगड़ जाती है, मस्तिष्क कुन्द हो जाता है, त्वचा और केशों में रुक्षता छाई रहती है, होंठ और पलक लटक जाते हैं, शरीर थुलथुल हो जाता है, उँगली गाढ़ने से गड्ढा बनने लगता है, थकान छाई रहती है, ठण्ड अधिक सताती है, यदि यह ग्रन्थि बढ़ जाय तो गला मोटा होने लगता है, ‘घेंघा’ की शिकायत खड़ी हो जाती है, आहार विहार सब कुछ ठीक रहने पर भी यह ग्रन्थि सूखने या बढ़ने लग सकती है।
इस महत्वपूर्ण किन्तु अनियन्त्रित ग्रन्थि में गड़बड़ी क्यों पड़ती है यह खोजते हुए शरीर शास्त्री सिर्फ इतना जान सके हैं कि ‘आयोडीन’ की कमी पड़ने से ऐसा होता है। वे कहते हैं भोजन में कम से कम 20 माइक्रो ग्राम आयोडीन होनी चाहिए, समुद्री जल, समुद्री नमक, समुद्री घास-पात, समुद्री मछली में वे आयोडीन का बाहुल्य बताते हैं। यह सब करने पर भी बहुत बार निराश ही होना पड़ता है। श्वास नली के ऊपरी भाग को ढके हुए, गहरे लाल रंग की दो पत्तियों वाली, तितलीनुमा यह थाइराइड ग्रन्थि तो भी काबू में नहीं आती। अन्वेषकों ने इस ग्रन्थि के गह्वर में ‘कोलाइड’ नामक एक पीला प्रोटीन और ढूँढ़ निकाला और अनुमान लगाया कि शायद यही थायराक्सिन को प्रभावित करता हो, पर यह निष्कर्ष भी गलत ही निकाला।
थाइराइड में सिकुड़न आ जाने से चमड़ी शुष्क रहने लगती है, बाल झड़ने लगते हैं और रूखे हो जाते हैं, उनकी चिकनाई और मुलायमी नष्ट होती जाती है। उभरी हुई आंखें, लटके हुए होंठ, याददाश्त की कमजोरी, मोटी चमड़ी माँस में उँगली दबाने से गड्ढा जैसा बन जाना जैसी विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। शरीर में बेहद थकान, मस्तिष्क में जड़ता, याददाश्त घटना, उदासी, किसी भी काम में मन न लगना, जैसी शिकायतें अकारण ही पैदा होने लगें तो उसका कारण थाइराइड से प्रवाहित होने वाले हारमोन थायराक्सिन की कमी पड़ना समझना चाहिए। इस कमी के कारण शरीर में ऑक्सीजन सोखने की शक्ति घट जाती है। स्वच्छ हवा मिलने पर भी वह उसका लाभ नहीं उठा पाता। ऑक्सीजन की कमी से उपरोक्त उपद्रव खड़े होते और बढ़ते हैं।
इस कमी को पूरा करने के लिए दूसरे प्राणियों की थाइराइड का सत्व प्रवेश कराया गया उसका ताल मेल-भी नहीं बैठा। कृत्रिम थायराक्सिन बनाने के लिये डॉ. ई.सी. कैन्डाल और हैरिंगटन तथा बार्गर नामक अंग्रेज ने भारी प्रयत्न किया और कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा आयोडीन के सम्मिश्रण से उसे बना भी लिया। देखने में समतुल्य होने पर भी वह उस कमी को पूरी न कर सका, आयोडीन नमक में मिलाकर खिलाने का भी प्रयोग बहुत चला पर वह भी कुछ स्थायी प्रभाव न दिखा सका।
अधिक मात्रा में यह हारमोन निकलने लगें तो भी मुसीबत खड़ी होती है। इञ्जन तेज हो जाता है और बढ़ी हुई गर्मी हर अवयव की गति तेज कर देती है। धड़कन बढ़ जाती है- पसीना फूटता है, उत्तेजना रहती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और रक्तचाप बढ़ा हुआ दिखाई देता है। गले की मोटाई बढ़ने लगती है। रेडियम, एक्स किरणें, रेडियो सक्रिय आयोडीन आदि उपचारों का भी इन दिनों इस पर प्रयोग परीक्षण चल रहा है। थाइराइड के भीतर पाई जाने वाली पैराथाइराइड नन्हीं सी ग्रन्थियों की भी तलाशी की जा रही है पर रहस्य का पर्दा तो भी उठता नहीं।
डॉ. इमले से कनाडा के रसायन शास्त्री कोलिय तक से लेकर थाइराइड को नियन्त्रित करने का सिलसिला अद्यावधि चल ही रहा है। कैल्शियम देने से शायद कुछ काम चले, यह भी परख लिया गया है।
भोजन का ग्रास पेट में पहुँचते ही वहाँ उसका परिवर्तन होने लगता है। स्टार्च तथा शुगर दोनों अंश ग्लूकोस शर्करा में बदल जाते हैं। इस ग्लूकोस का कुछ अंश तत्काल खून में चला जाता है और शरीर को गर्मी तथा शक्ति देने के काम आता है। शेष ग्लाइकोजन के रूप में जिगर में जाकर जमा हो जाता है और आवश्यकतानुसार उसका उपयोग होता रहता है।
पर जिन्हें मधुमेह- डायबिटीज की शिकायत हो जाती है उनकी भोजन से बनी हुई शर्करा शरीर में काम नहीं आती वरन् रक्त में उसकी मात्रा बढ़ती चली जाती है उधर उसका शर्करा अभाव के कारण शरीर क्षतिग्रस्त होता चला जाता है। यह गड़बड़ी अग्न्याशय नामक ग्रन्थि से निकलने वाले इन्सुलिन नामक हारमोन की कमी पड़ जाने के कारण उत्पन्न होती है।
फैडरिक वैटिंग ने इस सम्बन्ध में भारी शोध की। लैंगर हैंस की द्वीपिकाओं में बनने वाले इस रसायन को पहले आइजलीटिन कहा जाता था पीछे इसे इन्सुलिन कहा जाने लगा। इसी शोध पर वैटिंग तथा मैकलियाड को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
आधी लीटर रक्त में एक ओंस के साठवें भाग के बराबर शर्करा रहती है। इसे एक प्रकार का ईंधन कहना चाहिए जिसके आधार पर कोशिकाओं तथा माँस पेशियों को समस्त अवयवों को गरम और गतिशील रहने का अवसर मिलता है, इस कार्य में इन्सुलिन की सहायता एड्रीनेलिन भी करता है।
गुर्दों के पास दो छोटी ग्रन्थियाँ हैं इन्हें एड्रिनल या अधिवृक्क कहते हैं। दोनों का मिलाकर कुल वजन लगभग 12 ग्राम बैठता है। वे लगभग दो इंच लम्बी, एक इंच चौड़ी होती हैं। इनके दो भाग होते हैं। भीतरी भाग बाहर के भाग से खोल की तरह घिरा होता है और बाहरी भाग छाल (कौटेक्स) कहलाता है। भीतर के गूदे को ‘मनडुला’ कहते हैं। कोई विपत्ति की घड़ी या तात्कालिक उत्तेजना का अवसर आने पर यह ग्रन्थियाँ सक्रिय हो उठती हैं और उससे इतनी शक्ति मिलती है जो सामान्य शरीर बल की अपेक्षा कई गुनी होती है।
यह छोटी सी गांठें उपेक्षित सी एक कोने में पड़ी थीं, इनका कार्य ठीक तरह समझ में नहीं आता था पीछे वे बड़ी महत्वपूर्ण मालूम हुई। उनके द्वारा स्रवित होने वाला रस एड्रीनेलिन कहा जाने लगा।
भय या खतरे के समय पाचन यन्त्र ठप्प हो जाते हैं और उस ओर लगी हुई शक्ति खतरे का सामना करने के लिये असाधारण शक्ति उत्पन्न करना आरम्भ कर देती है। दिल जोरों से धड़कता है, श्वास तेज चलता है, रक्त की चाल बढ़ जाती है ताकि उस अतिरिक्त शक्ति के आधार पर शरीर उस संकट का सामना करने के लिए जोरदार प्रयत्न करने में लड़ने या भागने में समर्थ हो सके। श्वास नली चौड़ी हो जाती है ताकि अधिक हवा फेफड़ों में भरी जा सके। रक्त में शर्करा बढ़ जाती है ताकि शक्ति के लिये आवश्यक ईंधन जुट सके। खतरे का सामना करने के लिये इस प्रकार हर अवयव अपनी क्षमता को तीव्र करता है। माँस पेशियाँ तन जाती हैं समस्त शरीर उत्तेजित दीखता है, चेहरा लाल हो जाने के रूप में इस बढ़ी हुई शक्ति को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
अन्तः स्रावी ग्रन्थियों के उपभेद तो कई हैं और उनसे निकलने वाले स्रावों की भेद उपभेद की दृष्टि से संख्या भी बढ़ती जा रही है पर साधारणतया उनमें से छह प्रमुख हैं (1) पीयूष ग्रन्थि (2) कण्ठ ग्रन्थि (3) अधिवृक्क ग्रन्थि (4) अग्न्याशय ग्रन्थि (5) अण्डाशय ग्रन्थि (6) वृषण ग्रन्थि।
शरीर का आकार सामान्य रखने या उसे असाधारण रूप से घटा या बढ़ा देने का यकायक भारी हेर फेर उत्पन्न कर देने का कारण मस्तिष्क स्थित पीयूष ग्रन्थि ही है। उसमें जहाँ बाल की नोंक की बराबर अन्तर पड़ा कि शरीर में वैसी ही विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सर्जन डॉ. हार्वे कुशिंग ने एक पिल्ले की पीयूष ग्रन्थि निकाल दी। बस फिर वह बढ़ा ही नहीं। सदा के लिये पिल्ला ही बना रह गया। चूहों के बच्चे पीयूष ग्रन्थि रहित किये गये तो वे बढ़िया से बढ़िया भोजन देने पर भी उतने ही छोटे बने रहे न उनका कद बढ़ा और न वजन में रत्ती भर अन्तर आया। बूढ़े होने तक वे बच्चे ही बने रहे। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के सर्जन फिलिप स्मिथ ने एक चूहे की पीयूष ग्रन्थि दूसरे में फिट कर दी तो दूने हारमोन बढ़ने से वह चूहा असाधारण रूप में बढ़ा और अपने साथियों की तुलना में तीन गुना दैत्य जैसा हो गया।
हारमोन ग्रन्थियों में अन्तर आने से शरीर का विकास असाधारण रूप से रुक सकता है और आश्चर्यजनक रीति से बढ़ सकता है। 25 इंच ऊँचा आदमी टामथम्ब और 24 इंच ऊँची स्त्री लेवोनिया लोगों की दृष्टि में आश्चर्यजनक हैं, पर यह हारमोन ग्रन्थियों की एक मामूली सी उलट-पुलट मात्र है। टामथम्ब जन्म के समय 9 पौण्ड 2 औंस था, पर न जाने क्या हुआ कि आशा के विपरीत वह जहाँ का तहाँ रह गया। बाजीगरों का धन्धा करता था। उसने अपने ही जैसी बौनी लड़की भी ढूंढ़ निकाली उससे शादी करके अपने व्यवसाय को और भी अधिक आकर्षण बनाया। उनका यह पलड़ा दूसरी तरफ झुक जाय फिर लम्बाई ही लम्बाई बढ़ती चली जायेगी। 8 फुट 11 इंच ऊँचा आदमी राबर्ट वाडली ताड़ के पेड़ जैसा लगता था। पलामू (बिहार) में साड़े सात फुट ऊँचा तिलवर नामक व्यक्ति अभी कुछ दिन पहले तक लोगों का ध्यान अपनी अनोखी लम्बाई की ओर खींचता रहता था।
रूस का शासक जार पीटर स्वयं लम्बे कद का था, उसे लम्बे आदमी बहुत पसन्द थे। उसका एक प्रिय लम्बा सार्जेन्ट जब मरा तो जार ने उसके अस्थि-पिंजर को कुन्सत्कैयर के संग्रहालय में सुरक्षित रखने का आदेश दिया तब से वह रखा ही हुआ था। अब दो सौ वर्ष बाद एक्स किरणों की सहायता से उस कंकाल की असाधारण लम्बाई का कारण खोजा गया है तो उसमें पीयूष ग्रन्थि से अधिक स्राव होना ही कारण पाया गया है।
मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह जितना अधिक सम्भव है, बाहरी परिस्थितियों पर शासन करे और जितना कम हो सके उनसे शासित रहे।
-गेट
सिकन्दरिया में एक ऐसा बौना मनुष्य था जिसकी ऊँचाई केवल 17 इंच थी, उसका नाम था अलीपियस। उसे वहाँ के अमीर जैम्बिलकस ने अपने मेहमानों के मनोरंजन के लिये अपने पास रखा था। उसे कभी कभी तोते के पिंजड़े में बंद करके इधर उधर ले जाया जाता था।
ओहियो (संयुक्त राज्य) के सिनसिनाटी नगर में एक लड़की थी कुमारी फैनी माइल्स। यह सन् 1880 में जन्मी। इसके और सब अंग तो साधारण थे पर पैरों के पंजे असाधारण रूप से लम्बे थे। उनकी लम्बाई दो-दो फुट थी। उसकी इस विचित्रता से सभी डरते थे और कोई उससे विवाह करने के लिये तैयार न हुआ।
डेट्रामेट, मिचीराना (अमेरिका) का एक नागरिक अल्फ्रेड लेंजवेन एक अनोखी शारीरिक विशेषता से सम्पन्न था। जिस प्रकार दूसरे लोग नथुनों से साँस लेते हैं वह आँखों से साँस ले सकता था और छोड़ सकता था। परीक्षा के तौर पर वह जलता दीपक और मोमबत्तियाँ मुँह और नाक बन्द करके मात्र आँखों से देखकर बुझा देता था।
फेडपैटजेल की आवाज इतनी बुलन्द थी कि जब वे गरज कर बोलते तो उनकी कही हुई बात तीन मील तक सुनी जा सकती थी।
हारमोन स्रावों की घटोत्तरी बढ़ोत्तरी का आहार विहार से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार उनका सचेतन और अचेतन मन से भी कोई सम्बन्ध अभी तक स्थापित नहीं किया जा सका। इसी प्रकार आनुवंशिकी विज्ञान में पैतृक जीनों से भी उनकी कुछ संगति नहीं बैठती, अचेतन मन से कोई संग्रहीत संस्कार उन्हें प्रभावित करता हो ऐसी भी तुक किसी प्रकार नहीं बैठती। फिर अकारण इन अन्तःस्रावों की अक्समात क्यों घटोत्तरी बढ़ोतरी आरम्भ हो जाती है इसका यथार्थ कारण ढूंढ़ना हो तो हमें अधिक गहराई तक जाना पड़ेगा। इसके आधार मनुष्य की सूक्ष्मतम चेतना से सम्बन्धित हैं।
मनुष्य तीन भागों में विभक्त है। एक भाग वह जो भौतिक पदार्थों का पंचतत्वों का बना है, जिसे स्थूल शरीर कहते हैं। जिस पर आहार विहार का प्रभाव पड़ता है और जिसका उपचार औषधियों अथवा उपकरणों से किया जाता है। दूसरा भाग वह जिसे मन, मस्तिष्क अथवा अचेतन कहते हैं। यह सूक्ष्म शरीर है। चिन्तन एवं वातावरण का इस पर प्रभाव पड़ता है। तर्क, विवेक विचार विनिमय, भावोत्तेजना जैसे उपायों से इसे विकसित किया जाता है। नशीले तथा दूसरे प्रकार के रसायन भी इसे प्रभावित करते हैं। आहार का एवं क्रिया-कलाप का भी इस पर असर पड़ता है। मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान, मस्तिष्कीय विद्या आदि के माध्यम से इसे परिष्कृत, संतुलित किया जाता है।
तीसरा भाग इन दोनों से ऊपर है, जिसके कारण शरीर लिंग शरीर हृदय, अन्तःकरण आत्मा चेतना आदि नामों से पुकारते हैं। इसका सीधा सम्बन्ध मनुष्य की आस्था, श्रद्धा आकाँक्षा, भावना एवं अहंता से है। उस स्तर के पाप पुण्य वहाँ छाये रहते हैं और इन्हीं के आधार पर जीव की अन्तरंग सत्ता का प्रकटीकरण होता है। हारमोन इसी स्तर की स्थिति में प्रभावित होते हैं इसलिए यदि उन्हें चाहें तो संचित प्रारब्ध, अथवा संग्रहीत संस्कार भी कह सकते हैं। यह संचय इस जन्म का भी हो सकता है और पिछले जन्मों का भी परिवर्तन एवं उपचार इस स्तर की स्थिति का भी हो सकता है, पर वे प्रयत्न होने उसी प्रकार के चाहिएं जो आन्तरिक सत्ता की गहराई तक प्रवेश कर सकें और अपना प्रभाव उस पृष्ठभूमि तक उतार सकें।
क्या हारमोन क्षेत्र पर नियन्त्रण हो सकता है? क्या उनकी विकृत गतिविधियों को सन्तुलित किया जा सकता है? क्या इच्छा या आवश्यकता के अनुरूप इन्हें घटाया या बढ़ाया जा सकता है? इसका उत्तर ‘हाँ’ में दिया जा सकता है। पर यह समझ लेना चाहिए कि इसके लिए प्रयास वे करने पड़ेंगे जो अन्तःचेतना को गहराई तक प्रभावित करते हैं। शारीरिक आहार विहार या मानसिक तर्क वितर्क या उपचारों से उस गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता जहाँ इन हारमोनों का मूलभूत उद्गम है। केवल आध्यात्मिक साधनाओं का मार्ग ही ऐसा है जो शरीर और मन को प्रभावित कर के हारमोनों को ही नहीं और भी कितने ही महत्वपूर्ण आधारों में हेर फेर करके मनुष्य को सामान्य से असामान्य बना सकता है।
कोई अशुभ कार्य करते समय तुम निष्कपट हो न? जो कुछ बोल रहे हो निस्वार्थ भाव से ही न? जो दान-उपकार कर रहे हो बदले की आशा के बिना ही न? जो धन संचय कर रहे हो कृपणता छोड़कर ही न?
-हातिम हासम
दूध को तपाने से मलाई और घी निकलता है। धातुओं को तपाने से वे बहुमूल्य भस्म और रसायन बनती हैं। सामान्य अन्न तपाये जाने पर स्वादिष्ट आहार बनता है, मिट्टी को तपाने से पत्थर बनती है। कच्चा लोहा पकाने पर ही फौलाद बनता है। स्वर्ण की आभा अग्नि संस्कार से ही निखरती है। खारी और भारी समुद्र जल तपने के उपराँत मीठा और हलका बादल बनकर आकाशगामी होता और तृषित भूमि की तृप्ति करता है। हिमालय पर जमी बरफ तपने पर ही गंगा-यमुना का सम्मान पाती है, तपता हुआ सूर्य अपनी आत्मा और ऊष्मा से समस्त विश्व में प्राण वर्षा करता है और ग्रह परिवार को अपने साथ बाँध रहने में समर्थ है।
यदि यह सब तपने के लिये तैयार न हों, कच्चे और शिथिल ही बने रहें तो उनमें प्रखरता उत्पन्न न होगी ऐसी ही कच्ची कमजोर स्थिति में पड़े रहेंगे। दबी हुई समर्थता को उभारने के लिए तप एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वह कष्ट साध्य तो है पर उसके द्वारा होने वाले लाभों को देखते हुए महत्ता इतनी बड़ी है कि उसे घाटे का सौदा नहीं कह सकते हैं। व्यायामशाला में किया हुआ तप पहलवान बनाता है। पाठशाला में तप करने वाला विद्वान बनता है। खेत का तपस्वी सुसम्पन्न कृषक बनता है। पत्थर को प्रतिमा, कागज को चित्र बना देने की क्षमता मूर्तिकार के, चित्रकार के तप में ही सन्निहित है।
लौकिक जीवन में पग-पग पर कठोर श्रम, पुरुषार्थ, साहस, मनोयोग की महत्ता स्पष्ट है। अध्यात्म क्षेत्र में भी यही तथ्य काम करता है। तपस्वी शक्तिशाली बनते हैं और उस तप साधित शक्ति के आधार पर वे भौतिक सिद्धियों से सम्पन्न बनते हैं। इतिहास के महामानवों, ऋषियों, तत्वदर्शियों, देवदूतों की महत्ता उसके तप के कारण ही प्रकाशवान हुई है। देवताओं के वरदान केवल तपस्वियों के लिये सुरक्षित रहते हैं। केवल याचना प्रार्थना से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है। पुराणों का प्रत्येक पृष्ठ तप साधना के द्वारा उपलब्ध विभूतियों की महत्ता प्रतिपादित करता है धर्म-शास्त्रों में तपश्चर्या का महात्म्य ही विभिन्न प्रकारों और प्रकरणों में गाया गया है।
मनुष्य के भीतर बहुत कुछ दिव्य, अलौकिक एवं अद्भुत है। उसके उत्खनन के लिए तपश्चर्या अनिवार्य है। भगवान ने विभूतियों का भण्डार मानवी कलेवर में भर दिया है, पर उससे लाभान्वित होने का अधिकार उसी को दिया है जो तप साधना द्वारा अपनी पात्रता सिद्ध कर सके। समुद्र में अनादि काल से अगणित रत्न भरे पड़े हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिये गहरे में गोता लगाने का साहस करना पड़ता है। जब समुद्र मंथन किया गया तो उसमें से 14 रत्न निकले, यदि वह कठोर पुरुषार्थ न किया गया होता तो उन रत्नों के प्राप्त होने की आशा कैसे की जा सकती थी। देवताओं ने गौरवशाली पद तप साधना से ही प्राप्त किये हैं। इसके बिना वे भी अन्य प्राणियों की तरह मात्र जीवधारी ही बने रह सकते थे। जो तप की कष्ट साध्य प्रक्रिया को देखकर डरा, या घबराया उसके लिए विभूतियों ने अपना द्वार बन्द ही कर दिया है। सहज ही सब कुछ प्राप्त करने का स्वप्न देखते रखने वाले व्यक्ति खाली हाथ ही रहते हैं।
हमें अभीष्ट उद्देश्य के लिए तपस्वी बनने का प्रयत्न करना चाहिए और इस मान्यता को दृढ़तापूर्वक हृदयंगम कर लेना चाहिए कि भौतिक उन्नति के लिये जिस प्रकार कठोर श्रम और प्रचण्ड साहस की, एकाग्र मनोयोग की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार आत्मिक विभूतियाँ प्राप्त करने के लिये तप साधना की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। जो इस मूल्य को चुका सकते हैं वे ही शक्तियों और सिद्धियों से सम्पन्न होते हैं।
तपश्चर्या की उपलब्धियों का वर्णन विवेचन करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है कि ईश्वर भी तप के प्रभाव से ही इस सृष्टि की रचना में समर्थ हुआ है। मनुष्य के लिए तो अभीष्ट उपलब्धियों के लिए भी तप ही एकमात्र मार्ग है-
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत।
गुहा प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत ॥ एतद्वैतत्। 6।
क. 2। 1। 6
उस परमेश्वर ने सर्वप्रथम तप किया। उस तप के श्रम स्वेद से जल उत्पन्न हुआ।
तस्मै स होवाच प्रजाकामौ वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ में बहुधा प्रजाः करिष्यत इति॥ 5
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्व यन्मुर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयि॥5
-प्रश्नोपनिषद् 1।4-5
प्रजा उत्पन्न करने की कामना वाले प्रजापति ने तप किया। तप द्वारा प्राण और रति यह दो तत्व उत्पन्न किये संसार में जो मूर्तिमान है वह प्राण है और जो अमूर्तिमान है वह रति है।
सोऽकामयत्। बहुस्याँ प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्त्वप्त्वा इद œ सर्वमसृजत यदि किं च। सत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशित्।
-तैत्तरीय ब्रह्मावल्ली 6
उस परमात्मा ने प्रकट होने की इच्छा की। इसके लिये तप किया। तप की शक्ति से जगत रचा और फिर उसी में प्रविष्ट हो गया।
अवीहि भगवो ब्रह्मेति। तँ होवाच ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रहयेति। स तपोऽतप्त्वा।
-तैत्तरीय भृगुवल्ली 2
भृगु ने कहा-ब्रह्म का ज्ञान कराइये। तब वरुण बोले- तप के द्वारा ब्रह्म को जानो। तप ही ब्रह्म है। यह सुनकर भृगु तप करने चले गये।
अथैष ज्ञानमयेन तपसा यीयमानोऽकामयत बहुस्याँ प्रजायेयेति। अथैतस्मात् तप्यमानात् सत्यकामात् त्रीण्यक्षराण्यजायन्त। तिस्त्रो व्याहृतयस्त्रिपदा गायत्रीं त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयो वर्णास्त्रयोऽनयश्च जायन्ते।
-शाण्डिल्योपनिषद् 3।1
ब्रह्म ने ज्ञान मय तप किया। उस तप से वृद्धि पाकर उसने इच्छा की मैं एक से अनेक जाऊँ। इसके लिये उसने फिर तपस्या की तब तीन अक्षर, तीन आवृत्ति, त्रिपदा गायत्री, तीन वेद, तीन वर्ण, तीन अग्नि प्रकट हुए।
तप्श्वचार प्रथमममराणाँ पितामहः।
आविर्भूतास्ततो वेदाः साँगोपाँगपदक्रमाः॥
-मत्स्यपुराण
देवों के पितामह ने सबसे प्रथम तो तपश्चर्या की थी। इसके अनन्तर सब वेदों का आविर्भाव हुआ था जो अपने अंग शास्त्र, उपांग तथा पद एवं क्रम से संयुक्त थे।
मानव जीवन की भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिये तपश्चर्या अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जो साहसी उसके लिए कटिबद्ध होते हैं वे इतना प्राप्त करते हैं कि उस तप साधना का कष्ट उन उपलब्धियों की तुलना में नगण्य ही होता है। बीज का तप वृक्ष के रूप में परिणत होता है। मनुष्य का तप उसे नर से नारायण-पुरुष से पुरुषोत्तम-आत्मा से परमात्मा बना देता है।
तपोमूलमिदं सर्वं यन्माँ पृच्छसि क्षत्रिय।
तपसा वेदविद्धाँसः परं त्वमृतमाप्नुयूः॥
-महाभारत
राजन्! तुम जिस तपस्या के विषय में मुझसे पूछ रहे हो, यह तपस्या ही सारे जगत का मूल है! वेदवेत्ता विद्वान इस तप से ही परम अमृत मोक्षों को प्राप्त होते हैं।
तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते।
ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षयः॥
-महाभारत
तप से स्वर्गलोक में जाने का सौभाग्य प्राप्त होता है, दान से भोगों की प्राप्ति होती है। ज्ञान से मोक्ष मिलता है, यह जानना चाहिये तथा तीर्थ स्नान से पापों का क्षय हो जाता है।
न विद्यया केवलया तपसा चाऽपि पात्रता।
यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रम्प्रचक्षते॥
-स्कन्द
केवल विद्या से और न केवल तपश्चर्या से पात्रता हुआ करती है। जहाँ पर सच्चरित्रता है और ये दोनों (विद्या और तप) भी विद्यमान हैं वह ही वस्तुतः पात्र कहा जाया करता है।
अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति, मनः सत्येन शुद्धयति।
विद्यातपोभ्याँ भतात्मा, बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति ॥
-मनु
शरीर जल से शुद्ध होता है। मन सत्य से। आत्मा विद्या और तप से तथा बुद्धि, ज्ञान से शुद्ध होती है।
जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाँ नाडीका दन्तास्पतसाभिदिग्धाः तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृदयबलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः।
-अथर्व 5।18। 8
देव भावनाओं से भरा ब्राह्मण का आत्म-बल ही धनुष है। उनकी वाणी प्रत्यंचा है। उसका तप बाण है। इस अचूक ब्रह्मास्त्र से सुसज्जित ब्रह्मवेत्ता असुरता को बेध कर रखा देता है।
तपसा स्वर्गभवाप्नोति।
-अत्रि
तप से ही स्वर्ग मिल सकता है।
तपस्विनः पूजनीयाः।
-याज्ञवलक्य
पूजनीय केवल तपस्वी होते हैं।
चेत्युच्यतं एतदप्युक्त नातपस्कस्यात्मज्ञानेऽधिगमः कर्मशुद्धिर्वेत्यवं ह्याह।
तपसा प्राप्यते सत्वं सत्वात् संप्राप्यते तनः।
मनसा प्राप्यते त्वामा ह्यात्मापत्त्या निवर्तते॥
-मैत्रायण्यपुपनिषद् 4।3
तपश्चर्या बिना आत्मा में ध्यान नहीं लगता। न कर्म शुद्धि होती है। तप द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान से मन का निग्रह होता है। मन स्थिर होने पर आत्मा की प्राप्ति होती है और इस उपलब्धि से बन्धन छूट जाते हैं।
आत्म-कल्याण के लिए तप सम्पदा सम्पन्न लोगों की ही शरण में जाना चाहिए। वे ही स्वयं पार होते और दूसरों को पार कर सकने में समर्थ होते हैं-
ऋषीन्तपस्वतो यमतपोजाँ अभिगच्छतात्।
-ऊचर्वः /8/2/15
तप से उत्पन्न-तपश्चर्या करते हुए ऋषियों की शरण में जाओ। आत्मिक प्रगति और शक्ति सम्पन्नता के लिये, तपस्वी बनने के लिये तत्पर होना आवश्यक है। श्रुति कहती है-
भद्रमिच्छत ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्यै देवा उपसंनमन्तु॥
-अथर्व 16। 41। 1
उन शिव संकल्पी ऋषियों ने व्रतों में दीक्षित होकर तप का अनुष्ठान किया। जिससे राष्ट्र का जन्म हुआ और तपानुष्ठान से ही उन्होंने इस राष्ट्र में बल और सामर्थ्य का विकास किया। आइये, तप के द्वारा हम सब भी इस सामर्थ्य का सम्वर्धन करें।
जीव परमात्मा से एक ही प्रार्थना करता है कि उसकी प्रवृत्ति तप साधना की ओर मुड़े ताकि वह समस्त विभूतियाँ अनायास ही उपलब्ध कर सके।
यदग्ने तपसा तप, उपतप्यामहे तपः।
प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मा, ऽऽयुष्मन्तः सुमेधसः॥
-अथर्व. 7। 61। 1
हे परमात्मन्! हम आपकी कृपा से तप करेंगे, तीव्र तप करेंगे। हम विद्वान और तपस्वी होकर जियें।
अग्ने तपस्तप्यामह, उपतप्यामहे तपः।
श्रुतानि शृण्वन्तो वयम्, आयुष्मन्तः सुमेधसः॥
-अथर्व. 7। 62। 2
आत्मा को जानो। दर्शन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा आत्मा को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। इसलिये जो ज्ञान इन्द्रियों के वेग को शान्त करने वाला है, वही ज्ञान है; उपनिषदों का यह निश्चित सिद्धान्त है।
दूसरों की बुराइयाँ सभी देखते हैं परन्तु अपनी ओर देखने का अभ्यास बहुत कम लोगों को होता है। सुप्रसिद्ध विचारक इमर्सन का कथन है- ‘बहुत कम लोग मृत्यु से पूर्व अपने आपको पहिचान पाते हैं’ बहुत कम व्यक्ति अपने जीवन में सभी शक्तियों को प्रकट करते हैं; बाकी तो उन्हें साथ लिए ही मर जाते हैं। हममें से अनेकों तो ईश्वर के सन्देश को संसार में दिये बिना ही यहाँ से चले जाते हैं’।
वस्तुतः तथ्य तो यह है कि हमारे अन्दर असंख्य गुप्त शक्तियाँ सोई पड़ी हैं परन्तु हमें उन योग्यताओं तथा क्षमताओं का पता ही नहीं और न ही उन्हें जानने का प्रयास करते हैं। यह ठीक है कि बाहर की अनेकों वस्तुएं जानकर हम ज्ञानवान् कहलाएँ, परन्तु यह भी कम आवश्यक नहीं कि हम अपने आपको पहचानना भी सीखें। जो अपनी और देखने का अभ्यास डालता है, वही महान् बनता है। ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों तथा बाधाओं पर विजय पाकर सतत् उन्नति करता रहता है।
महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे सतत् आत्म-निरीक्षण करते रहें तथा अपनी भूलों से सदैव शिक्षाएँ ग्रहण करते रहें। यदि आप भी महान् बनना चाहते हैं तो दूसरों को तुच्छ समझने की, उनमें छिद्रान्वेषण करने की दृष्टि का परित्याग कर दीजिए। दूसरों को तुच्छ समझने वाला मनुष्यत्व खो देता है। अन्यों की गलतियाँ खोजने की अपेक्षा अपनी त्रुटियाँ खोजिए और उन्हें दूर कीजिए। अपनी शक्तियों को पहचानिए और उनका सदुपयोग कीजिए।
ईश्वर ने अनेकों दिव्य शक्तियाँ देकर आपको संसार में भेजा है, उनका सदुपयोग कीजिए। पेट और प्रजनन जैसे क्षुद्र कार्यों में उन्हें व्यर्थ न होने दीजिए। आप जो भी कार्य कर रहे हैं उनसे हजारों गुना अधिक कार्य करने की सामर्थ्य आपके अन्दर है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि अपना महत्व समझे, शक्तियों को पहिचाने तथा समय का सदुपयोग करें। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है, उसे व्यर्थ न जाने दें।
जो कार्य करने की इच्छा रखते हैं, उसे आज से ही प्रारम्भ कर दीजिए। अपनी समस्त शक्तियाँ उसमें एकाकार। वह क्षण आपके जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण होगा जब आपको यह अनुभव होगा कि संसार को आपकी आवश्यकता है। आपके अन्दर एक और व्यक्तित्व समाहित है जो आपके बाहरी व्यक्तित्व से कहीं अधिक महान है। जिस क्षण व्यक्ति अपनी महानता की झलक पा लेता है; वह मानव से महामानवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है।
हो सकता है कि किन्हीं कठिनाइयों या बाधाओं के कारण आपका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित न हो सकता हो। परन्तु आपत्तियाँ आने पर घबराएं मत। जिस प्रकार से अग्नि में तप कर सोना निखर जाता है, और भी अधिक चमकने लगता है, उसी प्रकार बाधाएँ और कठिनाईयाँ मनुष्य को खरा कुन्दन बना देती है। कई पादप ऐसे होते हैं, जब तक उन्हें मसला न जाए सुगन्धि नहीं देते। उसी प्रकार कुछ व्यक्ति भी ऐसे होते हैं, जब तक वे विपत्तियों से आक्रान्त न किये जायें, उनकी योग्यताओं की सुगन्धि फैल ही नहीं पाती। अतएव आत्म-निरीक्षण के द्वारा अपनी योग्यताओं को पहचानिये। किसी भी प्रतिभा का अंकुर आपको अपने अन्दर दिखलाई पड़े उसको पुष्पित पल्लवित होने का अवसर दीजिये। कौन जाने एक दिन आप संसार के महान कलाकार बन जायें, विश्वप्रसिद्ध लेखक बन जायें, दार्शनिक या राजनीतिज्ञ बन जायें। चलिये और सतत् बढ़ते रहिए।
जो स्वयं को जान लेता है, वही साक्षात् परमेश्वर को जान सकता है। वही व्यक्ति ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा कर सकता है तथा उसके संदेशों को जनसाधारण तक पहुँचा सकता है।
एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को तर्क, प्रमाण विचार, परामर्श आदि देकर प्रभावित कर सकता है इसकी जानकारी सभी को है। अध्यापक अपने छात्रों के मस्तिष्क को विकसित करते हैं, पहलवान अपने शागिर्दों को कुश्ती, कसरत सिखाकर बलवान बनाते हैं। वक्ता, लेखक विचारों से हलचल उत्पन्न करके लोगों के सोचने के तरीके में परिवर्तन करते हैं। नर-नारी के बीच शारीरिक आकर्षण भी काम करता है और प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने रौब-दौब, आतंक का भी उपयोग करते हैं।
उपरोक्त प्रभाव प्रक्रिया का स्तर उथला ही रहता है। अध्यापक गणित, इतिहास, भाषा, भूगोल आदि की जानकारी करा देने पर अपने कर्त्तव्य से छुट्टी पा लेते हैं। वे चिन्तन की शैली, आकाँक्षा और दिशा नहीं बदल सकते हैं। अखाड़े के पहलवान शागिर्दों की माँस-पेशियाँ मजबूत कर सकते हैं उनमें मनोबल उत्पन्न नहीं कर सकते। अखाड़े में जाकर कोई संयमी, सदाचारी, मनस्वी साहसी बन जाय यह आवश्यक नहीं, क्योंकि पहलवानी की शिक्षा उथले स्तर पर ही समाप्त हो जाती है वह अन्तरंग की गहराई में नहीं उतरती है।
इसी प्रकार लेखक, वक्ता, नेता, प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति अपनी तेजस्विता के सम्मोहन से तत्काल तो कुछ भी सोचने करने को आवेश उत्पन्न कर सकते हैं पर वह क्षणिक होता है और उथला रहता है। वह नशा उतरते ही लोग अपने पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं और वह कृत्रिम उत्साह अपनी क्षणिक चमक दिखाकर तिरोहित हो जाता है। कारण स्पष्ट है, जो शिक्षण दिया गया था वह अन्तः करण की गहराई तक प्रवेश न कर सका; केवल उथले बौद्धिक स्तर तक टकराकर बिखर गया। उस टकराहट की प्रतिक्रिया जितनी देर रह सकती थी उतनी देर रही और इसके बाद व्यक्ति की वही संस्कार गत स्थिति आ गई।
मनुष्य का समग्र व्यक्तित्व विकसित एवं परिवर्तित करने से ही उसकी गरिमा और महत्ता बढ़ सकती है। महामानव ही इस विश्व की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। कोई देश और समाज उन्हीं के कारण गौरवशाली बनते हैं और उन्हीं के अभाव में पतन के गर्त में गिरते चले जाते हैं। राष्ट्रीय सम्पदा का मूल्याँकन, धन के आधार पर नहीं मनस्वी, तेजस्वी और आत्म बल सम्पन्न प्रतिभा के आधार पर ही किया जाना चाहिए। वे यदि उद्भूत नहीं तो विपुल सम्पदा सम्पन्न होते हुए भी कोई समाज दरिद्र ही रहेगा। उसकी वह आर्थिक उन्नति भी ठोस प्रगति की दिशा में कुछ अधिक सहायता न कर सकेगी।
यह उच्चस्तरीय व्यक्तियों का निर्माण कैसे हो? इसके लिए उसी स्तर के साँचे चाहिए। टकसाल के साँचे जैसे होते हैं वैसे ही सिक्के ढलते चलते जाते हैं। बुद्ध के अनुगामी ढाई लाख व्यक्तियों ने संसार भर में सत्य अहिंसा का संदेश पहुँचाया था। गान्धी के अनुचर स्वतंत्रता संग्राम में एक से एक बढ़े अनुदान लेकर आगे आये। यह प्रेरणाएँ बौद्धिक आधार पर नहीं-भावना स्तर पर दी जाती हैं और इसके देने के लिए वैसा ही आत्म शक्ति सम्पन्न व्यक्तित्व चाहिये। आज आवश्यकता ऐसी ही हस्तियों की है जो अपने आत्मबल से जन साधारण के भावस्तर को विकसित और परिष्कृत कर सकें। विज्ञान इस संभावना को स्वीकार करता है कि अदृश्य शक्ति प्रवाह के द्वारा भी मानवीय चेतना को अभीष्ट दिशा में मोड़ा या ढाला जा सकता है।
मानव मस्तिष्क की अन्तस्त्वचिका के भीतर एक विशेष प्रकार की तंत्रिकाएं पाई जाती हैं उनका समूह भावात्मक मस्तिष्क कहलाता है। भय, क्रोध, शोक, चिन्ता, अवसाद, हर्ष, संतोष, प्रेम, त्याग, संयम और कामोद्वेग जैसी प्रवृत्तियां इसी भाग से संबंधित हैं। इसका स्वरूप बहुत कुछ वंश परम्परा से उत्तराधिकार में मिला था, कुछ वातावरण एवं संगति में और कुछ व्यक्तिगत चिन्तन की दिशा के आधार पर विकसित होता है। अविकसित और विकसित प्राणियों का यों मानसिक अन्तर कुछ तो बुद्धि के आधार पर भी होता है पर मुख्य अन्तर यह भावात्मक ही है। भावनाओं के आवेश में ही मस्तिष्क उत्तेजित होता है और मस्तिष्क सक्रिय होता है। इन दोनों की बिखरी हुई दिशाओं को एक केन्द्र पर एकत्रित करने और क्रियाशील बनाने का श्रेय इस भावात्मक मस्तिष्क केन्द्र को ही है।
येल विश्वविद्यालय के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जोसे डैलगेडों ने ऐसे विधुदग्र रेडियो उपकरणों का आविष्कार किया है जिनके आधार पर बिना शल्य चिकित्सा के ही रेडियो किरणों द्वारा मस्तिष्क के किसी भाग से संपर्क बनाना और उसे प्रभावित कर सकना संभव हो सके। भावनात्मक मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और कोशिकाओं को उन्हीं शरीर के आर-पार जा सकने वाली किरणों के द्वारा वहाँ के असंतुलन को मिलाया जा सकेगा। विशेष प्रकार का भावावेश उत्पन्न किया जा सकेगा। यह किरणें ‘क्ष’ किरणों से मिलती जुलती हैं जिन्हें शरीर के आरपार जाने में मस्तिष्क की कठोर खोपड़ी में भी कोई बड़ी बाधा नहीं पहुँचती।
अब तक भावनाओं का समाधान भावनाओं से ही किया जाता रहा है। क्रोध को विनय से, घृणा को प्रेम से, असंतोष को उपलब्धियों से शमन किया जाता रहा है। इसके लिये सामने वाले व्यक्ति को वैसा विश्वास दिलाकर उसे उद्वेग का समाधान करना पड़ता था जिसके अभाव में उसे असंतुलित होना पड़ा। इतनी लम्बी प्रक्रिया के बाद तब कहीं उत्तेजित व्यक्ति सामान्य स्थिति में आता था। उसके समाधान के लिए व्यक्ति विशेष को माध्यम बनाकर अथवा वातावरण को बदल कर मनोविकार ग्रस्त मनुष्य की शान्ति संभव की जाती थी। उचित ही नहीं अनुचित समाधान भी प्रस्तुत करने पड़ते थे। पर अब उपरोक्त वैज्ञानिक उपलब्धियों के कारण यह कठिन प्रक्रिया सरल हो गई। रेडियो विद्युत धाराएँ आवेश ग्रस्त मस्तिष्कीय खण्ड का शमन कर दिया करेंगी और मनुष्य चिकित्सक के इशारे पर अपने भाव संस्थान में आवश्यक परिवर्तन कर लिया करेगा। इस सफलता के कारण न केवल भावनात्मक रुग्ण ग्रन्थियों को खोला जा सकेगा वरन् उपयोगी ऐसे भाव बीज भी जमाये जा सकेंगे जो उसे किसी दिशा विशेष में चलने के लिये आवश्यक रुचि एवं स्फूर्ति पैदा कर सकें।
मानवीय मस्तिष्क पर इलेक्ट्रॉनिक नियमन की इस प्रक्रिया पर विज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य बहुत तेजी से चल रहा है और काफी प्रगति भी हुई है। दो दशक पूर्व स्विट्जरलैंड के विज्ञानी डॉ. डब्ल्यू. आर. हेस ने इस दिशा में प्रयास आरम्भ किया था उन्होंने जीवित प्राणी के मस्तिष्क में एक सुई घुसेड़ कर उसके माध्यम से विविध स्तरों की विद्युत तरंगें पहुँचाई थीं और उनके प्रभाव का अध्ययन किया था। उन्होंने पाया कि चेतन और अचेतन मस्तिष्क भागों में विभिन्न स्तर के जो चेतन केन्द्र बने हुए हैं उनसे संबन्ध स्थापित किया जा सकता है और उन केन्द्रों को उत्तेजित करके उसी स्तर की विचारणा से प्राणी को ओत प्रोत किया जा सकता है।
इसके बाद अमरीकी मस्तिष्क विद्या विशारद डॉ. जेम्स ओल्डस् ने इस कार्य को ओर आगे बढ़ाया। उन्होंने मानवी मस्तिष्क को हाथ में लिया जब कि पूर्ववत् स्विस विज्ञानी वैसे प्रयोग अन्य प्राणियों पर करते रहे। भूख, भय, इच्छा, कामुकता, क्रोध, पीड़ा, निराशा, उत्साह जैसे मस्तिष्क क्षेत्र तो पहले भी मालूम थे पर उनके केन्द्रीय कण उन्होंने ढूंढ़े और इस खोज के बाद उन्होंने वह पद्धति खोजी जिसके अनुसार उस केन्द्र तक बाह्य प्रभाव को पहुँचाया जा सकना संभव हो सके। इसमें सबसे बड़ी बाधा खोपड़ी को चारों और से जकड़ी हुई कपाल अस्थियों की थी। यह अस्थियाँ सिर की केवल सर्दी गर्मी चोट आघात आदि से ही रक्षा नहीं करती वरन् बाहरी विद्युत प्रभावों को भी भीतर जाने से रोकती हैं। विचारों की बिजली अति सूक्ष्म होने से भीतर प्रवेश कर सकती है। एक संकल्प शील व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति पर आरोपित करने का सफल प्रयोग तो जर्मनी के डॉ. शेक्सर पहले ही कर चुके थे। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म आविष्कारों ने उनमें इसी तथ्य को प्रत्यक्ष किया था, पर यह तो प्रश्न विचार तरंगों की नहीं- विद्युत तरंगों के प्रवेश का था इसमें कपाल अस्थियाँ प्रधान रूप से अवरोध उत्पन्न कर रही थीं। इसलिए उन्होंने चोर रास्ते से प्रवेश किया, रेडियो प्रभावित रसायनों को रक्त में मिलाकर और उस प्रभावित रक्त में विद्युत तरंगें पहुँचाकर नया रास्ता खोज लिया गया और अमुक केन्द्र को उत्तेजित करने के लिए अमुक स्तर की विद्युत का प्रयोग करने की पद्धति का निर्धारण कर लिया गया।
यह प्रयत्न और भी अधिक तेज कर दिये गये हैं और वह सरलता खोजी जा रही है जिससे जिसे प्रभावित करना हो उसके सहयोग की आवश्यकता न रहे। अभी तो यह कार्य तभी हो सकता है जब व्यक्ति पर लोह पट्टी बँधवाने और औषधालय सेवन के लिए सहायता हो। बाँधकर बलात्कार पूर्वक तो यह किया नहीं जा सकता। यदि व्यक्ति अपने ऊपर इस प्रकार का प्रभाव डलवाने के लिए सहमत न हो तब तो सारी योजना ही निरस्त्र हो जायेगी। अस्तु शोध के चरण इस दिशा में चल रहे हैं कि मनुष्य को पता भी न चले और परोक्ष रूप से उसे बौद्धिक पराधीनता के पास से मजबूती से जकड़ा जा सके। अभी तो मछली पकड़ने के लिए काँटा फेंकने वालों की सफलता मछली की इच्छा पर निर्भर रहती है।
ये वैज्ञानिक मछुए यह प्रयत्न कर रहे हैं कि काँटा डालने की जरूरत ही न पड़े मछली का सहयोग अपेक्षित ही न रहे वरन् उनमें ऐसी प्रेरणा उत्पन्न की जाय कि ये जाल में आने के लिए खुद ही दौड़ती चली आयें। मानवी मछलियों को फाँसने के लिये यह शोध प्रयास इसी स्तर का है। प्रकृति की शक्तियों को वशवर्ती करने में बहुत बड़ी मात्रा में सफलता प्राप्त कर लेने के बाद अब चेतना की स्वतंत्रता को विज्ञान मुट्ठी में कैद करने के लिये अन्वेषण गतिविधियाँ तीव्र कर दी गईं हैं और विज्ञान क्षेत्र में समुन्नत देश गुप चुप इस दौड़ में परस्पर बाजी मारने के लिये खुले हुये हैं। अन्तरिक्ष पर नियन्त्रण करने से भी भी बढ़कर यह आविष्कार होगा।
इस दिशा में संतोषजनक सफलता मिलती है तो फिर युद्ध का सब से बड़ा माध्यम यही होगा, एक अणु बम, हाइड्रोजन बम जैसे अस्त्र को बेकार समझ कर त्याग दिया जायेगा क्योंकि उससे शत्रु देश के विनाश के साथ-साथ विश्वव्यापी वातावरण के विकरण उत्पन्न होने से मित्र देशों को भी खतरा उपस्थित होता है। फिर उसमें कई तरह के खतरे और झंझट भी हैं। खर्चीली तो वह प्रक्रिया है ही उसकी सुरक्षा के लिये भी कम चिन्ता नहीं करनी पड़ती।
प्रगति जिस चरण में पहुँची है उसे देखते हुए मिशिगन विश्वविद्यालय अमेरिका के इस संदर्भ में संलग्न विज्ञानी डॉ. ओटो शिमल ने घोषणा की है अब हमारे हाथ में मानव मस्तिष्क को नियन्त्रित करने की शक्ति आ गई, पर आशा की जानी चाहिए कि उसका प्रयोग केवल अच्छाई के लिये ही होगा; किन्तु साथ ही इस खतरे को भी ध्यान में रखना होगा कि इस नव उपार्जित शक्ति का प्रयोग निजी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति एवं राष्ट्रीय विस्तार वाद के लिये भी किया जा सकता है। यदि ऐसा किया गया तो यह आविष्कार संसार का सबसे अधिक विघातक अस्त्र सिद्ध होगा।
हमारी आत्मा ब्रह्म का ज्योतिस्वरूप है, उसे मैं द्वेष, इच्छाओं और चिन्ताओं से मुक्त रखना चाहता हूँ। आत्मा के लिए पूर्ण अखण्ड स्वतन्त्रता सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।
कुछ दिन अमरीका प्रति रक्षा विभाग के एक गधे पर यह प्रयोग किया गया था और उसे उपकरणों से प्रभावित करके अकेला छोड़ा गया था। उसे जिधर चलने और जो करने के लिए निर्देश किया उसने वही सब कर दिखाया।
इस अन्वेषण के आधार पर कई उपयोगी चमत्कार अमेरिका के मेयो क्लिनिक ने कनाडा के मोन्ट्रियल न्यूरोलॉजिकल इन्स्टीट्यूट ने तथा नार्वे के गुस्टाड मेन्टल हॉस्पिटल ने दिखाये हैं। रोगी को खुशी-खुशी बिना डरे आपरेशन करा लेने के लिए इस आधार पर तैयार करने में आश्चर्यजनक सफलता पाई गई है। एक प्रयोग में तो एक 18 वर्ष से अन्धी चली आई महिला को उसका मस्तिष्कीय दृष्टि संस्थान उत्तेजित करके देख सकने की शक्ति ही प्रदान कर दी। यह इस अन्वेषण का उपयोगी पक्ष है। निस्सन्देह इन आविष्कारों का उपयोग मानवी सुविधाओं की वृद्धि भी कर सकता है पर खतरा तो उस दिशा से है जिस पर कि आज के विश्व राजनेता धृष्टतापूर्वक चलते हुए एक दूसरे से बाजी मारने की बात सोच रहे हैं।
अवाँछनीय दृष्टि-कोण लेकर किया हुआ इस आविष्कार का उपयोग किसी भी अधिनायक वादी के हाथ में चक्रवर्ती विजय सौंप सकता है। इस क्षेत्र में प्रगति सम्पन्न देश अपने विरोधी या असहयोगियों की जनता तथा सैन्य शक्ति में निराशा, भीरुता, एवं भयाक्राँत मनः स्थिति व्यापक रूप से उत्पन्न कर सकता है और उस व्यामोह में फँसे हुये विशाल जन समाज को मुट्ठी भर लोग अपने काबू में रखने और इशारे पर चलने के लिये विवश कर सकते हैं। गुलामी के बंधनों से जकड़ने के अब तक के प्रयासों में यह सबसे घृणित प्रयास होगा। जब आदमी सोचने की निजी क्षमता ही खो बैठा तो फिर उसका ‘अपनापन’ तो कुछ रहा ही नहीं, तब उसे जीवित होते हुए भी मृतकों की तरह कहीं भी खींचा घसीटा जाता रहेगा। ऐसे शक्ति सम्पन्न लोगों के चंगुल से तो मुक्त होने की भी फिर कोई आशा न रहेगी।
रूस के लौह आवरण में क्या हो रहा है इसका पता चलना कठिन है पर अमेरिका के समाचार हैं कि कुछ उच्च कोटि के वैज्ञानिकों ने मनुष्य समाज की वर्तमान मनोदशा से इस आविष्कार के खतरे को देखते हुए इस प्रयास में भाग लेने और काम करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। जो लगे हुये हैं उनका तर्क यह है कि हम इस प्रयास में इसलिये लगे हुए हैं कि रूस हमसे आगे न निकल जाय और कहीं उसके चंगुल में हमारा देश ही न फँस जाय। वे कहते हैं अन्तरिक्ष यानों की प्रतिस्पर्धा का भी तो यही कारण है फिर मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने की इस खोज में ही क्या दोष है?
भौतिक विज्ञान मनुष्य के मस्तिष्क तक ही पहुँच सकता है क्योंकि मस्तिष्क भी शरीर का ही एक अंग होने से उसे भी भौतिक क्षेत्र में सम्मिलित रखा गया है। मन को छठी या ग्यारहवीं इन्द्रिय ही माना गया है। वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा मस्तिष्कों को प्रभावित करने की विधि लगभग खोज निकाली गई है और वह निकट भविष्य में सामने आ भी रही है। इसका भला बुरा प्रभाव जल्द ही देखने के लिये मिल जायेगा
पर भाव क्षेत्र फिर भी सूना ही पड़ा रहेगा। वह भौतिक विज्ञान की परिधि से बाहर है क्योंकि अन्तरात्मा विशुद्ध चेतना का अंश है उसे प्रभावित, परिणत और परिष्कृत करने में केवल आत्मसत्ताएं ही समर्थ हो सकती हैं।
आज आत्मसत्ता की दुर्बलता के कारण भौतिक वादी असुर सत्ता संसार की समस्त सम्पदाओं पर हावी होती जा रही है। मस्तिष्क की स्वतन्त्र चिन्तन शैली पर भी उसका दाँत है और आश्चर्य नहीं कि वह भी उसकी पकड़ में आ जाय। ऐसी विषम घड़ियों में इस बात की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है कि आत्म सत्ता का पक्ष इतना प्रबल हो कि उसके द्वारा संसार की भाव चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर किया जा सके। ऐसा हो सका तो भौतिक विज्ञान और उसकी समस्त उपलब्धियों को विश्व कल्याण में नियोजित किया जा सकेगा। यदि ऐसा न हो सका तो भौतिक विज्ञान के बढ़ते हुये चरण मनुष्य को एक मशीन मात्र बनाकर छोड़ेंगे और कुछ सत्ताधारियों की कठपुतली बनकर समस्त मनुष्य समाज को सबसे बुरी पराधीनता-मस्तिष्कीय गुलामी के निविड़ बंधनों में बंध कर दयनीय स्थिति में जीना पड़ेगा। ऐसे विषम समय में आत्म विज्ञान पक्ष को अधिक समर्थ और अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है।
शिल्पकार ने बहुत सुन्दर मूर्ति बनाई। बहुत देर तक उलट पुलट कर उसने देखा, और फिर फूट-फूट कर रोने लगा।
लोगों ने रोने का कारण पूछा तो उसने कहा-कि बहुत खोजने पर भी मुझे इसमें कोई त्रुटि नजर नहीं आती। यदि मेरी सूक्ष्म दृष्टि इतनी ही कुँठित बनी रही तो भविष्य में इससे अच्छी मूर्तियाँ बनाने का द्वार बन्द हो जायेगा।
मनुष्य अपने को ही महत्वपूर्ण मानता रहे और दूसरे प्राणियों को तुच्छ समझे यह उचित नहीं। सोचने की क्षमता, सामाजिक सूझ-बूझ बेशक मनुष्य में अधिक है और इन दो कारणों से उसने उन्नति भी बहुत की है पर इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य जीव कूड़ा-करकट ही हैं। भगवान ने उन्हें भी अनेक प्रकार की विशेषतायें दी हैं, जिनसे मनुष्य सर्वथा वंचित है। अपने इन ईश्वरीय अनुदानों के कारण वे मनुष्य की तुलना में कई अभाव रहते हुए भी सुख-सुविधा भरा जीवन जीते हैं। एक किस्म के खिलौने मनुष्य को दिये हैं तो दूसरी किस्म के खिलौने भगवान ने अपने इन छोटे बच्चों को, अन्य जीवों को भी दे रखे हैं और खाली हाथ उन्हें भी नहीं रहने दिया गया है।
दीमक और चींटियाँ परस्पर अंग स्पर्श करके -एक दूसरे साथी की अपनी बात बताती और सुनती हैं। इस पारस्परिक जानकारी के आधार पर उन्हें अपना भावी कार्यक्रम बनाने में बड़ी सहायता मिलती है।
तितलियाँ और पतंगे अपने शरीर से समय-समय पर भिन्न प्रकार की गन्ध छोड़ते हैं, उस गन्ध के आधार पर उस जाति के दूसरे पतंगे अपने साथियों की स्थिति से अवगत होते हैं और उपयोगी सूचनायें संग्रह करते हैं। किस दिशा में उपयोगी किसमें अनुपयोगी परिस्थितियाँ हैं उसका ज्ञान वे साथी पतंगों के शरीर से निकलने वाली गन्ध से ही प्राप्त करते हैं। उनकी दृष्टि दुर्बल होती है। आँखें उनकी इतनी सहायता नहीं करतीं जितनी कि नाक।
बहुत पतंगे एक दूसरे के विभिन्न अंगों का स्पर्श करके अपने विचार उन तक पहुँचाने और उनके जानने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। मनुष्य का सम्भाषण वाणी से अथवा भाव भंगिमा के माध्यम से सम्पन्न होता है। पतंगे यही कार्य परस्पर अंग स्पर्श से करते हैं। जीभ से उच्चारण न कर सकने पर भी वे एक दूसरे की शारीरिक और मानसिक स्थिति जान लेते हैं। इस प्रकार उनका पारस्परिक संपर्क एक दूसरे के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। मधुमक्खियों के पैर बहुत संवेदनशील होते हैं। वे उन्हें रगड़ कर एक प्रकार का प्रवाह उत्पन्न करती हैं। उससे न केवल ध्वनि ही होती है वरन् ऐसी संवेदना भी रहती है जिसे उसी वर्ग की मक्खियाँ समझ सकें और उपयोगी मानसिक आदान-प्रदान से लाभान्वित हो सकें।
टिड्डे और झींगुर अपने पिछले पैर और पंख रगड़कर अनेक चढ़ाव-उतार सम्पन्न ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करते हैं। सितार, सारंगी या वेला के तारों का घर्षण जिस प्रकार कई तरह की स्वर लहरी पैदा करता है, उसी तरह टिड्डे तथा झींगुरों के पैरों तथा पंखों के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला स्वर प्रवाह अनेक प्रकार का होता है और उसमें अनेक प्रकार के भाव तथा संकेत छिपे रहते हैं।
जीव विज्ञानी जर्मन वैज्ञानिक डॉक्टर फैवर ने योरोप भर में घूमकर विभिन्न जातियों के टिड्डे, झींगुरों की ध्वनियों का टैप संकलन किया है। उसने 400 प्रकार के शब्द पाये जो निरर्थक नहीं, सार्थक थे और सुरुचि पैदा करते थे। उन्होंने 14 प्रकार के प्रणय गीत भी इकट्ठे किये जिनमें प्रणय निवेदन के उतार-चढ़ाव, आग्रह, अनुरोध आकर्षण, निषेध, मनुहार, प्रलोभन, सहमति, असहमति की मनःस्थिति की जानकारी सन्निहित थी। इसके अतिरिक्त वे अन्य मनोभाव अपने वर्ग तक पहुँचाने के लिए अपनी अन्तः अभिव्यक्ति के लिये यह ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करते हैं इसका विस्तृत विश्लेषण और विवरण डॉक्टर फैवर ने तैयार किया है। ग्राईलस, कम्पोस्टिस, ग्राइवो, मेकूलेटस जाति के झींगुरों की शब्दावली और भी अधिक विकसित पाई गई।
मधु मक्खियाँ जब घर लौटती हैं तो अपनी दैनिक उपलब्धियों की जानकारी छत्ते की अन्य मक्खियों को देती हैं इसके लिए उनका माध्यम नृत्य होता है। स्थिति की भिन्नता को सूचित करने के लिए उनकी अनेक नृत्य पद्धतियाँ निर्धारित हैं। परिसंवाद से वे परस्पर एक दूसरे की उपलब्धियों से परिचित होती हैं और अगले दिन के लिए अपना क्रम परिवर्तन निश्चित करती हैं। कार्ल वाल फ्रञ्च का मधु मक्खियों सम्बन्धी अध्ययन अति विशाल है। रानी मधुमक्खी जब ऋतुमती होती है तो उसके शरीर से निकलने वाले आक्सोइका और ड्रनोइक द्रव हवा में उड़कर नरों तक सन्देश और आमन्त्रण पहुँचाते हैं।
कुछ लघु कार्य कीट पतंग केवल अपने नेत्र सञ्चालन और मुख मुद्रा में थोड़ा हेर-फेर करके अपनी मनःस्थिति से साथियों को अवगत करते हैं। प्रो. राबर्ट हिण्डे ने कितनी ही चिड़ियों को केवल नेत्र संकेतों से वार्तालाप करते देखा है। एक दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान की आवश्यकता वे आँखों में रहने वाली संवेदना से कर लिया करती हैं, जुगनू अपने मनोभाव पूँछ में से प्रकाश चमकाकर प्रकट करते हैं। प्रकाश के जलने बुझने का क्रम उस वर्ग के दूसरे जुगनुओं के चमकते हुए प्रकाश के माध्यम से पारस्परिक परिचय तथा एक दूसरे की स्थिति समझने का अवसर मिलता है।
मेंढ़कों का टर्राना एक स्वर से नहीं होता और न निरर्थक। वे अपनी स्थिति की सूचना इस टर्राहट के द्वारा साथियों तक पहुँचाते हैं। इसलिये इस टर्राने में कितने ही प्रकार के उतार-चढ़ाव पाये जाते हैं। पक्षियों में कौए की भाषा अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत है। वे अपने वर्ग की ही बात नहीं समझते वरन् आस-पास रहने वाले अन्य पक्षियों की भाषा भी बहुत हद तक समझ लेते हैं और उस जानकारी के आधार पर चतुरतापूर्वक लाभ उठाते हैं।
आमतौर में छोटे-जीव जन्तुओं के पारस्परिक संवाद के विषय होते हैं, सहायता की पुकार, खतरे की सूचना, क्रोध की अभिव्यक्ति, हर्षोल्लास का गीत राग, व्यथा वेदना का क्रन्दन, ढूँढ़ तलाश। इन प्रयोजनों के लिये उन्हें अपने वर्ग के साथ सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है। ऐच्छिक या अनैच्छिक कुछ भी हो यह विचार विनिमय उनके लिये उपयोगी ही सिद्ध होता है। यदि इतना भी वे न कर पाते तो सामाजिक जीवन का सर्वथा अभाव, नितान्त एकाकीपन उन्हें और भी अधिक कष्टमय स्थिति में धकेलता।
नीलकण्ठ पक्षी द्वारा मछली का शिकार देखते ही बनता है। वह पेड़ की डाली पर बैठा हुआ घात लगाये रहता है, और जहाँ मछली दिखाई पड़ी कि बिजली की तरह टूटता है और पानी में गोता लगाकर मछली पकड़ लाता है। आश्चर्य इस बात का है कि जिस डाली पर से- जिस स्थान से वह कूदा था लौटकर ठीक वहाँ वापिस आता है और वहीं बैठता है। यह स्प्रिंग पद्धति का क्रिया-कलाप है। दीवार पर फेंककर मारी गई गेंद लौटकर फैंकने के स्थान पर ही आती है। नीलकण्ठ प्रकृति के उसी सिद्धान्त का जीता जागता नमूना है।
तोता, मैना, बुलबुल, रोबिन, चटक, कनारी कुलम जैसे कितने ही पक्षी मनुष्य की बोली की नकल उतारने में सक्षम होते हैं। पढ़ाये हुए तोता मैना राधा, कृष्ण सीताराम, कौन हैं, क्यों आये, आदि कितने ही शब्द याद कर लेते हैं, और समय-समय पर उन्हें दुहराते रहते हैं। ‘अमेजन’ जाति का तोता तो 100 शब्दों तक की नकल उतार सकता है। आस्ट्रेलियाई तोते 10 तक गिनती गिन ही नहीं लेते वरन् उस संख्या को पहचान भी लेते हैं।
कबूतरों की सन्देश वाहक के रूप में काम करने की क्षमता प्रसिद्ध है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने और वापिस लौटने में उन्हें सिखाया सधाया जा सकता है। डाक-तार की सुविधा से पूर्व वे सन्देश वाहक का काम खूबी के साथ निबाहते थे। पैरों में पत्र बाँध दिया जाता था, वे निर्दिष्ट स्थान तक पहुँचते थे और उत्तर को दूसरा पत्र उसी पैर में बँधवाकर वापिस अपने स्थान को लौट आते थे।
शिकारी जानवरों के दाँत साफ करने के लिये कितने ही पक्षी अभ्यस्त रहते हैं। मगर, बाघ आदि अपने दाँतों की सफाई कराने के लिये मुँह फाड़कर पड़े रहते हैं और वे चिड़ियाँ अपने शरीर का बहुत सा हिस्सा उनके जबड़े में डालकर दाँतों की सफाई करती रहती हैं। उन्हें जरा भी डर नहीं लगता कि वे हिंसक पशु यदि चाहें तो जबड़ा बन्द करके उनका कचूमर बना सकते हैं। यह चिड़ियाँ निर्भय ही नहीं होती वरन् उनकी सहायता भी करती हैं। जहाँ शिकार होती हैं वहाँ चहचहा कर उनका मार्गदर्शन और प्रोत्साहन भी करती हैं।
चमगादड़ अपनी श्रवणेन्द्रिय के आधार पर आकाश में गतिशील विविध कम्पनों का अनुभव करती हैं और नेत्रों का प्रायः बहुत सा काम उसी से चला लेती हैं।
हाथी की दृष्टि बहुत मन्द होती है। प्राणियों के समीप में उपस्थित वह गन्ध के आधार पर ही भाँपता है। कुत्ता अपने प्रिय या परिचित व्यक्ति की ढूंढ़ खोज गन्ध के आधार पर करता है। हवा का रुख विपरीत हो और गन्ध का प्रवाह उल्टा हो जाय तो सौ गज दूर खड़े मालिक को पहचान भी उसके लिये कठिन होगा। पक्षियों की पहचान रंगों पर निर्भर है। उनके नेत्र रंगों के बहुत छोटे अन्तर को भी पहचानते हैं और उसी आधार पर अपने आवागमन की राह निर्धारित करते हैं।
सील मछली अपने बच्चे की नन्हीं सी आवाज हजारों अन्य मछलियों के कोलाहल में से पहचान लेती है। मोटे तौर से उस समूह में एक ही शक्ल के अनेकों शिशु वयस्क होते हैं पर सील अपने बच्चे की पुकार सुनते ही तीर की तरह उसी पर जा पहुँचती है। बीच के व्यवधान को हटाने में अपने पराये की ठीक, पहचान करने में उससे जरा भी भूल नहीं होती।
बया पक्षी का घोंसला कितना सुन्दर और व्यवस्थित होता है। घोर वर्षा होते रहने पर भी उसमें पानी की एक बूँद भी नहीं जाती। आँधी तूफान आते रहते हैं पर वे घोंसले टहनियों पर मजबूती के साथ टँगे रहते हैं। बया अपने बच्चों सहित उसमें मोद मनाती रहती है जबकि ऋतु प्रतिकूलता के कारण अन्य जीवधारी कई तरह के कष्ट उठाते रहते हैं।
जीवधारियों की इन विशेषताओं को देखते हुए यही मानना पड़ता है कि वे भी मनुष्य की तरह भी भगवान को प्रिय हैं और उन्हें भी कितनी ही तरह की विशेषतायें, विभूतियाँ दी गई हैं। अपने उन छोटे भाइयों के प्रति न तुच्छता का भाव रखा जाय और न उन्हें सृष्टि का निरर्थक निर्माण समझा जाय। मनुष्य की तरह ही वे भी अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं।
महारानी विक्टोरिया की स्पेशल ट्रेन रात के घने कोहरे को चीरती हुई-धड़धड़ाती लन्दन की ओर दौड़ रही थी। ट्रेन के ड्राइवर को रेल की पटरी पर एक विशालकाय दैत्य खड़ा हुआ-हाथ पैर चलाता हुआ दिखाई दिया। रेल के आगे आगे ही वह पटरी पर दौड़ रहा है।
गाड़ी रोक दी गई। पटरी पर दौड़ने वाले दैत्य को तलाश किया गया पर वह गायब हो चुका था। असमंजस के साथ गाड़ी आगे बढ़ाई गई। देखा गया कि दो सौ गज आगे ही नदी का पुल टूट गया है। यदि गाड़ी तेज चाल से चली आती होती तो वह जरूर नदी में गिर जाती और महारानी समेत सभी लोगों को प्राण गँवाने पड़ते।
दैत्य ने पटरी पर दौड़कर गाड़ी को रुकवाया। सचमुच वह कोई बड़ा शुभ चिन्तक होगा। महारानी ने इस उपकार के लिये बहुत बहुत अहसान माना और धन्यवाद दिया। वह यह जानने को बहुत उत्सुक थी कि आखिर वह देव दैत्य था कौन? दूसरे दिन गाड़ी यथास्थान पहुँची, सफाई करते समय मालूम हुआ कि एक छोटा कीड़ा रेल फ्लैश लाइट में फंस गया था। बल्ब के सामने वही फड़फड़ाता था। उसकी छाया पटरी पर दैत्य, बनकर उछल कूद करती थी।
तथ्य जब महारानी को बताया गया तो उनने, उस उपकारी कीड़े को बहुत कृतज्ञता और सम्मानपूर्वक ब्रिटिश म्यूजियम में रखवा दिया, जो अभी तक सुरक्षित है।
ऐसे उपकारी तत्व हमारे चारों ओर भीतर और बाहर बिखरे पड़े हैं और निरन्तर अज्ञात सहायता करते रहते हैं। काश हम उन्हें देखने समझने में समर्थ होते तो प्रतीत होता कि यहाँ उपकारियों और शुभचिन्तकों का कितना महत्व है।
हाथ-पाँव, आँख, नाक, हृदय, मस्तिष्क आदि अंगों के समूह का नाम ही शरीर है। जीवाणुओं की सामूहिक हलचल का नाम ही जीवन है। इन समूह शृंखला से पृथक रहकर एकाकी जी सकना किसी के लिये सम्भव नहीं। व्यक्ति समाज का एक अंग मात्र है। जब वह समूह की उपेक्षा करके व्यक्तिवादी संकीर्णता से ग्रसित होता है और क्षुद्र स्वार्थों के साधनों में लगता है तब वह ऐसे मार्ग पर भटकता है जो उसके स्वरूप और गौरव के न अनुरूप है और न अनुकूल।
समाज से जो जितना पृथक होता है वह उतना ही अपने को एकाकी और अभावग्रस्त अनुभव करता है। समूहगत आत्मीयता की सम्पदा से जो वंचित है उसे भावनात्मक दृष्टि से दरिद्र ही कहना चाहिए। अपने को समाज से पृथक मानने की जिसकी जितनी मान्यता है वह उतना ही भयभीत, आशंकाग्रस्त और अनिश्चित स्थिति में अनुभव करेगा। अपने निज के सुखों के लिये सचेष्ट व्यक्ति जब सामूहिक सुखों की अपेक्षा करने के लिये-नीति और समाज की मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगता है तो वह उस समष्टि सहयोग से वंचित रह जाता है जो आनन्द, सन्तोष और उल्लास का प्रमुख आधार है। व्यक्तिवादी भले ही छीन झपट से कुछ आगे निकल जाय पर उसे असुरक्षा और आत्महीनता की भावना दिन-दिन अधिक ग्रसित करती चली जायेगी। ऐसा व्यक्ति बाहर से सुख साधन युक्त दीखते हुए भी भीतर उद्विग्न और अशान्त ही बना रहेगा।
व्यक्ति वस्तुतः समूह का एक अविच्छिन्न घटक मात्र है। उसकी सत्ता का समुचित विकास तभी हो सकता है जब वह समाजनिष्ठ होकर रहे। घड़ी का एक पुर्जा अलग अपनी अहंता प्रकट करे तो उसका यह उपहासास्पद प्रयास है। यदि वह घड़ी का अंग बनकर रहता है तो ही उसका कुछ महत्व हो सकता है। मछली को शान्ति अगाध जल राशि में विचरण करते हुए ही मिल सकती है यदि वह जलाशय की उपेक्षा कर स्वतन्त्र निवास की बात सोचे तो वह सुख की अपेक्षा दुख के जाल जञ्जाल में ही जा फंसेगी।
मनुष्य के लिये डरने और लड़ने के लिये कोई सत्ता इस संसार में नहीं है। केवल उसकी स्वनिर्मित भ्रान्तियाँ और विकृतियाँ ही हैं जो क्षोभ उद्वेग बनकर सामने आती हैं। दर्पण के सामने आकर चिड़िया अपने आप से ही लड़ती है। उसे लगता भर यह कि सामने कोई दूसरा पक्षी उसे ललकार रहा है और प्रतिद्वन्द्वी चुनौती दे रहा है। पर यथार्थता यह है कि चिड़िया का अपना आप ही शत्रु बनकर सामने खड़ा होता है। मनुष्य के सामने प्रस्तुत विपत्ति और विपन्नता उसकी निजी उपार्जित हैं। यदि वह यथार्थता के अनुकूल अपने को ढाल सके तो मृत्यु भी चिर विश्रान्ति के लिए प्रस्तुत शालीन शान्ति जैसी प्रिय मधुर प्रतीत हो सकती है।
एक दिन ऐसा आवेगा ही जब मनुष्य अपनी सत्ता के स्वरूप और सृजन को समझ सकेगा तब उसे विदित होगा कि वह न तो अकेला है और न बाधित। कैदी उसे किसी ने बनाया नहीं- वह स्वयं ही बना है। वह कैद जिसमें निरंतर तड़पना पड़ रहा है- लगती भर अष्ट धातु की है वस्तुतः वह ऐसे झीने पर्दे की बनी है जिसे तनिक से प्रयास में तोड़ फोड़कर फेंका जा सकता है। जिस दिन मनुष्य अपनी सर्व तन्त्र स्वतन्त्र और अपरिमित शक्ति सम्पन्नता पर विश्वास करेगा उस दिन उसे न किसी से शिकायत करने की आवश्यकता पड़ेगी और न शत्रुता ठाननी पड़ेगी। तब उसे किसी की सहायता भी अपेक्षित न होगी। आत्मबोध की किरणें उस अन्धकार को दूर कर देती हैं जिसके कारण पग-पग पर ठोकरें खाने के लिये विवश होना पड़ता है। पाने योग्य इस संसार में एक ही वस्तु है आत्म-ज्ञान और उससे बढ़कर किसी को देने योग्य वस्तु भी किसी के पास और कुछ नहीं हो सकती।
शरीर वैसे हाड़-माँस का दिखाई पड़ता है, इसे मिट्टी का पुतला और क्षण भँगुर कहा जाता है पर वस्तुतः उसकी संरचना अष्ट धातु से बढ़कर मजबूत तत्वों से की गई है। छोटी मोटी टूट-फूट, हारी बीमारी तो रक्त के श्वेत कण तथा दूसरे संरक्षण कर्ता, शासक तत्व अनायास ही करते रहते हैं, पर भारी संकट या दुर्घटना उपस्थिति हो जाने पर भी यदि साहस खोया नहीं गया है तो उत्कट इच्छा शक्ति के सहारे उसका सामना भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
मृत्यु की विभीषिका से कोई इनकार नहीं कर सकता, विपत्ति का संकट हलका करके नहीं आँका जा सकता इतना होते हुये भी जिजीविषा का- जीवन आकाँक्षा की सामर्थ्य सबसे बड़ी है। उसके सहारे संकट को परास्त किया जा सकता है। जीवन के लिये संकट प्रस्तुत करने वाले क्षण बहुत लोगों के सामने आते हैं उनमें से आधे लोग तो भयभीत होकर हिम्मत खो बैठते हैं और उस कातर मनः स्थिति में बेमौत मारे जाते हैं।
एकबार यमराज ने मौत को दस हजार मनुष्य मार लाने के लिये भू-लोक में भेजा। वह आई और अपना काम करके ले गई। गिने गये तो मरे हुए लोगों की संख्या बीस हजार निकली। यमराज ने मौत से पूछा- इतने क्यों मारे। उसने गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया। मेरे आघात से दस हजार ही मरे हैं शेष उतने ही लोग डर के मारे बेमौत मरकर अपने आप पीछे चल दिये हैं।
देखा गया है कि पेड़ के नीचे चीते को खड़ा देखकर बन्दर हक्का-बक्का रह जाता है और डर के मारे पेड़ पर से गिर पड़ता है। चीता उसे शान्तिपूर्वक मुँह में दबा कर चल देता है। विपत्ति की घड़ी आने पर अक्सर लोग ऐसे ही भयभीत स्थिति में फँस जाते हैं और बेमौत मरते हैं। इसके विपरीत यदि उस कठिन समय में उनने मनोबल स्थिर रखा होता तो बहुत सम्भव है कि वह विपत्ति बच जाती। इच्छा शक्ति की प्रबलता अंग प्रत्यंग में जीवनेच्छा की ऐसी अद्भुत संरक्षण शक्ति भर सकती है जिसके सहारे यही अपना माटी की पुड़िया कहा जाने वाला शरीर मृत्युञ्जय बन कर जीवित बना रहे। मनस्वी लोगों के ऐसे उदाहरण हमें अपने चारों ओर बिखरे हुए मिल सकते हैं।
बारूद के मिश्रण से धातुओं के मोटे परतों में छेद करने के एक अमेरिकी कारखाने में फिनीज पी. गेग नामक फोरमैन नियुक्त था। उसके साथ एक असाधारण दुर्घटना घटी। सुराख करने का वरमा जो तीन फीट सात इंच लम्बा और तेरह पौण्ड वजन का था भारी धमाके के साथ अपनी मशीन से निकलकर उचटा और उसके मस्तक को बेधता हुआ पार निकल गया। संसार के इतिहास में इतनी बड़ी और भयानक दुर्घटना के बाद भी कोई जीवित रहा हो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है।
वरमा चेहरे के बाँई और घुसा, भीतरी भाग की हड्डियों को तोड़ता हुआ आँख के निचले भाग। होता हुआ बाहर निकला तब यह अनुमान किया गया था कि वह तत्काल मर गया होगा, पर वह मरा नहीं। झटके के साथ नीचे गिरा-ऐंठ गया फिर भी उसमें जान बाकी थी। एक मील दूर अस्पताल उसे पहुँचाया गया। डॉ. हार्लो ने उसका निरीक्षण किया तो पाया इस घायल के साथ कितना ही परिश्रम क्यों न किया जाय इसे बचाया न जा सकेगा। फिर भी उन्होंने चिकित्सक का कर्त्तव्य निवाहा और साधारण मरहम पट्टी कर दी।
गेग की बेहोशी उसी दिन दूर हो गई। उसका खून बहना बन्द नहीं हुआ था फिर भी दर्द को उसने सहा और रात को 10 वे उपस्थित लोगों से बातें करने लगा। वह तेजी से अच्छा होना शुरू हुआ और लगभग तीन वर्ष अस्पताल में रहने के बाद वह मुक्त हो गया। अन्तिम रिपोर्ट अस्पताल के अधिकारी ने विस्तारपूर्वक तैयार की जो विश्व के समस्त चिकित्सकों के लिए आज भी अध्ययन की और आश्चर्य की वस्तु बनी हुई है। रोगी की नेत्र ज्योति तो चली गई थी पर बाकी मस्तिष्क पूरी तरह ठीक हो गया और वह अपना सामान्य जीवन-क्रम ठीक तरह चलाने लगा। इतने भयानक मस्तिष्कीय आघात के बाद भी कोई व्यक्ति बच सकता है, इस पर शरीर विज्ञानियों को सहसा विश्वास नहीं हो सकता उनका अविश्वास दूर करने के लिए गेग की टूटी हुई खोपड़ी के अस्थि खंड तथा उससे सम्बन्धित पदार्थ और कागजात हार्वर्ड मेडीकल कालेज ब्रकलिन के संग्रहालय में सुरक्षित रखे हुये हैं, साथ ही वह वरमा भी रखा हुआ है जो खोपड़ी चीरता हुआ बाहर निकला था।
सन 1891 की बात है। एक अंग्रेज मछुआरा अपना जहाज लेकर दलबल के साथ व्हेल मछली के शिकार के लिये चला। आकलेण्ड द्वीप के समीप उसे एक विशालकाय व्हेल दिखाई पड़ी। दो नावों द्वारा उस पर भालों द्वारा आक्रमण किया गया। व्हेल ने पलटा खाया तो उसकी पूँछ की चपेट में नाव आ गई। एक नाविक तत्काल डूब गया। दूसरा जेम्स वर्टली गायब हो गया। उसे व्हेल ने निगल लिया था। ऐसा निगला हुआ व्यक्ति जीवित बच जायेगा इसकी कौन आशा कर सकता है। पर वर्टली निराश नहीं हुआ। उसने अपना चाकू किसी प्रकार निकाला और बड़ी हिम्मत के साथ व्हेल का पेट चीरना शुरू किया। जकड़न कुछ करने नहीं दे रही थी फिर भी उसने अपना प्रयत्न जारी रखा और पेट चीर कर बाहर निकल आने में सफल हो गया।
डेढ़ दिन के तलाश के बाद उसे अचेत अवस्था में तैरता पाया गया। नाविक उसे किसी प्रकार बाहर लाये और अस्पताल में भर्ती किया। तीन हफ्ते में जाकर कहीं उसके मस्तिष्क ने ठीक काम करना शुरू किया उसका सारा शरीर पीला हो गया वैसा ही चमड़ी का रंग अन्त तक बना रहा।
वर्टली का संस्मरण ‘डेट डिवैटस्’ पत्र में छपा है। उसने बताया है के व्हेल के मुँह में मैंने एक अँधेरी गुफा में घसीटे गये व्यक्ति की तरह प्रवेश किया। उस तालाब जैसे पेट में साँस लेने की तो गुंजाइश थी पर गर्मी इतनी तेज पड़ रही थी मानो खौलते पानी में उबाला जा रहा हो, फिर भी मैंने साहस से काम लिया। कमर में से कठिनाई से ही चाकू निकला मछली की आँतों में बेतरह कसा हुआ था। हिलने-डुलने की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी किसी तरह निकला और भीतर में मछली का पेट चीरने का सिलसिला चलाया। पेट की परत इतनी मोटी थी और उसकी भीतरी अंग रचना इतनी जटिल थी कि उसके परतों को फाड़ते उभारते घण्टों लग गये तब कहीं बाहर निकलने का रास्ता बन सका।
शरीर ऐसा नहीं है जो सहज ही मर जाय। मनोबल साथ न दे तो बात दूसरी है पर यदि उसे इच्छा शक्ति की सहायता मिले तो इसमें कितनी ही ऐसी विशेषताएं उत्पन्न की जा सकती हैं जो साधारणतया असम्भव मालूम पड़ती हैं। पर जो लोग शरीर पर मन के नियन्त्रण का तथ्य जानते हैं उन्हें यह समझना कठिन न होना चाहिए कि देह के अवयव अपनी प्रकृति बदल सकते हैं और मन की इच्छानुसार ऐसा भी करने के लिए तत्पर हो सकते हैं जो अतिरिक्त प्रयत्नशीलता के अभाव में असम्भव ही समझा जा सकता है।
मनोबल ही सुख-सर्वस्व है, यही जीवन है; और यह अमरता है। मनोदौर्बल्य ही ही रोग है, दुःख है और मौत है।
साम्राज्ञी मेरी लुईस अपनी इच्छानुसार अपने कानों को बिना हाथ से छुये किसी भी दिशा में मोड़ सकती थी और आगे पीछे हिला सकती थी।
एक फ्राँसीसी अभिनेता अपनी इच्छानुसार अपने बालों को घुमा सकता था। बालों को गिराने उठाने और घुँघराले बनाने की क्रिया इच्छानुसार कर सकने की उस अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन करके वह धन भी कमाता था। एक बाल को घुँघराला और ठीक उसी की बगल में उगे हुए दूसरे बाल को चपटा कर देना इसका अति आश्चर्यजनक करतब था। डाक्टरों ने उसका परीक्षण किया और प्रो. आगस्ट कैवेनीज ने बताया कि उसने सिर त्वचा की माँस पेशियों तथा तन्तुओं को अपनी इच्छा शक्ति के आधार पर असाधारण रूप से विकसित और संवेदनशील कर लिया।
एक व्यक्ति ने अपने पेट को प्रशिक्षित किया और उसे असाधारण खुराक खाने में ही नहीं उसे पचाने में भी सफलता पाई।
ग्रीस का क्रोटोना कामिलो नामक पेटू अधिक खा जाने और पचा जाने के लिए प्रसिद्ध था। वह 150 पौण्ड माँस एक दिन में खा जाता था। डेट्रायठ (मिचीगन) निवासी एडिको नामक एक रेलवे मजदूर उसका भी ताऊ निकाला, उसने 60 सुअरों के माँस से बनी हुई टिकिया एक दिन में खाकर पचाई। इसके बाद भी उसने कुछ जामुन की कचौड़ियाँ खाकर और दिखाई। उसकी सामान्य खुराक इतनी थी जितनी पाँच व्यक्तियों के सामान्य परिवार के लिये एक हफ्ते के लिये पर्याप्त होती। उसने शादी इसलिए नहीं कि कि जो कमाता था वह अपने पेट के लिए ही कम पड़ता था। बीबी को क्या खिलाता। वेतन से एडिको का काम न चलता तो उसके मित्र सहायता करते थे ताकि वह भूखा न मरे।
खुराक के बारे में कहा जाता है कि सन्तुलित भोजन होना चाहिए और जो पदार्थ शरीर में हैं वह खुराक के द्वारा पेट में पहुँचाये जाने चाहिये पर ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें अपूर्ण कहे जाने वाले भोजन के सहारे भी न केवल स्वास्थ्य स्थिर रखा गया वरन् दीर्घजीवन भी प्राप्त किया गया।
बाल काफे (आयरलैंड) निवासी वायल नील नामक व्यक्ति केवल जौ की रोटी, आलू और दूध पर 115 वर्षों तक जीवित रहा।
कहा जाता है कि नींद न आने पर मनुष्य पागल हो जाता है और जल्दी ही मर जाता है पर ऐसे भी उदाहरण मौजूद हैं जिनमें बिल्कुल न सोने वाले भी सामान्य जीवन जीते रहे और अपना काम ठीक प्रकार चलाते रहे।
पैरिस (फ्राँस) का प्रख्यात वकील जैक्विस लहरवेट 72 वर्ष जीवित रहा। इस अवधि में वह 68 वर्ष तक एक क्षण के लिये भी नहीं सोया पर अपना काम यथावत करता रहा। बात यह हुई कि फ्राँस के सम्राट सोलहवें लुई को ता. 21 जनवरी 1793 को मृत्यु दण्ड दिया गया। शूली पर चढ़ाये जाने का दृश्य देखने के लिये भारी भीड़ एकत्रित थी। उसी भीड़ में जैक्विस की माता भी अपने इस तीन वर्ष के बच्चे को गोदी में लेकर देखने के लिये जा पहुँची। शूली पर चढ़ाये जाने का दृश्य ऐसा वीभत्स था कि बालक उससे बुरी तरह डर गया और वह मूर्छित स्थिति में अस्पताल पहुँचाया गया। वहाँ से छुट्टी पाने के बाद उसकी नींद बिल्कुल गायब हो गई। इसके बाद वह एक क्षण के लिये भी नहीं सोया पर इसका उसके स्वास्थ्य पर विशेष असर नहीं पड़ा। वह अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होता रहा और सफल वकील की आजीविका उपार्जित करता रहा।
अच्छा हो, हम मनोबल का महत्व समझें और उसे सक्षम बनाकर बड़ी से बड़ी दुर्घटनाओं को पार कर लेने की सामर्थ्य संचय करें।
हर किसी को मरना ही पड़े यह आवश्यक नहीं। कहा जाता है परशुराम, भीष्मपितामह, अश्वत्थामा, हनुमान आदि कितने ही महाभाग इस धरती पर ही अजर-अमर हैं। यह कहाँ तक सत्य है कुछ कहा नहीं जा सकता। पर अमीबा, पैरामीसियम, पूग्लीना आदि कितने ही एक कोशीय जीव अमर हैं। इनमें नर मादा का अन्तर नहीं होता। न इनके बच्चे होते हैं। अपने विकास क्रम में आगे बढ़ते हुए वे टूटकर एक से दो बन जाते हैं और यदि मानना हो तो यही इनका जन्म-मरण माना जा सकता है।
आत्मा की अमरता असंदिग्ध है पर यदि प्रयत्न किया जाय तो पूर्ण अमरता न सही वर्तमान जीवन अवधि को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही व्यवहार करता है। विचारों का प्रभाव हमारे आचार पर अवश्यंभावी रूप से पड़ता है। अतएव मानव जीवन की सफलता के लिये स्वस्थ एवं उन्नत विचार परमावश्यक हैं। शारीरिक स्वास्थ्य तथा सौंदर्य भी स्वस्थ एवं प्रसन्न मन पर ही निर्भर है अतएव स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन का होना अनिवार्य है।
जैसी हमारी मानस कल्पनाएं तथा विचार होंगे, वैसा ही जीवन भी ढल जायेगा। वस्तुतः हम जो सोचते हैं, उससे शरीर की ग्रन्थियों में एक प्रकार का रस द्रवित होता है। यदि विचार सुखदाय, स्फूर्तिवान तथा आशाप्रद होंगे तो शरीर के नन्हें-नन्हें कोषों तथा रोमों को भी नूतन स्फूर्ति एवं चैतन्यता प्राप्त होगी। इसके विपरीत भय, चिन्ता, द्वेष एवं मनोमालिन्य की भावनाएं शरीर के घटकों में अज्ञात विष उड़ेलती रहती हैं जिससे जीवन शक्ति तथा कार्यक्षमता नष्ट होती है तथा अनगिनत रोग और पीड़ाएं उत्पन्न होती हैं। स्वस्थ रहने के लिये यह परमावश्यक है कि हमारे मन में निराशा, चिन्ता, दुर्बलता और अवसाद के विचार न आने पायें। रोगों की जड़ें शरीर में नहीं अपितु मन में होती हैं।
अनेकों व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपने भाव संस्थान को निर्बल तथा कायर भावनाओं से विकृत बनाये रहते हैं। वे स्वयं को संसार के दुर्भाग्यशाली व्यक्तियों में गिनने हैं इस बात में विश्वास रखते हैं कि उन्हें किसी कार्य में सफलता प्राप्त हो ही नहीं सकती। परिणामतः या तो वे कार्य ही नहीं करते, यदि प्रारम्भ भी करते हैं तो असफलता के भय से या बाधायें आ जाने पर, बीच में ही छोड़ बैठते हैं। बिना दृढ़ निश्चय एवं संकल्प शक्ति के कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता।
ऐसे कापुरुषों की भी संसार में कमी नहीं है जो मानव जीवन का मूल्य न समझकर मृत्यु के दिन गिनते रहते हैं। यह भ्रम उन्हें खाये डालता है कि वे बीमार हैं, शक्ति हीन हैं। काल्पनिक दुःख एवं चिन्ताएं हर समय उन पर सवार रहती हैं। वस्तुतः इन्हें शारीरिक रूप से कोई बीमारी नहीं होती परन्तु मानसिक निर्बलता के कारण उनकी शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की शक्ति तथा सामर्थ्य पंगु बन जाती हैं। अनेक प्रकार के शारीरिक रोग इन्हें घेरे रहते हैं। जीवन के आनन्द से वंचित कर देते हैं। निर्बल एवं- रोगी शरीर व्यक्ति सुखों से सदैव वंचित ही रहता है।
मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि अनेक शारीरिक रोग मानसिक निर्बलता तथा संवेगों से उत्पन्न होते हैं। शरीर विज्ञान-शास्त्रियों का भी मत है कि केवल मानसिक चित्रों के आधार पर ही अनेक शारीरिक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस सम्बन्ध में डॉ. टुके ने अपनी पुस्तक ‘इन्फ्लूएन्स आफ दी माइण्ड अपान दी बॉडी’ में लिखा है- ‘पागलपन, मूढ़ता, अंगों का निकम्मा हो जाना, पित्त पाण्डु रोग, बालों का शीघ्र गिरना, रक्तहीनता, घबराहट, मूत्राशय के रोग, गर्भाशय में पड़े हुए बच्चे का अंग भंग हो जाना, चर्म रोग, फुन्सियाँ-फोड़े तथा एक्जिमा आदि कितने ही स्वास्थ्यनाशक रोग केवल मानसिक क्षोभ तथा भाव से ही पैदा होते हैं।’
यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, सुख तथा समृद्धि पाना चाहते हैं, सफलता का वरण करना चाहते हैं तो विचारों को निर्मल, पवित्र तथा उदात्त बनाइये। यदि कोई ऐसा विचार मन में आये कि आप बीमार हैं, दुर्बल हैं, तो तुरन्त उसे दबा दें। यदि मस्तिष्क से कोई ऐसी ध्वनि निकले जो सफलता में बाधक बने-तो फौरन उसे बाहर निकाल दीजिये। विश्वास रखिये आप संसार के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तथा ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोग देने के लिये संसार में जन्में हैं। अनेक महत्वपूर्ण कार्य आपको पूरे करने हैं। उठिये, आगे बढ़िये-मंजिल पर तीव्रता से कदम बढ़ाइये, जीवन के किसी मोड़ पर खड़ी सफलता आतुरता से आपकी प्रतीक्षा कर रही है।
इण्डियन मेडिकल ऐसोसिएशन की राजस्थान शाखा के अध्यक्ष एवं हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रामेश्वर शर्मा ने जयपुर की एक संवाद गोष्ठी में हृदय रोगों की बाढ़ में दो कारणों को प्रधान बताया उन्होंने कहा -(1) सुन्दर पत्नी (1) बढ़िया रसोइया। यह दोनों ही हृदय रोगों की बढ़ोत्तरी में विशेष रूप से उत्तरदायी हैं।
उनका इशारा इनके आधार पर बरते जाने वाले असंयम से था। यों सुन्दर पत्नियाँ बहुत शालीन, समझदार अपने पारिवारिक स्वास्थ्य की प्रहरी भी होती हैं और अच्छे रसोइये सुपाच्य भोजन बनाकर आरोग्य रक्षा में सहायता ही करते हैं। इसलिये दोष किसी वर्ग विशेष को नहीं दिया जा सकता, न पत्नी को, न रसोइये को। दोष असंयम का है जो अन्य अनेक मार्गों की तरह उनके माध्यम से भी बरता जाता है। चटोरी आदत तरह तरह के गरिष्ठ दुष्पाच्य मिष्ठान और पकवान, मिर्च मसाले वाले भोजन पसन्द करती है और आवश्यकता से अधिक मात्रा में उदरस्थ करती है। इसी प्रकार लोलुप वासनायें स्वास्थ्य का ध्यान रखे बिना अमर्यादित शरीर क्षरण करती है और फिर खोखला हुआ शरीर साधारण कारणों को लेकर हृदयगत बीमारियों से ग्रसित हो जाता है।
यों मानसिक तनाव, उद्वेगों भरी मनःस्थिति, नशेबाजी अस्त-व्यस्त दिनचर्या, सामर्थ्य से अधिक श्रम, अथवा निठल्लापन जैसे अन्य कारण भी हृदय रोगों की वृद्धि में कारण होते हैं पर अधिक दोष इन दो कारणों का ही है। इन्द्रियों का असंयम तत्काल ही सुखद लगता है पर अन्ततः उसका परिणाम इतना विघातक होता है कि पीछे पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता। हृदय रोग एक बार जिन्हें दबोच लेता है फिर उनके लिये उसके कभी भी उभर खड़े होने का खतरा बना रहता है।
खाओ, पियो, मजा करो की सभ्यता मनुष्य को असंयमी बनने का प्रोत्साहन देती है। जीभ का चटोरापन, माँसाहार, नशेबाजी, अश्लील चिन्तन, व्यभिचार को जीवन का लक्ष्य मानकर चल रही आज की उच्छृंखलता तत्काल तो अच्छी लगती है। उस समय सुखद भी प्रतीत होती है पर इस असंयम का परिणाम हृदय रोग जैसी कितनी ही विभीषिकाओं के रूप में सामने आता है।
हृदय रोगों की संख्या संसार भर में तेजी से बढ़ रही है। अकेले अमेरिका को लीजिये वहाँ सन् 1942 की स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार साल में 22000 व्यक्ति हृदय रोगों से मरते थे। अब वह संख्या लगभग पाँच गुनी हो गई है अर्थात् 123000 हर साल। अन्य देशों से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार संसार भर में कम से कम 600000 मनुष्यों को हृदय सम्बन्धी रोगों से मरना पड़ता है।
दाहिने अलिन्द में होकर पल्मोनरी महाधमनी द्वारा रक्त फेफड़ों में पहुँचता है और वहाँ से पुनः ऑक्सीजन युक्त हो जाता है। शुद्ध रक्त फेफड़ों से हृदय के ऊपरी भाग- बाँये अलिन्द में- पल्मोनरी शिरा द्वारा बाँये वेंट्रिकिल में आता है। वहाँ से महाधमनी चाप की शाखाओं में होकर शरीर के हर भाग तक पहुँचता है।
दांये तथा बाँये अलिन्दों तथा वेंट्रिकिलों के बीच माँस पेशियों की एक दीवार है। हृदय रोग की स्थिति में इस दीवार में छेद या घाव हो जाते हैं। इससे दाहिने अलिन्द या दाहिने वेंट्रिकिल के बीच ट्रिकास्पिड नामक वाल्व तथा बांई ओर के मिट्राल वाल्व सिकुड़ जाते हैं और रक्त प्रवाह में रुकावट पड़ती है। आमतौर से हृदय रोगों में यही स्थिति होती है।
कभी-कभी हृदय की रक्त वाहिनी नलियों में कुछ पदार्थ जमकर भी अवरोध उत्पन्न करते हैं। कोलेस्ट्रॉल नामक रसायन कभी-कभी रक्त नलियों में जमता देखा गया है। उसके कारण थक्के या थ्राँवस बनते हैं और हृदय के लिये कठिनाई उत्पन्न करते हैं। कभी-कभी कैल्शियम भी जमने लगता है।
साधारण श्रम करने वालों के भोजन में 2300 कैलोरी गर्मी पर्याप्त है पर यदि पौष्टिक आहार के नाम पर 3000 कैलोरी या इससे अधिक प्राप्त की जाय तो भी हृदय रोगों की सम्भावना रहेगी।
आयु वृद्धि के साथ-साथ धमनियाँ कड़ी होने लगती हैं पर यदि वे अधिक कड़ी हो जायें तो आर्थेरोस्कलेरोसिस रोग उत्पन्न होता है। रक्त में थक्के- -थ्रोम्विन-बनने लगें तो वे रक्तसंचार में रोड़े जैसे बनकर अटकने लगते हैं। रक्त वाहिनी धमनियाँ कड़ी होते जाने से और भी कई प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं। स्टेनों कार्डिया और मायोकार्डियल (हृत्पेशीय अमिशोष) इसी स्तर के रोग हैं। विकार ग्रस्त हृदय जब शरीर को शुद्ध और समुचित मात्रा में रक्त नहीं पहुँचाता तो मृत्यु की घड़ी सामने आ उपस्थित होती है।
किन्हीं कारणों से जब हृदय की रक्त धमनियाँ सिकुड़ जाती हैं, थक जाती हैं, भर जाती हैं तो हृदय में दर्द होने लगता है। डाक्टरों की भाषा में इस दर्द को ‘ऐजाइना पैकटोरिस’ कहते हैं। इस व्यथा के उठने के साथ-साथ श्वाँस बढ़ना, धड़कन तेज हो जाना, छाती में बाँई ओर हृदय के आस-पास दर्द रहना, थकान, सुस्ती और कभी कभी बेहोशी जैसी अनुभव होना जैसे लक्षण भी प्रतीत होते रहते हैं।
प्रायः 30-40 वर्ष की आयु के बाद हृदय रोग उत्पन्न होते हैं। छोटी आयु में वे कम ही होते हैं। उठती उम्र और ढलती उम्र के बीच शरीरगत कारबोहाइड्रेट प्रोटीन तथा मेटाबॉलिज्म में तो अधिक अन्तर नहीं पड़ता हड्डियाँ और माँस पेशियाँ भी भारी नहीं होती पर चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है, त्वचा के नीचे परत में, रक्त में, पेट पर तथा हृदय पेशियों में इस बढ़ी हुई चर्बी का प्रभाव अधिक होता है और वहाँ मुटाई तथा भारीपन में वृद्धि होती है। भार बढ़ने पर उसका दबाव भार वाहन और पोषण का उत्तरदायित्व हृदय को ही वहन करना पड़ता है। निरन्तर अथक कार्य करते रहने से सामान्य उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के अतिरिक्त जब भार वृद्धि का अतिरिक्त दबाव भी उस पर पड़ता है तो उसकी थकान बढ़ती है और वह रुग्ण होने लगता है।
यह तो हुई हृदय रोगों में पाई जाने वाली आन्तरिक अवयवों की स्थिति। विचार यह किया जाना है कि ऐसा होता क्यों है। प्रकृति ने हृदय को जितना कोमल बनाया है उतनी ही उसे समर्थता भी दी है। यदि उस पर अनावश्यक दबाव न पड़े तो वह आजीवन अपना काम ठीक से करता रह सकता है। पर यदि आहार-विहार का असंयम बरता गया तो उसके कारण उत्पन्न हुई रक्त की विकृति अपना प्रभाव हृदय पर छोड़ती है और वह अशक्त असमर्थ होकर कितने ही प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाता है। इस रोग का रोगी एक प्रकार से अपाहिज होकर जीता है। तनिक भी मानसिक दबाव, सीढ़ियों पर चढ़ना या छोटा मोटा व्यतिक्रम उत्पन्न होते ही बीमारी फिर उभर आती है।
जहाँ तक चिकित्सा का प्रश्न है अभी विज्ञान कोई सुनिश्चित उपचार ढूँढ़ नहीं पाया है। केवल विश्राम करना ही प्रधान उपाय माना जाता है ताकि प्रकृति उसे अपने ढंग से आप सुधार सके। औषधि उपचार के क्षेत्र में थोड़ी सी ही दवाएं काम में आती हैं और वे थोड़ी रोक-थाम करने में ही सहायता करती हैं।
साधारण हृदय दर्द-ऐंजाइना पेक्टोरिस-में नाइट्रोग्लिसरीन दवा दी जाती है और वह जल्दी ही काबू में आ जाता है। ‘मायोकार्डियल इन्फार्कशन’ कहलाने वाला दर्द अति भयंकर होता है। इसमें रोगी काँपने लगता है और उसकी बोलती बन्द हो जाती है। हृदय पेशियों का भयंकर दर्द-एक्यूट मायोकार्डियल पेन-रोगी को एक बारगी तड़पा देता है। कुछ हृदय रोग ‘इलक्ट्रोकार्डियो ग्राम’ की पकड़ में भी नहीं आते। हृदय पेशियों की विकृति जानने के लिए ‘मायोकार्डियम’ आवश्यक हो जाता है।
हृदय रोगों की खास औषधि इन दिनों एक ही प्रख्यात है-’क्लोट्राइड’ इसी को ब्रिटेन में ‘सैलुरिक’ और अमेरिका में ‘डाडरिल’ कहा जाता है। रोगी की स्थिति के अनुसार इससे वेराट्रम, एप्रेसोलिन, सार्पासील आदि को भी मिला दिया जाता है। भारत की सर्पगन्धा जड़ी जो संसार में ‘सर्पेन्टाइन’ के नाम से प्रख्यात है हृदय रोगों में भी अच्छा काम करती है।
आपरेशन करके किसी का हृदय किसी को लगा देने की प्रक्रिया का परिक्षण भी हुआ पर वह अभी तक सफल नहीं हो पाई। एक तो आज हृदय दान देने वाले मिलते ही कहाँ हैं। फिर मिलें भी तो जिसमें मृत्यु सुनिश्चित हो, ऐसा अनुदान स्वीकार करना कानूनी दृष्टि से भी हेय है। इस पर भी उस प्रत्यारोपण की सफलता नितान्त संदिग्ध है। ऐसे आपरेशन महंगे भी बहुत हैं अमेरिका में उन पर डेढ़ लाख से तीन लाख रुपये तक का खर्च आता है। संसार भर में अब तक लगभग ऐसे 15 ऑपरेशन हुए हैं पर उन पर दृष्टिपात करते हुए सफलता की दिल्ली भी बहुत दूर मालूम पड़ती है। अब तक के प्रयोगों में इस प्रकार के आपरेशनों को उत्साहवर्धक सफलता नहीं मिली। कुछ समय पूर्व बम्बई के के.के. ई.एम. अस्पताल में 19 वर्षीय कुमारी ललता का सिर रेल दुर्घटना में फूट गया था उसकी मृत्यु निश्चित समझकर उनके अभिभावकों ने लड़की का हृदय किसी दूसरे के लगा देने की स्वीकृति दे दी, तदनुसार एक हृदय रोगी के उसका दिल निकाल कर लगाया गया। वह ऑपरेशन डॉ. सेन की अध्यक्षता में 30 डाक्टरों द्वारा लगातार आठ घण्टे तक चला उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न हुआ। रोगी आपरेशन के बाद तीन घण्टे जीवित रहकर चल बसा।
अब से 70 साल पहले विश्व विख्यात सर्जन डॉ. सी.ए.टी. विलरथ ने सर्जरी क्षेत्र को गंभीर चेतावनी दी थी कि ‘हमें यदि अपने पेशे की इज्जत बचानी है तो हृदय आपरेशन की बात नहीं सोचनी चाहिए।’ छुट पुट ऑपरेशन की बात दूसरी है पर हृदय प्रत्यारोपण जैसे गंभीर ऑपरेशनों के सम्बन्ध में उनकी वह चेतावनी सार गर्भित ही दीखती है।
रोगी होने पर चिकित्सा करने और पीछे पछताने की अपेक्षा यह अच्छा है कि सादगी और संयम का जीवन जियें, सात्विक गतिविधियाँ अपनायें, आहार-विहार की मर्यादाओं का पालन करें, प्रसन्न चित्त रहें और सदाचरण का हलका-फुलका जीवन जियें। ऐसी गति-विधि अपनाने से हृदय समेत समस्त रोगों से आजीवन बचा रहा जा सकता है। तब सुन्दर नारी और कुशल रसोइया रोगों का कारण नहीं बनेंगे वरन् वे स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने में सहायक ही सिद्ध होंगे।
बुढ़िया के इकलौते लड़के का ब्याह था, उत्सव के बीच एक थका माँदा साधु कहीं से आ निकला। उसने आश्रय ओर भोजन माँगा।
बुढ़िया ने कहा संतजी खुशी से ठहर जाइए यह चावल लीजिए और पका कर खा लीजिए मैं ब्याह की व्यवस्था में उलझी हूँ पर एक बात का ध्यान रखिए कोई अशुभ वचन मुँह से न निकालिए। साधु ने उस दिन चावल पकाया खाया। दूसरे दिन वह हाँड़ी पका ही रहा था कि बुढ़िया उधर से आ निकली हाल-चाल पूछने लगी।
साधु ने बुढ़िया को बिठा लिया और कहा-’माता जी’ आपके इकलौते लड़के का ब्याह है सो तो ठीक है, पर कदाचित इन्हीं दिनों लड़का बीमार पड़े और मरणासन्न हो जाय तो आप पर कैसी बीतेगी? साधु अपनी आदत से मजबूर था उसे अप्रिय कहे बिना चैन कहाँ?
बुढ़िया ने कहा-मुझ पर जो बीतेगी सो भुगत लूँगी पर आप इसी समय अपना चावल लेकर विदा लीजिये। साधु के कपड़े में से माँड़ टपकता देखकर राहगीरों ने साधु से पूछा-यह क्या टपकता है।
साधु ने कहा-यह मेरी आदत है, जो इस घिनौने रूप में अपनी असलियत हर किसी को बताती जताती जा रही है।
न जाने मनुष्यों की बुद्धि को क्या हुआ है कि वे प्राकृतिक भोज्य पदार्थों का छोड़कर अप्राकृतिक तथा टॉनिकर आहार अपनाते जा रहे हैं। केवल जीभ के स्वाद के लिए माँस, मछली, अण्डा इत्यादि घृणित पदार्थ अपने पेट में भरते हैं। ये पदार्थ स्वास्थ्यकर होते हैं, यह धारणा भी नितान्त भ्रममूलक है। अनेक वैज्ञानिक खोजों के आधार पर अब यह सिद्ध किया जा चुका है कि माँस शरीर में अनेक विकृतियां उत्पन्न करता है। डॉक्टर पारकर का कथन है- ‘सिरदर्द, अपच, गठिया, थकान रक्तपात, मधुमेह आदि का कारण योरोप तथा अमेरिका में तो बढ़ा हुआ माँसाहार ही है। शोधकर्त्ता मेनरी पडरी ने लिखा है- ‘शाकाहारियों की तुलना में माँसाहारी अधिक बीमार पड़ते हैं तथा जल्दी मरते हैं’। डॉक्टर क्लेमुड ने कहा है- ‘बच्चों को मास की आदत डालना उन्हें आलसी, दुर्बल और झगड़ालू बनाने की शुरुआत है।’ जापान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. वेञ्ज ने अनेकों प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘मनुष्य की प्रकृति में क्रोध उद्दण्डता, आवेश, अविवेक, कामुकता और अपराधी प्रवृत्ति उत्पन्न करने तथा भड़काने में माँसाहार का बहुत बड़ा हाथ है’ वस्तुतः आहार के सूक्ष्म तत्वों से ही हमारा मन बनता है। अतएव सात्विक या तामसिक जैसा भी आहार करेंगे, वैसा ही मन भी बन जायेगा। पशुओं का माँस खाने वालों का मन भी पशु प्रवृत्तियों से आपूरित रहता है। साथ ही माँसाहारी को निद्रा भी अधिक आती है तथा वह आलसी भी होता जाता है।
स्वाद के लिये माँस खाया जाता है, यह कहना भी अज्ञानमूलक है। माँस गन्ध, बनावट, स्वाद सभी ऐसे हैं कि असली रूप से घृणा ही उत्पन्न करते हैं। उबालकर मसालों में भूनकर वह इस योग्य बनाया जाता है कि मुँह में रखा जा सके। हिंसक पशुओं के लिये माँस रुचिकर व्यञ्जन हो सकता है, मनुष्यों के लिये तो कदापि नहीं।
अपने देश में प्राचीन काल से ही गोरक्षा, गोपालन और गो-पूजा को महत्व दिया गया है, वह अकारण ही नहीं दिया गया। उसके पीछे अनेक वैज्ञानिक तत्व सन्निहित हैं। यों दूध तो भैंस और भेड़-बकरी का भी मिलता है और कहीं-कहीं गधी तथा ऊँटनी का भी प्रयोग में लाया जाता है परन्तु गोदुग्ध से उसकी तुलना कदापि नहीं की जा सकती। गाय का दूध मधुर, स्निग्ध, शीतल नस-नाड़ियों को पुष्टि प्रदान करने वाला तथा अनेकानेक बीमारियों को दूर करने वाला होता है। धारोष्ण गोदुग्ध ही अमृत रूप है। इसका निरन्तर प्रयोग करने से रोग दूर होते हैं तथा बुढ़ापा शीघ्र नहीं सताता। इसके विपरीत भैंस आदि का दूध भारी, गर्म, कफ और वायु को बढ़ाने वाला, मंदाग्नि उत्पन्न करने वाला तथा छूत की बीमारियों को बुलाने वाला होता है।
पशुओं का मानसिक स्तर भी उनके दूध में घुला रहता है। गाय में सतोगुण की मात्रा अधिक होती है अतएव उसका दूध भी पुरुषार्थ, शान्ति तथा स्फूर्ति लाने वाला होता है। इसके विपरीत भैंस का दूध आसुरी होता है। इसे पीने से उसी जैसा आलस्य, प्रमाद तथा काम, क्रोध, राग द्वेष जैसी आसुरी-वृत्तियाँ बढ़ती हैं।
यह हमारा कर्त्तव्य है कि गोदुग्ध की उपयोगिता स्वीकार करें तथा उसी को प्रयोग में लायें। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि सरकार नये-नये बूचड़खानों को प्रश्रय दे रही है। आज डालर कमाने के लिये जीवित गायों को काट-काटकर उनका माँस, हड्डियाँ तथा आंतें विदेशों को निर्यात की जा रही हैं। हम गोरक्षा की बात तक करते हैं परन्तु उनकी नस्ल सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं करते। हमारा गोवंश बुरी तरह घटता और नष्ट होता जा रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनता तथा सरकार दोनों ही गाय का महत्व समझें तथा गो-पालन, गो-संवर्धन और गो-रस का उत्पाद बड़े पैमाने पर करें।
अपनी पूँजी से ही काम चलाना नैतिकता भी है और बुद्धिमता भी। स्वाभिमान का तकाजा यह है कि हम जितना उपार्जन कर सकें उसी सीमा में अपनी आवश्यकताएं सीमित रखें। सुविधाएं प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील तो रहें पर आकाँक्षा के अनुरूप उपलब्धि न मिल सके तो उद्विग्न न हों, बल्कि उतने से ही सन्तोष पूर्वक काम चलायें, जब उत्पादन बढ़ जाय तब उपयोग भी बढ़ायें, जब तक अभीष्ट उत्पादन न हो तब तक परिस्थिति से समझौता करके अपनी इच्छाएं सीमित कर लें और हँसती खेलती हलकी फुलकी जिन्दगी जियें। पुरुषार्थ से पीछे न हटें, प्रयत्नों में कमी न रखें, पर लम्बे चौड़े सपने न देखें। प्रयत्न की योजना बनायें पर उपलब्धि को परिस्थितियों से जुड़ी समझकर उनके बारे में अत्यधिक लालायित न हों। यदि मनोभूमि इस स्तर की बनाली जाय तो हर परिस्थिति में मनुष्य अपनी शान्ति और प्रसन्नता को अक्षुण्ण बनाये रह सकता है।
कई बार ऐसे अवसर भी आ सकते हैं जब दूसरों से सहायता लेनी पड़े। ऋण न लेकर सीमित काम चलाना ही बिना झंझट का और उचित तरीका है; पर कभी-कभी ऐसी आवश्यकता भी पड़ जाती है कि बाहर का सहारा लेना पड़े। कुआँ बनाने, बैल खरीदने आदि के लिये किसान लोग अक्सर तकावी लेते हैं। बैंकें भी उद्योगों के लिये ऋण देती हैं। कोई आपत्ति आ जाने पर मित्र सम्बन्धियों से भी लेना पड़ता है। आवश्यकतानुसार ऋण लेने का भी औचित्य है; पर वह लिया यह समझकर ही जाना चाहिए कि उसे चुकाना है।
इस दुनिया में मुफ्त लेने देने का कोई नियम नहीं है। हर वस्तु मूल्य देकर प्राप्त की जाती है और की जानी चाहिए। मुफ्तखोरी को निंदनीय बताया गया है। भिखारी को चोर से बुरा कहा जाता है। इसका कारण यह है कि चुकाने की तैयारी रखे बिना-ऐसे ही किसी का उपार्जन हड़प लेना अनैतिक है। इसी आधार पर मुफ्तखोर, ऋण भार लेने वाले, भिखारी चोर-उचक्के, सटोरिये, जुआरी बुरे माने जाते हैं कि वे जहाँ तहाँ से ऐसे ही झटके में कुछ प्राप्त करने के लालच में डूब रहते हैं। अपने लाभ के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाते हैं। दहेज को भी सामाजिक कोढ़ इसलिए कहा जाता है कि वधु ही नहीं उसके साथ दौलत भी मुफ्त में हड़पने के लिये ललचाने की प्रवृत्ति हर दृष्टि से हेय और अनैतिक है। ऐसी कमाई को निन्दनीय ठहराया गया है।
कोई व्यक्ति आशीर्वाद, वरदान प्राप्त करने के लिये भी इसी मुफ्तखोरी का दृष्टिकोण लेकर अपनी घात लगाते फिरते हैं। कोई सन्त, तपस्वी मिल जाय तो उसके हाथ पैर जोड़कर-पूजा प्रशंसा की तरकीब लड़ा कर सस्ती कीमती पर महंगा लाभ प्राप्त कर लेना ही ऐसे लोगों का दृष्टिकोण रहता है। देवी-देवताओं की पूजा पत्री में उत्साह भी इसलिये रहता है कि इस विधि से वह लाभ लिया जा सकेगा जो सीधे रास्ते बहुत श्रम करने और कष्ट सहने पर ही मिल सकना सम्भव है।
औचित्य की कसौटी पर इस प्रकार का दृष्टिकोण सर्वथा हेय स्तर का है। उसे अध्यात्म तो कहा ही नहीं जा सकता। अध्यात्म के साथ नैतिक तथ्य अनिवार्य रूप से जुड़े होते हैं। अनैतिक आचरण की उसमें तनिक भी गुंजाइश नहीं है। मनुष्य की गरिमा देने में है लेने में नहीं। देवत्व का अन्तरात्मा में जितना अवतरण होगा उतनी ही उसकी आकाँक्षा देने के लिए मचलेगी। लेने में संकोच ही बढ़ता जायेगा। अपने उत्पादन को भी वह अपेक्षाकृत कम मूल्य पर ही देना चाहता है। फिर दूसरों का उत्पादन सो भी बिना मूल्य लेने का उसका परिष्कृत अन्तःकरण कैसे स्वीकार करेगा।
संसार में अनेक उदार व्यक्ति मौजूद हैं। दानी लोग दीन दुखियों की सहायता करते रहते हैं। उनका यह दृष्टिकोण उचित है। भगवान ने जिनको दिया है उन्हें दूसरों को देने में प्रसन्नता अनुभव करनी चाहिए और उदारता को कर्त्तव्य मानना चाहिए, वे अपने स्थान पर सही हैं।
पर जो लोग दूसरों की उदारता से लाभ उठा लेना अपना अधिकार मान लेते हैं और उसे संकोच छोड़कर प्राप्त करने के लिए आतुर रहते हैं वे भूल करते हैं। वे भूल जाते हैं कि ‘मुफ्त’ नाम की कोई चीज इस दुनिया में नहीं है; यदि है तो उसे ‘ऋण’ ही कहा और माना जाना चाहिए। किसी का दान तभी स्वीकार करना चाहिए जब उपार्जन के सारे रास्ते बन्द हो जायँ और वह भी इतना लेना चाहिए जितना उस समय की कठिनाई को हल करने के लिये नितान्त आवश्यक है। सो भी इस दृढ़ निश्चय के साथ लेना चाहिए कि जिसका लिया है उसे समय आते ही निश्चित रूप से लौटा दिया जायेगा।
विवेकशील व्यक्ति भीख नहीं देते वरन् दीन-दुखियों को श्रम करने की सुविधा देकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने का प्रयत्न करते हैं। आपने उदारता तो दिखा दी- स्वयं तो पुण्य कमा लिया पर दूसरों को आलसी, अकर्मण्य, मुफ्तखोर और अनैतिक बना दिया तो फिर वह दान सार्थक कहाँ रहा। जितना पुण्य हुआ उतना ही पाप हो गया। अपनी आत्मा का उत्थान हुआ और दूसरे की का, पतन। यह प्रक्रिया तो सही नहीं रही। इसलिये दान की प्रशंसा तभी है जब वह पात्रता, प्रयोजन और परिणाम को समझकर प्रदान किया जाय। ऐसे ही अन्धाधुन्ध बिना विचारे चाहे जिस को चाहे जो कुछ देते रहना उचित नहीं, अनुचित ही माना जायेगा। विवेकवान दानी इसका ध्यान रखते हैं और लेने वाले को उस अनुदान को ऋण मानने और समाज के दूसरे सत्प्रयोजनों में उसे वापिस लौटाने की प्रेरणा करते हैं।
धनीमानियों की तरह सन्त और तपस्वियों के पास भी पुण्य और तप की पूँजी होती है। साथ ही उदारता और आत्मीयता भी। फलस्वरूप वे सम्बन्धित व्यक्तियों को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए अपनी तप पूँजी आशीर्वाद, वरदान के रूप में प्रदान करते रहते हैं। उनके लिए यह उचित भी है और शोभनीय भी।
किन्तु प्राप्त करने वालों को लेते समय हजार बार विचार करना चाहिए कि उनकी याचना का औचित्य क्या है? क्या वे ऐसी कठिनाई को हल करने के लिए यह प्रतिग्रह ले रहे हैं जो नितान्त अनिवार्य और आवश्यक हो गया है? क्या वे ऋण भावना से ले रहे हैं? जो मिलेगा उसे ब्याज समेत वापिस करने का क्या उनने अपने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया है? यदि ऐसा नहीं है; केवल अपनी तृष्णा की पूर्ति के लिए मुफ्त का माल जितना मिल जाय उतना अच्छा, सोचकर यदि लेने के लिए हाथ पसारा हो तो उचित यही है कि हाथ को तुरन्त वापिस खींच लिया जाय।
यह पूरी तरह स्मरण रखा जाय आशीर्वाद या वरदान जीवन की नोंक हिला देने भर से पूरे नहीं हो सकते। उसके साथ यदि अपनी तप साधना दी गई होगी तो ही वह फलित होगा। किसी ने कितना कष्ट सहकर कुछ उपार्जन किया है, उसे हम मुफ्त में प्राप्त करते हैं तो इसमें अपने ऊपर ऋण भार ही बढ़ेगा। प्रकृति के नियम उस ऋण को वापिस कराने के लिए बाध्य करेंगे। इस जन्म में नहीं तो अगले में वह कर्ज वापिस करना पड़ेगा। काम रुका न होने पर भी जो लोग उधार कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं, उन्हें हेय दृष्टि से ही देखा जाता है।
खुद ही अपनी परीक्षा कर, अपने को अपने आप उठा, इस प्रकार तू विचारशील हो अपनी रक्षा स्वयं करता हुआ, दुनिया में सुखपूर्वक विहार करेगा।
-बुद्ध
देवी-देवताओं के- ईश्वर के वरदान सम्बन्ध में भी यही बात है। महान शक्तियाँ उदारता का परिचय इसलिए देती हैं कि जो संपर्क में आये वह भी उसी उदारता की रीति-नीति का अनुकरण करना सीखे। व्यायाम अध्यापक पहले स्वयं कसरत करके इसलिये दिखाते हैं कि उस क्रिया को शिक्षार्थी भली प्रकार देख समझ सकें और फिर स्वयं भी उसी तरह कसरत करना आरम्भ करें। यदि ऐसा न हो; व्यायाम मास्टर कसरत करता रहे और लड़के तमाशा देखते रहें तो अध्यापक का प्रयत्न निरर्थक गया ही समझा जायेगा। इससे भी बुरी बात यह होगी कि शिक्षक को सिखाने वाले उपकरण भी छात्र लेकर चल दें।
सन्त और देवता स्वयं दयालु और दानी होते हैं। यह सत्प्रवृत्ति ही वस्तुतः उनकी महानता को बढ़ाती है। वे यह प्रयत्न करते हैं कि उनके संपर्क में आने वाले लोग भी उसी मार्ग का अनुसरण करें। आरम्भिक शिक्षा के रूप में वे अपने तप की पूँजी उन्हें देकर उसका स्वाद चखाते हैं और बताते हैं कि तुम्हें चखते समय जितना आनन्द मिला; देते समय हमें उससे हजार गुना आनन्द मिला। अब आगे तुम भी यही करना। देने वाले बनना। अपनी उपलब्धियाँ दूसरों को देकर उन्हें सुख प्रदान करना और स्वयं सन्तोष का आनन्द लेना। सुख देने वाले को ही सन्तोष मिलता है। दान देने के साथ सन्तोष का यह शिक्षण भी जुड़ा रहता है।
ज्ञान, प्रकाश, सत्साहस, सन्मार्ग की प्रेरणा, यही याचना योग्य वस्तुएं है। ईश्वर से, देवता से, सन्त से यह माँगा जा सकता है। यही उचित और श्रेयस्कर हैं। धन, यश, सन्तान, आरोग्य, वैभव, प्रगति एवं अवरोधों का निवारण जैसे भौतिक पदार्थों की कामना या याचना करते समय यह सोचना चाहिए कि क्या इनके बिना उनका जीवन संकट में है। यह नाव ऐसी फँस गई है; जिसे उबारने के लिए सहायता अनिवार्य हो गई है। ऐसी स्थिति में उतनी ही मात्रा में आशीर्वाद लेना चाहिए जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो।
भौतिक तृष्णाओं का अन्त नहीं। वैभव से किसी की तृप्ति नहीं हुई। तृष्णाएं शान्त करने में इस विश्व के समस्त सन्तों और देवताओं की सम्मिलित शक्ति भी अपर्याप्त है। उसी की पूर्ति के लिये यदि हमें किसी सन्त का वह अनुग्रह माँगते जो हमारी अपेक्षा किसी अधिक कष्ट पीड़ित के काम आ सकता था- तो यही कहना चाहिये कि सन्त के संपर्क में आकर भी हमने अपना असन्त तत्व ही बढ़ाया। उनकी संगति से लाभ लेने की अपेक्षा हानि ही उठायी। कर्ज लेकर अमीर बनने की अपेक्षा तो ऋण रहित गरीबी अच्छी। किसी के सामने दीन बनकर सम्पन्नता प्राप्त करने से तो स्वाभिमान भरी अभाव ग्रस्तता अच्छी। ‘ऋण कृत्वा धृतं पिवेत’ का आदर्श तो नास्तिकों का है। हम आस्तिक होकर नास्तिक का आचरण न करें यही उचित है।
देव या सन्त के अनुग्रह से यदि कुछ मिला है तो उचित यही है कि उसे विशुद्ध रूप से ऋण माने। जिससे लिया है उसे न सही-सत्कर्मों के लिए ब्याज समेत वापिस करने की तैयारी में ही संलग्न होना चाहिए, इसी में दानी की उदारता सार्थक होती है और इसी में अनुदान प्राप्त करने वाले की सज्जनता सिद्ध होती है।
वाचस्पति मिश्र भारतीय दर्शन के प्रसिद्ध भाष्यकार हुए हैं। उन्होंने पूर्व मीमाँसा को छोड़कर शेष सभी दर्शनों का भाष्य किया है। वे अपने इस पुण्य प्रयास में जुटे थे। इसी बीच उनकी पत्नी ने एक दिन सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा प्रकट की।
वाचस्पति गृहस्थ तो थे पर दाम्पत्य जीवन उन्होंने वासना के लिये नहीं, दो सहयोगियों के सहारे चलने वाले प्रगतिशील जीवन क्रम के लिये अपनाया था। उन्होंने पत्नी से पूछा सन्तान उत्पन्न क्यों करना चाहती हो?
पत्नी ने संकोच पूर्वक कहा-इसलिए कि पीछे नाम रहे।
वाचस्पति मिश्र उन दिनों वेदान्त दर्शन का भाष्य कर रहे थे। उन्होंने तुरन्त उस भाष्य का नाम ‘मामती’ रख दिया, यही नाम उनकी पत्नी का था। उन्होंने पत्नी से कहा। लो तुम्हारा नाम तो अमर हो गया अब व्यर्थ प्रसव वेदना और सन्तान पालन का झंझट सिर पर लेकर क्या करोगी?
निराशा का दूसरा नाम है भय, बेचैनी और अशाँति। भविष्य को अन्धकार में देखना और प्रस्तुत विपत्ति को अगले दिनों और अधिक बढ़ती हुई सोचना एक ऐसा स्वविनिर्मित संकट है जिसके रहते, सुखद परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना कदाचित ही सम्भव हो सके।
सोचने का एक तरीका यह है कि अपना गिलास आधा खाली है और अभावग्रस्त स्थिति सामने खड़ी है। सोचने का दूसरा तरीका यह है कि अपना आधा गिलास भरा है जबकि सहस्रों पात्र बिना एक बूँद पानी के खाली पड़े हैं। अभावों को, कठिनाइयों को सोचते रहना एक प्रकार की मानसिक दरिद्रता है।
जो रात्रि के अन्धकार को ही शाश्वत मान बैठा और जिसे यह विश्वास नहीं कि कुछ समय बाद अरुणोदय भी हो सकता है उसे बौद्धिक क्षेत्र का नास्तिक कहना चाहिए। दार्शनिक नास्तिक वे हैं जो सृष्टि की अव्यवस्थाओं को तलाश करके यह सोचते हैं कि दुनिया बिना किसी योजना व्यवस्था या सत्ता के बनी है। उन्हें सूर्य और चन्द्रमा का उदय अस्त-बीज और वृक्ष का अनवरत सम्बन्ध जैसे पग-पग पर प्रस्तुत व्यवस्था क्रम सूझते ही नहीं। ईश्वर का अस्तित्व और कर्तव्य उनकी दृष्टि से ओझल ही रहता है। ठीक इसी प्रकार की बौद्धिक नास्तिकता वह है जिसमें जीवन के ऊपर विपत्तियों और असफलताओं की काली घटाएं ही छाई दीखती हैं। उज्ज्वल भविष्य के अरुणोदय पर जिन्हें विश्वास ही नहीं जमता।
जीवन का पौधा आशा के जल से सींचे जाने पर ही बढ़ता और फलता-फूलता है। निराशा के तुषार से उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते रहने वाला आशावादी ही उनके लिये ताना-बाना बुनता है। प्रयत्न करता है-साधन जुटाता है और अन्ततः सफल होता है। यह सही है कि कई बाद आशावादी स्वप्न टूटते भी हैं और गलत भी साबित होते हैं पर साथ ही यह भी सत्य है कि उजले सपनों का आनन्द कभी झूठा नहीं होता। वह प्रकाश तब तक अन्तर में बना रहेगा जब तक ऐसी गुदगुदी बनी रहेगी जो मनोरथ पूरा न होने पर भी उस उपलब्धि जैसा ही उल्लास बनाये रहे। यह उज्ज्वल सपनों का आनन्द जब अभ्यास में आता है तब इतना मधुर होता है कि उसे बनाये रखने के लिये कठिन से कठिन कर गुजरने की हिम्मत की जा सके।
मुसीबतें और असफलताएं सिर्फ यह जानने के लिये आती हैं कि व्यक्ति किस हद तक साहस सँजोये रह सकता है। जिन्होंने हर कठिनाई को एक चुनौती माना उसके लिए इस संसार में कोई अवरोध नहीं, छात्रों को आये दिन अध्यापक के पूछे प्रश्नों को हल करना पड़ता है। तभी उसे उत्तीर्ण होने की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अवरोध एक प्रकार का अध्यापक है जो प्रतिभा को विकसित करने के लिये उत्तेजना प्रदान करता है और चिर स्मरणीय सफलता वरण कर सकने की क्षमता से सुसम्पन्न बनाता है। जो कठिनाई के दिनों में आशावादी रह सका, समझना चाहिए पुरुषार्थी महामानवों की पंक्ति में उसी का अभिषेक किया जाने वाला है।
बड़ी सफलताएं इस बात की अपेक्षा करती हैं कि व्यक्ति में धैर्यपूर्वक देर तक कठिन परिश्रम करते रहने की क्षमता हो। ऐसी मनः स्थिति उसी की हो सकती है जिसने आशावाद को अपने स्वभाव का अंग बना लिया हो। छुई-मुई की तरह जरा-सी कठिनाई आने पर जो मुरझा जाते हैं, अवरोधों को राई न मानकर जो पर्वत समझते हैं, उनके लिये अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रहना ही एक समस्या है, अपने आपको सँभाल सकना ही जिनके लिए भार बना हुआ है, उनके लिये सफलता के लिये जितनी शक्ति आवश्यक है उतनी जुटा सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा और वे हर काम में हर बार असफल ही होते रहेंगे। आशा रहित जीवन एक प्रकार से निर्जीव ही कहा जा सकता है।
सोवियत रूस के वैज्ञानिक डॉ. जी. ए. उशाकोव ने अपने ध्रुव शोध के विवरणों में एक और नया तथ्य प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं कि जीवन का आधार मानी जाने वाली ऑक्सीजन वायु पृथ्वी की अपनी उपज अथवा सम्पत्ति नहीं है। वह सूर्य से प्राणरूप में प्रवाहित होती हुई चली आती है और धरती के वातावरण में यहाँ की तात्विक प्रक्रिया के साथ संमिश्रित होकर प्रस्तुत ‘ऑक्सीजन’ बन जाती है। यदि सूर्य अपने उस प्राण प्रवाह में कटौती करदे अथवा पृथ्वी ही किसी कारण उसे ठीक तरह ग्रहण न कर सके तो ऑक्सीजन की न्यूनता के कारण धरती का जीवन संकट में पड़ जायेगा। पृथ्वी से 62 मील ऊँचाई पर यह प्राण का ऑक्सीजन रूप में परिवर्तन आरम्भ होता है। यह ऑक्सीजन बादलों की तरह चाहे जहाँ नहीं बरसता रहता वरन् वह भी सीधा उत्तरी ध्रुव पर आता है और फिर दक्षिण ध्रुव के माध्यम से समस्त विश्व में वितरित होता है। ध्रुव प्रभा में रंग बिरंगी झिलमिल का दीखना विद्युत मण्डल के साथ ऑक्सीजन की उपस्थिति का प्रमाण है।
प्राणायाम का- प्राण विद्या का उद्देश्य उसी सूर्य प्राण को अभीष्ट परिमाण में ग्रहण करना, शरीर में धारण करना है। चुम्बकीय विद्युत प्रवाह को दीप्तिमान करने के लिए जिस प्राण अभिवर्धन की आवश्यकता होती है उसे प्राण साधन क्रम में विशेष प्राणायामों द्वारा उपलब्ध किया जाता है। स्वरयोग एवं प्राणविद्या की निर्धारित साधना पद्धति द्वारा कुण्डलिनी अग्नि को ठीक उसी प्रकार प्रदीप्त करते हैं जैसे लुहार अपनी आग की भट्टी को धोंकनी की हवा से तेज करता है। नासिक छिद्रों से प्राणतत्व को अनन्त आकाश से आकर्षित करके सूर्य तत्व द्वारा प्रेरित चुम्बकीय प्रवाह को तीव्र बनाया जाता है।
इस प्रकार उत्पन्न हुए प्रकाश के कारण सारा सोया हुआ प्राण जीवित हो उठता है। सूर्य के निकलते ही पशु, पक्षी, कीट पतंग सभी निद्रा त्यागकर अपने कार्य में उत्साहपूर्वक लगते दिखाई देते हैं। कलियाँ खिलने लगती हैं और वायु का प्रभाव तीव्र हो जाता है। ठीक इसी प्रकार प्राण साधना से जब हमारे दोनों ध्रुव शक्ति प्रवाह से भरने लगते हैं तो सूर्योदय जैसी हलचल उत्पन्न होती है और न केवल स्थूल शरीर के वरन् सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के भी दृश्य और अदृश्य अंग अवयव अपनी सक्रियता प्रदर्शित करने लगते हैं। साधक को अनुभव होता है मानो वह केंचुली छोड़कर स्फूर्ति, या सर्प की तरह नव चेतना का अपने में अनुभव कर रहा है।
कभी-कभी सूर्यमण्डल में विशेष उत्क्रान्ति उत्पन्न होने से उस प्रवाह की एक लहर पृथ्वी पर भी चली आती है और ध्रुव प्रदेश में चुम्बकीय आँधी तूफानों का सिलसिला चल पड़ता है। इनकी प्रतिक्रिया उसे ध्रुव क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रखती वरन् समस्त विश्व को प्रभावित करती है। कई बार यह चुम्बकीय तूफान बड़े उपयोगी और सुखद परिणाम उत्पन्न करते हैं और कई बार इनमें कुछ ऐसे तत्व घुले हुए चले आते हैं जिनका प्रभाव समस्त विश्व को कई प्रकार के संकटों में धकेल दे। एक बार सन् 1938 में एक चुम्बकीय तूफान ध्रुव प्रदेश पर आया था, उसकी भयानक चमक अफ्रीका तथा क्रीमिया तक देखी गई। उसका प्रभाव न केवल वस्तुओं पर पड़ा वरन् जीव धारी भी बुरी तरह प्रभावित हुए। ऐसी ही विद्युत आँधियों ने धरती पर ‘हिम युग‘ उपस्थित कर दिया। मुद्दतों तक बहुत बड़े भूभाग को बर्फ ने ढके रखा। समुद्र में बाढ़ आई और जमीन समुद्र में, समुद्र मरुस्थल में बदल गया। कहते हैं कहीं ऐसी ही वायु प्रलय, जल प्रलय, अग्नि प्रलय भी उपस्थित हो सकती है और यह चुम्बकीय आँधियाँ धरती के वर्तमान स्वरूप को कुछ से कुछ करके रख सकती हैं।
प्रकृतिगत चुम्बकीय आँधियाँ पंच तत्वों के हेर फेर अथवा नियति के विधान से आती हैं। पर योग साधना से ऐसी चुम्बकीय आँधियाँ सूक्ष्म जगत में उठाई जा सकती हैं और आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों को ही नहीं, दिव्य सत्ता केन्द्रों, देवताओं को भी उससे प्रभावित किया जा सकता है। इस जगत को प्रभावित करने वाले चेतना केन्द्र सविता को तपस्वी लोग हिलाजुला सकते हैं। ध्रुव प्रकाश में प्रखर तीव्रता मार्च और सितम्बर में (चैत्र और आश्विन की नव रात्रि के दिनों में) अत्याधिक होती है। इसका कारण पृथ्वी का अक्ष- सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है। बीज बोने का वही समय अधिक प्रभावी होता है। गर्भ स्थापनाएँ भी उन्हीं दिनों अधिक होती हैं। फूल खिलने का समय यही है। साधक लोग साधनाओं में अधिक सफलता भी इन्हीं दिनों पाते हैं। हम अपनी पृथ्वी काम कला को सूर्य- तेज कला के साथ जब भी जोड़ सकें तभी यह प्रकाश प्रवाह में तीव्रता आने वाली स्थिति पैदा हो सकती है और उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत जीवन में आश्चर्यजनक परिणाम लेकर प्रस्तुत हो सकती है। इतना ही नहीं व्यापक वातावरण को भी उससे प्रभावित किया जा सकता है।
अलेक्जैंडर मार्शेक के साधन अन्तरिक्ष में प्रकाश के रूप में ही नहीं शब्दों के रूप में भी सौरमण्डल तथा मन्दाकिनी आकाशगंगा से आने वाले शक्ति प्रवाहों को सुना है। उसका यंत्र अंकन किया है। यह आवाज क्रमबद्ध संगीत एवं स्वर लहरियों की तरह है। यों कान से वे ध्वनि मात्र सुनाई पड़ती हैं उनका कोई विशेष महत्व समझ में नहीं आता पर खगोल विद्या की नवीनतम शोधें यह स्पष्ट करती चली जा रही हैं कि यह शब्द प्रवाह भी सूर्य से ध्रुव प्रदेशों पर बरसने वाले गति प्रवाहों की तरह ही अतीव सामर्थ्यवान हैं और उनके द्वारा प्राणियों के शरीर तथा मन पर ऐसा प्रबल प्रभाव पड़ता है जैसा व्यक्तिगत प्रयत्नों से बहुत परिश्रम करने पर भी संभव नहीं। यह प्रभाव भले और बुरे दोनों ही स्तर का होता है।
योग साधना में शब्द साधना का विशेष स्थान है। कुण्डलिनी साधना में नाद, बिन्दु, कला की साधनाएं इन अविज्ञात शक्ति प्रवाहों को समझना और उनके साथ अपना संबंध स्थापित करना ही है। शंख, घन्टा, सीटी, नफीरी, झींगुर, निर्झर, मेघ गर्जन आदि के शब्द नाद साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
ध्रुव प्रभा का स्वरूप सर्च लाइट की तरह होता है। वह उत्तर की अपेक्षा दक्षिण की ओर काफी तीव्र होती है। इससे प्रकट होता है कि वह प्रवाह एक स्थान पर दक्षिणी ध्रुव की ओर तीव्र गति से दौड़ रहा है। हमारे मस्तिष्क में अवतरित होने वाला दिव्य तेजस् भी योनि गह्वर की ओर, कुण्डलिनी केन्द्र की ओर ,दौड़ता है दक्षिणी ध्रुव में ‘पेन्गुइन’ नामक पक्षी पाया जाता है यह अति मृदुल स्वभाव का होता है और आगन्तुकों से अत्यन्त मधुर प्रेम भरा व्यवहार करता है। वस्तुतः दक्षिणी ध्रुव कला केन्द्र ही है। वहाँ प्रेम की कोमलता मधुरता और सरलता की अजस्र धारा बहती है। पेन्गुइन पक्षी की तरह ही- योनिगह्वर में सरसता और रसिकता का आनन्द और उल्लास का मिठास भरा पड़ा है। इसे जागृत किया जा सके तो जीवन में कलात्मक सरसता का उल्लास निर्झरिणी की तरह फूटकर प्रवाहित हो सकता है। दक्षिणी ध्रुव समुद्रतल से 19000 फुट उभरा हुआ है। इसे विश्व शरीर की जननेंद्रियां का उभार कह सकते हैं। पुराणों में इसे शिवलिंग कहा गया है। नारी जननेन्द्रिय में भी यह उभार छोटे रूप में पाया जाता है।
ध्रुवों पर सूर्य की किरणों की विचित्रता के फलस्वरूप वहाँ सब कुछ जादू नगरी जैसा दीखता है। वहाँ पर अक्सर अपनी छाया दुहरी दिखाई पड़ती है। आत्म वेत्ता भी अपने साथ परा और अपरा प्रकृति की दो सहेलियाँ साथ फिरते देखता है और अपने को इन छायाओं से स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से भिन्न अविनाशी आत्मा ही मानता है।
भारतीय प्राण विद्या का प्रयोजन यह है कि दोनों ध्रुवों पर बरसने वाली सूर्य शक्ति सन्निहित प्राण धारा को अभीष्ट मात्रा में आकर्षित करके उनके द्वारा स्थूल और सूक्ष्म चेतना की समग्र दृष्टि से पुष्ट किया जाय।
समुद्र, जैसा कुछ बाहर से दिखाई पड़ता है, वस्तुतः वैसा ही या उतना ही नहीं है। बाहर की सतह पर सिर्फ कुछ लहरें उठती या तैरती दीखती हैं। समतल लगता है। पर भीतर इसके सिवाय भी बहुत कुछ है। उसकी गहराई मीलों की है। प्रचण्ड जलधारायें बहती हैं। लाखों प्रकार के जलचर इतनी अधिक संख्या में हैं जितने इस धरती पर भी नहीं रहते। खनिज तथा दूसरे प्रकार के पदार्थ असीम मात्रा में भरे पड़े हैं। यही सब मिलकर समुद्र है, न कि उतना स्वल्प जितना कि खुली आँखों से सतह पर दीखता है।
जीवन समुद्र की तरह है। उसकी सतह छोटी है। खाना, कमाना, सोना, हँसना, रोना, जैसे क्रिया-कलापों की हलचल मात्र जीवन नहीं है। शरीर और परिवार मात्र तक वह सीमित नहीं है। जीवन की तह में अनेक प्रकार के सुख, दुख, आनन्द, चिन्तन, आकर्षण, विग्रह, उद्वेग, अवरोध, भ्रम, भय, भरे पड़े हैं। उसमें परस्पर विरोधी प्रचण्ड धारायें बहती हैं जो एक दूसरे से टकराती भी हैं और एक दूसरे को उदरस्थ भी करती हैं। विस्फोट कम्प और तूफान भी आते हैं और कई बार ऐसे अप्रत्याशित शक्ति चक्र उफन पड़ते हैं जिनसे सागर ही नहीं धरती भी प्रभावित होती है। इस प्रकार का दूसरा समुद्र ही जीवन है। इसकी तुच्छता इतनी नहीं है जितनी कि आमतौर से समझी जाती है।
जीवन के आरम्भ से यह सिखाया जाता है कि उसे क्लर्क, अफसर, व्यापारी, डॉक्टर, आदि बनना है इसी के लिये स्कूल उन्हें तैयार भी करते हैं। किन्तु कोई यह नहीं बताता कि जीवन का क्षेत्र कितना बड़ा और कितना गहरा है। उसे ठीक तरह समझने और उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए सोचने और करने का सही तरीका क्या होना चाहिए।
स्कूली वातावरण, परीक्षाएं पास कराने में व्यस्त हैं। मस्तिष्कीय कुशलता के आधार पर उन्हें श्रेणी प्रदान की जाती है। उपलब्ध परीक्षा अंकों के आधार पर उनके स्तर का वर्गीकरण किया जाता है, जिसे कम परीक्षांक मिले उसे अधिक नम्बर पाने वाले की तुलना में ‘हेय’ ठहराया जाता है। इस प्रकार ऊँच-नीच के आधार पर टिकी एक नये किस्म की जाति बिरादरी खड़ी की जाती है, हो सकता है कि मस्तिष्क का एक अंश प्रकृति प्रदत्त ढंग से विकसित होने के कारण कोई छात्र अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ हो किन्तु जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसकी पहुँच बहुत ही भोंड़ी और गन्दी हो। क्या मनुष्य की श्रेष्ठता का श्रेय परीक्षांकों के आधार पर ही निर्धारित होना चाहिए? जिन्हें कम नम्बर मिले हैं क्या उन्हें बुद्धु, निकम्मा, हेय स्तर का घोषित कर दिया जाना चाहिए।
शिक्षा का प्रयोजन छात्रों को कमाऊ बना देना भर नहीं होना चाहिए। यदि इतनी ही बात है तो उन्हें इतना श्रम कराने और समय गँवाने की क्या आवश्यकता है। बाप, दादों के धन्धे में कुशलता बिना पढ़े होने पर भी प्राप्त की जा सकती है और नौकरियों में मिलने वाली राशि की अपेक्षा अधिक आमदनी की जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य इससे अधिक और विस्तृत होना चाहिए। यदि जानकारियाँ मस्तिष्क में ठूँसने का नाम ही शिक्षा है तो उसका सरल तरीका यह है कि कोई साक्षर व्यक्ति ‘विश्वकोष’ उठाकर अपनी रुचि के विषयों का विवरण पढ़ने लगें तो उन्हें इतनी अधिक जानकारियाँ उपलब्ध हो जायेंगी जितनी प्राध्यापकों को भी नहीं होती। इतनी सी बात के लिये कष्ट साध्य पढ़ाई में सिर क्यों खपाया जाय? समय क्यों गँवाया जाय?
शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए-यथार्थता का ज्ञान। दुनिया वैसी ही नहीं है जैसी कि हमें दिखाई देती है- या बताई जाती है। व्यक्ति और समाज की समस्यायें वहीं नहीं है जिनकी चर्चा की जाती रहती है। यथार्थता की तली तक पहुँचने के लिये किस प्रकार की गोताखोरी की जानी चाहिए इसी कला का सिखाना शिक्षा का उद्देश्य है। भ्रान्तियों, विकृतियों और कुरीतियों के बन्धन से छुटकारा पाकर स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता प्राप्त करने और जीवन तथा विश्व का यथार्थ स्वरूप समझ सकने के योग्य तीक्ष्ण दृष्टि प्राप्त करना इसी का नाम मुक्ति है। तत्व दर्शियों के कथानुसार इसी ‘मुक्ति’ को करतल गत बनाना शिक्षा का मूलभूत प्रयोजन है।
शिक्षा लक्ष्य ‘मुक्ति’ प्राप्त करने के लिये छात्र में वह साहस विकसित करना पड़ेगा कि वह विवेक और तथ्य का सहारा लेकर यथार्थता की तह तक पहुँच सके। दादी क्या कहेगी? लोग क्या कहेंगे? पुस्तकों में क्या लिखा है? शिक्षकों ने क्या समझाया है? लोग क्या सोचते हैं और क्या करते हैं? इन सब जञ्जालों के आवरण चीरकर जो लोग सत्य को समझने और स्वीकार करने को तत्पर हो सकें ऐसी ऋतुम्भरा प्रज्ञा को प्रसुप्ति से विरत कर सक्रिय जागरण में संलग्न करना ही विद्या का मूलभूत उद्देश्य है। यदि हमें ऐसा कुछ सीखने को नहीं मिलता तो शिक्षा कैसे पूरी हुई?
आज सर्वत्र भय का साम्राज्य है। हर व्यक्ति बेतरह डरा हुआ है। अवाँछनीय और अनुचित को जानते मानते हुए भी उसे अस्वीकार करने का साहस नहीं होता। अपनी मौलिकता मानो मनुष्य ने खो ही दी है। अपने पास मानो उसकी कोई समझ है ही नहीं। जो कुछ कहा बताया और कराया जा रहा है उसे ही पालतू जानवर की तरह मानने और करने को तैयार रहने वाली मनोभूमि एक प्रकार से पराधीनता के पाश में जकड़ी हुई ही है। ऐसा बंधित और बाधित व्यक्ति शिक्षित कैसे कहा जाय?
आज सर्वत्र भय, अविश्वास, सन्देह और आशंका का साम्राज्य व्याप्त है। एक देश दूसरे से डरता है, दूसरा आक्रमण न कर दे इसलिये आत्म रक्षा के लिये सैन्य शक्ति बढ़ाता है। उसे दूसरा पक्ष अपने ऊपर आक्रमण की तैयारी मानता है। इस प्रकार सन्देह और भय के कारण दोनों पक्ष युद्ध की तैयारी में जुटे रहते हैं और चिर पोषित भ्रान्तियाँ तनिक से कारण पर युद्ध के रूप में परिणत हो जाती हैं। राष्ट्रों के बीच फैला हुआ भय, सामाजिक, धार्मिक, जातीय एवं वैयक्तिक क्षेत्रों में भी व्याप्त है। चिन्तन में यथार्थता की मात्रा घटती और भ्रान्तियों का घटाटोप बढ़ता चला जा रहा है। भौतिक सुख को प्राथमिकता दी गई है और आत्मिक उल्लास को उस पर निछावर कर दिया गया है। कुमार्गगामिता पथ प्रदर्शन कर रही है सत्पथ पर चल सकने का साहस कुण्ठित होता चला जा रहा है। मूढ़ता की परम्परा और धूर्तता की रीति-नीति अब बेहिचक स्वीकार की जाने लगी है। उस अवाँछनीय ढर्रे के विरुद्ध सोच सकने की, बदलने का साहस कर सकने की, क्षमता मानो समाप्त हो ही गई हो। यह दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है।
अवयस्क बालकों को मिलने वाली स्कूली शिक्षा से लेकर बौद्धिक नेतृत्व करने वाले मनीषियों द्वारा जन साधारण को दिये जाने वाले वयस्क प्रशिक्षण तक का आधार एक ही होना चाहिए कि मनुष्य की स्वतन्त्र चेतना को मूर्च्छना से विरत किया जाय। उसे इस योग्य बनाया जाय कि जीवन का स्वरूप समझ सके, समस्याओं की तह तक पहुँच सके, यथार्थ निर्णय कर सके और औचित्य को अपनाने के लिए साहसपूर्वक अड़ सके।
धर्म शास्त्रों, राजनेता, मनीषी और कलाकारों के प्रतिपादन परस्पर विरोधी और भ्रान्तियों से भरे पड़े हैं। इनमें से किसे सही ठहराया जाय किसे गलत कहा जाय, अथवा इनमें कितना अंश उपयोगी कितना अनुपयोगी है, इसका निर्णय स्वतन्त्र चिन्तन का विकास किये बिना और किसी तरह हो ही नहीं सकता। जब तक यथार्थता को समझा और अपनाया न जायगा तब तक मानव-जीवन की विश्व वसुधा की कुरूपता को हटाया ही नहीं जा सकता। यह संसार, मानव जीवन सुन्दर और सुखद बनाया गया है पर दुर्बुद्धि ही है जिसने सब कुछ विकृत और दुखद बनाकर रख दिया, इस विडम्बना से मुक्ति दिला सकने की क्षमता केवल स्वतन्त्र चिन्तन में ही है। शिक्षा वही है जो विवेक को जागृत कर सके। ढर्रे में घुसे हुए अनौचित्य को हिम्मत और निर्भयता के साथ स्वीकार कर सके।
माता-पिता, शिक्षक धर्म शास्त्र, रीति रिवाज, पड़ौसी सम्बन्धी, नेता हमें सिखाते हैं और जिस रास्ते पर चलने के लिए विवश करते हैं आवश्यक नहीं कि वह उचित और यथार्थ हो। यदि हम आंखें बन्द करके किसी लकीर पर चलने के अभ्यासी रहेंगे तो अपनी आत्मा को खो बैठेंगे। एक अन्धे कैदी की तरह पराश्रित मात्र रह जायेंगे। बौद्धिक पराधीनता सबसे बुरे किस्म की गुलामी है। सच्चे शिक्षक वे हैं- सच्चे अभिभावक और हितैषी वे हैं जो अपने प्रभाव और ज्ञान का उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र में स्वतन्त्र चेतना विकसित करने के लिये करते हैं। यदि कहीं कोई सच्चे अर्थ में ‘विद्यालय’ जीवित हो तो उसका लक्ष्य भी विद्यार्थियों में स्वतन्त्र चेतना का विकास करना ही होगा।
पुरानी दुनिया अब टूट रही है। प्रचलित ढर्रे अब बिखरने ही वाले हैं। युद्धों से- दाव-पेचों से- अभाव दारिद्रय से- शोषण उत्पीड़नों से- छल प्रपञ्चों से- आदमी आजिज आ गया है। सुविधा साधनों की अभिवृद्धि के साथ साथ दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों की बढ़ोतरी भी बेहिसाब हो रही है। जो चल रहा है उसे चलने दिया जाय तो आज का समय शोषण कल वीभत्स और नग्न रक्तपात के रूप में सामने आ खड़ा होगा और मानवी सभ्यता बेमौत मर जायेगी। उस स्थिति को बदले बिना और कोई चारा नहीं। नई दुनिया अगर न बनाई जा सकी तो इस बढ़ती हुई घुटन से मनुष्यता का दम घुट जायेगा।
नई दुनिया के निर्माण से पूर्व जीर्ण-शीर्ण खंडहरों को धराशायी करना पड़ेगा। इसके लिए प्रचण्ड विद्रोह की आवश्यकता है। वह तब तक नहीं उभर सकता जब तक स्वतन्त्र चिन्तन की गरिमा स्वीकार न की जाय और जो अवाँछनीय है उससे इनकार करने का साहस उत्पन्न न किया जाय।
जीवन उसी का नाम है जो यथार्थ की तह तक पहुँच सके, उचित और अनुचित का सही निर्णय कर सके। स्वतन्त्र चिन्तन की जिसमें क्षमता हो और हर प्रकार के अवाँछनीय दबावों को निर्भयता पूर्वक अस्वीकार कर सके, ऐसा जीवन ही उस विस्तार और आनन्द का उपभोग कर सकता है जो उसे सम्पदा के रूप में उपलब्ध हुआ है।
सड़ी दुनिया की अन्त्येष्टि किये बिना कोई चारा नहीं। सड़न को यथावत् चलने दिया जाय तो उससे असह्य विपत्ति बढ़ेगी। नई दुनिया में ही मनुष्य जीवित रह सकेगा और विश्व का सौंदर्य स्थिर रह सकेगा। ऐसा नवीन विश्व जीवन्त लोगों द्वारा ही विनिर्मित हो सकेगा। अस्तु जीवन की गरिमा को समझा सकने वाली और उसे परिष्कृत कर सकने वाली समग्र शिक्षा की हमें व्यवस्था करनी ही होगी। इसके बिना प्रगति की समस्त संभावनायें अवरुद्ध ही पड़ी रहेंगी।
एक धनी ने कहीं सुना कि चींटियों को आटा खिलाने से सारे पाप कट जाते हैं। इतना सस्ता नुस्खा पाकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और एक छटाँक आटा वह रोजाना सवेरे मन्दिर के आस-पास चींटियों के बिलों पर बिखेरने जाने लगा।
महीने भर में चींटियों के हजारों नये बिल तैयार हो गये और इस सुविधा से लाभ उठाने के लिये करोड़ों चींटियाँ उस क्षेत्र में जमा हो गई। उनकी संख्या इतनी बढ़ी की मन्दिर के समीप रहने वाले लोगों के नाकों दम आ गया और वे वह इलाका छोड़कर अन्यत्र भागने लगे।
मन्दिर के आँगन में एक दिन एक संत का प्रवचन हुआ उनने कहा -”जोश के साथ होश भी कायम रखा जाना चाहिये, भावुकता के साथ विवेक का भी ध्यान रहना चाहिये। धर्म कृत्य करने के साथ यह भी सोचना चाहिये कि उससे धर्म की जड़ें तो नहीं कट रहीं चींटियों को बुलाकर हम इन्सानों को भगाने में तो नहीं लगे हुए हैं।
धनी ने उस प्रवचन पर गहराई से विचार किया और अपने अविवेक से हाथ खींच लिया।
भगवान् भास्कर शीर्ष से दक्षिणावर्त हो चुके हैं, तथापि उनकी प्रखरता अभी कम नहीं हुई। यही कारण है कि मगध-निवासी अभी तक मध्याह्न विश्राम कर रहे हैं। पक्षी कोटरों से बाहर नहीं आ रहे। राजहंस अवश्य ही अपनी हंसिनी प्रेयसी के साथ जल क्रीड़ा में निमग्न है। उसकी क्रीड़ा से स्पन्दित तरंगें राज-सरोवर के किनारे थपके लगा जाती हैं और उसके साथ ही कमलिनी नाच-नाच उठती है। लगता है ग्रीष्म की प्रखरता का राजोद्यान पर कोई प्रभाव नहीं है। न तो उसकी सुषमा यत्किंचित् म्लान हुई और न सौरभ मुरझाया। उपवन में प्रातःकाल जैसा मादक सौंदर्य अब भी बिखरा पड़ रहा है।
आम्र-निकुंज के सघन एकान्त में राजकुमार कुणाल बैठे हैं। उनकी मुद्रा बताती है कि वे किसी विचार में खोये हैं। यह समाधि न जाने कब तक चलती कि सहसा लौध्र पुष्पों की सुन्दर सुवास नासा रंध्रों को पार कर उनके मर्मस्थल को आलोड़ित करने लगी। नूपुर और पायलों की मन्द मोहक ध्वनि इस तरह सुनाई दी मानो स्वर्ग से कला साम्राज्ञी उर्वशी का पदार्पण हो रहा हो? कुणाल चौंके,- कौन आ रहा है वह देखने के लिये जब तक नयन उठें तब तक सौंदर्य की प्रतिकृति साम्राज्ञी तिष्यरक्षिता सम्मुख आ उपस्थित हुई। उनका वेश विन्यास, नेत्रों की चपलता और मुखड़े की मादकता देखकर रति निष्प्रभ पड़ जातीं। तिष्यरक्षिता का वह सौंदर्य देखकर लताओं में भी काम भाव छा गया। मनुष्य विछल जाता तो यह कोई बड़ी बात न होती।
जननी! आप? कुणाल अब खड़े हो चुके थे और सुस्मित पूँछ रहे थे- आप स्वस्थ तो हैं न? अर्थ श्रेष्ठ विश्राम कर रहे होंगे। आज्ञा करतीं वहीं आ जाता यहाँ तक आने का कष्ट आपने क्यों किया?
“दीप-शिखा का रूप देखकर पतंग नर्तन क्यों करता है राजकुमार?” तिष्यरक्षिता बोलीं कलिका का केसर चूमने के लिये भौंरा क्यों उड़कर आता है? कुणाल! पावस ऋतु आने पर पथिकगण सहसा अपने घरों की ओर क्यों मुड़ते हैं? यह भी कुछ बताने की बात है कि राज कुमार कि लतिका तरु का सघन सान्निध्य प्राप्त करने के लिये क्यों आतुर हो उठती है?
कुणाल मर्माहत हो उठे? आप मेरी माँ के समान हैं भद्रे! आर्य श्रेष्ठ के लिये आप तीसरी धर्म पत्नी होंगी, मैंने तो तुम्हें सदैव अपनी माँ के रूप में ही देखा है। फिर मेरे साथ यह प्रवञ्चना कैसी? नारी धर्म से विचलित न हूजिये माँ?” कहते-कहते कुणाल के स्वर में कुछ तीक्ष्णता आ गई।
कुणाल! सम्बन्ध बनाना बिगाड़ना मनुष्य के हाथ की बात है। महाराज अशोक से विवाह मेरे शरीर ने किया, मन ने नहीं। मन से तो मैंने तुम्हें ही अपना देवता माना है।
यह प्रतारणा है देवि! आर्य संतानें एक पत्नी व्रत पालन करती हैं। मेरी सहचर काँचना ही हो सकती है आप तो मेरी पूज्या हैं, माँ हैं आपकी मनोकामना पूर्ण करना मेरे लिये असम्भव है।
यह कहकर कुणाल एक ओर चल दिये। तिष्यरक्षिता ने इसे सौंदर्य का अपमान समझा और कहा कुणाल तुम्हारी जिन आँखों पर मैं मुग्ध हुई उन्हें ही निकलवा न लूँ तो मैं भी मगध साम्राज्ञी नहीं- मेरे अपमान के लिए तुम्हें एक दिन पछताना ही पड़ेगा।
कुणाल एक क्षण रुके, पीठ फेरे रहे बोले-माँ का हर प्रसाद स्वीकार है बेटे को और चरित्र के धनी कुणाल वहाँ से क्षिप्र गति से दूर- बहुत दूर चले गये रुके नहीं। उनकी आंखें निकलवा ली गईं पर वे अपने पथ से विचलित न हुये। उन्होंने यह दिखा दिया कि चरित्र सौंदर्य से भी श्रेष्ठ है।
अपनों से अपनी बात-
देवत्व और असुरत्व इस संसार में सर्वत्र विद्यमान हैं। वह मानवी अन्तरंग में भी मौजूद हैं। दोनों में से जो जिसे वरण करता है वह उसे प्राप्त कर लेता है। संसार में दुष्ट अनाचारी तत्व भरे पड़े हैं। यदि उन्हें ढूंढ़ा जाय संपर्क बनाया और अपनाया जाय तो सहज ही अपने भीतर बाहर असुरता का ही बाहुल्य होगा। अभिरुचि का आकर्षण सब दिशाओं से अपने स्तर के व्यक्ति तथा साधन इकट्ठे कर लेता है और जिस रंग में मन रंगा था देखते देखते उसी तरह का वातावरण पूरी तरह घिर जाता है। यही बात असुरता के सम्बन्ध में लागू होती है, यही देवत्व के सम्बन्ध में। आसुरी प्रकृति मनुष्य को साधने, सहयोगियों तथा परिस्थितियों, सफलताओं की निरन्तर उपलब्धि होती जाती है और आकाँक्षा के अनुरूप असुरता के सुदृढ़ दुर्ग में अपने को विराजमान पाया जाता है। इसी प्रकार यदि अन्तरंग में दैवी आकाँक्षाएं प्रदीप्त हों, उसी दिशा में कदम बढ़ रहे हों तो सन्त सज्जनों का संपर्क-सत्कर्म करने का वातावरण, सन्मार्ग प्रेरक साधन सहज ही बनने लगते हैं और जीवन-क्रम में देवत्व का सागर हिलोरें लेने लगता है।
बाह्य जगत में संव्याप्त सत और तम-देवत्व और असुरत्व की तरह अन्तरंग में भी यह दोनों प्रवृत्तियाँ यथास्थान विद्यमान रहती हैं। इनमें से जिसे अपनाया बढ़ाया जाय वही पनपती चली जाती है और विचारणा तथा क्रियाशीलता में वही आस्था सक्रिय बनकर झाँकने लगती है। आसुरी अभिरुचि वाले व्यक्ति उसी स्तर के विचारों में डूबे रहते हैं, जैसा सोचते हैं वैसे ही उपाय सूझते हैं- साधन ढूँढ़ते है और प्रयास करते हैं। फलस्वरूप जीवन क्रम उसी दिशा में चल पड़ता है। अन्तरंग में गाया हुआ आकाँक्षाओं का बीज कुछ ही समय में विशाल जीवन वृक्ष बनकर खड़ा हो जाता है। यदि आस्थाएं सतोगुणी हों- आकाँक्षाएं देव स्तर की हों तो स्वभावतः मन और बुद्धि का प्रवाह उसी ओर बहेगा। बूँद-बूँद से घट भरने की तरह सत् चिन्तन और सत्कर्मों की सम्पदा मनुष्य को स्वर्गीय विभूतियों से सुसज्जित कर देती है और क्रमशः व्यक्तित्व में देव मानव के अधिक स्पष्ट दर्शन होते चले जाते हैं।
अध्यात्म क्षेत्र में अनेक देवताओं की मान्यताएं और कल्पना है। हर देश, सम्प्रदाय, क्षेत्र वर्ग के पृथक पृथक देवता हैं आश्चर्य होता है कि ये विभिन्न आकृति-प्रकृति के देवता कैसे अपनी गतिविधियों में परस्पर तालमेल बिठा पाते होंगे। इस असमंजस का हिन्दू धर्म में भली प्रकार समाधान कर दिया गया है। यहाँ कभी 33 करोड़ की जनसंख्या रही होगी तदनुसार 33 कोटि देवताओं की संख्या घोषित कर दी गई। प्रत्येक नागरिक को एक देवता माना गया। यह मान्यता अत्यन्त प्रामाणिक है, गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से जिसमें देवत्व की प्रचुर मात्रा विद्यमान है जिसने अपनी सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के आधार पर अन्तरंग और बहिरंग परिस्थितियों में स्वर्गीय वातावरण भर रखा है उसे देवता मानने में किसी को क्यों और क्या आपत्ति होनी चाहिए। इस देश का हर व्यक्ति कभी देव वर्ग में था, इसलिये सहज ही यहाँ की परिस्थितियां भी ‘स्वर्गादपि गरियसी’ बनी रहीं।
पूजा प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले देवता साधनकर्त्ता की मानसिक सन्तान होते हैं। व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुरूप एक देव प्रतिमा की कल्पना करता है, आस्था के आधार पर उसमें प्राण फूँकता है और तप साधना द्वारा उसमें सक्रियता उत्पन्न करता है। वरदान आशीर्वाद देने की चमत्कार दिखाने की हर देवता में उतनी ही शक्ति रहती है जितनी कि उस उपासक की आस्था और निष्ठा में परिपक्वता रहती है। एक ही देवता एक साधक के लिये प्रचण्ड शक्तिशाली सिद्ध होता है और वही दूसरे के लिये बिल्कुल निर्जीव बनकर रह जाता है। इस अंतर का एकमात्र कारण साधनकर्त्ता की मनः स्थिति ही है। इस तथ्य को अध्यात्म विद्या के महामनीषियों ने कभी छिपाया नहीं है उन्होंने बराबर कहा है- जिसकी जैसी भावना होगी उसे वैसी ही सिद्धि मिलेगी। इसी बात को यदि यों कहा जाने लगे कि श्रद्धालु की आस्था ही प्राणवान रहती है तो उसे यथार्थ का ही प्रतिपादन माना जाना चाहिए।
इस सचाई को वेदान्त दर्शन ने और भी स्पष्ट कर दिया है। देवाधिदेव परब्रह्म को अद्वैत तत्व विज्ञान ने आत्मदेव के रूप में देखा है। सोऽहम् शिवोऽहम् तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म जैसे सूत्रों में आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। जीव स्थिति तो तभी तक है जब तक मल आवरण, विक्षेप और कषाय कल्मष अन्तःकरण पर चढ़े हुए हैं। इन विकारों का शोधन हो जाने पर तो आत्मा निस्सन्देह परमात्मा ही है। तत्वदर्शी सदा से यही कहते रहते हैं कि ईश्वरीय समस्त महत्ताएं बीज रूप से जीव में विद्यमान हैं, यदि उन्हें विकसित किया जा सके तो नर में नारायण की झाँकी तत्काल देखी जा सकती है। साधन का एकमात्र प्रयोजन आत्म शोधन है। अपनी शारीरिक-मानसिक और भावनात्मक मलीनताओं को शुद्ध करने के लिए ही तपश्चर्या उपासना की जाती है। भौतिक विज्ञानी भी यही मानते हैं कि ब्रह्माण्ड की विशालता और परमाणु की लघुता में भारी अन्तर दीखते हुए भी मूलतः उनका क्रिया कलाप एक है। मानव शरीर में काम करने वाली परमाणु, जीवाणु परक सत्ता उन समस्त शक्तियों और हलचलों की प्रतिलिपि है जो इस विशाल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त हैं। काय कलेवर एक प्रकार से छोटा ब्रह्माण्ड ही है। यों वह नर कीटकों का घृणित घोंसला भर दीखता है पर यदि उसे व्यवस्थित और परिष्कृत बनाया जा सके तो शरीर भूलोक का-मन भुवः लोक का और अंतरात्मा का स्वः लोक का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होगा। तीनों लोकों की त्रिविध सम्पदाएं अपने भीतर सार रूप से कूट-कूट भरी हुई हैं। जीवन का प्रबलतम पुरुषार्थ उस अप्रकट का प्रकटीकरण करना ही है उसी को साधना तपस्या आदि के नाम से पुकारते हैं।
वेदान्त प्रतिपादित आत्म ब्रह्म के तत्व दर्शन को साधना शास्त्र में आत्मदेव के महात्म्य विस्तार एवं साधन विधान पर विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। शरीर और मन के किन-किन अंग प्रत्यंगों में कौन-कौन देवता, नदी, पर्वत, सागर, लोक, तत्व, तीर्थ शक्तिपीठ आदि विद्यमान हैं इसकी चर्चा भली प्रकार की गई है और बताया गया है कि जो बहिरंग में मौजूद है, अस्तु काय कलेवर को तुच्छ नहीं समझा जाना चाहिए वरन् उसमें श्रेष्ठतम सत्ता की झाँकी की जानी चाहिए। भौतिक संपदा का अहंकार तो हेय है पर आत्मदेव का गौरव हर किसी को अनुभव करना चाहिये और आत्मगौरव की रक्षा करने वाली- आत्मगरिमा को ज्योतिर्मय करने वाली रीति-नीति अपनानी चाहिए।
आत्मदेव की साधना, उपासना के विधि विधानों का अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत सुविस्तृत उल्लेख है। निराकार साधना में अपने कण-कण को नील वर्ण प्रभा ज्योति से ज्योतिर्मय देखने का अभ्यास किया जाता है। आकाश में आत्म सत्ता तनिक सी नील आभा लिये हुए सूर्य के समान प्रकाशवान है और उसकी दिव्य एवं प्रखर किरणें शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके, बलिष्ठता बढ़ा रही हैं- मन में प्रवेश करके मनस्विता को प्रखर कर रही हैं। अन्तरात्मा के भाव संस्थान (हृदय) में प्रवेश करके आत्मशक्ति को ज्वलन्त बना रही हैं। अपना सबकुछ ज्योतिर्मय हो रहा है। प्रकाश से सागर में जल मत्स्य की तरह स्वच्छन्द विचरण किया जा रहा है।
प्रकाश ध्यान का अभ्यास करने के लिये आरम्भ में आँख में दीपक की नील वर्ण शुभ्र ज्योति की स्थापना की जाति है और उस पर त्राटक की तरह पलक खोलते बन्द करते हुए ज्योति धारणा का अभ्यास किया जाता है। पीछे यह प्रकाश ध्यान बिना किसी दीपक आदि के स्वतः ही दृश्यमान होने लगता है। हलका नील वर्ण शान्ति एवं सात्विकता का प्रतीक है। राम, कृष्ण आदि भगवान के सभी अवतार नील कमल की आभा वाले शरीर धारण किये हुए हैं। दिव्यात्माओं का तेजोवलय भी ऐसा ही नीलिमा युक्त होता है। अस्तु आत्म देव की ज्योति अवतरण साधना नील झलक युक्त प्रकाश को ही ध्यान चेतना में प्रतिष्ठापित किया जाता है। दीपक पर त्राटक करते समय उन पर नील आवरण चढ़ा लेते हैं ताकि प्रत्यक्ष प्रकाश भी उसी आभा युक्त दिखाई पड़े।
साकार आत्म साधना में अपने शरीर का चित्र ही देव स्थान पर प्रतिष्ठापित किया जाता है। उसी का पूजन, वन्दन और साधन करते हैं। ताँत्रिक विधान के अनुसार ‘छाया पुरुष’ की सिद्धि में अपने ही सूक्ष्म शरीर की सत्ता को प्रखर बनाया जाता है और वह उस साधना क्रम के कारण इतनी सत्तावान हो जाती है कि एक सामर्थ्यवान् अदृश्य मित्र की तरह अभीष्ट सहायता करते रहने के लिये प्रस्तुत रहे। छाया पुरुष के द्वारा दूरवर्ती समाचार मालूम करना-वस्तुएं मँगाना-काम में सहायता करना जैसे प्रयोजन सिद्ध किये जाते हैं। विक्रमादित्य के पास पाँच वीर बेताल बताये जाते हैं, अलादीन के चिराग के साथ सहायक जिन्नों’ के सहयोग की किम्वदंती प्रचलित है। इस स्तर के कार्य छाया पुरुष कर सकता है। मनुष्य काया में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञान मय कोश, आनन्दमय कोश, यह पाँच कोश आवरण हैं इन पाँचों को ही स्वतन्त्र चेतनाओं के रूप में विकसित किया जा सकता है। पाँच देव यही हैं। जो इन्हें जागृत कर सके वह पाँच सशक्त सहायकों की महत्वपूर्ण सहायता का लाभ निरन्तर उठाता रह सकता है। सभी प्रकारान्तर से छाया पुरुष ही कहे जायेंगे। यों सच बात तो यह है कि प्रत्येक वरदानी देवता अपनी स्वविनिर्मित मानस सन्तान ही है उसमें उतना ही बल रहता है जितना अपनी निष्ठा प्रखर होती है। श्रद्धा विश्वास की प्रतिक्रिया का नाम ही देव अनुकम्पा है। देव अनुग्रह से जो कुछ प्राप्त किया जाता है तत्वतः वह आत्म देवता का ही वरदान होता है। अपनी गरिमा से अपरिचित व्यक्ति को बहिरंग देवता की संरचना करके एक मनोवैज्ञानिक लाभ ही देव साधना द्वारा मिलता है। वस्तुतः उसे अपने लिये अपना अनुदान ही समझा जाना चाहिए।
साकार आत्म साधना के लिए दर्पण का उपयोग किया जाता है। बड़ा दर्पण सामने रखकर उसमें अपना आधा या सम्पूर्ण शरीर ध्यानपूर्वक देखते हैं और उसे परिष्कृत स्तर का देव मानकर उसका पञ्चोपचार पूजन, ध्यान, वन्दन, स्तवन करते हैं। साथ ही यह आस्था जमाते हैं कि इस कार्य कलेवर में निवास करने वाली ‘दिव्य ज्योति’ यदि आत्म भाव की भूमिका में जागृत हो उठे तो निश्चित रूप से देव सत्ता सम्पन्न हो सकती है। विश्व वन्द्य महामानवों की पंक्ति में बैठने का उसे अवसर मिल सकता है। मल आवरण विक्षेपों के कषाय कल्मषों से उसे मुक्ति मिलने ही वाली है, उसका परिष्कार परिशोधन अब सम्पन्न होने ही वाला है। यह देव अपने अवतरण का पुण्य प्रयोजन पूरा करके ही रहेगा। इस भावना के साथ की गई आत्म देव उपासना अपना दिव्य प्रभाव तत्काल ही दिखाना आरम्भ कर देती है। अपने काय कलेवर में परमेश्वर की सत्ता और महत्ता की अनुभूति जितनी गहरी होगी उतनी ही उत्कृष्ट रीति-नीति अपनाने की भावना उमड़ेगी। कहना न होगा कि अन्तःकरण में उत्कृष्टता का उभार ही नर को नारायण बनाया करता है।
इस तथ्य को हजार बार हृदयंगम किया जाना चाहिए कि तप साधना का उद्देश्य किसी देवता से मनमानी मुराद पूरी करने के लिए ठाना गया दुराग्रह नहीं वरन् आत्म शोधन और आत्म परिष्कार के लिए तितीक्षा द्वारा प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करना है। स्मरण रखा जाय महान उपलब्धियाँ कहीं बाहर से प्राप्त नहीं होती वरन् भीतर से ही उभरती हैं। कुत्साएं और कुण्ठाएं ही अन्तः वैभव को दबाये पड़ी रहती हैं, इन पत्थरों को हटाने के लिये जो साहसिक कदम उठाने पड़ते हैं उन्हीं का नाम योगाभ्यास, तपश्चर्या, व्रत, अनुष्ठान, साधन प्रक्रिया आदि हैं। इन क्रियाकलापों द्वारा जितना आत्म शोधन होता चले समझना चाहिए साधना उतनी ही सफल हो रही है। आत्म परिष्कार का ही दूसरा नाम देव अनुग्रह अथवा सिद्धि वैभव है। नर कीट को देव मानव में परिणत करने का सारा श्रेय इस आत्म सुधार प्रक्रिया को ही मिलना चाहिए। अध्यात्म क्षेत्र की समस्त सिद्धियाँ और विभूतियाँ उसी केंद्रबिंदु के ईद-गिर्द चक्कर काटती हैं।
याद रखना चाहिए कि कपड़े को रंगने से पूर्व उसका धोना आवश्यक है। जप, भजन आरम्भ करने से पूर्व स्नान की जरूरत पड़ती है। भोजन से पूर्व हाथ मुँह धोने का औचित्य है। घाव पर मरहम चढ़ाने से पूर्व उसकी सफाई करनी पड़ती है। साधना उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म से बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानि कारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष है, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीन मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र विछोह का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख बिलखकर प्राण त्यागने पड़े थे। बालि को छिपकर बाण मारने का कर्मफल राम को कृष्णावतार के समय भुगतना पड़ा था और बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारकर उन्हें मृत्यु मुख में पहुँचाया था। जब भगवान भी कर्मफल से नहीं बच सकते तो दूसरों की बात ही क्या है। पुण्यात्मा पुरुषों को भी पूर्वकृत पापों के फलस्वरूप दुःसह दुख सहने के लिये बाध्य होना पड़ता है।
भारतीय धर्मशास्त्रों में इस जन्म के किये पापों का प्रायश्चित करने उनके दण्ड को कर्मफल बनने से पूर्व ही भुगत लेने का आदेश किया है। यह मान्यता शत प्रतिशत मिथ्या है कि नदी सरोवर स्नान, तीर्थ दर्शन, कथा कीर्तन जैसे छुट पुट कर्मकाण्डों से पाप फल से छुटकारा मिल सकता है। इन कृत्यों से भविष्य में दुष्कर्म न करने की प्रेरणा मिल सकती है इसी अर्थ से पाप से छुटकारा पाने का कुछ तुक है। इतने सस्ते में यदि दुष्कर्मों के दण्ड से बचा जा सकता तो फिर न पाप से डरने की जरूरत थी और न उसे छोड़ने की। जब इतनी आसानी से पाप फल निरस्त हो सकता है तो उसके कारण प्राप्त होने वाले भौतिक लाभों को कोई क्यों छोड़ेगा? यदि वस्तुतः ऐसा होता तो फिर भगवान की सारी न्याय व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती। सृष्टि में पूरा अन्धेरा छा जाता है। अमुक मन्त्र, देवता, सम्प्रदाय, गुरु कर्मकाण्ड में कर्मकाण्ड को अपनाने वाला पाप दण्ड से बच सकता है इस तरह के प्रतिपादन जिन्होंने भी किये हैं उन्होंने ईश्वर की कठोर न्याय व्यवस्था के साथ निर्भय उपहास किया है। इस सस्ती झाँसेपट्टी की निरर्थकता को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है। भ्रान्ति की सुखद कल्पना में उड़ते फिरने की अपेक्षा यथार्थ को जानकर प्रस्तुत आपत्ति से जूझने के लिये कटिबद्ध होने का उत्तरदायित्व वहन करना लाख गुणा श्रेयस्कर है।
पिछले जन्मों के पाप कर्म इस जन्म के लिये प्रारब्ध बन चुके, उन्हें भुगतने के लिए आवश्यक धैर्य, साहस और सन्तुलन एकत्रित करना चाहिए। विवेकवान् आपदाओं को हँसकर सहते हैं और अधीर अविवेकी रोते चिल्लाते उपहासास्पद बनते हैं। और सम्बन्धित लोगों को विक्षुब्ध करते हैं। अकाट्य प्रारब्धों को भुगतते हुए ऑपरेशन प्रक्रिया के साथ तुलना करनी चाहिए और सोचना चाहिए फोड़ा चीरकर मवाद निकल जाने से दुस्सह वेदना से छुटकारा मिल जायेगा। गीता की सन्तुलन शिक्षा ऐसे ही प्रसंगों पर काम आती है। ऐसी मनः स्थिति में विपत्ति का बोझ एक चौथाई ही रह जाता है स्पष्टतः तीन चौथाई विपत्ति तो अधीरता और भीरुताजन्य हड़बड़ी की ही होती है।
इस जन्म के पाप और पुण्यों का जमा खर्च बनता रहता है। अन्त में जो घटोत्तरी बढ़ोत्तरी होती है उस लेख-जोख के अनुसार भावी जीवन के लिए स्वर्ग नरक की-सुख दुख की प्रारब्ध व्यवस्था बनती है। वर्तमान जीवन में हर किसी को यह अवसर उपलब्ध है कि अब तक के ज्ञात पापों का स्मरण करके उनका प्रायश्चित कर लें। यह एक स्वविनिर्मित दण्ड व्यवस्था है। इसमें सदाशयता का गहरा पुट है और ईमानदारी की स्पष्ट झाँकी है। बिना पुलिस के पकड़े कोई अपराधी स्वयं न्यायाधीश के सामने उपस्थित हो अपने अपराधों का विवरण बताये और दण्ड की याचना करे तो निश्चय ही न्यायाधीश उससे प्रभावित हुए बिना न रहेगा और अपेक्षाकृत हलका दण्ड देगा। ठीक यही बात प्रायश्चित विधान में भी लागू होती है। विधि व्यवस्थानुसार जितना दण्ड मिलना चाहिए प्रायश्चित के लिए साहस करने पर उससे कहीं कम में वह संकट निपट जाता है।
पाप कर्मों का फल नारकीय दुख दण्ड तक ही सीमित रहता हो केवल इतना ही नहीं वरन् उनके कारण उससे बड़ा व्यवधान अन्तःकरण की सत्प्रवृत्तियों की दिशा में उत्पन्न होता है। कुकर्म के फलस्वरूप कुसंस्कार बन जाते हैं और वे सत्मार्ग पर चलने के प्रयास में हजार प्रकार से रोड़े अटकाते हैं। कुकर्म और उसके फलस्वरूप नारकीय यातना के दो सिरों के बीच की कड़ी यह कुसंस्कार ही हैं। वे ही अपने आप समयानुसार दैवी कोप की तरह सामने आ खड़े होते हैं। यह कुसंस्कार ही जप ध्यान के समय मन में उच्चाटन उत्पन्न करते हैं और एकाग्रता नहीं जमने देते। श्रद्धा विश्वास की जड़े उन्हीं के कारण जमने नहीं पातीं। तप साधना के अवसर पर अनेक प्रकार के विघ्न बनकर वे ही बाधक बनते हैं। सन्मार्ग पर चलने की उत्कट इच्छा होते हुए भी उस आकाँक्षा को सफल न होने देने वाली परिस्थितियों के पीछे इन्हीं कुसंस्कारों का हाथ रहता है। अश्रद्धा और अरुचि के रूप में साधना को वे ही असफल बनाने वाले प्रधान कारण बने रहते हैं। जिस प्रकार गलित कुष्ठ का रोगी बहुमूल्य औषधियाँ खाने पर भी मुक्त नहीं हो पाता उसी प्रकार संचित पाप कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न हुए कुसंस्कार साधना की सफलता में प्रधान बाधा बनकर खड़े रहते हैं। अस्तु आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सच्चे मन से तत्पर मनुष्य को प्रथम चरण इस जन्म के पाप कर्मों का परिशोधन करने वाले प्रायश्चित के रूप में उठाना पड़ता है।
प्रायश्चित्य की प्रक्रिया इस प्रकार सम्पन्न होती है (1) इस जन्म में अब तक बने पड़े पाप कर्मों की सूची बनाना। उसके लिए दुख मनाना। भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति न करने की प्रतिज्ञा करना (2) किसी ऐसे उदात्त और विश्वस्त व्यक्ति के सामने अपने पाप कर्मों का विस्तृत वर्णन करना और प्रायश्चित्य विधान के लिए परामर्श लेना। (3) इसी प्रयोजन के लिए शास्त्रानुमोदित व्रत, तप, तितीक्षा, मौन, एकान्त सेवन, आदि शारीरिक मानसिक कष्टों के दण्ड उपचार सम्पन्न करना (4) पाप कर्मों द्वारा व्यक्तियों की या समाज की जो हानि की हैं उनकी क्षतिपूर्ति के लिए शारीरिक मानसिक, आर्थिक अनुदान समाज को सुखी बनाने के लिए प्रस्तुत करना। (5) अपने अनाचार से जिन लोगों को कष्ट सहना पड़ा उनसे सच्चे मन से क्षमा याचना करना। यह पाँचों ही प्रक्रिया जुड़कर एक प्रायश्चित्य विधान बनता है। किसी कर्म का कोई निश्चित दण्ड निर्धारित नहीं है। किस स्थिति में पाप किया गया और उसके फलस्वरूप किसकी किस तरह की हानि हुई इसकी गहराई को समझकर ही पाप का मूल्यांकन किया जायेगा और उसी के आधार पर दण्ड निर्धारण होगा। इसलिए उसका निर्णय कोई तत्वदर्शी ही कर सकता है। अस्तु इस संदर्भ में किसी सूक्ष्मदर्शी तत्ववेत्ता का ही परामर्श लेना चाहिए। किये हुए कुकर्मों की सूची बनाना, उन पर दुख प्रकट करना और भविष्य में उन्हें न दुहराने का संकल्प बिना किसी दूसरे की सहायता के एकाकी भी किया जा सकता है। इसके बाद दूसरी प्रक्रिया के लिए किसी की सहायता की जरूरत पड़ती है। इसके लिए अत्यन्त प्रामाणिक और उदात्त प्रकृति का व्यक्ति ही होना चाहिए। आज लोगों का स्तर इतना घटिया हो गया है वे दूसरों की दुर्बलताएं जानने पर उससे घृणा किये बिना नहीं रह सकते। उसे पचा भी नहीं सकते। अनुपयुक्त व्यक्तियों में उसकी चर्चा हर दृष्टि से अहितकर है। यदि व्यभिचार का रहस्योद्घाटन किया जाय तो अपनी तो सफाई हो सकती है पर जो दूसरा साथ में था उसका सम्मान समाप्त होता है, यह उसके साथ में एक प्रकार का विश्वासघात है। प्रायश्चित्य के सिलसिले में यदि किसी लड़की को बदनाम कर दिया जाय तो उसके जीवन स्तर का सत्यानाश ही होता है और यह उसकी हत्या कर डालने से बढ़कर पाप है। अस्तु अपना मन हलका करने के लिए-अनाचार की ग्रन्थि खोलने के लिए जहाँ किसी विश्वस्त व्यक्ति के सामने अपने पाप कर्मों का संक्षिप्त नहीं सविस्तार वर्णन करना आवश्यक है वहाँ यह भली प्रकार परख लिया जाना चाहिए कि रहस्य जिसके आगे खोले जायँ वह उतना उदार हो कि घृणा के स्थान पर सदाशयता का आत्मीयता का मूल्य समझे और पूर्व की अपेक्षा भी अधिक सम्मान का भाव बनाये रह सके। केवल कह देना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके लिए दण्ड विधान की प्रायश्चित्य प्रक्रिया भी उसी के द्वारा बताई जानी है अतएव उसका सूक्ष्म दर्शी और शास्त्र मर्मज्ञ भी होना आवश्यक है।
तीसरा चरण कुछ काल तक शारीरिक मानसिक तप तितीक्षा की कष्ट साधना एवं असुविधाएं स्वीकार करना है। इस संदर्भ में शास्त्रकारों ने चान्द्रायण, कृच्छ चान्द्रायण, महाव्रत, शिर मुण्डन, सप्तासि व्रत, तप्तयान गव्योच्छेदन, शान्तापन, महाशान्तापन, कष्ट मौन, महा मौन, उर्ध्ववाहु, अधोपाद, रात्रि जागरण, परिभ्रमण आदि कितनी ही कष्ट साध्य तप तितीक्षाओं का उल्लेख किया है और विधि विधान बताया है। बाल, वृद्ध, रुग्ण एवं गर्भ धारण जैसी विशेष परिस्थितियों में उपरोक्त दण्ड विधानों की कठोरता को सरल बनाने के भी अपवाद रखे गये हैं। इनका विस्तृत विवेचन प्रायश्चित्य परक ग्रन्थों में बताया गया है। इन तपश्चर्याओं का आधार यह है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक कष्ट सहकर वैसी ही दण्ड प्रताड़ना का अनुभव करे जैसी अपराधियों को न्यायालयों द्वारा दी जाती है। कारागार यातना सहकर जब बन्दी निकलते हैं तो समझा जाता है कि जो कुकृत्य उन्होंने किये थे उनका दण्ड भुगत लिया गया। धर्मानुमोदित प्रायश्चित्य करने वाले को भी अपने का उस प्रक्रिया में होकर गुजरा हुआ अनुभव करने का अधिकार है। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह यदि धर्माधिकारी ने उचित तितीक्षा बताई है तो उससे भी न्याय का प्रयोजन पूरा हो जाता है। अपराधी और न्यायाधीश गुप्त संधि करके यदि दण्ड हलका कर लेते हैं तो उसमें अपराधी से अधिक दोषी न्यायाधीश होता है। इसी प्रकार प्रायश्चित्य को यदि अति सरल बनाया गया है तो उसका भार उस निर्धारणकर्त्ता पर पड़ेगा, जो प्रकारान्तर से उसे ही भुगतना पड़ेगा।
पाप कर्मों में व्यक्ति को या समाज को आर्थिक अथवा शारीरिक, मानसिक, नैतिक क्षति पहुँचाई गई होती है। इस अनाचार उत्पादन की खोदी हुई खाई को पाटना प्रजापति ने आजीवन उद्यान लगाते रहने का आदेश किया था। चोरी करके धनवान बने लोगों को उचित है कि उस पाप भार में से धन का अधिक भाग लोक मंगल के लिए वापिस कर दें। धन गबन करने वालों पर भारी रकम जुर्माने की की जाती है ताकि उनने जो कमाया है उसे वापिस लिया जा सके। अपने पाप पर सच्चे मन में शर्माने वाले के लिये यही उचित है कि उस अनीति उपार्जित सम्पदा को पूरे या अधूरे रूप में वापिस करे। प्रायश्चित्यों में तरह-तरह के दान विधानों का नियोजन इसी दृष्टि से हुआ है।
जिस व्यक्ति को क्षति पहुँचाई गई थी हो सकता है, स्वर्गवासी हो चुका हो, ऐसी दशा में उसे आर्थिक वापिसी नहीं की जा सकती और न जो शारीरिक, मानसिक आघात लगाये थे उनकी भरपाई हो सकती है। कई बार जीवित होने पर भी वैसा किया जा सकना सम्भव नहीं जैसे किसी लड़की को फुसलाकर उसका सतीत्व नष्ट किया गया था अब उसका कौमार्य कैसे वापिस किया जाय। यदि उसे कुछ मुआवज़ा दिया जाय तो उसकी बदनामी होने से और भी भारी विपत्ति उस पर आवेगी और यह पहले से भी बड़ा अपराध हो जायेगा। कोई व्यक्ति जब गरीब था तब उसकी पुरानी चप्पलें चुराई गई थीं अब वह गरीब अमीर है यदि उसकी पुरानी चप्पलें वापिस की जायँ तो वह उसे अपना अपमान समझेगा और उस प्रायश्चित्य पर और भी अधिक क्रुद्ध होगा। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ऋषियों ने यह सिद्धान्त रखा है कि समस्त समाज को एक अंग माना जाय और उसके एक अंग या अनेकों अंगों को पहुँचाई हुई क्षति समाज, मानव समाज की क्षति मानी जाय। प्रायश्चित्य के लिए वह वापिसी ब्याज सहित, बिना ब्याज के अथवा आधी अधूरी जितनी भी सम्भव हो सके वापिस करनी चाहिए। खोदी गई खाई को पाटने का यही तरीका है। समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के किसी उपयोगी प्रयोजन के लिये यदि अपना समय, श्रम, एवं साधन अर्पित किये जाते हैं तो उससे पाप कर्मों की क्षतिपूर्ति हो सकती है। यह प्रायश्चित्य का चौथा वर्ग है।
पाँचवाँ वर्ग यह है कि भावना के बदले भावना को प्रस्तुत किया जाय। अनाचार पीड़ित व्यक्ति को निस्सन्देह क्रोध, रोष उपजा होगा। संभव है उसने विलाप क्रन्दन किया हो। उत्पीड़न का अभिशाप अंतरिक्ष में घुमड़ता है और क्रुद्ध सर्प की तरह अवसर पाते ही काटता है। प्रायश्चित्य कर्ता को उसकी घायल मनः स्थिति का अनुमान लगाना चाहिए और अपने मन में उसके लिये उतनी संवेदना सहानुभूति उपजानी चाहिए जो अन्तरिक्ष में घुमड़कर उसे शान्ति प्रदान कर सके। भूल से अथवा आवेश में यदि अपने ही अति निकटवर्ती कुटुम्बी को कोई भारी आघात पहुँचा दिया जाय तो उस गलती के लिए भारी आत्मग्लानि उठती है-आहत के प्रति संवेदना का उफान उमड़ता है और अन्तः करण का रोम-रोम उससे क्षमा माँगता है; तथा बदले में बड़ी से बड़ी क्षतिपूर्ति करने का भाव रहता है। यही मनः स्थिति यदि अपराधकर्ता अपने भीतर उदय कर सके और वह भी मात्र कल्पना बनकर न रह जाय वरन् इतनी सक्रिय हो उठे कि पश्चाताप के आँसू बनकर उस क्रूर निष्ठुरता को दुष्ट असुरता को अश्रुबिन्दुओं के साथ बहा दे।
कहावत है कि जो अपनी सहायता आप करता है उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। सरकार केवल प्रतिभा बनाने को छात्रवृत्ति देती है। स्वयंवर में गुणवान और रूपवान युवकों के गले ही जयमाला पड़ती है। बादल की वर्षा का अधिक अनुदान गहरे सरोवरों को मिलता है। स्वाति की बूंदें उन्हीं सीपियों में मोती बनाती है जिनका मुँह तो अमृत वर्षा का भी लाभ नहीं ले सकता मधुमक्खियाँ, भ्रमर, तितलियाँ केवल खिले हुए फूलों के इर्द-गिर्द मँडराती हैं। किसी के सामने गिड़गिड़ाने से काम नहीं चलता। दुर्बल का तो दैव भी भी घातक होता है। दीनता प्रदर्शित करके कुछ बड़ी उपलब्धि नहीं मिल सकती। कुत्ता पूँछ हिलाने और पैर चाटने पर भी जूठन के टुकड़े पाता है पर स्वाभिमानी हाथी की सशक्तता उसके लिए उचित भोजन अपने स्थान पर मँगा लेती है, भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिये हमें किसी के सामने गिड़गिड़ाने नाक रगड़ने की आवश्यकता नहीं यहाँ तक कि देवता और ईश्वर के सामने भी नहीं। हम अपना सारा ध्यान प्रसुप्त आत्म गरिमा को सजग एवं बलिष्ठ बनाने में लगायें तो सहज ही वह चुम्बकत्व प्रबल होगा जिसके आकर्षण से अभीष्ट सिद्धियाँ, सफलताएं अनायास ही खिंचती हुईं अपने पास चली आवेंगी।
बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का प्रवाह सहज ही तिनके जैसे हलके स्तर के लोगों को बहा ले जाता है। मृगमरीचिका में भटकते हुये अज्ञानी ही मरते खपते हैं। कस्तूरी की गन्ध के लिये लालायित अशान्त मूढ़ मृग ही दिशाओं में मारा-मारा फिरता है। यदि उसे पता हो कि कस्तूरी अपनी ही नाभि में है और उस सुगन्ध का लाभ आत्माभिमुख होने पर सहज ही मिल सकता है; वासना और तृष्णा को मृग तृष्णा मात्र समझ लिया जाय तो शक्ति के अपव्यय को रोककर जलाशय की यथार्थ खोज संभव हो सकती है। इस तथ्य को गीताकार ने अत्यंत स्पष्ट कर दिया है “उद्धरेदात्मनात्मानं” अपना उद्धार आप करो। अपनी प्रगति का पथ स्वयं प्रशस्त करो। जो माँगना है अपने आप से माँगो। क्योंकि जो कुछ बाहर रुचिर, मृदुल, सुखद दीखता है उसका उद्गम केन्द्र अपने ही अन्तरंग में विद्यमान है। आत्मदेव की साधना ही अध्यात्म तत्व ज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। जिस प्रकार भौतिक सुखों को अज्ञानवश बाहर खोजा जाता है उसी प्रकार आत्मिक विभूतियों के लिए मूढ़ मति हमें वाह्य जगत के देवताओं, गुरुओं, तीर्थों, कर्मकाण्डों में भटकाती है। यदि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को अंतर्मुखी बना लें- देवाधि देव आत्म देव की साधना के लिए तत्पर हों तो वह सब कुछ निश्चित रूप से मिल सकता है जिसकी शान्ति और प्रगति के लिए आनन्द और उल्लास के लिए वास्तविक आवश्यकता है।
कलाकारों और कवियों के नाम
ओ कलाकार! ओ गीतकार!! युग निर्माता-
सन्तुलित तूलिका और लेखनी करो आज ॥
मत करो कला को निर्वसना बाजारों में-
पैसे लेकर मत बेचो वैश्या के तन-सा-॥
मत दुहराओ इतिहास, दुशासन वाला फिर -
मत खोलो सबके बीच, नारी-तन कञ्चन-सा॥
विज्ञापन का साधन न बनाओ तुम इसको-
आँचल के नीचे ही रहने दो छिपी-लाज ॥ संतु0
क्यों भाता है बस, रंग गुलाबी ही तुमको-
है रंग और भी जीवन की गहराई में ॥
कल्पना करो चित्रित पट पर पतझर की भी-
मत रह जाओ बैठे-मादक अमराई में॥
है कला, सत्य, शिव, सुन्दर की शुचितम व्याख्या-
इसको न अशिव का पहनाओ अपवित्र ताज ॥ संतु0
फिर से न कामिनी मात्र बना दो कविता को-
मत भ्रमर बनाओ प्रज्ञाशाली पौरुष को॥
मत गन्दे गीतों का इनको अभ्यस्त करो-
रामायण गाने दो फिर युग के लव-कुश को॥
भूषण बन दृढ़ता और वीरता सिखलादो-
कर सके अनागत इनके ऊपर बहुत नाज॥ संतु0
मत घोलो गीतों में बस, खुशबू फूलों की-
है गीत चुभन की, और दर्द की भी भाषा॥
जन्मी थी पहली पंक्ति, आदि कवि के स्वर में-
है वही जिन्दगी की चिर-शाश्वत परिभाषा॥
क्वारी कन्या का ही घूँघट मत उठने दो-
संस्कृति के महानाश की तुम मत बनो गाज॥ संतु0
अपनी क्षमता को पहचानो ओ कलाविदों-
तुम युग की आत्मा के गायक, साहित्यकार॥
तुमको पुकारती गिरती हुई सभ्यता फिर-
मत करो अनसुनी घायल युग की चीत्कार ॥
तुम युग के-जन मानस के-सबल सृजेता हो-
तुम से ही उठता है या गिरता है समाज ॥ संतु0
(माया वर्मा)
*समाप्त*