अंतःकरण में ईश्वर का दर्शन

ईश्वर का सबसे निकटवर्ती स्थान हमारा अंतःकरण है, यदि हम उसे वहाँ देखें और ढूंढ़ें तो बाहर भटकने की अपेक्षा उसे अधिक सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं।

न केवल दर्शन; वरन उसके साथ वार्तालाप, परामर्श भी हो सकता है। इसके लिए अंतःकरण से बढ़कर ईश्वर के साथ इकांत मिलन का और कोई स्थान नहीं है। यदि चाहें तो उसकी छाती-से-छाती लगाकर राम- भरत की तरह यहीं मिल सकते हैं और उत्कृष्ट की आत्मारूपी राधा का परमात्मारूपी कृष्ण से संगम-समर्पण भी यहीं हो सकता है।

विवेक की आँख खोलकर देखें तो उत्कृष्टता की प्रतिमा के रूप में यहीं हँसता, मुस्कुराता मिलेगा। मानवीय आदर्शों की महिमामयी महत्ता से संपत्र, उज्ज्वल और प्रकाशवान अपना आत्मा ही परमेश्वर है। मलीनताओं का आवरण उठाकर यदि उसके सत, चित और आनंदस्वरूप का— सत्यं, शिव, सुंदरम के भवन-प्रकाश का दर्शन करें तो प्रतीत होगा कि दूर समझा जाने वाला भगवान वस्तुतः अपने अति निकट है। कषाय और कल्मषों से ढ़का रहने के कारण ही वह दीखता न था।

विश्वात्मा के रूप में उसकी आत्मा अपने भी भीतर ज्योतिर्मय हो रही है। समस्त प्राणियों में ओत-प्रोत वह दिव्य सत्ता अपने भीतर भी विराजमान है। सबको अपने में और अपने को सब में देखने का दृष्टिकोण जैसे ही विकसित हुआ कि बदली हटते ही प्रकट होने वाले सूर्य की तरह भगवान सामने आया। व्यक्तिवादी संकीर्णता की बदली ही उस दिव्य दर्शन से हमें वंचित किए रहती है।


समुद्री लहरों की तरह हमारा जीवन उछले, गरजे और आगे बढ़े

देखा जाता है कि समुद्रतल पर लहरें उठती और गिरती रहती हैं। इसका कारण जानना हो तो उसकी उस ग्रहणशक्ति पर ध्यान देना होगा, जो वे पवन से ऊर्जा प्राप्त करने में संवेदनशील होती हैं। जल कोमल होता है— "द्रव और सरल।" उड़ती हुई पवन अपने प्रचंड वेग की ऊर्जा का अंश इस श्रद्धालु जल को दे जाती है, और तरंगें उठने लगती हैं

यदि किसी एक खूँटी से रस्सी का एक सिरा बाँध दें और दूसरा सिरा अपने हाथ में रखें। रस्सी को हिलाएँ तो देखेंगे कि रस्सी में लहरें उठती हैं । वे हाथ से आरंभ होकर खूँटी में बँधे सिरे पर जाकर समाप्त होती है। यह हाथ के द्वारा रस्सी को दी गई ऊर्जा का चमत्कार है। पवन की ऊर्जा जल को इसी प्रकार हिलाती हैं। हिलने की हलचल ऊँचे उठने और नीचे गिरने के रूप में दिखाई पड़ती हैं। गतिशीलता की दो ही दिशा है— उत्थान और पतन। पवन का काम यहीं समाप्त हो गया अब तरंगों का काम आरंभ हुआ वे एकदूसरे को अपना सहयोग प्रदान करती हैं । अपनी गति पड़ौस वाली तरंग को प्रदान करती हैं। इसी प्रकार एक का अनुदान दूसरे को मिलते रहने पर सहज ही एक अग्रगामी नई हलचल पैदा होती जाती है और तरंगें जहाँ उत्पन्न हुई थीं वहीं न रहकर धीरे-धीरे बहुत आगे-तक— वहाँ तक बढ़ती जाती हैं जहाँ समुद्र का छोर आने से उनका आगे का रास्ता बंद नहीं हो जाता।

समुद्री लहरें कई बार बड़ी प्रचंड और उग्र देखी गई हैं। कई बार तो वे जहाजों को उलट देती हैं और कई बार तटों से टकराकर वहाँ भारी तोड़-फोड़ कर डालती हैं। आमतौर से समुद्री तूफानों में 15 मीटर ऊँची लहरें उठती हैं; पर कई बार वे उससे भी कहीं ऊँची देखी गई हैं। जल वैज्ञानिकों ने 36 मीटर तक ऊँची लहरे नापी हैं और उनके श्रृंग आज तो इससे भी कई मीटर ऊँचे उठते पाए गए हैं। कभी-कभी असाधारण तूफानों में तो और भी ऊँची उठ जाती हैं।

तरंगों की ऊँचाई में जितना महत्त्व पवनप्रदत्त ऊर्जा का है, उससे अधिक लहरों के पारस्परिक सहयोग का है। छोटी-छोटी तरंगें जब आपस में मिलती हैं, तो उस मिलने के फलस्वरूप अधिक बड़ी और अधिक सशक्त लहर का उदय होता है। पर यदि वे विपरीत दिशा से आ रही हों तो एकदूसरे से लड़ पड़ेंगी और फिर वह गृहयुद्ध दोनों का ही अंत कर देगा। यदि दो प्रतिपक्षी तरंगों का आयाम समान हो तो फिर दोनों का मरण निश्चित है; पर यदि उनमें एक छोटी एक बड़ी हो तो नष्ट छोटी ही होगी, बड़ी की भी शक्ति तो घट जाएगी, पर उसका अस्तित्व बना रहेगा और वह अपनी दिशा में किसी प्रकार चलती रहेगी।

यदि छोटी लहरें आपस में घुल-मिल जाने की नीति अपना लेती हैं तो उनकी संख्या अवश्य घट जाती हैं पर नई तरंगें उत्पन्न होती हैं । उनकी ऊँचाई, गति और आकृति तीनों में ही असाधारण उन्नति होती है। ये लहरें फिर लंबी यात्रा करती हैं और इतनी तेज चलती हैं कि तूफान को भी पीछे छोड़ देती हैं। कुछ दिन पूर्व ब्रिटेन के तट पर ऐसी लहरें पाई गई थीं जो 800 किलोमीटर दूर अमेरिका में एक समुद्री तूफान के कारण उत्पन्न हुई थीं और तूफान को पीछे छोड़कर उससे काफी समय आगे आ गई थीं।

शक्तिशाली लहरों के थपेड़े गजब के होते हैं। उन थपेड़ों में 50 टन प्रति वर्ग गज की शक्ति से अपने अवरोधों के साथ टकराने की शक्ति होती है। एक बार अमेरिका के समुद्रतट पर इन थपेड़ों ने एक भारी चट्टान को ऐसा उछाला कि वह 30 मीटर ऊँचे प्रकाश स्तंभ से जा टकराई और उसमें छह मीटर व्यास का छेद कर दिया।

लहरों का पूरी तरह पारस्परिक सम्मिश्रण प्रायः तभी होता है, जब वे ऊँचाई और आकृति में समान होती हैं। छोटी-बड़ी तरंगें कुछ हद तक संयोग तो करती हैं, पर स्तर की बाधा उन्हें पूरी तरह आत्मसात नहीं होने देती।

समुद्रों में निरतंर उठने वाली तरंगों में प्रकृति के विधान का कुछ परिचय हमें मिलता है, वह इतना महत्त्वपूर्ण है यदि उसे समझा और अपनाया जा सके तो उससे अपने जीवनक्रम में भी समुद्री लहरों जैसी ऊँची और शक्तिशाली क्षमताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

पवन की ऊर्जा अनवरत रूप से सर्वत्र विद्यमान रहती हैं और अपना प्रभाव छोड़ती हैं, पर चट्टानों पर इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। वे सघन जड़ता के कारण किसी का प्रभाव ग्रहण नहीं करते, अपनी स्थिति में संतुष्ट बने रहते हैं और हलचल उत्पन्न करने के लिए उत्सुक नहीं होते। धूलि भरी मिट्टी में थोड़ी हलचल होती है। वृक्ष, वन,पत्तियों के पत्ते भर हिलते हैं, किंतु समुद्री जल उनका अधिक प्रभाव ग्रहण कर लेता है और गरजती, उछलती हलचलों से अपनी शोभा बढ़ाता है। मनुष्यों में भी ऐसी ही मनोभूमि के लोग होते हैं। कुछ बिलकुल जड़, मूढ़ और अपरिवर्तनशील, कुछ स्वल्प और क्षणिक चेतना वाले, ऐसे लोगों को पवन जैसी ईश्वरीय प्रेरणा या महापुरुषों के अनुग्रह का कुछ अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता। उनकी आंतरिक जड़ता कुछ ग्रहण ही न करे तो बेचारा अनुदान क्या करेगा। घड़े का मुँह ओंध करके रखा गया हो तो भारी वर्षा होने पर भी उसके पेट में एक बूँद पानी नहीं जाएगा । पवन का समुद्र पर कुछ पक्षपात नहीं है और न पर्वत से द्वेष। उनकी अपनी कोमलता, सरसता, द्रवित होने के गुणों में न्यूनाधिकता ही वह कारण है; जिससे समुद्र को लहरों की संपदा मिली प्रतीत होती है और पर्वत को पवन ने कुछ नहीं दिया, ऐसा समझा जाता है। वस्तुतः यहाँ पक्षपात नहीं ग्रहण करने का पात्रत्व ही प्रधान कारण है।

जहाँ हलचल होगी वहाँ दो ही क्रम चलेंगे—  उत्थान या पतन। शक्ति घटती जाएगी , पतन की संभावनाएँ बढ़ेंगी। दृढ़ता और स्फूर्ति बनी रहेगी, बल अक्षुण्य रहेगा और प्रगति का वातावरण बना रहेगा। ढील पड़ी, उदासी आई, अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हुई कि उत्थान की संभावनाएँ भी गिरी। समुद्र की लहरों में जितनी ऊर्जा भरी उमंग रहती है उतनी ही वे ऊँची उठती हुई— उफनती और गरजती दिखाई देती है; पर जब उनकी अंतःप्रेरणा, स्फूर्ति घटी तो फिर बाहर क्रियाकलाप भी शिथिल हो जाता है। ऊर्जा खो देने के बाद लहरें मरी-गिरी सी किसी प्रकार दिखाई भर देती रहती हैं उनमें कुछ जान नहीं रहती। मनुष्य के आत्मबल, उत्साह और पुरुषार्थ की ऊर्जा ही उसे ऊँचा उठाए रहने में समर्थ रखती है। जहाँ दृढ़ता गिरी वहाँ फिर पतन की परिस्थितियाँ ही उत्पन्न होती चली जाती हैं। सारा वैभव और चमत्कार न जाने कहाँ तिरोहित हो जाता है।

परस्पर का सहयोग अनेक गुनी शक्ति उत्पन्न करता है। सूत के धागों से बटकर बनाए हुए रस्से, कमजोर सींकों से बनी बुहारी रोज यही स्मरण दिलाते हैं कि एकाकी व्यक्ति नगण्य है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, ढाई चावल से खिचड़ी नहीं पकती। महत्त्वपूर्ण कार्यों की भूमि ईंट और चूने के मिलन, सहयोग की तरह ही आरंभ होती है। जहाँ व्यक्तिगत अहंता, महत्त्वाकांक्षा मिटाकर सहयोग और समर्पण की महत्ता को समझ लिया जाएगा वहाँ हजार गुना अधिक प्रयोजन सधने की संभावना बनेगी। जहाँ अपनी ढपली अपना राग बजाते हुए, लोग अपने-अपने पद, यश और वर्चस्व के लिए लुभाते, ललचाते फिरेंगे वहाँ ऐसी ही विडंबना में शक्ति नष्ट होती रहेगी, काम कुछ भी न हो सकेगा। पति-पत्नी के सहयोग से गृहस्थ की सुरम्य व्यवस्था बनती है और गृह-उद्यान फला-फूला दिखाई पड़ता है। पर यह होता तभी है जब पति-पत्नी सच्चे मन से एक होते हैं। यदि दोनों अपना अहंकार और स्वार्थ अलग-अलग संजोए रहें तो फिर उस गृहस्थ में हर घड़ी नारकीय दृश्य ही उपस्थित रहेंगे। जीवन विकास में—  महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की सिद्धि में यह पारिवारिक सहयोग की अनिवार्य आवश्यकता यदि समुद्र की लहरों की तरह हम भी हृदयंगम कर लें और अपने व्यक्तिगत अहंता को सामूहिक प्रयोजनों में घुला देने का प्रयत्न करें तो निस्संदेह अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध होगा। लहरें आकाश चूमेंगी और थपेड़ों से चट्टानों को उछाल देने जैसी क्षमता उपलब्ध होगी ।

पूर्ण मिलन समान, गुण, कर्म स्वभाव के लोगों में होता है। इसलिए उच्चस्तर के लोगों को न केवल अपने स्तर के व्यक्तित्व तलाश करने चाहिए; वरन् उनमें घनिष्ठता बढ़ाने का भी प्रयत्न करना चाहिए। यों सहयोग तो सर्वत्र ही सराहनीय है। यदि सदुद्देश्य के लिए सहयोग इकट्ठा किया गया है तो स्तर की भिन्नता रहते हुए भी उसका लाभ मिलेगा; किंतु चमत्कार समान मानसिक स्तर के लोगों के मिलने पर ही उत्पन्न होता है। समान ऊँचाई की लहरें जब परस्पर घुलती हैं, तो उनका वेग और स्तर दोनों ही असाधारण रूप से बढ़ते हैं। इस दिशा में भी हमें प्रयत्नशील रहना चाहिए।

उत्थान के प्रति सुदृढ़ संकल्प और कठिन पुरुषार्थ में जब भी कमी आवेगी, पतन की परिस्थितियाँ पैदा होंगी। जीवन के अभाव का नाम ही मृत्यु है। प्रकाश बुझ जाने को ही अंधकार कहते हैं। प्रगति की दिशा में निष्क्रिय होना— उत्कृष्टता को उच्चस्तरीय बनाने की चेष्टा में आलस या शिथिलता बरतना, इसी का नाम पतन है। पतन कोई अलग वस्तु नहीं है। उत्कृष्टता की उपेक्षा ही पतन बनकर सामने आती है। हमें लहरों की तरह ऊँचा उठे रहने में ही अनवरत रूप से प्रयत्नशील रहना है अन्यथा निःचेष्ट होते ही पतन के गर्त में गिरना पड़ेगा।

परस्पर टकराना तो प्रत्यक्ष ही अपने अस्तित्वों को समाप्त कर लेना हैं। शक्तिशाली लहरें यदि प्रतिकूल दिशा में चलती हैं और एकदूसरे के ऊपर चढ़ने का प्रयत्न करती हैं तो भले ही वे इसे महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आवश्यक समझें, पर होता उलटा ही है। परस्पर लड़ने में खर्च की गई शक्ति केवल खोखलापन ही शेष छोड़ती हैं। सारतत्त्व तो उस द्वंद्व में ही जलकर नष्ट हो जाता है।

तूफान बड़ा है, पर उससे यदि सागर की सत्पात्र लहरें समुचित शक्ति ग्रहण कर लें तो उनकी गति और भी अधिक बढ़ जाती है। तूफान पीछे रह जाता है और लहरें आगे जा पहुँचती हैं। ग्रहणशीलता और पात्रत्त्व का अभाव न हो तो हम ईश्वर से, देव शक्तियों से और महामानवों से इतना अधिक प्राप्त कर सकते हैं कि लहरें आगे निकल जाएँ और तूफान पीछे ही रह जाए ।


अत्यधिक तेज गति से खाली झोली ही मिलती है (कहानी)

चंद्रमा की दो संतानें थीं— "एक पुत्र और दूसरी पुत्री।" पुत्र का नाम पवन और पुत्री का नाम आँधी। पुत्री को एक दिन ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे पिताजी सांसारिक पिताओं की तरह पुत्र और पुत्री में भेद करते हैं। चंद्रमा आँधी की व्यथा को ताड़ गए। उन्होंने पुत्री को आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देने का निश्चय किया।

चंद्रमा ने आँधी और पवन दोनों को अपने पास बुलाकर कह— ‘बच्चों' ! क्या तुमने स्वर्गलोक में इंद्र के कानन में परिजात नामक देववृक्ष को देखा है ?

‘हाँ ! दोनों ने एक स्वर से उत्तर दिया।’

‘तो तुम पारिजात की सात परिक्रमा करके आओ।’

पिता की आज्ञा शिरोधार्यकर दोनों चल दिए, पारिजात देववृक्ष की ओर आँधी सिर पर पैर रखकर दौड़ी। वह धूल, पत्ते और तमाम कूड़ा-करकट उड़ाती हुई बात की बात में परिक्रमा करके आ खड़ी हुई। आँधी समझ रही थी, पिता का काम कर मैं जल्दी लौटी हूँ तो जरूर पिताजी मेरी पीठ ठोकेंगे।

थोड़ी देर बाद पवन लौटा, पर उसके आगमन पर सोंधी सुगंध से सारा भवन महक उठा। चंद्रमा ने कह— 'बेटी' ! अब तुम अच्छी तरह समझ गई होगी कि जो अत्यधिक तेज गति से दौड़ता है वह खाली झोली लेकर आता है और जिसकी गति स्वाभाविक होती है वह मन को मुग्ध करने वाली सुगंध लाता है , जिससे संपूर्ण वातावरण सुगंधित हो जाता हैं।


मृदुलता और कठोरता से ओत-प्रोत मानवी काया

शरीर-यंत्र देखने में मुलायम, लचीला, कमजोर, तुच्छ-सा प्रतीत होता है, पर वस्तुतः वह अद्भुत है। उसका प्रत्येक क्रियाकलाप ऐसा है; जिस पर यदि बारीकी से विचार किया जाए तो आश्चर्यचकित ही रह जाना पड़ता है। छोटे-छोटे अवयव किंतु काम उनके कितने विलक्षण— नन्हें-नन्हें से तंतुकोष देखने में कितने नगण्य ,पर उनकी क्रियापद्धति कितनी विलक्ष ब्रह्मांड की विलक्षणता, उसमें सन्निहित शक्तिपुंज का कर्तृत्त्व जितना अद्भुत है, उसमें कम इस मानवी पिंड की विलक्षणता भी नहीं है। इन्हीं सब विशेषताओं से भरी-पूरी काया में रहने वाला आत्मा कितना विलक्षण हो सकता है, तब प्रतीत होता है कि जादू के महल में रहने वाला यह बाजीगर स्वयं कितना अधिक गौरव-गरिमामय हो सकता है।

बाहर से दिखने वाली कोमलता, कमनीयता के मूल में वे सुस्थिर तथ्य काम करते हैं जिनकी तुलना धातुओं एवं खनिज पदार्थों से की जा सकती है। जीवन सरल और मृदुल मालूम भर पड़ता है पर वस्तुतः उसके मूल में कठोरता, सुदृढ़ता के वे आधार ही होते हैं जिन्हें चाहे तो अध्यात्म की भाषा में तप या संयम भी कह सकते हैं। विभूतियों की मृदुलता के पीछे यही धातुओं जैसी सहज सुदृढ़ स्थिरता ही काम करती रहती है।

जिसके अंतरंग में सुदृढ़ आस्था और सुव्यवस्थित गतिविधियाँ विद्यमान हैं। समझना चाहिए कि उसके पास सुरक्षा के, प्रगति के, सुस्थिरता के समस्त आधार विद्यमान हैं। शरीर में अस्थियाँ यों दिखाई नहीं पड़ती, ढंकीं रहती हैं। पर सही बात यह है कि काया का ढाँचा उन्हीं स्तंभों पर खड़ा हुआ है। सुदृढ़ नैतिक सिद्धांतो और उच्चस्तरीय आदर्शों को एक प्रकार से विकासोन्मुख जीवन की अस्थियों जैसी पृष्ठभूमि ही कहना चाहिए।

शरीर के अस्थि-पिंजर को सात भागों में विभक्त कर सकते हैं— (1) खोपड़ी (2) कंधे  के जोड़ की हड्डियाँ (3) पसलियों का पिंजरा (4) कूल्हे की हड्डियाँ (5) जाँघ की हड्डियाँ (6) घुटने के जोड़ की अस्थियाँ (7) एड़ी की हड्डियाँ ।

जन्म के समय 270 हड्डियाँ होती हैं। आयु बढ़ने पर उनमें से कुछ हड्डियाँ आपस में जुड़ने लगती हैं और उनकी संख्या घट जाती है और कुल 206 रह जाती हैं। रीढ़ की हड्डी छोटे-छोटे सिंघाड़े जैसे टुकड़ों से मिलकर बनी है।

हड्डियाँ आपस में 180 जोड़ों द्वारा जुड़ी हैं। इन्हीं के कारणशरीर का इधर-उधर, मुड़ना-तुड़ना संभव होता है। अस्थि-पिंजर की पाँच धुरी हैं; जिनके आधार पर यह रथ यथाक्रम चलता-लुढ़कता है। यह पाँच धुरी इस प्रकार जानी जा सकती हैं— (1) गर्दन का हिस्सा (2) पीठ के हिस्से की कशेरुकाएँ (3) कमर की हड्डियाँ (4) त्रिकम अस्थि (5) अनुत्रिक ।

हड्डियों में दो-तिहाई भाग कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीज जैसे खनिज होते हैं। एक तिहाई भाग प्रोटीन तंतुओं का होता है। समय-समय पर रक्त को अतिरिक्त कैल्शियम की जरूरत पड़ती रहती है तब वह हड्डियों से उधार ले लेता है और अपना काम निकल जाने पर वापिस कर देता है।

बचपन में हड्डियाँ मुलायम होती हैं, पर आयु बढ़ने के साथ-साथ उनमें फास्फेट ,कैल्शियम आदि खनिजों की मात्रा बढ़ने लगती है जिससे वह अधिक कड़ी होती चली जाती है, वृद्धावस्था में उनका लचीलापन बहुत घट जाता है, इसलिए जरा-सी चोट लगने पर उनके टूटने का डर रहता है। वृद्धावस्था में टूटी हुई हड्डी जुड़ने में बहुत समय लेती है। बालकपन में उनमें प्रोटीन की मात्रा रहने से वे सहज टूटती नहीं, मुड़ भर जाती हैं और यदि टूट भी जाएँ तो जल्दी ही जुड़ जाती हैं।

अस्थियों में छोटे-छोटे छेद होते हैं और भीतर से पोली होती हैं। छोटे छिद्रों में होकर रक्तवाहनियाँ भीतर प्रवेश करती हैं और अस्थियों को आहार पहुंचाती हैं। सुरंग की तरह पोले स्थान में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं । एक वे जो टूटने पर हड्डियों को जोड़ देती हैं। दूसरी वे जो हड्डियों की क्षमता बढ़ाती हैं और उनके कूड़े को साफ करती है। तीसरी वे रक्त द्वारा प्राप्त आहार से अस्थियों की पोषण-व्यवस्था जुटाती हैं। कैल्शियम तथा विटामिन डी की कमी पड़ जाए तो वे टेढ़ी कमजोर तथा अन्य कई प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाती हैं।

नर की अपेक्षा नारी की हड्डियाँ हलकी, कोमल तथा छोटी होती हैं। नारी की रीढ़ लगभग 4 इंच छोटी पाई जाती है। अब तक मिले अस्थि-पिंजरों के आधार पर संसार के भूतकालीन लंबे मनुष्यों में सबसे बड़ा ढाँचा लंदन म्यूजियम में रखा है। उससे अधिक से अधिक लंबाई 7 फुट 4 इंच सिद्ध होती है।

अस्थि संस्थान संबंदी इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि बाह्य सौंदर्य के पीछे भीतरी कठोरता का यह ढाँचा कुरूप दिखता भर है वस्तुतः उनके मुड़ने, तुलने, घूमने की अपनी जो विशेषताएँ हैं ,वे ऐसी हैं जिनका दृश्यमान न सही उपयोगितात्मक महत्व एवं सौंदर्य असाधारण है। कठोर दिखने वाली हड्डियों के भीतर मज्जा का बहुत ही कोमल पदार्थ भरा हुआ है। कर्कश, रूखी और निष्ठुर कठोरता तो हिंस्र पशुओं और दुष्ट दानवों में होती है। सहृदय, सज्जन अपने आदर्शों के प्रति तो निष्ठावान होते हैं,पर जहाँ तक दूसरों के प्रति सदव्यवहार का संबंद है वहाँ तक उनमें उदारता, करुणा, स्नेह, क्षोभ, सद्भाव का बाहुल्य ही अनुभव में आता है।

शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों के संबंद में भी यही बात लागू होती है। कोमल अवयवों म—रक्त में यह खनिज द्रव्य ही शक्ति-संचार की धुरी का काम करते हैं। सामान्य कार्यों के पीछे लगन, स्फूर्ति, व्यवस्था, निष्ठा, उत्साह, तत्परता जैसी विशिष्टताओं का वही महत्त्व है, जो शरीर में खनिज पदार्थों का। यदि मनुष्य के पास योग्यता, शिक्षा, सुविधा, साधन आदि का बाहुल्य हो, किंतु इन विशेषताओं की कमी हो तो समझना चाहिए कि सरल कार्य भी कठिन ही सिद्ध होगा, और सुगम प्रतीत होने वाली सफलता भी जटिल होती चली जाएगी। शरीर में खनिज पदार्थों की थोड़ी सी कमी पड़ जाने पर रक्त, मंश का सारा ढांचा सही होने पर भी स्वास्थ्य-संतुलन बिगड़ जाता है इसी प्रकार छोटे दिखने वाले मानवी सद्गुण यदि कम पड़ते है, तो वह कमी प्रगति की समस्त संभावनाओं को ही लड़खड़ा देती है।

शरीर को खनिज पदार्थों की एक खान कह सकते हैं। अन्य रासायनिक पदार्थों की तरह उसमें खनिज भी कम नहीं हैं। जो हैं वे ऐसी भूमिका प्रस्तुत करते हैं मानों जीवन की स्थिरता में उनका ही महत्त्वपूर्ण योगदान हो। धातुओं और खनिज पदार्थों के बिना संसार का काम नहीं चल सकता। लोहा, जस्ता आदि धातुएँ न हों तो सारी प्रगति ही रुक जाए। नमक, गंधक आदि न हो तो कितनी असुविधा खड़ी हो जाए। ठीक उसी प्रकार शरीररूपी संसार में खनिज पदार्थों की उपयोगिता है।

आर्सनिक, क्रोमाइड, कैल्शियम, क्लोरीन, कोबाल्ट, तांबा, फ्लोरीन, लोहा, मैग्नेशियम, फास्फोरस, पोटेशियम, सिलकन, सोडियम, गन्धक, जस्ता, एल्युमिनियम, आयोडीन, खनिजों में से कोई थोड़ी मात्रा में तनिक-सी कमी पड़ जाने से देह का ढांचा ही लड़खड़ाने लगता है।

कुल मिलाकर शरीर में लगभग 6। पोंड खनिज पदार्थ होते हैं। आयोडीन संपूर्ण शरीर में एक राई की बराबर होगी, पर व्यक्तित्व के विकास और मानसिक वृद्धि में उसकी सहायता से ही गाड़ी चलती है। एल्युमिनियम की जो थोड़ी सी ही मात्रा रहती है मस्तिष्क की क्षमता को उतने से ही बड़ी गति मिलती है।

लोहा 1/10 ओंस है पर रक्त के लाल-कण हीमोग्लोबिन उपलब्ध करते हैं। वे ऑक्सीजन ग्रहण करके संपूर्ण शरीर में पहुँचाने और वापिस कार्बनडाईऑक्साइड लेकर फेफड़ों तक पहुँचाने का कार्य लाल रक्त-कण इस लोहे की उपयुक्त मात्रा होने पर ही ठीक तरह कर पाते हैं। प्रायः हर रोज जीवन-संग्राम में 6 लाख रक्ताणु का लोहा खेत रहते हैं, नई पौध इन मृतरक्ताणुओं को विरासत में मिल जाता है। एक वर्ग मिली मीटर जगह में लाल रक्ताणुओं की संख्या 50 लाख रहनी चाहिए। यदि यह संख्या घट जाए तो शारीरिक और मानसिक थकान घेर लेगी और चेहरा पीला पड़ जाएगा ।

इस संकट से बचाने में यह थोड़ा-सा लोहा ही गजब करता है। जन्म के समय छह महीने तक के खर्च के लिए बालक लोहा अपने साथ लेकर आता है। पीछे वह उसकी मात्रा खुराक से पूरी करने लगता है।

रक्तवाहिनी, बड़ी और छोटी शिराएँ संपूर्ण शरीर में 70 हजार मील जितनी लंबीहैं। रक्त को इतनी बड़ी परिक्रमा निरंतर करनी पड़ती है। इतनी दौड़-धूप, सफाई और पोषणकर सकने का कार्य इस लौहांश के आधार पर ही रक्त पूरा करता है। स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा अधिक लोहे की जरूरत पड़ती है; क्योंकि मासिक-धर्म में उनका वह तत्त्व बाहर भी निकलता रहता है।

लोहे को 'हीमोग्लोबिन' के रूप में परिणत करने में मुख्य सहायक ताँबा ही है। जीवनकोष और स्नायुमंडल के ठीक तरह कार्यरत रहने के लिए, यह प्रक्रिया आवश्यक है। तांबे की मात्रा थोड़ी-सी होते हुए भी यह कार्य संपादिक करती है।

हड्डियों का ढाँचा कैल्शियम  और फास्फोरस पर खड़ा है। कैल्शियम की मात्रा लगभग 3 पौंड हैै। यह 99 प्रतिशत हड्डियों में रहता हैैै। एक प्रतिशत रक्त में रहकर हृदय-संचालन की गति ठीक रखता है। शरीर के समस्त कोष इस कैल्शियम के सिमेंट से ही परस्पर जुड़े हुए हैं, मांस पेशियों को और स्नायुओं में यदि उसकी निर्धारित मात्रा घट जाए तो वे जकड़ जाएगी। कमी पड़ने पर हड्डियों में से निकलकर उस आवश्यकता की पूर्ति करता है, किंतु ऐसी दशा में हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं और जरा-सी चोट लगने पर उनके टूटने का खतरा उत्पंन हो जाता है।

फास्फोरस लगभग दो पौंड होता है। हड्डियों में तो वह मिश्रित है ही। फास्फेट कंपाउंड के रूप में वह अन्यत्र भी विद्यमान रहता है। हर कोष में प्रोटोप्लाज्म (जीवन रस) और न्यूक्लियस (नाभिक) रहता है उनमें फास्फोरस रहता है। प्रोटीन और चर्बी में भी उसका मिश्रण है।

आयोडीन का महत्त्वपूर्ण कार्य थाइराइड ग्रंथियों को पोषण प्रदान करना है, सोडियम और क्लोरीन के रूप में पाया जाता है। गंधक की मात्रा पर बाल और नाखून सही सलामत रहते हैं। कोबाल्ट रक्त बनाने की प्रणाली में आवश्यक रहता है। चमड़ी की कोमलता सिलक्रिन पर निर्भर है। दांतों के सफेद और चमकदार होने में क्लोरीन की उपस्थिति रहती है।

यह खनिज हमें भोजनों में मिलते हैं। भोजन में सब खनिज न भी हों तो भी हमारे पाचक रस उन्हें परिवर्तित करके इस योग्य बना लेते हैं कि अभीष्ट मात्रा में उपरोक्त खनिजों की आवश्यकता पूरी होती रहे।

यह आवश्यक नहीं कि दूसरे लोग हमें सन्मार्ग की प्रगति की शिक्षा दें तो ही काम चले। यह आवश्यक नहीं कि साधनों के सहारे ही ऊँचा उठा जाए। अपनी भीतरी विशेषताएँ अपने आप में इतनी महान और स्वसंचालित हैं कि यदि उनका उपयोग किया जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में सामान्य वातावरण से भी अभीष्ट प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है। खनिज पदार्थ बाहर से आहार द्वारा ही मिलें, यह आवश्यक नहीं। शरीर की क्रियापद्धति उन पदार्थों में से भी ऐसे खनिज उत्पन्न कर लेती है; जिनमें कि वे वस्तुतः होते ही नहीं। मनुष्य भी यदि चाहे तो व्यक्तियों तथा परिस्थितियों में जिन विशेषताओं की कमी है, उनमें भी अपने प्रखर प्रभाव के कारण उत्पन्न कर सकता है।


स्वामी विवेकानंद (कहानी)

स्वामी विवेकानंद से एक बार एक जापानी ने पूछा— "भारत में गीता, रामायण-वेद उपनिषद् का इतना ऊँचा दर्शन है फिर भी वहाँ के लोग पराधीन और निर्धन क्यों हैं?"

इस पर स्वामीजी ने उत्तर दिया— "बंदूक बहुत अच्छी होते हुए भी यदि कोई उसे चलाना न जाने तो उस सैनिक का श्रेय नहीं मिल सकता। इसी प्रकार भारत का दर्शन तो ऊँचा है पर भारतीय उसे व्यवहार में लाना नहीं जानते।"


शांति बाहर नहीं— भीतर खोजनी पड़ेगी

शांति को खोजना हो तो उसे अपने भीतर ही खोजना चाहिए। बाहर तलाश करने में कितना ही श्रम किया जाए, कितना ही भटका जाए, वह मिलने वाली नहीं है। कस्तूरी वाला मृग उस दिव्य सुगंध को प्राप्त करने के लिए हर दिशा में भागता है, पर हर छलांग के बाद वह और आगे ही बढ़ जाती है। जब तक वह न जाने कि इस गंध का स्त्रोत मेरी नाभि है तब तक उसे चैन नहीं पड़ता।

जनसंकुल कोलाहलपूर्ण स्थानों में लोग अशांति अनुभव करते हैं और उसे छोड़कर ऐसे एकांत स्थान में जाना चाहते हैं, जहाँ शांति मिल सके। एकांत में जाकर रहने पर भी वह लक्ष्य पूरा नहीं होता क्योंकि वहाँ दूसरी तरह का कोलाहल शुरू हो जाता है। नदी, पर्वत, वन भी अपवाद नहीं हैं; वहाँ भी अशांति के लक्षण यथावत विद्यमान मिलते हैं। अंतर केवल तौर-तरीकों का पड़ता है।

ध्वनि-कोलाहल शहर-नगरों में यातायात वाहनों का, कल-कारखानों का, मनुष्यों की भीड़ का रहता है। वन प्रदेश में नदियों की कर्कश ध्वनि विचित्र ही प्रकार की होती है। चट्टानों से टकराती हुई जल-धाराएँ बेतरह दहाड़ती हैं और कानों के पर्दे विक्षुब्ध करती हैं। रात्रि को झींगुर-झिल्ली हिंस्र पशु अलग से चित्र-विचित्र बोलियाँ बोलते हैं। नगर में दुष्ट दुरात्मा चैन नहीं लेने देते हैं। वन में सर्प, बिच्छू, कांतर, कानखजूरा, गोह, सेही से लेकर रीछ, व्याघ्र, चीते, तेंदुए प्राण लेने के लिए घूमते रहते हैं। वहाँ प्रकाश का चकाचौंध बुरा लगता है यहाँ घोर अंधकार में डर लगता है। वहाँ एक प्रकार के अभाव थे यहाँ दूसरी तरह के। गुजारे के लिए वहाँ नौकरी-दुकानदारी करनी पड़ती है। यहाँ ईंधन, शाकपात खाने को, बाँस, फूस, झोपड़ी को तलाश करने पड़ते है। जलपात्र लिए एक झरने से दूसरे झरने तक फिरना पड़ता है। सारा दिन यहाँ भी पेट और शरीर के धंधे में ही बीत जाता है।

पाप और बुराइयाँ इस वन प्रदेश में भी कम कहाँ हैं। दुष्ट बगुले दिन भर मछलियाँ खाते हैं। अजगर मेंढकों को जिंदा नहीं रहने देते, चिड़ियाँ कीट-पतंगों की जान लेती रहती हैं। बाघ-चीतों से बचने के लिए हिरन-खरगोश शरण ताकते फिरते हैं, हिंसा और पाप से यह प्रदेश भी अछूता नहीं। यदि यहाँ शांति होती तो वनवासी बार-बार नमक, शक्कर, तेल, दिया, सलाई, कपड़े, जूते खरीदने हाट बाजार को क्यों भागते। शहर की दृष्टि से वन में शांति है। वनवासी को शहर सुंदर लगते हैं। जो जिसके लिए प्राप्य है वही उसके लिए सुंदर कैसे है। यह विचित्र विडंबना है, गृहस्थ को साधु सुखी दीखता है और साधु को गृहस्थ लोग आनंद से रहते दीखते हैं। कार्य संलन्न सोचता है विश्राम में आनंद है। बैठा ठाला उस स्थिति से ऊब जाता है और काम न करके अपनी शक्तियों के कुँठित होने का खतरा देखता है। निःसन्तानों को पुत्र-पौत्रों वाले भाग्यवान लगते हैं और संतान वाले सोचते हैं, इस नरक से बचे हुए संतानहीन ही सुखी है।

वस्तुतः स्थान और परिस्थितियों के बदलने से शांति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता जो वस्तु जहाँ है ही नहीं वह वहाँ मिलेगी कैसे? शांति न एकांत में है न जनसंकुल में और वह दोनों ही जगह मौजूद है। भीतर छिपी हुई शांति को खोज निकाला जाए, तो उसके प्रकाश में हर जगह शांति दिखाई देगी और अंतर में अशांति जल रही हो तो जहाँ भी जाया जाए वहाँ विग्रह, उपद्रव, दिखाई देगा।

निवास या देश-परिवर्तन इसलिए नहीं करना चाहिए कि ऐसा करने से शांति मिल सकेगी। साधु और गृहस्थ नगरनिवासी और वनवासी समान रूप से खिन्न-उद्विग्न रहते हैं। जब तक अंतर अशांत है तब तक बेचैनी के अतिरिक्त और कुछ कहीं भी नहीं मिलेगा, पर जब अंतःकरण में सदाशयता भर जाने से अंतरात्मा का समाधान हो जाता है, जहाँ भी रहें अखंड शांति का अनुभव होगा।


पृथ्वी का ओर-छोर बनाम जीवन का आदि अंत

जीवन का ओर-छोर कहा है ? यों मोटे तौर पर यह उत्तर दिया जा सकता है कि जन्मदिन उसका आरंभ होता है और मरणदिन पर इतिश्री हो जाती है। पर यह स्थूलउत्तर है। सूक्ष्मउत्तर के रूप में कहा जाना चाहिए कि जिस दिन ईश्वरीय महातेज में जीवरूप स्फुल्लिंग प्रकट हुआ, वह उसका जन्मदिन है। योनियों के चक्र में भ्रमण करते हुए उसका यात्राक्रम चल रहा है। वर्तमान मनुष्य जीवन उस जन्मांतरण के महाग्रंथ का एक पृष्ठमात्र है। उसका अंत तब होगा जब महाप्रलय में ब्रह्म अपने सारे प्रस्तार को अपने आप में समेटकर केंद्रीभूत कर लेगा।

पृथ्वी का आदि-अंत कहाँ है? इस प्रश्न का उत्तर साधारणतया उसका व्यास 8000 मील बताकर अध्यापक लोग दे देते हैं, पर यह तो केवल धरती की ठोस सीमा हुई। धरती का जीवन उसका वायुमंडल है। वायु न हो तो जीवन-संचार ही संभव न हो। शब्दों का बोलना, सुनना ही शक्य न रहे। बादल वर्षा आदि की कोई व्यवस्था न बने। यह वायु भी धरती का वैसा ही अंग है जैसा कि ठोस पदार्थ। यह वायु का घेरा उसका अपना है। जिस तरह किसी देश की सीमा उसके समीपवर्ती समुद्र में भी उतनी घुसी रहती है; जितनी में कि उसका यातायात एवं सुरक्षा निर्भर है। ठीक इसी प्रकार धरती की सीमा भी वहाँ तक जाएगी, जहाँ तक कि उसका अपना वायुमण्डल संव्याप्त है। यह अत्यंत मोटी परिभाषा है जितनी गहरी शोध धरती के अस्तित्व के बारे में है उतने ही नए तथ्यों का अनावरण होता चला गया है। पिछली मान्यताएँ झुठलाई जाती रही हैं और नई स्थापना होती रही है। इस उलट-पुलट का अंत कब और कहाँ होगा यह बताया जा सकना आज की स्थिति में संभव नहीं।

अब से पचास वर्ष पूर्व धरती का वायुमंडल 7-8 मील की ऊंचाई तक माना जाता था। पीछे कहा जाने लगा कि वह 100-150 मील है। वैज्ञानिक अनुसंधान आगे बढ़े और यह परिधि 250-300 मील बताई जाने लगी, इसे आयनोस्फियर कहते हैं। इससे भी ऊँची लहराती, झूमती, घूमती, रंगीन ज्योतियाँ देखी गई जिन्हें वैज्ञानिकों की भाषा में आऊरोकल लाइट्स— "मेरु ज्योतियाँ कहा जाता है।" इनका अस्तित्व वायुमंडल के बिना संभव नहीं। अस्तु, वायुमंडल की सीमा 700 मील ऊँचाई तक मानी गई। इस प्रकार पृथ्वी की परिधि पहले की अपेक्षा अब और आगे खिसक गई।

रूस का प्रथम उपग्रह पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर काटने के लिए जब भेजा गया था, तो अनुमान था कि 500-600 मील ऊँचाई पर हवा नाममात्र की होगी। उपग्रह को उससे कोई बाधा न पड़ेगी और वह 6 महीने अपना काम जारी रख सकेगा। पर वह अनुमान गलत निकला। इतनी ऊँचाई पर भी दबाव का काफी दबाव था। उसकी रगड़ से यान की गति धीमी होती गई और उसे दो महीने में ही वापिस लौटना पड़ा।

पृथ्वी के चारों ओर तीस मील तक फैला हुआ सघन वायुमंडल, सूर्य के अल्ट्रावायलेट किरणों का विवरण, व्यूहाणुओं से संबद्ध गैस क्षेत्र, दृश्यमान, प्रकाश, अदृश्य ब्रह्मांड किरणें, रेडियो तरंगें, चुंबकीय परतें, लोकांतरों से आने वाला प्रभाव आदि अनेक तथ्य ऐसे हैं, जो खुली आँखों से दीख नहीं पड़ते फिर भी वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उनका अपनी धरती के साथ अविच्छिन्न संबंध है। मोटे तौर से ऋतु-प्रभाव के साथ धरती के साथ जुड़े हुए अंतरिक्ष-संबंध से ही हम परिचित हैं, पर जो इससे आगे की अनदेखी बाते हैं वे और भी अधिक प्रभावशील हैं। दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि भूगर्भ में जो कुछ है उससे असंख्य गुना पदार्थ और प्रभाव अंतरिक्ष में भरा पड़ा है। उससे अपरिचित रहे तो हमें अज्ञानियों की संज्ञा में ही गिना जाएगा।

अब तक समुद्रतट पर हवा का दबाव देखकर यह हिसाब लगाया जाता था कि ऊँचाई पर वह परत अमुक क्रम से घटती जाएगी और अंत में एक स्थान पर जाकर हवा बिलकुल समाप्त हो जाएगी। पर वह अनुमान गलत निकला। वायुमंडल गर्मी को पाकर फैलता ही जाता है वह इतना हलका हो सकता है कि उसे जाना न जा सके पर रहता वह बहुत आगे तक है।

31 जनवरी 1958 को अमेरिकी कृत्रिम उपग्रह ‘एक्स-फ्लोरा’ - ‘प्रथम’ अंतरिक्ष में उड़ाया गया। बाद में रूसी और अमेरिकन उपग्रह और भी उड़े। उनसे नई सूचना मिली कि पृथ्वी की भूमध्य-रेखा के चारों ओर दो मोटे-मोटे कवच हैं। मानो धरती ने अपनी कमर में दो मेखलाएं पहन रखी हैं। इनमें एक विचित्र प्रकार का वायुमण्डल और इनमें से एक की ऊँचाई दो हजार मील और दूसरी के बीस हजार मील के लगभग है। इस प्रकार धरती की सीमा अब और आगे बढ़ गई।

यह मेखला कवच किसी एक नई वस्तु के बने हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘प्लाज़्मा’ कहा जाता है। अब तक यही पढ़ा सुना जाता रहा है कि पदार्थ तीन रूपों में पाया जाता है (1) ठोस, (2) तरल, (3.) वायव्य पर अब यह चौथी वस्तु और सामने आई प्लाज़्मा। यह वायु से भी विरल एक ऐसी गैसीय स्थिति है जिसमें परमाणुओं का भी विघटन हो जाता है।

पुराना अनुमान यह था कि आकाश सर्वथा शून्य एवं रिक्त है। पर अब यह स्पष्ट हो गया है कि वह क्षेत्र निस्तब्ध नहीं है। उसमें विद्युन्मय और चैतन्य तत्त्व भरे पड़े हैं। उसमें भी अपनी दुनिया की तरह ही हलचलों की भरमार है। समझना चाहिए इस शून्य आकाश-सागर में ही लहरें, ध्वनियाँ, उथल-पुथल, जीव-जंतु जैसे अपने ढंग के अतिरिक्त पदार्थों की भरमार है। न वहाँ निःस्पंदन है न निश्चल स्थिति।

पृथ्वी में एकदूसरे किस्म का वायुमंडल भी है जिसे आकर्षण-चुंबकत्व अथवा ग्रेविटी के नाम से पुकारते हैं। यह चुंबकत्व प्लाज्मा को प्रभावित करता है और उसकी प्रतिक्रिया लौटकर फिर पृथ्वी पर आती है। इस प्रकार का आदान-प्रदान और भी विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार जमाता है। इस चुंबकीय प्रत्यावर्तन को संपंन करने वाला वायुमंडल की तरह का ही एक चुंबकमंडल भी है। यह भी पृथ्वी का ही विस्तार है, इसे उसी का आधार-साधन अथवा अधिकार-क्षेत्र कह सकते हैं। इस प्लाज्मा प्रवाह के कारण ही सूर्य की शक्ति का धरती तक नियन्त्रित रूप से आना संभव होता है और अन्य ग्रहों से उसका संपर्क बनता है। इसलिए धरती की परिधि नापनी हो तो उसकी गणना वायुमंडल को आधार मानकर नहीं; वरन् चुंबकमंडल की परिधि के आधार पर नापनी चाहिए।

पृथ्वी से सूर्य की दूरी 9,30,00,000 मील है। चूँकि यह सूर्य भी पृथ्वी की परिधि है और वायु की तरह उसकी गर्मी रोशनी भी पृथ्वी के लिए जीवन आधार है। मछली का आधार पानी होता है। किसान का आधार खेत। इसी प्रकार पृथ्वी जिस खेत या समुद्र से अपना काम चलाती है उसका नाम हुआ सूर्य। यह सूर्य भी एक प्रकार से उसी की संपत्ति है और वायुमंडल की तरह वह भी उसी का अधिकार-क्षेत्र है। दूसरे ग्रहों का भी सूर्य से संबंध है— हो न बना रहे। इससे अपना क्या बनता बिगड़ता है। किसान का खेत होता है उसमें चूहे, दीमक, कीड़े, पतंगे भी पलते रहते हैं। चूँकि दूसरे ग्रह भी सूर्य से लाभ उठाते हैं इसलिए धरती का अधिकार उस पर से कम नहीं हो जाता। पृथ्वी की असली परिधि नापनी हो तो उसकी लपेट के भीतर सूर्य को भी लेना पड़ेगा।

क्या अनंत अंतरिक्ष का अंत कहीं है, इस प्रश्न के उत्तर में विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन एवं मिन्कोवस्की ने ‘है’ के रूप में दिया है। वे कहते हैं सीधी चलते हुए भी कोई वस्तु अंततः अपने मूल उद्गम पर घूमकर आ जाती है। इस गणित सिद्धांत के आधार पर अंतरिक्ष का अंत भी वहीं होना चाहिए। जहाँ से उसका आरंभ होता है; अर्थात अनादि और अनंत कहे जाने वाले अंतरिक्ष का किसी एक बिंदु पर मिलन अवश्य होता है भले ही कितना ही दूरवर्ती क्यों न हो।

‘अनंत के अंत’ की बात उन्होंने सीधेपन की घुमाव-प्रक्रिया के साथ जोड़ी है। यूक्लिड के रेखा गणित सिद्धाँत के अनुसार एक सीधी रेखा लंबाई में असीमित होने के बावजूद अपने उद्गम पर आ पहुँचेगी और मिल जाएगी। गणितज्ञ कहते हैं कि इस रेखा के मिलन घुमावक्रम में पचास खरब प्रकाश वर्ष लग सकते हैं पर अंततः वह मिल जरूर जाएगी। ग्रह-नक्षत्र सीधे ही दौड़ते हैं पर वह ‘सीध’ भी सीधी न रहकर आखिर गोलाई में ही घूम जाती है और हर पिंड को अपनी कक्ष निर्धारित करके उसी में चक्र की तरह घूमते रहना पड़ता है। गति कितनी ही सीधी या तीव्र क्यों न हो उसे झुकाव या घुमाव के प्रकृति बंधनों को स्वीकार ही करना पड़ेगा। यह सिद्धांत अंतरिक्ष पर भी लागू होता है, उसे भी गोल होना चाहिए और जहाँ भी उसका आरंभ बिंदु माना जाए उसी से जुड़ा हुआ उसका अंत भी जानना चाहिए।

पृथ्वी की तरह ही जीवन की ओर-छोर कहाँ है—  "इस प्रश्न के उत्तर में यदि गहरे मंथन पर उतरें तो प्रतीत होगा। यह मोटी मान्यता सर्वथा अपूर्ण है कि हम जन्मदिन पर जन्में हैं मरणदिन पर अपना अस्तित्व गंवा देंगे।"

वस्तुतः जीवन का दायरा बहुत बड़ा है। हम महान से जन्में है और महान की ओर चल रहे हैं। मृत्यु न हमारा अंत है और न जन्म आदि। यह एक दिन के प्रभात और दिनांत जैसा उपक्रम है। इस स्थूलपरिधि की ही हम सब कुछ न मानें; वरन् यह मानकर चलें कि सूर्य की परिधि तथा फैली हुई पृथ्वी की सीमाएँ जिस तरह अत्यंत विस्तीर्ण हैं, उसी तरह जीवन एक शरीर में दृश्यमान होते हुए भी उसका विस्तार समस्त जड़-चेतन की परिधि तक व्यापक है। सीम को असीम तक फैला देखना यही तत्त्वज्ञान है। पृथ्वी के ओर-छोर और जीवन के आदि-अंत का सही उत्तर इसी तथ्य के आधार पर उपलब्ध किया जा सकता है।


आत्मविश्वास से सब कुछ संभव (कहानी)

आत्मविश्वास से सब कुछ संभव--

सृष्टिकर्ता ने एक दिन सोचा कि धरती पर जाकर कम-से-कम अपनी सृष्टि को तो देखा जाए। धरती पर पहुँचते ही सबसे पहले उनकी दृष्टि एक किसान की ओर गई। वह कुदाली लिए पहाड़ खोदने में लगा था। सृष्टिकर्त्ता प्रयत्न करने पर भी अपनी हँसी न रोक पाए। उस इतने बड़े कार्य में केवल एक व्यक्ति को लगा देख और भी आश्चर्य हुआ।

वह किसान के पास गए उन्होंने कारण जानना चाहा, तो उसका सीधा उत्तर था। 'महाराज' ! मेरे साथ कैसा अन्याय है? इस पर्वत को अन्यत्र स्थान ही नहीं मिला। बादल आते हैं, इससे टकराकर उस ओर वर्षा कर देते हैं और पर्वत से इस ओर जो मेरे खेत हैं वह सूखे ही रहते हैं।

"क्या तुम इस विशाल पर्वत को हटा सकोगे?"

"क्यों नहीं? मैं इसे हटाकर ही मानूँगा यह मेरा दृढ़ संकल्प है।"

सृष्टिकर्त्ता आगे बढ़ गए उन्होंने अपने सामने पर्वतराज को याचना करते देखा। वह हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा था— ‘विधाता' ! इस संसार में सिवाय आपके मेरी रक्षा कोई नहीं कर सकता।’

"क्या तुम इतने कायर हो, जो एक किसान के परिश्रम से डर गए"

मेरे भयभीत होने के पीछे कोई कारण है। क्या आपने अभी-अभी नहीं देखा था, कि किसान में कितना आत्मविश्वास है वहाँ से वह मुझे हटाकर ही मानेगा। अगर उसकी इच्छा इस जीवन में पूरी न हुई तो उसके छोड़े हुए काम को उसके पुत्र और पौत्र पूरा करेंगे और मुझे भूमिसात् करके ही चैन लेंगे। आत्मविश्वास असंभव लगने वाले कार्य को भी संभव बना देता है।—  "पर्वतराज ने कहा।"


दर्शन पर्याप्त नहीं, भगवान को साथी और सेवक बनाएँ।

परमेश्वर का कलेवर यह विश्व-ब्रह्मांड है। उसकी प्रतिमा देखनी हो— "क्रियाकलाप देखना हो तो इस विराट-विश्व को देखना चाहिए। यह जो कुछ दृश्यमान है परमेश्वर का कलेवर है"— "कर्तव्य है"— "उसी में ओत-प्रोत है।"

यदि परमेश्वर के प्राण का स्पर्श करना हो तो वे इंद्रियों से नहीं, अंतःकरण की अनुभूति के रूप में ही उपलब्ध होगा। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के रूप में उसकी झाँकी अपने भीतर की जा सकती है। जितनी ही उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता अपने में हो उसी अनुपात से भगवान के अंश अपने में विद्यमान अनुभव किए जो सकते हैं।

उपरोक्त पाँच सत्प्रवृत्तियों को—  "परमेश्वर के प्रतिनिधि पाँच देवता कह सकते हैं। पाँच पांडव यही हैं। इन्हीं को आजीवन आंतरिक असुर कौरवों से लड़ना पड़ता है।' जब असुरता के उन्मूलन का हृदयमंथन आवेशपूर्वक हो रहा हो तो समझना चाहिए। जीवरूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह सच्चा कृष्णभक्त होकर उनके इच्छित महाभारत का पात्र बन गया।

सत्प्रवृत्तियों का अंतःकरण के राज्य पर आधिपत्य तब होता है, जब दुष्प्रवृत्तियों के प्रति रोष और घृणा ही नहीं संघर्षात्मक प्रक्रिया भी प्रखर कर दी जाए। प्रतिरोध के अभाव में तो वे जड़ जमाए ही बैठी रहेंगी, हटने का नाम नहीं लेंगी। सुई की नोंक बराबर जमीन देने को तैयार नहीं थी। अस्तु संघर्ष के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। महाभारत रचे बिना, आंतरिक शत्रुओं से लड़े बिना और कोई रास्ता नहीं।

हृषीकेश पांचजन्य बजाते हैं और पार्थ ने गांडीव उठाया हो तो समझना चाहिए। परमेश्वर का अभीष्ट प्रयोजन पूरा होने की व्यवस्था बन गई। इस महाभारत की युद्धस्थली ने ही अर्जुन को अपने साथ पाया है। तब अर्जुन को कृष्ण का पूजन आह्वान नहीं करना पड़ा। उलटे कृष्ण ही उसका रथ चलाने और सफलता का पथप्रशस्त करने आए थे। प्रार्थना अनुरोध अर्जुन को नहीं करना पड़ा सारा स्तोत्र-पाठ तो कृष्ण ने किया। गीता अर्जुन ने नहीं पढ़ी— "कृष्ण ने सुनाई। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चला है और अनंतकाल तक यही चलता रहेगा।"

भगवान का दर्शन विराट-विश्व के रूप में देखा जा सकता है। उसकी लीलाएँ देखनी हों तो प्रकृति के हर्षोल्लास भरे कर्तृत्व को गंभीरतापूर्वक देखना चाहिए। उनकी निकटता— का रसास्वादन करना हो तो फिर सत्प्रवृत्तियों के रूप में अपनी अंतरात्मा टटोलनी चाहिए। उसमें जितनी प्रखरता पाई जाए, समझना चाहिए उतना ही तेजस्वी परमेश्वर अपने भीतर सजग और सक्रिय हो रहा है।

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इसमें भी और आगे बढ़कर परमेश्वर को अपने साथी, सहायक और सेवक के रूप में प्राप्त करना हो तो उनकी इच्छा को समझना चाहिए, ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए और संकेत पर चलने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। अर्जुन ने यही किया था। भगवान अधर्म का विनाश और धर्म का विकास करने के प्रयोजन से ही अवतार लेते हैं। अपने अंतःकरण में यदि इसी ईश्वरीच्छा के अनुरूप परिस्थिति उत्पन्न कर ली जाए, तो भगवान का अवतरण इसी भूमि में तत्काल संभव हो सकता है।

अंतःकरण में समाविष्ट असुरता का उन्मूलन आवश्यक है। समाज में फैले अनाचार के प्रतिविद्रोह वाँछनीय है। जो इस झंझट भरे काम को करने के लिए तैयार है वह पक्का अर्जुन है। उसका दर्शन करने भगवान स्वयं ही आते हैं। साथ रहते और सेवक बनते हैं।

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सद्वाक्य

ईश्वर के दर्शन तब होते हैं, जब मन बिलकुल शांत हो जाता है।

—रामकृष्ण परमहंस


चुंबक और मानवीय प्रकृति का सादृश्य

भेड़ चराते हुए मैनानैस गड़रिए को सबसे पहले चुंबक मिला था। उस जंगल में कितने ही गड़रिए पीढ़ियों से भेड़ चराते चले आते थे। चट्टान भी चिरकाल से वहीं पड़ी थी। किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। चारों ओर कहाँ क्या हो रहा है? कहाँ क्या भरा पड़ा है उसे देखता-खोजता भी कौन है? जो सामने आ गया उसी को हलकी नजर से देखकर काम चला लिया, इतना ही ढर्रा मोटी अकल चलाती रहती है। जिज्ञासा के अभाव में जड़ जीवन ही जीना पड़ता है।

मैनानैस जिस चट्टान पर खड़ा था उसके जूते चिपक रहे थे। पैर उठाने में ऐसी कठिनाई लगती थी मानो वे किसी ने पकड़ लिए हों, किसी गहरे में धंस गए हों। उसकी जिज्ञासा जगी। बारीकी से देखा और गहराई से खोजा तो प्रतीत हुआ कि पैरों के नीचे जो पत्थर पड़ा है, उसमें कुछ विशेषता है। जूते की तली में गड़ी हुई कीलों की उस पत्थर के साथ क्या संगति हो सकती है। उसकी खोज-बीन और उलट-पुलट की तो पता चला कि इस निरर्थक पत्थर में ऐसी अजीब शक्ति है कि वह लोहे को अपनी ओर खींचती है।

बस उसने इस पत्थर की बात लोगों को बता दी। वह बड़ा उपयोगी निकला। आगे जाकर उससे बहुत काम बने। गड़रिए को उसका आविष्कारक, अन्वेषक माना गया और पत्थर का नाम उस मैगनैस गड़रिए के नाम पर— "मैगनेट रख दिया गया।" यद्यपि इससे पहले उस पत्थर को लोड स्टोन के नाम से जाना जाता था।

पुराणोक्त पारस पत्थर भी शायद आरंभ में ऐसे ही खोजा गया हो। जितना महत्त्व मैगनेट और पारस का है उससे हजार गुना उस सूक्ष्मदर्शी जिज्ञासा बुद्धि का है, जो साधारण में से असाधारण को खोजती है और उसे ढूंढ़ भी निकालती है।

जीवन के जंगल में न जाने कितने चुंबक ऐसे ही उपेक्षित और अनजाने पड़े हैं। हममें से कोई गड़रिया थोड़ी खोज-बीन कर सकने की पैनी बुद्धि से काम ले तो न जाने कितना कुछ ऐसा खोज निकाले जिसे पाकर वह स्वयं भी धन्य हो जाए और असंख्यों को उपकृत कर जाए।

चुंबक की एक छड़ को यदि किसी धागे में बाँधकर अधर लटका दिया जाए, तो उसके दोनों सिरे उत्तर-दक्षिण की ओर घूम जाएँगे। जब तक उनके घूमने को रोका न जाए कितनी ही उलट-पुलट करने पर भी वे अपनी नियत दिशा के लिए ही उन्मुख रहेंगे। दिगसूचक-यंत्र कंपास इसी आधार पर बना है। दिशा का सही ज्ञान करने के लिए सर्वत्र उसी को काम में लाया जाता है। जो स्वयं सही है— उसी से मार्गदर्शन की आशा की जा सकती है। जो स्वयं अस्थिर, चंचल और पथभ्रष्ट है वह दूसरों का मार्गदर्शन क्या करेगा? रास्ता बताने की उससे क्या कोई अपेक्षा करेगा? यदि कंपास न हो तो जल व वायु, यानों की लंबी यात्राकर सकना ही संभव न हो। आदर्शनिष्ठ व्यक्ति इस दुनिया में न रहे तो पीड़ितों को दिशा-दर्शन कौन कराये? पथप्रदर्शन कैसे संभव हो?

उतरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव परस्पर बहुत दूर हैं—  "एक धरती के इस छोर पर दूसरा उस छोर पर। चुंबक का टुकड़ा कितना ही छोटा क्यों न हो उसके दो छोर भी उत्तर और दक्षिण ध्रुव की विशेषताओं से युक्त मिलेंगे। धरती की आकर्षणशक्ति की प्रक्रिया यों ही यह छोटे चुंबक खंड इस तरह प्रदर्शित करते हैं मानों वे ही धरती की इस विशेषता का प्रतिनिधित्व करते हों।"

मनुष्य भी एक चुंबक ही है। वह विश्व-ब्रह्मांड की सारी क्षमता और विशेषता का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलए पिण्ड को— मनुष्य को— ब्रह्मांड का नक्शा कहा जाता है।

उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के आकर्षण परस्पर विरोधी हैं। एक-एक तरफ खींचता है दूसरा दूसरी तरफ । यह खींच-तान की रस्साकशी अनादिकाल से चली आती है। दैवी और आसुरी प्रवृत्तियाँ इस संसार पर आधिपत्य जमाए हुए हैं वे परस्पर विरोधी होते हुए भी एकदूसरे के पूरक हैं। असुरता न हो तो देवत्व की गरिमा ही प्रकाश में न आए। संघर्ष का अवसर न रहने से देवतत्त्वों की प्रखरता, तेजस्विता ही नष्ट हो जाए और देव-दानव का अंतर न रहने से सतर्कता और चेष्टा जैसे गुणों का विकास ही न रह सके और उनके बिना जीवन का आनंद ही न रहे। चुंबक के उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव— " धरती के ध्रुवों की तरह परस्पर विरोधी ही रहते हैं।" विरोधों का समन्वय करने की क्षमता ने ही चुंबक को चुंबक— "धरती को धरती और मनुष्य को मनुष्य बनाया है।"

चुंबक के दोनों सिरे अपनी क्षमता से भिन्न प्रकार की क्षमता की ओर सदा आकर्षित रहते हैं। यदि चुंबक के उत्तर ध्रुव को दूसरे चुंबक के दक्षिण ध्रुव की ओर किया जाए, तो वे परस्पर आकर्षित होंगे। अर्थात हर कोई अपने अभाव की पूर्ति करना चाहता है। नर और नारी के बीच का आकर्षण इसी प्रकार का है, दोनों अपनी कमियों को दूसरे के सहारे पूरी करना चाहते हैं। आत्मा और परमात्मा के बीच आकर्षण की शृंखला इसी कारण चल रही है। आत्मा में जिन दिव्य गुणों का अभाव है उसे वह परमात्मा की समीपता से प्राप्त करने के लिए उपासनारत होती है और ईश्वर निराकार होने से अपनी गरिमा शरीरधारी मनुष्य के द्वारा प्रकट करना चाहता है। भक्त भगवान के लिए ललचाता है और भगवान भक्त को पाने के लिए लालायित रहता है।

चारों दिशाओं में तथा नीचे-ऊपर यदि छह प्लेट चुंबक की खड़ी कर दी जाएँ। दोनों सिरे परस्पर आमने-सामने रहें तो बीच में कोई लोहे की वस्तु अधर में लटकाई जा सकती है। चुंबक की प्लेटें अपनी-अपनी ओर उसे खींचेगी और वह इस संतुलन से अधर लटकता रहेगा। ऐसा प्रतीत होगा मानो वह बिना किसी के सहारे आकाश में विचरण कर रहा है।

जीवन के हर क्षेत्र में भगवान का प्रतिनिधित्व करने वाली सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की प्लेटें लगी हों तो वे उसे निरंतर खींचती रहेंगी, गिरने न देंगी। महापुरुष अपने बलबूते अधर लटके और आकाश में विचरते जैसे लगते हैं और सबको अचम्भे में डालते हैं। वस्तुतः यह महानता हर दिशा में भगवान पर आश्रित रहने और जीवन के हर क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की चुंबकीय छड़ों के आरोपण का ही प्रतिफल है।

एक बड़े चुंबक को टुकड़ों में तोड़ते चले जाएँ, तो भी उसके उत्तर-दक्षिण ध्रुव वाली विशेषता समाप्त न होगी। हर टुकड़े में दोनों सिरों पर उत्तर ध्रुव, दक्षिण ध्रुव वाले दो गुण ही पैदा होते चले जाएँगे। महामानवों को विपत्तियाँ तोड़ती हुई चली जाएँ, वे बाह्यदृष्टि से कितने ही छोटे क्यों न हो जाएँ, पर उनकी विशेषता एवं महानता में अंतर न आएगा। परिस्थितियाँ उनके अंतर को तोड़ नहीं सकेंगी।

सज्जन जो भी काम करते हैं— "उनका व्यक्तित्व जहाँ भी प्रयोग में आता है, वहीं उनकी महानता स्पष्ट प्रकट होती हैं।" वे अनेक काम करें— "अनेक से संबंध रखें ,तो भी उनका व्यक्तित्त्व खंडित नहीं होता।" सूर्य की हर किरण में— "समुद्र की लहर में उनकी मौलिक विशेषता बनी रहती है।" चुंबक की तरह ही महापुरुष भी अपनी हर क्रिया-प्रक्रिया सभी विभाजनों में अपनी विशेषता अक्षुण्य ही बनाए रखते हैं।

चुंबक भले ही पारस जैसा मूल्यवान न हो, पर एक दृष्टि से उससे भी बढ़कर है। पारस के स्पर्श से लोहा-सोना भर हो सकता है। पारस नहीं बन सकता। पर चुंबक के संपर्क में लोहे का टुकड़ा लाया जाए, तो वह भी चुंबक बन जाएगा। दानी किसी का दुख दूर करने में सहायता भर कर पाते हैं, दयापात्र को वे अपने समान समृद्ध और दानी नहीं बना पाते। पर चुंबक की अपनी शैली ही निराली है। जो उसके संपर्क में आया वह भले ही मूलतः तुच्छ हो, पर उन्हीं विशेषताओं से संपंन वह भी हो जाता है। महामानवों के संपर्क में आने वाले सामान्य स्तर के व्यक्ति भी उन्हीं जैसी विशेषताओं से संपंन हो जाते हैं।

अधःपतन आत्मा की महानता को भी नष्ट करता है। चुम्बक के टुकड़े काटते जायें तो भी उसकी विशेषता नष्ट न होगी पर यदि उसे बार-बार ऊपर से नीचे पटकते रहा जाय तो क्रमशः उसकी आकर्षण शक्ति घटती ही चली जायगी। विपत्ति आदमी का कुछ अधिक नुकसान नहीं करती, पर यदि वह पतित विचारणा और पतित क्रिया पद्धति अपनाता है, पतन के गर्त में गिरता है तो उसकी प्रतिभा, तेजस्विता एवं महानता देर तक ठहर नहीं सकती, वे क्रमशः घटती चली जायेंगी और वह संग्रहीत पूजा धीरे-धीरे समाप्त हो जायगी, चुम्बक पर पतन की प्रक्रिया जो दुष्प्रभाव छोड़ती है वह दुष्परिणाम पतनोन्मुख व्यक्ति को भी भुगतान पड़ता है फिर चाहे वह उच्च महापुरुष के स्तर पर पहुँचा हुआ ही क्यों न हो।

पृथ्वी के चारों और उसका एक चुंबकीय-क्षेत्र है। उसी के आधार पर वह ब्रह्मांड में संव्याप्त अनेक प्रकार की सूक्ष्मतरंगों तथा शक्तियों को आकर्षित करके अपना भंडार भरती है। यदि उसका पद चुंबकीय-क्षेत्र न होता, तो ब्रह्मांड से निरंतर मिलने वाले अगणित अनुदानों से उसे वंचित ही रहना पड़ता। उसके पास जो अपनी थोड़ी सी पूँजी है, उसी पर निर्भर रहकर उसे दरिद्र जीवन बिताना पड़ता। तब यह इतनी साधन-संपंन और अद्भुत विशेषताओं से भरी-पूरी न होती, जैसी कि अब है। यह सब उसके चुंबकीय घेरे का ही परिणाम है।

धरती में यह चुंबकत्त्व आता कहाँ से है? यह उसके अंतरंग की बहिरंग प्रतिक्रियामात्र है। पृथ्वी के भीतर फेटस ऑक्साइड-मैंगनेटाइड का विशाल भंडार भरा पड़ा है। उसी की गन्ध बाहर उड़कर आती रहती है और धरती की आकर्षण शक्ति बनाये रहती है।

भीतर की संपदा का बाहर फूटकर निकलना स्वाभाविक है। पेट की खराबी साँस की बदबू बनकर बाहर आती है। दुर्भावना युक्त व्यक्ति कडुए, रूखे और पतन प्रेरक शब्द बोलता है। जिसके भीतर उत्कृष्टता भरी होगी उसकी वाणी से लेकर क्रिया तक में वे सब विशेषताएँ प्रस्फुटित होती रहेंगी। अंतर की सद्भावनाएँ बाहर सत्प्रवृत्तियां बनकर फूटती हैं, और उनसे उस व्यक्ति के आस-पास एक ऐसा आकर्षणयुक्त घेरा वातावरण में बन जाता है; जो प्रत्यक्ष और परोक्ष जगत में स्नेह, सहयोग के अगणित आधार बरसाता रहता है। अनुदान की यह छोटी-छोटी बूंदें इकट्ठी होकर व्यक्तित्व को साधन-संपंन बना देती हैं और उन्हीं के आधार पर सामान्य मनुष्य महामानव बन जाता है। धरती की चुंबकीय शक्ति जैसी भी हो मनुष्य में भी आकर्षण क्षमता विद्यमान है। जो उसे प्रयोगकर लेते हैं; वे ही समर्थ और साधन-संपंन बनते हैं।


विल्मा गोल्डीन रुडॉल्फ के संकल्प और अभ्यास (कहानी)

टेनेसी राज्य में रहने वाली महिला विल्मा गोल्डीन रुडॉल्फ जब चार वर्ष की थी— "स्कारलेट फीवर के कारण उसका दाहिना पैर खराब हो गया। वह बिना सहारे चल भी न सकती थी। पर साहस की धनी उस बालिका ने नियमित टहलने और दौड़ने का क्रम प्रारंभ किया।"

वह पढ़ने के लिए विद्यालय भेजी गई, वहाँ भी उसे दयनीय स्थिति के कारण शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के व्यंग सुनने पड़ते थे। एक अध्यापक ग्रे द्वारा उसे मच्छर की संज्ञा मिली थी, पर उसके धैर्य, संकल्प और साहस ने उसे मच्छर से बिजली बना दिया। सन् 1960 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन हुआ, तो रुडॉल्फ ने भी उसमें भाग लिया और एक साथ तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किये।

उस लँगड़ी बालिका की इस महान विजय पर दर्शक दंग रह गए। एक खिलाड़ी ने जब उसकी विजय का रहस्य पूछा, तो बड़े गर्व से उत्तर दिया— "मित्र" ! मेरा पैर लँगड़ा हो सकता है, पर मेरे संकल्पों ने और नियमित अभ्यास ने मुझे यह दिन दिखा दिया। वास्तव में नियमित साधना ऐसा अमूल्य खजाना है, जो साधक को मालामाल कर देता है।


सुख भगवान की दया, दुख उनकी कृपा

भगवान की दया सुखों और कृपा दुखों के बीच देखी जा सकती है, इन दोनों का समन्वय उचित ही हुआ है। सुख-दुख के दो पहियों पर ही जीवनरूपी रथ ठीक तरह चल सकता है। दोनों की सुविधा देकर भगवान ने हमारे ऊपर दया और कृपा की दुहरी अनुकंपा की है।

सुख इसलिए है कि उसके सहारे हमें हँसने, प्रमुदित होने का अवसर मिले और वैसे ही अवसर अधिक उपार्जित करने के लिए, अधिक प्रयास करने की प्रेरणा मिले। सत्कर्मों के सत्परिणाम पर हमारा विश्वास सुदृढ़ होता चला जाए। अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर विश्वास बढ़े साथ ही यह देखता रहे कि ईश्वर का वरद्हस्त सिर पर है, वह हमें आगे बढ़ाने और सुखी रखने के लिए निरतर अनुग्रह की वर्षा कर रहा है।

दुख इसलिए है कि—  "हमें कठिनाइयों से जूझने का और उन्हें नगण्य समझने का अभ्यास बढ़े। साधारणतया कठिनाइयों की आशंका हमें उतना कष्टकर नहीं होती, छोटे बच्चे ठंडे पानी से नहाने में डरते हैं और पानी देखते ही रोते हैं, पर माता उनकी बात पर ध्यान नहीं देती और उसे पानी से नहला देती है, नहाने के बाद बच्चा समझता है पानी उतना कष्टकारक नहीं था; जितना समझा गया था।" डर निकल जाना अच्छा ही है; क्योंकि कठिनाइयों से रहित किसी का भी जीवन हो नहीं सकता। उनसे लड़ना उतना कठिन नहीं है। सच तो यह है कि जटिल परिस्थितियों से निपटने में मनुष्य के साहस, आत्मविश्वास, पौरुष, धैर्य जैसे अनेक सद्गुणों को विकसित करने का लाभ मिल जाता है, और मनुष्य इतना पराक्रमी बन जाता है कि आगे चलकर बड़े काम कर सके।

माता बच्चे को अनिच्छापूर्वक डॉक्टर के पास तब ले जाती है, जब उसके फोड़े का बढ़ता हुआ मवाद सारे हाथ को सड़ाता हुआ दीखता है। आपरेशन के समय थोड़ा कष्ट होगा तो जरूर, पर बच्चा उस थोड़ी देर की व्यथा को सहकर ही देर तक रहने वाली और सारे शरीर को विषैला कर देने वाली विभीषिका से बच सकता है। इस हित-कामना से ही छाती पर पत्थर रखकर अस्पताल ले जाती है। डॉक्टर को भी बच्चे से कोई द्वेष नहीं; वरन वह भी हितैषी और शुभचिंतक की भावना से ही आपरेशन करता है। यह प्रसंग अप्रिय तो है, पर क्या किया जाए, उसके बिना कोई अन्य उपाय भी तो नहीं। हाथ को सड़ने देना और महीनों-वर्षों दुख भोगना एक ओर, थोड़ी देर का कष्ट एक ओर, दोनों में से माता को भी और डॉक्टर को भी आपरेशन ही उचित दीखता है और वही होता भी है, बालक की इच्छा न होने पर भी—  "उसके रोने-चिल्लाने पर भी।"

एक को जेल जाते देखकर दूसरे के कान खड़े होते हैं। अकर्म करने के ढर्रे को रोकने के लिए उस दंड-विधान को प्रत्यक्ष देखने वालों को पुनर्विचार करना पड़ता है। कइयों के हाथ रुक भी जाते हैं। न्यायाधीश किसी को फाँसी भी देता है, तो उसमें उसकी लोकहित भावना ही काम करती है। सर्वसाधारण की अनीति का परिणाम देखकर भय करने का अवसर मिलता है। साथ ही उस अपराधी को जल्दी ही उस पाप से मुक्ति मिल जाती है अन्यथा वह भीतर-ही-भीतर घुमड़ता रहता है, तो सारी स्वस्थ मनोवृत्तियों का नाश कर देता है। न्याय और व्यवस्था के लिए यह दंड आवश्यक था। सो ही दिया भी गया। जीवन की सरसता उभयपक्षीय अनुभवों में है। मिठाई के साथ नमकीन भी रहे तो भोजन का मजा आवे। दिन ही नहीं रात भी आवश्यक है। बरसात ही नहीं गर्मी भी चाहिए। धूप-छाँह वाला मौसम ही तो सुख होता है। सुख हमें हताश नहीं होने देता और दुख अहंकार भरी मदोन्मत्तता पर नियंत्रण करता रहता है। सुख के प्रलोभन से मनुष्य सत्कर्म करता है और दुख के आतंक से कुकर्म करने से बचता है। सो दुख-सुख की कृपा और दया की खट्टी-मिट्ठी चटनी हमें रुचिपूर्वक चाटनी चाहिए।


मरने के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है

मरणोत्तर जीवन की बात ईसाई और मुसलमान नहीं मानते। उनका कहना है कि मरने वाले मनुष्य की आत्मा को प्रलयकाल तक कब्र में दबा रहना पड़ता है। अंत में न्याय होता है, तब कर्मफल स्वर्ग-नरक के रूप में मिलता है। जब नई सृष्टि रची जाती है, तब फिर एक बार जन्म मिलता है। इस प्रकार हर सृष्टि में केवल एक बार मनुष्य को नर-तन धारण करने का अवसर मिलता है। जब एक सृष्टि में एक ही बार जन्म मिलता है और वह भी बीत चुका तो एक प्रकार से वह अवसर समाप्त ही हुआ। अब किसी रूप में वह अपना अस्तित्व प्रकट न कर सकेगा, यह उपरोक्त धर्मों की मान्यता का सार है।

नास्तिक मान्यताएँ इससे भी आगे बढ़ी-चढ़ी हैं। वे पंचतत्त्वों की अमुक्त संमिश्रण-प्रक्रिया के साथ जन्म और उसके विलगन के साथ मृत्यु मानते हैं। शरीर ही जीव है। शरीर के न रहने पर जीव का भी अस्तित्व नहीं रहता।

क्या उपरोक्त मान्यताएँ सही हैं? इसे शास्त्रकारों, आप्तपुरुषों, सूक्ष्मदर्शियों द्वारा प्रतिपादित तथ्यों को छोड़कर यदि प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर देखें, परखें, तो भी वे मान्यताएँ सही सिद्ध नहीं होती। ऐसे अगणित प्रमाण आए दिन मिलते रहते हैं, जिनसे मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व सिद्ध होता है।

पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ लिए हुए कितने ही बालक जन्मते हैं और वे यह बताते हैं कि इससे पूर्वजन्म में वे कहाँ, किस स्थिति में जीवनयापन कर चुके हैं। खोज-बीन करने पर सही प्रमाणित होता है कि यह कोई चालाकी, कौतूहल, मिली भगत, बात का बतंगड़ नहीं था; वरन ठोस वास्तविकता थी। वे बालक ऐसी घटनाएँ—  "स्मृतियाँ बताते हैं, जो अन्य लोगों को विदित ही नहीं थीं। इस प्रकार के पूर्वजन्मों की स्मृति से संबंधित प्रमाण मरणोत्तर जीवन की पुष्टि करते हैं।"

इसके अतिरिक्त सूक्ष्मशरीर से प्रेतयोनि में बने रहने के प्रमाण भी मिलते हैं। मरने के बाद भी आत्मा अपने संबंधियों से संपर्क बनाने का इच्छुक रहता है। आह्वान करने की पद्धति मालूम होने पर वह संपर्क घनिष्ठ भी हो जाता है और उसमें ऐसे तथ्य जुड़े रहते हैं जिनके कारण इस संपर्क की वास्तविकता में कोई संदेह नहीं रह जाता। प्रेतयोनि का अस्तित्व भी मरणोत्तर जीवन की पुष्टि करता है। स्थूलशरीर न सही  सूक्ष्मशरीर सही आत्मा का अस्तित्व तो विद्यमान रहा ही। कब्र में कैद रहने वाली— "अस्तित्व प्रकट न कर सकने वाली बात-शरीर के साथ आत्मा की समाप्त हो जाने वाली बात जो एक प्रकार से मिथ्या ही सिद्ध हो गई।"

मरणोत्तर जीवन की मान्यता अध्यात्म दर्शन का एक बहुत बड़ा आधार है। शुभ-अशुभ कर्म, जो इस जीवन में भोगे नहीं जा सकते आगे भोगने पड़ेंगे, यह कर्मफल सिद्धांत नैतिकता का प्रमुख आधार है। एक ही जन्म मान लेने से तो जो कर्मफल इस जन्म में नहीं मिला, उसे समाप्त हुआ ही मानना पड़ेगा। कयामत के समय भी स्वर्ग-नरक की बात भी बेतुकी सी है। उसमें कर्मफल नहीं, अमुक संप्रदाय को मानने-न मानने पर ही स्वर्ग-नरक की व्यवस्था है। ऐसी दशा में वह मान्यता इस जन्म में न मिले कर्मफल को अगले जन्म में मिलने वाले प्रतिपादन का समर्थन नहीं करती। ऐसी दशा में अध्यात्म मान्यताओं द्वारा नैतिकनिष्ठा बनाने में योगदान नहीं मिलता। यदि इतना भी प्रयोजन सिद्ध न हो तो फिर अध्यात्म दर्शन की उपयोगिता ही क्या रह गई।

मरणोत्तर जीवन की प्रामाणिकता पर ही कर्मफल आगे मिलने का सिद्धांत पुष्ट होता है और आत्मा की अमरता से संबंधित अनेक उच्चआदर्शों की दीर्घकालीन दूरदृष्टि रखकर अपनाने का अवसर मिलता है। इसलिए मरणोत्तर जीवन की प्रामाणिकता का प्रतिपादन होना ही चाहिए। पुनर्जन्म और प्रेत अस्तित्व के प्रमाण इस दृष्टि से अध्यात्म दर्शन की परिपुष्टि ही करते हैं। प्रेतात्मा के अस्तित्व संबंधी कुछ प्रामाणिक विवरण नीचे प्रस्तुत हैं।

रिचमांड, कैलीफोर्निया पुलिस अधिकारी, ने टेलीफोन पर किसी व्यक्ति की सूचना सुनी— "पैनपाब्लो के मैकडोलाल्ड एवे. यू में जल्दी पहुँचिए। स्टीम लाइनर ने अभी-अभी एक ट्रक को बुरी तरह उलट दिया। ड्राइवर की छाती चूर हो गई और दूसरे व्यक्ति घायल हुए हैं।"

टेलीफोन सुनते ही पुलिस उस स्थान पर पहुँची, पर देखा और पूछा तो पता चला कि, यहाँ ऐसी कोई घटना नहीं घटी है। पुलिस ने समझा किसी ने ऐसे ही मजाक करके उन्हें व्यर्थ परेशान किया है।

पुलिसदल लौटने को ही था कि उसके सामने ही एक दुर्घटना घटी। स्टीम लाइनर दौड़ता हुआ आया और सामने से आ रहे एक ट्रक से भिड़ गया । ड्राइवर की छाती चूर-चूर हो गई और उसकी चपेट से कई व्यक्ति बुरी तरह घायल हुए।

घटनाक्रम वही था, जो टेलीफोन पर सुना गया था। पर आश्चर्य यह रहा कि वह दुर्घटना पुलिस के पहुँचने पर उसके सामने हुई, जबकि उसका पूर्ण विवरण पहले ही सुन और जान लिया गया था। यह पता नहीं चल सका कि यह पूर्वकथन करने वाला व्यक्ति आखिर था कौन?

भारत के भूतपूर्व वायसराय लार्ड डफरिन जब इंग्लैंड में थे, तब एक बार उनके एक मित्र ने आयरलैंड में आमंत्रित किया। वे एक एकांत बंगले में ठहरे हुए थे कि यकायक उनकी नींद उचट गई और भारी बेचैनी अनुभव हुई। वे उठे और खिड़की से बाहर झाँका तो दिखाई दिया। उस जंगल में कोई कराह रहा है। सहायता की दृष्टि से वे आगे बढ़े। देखा कि कोई व्यक्ति पीठ पर एक संदूक लादे जा रहा है। उन दिनों मेडीकल कालेजों में चीर-फाड़ के लिए काम आने वाली लाशें चोर-डाकू कहीं से लाकर वहाँ बेच जाते थे। डफरिन ने उसे ललकारा और पूछा— "इस बक्से में क्या है, इसे कहाँ ले जा रहे हो।"

वह रुका डफरिन पास पहुँचे। उनने एक ऐसा विकराल और वीभत्स चेहरा देखा जैसा उन्होंने पहले कभी भी नहीं देखा था। इसके बाद वह अंतर्ध्यान हो गया। इस घटना ने उन्हें बुरी तरह डरा दिया।

कुछ समय बाद डफरिन की नियुक्ति फ्राँस में। ब्रिटेन के राजदूत के रूप में हुई। एक दिन उन्हें ब्रांड होटल के किसी राजनैतिक समारोह में सम्मिलित होना था। वे सेक्रेटरी सहित पहुँचे, तो देखा कि लिफ्ट ऊपर ले जाने के लिए वह आयरलैंड के जंगल वाला वीभत्स आदमी खड़ा है। वे उलटे पैरों लौट आए और होटल मैनेजर से उस लिफ्टमैन के बारे में पूछने के लिए गए। इतने में क्या हुआ कि लिफ्ट जब पाँचवीं मंजिल पर पहुँचने को थी तब सहसा उसका रस्सा टूटा, लिफ्ट नीचे गिरी और उस पर सवार सभी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कुचल कर मर गए। लार्ड डफरिन की इस प्रेत अनुभूति को फ्राँस के सभी समाचारपत्रों में मोटी हैडिंग देकर छापा।

अमेरिका के प्रख्यात लेखक और पुलित्सर पुरस्कार विजेता और मैकिनले कैंटोर ने अपनी सन् 1945 की प्रेत-संघर्ष संबंधी अनुभूतियाँ पुस्तकाकार छपाई हैं। उसमें एक रोचक वर्णन यह भी है कि उन्हें द्वितीय महायुद्ध के दिनों लंदन जाना पड़ा। वहाँ केसिगटन के एक ऐसे मकान में उन्हें रात काटनी पड़ी जिसका ‘भुतहा’ होना प्रख्यात था। वे यथार्थ का पता लगाने के लिए उसी मकान में ठहरे । हुआ यह कि रात को तीन बजे से कोई उनका कंबल खींचने लगा। वे ओढ़ने के लिए उसे ऊपर खींचते, किंतु नीचे से कोई उसे अपनी ओर जोरों से खींच लेता। इस प्रकार कंबल के आधार पर प्रेत और मिकैंटोर के बीच रस्साकशी घंटों चलती रही। यह सब तब हुआ जब कमरे की चटखनी भीतर से बंद थी दूसरे उसमें किसी मनुष्य को प्रवेश करने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

कुछ देर बाद कैंटोर ने देखा कमरे में प्रकाश छाया हुआ है और इसमें एक मानव मूर्ति तैर रही है। उनने कमरे से बाहर बरामदे में बहुत से लोगों के चलने-फिरने, हँसने-रोने की आवाजें भी सुनीं। रात बीतने पर वे कमरा खोलकर बाहर निकले और अपने रात वाले अनुभव सुनाते हुए उस मकान के भुतहा होने की पुष्टि की।

प्रेत केवल डरावने या कष्टदायक ही नहीं होते उनमें से कितने ही बड़े उदार और सहायक भी होते हैं। उनकी सहायता से कई बार आश्चर्यजनक लाभ होते हैं—

"लंदन की एक महिला रोजमेरी ब्राउन परलोक वेत्ताओं के लिए पिछली तीन दशाब्दियों से आकर्षण का केंद्र रही हैं। वे संगीत में पारंगत हैं। बहुत शर्मीले स्वभाव की हैं भीड़-भाड़ से, सार्वजनिक आयोजनों से दूर रहती हैं और अपनी एकांत संगीत-साधना को शब्द ब्रह्म की साधना के रूप में करती है।"

आश्चर्य यह है कि उनका कोई मनुष्य संगीत शिक्षक कभी नहीं रहा। उन्हें इस शिक्षा में अदृश्य मनुष्य सहायता देते रहे हैं और उन्हीं के सहारे वे दिन-दिन प्रगति करती चली हैं। उनकी संगीत-साधना तब शुरू हुई जब वे सात साल की थी। उन्होंने एक सफेद बालों वाला— "काले कोट वाला आत्मा देखा, जो आकाश से ही उतरा और उसी में गायब हो गया। उसने कहा मैं संगीतज्ञ हूँ, तुझे संगीतकार बनाऊँगा । कई वर्ष बाद उसने विख्यात पियानोवादक स्वर्गीय फ्राजलिसट का चित्र देखा। वह बिलकुल वही था, जो उसने आकाश में से उतरते और उसे आश्वासन देते हुए देखा था।"

बचपन में वह कुछ थोड़ा-सा ही संगीत सीख सकी। पीछे वह विवाह के फेर में पड़ गई और जल्दी ही विधवा भी हो गई। उन दिनों उसकी गरीबी और परेशानी भी बहुत थी; फिर वही मृतात्मा आई और कहा संगीत-साधना का यही उपयुक्त अवसर है। उसने कबाड़ी के यहाँ से एक टूटा पियानो खरीदा और बिना किसी शिक्षक के संगीत-साधना आरंभ कर दी। रोजमेरी ब्राउन का कहना है कि उसका अशरीरी अध्यापक अन्य संगीतविज्ञानियों को साथ लेकर उसे सिखाने आता है। उनके मृतात्मा शिक्षकों में बाख, बीठों, फेंन, शोर्ये, देवुसी, लिश्ट, शूवर्ट जैसे महान संगीतकार सम्मिलित हैं, जो उसे ध्वनियाँ और तर्ज ही नहीं, सिखाते उसकी उँगलियाँ पकड़कर यह भी बताते हैं कि किस प्रकार बजाने से क्या स्वर निकलेगा। गायन की शिक्षा में भी वे अपने साथ गाने को कहते हैं। वे यह सब प्रत्यक्ष देखती हैं, पर दूसरे पास बैठे हुए लोगों को ऐसा कुछ नहीं दीखता।

रोजमेरी ने एक जीवित शिक्षक को परीक्षक के रूप में रखा है। वह सिर्फ देखता रहता है कि उसके प्रयोग ठीक चल रहे हैं या नहीं। ऐसा वह इसलिए करती है कि कहीं उसकी अंतःचेतना झुठला तो नहीं रही है; उसके अभ्यास सही हैं या गलत। पर वह दर्शकमात्र अध्यापक उसके प्रयोगों को शत-प्रतिशत सही पाता है रोजमेरी लगभग 400 प्रकार की ध्वनियाँ बजा लेती हैं। बिना शिक्षक के टूटे पियानो पर बिना निज की उत्कट इच्छा के यह क्रम इतना आगे कैसे बढ़ गया, इस प्रश्न पर विचार करते हुए अविश्वासियों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि इस महिला के प्रयासों के पीछे निस्संदेह कोई अमानवीय शक्तियाँ सहायता करती हैं।

रोजमेरी का जीवन गरीबी और कठिनाइयों से भरा था। वह एक स्कूल में रसोईदारिन का काम करती थी, उसी में से उसने समय निकाला और अपने अदृश्य सहायकों की सहायता से संगीत-साधना का क्रम चलाया। लोगों ने उसके कथन में यथार्थता पाई तो उन्होंने स्वर्गीय आत्माओं द्वारा निर्देशित कुछ संगीत निर्देशावलियाँ नोट कराने का अनुरोध किया। उसने यह स्वीकार कर लिया। फलतः 3000 शब्दों की एक संगीत निर्देश माला प्रकाशित हुई। नाम है उसका—   "टेन कमाँडमेन्टर फारम्युजिशि येशन्स। इन निर्देशों के आधार पर जो ग्रामोंफोन रिकार्ड (एल.पी.) बने हैं, उनने स्वर्गीय आत्माओं के संगीत से परिचित लोगों को इस सादृश्य ने बहुत प्रभावित किया है।"

कई व्यक्ति रोजमेरी के प्रयास के पीछे कुछ ढोंग ढूँढ़ते हैं, पर उन्हें तब चुप हो जाना पड़ता है, जब वह धन या यश की कामना से सर्वथा दूर रहकर अपनी एकांत शब्द-साधना में निमग्न रहती हैं। ढोंग तो किसी प्रयोजन के लिए होता है, किंतु यहाँ तो वैसा कुछ भी नहीं है। उल्टी वह तो डरती रहती है कि कहीं उसे पागल न समझ लिया जाए। मनोविज्ञानवेत्ताओं ने उसके अर्धचेतन में संगीत तथ्य के छिपे होने और उसके जागृत होने की बात चलाई पर वह भी फिट नहीं बैठी; क्योंकि उसे स्वयं की इच्छा से या वंश-परंपरा से यह शौक नहीं मिला, यह तो किन्हीं दूसरों ने उसके गले मढ़ दिया है और वे ही वलात् उसे जोते रहते हैं।

मनोविज्ञानशास्त्र के सुप्रसिद्ध शोधकर्त्ता श्री मारिस वार्व नेल की मान्यता है कि रोजमेरी को अतींद्रिय श्रवण और दर्शन की विलक्षण शक्ति प्राप्त है और वह उसी के सहारे प्रगति कर रही है।


आलोचना से डरें नहीं— उसके लिए तैयार रहें

दूसरा कोई समीक्षा करे तो स्वभावतः बुरा लगेगा। निंदनीय स्थिति किसी की स्वीकार नहीं । उसे सुनने से कष्ट होता है और आमतौर से आलोचना बुरी लगती है।

यह अप्रिय के स्थान पर प्रिय भी हो सकती है, यदि हम वस्तुतः अच्छे हों, अच्छे व्यक्ति को द्वेषवश लांछन लगाने का दुस्साहस कोई यदा-कदा ही करता है। आमतौर से निंदात्मक आलोचना हमारे दोष-दुर्गुणों की ही होती है। नमक-मिर्च लगाने की तो लोगों को आदत है पर जो कहा जाता है, उसमें कुछ सार जरूर होता है। आलोचना का लाभ यही है कि यह देखें कि जो कुछ निंदापरक कहा जा रहा है, उसमें कितना तथ्य और सत्य है। जो वास्तविकता हो उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। अपना चेहरा अपने को दिखाई नहीं पड़ता, उसे देखना हो तो दर्पण का सहारा लेना पड़ेगा। आलोचक हमारे लिए दर्पण की तरह उपयोगी हो सकते हैं। और जहाँ कुरूपता है वहाँ सुधार के लिए प्रयत्न करने की प्रेरणा दे सकते हैं।

यदि गलतफहमी या द्वेषवश आलोचना की गई है, तो उसे हँसकर उपेक्षा से टाल देना चाहिए। जिसमें वास्तविकता न होगी, ऐसी बात अपने आप हवा में उड़ जाएगी। मिथ्या निंदा करने वाले क्षण भर के लिए ही कुछ गफलत पैदा कर सकते हैं पर कुछ ही समय में वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाती है और सूर्य  पर कीचड़ उछालने वाले को स्वतः ही उस दुष्कृत्य पर पछताना पड़ता है। मिथ्या दोषारोपण से कभी किसी का स्थायी अहित नहीं हो सकता। क्षणिक निंदा-स्तुति का कोई मूल्य नहीं। पानी की लहरों की तरह वे उठती और विलीन होती रहती हैं।

प्रशंसात्मक आलोचना सुनने का यदि वस्तुतः अपना मन ही हो, तो सचमुच ही अपने को ऐसा बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। जिससे दूसरे लोग विवश होकर प्रशंसा करने लगें। मुख से न कहें तो भी हर किसी के मन में उच्च चरित्र व्यक्ति के बारे में जो श्रद्धा-सद्भावना अनायास हो जाती है, उसे तो कोई रोक ही नहीं सकता। इसके अतिरिक्त अपनी अंतरात्मा संमार्गगामी गतिविधियों पर संतोष और प्रसन्नता अनुभव करती हैं। यह आत्मप्रशंसा सब से अधिक मूल्य वाली है। अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने और शेखी बघारने की आत्मप्रशंसा बुरी है, पर अंतःकरण जब अपनी सत्प्रवृत्तियों को देखते हुए संतोष व्यक्त करता , तो उस आत्मप्रशंसा की अनुभूति रोम-रोम पुलकित कर देती है।

दूसरों के मुँह निन्दात्मक आलोचना सुनना यदि अपने को सचमुच बुरा लगता हो तो उसका एक ही तरीका है कि हम अपने आप अपनी आलोचना करना आरम्भ करें। जिस प्रकार दूसरों के दोष दुर्गुण देखने और समझने के लिए अपनी बुद्धि कुशाग्र रहती है; वैसा-ही छिद्रान्वेषण अपना करना चाहिए। अपनी निष्पक्ष समीक्षा आप कर सकना यह मनुष्य का सबसे बड़ा साहस है। अपने दोषों को ढूँढ़ना, गिनना और समझना चाहिए। साथ ही यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन दुर्गुणों को अपने व्यक्तित्व में से अलग कर दिया जाए। निर्दोष और निर्मल व्यक्तित्व विनिर्मित किया जाए। जिस प्रकार हम दूसरों के पाप और दुर्गुणों से चिढ़ते हैं और उनकी निंदा करते हैं वैसी ही सख्ती हमें अपने साथ भी बरतनी चाहिए और यह चेष्टा करनी चाहिए कि निंदा करने का कोई आधार ही शेष न रहे और अप्रिय आलोचना के वास्तविक कारणों का ही उन्मूलन हो जाए।

अपने आप से लड़ सकना शूरता का सबसे बड़ा प्रमाण है। दूसरों से लड़ सकने को तो निर्जीव तीर-तलवार भी समर्थ हो सकते हैं, पर अपने से लड़ने के लिए सच्ची बहादुरी की जरूरत पड़ती है।

हम अपनी आलोचना आप करें, ताकि बाहर वालों को निंदात्मक आलोचना करने का अवसर ही न मिले। हम प्रशंसा के योग्य रीति-नीति अपनाएँ, ताकि हर दिशा से प्रशंसा के प्रमाण अपने आप बरसने लगें।


हारमोन स्रावों का उद्गम अंतःचेतना से

साधारणतया आहार-विहार का प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले निरोग रहते हैं और असंयम बरतने वाले— "अखाद्य खाने वाले बीमार पड़ते हैं।" बीमारियों के कारण रोग-कीटाणुओं के रूप में— "ऋतु-प्रभाव या धातुओं, तत्वों के हेर-फेर में ढूँढ़े जाते हैं और उसी आधार पर चिकित्सा की जाती है। पर कई बार इन सब मान्यताओं को झुठलाते हुए ऐसे कारण उपस्थित हो जाते हैं कि अप्रत्याशित रूप से शरीर के किन्हीं अवयवों का या प्रवृत्तियों का यकायक घटना-बढ़ना शुरू हो जाता है।" कारण ढूँढ़ते हैं, तो समझ में नहीं आता, अँधेरे में ढेला फेंकने की तरह कुछ उपचार किया जाता है, तो उसका कुछ परिणाम नहीं निकलता।

ऐसी परिस्थितियाँ प्रायः हारमोन ग्रंथियों में गड़बड़ी आ जाने के कारण उत्पन्न होती हैं। शरीर के सामान्य अवयवों की संरचना और उनकी कार्यपद्धति का ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ता आया है, इसलिये रोगों के कारण और निवारण के संबंध में काफी प्रगति की गई है। पर यह अंतःस्रावी ग्रंथियों की आश्चर्यचकित करने वाली हरकतें जबसे सामने आई हैं, तब से चिकित्साविज्ञानी स्तब्ध रह गए हैं, प्रत्यक्षतः शरीरगत क्रियाकलाप से इनका कोई सीधा उपयोग नहीं है। वे किसी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति नहीं करतीं चुपचाप एक कोने में पड़ी रहती हैं और वहीं से तनिक-सा स्राव बहा देती हैं। वह स्राव भी पाचन अंगों द्वारा नहीं, सीधा रक्त से जा मिलता है और अपना जादू जैसा प्रभाव छोड़ता है।

हारमोन, शरीर और मन पर कितने ही प्रकार के प्रभाव डालते और परिवर्तन करते हैं। उनमें से एक परिवर्तन कामवासना का, मानसिक जागरण और यौन अंगों की प्रजनन क्षमता भी सम्मिलित है।

छोटी उम्र की लड़की और लड़के लगभग एक जैसे लगते हैं। कपड़ों से बालों से उनकी भिन्नता पहचानी जा सकती है अन्यथा वे साथ-साथ हँसते, खेलते, खाते हैं; कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं पड़ता। पर जब बारह वर्ष से आयु ऊपर उठती है, तो दोनों में काफी अंतर अनायास ही उत्पन्न होने लगता है। लड़के की आवाज भारी होने लगती है। होठों के बाल काले होने लगते हैं और कोमल अंग कठोर होने लगते हैं। लड़कियाँ शरमाने लगती हैं उनके कुछ अंगों में उभार आने लगता है और नए किस्म की इच्छाएँ तथा कल्पनाएँ मन में घुमड़ने लगती हैं।

यह ‘हारमोन’ स्रावों की करतूत है। वे समय-समय पर ऐसे उठते जगते हैं, मानो किसी घड़ी में अलार्म लगाकर रख दिया हो, अथवा टाइम बम को समय के कांटे के साथ फिट करके रखा हो। यौवन उभार के संबंध में इन्हीं के द्वारा सारा खेल रचा जाता है। अन्य सारा शरीर अपने ढंग से ठीक काम करता रहे, पर यदि इन हारमोन ग्रंथियों का स्राव-न्यून हो, तो यौवन अंग ही विकसित न होंगे और यदि किसी प्रकार विकसित हो भी जाएँ, तो उनमें वासना का उभार नहीं होगा, न कामेच्छा जागृत होगी, न उस क्रिया में रुचि होगी। संतानोत्पादन तो होगा ही कैसे?

साधारणतया कामोत्तेजना का प्रसंग 15-16 वर्ष की आयु से आरंभ होकर 60 वर्ष पर जाकर लगभग समाप्त हो जाता है। स्त्रियों का मासिक-धर्म बंद हो जाने पर लगभग पचास वर्ष की आयु में उनकी वासनात्मक शारीरिक क्षमता और मानसिक आकांक्षा दोनों ही समाप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार 60 वर्ष पर पहुँचने पर पुरुष की इंद्रियाँ एवं आकांक्षाएँ भी शिथिल और समाप्त हो जाती हैं। यह सामान्य क्रम है। पर कई बार हारमोनों की प्रबलता इस संदर्भ में आश्चर्यजनक अपवाद प्रस्तुत करती है। बहुत छोटी आयु के बच्चे भी न केवल पूर्ण मैथुन में; वरन सफल प्रजनन में भी समर्थ देखे गए हैं। उसी प्रकार शताधिक आयु हो जाने पर भी वृद्ध व्यक्तियों में इस प्रकार की युवावस्था जैसी परिपूर्ण क्षमता पाई गई है।

लिंग-भेद से संबंधित हारमोनों में गड़बड़ी पड़ जाए, तो नारी को मूँछ निकल सकती है, पुरुष बिना मूँछ का हो सकता है तथा दोनों की प्रवृत्तियाँ भिन्न लिंग जैसी हो सकती है। नारी पुरुष की तरह कठोर व्यवहार करने वाली और नर, जनखों जैसे स्त्री-स्वभाव का हो सकता है। यौन आकांक्षाएँ भी विपरीत वर्ग जैसी हो सकती हैं, इतना ही नहीं, कई बार तो इन हारमोनों का उत्पात ऐसा हो सकता है कि प्रजनन अंगों की बनावट ही बदल जाए। ऐसे अनेक आपरेशनों के समाचार समय-समय पर सुनने को मिलते रहते हैं; जिनमें नर से नारी की और नारी से नर की जननेंद्रियों का विकास हुआ और फिर शल्यक्रिया द्वारा उसे, तब तक के जीवन की अपेक्षा भिन्न लिंग का घोषित किया गया। इसी नई परिस्थितियों के अनुसार उनने साथी ढूँढ़े, विवाह किए और गृहस्थ बनाए।

हिप्पोक्रेटस् ने इस तरह की विपरीतवर्गीय कुछ घटनाएँ देखी थीं और उनका कारण समझने का प्रयत्न किया था। चिकित्सक प्लिनी ने एक ऐसे सात वर्ष के लड़के का वर्णन लिखा है, जो लेंगिक दृष्टि से पूर्ण विकसित हो गया था।

8 जनवरी सन् 1910 को दो चीनी बच्चों ने सामान्य बालकों को जन्म दिया । जिसमें माता की उम्र 8 वर्ष और पिता की 9 वर्ष की थी। संसार में यह सबसे छोटे माता-पिता हैं। अमोय फूकेन प्रांत का यह कृषक परिवार ‘साद’ नाम से पुकारा जाता है। इस परिवार में ऐसे ही वाल-प्रजनन के और भी उदाहरण होते हैं।

कलावार (अफ्रीका) में भी कुछ समय पूर्व ऐसी ही घटना घटित हुई थी। वहाँ एक्क्री नामक एक नीग्रो की आठ वर्षीय पत्नी ने आठ वर्ष चार मास की आयु में ही प्रसव किया और एक बालिका को जन्म दिया, आश्चर्य यह और देखिए कि वह बच्ची भी अपनी माँ की तरह आठ वर्ष की आयु में ही माँ बन गई। इस प्रकार उमजी को 17 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते दादी बनने का अवसर प्राप्त हो गया।

सूडान में अभी इसी वर्ष एक नौ वर्ष की लड़की माँ बनी है उसका पति 10 वर्ष का है। यह समाचार कुछ ही दिन पूर्व प्रायः सभी समाचारपत्रों में छपा था।

जोरा आगा नामक टर्की के एक दीर्घजीवी वृद्ध पुरुष की आयु 1927 में 153 वर्ष की थी। उस समय उसने अपना ग्यारहवाँ विवाह किया था। उससे पूर्व 10 स्त्रियाँ और 27 बच्चों को, वह अपने हाथों कब्र में सुला चुका था। उसके जीवित बच्चे 70 से ऊपर थे।

लिंग-परिवर्तन की घटनाओं में यही होता है। मनुष्य की आकांक्षाएँ और अभिरुचियाँ जिधर गतिशील होती हैं, उसी तरह की लिंग मनोभूमि बनती चली जाती है। कोई नारी यदि नर के प्रति अत्यधिक आसक्त होती है, उसी के सान्निध्य एवं चिंतन में निरत रहती है, तो उसका अंतःकरण उसी ढाँचे में ढलता और तादात्म्य होता चला जाएगा। कालांतर में वह आकांक्षा उसे स्वयं नर के रूप में परिणत कर सकती है। इस प्रकार कोई नर यदि नारी के चिंतन और सान्निध्य में अतिशय रुचि लेता है, तो उसकी चेतना नारी वर्ग में परिणत होने लगेगी और वह उस प्रवृत्ति को तीव्रता के अनुरूप देर में या जल्दी लिंग-परिवर्तन कर लेगा। इसमें एकाध जन्म की देरी भी हो सकती है। लिंग-परिवर्तन की ऐसी घटनाओं में; जिनमें नारी नर के रूप में या नर नारी के रूप में परिणत किए गए, उनमें शारीरिक या मानसिक कारण नहीं होते; वरन अंतःचेतना का गहन स्तर—  "कारणशरीर ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि विनिर्मित करता है। नपुंसक वर्ग भी ऐसी ही स्थिति है। इसे परिवर्तन का मध्य स्थल कह सकते हैं।"

समलिंगी आकर्षण से लेकर सहवास तक की अनेक घटनाएँ देखने सुनने में आती रहती हैं। इसमें भी वह अतृप्त आंतरिक आकांक्षा ही उभरती है। दो नारी यदि नररूप में विकसित हो रही होंगी, तो उनमें नर के प्रति आकर्षण की विद्यमान मात्रा स्त्री रति की अपेक्षा पुरुष रति में रस एवं तृप्ति अनुभव करेगी और उनमें परस्पर घनिष्ठता बढ़ती जाएगी। इसी प्रकार दो नर यदि नारीरूप में विकसित हुए हैं, तो उनका पूर्वाभ्यास नारी के प्रति आकर्षण बनाए रहेगा और वे दो नारियाँ परस्पर मिलन का अधिक आनंद अनुभव करेंगी। यह विपर्यय दोनों कारणों से हो सकता है। विकसित होती हुई आकांक्षा भी अपनी अतृप्ति का समाधान कर सकती है। इसी प्रकार विकास आगे चल पड़ा है। शरीर बदल गए हैं, पर पूर्व मनोवृत्ति में भिन्न लिंग संस्कार अभी भी प्रबल हैं, तो वे भी बार-बार वैसी ही उमंगे उठाकर समलिंगी संपर्क से अधिक आकर्षण अनुभव कर सकते हैं।

गत वर्ष योरोप में ऐसे विवाहों को अदालत द्वारा भी मान्यता मिल चुकी जिनमें पति दोनों या तो नर ही थे या नारी ही नारी। यों ऐसे प्रसंग निजी और अप्रकट रूप से चलते तो रहते हैं पर पिछली न्यायिक परंपराएं तोड़कर जिन्हें कानूनी मान्यता मिली हो ऐसे विवाह गत वर्ष ही सर्वसाधारण के सामने आये हैं।

कामवासना को ही लें। पुराने जमाने में भस्में तथा रसायनों खिलाकर मृत या स्वल्प कामेच्छा को पुनर्जागृत करने का प्रयत्न किया जाता था। वह प्रयास भी नशे से उत्पन्न क्षणिक उत्तेजना जैसी ही सिद्ध हुई। जब से हारमोन प्रक्रिया का ज्ञान हुआ है, तब से यौन ग्रंथियों के रसों को पहुँचाने से लेकर बंदर एवं कुत्ते की ग्रंथियों का आरोपण करने तक का क्रम बराबर चल रहा है। आरंभ में उससे तत्काल लाभ दीखता है, पर वह बाहर का आरोपण देर तक नहीं ठहरता। भयंकर आपरेशनों के समय रोगी को अन्य व्यक्ति का रक्त दिया जाता है, वह शरीर में 3-4 दिन से अधिक नहीं ठहरता। शरीर यदि नया रक्त स्वयं बनाने लगे तो ही फिर आगे की गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आरोपित स्राव अथवा रस ग्रन्थियाँ तत्तकाल ही लाभ दिखावेंगी। यदि उत्तेजना से अपनी ग्रंथियाँ जागृत होकर स्वतः काम करने लगें तो ही कुछ काम चलेगा अन्यथा वह बाहरी आरोपण की फुलझड़ी थोड़ी देर चमक दिखाकर बुझ जाएगी। अब तक के बाहरी आरोपण के सारे प्रयास निष्फल हो गए हैं। कुछ सप्ताह का चमत्कार देख लेने के अतिरिक्त उनसे कोई प्रयोजन सिद्ध न हुआ।

सन् 1876 में एक वृद्ध डॉक्टर ब्राउन सेक्वार्ड ने घोषणा की कि उसने कुत्ते को वृषण रस अपने शरीर में पहुँचा कर पुनः यौवन प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर ली है। 72 वर्षीय इस डॉक्टर की ओर अनेक चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने उसकी घोषणा को सच पाया, लेकिन यह सफलता स्थिर न रह सकी वह कुछ ही दिन बाद पुनः पुरानी स्थिति में आ गए।

इंग्लैण्ड के डॉक्टर मूरे ने थामरेक्सिन का प्रयोग एक थाइराइड विकारग्रस्त रोगिणी पर किया। दवा का असर बहुत थोड़े समय तक रहता था। कुछ वर्ष जीवित रखने के लिये एक-एक करके 870 भेड़ों की ग्रंथियाँ निचोड़कर, उसे आए दिन लगानी पड़ती थी। इस पर धक्का-मुक्की करके ही उसकी गाड़ी कुछ दिन और आगे धकेली जा सकी।

शरीरशास्त्रियों ने इस अद्भुत निरंकुश को ढूँढ़ने का प्रयत्न किया, तो उनकी पकड़ में अंतःस्राव ग्रंथियाँ आ गई। इनमें छह प्रधान हैं। कई उप-प्रधान हैं। इनमें तनिक-तनिक से रस स्रावित होते रहते हैं और वे रेंग कर रक्त में जा मिलते हैं। इन्हें हारमोन कहते हैं। इनके भी कई भेद-उपभेद ढूँढ़े गए हैं। इतना सब होते हुए भी यह आश्चर्य का ही विषय है कि इनमें आखिर ऐसा क्या जादू है, जो शरीर की सामान्य व्यवस्था में इतनी भयानक उलट-पुलट वे करके रख देते हैं। स्वास्थ्य के साधारण नियमोपनियम एक ओर और इनकी मनमानी एक ओर, तथा इस रस्साकशी में सामान्य व्यवस्था लड़खड़ा जाती है और इन हारमोनों की मनमानी जीतती है। इन स्रावों का रासायनिक विश्लेषण करने पर वे सामान्य स्तर के ही सिद्ध होते हैं, उनमें कुछ ऐसी अनहोनी मिश्रित नहीं दीखती जिससे ऐसे उथल-पुथल भरे परिणाम होने चाहिए। पर ‘चाहिए’ को ताक पर रखकर जब ‘होता’ है, सामने आता है, तो बुद्धि चकरा जाती है और इन अंधाधुंधी में हाथ पर हाथ डालकर बैठना पड़ता है।

जहाँ तक खोज का विषय है, उन अंतःस्राव ग्रंथियों का— "उनमें प्रवाहित होने वाले रसों का स्वरूप समझ लिया गया और उनका रासायनिक विश्लेषण कर लिया गया है।" पर उनकी असाधारण महत्ता और असाधारण हरकत का कुछ कारण नहीं, जाना जा सका। इतना ही नहीं उनके नियंत्रण का भी कोई उपाय हाथ नहीं लगा है। यह मोटा और भोंड़ा तरीका है कि उसी स्तर के रसायन बाहर से पहुँचाकर उन स्रावों की कमी-वेशी के परिणामों को रोकने का प्रयत्न किया जाए। इतना ही बन पड़ा है, सो किया भी गया है। अन्य जीवों से प्राप्त करके- अथवा रासायनिक पद्धति से विनिर्मित करके उन रसों को व्यक्ति के शरीर में पहुँचाकर यह किया जाता है कि विकृतियों पर नियंत्रण किया जाए। उसका लाभ होता तो है पर रहता क्षणिक ही है। भीतर का उपार्जन बंद हो जाए, तो बाहर से पहुँचाई मदद कब तक काम देगी। इसी प्रकार जमीन फोड़कर कोई स्त्रोत निकल रहा हो तो उसे एक जगह से बंद करने पर दूसरे छेद से फटेगा। यह तो तात्कालिक या क्षणिक उपचार हुआ । बात तब बनती है, जब उत्पादन के केंद्र स्वतः ही अपने स्रावों को घटा या बढ़ा लें। उपचार का उद्देश्य तो तभी पूरा हो सकता है। पर यह स्थिति हाथ आ नहीं रही है। शरीरशास्त्रियों के सारे प्रयत्न अब तक निष्फल ही रहे हैं; और आगे भी इनकी अद्भुत संरचना और कार्यपद्धति को देखते हुए कुछ अधिक आशा नहीं बँधती।

ओछी भावनाएँ अंतरात्मा में जमी हों और छोटा बनाने वालों पर बड़प्पन के संस्कार जम जाएँ, तो शरीर को ही नहीं मस्तिष्क को भी बड़ा बनाने वाले हारमोन उत्पंन होंगे। इंद्रिय भोगों में आसक्त अंतः भूमिका अपनी तृप्ति के लिए कामोत्तेजक अंतःस्रावों की मात्रा बढ़ाती है। विवेक जागृत हो और विषय भोगों की निरर्थकता एवं उनकी हानियों को गहराई से समझ लिया जाए, तो इन हारमोनों का प्रवाह सहज ही कुण्ठित हो जाता है। इसी प्रकार वियोग, विश्वासघात, अपमान जैसे आघात अंतःकरण की गहराई तक चोट पहुँचा दें ,तो युवावस्था में भी भले-चंगे हारमोन स्त्रोत सूख सकते हैं इसके विपरीत यदि रसिकता की लहरें लहराती रहें, तो वृद्धावस्था में भी वे यथावत् गतिशील रह सकते हैं। जन्मांतरों की रसानुभूति बाल्यावस्था में भी प्रबल होकर उस स्तर की उत्तेजना समय से पूर्व ही उत्पन्न कर सकती हैं।

कामक्रीड़ा शरीर द्वारा होती है, कामेच्छा मन में उत्पन्न होती है। पर इन हारमोनों की जटिल प्रक्रिया न शरीर से प्रभावित होती है और न मन से। उसका सीधा संबंध मनुष्य की अंतःचेतना से है इसे आत्मिक स्तर कह सकते हैं। जीवात्मा में जमे काम बीज जिस स्तर के होते हैं तदनुरूप शरीर और मन का ढाँचा-ढलता और बनता-बिगड़ता है। हारमोनों को भी प्रेरणा, उत्तेजना वहीं से मिलती है।

पीनियल ग्रंथि भूमध्य-भाग में है। जहाँ देवताओं का तीसरा नेत्र बताया जाता है। प्राचीनकाल में ऐसे प्राणी थे भी जिनके मस्तिष्क में सचमुच एक अतिरिक्त तीसरी आँख और भी होती थी, जिससे वे बिना गर्दन मोड़े पीछे के दृश्य भी देख सकें। अभी अफ्रीका में कुछ ऐसी छिपकलियाँ देखी गई हैं; जिनके सिर पर कार्निया, रेटिना लेन्स युक्त पूरी तीसरी आँख होती है।

धान के दाने की बराबर धूसर रंग की इस छोटी-सी ग्रंथि में आश्चर्य भरे पड़े हैं। जिन चूहों में दूसरे चूहों की पीनियल ग्रंथि का रस भरा गया, वे साधारण समय की अपेक्षा आधे दिनों में ही यौन रूप में विकसित हो गए और जल्दी बच्चे पैदा करने लगे। समय से पूर्व उनके अन्य अंग भी विकसित हो गए, पर इस विकास में जल्दी भर रही मजबूती नहीं आई। काम दहन की शिवजी की कथा की इन हारमोन से संगति अवश्य बैठती है, पर अंतःकरण की रुझान जिस स्तर की होगी, शरीर और मन ढालने के लिए हारमोनों का प्रवाह उसी दिशा में बहने लगेगा।


अभिमान न करे (कहानी)

एक राजा को ऐसा अभिमान हुआ कि स्वयं को ही भगवान घोषित कर दिया। चाटुकार राज्य कर्मचारी भी उसकी हाँ में, हाँ मिलाते। जो न मिलाता राजा उसे व्यर्थ ही दंड देता और राज्य से निकाल देता।

एक दिन एक साधु दरबार में उपस्थित हुए और राजा से पूछा—  "महाराज बताइए आपके राज्य में कितने कौवे, कितने कबूतर और दूसरे पक्षी हैं?" राजा ने कहा— "यह तो मुझे नहीं मालूम? तो फिर उन सबको भोजन कैसे देते होंगे। भगवान तो, सबको खिलाता, सबकी रक्षा करता है। राजा के ज्ञान-चक्षु खुल गए उस दिन के बाद उसने अभिमान करना छोड़ दिया ।"


शरीरगत विद्युतशक्ति को सुरक्षित रखें— बढ़ाएँ

विद्युत वैज्ञानिक की दृष्टि में पृथ्वी एक चुंबकीय शक्ति से भरा पूरा गोला है। रासायनिक पदार्थों का अस्तित्त्व अवश्य है पर उनकी क्षमता, कार्य-प्रणाली, परिवर्तन-पद्धति, सम्मिश्रण से रूपांतरण की प्रक्रिया जैसी हलचलों के पीछे वह विद्युतशक्ति ही काम करती है, जिसे प्रत्येक पदार्थ का प्राण कहना चाहिए। यदि इसका अपहरणकर लिया जाए, तो वस्तु अपनी मौलिक विशेषताएँ खो बैठेगी और मृततुल्य बन जाएगी।

यह तथ्य न केवल वस्तुओं के संबंध में है,अपितु जीवित प्राणियों के संबंध में भी है। जीवन और मृत्यु के बीच अंतर करने वाले तत्त्व को अध्यात्म की भाषा में ‘प्राण’ कहा जाता है । भौतिकविज्ञानी उसे बिजली की ही एक किस्म मानते हैं।

यह शरीरविद्युत जिसके शरीर में जितनी अधिक मात्रा में संचित होती है, वह उतना ही अधिक तेजस्वी, सुंदर, सक्रिय, स्फूर्तिवान, ओजस्वी, प्रतिभावान दिखाई पड़ता है। शरीर की रोग-निरोधकशक्ति एवं मस्तिष्क की सूक्ष्मदर्शिता, दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता इसी विद्युत पर निर्भर है।

स्वभाव के मिठास को आमतौर से आकर्षण कहा जाता है। अंग की कोमलता में भी जिस सौंदर्य की झाँकी होती है, उसमें भी शरीर शास्त्रीय दृष्टि से विद्युत कंपन की ही विशेष थिरकन समाई रहती है। किसी की आँखों में, किसी के होठों में, किसी की ठोड़ी आदि में विशेष मनमोहकता रहती है, इसका तात्विक विश्लेषण करने पर मानवी शरीर की बिजली ही लहराती सिद्ध होती है। इसमें जब कमी होने लगती है, तो शरीर रूखा, नीरस, कुरूप, शिथिल, निस्तेज, दिखाई पड़ने लगता है। आँखों में दीनता, चेहरे पर उदासी छाई रहती है, इस विघटन को देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि तेजस्विता की तरंगें शिथिल हो गई और अभीष्ट-ऊर्जा का अभाव हो गया।

शरीर में रक्त-मांस की वृद्धि के लिए उपाय किए जाते हैं। पर इस तथ्य पर पहुँचने में भूल की जाती है कि आग मंदी पड़ जाने पर पकने और पचने की क्रिया ही नहीं, उमंग और उत्कर्ष का प्रत्येक पक्ष शिथिल पड़ जाता है। यह अभाव समस्त शरीर की दुर्बलता अथवा अंग विशेष की अशक्तता के रूप में प्रकट होकर मनुष्य को रुग्ण बनाता है। बीमारी में रोग-कीटाणुओं की खोज की जाती है। इनकी उपस्थिति कारण नहीं लक्षणमात्र है। जिस तरह निर्जीव प्राणरहित मांस में कीड़े पड़ जाते हैं, उसी प्रकार देह में विद्युत की अभीष्ट मात्रा में जहाँ कमी आई वहाँ उस अर्धमृत काया पर तुच्छ-से कीटाणु अपना अंग जमाते और वंश बढ़ाते चले जाते हैं। यदि शरीर में गर्मी की बिजली की आवश्यक मात्रा विद्यमान हो, तो उसके प्रचंड तेज में किसी विजातीय द्रव को, रोग-कीटक को जीवित रहने का अवसर नहीं रहता। बाहर के आक्रमणकारी कीटाणु उसमें प्रवेश करते ही जल-भुनकर नष्ट हो जाते हैं।

पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति से जड़-चेतन जगत भर-पूरा लाभ उठाता है। मनुष्य ही नहीं अन्य प्राणी भी उससे लाभांवित होते हैं। पक्षी ऋतु-परिवर्तन के अनुरूप सुविधाजनक स्थानों में आते जाते रहते हैं। इसके लिए, उन्हें हजारों मील लंबी महासागरों को पार करती हुई, लंबी उड़ाने-उड़नी पड़ती है। बहुधा यह उड़ाने रात्रि में होती हैं। यह पक्षी किस प्रकार दिशाज्ञान प्राप्त करते हैं और कैसे अभीष्ट स्थानों तक पहुँचते हैं? इनका मार्गदर्शन कौन करता है? इसका उत्तर पृथ्वी की ध्रुवीय आकर्षणशक्ति से ही मिलता है। यह पक्षी ग्रीष्मांत में उत्तर से दक्षिण की ओर और बसंत में दक्षिण से उत्तर की ओर उड़ते हैं। अपनी अतींद्रिय चेतना के आधार पर, यह पक्षी पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं का ही सहारा लेते हैं और बिना भूले अपने अभीष्ट लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

अपने भीतर देवत्त्व का आकर्षणतत्त्व भरे हुए महामानव धरती की तरह ही अदृश्यरूप से असंख्य मनुष्यों का सूक्ष्म मार्गदर्शन करते रहते हैं। प्रत्यक्ष में भले ही उनकी यह क्रिया दीख नहीं पड़ती, पर अतींद्रिय चेतना के आधार पर असंख्य मानवों को उस अदृश्य प्रेरक से ऐसा प्रकाश-प्रोत्साहन और साहस मिलता रहता है, जिसके सहारे वे लक्ष्य तक सफलतापूर्वक पहुँच सकें।

पक्षी ही क्यों— "अतिक्षुद्र जीव भी धरती की उस चुंबकीय क्षमता से अनायास ही प्रेरणा ग्रहण करते और प्रभावित होते रहते हैं। ‘टर माइट’ नामक एक कीड़ा अपने घर सदा पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं के समानांतर ही बनाता है।"

मनुष्य शरीर की गतिविधियाँ इसी व्यापक चुंबकीय प्रेरणा से प्रभावित हैं। जीवकोषों के सूत्र-विभाजन की आरंभिक और मध्यावस्था का चुंबकीय शक्ति रेखाओं के साथ आश्चर्यजनक तालमेल है। कोषों का विभाजन में क्रोमोज़ोम निरंतर सेलों के ध्रुवों की ओर ही चलता है।

विद्युत और चुंबक में परस्पर अत्यधिक घनिष्ठ संबंध है। डायनेमो की रचना स्पष्ट करती है कि चुंबकीय-क्षेत्र का परिवर्तन विद्युतधारा उत्पन्न करता है। इसी प्रकार यदि विद्युतधारा किसी लौहखंड में प्रवाहित की जाए, तो वह भी चुंबक बन जाता है। यह तथ्य बताते हैं कि— "ऊर्जा-क्षमता ही चुंबक के रूप में परिणत होता है। आत्मबलसंपंन व्यक्ति ही अपने में प्रभावात्मक आकर्षण पैदा करते हैं और आकर्षक-स्वभाव वाले शक्तिसंपंन बनते हैं। उसे अन्योन्याश्रय संबंध ही मानना चाहिए। एक को प्राप्त करने के उपरान्त दूसरी विशेषता अनायास ही उत्पन्न होती है"।

रक्तनलिकाओं में लौहयुक्त हीमोग्लोबिन भरा पड़ा है। यह लौह ही विश्वव्यापी चुम्बकत्त्व को अपनी ओर आकर्षित करता है और उस संचय के आधार पर शरीर का क्रियाकलाप चलाते रहने योग्य बिजली प्राप्त होती है। यदि यह लौहतत्त्व शरीर में कम पड़ जाए, तो मनुष्य निर्जीव और अनाकर्षक बनता चला जाएगा और जीवित न रह सकेगा।

हिन्दू शास्त्रों में, हिन्दू धर्मग्रन्थों में, जापानी परंपराओं में इस बात का प्रतिपादन है कि सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर करके सोना चाहिए। इसके औचित्य की रीचेन बैक, डूरविले, क्लोरिक, अब्रावस, रेग-नाल्ट लिंप्रिस, मुलर प्रभृति अनेक मनःशास्त्रियों ने लंबी खोज की और उसे ही सही बताया। उनने यही निष्कर्ष निकाला है कि सही और गहरी नींद के लिए उत्तर की ओर—  "उत्तरी ध्रुव की ओर मस्तिष्कीय चुंबक का रुख रहना चाहिए। उत्तर को सिर करके सोना ही ठीक है।"

डॉक्टर मौरिनेस्को ने अपने प्रयोगों में चुंबकीय उपकरण द्वारा तीसरी वोट्रकिल को धन ध्रुवीण करके कृत्रिम निद्रा उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की है। मस्तिष्क को अचेत करने वाले इन्जेक्शनों की तरह ही इस प्रयोग का प्रभाव सम्भव पाया गया। लोहे के पलंगों की अपेक्षा लकड़ी की चारपाई की- लोहे की छड़ी या टीन की चादर से बने मकानों की अपेक्षा लकड़ी मिट्टी या फूँस के पटाव को अधिक उपयुक्त इसलिये पाया गया कि ध्रुवीय विद्युत संचार का- आकाशीय विद्युत- फेराडेन्डेज का अनावश्यक संग्रह शरीर में न होने पावे। अनावश्यक संग्रह हर चीज का अहितकर होता है। चुम्बकत्व की अनावश्यक मात्रा शरीर और मस्तिष्क में ठूँसने वाले लौह उपकरण इस दृष्टि से यदि अनुपयुक्त माने गये हैं तो यह तर्कसंगत ही है।

पृथ्वी दृश्यरूप से मिट्टी, पानी, खनिज, वनस्पति आदि का समन्वय दीखती है, या सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर वह एक विशाल चुबक ही प्रतीत होती है । मानव शरीर भी यों रक्त, मांस, अस्थि, त्वचा आदि का समूह दीखता है, पर तात्विक दृष्टि से उसे भी एक चलता फिरता सजीव चुंबक ही कहना चाहिए।

शरीर का प्रत्येक कोषाणु एक विद्युत इकाई है। जिस तरह पौधे अपने पत्तों द्वारा आकाश से सांस वायु ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार यह कोषाणु आकाशीय वायु मंडल से ‘फ्रीक्वेन्सी आवृत्ति’ खींचते हैं। उन्हीं के आधार पर वे अपना वाइब्रेट (कंपन) एवं आसीलेट (दोलन) क्रम चलाते हैं।

स्विट्जरलैंड के डॉक्टर फिलिप्स आरोलस पेरा सेलसंस ने कितनी ही बीमारियों का कारणशरीरगत चुम्बकत्त्व की विकृति एवं विशृंखलता को सिद्ध किया है। ऐसे रोग जिनका कारण डॉक्टर ठीक से समझ नहीं पा रहे थे और चिकित्सा के अनेक प्रयोगों में असफल रह रहे थे, डॉक्टर फिलिप्स ने रुग्ण केंद्रमूलों में चुंबक की आवश्यक मात्रा पहुँचाकर उन रोगों से मुक्ति दिलाई।

चुंबकत्त्व का उत्तरी ध्रुव जीवाणु-क्रिया को नियंत्रित करता है और दक्षिणी ध्रुवशक्ति पोषण की आवश्यकता पूरी करता है। अस्वस्थता को इन दो वर्गों में वर्गीकृत करके यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चुंबक की दोनों धाराओं में से किसका, कहाँ और कितना उपयोग किया जाए?

‘मेडीकल वर्ल्ड न्यूज’ पत्रिका में शिकागो की वायो मैगनेटिक रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा किए गए। इस संदर्भ के अनुसंधानों का विस्तृत विवरण छपा है। हंगरी निवासी डॉ. जीन बारगेथी के प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला है कि विषाणुओं से निपटने और कोषाणुओं की अशक्तता को दूर करने में चुंबक के प्रयोग आश्चर्यजनक रीति से सफल हो रहे हैं। इस चिकित्सा पद्धति का स्वतन्त्र नामकरण किया गया है—’वायोमैगनेटिक्स’।

‘फेट’ पत्रिका में जीसेफ एफ. गुडवेज का एक लेख छपा है, उसमें उन्होंने चुंबकत्त्व के प्रभाव परिणामों पर विस्तृत प्रकाश डाला है। इसी विवरण में उन्होंने डॉक्टर के. ई. मेकलीन के निजी प्रयोग की चर्चा की है और कहा है कि वे प्रतिदिन 3600 ग्रास चुंबकीय-क्षेत्र का अपने शरीर पर प्रयोग करने के कारण स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने में सफल रहे हैं। वे 64 वर्ष की आयु में भी 45 वर्ष जैसे लगते हैं।

प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी फ्रांसिस विक्टर व्रोसाइस और डॉक्टर हार्वर्ड डी स्टेंगल ने चुंबक चिकित्सा के अनेक उदाहरणों का विवरण प्रस्तुत करते हुए, बताया है कि उसकी उपयोगिता और संभावनाएँ विश्व की किसी भी चिकित्सा प्रणाली से कम नहीं हैं।

मस्तिष्कीय विकृतियों में साधारणतया औषधियों का उपचार कुछ विशेष कारगर सिद्ध नहीं हुआ है। मूढ़ता, मंद बुद्धि, आवेश, आदतों की जकड़न से लेकर मृगी और उन्माद तक के औषधि उपचार यों होते तो रहते हैं, पर उनका प्रभाव अति स्वल्प ही देखा जाता है। इस क्षेत्र में जो थोड़ी बहुत सफलता मिली है उसका श्रेय विद्युत चिकित्सा को ही है। बिजली के झटके देकर अक्सर सनक और उन्माद का इलाज मानसिक अस्पतालों में किया जाता है और उनमें सफलता भी मिलती है। डॉ. के. हिलाल ने मस्तिष्कीय मूढ़ता और विकारग्रस्तता के लिए चंबक का प्रयोग करके, यह पाया कि इस माध्यम से उन कोषों को अधिक सुविधापूर्वक स्पर्श किया जा सकता है, जो इस प्रकार की रुग्णता के लिये उत्तरदाई है।

मनुष्य शरीर में बिजली की उपस्थिति न तो स्वल्प है और ने महत्वहीन। बालों में कंघी करके उतनी भर रगड़ से उत्पन्न चुंबक को देखा जा सकता है। बालों से घिसने के बाद कंघी को लोहे की पिन से स्पर्श करें, तो उसमें चुंबक के गुण विद्यमान मिलेंगे। निर्जीव बालों में ही नहीं सजीव मस्तिष्क में भी बिजली की महत्त्वपूर्ण मात्रा विद्यमान है। अन्य बिजलीघरों की तरह वहाँ भी बनाव-बिगाड़ का क्रम चलता रहता है। इस मरम्मत में चुम्बकीय चिकित्सा का आशाजनक उपयोग किया जा सकता है।

हमें शरीर एवं मन को सजीव, स्फूर्तिवान तेजस्वी बनाने के लिए, अपनी विद्युतशक्ति को सुरक्षित रखने का ही नहीं, इस बात का भी प्रयत्न करना चाहिए कि उसमें निरंतर वृद्धि भी होती चले। क्षतिपूर्ति की व्यवस्था बनी रहे। यह प्रयोजन, प्राणायाम, षट्चक्र-वेधन, कुण्डलिनी योग एवं शक्तिपात जैसी साधनाओं से संभव हो सकता है।


सद्वाक्य

जीवन जगाने के लिए है और इसके समान जीवन में कोई आनंद नहीं है। संपत्ति और वैभव मनुष्य को सुख देंगे, यह भ्रम है। सौंदर्य, और आनंद में ही सुख है, वास्तविक सौंदर्य— "शांत प्रकृति, पवित्र-आचार और पवित्र-विचार में है। ये बातें जिस मनुष्य में हैं, वही सुख का भोक्ता है, इस सुख को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अहर्निशि-संघर्ष करना चाहिए, यही जीवन है।"

—प्लेटो


हम ईश्वर के होकर रहें— उसी के लिए जिएँ।

परमेश्वर को अपनी इच्छानुसार चलाने के लिए विवश न करें; वरन उसकी इच्छापूर्ति के निर्मित स्वयं बनें । अब तक के उपलब्ध अनुदान कम नहीं, उन पर संतोष करना चाहिए और यदि अधिक की अपेक्षा है, तो बुद्धि और पुरुषार्थ के मूल्य पर उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।

इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान के सम्मुख गिड़गिड़ाना अशोभनीय है। जो मिला है उसी का सदुपयोग कहाँ कर सके जो और अधिक माँगने की हिम्मत करें। कर्मफल भोगने के लिए हमें साहसी और ईमानदार व्यक्ति की तरह तैयार रहना चाहिए। गलती कर्ण्व में कभी जो दुस्साहस दिखाया था, आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर्मफल को भोगते समय भी दिखाना चाहिए। विशेषत तब जबकि कर्मफल अनिवार्य है। उस विधान से कोई छूट नहीं सकता। स्वयं भगवान तक नहीं बच सके। तो हम क्यों साहस खोकर दीनता प्रकट करें। जो सहना ही ठहरा— "उसे हँसते हुए बहादुरी के साथ क्यों न सहें।"

कर्मफल से छुटकारे के लिए, पात्रता से अधिक उपलब्धियों के लिए प्रायः लोग ईश्वर का दरवाजा खटखटाते हैं और पूजा-परिचर्या की व्यवस्था बनाते हैं। यह भक्ति नहीं है। न इसमें श्रद्धा का पुट है। ऐसी ओछी दृष्टि से की गई उपासना से आत्मकल्याण का पथप्रशस्त नहीं होता और न वह परमेश्वर को ही प्रभावित करती है।

ईश्वर को अपना आज्ञानुवर्ती बनाने की अपेक्षा यह उचित है कि हम ईश्वर के आज्ञानुवर्ती बनें। ईश्वर को अपनी इच्छानुसार चलाने और अपनी नियम-व्यवस्था बिगाड़ देने के लिए कहने की अपेक्षा, यह उचित है कि हम ईश्वर की इच्छानुसार चलें और अपनी वासना, तृष्णाओं का ताना-बाना समेट लें। ईश्वर को अपना अनुचर बनाने की अपेक्षा यही उचित है कि हम उसके अनुचर बनें। मालिक की तरह ईश्वर पर हुक्म चलाना उचित नहीं। उपयुक्त यह है कि हम उसके आदेशों को समझें और तदनुरूप अपनी गतिविधियों का पुनःनिर्माण— "पुनर्निर्धारण करें।"

आस्तिकता का अर्थ केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करना ही नहीं, वरन यह भी है कि उसके निर्देशों का पालन यथावत किया जाए, उपासना का अर्थ समृद्धि और सुविधा के लिए गिड़-गिड़ाना नहीं; वरन यह है कि हमारा वह शौर्य सजग हो; जिसमें अंधकार में भटकते लोगों का अनुसरण छोड़कर ईश्वर के पीछे एकाकी चल सकें।

अच्छा हो हम ईश्वर के लिए जियें -उसके बनकर रहें और उसकी प्रेरणाओं का अनुसरण करें। उपासना का अर्थ है- पास बैठना। पास बैठें और बिठायें। जीवन के उद्देश्य और सदुपयोग का मार्ग पूछें और उस पर चलने की अपनी तत्परता बनायें। बैठने की दूरी क्रमशः घटनी चाहिए और निकटता इतनी बढ़नी चाहिए कि अपना आपा— "परमेश्वर में तल्लीन हो जाए और उस परम ज्योति से अपना कण-कण जगमगाने लगे।ठ

अपनी आकांक्षाओं में ईश्वरीय आकांक्षा घुली रहे। हम वही चाहना करें—  "वही सोचें जो ईश्वर प्रेरणा-प्रवाह के अनुकूल हो। हम व्ही करें,जो ईश्वर को अपेक्षित है। मन का शासन अस्वीकार करके— ईश्वर के हाथों अपने को सौंप दें और उसी के संकेतों पर अपने चिंतन और कर्तृत्त्व की दिशा का निर्धारण करें।"

अपने लिए नहीं हम ईश्वर के लिए जिएँ। यह घाटे का नहीं सबसे अधिक लाभ का कदम है। यह निश्चित है कि जो ईश्वर का होकर रहता है, ईश्वर भी उसी का हो जाता है।


सद्वाक्य

ईश्वरप्राप्ति के लिए, मुझे अपनी अनासक्ति ही अच्छी लगती है, उसमें सब कुछ आ जाता है।

—गाँधी


मस्तिष्कीय स्तर मोड़ा और मरोड़ा जा सकता है।

मस्तिष्क की विचित्रता असंदिग्ध है। जीवित रहने के लिए आवश्यक क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष संचालन यों विभिन्न अंग प्रत्यंगों द्वारा होता है, पर उसका मूलभूत आधार मस्तिष्क की संचार-प्रणाली है। अचेतन द्वारा शरीर की स्वसंचालित प्रणाली की साज-सँभाल रखी जाती है और चेतन द्वारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अंतःकरण चतुष्ट्य का संचालन होता है। मस्तिष्क की स्थिति के अनुरूप व्यक्तित्व का निर्माण होता है, प्रगति का पथप्रशस्त होता है। सोचने की विशेषता ने ही मनुष्य को क्रमशः समुंनत करते हुए इस स्थिति तक पहुँचाया है, जहाँ वह आज है। विज्ञान, शिल्प, दर्शन, अध्यात्म, कला, शिक्षा, चिकित्सा आदि ज्ञान की अगणित धाराएँ ही वे विभूतियाँ हैं जिनका संग्रह करके मनुष्य सामान्य न रहकर असामान्य बनता है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य जितना विकसित एवं साधनसंपंन दिखता है, उसे मस्तिष्कीय विकास का चमत्कार प्रतिफल ही कहना चाहिए।

इन मनः संस्थान का विकास ही दूसरे शब्दों में मानवी विकास कहा जा सकता है। उसका स्तर गिर जाना यदि जीवन का अधःपतन कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

मानसिक स्तर के परिवर्तन के संबंध में परंपरागत उपाय चल रहे हैं उनकी गति मंथर है। कान और आँख के माध्यम से जिस स्तर की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं क्रमशः मनुष्य का रुझान उस ओर ढलना शुरू होता है। इसलिए प्रचारकों द्वारा लेखनी और वाणी का उपयोग किया जाता है। दृश्य और श्रव्य आधार उपस्थित किए जाते हैं। स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता इसी प्रयोजन के लिए अनुभव की जाती है। चिंतन और मनन द्वारा व्यक्ति अपने आप भी अपने मानसिक स्तर को बढ़ाता है। इन दिनों मस्तिष्कीय विज्ञानवेत्ताओं का शोधकार्य यह चल रहा है कि परंपरागत मंथर उपायों के अतिरिक्त कुछ ऐसे उपाय प्राप्त किए जाएँ; जिनमें मस्तिष्कीय स्थिति में अभीष्ट परिवर्तन तुर्त-फुर्त किया जा सके आज इस स्तर की गतिविधियाँ जो अपनाने हुए हैं, वह कल दूसरी तरह की स्वेच्छापूर्वक अपना लें। आज के डाकू को कल संत बनाया जा सके।

स्वतंत्र चिंतन की विशेषता को नियंत्रित करने के उपाय यदि सचमुच हाथ लग जाएँ, तब फिर यह संभव हो सकेगा कि उस विज्ञान का ज्ञाता अपनी इच्छित दिशा में गतिशील होने की प्रेरणा अगणित मनुष्यों को दे सके। इस उपलब्धि में जहाँ सुधार की संभावनाएँ हैं, वहाँ यह खतरा भी है कि कोई अधिनायक समस्त प्रजा पर अपनी इच्छित विचारधारा थोपकर उसे सदा के लिए वशवर्ती बना ले।

मनोविज्ञान रसायनों के विशेषज्ञ डॉ. स्किनर का कथन है कि वह दिन दूर नहीं जब इस बीस करोड़ तंत्रिका कोशिकाओं वाले तीन पौंड वजन के अद्भुत ब्रह्मांड— "मान वीय मस्तिषक के दिए एक से एक अद्भुत  रहस्य को बहुत कुछ समझ लिया जाएगा और उस पर रसायनों तथा विद्युतधाराओं के प्रयोग द्वारा आधिपत्य स्थापित किया जा सकेगा"। यह सफलता अब तक की समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियों से बढ़कर होगी; क्योंकि अन्य सफलताएँ तो केवल मनुष्य के लिए सुविधा-साधन ही उत्पन्न करती हैं, पर मस्तिष्कीय नियंत्रण से तो अपने आपको ही अभीष्ट स्थिति में बदल लेना संभव हो जाएगा। तब देवता या असुर किसी भी रूप में मनुष्य की सत्ता को बदला जा सकेगा।

जर्मनी के मस्तिष्क विद्याविज्ञानी डॉ. ऐलन जैन बसन और उनके सहयोगी मार्क रोजन वर्ग एक प्रयोग कर रहे हैं कि क्या किसी सुविकसित मस्तिष्क की प्रतिभा का स्वल्पविकसित मस्तिष्क में परिवर्तन किया जा सकता है? क्या समर्थ मस्तिष्क का लाभ अल्पविकसित मस्तिष्क को अनुदान के रूप में प्राप्त हो सकता है?

शिक्षण की प्रणाली पुरानी है। शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्ति को पढ़ा-लिखाकर सुयोग्य बनाते हैं और मस्तिष्कीय क्षमता विकसित करते हैं। विद्यालयों में यही होता चला आया है।

चिकित्साशास्त्री ब्राह्मी, आँवला, शतावरी, असगंध, सर्पगंधी आदि औषधियों की सहायता बुध्दि-वृद्धि का उपाय करते हैं मस्तिष्क-रासायनिक तत्त्वों का सार लेकर इंजेक्शन द्वारा एक जीव से लेकर दूसरे के मस्तिष्क में प्रवेश करने का भी प्रयोग हुआ, पर वह कुछ अधिक सफल न हो सका। अन्य जाति के जीवों का विकसित मस्तिष्क सत्त्व अन्य जाति के जीवों का शरीर ग्रहण नहीं करता। कई बार तो उलटी प्रतिक्रिया होने से उलटी हानि होती है । फिर क्या उपाय किया जाए। उसी जाति के जीव का मस्तिष्क उसी जाति के दूसरे जीव को पहुँचाएँ, तो लाभ कुछ नहीं क्योंकि उनकी संरचना प्रायः एक-सी होती है।

मस्तिष्क के तीन भाग मुख्य हैं— "एक समस्त क्रिया-प्रक्रियाओं का संचालक, दूसरा मांस-पेशियों का नियंत्रक, तीसरा साँस लेने, भोजन पचाने आदि स्वसंचालित प्रक्रिया का विधायक। इन तीनों में वह भाग अधिक महत्त्वपूर्ण है, जो मन और बुद्धि को संभालता है। इसी के विकास को मानसिक विकास माना जाता है। शेष मस्तिष्कीय क्रियाकलाप प्राणियों के शरीरों की स्थिति के अनुरूप अपना काम करते ही रहते हैं।"

कुछ प्राणियों के मस्तिष्क सुई की नोंक जितने छोटे होते हैं। कुछ के बहुत बड़े। व्हेल मछली का मस्तिष्क मनुष्य से भी बड़ा होता है। इतने बड़े शरीर की व्यवस्था बनाये रखने के लिए इतना बड़ा यंत्र भी होना चाहिए, पर उसमें भी बौद्धिक प्रतिभा वाला भाग अविकसित है।

प्राणशास्त्री विचिस्टन और मनोविज्ञान शोधकर्त्ता वेलेस्कोव मानसिक विकास की बहुत कुछ संभावना इस बात पर संभव मानते हैं कि अविकसित मस्तिष्क वालों का सान्निध्य विकसित मस्तिष्क वालों के साथ रहे। सरकस के पशुओं को सिखाने में जहाँ सधाने की पद्धति कम कारगर सिद्ध होती है, वहाँ उनका बौद्धिक और भावनात्मक विकास बहुत कुछ पशु-शिक्षक की स्थिति से जुड़ा रहता है। समीपता के कारण उनका सोचने का ढंग और भावना बहुत कुछ वैसी ही बनने लगती है।

राजाओं, सेनापतियों के घोड़े, हाथी उनका इशारा समझते थे और सम्मान करते थे। बिगड़े हुए हाथी को राजा स्वयं जाकर संभाल लेते थे। राणा प्रताप, नैपोलियन— "झाँसी की रानी के घोड़े मालिकों के इशारे ही नहीं उनकी इच्छा को भी समझते थे और उनका पालन करते थे। यह उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व का अल्पविकसित बुद्धि वाले घोड़े हाथी आदि पशुओं पर पड़ा हुआ प्रत्यक्ष प्रभाव ही था"।

मस्तिष्क में से एक प्रकार की गंध सरीखी विशेष चेतन क्षमता निरंतर उड़ती रहती है। समीप रहने वाले लोग उस विशेषता से प्रभावित होते हैं। व्यक्तित्व जितना प्रभावशाली होगा— " मस्तिष्क जितना विकसित होगा, उसका संपर्क-क्षेत्र को प्रभावित करने वाला चुंबक भी उतना ही प्रभावशाली होगा। यदि तीव्र इच्छा और भावना के साथ इस शक्ति को किसी दूसरे की ओर प्रवाहित किया जाए, तो प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। मनस्वी लोगों की समीपता से अल्पबुद्धि वालों का मस्तिष्कीय विकास होने लगता है, भले ही वह मंदगति से क्यों न हो रहा हो।"

धातुपट्टी बाँधने-बंधवाने के झंझट से बचने के लिए एक दूसरा सरल रासायनिक तरीका निकाला जा रहा है, वह है रेडियो तत्त्वों से प्रभावित औषधियों को मनुष्य के रक्त में मिला देना। यह कार्य इंजेक्शन लगा कर अथवा मुख के द्वारा खिलाकर उसे खून में घोल दिया जाएगा। अब यह सारा रक्त ही एरियल का काम करेगा और प्रेषित प्रभाव तरंगों को पकड़कर रक्त में समाविष्ट करेगा। यह रक्त मस्तिष्क में पहुँचने पर मनुष्य को उसी प्रकार से सोचने के लिए मजबूर कर देगा जैसा कि रक्त में मिश्रित तरंगें उसे प्रेरणा देंगी। इस अपेक्षाकृत अधिक सरल विधि से वैज्ञानिक साधन किसी भी व्यक्ति को कुछ भी सोचने और कुछ भी करने के लिए पूर्णतया पराधीन बना देंगे।

जिस प्रकार अंतरिक्षयानों का नियंत्रण, निर्देशन धरती पर बैठे हुए वैज्ञानिक करते रहते हैं और यान उसके निर्देशानुसार अपनी गतिविधियों में हेर-फेर करता रहता है, ठीक उसी प्रकार यह प्रयत्न भी वैज्ञानिक-क्षेत्र में आरंभ हो गया है कि मनुष्य के मन मस्तिष्क को भी वैसी ही सूक्ष्मतरंगों द्वारा नियंत्रित किया जाए जैसे राकेटों को किया जाता है।

इन नए वैज्ञानिक अंवेषणों द्वारा मनुष्य को जीवित रोबोट बनाया जाएगा। वह संचालकों की इच्छानुसार चेतनायुक्त राकेट की भूमिका संपादित करेगा। प्रयोग अभी इस स्थिति में चल रहा है कि मनुष्य के सिर से एक विशेष प्रकार की धातुतारों से युक्त पट्टियाँ बाँध दी जाएँ और व्यक्ति के मस्तिष्क को एक प्रकार से रेडियो सुनते समय काम आने वाले एरियल की तरह बना दिया जाए। ट्रान्समीटर द्वारा फेंकी हुई शब्द किरणों को जिस प्रकार एरियल पकड़ता है और उसे रेडियो पर सुन लिया जाता है, उसी प्रकार वैज्ञानिक केंद्र द्वारा फेंकी गई तरंगों को मनुष्य के सिर पर बँधी हुई वह धातुपट्टी पकड़ेंगी और उसे मस्तिष्क में प्रवेश कर देंगी। बस चिंतन पर वही प्रेषित तरंगें छा जाएँगी और उसे जैसा सोचने के लिए निर्देश दिया गया था, वैसा ही सोचने के लिए विवश करेंगी। मनुष्य की स्वतंत्र चिंतन क्षमता समाप्त हो जाएगी और वह बौद्धिक पराधीनता से पूरी तरह ग्रस्त होकर वही सोचेगा, जो उसे सोचने के लिए बाध्य किया गया है।

क्या दूरवर्ती लोग बिना किसी तार रेडियो आदि के केवल मनः चेतना के आधार पर परस्पर संबंध स्थापित कर सकते हैं, उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान हो सकता है? इस प्रश्न को किंवदंतियों पर आधारित नहीं छोड़ा गया है; वरन मनः शास्त्रियों ने इस संदर्भ को शोध का विषय भी बनाया है। उत्तरी केरोलिना के ड्यूक विश्वविद्यालय द्वारा डॉ. राइन के नेतृत्त्व में इस विषय पर ढूँढ़-खोज की गई और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ. व्हाटले कैरिंगटन ने इस अंवेषण को हाथ में लिया। उन्होंने पाया कि यह चेतना एक सीमा तक हर किसी में होती है, पर जो लोग उसे विकसित कर लेते हैं वे अपेक्षाकृत अधिक सफल रहते हैं। किंहीं को जन्मजात रूप से यह प्राप्त रहती है और कुछ साधनाओं द्वारा इसे विकसित कर सकते हैं। प्रेम और घनिष्ठता की स्थिति में यह आदान-प्रदान किंहीं महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अनायास भी हो सकता है।

भारत के अध्यात्मवेत्ता किसी समय इस दिशा में बहुत बड़ी खोज करने और सफलता प्राप्त करने में कृतकार्य हो चुके हैं। बुद्ध की प्रचंड विचारधारा ने अपने समय में लगभग ढाई लाख व्यक्तियों को अपनी विलासी एवं भौतिक महत्त्वाकांक्षी गतिविधियाँ छोड़कर उस कष्टकर प्रयोजन को अपनाने के लिए खुशी-खुशी कदम बढ़ाया, जो प्रचंड मानसिक विद्युत से सुसंपंन बुद्ध को अभीष्ट था। भगवान राम ने रीछ-बानरों को ऐसे कार्य में जुट जाने के लिए भावावेश में संलग्न कर दिया; जिससे किसी लाभ की आशा तो थी नहीं; उलटे जीवन-संकट स्पष्ट था। भगवान कृष्ण ने महाभारत की भूमिका रचीं और उसके लिए मनोभूमियाँ उत्तेजित कीं। पांडव उस तरह की आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहे थे और न अर्जुन को उस संग्राम में रुचि थीं, तो भी विशिष्ट प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए मानसिक क्षमता के धनी कृष्ण ने उस तरह की उत्तेजनात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं। गोपियों के मन में सरस भावाभिव्यंजनाएँ उत्पन्न करने का सूत्र−संचालन कृष्ण ही कर रहे थे।

ईसा मसीह, मुहम्मद, जरथुस्त्र आदि धार्मिक-क्षेत्र के मनस्वी ही थे जिन्होंने लोगों को अभीष्ट पथ पर चलने के लिए विवश किया। उपदेशक लोग आकर्षक प्रवचन देते रहते हैं पर उनकी कला की प्रशंसा करने वाले भी उस उपदेश पर चलने को तैयार नहीं होते। इसमें उनके प्रतिपाद्य विषय का दोष नहीं उस मनोबल की कमी ही कारण है, जिसके बिना सुनने वालों के मस्तिष्क में हलचल उत्पंन किया जा सकना संभव न हो सका। नारद जी जैसे मनस्वी ही अपने स्वल्पपरामर्श से लोगों की जीवनधारा बदल सकते हैं। वाल्मीकि , ध्रुव, प्रहलाद, सुकन्या आदि कितने ही आदर्शवादी उन्हीं की प्रेरणा भरी प्रकाश-किरण पाकर आगे बढ़े थे। समर्थ गुरु रामदास, दयानंद , कबीर आदि मनस्वी महामानवों में अपने समय के लोगों को उपयोगी प्रेरणाएँ दी हैं और अभीष्ट पथ पर चलने के लिए साहस उत्पंन किया है। गान्धी जी की प्रेरणा से स्वतंत्रता संग्राम में अगणित व्यक्ति असाधारण त्याग-बलिदान करने के लिए किस उत्साह के साथ आगे आए, यह पिछले ही दिनों की घटना है।

शक्तिपात इसी स्तर की प्रक्रिया है; जिसमें मानुषी विद्युत से सुसंपंन व्यक्ति का तेजस दूसरे अल्पतेजस् व्यक्तियों में प्रवेश करके देखते-देखते समर्थ बना कर रख देती है। दीपक से दीपक जलने का पारस स्पर्श से लोहा सोना होने का, उदाहरण इसी प्रकार के संदर्भों में दिया जाता है।

वैज्ञानिक आधार पर मस्तिष्कीय नियंत्रण की प्रक्रिया यदि मनुष्य के हाथ लग गई, तो उससे सदा के लिए मानवी प्रजा को किसी अधिनायकवादी गुट के वशवर्ती हो जाने का खतरा है। अणुशक्ति के विनाशात्मक उपयोग की आशंका इसी कारण है कि उसका स्वामित्व अवाँछनीय लोगों में चला गया है। यदि वह प्रामाणिक हाथों में सीमित रही होती, तो उस वैज्ञानिक उपलब्धि से केवल हित-साधन ही होता।

मस्तिष्कीय नियंत्रण का विज्ञान विकसित होना चाहिए, पर उसका नियंत्रण सनातन महामानव ही कर सके, ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए। अच्छा यही है कि इस प्रतिस्पर्धा के युग में आत्मविज्ञान विकसित किया जाए और उस विद्या के विज्ञानी इस महाशक्ति का उत्पादन एवं उपयोग करने की दिशा में पहल करें।


महान विभूतियाँ (कहानी)

महान विभूतियाँ अपने जीवनकाल में कदाचित ही यश, सफलता, सहयोग पाती हैं। उस समय तो लोग उनका उपहास, तिरस्कार करते रहते हैं, पर जब वे चले जाते हैं तो पछताते और पूजते हैं। यही है इस दुनिया का विडंबना भरा रिवाज।

संसार का सबसे ख्यातिप्राप्त चित्र, ला मैडोला डेला ऐडिया है। वह क्लोरेंस के पिट्टी राजमहल में टँगा है। इटली सरकार ने इसे 1939 के न्यूयार्क के विश्व चित्रमेले में भेजा था। वहाँ उसे विश्व की सर्वोत्तम कृति के रूप में सम्मान मिला। इतना सुंदर भावाभिव्यक्ति कोई अन्य चित्रकार कर नहीं सका, ऐसा कहा जाता है। इस का मूल्य दस लाख डालर से भी अधिक आँका गया है।

इटली का महान चित्रकार राफेल एक दिन घूमता हुआ किसी देहात में जा पहुँचा। वहाँ उसने एक सुंदर दृश्य देखा— एक माँ अपने छोटे बच्चे को गोद में लिए भावपूर्वक महीन आवाज में कुछ गा रही थी, बगल में ही उसका बड़ा लड़का खड़ा था, जो छोटे भाई की तरह ही माँ की स्नेह-व्यंजना पाने के लिए आतुर होकर खिन्न मुद्रा में खड़ा था। इन भावाभिव्यक्तियों की गहरी छाप कलाकार के मन पर पड़ी और उसने उस चित्र को तूलिकाबद्ध करने का निश्चय किया।

राफेल घर आए और चित्र बनाने की तैयारी करने लगे। पर दुर्भाग्यवश उनकी आर्थिक तंगी कुछ भी करने नहीं दे रही थी। तस्वीर बनाने का कपड़ा उसे खड़ा करने का लकड़ी का ढांचा आदि वे कुछ भी न जुटा सके। उन्होंने कूड़े के ढेर में से शराब का एक खाली पीपा ढूँढ़ निकाला और उसी को सीधा करके चित्र बनाने के काम में लिया। चित्र उनने बड़े मनोयोग से बनाया। पर पेट की आग अब कुछ भी नहीं करने दे रही थी, सो वे एक भटियारे के पास गए और 25 सेंट की रोटियाँ खरीदने के बदले में उसी को उन्होंने वह चित्र बेच दिया।


प्रतिविश्व— प्रतिपदार्थ— शक्ति का अजस्र स्रोत

धूप के साथ छाया जुड़ी रहती है। ध्वनि की प्रति ध्वनि होती है, रबड़ की गेंद को दीवार पर मारने से लौटकर वह वापिस आती है। प्रकाश का प्रतिद्वंद्वी अंधकार मौजूद है। पेंडुलम एक ओर चला देने से उसके आगे-पीछे चलने की क्रिया अनायास ही चलने लगती है। हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन जैसे परस्पर जैसे परस्पर विरोधी क्रियाकलाप ही शरीर को जीवित रखते हैं। समुद्र में ज्वार-भाटे के कारण ही लहरों की तरंगशृंखला चलती है। ‘पिस्टन’ द्वारा गति तभी उत्पन्न होती है, जब वह आगे-पीछे चलने का क्रम अपनाता है। शक्ति-तरंगों के कंपन आगे-पीछे बढ़ने हटने की हलचल पर ही निर्भर है। क्रिया की प्रतिक्रिया पर ही इस विश्व का सारा क्रियाकलाप चल रहा है। पुण्य का प्रतिद्वंद्वी पाप, देव विरोधी-दानव, भगवान विरोधी-शैतान, सत् विरोधी-तम, स्वर्ग का प्रतिद्वंद्वी नरक इसी विरोध विपक्ष के आधार पर अध्यात्म जीवन की गतिविधियाँ कार्यांवित हो रही हैं।

अब पता चला है कि विश्व का प्रतिद्वंद्वी भी एक प्रतिविश्व है। जिसका अस्तित्व उस विश्व के समान ही मौजूद है, जिससे कि हमारा निरंतर काम पड़ता है और जिसकी शक्तियों से अवगत मानव समाज ने पदार्थ विज्ञान की शोध की है। उसी आधार पर विविध आविष्कारों के द्वारा अनेकों सुविधाओं की—"शक्ति और सामर्थ्य की"—"उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकी हैं।"

प्रतिविश्व का अंवेषण होना अभी बाकी है। उसकी शक्तियों को जानना, और उन्हें प्रयोग में लाने का श्रीगणेश अगले दिनों करना होगा; क्योंकि वर्तमान उपलब्धियाँ एकांगी एवं एकाकी हैं। उनकी अपूर्णता को पूर्णता में तभी परिणत किया जा सकेगा जब प्रतिविश्व की शक्तियों को प्राप्त कर लिया हो। फिर एक की कमी दूसरी से पूरी होगी और एक का ईंधन दूसरी से मिलेगा। तब विविध यंत्रों के संचालन के लिए तेल, कोयला, भाप, बिजली, एटम शक्तियों के द्वारा ईंधन प्राप्त करने की आवश्यकता न पड़ेगी। विश्व और प्रतिविश्व का परस्पर संतप्त समन्वय हो जाने से पदार्थ और प्रतिपदार्थ एकदूसरे का अभाव पूरा कर दिया करेंगे और लगभग सभी प्रयोजन स्वसंचालित पद्धति द्वारा पेंडुलम-प्रक्रिया की भाँति अपने आप चलते रहेंगे और जब जिस कार्य की आवश्यकता होगी उसे पदार्थ और प्रतिपदार्थ का तालमेल बिठा देने की प्रणाली संचालित कर देने मात्र से सब कुछ गतिशील हो जाया करेगा।

प्रतिविश्व की प्रतिपदार्थ की ओर जब से वैज्ञानिकों का ध्यान गया है, तब से एक नई हलचल, एक नई उमंग सर्वत्र दिखाई पड़ने लगी है। उसकी खोज के लिए सिद्धांत और आधार तलाश किए जा रहे हैं; क्योंकि जिन सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत पदार्थ का ढाँचा खड़ा किया गया है, वे प्रतिपदार्थ के लिए लागू न किए जा सकेंगे; वरन उसमें लगभग उलटे आधारों का कहीं-कहीं तिरछे लहराते सिद्धांतों का प्रयोग करना पड़ेगा, जब उसकी रूपरेखा बन जाएगी, तब आशा की जाती है कि एक ऐसी प्रतिविद्युतशक्ति का आविष्कार किया जा सकेगा, जो उपलब्ध विद्युत से कहीं अधिक शक्तिशाली होगी। उसके माध्यम से प्रस्तुत विद्युत उत्पादन के लिए, जो साधन जुटाने पड़ते हैं उनमें से किसी की भी आवश्यकता न रहेगी। बटन दबाने भर की देर होगी कि आकाशव्यापी विघुत और प्रतिविघुत परस्पर मिलकर प्रचुर परिमाण में बिजली पैदा करने लगेंगी और यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक उन दोनों को पृथक न किया जाए।

यह ब्रह्मांड अणुगठित पदार्थ से भरा है— "जिसे मैटर कहते हैं। पंचतत्त्व और उनसे बने अनेक जड़-चेतन इस पदार्थ वर्ग में ही आते हैं। प्रकाश-किरणें, रेडियो-किरणें, विद्युत-किरणें, ध्वनि-किरणें अणुकंपनी सहित पदार्थ जन्म क्रियाकलाप में गिनी जाती हैं।" जो शून्य या रिक्त दिखाई पड़ता है उस पोले भाग में वायु, ईथर आदि आँख से न दीखने वाले भरे पड़े हैं। यहाँ खाली कुछ नहीं है। विज्ञान की पिछली मान्यता यही रही है।

पर अब विज्ञान ने एक और तत्व खोज निकाला है। प्रतिपदार्थ अर्थात् पदार्थ का प्रतिद्वन्द्वी। जैसे क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, ध्वनि की प्रतिध्वनि इसी प्रकार पदार्थ का प्रतिद्वंद्वी एक प्रतिपदार्थ भी है जो सामर्थ्य में कम नहीं; वरन अधिक ही बैठता है।

जब कैंब्रिज विश्वविद्यालय के गणित प्राध्यापक डिराक ने ब्रिटेन की रायल सोसायटी के सम्मुख अपना एक निबंध सुनाते हुए यह तथ्य प्रतिपादित किया तो उस गोष्ठी में उपस्थित संसार भर के वैज्ञानिक अवाक् रह गये। डिराक ने क्वाँटम भौतिकी, सापेक्षतावाद, के सिद्धान्तों पर अणु के प्रतिद्वन्द्वी प्रति अणु का प्रतिपादन जिन अकाट्य तथ्यों के आधार पर किया था, उसे झुठलाया भी नहीं जा सकता है। जिस प्रकार ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी शैतान, धर्म का विरोधी पाप, देवता का प्रतिपक्षी असुर है उसी प्रकार यह प्रति अणु प्रति पदार्थ न केवल अस्तित्व ही सिद्ध करता है वरन् प्रति-पक्षी होने के कारण सामर्थ्यवान भी अधिक बैठता है। कितने आश्चर्य की बात है यह विश्व अपने साथ एक प्रतिविश्व भी सँजोये हुए है। पदार्थ के साथ-साथ प्रति पदार्थ भी अपना काम कर रहा है।

बहुत दिनों से विज्ञान क्षेत्र में परमाणु की जानकारी थी, पीछे वह भी एक इकाई नहीं रहा। वरन् इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि का समूह माना गया। पीछे उसके भीतर और भी ऐलीक्वेन्टरी पार्टिकल मेसान, न्यूट्रिनों आदि मिले। यह सभी अपने-अपने ढंग से गतिशील हैं। पर गति करने को तो जगह चाहिए खाली जगह न हो तो गति कहाँ और कैसे होगी— "यह खाली जगह ही प्रति पदार्थ है।"

यदि एक डिब्बे में खचाखच गोलियाँ भर दी जाए, तो फिर न तो वह हिल-डुल सकेंगी और न गिनी जा सकेंगी। इसी प्रकार यदि विश्व में अणु खचाखच भरे हों तो वे वैसी गति नहीं कर सकते जैसी कि अब करते हैं; और न उनका अस्तित्व ही अनुभव किया जा सकेगा। गतिशीलअणु और उसके साथ जुड़ा हुआ अवकाश दोनों के परस्पर संयोग-वियोग का जो क्रम निरंतर चलता है; उसी से शक्ति उत्पन्न होती है और चुंबकत्त्व भरी ऊर्जा का जो प्रवाह सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है, वह उसी उद्गम से प्रादुर्भूत होता है इसका जितना श्रेय अणु को है उतना ही उसे गतिशील रहने का अवसर देने वाले प्रतिअणु को। दोनों में से एक का अस्तित्व यदि समाप्त हो जाय तो विश्व में फिर किसी प्रकार की कोई हलचल दिखाई न पड़ेगी। तब अणु गतिशील न रहकर स्थिर बने बैठे होंगे। इलेक्ट्रॉन के इस प्रतिद्वंद्वी को ऐन्टीइलेक्ट्रान या पाजिट्रान कहते हैं।

डिराक के इस प्रतिपादन के आधार पर यह सोचा गया है कि अणु के प्रत्येक अवयव का प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। प्रकृति के प्रत्येक भौतिक पदार्थ का— "तत्त्व का"— "प्रतिद्वंद्वी यह है, तो फिर सचमुच ही पदार्थ की तुलना में एक उतना ही सशक्त प्रतिपदार्थ भी मानना पड़ेगा। इस शोध की वैज्ञानिकों ने जोर-शोर से खोज आरंभ की और आइरीन, फेडरिक, क्यूरी दंपत्ति, ने उसे एक वास्तविकता के रूप में पाया। एंडरसन ने ब्रह्मांड किरण संबंधी अपने अनुसंधान में इसी आधार पर सफलता प्राप्त की।"

प्रति पदार्थ कणों के बारे में एक बात ध्यान रखने योग्य है कि वे अकेले अपना अस्तित्व बनाए नहीं रह सकते, उत्पन्न होते हैं और अन्य कणों के साथ संयोग करके स्वयं विलुप्त हो जाते हैं। उनकी इस आँखमिचौनी के कारण ही विद्युत चुंबकीय विकरण की ऊर्जा इस विश्व को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो रही है। अब ब्रह्माण्ड का प्रतिद्वंद्वी प्रतिब्रह्माण्ड— "एन्टी युनिवर्स के सम्बन्ध में खोजें चल रही हैं। इस संदर्भ में यह जानकारी भी मिली है कि ‘साइग्लेस’ और ‘विर्गो’ नीहारिकाओं में पदार्थ और प्रतिपदार्थ के बीच युद्ध चल रहा है। संभव है यह अपना ब्रह्मांड भी अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ संघर्ष में निरत हो।"

अध्यात्म जगत में दक्षिण मार्ग और वाममार्ग-योग और तन्त्र की द्विविध परस्पर विरोधी आत्मबल उत्पादक साधना पद्धतियाँ प्रचलित हैं। दोनों ही विद्याएँ अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं। तंत्र की प्रत्यक्ष शक्तियोग से अधिक है इसीलिए असुर वर्ग उसे अपनाता रहेगा। जहाँ तक शक्ति उत्पादन का संबंध है वहाँ तक तंत्र अधिक क्षमता संपंन और जल्दी परिणाम उत्पन्न करने वाला है, पर उसमें दोष एक ही है कि योग संबंधित सतोगुण का सर्वथा प्रतिकूल तमोगुण उत्पन्न होता है। पाप वृत्तियाँ भड़कती हैं और उपलब्धियों को असुर कर्मों में लगा देने का क्रम चल पड़ता है। इसीलिए विचारशील लोगों ने उसे विष मिश्रित मक्खन की तरह हेय ठहराया है।

परमात्मा और जीव को पदार्थ— "प्रतिपदार्थ का युग्म कह सकते हैं। दोनों जब मिल जाते हैं,  तो परस्पर पूरक होते हैं। एक के अभाव की पूर्ति दूसरे से होती है।" और जीव अपने में स्वसंचालित शक्ति-प्रवाह का स्रोत उमड़ता देखता है; ऐसा स्रोत जो न तो कभी समाप्त होता है और न जिसकी क्षतिपूर्ति के लिये कुछ साधन जुटाने की आवश्यकता होती है।

सामान्यतया रति और प्राण की एकांगी स्थिति की पूर्ति प्रतिपक्षी लिंग वाले जीव के सान्निध्य से पूरी होती है। पति-पत्नी मिलन से न केवल भावनात्मक अभाव और इंद्रियजन्य अतृप्ति तृप्त होती है; वरन प्रजनन प्रक्रिया से संबंधित वंशवृद्धि का क्रम भी चलता है। यह प्रचलित एकपक्षीय पदार्थक्रम है। शक्ति उत्पादन के लिए ईंधन चाहिए। इस ईंधन की पूर्ति नर के लिए मादा से और मादा के लिए नर से पूरी होती है। रयि को चेतनाप्राण से और प्राण की तृप्ति रति से होती है। प्रचलित स्थूलक्रम यही है।

अगले दिनों पदार्थ और प्रतिपदार्थ की परस्पर पूरक उपलब्धि एक ही शरीर से पूरी हो जाया करेगी। प्राचीनकाल में यह विज्ञान कुंडलिनीयोग के नाम से प्रचलित था; उसमें एक ही शरीर को अवस्थित रयि और प्राण को उभारकर आत्मरयि का उच्चस्तरीय आनंद लिया जाता है। इतना ही नहीं आत्मा और प्रतिआत्मा के संयोग से वे सभी उपलब्धियाँ मिल जाती हैं; जिन्हें ऋद्धि-सिद्धि के नाम से पुकारा जाता है। भारतीय आत्मविज्ञानी चेतना विश्व में पदार्थ और प्रतिपदार्थ के आधार-सिद्धांतों से न केवल परिचित ही रहे हैं; वरन उनका प्रयोग भी करते रहे हैं। यदि इस संदर्भ में सुविस्तृत शोध की जाए, तो भौतिक विज्ञान और आत्मिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी बडी उपलब्धियाँ हाथ लग सकती हैं जिनके आधार पर मनुष्य को धरती का देवता कहा जा सकेगा।


तीन महीने के प्रशिक्षण का एक संक्षिप्त सत्र (कहानी)

तीन महीने के प्रशिक्षण का एक संक्षिप्त सत्र

परिवार के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को प्रशिक्षित करने के लिए इन दिनों शिक्षण शिविर शृंखला, गायत्री तपोभूमि में सफलतापूर्वक चल रही है । कतिपय अतिव्यस्त कार्यकर्त्ताओं का आग्रह था कि उन्हें इतने दिन का अवकाश न मिल सकेगा। कम समय के लिए ही उनका आ सकना संभव है। वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुए एक-एक माह के दो शिविर करने का निश्चय किया गया है। अस्तु 1 सितंबर से 30 सितंबर तक का एक और 1 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक दूसरा, इस प्रकार एक-एक माह के दो अतिरिक्त शिविर इसी प्रयोजन के लिए किए जा रहे हैं।

इन शिविरों में भी वही सारी शिक्षा दी जाएगी जिसकी चर्चा अखंड ज्योति मई 72 अंक के पृष्ठ 45 पर युगनिर्माण योजना मासिक के मई 72 अंक में पृष्ठ 11 पर और पाक्षिक के 20 मई अंक में पृष्ठ 22 पर विस्तारपूर्वक की जा चुकी है। तीन महीने वाले पाठ्यक्रम को ही कुछ संक्षिप्त तथा व्यस्त करके उसे एक महीने में संपंन करने का यह विशेष प्रयत्न है।

जो सज्जन इस प्रशिक्षण को प्राप्त करने के इच्छुक थे, किंतु तीन महीने का अवकाश न मिलने के कारण खिन्न थे, उनके लिॆए यह स्वर्ण अवसर है। उन्हें तत्त्काल अपने लिए 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से प्रारंभ होने वाले शिविर में आने के लिए स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। ऐसे संक्षिप्त किंतु अतिमहत्त्वपूर्ण अवसर का फिर कब अवसर आवे। कुछ कहा नहीं जा सकता।


परमेश्वर का निराकार और साकार स्वरूप

परमात्मा का सजीव और साकाररूप यह विश्व है। चैतन्यशक्तिसत्ता को अंतःकरण में अनुभव किया जा सकता है, आँखों से देखा नहीं जा सकता, इसलिए उसे निराकार कहते हैं। भावना के क्षेत्र में उदात्त मनोवृत्तियों के रूप में उसकी अनुभूति होती है और शरीरधारियों में सत्प्रवृत्तियों को ईश्वरीय चेतना का प्रकाश कह सकते हैं। पर यह सारा क्षेत्र निराकार ही है। निखिल ब्रह्मांड का सृजनकर्ता— "संचालक, महातत्त्व दृश्यमान नहीं। इसी प्रकार सद्भावनाएँ भी देखी नहीं जा सकती हैं।"

परमात्मा का साकाररूप देखना हो तो यह विश्व ही परमेश्वर माना जा सकता है। मूर्तियाँ और प्रतिमाएँ ध्यान साधना की एकाग्रता के लिए मनुष्य की अपनी सूझ-बुझ है। देवता या अवतारों के जैसे चित्र दिखाए या बताए जाते हैं, वे भी मानवीय कल्पनाएँ हैं। विभिन्न देश, धर्म के लोगों ने अपने रूप और स्वभाव वाले परमात्मा बनाए हैं; उनमें इतनी भिन्नता है कि उनमें कौन वास्तविक है यह निर्णय कर सकना शक्य नहीं।

ईश्वर की सभी प्रतिमाएँ सही हैं और सभी गलत। सही इसलिए है कि जिसमें श्रद्धा और सद्भावना का समन्वय हो वह कल्पनाकृति सही ही कही जानी चाहिए। गलत इसलिए है कि ईश्वर मनुष्य आकृति का ही हो यह क्या आवश्यक है? उसके लिए सभी जीव-कलेवर एक से हैं, वह मनुष्य का ही रूप क्यों बनायेगा। फिर मनुष्यों में भी भिन्न प्रकार की आकृति-प्रकृति क्यों धारण करेगा? यदि वस्तुतः उसका आकार होता तो सर्वत्र एक-सा ही अनुभव में आता। सूर्य, चंद्र आदि सर्वत्र एक समान ही देखे जाते हैं। रूपधारी परमेश्वर को मानवीय कल्पनाकृति ही कहना चाहिए। अवतारों की प्रतिमाएँ भी अवास्तविक हैं। उस अवतारकाल के वास्तविक-चित्र उपलब्ध नहीं। आकृतियों की भिन्नता का होना यही बताता है कि भक्तिभावना द्वारा ध्यान, उपासना, प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उपयुक्त माध्यम के रूप में उन्हें गढ़ा गया है। उनमें मूर्तिकार, शिल्पियों की कला को ही प्रत्यक्ष और वास्तविक कहा जा सकता है।

तब क्या ईश्वर का कोई स्वरूप है नहीं। क्या वह साकार नहीं है। निश्चितरूप से वह निराकार होने की तरह साकार भी है। इस विश्व में जो कुछ दृश्यमान हो रहा है, उसे भगवान ही कहना चाहिए। यों जड़ पदार्थ भी ब्रह्ममय है। उनके भीतर काम करने वाली परा प्रकृति-अणुसंचार-प्रक्रिया— "उसी महाशक्ति का स्पंदन है। चेतन प्राणियों में वह और भी स्पष्ट है। ज्ञान और इच्छाशक्ति के रूप में उसका दर्शन हर प्राणधारी में किया जा सकता है।" उसका और भी स्पष्ट-उत्कृष्ट दर्शन ऋतंभरा प्रज्ञा— "धर्मचेतना, निस्वार्थ आत्मीयता और कर्त्तव्यनिष्ठा के रूप में देखा जा सकता है। जहाँ कहीं भी जितने अंशों में यह उत्कृष्टता विद्यमान है, वहाँ उतने ही अधिक प्रखर परमेश्वर के अंश का दर्शन किया जा सकता है। अवतारों में उनकी गरिमा कलाओं के आधार पर नापी गई है। कोई अवतार कितनी कला के हुए है कोई कितनी के। यह अंतर बताता है कि अवतारी आत्माओं में श्रेष्ठता की ऊर्जा कितनी ऊँची थी।"

समग्र ब्रह्म का दर्शन न संभव है न आवश्यक न उपयोगी। ईश्वरीय रचना में तो विनाश और विकृति की भी बड़ी मात्रा है, जिसे असुरता कहते हैं। देवत्त्व को संघर्ष की चेतना सजग रखने और सत्प्रवृत्तियों की अपनी क्षमता तीक्ष्ण रखने के लिए चुनौती के रूप में यह विकारी असुरता भी विद्यमान है। उसे ब्रह्म की परिधि से बाहर नहीं किया जा सकता। उतने ब्रह्म अंश के साथ, तो उचित व्यवहार संघर्ष और विग्रह के रूप में ही किया जा सकता है। ईश्वरदर्शन मानव प्राणी की— "अन्य प्राणधारियों की सत्प्रवृत्तियों के रूप में करना चाहिए। उस दिव्य प्रेरणा से संपंन प्रकाश को ही परमेश्वर का साकार स्वरूप कह सकते हैं। गायत्री मंत्र में उसी सविता देवता को वरेण्य-वंदनीय कहा गया है।"


साँस मत लो— "इस हवा में जहर है"

वाशिंगटन के बाजारों में ‘गैस मास्क’ पहने हुए नवयुवकों का एक जुलूस निकला। प्रदर्शनकारियों के हाथ में तख्तियाँ थी “साँस मत लो। इस हवा में जहर है।”

डिव्राइट नदी पर स्थित एक इस्पात मिल के दरवाजे पर वहाँ की स्त्रियों ने धरना दिया। यह स्त्रियाँ गले में तख्तियाँ बाँधे बैठी थीं, हमारे “सुंदर परिवार को जहर पिलाकर मत मारो।”

कनेक्टिक्ट के कालेज में छात्रों ने एक जुलूस निकाला उसमें एक गाड़ी पर पेट्रोल इंजन रखा हुआ था। उस पर बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे— "हवा को जहरीली बनाकर अगणितों को मौत की आग में धकेलने वाला शैतान यही है।" इंजन को भारी भीड़ के सामने गड्ढा खोदकर दफनाया गया, उसकी कब्र बनाई गई और उस पर लिखा गया— ”शैतान का संतरी।”

ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कथन है कि पिछले दिनों लगभग साढ़े तीन खरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ी गई है। यह विषैली गैस जलवायु में बुरा असर भर रही है। सूर्य की गरमी धरती पर तो आ जाती है, पर उस गैस की अधिकता उसे वापिस जाने से रोकती है। क्रम यही रहा तो इस शताब्दी के अंत तक वायुमंडल का तापमान दो अंश सेन्टीग्रेड बढ़ जाएगा। इससे ध्रुवों की बरफ पिघल सकती है। उससे समुद्र में पानी बढ़ेगा और सागरतट पर बसे हुए अनेक नगर पानी में डूब जाएगें और बड़ी मात्रा में उपजाऊ जमीन उसी में विलीन हो जाएगी।

श्रीमति राइखेल कार्सन ने अपनी पुस्तक ‘साइलेंट स्प्रिंगों’ में कृमिनाशक घोल डी.डी.टी. के अंधाधुंध प्रयोग से उत्पन्न खतरे की ओर सर्वसाधारण का ध्यान खींचा है और कहा है कि कीड़ों के साथ ही मनुष्यों को भी न मार डाला जाए। इस विष की थोड़ी मात्रा भी मनुष्य के शरीर में जाकर दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करती है।

उन्होंने जहाँ तापमान बढ़ने, ध्रुवों के पिघलने से जलप्रलय की बात कही है, वहाँ इसके ठीक विपरीत एक दूसरी संभावना भी व्यक्त की है कि यदि बढ़े हुए धूलि कणों की छतरी के नीचे सूर्य की गर्मी न आ सकी और वह ऊपर ही रुकने लगी, तो तापमान घट जाने से हिमप्रलय भी हो सकती है और गर्मी के अभाव में जीवधारियों के लिए संकट भी उत्पन्न हो सकता है।

जर्मनी के फेडरल रिपब्लिक में हिसाब लगाया गया है कि उस देश के उद्योग हर साल 2 करोड़ टन विषाक्त द्रव्य हवा में उड़ाते हैं। इनमें कोयले की गैस, तेल की गैस तथा जमीन खोदकर इन पदार्थों को निकालते समय उड़ने वाली गैसें मुख्य हैं। कार्बन मोनोक्साइड 20 लाख टन, सल्फ्यूरिक ऑक्साइड 25 लाख टन, नाइट्रस ऑक्साइड 30 लाख टन और हाडड्रो कार्बन की 25 लाख टन मात्रा धूलि बनकर आसमान में उड़ती है और उसकी प्रतिक्रिया प्राणियों के लिए विघातक होती है।

सन् 1963 की उस घटना को न्यूयार्क निवासी भूले नहीं हैं; जिसमें वायु के दबाव से विषाक्त धुंध छाई रही और 400 व्यक्तियों के देखते-देखते दम घुट गए। सन् 52 के दिसंबर में लंदन में भी इसी धुंध ने कहर ढाया था और महामारी की तरह अनेकों को रुग्ण बनाया था, अनेकों को मौत की गोद में सुलाया था।

औद्योगिक कारखाने निरंतर, कार्बन डाई ऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड, डाइ ऑक्साइड, क्लोरीन, जली हुई रबड़ जैसे लगभग 300 प्रकार के विष उत्पन्न करते हैं। यह हवा में छा जाते हैं और उस प्रदेश में साँस लेने वालों को उसी हवा में साँस लेने के लिए विवश रहना पड़ता है। बेचारों को यथार्थता का पता भी नहीं चलता कि इन शहरों में दीखने वाली चमक-दमक के अतिरिक्त यहाँ वायु में विषाक्तता भी है, जो स्वास्थ्य की जड़ें निरंतर खोखली करती चली जाती है।

अमेरिका की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तथा राष्ट्रीय केंसर संस्था ने औद्योगिक नगरों के वायुमंडल का विश्लेषण करके पता लगाया है कि उसमें जो पायरीन जैसे इस प्रकार के तत्त्वों की भरमार है, वह मनुष्यों और जानवरों में कैंसर उत्पन्न करते हैं।

गत बीस वर्षों में फेफड़ों के केंसर की चार सौ प्रतिशत वृद्धि हुई है। डाक्टरों का कहना है कि मोटर-गाड़ियों तथा कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुँआ इसका प्रमुख कारण है। अमेरिका की वायुदूषण संस्था ने पता लगाया है कि उस देश के कारखाने हर रोज एक लाख टन प्राणघातक सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस उगलते हैं। नौ करोड़ मोटरगाड़ियों से निकलने वाली ढाई लाख कार्बन मोनो ऑक्साइड का दैनिक योगदान इसके अतिरिक्त है। मोटरों के धुँए में ‘ट्रट्राइथाइल लेड’ मिला होता है वह मनुष्यों के स्नायुमंडल में अस्त-व्यस्तता और दिमाग में गड़बड़ी उत्पन्न करता है। पेट्रोल में शीशे की मात्रा बढ़ती जाने से यह विषाक्तता और भी अधिक बढ़ी है।

अमेरिका तथा योरोप के कतिपय देशों में पशु-पक्षियों की प्रजनन क्षमता में भारी कमी आई है। अमरीकी कृषि विभाग ने अपने रोग निरोधक कार्यक्रमों में डी.डी.टी. आदि प्रभावी कीटनाशकों पर अस्थायी रोक लगा दी है और उस हानि से बचने का उपाय खोजा जा रहा है जो इन रसायनों के प्रयोग से उठानी पड़ती है।

लॉरेल (मेरीलेण्ड) स्थित ब्यूरो आफ स्पोर्ट फिशरीज एण्ड वाइल्ड लाइफ संस्थान के तत्त्वावधान में दो वैज्ञानिकों ने इस संबंध में विशेष खोज की है। इनके नाम है आर.डी.पोर्टर और एस.एन. वायमेयर, उन्होंने कुछ पक्षियों पर परीक्षण किये। उनके भोजन में इतनी अल्प मात्रा इन कृमिनाशक रसायनों की मिलाई जिससे प्रत्यक्षतः उन पर कोई घातक प्रभाव न पड़े। लगातार दो वर्ष तक उस परीक्षण के तीन परिणाम निकले (1) घोंसलों में से उनके अंडे गुम होने लगे (2) स्वयं पक्षी अपने अंडों का नाश करने लगे (3) अंडों के ऊपर का खोल बहुत पतला पड़ गया। यह पतलापन 10 प्रतिशत तक को गया। फलस्वरूप वे अण्डे तनिक से आघात से टूटने लगे। यहाँ तक कि मादा जब उन्हें सेने के लिये उठती-बैठती या करवट बदलती तो उतने में ही वे फट पड़ते।

आश्चर्य यह था कि पक्षी अपने आप अपने अण्डे खाने लगे। आमतौर से ऐसा कहीं अपवाद स्वरूप ही होता है कि कोई मादा अपने अण्डे बच्चों को खाती है। नासमझी या आपत्तिकाल की बात अलग है, सामान्यतया क्रूर या हिंसक समझे जाने वाले पशु-पक्षी भी अपने अण्डे बच्चों को प्यार करते हैं और उनकी रखवाली पर पूरा ध्यान देते हैं। पर यह पक्षी इतने भावना शून्य और आलसी हो गये कि खुराक ढूंढ़ने जाने का कष्ट उठाने की अपेक्षा घर में रखे इस भोजन से ही काम चलाने लगे। मातृत्त्व की प्रकृति प्रदत्त भावना और प्रेरणा को भी उठाकर उन्होंने ताक पर रख दिया।

यह प्रभाव था जो दो वर्ष के अंदर ही पक्षियों पर देखा गया और वह भी तब जबकि आहार में मिलावट की मात्रा 1.3 पी.पी.एम. (एक पी.पी.एम. बराबर है दस लाखवें भाग के) जितनी स्वल्प थी। अंडों की संख्या का घटना, उनका छोटा और हलका होना तो प्रत्यक्ष ही था। कई पक्षी ऋतुसेवन करने के बाद भी गर्भधारण करने से वंचित रहे, जबकि आमतौर से पक्षियों का ऋतुसेवन शत-प्रतिशत प्रजनन में ही परिणत होता है।

उनके स्वास्थ्य पर अथवा पीढ़ियों पर स्वल्प विषसेवन का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह जानना अभी शेष है। फिर आशंका यह की जा सकती है कि आगे चलकर उनके स्वास्थ्य में अवाँछनीय दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं और पीढ़ियों पर बुरा असर पड़ सकता है।

कृमिनाशक— 'पेस्टिसाइड'— "रसायनों का आजकल बहुत प्रचलन है। समझा जाता है कि इनके द्वारा फसलों और पेड़-पौधों की रक्षा होती है। पेड़-पौधों और फसलों का बचाव किया जाना चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह बचाव कही घातक तो नहीं बन रहा। अंधी दौड़ दौड़ने की अपेक्षा यही उचित है कि गुण दोषों का गंभीरतापूर्वक विवेचन किया जाए और ऐसा संतुलन कायम किया जाए; जिससे विघातक सुरक्षा के फंदे में फँसकर हम उलटे अपने पैरों में कुल्हाड़ी न मारने लगें। डी.डी.टी.-डाइएल्ड्रिन आदि क्लोरीन युक्त हाइड्रो कार्बन का प्रयोग इन दिनों जिस आवेश और उत्साह के साथ किया जा रहा है, उसमें उन हानियों को भुला दिया गया है, जो इन प्रयोगों के कारण मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों को उठानी पड़ रही है।"

प्रश्न पक्षियों का नहीं मनुष्यों का है। उन बेचारों पर तो सिर्फ परीक्षण किया गया है और देखा गया है कि कीड़ों से बचने के नाम पर जिस अनाज पर पेड़-पौधों पर यह कीटनाशक विष छिड़के जाते हैं वे घूम फिरकर मनुष्य के पेट में भी जाते हैं और वही प्रभाव डालते हैं, जो पक्षियों पर पड़ा। इस प्रकार धीमी गति से आत्महत्या करते हुए बेमौत मरने के लिए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं, पुराने जमाने में भूत पलीतों की-ओझा तान्त्रिकों की कमान चढ़ी हुई थी, वे जिधर नचाते थे उधर लोग नाचते थे, अब वह पद विज्ञान और वैज्ञानिकों को मिल गया है। अनपढ़ों के अंधविश्वास को पढ़े-लिखों ने दूर किया अब इन पढ़े-लिखों में फैले हुए अन्धविश्वास को कौन दूर करेगा— "यह बहुत बड़ा प्रश्न है।"

रोम की राष्ट्रीय अनुसन्धान समिति के अनुसंधान निर्देशक श्री राबर्टो पैसिनो ने संरक्षण समस्याओं पर आयोजित एक सम्मेलन में ‘दी फैक्टस आफ इंडस्ट्रियलाइजेशन आन दी एनवाइरनमेन्ट’ विषय पर एक निबंध पढ़ा। इसमें उनने जलवायु दूषण से उत्पन्न समस्याओं से आक्रांत योरोप की दयनीय दुर्दशा का चित्र खींचा। उन्होंने कहा— "उद्योगीकरण की घुड़दौड़ में लोग यह भूल गए हैं कि उसके साथ जो खतरे जुड़े हुए हैं उनका भी ध्यान रखें। संपत्ति उपार्जन की इच्छा इतनी अनियंत्रित नहीं होनी चाहिए कि उसके बदले व्यापक जीवनसंकट का खतरा मोल लिया जाए। इस दृष्टि से ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रान्स, बेल्जियम जहाँ औद्योगीकरण देर से चल रहा है, स्थिति बहुत ही बुरी है। जर्मनी में सल्फरडाइ-ऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ जाने से 1,30,000 एकड़ वन संपदा नष्ट हो रही है और उससे 210000000 वार्षिक की क्षति हो रही है।" स्विट्जरलैंड में इन दिनों कपड़ा मिलों की संख्या चौगुनी हो गई है। फलस्वरूप स्विस झीलों की स्थिति भयावह बन गई है। इन बीस वर्षों में उनमें फास्फेट 10 गुना और प्लवक 30 गुना बढ़ गया है। फिनलैण्ड के हेलसिंकी-क्षेत्र का समीपवर्ती पानी पीने के लायक नहीं रहा इसलिए 160 मील दूर से अच्छा पानी लाने का प्रबंध करना पड़ा है। साइप्रस के समीपवर्ती समुद्र जल में प्रदूषण भर जाने से उसका पर्यटन उद्योग ठप्प होता चला जा रहा है। नीदरलैंड भी इसी मुश्किल में फँसता चला जा रहा है। उनने सुझाव दिया है कि जहाँ भी बड़े कारखाने खड़े किये जाएँ; वहाँ प्रदूषण की शुद्धि के लिए कम से कम तीन प्रतिशत पूंजी अलग से रखी जाए अंयथा आज की औद्योगिक प्रगतिकल एक भयंकर संकट बनकर सामने आएगी।

हवा के दूषण का 60 प्रतिशत हिस्सा मोटरों का और 30 प्रतिशत उद्योगों का है। अंतरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी से 70 मील ऊपर जाकर धरती को देखा तो लॉसऐन्जिल्स सरीखे औद्योगिक नगर गंदी धुंध से बेतरह ढके दिखाई पड़े।

अगले दिनों कारखाने अणुशक्ति से चलाने की बात सोची जा रही है, पर उसमें विकरण का दूसरे किस्म का खतरा है। उस दिशा में कदम बढ़ाते हुए इस खतरे को ध्यान में रखना होगा कि अणुशक्ति से उत्पन्न विकरण भी एक संकट है। एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाते हुए रेडियो एक्टिविटी की विषाक्तता में हजारों गुनी वृद्धि हो जाती ,है इस तथ्य को वैज्ञानिक भली-भाँति जानते हैं।

भारत की केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्था के निर्देशक प्रो.एस.जे. आरसी वीना के अनुसार भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में मोटरों की संख्या तो कम है, पर धुँए की मात्रा लगभग एक समान है। कलकत्ता के सर्वेक्षण से पता चला यहाँ के वायुमंडल में कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस की मात्रा 35 है जबकि न्यूयार्क में 27 है। इसका कारण पुरानी और भोंडी बनावट की मोटरों द्वारा अधिक धुआँ फेंकना है। कारखाने की चिमनियाँ भी घटिया कोयला जलाती हैं और सफाई के संयंत्र न लगाकर वायु विषाक्त के अनुपात में और भी अधिक वृद्धि करती है।

वायुशुद्धि के लिए वृक्ष अत्यन्त उपयोगी हैं, वे गंदी हवा स्वयं पी जाते हैं और बदले में स्वच्छ हवा देते हैं पर उन बेचारों को भी बुरी तरह काटा जा रहा है। वन-सपदा नष्ट हो रही है और उनकी जगह नित नए कारखाने खुलते जा रहे हैं।

कृषि के लिए जमीन की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए जंगलों का सफाया होता जा रहा है। इधर लकड़ी की जरूरत भी, जलाने के लिए, इमारती आवश्यकता तथा फर्नीचर के लिए बढ़ी है। लकड़ी के कोयले की भी खपत है। इस तरह बढ़ती हुई आवश्यकतायें वन-संपदा को नष्ट करने में लग गई हैं। पुराने वृक्ष कटते चले जा रहे हैं, नए लग नहीं रहे हैं। सन् 1962 में संसार के बाजारों में 1 अरब घन मीटर लकड़ी की जरूरत पड़ी। अनुमान है कि 1958 तक यह मात्रा दूनी हो जाएगी। यदि काटना जारी रहा और उत्पादन की उपेक्षा की गई तो वृक्षरहित दुनिया कुरूप ही नहीं, अनेक विपत्तियों से भरी हुई भी होगी।

वृक्ष और वनस्पति वर्षा में तथा नदी-नालों के प्रवाह में मिट्टी के बह जाने को रोकते हैं। जल के तेज बहाव को, बाढ़ों को नियन्त्रित करते हैं। इटली का दुखद उदाहरण हमारे सामने हैं। वहाँ कई शताब्दियों से वन-संपदा की बरबादी ही होती चली आ रही है। फलस्वरूप भूमि की भी भारी क्षति हुई। अकेली आर्वो नदी ही हर साल 2 करोड़ 60 लाख क्विन्टल मिट्टी बहा ले जाती है और समुद्र में पटक आती है। नवंबर, 66 की प्रलयंकर बाढ़ ने एक प्रकार से तबाही ही खड़ी कर दी। तब कहीं वन-संपदा की बर्बादी के खतरे को लोगों ने समझा। विशेषज्ञों ने बताया है कि यदि इटली को इस तरह बाढ़ों से बचना है तो उसे 86 लाख एकड़ में वृक्ष लगाने होंगे। अन्वेषण ने सिद्ध किया है कि वन-संपदा से युक्त भूमि में बाढ़ का खतरा 50 प्रतिशत कम रहता है, जहाँ काटने में ही उत्साह हो वहाँ कितनी ही वृक्ष-वनस्पतियों का वंश ही लुप्त होता चला जाता है। स्विट्जरलैंड के आर्गोविया प्रांत में इसी शताब्दी में लगभग 400 वन-संपदा की उपयोगी जातियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

लॉसएंजेल्स के क्रीडांगन के समीप बहुत बड़े-बड़े सूचना पटल लगे हैं; जिनमें चेतावनी दी गई है— "‘डू नौट ब्रीद टू डीप’ अर्थात् यहाँ गहरी साँस मत लीजिए।"

टैक्सास विश्वविद्यालय का क्रीडांगन बढ़ाया गया। इसके लिए आस-पास के बहुत से वृक्ष काटे गए। इसका विरोध भी किया गया कि इस शिक्षाकेंद्र के लिए हरितमा की भी उपयोगिता है, उसे नष्ट न किया जाए, पर किसी ने सुना नहीं। सायप्रस के दर्जनों विशाल वृक्ष काटकर धराशायी कर दिए गए। जब वह उपवन वृक्षों का बूचड़खाना बन रहा था, तो एक स्नातक कटे हुए वृक्ष के कोंतर में एक दिन तक विरोध प्रदर्शन के लिए बैठा रहा उसके हाथ में पोस्टर था—”ट्रीज एण्ड पिपल बिलाँग टू गेदर” अर्थात् वृक्ष और मानव साथ-साथ जीते हैं। वृक्षों का मरण प्रकारांतर से मनुष्यों का ही मरण है।

वायुशुद्धि का दूसरा उपाय था हवन। उस प्रयोग में अणु विकरण तक को शुद्ध करने की शक्ति थी। गोपालन भी ऐसे संकटों से रक्षा करता था, पर सभ्यता के नाम पर अब हवन दकियानूसीपन कहा जाता है और गोपालन की जगह गौमरण को महत्त्व दिया जा रहा है।

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वर्धा की मैत्री पत्रिका में केंद्रीय मंत्री श्री के.के. शाह के साथ रूसी वैज्ञानिक शिष्टमंडल की वार्त्ता का वह साराँश छपा है। जिसमें रूसी वैज्ञानिकों ने यह कहा था कि— "गाय के दूध में एटमिक रेडियेशन से रक्षा करने की सबसे अधिक शक्ति है। अगर गाय के घी को अग्नि में डालकर उसका धुँआ पैदा किया जाए, जिसको भारतीय भाषा में हवन कहते हैं तो उससे वायुमंडल में एटमिक रेडियेशन का प्रभाव बहुत कम हो जाएगा। इतना ही नहीं गाय के गोबर से लिपे हुए मकान में रेडियेशन घुसना बहुत कठिन है।"

वायु को निरंतर गंदी बनाते जाने का और उसकी शुद्धि उपायों से विमुख रहने का हमारा रवैया अंततः अपने लिए ही घातक सिद्ध होगा।


सद्वाक्य

जिसे उचित-अनुचित का विचार है, वही वास्तव में जीवित है, पर जो योग्य-अयोग्य का ख्याल नहीं रखता उसकी गिनती मुर्दों में की जाएगी।

—तिरुल्लुवर


दिव्य अग्नि का अभिवर्ध्दन, उन्नयन

यज्ञ को भारतीय धर्म और संस्कृति का पिता माना गया है। अग्निहोत्र की परम पवित्र, श्रेष्ठ सत्कर्मों में गणना है, पर उससे वायु शुद्धि, रोग, निवृत्ति, मनोबल की वृद्धि, प्राण वर्षा, वातावरण में सततत्व प्रवाह आदि अनेकों लाभ भी हैं। यह यज्ञ का स्थूलरूप है। जिस ज्वलंत अग्नि का हवनकुंडों में पूजन किया जाता है, उसे प्रतीकात्मक प्रक्रिया ही समझना चाहिए।

अग्नि का, यज्ञ का, यज्ञ कुंड का, सूक्ष्म— "दिव्य रूप भी है। वह मानवी पिंड में वैश्वानर के रूप में विद्यमान है, उसका केंद्र मूलाधार स्थित कुंडलिनी शक्ति है। यही अग्निसंपर्क शरीर में प्राणरूप संव्याप्त होकर जीवन का संचार करती है। अंतःकरण में इसी दिव्य ज्योति की आभा जाज्वल्यमान रहती है। अग्निपूजा का आध्यात्मिक स्वरूप इसी दिव्य अग्नि की साधना-अर्चना है।"

ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रारचक्र को ब्रह्मांड अग्नि कहा गया है। कहीं-कहीं इसी की चंद्रमा के रूप में भी चर्चा है। सूर्य या चंद्र दोनों ही प्रकाश के प्रतीक हैं। दोनों ही ऊर्जा, प्रदान करते हैं। सूर्य इसलिए कहते हैं कि इसमें प्रचंड-ऊर्जा विद्यमान है। चंद्र इसलिए कहते हैं कि उसमें शांति और शीतलता का अमृत भरा है। इसे शिव कहते हैं और कुंडलिनी को शक्ति। कुंडलिनी-साधना को इसलिए शिव-शक्ति की संयोग प्रक्रिया कहा गया है।

पौराणिक अलंकार में जिस तत्त्व को शिव और शक्ति कहते हैं, उसी को वैदिक भाषा में सोम और अग्नि कहते हैं। शिव का दूसरा नाम सोम और शक्ति को ही अग्नि कहते हैं। आगम और निगम दोनों ही शास्त्रपक्ष इसी प्रकार का प्रतिपादन करते हैं।

यज्ञ का सूक्ष्मस्वरूप कुंडलिनी अग्नि में सोमरूपी अमृत-घृत का हवन करना है। आत्मारूपी अग्नि और सोमरूपी ब्रह्म का समन्वय, लय, समर्पण ही आत्मयज्ञ है। उसी में मानवी महत्ता का विस्तार एवं जीवन लक्ष्य की पूर्ति सन्निहित है।

मानवीय काया में स्थित कुंडलिनीरूपी अग्नि और ब्रह्मरंध्र अवस्थित सोम का वर्णन शास्त्रकारों ने इस प्रकार किया है।

द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। आर्द्रंचैव शुष्कं

च यदार्द्रं तत् सौम्यं यच्छुंष्क तदाग्नेयम्।

— शतपथ1/6/3(23)

यह संसार दो पदार्थों से मिलकर बना है 1. अग्नि  2. सोम। इनके अतिरिक्त तीसरा कुछ नहीं है।

अग्निर्वा अहः सोमोरात्रिरथ यदन्तरेण तद्

विष्णुः।

— श.प. 3। 4। 4। 15

अग्नि और सोम के मिलन को विष्णु कहते हैं।

इमौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्यां रक्षां स्यपंहंस्यग्ने। ताभ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः।

— यजु. 18।52

हे अग्नि! तेरे दोनों पंख फड़फड़ाते हैं। उनसे पाप और तम का हनन होता है। इन्हीं पंखों के सहारे हम उस पुण्यलोक तक पहुंचते , जहाँ पूर्ववर्ती ऋषि पहुँचे थे।

इन्दुर्दक्षः श्येनऽऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः। महान्त्सधस्थे ध्रुवऽआ निषत्तो नमस्ते अस्तु मा मा हिंसीः

— यजु. 18।53

हे अग्नि! तू सोमरस से परिपूर्ण है। तू दक्ष है। तू ही ऋतुयुक्त है। तेरे अमृतसिक्त पंख हैं। तू शक्तिशाली है। पोषक है तू मस्तिष्क में ध्रुवकेंद्र बनकर विराजमान है। तुझे नमस्कार। तू हमें जलाना मत।

अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्।

— अथर्व 9।12।1

तुम्हारे ललाट में वह अग्नि उत्पन्न हो, जो शिवरूप बनकर काम विकृतियों को भस्म कर सके।

पुरुषो यज्ञः। पुरुषसंम्मितो यज्ञः।

—शत. 3।1।4।23

मनुष्य ही यज्ञ है। यज्ञ का स्वरूप मनुष्य पर निर्भर होता है।

एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध।

— ऋ.8/58/2

उस एक ही अग्नि में अनेक प्रकार से हवन किया जाता है।

शिरोवा एतद् यज्ञस्य यदातिथ्यम्

—ऐतरेय ब्रा.3।6

इस यज्ञ का आतिथ्य स्थल सिर है।

सोम एवं शिव को प्रकरण विशेष से इंद्र भी कहा गया है। इंद्र और अग्नि संयोग का तात्पर्य भी वही है—

ता हि मध्यम्भराणामिन्द्राग्नी अधिक्षितः ।

ता उ कवित्वना कवी पृच्छयमाना सखीयते संधी तमरनुतं नरा नभन्तामन्येके समे॥

— ऋ. 8।40।3

यह इंद्र और अग्नि संघर्ष बनकर साथ-साथ निवास करते हैं।

यह दोनों ही भावुकता भरे कवि हैं। यह सखा बनकर कर्म में प्रवृत्त होते हैं।

या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उपद्युभिः।

इन्द्राग्न्योरनुव्रतमुहाना यन्ति सिन्धाबो यान् त्सीं बन्धादमुंचतां नभन्तामन्यके समे।

—ऋ. 8।40।8

इंद्र और अग्नि दोनों शुभ्र वर्ण हैं, यह दीप्ति बनकर नीचे से ऊपर को चढ़ते हैं। इनके प्रताप से ही शक्ति नदियाँ गतिशील हैं। द्युलोक में पहुँचकर फिर नीचे को चलते हैं। उन्हें यह दोनों ही असीम बनाते हैं।

शरीर व्यापी अग्नि— "विश्वव्यापी महाअग्नि का ही एक स्फुल्लिंग है।" इसलिए उसे ब्रह्म का अंश ही कहा जाता है। जीव को ईश्वर का अंश ही कहा जाता है, इस ब्रह्माग्नि— "आत्माग्नि, की ही प्रार्थना, उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है, जो इस विश्व में पाने योग्य है, इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है"—

अयमग्नि ब्रह्म।

— यजु. 17।14

ब्रह्म ह्यग्निः।

— शतपथ 1।5।1।11

अग्नियो ब्राह्मणः।

— ता.ब्रा. 15।4।8

तैन. 2।7।3।1

ब्रह्म ह्यग्निस्तस्मादाह ब्राह्मरणेति।

—  शपतथ. 1।4।2।8

मनुष्य शरीर में विद्यमान यह आत्मारूपी अग्नि ब्रह्म ही है।

येन ऋषयस्तपसा सत्रमायन्निन्धानाऽअग्निं स्वराभरन्तः। तस्मिन्नहं निदधे नाके अग्निं यमाहुर्मनवस्तीर्णवर्हिषम्।

—यजु.15।49

इस आंतरिक अग्नि को ऋषि लोग अपने तप-बल से प्रदीप्त करते हैं और उसे स्वर्गलोक तक पहुँचाकर मस्तिष्क को प्रकाश से भरते हैं। यही दिव्य अग्नि है।

अग्निः पूर्वेभिर्ऋर्षिभिरीडयो नूतनैरुत। स देवाँ एह वक्षति॥

—ऋ 1।1।2

प्राचीन और अर्वाचीन सभी ऋषि अग्नि का आश्रय लेते हैं। क्योंकि वही देवताओं को धारण करती है।

अग्निर्ऋषिः पवमानः पांचजन्यः पुरोहितः।

तमीमहे महागयम्॥

—ऋ. 9।66।20

यह अग्नि— "ऋषि है। पवित्र करने वाली है । पंचकोशों का मार्ग दर्शक है। इस महाप्राण की हम शरण जाते हैं।"

तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्युमतीं जातवेदः।

यया राधः पिन्वसि विश्ववार पृथुश्रवो दाशुषे मर्त्याय।

—ऋ॰ 7।5।8

हे अग्नि! हमारे भीतर वे उदात्त आकांक्षाएँ पैदा करो, जिनसे प्रभावित होकर तुम प्रसन्न होते हो और कीर्ति एवं सिद्धियाँ प्रदान करते हो।

अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य।

आ दाशुषे जातवेदो वहात्वमद्या देवाँ उपर्बुधः।

हे अग्नि! मेरे जीवन की ऊषा बनकर प्रकटो। अज्ञान के अंधकार को दूर करो। ऐसे आत्मबल प्रदान करो, जिससे देवों का अनुग्रह खिंचा चला आवे।

त्वदग्ने काव्यास्त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि।

त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्थाधिये दाशुषे मर्त्याय॥

—ऋ॰ 4।11।3

हे अग्नि! आप सत्य को धारण करने वाले उदार व्यक्ति के अंतःकरण में कवित्व जैसी करुणा भर देते हो। तुम्हारी ऊष्मा से ही साहसी लोग सिद्धियाँ और सफलताएँ प्राप्त करते हैं।

अग्ने तवश्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो।

बृहद्भानो शवसा बाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥

—ऋ॰ 10। 140। 1

हे अग्नि! शरीर में संव्याप्त होकर आपकी प्रशंसनीय ज्वालाएँ, हर दिशा में चमकती हैं। भावविभोर उदात्त व्यक्ति को आप ही उत्थान की प्रेरणा और प्रतिभा प्रदान करती हैं।

यत् ते पवित्रमर्चिषि, अग्ने विततमन्तरा।

ब्रह्म तेन पुनीहि नः

—  ऋग्वेद 9।67।23

हे अग्नि देव! जो पवित्र और विशाल ब्रह्म तेरी ज्वाला में लस-लस कर रहा है, उससे हमें पवित्र करो।

इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन्

भर्गो यशः सह ओजो वयो बलम्।

त्रयस्त्रिंशद् यानि च वीर्याणि,

तान्यग्निः प्र ददातु मे॥

—अथर्व 16। 37। 1

मुझे अग्नि द्वारा क्या कुछ नहीं मिल रहा? प्रकाश तेज, यश, प्रभाव, पराक्रम, और बल— "सभी मेरे अन्दर आ रहे हैं। मुझ पर अग्नि की कृपा बनी रहे और मुझे तैंतीस प्रकार के सभी वीर्य प्राप्त होते रहें।"

अग्ने भ्यावर्तिन्नभि मा निवर्त्तस्वायुषा वर्चसा

प्रजया धनेन। सन्या मेधया रय्या पोषेण।

—  यजु. 12। 7

हे अग्नि! आयु, वर्चस, प्रज्ञा, धन, दान, मेधा, रति, पुष्ट बनकर अपना अनुग्रह हमें प्रदान करें।

यह आत्मानि जैसे-जैसे प्रखर होती जाती है, वैसे-वैसे उसका स्तर और पद बढ़ता जाता है। चार वर्ण चार आश्रम क्रमिक पदोन्नति के आधार पर ही विकसित होते हैं यह उन्नति, ऋषि, राजर्षि, ब्रह्मर्षि, देवर्षि के रूप में होती है। देववर्ग में गणना करते समय इसी को वरुण, मित्र, विश्वेदेवा, और इन्द्र के नाम से पुकारते हैं। ब्रह्म अग्नि के भी यही चार स्तर हैं, जो पदार्थों, जीवों और व्यक्तियों को उनकी पात्रता के अनुरूप उपलब्ध होते रहते हैं। अग्नि के चार स्वरूपों का ऋग्वेद में इस प्रकार वर्णन आता है—

त्वमग्ने वरुणो जायसे यत् त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः।

त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे मर्त्याः।

— ऋ॰ 5। 3। 1

इस अग्नि के चार स्वरूप हैं। जब वह उत्पन्न होती है तब ‘वरुण’ कहलाता है। जब प्रदीप्त होता है, तब उसे मित्र कहते हैं। जब प्रचंड होता है तब विश्वेदेवो कहलाता है और अन्त में इंद्र बनकर होता के लिए परम ऐश्वर्य प्रदान करता है।

अपनी स्वार्थपरता, अहंता, संकीर्णता एवं पशुता को जो इस दिव्य अग्नि में होम देता है वह बदले में इतना प्राप्त करता है जिससे नर को नारायण की पदवी मिल सके। वेद कहता है-

देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूत प्रत्नमिन्घते

विश्व सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मत्योेः।

— ऋ॰ 1। 36। 4

हे अग्नि! जो अपना आपा तुम्हें सौंप देता है, वह उदात्त भावनाओं वाला व्यक्ति बदले में तुम्हारे समर्पण अनुदानों को प्राप्त करता है।


बुद्ध की निंदा करो (कहानी)

एक वीरांगना गुंडों को शराब पिलाती थी और उनसे कहती थी कि बुद्ध की निंदा करो। वीरांगना की प्रेरणा से उन्होंने हफ्तों तक बुद्ध का पीछा किया। डगर-डगर, गाँव-गाँव छेड़ा, पीटा और उन्होंने भद्दी से भद्दी गालियाँ दीं उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला। बुद्ध के शिष्य आनंद इस मार-पीट और गाली-गलौज से इतने संत्रस्त हो गए कि उन्होंने बुद्ध से वह प्रदेश छोड़कर अन्यत्र भाग जाने का अनुरोध किया। बुद्ध ने आनंद को सस्नेह कहा— "वत्स! भय तो मन का विकार है।" मन से भागकर तन कहाँ जाएगा? मन के घट को मोद-माँगल्य से इतना भर लो कि कोई विकार उसमें प्रवेश ही न कर सकें। किसी की निंदा या गाली-गलौज का उस पर असर ही न हो।


परमार्थ के लिए अपने को खतरे में डालने वाले

अपने जीवन को जोखिम में डालकर भी दूसरों की सहायता और रक्षा करने वाले व्यक्ति भी इस दुनिया में कम नहीं हुए। वस्तुतः धर्म उन्हीं के सहारे खड़ा हुआ है। यह धरती ऐसे ही धर्मपरायण लोगों के आधार पर टिकी हुई है। यदि सभी लोग स्वार्थी, पेटू, लालची और रक्तपिपासु बन जाएँ, तो फिर इस संसार में ऐसा कुछ भी शेष न रहे जिसके लिए आत्मा यह जन्म लेने और जीवन जीने में प्रसन्नता का अनुभव कर सके। चंदन का वृक्ष अकेला ही अपने क्षेत्र को महका देता है, नदी अकेली ही अपने क्षेत्र की प्यास बुझाती है। उदार और परोपकारी मनुष्य अकेला हो तो क्या, उसका प्रकाश चंद्रमा की तरह अंधेरे में प्रकाश उत्पन्न करता है और भटके हुओं को राह दिखाता है।

फ्रांस की राज्य क्रांति में 34 हजार ऐसे नर-नारी पकड़े गए; जिन्हें राजतंत्र का सहायक और प्रजाद्रोही सिद्ध किया जा रहा था और उन्हें मृत्युदंड की सजा देने की तैयारी की जा रही थी। क्रांतिकारियों की सरकार यह निश्चय कर चुकी थी, पर उसे भी लोकमत को अपने पक्ष में रखने के लिए, यह उचित लगा कि इन बंदियों पर मुकदमा चलाया जाए, तब विधिवत उन्हें मृत्युदंड दिया जाए। मुकदमें की तैयारी आरंभ हो गई। और इन बंदियों के विरुद्ध सबूत इकट्ठे करने में अधिकारी लोग लगाए।

एक उदार व्यक्ति ने देखा कि इन में कुछ ही व्यक्ति अपराधी हो सकते थे। शेष तो प्रतिहिंसा एवं द्वेष वश पकड़े गये और उन्हें अकारण न्याय का ढोंग बनाकर मृत्युदंड दिया जाने वाला है। इनकी रक्षा के लिए कुछ उपाय हो सकता हो तो करना चाहिए। इस सुशिक्षित व्यक्ति को एक उपाय सूझा। उसने अशिक्षित देहाती का वेश बनाया और इमारत की सफाई करने वाले मेहतर की नौकरी प्राप्त करने में किसी प्रकार सफलता पा ली। उसने अपने को एक मूर्ख मेहतर के ढांचे में इस तरह फिटकर लिया कि किसी को उस पर कोई संदेह ही न हो सके। दिन में वह सफाई करता और रात को अदालत की फाइलों में लगे प्रमाणों की चोरी। यह सिलसिला उसने तब तक जारी रखा जब तक कि सभी के मजबूत सिद्ध हो सकने वाले सबूतों को वहाँ से हटा न दिया। कुछ कागज तो उसने पानी में गिरा कर ऐसे कर दिए जो पढ़े ही न जा सकें। इस उच्च परिवार के सुशिक्षित व्यक्ति का नाम था— "चार्ल्स डी ला वसेर"

जब सबूत पूरे हो गए और मुकदमा चला तो ठोस प्रमाणों के अभाव में एक-एक करके सभी बंदी छूटते चले गए और क्रांतिकारी सरकार की इच्छा पूरी न हो सकी। इन बचाए हुए लोगों में कितने ही ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी थे, जिन्होंने आगे चलकर फ्रांस की जनता की। भारी सेवा की इनकी प्राणरक्षा इस चतुरता से करने वाला चार्ल्स वसेर हेय नहीं माना जाता। उसका छद्म भी न्याय और समाज के हित में ही था। फ्रांस के एक जनरल ट्रेक्ट को सैनिक अदालतों ने मृत्युदंड दिया। जनरल की पत्नी राजा के पास दया की अर्जी लेकर गई, पर राजा दौरे पर गया हुआ था। पाँच दिन बाद लौटने वाला था। सैनिक अदालत का हुक्म तुरंत अमल में आने वाला था, पर उसमें वकील को तर्क करने की गुँजाइश थी। साथ ही यह भी कायदा था कि कोई वकील जितने तर्क पेश करने हो एक बार में ही कर दे। अठारहवीं सदी में ऐसे कानून थे।

जनरल ट्रैक्ट के वकील लुई वर्नाडे ने बहस आरंभ की और इतनी लंबी चली कि पाँच दिन और पाँच रात लगातार उसे बोलते रहना पड़ा। इतनी लबी दलील बिना रुके करते रहने का यह वकीलों की दुनिया में अनोखा उदाहरण था। पाँच दिन बाद जनरल की पत्नी ने सम्राट से मिलकर अपने पति का मृत्युदंड माफ करा लिया; किंतु अदालत का समय बर्बाद करने के अपराध में वकील लुईस को खुद सजा भुगतनी पड़ी।

दूसरों की न्यायोचित सहायता के लिए अपना समय बुद्धि, धन और श्रम खर्च करना— "आवश्यक पड़ने पर उसके लिए कष्ट उठाकर भी दूसरों का दुःख हलका करना वस्तुतः यही तप है। ऐसे परमार्थ परायण व्यक्तियों को सच्चा तपस्वी ही कहा जाएगा।"


हम सोमरस पिएँ— अजर-अमर बनें

वर्णन आता है देवता सोमपान करते हैं। ऋषि सोम पीते हैं। सोम का महत्त्व और माहात्म्य वैदिक साहित्य में विस्तारपूर्वक वर्णित है। यह सोम क्या है? इसका रहस्य जानना आवश्यक है।

यों सोमवल्ली नामक एक औषधि वल्लरी भी है, गिलोय की तरह उसे भी बहुत गुणवती माना जाता है और शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के अभिवर्ध्दन में उसका भी प्रयोग किया जाता है। पर जिस सोम की असाधारण महिमा ऋषियों ने गाई है वह अप्रत्यक्ष, सूक्ष्म और दिव्य है।

मस्तिष्कीय चेतनाकेंद्र के प्रेरणात्मक एवं भावात्मक पक्ष को सोम कहते हैं। ब्रह्मरंध्र, सहस्रकमल, क्षीरसागर, कैलाश, महासूर्य, अमृतघट आदि अनेक नामों से इसी तत्त्व का वर्णन किया गया है।

स्थूलमस्तिष्क की चेतना— इच्छा, ज्ञान, क्रिया के तीन भागों में विभक्त है। उसका सूक्ष्मस्तर भावनात्मक है। इस भाव पक्ष को ही सोम कहते हैं। स्थूलमस्तिष्क प्रकृति से प्रभावित है। वातावरण का— वस्तुओं का व्यक्तियों का— इंद्रियों का— कामनाओं-वासनाओं और तृष्णाओं का उस पर प्रभाव पड़ता है। दूसरों का प्रभाव ग्रहण करता है और अपना दूसरों पर डालता है। सूक्ष्मशरीर का कलेवर भी यही है।

इसके अंतराल में भावात्मक चेतना-प्रवाह है, जिसे दिव्य-ज्योति, ब्रह्मसत्ता, एवं जीवईश्वर का मिलन-मंदिर कह सकते हैं। इसी केंद्र का उभार उत्पादन सोम है। इसी को द्युलोक— स्वर्गलोक— देवलोक आदि के नाम से पुकारते हैं। यहाँ झरने वाले दिव्य भावना और दिव्य प्रेरणा के अमृत को देवता और ऋषि पीते हैं और अमर हो जाते हैं। यहाँ किसी खाने-पीने की वस्तु की चर्चा नहीं; वरन अंतरात्मा को उस दिव्य भावात्मक प्रवाह में ओत-प्रोत कर लेना है जो ईश्वरीय सत्ता आत्मचेतना के कल्याणार्थ निरंतर बरसती रहती है और जिसे ग्रहण न कर पाने के कारण मनुष्य दीन-दुर्बल बना रहता है।

सोमं  मन्यते  पपिवान्  यत्  संपिषन्त्योष।

सोमं यं ब्रह्मणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः॥

— अथर्ववेद 14।13

सोमरस जड़ी-बूँटी नहीं है। उसका आस्वादन तो ब्रह्मवेत्ता ही करते हैं और वे ही उसका तत्त्व जानते हैं।

सोमो राजा मस्तिष्कः।

—अथर्ववेद 9।7।2

यह सोम मस्तिष्क का राजा है।

सोमेन  पूर्ण  कलशं  विभीर्षि।

— अथर्ववेद अथर्ववेद  9।4।6

सोम से भर शीर्ष-कलश इसी शरीर में है।

आत्सोम इन्द्रियो रसो।

—ऋग्वेद 9।47।3

यह सोम इंद्रियों का रस है।

यो वै विष्णुः सोमः स।

— शतपथ 3।6।3।9

जो विष्णु है वही सोम है।

दिवः पीयूषमुत्तमं सोमं।

— ऋग्वेद 9।51।2

यह सोम दयुलोक(मस्तिष्क) का अमृत है।

दिवि सोमो अधिश्रितः।

-— अथर्ववेद 14।1।1

यह सोम दयुलोक में रहता है।

एषस्य सोमो भतिभिः पुनानः।

-— ऋग्वेद 9।96।15

सोम को प्रज्ञा पवित्र करती है।

-— ऋग्वेद 9।63।20

प्रज्ञा द्वारा पवित्र सोम ब्रह्मपरायण को भावनाओं से भर देता है।

सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।

-— शतपथ 5।4।2।3

यह सोम ब्राह्मणों का राजा है।

सोमो भूत्वा रसात्मकः।

-— गीता

रसात्मक तत्त्व सोम है।

आत् सोम इन्द्रियो रसः।

-— ऋग्वेद 9।47।3

इंद्रियों का रस सोम है।

सोमरारन्धिनो हृदि।

-— ऋग्वेद. 1।91।3

हे सोम! हमारे हृदय में रमण कीजिए।

आ यद् योनिं हिरण्ययमाशुऋतस्य सीदति।

जहाति   अप्रचेतसः॥

-— ऋग्वेद. 9।61।20

ऋत की योनि मस्तिष्क है। यही हिरण्यकोश स्वर्ग है। जब यहाँ सोम प्रस्फुटित होता है तब अज्ञान-अंधकार से छुटकारा मिल जाता है।

अग्नि और सोम का युग्म है। अग्नि को नारी और सोम को नर कहा है। दोनों के संयोग को आत्मरति कहते हैं। इस प्रयोग की उपलब्धियों को मादकता, कामुकता जैसे अलंकारों के साथ भी वर्णन किया जाता है।

यत्ते पवित्रमर्चिष्यग्ने विततमन्तरा। ब्रह्म तेन पुनीहि नः ।

-— ऋग्वेद. 9। 67।23

हे अग्नि! तेरी ज्वालाओं द्वारा ही सोम पवित्र होता है। हमारे सोम को तू पवित्र कर दे।

शिरो वै यज्ञस्यातथ्यम्। जनयन्ति वा एन— मेतद् यन्मन्थन्ति शीर्षतो वा अग्रे जायमानो जायते। शीर्षत एवैतदग्रे यज्ञं जनयत्यग्निर्वैसर्वा देवता अग्नौ हि सर्वाभ्योदेवताभ्यो जुह्वति शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम्। शीर्षत एवैतद् यज्ञ सर्वाभि र्देवताभिः समर्धयति तस्मादग्निं मन्थति।

-— शतपथ. 3।4।1।19

सिर ही यज्ञ का आतिथ्य स्थल है। यहीं अग्नि का मंथन होता है। यहीं से अग्नि उत्पन्न होती और आगे बढ़ती है। अग्नि में ही सब देवताओं का निवास है। प्रदीप्त अग्नि सोमपान करती है। देवता हवि ग्रहण करते हैं।

ब्रह्मतत्व, देवतत्व, यज्ञतत्व का जो सूक्ष्मस्वरूप चेतनाकेंद्र में अवस्थित है, उसे तत्त्वदर्शी सोम कहते हैं। उसे आत्मा में धारण करके ब्रह्मसाक्षात्कार एवं देव अनुग्रह प्राप्त करते हैं। इस देवसत्ता की प्रार्थना-स्तुति भी इसी प्रयोजन के लिए की जाती है।

यो वै विष्णुः सोमः स हविर्वा एष देवानां भवति।

-— शतपथ.3।6।3।29

यह सोम ही विष्णु है। वही देवताओं के हवि हैं। प्र त आश्विनीः पवमान धीजुवो दिव्याअसृग्रन् पयसा धरीमणि। प्रार्न्तऋषयः स्थाविरीरसृक्षत ये त्वा मृजन्त्यृषिषाण वेधसः

-— ऋग्वेद.9।86।4

हे सोम! तेरी दिव्य धाराएंँ मस्तिष्क में दिव्यरस को प्रवाहित करती हैं। ऋषित्व को प्रदान करती हैं, जो उसे अपने में धारण कर लेता है वह निरंतर भाव-प्रवाहों से भरा रहता है।

तमृ त्वा वाजिनं नरो धीभिर्विप्रा अवस्यवः। मृजन्ति देवतातये।

-— ऋग्वेद.9।17।7

हे सोम! आत्मरक्षा के इच्छुक, देवत्व की वृद्धि के इच्छुक, नेतृत्व की क्षमता के इच्छुक, ब्रह्म परायण लोग तुम्हें प्रज्ञा द्वारा पवित्र करते हैं।

तमांसि सोम योध्या। तानि पुनान जंड्घन।

-— ऋग्वेद. 9।9।7

सोम, अज्ञान-अंधकार को नष्टकर पवित्रता प्रदान करता है। ब्रह्मांडव्यापी सोम ब्रह्म ही है। उसका आत्मा से अवतरण यज्ञ है। विश्व में संव्याप्त देवशक्तियाँ उस ब्रह्मांडव्यापी सोम की ही किरणें है, देवता और ऋषि इन्हीं को प्राप्त कर दिव्यता से ओत-प्रोत होते हैं, विश्व-वसुधा का शोभा-सौंदर्य इसी से विकसित होता है।

ऊर्ध्वमिमं यज्ञं देवलोकं नयतम्।

— शतपथ 3।5।3।17

यह मस्तिष्क यज्ञभूमि है। यही देवलोक है।

शिर एवास्य हविर्धानम वैष्णवं देवतयाथ यद-

स्मिन्त्सोमो भवति हविर्वे देवानां सोमस्त-

स्माद्धविर्धानं नाम।

— शतपथ. 3।5।3।2

यह मस्तिष्क ही देवलोक है। जहाँ इंद्रियों के रूप में देवता विराजमान हैं। यहीं सोम को हवि दी जाती है और यहीं देवता सोमपान करते हैं।

ऋषिमना य ऋषिकृन्स्वर्षाः ।

— ऋग्वेद. 9।96।18

सोम ऋषि है। सोम पायी को ऋषि बनाता है।

एह गमन्नृषयः सोमशिताः।

— ऋग्वेद. 10।108।8

ऋषि अपने में सोम द्वारा तीक्ष्णता प्राप्त करते हैं। सोमः पवते जनिता मतीनाँ जनिता दिवो जनिता पृथिव्या। जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः॥

— ऋग्वेद.9।96।5

यह सोम पवित्र है। समस्त बुद्धियों को पवित्र करता है। पृथ्वी और स्वर्ग का सृजेता है। अग्नि, सूर्य, इंद्र और विष्णु का उत्पादक वही है।

दिविस्पृथिथ्वा अभिभव।

— ऋग्वेद.. 9।31।2

हे  सोम!  द्युलोक  में  पृथ्वी  पर  उतरो।

ते नो वृष्टिं दिवस्परि पवन्तामा सुवीर्यम्।

— ऋग्वेद. 9।65।24

यह सोम, दयुलोक से पृथ्वी पर तेज बनकर बरसता है।

स विश्वा दाशुषे वसु सोमो दिव्यानि पार्थिवा। पवतामान्तरिक्ष्या॥

— ऋग्वेद.9।36।5

सोम के प्रवाह से ही पृथ्वी आदि तीनों लोकों में अमृत बरसता है और उदात्त मनुष्य उससे पवित्र होते हैं।

सहस्र    वृदियं     भूमिः।    परं   व्योम      सहस्रवृत्।

— तै.आ.1।10

यह भूमि सहस्रों प्राणों से भरी है और यह द्युलोक सहस्रों देवों से भरा है।

शरीर में यह सोम ‘ओजस्’ एवं रेतस में दीप्तिवान है। वीर्य जों एक शारीरिक रस है, पर उसका जो सूक्ष्मततत्व ओजस् बनकर मस्तिष्क में विद्यमान रहता है, उसे भी सोम कहते हैं और ब्रह्मचर्य-साधना को भी सोमपान का नाम देते हैं।

ओजः सोमत्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम्।

— सु.सू. 15।21।4

सोम ओज है। स्निग्ध, शुक्त, शीत, स्थिर है।

रयिं      कृण्वन्त्ति       चेतनम्।

— ऋग्वेद.9।31।1

यह सोम प्रजननशक्ति को चैतन्य करता है।

सोमं सन्तं विष्णुमिति यजति तद् यदेवेदं क्रीतो विशतीव तदुहैवास्य वैष्णवं रूपम्।

— शा.ब्रा.8।2

ऊर्ध्व रेता के मस्तिष्क में स्थित वीर्य, विष्णु देवता है और वह क्षेत्र विष्णुलोक ।

रेताे वै सोमः।

— को.श.तै.

वीर्य ही सोम है।

वर्चः सोमः।

— शतपथ

वर्च ही सोम है।

रसः सोम।

— शतपथ

आनंद सोम है।

शुक्रः सोमः।

— ताण्ड्य

वीर्य ही सोम है।

सोमो वै ब्राह्मणः।

— ताण्ड्य

ब्राह्मण ही सोम है।

ब्राह्मणानां स (सोमः) यक्षः।

— ऐत

ब्राह्मण का आहार सोम है ।

रेतः सोमः।

— कौ. ब्रा.13।7

— तै. ब्रा. 2।7।4।1

— शतपथ 3।3।2।1

रेतो वै सोमः।

— शतपथ 1।9।2। 9

2।5।1। 9 3।8।5।2

लगता है, अंग्रेजी भाषा में सोम का अपभ्रंश होकर सीमन (Semen) शब्द बना है, जो वीर्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

वीर्य में जो सारभूत तत्त्व ओजस् है उसे बुद्धिमान नष्ट नहीं करते, उससे अपना ब्रह्मवर्चस् बढ़ाते और सोमपान का आनंद लेते हैं। मूर्ख उसे हास-परिहास क्रीड़ा-कल्लोल एवं इंद्रिय-लिप्सा में खर्च करके खोखले बनते हैं और अंततः दुःख पाते हैं।

अभि वेना अनूषतेयक्षन्ति प्रचेतसः। मज्जन्त्यविचेतसः

— ऋग्वेद. 9।64।21

आत्मदर्शी सोम के गीत गाते हैं, विवेकी सोम का भजन करते हैं, मूर्ख सोम को नष्ट करते हैं, और स्वयं नष्ट हो जाते हैं।


संसार में त्रिविधि कष्ट और उनका निवारण

दुःखों से निराकरण का उपायमात्र अभावों और कठिनाईयों का निराकरण ही नहीं निषेधात्मक दृष्टिकोण का परिष्कार भी है। इसके बिना न चिंता से छुटकारा मिलता है न उद्विग्नता से। शोक-संताप छाए ही रहते हैं। एक से छुटकारा मिल नहीं पाता कि दूसरा सामने आ खड़ा होता है।

कुछ दुख ऐसे हैं जो शरीर से संबंध रखते हैं— "कुछ ऐसे हैं; जिन्हें मन से संबंधित माना जाना चाहिए। भूख, प्यास, सर्दी-गर्मी, हारी-बीमारी जैसे कष्ट शरीर को होते हैं, उन अभावों और कष्टों को दूर करने के लिए साधन जुटाना आवश्यक है।" प्रयत्न पुरुषार्थ से, "सूझबूझ से", एक दूसरों के सहयोग से, इस प्रकार के कष्टों को दूर किया जाना चाहिए। जब तक हल न निकल आए उतने बेवसी के क्षणों को धौर्यपूर्ण संतुलन बनाए रहकर सहना चाहिए,  ऐसे कष्ट स्थायी नहीं होते। कभी-कभी अकस्मात ही आ जाते हैं। पूर्व असावधानी भी उसका कारण होती है। आवश्यक सतर्कता रखी जाए, तो उनकी संभावना और कम रहती है। आ ही जाए तो देर तक ठहरती नहीं।

दूसरे कष्ट मानसिक हैं। कुछ ऐसे हैं जो अपने से अधिक साधनसंपन लोगों की स्थिति में बहुत जल्दी पहुंचने की तीव्र अभिलाषा से उत्पन्न होते हैं। पड़ौसी की जितनी अमीरी अपने पास भी हो— "सुंदरस्त्री अमुक की है"— "अपनी तो हैं नहीं, उनके कई बच्चे हैं अपना कोई बच्चा नहीं। यह सोचकर कितने ही व्यक्ति बहुत दुखी रहते हैं। भाग्य को दोष देते हैं और साधनासंपंन लोगों से ईर्ष्या करते हैं। कई तो वैसी उपलब्धियों के लिये कुकर्म करने से भी नहीं चूकते।"

इस प्रकार के दुख अवास्तविक और काल्पनिक हैं। ऐसे लोग यदि अपने से गई गुजरी और अभावग्रस्त स्थिति के लोगों के साथ अपनी तुलना करें, तो प्रतीत होगा कि वर्तमान स्थिति भी ऐसी है, जिस पर पहुँचने के लिए लाखों-करोड़ों तरसते हैं। ऐसी तुलना संतोष देती है कि हजार से बुरे हैं, तो हजार से अच्छे भी हैं। तुलना करने की भ्राँत मनःस्थिति के कारण जो तृष्णा जन्य कष्ट होते हैं, उन्हें विवेक द्वारा दूर किया जा सकता है।

प्रयत्न करने पर अभीष्ट परिणाम न मिलने पर कई बार निराशा उपजती है और कष्ट होता है। ऐसा अवसर न आए इसलिए, फल के लिए अत्यधिक लालायित न होकर अपने प्रयत्नों की प्रखरता पर संतोष केंद्रित करने की मनःस्थिति रखनी चाहिए। यह ठीक है कि हर काम किसी सफलता के लक्ष्य को लेकर ही किया जाता है, पर यह भी ठीक है कि उसमें पुरुषार्थ ही एकमात्र कारण नहीं होता परिस्थिति भी कारण रहती है। यदि परिस्थितियाँ प्रतिकूल पड़ें तो देर लग सकती है और असफलता मिल सकती है। इसके लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए। अच्छी से अच्छी की आशा जरूर करें, पर बुरी से बुरी परिस्थिति के लिए तैयार भी रहें। तभी असफलता जन्य निराशा से बचा जा सकता है और कर्म की तत्परता में प्रसन्नता अनुभव करते हुए अगली बार और भी अधिक तत्परता के साथ सफलता की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। निराशा जन्य कष्टों से बचाव इसी स्तर की मनःस्थिति का निर्माण करने से हो सकता है।

सामाजिककष्ट दुष्टों द्वारा मिलते हैं। आक्रमणकारी, अनाचारी,अवाँछनीय तत्त्वों की इस संसार में कमी नहीं। वे अपनी घात वहाँ लगाते हैं; जहाँ प्रतिरोध की संभावना कम होती है। सज्जन लोग दूसरों को भी सज्जन समझते हैं और अक्सर धूर्तों से ठगे जाते हैं। कई बार उन्हें सताकर, डराकर 'अपना उल्लू सीधा' करना चाहते हैं। इस प्रकार के आघात प्रायः सज्जनों को अधिक सहने पड़ते हैं।

जो केवल सज्जन तो होते हैं, पर सतर्क नहीं होते उन्हें प्रायः आक्रमणकारियों के द्वारा त्रास सहने पड़ते हैं। सतर्कता और समर्थता का संचय ऐसे कष्टों से भी बचा सकता है।


साहसी पक्षी— जिन्हें पुरुषार्थ के बिना चैन नहीं

सुगम-सुविधाजनक, आरामतलबी की जिंदगी आज के आदमी का लक्ष्य बनी हुई है। वह अधिक से अधिक शौक-मौज से भरे दिन काटना चाहता है और विलासिता में निमग्न रहने के साधन ढूँढ़ता है। तथाकथित बड़े लोगों की आजकल यही प्रवृत्ति है। वे अधिक धन और सुविधा-सामग्री इसी प्रयोजन के लिए जमा करते हैं।

छोटा कहा जाने वाले वर्ग धन की कमी की वजह से नहीं, उत्साह और उमंगों की दरिद्रता के कारण छोटा है और दिन-दिन और भी अधिक गिरता जाता है। उसे आलस्य और प्रमाद खाए जाता है। जब भूख विवश करती है, तो कुछ करने को खड़ा होता है और उतने ही हाथ-पैर हिलाता है, जितने के बिना कि पेट का गड्ढा नहीं भरता। इसके बाद उसे भी आलस्य, प्रमाद, व्यसन आदि झगड़े, गपशप और आवारागर्दी की सूझती है। अपने आपके संबंध में बेखबर यह लोग कितना गंदा-गलीज जीवनक्रम अपनाए रहते हैं, यह देखकर दया आती है, आवारागर्दी के समय को यदि वे शरीर, वस्त्र, मकान और जो कुछ उनके पास है। उसे स्वच्छ बनाने में ही लगा लिया करें तो इतने मलीन तो न दिखें पिछड़ेपन में निर्धनता और अशिक्षा भी कारण हो सकती है पर सबसे बड़ा कारण है — "मानसिक छोटापन। उसी व्यापक छूत की बीमारी को हम इस देश के पिछड़ेपन का मूलभूत कारण भी कह सकते हैं।"

आरामतलबी या आलसीपन यह दोनों ही सजीव चेतन प्राणी की अंतरात्मा की मूल प्रकृति के विपरीत हैं। यदि अंतःकरण को दुर्बुद्धि ने मूर्छित न कर दिया हो तो उससे सदा साहसिकता का परिचय देने की— "शौर्य प्रवृत्ति उमंगती रहती दिखाई देगी। बहादुरी और वीरता के प्रतिफल ही सच्चा आनंद और संतोष दे सकते हैं, इसे छोटे पक्षी भी जानते हैं।"

चिड़ियों में बहुत-सी ऐसी होती हैं, जो बदलती हुई ऋतुओं का आनंद लेने के लिए लंबी यात्राएँ करती हैं। इसमें उन्हें काफी श्रम करना पड़ता है और भारी जोखिम उठानी पड़ती है तथा मनोयोग का प्रयोग करना पड़ता है, पर वे बेकार झंझट में क्यों पड़ें, चैन के दिन क्यों न गुजारें की भाषा में नहीं सोचती; वरन इस प्रकार साहसिकता का परिचय देने में आंतरिक प्रसन्नता एवं संतोष का अनुभव करती हैं। इसके लिए उनमें भीतर से ऐसी उमंग उठती है, जिसे पूरा किए बिना रहा ही नहीं जाता। पेट कहीं भी भरा जा सकता है और दिन कहीं भी काटे जा सकते हैं, यह मरी हुई जिंदगी है जिसे मनुष्य भले ही पसंद करे, पर पशु-पक्षियों से लेकर कीट-पतंगों तक कोई भी उसे पसंद नहीं करता। कुछ चिड़ियाँ तो ऐसी हैं, जो अपनी साहसिक यात्राओं द्वारा संभवतः मनुष्य को भी उत्साही, परिश्रमी, साहसी और महत्त्वाकांक्षी होने की प्रेरणा करती हैं।

सितंबर के प्रथम सप्ताह में भारत में ऐसे अनेक रंग-बिरंगे पक्षी दिखाई पड़ते हैं, जो गर्मी और बरसात में नहीं थे। यह पक्षी जर्मनी, साइबेरिया, चीन, तिब्बत, आदि सुदूर देशों से हजारों मील की लंबी यात्रा करके आते हैं। तिधारी, चैती, हंसक, पैतरा, सुरखाव, लालसर आदि प्रमुख हैं। इनमें पैर के अँगूठे के बराबर ‘स्वेट पेनिकल’ जैसे छोटे और 25 पौंड भारी आदम कद सारस जैसे बड़े पक्षी भी होते हैं। यह लंबी यात्रा सप्ताहों तथा महीनों की होती है। आहार की सुविधा, ऋतु-प्रभाव से बचाव और सैर-सपाटे का आनंद यह इस लंबी यात्रा का उद्देश्य होता है। आश्चर्य यह है कि यह अपनी यात्रा अवधि पूरी करके नियत समय पर ही अपने स्थानों को लौट जाते हैं और अपने पुराने पेड़ों और पुराने घोंसलों में ही जाकर फिर बस जाते हैं। भारत में भी वे मारे-मारे नहीं फिरते; वरन यहाँ भी वे अपने नियत स्थान बनाते हैं और जब तक जीवित रहते हैं प्रायः इन दोनों क्षेत्रों में अपने नियत स्थानों पर ही निवास करते हैं।

इन पक्षियों की लंबी यात्राएँ, ऊँची उड़ानें आश्चर्यजनक हैं। बागटेल 2000 मील की लंबी यात्रा करके बंबई के निकट एक मैदान में उतरते हैं और फिर विभिन्न स्थानों के लिए बिखर जाते हैं। गोल्डन फ्लावर पक्षी अमेरिका से चलते हैं। पतझड़ में भारत में विश्राम करते हैं, फिर थकान मिटाकर अटलांटिक और दक्षिण महासागर पार करते हुए दक्षिण अमेरिका जा पहुँचते हैं। आते समय वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हैं और जाते समय जमीन के रास्ते लौटते हैं। अलास्का में उनके घोंसले होते हैं और वहीं अंडे देते हैं। हर वर्ष प्रायः वह दो ढाई हजार मील की यात्रा करते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा तीन हजार मील की है। इस प्रकार वे लगभग पृथ्वी की एक परिक्रमा हर वर्ष पूरी करते हैं। आर्कटिक टिटहरी इन सब घुमक्कड़ पक्षियों से आगे है। उतरी ध्रुव के समीप उसका घोंसला होता है। पतझड़ में वह दक्षिणी ध्रुव जा पहुँचती है। बसंत में फिर वापिस उत्तरी ध्रुव लौट जाती है। जर्मनी के बगुले 4 महीने में करीब 4000 मील का सफर पूरा करते हैं। रूसी बतखें भी 5000 मील की लंबी यात्राएँ करती हैं। यह पक्षी औसतन 200 मील की यात्रा हर रोज करते हैं। टर्नस्टान इन सबसे अधिक उड़ती है, उसकी दैनिक उड़ान 500 मील के करीब तक की होती है साथ ही उसका 17 हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ समुद्र पार करते समय उड़ने की ऊँचाई तीन हजार फीट से अधिक नहीं होती।

इन्हें इतनी खतरनाक और कष्टसाध्य उड़ानें उड़ने की उंमग क्यों उठती है। क्या उनके लिए यह उड़ान अनिवार्य है? क्या वे अपने क्षेत्र में गुजारा नहीं कर सकते या वहीं कही थोड़ा उड़कर काम नहीं चला सकते? आखिर ऐसा बड़ा कारण क्या है, जिसके कारण जान-जोखिम में डालने वाला ऐसा कदम उन्हें उठाना पड़ता है।

पक्षी विज्ञान के विज्ञानियों ने यह पाया है कि वाह्यदृष्टि से उनके सामने कोई ऐसी बड़ी कठिनाई नहीं होती, जिसके कारण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की, ऋतु-प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे पक्षी भी तो उन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर इन सैलानी चिड़ियों को ही ऐसी विचित्र उमंग क्यों उठती है। इस प्रश्न का उत्तर उनकी वृक्क ग्रंथियों में पाए जाने वाले विशेष हारमोन रसों में मिलता है। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन अपने समय पर काम-वासना के लिए बेचैनी उत्पन्न करते हैं, लगभग वैसी ही बेचैनी इस प्रकार की लंबी उड़ान भरने के लिए इन पक्षियों को विवश करती है। वे अपने भीतर एक अद्भुत उमंग अनुभव करते हैं और वह इतनी प्रबल होती है कि उसे पूरा किए बिना उनसे रहा ही नहीं जाता। यह उड़न हारमोन न केवल प्रेरणा देते हैं; वरन उसके लिए उनके शरीरों में आवश्यक साधन-सामग्री भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित- साधन न जुटा सकने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी, साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय का ज्ञान, नियत स्थानों की पहचान, सफर का सही मार्ग जैसी कितनी ही एक से एक अद्भुत बाते हैं, जो इस लंबी उड़ान और वापसी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन उड़न हारमोनों को पक्षी के शरीर, मन और अंतर्मन में इस प्रकार के समस्त साधन जुटाने पड़ते हैं, जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कार्यांवित होते रहने का अवसर मिलता रहे।

प्रकृति नहीं चाहती कि कोई प्राणी अपनी प्रतिभा को आलसी और विलासी बनाकर नष्ट करे। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुंदरदृश्य देखें, और वहाँ के ऋतु-प्रभाव एवं आहार-बिहार के हर्षोल्लास का अनुभव करें। अपनी क्षमता और योग्यता को परिपुष्ट करें।

मनुष्य में आरामतलबी की प्रवृत्ति इतनी घातक है कि वह कुछ महत्त्वपूर्ण काम कर ही नहीं सकता, अपनी प्रगति के द्वार किसी को रोकने हों, तो उसे काम से जी चुराने की आदत डालनी चाहिए और साहसिकता का त्याग कर विलासी बनने की बात सोचनी चाहिए। ऐसे लोगों को मुँह चिढ़ाते हुए,उनकी भर्त्सना करते हुए ही यह उड़नपक्षी विश्व निरीक्षण,विश्व-भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा लगता है।


अस्वस्थता की टहनी नहीं— जड़ उखाड़ें

बहुत दिनों तक यह समझा जाता रहा कि बाहर की परिस्थितियों तथा व्यक्तियों से मनुष्य प्रभावित होता है और उसी के अनुसार उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। अभी भी बहुत लोग ऐसा ही समझते हैं। शारीरिक स्थिति के बारे में भी यह सोचा जाता है कि जलवायु का, आहार-विहार का प्रभाव ही मनुष्य को आरोग्य और रुग्णता प्रदान करता है। किसी व्यक्ति को बीमार देखकर आमतौर से यही पूछा जाता है कि उसने क्या खाया-पिया, सर्दी-गर्मी से कितना प्रभावित हुआ, क्या किया, कैसे रहा आदि। उन्हीं उत्तरों को रोग का कारण मान लिया जाता है। इसी प्रकार किसी स्वस्थ-सबल व्यक्ति को देखकर, उसकी खुराक, दिनचर्या, व्यायामविधि, परिस्थिति आदि के बारे में पूछताछ होती है, इसलिए कि उसी का अनुसरण करके अपना स्वास्थ्य भी वैसा ही बना लिया जाए।

पर यह भ्रम अब धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। बाहर का प्रभाव भीतर पर, के स्थान पर विज्ञान ने चिंतन को नई दिशा दी है— भीतर के आधार पर बाहर का ढाँचा। इस वैज्ञानिक नए दृष्टिकोण को अपनाकर हम अध्यात्म के सनातन सिद्धांत को ही स्वीकार करते हैं। अध्यात्म ने सदा यही कहा है, जैसा अंतरंग होगा वैसा बहिरंग विनिर्मित होगा। विज्ञान और अध्यात्म का एकीकरण ही समग्र सत्य को जनसाधारण के सामने प्रस्तुत करेगा और उसी से ज्ञान की परिधि विस्तृत होगी।

शक्ति का स्रोत कभी स्वर्गस्थ देवी-देवताओं में माना जाता था। अब समझा गया है कि परमाणु का मध्यकेंद्र ‘नाभिक’ इस जड़ जगत की हलचलों का सृजेता है, शक्ति का भंडार अणुकेंद्र है। विज्ञान इससे भी आगे बढ़ा है और कहा है कि अणु की उपलब्ध शक्ति उसकी अपनी नहीं; वरन सूर्य-ऊर्जा एवं ब्रह्मांड किरणों की है। लोक-लोकांतरों से धरती पर बरसने वाली रेडियो-तरंगें मात्र, शब्द-संदेश ही प्रवाहित नहीं करती, वरन अपने साथ अगणित प्रकार के शक्तिपुंज भी संजोए रहती हैं। उन्हीं का दूध पीकर परमाणुरूपी बछड़ा उछलता-कूदता है।

पदार्थ का छोटा रूप अणु है, इसलिए पदार्थ बड़ा है इस परिभाषा को बदलकर विज्ञान ने यह कहा है कि अणुओं के समन्वय से पदार्थ बना है, इसलिए महत्ता दृश्य पदार्थ की नहीं, अदृश्य परमाणु की है। बाहर का प्रभाव भीतर या भीतर का प्रभाव बाहर, इस विवाद में विज्ञान और अध्यात्म दोनों ने एक स्वर से एक ही साक्षी दी है—  "भीतर का प्रभाव बाहर, सूक्ष्म की प्रतिक्रिया स्थूल।"

शरीर विज्ञान भी इसी तथ्य को प्रतिपादित करता है। आहार-विहार और ऋतु-प्रभाव की महत्ता अब नहीं रही; क्योंकि एक-सा आहार-विहार, ऋतु-प्रभाव उपलब्ध करने वाले लोगों में कुछ स्वस्थ होते हैं, कुछ अस्वस्थ। यह आधार बाहर ही होता तो प्रभाव सब पर एक-सा पड़ता। शीत के कारण सबको जुकाम नहीं होता। हिम-प्रदेशों में रहने वाले लोग धड़ल्ले से रहते हैं और कभी सर्दी, जुकाम के शिकार नहीं होते। आंतरिक दुर्बलता या रुग्णता ही वह कारण है, जो तनिक से ऋतु-प्रभाव या आहार-विहार के बहाने शरीर की स्थिति बेतरह बिगड़ती रहती है।

वस्तुतः रोग के बीज जहाँ तक देखने का संबंध है— कोशिकाओं में दृष्टिगोचर होते हैं। वहीं से अंकुर फूटते हैं और जब वे डाल पात से लद जाते हैं, तो हकीम डॉक्टर की समझ में आते हैं। बाह्यस्तर पर रुग्णता प्रकट होने से बहुत पहले ही वह भीतर ही भीतर पलती रहती है। जब बात बेकाबू हो जाती है, जीवन कोष-विजातीय द्रव को निरस्त करने में असमर्थ हो जाते हैं, तभी वह चीख, पुकार बीमारी का लक्षण बनकर बाहर आती है।

कोशिकाओं की रुग्णता, मनुष्य की मनोभूमि, चिंतनशैली और साहसिकता पर निर्भर रहती है। आशंकाग्रसित, घबराने वाले, चिंतातुर व्यक्ति छोटी कठिनाई को बड़ा करके देखते हैं और तिल का ताड़ बनाते हैं। उसी प्रकार कितने ही अशुभ चिंतक लोग बैठे-ठाले भविष्य के अंधकारमय कल्पना-चित्र बनाते रहते हैं और अपने गढ़े हुए उस “हौआ” को देख-देखकर काँपते रहते हैं। कई व्यक्ति द्वेष, दुर्भाव के आदी होते हैं और छिद्रांवेषी प्रवृत्ति के कारण हर व्यक्ति में कुटिलता हर परिस्थिति में अवांछनीयता ढूँढ़ते रहते हैं और अपने मानसिक क्षोभ को बढ़ाते रहते हैं। इस प्रकार के कितने ही मनोविकार अंतःकरण में भर जाते हैं। छल, क्रोध, लोभ, स्वार्थ, अहंकार की मात्रा बढ़ जाने से भी अंतःचेतना बेतरह विकृत हो जाती है और उसका बुरा प्रभाव स्वस्थ कोशिकाओं को दुर्बल बनाता चला जाता है और अंततः वे छोटे कारण सामने आते ही रुग्ण हो जाती हैं। यही भीतरी रुग्णता समयानुसार बड़ी और कष्टसाध्य बीमारी के रूप में प्रकट होती है।

रुग्णता का विश्लेषण करते हुए अरोग्य विज्ञान ने कहा है कि शिराओं को धमनियों से मिलाने वाली रक्तवाहिनियों में, कोशिकाओं में, आरोग्य का रहस्य सन्निहित है। शरीर के अरबों-खरबों कोषों को आहार और प्राणवायु पहुँचाना इन्हीं का काम है, विभिन्न मलों का विसर्जन भी इन्हीं का काम है, इनके भीतर ऐसा रासायनिक अनोखापन है कि उसे देखकर चकित रह जाना पड़ता है। एक ओर से ऑक्सीजन सम्मिलित लाल रक्त-प्रवाह, दूसरी ओर से कार्बन डाई-ऑक्साइड मिश्रित नीला खून। इसकी मध्यवर्ती दीवारों में होकर ऊतक बनाने वाले एमीनो अम्ल, शक्तिदायक शर्करा, चिकनाई, अम्ल, खनिज, विटामिन आदि रक्त में पहुँचते हैं।

इन कोशिकाओं की स्वस्थता पर समस्त शरीर की स्वस्थता निर्भर है। रुग्ण पहले यही होती है। प्रत्यक्ष रोग लक्षण तो बहुत बाद में शरीर के वाह्यस्तर पर उभरते हैं। रुग्णता से संघर्ष पहले इसी क्षेत्र में होता है। जब स्थिति बेकाबू हो जाती है, तभी बीमारी बाहर उभरती हुई दिखाई देती है।

स्वीडन के शरीर विज्ञानी व्राने मार्क ने ऐसे उपकरण तैयार किए हैं, जो कोशिकाओं की स्थिति का निरूपण करते हैं। उनसे रोग प्रकट होने से पूर्व ही यह पता चल जाता है कि काया के भीतरी परत में क्या हो रहा और क्या बाहरी परत में होने जा रहा है। बाहरी लक्षण प्रकट हो उससे पूर्व ही चिकित्सा का आरंभ उपयुक्त है। कई रोग, कोशिकाओं में मुद्दतों पहले पलते रहते हैं और जब वे परिपक्व होकर बाहर प्रकट होते हैं, तब स्थिति काबू से बाहर हो चुकी होती है, तब साधारण दवा-दारु कुछ काम नहीं करती।

कोशिकाओं पर विशेष प्रभाव डालने वाले रसायनों में एक है— “हिस्टे माइन” यह शरीर में ही पैदा होता है। इसके प्रभाव से कोशिकाएं फैलती हैं और उनमें होकर रक्त का अधिक प्रवाह संभव हो जाता है। जब हम तेज धूप में बैठते हैं, तो अल्ट्रा वायलेट ऊर्जा के कारण शरीर में— हिस्टेमाइन की उत्पत्ति बढ़ जाती है। कोशिकाएँ फैलती हैं और चमड़ी पर सुर्खी आ जाती है। अनावश्यक मात्रा में यह तत्त्व देह में बनने लगे तो एलर्जी, जुकाम, छाजन जैसे रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

हिस्टेमाइन के प्रभाव को दबाने वाली दवाएँ भी उसी तत्त्व से बनती हैं जो अक्सर जहरीली होती है। एक बीमारी को दबाने के लिए दूसरी उत्पन्न होने का खतरा इस प्रकार की दवाओं में हमेशा बना रहता है। कोशिकाओं की निरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता डॉक्टर लीनस पोलिंग ने विटामिन सी. की उपयोगिता पर बहुत जोर दिया है।

रोगों का दूसरा कारण विषाणुओं का, वायरसों का आक्रमण बताया जाता है। प्रयोगशालाओं में अनेक जाति के वायरस खोज निकाले गए हैं और उनके मारण निवारण के लिए कतिपय रसायन विनिर्मित किए गए हैं। कहा जाता है कि ये विषाणु वायुमंडल में चोर, तस्करों की तरह घूमते रहते हैं और जहाँ भी दाव लगता है घुस पड़ते हैं और डकैतों द्वारा संपत्ति की लूट करने की तरह आरोग्य का हरण कर लेते हैं। इन दस्यु तस्करों की खोज जितनी लंबी हो रही है, उतनी ही उनकी संख्या शैतान की आँत की तरह बढ़ती जाती है और उनकी जातियाँ-उपजातियाँ विदित होती हैं। उनके मारण-निवारण के अस्त्र-शस्त्र भी नित नए निकलते हैं। आज जो अमोघ उपचार माना गया था, कल वह निरर्थक घोषित कर दिया जाता है। वायरसों के साथ युद्ध करने में अन्वेषक ही मात खाते जा रहे है। विषाणु मूंछों पर ताव देते हुए जहाँ के तहाँ विराजमान है। वे एक कदम पीछे हटने का नाम नहीं लेते जबकि एक से एक बढ़-चढ़कर तेज ‘एन्टीबायोटिक’ दवाओं का नित नया आविष्कार होता चला जा रहा है।

विषाणु (वायरस) विज्ञान की परिभाषा के अनुसार एक प्रकार के जीवित कण हैं जो विघटन और विनाश में तत्पर रहते हैं। वे इतने छोटे होते हैं कि एक मिलीमीटर स्थान में दस हजार बैठ सकते हैं। जरा-सा ‘न्यूक्लिक ऐसिड’ और चारों ओर प्रोटीन का घेरा यही है। इनकी छोटी-सी संरचना; पर विघातक क्षमता इतनी कि जिस पर आक्रमण कर दें, उसके प्राण लेकर ही छोड़ें। इनकी आकृति कई तरह की होती है, कुछ गोल, कुछ आड़े, तिरछे, लंबे, चौकोर और कुछ डूबे उलझे से।

विषाणु परजीवी होते हैं-मनुष्य, पशु-पक्षी, घास-पात, फल-फूल, कीट-पतंग जिस तक भी इनकी पहुँच हो जाए, अधिकार जमा लेते हैं। धीरे-धीरे उसी को खाते चूसते अपनी वंशवृद्धि करते रहते हैं और देखते-देखते अपना परिवार बढ़ाकर इतना विस्तृत कर लेते हैं कि शिकार को खोखला करना सरल हो सके। उनकी वंशवृद्धि का क्रम आश्चर्यजनक है। वे एक घंटे में एक लाख भी प्रजनन कर सकते हैं।

यह रावण की तरह अमरता का वरदान लेकर आए हैं, जिस पर सवार थे वह जब तक जीवित रहे तब तक मजे से खाते हैं। मर जाने पर उसे छोड़कर किसी दूसरे पर सवार होते हैं। कोई न मिले तो वे अकेले भूखे-प्यासे सहज ही मुद्दतों पड़े रहते हैं। आसानी से मरते नहीं।

डॉक्टर स्टैनली ने तमाखू के पौधे चौपट करने वाले ‘विषाणु’ पकड़े। उन्हें सुखाया, सुखाने के बाद चीनी के दानों की शक्ल में बदला। इसके बाद एक बोतल में बंद करके रख दिया। दस वर्ष बाद उन्हें निकाला तमाखू के पत्तों पर छोड़ा। जल्दी ही वे सक्रिय हो गए और प्रयोग वाली पौधों को उन्होंने जल्दी ही सफाचट कर दिया।

अब तक लगभग 300 तरह के विषाणु पहचाने और परखे जा चुके हैं। उनकी गतिविधियाँ लिपिबद्ध कर ली गई हैं और उनकी करतूतों का पूरा शास्त्र बन गया है। अभी इस शोध में बहुत कुछ परिवर्तन होना बाकी है।

कभी-कभी वे इतने उग्र, प्रबल और आँधी-तूफान की तरह आक्रमणकारी हो जाते हैं कि उनकी रोक-थाम कठिन हो जाती है और चिकित्सक हार मान लेते हैं। कुछ दिन पहले उत्तर भारत में माओ फ्लू फैला था। उसने घर-घर हमला किया और आदमी-आदमी को पछाड़ा। कई बार ‘इन्फ्लुएंजा’ ऐसे ही विकराल रूप में फैल चुका है। चेचक, हैजा, प्लेग, मलेरिया आदि महामारियों की जब बाढ़ आती है, तो रोके नहीं रुकती।

मनुष्यों की तरह पशु-पक्षियों पर भी इनका धावा होता है। गाय-भैंसों में बीमारी फैलती है तो उनकी भारी संख्यकाल के गाल में चली जाती है। मुर्गियों की बीमारी आई ,तो बस मुर्गीखानों को झाड़ बुहारकर रख जाती है। कुछ दिन पूर्व मैसूर के कयासानुर जंगल के बंदरों पर वह चढ़ दौड़ी, देखते-देखते बंदरों का वंश नाश ही उस इलाके में हो गया। खोज की गई तो पता चला कि साइबेरिया से उड़कर भारत आए, पक्षियों पर सवार होकर यह विषाणु आए थे और यहाँ आकर उनने बंदरों पर चढ़ाई कर दी। ये बिना टिकट सफर करते हैं। रेल, मोटर का इंतजार नहीं देखते। जो भी आदमी, जीव-जन्तु इनकी पकड़ में आ जाए उसी पर सवारी गाँठ लेते हैं और जब तक चाहते हैं, चढ़े रहते हैं। उतरने का नाम ही नहीं लेते।

विषाणुओं को मारने की कितनी दी दवाएँ बनी हैं। उनसे बचने के उपाय ढूँढ़ने में कितने ही शोध संस्थान लगे हैं। भारत में पूना का ‘वाइरस-रिसर्च सेंटर’ अधिक बड़ा और साधनसंपन्न संस्थान है। रोग-निवारक औषधियों की पहुँच सर्वत्र नहीं होती; पर यह वायरस तो हर कहीं जा पहुँचते हैं। दवाओं के प्रभाव को भी वे बहुत बार निष्फल कर देते हैं। आक्रमण और आत्मरक्षा के इस देवासुर संग्राम में अभी तक रक्षात्मक सफलता की तुलना में आक्रामक विभीषिका का ही पलड़ा भारी रहा है।

प्रश्न यहाँ भी यही पैदा होता है कि यह विषाणु सर्वत्र हवा में फैले हुए हैं और साँस या छूत द्वारा कहीं भी पहुँच सकते हैं, तो फिर सब पर इनका आक्रमण समानरूप से क्यों नहीं होता। एक ही घर-परिवार के लोगों में से एक पर ही वे क्यों आक्रमण करते हैं; जबकि छूत या साँस के द्वारा वे वहाँ रहने वाले सभी पर आक्रमण कर सकते हैं। क्षय का रोगी उसी घर में रहता और मरता भी उसी घर में है। छूत से बचने का भी गरीबी के कारण वहाँ कोई प्रबंध नहीं होता फिर भी अन्य लोगों पर उस रोग का आक्रमण नहीं होता। यह भेदभाव क्यों?

इसी प्रकार जिस दवा से एक रोगी के वायरस मर गए, उसी का प्रयोग दूसरे पर क्यों असफल होता है? एक ही मर्ज के लिए तरह-तरह की औषधियाँ क्यों प्रयोग करनी पड़ती है और फिर भी वे असफल क्यों रहती हैं? यह ऐसे प्रश्न हैं, जिनका समाधान विषाणुओं को ही सर्वशक्तिमान मान लेने से नहीं हो सकता।

वास्तविकता यह है कि अपनी सुरक्षा शक्ति मूलतः इतनी प्रबल है कि उसके सही और शुद्ध होने पर किसी भी वायरस का कोई असर नहीं हो सकता। जीवन कोषों की रचना ही ऐसी है कि उन्हें बेध सकना विषाणुओं के लिए सरल नहीं। उन्हें रोका भी नहीं जा सकता। साँस लेते समय शुद्ध-अशुद्ध कणों की कैसे तो पहचान हो सकती है और कैसे, उन्हें अलग किया जा सकता है? उसी प्रकार छूत तो इतनी व्यापक है कि कहीं से भी किसी भी प्रकार लग सकती है। बचाव और निवारण के लिए, जो उपाय सोचे गए हैं वे पर्याप्त नहीं। इन विषबीजों से बचाव तो अपनी जीवनीशक्ति को ही सुरक्षित रखकर किया जा सकता है। उसी केंद्र पर हमारा ध्यान केंद्रित होना चाहिए।

आहार-विहार, रहन-सहन प्रकृति के अनुकूल रखा जाए, तो असंयम से उत्पन्न उपद्रवों से बचा जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कायिक ढाँचे को चरमरा देने वाले मनोविकारों की विभीषिका को समझा जाए। अंतःकरण निर्मल और प्रफुल्ल रखने की यदि आदत डाली जा सके तो समझना चाहिए; स्वास्थ्य की तीन-चौथाई सुरक्षा बन गई। एक-चौथाई को भी प्रकृति के अनुरूप जीवनचर्या अपनाकर पूरा किया जा सकता है। निरोग रहने की कुंजी अपने हाथ में है। यदि हम सच्चे मन से चाहें और सही तरीका अपनाएँ, तो निरोग रहना भी संभव है और दीर्घ जीवन भी।


सभ्यता और समृद्धि (कहानी)

सभ्यता और समृद्धि तथाकथित अग्रणी अमेरिका की इस प्रगति के साथ-साथ वहाँ अपराधी मनोवृत्ति भी आँधी-तूफान की तरह बढ़ती चली जा रही है।

सरकारी सूचना के अनुसार उस सभ्य और समृद्ध देश में हर 73 मिनट में एक कत्ल हो जाता है। हर 19 मिनट में बलात्कार की एक घटना घटती है। हर 30 सैकिंड पर एक डाका पड़ जाता है और हर सैकिंड में दो चोरी होती हैं। यह पुलिस में दर्ज रिपोर्टों के आधार पर एक-तिहाई घटनाएँ ऐसी समझी जाती हैं; जिनकी सूचना पुलिस तक पहुँच ही नहीं पाती। वहाँ अपराधों की संख्या इन्हीं पाँच वर्षों में ड्योढ़ी हो गई है। पकड़े गए अपराधियों में 46 प्रतिशत वे हैं जिनकी आयु 13 से 21 वर्ष के बीच है। यह गरीब या अभावग्रस्त नहीं; वरन अधिकांश ऐसे हैं, जिन्होंने अपराधों के क्षेत्र में प्रस्तुत वातावरण से प्रभावित होकर प्रवेश किया।

हत्या-चोरी, व्यभिचार, उद्दंडता का विस्तृत चर्चा करने वाला जासूसी, अय्याशी का कथा साहित्य आज बेहिसाब छप और बिक रहा है। फिल्में ऐसी ही कुरुचि भड़का रही हैं। उसका प्रभाव कच्चे मस्तिष्कों पर बेतरह पड़ता है और वे इन अपराधों के माध्यम से अपनी साहसिकता एवं चतुरता प्रकट करने के लिए इस प्रकार के दुष्कर्म करते हैं।

अपराधियों को पकड़ने और दंड देने के प्रयास तब तक अपर्याप्त और असफल रहेंगे, जब तक उस प्रवृत्ति को भड़काने वाले साहित्यकारों,  कलाकारों तथा उत्पादकों को दंडित न किया जाए।

— पियर्सनहाम्फ्रे


जीवन तत्त्व की गंगोत्रीम— प्राणशक्ति

शरीर के अवयवों के कार्यरत रहने से जीवन प्रक्रिया का संचालन होता है, इस मोटे तथ्य को सभी जानते हैं। शरीरशास्त्र के विद्यार्थियों को यह भी पता है कि नाड़ी-संस्थान के संचालन में अचेतन मस्तिष्क की कोई सूक्ष्मप्रक्रिया काम करती है। उसी के आधार पर रक्तसंचार, श्वास-प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन के क्रियाकलाप अनायास ही चलते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता और पलक झपकने, पाचनतंत्र चालू रहने, जैसे अगणित कार्यों की अतिसूक्ष्म कार्यपद्धति अपने ढर्रे पर स्वसंचालित रीति से चलती रहती है।

मस्तिष्क का चेतन मस्तिष्क तो जागृत स्थिति में कोई आवश्यकता उत्पन्न होने पर ही कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश देता है अन्यथा वह ऐसे ही पूर्व स्मृतियों  भावी-कल्पनाओं में उलझा रहता है। यों विद्या, बुद्धि-कुशलता, चतुरता आदि में सिर के अग्र भाग में अवस्थित चेतन मस्तिष्क ही काम आता है, पर शरीर की समस्त क्रिया के संचालन, यहाँ तक कि मस्तिष्क की गतिविधियों को भी गतिशील रखने में यह अचेतन ही काम करता है।

अचेतन की वह कार्यपद्धति जो स्वसंचालित रूप से शरीर और मस्तिष्क को गतिशील रखती है, उसे ‘नाड़ीशक्ति’ ( vital energy) कहते हैं। यह एक रहस्य है कि शरीर को सक्रिय रखने वाली इस दिव्यशक्ति का स्रोत कहाँ है? चेतन और अचेतन मस्तिष्क तो उसके वाहनमात्र है। इन उपकरणों को प्रयोग करने के लिए जो यह क्षमता उपलब्ध होती है, उसका भंडार उद्गम कहाँ है। शरीरशास्त्री इस प्रश्न का उत्तर कुछ भी न दे सकने में समर्थ नहीं हैं। नाड़ीशक्ति तक ही उनकी पहुँच है। यहाँ कहाँ से आती है, कैसे काम आती है, घटती बढ़ती क्यों है? इस रहस्यमय तथ्य के अन्वेषण को वे अपनी शोध परिधि से बाहर ही मानते हैं। वस्तुतः जहाँ भौतिक विज्ञान अपनी सीमा समाप्त कर लेता है— "अध्यात्म विज्ञान उसके आगे आरंभ होता है।"

‘जीवन तत्त्व’ यों शरीर में ओत-प्रोत दिखाई पड़ता है और उसी के आधार पर जीवित रहना संभव होता है, पर यह जीवन तत्त्व शरीर का उत्पादन नहीं है। यह अदृश्य और अलौकिक शक्ति है, जिसमें से उपयोगी और आवश्यक अंश यह काय-कलेवर अंतरिक्ष से खींचकर अपने भीतर धारण कर लेता है और उसी से अपना काम चलाता है। इस विश्वव्यापी जीवन तत्त्व का नाम ‘प्राण’ है।

प्राण व्यक्ति के भीतर भी विद्यमान है, पर वह विश्वव्यापी-महाप्राण का एक अंश ही है। बोतल के भीतर भरी हवा की सीमा की नाप-तौल की जा सकती है और मोटी दृष्टि से उसका पृथक-स्वतंत्र अस्तित्व भी माना जा सकता है। पर वस्तुतः वह विश्वव्यापी वायुतत्त्व का एक अंशमात्र ही है। इसी प्रकार विश्वव्यापी महाप्राण का एक छोटा-सा अंश मानव शरीर में रहता है— "उसी अंश को ‘जीवन तत्त्व’ के रूप में हम देखते अनुभव करते हैं। यह जब न्यून पड़ता है तो व्यक्ति हर दृष्टि से लड़खड़ाने लगता है और जब वह संतुलित रहता है तो समस्त क्रियाकलाप ठीक चलता है। यह जब बढ़ी हुई मात्रा में होता है तो उसे बलिष्ठता, समर्थता, तेजस्विता, मनोबल, ओजस् प्रतिभा आदि देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही ‘महाप्राण’ कहलाते हैं वे अपना प्राण असंख्यों में फूँकने और विश्व का मार्गदर्शन कर सकने में भी समर्थ होते हैं। ‘प्राण’ को ही जीवन का आधार माना जाना चाहिए। शरीरशास्त्री जिस शक्तिस्रोत की व्याख्या ‘नाडीशक्ति’ कहकर समाप्त कर देते हैं, वह वस्तुतः प्राणतत्त्व की एक लघु-तरंग मात्र ही है।"

मानव शरीर में विद्यमान प्राणशक्ति से ही समस्त अंतःसंचालन (Afferent) और नाडीसमूह (Nervous System) इसी से अनुप्राणित हैं। मस्तिष्क की कल्पना, धारणा, इच्छा, निर्णय, नियंत्रण, स्मृति, प्रज्ञा आदि समस्त शक्तियों का उत्पादन--अभिवर्ध्दन तथा संचालन का मर्म जानना हो, तो कुंडलिनी विद्या का आश्रय लेना चाहिए। अचेतन मन अजस्र संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य कहा जाता है और उसे योग की समस्तसिद्धियों का केंद्रबिंदु माना जाता है।

विश्वव्यापी प्राण जब शरीर में प्रवेश करता है तो उसका प्रवेश दो छिद्रों के माध्यम से होता है, जिन्हें ‘मूलाधार’ और ‘सहस्रार’ कहते हैं। सूर्य की शक्ति जब पृथ्वी पर आती है तो उसके माध्यम दोनों ध्रुव होते हैं। विद्युत भंडार को जब छोटे यंत्रों में लाना होता है, तब भी प्लग के दो छेदों में दो हुक फँसाने पड़ते हैं। विश्वविद्युत महाप्राण, शरीरविद्युत--कायप्राण में अवतरित करने के लिए भी उपरोक्त मूलाधार और सहस्रार छिद्र ही माध्यम होते हैं। कुंडलिनी इस शक्ति-संतुलन का नाम है। आत्मविज्ञान प्राण की मात्रा आवश्यकतानुसार घटाने-बढ़ाने के लिए इन्हीं छिद्रों का प्रयोग करता है। इस विज्ञान के समझने से जीवन तत्त्व के मूल उद्गम का पता नहीं लगता; वरन उसकी मात्रा में न्यूनाधिक करके अभीष्ट संतुलन बनाने का भी लाभ मिलता है।

इस संसार में दिखाई पड़ने वाली और न दीखने वाली जितनी भी वस्तुएँ तथा शक्तियाँ हैं, उन सबके संपूर्ण योग का नाम ‘प्राण’ है। इसे विश्व की अतिसूक्ष्म और अतिउत्कृष्ट सत्ता (vital energy) कह सकते हैं। श्वास-प्रश्वास क्रिया तो उसकी वाहन मात्र है, जिस पर सवार होकर वह हमारे समस्त अवयवों और क्रियकलापों तक आती जाती और उन्हें समर्थ, व्यवस्थित एवं नियंत्रित बनाए रहती है। भौतिक जगत में संव्याप्त गर्मी, रोशनी, बिजली, चुंबक आदि को उसी के प्रति स्फुरण समझा जा सकता है। वह बाह्य और अंतर्मन से संबोधित होकर इच्छा के रूप में परिणत होती हुई, अंततः परमात्मा से जा मिलने वाली इस विश्व की सर्व समर्थसत्ता है। एक प्रकार से उसे परमात्मा का कर्तृत्व माध्यम या उपकरण ही माना जाना चाहिए।

यद्यपि प्राणसत्ता एक ओर अविच्छिन्न है; पर उसके क्रियाकलापों और सीमा प्रयोजनों के आधार पर समझने की सुविधा के लिए कई नामों में विभाजित कर दिया गया है। यों पृथ्वी एक है,  समुद्र एक है; पर उन्हें समझने-समझाने की सुविधा के लिए कई महाद्वीपों और कई नाम के समुद्रों में विभाजित कर दिया गया है। एक ही व्यक्ति समय-समय पर अपने कार्यों के आधार पर क्लर्क पंडित, रोगी, ग्राहक, जनता, नेता आदि माना जाता है। फिर भी उसका अस्तित्त्व एवं व्यक्तित्व एक ही रहता है। इसी प्रकार यह विश्वव्यापी प्राणशक्ति प्रत्येक जड़-चेतन में समाई हुई है और उपकरणों के अनुसार विभिन्न कार्य कर रही है। अणु की गतिशीलता से लेकर, अंकुर उत्पन्न होने तक के अगणित क्रियाकलाप उसी के हैं। फिर भी मानव शरीर में उसके विभिन्न क्रियाकलापों से उसका जो विविध-विधि योगदान है, उसके आधार पर सुविधा के लिए उसके नाम रख दिए गए हैं। पाँच प्राण मुख्य हैं। पाँच इनके सहायक उपप्राण भी माने गए हैं। पाँच मुख्य प्राणों के नाम (1) प्रान (2) अपान (3)समान (4)उदान और (5) व्यान हैं। उप प्राणों को (1) नाग (2) कूर्म (3) कृकल (4) देवदत्त (5)धनञ्जय कहते हैं, इन्हें क्रमशः उपप्राणों का गौण प्रक्रियाएं संपन्न करने वाला माना जाना चाहिए।

प्रथम प्रान का कार्य श्वास-प्रश्वास क्रिया का संपादन, स्थान छाती है। इस तत्त्व की ध्यानावस्था में अनुभूति पीले रंग की होती है और षट्चक्र वेधन की प्रक्रिया में यह अनाहतचक्र को प्रभावित करता पाया जाता है।

द्वितीय— "अपान का कार्य शरीर के विभिन्न मार्गों से निकलने वाले मलों का निष्कासन एवं स्थान गुदा है। यह नारंगी रंग की आभा में अनुभव किया जाता है और मूलाधार चक्र को प्रभावित करता है।"

तीसरा समान— "अन्न से लेकर रस रक्त और सप्तधातुओं का परिपाक करता है और स्थान नाभि है। हरे रंग की आभा वाला और मणिपूर चक्र से संबंधित इसे बताया गया है।"

चौथा उदान— "का कार्य आकर्षण ग्रहण करना, अन्न-जल, श्वास, शिक्षा आदि जो कुछ बाहर से ग्रहण किया जाता है, वह ग्रहण प्रक्रिया इसी के द्वारा संपन्न होती है। निद्रावस्था तथा मृत्यु के उपरांत का विश्राम संभव करना भी इसी का काम है। स्थान कंठ, रंग बैंगनी तथा चक्र विशुद्धाख्य है।"

पाँचवा व्यान— "इसका कार्य रक्त आदि का संचार, स्थानांतरण। स्थान संपूर्ण शरीर। रंग गुलाबी और चक्र स्वाधिष्ठान है।"

पाँच उप,प्राण इन्हीं पाँच प्रमुखों के साथ उसी तरह जुड़े हुए हैं जैसे मिनिस्टरों के साथ सेक्रेटरी रहते हैं। प्राण के साथ नाग। अपान के साथ कूर्म। समान के साथ कृकल। उदान के साथ देवदत्त और व्यान के साथ धनञ्जय का संबंध है। नाग का कार्य वायु-संचार, डकार, हिचकी, गुदा वायु। कूर्म का नेत्रों के क्रियाकलाप। कृकल का भूख-प्यास, देवदत्त का जँभाई, अंगड़ाई, धनंजय का हर अवयव की सफाई जैसे कार्यों का उत्तरदाई बताया गया है, पर वस्तुतः वे इतने छोटे कार्यों तक ही सीमित नहीं हैं। मुख्य प्राणों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बनाए रहने में उनका पूरा योगदान रहता है। इन प्राण और उपप्राणों के भेद को और भी अच्छी तरह समझना हो तो तंमात्राओं और ज्ञानेंद्रियों के संबंध पर गौर करना चाहिए। शब्द तत्त्व को ग्रहण करने के लिए कान, रूप तत्व की अनुभूति के लिये नेत्र रस के लिए, जिह्वा गंध के लिए, नाक और स्पर्श के लिए जो कार्य त्वचा करती है, उसी प्रकार प्राणतत्त्व द्वारा विनिर्मित सूक्ष्म संभूतियों को स्थूल अनुभूतियों में प्रयुक्त करने का कार्य यह उपप्राण संपादित करते हैं। यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि यह वर्गीकरण मात्र वस्तुस्थिति को समझने और समझाने के उद्देश्य से ही किया गया है। अलग-अलग आकृति-प्रकृति के दस व्यक्तियों की तरह इन्हें दस सत्ताएँ नहीं मान बैठना चाहिए। एक ही व्यक्ति को विभिन्न अवसरों पर पिता, पुत्र, भाई, मित्र, शत्रु, सुषुप्त, जागृत, मलीन, स्वच्छ स्थितियों में देखा जा सकता है, लगभग उसी प्रकार का यह वर्गीकरण भी समझा जाए।

प्राण को पकड़ने की विद्या का नाम प्राणायाम है। एक जगह से उसकी पकड़ मिल जाए और उसे जकड़ने की गुंजाइश हो जाए तो फिर विराट प्राण को पकड़ना और उसका प्रयोग कर सकना संभव हो जाता है। छड़ का एक सिरा पकड़कर घसीटने से सारी छड़ घिसटने लगती है। बकरी का कान पकड़ लेने से सारी बकरी पकड़ में आ जाती है, फिर उसे जिधर भी ले चलना हो, कान पकड़ने वाले के इशारे पर चलती चली जाती है। प्राणायाम की स्थूल प्रक्रिया श्वास-प्रश्वास लेने छोड़ने के क्रम में कुछ विशेष गतिविधि उत्पन्न करना हो सकता है और उसका लाभ स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उपयोगी माना जा सकता है; पर यह तो उसकी बाह्यतम प्रक्रिया है। मूल लाभ प्राणतत्त्व की स्वच्छंद गतिशीलता के साथ अंतःचेतना की पकड़ स्थापित करना है। जिन पहलवानों को कुश्ती लड़ने की विशेष पकड़ आती है वह अपने से बड़े पहलवानों को भी काबू में कर लेते हैं। प्राणायाम को अंतःचेतना द्वारा प्राणतत्त्व की पकड़ और उसको अभीष्ट दिशा में प्रयुक्त करने की कला में अभ्यस्त होने की चेष्टा के रूप में ही देखा समझा जाना चाहिए।


सद्वाक्य

गाँधी जी की अतृप्त कामना

“..........कभी-कभी यह आता है कि सब छोड़-छाड़कर एकदम एकांत में जाकर अपना प्रयोग चलाकर देखूँ तो? अपनी शाति और कल्याण साधने के लिए नहीं, किंतु आत्मनिरीक्षण के लिए, आत्मा की आवाज को अधिक स्पष्टता से सुनने के लिए, जगत के ही कल्याण का प्रतिक्षण विचार हो, और इस विचार की सहज-सिद्धिप्राप्त हो सके। तभी मेरा अहिंसा का प्रयोग सफल होगा। पूर्ण अहिंसक मनुष्य गुफा में बैठा हुआ भी; जगत को हिला सकता है।

— हरिजन सेवक


अंतःकरण को पवित्र बनाने की प्रभु-प्रार्थना

अथर्ववेदीय पिप्पलाद संहिता के पवमान-सूत्र में भगवान से पवित्रता-प्रदान करने की प्रार्थना की गई। वस्तुतः यह सबसे महत्त्वपूर्ण याचना है।

संसार विपत्तियों, शोक-संतापों और कष्ट-क्लेशों का कारण एक ही है, अपना अंतःकरण कषाय-कल्मषों से कलुषित होना। प्रकारंतर से यह समस्त अभावों और अवरोधों की जड़ है। जड़ कट जाने पर पत्र-पल्लव तो अनायास ही नष्ट हो जाते हैं।

भगवान से साँसारिक कष्टों की निवृत्ति एवं संपत्ति अभिवर्ध्दन के लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं। यह तो अपने पौरुष और कौशल पर निर्भर होने से सर्वथा अपने ही हाथ में है। प्रभु का अनुग्रह तो आंतरिक पवित्रता के रूप में ही उपलब्ध होता है। पवमान-सूत्र का पाठ और मनन-चिंतन करने से इसी की प्रेरणा हमें प्राप्त होती है।

सहस्राक्षं   शतधारमृषिभिःपावनं  कृतम्।

तेना  सहस्रधारेण  वमानः पुनातु माम् ॥

सहस्रों नेत्रों वाला, सहस्रों धाराओं वाला, ऋषियों को पवित्र करने वाला, पवमान सहस्रधारा वाले सोम से मुझे पवित्र करे।

येन  पूतमन्तरिक्षं यस्मिन्वायुरधिश्रितः ।

तेना   सहस्रधारेण  वमानःपुनातु  माम् ॥

जिसने अंतरिक्ष को पवित्र किया, जिसमें वायु का निवास है। वह पवमान सहस्रधारा वाले सोम से मुझे पवित्र करे।

येन पूते द्यावापृथिवी आपः पूता अथो स्वः।

तेना सहस्रधारेण पवमानः  पुनातु   माम् ॥

जिससे यह द्युलोक, पृथ्वी, जल और स्वर्ग पवित्र किए गए, उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।

येन पूते अहोरात्रे दिशः पूता उत येन प्रदिशः ।

तेना   सहस्रधारेण  पवमानः   नातु    माम् ॥

दिन-रात, दिशा-प्रदिशा, जिससे पवित्र हुई उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।

येन पूतौ सूर्याचन्द्रमसौ नक्षत्राणि भूतकृतः सहयेनपूताः।

तेना    सहस्रधारेण     पवमानः     पुनातु         माम् ॥

सूर्य-चंद्र, नक्षत्र और पंचतत्त्व, जिससे पवित्र हुए उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे करे ।

येन पूता वेदिरग्नयः परिधयः सह येन पूताः ।

तेना  सहस्रधारेण  पवमानः  पुनातु   माम् ॥

जिससे वेदी, अग्नि और मेखलाएं पवित्र की गई, उस सहस्रधारा वाले सोम से मुझे पवित्र करे ।

येन पूता ऋचः सामानि यजुर्ब्राह्मणं सह येन पूतम्।

तेना    सहस्रधारेण    पवमानः    पुनातु      माम् ॥

जिससे ऋचाएँ, साम, यजु और ब्राह्मण पवित्र हुए उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।

येनपूतावनस्पतयोवानस्पत्या, ओषधयोवीरुधःसहयेनपूता।

तेना    सहस्रधारेण      पवमानः      पुनातु         माम् ॥

जिससे वंस्पत्तियाँ, पुष्प, फल ,वृक्ष, औषधियाँ, वल्लरियाँ, पवित्र हुई , उस सहस्त्रधारा वाले सोम से पवमान मुझ पवित्र करे ।

येन पूता नद्यः सिन्धवः समुद्राः सह येन पूताः ।

तेना      हस्रधारेण   पवमानः   पुनातु    माम् ॥

जिससे नदी-नाले, समुद्र पवित्र हुए, उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे ।

येन पूतः स्तनयित्यनुरपामुत्सः प्रजापतिः।

सहस्रधारेण      पवमानः   पुनातु    माम् ॥

जिससे विद्युत और जल से भरे मेघ पवित्र हुए, उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।

येन   पूतमिंद  सर्वं  यद्भूतं  यञ्चभव्यम्।

तेना सहस्रधारेण पवमानः पुनातु माम् ॥

जिस पर भूत और भविष्य की समस्त पवित्रता निर्भर है, उस सहस्रधारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।

अपनो से अपनी बात —


अपनों से अपनी बात— आत्मबोध, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की राह पर चल पड़ें

जीवात्मा के सामने दो क्षेत्र खुले पड़े है, एक श्रेय और दूसरा प्रेय। दोनों में से वह जिसे चाहे उसे प्रधान रूप से चुन सकता है। दोनों का संतुलन मिला सकता है। यही बुद्धिमता की कसौटी है। जो सामने चुनौती की तरह पड़ी रहती है। भूलभुलैया और यथार्थता में से किसे चुना गया, इसी प्रकार जीवन लक्ष्य की, दूरदर्शिता की परीक्षा है। जो उत्तीर्ण हो जाते हैं, वे अनंत ऐश्वर्य और आनंद प्रदान करने वाली अध्यात्म विभूतियाँ प्राप्त करते हैं— स्वर्ग और मुक्ति के अधिकारी बनते हैं। आत्मसाक्षात्कार का ईश्वरीय अनुग्रह का, अजस्रशक्ति वर्चस्व का लाभ प्राप्त करके इस सुरदुर्लभ मानव अवतरण को धन्य बनाते हैं और जो भटक जाते हैं, उन्हें चिरकाल तक पश्चाताप की आग में जलना पड़ता है।

भ्रम-जंजाल वह है कि जिसमें अप्रबुद्ध प्राणी आमतौर से भटकते रहते हैं। मछली आटे की गोली पर बेतरह टूट पड़ती है, बिना आगे-पीछे सोचे उसे निगल जाती है। उस भूल का परिणाम प्राणघातक पीड़ा के रूप में सहना पड़ता है। बहेलिया जाल को ढ़ककर दाना बिछाता है, जिन्हें सतर्कता बरतना नहीं आता वे पक्षी उन्हें खाने के लिए दौड़ पड़ते हैं, बड़ी मात्रा में सहज ही, मनमाना आहार पाने की आतुरता उन्हें जाल में फँसा देती है और उस नादानी का फल उन्हें जान गँवाने के रूप में भुगतान पड़ता है। सँपेरा मधुर ध्वनि बजाकर साँपों को बिल में से बाहर निकालता है और उन्हें मोहित करके पिटारों में आजन्म कैदी बनाकर बंद कर लेता है। हिरन की भी यही दुर्गति होती है। पुराने जमाने के वधिक वीणा की मधुर ध्वनि बजाने में प्रवीण होते थे, दौड़ते, उछलते हिरन अपनी चौकड़ी भूलकर उसे सुनने में तन्मय हो जाते थे। इस अवसर का लाभ उठाकर बधिक उन्हें पकड़कर वध कर डालते थे। शोभा-सौंदर्य पर मुग्ध होने वाले भ्रमर का कमलपुष्प में बंद होना और फिर हाथी द्वारा उसे उदरस्थ कर लिया जाना प्रसिद्ध है। शीरे की चसक के लिए आतुर मक्खियाँ किस तरह बेमौत मरती हैं, इसे कौन नहीं जानता। ऐसी ही आसुरी माया, अबोध मानव प्राणी को भटकाती हैं। वह भ्रांति और यथार्थता के बीच अंतर नहीं कर पाता और उसी दल-दल में गहरा घुसता चला जाता है, जिससे निकलने के लिए यह मनुष्य जीवन जैसा सुरदुर्लभ अवसर मिला था।

सुख की आकांक्षा जीव को स्वभावतः रहती है। वह आगे बढ़ना चाहता है, ऊँचा उठना चाहता है, अधिक पाना चाहता है और अपना क्षेत्र विस्तृत करना चाहता है। यह आकांक्षाएँ उचित भी हैं और आवश्यक भी। इनकी प्रेरणा से ही उत्कर्ष की दिशा में प्रगति होती है; पर दुर्भाग्य वहाँ अड़ जाता है जहाँ इन प्रयोजनों को पूरा करने का सही रास्ता नहीं मिलता और फिसलन की ओर प्राणी भटकता, घिसटता चला जाता है। कदाचित लक्ष्य-निर्धारण के अवसर पर थोड़ी सतर्कता बरती जा सके, तो तुरंत के तनिक से आकर्षक व्यामोह से सहज ही बचा जा सकता है जो जीवन-लाभ की महान उपलब्धियों से वंचित ही किए रहता है।

इंद्रिय सुखों के पीछे मानसिक बचपन लालायित होकर अंधी-दौड़ लगाता है। पतंग लूटने में अति उत्साही अक्सर छतों से गिरकर हाथ-पांव तोड़ते और जान गँवाते देखे जाते हैं। जिनके सामने जीभ का चटोरापन, जननेंद्रिय की खुजली, आलस्य, आराम, सजधज का बचकाना प्रदर्शन, उद्धत अहंकार का पोषण, संपत्ति संग्रह में बड़प्पन का अनुभव, परिवार में अविवेकपूर्ण मोह, विनोद में अतिरुचि जैसे प्रसंग ही सब कुछ हैं, उन्हें आत्मिक उत्कर्ष की बात सूझती ही नहीं। सूझती भी हो तो उन्हीं प्रसंगों में इतनी व्यस्तता रहती है कि जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ पुरुषार्थ कर सकना संभव ही नहीं रहता। न उसके लिए समय ही बचता, न मनोयोग लगता है, न साधनों को उसके लिए प्रयुक्त करने का उत्साह उमड़ता है । ऐसी दशा में आत्मोन्नति की हलकी-फुलकी कामना, कल्पना मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी हुई भी हो तो उससे कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। छुट-पुट पूजा-पत्री द्वारा आत्मिक-प्रगति की महान प्रक्रिया न सफल हो सकती है और न संभव।

विवेक द्वारा जब आत्मिक और भौतिक उपलब्धियों की तुलनात्मक विवेचना की जाती है तब पता चलाता है कि एक तराजू के एक पलड़े में काँच है और दूसरे में काँचन। शरीरगत इंद्रियलिप्सा, वासना और मनोगत लोभ, मोहजन्य तृष्णा, जिनके व्यक्तित्व पर आच्छादित हो गई है, जिन्हें इन दो के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं उनके लिए आत्मोन्नति का कोई महत्त्व भले ही न हो, पर जिन्होंने महामानवों के उज्ज्वल चरित्र, महान कर्त्तव्य और उनके अनुदानों के प्रति उमगती लोकश्रद्धा का यदि मूल्यांकन किया है तो प्रतीत होगा कि पेट और प्रजनन के लिए मरते-खपते रहने वाले नर-कीटकों की तुलना में आध्यात्मिक उपलब्धियों का महत्त्व कितना अधिक है। आंतरिक संतोष, उल्लास एवं अजस्रबल की अनुभूति आत्मतत्त्व की अभिवृद्धि से ही संभव है। सोचने की, पढ़ने-लिखने की, परिवार, उपार्जन, शासन एवं अगणित साधनों की जो सुविधाएँ मनुष्य को मिली हैं, वे किसी और प्राणी को नहीं मिलीं, केवल एक ही जीव को इतना मिलना अकारण नहीं है। ईश्वर ने मनुष्य को अपने सहायक-सहयोगी के रूप में सृजा है और आशा की है वह उसकी सृष्टि को सुंदर, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने में योगदान करेगा। अन्य प्राणियों में अतिरिक्त जो भी अनुदान हैं वे मात्र इसी प्रयोजन के लिए है; पर यदि उस दिशा से मुँह मोड़ लिया जाए तो अंतरात्मा ईश्वरीय प्रयोजन को पूरा न करने की आत्मप्रताड़ना से निरंतर पीड़ित रहेगी। वह आंतरिक विक्षोभ जीवन की हर दिशा में फूटेगा और हर घड़ी क्षुब्ध, उद्विग्न, अशांत एवं खिन्न रहना पड़ेगा। इस अंतःविद्रोह को रोग, शोक, दारिद्रय, विक्षोभ, क्लेश-कलह, असंतोष, अनाचार के रूप में फूटता हुआ देखा जा सकता है। प्रचुर संपदा और सुख-साधन होते हुए भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं रह सकता, जब तक वह जीवन लक्ष्य को पहचाने नहीं और अपनी दिशा जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए निर्धारित न करे।

विवेक का हृदय होते ही मनुष्य अपने आपको एक ऐसे चौराहे पर खड़ा पाता है, जहाँ उसे दिशा-निर्धारण करने की आवश्यकता अनुभव होती है, हवा के साथ उड़ते हुए पत्ते की तरह जहाँ परिस्थितियाँ ले जाएँ, वहीं जा पहुँचना अपरिपक्वता का चिह्न है। किधर चलना चाहिए, क्या करना चाहिए, क्या बनना और क्या पाना चाहिए? इन प्रश्नों का हल स्वतंत्र चेतन से, दूरदर्शी विवेक-बुद्धि के साथ किया जाना चाहिए। लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं यदि इस आधार पर अंधानुकरण भर करते रहा गया तो समझना चाहिए, सुरदुर्लभ अवसर के साथ मखौल करने वालों की पंक्ति में अपने को भी खड़ा किया जा रहा है।

भौतिकवादी जीवन लक्ष्य अपनाने वाला घोर परिश्रम और अनीति आचरण करने के उपरांत थोड़ी-सी संपत्ति एवं सत्ता उपार्जित कर सकता है, पर दुर्बुद्धि उसका सदुपयोग नहीं करने देती फलतः प्राप्त संपदाएँ अगणित उलझनें उत्पन्न करती हैं और वे इतनी जटिल होती हैं कि उनका हल करने के असफल प्रयास में अपने को ही गँवा गला देना पड़ता है। इंद्रियलिप्सा बिजली की चमक जैसी कौंधती है और भोग को प्राप्त हो, विलीन हो जाती है। कामनाएँ जब तक पूरी न हों तब तक वे बहुत आकर्षक लगती हैं; पर जैसे ही वे प्राप्त हुई कि नीरस लगने लगीं। न कोई वासनाएँ भोगने से तृप्त हुआ और न किसी को तृष्णा से संतोष हुआ। यह एक प्रकार की अग्नियाँ हैं जो मनुष्य को केवल जलाती ही रहती हैं। आग में घी डालने से वह बुझती नहीं भड़कती ही है। विषय भोगों से लेकर वैभव-वर्चस्व तक जैसे जितनी अधिकता प्राप्त होगी, वह उतना ही अतृप्त और उतना ही अशांत दिखाई पड़ेगा। लोभ और मोह में अंधा हुआ मनुष्य प्राप्त करने में तो एक हद तक सफल हो जाता है, पर उसे सदुपयोग करना तनिक भी नहीं आता। फलतः संपदाएँ उसे शूलती-हूलती रहती हैं और उत्तराधिकारियों के लिए हराम की कमाई के साथ जुड़ीं रहने वाली विपत्तियों की मेघमाना सिद्ध होती हैं। जो प्राप्त करना था, उससे विमुख रहा गया और पापों की भारी पोटली लादकर अंधकारमय भविष्य की ओर प्रयाण किया गया, यही है भौतिक जीवन की उपलब्धि। भूसी कूटने पर मिलता कुछ नहीं— कूटने वाले के हाथ में छाले भर स्मृति चिह्न रह जाते हैं। वासना और तृष्णा की मृगमरीचिका में भटकने वाले को मिलता कुछ नहीं— सुरदुर्लभ अवसर को कृमि-कीटों की तरह गँवा देने का पश्चात्ताप भर शेष रहता है। इतना ही नहीं, साथ ही पाप-पोटली के फल भुगतने के लिए चिरकाल तक चलने की नारकीय यंत्रणा भी गले बँध जाती है।

इसी भौतिक जीवन को जिया जाए तो कहना होगा कि बुद्धिमान कहलाने वाले ने अबुद्धिमत्ता की रीति-नीति अपनाई। समझदारी का तकाजा यह है कि शरीर और मन के खिलौनों को सजाने-रिझाने में ही सारी शक्ति खरच न कर दी जाए; वरन अपने आपे के हित-अनहित पर भी कुछ विचार किया जाए। आत्मसंतोष की, आत्मनिर्माण की, आत्मकल्याण की भी बात सोची जाए। इस तथ्य पर अधिकतम गहराई से विचार कर सकना इस बात का चिह्न है कि— प्रज्ञा का प्रकाश हो चला। सद्बुद्धि उदय हुई और आत्मज्योति का आलोक उभरा।

जीवन संपदा का उपयोग दो ही दिशा में होता है। एक को तमसाच्छन्न— भौतिक-आसुरी कहते हैं और दूसरी को ज्योतिर्मय— आत्मिक-दैवी कहा जाता है। इनमें से किसे अपनाया जाए, किस मार्ग पर चला जाए, इसका निर्णय करने में प्रत्येक मनुष्य पूर्णतया स्वतंत्र है। हाँ, वह अपने निर्णय के भले-बुरे परिणाम से नहीं बच सकता, इस संदर्भ में वह पराधीन है। विष खाना या अमृत पीना अपनी इच्छा पर निर्भर है; पर जब वह कदम उठा लिया गया तो मृत्यु या अमरता की प्रतिक्रिया की अविच्छिन्नता को समझकर चला जाए तो फिर रुदन-क्रंदन के लिए विवश होने की आवश्यकता न पड़े। सन्मार्ग पर चलकर ही सुखद सत्परिणाम संभव है, सद्बुद्धि के सहारे ही आंतरिक संतोष एवं आनंद मिल सकता है, इस आस्था का नाम ही आस्तिकता है। नास्तिकता इस विश्वास का नाम है कि दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की रीति-नीति अपनाकर भी उसके दुखद प्रतिफल से बचा जा सकता है। स्वतंत्र चेतना की प्रशंसा इस बात में है कि वह देवपथ का वरण करे और महान बनने की आकांक्षा प्रदीप्त करके आत्मवादी रीति-नीति अपनाने के लिए साहसपूर्वक अग्रसर हो। अंततः यही निर्णय सर्वोपरि बुद्धिमता का चिह्न सिद्ध होता है। जिन्होंने देव-पथ चुना उन्हीं ने जीवन लक्ष्य की पूर्ति के साथ जुड़े हुए अजस्र आनंद का लाभ लिया है।

यह एक भयावह भ्रांति है कि जीवन लक्ष्य की पूर्ति छुट-पुट पूजा-पाठ करने या धार्मिक कर्मकांडों की लकीर पीट लेने से हो सकती है। साधना-उपासना भी एक सीमा तक ही इस प्रयोजन में सहायक हो सकती है। स्पष्ट है कि उपासनात्मक उपचारों को ‘साधन’ कहा जाता है, साध्य नहीं। साध्य है आत्मोत्कर्ष और उसके लिए चिंतन एवं कर्त्तृत्व से प्रखर, परिष्कृति का समावेश। जीवन लक्ष्य इसी का दूसरा नाम है। स्वर्गमुक्ति इसी के प्रतिफल हैं। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन इस मनः स्थिति का नाम है। यदि अंतरंग और बहिरंग व्यक्ति को उत्कृष्टता की रीति के साथ जोड़ा न जा सके तो समझना चाहिए कि भजन-पूजन के सारे क्रियाकलाप बालक्रीड़ा जैसे निरर्थक और उपहासास्पद ही सिद्ध होंगे।

आत्मवादी जीवनक्रम का आरंभ यहाँ से होता है कि हम काय-कलेवर और कूटस्थ आत्मा की भिन्नता समझें और उनके स्वार्थों का वर्गीकरण करना सीखें। माया, मोहित, अज्ञानी जीव अपने आपे को शरीर एवं मन से विनिर्मित काय-कलेवरमात्र मानकर चलता है। अपने शुद्ध-बुद्ध रूप को एक प्रकार से पूर्णतया भूला रहता है। इंद्रियों की वासना, मन की तृष्णाएँ ही उसे जीवन लक्ष्य प्रतीत होती हैं। आकांक्षाएँ, संपत्ति संग्रह, अहंकार के पोषण और कुटुंबियों के व्यामोह में ये इतनी घुली रहती हैं कि और कुछ सोचने के लिए न मन को उत्साह रहता है, न शरीर को अवकाश। जब “अहं” का स्वरूप ही विस्मृत हो गया और कलेवर को ही आपा मान लिया गया तो स्वभावतः शरीर की वासना और मन की तृष्णा ही जीवनक्रम पर आच्छादित रहेगी। आत्मचिंतन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण विकास की बात तब सूझेगी ही नहीं और सूझेगी भी तो अत्यंत फूहड़ ढंग से। आत्मवाद का अर्थ पूजा-पाठ को सीमित कर देना, उसमें जीवन के समग्र परिष्कार की आवश्यकता को अविच्छिन्न न मानना एक प्रकार से परले सिरे की भ्रांति है।

शारीरिक स्वस्थता के लिए व्यायाम का भी अपना स्थान है; पर आहार-बिहार की मर्यादाओं का उल्लंघन करके कोई चाहे कि हम मात्र व्यायाम के सहारे बलवान बन सकते हैं तो यह उसकी भूल है। व्यायाम अपने आप में कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, पर वह समग्र नहीं है। जप, तप एक प्रकार के आध्यात्मिक व्यायाम हैं। वे करने ही चाहिए; पर यह न भूल जाना चाहिए कि चिंतन और कर्त्तव्य की महत्ता आहार-विहार से भी बढ़कर है। यदि उनकी उपेक्षा की गई तो हाथ कुछ भी लगने वाला नहीं है। आज यही हो रहा है। धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में मंत्र जाप, स्तोत्र, पाठ, तीर्थ-दर्शन, स्नान-ध्यान, कथा-कीर्तन, आसन-प्राणायाम जैसे कर्मकांडों का महत्त्व आकाश-पाताल जितना बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इतने भर से ही समस्त आत्मिक और भौतिक मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाएँगी। इस मूर्खतापूर्ण शिक्षा का परिणाम यह हुआ कि लोग आत्मनिर्माण की महान प्रक्रिया को तिलांजलि देकर सस्ते कर्मकांडों से आत्मलाभ प्राप्त करने की आशा करने लगे। परिणाम यह हुआ कि आज अध्यात्मवाद की उपलब्धियाँ नगण्य हैं। 56 लाख साधु बाबाओं से लेकर करोड़ों भजनानंदी और कर्मकांडी लोगों में से उँगलियों पर गिनने जितने भी प्राणवान ऋषितुल्य व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ते। व्यायाम करने वाले पहलवान बन जाते हैं, व्यापार करने वाले धनवान, पढ़ने वाले विद्वान, फिर क्या कारण है कि आत्मिक प्रयोजनों में संलग्न व्यक्ति सर्वथा छूँछ दृष्टिगोचर हो? किसान का श्रमधान्य से कोठे भरता है, मजदूर अपना वेतन लेकर घर में घुसता है, व्यवसायी को अपना लाभ प्रत्यक्ष दिखता है। फिर आत्मवादी को मरने के बाद परलोक में कुछ मिलने की आशा पर लटकाए रहा जाए, यह कहाँ तक उचित है। वस्तुतः अध्यात्म संसार का सबसे बड़ा लाभदायक व्यापार है। उसे जिसने अपनाया वह महामानव बना, लोकश्रद्धा उस पर निछावर हुई, संपदा और सफलता उसके पीछे-पीछे छाया की तरह फिरी,  इतिहासकारों ने उसके गुणगान करके अपनी लेखनी को धन्य बनाया, असंख्य भूले-भटकों ने उसके प्रकाश में अपना पथ-प्रशस्त किया। स्वयं का अंतस्थल दिव्य विभूतियों से इतना ओत-प्रोत रहा कि उपलब्ध आनंद को दोनों हाथों से चारों ओर उलीचकर संपर्क-क्षेत्र को चंदन बन जैसा सुरभित बनाया। आज ऐसे आत्मवादी व्यक्ति ढूँढ़े नहीं मिलते, इसका एकमात्र कारण वह भ्रांत दर्शन है, जिसने लोगों को पूजापरक कर्मकांडों को सब कुछ बताया है। काश, लोगों ने अध्यात्म का यथार्थ स्वरूप समझा होता और उन्हें वास्तविकता समझाई गई होती तो एक रुपये की लाटरी का टिकट खरीदकर लखपति बनने के सपने देखने वाले शेखचिल्ली शायद इस तरह भेड़ियाधसान न मचाते, तब शायद आज का कागज के बने गगनचुंबी रावण की तरह धर्म घटाटोप भी दिखाई न पड़ता; पर जो कुछ थोड़ा बहुत रह जाता उसमें शक्ति होती और उतनी-सी छोटी चिनगारियाँ भी बहुत कर गुजरने की भूमिका संपादित कर रही होतीं।

हमें हजार बार समझना चाहिए और लाख बार समझाना चाहिए कि अध्यात्मवाद जीवन-नीति को ही कहते हैं। पूजा, उपासना उसका शोभा-शृंगारमात्र हैं। इस दिशा में आज तक जिनने भी कुछ कहने लायक प्रगति की है, उन्होंने अनिवार्य रूप से आत्मबोध, आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया पूरी की है। हमें यदि खिलवाड़ का ही शौक हो तो हम तंत्र-मंत्रों के विधि-विधान में सीमित रह सकते है, यदि कुछ पाना हो तो कदम आगे बढ़ाने ही होंगे।

कहा जा चुका है कि आत्मबल संपादन के लिए, आत्मिक-प्रगति के लिए, पहला कदम आत्मबोध के रूप में उठाया जाना चाहिए। यह समझा ही नहीं, अनुभव भी किया जाना चाहिए कि शरीर और मन हमारे वाहन-उपकरणमात्र हैं। अपना यथार्थ स्वरूप आत्मा है। आत्मा ईश्वर का अंश है— परमेश्वर का उत्तराधिकारी राजकुमार। उसे अपना स्तर आत्मगौरव के अनुरूप ही बनाना चाहिए। वह सोचना वही करना चाहिए जो विश्वसम्राट के युवराज की गरिमा के अनुरूप हो। आत्मा के स्वार्थ, आत्मा के कर्त्तव्य, नर-पशुओं के स्तर के नहीं हो सकते, उन्हें देवोपम होना चाहिए। मनुष्य शरीर ईश्वर ने जिस विशेष प्रयोजन के लिए दिया है, उसी में उसे लगना लगाया जाना चाहिए। यदि इस बात का ध्यान बना रहे तो ओछी रीति-नीति नहीं अपनाई जा सकती। पेट और प्रजनन की आवश्यकता तो कीट-पतंग भी पूरी कर लेते हैं, मानव जीवन का उद्देश्य उससे ऊँचा है।

यह बात समझ ली जाए तो शरीर और मन को वाहन-उपकरण की तरह सन्मार्ग पर चलने के लिए सहायक के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा। उनकी गुलामी करके लोभ, मोह की घिनौनी कीचड़ में फँसते जाने से साहसपूर्वक इनकार किया जाएगा। आत्मभूमिका में जागृत व्यक्ति विनाश के गर्त में गिरने के लिए दौड़ी जा रही अंधी भेड़ों के पीछे नहीं चलता; वरन अपने दूरदर्शी यथार्थवादी विवेक-चिंतन के आधार पर अपना मार्ग-निर्धारण स्वयं करता है और स्वयं ही अपने साहस के बलबूते उस दिशा में चल पड़ने का साहस बटोरता है। वह जानता है कि मार्गदर्शन तो जीवित या दिवंगत महामानवों से ही ग्रहण किया जाना चाहिए। नर-पशु तो कितनी ही बड़ी संख्या में क्यों न हों, भले ही वे अपने स्वजन, संबंधियों में ही भरे पड़ें हों, दया के पात्र हैं उन्हें तो प्रकाश दिया जाना चाहिए, भटकने से बचाकर रास्ते पर लाया जाना चाहिए। संपर्क निकटता के कारण उन्हें यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि उच्च आदर्शों से गिराकर निरुद्देश्य जीने वाले नर-कीटकों के रास्ते पर चलने के लिए बाध्य विवश करें।

जीवन के आत्मवादी क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को आत्मबोध का प्रकाश ग्रहण करना चाहिए। निरंतर यह विचार करना चाहिए कि वह स्वयं क्या है, क्यों है? किस रीति-नीति को अपनाने में अपनी भलाई है। विवेकशीलता, दूरदर्शिता और यथार्थता को अपनाने का साहस आत्मबोध की एकमात्र देन है। जिसे अपने आपे का ज्ञान हो गया होगा, वह अज्ञानग्रस्त भीड़ का नेतृत्त्व अस्वीकार करेगा। प्रचलित परंपराओं और मान्यताओं से नहीं; वरन उच्च आदर्शों से ही प्रभावित होगा उन्हें ही स्वीकार अंगीकार करेगा। अपने को अल्पमत में पाने कि उसे चिंता नहीं होती और न इसकी परवाह रहती है कि कोई उसका उपहास करता है या स्तवन, न वह विरोध को देखता है, न समर्थन को। मात्र उसे उच्च आदर्श के लिए जीवन संपदा को नियोजित करने की चिंता होती है और इस प्रयोजन को वह विरोध, अवरोध की घनघोर घटाओं को चीरता हुआ भी पूरा करके रहता है। आत्मबलसंपन्न महामानवों में से हर किसी को इस प्रथम परीक्षा में होकर गुजरना पड़ता है, जिसे आत्मबोध हो गया वह इस दिशा में प्रयाण करता हुआ ही दिखाई देगा।

आत्मबोध को आत्मबल के रूप में देखा, परखा जा सकता है। आत्मबल जितनी मात्रा में उदय होता जाता है, उतने ही उसके प्रयास आत्मनिर्माण की दिशा में अग्रसर होते हैं। जन्म-जन्ममांतरों के कुसंस्कार आज के घिनौने वातावरण, दुष्प्रवृत्तियों के प्रवाह अंधड़ ने अपनी मनोभूमि को भी आच्छादित कर रखा हो, यह नितांत स्वाभाविक है। सुधार यहीं से आरंभ होता है, निर्माण का प्रथम केंद्र यहीं है— संसार को सुखी, समुन्नत और सुंदर बनाने का शुभारंभ अपने को सुधारने की प्रक्रिया के साथ आरंभ करना होता है। जीवन-साधना विशुद्ध रूप से एक संग्राम है, जिसे लड़े बिना आगे बढ़ने का कोई उपाय नहीं।

गीता के कृष्ण, महाभारत के अर्जुन को गांडीव उठाने के लिए ललकारते हैं। स्वयं पाँचजन्य बजाकर युद्ध घोषणा करते हैं। यह एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं; वरन हर आत्मवादी को अनिवार्य रूप से अपनाने के लिए प्रस्तुत ईश्वरीय मार्गदर्शन है। अपने कुसंस्कारों को, अवांछनीय आचरणों को, कुत्सित आकांक्षाओं की मूढ़विश्वासों को, भ्रष्ट अभ्यासों को बारीकी से ढूँढ़ना, खोजना पड़ेगा और उसकी सूची बनानी पड़ेगी। इन मल आवरण विक्षेपों से कैसे निपटा जाए, उन्हें निरस्त कैसे किया जाए, इसकी समग्र एवं सुव्यवस्थित योजना तैयार करनी होगी। अंतरंग पर अधिकार किए बैठे सौ कौरवों से निपटने के लिए पाँच पांडवों को जो करना पड़ा उसी में अपने मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और शरीररूपी पाँचों योद्धाओं को जुटाना पड़ेगा। जिस किसी के भी आत्मा में जब किसी भी परमात्मा का प्रकाश आता है, तब उसे महाभारत करने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आत्मपरिष्कार उसका प्रथम कर्त्तव्य हो जाता है।

जिन मान्यताओं और गतिविधियों में अवांछनीयता अनुभव की जाए, उनके कारण हो सकने वाली हानियों का सविस्तार चिंतन करना चाहिए और उन्हें डायरी में नोट कर लेना चाहिए। इसी प्रकार व्यक्तित्व में घुसी हुई दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को त्याग देने पर जो अपना परिष्कृत स्वरूप निखरेगा उसकी देव प्रतिमा ज्ञानचक्षुओं के सम्मुख प्रस्तुत करनी चाहिए। दिव्य जीवन कितनी सिद्धियों और विभूतियों से संपन्न होता है, उसका सुंदरतम चित्र गढ़ना चाहिए और उसमें अपने को घुलाकर यह सोचना चाहिए कि जब हम उस दिव्य स्थिति में होंगे तो अपने लिए कितनी शांति अर्जित करेंगे और अपने संपर्क को किस दिव्य आलोक से प्रकाशित करेंगे। इस प्रकार का चिंतन, आंतरिक महाभारत की सफलता का पथ-प्रशस्त करता है। अवांछनीयता के दुष्परिणामों पर सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणामों पर जिनका तर्कपूर्ण, तथ्यपूर्ण उदाहरण सहित, भावसिक्त चिंतन जितनी गहराई के साथ किया जाएगा उतना ही यथार्थवादी दृष्टिकोण परिष्कृत होगा और आत्मशोधन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से बढ़ चलना संभव हो जाएगा। बैल को, घोड़े को, जिस तरह ठीक तरह काम करने का अभ्यास कराया जाता है और सख्त-सुस्त व्यवहार किया जाता है, उसी तरह मन से भी बरतना पड़ता है। साधना, तपस्या, तितीक्षा इसी का नाम है। अपनी आकांक्षाओं अभिरुचियों और आदतों को परिष्कृत करने के प्रयास ही आत्मसुधार या आत्मनिर्माण कहलाते हैं, साधना-समर में विजय प्राप्त वीरवर्ती ही आत्मोत्कर्ष की मंजिल पूरी करते हैं।

आत्मविकास जीवन लक्ष्य प्राप्ति की तीसरी मंजिल है। अपनी लिप्सा, लालसा में निमग्न रहना, प्रजनन आकर्षण के फलस्वरूप जिन स्त्री, बच्चों के साथ मोह जुड़ गया है उन्हीं के लिए मरते खपते रहना, यही है संकीर्ण स्वार्थपरता का अवरुद्ध जीवन। इसी को भवबंधन कहते हैं, मायाबद्ध जीव की दयनीय दुर्दशा का जो चित्रण किया गया है, उसे इसी बाधित जीवन की दुखद प्रतिक्रिया समझना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है— लोभ और मोह से, स्वार्थ और संकीर्णता से, तृष्णा और वासना से छुटकारा। इसके लिए तत्त्ववेत्ताओं ने भक्तिभाव का, प्रेम प्रकाश का, सेवा-साधना का मार्ग बताया है। उदारता, करुणा, आत्मीयता का विस्तार जब होता है तो स्वभावतः दूसरों का दुख अपना दुख प्रतीत होता है और दूसरों के सुख में अपने सुख की अनुभूति होती है। ऐसी मनःस्थिति में व्यापकता और उदारता की मात्रा बढ़ती चली जाती है। आत्मविस्तार के साथ अपने पराए का भेदभाव मिटता जाता है और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का आदर्श व्यवहार में अधिकाधिक प्रविष्ट होता चला जाता है। तब मनुष्य को स्वार्थी न रहकर परमार्थी बनना पड़ता है। अपने विलास-वैभव पर नियंत्रण करना पड़ता है और परिवार के लिए उतना ही करना पर्याप्त लगता है जो कर्त्तव्य की माँग है। परिवार को सुयोग्य बनाया जाए ठीक है; पर उनके लिए धन-संपदा छोड़कर मरना अपनी क्षुद्रता का परिचय देना है, इससे उत्तराधिकारी हरामखोर और व्यसनी बनते हैं। औलाद को श्रमजीवी बनने देना चाहिए। उनके भरण-पोषण की उचित आवश्यकता पूरी करने के बाद जो समय, श्रम,ज्ञान, प्रभाव, स्नेह, साधन बचता है, उसे लोक-मंगल के लिए देश, धर्म, समाज, संस्कृति के लिए, संसार के पिछड़ेपन और अज्ञान को दूर करने के लिए खरच किया जाना चाहिए। इस दिशा में जिसका जितना साहस, त्याग, उत्साह और कर्त्तृत्व बढ़ चला, समझना चाहिए आत्मविकास की कसौटी यही है कि ‘स्व’ की परिधि को अधिकाधिक बढ़ाते चला जाए। दूसरों के शरीर में भी अपना ही आत्मा प्रतिष्ठापित दिखाई पड़े। जो सुख-सुविधा और उन्नति अपने लिए सोची, चाही और बढ़ाई जाती है उसी को दूसरों के लिए बढ़ाना भी आवश्यक प्रतीत होने लगे तो समझना चाहिए कि आत्मविस्तार की, आत्मोन्नति की, आत्मविकास की प्रक्रिया संपन्न हो रही है।

आत्मबोध, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की त्रिविधि आत्मोत्कर्ष प्रक्रिया अपनाने के लिए जो साधना करनी पड़ती है, उसका क्रम अहर्निश चलता है। जागने से लेकर सोने तक का प्रत्येक क्षण इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि चिंतन में उत्कृष्टता का और कर्त्तृत्व में आदर्शवादिता का परिपूर्ण समावेश रहे। अपनी कोई भाव तरंग उच्च गौरव से गिरी पिछड़ी न रहे, अपनी कोई हलचल ऐसी न हो जो ईश्वर के पुत्र की गरिमा के माथे पर कलंक-कालिमा लगाए। उचित-अनुचित का, श्रेय और प्रेय का निरंतर अंतर करते रहने वाली, सन्मार्ग पर अग्रसर करने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा को जिन्होंने सर्वोपरि प्रतिष्ठा प्रदान की है वस्तुतः वे ही आत्मज्ञानी हैं। आत्मोत्कर्ष उन्हीं का हो सकता है जिन्होंने अपने सोचने और करने की समस्त हलचलों में उच्चस्तरीय तत्त्व दर्शन का समावेश कर सकने में सफलता प्राप्त की है। इस महान प्रयास में पूजा, उपासना भी एक अंग है। भोजन में नमक शक्कर का जितना स्थान है, उतना ही मूल्य जप भजन का भी है। क्षुधा तो आहार से पूरी होती है, आत्मकल्याण तो जीवन-साधना की तत्परता पर निर्भर रहता है।

हमें आत्मकल्याण की राह ढूँढ़नी चाहिए। आत्मबल संपादित करना चाहिए और आत्मप्राप्ति के अजस्र आनंद का लाभ लेकर मानव जीवन को धन्य बनाना चाहिए।

इस प्रकार का आत्मवादी चिंतन यदि अंतःकरण में स्थान प्राप्त कर सके तो समझना चाहिए ज्ञान चेतना सार्थक हो गई। यदि कर्त्तृत्व में दिव्य क्रियाकलाप का समावेश हो सके तो समझना चाहिए सुरदुर्लभ मानव-काया का ईश्वरीय अनुदान सार्थक हो गया। असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर, यदि हम चल सके तो ही जीवन की महान उपलब्धि को धन्य माना जा सकेगा।


शहीदी दिवस (कहानी)

17 जनवरी 1872 का शहीदी दिवस। मालेर कोटला में इस दिन कितने ही कूका वीरों ने अपना बलिदान कर दिया। एक कूका वीर आया, जिसकी आयु केवल 12 वर्ष थी। माता खैमकोर का यह इकलौता पुत्र था, नाम था बिशनसिंह।

अब तक कितने ही वीर सीना तानकर, तोप के सामने आ खड़े हुए थे और मौत के घाट उतारे जा चुके थे। अन्य वीरों की तरह बिशनसिंह भी आया और अंग्रेजों की तोप के सामने आ खड़ा हुआ। सतगुरु के चरणों का स्मरण किया। उसके भोले-भाले रूप को देखकर अंग्रेज अधिकारी की पत्नी काबन बहुत प्रभावित हुई। वह नहीं चाहती थी कि उसके पति द्वारा ऐसे मासूम बच्चों की हत्या की जाए। उसने अपना मुँह पति के कान के पास ले जाते हुए कहा— “क्या इस दुधमुँहे की रक्षा नहीं हो सकती ?”

हाँ हो सकती है, यदि वह स्वीकारकर ले कि सतगुरु रामसिंह का भक्त नहीं है। बिशनसिंह ने इतना सुना, तो वह आवेश को न रोक सका। उसने यह भी नहीं सोचा कि आस-पास कितने सैनिक खड़े हुए हैं मरना तो था ही, उसने उछलकर काबन की दाढ़ी पकड़ ली और उसको झटका देकर जमीन पर गिरा लिया। अब काबन नीचे और बिशनसिंह ऊपर था। उसने कहा— "बोल अब तू फिर कहेगा कि बिशनसिंह सतगुरु रामसिंह का भक्त नहीं है।"

वीर बिशनसिंह ने कार्बन की दाढ़ी तब तक न छोड़ी जब तक उसके शरीर के तलवार से टुकड़े-टुकड़े न कर दिए गए। बहुत पहले से भारत में बहादुरी की यह परंपरा रही है।


जय बोलो श्रीराम की


जय बोलो श्रीराम की (कविता)

जिसने की उपासना निशिदिन, ज्ञान-ध्यान सत्काम की।

शुद्धहृदय से, मुक्तकंठ से, जय बोलो श्रीराम की॥

भव-भयहारी, जन-हितकारी, ज्योति जलाई ज्ञान की।

प्रेम-प्रीति का बिरवा रोपा, जड़ काटी अभिमान की॥

जिसने रक्षा की आजीवन, धर्म-कर्म ईमान की।

जिसने डाली नींव अलौकिक, शक्ति-भक्ति बलिदान की॥

जिसने छुई न सपने में भी, कौड़ी कभी हराम की।

शुद्धहृदय से, मुक्तकंठ से, जय बोलो श्रीराम की॥

दुष्प्रवृत्तियों के घेरे को, ध्वस्त किया तप त्याग से।

रहे सदैव सचेत हृदय से, काम-क्रोध की आग से॥

भूले-भटके राहगीर को, राह बताई प्रेम से।

जड़-विमूढ़ को गले लगाकर, पाठ पढ़ाया नेम से॥

दूर हटाई गहन उदासी, गली-गली हर ग्राम की।

शुद्धहृदय से, मुक्तकंठ से, जय बोलो श्रीराम की॥

मर्यादा का कभी उल्लंघन, किया नहीं अनजान में।

तन-मन-धन से रहे सदा रत, नवयुग के निर्माण में ॥

धार मोड़ दी आत्मशक्ति से, हिंसा के हथियार की।

द्वेष-घृणा के अंगारों पर, प्रेमामृत बौछार की॥

परहित में ही लगे रहे नित, फिकर न की धनधाम की॥

शुद्धहृदय से, मुक्तकंठसे, जय बोलो श्रीराम की॥

नजर बाँध दी तूफानों की, अनुपम आत्म प्रकाश से।

अनजाने भर दिया दीन का, घर आँगन उल्लास से ॥

नई प्रेरणा नूतन गति दी, नवयुग के निर्माण को।

पथ-प्रशस्त कर नई दिशा दी, ज्ञान और विज्ञान को॥

मन-मंदिर में पूजा कर लो, मानव मूर्ति ललाम की।

शुद्धहृदय से, मुक्तकंठ से, जय बोलो श्रीराम की॥

*समाप्त*