अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।
(1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।
(2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।
(3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।
(4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।
(5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।
मरण शैया पर पड़े हुए पिता ने अपने पुत्र की ओर कातर दृष्टि से देखा। बैजू ने कहा-तात मैं आपकी जीते जी तो कोई विशेष सेवा नहीं कर पाया बताइए अब क्या आदेश है?”
‘बेटा! मुझे इस समय अपनी एक ही इच्छा कचोट रही है। अपने संगीत दर्प से तानसेन ने मुझे बड़ा अपमानित किया था और मैं उसका बदला नहीं ले सका।’ यह कहकर बैजू के पिता ने दम तोड़ दिया।
बदला मैं लूँगा-निश्चय कर उसने अपने पिता की मृत देह की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करा दी। श्मशान में भी अपने पिता की राख को हाथ में लेकर उसने कसम खाई कि में बदला लेकर रहूँगा।
रात का घना अन्धकार था। तानसेन के महल की चहार दीवारी फाँद कर बैजू अन्दर घुस गया। हाथ में परशु की तेजधार, अँधेरे में भी चमक रही थी। वह तानसेन के शयन कक्ष की ओर बढ़ा। दरवाजे की झिरझिरी से झाँक कर देखा। सब लोग निद्रा मग्न थे तानसेन देवी सरस्वती की प्रतिभा के आगे बैठा कुछ पढ़ रहा था।
सरस्वती की शान्त और वरद्हस्त उठाए प्रतिमा को देख कर बैजू के हृदय में विचार मन्थन होने लगा। अन्तः करण में स्फुरणाएं उठने लगीं-प्रतिरोध ऐसा प्रतिशोध, किस काम का जिसमें अपना और भी पतन हो। माना कि तानसेन तो संगीत दर्प में पिताजी को अपमानित कर बैठा तो क्या मैं भी अपने बल और छल के दर्प में उसे मारकर उसका बदला लू क्या प्रतिशोध का दूसरा मार्ग नहीं है? हो सकता है? ऐसा ही प्रतिशोध मुझे नहीं लेना। देवी माँ मुझे सद्बुद्धि दे।’ और वह बिना प्रतिशोध लिए ही घर लौट आया। वस्तुतः ऐसे प्रतिशोध से क्या लाभ जो मनुष्य को दानवी-प्रवृत्तियों में लगा दे।-
बैजू ने घर आते-आते रास्ते में संगीत साधना का निश्चय किया और अपनी साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
संगीत के स्वरों में झंकृत वीणा के साथ-साथ उसकी हृदय तंत्री भी बजने लगी और बैजू के गीतों का आराध्य सर्व नियामक परमात्मा हो गया। अपनी साधन तन्मयता में वह खाने पीने की सुध तक भूल जाता। लोगों ने उसे बावरा कह कर सम्बोधित करना शुरू कर दिया। उसके गीतों और स्वरों को जो भी सुनता, ईश्वर भक्ति की तरंगें मन में उठने लगती।
बैजूबावरा की ख्याति फैलने लगी। होते-होते सम्राट अकबर तक उसकी प्रशंसा पहुँची। अकबर की दृष्टि से तो तानसेन के समान और कोई गायक ही नहीं था परन्तु जब सुना कि बैजू बावरा भी बहुत अच्छा गाता है तो स्वाभाविक ही उसका जी भी गायन सुनने के लिए मचल उठा।
अकबर ने दूत को भेजा बैजू बावरा को दरबार में उपस्थित होने के लिए। परन्तु दूत अकेला ही लौट आया और बोला-महाराज आपको गीत सुनना है तो उसकी झोंपड़ी पर जाए
दरबारियों समेत राजा बैजू बावरा की झोंपड़ी पर पहुँचे और बैजू ने अपनी स्वर लहरी छोड़ी। सब मंत्रमुग्ध हो उठे। तानसेन ने अपनी पराजय को अब प्रत्यक्षतः स्वीकार कर लिया- जहाँपनाह मैं आपको खुश करने के लिए गाता हूँ और बैजू ईश्वर को खुश करने के लिए। ईश्वर की तुलना में आपकी सत्ता की संगति कहाँ बैठेगी। जो अन्तर ईश्वर और आपमें है वही अन्तर बैजू और मुझमें है।
ईश्वर भक्ति के प्रसार स्वरूप बैजू के मन से प्रतिशोध या विकार की भावना नष्ट हो चुकी थी। उसे ध्यान भी नहीं था कि ‘मुझे तानसेन को पराजित करना था’ फिर भी उसका प्रतिरोध-सही अर्थों में पूरा हो चुका था। क्योंकि तानसेन का संगीत दर्प टूट गया।
विज्ञान के विगत अनुसंधानों के आधार पर यह संसार हृदय और अदृश्य स्वरूप परमाणु घटकों के आधार पर रचित विनिर्मित है। अणुगत हलचलों से वस्तुओं का स्वरूप बनता है और प्राणियों के शरीर अवयव उन्हें अपने-अपने ढंग से पहचानते अनुभव करते हैं। वस्तुओं का निजी क्रिया-कलाप और उसे अनुभव करने की शरीरधारियों की क्षमता का पारस्परिक सम्मिश्रण जिस रूप में समझा जाना जाता है, वही है संसार का स्वरूप। इसी की चर्चा विवेचना विज्ञान जगत में होती रहती है।
पिछले वैज्ञानिक निष्कर्ष यह बताते रहे हैं कि यह संसार आणविक संरचना की विभिन्न प्रक्रियाओं की ही प्रतिक्रिया है। पर अब जैसे-जैसे इस संदर्भ में अधिक गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाने लगा है यह सोचने को विवश होना पड़ा है कि सब कुछ जड़ ही नहीं है। इसके भीतर एक चेतन सत्ता भी विद्यमान् है और उसकी भूमिका अकिंचन नहीं है। अनुसंधानों से यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि चेतना की सूक्ष्मसत्ता स्थूल अणुसत्ता की तुलना में अत्यधिक समर्थ और प्रभावी हैं। सच तो यह है कि जड़ पदार्थों में निरन्तर गतिशील रहने वाली हलचलों के पीछे कोई समष्टिगत चेतना प्रवाह ही काम कर रहा है।
भौतिक पदार्थों में हलचल मात्र पाई जाती है, उनमें जानने, विचारने और अनुभव करने की कोई शक्ति नहीं है। मशीनें तेल, कोयला आदि खाती तो हैं निर्धारित रीति-नीति से काम भी करती हैं पर उनमें सोचने विचारने जैसी कोई क्षमता नहीं है। भाव सम्वेदनाओं से भी उनका सम्बन्ध नहीं है। इससे स्पष्ट है कि जड़ परमाणुओं से ही यदि शरीर रूपी यन्त्र बना होता तो उसमें विविध स्तर की अनुभूतियाँ क्योंकर पाई जाती?
देखना, सुनना, चखना, सूँघना, संकल्प करना, स्मरण रखना, रागद्वेष, काम, क्रोध, सुख, दुःख, हर्ष, शोक आदि सम्वेदनाओं का उभार जिस आधार पर प्राणि जगत में दृष्टिगोचर होते हैं, उन्हें चेतन सत्ता का प्रवाह ही कहा जा सकता है। जड़ पदार्थों के स्वरूप एवं क्रिया-कलाप में इस प्रकार की विचार चेतना के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। अस्तु पिछले दिनों से चली आ रही इस मान्यता का सहज ही खण्डन हो जाता है कि यह जगत परमाणु घटकों की स्वसंचालित संरचना मात्र है, सृष्टि संचालन आत्मा या परमात्मा जैसी किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता नहीं है। हलचलों के साथ सम्वेदनाएँ किस प्रकार जुड़ सकती हैं इसका कोई समाधान वैज्ञानिकों के पास नहीं है। जो उत्तर वे देते हैं उनसे सन्तोषप्रद समाधान नहीं निकलता। इस संदर्भ में जो अगली खोजें हुई हैं उनमें रिलाइजेशन-अनुभूति को एक स्वतंत्र सत्ता मानना पड़ा है और यह समझा जाने लगा है कि चेतना का नियन्त्रण जब पदार्थगत हलचलों के साथ जुड़ता है तभी जीवन का स्वरूप सामने आता है।
‘मिस्टीरिअस’ यूनीवर्स ग्रन्थ के रचयिता सर जेम्स जोन्स ने लिखा है-विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता का नियन्त्रण करने वाली चेतना सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है और यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालित अचेतन सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास अधिक गम्भीरता पूर्वक कर रहे हैं।
फिजियोलॉजिकल साइकोलॉजी के लेखक मनोविज्ञान वेत्ता श्री मैकडूगल ने लिखा है- मस्तिष्कीय संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि पाशविक स्तर से ऊँचे उठकर मानव प्राणी अपने में उच्चस्तरीय ज्ञान विज्ञान की धारायें कैसे बहाता रहता है और भावनापूर्ण सम्वेदनाओं से कैसे ओत-प्रोत रहता है? भाव सम्वेदनाओं की गरिमा समझते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्त सत्ता भी विद्यमान् है जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसी कोई नाम दिया जा सकता है।
अणु विज्ञान के आचार्य अलबर्ट आइन्स्टीन ने परमाणु प्रक्रिया का विशद विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष को घोषित करते हुए कहा है-मुझे विश्वास हो गया है कि जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना भी काम रही है।
सर ए. एस. एडिगृन का कथन है-भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सके। हम उसका सही स्वरूप और क्रिया-कलाप अभी नहीं जानते पर यह अनुभव करते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है- वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है।
पी. गेइर्डस अपने ग्रन्थ ‘इवोल्यूशन’ में अपने निष्कर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं-सृष्टि का आरम्भ जड़ परमाणुओं से हुआ और ज्ञान पीछे उपजा यह मान्यता सही नहीं है। लगता है सृष्टि से भी पूर्व कोई चेतना मौजूद थी और उसी के क्रमबद्ध एवं सोद्देश्य रीति-नीति के साथ इस विश्व ब्रह्माण्ड का सृजन किया।
‘इन्ट्रोडक्शन टू साइंस’ की पुस्तक में विज्ञानी जे. ए. थामसन ने कहा है-विश्व में जीवन कब और कैसे उत्पन्न हुआ उसका विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है।
ख्याति प्राप्त विज्ञान वेत्ता टेन्डल ने अपने ग्रन्थ फ्रेगमेन्टस आफ साइंस में स्वीकार किया है-हाइड्रोजन आक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस प्रभृति तत्त्वों के ज्ञान शून्य परमाणुओं से मस्तिष्क की संरचना हुई है। इस यांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से देखना, सोचना, स्वप्न, सम्वेदनाएँ एवं आदर्शवादी भावनाओं के उभार की कोई तुक नहीं बैठती। शरीर यात्रा की आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त मनुष्य जो कुछ सोचता चाहता और करता है वह इतना अद्भुत है कि जड़ परमाणुओं से बने मस्तिष्क के साथ उसकी कोई संगति नहीं बिठाई जा सकती। चौपड़ के पासे खड़खड़ाने से होमर कवि की प्रतिभा एवं गेंद की फड़फड़ाहट से गणित के डिफरैन्शियल सिद्धान्त का उद्भव कैसे हो सकता है इसका उत्तर मस्तिष्क को जड़ परमाणुओं की संरचना मात्र मानकर चलने से मिल ही नहीं सकता?
जे. पी. एम. ऐल्डन का कथन है-पदार्थ या शक्ति ही इस संसार का समग्र स्वरूप नहीं है। हम दिन-दिन इस निष्कर्ष पर पहुँचते जाते हैं कि एक समष्टिगत मन तत्त्व समस्त विश्व पर नियन्त्रण स्थापित किये हुए है।
आर्थर एच-क्राम्पटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि संसार के पदार्थों को जलते हुए ईंधन जैसा समझा जा सकता है। जड़ चेतना की ज्वलन्त गतिविधियाँ ऐसे अग्नि तत्त्व के साथ सम्बद्ध हैं जिसे व्यापक चेतना या आत्मा का आदि किसी नाम से सम्बोधित किया जा सके।
हर्बर्ट स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘फर्स्ट प्रिंसिपल’ में कहा है- एक ऐसे विश्वव्यापी चेतन तत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता है, जो साधारणतया सभी प्राणधारियों में विशेषतया मानव प्राणियों में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीन काल के धर्माचार्य या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे है भले ही वह संदिग्ध हो, भले ही उसका सही स्वरूप अभी समझा न जा सका हो पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण होना चाहिए।
डा. गाल कहते हैं-संसार का मुख्य तत्त्व ‘पदार्थ’ नहीं वरन् वह चेतन सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।
संसार के प्रमुख विज्ञान वेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ ‘दी ग्रेट डिजाइन’ में प्रतिपादन किया गया है कि-यह संसार निर्जीव यन्त्र नहीं है। यह सब अनायास अकस्मात् ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही है उसका नाम भले ही कुछ भी दिया जाय।
‘साइंस एण्ड सोल’ के लेखक आर. डवलिन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्राणि जगत के अस्तित्व को जड़ परमाणुओं की हलचल मात्र मान बैठने से काम नहीं चलेगा भावना, विचारणा, कल्पना और सम्वेदना जैसी तरंगें उत्पन्न करने वाली ज्ञान सत्ता को यदि अस्वीकार किया जाय तो जीवधारियों की सत्ता की सही व्याख्या ही नहीं हो सकती।
इसी प्रकार विश्व के अगणित प्रख्यात विज्ञानवेत्ता चेतना के अस्तित्व को स्वीकार कर चुके हैं और इस संदर्भ में चल रहे शोध प्रयास निरन्तर अधिक स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित कर रहे हैं कि चेतना प्रवाह की सत्ता को न आत्मा के अस्तित्व के संदिग्ध मानने का कोई कारण नहीं। ‘क्रौयोटिव इवोल्यूशन’ नामक अपने ग्रन्थ में शरीर शास्त्री वर्गसन ने इस बात पर अत्यन्त विस्मय प्रकट किया है कि नेत्र गलोके की संरचना अत्यधिक जटिलताओं के साथ बनी हैं और साथी ही उनके द्वारा प्रकाश तरंगों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक उस सम्वेदना को पहुँचाने की प्रक्रिया और भी अधिक पेचीदगियों से भरी है। इतने पर भी दृष्टि कार्य अत्यधिक सरल है। जो कुछ देखा जाता है, उसके स्वरूप को मस्तिष्क क्षण भर में पकड़ लेता है। इतनी लम्बी और इतनी जटिलताओं के बीच घूमती हुई दृष्टि प्रक्रिया इतनी अधिक सरलता पूर्वक गतिशील रह सकती है। इसका जितनी गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय, उतना ही यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि इसी प्रकार की संरचनाओं से भरे हुए समस्त अवयवों वाला यह शरीर अनायास ही जड़ प्रकृति द्वारा बना नहीं रह सकता। इसकी सृजेता कोई विचारशील और बुद्धिमान सत्ता होनी चाहिए, चेतन सत्ता केवल प्राणधारियों के अस्तित्व में चिन्तनात्मक एवं भावनात्मक सम्वेदना उत्पन्न करती हो सो बात नहीं। जड़ समझे जाने वाले वृक्ष वनस्पति से लेकर रासायनिक एवं खनिज पदार्थों में भी उसका न्यूनाधिक प्रभाव रहता है। चेतना तत्त्व के सम्बन्ध में जो शोध संशोधन चल रहे हैं, उन्होंने वृक्ष वनस्पतियों को भी प्राणि जगत का ही असंदिग्ध सदस्य बना दिया है। मनुष्य से लेकर वनस्पति तक की विभिन्न प्राण योनियों में सम्वेदनाओं का स्तर विभिन्न प्रकार का पाया जाता है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इन सभी में चेतन सत्ता आत्मा का अस्तित्व विद्यमान् है। इससे आगे जल, खनिज, मृतिक, रासायनिक कैसे सृष्टि वर्ग रह जाते हैं। इनके सम्बन्ध में भी दिन-दिन यह समझा जा रहा है कि ये भी वैसे निश्चेष्ट निर्जीव नहीं है जैसे दिखाई पड़ते हैं। लोहे पर जंग लगना, कीचड़ से कीड़ों का उत्पन्न होना, जल पर कोई जमना, इस बात के प्रमाण है कि उनमें जीवन तत्त्व की मात्रा विद्यमान् है। जल की प्रत्येक बूँद से अणुवीक्षण यंत्र से चलते फिरते कीड़े देखे जा सकते हैं और उनमें अगणित प्रकार के बड़ी आकृति वाले जल चर उत्पन्न होते रहते हैं। इस प्रकार जल की सजीवता भी स्वयं प्रकट ही है। यह जीवन धातुओं, पत्थरों से कम भले ही हो पर क्रमशः उनकी बद्धता और विनष्ट होते रहने की रीति-नीति को देखते हुए उन्हें भी मंद जीवन धारी वर्ग में बिठाया जा सकता है। इन तथ्यों पर विचार करते हुए अब वैज्ञानिक मान्यताएँ यही बन चली हैं कि विश्व के कण-कण में न केवल हलचलें हो रही है वरन् उनमें जीवन तत्त्व भी हिलोरें ले रहा है।
जीवन ही आत्मा है। समष्टिगत आत्मा परमात्मा है। जिस पर ब्रह्माण्ड की छोटी प्रतिकृति पिण्ड ग्रह और प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान् जीवन सत्ता आत्मा का समग्र स्वरूप परमात्मा है। विज्ञान अब उतना नास्तिक नहीं रहा जितना पचास वर्ष पूर्व था। अब वह आत्मा ही नहीं प्रकारान्तर में परमात्मा की सत्ता स्वीकार करने जारी रहेगी और चेतना के स्वरूप, लक्ष्य एवं क्रियाकलाप का सर्वमान्य आधार भी सामने आयेगा, भले ही वह धर्म सम्प्रदायों के द्वारा की गई चेतना की परिभाषा से कितनी ही भिन्न क्यों न हों। वैज्ञानिक प्राप्ति क्रमशः नास्तिकवाद को अमान्य ठहराती चली जा रही है और चेतना के अस्तित्व को स्वीकार करके आस्तिकता के आगे मस्तक झुका रही है। वह दिन भी दूर नहीं जब आत्मा और परमात्मा का जीवनोपयोगी उपयोग कर सकने का आधार भी उपलब्ध होगा और उपासना साधना को भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मान कर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
शब्द के अक्षरों से सीमाबद्ध हो जाना न तो सत्य की रक्षा है न वचन का पालन। शब्द भावनाओं का आवरण है सत्य का निरूपण नहीं। कितनी ही बार भावनात्मक आवेश आते है और कई बार भ्रम ग्रस्त स्थिति होती है, उन परिस्थितियों में यदि कोई शब्दात्मक निर्णय घोषित कर दिया जाता है तो उसका विवेक न्याय और दूरदर्शिता की कसौटी पर सही होना आवश्यक नहीं। उसमें बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जिसके लिए पीछे पश्चाताप या परिशोधन करना पड़े।
नशा पी लेने के आवेश में और भ्रमग्रस्त स्वप्न स्थिति में वाणी से जो कुछ कहा गया था, उसे पूरा करना ही चाहिए, पालन करना ही चाहिए यह आवश्यक नहीं। इसी प्रकार भय आतंक या विवशता की स्थिति में यदि कुछ कह दिया गया है, तो उसे ग्रहण के उतर जाने पर वैसी ही मलीनता धारण किये रहना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। आतंक रहित सरल और स्वाभाविक स्थिति आने पर अपनी तथाकथित वचन बद्धता की स्थिति में बदल देना-सत्य का पालन है विरोध नहीं। इसीलिए तत्त्वदर्शी सत्य का पालन है विरोध नहीं। इसीलिए तत्त्वदर्शी सत्य को शब्द की परिधि तक सीमित रहने वाला नहीं मानते, वे तथ्य के साथ सत्य को जोड़ते हैं ओर कहते हैं विवेक, न्याय और आदर्श की स्थिति पर जो खरा उतरे वही सत्य है। अवांछनीय स्थिति के प्रतिपादन को अनौचित्य सिद्ध हो जाने पर भी इसलिए पकड़े रहना कि वचन का पालन किया ही जाना चाहिए सत्य का अवलम्बन नहीं। भूल प्रतीत हो जाने पर स्थिति को बदल देना सत्य की रक्षा ही कहा जायेगा। शब्द बंधन में बंध कर रह जाना तो एक प्रकार की बौद्धिक जड़ता ही कही जा सकती है।
महाभारत में कई ऐसी घटनाएँ आती है जिनमें शब्द सत्य को यथार्थ सत्य मान बैठने का परिणाम वैसा ही अनर्थमूलक हुआ जैसा कि असत्य अपनाने से होता है।
स्वयंवर में अर्जुन का वरण द्रौपदी ने किया। वे पति-पत्नी घर लौटे। कुन्ती काम में लगी थी। अर्जुन ने कहा-माँ एक बड़ी उपलब्धि लाये हैं। कुन्ती भी काम में लगी थी उसने ऐसे ही सरल स्वभाव से कह दिया-जो लाये हो उसका उपयोग तुम पाँचों मिल जुल कर लो। शब्द को ही आदेश मानकर शिरोधार्य किया गया। द्रौपदी को पाँच भाइयों की पत्नी बनाना पड़ा। आदेश सो आदेश। वचन सो वचन। द्रौपदी ने अर्जुन को वरण किया था पर शब्द बंधनों में बँधी होने के कारण उसे पाँचों की पत्नी बनना स्वीकार करना पड़ा। अन्तरात्मा का हनन भी उसने किया। न्याय, औचित्य सब कुछ निरर्थक शब्द प्रधान। यही द्रौपदी का दाम्पत्य जीवन।
पाण्डव जब अन्तिम समय हिमालय पर गये तो सबसे पहले द्रौपदी का अवसान हुआ। पहले उसी को क्यों गिरना पड़ा। इसका निरूपण करते हुए तथ्य वेत्ताओं ने कहा-उसने आदेश को मुख्य माना शब्द को सत्य समझा। औचित्य और अन्तरात्मा को गौण माना। यह भूल थी। ऐसे अवसर पर उसे शब्दादेश का प्रतिरोध करना चाहिए था।
ऐसी ही भूलें पाण्डव स्वयं भी कई बार करते रहे। भाइयों ने निश्चय किया कि जब एक भाई की बारी द्रौपदी के साथ रहने की हो तब दूसरा वहाँ न जाय।
गाण्डीव की निन्दा अर्जुन की असह्य थी। उसने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जो कोई गाण्डीव की निद्रा करेगा उसका शिर काट लूँगा। महाभारत के एक प्रसंग में खीज़ कर युधिष्ठिर ने अर्जुन के गाण्डीव को धिक्कार दिया। अर्जुन को प्रतिज्ञा का ध्यान आया और वह युधिष्ठिर का सिर काटने चल दौड़ा। भगवान कृष्ण बड़ी कठिनाई से शब्द सत्य की निरर्थकता समझाते हुए उसे शान्त कर पाये।
वेदान्त दर्शन संसार को माया बताया है और संसार को स्वप्न कहता है इसका अर्थ यह नहीं कि जो कुछ दीखता है उसका अस्तित्व ही नहीं अथवा जो सामने है वह झूठ है। वर्तमान स्वरूप एवं स्थिति में वे सत्य भी हैं यदि ऐसा न होता तो कर्म फल क्यों मिलते? पुण्य और तप तितीक्षा करने की क्या आवश्यकता होती है। कर्तव्य और अकर्तव्य में क्या अन्तर होता? धर्मकृत्यों की क्या उपयोगिता रहे जाती? और पापकर्मों से डरने बचने की क्या आवश्यकता रहती?
माया का अर्थ वेदान्त ने इस अर्थ में किया है जिसमें जो भाषित होता हो वह तत्त्वतः यथार्थ न हो। जगत को इसी स्थिति में-इसी स्तर का माना गया है। वह जैसा कुछ प्रतीत होता है, क्या वह वैसा ही है? इस प्रश्न पर जब गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि संसार में जो कुछ हम इन्द्रियों द्वारा देखते हैं, अनुभव करते हैं वह सब यथार्थ में वैसा ही नहीं होता। इन्द्रिय छिद्रों के माध्यम से मस्तिष्क को होने वाली अनुभूतियों का नाम ही जानकारी है। यह जानकारी तभी सही रूप में इन्द्रियाँ समझ सकें। यदि वे धोखा खाने लगें तो मस्तिष्क गलत अनुभव करेगा और वस्तुस्थिति उलटी दिखाई पड़ने लगेगी।
नशा पी लेने पर मस्तिष्क और इन्द्रियों का संबंध लड़खड़ा जाता है, फलस्वरूप कुछ का कुछ अनुभव होता है शराब के नशे में धुत व्यक्ति जैसे कुछ सोचता, समझता, देखता अनुभव करता है वह यथार्थता से बहुत भिन्न होता है। और भी ऊँचे नशे इस उन्मत्तता की स्थिति की और भी अधिक बढ़ा देते हैं। डी. एलस्केस. ए. सरीखे नवीन नशे तो इतने तीव्र हैं कि उनमें चेतन के उपरान्त ऐसे विचित्र अनुभव मस्तिष्क को होते हैं जिनकी यथार्थता के साथ कोई संगति नहीं होती।
साधारणतया दैनिक जीवन में भी अधिकांश अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के पर्दे पर जो दीखता है सही कहाँ है? एक के बाद एक आने वाली अलग-अलग तस्वीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आंखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है है मानो फिल्म में पात्र चल फिर रहे है। लाउडस्पीकर से शब्द अलग चलते हैं पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है मानो अभिनेताओं के मुख से ही वार्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर पर्दे पर उतरती है पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है और मस्तिष्क ऐसा अनुभव करता है मानो यथार्थ ही वह घटना क्रम घटित हो रहा है।
सिनेमा के दृश्य क्रम को देखकर आने वाला यह नहीं अनुभव करता कि उसे यांत्रिक जाल जंजाल में ढाई तीन घंटे उलझा रहना पड़ा है। उसे जो दुःखद, सुखद रोचक भयानक अनुभूतियाँ उतने समय होती रही हैं वे सर्वथा भ्रान्त थीं। सिनेमा हाल में कोई घटना क्रम नहीं घटा। कोई प्रभावोत्पादक परिस्थिति नहीं बनी केवल प्रकाश यन्त्र या ध्वनि यन्त्र अपने-अपने ढंग की कुछ हरकतें भी करते रहे। इतने भर से दर्शक अपने सामने अति महत्त्वपूर्ण घटना क्रम उपस्थित होने का आभास करता रहा, इतना ही नहीं उससे हर्षातिरेक एवं अश्रुपात जैसी भाव भरी मनः स्थिति में भी बना रहा। इस इन्द्रिय भ्रम को माया कहा जाता है। मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमा हाल, उसमें युक्त यन्त्र, दर्शकों की भीड़ उनकी अनुभूति आदि का क्या महत्त्व रह जाता? थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाय तो यह यन्त्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने को नेत्र असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने-अपने ढंग से सही हैं। संसार चूँकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटना क्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं। इसलिए वह सही है किन्तु गहराई में प्रवेश करने पर वे दैनिक अनुभूतियाँ नितान्त भ्रमित सिद्ध होती हैं। ऐसी दशा में उन्हें भ्रम, स्वप्न या माया कहना भी अत्युक्ति नहीं है।
स्पष्ट है सभी दृश्य पदार्थ एक विशेष प्रकार के परमाणुओं का एक विशेष प्रकार का संयोग मात्र है। प्रत्येक परमाणु अत्यन्त तीव्र गति से गतिशील है। इस प्रकार हर पदार्थ अपनी मूल स्थिति में आश्चर्यजनक तीव्र गति से हरकत कर रहा है। पर खुली आंखें यह सब कुछ देख नहीं पाती और वस्तुएँ सामने जड़वत् स्थिर खड़ी मालूम पड़ती है। ऐसा ही अपनी पृथ्वी के बारे में भी होता है। भू मण्डल अत्यन्त तीव्र गति से (1) अपनी धुरी पर (2) सूर्य की परिक्रमा के लिए अपनी कक्षा पर (3) सौर मण्डल सहित महासूर्य की परिक्रमा के पथ पर (4) घूमता हुआ लट्टू जिस तरह इधर उधर लटकता रहता है उस तरह लटकते रहने के क्रम पर (5) ब्रह्माण्ड के फैलते फूलते जाने की प्रक्रिया के कारण अपने यथार्थ आकाश स्थान को छोड़ कर फैलता स्थान पकड़ते जाने की व्यवस्था पर-निरन्तर एक साथ पाँच प्रकार की चालें चलती रहती हैं। इस उद्धत नृत्य को हम तनिक भी अनुभव नहीं करते और देखते हैं कि जन्म से लेकर मरण काल तक धरती अपने स्थान पर जड़वत् जहाँ की तहाँ पड़ी रही है। आँखों के द्वारा मस्तिष्क को इस संबन्ध में जो जानकारी दी जाती है ओर जैसी कुछ मान्यता आमतौर से बनी रहती है उसका विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि हम भ्रम अज्ञान की स्थिति में पड़े रहते हैं और कुछ का कुछ अनुभव करते रहते हैं, यह माया ग्रस्त स्थिति कही जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
जल से सूर्य चन्द्र के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं और लगता है कि पानी में वे प्रकाश पिण्ड जगमगा रहे हैं। हर लहर पर प्रतिबिम्ब पड़ने से हर लहर पर एक चन्द्रमा नाचता थिरकता मालूम पड़ता है। रेल में बैठने वाले देखते हैं कि वे अपने स्थान पर स्थिर बैठे हैं केवल बाहर तार के खंभे और पेड़ आदि भाग रहे हैं। क्या यह अनुभूतियाँ सत्य हैं?
रात्रि को स्वप्न देखते हैं। उस स्वप्नावस्था में दिखाई पड़ने वाला घटना क्रम यथार्थ मालूम पड़ता है। देखते समय दुःख-सुख भी होता है। यदि यथार्थ में सन्देह होता तो कई बार मुख से कुछ शब्द निकल पड़ना-स्वप्नदोष आदि हो जाने की बात क्यों होती? जागने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो सपना देखा गया था उसमें यथार्थ कुछ भी नहीं था। केवल कल्पनाओं की उड़ान को निद्रित मस्तिष्क ने यथार्थता अनुभव कर लिया। उतने समय की मूर्छित मनः स्थिति अपने को भ्रम जंजाल में फँसाये रह कर वे सिर पैर की उड़ानों में उड़ाती रही।
अँधेरे में झाड़ी भूत जैसी लगती है-रस्सी का टुकड़ा साँप प्रतीत होता है, मरीचिकाएं थल में जल का और जल में थल का भान करती हैं। यथार्थता से सर्वथा भिन्न अनुभूतियों का होना कोई अनहोनी बात नहीं है। आकाश में बहुत ऊँचे उड़ने वाले वायुयान छोटे पक्षी जैसे लगते हैं। पृथ्वी की अपेक्षा लाखों गुने बड़े और अपने सूर्य से हजारों गुने अधिक चमकदार तारागण नन्हे से दीपक की तरह टिमटिमाते दीखते हैं। क्या यह सारे दृश्य यथार्थता में वैसे ही जैसे कि आंखें हमें अनुभव कराती हैं?
स्वर्ग और नरक दोनों का उत्कृष्ट और गर्हित दृष्टि कोण के रूप में अपने ही भीतर विद्यमान् हैं।
आँखों की तरह ही अन्य इन्द्रियों की बात है। वे एक सीमा तक ही वस्तुस्थिति का ज्ञान कराती हैं और जो बताती जाती है उसमें से भी अधिकांश भ्रान्त होता है। बुखार आने पर गर्मी की ऋतु में शीत का और शीत में गर्मी का अनुभव होता है। मुँह का जायका खराब होने पर हर चीज कड़ुई लगती है। जुकाम हो जाने पर चारों ओर बदबू का अनुभव होता है। पीलिया रोग होने पर आँखें पीली हो जाती है और हर चीज पीले रंग की दिखाई पड़ती है। क्या यह अनुभूतियाँ सही होती हैं?
जिस वस्तु का जैसा स्वाद प्रतीत होता है वह वास्तविक नहीं है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य को जो नीम के पत्ते कड़ुए लगते हैं, वे ऊँट को भी वैसे ही क्यों न लगते, वह उन्हें रुचि पूर्वक स्वादिष्ट पदार्थों की तरह क्यों खाता? खाद्य पदार्थों का स्वाद हर प्राणी की जिह्वा से निकलते रहने वाला अलग-अलग स्तर के रसों तथा मुख के ज्ञान तन्तुओं की बनावट पर निर्भर है। भोजन मुँह में गया-वहाँ के रसों का सम्मिश्रण हुआ और उस मिलाप की जैसी कुछ प्रतिक्रिया मस्तिष्क पर हुई उसी का नाम स्वाद की अनुभूति है। खाद्य पदार्थ की वास्तविक रासायनिक स्थिति इस स्वाद अनुभूति से सर्वथा भिन्न है। जो कुछ चखने पर अनुभव होता है वह यथार्थता नहीं है।
शरीर विज्ञानी जानते हैं कि काया का निर्माण अरबों खरबों कोशिकाओं के सम्मिलन से हुआ है। उनमें से प्रतिक्षण लाखों मरती हैं और नई उपजती हैं। यह क्रम बराबर चलता रहता है और थोड़े ही दिनों में, कुछ समय पूर्व वाली समस्त कोशिकाएँ मर जाती हैं और उनका स्थान नया ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह एक प्रकार से शरीर का बार-बार काया कल्प होता रहता है। पुरानी वस्तु एक भी नहीं रहती उनका स्थान नये जीव कोष ग्रहण कर लेते हैं। देह के भीतर एक प्रकार श्मशान जलता रहता है और दूसरी ओर प्रसूति गृह में प्रजनन की धूम मची रहती है। इतनी बड़ी हलचल का हमें तनिक भी बोध नहीं होता और लगता है देह जैसी की तैसी रहती है। जिन इन्द्रियों के सहारे हम अपना काम चलाते हैं उनमें इतना भी दम नहीं होता कि बाहरी वस्तुस्थिति बताना तो दूर अपने भीतर की इतनी महत्त्वपूर्ण हलचलों का तो आभास दे सकें। ऐसी इन्द्रियों के आधार पर यथार्थ जानकारी का दावा कैसे किया जाय? जिस मस्तिष्क को अपने कार्यक्षेत्र शरीर के भीतर होने वाले रोगों में क्या स्थिति बनी हुई है, इतना तक ज्ञान नहीं है और घर की बात को बाहर वालों से पूछना पड़ता है वैद्य डाक्टरों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, उस मस्तिष्क पर यह भरोसा कैसे का जाय कि वह इस ज्ञान को वस्तुस्थिति में हमें सही रूप में अवगत करा देगा।
ज्ञान जीवन का प्राण है। पर वह होना यथार्थ स्तर का चाहिए। यदि कुछ का कुछ समझा जाय, उलटा देखा और जाना जाय, भ्रम और विपर्यय हमारी जानकारियों का आधार बन जाय तो समझना चाहिए वह ज्ञान प्रतीत होने वाली चेतना वस्तुतः अज्ञान ही है। उसमें जकड़े रहने पर हमें विविध विधि त्रास ही उठाने, पड़ेंगे, पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ेगी। इसी स्थिति को माया कहते। माया कोई बाहरी संकट नहीं, मात्र भीतरी भ्रान्ति भरी मनः स्थिति ही है, यदि उसे सुधार लिया जाय, तो समझना चाहिए माया के बन्धनों से मुक्त मिल गई। यह मुक्ति वस्तुतः हर किसी के करतलगत है।
मध्यप्रदेश में नर्मदा तट पर एक नमदेश्वर महादेव का विशाल मन्दिर है। कहते हैं कि वहाँ शंकर पार्वती सूक्ष्म रूप से सदा निवास करते हैं।
जनश्रुति हैं कि प्राचीन काल में उस स्थान पर एक उदारमना तपस्वी तप करता था। साधना से प्रसन्न होकर शंकर भगवान प्रकट हुए और वरदान माँगने के लिए कहा।
साधु ने विचार किया मेरी ही तरह सब लोगों को भगवान के दर्शन का लाभ सदैव प्राप्त होता रहे ऐसा वरदान क्यों न माँगू?
उसने निवेदन किया कि यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वरदान दें कि जब तक मैं नर्मदा स्नान कर लौट न आऊँ तब तक यहाँ से आप जायें नहीं। शिवजी ने तथास्तु कह दिया।
साधु की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा कि अब उसकी तपस्या का लाभ असंख्यों को मिलता रहेगा। वह गया और नर्मदा के अथाह जल में कूद कर उसी में विलीन हो गया।
साधु तो लौटने गया था नहीं, शंकर जी उसके न लौटने तक वहाँ रहने के लिए वचन बद्ध थे तदनुसार उन्हें वहीं अपना डेरा डाल कर रह जाना पड़ा। इस जनश्रुति में इतना तथ्य तो स्पष्ट है कि कोई उदारमना अपनी तप साधना का लाभ असंख्यों को पहुँचाने में सफल हो ही सकता है।
जो कुछ हम देखते और समझते हैं वह सब सही ही नहीं होता। उसमें भ्रम का भी एक बहुत बड़ा अंश जुड़ा रहता है। इसलिए मोटे रूप से जो कुछ समझते हैं उसी में यथार्थता नहीं मान लेना चाहिए वरन् वस्तुस्थिति जानने के लिए गहराई तक प्रवेश करना चाहिए।
मृग मरीचिका की बात प्रसिद्ध है। सूखे रेगिस्तानों में खार की परतें रेत के ऊपर उभरी होती है। रात को चन्द्रमा की चाँदनी में वे स्वच्छ जल से भरे तालाब जैसी दीखती हैं। प्यासे हिरन वहाँ अपनी प्यास बुझाने को आते हैं पर मिलता कुछ नहीं। दूसरी ओर नजर उठाकर देखते हैं तो वैसे ही जल दृश्य फिर देखते हैं, वे उधर दौड़ते हैं पर मिलता वहाँ भी कुछ नहीं। इस प्रकार के भ्रम जंजाल में फँसे प्यास बुझाने के स्थान पर दौड़-धूम के अतिरिक्त थकान से ग्रसित होते जाते हैं।
कस्तूरी हिरन के बारे में भी ऐसी बात है। अपनी नाभि में से निकलने वाली सुगन्ध को वह अन्यत्र समझता है और उसका आनन्द लेने के लिए दिशा-दिशा में दौड़ता है परन्तु अन्त तक असफल ही बना रहता है।
पतंगे दीपक पर उसका रूप दर्शन करने के लिए दौड़ते हैं और पंखों को जला बैठते हैं। चकोरी की चन्द्रमा का प्रतीक समझ कर अंगार को खाने और अपनी चोंच जला लेने की किम्वदन्ती प्रसिद्ध है। कुत्ता सूखी हड्डी चबाते समय अपने जबड़े में निकलने वाले रक्त को हड्डी का रस समझता है और अपने शोषण को बाहर की उपलब्धि मानता है। ऐसे असंख्य उदाहरण अल्पविकसित पिछड़े प्राणियों के हैं।
सिसली द्वीप और इटली की मुख्य भूमि के मध्य अवस्थित मैसीना जल मउरु मध्य के आकाश में ऐसे दृश्य दिखाई पड़ते रहते हैं जिन्हें जादुई सृष्टि-तिलस्मी या मृग-मरीचिका कह सकते हैं। आकाश में तैरते हुए घर, महल, पेड़, यहाँ तक कि पशु और मनुष्य भी सीख पड़ते हैं। इटली की भाषा में इन्हें ‘पाता मोर गाना’ कहते हैं। उस क्षेत्र के निवासियों की मान्यता है यह जादुई रचना ‘मोर गाना’ नामक अप्सरा द्वारा की जाती है।
ऐसी ही मृग मरीचिका कभी-कभी जापान की पश्चिमी तटवर्ती तोयामा खाड़ी के ऊपर भी देखी जाती हैं उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों के ऊपर भी अक्सर ऐसे ही तिलस्मी दृश्य देखने को मिलते हैं।
भूत-प्रेतों की मान्यता के दिनों इस अजूबे का समाधान सरल था पर अब इस विज्ञान वादी युग में हर बात की यथार्थता जानने का प्रयत्न किया जाता है। विशाल जल राशि के भूतल गर्भ में कई बार छुटपुट विस्फोट होते रहते हैं उसमें गैसें ही नहीं कितने ही विचित्र तथा दूसरे पदार्थ भी मिले रहते हैं। यह उछलकर जल की सतह के ऊपर आते हैं, तो सूर्य की किरणें-वायु चक्र तथा विशिष्ट विद्युत तरंगों का एक असाधारण कुहरा बन जाता है। इसके छितराते हुए मेघ खण्ड आँखों को भ्रम में डालते हैं। उस उथल पुथल में ऐसा आभास होता है मानो कोई जीवधारी आकृतियाँ एवं भवन उद्यान जैसी रचनाएँ, आकाश में तैर रही हैं। वायुयानों में टेलीविजन यन्त्रों में से वस्तु स्थिति मालूम की गई तो यह सत्य सिद्ध हुए, यह दृश्य मृग मरीचिका भर उनका वैसा अस्तित्व वही जैसा कि आँखों को दीख पड़ता है।
तृष्णाग्रस्त होकर सम्पत्ति के संग्रह में उचित अनुचित का भेद छोड़कर निरन्तर संलग्न रहना लगना तो अच्छा है पर उसमें सार कुछ नहीं। निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है उतने का ही उपयोग किया जा सकता है शेष तो जहाँ का तहाँ ही पड़ा रहता है। बालू में से तेल निकालने की भ्रान्ति उपहासास्पद मानी जाती है। पर जब वासना और तृष्णा में से आनन्द और संतोष पाने का प्रयत्न करते है, तो वस्तुतः यह मृग मरीचिका जैसी भ्रान्तिग्रस्त मनः स्थिति का ही परिणाम है।
समाज में शान्ति कैसे स्थापित हो यह प्रश्न इन दिनों जितना तेजी से उठाया जा रहा है उतना ही वह क्लिष्ट और गहन है। शान्ति के सारे उपक्रम असफल हो रहे हैं क्योंकि आज बच्चों के मस्तिष्क में व्यवस्थित क्रियायें और विचारशीलता उत्पन्न नहीं की जा रही। यह क्रिया दृढ़ नैतिक ढाँचे (रिजिड मोरल स्ट्रक्चर) द्वारा उत्पन्न की जाती है। सद्विचारों की अनुपस्थिति में अवस्थित क्रियायें काम तो करती है। पर धीरे-धीरे करती हैं। शान्ति स्थापना के लिए किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं। यदि मनुष्य अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन आप करने लगे तो शान्ति और व्यवस्था अपने आप जम जाये। शर्त यह है कि उस दुबारा कहीं से भी छेड़छाड़ न किया जाये।
विश्व का संतुलन इस बात पर टिका हुआ है कि लोग न्याय, वाणिज्य, उद्योग, विज्ञान की एकता में विश्वास करें और दी जाने वाली शिक्षा में मुख्य रूप से नैतिकता का समावेश करें। व्यक्तिगत नैतिकता इतनी सामर्थ्यवान है कि स्वास्थ्य, बुद्धि और शिक्षा आदि कमियाँ होने पर भी उसके विकास को संसार की कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती। स्वास्थ्य की दृष्टि से गाँधी जी बहुत कमजोर व्यक्ति थे। उनकी बुद्धि भी उतनी प्रखर नहीं थी शिक्षा भी उनकी कोई बहुत अधिक न थी। पर उनके सदाचरण, उनकी नैतिकता ने जब सोये हुये अन्तःकरण को जागृत किया तो उन्होंने अकेले ही सारे भारतवर्ष, एशिया और योरोप में अपने नाम का डंका बजा दिया। भारतवर्ष को काँग्रेस ने स्वतंत्रता नहीं दिलाई गाँधी जी भी शारीरिक माध्यम मात्र थे जिस शक्ति ने सामंतवाद, दमनवाद को भी परास्त कर दिया वह मानव मन में पैदा होने वाली नैतिकता थी। वह गाँधी जी में साकार होकर आई थी।
अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग, ईसा मसीह, सुकरात, शंकराचार्य इन सबकी सफलताओं के मूल में उनकी नैतिकता प्रमुख थी। इसी से उनकी आध्यात्मिकता प्रभावित हुई और लोगों की दृष्टि में वे मृत्यु पर्यन्त आदर्श और खरे बने रहे। हजरत इब्राहिम एक धनाढ्य व्यक्ति के बाग की रखवाली करते थे। उन्होंने तीस वर्ष तक उस बाग से कच्चा आम तक तोड़कर नहीं खाया। उस पर उन्हें गर्व रहा और आत्मसंतोष भी। उनकी इस नैतिकता ने लोगों के मुख से उन्हें सन्त सम्बोधन करने को विवश कराया।
धर्म का उद्देश्य मानव को आन्तरिक रूप से विकसित करना है जिससे वह नैतिकतापूर्वक विचार कर सके। शरीर और मन से अधिक शक्तिशाली का अस्तित्व अधिक समय तक नहीं रहा। नीतिवान पुरुष ही हैं जो मर जाने के बाद भी मनुष्य जाति को प्रेरणा और प्रकाश देते रहते थे। उन्हीं लोगों की जीवन गाथायें, आदरपूर्वक पढ़ी और आचरण में ढाली जाती हैं। नैतिक व्यक्ति ही समाज को गलत परम्पराओं, प्रथाओं और पंथों से बचा कर उन्हें कल्याणकारी मार्गदर्शन देने में समर्थ हुए है, अन्य कोई सामान्य या असामान्य लोग ऐसा नहीं कर सके।
खून की नदियाँ बहाना आसान है पर एक बूँद आँसू सुखाना बहुत मुश्किल है -बायरन
आइन्स्टीन एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, अमेरिकन सरकार को उनकी विद्वता का इतना विश्वास था कि उन पर लाखों रुपया यों ही खर्च कर दिया जाता है। उनके मस्तिष्क में तैयार ज्ञान और वह जानकारियाँ, जिनके कारण अमेरिका एक सर्व शक्तिशाली राष्ट्र बन रहा था, किसी और के हाथ न लग जायें इसके लिये आइन्स्टीन के पीछे सदैव जासूस लगे रहते थे। सुविधा के लिये उनके लिए एक अलग ही कालोनी बसाई थी। आइन्स्टीन उसी में घूम सकते थे, उसी के पार्कों का आनन्द ले सकते थे पर उनके व्यक्तित्व आचरण के अनुगमन की बात आज संसार के लोगों में वैसी नहीं है जैसी अब्राहम लिंकन, सन्त सुकरात, गाँधीजी, लूथरकिंग आदि के प्रति है। यह उदाहरण हमें बताते हैं कि नैतिकता ज्ञान से भी बड़ी आवश्यकता है।
कुत्ता सबसे हीन जानवर माना जाता है। उसकी तुलना दे दी जाये तो मनुष्य मरने मारने पर उतारू हो जाता है। एक प्रश्न है कि तब भी लोग उसे क्यों पालते हैं? अमेरिका और इंग्लैण्ड में तो कुत्तों पर हजारों रुपये तक खर्च कर दिये जाते हैं। यह सम्मान उसके एक ही गुण “स्वामिभक्ति” पर दिया गया है। शेर बड़ा वीर, साहसी और सुन्दर जीव है पर उसके पालने का परिणाम यह होगा कि वह एक दिन में घर के लोगों को खाकर जंगल भाग जायेगा। नैतिकता यों गुणों का सर्वतोमुखी विकास है उसकी स्वल्प मात्रा भी सुख प्रदान करती है पर अनीति का एक अंश भी सारे मनुष्य समाज को संकट में डाल देता है। इसलिए नीति परक साधनों के विकास और सामंजस्य की आवश्यकता आदि से ही रही है।
शान्ति और मानवता कोई आज की ही माँग या आवश्यकता नहीं हैं, यह तो एक अनादि आवश्यकता है जो कई बार पूरी हुई और कई बार बिगड़ी। पर इतिहास ने आज की परिस्थितियों में साफ-साफ सोचने का रास्ता बना दिया है, इसलिये यदि युग में द्वन्द्व और अशान्ति का बाहुल्य है तो शान्ति और मानवता की प्रतिष्ठा की सम्भावनायें उससे भी अधिक है।
इतिहास का हर पिछला पन्ना यह बताता है कि जिस युग में नैतिकता के स्तम्भ दृढ़ और शीर्षस्थ रहे विश्व सुख, शान्ति और चैन अमन से जिया, जबकि अनैतिकता और स्वार्थ की प्रवृत्ति जब भी बड़ी अशान्ति तब-तब बढ़ती रही। राम, कृष्ण, गौतम, बुद्ध, शंकराचार्य, ईसामसीह, सुकरात और स्वाइत्जर आदि महापुरुषों के समय में हम नैतिकता का विकास देखते हैं इसलिये उनके बाद संसार में स्पष्ट शान्ति के दर्शन हुए पर चंगेज खाँ, हिटलर, मुसोलिनी और सिकन्दर का समय ऐसा रहा जब लोगों की व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाएँ अनियंत्रित हुई और उन्होंने समाज की शान्ति-व्यवस्था को उजाड़ कर रख दिया।
इन दिनों परिस्थितियों के निष्कर्ष बताते हैं कि मनुष्य यदि नैतिकता को चरम निष्ठा तक बनाये रखना स्वीकार कर ले तो न केवल व्यक्तिगत जीवन को वरन् सारे समाज को शान्तिपूर्ण बना सकता है। ऐसे व्यक्तियों का बाहुल्य जिस दिन हो जायेगा जो नीति के मामले में अपनी किसी भी महत्त्वाकाँक्षा को कुचल डालने से हिम्मत न हारेंगे तो इस धरती का दृश्य ही कुछ और रहेगा। उस दिन यहाँ सर्वत्र सुख, ही सुख शान्ति ही शान्ति होगी।
संसार को शान्ति की सन्देश सुनाने के लिए एक दिन गाँधी जी की समाधि को नमन करके विश्व यात्रा पर निकल पड़े। न इसके पास पैसा था, न सवारी, न कोट न यात्रा के उपयुक्त सामान।
पाकिस्तान पहुँचे तो स्वागत हुआ। खैर के दरे को पार करते हुए अफगानिस्तान पाकिस्तान, ईरान, पार करते हुए रूस पहुँचे। यह वहाँ पूरे चार महीने गाँव-गाँव घूमे। फिर पोलैण्ड फिर जर्मनी वे लोग जा पहुँचे। फ्राँस सरकार ने इस प्रकार आन्दोलन करने की इजाजत नहीं दी और गिरफ्तार करके इंग्लैण्ड के सीमा पर छोड़ दिया। वहाँ वट्रेन्ड रसेल जैसे शान्ति वादियों ने इनका भारी स्वागत किया। इसके बाद वे अमेरिका पहुँचे वहाँ उन्होंने छः महीने उस महाद्वीप में अपनी प्रचार यात्रा चलाई। जापान में आठ हजार मील का सफर उन्होंने किया इस प्रकार अपनी यात्रा पूरी कर के गाँधी जी की समाधि पर पुनः लौट आये।
इन शान्ति यात्रियों के नाम है-श्री सतीश कुमार और श्री प्रभाकर मेंनन।
हराम का धन पाते और उसके सुखोपभोग की आकांक्षा न तो सैनिक है और न प्रकृति परम्पराओं के अनुरूप। इस दिशा में जिसने प्रयास किया उसे निराशा पश्चाताप और खोज के सिवाय और कुछ हाथ नहीं लगा। फलता फूलता वही धन है, जो परिश्रम और ईमानदारी से साथ कमाया जाय। स्थिरता और सत्परिणाम उत्पन्न करने की क्षमता भी उसी में होती है।
सट्टा, जुआ, लाटरी द्वारा कमाई गई आमदनी भी चोरी डकैती की तरह अनैतिक ही है। नियति की इच्छा यह है कि मनुष्य बुद्धि और काया की क्षमता विकसित कर और उनके द्वारा परिपूर्ण श्रम करके जो उपलब्ध हो, उस धन से अपनी सुख शान्ति का पथ प्रशस्त करें। किन्तु कितने लोग सरलता पूर्वक झटके की कमाई करके गुलछर्रे उड़ाने की बात सोचते रहते हैं। इसके लिये वे कई बार दुस्साहसपूर्ण कदम भी उठाते हैं। इस प्रयास में अधिकांश को असफल रहना पड़ता है। कभी किसी का दाव लग भी जाय तो देखा गया है कि वह उस सुखोपभोग से सर्वथा वंचित ही रहता है, जिसकी आशा से कुमार्ग पर चलने और कुकर्म करने के लिये कदम बढ़ाया गया था। चोरी-डकैती का उपार्जन और उसकी निरर्थकता को देखते हुये इसी परिणाम पर पहुँचना पड़ता है।
समुद्री डाकेजनी का एक संगठित गिरोह बनाकर कप्तान किड ने किसी समय अमेरिका में एक प्रकार का आतंक उत्पन्न कर दिया था। उन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का एकमात्र माध्यम जलयान ही थे। किड का गिरोह इस घात में रहता था कि सबसे अधिक धन लेकर कौन जहाज किस बन्दरगाह पर जा रहा है, जिसमें अधिक जोखिम उठानी पड़े और कम लाभ मिले ऐसे जहाजों पर वह हाथ नहीं डालता था। पर जिसकी लूट से उसे प्रचुर धन की आशा होती उसे हाथ से न जाने देता। उसके गिरोह में न केवल अच्छे गोताखोर तैराक थे वरन् गोलाबारी कला में प्रवीण निशानेबाज और आग्नेय अस्त्र भी थे। उन्होंने सैकड़ों डाके डाले और उस समुद्री लूट से अरबों की सम्पत्ति इकट्ठी की।
साथियों को बाँटने के बाद किड के पास प्रचुर सम्पत्ति बचती थी, उसे वह समुद्र तट के आस-पास जंगलों में हीरे मोतियों के, सोने चाँदी के रूप में लोहे के घड़ों और सन्दूकों में बन्द करके गाढ़ देता था। अपने जीवन काल में उसने प्रचुर सम्पत्ति लूटी और बक्सों में बन्द करके अनेक स्थानों पर दबाई।
यह सब तो होता रहा पर किड उस धन का कुछ उपयोग न कर सका। वह जहाँ का तहाँ जमीन में गढ़ा ही रहा गया। किड के साथियों के अनुसार वह खजाने एक सौ से अधिक स्थानों पर दबे होने चाहिये। अनुमानों और गवाहियों और आम लोगों के आधार पर इस सम्पत्ति का अनुमान और स्थान जो समझा जाता है, उसमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है-
लाँग आइलैंड साउण्ड के फिशर्स में ढाई लाख डालर का सोना।
-चालीस लाख डालर का सोना चाँदी जवाहरात वेस्ट पाइंट के पास हडसन हाइ लेण्डस मनीहिल में।
-साठ लाख डालर के सोना, चाँदी, रत्न, भंडार कनैक्टक्ट नदी के ब्रार्क आइलैंड में। स्टोनी बुक ओल्डलाइम बैदर्स फील्ड के आस-पास
-अस्सी लाख डालर की सम्पत्ति न्यू जरसी इलाके में केप में पाइण्ट के आस-पास की भी तालाब में।
-तीस लाख डालर का सोना चाँदी बाम्बी हुक आई लैण्ड तथा केली द्वीप की तिरछी चट्टानों के नीचे।
-रोड आइलैण्ड पाइरैटस कोब के आस-पास दस लाख डालर का सोना चाँदी।
-मैसेचूसेटस के विलिमगटन डेल्विस डेन क्षेत्र में करोड़ों डालर का विशाल रत्न भंडार। चैशायर क्षेत्र में तीन लाख डालर की स्वर्ण मुद्रायें टाप पोलित कोव नौशोन आइलैण्ड के पूर्वी किनारे पर सत्रह बड़े घड़े सोना। टरनर्स फाल्स और विन्थौपा के इर्द गिर्द आठ पेटी रत्न राशि।
-न्यू हैम्पशायर के एण्टरिम क्षेत्र में कुदैग मर्जेण्ट जहाज की लूट का सत्तर लाख डालर का माल।
-वूथ व हार्वर के आउटर हेरोन आइलैण्ड में बीस लाख डालर सोने की छड़ें।
-शीप्स काट नदी के किनारे वायके सेट इलाके में एक लाख गिन्नियाँ, जिसमें से हजारों तो निकाली भी जा चुकीं।
-फार्मलैण्ड क्षेत्र से एजकाम्ब इलाके में पाँच लाख डालर के जवाहरात।
-ड्रस्डेन मिल्स के पास मनीहोल्स में बारह लाख डालर का सोना चाँदी।
-आइल आऊ हाट के मनीकोव में पन्द्रह लाख डालर की सम्पदा।
-स्टोनी ब्रुक के पास फोर्ट पाइण्ट कोव में पन्द्रह लाख डालर की स्वर्ण सम्पदा चार घड़ों में।
-पेनोल्स काट क्षेत्र में काडलेड क्रीक के आस-पास बीस लाख डालर की रत्न राशि।
-कास्को वे में डियर आइल के आस-पास पैंतीस लाख डालर की सोने की छड़ें।
कुछ लोग स्वयं तो अनैतिक कर्म करके डाकुओं जैसा दुस्साहस नहीं करते पर यह सोचते रहते हैं कि कहीं गढ़ा हुआ खजाना मिल जाय, लाटरी खुल जाय, बाप दादों की कमाई के बल पर गुलछर्रे उड़ाने का अवसर मिल जाय। स्वयं की क्षमता बढ़ाने और पुरुषार्थ में संलग्न होने के झंझट से बचकर समृद्धि की पगडंडियाँ ढूँढ़ते रहने वालों का भी प्रायः असफलता ही मिलती है।
खजाना पाने के लालच में न जाने कितने लोग अपार श्रम करते, पूँजी लगाते और कष्ट उठाते हैं। उतना ही प्रयत्न यदि-उतना ही प्रयास स्वस्थ उत्पादन के लिये किया गया होता तो लागत से कहीं अधिक लाभ मिलता, जब कि हराम की कमाई के लिये लालायित लोग कमाते कुछ नहीं, गँवाते ही हैं। निराशा और खीज़ पल्ले पड़ती है, सो अलग।
एक सात फुट चौड़ा और चार फुट ऊँचा एक बड़ा बहुमूल्य रत्न राशि और स्वर्ण खण्डों में भरा पूरा सब की जानकारी में है। उसे प्राप्त करने के लिये डेढ़ सौ वर्षों से घोर प्रयत्न किये जा रहे हैं, पर अभी तक यह सम्भव न हो सका कि उसे निकाल कर मानवी अधिकार में लिया जा सके।
अमरीका की मिसिसिपी नदी के किनारे सुन्दर क्षेत्र में फैला हुआ होमोचिटो जंगल जितना सघन है उतना ही सुरम्य भी। उस जंगल के एक क्षेत्र पर बसा हुआ एक छोटा गाँव है, नैट चेज। उससे बीस मील आगे एक धनी किसान रीवरडोव का लम्बा चौड़ा कृषि फार्म है। इस फार्म के उत्तरी भाग में मिसिसिपी नदी का एक दलदली डेल्टा है। वहाँ खड़े होने से एक चौड़ा बहुत चौड़ा छेद देखा जा सकता है। यह अब तक क्रमशः अधिकाधिक चौड़ा ही होता चला आया है। इसी छेद में दबा पड़ा है उपरोक्त अपार धन राशि से भरा रत्न कुंभ उसे निकालने के अब तक के सारे प्रयत्न बेकार होते चले आये हैं। कहते हैं कि एक प्रेतात्मा उस पर अधिकार जमाये बैठी है, और वह उसे निकालने के लिये किये गये हर प्रयत्न को असफल कर देती है।
इस खजाने को प्राप्त करने के लिये रीवरडोव के पूर्वज प्रयत्न करते रहे थे। उन्होंने उस डेल्टा के पास एक मकान भी कृषि-व्यवस्था की देख भाल के लिये बनाया था। पर उस क्षेत्र में भूतों का आधिपत्य समझ कर डर के मारे उसे छोड़ देना पड़ा। तब से वह ऐसे ही खाली पड़ा है। उसमें रहना तो दूर किसी की हिम्मत उसमें ठहरने की भी नहीं पड़ती।
खजाने को निकालने के प्रयास एक प्रकार से छोड़ ही दिये गये थे, पर रीवर डोव ने हिम्मत करके फिर कमान संभाली और उसने खुद ही अपार धनराशि के प्राप्त करने के लिए कदम आगे बढ़ाया।
पूर्वजों के छोड़े हुए नक्शों के आधार पर उसने डेल्टा के उस देश में प्रवेश किया और अपने साथियों सहित फावड़े चलाये। कीचड़ में पैर बार-बार धँस जाते थे पर खुदाई जारी रखी गई। फावड़ा किसी धातु के बने बर्तन से टकराया और ठन्न की आवाज हुई। कीचड़ हटा कर देखा गया तो एक लोहे का बना विशालकाय घड़ा सामने था। हीरे पन्नों से भरे इस घड़े में अरबों की सम्पत्ति बताई जाती है। उतनी दौलत सामने रखी देखकर डीव की आंखें चमक उठी। धातु ढक्कन मजबूती से बन्द किया हुआ था। उसे खोलना सम्भव न था अतः यही निश्चय किया कि आस-पास की कीचड़ हटाकर उसे उभारा जाय और प्रयत्न पूर्वक समूचे घड़े को ही बाहर खींचा जाय। रस्सी से बाँधने के लिये आसपास की कीचड़ हटाया जाना आवश्यक था। डीव उसी में जुटा।
पर यह क्या-जितना ही कीचड़ हटाने का प्रयत्न किया गया, उतना ही घड़ा नीचे धँसता गया। कुछ देर में डीव ने देखा कि न केवल घड़ा वरन् वह खुद भी कीचड़ में बहुत गहरा धँस चुका है। उसे जान के लाले पड़ गये, और लगातार छः घण्टे कीचड़ में लड़कर वह बाहर निकल सकने में सफल हुआ।
कहा जाता है कि किसी जमाने में नेटचेज और न्यू आलिएन्स के बीच एक पाँच सौ मील लम्बी सड़क थी और उस पर अच्छा व्यापार होता था। उसी क्षेत्र में कई डाकू दल भी थे और वे भारी लूट पाट करते थे। इन्हीं डाकुओं के सरदारों में लैफिट, मेसन, हार्प में से किसी का है, और उन्होंने तब उसे सुरक्षित जगह समझ कर वह धन-राशि यहाँ गाढ़ी थी। पीछे नदी का पानी रिसता रहा और दलदल बन गया। डाकू पकड़े और मारे गये और वह धन जहाँ का तहाँ गढ़ा रह गया। रीवर के पूर्वजों के उस वीरान भूमि को खजाने सम्बन्धी प्रकाशित किम्वदन्ती के कारण ही खरीद ली थी।
कितने ही इंजीनियर ठेकेदार तथा दूसरे कुशल कर्मी हर वर्ष दलदल से घड़ा निकालने की योजना लेकर आते रहे, उनका प्रतिशत निकालने वालों को मिलने को लिखित इकरार नामों के आधार पर विशालकाय बहुसंख्यक श्रमिकों तथा बाँस, बल्ली, रस्से आदि उपकरणों की सहायता से उसे निकालने का सिर तोड़ परिश्रम करते रहने पर हाथ इतना ही लगता है कि घड़ा और गहरा धँस जाता है। और खुदाई का छेद पहले की अपेक्षा अधिक चौड़ा हो जाता है। यह गोल्ड होल अमेरिकी बुद्धि कौशल और तकनीकी पुरुषार्थ के लिये अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
इस संदर्भ में सबसे बड़ा प्रयत्न सन् 1939 में हुआ। पम्प से पानी निकालने, भारी बुलडोजरों मशीनों से कीचड़ हटाने तथा बगल से रास्ता बनाने के उपाय इंजीनियरों की समिति ने बनाई, लाखों रुपयों की यह योजना बड़े उत्साह के साथ कार्यान्वित की गई। पर सफलता आकाश कुसुम की तरह आगे ही बढ़ती गई। सामने रखा घड़ा निकालने वालों के पुरुषार्थ को चुनौती ही देता रहा और व्यंग ही करता रहा। क्रेन लगाकर जब घड़े की गरदन जकड़ ली गई और निकलने की आशा बँध चली तब अकस्मात् इतनी विकट वर्षा प्रारम्भ हो गई कि सारा प्रयत्न गुड़ गोबर हो गया। बुलेक और स्टिक्लोन जैसे ख्याति नाम इंजीनियर सिर पिटते हुये वापिस लौट गये।
इस प्रयास की असफलता का समाचार उस क्षेत्र के आदिवासियों ने बड़े उत्साह के साथ सुना और अपनी बात पर बहुत विश्वास प्रकट करते हुये कहा कि डाकू मेसन का सिर कटा भूत उस खजाने की रखवाली मुस्तैदी से करता है और वह इतना जबरदस्त है कि कोई प्रयत्न उसके विरुद्ध सफल नहीं हो सकता।
गढ़ा खजाना पाने के पुराने ढर्रे ने अब आधुनिक रूप धारण किया है। “लाटरी” इस गोरखधन्धों में लोग बेतरह जेब काटते हैं। लाटरी में से किसी के हाथ ही कुछ पड़ता होगा। शेष तो खजाना पाने के लालायित की तरह लार टपकाते ही रह जाते हैं। काश, न्याय और श्रम से अर्जित आमदनी से संतुष्ट रहना सीख लिया गया होता तो उस थोड़ी कमाई में भी सुख शान्ति की प्रचुर मात्रा हर किसी को सहज ही मिल सकती।
जितना प्रयास दूसरों का आसरा लेने और जिस-तिस का दरवाजा खटखटाने में किया जाता है यदि उतना ही स्वावलम्बन पर केन्द्रित किया जाय तो उससे कहीं अधिक मिल सकता है, जो अन्य किन्हीं की सहायता से मिल सकना संभव है।
यों देवताओं की संख्या बहुत है और उनके महत्त्व महात्म्य भी बहुत हैं पर उनकी साधना सर्वदा अभीष्ट फल प्रदान नहीं कर सकती। एक ही देवता ऐसा है जिसकी साधना का सत्परिणाम असंदिग्ध रूप से प्राप्त होता है ऐसा शक्तिशाली महादेव है-आत्मदेव अब तक किसी को भी यह परिवाद नहीं करना पड़ा कि आत्मदेव की पूजा अर्चना से किया गया श्रम निरर्थक चला गया अथवा उसके दरबार से खाली हाथ लौटना पड़ा।
भिक्षा माँगने में दीन दयनीय बन कर जितना श्रम किया जाता और समय लगाया जाता है उसकी अपेक्षा कम श्रम और कम समय में कहीं अधिक कमाया जा सकता है। यह तथ्य यदि आँख से ओझल न रहे तो अपना सम्मान गँवाये न स्तर गिराये और न घाटे में रहे।
आत्मदेव की उपासना का अर्थ है अपने गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार। मनुष्य में अकूत शक्तियाँ भरी पड़ी है। उनका जागरण थोड़े ही प्रयास से हो सकता है शर्त एक ही है कि वैसी उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत हो और आत्म परिष्कार के उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत हो और आत्म परिष्कार के उत्कृष्ट प्रयास में जुट पड़ने की तत्परता सक्रिय की जाय। मनुष्य में इतना विशेषताएँ बीच रूप में विद्यमान् हैं कि उनका जागरण सहज ही प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचा देने में समर्थ हो सकता है। महामानवों के जीवन क्रम में पग-पग पर यही तथ्य जगमगाता दीखता है। कि उनने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को व्यवस्थित एवं परिष्कृत बनाने में उत्कृष्ट प्रयास किया और उसमें तब तक लगे ही रहे जब तक आत्म विजय की तपस्या को पूरी तरह फलदायी न बना लिया गया।
आलस और प्रमाद के दुर्गुण हैं जो मानवी जाति का सबसे अधिक क्षरण अपना समय गँवाते रहते हैं फलतः उनका सौभाग्य भी साथ ही गुम हो जाता है। सामने प्रस्तुत कर्म में उदासी उपेक्षा, बरतने वाले, कर्म को भार समझ कर उसका बोझ ढोने वाले पग-पग पर थकते हैं और प्रगति का पथ अपने हाथों प्रशस्त करते हैं। काम में मनोयोग लगाकर उस माध्यम से कौशल विकसित करना और पुरुषार्थ का आनन्द लेना कितना अधिक मंगलमय है इसका रहस्य कोई विरले ही जानते हैं पुरुषार्थी, श्रमशील और मनस्वी कर्म परायण व्यक्ति आत्म निर्माण में संलग्न रहकर कुछ ही समय में इतने सुयोग्य एवं सक्षम बन जाते हैं कि अपनी उचित आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति सहज की की जा सके।
नेक, भला मनुष्य और चरित्रवान बन कर रहना इतनी बड़ी उपलब्धि है कि उस प्रामाणिकता के आधार पर दूसरों स्नेह-सद्भाव सहज ही आकर्षित किया जा सकता है। सज्जनता और सरलता की रीति नीति विविध विधि चरम चातुर्य की तुलना में कही अधिक लाभदायक सिद्ध होती है। उद्धत व्यक्ति आतंकवादी उद्दण्डता बरतने पर अहंकार की जितनी प्राप्ति करते हैं उससे असंख्य गुना सम्मान विनयशील एवं सुसंस्कारी व्यक्ति प्राप्त करते हैं। व्यवस्थित रीति-नीति अपनाकर निर्धारित लक्ष्य की ओर अनवरत निष्ठा के साथ चलते रहने वाले अन्ततः सफल मनोरथ होकर ही रहते हैं।
स्वावलम्बन की साधना करने वाले ही अभीप्सित मनोरथ पूर्ण कर सकने का वरदान प्राप्त करते हैं इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही श्रेयस्कर है।
हताश रहना तथा अकारण किसी बात को लेकर भयभीत रहना (डिप्रेशन एण्ड फोबिया) यह दो बीमारियाँ आज कल नई सभ्यता की देन के रूप में बढ़ती चली जा रही हैं। इस तरह के बीमार सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों के प्रति अलगाव की सी वृत्ति रखते हैं। बात-बात में चिढ़ पड़ते या उबल उठते हैं। गर्म हो जाने के कुछ ही देर बाद इतने निराश हो जायेंगे कि रोने लगेंगे। इस तरह के बीमारों के लिए “मनोविज्ञान चिकित्सा” ‘रिक्रियेशनल’ अथवा 'एक्यूपेशनल' थैरेपी चिकित्सा का प्रयोग करती है। रोगी की मानसिक प्रसन्नता और स्थिरता के लिए उसे किस प्रकार के वातावरण में रखा जाये, कैसे बातचीत की जाये, क्या सुझाव और परामर्श दिये जायें? इन सब के पूर्व उसके पिछले जीवन की सारी गुप्त-अगुप्त बातें बता देने के लिए कहा जाता है इस प्रकार आधुनिक मनोविज्ञान चिकित्सक भी यह मानते हैं कि रोगों की जड़ें उसके कुसंस्कार होते हैं जो एक लम्बे अर्से से अन्तरमन में पड़ी फल फूल रही होती हैं।
उदाहरण के लिये एक अच्छे घराने का, एक मिलिटरी कर्नल के घर का लड़का जेब, उसकी समझ काफी विकसित हो गई थी एक दिन अपने पिता की जेब से दस रुपये का एक नोट निकाल दिया लिया और सिनेमा देख आया। बेसिक और पैसे वाले कर्नल साहब को पता भी नहीं, जेब में कितने पैसे थे कितने रह गये, इस तरह की लापरवाही ही अधिकांश घर के छोटे बच्चों को लापरवाह बनाती है, कुछ दिन में लड़के ने समझ लिया पिताजी बावले हैं कुछ पता चलता नहीं सो वह बड़ी रकमें साफ करने लगा। और उस मुफ्त के पैसों को शराबखोरी और दूसरी गंदी बातों में खर्च करने लगा। दूसरे शिकायती सूत्रों से कर्नल साहब को पला चला। गन्दा नाला एक बार बह निकलता है तो दुर्गन्ध भी अभ्यास में आ जाने से स्वाभाविक हो जाती है, पर कहीं एकाएक उस नाले का रोक दिया जाये तो दुर्गन्ध एक स्थान पर एकाएक तीव्र हो उठेगी और सड़ाँध पैदा करेगी। ऐसा ही हुआ। कर्नल साहब ने एकाएक ब्रेक लगाया। फलतः लड़के व मानसिक कुसंस्कार एक स्थान पर रुक कर मानसिक निराशा और आतंक के रूप में सड़ने लगे। उसे हाई-ब्लड प्रेशर और सिर-चक्कर खाने की बीमारी रहने लगी। पीछे जब मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के लिये लड़के को ले जाया गया और उसने पिछली सब बातें बताई गई तब उसके मन से पिछला भय निकालकर हलका और प्रसन्नता का जीवन जीने की प्रेरणाएँ दी गई, बच्चा ठीक हो गया।
जहाँ तक बाल्यावस्था की छोटी-छोटी भूलों का सवाल हैं उन्हें इस तरह के “निष्कासन प्रयोग” द्वारा ठीक भी किया जा सकता है, पर अपराध मनोवृत्ति और उन संस्कारों को जिन्हें स्वयं रोगी भी नहीं पहचानता मनोवैज्ञानिक बेचारा कैसे अच्छा कर सकता है। उसके लिये भारतीयों ने कृच्छ चांद्रायण जैसे कठोर तपों की व्यवस्था बनाई थी। शरीर में अन्न नहीं पहुँचता तो तात्कालिक बुरे विचार शिथिल पड़ जाते हैं और अंतर्मन में दबे हुए जन्म जन्मान्तरों के संस्कार स्वप्नों के रूप में, अनायास विचारों के रूप में निकलकर साफ हो जाते हैं यह एक सही पद्धति थी। आज के मनोविज्ञान की पहुँच वहाँ तक नहीं होने, साथ ही उसकी धारणा रोगी की मनोवाँछित इच्छाओं की पूर्ति की होती है इसलिये तात्कालिक संतुष्टि का कुछ लाभ दिखाई देने पर भी वह चिकित्सा जहाँ सिद्धांतत सत्य है, वहाँ व्यावहारिक दृष्टि से और भी कुसंस्कारों को उकसाने और मन में नई उत्तेजनायें भरने वाली बन जाती है।
हिस्टीरिया के मामले में खासतौर पर ऐसा ही होता है जिसे भूत या पिशाच कहा जाता है वह वस्तुतः किसी ऐसे व्यक्ति की मानसिक चेतना होती है जिसके साथ रोगी ने कभी छल किया हो, कपट किया हो, हत्या या ऐसा कुछ बुरा कृत्य किया हो। शरीर मर जाता है पर मन संस्कार अमर होते हैं यह बात विज्ञान भी मानता है। क्रोमोज़ोम संस्कार सूत्र होते हैं वह कभी नष्ट नहीं होते। डा. नेहम ने ऐसे ही एक रोगी का जिक्र किया है उसे जब हिस्टीरिया के दौरे आते तो रोगी हर बार एक ही बात चिल्लाया करता “अब मैं उसके साथ एक तंग गली से जा रहा हूँ, वहाँ जाकर हम दोनों ने शराब पी- मैंने कम पी उसको ज्यादा पिलाई अब वहाँ से एक निर्जन स्थान की ओर गया वहाँ बड़ा अन्धकार है। इतना कहते कहते वह भयभीत होकर रोता और बुरी तरह चिल्लाता मैंने उसे छुरा भोंका और वह अब मेरे ऊपर चढ़ बैठा।”
रोगी के व्यवहार का घर वालों के रहन सहन का पता लगाया गया। उसके घर कभी शराब पी ही नहीं गई थी उसने तो छुई तक नहीं थी। यह भी देखा जाता था कि इस तरह जब दौरा पड़ता तब मस्तिष्क की एक खास नस बुरी तरह फूल जाती। मस्तिष्क का हर कल पुर्जा आश्चर्यों की पिटारी हैं। अंर्तचेतना यहीं निवास करती है, संस्कार कभी नष्ट नहीं होते स्पष्ट है कि तब वह सनातन जीवन क्रम (जिसे पुनर्जन्म ही कहा जा सकता है) से आये। अतएव ऐसे कठिन संस्कारों का दोष परिमार्जन कठोर प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा ही होना चाहिये। जब कि आज का मनोविज्ञान व्यवहार में उस तरह के कुसंस्कारों में संतुष्टि देने के पक्ष का समर्थन करता है। अतएव उसे पूर्ण-चिकित्सा नहीं कहा जा सकता जब कि रोगों की जड़ का पता लगाने के बारे में वह सिद्धांतत सही है।
“एजीटेटैड डिप्रेसिव साइकोसिस” पैरानाइड शिजो फ्रेनिया” साइकोपैथी साइकोसोमेटिक और “मेनिक डिप्रेसिव न्यूरोसिस” आदि मानसिक बीमारियाँ पूर्व जन्मों से सम्बन्धित नहीं हैं पर उनका सम्बन्ध आज भी विकृत विचारणा, सभ्यता के नाम पर इन्द्रिय-जन्य आकर्षणों और प्रलोभनों तथा त्रुटिपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण ही है। एक बार सुप्रसिद्ध सेल्डन शेफर्ड के पास नवदंपत्ति परामर्श के लिए आये। उनमें परस्पर खींचतान चल रही थी। विवाह हुए 9 माह हुये थे। पत्नी तब से निरन्तर पति के पास ही थी पर उसका गर्भवती होना दोनों के लिये विष हो गया। पति की धारणा थी कि पत्नी विवाह से पूर्व ही गर्भवती थी इसलिये वह कटुता पूर्ण व्यवहार करता था। चिकित्सक ने दोनों की अलग-अलग जाँच की, इसके बाद दोनों की शारीरिक जाँच भी की। शारीरिक जाँच के दौरान एक विचित्र बात सामने आई, वह यह कि पत्नी को दरअसल गर्भ था ही नहीं। पेट का रोग (फाल्स प्रेगनैन्सी) था जिसमें पेट फूल जाता है। यह बात प्रकट होने पर उनका मनोमालिन्य दूर हो गया पर यह बात स्वयं शेफर्ड ने भी स्वीकार किया कि आज के सिनेमाओं ने यौन-स्वाधीनता और उच्छृंखल मनोवृत्ति युवक-युवतियों के स्वेच्छापूर्वक मिलने जुलने की छूट आज की सभ्यता और शिक्षा ने न दी होती, तो आज जो घर और परिवारों में परस्पर अविश्वास का वातावरण दिखाई देता है क्यों दिखाई देता? और क्यों ‘पैरानाइड शिजोफ्रेनिया” जैसे रोग स्थान बनाते।
सुख और चरित्र परस्पर जुड़े हैं। चरित्रवान सबसे अधिक सुखी और सुखी लोग प्रायः चरित्रवान होते हैं।
एक दुकानदार के पास पैसे की कमी नहीं, स्वयं अच्छे कपड़े पहनते बच्चों और पत्नी को भी पहनाते, खाते भी अच्छा-अच्छा तो भी पैसे की काफी बचत। लड़का कालेज का छात्र पहले पैसा चुराने लगा पीछे पिता को मालूम पड़ गया तो दोनों में तनातनी रहने लगी। इसी मानसिक खिचाव ने बाप-बेटे दोनों को बीमार कर दिया। कोई रोग हो तो दवायें काम करें। निदान मनोचिकित्सक के पास गए बाप ने बताया लड़का पैसा बरबाद करता है, लड़का बोला “तुम मिलावट का सामान बेचकर यह जो रकम इकट्ठा कर रहे हो इसका क्या होगा।” मालूम नहीं उनका झगड़ा निबटा या नहीं पर न कहने पर भी आज अधिकांश अनैतिक उपार्जन करने वालों के घर यही हो रहा है भले ही बाहर वालों को वे अच्छे खाते पीते पैसे वाले दिखाई देते हों। यह सब पाश्चात्य सभ्यता की देन है जो धन को तो अनावश्यक महत्त्व देती हैं पर जिसके लिए नीति, ईमानदारी और कर्तव्य परायणता के लिये कोई स्थान नहीं।
साइकोसोमेटिक रोग” प्रत्यक्ष में शारीरिक होते हैं पर उनकी जड़ मानसिक विकार ही होते हैं। मस्तिष्क का विचार संस्थान उस नाड़ी जाल के प्रभावित करता है जो सारे शरीर में गुँथा पड़ा है। अच्छा विचारों के उमड़ने से शरीर में स्वास्थ्यवर्धक और आरोग्य वर्धक “हारमोन्स” (एक प्रकार के रस) निकलकर रक्त में मिलकर काम करते हैं। खराब विचार विष उत्पन्न करते हैं अतएव यह बात निर्विवाद सत्य है कि आज की बढ़ती हुई बीमारियों का इलाज औषधियाँ नहीं विचार और चिन्तन प्रक्रिया में संशोधन ही है। दूषित विचार मानसिक परेशानी के रूप में उत्पन्न होते हैं और अल्सर, कैंसर तथा टी.बी. जैसे भयानक रोगों के रूप में फूट पड़ते हैं। कई बार तो कई जन्मों के कुसंस्कार पीछा करते हैं जिन्हें समझ पाना कठिन होता है। उन सबका इलाज एक ही है, कि मनुष्य व्यवहार और क्रिया की सच्चाई और सच्चरित्रता का परित्याग न करे। आज की सभ्यता इन दोनों को नष्ट करने पर तुली है, इसी कारण तरह तरह की बीमारियाँ उठ खड़ी हो रही है। आज का स्वास्थ्य एक व्यक्ति से सम्बन्धित नहीं सारे समाज के स्वास्थ्य से बँध गया है अतएव जन-स्वास्थ्य के लिये अस्पतालों और दवाओं की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी मान्यताओं और सामाजिक परिस्थितियों के संशोधन परिमार्जन की। समाज के विकृत ढाँचे को ठीक कर लिया जाये तो इन उद्भिज बीमारियों का अन्त होते देर न लगे।
मलिकशाह का पुत्र सुल्तान संजर अपने सैनिकों के साथ सीमा प्रान्त का दौरा करने जा रहा था। स्थान काफी दूर था। दिन भर में सारा रास्ता तय करना मुश्किल था। सूर्यास्त के समय एक गाँव के किनारे बगीचे में डेरा डाल दिया गया। सुल्तान ने देखा दूर एक टीले पर कोई पक्षी बैठा हुआ है, उसने अपने अंग रक्षक से तीर कमान लिया और ऐसा तीर चलाया कि देखते ही देखते वह नीचे लुढ़क गया।
सुल्तान ने नौकर को आदेश दिया कि वह जाकर देखें कि कौन सा पक्षी है। नौकर गया उसने देखा कि वह पक्षी नहीं एक छोटा बालक है जो दूर बैठकर सुल्तान और सैनिकों की गतिविधियों को देख रहा था। उसने मूर्छित अवस्था में ही लाकर उस बालक को सुल्तान के सम्मुख लिटा दिया।
उसने पक्षी के स्थान पर अबोध बालक को देखा तो अपनी अदूरदर्शिता पर पश्चाताप करने लगा। वह बहुत दुखी हुआ। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वह जाकर पास के गाँव में पता लगायें कि यह बालक किसका है।
उसका पिता था जो मेहनत मजदूरी करके अपना तथा बच्चे का पेट पालता था। उस निर्धन श्रमिक को सुल्तान के सम्मुख पेश किया गया।
सुल्तान ने उसे डेरे के अन्दर बुलाया। बालक तब तक दम तोड़ चुका था। उसने अपना अपराध स्वीकार करते हुये कहा-भाई तुम्हारे सम्मुख यहाँ एक थाल में अशर्फियाँ रखी हैं और एक थाल में तलवार रखी है। यदि क्षमा करना चाहते हो तो यह अशर्फियों का थाल अपने घर ले जाओ और यदि बदला लेना चाहते हो तो तलवार और मेरा सर तैयार है। जो कुछ दण्ड देना चाहते हो वह आज ही दे दो। इस कार्य को मैं कल के लिये नहीं टालना चाहता।
श्रमिक ने कहा राजन्! पश्चाताप, ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। आप भविष्य में इस प्रकार की भूल न दुहरायें। पुत्र के बदले में धन लेने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। यह कहता हुआ वह व्यक्ति चुपचाप चला गया। बादशाह उसकी महानता को देखता ही रह गया।
हम परम सौभाग्यशाली हैं कि मानव-जीवन जैसा दुर्लभ अवसर हमें प्राप्त हुआ है। यही हमारा अनमोल जीवन कषाय-कल्मषों में, विषय-वासनाओं में व्यतीत हो रहा हो तो इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना ही कहनी चाहिए। इन्द्रिय-सुख मानव जीवन का साध्य कदापि नहीं है। मात्र पेट और प्रजनन के लिए जीने वाले व्यक्तियों का जीवन तो पशुओं के सदृश होता है। मानव जीवन की सार्थकता तो इसी में है कि विषय-वासनाओं की पंक में न फँसकर आत्मिक उत्कर्ष का सतत् प्रयास किया जावे।
तृष्णाओं और वासनाओं की अग्नि ऐसी जबरदस्त है कि एक बार प्रज्वलित होने पर फिर कठिनाई से ही शान्ति होती है। जिस प्रकार आग में घी डालने से वह बढ़ती ही जाती है, उसी प्रकार शारीरिक सुख की इच्छा को परितृप्त करते रहने से इच्छाएँ परिवर्धित होती ही जाती हैं। इच्छाएँ आसक्ति को, आसक्ति क्रोध को, क्रोध विभ्रम को जन्म देते हैं। विभ्रम स्मृति को नष्ट करता है। स्मृति नाश से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश ही सर्वनाश है।
शरीर रूपी रथ के चंचल घोड़े ये पंच ज्ञानेन्द्रियाँ अपने पंच विषयों की ओर उसी वेग से दौड़ती हैं जैसे ताँगे में जुता हुआ घोड़ा दिन भर काम करके सन्ध्या के समय घर की और दौड़ता है। हिरन शब्द के श्रवण मोह में फँसकर प्राण गँवाता है। भ्रमर गन्ध ओर रसना के आकर्षण में बन्दी बनता है। स्पर्श सुख का आकर्षण मछली और पतंगे को नष्ट ही कर देता है तो पाँच-पाँच विषयों के आकर्षण में फँसा मनुष्य सतत् उद्विग्नता की अग्नि में झुलसता हुआ अन्तस् से कितना दुःखी होगा, यह कल्पनातीत ही है। इन इन्द्रिय वासनाओं का संयम न कर सकने वाले मनुष्य कनक, कामिनी और कादम्बरी के आकर्षण में फँसकर अपना स्वास्थ्य, समय, धन और आत्मसुख को खोकर नरक की ओर बढ़ते हैं।
यह सोचता है कि भोग-विलास हमें आन्तरिक सुख दे पायेंगे-एक भयंकर भूल है। वासना और तृष्णा का जाल-जंजाल बाहर से तो बड़ा मनोहारी लगता है परन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति उनके अन्दर बैठता जाता है, वह उसे तिल-तिल करके गलाने लगता है। वासना के कीट शिकार होकर शरीर और आत्मा निस्तेज-निर्जीव हो जाते हैं। शरीर के भोग ही रोग बनकर उसे ग्रस लेते हैं।
वासनाएँ चोर के समान होती हैं। जिस प्रकार चोर अँधेरा देखकर निर्बल व्यक्ति को लूट ले जाते हैं उसी प्रकार वासनाएँ भी निर्बल व्यक्ति को लूट ले जाते हैं उसी प्रकार वासनाएँ भी निर्बल इच्छा शक्ति वाले, निर्बल चरित्र वाले मूढ़ व्यक्तियों पर अपना हमला बोल देती है। सुदृढ़ चरित्र वाले मूढ़ व्यक्तियों पर अपना हमला बोल देती हैं। सुदृढ़ चरित्र वाले आस्था और साहस से युक्त व्यक्तियों से तो वे ऐसे ही डरती हैं जैसे भेड़िये से मेमना डरता है।
जिसके जीवन का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता-उसे कुकामनायें शीघ्र ही प्रलोभन देने लगती हैं। यदि हम मानव शरीर प्राप्त करके भी लक्ष्यहीन जीवन व्यतीत करते हैं तो यह हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। हमें चाहिए कि अपने स्वरूप और कर्तव्य को समझें तथा तद्नुरूप कार्य करें।
वस्तुतः आत्मशान्ति इन्द्रिय सुखों से नहीं अपितु आत्मिक सम्पदा बढ़ाने से मिलती है। जैसे-जैसे हम गुणकर्म और स्वभाव को उत्कृष्ट बनाते जायेंगे, वैसे-वैसे हमारा अन्तःकरण निर्बल बनता जायेगा तथा दृष्टिकोण होगा-हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे और वैसा ही संसार हमें दिखाई पड़ेगा
परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग हैं वस्तुतः स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं अपितु वह तो अपने ही अन्तस् की भावात्मक सृष्टि है। इस सृष्टि का विस्तार जैसे-जैसे बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे ही व्यक्ति उस कैवल्य सत्ता की महत्ता में समाता हुआ सच्चिदानन्द की प्राप्ति में समर्थ होगा जो उसकी जीवन यात्रा की अन्तिम परिणति है।
नैतिकता वह जीवन-व्यवस्था है जिसके सहारे मानव मन्दिर का सफल निर्माण होता है। नैतिक शक्ति मानव जीवन के विकास की जड़ है नैतिक जीवन जितना बलवान और पवित्र होगा, उसी परिमाण में व्यक्ति का विकास होता है। नैतिक निर्बलता व्यक्ति के विकास के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा है। समाज या राष्ट्र व्यक्तियों की नैतिक शक्ति पर ही पनपता है, अतः जिस देश के व्यक्तियों का नैतिक स्तर गिर जाता है वह देश निर्बल हो जाता है। आज भारत में चारों ओर नैतिक शक्ति की गिरावट का स्पष्ट दर्शन होता है। देश में और देश के नेतृत्व में यदि सर्वव्यापी चिन्ता का कोई विषय है, तो वह है, आज के भारत की सर्वव्यापी नैतिक गिरावट। जीवन के समस्त क्षेत्रों में चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, धार्मिक हो अथवा शैक्षणिक हो, सबमें नैतिक स्तर गिरा हुआ है। दूसरा यह अर्थ नहीं कि देश के हर व्यक्ति का नैतिक स्तर गिरा है और समान रूप में गिरा है। आज भी देश में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिनका नैतिक स्तर खूब ऊँचा है और यत्किंचित् भी उसमें कमी नहीं है। दूसरा वर्ग यह है, जिसमें नैतिक स्तर के गिरावट की-सीमा कुछ सीमित है और समाज में ऐसे लोग भी हैं, जिनका नैतिक स्तर बिलकुल गिरा हुआ है। राष्ट्र में उच्च स्तर के व्यक्तियों के होते हुए भी राष्ट्रीय स्तर इसलिए गिरा हुआ है। बहुजन की स्थिति पर ही राष्ट्र की स्थिति निर्भर रहती है और इसीलिए आज सम्पूर्ण देश में नैतिक पतन का दृश्य दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति में यदि देश को फिर ऊँचा उठाना है, सभ्य समाज का महान् चट्टान पर नव-निर्माण करना है तो नैतिक शक्ति की बुनियाद पर ही ऐसा हो सकेगा। देश की सबसे प्रमुख समस्या नैतिक समस्या है। उसका निर्धारण हर व्यक्ति की नैतिक शक्ति जगाने से ही संभव है। अब हमें यह देखना है कि नैतिक शक्ति क्या है, उसे किस प्रकार जगाया जा सकता है और उसे किस तरह परिणामी बनाया जा सकता है। स्वस्थ मानव का नव-निर्माण ही नैतिकता का अंतिम उद्देश्य है।
विश्व में जीवन-निर्माण के साथ जीवित रहने की भावना का निर्माण हुआ। पशु-पक्षियों में यह भावना जीवन-व्यापी है। मानव के जीवन में इस भावना शक्ति के साथ विचार-शक्ति ने जन्म लिया। मानव की बाल्यावस्था भावनामय अवस्था है। इसके बाद विचार-शक्ति का जन्म होता है और विचार-शक्ति का ही उन्नत स्वरूप विवेक शक्ति है। मनुष्य में विवेक शक्ति जितनी बलवान होगी उतना ही उसका नैतिक स्तर ऊँचा और प्रभावशाली होगा। विवेक मानव-जीवन की निर्णयात्मक सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। कौन सा कार्य उचित है और कौन सा अनुचित इसका निर्णय यही विवेक शक्ति करती है। यह शक्ति फिर विचारों से टकराती है और यदि विचार निम्न श्रेणी के हों तो विवेक न्याय-अन्याय का दर्शन करते हुए भी निर्बल रह जाता है और मनुष्य अन्याय मार्ग से कार्य करता रहता है उदाहरण के लिए मनुष्य को कई प्रकार के व्यसन रहते हैं विवेक कहता है कि व्यसन खराब हैं हानिकारक है पर व्यसन-शक्ति बलवान रहती है। फलतः मनुष्य व्यसनों को त्याग नहीं सकता। दुनिया की किसी वस्तु को अनाधिकार ले लेना, यह अनुचित विचार है। विवेक कहता है कि यह अनुचित कार्य है पर उसकी आवाज निर्बल रहती है और मनुष्य अन्याय को जानते हुए भी जीवन में उसका अवलम्ब करता है। सारांश मनुष्य की विवेक शक्ति जितनी प्रभावी होगी, उतना ही व्यक्ति का नैतिक बल भी प्रभावी होगा। अतः समाज के स्वस्थ नव-निर्माण के लिए सर्वप्रथम इस बात की आवश्यकता है कि मनुष्य की विवेक बुद्धि इतनी बलवान और जाग्रत हो कि वह अनुचित कार्य के मोह में न फँसे और जो न्याय दिखाई दे, उसी मार्ग पर जीवन को निश्चय के साथ अग्रसर कर सके।
नैतिक शक्ति का मूल स्रोत यद्यपि मानव की अंतस्थ विवेक शक्ति में है, पर यह अंतस्थ शक्ति बाह्य स्थिति से प्रभावित हुआ करती है और बाह्य शक्तियाँ इस अंतस्थ शक्ति को अपने अनुरूप ढालने का प्रयत्न किया करती हैं। ये बाह्य शक्तियाँ हैं-मानव-समाज की सामयिक स्थिति और व्यवस्था।
समस्त मानव-समाज का यदि अवलोकन किया जाय तो वहाँ नैतिकता मानव-व्यापी दिखाई देगी। इस दृष्टि से नैतिकता ही मानव-समाज की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है और इसकी बुनियाद पर ही नव-मानव का एवं नये युग का निर्माण होना संभव हो सकता है। नैतिकता यदि विवेक पर आधारित विश्वव्यापी बनेगी तो वह आत्मशक्ति प्रेरित नैतिकता होगी। उस नैतिकता में निर्भयता रहेगी। वहाँ आत्मप्रेरणा का स्रोत रहेगा और मानव को अपनी जीवनी शक्ति का एक नया अनुभव आयेगा। आज इस प्रकार की विश्वव्यापी नैतिकता की माँग संसार में बढ़ रही है और यद्यपि सर्वत्र राज्य-सत्ता और संकुचित धर्मसत्ता की प्रबलता दिखाई देती है पर इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाला युग नैतिकता और विज्ञान शक्ति का युग होगा।
नैतिकता के क्षेत्र में दो बातों का स्पष्ट दर्शन होना चाहिए-(1) अपने मानवीय अधिकारों के रक्षण की सामर्थ्य और (2) हर कार्य में निर्भय-वृत्ति समाज में व्यक्ति के सुखों का और सामाजिक सुखों का समन्वय आवश्यक है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सुख भिन्न-भिन्न होते हैं और जिनके पास अधिक शक्ति है, वे निर्बलों का शोषण करते हैं। निर्बल व्यक्ति शोषण को सहन करता है और जीवित रहता है, यह मानसिक अवस्था नीति युक्त नहीं। नीति का दर्शन वहाँ होगा, जहाँ व्यक्ति अपने सिद्धान्तों एवं अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ होगा और उसके लिए अपनी सारी शक्ति लगा देगा यहाँ तक कि जीवन-समर्पण तक के लिए तत्पर रहेगा, तभी नैतिकता का सही अवलंब व्यक्ति के जीवन में दिखाई देगा। नैतिकता में अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों की रक्षा का भी समावेश होता है। शक्तिशाली मनुष्य अपने अधिकारों की तो रक्षा करता है पर वह निर्बलों का शोषण कर उनके अधिकारों पर आक्रमण करता है। सभ्य नीतिवान व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। अपने अधिकारों की रक्षा और अन्यों के अधिकारों का आदर उसका जीवन-लक्ष्य रहेगा। इस लक्ष्य से ही व्यक्ति और समाज के सुखों का समन्वय होकर शान्तिमय कल्याणप्रद समाज-व्यवस्था स्थापित होगी।
नैतिकता का दूसरा लक्षण है। निर्भयता। धर्म और राजसत्ता से प्रभावित नैतिकता भय प्रेरित हुआ करती है। किन्तु स्व प्रेरित नैतिकता पूर्णतः निर्भय होती है और वही स्थायी एवं सच्ची नैतिकता कहलाती है। भययुक्त नैतिकता की आड़ में मनुष्य छिपकर अनुचित कार्य करता है और छिपाने का प्रयत्न करता है। अनुचित कार्य करने पर वह व्यक्ति असत्य का आश्रय लेता है और जब सारा समाज असत्य की बुनियाद पर नीतिवान बनने का दावा करता है तब अनीति सर्वव्यापी बन जाती हे और समाज निःस्वत्व बन जाता है। स्व प्रेरित नीतिवान व्यक्ति प्रथमतः अनुचित कार्य करेगा ही नहीं पर किसी स्थिति में कर भी डाले तो उसे वह निर्भयता से स्वीकार कर लेता है। ऐसा करना यद्यपि समाज की दृष्टि से उचित न हो पर नीति की दृष्टि से अनुचित नहीं होगा। कोई व्यक्ति भावना वश या अन्याय के प्रतिकार में किसी का खून कर डालता है पर उसकी विवेक शक्ति इतनी बलवान होती है कि वह थाने में जाकर अपने अपराध को स्वीकार करता है। शासन और धर्म के नाते भले ही उसका कार्य अनुचित हो परन्तु यदि वह निर्भयता से उसे स्वीकार करता है, तो वह व्यक्ति नीतिवान ही कहा जायेगा।
निर्भयता का दर्शन मानव-जीवन की आकांक्षाओं की पूर्ति में भी होता है और वह है कार्य की सफलता के लिए उचित साधनों का प्रयोग। नैतिकता के क्षेत्र में साध्य की अपेक्षा साधनों की शुचिता का अधिक महत्त्व होता है। नीतिवान व्यक्ति उचित या न्याय पूर्ण साधनों का ही अवलंब करता है। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए वह अनुचित साधन का उपयोग नहीं करता है। ऐसी हालत में उसे निर्भय वृत्ति का परिचय देना ही पड़ता है। अनुचित साधनों का प्रयोग निर्भयता के साथ प्रायः नहीं किया जाता। अतः निर्भयता जीवन के कार्य क्षेत्र में बहुत बड़ी शक्ति है और वह शक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में नीतिमय बनाये रखने में सहायक होती है।
मानव जीवन में अनेक गुणात्मक शक्तियाँ होती हैं। यथा-सत्य अहिंसा, अक्रोध आदि। इन सारी शक्तियों की जड़ भी निर्भयता में है। जिस शक्ति के जीवन में भय है वह दृढ़ता पूर्वक सदा सत्य का पालन नहीं कर सकता। न वह अहिंसा का उपासक हो सकता है और न क्रोध को ही वश में रख सकता है।
सन्मार्ग के अवलम्बन के लिए अनेक गुणों के समन्वय की आवश्यकता है। जीवन की पवित्रता और जीवन की श्रेष्ठता सन्मार्ग पर अवलंबित है। व्यक्ति और समाज दोनों की महानता व्यक्ति के गुण समन्वय पर आधारित हैं। सारे सद्गुणों की शक्ति का स्रोत निर्भयता है। निर्भयता में से ही अनेक गुणों का प्रवाह स्रावित होता है, जो जीवन-सरिता को सर्वत्र सन्मार्ग में प्रवाहित करता रहता है। देश की आज सर्वाधिक आवश्यकता जीवन के सर्वव्यापी क्षेत्र में सही मार्ग का अवलम्ब, उसका निर्भयता के साथ पालन एवं जीवन की सर्वव्यापी ऊँचाई की है। इसी में व्यक्ति के जीवन एवं समाज के विकास तथा शान्तिमय सह-अस्तित्व की सफलता है।
एक दिन इन्द्र और इन्द्राणी विमान में बैठकर पर्यटन को निकले, उनका विमान भूलोक के जिस नगर के पास रुका वह बड़ा अभावग्रस्त था। वहाँ के निवासी बड़ी दीन-हीन स्थिति में गुजर करते थे। अधिकतर लोगों का भाग्य पर विश्वास था। पूर्वजों के द्वारा पुरुषार्थ से कमा-कमा कर जो धन संचित किया गया था। उसे उनकी सन्तानें खर्च करने में जुटी हुई थी।
उनकी स्थिति देख कर इन्द्राणी को दया आ गई वे बोलीं “प्राणेश्वर! आपका हृदय भी कितना निर्मम है जो ऐसे दुखी व्यक्तियों को देखकर भी नहीं पसीजता।’
‘यह व्यक्ति भाग्यवादी और असन्तोषी हैं मुझे तो ऐसा लगता है कि इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन होगा नहीं पर तुम्हारी इच्छा है, तो कुछ प्रयत्न करता हूँ। ‘इन्द्र ने इतना कह कर उस नगर के पास एक सोने की खान बना दी। जिसने भी सुना कुदाली और टोकरी लेकर चल पड़ा सोने की खुदाई करने। अब उस नगर में कोई निर्धन नहीं रह गया था सब की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई थी सब धनी बन गये थे।
फिर भी सन्तुष्ट न थे। इन्द्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना तो दूर रहा उल्टे उसे अन्यायी और निर्दयी ही ठहराया जा रहा था। लोग कह रहे थे-इन्द्र तुम जैसा निर्दयी और बना दिया। अब तुम्हीं बताओ हमारे इस बड़प्पन का प्रभाव किस पर पड़ेगा?
इन्द्र ने इन्द्राणी से कहा-प्रिय मृत्यु लोक के इस अज्ञानी मनुष्य की स्थिति देख ली तुमने! कितना असन्तोषी है? कितना अविवेकी है?
हाथी, ऊँट, गेंडा, जिराफ़, चिम्पेन्जी, गुरिल्ला, सिंह, व्याघ्र, ह्वेल, जैसे समर्थ और बड़े शरीर वाले प्राणियों की गतिविधियों और सामर्थ्यों के सम्बन्ध में हमें बहुत कुछ जानकारी उपलब्ध है। मनुष्य की बुद्धिशीलता के सम्बन्ध में बहुत कुछ जाना खोजा गया है, पर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्रकृति ने ऐसी विशेषताएँ बड़ी आकृति वाले प्राणियों को ही दी है।
छोटे जीवों में चींटी, दीमक और मधुमक्खियों जैसे कीड़े मकोड़ों की गतिविधियों तक यदि गंभीरता पूर्वक दृष्टि डाली जाय तो आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है और प्रतीत होता है कि अपने जीवन क्षेत्र की परिधि में उन्हें मनुष्य से भी अधिक बुद्धिमतां और कुशलता उपलब्ध है।
जिन प्राणियों को मूर्ख ठहराया जाता है उनके सम्बन्ध में विचार करते समय हम अपने स्तर की क्षमता की कमी-वेशी का ही लेखा-जोखा लेते हैं। यह भूल जाते हैं कि सब प्राणियों का कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्रम एक नहीं। जिसको जिस स्तर का जीवन-यापन करना पड़ता है, उसे प्रकृति ने उसके कार्य क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकने योग्य कुशलता पर्याप्त मात्रा में दी है। इस तरह से वे न तो तुच्छ ठहरते हैं न मूर्ख न अशक्त। मछलियों के समाज में हमें रहना पड़े और जल में निवास करना पड़े तो निस्सन्देह मछलियाँ हमें सर्वथा असफल एवं दयनीय प्राणी मानेगी यही बात मक्खियों के सम्बन्ध में है। हम उनकी दृष्टि में एक निरीह जीवधारी ही ठहर सकते हैं और वे उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए हमारी असमर्थता को दुर्भाग्य का चिह्न ही ठहरा सकते हैं।
दृश्यमान स्थूलकाय प्राणियों से भी आगे बढ़े तो ऐसे जीवधारियों की बहुत बड़ी संख्या मिलेगी जिन्हें विकसित कहा जा सकने योग्य मस्तिष्क तथा सम्वेदना सूचक इन्द्रिय समूह प्राप्त नहीं है। इतनी अभाव ग्रस्तता के बीच भी उन्हें चेतना का अपना अद्भुत स्तर उपलब्ध है और वंश वृद्धि से लेकर जीवनयापन के दूसरे साधनों तक बहुत कुछ प्राप्त है, और वह इतना अधिक और विस्तृत है कि मनुष्य उस पर दाँतों तले उँगली ही दबा सकता है।
जीवाणुओं की अपनी दुनिया है। ये बहुत छोटे हैं। उनमें से कितने तो ऐसे हैं जो सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता के बिना खुली आँखों से देखे ही नहीं जा सकते। इतने छोटे होते हुए भी उन्हें अपने स्तर का क्रियाकलाप जीवन-यापन कर सकने की आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त है। शरीर के अनुपात से जितनी सामर्थ्य उन्हें प्राप्त है, उसी हिसाब से हमारे शरीर के लिए कितनी सामर्थ्य चाहिए इसका हिसाब लगाया जाय तो प्रतीत होगा कि अनुमान की दृष्टि से मनुष्य की प्रकृति का अनुदान बहुत ही स्वल्प प्राप्त है। जीवाणुओं को उनके छोटे कलेवर के अनुसार जो कुछ मिला है, यदि वही अनुदान मनुष्य को प्राप्त रहा होता तो उसकी क्षमता उतनी अधिक होती जितनी कि हम देवताओं की सामर्थ्य की कल्पना करते हैं।
जीवित प्राणियों में सबसे सूक्ष्म जीव इकाई है जीवाणु। इनमें तरल प्रोटोप्लाज्मा भरा रहता है। ऊपर से ल्यूकोज की झिल्ली होती है। इनका आकार प्रायः एक इंच का पच्चीस हजारवाँ भाग होता है। ये स्वयं ही अपने शरीर में प्रजनन करते हैं। 24 घण्टे में प्रायः एक जीवाणु लगभग डेढ़ करोड़ नये जीवाणु उत्पन्न कर देता है और हर नया जीवाणु अपने जन्म के प्रायः 15 मिनट बाद प्रजनन योग्य प्रौढ़ता प्राप्त कर लेता है। सूर्य का तीव्र ताप इनकी मृत्यु का प्रधान कारण होता है।
जीवाणुओं में कोमलता और अशक्तता बहुत है। पर इतने पर भी उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकने लायक वह विशेषताएँ भी प्राप्त हैं जिनके आधार पर वे प्रलय जैसी भयंकर विपत्तियों से भी जूझते हुए अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकें।
धरती की उष्णता जब शान्त होकर जीवधारियों के योग्य हुई तो सबसे पहिले जीव द्रव्य-प्रोटोप्लाज्मा उत्पन्न हुआ। प्रथम जीवधारी जीव द्रव्य की बूँदों के सम्मिश्रण से नहीं बना वरन् वह एक स्वतंत्र सत्ता सम्पन्न एक कोषीय जीव था, उपलब्ध ‘अमीबा’ उसी स्तर के जीवों का एक जीव है। ‘अमीबा’ नदी-तालाबों नालियों एवं कीचड़ जैसे स्थानों में पाया जाता है। इसका आकार प्रायः इंच के सौवें भाग के बराबर होता है।
इसके ऊपर एक पतली झिल्ली चढ़ी रहती है जिसे प्लाज्मा कहते हैं। इसमें कई-कई शंकुपाद हाथी की सूँड़ जैसे निकले रहते हैं वह अपना आहार इन्हीं के सहारे पकड़ता और खींचता है।
प्रौढ़ अमीबा अपने को ही दो टुकड़ों में विभाजित कर लेता है, यह है उसकी वंश परम्परा का क्रम। विभाजन से पूर्व वह अपनी आकृति को गोलाकार बनाता है, इसके बाद मध्य में पतला होते हुए दो टुकड़ों में बँट जाता है। इस भाँति विभाजन प्रजनन कर्म में उसे प्रायः डेढ़ घण्टा लगता है।
भौतिक और रसायन शास्त्र के परमाणुओं की चर्चा आमतौर से होती रहती है। ठीक इसी प्रकार सजीव जगत के परमाणु भी कई प्रकार के होते हैं। इनमें से एक का नाम है-डायटम का अर्थ है-दो परमाणुओं की शक्तिवाला’। यों यह वनस्पति वर्ग में आते हैं पर इसमें पेड़ पौधों जैसा प्रत्यक्ष लक्षण एक भी दीख नहीं पड़ता’ इनका आकार इंच के पचासवें भाग से लेकर इंच के छह हजारवें भाग तक होता है। वे सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता से ही देखे जा सकते हैं।
आकृति में ये इतने सुन्दर और इतने चित्र-विचित्र होते हैं कि देखने वाला मुग्ध होकर रह जाता है। लगता है किसी बहुत ही कुशल कारीगर ने पच्चीकारी, मीनाकारी की एक से एक सुन्दर डिजाइनों के रूप में इन्हें गढ़ा है। गुलदस्ते, रत्नजटित हार, डिजाइनर कालीन, केकड़ा, कनखजूरा, स्फटिक, कच्छप जैसे प्राणियों की तथा कई प्रकार के पुष्प गुच्छकों के रूप में इन्हें सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से ही देखा जा सकता है। देखने वाले को अचम्भा होता है कि इतने छोटे असमर्थ और अविकसित प्राणी पर नियति ने कितनी सुन्दरता से अपनी कलाकृति का अनुदान बिखेरा है।
इनकी चाल की विचित्रता वैज्ञानिकों के लिए न केवल आश्चर्य का विषय है। वरन् बहुत कुछ सिखाती भी है। कितने ही यंत्र का गतिचक्र निर्धारण करने में इन छोटे डायटम ने महत्त्वपूर्ण मार्ग निर्देशन किया है। इनमें से कुछ टैंक की तरह कुछ जलयान की तरह कुछ राकेट की तरह और कुछ बिजली की तरह आगे पीछे हटते बढ़ते अपनी गति का प्रदर्शन करते हैं।
अपने आपको दो टुकड़ों में विभाजित करके ये एक से दो बनते हैं। इसी क्रम में इनकी वंश-वृद्धि होती रहती है।
जड़ अण्ड ‘परमाण्ड’ के नाम से पुकारे जाते हैं, इन्हें प्राणधारियों में काम कर रहे चेतन अण्डजों की कोशिकाएँ कहते हैं। यों ये कोशिकाएँ भी अण्डजों से ही स्वनिर्मित हुई पर उनमें चेतना का अतिरिक्त अंश मिल जाने से उन्हें दूसरे वर्ग में रखा गया है। दूसरे शब्दों में ये भी कह सकते हैं कि जड़ जगत अण्डजों से और चेतन सृष्टि जीवाणुओं एवं कोशिकाओं से बनी है। जिस प्रकार परमाणु के भीतर भी कई अनोखी सृष्टि होती है उसी प्रकार कोशिकाओं के भीतर भी एक पूरा चेतन सरोवर भरा हुआ है और इन दोनों को इकाइयाँ माना जाता है पर वे अविच्छिन्न नहीं है। उनके भीतर भी विश्लेषण करने जैसे असीम और अगणित तत्त्व एवं भेद प्रभेद भरे पड़े हैं। इस लघुता का अंत भी विराट के अन्त की तरह अभी तो बुद्धि की सीमा से बाहर ही दीखता है जितना खोलते हैं उतनी ही एक के भीतर एक नई पर्त निकलती चली जाती है।
सभी पौधे और प्राणी कोशिकाओं से बने हैं। आर्द्यलस जेली जैसे चिपचिपे पदार्थ से भरी होती हैं। ये कोशिकाएँ अपनी पूर्व वर्ती कोशिकाओं के विभाजन से बड़ी होती हैं। और विभाजन क्रम ही उनकी आगे की वंश वृद्धि करता रहता है। प्राणी के वृद्धि, विकास, आनुवांशिकता, बलिष्ठता, दुर्बलता, जरा, मृत्यु मनः स्थिति आदि का आधार इन कोशिकाओं की आन्तरिक संरचना पर ही निर्भर रहता है। इस प्रकार हम चाहें तो इन कोशिकाओं को भी एक स्वतंत्र जीवधारी जैसी संरचना कह सकते हैं। जीव का समान स्वरूप इन जीवाणु कोशिकाओं के समूह संगठन का ही दूसरा नाम है।
अमीबा सरीखे कुछ प्राणी केवल एक ही कोश के बने होते हैं। अन्य विकसित और बड़े प्राणियों से उनकी संख्या अधिक होती है। एक सौ साठ पौण्ड के वयस्क पुरुष में प्रायः 60 हजार अरब तक कोशिकाएँ होती हैं। इनके भीतर भरे हुए पदार्थ को प्रोटोप्लाज्मा कहते हैं। इसके ऊपर चढ़ी हुई झिल्ली इतनी लचीली होती है कि उसमें होकर आवश्यक आदान-प्रदान होता रहता है किन्तु अवांछनीय प्रवेश को वह रोके भी रहती है। प्रोटोप्लाज्मा को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं। प्रोटोप्लाज्मा को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं, (1) साइटो प्लाज्म (2) न्यूक्लियस साइटो प्लाज्म में लवण, वसायें, शर्करा, प्रोटीन, खनिज जैसे अनेक पदार्थ सम्मिश्रित होते हैं। न्यूक्लियस उसी के भीतर एक अचेतन मृत सघन गेंद की तरह रहता है। उसकी संरचना क्रोमोज़ोम समूह के न्यूक्लियस पदार्थों से होती है। मानव शरीर की कोशिकाओं से 46 क्रोमोज़ोम होते हैं। इनके भी बहुत छोटे-छोटे कण होते हैं जिन्हें ‘जीन’ कहते हैं। वंश परम्परा से वे उत्तराधिकार इन जीवों द्वारा ही भावी पीढ़ी पर उतरते हैं। इन जीवों को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है और उनके सम्बन्ध में अधिक बारीकी तथा तत्परता के साथ खोज की जा रही है। यदि गहराई में उतारा जाय तो यह जीन भी एवं स्वतंत्र सत्ता कहे जा सकने जैसी स्थिति में है।
इससे भी आगे बढ़कर जब निर्जीव समझे जाने वाले रासायनिक पदार्थों को देखते हैं तो वे जड़-अचेतन स्तर की दयनीय और चेतना जगत में अत्यन्त पिछड़े हुए प्रतीत होते हैं। बहुत करके तो उन्हें जड़ कहकर चेतन जगत से बहिष्कृत ही मान लिया जाता है। पर विज्ञान के अन्वेषणों ने बताया है कि इन रासायनिक पदार्थों में वह अद्भुत शक्ति भरी पड़ी है जिससे वे स्वयं निर्जीव कहलाते इस जीवन को-जीवधारियों को-उत्पन्न कर सकें। पर इस शक्ति को वे तभी कार्यान्वित कर सकते हैं, जब परस्पर धुल मिल जाने के लिए तत्पर हो जाते हैं अलग-अलग रहने की प्राथमिकता नीति जब तक वे अपनाये रहते हैं तभी तक वे जड़ हैं पर जिस क्षण वे रासायनिक द्रव्य सन्तुलित रूप से एकत्रित होते हैं उसी क्षण द्रव्य के रूप में चेतना का संचार होने लगता है।
जीव-द्रव्य प्रोटोप्लाज्मा कुछ रासायनिक तत्त्व वेत्ताओं का सम्मिश्रण मात्र समझा जाता है। कार्बन क्लोरीन, आयोडीन, मैग्नेशियम प्रभृति रासायनिक पदार्थों का समन्वयीकरण इस जीव-द्रव्य को विनिर्मित करने की भूमिका सम्पादित करता है।
हमें चाहिए कि न तो अपने को सृष्टि का सबसे बड़ा प्राणी मानें और न प्रकृति का वरद-पुत्र न अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करें न उद्धत बनें। साथ ही छोटे प्रतीत होने वालों को हेय दृष्टि से भी न देखें न उन्हें अकिंचन समझें न दयनीय, दुर्भागी। वरन् यही समझते रहें कि सृष्टि के प्रत्येक घटक को ईश्वर की दिव्य ज्योति विद्यमान् है। यह परमाणुओं से लेकर जीवाणुओं तक हर लघुतम समझी जाने वाली इकाई में प्रकृति के अद्भुत अनुदान भरे पड़े हैं। भगवान ने हर कण को उसके क्रियाकलाप के अनुसार समर्थता दी है। चिंतन एवं विवेचन की बात एकाएक ही है कि हमें जो सामर्थ्य प्रजनन प्रयोजन के लिए मिली है उस का उपयोग अभीष्ट उद्देश्य के लिए कर रहे हैं या नहीं। यदि इस कसौटी पर चिन्तन खरा उतरे तो समझाना चाहिए कि हमारी सोचने की क्षमता सार्थक सिद्ध हो रही है।
शिष्य अपने गुरु से शिकायत भरे स्वर में कह रहा था-गुरु-देव आपने ही तो उसे दिन कहा था, जो व्यक्ति त्यागी होते हैं और प्रतिष्ठा से दूर भागने का प्रयास करते हैं सामाजिक सम्मान उनके पीछे दौड़ा-दौड़ा आता है। मैं गत 15 वर्षों से अपना सर्वस्व समाज सेवा पर न्यौछावर करता आ रहा हूँ पर सम्मान मेरे पीछे कभी दौड़ कर नहीं आया।
गुरु का उत्तर-बात ठीक है पर तुम्हारी दृष्टि सदैव इसी बात पर रही होगी कि देखें सम्मान पीछे आ रहा है या नहीं।”
सर्प के सम्बन्ध में किम्वदन्तियाँ जितनी अधिक प्रचलित हैं उनसे भी अधिक वे तथ्य हैं जिन्हें अप्रचलित और अविदित ही कहना चाहिए। साधारण तथा सर्प को मृत्यु दूत के रूप में चित्रित किया जाता है। ईसाई और मुसलिम धर्म में ईश्वर के प्रतिद्वन्द्वी शैतान का सर्प रूप में वर्णन हुआ है। हिन्दू धर्म में हर प्राणी और हर वस्तु में भगवान का दर्शन करने के दार्शनिक आदर्श के अनुरूप सर्प का स्वरूप भी श्रेष्ठता के साथ सम्बद्ध किया गया है किन्तु साथ ही उसकी गरिमा को उच्चस्तरीय स्थान दिया गया है।
शेष नाग के फन पर यह धरती टिकी हुई है। विष्णु भगवान की शैया सर्प पर हैं, शंकर भगवान ने सर्प के अलंकार धारण किये हैं। समुद्र मन्थन में सर्प की रस्सी का प्रयोग हुआ है जैसे पौराणिक उपाख्यानों में उसकी महिमा का वर्णन है। जहाँ अशुभ वर्णन है वहाँ भी उसे भगवान के समतुल्य ही कूता गया है। कालिया नाग का दर्प दमन करने में श्री कृष्ण को स्वयं जुटना पड़ा, भागवत् के इस उपाख्यान में ईसाई धर्म के सर्प शैतान जैसा ही वर्णन है। राजा परीक्षित का सर्प द्वारा काटा जाना इसके पश्चात् कलियुग का आगमन-जन्मेजय द्वारा नागयज्ञ करके विकृति के निराकरण का प्रयास जैसी आख्यायिकाएँ भी सर्प की ध्वंसात्मक शक्ति पर प्रकाश डालती है। योग साधना में कुण्डलिनी जागरण विद्या की सर्प सर्पिणी संयोग के रूप में चर्चा की जाती है। इस प्रकार के वर्णन यह बताते हैं कि सर्प की अपनी कुछ भली बुरी विशेषताएँ उच्च स्तर की हैं और ऐसी हैं जिन पर गम्भीरता पूर्वक चिन्तन करके जीवनोपयोगी तथ्य हस्तगत किये जाने चाहिए।
ईसाई धर्म की पौराणिक गाथा है कि शैतान ने साँप बन कर हौवा को बहकाया कि वह ईश्वरी आदेश की अवज्ञा करे। इस पर अल्लाह ने शैतान रूपी साँप को शाप दिया कि ‘तेरी और हौवा की सन्तान में सदा बैर रहेगा।’ सो साँप और मनुष्य का बैर तो प्रख्यात है, पर बात यहीं समाप्त नहीं हुई। उस शैतान सर्प ने अपने वंशजों से भी बैर ही बना रखा है।
सर्पों के बारे में अनेकानेक किम्वदन्तियाँ प्रचलित हैं। ह्यूम सर्प के बारे में कहा जाता है कि उसकी फुफकार से पेड़ जल जाता है बल्कि स्नेक के बारे में कहा जाता है कि वह दुधारू जानवरों के थनों से लिफ्ट कर दूध पी जाता है। अमेरिका के किसान ऐसा मानते थे कि घिर जाने पर सर्प अपने आपको काट कर आत्म हत्या कर लेता है। एशिया और अफ्रीका के अनेकों देशों में किसी न किसी रूप में सर्प पूजा प्रचलित हैं उसे कहीं देवताओं का ही दैत्यों का प्रतिनिधि मानकर पूजा-पत्री द्वारा संतुष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है। भारत में मान्यता है कि कृपण व्यक्ति अपनी भूमि में छिपी सम्पदा की रक्षा के लिए सर्प बनते हैं और उसका उपयोग किसी को नहीं करने देते। किसी सर्प को मार देने पर उसके साथी मारने वाले से बदला लेते हैं। और मौका पाते ही काट लेते हैं ऐसा कहा जाता है।
साँप मनुष्यों का ही शत्रु नहीं, अपने जाति बन्धुओं और वंशजों का भी शत्रु है। वह मात्र मनुष्यों के ही प्राण हरण नहीं करता, मात्र चिड़ियों, चूहों पर ही आक्रमण करके संतुष्ट नहीं होता वरन् वही व्यवहार उनके साथ भी करता है जो उसके साथी सहचर ही नहीं वंशज होने का भी दावा करते हैं। क्रोधी दुष्ट को अपने पराये का ज्ञान रह भी कैसे सकता है। सच तो यह है कि साँप ही साँप का सबसे बड़ा शत्रु है। जाति विनाश में उसकी भूमिका अन्य सब प्राणियों से आगे है।
ब्लैक केसर नाग का प्रिय भोजन अपने ही स्वजातीय हैं। न मिलने पर वह मिलते जुलते सगोत्री गार्टर सर्पों से भी काम चला लेता है। स्नेक स्टार्स का भी यही हाल हैं। वे दूसरे जीवों को तभी खाते हैं जब अपनी जाति वालों की उपलब्धि सर्वथा असंभव हो जाय।
सर्पिणी प्रजनन के बाद क्षुधातुर होती है। अण्डे देते समय उसमें जो क्षणिक मातृत्व उदय होता है। वह ज्यादा समय ठहरता नहीं। जैसे ही बच्चे निकलते हैं वैसे ही उसके मुँह में पानी भर आता है। वात्सल्य और क्षुधा निवृत्ति में से उसे दूसरे का चयन करना भला लगता है और भी सँपोला उसकी नजर में आ जाय उसी को निगल जाती है। जो इधर उधर खिसक जायें वे ही भाग्यशाली जीवित बचते हैं।
क्रोधी, दुष्ट और क्रूर प्रकृति बाहर वालों को ही हानि पहुँचाती हो सो बात नहीं, उसकी प्रतिक्रिया स्वजनों कुटुम्बियों, आत्मीयों के लिए भी कम घातक नहीं होती। मोटे तौर से यह समझा जाता है कि दुष्ट मनुष्य बाहर के लोगों पर आक्रमण करके उनका अहित करके जो कमाते हैं, उससे अपने परिवार को लाभ पहुँचाते हैं पर वास्तविकता इससे भिन्न है। दुष्टता की कमाई, स्वजनों को तत्काल कुछ विलास सामग्री भले ही जुटा दे पर अन्ततः उनमें भी इतने दुर्गुण मनोविकार भर देती है कि वे बिना परिश्रम प्राप्त हुए वैभव से मिलने वाले क्षणिक सुख का मूल्य भविष्य में अत्यन्त दुःखद परिणाम भोगते हुए चुकाते हैं। समय पड़ने पर वे अपने आश्रितों और आत्मीयों के लिए भी विषधर जैसा दंशन करने में नहीं चूकते। तनिक-तनिक से कारणों अथवा संदेहों की आड़ में लोग अपने स्त्री बच्चों तक की हत्या कर देते हैं। दूसरों के साथ प्रेमालाप को सहन न कर सकने की ईर्ष्या के आवेश में कितने ही नर पिशाच अपनी पत्नी की समस्त सेवा सहायता को भुला कर उसके रक्त पिपासु बन जाते हैं। ऐसे समाचार आये दिन पढ़ने को मिलते रहते हैं। तथाकथित देवताओं से अमुक सुख सुविधा का वरदान मिलने के प्रलोभन में निरीह पशु पक्षियों का ही नहीं अपने या पड़ोसी के बच्चों की बलि चढ़ाने वाले दुरात्माओं की संख्या भी कम नहीं है। दुष्टता तो एक अग्नि है जो दूरवर्ती और निकटवर्ती का भेद भाव किये बिना सर्वतोमुखी अहित ही करती है। सर्प में पायी जाने वाली यह दुष्टता उसे मृत्युदूत, घृणित, शैतान आदि के रूप में सर्वत्र निन्दनीय ठहराती है। उसकी आतंक वादी प्रकृति से लोग डरते तो हैं पर साथ ही उसका मुँह कुचलने में भी नहीं चूकते।
भारत में पाये जाने वाले विषधरों में कोबरा, किरात, कोरल, वाइपर, कोडर, करायत, वफई, राजनाग, रसेल प्रमुख हैं। इनका पूरा दंश लग जाय तो 10 मिनट से लेकर 2 घण्टे की अवधि में मनुष्य दम तोड़ देता है। अजगरों की लम्बाई 35 फीट तक पाई जाती है उनका वजन तीन मन तक देखा गया है। हिरन, सुअर, सियार, जंगली भैंसा जैसे जानवरों का वह अपनी कुण्डली में ऐसे जकड़ता है कि उनकी हड्डी पसली चूर-चूर हो जाती है, इसके बाद वह अपनी शिकार को प्रायः समूची ही निगलता है और पचने तक आराम से पड़ा सुस्ताता रहता है। शेर के साथ मल्लयुद्ध में कभी-कभी अजगर के हाथ ऐसी पकड़ आ जाती है कि शेर का चूरा करके उसे पूरी तरह निगल जाय।
इतनी सामर्थ्य का उपयोग यदि कोई प्राणी रचनात्मक दिशा में कर सके तो उसकी उपयोगिता बैल या घोड़े से कई गुनी अधिक सिद्ध हो सकती है। पर यदि उसका उपयोग घातक प्रयोजनों के लिए किया जाय तो इससे अजगर की तरह अशान्ति ही उत्पन्न की जा सकती है।
संसार में प्रायः 2500 जाति के सर्प पाये जाते हैं। भारत में इनकी 400 जातियाँ ही देखने में आई हैं। इनमें से 80 प्रकार के ही विषधर होते हैं। हर वर्ष भारत में प्रायः डेढ़ लाख मनुष्यों को साँप काटते हैं पर उनमें से 10 प्रतिशत की ही मृत्यु होती है क्योंकि काटने वाले सभी सर्प अधिक विषैले नहीं होते।
कुछ की दुष्टता से उस वर्ग के अन्य निर्दोषों को भी कलंकित होना पड़ता है। समस्त सर्प विषधर और दुष्ट प्रकृति के न होने पर भी बेचारे अकारण घृणास्पद समझे जाते हैं और लोग उनका भी जीवन दुर्लभ कर देते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए मनुष्य समाज में यह प्रथा प्रचलित है कि हर वर्ग अपने समाज के लोगों को दुष्प्रवृत्तियों से रोकने बचाने के हर सम्भव प्रयत्न करे। समझाने बुझाने से न सुधरे तो उसे बहिष्कृत एवं दण्डित करके कड़े कदम भी उठाये। राजसत्ता और समाज संगठन द्वारा ऐसा किया भी जाता है। इसी कारण मानव समाज की बहुत कुछ दुष्टताएँ नियन्त्रण में रहती है। सर्पों को भी यदि यह सहज बुद्धि होती तो सम्भवतः वे भी क्रोधी और दुष्ट सर्पों को बहिष्कृत एवं दण्डित करने में न चूकते।
सर्प का विष उसकी पैराटाइड ग्रन्थि से निकलता है। उसकी संरचना प्रोटियोलाइटिक, एजाइम, फास्फेटाइडेज और न्यूरोटा निक्स से होती है।
सर्प विष के बारे में यह कथन सत्य है कि काटे हुए स्थान का रक्त मुँह से चूसा जा सकता है। और उससे रोगी को विष मुक्त किया जा सकता है पर यह बात तभी सही होगी जो चूसने वाले के मुँह में किसी प्रकार का छोटा बड़ा जख्म न हो। सपेरे साँप को मार कर खा जाते हैं यह भी सत्य है। साँप का विष बिना किसी हानि के पचाया जा सकता है। वह घातक तभी होता है जब रक्त में सीधा जा मिलता है।
सर्प विष रक्त में मिल कर ही ‘हिमोलिसस’ नामक पदार्थ उत्पन्न करता है। रक्त कोशिकाएँ फट जाती है, आमाशय और गुर्दे में रक्त जमा होना प्रारम्भ हो जाता है। त्वचा ठंडी पड़ जाती है। हाथ पैर जीभ आदि सुन्न होते-होते मस्तिष्क अपना काम करना बंद कर देता है और बेहोशी के बाद दिल धड़कना बंद हो जाता है।
हाँगकाँग पर में सर्प का पित्ताशय बड़े चाव से खाया जाता है। ब्रह्मा में एक बार अन्वेषी चिडविन का दल जंगलों में फँस गया तो उसने अजगर खाकर अपना काम कई सप्ताह तक चलाया। अमेरिका में गार्टर साँप का माँस डिब्बों में बन्द बिकता है।
संसार में फैली हुई दुष्प्रवृत्तियाँ अपने लिए सर्प विष की तरह तभी घातक बनती हैं जब वे अपने रक्त में-जीवन क्रम में मिलने घुलने लगें। यदि उन्हें आत्मसात् न किया जाय तो विकृतियाँ कितनी ही भयंकर क्यों न हो किसी का कुछ अहित नहीं कर सकतीं। सर्प विष को सीधा रक्त में न मिलने देने की सावधानी रखने वाले कालकूट के साथ अठखेलियाँ करते रहते हैं और उसके दुष्प्रभाव से सहज ही बचे रहते हैं।
इतना ही नहीं बुद्धिमान लोग तो सर्प विष जैसे भयंकर पदार्थ से भी लाभ उठा लेते हैं। उससे सम्पदा उपार्जन करते हैं और सदुपयोग करके उस विष को अमृत में बदलते हैं। सर्प विष से भयानक रोगों का शमन करने वाली औषधियाँ बनती हैं और उसका संग्रह करने वाले सम्पन्न एवं यशस्वी बनते हैं।
भारत में हाफकिन इंस्टीट्यूट बम्बई, सर्प शोध-कार्य में प्रवृत्त है, साथ ही सर्प विष संग्रह करके उन्हें विदेशों में चिकित्सा अनुसंधानों के लिए भेजता है और दुर्लभ विदेशी मुद्रा कमाता है। सर्प विष सोने की अपेक्षा पन्द्रह गुने अधिक मूल्य का होता है। पाले हुए सर्पों में से नाग एक बार में 200 मिलीग्राम, काँडर 150 मिली ग्राम करायत 26 मिली ग्राम और अफई 6 मिली ग्राम विष देता है।
दुष्टता को परिष्कृत करके उसे सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त कर सकना एक महत्त्वपूर्ण कला है। सपेरे विषैले साँप पकड़ने का धन्धा करते हैं, इससे वे अनेकों को भययुक्त करते हैं साथ ही बीन बजा कर उन्हें लहराने का खेल दिखा कर दर्शकों का मनोरंजन एवं अपने लिए आजीविका उपार्जन करते हैं। शेष शैयाशायी विष्णु और सर्पालंकार धारी शंकर के चित्र इसी प्रयोग की सफलता का संकेत करते हैं। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अम्बपाली, अजामिल, विल्वमंगल, अशोक आदि के पूर्व पक्षी दुष्टजन उत्तर भाग में कितने श्रेष्ठ बन सके, इस तथ्य पर दृष्टिपात किया जाय तो यह स्वीकार किया जाएगा कि उच्चस्तरीय सद्भावनाएँ बुरों को भी भला बना सकती हैं। इस तथ्य को स्मृति पलट पर बनाये रखने के लिए हिन्दू धर्म में एकाध त्योहार सर्प पूजा का भी है।
श्रावण शुक्ल पंचमी को हर साल नाग पंचमी का त्यौहार आता है उस दिन जगह-जगह सपेरे अपने साँप पिटारे लेकर पहुँचते हैं, सर्प का दर्शन कराते हैं, धर्म भीरु लोग उन्हें दूध पिलाते हैं और सपेरों को दान दक्षिण देते हैं।
महाराष्ट्र के साँगली नगर में कोई 70 मील दूर शिराला गाँव में बसन्त पंचमी पर होने वाली सर्प पूजा अद्भुत है। वहाँ दूर गाँवों के लोग इकट्ठे होते हैं और सर्प नृत्य का आनन्द मनाते हैं। सपेरे तथा दूसरे लोग अपने पकड़े सर्पों को लेकर पहुँचते हैं। गाते बजाते हैं। सर्प, फन फैलाकर उनके साथ-साथ नृत्य करते हैं। कहते है कि बाबा गोरख नाथ ने यह आशीर्वाद दिया था कि इन 32 गाँवों में सर्प किसी को नहीं काटेंगे और न इन गाँवों के लोग उन्हें मारेंगे। आश्चर्य है कि यह लोकोक्ति सही भी होती चली आती है। पूना से इस्लाम पुर तक पक्की सड़क जाती है। इसके बाद शिराला तक 10 मील पैदल चलना पड़ता है।
इस प्रकार के उदाहरण बताते हैं कि एक पक्षीय सद्भावना भी दूसरे पक्ष की दुष्टता को ऋजुः एवं मृदुल बनाने में बहुत हद तक सफल हो सकती है।
पशु समान कार्य से जिस यौन-शक्ति का नाश होता है, उसी को ऊर्ध्वगति कर देने अर्थात् मानव शरीर की महाविद्युत धारा में अथवा मस्तिष्क में परिचालित कर देने से वह वहाँ पर सञ्चित होकर ओज, अथवा आध्यात्मिक शक्ति में परिणत हो जाती है समस्त सत् चिन्तन, समस्त प्रार्थनाएँ इस पाशविक शक्ति का ओज में रूपान्तरण करने में सहायता करती है। और उसी से हम आध्यात्मिक शक्ति भी प्राप्त करते हैं। यह ओज ही है मनुष्य का मनुष्यत्व। और केवल मानव शरीर में ही इस शक्ति का संग्रह सम्भव है। समस्त यौन शक्तियों को ओज में परिणत करने वाला व्यक्ति देवता है। उसके वचनों में अमोघ शक्ति होती है-उसके वचनों से नूतन जगत की सृष्टि हो सकती है। —स्वामी विवेकानन्द
विधाता सृष्टि की रचना में लगा था, जब मनुष्य का नम्बर आया तो उसे बनाने में अधिक श्रम, समय और अपनी सूझबूझ का परिचय देना पड़ा। ईश्वर का लाड़ला पुत्र कहलाने में मनुष्य को गौरव का अनुभव होता था । उसके कृत्य अपने पिता की तरह ही नेक ओर भलमनसाहत से पूर्ण थे। उसके नेत्र अच्छी वस्तुएँ देखते थे, कान हरि कीर्तन तथा गुणानुवाद को बड़े चाव से सुनते थे। जिह्वा से निकलने वाला प्रत्येक शब्द मधुर और सार्थक होता था। हाथ दान देने और पिछड़े हुए व्यक्तियों को उठाने में लगे थे। पैर अपने स्वभावानुसार सुमार्ग पर चलने के अभ्यस्त हो गये थे।
शैतान तंग आ गया, उसे अपनी कारगुजारी दिखाने का अवसर ही नहीं मिल रहा था। वह तो कितने ही दिनों से बेकार पड़ा था, वह वेष बदल कर मनुष्य के पास पहुँचा और बोला-इसमें कौन-सी बुद्धिमानी है जो कार्य एक आँख, एक कान, एक हाथ और एक पैर से हो सकता है उसके लिए तुम अपनी दोहरी शक्ति लगा रहे हो यह तो उसका दुरुपयोग है।’
सीधा सादा मनुष्य शैतान की बातों में आ गया उस दिन से वह एक आँख से अच्छा देखने लगा, एक कान से अच्छी बातें सुनने लगा, एक हाथ से दान देने तथा अन्य भलाई के कार्य करने शुरू किये और एक पैर को भलाई के मार्ग पर बढ़ाया। अधिक, समय तक कोई हथियार काम ने आये तो उस पर जंग लग जाती है यह ठहरा मानव शरीर, हाड़ माँस का पुतला जिन अंगों से कुछ काम नहीं लिया गया वह निष्क्रिय हो गये। शैतान तो ऐसे अवसर की ताक में था ही उसने इन खाली पड़े अंगों पर अपना अधिकार जमाना शुरू किया। इसीलिए तो यह कहा जाता है कि तभी से मनुष्य अच्छाई के साथ बुराई देखने लगा, प्रशंसा के साथ परनिन्दा सुनने लगा, अच्छे कार्यों के साथ में बुरे कार्य करने लगा और सन्मार्ग के साथ कुमार्ग पर चलने लगा। आलस में पड़ी निकम्मी वस्तु का विकृत हो जाना स्वाभाविक ही था।
अपने स्वजन संबंधी कहीं बाहर जाकर रहने लगें तो भी उनके साथ जड़ी हुई न तो आत्मीयता टूटती है और न रक्त का रिश्ता टूटता है । जल्दी-जल्दी मिलना जुलना न हो सकने पर भी निवासी आत्मीयजनों के प्रति ममता का अन्त नहीं हो सकता और न होना ही चाहिए।
परिस्थिति वश भारत माता के लाखों करोड़ों सपूतों को विदेश जाना पड़ा। और वे प्रवासी भारतीय बन गये। भूतकाल में इस देश में धर्म प्रचारक समाज व्यवस्थापक, कुशल प्रशासक, शिल्पी, व्यवसायी, चिकित्सक, शिक्षा शास्त्री संसार के कोने-कोने में भेजे जाते रहे हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा से जो लाभ देश विदेश में पहुँचाया उसके लिए समस्त विश्व उनके प्रति कृतज्ञ रहा है। जगद्गुरु, चक्रवर्ती प्रशासक के रूप में उन्हें व्यापक सम्मान प्राप्त हुआ। भगवान बुद्ध ने अपने हजारों शिष्य सुव्यवस्थित योजना के अन्तर्गत विदेशों में भेजे थे और उन्हें संसार के विभिन्न भागों की विविध विधि सेवा साधना का निर्देश दिया था। तदनुसार एशिया भर में बौद्ध धर्म तेजी से फला और प्रगति के विविध विधि प्रयास वहाँ पाये। यह प्रवासी भारतीय और उनके वंशज एवं अनुयायी एशिया में बहुलता पूर्वक और संसार भर में न्यूनाधिक रूप में फैले हुए हैं। दुर्भाग्य इतना ही हुआ कि भारत के और उनके बीच का संबंध एक प्रकार से टूटता चला गया और एक महत्त्वपूर्ण कड़ी नष्ट हो गई। अन्यथा हिन्दू धर्म उस संस्कृति की पताका विश्व भर में फहरा रही होती आज तो बौद्ध धर्म अपने आपको हिन्दू धर्म का अविच्छिन्न अंग मानने तक को तैयार नहीं। इसका, प्रवासी भारतीय धर्मानुयायी और भारत भूमि के संबंध सुदृढ़ बनाये रखने के लिए बरती जाने वाली प्रक्रिया की उपेक्षा करने की भूल भी सबसे बड़ा दुखदायी कारण रही है।
मध्य काल में बहुत से भारतीय विदेशों में व्यापार के लिए गये और वहीं बस गये। अंग्रेजी शासन काल के दिनों में गोरों ने संसार के विभिन्न भागों में अपने उपनिवेश कायम किये। उन्हें आबाद करने के लिए कुशल कर्मियों की जरूरत पड़ी। अंग्रेज उन्हें आकर्षक प्रलोभन देकर विदेशों में ले गये और उन्हें वही बस जाना पड़ा। उन दिनों के श्रमिक कारीगर मात्र थे पर जब वहाँ बस गये तो अपनी योग्यता, शिल्प कुशलता एवं पूँजी के बल पर सम्भ्रान्त नागरिकों जैसी सुखद परिस्थितियों में वे रहने लगे। नेपाल, भूटान, लंका, वर्मा किसी समय विशाल भारत के ही अंग थे, पर पीछे विभाजन एवं पृथक्करण के कारण वहाँ के भारतीय भी प्रवासी बन गये। अब तो पाकिस्तान में भी वही हुआ है।
जो जहाँ निवास करे वहाँ की नागरिक वफादारी उसे राजनैतिक दृष्टि से निभानी ही चाहिए। पर धर्म उद्गम और संस्कृति माता के भावात्मक स्नेह-संबंध भी ऐसे हैं जिन्हें सहज ही नहीं तोड़ फेंका जाना चाहिए। मुसलमान कहीं भी रहें मक्का की तरफ मुँह करके नमाज पढ़ते हैं। यरुसलम के प्रति ईसाइयों की वैसी ही निष्ठा है। लोग बुद्ध भगवान से सम्बन्धित स्थानों का दर्शन करने किस भावना के साथ आते हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं। विचारशील लोग जानते हैं कि भावनाओं का परस्पर जुड़ा रहना देश देशों की बीच महत्त्वपूर्ण होता है। पाकिस्तान ने कश्मीर पर और बाँग्लादेश पर जो अत्याचार किए वे सर्वत्र निन्दनीय ठहराये गये किन्तु मुसलमान देश इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान के अनुचित कदमों का भी समर्थन करते रहे । यह उदाहरण है कि भावनात्मक एकता ही कितना महत्त्व है। ईसाई मिशनरी अरबों रुपया खर्च करके लाखों धर्म प्रचारकों द्वारा इसीलिए मसीहा धर्म फैलाने में लगी है कि विश्व भर में साँस्कृतिक एकता के नाम पर अपने वफादार और विश्वास पैदा कर सकें और उस आधार पर अपना एक शक्तिशाली गुट खड़ा कर सकें।
दुर्भाग्य हमारा है कि प्रवासी भारतीयों के साथ स्नेह सद्भाव का आदान -प्रदान करते रहने की महत्ता, उपयोगिता एवं आवश्यकता को हम एक प्रकार से भुला ही बैठे। भारतीय विदेशों में बसे हुए भारतीयों को यदि उनकी मातृभूमि से मार्ग दर्शन, प्रकाश, सहयोग, समर्थन मिलता रहता तो वे लोग जिस प्रकार अपनी भाषा और संस्कृति को भूलते चले जा रहे हैं, वह दुर्दिन देखने को न मिलता। आदान-प्रदान का सिलसिला चलता रहा होता तो न केवल प्रवासी भारतीय ही अपनी धर्म और संस्कृति के उद्गम केन्द्र के साथ मजबूती के साथ जुड़े होते वरन् हिन्दू धर्म भी उन देशों में फैला होता । ईसाई और मुसलमान हर देश में तेजी से बढ़ रहे हैं पर प्रवासी भारतीयों की संतानों ही हिन्दू धर्म रह सकी हैं वहाँ के मूल निवासियों में कहीं भी हिन्दू धर्म नहीं फैला सका इसका एक मात्र कारण यही है कि भारतभूमि से उन्हें किसी प्रकार का कोई प्रोत्साहन नहीं मिला।
समय-समय पर भारत से इन प्रवासी भारतीयों के बीच साधु बाबा पंडित-पुरोहित संस्था संचालक जाते रहे हैं उनका मात्र उद्देश्य किसी न किसी बहाने उनका भावनात्मक शोषण करके पैसा बटोरना ही रहा है। लेने के लिए ही यह यात्राएँ हुई, देने की गंध भी उनमें नहीं थी। यदि घनिष्ठता और प्रकाश उत्पन्न करने वाले भारतीय मिशन इन प्रवासी भारतीयों के बीच आते-जाते रहते तो स्थिति उससे कहीं अधिक आशा जनक रहती जैसी कि आज है। प्रवासी भारतीयों में आज भी जो धर्म, निष्ठा, अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धः है उसका श्रेय उन्हीं को है। हमने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे इस श्रद्धा का अभिवर्धन हुआ होता।
समय आ गया कि भारत से बाहर रहने वाले प्रायः 3 करोड़ हिन्दू धर्मानुयायियों की ओर ध्यान देना चाहिए और उनकी श्रद्धः के अभिवर्धन कर सकने योग्य कदम बढ़ाने चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि बौद्ध धर्म को विशुद्ध रूप से हिन्दू धर्म का ही एक अंग समझा जाय और उस धर्म के अनुयायियों को भी बिछुड़े भाई समझ कर गले लगाने के लिए बहुत कुछ किया जाय, शिया शुन्नी - कैथोलिक प्रोटेस्टेण्ट - दो सम्प्रदाय होते हुए भी अन्ततः एक हैं, तो कोई कारण नहीं कि हिन्दू और बौद्ध भी उसी प्रकार एक होकर रहें जैसे वैष्णव, शैव, शाक्त सनातनी, आर्य समाजी, सम्प्रदाय भेद होते हुए भी एक हैं। सिख और जैन हिन्दू धर्मानुयायी हैं फिर बौद्ध और हिन्दू धर्म में परस्पर घनिष्ठता और एकता बढ़ाने में क्यों और क्या कठिनाई होनी चाहिए।
फिलहाल हमें एक कदम तो तत्काल उठाना चाहिए कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों की जानकारी प्राप्त करें-उनके साथ घनिष्ठता बढ़ाने और उनकी श्रद्धः एवं आत्मीयता को सुविकसित करने के लिए प्रचार यात्राओं को लेकर अन्य प्रकार के सहयोग प्रदान करने के लिए कदम उठाये ईसाई मिशन-भारतीय इसाइयों के समर्थन एवं अभिवर्धन के लिए कितना कुछ कर सकती हैं तो हमें कम से कम प्रवासी भारतीयों की श्रद्धः सद्भावना का अभिवर्धन करने के लिए प्रचार यात्राएँ तो आरम्भ कर ही देनी चाहिए।
अन्य देशों में प्रवासी भारतीयों की स्थिति के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उसे देखते हुए हमें आगे क्या करना है इस पर विचार करना चाहिए।
ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, फिजी, ट्रीनडाड, सुरीनाम, चाइना, सिंगापुर में भारत मूल के लोग विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठन, सार्वजनिक-सेवा कार्य सुचारु रूप से चलाते हैं। अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैण्ड, हाँगकाँग प्रभृति देशों में भारत मूल के लोगों की संख्या तो काफी है पर विधिवत् संगठन और रचनात्मक गतिविधियाँ अपनाने का उत्साह अभी थोड़े दिनों में हो जाना है अफगानिस्तान की हिन्दू सहायता समिति, सुरीनाम की सनातन धर्म सभा, गयाना का गाँधी संगठन, बैन्काक (थाईलैण्ड) की हिन्दू धर्म सभा विष्णु मन्दिर का कार्य बहुत दिनों से चल रहा है इंडोनेशिया की हिन्दू धर्म परिषद तो ‘हिन्दू धर्म’ नामक मासिक पत्रिका ही प्रकाशित करती है।
अफगानिस्तान की हिन्दू सहायता समिति की एक पाठशाला संस्कृत और हिन्दी ही पढ़ाती है।
इंग्लैण्ड में एक दर्जन से भी अधिक हिन्दू मन्दिर हैं। लीडस व्रैड फोर्ड, स्लाव के हिन्दुओं में सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिक उत्साह है। लन्दन में रामकृष्ण मिशन ने प्रबुद्ध वर्ग में अच्छा स्थान प्राप्त किया है।
कैरेवियन टापुओं में श्रमजीवी भारतीयों की संख्या काफी है, उन्होंने धार्मिक संस्कारों को अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह पकड़े रखा है। ट्रीनिडाड में 45 प्रतिशत हिन्दू हैं। हालैण्ड सरकार के उपनिवेश ‘सुरीनाम’ में लगभग आधी आबादी भारतीयों की है। गयाना में कोई 60 प्रतिशत हिन्दू होंगे। बार्वेडीज, ग्रेनेडा, सेन्टविसेन्ट में काफी भारतीय हैं।
ब्रिटेन में भारतीयों की संख्या पहले से भी काफी थी अब और भी अधिक बढ़ रही है। पूर्वी अफ्रीका के युगाँडा, केनिया और तंज़ानिया देशों को इंग्लैण्ड ने जब स्वतंत्रता दी तो भारतीयों को यह अवसर मिला कि वे भारत, ब्रिटेन या अफ्रीका में से किसी एक ही नागरिकता ले लें। उस समय बहुतों ने ब्रिटेन की नागरिकता ले ली युगाँडा द्वारा अमानवीय ढंग से भारतीयों को निष्कासित कर देने के बाद उनमें से हजारों ब्रिटेन चले गये और वहाँ जा बसे। इन दिनों ब्रिटेन के बड़े नगरों से लेकर छोटे देहातों तक भारतीय बड़ी संख्या में बसे हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार जिन देशों में भारतीयों की बड़ी संख्या है उनमें अब ब्रिटेन को भी सम्मिलित किया जा सकता है।
गयाना, सुरीनमी या ट्रीनडाड में प्रायः प्रत्येक ग्राम में राम या कृष्ण के मन्दिर हैं। ट्रीनडाड में 100 सुरीनाम में 50 और गयाना में 35 पंडित पुरोहित भी हैं जो किसी न किसी प्रकार कथा कीर्तन, संस्कार आदि करते रहते हैं। श्लोक मंत्र तो वे बोल लेते हैं किन्तु विधि विधान और व्याख्या के लिए स्थानीय भाषाओं का ही प्रयोग करते हैं। ट्रीनडाड और गयाना में अंग्रेजी और सुरीनाम में उच्च भाषा बोली जाती है। जोमेका में लगभग चालीस हजार भारतीय हैं।
फिजी में प्रायः आधी आबादी भारतीयों की है। ये लोग अभी भी हिन्दी समझते और बोलते हैं। यहाँ की गुजराती सभा ने उस देश में महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं।
इण्डोनेशिया और मलेशिया में हिन्दू मुसलमानों में एक दूसरे के प्रति बहुत धार्मिक सहिष्णुता और सम्मान बुद्धि है। थाईलैण्ड में राम चरित्र के प्रति बहुत उत्साह है। बाली निवासियों में शिव पूजा का चिह्न पद्म के साथ जुड़ा हुआ स्तम्भ है। थाईलैण्ड में बौद्ध धर्म अधिक है पर वहाँ हिन्दू धर्म के प्रति भी आस्था है। हाँगकाँग में लगभग आठ हजार भारतीय हैं इनमें से अधिकांश सिंधी हैं।
श्रीलंका कल तक भारत का ही अंग था । उसके पृथक् हो जाने पर भी भारत मूल के लाखों हिन्दू धर्मानुयायी वहाँ मौजूद हैं। नेपाल और भूटान को हिन्दू प्रधान देश कह सकते हैं। वर्मा में कुछ समय पूर्व भारतीयों की बड़ी संख्या थी, अब उसमें भारी कमी हो गई है फिर भी कई हजार अभी भी मौजूद हैं। सिंगापुर से लेकर जापान तक हर देश में भारतीयों की हिन्दू धर्मानुयायियों की काफी संख्या मौजूद है। यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड में भी वे कई महत्त्वपूर्ण व्यवसाय कर रहे हैं। अमेरिका ब्रिटेन और जर्मनी आदि में भारतीय छात्रों की अच्छी संख्या बनी रहती है।
फिजी, मौरिसस, दक्षिण अमरीका और अफ्रीका में इन्हीं प्रयोजनों को लेकर भारतवासी बड़ी संख्या में पहुँचे हैं और वहाँ के अग्रगामी वर्ग में गिने जा रहे हैं। दक्षिण अमरीका स्थिति ब्रिटिश गायना में 50 प्रतिशत, डचगायना (सुरीनाम) में 32 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं। ट्रीनिडाड में 36 प्रतिशत, मारीसस में 63 प्रतिशत, फिजी में 47 प्रतिशत हिन्दू धर्मानुयायी हैं।
कम्बोडिया, खमेर, वियतनाम, उत्तर मलाया, थाईलैण्ड निवासी अपने को कौडिन्य ब्राह्मण के वंशज कहते हैं। उनकी पौराणिक गाथा है कि कौडिन्य भारत से आये और उन्होंने यही गृहस्थी बसायी वे उन्हीं के वंशज हैं।
पूर्वी अफ्रीका में गुजराती और माल्टा एवं जिव्राल्टर में सिंधी लोगों ने उन देशों की समृद्धि बढ़ाने में भारी सहयोग दिया है।
पाँचवीं शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक मलाया, जावा, सुमात्रा, वोर्नियो, वाली आदि द्वीपों का प्रगाढ़ संबंध भारत के साथ था। भारतीय वहाँ बसे और व्यवसाय शिक्षा, धर्म, सुरक्षा, शासन आदि सभी क्षेत्रों को वहाँ के निवासी और भारतीय मिल जुल कर काम करते रहे।
यमन के प्राचीन राज्य भवनों में भारत विनिर्मित काष्ठ मूर्तियाँ मिली हैं। उनकी खुदाई में नीलगिरी पर्वत के पाषाण खण्ड मिले हैं। इतिहास पेरीप्लस का कथन है कि पूर्वी अफ्रीका अरेविय, पर्शिया और सोकान्न में भारतीयों का निरन्तर आवागमन रहा है। वे व्यवसाय और धर्म प्रचार के लिए इन देशों में ईसा की पाँचवीं शताब्दी से ही जलयानों द्वारा आते जाते रहे हैं। वास्कोडिगामा जब अफ्रीका के पूर्वी तट पर पहुँचा तो उसने वहाँ पहले से ही रह रहे ‘कान्हा’ नामक गुजराती व्यापारी को अपना मित्र बनाया। पीछे वही वास्कोडिगामा को हिन्द महासागर पार करा के कालीकट तक पहुँचा गया।
इतिहासज्ञ प्लीनी ने लिखा है कि रोम साम्राज्य भर में भारत में बने वस्त्राभूषण की भरमार थी। इसके लिए वहाँ से लाखों स्वर्ण मुद्रायें भारत आती थीं। व्यवसाय के लिए ही नहीं भारतवासी वहाँ लोकशिक्षण एवं चिकित्सा के लिए भी पहुँचते थे। टागोवैरा उन दिनों भारतीय धर्म पुरोहितों का केन्द्र स्थान था। स्कैडेनेविया में उपलब्ध बौद्ध मूर्तियाँ भारत से बौद्ध धर्म का प्रभाव वहाँ तक पहुँचाना प्रमाणित करती हैं। मध्य एशिया, वैक्टोरिवा, सोगाडियना तारीम वेसिन से प्राप्त अवशेषों से विदित होता है कि वहाँ कभी बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार रहा है। मसका, काराशर में तो लगभग एक दर्जन ऐसे बौद्ध विहारों के ध्वंसावशेष मौजूद हैं जिनमें एक हजार भिक्षु रह सकें।
प्रागैतिहासिक काल में भारत और अफ्रीका एक ही महाद्वीप था और आवागमन थल मार्ग से होता था। भौगोलिक उथल-पुथल ने बीच में समुद्र खड़ा कर दिया और यातायात के लिए जलयानों की आवश्यकता पड़ने लगी। पूर्वी अफ्रीका की भाषा स्वम्हिली में हिन्दी और संस्कृत भाषा के शब्दों का आश्चर्यजनक बाहुल्य है। वहाँ की लोक गाथाओं और पुरातत्व उपलब्धियों से स्पष्ट है कि यहाँ कभी भारतीय संस्कृति का ही प्राधान्य था।
अमेरिका का पता कोलम्बस ने लगाया यह मान्यता भ्रम पूर्ण है। तथ्य यह है कि भारतीय बहुत पहले से ही वहाँ थे। ‘माया’ और ‘इन्कास’ बने सूर्य मन्दिरों की वास्तुकला पर भारतीयता की पूरी छाप है। भिक्षु चमनलाल द्वारा लिखित ‘हिन्द अमरीका’ में ऐसे अनेक तथ्यों का उल्लेख है जिनसे प्रतीत होता है कि किसी समय भारत के प्रभाव क्षेत्र में ही अमरीका भी था।
सी. कौण्डापै द्वारा लिखित और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस तथा इण्डियन कोन्सिल आफ वर्ल्ड ऐफर्स द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित “इण्डियन ओवरसीज 1938-1949” ग्रन्थ में विदेशों में बसे हुए भारतीयों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण जानकारियों परिवर्तित हुई हैं। उनकी भी जानकारियाँ जिनमें सम्मिलित हों ऐसे नये ग्रन्थ के लिखे जाने और प्रकाशित करने की भी आज बड़ी आवश्यकता है।
प्रवासी भारतीयों की हिन्दू धर्म के प्रति आस्था को परिपुष्ट करने ओर उनके साथ घनिष्ठता बढ़ाने के प्रयास की यदि भूतकाल जैसी उपेक्षा की जाती रही तो जिस प्रकार हम बौद्ध धर्मानुयायियों से विलग हो गये उसी प्रकार इस तीन करोड़ आत्मिक जनों की सद्भावना से भी वंचित रह जायेंगे। समय रहते चेतने में ही कल्याण है।
दीपक का स्नेह समाप्त हो गया । रुई की बाती चहुँ ओर धीमा-धीमा प्रकाश छोड़ रही थी। और अब अन्तिम लौ तीव्रता से चमकी और शून्य में विलीन हो गई।
बुझते दीपक के सम्मुख एक प्रश्न था-बन्धु अभी तक तो तुम मन्द-मन्द जल रहे थे और अब एक साथ अपनी तीव्र लौ से वातावरण को आलोकित कर बुझ गये। ऐसा क्यों?
दीपक ने धूम्र की वक्र रेखा बनाते हुए कहा-अन्तिम समय भी मेरा प्रयास यह था कि सम्पूर्ण शक्ति लगाकर इतना प्रकाश फैला दूँ कि यदि अन्धकार में कोई जीव भटक रहा हो तो उसे मार्ग दिखाई दे जाए।’
ऋषि तपस्वी और ब्राह्मण, व्यक्तियों की संख्या मानी जाती है। अभीष्ट विशेषताओं से संपन्न व्यक्तियों को उनके गुण कर्म स्वभाव के आधार पर ऋषि तपस्वी एवं ब्राह्मण माना जाता है पर यह तत्त्व भी है। ऋषित्व ब्राह्मणत्व और तपस तत्त्व प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर मौजूद है। उन्हें जागृत, विकसित एवं समुन्नत किया जा सके तो बाहरी वेष विन्यास एवं क्रिया कलाप में साधारण दीखने पर भी कोई व्यक्ति ऋषि तपस्वी एवं ब्रह्म हो सकता है। इसके लिए शारीरिक एवं कर्मकाण्डपरक साधन न पड़े तो केवल मानसिक एवं भावनात्मक निष्ठा से भी काम चल सकता है।
विश्वामित्र ने ब्रह्मर्षि बनने का प्रयत्न किया था। उनने शारीरिक तपश्चर्याएँ तो बहुत कीं-पर भावनात्मक स्तर ऊँचा न उठा पाने के कारण वे उस पद को प्राप्त न कर सके। जब उन्होंने वह प्रयोजन पूरा कर लिया तो राजर्षि से पदोन्नति करके ब्रह्मर्षि बन सकें।
ब्राह्मणत्व के आवश्यक गुणों में मनु भगवान ने जिन्हें आवश्यक बताया है वे यह हैं (1) स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन मनन (2) सत्प्रवृत्तियों के सुदृढ़ता पूर्वक अपनाने का व्रत (3) अग्नि होत्र यज्ञीय जीवन, परमार्थ में संलग्नता (4) भक्ति पूर्वक ध्यान उपासना (5) विवेक की प्रधानता (6) आत्मीयता करुणा एवं ममता का विकास कहा भी हैं।
स्वाध्यायेन व्रतैर्होंमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः।
मनु0 2।18
स्वाध्याय, व्रत, होम वेदाध्ययन, इज्यया, सोमपान, यज्ञ और महायज्ञों में यह शरीर ब्राह्मण बनता है।
वेद ज्ञान का मूल है। ब्रह्म विद्या कभी उपलब्धि उसी सद्ज्ञान से होती है। पर वह वेद ज्ञान मात्र पुस्तक पढ़ने से प्राप्त नहीं होता । उसका सार समझने और अन्तरंग में धारण करने के लिए अभीष्ट पात्रता विकसित करनी पड़ती है। उस विकसित पात्रता का नाम ही ब्राह्मणत्व है। उसे प्राप्त होते ही वेद का -ब्रह्म का-सहज साक्षात्कार होने लगता है।
प्रत्नास ऋष्यो दीध्यानाः।
पुरो विप्रा दधिरेमिन्द जिह्वम्।
ध्यान करते हुए ऋषि और ब्राह्मण उस मन्त्र देवता का प्रत्यक्ष करते हैं।
न ह्येषु प्रत्यक्षमस्त्यनृषेर तपसो वा निरुक्त।
वेद ऋचाओं का प्रत्यक्ष ऋषि और तपस्वी हुए बिना नहीं होता।
आचार निष्ठ उज्ज्वल चरित्र, आत्मज्ञानी-विवेकशील एवं परमार्थ परायण व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते हैं। जब उस स्तर के व्यक्ति तपश्चर्या द्वारा अपनी दिव्य शक्तियों का विकास करने में तत्पर होते हैं तो ऋषि पर प्राप्त करते हैं। ऋषियों का तप तेज-ब्राह्मण के आत्मबल से बढ़ा चढ़ा होता है इस सशक्तता की उपलब्धि में जो विशेष श्रम करना पड़ा अस्तु बढ़ा हुआ ब्रह्म वर्चस्व उन्हें ब्रह्म मय ही बना देता है।
ऋषी नार्षेयांस्तपसाउधिजातान्।
अथर्व 11।1।26
ऋषि और तत्त्वदर्शी यह दोनों तप से उत्पन्न होते हैं।
ऋषिर्दर्शनात्। निरुत-2।11
तत्त्वदर्शी को ऋषि कहते हैं।
तत्पय मानान् ब्रह्य स्वयंभफ अभ्यनार्षत ।
-यास्क
ऋषियों को तप करते हुए स्वयंभू वेद का साक्षात्कार हुआ।
अपना काय कलेवर ही सूक्ष्म तपोवन है। उसमें निवास करने वाले चेतना केन्द्र यदि परिष्कृत हो जाते हैं तो वे ऋषि बन जाते हैं। ऐसे चेतना केन्द्र साथ हैं। इसलिए उन्हें सप्त ऋषि भी कहते हैं। अपने काय कलेवर के तपोवन में अवस्थित सात ऋषियों का वर्णन, विवरण इस प्रकार है।
सप्तऋषयः प्रतिहिता, शरीरे सप्त रक्षिन्त सदम प्रमादम ।
यजु 34।55
सप्त इन्द्रियाँ सप्त ऋषि हैं । यही सइस कलेवर की रक्षा करती हैं।
कः सप्त स्तानि वितदर्द शीर्षाणि।
कर्णा विमौ नासिके चक्षिणी परुवम्।
अथर्व 10।2।6
सप्त ऋषि यह हैं -दो कान, दो नासिका छिद्र, दो नेत्र एक मुख, इस प्रकार सात हुए।
चक्षुर्वे जमदाग्नि ऋषिर्यद्वेनेन जगत्पश्यति।
शत पथ 8।1 ।2।3
जय यह नेत्र समस्त विश्व को देखते हैं तब वे जमदग्नि कहलाते हैं।
श्रोत्रं वै विश्वामित्र ऋषिर्यदेनन सर्वतः
श्रृणोत्यथो यदस्यै सर्वतोमित्रं भवति तस्मा-च्छोत्रं विश्वामित्र ऋषिः । श.प. 8।1।2।9
कान जब दसों दिशाओं के दूर व्यापी शब्दों को सुनते हैं सब ओर से सद्वचनों को ही ग्रहण करते हैं । तब वह विश्वामित्र कहलाते हैं।
वाक वै विश्व कर्मषि वर्चाहीदं सर्व कृतम-शत पथ 8।1।2।9
वाणी जब उच्चारण मात्र से ही सब कुछ उत्पन्न और सम्पन्न करती है तब वह विश्वकर्मा ऋषि बन जाती है।
शत पथ ब्राह्मण 14।5।2 में इन्द्रियों का ऋषि परक नाम करण इस प्रकार हुआ है-
“दो कान गौतम और भारद्वाज हैं। दो नासिका छिद्र विशिह आदि काश्यप हैं। दो आंखें विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। मुख अत्रि है।”
विश्वामित्रः सर्व मित्रः।
निरुक्त 2।7।24
विश्वामित्र वह जो सब का मित्र हो।
विश्वस्य ह मित्रं विश्वामित्र आस।
विश्वं हास्मै मित्रं भवति य एवं वेद।
ऐ. व्रा. 6।20
समस्त विश्व का मित्र विश्वामित्र । उसके सभी मित्र होते हैं।
तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते।
अरुन्धत्यैव कथिता पुराविद्मि सरस्वती॥
- योगकुण्डल्युपनिषत 1।9
सुषुम्ना नाड़ी को अरुन्धती अथवा सरस्वती कहते हैं। शरीर की स्थूल इन्द्रियों में नहीं वरन् इन इन्द्रियों के संचालक सूक्ष्म केन्द्र जो मानसिक क्षेत्र में विद्यमान् हैं। उन्हें ही ऋषि स्थापना का उद्गम मानना चाहिए, इन्द्रियों का माँसल भाग तो मात्र क्रिया कलाप सम्पन्न करता है। अनुभूतियाँ तो मस्तिष्क में ही होती हैं। इन्द्रियाँ उपभेजा के पीछे दृष्टि कोण का निर्धारण और उसके संचालन का निर्देश तो मानसिक आस्था पर ही निर्भर रहता है। अस्तु उन्हीं मस्तिष्क में अवस्थित चेतना केन्द्र को ऋषि मानना चाहिए।
सप्तऋषि मस्तिष्क में निवास करने वाले सात प्रमुख चेतना केन्द्र हैं-
(1) आज्ञा केन्द्र Motor area
(2) प्रज्ञा केन्द्र Sensory area
(3) श्रवण केन्द्र Hearing
(4) वाणी केन्द्र Speech
(5) दृष्टि केन्द्र Vision
(6) घ्राण केन्द्र Smell
(7) स्वाद केन्द्र Taste
इन्हें ही सप्त ऋषि आश्रम कहना चाहिए । काय तपोवन में हमारा मस्तिष्क-मानसिक स्तर ही सप्त ऋषि आश्रम हैं। इन्द्रियाँ तो अपना आहार पदार्थों के रूप में माँगती हैं पर यह ऋषि तो तप और ब्रह्म-परायणता के आधार पर ही पोषण प्राप्त करते हैं-जीवित रहते हैं।
तद्ब्रह्य च तपश्च सप्तऋषय उपजीवन्ति
ब्रह्यावर्चस्युप्रजीवनीयो भवति एवं वेद।
अथर्व 8।13।16।10।4
सप्त ऋषि तप और बल के आधार पर जीवित रहते हैं। जो इस रहस्य को जानता है वह ब्रह्मचर्य और जीवन प्राप्त करता है।
तदब्रह्य च तपश्च सप्तऋष्य उपजीवन्ति ब्रह्यःवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद।
अथर्व 8।13।16।10।4
सप्त ऋषि तप और बल बल के आधार पर जीवित रहते हैं जो इस रहस्य को जानता है वह ब्रह्मवर्चस और जीवन प्राप्त करता है।
वस्तुतः मनुष्य के अन्त-करण-हृदय में निवास करने वाली दिव्यता ही ‘देव’ है। इन्हीं की समर्थता के अनुरूप जीवन विश्व का निर्माण होता है। यह सच्चे ऋषि महात्मा हैं। भावना, बुद्धि और क्रिया में इनका प्रकाश प्रत्यक्ष झलकता है। जो व्यक्ति इस ऋषि प्रक्रिया के साथ जुड़ गया है समझना चाहिए कि उसे अमृत की प्राप्ति हो गई । श्रेष्ठतर उपनिषद् में इसी तथ्य का प्रतिपादन किया गया है।
एष देवो विश्वकर्म्मा महात्मा
सदा जनाना ह्नदये सन्निविष्टः।
ह्नदा मनीषा मनसाभिल्कृप्तो
य एतहुदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
(श्रेताश्वर 4।17)
यह देवता विश्व के बनाने वाले और महात्मा हैं, सदा लोगों के हृदय में सन्निविष्टः हैं। हृदय, बुद्धि और मन के द्वारा पहचाने जाते हैं, जो इसे जानते हैं वे अमृत होते हैं।
साधक गुरुदेव के निकट रहकर ही उनकी सेवा किया करता था। एक बार उनसे आज्ञा लेकर वह कुछ दिनों के लिये अपने गाँव चला गया। जब वह लौट कर पहुँचा तो उसने अपने गुरु से कहा-गुरु देव मेरी सगाई हो गई है।’
‘तब तो तुम मुझसे भी दूर हो गये।’ इतना कहकर वह मौन हो गये।
दूसरी बार जब उस साधक को घर जाने का अवसर मिला तो शुभ मुहूर्त में उसका विवाह कर दिया गया। विवाह की सूचना जब गुरु को मिली तो उन्होंने कहा-अब तो तू अपने माता पिता से भी गया।’
अब उस व्यक्ति ने गुरु के साथ रहना छोड़ दिया था क्योंकि उस पर पहले की अपेक्षा उत्तरदायित्व बढ़ गये थे। लगभग 1 वर्ष बाद गुरु के दर्शन करने का अवसर मिला तो उसने शुभ संदेश सुनाते हुए कहा-मुझे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।’
‘तब तो तू अपने से भी गया’ कहकर गुरु जी मौन हो गये।
इन छोटे रहस्यपूर्ण उत्तरों से वह व्यक्ति असंतुष्ट हो गया था पर कुछ कहने और पूछने का भी साहस न कर पा रहा था एक दिन अचानक उसकी भेंट अपने गुरु से हो गई । औपचारिकता का निर्वाह करते हुए उसने घर चलने का आग्रह किया। ‘जब तुम्हारी इच्छा हो तब मुझे बुला लेना’ कह कर दोनों साथ-साथ चल दिये।
आज गुरुजी अकेले थे अच्छा मौका था अतः उसने पुरानी बातों को जानने की इच्छा व्यक्त की। गुरुजी ने सहज भाव से समझाते हुए कहा-क्या तुम इतनी साधारण सी बातों को भी नहीं समझ सके। सगाई होते ही मेरे प्रति तुम्हारी निष्ठा कम हो गई और उसके परिणाम स्वरूप मुझ से अलग होना पड़ा। और विवाह होते ही अपने सुख के लिये माता पिता से भी अलग हो गये। अब पिता बनने पर तो तुमने अपने सुख को भी खो दिया है। रात दिन परिवार वालों की चिन्ताओं में घुलते रहते हो। अधिक से अधिक कमा कर उन्हें सुखी बनाने की चिन्ता तुम्हारे सिर पर सदैव सवार बनी रहती है।
दिन और रात की तरह मनुष्य जीवन में प्रिय और अप्रिय घटनाक्रम आते जाते रहते हैं। इन उभयपक्षीय अनुभूतियों के कारण ही जीवन की शोभा और सार्थकता है। यदि एक ही प्रकार की परिस्थितियाँ सदा बनी रहें तो यहाँ सब कुछ रूखा और नीरस लगने लगेगा। सदा दिन नहीं रहे, कभी रात न हो, सब की उम्र एक सी रहे न कोई छोटा हो न बढ़ा, सर्दी या गर्मी की एक ही ऋतु सदा रहे, दूसरी बदले ही नहीं, तो फिर इस संसार की सुन्दरता ही नष्ट हो जाएगी सदा प्रिय, अनुकूल और सुखद परिस्थितियाँ बनी रहें, कभी अप्रिय और प्रतिकूल स्थिति न आवे तो कुशलता, कर्मनिष्ठा और साहसिकता की जरूरत ही न पड़ेगी। लोग आलसी, निकम्मा और नीरस जीवन जीते हुए किसी प्रकार मौत के दिन पूरे किया करेंगे।
अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली सुविधा असुविधा का उतना महत्त्व नहीं जितना माननीय सद्गुणों का। पुरुषार्थ, साहस, धैर्य सन्तुलन, दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों का विकास और परीक्षण प्रतिकूल परिस्थितियों में ही सम्भव है। यदि सदा अनुकूलता बनी रहे तो फिर ढर्रे का जीवन जीने वाले लोग गुणों की दृष्टियों से पिछड़े ही पड़े रहेंगे। इस प्रकार के विकास की उन्हें आवश्यकता ही अनुभव न होगी।
इस प्रकार के अगणित तथ्यों का ध्यान रखते हुए सृष्टि ने इस दुनिया में अनुकूलता प्रतिकूलता उत्पन्न की है। अनुकूल स्थिति से लाभ उठाकर हम अपने सुविधा साधनों को बढ़ायें और प्रतिकूलता के पत्थर से घिस कर अपनी प्रतिभा पैनी करें यह उचित है और यही उपयुक्त।
कई व्यक्ति प्रतिकूल स्थिति में मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और वे बेहिसाब दुखी रहने लगते हैं। एक बार प्रयत्न करने पर कष्ट दूर नहीं हुआ या सफलता नहीं मिली तो निराश हो बैठते हैं कई व्यक्ति इससे भी आगे बढ़े-चढ़े होते हैं और बैठे ठाले भविष्य में विपत्ति आने की आशंका करते रहते हैं। प्रस्तुत असुविधा के समाधान का पुरुषार्थ करें उपाय सोचें, इसकी अपेक्षा वे चिन्ता, भय, निराशा आशंका, उद्विग्नता जैसी उलझनें खड़ी करके अपने को उसमें फँसा लेते हैं और स्वनिर्मित एक नई विपत्ति गढ़ कर खड़ी कर लेते हैं। इस बौद्धिक अवसाद के खतरे को और उससे उत्पन्न हानियों को हमें समय रहते समझ लेना चाहिए ताकि उस दल-दल में फँसने की विपत्ति से बचा जा सके।
जर्मन मनोवैज्ञानिकों ने चिन्तातुर लोगों से पूछ कर उनके कारणों का वर्गीकरण किया है तो पता चला है कि 40 प्रतिशत समस्याएँ ऐसी थीं जिनकी केवल आशंका मात्र थी, वे सामने आई ही नहीं । 30 प्रतिशत ऐसी थीं जो बहुत मामूली थीं। वे कारण थे तो पर सूझ-बूझ तथा परिस्थितियों ने उन्हें इस प्रकार सुलझा दिया कि समय पर किसी उलझन में नहीं पड़ना पड़ा 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सम्बन्धी थीं। वे उपचार से ठीक हो गईं न वे असाध्य थीं और न इनने प्राण संकट उत्पन्न किया। 10 प्रतिशत ऐसी थीं जिनके लिए दौड़ धूप करनी पड़ी दूसरों का सहारा लेना पड़ा और थोड़ी परेशानी भी सहनी पड़ी। केवल 8 प्रतिशत चिन्ताएँ ही ऐसी थीं जिन्हें कुछ वजनदार कहा जा सकता था और जिन्हें पूरी तरह हल न किया जा सका उनके कारण नुकसान भी उठाना पड़ा।
चिन्ता ग्रस्त रहने वाले लोग निश्चिन्त व्यक्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक घाटे में रहते हैं। मन मौजी और मस्त लोगों को नियत समय पर ही समस्या का सामना करना पड़ता है पर चिन्तातुर लोग बहुत पहले से ही मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और हड़बड़ी के कारण अपना अच्छा भला स्वास्थ्य भी गँवा बैठते हैं। मस्तिष्क जितना अधिक समस्याओं में उलझा हुआ रहेगा उतना ही वह समस्या सुलझाने में असमर्थ हो जाएगा क्रोधी आवेश ग्रस्त, उत्तेजित, आक्रोश में भरे हुए दिमाग एक प्रकार से विक्षिप्त जैसे हो जाते हैं वे एक ही आवेश संचालित दिशा में सोचते हैं। कई तथ्यों पर ध्यान रखते हुए सही निष्कर्ष निकालना उनके काबू से बाहर की बात हो जाती है। चिन्ता का कारण दूर करना तो दूर ऐसे लोग शारीरिक और मानसिक गँवाकर दुहरी हानि उठाते हैं।
मनुष्य के समान न तो कोई बलवान प्राणी है न निर्बल। बलवान इसलिए है कि यदि वह सूझबूझ से काम ले, अपनी शक्तियों को ठीक तरह प्रयुक्त करें, अपने मधुर व्यवहार के कारण दूसरों का सद्भाव सहयोग संजोये रहे तो प्रगति के पथ पर द्रुतगति से आगे बढ़ सकता है। निर्बल इसलिए है कि हड़बड़ी उतावली और अदूरदर्शिता अपनाये तो बने काम बिगड़ते चले जाएँगे और सफलता की संभावना असफलता बन कर सामने आ खड़ी होंगी। अपने अप्रामाणिकता और अयोग्यता सिद्ध करके वह अपने को मित्रों से रहित एकाकी बना लेगा। यदि अधीरता प्रकट करके विपरीत होती चली जाएँगी और परिस्थितियाँ उसके विपरीत होती चली जाएँगी और अनुभव करेगा कि दुर्भाग्य ग्रस्त और दुर्बल मैं ही हूँ।
चिन्ता और चिता में थोड़ा ही अन्तर है। लिपि की दृष्टि से एक बिन्दु की न्यूनाधिकता है। चिता मरने के पश्चात् मनुष्य को जलाती है किन्तु चिन्ता जीवित को ही जलाना आरम्भ कर देती है। इस जलन से शरीर का सबसे बहुमूल्य अंग-मस्तिष्क झुलसता है और उसके कोमल कण कठोर हो जाते हैं। प्रमाद, दीर्घसूत्रता और निर्णय करने में असमंजस बने रहने की नई व्यथा उठ खड़ी होती है। जलन, गर्मी और खुश्की की बढ़ोत्तरी से कपाल में जाने वाला प्राण वायु विषैला बनता है और वहाँ धुँआ सा उमड़ता रहता है। उसकी स्वच्छ और पारदर्शी परतें धूमिल होकर बुद्धि हीनता उत्पन्न करती हैं-ऐसे व्यक्ति स्मरण शक्ति भी खो बैठते हैं और हर घड़ी असहाय, कायर असफल जैसे दीखते हैं । उन्हें आशा की किरणें कहीं से आती नहीं दीखती चारों ओर अँधेरा ही प्रतीत होता है।
चिन्तित दीखने वाला व्यक्ति प्लेटो की दृष्टि में एक आविष्कारक है। अन्तर इतना ही है कि वैज्ञानिक आविष्कारक किसी ठोस आधार को पकड़ते और कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं, जबकि चिन्तित व्यक्ति काल्पनिक आशंकाएँ रचता और गढ़ता रहता है। वह अपने लिए एक उलझी हुई दुनिया बनाता है और उसी में ताने बाने बुनता हुआ अपनी क्षमता खोता गँवाता चला जाता है।
अपने आपको असमर्थ, असहाय, अपंग और अनाथ मानने से ही चिन्ता ग्रस्त मनः स्थिति बनती है । साहसी व्यक्ति कठिनाइयों को अपने पौरुष के लिए एक चुनौती मानता है और खिलाड़ी लोग जिस तरह साहस और उत्साह के साथ गेंद के साथ गुँथ जाते हैं उसी तरह आत्मविश्वासी अपने पुरुषार्थ के बल पर बड़ी दीखने वाली कठिनाइयों को तुच्छ सिद्ध करते हैं।
संगीत शास्त्री हेडेल को लकवा मार गया। दाया अंक बेकार हो गया। केवल बायाँ अंग ही दैनिक कृत्यों में सहायता करता था। पैसा पास में रहा नहीं । चिकित्सा तो दूर पेट भरने का भी प्रबन्ध नहीं रहा। क्या किया जाय। उसे एक बात सूझी। सामूहिक गानों की उन दिनों विद्यालयों में बहुत माँग थी। हेडेल ने कुछ सामूहिक गान रचे और उनकी स्वर लिपियाँ बनाई। एक महीने में वह पुस्तक तैयार हो गई उसे लेकर घसीटता हुआ प्रकाशक के पास गया। पुस्तक छपी और उसकी रायल्टी से वह शेष जीवन अर्थ चिन्ता से मुक्त होकर बिताने में सफल हो गया। दुर्भाग्य का रोना रोने, भीख माँगने या दीनता प्रकट करने की अपेक्षा हेडेल ने यही उचित समझा कि जो शक्ति शेष हैं उसे रचनात्मक काम के लिए प्रयुक्त क्यों न करें? कठिनाइयों से ग्रस्त व्यक्ति भी यदि धैर्य और संतुलन से काम लें तो उन्हें कोई न कोई रास्ता अवश्य मिल सकता है।
आत्म हत्या करने वाले उतावले लोगों में से बहुतों के सामने इतनी बड़ी कठिनाई नहीं होती जितनी कि वे भावुकता वश अनुभव करते हैं। इसी अवास्तविक कल्पना में उलझे हुए वे लोग तिल का ताड़ बना कर अपने प्राण खो बैठते हैं।
न्यूयार्क में एक युवक संगीतकार ने इसलिए आत्म हत्या कर ली कि वह अपना प्रिय वायलिन गिरवी से छुड़ाने के लिए आवश्यक कमाई न कर सका। परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थी, प्रेम प्रणय में असफल होने वाले प्रेमी लोग, परिवार में कलह कटुता आ जाने जैसे प्रसंगों पर कितने ही लोग हत्या या आत्म हत्या जैसे उद्धत कार्य कर डालते हैं। यह आवेश की स्थिति है। चिन्ता भी लगभग ऐसी ही भावुकता है जो निराशा जैसी मन्द आत्महत्या के गर्त में धकेल कर व्यक्ति को अपंग बना देती है।
वर्तमान की चिन्ता करना और हल खोजने में स्थिर चित्त से तन्मय होना यह उपयुक्त है। भूतकाल की उधेड़ बुन में खोये रहना, बेकार है। ऐसा क्यों हुआ, किसने किया, भूल कहाँ रही जैसे प्रश्नों की उखाड़ पछाड़ करते रहने से क्या लाभ? जो बीत गया सो गया अब वह लौट नहीं सकता। उसके लिए माथा पच्ची करना बेकार है। इसी प्रकार भविष्य में क्या कठिनाई आयेगी, किस संकट में होकर गुजरना पड़ेगा जैसी बातें सोचते हुए समय से पूर्व चिन्ताएँ समेटना बेकार है। अपने लिए वर्तमान ही पर्याप्त है। उसी को देखा, समझा जाय और जो आज की स्थिति में सर्वोत्तम कदम उठाया जा सकता है उसी के लिए साहस समेटा जाय। वर्तमान पर केन्द्रित रहना सीख लिया जाय तो चिन्ता करने के लिए न तो अवसर ही मिलेगा और न आवश्यकता ही प्रतीत होगी।
हमें हर घड़ी व्यस्त रहना सीखना चाहिए। जार्ज बर्नार्डशा कहते थे दुखी और चिन्तित होने के लिए मनुष्य के पास फालतू वक्त होना चाहिए। जिसके पास करने के लिए ढेरों काम पड़ा है उसे इतनी फुरसत कहाँ होगी कि बेकार बातें सोचे और चिन्ता और दुःख में डूबे।
इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री बुढ़ापे में भी 18 घण्टे काम करते थे। द्वितीय महायुद्ध में उनके सामने बहुत समस्याएँ थीं और चिन्ता के कारण भी, पर उन्हें कभी किसी ने उद्विग्न नहीं देखा । हर काम को शान्ति और एकाग्रता के साथ करते थे। उसी मनः स्थिति के कारण वे अपने देश को जीवन मरण की घड़ियों में से उवार कर पार ले गये।
‘अप्रिय को कैसे भूलें, पुस्तक के लेखक जान कूपर पोन्स का कथन है चिन्ता और तनाव से बचने को एक ही उपाय है कि अपने लिए सोचने और करने के लिए कार्यक्रम निर्धारित करें और उसी में उत्साह, प्रसन्नता तथा तन्मयता के साथ जुटे रहें।
ओसा जॉन्स ने कहा है -यदि मैं निरन्तर रचनात्मक विचारों और कार्यों में लगने की पद्धति सीख न पाता तो दूसरों की तरह मुझे भी चिन्ता में घुल-घुल कर मरना होता।
दार्शनिक पैरल्कीज कहा करते थे-छोटे आदमी छोटी बातें सोचते हैं। और अपने ओछेपन के कारण निराश और व्यथित रहते हैं। परिष्कृत व्यक्तित्व हमेशा सृजन सोचता है और उन साधनों को अपनाता है जिनके सहारे कठिनाइयों को पार कर सकना संभव हो सके।
जार्ज क्रुक ने लिखा है- कभी मुझे भी चिन्ताएँ बहुत सताया करती थीं पर जब मैंने देखा कि वे काल्पनिक ही नहीं अहितकर और अवांछनीय भी हैं तो मैंने उन्हें दुत्कार दिया और जितना समय चिन्ता में लगाता था उतना कुछ महत्त्वपूर्ण काम करने में लगाने लगा।
सुकरात को जहर का प्याला दिया जाने लगा तो वे मुसकराते हुए उसे पीने लगे। ऐसे अवसर पर भी उन्हें दुःखी न देख कर उपस्थित लोगों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने यही कहा जिसे बदला नहीं जा सकता उसे शान्ति के साथ सहन करना चाहिए।
कठिनाई की घड़ी में अपेक्षाकृत अधिक साहस और अधिक पुरुषार्थ की जरूरत पड़ती है। इन दोनों महान् अवलम्बनों को चिन्ता की आग में जला कर स्वयं असहाय बन जाने में कुछ बुद्धिमानी की बात नहीं हैं।
जनता तक कोई विचार और संदेश निरन्तर पहुँचाने के लिए समाचार पत्र और सिनेमा दो साधन हैं। समाचार पत्रों की सारी पहुँच 12 प्रतिशत जनता तक है। सिनेमा की पहुँच इससे अधिक बढ़ गई है। वह 20 प्रतिशत जनता तक अपनी प्रेरणाएँ पहुँचाता है। जबकि रेडियो को सारी क्षमता 6 लाख व्यक्तियों को सूचना संदेश दे सकने में ही समर्थ हो पाई है। यदि सिनेमा का उपयोग लोक-रंजन के साथ लोक-मंगल को समन्वय किया जा सके तो यह वैज्ञानिक उपलब्धि समाज के लिए अभिशाप न रह कर वरदान बन सकती है।
-लोक लायक अत्रे
शरीर में शक्ति का अभाव नहीं वह इतनी प्रचुर मात्रा में मौजूद है कि यदि उसे ढंग से खर्च किया जाय तो आमतौर से लोग जितना काम करते हैं उसकी तुलना में कम से कम दूना काम तो सहज ही किया जा सकता है।
होता यह है कि सार्थक प्रयोजन में जितनी शक्ति खर्च होती है, उससे कहीं अधिक निरर्थक कर्मों में खर्च होती रहती है। यदि सतर्कता से काम लिया जाय तो इस अनावश्यक अपव्यय को बचाया जा सकता है और ऐसे कार्यों में लगाया जा सकता है जिनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है।
अकारण बकझक में जिह्वा के माध्यम से कितनी शक्ति नष्ट हो जाती है लोग उसका मूल्यांकन करते ही नहीं। वे यह भूल जाते हैं कि क्रिया कुछ भी क्यों न हो उसके लिए ऊर्जा चाहिए और उसे जुटाने में कोशिकाओं का ईंधन जलेगा ही। यह होली की तरह क्यों फूँका जाय। जलाना ही हो तो चूल्हे की तरह जलाना चाहिए जिससे कुछ पकाये जाने या बनाये जाने का प्रयोजन सिद्ध हो। व्यायाम करना और बात है। उसके पीछे उद्देश्य है पर बेकार की उछल-कूद चंचलता और मटरगश्ती में न केवल समय बर्बाद होता है वरन् शक्ति का ऐसा महत्त्वपूर्ण कोश चुकता है जिसे यदि उपयोगी योजनाबद्ध कार्यों में लगाया जाय जो उतने से ही प्रगति की दिशा में काफी दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है। सतर्कता बरत कर शक्ति की यह थोड़ी-थोड़ी बचत और उसे उपयोगी कार्यों में लगाने की प्रवृत्ति ही बूँद-बूँद करके घड़ा भरने की उक्ति के अनुसार जीवन को महान् बनाने वाली सफलताओं में परिणत होती है।
शरीर की ही भाँति मस्तिष्क शक्ति का भी लोग बुरी तरह अपव्यय करते हैं। सोचने में अधिकांश निरर्थक और निरुद्देश्य बातें भरी रहती हैं। शेख चिल्ली की तरह रंग-बिरंगे सपने देखने में न जाने कितना समय गुजर जाता है। परिस्थिति और योग्यता से उन बातों की तनिक भी संगति नहीं होती फिर भी लोग उड़ाने आकाश तक ही उड़ते रहते हैं । सिनेमा में कोई सुन्दर सी नर्तकी देखकर आये और उसी का नशा हफ्तों दिमाग पर चढ़ा रहा। यह जानते हुए भी उसका संपर्क उन जैसे गई गुजरी स्थिति के व्यक्ति के लिए सर्वथा असम्भव है तो भी यह नहीं सोचते कि उतना चिन्तन किसी काम के प्रयोजन पर केन्द्रित करें तो कितना उद्देश्य पूरा हो। छात्रों में अनुत्तीर्ण रहने वालों में से अधिकांश ऐसे होते हैं जिन्हें निरर्थक कल्पनाओं से चित्त को हटा कर उसे उपयोगी केन्द्र पर नियोजित करना नहीं आता।
कितने ही व्यक्ति जीवन क्रम के साधारण उतार चढ़ावों को आकाश पाताल जैसा बढ़ा चढ़ाकर देखते हैं और उनसे असाधारण रूप से उद्विग्न उत्तेजित हो जाते हैं। चिन्ता और व्याकुलता के कारणों का विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होता है कि जिस वजह से मन को इतना उद्विग्न किया गया वह आये दिन मानव जीवन में घटित होती रहने वाली घटनाओं में से एक बहुत ही छोटी सी हलचल थी। मानसिक उद्वेग जितनी शक्ति नष्ट करता है उसे यदि सृजनात्मक चिन्तन में लगाया जाय तो न केवल असाधारण ज्ञान वृद्धि हो सकती है वरन् वर्तमान स्थिति से ऊँचे उठने आगे बढ़ने के उपाय भी सामने आ सकते हैं। उद्वेग की आँधी तो इतनी भयंकर होती है कि उसमें उपयोगी एवं दूरदर्शिता पूर्ण सूझ-बूझ का उठना ही कठिन हो जाता है।
मनः शास्त्री विल्डर पेन फिल्ड दीर्घकालीन शोध के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य की स्थिरता इस बात पर अवलम्बित है कि उसमें क्षोभ और उद्वेग कम से कम हो । जो व्यक्ति जितना ही मानसिक तनाव या दबाव अनुभव करेगा उतना ही शरीर और मन रुग्ण होगा साथ ही ऐसी विकृतियाँ उठ खड़ी होगी जिन्हें अर्ध रुग्ण स्थिति एवं अस्त व्यस्तता कहा जा सकता है। ऐसी मनःस्थिति का व्यक्ति अपने लिए और अपने साथियों के लिए एक समस्या बनकर रहता है। न वह स्वयं चैन से बैठता है और न दूसरों को बैठने देता है।
समुचित मनोयोग के अभाव में प्रायः हमारे सभी काम आधे अधूरे रहते हैं और उनका परिणाम भी असंतोषजनक ही रहता है। यदि पूरी दिलचस्पी और तत्परता से कुछ किया जाय तो सारी शक्ति एकाग्र हो जाने से छोटा काम भी इतना सुन्दर बन पड़ता है कि करने वाले की प्रतिष्ठा आदि प्रामाणिकता में चार चाँद लग जाते हैं। फिर उसे अनायास ही एक से एक बढ़कर महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सँभालने के अवसर मिलने लगते हैं।
जब काम करना हो तो तब पूरे मन, पूरे श्रम, पूरे मनोयोग के साथ पूरी दिलचस्पी और तत्परता के साथ उसे करने में जुटना चाहिए। इस प्रकार समान रूप से सारी तन्मयता समेट कर यदि किसी काम को किया जाय तो वह अधिक मात्रा में भी होगा और उसका स्तर भी ऊँचा रहेगा। अन्वेषक और विज्ञानी यही करते हैं जब वे अपना काम आरंभ करते हैं तो एक प्रकार से उसमें खो जाते हैं। दूसरी बात उन्हें सूझती ही नहीं। शरीर की प्रत्येक हरकत और मन की हर तरंग की उसी लक्ष्य पर एकाग्रता रहती है। आँख हृदय जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों का आपरेशन करते समय सर्जन की पूरी तन्मयता अपने काम पर केन्द्रित रहती है यदि वह अधूरे मन से उस क्रिया को सम्पन्न करे तो रोगी की जान पर बन आयेगी।
हमारा प्रत्येक काम, विज्ञान अन्वेषी या जिम्मेदार सर्जन जैसा होना चाहिए। काम चाहे छोटा हो या बड़ा उसकी उत्कृष्टता ही करने वाले का गौरव है घटिया काम करके रख देना किसी व्यक्ति बुरी किस्म का असम्मान है। भौंड़ा, फूहड़, अधूरा काम उनका होता है जो अन्यमनस्क होकर आधे मन से काम करते हैं। इसमें समय भी बहुत बर्बाद होता है। काम भी कम होता है और जो होता है उसका स्तर गया गुजरा होता है। ऐसा कर्त्तृत्व करने वाले व्यक्तित्व को ही गिराता है। इस रीति-नीति को अपनाने वाले व्यक्ति कभी कोई ऊँचा काम नहीं कर सकते और उन्नति के उच्च शिखर पर नहीं चढ़ सकते ।
काम को बहुत देर लगातार करते रहना उचित नहीं। बीच-बीच में विश्राम चाहिए, विश्राम का मतलब काम की दिशा बदल देना है। हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना चाहिए । चुप चाप बैठे भी रहें तो भी मस्तिष्क तो अपना काम करेगा ही, वह कुछ न कुछ सोचेगा ही, किसी न किसी उधेड़ बुन में वह लगेगा ही। उसकी बनावट ही ऐसी नहीं है कि चुपचाप बैठा रह सके । यहाँ तक कि सोते समय भी उसे चैन नहीं पड़ता और सपने गढ़ कर उनके साथ खेलने लगता है । मस्तिष्क को विश्राम देने का महत्त्व समझना चाहिए और उसके लिए क्या किया जाना चाहिए इससे परिचित होना चाहिए।
दफ्तरों में छः दिन काम करने के बाद सातवें दिन इतवार की छुट्टी रहती है । बाज़ार भी सप्ताह में एक दिन बन्द रहते हैं। सिनेमा के बीच अन्तराल होता है। शरीर रात को सोकर छुट्टी मनाता है। यह छुट्टी समय की बर्बादी नहीं है वरन् अगले दिन अधिक काम कर सकने की सामर्थ्य संग्रह करने की तैयारी है। मशीनों को भी लगातार नहीं चलाया जाता । यदि उन्हें अवकाश न दया जाय तो गरम होकर अपनी जीवन अवधि से बहुत पहले ही खराब हो जाएगी हमें शरीर और मन को भी विश्राम देना चाहिए ताकि उनकी कार्य क्षमता और स्थिरता व सुदृढ़ता अक्षुण्ण बनी रहें।
लगातार कड़ा काम करते रहना और विश्राम की व्यवस्था न करना वस्तुतः कम काम करने और घाटा सहने का ही एक फूहड़ तरीका है। यद्यपि ऐसे व्यक्ति अपनी कर्मठता की शेखी बहुत बघारते हैं। समय पर भोजन तक नहीं कर पाते-सोने का कोई समय नहीं, इतने व्यस्त रहते हैं । यह कहकर अपने मन में झूठा संतोष किया जा सकता है या दूसरों पर अपनी धाक जमाई जा सकती है। पर इससे प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता । लगातार और अस्त-व्यस्त ढंग से काम करने वाला व्यक्ति बेतरह थका रहता है। थकान चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करती है और क्षमता घट जाने से काम भी उतने अच्छे नहीं होते, जितने कि ताजगी की स्थिति में हो सकते थे। प्रातः सोकर उठने पर ताजगी की स्थिति में जितना अच्छा काम हो सकता है उतना थक कर चूर-चूर हो जाने पर रात के समय कर सकना कदापि संभव नहीं ।
शरीर का रासायनिक संतुलन मुख्यतः तीन ग्रन्थियों पर अवलम्बित है। एक पिट्यूटरी-मस्तिष्क के नीचे हैं। ड्रेनल गुर्दे के समीप दो ग्रन्थियाँ है। हारमोन तथा दूसरे अति रासायनिक तत्त्वों का निमार्ण, शोधन एवं परिवर्तन प्रायः इन्हीं की सक्रियता के कारण संभव होता है। अधिक और लगातार श्रम करने का प्रभाव इन तीनों ग्रन्थियों पर पड़ता है और वे अपना काम ठीक तरह न कर पाने से शरीर की रासायनिक आवश्यकता ठीक तरह पूरी कर सकने में असमर्थ हो जाती है। इस प्रकार हमारी आन्तरिक एवं अदृश्य भूख पूरी न होने के कारण भीतरी दुर्बलता बढ़ती जाती है और रोग निरोधक तथा दूसरी क्षमताओं का भंडार रिक्त होता हुआ चला जाता है। यह स्थिति सचमुच चिन्ताजनक है।
मस्तिष्क का सारा भार हटा कर पूर्ण निश्चिन्त और खाली मन करके यदि थोड़ी देर भी विश्राम कर लिया जाय तो उससे थकान दूर करने और ताजगी लाने में उतनी सहायता मिलती है जितनी कि उद्विग्न में से घंटों लेटे रहने से भी नहीं मिलती।
नेपोलियन वोनापार्ट को दिन रात युद्ध कार्यों में व्यस्त रहना पड़ता था। दिन में वह अपने सैनिकों के साथ लड़ता था और रात को अगले दिन की योजनाएँ बनाता था। उसे पूरी नींद या समुचित विश्राम का अवसर नहीं मिलता था, उसने शिथिलीकरण की विधि अपनाई। जब भी अवसर मिलता अपना शरीर और मन पूरी तरह शिथिल करके पड़ा रहता और एक घंटे का एक विश्राम ही उसके लिए पूरी रात सोने का काम पूरा कर देता। कभी कभी तो वह अपने घोड़े को किसी पेड़ के सहारे खड़ा करके उसी पीठ पर बैठा बैठा ही झपकी ले लेता और यह शरीर और मन को दिया गया गहरा विश्राम उसे फिर नये सिरे से ताजगी प्रदान कर देता ।
कहते हैं कि रूस के अधिनायक स्टालिन की मृत्यु मस्तिष्क की नली फटने के कारण हुई थी और उसका कारण लगातार उग्र चिन्तन करना था। अपने ही देश में कुछ समग्र पूर्व सरदार पटेल और गोविन्द बल्लभ पन्त की मृत्यु के कारणों में ऐसा ही विग्रह प्रधान था।
कनाडा के शरीर विज्ञानी डा. हेन्स सेल्ये इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वास्थ्य के बिगड़ने और मनः संस्थान को अस्त-व्यस्त करने का प्रधान कारण नाडी संस्थान पर बढ़ा हुआ तनाव ही है। और इसका प्रधान हेतु श्रम करने का संतुलन बिगड़ जाना है। लोग काम करना तो चाहते है पर यह नहीं जानते कि उसे किया कैसे जाना चाहिए।
शरीर और मन का तनाव कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटना नहीं है। वह बादलों की तरह बरसता नहीं और न बिजली की तरह गिरता है। वह आग्रह पूर्वक बुलाने पर स्वाभिमानी अतिथि की तरह ही आता है। बेढंगे मन से अत्यधिक काम करना इस संकट के आगमन का मुख्य कारण है। ढंग-कायदे ओर करीने के साथ आदमी 18 घंटे भी काम करता रह सकता है। पर यदि बेतरतीब आठ दस घंटे भी काम किया जाय तो बेतरह थकान आयेगी और तनाव उत्पन्न हो जाएगा
शक्ति को अनावश्यक कार्यों से बचाना-उसे उपयोगी कार्यों में लगाना-हलके मन से किन्तु पूरी दिलचस्पी के साथ काम करना-श्रम और विश्राम को एक दूसरे से जोड़कर चलना ऐसे सूत्र हैं जिन्हें अपना कर अच्छा और अधिक काम किया जा सकता है। कहना न होगा कि सफल और समुन्नत जीवन की सकना केवल उन्हीं के लिए संभव होता है। जो अपने शारीरिक मानसिक शक्ति संतुलन का ध्यान रखते हुए उपयोगी और महत्त्वपूर्ण कार्यों पर अपनी गति-विधियाँ केन्द्रित किये रहते हैं।
परिद्रोहः की भावना ईर्ष्या-द्वेष के रूप में पल्लवित होकर मनुष्य के अन्तर बाह्य जीवन को दूषित बना देती है।
मानव समाज में उभरते विद्रोही स्वरों की एक झाँकी हम हिप्पी आन्दोलन में देख सकते हैं। बाल-बिखरे कपड़े छितराए, नशा पिये, निरुद्देश्य घूमने ओर पड़े रहने वाले पाश्चात्य युवकों को भारत में भी जहाँ-तहाँ बड़े नगरों में और तीर्थ स्थानों में देखा जा सकता है। इसी वर्ग को थोड़े हेर-फेर के आधार पर वीटल, वीटकिक कहते हैं। उनकी अस्त-व्यस्त गतिविधियों का कारण जानने पर पता चलता है कि वे आज की सामाजिक और बौद्धिक परम्पराओं से सर्वथा असन्तुष्ट हैं और उन्हें बदलने के लिये सबसे पहले ध्वंस का मार्ग अपनाते हैं। उनका कहना है कि प्रचलित परम्पराएँ लगभग सर्वथा अवांछनीय स्तर की बन गई हैं। इनको आदि से अन्त तक ध्वस्त किया जाना चाहिए। उपयोगी परम्पराओं का निर्माण, इतना कर चुकने के बाद ही संभव होगा। किसी विशेष राजनैतिक या सामाजिक परम्परा के ही विरुद्ध नहीं वरन् उनका विद्रोह प्रचलित सारे ढर्रे के विरुद्ध ही है जिसमें वे उपयोगिता स्वल्प और अनुपयोगिता की भर मार देखते हैं।
हिप्पियों की जीवन चर्या अथवा कार्यपद्धति कोई सुख-सुविधा भरी नहीं है। समाज का सहयोग भी प्राप्त नहीं होता और न कमाई के प्रचुर आर्थिक स्रोत ही उनके पास हैं। निरुद्देश्य और असामाजिक रीति नीति जहाँ उन्हें उपहासास्पद बनाती है वहाँ सहानुभूति से भी वंचित करती है। ऐसा कष्ट साध्य मार्ग वे किसी भौतिक सुख-सुविधा के लिए चुन रहे हों, ऐसा नहीं लगता। धूर्तों जैसे छल प्रपंच भी उनके क्रिया-कलाप में सम्मिलित नहीं हैं भरी जवानी में इस प्रकार अवधूतों जैसे आचरण में इतने प्रतिभाशाली जीवन क्यों लग पड़े, इस तथ्य पर गम्भीरता, पूर्वक विचार किया जाना चाहिए। सिरफिरों की सनक कहकर सस्ता समाधान नहीं ढूँढ़ा जाना चाहिए।
हिप्पीवाद का आरंभ थोड़े सी वीटल किशोरों द्वारा हुआ। उन्होंने सड़कों पर गीत गाकर समाजगत कुत्साओं और व्यक्तिगत कुण्ठाओं पर करारे व्यंग किये और कहा-स्वस्थ मनुष्यता पर दुष्ट नियंत्रण इतने अधिक हावी हो गये हैं कि जो यथार्थ है उसे ढूँढ़ निकालना अब संभव नहीं रहा। अस्तु हम इसे आदि से अन्त तक अस्वीकार करेंगे ताकि मनुष्यता को नये सिरे से उभरने का अवसर मिले।
प्रचलित परम्पराओं के विरुद्ध सुलगती आग ने इस प्रकार एक नये किस्म के विद्रोह को जन्म दिया । वह तेजी से फैला। यूरोप, अमेरिका से आगे बढ़ कर वह ऐसा अन्यत्र विश्व के हर कोने में फैला और अब लाखों व्यक्ति हिप्पियों के रूप में अवधूत गतिविधियाँ अपनाये हुए विचरण करते दीखते हैं। यह एक अनोखे किस्म का विद्रोह है। दूसरे आन्दोलनों में दबाव रहता है और विपक्ष की गतिविधियों को बदलने के लिए विवशता उत्पन्न की जाती है। पर इस आन्दोलन में व्यक्ति अपने आप को विद्रोही के रूप में प्रस्तुत करता है। स्वयं कष्ट सहता है और सर्व साधारण का ध्यान यह विचार करने के लिए आकर्षित करता है कि उनका विद्रोह अकारण है या नहीं? वीटल इसकी तुलना गाँधी जी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन से करते हैं।
हिप्पी वर्ग का कहना है कि आज शब्दों की फेर बदल ने आदिम काल की दुष्ट पशुता पर ऐसे रंग-बिरंगे सैद्धान्तिक आवरण चढ़ा दिये हैं जिनके कारण साधारण बुद्धि के लिए उचित-अनुचित का भेद कर सकना भी सम्भव नहीं रहा। ऐसी दशा में कुछ खास प्रचलनों में सुधार कर देने से काम चलने वाला नहीं है। प्रचलन आमूलचूल होना चाहिए। यही हिप्पी वाद का मूल आधार है। वे धर्म के नाम पर भूतकाल के वीभत्स रक्त पात को राजनैतिक शासन के नाम पर गाँधी वाद से लेकर साम्यवाद तक के लिए बरती गई क्रूरताओं को प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं प्रजातंत्र के पर्दे में पल रहा भ्रष्टाचार इससे भी गया बीता है। सामाजिक परम्पराओं में अभी भी असमानता और शोषण को पूरी मान्यता मिली हुई है। इन प्रचलित मूल्यों के रहते हुए मानवता का सही रूप में उभर सकना सम्भव नहीं। विद्रोह के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं । इस मान्यता के अनुसार वे विद्रोह का आरम्भ पनपती समाज विरोधी गतिविधियों से आरंभ करते हैं और सोचते हैं कि यह बीच अन्ततः एक ऐसे समग्र विद्रोह के रूप में परिणत होगा जिसके द्वारा खण्ड-खण्ड सुधार की अपेक्षा समग्र नव निमार्ण सम्भव हो सके।
विचारशील वर्ग द्वारा पूर्ण रूप से न सही आँशिक रूप से यह स्वीकारा गया है कि विज्ञान, बुद्धिवाद और व्यवसाय की वृद्धि के साथ अवांछनीयता की मात्रा बढ़ती ही गई है। दो महायुद्धों के समय जो छल-छद्म राजनैतिक स्तर पर सैन्य प्रयोजन के लिए अपनाये गये अब वे सर्वविदित हो गये हैं और जिस तरह सरकारों ने उस समय उन बातों को आवश्यक माना था उसी तरह जनता ने सामान्य जीवन में उन्हें आवश्यक मान लिया है। युद्धों में बर्बरता और छल-छिद्रों का बोलबाला रहता है। विजयी ने जो भी तरीका अपनाया हो उसका गुण दोष नहीं देखा जाता वरन् सफलता की सराहना की जाती है भले ही उसका आधार अवांछनीय ही क्यों न रहा हो। महायुद्धों ने इस युग के महान् धर्मोपदेशक का काम किया है। छुट-पुट लड़ाइयाँ भी देश देशों के बीच लड़ी जाती रही है उनके साथ जुड़े हुए राजनैतिक दाब पेंचों और सैन्य चातुर्य को हर किसी ने समझा है। और देखा है कि नीति-अनीति के पचड़े में कोई नहीं पड़ता । अपनी धींगा मस्ती को हर कोई सिद्धान्तों के आवरण में लपेट कर इस तरह प्रस्तुत करता है कि सत्य के असत्य और असत्य के सत्य कहने में कुछ कठिनाई अनुभव नहीं। समय ने यह सिखाया है कि सफलता का नाम ही सत्य है, फिर चाहे उसका आधार कुछ भी क्यों न रहे।
युद्ध नीति ने अब पूरी तरह व्यक्तिगत जीवन नीति का प्रामाणिक स्वरूप प्राप्त कर लिया है। हर व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ, सुख, विनोद और वर्चस्व के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर हैं। मनुष्यों का समूह ही समाज है । लोग जिस स्तर के होते हैं समाज भी उसी स्तर का बन जाता है। हिप्पी वर्ग के अनुसार यही आज की ऐसी असह्य स्थिति हैं जिसे बदला न गया तो मनुष्य की पिशाच प्रवृत्तियाँ घटेगी नहीं बढ़ती ही जायेंगी।
हिप्पी वर्ग के इस मूल प्रतिपादन से निष्पक्ष विचारता बहुत हद तक सहमत हैं। मतभेद का प्रधान मुद्दा यह है कि भ्रष्टता को महाभ्रष्टता से नहीं रोका जा सकता। विद्रोही की भी अपनी कुछ मान्यता और आस्था होनी चाहिए। वह क्या चाहता है उसका लक्ष्य किस प्रकार के किस निमार्ण का है इसका स्वरूप भी स्पष्ट करना चाहिए। विरोध के लिए विरोध अपूर्ण है। अमान्य को अस्वीकार तो किया जा सकता है पर साथ ही अपना पक्ष भी बताया जाना चाहिए और जो स्वरूप अपने प्रतिपादन का हो उसके अनुरूप अपना आचरण ढालना चाहिए। तभी दोनों के नवीन प्रतिपादन की अच्छाई-बुराई समझने का अवसर मिलेगा और अपनाने न अपनाने का निर्णय कर सकना संभव होगा। इस दृष्टि से हिप्पी आन्दोलन अपूर्ण एवं एकाकी है। उसमें निषेध है पर प्रतिपादन नहीं। निषेध भी कुछ विचित्र प्रकार का। समस्त प्रचलनों से इनकार करना जीवन क्रम को निराधार और निरुद्देश्य बना देता है यह ऐसा कदम है जिससे पूर्व प्रचलित अवांछनीय परम्पराओं से भी अधिक अस्त व्यस्तता उत्पन्न हो सकती है। इस अपूर्णता के कारण ही हिप्पी आन्दोलन का मूल आधार विचारोत्तेजक होते हुए भी उसे वैसा समर्थन नहीं मिल सका जैसा मिलना चाहिए था । कीचड़ धोने की तरह ही हिप्पी बाद का यह प्रयास है कि अवांछनीयता का निराकरण अस्त व्यस्तता द्वारा किया जाना चाहिए।
धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक और दार्शनिक बंधनों का जाल-जंजाल मनुष्य की मूलभूत विशेषता को नष्ट भ्रष्ट किये दे रहा है। यह सिद्ध करते हुए पाल सत्रि ने स्वतन्त्र स्वतंत्रता की आवश्यकता की माँग की है। दार्शनिक गिंस वर्ग ने वाँछनीयता के आवरण से ढके हुए अवांछनीय प्रतिबंधों की भर्त्सना की है और कहा है कि अवैज्ञानिक प्रतिबंधों से मनुष्य सदाचारी कहा है कि अवैज्ञानिक प्रतिबंधों से मनुष्य सदाचारी नहीं पाखण्डी ही बन सकता है। टामस लियरी ने सलाह दी है कि विचारशील लोग दुनिया का साथ छोड़ दें । वर्तमान ढर्रे की हर प्रथा से इनकार करें ताकि विद्रोहियों का एक विशेष वर्ग खड़ा हो सके। कामू ने प्रचलित संस्कृति को असभ्यों की सभ्यता नाम दिया है।
यह बन्धन विद्रोह विभिन्न क्षेत्रों में फूटा है। एक्शन पेंटिंग के जन्मदाता पिकासो और जैक्शन पालाक ने चित्रकला के प्रचलित मूल्यों को उठा कर ताक पर रख दिया है। रंगमंच पर आफ व्राडवे शैली ने पुरानी अभिनय परम्परा को उपहासास्पद बताया है। आज हैरीसन ने संगीत की ऐसी स्वतंत्र शैली विकसित की है जिसमें गायन और वादन अनाथालय के छात्रों की प्रार्थना सभा जैसा लगता है। इन बुद्धिवादियों के नेतृत्व ने परम्परा विरोधी विद्रोह को एक व्यवस्थित दर्शन दिया है कहते हैं हिप्पीवाद उसी चिन्तन की देन है। विद्रोह के स्वर ऊँचे करते हुए वे कहते हैं -राजनीतिज्ञों, धर्म गुरुओं, समाज के ठेकेदारों, साहित्यकारों, कलाकारों, धनाधीशों बुद्धिवादियों और सुव्यवस्था के ठेकेदारों पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता । ये वर्ग निरन्तर आज तक जनता के साथ विश्वासघात करते रहे हैं। मानवता और लोग कल्याण की दुहाई देकर ये लोग खोखली शब्दावली में हमें यथार्थता से विरत कर ऐसे कल्पना लोक में उड़ाते रहे हैं जिसमें भ्रमजाल में उलझे रहने के अतिरिक्त और किसी को कुछ नहीं मिला।
हिप्पी, शंकर को एक विरोधी हिप्पी के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं और बुद्ध को अपनी बिरादरी का मानते हैं और पाण्डव जाति को भी । उनका कथन है देव-समाज के पाखण्ड से रुष्ट होकर शिव ने श्मशान का निवास, भस्म का परिधान, सर्पों को साथी बनाया था और नशे पीकर अपने विद्रोह की ज्वाला पर नियंत्रण करते थे एक बार तो वे ताण्डव नृत्य करके पुरानी दुनिया को जला देने पर भी उतारू हो गये थे। बुद्ध ने पुत्र, पत्नी और राजपाट को त्याग कर यह सिद्ध किया था कि मनुष्य को समाज का कोई भी बन्धन स्थायी रूप से स्वीकार नहीं करना चाहिए। पाँच पाण्डवों ने एक ही सम्मिलित पत्नी से काम चलाया था और नारी के इस अधिकार को स्वीकार किया था कि एक ही समय उसका प्रणय व्यापार कई व्यक्तियों के साथ चलता रहे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं है।
यह विवादास्पद है कि हिप्पी आन्दोलन समाज में व्यक्ति में वह परिवर्तन ला सकेगा जिसे सामने रखकर नई पीढ़ी के एक बड़े वर्ग ने यह सविनय अवज्ञा जैसा विचित्र अभियान खड़ा किया है। सभी परम्पराएँ त्याज्य नहीं हैं। संस्कृति समग्र रूप से अवांछनीय नहीं हैं । उसमें जितना अनुपयुक्त उतने का ही विरोध उन्मूलन किया जाना चाहिए। भौतिक उपलब्धियों की तरह बौद्धिक क्षेत्र में भी कुछ न कुछ उत्कृष्टता बढ़ी है। उसे भी नष्ट करने पर उतारू हो जाना अविवेकपूर्ण है। फिर जिसका विरोध करना हो उसका विकल्प भी तो कुछ रहना चाहिए अन्यथा रिक्त की पूर्ति कैसे होगी।
हिप्पी आन्दोलन का परिणाम क्या होगा यह कहना असामयिक है पर इतना निश्चित है कि कुत्साएं और कुण्ठाएँ, विकृतियाँ और विडम्बनाएँ इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि उनके विरुद्ध विद्रोह किसी न किसी द्वार से फूटेगा अवश्य। समाज के कर्णधारों का कर्तव्य है कि स्थिति की विषमता को समझें और विस्फोट को रोकने के लिए सुधार प्रक्रिया अविलम्ब अपनायें।
संसार के प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई ऐसी वस्तु रहती है जिसे देकर वह दूसरे का उपकार कर सकता है। अन्न, वस्त्र, धन, विद्या आदि जिसके पास जो वस्तु अधिक है वह अभाव ग्रस्त व्यक्ति को कृपा पूर्वक देकर उसकी कठिनाइयों, कष्टों और दुःखों में सहयोग कर सकता है। अपने पास जो कुछ है वह दूसरे की सुख-सुविधा में बिना किसी विनिमय भावना से लगा देना यही उदारता है। मनुष्य के बड़ा होने, उत्कृष्ट होने का यही प्रमाण है।
‘जो कुछ है सो मेरे लिए’ यह पशु-प्रवृत्ति है। जानवर अपनी घास किसी को खाते देख लें तो मरने मारने पर उतारू हो जाय बहुत शहद इकट्ठा कर लेती हैं पर माँगने पर मधुमक्खी उसका एक कण भी नहीं दे सकती कुत्ते को सबसे बड़ा डर अपने सजातियों से ही रहता है।
कितनी ही परिश्रम की कमाई हो हर छोटे कुत्ते का टुकड़ा बड़ा वाला दबोच कर छीन लेता है यह पशु-प्रवृत्तियाँ हैं ‘अपना दो मत दूसरों का छीन लो’ यह पाशविक वृत्ति जहाँ भी रहेगी वहीं कलह क्लेश कटुता का नारकीय वातावरण बना रहेगा।
मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है। उसने बहुत कुछ पाया है पर तब जब उसने बहुत कुछ दिया है। आज हमें जितनी सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं वह सब उदारता पूर्वक आदान-प्रदान के कारण ही विकसित हुई हैं। गुरु को अन्न वस्त्र देते हैं बदले में वे विद्या देते हैं। इसमें गुरु शिष्य दोनों की उदारता है। जहाँ एक सी उदारता है, वहाँ संतोष, स्नेह, आत्मीयता का स्वर्गीय सुख भी है। पिता कमाता है उस कमाई के शतांश से भी कम का उपयोग अपने शरीर के हित में करता है शेष अपनी धर्म पत्नी, बच्ची, बच्चों, भाइयों-भतीजों को दे डालता है जहाँ यह उदारता है वहाँ परस्पर प्रेम होता है, दया होती है, विनम्रता होती है। सौजन्यता, सफलता और समृद्धियाँ भी होती हैं।
मनुष्य देने के स्वभाव से ही बड़ा है यह तो कोई कह ही नहीं सकता कि मेरे पास देने को कुछ नहीं है। जो धन, विद्या, अन्न आदि नहीं दे सकते, वे प्रेम-स्नेह दया, परोपकार, सन्मार्ग की प्रेरणा, बुराइयों से बचाने के सर्वोत्कृष्ट दान देकर अपनी उदारता व्यक्त कर सकते हैं। इससे समाज का जो हित होगा वह किसी उदारता पूर्वक दी गई भौतिक वस्तु से अधिक मूल्यवान होगा।
काम जितना ही बड़ा हो, यदि वह केवल अपने अभिमान की रक्षा अथवा दिखावे के लिये ही किया जा रहा है उसमें उदारता का कोई स्थान नहीं तो उससे कोई लाभ नहीं। इससे आत्म संतोष नहीं मिल सकता जबकि उदारता पूर्वक दिया हुआ छोटा बड़ा जो कुछ भी हो उतना ही फलदायी होता है और उससे बड़ा आत्म-सुख मिलता है। काम की बड़ाई उसके आकार पर नहीं व्यक्ति की विशालता से संयुक्त होती है तो उसमें दिव्यता के दर्शन होते हैं। वह बुराई करने वालों की भी भलाई करता है। निन्दा करने वालों में भी गुण देखता है। घृणा द्वेष और हिंसा न करते हुए दया करुणा, स्नेह और सम्मान देता हुआ अपनी दैवी-सम्पदा का विकास करता है। समाज में सम्पन्नताओं का विकास इसी तरह हुआ है और व्यक्ति में उत्कृष्टता व अभिवर्द्धन इसी तरह होता है।
अनुदार व्यक्तियों को उनका आसुरी अन्तःकरण ही असंतुष्ट रखता है जबकि उदार मति वाले मानवता के दिव्य दर्शन का आनन्द प्राप्त करते हैं। जिसमें उदारता अपने लिए किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता वरन् सब पदार्थों में और सब के ऊपर परमात्मा की दया और करुणा देखने की उत्कंठित रहता है। यह सरलता, सज्जनता और मनोवाँछित धर्म अपने आप में इतना मधुर और बड़ा सुख हैं कि उसकी क्षणिक अनुभूति जिसे हो जाती है वह बार-बार उसी की ओर भागता है। अपना सर्वस्व विश्वात्मा के उद्धार और विकास में लगा देने के लिए तत्पर होता है। वह किसी व्यक्ति से ईर्ष्या नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि सब चीजें परमात्मा से ओत-प्रोत हैं । वह अच्छे कार्यों का कर्त्ताः व्यक्ति को नहीं परमात्मा को मानता है जहाँ से वे मूलतः विकसित होती है इससे वह द्वन्द्व रहित निर्मल और शान्त अन्तःकरण की आनन्द विभूति प्राप्त करता है। जिन्हें सच्ची उदारता का ज्ञान हो गया वे अनुभव करते हैं कि सब पार्थिव वस्तुएँ असार हैं। आध्यात्मिकता इसीलिए हमें उदारता का सबक पहले सिखाती है।
दी हुई वस्तु का मोल माँगना पड़ता है पर जो वस्तु बिना किसी प्राप्ति-भावना से केवल औरों के कल्याणार्थ दे दी जाती है उसका मूल्य माँगना नहीं पड़ता । इसे चाहे ईश्वर विश्वास कहें अथवा विश्व की अन्तर्व्यथा दान करने वाला, उदारता पूर्वक अपनी शक्तियों को परोपकार में खर्चने वाला उससे भी अधिक पा लेता है। यदि वह स्थूल रूप से न भी दिखाई दे तो भी सामाजिक जीवन में जो सच्चा आदर सम्मान, विश्वास, सहानुभूति और आत्मीयता उसे मिलती है वह किसी प्रत्यक्ष लाभ से कम नहीं होती। शर्त केवल इतनी ही है कि अनुचित कामना पूर्ति के रूप में उदारता का प्रदर्शन न किया गया हो। प्रदर्शन की उदारता उदारता नहीं रह जाती वह व्यवसाय बन जाता है और उसकी प्रतिष्ठा जाती रहती है।
फूल सब की प्रियता का पात्र है। सब उसे स्नेह करते हैं क्योंकि वह अपनी सुवास का कोई मूल्य नहीं माँगता पर मधुमक्खी से उतना मीठा मधुर पाकर भी उसे कोई नहीं सराहता क्योंकि वह उदारता पूर्वक नहीं देती। देने की भावना अकाम हो तो वह कर्ता को अपने आप ही विकसित होने योग्य परिस्थितियाँ प्रदान कर देती हैं।
उदारता का सच्चा स्वरूप वह है जो हमें अपने कुटुम्ब में देखने को मिलता है। परिश्रम कुछ थोड़े से लोग करते हैं पर उसका लाभ बहुत से लोग उठाते हैं। प्रत्यक्ष में इसमें परिश्रम कर्त्ताः को हानि दिखाई देती है पर अपने परिजनों की श्रद्धा, आत्मीयता, प्रेम और स्नेह का उसे जो भावनात्मक प्रतिफल मिलता है वह भौतिक भोग से कहीं अधिक सुखदायी होता है। मनुष्य इसीलिए तो जीता है कि लोग उसे अधिक से अधिक प्रेम करें। अच्छा आदमी कहें, प्रशंसा करें और जब कभी आवश्यकता पड़े तो सच्ची सहानुभूति व्यक्त करें।
सामाजिक जीवन में भी ऐसी चाह स्वाभाविक है। वह आदान-प्रदान के ही नियम से मिलती है। समाज और संसार भी एक प्रकार का कुटुम्ब ही है। इससे उसमें अधिक सदस्य हैं इसलिए वहाँ आत्मविकास की परिस्थितियाँ भी बहुत अधिक होती हैं। समाज में जो भी विद्या-बुद्धि धन साधनों की दृष्टि से गये गुजरे हैं उनकी सहायता करके हम अधिक प्रेम और आत्मीयता का सुख अर्जित कर सकते हैं।
हम भारतीयों की विशिष्टता इसी बात में रही हैं कि हमने सारे संसार को एक कुटुम्ब माना है। और समान रूप से जन-सेवा और सहयोग के कर्तव्य का पालन बिना किसी मूल्य प्राप्ति की भावना से किया है। इसीलिए गई गुजरी परिस्थितियों में भी हमारी उत्कृष्टता बनी रही है। हमारे पुरखों का स्वभाव ही था- दीन-दुखियों और अभाव ग्रस्तों को कुछ देकर उन्हें ऊँचे उठाना। इन परिस्थितियों ने ही इस देश को विशालता के एक सूत्र में बाँधा है। अब तो उसके लिए परिस्थितियाँ भी और अधिक अनुकूल हैं। सही अर्थों में यह युग सेवा और उदारता का युग है इस युग में मनुष्य को धन साधनों का दान देने की आवश्यकता नहीं, लोगों को प्रेम और आत्मीयता का, स्नेह और सौजन्यता का दान देने की जरूरत हैं ताकि अविकसित मानवता का क्रम पुनः स्वर्गीय परिस्थितियों की ओर मुड़ चले और पीड़ित लोगों को भी आत्म-विकास का समुचित वातावरण मिल सके।
यह उदारता मनुष्य में विकसित हो तो इस युग की बुराइयों का अन्त हो और उत्कृष्टता का विकास। हमें ऊपर उठने की चाह है। हम मानवीय उत्कृष्टता को सिद्ध करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले उदार बनना चाहिए। अपनी साधन सम्पत्ति का एक अंश समाज को भी देने के लिए तत्पर होना चाहिए।
गर्मी को अवसर मिले तो वह चमक के रूप में परिणत हो सकती है। गर्मी क्रिया ह चमक उसकी प्रतिक्रिया, प्रतिक्रिया क्रिया के बिना नहीं हो सकती। जहाँ गर्मी नहीं है वहाँ चमक की आशा नहीं की जा सकती । यह हो सकता है पदार्थ की अपनी निज की गर्मी न हो वह किसी अन्य से ग्रहण की गई हो, पर चमक संभव तभी हो सकेगी जब अपनी या पराई-कमाई हुई या माँगे की गर्मी का अस्तित्व मौजूद हो।
जीवन में गर्मी का स्रोत है, परिश्रम पुरुषार्थ और साहस साहसी व्यक्ति चमकते हैं, कीर्तिमान होते हैं। यशस्वी और तेजस्वी कहलाने का अवसर केवल उन्हीं को मिलता हे जो मनोयोग, अभिरुचि एवं उत्तरदायित्व का समन्वय करके अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं। अधूरे मन से बेगार टालने की तरह उपेक्षा पूर्वक यदि कुछ किया जाय तो उसमें चिन्तन की गर्मी उत्पन्न होगी ही नहीं और जिस प्रकार बिना आग के भोजन नहीं पकता, उसी प्रस्तुत कार्य उस सुन्दरता एवं सफलता के साथ न हो सकेगा, जिस प्रकार कि हो सकता था सूर्य की किरणें आतिशी शीशे द्वारा केन्द्रित की जाय तो देखते देखते आग प्रकट हो जाती है। मनोयोग पूर्वक किये गये कार्यों में भी ऐसी ही ऊर्जा होती है फलस्वरूप उनकी सफलता ज्योतिर्मय होकर चमकती है। भाग्य से, संयोग वश अथवा अनैतिक उपायों द्वारा किसी को कम श्रम, कम समय और कम मनोयोग में भी कुछ बड़ी सफलता मिल सकती हे पर उन्हें मनस्वी की भूमिका संपादित कर सकने का श्रेय सौभाग्य तो नहीं ही मिलता ।
शरीर एक मणि मुक्तकों की खदान है जिसे श्रम की कुदाली से खोदा जाता है। कहा जाता रहा है कि जो खटखटाता है उसके लिए खोला जाता है। “ पर सुनिश्चित यह है कि जो खोदता है सो पाता है। भूमि को खोदे बिना कुँए का शीतल जल कौन पीता है। भूमि को जोते बिना फसल किसने पाई है। परिश्रमी और पुरुषार्थी ही सम्पत्तियाँ और विभूतियाँ उपार्जित करते हैं विविध विधि सफलताएँ उन्हीं के पल्ले बँधती हैं। यही ऊर्जा है, इसी को तप या तेजस कहते हैं। शरीर एवं मन की तेजस्विता निखारने के लिए ही मनस्वी लोग साहस पूर्वक आगे बढ़ते है और तपस्वी की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
भौतिक जगत में भी यही नियम काम करता है। संसार के हर पदार्थ में न्यूनाधिक मात्रा में ऊर्जा मौजूद है, उसे यदि उपयुक्त अवसर मिले तो यह सुनिश्चित है कि वह चमकीली हो सकती है और न केवल अपने अस्तित्व को आकर्षक बना सकती है वरन् दूसरों को भी उस चमक का लाभ दे सकती हैं।
ऊर्जा का प्रकाश रूप में बहुत बार रूपान्तर होता रहता है और हमें जो चमक दीख पड़ती है उसमें ऊर्जा रूपी फुलझड़ी का जलना ही प्रधान कारण होता है। पदार्थ किसी विशेष ऊर्जा को अपने भीतर सोखे रहते हैं। उस अवशोषण से प्रभावित परमाणु उत्तेजित होते हैं और उस सोखी हुई ऊर्जा को बाहर फेंक कर अपना स्वाभाविक स्थान ग्रहण करना चाहते हैं। इस संघर्ष से वह अवशोषित ऊर्जा जब वापिस जाने लगती है तो वह चमक के रूप में दिखाई देती है। यह आवश्यक नहीं वह सारी ऊर्जा ही वापस लौट जाय, यह भी हो सकता है कि कुछ अंश पदार्थ में ही विद्यमान् रहें और कुछ वापिस जायें । ऐसी दशा में जितना अंश वापिस जाएगा उतना ही चमकेगा।
किस पदार्थ की कितनी ऊर्जा, कब, कैसे, प्रकाश रूप में परिणत होती है यह पदार्थ की अपनी परिस्थिति और संरचना पर निर्भर है। जिस पदार्थ के कण आलसी और संग्रही होने के बाहरी प्रभाव से प्रभावित न होंगे ऐसी दशा में वे न तो उत्तेजित होंगे और न चमकेंगे ऐसे मंद मति पदार्थों की वजह से ही इस संसार में अँधेरा कायम है। यदि सब पदार्थों में चैतन्यता-और ऊष्मा के अवशोषण की शक्ति और उससे प्रभावित होने की क्षमता होती तो दुनिया का हर पदार्थ चमक रहा होता । फिर रात्रि में भी ऐसा अँधेरा न होता जैसा अब होता है।
चमक पदार्थों का स्वाभाविक विकिरणों से विद्युत रासायनिक क्रियाओं से अथवा घर्षण जैसे माध्यमों से पदार्थ को शोषक ‘केन्द्र’ होता है उन केन्द्रों को यदि हटा दिया जाय तो फिर जिनमें चमकने का गुण है वे उसे खो बैठेंगे। कुछ पदार्थों में एक विशेष गुण होता है कि वे एक बार ऊर्जा प्रभाव ग्रहण कर लेने के बाद पीछे भी बहुत समय तक चमकते रहते हैं। इन उत्तर दीप्ति वाले पदार्थों को फास्फोरस कहते हैं। इस फास्फोरस प्रतिभा को अधिक स्थाई बनाने के लिए वैज्ञानिक क्षेत्र में विशेष प्रयास चल रहे हैं। यो बल्बों का विकसित स्वरूप ट्यूब लाइट’ से अधिक और सुहावना प्रकाश इस फास्फोरस पद्धति की ही एक उपलब्धि है। साधारण बल्ब तो ताप क्रिया के आधार पर प्रकाशित होते हैं।
चमकने के अवसर संसार में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। हर परिस्थिति में मनुष्य को ऊँचा उठने और आगे बढ़ने की संभावना विद्यमान् है। आवश्यकता अपनी ग्रहण कर सकने वाली क्षमता की है। ग्रहण करने का उत्साह हो तो अपने आस-पास में ही पर्याप्त मात्रा में सहायक साधन मिल सकते हैं। पर यदि भीतर उदासीनता अन्यमनस्कता एवं उपेक्षा हो तो बाहर कुछ भी क्यों न हो वह सब कुछ बन्द दरवाजे से टकरा कर वापिस लौट जाएगा पदार्थ में यही होता रहता है। ऊर्जा हर पदार्थ में मौजूद है। पर वह प्रतिक्रिया का अवशोषण कर सकने की क्षमता में निहित होने के कारण अँधेरी स्थिति में पड़ा रहता है और अपने अस्तित्व को चमकदार बनाने के लाभ से वंचित ही रह जाता है
जिनमें अपनी निज की क्षमता है वह सूर्य की सतरंगी-असंख्य धाराओं वाली किरणों में से अपने स्तर के अनुकूल सामग्री आकर्षित कर लेती हैं और उससे लाभान्वित होती है चुम्बक में अपनी ओर खींचने की शक्ति होती है उसी से आकर्षित होकर लौह कण खिंचते चले जाते हैं। मानवी सत्ता में ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा भरी पड़ी है। आज का तुच्छ समझा जाने वाला व्यक्ति यदि अपनी अवशोषण क्षमता बढ़ा के-संग्राहक बन जाय तो फिर उसे वे साधन सहज ही पर्याप्त मात्रा में मिल जायेंगे जो कल उसे सहज ही प्रकाशवान बना सकते हैं। यह आकर्षक चुम्बकत्व उत्पन्न करना ही जीवन साधना का प्रधान क्रिया कृत्य है।
संदीप्ति का एक उदाहरण है- ‘टिनोपाल’ साधारण धुले कपड़ों में कुछ पीलापन रहता है। इसका कारण यह है कि वह प्रकाश की नीली जामुनी रंग की किरणों को पी जाता है और पीली किरणें बाहर छोड़ता है। विनोदय के रसायन में यह विशेषता है कि जहाँ वह प्रयुक्त होता है वहाँ सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों का अवशोषण होता है और कपड़ों को नीले जामुनी रंग में बदल देता है। इस प्रकार धुले कपड़ों में नीली झलक दिखाई पड़ती और वे झकाझक उजले दिखाई पड़ते हैं।
ऊर्जा को प्रकाश रूप में परिणत करने की विशेषता कतिपय पदार्थों में ही नहीं होती वरन् वह जीवधारियों में भी पाई जाती है। जुगनू, फुँगी, मधुरिका और कितने ही जन्तु जीव अपने शरीरगत ऐंजाइम और आक्सीजन की प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा को प्रकाश में बदलते रहते हैं, फलतः वे चमकते हुए दिखाई पड़ते हैं।
मादा जुगनू जब नर को अपने पास बुलाना चाहती है तो उसकी यौन उत्तेजना चमक के रूप परिणत होती है और वह टिम-टिम चमकती है उसके भीतर उस समय रासायनिक लूसीफेरिन, लूसीफेरस ऐंजाइम और ए. टी. पी. नामक यौगिक क्रियाशील होते हैं और उनकी हलचलों से उत्पन्न ऊर्जा प्रकाश बनकर बाहर आती है।
दबाव एवं आयात से उत्पन्न ऊर्जा को पदार्थ पी जाते हैं। अण्ड विस्फोट का उस क्षेत्र के पदार्थों द्वारा ऊर्जा शोषण कर लिया जाता है इसकी परख कर यह जाना जा सकता है उन्हें कितना दबाव या आघात सहना पड़ा है, इस आधार पर विस्फोट की शक्ति का मूल्यांकन कर लिया जाता है।
दबाव एवं आघात इस संसार में रहेंगे ही। बिखरेपन को केन्द्रित करने की दृष्टि से उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता भी है। यों प्रतिकूलता और अभावग्रस्तता हर किसी को खलती है। कठिनाई का स्वागत कौन करता है? असफलता एवं अवरोधों को कौन चाहता है। फिर भी वे अनिवार्य रूप से आते हैं। क्योंकि ढीला पोला और असावधान मनुष्य कभी भी इस स्थिति में नहीं होता कि वह प्रकृति प्रदत्त अनुदानों को आकर्षित करके अपने भीतर धारण कर सके। आघात और दबाव इच्छा न होते हुए भी आते हैं। डरने या बचने पर भी वे आ ही धमकते हैं उनसे टकराने के लिए आवश्यक साहस इकट्ठा किये बिना और कोई मार्ग नहीं । अपनी ऊर्जा को चमकाने के लिए व्यक्तित्व को निखारने के लिए यह अरुचिकर होते हुये भी आवश्यक तो है ही।
संगीत एक भावनात्मक घिराव है, जो मनुष्य को चारों ओर से अपने पाश में जकड़ने का प्रयत्न करता है। -जाँ कोक्त
‘उन मनुष्यों को- जो नम्र हैं- धन्य है, क्योंकि उनका स्थान स्वर्ग में निश्चित है’
-मैथ्यू अध्याय 5।3
‘वे मनुष्य- जिनका हृदय शुद्ध है- धन्य हैं, क्योंकि वे परमेश्वर से मिल सकेंगे।’
-मैथ्यू अध्याय 5।8
उन मनुष्यों को- जिन पर सत्यता के कारण अत्याचार किया जाता है-धन्य हैं क्योंकि उनके लिए स्वर्ग में स्थान सुरक्षित है।
-मैथ्यू अध्याय 5।10
‘प्राचीन समय से कहते आते हैं कि तू किसी को मत मार, क्योंकि न्याय के दिन हिंसक मनुष्य विपत्ति में पड़ जायेगा, परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो मनुष्य अपने किसी भाई से, बिना विशेष कारण के, अप्रसन्न होगा, वह भी न्याय के दिन आपत्ति में पड़ेगा। जो मनुष्य अपने भाई से अप-शब्द कहेगा, उसके साथ भी पंचायत कठोरता का बर्ताव करेगी। जो दूसरे मनुष्य को मूर्ख कहेगा, उसको नरक की यातनाएँ सहनी होंगी।’
-मैथ्यू अध्याय 5।21-22
‘प्राचीन समय से कहते आये हैं कि तू व्यभिचार मत कर, परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो पुरुष किसी स्त्री को काम-दृष्टि से देखता है, वह व्यभिचार का दोषी होता है, क्योंकि उसने अपने हृदय में उस स्त्री से काम सेवन कर लिया ।’
-मैथ्यू अध्याय 5।28-29
‘यह कहा जाता है कि आँख के बदल आँख, पैर के बदले पैर,’ (अर्थात् जैसे को तैसा) परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि बुराई के बदले बुराई मत कर यदि कोई मनुष्य तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, तो तुम उसकी ओर बांया गाल भी कर दो।’
-मैथ्यू अध्याय 5।38.39
‘यह कहा जाता है कि तुम अपने पड़ोसी से प्रेम एवं शत्रु से द्वेष करो, परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो, जो तुमको अपशब्द कहें, उन्हें आशीर्वाद दो, जो तुमसे घृणा करते हों उनके साथ भलाई करो, जिनका बर्ताव तुम्हारे साथ बुरा हो और जो तुम पर अत्याचार करते हों, उनके आत्म कल्याण के लिए प्रार्थना करो।’
-मैथ्यू अध्याय 5।44-45
‘तम जो दान दो, उसकी सूचना बांये हाथ को भी न होने दो। तुम्हारा दान गुप्त होना चाहिए। ईश्वर गुप्त दान को देखता है, वह तुमको गुप्त दान का पुरस्कार देगा।’
-मैथ्यू अध्याय 6।3-4
सुख-शान्ति पाने का एक सरल सा उपाय यह भी है कि जीवन में ऐसी गतिविधि को अपनाए रहा जाए जिस से दुःख की उपस्थिति ही न हो। दुःख का अभाव भी सुख ही होता है। सच्ची बात भी यही है कि संसार में जो भी सुख पाने के उपाय किये जाते हैं, वे वास्तव में दुःख कसे बचने का ही उपक्रम होता है। दुःख अथवा उसकी आशंका न होने पर संसार में विशुद्ध अथवा मूल सुख पाने को उपाय प्रायः लोग नहीं करते हैं। भोजन, वस्त्र, आवास, धन वैभव, स्वास्थ्य, परिवार-मित्र सम्बन्धी, पत्नी-पुत्र आदि की सम्पन्नता, जो कि सुख हेतु मानी जाती है यथार्थ में किसी न किसी दुःख कष्ट से बचने के ही साधन होते हैं। भोजन क्षुधा के कष्ट से, वस्त्र ऋतु के प्रकोप से, आवास वर्षा, धाम और अपराधियों से बचने के लिए, धन दरिद्रता के दुःख से बचने के लिये, स्वास्थ्य रोग तथा निर्बलता के कष्ट से बचने के लिए परिवार अव्यवस्था के दुःख से बचने के लिए, मित्र सम्बन्धी आदि अकेलेपन , विरोधियों तथा असहायता के दुःख से बचने के लिए और पत्नी पुत्र आदि मानसिक दुःख से बचने और वंश परम्परा तथा वृद्धावस्था के दुःख से बचने के लिए ही संचय किए जाते हैं। इसी तरह अन्य और भी सारे उपक्रम तथा उपाय जिन्हें सुख साधन माना जाता है प्रायः वास्तव में दुःख से बचने के ही उपाय होते हैं। इसलिए उचित भी यही है और सरल भी कि कुछ ऐसी गतिविधि अपनाकर चला जाए जिससे दुःख के कारण कम से कम सामने आवें। दुःख के अभाव में सुख होना स्वाभाविक ही है।
दुःख के सामान्यतः दो मोटे प्रकार होते हैं। एक समुपस्थित दुःख, दूसरे आकस्मिक अथवा अप्रत्याशित’। सर्व साधारण जिन दुःखों से दिन रात पीड़ित रहते हैं वे दुःख अधिकांशतः समुपस्थित दुःख ही होते हैं। जिन का प्रादुर्भाव या तो आकांक्षा की आपूर्ति से होता है अथवा किसी अभाव या प्रतिकूलता से’ कोई मनुष्य लखपति बनना चाहता है किन्तु उसकी योग्यता और परिस्थितियाँ ऐसी नहीं है कि वह हजार दो हजार रुपये भी संग्रह कर पायें। ऐसी स्थिति में उसकी आकांक्षा अपूर्ण रह जाना स्वाभाविक ही है। आकांक्षा पूरी न होने से उसे असन्तोष अशान्ति, व्यग्रता आदि का दुःख होगा ही। वह अपने को असफल, अभागा और निर्धन मानने एवं दुःखी रहने लगेगा।
कोई विद्यार्थी एस. ए. पास करना चाहता है। उसके पास प्रतिभा, गुण अध्यवसाय, रुचि, लगन आदि विद्यार्थी के योग्य सारी विशेषताएँ हैं। अब तक जितनी भी कक्षाएँ उसने पास की हैं, प्रथम श्रेणी में ही पास की हैं। आगे भी निश्चित है कि वह एम. ए. तक की शेष परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी में ही पास कर लेगा, किन्तु स्वयं वह और उसका परिवार इस योग्य नहीं है कि अगली पढ़ाई का खर्च उठा सके। पैसे और साधनों की कमी अथवा अभाव है। इस प्रकार अभाव के कारण आगे न पढ़ सकने को दुःख विद्यार्थी को और न पढ़ा सकने को दुःख परिवार को होगा ही। आकांक्षा की आपूर्ति के समान आवश्यकता की आपूर्ति का कष्ट भी कम नहीं होता । स्थिति और परिस्थिति आकांक्षा की पूर्ति में बाधक होती है और अभाव आवश्यकता की पूर्ति नहीं होने देता।
एक मनुष्य सरकार के किसी उच्च पर पहुँचना चाहता है। उसके पास अपेक्षित योग्यता भी है, साधन भी है, व्यक्तित्व और प्रतिभा भी है। वह बुलाया भी जाता है और प्रतियोगिता में बैठने का अवसर भी दिया जाता है। उत्तीर्ण भी हो जाता है। लेकिन संयोगवश उसके परिवार की स्थिति अथवा उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति, वह चाहे रोग जन्य हो, किसी के स्थानान्तरण जन्य हो ब्याह शादी आदि के पैदा की हुई हो, इस प्रकार बदल जाती है कि उस पद पर पहुँच कर काम करना उसके लिए सम्भव नहीं रहता। इस प्रकार सारे साधन अनुकूल होने पर भी किसी परिस्थिति की प्रतिकूलता ने उसे उस पद पर जाने से रोक दिया । इस प्रतिकूलता के कारण मनुष्य को दुःख होना स्वाभाविक ही है।
अनेक बार कोई अनजान कारण अथवा दुष्टों का विरोध भी आड़े आकर मनुष्य को उसके लक्ष्य अथवा उद्देश्य में असफल बना कर दुःख पैदा कर देता है। बहुत से परीक्षार्थी अपनी शक्ति भर सारे परचे अच्छे कर आते हैं लेकिन जब परिणाम देखते हैं तो अपने को असफल पाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें कुछ कम दुःख नहीं होता । अनेक लोग किसी लक्ष्य के लिए अथक परिश्रम करते हैं। प्रयत्न में कोई कमी नहीं रखते। सफलता की सारी शर्तें पूरी कर देते हैं । तब भी असफल हो जाते हैं। बहुत बार किन्हीं कामों में दुष्टों, विरोधियों तथा अपराधियों की दुरभि लोगों का धोखा और विश्वासघात असफल बना देता है। आकांक्षा की आपूर्ति, अभाव, विरोध, प्रतिकूलता आदि से उत्पन्न होने वाले समुपस्थित दुःखों से ही अधिकांश लोग दुःखी रहते हैं। आकस्मिक दुःख तो मनुष्य पर कभी-कभी ही आते हैं। उनकी संख्या भी अधिक नहीं होती। यदि समुपस्थित दुखों से ही बचने का उपाय ठीक से कर लिया जाय तब भी एक बड़ी सीमा तक सुख-शान्ति से रहा जा सकता है।
इच्छाओं की पूर्ति सुख का हेतु है। इसमें सन्देह नहीं। इच्छाओं के अनुकूल वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ मिलने पर मनुष्य को सुख संतोष की अनुभूति होती ही है। जिस अनुपात से इच्छा आकांक्षा की पूर्ति होती जाती है उसी अनुपात से उसकी सुखानुभूति बढ़ती जाती है। यही कारण हे कि मनुष्य प्रायः सुख के लिए इच्छाओं की पूर्ति का ही प्रयत्न किया करता है। किन्तु सुख पाने के इस उपाय में दो कठिनाइयाँ सामने आती हैं। एक तो यह कि बहुधा लोग अपने लिये दुर्लभ अथवा शक्ति सामर्थ्य के बाहर की आकांक्षा कर बैठते हैं, ऐसी दशा में या तो वे पहले अपनी शक्ति सामर्थ्य को आकांक्षा के अनुरूप बनाएँ तब उसकी पूर्ति कर सुख की प्राप्ति करें, अन्यथा जीवन भर प्रयत्न करने के बाद भी उसकी आपूर्ति का दुःख सहने के लिए तैयार रहें। दूसरी कठिनाई यह होती है कि इच्छा आकांक्षाएँ सीमित नहीं रहने पातीं। एक की पूर्ति होते ही दूसरी खड़ी हो जाती है और इस प्रकार उनकी शृंखला बढ़ती ही चली जाती है। संसार में किसी की सारी इच्छाएँ कभी भी पूरी नहीं हो सकतीं। यदि दो पूरी होंगी तो दो अपूर्ण भी रह जायेंगी। तब उनकी आपूर्ति का का दुःख होना स्वाभाविक ही है।
इसके अतिरिक्त एक कठिनाई यह भी होती है कि किसी नई इच्छा की आपूर्ति का दुःख पिछली इच्छा की पूर्ति से कम नहीं होता, और न मनुष्य किसी अपूर्ण इच्छा का दुःख पूर्ण इच्छा के संतोष से भुला ही पाता है। किसी इच्छा की पूर्ति का सुख अधिक स्थायी नहीं होता। कुछ ही दिनों में वह पुराना होकर नीरस पड़ जाता है। तब फिर किसी नई इच्छा की पूर्ति की आवश्यकता सताने लगती है। इस प्रकार इच्छाओं के तारतम्य और उनकी पूर्ति आपूर्ति के बीच मनुष्य सुखी नहीं रह सकता । इसीलिये मनीषियों ने कामनाओं को मनुष्य के दुःख का बड़ा हेतु माना और कहा है।
इच्छाओं की आपूर्ति से उत्पन्न दुःख के कारण से बचने का उपाय यह है कि मनुष्य यथा सम्भव निष्काम बन कर रहे। इस उस अथवा यह -वह की इच्छा ही न करें। अपनी सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति की ही कामना करे और उनकी पूर्ति में ही अपने प्रयत्नों को लगाए। अभी मनुष्य की न तो क्षमता ही इतनी कम हो गई है और न संसार में साधनों का इतना अभाव हो गया है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ करने बाद भी सीमित आवश्यकताओं की इच्छा पूर्ति न हो सके। उनकी बात तो छोड़ दीजिये जो आलसी, प्रमादी, निकम्मे और अकर्मण्य होते हैं, क्योंकि ऐसे धरती के भारत-भूत लोगों को जितना अधिक कष्ट, दुःख और संताप मिले उतना ही अच्छा है। अन्यथा जो अपनी आवश्यक इच्छाओं की पूर्ति के लिये अपेक्षित पसीना देने के लिए तत्पर रहता है उसको आपूर्ति का दुःख सहना पड़े यह सम्भव नहीं।
यदि वह आवश्यकताओं के अतिरिक्त इच्छा करता ही है तो उसकी आपूर्ति के दुःख से बचने का उपाय यह है कि किसी भी अतिरिक्त इच्छा को अस्तित्व में लाने से पूर्व यह देख ले कि उसकी स्थिति, परिस्थिति और शक्ति सामर्थ्य से उसकी उस नई आकांक्षा का तालमेल भी है या नहीं। यदि आकांक्षा और स्थिति में सामंजस्य है तब तो उसका पालन और पूर्ति का उपाय करना चाहिये और यदि वह शक्ति सामर्थ्य के बाहर है तो उसे ऐसे छोड़ देना चाहिए जैसे दुखदाई मित्र का त्याग कर दिया जाता है।
उन्नति और विकास के लिए इच्छाओं को आवश्यक माना गया है। इच्छा की प्रेरणा से ही मनुष्य प्रयत्न पथ पर चलता और उन्नति के लक्ष्य को प्राप्त करता है। इस दृष्टिकोण से इच्छाओं का महत्त्व है और उन इच्छाओं का महत्त्व तो सामान्य आवश्यकताओं से आगे बढ़ा होता है। आपूर्ति के डर से इच्छाओं को सर्वथा तिलाञ्जलि दे देना भी ठीक नहीं लगता। इस उलझन का समाधान यह है कि यदि आप दुःख भीरु हैं कष्ट आपत्ति और असफलता सहने की क्षमता आप में नहीं है तो आपको उन्नति और विकास के स्वप्न बंद करने होंगे और सामान्य रूप से साधारण जीवन में चलना होगा यह बिना किसी संकोच अथवा खेद के मान ही लेना होगा कि जो कष्ट अथवा विरोध भीरु हैं उन्हें उन्नति अथवा विकास के स्वप्न देखने का कोई अधिकार नहीं यह अधिकार उन लक्ष्यवान वज्र पुरुषों का है जो कष्ट और आपत्ति के प्रहारों को हँसते-हँसते सहन कर सकते हैं। या तो इच्छाओं का त्याग कर दिया जाए या अपनी शक्ति एवं स्थिति के अनुरूप छोटी-छोटी इच्छाओं के सहारे थोड़ी-थोड़ी प्रगति करते हुए बढ़ा जाए’ इस सामान्य प्रगति से यदि कोई उल्लेखनीय शिखर पर नहीं भी पहुँचता तो भी उसे असंतोष नहीं करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का एक जन्म ही तो नहीं होता। उसे और भी जन्म मिलते हैं। जन्म-जन्म प्रगति का प्रयत्न जारी रखने से एक दिन उन्नति का चरम शिखर मिल ही जाएगा और मनुष्य वर्तमान जीवन में दुःख से बचा रहेगा।
समुपस्थित दुःखों में अभाव जन्य दुःख भी कम नहीं होते । अभाव का अर्थ असम्पन्नता नहीं है। अभाव वास्तव में उस कमी को कहते हैं जिसके कारण मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकतायें पूरी नहीं हो पातीं । फिर कहना न होगा कि मनुष्य की मूल अथवा अनिवार्य आवश्यकतायें बहुत कम होगी। उनकी पूर्ति में प्रायः बाधा नहीं ही पड़ती है। बाधा अधिकतर उन आवश्यकताओं में पड़ती है जो कृत्रिम अथवा बढ़ी-चढ़ी आवश्यकताएँ होती हैं। यदि मनुष्य इच्छाओं की तरह अपनी आवश्यकताओं को भी अपनी स्थिति तक ही सीमित रखे तो कोई कारण नहीं कि उसे अभाव के दुःख का शिकार बनना पड़े। अभाव जन्म दुःखों से बचने का सरल सा उपाय यही है कि कृत्रिम आवश्यकताओं को त्याग देना चाहिए और बढ़ी चढ़ी आवश्यकताओं में कमी कर उन्हें अपनी स्थिति के अनुरूप बना लेना चाहिए।
प्रतिरोध अथवा प्रतिकूलता से उत्पन्न असफलता के दुःख से बचने का अमोघ उपाय तो तटस्थता ही है जिसे गीता में अनासक्त कर्म योग के नाम से बताया गया है। अपनी शक्ति भर प्रयत्न करते रहने पर भी उसके परिणाम के प्रति उदासीन रहा जाए । क्योंकि कर्तव्य के सिवाय उसके फल में मनुष्य का अधिकार नहीं है।
तथापि इतना तो मनुष्य कर ही सकता है कि किसी लक्ष्य को निर्धारित करने से पूर्व उसकी हर स्थित पर विचार करके यदि यह देखें कि इस दिशा में प्रतिरोध तथा अनुकूल के काँटे अधिक है तो यथा सम्भव अपनी दिशा ही बदल दे। अन्यथा सहानुभूति, सद्भावना और विनीत बुद्धि का संबल लेकर अपने लक्ष्य पथ की सारी प्रतिकूलताओं को अनुकूल बनाते चला जाय। इस प्रयत्न में जो त्याग अथवा सहिष्णुता आवश्यक हो उसे देता चले। इस प्रकार वह प्रतिरोधों तथा प्रतिकूलताओं से उत्पन्न असफलता के दुःख से किसी हद तक बचा रह सकता है। यदि मनुष्य अपने जीवन में दृढ़ता पूर्वक इस नीति का समावेश कर ले तो वह सबसे अधिक माने जाने वाले उन तीन चार प्रकार के समुपस्थित दुखों से तो निश्चय ही बच सकता है।
दूसरों की निन्दा करके किसी को कुछ नहीं मिल, जिसने अपने को सुधारा उसने बहुत कुछ पाया
आधुनिक मनोविज्ञान शास्त्री इस विचार में फँस गये हैं कि मनुष्य के व्यक्तित्व में कुछ मूल प्रवृत्तियाँ- जन्मजात रूप से जुड़ी हुई हैं और वे स्वभाव का एक अंग बनकर रह रही हैं। उन्हें हटाया नहीं जा सकता । इसलिए जीवन की रीति-नीति ऐसी होनी चाहिए जिसमें मूल प्रवृत्तियों के अनुरूप क्रम व्यवस्था का समावेश रहे। इस प्रकार की तृप्ति से ही सन्तोष प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अन्तरंग की अतृप्ति अन्तर्द्वन्द्वों में परिणत होकर विविध विधि उद्वेग उत्पन्न करेगी। फलस्वरूप मानसिक स्तर एवं जीवन क्रम में विग्रह उत्पन्न होंगे और कई प्रकार के रोग विक्षोभ बढ़ेंगे
इसे अत्यन्त खेद जनक माना जाना चाहिए कि फ्रायड वर्ग के प्रतिपादन को ही शिक्षा शास्त्रियों ने प्रधानता दी है और पाठ्य पुस्तकों में उसी को उभारा है। यों दूसरे ऐसे मनोविज्ञानी भी हैं जो मनः शास्त्र की संतुलित व्याख्या करते हैं और काम प्रवृत्ति की चर्चा करते हुए इतना ही कहते है कि अन्य अनेकों प्रवृत्तियों में से एक वह भी है। किन्तु न तो अनिवार्य और न अपरिहार्य। परिस्थितियाँ उसे उभार भी सकती हैं और दबा भी सकती हैं। जैसा कि अन्य मानवी प्रवृत्तियों के बारे में समय समय पर उतार चढ़ाव आते रहते हैं उसी प्रकार काम प्रवृत्ति की भी तरंगें अपने समय पर मन में उठती और समाप्त होती रहती हैं वे ऐसी नहीं कि निरन्तर उन्हीं के सम्बन्ध में मनुष्य को सोचने और करने के लिए तत्पर रहना पड़े।
फ्रायड वर्ग के मनोवैज्ञानिक तो शिशु द्वारा माता के स्तन पान किया जाना भी प्रकारान्तर से काम सेवन ही मानते हैं और कहते हैं जन्म और जीवन का आधार इसी प्रवृत्ति से जुड़ा हैं तो आगे चल कर भी तृप्ति और प्रसन्नता इसी के साथ क्यों न जड़ी रहेगी?
उच्छृंखल बुद्धि जीवी वर्ग की सम्भवतः अपनी निज की दुर्बलताएँ उचित ठहराने के लिए इस तर्क पद्धति को प्रधानता देनी पड़ी है, अथवा कोई और कारण रहा है, पर इतना निश्चित है कि नीति समर्थक मनोविज्ञान वेत्ताओं की तुलना में उच्छृंखल प्रतिपादन की ही ध्वजा पताका उसके अलमावरदारों ने आकाश तक उड़ा दी हैं। और प्रच्छन्न रूप से आस्थाओं की उत्कृष्टता पर अनजाने ही कुठाराघात किया है। मनोविज्ञान का छात्र पग पग पर फ्रायड की दुहाई देता है और उसी के सिद्धान्तों पर आधारित अन्य मान्यताओं को सही मानता है। इसमें दोष इन शिक्षा शास्त्रियों का है- लेखकों का है- जिन्होंने कुरुचि पूर्ण तथ्यों को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने का खेदजनक निर्णय किया है।
मनोविज्ञान फ्रायड की ही बपौती नहीं है। इस पर अन्यान्य शोधकर्ताओं ने भी भारी परिश्रम किया है और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला है। मानवी मूल प्रवृत्तियों की चर्चा करते हुए अन्यान्य मनः शास्त्रियों ने कितनी ही प्रवृत्तियों को प्रमुख बताया है और उनमें एक नगण्य सी प्रवृत्ति के रूप में ही कामुकता को स्थान दिया है। वे कहते हैं इस प्रवृत्ति को वैसी प्रधानता किसी भी प्रकार नहीं दी जानी चाहिए जैसी कि फ्रायड प्रभृति ने दी है।
मनोविज्ञान वेत्ता जुँग ने डा. सिगमंड फ्रायड के इस प्रतिपादन पर करारा व्यंग किया है कि “मनुष्य की इच्छाएँ तथा चेष्टाएँ प्रधानतया काम वासना से प्रेरित हैं”। उन्होंने कहा है ऐसा सोचना अन्तःकरण और व्यवहार के बीच की एक धुँधली सी परत की चर्चा भर है। यह मन की वास्तविक स्थिति नहीं वरन् उसकी काली कुरूप छाया भर है। क्रिया प्रतिक्रिया की उस उथल पुथल में कई मीठी कड़ुई लहरें मन में उठती रहती हैं । उनमें से एक लहर काम वासना भी है। उसे इतना ही महत्त्व मिलना चाहिए । वह अकिंचन सी विकृति ही चेतना की मूल प्रेरणा नहीं है।
यदि वह मनुष्य की अपरिहार्य प्रवृत्ति है तो उससे छुटकारा पाने का कोई क्यों प्रयत्न करेगा और क्योंकर उससे छूट पायेगा। प्रतिबंधों और मर्यादाओं से रहित काम तृप्ति की स्वच्छंदता यदि तथाकथित मनोभाव के आधार पर माँगी और दी जाएगी, तो फिर इस संदर्भ में पूरी तरह पशु प्रवृत्ति का साम्राज्य छा जाएगा बहिन, बेटी, माता का रिश्ता पशुओं में नहीं होता वे इस सम्बन्ध में पूरी स्वच्छंदता बरतते हैं। फिर यही आधार प्रकृति की प्रेरणा के नाम पर मनुष्यों को भी अपनाना होगा तब बात इसी सीमा तक न रुकेगी वरन् प्रचलित परिवार व्यवस्था को भी प्रतिगामी ठहराना पड़ेगा। पशु समाज में दाम्पत्य जीवन प्रायः काम सेवन के थोड़े समय तक ही सघन रहता है उसके उपरान्त तत्क्षण उकसा अन्त हो जाता है । गर्भवती के प्रति नर का न कोई कर्तव्य होता है और न उत्तरदायित्व । बच्चों के पालन पोषण में भी वह क्वचित् ही सहायता करता है। मादा को भी दाम्पत्य सुख के लिए कुछ क्षण तक साथ रहे क्षण स्थायी पति की न तो याद रहती है और उन उसके साथ कोई सहानुभूति दीखती है। बच्चे तभी तक माँ का सहारा ताकते हैं। जब तक वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते । समर्थ होते ही माता और बालकों के सम्बन्ध का अन्त हो जाता है। मनुष्य को भी इसी स्थान तक यह मनोविज्ञानी प्रतिपादन पहुँचा कर रहेंगे। इतने सामाजिक, नैतिक, भावनात्मक बन्धनों में जकड़ कर मनुष्य को दाम्पत्य जीवन के प्रति एक सीमा तक निष्ठावान् बनाया गया है। इसमें भी आये दिन लुक छिप कर व्यतिरेक होते रहते हैं और व्यभिचार, बलात्कार, गर्भपात, अपहरण, हत्या, आत्महत्या जैसे क्रूर कर्म सामने आते रहते हैं। समाज शास्त्री यही सोचते हैं कि यदि यह प्रतिबन्ध ढीले होते चले गये और मर्यादाएँ शिथिल पड़ी तो मनुष्य पशुता तक ही नीचे न उतरेगा वरन् पिशाच होकर रहेगा। धर्म के प्रति अनास्था और यौन उच्छृंखलता वर्तमान वातावरण में अपने आप ही बढ़ती चली जा रही है यदि इसे मनोविज्ञान के नाम पर आवश्यक और उचित भी ठहराया जाने लगेगा तब फिर इस संदर्भ में बरते जाने वाली नीति नियमों की कोई आवश्यकता ही न समझी जाएगी इन्हें तोड़ना प्रतिगामिता मानी जाएगी ऐसी दशा में नर नारी के बीच सभ्यता की शील सदाचार की-मर्यादा और उत्तर दायित्व की जो झीनी दीवार खड़ी है उसका भी पूरी तरह अन्त हो जाएगा धर्म और संयम का परित्याग कर देने पर मनुष्य समाज का अन्ततः क्या बनेगा, इसका स्वरूप सोचने भर से जी काँपने लगता है। विज्ञान या मनोविज्ञान यदि इसी स्तर पर मनुष्य को पहुँचाने के लिए प्रयत्नशील हैं तो फिर वह दुःखद दुर्भाग्य एवं अभिशाप ही सिद्ध होगा।
मनोविज्ञानी फ्रायड के विश्लेषण पर इन दिनों बहुत चर्चा है वे मूल प्रवृत्तियों में सर्व प्रधान काम प्रवृत्ति को मानते हैं। चर्चा तो अन्य कई प्रवृत्तियों के अस्तित्व की भी करते हैं पर सबसे प्रबल काम प्रवृत्ति को ही मानते हैं और कहते हैं उसकी तृप्ति के लिए समुचित अवसर मनुष्य के जीवन क्रम में रहना चाहिए।
इस प्रतिपादन ने कामुकता के नियन्त्रण को भूतकालीन मान्यता पर आघात किया है और यह इस प्रकार सोचा जाने लगा है कि काम क्रीड़ा एवं यौन तृप्ति के लिए स्वच्छंदता को मान्यता मिलनी चाहिए और इस संदर्भ में लगे हुए वर्तमान प्रतिबन्ध समाप्त अथवा शिथिल किये जाने चाहिए। नर नारी के बीच सामान्य वार्ता व्यवहार की तरह कामुक आमोद-प्रमोद को भी स्वाभाविक एवं निर्दोष समझा जाना चाहिए। फ्रायड का प्रतिपादन क्रमशः इसी प्रकार की मान्यताओं का समर्थन करता है। फलतः कामुक स्वेच्छाचार को उचित एवं आवश्यक समझ लिया जाता है । ऐसी दशा में दाम्पत्य जीवन की ‘पवित्रता की जड़े ही हिल जाती हैं।’
किन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि मनोविज्ञान के कर्ता–धर्ता केवल फ्रायड ही हैं उन्हीं की तरह दूसरे अन्वेषक भी हुए हैं और वे भी शोध कार्य में इस क्षेत्र के अग्रणी समझे जाते हैं, उनने मूल प्रवृत्तियों को प्रमुख माना है। उनकी खोज में कामुकता एक प्रवृत्ति तो है पर उसका स्थान बहुत ही हलका एवं गौण है। इसे बदलने, सुधारने में उनके कथानुसार कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। सामाजिक एवं नैतिक आवश्यकता के अनुरूप यदि उस पर एक सीमा तक प्रतिबन्ध लगाया जाय तो उससे बड़ी हानि की आशंका नहीं है।
मनोविज्ञानियों के विश्लेषणों में प्रधान मूल प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में भारी मतभेद हैं उदाहरणार्थ हाव्स ने मूल प्रवृत्तियों के अनुसार मनुष्य को निर्दयी तथा स्वार्थी माना है। एडम स्मिथ ने अपने ग्रन्थ, “सिंपेथेटिक बेसिस आफ ह्यूमन एक्टिविटीज” में “सहानुभूति को मूल-प्रकृति एवं मनुष्यों का पारस्परिक व्यवहार का प्रधान आधार माना है। ट्रोटर ने अपने ग्रन्थ- “इन्स्टिंक्ट्स आफ दि हर्ड पीस एण्ड वार” में मनुष्य को सामाजिकता एवं सामूहिकता की प्रवृत्तियों से ओत प्रोत सिद्ध किया है।
डा. पेमाख मूल प्रवृत्तियों के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, पर वे कहते हैं कि उत्तेजना मिलने पर ही वे जागृत होती हैं यदि उन्हें छेड़ा न जाये तो उनका क्वचित् प्रभाव ही दृष्टिगोचर होगा। वह भी इतना हलका होगा कि उसे थोड़े प्रयत्न से मोड़ा मरोड़ा जा सके।
“जिंसवर्ग” यह मानते हैं कि मूल प्रवृत्तियाँ मनुष्य की अभिरुचि को अपनी दिशा में आकर्षित करती हैं पर वे इतनी प्रबल नहीं होती कि रोकने मोड़ने पर कोई विग्रह खड़ा कर दें।
मैग्डुगल ने अपने ग्रन्थ “आउट लाइन आफ साइकोलॉजी में इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट किया है कि मूल प्रवृत्तियों में ज्ञानात्मक क्रियात्मक और रागात्मक तीनों प्रकार की मानसिक क्रियाएं जुड़ी हुई हैं। फिर भी वे शरीर मस्तिष्क को चलाने वाली स्वसंचालित सहज क्रियाओं जैसी नहीं । रक्ताभिषरण, श्वास-प्रश्वास आकुंचन प्रकुञ्चन जैसा अपरिहार्य उनका वेग नहीं हैं वे परिवर्तनशील हैं और सुधारी जा सकती है। शहद की मक्खी में छत्ता बनाने की जो प्रवृत्ति है वह सहज क्रिया है पर कुत्ते की मूल प्रवृत्ति जहाँ भी आहार मिले वहाँ से झपट लेने की आदत बदली जा सकती है। उसे लिखा-पढ़ा कर शिष्ट बनाया जा सकता है और रोटी पाने के लिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करने के लिए अभ्यस्त किया जा सकता है।
मनोविज्ञानी जेम्स के अनुसार 6 प्रकार की मूल प्रवृत्तियाँ मनुष्यों में पाई जाती हैं पर यह आवश्यक नहीं कि हर किसी में वे समान रूप से उभरी हुई हैं। किसी में इनमें से किसी का संवेग तीव्र हो सकता है और किसी में उसका स्तर इतना क्षीण हो सकता है कि उनके अस्तित्व की संभावना ही संदिग्ध प्रतीत होने लगे । जेम्स इन्हें छः की संख्या में गिनते हैं (1) सार्वभौमिकता - यूनिवर्सिटी (2) जन्मजात - इन्नेट (3) संशोधन क्षमता-एडाब्टेबिलिटी (4) प्रयोजन - परपज (5) प्राथमिक पूर्णता-परफेक्शन फर्स्ट पटोंरमेन्स (6) समर्पण मानसिक क्रिया - कम्पलीट मेन्टल एक्शन ।
थार्न डाइक का कथन है कि मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ एक सौ तक गिनी जा सकती हैं जिनमें से चालीस तो ऐसी हैं जिनका अस्तित्व न्यूनाधिक मात्रा में प्रायः हर किसी में देखा जा सकता है। डा. वर्नार्ड ने अपने “एस्टडी आब सोशल साइकोलॉजी ग्रन्थ में लगभग उतनी ही संख्या में मूल प्रवृत्तियों की गणना की है जितनी कि थार्न डाइक बताते हैं।
‘ड्रेवर’ ने अपने ग्रन्थ ‘इन्स्टिक्ट इन मैन’ में वासनात्मक और प्रतिक्रियात्मक दो वर्गों में मूल प्रवृत्तियों का विभक्तिकरण किया है ।’ किल पेट्रिक ने (1) आत्म रक्षा की प्रवृत्ति-सैल्फ प्रिजर्वेटिव इंस्टिक्ट (2) सन्तानोत्पत्ति की प्रवृत्ति-रिप्रोडक्टिव इंस्टिक्ट (3) सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति-ग्रेगेरियस इंस्टिक्ट (4) परिस्थितियों के अनुकूल जीवन चलाने की प्रवृत्ति-एडाप्टिव इंस्टिक्ट (5) आदर्श पालन की प्रवृत्ति रेगुलेटिव इंस्टिक्ट को ही प्रधान माना है। शेष को या तो प्रधान प्रवृत्तियों में गिनते ही नहीं, या फिर उन्हें वे तुच्छ उपेक्षणीय कहते हैं।
वुडवर्थ ने उनका विभाजन नौ श्रेणियों में किया है (1) आँगिक आवश्यकता (2) काम प्रेरणा (3) पलायन प्रेरणा (4) लड़ना (5) अनुसंधान (6) विनोद (7) सामाजिक चेतना (8) संस्थापन (9) विनीतता।
मैग्डुगल के ग्रन्थ ‘सोशल साइकोलॉजी एण्ड आउट लाइन आफ साइकोलॉजी’ में मूल प्रवृत्तियों की संख्या चौदह बताई गई है । (1) पलायन-एस्केप (2) युयुत्सा-काम्बैट या पुगनैसिटी (3) निवृत्ति-रपिल्सन (4) सम्वेदना -अपील (5) भोग-मैटिंग आरसेक्स (6) जिज्ञासा-क्यूरियासिटी (7) दैन्य-सबमिशन (8) आत्म गौरव (9) सह जीवन-ग्रेगेरियास नेस (10) आहारान्वेषण-फडसीकिंग (1) संचय एक्विजसन (12) विधायकता कान्स्ट्रक्टिव नसे (13) हास-लाफ्टर
मनः शास्त्री वेब्लोनस्की का कथन है कि मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ इतनी अधिक हैं जितना अनन्त आकाश। उन्हें गणना की सीमा से परे सार्वभौम कहना चाहिए । सार्वभौमिकता भूख-प्यास निद्रा जैसी उन प्रवृत्तियों को कहते हैं जो समस्त विश्व के मनुष्यों में एक समान पाई जाती हैं । ‘जन्मजात’ - वे हैं जो बच्चों में जन्मते ही साथ आती हैं- दूध चूसना, अंग संचालन आदि। ‘समायोजन की क्षमता’ का तात्पर्य है- परिस्थितियों के अनुरूप उपाय खोजना और अपने को ढालना, प्रयोजन किसी सामयिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए सहज बुद्धि से तत्पर हो जाना। ‘सम्पूर्ण मानसिक क्रिया का स्वरूप है विपत्ति सामने आते ही उसका सामना करने के लिए हर अंग का क्रियाशील हो जाना । शेर सामने आते ही मुँह चिल्लाने हाथों से पत्थर उठाने, पैरों से भागने जैसे बहुमुखी क्रियाकलाप का एक साथ-तत्काल आरम्भ हो जाना। जिज्ञासा, संग्रहशीलता, अहमन्यता का प्रदर्शन दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होने की इच्छा जैसी अनेकों अन्य प्रवृत्तियाँ भी ऐसी हैं जो न्यूनाधिक मात्रा में हर मनुष्य के अन्दर विद्यमान् रहती हैं।
मनः शास्त्रियों के अन्याय प्रतिपादनों को देखते हुए फ्रायड के काम स्वेच्छाचार का प्रतिपादन बहुत ही बचकाना और एकांगी प्रतीत होता है। खेद इसी बात का है कि ऐसे अधूरे और अवांछनीय निष्कर्षों को अग्रिम पंक्ति में बिठाने की ऐसी भूल की जा रही है जिसका परिणाम मानव समाज का भविष्य अन्धकारमय ही बना सकता है।
पोस्ट एलिजाबेथ के अजायब घर में एक ऐसा सर्प भरती किया गया था जिसके एक ही धड़ में पास-पास दो मुँह थे। एक दिन दोनों झगड़ पड़े और दोनों ने एक दूसरे को बुरी तरह घायल कर दिया। चौकीदार के बीच बचाव करने पर इस समय तो झगड़ा शान्त हो गया, पर शाम को अवसर पाते ही एक ने दूसरे पर प्रतिशोधात्मक आक्रमण किया और जम कर लड़ाई हुई । सवेरे देखा गया कि दोनों मुँह घायल थे और एक ने दूसरे को बुरी तरह चबा डाला था। बेचारा सर्प मरा हुआ पड़ा था।
ठीक ऐसे ही एक दुमुँहा सर्प न्यूयार्क के अजायबघर में रखा गया था। यह किंग स्नेक जाति से लड़ न पड़े इसलिए चौकीदार उनके बीच में एक मोटे कार्डवोर्ड का टुकड़ा लगाये रहता था। इतने पर भी यह कठिनाई बनी ही रहती थी कि एक मुँह एक दिशा में चलना चाहता था और दूसरा मुँह दूसरी दिशा में । ऐसी स्थिति में धड़ की जो खींचतान भरी दुर्गति होती थी उसे देखते हुए उस अभागे पर दर्शकों को दया ही आती थी।
श्याम देश में एक इसी प्रकार का दुमुँहा कछुआ था। दोनों सिर जब दो दिशाओं में चलना चाहते तो पैरों की लड़खड़ाहट और खींचतान से उसे भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता था और प्रायः एक ही स्थान पर आगे पीछे खिंचता घिसटता वहीं उलटा पुल्टा होता रहता था।
दुमुँहा सर्प की बात बड़ी अचम्भे की प्रतीत होती है और एक ही शरीर के अंग एक दूसरे के लिए प्राण घातक सिद्ध हों अजीब लगती है पर ध्यान से देखने पर हम स्वयं भी इसी प्रकार के दुमुँहे सर्प हैं। अपने भविष्य को अपने समाज को नष्ट करने वाली प्रवृत्तियाँ अपना कर हम भी तो अपना ही सर्वनाश नियोजित करते हैं।
युग परिवर्तन के शब्द कहने और सुनने में सरल मालूम पड़ते हैं पर विश्व में अगणित धाराओं के उलटी दिशा में बहने वाले प्रचण्ड प्रवाह को मोड़ने के लिए कितनी, किस स्तर की शक्ति चाहिए इसका लेखा जोखा तैयार करने पर विदित होता है कि बड़े काम के उपयुक्त ही बड़े साधन संजोने पड़ेंगे यह सरंजाम जुटाना न तो सरल है और न उसका स्वरूप स्वल्प है। विश्व बड़ा है- उसकी समस्याएँ बड़ी हैं । इतने विशाल क्षेत्र की उलझनों को सुलझाने के लिए कितना कुछ करना पड़ेगा इस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि पुराने खण्डहर को तोड़कर उसी की मिट्टी से नया भवन बनाने के लिए जो कुछ अभीष्ट है वह सभी कुछ जुटाना पड़ेगा। इससे कम तैयारी से मानवी कल्पना को हतप्रभ कर देने वाले लक्ष्य की पूर्ति हो ही नहीं सकती।
भगवान कृष्ण को महाभारत रचाना था। पाण्डव निमित्त बनाये गये थे। पर वे बेचारे करते क्या? अज्ञातवास वनवास की व्यथा भोगते-भोगते इतने साधन हीन हो गये थे कि कौरवों के दुर्घर्ष सत्ता को चुनौती दे सकने लायक सेना शस्त्र, धन-साधन आदि कुछ भी उनके पास नहीं था। कृष्ण के बार-बार उकसाने पर भी पाण्डव लड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। अर्जुन तो ऐन वक्त तक कतराता रहा। इसका कारण स्पष्टतः तुलनात्मक दृष्टि से साधनों की न्यूनता होगी। सन्तुलन स्थापित करने के लिए भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश ही नहीं दिया था, रथ के घोड़े ही नहीं हाँके थे वरन् और भी बहुत कुछ किया था। सर्वथा निर्धन और साधन हीन पाण्डवों का साथ देने उनके पक्ष में लड़ने के लिए जो विशाल काय सेना खड़ी थी वह तमाशा देखने वाली भीड़ नहीं थी उसे जुटाने, प्रशिक्षित एवं सुसज्जित करने से लेकर अर्थव्यवस्था और युद्ध योजना बनाने तक का सारा कार्य परोक्ष रूप से कृष्ण को ही करना पड़ा था। युद्ध में पाण्डव ही विजयी हुए सही-राजगद्दी पर वे ही बैठे सही पर साथ ही यह भी सही है कि कंस, जरासन्ध, कौरव और शिशुपाल जैसे दैत्यों के माध्यम से नग्न नृत्य करने वाली असुरता को नीचा दिखाने के अद्भुत योजना का सूत्र संचालन पर्दे की पीछे रह कर मुरली वादक ही का रहा था।
अभी इन दिनों युग परिवर्तन के प्रचण्ड अभियान का शिलान्यास शुभारम्भ हुआ है। ज्ञान यज्ञ की हुताशन वेदी पर बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित करने वाली आज्याहुतियाँ दी जा रही हैं । जन्मेजय के नाग यज्ञ की तरह फुफकारते हुए विषधर तक्षकों को ब्रह्म तेजस् स्वाहाकार द्वारा घसीटा ही जाएगा तो उस रोमांचकारी दृश्य को देख कर दर्शकों के होश उड़ने लगेंगे। वह दिन दूर नहीं जब आज की अरणि मन्थन से उत्पन्न स्फुल्लिंग शृंखला कुछ ही समय उपरान्त दावानल बन कर कोटि-कोटि जिह्वा लपलपाती हुई वीभत्स जंजालों से भरे अरण्य की भस्मसात् करती हुई दिखाई देगी।
अभी भारत में -हिन्दू धर्म में-धर्म मंच से, युग निमार्ण परिवार में यह मानव जाति का भाग्य निमार्ण करने वाला अभियान केन्द्रित दिखाई पड़ता है। पर अगले दिनों उसकी वर्तमान सीमाएँ अत्यन्त विस्तृत होकर असीम हो जायेगी तब किसी एक संस्था संगठन का नियन्त्रण निर्देश नहीं चलेगा वरन् कोटि-कोटि घटकों से विभिन्न स्तर के ऐसे ज्योति पुँज फूटते दिखाई पड़ेंगे जिनकी अकूत शक्ति द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्य अनुपम और अद्भुत ही कहे समझे जायेंगे । महाकाल ही इस महान् परिवर्तन का सूत्रधार हैं और वही समयानुसार अपनी आज की मंगलाचरण थिरकन, को क्रमशः तीव्र से तीव्र तर तीव्र तम करता चला जाएगा ताण्डव नृत्य से उत्पन्न गगनचुम्बी जाज्वल्यमान आग्नेय लपटों द्वारा पुरातन को नूतन में परिवर्तित करने की भूमिका किस प्रकार किस रूप में अगले दिनों सम्पन्न होने जा रही है आज उस सब को सोच सकना-कल्पना परिधि में ला सकना सामान्य बुद्धि के लिये प्रायः असंभव ही है फिर भी जो भवितव्यता है वह होकर रहेगी । युग को बदलना ही है, आज की निविड़ निशा का कल के प्रभात कालीन अरुणोदय में परिवर्तन होकर ही रहेगा।
आवश्यक साधन जुटाने के लिए गुरुदेव की विश्व यात्रा प्रक्रिया का क्रम चल रहा है। दूसरे सन्त महन्त कथा कीर्तन कहने- धन कमाने शिष्य सम्प्रदाय बढ़ाने अनेक कलेवर आवरण ओढ़ कर वायुयानों में उड़ते, पाश्चात्य देशों में विचरण करते देखे जाते हैं। इस योग और अध्यात्म के नाम पर चलने वाली विडम्बना को गुरुदेव मात्र उपहासास्पद बालक्रीड़ा मानते हैं। इनसे न भारत गौरव बढ़ता है और न साधुता की अध्यात्म की गरिमा रहती है। कलावन्त का कौशल चमत्कार ही उस अभिनय में पीछे झाँकता है। एक और भी कुचक्र इसी जाल जंजाल में और भी आ मिला है भारत पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले देश इन साधु सन्तों के चोर दरवाजे से घुस कर अपनी दुरभि संधियों की जड़े जमाने में लगे हैं । हिप्पियों के नाम पर जासूसों का टिड्डी दल उमड़ रहा है और तरह-तरह के बहानों से पैसा उड़ता आ रहा है। यह सी एक देश का कुकृत्य नहीं वरन् नहीं वरन् गरम-नरम पोले ढीले सभी स्तर के देश अपने खूनी पंजे जिन दरवाजों से घुसते आ रहे हैं उनमें ‘सन्त बाजी भी एक है। ऐसे दुर्दिनों में गुरुदेव की विश्व यात्रा प्रक्रिया को भी इन्हीं घिनौने कुकर्मों में से एक होने की आशंका की जा सकती है। पर तथ्य तो तथ्य ही रहेगा। काँच और हीरे का अन्तर सोने और पीतल का भेद छिपा कहाँ रहता है-छिपा कैसे रहेगा।
गुरुदेव इन दिनों विभूतियों को प्रेरणा देने में लगे हैं और उनका प्रयास आरम्भ भले ही छोटे क्षेत्र से हुआ हो पर अब अधिकाधिक व्यापक विस्तृत होता चला जा रहा है। युग-परिवर्तन की भूमिका लगभग महाभारत जैसी होगी । उसे लंका काण्ड स्तर का भी कहा जा सकता है। स्थूल बुद्धि इतिहासकार इन्हें भारतवर्ष के अमुक क्षेत्र में घटने वाला घटना क्रम भले ही कहते रहें पर तत्त्व दर्शी जानते हैं कि अपने अपने समय में इन प्रकरणों का युगान्तरकारी प्रभाव हुआ था। अब परिस्थितियाँ भिन्न हैं । अब विश्व का स्वरूप दूसरा है। समस्याओं का स्तर भी दूसरा है और फलस्वरूप परिवर्तन का उपक्रम भी दूसरा ही होगा भावी युग-परिवर्तन प्रक्रिया का स्वरूप और माध्यम भूतकालीन घटना क्रम से मेल नहीं खा सकेगा किन्तु उसका मूलभूत आधार वही रहेगा जो कल्प कल्पान्तरों से युग परिवर्तन कारी उपक्रमों के अवसर पर कार्यान्वित होता रहा है।
असुरता जिस स्तर की हो उसी के अनुरूप प्रतिरोध खड़ा करने के अतिरिक्त परिवर्तन की प्रक्रिया और किसी प्रकार सम्पन्न नहीं हो सकती । जन-मानस की कुत्साओं कुण्ठाओं ने जिस प्रकार जिस रास्ते मलिन अवरुद्ध किया है उसी रास्ते को उलट कर सृजन का उपक्रम खड़ा करना पड़ेगा इसलिए तोप तलवारों से नहीं उन अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होना पड़ेगा जिससे मानवी अन्तःकरण में गहराई तक घुसे पड़े कषाय कल्मषों का उन्मूलन किया जा सके । इस प्रक्रिया के लिये उपयुक्त व्यक्ति भी चाहिए और उपयुक्त साधन भी । विभूतियों का आह्वान यही है जिसकी चर्चा युग-निर्माण परिवार में इन दिनों कही सुनी जा रही है। विभूतियों की खोज करने के लिए ही गुरुदेव इन दिनों राजहंस की गति से उड़ते हुए मानसरोवरों को मझार रहे हैं । अभीष्ट मात्रा में मणि मुक्तक हाथ लगने को उन्हें पूरी-पूरी आशा है। विश्व यात्रा के पीछे यही प्रकट रहस्य सन्निहित है।
युग निर्माण परिवार का गठन भी इसी क्रम से हुआ है। गुरुदेव ने अपनी अत्यंत पैनी दृष्टि से इन सुसंस्कारी आत्माओं को ढूँढ़ा है जिनके पास आत्मबल की पूर्व संचित सम्पदा समुचित मात्रा में पहले से ही विद्यमान् थी। गायत्री यज्ञों के बहाने-सत्साहित्य के आकर्षण से व्यक्तिगत संपर्क की पकड़ से मणि मुक्तक की उस स्फटिक माला में उन्हें गूँथा हैं जिसे युग-निमार्ण परिवार के नाम से कहा-पुकारा जाता है। युग निर्माताओं की की इस सृजन सेना के अभियान उत्तरदायित्व का भार बहन कर सकने में समर्थ आत्माओं को वे प्रत्यावर्तन सत्र में अभीष्ट अनुदान के लिए इन दिनों बुला भी रहे हैं । यही प्रक्रिया विकसित होकर विश्वव्यापी बनने जा रही है। परिवर्तन न तो भारत तक सीमित रहेगा और न उसकी परिधि हिन्दू धर्म तक अवरुद्ध रहेगी। परिवर्तन विश्व का होना है। निमार्ण समस्त जाति का होगा। धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय, किसी देश, जाति, धर्म, वर्ग तक सीमित नहीं रह सकता उसे असीम ही बनना पड़ेगा। इन परिस्थितियों में युग-निमार्ण प्रक्रिया का विश्वव्यापी होना और गुरुदेव का कार्य-क्षेत्र उसी स्तर पर विकसित होना स्वाभाविक है।
गुरुदेव अपने मार्गदर्शक के चरणों पर समर्पित अकिंचन पुष्प हैं । उन्होंने सर्वतोभावेन अपने तमाम अस्तित्व को सूत्र संचालक के हाथों में सौंपा है। सो उन्हें जब जो नाच नचाने के लिए कहा जाता है। कठपुतली की तरह वैसी ही थिरकन उनकी हलचलों में देखी जा सकती है। वंशी की तरह वे बिलकुल पोले हैं और अपने वादक के अधरों से सटे हैं, श्वास की जैसी धारा बहती है वैसी ही रागिनी उनमें से निसृत होती है वे क्या करेंगे? कैसे करेंगे? इसका पूरा स्वरूप और उपक्रम समझना अपने लिए इसलिए कठिन है कि वे स्वयं तक नहीं समझते कल उन्हें क्या करना है और न इसकी ओर कभी सोचते हैं। जिस दिन जो कार्य सौंपा गया उस दिन वही करने लगना बह उनका सहज स्वभाव और प्रसन्नता का केन्द्र हो गया है। विश्व यात्रा के नये कार्यक्रम के सम्बन्ध में लोग कई प्रकार के प्रश्न पूछते हैं कई तरह के जिज्ञासाएँ करते हैं, इसी संदर्भ में उपरोक्त चर्चा करनी पड़ी और बताना पड़ा कि वे इन दिनों विभूतियों की खोज में हैं। उसी स्तर के व्यक्ति और साधन युग परिवर्तन की भूमिका सम्पादन कर सकेंगे महाभारत काल में अर्जुन के साथ विशाल काय सैन्य दल था यह सर्वविदित है और यह भी किसी से छिपा नहीं कि लंका विजय के लिये रीछ वानरों की सेना गई थी। भगवान बुद्ध के ढाई लाख शिष्य और गाँधी की सत्याग्रही सेना का परिचय किसे नहीं है। सदा सर्वदा युगान्तरकारी महान् परिवर्तनों की पृष्ठभूमि यही रही है लोगों के चर्म चक्षु सामने प्रस्तुत घटना को देखते हैं उनमें कोई विरले ही जानते हैं कि उन सरंजामों को जुटाने के पीछे किन अदृश्य हाथों ने किस प्रकार सूत्र संचालन किया था। इन दिनों गुरुदेव की हलचलों को ऐसे ही अदृश्य सूत्र संचालन स्तर को समझ लिया जाय तो हमारी समस्त जिज्ञासाओं का एक शब्द में ही समाधान हो सकता है। गुरुदेव कब गये-कहाँ गये-क्यों गये? क्या किया? कब लौटे? कब जायेंगे? कब आयेंगे? कहाँ जायेंगे? क्या करेंगे? आदि प्रश्न असामयिक है इन्हें पूछा नहीं जाना चाहिए । समय से पूर्व अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों को जन चर्चा का विषय बनाना न तो उचित है और न आवश्यक, इस संदर्भ में पूछताछ नहीं करनी चाहिए।
जिज्ञासाओं में उलझने की अपेक्षा हमें इन ऐतिहासिक क्षेत्रों में अपनी ओर अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों की ओर ही निहारना चाहिए। युग निर्माण परिवार के सदस्य को यह अनुभव करना चाहिए कि वह साधारण नहीं असाधारण है। इसके लिए असाधारण कर्तव्य और उत्तरदायित्व सम्मुख हैं। इनकी ओर से विमुख रहने पर वह घाटे की आशंका से स्वार्थ साधन में कमी पड़ने के भय से शायद बच जाय पर इसके बदले में ईश्वरीय आह्वान की -आंतरिक प्रेरणा की-युग की पुकार की अवज्ञा करने पर जो आत्म प्रताड़ना सहनी पड़ेगी उससे किसी भी प्रकार बच नहीं सकेगा। यह आत्मदण्ड इतना भारी पड़ेगा जिसकी तुलना में वासना और तृष्णा की पूर्ति के लिए कमाये गये लाभ रंच मात्र ही प्राप्त होंगे।
युग परिवर्तन की घड़ियों में भगवान अपने विशेष पार्षदों को महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करने के लिए भेजता है। युग-निर्माण परिवार के परिजन निश्चित रूप से उसी शृंखला की अविच्छिन्न कड़ी हैं । उस देव ने उन्हें अत्यंत पैनी सूक्ष्म दृष्टि से ढूँढ़ा और स्नेह सूत्र में पिरोया है। यह कारण नहीं है। यों सभी आत्मायें ईश्वर की सन्तान हैं पर जिनने अपने को तपाया निखारा है उन्हें ईश्वर का विशेष प्यार-अनुग्रह उपलब्ध रहता है। यह उपलब्धि भौतिक सुख सुविधाओं के रूप में नहीं है। यह लाभ की प्रवीणता और कर्मपरायणता के आधार पर कोई भी आस्तिक नास्तिक प्राप्त कर सकता है। भगवान जिसे प्यार करते हैं उसे परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए स्फुरणा एवं साहसिकता प्रदान करते हैं। रिजर्व फोर्स की पुलिस एवं सेना आड़े वक्त पर विशेष प्रयोजनों की पूर्ति के लिए भेजी जाती है। युग-निमार्ण परिवार के सदस्य अपने को इसी स्तर का समझें और अनुभव करें कि युगान्तर के अति महत्त्वपूर्ण अवसर पर उन्हें हनुमान् अंगद जैसी विशेष भूमिका सम्पादित करने को यह जन्म मिला है। इस देव संघ में इसीलिये प्रवेश हुआ है । युग परिवर्तन के क्रिया कलाप में असाधारण आकर्षण और कुछ कर गुजरने के लिए सतत् अन्तः स्फुरण का और कुछ कारण हो ही नहीं सकता हमें तथ्य को समझना चाहिये । अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचानना चाहिए और आलस्य प्रमाद में बिना एक क्षण गँवाये अपने अवतरण का प्रयोजन पूरा करने के लिए अविलम्ब कटिबद्ध हो जाना चाहिए। इससे कम में युग-निर्माण परिवार के सदस्य को शांति नहीं मिल सकती । अन्तरात्मा की अवज्ञा उपेक्षा करके जो लोभ मोह के दलदल में घुसकर कुछ लाभ उपार्जन करना चाहेंगे तो भी अन्तर्द्वन्द्व उन्हें उस दिशा में कोई बड़ी सफलता मिलने न देगा। माया मिली न रमा वाली दुविधा में पड़े रहने की अपेक्षा यही उचित है दुनियादारी के जाल-जंजाल में घुसते चले जाने वाले अन्धानुयायियों में से अलग छिटक कर अपना पथ स्वयं निर्धारित किया जाय। अग्रगामी पंक्ति में आने वालों को ही श्रेष्ठ भाजन बनने का अवसर मिलता है महान् प्रयोजनों के लिए भीड़ तो पीछे भी आती रहती हैं और अनुगामियों से कम नहीं कुछ अधिक ही काम करती हैं पर तब श्रेय सौभाग्य का अवसर बीत गया होता है। गुरुदेव चाहते हैं कि युग निमार्ण परिवार की आत्मबल सम्पन्न आत्मायें इन्हीं दिनों आगे आयें और अग्रिम पंक्ति में खड़े होने वाले युग-निर्माताओं की ऐतिहासिक भूमिकाएँ निबाहें इन पंक्तियों का प्रत्येक अक्षर इसी संदर्भ से ओत-प्रात समझा जाना चाहिए।
पिछले दिनों अभियान के प्रथम चरण में एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान यज्ञ के लिए समर्पित करते रहने और उस तेल-बाती का विनियोग करते हुए अपने क्षेत्र में नव जीवन का प्रकाश फैलाते रहने भर का कार्य सौंपा गया था। प्रसन्नता की बात है कि उस अनिवार्य कर्तव्य को प्रायः सभी परिजनों ने निभाया है। कोई विरला ही हतभागी ऐसा रहा होगा जिसने इस तेजस्वी ब्रह्ममुहूर्त के अरुणोदय की अवज्ञा उपेक्षा करते हुए आँख बन्द किये रहने-झपकी लेते रहने की हठ ठानी हो। इन अपवादों को छोड़ कर गर्वोन्नत मस्तक से यह घोषणा की जा सकती है। कि युग निर्माण परिवार के प्रायः सभी सदस्य अपना प्राथमिक कर्तव्य भली प्रकार पालन कर रहे हैं झोला पुस्तकालय चलाने के लिए प्रत्येक परिजन, श्रम मनोयोग और धन नियमित रूप से लगा रहा है। भले ही उसकी न्यूनतम मात्रा अकिंचन नियत है पर प्रायः अधिकांश सदस्यों का अनुदान क्रमशः अधिकाधिक ही बढ़ता चला जा रहा है। यदि ऐसा न होता हो तो मिशन का जो गगनचुम्बी विस्तार इन दिनों परिलक्षित हो रहा है। वह कैसे संभव हुआ होता?
किन्तु प्रगति के साथ-साथ और भी सब कुछ बढ़ जाता है। छोटे बालक का भोजन वस्त्र तथा अन्य खर्च स्वल्प होता है पर जैसे-जैसे बढ़ता है, आवश्यकता भी हर क्षेत्र में बढ़ जाती है। मिशन का बालक पन अब किशोर अवस्था में प्रवेश कर रहा है। यौवन आभास उभर रहा है। ऐसी दशा में सब साधन सामग्री का स्तर भी सहज ही बढ़ जाना चाहिए। चिड़िया अण्डे को छाती की गर्मी से पका लेती है, पर वे जब बच्चे बन कर घोंसले में कुलबुलाते हैं तो उनके लिए चिड़िया को दूर-दूर तक दौड़ कर चुगा चारा इकट्ठा करना पड़ता है। गुरुदेव चिड़िया की तरह देश देशान्तरों में उड़ रहे हैं और मिशन की प्रौढ़ता जिस साधनों की अपेक्षा करती है उन्हें जुटाने के लिए लगे हैं।
इन परिस्थितियों में हमारा कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ जात है । ज्ञान यज्ञ के लिए स्वल्प सहयोग से बढ़कर अब माँग का दायरा कहीं अधिक विस्तृत हो गया है। अब विभूतियों की पुकार हैं छोटा छप्पर हाथों हाथ उठा लिया जाता है पर भारी बोझ तो क्रेनें ही उठाती हैं। आज दिशायें क्रेनों की पुकार गुहार लगा रही हैं। युग की माँग अब इससे कम में पूरी नहीं हो सकती । अब विभूतियाँ चाहिए- विभूतियों की चर्चा पिछले कई अंकों से इस स्तम्भ में होती चली आ रही है। प्रतिभा, साहित्य, कला, सम्पत्ति विज्ञान, सत्ता, अध्यात्म की सात विभूतियों की चर्चा हो रही है। इन्हें उभारना और जुटाना ही पड़ेगा। हम सब को अब इसी ओर ध्यान देना चाहिए।
गत अंक में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया है कि प्रतिभा की सर्वोपरि विभूति हम सब के पास प्रचुर परिमाण में मौजूद हैं किसने इसे कम निखारा किसने अधिक, इस भेद में थोड़ी न्यूनाधिकता हो सकती है पर जिस प्रकार प्रत्येक परमाणु में अजस्र शक्ति भरी है और विस्फोट के अवसर पर उसकी प्रतिक्रिया स्पष्ट देखी जा सकती है उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में प्रतिभा मौजूद है। जागृत आत्माओं में तो वह सहज ही अत्यधिक होती है। युग निमार्ण परिवार के प्रत्येक सदस्य में उसकी समुचित मात्रा विद्यमान् है जो आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की उठती हुई हिलोरों के रूप में सहज ही जानी परखी जा सकती है, इसे अग्नि प्रज्ज्वलन की तरह तीव्र से तीव्रतर-तीव्रतम किया जाना चाहिए। जिस संकल्प और विश्वास के साथ लोभ मोह की पूर्ति करने वाले साधनों में लगते है-काम और क्रोध के क्षणों में जैसी आतुरता होती है-मद और मत्सर के लिए जितना मनोयोग लगता है उतना ही यदि ईश्वर के सामयिक निर्देशों को समझने आत्म की युग की पुकार का अनुसरण करने में लग पड़ा जाय तो सामान्य से सामान्य स्तर का व्यक्ति भी कुछ ही समय में महामानव स्तर का बन जाएगा उसकी प्रतिभा प्रभात कालीन ब्रह्ममुहूर्त में उदीयमान प्रातःकाल की तरह विकसित परिष्कृत हो सकती है। हममें से कोई भी अपने को विभूतिवान् प्रतिभावान बना सकता है और नवनिर्माण के आवश्यक साधन की पूर्ति करने योग्य अपना व्यक्तित्व विनिर्मित कर सकता है। आस्था, निष्ठा सहित संकल्प और पुरुषार्थ जब श्रेय साधन की दिशा में अग्रसर होता है तो व्यक्ति को देवतुल्य बनने में आत्मा को परमात्मा होने में देर नहीं लगती। हमें अपना साहस और संकल्प उभारना चाहिए। अन्धी भेड़ें किधर जा रही हैं -क्या चाह रही हैं यह देखने की अपेक्षा परमेश्वर के संकेत को युग-धर्म को शिरोधार्य करके ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए जो अपने लिए समस्त संसार के लिए श्रेय साधन प्रस्तुत कर सकें। यदि ऐसा कदम बढ़ा सकना अपने लिए संभव हो सके तो गुरुदेव की महाकाल की-एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक हो सकती है। जहाँ तेजस्विता जीवित हो वहाँ यह चुनौती स्वीकार की ही जानी चाहिए।
अन्यान्य प्रतिभाओं की खोज हो रही है, जहाँ वे हैं वहाँ उन्हें खटखटाया और जगाया जा रहा है। सच्चे योगी तपस्वी और आत्मवादी जहाँ कहीं होंगे व्यक्तिगत स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि का प्रलोभन छोड़ कर आपत्ति धर्म का पालन करते हुए युग परिवर्तन के धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अर्जुन की तरह दृष्टिगोचर होंगे। सत्ताधारियों को कई अदृश्य शक्ति मोड़ने मरोड़ने में लगेंगी, वे क्षेत्र गत और गत संकीर्णता से ऊँचे उठ कर विशाल दृष्टि से सोचना शुरू करेंगे। सत्ता पक्ष न सही विरोध पक्ष जनता के इसी आदर्श का पक्षधर समर्थक बनाएगा अगले दिनों लोग वर्ग स्वार्थ के लिए लड़ने के लिए उत्पन्न नहीं किये जा सकेंगे। हर राजद्वारों को विशाल और व्यापक दृष्टि रख कर भावी योजनाओं का आधार खड़ा करना होगा।
साहित्यकार अगले दिनों लोक रंजन के लिए नहीं लिखेंगे उन्हें माता सरस्वती से वेश्या वृत्ति कराने में ग्लानि अनुभव होगी और कलम का उपयोग जन मानस को पाप पंक में धकेलते हुए उनकी आत्मा रोएगी। आत्मग्लानि से प्रताड़ित साहित्यकार अब दिनोंदिन लोक मंगल की दिशा में बढ़ेगा। कलाकार कवि गायक, वादक, चित्रकार, मूर्तिकार अभिनेता की आजीविका अब पशुता को भड़का कर अबोध लोक मानस के साथ व्यभिचार करने की प्रवंचना नहीं रखेंगी वरन् वे अपनी प्रतिभा को उसी दिशा में मोड़ेंगे जिधर मोड़ने के लिए मानवता उन्हें करुण क्रन्दन भरे स्वरों में पुकारती है। कला और साहित्य की भूमिका अगले दिनों नवनिर्माण की होगी पिछले दिनों इस क्षेत्र में जिस प्रवंचना ने जड़ें जमा ली थीं उनका अहं लोक धिक्कार की भर्त्सना में जल-जल कर विनष्ट ही हो जाएगा
विज्ञान दुधारी तलवार है उसे पैशाचिकता के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है और समर्थ संरक्षण के लिए भी । अगले दिनों विज्ञान के सिद्धान्त अध्यात्म विरोधी न रहकर समर्थक सहयोगी होंगे। साथ ही नये आविष्कारों का उदय और पुरानों का परिमार्जन इस प्रकार होगा कि वैज्ञानिकों की श्रम साधना मानव कल्याण के विविध पक्षों में अभिनव उपलब्धियों का प्रयोग कर सके। आज संकीर्णता वादी राज सत्ताओं ने विज्ञान को-वैज्ञानिकों को अपने फौलादी पंजों में जकड़ रखा है और उससे करने न करने योग्य कार्य करा रहे है। । कल ऐसा न हो सकेगा। विज्ञान को भी मुक्ति मिलेगी और वह युगान्तर कारी भूमिकाएँ सम्पन्न करेगा।
यही क्षेत्र भीतर ही एक पक और उभर रहे हैं। कुछ ही समय में हम देखेंगे कि इन विभूतियों ने कैसी अद्भुत करवट ली। प्रतिगामी तत्त्वों को कैसे नीचा दिखाया । आज जो अपनी छद्म-दुष्टता को छिपाये हुए दोनों हाथों से धन और यश लूट कर गर्वोन्नत हो रहे हैं कल उन्हें बेतरह पछताते पददलित होते देखा जा सकेगा। उदीय लोकमानस इन अनाचारियों की बोटी-बोटी नोंच लेगा और उनकी घृणित दुरभि संधियों को एक स्वर में धिक्कारा जाएगा आज के पदोन्नति पर आँसू बहा रहे होंगे। उसी स्तर का परिवर्तन लाने के लिए गुरुदेव इन दिनों आकाश में उड़ रहे हैं। युग निमार्ण परिवार इन दिनों भारत में एक सुधारवादी धर्म संगठन के रूप में दीखता है कल उसकी भूमिकाएँ सर्वतोमुखी सर्वभौम, सार्वजनिक होंगे। अनेकता को एकता में परिणत करने वाले प्रयास कहाँ से कहाँ किस तरह उभरते हैं इनके मनमोहक और आश्चर्य चकित करने वाले दृश्य देखने के लिए प्रत्येक दूरदर्शी आँखों वाले को अब तैयार ही रहना चाहिए।
कैंसर के फोड़े की तरह विभूतियों का एक क्षेत्र ऐसा है जिसकी चिकित्सा अति कष्टसाध्य प्रतीत हो रही है। कारवेंकिल- रीढ़ की हड्डी का फोड़ा इतना विषाक्त होता है कि उसके चंगुल से कोई रोगी कदाचित ही बचता है। विभूतियों में सम्पत्ति का एक रोग ऐसा है जिसमें नशे ने आगे बढ़कर विष का रूप धारण कर लिया है। लगता है इसकी मरम्मत नहीं हो सकेगी उसे मिट्टी में डालकर दुबारा गलाना और ढालना पड़ेगा। सम्पत्ति का लोभ, आकर्षण संग्रह और अपव्यय उस स्तर पर विभीषिका के उस बिन्दु पर जा पहुँचा है वैसा सुधार कठिन है जैसा कि विभूतियों के अन्य क्षेत्रों में सम्भव है। साहित्यकार, कलाकार, धर्म नेता विज्ञानी प्रतिभा यहाँ तक कि सत्ताधारी भी युग की आवश्यकता और दिशा का पूर्वाभास अनुभव कर रहे हैं और उन्हें विश्वास हो गया है कि समय के साथ चलने में ही भलाई है। वे नियति की प्रेरणा और भगवान की इच्छा को समझने लगे है। तदनुसार उनमें सामयिक परिवर्तन सरलता पूर्वक हो सकेगा गुरुदेव अपने यात्रा अनुभव में यह निष्कर्ष लेकर लौटे हैं।
किन्तु धनाधीशों के बारे में उनका निष्कर्ष सर्वथा विपरीत है। स्थिति का मूल्यांकन उन्होंने इस प्रकार किया हे कि वे समय न तो समझ ही पा रहे हैं और न उसके साथ बदलने को तैयार हैं। अधिकाधिक संग्रह, अधिकाधिक अपव्यय और अधिकाधिक अहंकार की पूर्ति में यह क्षेत्र उतने गहरे दलदल में फँस गया है कि वापिस लौटना कठिन ही दीखता है कोई धनी अपने को निर्धन बनाने के लिए तैयार नहीं । परमार्थ के नाम पर आत्म विज्ञापन के लिए बदले में परलोक गत विपुल सुख सुविधा खरीदने के लिए कोई कुछ पैसे-कौड़ी फेंक सकता है। इससे आगे की आशा नहीं की जा सकती है। आज न कोई भी भामाशाह, अशोक, मान्धाता, वाजिश्रवा, जनक, भरत, हरिश्चन्द्र, उपार्जन क्षमता का लाभ इन्द्रिय लिप्सा की अहंता की तृप्ति से आगे अन्य किसी काम में करने के लिए तैयार नहीं। स्त्री-पुत्रों से आगे के क्षेत्र में उदारता बरतने और अनुदान देने के लिए किसी को साहस नहीं हो रहा है। उपार्जन की न्याय की औचित्य की मर्यादायें टूट चुकीं। जिससे-जैसे बन पड़ रहा है वह उचित अनुचित का भेदभाव किये बिना दोनों हाथों से कमाने में लगा है। कौशल के अभाव में कोई आये रहता है कोई पिछड़ता है, यह घुड़ दौड़ में होता रहता है पर दिशा सभी घोड़ों की एक है। उनकी चेतना इतनी परिपक्व हो गई है कि उस पर उपदेशों की बूँदें चिकने पड़े पर पड़ने के बाद इधर उधर ढुलक कर रह जाती है। प्रभाव कुछ नहीं होता ।
लगता है विभूति का यह क्षेत्र दुबारा गलाने के लिए भट्टी में भेजना पड़ेगा वहाँ उसमें नये साँचे में ढल सकने लायक नरमी पैदा हो सकेगी। गाँधी की ट्रस्टीशिप, विनोबा का भूदान सम्पत्ति दान ऋषियों का अपरिग्रह अब दर्शन शास्त्र का एक पाठ्यप्रकरण भर है। उसे व्यवहार में उतारने की कोई गुँजाइश नहीं दीखती । फलतः उसके भाग्य में दुर्गति होती ही लिखी दीखती है। फ्राँस के लुई रूस के जार-भारत के राजाधिराज, रूस के उमराव, चीन के अमीर महाकाल की एक लात से किस तरह चूर्ण विचूर्ण हो गये उसे कोई देख समझ सका होता तो मानवी निर्वाह में प्रयुक्त होने वाले चंद पैसों को छोड़कर विपुल सम्पदा का उपयोग लोक कल्याण के लिए अभाव और अज्ञान को मिटाने के लिए किया गया होता मिलजुल कर बाँटा खाया गया होता, तो संसार में शांति और समृद्धि की कमी न रहती। पर आज के लोभ मोह के सर्वभक्षी नग्न नर्तन को देखते हुए ऐसी समझ का उत्पन्न हो सकना, धनी वर्ग में तो लगभग असंभव हो दीखता है। यों लंका में विभीषण भी हो सकते हैं पर उतने भर से क्या बनेगा समय आर्थिक क्षेत्र में साम्यवाद को ही प्रतिष्ठापित करेगा।
यह प्रक्रिया कहाँ धीमी होती है, कहाँ झटके से उतरती है यह बात दूसरी है, पर होना यही है, राजा महाराजाओं का स्वरूप अब अजायबघरों की शोभा बढ़ायेगा और इतिहास के पृष्ठों पर कौतूहल पूर्वक पढ़ा जाएगा ठीक इसी प्रकार कुछ समय पश्चात् अमीर उमराव, धनाध्यक्ष और वैभवशाली वर्ग भी अपना अस्तित्व समाप्त कर लेगा समय की आवश्यकता उपयोगिता से बाहर की चीज कूड़े करकट के ढेर में डाली जाती रही हैं। सम्पन्नता की भी अगले दिनों ऐसी दुर्गति ही होने जा रही है।
यह सब तो भविष्य का दिग्दर्शन हुआ। युग परिवर्तन के लिए आज दिन विभूतियों की आवश्यकता पड़ रही है, उनमें एक का नाम सम्पत्ति भी है। विद्या की तरह उसका भी महत्त्व है। काँटे से काँटा निकाला जाता है, तलवार से तलवार का मुकाबला होता है। कौरव सेना के सामने पाण्डव सेना और रावण असुरता से वानर दल को जूझना पड़ा था सम्पत्ति के मोर्चे पर भी हमें लड़ना पड़ेगा। बौद्धिक परिवर्तन के लिए ज्ञान यज्ञ का विशाल काय कलेवर खड़ा करना पड़ेगा रचनात्मक और संघर्षात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन भी साधनों की अपेक्षा करता है। इसकी पूर्ति धनी वर्ग चाहता तो अति सरलता पूर्वक कर सकता था पर वह मरणासन्न रोगी की तरह है उसके सुधरने बदलने की आशा लगभग छोड़ ही देनी चाहिए और प्रयोजन की पूर्ति के लिए हमें सीमा जन्म के लिए किये गये ऋषि रक्त संचय की तरह ही आत्मोत्सर्ग की एक और कड़ी जोड़नी चाहिए एक और परीक्षा उत्तीर्ण करनी चाहिए।
बगदाद के सन्त जुनैद अपने एक शिष्य को औरों से ज्यादा प्यार करते थे।
शिष्यों ने शिकायत की कि एक साथ पक्षपात क्यों होता है?
सन्त चुप हो गये । कई दिन बाद उन्होंने सब शिष्यों को बुलाया और एक मच्छर हाथ में थमाते हुए कहा- इसे ऐसी जगह मार कर लाओ जहाँ कोई देखता न हो।
शिष्य गये और ऐसे ही कहीं छिप कर अपना काम पूरा कर लाये।
पर वह प्रिय शिष्य उस जीव को ज्यों का त्यों वापिस ले आया और कहा-ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ अल्लाह देखता न हो।
जुनैद ने कहा- तुममें से यह एक है जो ईमान और अल्लाह को पहचानता है। ऐसे ही लोग हैं जिन पर खुदा की रहमत बरसेगी।
करो पदच्युत मठाषीश तम को, प्रकाश को सिंहसान दो,
अर्पण करो स्नेह दीपक को, बाती को जीवन्त किरन दो।
यह प्रकाश की जन्मभूमि है, नहीं तिमिर का क्रीड़ास्थल है,
अन्धकार पर जय पाने के लिए शौर्य है अतुलित बल है,
मनसा वाचा और कर्मणा-शक्ति यहाँ निश्छल रहती हैं,
क्षमाशील संयम सहिष्णुता की अजस्र धारा बहती हैं,
गौरवान्वित अतीत की स्वर्णिम आभा है इसके कण-कण में,
और वज्र जैसी कठोरता है प्रत्येक प्राण में प्रण में,
ये न कहीं सो जायें तुम्हारा आमन्त्रण पाने के पहिले-
उन्हें मार्ग दो भव्य भावनाओं से भीगी शुद्ध पवन दो।
असतो मा सदगमय यहाँ का मूलमंत्र है जीवन-धन है,
निर्विकार निर्विघ्न तपःपूतों का पावन वृन्दावन है,
विद्या परा और अपरा ने इसी भूमि पर जन्म लिया है,
जिसने इसे प्रेम से माता कहा-अमृत का पान किया है,
दिग्भ्रान्तों के लिए दशा का ज्ञान दिया है इसी धरा ने,
मर्यादा को दिया रूप इस की पवित्रतम् परम्परा ने,
उसी धरा की धवल कीर्ति की आत्मा आज कराह रही हैं,
निराधार मत करो उसे आदर दो और नया जीवन दो।
राम जानते थे कि हिरण सुन्दर है किन्तु नहीं कंचन का,
यह तो है षड्यन्त्र आर्यों की संस्कृति के उन्मूलन का,
भौतिकता के दास-दानवों को भौतिक सुख से ममता थी,
और ‘राम’ आदर्शों के उन्नायक थे अपूर्व क्षमता थी,
राजतिलक के समय उपस्थित हुआ विघ्न केकयि के द्वारा,
धर्म मूर्ति थे राम-धर्म के दृष्टिकोण से उसे निहारा,
नहीं राज्य से मोह, बन्धु के लिए प्राण भी दे सकता हूँ
है सहर्ष स्वीकार राज्य दो बन्धु भरत का मुझको ‘बन’ दो।
इस प्रकार संस्कृति की रक्षा के निमित्त उनने सुख छोड़ा,
किन्तु खेद है आज उसी संस्कृति से हम ने नाता तोड़ा,
संस्कृति हीन हमें कर देगी वर्तमान की भीषण ज्वाला,
पनप रही है इस के इंगित पर आदर्शों की वधशाला,
लौटो लौटो पुनः उन्हीं आदर्शों के मन्दिर में आओ,
वे पवित्र आदर्श हमारी रक्षा का आधार बनेंगे,
उनके लिए अटूट स्नेह श्रद्धा से भरा हुआ आँगन दो।
*समाप्त