उथली और सुदृढ़ तट से रहित नदियाँ तनिक सी वर्षा होने पर सब ओर बिखर पड़ती हैं और बाढ़ का रूप धारणकर निकटवर्ती खेतों को नष्ट-भ्रष्ट कर देती हैं। इसके विपरीत दूसरी वे नदियाँ भी है, जिनमें प्रचण्ड वेग युक्त जल-धार बहती हैं, किन्तु उफनने की दुर्घटना उत्पन्न नहीं करतीं। कारण कि वे गहरी होती हैं और किनारे मजबूत मिट्टी से बने होते हैं।
तनिक से आकर्षण और भय का अवसर आते ही मनुष्य अपने चरित्र और ईमान को खो बैठता है। तनिक सी प्रतिकूलता उसे सहन नहीं होती और आवेशग्रस्त स्थिति उत्पन्न कर देती है। इसका कारण व्यक्ति का आन्तरिक उथलापन है। श्रद्धा का अभाव और आदर्शों की कमी है। ऐसे लोग तभी तक अच्छे लग सकते हैं, जब तक कि परीक्षा का अवसर नहीं आता। जैसे ही परख की घड़ी आती है, वैसे ही वे मर्यादाओं का उल्लंघन करके उथले नालों की तरह बिखरते हैं और बाढ़ का संकट उत्पन्न करते हैं।
मजबूत किनारों का तात्पर्य है– व्रतशील जीवन। आदर्शों और मर्यादाओं के प्रति आस्था। ऐसा संकल्प जो जीवन-क्रम में ऊर्ध्वगामी प्रेरणाएँ भरता रह सके। जिनने अपने किनारे मजबूत बनाये हैं और निश्चय किया है कि किसी भी मूल्य पर आदर्शों की अवहेलना नहीं करेंगे - केवल उन्हीं के लिए यह सम्भव है कि वे महामानवों के लिए शोभनीय मार्ग पर अनवरत रूप से बढ़ सकें। व्रतशील जीवन का अर्थ है- जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये अभीष्ट साधन और साहस का सुसंचय।
– भगवान महावीर
महान् चित्रकार आगस्टी केन्वायर जितने अधिक वृद्ध होते गये उतना ही उनका कला-प्रेम बढ़ता गया। युवावस्था में वे एक अच्छे चित्रकार थे। उनकी रोजी-रोटी उसी से चलती थी। पर दुर्भाग्य से यह न देखा गया। उनके हाथ-पैरों में गठिया की शिकायत आरम्भ हुई और इतनी बढ़ी कि पैरों ने दो कदम चलने से भी इनकार कर दिया। पहियेदार कुर्सी के सहारे ही वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक खाने, सोने जैसी दैनिक आवश्यकताएँ पूरी करने जा पाते थे। हाथों का यह हाल हो गया कि ब्रुश पकड़ना उँगलियों के लिये कठिन हो गया। तब वे उँगलियों के साथ रस्सी से ब्रुश बाँध लेते और चित्रकारी में तन्मय रहते।
यों तो दर्द उन्हें चौबीस घण्टे बना रहता था। कई बार तो वह इतना बढ़ जाता कि पहियेदार कुर्सी से उतरने और चढ़ने का अवसर आने पर उन्हें कराहना पड़ता। ब्रुश को रंग की प्लेट तक ले जाने, डुबाने और उठाने में कई बार उँगलियों में बेतरह कसक होती और वे उसे जहाँ की तहाँ रखने के लिए मजबूर हो जाते। थोड़ा चैन मिलने पर ही हाथ उठता, पर चित्रकला की उनकी तन्मयता में इससे भी कुछ अन्तर न आया।
अपंग कला साधक की लगन और कला देखने के लिये दूर-दूर से नवसिखिए चित्रकार उनके पास आया करते थे और उस सन्दर्भ में गूढ़ प्रश्न पूछते थे। एक प्रश्न यह तो होता ही था, सत्तर वर्ष से अधिक आयु हो जाने के कारण जरा, जीर्णता और रुग्णता के रहते हुए भी वे किस प्रकार अपने प्रयास में इतने दत्त चित्त रह पाते थे ? उत्तर में वे नये कलाकारों को अपनी मनःस्थिति का सार बताते हुए यही कहते– यदि कोई कलाकार अपनी कृति और प्रगति को देखकर सन्तोष कर बैठे या अहंकार करने लगे, तो समझना चाहिए, उसके विकास का अन्त हो गया। प्रगति का एक ही मार्ग है– अकल्पनीय प्रगति तक पहुँचने की उत्कट आकांक्षा और उसके लिए मजदूर जैसी कठोर श्रम साधना। जिसने थोड़ी सफलता पर अहंकार व्यक्त किया, समझ लो, वह मारा गया। प्रगति तो अनन्त है, इसलिये उसकी साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
78 वर्ष की आयु में, जबकि आगस्टी केन्वायर बहुत अधिक वृद्ध हो गये थे और बीमारी ने उन्हें नर कंकाल मात्र बना दिया था, तो भी उन्होंने अपनी कला-साधना छोड़ी नहीं। फेफड़ों की खराबी बेतरह तंग करती थी और लगता था कि वे अब महाप्रयाण करने ही वाले हैं, तो भी उन्होंने अपनी साधना छोड़ी नहीं। अन्तिम दिनों में वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कलापूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज़ पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
डाक्टरों ने पूर्ण विश्राम के लिए कहा, तो उन्होंने एक ही उत्तर दिया। कुछ न करने की– कुछ न सोचने की बात मेरी प्रकृति स्वीकार ही न कर पायेगी। अन्तिम दिन उन्हें श्वास का ऐसा विकट दौरा पड़ा, जो उन्हें साथ लिए बिना गया ही नहीं। वे फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़े। वे होश में आये तो गृह सेविका लूसी ने पूछा– अब आपकी तबियत कैसी है ? तो उन्होंने तबियत का मतलब अपनी कला-साधना से समझा और बुझती हुई आँखों को नये सिरे से चमकाते हुए कहा– लूसी मैं समझता हूँ कि चित्रकला के बारे में मैं अब कुछ-कुछ समझ सकने योग्य हो चला। इसके बाद उन्होंने सदा के लिए आँखें बन्द कर ली।
इस विशाल ब्रह्माण्ड में अकेली पृथ्वी पर ही जीवधारी नहीं रहते, वरन् अन्यत्र ग्रह-नक्षत्रों पर भी जीवन विद्यमान् है, अब यह सम्भावना स्पष्टतः स्वीकार कर ली गई है। परिस्थितियों के अनुरूप जीवधारियों की आकृति और प्रकृति में अन्तर हो सकता है, पर उसका अस्तित्व अन्यत्र भी है अवश्य।
इस दिशा में खगोलवेत्ताओं की उपलब्धियाँ क्रमशः यही सिद्ध करती जा रही हैं कि अपने सौर-मण्डल में भी जीवन का अस्तित्व मौजूद है और उसके बाहर के अन्य तारकों में बुद्धिमान जीवधारियों की सत्ता मौजूद है।
जैसे-जैसे अन्यत्र जीवन में अस्तित्व का पता चलता जा रहा है वैसे-वैसे यह चेष्टा भी तीव्र होती जा रही है कि इन जीवधारियों के साथ किस प्रकार सम्पर्क बनाया जाय और पारस्परिक सहयोग के आधार पर निखिल चेतना को किस प्रकार संबन्ध सूत्र में पिरोया जाय। धरती के निवासी मानवों के परस्पर सहयोग ने इस छोटे से ग्रह पिंड को कैसा सुन्दर सुविकसित बना डाला। यदि ब्रह्माण्डव्यापी जीवन सत्ता के बीच घनिष्ठता स्थापित हो सके, तो उस सहयोग का न जाने कितना बढ़ा-चढ़ा चमत्कारी परिणाम उत्पन्न हो सकता है। इस दिशा में चल रहे प्रयास को चेतना की उज्ज्वल संभावना के रूप में बड़े मनोयोगपूर्वक विज्ञ समाज द्वारा देखा जा रहा है।
फेनेमारिया (कैलीफोर्निया) विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. मेथ्यू नार्टन का कथन है कि मानवी प्रयत्नों से शुक्र ग्रह में कुछ स्थानों पर वनस्पतियाँ उगाई जा सकती हैं और अन्य रेडियो प्रयत्नों द्वारा वहाँ संव्याप्त कार्बन डाइ ऑक्साइड के मूल तत्त्व कार्बन को अलग किया जा सकता है। शुक्र ग्रह सम्बन्धी अपने शोध-निबन्ध में नार्टन महोदय ने इन गैसों के विच्छेदीकरण और वनस्पति उत्पादन की प्रक्रिया को 'फोटो सिंथेसिस' की एक विशिष्ट प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया है और कहा है, कि इस आधार पर शुक्र में जल वर्षा आरम्भ हो सकती है तथा वहाँ का वातावरण कुछ दिन में ऐसा ही हो सकता है, जैसा कि जीवधारियों के रहने योग्य अपनी पृथ्वी का है।
पुल्कोवो रेडियो टेलिस्कोप द्वारा प्राप्त सूचनाएँ ऐसी नहीं है कि शुक्र ग्रह पर जीवन के अस्तित्व से सर्वथा इंकार किया जा सके और न डॉ. री का वह कथन अभी तक पूरी तरह रद्द किया गया है, जिसमें उन्होंने शुक्र में प्राणधारियों की बड़ी संख्या में होना सम्भावित बताया था।
मंगल ग्रह में कई हजार मील दूर रहकर अन्तरिक्ष यानों ने जो 80 हजार फोटो भेजे हैं, उन्हें देखने पर यह निश्चित नहीं किया जा सका कि उनमें जीवन विद्यमान् है। ग्रीनवैक्स (वर्जीनिया) के पर्यवेक्षकों ने भी उपलब्ध रेडियो सन्देशों के आधार पर अभी यह निष्कर्ष नहीं निकाला है कि उनकी पहुँच के क्षेत्र में पृथ्वी के अतिरिक्त अन्यत्र भी जीवन है।
वर्जीनिया के ग्रीनवैक्स नामक स्थान पर अवस्थित रेडियो वेधशाला के खगोलशास्त्री फ्रैकड्रेक ने एक तारे से आने वाले रेडियो संकेतों का अध्ययन किया था। जहाँ से यह संकेत आते थे, उस तारे का नाम उन्होंने “ओज्मा” रखा था और इसी नामकरण के आधार पर उनकी अनुसन्धानशाला को ओज्मा प्रोजेक्ट कहा जाता था। उन्होंने 21 सेंटीमीटर वेवलेंथ पर 150 घण्टे तक संकेत सुने थे। यद्यपि उस समय किसी निष्कर्ष पर न पहुँचा जा सका, फिर भी ड्रेक महोदय ने यह भविष्यवाणी की थी कि अब न सही, फिर कभी सही, हम अन्तर्ग्रही प्राणियों के साथ आदान-प्रदान में सफलता प्राप्त करके रहेंगे।
जहाँ-तहाँ पाये गये उल्का पिण्डों में जीवन तत्त्व पाए गए हैं, इससे अनुमान होता है कि जीवन होना चाहिए। अपने लोक में कभी-कभी ऐसे वाइरस (विषाणु) आ धमकते हैं, जिनमें ताप सहन शक्ति इतनी अधिक होती है जितनी पृथ्वी पर सम्भव नहीं। इन आधारों को देखते हुए इस मान्यता की पुष्टि होती है कि अन्यत्र भी जीवन होना ही चाहिए।
जीवन कहीं भी– किसी भी रूप में क्यों न प्राप्त हो, उसके मूल में डी.एन.ए. धागों के रूप में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थ ही है। इन रसायनों का अस्तित्व अन्य लोकों में भी है, इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
प्रख्यात रूसी खगोलवेत्ता निकालाई कार्दाशेव ने अन्तरिक्ष से अवतरित होने वाली विभिन्न रेडियो ध्वनि तरंगों को वर्णछटा में परिवर्तित करके ऐसे चार्ट तैयार किये थे, जिनसे यह प्रकट होता है कि प्राकृतिक परिवर्तनों से रेडियो कम्पनों की क्या स्थिति होती है और अन्तर्ग्रही रेडियो संकेतों की उन से क्या भिन्नता है।
इस अन्वेषण को आगे जारी रखते हुए सोवियत संघ के एक-दूसरे ज्योतिर्विद् गेन्नादी शोलोमित्स्को ने पता लगाया कि सौ दिन के अन्तर से एक जैसे अन्तर्ग्रही रेडियो संकेत नियमित रूप से– नियमित क्रम से आते हैं। इस नियमितता के पीछे किन्हीं प्रबुद्ध प्राणियों का प्रयास ही होना चाहिए ?
खगोलज्ञ मानते हैं कि हमारी आकाश गंगा में एक करोड़ के लगभग ग्रह ऐसे है, जो अपने-अपने सूर्यों की परिक्रमा करते हुये ऐसे क्षेत्र में रहते हैं, जहाँ न अधिक सर्दी है न गर्मी। वहाँ हमारी धरती की तरह ही मध्यवर्ती शीत-ताप ही नहीं, अन्य परिस्थितियाँ भी ऐसी हैं, जिन पर जीवन अपने आप पनप सकता है। जीव-विज्ञानी पहले यह मानते थे कि वहाँ जीवन का आधार कठिन है, पर अब यह माना जाने लगा है कि सिलिकन में भी कार्बन जैसी ही जीवन को उत्पन्न कर सकने वाली क्षमता मौजूद है। सिलिकन प्रचुर मात्रा में अन्य ग्रहों पर मौजूद है, तो वहाँ जीवन भी होना ही चाहिए।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रो. मार्टिन रायल ने 25 ऐसे रेडियो तारकों की सूची तैयारी की है, जो अपने सूर्य की अपेक्षा सैकड़ों गुने बड़े और तेजस्वी हैं। उनकी ऊर्जा कल्पनातीत हैं। प्रो. फ्रड हायल के अनुसार उन रेडियो तारकों के अनेक ग्रह-उपग्रह जुड़े हुए हैं। उनमें अनेकों की स्थिति जीवन के लिए अनुकूल उपयुक्त होने की पूरी-पूरी सम्भावना मानी जा सकती हैं। ऐसी ही उपलब्धियों से प्रभावित होकर ब्रिटेन के अन्तरिक्ष विज्ञानी लार्ड स्नो ने आशा व्यक्त करते हुए कहा था कि वह दिन हम सब के लिए बेहद खुशी का होगा, जब ब्रह्माण्ड के अन्य प्राणियों के साथ हमारा सम्पर्क बनेगा।
एक प्रश्न यह भी है कि यदि अन्य ग्रहों पर जीवन हो, तो क्या वहाँ हमारा आवागमन सम्भव हो सकता है? क्योंकि बिना प्रत्यक्ष संपर्क अथवा आदान-प्रदान के जीव सत्ताएँ ब्रह्माण्ड में अपने स्थान पर बनी रहकर अन्य लोक वासियों के लिए कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेंगे।
तारकों की दूरी को देखते हुए और मनुष्य-प्राणी की सीमित आयु को देखते हुए यह खाई पटती नहीं दीखती कि उन लोकों तक पहुँचना और वापिस लौटना सम्भव हो सके। अपने आधुनिकतम अन्तरिक्ष यान द्वारा यदि निकटतम तारक की यात्रा की जाय तो उसमें कम से कम चार प्रकाश वर्ष लगेंगे। एक प्रकाश वर्ष अर्थात् लगभग 60 खरब मील की दूरी।
वैलेस सलीवान ने अपनी पुस्तक “वी आर नाट अलोन" (हम अकेले नहीं हैं), पुस्तक में अन्तरिक्ष यात्राओं के एक नवीन आधार का उल्लेख किया है। यह आधार 21 सेंटीमीटर अथवा 1420 मेगा साइकिल वेवलेंथ के रेडियो कम्पनों पर अवलम्बित है। हाइड्रोजन परमाणुओं के विकिरण की यह स्वाभाविक कम्पन गति है। इसे करतलगत किया जा सकता है। तब अन्तरिक्ष यात्रा के लिए कम समय, कम श्रम एवं कम धन लगाकर ही अन्तर्ग्रही आवागमन सम्भव हो सकता है।
प्रकाश की चाल से चल सकने वाले अन्तर्ग्रही यान तारकों की दूरी को देखते हुए वहाँ पहुँचने और लौटने में जितना समय लेंगे, उसमें मनुष्य की कई पीढ़ियाँ बीत जायेंगी। इतनी लम्बी प्रतीक्षा में बैठे रहना अन्तरिक्ष जिज्ञासुओं के लिए कठिन है, अस्तु वह आधार ढूँढे जा रहे हैं, जो उस गति में तीव्रता ला सके। सौभाग्य से वह आधार मिल भी गया है। मेगा साइकिल वेवलेंथ के सहारे यान इतनी तेजी से उड़ सकेंगे कि अभीष्ट अवधि के अन्दर ही अन्तर्ग्रही आवागमन सम्भव हो सके।
मनुष्य की गरिमा महान् है। उसकी बुद्धि को दैवी वरदान ही कहा गया है। अलभ्य आकांक्षा, तन्मय तत्परता, समग्र एकाग्रता और प्रचंड श्रमशीलता के चारों आधार मिल जाने पर मानवी बुद्धिमत्ता सीमा की समस्त मर्यादाओं को लांघ जाती है। बलि भगवान की तरह वह तीन चरणों में समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को नाप सकती है, नापने जा भी रही है। इस बुद्धिमत्ता का जब भी सदुपयोग होगा, तो मनुष्य पर देवताओं को निछावर किया जा सकेगा और तब इस धरती की गरिमा स्वर्ग से बढ़ी-चढ़ी ही होगी।
विजयश्री वरण करने की महत्त्वाकांक्षाएँ सम्राट पाइरस को नये आक्रमण करने के लिये व्याकुल कर रही थीं। सेनापतियों को बुलाकर उन्होंने नई योजना का विवरण बताया और नई तैयारी करने का आदेश दे दिया।
नये अभियान में इटली को रौंद डालने की– फिर मेसीडोनिया, ग्रीस और सीरिया को जीतने की, सुविस्तृत रूप-रेखा का समावेश किया गया था।
सम्राट् पाइरस के विद्वान् मित्र साइनेस के कानों तक यह महत्त्वाकांक्षी योजना पहुँची, तो वह एक दिन टहलता-टहलता राजभवन पहुँचा। दो पुराने मित्र मिले, तो खूब आवभगत हुई। सहज स्वभाव में नये आक्रमण की तैयारी पर भी चर्चा हुई।
साइनेस ने गम्भीर होकर पूछा– "सम्राट् आखिर इस आक्रमण का उद्देश्य क्या है?"
पाइरस ने बताया– "वह प्रजा को सुशासन प्रदान करना चाहता है।" इस पर साइनेस ने और भी अचम्भे में आकर कहा– "यह कार्य तो आप बिना आक्रमण किये अपनी प्रजा को सुशासन देते हुए आज ही आरम्भ कर सकते हैं और यदि कदम ठीक उठे हैं, तो उसका अनुकरण अन्यत्र भी हुआ देख सकते हैं। क्या सुशासन स्थापना का यह तरीका बुरा है?"
सम्राट् सोच में पड़ गये। कई दिन वे इसी उधेड़ बुन में लगे रहे, अन्त में इस नतीजे पर पहुँचे। आक्रमण में लगने वाली शक्ति को प्रजा की सुख-समृद्धि पर खर्च किया जाय, ताकि शान्ति व सन्तोष की हवाएँ दूर-दूर तक फैलकर वैसा ही वातावरण उत्पन्न कर सके।
युद्ध की तैयारी रोककर साधनों को सृजन में लगाया, तो आतंक की जगह विकास का वैभव उमड़ने लगा। जानकारों ने कहा– "पाइरस का सोचना गलत था और साइनेस का सही।"
आमतौर से लोग सदा जीवित रहने भर की बात सोचते हैं, मरण तो एक प्रकार से विस्मृत ही हो जाता है। यदि जीवन इकाई के दोनों सिरे ध्यान में रहें, तो ही मध्यवर्ती भाग का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात को महत्त्व दिया जाता रहेगा और ऐसा कुछ किया जाता रहेगा, जिसके आधार पर मनुष्य जन्म जैसी महान् उपलब्धि को सार्थक बनाया जा सके।
हम समर्थ हों, स्वस्थ हों, सो ठीक है, पर कल नहीं परसों मृत्यु का वरण तो करना ही पड़ेगा। सूर्य जैसी समर्थ सत्ता के भी मरण की रूपरेखा विज्ञों ने बनाकर रख दी है, फिर हमारी तो हस्ती ही क्या है?
अपने सूर्य का भूत, वर्तमान और भविष्य जानने के लिए खगोलवेत्ताओं ने गहरे अनुसन्धान किए हैं। इस संदर्भ में जार्ज गेमो, एडिंगटन, फीडलर, हेनबेधे, फान वित्सकर के निष्कर्षों को अधिक प्रामाणिक माना गया है।
उन खगोलवेत्ताओं के अनुसार सूर्य में हाइड्रोजन का विशाल भण्डार है। उसके भीतरी भाग में जो जटिल हलचलें हो रही हैं, उनके कारण प्लाज्मा स्थिति के अंतर्गत प्रोटीन कणों की मात्रा बढ़ रही है। वे ही प्रकाश और ऊर्जा के रूप में धरती पर पहुँचते हैं, सूर्य में भरा हाइड्रोजन धीरे-धीरे हीलियम में बदलता जा रहा है।
सूर्य की आयु लगभग 500 करोड़ वर्ष है। उसमें जो परिवर्तन हुए हैं, उससे धरती की स्थिति में भारी परिवर्तन हुए हैं। वे शीत, ताप, वर्षा, वनस्पति एवं प्राणियों की स्थिति से ही सम्बन्धित नहीं है, वरन् प्राणियों के विशेषतया मनुष्यों के मानसिक स्तर को भी उसने बहुत प्रभावित किया है। मनुष्य के चिन्तन एवं उत्साह का विस्तार ही नहीं, स्तर भी सौर हलचलों से प्रभावित हुआ है।
ठंडे होते चलने पर नक्षत्रों का रंग प्रायः लाल हो जाता है। अपना सूर्य भी भविष्य में लाल दानव की तरह अत्यन्त भयावह दिखाई देगा। इसके बाद बूढ़ा सूर्य समझना आरंभ करेगा। वृद्ध मनुष्य जिस तरह कुरूप कंकाल भर रह जाते हैं, वही दुर्गति सूर्य की होगी। वह एक कठोर प्लाज्मा पिण्ड की शक्ल में जा पहुँचेगा। उसका घनत्व हमारे पानी की तुलना में पच्चीस लाख गुना अधिक होगा। सिकुड़ते-सिकुड़ते वह पृथ्वी से भी छोटा रह जायेगा। ऐसी स्थिति में उसकी गणना ब्रह्माण्ड के एक नगण्य पिण्ड की स्थिति में बहुत समय तक भले ही बनी रहे, किन्तु उसका कुछ मान-महत्त्व न रह जायेगा। उस स्थिति में पृथ्वी निरन्तर ठंडी होते-होते शून्य में 325 डिग्री फारनहाइट से नीची स्थिति में चली जायेगी। तब सूर्य और पृथ्वी पर नीरवता भरी मृत्यु का साम्राज्य छाया रहेगा।
यों मनुष्य को शतायु कहा गया है, पर वर्तमान परिस्थितियों में कौन उतने समय तक जी पाता है। आमतौर से लोग आधी पौनि आयु ही भोग पाते हैं। इस बहुमूल्य अवसर का सदुपयोग करने के लिए यह दृष्टिकोण सजग रहना चाहिए कि जीवनकाल तेजी से समाप्त हो रहा है और मरण तेजी से निकट दौड़ता चला आता है। जो समय बीत गया, सो गया, उसके लिए पछताने से कुछ लाभ नहीं। जो शेष है, उसी के सदुपयोग पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यह सम्भव तभी है, जब हम सूर्य के मरण की जैसी मरण कुण्डली दैवज्ञों ने बनाई है, उसी तरह अपने मरण को भी मूर्तिमान् देखें और जो समय बचा है, उसके सदुपयोग के लिए आतुरता उत्पन्न करें।
आत्मा न नर है न नारी। एक दिव्य सत्ता भर है। समयानुसार– आवश्यकतानुसार वह तरह-तरह के रंग-बिरंगे परिधान पहनती-बदलती रहती है। इसी को लिंग व्यवस्था समझना चाहिए। सर्दी की ऋतु में गरम और भारी कपड़े पहनने की आवश्यकता अनुभव होती है और गर्मी में हलके वस्त्र पहनने या नंगे रहने की इच्छा होती है। नर-मादा रूपी दो आवरण दो ऋतुओं के लिए हैं। आत्मा की जब जैसी रुचि होती है, तब वह वैसे वस्त्र पहन लेती है। कभी गरम-भारी तो कभी ठंडे- झीने। कभी खट्टा स्वाद चखने की इच्छा होती है तो कभी मीठा।
मादा के जीवन का अपना आनन्द है और अपना स्तर। उसे देखे, समझे और अनुभव किये बिना आत्मा की तृप्ति नहीं होती। सो जब स्नेह, वात्सल्य, समर्पण, सेवा की प्रवृत्तियाँ उभारने की शिक्षा लेनी होती है, तो नारी के शरीर में प्रवेश करके उस तरह का अध्ययन, अनुभव, अभ्यास करना होता है और जब शौर्य, साहस, पुरुषार्थ, श्रम की कठोरता का शिक्षण आवश्यक होता है, तब उसे नर कलेवर पहनना पड़ता है।
मृदुलता और कठोरता के उभयपक्षीय समन्वय से जीवधारी की समग्र शिक्षा हो पाती है। यदि वह एक ही योनि में पड़ा रहे तो उसके आधे ही गुणों का विकास हो पायेगा और उस अपूर्णता के रहते सर्वांगीण पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त न हो सकेगा। अस्तु भगवान ने यह व्यवस्था बना रखी है कि जीवधारी कभी मादा शरीर में रहा करे, कभी नर शरीर में। यह परिवर्तन धूप - छाँह जैसे उभयपक्षीय आनन्द की अनुभूति कराता है और जीवन के दोनों पहलुओं से परिचित ही नहीं, अभ्यस्त भी रखता है।
यह सोचना ठीक नहीं कि नर जन्म-जन्मान्तरों तक नर ही रहेगा और नारी को नारी ही रहना पड़ेगा। अभ्यास और रुचि परिपक्व हो जाय, तो एक ढर्रा भी कई जन्मों तक चलता रह सकता है, पर यदि तीव्र उत्सुकता-उत्कंठा हो, तो वह परिवर्तन अगले ही जन्म में हो सकता है। नर यदि नारी जैसी मनोभूमि और गतिविधियाँ अपनाकर उस तरह की उत्कंठा तीव्र करे, तो अगला जन्म उसे नारी के रूप में भी मिल सकता है। इसी प्रकार नारी के लिए यह सर्वथा सम्भव है कि वह पुरुषोचित गतिविधियाँ और मनोवृत्तियाँ अपनाकर अगला परिवर्तन अपनी अभिलाषा के अनुरूप कर ले। यों प्रकृति के नियमानुसार बिना किसी प्रयत्न के भी यह परिवर्तन होते रहते हैं।
शरीरशास्त्री यह तथ्य भली प्रकार जान गये हैं कि हर जीवधारी में नर और नारी की उभयपक्षीय सत्ता बीज रूप में विद्यमान् रहती है। उसका जो पहलू उभरा रहता है, उसी को समर्थ एवं सक्रिय रहने का अवसर मिलता है और दूसरा पक्ष प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। यदि उभार दूसरी दिशा में बह निकले, तो सुप्त पक्ष जागृत हो सकता है और जागृत को सुषुप्ति में चला जाना पड़ता है।
सृष्टि में ऐसे अगणित जीवधारी विद्यमान् है, जिसमें नर और नारी के दोनों पक्ष समान रूप से सक्रिय होते हैं। वे एक ही जीवन में कभी नर और कभी मादा बनते रहते हैं। जब उनका जी आता है, अपने संकल्प बल से नर बन जाते हैं और जब उमंग उठती है, नारी। स्वभाव ही नहीं, बिना किसी कठिनाई के नारी अंगों का भी विकास अधूरा नहीं होता, वरन् इस सीमा तक प्रखर होता है कि सन्तानोत्पादन भी भली प्रकार से हो सके। आज का नर कल नारी बनकर अपने पेट में गर्भ धारण करेगा और परसों बच्चे जनेगा। यह बात विचित्र लगती है, पर है सर्वथा सत्य। कितने जीवों में यही प्रवृत्ति है और वे एक ही जीवन में इस प्रकार के उभय-पक्षीय आनन्द की अनुभूतियाँ लेते रहते हैं। उनके जीवन समुद्र में कभी नर का ज्वार आता है, तो कभी नारी का भाटा। प्रकृति ने उन्हें इच्छानुसार आवरण बदलने की जो सुविधा दी है, वैसी ही यदि मनुष्यों को भी मिली होती, तो वे भी इस प्रकार का आनन्द-लाभ प्राप्त करते। इतना ही नहीं, नर और नारी के बीच असमानता की जो खाई बन गई है, उसके बनने का कोई कारण न रहता। फिर न कोई छोटा समझा जाता, न कोई बड़ा। किसी को किसी पर आधिपत्य जमाने की खुराफात भी न सूझती।
गोल्ड इस्मिट, रोश, हैरीसन आदि प्राणिवेत्ताओं ने तितलियों की कलम एक दूसरे को लगाकर उनका लिंग परिवर्तन कृत्रिम रूप से सम्भव बनाकर दिखाया है। विज्ञानी डबल्यू. हीरम्स ने मछलियों की कई जातियाँ उभयलिंगी पाई है और कुछ प्रयोगों में छोटे आपरेशन करके उन्हें परिवर्तित लिंग का बनाया है। पक्षियों में भी लिंग परिवर्तन के आपरेशन बड़ी मात्रा में सफल हुये हैं।
कुछ कीड़े होते हैं,जो एक ही शरीर में बार-बार उभयलिंगी परिवर्तन करते रहते हैं। वे कभी नर बन जाते हैं, कभी मादा। कीट विज्ञानी प्रो. ओरटन ने ऐसे जीवों की खोज की थी, जो एक ही जन्म में कभी नर रहते हैं, कभी नारी। ओइस्टर ऐसे जन्तुओं में अग्रणी हैं। वे मादा की तरह अण्डे देने के बाद एक मास बाद ही नर बन जाते हैं और उभयपक्षीय लिंग में रहने वाली विभिन्नताओं का आनन्द लूटते हैं। आस्ट्रिना, गिवासा, स्लग लाइयेकस जाति के जलचर भी उभयलिंगी रसास्वादन का क्रम परिवर्तन करते रहते हैं। लिमेष्ट्रिया पतंगा भी इसी स्तर का है। वह कभी नारी होता है, तो कभी नर।
आयस्टर वर्ग-जाति का “मोलस्क” घोंघा अपना लिंग परिवर्तन करता रहता है। कभी वह मादा होता है, तो कभी नर। 40 साल की पूरी आयु यदि वः जी सके, तो प्रायः एक दर्जन बार वह अपना लिंग परिवर्तन करता है।
सृष्टि में ऐसे जीव-जन्तुओं की संख्या कम नहीं, जो उभयलिंगी होते हैं। एक ही शरीर में शुक्र और डिम्ब उत्पन्न करने वाली ग्रन्थियाँ होती है। जब उनमें प्रौढ़ता आती है, तो प्रजनन स्राव अपने आप प्रवाहित होते हैं और रक्त संचार के सहारे उनको आत्मरति का आनन्द, प्रजनन का लाभ मिल जाता है। ड्रोसोफिला मक्खी, हैब्रो व्रेकन ततैये, सिल्क व्रम मोथ, वैक्स मोथ, जिप्सी मोथ, ओलोकेसपिस, जैसे अनेक पतंगे उभयलिंगी होते हैं।
समझा जाता है कि नर और मादा का संयोग होना सन्तानोत्पत्ति के लिए आवश्यक है, पर यह मान्यता बड़े आकार वाले विकसित जीवों पर ही एक सीमा तक लागू होती है। छोटे जीवों में अगणित जातियाँ ऐसी हैं, जिनमें प्रजनन के लिए साथी की सहायता लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अपने शरीर में रहने वाली उभय योनियाँ समयानुसार आप ही संयोग बना लेती हैं और उस आत्मरति से ही प्रजनन का अध्याय पूरा हो जाता है।
प्रजनन क्रिया के लिए यौन संयोग के अतिरिक्त एक और भी तरीका है। अपने विकसित स्वरूप को विघटित कर देना। यह क्रिया वनस्पति जगत में ही निरन्तर होती है। बीज गलकर अंकुर और पत्र-पल्लवों के रूप में विकसित होता है और एक से अनेक बनने का क्रम अपनाकर कालान्तर में वही पुष्ट पौधा बनकर कितने ही नये बीज हर साल उत्पन्न करता है। यह अमैथुनी प्रजनन क्रिया वनस्पति जगत की सर्वविदित परिपाटी है।
गन्ना, गुलाब आदि अगणित पौधे, जिनके टुकड़े करके गाढ़ देने पर अलग-अलग पौधे बन जाते हैं। बट, गूलर जैसे वृक्षों की बड़ी डालियाँ भी नये पेड़ का रूप धारण करती हैं। विकसित पुष्पों के पराग हवा में उड़कर एक से दूसरे तक पहुँचते हैं। मक्खियाँ और तितलियाँ भी उनका स्थानान्तर करती रहती हैं। इस प्रकार पराग युगल परस्पर योग-संयोग मिलाकर बिना रति क्रिया के अपनी वंश वृद्धि करते रहते हैं।
छोटे जीवों में भी वह गुण होता है कि वे अपने शरीर से अपने ही सरीखी नई संतति उत्पन्न कर सकें। यों दूसरी जाति की उत्पत्ति तो सहज ही हो जाती है। पेट में सड़ा अन्न मलकृमि बनकर विष्ठा के साथ निकलता है। शरीर पर चिपका हुआ मैल जुएं, चीलर बनता है। जीवित या मृत शरीर का सड़ा हुआ मांस आँख से देखे जा सकने वाले कीड़ों के रूप में अनायास ही बदल जाता है। सड़े हुए फल और तरकारियों में भी उसी रंग-रूप के कीड़े रेंगते देखे जा सकते हैं। यह प्रजनन ही है। सड़न को रति-क्रिया तो नहीं कह सकते और न उससे सहधर्मी जीव उत्पन्न होता है, फिर भी इसे जीव उत्पादन तो कह ही सकते हैं। कीचड़ और गन्दगी में मक्खी, मच्छरों और रेंगने वाले कृमियों का उत्पन्न होना इसी स्तर का प्रजनन है।
जिनकी गणना जीवधारियों में की जाती है, ऐसे प्राणी भी अपने शरीर के ही टुकड़े बिखेरकर, अपनी जाति के नये प्राणी को जन्म देकर, विधिवत् वंश वृद्धि करते रहते हैं। इसलिए उन्हें जोड़ी ढूँढते या रति-क्रिया का सहारा लेने की जरूरत नहीं पड़ती। अपना शरीर ही इसके लिये पर्याप्त होता है और उसी से उभयपक्षीय मिलन संयोग से लेकर प्रजनन तक की सारी आवश्यकतायें सुचारु रूप से सम्पन्न होती रहती हैं। 'अमीबा' और 'डायटम' जीव इसी स्तर के है। उनमें जब प्रौढ़ता आती है, तो अपने ही शरीर को फुलाकर उसका आधा भाग अलग छिटका देते हैं और एक-एक स्वतन्त्र प्राणी बनकर अपनी अलग वंश परम्परा का संचालन करते हैं।
जीवित कहे जाने वाले प्रत्येक जीवधारी या जीवाणु में मेटाबोलिज्म-उपापच्य, प्रजनन शक्ति होती है। सृष्टि में जीवधारियों का उत्पादन-अभिवर्धन कैसे उत्पन्न हुआ ? इसका युक्ति संगत एक मात्र उत्तर यही हो सकता है, कि आदि जीवाणुओं में अपने आपको विखण्डित करके सन्तानोत्पादन करने की सरलतम योग्यता विद्यमान् थी। उसी के आधार पर जीवधारियों की संख्या बढ़ी और परिस्थितियों के अनुरूप उनने अपनी काया तथा चेतना का विकास- परिष्कार किया। रति-क्रिया का प्रचलन तो बहुत बाद में– तब हुआ– जब प्राणधारी एक लिंगी न रहकर द्विलिंगी बन गये और उन नर-मादा की जननेन्द्रियाँ स्पष्ट उभरीं तथा गर्भ धारण के योग्य हो गईं। इससे पूर्व अपने शरीर से विखण्डित होकर ही पीढ़ियाँ बढ़ाने का प्रचलन था। इसके आगे– मध्यकाल में– उभयलिंगी अन्तःस्राव मात्र उभय और पुष्प-पराग की तरह जीवधारी नर-मादा परस्पर स्नेह-आलिंगन का क्रिया-कलाप गन्ध मादकता के आधार पर करने लगे थे। उतने से ही उनमें प्रजनन उपयोगी हलचलें उठ खड़ी होती थीं और सन्तान होने लगती थी। यौन संसर्ग तो बहुत बाद की प्रगतिशीलता है।
सेलों के भीतर भरे न्यूक्लिक एसिड के माध्यम से पूर्वजों की शारीरिक, मानसिक विशेषताएँ सन्तान में हस्तान्तरित होती हैं। एडमोसिन फास्टेट रसायन का होना प्रजनन योग्यता के लिए आवश्यक है। इन तत्त्वों को यदि प्राणियों में घटाया - बढ़ाया जा सके, तो उनकी प्रजनन क्षमता का स्तर भी बदल सकता है। यह असंभव नहीं कि क्षुद्र -जीव अनभ्यस्त रति-क्रिया अपनाने लगे और सुविकसित प्राणी, जिनमें मनुष्य भी सम्मिलित हैं, अकेला, बिना सहचर के, बिना रति-क्रिया के, सुयोग्य सन्तान का उत्पादन कर सकें।
पेप्टाइड रसायन का यह विदित गुण है कि गरम करने पर वह पानी में घुलता है। और ठंडा होने पर छोटे पिण्ड की शकल धारण कर लेता है। बाहर से उपयुक्त रासायनिक भोजन मिले और उपयुक्त ऊर्जा का वातावरण मिले, तो उनमें विभाजन की प्रजनन प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। इसी आधार पर जीवशास्त्री कृत्रिम जीवाणु उत्पन्न करने और उनसे वंश-वृद्धि का उपक्रम आरम्भ कराने के लिए प्रयत्नशील हैं।
आये दिन ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं, जिनमें नर के भीतर नारी के अथवा नारी के भीतर नर के यौन-चिह्न विकसित होते चले गये और स्थिति यहाँ तक जा पहुँची कि आपरेशन करके उनका लिंग परिवर्तन करना पड़ा। यह परिवर्तन इतना सफल रहा कि उन्होंने जोड़ा बनाया और सफल दाम्पत्य जीते हुए सन्तानोत्पत्ति भी की।
मनोविज्ञान और अध्यात्म-विज्ञान के आधार पर यह सिद्धान्त मान्यता प्राप्त है कि लिंग परिवर्तन के लिए मानवी प्रयत्न बहुत हद तक सफल हो सकते हैं। बहुत कुछ परिवर्तन तो इस जन्म में भी हो सकता है। अन्यथा अगले जन्म में तो वह सम्भावना शत-प्रतिशत साकार हो सकती है। पुराणों में इस प्रकार के अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं, जिनमें व्यक्तियों ने अपने संकल्प-बल एवं साधना-उपक्रम के द्वारा लिंग परिवर्तन में सफलता प्राप्त की हैं। इन दिनों भले ही वे उपचार विस्मृत-विलुप्त हो गये हों– इससे क्या– तथ्य तो जहाँ के तहाँ ही रहेंगे। आत्मा के संकल्प सुदृढ़ और प्रयत्न यदि प्रखर होवे, तो किसी भी आत्मा के लिए अपना वर्तमान लिंग बदल लेने की पूरी-पूरी सम्भावना हो सकती है।
कभी-कभी किन्हीं पुरुषों में नारी प्रकृति और नारियों में पुरुष प्रकृति पाई जाती है। उनके हाव-भाव, स्वभाव एवं आचरण में इस प्रकार का अन्तर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसका एक मात्र कारण यह है कि पिछले दिनों उनकी मन्द इच्छा लिंग परिवर्तन की तो रही, पर उनमें प्रौढ़ता-प्रखरता नहीं आई। यदि उनका संकल्प बल और प्रयत्न बलशाली रहा होता, तो उन्हें इस प्रकार के आधे-अधूरे परिवर्तन का सामना न करना पड़ता। इतने पर भी उनका प्रकृति परिवर्तन की दिशा में ही मन चलता रहे, तो यह आशा की जा सकती है कि इस विराम के उपरान्त वे अपनी अभीष्ट मनोवांछा के अनुरूप लिंग परिवर्तन का लक्ष्य अगले जन्म तक पूरा कर लेंगे।
कभी-कभी ऐसी घटनाएँ भी सामने आई हैं, जिनमें पुरुष के शरीर से भी बच्चों का जन्म हुआ है। भले ही वे भ्रूण अविकसित रहे हों और भले ही वे जुड़वा भाई समझे जा सकते हों, पर उत्पत्ति तो नर शरीर से हो ही गई। इन उदाहरणों से यह तो सिद्ध होता ही है कि मात्र नारी के शरीर में ही नहीं– नर कलेवर में भी यह क्षमता मौजूद है कि गर्भ धारण करने से लेकर गर्भ-पोषण तक की क्रिया सम्पादन कर सके। अवसर मिले, तो इस सम्भावना का अधिक विकास भी हो सकता है और नारी की तरह ही नर भी प्रजनन कर्म कर सकने में समर्थ हो सकते हैं।
फ्रांस के एक 17 वर्षीय लड़के जीन जैक्यूस लोरेन्ट को छाती के दर्द की शिकायत थी। डाक्टरों ने फेफड़े का ट्यूमर पाया और उसका आपरेशन किया। डाक्टरों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने ट्यूमर के स्थान पर 3 पौण्ड 15 ओंस वजन का एक विकसित अंडों वाला बच्चा निकाला।
ब्रिटिश पैथोलोजिस्ट ऐसोसिएशन ने एक भ्रूण को लड़के का जुड़वा भाई बताया है, जो गर्भकाल में किसी प्रकार उसके शरीर में प्रवेश कर गया और वहीं बढ़ता- पलता रहा।
इसी प्रकार की एक घटना बरेली (उ.प्र.) के जिला अस्पताल में हुई। बदायूँ निवासी एक दो वर्ष के बालक का आपरेशन पेट का ट्यूमर समझकर किया गया। पेट खोलने पर उसमें एक विकसित भ्रूण पाया गया, जिसे अधिक अन्वेषण के लिए सुरक्षित रख लिया गया।
नर के शरीर से बच्चे की उत्पत्ति की अनेकों घटनायें बहुचर्चित हैं और उनके विवरण पत्र-पत्रिकाओं में विस्तारपूर्वक छपे हैं। सन् 1956 में टोक्यो अस्पताल में एक किशोर लड़के के पेट का आपरेशन करके उसमें से 11 ओंस का अपरिपक्व बच्चा निकाला गया था। बच्चे की टाँगें, बाल एवं शरीर के अन्य भाग स्पष्ट थे। उसी साल सन् 1956 में उत्तर वियतनाम के हनोई अस्पताल में एक पुरुष का आपरेशन करके बच्चा निकाला गया था, जो जन्मते समय रोया भी था।
सन् 1954 में पाकिस्तान में बहावलपुर नगर के विक्टोरिया अस्पताल में डाक्टरों ने एक पुरुष का पेट चीरकर बच्चा निकाला था।
इन तथ्यों पर गहराई से विचार किया जाय, तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि नर और नारी के कलेवर करती और बदलती रहने पर भी, आत्मा की स्थिति दोनों से ऊपर है अथवा उभयपक्षीय सम्भावनाओं से भरपूर है। जो आज नर है, कल नारी बनना पड़ सकता है। इसी प्रकार नारी को नर की भूमिका सम्पादित करने का अवसर भी मिलता है। जब यह आवरण सामयिक है, तो नर और नारी के बीच ऐसी दीवारें क्यों खड़ी किये जायें, जिनमें अधिकार और कर्तव्य की खाई खड़ी की जाय। किसी को छोटा, किसी को बड़ा माना जाय। दोनों को मिल-जुलकर ऐसी समाज-व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे बदलते रहने वाली लिंगीय परिस्थिति में किसी आत्मा को असुविधा अथवा अन्याय का अनुभव न करना पड़े।
भगवान ने दुनिया बनाई। उसकी सुन्दरता देखकर वे स्वयं मुग्ध हो गये। सोचने लगे, ऐसे सुन्दर उद्यान का कोई माली होना चाहिए। सो उन्होंने मनुष्य की रचना कर डाली।
मनुष्य ने धरती देखी, तो प्रसन्न हो गया। धरती ने मनुष्य को पाया, तो फूली न समाई, पर यह स्थिति देर तक न रही। मनुष्य यह भूल गया कि उसे किसने, किस प्रयोजन के लिए बनाया है ? उसने धरती की हर चीज का अपने को स्वामी घोषित किया और आत्मश्लाधा भरे अहंकार के गीत गाने लगा। अधिकार, अधिकार, अधिकार और उसे कहीं कुछ सूझा ही नहीं। कर्तव्य तो मानो उसने पूरी तरह भुला ही दिया।
बहुत दिन बाद भगवान धरती का निरीक्षण करने आये। मनुष्य की हरकतों पर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उनने नये प्रतिनिधि भेजने की बात सोची। मन्दिर में ज्ञानदीप को संसार का मार्गदर्शक बनाकर प्रतिष्ठापित किया और उस देवदूत से कहा– तुम ज्ञान का आलोक फैलाना, ताकि प्राणियों को सही मार्गदर्शन मिलता रहे। शास्त्र, धर्म और गुरुओं के रूप में दीपक से अग्नि, तेल और बाती का सम्मिलित प्रकाश आलोकित होने लगा।
बहुत दिन नहीं बीतने पाये, कि दीपक की अंतःस्थिति गृह-कलह से भरने लगी। अवयवों में अहं फूटा और वे अपना वर्चस्व सिद्ध करने के लिए आतुर रहने लगे। जो कुछ हो रहा है, मेरे कारण ही है, अन्य सब तो तुच्छ हैं। यह गर्वोक्ति साथी सहन न कर सके। उनका अहंकार तिलमिलया, तो तनकर खड़े हो गये और बोले– हम भी क्या कुछ कम हैं।
कलह-संवाद में तर्कों का और तथ्यों का भरपूर प्रयोग किया गया। बाती कहती थी- “अग्नि को धारण मैंने कर रखा है। जलती मैं हूँ। प्रकाश तो मैं ही फैलाती हूँ। साथी लोग तो ऐसे ही मेरे साथ जुड़े हैं।”
तेल बोला– रुई की चिन्दी ! बढ़-चढ़ कर बात मत बना। मैं ही हूँ, जो तुझे सिक्त करता हूँ। स्वयं पैरों में पड़ा रहकर जलता हूँ। तू है, जो श्रेय-सम्मान भी पाती है और घटती-गलती भी नहीं। मिट्टी का दिया क्यों पीछे रहता। बोला– तुम लोगों का आखिर आधार क्या है ? टिके किस पर हो ? मेरे अभाव में तुम लोगों का मिलन तक संभव न हो सकेगा। अग्नि देवता कुछ कहना ही चाहते थे कि तीनों एक स्वर से बोले– आप तो देखने भर के हैं, बिना अस्तित्व के। हम लोग ही हैं, जो चलते हैं, पर नमन आपका होता है। सिट-पिटाकर अग्नि देव चुप तो हो गये, पर आक्रोश यही कहता रहा– मूर्खों ! मेरे बिना तुम लोग घिनौने उपकरण मात्र हो। बढ़-बढ़ कर डींग हाँकते हुए 'छोटे मुँह बड़ी बात' वाला उदाहरण प्रस्तुत करते हो।
यह विवाद मन्दिर की प्रतिमा शान्तिपूर्वक सुनती रही। वह उस दार्शनिक प्रतिपादन की यथार्थता को मूर्तिमान देखती रही, जिसमें कहा गया है कि– "बुद्धिमान की जीभ हृदय में और मूर्ख का हृदय जीभ में होता है।” इन मूर्खों को इतना तक नहीं सूझता कि ज्ञान-दीप का महत्त्व देवालय में स्थापित होने के कारण ही है। यही दीपक यदि शौचालय में रखा होता, तो किसको क्या और कितना श्रेय मिलता ?
भगवान को विश्वास था कि मनुष्य न सही– देवालय सही, संसार को सन्मार्ग दिखाने का कार्य तो हो ही रहा होगा। शास्त्र, धर्म और विद्वानों की सम्मिलित शक्ति ने वैसा ही वातावरण उत्पन्न किया होगा, जैसा कि मैं चाहता था।
अपनी आशा को प्रत्यक्ष देखने की आकांक्षा लेकर भगवान फिर स्वर्गलोक से धरती पर उतरे। उन्होंने पहले देवालय में पदार्पण किया, क्योंकि उनकी अभिलाषा का केन्द्र वहीं पर केन्द्रीभूत किया गया था।
गृह-कलह का विवाद, उन्होंने देव प्रतिमा में प्रवेश करके, ध्यान पूर्वक सुना। तेल, बाती, दीपक ही नहीं, अग्नि में भी इस प्रकार अहं उमड़ता देखा, तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। जिन्हें संसार में प्रकाश उत्पन्न करना था, वे स्वयं ही अन्धकार में भटक गये, फिर मार्गदर्शन किसका करेंगे ?
अहं एक कोने में खड़ा भगवान पर करारे व्यंग कर रहा था और कह रहा था– भले ही आप परमेश्वर हो– भले ही आपने संसार बनाया हो अथवा मनुष्य सृजा हो। देवालय स्थापित कराये या ज्ञानदीप जलाये। जब तक मेरा वश चलेगा, आपकी इच्छा पूरी नहीं होने दूँगा। ऐसा कुछ हो ही नहीं सकेगा, जिस पर आप संतोष व्यक्त कर सकें।
भगवान सोचने लगे– अहं का सृजन करके मैंने कितनी भूल की। तब से अब तक वे इसी सोच में लगे हैं कि अहं के चंगुल में फँसे इस संसार की सुन्दरता को कैसे बचाया जाय ?
एक पादरी ने स्कूल भी चला रखा था। वे बच्चों को रोज शिक्षा देते कि दया का काम जरूर करना चाहिए। शिक्षा देते हुए दिन हो गये, तो उनने सोचा– लड़कों से पूछूँ तो, कि क्या कोई दया-धर्म पालन के लिए उत्साहित हुआ भी या नहीं?
उस दिन पादरी पूछ ही बैठे– "जिनने इस महीने कुछ दया के काम किये हों, वे हाथ उठाये।"
तीन लड़कों ने हाथ उठाये। पादरी ने उन्हें पास बुलाया और प्यार से पूछा– "बच्चों! बताओ तो, तुमने भला क्या-क्या दयालुता के काम किये ?"
पहले लड़के ने कहा– "एक जर्जर बुढ़िया को मैंने हाथ पकड़कर सड़क पार कराई।" पादरी ने उसकी प्रशंसा की।
दूसरे से पूछा गया, तो उसने भी एक बुढ़िया को हाथ पकड़कर सड़क पार कराने की बात कही। पादरी ने उसे भी शाबाशी दी।
तीसरे ने भी जब वही बुढ़िया का हाथ पकड़कर सड़क पार कराने वाली बात कही, तो पादरी को संदेह भी हुआ और आश्चर्य भी। उनने पूछा– "बच्चों! कहीं तुमने एक ही बुढ़िया का हाथ पकड़कर तो सड़क पार नहीं कराई थी ?"
बच्चों ने एक स्वर से कहा– "हाँ हाँ ! बिलकुल! ऐसा ही किया गया था।" अब तो पादरी का आश्चर्य और भी अधिक बढ़ा। उनने फिर पूछा– "भला, एक ही बुढ़िया को पार कराने के लिए तुम तीनों को क्यों जाना पड़ा ?"
लड़कों ने कहा– "हमने उसे कहा था, हमें दया धर्म का पालन करना है। चलो तुम्हें हाथ पकड़कर सड़क पार करायेंगे। बुढ़िया रजामंद नहीं हुई। उसने कहा– 'मुझे जहाँ जाना है, वह पटरी के इसी किनारे पर है। सड़क पार करने की मुझे तनिक भी आवश्यकता नहीं है।' इस पर हम तीनों चिपट गये और उसके हाथ पकड़कर घसीटते ले गये और सड़क पार कराके ही माने।"
पादरी लड़कों द्वारा आत्म-लाभ के लिए किए गये इस धृष्ट परोपकार से बड़ा दुःखी हुए। वे कुछ देर मुँह लटकाये बैठे रहे, पर फिर यह सोचकर शान्त हो गये कि दुनिया में लोकसेवा के नाम पर यही विडम्बना तो चल रही है, अकेले बच्चे ही तो गुनहगार नहीं है।
वेद में कहा गया है कि “जो लोग सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहते हैं, परमात्मा उनका भार स्वयं वहन करता है।" पर समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का समुचित रीति से पालन न करने वाले ईश्वर भक्त आत्म-कल्याण में समर्थ नहीं होते। समाज भी तो मनुष्य का अपना ही स्वरूप है। अपने स्वार्थ की पूर्ति में तो उद्यत रहा जाय, पर अपने ही समान अपने समाज के प्रति परमार्थ का ध्यान न रखा जाय, तो उस ईश्वर-उपासना से आत्म-सन्तोष होना सर्वथा असंभव है।
नास्तिकवादी मान्यता यह है कि शरीर ही जीव है। शरीर के मरण के साथ-साथ ही जीव का भी अन्त हो जाता है। शरीर और जीव का पृथक् अस्तित्व नहीं, दोनों एक साथ ही जीते-मरते हैं। इस मान्यता के अनुसार परलोक का– पुनर्जन्म का आधार नहीं पाता।
नास्तिकवाद यदि किसी दार्शनिक चिन्तन तक सीमित रहता, तो बात दूसरी थी; पर उसका अत्यन्त दूरगामी प्रभाव हमारी जीवन-यापन सम्बन्धी विचारणा एवं क्रिया-प्रक्रिया पर पड़ता है। कतई इसे विचारभिन्नता कहकर टाला नहीं जा सकता।
मानवी स्वभाव येन-केन प्रकारेण अधिकाधिक सुख-सुविधा, साधनों का संग्रह एवं उपयोग करने का है। कम समय, कम श्रम में अधिक सुख-साधन उपलब्ध करने की आतुरता में उचित-अनुचित का भेद छूट जाता है। उचित मार्ग से तो अभीष्ट श्रमशीलता ओर योग्यता के आधार पर ही वस्तुएँ मिलती हैं। यदि इस मर्यादा में रुके रहने की गुंजाइश न हो, तो गतिविधियों को उस स्तर की बनाना पड़ेगा; जिसे पाप, बेईमानी, छल, उत्पीड़न आदि अपराध वर्ग में गिना जा सके। प्रत्यक्ष है कि ईमानदारी की अपेक्षा बेईमानी की नीति अपनाने वाले स्वल्प समय में अधिक सुख-साधन एकत्रित कर लेते हैं। एक की देखा-देखी दूसरे की भी इस प्रचलन का अनुसरण करने की इच्छा होती है और अनैतिक आचरण का प्रवाह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगता है। नास्तिकवाद इस प्रवाह को रोकता नहीं, वरन् प्रोत्साहित करता है। कहना न होगा कि यदि अपराधी प्रकृति और कृति बढ़ती ही जाये, तो आचार-संहिता एवं मर्यादा नाम की कोई चीज न रहेगी। स्वेच्छाचार बढ़ेगा और स्वार्थपरता अन्ततः मानव समाज को परस्पर नोंच खाने की स्थिति में ले जाकर पटक देगी। फलतः व्यक्ति एवं समाज का सत्यानाशी अहित ही सम्मुख उपस्थित होगा।
कानून की पकड़ से आदमी को बुद्धि-कौशल सहज ही बचा सकता है। अपराधों की महामारी अब सार्वजनीन और सर्वव्यापक होती चली जा रही है। पकड़ में कोई विरले ही आते हैं। जो पकड़े जाते हैं, वे भी दुर्बल न्याय-व्यवस्था का लाभ उठाकर राजदण्ड से बच जाते हैं। समाज में, एक तो वैसे ही समर्थ एवं संगठित प्रतिरोध की क्षमता नहीं, इस पर भी गुंडावाद का आतंक उसे चुप रहने और सहन करने में ही भलाई मानने के लिए आतंकित करता है। ऐसी दशा में समाज- प्रतिरोध का भी भय नहीं रहता। सरकारी पकड़ से बचने या पूछने के उपाय तो अब सर्वविदित हो चले हैं। इसलिए चतुर लोग उससे डरने की आवश्यकता नहीं समझते। विपत्ति में फँसने से पहले ही आवश्यक सुरक्षा-व्यवस्था के साधन बना लेते हैं।
अपराधी मनोवृत्ति से बचने का भावनात्मक अंकुश ही अब तक कारगर होता रहा है। यों उसमें भी भारी शिथिलता आई है; फिर भी जितनी रोकथाम आस्तिकता के कारण रह रही है; उसे भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। ईश्वर का न्याय, कर्म का फल यदि पूरी तरह मानवी चेतना में से हटा दिया जाय, तो फिर उसे आचरण में पूरे उत्साह के साथ प्रवृत्त होने से कोई रोक नहीं सकेगा। सरकारी नियन्त्रण किसी की बहिरंग गतिविधियों पर ही एक सीमा तक रोकथाम कर सकता है। विचारणा, आकांक्षा एवं अभिरुचि पर तो सरकारी अंकुश भी नहीं चलता। दुष्ट-बुद्धि, दुर्भाव और अशुभ चिन्तन पर रोकथाम तो आत्म-नियन्त्रण से ही हो सकता है। कहना न होगा कि इस आत्म-निग्रह में ईश्वर की न्याय और कर्मफल देने की मान्यता ही कारगर सिद्ध हो सकती है। नास्तिकवादी मान्यता अपनाने पर तो, अवांछनीय रीति-नीति अपनाकर अधिकाधिक सुख-साधन कमाने में, फिर कोई बड़ा बन्धन ही नहीं रह जाता। कानून और लोकमत को तो सहज ही बहकाया जा सकता है।
विद्वान् वाल्टेयर ने इसी तथ्य को ध्यान में रखकर कहा था– यदि सचमुच ईश्वर न हो, तो भी उसका सृजन करना, मानवी सुव्यवस्था की दृष्टि से परम आवश्यक है। सत्प्रवृत्तियों को अपनाने और दृष्प्रवृत्तियों से विरत होने की प्रेरणा देने के लिए ही धर्म एवं अध्यात्म का ढाँचा खड़ा किया गया है। इन दोनों को ईश्वरीय अस्तित्व के सहारे ही खड़ा रखा जा सकता है। वस्तुतः ईश्वरवाद की व्याख्या ही धर्म एवं अध्यात्म की क्रियात्मक एवं भावात्मक उत्कृष्टता को समर्पण करने की दृष्टि से की जाती है।
आस्तिकवाद में भी एक भयानक विकृति कुछ समय से ऐसी पनपी है, जिसे नास्तिकवाद के समकक्ष ही कह सकते हैं। वह है– छुट-पुट कर्मकाण्डों के आधार पर पापदंड से छुटकारा मिल जाने का समर्थन। इन दिनों सम्प्रदायवादियों ने अपने-अपने मत-सम्प्रदाय के अनुयायी बनाने और बढ़ाने के लिए एक सस्ता नुस्खा ढूँढ निकाला है; कि उनके मत के अनुसार बताये पूजा-विधान, मन्त्र या क्रिया-कृत्य की अत्यन्त सरल विधि पूरी कर लेने से जीवन भर के समस्त पापों के दंड से छुटकारा मिल जाता है। यह प्रलोभन इसलिए दिया गया प्रतीत होता है कि पापदण्ड की कष्टसाध्य प्रक्रिया से सहज ही छुटकारा मिल जाने का भारी लाभ देखकर लोग उनके सम्प्रदाय की रीति-नीति अपना लेंगे। यदि बात इतनी भर होती, तो भी क्षम्य थी, पर इस मान्यता में एक अत्यन्त भयानक प्रतिक्रिया भी जुड़ी हुई है ; जिसके कारण यह प्रलोभन व्यक्तिगत चरित्र और सामाजिक सुव्यवस्था पर घातक प्रभाव डालता है। मनुष्य पापदंड से निर्भय हो जाता है। दुष्कर्म करने का उसे प्रोत्साहन– साहस मिल जाता है। अब अनीति अपनाकर भरपूर लाभ उठाया जा सकता है और उनके दण्ड से छुट-पुट कर्मकाण्ड का आश्रय ही बचा सकता है, तो फिर कोई क्यों अनीति आचरण के लाभ को छोड़ना चाहेगा ?
नास्तिकवाद और इस पापदंड से बचाने वाले अनास्तिकवाद का निष्कर्ष एक ही है। नास्तिक इसलिए पाप से निश्चिंत होता है, कि सरकार और समाज को चकमा देने के बाद ईश्वर, परलोक, कर्मफल आदि का अतिरिक्त झंझट नहीं रह जाता। ठीक इसी निर्णय पर विकृत चिन्तन से भरा प्रचलित ईश्वरवाद भी पहुँचता है। इस प्रकार वे बाहर से एक-दूसरे के प्रतिकूल दिखते हुए भी निष्कर्ष एक ही निकालते हैं। पापाचार के लिए दोनों ही समान रूप से पथ प्रशस्त करते हैं।
एक और प्रश्न पर भी वे दोनों एक मत हैं। पुण्य-परमार्थ की आवश्यकता नास्तिकवाद नहीं मानता ; क्योंकि इससे धन और समय बर्बाद हो जाता है। जब पुण्य प्रतिफल ही नहीं मिलने वाला है, तो प्रत्यक्ष घाटा देने वाले परोपकार जैसे कार्यों को क्यों किया जाय ? प्रचलित विकृत अध्यात्मवाद भी यही सिखाता है। जब छुट-पुट कर्मकाण्डों के नाम, जप आदि से ही अक्षय पुण्य मिल जाता है और स्वर्ग, मुक्ति तक का द्वार खुल जाता है, तो खर्चीले एवं कष्टसाध्य परमार्थ प्रयोजनों को अपनाने से क्या लाभ? प्रकारान्तर से सेवा-सत्कर्मों की निरर्थकता सिद्ध करने में भी यह दोनों ही दर्शन एक मत है।
नास्तिकवाद के दुष्परिणामों पर समाज के मूर्धन्य लोग विचार करते रहे हैं और उसे अपनाने पर उत्पन्न होने वाले चरित्र संकट की विभीषिका समझाते रहे हैं। पर न जाने दूसरे उस प्रच्छन्न नास्तिकवाद की ओर विचारशील लोगों का ध्यान क्यों नहीं जाता, जो छुट-पुट कर्मकाण्डों का अतिसंयोक्तिपूर्ण माहात्म्य बताकर पापदंड से निर्भय रहने और पुण्य की निरर्थकता सिद्ध करने में प्रकारान्तर से नास्तिकवाद का सहोदर भाई ही सिद्ध होता है। धर्म, अध्यात्म और ईश्वरवाद के मूल प्रयोजन की यह प्रच्छन्न नास्तिकवाद जड़ ही काट रहा है। इसलिए उसे भी निरस्त किये जाने की आवश्यकता है।
डर स्वयं उपार्जित एवं आमन्त्रित ऐसी बीमारी है जो शारीरिक रोगों से कम नहीं, अधिक ही कष्टकारक है। शारीरिक रोगों में रक्त - माँस ही सूखता है, पर डर में शरीर भीतर ही भीतर खोखला, निस्तेज और दुर्बल होता जाता है। इसके अतिरिक्त मानसिक कमजोरी की क्षति और भी बड़ी है। बीमार शरीर को दवा-दारु तथा अच्छे आहार-विहार से जल्दी ही अच्छा कर लिया जा सकता हे, पर यदि मनःसंस्थान लड़खड़ाने लगे तो मनुष्य विक्षिप्त की श्रेणी में जा पहुँचता है और मस्तिष्कीय विशेषताएँ खो बैठने पर पशु जैसा निरर्थक जीवन-क्रम ही शेष रह जाता है। डर की भयंकरता हमें समझनी चाहिए और उससे सर्वथा मुक्ति पाने का प्रबल प्रयत्न करना चाहिए।
कहीं बीमार न पड़ जाय, कहीं घाटा न हो जाय, कहीं बदली न कर दी जाय, बड़े अधिकारी नाराज न हो जाएँ, बच्चे कुपात्र न निकल जाय, आदि आशंकाएँ लोग ऐसे ही बैठे बिठाये किया करते हैं। दूसरों के सामने कोई कठिनाई देखकर आशंका करते हैं कि कहीं उनके सामने भी वही विपत्ति न आ जाय। संसार के दुःखी और असफल पक्ष को देखते रहना और उसी वर्ग में अपने को जा पहुँचने की आशंका से लोग भारी मानसिक कष्ट पाते रहते हैं। यदि वे संसार के सुखी और समुन्नत पक्ष को देखें और वैसी ही सुविधा - सफलता अपने को भी मिल सकने की बात सोचें, तो आशा से आँखें चमकने लगेंगी और यत्न - पुरुषार्थ की गति बढ़ जायेगी। निषेधात्मक कल्पनाएँ छोड़कर यदि लोग विधेयात्मक कल्पनाओं में रस लेने लगें, तो वास्तविकता न होने पर भी वह कल्पना ही अपने लिए सुखद हो सकती है। कल्पना का परिमार्जन भी यदि कर लिया जाय तो भी मनुष्य डर के जंजाल से बहुत हद तक बचा रह सकता है।
डर की प्रवृत्ति मानवीय अन्तःकरण में इसलिये विद्यमान् है कि वह सम्भावित खतरे की ओर से सतर्क रहें। और यदि कुछ गड़बड़ी दिखाई पड़े तो उससे बचने के उपाय सोचें। यह आत्मरक्षा की वृत्ति है। जहाँ तक उसका औचित्य एवं उपयोग हो, वहाँ तक अपनाया जाना ठीक है। आग जल रही है, उससे दूर रहें। कपड़े सम्भालें, उसकी चिनगारियाँ कोई दुर्घटना पैदा न करे। यह सतर्कता रखना ठीक है। वन्य प्रदेश में हिंसक पशुओं की सम्भावना को ध्यान में रखें। छूत के रोगों से बचने के लिए आवश्यक स्वच्छता को अपनायें। अवांछनीय व्यक्तियों के संपर्क में अपने बच्चों को न आने दें ; आदि-आदि सतर्कताएँ - सजग रखने के लिए डर का उपयोग ठीक है, पर अकारण विपत्ति की बात सोचते रहना गलत है। परीक्षा में फेल हो जायेंगे, सड़क पर चलने से दुर्घटना हो जायेगी, जमा पैसे वाली बैंक फेल हो जायेगी, मित्र विश्वासघात करेगा जैसी आशंकाएँ डराती हैं। पर समय यही बताता है कि वे सर्वथा निरर्थक और मन गढ़न्त थीं।
लोग क्या कहेंगे ; यह डर आत्महीनता पैदा करता है और कई व्यक्ति तो निधड़क होकर बात करने या भाषण देने तक में समर्थ नहीं हो पाते। अमुक तरह की बढ़िया पोशाक न होने से, सस्ती सवारी में बैठकर जाने से लोग क्या कहेंगे। विवाह-शादियों में बड़ी धूम-धाम न करने से क्या इज्जत रहेगी ; जैसी बातें सोचकर लोग अपना आधा मनोबल गँवा देते हैं और लोक दिखावे के ऐसे काम करते हैं, जिनकी वस्तुतः कोई जरूरत ही न थी। जहाँ तक अनैतिक कामों का प्रश्न है, वहीं तक लोगों से डरना चाहिए अन्यथा 'हजार मनुष्य हजार तरह की बात' का ढर्रा तो दुनिया में चलता ही रहेगा। किसका मुँह पकड़ा जा सकता है। जो कहते हैं कहने दें। उसकी चिन्ता न करें। चिन्ता केवल एक ही बात कि, की जाय कि अनैतिक कार्य करने के कारण समाज और परमात्मा के सामने दुष्ट- दुराचारी के रूप में अपना व्यक्तित्व न आवे। इसके अतिरिक्त आलोचनाएँ, निन्दा, स्तुतियाँ केवल मनोरंजन, कौतूहल की दृष्टि से सुननी चाहिए।
मनुष्य ज्ञान का पुंज और साहस का धनी है। उसमें न योग्यता की कमी है न प्रतिभा की। उसे विकसित किया जा सके, तो छोटा दीखने वाला व्यक्ति अगले दिनों बड़ा बन सकता है। जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार हो और जिम्मेदारी उठाने का साहस करे तो उसका निर्वाह करने का बल भी भीतर से ही प्रकट होगा। दूसरे लोग सहायता भी करेंगे और यह सिद्ध होगा कि अपनी तुच्छता और असमर्थता की आशंका निरर्थक थी और सफलता का डर जो बार-बार संकोच में डालता था, सर्वथा निरर्थक था।
“इलिनोयस इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी” ने डरपोक और चिन्तातुर व्यक्तियों से उनकी परेशानी का कारण पूछा तो विदित हुआ, कि उनमें भविष्य में अपने दाम्पत्य जीवन के असफल हो जाने, बच्चों के आवारा निकलने, व्यापार में घाटा पड़ने, बीमार हो जाने, योजनाओं में असफलता मिलने जैसी चिन्ताएँ ही सवार रहती हैं। वे इन क्षेत्रों में असफल रहे व्यक्तियों के साथ अपनी तुलना करते रहते हैं। किन्हीं रोगग्रस्त, दुर्घटना पीड़ित या ऐसे ही दुःखी मनुष्य के साथ बीते हुए घटना क्रम के साथ संगति मिला लेते हैं और एक ऐसा चित्र गढ़ते हैं, जिसमें उनकी भी वही दुर्गति चित्रित की गई होती है। यही बुरी चिन्ता, आशंकाएँ उन्हें निरन्तर भयभीत बनाये रहती हैं।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान शोध मण्डल ने निष्कर्ष निकाला है, कि डर एक छूत का रोग है। डरपोक लोगों के साथ रहकर आदमी बुज़दिल और हिम्मत वाले लोगों के साथ रहकर बहादुर हो जाता है। इस निष्कर्ष की पुष्टि में एक प्रमाण उनने यह भी दिया है, कि डरी हुई या रोती हुए माता को देखकर अबोध बालक स्वयं डर जाता है और रोने लगता है। यद्यपि वहाँ भय का अन्य कोई कारण नहीं दिखता। डरी हुई भीड़ भाग रही हो, तो कारण न जानने पर भी लोग डर जाते हैं और भागने लगते हैं। चीख-पुकार सुनकर कलेजा काँपने लगता है। आततायी से ही नहीं - आतंक ग्रस्त लोगों को देखकर भी लोग आतंकित हो जाते हैं।
डर केवल मन तक सीमित नहीं रहता, उसका दुष्प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। दिल धड़कना, नाड़ी की तेज चाल, पेट भीतर को धँसना, सो जाना, मूँह सूखना, पसीना, काँपना, पीठ और सिर में तनाव, कमजोर, मूर्छा, किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति भी भय की स्थिति से उत्पन्न हो जाता है और दिमाग सही काम नहीं करता, स्मरण शक्ति कुंठित हो जाती है। यह बाह्य चिन्ह अनायास ही उत्पन्न नहीं हो जाते। भीतर के अनेक अंगों पर प्रभाव पड़ने से उत्पन्न आन्तरिक अस्त-व्यस्तता के लक्षण जब बाहर उभर कर आते हैं, तो उपरोक्त बातें दृष्टिगोचर होती है। डर बुरी तरह हमारे सामान्य क्रिया-कलाप को झकझोरता है और तोड़-मरोड़कर रख देता है। इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है और बीमारी, कमजोरी के स्थायी चिन्ह प्रकट होने लगते हैं। दबे हुए रोग उभर आते हैं और श्वेत रक्त कणों की रोग निरोधक शक्ति घट जाती है। इसलिए डर की स्थिति में किसी को देर तक नहीं पड़ा रहना चाहिए अन्यथा उसकी यह मानसिक दुर्बलता शरीर को भी चौपट कर देगी।
कई व्यक्ति बालपन में उनके अभिभावकों द्वारा अधिक डराने या दण्डित किये जाने के कारण डरपोक बन जाते हैं। कुछ के सामने छोटी अवस्था में ऐसी भयानक दुर्घटनाएँ गुजरी होती हैं और वे उनसे आतंकित होकर अपना मनोबल खो बैठे होते हैं। कुछ लोग चिन्तन के क्षेत्र में कोई सही साथी न मिलने के कारण एकाकी अपनी कल्पना गढ़ते हैं और उसमें शूल-बबूल होकर उलझने, चुभने वाले काँटे खड़े कर लेते हैं। किसी प्रियजन का विछोह, विश्वास घात, ऊँची आकांक्षा पर अप्रत्याशित आघात, अपमान, घाटा, असफलता , आतंक जैसे कारण भी मनुष्य के भय को इतना बढ़ा देते हैं कि उसकी स्थिति विक्षिप्त जैसी बन जाती है। बढ़ी हुई स्थिति में तो ऐसे व्यक्ति को पागल खाने ही भेजने पड़ते हैं।
अन्तर की घुटन मनःस्थिति को गड़बड़ा देती है और मनुष्य पग-पग पर डरने लगता है। तब डाक्टरी भाषा में इसे ‘फोबिया’ या ‘फोबिक न्यूरोसिस’ कहते हैं। मानसोपचार में भय के आतंक के अनुसार निदान वर्गीकरण भी है। मृत्यु का भय - मोनो फोबिया, पाप का भय- थैनिटो फोबिया, रोक का भय - गाइनो फोबिया, काम विकृति का आतंक - पैकाटो फोबिया, विपत्ति का भय - नोजो फोबिया, अजनबी का भय- पैथो फोबिया कहलाते हैं और भी इसके कई भेद हैं।
इन भयों का निवारण हमें स्वतः ही अपनी विवेक बुद्धि से करना चाहिए। यह समझने या समझाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए कि भय भीड़ में से तीन चौथाई तो नकली, अवास्तविक और काल्पनिक है। जितने संकटों की आशंका की जाती है, उनमें से बहुत थोड़े ही सामने आते हैं और वे भी इतने सामान्य होते हैं कि थोड़े से साहस और प्रयत्न करने पर उनका आसानी से निराकरण हो जाता है। यदि दुर्भाग्य से कोई संकट सहना ही पड़े, टल न सके; तो भी उसकी हानि उतनी नहीं होती जैसी कि पहले सोची गई थी। फिर संकट के दिन बहुत समय ठहरते भी नहीं। धूप-छाँह की तरह वे आते हैं और आँख-मिचौनी खेल कर चले जाते हैं। जीवन में सतर्कता और साहसिकता की मात्रा बनाये रहने के लिए - शौर्य और साहस पर धार रखी जाती रहने के लिए - वे संकट आते हैं और जितनी हानि पहुँचाते हैं, उससे कहीं अधिक मूल्य की मानसिक मजबूती उपहार में दे जाते हैं। इन तथ्यों पर यदि विचार करते रहा जाय, तो डरपोक मन से - कायरता जन्य अपनी दुर्बलता से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है। जिन साहसी लोगों ने विपत्ति से जूझते हुए सफलता की मंजिल पार की उन मनस्वी व्यक्तियों के जीवन वृत्तान्त पढ़ते रहना ऐसे लोगों के लिए अच्छा उपचार सिद्ध होता है।
साहसी लोगों का संपर्क उस स्थिति से उबारने का अच्छा माध्यम है। ऐसे लोगों के साथ रहने का यदि अवसर मिल सके तो डरपोक व्यक्ति भी उनका अनुकरण करके साहसी और निर्भय बन सकता है।
आत्मा की समर्थता का चिन्तन - ईश्वर को अपने साथ में लेने की अनुभूति का सह सहारा लेकर भी मनुष्य निर्द्वंदता और निश्चिन्तता का लाभ प्राप्त कर सकता है।
भविष्य की अँधियारी गलियों में भटकते फिरने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम वर्तमान पर ध्यान दें, उसे ही पकड़ने और संभालने में लग जावें।
किसका भविष्य क्या है, इसे कोई नहीं जानता। सतत् प्रयत्न करने पर भी कितनों को ही नितान्त असफलता ही हाथ लगती है। जो अनिश्चित है उससे सपनों में उलझना और आकाश कुसुम पाने के लिए बादलों में उड़ना बचपना भर है। प्रौढ़ता की निशानी यह है कि वर्तमान को समझे और उसका श्रेष्ठतम रीति-नीति से सदुपयोग करने में जुट जाय।
वर्तमान के अगणित कर्तव्य हमें घेरे खड़े हैं। क्यों न हम उन्हीं से निपटने में जुट पड़ें, ताकि उज्ज्वल भविष्य का सृजन हो सके। जो वर्तमान के प्रति तत्परता और वफादारी दिखा रहे हैं, उन्हें ही स्वर्णिम भविष्य का लाभ मिला है। वर्तमान को समझने और उसके अनुरूप गतिविधियाँ निर्धारण करने में जिन्होंने भविष्य की रंगीन कल्पनाओं की पतंगें उड़ाने में रुचि रखी, उन्हें वर्तमान का सदुपयोग करते नहीं बन पड़ा ; फिर उज्ज्वल भविष्य तो वे पा ही कैसे सकेंगे।
—फेंने लान
विद्वान् इब्सन का कथन है - शक्तिशाली मनुष्य वह है जो अकेला है। कमजोर वह है जो दूसरों का मुँह ताकता है “अकेले का अर्थ है आत्मनिर्भर - अपने पैरों खड़ा होने वाला। यहाँ अकेलापन, असामाजिक या असहयोग के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। इब्सन का तात्पर्य यह है कि जो अपनी जिम्मेदारी को समझता है, अपने कर्तव्यों को निबाहता है, उसे प्रगति के लिए आवश्यक आधार अपने भीतर से ही मिल जाता है। बाहर के साधन उसके चुम्बकत्व से खिंचकर अनायास ही इकट्ठे हो जाते हैं। अपनी सामर्थ्य के स्रोतों को भरा-पूरा देखना, बाहर की सहायता का प्रवाह निरन्तर समीपतम चलते आने के लिए पथ प्रशस्त करता है।
कन्फ्यूशियस ने कहा है- महान् व्यक्ति अपनी आवश्यक वस्तुओं को भीतर ढूँढ़ते हैं, जबकि कमजोर उन्हें पाने के लिए दूसरों को सहारा तकते हुए भटकते रहते हैं। ये तथ्य ऐसे हैं, जिन्हें स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए और हर किसी की जीवन पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर अंकित किया जाना चाहिए। तत्त्वदर्शी और मनीषी सदा से ही कहते रहे हैं - जो अपनी सहायता आप करता है उसी की सहायता करने परमात्मा भी आता है। जिसने अपने ऊपर से भरोसा खो दिया, उसे ईश्वर की आँख भी अविश्वासी ठहराती है। परमात्मा की निकटतम और अधिकतम सत्ता अपने भीतर ही पाई जा सकती है। जो उसे नहीं देखता वह बाहर कहाँ पर ऐसा अवलम्बन प्राप्त कर सकेगा, जो उसे विपत्ति से बचाने और आगे बढ़ाने में सहायता कर सके? अपनी क्षमता ओर संभावना पर से विश्वास उठा लेना परमात्मा की सत्ता और महत्ता को अस्वीकार करना है। ऐसी अनास्थावादी मनोभूमि जहाँ हो वहाँ घिनौने किस्म की नास्तिकता की गन्ध मिलेगी।
व्यक्ति अकेला नहीं है। उसके कण में भौतिक प्रकृति की असीम शक्ति संजोये हुए कोटि-कोटि परमाणुओं का सैन्य दल मौजूद है। जीवाणुओं में से हर एक के भीतर एक स्वतंत्र सौर मण्डल की सत्ता विद्यमान् है। कोटि-कोटि जीवाणुओं की हलचलें जहाँ हो रही हैं वहाँ अशक्तता का अस्तित्व कैसे हो सकता है। जिसके पास धन-वैभव के अनेक स्त्रोत विद्यमान् है, वह यदि अपने को दीन-दरिद्र कहता फिरे तो उसे अविश्वासी ही कहा जायेगा। जो अपने वैभव और शक्ति भण्डार को भुला चुका और तनिक-तनिक से अवसरों पर दूसरों की सहायता पर निर्भर रहता है, वह सामर्थ्य से न हो सके, तो भी अन्तः चेतना की दृष्टि से निश्चय ही दरिद्र है। दरिद्र की कोई क्वचित् ,कदाचित् और किंचित् ही सहायता करता है।
जिसे अपनी सत्ता और महत्ता का ज्ञान है, उसे यह भी पता रहता है कि प्रतिपक्षी अवरोध कितने पानी में हैं। कोई किसी को न तो डरा सकता है और न स्थायी अवरोध उत्पन्न कर सकता है। जो डरता और रोकता है, वह प्रचण्ड आत्मतेज के सामने अपनी भूल स्वीकार करता है और उलटे पाँव वापिस लौट जाता है। और की तो क्या बिसात मृत्यु तक उसे विचलित नहीं कर सकती। जिसे अपने अनन्त जीवन का विश्वास है, वह मौत को विश्राम मान सकता है, अवरोध नहीं। उसकी यात्रा अवधि की परवाह किये बिना निरन्तर गतिशील रहती है। वेद का ऋषि इसी सत्य का निरन्तर उद्घाटन करता रहा है “तमेष विद्वान न विभाय मृत्यो।" जो अपने को जानता है, वह मृत्यु से भी नहीं डरता। अवरोध और असहयोग के कारण तो वह हताश हो ही कैसे सकता है।
किन्हीं-किन्हीं मनुष्यों में ऐसी शारीरिक या मानसिक क्षमताएँ पाई जाती हैं, जो सर्वसाधारण में नहीं होतीं। इसे देखकर उन्हें विलक्षण या चमत्कारी ठहराया जाता है। अतीन्द्रिय क्षमता के आधार पर लोग ऐसी बातें जान लेते हैं या बताते हैं जिनका कोई बुद्धि संगत आधार नहीं होता, किन्तु पीछे तलाश करने पर वे बातें सही निकलती हैं। जो ज्ञान-इन्द्रियों की सीमा से परे है, उसे जानने वाले सिद्ध योगी कहलाते हैं और आश्चर्य एवं आकर्षण का विषय समझे जाते हैं।
हमें जानना चाहिए कि अतीन्द्रिय शक्ति मनुष्यों में तो कभी किसी को ही मिलती है, पर यह प्राणिजगत में से कितनों को ही जन्म जात रूप में प्राप्त है। वे ऐसा बहुत कुछ जान लेते हैं जो इन्द्रियों तथा मस्तिष्क की बनावट को देखते हुए अद्भुत या अलौकिक ही कहा समझा जा सकता है।
सन् 1904 में अमरीका के पश्चिमी द्वीप समूह का 5000 फीट ऊँचा माउन्ट पीरो नामक पर्वत ज्वालामुखी बन कर फूटा था और उसके टुकड़े-टुकड़े उड़ गये थे। कोई तीस हजार व्यक्ति मरे थे ओर करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हुई थी।
इस दुर्घटना की आशंका मनुष्यों में से किसी को न थी किन्तु वहाँ के पशु पक्षी महीनों पहले घबराये हुए लगते थे। रात को एक स्वर में रोते थे और धीरे-धीरे अन्यत्र खिसकते जाते थे। विस्फोट के मुख्य केन्द्र से सर्प, कुत्ते, सियार कहीं अन्यत्र चले गये थे और उनके दर्शन दुर्लभ बन गये थे। पक्षियों ने तो पूरा ही द्वीप खाली कर दिया था।
प्राणविद्या विशारद विलियम जे. लांग ने पशुओं की इन्द्रियातीत शक्ति के बारे में अपनी पुस्तक 'हाऊ एनिमल्स टॉक' में विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया है कि भले ही बुद्धि-कौशल में मनुष्य की तुलना में पशु पिछड़े हुए हों, पर उनमें इन्द्रियातीत शक्ति कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। उसी के आधार पर वे अपनी जीवन चर्या का सुविधापूर्वक संचालन करते हैं। कुत्ते और भेड़ियों की नाक मीलों दूर की गन्ध लेती है। हिरन के कान कोसों दूर की आहट लेते हैं। आकाश में मीलों ऊँचे उड़ते हुए चील और गिद्ध धरती पर पड़े माँस को देख लेते हैं। देखने, सुनने ओर सूँघने की यह क्रिया मात्र दृश्य, ध्वनि या गन्ध का ही अनुभव नहीं करती वरन् उन्हें ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ देती हैं, जिसके आधार पर वे आत्म-रक्षा से लेकर सुविधा सामग्री प्राप्त करने में सरलता पूर्व सफल हो सकें।
लांग महोदय ने अपनी पुस्तक में ऐसे अनेकों प्रसंग भी लिखे हैं, जिनसे स्पष्ट होता है, कि उन्हें निकट भविष्य में घटित होने वाले घटनाक्रम का भी सही पूर्वाभास मिल जाता है। यदि उनकी वाणी होती तो कहीं अधिक सही भविष्य कथन कर सकते।
पुस्तक के कुछ संस्मरण इस प्रकार हैं - एक मैदान में हिरनों का झुण्ड ऐसी अस्वाभाविक तेजी से घास चर रहा था मानों उन्हें कहीं जाने की आतुरता हो। उस समय कुछ कारण समझ में नहीं आ रहा था, पर कुछ घण्टे बाद ही बर्फीली तूफान आ गया और कई दिन तक घास मिलने की संभावना नहीं रही। स्थिति का पूर्वाभास प्राप्त करके हिरन अत्यन्त तीव्रता से इतनी घास चरने में लगे थे कि कई दिन तक उनसे गुजर हो सके।
जब बर्फ पड़ने को होती है तब रीछ अपनी गुफा में चले जाते हैं और उसमें पहले कई दिन का आहार जमा कर लेते हैं।
उत्तरी कनाडा में झील की मछलियाँ बर्फ की मोटी सतह झील पर जमने से पहले ही गर्म जगह में पलायन कर जाती हैं।
वियना में एक कुत्ता माल उठाने - उतारने की क्रेन के समीप ही पड़ा सुस्ता रहा था। अचानक वह चौंका, उछला और बहुत दूर जाकर बैठा। इसके कुछ देर बाद क्रेन की रस्सी टूटी और भारी लौह खण्ड उसी स्थान पर गिरा, जहाँ कुत्ता बैठा था। कुत्ते के चौंककर भागने का कारण उसका पूर्वाभास ही था।
प्रकृति की संरचना में ऐसे अनेक अद्भुत आकार-प्रकार और क्षमताओं के प्राणी भरे पड़े हैं। बारीकी से उन्हें समझा - देखा जाय तो प्रतीत होता है, कि अपने बुद्धि बल मात्र पर अहंकार करने वाला मनुष्य, अन्य प्राणियों की तुलना में कितना असमर्थ - अक्षम है।
चीता सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है। वह एक मिनट में एक मील दौड़ सकता है-घण्टे में साठ मील। आस्ट्रेलिया का कंगारू ऊंची कूद में अद्वितीय है। उसकी उछाल ४० फीट तक ऊंची होती है। मात्र पाँच इंच शरीर का अफ्रीका में पाया जाने वाला जेंवोंआ 15 फीट तक ऊँचा उछल सकता है।
पक्षियों में गरुड की उड़ान सबसे तेज है। वह 200 मील प्रति घण्टे की लम्बी उड़ान भर सकता है। तेज रफ्तार से हवा में गोता खाने वाला और फिर सीधे ऊपर उड़ जाने के करतब में गोशात्क गति के बाज़ से आगे बढ़कर बाजी मारने वाला और कोई नहीं।
उल्लू रात को आसानी से देख सकता है। उसकी आँखों में मनुष्य की अपेक्षा दस गुनी अधिक रोशनी है। बाज़ की आँखें लाखों रुपयों में मिलने वाली दूरबीन से भी बेहतर होती हैं। एक हजार फीट ऊँचाई पर उड़ते हुए भी वह घास या झाड़ी में छिपे मेंढक, चूहों या साँपों को आसानी से देख सकता है। खरगोश की आँखों की बनावट ऐसी है कि सामने की ही तरह पीछे भी साथ-साथ देख सकता है। बिना सिर घुमाये आगे पीछे दोनों तरफ के दृश्य देखते चलना थलचरों में सचमुच अद्भुत है। यह विलक्षणता मछलियों में भी पाई जाती है। वे पानी में नीचे और ऊपर दोनों ओर देखती हैं।
हाथी की सूँड़ में 40 हजार माँसपेशियाँ होती हैं। इसी से उसमें इतनी लचक रहती है कि जमीन पर पड़ी सुई तक को पकड़ सके। विशालकाय प्राणियों में सबसे बड़ी ह्वेल मछली होती है। उसकी लम्बाई 110 फीट और वजन 140 टन तक होता है। प्रसवकाल में माता और बच्चे के अनुपात का रिकार्ड भी ह्वेल ही तोड़ती है। नवजात बच्चा प्रायः माँ से लगभग आधा होता है।
शेर का पंजा और ह्वेल की दुम इतने सशक्त होते हैं कि प्राण-धारियों में से किसी का भी एक अंश-उसके अन्य अंगों की तुलना में इतना अधिक मजबूत नहीं होता। गहरे समुद्रों में पाया जाने वाला ‘अष्ट पद’ का जरा सा सिर धड़ के बीच में होता है और हाथी की सूँड़ जैसी विशाल आठ भुजाएँ इतनी मजबूत होती हैं कि उनकी पकड़ में आया हुआ बड़े से बड़ा प्राणी जीवित निकल ही नहीं सकता। अमेरिका में पाया जाने वाला एक समुद्री घोंघा, अटलांटिक में पायी जाने वाली सीपियाँ और कुछ किस्म की मछलियाँ प्रजनन की प्रतियोगिता में चैम्पियन ठहरती हैं। वे प्रायः 40 से 50 करोड़ तक अण्डे हर वर्ष देती हैं।
आकाश की तरह पानी के भीतर भी उड़ सकने में समर्थ ‘आरेब्डक’ नामक वाटरप्रूफ पक्षी अनोखा है। वह तैरता उड़ता महीनों समुद्र में ही गुजारा करता रहता है। आर्कटिक सागर के उत्तरी छोर पर बर्फीले प्रदेश में रहने वाले कुछ पक्षी बिना रुके 22 हजार मील की लम्बी यात्रा करके दक्षिण ध्रुव पर जा पहुँचते हैं।
स्मरण शक्ति की दृष्टि से कुत्ता सबसे आगे है। जर्मनी के म्यूनिक नगर में नोरा नामक कुतिया को उसके घर से पाँच मील दूर ऐसे स्थान पर छोड़ा गया जो उसने पहले कभी नहीं देखा था और न घर से वहाँ तक का रास्ता ही उसे मालूम था। फिर भी वह इधर-उधर चक्कर काटती हुई दो घण्टे में अपने घर पहुँच गई। दूसरी बार फिर उसे छोड़ा गया। तो अबकी बार उसने सीधा रास्ता ढूँढ़ निकाला और 35 मिनट में ही घर पहुँच गई।
भारत का विश्वविख्यात बुद्धिमान कुत्ता “हैरी” अब इस संसार में नहीं है, पर उसके बुद्धि-कौशल की अभी भी सर्वत्र प्रशंसा है।
हैरी विश्व के 50 देशों में अपने ढंग का अनोखा था। उसने दर्जनों श्वान प्रदर्शनियों में भाग लिया और पुरस्कार प्राप्त किये। उसकी सूझ-बूझ और अनुशासनशीलता पर संसार की अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने लेख प्रकाशित किये।
मुस्कराना, गाना, नाचना, नमस्ते करना, हाथ मिलना, तीन टाँग से चलना, ताश की गड्डी में से किसी का छुआ हुआ पत्ता निकाल देना, मुर्दे का स्वाँग बनाकर बिलकुल उसी तरह निश्चेष्ट हो जाना, पानी में से किसी वस्तु को ढूँढ़ लाना, अतिथियों को पुष्पहार पहनाना आदि अनेक क्रिया-कौशल उसने सीख रखे थे। चोरी का पता लगाने में वह पुलिस के प्रशिक्षित कुत्तों को मात देता था। दिल्ली के एक स्वागत गान समारोह में उसने दर्शकों को मुग्ध कर दिया था। यद्यपि वह गीत के शब्दों का उच्चारण नहीं कर सकता था तो भी उसने अपनी सुरीली आवाज से ध्वनि के जिस उतार चढ़ाव के साथ गीत गाया, उससे हर किसी ने अनुमान लगाया कि वह क्या गीत गा रहा है। इंदिरा गाँधी तक को वह अपने कौशल से चमत्कृत कर चुका था।
हैरी ने एक रंगीन फिल्म में काम किया था जो देश-विदेश में चावपूर्वक देखी गई। घटना-क्रम के अनुसार मुख मुद्रा का ठीक उसी के अनुरूप बना लेना इस अभिनय का विशेष चमत्कार था जिसे देख कर दर्शक ताली बजाये बिना रह नहीं सकते थे।
हैरी को सौंदर्य प्रतियोगिताओं में कई चैलेंज प्रमाण-पत्र प्राप्त हुए। उसे आज्ञा पालन प्रतियोगिताओं में अन्तर्राष्ट्रीय चैम्पियनशिप प्राप्त हुई थी। उसके पास अन्तर्राष्ट्रीय ट्राफियाँ, कप, पदक, प्रमाण-पत्रों का ढेर था। उसने अपने मालिक और शिक्षक श्री आनन्द प्रकाश कनौडिया को भी गौरवान्वित किया। हैरी छह वर्ष जीकर परलोक वासी हो गया।
अतीन्द्रिय शक्ति हर मनुष्य में होती है, पर अस्वाभाविक एवं मनोविकार ग्रस्त जीवन जीने के कारण वह कुंठित हो जाती है। वनवासी लोग प्रकृति के अधिक समीप रहने और सरल जीवन जीने के कारण उस शक्ति से अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न होते हैं।
सिद्ध योगी जिन अद्भुत या अतीन्द्रिय क्षमताओं को विकसित कर लेते हैं उनमें उनका प्रयास, परिश्रम एवं अभ्यास ही सफलता का प्रधान कारण होता है। वैसे वे समस्त सामर्थ्य हर मनुष्य के भीतर जन्मजात रूप में ही भरी पड़ी हैं। पशु पक्षियों में पाई जाने वाली विलक्षणताओं की तुलना में प्रकृति ने कुछ कम नहीं अधिक ही दिया है। साधना की कुदाली से उन्हें खोद निकाला जाय तो सिद्धि-सम्पदा से सुसम्पन्न बन सकना, किसी के लिए भी सम्भव एवं सरल हो सकता है।
मनुष्य ब्रह्मा जी के पास पहुँचा और उन्नति एवं सुख-शान्ति का वरदान मांगा।
ब्रह्मा जी ने उपहारस्वरूप उसे दो भरे हुए थैले दिये। एक को पीठ पर बाँध दिया और दूसरे को गले में लटका दिया। मनुष्य ने आश्चर्यचकित होकर इन थैलों का रहस्य और उपयोग पूछा।
ब्रह्मा जी ने कहा - 'पीछे वाले थैले में पड़ोसियों की बुराइयाँ भरी हुई है। इन्हें पीछे रखना। इन्हें देखना मत अन्यथा तुम्हें अकारण क्षोभ होगा और प्रगति के लिए जो करना चाहिए, वह न करके उस क्षोभ में उलझ जाओगे।'
गले में लटके हुए थैले का रहस्य बताते हुए उन्होंने कहा - 'इसमें तुम्हारी बुराइयाँ भरी हुई है। आँखों के सामने इसे रखना। बार-बार देखना और उन्हें सुधारने के प्रयत्न में लगे रहना।'
इन दोनों थैलों का यदि तुम ठीक उपयोग कर सके तो निश्चय ही तुम्हारी सुख-शान्ति और प्रगति की मनोकामना पूर्ण होगी। प्रजापति को प्रणाम करके चला आया और जब वह ब्रह्माजी के आदेश पर ध्यान देने लगता है तब मनोरथ सफल होकर रहता है।
अब से कोई साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व सन् 1607 में जर्मन विज्ञानी कैप्लर ने दिन-दोपहर एक तारे को चमकते देखा था। यह उसका मस्तिष्कीय भ्रम तो नहीं है, यह जानने के लिए उन्होंने उसे सैकड़ों अन्य दर्शकों को दिखाया था। दिन में तारे दिखना या बोलचाल की भाषा में किसी बड़ी कठिनाई से सामना करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है, पर वैसा प्रत्यक्ष हो भी सकता है, इस पर कदाचित् ही विश्वास किया जा सके, पर ऐसा हुआ है और होता रहा है। सन् 1578 में भी टाइको ब्राहे नामक एक विज्ञानी ने दिन में तारा निकला हुआ देखा था।
इतिहास में यह क्रम पहले भी चलता रहा है। चीन की पुरानी पुस्तकों में लिखा है कि 4 जुलाई 1054 में एक चमकदार तारा उगा था, जिसकी रोशनी शुक्र ग्रह के समान थी और जो 23 दिनों तक रात में तो चमका ही, दिन में भी उसे देखा जाता रहा। फिर उसकी ज्योति हलकी पड़ते-पड़ते दो वर्ष में पूर्णतया विलुप्त हो गई। सीरिया के ज्योतिष ग्रन्थों में उस प्रकार का एक तारा सन् 1006 में उदय हुआ था, ऐसा उल्लेख है। अरब देश के ज्योतिर्विदों ने सन् 827 में दिन में उगा हुआ तारा देखा था और उसका शुभ-अशुभ की दृष्टि से विचार किया था।
ये दिन में निकलने वाले तारे क्या हैं - खगोलवेत्ता - इन्हें “सुपरनोवा” कहते हैं। यह नवोदित वर्ग के तारक हैं। इनमें कुछ अपेक्षाकृत हलकी द्युति के होते हैं, उन्हें ‘नोवा’ मात्र कहा जाता है।
अनन्त अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले तारकों के आकार-प्रकार यों एक जैसे लगते हैं, पर बारीकी से देखने पर अपनी धरती पर रहने वाले प्राणियों की तरह उनकी भी आकृति-प्रकृति अगणित प्रकार की होती है। सामान्य वर्गीकरण की दृष्टि से इन्हें नीली-सफेद रोशनी वाले,व्हाइट ड्वार्फ्स और लाल, पीले रंग के, रेड डैमेन्स कहते हैं। कुछ तारक इन दोनों के बीच की मिली जुली स्थिति के होते हैं। इस वर्गीकरण के अंतर्गत 97 प्रतिशत तारे आते हैं। इनके अतिरिक्त 3 प्रतिशत तारे ऐसे हैं, जिन्हें नवोदित कह सकते हैं। ये अपनी आकृति-प्रकृति, कक्षा और स्थिति को अस्थिरता से स्थिरता की ओर ले जा रहे हैं। अभी इनका जीवन-क्रम ऐसे ही अस्त-व्यस्त है। वैज्ञानिक इनकी हरकतों को बारीकी से देखते रहते हैं, ताकि तारकों को जन्म, शैशव एवं किशोरावस्था सम्बन्धी तथ्यों की जानकारी प्राप्त हो सके। इन्हीं नवोदित तारकों में से जो दुर्बल, पतले और मध्यवर्ती हैं, वे नोवा कहलाते हैं और जिनका आकार एवं आवेश दैत्याकार है, उन्हें सुपरनोवा कहा जाता है। दिन में दिखने वाले तारे सुपरनोवा ही होते हैं।
इन “नोवा” और "सुपरनोवा" तारकों की आकृति और द्युति आश्चर्यजनक ढंग से घटती-बढ़ती हैं। उनके आकार दस प्रतिशत तक सिकुड़ते-फैलते हैं और रोशनी का तो कहना ही क्या। वह कुछ समय के लिए सैकड़ों गुनी बढ़ जाती है।
इस विशालता के साथ मनुष्य यदि अपने क्षेत्र, शरीर और अस्तित्व की कल्पना करे, तो प्रतीत होगा कि पदार्थों की दृष्टि से उसके साधन नगण्य हैं और प्राण-धारियों की सत्ता से उसकी चेतना क्षुद्रतम है। अपनी तुच्छता और विश्व ब्रह्माण्ड की विशालता की यदि तुलना की जाये तो मनुष्य को अपना अस्तित्व विशाल समुद्र के आगे एक बूँद जल से भी कम दिखाई पड़ेगा। इस क्षुद्रता पर यदि विचार करें तो किसी का भी गर्व गल सकता है और अहंकार की भ्रान्ति का सहज निराकरण हो सकता है।
जिस प्रकार जलती हुई अग्नि अपने समीपवर्ती क्षेत्र को गर्म करती है, अपनी ताप किरणें दूर-दूर तक फैलाती है, उसी प्रकार मानव शरीर में होता है। यों ताप भी उस में रहता है, साँस के सहारे वह कुछ दूर गर्मी भी फैलाता है और देह के संपर्क में जो वस्त्र आदि आते हैं, वे भी गरम हो जाते हैं। यह गौण बात हुई। मनुष्य की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति है विचार। उसकी प्रचण्डता देखते ही बनती है। मस्तिष्क में इच्छा शक्ति एवं विचार शक्ति का निर्माण होता है अथवा इच्छा शक्ति की प्रबलता से मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ती है। इस विवाद में इच्छा शक्ति का ही पलड़ा भारी बैठता है। मस्तिष्कीय उपचारों से कदाचित ही किन्हीं जड़-मति लोगों को बुद्धिमान बनाया जा सकता हो, पर इच्छा शक्ति की प्रेरणा से कालिदास, वरदराज जैसे अगणित मन्द मति उच्च श्रेणी के विचारवान विद्वान् बन सके हैं। अंतःप्रेरणा अविकसित मस्तिष्क को विकसित स्तर का बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है।
मस्तिष्क क्या है? निश्चित रूप से उसे जादू का पिटारा कह सकते हैं। इन दिनों कम्प्यूटरों के कारण कठिन बौद्धिक कार्यों को जिस सरलता से सम्पादित कर दिया जाता है, उसके कारण उनकी बहुत चर्चा-प्रशंसा है। किन्तु यदि मस्तिष्कीय क्रिया-कलाप को देखा जाये तो उस पर अब तक के बने सम्पूर्ण कम्प्यूटरों के आविष्कार निछावर कर देने पड़ेंगे। यह एक ऐसा अद्भुत यन्त्र है जिसकी तुलना का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना मनुष्य की बुद्धि कल्पना से बाहर की चीज है। मस्तिष्क द्वारा शारीरिक क्रिया-कलापों का अनवरत् और सुव्यवस्थित संचालन किस खूबसूरती के साथ होता है। यदि इसका विवरण तैयार किया जा सके तो प्रतीत होगा कि उसकी क्षमता इतनी अद्भुत है कि मनुष्यकृत अद्यावधि सभी आविष्कार उसके सामने फीके पड़ जाते हैं।
मस्तिष्क केवल जीवन-यापन सम्बन्धी क्रिया-कलापों या सोच विचारों में लगा रहता हो और उतनी ही सीमा में उसकी शक्ति सीमित रहती हो, सो बात नहीं है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बाँटता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा की निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उनके संयुक्त संमिश्रण के रूप में कह या पहचान सकते हैं। इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को असामान्य रूप में अनजाने ही प्रभावित करता रहता है।
अनन्त आकाश की पोल में ईथर तत्त्व भरा पड़ा है। ढेला फेंकने पर तालाब में जिस तरह लहरें उठने लगती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी 'ईथर' महासागर में हमारे विचार अपने स्तर के प्रहार करते हैं और उनसे प्रकाश ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की, किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती हैं। वे कुछ दूर जाकर ही समाप्त नहीं हो जातीं, वरन् अनन्त आकाश में भ्रमण करने निकल जाती हैं। स्पष्ट है कि किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने पर उसका अन्त आरम्भ किये जाने वाले स्थान पर ही होगा। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुई अन्ततः अपने उद्गम स्रोत पर-विचार के मस्तिष्क पर वापिस लौट आती हैं। इस क्रिया-प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। अनेकों उसी स्तर की विचार बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं और जब वे वापिस लौटते हैं, तो अपने इस उत्पादन को नये आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ मिलता है।
किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं भी उठाता है और उससे अन्य अनेकों को आहार मिलता है। विचारोत्पादन भी इसी प्रकार का कृषि कर्म है। पशु अपनी-अपनी शरीर यात्रा संबंधी सोच-विचारों में ही लगे रहते हैं; इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना, इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु उनसे विचार तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर की परिधि में ही एक ढर्रे पर घूमता रहता है, उनकी भी विचार तरंगें बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार सम्मिलित रह रहा हो।
स्पष्ट है आदर्शवादी उच्च स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवाभावी लोग अपनी विचार तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ता हो। यह बात दुष्ट दुरात्माओं के बारे में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि संधियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं, जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर दें और कुमार्ग गामिता के कदम बढ़ायें।
समान विचारों के लोगों को अपने स्तर के नये विचार आकाश से मिलते रहें तो उनका बल बढ़ेगा। सजातीयता का आकर्षण प्रकृति का सर्वविदित नियम है। धातुओं के कण धूल में बिखरे रहते हैं। पर जिधर इन धातुओं की खान होती है उधर वे धीरे-धीरे सहज ही खिसकते जाते हैं। समुद्र की दिशा में ही समस्त नदियाँ बहती हैं। नदियों की तरफ नाले दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातियों की तरफ अधिक तेजी से बढ़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोर, लवार, जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं। सन्त-सज्जनों के सत्संग भी जमे ही रहते हैं। यह समान स्वभाव का आकर्षण ही है।
विचारों के क्षेत्र में भी यही होता है। जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे, वहाँ उसी स्तर की अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गई विचार तरंगें भी उड़ती हुई आयेंगी और अपना अड्डा जमा लेंगी। यही कारण है कि हर भले-बुरे विचारकर्ता को नई-नई सूझ-बूझ सहज ही मिलती चली जाती है। इसे अन्य सजातीय लोगों द्वारा छोड़े गये सजातीय विचारों का अनुग्रह-अनुदान भी कहा जा सकता है। प्रोत्साहनकारी और मार्गदर्शक विचारों की इस दुनिया में कमी नहीं। जिसे जो कुछ पसंद हो, इस विचार बाज़ार में से मनचाही वस्तु, मनमानी मात्रा में, बिना मूल्य और बिना रोक, खरीद सकता है।
हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है, जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उसी समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं। हमसे सम्पर्क उन्हीं का होता है, जिन्हें अपना रेडियो पकड़ता है। विचार तरंगों को भी रेडियो तरंगों का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती उमड़ती है और स्पर्श भी सभी को करती है। अत्यन्त सूक्ष्म प्रभाव वे सभी पर छोड़ती है, पर विशेष प्रभाव सजातीय पर ही डालती है। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हैं। यह बात दुर्जनों के सम्बन्ध में लागू नहीं होती है।
यह बात सज्जन-दुर्जनों तक ही सीमित नहीं है; दर्शन, कला और विज्ञान जैसे विषयों में भी इस तथ्य का चमत्कार देखा जा सकता है। ठीक एक ही समय में, एक ही वैज्ञानिक शोध पर, एक ही स्तर की खोज-बीन करते हैं, वे अपने प्रयोगों की पूर्णता प्राप्त न होने तक छिपाते भी हैं। पर देखा गया है कि उनमें एक ही स्तर का चिंतन, एक ही क्रम से, ऐसे ढंग से चला, मानो एक ने दूसरे की नकलची परीक्षार्थियों की तरह नकल टीप या चोरी की हो। वस्तुतः यह विशेष मनोयोगपूर्वक निःसृत विचारधारा का ही चमत्कार होता है, जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ जाने से रोका नहीं जा सकता।
शारीरिक पुण्य-पापों की तरह मानसिक पुण्य-पापों की चर्चा भी धर्म पुस्तकों में मिलती है और अनेक भले-बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं, ऐसा कहा गया है। इस प्रतिपादन में ठोस तथ्य है। हमारा चिन्तन समस्त विश्व को प्रभावित करता है। ऐसी दशा में हमारे क्रिया द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही सही, कुछ क्षति पहुँचाई गई अथवा सेवा सहायता की गई है, तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें मिलना ही चाहिए। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्त्व है, पर मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक-नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रभाव होता ही है, तो क्या परिणाम नहीं मिलेगा?
बैठे ठाले जब चाहे, जैसी कल्पनायें करते रहने में, हम स्वतन्त्र तो हैं, पर यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि यह कोई निरर्थक मनोविनोद मात्र था। विचारों की शक्ति आग या बिजली की तरह है। उसके साथ मखौलबाजी करना खतरनाक है। दुष्टता और दुराचार की कल्पना भर करते रहें, योजना भर बनाते रहें, तो भी उसी स्तर के सजातीय विचार चारों ओर से दौड़ पड़ेंगे और मस्तिष्क पर हावी हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हमारे प्रादुर्भूत विचार अनेक गुनी शक्ति सामर्थ्य से भर जायेंगे और अनेक भले-बुरे प्रभाव-परिणाम सामने आ उपस्थित होंगे। यदि हम बुरे विचारों में निमग्न हैं, तो स्वभावतः उस बुराई की अगणित प्रेरणाएँ योजनाएँ सामने आती चली जायेंगी और क्रमशः इसी दुर्गुण के लिए अपना मन प्रशिक्षित हो जायेगा। विनोद मात्र के लिए निरर्थक कल्पना समझ कर जिन उड़ानों में हम उड़ रहे थे, वे ही अपने लिए गले का फन्दा बन जायेंगी और एक दिन हमें उसी जाल-जंजाल में बेतरह डुबोकर रख देंगी। यदि कल्पना करना हो तो केवल शुभ कल्पनायें करनी चाहिए, ताकि उस मार्ग पर चलने के लिये प्रोत्साहन और बल मिलता चला जाय और समयानुसार हम उसी प्रकार की अपनी क्षमताएँ विकसित करते हुए उत्साहवर्धक प्रगति भी कर सकें।
विचार शक्ति को विद्युत शक्ति जैसी, अणु शक्ति जैसी प्रचण्ड सामर्थ्य माना जाना चाहिए और प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए कि उसका सही सदुपयोग क्या हो सकता है। धन-सम्पत्ति अपने पास हो तो उसका ऐसे ही अपव्यय नहीं किया जाता है। धन की बर्बादी करने से लोग क्षतिग्रस्त होते और उपहासास्पद बनते हैं। यही तथ्य विचारों की सम्पदा पर भी लागू होना चाहिए।
फालतू समय में कुछ भी, किसी भी प्रकार के विचार में प्रवेश करते रहें, तो मोटे तौर पर उससे कुछ प्रत्यक्ष हानि होती दिखाई नहीं पड़ती, पर यदि गम्भीरतापूर्वक देखा जाय तो प्रतीत होगा कि मस्तिष्क में उमड़ने-घुमड़ने वाले विचार मस्तिष्क को उसी अपने ही स्तर का विनिर्मित एवं प्रशिक्षित करते हैं। कुछ समय रुचिपूर्वक जिन विचारों को मस्तिष्क में स्थान दिया जायेगा, वे फिर वहाँ अपना अड्डा जमा लेंगे और उसी स्तर की अभ्यस्त विचारधारा चिन्तन के क्षेत्र में बिना बुलाये ही उमड़ने-घुमड़ने लगेगी। यह सब ऐसे ही उमड़-घुमड़, ऐसे ही समाप्त नहीं हो जाती, वरन् रुचि, रुझान और प्रवृत्तियों का निर्माण करती है। यह तथ्य है कि देर तक जिन विचारों को अपनाया गया है, वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में काम करने के लिए क्रिया-शक्ति को सहमत-तत्पर कर लेते हैं।
अवांछनीय विचारों को मस्तिष्क में स्थान देने और उन्हें वहाँ जड़-जमाने का अवसर देने का अर्थ है, भविष्य में हम उसी स्तर का जीवन जीने की तैयारी कर रहे हैं। भले ही यह सब अनायास या अनपेक्षित रीति से हो रहा है, पर उसका परिणाम तो होगा ही। उचित यही है कि हम उपयुक्त और रचनात्मक विचारों को ही मस्तिष्क में प्रवेश करने दें। यदि उपयोगी और विधेयात्मक विचारों का आह्वान करने और अपनाने का स्वभाव बना लिया जाय तो निस्सन्देह प्रगति पथ पर बढ़ चलने की सम्भावनाएँ आश्चर्यजनक गति से विकसित हो सकती है।
समस्याओं के बारे में यह मत कहो कि वे बहुत कठिन हैं। कठिन न होतीं तो समस्याएँ ही क्यों कहलातीं। कठिनाई की चर्चा किये बिना जो हल खोजते हैं वे ही उन्हें सुलझा पाते हैं।
-मार्शल फाश
महर्षि अगस्त की पत्नी लोपामुद्रा ने एक बार अपने पतिदेव के सम्मुख इच्छा व्यक्त की कि मेरा मन रत्नजड़ित स्वर्ण आभूषण पहनने का है, सो आप अपने सम्पन्न शिष्यों में से किसी से धन याचना करके मेरी अभिलाषा पूरी करें।
महर्षि बहुत दिन तक आना-कानी करते रहे, पर जब पत्नी का आग्रह बहुत अधिक बढ़ गया तो वे इस शर्त पर याचना पर जाने के लिए सहमत हुए कि जो धन दूसरों को दुःख न देकर नीतिपूर्वक कमाया हुआ हो और उचित व्यय करने के बाद शेष रहा हो, उसी को वे स्वीकार करेंगे। लोपामुद्रा ने भी कहा - अनीति उपार्जित और उचित व्यय रोक कर दिये गए धन से तो मैं भी आभूषण नहीं पहनना चाहती।
महर्षि अगस्त अपने सुसम्पन्न शिष्यों के यहाँ याचना के लिए चल पड़े। जहाँ भी गये वहीं भाव भरा स्वागत हुआ। शिष्यों ने अपने गृह गुरुदेव को आया देखकर श्रद्धा के पलक बिछा दिए और अनुरोध किया कि वे ऐसा आदेश करें, जिसे पालन करते हुए वे अपने को धन्य मानें। हर शिष्य के यहाँ उनने उनके आय-व्यय का हिसाब माँगा, उन्हें सहर्ष थमा दिया गया।
श्रेष्ठ श्रुतर्ण के बही खाते ने बताया - 'धन बहुत आया। सभी न्यायोपार्जित था। साथ ही जो कमाया गया, वह लोकोपकारी कार्यों में खर्च हो गया। निजी व्यय तो सादगी के निर्वाह जितना ही किया गया था। बचत शून्य थी।
महर्षि ने कोष पुस्तकें देखकर वापिस कर दीं और अपनी कुछ इच्छा व्यक्त किए बिना ही आशीर्वाद देकर अन्य शिष्यों के पास गये। क्रमशः वे राजा बघ्नश्व के, राजा त्रसद्दसु के पास पहुँचे। इन दोनों के ही धनाधिय (धनाढ्य) होने की बहुत ख्याति थी। महर्षि के आगमन पर वे भी फूले न समाये और कुछ आदेश करने का आग्रह करने लगे। उनसे भी हिसाब माँगा गया, जिसे प्रसन्नतापूर्वक देखा गया। ऋषि ने पाया - वे दोनों उपार्जन पूरे मनोयोग से करते हैं, पर साथ ही बचाते कुछ नहीं। कमाई के साथ ही वे श्रेष्ठ कर्मों में तत्काल व्यय करते रहते हैं। अपने लिए तो वे तन ढकने और पेट भरने भर को राशि लेते हैं।
अन्त में अगस्त मुनि अपने शिष्य इल्बल दैत्य के यहाँ पहुँचे। उसके भण्डार रत्न राशि से भरे पड़ें थे। आदेश करने पर वह सारी सम्पदा ऋषि को दे सकता था। पर जब हिसाब देखा गया, तो मिला कि उसकी सम्पदा अनीति उपार्जित है। उसमें से सत्कर्मों के लिए कुछ भी खर्च नहीं हुआ। जो खर्चा गया है, वह व्यसनों और कुकर्मों पर ही लगा है।
ऐसे धन को लेकर वे क्या करते! इस राशि के आभूषण लोपामुद्रा भी क्यों पहनती! निराश महर्षि अगस्त सारी पृथ्वी पर धनी शिष्यों का लेखा-जोखा प्राप्त करके घर वापिस लौट आए।
खाली हाथ लौटा देखकर लोपामुद्रा ने इसका कारण पूछा। महर्षि अगस्त ने बताया - जहाँ न्यायोपार्जित आजीविका थी वहाँ सत्कर्मों से सदुपयोग करने का उत्साह भी कम न था। ऐसे व्यक्ति कुछ बचा ही नहीं पाये, तो उनसे माँगे कैसे?
लोपामुद्रा ने एक नये तथ्य को समझा। अनीति का उपार्जन ही अविवेकपूर्वक संग्रहित होता रहता है और न्यायोपार्जन पर विश्वास रखने वाले उदार चित्त प्रायः खाली हाथ ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में ऋषि पत्नी ने यही उचित समझा कि आभूषणों का मोह उसे छोड़ ही देना चाहिए।
पाश्चात्य देशों में पिछले दिनों संगीत द्वारा रोग निवारण की दिशा में बहुत शोध कार्य हुआ है। तदनुसार ऐसे सूत्र ढूँढ निकाले गये हैं, जिनके सहारे विभिन्न रोगों के रोगियों की चिकित्सा विभिन्न स्वर प्रवाहों और वाद्य-यन्त्रों की सहायता से की जाती है। इंग्लैण्ड के डाक्टर मीड़ और अमेरिका के एडवर्ड पोडीलास्की ने अपनी लम्बी शोध का निष्कर्ष यह बताया कि संगीत से नाड़ी संस्थान में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना उत्पन्न होती है, जिसके सहारे शरीरगत मल विसर्जन की शिथिलता दूर होती है। मल, मूत्र, स्वेद, कफ़ आदि मल जब मन्द गति से रुक-रुक कर निकलते हैं, तो ही विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। यदि मलों का विसर्जन ठीक तरह से होने लगे, तो फिर रोगों की जड़ ही कट जाय। इस संदर्भ में किस मल का विसर्जन आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए तद्नुरूप गीतवाद्य की व्यवस्था की जा सके, तो रोगों के निवारण में सहज ही सफलता मिलेगी। संगीत चिकित्सा का यही आधार है।
सोवियत रूस के अस्पतालों में प्रो. एस. वी. फैकफ ने संगीत के प्रभाव का अन्वेषण करके यह पाया है कि उस उपचार का प्रभाव नाड़ी संस्थान की विकृतियों पर और मनोविकारों पर बहुत ही सन्तोष जनक मात्रा में होता है। डॉ. वाल्टर एच. वालसे के अनुसार जुकाम, पीलिया, अपच, यकृत शोध, रक्तचाप जैसे रोगों की स्थिति में उपयोगी संगीत का अच्छा प्रभाव होता है। जर्मनी के मनोरोग चिकित्सक डॉ. वाल्टर क्यूग का कथन है कि मनोविकारों के निवारण में संगीत को सफल उपचार के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
लन्दन की 'हॉस्पिटल एण्ड हैल्थमैन मैनेजमेंट' नामक पत्रिका में इंग्लैण्ड के छः ऐसे अस्पतालों द्वारा 'संगीत का रोगियों पर प्रभाव, विषय पर किये गये प्रयोग-परीक्षणों का विवरण छपा है, जिसमें बताया गया है कि प्रसूति गृहों में जच्चा-बच्चा की मनःस्थिति में उत्साह बनाये रखने में संगीत ने बहुत योगदान दिया और अन्य कष्ट पीड़ितों की उदासी दूर करके उनकी जीवनी शक्ति को रोग निवारण कर सकने की दृष्टि से अधिक समर्थ बनाया। अमेरिका के डाक्टर एस. जे. लोडन ने गायकों, वादकों के स्वास्थ्य का परीक्षण करके यह पाया है कि वे दूसरों की अपेक्षा कहीं कम बीमार पड़ते हैं।
संगीत को कभी मनोरंजन का एक साधन समझा जाता था, पर वैसी स्थिति नहीं रही। वैज्ञानिकों का ध्यान उसकी जीवन दात्री क्षमता की ओर गया है और उसे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की विकृतियों के निराकरण के लिए प्रयुक्त करने के प्रयोग बड़े उत्साहपूर्वक हो रहे हैं।
संगीत चिकित्सा का प्रचलन अब क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। मनोविकारों के समाधान में उसके आधार पर भारी सफलता मिल रही है। शरीरगत रुग्णता पर नियन्त्रण प्राप्त करने में भी निकट भविष्य में संगीत की स्वर लहरियाँ महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करने जा रही है। इन दिनों गीत-वाद्य का उथला उपयोग मनोरंजन और लोकरंजन तक सीमित होकर रह गया है। भविष्य में उसे एक कदम आगे बढ़कर मनुष्य की शारीरिक और मानसिक स्वस्थता का सन्तुलन बनाये रखने का उत्तरदायित्व वहन करना है। इससे आगे उसे आत्मा के महासागर में से उल्लास और आनन्द के मणिमुक्तक ढूँढकर बाहर लाने हैं।
डॉ. ऐरोल्ड आईवर का एक लेख लन्दन की मेडिकल न्यूज पत्रिका में छपा है, जिसमें उन्होंने संगीत द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण और दीर्घ जीवन की सम्भावनाओं पर शोधपूर्ण प्रकाश डाला है। उन्होंने कुछ विश्व प्रसिद्ध गायकों की सूची प्रस्तुत की है और बताया है कि पूछने पर वे लोग अपने अच्छे स्वास्थ्य का आधार अपनी संगीत प्रिय अभिरुचि को ही बताते हैं। ऐसे लोगों में उन्होंने स्विट्जरलैंड के 88 वर्षीय पियेरे मोन्टी, जर्मनी के 78 वर्षीय ओट्टो क्लेपर, इटली के 80 वर्षीय सरकेट वेर्डी के नाम का विशेष रूप से उल्लेख किया है। इन लोगों ने न केवल सिद्धान्त रूप से वरन् प्रयोग-परीक्षणों द्वारा भी यह सिद्ध किया है कि संगीत को स्वास्थ्य संवर्धन का एक महत्त्वपूर्ण आधार बनाया जा सकता है और उससे औषधि उपचार जैसा ही लाभ उठाया जा सकता है।
रूस के क्रीजिया स्वास्थ्य केन्द्र ने चिकित्सा में औषधि उपचार के साथ-साथ संगीत को भी एक उपाय माना है। इस संदर्भ में वहाँ देर से प्रयोग चल रहे है, जिनमें उत्साहवर्धक सफलता मिल रही है। अनिद्रा, उदासी, सनक जैसे मस्तिष्कीय रोगों में तो इस उपचार ने औषधि प्रयोग की सफलता को कहीं पीछे छोड़ दिया है।
शरीर पर संगीत का प्रभाव पड़ता है, यह तथ्य स्वीकार करने के साथ-साथ मनोविज्ञानवेत्ताओं का प्रतिपादन यह है कि इस आधार पर मनोविकारों के नियन्त्रण पर अधिक और अच्छी सफलता प्राप्त की जा सकती है। सनक और पागलपन के निवारण में संगीत को आवश्यक उपचार क्रम में सम्मिलित करने के लिए जोर दिया जा रहा है।
न्यूयार्क के ख्याति नामा चिकित्सक डॉ. एडवर्ड पोडीलास्की ने अपने रोगियों को गायन की शिक्षा देकर उनके फेफड़ों को मजबूत बनाने और रक्त संचार को व्यवस्थित बनाने में अच्छी सफलता पाई। वे कहते हैं स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से संगीत एक बहुत मृदुल और सुखद व्यायाम है। उसका लाभ बाल-वृद्ध, दुर्बल-समर्थ सभी अपने-अपने ढंग से प्राप्त कर सकते हैं।
एक दूसरे डॉक्टर वाल्टर एच. वालसे ने जिगर, आमाशय, आँतें और गुर्दे की बीमारी पर संगीत का उपयोगी प्रभाव स्वीकार किया है। पाचन और मल विसर्जन की क्रिया को उत्तेजित और व्यवस्थित करने में उन्होंने संगीत के प्रभाव को स्वीकार किया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वर्नर मैकफेडन भी संगीत को उपयोगी व्यायाम मानते थे। डॉ. लीक का कथन है कि यदि संगीत को एक दैनिक, शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया जा सके तो मनुष्य जाति का बहुत हित साधन हो सकता है। दार्शनिक पैथागोरस ने संगीत की उपयोगिता स्वास्थ्य-संरक्षण, चरित्र-गठन और आत्मिक-प्रगति के इन तीनों प्रयोजनों को पूरा कर सकने की तीनों दृष्टियों से स्वीकार किया है।
आमेलिटा नामक एक गायिका यूरोप और अमेरिका में बहुत ख्याति प्राप्त कर चुकी है। वह जितनी मधुर कंठी थी, उतनी ही सुन्दर और सुडौल भी। वह जीवन में कभी बीमार नहीं पड़ी। अपने स्वास्थ्य की स्थिरता का आधार वह तन्मय गायन को ही बताया करती थी। उसकी अन्य सहेलियाँ भी स्वास्थ्य, सौंदर्य और दीर्घजीवन का लाभ उठा सकीं। वे भी इसे संगीत देवता का वरदान मानती थीं।
यूनान के चिकित्सक गोलमन तथा मेरिनन अपने समय के प्रख्यात संगीत चिकित्सक थे। गायन और वाद्य के विविध उतार-चढ़ावों का आश्रय लेकर कतिपय रोगियों को कष्ट साध्य बीमारी की व्यथाग्रस्त स्थिति से छुड़ाते थे। सर्प, बिच्छू जैसे विषैले जन्तुओं के काटने पर उसके दुष्प्रभाव से मुक्ति दिलाने के लिए अभी भी विशेष वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है।
योरोप के इतिहास में ऐसे तीन सम्राटों का वर्णन मिलता है, जिन्हें पागलपन की स्थिति से छुटकारा दिलाने में औषधियाँ असफल रहीं, किन्तु संगीत ने उस प्रयोजन को पूरा किया। इंग्लैण्ड के सम्राट जार्ज तृतीय को अन्यमनस्कता - मेलेन कोलिया - ने धर दबोचा था। इसी प्रकार इसराइल के शासक - साल और स्पेन के बादशाह फिलिप पंचम लगभग पागल ही हो चुके थे। उनकी चिकित्सा कुशल कलावन्तों ने संगीत के माध्यम से की - फलस्वरूप उन्हें विपत्ति से छुटकारा भी मिल गया।
सुप्रसिद्ध संगीतकार तानसेन के बारे में यह कहा जाता है कि वे जन्मतः गूँगे थे। सात वर्ष की आयु तक उन्हें बोलना बिलकुल भी नहीं आता था। उनके पिता मकरन्द और माता कालन्दीबाई ने अपने पुत्र के गूँगेपन का उपचार करने के लिए सामर्थ्य भर उपाय कर लिया, पर कोई सफलता न मिली। अन्त में एक उपाय कारगर हुआ, उन्हें तत्कालीन मूर्धन्य गायक मुहम्मद गोस की कृपा प्राप्त हुई। वे अपने साथ-साथ तानसेन को भी गाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इस पर बच्चे की वाणी खुली। वह न केवल बोलने लगा, वरन् मधुर कंठ से गाने भी लगा। मुहम्मद गोस के बारे में कहा जाता है कि उनने अन्य कई कष्टसाध्य रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को अपने संगीत की मधुर ध्वनियाँ सुनाने का उपचार करके रोग मुक्त किया था।
उत्तर प्रदेश की रामपुर स्टेट के नवाब के यहाँ सूरज खाँ नामक एक गायक आते थे। उन्होंने संगीत के आधार पर नवाब को लकवे से मुक्ति दिलाई थी। इसी प्रकार उनने अन्य कितने ही रोगी विभिन्न राग–रागनियाँ सुनाकर रोग मुक्त किये थे।
मनुष्यों तक ही संगीत का प्रभाव सीमित नहीं है, वरन् उसे पशु-पक्षी भी उसी चाव से पसन्द करते हैं और प्रभावित होते हैं। संगीत सुनकर प्रसन्नता व्यक्त करना और उसका आनन्द लेने के लिए ठहरे रहना यही सिद्ध करता है कि वह उन्हें रुचिकर एवं उपयोगी प्रतीत होता है। अन्य जीवों की जन्मजात प्रकृति यही होती है कि उनकी स्वाभाविक पसन्दगी उनके लिए लाभदायक ही सिद्ध होती है। पशु-पक्षियों पर संगीत का अच्छा प्रभाव देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि वह मनुष्यों की तरह अन्य जीवों के लिए भी न केवल प्रिय वरन् उपयोगी भी है।
पशु मनोविज्ञानी डा. जार्जकेर वित्स ने छोटे जीव-जन्तुओं की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव का लम्बे समय तक अध्ययन किया है। घर में बजने वाले पियानो की आवाज सुनकर चूहों को अपने बिलों में शान्तिपूर्वक पड़े हुये उन्होंने कितनी ही बार देखा है। बेहिसाब उछल-कूद करने वाली चूहों की चाण्डाल चौकड़ी, मधुर वाद्य-यन्त्र सुनकर किस प्रकार मन्त्र मुग्ध होकर चुप हो जाती है, यह देखते ही बनता है।
दुधारू पशुओं को दुहते समय यदि संगीत ध्वनि होती रहे तो वे अपेक्षा कृत अधिक दूध देते हैं।
सील मछली का संगीत प्रेम प्रसिद्ध है। कुछ समय पूर्व पुर्तगाल के मछुआरे अपनी नावों पर वायलिन बजाने की व्यवस्था बनाकर निकलते थे। समुद्र में दूर-दूर तक वह ध्वनि फैलती तो सील मछलियाँ सहज ही नाव के इर्द-गिर्द इकट्ठी हो जातीं और मछुआरे उन्हें जाल में पकड़ लेते।
घरेलू कुत्ते संगीत को ध्यानपूर्वक सुनते और प्रसन्नता व्यक्त करते पाये जाते हैं। वन विशेषज्ञ जार्ज ह्वेस्ले ने अफ्रीका के कांगो देश में चिंपांजी तथा गुरिल्ला वनमानुष को संगीत के प्रति सहज आकर्षित होने वाली प्रकृति का पाया है। उन्होंने इन वानरों से संपर्क बढ़ाने में मधुर ध्वनि वाले टेपरिकार्डरों का प्रयोग किया और उनमें से कितनों को ही पालतू जैसी स्थिति का अभ्यस्त बनाया। नार्वे के कीट विज्ञानी डॉ. हडसन ने शहद की मक्खियों को अधिक मात्रा में शहद उत्पन्न करने के लिए संगीत को अच्छा उपाय सिद्ध किया है। अन्य कीड़ों पर भी वाद्य यन्त्रों के भले-बुरे प्रभावों का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया है और बताया है कि कीड़े भी संगीत से बिना प्रभावित हुए नहीं रहते।
ह्यूज फ्रेयर ने जुलूलेण्ड फार्म हाउस की एक घटना का विवरण छपाया है, जिसके अनुसार एक महिला वायलिन वादक को उस जंगल की झोपड़ी में दो भयंकर सर्पों का समाना करना पड़ा था और वह मरते-मरते बची थी। बात यों थी, कि उसे आधी रात बीत जाने पर भी नींद न आई, तो उठकर वायलिन बजाने लगी। इतने में कोबरा सर्पों का एक अधेड़ जोड़ा, उस स्वर लहरी पर मुग्ध होकर घर में घुस गया और फन फैलाकर नाचने लगा। वादन में व्यस्त महिला को पहले तो कुछ पता न चला, पर जब उसे दो छायाएँ लगातार हिलती-जुलती दिखीं, तो उसने पीछे मुँह मोड़कर देखा और पाया कि दोनों सर्प मस्ती के साथ संगीत पर मुग्ध होकर लहरा रहें है।
महिला एक बार तो काँप उठी, पीछे उसने विवेक से काम लिया और खड़े होकर वायलिन बजाती हुई उलटे पैरों दरवाजे की ओर चलने लगी। दोनों साँप भी साथ-साथ चल रहे थे। दूसरे कमरे में उसका पति सो रहा था। वहाँ उसने जोर से वायलिन बजाया - वह जगा। इशारे में महिला ने वस्तु स्थिति समझाई। पति ने बन्दूक भरी और किवाड़ों के पीछे निशाना साधकर बैठा। साँप जब सीध में आ गये, तब उसने गोली चलाई। एक तत्काल मर गया, दूसरा घायल हो गया। तब कहीं उस काल-रज्जु के रूप में आये हुए मृत्यु दूतों से महिला का पीछा छूटा।
भीलवाड़ा, राजस्थान के एक गाँव सलेमपुर का समाचार है कि वहाँ का निवासी एक युवक ट्रांजिस्टर बजाता हुआ गाँव लौट रहा था। तो संगीत की ध्वनि से मोहित एक सर्प भी पीछे-पीछे चलने लगा। बहुत दूर साथ चलने पर जब साँप का आभास युवक को हुआ, तो वह डर गया और ट्रांजिस्टर पटक कर भागा। सर्प ट्रांजिस्टर के निकट तब तक बैठा रहा जब तक कि संगीत बजता रहा। बन्द होने पर चला गया। पीछे सर्प की लकीर देखने से प्रतीत हुआ कि वह एक मील तक इस संगीत श्रवण के लिए पीछे-पीछे चला आया था।
यह घटनाएँ बताती है कि सर्प जैसे भयंकर और क्रोधी प्रकृति के प्राणी को संगीत कितना अधिक प्रभावित एवं भाव-विभोर बना देने में समर्थ है।
गन्ना, धान, शकरकन्द, नारियल आदि के पौधों और पेड़ों के विकास पर क्रमबद्ध संगीत का उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ता है। यह प्रयोग भारत के एक कृषि विज्ञानी संगीतकार डाक्टर टी.एन सिंह ने कुछ समय पूर्व किया था। कोयम्बटूर के सरकारी कृषि कॉलेज ने अन्वेषण से पौधों पर संगीत के अनुकूल प्रभाव की रिपोर्ट दी है।
मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े ही नहीं, वृक्ष वनस्पतियों पर भी संगीत का उपयोगी प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं समस्त चेतन-सृष्टि की तरह जड़-सृष्टि भी उससे प्रभावित होती है। उन्हीं तथ्यों के आधार पर संगीत को विश्व का प्राण कहा गया है।
विज्ञान अब इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि हानिकारक या लाभदायक पदार्थ उदर में पहुँच कर उतनी हानि नहीं पहुँचाते जितनी कि उसके द्वारा उत्पन्न हुआ वायु विक्षोभ प्रभावित करता है। किसी पदार्थ को उदरस्थ करने पर होने वाली लाभ-हानि उतनी अधिक प्रभावशाली नहीं होती जितनी कि उसके विद्युत आवेग संयोग।
कोई पदार्थ सामान्य स्थिति में भी जहाँ रहता है वहाँ भी विद्युत कम्पनों से कुछ न कुछ प्रभाव छोड़ता है और समीपवर्ती वातावरण में अपने स्तर का संवेग छोड़ता है पर यदि अग्नि संस्कार के साथ उसे जोड़ दिया जाये तो उसकी प्रभाव शक्ति असंख्य गुनी बढ़ जाती है।
तम्बाकू सेवन से कैन्सर सरीखे भयानक रोग उत्पन्न होने की बात निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुकी है। इस व्यसन के व्यापक बन जाने के कारण सरकारें बड़े प्रतिबन्ध लगाने से डरती है कि जनता में विक्षोभ ओर विद्रोह उत्पन्न होगा, फिर भी सर्व साधारण को वस्तु स्थिति से सचेत करने के लिए प्राथमिक कदम तो उठा ही दिये गये है। अमेरिका में सिगरेटों के पैकेट पर उनकी विषाक्तता तथा संभावित हानि की चर्चा स्पष्ट शब्दों में छपी रहती है। फिर भी जो लोग पीते हैं उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने आरोग्य और रुग्णता के चुनाव में बीमारी और अपव्यय के पक्ष में अपनी पसंदगी व्यक्त की है।
तंबाकू से कैन्सर कैसे पैदा होता है इस सन्दर्भ में जो नवीनतम खोज हुई है उससे नये तथ्य प्रकाश में आये है।
शोधकर्ताओं द्वारा निष्कर्ष यह निकाला गया है कि तंबाकू में रहने वाले रसायन उतने हानिकारक नहीं जितने कि उसके धुएँ के कारण धनात्मक आवेशों से ग्रस्त साँस का लेना। तंबाकू का धुँआ भर मुँह से बाहर निकल जाता है सो ठीक, उसके द्वारा शरीर में रहने वाली वायु पर धनात्मक आवेश भर जाता है। आवेश ही कैन्सर जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करने के कारण बनते हैं। धुँआ मुँह से छोड़ देने के बाद उसकी गर्मी और विषाक्तता समीपवर्ती वातावरण में ऐसे विद्युत करण उत्पन्न करती है जिससे साँस लेना भयंकर विपत्ति उत्पन्न करता है। सिगरेट का धुँआ उगलने के बाद साँस तो उसी वातावरण में लेनी पड़ती है। अस्तु तंबाकू की विषाक्तता विभीषिका बनकर भयंकर हानि पहुँचाती है। उस हानि से किसी प्रकार भी नहीं बचा जा सकता।
इनको ही नहीं तंबाकू पीने वालों के निकट बैठने वालों को भी उस धुँआ से होने वाली हानि भुगतनी पड़ती है इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए रेलगाड़ियों में-बसों में यह हिदायत लिखी रहती है कि यदि साथ मुशाफिरों को आपत्ति हो तो तंबाकू न पिएं। कोई स्वयं अपने पैरों कुल्हाड़ी मारे उसकी इच्छा पर यह छूट दूसरों पर आक्रमण करने के लिए नहीं दी जा सकती। तंबाकू के धुएँ से पास बैठे हुये लोगों का स्वास्थ्य बिगाड़ना एक प्रकार से अनैतिक और असामाजिक कार्य ही माना जायेगा।
आक्सीजन की समुचित मात्रा रहने पर ही वायु हमारे लिए स्वास्थ्य रक्षक रह सकती है। यदि उसमें कार्बनडाइ आक्साइड गैस अथवा अन्य विषैली गैसें बन जाय तो ऐसी वायु जीवन के लिए संकट ही उत्पन्न करेगी। कमरा बन्द करके उसमें जली अँगीठी रखकर सोया जाय तो आक्सीजन समाप्त होकर कार्बन बन जाने के कारण उसकी साँस बन्द कमरे में सोने वालों के लिए प्राणघातक बन जाती है।
साँस के लिये केवल आक्सीजन ही काफी नहीं-हवा में रहने वाले धूलिकणों का विद्युत आवेश ऋणात्मक होना भी आवश्यक है। सर्वविदित है कि वायु में छोटे-छोटे धूलिकण भरे रहते हैं। इन कणों में से अधिकांश में विद्युत आवेश चार्ज रहता है। इन आवेशित कणों को आयन कहा जाता है। धनात्मक आवेश वाले स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं और ऋणात्मक कण श्रेयस्कर सिद्ध होते हैं। जिस प्रकार स्वास्थ्यवर्धक जल-वायु प्राप्त करने की व्यवस्था स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक समझी जाती है उसी प्रकार अब विशेषज्ञ लोग यह भी सुझाव देते हैं कि ऐसी जगह रहना चाहिए जहाँ वायु में हरने वाले धूलि-कण ऋणात्मक विद्युत से आवेशित हो। प्रायः यह कहा जा रहा है कि वायु में आवेश नियन्त्रण करके बिगड़े स्वास्थ्य को सुधारने की-रोगों के निवारण की व्यवस्था की जाय। इस सन्दर्भ में काफी खोजें हुई है और अभीष्ट आवेश उत्पन्न करने वाले यन्त्र बनाये गये हैं। विद्युत चिकित्सा पद्धति पहले से भी प्रचलित थी पर अब उसमें धूलिकणों को आवेशित करके उपचार करने की एक नई प्रक्रिया “आयनिक थैरेपी” भी सम्मिलित कर ली गई है। फेफड़े से सम्बन्धित श्वास रोगों पर तथा रक्त शुद्धि एवं रक्त संचार प्रक्रिया में दोष होने के कारण उत्पन्न हुए रोगों पर तो इस पद्धति का आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिल रहा है।
यों तंबाकू खाना भी कम विपत्ति का कारण नहीं है। पर धुएँ के द्वारा जितना विष शरीर में पहुँचता है उतना ही यदि उसे खाकर उदरस्थ किया जाय तो अपेक्षाकृत कम हानि होगी। तंबाकू खाने वालों को मुँह का-गले का-फेफड़े का और पेट का कैन्सर इसलिए होता है कि उसकी अत्यधिक मात्रा पेट में ठूँस जी जाती है। धुएँ के द्वारा सिगरेट पीने वाले जितना जहर खाते हैं उतनी ही मात्रा यदि खाई जाय तो तुलनात्मक दृष्टि से पीने वालों की तुलना में खाने वालों को कम हानि उठानी पड़ेगी।
कोई वस्तु खाई जाय तो उसकी अवांछनीय विषाक्तता का बहुत कुछ भाग मुख और पेट में स्रवित होने वाले रस सम्भाल सुधार लेते हैं। सर्प का विष यदि मुँह से खाया जाय तो उतनी हानि नहीं करेगा पर यदि वह सीधा रक्त में सम्मिलित हो जाय तो मृत्यु का संकट उत्पन्न करेगा। टेट्नस के विषाणुओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। टेट्नस के कीड़े तभी संकट उत्पन्न करते हैं जब वे खुले घाव में होकर रक्त में सम्मिलित हो जायं इन्हीं कीड़ों को यदि आहार या जल द्वारा पेट में पहुँचा दिया जाय तो उसका इतना बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इन तथ्यों से यह स्पष्ट है कि वस्तुएँ आहार द्वारा सन्तुलित और बाह्य प्रभाव ही उत्पन्न कर सकती है। वे यदि सामान्य स्तर की हों तो न तो बहुत अधिक हानि ही पहुँचा सकेगी और न अत्याधिक लाभ ही उत्पन्न करेगी। शरीर उन्हें काट-छाँट कर अपने सामान्य क्रम के अनुरूप बना लेगा।
दवा-दारु गोली चूर्ण मिक्स्चर के रूप में खिलाने की अपेक्षा उन्हें इंजेक्शन द्वारा रक्त में सम्मिश्रित करना इसी दृष्टि से अधिक लाभदायक माना गया है कि औषधि रक्त में सीधा सम्मिलित होकर अपना पूरा प्रभाव डालती है और उसे पेट के रसों द्वारा होने वाला काट-छाँट का समाना नहीं करना पड़ता। रक्त में औषधि सम्मिलित करने से भी अधिक प्रभावी उपाय साँस द्वारा उसे शरीर में पहुँचाया जाना है। यज्ञ विज्ञान का सारा आधार इसी तथ्य पर विनिर्मित है।
तंबाकू पीने की हानिकारक प्रक्रिया की तरह ही यज्ञ हवन की लाभदायक प्रक्रिया का उपक्रम है यों दोनों की दिशायें एक दूसरे से सर्वथा पृथक् है। एक में हानि ही हानि है दूसरे में लाभ ही लाभ। पर दोनों का सिद्धान्त एक है। यज्ञ सामग्री में प्रयुक्त होने वाले घी शक्कर आदि पदार्थ मुख के द्वारा खाये जाय अथवा गुण कारक हव्य औषधियों का सेवन कराया जाय तो उससे होने वाले सम्भावित लाभ की तुलना में वह लाभ हजारों गुना अधिक होगा जो उन पदार्थों को वायु भूत बनाकर समीपवर्ती एवं दूरवर्ती लोगों के शरीर में प्रवेश कराया जाता है। तंबाकू के धुएँ की तरह ही हवन का धुंआ भी शक्ति शाली विद्युत आवेश उत्पन्न करता है। अन्तर इतना ही होता है कि उनमें उपयोगी तत्त्व सम्मिलित रहने से यज्ञ कर्ताओं को और समस्त समाज को लाभ पहुँचाता है जब कि तंबाकू का धुँआ अपनी मादक शक्ति से हर किसी का हर प्रकार अहित ही करता है।
मनुष्य को यदि जन्म से ही अकेला छोड़ दिया जाय तो वह बुद्धि और भावना की दृष्टि से नितान्त पशु सदृश होगा। उसमें मनुष्योचित स्वभाव, संस्कार, विचार एवं क्रिया-कलाप को काई चिन्ह न मिलेगा। हम आज जो कुछ भी हैं सामाजिक अनुदानों की विभूतियों से लाभान्वित होने के कारण हैं। विशाल मानव समुदाय की सदस्यता का जो लाभ मिला है उसी के कारण हम विविध प्रकार की भौतिक और आत्मिक उपलब्धियां प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं।
थोड़ा अधिक विचार पूर्वक देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य लगभग पूर्णतया परजीवी है। उसकी जीवन प्रक्रिया दूसरों की सहायता से चल रही है। हम दूसरों का उगाया अन्न खाते हैं। दूसरों के तैयार किये कपड़े पहनते हैं। दूसरों के बनाये घरों में निवास करते हैं। दूसरों की बनाई भाषा बोलते हैं। दूसरों की लिखी पुस्तकों के सहारे अध्ययन करते हैं। जिन उपकरणों का हम उपयोग करते हैं उनमें अपने बनाये हुए कितने होते हैं मित्र मण्डली, परिवार के सदस्य, हित सम्बन्धी, सभी तो दूसरे हैं उन्हीं के सहारे दैनिक जीवन में व्यवस्था ओर सरसता रहती है। आजीविका के लिये दूसरों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है। मानवी बुद्धिमत्ता को बहुत महत्त्व दिया जाता है सो ठीक है पर यह ध्यान रखना चाहिए कि सहयोग की मूल प्रवृत्ति ने ही बुद्धिमत्ता को विकसित किया है। मस्तिष्क कितना ही तीव्र क्यों न हो यदि उपयुक्त वातावरण न मिले, जन सहयोग उपलब्ध न हो तो मस्तिष्कीय क्षमता ऊपर से उगे अंकुर की तरह मुरझा कर नष्ट ही हो जायेगी। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की जो अतिरिक्त विशेषता है उसे बुद्धिमत्ता पूर्वक सहकारिता के नाम से ही पुकारा जाना चाहिए।
समाज में जो कुछ भौतिक और आध्यात्मिक विशिष्ट उपलब्धियाँ दृष्टिगोचर होती है वे सृजनशील व्यक्तियों द्वारा अगणित पीढ़ियों द्वारा उपार्जित और प्रदत्त अनुदान है। किसी ने आग को खोजा, किसी ने कृषि किसी ने पशुपालन, किसी ने चिकित्सा किसी ने वस्त्र, किसी ने भाषा का सृजन किया। साहित्य की तरह विज्ञान की भी अगणित धारायें है। उनका क्रमिक विकास सृजनशील मस्तिष्क ही करते आये हैं। शासन, नीति, शास्त्र, धर्म, और अध्यात्म का ढाँचा भी दूरदर्शी और चिन्तनशील मनुष्यों ने ही किया हैं। हमारी आज की चिन्तन प्रक्रिया ऐसी लगती है मानों वह स्वतन्त्र एवं उपार्जित है पर सच तो यह है कि हम किन्हीं अन्य लोगों द्वारा सृजन किये विचारों की लहरों पर ही बैठते रहते हैं विशुद्ध स्वतन्त्र चिन्तन तो कदाचित ही किसी के पल्ले पड़ता है।
न्याय और औचित्य सम्बन्धी हमारी मान्यताएँ भी अपनी नहीं है। उन्हें सामुदायिक प्रवाह ने नदी नहरों की तरह बनाया है हम तो उसके बहाव में घास फूस की तरह तिनके भर हैं। व्यक्ति के विकास में समाज का असाधारण योगदान ह- यह सुनिश्चित है, पर यह बात उससे भी अधिक सही है कि समाज का जैसा भी कुछ भला बुरा ढाँचा सामने है उसे सृजनशील व्यक्तित्वों ने ही खड़ा किया है। समाज बड़ी बात है पर उससे भी बड़ी बात है सृजनशील व्यक्तित्वों की सत्ता।
हम इस सुन्दर संसार को अगणित सुविधा साधनों से भरा पूरा देखते हैं और सुख सन्तोष के प्रचुर आधारों का उपयोग उपभोग करते हैं बारीकी से देखें तो इन उपलब्धियों के पीछे किन्हीं सृजनशील व्यक्तित्वों के अथक और तत्पर प्रयत्न ही झाँकते दिखाई देंगे।
निस्सन्देह हम प्रगति और समृद्धि के युग में रह रहे है। वैज्ञानिक आविष्कारों की धूम है। समृद्धि के साधन बढ़ रहे, शिक्षा एवं विचार विस्तार का क्षेत्र भी सुविस्तृत हो रहा है, पर यह सब कुछ मशीनी ढंग से हो रहा है। यह सब प्रसन्नता के कारण हैं पर साथ ही यह दारुण दुःख भी बड़ा रहता है कि युग की परिस्थितियों पर दूरगामी चिन्तन करने वाले और समाज को दिशा देने वाले सृजनशील व्यक्तित्वों की संख्या घटती चली जा रही है। मस्तिष्क विकसित होते रहे किन्तु ऊर्ध्वगामी प्रखरता सम्पन्न व्यक्तित्व घटते रहे तो हमारी सारी समृद्धि अन्ततः विपत्ति के रूप में ही परिणत होगी। अदूर-दर्शी बुद्धिमत्ता की अपेक्षा निपट मूर्खता कम विनाशक होती है। चतुर किन्तु दुष्ट से बढ़कर कदाचित ही कोई विनाशक तत्त्व इस धरती पर हो सकता है।
धरती के कोने कोने में आबादी आँधी तूफान की तरह बढ़ रही है। किन्तु ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर घटती चली जा रही है जो समाज को नैतिक और आत्मिक उपलब्धियाँ प्रदान कर सकें। धन उपार्जन और विज्ञान के विकास पर लोगों का ध्यान केन्द्रित है। फलस्वरूप विभूतिवान् व्यक्तित्वों का प्रवाह उसी दिशा में मुड़ चला है। लगता है नैतिक और सामाजिक मूल्यों की उपयोगिता भूला दी गई है और उस क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर काम करने की आवश्यकता नहीं समझी जा रही है। अब ऐसे अग्रणी लोग उँगलियों पर गिने जाने जितने ही मिलेंगे जिनका व्यक्तित्व मानवी चिन्तन को अधिक पवित्र और अधिक लोकोपयोगी बनाने की तप साधना में निरत हो।
उद्योग और विज्ञान के क्षेत्र में संगठित संस्थानों का बोल बाला है। उनके अंतर्गत काम करने वाले व्यक्ति क्रमशः उपकरण मात्र बनते चले जाते हैं। अच्छे वेतन और अच्छे पुरस्कार की लालसा से वे काम करते हैं और साथ के साथ अपने कर्तव्य का मूल्य चुकाते रहते हैं। ऐसी दशा में न तो वे स्वयं अनुभव करते हैं और न समाज ही ऐसा मानता है कि उनने किसी आदर्श की स्थापना की अथवा कोई अनुकरणीय आदर्श उपस्थित किया। इस प्रकार की अन्तर्दृष्टि के बिना व्यक्तित्वों में महानता उभरती ही नहीं। हम देखते हैं कि महान् व्यक्तित्वों की दृष्टि से यह धरती क्रमशः बंध्या होती चली जा रही है।
कला के क्षेत्र में अब सच्चे कला साधकों का अभाव होता चला जा रहा है। चित्रकार, साहित्यकार, कवि और गायकों के क्षेत्र में जब इस उद्देश्य से दृष्टि दौड़ाई जाय कि किसकी उद्देश्य पूर्ण साधना थी तो निराशा ही हाथ लगेगी। प्रलोभन के लिए उछल कूद करने वालों की संख्या बढ़ी है पर इससे कला का स्तर तनिक भी ऊँचा नहीं उठा। उसके प्रति विचारशील वर्ग के आकर्षण में बुरी तरह गिरावट आई है। आश्चर्य नहीं कलाकार और कला प्रेमियों को अगले दिनों बाजारू कहा जाने लगे।
शासन तन्त्र चलाने वाले राजनीति के क्षेत्र में बहुत हैं पर जनता के हृदय पर शासन करने की विभूति से वे लोग क्षीण होते चले जा रहे हैं। लोकमानस में से स्वतन्त्र चेतना, दूरदर्शिता और न्याय बुद्धि की मात्रा घट जाने का परिणाम यह हुआ है कि राजसत्ताओं की जड़ें खोखली हो रही है। गृह कलह और अन्तर्द्वन्द्वों में राष्ट्रीय सामर्थ्य का जिस तरह क्षरण हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि सृजन के लिए भावनात्मक उभार की मात्रा नगण्य सी ही बच पायेगी।
यही बात धर्म क्षेत्र के बारे में है। जगद्गुरु अथवा अवतारी कहलाने की धृष्टता पूर्ण आतुरता कितनों को ही व्यग्र किये हुए है। मठाधीशों के वैभव बढ़ रहे है। पर उज्ज्वल चरित्र, अगाध ज्ञान और सेवा साधना के आधार पर जन-साधारण की सहज श्रद्धा अर्जित करने वाले धर्मात्मा आज कहाँ हैं?
जहाँ प्रखर व्यक्तित्व होंगे वहाँ समाज का स्तर समुन्नत होगा और जहाँ समुन्नत समाज होगा वहाँ विभूति वान व्यक्तित्व आगे आयेंगे। दोनों के परस्पर आदान-प्रदान से ही शान्ति ओर समृद्धि की आधार शिला रखी जाती है न कि साधनों के अभिवर्धन होने से।
हमें विशेषतया मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का, विश्व-व्यापी सुख-शान्ति का-चिन्तन करते हुए तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए। विभूतिवान् व्यक्तित्वों का अभिवर्धन करने पर यदि समुचित ध्यान दिया जाये तो ही वह सब प्राप्त हो सकेगा जिसकी कि आज वस्तुतः आवश्यकता है।
दुनिया वैसी ही नहीं-जैसी कि हम उसे देखते हैं। सच तो यह है कि संसार के समस्त पदार्थ कुछ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती दौड़ती हलचल मात्र है। हमारी आँखों की संरचना और मस्तिष्क का क्रिया कलाप जिस स्तर का होता है उसी प्रकार की वस्तुओं की अनुभूति होती है।
हमारी आँखें जैसा कुछ देखती है आवश्यक नहीं दूसरों को भी वैसा ही दिखे। दृष्टि के मन्द, तीव्र, रुग्ण निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं। एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दीखता है तो दूसरे को दूसरी तरह का। यही बात स्वाद के सम्बन्ध में है। रोग में मुँह का जायका खराब होने के कारण हर वस्तु कड़वी लगती है। पेट भरा होने या अपच रहने पर स्वादिष्ट वस्तु का भी स्वाद बिगड़ जाता है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, हर मनुष्य के मुख के स्राव में कुछ न कुछ रासायनिक अन्तर रहता है जिसके कारण एक ही खाद्य पदार्थ का स्वाद हर व्यक्ति को दूसरे की अपेक्षा कुछ न कुछ भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यों नमक, शक्कर आदि का स्वाद मोटे रूप से खारा या मीठा कहा जा सकता है पर यदि गम्भीर निरीक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इस खारापन और मिठास के इतने भेद प्रभेद है जितने कि मनुष्य। किसी का स्वाद किसी में पूर्णतया नहीं मिलता, कुछ न कुछ भिन्नता रहती है। यही बात आँखों के संबन्ध में हैं आँखों की संरचना और मस्तिष्क की बनावट में जो अन्तर पाया जाता है उसी के कारण एक मनुष्य दूसरे की तुलना में कुछ न कुछ भिन्नता के साथ ही वस्तुओं तथा घटनाओं को देखता है।
मनुष्यों और पशु पक्षियों की आँखों की सूक्ष्म बनावट में एवं मस्तिष्कीय संरचना में काफी अन्तर है इसलिए वे वस्तुओं को उसी तरह नहीं देखते जैसे कि हम देखते हैं उन्हें हमारी अपेक्षा भिन्न तरह के रंग दिखाई पड़ते हैं।
रूस की पशु प्रयोगशाला ने बताया है कि बैल को लाल रंग नहीं दीखता, उनके लिए सफेद ओर लाल रंग एक ही स्तर के होते हैं इसी तरह मधु-मक्खियों को भी लाल ओर सफेद रंग का अन्तर विदित नहीं होता। जुगनू सरीखे कीट पतंग एक अतिरिक्त रंग अल्ट्रावायलेट भी देखते हैं जो मनुष्यों की आँखें देख सकने में असमर्थ है। पक्षियों को लाल, नीला, पीला और हरा यह चार रंग ही दीखते हैं हमारी तरह वे न तो सात रंग देखते हैं और न उनके भेद उपभेद से ही परिचित होते हैं।
ठीक इसी प्रकार हरी घास की हरीतिमा सबको एक ही स्तर की दिखाई नहीं पड़ेगी। किन्तु हमारी भाषा का अभी इतना विस्तार नहीं हुआ कि इस माध्यम से हर व्यक्ति को जैसा सूक्ष्म अन्तर उस हरे रंग के बीच दिखाई पड़ता है उसका विवरण बताया जा सके। यदि अन्तर प्रत्यन्तर की गहराई में जाया जाय तो स्वाद और रग के अन्तर बढ़ते ही चले जायेंगे और अन्ततः यह मानना पड़ेगा, कि जिस तरह हर मनुष्य की आवाज शकल और प्रकृति में अन्तर होता है उसी प्रकार रगों की अनुभूति में भी अन्तर रहता है। स्वाद के सम्बन्ध में भी यही बात है। गन्ध में भी यही अन्तर रहेगा। सुनने और छूने में भी हर व्यक्ति को दूसरे से भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यह भिन्नता बहुत ही सूक्ष्म स्तर की होती है पर होती अवश्य है।
सच तो यह है कि स्वाद की तरह रगों की अनुभूति में भी हर मनुष्य का अनुभव एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता और उसमें अन्तर होता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म होता है कि उसका वर्णन हमारी शब्दावली ठीक तरक से नहीं कर सकती। एक वस्तु की मिठास एक व्यक्ति को जैसी अनुभव होती है दूसरे को उसकी अनुभूति जैसी होगी उसमें अन्तर रहेगा और अन्तर इतना हल्का है कि सभी लोग गन्ने की मीठा कह सकते हैं पर इस मिठास को किसने किस स्तर का अनुभव किया इसकी सूक्ष्म परीक्षा व्यवस्था हो तो सहज ही यह कहा जा सकता है कि एक ने दूसरे से काफी अन्तर वाली मिठास चखी है। इसका कारण मुख में रहने वाले रासायनिक द्रवों की संरचना एवं मात्रा में अन्तर होना होता है।
हमारी आँखें जिस वस्तु का जो रंग देखती है क्या वस्तुतः वह उसी रंग की है? हमारी आँखों को जिस वस्तु का जो रंग दीखता है क्या अन्य जीवों को भी वैसा ही दीखता है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बेखटके नहीं दिया जा सकता है।
तथ्य यह है कि वस्तुतः किसी पदार्थ का कोई रंग नहीं है। अणुओं की विशेष प्रकार की संरचना ही सघन होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं जैसी बनती है अणुओं का कोई रंग नहीं। फिर रंगीनी क्या है?
वस्तुएँ सूर्य की केवल सफेद किरणों को आत्मसात् करती है और उन किरणों के किसी एक रंग को प्रतिबिम्बित करती है। पौधों की पत्तियाँ हरे रंग की इसलिए दीखती है कि वे सूर्य किरणों का हरा रंग पचा नहीं पाती और उसको उलटी कर देती है। पत्तियों द्वारा किरणों का हरा-रंग वापिस फेंक देना, यही है उनका हरा रंग दिखाई पड़ना।
तत्त्व ज्ञानियों का यह कथन एक दृष्टि से सर्वथा सत्य है कि-हर मनुष्य की अपनी दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहाँ अणुओं की धूलि बिखरी पड़ी है और वह किन्हीं प्रवाहों में बहती हुए इधर-उधर भगदड़ करती रहती है। इसके अतिरिक्त यहाँ ऐसा कुछ नहीं है जिसे स्वादिष्ट अस्वादिष्ट या रूपवान् कुरूप कहा जा सके। हमें नीम की पत्ती कड़वी लगती है पर ऊँट उन्हें रुचिपूर्वक खाता है। संभव है कि उसे वे पत्तियाँ बिस्किट या मिठाई की तरह मधुर लगती हो। वस्तुतः कोई वस्तु न मधुर है न कड़वी। हमारी अपनी संरचना ही अमुक वस्तुओं के साथ तालमेल बिठाने पर जैसी कुछ उलटी−पुलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है उसी आधार पर हम उसका रंग स्वाद आदि निर्धारण करते हैं।
यही बात प्रिय अथवा अप्रिय के सम्बन्ध में लागू होती है। अपने और बेगाने के सम्बन्ध में भी अपनी ही दृष्टि और अपनी ही मान्यता काम करती है। वस्तुतः न कोई अपना है न बेगाना। इस दुनिया के आँगन में अगणित बालक खेलते हैं। इनमें से कभी कोई किसी के साथ हो लेता है, कभी प्रिय बन जाता है, कभी प्रतिपक्षी का खेल खेलता है। इन क्षणिक संयोगों और संवेगों की बालबुद्धि में अब बहुत अधिक बड़ी अनुकूलता प्रतिकूलता उत्पन्न हो गई है। हर्ष शोक के आवेशों में घटना क्रम उतना उत्तरदायी नहीं होता जितना कि अपना मनःस्तर एवं सोचने का दृष्टिकोण। सन्त और चोर के-ज्ञानी और अज्ञानी के -दृष्टिकोण में, एक ही स्थिति के सम्बन्ध में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है उसका कारण पृथक-पृथक मनःस्थिति ही है। घटना क्रम का उतना श्रेय या दोष नहीं।
यह सत्य है कि जैसी भी कुछ भली बुरी दुनिया हमारे सामने है वह अपनी बनाई हुई है। सोचने में जो उतार चढ़ाव आते हैं उन्हीं के कारण उलझने जटिल होती है और सोचने के हेर-फेर में उलझती है। किस समस्या का समाधान क्या हो सकता है यदि यह तथ्य सही रूप से विदित हो जाय तो सामने खड़ी विभीषिकाएँ देखते-देखते नगण्य बन सकती है और तिरोहित हो सकती है। तत्त्वदर्शी इसीलिए चिरकाल से यह कहते आ रहे हैं कि हर मनुष्य अपनी दुनिया अपने दृष्टिकोण के अनुरूप विनिर्मित करता है। उसमें सन्तुष्ट असन्तुष्ट रहता है। चिन्तन और कर्तव्य को बदलकर कोई भी अपनी दुनिया के स्वरूप में सहज ही आमूल चूल परिवर्तन कर सकता है।
प्राचीनकाल में भी गृहस्थ संन्यासी, गृही-बैरागी होते थे और अब भी वही प्रक्रिया अध्यात्म मार्ग पर द्रुत गति से आगे बढ़ने वाले साधनों के लिए उपयुक्त है।
भिक्षा का अन्न वही ग्राह्य है जो उच्च संस्कारवान व्यक्तियों का है, और पूर्ण न्यायोचित, नीतियुक्त कमाया गया है। आज ऐसा अन्न मिलना प्रायः एक प्रकार से असम्भव नहीं है। अनीति उपार्जित धान्य को खाकर साधना करने से साधक की बुद्धि भी वैसी ही कुसंस्कारी बनेगी। उसे न एकाग्रता प्राप्त होगी और न शान्ति। भजन का बहाना भले ही करते रहा जाय, न उसमें मन लगेगा और न सफलता मिलेगी। ऐसी दशा में आज की स्थिति में-भिक्षा का अन्न, मुफ्त का निर्वाह एक प्रकार से सर्वथा अवांछनीय ही है। जंगलों में कन्द, मूल, फल की प्राचीन सुविधा रही नहीं। अब वे बन कहाँ है जहाँ थोड़ी कृषि उद्यान गो पालन करके निर्वाह की व्यवस्था की जा सके। ऐसी दशा में यही उचित है कि अपने हाथ-पैर के उपार्जन से गुजारा करते हुए साधनात्मक जीवन जिया जाय।
जिसका अन्न खाया जाता है उसके बदले में अपना तप उपार्जित पुण्य देना पड़ता है। मुफ्त में यहाँ कहीं कुछ भी मिलने का नियम नहीं है। भौतिक जीवन का क्रम अवरुद्ध करके मन साधन किया और जो कमाया वह अन्न, वस्त्र दाता दानी के लिए चला गया। उसमें अपने लिए क्या बचा। इसमें क्या बुद्धिमानी रही। भले ही थोड़ा भजन या सेवा कार्य किया जाय पर वह स्वावलम्बी होकर ही करना चाहिए। तभी उसमें कुछ सफलता मिलेगी।
प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि आज के साधु बाबाओं से सर्वथा भिन्न थे। उनमें से अधिकांश गृहस्थ संन्यासी-गृही विरागी थे। प्रकृति के समीप शुद्ध जल-वायु का आश्रय लेकर वे विरल प्रदेशों में रहते थे। गो पालन, फल, शाक उत्पादन आदि निर्वाह की उपयुक्त व्यवस्था वही बना लेते थे। आश्रम में स्त्री-बच्चों समेत रहते थे। अपने परिवार को भी सुसंस्कारी और लोकोपयोगी बनाते थे। साथ ही गुरुकुल, चिकित्सा तप, शास्त्र चिन्तन, आगन्तुकों को परामर्श विभिन्न विषयों के शोधकार्य जैसी प्रवृत्तियाँ वहाँ रह कर चलाते थे और आवश्यकतानुसार भ्रमण करके जन-जागरण की आवश्यकता पूरी करते थे। यही ऋषि जीवन था। संन्यास तो जीवन के अन्तिम एवं अशक्त भाग में लिया जाता था। इससे पूर्व तो वानप्रस्थ की-ऋषि-मुनि की भूमिका ही समस्त आत्म-परायण व्यक्ति निबाहते थे।
आज की युवावस्था में संन्यास परम्परा अवैदिक- अशास्त्रीय है। उसका जन्म बुद्ध काल में हुआ। समय-समय पर उस अवांछनीय उभार का खण्डन भी किया जाता रहा है। निम्न स्तर के व्यक्ति यदि उच्चस्तर का वेष धारण कर लें तो भी वस्तुस्थिति का निर्वाह नहीं हो सकता। कोई छोटा बच्चा, वृद्ध जैसी सफेद दाढ़ी मूँछ लगा ले, अशिक्षित व्यक्ति विद्वान् का वेष धारण कर ले, निर्धन होते हुए भी अमीर का स्वाँग बनाये तो यह सर्वथा उपहासास्पद ही होगा। योग्यता के अभाव में ऊँचे पद के उत्तरदायित्वों का निर्वाह हो नहीं सकेगा। फलतः अवांछनीय परिणाम ही सामने आवेंगे। आज की साधु-बाबाओं की भीड़ से केवल गड़बड़ी ही उत्पन्न हो रही है। उस पद के अधिकारी पात्र और उत्तरदायित्व का सही निर्माण करने वाले कोई विरले ही कहीं-कहीं दीखते हैं।
अध्यात्म साधनाओं के पथ पर चलने के लिये साहस करने वाले व्यक्तियों को आज की स्थिति में संन्यासी होने की-कपड़े रंगने की, घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। यदि युवावस्था हो तो गृह आजीविका उपार्जित करते हुए इस मार्ग पर चलने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। यदि आयु ढल गई है और बच्चे कमाने योग्य हो गये है, छोटे बहन-भाइयों को सम्भाल सकते हैं तो फिर वानप्रस्थ की तरह घर में रहते हुए स्वाध्याय, सेवा संयम, साधना का क्रम निर्धारित करना चाहिए। घर से कुछ दूरी भी निवास किया जा सकता है। पत्नी को भी साथ रखा जा सकता है। पर आजीविका की दृष्टि से स्वावलम्बी ही होना चाहिए।
संचित आजीविका का प्रबन्ध न हो तो सेवा कार्य के बदले पारिश्रमिक लेकर निर्वाह करना चाहिए पर मुफ्त का भोजन निर्वाह किसी भी दशा में स्वीकार नहीं करना चाहिए। सम्पर्क में कोई उदार दानी हो और अपनी सेवा सहायता करना चाहे तो उस धन को अपने लिए न लेकर लोकमंगल लिए ही लगा या लगवा देना चाहिए। प्राचीनकाल में पुरोहितों द्वारा जो प्रतिग्रह लिया जाता था वह उनके निजी काम नहीं आता था वरन् सार्वजनिक सत्प्रयोजनों के लिये ही नियोजित होता था। अभी भी उसी परम्परा को अपनाया जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य की मर्यादा जितनी अधिक सम्भव हो उतनी रखी जाय पर दुर्बल मनोभूमि के रहते उस प्रकार की प्रतिज्ञा करना अनिवार्य नहीं। हाँ साधना मार्ग पर चलने वालों को सन्तान की संख्या न्यूनतम रखने का आरम्भ से ही प्रयास रखना चाहिए। ढलती आयु में तो यह सतर्कता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। बुढ़ापे में सन्तान पैदा करना अपने साथ और उस सन्तान के साथ एक प्रकार से अत्याचार करना ही है।
प्राचीनकाल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे, स्त्री बच्चे भी साथ रहते थे उसके कुछ प्रमाण देखिये-
तारावृहस्पतेर्भार्य्या वशिष्ठस्याप्यरुन्धती।
अहल्या गौतमस्त्री साप्यनस्यात्रिकामिनी॥
देहहूती कर्दमस्य प्रसूतिर्द क्षकामिनी।
पितृणाँ मानसी कन्या मेनका साम्बिकाप्रसूः॥
लोपामुदा तथाहूती कुबेरकामिनी तथा।
बरुणामी यमस्त्री चबलेर्विन्ध्यावलीति च॥ - ब्रह्म वैवर्त पुराण
सुर गुरु बृहस्पति की भार्या का नाम तारा देवी है, वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धती है, गौतम ऋषि की पत्नी का नाम अहल्या है, अत्रि की पत्नी अनसूया नाम वाली है, देवहूति नाम वाली कर्दम की पत्नी है तथा दक्ष की पत्नी प्रसूति नाम धारिणी है। पितृगण की मानसी कन्या मेनका अम्बिका प्रसू है। लोपामुद्रा तथा आहुति कुबेर की कामिनी है यम की वरुणानी है और राजा बली की पत्नी विन्ध्यावली है।
तस्य प्रधायमानस्य कश्यपस्य महात्मनः।
ब्रह्माणोऽशौ सुतौ पश्चात् प्रादुर्भूतौ महौजसौ॥
वत्सारश्चासिश्चैव ताबुभौ ब्रह्मवादिनौ। - वायु पुराण
महात्मा कश्यप के दो पुत्र उत्पन्न हुए वात्सर और असित। वे दोनों ही ओजस्वी और ब्रह्मवादी थे।
तस्य कन्या त्विडविडा रुपेणाप्रतिमाभवत्।
पूलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत्॥
ऋषिरिडविडायान्त विश्रवाः समपद्यत। - वायु पुराण
तृतीय त्रेता युग में मुख में राजा हुआ था। उसकी इडविडा थी जो कि रूप में अप्रतिम थी। उस राजर्षि ने वह परम सुन्दरी कन्या पुलस्त्य के लिये दे दी थी। ऋषि पुलस्त्य ने इडविडा में विश्रवा को जन्म दिया।
बृहस्पतेबृहत्कीर्तिर्दे वाचार्यस्य कीर्तितः।
कन्याँःतस्योपयेमे स नाम्ना वै देववर्णिनीम्। - वायु पुराण
देवों के आचार्य बृहस्पति को बृहत्कीर्ति कहा गया है नाम से देववर्णिनी उसकी कन्या के साथ उसने विवाह किया था।
शुकस्याऽस्याभवन् पुत्राः पश्चाऽत्यन्ततपस्विनः।
भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भु कृष्णो गौरश्च पश्चमः॥
कन्याकीर्तिमतीचैवयोग माताधृतव्रता। - कूर्म पुराण
इन शुकदेव के पाँच अत्यन्त तपस्वी पुत्र हुए थे जिनके नाम भूरिश्रवा-प्रभु-शम्भु-कृष्ण और गौर थे। एक कन्या थी जो कीर्तिमती- योग माता और धतवृता थी।
अरुन्धत्याँ वशिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत्सुतम्।
शंक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्व्वज्ञस्तपतां वरः॥
आराध्य देवदेवेशमीशानंत्रिपुरान्तकम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायं प्रभुम्॥ - कूर्म पुराण
वशिष्ठ ने अरुन्धती पत्नी से शक्ति नामधारी पुत्र को ही उत्पन्न किया था। शक्ति से श्रीमान् सर्वज्ञ और तपस्वियों में परम श्रेष्ठ पराशर ने अपना जन्म ग्रहण किया था। उस पराशर महामुनि ने देवों के भी देवेश्वर त्रिपुरान्तक ईशान की समाराधना करके एक अति अप्रतिम प्रभु श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास जैसा उत्तम पुत्र प्राप्त किया था।
वशिष्ठस्तूपयेमेऽथ भागिनी नारदस्य तु ।
अरुन्धतीं वरारोहां तस्यां शक्ति मजीजनत् ॥
शक्तः शराशरः पुत्रस्तस्य वंश निभोध मे ।
यस्य द्वैपायनः पुत्रः स्वयं विष्णुरजायत ॥ - मत्स्य पुराण
वशिष्ठ ने नारद की भगिनी के साथ विवाह किया था, जिस वरारोहा का नाम अरुन्धती था। उस अरुन्धती में उसने शक्ति को समुत्पन्न किया था। शक्ति का पुत्र पराशर हुआ था। अब उसका जो भी अंश हुआ, उसे मुझसे समाज लो। जिस पराशर का स्वयं विष्णु द्वैपायन पुत्र उत्पन्न हुआ था।
अङ्गारेष्वङ्गिरा जातो ह्यार्चिभ्योऽत्रिस्तथैव च ।
मरीचिभ्यो मरीचिस्तु ततो जातो महातपाः ॥
कशैस्तु कपिशा जातः पुलस्त्यश्च महातपाः ।
केशै प्रलम्बैः पुलहस्ततोजातोमहातपाः ॥
वसुमध्यात् समुत्पन्नो वशिष्ठस्तु तपोधनः ।
भृगुः पुलोम्नस्तुसुतांदिव्यांभार्यामविन्दत ॥ - मत्स्य पुराण
अङ्गारों में अङ्गिरा उत्पन्न हुए और हुताशन की अर्चियों से अत्रि ऋषि की उत्पत्ति हुई थी और इसके अनन्तर मरीचियों से महान् तपस्वी महर्षि मरीचि उत्पन्न हुए थे। केशों से कपिश और महान् तपस्वी पुलस्त्य उत्पन्न हुए। पुलम्ब केशों से फिर महान् तपस्वी पुलह समुत्पन्न हुए। वासु के मध्य से तप के ही धन वाले वशिष्ठ ऋषि प्रसूत हुए थे। भृगु महर्षि ने पुलोमा की पुत्री को अपनी दिव्य भार्या बनाया।
एतानुत्पाद्य पुत्रास्तु प्रजासन्तानकारणात् ।
कश्यपः पुत्रकामस्तु चचार सुमहत्तपः ॥
तस्यैवन्तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौसुताविमौ ।
वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ ॥ - कुर्म पुराण
कश्यप ऋषि ने पुत्रों की कामना करते हुए इस प्रकार से प्रजा को सन्तान के कारण से पुत्रों को समुत्पन्न करके फिर सुमहान् तप किया था। उनके इस भाँति तप करने पर ये दो सुत समुत्पन्न हुए थे जिनमें एक वत्सर और दूसरा असित था। वे दोनों की ब्रह्मवादी थे।
पाण्डुश्चैव मृकण्डुश्च ब्रह्मकोशौ सतातनो।
मनस्विन्याँ मृकण्डोश्च मार्कण्डेयो बभूव हे॥
प्रजायते पूर्णमासं कन्याश्चेमा निबोधत।
तृष्टि पृष्टिस्त्विष चैव तथा चापचितिः शुभा॥
स्मृतिश्चाडिरसः पत्नी जज्ञे तावात्मसम्भवौ।
पुत्रौ कन्याश्चतस्त्रश्च पुण्यास्ता लोकविश्रुता॥
अनसूयापि जज्ञे तान् पश्चात्रे यानकल्मषान्।
कन्याँचैव श्रुति नाम माता शख्पादस्य या।
कर्म मस्य तु या पत्नी पुलहस्य प्रजापतेः॥
ऊर्जायान्तु वशिष्ठस्य पुत्रा वै सप्त जज्ञिरे।
ज्यायसी च स्वसा तेषाँ पुण्डरीका समुध्यमा॥ - वाय पुराण
पांडु और मृकण्डु ब्रह्मकोश तथा सनातन हुए। मनस्विनी में मृकण्डु से मार्कंडेय उत्पन्न हुए। मारीचि की पत्नी सम्भूति नाम वाली थी उसने अपत्य पुत्र उत्पन्न किया जो पूर्णमास उत्पन्न होता है। और उसके कन्यायें हुई उन्हें समझ लो तुष्टि, पुष्टि, त्विषा, अत्यचिति और शुभा ये कन्याएं हुईं। अंगिरा की पत्नी स्मृति ने दो पुत्र पैदा किए और चार परम पवित्र तथा लोक विश्रुत कन्या उत्पन्न की थी। अनसूया ने भी अकल्मष पाँच अत्रियों को जन्म दिया और एक कन्या उत्पन्न की जिसका नाम श्रुति था और जो शंखपद की माता थी जो प्रजापति पुलह कर्दम की पत्नी थी। ऊर्जा में वसिष्ठ के सात पुत्र उत्पन्न हुए और ज्यायसी (बड़ी) उनकी बहिन सुमध्यमा पुण्डरीका थी।
स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः।
तेषाँ विख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ सुमहौजसौ॥
दत्तात्रेयस्तस्य ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः। - वायु पुराण
स्वस्त्यात्रेय इस नाम से विख्यात वेद के पुरोगामी ऋषिगण थे उनमें विख्यात यश वाले महान् ओज से युक्त परम ब्रह्मिष्ठ दो पुत्र थे। उनमें दत्तात्रेय सबसे बड़ा था उसका छोटा भाई दुर्वासा था।
गृहस्थ में रहते हुए-स्वावलम्बी आजीविका उपार्जन करते हुए राजा जनक की तरह जल में कमल पत्र व्रत रहना सम्भव है (1) उच्च मनोभूमि (2) सत्कर्म (3) वाणी का श्रेष्ठतम सदुपयोग करना यह तीन दण्ड है। उन्हें धारण करने वाला व्यक्ति बिना वेष धारण किये त्रिदण्डी संन्यासी हो सकता है।
वस्तुतः शारीरिक और मानसिक उत्कृष्टता को धारण करना ही योगी यति होने का वास्तविक आधार है घर छोड़ देना या वेष धारण करना उसके लिए आवश्यक नहीं। प्राचीन परम्परा ऐसी ही साधना की है। जिसमें मन की क्रिया को निर्मल उत्कृष्ट बनाने पर ही सारा जोर दिया जाता रहा है। ऋषि-मुनि इसी स्तर के होते रहे है इसका उल्लेख शास्त्रों में सर्वत्र उपलब्ध है-
एवं निश्चित्य सुविधा गृहस्थोऽपि यदा चरेत्।
तदां सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ - शिव गीता
निश्चय आस्था और निर्मल बुद्धि वाला गृहस्थ भी योग साधना करते हुए निस्सन्देह सिद्धि प्राप्त करता है।
गृहस्थश्चाप्यनासक्तः स मुक्तो योगसाधनात्।
योगक्रियाभियुक्तानाँ तस्मात्संयतते गृही॥
गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सगंत्यक्त्वा चान्तरे योगमार्गे।
सिद्धे चिन्ह वीक्ष्य पश्चाद्गृहस्थः क्रीडेत्सों वै सम्मत साधयित्वा॥ - शिव गीता
योग साधना में संलग्न साधक गृहस्थ रहते हुए भी संयम पूर्वक साधना करने से सिद्धि प्राप्त करता है।
घर में रह कर स्त्री पुत्र आदि की व्यवस्था अनासक्त भाव से करते हुए योग साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है।
बाग्दण्डःकर्मदण्डश्चमनोदण्डश्चतेत्रयः।
यस्यैतैनियतादण्डाःसत्रिदण्डीमहायतिः॥ - मारकण्डेय पुराण
जिसके पास (1) वाक् दण्ड (2) कर्म दण्ड (3) मनः दण्ड है वही त्रिदण्डी है। वही महा यति है।
इन्द्रियाणि वशीकृत्य गृह एवं वसैन्नरः।
तत्र तस्य कुरुक्षेत्र नैमिष पुष्कराणि च॥
गडद्वारच्च् केदारं सन्निहत्यां तथैव च।
एतानि सर्वतीर्थानि कृत्वा पापैः प्रमुच्यते॥ - व्यास स्मृति
अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य यदि घर में ही रहे तो उसके लिए वह घर ही नैमिषारण्य, कुरु क्षेत्र एवं पुष्कर के समान है। जिसने अपने मन को जीत लिया उसके लिये गंगा द्वार, केदारनाथ आदि सभी तीर्थों का लाभ अपने पास ही मिल जाता है।
प्रपश्चमखिलं यस्तु ज्ञानाग्नौ जुहुताद्यतिः।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य सोऽग्निहोत्री महायतिः॥ - संन्यासोपनिषद् 21229
जो अपनी आत्मा में अग्नि को प्रज्वलित करता है वही सच्चा अग्निहोत्री और महायति है।
साधनात्मक पथ पर अग्रसर होते हुए विचारवान साधकों को साँसारिक और आत्मिक दोनों भूमिकाओं का समन्वयात्मक निर्वाह करना चाहिए। प्राचीन काल में भी ऋषि-मुनियों की जीवनचर्या यही थी। आज की दृष्टि से यही उचित एवं उपयुक्त है।
नाम था उसका पट्टाचारा, बहुत ही सुन्दर और चतुर। लड़की चन्द्र कलाओं की तरह बढ़ने लगी। किशोरावस्था पार भी न हो पाई थी कि वह पड़ोसी युवक के प्रेम पाश में बँध गई। माता पिता ने रोका समझाया भी पर वह मानी नहीं। रात्रि में वे दोनों प्रेमी घर छोड़कर निकल पड़े और योजनों दूर जाकर किसी नगर में रहने लगे। युवक मजदूरी करता और वे दोनों सुखपूर्वक निर्वाह करते।
इस तरह बहुत दिन बीत गये। पट्टाचारा गर्भवती हुई। उसने पति से कहा चलो पितृगृह चलें। प्रसव का प्रबन्ध वहीं ठीक तरह हो सकेगा। युवक ने सुझाया- वहाँ चलने पर क्रोध और अपमान सहना पड़ेगा सो पट्टाचारा चुप हो गयी। पुत्र-जन्मा- नाम रखा गया- रोहित सुन्दर पुत्र को पाकर दोनों का सुख और भी बढ़ गया।
रोहित दो वर्ष का हुआ था कि पट्टाचारा फिर गर्भवती हो गई। अब की बार कठिनाई अधिक थी। बड़े बच्चे को पालना और नये का प्रसव दोनों कार्य किसी की सहायता चाहते थे। सो उसने फिर पितृगृह चलने की बात कही। अब की बार युवक भी सहमत हो गया। बात पुरानी पड़ जाने से क्रोध शान्त हो गया होगा। बहुत दिन से बिछुड़ने के बाद मिलने से सभी को सन्तोष होगा और बच्चे भी पल जायेंगे। पति-पत्नी बच्चे को लेकर अपनी जन्मभूमि चल दिये।
रास्ता लम्बा था और घना बीहड़। चलते-चलते पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे तो पट्टाचारा को प्रसव पीड़ा उठ खड़ी हुई। दूसरा पुत्र जन्मा। आग की आवश्यकता पड़ी तो युवक लकड़ियाँ बीनने गया। दुर्भाग्य से सर्प ने उसे डस लिया। वापिस लौटते-लौटते उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। असहाय पट्टाचारा इस विपत्ति में किंकर्तव्य विमूढ़ हो गई। रोई भी बहुत। पर कुछ करना तो था ही। पति की लाश को उसी ने नदी में बहाया और घर चलने के लिए नदी पार करने की तैयारी करने लगी। उस समय वह बहुत अशक्त हो रही थी। दोनों बच्चों को एक साथ लेकर चलना कठिन था। सो सोचा एक एक को लेकर नदी पार करे। छोटे बच्चे को लेकर पार गई उसे पत्तों से ढका और दूसरे को लेने के लिए लौटी। इतने में दुर्भाग्य दूनी विपत्ति लेकर फिर आ धमका। नवजात शिशु को पत्तों के नीचे से कुरेद कर शृंगाल ले भागा और बड़ा बच्चा माँ के पास आतुरता से दौड़ा तो वह भी नदी में बह गया। दो घण्टों के भीतर उसका सोने का संसार उजड़ गया। पति मरा, दोनों बच्चे मरे, प्रसव कष्ट-बीहड़ बन-दूर की यात्रा-क्षुधा-निवृत्ति तक के साधनों का अभाव-एकाकीपन इन सब संकटों ने मिल कर आक्रमण किया तो बेचारी हतप्रभ हो गई। विक्षिप्त जैसी स्थिति में रोती चिल्लाती अपने पितृगृह की ओर अहर्निश चलती रही और अन्ततः किसी प्रकार मरते गिरते वहाँ तक जा पहुँची।
पितृगृह पहुँचने पर पता चला कि उसके माता पिता मर चुके थे। सास श्वसुर बीमार पड़े थे। एक भाई बचा था सो भी पहुँचने के दिन ही मरा और उसकी चिता भर जलती पट्टाचारा ने देखी। वहाँ भी सारे आश्रय समाप्त हो चुके। शोक का समुद्र ही हर दिशा में गरज रहा था। भोली लड़की इतना सहन न कर सकी और वह विलाप करते-करते पागल हो गई। भोजन वस्त्र तक की उसे विस्मृति हो गई।
श्रावस्ती के लोग उसे पकड़ कर भगवान बुद्ध के पास ले पहुँचे। भगवान ने उसे दिलासा दिया - सान्त्वना दी और भोजन, वस्त्र के अतिरिक्त समुचित विश्राम का प्रबन्ध किया।
थोड़े दिन में उसे धीरज बँधा। तब तथागत ने उसे अपने पास बुलाया और ज्ञान का अमृत बरसाते हुए कहा- शुभ्रे, यह संसार जलती हुई आग की तरह है। हम सब ईंधन की तरह हैं जो जलने के लिए ही जन्मे हैं। मरण एक अविचल सत्य है उससे बचा नहीं जा सकता। कोई कितना ही दुखी क्यों न हो, मरण रुकता नहीं। अपने अपने प्रारब्ध और समय के अनुसार सभी को आगे पीछे मरना पड़ता है। सो कौन किसके लिए शोक करे?
भद्रे, यहाँ कोई किसी का नहीं। एकाकी आगमन और एकाकी गमन के सत्य को समझो। राहगीरों के झुण्ड में क्षणिक मिलन का मोद तो मानो, पर बिछुड़न के तथ्य को भी जानो। जीव को रोज ही मिलना बिछुड़ना पड़ता है। सो सन्तुलन मत खोओ, जाने वालों को जाते देख कर अपने मरण की तैयारी में लगो। महासत्य को ढूँढ़ो और आत्मा के दुर्ग में प्रवेश कर संतापों से अपने को बचाओ।
तथागत के अमृत वचन पट्टाचारा के अन्तःकरण को बेधते चले गये। उसने शोक के परिधान उतार फेंके और महासत्य की शरण में जाने वाली व्रतधारी तपस्विनियों की पंक्ति में जा बैठी।
उस दिन लड़के के मन में घर से उच्चाटन हुआ सो जंगल में निकल गया। कुछ समय तो सुहावने दृश्य बहुत भले लगे पर पीछे से एकाकीपन खलने लगा और किसी अज्ञात आपत्ति के भय से उसका मन शंकाकुल हो उठा।
आशंका उठने की देर थी कि झाड़ी के पत्ते खड़खड़ाये। उसे नानी द्वारा सुनाई गई वनपरी की कहानी याद आ गई। हो न हो झाड़ी में भूत ही बैठा है। लड़का जल्दी घर वापिस लौटने के लिए तेजी से चलने लगा। उसे स्पष्ट सुनाई दे रहा था कि कोई पैर पर पैर रखता हुआ पीछे-पीछे बढ़ता चला आ रहा है। पीछे मुड़ कर देखा तो चमकते चाँद के कारण उत्पन्न हुई अपनी ही परछाई वनपरी की प्रतिमा बन कर अपना रूप प्रकट करने लगी।
लड़के को भरोसा हो गया कि वनपरी ही पीछा कर रही है। दिल जोर से धड़कने लगा तो पूरा साहस समेट कर वह जोर से चिल्लाया-कौन है, अपना नाम बता” ठीक उन्हीं शब्दों में बन पर्वतों से टकराती हुई आवाज गूँजी-कौन है अपना नाम बता? लड़का बेतरह डर गया। अब की बार उसने पूरी हिम्मत समेटी ओर प्रतिपक्षी को ललकारा-खबरदार-दौड़ना मत” चौगुने स्वर से प्रतिध्वनि गूँजी-खबरदार-दौड़ना मत।”
लड़का थर-थर काँपने लगा और मुट्ठी बाँध कर घर की ओर भागा। बड़ी कठिनाई से घर तक पहुँचा और जाते-जाते बेहोश हो गया। रह-रह कर वनपरी-वनपरी चिल्लाता था।
माँ ने शान्ति पूर्वक उसकी बात सुनी-और समझाया बेटा, वह वनपरी अपनी ही कुलदेवी है। वह हम लोगों की हानि नहीं सहायता करती है।
कई दिन में लड़के का डर दूर हुआ तब उसने सुनसान जंगल में रहने वाली कुलदेवी वनपरी के बारे में अधिक जानकारी देने के लिए माता से आग्रह किया।
माँ ने फिर वनपरी की बहुत बड़ाई की और कहा आज फिर उसी जंगल में जा और जोर से पुकारना स्नेह और सहायता का उपहार स्वीकार करो।
लड़का हिम्मत बाँध कर फिर गया और उसने माँ के बताये शब्द बार बार स्थान स्थान पर दुहराये। वनपरी ने ठीक उन्हीं शब्दों में दूने चौगुने उद्घोष के साथ दुहराया-स्नेह और सहायता का उपहार स्वीकार करो।
लड़का बहुत प्रसन्न था। माँ से चिपट गया और बोला- माँ उस भली वनपरी का नाम तो बताओ जो मुझे इस प्रकार दुलारती और सहायता का आश्वासन देती है।
मां ने गम्भीर स्वर में कहा- बेटा उनका नाम है- प्रतिध्वनि। पर उस में एक ही कमी है वह हमें देख अपना रुख बदल लेती है कभी वह बहुत डरावनी लगती है और कभी बहुत सुहावनी।
अमेरिकी जन-गणना बताती है कि इस देश में कुल मिलाकर 26 हजार व्यक्ति ऐसे हैं जो लगभग सौ वर्ष की आयु पर पहुँच चुके हैं जबकि सामान्य मनुष्य उससे कहीं कम आयु में प्रयाण कर जाते हैं तब इनके लिए इतनी लम्बी अवधि तक जीवित रह सकना कैसे सम्भव हुआ? इस प्रश्न का समाधान आवश्यक समझा गया और उपयोगी भी। अस्तु इस सम्बन्ध में खोज की गई महत्त्वपूर्ण उत्तर प्राप्त किये गये।
डॉ. जार्ज गैलुष और डॉ. एविनहिल ने इस खोज में विशेष दिलचस्पी ली ओर उपरोक्त 26 हजार में से 95 वर्ष से अधिक आयु के 402 के साथ विशेष भेंट का प्रबन्ध किया और दीर्घ जीवन सम्बन्धी जानकारी के लिए कितने ही प्रश्न पूछे। उन 402 में 242 पुरुष और 250 महिलायें थीं। संख्या अनुपात के हिसाब से रखी गई, क्योंकि दीर्घ जीवियों में पुरुषों की अपेक्षा महिलायें ही अधिक थीं।
आशा यह की गई थी कि ऐसे उत्तर प्राप्त होंगे जिनसे दीर्घ जीवन सम्बन्धी किन्हीं अविज्ञात रहस्यों पर से पर्दा उठेगा और कुछ ऐसे नये गुर प्राप्त होंगे जिन्हें अपनाकर दीर्घ-जीवन के इच्छुक लोग लम्बी आयुष्य भोगने का मनोरथ पूरा कर सकें। तैयारी यह भी की गई थी कि जो उत्तर प्राप्त होंगे उन्हें अनुसन्धान का विषय बनाया जाएगा और देखा जाएगा कि उपलब्ध सिद्धान्तों को किस स्थिति में किस व्यक्ति के लिए किस प्रकार प्रयोग कर सकना सम्भव है। किन्तु जब उत्तरों का संकलन पूरा हो गया तो सभी पूर्व कल्पनायें और योजनाएँ निरस्त करनी पड़ी। जैसी कि आशा थी कोई अद्भुत रहस्य मिल नहीं सके। वरन् उलटे यह प्रतीत हुआ कि - जो इस विषय में अधिक लापरवाह रहे हैं वही अधिक जिये हैं, हाँ इतना जरूर रहा है कि उनने सीधा और सरल जीवन क्रम अपनाया था।
आप लम्बी अवधि तक कैसे जिये? इसके उत्तर में 25 प्रतिशत ने कहा - हमें इसका कोई रहस्य नहीं मालूम। यह अनायास ही हो गया। 22 प्रतिशत ने इसे ईश्वरेच्छा बताया। 27 प्रतिशत ने कहा वे अपनी समस्याओं की ओर से उदासीन रहे हैं और हँसती खेलती जिन्दगी काटते रहे हैं। 26 प्रतिशत ने परिश्रमशीलता और नियमितता को कारण बताया। 11 प्रतिशत ने कहा हमारे पूर्वज दीर्घ-जीवी होते रहे हैं सो हमें भी उनकी विरासत मिली। केवल 3 प्रतिशत ने ही नियमित आहार -बिहार और जानबूझ कर दीर्घ जीवन के लिए प्रयत्नशील रहने की बात बताई। इन वृद्ध व्यक्तियों के आहार-बिहार का अन्वेषण किया गया तो इतना पता जरूर लगा कि उनमें से तीन चौथाई सादा-जीवन जीते रहे हैं उनका आहार बिहार सरल रहा है और मानसिक दृष्टि से उन पर कोई अतिरिक्त तनाव या दबाव नहीं रहा। उनने निश्चिन्त ओर निर्द्वंद्व मनन स्थिति में जिन्दगी के दिन बिताए हैं।
दीर्घ जीवन के रहस्यों का पता लगाने के लिए शरीर शास्त्री विभिन्न प्रकार के खोजे करते रहे हैं और विभिन्न निष्कर्ष निकालते रहे हैं पर यह निष्कर्ष सबसे अद्भुत है कि हलका फुलका और सीधा सरल जीवनक्रम अपनाकर भी लम्बी आयुष्य प्राप्त की जा सकती है।
पूछताछ में दीर्घायुष्य नर नारियों द्वारा जो उत्तर डॉ. गैलुप और डॉ. हिल को मिले वे आश्चर्यजनक भले ही न हो पर कौतूहल वर्धक अवश्य है। वे ऐसे नये तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं जिन पर इन नवीन आविष्कारों की खोज में आकुल व्याकुल लोगों को सन्तोष हो सकना कठिन है पर उनसे मनोरंजन हर किसी का हो सकता है और सोचने के लिए एक नया आधार मिल सकता है कि क्या सभ्यता के इस युग में ‘दकियानूसी’ पर भी दीर्घ-जीवन का एक आधार हो सकता है?
115 वर्षीय सिनेसिनोंटी ने नशेबाजी से परहेज रखा। 65 वर्षीय राज रावर्टस ने कहा उन्नत पकवान कभी नहीं रुचे। 66 वर्षीय दन्त चिकित्सक रहैटस् को सदा से मस्ती सूझती रही है। वह गवैयों की पंक्ति का अभी भी जावेवला है और अपने पुराने गीतों तथा भर्राये स्वर से लोगों का मनोरंजन नहीं कौतूहल आवश्यक बढ़ाता है।
लुलु विलियम ने बताया उनने सदा पेट की माँग से कम भोजन किया है और पेट में कभी कब्ज नहीं होने दिया। श्रीमती मौंगर 103 वर्ष की है वे कहती है आलू और रोटी ही उनका प्रिय आहार रहा है तरह तरह के व्यंजन न तो उन्हें रुचे न पचे।
स्त्रियों में से अधिकांश ने कहा अपनी चर गृहस्थी में वे इतनी गहराई से रमी रहीं कि उन्हें यह आभास तक नहीं हुआ कि इतनी लम्बी जिन्दगी ऐसे ही हँसते खेलते कट गई। उन्हें तो अपना बचपन कल परसों जैसी घटना लगता है।
106 वर्षीय हैफगुच नामक गड़रिया ने कहा उसने अपने को भेड़ों में से ही एक माना है और ढर्रे के जीवनक्रम पर सन्तोष किया है। न बेकार ही महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर पर ओढ़ी और न सिर खपाने वाले झंझट मोल लिये। केलोरडे का कथन है एक दिन जवानी में उसने ज्यादा पीली और बीमार पड़ गया। तब से उसने निश्चय किया कि ऐसी चीजें न खाया पिया जायेगा जो लाभ के स्थान पर उलटे हानि पहुँचाती है। मेर्नवोके ने जोर देकर कहा उसे भली भाँति मालूम है कि जो ज्यादा सोचते ओर ज्यादा खोजते हैं वे ही जल्दी मरते हैं इसलिए उसने मस्तक को चिन्ता और बेचैनी से सदा बचाये रखा है, लड़कपन को उसने मजबूती से पकड़ा है और इस डूबती उम्र तक उसे हाथ से जाने नहीं दिया।
यह एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया कि दीर्घ जीवी परिवार की सन्तानें भी दीर्घजीवी होती है। जिनके बाप दादे कम उम्र में चल बसते रहे हैं उनकी सन्तानें भी बहुत करके बिना किसी बड़े कारण के अल्पायु ही भोग सकी है ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे क्या रहस्य है यह निश्चित रूप से तो नहीं मालूम पर इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार के वातावरण में यह निश्चिन्तता रहती होगी कि पूर्वजों की तरह हम भी अधिक दिन जिये। विश्वास भी तो जीवन का एक बहुत बड़ा आधार है।
गहराई से इन दीर्घजीवियों के चारित्रिक स्तर का विश्लेषण किया गया तो यही तथ्य सामने आया कि उन्होंने, किसी के साथ छल, विश्वासघात या निष्ठुर व्यवहार नहीं किया, उन्होंने सज्जनता की नीति बरती और अपनी जीवन पुस्तक का हर पृष्ठ खुला रखा। छिपाने जैसी कोई घटना उनके पास थी ही नहीं। उन्होंने न किसी का बुरा चाहा और न किया। फलतः कोई भी तो उनका दुश्मन बना न रहा। कभी भी नोंक झोंक हुई भी तो वह ऐसे ही कुछ समय बाद हवा में उड़ गई। किसी अप्रिय घटना क्रम को उन्होंने मस्तिष्क में गाँठ बाँध कर नहीं रखा। बेकार की बातों को अनसुनी कर देने और भुला देने के स्वभाव ने ऐसा मानसिक तनाव नहीं पड़ने दिया जिसके कारण उन्हें उद्विग्न होकर रहना पड़ता।
नियमित व्यायाम करने वाले तो इन वृद्धों में से 10 प्रतिशत भी नहीं थे। शेष ने यही कहा हमारा दिन भर का काम ही ऐसा था जिसमें शरीर को थक कर चूर-चूर हो जाना पड़ता था, फिर हम क्यों बेकार व्यायाम के झंझट में पड़ते? वर्ग विभाजन के अनुसार आधे से अधिक लोग ऐसे निकले जो श्रम जीवी थे। स्त्रियाँ मजदूर श्रमिक थी। दिमागी काम करने पर भी दीर्घ-जीवन का आनन्द ले सकने वाले केवल 8 प्रतिशत ही निकले।
सैन फ्रांसिस्को के 203 वर्षीय विलियम मेरी ने कहा युद्धों में उसे कई बार गोलियाँ लगी और हर बार गहरे आप्रेशनों के सिलसिले में अस्पतालों में रहना पड़ा। पर मरने की आशंका कभी उसे छू तक नहीं पाई। उन कष्टकर दिनों में भी कभी आँसू नहीं बहाये वरन् यही सोचा इस स्कूल से जल्दी ही छुट्टी लेकर वह और भी शानदार दिन गुजारेगा। आशा की चमक उसकी आँखों में से एक दिन के लिए भी बुझी नहीं है।
सुगृहिणी मेरुचीने का कथन है उसने पड़ोसी परिवार के बच्चों से अपना विशेष लगाव रखा है। उन्हीं के साथ हिलमिल कर रहने में खुद को इतना तन्मय रखा है कि अपना आप भी, बचपन जैसी हर्षोल्लास भरी सरलता का आनन्द लेता रहे। शरीर से वृद्धा होते हुए भी मन से मैं अभी भी एक छोटी, लड़की ही हूँ।
दीर्घजीवियों में व्यवसाय के हिसाब से वर्गीकरण करने पर जाना गया है कि नौकरी पेशा लोगों की अपेक्षा स्वतन्त्र व्यवसायी अधिक जीते हैं। उन्हें मालिकों की खुशामदी नहीं करनी पड़ती है और न डाँट-डपट सहनी पड़ती है। उससे शारीरिक काम भले ही अधिक करना पड़े, हीनता और खिन्नता का दबाव उन पर नहीं पड़ता। कई व्यक्ति नौकरी की अवधि तक अस्वस्थ रहते थे पर रिटायर होने के बाद नीरोग रहने लगे इसका कारण था, उनने निश्चित दिनचर्या और भावी योजना अपने ढंग से बनाई थी उस पर किसी दूसरे का अंकुर या दबाव नहीं था।
बहुत जीने के लिए अलमस्त प्रकृति का होना जरूरी है। इसके बिना गहरी नींद नहीं आ सकती और जो शान्ति पूर्ण निद्रा नहीं ले सकता उसे लम्बी जिन्दगी कैसे मिलेगी? इसी प्रकार खाने और पचने की संगति जिन्होंने मिला ली उन्हीं को निरोग रहने का अवसर मिला है और वे ही अधिक दिन जीवित रहे हैं। एक बूढ़े ने हँसते हुए पेट के सही रहने की बात पर अधिक प्रकाश डाला और कहा कब्ज से बचना नितान्त सरल है। भूख से कम खाया जाय तो न ही किसी को कब्ज रह सकता है और न इसके लिये चिकित्सक की शरण में जाना पड़ सकता है।
हेफकुक ने कहा- मैंने ईश्वर पर सच्चे मन से विश्वास किया है और माना है कि वह आड़े वक्त में जरूर सहायता करेगा। भावी जीवन के लिये निश्चिन्तता की स्थिति मुझे इसी आधार पर मिली है और शान्ति सन्तोष के दिन काटता हुआ लम्बी जिन्दगी की सड़क पर लुढ़कता आया हूँ। जेम्स हेनरी ब्रेट का कथन है वह एक धार्मिक व्यक्ति हैं विश्वासों की दृष्टि से ही नहीं आचरण की दृष्टि से भी। धार्मिक मान्यताओं ने मुझे पाप पंक में गिरने का अवसर ही नहीं आने दिया। शायद सदुद्देश्य भरा क्रिया कलाप ही दीर्घ जीवन का कारण हो।
पेट्रिस अपने भूत काल की सुखद स्मृतियों को बड़े सुख पूर्वक सुनाता था। साथ ही उस बात की उसे तनिक भी शिकायत नहीं थी कि अब वृद्धावस्था में वह सब क्यों तिरोहित हो गया। उसे इस बात का गर्व था कि उसका अतीत बहुत शानदार था। वह कहता था-भला यह भी क्या कोई कम गर्व और कम सन्तोष की बात है? आज के अवसान की तुलना करके अतीत की सुखद कल्पनाओं की क्यों धूमिल किया जाय? हेन्स बेर्ड का कथन था उसने जिन्दगी भर आनन्द भोगा है। हर खट्टी मीठी घटना से कुछ पाने और सीखने का प्रयत्न किया है। अनुकूलता का अपना आनन्द और प्रतिकूलता का दूसरा। मैंने दोनों प्रकार की स्थितियों का रस लेने का उत्साह रखा और आजीवन आनन्दी बन कर रहा।
दीर्घ-जीवियों में से अधिकांश वर्तमान स्थिति में सन्तुष्ट थे। वे मानते थे बुढ़ापा अनिवार्य है और मौत भी एक सुनिश्चित सच्चाई फिर उनसे डरने का क्या प्रयोजन? जब समर्थता की स्थिति थी तो मन को स्थिति के अनुरूप ढाल कर सन्तोष के दिन क्यों न काटे।
इन में से सब लोग सदा निरोग रहे हों ऐसी बात नहीं बीच-बीच में बीमारियाँ भी सताती रही है और दवा दारू भी करनी पड़ी है। पर मानसिक बीमारियों ने उन्हें कभी त्रास नहीं दिया। लम्बी अवधि में उन्हें अपने स्त्री बच्चों तक को दफनाना पड़ा। कितनों से तलाक ली और कितनों के बच्चे कृतघ्न थे पर इन सब बातों का उन्होंने मन पर कोई गहरा प्रभाव पड़ने नहीं दिया और सोचते रहे जिंदगी में मिठास की तरह ही कड़वापन भी चलता है।
उपरोक्त अन्वेषण के आधार पर हम नये निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। हलके फुलके-सीधे सरल जीवन क्रम को अपना कर भी लम्बी आयुष्य प्राप्त की जा सकती है। भले ही बहुचर्चित स्वास्थ्य साधनों का अभाव ही क्यों न बना रहे।
हम सही हैं और दूसरे सभी गलत। हम सत्यवादी हैं और अन्य झूठे। हमारी मान्यताएँ ही खरी है दूसरों की खोटी। इस प्रकार का आग्रह रखना मनुष्य के ओछेपन ओर मिथ्या अहंकार का चिन्ह है। हमें जानना चाहिए सत्य उतना ही सीमित या छोटा नहीं है जितना कि हमने समझा या माना है उसके आगे भी बहुत कुछ हो कसता है। हो सकता है कि दूसरे लोग भी अपने विचारों के सम्बन्ध में इतने ही ईमानदार या आग्रही हों जितने कि हम। ऐसी दशा में इस विपरीतता के बीच कौन गलत है ,कौन सही, इसका, निर्णय हम स्वयं तो नहीं ही कर सकते।
वादी, प्रतिवादी यदि न्यायाधीश का ही आसन हथियाने लगे तो फिर न्याय और औचित्य की कसौटी क्या रह जायेगी? निष्पक्षता की मनःस्थिति ही सही गलत का विवेचन, विश्लेषण कर सकती है। पूर्वाग्रही लोगों का चिन्तन एकांगी और पक्षपाती होता है। ऐसी दशा में उनके आग्रह में आवेश की मात्रा ही अधिक रहेगी, विवेक की कम। कट्टरपन्थी और दुराग्रही लोग ऐसा ही रवैया अपनाते हैं और दार्शनिक प्रश्नों को लेकर वे बेतरह लड़ते झगड़ते हैं। उनका आदर्शवाद इस प्रकार अवांछनीयता की उत्पत्ति करता है जो कि यथार्थ में उसका उद्देश्य है नहीं।
हम सही हैं, हमारी मान्यताएँ औचित्यपूर्ण है यह मानने का हर मनुष्य को अधिकार है। अपनी मान्यताओं और निष्ठाओं को मनुष्य अपने ढंग से अपनाये संजोये रहे, यहाँ तक ही औचित्य की सीमा है। जब वह यह कहता है कि मेरे अतिरिक्त अन्य सब गलत या झूठे हैं तब वह विचारशीलता की मर्यादा का उल्लंघन करता है। सत्य इतना छोटा नहीं है जो एक व्यक्ति या वर्ग की सीमाओं में ही अवरुद्ध करके रखा जा सके। मनुष्य की बुद्धि कितनी ही तीक्ष्ण क्यों न हो-उसकी भावनाएँ कितनी ही अच्छी क्यों नहीं, सत्य की विशालता की तुलना में ओछी ही पड़ेगी सूर्य पृथ्वी से छोटा लगता है और वह उसके एक भाग पर ही चमकता है यह मान्यता पृथ्वी को बड़ा सिद्ध करती है और सूर्य को छोटा। फिर भी विचारशील जानते हैं कि सचाई उससे आगे है। सूर्य पृथ्वी से बहुत बड़ा है। मनुष्यों के किसी वर्ग विशेष की मान्यताएँ कितनी ही सूझ-बूझ के साथ गढ़ी गई हो उनमें कहीं न कहीं त्रुटि रहेगी ही। ऐसी दशा में सत्य शोधक को यह गुंजाइश छोड़नी ही पड़ती है कि अपनी मान्यताओं में सुधार करने की ओर प्रतिपक्षी के चिन्तन में विशिष्टता की जहाँ भी झाँकी होती हो वहाँ उचित हेरफेर कर लिया जाय।
आत्यन्तिक सत्य की ओर हम सब क्रमशः ही बढ़े हैं और बढ़ रहे हैं इसमें अधीर होने की आवश्यकता नहीं, पूर्णता तक पहुँचने की मंजिल पर हम जितना चल चुके सम्भवतः अभी उससे अधिक रास्ता नापना शेष है ऐसी दशा में हमें प्रस्तुत मील के पत्थर को ही अन्तिम क्यों मान बैठना चाहिए?
कई बार तो नैतिक प्रश्नों में विपरीतता देखकर भी हमें विवेक और धैर्यपूर्वक वस्तु-स्थिति को समझने की आवश्यकता होती है- क्षुधार्तों की प्राण क्षति बचाने के लिए किसी सम्पन्न व्यक्ति के यहाँ चोरी करने वाला व्यक्ति साधारण दृष्टि से चोर के अपराध में दण्ड प्राप्त करेगा, किन्तु मानवीय मूल्यों के आधार पर उसे निर्दोष भी समझा जा सकता और कभी तो उसे दयालु और सदाशयता के पक्ष में दुस्साहसी भी कहा जा सकता है। इसलिये नैतिक दृष्टि से उचित अनुचित का निर्णय करने में कर्ता के उद्देश्य को नापना पड़ता है। कोई धूर्त पुण्य ढोंग रच सकता है। ऐसी दशा में दार्शनिक ही नहीं नैतिक मान्यताओं के सम्बन्ध में भी हमें दूरदर्शी एवं सत्यान्वेषी दृष्टिकोण लेकर चलना चाहिए। दुराग्रही बन कर तो हम सत्य का नहीं असत्य का ही पोषण करेंगे।
योग साधना का अपना विज्ञान, रसायनशास्त्र या विद्युत विज्ञान की तरह ही है। रासायनिक कणों के सम्मिश्रण से नये गुण धर्म वाले पदार्थों के विनिर्मित होने की बात रसायनशास्त्री कहते ही रहते हैं और ऋण तथा धन प्रवाहों का मिलन किस प्रकार विद्युत धारा का सृजन संचार करता है यह विद्युत विज्ञानी बताते ही रहते हैं। योग विज्ञान का प्रतिपादन यह है कि आत्मा की असीमता जब परमात्मा की असीमता के साथ घुल-मिल जाती है तो सामान्य समझा जाने वाला मनुष्य अनेक दृष्टियों से असामान्य बन जाता है। योगी, तपस्वी, ऋषि, सिद्ध पुरुष महामानव, देवदूत प्रायः इसी स्तर के होते हैं। सिंह की खाल ओढ़कर कोई गधा वनराज बनने का उपहासास्पद उपक्रम करे यह दूसरी बात है पर यदि वस्तुतः आत्मा को परमात्मा स्तर के अनुरूप बनाने का प्रयत्न किया गया हो तो प्रगति के अनुरूप वैसी क्षमताएँ असंदिग्ध रूप से प्राप्त होती चली जायेगी जो सामान्य स्तर के लोगों में प्रायः नहीं ही पाई जाती।
चरित्रवान, सन्मार्ग पर दुस्साहसपूर्वक चलने वाले, लोक मंगल के लिए आत्म समर्पण कर्ता, तत्त्वदर्शी, युगान्तरकारी, एवं उपयुक्त नेतृत्व कर सकने में समर्थ व्यक्ति प्रायः इसी स्तर के होते हैं, जब कि सामान्य नर कीटकों को पेट और प्रजनन से ही फुरसत नहीं। कृपणता किसी सत्कर्म में कोई कहने लायक अनुदान नहीं देने देती तब धारा चीरकर उलटी दिशा में चल पड़ने का साहस दिखा सकना, निश्चय ही बड़ा कठिन काम है। इस कठिनाई पर विजय आत्मबल के आधार पर ही पाई जा सकती है। ऐसी देव स्तर की आत्मशक्ति को प्राप्त कर सकना एक उच्चस्तरीय चमत्कार ही समझना चाहिए। ऐसे सिद्ध पुरुष अपने व्यक्तित्व से जन-मानस को उलट देने और युग के प्रवाह को पलट देने का जो कार्य कर दिखाते हैं उसका अणिमा, महिमा-लघिमा आदि के नाम से जानी जाने वाली ऋद्धि-सिद्धियों से कम नहीं वरन् अधिक ही मूल्याँकन किया जा सकता है।
अनिवार्य तो नहीं, पर योग की कोई कोई शाखा ऐसी भी है जिसका आश्रय लेकर कोई विशेष व्यक्ति अपने शरीर या मन में असाधारण दीखने वाली क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। इनसे भले ही उस साधक को अथवा दर्शक को कोई विशेष लाभ न हो पर यह प्रमाणित तो हो ही जाता है कि योग साधना के आधार पर सामान्य स्तर से ऊँचा उठकर असामान्य बना जा सकता है। समय समय पर ऐसे कौतुक कौतूहल देखने को भी मिलते रहते हैं, जिनसे योग साधना के द्वारा प्रत्यक्ष देखे जा सकने वाली असामान्य उपलब्धियों का आभास मिलता है।
पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के समय एक योग चमत्कार संबंधी घटना का उल्लेख एक अंग्रेज सर क्लावडे वोडे ने किया है। घटना सन् 1839 की है एक साधु ने भूमिगत समाधि लेने की अपनी विशेषता का परीक्षण कराया जो महाराजा की देख-रेख में सम्पन्न हुआ। साधु के निर्देशानुसार उसे जीवित अवस्था में एक सन्दूक में बन्द किया गया और सन्दूक समेत जमीन में गहरा गाड़ दिया गया। गड्ढे के ऊपर से चूने का पलस्तर कर दिया गया। छः सप्ताह तक एक एक घण्टे की ड्यूटी लगाकर दिन-रात के पहरेदार नियुक्त किये गये ओर उनके ऊपर एक निरीक्षक अफसर रखा गया ताकि किसी प्रकार की चालाकी या सन्देह की गुँजाइश न रहे।
छह सप्ताह की नियत अवधि पूरी होने पर गड्ढा खोला गया। साधु निर्जीव था। फिर भी उसके पूर्व निर्देशों के अनुसार जीवन वापिस लाने के प्रयत्न किये गये। हाथ पैरों के जकड़े हुए जोड़ों पर गरम पानी की धारा छोड़ी गई। पीठ की मालिश की गई। माथे को आटे की गरम पुलटिस से सेंका गया। नाक और कान में भरी रुई निकाली गई, आँखों में घी आँजा गया, पीठ ओर सीने पर हलकी मालिश की गई। फलतः शरीर में हरकत आरम्भ हुई। साँस चली नाड़ी धड़की और धीरे-धीरे वह साधारण स्थिति में आ गया? साधु ने राज मण्डली से पूछा आपको योग की शक्ति पर विश्वास हुआ या नहीं? दरबारी क्या कह सकते थे, उनने स्वीकृति सूचक सिर ही हिलाया।
सर क्लावडे वोडे उन दिनों भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी थे। उनने अपनी जानकारी में घटी इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है भारत में ऐसे ज्ञात और अविज्ञात योगियों की कमी नहीं जो ऐसे आश्चर्यजनक करतब प्रस्तुत कर सकते हैं। जिनका सामान्य शरीर विज्ञान की दृष्टि से कोई समाधान नहीं सूझता।
स्वामी विशुद्धानन्द जी की चमत्कारी सिद्धियों के बारे में कल्याण पत्रिका में जो विवरण प्रकाशित हुआ है उससे उनकी विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है। कहा गया है कि वे हाथ रगड़ कर मन चाहे पुष्पों की सुगन्ध उत्पन्न कर देते थे। उनके शिष्यों द्वारा अनेक प्रकार की सुगन्धों की फरमाइश करना और तत्काल वैसी ही उत्पन्न हो जाना कम आश्चर्यजनक नहीं था। एक वस्तु की दूसरे रूप में परिवर्तित करने की विद्या को वे सूर्य विद्या बताते थे। उन्होंने उसे प्रमाणित भी किया था। उनने एक फूल उठाया और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी से एक एक अलग फूल उत्पन्न कर दिया। रुई के टुकड़े को सफेद से लाल रंग का और फिर पत्थर जैसा कठोर बना दिया। खजूर के हरे भरे पत्ते को उन्होंने पत्थर जैसा बना दिया। स्वामी जी का कहना था कि यह कोई जादू नहीं विशुद्ध विज्ञान है। सूर्य की सूक्ष्म शक्ति के साथ यदि साधना द्वारा संपर्क बना लिया गया तो उसके सहारे प्रकृति के पदार्थों के हेर-फेर करने की विद्या करतलगत हो सकती है।
भारत में तथा अन्य देशों में ऐसे योगाभ्यासी रहे हैं जो अपनी इच्छा शक्ति के प्रयोग से शरीर की गतिविधि में असामान्यता ला सकते हैं। इस स्तर के लोगों में पिछले दिनों यहूदी मनुदीन फ्रेंच महिला हुगुनेर-फिनिश ओवेसेडर आदि के नाम प्रख्यात रहे हैं। वे योग से शारीरिक स्थिति में क्या विचित्रता लाई जा सकती है उसका खुला प्रदर्शन करते थे।
अभी भी ऐसे योग-साधकों की कमी नहीं जो आश्चर्यजनक चमत्कार दिखाते हैं। कुछ समय पूर्व अमेरिकी टेलीविजन पर मैसूर के हठयोगी श्रीराव को नाइट्रिक एसिड पीते हुए दिखाया गया था।
डॉ. ब्रोरो, डॉ. बेगनर, डॉ. बेकची, डॉ. चेना प्रभृति शरीर शास्त्रियों ने इस सम्बन्ध में कितने ही योगाभ्यासियों से भेंट की और पाया कि उनमें सामान्य मनुष्यों की तुलना में शरीर पर असाधारण नियन्त्रण कर सकने की अतिरिक्त क्षमता विद्यमान् है। हृदय की धड़कन को घटा देना, नाड़ी की गति अति मन्द कर देना, शरीर के किसी भी भाग से पसीना निकला देना, माँस-पेशियों को कड़ी कर देना, एक निश्चित समय के लिये प्रगाढ़ मूर्छा की स्थिति में चले जाना, किसी अवयव को सुन्न कर लेना, अखाद्य खाना और उन्हें पचा जाना, तापमान एवं रक्तचाप बढ़ा लेना वजन घटा या बढ़ा देना।
लन्दन में एक भारतीय योगी ने सन् 1928 में एक सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उसने नाड़ी की गति को न्यूनतम 20 और अधिकतम 120 करके डाक्टरों को आश्चर्यचकित कर दिया था। वह अपनी माँस-पेशियों और त्वचा को इतनी कड़ी कर लेता था कि सामान्य हथियार के प्रभाव का भी उन पर कुछ प्रभाव न पड़े।
योग आत्मा और परमात्मा के मिलन को कहते हैं। मिलन का नाम ही योग संयोग है। जीव प्रायः पेट और प्रजनन के गोरखधन्धे में उलझा हुआ वासना तृष्णा की कीचड़ चाटता रहता है। आदर्शवादिता और उत्कृष्टता उसकी आँख से ओझल ही बनी रहती है। उसी भ्रमजाल को काटने का नाम योग साधना है। शारीरिक बल-वर्धन के लिये आसान प्राणायाम के नेति, धोति, वस्ति आदि की प्रक्रिया अपनाई जाती है। मानसिक क्षमता विकास के लिए ध्यान धारण ओर प्रत्याहार की एकाग्रता मूलक साधना प्रयोगों को काम में लाया जाता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन उससे ऊँचा है। अपनी आकांक्षा की भावना को संकीर्ण स्वार्थ परता की परिधि से ऊँचा उठाकर जब उत्कृष्ट दैवी प्रेरणाओं में नियोजित किया जाता है तो वह भाव योग की साधना नर को नारायण ही बना देती है तब उसके चमत्कार बाजीगरी, कौतुक, कौतूहल जैसे न रह कर इस स्तर के होते हैं जिनसे विश्व में सुख-शान्ति का संवर्धन सम्भव हो सके।
सिंह जैसी खूँखार और क्रूर प्रकृति के प्राणी को भी स्नेह सौजन्य के बन्धनों में बाँधा जा सकता है और उसे मृदुलता एवं सौजन्य के ढाँचे में ढाला जा सकता है।” यह सिद्धान्त या आदर्श ही नहीं एक व्यवहार भी है जिसे हॉलैण्ड निवासी एक बन संरक्षक दम्पत्ति ने अफ्रीका में साकार करके दिखा दिया।
उन्होंने समय समय पर छः सिंह शावकों को उन्मुक्त वातावरण में पाला और बड़ा किया। स्नेह दिया और स्नेह पाया। विश्वास किया और विश्वास पाया। परम्परा गत क्रूर प्रकृति को सौम्य सौहार्द में बदला जा सकता है या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर दार्शनिक विवाद के रूप में नहीं वरन् प्रत्यक्ष उदाहरण के साथ पिछले ही दिनों प्रस्तुत किया गया है।
सिंहों के बारे में आमतौर से इतना ही जाना गया है कि वे बड़े भयंकर बलवान और क्रूर होते हैं। अपनी सशक्तता ओर क्रूरता से सारे बन प्रदेश को आतंकित रखते हैं। उनसे सभी वनचर भय खाते हैं। अस्तु आतंकवादियों को भूतकाल में जैसे शासक मानने की परम्परा थी उसी के अनुसार सिंहों को भी ‘वनराज’ कहते हैं। यद्यपि उस क्षेत्र की शासन व्यवस्था तथा सुविधा संचालन में उनका कोई योगदान नहीं होता।
सिंह स्वच्छता प्रिय प्राणी है। भोजन के बाद वह अपने मुँह के बाहरी भाग को पंजों और जीभ से चाट कर इस तरफ साफ करता है जैसे हम भोजन के बाद साबुन पानी और तौलिया की सहायता से मुँह ओर हाथ की सफाई करते हैं। गन्दगी उसे बिलकुल नापसन्द है। इसी प्रकार सिंह अपनी जाति वालों की हत्या नहीं करते जबकि मनुष्यों ने अगणित मनुष्यों को लड़ाइयाँ लड़कर मृत्यु के मुख में पहुँचाया है।
इंग्लैण्ड निवासी मि. जार्ज नेशनल पार्क के वरिष्ठ वन अभियन्ता के पद काम करते थे। उनका निवास अधिकतर इन्हीं के साथ रहा। उनकी पत्नी का नाम था- जाय एडमसन। इस युगल दम्पत्ति को स्वभावतः वन जीवों से प्रेम था पर जाय एडमसन तो उनके साथ इतनी अधिक घनिष्ठता स्थापित करने में सफल हुई कि उन्हें वनदेवी ही समझा ओर कहा जाने लगा।
संसार का सबसे बड़ा चिड़िया घर तंज़ानिया। पूरी लम्बाई 280 मील और क्षेत्रफल 4500 वर्ग मील है। ऊँचाई समुद्र तल से 4 हजार से लेकर 23 हजार फुट है। वन जीवों के लिए बने इस उन्मुक्त उद्यान को देखने के लिए संसार भर से लाखों यात्री लम्बी यात्राएँ करके आते हैं। कुछ समय पूर्व उसमें जानवरों की संख्या 366980 जाँची गई थी। और अनुमान था दस हजार के करीब ऐसे होगे, जो गिने नहीं जा सके। इसी उद्यान के पशु संरक्षक थे मि. जार्ज।
एक दिन गश्त पर गए पार्क के एक वन-रक्षक कर्मचारी की खोज खबर ली गई और पाया गाया कि उसे किसी सिंह ने मार डाला। बची हुई लाश से लेकर जहाँ तक सिंह के पंजे गये थे वहाँ तक पीछा किया गया और अन्ततः झाड़ी में छिपी सिंहनी को ढूँढ़ निकाला गया। मनुष्य के रक्त का एक बार चस्का लग जाने पर सिंह प्रायः नर भक्षी हो जाते हैं। इस संकट से बचने के लिए उन्हें समाप्त ही करना पड़ता है जार्ज को यही करना पड़ा। वन अभियन्ता के उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए यह आवश्यक भी था कि वे उस नर-भक्षी को समाप्त करें। वे सधे हुए निशानेबाज थे सो गोलियाँ चलाकर आसानी से उस नर भक्षी को ढेर कर दिया।
मृत सिंहनी के माँद में कुछ ही दिन के जन्मे बहुत छोटे तीन बच्चे पाये गये। जार्ज को न जाने क्या सूझी कि वे उन बच्चों को पकड़ लाये और पत्नी के सामने खिलौनों के रूप में प्रस्तुत किया। उस समय उनका प्रयोजन कुछ समय मन बहलाने भर का था। सिंहों को पालने की बात उनके मस्तिष्क में रही भी नहीं थी। इतना बड़ा दुस्साहस करने और झंझट मोल लेने की उनकी तनिक भी इच्छा नहीं थी।
पत्नी ने पहले तो सिंह शावकों को आश्चर्य से देखा पीछे वे डरी किन्तु बाद में उनका वात्सल्य उभर आया और माता सदृश सहृदय व्यवहार करने लगीं। उन्होंने तीनों बच्चों को उसी चाव दुलार से पालना शुरू कर दिया जैसे कोई अपने बच्चों को सम्भालता है। आरम्भ में उन्हें दूध पीना सिखाना तक बड़ा कठिन प्रतीत हुआ। मुँह में रबड़ की नली डालकर दूध पिलाया गया। एक बार तो लगा कि वे इसके अभ्यस्त न हो सकेंगे ओर भूखों मर जायेंगे पर पीछे उन्हें समझ आई ओर दूध पीने को तैयार हो गये। इस सुधार के कारण ही उन्हें मृत्यु के मुख से बचाया जा सका।
कुछ ही महीनों में बच्चे उछलने कूदने लायक हो गये। परिवार के सदस्यों की तरह वे रहने में तो अभ्यस्त हो गये थे पर अपनी उछलने कूदने की आदत को क्या करते। घर में रखी वस्तुओं को मौका पाते ही वे तोड़ फोड़ डालते और फाड़ चीर कर रख देते। लालन पालन से भी यह कठिनाई अधिक बड़ी थी। इस शिर दर्द को हलका करने के लिए घर के एक हिस्से में उनके लिए बाड़ा बनाया गया, पर बन्द करते ही वे आसमान सिर पर उठा लेते और बाहर निकलने के लिए बेतरह हैरान करते। जार्ज महोदय उन्हें जल्दी ही किसी चिड़ियाँ घर में भेज देने के पक्ष में थे। उनकी पत्नी ने एक बच्चे को अपने पास ही रखने का आग्रह किया। निदान दो बच्चे हवाई जहाज से हॉलैण्ड के चिड़ियाँ घर के लिए भेज दिये गये। एक घर पर रखा गया। यह मादा थी। उसका ना रखा गया -एल्सा।
जाय एडमसन ने उस छोटी सिंहनी को अपनी दत्तक पुत्री की तरह पालना शुरू किया। वे अपने हाथ से उसे भोजन कराती। उसी के लिए बनाई गई चारपाई पर सुलाती, मच्छरों से बचाने के लिए मशहरी लगातीं। सर्दी न लग जाय इसके लिए रजाई ओढ़ाती। इस प्रेम व्यवहार से प्रभावित हुए बिना एल्सा भी न रह सकी। वह अपनी इस नर शरीर धारी मौसी के कृतज्ञता पूर्ण हाथ पैर चाटती, गोदी में जा बैठती, और सिर खुजलाए जाने का आनन्द लेती। बिल्ली की तरह वह पीछे ही लगी फिरती। इन मौसी भतीजी में प्यार का रिश्ता दिन-दिन सघन होता गया और स्थिति यहाँ तक पहुँची कि कभी एल्सा अपना सिर जाय एडमसन की गोदी में रखकर घण्टों निद्रा मगन रहती और कभी मौसी को तकिया बना एल्सा चुपचाप पड़ी रहती।
जब तक तीनों बच्चे साथ रहे तब तक उन्हें बहुत प्रसन्नता रही। पर जब दो बच्चे हॉलैण्ड भेज दिये गये तो एल्सा अकेलापन महसूस करके उदास रहती। वह अपनी बहिनों को ढूँढ़ने दूर तक आस-पास को झाड़ियों में जाती और जब वे नहीं मिलते तो दुखी होकर वापिस लौट आती। जिस गाड़ी में बिठा कर उसकी बहिनों को हवाई अड्डे तक पहुँचाया गया था उसे वह पहचान गई थी वस्तु उस से सदा दूर रहती उसे भय हो गया था कि कही वही गाड़ी उसे भी कही न भगा ले जाय। भाई-बहिनों का प्यार सिंह शावकों में आमतौर से नहीं होता।
दो वर्ष बाद एडम्स दम्पत्ति हॉलैण्ड के अजायब घर में भी दोनों सिंहनियों को देखने गये। कई वर्ष तक बिछुड़े रहने के बाद भी जब दोनों ने एक दूसरे को देखा तो प्यार की मधुर स्मृति बह निकली। दोनों सिंहनियाँ कटघरे के पास एडम्स से सट कर आ खड़ी हुई और संतुष्ट नेत्रों से उन्हें चाटती रही। उन्होंने भी अपनी इन पोष्य सन्तानों की पीठ पर देर तक हाथ फिराने का क्रम जारी रखा दर्शकों के लिए यह दृश्य अनोखे कौतूहल का विषय था।
यों एल्सा की चारपाई अलग रखी गई थी और जार्ज दम्पत्ति की चारपाईयों के पास ही था। फिर भी उससे अलग सोने में सन्तोष न होता और यह प्रयत्न करती कि अपनी खाट छोड़कर उन्हीं के पलंग पर जा सोये। कई बार तो उसे गहरी नींद में से जगाना उचित न समझा जाता तो वे लोग अलग सोकर किसी प्रकार गुजर करते। यों भोजन उसे स्वयं ही करने को दिया जाता था पर वह चाहती यह भी कि उसे प्यार पूर्वक हाथ से खिलाया जाय। जब इसकी इच्छा पूरी न होती तो ही उदास मन अपने आप खाना खाती।
यह स्नेह सद्भावना का ही चमत्कार था कि सिंह की क्रूरता इस कदर मृदुल हो गई कि उसको परम्परागत आक्रमणकारी स्वभाव में ममता और आत्मीयता के गहरे अंकुर जम गये और उसकी भयंकरता एक प्रकार तिरोहित हो गई।
वातावरण ने एल्सा की प्रकृति ही बदल दी थी, वह मास तो खाती थी पर शिकार मारना नहीं आता था। जाय एडमसन के घर के आस-पास तरह-तरह के पक्षी और हिरन, जिराफ़ आदि पशु निर्भय होकर घूमते रहते थे। उसने कभी किसी पर हाथ साफ नहीं किया। मरे हुए जानवर जब सामने डाले जाते तो वह भली प्रकार देख लेती कि कही यह जीवित तो नहीं है। उसने अपनी प्रकृति में शाकाहारी भोजन को सम्मिलित कर लिया था। रोटी, सब्जी और फल भी उसे प्रिय लगते थे, और उन्हें वह चावपूर्वक खाती थी।
एल्सा को बहुत से शब्दों का और इशारों का अर्थ मालूम हो गया था। इसलिए उसे कुछ निर्देश करना उतना कठिन नहीं रह गया था। जो उसे कहा जाता उसे वह कभी उत्साहपूर्वक, कभी आलस के साथ पूरा करती थी। अवज्ञा तो उसने शायद ही कभी की हो।
एल्सा क्रमशः बड़ी होती चली गई। दूसरे लोग उसे शेरनी समझ कर डरते पर वस्तुतः उसका आदत बहुत की सौम्य थी। आक्रमण करने की बात उसे सूझती ही न थी। ऐडम्स वन यात्रा पर जाते तो अपने काफ़िले के साथ एक पतली जंजीर में बाँधकर उसे भी ले जाते। गधे, खच्चर, कुत्ते, आदमी और यह पालतू शेर जब बिना किसी भेद भाव के आपस में नोंक-झोंक करते हुए रास्ता काटते तो किसी को भी ऐसा नहीं लगता था कि कोई खतरा साथ चल रहा है।
धीरे-धीरे एल्सा प्रौढ़ हो गई। उसके भीतर प्रौढ़ता की उमगे उभरी और साथ की आवश्यकता अनुभव करती हुई व्याकुलता प्रदर्शित करने लगी। जार्ज ने उसकी मनःस्थिति को समझा और जंगल के उस क्षेत्र में जा छोड़ा जिधर सिंह रहा करते थे। यौवन गन्ध के आकर्षण ने उसे सिंह साथी मिला दिया और वह फिर उधर ही रहने लगी।
एल्सा इन उलझन भरे दिनों में भी अपनी मौसी को भूल नहीं पाती थी और उनसे मिलने जा पहुँचती थी पर साथ में क्रूर प्रकृति का साथी रहने के कारण उसे वहाँ से जल्दी ही भगा दिया जाता या भागना पड़ता।
सिंह जाति की सुहागरातें भी विचित्र होती है। वे लगातार चार-पाँच दिन तक हर दिन कई कई बार जोड़ा मिलाते रहते हैं। तब कहीं वे गृह स्थापना में सफल होते हैं। इन दिनों सिंह दम्पत्ति अपने ही गोरखधन्धे में उलझे रहते हैं और खाने पीने तक की सुध भूल जाते हैं। एल्सा की लगातार गैर हाजरियों से जाय एडम्सन को बहुत चिन्ता हुई पर जब उसे सिंह प्रणय प्रक्रिया की जानकारी मिली तो चुप हो गई। गर्भधारण करने के उपरान्त फिर नया क्रम चलने लगा। एल्सा को पतिव्रता धर्म के अनुसार अधिक समय तो ससुराल में ही रहना पड़ता था, पर नैहर को सर्वथा छोड़ बैठने को भी तैयार न हुई। पति ने आखिर समझौता कर लिया और ससुराल तक अपनी नव वधू को हर रोज पहुँचाने ओर वापिस लाने के लिए सहमत हो गया।
एल्सा अपने पति के साथ रहती तो भी उसे अपने नैहर की याद भूलती न थी। वह सायंकाल एक फेरी लगाने जरूर आती । उसका पति भी साथ आता पर वह दूर ही बैठा रहता और यह इन्तजार करता रहता कि उसकी पत्नी कब वापिस आये और कब घर चले। बहुत दिन बाद वह भी बँगले को पहचान गया तो ससुराल में स्वादिष्ट भोजन पाने के लालच में कुछ आगे तक खिसक आता और स्वागत सत्कार का लाभ लेकर फिर पीछे खिसक जाता। ऐडम्स परिवार के साथ वह घनिष्ठता तो न जोड़ सका पर इतना जरूर समझ गया कि यह हमारे शुभ-चिन्तकों का घर है। इसलिए उसने न तो कभी इस क्षेत्र में स्वयं कुछ उपद्रव किया और न किसी अन्य सजातीय को इधर पैर रखने दिया। वह घर-जमाई तो न बन सका पर वफादार सुरक्षा अधिकारी तो आजीवन ही बना रहा।
गृहस्थ बन जाने के बाद एल्सा यों वनवासी हो गई थी और उसका निश्चित निवास पति गृह बन गया था तो भी वह अपने मौसी-मौसा को भूली नहीं और न वे लोग ही उसे भुला सके। जार्ज और जाय ऐडम्सन जब कभी बन बिहार को जाते एल्सा से भेंट करने का उनका प्रोग्राम अवश्य रहता। उन्हें पता रहता था कि वह किधर कहाँ होनी चाहिए। अस्तु वे पुकार लगाते और देखते कि एल्सा किधर से भी दौड़ी चली आ रही है और उनसे लिपटकर अपनी पूर्व स्थिति पर आँसू बहा रही है। यों उसे गृहस्थ बनना तो पड़ा ही पर उसे यह बहुत महँगा पड़ा। माता-पिता के प्यार से उसे पति का प्यार घटिया भी लगा और महँगा भी पड़ा।
कुछ समय बाद एल्सा ने तीन बच्चे दिये। दो नर एक मादा। सिंहों की प्रकृति है कि वे अपने बच्चों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और उनकी सुरक्षा के सन्दर्भ में किसी का भी विश्वास नहीं करते। यह प्रकृति एल्सा की भी रही। वह अपने बच्चों को छिपाकर झाड़ी में रख आती और तब नैहर आती। जार्ज को उसकी चालाकी मालूम थी। वे एक दिन बच्चों की झाड़ी के समीप जा पहुँचे। इस पर एल्सा ने नाराजगी व्यक्त की, और दूसरे दिन दूर की झाड़ी में उन्हें छिपा आई। लेकिन यह छिपाव-दुराव अधिक दिनों तक न रहा। बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो वह उन्हें ननिहाल दिखाने ले गई। नानी ने उनका भी स्वागत सत्कार किया फिर तो वे भी अभ्यस्त हो गये और माँ को धकेल कर नानी के यहाँ जल्दी-जल्दी चलने के लिए विवश करने लगे वहाँ उन्हें अधिक सुविधाएँ अधिक आव भगत और अधिक खेलने-कूदने का अवसर जो मिलता था।
बच्चे भी धीरे-धीरे ननिहाल में इतने घुल-मिल गये कि नानी का कुर्ता पकड़कर लटकने में उन्हें आनन्द आने लगा। कुछ समय तक तो एल्सा का यह प्रयत्न रहा कि बच्चों के साथ कोई अधिक घुलने मिलने न पाये। इसमें उसे सुरक्षा में खतरा पड़ने का डर रहता होगा पीछे जब उसने समझ लिया कि उसका भय आशंका मात्र ही था तो उसने पूरी छूट दे दी और कभी कभी बच्चों को वहीं छोड़कर घूमने चली जाने लगी।
नानी ने अपने धेवती धेवतों का चाव पूर्वक नामकरण किया दो लड़के थे उनके नाम रखे गये जस्फा और गोपा, लड़की का नाम रखा गया-छोटी एल्सा माँ बड़ी एल्सा बेटी छोटी एल्सा
यह लाड़ दुलार विधाता से अधिक दिन न देखा गया। प्रसूति के छः महीने वाद एल्सा बीमार पड़ी और मर गई। धेवती धेवतों के लालन पालन का भार नानी-नाना के कन्धों पर आया। बाप तो उन्हें अनाथ छोड़कर एक तरफ खिसक गया। पर नानी के मन पर एल्सा के प्रति जो स्नेह वात्सल्य था उसने अपनी धारणा कुंठित नहीं होने दी और यह तीनों बच्चे भी उन्हीं के आश्रम में भली प्रकार पाले गये। पीछे जब वे प्रौढ़ हो गये तो नेशनल पार्क में सर्वथा स्वतन्त्र जीवन जीने के लिए उन्हें उन्मुक्त छोड़ दिया गया।
एडम्सन द्वारा उन्मुक्त वातावरण में सिंह पाले जाने ओर उनकी क्रूरता निरस्त करके सौम्य स्वभाव उत्पन्न करने की कुशलता को सर्वत्र सराहा गया और उस अद्भुत कर्तृत्व हो देखने के लिए संसार भर के लोग उनके पास आये। पत्र प्रतिनिधियों ने इस संदर्भ में उनसे तरह-तरह के प्रश्न पूछे। उनका जो उत्तर वे देते उसका संक्षिप्त सारांश यही होता कि प्रेम और सौजन्य की शक्ति सर्वोपरि है। यदि हमारी सद्भावना एवं आत्मीयता बनावटी न हो तो उसका प्रभाव दूसरों पर भी अवश्य पड़ेगा फिर भले ही उसका प्रकृति कितनी ही क्रूरता युक्त क्यों न रही हो। वे इस बात पर बहुत जोर देती थीं कि यह भटके हुए दुराग्रही और अपराधी प्रकृति के मनुष्यों को स्नेह सौजन्य भरे वातावरण में रखा जा सके तो उन्हें सज्जन ओर संभ्रान्त बनाया जा सकना न तो अशक्य ही होगा और न कठिन ही प्रतीत होगा।
विश्व में कई जातियाँ ऐसी भी है जो सभ्यता की दृष्टि से सदियों पिछड़ी हुई और उनमें नमक का प्रचलन कतई नहीं है। अल्जीरिया के मूल निवासी तथा कोलम्बिया नदी के तटवर्ती मैदानों में बसने वाले लोग नमक का बिलकुल प्रयोग नहीं करते। सहारा के बद्दू कबीले के लोग नमक को उसी प्रकार घृणास्पद तथा त्याज्य समझते हैं जैसे एक धर्मनिष्ठ भारतीय माँस और मदिरा को। मध्य अफ्रीका के लाखों आदिवासी प्रशान्त महासागर के मध्य द्वीपों में रहने वाले लोग नमक को अनावश्यक मानते हैं तथा उसका प्रयोग भी नहीं करते। साइबेरिया के मूल निवासी और नेपाल के सुदूर प्रान्तों में बसने वाले लोग भी नमक नहीं खाते। फिर भी उनका स्वास्थ्य और शरीर बल आज 20 वीं शताब्दी के सभ्य व्यक्ति से कई गुना बेहतर है।
ये उदाहरण उन व्यक्तियों की धारणा को निर्मूल सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है जो यह समझते हैं कि नमक नहीं खायेंगे तो न जाने क्या हो जायेगा? कुछ लोग तो यहाँ तक कहते पाये गये हैं कि नमक न खाने वाले व्यक्ति का शरीर विषाक्त हो जाता है उसके शरीर में कई दूषित तत्त्व आ संचित हो जाते हैं।
विज्ञान की आधुनिक गवेषणाओं के अनुसार नमक मनुष्य शरीर के लिये एकदम अनावश्यक है। स्वास्थ्य और शरीर व्यवस्था के लिए जितना नमक आवश्यक होता है वह प्राकृतिक रूप से अन्न और सब्जियों के रूप में अपने आप मिल जाता है। भारतीय योग ग्रन्थों में आहार शुद्धि का जहाँ उल्लेख आता है वहाँ प्रत्याहार साधना के अंतर्गत नमक का प्रयोग बन्द कर देने की बात भी कही गई है। भारतीय धर्मग्रन्थों में नमक के त्याग को एक व्रत के रूप में निरूपित किया गया है। धार्मिक दृष्टि से नमक त्याग का महत्त्व तो है ही विज्ञान की खोज ने भी इस नियम की पुष्टि की है। यही नहीं नमक को शरीर के लिए हानिकारक भी माना है।
रसायन शास्त्र की भाषा में नमक को सोडियम क्लोराइड कहा गया है। क्लोरीन एक जहरीली गैस है जिसका एक हल्का सा झोंका मनुष्य को 24 घण्टे तक बेहोश कर देने के लिए पर्याप्त है। थोड़ी सी अधिक मात्रा उसे दूसरे लोक भी पहुँचा सकती है। इसके योजकों को आहार रूप में लेने से आमाशय यन्त्र की श्लेष्मिक झिल्ली को हानि पहुँचती है तथा शरीर के कैल्शियम का भी क्षरण होता है जिससे शरीर में पक्षाघात और मिरगी के रोगों की सम्भावना रहती है।
सुप्रसिद्ध अमरीकी आहार विशेषज्ञ ने इस सम्बन्ध में बड़ी निष्कर्ष पूर्ण खोज की है और इसे पूर्णतया विष बताया है।
एक शंका उठना स्वाभाविक है कि नमक यदि विष है तो फिर शरीर पर उसका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता। इसका एक बहुत बड़ा कारण है। शताब्दियों से नमक का प्रयोग करते चले आ रहे मानवजाति का शरीर और उसके कोष अभ्यस्त हो गये हैं फिर भी मनुष्य शरीर की प्रकृति इस तत्त्व की उपस्थिति सहन नहीं करती और पसीने, मूत्र आदि के रूप में यह विसर्जित होता रहता है।
फिर भी इसका प्रभाव किसी न किसी रूप में तो होना ही है और वह होता है दुःसाध्य रोगों के रूप में। रक्तविकार, हृदयरोग, आमाशय के रोग आदि कई बीमारियों का कारण नमक ही है। डाक्टर लोग रोगी की चिकित्सा करते हुए परहेज में नमक न खाने की सलाह देते हैं। इसका यही कारण है शरीर में नमक की मात्रा बढ़ते रहने पर रोग का दूर होना मुश्किल है।
कुछ वैज्ञानिकों ने नमक को अफीम, संखिया जैसी विषैले मादक द्रव्यों की श्रेणी में गिना है और वस्तुतः वह है भी। अफीम संखिया खाने के तुरन्त बाद बड़ी तेज प्यास लगती है उसी प्रकार स्वभाव से अधिक नमक खा लेने पर थोड़ी थोड़ी देर से पानी पीते रहना पड़ता है।
कुछ दिनों तक नमक का प्रयोग न करने पर शरीर से जो स्वास्थ्य शक्ति और बल का अनुभव होता है उसे देखकर फिर कभी नमक खाने की इच्छा नहीं होगी।
जीवित वे रहते हैं जो सतर्क रहते हैं और सामयिक परिस्थितियों से जूझने का साहस करते हैं। जिन्होंने प्रमाद बरता और सरलता का जीवन जीने की राह ढूँढ़ी, उन्हें यह आरामतलबी बहुत महँगी पड़ी है। प्रकृति की विघातक शक्तियाँ इसी फेर में रहती है कि कब किसे बेखबर और कमजोर पाये और किसे कब कैसे धर दबोचे। यह संसार कुछ ऐसा ही विचित्र है, यहाँ उपयोगी का चुनाव वाला क्रम काम करता रहता है और जो संघर्ष से बचता डरता पाया जाता है उसी पर विपत्ति का कुल्हाड़ा चलने लगता है। सरलता और सुविधा के फेर में जिन्होंने अपने सतर्कता संघर्षशीलता गँवा दी उन्हें देर सबेर में अपने अस्तित्व से भी हाथ धोना पड़ता है।
रूस की विज्ञान एकेडेमी के पुराजीव संग्रहालय में लाखों वर्ष पुराने जीव कंकालों का संग्रह किया गया है। इनमें सबसे बड़ा कंकाल सारो लोफ वर्ग की एक विशालकाय ‘डायनोसौर’ का है जो 23 फुट ऊँचा हैं। यह मंगोलिया में पाया गया था। ऐसी प्रागैतिहासिक दुर्लभ वस्तुएँ उसी क्षेत्र में मिली हैं। मंगोलिया में समुद्र की सतह से कोई 3200 फुट ऊँचा एक पठार है। समुद्री हलचलों से वह स्थान पिछले 10 करोड़ वर्षों से सुरक्षित रहा है। वहाँ का गोबी रेगिस्तान चिर अतीत की भौगोलिक गाथाओं और जीव इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ अपनी छाती से छिपाये बैठा है। अन्वेषकों का बहुत ध्यान इस क्षेत्र पर है उपरोक्त कंकाल वही से मिला है।
किसी समय मनुष्य भी अब की अपेक्षा काफी लम्बे तगड़े थे पर उनमें बुद्धि की कमी रही। प्रकृति के अवरोधों से अपना बचाव करने की बात न सोच सके फलतः उनकी विशेषताएँ घटती चली गई। लुप्त होने से जो बच सके तो उनकी पीढ़ियाँ कद और वजन की दृष्टि से हलकी होती चली गई ओर वही स्थिति अब तक चली आ रही है।
सन् 1939 में जावा इण्डोनेशिया में सोलो नदी के किनारे खुदाई करते हुए पुरातत्त्ववेत्ता क्योनिंगवाल्ड को एक ऐसा मनुष्य का जबड़ा मिला था जो बताता था कि प्राचीनकाल के मनुष्य अब की अपेक्षा काफी लम्बे चौड़े थे। उन्हें दो वर्ष बाद सन् 41 में उससे भी बड़ा जबड़ा प्राप्त हुआ जिससे पता चलता है कि भूतकाल के दैत्याकार मनुष्यों की जैसी किंवदन्तियाँ प्रचलित है वे निराधार नहीं है।
दैत्याकार मानवों के शोध प्रसंगों में चीन के विभिन्न स्थानों पर कुल मिलाकर मानव प्राणी के 49 दाँत ऐसे मिले हैं जो अब के मनुष्यों की तुलना में छः गुने बड़े हैं। दैत्याकार अस्थि पिंजरों के टुकड़े प्रायः चार लाख वर्ष पुराने माने गये हैं। इन अस्थियों से एक और रहस्योद्घाटन होता है कि पुराने समय में जबड़े बड़े थे और मस्तिष्क का आकार जैसे-जैसे बढ़ा वैसे वैसे जबड़ा छोटा होता चला गया। पंख युक्त होते हुए भी उड़ सकने की क्षमता से रहित पक्षियों में मोआ, रही, कीवी, कैसावरी, एमू, शुतुरमुर्ग और पेन्गुइन मुख्य है। यों पालतू मुर्गे और मोर भी धीरे-धीरे अपने उड़ने की क्षमता खोते चले जा रहे हैं। इस स्तर के और भी कुछ पक्षी हैं जिनका स्वाभाविक वजन बढ़ता जा रहा है। और वे उड़ने की दृष्टि से अपंग होते चले जा रहे हैं।
न्यूयार्क के म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री में पिछले दिनों न्यूजीलैण्ड में पाये जाने वाले मोआ पक्षी का अस्थि पिंजर रखा है इसकी ऊँचाई 13 फुट थी और वजन 500 पौण्ड। यह पक्षी अपने उड़ने की क्षमता खो चुका था।
अमेरिकी शुतुरमुर्ग कभी भूमिचारी था। नर के साथ 5-10 मादाएँ रहती थीं। मादाएँ वन-विहार करती थीं और नर सबके अण्डे बच्चे सम्भालने घर पर रहता था उसे चारे दाने के लिए तभी बाहर जाने की अवसर मिलता था जब मादाएँ उसे वैसी सुविधा और आज्ञा प्रदान कर दे।
न्यू गायना में पाया जाने वाला कैसेवरी धरती पर सुविधाजनक रीति से आहार पाकर संतुष्ट हो गया और उड़ने का परिश्रम करने से जी चुराना शुरू कर दिया फलस्वरूप उसकी उड़न शक्ति विदा हो गई और धरती पर रहने वाली लोमड़ियाँ उसे चट कर गई। यही हाल आस्ट्रेलियाई एमू का हुआ। दौड़ने की क्षमता गँवा बैठने के बाद उसे अकल आई तब उसने तेज दौड़ने का अभ्यास करके किसी प्रकार जान बचाने की तरकीब लड़ाई। इससे भी काम नहीं चला, जो एक बार हारा सो हारा। धूर्त शिकारियों ने उसका अस्तित्व निर्दयता पूर्वक मिटा ही डाला। गोल गोंद जैसे कोवी अब कुछ ही दिन में धरती पर से उठ जायेंगे। आलसी नर घर पर पड़ा-पड़ा अण्डे बच्चे सेता रहता है। बेचारी मादा को ही आहार जुटाने के लिए भी दौड़ धूप करनी पड़ती है। 80 दिनों में जब तक पिछले बच्चे उड़ने योग्य हो पाते तब तक मादा पर नये बच्चे देने का भार आ पड़ता है इस प्रकार वह प्रजनन का ही कष्ट नहीं उठाती, परिवार का पेट पालने में भी मरती खपती है। नर को आलस मारे डाल रहा है और मादा की जान अति भार बहन से निकली जा रही है। इस असंतुलन का परिणाम सामने है यह सुन्दर पक्षी, पंख तो पहले ही गँवा चुका था अब प्रकृति के निर्दय रंग मंच पर अपनी सत्ता भी समाप्त करने जा रहा है।
प्रकृति के साथ संघर्ष करने में जो प्राणी साहस और सतर्कता के साथ संलग्न है उन्हें अतिरिक्त परिश्रम तो करना पड़ता है पर अपने अस्तित्व को भली प्रकार अक्षुण्ण रखे हुए है।
कुछ बतख जल तट पर नहीं पेड़ों पर अण्डे देती है और जब बच्चे कुछ समर्थ हो जाते हैं तो उन्हें पीठ पर लाद कर पेड़ से नीचे लाती है। हिप्पो, समुद्री ऊदबिलाव भी अपने बच्चों को पीठ पर लादते हैं। मादा बिच्छू की पीठ पर तो तीस की संख्या तक बच्चे लदे देखे गये हैं। चलते समय जो गिर पड़े उन्हें उठाकर फिर पीठ पर लाने का काम भी मादा को ही निपटाना पड़ता है। चमगादड़ के बच्चे अपनी माँ की गरदन पकड़ कर लटके रहते हैं। कंगारू के बच्चे माता के पेट से सटी हुई थैली में बहुत दिनों तक गुजर बसर करते हैं।
गिनी चकमो और हेमड्रेज वानर मिश्र ओर एवीसिनिया में धार्मिक श्रद्धा के पात्र समझे जाते हैं। दक्षिणी एवीसीनिया में पाये जाने वाले गेलेडा जब समूह बद्ध युद्ध करते हैं तब उनका रण कौशल मनुष्य युद्ध विद्या विशारदों के लिए भी देखने समझने योग्य होता है लगता है कि चक्रव्यूह विद्या के अनेक पक्ष अभिमन्यु की तरह गर्भ में से ही सीख कर आये हैं। उनका रौद्र रूप देखकर आक्रमणकारी चीता भी दुम दबाकर भागता है।
कृमि कीटकों की प्रायः 50 जातियाँ इस पृथ्वी पर होने का अनुमान है। इनमें से 20 लाख की खोज खबर मनुष्य द्वारा अब तक ली जा चुकी है। संसार में आँखों से दीख पड़ने वाले जितने जीवधारी बसते हैं उनमें से 75 प्रतिशत यह कीट पतंगे ही हैं।
आत्मरक्षा, ऋतु प्रभाव और आहार उपलब्धि एवं वंश वृद्धि की समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें अपनी आकृति-प्रकृति में सृष्टि के आदि से लेकर समयानुसार अनेक परिवर्तन करने पड़े है। परिस्थितियाँ उनकी इच्छानुसार नहीं बन सकती थीं तो अपने आपको उन्होंने बदलना आरम्भ किया फलस्वरूप अभावग्रस्तता, असुविधा और विघातक परिस्थितियों से अपने अस्तित्व को बचाये रहना उनके लिए सम्भव हो सका।
हवा और पानी के प्रवाह में से अक्सर कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं। परिवर्तन आकांक्षा से प्रेरित हो कर भी रेंगते फुदकते उड़ते दूर-दूर की ऐसी यात्राएँ कर लेते हैं जहाँ अनभ्यस्त आहार और अजनबी वातावरण में ही निर्वाह करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। तब प्रकृति उनके शरीरों में तेजी से परिवर्तन करती है और इस लायक बना देती है कि वे नये वातावरण में गुजर कर सके।
कछुआ को प्रकृति ने जलचर के रूप में बनाया है। वह जलाशयों के समीपवर्ती तटों पर भी रह सकता है पर जब उसे परिस्थिति वश कठोर पर्वतों पर रहना पड़ा तो वह पाषाण कच्छप के रूप में बदल गया ओर चट्टानों के बीच ही निर्वाह करने लगा। बिलों में रहने वाला सर्प आहार की सुविधा के लिए जलाशयों की मछलियाँ आसानी से प्राप्त करने लगा तो उसने जलचर बनना अंगीकार कर लिया और जल सर्पों की जातियाँ अस्तित्व में आई।
आक्रमणकारियों से अपना बचाव करने, शिकार पकड़ने के दाँव पेंच सफल बनाने के लिए इन कीड़ों ने पेड़-पौधों की पत्तियों में छिपे रहने योग्य काय -कलेवर का रंग रूप आवश्यक समझा । तदनुसार अधिकांश कीड़े डाल-पात की हरियाली में छिप सकने जैसे रंग रूप के बने गये। फलों पर उड़ने वाले तितलियों का रंग-रूप प्रायः वैसा ही रंग-बिरंगा हो गया। जिराफ़ की चमड़ी के दाग धब्बे ऐसे होते हैं जिससे वह दूर से देखने वालों को झाड़ी मात्र प्रतीत हो।
सींग, विष-दंत दाँत, पंजे प्रायः इसी आधार पर बने हैं कि वे अपना आहार सरलता पूर्वक पकड़ने और खाने में सफल रहें। पेट के पाचन यन्त्रों में भी इसी आधार पर विकास परिवर्तन होता रहा है।
दुर्बलकाय सीप और घोंघे, शंख, शम्बुक, कौडी, जाति के कीड़ों ने आत्मरक्षा का एक उपयोगी उपाय सोचा है- अपने चारों और एक मजबूत कवच का निर्माण करना। वे अपने शरीर में से ही एक अजीब किस्म का रस निकालते हैं और उसकी परतें शरीर के चारों ओर चढ़ाते चले जाते हैं। समयानुसार यह परत इतनी मजबूत हो जाती है कि शिकारी जल जीव इनका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर पाते और सुरक्षित शान्तिपूर्ण जीवन यापन करते हैं। इन कीटकों की कुशलता उन पर चढ़े कवचों की आकर्षक सुन्दरता के रूप में दर्शकों का मन मुग्ध करती है।
जो हो इस विश्व में सजगता, समर्थता और सक्रियता का अपना महत्त्व है इन्हें गवाँ कर जो आलसी बनते हैं असावधान रहते हैं उनकी सुविधा को प्रकृति सहन नहीं कर सकती और एक दिन झल्लाकर छीन ही लेती है। उसे तो पुरुषार्थ और संघर्ष ही भाता है।
किसी एक अमीर के दो सन्तान थी, एक लड़का एक लड़की। दोनों आराम से तलबी ओर विलासिता के वातावरण में पले, तो वयस्क होते ही उन्होंने व्यसन व्यभिचार की राह पर सरपट दौड़ना शुरू कर दिया।
बच्चों को कैसे सुधारा जाय, यह प्रश्न अमीर को चिन्तित किये हुए था। उपाय पूछने पर मित्रों ने अनेक सुझाव दिये। बहुत सोच विचार के बाद यह निश्चय हुआ कि उन्हें एक महीने तक महर्षि व्यास कृत महाभारत की कथा सुनाई जाय। उसमें धर्म, सदाचार के सभी तत्त्व मौजूद हैं।
कथा का प्रबन्ध हो गया। दोनों बच्चों ने उसे सुना भी। कुछ दिन बाद उसका परिणाम देखा पूछा गया तो मालूम पड़ा कि लड़का अपने दोस्तों से कहता है कि श्रीकृष्ण भगवान के जब 16 हजार रानियाँ थी तो 10-20 के साथ सम्बन्ध रखने में क्या हर्ज है। उसी प्रकार लड़की ने अपनी सहेलियों को बताया कुन्ती कुमारी अवस्था में पुत्र जन्म दे सकती है, द्रौपदी पाँच पति रख सकती है तो हम कौन सा बड़ा अनर्थ कर रहे हैं।
सुधार प्रयत्नों पर फिर विचार हुआ और यह निष्कर्ष निकाला गया कि कथा श्रवण की धर्म चर्चा अपर्याप्त है। दृष्टिकोण बदलने के लिए ऐसा प्रभावी वातावरण भी होना चाहिए जहाँ चर्चा और क्रिया में उत्कृष्टता का समुचित समन्वय हो। अगले कदम उसी आधार पर उठाये गये और वे सफल भी हुए।
खोज, खबर इसलिए भी उपयोगी है कि एकाकीपन नामक कोई तत्त्व अगले दिनों शेष नहीं रहने वाला है इस विश्व का कण कण एक दूसरे से अत्यन्त सघनता और जटिलता के साथ जुड़ा हुआ है। उन्हें पृथक करने से किसी की सत्ता अक्षुब्ध नहीं रह सकती। सब एक दूसरे के साथ इतनी मजबूत जंजीरों से बंधे हुए हैं कि पृथकता की बात सोचना दूसरे अर्थों में मृत्यु को आमन्त्रण देना ही कहा जा सकता है।
शरीर में कोशिकाओं की स्वतन्त्र सत्ता अवश्य है पर वह अपने आप में पूर्ण नहीं है। एक से दूसरे का पोषण होता है, और दूसरे से तीसरे को बल मिलता है, हम सभी एक दूसरे पर निर्भर है। यहाँ न कोई स्वतन्त्र है न स्वावलम्बी। साधन, सामूहिकता ही विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों, अस्तित्वों और तथ्यों की जननी है। मानवी प्रगति का यह रहस्य है- प्रकृति प्रदत्त समूह संरचना का उसने अधिक बुद्धिमत्तापूर्वक लाभ उठाकर समाज व्यवस्था बनाई और सहयोग के आधार पर परिवार निर्माण से लेकर शासन सत्ता तक के बहुमुखी वट खड़े किये हैं। एक दूसरे के लिए वे किस प्रकार उपयोगी सिद्ध होंगे, पारस्परिक सहयोग से किस प्रकार एक दूसरे की सुख सुविधा बढ़ाये, इसी रीति-नीति के अभिवर्धन को अग्रगामी बनाने के लिए धर्म, अध्यात्म तत्त्वज्ञान की आधारशिला रखी गई। भौतिक विज्ञान की खोज और प्रगति ने प्रकृति गत परमाणुओं की इसी रीति-नीति का परिचय दिया है। जड़ अथवा चेतन किसी भी पक्ष को देखें, इस विश्व के समस्त आधार परस्पर सम्बद्ध प्रतीत होते हैं और उनकी सार्थकता एक दूसरे के साथ जुड़े हुए रहने से ही सिद्ध होती है। एकाकी इकाइयाँ तो इतनी नगण्य है कि वे अपनी अस्तित्व का न तो परिचय दे सकती है और न उसे सुरक्षित रख सकती है।
यह सिद्धान्त ग्रह नक्षत्रों पर भी लागू होता है। विश्व-ब्रह्माण्ड के समस्त ग्रह नक्षत्र अपनी सूत्र संचालक आकाश गंगाओं के साथ जुड़े हैं और आकाश गंगाएँ मातृतत्त्व हिरण्य गर्भ की उँगलियों में बँधी हुई कठपुतलियाँ भर हैं। अगणित सौर मण्डल भी एक दूसरे का परिपोषण करते हुए अपना क्रियाकलाप चला रहे हैं। सूर्य ही अपने ग्रहों को गुरुत्वाकर्षण में बाँधे हो और उन्हें ताप प्रकाश देता है सो बात नहीं है, बदले में ग्रह परिवार भी अपने शासनाध्यक्ष सूर्य का विविध विधि आधारों से पोषण करता है। सौर परिवार के ग्रह अपनी जगह से छिटक कर किसी अन्तरिक्ष में अपना कोई और पथ बना ले तो फिर सूर्य का सन्तुलन भी बिगड़ जाएगा और वह आज की स्थिति में न रहकर किसी चित्र विचित्र विभीषिका में उलझा हुआ दिखाई देगा।
तारे और नक्षत्र में यह अन्तर है कि तारा अपनी रोशनी से चमकता है जब कि नक्षत्रों में अपनी रोशनी नहीं होती वे तारकों की धूप के प्रकाश में आते हैं तभी चमकते हैं। अपने सौर मण्डल में केवल एक ही सूर्य है शेष 9 नक्षत्र हैं ब्रह्माण्ड की तुलना में अपने सूर्य का सीमा क्षेत्र बहुत छोटा है पर पृथ्वी की तुलना में वह बहुत बड़ा है। नक्षत्रों के अपने उपग्रह होते हैं जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा। ग्रह स्थिति में 12 चन्द्रमा हैं।
जिस प्रकार अपने सौर मण्डल के नव ग्रह सूर्य तारक के साथ जुड़े हैं उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के अगणित तारक अपनी अपनी निहारिका के सदस्य हैं। ऐसी निहारिकाएं अरबों की संख्या में हैं। उनमें भीतर ही भीतर कुछ ऐसी हलचल चलती रहती है जिसके कारण कुछ समय बाद भयंकर विस्फोट होता है और अन्तर्भूत पदार्थ में सब कुछ टूट बाहर छिटक कर स्वतन्त्र तारकों का निर्माण होता है। इन तारकों का नाम नोवा और सुपर नोवा दिया गया है। जिस प्रकार बिल्ली हर साल कई कई बच्चे देती है। इसी प्रकार से निहारिकाएं भी थोड़े-थोड़े दिनों बाद प्रसूता होती है और विस्फोट जैसी भयानक प्रसव पीड़ा के साथ नव-तारकों को जन्म देती है। बच्चों की सारी हरकतें जैसे बे-सिर-पैर होती है वैसा ही कुछ ऊटपटाँग यह नवोदित तारे भी करते रहते हैं।
जब वे घिस-पिट कर ठीक हो जाते हैं, शैशव से आगे बढ़कर किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तब उनकी व्यवस्था क्रमबद्ध हो जाती है, तब तक उनका फैलाव, सिकुड़न, रुदन, उपद्रव शयन सब कुछ अचंभे जैसा ही होता है। छोटे-बच्चे जैसे बार-बार टट्टी कर देते हैं उसी प्रकार इन नवोदित तारकों की गरम गरम गैस भी कटती छिटकती रहती है और उससे भी ग्रह, उपग्रह, उल्का, धूमकेतु आदि न जाने क्या-क्या अन्तरिक्षीय फुलझड़ियों का सृजन विसर्जन होता रहता है। इनके अतिरिक्त इन बच्चों में लड़-झगड़ और मारपीट भी कम नहीं होती। निश्चित व्यवस्था का कार्यक्षेत्र न बन पाने के कारण उनके टकराव भी होते रहते हैं और कभी कभी तो यह टकराव ऐसे विचित्र होते हैं कि दोनों पक्ष अपना अस्तित्व गँवा बैठे और फिर उनके ध्वंसावशेष से कुछ-कुछ और नवीन संरचना सामने आये।
आकाश की नाप तोल मीलों की संख्या में करना कौड़ियाँ बिछाकर मुहरों का हिसाब करने बैठने की तरह उपहासास्पद होगा। इस प्रकार तो इतनी बिंदियाँ प्रयोग करनी पड़ेगी कि ज्योतिर्विदों को बाध्य बिंदियों से ही भरने पड़े।
सूर्य की दूरी पृथ्वी से सवा नौ करोड़ मील है, इसके बाद का सबसे निकटवर्ती तारा 2,50,00,00,00,00,000 मील की दूरी पर है। अन्य तारे तो इससे भी लाखों गुनी दूरी पर है। इस दूरी का हिसाब रखने के लिए प्रकाश वर्ष का नया पैमाना बनाया गया है। प्रकाश की किरणें एक सेकेण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलती है। इस गति से चलते हुए प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूर तय कर ले उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जाएगा। इस पैमाने के हिसाब से पृथ्वी से सूर्य की दूर सिर्फ सवा आठ प्रकाश सेकेण्ड रह जाती है। इसके आगे किसी और तारे की खोज में आगे बढ़ा जाय तो सबसे निकटवर्ती तारा सवा चार प्रकाश वर्ष चल लेने के बाद ही मिलेगा।
ब्रह्माण्ड का 33 प्रतिशत भाग शून्य है। एक प्रतिशत भाग को ही ग्रह नक्षत्र घेरे हुए हैं। अनुमान है कि आकाश में सूर्य जैसे 100 अरब तारकों का अस्तित्व है। वह तारे आकाश गंगा से जुड़े हैं वे उसी से निकले हैं और उसी से बंधे है। मुर्गी अण्डे देती है उन्हें सेती है और जब तक बच्चे समर्थ नहीं हो जाते उन्हें अपने साथ ही लिए फिरती है। आकाश गंगाएँ ऐसे ही मुर्गियाँ हैं जिनके अण्डे बच्चों की गणना करना पूरा शिर दर्द है। हमारी आकाश गंगा एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी और 20 हजार प्रकाश वर्ष मोटी है। सूर्य इसी मुर्गी का एक छोटा चूजा है जो अपनी माता से 33,000 प्रकाश वर्ष दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा 170 मील प्रति सेकेण्ड की गति से करता है। आकाश गंगाएँ भी आकाश में करोड़ों हैं। वे आपस में टकरा न जायें या उनके अंडे बच्चे एक दूसरे से अलग न पड़े इसलिए उनने अपने सैर-सपाटे के लिए काफी-काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया है। प्रायः ये आकाश गंगाएँ एक दूसरे से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर रहती है।
अब तक खोजे गये तारकों में सबसे बड़ा काला तारा है यह अपने सूर्य से 20 गुना बड़ा है। यहाँ यह भूलना नहीं चाहिए कि सूर्य अपनी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। उस हिसाब से पृथ्वी की तुलना में काला तारा कितना बड़ा होगा इसे कागज पर जोड़ लेना तो सरल है पर उस विस्तार को मस्तिष्क में यथावत् बिठा सकना बहुत ही कठिन है।
सृष्टि के आरम्भ में एक मूल द्रव्य हिरण्य गर्भ था। उसकी विस्फोट से आकाश गंगाएँ विनिर्मित हुई। इस विस्फोट की तेजी कुछ तो धीमी हुई है पर अभी भी उस छिटकाव की चाल बहुत तीव्र है। अनन्त आकाश में ये आकाश गंगाएँ अपनी अपनी दिशा में द्रुत गति से दौड़ती जा रही है। इस सन्दर्भ में अपनी आकाश गंगा की चाल 24,300 मील प्रति सेकेण्ड नापी गई है।
यह विश्व अनन्त है और उसके संबंध में जानकारियाँ प्राप्त करने का क्षेत्र भी असीम है। इस असीम और अनन्त की खोज के लिए बिना निराश हुए मनुष्य की असीमता किस उत्साह के साथ अग्रगामी हो रही है यह देखकर यह विश्वास होता है कि मानवी महत्ता अद्भुत है और यदि वह सही राह पर चले तो न केवल प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करने में वरन् उन्हें करतलगत करने में भी समर्थ हो सकती है।
हमारा बहिरंग जीवन दो आधार पर सुव्यवस्थित रहता है (1) उपलब्ध साधन सामग्री (2) सम्बद्ध व्यक्तियों की शृंखला। इन दोनों के अनुकूल होने पर सुख अनुभव किया जाता है और प्रतिकूलता अथवा न्यूनता में दुःख। उपलब्ध जीवनोपयोगी साधन सामग्री में धन और उसके द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली वस्तुएँ आती हैं। भोजन, वस्त्र, मकान, वाहन, विनोद, तथा सुविधा उपकरण इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं। सम्बद्ध व्यक्तियों की शृंखला में परिवार के सदस्य पत्नी संतति भाई-बहिन माता पिता आदि वे लोग आते हैं जिन्हें कुटुम्बी कहते हैं इसी शृंखला की कड़ी में स्वामी, पड़ोसी ग्राहक साथी आदि भी गिने जा सकते हैं। साधनों की कमी नहीं और सम्बद्ध व्यक्ति सहयोगी बनकर काम कर रहे हों तो बहिरंग जीवन को सुखी कहा जा सकता है।
अन्तरंग जीवन के भी दो पहिये है (1) शरीर और (2) मन। यह दोनों स्वस्थ हों तो व्यक्तिगत रूप से मनुष्य सुखी रहेगा। रुग्ण शरीर और उलझा हुआ मस्तिष्क आधि व्याधि से ग्रसित दुखदायी अनुभूतियाँ प्रस्तुत करता है। यह दोनों साथी ठीक प्रकार कर साथ देते रहे हैं और सन्तुलित रीति-नीति अपनाकर आलस्य, प्रमोद के विसंगतियाँ से बच रहे हों तो मनुष्य अपने आप में प्रसन्नता अनुभव करता रहेगा।
बहिरंग जीवन के दो माध्यम है साधन और परिवार। अन्तरंग जीवन के दो माध्यम है शरीर और मन। इन चारों को मिलाकर जीवन रथ के चार पहिये बनते हैं और वे ठीक प्रकार से अपनी धुरी पर लुढ़क रहे हों तो कहा जा सकता है कि सुख पूर्वक जीवन यापन की क्रम व्यवस्था चल रही है।
इन चारों को सही और सन्तुलित रखने का उत्तरदायित्व हमारे दृष्टिकोण का है। उसे सारथी भी कह सकते हैं। दृष्टिकोण में विकृति आने पर यह चारों अस्त-व्यस्त और नष्ट भ्रष्ट होने लगे और मनुष्य दुःख-दारिद्रय के शोक सन्ताप के गर्त में जा गिरता है।
शरीर की संरचना प्रकृति ने इस प्रकार की है कि यदि उसे आहार-बिहार के प्रकृति प्रदत्त निर्देशों पर चलने दिया जाय, असंयम और अव्यवस्था में न उलझा जाय तो सामान्यतया आजीवन स्वास्थ्य बना रहेगा और रुग्ण एवं दुर्बलता का कष्ट न सहना पड़ेगा। मन यदि उच्छृंखल तृष्णा के लिए उद्विग्न न हो रहा हो और परिस्थितियों से निपटने की रीति समझता हो तो उस बुद्धिमत्ता, विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर सन्तोष और सन्तुलन बनाये रह सकेगा। उद्विग्न प्रायः वही लोग पाये जाते हैं जिन्हें सोचना नहीं आता। सब कुछ हमारी इच्छानुकूल ही होता रहे-जो चाहते हैं वही मिलता रहे यह सम्भव नहीं। प्रतिकूलताएँ बनी ही रहेंगी। उनके साथ किस प्रकार निपटा जाय यह एक कला है। परिस्थितियों को कैसे अनुकूल बनाया एवं अपने को कैसे परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाय, इसकी रीति-नीति जिसे मालूम है वह खीजता झल्लाता नहीं वरन् संगति बिठाने में निरत होता है और कोई काम चलाऊ हल निकाल लेता है। ऐसे मनुष्य ही मानसिक दृष्टि से सन्तुलित और प्रसन्नचित्त रहते देखे जाते हैं।
साधनों का बाहुल्य रहने से सुखी रहने की बात आम तौर से सोची जाती है किंतु वस्तु स्थिति इससे भिन्न है। जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है इस तथ्य को यदि कोई ठीक तरह जानता हो तो स्वल्प साधनों में भी हँसी खुशी की जिन्दगी जी जा सकती है। साधन सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त हों किन्तु उसका सही उपयोग न आता हो तो उनसे लाभ मिलना तो दूर उलटे समस्यायें उत्पन्न होंगी। कितने ही धनाढ्य लोग, संग्रहित सम्पदा का उपयोग नहीं जानते। फलतः उससे विग्रह और अनाचार जन्य संकटों की घटाये ही घूमती रहती है। उन्हें सम्पन्नता निर्धनता से भी महँगी पड़ती है। उच्छृंखल अपव्यय अथवा कृपण संग्रह तरह तरह के विक्षोभ उत्पन्न करता है और उस व्यक्ति की स्वाभाविक शान्ति का अपहरण कर लेता है।
कुटुम्ब में सब लोग एक प्रकृति के नहीं होते। जन्म जन्मान्तरों से संग्रहित अपने अपने स्वभाव संस्कार लिए होते हैं इसलिए अपनी रुचि के ढाँचे में सबको मिट्टी के खिलौनों की तरह नहीं ढाला जा सकता। अस्तु बुद्धिमान लोग हर व्यक्ति को स्वीकार करते हैं ताकि अधिकाधिक सामंजस्य बना रहे। स्नेह सद्भाव और सहयोग की सौम्य शृंखला में वे परस्पर बँधे जकड़े रहते हैं। अवांछनीय दोष दुर्गुणों के निराकरण और सत्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध का उत्तरदायित्व चतुर लोग इस प्रकार निबाहते हैं कि साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे। सुधार की उग्रता इतनी न हो कि जिससे स्नेह सद्भाव का धागा टूटने और दाने बिखरने की ही स्थिति बन जाय। इतनी उपेक्षा भी न बरती जाय कि हर कोई अनियन्त्रित होकर मनमानी करने लगे और परिवार संस्था का उद्देश्य ही नष्ट हो जाय। कुटुम्ब के छोटे समूह को स्नेहसिक्त संतुलित प्रगतिशील और सुसंस्कारी बनाने के लिये मध्य मार्ग किन्तु आदर्शवादी विधि व्यवस्था अपनानी पड़ती है। जो इस सन्तुलन का अभ्यस्त है उसे परिवार सुख की कमी नहीं रहती भले ही सम्बद्ध व्यक्ति उतने सुसंस्कारी एवं सुविकसित नहीं भी हो।
अन्तरंग जीवन का आधार शरीर और मन है उनका स्वस्थ और संतुलित रहना आवश्यक है। इसी प्रकार बहिरंग जीवन का आधार साधन और सहचर है उनका सदुपयोग और समन्वय किया जाना आवश्यक है। जिसने इतना सीख लिया समझना चाहिए कि उसने जीवन जीने की कला जान ली और सुख शान्ति के ताले की चाबी खोज ली। वस्तुतः प्रचुर मात्रा में ही इसके लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए किन्तु यदि वे शरीर काया की सामान्य आवश्यकता पूरी कर सकने जितनी है तो भी सदुपयोग की विद्या जानने वाला उस न्यूनता के बीच भी सुखी जीवन जी सकता है। इस तथ्य को अभावग्रस्त समझी जाने वाली परिस्थिति में स्वेच्छा से रहने वाले ऋषि मनीषियों ने सत्य सिद्ध करके दिखाया था कि कम वस्तुएँ मनुष्य की प्रगति एवं सुविधा में कोई विशेष व्यतिरेक उत्पन्न नहीं करती। सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श न तो मिथ्या है और न अव्यावहारिक। जीवन जीने की कला जो जानते हैं वे अधिक साधन उपलब्ध करने का प्रयत्न तो करते हैं पर साथ ही यह भी नहीं भूलते कि जो प्राप्त है उसका सदुपयोग करके भी सन्तोष के साथ जिया जा सकता है। उस स्थिति में भी प्रगति के पथ पर बढ़ा जा सकता है।
परिवार के सदस्यों को अधिक सम्पन्न बनाने और सुविधा विलासिता के साधन से मोह ग्रस्तता नहीं अपनाई जानी चाहिए । इस लाड़-चाव में वे कुसंस्कारी, व्यसनी और दुर्गुणी बनते हैं। अमीरों जैसे साधनों से घर परिवार के लोगों को लाद देने और उन्हें बैठे-बैठे खाने उड़ाने के लिए धन दौलत छोड़ मरने की बात सोचना प्रकारान्तर से परिजनों के स्वभाव को बिगाड़ना और उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाया है। आरम्भ से ही अनुशासन, मितव्ययी, श्रमशीलता, शिष्टता और स्नेह सहयोग के पारिवारिक जीवन में समावेश करने की सूक्ष्म दृष्टि रखी जाय और घर के हर सदस्य के साथ दैनिक संपर्क, परामर्श का क्रम रखा जाय तो ऐसा अवसर न आने पावेगा जिसमें पीछे पछताने और सिर धुनने की आवश्यकता पड़े । हमारा अनावश्यक मोह ही है जो परिवार के सदस्यों को दुर्गुणी बनाता है। लाड़-चाव की उमंग में अक्सर कर्तव्य की बात भुला दी जाती है। कुटुम्बियों को अमीरी का चस्का लगाना नहीं, अपना उत्तरदायित्व जो उन्हें सुसंस्कारी बनाना मानते हैं और उसमें अदूरदर्शिता पूर्ण लाड़ दुलार को बाधक नहीं बनने देते, वे अन्ततः लाभ में रहते हैं। ऊपर से रुखाई और कड़ाई भले ही दिखाई पड़ती रहे पर अन्ततः यही रीति-नीति सर्वोत्तम स्नेह साधना सिद्ध होती है और न केवल अपने को वरन् परिवार के प्रत्येक सदस्य को उसका समुचित लाभ मिलता है।
स्पष्टतः बहिरंग जीवन के लिए साधनों और सहचरों का सदुपयोग संतुलन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जो इस दिशा में उपेक्षा बरतेगा तो उसे बहिरंग जीवन में कभी सुख, चैन की साँस लेने का अवसर न मिलेगा। अभाव और विग्रह की शिकायत उसे सदा बनी ही रहेगी। ठीक इसी प्रकार जो शरीर को आलस और असंयम के गर्त में गिरने से रोकेगा नहीं, इन्द्रिय निग्रह और नियमित दिनचर्या की आवश्यकता अनुभव न करेगा वह रुग्णता से बच नहीं सकेगा। दवा-दारु भी उसकी कुछ विशेष सहायता न कर सकेगी। असमय का वृद्धता एवं अकाल मृत्यु का त्रास उसे सहना ही पड़ेगा। मन की प्रसन्नता जिसने दूसरों के हाथ गिरवी रख छोड़ी है, जिसे कोई भी क्षुब्ध कर सकता है उसका मन ज्वार-भाटे की तरह अशान्त उद्विग्न ही रहेगा। जो अपने चिन्तन की परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने योग्य परिष्कृत न बन सके उसकी मनोव्यथा का अन्त हो ही नहीं सकता। समस्त परिस्थितियाँ के साथ ताल-मेल बिठा सकने योग्य परिष्कृत न बने सके उसकी मनोव्यथा का अन्त हो ही नहीं सकता। समस्त परिस्थितियाँ सदैव अनुकूल ही बनी रहे यह सर्वथा असंभव है। जिसने असम्भव को सन्तोष का आधार बना रखा हो उसके मानसिक आकाश में हर्षोल्लास की बिजली कभी कभी ही कौंध जाया करे तो बहुत है अन्यथा उसमें नीला काला अन्धकार ही छाया रहेगा।
जीवन बहन की रक्षा बहुमूल्य है उसे कुशलता पूर्वक चलाया जा सके तो ही सुख शान्ति भरे आनन्द, उल्लास का लाभ लिया जा सकता है। निश्चित रूप से मानव जीवन असाधारण रूप से महान् है उसके साथ अगणित विभूतियाँ जुड़ी हुई है पर उनका रसास्वादन कर सकना हर किसी के बस की बात नहीं। अनाड़ी ड्राइवर कीमती मोटर का भी चूरा करता है। सवारियों को मारता है और खुद मरता है। जिसे मानव जीवन के सदुपयोग संचालन की विधि व्यवस्था का ज्ञान नहीं उसका नर जन्म निरर्थक ही रहेगा। उसे शोक संताप के ही दिन गुजारने होंगे। निरन्तर दुर्भाग्य का रोना रोते रहना पड़ेगा।
जीवन जीने की कला मनुष्य कलेवर धारण करने वाले हर जीव के लिए सर्वोपरि, सर्वप्रधान और महानतम आवश्यकता है उसे समझा और सीखा जाना ही चाहिए। यहाँ इस असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है कि जीवन जटिल संरचना वाले सरंजाम के कलपुर्जों को समझना और उनके बनाव बिगाड़ को सुधारने सम्भालने के लिए बहुत लम्बा-चौड़ा अध्ययन करना पड़ेगा और दीर्घ कालीन प्रशिक्षण लेना पड़ेगा। सौभाग्यवश यह प्रक्रिया जितनी जटिल ओर कठिन दीखती है उतनी ही सरल भी है। इस विद्या को एक शब्द में कहा जाय तो दृष्टिकोण का परिष्कार कह सकते हैं। यदि यह मान कर चला जाये कि हमें विवेक से प्रेरणा लेनी है और कर्तव्य का अवलम्बन करना है तो इतने भर से काम चल जाएगा। लोग क्या चाहते हैं, क्या करते हैं, क्या कहते हैं उस प्रवाह से यदि मुँह मोड़ लिया जाय और आदर्श क्या चाहता है, क्या कहता है को आधार मानकर अपने चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता भरी जाय तो उतने भर से काम चल जायेगा और जीवन काल का रहस्यमय विज्ञान सहज ही करतलगत हो जाएगा। तदनुसार शरीर, मन, साधन और परिवार का सुसंचालन कर सकने में निपुणता प्राप्त हो जाएगी। तब सुख-युक्त परिस्थिति और शान्ति पूर्ण मनः स्थिति का रसास्वादन पग पग पर उपलब्ध होने लगेगा।
जीवन की नीति निर्धारण करने में आत्मबल की और परिष्कृत क्रिया-पद्धति अपनाने में मनोबल की आवश्यकता पड़ती है। संक्षेप में इसे आन्तरिक साहसिकता कह सकते हैं। आर्ष ग्रन्थों और आप्तपुरुषों की भाषा में इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं। स्वाध्याय सत्संग द्वारा उसी जीवन दर्शन को समझने का प्रयत्न किया जाता है और उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है। आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निमित्त खड़ा किया गया है। ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष संबन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है। उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण संभव हो सकता है। साधना उपक्रम का एक मात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है। आत्मा की पवित्रतम और उदारतम स्थिति का नाम ही परमात्मा है। लोभ, मोह के बन्धनों को काटकर आदर्श और कर्तव्य के अपनाने का नाम ही मुक्ति है। स्वर्ग न तो स्थान है और न परिस्थिति। वह विशुद्ध रूप से परिष्कृत दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाला देव संज्ञा में गिना जाने लगता है और अति मानवी आनन्द का रसास्वादन करता है। प्रशंसा गान अथवा नाम जप से ईश्वरीय अनुग्रह मिलने की कल्पना बाल-विनोद मात्र है। उसका न कोई आधार है और न कारण। अमुक कर्मकाण्ड को देख कर अथवा अमुक उच्चारण को सुन कर ईश्वर प्रसन्न हो सकता है ऐसा सोचना परमब्रह्म की सत्ता और महत्ता का उपहास करने जैसा ही है। उपासना का तथ्य यदि न समझा जाय तो उस दिशा में किये गये प्रयत्न काल-क्षेप मात्र बन कर रह जायेंगे। हमें हजार बार जानना चाहिए और लाख बार समझना चाहिए कि अध्यात्म का एक मात्र अर्थ परिष्कृत दृष्टिकोण का अवलम्बन ही है। उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुंचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अंतःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है। अन्यथा ईश्वर की किसी निन्दा- प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है?
दृष्टिकोण के परिष्कार को अन्तरंग और बहिरंग जीवन की सुख शांति का प्रेरणा स्रोत कहा जा सकता है। उसी के आधार पर शरीर को संयमशील व्यवस्था में कस कर स्वस्थ रखा जा सकता है। परिस्थितियों में ताल-मेल बिठा कर मन को संतुलित बनाया जा सकता है। साधनों का अपव्यय रोक कर उनका सदुपयोग हो सकता है और सहचरों के प्रति कर्तव्यपालन का उत्तरदायित्व निबाहा जा सकता है और असंयम उद्वेग, अपव्यय और व्यामोह इन चार नरक द्वारों में प्रवेश करने से बचा जा सकता है। जो इतना कर लेगा उसका सुख संतोष हर घड़ी- हर स्थिति में- अक्षुण्य बना रहेगा। साधनों और व्यक्तियों को गुलामी से- लोभ और मोह की लौह शृंखला से जिसने पराधीन रहना अस्वीकार कर दिया और समग्र आत्मनिर्भरता को ध्यान पूर्वक अपना लिया उस जीवन मुक्त के लिए यही धरती स्वर्गादपि गरीयसी होगी। इसी काय-कलेवर में देवत्व का अवतरण परिलक्षित होगा।
दृष्टिकोण का परिष्कार सर्वप्रथम अपने अन्तःकरण में विकसित करना होता है। जब उसकी पौध उपज आती है तब शरीर, मन, साधन एवं परिवार में प्रयोग करना पड़ता है। धान की फसल इसी तरह उगती है। उसे पहले एक जगह सघन बोते हैं। पीछे उसे उखाड़ कर जहां तहां आरोपित करते हैं। उद्यान नर्सरी भी पौध उगाने का व्यवसाय करती है। अपनी जमीनों में पेड़ लगाने वाले, नर्सरी से पौध खरीद कर ले जाते हैं। यही क्रम दृष्टिकोण के सम्बन्ध में भी चलता है।
अपना वास्तविक स्वरूप मानव जीवन का असाधारण महत्व- नर जन्म का चरम लक्ष्य, उसकी प्राप्ति का राजमार्ग यदि भली भांति समझ में आ जाय तो कहना चाहिये कि परिष्कृत दृष्टिकोण का अंकुर उग आये और उनका स्थूल जीवन के चारों क्षेत्रों में आरोपण सम्भव हो सकेगा। कहना न होगा कि इस आरोपण के फलस्वरूप उगने वाली फसल इतनी बहुमूल्य है कि उसे प्राप्त करने वाला हर दृष्टि से- हर दिशा में अपने आपको सुसंपन्न सौभाग्य शाली अनुभव करता है।
(1) मनुष्य ईश्वर का जेष्ठ राजकुमार है, (2) उसे सुसम्पन्न मानव शरीर इसलिए मिला है कि ईश्वरीय उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य बनाने में बढ़ा चढ़ा कर योगदान प्रस्तुत करे। (3) शरीर और मन ढाल तलवार की तरह- छैनी हथौड़े की तरह थे मूल्यवान औजार उपलब्ध हैं जिनके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रबल पुरुषार्थ कर सकना सम्भव हो सके (4) परिवार की छोटी प्रयोगशाला लोक मंगल के निर्धारित कर्तव्यपालन की क्षमता विकसित करने का अभ्यास करने के लिए मिली है। इन चार महासत्यों को यदि अन्तःकरण के गहनतम स्तर में प्रतिष्ठापित किया जा सके तो मनुष्य को अपनी दिशा एवं रीति-नीति का निर्धारण करने में कोई कठिनाई नहीं रहती। तब वह न तो पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा के साथ जुड़ी हुई वासना, कृपणता एवं अहमन्यता में फँसने से स्पष्ट इनकार कर देता है। उसे न वस्तुओं का लोभ होता है और न व्यक्तियों का मोह सताता है। लक्ष्य की पूर्ति में समर्थ कर्तव्य निष्ठा ही उसे सुहाती है और उसका निर्धारण करने में आदर्शवादी दूरदर्शी विवेकशीलता ही मार्गदर्शन का प्रधान आधार बनती है। ऐसा व्यक्ति अन्धी भेड़ों की नीति अपनाकर चलने वाले लोक प्रवाह की धारा में कूड़े करकट की तरह बहने से स्पष्ट इनकार कर देता है। उसकी अपनी मौलिकता उभरती है और ऐसी दिशा अपनाने का प्रचण्ड साहस मारती है जो परम लक्ष्य तक पहुँचा सकने में समर्थ हो। इसी उत्साह भरी मौलिकता में एक विशेषता यह भी जुड़ी रहती है कि लोग क्या कहते हैं या चाहते हैं इसे देखने सोचने की पूर्ण उपेक्षा करते हुए उस आधार को अपना सकें, जिसमें लोक मंगल की विवेक और असत्य के विजयी होने की संभावनाएँ सन्निहित है।
परिष्कृत दृष्टिकोण का यह आत्मवादी चिन्तन मनुष्य को स्थायी ओर संकीर्ण नहीं रहने देता। वह न तो इन्द्रियों का गुलाम बनता है और न मन का। उसे न लोभ सताता है न मोह। न उसे आत्मश्लाघा व्याकुल करती है और न लोक प्रवाह के साथ बहने में रुचि होती है। कौन समर्थक है कौन विरोधी यह सोचने की भी उसे फुरसत नहीं होती। आत्मा की पुकार, विवेक की प्रेरणा ईश्वरी निर्देश की पूर्ति और परम लक्ष्य की प्राप्ति यह चारों विभूतियाँ उसे अत्याधिक मूल्यवान प्रतीत होती है। इतनी मूल्यवान विभूतियाँ जिस पर भौतिक आकर्षणों को सहज ही निछावर करके फेंका जा सके।
दृष्टिकोण के परिष्कार के साथ यह भी जुड़ा हुआ है कि जीवन के साथ जुड़े हुए शरीर, मन, साधन एवं परिवार के प्रति दूरदर्शिता पूर्ण रीति-नीति के साथ अपनाई जा सके। इसी कदम के साथ हमारी जीवन विधा में प्रगति, समृद्धि, प्रसन्नता का भरपूर समावेश होने की सम्भावनाएँ जुड़ी हुई है। विकृत दृष्टिकोण के कारण ही मनुष्य अवांछनीय गतिविधियाँ अपनाता है और फलस्वरूप विविध विधि शोक-संतापों में कष्ट-क्लेशों में डूबता उतराता है। ओछा चिन्तन, निकृष्ट जन समूह का अन्धानुकरण इसी का नाम माया बन्धन है। उसी में फँसा हुआ प्राणी भव बन्धनों में कसा जकड़ा-अगणित विपत्तियों से संत्रस्त रहता है। नरक इसी का नाम है। ग्रसित और विकृत चिन्तन अपना कर हम स्वयं ही अपने जलने गलने के लिए नरक का सृजन करते हैं और स्वयं स्वेच्छापूर्वक उसमें प्रवेश करते हैं।
सुख शान्ति की स्वर्गीय परिस्थिति और आनन्द उल्लास की देवोपम मनःस्थिति को प्राप्त करने के लिए हमें परिष्कृत दृष्टिकोण का अमृतपान करना होता है। तत्त्वदर्शी उसी को सोमपान कहते हैं। समस्त विपत्तियों से छूटने और सदैव हर्ष सन्तोष का रसास्वादन करने की आकांक्षा इसी मार्ग पर चलने से पूर्ण होती है। श्रेय साधन का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं। दृष्टिकोण का परिष्कार किये बिना निरीह नरक में से और किसी प्रकार छुटकारा हो ही नहीं सकता। समुन्नत ओर सुविकसित जीवन की महान् उपलब्धि चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। धर्म और अध्यात्म का एकमात्र प्रयोजन मानवी चेतना को इसी पुण्य पथ पर अग्रसर करना है। ईश्वर अनुग्रह का सर्वोपरि वरदान यही हो सकता है कि भक्ति के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहने वाली सद्भावनाएँ उमड़े और सत्प्रवृत्तियों के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित हो। जहाँ इन उपलब्धियों का दर्शन नहीं होता हो, समझना चाहिए वहाँ आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना ही है -यथार्थता नहीं।
मानवी गरिमा के अनुरूप भावात्मक उत्कृष्टता और क्रियात्मक आदर्शवादिता जब हम वस्तुतः अपनाते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया स्वार्थ के विकार, परमार्थ में विकसित होने के रूप में परिलक्षित होती है। ओछा आदमी लोभ में निमग्न और मोह में ग्रसित देखा जाता है। उसे पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ रुचिकर होता ही नहीं। शरीर और परिवार से आगे भी कुछ है क्या, यह समझ में ही नहीं आता। ऐसा अनुदार, संकीर्ण स्वार्थी और पाषाण हृदय मनुष्य, मानव जीवन की गरिमा समझता ही कब है जो उसके सदुपयोग की बात सोंचे। जो सोचा ही नहीं गया है वह किया तो जा सकेगा ही कैसे?
परिष्कृत दृष्टि जब विकसित होगी तो वह लोभ, मोह ओर वासना-तृष्णा की क्षुद्रता से छलाँग मारकर परमार्थ के क्षेत्र में प्रवेश करेगी। आत्मवत् सर्व भूतेषु की प्रतिध्वनि उसके हृदयाकाश के कण-कण में गूँजेगी और वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता, अपना सुख दूसरों को बाँट देने की - दूसरों का दुःख स्वयं बँटा लेने की व्याकुलता उत्पन्न होगी। उसे सूझेगा कि समस्त विश्व उसका घर है और समस्त मनुष्य उसके अपने सहोदर। जीवन पेट और प्रजनन पर उत्सर्ग करने के लिए नहीं वरन् देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति विश्व मानव के प्रति, लोकमंगल के प्रति भी उसके कुछ कर्तव्य उत्तरदायित्व हैं। उन्हें पूरा करने की आकुलता, उत्कृष्ट अन्तःकरणों में पीड़ा और व्यथा के रूप में इस प्रकार प्रकट होती है कि उसका समाधान ढूँढ़े बिना क्षण भर के लिए भी चैन नहीं पड़ता।
परिष्कृत दृष्टिकोण की प्रखरता का चिन्ह यह है कि समस्त विश्व ब्रह्माण्ड भगवान की साकार प्रतिमा दीख पड़े और उसे सुविकसित बनाने के लिए अपने मनोयोग युक्त श्रम बिन्दुओं की श्रद्धाञ्जलि समर्पण करने की भक्ति भावना जागे। इस सेवा साधना के दोनों रूप हो सकते हैं अभिवर्धन भी और उन्मूलन भी। कुशल माली अपने बगीचे को सुरम्य बनाने के लिए उसमें कुछ आरोपण करता है कुछ उखाड़-पछाड़ कुछ काट-छाँट आरोपण की तरह यह उन्मूलन भी महत्त्वपूर्ण विद्या है। सहयोग का सहोदर ही संघर्ष है। आवश्यकतानुसार दीपक और जल कलश की तरह उन दोनों ही शीत-ताप पुण्यों का प्रयोग करना पड़ता है। परिष्कृत दृष्टि से मानव जीवन की सार्थकता लोक मंगल के क्रिया कलाप को व्यक्तिगत लाभ व्यवसाय की तरह ही परम रुचिकर मानने और उसमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त होने में मानी जा सकती है। जिसे सभी अपने दीखने लगेंगे वह परिवार के चन्द लोगों को ही अपना मान बैठने और अन्य सभी को पराया समझने की भूल नहीं कर सकता है। सब के सुख-दुःख में अपनी साझेदारी सबके विकास अभिवर्धन में अपनी प्रगति का अनुभव करना यही तो अध्यात्म दृष्टि है। साधना और उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रूप में ही उपलब्ध होता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ फोड़ कर फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है। स्वर्ग के दो पक्ष है उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व। जिसके अन्त करण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई समझना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही देवयोनि प्राप्त कर ली।
देव मानव न केवल आत्म-कल्याण का लक्ष्य सम्पन्न करते हैं वरन् शरीर, मन, साधन एवं परिवार की दृष्टि से भी सुसंतुलित रहते हैं। विकृतियाँ तो अपने ही दृष्टिकोण की होती है जो रुग्णता, उद्विग्नता, दरिद्रता और गृह कलह के रूप में प्रकट होती है। जीवन की जड़ में यदि सुसंस्कृत चिन्तन का जल लगता रहे तो उसके सभी पत्र पल्लव हरे भरे रहेंगे और उसे फला - फूला सुरम्य सुविकसित देखा जा सकेगा। इसी सर्वांगीण सुख शान्ति को मानव जीवन की सार्थकता कहा जा सकता है। उसकी उपलब्धि पूर्णतया अपने हाथ में है। आत्मचिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही बह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द-उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं।
शौर्य और साहस की सर्वोत्तम कसौटी यह है कि हम अपने दृष्टिकोण को न केवल परिष्कृत करें वरन् उसे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित करने का पुरुषार्थ, पराक्रम भी कर सकने में सफलता प्राप्त करें। पढ़ने, जानने, सोचने और मानने की मस्तिष्कीय परिधि तक आदर्शों का सीमित रहना, उन्हें कार्यान्वित करने में असमंजस अनुभव करते रहना बहादुरी का चिन्ह नहीं है। आत्मबल और मनोबल की परख केवल एक ही कसौटी पर होती है कि आदर्शवादी मान्यता ने क्रियाशील होने की दिशा में कितनी प्रगति की, कुसंस्कारी ढर्रे को तोड़ फेंकने और उसके स्थान पर महामानवों के स्तर की विधि व्यवस्था अपनाने में कितनी हिम्मत दिखाई। परिवर्तनकाल में जो हिचक होती है, निम्नगामी प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाने में जो दुस्साहस करना पड़ता है उसके लायक अपने पास शक्ति नहीं। योद्धा दूसरों का सिर काटने वाले को नहीं कहते, सच्चे शूरवीर वे हैं जो अपनी प्रवृत्तियों को महामानवों के स्तर तक बदलने में अपने प्रचण्ड पराक्रम का परिचय दे सके। अपना दृष्टिकोण सुधार सके। अपना कर्तृत्व उलट सके।
युग परिवर्तन की इस पुण्य वेला में जागृत आत्माओं के लिए यह खुली चुनौती है कि वे अपना दृष्टिकोण परिष्कृत करें। अपनी रीति-नीति बदलें। अनुकरणीय आदर्शवादिता के लिए दुस्साहस कर सकना न तो कठिन है न असम्भव। इसका उदाहरण अपने आचरण द्वारा जन साधारण के सामने प्रस्तुत करना होगा। देव परम्परा का प्रवाह इसी आधार पर गतिशील होगा। परोपदेश की प्रवीणता प्राप्त करके वाक् विलास भर हो सकता है उससे कुछ बनता नहीं। दूसरों को गहरी प्रेरणा देने का एक मात्र उपाय यही है कि हम अपना आदर्श प्रस्तुत करके उनमें अनुगमन का साहस उत्पन्न करें। व्यक्तियों का परिवर्तन ही युग परिवर्तन है। नव युग में भी लोगों की आकृति तो यही रहेगी केवल प्रकृति बदलेगी। आहार विहार तो यही रहेगा केवल आचार व्यवहार बदलेगा। व्यक्तियों का समूह ही तो विश्व है। विश्व शान्ति का भाव व्यक्तिगत शान्ति की ईंटों से ही चुना जा सकता। इस परिवर्तन के लिए दूसरों को प्रेरणा दी जाय यह ठीक है पर उसके लिए मात्र वाचालता को ही पर्याप्त न माना जाय। आदर्शों को व्यवहार में किस प्रकार लाया जा सकता है इस असम्भव समझे जाने वाले तथ्य को यदि हम स्वयं संभव करके दिखायें तो इससे लोक शिक्षण की अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किया जा सकेगा।
दुष्प्रवृत्तियों का नागपाश गले में बाँधे सर्वनाश के पथ पर दौड़ी जा रही दुनिया को आत्मघात से बचाया जाना चाहिए। मानवी सभ्यता का अस्तित्व मिटाने को आतुर सर्वभक्षी विभीषिकाओं का मुँह मोड़ा जाना चाहिए। यह महान् कार्य एक दूसरे पर निर्भर रहने से सम्भव न हो सकेगा। आरम्भ हमें स्वयं ही करना होगा और व्यक्ति को, विश्व को जैसा कुछ बनाना चाहते हैं वैसा उदाहरण अपने आपे में अभीष्ट परिवर्तन करके प्रस्तुत करना होगा। आज इसी साहसिकता की परीक्षा बेला है। उचित यह है कि अर्जुन की कायर भूमिका को पददलित करने के लिए गीता ज्ञान का अमृत पियें और गाण्डीव पर बान धर सन्धान करते हुए तुच्छ समझे जाने वाले आज के उपहासास्पद भारत को महाभारत बनाने के लिए जुट पड़ें और सृजन संग्राम में अपनी भूमिका बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत करें।
स्वार्थी, संकीर्ण और निकृष्ट दृष्टिकोण को त्यागने में हमें केवल अपने चारों ओर घिरे हुए नरक को ही खोना पड़ेगा और कुछ गँवाया जाना नहीं है। दृष्टिकोण को परिष्कृत बनाने और आदर्शवादी कर्तृत्व के लिए अड़ जाने में हमें शरीर, मन, साधन और परिवार में सर्वतोमुखी सुख-शान्ति ही मिलनी है। इतना ही नहीं इसी प्रवाह में जीवन लक्ष्य की प्राप्ति और युग पुकार की उस महती आवश्यकता की पूर्ति भी होती है जिसके आधार पर हम नर पशु से ऊँचे उठकर ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करने वाले महामानवों की पंक्ति में जा बैठते हैं।
बहुत बह चुकी धरा आषाढ़ी, मेघ बनो-छा जाओ। और संस्कृति के हित कोई सन्देशा भी लाओ॥
सिन्धु तुम्हारी तरण शक्ति को, नाप नाप कर हारा। और झुका तूफान अदब से साहस देख तुम्हारा॥
भग्न हुई प्राचीन अनय की खण्डहर हुए महल है। गढ़ ढह गई, विषमताओं का मनुज हुए निर्बल है॥
तनिक और जूझो कि असद् के प्राण अभी बाकी हैं। कभी पिया था, गरज -गरज के पात्र आज बन जाओ॥
नींव रखो नवयुग की जिसमें कही न दानवता हो। ओर विजय लक्ष्मी बन शासन करती मानवता हो॥
इन्हीं खण्डहरों की ईंटों से ऊँचा बने शिवाला। जिसमें हो भगवान-मनुज को हरी समझने वाला॥
झुलस रहा संसार, तपन हर क्षण बढ़ती जाती है। अन्तर रस बनकर जन-जन के अधरों पर मुस्काओ।
कह दो संस्कृति कि सीता से विरह काल अब बीता। हल चला लावण्य और देवत्व मनुज का जीता॥
एक हाथ में शास्त्र-दूसरे कर में शस्त्र तुम्हारे। आने दो प्रकाश-खुले है नूतन युग के द्वारे॥
यज्ञ हुआ प्रारम्भ मगर पूर्णाहुति तो बाकी है। उसे करो सम्पन्न और युग निर्माता कहलाओ।
*समाप्त*
बहुत बह चुकी धरा आषाढ़ी, मेघ बनो-छा जाओ। और संस्कृति के हित कोई सन्देशा भी लाओ॥
सिन्धु तुम्हारी तरण शक्ति को, नाप नाप कर हारा। और झुका तूफान अदब से साहस देख तुम्हारा॥
भग्न हुई प्राचीन अनय की खण्डहर हुए महल है। गढ़ ढह गई, विषमताओं का मनुज हुए निर्बल है॥
तनिक और जूझो कि असद् के प्राण अभी बाकी हैं। कभी पिया था, गरज -गरज के पात्र आज बन जाओ॥
नींव रखो नवयुग की जिसमें कही न दानवता हो। ओर विजय लक्ष्मी बन शासन करती मानवता हो॥
इन्हीं खण्डहरों की ईंटों से ऊँचा बने शिवाला। जिसमें हो भगवान-मनुज को हरी समझने वाला॥
झुलस रहा संसार, तपन हर क्षण बढ़ती जाती है। अन्तर रस बनकर जन-जन के अधरों पर मुस्काओ।
कह दो संस्कृति कि सीता से विरह काल अब बीता। हल चला लावण्य और देवत्व मनुज का जीता॥
एक हाथ में शास्त्र-दूसरे कर में शस्त्र तुम्हारे। आने दो प्रकाश-खुले है नूतन युग के द्वारे॥
यज्ञ हुआ प्रारम्भ मगर पूर्णाहुति तो बाकी है। उसे करो सम्पन्न और युग निर्माता कहलाओ।
*समाप्त*
कमरे के एक कोने पर धूपबत्ती जल रही थी दूसरे पर मोमबत्ती।
मोमबत्ती ने तिरस्कार पूर्वक धूपबत्ती की ओर देखा और कहा - देखती नहीं मैं कितनी भाग्यवान हूँ। चारों ओर मेरा प्रकाश फैल रहा है। सबकी आँखें मेरी ओर रहती है।
धूपबत्ती ने कहा - बहिन सो तो ठीक है, पर परीक्षा के कठिन समय में धैर्य और साहस के साथ अपनी जगह अड़ी रह सको, तभी तुम्हारी चमक की सार्थकता है। मोमबत्ती ने बात अनसुनी कर दी।
हवा का एक तेज झोंका आया। मोमबत्ती बुझ गई, पर धूपबत्ती ने अपनी सुगन्ध और भी तेजी से बिखेरना शुरू कर दिया।
कमरे का आकाश बोला - वह चमक किस काम की, जो एक झोंके का सामना भी न कर सके।