गलोगे, तो ही उगोगे

बीज की तीन ही गति हैं-या तो वह बीज बनकर गले और अपने को सुविकसित पौधे के रूप में परिणत करके अपने जैसे अनेक बीज पैदा करे और अपना वंश चलाता रहे। दूसरी यह कि पिसकर आटा बन जाय फिर रोटी के रूप में एक प्राणी का पेट भरे और अन्त में दुर्गन्धित विष्ठा बनकर किसी आड में उपेक्षित पड़ा रहे। तीसरी यह कि भीरुता और संकीर्णता से ग्रसित आत्म-रक्षा की बात सोचता रहे और कीड़े-मकोड़ों अथवा सड़न-सीलन द्वारा नष्ट कर दिया जाय।

मनुष्य-जीवन की भी यही तीन गतियाँ हैं, परमार्थ-प्रयोजनों में अपने को संलग्न करके यशस्वी-जीवन जिये और संसार की सुख-शान्ति में योगदान करे-यह पहली गति है। दूसरी गति यह कि अपने शरीर और परिवार को ऐश्वर्यवान बनाने पर ध्यान को केन्द्रित रखे, पेट और प्रजनन की समस्याओं में उलझा रहे। उचित-अनुचित का विचार न करके पशु स्तर की जिन्दगी गुजारे और अन्ततः विष्ठा जैसी हेय और घिनौनी परिणति प्राप्त करे। तीसरी गति अति कृपणता, अति संकीर्ण और अति स्वार्थ बुद्धि की है। उस स्तर के लोग न परमार्थ सोचते हैं, न स्वार्थ।

मनुष्य जीवन की सार्थकता और मानवी-बुद्धि की प्रशंसा इस बात में है कि वह प्रथम गति का वरण करे और श्रेष्ठ सज्जनों के मार्ग का अवलम्बन करे। ईसा ने लोगों से कहा था-मूर्खों जो बीज तुम बोते हो वह गले बिना नहीं उगता। भौतिक रूप से तुम गलोगे तो अध्यात्मिक रूप से ऊँचे उठोगे।


अखण्ड ज्योति के चंदे में एक रुपये की वृद्धि

इन दिनों आकाश छूने वाली महँगाई से कोई अपरिचित नहीं है। पर कागज के क्षेत्र में तो उसने सारी मर्यादाओं को ही तोड़कर रख दिया है। गतवर्ष इन्हीं दिनों कागज का जो भाव था, इन दिनों उससे दूने भाव में मिलना दुर्लभ हो रहा है, सरकारी कोटे का जो कागज मिलता था, उसकी न केवल मात्रा में भारी कमी हुई है, वरन् वह कब मिलेगा? कितना मिलेगा? यह सब भी अनिश्चित है।

सभी चीजों की महँगाई बढ़ने का प्रभाव प्रेस-कर्मचारियों की वेतन -वृद्धि के रूप में भी सामने आ गया है। न केवल ‘कागज’ के दानों में, वरन् ‘छपाई की लागत’ में भी खर्च बढ़ा है।

इन परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति का चन्दा बढ़ने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रह गया है। पृष्ठ घटाकर काम चलाने की बात भी सोची गई, पर हिसाब लगाने से पता चला कि ठीक आधे पृष्ठ घटाने पर ही जमा-खर्च बराबर होगा। अब 64 पृष्ठ छपते हैं, आगे यदि 7 रुपया ही चन्दा रखना हो तो 32 पृष्ठ से अधिक न दिये जा सकेंगे। इतने कम पृष्ठों में वे ज्ञान-किरणें पाठकों तक पहुँच ही न सकेंगी, जिन्हें ‘गुरुदेव’ अपने गहन-तत्व-चिंतन को नवनीत की तरह पहुँचाने की साधना में निरत हैं।

गत वर्ष इस महँगाई ने अखण्ड-ज्योति को इतना घाटा दिया है कि इस वर्ष आर्थिक दृष्टि से उसके पैर ही लड़खड़ाने लगे हैं। अगले वर्ष भी वही स्थिति चलने दी जाय तो निश्चित रूप से उसे बन्द कर देने के अतिरिक्त और कोई मार्ग शेष नहीं रहेगा।

स्पष्ट है कि इस महँगाई का असर प्रत्येक ‘पाठक’ पर है और उसे भी अपना निर्वाह कठिन पड़ रहा है। आवश्यक खर्चों में भी कटौती करके किसी प्रकार काम चलाना पड़ रहा है। ऐसी दशा में उसे अखण्ड-ज्योति के चंदे में वृद्धि होना निश्चित रूप से भारी पड़ेगा। दूसरी ओर हमारी भी वही स्थिति है। घाटे का असह्य बोझ उठाना अपने लिये भी असम्भव है।

बहुत सोच-विचार के बाद यत्किंचित् मूल्य वृद्धि करके किसी प्रकार काम चलाने का निश्चय किया गया है और मात्र एक रुपया ही बढ़ाया गया है। अब जनवरी 74 से अखण्ड-ज्योति का चन्दा सात के स्थान पर ‘आठ रुपया वार्षिक’ कर दिया गया है, इससे महंगाई के घाटे की एक एक सीमा तक ही पूर्ति होगी। शेष कमी पूरा करने के लिये सम्भव है-कुछ पृष्ठ भी घटाने पड़ें।

यह बुद्धि हमें अखरी है। पाठकों को भी अखरेगी ही, पर विवशता ने और कोई मार्ग शेष नहीं रहने दिया, इसलिए उसे हमें स्वीकार करना ही होगा। आशा है, प्रेमी पाठक अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उपलब्ध होती रहने वाली प्रकाश-किरणों का महत्व समझते हुए इस अतिरिक्त भार को अपनी सहज उदारता पूर्वक स्वीकार करेंगे।

खतरा एक और भी है कि यदि मूल्य वृद्धि के कारण ग्राहकों की संख्या घट गई तो घाटा ज्यों का ज्यों बना रहेगा। कम उत्पादन में लागत बढ़ने का सिद्धान्त हर कोई जानता है। इसलिए पाठकों के कन्धों पर बढ़ा हुआ ‘एक रुपया’ चन्दा और देने के अतिरिक्त एक नया उत्तरदायित्व यह भी आता है कि वे ग्राहकों-संख्या घटने न देने के लिए पिछले वर्षों की अपेक्षा अधिक प्रयत्न करें और पुराने ग्राहकों को प्रोत्साहित करने तथा नये ग्राहक बढ़ाने के लिए इन दिनों अधिक ध्यान दें और अधिक परिश्रम करें।” इस वर्ष तो यह आपत्ति-कालीन अतिरिक्त कर्तव्य विशेष रूप से पूरा करने के लिए हममें से प्रत्येक को अधिक तत्परता पूर्वक जुटना ही चाहिए।

जिन लोगों के पास ग्राहकों से चन्दा वसूल करने के लिए रसीद-बहियां भेजी गई थीं, उन्हें भी इस सम्बन्ध में पूरा ध्यान देना है। रसीद में छपे सात रुपये को काटकर हाथ से आठ रुपया बना लेना है। जिनसे सात रुपया लिया है, उनसे ‘एक रुपया’ और लेना है।

बढ़ी हुई महँगाई के कारण बढ़े हुए चंदे का अतिरिक्त भार उदारता पूर्वक उठा कर प्रेमी-पाठक अखण्ड-ज्योति के प्रति अपनी सहज श्रद्धा और सघन आत्मीयता का परिचय देंगे, ऐसी आशा है-और विश्वास भी।


“शान्ति कुँज” से प्रेषित सूचनाएँ।

(1) छः महीने के वानप्रस्थ शिक्षण-शिविर का पहला सत्र तारीख 20 जनवरी, 1974 से आरम्भ होगा। जिन्हें स्वीकृति दी जा चुकी है, उन्हें 19 जनवरी की शाम तक शान्ति-कुँज पहुँच जाना चाहिए। जिन्हें स्वीकृति नहीं मिली है, उन्हें अगले सत्र के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। स्थान सीमित होने से सभी आवेदन कर्ताओं का एक ही सत्र में सम्मिलित हो सकना सम्भव नहीं।

(2) छः महीने की वानप्रस्थ-शिक्षा दो भागों में विभक्त है। (1) सैद्धान्तिक (2) व्यावहारिक। सैद्धान्तिक प्रशिक्षण तीन महीने का है, जो शान्ति-कुँज में होगा। व्यावहारिक-शिक्षा कार्य-क्षेत्र में मिलेगी। इसके लिए उन्हें युग-निमार्ण शाखा-संगठनों में विविध गतिविधियों का संचालन करने के लिए भेजा जायेगा।

(3) कनिष्ठ वानप्रस्थों की शिक्षा दो महीने की कर दी गई है। वह 25 अप्रैल से आरम्भ होगी। एक महीना सैद्धान्तिक-शिक्षण शान्ति-कुँज में होगा और एक महीना शाखा-संगठनों में व्यावहारिक-प्रशिक्षण के लिए जाना पड़ेगा। जिन्हें स्वीकृति मिल जाय, उन्हें 24 अप्रैल तक हरिद्वार पहुँच जाना चाहिए।

(4) प्रत्यावर्तन सत्र 15 जनवरी को बन्द कर दिये जाएँगे। इसके पश्चात् जून-जुलाई दो महीने चलेंगे। इन सत्रों में भी मात्र स्वीकृति-प्राप्त साधकों को ही आना चाहिए। स्त्री, बच्चे, पड़ोसी, मित्र आदि साथ लेकर नहीं चलना चाहिए। शान्ति-कुँज में मात्र साधकों के ही ठहरने की व्यवस्था है।

(5) इस वर्ष हरिद्वार का कुम्भ-मेला है। फरवरी मार्च, अप्रैल प्रायः तीन महीने चलेगा। ऐसी प्रचण्ड भीड़ में जान-माल का भारी खतरा रहता है। अपनी ओर से ऐसी भगदड़ में आने के लिए किसी को भी सलाह नहीं दी गई है। उन दिनों शान्ति-कुँज वानप्रस्थ-शिक्षार्थियों से पूरी तरह भरा रहेगा। कुम्भ-स्नानार्थियों के लिए ठहरने आदि की यहाँ तनिक भी गुँजाइश नहीं रहेगी। यह बात भली प्रकार नोट कर ली जानी चाहिए।

(6) शान्ति-कुँज में अभी प्रत्यावर्तन, वानप्रस्थ आदि के प्रशिक्षण-सत्र चल रहे हैं। जो थोड़ा सा स्थान यहाँ बना है, वह इन शिक्षार्थियों के लिए ही कम पड़ता है। तीर्थ-यात्रियों पर्यटकों तथा दर्शन, परामर्श के लिए आने वालों के लिए धर्मशाला-स्तर की व्यवस्था तनिक भी नहीं है। इसलिए स्वीकृति प्राप्त शिक्षार्थियों के अतिरिक्त अन्य परिजन यहाँ ठहरने की योजना बनाकर नहीं चलें। धर्मशाला में ठहरें और मध्याह्नोत्तर दो से पाँच के बीच में ही विचार-विमर्श परामर्श के लिए आवें। अन्य समय यहाँ अन्य कार्यों की व्यस्तता रहती है।

(7) सभी जीवन्त युग-निर्माण शाखा-संगठनों को परामर्श दिया गया है कि वे अपने-अपने यहाँ मई, जून, जुलाई इन तीन महीनों में पन्द्रह-पन्द्रह दिन के नव-निमार्ण शिक्षण-शिविरों की व्यवस्था करें। उसमें प्रातः 5 से तक सदस्यों एवं कार्यकर्ताओं का शिक्षण होगा और रात्रि को 7 से 10 तक जनता के शिक्षण सभा-सम्मेलनों के रूप में होगा।

मध्याह्नोत्तर जन-संपर्क के क्रिया-कलाप करेंगे। इसी अवधि में चार दिन का गायत्री-यज्ञ भी सम्पन्न होगा। पूरी योजना पाक्षिक युग-निमार्ण में छप चुकी है। इस आधार पर सभी जीवन्त शाखा-संगठनों को अभी से अपने यहाँ के कार्यक्रमों का समय निर्धारित कर लेना चाहिए। उनमें शान्ति-कुँज से प्रशिक्षित दो वानप्रस्थ भी पहुँचेंगे।

इस वर्ष छुटपुट यज्ञ-आयोजन न करके शाखाएँ अपनी पूरी शक्ति से शिविर-सम्मेलन की सुव्यवस्थित योजना को ही अधिकतम सफल बनाने के लिए कटिबद्ध हों। उसी की तैयारी करें। इस अवधि में बसन्त-पर्व का एक आयोजन तारीख 28 जनवरी, सोमवार को सम्पन्न कर लेना पर्याप्त होगा। वह तो इस मिशन का सर्वोपरि पर्व है।

इस अंक के साथ अधिकाँश सदस्यों का चंदा समाप्त हो जाता है। कृपया नये वर्ष का चन्दा अविलम्ब भेजें। अंक उतने ही छपते हैं, जितने निश्चित ग्राहक होते हैं। देर से चन्दा भेजने पर बीच के अंकों से ग्राहक बनना पड़ता है ओर वर्ष की फाइल अधूरी रह जाती है। जिनका चंदा बीच के किसी महीने में समाप्त होता है वे सज्जन भी वर्ष के शेष महीनों को चंदा भेजकर अपना हिसाब ‘जनवरी से दिसम्बर’ का ठीक कर लें।


बलिदान से दुर्भिक्ष निवारण

उन दिनों विकट दुर्भिक्ष पड़ा था। प्रजा भूख से तड़प कर प्राण त्याग रही थी। देवताओं से विपत्ति निवारण करने वाली वर्षा करने के लिए पूजा-परिचर्या के साथ अनुनय-विनय की गई। पर वे टस से मस नहीं हुए।

उन दिनों ढर्रा कुछ ऐसा ही चल पड़ा था। लोग स्वार्थों में निरत थे। परमार्थ में किसी को रुचि नहीं थी। बलिदान की बात सुनकर कँपकँपी आती थी। इस दयनीय दुर्बलता से ग्रसित लोगों के भू-भर को धरती पर से हल्का करने के लिए दुर्भिक्ष उतरा था। लोग बेतरह मर रहे हैं। बिलखती-तड़पती मरणोन्मुख प्रजा के करुण-क्रन्दन से आकाश प्रतिध्वनित हो रहा है।

बलिदान से देवताओं को प्रसन्न करके दुर्भिक्ष-निवारण का उपाय लोगों को मालूम तो था, पर इसके लिए साहस कौन करे।

एक ब्राह्मण परिवार में रोज ही बलिदान का साहस करने की चर्चा होती। उस परिवार में तीन पुत्र थे। क्या हम लोग देव-समाधान के लिए आगे बढ़ सकते हैं? अशक्ति वृद्धि की हतवीर्य काया से देवताओं की रुचि नहीं। उन्हें तरुण-रक्त चाहिए।

उस रात चर्चा बहुत समय तक चली। ब्राह्मण दम्पत्ति अपने पुत्रों की बलि देने की चर्चा करने लगे। माता ने कहा-छोटा मुझे बहुत प्यारा है, उसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी। पिता ने कहा बड़ा कमाऊ है, उसे हाथ से नहीं जाने दिया जा सकता। कम महत्व का बीच वाला शुनिशेप ही था।

न जाने क्यों उस खुसपुस में शुनिशेप को नींद नहीं आई। वह उनींदा ऐसे ही पड़ा रहा और सब कुछ ध्यान पूर्वक सुनता रहा। मन ही मन उसने सोचा-जब माता-पिता की आवश्यकता को छोटे और बड़े भाई पूरी कर सकते हैं तो मैं पीड़ित-प्रजा के काम आने से क्यों झिझकूं? दूसरों जैसी कायरता से मरा मन मोह-ग्रस्त नहीं है तो बलिदान का प्रयोजन पूरा करके देव-अनुग्रह क्यों न प्राप्त करूँ? उसने मन ही मन निश्चय कर लिया।

प्रभात होते ही उसने अपनी आकांक्षा बलिदान के लिए व्यक्त की। बिना उत्तर आदेश की प्रतीक्षा किए वह उस यज्ञ भूमि में जा पहुँचा -जहाँ बलि के अभाव में यज्ञ की अग्नि ठण्डी पड़ चुकी थी। स्वेच्छा बलिदान के लिए उपयुक्त पात्र मिलने पर सर्वत्र प्रसन्नता का वातावरण छा गया और यज्ञायोजन की शिथिल पड़ी प्रक्रिया पुनः गतिशील हो गई। शुनिशेप देव-प्रयोजन में समर्पित होने के लिए अपने जीवन को सार्थक मान रहा था। प्रजा उसकी साहसिकता का भार भरे अश्रु-कणों के साथ अभिनन्दन कर रही थी।

बलि का समय निकट आ गया। ब्राह्मण-शरीरधारी वरुण, यज्ञ-भूमि में उपस्थित हुए। उनने कहा-परमार्थ-परायणता से विमुख प्रजा को अगणित संकटों का सामना करना ही पड़ता है। यह देश अपनी भीरुता का दण्ड-भोग रहा है। शुनिशेप ने उस कलंक को धो दिया। बलि का अर्थ-मरण नहीं, समर्पण है। बलिदानी शुनिशेप आगे बढ़ा तो स्वभावतः अनेकों उसके अनुयायी बनेंगे और संसार में परमार्थ की प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करेंगे। देवता उसी की प्रतीक्षा में थे। उनका क्रोध अब शाँत हो गया। आज से ही प्रबल वर्षा होगी और दुर्भिक्ष मिट जाएगा।

वैसा ही हुआ भी। शुनिशेप प्रजा की परमार्थ परायण और संगठित बनाने में जुट गया। देवताओं ने भरपूर वर्षा की और दुर्भिक्ष का संकट टल गया। बलि दानी का देश दुखी रह भी कैसे सकता था।


समष्टिगत उत्कृष्टता ही धर्म का प्राण है।

समष्टि का देवता ही हमारा आराध्य होना चाहिए। लोकहित को हम सर्वोपरि रखें। सदुद्देश्यों को आश्रय दें। इसके लिए व्यक्तिगत क्षति उठानी पड़े तो सहें। धर्म का तत्व-दर्शन यही है। जब व्यक्तिगत स्वार्थ की वितृष्णा बढ़ जाती है और उसके लिए समष्टि के हित की उपेक्षा की जाती है तो पाप के लिए द्वार खुल जाता है और अनेकानेक अकरणीय कार्य होने लगते हैं। व्यक्ति अपने स्वार्थों को सँभाले तो सही, पर वे इतने प्रबल न हो उठें कि समष्टिगत स्वार्थों से टकराने लगें। यदि वह टकराये तो ऐसी दुष्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करेंगे, जिससे व्यक्ति और समाज दोनों का घोर अहित होगा।

विवेकशीलता और मनुष्यता की माँग यह है कि आदमी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं के क्षेत्र में संयम बरतें, स्वल्प-संतोषी बने और अपरिग्रह व्रत का पालन करे। इस प्रथम भूमिका का सम्पादन करने के बाद ही मनुष्य उस द्वितीय भूमिका में प्रवेश कर सकता है, जिसे पुण्य, परमार्थ, महानता, धार्मिकता, आध्यात्मिकता, मनुष्यता आदि के गौरवशाली नामों से सम्बोधन किया जा सके।

व्यक्ति का गौरव-उसके कर्तव्यनिष्ठ और समाज परायण रहने में है। यदि इतना किया जा सके तो अभाव ग्रस्त स्थिति में रहते हुए भी यह अनुभव किया जाना चाहिए कि जीवनोद्देश्य को पूरा कर सकने वाली महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर ली। इसके विपरीत यदि कोई अपने अहंकार की पूर्ति और वैभव की वृद्धि में ही लगा रहे-अपने उत्पादनों का लाभ कुटुम्ब के दो-चार व्यक्तियों को ही उठाने देने की मोहग्रस्त संकीर्णता बरते तो समझना चाहिए कि उसके कष्टसाध्य प्रयास विश्वहित की दृष्टि से निरर्थक ही चले गये।

भौतिक सम्पदा से कुछ ऊंचे उठकर कुछ लोग व्यक्तिगत सम्मान के प्रश्न को प्रमुखता देने लगते हैं और वह अहंकारिता इतनी प्रबल हो उठती है कि यदि पूरी न हो सकी तो वह अपने प्रिय प्रतिपादन को ही तोड़ने में लग जाती है। नेता बनने की -पदाधिकारी होने की-लोगों की आँखों में सम्मानित समझे जाने की भूख भी धन-लोलुपता से कम भयंकर नहीं, वह भी कम अनर्थ नहीं करती। प्रशंसा और प्रतिष्ठा के भूखे मनुष्य भी लोभग्रसित कृपणों से कम अनर्थकारी नहीं होते। वे त्याग के नाम पर अर्थ-हानि उठा सकते हैं, पर प्रतिष्ठा की स्थिति हाथ से निकलते देखकर साँप की तरह फुफकारने लगते हैं। और कभी-कभी ऐसा विषैला दाँत मारते हैं कि वह पेड़ ही जल जाता है, जिस पर उनका अपना कोंचना बना हुआ था।

संसार में जितने अनर्थ और अपराध धन-ऐश्वर्य लूटने के लिए हुए हैं, उससे हजारों गुने अनाचार अहंकार और दर्प ने कराये हैं। द्रौपदी के कुछ कटु शब्दों से मर्माहत होकर दुर्योधन ने वह रुख अपनाया, जिसने महाभारत काल में हुआ नर-संहार अनिवार्य कर दिया। यह अहंकार के दैत्य का निर्भय अनुदान था, जिसने इस देश को सहस्रों वर्षों तक दुर्गति सहने वाले गर्त में धकेल दिया। जयचंद ने अपने व्यक्तिगत अपमान और स्वार्थ हानि की बात को प्रमुखता दी और भारत-भूमि को आक्रमणकारियों द्वारा पैरों-तले रौंद दिये जाने का पथ प्रशस्त कर दिया।

राज-सत्ता हथियाने के लिए लड़े जाने वाले शीतयुद्धों और रक्तयुद्धों में जितना धन लिप्सा का हाथ होता है, उससे हजारों गुना विजय-श्री का वरण करने की उद्धत आकांक्षा काम करती है। सिकन्दर और नैपोलियन पड़ोसी देशों की निरीह-प्रजा को रक्त-स्नान कराने के लिए विजेता कहलाने की उद्धत लालसा से ही ओत-प्रात हो रहे थे।

उद्धत ठाट-बाट और वैभव प्रदर्शन के लिए कितना अपव्यय होता है। इसका प्रभाव विवाह-शादियों की धूम-धाम में कहीं भी देखा जा सकता है। धर्मात्मा कहलाने की सनक में लोग न जाने जनता को किन-किन भ्रमों में उलझाते हैं और न जाने उन भोले भावुकों का कितना धन कितना श्रम नष्ट करते हैं? लोभ और मोह के कुचक्र में फँसे व्यक्ति जितने अनाचार करते हैं, उससे अधिक वे लोग करते हैं, जिनकी दर्प भरी तथाकथित प्रतिष्ठा उफनती रहती है। आन-वान शान पर न जाने कितनों को फिदा और फना होना पड़ता है।

चोर भी धनी बनते हैं, अनाचारी भी मौज उड़ाते हैं, अहंकारी भी विजेता बनते हैं, विदूषकों की हरकतें भी लोक-रञ्जन करती हैं, पैर ऊपर और हाथ नीचे करके चलने वालों को देखकर भी दर्शक तालियाँ बजाते हैं। यदि इतनी ही छोटी उपलब्धियों के लिए मनुष्य समष्टि का अहित करने वाले कार्य करने लगे तो इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए।

सदाशयता इसमें है कि मनुष्य व्यक्तिगत घाटा ही नहीं, अपयश सहकर ही समष्टिगत हित-साधन को ही प्रधानता दे। महानता इसमें है कि धन नहीं मान खोकर भी मनुष्य वह करे-जिससे लोक-हित साधना हो। दूर-दर्शिता इसमें है कि उच्च आदर्शों की समाज में विजयी बनाने के लिए व्यक्तिगत आदर्शवादिता की उपेक्षा भी कर दी जाय। साधन और साध्य दोनों उत्तम हों तो उसे स्वर्ण सुयोग कहा जा सकता है, पर जब आपत्ति-धर्म सामने आ खड़ा हो तो साध्य की गरिमा को विजयी बनाने के लिए साधनों की आदर्शवादिता को घटाया या गिराया भी जा सकता है।

महाभारत की अनेकों घटनाएँ इस तथ्य पर प्रकाश डालती हैं कि धर्म को विजयी बनाने के लिए उन आचरणों का भी आश्रय लिया गया, जिन्हें व्यक्तिगत दृष्टि से अधर्म ही ठहराया जाएगा। तत्त्वदर्शी और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने केवल ऐसे कार्यों का समर्थन ही किया, वरन् मूलतः वे ही उनके सूत्र संचालक भी थे। सत्य की रक्षा के लिए असत्य आचरणों को उन्होंने प्रोत्साहन देते हुए यही ध्यान रखा कि इसमें भले ही प्रयोक्ता को निन्दा का अथवा पाप का ही शिकार क्यों न बनना पड़, समष्टि-हित का लक्ष्य पूरा होना चाहिए। धर्म परम्परा को विनयी होना चाहिए।

स्पष्ट है कि भगवान का हर अवतार धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करने के लिए ही होता है। यह भी स्पष्ट है कि अहिंसा की धर्माधिकरण की प्रथम पंक्ति में गणना है। फिर भी प्रायः प्रत्येक अवतार को शस्त्र-पाणि होकर अधार्मिक तत्वों का दमन हिंसा से करना पड़ता है। बलि और वामन उपाख्यान में वामन भावना द्वारा बलि के साथ छल करने की बात स्पष्ट है। बुद्ध का भरी जवानी में स्त्री-पुरुष का त्याग धर्म-मर्यादाओं के अंतर्गत नहीं आता। राम सीता-त्याग भी सामान्य न्याय की कसौटी पर खरा कहाँ उतरता है , समष्टि हित-साधन को दृष्टि में रखकर किये गये अनुचित कार्यों की सूची यदि तैयार की जाय तो उस लपेट में अवतार, देवता, ऋषि भी आये बिना न रहेंगे। पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर को जन्म देने वाले महर्षि व्यास का अवैध सन्तानोत्पादन धर्म-मर्यादाओं से सम्मत कहाँ था? द्रौपदी के पतिव्रत-धर्म की पुष्टि किस संहिता के आधार पर की जाय? युधिष्ठिर द्वारा नरों वा कुँजरोवा’ का भ्रम उत्पन्न करने के उपरान्त भी उनका धर्मराज-पद छिना नहीं और वे स्वर्ग के अधिकारी यथावत बने रहे। कारण स्पष्ट था -उन्होंने व्यक्तिगत अपयश को सहन करते हुए भी धर्म-पक्ष को विजयी बनाने के लिए पाप-दण्ड और अपयश को बिना खेद अनुभव किये प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया।

भगवान कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि वे महाभारत में शस्त्र नहीं उठायेंगे, पर धर्म-पक्ष के सम्मुख अनर्थ प्रस्तुत होते देखकर उन्होंने भीष्म के विरुद्ध शस्त्र उठाये और अपनी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा टूटने की परवाह न की। अर्जुन द्वारा जयचंद-वध किये जाने का समूचा प्रकरण प्रतिज्ञा-भंग और छल-छलावा से भरा पड़ा है। भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन आदि कौरवों के सभी सेनानी प्रत्यक्ष लड़ाई में नहीं हारे, इन सबको युद्ध मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए भी पाण्डवों द्वारा मारा गया था।

कुन्ती ने कर्ण के पास जाकर अपनी कलंक-गाथा का रहस्योद्घाटन किया कि वह उसके कौमार्य-काल में जन्मा पुत्र है। इस रहस्योद्घाटन से कुन्ती की कीर्ति को कलुषित होना पड़ा। यदि वह रहस्य छिपा ही बना रहता तो उस समय के लोग और पीछे के इतिहासकार उस पर कोई उँगली न उठा पाते। इस तथ्य को कुन्ती भी जानती थी, पर उसने धर्म-पक्ष को विजयी बनाने के लिए उथली निन्दा-प्रशंसा के चक्र से ऊपर उठने का निश्चय कर लिया। कीर्ति की दृष्टि से यह एक प्रकार की मृत्यु ही थी, जिसे संभ्रान्त लोग प्रायः स्वीकार करने का तैयार नहीं होते। कुन्ती ने वैसा साहस किया। कर्ण को समझाया। पूर्ण मनोरथ तो नहीं पाया, पर आधा लाभ तो उसने उठा ही लिया। अर्जुन के अतिरिक्त अन्य सब पाण्डवों के लिए कर्ण का अभय वचन तो वह ले ही आई।

महाभारत की घटनाओं का धर्म-अधर्म की दृष्टि से यदि विश्लेषण किया जाय तो पाण्डव-पक्ष द्वारा अपनाई गई गति विधियों में से अधिकाँश को अधार्मिक ठहराया जा सकेगा। कृष्ण-चरित्र पर भी पग-पग पर उँगली उठाई जा सकेगी। इसके विपरीत कौरव-अधिक धर्म परायण दिखाई पड़ेंगे। परन्तु यह धार्मिकता उनके व्यक्तिगत अहंकार एवं सम्मान की रक्षा भर के लिए थी। जिस पक्ष के लिए वे लड़ रहे थे, उसकी वफादारी का स्पष्ट उल्लंघन होता था।

‘शिखण्डी से युद्ध नहीं करूंगा’ की प्रतिज्ञा को भीष्म ने अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बना लिया था। वे यह नहीं सोच सके कि सेनापति के लिए व्यक्तिगत प्रतिज्ञा का महत्व क्यों होना चाहिए। उसे तो पद के अनुरूप कर्तव्य ही पालन करने का ध्यान रखना चाहिए।

सेनापति द्रोणाचार्य का पुत्र मारा गया तो वे शोक ग्रस्त होकर शस्त्र पटक बैठे। सेनापति के लिए व्यक्तिगत पुत्र-शोक के लिए क्या स्थान हो सकता है? युद्ध-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को जीवन और मृत्यु से ऊपर उठना पड़ता है और ‘अपना बेटा या पराया बेटा’ वाला अन्तर हटाना पड़ता है। द्रोणाचार्य का व्यक्तिगत उभरा रहा , फलतः वे स्वयं भी मरे और अपने पक्षधरों को भी ले डूबे।

कर्ण अपनी दान-वीरता का यश कुण्ठित नहीं करना चाहते थे। माँगने वाले से मना करके अपयश क्यों ओढ़े? इसी व्यक्तिवाद ने कवच और कुण्डल दान करा दिये। उनके रहते अपराजय बनकर वे अपने पक्ष का कितना हित-साधन कर सकते थे-इस दूरगामी चिन्तन को वे भुला बैठे। सूर्य ने यों तो इस के छल की सम्भावना से पहले ही सचेत कर दिया था, पर उन्हें तो अपनी दान-वीरता द्वारा उपलब्ध होने वाली ख्याति की ही चिन्ता थी। सेनापति का कर्तव्य क्या कहता है-इसे तो उनने झुठला ही दिया।

कौरव-पक्ष चूँकि समष्टि दृष्टि से अधर्म-पोषक था, इसके लिए उसके पक्षधर प्रत्यक्षतः धार्मिक आचरण करते हुए दीखते हुए भी अधार्मिक ही कहे जाते हैं। इसके विपरीत धर्म-पक्ष को विजयी बनाने के लिए लड़ने वाले पाण्डव धर्मजीवी के रूप में ही प्रशंसा-पात्र होते हैं, यद्यपि युद्ध-काल में उनके द्वारा बरते गये क्रियाकलापों में प्रत्यक्ष अधार्मिकता की भी कमी नहीं थी।

वस्तुतः समष्टि का हित-साध नहीं धर्म है। आदर्श वादी परम्पराओं और नीति-न्याय का संरक्षण ही धर्म है। शाश्वत-धर्म की रक्षा के लिए प्रचण्ड प्रयत्न होने ही चाहिए। इसमें यदि व्यक्ति को अनुचित कार्य करने का अप्रिय उत्तरदायित्व संभालना पड़े तो भी साहस पूर्वक स्वीकार करना चाहिए। व्यक्तिगत रूप में यश-हानि करने वाले इस प्रयास में जिसे व्यक्तित्व और अधिक क्षति-ग्रस्त करना पड़ा है, उसके त्याग को धर्म-तत्व की गहन दृष्टि से देखा जाय तो सराहा ही जाएगा।


अध्यात्म का आधार और परिणाम

स्पष्टतः जड़ की तुलना में चेतना की सत्त असंख्य गुनी अधिक है। जड़ शक्तियाँ प्रबल कितनी ही हों, उनकी हाथी जैसी विशालता और क्षमता पर मानवी-चेतना का ही अंकुश रहता है। यह चेतना जितनी बुद्धियुक्त और सूक्ष्म होती चली जा रही है, उतनी ही मात्रा में प्रकृति की एक से एक बढ़ी-चढ़ी शक्तियों पर नियन्त्रण स्थापित कर सकना सम्भव होता जाता है। आश्चर्य नहीं कि किसी दिन मनुष्य अपने पिता परमात्मा का भावनात्मक दृष्टिकोण से ही नहीं, प्रकृति पर नियन्त्रण कर्ता के रूप में भी अपना वर्चस्व सिद्ध करे। चेतना की गरिमा निस्सन्देह असीम है, वह उतनी ही महिमामयी है -जितनी उसकी अधिष्ठात्री परमात्म सत्ता।

जड़ सत्ता का स्वरूप वर्चस्व और प्रयोग समझने के लिए हमें भौतिक-विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार चेतन-सत्ता की स्थिति, क्षमता और विधा को जानने के लिए जिस विज्ञान का आश्रय लेना पड़ता है, उसे अध्यात्म कहते हैं। चेतना-शक्ति का सदुपयोग कर सकने पर हम उन अनन्त वैभवों को अधिपति बन सकते हैं, जिनके सामने भौतिक समृद्धियाँ राई-रत्ती के समतुल्य ही बैठती हैं।

अध्यात्म के उपकरण कलेवर के रूप में पूजा-पाठ साधना, वेश, वस्त्र आदि का उपयोग हो सकता है, पर वस्तुतः उसका प्रयोजन उससे बहुत आगे का है। देवता या परमेश्वर के रूप में जिसकी आराधना की जाती है, वह वस्तुतः अपने आपे का परिष्कृत रूप ही है। इष्टदेव और सद्गुरु के रूप में इसी को विभिन्न नाम व रूपों से प्रस्तुत किया गया है। अपने आप में गहरी दिलचस्पी उत्पन्न करके आत्म-शोधन और आत्म विकास का क्रिया कलाप ही वस्तुतः भक्ति-भावना अथवा योग-साधना का प्रयोजन है। परमात्मा के जो गुणानुवाद गाये जाते हैं, वे वस्तुतः अपने ही परिष्कृत रूप में अभ्यर्थना है। ईश्वरीय अनुकम्पा से जो कुछ वरदान अनुदान मिलने का विश्वास किया जाता है-वह कहीं अन्यत्र से नहीं, अपने ही अन्तरंग से प्रस्फुटित होता है। देवता हमारे मानस-पुत्र हैं और मन्त्र विधानों का प्राण-साधक के प्रचण्ड संकल्पों के साथ गुँथा पड़ा है। मानवी-निष्ठा की श्रद्धा और विश्वास की परिणति ही सिद्धियों और विभूतियों के रूप में होती है।

बहिरंग साधनों के माध्यम से अन्तरंग में प्रवेश करना यही है-अध्यात्म साधना का तत्त्वज्ञान। इंजेक्शन की पिचकारी के सहारे द्रव औषधियाँ रक्त में मिलाई जाती हैं, सीधा प्रवेश कठिन पड़ता है। ठीक यही प्रयोग देव-मन्त्रों कर्मकाण्डों और साधना-विधानों के द्वारा आत्म-सत्ता की गरिमा के प्रति श्रद्धालु होने के लिए किया जाता है।

अध्यात्म-विज्ञान का उद्देश्य ईश्वरीय-क्रम व्यवस्था में गड़बड़ी फैला कर अपने लिए कुछ अतिरिक्त लाभ प्राप्त कर लेना नहीं है। यह खुशामद या रिश्वत जैसे ओछे हथकण्डों से हो भी नहीं सकता। अध्यात्म आत्म देवता में उत्कृष्टता की मान्यता परिपक्व करने और उसका स्तर, ऊँचा उठाने की विधि व्यवस्था है। जो उसे ठीक तरह समझते हैं और सही रीति से प्रयास करते हैं, वे भौतिक विज्ञानियों से कम नहीं, अधिक ही पाते हैं, क्योंकि जड़ की अपेक्षा चेतन की सत्ता भी बड़ी है और उसकी उपलब्धियाँ भी अधिक ऊँचे स्तर की हैं।

जड़-विज्ञान हमें शरीर और मन की प्रसन्नता दे सकने वाले साधन प्रदान कर सकता है। किन्तु अन्तःकरण की प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भर देने की क्षमता परिष्कृत चिन्तन के अतिरिक्त और कहीं नहीं। दूरदर्शी और वस्तु स्थिति समझने वाले दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है और पूर्वाग्रहों तथा कुसंस्कारों से छुटकारा पाकर उच्चस्तरीय रीति-नीति अपना सकने के साहस सका नाम मुक्ति। वस्तुतः अध्यात्म-विज्ञान के यही दो प्रधान प्रतिफल हैं। यों उसके साथ पत्र-पल्लवों की तरह ऋद्धि-सिद्धियाँ तो असंख्यों जुड़ी हुई हैं।


मरने के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है।

पालटेराजेस्ट फेनामेना, आडिटरी हेलसिनेशन, फिजीकल, ट्राँसपोजीशन, ह्विजिनरी एक्पीरियेन्स, स्पिटिपाजेशन प्रभृति वैज्ञानिक कसौटियों पर कसे गये घटना क्रम अनुभवों द्वारा आत्मा और शरीर की भिन्नता के अधिकाधिक प्रमाण मिलते जा रहे हैं। शरीर के मरने पर भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है और जीव बिना शरीर के होने पर भी दूसरों के सम्मुख अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकता है, इस तथ्य की पुष्टि में इतने ठोस प्रमाण विद्यमान हैं कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। विज्ञान क्षेत्र की वह मान्यता अब निरस्त हो चली है कि शरीर ही मन है और मन उन दोनों का अन्त एक साथ हो जाता है।

मरने के बाद प्राणी की चेतना का क्या हश्र होता है, इसका निष्कर्ष निकालने के लिए अमेरिकी विज्ञान वेत्ताओं ने एक विशेष प्रकार का चैंबर बनाया। भीतरी हवा पूरी तरह निकाल दी गई और एक रासायनिक कुहरा इस प्रकार का पैदा कर दिया गया, जिसने अन्दर की अणु हलचलों का फोटो विशेष रूप से बनाये गये कैमरों से लिया जा सके।

इस चैंबर से सम्बद्ध एक छोटी पेटी में चूहा रखा गया और उसे बिजली से मारा गया। मरते ही उपरोक्त चैंबर में जो फोटो लिये गये, उनमें अन्तरिक्ष में उड़ते हुए आणविक चूहे की तस्वीर आई। इसी प्रयोग शृंखला में दूसरे मेंढक, केकड़ा जैसे जीव मारे गये तो मरणोपरान्त उसी आकृति के अणु बादल में उड़ते देखे गये। यह सूक्ष्म शरीर हर प्राणधारी का होता है और मरने के उपरान्त भी वायु भूत होकर बना रहता है।

टेलीपैथी, प्रीकागनीशन, क्लेयरवायेन्स, आकाल्ट साइंस, मेंटाफिजिक्स प्रभृति विचारधाराओं पर चल रहे प्रयोगों एवं अन्वेषणों से अब यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता चला जा रहा है कि शरीर की सत्ता तक ही मानवी-सत्ता सीमित नहीं। वह उससे अधिक और अतिरिक्त है तथा मरने के उपरान्त भी आत्मा का अस्तित्व किसी न किसी रूप में बना रहता है। यह अस्तित्व किस रूप में रहता है-अभी उसका स्वरूप निर्धारण किया जाना शेष है। इलेक्ट्रानिक (विद्युतीय) एवं मैगनेटिक (चुम्बकीय) सत्ता के रूप में अभी वैज्ञानिक उसका अस्तित्व मानते हैं और ऐसी प्रकाश ज्योति बनाते हैं, जो आँखों से नहीं देखी जा सकती। डा. रह्यन ने इस संदर्भ में जो शोध कार्य किया है, उससे आत्मा के अस्तित्व की इसी रूप में सिद्धि होती है। उन्होंने ऐसी दर्जनों घटनाओं का उल्लेख किया है, जिसमें किन्हीं अदृश्य आत्माओं द्वारा जीवित मनुष्यों को ऐसे परामर्श, निर्देश एवं सहयोग दिये-जो अक्षरशः सच निकले और उनके लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।

सरविलियम वेनेट की ‘डौथवैड विजन्स’ पुस्तक में ऐसी ढेरों घटनाओं का वर्णन है-जिसमें मृत्युकाल की पूर्ण सूचना से लेकर घातक खतरों से सावधान रहने की पूर्व सूचनाएँ समय से पहले मिलीं थीं और वे यथा समय सही होकर रहीं। इसी प्रकार के अपने निष्कर्षों का विवरण प्रो. रिचेट ने भी प्रकाशित कराया है।

मरने के बाद पुनर्जन्म होता है और उसकी स्मृति भी कभी-कभी अगले जन्म में बनी रहती है। ऐसी घटनाओं की बहुत बड़ी शृंखला है। इसी शृंखला की एक कड़ी वह घटना भी है, जो माइकल शेल्डन नामक अंग्रेज को अपनी इटली-यात्रा के समय प्रकाश में आई थी। इटली में यों प्रत्यक्षतः उसे कुछ आकर्षण नहीं था और न कोई ऐसा कारण था-जिसकी वजह से इस यात्रा के बिना उसे चैन ही न पड़े। कोई अज्ञात प्रेरणा उसे इसके लिए एक प्रकार से विवश ही कर रही थी। माइकल ने यात्रा के कुछ ही दिन पूर्व एक स्वप्न देखा कि वह इटली के किसी पुराने नगर में पहुँचा है और किसी जानी-पहचानी गली में घुस कर एक पुराने मकान में जा पहुँचा। जीने में चढ़ते हुए वह चिर-परिचित दुमंजिले कमरे में सहज-स्वभाव घुस गया और देखा-एक लड़की घायल पड़ी है, उसके गले में छुरे के गहरे घाव हैं और रक्त बह रहा है। अनायास ही उसके मुँह से निकला- मारिया! मारिया! घबराना मत, मैं आ गया।’ सपना टूटा। शेल्डन विचित्र स्वप्न का कुछ मतलब न समझ सका और आतंकित बना रहा। फिर भी यात्रा ता उसने की ही।

जब वह जिनोआ का सड़कों पर ऐसे ही चक्कर लगा रहा था तो उसे वही स्वप्न वाली गली दिखाई पड़ी। अनायास ही पैर उधर मुड़े ओर लगा कि वह किसी परिचित घर की ओर चला जा रहा था। स्वप्न में देखी कोठरी यथावत थी, वह सहसा चिल्लाया- मेरिया! मेरिया!! तुम कहाँ हो?

जोर की आवाज सुनकर पड़ौस के घर में से एक बुढ़िया निकली, उसने कहा- मारिया तो कभी की मर चुकी। अब वहां कहां है? बुढ़िया ने शेल्डन को घूर-घूर कर देखा और पहचाने के बारे में आश्वस्त होकर बोली- पर लुइगी ब्रोन्दोनो! तुम तो इतने अर्से बाद लौटे-अब तक कहाँ रह रहे थे?

बुढ़िया हवा में गायब हो गई तो शेल्डन और भी अधिक अचकचाया। उसे ऐसा लगा-मानों किसी जादू की नगरी में घूम रहा है। अपरिचित जगह में ऐसे परिचय-मानो सब कुछ उसका जाना-पहचाना ही हो। बुढ़िया भी उसकी जानी-पहचानी हो-घर भी-गली भी ऐसी है-मानो वह वहाँ मुद्दतों रहा हो। मारिया मानो उसकी कोई अत्यन्त घनिष्ठ परिचित हो।

हतप्रभ शेल्डन को एक बात सूझी-वह सीधा पुलिस ऑफिस गया ओर आग्रह पूर्वक यह पता लगाने लगा कि क्या कभी कोई मारिया नामक लड़की वहाँ रहती थी-क्या वह कत्ल में मरी? तलाश कौतूहल की पूर्ति के लिए की गई थी, पर आश्चर्य यह कि 122 वर्ष पुरानी एक फाइल ने उस घटना की पुष्टि कर दी।

पुलिस-रिकार्ड के कागजों ने बताया कि उसी मकान में मारिया बुइसाकारानेबों नामक एक 19 वर्षीय लड़की रहती थी। उसकी घनिष्ठता एक 25 वर्षीय युवक लुइगी व्रोन्दोनो नामक युवक से थी। दोनों में अनबन हो गई तो युवक ने छुरे से उस लड़की पर हमला कर दिया और कत्ल करने के बाद इटली छोड़कर किसी अन्य देश को भाग गया। तब से अब तक उसका कोई पता नहीं चला।

शेल्डन का यह विश्वास पूरी तरह जम गया कि वही पिछले जन्म में मारिया का प्रेमी और हत्यारा रहा है। यह तथ्य-उसे न तो स्वप्न प्रतीत होता था, न भ्रम वरन् जब भी चर्चा होती, उसके कहने का ढंग ऐसा ही होता-मानो किसी यथार्थ तथ्य का वर्णन कर रहा है।

इस घटना को पूरा मनोविज्ञान-वेत्ताओं ने अपनी शोध को विषय बनाया। शेल्डन ने लम्बी पूछ-ताछ की-पुलिस कागजात देखे और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जो बताया गया है-उसमें कोई बहकावा या अतिशयोक्ति नहीं है। इस प्रकार की अन्य घटनाओं के विवरणों पर गम्भीर विचार करने के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अतीन्द्रिय चेतना की प्रस्फुरण से ऐसी घटनाओं की स्मृति भी सामने आ सकती है और न अनुभव करने वाले व्यक्ति को इस तरह की कोई जानकारी या जिज्ञासा।

इससे इस तथ्य पर भी प्रकाश पड़ता है कि जीवन अनन्त है और जीवधारी एक के बाद दूसरा जन्म लेता रहता है। यद्यपि ईसाई और मुस्लिम-धर्म पुनर्जन्म की बात नहीं मानते, वे सृष्टि के आरम्भ और अन्त के बीच केवल एक ही जन्म का होना मानते हैं, पर पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ उन मान्यताओं को गलत सिद्ध कर देती हैं।


अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की अद्भुत और अतिमानवी क्षमता - 2

जे. कार्लसन ने अपनी पुस्तक ‘मशीनरी आफ दी वाडी’ में मनुष्य को प्रजनन क्षमता यौन रुचि से-स्थूल प्रभाव से आगे की चर्चा करते हुए लिखा है-दाम्पत्य जीवन का तालमेल बिठाने में और उनके बीच सन्तोष असन्तोष रखने में हारमोन स्थिति का बहुत बड़ा हाथ है। सन्तानोत्पादन कर्म से आगे की बात में यह कहते हैं कि बालकों को मनः स्थिति का जो उत्तराधिकार पूर्वजों से मिलता है, उसका आधार ये हारमोन ही होते हैं। वंशानुक्रम और गुण सूत्र सम्बन्धी चर्चा इन दिनों बहुत है, पर उनमें जो विशेषता उगती-डूबती है, उनका मूल उद्गम कहाँ है? इसकी खोज की जाय तो पता चलेगा कि यह हारमोन्स ही हैं जो एक से एक प्रकार के अद्भुत अवतरण पीढ़ियों में करते हैं। जो विशेषताएँ निकटवर्ती पूर्वजों में नहीं थीं, उन्हें वंशानुक्रम विज्ञानी सैकड़ों पीढ़ी पुरानी वंश परम्परा में छिपे हुए किन्हीं सूत्रों का अनुमान लगाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि हारमोन की निकटवर्ती उत्तेजना में कितना कुछ भरा पड़ा है और उसके आधार पर पीढ़ियों में कैसे अद्भुत परिवर्तन हो सकते हैं?

शिकागो विश्वविद्यालय के एन्क्रोपालोजी विभाग के प्रोफेसर डोरसेप ने तिल्ली के द्वारा होने वाले स्रावों को पाचन-तन्त्र का अति महत्वपूर्ण आधार माना है। वे आमाशय और आँतों की सुव्यवस्था से लेकर गड़बड़ी तक का तिल्ली के स्रावों को महत्व देते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि भोजन सम्बन्धी रुचि एवं तृप्ति की प्रवृत्ति का भी उन्हीं रसों से सम्बन्ध है।

शरीर-शास्त्री इन जादुई-ग्रन्थियों के स्वरूप, क्रियाकलाप एवं आधार को समझने में दत्तचित्त से संलग्न है। जो मोटी जानकारियाँ उनके सम्बन्ध में अभी तक मिली हैं , उसका निष्कर्ष प्रायः सर्व विदित हो चला है।

अन्तःस्रावी (इण्डोक्राइन) ग्रन्थियों में सात मुख्य हैं। (1) पिट्यूटरी तथा (2) मिनियल शिर में (3) पैराथराइडस (4) थाइराइड तथा (5) थाइमस गले में (6) स्पिलीन तथा (7) एड्रिनल उदर में। इनके अतिरिक्त पेनक्रियस (पचन) तथा गौनड (जनन) ग्रन्थियों को भी इसी शृंखला में सम्मिलित किया जा सकता है।

पिन की नोंक की बराबर पीनियल ग्रन्थि मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास से सम्बन्धित है। सुविस्तृत स्थूल तथा सूक्ष्म जगत की विभिन्न हलचलों के साथ इसी केन्द्र के माध्यम से संपर्क साधा जा सकता है। मानवेत्तर सूक्ष्म प्राणियों से प्रेतात्मा तथा देवदूतों के साथ सम्बन्ध बनाने का केन्द्र यही है। बहिरंग और अन्तरंग जीवन के बीच की कड़ी यही है। तृतीय नेत्र इसी को कहा जाता है। ईश्वरीय-प्रकाश को उत्पन्न करने तथा ग्रहण करने का कार्य यहीं से होता है।

पिट्यूटरी ग्रन्थि नाक की जड़ के पीछे अवस्थित है। बुद्धि की तीव्रता, प्रेम-सम्बन्ध उत्साह, आत्म-नियंत्रण उसका मुख्य कार्य ह। बौनेपन या लम्बाई की बढ़ोत्तरी से इसी की विकृति का सम्बन्ध है। पुरुषत्व और नारीतत्त्व का दिशा परिवर्तन यही से होता है। यौवन के उतार-चढ़ाव तथा प्रजनन सम्बन्धी गतिविधियों का संपर्क इसी केन्द्र से है।

थाइराइड गले में स्थित है। मस्तिष्कीय सन्तुलन एवं स्वभाव-निमार्ण में इसका बहुत हाथ होता है। भावना तथा व्यक्तित्व का विकास बहुत कुछ इसी पर निर्भर है। आलस्य तथा उत्साह के लिए यही केन्द्र उत्तरदायी है। यहाँ थोड़ी भी उत्तेजना बढ़ जाने से व्यक्ति अधीर, अशान्त, उत्तेजित, बकवादी हो जाता है। आपे से बाहर होने में उसे देर नहीं लगती। प्रतिभाशाली और विकासोन्मुख व्यक्तियों को वैसा अवसर थाइराइड की सुव्यवस्था से ही प्रदान किया होता है।

गेहूँ के दाने की बराबर पैराथराइडस का स्नायु-संस्थान से निकट सम्बन्ध है। इसमें अवांछनीय से जूझने का साहस भरा रहता है। टूटी हुई कोशिकाओं का पुनर्निर्माण स्नायु-तन्त्रों का गठन, स्फूर्ति , रोग-निरोधक क्षमता का भण्डार इसी केन्द्र में भरा है।

थाइमस वक्षस्थल के ऊपरी भाग में होती है। गर्भस्थ स्थिति में विकास करने की क्षमता इसी में भरी ही। यदि यह ग्रन्थि अविकसित रहे तो भ्रूण-स्वस्थ माता से भी उचित पोषण प्राप्त न कर सकेगा। जन्म से लेकर किशोरावस्था और यौवन के द्वार तक ठीक तरह पहुँचा देने की जिम्मेदारी भी उसी को संभालनी पड़ती है। संक्षिप्त में इसे विकास ग्रन्थि कह सकते हैं।

प्रकृति के प्रतिपक्ष में अवस्थित स्पिलीन (तिल्ली) ग्रन्थि शृंखला में सबसे बड़ी है। पाचन-संस्थान की बलिष्ठता और रक्त की शुद्धि का बहुत कुछ आधार इसी पर निर्भर रहता है। स्नायु-संस्थान का गतिविधियों में इसका बड़ा हाथ रहता है। सूक्ष्म शरीर को व्यवस्थितिः सूर्य-चक्र से इस ग्रन्थि का विशेष सम्बन्ध रहता है। तदनुसार अन्तर्ग्रही प्रभावों को शरीर एवं मस्तिष्क तक पहुँचाने में इस केन्द्र की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

गुर्दों के ठीक ऊपर एड्रीनल ग्रन्थिका दूसरा नाम- सुप्ररिनल भी है। यह एक बड़े सम-बीज के आकार की होती है। पुरुषत्व और नारीतत्त्व की कितनी ही विशेषताएँ यही से विकसित होती है। इस केन्द्र को दूसरा मस्तिष्क कह सकते हैं। आपत्ति के समय प्रेरणा में इसकी भूमिका देखते ही बनती है। वीरता और कायरता मानो उसी उद्गम की उपज हो। लिंग-परिवर्तन की जो घटनाएँ घटित होती रहती हैं, उसमें इसी ग्रन्थि के स्रावों की उल्टी-पुल्टी करतूतें झाँकती रहती हैं।

गोनडस् (जनन ग्रन्थियाँ) जननेन्द्रिय की हलचलों की क्षमता को तथा प्रजनन शक्ति को नियन्त्रित करती है। पुरुष-यौवन और नारी यौवन का-विशेषतया प्रजनन सम्बन्धी यौवन का इसी ग्रन्थि से सम्बन्ध रहता है। वृद्धावस्था में आमतौर से शरीर बहुत शिथिल हो जाता है और इन्द्रियाँ जबाब दे जाती हैं। फिर भी कई बार यह आश्चर्य देखा गया है कि शताधिक आयु वाले व्यक्ति भी नवयुवकों की तरह प्रजनन-क्रिया सफलता पूर्वक सम्पन्न करते रहते हैं। यह गोनडस ग्रन्थियों के सशक्त बने रहने का ही परिणाम है।

अभी तक अन्तःस्रावी ग्रन्थियों सम्बन्धी खोज प्रारम्भिक अवस्था में है और उनसे निकलने वाले हारमोन स्रावों के बारे में स्वल्प जानकारी ही प्राप्त हो सकी है। फिर भी जो समझा और पाया गया है, उसे देखते हुए शरीर विज्ञानी आश्चर्य-चकित हैं कि शरीर और मन पर वास्तविक नियन्त्रण करने वाले यह महत्त्वहीन लगने वाले स्राव वस्तुतः कितने अधिक महत्वपूर्ण हैं। मस्तिष्क, हृदय, रीढ़, गुर्दे, आमाशय और आँतों आदि अंगों को शारीरिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने वाले अंक समझे जाते हैं और बीमारियों का कारण भी इन्हीं में कहीं कोई गड़बड़ी के रूप में खोजा जाता है। रक्त-परीक्षा द्वारा यह जाना जाता है कि रोगी के शरीर में किन विषाणुओं ने प्रवेश किया है। मल, मूत्र, थूक आदि की परीक्षा करके भी आन्तरिक स्थिति का पता लगाया जाता है और पाई गई विकृतियों का शमन किया जाता है। पर जब से हारमोन स्रावों के सम्बन्ध में गहराई से जानकारी मिली है, तब से समझा जा रहा है कि हृदय, गुर्दे आदि तो डाली-टहनी मात्र हैं, शरीर -वृक्ष को जड़े तो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में गहराई तक घुसी बैठी है।

गरीब आदमी-जिन्हें चिकनाई की मात्रा अन्यत्र स्वल्प मिलती है, अत्यन्त मोटे हो सकते हैं और चिकनाई, आलू, चावल आदि का प्रयोग बिलकुल छोड़ देने पर भी मोटे ही होते चले जाते हैं। ऐसी दशा में प्रतीत होता है कि खुराक से नहीं, शरीर की स्थूलता और दुर्बलता का किसी दूसरी क्षमता से सम्बन्ध है। यह बात अल्प अवयवों के सम्बन्ध में है। यहाँ तक कि मस्तिष्कीय संरचना के सही होने पर भी सोचने की क्षमता उद्धत एवं अवास्तविकता ग्राही हो सकती है। ऐसी दशा में मस्तिष्क आदि का स्थानीय इलाज करने से भी कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, क्योंकि वे अवयव भी पराधीन होते हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा इन अंकों को कठपुतली की तरह नचाया जाता है।

औषधि-विज्ञान अभी भी तीर तुक्का ही बना हुआ है। छोटी-छोटी बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति एक के बाद दूसरे डाक्टर का दरवाजा जीवन भर खटखटाते रहते हैं ओर उस मर्ज के लिए निर्धारित औषधियों में से प्रायः सभी का उपयोग कर चुके होते हैं, पर उस कुचक्र में धन और समय गँवाते रहने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। यही स्थिति अधिकाँश रोगियों की होती है। वे विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों का भी आश्रय लेते रहते हैं, एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी, नैचरोपैथी आदि ढेरों तरह की चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हैं, वे अपने विज्ञान की महत्ता जोर-शोर से करती हैं, पर देखा गया है कि उनमें से किसी के भी दावे में बहुत ज्यादा दम नहीं है। रोगी प्रायः यहाँ-वहाँ भटकते-भटकते जहाँ के तहाँ ही बने रहते हैं। कोई अच्छे हो जाएँ तो उनकी अन्तःशक्ति की अविज्ञात हलचलों को ही श्रेय देने की बात उचित जँचती है।

शरीर की सुदृढ़ता, सुन्दरता, स्फूर्ति, इन्द्रिय-क्षमता से लेकर रोग निरोधक शक्ति तक के भले बुरे पक्ष अब संबद्ध अवयवों की स्थिति पर निर्भर नहीं माने जाते, वरन् यह समझा जाता है कि हारमोन तत्वों का बहुत बड़ा हाथ उस भली-बुरी स्थिति को उत्पन्न कर रहा है। यही बात मानसिक स्थिति के बारे में भी है। मन्द बुद्धि, तीव्र-बुद्धि दूरदर्शी, अदूरदर्शी मस्तिष्कीय-स्थिति मनुष्य के बहुत प्रयत्न करने पर भी जब बनती-बदलती नहीं तो प्रायः यही अनुमान लगाया जाता है कि न केवल शरीर की वरन् मन की स्थिति के सम्बन्ध में भी मनुष्य की प्रयत्न चेष्टा बहुत ही सीमित परिणाम उपस्थित कर पाती है।

शरीर और मन की स्थिति से एक कदम और आगे बढ़कर स्वभाव और चरित्र की बात आती है। इसे भावना एवं निष्ठा क्षेत्र कह सकते हैं-आध्यात्मिक स्तर भी। अन्तःकरण के भले बुरे अथवा सीधे-उल्टे होना का भी बहुत कुछ सम्बन्ध इन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के साथ पाया गया है। ऐसी दशा में यह भी सोचना होगा कि क्या स्वाध्याय सत्संग जैसे स्थूल आधारों के सहारे व्यक्तित्व का स्तर बदल सकना सम्भव भी है, अथवा नहीं। चरित्र निमार्ण एवं भावना-स्तर के विकास में अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ ही यदि सहायक-बाधक हैं तो फिर उस क्षेत्र में हो रहे प्रयत्नों पर नये सिरे से विचार करना होगा और व्यक्तित्व की गहराई तक पहुँचने के लिए चालू प्रयत्नों से आगे बढ़कर कुछ नये आधार ढूँढ़ने होंगे।

प्राणियों के हारमोन इंजेक्शन द्वारा रोगी शरीरों में पहुँचाने के प्रयत्न भी चले हैं और एक की ग्रन्थि दूसरे में फिट करने का प्रयास भी किया गया है, पर उससे भी कुछ काम नहीं चला है और उस दिशा में चल रहा अत्युत्साह अब शिथिल हो चला है।

अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के रहस्य और मर्म पर से पर्दा उठाने के लिए हमें षट्-चक्र-विज्ञान को समझना होगा। अदृश्य अन्तरिक्ष भरी विपुल और विभिन्न शक्तियों के साथ मानवी-सत्ता का संबंध वे षट्-चक्र ही बनाते हैं। उन्हीं के प्रभाव को वे अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ ग्रहण करती हैं और अपनी गतिविधियाँ अपनाती हैं।

कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में षट्चक्र बेधन का विधान है। उसे स्थूल-विज्ञान के आधार पर समझना हो तो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ सकते हैं और सिद्ध कर सकते हैं कि अध्यात्मिक साधनाएँ मानवी-व्यक्तित्व के साथ जुड़े रहने वाले अनेक उतार-चढ़ावों को सन्तुलित करने में तथा प्रगति के अवरुद्ध पथ को प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण सहायता कर सकती है। षट्चक्रों के विकास परिष्कार के साथ अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का सन्तुलन और नियन्त्रण भी किस प्रकार सम्भव हो सकता है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए योग-साधना के अंतर्गत चक्र-विज्ञान में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है।


स्वर्ग और मुक्ति का लाभ समस्त मानव समाज को मिले।

व्यक्तिगत स्वर्ग और मुक्ति की बात सोचना अब हमें छोड़ देना चाहिए और समझना चाहिए कि इन्हें विखण्डित नहीं किया जा सकता। इनकी उपलब्धि कितनी ही मन्द गति से क्यों न हो-मिलेगी एक साथ ही। स्वर्ग मिलने की सम्भावना तभी है, तब जिस समाज में अपना रहना है, वह समुन्नत हो। निकृष्ट वातावरण में रहते हुए हम अपना चरित्र एवं मानसिक सन्तुलन बनाये नहीं रह सकते। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया सज्जनों पर भी होती है। फलस्वरूप वे अपनी उत्कृष्टता बनाये नहीं रह सकते। ऐसी दशा में कोई व्यक्ति सन्त या सज्जन ही क्यों न हो-स्वर्ग की प्राप्ति न कर सकेगा। डाकुओं के बीच धनी का निर्वाह नहीं हो सकता, उसे कभी भी कोई दबोच लेगा। उत्कृष्टता यों उत्पन्न तो एक में भी हो सकती है, पर उसका पोषण और अभिवर्धन परिस्थितियों के खाद-पानी से ही होगा। अकेले सुधरने से ही काम नहीं चलेगा, दूसरों को सुधारते हुए अपना सुधार सम्भव है। दूसरों को तारने का उपक्रम करते हुए हम भी तर सकते हैं।

कोई देश पराधीन हो तो उसका एक नागरिक स्वाधीन नहीं हो सकता, स्वतन्त्रता पूरे देश को मिलेगी-तभी उसका अमुक नागरिक भी स्वतन्त्र कहला सकेगा। दोष-दुर्गुणों से-कषाय -कल्मषों से-स्वार्थ और संकीर्णता से छुटकारा पाना ही मुक्ति है। लोभ और मोह को ही भव-बन्धन कहा गया है। केवल ईश्वर से डरें और कर्तव्य पालन पर अडिग रहें तो फिर हमें किसी से भी डरने की आवश्यकता न पड़ेगी। जिसने कायरता को जीत लिया, उसे सर्वत्र-स्वतंत्र और निर्भय कहा जा सकता है। प्रलोभनों के आगे न झुके-अनीति के आगे अधिक आपत्ति आने के डर से घुटने न टेके - अनौचित्य को अस्वीकृत कर केवल विवेक-संगत और न्याय समर्थित को ही अंगीकार करें तो समझना चाहिए कि आत्मिक-प्रगति को अवरुद्ध करने वाले असुरों पर विजय प्राप्त कर ली। आध्यात्मिक भाषा में मुक्ति का यही अर्थ है। जहाँ भगवान और भक्त दो ही रह जायें-व्यक्ति और आदर्श दो का ही अस्तित्व हो-अवांछनीय विकृतियों को घुस-पड़ने की जहाँ सम्भावना न हो-ऐसी मनः स्थिति को ही जीवन-मुक्ति कहते हैं। यही मानव-जीवन का परम लक्ष्य है।

किन्तु यह मुक्ति भी एकाकी नहीं हो सकती। जिस प्रकार सारे देश को विदेशी गुलामी से मुक्त कराया जाता है, उसी प्रकार समस्त मानव-समाज को निकृष्ट-चिन्तन व अवांछनीय कृत्य से विरत करना होगा। अन्यथा एक के कषाय-कल्मष दूसरे पर आच्छादित हुए बिना न रहेंगे। सूखी लकड़ी के साथ-साथ गीली लकड़ी भी जल जाती है। छूत की महामारी शुद्ध रक्त वालों को भी चपेट में ले लेती है। तात्पर्य यह है कि कुछ ही मनुष्य सन्त बनकर मुक्ति के अधिकारी बन जाएँ-यह नहीं हो सकेगा।

भगवान बुद्ध ने इस तथ्य को समझा था, वे कहते थे-संसार के समस्त प्राणियों के मुक्ता हो जाने के उपरान्त ही मुझे मुक्ति मिलेगी। तब तक मैं बार-बार जन्म लेता और मरता रहूँगा।” मुक्ति के लिए प्रयत्नशील तो रहूँगा, पर वह सर्वजनीन होगी, मेरे अकेले के लिए नहीं।

ऋषि ने ठीक ही कहा है-मुझे राज्य, सुख, स्वर्ग और मुक्ति आदि की कामना नहीं, दुख-तप्त प्राणियों के कष्ट-निवारण की ही कामना है।”

स्वर्ग उत्कृष्ट-चिन्तन का नाम है और मुक्ति-आन्तरिक दुर्बलताओं से छूटना। यह विभूतियाँ समस्त मानव समाज को उपलब्ध हो सकें, तभी व्यक्ति का कल्याण सम्भव होगा।


बुद्धि पर धर्म का अंकुश रखा जाय

विज्ञान-बुद्धि से हम चित्र की लम्बाई-चौड़ाई नाम सकते हैं, उसमें लगे रंगों का विश्लेषण कर सकते हैं। यही उसकी सीमा समाप्त हो जाती है। चित्र में जो सौंदर्य है, जो भाव-अभिव्यंजना है-उसका लेखा-जोखा प्रस्तुत कर सकने का कोई माप-दण्ड विज्ञान के पास नहीं है। ऐसी दशा में चित्रों का मूल्याँकन-क्या उसमें प्रयुक्त हुए पदार्थों को नाप-तौल कर करना ही ठीक रहेगा?

आँसुओं के पानी का वैज्ञानिक विश्लेषण पानी, खनिज श्लेष्मा, क्षार, प्रोटीन का सम्मिश्रण भर किया जा सकता है। प्रयोगशालाएँ आँसुओं का स्वरूप इतना ही बता सकेंगी। ऐसी दशा में क्या उनके साथ जुड़े हुए-स्नेह ममता, करुणा, व्यथा, वेदना आदि के अस्तित्व से इनकार कर दिया जाय? अथवा इन संवेदनाओं को इस लिए अमान्य ठहरा दिया जाय, क्योंकि उसका कोई प्रमाण पदार्थ विश्लेषण द्वारा उपलब्ध नहीं हो सका।

मनुष्य का शरीर विज्ञान की दृष्टि से कुछ रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्रण मात्र है। उसकी गतिविधियों का आधार अन्न-जल और वायु से मिलने वाली ऊर्जा है। मस्तिष्कीय-चिन्तन को शरीरगत संवेदनाओं से प्रभावित आवेश मात्र कहकर विज्ञान दूर जा बैठता है। आत्मा का-निष्ठा का-भाव संवेदना का-आदर्शों के लिए कष्ट सहने का-त्याग करने की उमंगों का-विज्ञान के पास कोई समाधान नहीं? ऐसी दशा में मनुष्य को, आत्मा और भावना से रहित एक रासायनिक यन्त्र कहकर संतोष कर लिया जाय?

देहात के अशिक्षित लोग अपेक्षाकृत सुखी, सन्तुष्ट और निश्चिन्त पाये जाते हैं, जब कि शिक्षित और सम्पन्न वर्ग के लोग अधिक चिन्तित, उद्विग्न और असन्तुष्ट पाये जाते हैं। इसका कारण बुद्धि का एकांकी विकास है। उसके ऊपर से आस्थाओं का आवरण हट जाने से मानसिक उछलता न केवल अचिन्त्य-चिन्तन आधार प्रस्तुत करती है, वरन् उन दुष्कर्मों को करने के लिए भी छूट देती है, जो मनुष्य के गौरव और समाज गत अनुशासन को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देते हैं। उद्धत महत्त्वाकाँक्षाएँ मनुष्य को एक प्रकार से ऐसा अर्ध-विक्षिप्त बना देती हैं, जो कामना-पूर्ति के लिए उचित-अनुचित का भेद त्याग कर कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर हो जाता है। असीम उपयोग की ललक सीमित क्षमता और सामान्य परिस्थिति में पूर्ण नहीं हो सकती। असीम उपलब्धि के साधन नहीं जुटते, ऐसी दशा में हर समय मनुष्य पर खीज चढ़ी रहती है और उसकी अभिवृद्धि से मनः क्षेत्र विषाक्त हो जाता है। ऐसे लोग अपराध-कृत्यों में निरत, उद्धत, अशान्त और हत्या अथवा आत्महत्या के लिए उतारू दीखते हैं, उन्हें अपने चारों ओर का वातावरण प्रतिकूल दीखता है। प्रतिकूलता को पचा सकने का सन्तुलन भी आध्यात्मिक विवेक-दृष्टि से ही बनता है, चूँकि दर्शन को पहले ही तिलाञ्जलि दी जा चुकी थी। इसलिए तथा-कथित मरघट के प्रेत-पिशाचों से भी गई-गुजरी मनःस्थिति में लोगों को अपने दिन गुजारने पड़ते हैं। शिक्षा, धन, पद, वैभव और परिवार की उपलब्धियाँ निरर्थक सिद्ध होती हैं, उनसे कोई समाधान नहीं निकलता। आकांक्षाओं के तूफान में उपलब्धियों के तिनके अस्त-व्यस्त छितराए उड़ते फिरते हैं। मनुष्य पर अभाव और असन्तोष ही छाया रहता है। हर घड़ी बेचैनी अनुभव होती है।

शान्ति, सन्तोष और विश्वास की छाया यदि देखनी हो तो पिछड़े अशिक्षित, देहाती और निर्धन क्षेत्र में किसी न किसी मात्रा में अवश्य मिल जायगी, किन्तु सुसम्पन्न वर्ग में उसके दर्शन भी होंगे। मित्रता के नाम पर चापलूसी ही बिखरी दिखाई देगी। क्या गहन घनिष्ठता, आत्मीयता एवं सघन निष्ठा के दर्शन दुर्लभ होंगे। परिवार एवं मित्र-मण्डली में मित्रता के चोंचले तो बहुत चल रहे होंगे, पर जिस वफादारी में एक दूसरे के लिए मर-मिटता है-उसका कहीं पता भी न होगा। यह बात आन्तरिक स्थिति के बारे में निश्चिन्त और निर्द्वन्द्व मनोभूमि कदाचित ही किसी को मिलेगी। मनोविकारों के तूफान उठ रहे होंगे और उनकी जलन से उद्विग्नता इस कदर बढ़ी हुई होगी कि जीवन का रस उसमें जल-भुन कर नष्ट ही हो चलेगा।

इसमें निर्धनता को श्रेय, और सम्पन्नता को निकृष्ट होना कारण नहीं है, वरन् यह है कि तथा-कथित पिछड़े वर्ग के अपने विश्वासों में उन तत्वों का किसी कदर समावेश करके रखा, जिन्हें अध्यात्म के वर्ग में रखा जा सकता है। भाग्यवाद, ईश्वर पर विश्वास, सन्तोष, वचन का पालन, वफादारी का निर्वाह जैसी आस्थाएँ तथाकथित विज्ञ-समाज में दकियानूसी कही जा सकती है, पर जिनने उन्हें हृदयंगम किया है-वे अज्ञ इन विज्ञों की अपेक्षा अधिक हर्षोल्लास लेकर जा रहे होंगे। दूसरी ओर सम्पन्नता का लाभ केवल शरीर पाता है। वे सुविधा साधनों का उपयोग अधिक कर लेते हैं, इससे शारीरिक सुविधा में कमी नहीं रहती, फिर भी अन्तःकरण अतृप्त और क्षुब्ध ही बना रहता है, क्योंकि उसे आस्थाओं का आहार नहीं मिल सका। प्यार और विश्वास के अभाव में मनःस्थिति मरघट जैसी वीभत्स ही बनी रहेगी। बहिरंग सुविधा-साधन उस अभाव की पूर्ति न कर सकेंगे, भले ही वे कितने ही बढ़े-चढ़े क्यों ने हों।

देखते हैं कि आस्था खोकर सम्पन्न वर्ग ने कुछ नहीं पाया, जबकि आस्था को अपनाये रहकर तथाकथित पिछड़ा वर्ग लाभ में रहा। आस्थाएँ गँवाकर भटकाव और विक्षोभ के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। वैभव अपने साथ जो उत्तेजनाएँ लेकर आता है, उनके कारण उपलब्ध होने वाले दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों की बहुलता-न शरीर को स्वस्थ रहने देती है और न जटिल प्रतिक्रियाएँ इतनी दुर्धर्ष होती हैं कि उनके सामने हर्षोल्लास का वह वातावरण भी नहीं टिक पाता, जिसे सरल और सौम्य प्रकृति का सामान्य मनुष्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करता हुआ अपने पिछड़ेपन को भी सराहता रहता है। सम्पन्नता और सुशिक्षा लोक और परलोक दोनों ही गँवा बैठती है, जबकि वैभव रहित व्यक्तिक्रम से कम एक तो हथियाये ही रहते हैं। हत्या और आत्महत्या जैसे कुकृत्य अनास्था के बूचड़खाने में ही होते हैं। आस्थावान् सहन भी कर लेता है और भविष्य के प्रति विश्वासी भी रहता है, पर जिसने इन निष्ठाओं को उखाड़ फेंका है-उनके लिए मन को समाधान कर सकने वाला सम्बल ही हाथ से निकल जाता है। संयम और सत्कर्म के लिए औचित्य और विवेक के लिए उन्हीं के जीवन में स्थान रहता है, जिन्होंने आस्थाओं को मजबूती से पकड़ कर रखा है। अनात्मवान् खाओ-पियो मौज करो” से आगे की कोई बात सोच ही नहीं सकता। ऐसा वर्ग जिस समाज में बढ़ता है, उसका भविष्य अन्धकारमय बनकर ही रहेगा। संशय और अविश्वास की मनोभूमि में विक्षोभ के विष-वृक्ष ही उगते हैं।

स्थिरता तभी तक रहेगी-जब तक बुद्धि और धर्म का समन्वय रहेगा। बुद्धि से शक्ति अर्जित की जाय ओर धर्म का परामर्श लेकर उसका उपयोग किया जाय तो ही दुरुपयोग से बचा जा सकता है और तज्जनित दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। बुद्धि पर से धर्म का नियन्त्रण हट जाने से ऐसी भयावह उछलता उत्पन्न होती है, जिसके सामने बुद्धि के सुखद उपार्जन का कोई महत्व ही नहीं रह जाता। विज्ञान, शिक्षा, कला, तकनीकी, शिल्प आदि के क्षेत्र में इन दिनों भारी प्रगति हुई है, किन्तु उससे मानवी सुख-शान्ति में कोई वृद्धि नहीं हुई। आन्तरिक स्तर तनिक भी नहीं बढ़ा, वरन् आदिम युग की जंगली-सभ्यता की ओर लौट पड़ा। जबकि बढ़े हुए सुविधा-साधनों के सहारे व्यक्ति और समाज को अधिक परिष्कृत स्थिति का लाभ मिलना चाहिए था। बौद्धिक-विकास और तज्जनित उपलब्धियों का परिवार भस्मासुर की तरह सर्वनाश का आयोजन करने में जुटा हुआ है। परमाणु को तोड़कर प्रचण्ड शक्ति को हस्तगत तो कर लिया गया, पर अब वही मनुष्य के अस्तित्व को चुनौती देने पर तुल गई है। बुद्धि पर धर्म का नियन्त्रण रहना इन परिस्थितियों में अनिवार्य हो गया है। निरंकुश स्वेच्छाचार तो हमें नष्ट करके ही छोड़ेगा।


मस्तिष्क की अद्भुत क्षमताएँ जिन्हें जानें और बढ़ायें

मानवी-मस्तिष्क में जो अद्भुत शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उनमें से वह केवल कुछ की ही थोड़ी सी ही मात्रा का प्रयोग कर पाता है। सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक शिक्षण द्वारा मनुष्य की जानकारी तथा क्रिया-कुशलता बढ़ती है। उस आधार पर वह अनुभव एवं अभ्यास को बढ़ाकर तरह तरह की भौतिक सफलताएँ प्राप्त करता है। सामान्य जीवन की प्रगति इस प्रशिक्षण-जन्य मस्तिष्कीय-विकास पर ही निर्भर रहती है। यह सारा क्रियाकलाप समग्र मानसिक-क्षमता का एक बहुत छोटा अंश है। इस परिधि से बाहर इतनी अधिक सामर्थ्य बच जाती है, जिसका कभी स्पर्श तक नहीं हो पाता और अछूती क्षमताओं को प्रसूत अवस्था में पड़ी रहने की दुखद स्थिति में ही जीवन का अन्त हो जाता है।

मस्तिष्कीय-चमत्कारों में एक स्मरण-शक्ति का विकास भी है। यदि उस संस्थान को समुन्नत बना लिया जाय तो सामान्यतया जितना मानसिक श्रम किया जा सकता है, उससे कई गुना कर सकना सम्भव हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में एक ऐसे भाषा अनुवादक थे, जो एक ही समय में चार भाषाओं का अनुवाद अपने मस्तिष्क में जमा लेते थे और चार स्टेनोग्राफ़र बिठाकर उन्हें नोट कराते चले जाते थे।

दार्शनिक जेरमी वेन्थम जब चार वर्ष के थे, तभी लैटिन और ग्रीक भाषाएँ ठीक तरह बोलने लगे थे। जर्मनी गणितज्ञ जाचारियस ने एक बार 200 अंकों वाली लम्बी संख्या का गुणा मन ही मन करके लोगों को अचम्भे में डाल दिया था। अमेरिका के एक गैरिज कर्मचारी को सैकड़ों मोटरों के नम्बर जवानी याद थे और वह उनकी शक्ल देखते ही पुरानी मरम्मत की बात भली प्रकार याद कर लेता था।

डार्ट माउथ कालेज अमेरिका में एक प्रयोग किया गया कि क्या छात्रों की पुस्तक पढ़ने की गति तीव्र की जा सकती है? मनोवैज्ञानिक व्यायामों और प्रयोगों के सहारे हर मिनट 230 शब्दों की औसत से पढ़ने वाले छात्रों की गति कुछ ही समय में बढ़कर 500 प्रति मिनट तक पहुँच गई।

छोटी आयु भी प्रगति में बाधा नहीं डाल सकती है। शर्त एक ही है कि उसे मनोयोग पूर्वक अपने कार्य में तत्पर रहने की लगन हो। डान फ्रांसिस्को कोलंबिया विश्वविद्यालय में जब प्राकृतिक इतिहास का प्रोफेसर नियुक्त हुआ, तब उसकी आयु मात्र 16 वर्ष थी।

आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने एक चार वर्षीय बालिका बेबेल थाम्पनन को गणित अध्ययन के लिए अतिरिक्त प्रबन्ध किया। यह बालिका इतनी छोटी आयु में ही अंकगणित, त्रिकोणमिति और प्रारम्भिक भौतिक-शास्त्र में असाधारण गति रखती है। इस उम्र के बालक ने जिसने प्रारम्भिक पढ़ाई क्रमबद्ध रीति से नहीं पढ़ी, आगे कैसे पढ़ाया जाय? इसका निर्धारण करने के लिए शिक्षा शास्त्रियों का एक विशेष पैनल काम कर रहा है।

मद्रास संगीत एकेडेमी न्यास की ओर से रविकिरण नामक ढाई वर्ष के बालक को उसकी अद्भुत संगीत प्रतिभा के उपलक्ष में 50 रुपये प्रति मास तीन वर्षों तक अतिरिक्त छात्रवृत्ति देने की घोषणा की है। यह बालक ने केवल कई वाद्य यन्त्रों का ठीक तरह बजाना जानता है, वरन् दूसरों द्वारा गलत बजाये जाने पर उस गलती को बताता भी है।

मस्तिष्क की बनावट विचित्र है, उसकी संरचना अद्भुत है। छोटे-छोटे कणों के भीतर इतनी विशेषताएँ भरी पड़ी हैं, जिनका थोड़ा अधिक परिचय प्राप्त किया जाय तो आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। संसार में जितने भी अद्भुत कार्य हुए हैं और विशेष प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व प्रकाश में आये हैं, उनकी समस्त विशेषताओं की मूल उनके मानसिक विकास पर निर्भर रहती है। यह विकास कई बार तो जन्मान्तरों की मानसिक प्रगति के कारण छोटी आयु में अनायास ही हो जाता है। किन्तु इस विकास क्रम का मार्ग अवरुद्ध किसी के लिए भी नहीं है। प्रयत्न पूर्वक कोई भी अपनी मानसिक क्षमताओं का क्रमिक विकास करते हुए उन्हें उच्च स्तर तक पहुँचा सकता है।

एक विशेषज्ञ के अनुसार यदि संसार भर के विद्युतीय संयन्त्र इकट्ठे कर लिये जाएँ और उन उपकरणों को समस्त पेचीदगी इकट्ठी कर ली जाय तो वह उस पेचीदगी से कहीं कम प्रतीत होगी, जो मानवी-मस्तिष्क में भरे साढ़े चार पाव ‘ग्रेमेटर’ में भरी पड़ी है।

मस्तिष्क का सामने वाला भाग सेरेक्रम संवेदनाओं और इच्छाओं का केन्द्र है। बुद्धि, विचारशीलता और भावनाएँ भी यहीं उत्पन्न होती हैं। मस्तिष्क का पिछला हिस्सा ‘सेरेवलम’ कहा जाता है। यह शरीर के सन्तुलन को बनाये रखने की तथा विभिन्न अवयवों की गतिविधियों को स्वसंचालित रखने की भूमिका सम्पादित करता है। हमारी सहज क्रियाएं -रिएक्शन एक्शन का नियन्त्रण भी यहीं से होता है। मस्तिष्क का तीसरा भाग जिसको मेड्रला ओवलागटा कहते हैं, अंगों की स्वसंचालित प्रक्रिया का अधिष्ठाता है।

मस्तिष्क का एक और भी वर्गीकरण हो सकता है। भूरा पदार्थ बुद्धि का सफेद पदार्थ क्रिया का संचालन करता है। मस्तिष्क का दाहिना भाग शरीर के बांये भाग का और बाँया भाग शरीक के दाहिने भाग का संचालन करता है।

यह मस्तिष्कीय संरचना अपने आप में पूर्ण है। उसमें स्वावलम्बन की और घात प्रतिघात सहने की अद्भुत क्षमता मौजूद है। बाहरी पोषण से अथवा मानसिक व्यायामों से वह विकसित हो सकता है और अवरोधों का सामना करने के लिए अभ्यस्त हो सकता है। किन्तु ऐसा कुछ न भी किया जाय तो भी वह अपनी समर्थता का कई बार अनायास ही ऐसा परिचय देता है, जिसे देखकर उसकी आत्मनिर्भरता को स्वीकार करना पड़ता है। निद्रा को मस्तिष्क की खुराक माना जाता है और कहा जाता है कि यदि मनुष्य सोये नहीं तो जल्दी ही पागल हो जाएगा या मर जाएगा। पर ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि मस्तिष्क निद्रा आदि किसी सुविधा की परवाह न करके अपने बलबूते अपना काम भली प्रकार चलाता रह सकता है।

इंग्लैंड के एक जे. डब्ल्यू. स्मिथ नामक 76 वर्षीय किसान की निद्रा उसकी 18 वर्ष की आयु में किसी बीमारी के कारण सदा के लिए नष्ट हो गई और इसके बाद वह फिर कभी भी नहीं सोया। 58 वर्ष तक बिना निद्रा के भी उसका काम बिना किसी रुकावट के चलता रहा।

स्पेन के अर्नेस्टो येअर्स कृषि-फार्म में काम करने वाले लोंर्टन मेडिना की आयु अब 70 वर्ष के लगभग जा पहुँची, पर वे गत 50 वर्ष से नहीं सोये। इससे उनकी मुस्तैदी में कमी नहीं आई। दिन भर खेत पर काम करते हैं और रात को जागते रहने के कारण वे ही चौकीदार की आवश्यकता भी पूरी करते हैं। जब थकान आती है तो थोड़ा लेटभर लेते हैं, उतने से ही उनका काम चल जाता है। स्पेन के स्वास्थ्य विभाग ने उनके मरण उपरान्त मस्तिष्क की चीर-फाड़ करके अनिद्रा के कारण और उसकी क्षतिपूर्ति होते रहने की विशेषता जानने का अधिकार प्राप्त कर लिया है।

पूर्वी पटेल नगर दिल्ली में बाबा राम सिंह नामक एक शतायु सज्जन बच्चों की कापी-पेंसिल जैसी चीजों की दुकान चलाते थे। उनका कथन था कि गत 22 वर्ष से एक क्षण के लिए भी नहीं सोये। इस बात की पुष्टि उस मुहल्ले के सभी लोग करते थे, जो रात-विरात उधर से निकलने पर उन्हें बैठा, गुनगुनाता या कुछ न कुछ खटपट करते देखा करते थे।

नवीनतम शोधें यह बताती हैं कि बीमारियों के कारण मात्र विषाणुओं की प्रकृति की प्रतिकूलता को अथवा आहार-बिहार की अस्त-व्यस्तता तक सीमित मान बैठना उचित नहीं। वस्तुतः रोगों का बहुत बड़ा कारण मनुष्य की मानसिक विकृतियाँ होती हैं। मनोविकारों का आरोग्य पर जितना घातक प्रभाव पड़ता है, उतना और किसी का नहीं। यदि क्रोध, चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, ईर्ष्या जैसे आवेशों से मस्तिष्क भरा रहे तो स्वास्थ्य-संरक्षण की सारी सुविधाएँ रहने पर भी निरोग रह सकना संभव न होगा। इसके विपरीत -निश्चिंत, निर्भय साहसी और मस्त तबियत का आदमी अपनी व्यथाओं का बिना उपचार के अनायास ही आधा निवारण कर लेता है। दीर्घ-जीवन के अनेकों आधार बताये गये हैं, उनमें सबसे बड़ा कारण है-जीवन इच्छा की प्रबलता। जो अपनी जिन्दगी को समाप्त हुआ नहीं मानता, देर तक जीने पर गहरा विश्वास रखता है, वह कष्ट-साध्य और असाध्य रोगों से देर तक लड़ता रह सकता है और भयावह संकट को परास्त भी कर सकता है।

मनोविज्ञानी डा. ले का कथन है -”क्रोधी और झगड़ालू मनुष्यों के शरीर में आवेश जन्य उत्तेजना से एड्रेनेलीन जहर पैदा होता है और वह रक्त में मिलकर पहले तो कई तरह की हानियाँ पहुँचाता है, पीछे नशे सेवन करने वालों की तरह वह विष ही शरीर की एक भूख बन जाता है। उसके बिना रहा ही नहीं जाता। ऐसी दशा में उस व्यक्ति की अन्तः चेतना किसी से न किसी से झगड़ा करने की प्रेरणा करता है और वह मनुष्य कोई न कोई बहाना किसी न किसी से लड़ने का ढूँढ़ निकालता है। आये दिन बातों की लातों की लड़ाई करने के लिए उसे आकुलता बनी रहती है। क्रोध के कारण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक हानियों की बात तो अलग रही, यह न छूटने वाली झगड़ने की आदत इतनी बड़ी हानि है, जिससे मनुष्य का स्वास्थ्य और सन्तुलन ही नहीं, समग्र व्यक्तित्व नष्ट होता चला जाता है।”

यही बात अन्याय मनोविकारों पर लागू होती है, वे इतना अधिक अहित करते हैं, जिनकी तुलना किसी भी बाहरी शत्रु के भयानक आक्रमण से नहीं की जा सकती। इसके विपरीत यदि मानसिक सन्तुलन ठीक से बना रहे तो मूर्ख मनुष्य बुद्धिमान बन सकता है और प्रगति के अवरुद्ध मार्गों को खोल सकता है।

उपेक्षा में पड़ी हर वस्तु नष्ट होती चली जाती है-मस्तिष्क के सम्बन्ध में भी यही होता है। हम चेहरे की सुन्दरता बनाये रखने के लिए जितना प्रयत्न करते हैं, यदि उससे आधा प्रयास भी मस्तिष्कीय क्षमता को समझने और उसे सुसंतुलित, समुन्नत बनाने के लिए करते रहें तो निस्सन्देह हमारी अन्तर्हित क्षमताओं का सहज ही विकास हो सकता है और उस आधार पर हम अभीष्ट दिशा में आशातीत प्रगति कर रहे हैं।


उद्दण्ड मनुष्य (kahani)

सन्त एकनाथ जिस रास्ते स्नान को जाया करते थे, एक उद्दण्ड मनुष्य का घर उधर ही था। छत पर खड़ा होकर वह ताकता रहता, जैसे ही वे उधर से गुजरते-ऊपर से कूड़ा पटककर उन्हें गन्दा कर देता। दुबारा नहाने के लिए विवश करने में उसे बहुत मजा आता।

बहुत दिन ऐसे ही बीत गये। इसके बाद अचानक परिवर्तन आया। कूड़ा गिरना बन्द हो गया। सन्त को चिन्ता हुई। उसने इधर-उधर पूछ-ताछ की तो मालूम पड़ा-वह उद्दण्ड व्यक्ति बीमार पड़ा है।

सन्त ने कहा-मित्र तुम मेरा रोज ध्यान रखते थे, अब मेरी पारी है कि बीमारी के कठिन समय में तुम्हारा ध्यान रखूँ। जब तक वह व्यक्ति रोग मुक्त न हो गया, वे रोज ही उसकी कई तरह सहायता करते और आवश्यक साधन जुटाते।

बीमारी से उठा तो उस व्यक्ति का स्वभाव ही बदल गया। सन्त की सज्जनता ने उसकी भीतरी बीमारी को भी अच्छा कर दिया।


गाने वाली बालू एक रहस्य

भगवान की दुनिया विचित्र है। मानवी बुद्धि उसका थोड़ा ही रहस्य जान पाई है और उतने से ही इतराने लगी है। जो जाना गया है, उससे अनजाना करोड़ों गुना अधिक है। प्रकृति के कुछ रहस्य तो ऐसे है जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। गाने वाली बालू से भरे रेगिस्तान अभी भी अपने रहस्य जानने के लिए मानवी बुद्धि को चुनौती दे रहे हैं।

गाने वाली बालू संसार के विभिन्न भागों में पायी जाती है। बारहवीं शताब्दी की बात है-मध्य एशिया दुर्गम रेगिस्तान टकला माकान को मार्कोपोलो अपने सहित पार कर रहा था। एक शाम खेमा गाढ़ते समय एक दल ने सीटी जैसी सुरीली आवाज लगातार बजते सुनी। इसका कोई कारण समझ में नहीं आया तो दल के सदस्य भाग खड़े हुए। उन्होंने उसे स्पष्टतः भूत का आतंक बताया।

प्रायः सभी कुली भाग खड़े हुए थे, पर तीन को उसने बड़ी मुश्किल से रोका। भूत के आतंक से वे भी बदहवास हो रहे थे। इस सुनसान में लगातार इतनी मीठी बंसी बजाकर आखिर भूत के अतिरिक्त और कौन बजा सकता है। वे निरन्तर भागने की आतुरता व्यक्त करते रहे। मार्कोपोलो ने बड़ी चतुरता से उन्हें रोक पाने में सफलता पायी। उसने बचे हुए तीन कुलियों को अपने पास एक का ताबीज दिखाया और कहा-यह भूतों से रक्षा में पूरी तरह समर्थ है। कल जो कुली भागे थे, उन्हें अनजाने वाले भूत ने सामने वाले टीले के पीछे पकड़ डाला है और उनकी चमड़ी की डुग्गी बनाकर फिर रहा है। तुम भागना चाहो तो भले ही चले जाओ पर तुम्हारी भी वही दुर्गति होगी। हाँ, मेरे पास से यह ताबीज मेरी ही नहीं, तुम्हारी भी रक्षा कर सकता है इस आश्वासन से कुली रुक गये और उस रेगिस्तान को पार कर सकना सम्भव हो गया। मार्कोपोलो ने इस सुनसान के संगीत का पता लगाने में बहुत अक्ल लड़ाई, पर कुछ नतीजा नहीं निकला। भूत पर वे विश्वास नहीं करते थे, पर इस नीरव-निनाद का अन्य कोई कारण भी तो समझ में नहीं आता था।

उस रहस्य पर से पर्दा इस शताब्दी के आरम्भ में उठा है। सर आरेल स्टइन ने गोबी मरुस्थल का सर्वे करते हुए यह विवरण प्रकाशित किया कि ‘टकला माकान’ क्षेत्र में बिखरी बालू ध्वनि मुखर है। उससे वाद्य यन्त्रों की तरह क्रमबद्ध ध्वनि प्रवाह निकलता है। गोबी मरुस्थल प्रायः आठ लाख वर्गमील में बिखरा पड़ा है। इसके कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ बालू गाती है। इनकी आवाजें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह की हैं। टकला माकान क्षेत्र के पश्चिमी अंचल में अदाँस-पादशा के सारे क्षेत्र की बालू ध्वनि मुखर है। वहाँ अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग तरह के संगीत बजते, गूँजते सुने जा सकते हैं।

स्पेन के एक यात्री एन्टेनियों डी. अल्लोआ जब अपने दल के साथ ऐड्रीज पर्वत श्रेणी पार कर रहा था तो पंचामार्का नोटी के समीप वायु मण्डल में गूँजता हुआ संगीत सुना। उसे सुनकर सारा दल भाग खड़ा हुआ। भगोड़ों ने यहाँ तक बताया कि उन्होंने अत्यन्त विशाल-काय दैत्य की डरावनी छाया भी उस क्षेत्र में भागती-दौड़ती अपनी आँखों से देखी थी।

प्रकृति के कतिपय अद्भुत रहस्यों का पता लगाने में अपने जीवन का महत्वपूर्ण भाग खर्च करने वाले अन्वेषी लेवरी ने दक्षिणी अमेरिका के दुर्गम अंचलों की खोज-बीन की। उसने स्कूइवो नदी के रेतीले मैदान में मुखरित होने वाले ध्वनि संगीत का वर्णन किया है। इसका विवरण सर आर्थर कानन डायल की लास्टवर्ल्ड में विस्तार पूर्वक दिया गया है।


विषाणुओं को मारने की ही बात न सोची जाय

बीमारियाँ का निदान करने के लिए रक्त, मल, मूत्र थूक आदि की परीक्षा की जाती है और देखा जाता है कि प्रस्तुत रोग के कारण कौन से विषाणु हैं? रोगी के शरीर में जो विषाणु पाये जाते हैं, उन्हें मारने के लिए जो औषधि कारगर होती है, उसको उपचार के रूप में सेवन कराया जाता है।

समझा यह जा रहा है कि उन कीटाणुओं की आकृति प्रकृति समझली जाय और उन्हें मार डालना किस रसायन के उपयोग से सम्भव हो सकता है-इसका पता लगा लिया जाय तो रोगों से-उनके उत्पादक विषाणुओं से-छुटकारा प्राप्त कर लिया जाएगा।

पूना की विषाणु अनुसन्धानशाला ने मनुष्यों की तरह समय-समय पर पशु-पक्षियों में भी फैलने वाली महामारियों का लेखा-जोखा तैयार किया है। रानीखेत में एक बार कोयलों पर विपत्ति टूटी थी, मैसूर के क्यासानूर वनों में बन्दरों का सफाया हुआ था। नागपुर की मस्तिष्क-शोध बीमारी, कलकत्ता का रक्त स्रावी ज्वर, दिल्ली का पीलिया सभी को याद है। महामारियों के ऐसे हैजा, प्लेग और इन्फ्लुएञ्जा की जैसी बाढ़ आई थी , वह किसी से छुपी नहीं है।

अब तक प्रायः 200 से अधिक प्रकार के विषाणु आर्थोपोंड-बोर्नबाइरस-ढूँढ़े जा चुके हैं। ये मक्खी, मच्छर, पिस्सू, खटमल जैसे छोटे कीड़ों के शरीर पर कब्जा जमाते हैं और फिर उनके सम्पर्क में आने पर मनुष्य भी प्रभावित होते हैं।

राकफैलर फाउण्डेशन तथा इण्डियन कोन्सिल आफ मेडिसिन रिसर्च ने पिछले दिनों विषाणुओं की आकृति-प्रकृति के सम्बन्ध में तो सुविस्तृत लेखा-जोखा तैयार किया है, पर वे भी ऐसा कुछ ठोस उपाय नहीं निकाल सके कि किस प्रकार इन रक्त बीजों से छुटकारा पाया जाय। क्योंकि उनके आक्रमण ऐसे छद्म और इतने तीव्र होते हैं कि जब तक रोक-थाम का अवसर आवे-तब तक तो वे अपना तीन चौथाई काम पूरा कर लेते हैं।

विषाणुओं की खोजबीन न केवल भारत में, वरन् समस्त संसार में हो रही है। किन्तु अब तक जो परिणाम निकले हैं वे बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। क्योंकि मारण प्रयोग की सार्थकता पूर्णतया संदिग्ध होती चली जा रही है। इसका एक कारण तो यह है कि रोग कीटकों के साथ-साथ जीवन-रक्षक स्वास्थ्य कीटाणु भी मरते हैं, क्योंकि दवा तो रक्त में मिलकर मार-काट मचाती हैं, वह रोग को मारने और निरोग को बचा देने की समझ वाली नहीं होती। इसलिए जहाँ रोग-कीटकों को मारने में आँशिक सफलता मिलती है, वहाँ शरीर की जीवनी शक्ति इतनी दुर्बल हो जाती है कि इसके फल स्वरूप किसी रोग की सामयिक निवृत्ति भले ही हो जाय, पर पीछे-पीछे अनेक विकृति-विद्रोह उठ खड़े होने की सम्भावना बन जाती है। दूसरी एक बात यह है कि विषाणु-मारक औषधि प्रयोग के पहले झोंके में तो कुछ न कुछ मरते हैं, पर जो बच जाते हैं, वे ऐसे ढीठ बन जाते हैं कि दवाएँ उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर पातीं।

विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने रोग-वाहक कीटों की आनुवांशिकी पर एक अन्वेषण रिपोर्ट प्रकाशित करके बताया है कि कीटनाशक दवाएँ आरम्भ में तो मार-काट करने में सफल होती हैं, पर जो जीवित बच जाते हैं, उनमें इन कीट-नाशक दवाओं से लड़ने की क्षमता भी तेजी से विकसित हो जाती है। इस वातावरण में रहते-रहते यह कीट निर्भय हो जाते हैं और फिर डी. डी. टी. - डाएल्ड्रिलन-जैसी दवाएँ भी उन्हें नष्ट करने में असमर्थ हो जाती हैं। अभ्यस्त कीड़े इन विषैली दवाओं पर निर्भय होकर बैठ जाते हैं-इतना ही नहीं, कितने ही तो इन विषों के रसास्वादन का भी प्रेमपूर्वक आनन्द लेते हैं। जो बात फसल-नाशक कीटाणुओं पर लागू होती है, ठीक वही मानव शरीर में भीतर अड्डा जमाये बैठे विषाणुओं पर लागू होती है। कुछ दिन के अभ्यास के बाद वे भी दवाओं को अंगूठा दिखाने लगते हैं।

इन परिस्थितियों में यही सोचना पड़ रहा है कि कीटाणु-नाशक दवाओं पर लगने वाले प्रयत्न को एकांकी न हरने दिया जाय, वरन् शरीरों में उस जीवनी-शक्ति के उद्भव का प्रयास किया जाय, जिसके रहते न विषाणु बाहर आक्रमण कर सकें और न मलों व सड़न के कारण भीतर ही उत्पन्न हो सकें। स्वास्थ्य-सम्बन्धी सामान्य नियमों का पालन करना-आहार-विहार में प्रकृति के अनुरूप सामंजस्य उत्पन्न करना ही वह वास्तविक उपाय है, जिससे विषाणुओं की विभीषिका से निपटने का स्थायी उपाय निकल सकता है।

एक और भी चिन्ताजनक पक्ष यह है कि यह मारक औषधियाँ भी विषाणुओं से कम घातक नहीं हैं। यदि उनका मारक तत्व किसी प्रकार प्रबल हो चले तो फिर उसकी भयंकरता किसी महामारी से कम न रहेगी और लाभ सोचने के स्थान पर रोग और रोगियों के ही नहीं, स्वस्थ मनुष्यों के सफाया होने की सम्भावना भी सामने आ खड़ी होगी।

खरगोशों की बहुता से निपटने के लिए उनमें एक मारक तत्व की सुई लगाने का ऐसा ही प्रयोग हुआ है, जिसने विषाणु-नाशक दवाओं के सेवन के साथ जुड़ी हुई विभीषिका को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। फ्राँस में एक डाक्टर ने अपने बगीचे के खरगोश मारने के लिए उन्हें एक जहरीला इंजेक्शन लगाया, उसका अनुमान था कि इन खरगोशों के संपर्क में आने वाले बगीचे के कुछ और खरगोश भी मर जायेंगे। पर परिणाम अप्रत्याशित हुआ, वह मारक छूत इस प्रकार अनियन्त्रित होकर फैली कि यूरोप में खरगोश के वंश नाश का ही संकट उत्पन्न कर दिया। घटना इस प्रकार घटी कि - फ्राँसीसी डाक्टर पाल अमर्दाडिलाइल के बगीचे में खरगोशों का बाहुल्य था, वे आये दिन नये पौधे नष्ट कर देते। इससे वे खरगोशों पर बेतरह झल्लाये हुए थे। खरगोश मारने की दवा का विज्ञापन पढ़ा तो उनकी बाछें खिल गईं और दूसरे ही दिन उसे मँगाने का आदेश दे दिया और वह कुछ ही दिनों में आ भी गई। उनका विचार अपने बगीचे के खरगोशों को खत्म करने का था। सो बताई हुई तरकीब के अनुसार उन्होंने दो खरगोश पकड़े, उन्हें दवा के इंजेक्शन लगाये और बगीचे में छोड़ दिया। खरगोश बीमार पड़े, उनकी छूत बगीचे के अन्य खरगोशों को लगी और वे उसी छूत की बीमारी से सब के सब मर गये। डाक्टर को अपनी इस सफलता पर बहुत प्रसन्नता हुई।

पर बात एक ही बगीचे तक समाप्त नहीं हुई। छूत फैली और उसने पहले फ्राँस भर के खरगोशों का सफाया किया और पीछे सारे यूरोप में उन पर कहर बरसा दिया।

फ्राँस में माँस के लिए खरगोश पाले जाते थे। किसानों ने पशु-पालन के घरेलू उद्योग में खरगोश को भी शामिल कर रखा था। सरकारी शिकारग्रह में शिकारियों के लिए लाइसेन्स लेकर खरगोशों के शिकार की अनुमति मिलती थी। इससे सरकारी खजाने में करोड़ों रुपया लाइसेन्स फीस का जमा होता था। अनुमान किया गया था कि प्रायः 20 लाख खरगोशों का माँस उस देश के निवासियों को मिलता था। उनकी खालें काफी कीमती होती थीं और उससे किसानों तथा शिकारियों को काफी पैसा मिलता था। चमड़े के उद्योग में इस चमड़े की बड़ी भूमिका थी। इस उद्योग से सरकार को 20 करोड़ फ्रेंक का टैक्स मिलता था और चमड़े के कारखानों में प्रायः एक लाख कर्मचारी काम करते थे।

द्वितीय महायुद्ध के समय तो भुखमरी से खरगोशों ने ही फ्राँसीसियों का बचाया था। इन दिनों प्रायः 85 लाख खरगोश हर साल मारे जाने लगे थे।

यूरोप भर में इन उपयोगी खरगोशों का इतनी तेजी से सर्वनाश होने से सर्वत्र हाहाकार मच गया। उन दिनों एक तीन वर्ग मील के इलाके में 20 हजार खरगोश जमीन पर मरे हुए पड़े पाये गये। जंगलों और झाड़ियों में मरने-सड़ने वालों की संख्या तो और भी बढ़ी चढ़ी थी। बीमार खरगोशों से गाँवों की गलियाँ भरने लगीं और सड़कों पर पहुँच कर वे तेज दौड़ती मोटरों से कुचलने लगे। सड़कें इस रक्त-माँस से घिनौनी हो गई। यह समस्या उन दिनों यूरोप की एक बड़ी समस्या बन गई।

खरगोशों का वंश-नाश करने वाली इस दवा का नाम था- भिकजा मेटोसिस’ उसे आस्ट्रेलिया की सरकारी प्रयोगशाला में बढ़े हुए खरगोशों को नष्ट करने के लिए बनाया था। इस दवा के इंजेक्शन लगाकर कुछ खरगोश जंगलों में छोड़े गये, फल स्वरूप छूत की बीमारी उन्हें लगी और बड़ी संख्या में वे रम गये। इससे वे मरे तो, पर वैसा सफाया नहीं हुआ-जैसा कि यूरोप की जलवायु ने उन पर कहर बरसाया।

इस संकट के निवारण का खरगोशों की नस्ल बचाने के लिए फैली हुई महामारी पर नियन्त्रण करने का काम पाश्चर इन्स्टीट्यूट ने अनेक सरकारों के अनुरोध पर अपने हाथ में लिया। डा. प्येरलेपें के नेतृत्व में एक वेक्सीन निकाला गया और उससे उस महामारी पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सका।

रोकथाम के लिए जो ‘एन्टीभिक्जामेटोसिस’ इंजेक्शन बनाया जा सका, उससे इतना ही हो सका कि खरगोशों की नस्ल मिटने से बचाई जा सके। पाश्चर इंस्टीट्यूट के कर्मचारियों ने बड़ी मेहनत करके दो वर्ष में चार लाख स्वस्थ खरगोश पकड़े और उन्हें टीका लगाकर जंगलों में छोड़ दिया, ताकि वे उस महामारी के प्रभाव से अपने को बचा सकें और भविष्य के लिए नस्ल पैदा कर सकने योग्य बने रह सकें। जिन्हें टीका नहीं लगाया जा सका, वे तो बेचारे तेजी से मौत के ग्रास बनते ही चले गये।

बेल्जियम, लग्जेम्वर्ग, जर्मनी आदि देशों में भी खरगोशों का इसी प्रकार इस महामारी ने सफाया किया। डा. पाल डिलाइल ने कुछ खरगोशों पर ही मारक प्रयोग किया था, पर इसकी विष-बेल फैली तो उसने करोड़ों के ही प्राण ले लिये।

विषाणुओं की भयंकरता और उनकी हानि कम नहीं हैं। उनके निराकरण का उपाय किया जाना चाहिए। पर वह अति उत्साह भरा और एकांकी नहीं होना चाहिए। मारक औषधियों की उल्टी प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए उनका प्रयोग फूँक-फूँक कर करने में ही कल्याण है।

गुत्थी का हल आज निकल या कल, संयम और सादगी की अध्यात्म परम्परा को जीवन में स्थान देने पर ही निकलेगा। विषाणुओं का मारण जितना उचित है, उससे लाख गुना आवश्यक यह है कि हम समझदारी ओर सरलता की सौम्य जीवन पद्धति अपनायें। साथ ही मल संचय की उस गुँजाइश की जड़ उखाड़ने में निरन्तर प्रवृत्त रहें, जिसके कारण कि इन विषाणुओं की उत्पत्ति होती है।


बरगद की ऊँचाई (kahani)

बरगद का एक बड़ा पुराना पेड़ था। उसके नीचे नन्ही सी बेल उगी और तीन महीने में ही बढ़कर बरगद की आधी ऊँचाई तक चढ़ गई।

एक दिन बेल ने पूछा-वृक्षराज आपकी आयु कितनी है? पेड़ चुप रहा, पर जब वह बार-बार वही प्रश्न पूछती रही तो एक दिन उसने धीमे से कह ही दिया-तीन सौ वर्ष।

लता की हँसी रोके न रुकी। वह बोली- मुझे देखो, तीन महीने में ही इतनी आगे बढ़ गई एक आप हैं, जो तीन सौ वर्षों में इतने कम बढ़ पाये।

वृक्ष ने मौन तोड़ते हुए कहा- बच्ची तुम्हें अभी आँधी-तूफानों से पाला  नहीं पड़ा है? तीन सौ साल में शायद तुम तीन सौवीं बेल हो, जो ऐसा ही लाँछन लगाकर हर साल अतीत के गर्त में विलीन हो जाती हैं।


हत्यारे की आत्म-प्रताड़ना

6 अगस्त 1945 को जापान पर दो अणु बम फेंके गये थे, उसमें हिरोशिमा में 78 हजार मनुष्य मरे और 56 हजार घायल हुए थे। नागासाकी में 74 हजार मरे और 77 हजार घायल हुए थे। साढ़े नौ सौ वर्ग मील का क्षेत्र पूरी तरह नष्ट हो गया था। इसके अतिरिक्त रेडियो-धर्मी प्रभाव से पीड़ित लोगों की संख्या लाखों तक जा पहुँचती है।

इन अणु बमों को गिराने के लिए प्रख्यात मेजर इथरली को अपने उस कुकृत्य से भारी आत्म ग्लानि हुई। पहले वह सोचता था कि इतना बड़ा साहसिक काम करने के लिए उसे जो ‘यश’ मिलेगा, उससे उसे प्रसन्नता होगी, पर वैसा हुआ नहीं। आत्म-प्रताड़ना ने उसे विक्षिप्त बना दिया। वह आत्महत्या करने अथवा आत्म-दण्ड पाने के लिए इतना आकुल रहने लगा, मानो इसके अतिरिक्त आत्म-प्रताड़ना के दुःसह-दुख से बचने का और कोई रास्ता हो ही नहीं सकता।

अन्ततः उसने आत्म-दण्ड का सहारा चुना। कई अपराध किये और बन्दूक लेकर एक दुकान में डाका डालने के लिए घुस पड़ा और पुलिस द्वारा पकड़ा गया और न्यू आर्लियेन्स के जेलखाने में बन्द कर दिया गया। उसने अपनी सफाई देने का कोई प्रयत्न नहीं किया। खुले रहने की अपेक्षा उसने जेल पसन्द की। उसके ऊपर सरकार बनाम इथरली नाम से मुकदमा चला। पर उसका मानसिक और शारीरिक सन्तुलन इतना बिगड़ा हुआ था कि अदालत में खड़ा तक न हो सका। जेल से उसे अस्पताल भेजा गया।

नागासाकी (जापान) पर अणुबम गिराने वाले विमान संचालक फ्रेड ओवी ने अपने मार्मिक-वक्तव्य में कहा-इस युग की सबसे दर्दनाक, सबसे अमानुषिक और सबसे भयानक घटना का जब भी मैं स्मरण करता हूँ तो सिर घूम जाता है और रात-रात भर उसी सोच-विचार में जागना पड़ता है। मुझे हैरत होती है कि विज्ञान ने क्या अजीब परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं? जिस कार्य के लिए अनेक नैपोलियन मिलकर भी कम पड़ते, उसे मुझ जैसे नाचीज व्यक्ति को कर गुजरने में समर्थ बना दिया गया। यह ऐसा भयानक कृत्य था, जिसका प्रभाव मनुष्यों पर पीढ़ी दर-पीढ़ी तक पड़ता चला जाएगा।

हमें कोकुरा पर अणु बम गिराना था, पर उस दिन वहाँ पर घने बादल छाये हुए थे-सो कुछ दीख नहीं पड़ रहा था। अस्तु दूसरे आदेश के अनुसार उसे नागासाकी पर गिराया गया। जहरीले धुँऐ का छत्तेदार बादल प्रति मिनट एक मील की चाल से ऊपर उठता हुआ हमने देखा। मेरे मन में इस घड़ी इतनी प्राण-घातक भय की भावना उठी, जितनी मनुष्य के इतिहास में शायद कभी किसी ने अनुभव न की होगी। भागते-भागते हमें अणु तरंगों के एक के बाद झटके लगे। जहाज का नियंत्रण हाथ से छूटते-छूटते बचा और हम किसी प्रकार बाल बाल बच निकलने में सफल हो गये एक सेकेंड की भी देर हो जाती तो फिर हमारा भी खात्मा ही था। उस दस्ते के हमारा उड़ाकु निष्कर्ष यही अनुभव करते रहे, सिर्फ एक बम ही नहीं गिराया गया है, वरन् एक बड़ी पिशाच-शक्ति को इस विश्व को निगल जाने के लिए छुट्टा कर दिया है। उस घटना को काफी दिन बीत गये, पर आज भी जब मैं आँखें बन्द करता हूँ तो महादैत्य जैसी उस दिन की नीली रोशनी अभी भी आसमान में छाई दीखती है, जिसके सामने सूरज बुझती मोमबत्ती जैसा लगता था। ईश्वर न करे, मानव इतिहास में फिर कभी ऐसा भयानक दृश्य देखने को मिले।

“जब मैं अणु बम गिराकर लौटा तो मेरी बूढ़ी माँ अत्यधिक दुखी थीं। उनके चेहरे पर कातरता और करुणा बरस रही थी। जैसे ही घर में घुसा तो माँ ने कड़ककर पूछा-फ्रैंक तुम्हारी आत्मा तुम्हें कचोटती नहीं? अपराधी की तरह सिर नीचा किया मैं खड़ा रहा, एक शब्द भी मुँह से निकला नहीं।”

“वे रात को अक्सर चौंककर उठ बैठती और घुटने टेक कर प्रार्थना करती रहतीं-हे भगवान मेरे बेटे को क्षमा करना”


प्रसन्न रहना एक अच्छी आदत

शिकागो विश्वविद्यालय के नेशनल ओपीनियन रिसर्च सेन्टर ने डा. नार्मन एम. ब्रेड वर्न के तत्वावधान में एक समिति इसलिए बिठाई कि वह प्रसन्नता-अप्रसन्नता के कारणों और अनुभवों की गहराई को समझने का प्रयत्न करे।

समिति ने विभिन्न वर्गों के अनेकों व्यक्तियों से उनके व्यक्तिगत जीवन-सम्बन्धी गहराइयों में प्रवेश करने का प्रयत्न किया और अनेक प्रकार के प्रश्न पूछकर उनकी सन्तुष्ट-असन्तुष्ट मनः स्थिति को समझने का प्रयत्न किया।

समिति ने जो पूछ-ताछ की और उत्तर पाये, उनसे यह निष्कर्ष निकला कि परिस्थितियों से मनः स्थिति पर प्रभाव तो पड़ता है, पर वह बहुत अधिक गहरा नहीं होता। भली-बुरी घटनाएँ आरम्भ में ही प्रिय-अप्रिय लगती हैं, पीछे वे स्वभाव में सम्मिलित होकर अभ्यस्त हो जाती हैं। तब न सम्पन्न को अपनी सम्पन्नता से प्रसन्नता लगती और न गरीब का गरीबी अखरती है। यही बात अन्य बातों के सम्बन्ध में भी है। परिवार में तालमेल न बैठने से शुरू में जो परेशानी पड़ती है, पीछे वह चख-चख एक ढर्रे में सम्मिलित हो जाती है और अन्य साधारण कार्यों की तरह वह लड़-झगड़ भी अपने ढंग से उलझती-सुलझती रहती हैं। यदि वह ढर्रा टूट जाय, झगड़ालू सदस्य कहीं चला जाय तो फिर घर में सूनापन लगता है और खामोशी अखरती है। लगता है कि एक चालू ढर्रा टूट जाने से कोई अभ्यस्त चीज हाथ से निकल गई और उसका अभाव अखरने लगा है।

हँसोड़ व्यक्ति किसी सफलता, सम्पन्नता या उपलब्धि के कारण नहीं हँसा करते, वरन् उनकी वैसी आदत ही बन जाती है और साधारण सी बात को लेकर वे स्वयं हँसने और दूसरों को हँसाने का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। जरूरी नहीं कि अपनी ही स्थिति को लेकर कोई प्रसन्न या अप्रसन्न रहे। इसलिए दूसरों से सम्बन्धित बातें भी अच्छी भूमिका निभाती हैं। दूसरों की सफलता, प्रसन्नता अथवा साहसिकता के विवरणों में यदि रस लेने की आदत बन जाय तो उनके समाचार भी उत्साहवर्धक हो सकते हैं और वे उत्साह भरे रह सकते हैं। अमरीका के नौकर स्वयं में कोई सम्पन्न नहीं होते, उन्हें गुजारे भर को मिलता है, पर वहाँ के वातावरण में जो आकर्षक हलचलें होती रहती हैं, उनमें इन नौकरों का मन रम जाता है और वे वहाँ से छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहते। भले ही वहाँ आर्थिक लाभ अधिक ही क्यों न होता हो।

गाँवों को छोड़कर लोग शहरों में रहने के लिए अधिकतर इसीलिए भागते हैं कि वहाँ सम्पन्नता और ठाट-बाट का वातावरण बिखरा दीखता है। भले ही उसका प्रत्यक्ष लाभ अपने को न मिले, पर दूसरों को लाभान्वित होते देखकर एक परोक्ष तृप्ति होती है और उसे देखते भर रहने से खुशी मिलती है। इसी मनोवैज्ञानिक खुशी को पाने के लिए गरीब लोग अनेक कठिनाइयाँ सहते हुए भी बड़े शहरों में पड़े हुए दिन गुजारते रहते हैं।

सुख और दुख की परिभाषा हर व्यक्ति की दृष्टि में अपने-अपने ढंग की अलग-अलग है। कई व्यक्ति की दृष्टि के साथ जुड़ी हुई समस्याओं और जिम्मेदारियों से बेतरह डरे होते हैं और सोचते है-विवाह के बन्धनों में बँधना जान-बूझकर आफत मोल लेना और दूसरे के हाथों में अपनी आजादी बेच देना है। वे अविवाहित रहकर हँसी खुशी के दिन काटते हैं और उन लोगों को मुँह चिढ़ाते हैं, जो गृहस्थ के जंजाल में रोते-कलपते दिन काटते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो बिना स्त्री-बच्चों के रहने में श्मशान जैसी डरावनी खामोशी देखते हैं और उसकी कल्पना भर से घबराने लगते हैं। ऐसी दशा में ऐसे किसी तथ्य का प्रतिपादन कर सकना कठिन है कि प्रसन्नता-अप्रसन्नता किन कारणों और किन आधारों पर टिकी होती है।

यों मोटे तौर पर पर अच्छे सुविधा-साधन हर किसी का पसन्द होते हैं और वह उन्हें चाहता भी है। पर यह आवश्यक नहीं कि सुविधा-साधन मिलने पर व्यक्ति सन्तुष्ट रहे ही। वनवासी स्त्री-पुरुष कभी-कभी साधन-सम्पन्न नारी को कौतूहल पूर्वक देखने के लिए जाते तो हैं, पर वहाँ रहने के लिए तैयार नहीं होते। विवशता में रहना पड़े तो वहाँ से छुटकारा मिलते ही अपनी उस पुरानी जगह लौट जाते हैं, जहाँ अपेक्षाकृत कठिनाईयाँ ही अधिक उठानी पड़ती हैं। विरक्त और त्यागी व्यक्ति अपनी स्वेच्छा स्वीकृत अभाव-ग्रस्तता में गर्व अनुभव करते हैं और सुविधा-साधन मिलने पर भी उनका उपभोग नहीं करते। ऐसा विवशता से नहीं, वरन् प्रसन्नता पूर्वक करते हैं। अस्तु यह कह सकना कठिन है कि प्रसन्नता अमुक वस्तु या स्थिति के साथ जुड़ी हुई है। जेल के नाम से आमतौर से सबको डर लगता है, पर जिन्होंने उस रहन-सहन से अपने को अभ्यस्त कर लिया है, उन्हें बाहर चैन ही नहीं पड़ता और कुछ न कुछ खटपट करके अपने प्रिय वातावरण में फिर जेल जा पहुँचते हैं। छूटते ही फिर वापिस लौटने की तैयारी करने वाले अभ्यस्त कैदियों की संख्या कम नहीं होती।

डा. ब्रेडवर्न ने इलिनायश-क्षेत्र के चार छोटे कस्बों का प्रसन्नता-अप्रसन्नता की खोज करने का प्रयोजन लेकर अन्वेषण किया और लम्बी पूछ-ताछ की। इन चार कस्बों की आबादी तीन हजार से नौ हजार तक की थी। इनमें से 25 से 50 वर्ष तक की आयु के प्रौढ़ व्यक्ति के 2000 ऐसे व्यक्ति छाँटे गये, जो विभिन्न व्यवसायों में संलग्न थे और विभिन्न परिस्थितियों में रह रहे थे। इनमें से 24 प्रतिशत ने बताया, हमें परिस्थितियों से कोई शिकायत नहीं है। केवल 19 प्रतिशत ही ऐसे थे, जो अपने को दुखी मानते थे और उसके लिए दूसरों को दोषी मानते थे। आश्चर्य यह था कि जिन लोगों ने अपने को बहुत खुश बताया, वे गुजर-बसर कर सकने जितने ही साधन जुटा पाते थे और स्त्री-बच्चों की अथवा सामाजिक-सम्मान की दृष्टि से भी कुछ अधिक अच्छी स्थिति में नहीं थे। फिर भी वे मानते थे कि जो मिला है, वह उनके लिये पर्याप्त है। इसके विपरीत जो लोग अपने को अधिक दुखी अनुभव करते थे वे इन बहुत खुश लोगों की तुलना में कहीं अधिक साधन सम्पन्न थे -जो आया है, सो सहा है, जो आवेगा, उसे देखा जाएगा। भगवान की दुनिया में जब इतने जीव अपना गुजारा कर ही रहे हैं तो हमीं पर कौन पहाड़ टूट रहा है, जो छोटी-छोटी बातों के लिए अपनी शान्ति गँवाये।

शिक्षा और अशिक्षा का भी प्रसन्नता-अप्रसन्नता से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। यों पढ़ा-लिखा मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक कुशल और कमाऊ होता है और सलीका जानता है, पर इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उसके सोचने का तरीका सन्तुलित ही है। चिड़चिड़े, तुनकमिज़ाज, महत्त्वाकाँक्षी, बात-बात में शान के गिरने उठने की सनक जिन पर चढ़ी रहती है, ऐसे अर्धविक्षिप्त लोग पढ़े लिखों में ही अधिक पाये जाते हैं। अशिक्षितों में अति भावुकता की बीमारी कम होती है, वे परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बिठा लेते हैं। अस्तु उनका सन्तोष भी अक्षुण्ण बना रहता है। संसार के दीर्घ जीवियों में अधिक संख्या बिना पढ़ों या कम पढ़ों की है। जिन पर ज्ञान का भूत चढ़ा रहता है और जो बात-बात में मीन-मेख निकालते हैं, उन्हें भय, चिन्ता और आशंका से कभी मुक्ति नहीं मिलती। विपत्ति अब आई, तब आई। संकट ने अब खाया, तब मारा ‘ की बात सोचते सोचते ही अनेक मनोविकारों के नासूर बनकर बहती है। कहना न होगा कि संगीत , साहित्य-कला में प्रेमी शिक्षित लोग ही बहुत करके बेतुकी भावुकता में अधिक गहराई तक धंसे-फंसे पाये जाते हैं और दुख-दैत्य के, शोक-सन्ताप के, असन्तोष-उद्वेग के शिकार रहते हैं। उन्हें ही शारीरिक, मानसिक रोगों से अधिक ग्रसित पाया जाता है।

धनी निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित ही नहीं, स्वस्थ-अस्वस्थ और साधनों से सम्पन्न-विपन्न परिस्थितियों वाले व्यक्तियों में सामान्य मान्यता के अनुसार अन्तर होना ही चाहिए। सम्पन्नों को सुखी और विपन्नों को दुखी होना चाहिए, पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। मनुष्य के चिन्तन का क्रम ही पूर्णतया असन्तोष और सन्तोष का सृजन करता है और उसी आधार पर लोग प्रसन्न-अप्रसन्न पाये जाते हैं। अनेक झंझटों, शत्रुओं और संकटों के बावजूद कई व्यक्ति अपनी हँसी-खुशी यथावत बनाये रहते हैं। उलझनों को वे शतरंज अथवा टेनिस खेलने की तरह मानत है। हार और जीत दोनों का हलकी मुस्कराहट के साथ स्वागत करते हैं और अगली पकड़ लड़ने के लिए वे अधिक उत्साह के साथ तत्परता प्रदर्शित करते हैं।

काम-सुख के सम्बन्ध में समझदार लोगों की राय यह पाई गई कि यह सबसे सस्ता और सुलभ साधन है। हाथ-पैर इधर-उधर हिलाये कि बस खुशी ही खुशी बिखर पड़ी। पर यह भी एक कला है। जो हँसी, खेल और क्रीड़ा-विनोद की भावोत्तेजना में रस उत्पन्न करना जानते हैं, उन्हीं को काम-सुख का मर्मज्ञ कहना चाहिए। फूहड़ तो केवल जीवन-तत्व का क्षरण करते हुए मरण का अनुमान ही रचते रहते हैं।

कार्यरत रहने में जिन्हें रस मिलता है, काम को खेल की तरह करने की आदत जिन्होंने डाल ली है, उनके लिए वह हर घड़ी प्रसन्नता का उपहार देती है, पर जिन्हें काम को देखते ही डर लगता है और उससे जान बचाने की तरकीब ढूँढ़ते हैं, ऐसे आलसी और प्रमादी लोग खीजते-कुड़कुड़ाते ही देखे जाते हैं। उन्हें थकान घेरे रहती है और साथ वालों पर खीज़ आती रहती है। ऐसे लोग असफल भी रहते हैं और दुखी भी होते हैं।

चिन्ता और खीज़ का सम्बन्ध परिस्थितियों की विपन्नता से कम, और सोचने के तरीके में विकृति भर जाने से अधिक होता है। बचकाने लोग तनिक सी बात को तिल का ताड़ बनाते हैं और भावी संकटों का विकराल रूप कल्पना-क्षेत्र में गढ़ते हैं।। उन्हें डराने-सताने के लिए यह मन गढ़न्त ही पूरी चुड़ैल बन जाती है। इसके विपरीत जिन्हें साहस, धैर्य और पुरुषार्थ का सहारा प्राप्त है, वे दुर्दिनों में भी अपनी आन्तरिक-शान्ति अक्षुण्ण बनाये रहते हैं। प्रसन्नता-मनुष्य की आन्तरिक-शालीनता की परिणित है। मस्ती-एक आदत है, जो न केवल अभ्यस्त-व्यक्ति को सुखी बनाती है, वरन् उन्हें भी उत्साह प्रदान करती है, जो उस प्रसन्न-चित्त मनुष्य के सम्पर्क में आते हैं। अन्य आदतों की तरह प्रसन्नता भी ऐसी ही है, जिसे हर कोई सतत् अभ्यास से सहज ही बढ़ा सकता है।


स्वभाव और चरित्र का निर्माण(kahani)

महत्त्वाकाँक्षी जो शुआ लेवमेन भावी की रूप रेखा के संदर्भ में अनेकों योजनाएँ बना कर विद्वान युकाची के पास ले गया और उनसे पूछा-वह उन्हें पूरा करने के लिए क्या तैयारी करे?

युकाची ने वह सूची ध्यानपूर्वक देखी और मुस्कराते हुए उसे वापिस लौटा दिया। उनने कहा-बच्चे इन सब योजनाओं से पहली योजना का तो कहीं नाम भी नहीं है और उसके बिना तुम्हारा बढ़-चढ़कर सोचना व्यर्थ है।

जीसुल ने चकित होकर पूछा-भला वह क्या योजना होनी चाहिए? उन्होंने कहा-अपने स्वभाव और चरित्र का निर्माण, जिसके बिना कभी कोई व्यक्ति न बड़ा बन सकता है और न बड़ा काम कर सकता है।


कृतज्ञता और प्रतिदान से रहित होकर न जिये।

हमारी हँसी-खुशी और सुख-सुविधा स्व उपार्जित नहीं है। वह दूसरों के श्रम, सहयोग और अनुग्रह से मिली है। इस तथ्य को यदि ठीक तरह समझा जा सके तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि हम मनुष्य मात्र के ऋणी हैं। हमारी सुख-सुविधाओं में असंख्यों का असंख्य प्रकार का योगदान जुड़ा हुआ है। जीवित और मृतक लोगों के सतत् श्रम और अध्यवसाय का ही वह फल है, जिसका उपयोग करते हुए हम विविध-विधि सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कर रहे हैं। इस सच्चाई को जो जितनी अच्छी तरह समझ सकेगा, उसे मानव समाज के प्रति उतनी ही गहरी कृतज्ञता के साथ श्रद्धावनत होना पड़ेगा। अपने को उपकृत अनुभव करना पड़ेगा। यह मृदुल संवेदना प्रत्युपकार के लिए का कसक उत्पन्न करती है और ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करने के लिए उभारती है।

दूसरों द्वारा प्रदान किये अनुदानों का हम निरन्तर उपयोग करते रहें, किन्तु बदले में समाज को सुखी समुन्नत बनाने के लिए कोई महत्वपूर्ण योगदान न करें तो यह कृतघ्नता और निष्ठुरता हमारी मनः स्थिति को पाषाणवत् पिछड़ी और छिछली ही सिद्ध करेगी। अनुदान प्राप्त करते जाने में उत्साही रहना, किन्तु प्रतिदान की ओर से मुँह मोड़ लेना यों लाभदायक प्रतीत होता है, पर वह लाभ ऐसा है - जो अन्तरात्मा के स्तर को पतित और घृणित ही बनाता चला जाएगा। जिसे खाना ही आता है, खिलाने के आनन्द का जिसे ज्ञान ही नहीं ऐसे स्वार्थी तथा संकीर्ण व्यक्ति को सज्जनों की पंक्ति में नहीं बिठाया जा सकता, भले ही वह कितना ही सम्पन्न एवं समृद्ध क्यों न बन गया हो।

वट्रेडरसेला ने विलासिता और अर्हता के साधन जुटाने तक सीमित सम्पदा की तुलना डाकुओं द्वारा आँखों पर फेंकी जाने वाली ‘सर्च लाइट’ से की है। वे कहते हैं इस चकाचौंध से आदमी वस्तुस्थिति देख सकने में असमर्थ अन्धों जैसा बन जाता है, उसे दीखना-सूझना बन्द हो जाता है और यह समझ में नहीं आता कि आगे कदम बढ़ाने की दिशा कौन सी है।

आमतौर से लोगों का लक्ष्य-सुविधा-साधनों का संचय और दूसरों को चकाचौंध में डालने वाले आतंक तक सीमित बनकर रह गया है। यह उपभोग तक सीमाबद्ध रहने वाली विचारधारा वस्तुतः पशु-सभ्यता है। इसे अपना कर कोई अपनी लिप्साओं की तुष्टि कर सकता है, पर उस आत्म-शान्ति से वंचित ही बना रहेगा, जिसे मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ उपहार कह सकते हैं। पेट और प्रजनन की सुविधा सफलता की दृष्टि से शूकर को अधिक सौभाग्यशाली माना जा सकता है। रुचिकर और प्रचुर भोजन उसे सर्वदा उपलब्ध रहता है, साथ ही सन्तानोत्पादन में भी पशुवर्ग की सभी जातियों को पीछे छोड़ देता है। माँसल और परिपुष्ट काया के लिए भी वह गर्व कर सकता है। इतना सब होते हुए भी इसका लक्ष्य-विहीन जीवन किसी भी दृष्टि से सराहनीय नहीं ठहराया जा सकता। भौतिक प्रगति की दृष्टि से सफल और सुख-सुविधाओं से सम्पन्न व्यक्ति अपने सम्बन्ध में कुछ भी सोचे-मूल्याँकन की दृष्टि से वह नर पशु से आगे एक कदम भी बढ़ा हुआ नहीं समझा जा सकेगा।

कृतज्ञता और प्रत्युपकार मनुष्यता के प्राथमिक चिन्ह हैं। सज्जनता और सहकारिता के आधार पर ही आदमी आगे बढ़ा है, ऊँचा उठा है। यदि इन सत्प्रवृत्तियों को गँवा दिया जाय तो फिर आदमी-माँस का लोथड़ा भर रह जाता है।

जो कुछ हम हैं-वस्तुतः समाज के अनुदान एवं अनुग्रह के फल स्वरूप ही हैं। सहज कृतज्ञता और प्रत्युपकार की वृत्ति यही कहती है कि अनुदान की पुण्य-परम्पराओं को अविच्छिन्न रखने के लिए हमें भी अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए और समुन्नत-समाज की संरचना में समुचित योगदान करना चाहिए।


अगली शताब्दी का भविष्य कथन

अपने युग की दो ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं, जो भूतकाल में कभी भी इस तरह नहीं आईं। इनमें एक है, जनसंख्या की वृद्धि, दूसरी है-वैज्ञानिक प्रगति। इन दोनों में प्रतिक्रियाएँ भी वैसी ही प्रचण्ड होती हैं, जैसी कि वे स्वयं हैं।

भूतकाल में सुविस्तृत भूतल के अनुपात से मनुष्यों की जनसंख्या नगण्य थी। प्रकृति से जूझने के उतने समर्थ साधन हाथ में न होने से मृत्यु संख्या भी अधिक थी। दुर्भिक्षों, महामारियों तथा अन्य प्रकृति-प्रकोपों से असंख्य मनुष्य मरते थे। वासनात्मक प्रवृत्तियाँ उग्र न होने से सन्तान भी सीमित ही होती थीं। विधुर और विधवाएँ निवृत्त-जीवन जीते थे। अब किशोरावस्था आने से पूर्व ही मस्तिष्क गृहस्थ धर्म का उपभोग करने के लिए प्रशिक्षित हो जाता है। वासना भड़काने वाली फिल्में, पुस्तकें तथा तस्वीरें बे-हिसाब बढ़ रही हैं। कानाफूसी में प्रायः वहीं चर्चाएँ रहती हैं। जो देखा सुना जाता है, उसमें भावुकता भड़काने वाली प्रेरणाओं की भरमार होती है। इन परिस्थितियों में प्रजनन का अनुपात बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर विज्ञान की प्रगति ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि भूखों मरने अथवा प्रकृति-प्रकोप से दम तोड़ने की संभावनाएं कम ही रह गई हैं। बीमारियाँ सताती बहुत हैं, पर उनने भी मारने का उत्साह ढीला कर दिया है। दूसरी ओर बढ़ी हुई जनसंख्या द्वारा नई पीढ़ियों का उत्पादन चक्रवृद्धि दर से हो रहा है। एक के 3, 3 के 9, 9 के 27, 27 के 81, 81 के 243, 243 के 729, 729 के 2187, 2187 के 6561।

एक व्यक्ति की तीन सन्तानें होती चलें तो सातवीं पीढ़ी पर 6561 बच्चे हो जायेंगे। यही क्रम आगे भी बढ़ता रहा तो संख्या न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचेगी? इस क्रम में कुछ रोक-थाम भी होती है, पर बढ़ोत्तरी का अनुपात इतना तीव्र है कि निकट भविष्य में मनुष्यों के निवास, आहार के लिये जमीन खाली न बचेगी। पानी की कमी पड़ेगी और शिक्षा, व्यवसाय, यातायात आदि के लिए जगह न रहेगी। ऐसी दशा में स्वभावतः वर्तमान धरती के अपर्याप्त होने पर नये स्थान तैयार करने होंगे।

विज्ञान की प्रगति ने सुख-सुविधाओं की वृद्धि की है। आगे यह उत्साह और भी तीव्र होगा और नये-नये सुविधा साधन सामने आयेंगे। उनका उपयोग-उपभोग न किया जाय, यह भी नहीं हो सकता। इसलिये यन्त्रों द्वारा श्रम करने से मनुष्य को खाली-ठाली रहना पड़ेगा और अधिक सुविधा-साधनों का सहज उपलब्ध लाभ लेना होगा।

इन समस्याओं का हल खोजने के लिए संसार के मूर्धन्य मस्तिष्क चिन्तित हैं। कई उपाय सोचते हैं, पर इन समस्याओं पर काबू पाने का कोई कारगर उपाय हाथ लग नहीं रहा है। हाँ, इतना अवश्य स्पष्ट होता जाता है कि आत्यन्तिक परिणाम जो भी हो, अन्तिम उपाय जो भी निकले, फिलहाल अगली शताब्दियों का कम से कम तात्कालिक हल तो निकालना ही पड़ेगा, जिसमें महाविनाश को जितनी दूर तक टाला जा सके उतनी दूर उसे धकेल दिया जाय।

जनसंख्या वृद्धि और वैज्ञानिक प्रगति के वर्तमान उत्साह पर अधिक नियन्त्रण अगले दिनों न हो सकेगा। हाँ, इतना प्रयत्न अवश्य किया जाएगा कि कम से कम सौ वर्ष तक मानव जाति को जीवित रहने के लिए मार्ग निकाल लिया जाय। इसके लिए अभी से प्रयास चल पड़े हैं और सन् 2000 से 2100 तक की अवधि में जो किया जाना है, जो होना है, जो बनना है-आज उसकी रूपरेखा सबके सामने स्पष्ट रहे और उसे पूरा करने के लिए आवश्यक प्रयास समय रहते आरम्भ कर दिये जायें।

अर्थ-शास्त्री आर्थर सी. क्लार्क और प्रो. वक्र मिस्टर फुलर ने अगली शताब्दी के लिए जो विश्व योजना बनाई है, उसमें जनसंख्या वृद्धि को प्रथम स्थान दिया गया है और उसके अनुरूप साधनों की उपलब्धि में वर्तमान तथा भावी वैज्ञानिक उपलब्धियों को पूरी तरह नियोजित करने का कार्यक्रम बनाया है। उनके कथनानुसार अगली शताब्दी में माँस का उत्पादन बन्द हो जाएगा, क्योंकि वह बहुत महंगा पड़ेगा। एक पौंड माँस तैयार करने में प्रायः 20 पौंड चारा खर्च होता है। इतनी वनस्पति खर्च करके इतना कम माँस उत्पन्न करना सरासर घाटे का सौदा है। इसके लिए उपजाऊ जमीन की इतनी शक्ति बर्बाद नहीं की जा सकती। जो चारा, भूसा, इमारती लकड़ी अथवा कागज, गत्ता जैसी चीजें बनाने के लिए काम आकर जरूरी आवश्यकताओं को पूरी करेगी, उन्हें जानवरों को खिलाना और फिर माँस उत्पन्न करना सरासर फिजूल खर्ची है। गिनी-चुनी बहुत दूध देने वाली गायों के लिए जगह और खुराक बचाई जा सके-यही क्या कम है? यह भी तब हो सकेगा, जब मनुष्यों को स्थान तथा खुराक सम्बन्धी कटौती के लिए तैयार किया जा सके। दूध-दही तो सोयाबीन जैसी वनस्पतियाँ आसानी से बना दिया करेंगी। घी तो तेल की ही एक किस्म है। चिकनाई की जरूरत तेल से पूरी हो ही सकती है, फिर घी की क्या जरूरत? तेल में प्रोटीन तथा बैक्टीरिया मिलाकर कृत्रिम माँस आसानी से तैयार हो सकता है, फिर पशु-माँस के जंजाल में उलझने की लम्बी और महँगी प्रक्रिया अपनाने की कोई आवश्यकता ही न रहेगी। फ्राँस में कृत्रिम माँस बनाने में अभी भी सफलता प्राप्त कर ली गई है, आगे तो वह विधि और भी सरल तथा समुन्नत हो जायगी।

सड़कें बहुत जमीन घेरती हैं और वे जहाँ भी पक्की हो जाती है, जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट कर देती हैं। इन दिनों सड़कों ने जितनी जमीन घेर रखी है और भविष्य में घेरने जा रही हैं, उस भूमि-विनाश पर गम्भीरता से विचार करना होगा। सड़कें या तो जमीन के नीचे चलेंगी या फिर सस्ते वायुयान यातायात तथा परिवहन की आवश्यकता पूरी करेंगे। सड़कों से घिरी जमीन पर पौष्टिक किस्म की बड़ी फसलें देने वाली और साल में जल्दी जल्दी कई बार कटने वाली घास लगाई जायेंगी। वनस्पति को पूरा ही आहार प्रयोजन के लिए काम में लाना पड़ेगा। तभी आदमी का पेट भरेगा। इन दिनों अन्न खाने की जो आदत है, वह उस समय छोड़नी ही पड़ेगी। अनाज के पौधे का आकार विस्तार जितना होता है, उसकी तुलना में बीज का अनुपात बहुत थोड़ा होता है, फसलों का अधिकाँश भाग भूसे के रूप में चला जाता है। अभी तो भूसे चारे को पशु भी खा लेते हैं, आगे पशु रहेंगे ही नहीं तो चारे की उपयोगिता भी नहीं रहेगी। ऐसी दशा में पूरी घास खाने की आदत डालनी पड़ेगी। आखिर अन्य शाकाहारी प्राणी भी तो घास खाकर ही रहते हैं, फिर मनुष्य को ही इसमें क्या ऐतराज होना चाहिए? घास में प्रोटीन तथा दूसरे जीवनोपयोगी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। घास का चूरा आटे का काम दे सकता है। जरूरत के अनुसार उसमें दूसरी चीजें भी मिलाई जा सकती है, पर आटा बनेगा घास का ही। अनाज का प्रचलन भी अगले दिनों पशु माँस की तरह ही बहिष्कृत करना पड़ेगा। नकली दूध, नकली दही, नकली घी नकली माँस जब सभी खाद्य पदार्थ कृत्रिम बनने लगेंगे तो अनाज का आटा खाने के लिए ही कोई क्यों आग्रह करेगा? कुछ दिन में लोग घास का आटा खाने के लिए तैयार हो ही जायेंगे। न होंगे तो वैसा मजबूरी करा लेगी।

मनुष्यों को स्वच्छ साँस मिलती रहे, इसके लिए वृक्ष आवश्यक हैं। 25 वर्ग फुट जमीन में एक आदमी को साँस ले सकने के उपयुक्त वायु मिलती है। इसलिए खुली जगह में वृक्ष उद्यानों का प्रबन्ध अधिक करना पड़ेगा। तब सड़कों का ही सफाया नहीं करना पड़ेगा। मकान भी कई कई मंजिलों ऊँचे बना करेंगे। एक मंजिल मकान कहीं दिखाई नहीं पड़ेंगे। निवास-आवास में घिरने वाली जमीन तो बचानी ही पड़ेगी। वनस्पति उगाने के लिए यह आवश्यक होगा कि मकानों में उसे अधिक न घेरा जया। यह समस्या अनेक मंजिल ऊँचे मकान बनने के प्रचलन से ही सम्भव हो सकेगी।

घास के आहार को अधिक पौष्टिक बनाने के लिए उसमें प्रोटीन के नये स्रोत सम्मिलित करने पड़ेंगे। एक कोशीय यिस्ट-जीवाणु (बैक्टीरिया) कबक (फफूट) शैवाल, इनमें प्रमुख होंगे। प्रचलित तेल-प्रधान वनस्पतियों में मूँगफली, सोयाबीन, नारियल और बिनौले का सम्मिश्रण खाद्य पदार्थों में मिला दिया जाय तो घास का आटा प्रचलित गेहूं के आटे से कहीं अधिक पौष्टिक और स्वादिष्ट बन जायेगा। गेहूं में 10-12 प्रतिशत, चावल में 8-9 प्रतिशत और माँस-मछली में 20-22 प्रतिशत प्रोटीन होता है। इस दकियानूसी आहार को हटाकर प्रोटीन के नये स्रोतों का उपयोग करने से सहज ही कहीं अधिक पौष्टिकता मिल जायगी। यिस्ट में 55 प्रतिशत, बैक्टीरिया में 80 प्रतिशत, फफूँद में 40 प्रतिशत और शैवाल में 25 प्रतिशत प्रोटीन होता है। ऐसी दशा में उनका उपयोग करने से समस्या का बहुत समाधान निकलेगा।

पेट्रोलियम के कारखानों से उप-उत्पादन के रूप में मिलने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं से अच्छा प्रोटीन विनिर्मित करने में फ्राँसीसी विज्ञानी चेम्पेटन ने आशाजनक सफलता प्राप्त की है। एक कोशीय प्रोटीन माँस उत्पादन पर आने वाली लागत की तुलना में ढाई हजार गुना सस्ता पड़ता है और कम समय लेता है, ऐसी दशा में उसका आश्रय मनुष्य को लेना ही पड़ेगा। समुद्री वनस्पति क्लोरिला का जापान में खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करने का प्रचलन है। इंग्लैण्ड घास से प्रोटीन बनाने में लगा हुआ है। सोयाबीन का दूध गो दुग्ध की आवश्यकता पूरी कर सकेगा, यह विश्वास खाद्य-शोधकों में अभिनव-आशा का संचार कर रहा है। एक किलो सोयाबीन में 10 लीटर दूध बनाने की सम्भावना में सस्तेपन का आकर्षण भी बहुत है। गणों में तो उसे समान ही बताया जा रहा है।

भोजन पकाने की प्रणाली में भारी हेर-फेर करना पड़ेगा। कच्चा राशन रखने, पकाने के लिए चौका-चूल्हा बनाने, पकी हुई वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए जितने स्थान की अब जरूरत पड़ती है, भविष्य में उतनी जगह की बरबादी नहीं की जा सकेगी। अन्न, शाक आदि को उत्पन्न होते ही बड़े कारखानों में तैयार भोजन के रूप में तैयार किया जाएगा और उस सूखे सार-तत्व को पैकेट में बंद कर दिया जाएगा। चूँकि भोजन में 90 प्रतिशत पानी होता है, इसलिए सूखे सार-भोजन में आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर अँगीठी पर गर्म कर लिया जाया करेगा। बस दस मिनट में भोजन तैयार है। इससे स्थान की ही नहीं, बनाने-पकाने के समय की भी बचत होगी।

पहाड़ समतल बनाने पड़ेंगे। पथरीली जमीन जो कृषि योग्य नहीं बन सकेगी, वह निवास और कल कारखानों के काम में ली जायगी, शहर-गाँव उसी पर बसेंगे। पहाड़ों का चूरा करके इमारती ईंट-पत्थर सीमेंट आदि बनेगा, ताकि इन कार्यों में उपजाऊ जमीन का एक चप्पा भी बर्बाद न किया जाय। लकड़ी की जगह प्लास्टिक अथवा कृत्रिम-धातुओं का उपयोग करके मकानों की आवश्यकता पूरी की जायगी।

अमेरिका के विज्ञान-लेखक आइजक्र आसिमोव ने आँकड़ों सहित बताया है कि बढ़ती हुई आबादी के कारण अगले बीस वर्षों में जो संकट उत्पन्न होंगे उनमें जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में कमी पड़ने का संकट मुख्य है। वायु, जल और आहार यह तीनों ही वस्तुएं ऐसी हैं, जिनके आधार पर मनुष्य जीवित रहता है। बढ़ती हुई आबादी के लिए अगले दिनों यह तीनों ही न तो शुद्ध मिलेंगी और न पर्याप्त मात्रा में।

मनुष्य की आवश्यकताएँ और विलासी-प्रवृत्तियाँ जिस तेजी से बढ़ रही हैं , उसकी पूर्ति कल -कारखाने ही कर सकते हैं। कारखाने-धुँआ धूलि और शोर फैलाते हैं, तथा उनके प्रयुक्त होने वाले विषैले रासायनिक पदार्थ बहकर जलाशयों में जाते हैं। इससे जल और वायु दोनों ही विषैले होते चले जाते हैं बड़े शहरों के ऊपर धुँआ इतनी मात्रा में छाया रहता है कि वहाँ के निवासी धीरे धीर दम घुटने जैसे संकटों में ग्रसित होते चले जा रहे हैं। इस कठिनाई को हल करने के लिए सम्भवतः अणु-विद्युत काम में लानी पड़े और वर्तमान धुँआ देने वाले कारखानों में प्रयुक्त होने वाली मशीनें रद्द करनी पड़ें। तब कोयला जलाकर कारखाने चलाने पर प्रतिबन्ध लगेगा। डीज़ल और पैट्रोल से चलने वाली अन्य मशीनें भी रोकथाम की परिधि में आ जायेंगी। तब मोटरों में शक्तिशाली बैटरियाँ काम करेंगी। पैट्रोल पर भी प्रतिबन्ध लग जाएगा।

देहात सिमट कर जिस तेजी से शहरों के पेट में घुसती जा रही हैं, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि भविष्य में बड़े शहरों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। उनके लिए पानी का प्रबन्ध करना कठिन हो जाएगा। मौसम में वैज्ञानिक प्रगति ने जो परिवर्तन किया हैं, उन्हें देखते हुए वर्षा घटने की पूरी आशंका है। पानी जितना बरसेगा उससे न तो धरती की प्यास बुझेगी और न आदमियों की। ऐसी दशा में समुद्र का आश्रय लेना पड़ेगा। अणु शक्ति के दैत्याकार बिजली-धर समुद्र का पानी शुद्ध करेंगे और उसे सिंचाई तथा पीने-धोने की आवश्यकता पूरी करने के लिए उपलब्ध करेंगे। पर तब पानी इतना महंगा हो जाएगा कि उसे वैसी ही सावधानी के साथ खर्च करना पड़ेगा, जैसे कि आजकल दूध या तेल का खर्च करते हैं। एक सीमित कोटे से ही जल हर किसी को मिला करेगा। तब पानी का खर्च बहुत सोच-समझकर ही करना पड़ा करेगा।

निवास के लिए तब भूगर्भ का सहारा लेना पड़ेगा। चूहे, छछूँदर, साँप जिस तरह बिलों में रहते हैं, सन्त योगी गुफाओं में रहते हैं, तब वहीं रीति मानवी-निवास के लिए फिट पड़ेगी। जमीन की ऊपरी परत अनाज, घास, वृक्ष आदि लगाने के लिए सुरक्षित रखी जायगी। शुद्ध हवा पाने के लिए खुली जगह का होना और उससे वृक्ष वनस्पतियों का उगना जरूरी है। मनुष्य का मूल आहार वनस्पति ही है, उसे उगाने के लिए जमीन चाहिए। बढ़ी हुई आबादी के लिए शुद्ध हवा और आहार की पूर्ति के लिए जगह खाली करनी पड़ेगी। अब भी निवास तथा कारखानों, स्कूलों, बाजारों सड़कों कब्रिस्तानों ने जो जगह घर रखी है, उसे उनके कब्जे से छुड़ाकर पाताल लोक को भिजवाना पड़ेगा। जमीन खोद कर सुरंग-शहर बसाने पड़ेंगे, निवास के लिए जमीन की निचली परत काम में लानी पड़ेगी। अभी भी लोग समुद्र के भीतर पनडुब्बियों में रहते हैं। ऐयर-कण्डीशन मकानों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही होती है। उनमें कृत्रिम-प्रकाश कृत्रिम हवा से ही काम चलता है। इसका अभ्यास करने पर सारी मनुष्य जाति को भूतल-निवास की आदत पड़ जायगी। आदिम-काल में प्रायः सभी जीव खुले-मैदानों में रहते थे। पीछे परिस्थिति वश उन्होंने बिल माँद और गुफाओं में बनाने तथा उनमें रहने का अभ्यास किया था। परिस्थितियाँ मजबूर करेंगी तो मनुष्य को भी जमीन के नीचे रहना पड़ेगा। शायद समुद्र में या जलाशयों में तैरती बस्तियाँ बड़े जलयानों के रूप में उतारनी पड़ें। आकाश का उपयोग उतना ही हो सकता है कि सौ फुट ऊँचे मकान बनाकर उन पर बस्तियाँ बसाई जाएँ और उनके नीचे पेड़ पौधे उगते बढ़ते रहें।

पर्वतों को धकेल कर उनकी जमीन तो निश्चित रूप से छीननी पड़ेगी। भूगर्भ में बसी बस्तियों का संपर्क बनाये रहने वाले भूतल के मकान उसी पथरीली जमीन पर उपलब्ध पाषाण-चूर्ण से ही बनेंगे। एक सम्भावना यह भी है कि दक्षिणी ध्रुव पर जमी बर्फ को अणुशक्ति से पिघला कर उस क्षेत्र को मनुष्यों के रहने योग्य बनाया जाय। ध्रुवों की जमीन छीनने के लिए जो छेड़खानी करनी पड़ेगी, उसमें खतरा बहुत है। उन प्रदेशों में जमी बर्फ पिघलने लगी तो समुद्र की सतह ऊँची उठ जायगी और तटवर्ती इलाके पानी में डूब जाएँगे। फिर भी यह खतरा उठाना पड़ेगा, क्योंकि बम्बई जैसे शहरों के समुद्र में डूब जाने पर भी ध्रुवों से बहुत जमीन प्राप्त होगी और समुद्र की बाढ़ से उत्पन्न खतरा उठाकर भी मनुष्य जाति बर्फ में ही रहेगी।

वाहनों में उड़न-खटोले ही स्थायित्व प्राप्त करेंगे। हवा में उड़ने वाली मोटरें वर्तमान हैलिकाप्टरों का ही सुधरा हुआ रूप होगा। वे मकानों की ऊपरी छतों पर रखी जाया करेंगी और वहीं से उनके उड़ने-उतरने का भी प्रबन्ध होगा।

पशु थलचर है। थल तो मनुष्यों के लिए भी कम पड़ेगा। ऐसी दशा में उन्हें वाहन के अथवा श्रमिक के रूप में प्रयुक्त न किया जा सकेगा। दूध और माँस के लिए भी उन्हें पालना सम्भव न होगा, ऐसी दशा में शाकाहारी पशु तो न घरों में पलेंगे और न जंगलों में रहेंगे। माँस न मिलने पर सिंह आदि हिंसक जानवर भी न रहेंगे। माँस का प्रचलन बन्द हो जाएगा। हाँ, जलचर माँस के लिए प्रयुक्त होते रहेंगे। मछली अगली शताब्दी में भी मनुष्य का आहार बनी रहेगी, उसकी सस्ती, जल्दी बढ़ने वाली और स्वादिष्ट नस्लों की फसल तैयार की जायेगी और माँस उत्पादन में समुद्रों से, नदी-सरोवरों से योगदान मिलेगा। बंगाल की तरह घरेलू तालाब बढ़ेंगे और उनमें मत्स्य पालन अब की उपेक्षा कहीं अधिक होने लगेगा। इतना ही नहीं, समुद्र की सतह से लेकर तली तक में कई किस्म की घास उगाई जाएँगी और अत्यन्त छोटे जीवों की कृषि की जायेगी। जमीन पर उगी वनस्पति के अतिरिक्त खुराक की आधी आवश्यकता जलाशयों से पूरी की जायगी।

शिक्षा प्राप्त करने के लिए बच्चों को स्कूलों में नहीं जाना पड़ेगा। घर ही से स्कूल-कालेज की आवश्यकता पूरी हो सकेगी। रेडियो और टेलीविजन के सहारे हर कक्षा के उपयुक्त पाठ्यक्रम प्रसारित किये जाते रहेंगे और उन्हीं के सहारे सब कुछ सीखते रहना सम्भव हो सकेगा। शिल्प, यन्त्र, सर्जरी जैसे प्रत्यक्ष अनुभव वाले हाथ से करके सीखने वाले विषय ही स्कूलों में रहेंगे।

हर घर में बच्चे पालना और चूल्हा-चौका रोपना यह बहुत ही कष्ट साध्य और गन्दगी वाला और घरों की सुविधा व्यवस्था बिगाड़ने वाला कम माना जाएगा। अस्तु बच्चे राष्ट्र की सम्पत्ति होंगे। सरकारें उन्हें पालेंगी। पका हुआ सारतत्त्व वाला सखा आहार पैकेट में बन्द मिलेगा और खाते वक्त आवश्यकतानुसार उसे पानी मिला-मिलाकर बिजली की अँगीठी पर गर्म भर कर लिया जाएगा। अब जो तरह-तरह के मिष्ठान पकवान देखने को मिलते हैं, वे तब अजायबघरों में ही देखने को मिलेंगे। तब सबको राष्ट्रीय-भोजन के निर्धारित स्तर को ही स्वीकार करना पड़ेगा। बच्चे भी उतने ही पैदा करने की छूट होगी, जितने कि सरकार निश्चित करेगी। मर्यादा तोड़ने का अवसर देने से पूर्व ही नर नारियों को बधिया बना दिया जाया करेगा।

कपड़े लोग पहनेंगे तो सही, पर वे सूत, रेशम या ऊन के न होंगे। जो जमीन आहार उगा सकती है, उसमें कपास उगाना सरासर मूर्खता का काम होगा। पशु रहेंगे ही नहीं तो ऊन कहाँ मिलेगी? ऐसी दशा में प्लास्टिक सरीखे रसायनों से जो कृत्रिम-धागा बनेगा, वस्त्र उसी से बना करेंगे। उनके उपयोग में धोने-सुखाने जैसे झंझट भी हल्के हो जायेंगे। आजकल भी टेरालीन, नाइलोन आदि के कपड़े बनते हैं। भविष्य में इसी जाति का कपड़ा उपलब्ध रह जाएगा।

भविष्य विचारक विज्ञानी डा. जनरेल्स का कथन है, भविष्य में बिजली की आवश्यकता सूर्य-किरणों से उपलब्ध होगी। अणुशक्ति से भी काम लिया जाएगा। इन दिनों सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि अणु-भट्ठियों की राख को कहाँ डाला जाय? वह जहाँ भी डाली जायगी, वहीं सत्यानाश करेगी। इसके दो उपाय निकलेंगे। सस्ता उपाय यह है कि काँच के बने बड़े-बड़े ताबूतों में बन्द करके उसे गहरे और आबादी से दूर समुद्रों के बीचों बीच डुबोया जाय। महँगा उपाय यह है कि उसे किसी उपग्रह में राकेटों द्वारा फेंक दिया जाय, दोनों में से कोई न कोई उपाय कारगर सिद्ध हो ही जाएगा। क्योंकि अणुशक्ति से ही जब काम लेना रहा तो उसकी राख के लिए भी कोई न कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा।

अगली शताब्दी की अन्यान्य समस्यायें भी हैं। सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भावनात्मक, पारिवारिक, धार्मिक, साँस्कृतिक अनेक प्रश्न ऐसे उभर कर आवेंगे, जिन्हें अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धि से सामने प्रस्तुत संकटों का तात्कालिक समाधान प्राप्त करने की दृष्टि से करना होगा। यहाँ तो चर्चा उन अहम् समस्याओं की हो रही है, जिन पर मनुष्य के जीवित रहने का दारोमदार है।

निस्सन्देह प्रगति के पथ पर चलते हुए हम ऐसे दल-दल में फँस गये है, जिसमें से निकलने के लिए हमें भौतिक प्रगति की तुलना में लाख गुनी प्रगतिशील बुद्धिमत्ता का परिचय देना होगा। अन्यथा प्रगति से उत्पन्न समस्याएँ ही हमें चबा डालेंगी और मानवी अस्तित्व के अन्त का संकट उत्पन्न करेंगी।


Quotation

“वास्तविक धर्म यह है कि जिस बात को मनुष्य अपने लिए उचित नहीं समझता, दूसरों के साथ भी वैसी बात हरगिज न करें।” -भीष्म-पितामह


अदृश्य शक्तियों का दृश्य जगत पर प्रभाव

हमारी स्थूल दृष्टि उन वस्तुओं की शक्ति और महत्ताएं स्वीकार करती है, जो आँखों से दीखती हैं या प्रत्यक्ष अनुभव में आती हैं। किन्तु यदि गहराई से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि दृश्य का सूत्र संचालन अदृश्य से हो रहा है। जितनी महत्वपूर्ण शक्तियाँ संसार में हैं, वे सभी अदृश्य हैं।

हवा में पेड़-पौधों को हिलाने, त्वचा का स्पर्श करने जैसे सामान्य कार्य करती भर दीखती हैं, पर वस्तुतः उसका कार्य सृष्टि का सन्तुलन बनाये रखना है। धरती की जो स्थिति हम आज देखते हैं, उसके निर्माण में हवा का बहुत बड़ा हाथ हैं।

इस धरती के, और उस पर निवास करने वाले प्राणियों के अस्तित्व को-अनेक उत्थान-पतन को हवा जिस तरह प्रभावित करती है, उसे देखते हुए उसे जीवन मूरि ही कह सकते हैं। यों सभी जानते हैं कि प्राणियों का प्रधान आहार उनकी नाक द्वारा साँस के रूप में ही ग्रहण किया जाता है। जल और अन्न तो उसके बाद की आवश्यकताएँ हैं।

प्रकृति के अन्तराल में एक ऐसी शक्ति काम करती है, जो हवाओं की गरम अयनवृत्त और ठण्डे बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्र को परस्पर बदलती रहती है। एक दूसरी वायु-शक्ति ऐसी भी है, जो विषवत-रेखा पर 1000 मील प्रति घण्टे की चाल से उत्पन्न होती है और पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमने के लिए आवश्यक बल प्रदान करती है।

प्रकृति को प्राणियों के योग्य बनाने में हवाओं का बड़ा हाथ है। दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी किनारों को गर्मी से उत्तरी ध्रुव की हवाएँ ही बचाती हैं। नीदरलैण्ड की आर्थिक रीढ़ वायु-सम्पदा के साथ जुड़ी हुई है। वहाँ लगभग 1000 कारखाने ऐसे हैं, जो हवा के बल पर ही चलते हैं और अनाज पीसने, लकड़ी चीरने जैसे पचासों औद्योगिक प्रयोजन करती है।

संसार भर में वर्षा बहुत कुछ दारोमदार इन हवाओं के उतार-चढ़ाव और अनुग्रह पर ही निर्भर रहता है। प्राचीन काल में जलयानों का भाग्य हवाओं की अनुकूलता-प्रतिकूलता के साथ जुड़ा रहता था। रोमन लोगों ने हवाओं के बहाव का गहरा अध्ययन करके अपनी जहाज रानी को व्यवस्थित किया था और निर्धारित करना-इस तथ्य के सहारे अपना व्यापार खूब चमकाया था। अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका को अपना उपनिवेश बनाने में सबसे बड़ी सहायता अनुकूल हवाओं से ही प्राप्त की।

गत शताब्दी में मेथ्यू फान्टेन नामक वायु-विशेषज्ञ ने संसार भर में हवाओं के औंधे तिरछे प्रवाहों का क्रमबद्ध सर्वे किया, उससे अंग्रेजों के आस्ट्रेलिया आवागमन में जल-मार्ग की आधी कठिनाई दूर हो गई। सहारा का रेगिस्तान हवाओं की देन है। ईरान में लगभग चार महीने ऐसा अन्धड़ चलता है, जिससे बालू के टीले खड़े हो जाते हैं और पानी की भारी कमी पड़ जाती है।

सन् 1609 में सर जार्ज सोमेर का जहाज धुक्कड़ हवाओं के फेर में फँसकर बरमूडा के तट पर जा टकराया, उसने उस सुन्दर भू-प्रदेश को देखा और इंग्लैण्ड को अच्छी आजीविका देने वाला उपनिवेश बता दिया। वाटर लू की लड़ाई नैपोलियन इसलिए हारा कि हवाओं ने उससे दुश्मनी निबाही और पानी बरसाकर युद्धस्थल को कीचड़ में बदल दिया। बुलगे के युद्धक्षेत्र में हिटलर को प्रारम्भिक लाभ अनुकूल हवाओं के कारण ही प्राप्त हुआ था।

प्रकृति की सूक्ष्म-सत्ता का अध्ययन करके वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हैं कि अदृश्य जगत में कितनी बड़ी सामर्थ्य भरी पड़ी है। यदि हम चेतन-जगत को इस दृष्टि से देखें तो प्रतीत होगा कि दृश्यमान शरीर की तुलना में सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर कितनी महान किन्तु अदृश्य अविज्ञात शक्तियों से भरा पड़ा है।


विज्ञान की तरह दर्शन में भी उत्क्रान्ति होगी।

यह सच है कि गैलीलियो द्वारा प्रतिपादित ‘इन्वेन्शन’ समता सिद्धान्त ने विश्व के सम्बन्ध में बनी हुई अनेकों मान्यताओं का बदल डाला है। पहले जिस तरह से सोचा जाता था, अब उस तरह नहीं सोचा जाता। वस्तुओं के गुण धर्म के सम्बन्ध में जो मान्यताएँ पिछली पीढ़ी के लोगों की थीं, वे अब नहीं रहीं। विज्ञान ने एक नया दृष्टिकोण दिया है। तथ्य और प्रमाणों की कसौटी पर ही किसी सच्चाई को स्वीकार किया जाय- इस आधार की आवश्यकता और भी अधिक मात्रा में इसलिए समझी गई, क्योंकि पिछली मान्यताओं को जब तथ्यों की कसौटी पर कसा गया तो उनमें से अनेकों को झुठलाना पड़ा। ऐसी दशा में मन का शंकालु हो जाना स्वाभाविक था। समय की यह माँग उचित ही थी कि जो कुछ जैसा स्वीकारा जाय, वह तथ्यपूर्ण होना चाहिए।

इस पद्धति ने हजारों वर्षों से चली आ रही असंख्यों मान्यताओं को नये सिरे से परखा और बदला है। वस्तुओं का स्वरूप गुण, धर्म अब पूर्व मान्यताओं की अपेक्षा भिन्न प्रकार से समझा माना जाता है। इसमें पूर्वजों के प्रति व्यंग, उपहास अथवा अवज्ञा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। क्योंकि तथ्यों की शोध करते हुए पूर्ण सत्य तक पहुँचना एक छलाँग में नहीं हो सकता था। यह एक लम्बी मंजिल है, जिसे मनुष्य जाति के धीरे-धीरे चलकर ही पार किया है। अभी भी जो बातें तथ्य के रूप में स्वीकार की गई हैं, निश्चित नहीं कि भविष्य में भी उन्हें उसी रूप में माना जाता रहेगा। मानवी बुद्धि स्वल्प है। विश्व के रहस्य अनन्त हैं। ससीम को असीम तक पहुँचाने की लम्बी मंजिल में धैर्य भी रखना होगा और अधिक प्रखर प्रकाश को स्वीकार करने के लिए पूर्वाग्रहों की धुन्ध में जो दिखाई पड़ता रहा है, उसे छोड़ने का साहस भी रखना पड़ेगा। सत्य की शोध यों अनादि काल से चलती रही है।

पूर्व काल में इतने साधन उपकरण उपलब्ध न थे, जितने अब हैं। इसलिए उन दिनों स्वल्प उपलब्धियों पर ही सन्तोष करना पड़ता था और जिज्ञासाओं की प्रचण्ड क्षुधा को जो कुछ हाथ लगे, उसी से तृप्त करना होता था। ऐसी दशा में भूत और वर्तमान के बीच कोई मौलिक विरोध नहीं है। प्रगति की लम्बी यात्रा में मील के पत्थर तो बदले ही जाने थे, सो बदले भी हैं।

विज्ञान ने तथ्य और सत्य की कसौटी पर जहाँ भौतिकी पर वस्तुओं के गुण-धर्म को परखा है, वहाँ ईश्वर और धर्म को भी अछूता नहीं छोड़ा है। उन्हें भी तरह तरह की बुद्धिवादी कसौटियों पर कसा गया है। इस संदर्भ में श्रद्धा का क्षेत्र भी लड़खड़ाया है। धर्म के क्षेत्र में पिछले दो सौ वर्षों में एक प्रकार से क्राँतिकारी भाष्य और सुधार प्रस्तुत हुए हैं। सुधारवादी तूफान आये हैं। उनने सनातन मान्यताओं की या तो नये ढंग से व्याख्या की है, या फिर नया स्वरूप दिया है। हम देखते हैं कि धर्म-क्षेत्र में पूर्वाग्रहों से भिन्न मान्यताएँ प्रस्तुत करने वाले सम्प्रदायों और सुधारकों की इन्हीं दिनों बाढ़ आई है।

यह नहीं कहा जा सकता कि यह सभी सुधारक सही थे। पर यह स्पष्ट है कि पूर्व मान्यताओं के प्रति उनके मन में भारी विद्रोह था। उन्हें उनमें सड़न की गन्ध आ रही थी और ऐसा कुछ ढूँढ़ने-बताने की आकुलता थी, जो अधिक सत्य हो। वस्तुतः उसके लिए अधिक गहरी खोज की जरूरत थी और नये प्रतिपादनों में ऐसे तथ्य जोड़ने की आवश्यकता थी, जो अधिक टिकाऊ होते। पर लगता है-सुधारक अत्यन्त आवेश में थे और इस हाथ सुधर, उस हाथ प्रतिपादन के समय-साध्य और श्रम साध्य को तुर्त-फुर्त कर डालना चाहते थे। इस आकुल-व्याकुल मनः स्थिति में पिछली दो शताब्दियों में संसार भर में सुधारवाद और सम्प्रदायवाद की बाढ़ आई है और उस अन्धड़ ने प्रत्येक धर्म को झकझोरा है।

अधिक स्पष्ट तथ्य भले ही हाथ न लगे हों पर निस्सन्देह पिछले दिनों दार्शनिक और धार्मिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी हवाएँ चली हैं और उनसे जन-मानस को यह आधार मिला है कि जो कुछ पिछले दिनों कहा या माना जाता रहा है, वह सब कुछ यथार्थ ही नहीं था, उसमें सुधार और परिवर्तन की बहुत गुँजाइश है। इन दिनों हम इसी मनः स्थिति में चल रहे हैं और जिस प्रकार वैज्ञानिक-क्षेत्र में पूर्वाग्रहों के साथ संगति बैठने न बैठने का विचार किये बिना भौतिक तथ्यों का खुले मस्तिष्क से ऊहापोह किया जा रहा है, उसी प्रकार धर्म के सम्बन्ध में यह आवश्यक समझा जा रहा है कि जो उचित हो, उपयोगी हो-उसे ही स्वीकार किया जाय। अनुपयुक्त अथवा अनगढ़ मान्यताएँ वापिस ले ली जाएँ। भले ही वे कितनी ही पुरातन क्यों न हों।

अनगढ़ के प्रति अनास्था व्यक्त करने का कार्य बहुत हो चुका, एक दृष्टि से आवश्यकता से अधिक भी अनास्था सरल है। अस्वीकृति में मन के विद्रोही घटकों को भड़का देना भर काफी है। नदी में बाढ़ आते ही तटवर्ती मर्यादाओं की क्रम व्यवस्था देखते-देखते अस्त-व्यस्त हो जाती है, यह सब बिना योजना और बिना प्रयत्न के सहज ही हो जाता है। अनास्था सहज ही उत्पन्न की जा सकती है। इन दिनों अनास्थावाद आवश्यकता से अधिक पनपता है। सुधारवाद में पुराने के स्थान पर नया रखने की पुनर्निर्माण प्रवृत्ति होती है, पर अनास्था तो सब कुछ विस्मार भर देखना चाहती है। अधार्मिक होने के पक्ष में यह दलील काफी है कि हम भ्रान्त धारणाओं में क्यों उलझें? पर साथ ही यह भुला दिया जाता है कि धारणा रहित मनःस्थिति भ्रान्तियों से उलझने से भी अधिक बुरी है। मर्यादाहीन, आस्था रहित और सामाजिक मर्यादाओं को भी तोड़-फोड़ कर रख दें और उस विस्फोट की अव्यवस्था सँभालते ही न बने। धर्म के सम्बन्ध में सुधारवादी, सत्य-शोधी दृष्टिकोण ही सराहनीय है। अनास्थावादी अत्युत्साह प्रगतिशील-चिन्ह भले ही प्रतीत हो, पर अन्ततः वह भयावह ही सिद्ध होगा।

अभी यह निर्धारित करना शेष है कि तर्क और तथ्य पर आधारित मानवी-धर्म का स्वरूप क्या हो? यों मोटेतौर से विश्व का उच्च स्तरीय चिन्तन एक ही दिशा में चल रहा है कि धर्म का स्वरूप सार्वभौम होना चाहिए। उसे देश और जातिगत परम्पराओं अथवा मान्यताओं के आधार पर वर्गीकृत नहीं होना चाहिए। धर्म-शास्त्रों और आप्त-पुरुषों से शाश्वत-धर्म की स्थापना सहायता तो ली जा सकती है, पर उनमें से किसी एक को पूर्ण प्रामाणिकता नहीं मिल सकती। पिछले दिनों यह तो उत्साह हो रहा है कि समस्त विश्व का एक धर्म हो, पर उसके साथ यह आग्रह जुड़ रहा है कि हमारे ही धर्म को मान्यता मिले। समस्त विश्व को अपने ही धर्म के अन्तर्गत लाने के लिए मध्य-काल में कत्लेआम हुए हैं और धरती को बेतरह श्रोणित स्नान कराया गया है। अब वह कार्य प्रचार और प्रलोभन के आधार पर चल रहा है। हमारा धर्म ही विश्व-धर्म बने, इस आग्रह के पीछे दूसरे धर्म वालों की अवमानना का भाव जुड़ जाता है और वह बात धर्म का स्वरूप निर्धारण करने की न रहकर ‘प्रतिष्ठा’ के प्रश्न की चट्टान से जाकर अड़ जाती है।

पुरातन-धर्मों का विश्लेषण करने पर कोई भी तो पूर्ण खरा नहीं उतरता और उसकी मान्यताओं को यह बुद्धिवादी युग शत-प्रतिशत गले उतारने के लिए तैयार नहीं हो सकता। क्योंकि अनुपयुक्तता के दोष से कोई भी अछूता नहीं है। पौराणिक दन्त-कथाओं ने और अपने वर्ग के प्रति पक्षपात की स्थापना ने किसी भी धर्म कथाओं ने सर्वथा विवेक-संगत कहला सकने की स्थिति में नहीं रहने दिया है। न्यूनाधिक मात्रा में सभी इस दोष से ग्रसित हैं। ऐसी दशा में इतना ही हो सकता है कि सार्वभौम और सर्वमान्य धर्म की प्रतिष्ठापना में भले ही भूतकालीन देवदूतों अथवा शास्त्रों के उपयोगी कथनों की प्रशंसा की जाय, पर उसका आधार इतना मजबूत होना चाहिए, जो तर्क और तथ्यों की परख पर कहीं से भी डगमगाने न पावे। व्यक्ति और समाज की महानता को निरन्तर अग्रगामी बनाये रखने वाले तथ्यों से भरा-पूरा उसका स्वरूप हो। पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ही मौलिक चिन्तन के आधार से ऐसे सार्वभौम धर्म की स्थापना की जा सकती है। आज नहीं तो कल यही करना पड़ेगा, अन्यथा पुरातन के प्रति विद्रोही अनास्था अपनी तोड़-फोड़ में उन मर्यादाओं को भी तोड़-फोड़ कर रख देंगे, जो व्यक्ति और समाज की शान्ति और सुव्यवस्था के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।

गैलीलियो प्रभृति तथ्य शोधी दृष्टाओं ने चिनगारी भले ही भौतिक-विज्ञान के क्षेत्र में जलाई हो, पर वह दावानल अब किसी एक कोने तक सीमित नहीं रह गया है। दर्शन, अध्यात्म और धर्म भी इन लपटों से अछूते नहीं बचे हैं। धर्म के स्वरूप में सुधार की आवश्यकता समझी जा रही है और साथ ही ईश्वर को भी लपेट में लिया जा रहा है। अब जादुई-ईश्वर गये-बीते जमाने का हो गया है। ईश्वर का वर्णन ऐसे चमत्कारी और शक्तिशाली के रूप में होता रहा है, जिसे सुनकर बुद्धि हतप्रभ होकर रह जाय। वह कभी भी, किसी का भी, कहीं भी, कुछ भी करके रख सकता है। इस आतंकवादी प्रतिपादन को सुनकर मनुष्य उसी की शरण में जाने की बात सोचता था। उससे लड़ने में खैर नहीं, इसलिए भक्ति करना ही लाभदायक है। इस भक्ति का स्वरूप क्या हो? इसके लिए ईश्वर के जीवित या मृतक प्रतिनिधियों के वचन अथवा लेखन ही प्रमाण होते थे। इस दृष्टि से भूतकालीन ईश्वरों की आकृति, प्रकृति, रुचि, इच्छा, आज्ञा के परस्पर विरोधी इतने स्वरूप बन गये, मानो वे एक दूसरे को मार-काट करने या नीचा दिखाने के लिए ही पैदा हुई है। इन ईश्वरीय-आज्ञाओं में ऐसे तथ्य भी भरे पड़े है, जो विवेकवादी, नैतिकता और सामाजिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

ईश्वरीय-कृपा प्राप्त करने के लिए अमुक विधि-विधान से पूजा-पाठ कर लेना अथवा सम्प्रदाय-गत मान्यताओं को अपना लेना पर्याप्त समझा जाता था। इसके बदले ईश्वर असीम इन्द्रिय-सुखों से भरपूर स्वर्ग प्रदान करता था और पाप-कर्म का दण्ड मिलने से बचा देता था। यह प्रलोभन उस सरल-सी भक्ति-क्रिया का निर्वाह करने के लिए कुछ महंगा नहीं था। फलस्वरूप बहुत लोग ईश्वरवादी, ईश्वरक्त होने का भक्त दूसरी जाति के ईश्वर भक्तों से घृणा और शत्रुता भी कम नहीं करता था। अपराधी तत्वों ने अहंकार और लोभ वश जितना अनाचार फैलाया है, ईश्वर के नाम पर ईश्वर की प्रसन्नता के लिए-ईश्वर भक्तों ने परस्पर एक दूसरे का रक्त पान उससे कम नहीं किया ह। पुरोहित वर्ग ने अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि अथवा विशेष कृपा-पात्र सिद्ध करके जिस प्रकार भोली-भावुकता का शोषण किया है, वह तो और भी अधिक हृदय-विदारक एवं घृणास्पद है।

ईश्वर के नाम पर चल रही अँधेरगर्दी के विरुद्ध विद्रोह भले ही विस्फोटक रूप धारण न कर सका हो, पर वह सुलझता भूतकाल में भी रहा है और उस विक्षोभ ने विविध रूप में अपना परिचय दिया है। बौद्ध-धर्म और जैन धर्म को अनीश्वरवादी कहा जाता है। उनमें सत्कर्म एवं सद्भाव को आत्मिक प्रगति के लिए सद्गति कि लिए पर्याप्त माना, इसके अतिरिक्त ईश्वर के किन्हीं आकार-प्रकारों को मानने को आवश्यक बताया है। वेदान्त-दर्शन को आधा नास्तिकवाद कहा जाता है। आत्मा की उच्चतम स्थिति का नाम ही परमात्मा को सिद्ध करके किसी विशिष्ट-कर्मी देव दानव के रूप में चल रहीं भूतकालीन मान्यताओं की उसने भी उपेक्षा कर दी है। यों चार्वाक मत सरीखा उग्र और अनैतिक नास्तिकवाद भी जब-तब फूटा है। इन तथ्यों के प्रकाश में एक झाँकी इस बात की मिलती है कि मध्यकाल में भी ईश्वर के नाम पर चल रही अँधेरगर्दी के प्रति किस कदर संक्षोभ उभरता रहा है।

इन दिनों चेतन को जड़ की ही स्फुरणा के रूप में विज्ञान ने प्रतिपादित किया है और आत्मा-परमात्मा की अतिरिक्त सत्ता मानने से इनकार कर दिया है, उससे दार्शनिक-नास्तिकता पनपी है। दूसरी ओर ईश्वरवादियों द्वारा अपनाई जाने वाली रीति-नीति को मानव-समाज के लिए अहितकर सिद्ध करके समाजवादियों ने नास्तिकवाद का झण्डा फहराया है। वैज्ञानिक और सामाजिक कसौटी पर ईश्वर को खोटा सिद्ध करने के लिए इन दिनों जो बुद्धिवादी प्रयास हुए हैं, उनने धर्म-धारणा की ही भाँति ईश्वरीय-मान्यता की भी नींव कमजोर की है।

अत्युत्साह के आँधी-तूफानों को चीरते हुए पैनी आँखों से हम देख सकते हैं कि धर्म की ही तरह ईश्वरीय आस्था की भी मानव-जीवन को, उच्च-स्तरीय बनाये रहने के लिए, नितान्त आवश्यकता है-वस्तुतः ये दोनों एक ही प्रयोजन के दो पक्ष हैं। आदर्शवादी व्यवहार को धर्म कहते हैं और उत्कृष्ट परिष्कृत चिन्तन को अध्यात्म। यह दोनों ही ईश्वरवाद का जड़ से शोषण प्राप्त करते हैं यदि सत्समर्थक और असत्-विरोधी दिव्य-सत्ता के अस्तित्व से इनकार कर दिया जाय और मात्र भौतिक-सामाजिक आधार पर उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समर्थन किया जाय तो बात बनेगी ही नहीं। स्पष्टतः धार्मिकता और आस्तिकता की मान्यताएँ त्याग, संयम, सेवा, उदारता का दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं। जिनमें तात्कालिक एवं भौतिक दृष्टि से घाटा ही पड़ता है, नफा नहीं होता। फिर इसे कोई क्यों अपनायेगा? आत्मा का उल्लास, ईश्वरीय-अनुग्रह जैसे लाभ ही उत्कृष्ट जीवन के मूलभूत प्रेरणा-स्रोत हैं। भौतिक जगत में राजसत्ता की आवश्यकता है और आत्मिक-जगत में ईश्वरीय-सत्ता की। इसके बिना जो अराजकता उत्पन्न होगी, उससे समस्त व्यवस्था ही लड़खड़ा जायगी।

धार्मिक-सुधारों की ही तरह ईश्वर-सम्बन्धी मान्यताओं में भी बुद्धिवादी दार्शनिकता ने काफी हेर-फेर किया है। सुधरा हुआ ईश्वर उद्धत या उच्छृंखल नहीं है, वह अपने बनाये नियमों में स्वयं बँधा है और मर्यादाओं के अनुरूप स्वयं चलता है और उसी राह पर चलने के लिए अपने भक्त अनुयायियों को प्रेरणा देता है।

प्रकृति की क्रमबद्धता और ज्ञेयता, उसकी विश्वसनीयता, क्षमता मानव-हित में उसकी दोहन-शीलता को अब अधिक स्पष्टता के साथ समझा जाने लगा है। तद्नुरूप धर्म को कर्तव्य और ईश्वर को औचित्य की संरक्षक सत्ता के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

अध्यात्म का विकास अब किन्हीं जादुई क्षमताओं की उपलब्धि की दशा में पीछे लौट रहा है। ऋद्धि-सिद्धि की कौतूहल प्रस्तुत करने वाली भौतिक क्षमताएँ प्राप्त करने के लिए विचारशील अध्यात्मवादी अब इच्छुक नहीं रहे। क्योंकि यह सब तो बाजीगरी-कला के अथवा वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से और भी अधिक मात्रा में और भी अधिक सरलता से मिल सकता है। अध्यात्म की नई परिभाषा है-समष्टि को समुन्नत बनाने के लिए व्यष्टि का अधिकाधिक त्याग करने का उत्साह।’ उपनिषदों का यह प्रतिपादन अब अधिक अच्छी तरह समझा जाने लगा है। जिसमें कहा गया है-पवित्रता ही उल्लास की और सेवा ही आनन्द की जननी है। तत्व दर्शन ने पग-पद पर यह कहा है कि जिसने अपने को खोया है वह अनन्त वैभव का अधिकारी बनता है। सेवा और संयम के दोनों पहिये जिस अध्यात्म की धुरी से जुड़े हुए हैं, भविष्य में उसी को दूरगामी दार्शनिकता द्वारा मान्यता प्राप्त होगी।

धर्म, ईश्वर और अध्यात्म का भूतकालीन स्वरूप जो भी रहा है, उस विकासवादी और बुद्धिवादी युग में नये स्वरूप में ढाला जाएगा। परम्परागत मान्यताओं को जकड़े-पकड़े रहने से तो अधार्मिकता और अनास्था ही पनपेगी। विज्ञान ने तथ्य और तर्क की मान्यता प्रदान की है। दर्शन को भी इस बदलाव का स्वागत करना होगा। खीज़ व्यक्त करते रहने पर तो हम अपने पक्ष की दुर्बलता ही सिद्ध करेंगे।


धरती की हत्या करके बचेंगे हम भी नहीं

धन की तरह बुद्धि का भी एक नशा होता है। आवश्यकता से अधिक जो भी चीज जमा हो जाती है-पेट में भरे हुए अनावश्यक अन्न की तरह अपच और सड़न उत्पन्न करती है। बुद्धि का भी यही हाल है। थोड़ी सी सफलताएँ मिलने पर हमारा ओछापन इतराने पर उतारू हो जाता है और नगण्य सी समर्थता को सर्वशक्तिमत्ता मान बैठता है। विज्ञान के क्षेत्र में मिली यत्किंचित् सफलताओं ने लगता है कि अपनी पीढ़ी की बुद्धिमत्ता को अहमन्यता के उस स्तर पर पहुँचा दिया है, जिसे ‘विक्षिप्तता’ कहा जा सकता है।

प्रकृति हमारी माँ है, उसे बछड़े की तरह दुहने की मर्यादा में रहें, तो ही लाभ है। अन्यथा सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर सारे अण्डे निकालने की बात सोचने वाले लालची की तरह अपनी भी दुर्गति ही होती है। प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का उद्धत स्वप्न अन्ततः अपने ही पैर में आप कुल्हाड़ी मारने की तरह घातक सिद्ध होगा।

धरती को ही लें-वह हमारी माँ है। माँ से सत्कार पूर्वक दूध पीकर जीव जगत मुद्दतों से अपना निर्वाह करता चला आ रहा है। पर स्वाभाविक क्रम का उल्लंघन करने के लिए उतारू होंगे तो पायेंगे कम, खोयेंगे अधिक। सृष्टि का एक सन्तुलित क्रम है, उसे यथावत चलने देने से ही हमारी जीवन-रक्षा होगी। प्रगति की एक सीमा है, उसी में हमें रहना चाहिए। विशेषतया धरती-आकाश को जीतकर उन्हें मन चाहे प्रयोग के लिए तो विवश नहीं ही करना चाहिए। धरती के साथ इन दिनों अगले ही दिनों विघातक विभीषिका बनकर सामने प्रस्तुत होगा।

‘लिविंगसाइल’ (जीवित मिट्टी) पुस्तक की विद्वान लेखिका- ईवबलफर ने लिखा है-मनुष्य की काया मिट्टी से बनी है। मिट्टी ही उसे पालती-पोसती है। इसलिए सच्चे अर्थों में वह उसकी माँ है। यदि इस मिट्टी माता को मारेगा तो न केवल खुद मरेगा, वरन् संसार से अन्य जीवों का भी अस्तित्व मिटा देगा।

देखने में मिट्टी नगण्य लगती है- न उसका कुछ मूल्य है, न महत्व। चाहे जितनी मात्रा में, चाहे जितनी चाहे जहाँ पड़ी-बिखरी मिल सकती है और आवश्यकतानुसार मुफ्त में भी उसे पाया जा सकता है। पैरों के नीचे कुचलती और हवा में उड़ती हुई पाई जाती है, पर थोड़ी गहराई से उसे परखें तो प्रतीत होगा कि यह एक बहुमूल्य ऐसा रासायनिक सम्मिश्रण है, जिसके ऊपर प्राणियों की जीवन धारण क्षमता का सार-तत्व भरा पड़ा है। उसे चाहे तो मिनिरल राँक खनिज-रसायनों की चट्टान कह सकते हैं। दह्यूमस-सेन्द्रिय खाद तत्व तथा माइक्रोआरगेनिजम्स-अति सूक्ष्म जीवाणुओं के सम्मिश्रण से मिट्टी बनी है। अति सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा गोबर तथा घास-पात जैसी चीजों को सड़ाने पर जो डी. कम्पोजिशन बनता है, वही खाद-तत्व मिट्टी को प्राणवान बनाता है।

कार्बन दस भाग और नाइट्रोजन एक भाग के सम्मिश्रण से सेन्द्रिय खाद बनता है। वह जब फर्मेन्टेशन सड़न की प्रक्रिया से बने, तभी अधिक समर्थ होता है। उसी से भूमि की उर्वरा-शक्ति बढ़ती है।

‘फार्मर्स आव फारटीन्थ सेंचुरी नामक पुस्तक के लेखक -डा. किंग ने लिखा है-अमरीकी किसान जिन्हें प्रगतिशील कहा जाता है, चार सौ वर्षों के भीतर ही अपनी जमीन को बंजर बना रहे हैं। जबकि चीन और जैसे प्रतिगामी पुरातन-पंथी समझे जाने वाले खेतिहर अपनी भूमि को कम से कम जीवित तो बनाये हुए हैं। कृषि-विद्या का मूल सिद्धान्त यह है कि धरती से उत्पन्न होने वाली चीजें उपयोग करने के बाद उसी को वापिस लौटा दी जाय। मनुष्यों और पशुओं को जो आहार-अन्न फल, शाक, घास आदि के रूप में प्राप्त होता है, स्वभावतः उसे मल-मूत्र और कूड़े-कचरे के रूप में फिर धरती को वापिस किया जाना चाहिए, तभी उसकी उर्वरा-शक्ति जीवित रहेगी और उत्पादन का चक्र यथाक्रम चलता रहेगा।

इन दिनों रासायनिक-खादों का धूम है। इससे तुरन्त लाभ होता है और अधिक उत्पादन होता है। यह बड़ा आकर्षक भी है। किन्तु कुछ ही वर्षों में दुष्परिणाम सामने आता है कि भूमि की शक्ति किस बेतरह घटी और नष्ट हुई। इतना ही नहीं, इस प्रकार दुर्बल बनाई गई भूमि की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी क्षीण हो जाती है और फिर फसलों पर तरह-तरह के कीड़े हमला बोलते हैं और उत्पादन को चट कर जाते हैं। फसल को कीड़ों से बचाने के लिए उस पर जहरीली दवाओं के घोल छिड़का जाते हैं। कीड़े मारने का तात्कालिक लाभ मिल जाय तो भी वे विष घुमा-फिराकर मनुष्यों और पशु-पक्षियों के पेट में पहुँचते हैं। इससे उनके रुग्ण होने और असमय में ही मरने का संकट उत्पन्न होता है।

जैम्फ एण्ड हाइड की ‘रेप आव दी अर्थ’ नामक पुस्तक में धरती पर होने वाले अत्याचार और उसके दुष्परिणाम पर रोमांचकारी प्रकाश डाला है और आँकड़ों सहित बताया गया है कि अमेरिका में साइल इरोजन भू-क्षरण की समस्या कितनी विकट होती चली जा रही है। रासायनिक खाद किस तरह धरती को अनुर्वर बना रहे हैं। उसकी जल धारण करने की क्षमता नष्ट हो रही है और मरी हुई धरती रेगिस्तान बन रही है।

मिट्टी और मनुष्य का स्वास्थ्य एक दूसरे के साथ जुड़ा हुआ है। धरती यदि कमजोर या बीमार होती चली गई तो उसका बुरा प्रभाव निश्चित रूप से मनुष्य को भी भुगतना पड़ेगा। मनुष्य ही क्यों, अन्य प्राणी भी उस अस्वस्थता की लपेट में आये बिना न रहेंगे। मिट्टी स्वस्थ होगी तो घास, अनाज, शाक फल स्वस्थ होंगे, उन पर निर्वाह करने वाले प्राणी स्वस्थ रहेंगे। किन्तु यदि बीमारी जड़ में ही घुस गई तो पत्तों को सूखते-झड़ते क्या देर लगती है , आहार का मूल-स्रोत धरती में है, वहीं विकृति घुस पड़ी तो उसका परिणाम वे सभी भुगतेंगे- जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपना आहार भूमि के उत्पादनों से ग्रहण करते हैं। क्या शाक, क्या माँस-उसका उत्पादन तो मूलतः धरती से ही होता है। माँसाहारी-शाकाहारियों को खाते हैं। शाकाहारियों का खाद्य धरती ही तो उपजाता है। इस तरह कीड़ों-मकोड़ों और मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक सभी को भूमि ही निर्वाह प्रदान करती है। जलचर भी उस क्षेत्र से बाहर नहीं। समुद्रों तथा जलाशयों में जीवन तत्व हैं, वह धरती से ही बहकर पहुँचता है। जलचरों को आहार उसी मिलता है, जल-अकेला जल ही है। धरती से समुद्र को मिलने वाला यह अनुदान यदि विकृत होगा तो उसका प्रभाव जलचरों पर भी पड़े बिना न रहेगा।

मैकूकेरिसन ने चूहों को कई तरह की भूमियों में उत्पन्न हुए गेहूँ के अलग-अलग प्रयोग क्षेत्रों में रखा और देखा कि उसका क्या परिणाम होता है , सेन्द्रिय खाद की जमीन में उपजे गेहूँ खाकर चूहे पूरी तरह परिपुष्ट हुए, जबकि रासायनिक-खादों से उगायें गये गेहूँ खाने वाले चूहों का बुरा हाल था।

पाश्चात्य देशों में स्वास्थ्य-रक्षा की दिशा में बहुत कार्य हुआ है। सरकार इस पर बहुत खर्च करती है। चिकित्सा-विज्ञान का विकास हुआ है। फलस्वरूप छूत के रोग घटे हैं। स्त्रियों का प्रसूति-मरण भी धातु-विद्या के विकास से काफी कम हुआ है। किन्तु डीजनरेटिव डिसिजेस-शरीर को क्षीण करने वाले रोग बेहिसाब बढ़े हैं और वे इतने उग्र हैं कि डाक्टर उनके सहारे अपना धन्धा तो चलाते हैं, पर नियन्त्रण कर सकने में असमर्थ हैं। इन बढ़ते हुए क्षीणताकारी रोगों का एक मात्र कारण है-दोषयुक्त आहार। रासायनिक-खादों का उत्पादन वजन और आकार में तो बड़ा होता है, पर उसमें पौष्टिकता के स्थान पर स्वास्थ्य को क्षीण करने वाली विकृतियाँ भरी होती हैं। इस तथ्य पर एड्रीनल की ‘मेन आव दि फील्डस’ में तथ्य और तर्क प्रस्तुत करते हुए बताया गया है।

कुछ समय पूर्व फसलों में कीड़े लगने की घटनाएँ बहुत कम देखने में मिलती थीं। दीमक, चूहे, टिड्डी तो फसलों को बिगाड़ते थे, पर जिस तरह, तरह-तरह के कीड़े लगने से अब फसलें बर्बाद होने लगी हैं, वैसा पहले नहीं होता था। यह नया उपद्रव भावी-संकट की सूचना देने वाली चेतावनी समझी जानी चाहिए। कम्पोस्ट खादों की अपेक्षा-रासायनिक खादों की भरमार धरती की जीवनी-शक्ति घटाती है। उसमें फसल को निरोग उत्पन्न करने व रोगों के आक्रमण से जूझ सकने की क्षमता घटती है। उस सामर्थ्य से रहित पौधे सहज ही कीड़ों के आक्रमण से ग्रसित हो जाते हैं। ऊपर से कीड़े मारने के जो विष-घोल छिड़कते जाते हैं, उससे फसल की रही-सही पौष्टिकता भी नष्ट हो जाती है। देखने में अनाज अथवा शाक-फल रंग-रूप में सामान्य लगते हैं, पर उनकी जीवनी शक्ति को नाप-तोला जाय तो प्रतीत होगा कि आहार की उपयुक्तता एवं पौष्टिकता बुरी तरह गंवा दी गई है। ऐसा खाद्य खाकर प्राणियों की निरोगता कैसे अक्षुण्ण रह सकती है। प्राकृतिक-खाद के अभाव में केंचुऐ जैसे धरती को पोला करने और उसकी सजीवता बढ़ाने वाले कीड़े भी नष्ट होते चले जा रहे है। उसका भी बुरा प्रभाव उर्वरता घटने के रूप में सामने आ रहा है। मामूली जानवर इस अन्तर को समझते हैं। यदि कम्पोस्ट खाद और रासायनिक खाद से उगाए हुए चारे पशुओं के सामने रखे जाएँ तो वे अपनी सहज बुद्धि से प्राकृतिक-खाद वाले चारे को ही रुचि पूर्वक स्वीकार करेंगे।

इंग्लैण्ड में श्रीमती ऐलिस हेबनहम ने प्राकृतिक ढंग से खेती करने का और रासायनिक खाद के खतरों को समझने का एक व्यवस्थित आन्दोलन ही चलाया और उनने अपने प्रतिपादन के पक्ष में अनेक तर्क और तथ्य प्रस्तुत किये। अब इस प्रयोजन के लिए ‘सौइल ऐसोसिएशन’ नामक संस्था का ही गठन हो गया है, जिसकी शाखाएँ संसार के प्रायः सभी प्रमुख देशों में हैं। संस्था ने अपने घोषणा-पत्र में धरती के शोषण को एटम-बम से भी बड़ा खतरा बताया है और कहा है-इतिहासकार हमारी पीढ़ी को मृत्यु-कार्यों में इतनी कार्य-व्यस्त लिखेंगे, जिसका जीवन-तत्वों को सुरक्षित रखने की ओर ध्यान ही न था। देश पर आक्रमण होने पर सभी देशवासी मिलकर उसका मुकाबला करते हैं। धरती पर होने वाले आक्रमण को बचाने के लिए उन सभी धरती वासियों को एक होना चाहिए, जिन्हें अपनी और अपनी सन्तानों की जिन्दगी से लगाव और प्यार है।

कान्वेस्ट आव नेचर का ‘प्रकृति पर विजय’ का नारा थोथा है। प्रकृति को सन्तुलित रहने दें-तो ही हमारा अस्तित्व बचा रह सकता है। प्रकृति के प्रति हमें विनम्र होना चाहिए, उससे लाभ उठाये सो ठीक। पर वह लाभ एक अण्डा हर रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर सारे अण्डे एक बार में निकालने वाले की कहाने जैसी मूर्खता नहीं करनी चाहिए। प्रकृति के सन्तुलन में इन तुच्छ जीवाणुओं का भी योगदान है, जो हमारी धरती को जीवित रखे हुए हैं।

‘सवाइबल आव दी फिटैस्ट’ जैसे उद्धत सिद्धान्तों का अनुसरण करके हम पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने चलेंगे तो उसका जीवन भी नष्ट करेंगे और हम स्वयं भी नष्ट होंगे।


आचार्य अग्ने (kahani)

आचार्य अग्ने उन दिनों बीमार पड़े थे। फिर भी चारपाई पर सिरहाने बगल में उनने ढेरों पुस्तकें जमा कर रखी थीं। उस कष्टकर मनःस्थिति में पढ़कर मन को हलका करते थे।

एक मित्र मिलने आये और उन्होंने पूर्ण विश्राम की बात कहते हुए पढ़ने से बचने का परामर्श दिया।

अन्नेजी ने मुस्कराते हुए कहा-मैं बीमारी की खुराक बना हुआ हूँ, पर मैं भूखा कैसे रहूँ? अपनी खुराक पुस्तकों से हासिल करता हूँ।


अचेतन मन को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता

मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने के लिए आमतौर से अध्ययन अध्यापन का आश्रय लिया जाता है और इसके लिए विभिन्न स्तर के शिक्षा-संस्थान चलाये जाते हैं। इससे चेतना के वाह्य-मस्तिष्क की जानकारी ही बढ़ती है। अन्तःचेतना को प्रशिक्षित करने के लिए अनुभव, अभ्यास और वातावरण के सृजन को ही मान्यता दी जाती रही है। अब परा-मनोविज्ञान की शोधों ने एक नया तथ्य प्रस्तुत किया है कि प्रस्तुत स्थिति में आवश्यक निर्देश देकर मानसिक चेतना को सीखने-सिखाने का अधिक झंझट उठाये बिना भी अभीष्ट शिक्षा दी जा सकती है। अन्तः चेतना सोते समय भी जागृत रहती है और उस स्थिति में यदि क्रमबद्ध सुनियोजित शिक्षा दी जाय तो न केवल जानकारियाँ बढ़ सकती हैं, वरन् आदतें भी सुधारी जा सकती हैं।

क्या सोते हुए मनुष्य को आवश्यक शिक्षा देकर प्रशिक्षित किया जा सकता है? यह मनोवैज्ञानिक प्रयोग कैरोलिना विश्वविद्यालय में बहुत दिन चला और सन्तोषजनक सीमा तक सफल रहा। छोटे विद्यार्थियों के एक दल को उनके गहरी निद्रा में सो जाने पर तीन अक्षरों के पन्द्रह शब्द रिकार्ड बजाकर तीस बार सुनाये गये। दूसरे छात्र दल को ऐसा कुछ नहीं सुनाया गया। परीक्षा लेने पर उन बच्चों ने उन शब्दों को बहुत जल्दी याद कर लिया जो उन्होंने अविज्ञात रूप से गहरी निद्रा में सुने थे। इसके विपरीत जिन्होंने वह रिकार्ड नहीं सुना था, उन्हें वे शब्द काफी समय और श्रम करने के बाद ही याद हो सके।

उसी प्रयोग-परीक्षण के अंतर्गत छोटी कक्षाओं के कुछ ऐसे छात्र लिये गये, जिन्हें दाँतों से नाखून काटते रहने की आदत थी। वे जब गहरी नींद में सो गये तो कई रातों तक एक रिकार्ड सुनाया जाता रहा, जिसमें कहा गया था कि -’मेरे नाखूनों का स्वाद कडुआ है।” कुल मिलाकर यह वाक्य 600 बार सुनाया गया। परिणाम यह हुआ कि उन 20 में से 6 ने स्वतः ही नाखून चबाना छोड़ दिया और शेष की आदत नाममात्र की रह गई।

मांट्रियल स्थित मेकगिल विश्वविद्यालय में डा. विक्टर पेन फील्ड के निर्देशन में मस्तिष्कीय अनुसंधान में ऐसे बहुत से केन्द्रों का पता लगा लिया गया है, जहाँ से अमुक प्रवृत्तियों का संचालन एवं नियन्त्रण होता है। बहुत ही हलका बिजली का प्रवाह पहुँचा कर सोते हुए लोगों को तरह-तरह के स्वप्न दिखाये गये। एक स्थान का विद्युत स्पर्श तार टूटने जैसे दृश्य दिखाना था तो दूसरे स्थान का स्पर्श कानों को घण्टी बजने जैसी अनुभूति देता था। एक व्यक्ति ने बैंड-बाजा बजता सुना तो दूसरे ने पियानो पर हर किसी को संगीत बजने का सपना जरूर दिखाई दिया, हालाँकि बजाने वालों की आकृतियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की दिखाई दीं। एक ने तार टूटते देखा तो दूसरे ने बल्बों की जगमगाहट देखी। पर प्रकाश और चमक के अनुभव सभी को आये। ऐसे ही अनेक प्रयोगों के आधार पर विभिन्न शक्तियों के मूल केन्द्रों का पता लगाना बहुत हद तक संभव हो गया है और स्विच दबाकर उस स्थान को कार्य संलग्न करने में सफलता मिल गई है।

बालकों और वयस्कों को अर्थकारी विद्या की पढ़ाई पर जितना ध्यान है, उतना ही यदि अन्तःचेतना में सुसंस्कार स्थापित करने की चेष्टा की जाय तो जन-मानस सहज ही कल्याणकारी सत्प्रवृत्तियों का जागरण एवं अभिवर्धन किया जा सकता है।


शब्द ब्रह्मं की नाद-साधना

कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है-संगीत का मूल-तत्व अतीन्द्रिय और अति मानवी है। दैनिक जीवन के घटनाक्रम में बंधी हुई अन्तःचेतना को वह मुक्ति की अनुभूति तक ले जाता है। क्या गायक, क्या श्रोता-दोनों ही उन क्षणों में वैराग्य की उस भूमिका के समीप जा पहुँचते हैं, जिसे ब्रह्माण्ड की नींव के रूप में तत्व वेत्ताओं ने जाना है।

महाकवि होमर कहते थे-असह्य मनोव्यथा का समाधान या तो रुदन-क्रन्दन में होता है या फिर संगीत के गुँजन में।

भारतीय तत्व वेत्ता संगीत की गणना मानव जीवन की महती आवश्यकताओं में करते रहे हैं। उन्होंने इस विभूति से वंचित लोगों को पूँछ रहित पशु की संज्ञा में गिना है।

साहित्य संगीत कला विहीन। साक्षात पशुः पुच्छ विषाण हीनः॥

संगीत, साहित्य और कला से रहित मनुष्य बिना पूँछ का साक्षात् पशु है।

खगाः भृंगाः पतगांश्च कुरंगद्यापि जन्तवः। सर्व एव प्रगायन्ते गीतव्याप्ति दिगन्तरे॥ -नारद संहिता

पक्षी , भ्रमर, पतंगे, मृग आदि जीव-जन्तु तक गायन करते रहते हैं। गीत-ब्रह्माण्ड व्यापी है।

संगीत मनुष्यों की ही नहीं, सृष्टि के समस्त प्राणधारियों की सम्पदा है। वे सभी अपने-अपने ढंग से उसका उपयोग करते हैं।

सृष्टि का सूक्ष्म निरूपण करने वाले तत्व वेत्ताओं ने बतलाया है कि परा-प्रकृति के अन्तराल में महाकाश में -अनाहत स्वर की थरथराहट उत्पन्न होती है और उस आदि स्वर सूर की भी सात अश्व गतिशील होते हैं।

सूर्य के रथ में सात रंग के सात घोड़े जुड़े हैं। स्वर ब्रह्म भी महदाकाश का नाद-ब्रह्मं है। जो बेवजह अक्षर से क्षर बनता है तो उसकी परिणति सात विखण्डों में सप्त-स्वरों में दृष्टिगोचर होती है। प्रकृति और पुरुष का अनवरत संयोग-सम्भोग-आघात-प्रत्याघातों के रूप में स्व संचलित पेण्डुलम गति से नियत निर्धारित क्रम से चलता रहता है। इसी से ब्रह्माण्ड की घड़ी के समस्त कल-पुर्जे घूमते हैं और विश्व-व्यापी विभिन्न हलचलें गतिशील होती हैं।

भौतिक विज्ञानी कायिक हलचलों के कारण स्वर उद्रेक का अस्तित्व बताते हैं। आत्म-विज्ञानी कहते हैं-शब्द विश्व का मूल है-विभिन्न हलचलें उसकी प्रतिक्रिया मात्र है। क्रिया कौन? प्रतिक्रिया कौन? इसका निर्णय न ही हो सके, तो भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि दोनों परस्पर अविच्छिन्न हैं। एक का आधार टूटने पर दूसरा भी स्थिर न रह सकेगा। जीवन का अन्त होने पर स्वर समाप्त होगा, अथवा स्वर की तालबद्ध स्थिति में अन्तर आने पर रुग्णता पीछे पड़ेगी और उसमें विकृति आ जाने पर मरण ही सम्मुख आ उपस्थित होगा। आयुर्वेद विज्ञानी रोग-निदान के लिए नाड़ी-परीक्षा करते हैं, उसे रक्त संचार की हलचल समझने मात्र की बात ही उसकी झंकृति की अनुभूति की जाती है, उसी प्रकृति नाड़ी संचार के साथ चल रहे, स्वर प्रवाह की स्थिति देखकर भी काम-प्रकृति की सूक्ष्म स्थिति का अन्वेषण किया जाता है।

मनुष्य के अन्तरंग की सरसता जब हुलसती है तो उसे गायन के लिए बाध्य करती है। गान-आत्मा की कला है, न कि कण्ठ की विशेषता। आवश्यक नहीं कि गायक को मयूर कण्ठ या कोकिल कंठी ही होना चाहिए। भावनाओं का उद्रेक जब गतिक्रम और लयबद्ध से प्रस्फुटित होता है तो उसे गायन के रूप में उभरता देखा जाता है। गीत-भावपूर्ण ही हो, यह आवश्यक नहीं। शब्दों के अनगढ़ होते हुए भी गान अपनी विविध अभिव्यक्तियाँ प्रकट करता हुआ गुँजित रह सकता है, भले ही उसे कोई दूसरा सुनने के लिए मौजूद या तत्पर न हो।

भगवान का नाम यों किसी भी प्रकार के शब्दोच्चारण से लिया जा सकता है। पर यदि उसे गीतवाद्य के साथ लिया जाय तो शास्त्रकारों के मतानुसार उसका प्रभाव साम-श्रुति-गान के समान अत्यन्त ही प्रभावोत्पादक होता है।

विष्णु नामानि पुण्यानि सुस्वरें रन्वितानिचेत्। भवन्ति साम तुल्यानि कीर्तितानि मनीषिभः॥

यदि ताल सहित सस्वर भगवान का नाम गाया जाय तो वह साम-गान की तरह फलप्रद होता है।

संगीत के आदि-इतिहास पर दृष्टि डालें तो वह विनय, भक्ति, करुणा और ममत्व की अनुभूतियों के साथ उद्भूत हुआ प्रतीत होगा। ईश्वर भक्ति के पीछे उदात्त प्रेम की-आत्मार्पण की-लय तादात्म्य की धारा बहती दिखाई देगी। संगीत का आदि उद्गम भी इसी स्रोत के सन्निकट है। कला की उत्कृष्टता ही काल-जयति बनती है। संगीत को विलास और विनोद का माध्यम बनना जरूर पड़ा, पर वस्तुतः उसकी मूल सत्ता वैसी है नहीं। आत्मा की अभिव्यंजना ने ही क्रमशः संगीत की शाखा प्रशाखाओं के रूप में विकास किया है।

वेद-काल के ऋषियों से लेकर अद्यावधि भक्तजनों ने अपनी अनुभूतियाँ प्रायः छंदबद्ध में ही विनिर्मित की हैं। भक्तिकाल के प्रायः सभी साधनारत महामानव या तो कविताएँ रचते रहे हैं, या फिर छन्द-स्वरों में भगवान के गुणानुवाद गाते रहे हैं। महर्षि नारद से लेकर सूर, तुलसी, मीरा, कबीर तक वही परम्परा क्रमबद्ध शृंखला के रूप में चली आई है।

वीणा पुस्तक-धारिणी-भगवती सरस्वती के दो उपकरणों में शब्द-शास्त्र का विभाजन है। उनके एक हाथ में वीणा और दूसरे में पुस्तक है। इन्हें ज्ञान की दो धाराएँ कह सकते हैं। स्वर-शास्त्र और शब्द-शास्त्र के माध्यम से ही हमारी विचारधाराएँ और भावनाएँ प्रदीप्त होती है। आचार्य आनन्दवर्धन ने इस प्रतीक अलंकार पर अधिक प्रकाश डाला है। भगवान शंकर के डमरू और भगवान कृष्णा की बाँसुरी में भी संगीत-गरिमा का ही संकेत है।

इन दिनों शास्त्रीय संगीत ‘क्लासिकल म्यूजिक’ और सुगम-संगीत लाइट-म्यूजिक के दो भागों में संगीत को विभक्त किया जाता है। गीत के चार अंक माने गये हैं-स्वर पद, लय और मार्ग। स्वरवान अर्थात्-गायन के रूप में प्रयुक्त होते वाला और ‘अभिधानावान’ अर्थात्-वार्तालाप के रूप में व्यक्त होने वाला, इस रूप में भी शब्द का विभाजन है। इसी को गेय पक्ष और वाक् पक्ष भी कहते हैं।

संगीत रत्नाकर-ग्रन्थ में नाद-ब्रह्म की गरिमा पर प्रकाश डालते हुए कुछ ऊहापोह किया गया है-

चैतन्यं सर्व भूतानाँ विवृतं जगदात्मना। नादोब्रह्य तदानन्दंमन्दिलयमुपास्महे॥

नाद पासनयादेवा ब्रह्यविष्णु महेश्वराः। भवन्त्युपासितानूनं यस्मादेते तदात्मकाः॥

नाद-ब्रह्म समस्त प्राणियों में चैतन्य और आनन्दमय है। उसकी उपासना करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की सम्मिलित उपासना हो जाती है। वे तीनों नाद-ब्रह्म के साथ बंधे हुए है।

नकारं प्राण नामानं दकारमनलंविदुः। ज्ञातः प्राणाभिसंयोगा तेननाहैउभिघीयते॥

प्राण का नाम ‘ना’ है और अग्नि को ‘द’ कहते हैं। अग्नि और प्राण के संयोग से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसे नाद कहते हैं।

संगीत रत्नाकर में नाद की बाईस श्रुतियों में विभक्त किया गया है। ये श्रुतियाँ कान से अनुभव की जाने वाली विशिष्ट शक्तियाँ हैं। इनका प्रभाव मानवी-काया और चेतना पर होता है। इन बाईस शब्द श्रुतियों के नाम हैं-(1) तीव्रा,(2) कुमह्वति, (3) मन्दा, (4) छन्दोवती, (5) दयावती, (6) रंजनी, (7) रब्तिका, (8) रौही, (9) क्रोधा, (10) वडिनका, (11) प्रसारिणी, (12) प्रीति, (13) यार्जनि, (14) क्षति, (15) रक्ता, (16) संदीपिनी, (17) अलापिनी, (18) मदन्ति (19) रोहिणी, (20) रम्पा, (21) उग्रा, (22) क्षोभिणी।

इन बाईस ध्वनि-शक्तियों को सप्त स्वरों के साथ सम्बद्ध किया गया है। यह विभाजन इस प्रकार है-

- षडज (स) तीव्रा, कुमह्वात, मन्दा, छन्दोवती।

-रिषव (रे) दयावती, रंजनी, रब्तिका।

-गान्धार (ग) रौही, क्रोधा।

-मध्यम (म) बड़िनका, प्रसारिणी, प्रीति, मार्जनि।

-पंचम (प) क्षिति, रक्ता, संदीपनी, अलापिनी।

-धैवत (ध) मदन्ति, रोहिणी, रम्पा।

-निषाद (नि) उग्रा, क्षोभिणी।

इन बाईस शक्तियों की ध्वनि के द्वारा उत्पन्न होने वाले भौतिक एवं चेतनात्मक प्रभाव ही समझना चाहिए। औषधियाँ जिस प्रकार मूल द्रव्यों के रासायनिक सम्मिश्रण से उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त प्रभाव के कारण विभिन्न रोगों पर अपना प्रभाव डालती हैं। इसी कारण विभिन्न रोगों पर अपना प्रभाव डालती हैं। इसी प्रकार इन बाईस शक्तियों का उनके सम्मिश्रण का वस्तुओं तथा प्राणियों पर प्रभाव पड़ता है। प्राचीन काल में इस रहस्यमय विज्ञान के ज्ञाता नाद-ब्रह्म के उपासक कहलाते थे। वे विभिन्न गीत-वाद्यों के-भाव मुद्राओं के और रसानुभूति के आधार पर अपने अन्तराल में दबी हुई शक्तियों को जगाते थे और संपर्क में आने वाले श्रोताओं की व्यथा वेदनाएँ हरते थे। जड़-चेतन प्रकृति को प्रभावित करके वे अवांछनीय परिस्थितियों को बदल कर अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने में भी चमत्कारी सफलता प्राप्त करते थे। नाद-योग का स्थान किसी भी उच्चकोटि की योग-साधना से कम न था।

नाद-योग में अनाहत स्वर सूर्य ओंकार का आश्रय लिया जाता है, और उसके वाहन अन्य स्वरों को घण्टा, शंख, बंसी, भेरी, मृदंग, गुँजन, कम्पन, गर्जन आदि के रूप में सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय के माध्यम से सुना जाता है। इस आधार पर अवलम्बन के सहारे योगीजन भगवद्-वाणी का अवगाहन करते हैं। प्रकृति के अन्तराल में चल रही हलचलों को समझते हुए वर्तमान और भविष्य की स्थिति एवं सम्भावनाओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

ब्रह्माण्ड में चल रहे स्वर-प्रवाह की तरह ही पिण्ड रूपी सितार के तार भी अपने क्रम से झंकृत होते रहते हैं। मेरु-दण्ड स्पष्टतः वीणा-दण्ड है। सात धातुओं के सात तार इसमें जुड़े हैं। सप्त-विधि अग्नियों का पाचन परिपाक चलते रहने से ही तो प्राण को पोषण मिलता है और जीवन को स्थिर रखा जाता है। यह अग्नियाँ सात धातुओं को पकाती हैं और परिपाक को तेजस् में बदलती हैं। (1) पेशियों का आकुंचन-प्रकुञ्चन (2) नाड़ियों का रक्ताभिषरण, (3) फेफड़ों का श्वास-प्रश्वास (4) हृदय की धड़कन (5) मस्तिष्कीय विद्युत का ऋण धन, आरोह-अवरोह (6) चित्त का विश्राम जागरण, (7) कोशिकाओं का जन्म-मरण-यह सात क्रियाकलाप ही जीवन-विधा के मूलभूत आधार हैं। इन्हीं को सप्त-ऋषि सप्त-लोक सप्त-द्वीप सप्त-सागर सप्त-मेरु सप्त-सरित सप्त-शक्ति के नाम से पुकारते हैं। शब्द सूर्य के यही सप्त अश्व हैं। स्वर-सप्तक इन्हीं की प्रत्यक्ष अनुभूति हैं। ब्रह्माण्ड-व्यापी शब्द-ब्रह्म का गुँजन काय-पिण्ड के अंतर्गत भी सुना जा सकता है।

नाद के दो भेद हैं-आहत और अनाहत। स्वच्छन्द तन्त्र ग्रन्थ में इन दोनों के अनेकों भेद-उपभेद बताये हैं। आहत और नाद को आठ भागों में विभक्त किया है। घोष, राव, स्वन, शब्द, स्फुट, ध्वनि, झंकार, ध्वंकृति। अनाहत की चर्चा महाशब्द के नाम से की गई है। इन्हें स्थल कर्णेन्द्रिय नहीं सुन पाते, वरन् ध्यान धारणा द्वारा अन्तःचेतना में ही इनकी अनुभूति होती है।

विकृत, वादी, संवादी, अनुवादी और विवादी स्वरों का-उनके ग्रह अंश और न्यास-पक्षों का-तिरसठ अंलकारों का-उनचास कूट तानों का संगीत रत्नाकर में उल्लेख है। मध्यकाल में राज्याश्रय पाकर संगीत का स्वर पक्ष काफी विकसित हुआ था। इससे पूर्व वह सन्तों और योगियों का प्रिय विषय था। तब उसकी गणना श्रेय-साधना के रूप में की जाती थी।

दीपक-राग प्रेम-राग जैसे स्वर ब्रह्म के नगण्य से स्थूल प्रकृति से सम्बन्धित चमत्कार है सूक्ष्म प्रकृति को तरंगित और उत्तेजित करने में उसकी धाराएँ बदलने में भी संगीत का प्रभाव स्वल्प दृष्टिगोचर नहीं होगा।

अन्य योगों की साधना का अवलम्बन लेकर जिस प्रकार उच्चकोटि की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है, उसी प्रकार स्वर-योग की साधना से भी उच्च आध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद-ब्रह्म का गुँजन संव्याप्त है, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर साधना इस अव्यक्त गुँजन को व्यक्त बनाती है-मुखर करती है। गान यदि उच्च स्तर का हो तो अन्तरात्मा की भावसत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानंद की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।

प्रसिद्ध है कि तानसेन दीपक-राग गाकर बुझे हुए दीपक जलाते थे और मेघ-राग गाकर छितराए बादलों को घटा बनाकर बरसाते थे। यह विद्या उन्होंने स्वामी हरिदास के चरणों में बैठकर योग-साधना के रूप में सीखी थी। प्राणायाम के उच्च-स्तरीय अभ्यास ने उन्हें शब्द-ब्रह्म का वेत्ता बनाया था। आहत-नाद और अनाहत-नाद की अत्यन्त सूक्ष्म प्रवाह शृंखला को नादयोग के आधार पर ही अनुभव में लाया जाता है। योग के आधार पर ही अनुभव में लाया जाता है। स्वर-साधना प्रकारान्तर से नाद-ब्रह्म की वैसी ही आराधना है, जैसी ब्रह्म-विद्या के अन्तर्गत अद्वैत-ब्रह्म चिन्तन की।


मौत जिंदगी की शुभचिंतक (kahani)

जिन्दगी उगते सूर्य की दिशा में अपने ढंग से चलती चली जा रही थी।

एक विराम पर उसने मुड़ कर पीछे की ओर देखा तो चौंक पड़ी। चाण्डाली-सी काली और कुरूप छाया पीछे-पीछे दबे पाँवों चली आ रही थी।

जिन्दगी चिल्लाई। अभागिन, तू कौन है? मेरे पीछे क्यों आती है? तेरी काली, कुरूप और भयानक आकृति देखकर मुझे तो भारी डर लगता है। जा, भाग, मुझसे दूर हट।

छाया चुप रही। पर जिन्दगी जब डरती, घिघियाती ही चली गई तो छाया ने अपना मुँह खोला और बोली-बहिन। मैं तो तेरी सहचरी हूँ, तेरे साथ ही चल रही हूँ और अन्त में हमें और तुम्हें एक ही होकर रहना है। मुझसे डरने की क्या बात? जानती नहीं, मेरा नाम क्या है? अच्छा तो सुनो-मुझे मौत कहते हैं।

जिन्दगी ने मौत को छाया बनकर पीछे लगी देखा तो उसके डर का ठिकाना न रहा। सकपकाती, काँपती हुई वह मूर्छित होकर एक ओर गिर पड़ी।

जिन्दगी के सीने में दबा, मन का चोर निकलकर बाहर आया और उसे आश्वस्त करने का प्रयत्न करते हुए बोला-दीदी अपनी ही छाया से भला कोई डरती है? चोर की ही अपनी छाया से डर लगता है-तुम कोई चोर थोड़े ही हो, जिसे इस तरह डरने की आवश्यकता रहे।

प्रतिछाया ने देखा-जिन्दगी की मूर्छा कुछ हलकी पड़ी है और पलक खोलने का प्रयत्न कर रही है। अब उससे भी न रहा गया। सान्त्वना देने का प्रयत्न करते हुए वह भी कान के पास मुँह ले जाकर धीर-धीरे बुदबुदाई। बोली बहन, मैं तो पुरातन को नवीन में बदलने वाली तेरी शुभ-चिंतक सहेली हूँ, मुझसे डरने की कोई बात नहीं। डराने वाला तो मन का पाप है, तू उसे भगा। डर तो पाप में है, मैं तेरी थकान मिटाने और शान्ति देने के अतिरिक्त और कुछ करती ही नहीं।


गरीबी उदार दानवीरता में बाधक नहीं

अपने सुखों को बाँट देना, यह उदार और सहृदय लोगों से ही बन पड़ता है। निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त जो कुछ श्रम, समय, मनोयोग, कौशल एवं चिन्तन बच जाता है, उस पर समाज का अधिकार स्वीकार किया जाना ही न्यायोचित है। जो हम पाते हैं, वह वस्तुतः असंख्य लोगों के श्रम, सहयोग का ही परिणाम होता है। कृतज्ञता उच्च दृष्टि जब ऋण भार से उऋण होने की बात सोचती है तो उसका समाधान पुण्य परमार्थ की उदार सेवा-साधना में ही सन्निहित दीखता है। दान के पीछे यदि अन्धविश्वासों की मूढ़ मान्यता, विवशता और कुटिलता छिपी न पड़ी हो तो निश्चित रूप से उसके सहारे मनुष्य अपनी महानता विकसित कर सकता है और आत्म-शान्ति पा सकता है।

आमतौर से धन देना ही दान की परिधि में आता है, पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। संसार में ऐसे लोग बहुत हैं, जो अपना एवं अपने परिवार का अनिवार्य निर्वाह ही कठिनता पूर्वक जुटा पाते हैं। प्रतीक रूप से दैनिक अभ्यास में दान-प्रवृत्ति को जीवित रखने के लिए वे कुछ पैसे सत्प्रयोजन के लिए देते भी रह सकते हैं, पर बड़ी मात्रा में कुछ कर सकना उनके लिए सम्भव नहीं हो सकता है। निश्चित रूप से धनिकों की तुलना तो वे कर ही नहीं सकते। ऐसी दशा में वे अपनी निर्धनता को दान का आनन्द लेने में प्रधान बाधा मानने लगते हैं। और दुखी होते हैं।

पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। दान-अकेले धन का ही नहीं होता, बचा हुआ समय, श्रम, चिन्तन और मनोयोग लोक मंगल के लिए-विश्व-मानव की सेवा साधना के लिए किसी मात्रा में लगा रहना हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है। विचार पूर्वक आत्मनिरीक्षण किया जाय तो अपने पास समय का बहुत सा अंश ऐसा होता है, जो आलस्य, प्रमाद, गपशप अथवा दूसरे ऐसे निरर्थक कामों में खर्च होता रहता है, जिसे यदि चाहें तो आसानी से बचाया जा सकता है। समय के अपव्यय को तीखी दृष्टि से देखा-परखा जाय तो प्रतीत होगा कि अपना ढेरों समय ऐसी बरबादी में नष्ट होता है, जिसका न अपने लिए कोई प्रयोजन है और न दूसरे अन्य किसी के लिए। समय काटने के लिए हमारे कितने ही निरर्थक काम होते रहते हैं और जो करते हैं उनमें इतनी अन्य मनस्कता एवं शिथिलता बरतते हैं, जिनके कारण कम समय में हो सकने वाला काम दूना-चौगुना समय खा जाता है। यदि इस अस्त-व्यस्तता को हटाकर मुस्तैदी की आदत डाली जाय तो सहज ही ढेरों समय ऐसा बच सकता है, जो पहले फालतू नष्ट होता रहता था। समय की यह बचत यदि परमार्थ प्रयोजनों में लगाई जाने लगे तो निर्धन व्यक्ति भी दान-वीर धनिकों की तुलना में अधिक परमार्थ साधन कर सकता है। उसे श्रमदान का ऐसा पुण्य-फल मिल सकता है, जो धन-दान से हलका नहीं, वरन् भारी ही आँका जाएगा।

विचारों की क्षमता किसी भी साँसारिक सम्पदा की तुलना में अधिक होती है। यदि हम मस्तिष्क में आदर्शवादी उत्कृष्ट विचारधारा भरे रहें। अपने में महानता के साथ जुड़ी रहने वाली सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को भर लेने की योजना बनाते रहें तो विश्व-मानव के पुनरुत्थान में अपना क्या योगदान हो सकता है? इसका ताना-बाना बुनते रहें तो हमारा वह चिन्तन अपने व्यक्तित्व को महान बनाने और सामाजिक सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त करने में आश्चर्यजनक रीति से सहायक हो सकता है।

हमारे मस्तिष्क में अनावश्यक और अवांछनीय विचारों की घटाएँ घुमड़ती रहती हैं और वह महत्वपूर्ण संस्थान ऐसे सोच-विचार में उलझा रहता है, जिसका कोई अर्थ नहीं। ऐसी महत्त्वाकाँक्षाएँ जिनका आज की परिस्थितियों के साथ कोई तालमेल नहीं-यदि मस्तिष्क में घुमड़ती रहती है तो उन्हें शेखचिल्ली जैसी बेपर की उड़ानें ही कहा जा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों के साथ जिन कार्यों का सीधा सम्बन्ध है। यदि उतना ही सोचें और अधिक उपयुक्त समय आने पर आगे की योजनाएँ बनाने की व्यवहार वादी नीति अपनाएँ तो हमारी मस्तिष्कीय क्षमता का एक बहुत बड़ा भाग उस निरर्थक चिन्तन में नष्ट होने से बच सकता है।

इसी प्रकार चिन्ताओं, आशंकाओं और भविष्य में घटित हो सकने वाली दुर्घटनाओं की डरावनी कल्पनाएँ हमारे स्वभाव अभ्यास में समाविष्ट होकर चिन्तन की बर्बादी करती रहती हैं। इतना सोच-विचार यदि आशंकाओं के निराकरण का उपाय सोचने में लगता तो भी एक बात थी, पर वैसा होता नहीं। अशुभ सम्भावनाओं की बढ़ा-चढ़ा कर देखने से केवल मानसिक सन्तुलन ही बिगड़ सकता है और हड़बड़ी ही पैदा हो सकती है। द्वेष और प्रतिशोध से प्रेरित होकर विपक्षी को नीचा दिखाने की बात हम सोचते भर हैं। साहस और साधन के अभाव में वैसा कुछ कर नहीं पाते। अस्तु उस असफलता पर खीजते, हाथ मलते भर रह जाते हैं। इन उलझनों में उलझे रहने के साथ पर यदि समस्याओं का स्वस्थ और सम्भव समाधान भर ढूँढ़ने तक मस्तिष्क को सीमाबद्ध रखें तो उपयोगी निष्कर्ष भी निकल सकते हैं और चिन्तन का अनावश्यक अपव्यय भी रुक सकता है। समय की ही भाँति चिन्तन की बर्बादी को भी रोका जा सके तो आत्मोत्कर्ष और लोकमंगल के अनेक आधार ढूँढ़ निकालने और उन्हें कार्यान्वित करने की रीति-नीति ढूँढ़ी और अपनाई जा सकती है। उस बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर हम दानवीरों जैसी प्रसन्नता प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं।

शरीर और मस्तिष्क के उपरान्त तीसरी ईश्वर-प्रदत्त विभूति है-सद्भावना इसे अपने लिए और दूसरों के लिए ठीक तरह प्रयुक्त किया जा सके तो उसका प्रतिफल भलाई का निर्झर बनकर प्रवाहित हो सकता है। अपने प्रति करुणा प्रदर्शित कर सकना यदि हमारे लिए सम्भव हो सके तो निस्सन्देह आत्मसुधार और आत्म-निर्माण की सर्वप्रथम और सर्वोपरि आवश्यकता सामने आ खड़ी होगी और प्रतीत होगा कि आहार-विहार में विचार-व्यवहार में -क्रान्तिकारी परिवर्तन करने की आवश्यकता है। पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को अपनाने से जीवन का निकृष्ट स्वरूप बनता है। यदि विवेक और दूरदर्शिता का आश्रय लेकर गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत बना लिया जाय तो उसका परिणाम निखरे हुए व्यक्तित्व के रूप में सामने आ सकता है और हम क्षुद्र से महान बन सकते हैं।

आमतौर से नर-पशु स्तर के लोग पेट और प्रजनन भर की बात सोचते रहते हैं। वासनाओं और तृष्णाओं के अतिरिक्त उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं। लोभ और मोह के इर्द-गिर्द ही सारी अभिलाषाएँ चक्कर काटती रहती हैं। ममता के परिधि-परिवार के थोड़े से सदस्यों के आगे बढ़ ही नहीं पाती। इन संकीर्ण स्वार्थों की परिधि में जकड़ा हुआ मायाबद्ध जीवधारी आदि से अन्त तक सड़ी कीचड़ में बुदबुदाते रहने वाले कीड़ों से बढ़कर कोई अच्छी स्थिति सामने आने ही नहीं देते। भजन भी मनोकामना की पूर्ति अथवा स्वर्ग, मुक्ति की शौक-मौज में उलझा रहकर निकृष्ट स्तर का ही बना रहता है और उस पर कभी भी आत्म-कल्याण अथवा आत्म-शान्ति का फल नहीं लगता।

इस दयनीय भाव-भूमिका को यदि ऊपर उठाया जा सके तो उसका परिणाम आत्मीयता के असीम विस्तार के रूप में सामने आयेगा। स्वर्ग इस परिष्कृत दृष्टिकोण का ही है। संकीर्णता के तुच्छ सीमा-बन्धनों को तोड़-फेंकना ही जीवन-मुक्ति है। इन दिव्य विभूतियों से लाभान्वित होने के लिए हमें सहानुभूति का विकास करना होता है। दूसरों के सुख-दुख में साझीदार होना पड़ता है। अन्न, वस्त्र, औषधि जैसे भौतिक साधनों का निर्धनों को दान करना-यह धनियों के लिए ही सम्भव है। भौतिक वस्तुएं खरीदना और देना धनवानों के ही बस की बात है। ब्रह्म-भोज तीर्थ-यात्रा अथवा व्यय-साध्य धर्मानुष्ठानों को भी वे ही लोग कर सकते हैं। मन्दिर, धर्मशाला, कुँआ, तालाब बनाना बिना पूँजी के कैसे हो सकता है? किन्तु इससे किसी निर्धन को दुखी होने की आवश्यकता नहीं। गरीबी अभिशाप नहीं, लानत की कंगाली है। कंगाल वे है, जिन्हें कृपणता, संकीर्णता ने घेर रखा है। ऐसे लोग अमीर होते हुए भी कंगाल ही कहलायेंगे। जिनकी अपनी हविस पूरी नहीं होती, जिनके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं, उन्हें दीन दरिद्र के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा? इसके विपरीत उदार-हृदय निर्धन भी भाव-सम्पन्न होते हुए हजार गुना अधिक सराहनीय है। धन से सही-उदार भावनाओं से हम असंख्य लोगों के घावों पर मरहम लगा सकते हैं और उनके आँसू पोंछ सकते हैं

दुखियों को सांत्वना दी जा सकती है। निराशों में आशा की ज्योति जगाई जा सकती है। गिरे हुओं को उठाया जा सकता है और पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया जा सकता है। स्वयं हम कोई महत्वपूर्ण कार्य आरम्भ न कर सकें। संस्थापक-संचालक का श्रेय न ले सकें तो हर्ज नहीं। संसार में इतनी सत्प्रवृत्तियाँ चल रही हैं कि उनमें योगदान देकर श्रेष्ठ सत्कार्यों को सोचने का अति महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।

संसार में हर मनुष्य स्नेह और सहानुभूति का प्यास है। मैत्री और सदाशयता की ऐसी निर्झरिणी की हर किसी को तलाश है, जिसमें स्नान करके वह अपनी व्यथा-वेदनाओं के भार को उतार सके और अतृप्ति का तृषा का समाधान कर सके। इस आवश्यकता को निस्वार्थ, उदार और स्नेह सिक्त व्यक्तित्व ही पूर्ण कर सकते हैं। यदि हम अपनी करुणा और कोमलता की भाव-भूमिका को विकसित कर सकें तो उससे अगणित व्यक्ति लाभान्वित हो सकते हैं। धन दान की तुलना में यह भाव-दान किसी भी प्रकार कम मूल्यवान नहीं है।

आलोचना करना सरल है-किसी को दुत्कारने-फटकारने में भी कोई कठिनाई नहीं। ऐसा तो कोई मुँहफट और दुर्भाग्य-ग्रसित व्यक्ति भी कर सकता है, पर किसी भटके मनुष्य की मनःस्थिति को समझना, उसकी जलन पर सांत्वना की स्नेह-बिन्दु टपकाना और किसी की दबी हुई श्रेष्ठता को पुनर्जीवित करना-हर कसी का काम नहीं। इसे सद्भाव सम्पन्न ही कर सकते हैं। सहानुभूति का जल ही सूखी मिट्टी को गीली करके इस स्थिति में पहुँचा सकता है कि उसे अभीष्ट खिलौने की आकृति दी जा सके। यह कार्य भर्त्सना और कटु आलोचना से सम्भव नहीं, भटकाव की भूल-भुलैयों से दूसरों को निकाल सकना-उसी के लिए सम्भव है, जिसने पतितों और पिछड़े हुओं की दयनीय दुर्दशा को घृणा से नहीं, करुणा से देखने-समझने का प्रयत्न किया है।

उच्च स्तरीय सद्भाव सम्पन्न अन्तःकरण का विकास कर सकना प्रचुर धन सम्पदा एकत्रित कर लेने की अपेक्षा कहीं अधिक सौभाग्य है। धन देकर किसी का जितना भला किया जा सकता है, उसकी तुलना में भावनात्मक प्रेरणाएँ देकर दूसरों को ऊँचा उठा सकना, आगे बढ़ा सकना और समुन्नत स्तर तक पहुँचा सकना-कहीं अधिक उपयोगी गिना जाएगा। धनी न होते हुए भी हर व्यक्ति को यह सुविधा प्राप्त है कि अपने समय, श्रम, चिंतन और सद्भाव का अनुदान देकर विश्वमानव की इतनी बड़ी सेवा कर सके, जो मात्र धनी व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकती।


स्वभाव बड़ा क्रोधी (kahani)

अरस्तू से उसके एक शिष्य ने कहा-मेरा स्वभाव बड़ा क्रोधी है, फलस्वरूप तरह-तरह के त्रास सहने पड़ते हैं।

अरस्तू ने उत्तर दिया-क्रोध कहाँ है, जरा मुझे दिखाओ तो?

शिष्य दिखाता कैसे? बोला-वह हर समय थोड़े ही रहता है-कभी-कभी आ धमकता है।

गम्भीर होकर अरस्तू ने कहा-तब क्रोध तुम्हारा स्वभाव नहीं हो सकता। वह कोई बाहरी चीज है, जो तुम्हें असावधान पाकर आ धमकती है।

चोर से जैसी सावधानी बरतते हो, वैसी ही क्रोध से भी बरते तो वह तुम्हारे घर में प्रवेश न कर सकेगा।


असन्तुलन का तूफानी निराकरण

सर्दी-गर्मी का सन्तुलन जब कभी बिगड़ता है तो उसे सुधारने-संभालने के लिए आँधी-तूफान उठते हैं। सीधी चाल से उल्टी स्थिति को सीधा नहीं किया जा सकता, इसलिए प्रकृति उसे सुधारने के लिए आँधी-तूफान खड़े करती है।

समाज की व्यवस्थितिः और भावना का सन्तुलन जब तक बना रहता है, तब तक जन-जीवन सामान्य रीति से चलता रहता है, पर जब विकृतियाँ स्थिति को गड़बड़ा देती हैं और अवांछनीयता असहनीय हो जाती हैं तो ऐसे आन्दोलन अभियान फूट पड़ते हैं, जिसे सामयिक-क्रान्ति कह सकते हैं।

समय-समय पर यही होता रहा है और यही होता रहेगा। भगवान का, देवदूतों का महामानवों का अंतरण इसीलिए होता है। युग-पुरुष विकृतियों को निरस्त करने के लिए जन्म लेते हैं और अपने साथ आँधी-तूफान लेकर आते हैं। धर्म की ग्लानि, अधर्म का अभ्युत्थान जब असह्य हो जाता है और साधुता का परित्राण, दुष्कृत्यों का विनाश करने के बिना और कोई रास्ता शेष नहीं रह जाता तो फिर युग-परिवर्तन जैसे तूफान अभियान खड़े होते हैं।

आँधी और तूफान जब आते हैं तो जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं और धन-जन की भारी क्षति करके रख देते हैं। वे किसी के रोके रुकते भी नहीं। साइक्लोन, टाइफाने, हरीकेन स्तर के आँधी-तूफानों को इतिहास ऐसी विडंबनाओं से भरा हुआ है, जिसे देखने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे मनुष्य के भयंकर तम शत्रुओं में गिन जाने योग्य हैं।

साइक्लोन वर्ग के अन्धड़ के साथ तेज वर्षा भी होती है। इसकी ध्वंसात्मक शक्ति अत्यन्त तीव्र रहती है। जब साइक्लोन की गति 75 मील प्रति घण्टा से ऊपर चली जाती है, तब उसे झंझावात या हरीकेन कहते हैं। इनकी औसत क्षमता दस हजार करोड़ अश्व-शक्ति जितनी मानी जाती है। जब गति ओर भी आगे बढ़कर 200 मील प्रति घण्टा हो जाती है तो उसे ‘बवंडर’ या ‘टोर्नाडो’ कहते हैं। इस स्थिति में समुद्र और बादल परस्पर मिले हुए दिखाई देते हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में इसी आधार पर बालुका-स्तम्भों की सृष्टि होती है।

वायु-विशेषज्ञ सरफ्राँसिस वोफार्ट ने वायु के विभिन्न स्वरूपों और स्तरों के अनुरूप उसे 12 भागों में विभाजित किया है। उनके अनुसार प्रथम वर्ग की शुद्ध हवा काम-एयर प्रति घण्टा एक मील की चाल से चलती है दूसरी हल्की हवा लाइट-एयर की गति एक से तीन मील की गति से चलती है। लाइट बीज की चाल चार से सात मील होती है। इसका स्पर्श त्वचा पर अनुभव होता है और पेड़ों के पत्ते हिलते हैं। जेन्टल ब्रीज की चाल तेरह से अठारह मील होती है, यह धूलि उड़ाने की क्षमता रखती है। फ्रेश-ब्रीज छोटे पेड़ों को हिला डालती है, पानी में हिलोरें उठती हैं, भंवर पड़ते हैं। यह 19 से 24 मील की चाल से चलती है। 75 मील की चाल से आगे वाले बवंडर या तूफान जो भी कर गुजरे वह कम है।

गर्मी और सर्दी का असन्तुलन हवा का घनत्व और चाप घटाता बढ़ाता है। जलीय-वाष्प हवा से हल्का होने के कारण वायु के सन्तुलन में गड़बड़ी उत्पन्न करता है। फलस्वरूप विभिन्न स्तर के आँधी-तूफान उठ खड़े हुए हैं।

जिस क्षेत्र में सन्तुलन बिगड़ेगा उसी में आँधी उठेगी। जहाँ जितना अवरोध खड़ा होगा, वहाँ उसी अनुपात से तूफान उठेगा। सामान्य सुधार क्रम जब कारगर नहीं होते। तब ढीठता और उच्छृंखलता का बढ़ता हुआ उपद्रव उसी स्तर के क्रान्ति-अभियानों से दबता है, इस तथ्य को आँधियाँ आये दिन हमें बताती-जताती रहती हैं।


आग्नेय-उद्वेग का समाधान वरुण संस्कृति से

पुराणों में अग्नि और वरुण का युग्म माना गया है। कहीं-कहीं अग्नि को स्त्री लिंग में सम्बोधित किया गया है और उसका सहचर वरुण को बताया गया है। अग्नि को उग्र और वरुण को शान्त कहा गया है। एक के असंतुलित होने पर दूसरे के द्वारा उसका संतुलन बना देने की चर्चा की गई और उन्हें परस्पर पूरक बताया गया है।

इस पौराणिक प्रतिपादन में बहुत कुछ तथ्य है। पर्वत श्रेणियों से लेकर सामान्य धरातल तक समस्त स्थल क्षेत्र की ऊँचाई समुद्र तल से ऊँची है। धरातल का जीवन जल पर निर्भर है। वृक्ष वनस्पतियों से लेकर, प्राणधारियों तक का निर्वाह प्रधानतया जल से ही होता है। उनके काय कलेवर में तीन-चौथाई जल की ही मात्रा होती है। यह जल ऊँचाई से नीचे की ओर प्रवाहित होता है, उसकी गति स्वभावतः समुद्रतल की ओर है। नदी तालाबों में होता हुआ धरती का जल समुद्र की ओर ही दौड़ता रहता है। यदि यह दौड़ यथावत चलती रही तो कुछ ही समय में धरती का समस्त जल समुद्र में पहुँच जाएगा और भूतल निर्जल शुष्क मरुस्थल मात्र दृष्टिगोचर होगा। न वनस्पति रहेंगी न प्राणियों का अस्तित्व बचेगा।

वरुण देव को इस विपन्न स्थिति से अग्नि उबारती है। सूर्य ताप से समुद्र जल भाप बनकर ऊपर उठता है और वर्षा करके धरती की सजलता स्थिर रखता है साथ ही सागर में संसार का समस्त जल इकट्ठा हो जान पर भूतल का इसमें डूब जाने का जो खतरा है, उससे बचाता है। जल और अग्नि के संयोग का विश्व का संतुलन स्थिर है। अग्नि की उष्णता को सहृदय समतुल्य बनाये रहने में हल का हाथ है। एक की विकृतियों को दूसरे के द्वारा समाधान करते रहने का क्रम यदि न चला होता तो सृष्टि का अब से बहुत पहले ही विनाश हो गया होता।

मानव स्वभाव में, समाज में शान्ति और क्रान्ति का, स्नेह और आक्रोश का दौर चला है। यज्ञ-कुण्ड के चारों ओर जल की नाला बनाने की पीछे इस संतुलन की आवश्यकता का ही संकेत है। न तो अत्यन्त नम्र होकर संसार में जिया जा सकता है और न क्रुद्ध या उग्र रहकर काम चल सकता है। श्रम और विश्राम का युग्म बनाये रहने के लिए ही दिन और रात का सृजन हुआ है। ध्वंस और निर्माण के क्रम में शिव और ब्रह्म निरन्तर लगे हैं। इसी संतुलन के कारण यह वैष्णवी सृष्टि शोभायमान हो रही है।

पिछले दिनों अग्नि ऊर्जा का अत्यधिक प्रयोग होता रहा है। युद्ध, संघर्ष और विनाश का परशुराम अपना फरसा तेजी से चलाता रहा ह अब वह शस्त्र फेंककर बन उगाने का प्रायश्चित करना होगा। द्वेष के स्थान पर स्नेह का प्रतिष्ठा करने से ही संतुलन बनेगा। विनाश और पतन बहुत हो चुका अब सृजन और उत्कर्ष के अभिनव प्रयोजन में लगने के बिना और कोई चारा नहीं।

भौतिक विज्ञान ने ऊर्जा का बहुत उपयोग किया है। कोयला, तेल, विद्युत, अणुशक्ति का ईंधन कल-कारखानों में प्रयुक्त होता है और घर आँगन में चूल्हे से लेकर बत्ती जलने तक के अनेक प्रयोजनों में आग का प्रयोग होता है। परिणाम स्वरूप सृष्टि संतुलन में गर्मी बढ़ रही है और मनुष्य स्वभावों में उसका परिणाम उत्तेजना के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। यदि यही क्रम चलता रहे तो जड़ चेतन के जल मरने का संकट निश्चित रूप से सामने आ खड़ा होगा।

दूरदर्शी वैज्ञानिक इस संदर्भ में बहुत चिन्तित है। बढ़ते हुए ताप के कारण समस्त विश्व को क्या दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे यह अब क्रमशः अधिक स्पष्ट होता जा रहा है। इतना ही नहीं ताप की बढ़ती हुई आवश्यकता को पूरा करने के लिए ईंधन की जिस तरह खपत हो रही है उसे देखते हुए धरातल पर संग्रहित ईंधन का भी कुछ समय में अन्त होना निश्चित है तब एक नया प्रश्न यह उत्पन्न होगा कि ईंधन आखिर कहाँ से आये? ईंधन के नये स्रोत कहाँ से मिले?

प्रस्तुत समस्या बड़ी है। उसका हल निकलने पर ही धरती की प्राणी रह सकते हैं। इस समाधान के लिए विज्ञान की आँखें समुद्र पर ही जमती है। अग्नि का असंतुलन वरुण के अतिरिक्त और कोई कर भी नहीं सकता। उच्चतर की विचारशीलता में यह चिन्तन-मंथन चल रहा है कि अब अग्नि का वर्चस्व समाप्त होने जा रहा है उसका स्थान वरुण देव ग्रहण करेंगे। मनुष्य को अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए धरती पर आश्रित न रह कर समुद्र का आश्रय ग्रहण करना होगा।

पिछले दिनों यांत्रिक आवश्यकता की पूर्ति के दो प्रधान स्रोत रहे हैं-एक कोयला दूसरा पैट्रोल। पर जिस गति से पिछले दिनों उनका खर्च हुआ है और वह क्रम दिन-दिन बढ़ता ही जाता है उसे देखते हुए निश्चित है कि यह भण्डार एक शताब्दी के भीतर ही पूर्णतया समाप्त हो चुकेंगे। लाखों करोड़ों वर्षों के क्रमिक विकास में पृथ्वी ने यह सम्पदा मधुमक्खी द्वारा संग्रहित शहद की तरह एकत्रित की थी। इसके निचुड़ जाने पर फिर उसे इकट्ठे होने के लिए लाखों करोड़ों वर्षों का इन्तजार करना होगा। शहद निचोड़ लेने पर छत्ता दुबारा भी भरता तो है पर समय लगता है। तेल और कोयले का भण्डार सौ वर्ष में हम चुका तो देंगे पर दुबारा फिर उसे पा सकेंगे इसकी प्रतीक्षा की नहीं जा सकती।

इन दोनों स्रोतों के समाप्त हो जाने पर अगली शताब्दी में ऊर्जा कहाँ से प्राप्त की जायगी? आज के वैज्ञानिक जगत का यह सबसे अधिक उलझा हुआ प्रश्न है। इन दिनों इस प्रश्न को हल करने के लिए परमाणु शक्ति की ओर निहारा जा रहा है। अणु विद्युत उत्पन्न करने के लिए प्रायः हर बड़े देश में प्रयत्न हो रहे हैं। अमेरिकन अणु पनडुब्बियों प्रशान्त महासागर से अटलांटिक महासागर तक की यात्रा कर चुकी हैं। उत्तरी ध्रुव के नीचे रह चुकी हैं। रूसी ‘लेनिन अणु चालित जलयान जाड़े में बर्फ से ढके समुद्रों को पिघला कर दूसरे जहाजों के लिए रास्ता बनाता है। अन्य बड़े देशों में भी इस शक्ति के रचनात्मक उपयोग की तैयारी कर रहे हैं। ध्वंसात्मक अणु आयुध ही तो सदा नहीं बनते रह सकते।

इन दिनों अणुशक्ति थोरयम, यूरेनियम, प्लेटोनियम जैसे भारी तत्वों के परमाणुओं के तोड़ने से उपलब्ध होती है। यह तरीका हानि रहित नहीं है। अणु राख के विसर्जन से लेकर ऊर्जा के अनियन्त्रित हो उठने तक के ऐसे अनेक खतरे मौजूद हैं जिनके कारण ऐसा विषाक्त मरण संकट उत्पन्न हो सकता है जिसकी चपेट में आने से उस सुन्दर धरती का उसके निवासियों का यहाँ तक कि समुद्र और वनस्पति तक का अन्त हो सकता है। इसलिए अणु ऊर्जा उत्पन्न करने का उत्साह फूँक-फूँक कर कदम रखने के साथ ही बड़े असमंजस के साथ आगे बढ़ रहा है। इस दिशा में हुई छोटी सी भूलें ऐसी हो सकती है जो अभी तो सामने न आये, पर अगली पीढ़ी के लिए प्राण घातक संकट बन कर सामने आयें।

परमाणु शक्ति के उत्पादन का एक दूसरा विकल्प है-हाइड्रोजन और लिथियम जैसे हलके तत्वों के परमाणुओं को संचालित करके ऊर्जा उपलब्ध करना। इसी आधार पर हमारा सूर्य और असंख्य तारक अपने में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। उसे उत्पन्न करना अब उतना कठिन नहीं रहा जितना उसे नियन्त्रित की कार्य-विधि अगली शताब्दी में अवश्य हस्तगत हो जायगी। जब ऐसा संभव हो जाएगा तब समुद्र जल से भी असीम मात्रा में ईंधन मिलने लगेगा और उलझन का समाधान मिल जाएगा। ‘संगलन ऊर्जा’ जब मनुष्य के काबू में आ जायगी तब तेल कोयले की कोई आवश्यकता न रहेगी। बड़े देशों की विद्युत खपत पाँच-छः संगलन ऊर्जा वाले बिजलीघर ही पूरी कर दिया करेंगे।

परमाणु ऊर्जा भले ही आज की विखण्डन पद्धति से प्राप्त हो अथवा भावी ‘संगलन’ प्रक्रिया से उसका मूल स्रोत सूर्य ही रहेगा। सूर्य एक विशाल अणु भट्टी है जिसमें प्रायः 5,00000000000000000000000 अश्व शक्ति के बराबर ऊर्जा भण्डार विद्यमान है। पर वह पृथ्वी तक आते-आते बहुत ही क्षीण हो जाती है। उसे समेटना हो तो बहुत बड़े क्षेत्र पर चादर ताननी पड़ेगी। बीस अश्व शक्ति बिजली पानी हो तो दो सौ वर्ग मीटर क्षेत्र को समेटना पड़ेगा। वह बहुत झंझट भरा काम है, इससे बड़ी मात्रा में बिजली नहीं मिल सकती है विज्ञानी आर्थररसल ने यह कल्पना की है। कि सूर्य की कक्षा में ऐसा उपग्रह स्थापित किया जा सकता है जो धरती पर अभीष्ट मात्रा में ऊर्जा भेजता रहे। पर यह कार्य भी उतना सीधा और सरल नहीं है। ब्रह्माण्ड किरणों के उपयोग की बात भी जब तब उठती है, बेशक वे अत्यधिक ऊर्जा युक्त हैं पर वे पृथ्वी के वातावरण में स्वल्प मात्रा में और इतनी दूर-दूर रहती हैं कि कुल मिलाकर उनसे कोई बड़ा काम नहीं लिया जा सकता। यदि वे अधिक मात्रा में रही होती तो उनने पहले ही धरती का सफाया करके रख दिया होता। ग्रेनाइट जैसी ज्वाला मुखी चट्टानों में पाये जाने वाले रासायनिक तत्व भी ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। वे भी इतनी मात्रा में नहीं है जिससे संसार की विशालतम आवश्यकता की पूर्ति हो सके।

पृथ्वी का न केवल कोयला और पेट्रोल अगली शताब्दी तक समाप्त हो जाएगा वरन् खनिज पदार्थों की खदानें भी छूँछ हो जायेंगी। धातुएँ तथा रासायनिक पदार्थों को जिस तेजी से खोज निकाला जा रहा है उस क्रम से यह भण्डार भी एक नहीं तो दो शताब्दियों के अन्दर चुक जाएगा। तब इन वस्तुओं के लिए हमें समुद्र का आश्रय लेना होगा। समुद्र के ढाई वर्ग किलोमीटर पानी में प्रायः 15 करोड़ टन ठोस पदार्थ होता है। इसमें एक करोड़ टन नमक, दो करोड़ टन मैग्नेशियम और एक करोड़ टन खनिज पदार्थ होते हैं। इनमें से आवश्यक धातुएँ निकाली जा सकेंगी पर उसके लिये बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी। यह प्रयोजन संगलन अणु शक्ति से ही सम्भव हो सकेगा।

इस प्रकार समुद्र न केवल अगले दिनों ईंधन की आवश्यकता पूरी करेगा वरन् उससे आहार की तथा खनिज पदार्थों की आवश्यकता भी पूरी हो सकेगी। समुद्री घास और काष्ठ का अगले दिनों अन्न शाक और फलों के स्थान पर प्रयोग होगा। मछली आदि जलचरों को तो आदमी बहुत समय से खाने का अभ्यस्त है ही, मीठे जज की बढ़ती हुई आवश्यकता भी विशाल परिमाण में समुद्र के अतिरिक्त और किसी स्रोत से नहीं हो सकती। धातुएँ खनिज पदार्थ तथा रसायन में समुद्र में कमी नहीं है। पृथ्वी की अपेक्षा अब समुद्र में ही इनका विपुल भण्डार पाया जा सकता है। वर्षा और नदियाँ हर साल धरती की बहुमूल्य सम्पदायें बहाकर समुद्र में पहुँचाती हैं इस प्रकार धरती गरीब होती जाती है और समुद्र अमीर बन रहा है।

समुद्र के एक वर्ग मील जल में प्रायः डेढ़ अरब मन नमक, सोना 80 मन, चाँदी ढाई हजार मन, मैग्नेशियम डेढ़ करोड़ मन तथा बहुमूल्य खनिज एवं रासायनिक पदार्थ प्रचुर परिमाण में मिले होते हैं। हर वर्ष नदियों का जल समुद्र में लगभग 150 अरब मन पृथ्वी के खनिज पदार्थ बहाकर समुद्र में पहुँचा देता है।

मनुष्य को अगले दिनों इन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ेगी तो उसे नये साहूकार समुद्र के आगे ही अपना पल्ला पसारना पड़ेगा। निवास के लिए समुद्र के बीच जहाँ तहाँ अभी भी निर्जल टापू पड़े हैं उन्हें बसाना पड़ेगा और समुद्र में दबी पर्वत श्रेणियों के ऊपर खम्भे खड़े करके नये नगर बसाने पड़ेंगे। तैरती हुई बस्तियाँ बनाने की बात पर भी गम्भीरता पूर्वक विचार किया जा रहा है। आशा के केन्द्र बिन्दु जहाँ टिके हैं उसे देखते हुए यह कहना अत्युक्ति न होगी कि अगला युग वरुण युग होगा। समुद्री सभ्यता का विस्तार नये रूप में सामने आयेगा।

भौतिक जगत की गुत्थियों को हल करने में अगले दिनों वरुण देव की महत्वपूर्ण भूमिका मानव स्वभाव में ही उग्रता असहिष्णुता और संघर्ष की आग्नेय प्रवृत्ति घटेगी। स्नेह सौजन्य की नीति अपनाये बिना और कोई चारा नहीं। ध्वंस की चल रही अस्त्र शस्त्रों की दौड़ को रचनात्मक प्रयोजनों में बदले बिना और कोई गति नहीं। आग्नेय समस्या के स्थान पर जब वरुण देव की शीतल संस्कृति की स्थापना होगी तो विनाश की गति-विधियों को भी सृजन में परिवर्तन होने के लिए सहमत होना पड़ेगा।


प्रकृति-प्रवाह के साथ तालमेल बिठाना भी साधना का एक उद्देश्य

हम अपने आप में न तो परिपूर्ण हैं और न स्वावलम्बी। समीपवर्ती और दूरवर्ती परिस्थितियाँ हमें असाधारण रूप से प्रभावित करती हैं इस लिए सीमित सोचने और संकीर्ण परिधि से आगे बढ़ने की आवश्यकता होती है। अन्यथा न तो हम प्रतिकूल प्रभावों के दुष्परिणामों से बच सकेंगे और न अनुकूलताओं से लाभ उठा सकेंगे।

मौसम की परिस्थितियों का शरीर और मन दोनों पर प्रभाव पड़ता है। सुहावने मौसम में शरीर चुस्त रहता है और मन प्रसन्न। तब काम भी अधिक मात्रा में होता है और अपेक्षाकृत अच्छा भी। इसके विपरीत जब असह्य और प्रतिकूल मौसम होता है तो न केवल कई तरह की बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं वरन् मन भी उदास रहता है और काम का परिमाण और स्तर दोनों ही गिर जाते हैं। अपराध अन्वेषकों का कथन है कि सुहावने मौसम में अपराधों की संख्या काफी कम होती जाती है और जैसे ही उत्तेजना उत्पन्न होती करने वाला अधिक ठंडा गरम मौसम आता है वैसे ही अपराधों और दुर्घटनाओं की संख्या में तेजी से बढ़ने लगती है। दिल के दौरे पड़ने की न्यूनाधिकता का सम्बन्ध भी असह्य और सह्य मौसम के साथ बहुत कुछ जुड़ा रहता है।

स्विट्जरलैंड, दक्षिण जर्मनी विशेषतया आल्पसीय क्षेत्र में डाक्टर लोग उन दिनों महत्वपूर्ण आपरेशन नहीं करते जिन दिनों गर्म और सूखी हवाएँ तेजी से चलती हैं। हैम्बर्ग के डाक्टरों का भी यही निष्कर्ष है कि अकुलाने वाले मौसम के आपरेशन बहुत करके असफल हो जाते हैं। कारण यह है कि उन दिनों शरीर की प्रकृति मौसम की प्रतिकूलता को सफल बनाने में जितना उसका योगदान होना चाहिए उतना वह नहीं दे पाती। फलस्वरूप चिकित्सकों का कार्य अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है।

बीमारियों की सहज स्वाभाविक घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी को मौसम की उग्रता के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले बहुत से शोध निष्कर्ष विज्ञान वेत्ताओं ने निकाले हैं क्लोरिडा यूनिक सिटी के डाक्टर डब्ल्यू. बी वेव और नैवल स्कूल आफ ऐविएशन के प्रो. एच. एडिस ने इस सम्बन्ध में जो खोज बीन की है उसका विस्तृत विवरण अमेरिका की ‘साइन्स’ पत्रिका के 143 वें अंक में विस्तार पूर्वक छपा है। इसमें यह दर्शाया गया है कि ताप-मान घटने बढ़ने से वायु के विद्युत आवृष्टि कणों का ऋणायन और घनायन वर्ग के आवेशों में चढ़ाव उतार होता है। मानव शरीर के लिए ऋणायन वाले कण उपयोगी पड़ते हैं और घनायन हानिकारक सिद्ध होते हैं। बिजली की कड़क अथवा ताप मन के चढ़ाव उतार का जो प्रभाव उत्पन्न होता है, उससे वायुमण्डल में प्रत्यावर्ती विद्युत क्षेत्र-आल्टर नेर्हिग इलेक्ट्रिक फील्ड बन जाते हैं। रेडियो तरंगों की तरह इस विद्युत क्षेत्र का भी तेजी से विस्तार होता है और वे पहले दुर्बल शरीर वालों पर और पीछे सबल शरीर वालों पर अपना भला बुरा प्रभाव छोड़ कर बीमारियों को घटाने बढ़ाने की भूमिका विनिर्मित करते हैं।

पक्षी इन परिवर्तनों के प्रभाव को अच्छी तरह समझते हैं इसलिए वे अण्डे देने, घोंसले बनाने आदि का कार्य ऐसे मौसम में करते हैं जिसमें उन्हें कम से कम प्रकृति गत अवरोध सहना पड़े। उनके शरीर दुर्बल होते हैं और मौसम का अवरोध सबल। इस लड़ाई में अपनी हार देख कर वे संकट से पूर्व ही भाग खड़े होते हैं और लम्बी उड़ाने भरके ऐसे स्थानों पर चले जाते हैं जहाँ ऋतु परिवर्तन के कारण उत्पन्न असह्य स्थिति का सामना उन्हें न करना पड़े। एक स्थान से दूसरे स्थान को पक्षी-परिवारजन प्रायः इसी कारण होता रहता है।

विश्व चेतना के साथ अपना ताल मेल बिठाने की प्रक्रिया का नाम ही अध्यात्म साधना है। इस आधार पर हम अपनी अन्तः चेतना को इस योग्य विकसित परिष्कृत करते हैं कि ब्रह्माण्ड -व्यापी सूक्ष्म धारा प्रवाहों की अनुकूलता प्रतिकूलता के साथ हम उपयोगी सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर सकें।


आत्मबोध और आत्मदेव की उपासना

अपने को जान लेना सबसे बड़ा ज्ञान है। साधारणतया लोग अपना अस्तित्व शरीर और मन से बने काय कलेवर तक ही सीमित मानते हैं। वासना और तृष्णा की ही आकांक्षाएँ चित्त में उठती रहती है पेट और प्रजनन के लिए ही उसके क्रियाकलाप होते हैं। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति से आगे का कोई पुरुषार्थ उससे बन ही नहीं पड़ता। इसका कारण अपने दिव्य अस्तित्व को, मानव-जीवन की गरिमा को-सामने प्रस्तुत तथ्य को-न समझना ही होता है। इसी अज्ञान में भटकते हुए यह जन्म बीत जाता है और अन्ततः पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

आत्म-बोध को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है। जिसने अपने को जान लिया और जिसने लक्ष्य की पूर्ति की आवश्यकता को समझ लिया, वह महामानव बनता है। देव-संज्ञा में सम्मिलित होकर अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का कल्याण करता है।

अपने में ब्रह्मसत्ता ओतप्रोत है। उसे जागृत करना अपने में देवत्व तथा ईश्वरत्व का उदय करना है। आत्म चेतना की शक्ति इतनी प्रचण्ड है कि वह जिधर मुड़ती झुकती है, उधर ही प्रगति होती जाती है और वैसी ही परिस्थितियाँ बनती जाती हैं। वाह्य-जगत में जो कुछ भला बुरा सामने है, उसका मूल उत्तरदायित्व अपनी मनःस्थिति पर ही होता है। हम सुधरे तो बाहरी परिस्थितियों को सुधरते देर न लगे। इस सत्य और तथ्य को जानने के उपरान्त ही आत्म-शोधन और आत्म-निमार्ण की आवश्यकता अनुभव होती है। इस मार्ग पर चलते हुए ही जीवन-लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव होता है। इस सन्दर्भ में शास्त्रों को प्रतिपादन इस प्रकार है-

नानोपनिषदभ्यासः स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः। ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः॥

आत्मज्ञान के स्वाध्याय को यज्ञ कहा गया है। ज्ञान यज्ञ समस्त यज्ञों में सर्वोत्तम है।

आत्मवलोकने यत्नः कर्तव्यों भूतिमिच्छता। सर्वदुःखशिरश्च्छेद आत्मालोकेन जायेत -योगवाशिष्ठ

जो अपना कल्याण चाहता हो उसे आत्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। दुःखों का नाश इसी से होता है।

एकः शत्रुर्नद्वितीययोउस्ति-शत्रुरक्तान तुल्यः पुरुषस्य राजन्। येन्नावृतः कुरुते संप्रयुक्तो-घोराणि कर्माणि सुदारुणानि-महाभारत

इस संसार में मनुष्य का एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा कोई नहीं। यह शत्रु आन्तरिक-अज्ञान है। इसी से ग्रसित होकर मनुष्य दारुण कर्म को करने लगता है।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धरात्मैव रिपुरात्मनः। आत्मात्मना न चे़तस्तदुपयोयेउस्ति नेतरः।

अभ्यासवैराग्ययुतादाक्रन्तेन्द्रियपन्नगात्। नात्मनः प्राप्यते यत्तत्प्राप्तयेते न जगत्त्रयात्।

आराधयात्मनात्मानमात्मनात्मानमर्चयेमत्ः आत्मनात्मानमालोक्यं संतिष्ठस्वात्मनात्मनि ॥

सर्वेषामुक्तमस्थानाँ सर्वासाँ चिरसंपदाम्। स्वमनोनिग्रहो भूमिर्भूमिः सस्यश्रियामिव-योगवाशिष्ठ

आत्मा ही अपना बन्धु और अपना शत्रु-स्वयं है। यदि अपना उद्धार आप नहीं किया जा सकता तो दूसरा कोई और उपाय नहीं। अभ्यास, ज्ञान, वैराग्य और संयम से ही आत्मा की प्राप्ति होती है। वाह्य कर्मकाण्डों से नहीं। इसलिए आत्मा की ही पूजा करो, उसी की आराधना में लगो। उसी का दर्शन करके उसी में अवस्थित हो जाओ। जैसे भूमि से सब अन्न उत्पन्न होते हैं, उसी तरह परिष्कृत मनोभूमि से सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

खेदोल्लासविलासेषु स्वात्मकतृतयैकया। स्वसंकल्प क्षयं याते सगतैवावशिष्यते-महोपनिषद्

खिन्नता और उल्लास की स्थिति उत्पन्न करना मनुष्य के अपने हित की बात है। यह तथ्य समझ लेने पर मन में शान्ति और समता ही शेष रह जाती है।

उत्थितानुत्थितानेतानिन्द्रयारीन् पुनः पुनः। हन्याद्विवेकदण्डेन वज्रेणेव हरिंर्गिरीन्-महोपनिषद 6।21

मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं। जिस प्रकार छोटा सा इन्द्र वज्र बड़े-बड़े पर्वतों को गिरा देता है, वैसे ही विवेक के प्रहार से इन शत्रुओं को निरस्त करना चाहिए।

कुम्भकारों घटमिव चेतो हन्ति करोति च। सर्व संकलपरुपेण चिच्चमत्कुरुते चिति-योगवाशिष्ठ

जैसे कुम्हार मिट्टी को तोड़ता और बर्तन बनाता रहता है। वैसे ही मन अपनी सृजन-शक्ति से अपनी अभीष्ट दुनिया रचता रहता है। जैसे स्वप्नों की रचना मन स्वयं ही करता है, वैसे ही अपनी दुनिया भी आप ही बनाता है।

फलं ददाति कालेन तस्य तस्य तथा तथा। तपो वा देवता वापि भूत्वा स्वैव चिदन्यथा। फलं ददात्यथ स्वैरं नभःफलतिपातवत्-योगवाशिष्ठ

जीव अपनी इच्छा से ही देवता, तपस्वी बनता रहता है। प्रगति और अवनति का आधार मनुष्य का अपना कर्तव्य ही है।

चित्तमेव हिं संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत्। यच्चित्त्स्तन्मयों भाति गुह्यमेतत्सनातनम्-मैत्रेयुपनिषद 1।9

जैसा अपना मन है, वैसा ही अपना संसार है। इसलिए संसार को सुधारने की अपेक्षा अपने मन को सुधारना चाहिए। यह सनातन रहस्य है।

समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे। यद्येवं ब्रह्यणि स्यात्तत्को न मुच्येत बंधनात्।11। -मैत्रेयुपनिषद 1।11

मनुष्य का चित्त जितना बाहरी विषयों में संलग्न रहता है। उतना ही यदि ब्रह्म में रहने लगे तो सहज ही सब बन्धनों से छूट जाय।

मनो हि जगताँ कतृ मनो हि पुरुषः स्मृतः। स्वरुपं सर्वकृत्वं च शक्तत्वं च महात्मनः ॥1॥

प्रतिभासमुपायाति यद्यदस्य हि चेतसः। तत्तत्प्रकटतामेति स्थैर्य सफलतामति ॥3॥ -योगवाशिष्ठ

मन ही आत्मा का दृश्य रूप है। वह जैसी चाहता है, वैसी अपनी दुनिया गढ़ लेता है। उसमें असीम शक्तियाँ सन्निहित हैं। चित्त में जैसी कल्पनाएँ उदय होती हैं, संसार में परिस्थितियाँ भी वैसी ही बनने लगती हैं।

चित्तं प्रवर्तते चित्तं चितमेव विमुच्यते। चित्तं हि जायते नान्यच्चित्तमेव निरुध्यते॥

चित्त से ही प्रवृत्ति होती है, चित्त से ही निवृत्ति। चित्त से ही सब कुछ उत्पन्न होता है। चित्त से ही अवरोध होता है।

सर्वः स्वससंकल्पवशाल्लधुभवति वा गुरुः।

सब कोई अपने संकल्पों के कारण ही छोटा अथवा बड़ा बन जाता है।

भजन्ते विश्वे देवत्वं नाम ऋत सपन्तो अमृत मेवैः-ऋग्वेद

अपने आचार-व्यवहार को श्रेष्ठ रखकर सभी कोई देवत्व को प्राप्त कर सकते हैं।

एनं मनोमणिं ब्रह्यद् बहुपंककलंकितम्। विवेकवारिणा सिद्ध् यै प्रक्षाल्यालोकवान भव-महोपनिषद् 5।83

मन रूपी मणि को विवेक-जल से स्वच्छ कर डालों। इसी से तुम्हें तेजस्वी सिद्धियाँ मिलेंगी।

मनुष्य हाड़-माँस का पुतला नहीं है, उसके कण-कण में दिव्य तत्वों का समावेश है। ईश्वर की सत्ता उसमें समाई हुई है। ऋषियों और देवताओं का इसी काया में समावेश है। यदि उन्हें जान और समझ लिया जाय और अज्ञान का आवरण चीरकर आत्मज्ञान की -आत्मकल्याण की साधना की जाय तो अपने भीतर ही वह सब कुछ मिल सकता है, जिसकी हमें खोज है।

इस संदर्भ में आस वचन इस प्रकार मिलते हैं-

सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे, सप्त रक्षन्ति सर्वे अप्रमादम्-यजु 34।55

शरीर में सात ऋषि निवास करते हैं, वे प्रमाद रहित होकर सावधानी के साथ उसकी रक्षा करते हैं।

इमामेव गौतम भारद्वाजौ अयमेव गौतमोउयं भारद्वाजः। इमावेव विश्वामित्र जमदग्नि अयमेव विश्वामित्रोउयं जमदग्नि इमामेव वशिष्ठ कश्यपौ अयमेव वशिष्ठो, अयं कश्यपो, वागेव अत्रि। वाचा ह्यन्नमद्येतउत्रि द्ववै नामेतद्यदत्रिरिति सर्वसय अत्ता भवति-वृहदारण्यक 30-2।2।4

दांया कान गौतम है, बांया कान भारद्वाज। सीधी आँख विश्वामित्र, बाईं आँख जमदग्नि। दाईं नाक वशिष्ठ, बाईं नाक कश्यप। वाणी अत्रि। जो खाता है, सो अत्रि है। अति ही अत्रि है।

ता एता देवताः अस्मिन महत्यण्रवे प्रापतंस्तमशनायापिपसाभयामन्बवार्जत् ता एनमब्रुवन्नयतनै नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठता अन्नमदामेति ॥1॥

ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोउयमलमिति ताभ्योउश्वमानयत्त अब्रुबन् सुकृतं बतेति। सुरुषों बाव सकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति॥3॥

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षूर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वाँ कर्णा प्राविशन्नोषधिवनस्पतयों लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चंद्रमा मनो भूत्वा ह्नदयं प्राविशन्मृत्युरपाना भूत्वा नाभि प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ 4॥ -एतरेय-2।1 से 4

परमात्मा ने देवताओं को इस संसार में भेजा। उनमें भूख, प्यास और अनुभूति उत्पन्न की। देवताओं ने परमात्मा से कहा-हमारे लिए शरीर-निमार्ण करो। जिसमें रहकर हम अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करें। परमात्मा ने उन्हें गौ, अश्व आदि के शरीर दिखाये, जिसे उन्होंने अनुपयुक्त बताया। तब परमात्मा ने उन्हें मनुष्य देह दिखाया। देवताओं ने कहा-हाँ यही बहुत ठीक और सुन्दर है। तब परमात्मा ने कहा अपने-अपने मुख में, वायु प्राण बनकर नासिका में, सूर्य नेत्रों में दिशाएँ कानों में, औषधि त्वचा में, चन्द्रमा मन बनकर हृदय में यम अपान बनकर नाभि में और वरुण रेतस बनकर जननेन्द्रिय में प्रविष्ट हुआ।

पुरुषो वाद गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्नार्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विस्फलिंगा॥1॥

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्नति तस्या आहुते रेतः सम्भवति॥2॥ -छान्दोग्य 5।7।12

यह पुरुष की अग्नि है। वाणी समिधा है। प्राण धुँआ है। जिह्वा ज्वाला है। नेत्र अंगार हैं। कान चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवगण हवन करते हैं और उससे पराक्रम उत्पन्न होता है।

आत्म-चिन्तन को ज्ञान-तप कहा गया है और आत्म-निमार्ण को आध्यात्मिक अग्निहोत्र। बाह्य जगत में स्वाध्याय, सत्संग को ज्ञान का आधार माना गया है। किन्तु अंतर्जगत में आत्म-चिन्तन को ज्ञान देव की-आत्मदेव की आराधना माना है। अपनी अन्तःस्थिति में उत्कृष्ट-तत्वों की स्थापना करके हम आत्मदेव की आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-

अव्युत्पन्नधियो ये हि बालपेलवचेतसः। कृत्रिमार्चामयं तेषाँ देवार्चनमुदाह्नतम्॥

संवेदनात्मकतया गतया सर्वगोचरम। न तस्याह्नानमन्त्रादि किंचिदेवोपयुज्यते॥ न दीपेन न धूपेन न पुष्पविभवार्पणैः॥

न च कुँकुमकर्पूरभोगैश्चित्रैर्न चेतरैः। श्मबोधादिभिः पुष्पैर्देव आत्मा यदर्च्यते। तत्तु देवार्चनं विद्धि नाकारार्चनमर्चनम्-योगवाशिष्ठ

जिनकी बुद्धि चैतन्य नहीं हुई है, चित्त चंचल है, उनके लिए बाहरी देवदर्शन कृत्रिम रूप से बनाया गया है।

जो परमदेव सब जगह मौजूद है और ज्ञानरूप में सब प्राणियों के भीतर विद्यमान है, उसके लिए मन्त्रानुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है।

आत्मदेव की पूजा के लिए दीपक, धूप, पुष्प, नैवेद्य, चन्दन, दक्षिणा, केशर, कपूर आदि की आवश्यकता नहीं होती।

शम और बोध की पुष्पाञ्जलि से आत्मदेव की आराधना ही सच्ची पूजा है। वाह्य आकृतियों का पूजन अवास्तविक है।

तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम्। सर्वकर्म निराकारण-मावाहनम् निश्चलज्ञानमासनम्। समुन्मनं भावः पाद्यम्। सदामनस्कमर्ध्यम्। सदादीपितराचमनीयम्। वराकृतप्राप्तिः स्नानम्। सर्वात्मकत्वं दृश्यविलयो गन्धः। दृगविशिष्टात्मानः अक्षतः। चिदादीप्तिः पुष्पम। सूर्यात्मकत्वं दीपः। परिपूर्णचन्द्रामृतरसैकीकरणं नैवेद्यम्। निश्चलत्वं प्रदक्षिणम्। सोउहंभावो नमस्कार। परमेश्वरस्तुतिर्मौनम्। साउहंभावो नमस्कारः। सदासन्तोषी विसर्जनम्। एव परिपूर्णराजयोगिनः सर्वात्मकपूजोपचारः स्यात्। सर्वात्मकत्वं आत्माधारो भवति। सर्वनिरामयपरिपूर्णोउहमस्मीतिमुमृक्षणाँ मोक्षैकसिद्धिर्भवति॥ इत्युपनिषत्॥ -आत्म पूजोपनिषद्

आत्मा का ध्यान-उसका निरन्तर चिन्तन ही है। स्थिर ज्ञान ही उसका आसन है। उन्मन पाद्य है। तन्मयता अर्घ्य है। निष्ठा आचमन है। समर्पण स्नान है। लय गन्ध है। अन्तर्दृष्टि अक्षत है। विश्वास पुष्प है। अन्तः प्रकाश दीपक है। शान्ति नैवेद्य है। श्रद्धा प्रदक्षिणा है। ‘सोऽहं भाव’ नमस्कार है। मौन ही स्तुति है। संतोष विसर्जन है। यह आत्म-पूजा ही सर्वात्मा की सच्ची पूजा है। मैं परिपूर्ण निरामय ब्रह्म हूँ, यह मान्यता ही मोक्ष तक पहुँचती है। यही उपनिषद् है।

अस्य शरीरज्ञस्य यूपरशनाउशोभितस्यात्मा यजमान बुद्धिः पत्नी वेदा महऋत्विजः हंकारोउध्वर्युः चित्तं होता प्राणो ब्रह्यणाच्छंसी अपानः मैत्रा-वरुणः शरीर वेदिः नासिकाउन्तर्वेदिः मूर्धा द्रोणकलशः पादो रथः दिक्षणहस्तः स्रुवः सव्य आज्यस्थाली श्रोत्रे आधारौ चक्षुषह आज्यभागौ ग्रीवा धारा पोता तन्मात्राणि सदस्या महाभूतानि वाचः तालः शंयोर्वाकः स्मृतिदया क्षान्तिरहिंसा पत्नीसंयाजाः ओंकारो यूपः आशा रशना मनोरथः कामः पशुः केशा दर्भाः इन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि कर्मेनिद्रयाणि हवीशि अहिंसा इष्टयः त्यागो दक्षिणा अवभृथं मरणात् सर्वाण्यस्मिन् देवता शरीरेउधिसमाहिताः ॥22॥ -प्राणाग्नि होत्रोपनिषद् 22

इस जीवन यज्ञ का आत्मा-यजमान बुद्धि-यजमान-पत्री वेद-ऋत्विक् अहं-अध्वर्यु चित्त-होता प्राण-ब्राह्मणच्छमी अपान-प्रति प्रस्थान, व्यान-प्रस्तोता उदान-वेदी शिर-द्रोण-कलश पैर-रथ दाहिना हाथ-स्रुवा बाँया हाथ-घृत-पात्र कान-आधार नेत्र-आज्य भाग, गर्दन-धारा तन्मात्राएँ-सदस्य पंचभूत-प्रयाजा जीभ-इडा दाँत होठ-सबूत वाक्-तालु शयोर्वाक, स्मृति-दया ऊंकार-यूप आशा-रसना काम-पशु काल-कुशाएं ज्ञानेन्द्रियाँ-यज्ञ-पात्र कर्मेन्द्रियाँ-हवि अहिंसा-इष्टियाँ मृत्यु-अवधूत स्थान है। यह यज्ञ पूर्ण फलदायक है, इसमें सभी देवता समाहित हैं।

आत्म बोध की ज्ञान साधना और आत्म-कल्याण की कम-साधना से निरत रहकर जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकने में निश्चय पूर्वक सफल हो सकते हैं।


उपवास स्वास्थ्य रक्षा का महत्वपूर्ण आधार

भारत में उपवासों को धार्मिक मान्यता दी गई है। ‘तपोनानशनात् परम्’ के शास्त्र-वचन में उपवास को परम तप बताया गया है।

मातवे सर्व बालाना मौषधं रोगिणमिव। रक्षार्थ सर्व लोकानाँ निर्मितकादशी तिथिः। -स्कन्दपुराण

पक्ष उपवास की दृष्टि से एकादशी व्रत का भारी महात्म्य बताया गया है।

एकादशी की व्रताभ्यास बालकों का माता के समान पोषण करती है। रोगियों के लिए औषधि उपचार का काम देती है। समस्त संसार की रक्षा करती है।

इन धार्मिक प्रतिपादनों के पीछे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण अभिवर्धन के रहस्य छिपे पड़े हैं। उपवास शरीर की एक वैसी ही आवश्यकता है, जैसी श्रम के साथ विश्राम की। दिन के साथ रात की। अधिक और उपयुक्त श्रम करने की क्षमता बनाये रहने के लिए विश्राम की आवश्यकता न केवल प्राणियों को, वरन् मशीनों को भी पड़ती है। किसी मशीन को निरन्तर चलाया जाय तो वह जल्दी ही नष्ट हो जायगी। इसके विपरीत यदि बीच-बीच में उसे विश्राम देते रहा जाय तो कहीं अधिक समय तक काम करत रहेगी। साप्ताहिक अवकाश का नियम इसीलिए बनाया गया है कि एक दिन छुट्टी मनाने के बाद अधिक उत्साह पूर्वक काम कर सकना सम्भव हो सके। रात को यदि सोया न जाय तो थकान घेर लेगी और अनवरत श्रम करने पर जो लाभ सोचा गया था, वह न मिल सकेगा। ठीक यही बात पेट पर लागू होती है। उससे निरन्तर काम लिया जाय, कभी अवकाश न दिया जाय तो पाचन-यन्त्र नष्ट होने लगेंगे और रोज खाने से रोज ताकत मिलने की मूर्खतापूर्ण लालसा कभी पूरी न हो सकेगी। उपवास करने वालों की तुलना में नित्य खाते रहने वाले नफे में नहीं, नुकसान में रहते हैं।

जर्मनी और उत्तरी आस्ट्रिया के लोग अभी भी एक खाने से दूसरे खाने में आठ घण्टे से कम अन्तर नहीं रखते। दो बार से अधिक खाना वहाँ असभ्यता का चिन्ह माना जाता है।

अमेरिका के शरीर-शास्त्री डा. ऊप्टन सिंक्तेयर ने कहा है कि यदि लोग जीभ पर नियन्त्रण रखें, भूख से कम खायें, पचने के लिए उचित अवसर पेट को प्रदान करें तो संसार में आधी बीमारियाँ अपने आप दूर हो सकती हैं।

एक और विशेषज्ञ डा. प्युरिंगटन का कथन है कि पन्द्रह दिन में एक उपवास और भूख से कम खाने का सिद्धान्त यदि स्वीकार कर लिया जाय तो संसार पर छाया हुआ स्वास्थ्य संकट सहज ही हल हो सकता है।

यूनानी सभ्यता जिन दिनों उन्नति के उच्च शिखर पर थी, उन दिनों यह नियम प्रचलित हो गया था कि काम-धाम से निवृत्त होकर दिन में एक बार ही भोजन किया जाय। प्रातःकाल हलके से दो-चार बिस्किट खाना पर्याप्त था। इसके बाद लोग शाम को पाँच बजे कड़ाके की भूख लगने पर ही एक बार भोजन करते थे। उस काल में इटली के निवासी शारीरिक दृष्टि से बहुत ही अधिक समुन्नत स्थिति में पहुँचे थे।

रूस के जीव-विज्ञानी ब्ल्डादि मौर निकितन के स्वास्थ्य-संवर्धन सम्बन्धी शोध कार्य का निष्कर्ष यह है कि आदमी अधिक खाकर बेमौत मरता है। पचने की क्षमता से अधिक खाने की कुटेव अधिकाँश लोगों का पेट खराब कर देती है और वे अनेक बीमारियों के शिकार बनकर मौत के मुँह में घुसते चले जाते हैं। प्रो. निकितिन की सलाह यह है कि जिन्हें अधिक दिन जीना हो, उन्हें चाहिए कि भूख से कम खायें। दिन में दो बार से अधिक न खायें और सप्ताह में एक बार उपवास करें।

रोम का का सम्राट वैखासियन महीने में दो दिन उपवास करते थे और कम खाते थे। वे कहते थे कि -निरोग रहने का यह अच्छा तरीका है।


शीतल आवरण से ही समस्वरता सम्भव है।

भीतरी आग को बाहर फूट पड़ने से बचाने की प्रक्रिया ही इस संसार को सामान्य क्रम से चलने देने का आधार बनी हुई है। यदि भीतरी आग को स्वच्छन्द फूटने का अवसर मिलता रहे तो यहाँ न व्यवस्था रहेगी और न सुरक्षा। धरती के भीतर आग भरी पड़ी है। इसके ऊपर भूतल का ठण्डा और मोटा कवच चढ़ा है। यह कवच जब भी, जहाँ भी-ढीला पड़ता है, वहीं विनाशकारी भूचाल सामने आ उपस्थित होते हैं।

पृथ्वी की ऊपरी परत एक प्रकार से नारंगी के छिलके की तरह है, जिसके भीतर भूगर्भ की भयंकर ऊष्मा और उथल-पुथल पर नियन्त्रण रहता है। बहुत गहराई पर पृथ्वी का भीतरी भाग अभी भी पिघले हुए लाल लोहे की तरह है और क्रमशः ठण्डा होने की प्रक्रिया के अंतर्गत भीतर ही भीतर भारी हलचलें चलती रहती हैं। वह उथल-पुथल भीतर ही सीमित रहे। इसकी सुरक्षा पृथ्वी की ऊपरी परत पर अवस्थित वह कवच ही करता है, जो प्रायः तीन मील से लेकर 100 मील तक मोटा है। यदि यह छिलका न होता तो भीतरी हलचलें ऊपरी परत तक उभरती रहीं और भूमि पर सर्वत्र अस्थिरता रहने से कहीं कुछ भी सुरक्षित न होता।

इस कवच-परत में कहीं-कहीं कुछ छिरछिरापन है। इसलिए समय-समय पर उसमें से भीतरी हलचलें फूट पड़ती हैं और धरती पर भूचाल एवं भूकम्प होते रहते हैं। कभी-कभी तो बहुत ही विकट होते हैं। अलास्का का भूकम्प इतना विकट था कि जापान पर डाले गये अणुबम की तुलना में उसे एक करोड़ गुना शक्तिशाली कहा जा सके। उसने 7 लाख वर्ग मील भूमि को प्रभावित किया था।

भूतल के अन्तराल में होते रहने वाले परिवर्तन उसकी बाहरी सतह को प्रभावित करते हैं। हिमालय लगातार ऊँचा उठ रहा है। नीलगिरी तो प्रायः 300 मीटर ऊपर उठ चुका है। रामेश्वर का तटवर्ती जंगल समुद्र में धँस गया, बम्बई के निकट भी कुछ भूभाग जल-समाधि ले चुका है। भौगोलिक दृष्टि से भारत का दक्षिणी पठार किन्हीं भूचालों की ही देन है। भीतर की आग जब बाहर फूटती है तो समस्वरता को तोड़-मरोड़ कर रख देती है। पर्वत उठें या खड्डे पड़ें दोनों ही स्थिति में उपयोगी समतल भू-परत की उपयोगिता से तो हाथ धोना ही पड़ता है।

धरती की तरह ही मनुष्य के भीतर भी कई प्रकार की आग छिपी पड़ी है, उनमें से उपभोग और संचय की लालसा प्रमुख है। उद्धत स्वेच्छाचार की अहंकारिता भी लगभग वैसी ही है, वह मर्यादाओं को तोड़कर मनमानी करने पर उतारू रहती है। यह भी एक प्रकार की आग है। क्रोध और दर्प को भी इसी पंक्ति में बिठाया जा सकता है। वासना और तृष्णा की चिन्ता और उद्विग्नता की आग की भयंकरता से कौन परिचित न होगा? यदि इन्हें ही दबा न रहने दिया जाय-उभरने के लिए स्वच्छन्द छोड़ दिया जाय तो जीवन की समस्वरता स्थिर रह नहीं सकेगी। समाज का संतुलन टिक ही न सकेगा।

शील, मर्यादा, नीति, संयम और आस्तिकता की दूरदर्शिता पूर्ण परतें ही जीवन क्रम में सज्जनता और शालीनता स्थिर रखती हैं। न्याय, धर्म और विवेक के बन्धनों में बँधा हुआ समाज ही शान्ति पूर्वक रहता और प्रगति के पथ पर बढ़ता है। अपराधी उच्छृंखलता और संकीर्ण स्वार्थपरता की दुष्टता की आग को ऊपर तक न आने देना ही बुद्धिमत्ता है। नीलकंठ शिव की तरह इस विषाक्तता को कण्ठ में रोके रहने में ही भलाई है। अन्यथा भूचाल जैसे दुष्परिणाम हमारे लिए घातक संकट उत्पन्न करेंगे।


Quotation

यदि अभिलाषा करनी है तो निर्मल भजन की कीजिये, समीप रहना तो मालिक के चरणों के समीप रहिये, तथा दूर रहना चाहते हैं तो दुर्जनों और पापियों तथा बुरे संग से दूर रहिये। -श्री राम शर्मा आचार्य


अपनों से अपनी बात

समाज-निर्माण अपने कर्तव्य का तीसरा चरण

व्यक्ति सुखी रहे, इसके लिए समुन्नत समाज की आवश्यकता है। समुन्नत समाज भी अपने आप नहीं बन जाता, उसे उत्कृष्ट नेतृत्व में अग्रगामी सज्जनों का समूह विनिर्मित करता है। जब श्रेष्ठ व्यक्ति घट जाते हैं और सामाजिक वातावरण में उत्कृष्टता बनाये रखने के रचनात्मक प्रयास शिथिल हो जाते हैं तो समाज का स्तर गिर जाता है। समाज गिरेंगे तो उस काल के व्यक्ति भी निकृष्ट, अधःपतित और दीन-दुर्बल बनते चले जाएँगे। अच्छा समाज अच्छे व्यक्ति उत्पन्न करता है और अच्छे व्यक्ति अच्छा समाज बनाते हैं। दोनों अन्योऽन्याश्रित हैं। मुर्गी में से अण्डा या अण्डे से मुर्गी? बीज में से वृक्ष अथवा वृक्ष में से बीज की तरह है। यह प्रश्न भी है कि व्यक्तियों से समाज अथवा समाज से व्यक्ति? वस्तुतः दोनों इतने अविच्छिन्न हैं कि उन्हें प्रथक किया ही नहीं जा सकता है। अच्छे व्यक्तियों की आवश्यकता हो तो अच्छा समाज बनाने के लिए जुटना चाहिए। अच्छा समाज बनाने पर ही श्रेष्ठ व्यक्तित्व की आवश्यकता पूरी होगी। सुख-साधनों को अभिवर्धन और समुन्नत लोक-व्यवहार का का प्रचलन ही सर्वतोमुखी सुखी-शान्ति का आवश्यकता पूरी करता है और इस प्रकार का उत्पादन प्रखर प्रतिभा सम्पन्न सुसंस्कृत व्यक्ति ही कर सकने में समर्थ होते हैं।

निजी स्वार्थ-सिद्धि की दृष्टि से विचारे अथवा परिवार के हित -साधन की दृष्टि से देखें-दोनों ही तरह यह आवश्यक हो जाता है कि सुसंस्कृत-समाज में रहकर ही निर्वाह करने का अवसर मिले। बुरे लोगों के बीच, बुरे वातावरण में-अपनी तथा परिवार की प्रगति के लिए किये गये सारे प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। जिस मुहल्ले में आग लगी हो, हैजा फैला हो-उसमें रहने वाले स्वच्छता प्रिय अथवा जागरूक लोगों की भी सुरक्षा नहीं होती। सूखे के साथ गीला जलने की कहावत चरितार्थ होती है। सूखे के साथ गीला जलने की कहावत चरितार्थ होती है। चारों और दुष्टों के पड़ोस में रहकर कोई सज्जन भी चैन से नहीं बैठ सकता। बैठना चाहे तो भी वे दुष्ट लोग शान्त रहने न देंगे। उपद्रव खड़े करके सन्तुलन बिगाड़ने। अपने परिवार को सुसंस्कृत बनाने के लिए कुछ भी क्यों न किया जाता रहे, पड़ोस की गन्दी हवा अपना प्रभाव छोड़ेगी और निकृष्टता का आकर्षण कुटुम्बियों में भी उसी प्रकार की दुर्बुद्धि के संस्कार पैदा करेगा। वेश्याओं के पड़ोस में रहकर-उनकी हरकतें भर देखते रहा जाय तो सदाचार की मानसिक मर्यादाएँ टूटे बिना न रहेंगी।

समाज में यदि अनैतिक, अवांछनीय, अपराधी-तत्व भरे पड़े हों तो उनकी हलचलें, हरकतें-किसी सन्त, सज्जन की उत्कृष्टता को सुरक्षित नहीं रहने दे सकतीं। विकृत समाज में असीम विकृतियाँ उत्पन्न करती हैं। उनकी लपेट में आये बिना कोई नीतिवान व्यक्ति भी रह नहीं सकता उसे प्रत्यक्ष एवं परोक्ष आक्रमणों का शिकार होना पड़ेगा। जहाँ खाद्य-पदार्थों में मिलावट का बोलबाला हो-वहाँ स्वास्थ्य-रक्षा पर ध्यान रखे रहने वाला व्यक्ति भी बीमार पड़े बिना नहीं रह सकता।

कुरीतियों और रूढ़ियों से भरे समाज में सामान्य मनोबल का सुधारवादी-चीं बोल जाएगा और उसे सिद्धान्तवाद ताक पर रखते हुए समूह गत प्रवाह में बहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। दहेज के विरोधी और आदर्श विवाहों के समर्थक को भी जब अपनी जवान कन्या के लिए विवाह का कोई सुयोग बनता नहीं दीखता तो जाति बिरादरी वालों और दहेज-लोभियों की शरण में ही जाना पड़ता है और उनके इशारे पर चलने के लिए विवश होना पड़ता है। सुविस्तृत समाज के विरुद्ध एकाकी खड़े रहने वाले तो कोई विरले ही सुस्साहसी होते हैं, सामान्य मनोबल के लोग तो लड़खड़ा ही जाते हैं।

शिक्षा में उद्दण्डता भरती जाय तो न तो अपनी लड़की का गृहस्थ चैन से बैठेगा और न बेटे की बहू घर में शान्ति रहने देगी। क्या जामाता क्या पुत्र बहू? निकले तो उसी शिक्षा-संस्था से है, जहाँ-उच्छृंखलता का निरन्तर बोलबाला रहता है। यह बच्चे जिस प्रकार का प्रशिक्षण पाते रहे हैं, उसका प्रभाव उनके गृहस्थ पर न पड़े-यह हो ही नहीं सकता। देश-शिक्षा-पद्धति से हमें क्या लेना-देना कहकर काम नहीं चल सकता है। उसका प्रभाव अपने बच्चों के गृहस्थ जीवन पर पड़ेगा ही और फलस्वरूप अपनी बेचैनी भी बढ़ेगी ही।

इसी प्रकार शासन की स्थिति -व्यापारियों की रीति-नीति-अपराधों और अनैतिकता की वृद्धि-साहित्य और कला संगीत का प्रवाह -मूर्धन्य व्यक्तियों का कर्तृत्व-वर्ग-संघर्ष आदि की विषाक्तता-किसी सज्जन सद्गृहस्थ को शान्ति पूर्वक जीवन-यापन नहीं करने दे सकती। वास्तविकता यही है कि व्यक्ति एकाकी निर्वाह नहीं कर सकता, उसे समाज से प्रभावित होना ही पड़ता है। इतना ही नहीं उस प्रवाह में जन-साधारण की पीढ़ियों का मनः स्तर अनायास ही ढलता चला जाता है। बुरे वातावरण में केवल बुराई ही पनपती है। बुरे लोग बढ़ते हैं और उनके उपद्रवों से बुरी परिस्थितियाँ ही उफनती है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत रूप से किया गया स्वाध्याय, चिन्तन मनन, पूजा, पाठ अथवा सज्जनोचित निर्वाह में कुछ सार नहीं रह जाता।

व्यक्ति निर्माण और परिवार निमार्ण की तरह ही समाज-निमार्ण भी हमारे अत्यन्त आवश्यक दैनिक कार्यक्रमों का अंग माना जाना चाहिए। अपने लिए हम जितना श्रम, समय, मनोयोग एवं धन खर्च करते हैं, उतना ही समाज को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए लगाना चाहिए। यह परोपकार परमार्थ की दृष्टि से ही नहीं, विशुद्ध स्वार्थसाधन और सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है।

अपनी क्षुद्रता की संकीर्णता को व्यापक आत्मीयता में विकसित करना ही अध्यात्म तत्व दर्शन का मूलभूत प्रयोजन है। इस दृष्टिकोण को अपनाने पर ही संयम, सदाचार, सेवा, एवं लोकमंगल के लिए संकल्प एवं उत्साह उत्पन्न होता है और उन्हें निरन्तर निबाहने के लिए साहस, विश्वास बढ़ता है। ईश्वर-भक्ति इस तात्त्विक दृष्टि का नाम है। इसी तत्व-दर्शन का प्रतिपादन करने के लिए धर्म, अध्यात्म एवं ईश्वरवाद का विशाल-काय कलेवर खड़ा किया गया है। स्वर्ग और मुक्ति जैसे अमरफल आत्म-विस्तार के कल्पवृक्ष पर ही लगते हैं। साधना, उपासना, तपश्चर्या, योग-परायणता वैराग्य, संन्यास, दान-पुण्य स्वाध्याय सत्संग एवं विविध-विधि धर्म-कृत्यों का एक मात्र प्रयोजन यही है कि आत्मा पर चढ़े हुए संकीर्ण-स्वार्थपरता के वे कषाय कल्मष हट जाएँ तो वासना-तृष्णा के-लोभ-मोह के भव-बन्धनों में जकड़े रहते हैं। नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है। उदारता एवं सेवा-साधना के जल-साबुन से ही मनःक्षेत्र पर छाई हुई मलिनताएँ धोई जाती हैं। यह समस्त प्रयोजन समाज-सेवा का व्रत धारण किये बिना सम्भव नहीं हो सकते। सेवा-धर्म को अंगीकार किये बिना कोई व्यक्ति मात्र पूजा-पाठ की टण्टघण्ट अपनाये रहकर सच्चा अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न उसे आत्मिक प्रगति का लाभ मिल सकता है।

प्राचीन काल में साधु और ब्राह्मण वर्ग अपना समस्त जीवन लोक-मंगल के लिए समर्पित करते थे। वानप्रस्थ-आश्रम- स्वार्थ की परिधि से निकलकर परमार्थ की कक्षा में प्रवेश करने की सन्धि बेला ही तो है। क्षुद्रता की -संकीर्णता की-आत्मवत् सर्व भूतेषु, वसुधैव कुटुम्बकम् के देवत्व में विकसित परिणत करने का व्यावहारिक कार्यक्रम वानप्रस्थ के रूप में अप्त-पुरुषों ने निर्धारित किया है। भारतीय संस्कृति की सुनिश्चित परम्परा है कि वैयक्तिक और पारिवारिक प्रयोजनों के लिए किसी को भी आधे से अधिक समय एवं मनोयोग नहीं लगाना चाहिए।

जीवन का पूर्वार्ध- ब्रह्मचर्य-गृहस्थ की भौतिक-प्रगति के लिए पर्याप्त है। उत्तरार्ध को-वानप्रस्थ एवं संन्यास के रूप में समाज के लिए समर्पित करना चाहिए। यह विधान इसीलिए है कि व्यक्ति को अपना महत्वपूर्ण अनुदान समाज-निर्माण के लिए देना चाहिए। दान-पुण्य का जो महात्म्य महत् बताया गया है, उसके पीछे भी यही प्रयोजन है।

प्राचीन काल में साधु-ब्राह्मण उन्हें कहते थे, जो लोक मंगल के लिए ‘सर्वतो भावेन’ आत्म-दान करके उसी में तन्मय निमग्न हो जाएँ। उन दिनों देवालयों और तीर्थ-स्थानों का निमार्ण-जन कल्याण के लिए संचालित प्रवृत्तियों के केन्द्र संस्थान के रूप में होता था। उनका संचालन ऋषि-कल्प देव-पुरुषों के हाथ में रहता था। जनता भी इस झंझट में नहीं पड़ती थी कि इन दिनों किन सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन को प्राथमिकता दी जाय? यह निर्णय साधु-ब्राह्मणों की परिषद ही करती थी।

धार्मिक जनता साधु-ब्राह्मणों को-तीर्थ देवालयों को दान इसी के लिए देती थी कि उसके द्वारा समाज में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयोजन पूरा होता रहे। इन लोक-सेवा के निर्मित बने धर्म-केन्द्रों को भगवान को निवास-गृह माना जाता था और वहाँ जाकर लोग श्रद्धा से मस्तक नवाते थे एवं संचालित सत्प्रवृत्तियों में योगदान देने की प्रेरणा प्राप्त करते थे। तीर्थ में विशेष समारोह भी समय-समय पर इसी आह्वान के लिए होते थे कि इन अवसरों पर अधिक संख्या में, अधिक भावना-सम्पन्न लोग एकत्रित हो और समाज-निर्माण के लिए तत्कालीन योजनाओं को अग्रगामी बनाने के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन एवं अभीष्ट उत्साह प्राप्त करें। समय दान-श्रम दान-धन दान का एक मात्र उद्देश्य समाज के पिछड़ेपन को दूर करना-पिछड़े वर्गों को ऊँचा उठाना है। इस प्रयोजन को पूरा करने वाले व्यक्तियों तथा संगठनों का पोषण करना है।

पिछड़े वर्ग में अन्धे, कोढ़ी, अपंग, दीन, दुर्बल ही नहीं आते, वरन् ऐसे अज्ञानी, कुमार्गगामी, उद्दण्ड एवं दुराग्रही भी आते हैं-जो औचित्य एवं विवेक का तिरस्कार करके अवांछनीय लोक-प्रवाह में बहते हुए चले जा रहे हैं। अन्न-वस्त्र अन्धे-अपंगों को बाँटने भर से समाज-सेवा की इतिश्री नहीं हो जाती, वरन् उनकी सहायता का भी ध्यान रखना चाहिए-जो अविवेक का शिकार होकर घिनौना और दुराग्रही जीवन जी रहे हैं, वस्तुतः यह वर्ग और भी अधिक दया का पात्र है। सत्प्रेरणाएँ देकर यदि उन्हें सन्मार्गगामी बनाया जा सके तो गन्दे नाले में गिरकर नष्ट होने वाली महत्वपूर्ण शक्ति को बचाया और उपयोगी प्रयोजनों में लगाया जा सकता है। इसमें उन भूले-भटको का भी कल्याण होता है और समाज को ऊँचा उठने का भी अवसर मिलता है। विचार-क्रान्ति एवं ज्ञान-यज्ञ की पुण्य-प्रक्रिया ज्ञान-दान के जिस महान् उद्देश्य को पूर्ण करती है, उसे अन्न-वस्त्र दान की तुलना में लाख-करोड़ गुना अधिक श्रेयस्कर, सत्परिणमोत्पादक माना जाएगा।

अपने समाज में आज अगणित दुष्प्रवृत्ति संव्याप्त है। असंख्य उलझी हुई समस्याएँ सामने हैं। कष्ट, कलह और शोक-सन्ताप के असीम कारण मौजूद हैं। इन विकृतियों के दुष्परिणाम पग-पग पर भुगतने पड़ रहे हैं। मनुष्य पतित और दुष्ट बनता जा रहा है। अपने और दूसरों के लिए विपत्तियाँ और विभीषिकाएँ उत्पन्न कर रहा है, इस समस्त शृंखला की जड़ में व्यापक दुर्बुद्धि ही उफनती दिखाई देती है। चिन्तन का स्तर निकृष्टता के दल-दल में फँस जाने से उत्पन्न विग्रह की चीख-पुकार ही आज दसों दिशाओं में कुहराम गूँज रहा है। संसार में न तो वस्तुओं का अभाव है और न उपयुक्त परिस्थितियों में कोई कमी है। विपत्ति केवल दुर्बुद्धि की उत्पन्न की हुई हैं। सद्भावों का स्थान दुर्भावों ने सत्प्रवृत्तियों के स्थान दुष्प्रवृत्तियों ने पकड़ लिया है। फलस्वरूप जो वस्तुएं सुख-शान्ति एवं प्रगति के अभिवर्धन में लग सकती थीं, वे ही विपत्तियाँ एवं उलझने बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है। प्रगति के स्थान पर अधोगति पल्ले बँध रही है। इसका निराकरण फुंसियों पर मरहम लगाने से नहीं, रक्त-शुद्धि का उपचार करने से होगा। अमुक कठिनाई को अमुक उपास से हल करने की बात सोचना मुरझाए पेड़ की पत्तियाँ धोने की तरह है, इससे कुछ बनेगा नहीं। काम तो जड़ सींचने से चलेगा।

जीवन के हर क्षेत्र में-समाज के हर वर्ग में-दुष्प्रवृत्तियों ने गहराई तक जड़े जमा ली है। फलस्वरूप हर दिशा में संकटों के दान सर्वभक्षी नग्न-नर्तन कर रहे हैं। लड़ना हमें उन दुर्बुद्धि से है, जो समस्त विपत्तियों की जननी है। समाज-सेवा के यों छुट-पुट उपाय भी बहुत हैं, और उन्हें खड़ा करने वाले को थोड़ा यश भी मिल जाता है, पर इससे संकट के मूल प्रयोजन को टालने में प्याऊ, धर्मशाला, दवाखाना, बगीचा, मन्दिर आदि स्थापित करने वाले ‘धर्मात्मा’ कहलाने की वाहवाही प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-विज्ञान का लाभ तो इसमें प्रत्यक्ष है, पर विश्व-संकट की छाई हुई घटाओं को खिसकाने में इससे तनिक भी सहायता नहीं मिलती। दुर्बुद्धि से लड़ने के लिए विचार-क्रान्ति का गाण्डीव उठाना पड़ेगा और पाँच जन्य बजाना पड़ेगा। परशुराम के कुल्हाड़े को सँभाल कर निकृष्ट-चिन्तन के परिवार का शिर उतारना पड़ेगा। किसी समय रावण, कुम्भकरण, कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुशासन, महिषासुर, मधुकैटभ, वृत्रासुर, हिरण्यकश्यपु आदि का दमन धर्म-स्थापना के लिए आवश्यक माना गया था। आज दुष्प्रवृत्तियों के परिपोषक ज्ञान का कलेवर ओढ़कर नग्न-नृत्य करने वाले अज्ञान रूपी महादैत्य का दमन करना पड़ेगा। विचार-क्रान्ति किये बिना समाज निमार्ण की आधार-शिला नहीं रखी जा सकेगी। ज्ञान यज्ञ के बिना सुख शान्ति एवं प्रगति की सर्वतोमुखी संभावनाएं प्रस्तुत कर सकने वाले नव-युग का अवतरण नहीं हो सकेगा। हमें हनुमान् आदि की तरह-पाण्डवों की तरह धर्म की स्थापना कर सकने वाले अधर्म-विरोधी अभियान में अपने आप को झोंकना चाहिए। गोवर्धन उठाने में योगदान देने वाले ग्वाल-बालों की तरह अपनी भूमिका उत्साह पूर्वक सम्पन्न करनी चाहिए। भले ही वह देखने में कितनी ही नगण्य क्यों न हो।

युग-निमार्ण योजना का तीसरा चरण समाज-निमार्ण का है। आत्म-निमार्ण और परिवार-निमार्ण के समान ही उसकी भी महत्ता उपयोगिता है। संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत समाज-निमार्ण की जो सुव्यवस्थित क्रिया-प्रक्रिया प्रस्तुत की गई है, उसमें उन सभी तत्वों का समावेश है- जो आज की स्थिति में समाज उत्थान के सुनिश्चित आधार बन सकते हैं। विचार-विस्तार जैसा व्यापक और महान् प्रयोजन संगठित संस्थान ही कर सकते हैं। वह मिल-जुल कर करने का काम है। एक व्यक्ति चाहे कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो, जन-संपर्क का कार्य बड़े पैमाने पर नहीं कर सकता। इस युग की सबसे बड़ी सामर्थ्य संघ-शक्ति ही है। जहाँ भी युग-निमार्ण विचारधारा से परिचित प्रभावित लोग हों, वहाँ उन्हें संघबद्ध होना चाहिए। प्रतिदिन 10 पैसा और एक घण्टा समय नव-निर्माण आन्दोलन के लिए नियमित रूप से देते रहने वाला कोई भी व्यक्ति इस शाखा-संगठन का सदस्य बन सकता है। पदाधिकारी एक ही होता है, जिसे कार्य-वाहक कहते हैं।

संगठन का प्रथम और प्रमुख कार्य विचार-क्रान्ति की भूमिका प्रस्तुत करना है। इसके लिए झोला-पुस्तकालय ज्ञान-रथ विज्ञप्ति-वितरण पोस्टर चिपकाना, दीवार लेखन आदि कार्य हाथ में लेने होते हैं। साप्ताहिक -सत्संग कथा, कीर्तन, विचार-गोष्ठियाँ युग-निमार्ण सम्मेलन, कविता-सम्मेलन संगीत-सम्मेलन गायत्री-यज्ञ जन्म-दिन विवाह-दिवस संस्कार, पर्व-आयोजन आदि के माध्यम से जन-सम्मेलनों के प्रचार अभियान को आगे बढ़ाया जाता है। पढ़े-लिखों को साहित्य पढ़ाकर और बिना पढ़ों को प्रतिपादनों को सुनाकर विचार-परिष्कार का प्रयास किया जाता है। ‘मस्तिष्कीय धुलाई’ का नाम ही ज्ञान-यज्ञ है। पिछले अज्ञानान्धकार-युग की अनैतिकताएं, कुरीतियाँ, मूढ़ताएँ, अन्ध-मान्यताएँ संकीर्णताएँ अभी भी हमारे मस्तिष्कों में कूट-कूट कर भरी है। मनुष्य बेतरह व्यक्तिवादी और स्वार्थान्ध बना हुआ है। लोक-मंगल परमार्थ प्रयोजन एवं समाज-उत्थान में हमारा क्या योगदान होना चाहिए? यह बात एक तरह से भुला ही दी गई है। अध्यात्म दर्शन तक सिद्धि-चमत्कार स्वर्ग, मुक्ति मनोकामना पूर्ति की सड़ी दुर्गन्ध में फँसकर रह गया है। लोक-मंगल के उद्देश्य से यहाँ ढाँचा खड़ा किया गया था, यह किसी को ध्यान नहीं नहीं प्रातः-स्नान करके पाप-फल बचाव और सस्ते कर्मकाण्ड करके स्वर्ग का अक्षय पुण्य प्राप्त करने के लालच में जैसे-तैसे लोग कुछ धार्मिक टण्ट-घण्ट करते हैं। संयम-सेवा की कर्तव्य-निष्ठा तो एक प्रकार से धर्म-प्रयोजनों में से हटा ही दी गई है। जब धर्म-अध्यात्म का यह हाल है, तो अन्य क्षेत्रों में अनाचार की सड़ान जितनी कुछ पनपे-कम है। इस स्थिति को बदलने के लिए क्रान्तिकारी विचारधारा का लोक-मानस में प्रवेश कराया जाना आवश्यक है। उखाड़ने के साथ-साथ उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श-कृत्य की प्रेरणा भरने वाले तत्त्वज्ञान की स्थापना भी आवश्यक है। युग-निमार्ण साहित्य द्वारा इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति की जा रही है। लेखनी और वाणी के दोनों माध्यमों के ज्ञान-यज्ञ को ज्योतिर्मय बनाने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। हम में से प्रत्येक को इस संगठनात्मक और प्रचारात्मक कार्यक्रमों में उत्साह पूर्वक अपना भाव भरा योगदान देना चाहिए।

समाज -निर्माण का आधार बनाने वाले संगठनात्मक और प्रचारात्मक पूर्वार्ध की जहाँ जड़ जमने लगे, वहाँ अभियान का उत्तरार्ध कार्यान्वित किया जाना चाहिए। युग-निमार्ण पाठशाला, शिल्पशाला, प्रौढ़-शिक्षा पुस्तकालय, व्यायामशाला आदि की स्थापना और संचालन व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। शाखाओं की समर्थता सिद्ध करने वाले ज्ञान-रथ लाउडस्पीकर, स्लाइड प्रोजेक्टर, टेप-रिकार्डर यज्ञ-आच्छादन आदि उपकरण एकत्रित करने चाहिए और उनके माध्यम से जन-जागरण का अभियान तीव्र करना चाहिए। सामूहिक श्रमदान की परम्परा जहाँ भी चल पड़ेगी, वहाँ अनेकों रचनात्मक कार्य सहज ही बढ़ने लगेंगे। सहकारी आन्दोलन को प्रोत्साहित किया जा सके तो सृजन की असंख्य प्रवृत्तियाँ सहज ही सामने खड़ी हो सकती है।

संघर्षात्मक आन्दोलनों में कुरीतियों और अनैतिकताओं के दुहरे मोर्चे पर लड़ा जाना आवश्यक है। विवाहोन्माद में होने वाला अपव्यय दहेज-प्रचलन रोकने के लिए हमें युद्ध स्तर पर तीव्र आन्दोलन खड़ा करना चाहिए और देश को निरन्तर खोखला, अनैतिक ओर दरिद्र बनाते जाने वाले इस अनाचार का हर सम्भव उपाय से डटकर विरोध करना चाहिए। मृतक-भोज भिक्षा-व्यवसाय धर्म-क्षेत्र पर छाया हुआ पुरोहितवाद, भूत-पलीत भाग्यवाद, धर्म के नाम पर पशुबलि, बाल-विवाह अनमेल-विवाह जन्म-जाति के नाम पर ऊँच-नीच की मान्यता, के प्रति अमानवीय प्रतिबन्ध ऐसे हैं, जिन्हें अविलम्ब हटाया जाना चाहिए। नैतिक क्षेत्र में माँसाहार, नशेबाजी, आलस्य, श्रम की अप्रतिष्ठा, पशुओं के साथ बरती जाने वली निर्दयता, भ्रष्टाचार, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, सन्तान की अवांछनीय अभिवृद्धि, गंदगी फिजूलखर्ची, नागरिक-कर्तव्यों की उपेक्षा, समय की बरबादी, उद्दण्ड उच्छृंखलता आदि अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ प्रचलित हैं, जिन्हें सहन किया जाता रहा तो इस नासूर से सारा समाज शरीर ही सड़ जाएगा।

अनाचार प्रायः हर क्षेत्र में अपनी जड़ें गहरी करता चला जा रहा है। इसके खतरों से जनसाधारण को सचेत किया जाना चाहिए। लोक-मानस में अवांछनीयता के प्रति विरोध असहयोग एवं विद्रोह की भावनाएँ जगाई जानी चाहिए। कुड़कुड़ाते रहने की अपेक्षा अनीति से जूझने की संघर्षात्मक चेतना उभारी जानी चाहिए और उसका सजीव मार्ग-दर्शन हमें आगे बढ़कर करना चाहिए। ऐसे संघर्षों को आगे बढ़ाने वाले प्रतिनिधियों का आक्रमण सहना पड़ता है और तरह-तरह की क्षति उठानी पड़ती है। इसके सहने के लिए जिनमें धैर्य, शौर्य, सन्तुलन और साहस हो, उन्हें आगे बढ़कर संघर्ष का मोर्चे पर हम में से हर किसी को करना चाहिए कि अनीति एवं अनौचित्य के साथ कोई सम्बन्ध न रखें-समर्थन न करें-सहयोग न दें। उससे पूरी तरह अलग रहें और समय-समय पर अपने असहयोग एवं विरोध को व्यक्त करते रहें। दुर्बल और असंगठित स्थित में इस ‘असहयोग’ से भी काम चल सकता है। आगे बढ़ना हो तो विरोध व्यक्त करने के लिए लेखनी, वाणी और प्रदर्शन जैसे साधनों का उपयोग किया जा सकता है। सत्याग्रह, घिराव, भर्त्सना, धिक्कार और दूसरे प्रतिरोधात्मक उपाय भी काम में लाये जा सकते हैं। कहाँ, किस अनीति के विरुद्ध, क्या कदम उठाया जाय? इसका निर्णय अपने पक्ष के साहस और संगठन पर निर्भर करता है। जहाँ जो सम्भव हो-अनीति के विरुद्ध मोर्चा बनाया ही जाना चाहिए। ताकि आततायी, अनाचारियों को निर्भय होकर कुछ भी करते रहने की छूट न मिले।

समाज-निमार्ण के लिए हमें सृजन-सेना का सैनिक बनकर संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चे संभालने चाहिए। इसके लिए अपने समय और साधनों का अधिकाधिक अनुदान विश्व-मानव के चरणों पर समर्पित करना चाहिए। साधारणतया आठ घण्टे आजीविका उपार्जन के लिए, सात घण्टा शयन-विश्राम के लिए, पाँच घण्टा घरेलू और शारीरिक कामों के लिए, कुल मिलाकर 20 घण्टे निजी कामों में खर्च करने चाहिए और 4 घण्टे समाज-निमार्ण की उपरोक्त चार क्रिया-प्रक्रियाओं में लगाने चाहिए। एक घण्टा ओर दस पैसा प्रतिदिन विचार-क्रान्ति के लिए लगाना तो आरम्भिक सदस्यता शर्त है। कर्मठ कार्यकर्ताओं को एक न्यूनतम अनुदान तक सीमित न रहकर बढ़-चढ़ कर त्याग, बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। महीने में एक दिन की आजीविका समाज-निमार्ण के लिए हर उदार व्यक्ति आसानी से खर्च कर सकता है। यों यदि हृदय में विशालता हो तो घर-परिवार के एक सदस्य के रूप में युग-परिवर्तन के देवता को महाकाल को गिना जा सकता है। समझा जा सकता है कि यदि एक सन्तान और होती तो उसका भी किसी प्रकार भरण-पोषण करना ही पड़ता। वैसा मानकर चला जाय तो निर्धन व्यक्ति भी इस महान प्रयोजन के लिए अपना अनुकरणीय अनुदान आर्थिक स्तर पर भी प्रस्तुत कर सकता है। समय, श्रम, प्रभाव, मनोयोग एवं धन जैसे समस्त साधनों की बढ़ी-चढ़ी मात्रा हमें युग-देवता के सम्मुख प्रस्तुत करनी चाहिए। पेट और प्रजनन के लिए, लोभ और मोह के लिए सारी शक्तियाँ लगी रहें तो यह किसी आदर्शवादी और विचारशील व्यक्ति के लिए लज्जा की बात ही समझी जा सकती है।

जिनकी पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हो गये हैं। बड़े बच्चे कमाऊ हो गये हैं और अपने छोटे बहन-भाइयों को सम्भालने की स्थिति में आ गये हैं अथवा पूर्व संचित सम्पत्ति के सहारे वे स्वावलम्बी बनने तक अपना निर्वाह कर सकते हैं, उन्हें अपना पूरा समय लोक-मंगल के लिए समर्पित करना चाहिए। रिटायर लोग पेन्शन, फण्ड आदि इतना पा लेते हैं कि उनके पीछे यदि पत्नी आदि की जिम्मेदारी रह गई है तो उसकी पूर्ति होती रहे। जिनके बच्चे नहीं हैं, वे तो मानो भगवान ने इसी प्रयोजन के लिए आरम्भ से ही परोपकारी, पुण्यात्मा के रूप में पैदा किये हैं। उन्हें अपने को ऐसा सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि जिनके सामने परमार्थी-जीवन जीने का द्वार खुला पड़ा है। जिन्हें केवल कन्याएँ दी हैं वे भी कम सौभाग्यवान् नहीं है। बच्चियों का विवाह करके वे समाज-निर्माण के मोर्चे पर निरन्तर जुटे रह सकते हैं। साधु और ब्राह्मणों की प्राचीन परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए हम में से प्रत्येक को जीवन का उत्तरार्ध-वानप्रस्थ प्रयोजन के लिए समर्पित करने की तैयारी करनी चाहिए। समाज-निमार्ण का व्यापक और महान् प्रयोजन ऐसा दुस्साहस कर गुजरने वाले ही सम्पन्न करते हैं। जिनकी अन्तरात्मा और आदर्शवादी विचारधाराएँ उमड़ती हों-लोक मंगल के लिए कुछ अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत की महत्त्वाकाँक्षा जागती हो-उन्हें युग की पुकार सुननी चाहिए और स्वार्थपरता को परमार्थ-परायणता परिवर्तित करके अपनी महत्त्वाकाँक्षा का परिचय देना चाहिए।

आत्म-निमार्ण परिवार-निमार्ण और समाज-निमार्ण की त्रिविधि क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करते हुए युग-निमार्ण की समग्र आवश्यकता पूरी की जाय-उसके लिए बढ़-चढ़कर शौर्य, साहस दिखाया जाय-इसी में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का गौरव है।


Quotation

“हमें मरना है- यह ध्यान देने की बात नहीं, सत्यता से अपनी यात्रा की लीला को चलाते हुए काम किये जाओ। -श्रीराम शर्मा आचार्य


श्रद्धांजलि पर्व इस तरह मनायें

अखण्ड-ज्योति मिशन का जन्म दिन-बसन्त पंचमी’ है। वहीं गुरुदेव का अध्यात्मिक ‘जन्मदिन’ है। युग-निमार्ण आन्दोलन का श्रीगणेश भी उसी दिन हुआ। गुरुदेव के जीवन की प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रक्रिया इसी पर्व से प्रारम्भ हुई है। गायत्री-तपोभूमि का निमार्ण , आर्ष-साहित्य का सृजन’। हिमालय-यात्रा विश्व-व्यापी विचार-क्रान्ति अभियान’ जैसी-न जाने कितनी हलचलें उन्होंने इसी पर्व से आरम्भ की हैं। हर वर्ष उन्होंने अपने अगले वर्ष का कार्यक्रम इसी दिन बनाया है और प्रत्येक ‘परिजन’ को वैसा करने के लिए कह है।

अखण्ड-ज्योति परिवार’ और युग-निमार्ण परिवार’ के प्रत्येक सदस्य के लिए यह परम-पुनीत प्रेरणा-पर्व है। इसे हर साल उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इस वर्ष भी उसे भाव-भरो श्रद्धा के साथ, परिपूर्ण उल्लास के साथ मानना चाहिए।

सामूहिक रूप से छोटे-बड़े सम्मेलन विचार-गोष्ठी प्रवचन, संगीत, कविता-सम्मेलन गायत्री-यज्ञ प्रभात-फेरी दीपदान आदि के कार्यक्रम बसन्त-पंचमी को रखे जा सकते हैं। बसंत-पंचमी इसी वर्ष 28 जनवरी, सोमवार की है। जहाँ एक दिन से अधिक के कार्यक्रम सम्भव हों, वहाँ उस तरह की व्यवस्था बनानी चाहिए, और उनके सम्पन्न होते ही प्रकाशनार्थ विवरण-रिपोर्ट भेजनी चाहिए। जहाँ सामूहिक रूप से सम्भव न हो-वहाँ व्यक्तिगत रूप से अपने परिवार के बीच श्रद्धांजलि का घरेलू आयोजन कर लेना चाहिए। नितान्त एकाकी हो-तो भी उस दिन 11 माला गायत्री मन्त्र का विशेष जप, एक समय का उपवास, 48 दीपकों तथा 48 अगरबत्तियों की वेदी पर पुष्पाञ्जलि जैसे निजी आयोजन कर लेने चाहिए। स्वभावतः किसी न किसी रूप में श्रद्धा अभिव्यक्ति किये बिना हम में से कोई भी रहना न चाहेगा। किसे क्या करना है-इसकी रूप-रेखा अभी से अपने मस्तिष्कों में स्थिर रहनी चाहिए और उसकी अभी से तैयारी की जानी चाहिए।

गुरुदेव के शरीर एवं व्यक्तित्व का जितना महत्व है, उससे कही अधिक उनके मिशन, प्रकाशन, प्रतिपादन एवं प्रेरणा का ह। असल में उनका असली स्वरूप इन प्रेरणाओं में ही देखा-समझा जाना चाहिए। कहना न होगा कि वे अभी भी अपनी निजी लेखनी से अखण्ड-ज्योति-को प्यार किये बिना गुरुदेव के प्रति सद्भावना अधूरी और एकांकी ही रह जाती है। अखण्ड-ज्योति पढ़ना-गुरुदेव को पढ़ना है और उसका प्रसार करना-उनके जीवन-प्राण नव-निमार्ण मिशन का पोषण करना है। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह से समझ लिया जाय-उतना ही उत्तम है। बसन्त-पर्व पर श्रद्धांजलि का श्रेष्ठतम माध्यम यह है कि इन दिनों अधिक से अधिक सदस्य ‘पत्रिका’ के बनाये जाएँ। अभी लगभग डेढ़ महीना शेष है, तब तक प्रयास करके हमें अधिक से अधिक सदस्य बनाने में जुट जाना चाहिए। बसन्त-पर्व पर किसकी सदस्य-संवर्द्धन श्रद्धांजलि कितनी बढ़ी-चढ़ी होती है, इसकी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हमें पूरे जोश और उत्साह के साथ चलानी चाहिए।

पत्रिकाएँ उतनी ही छपती हैं, जितने सदस्य हैं। देर से चन्दा भेजने वालों को बीच के महीनों से ही ग्राहक बनाया जाता है, उनकी फाइल अधूरी रह जाती है। इसलिए अपना तथा अन्य सदस्यों का चन्दा यथासम्भव जल्दी ही मनीआर्डर, पोस्टर-आर्डर अथवा बैंक-ड्राफ्ट से भेजने का प्रयत्न करें। ग्राहकों से चंदा वसूल करने के लिए प्रामाणिक परिजनों के पास रसीद-बहियां भेजी जा सकती हैं, जिन्हें आवश्यकता हो मंगा लें। सभी भाषाओं में युग-निमार्ण पत्रिकाएँ गायत्री-तपोभूमि से निकलती हैं। ‘अखण्ड -ज्योति कार्यालय’ घीया मण्डी में हैं। दोनों संस्थानों के हिसाब अलग हैं। इसलिए दोनों के पत्र-व्यवहार एवं पैसा भेजने की व्यवस्था अलग-अलग ही करनी चाहिए।


आज पुलकित प्राण मेरे

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द्दद्मह्य फ्;द्म क्द्मस्रद्भ [द्मरु+द्म द्गस्ड्ड] त्त्द्मद्भ द्बद्भ ॥द्मफ्शद्मह्व ह्ह्यद्भह्य्न

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द्गद्मशह्वद्ध स्रनर्द्मंह्र;&द्बस्नद्म द्गह्यड्ड] द्दद्मह्यड्ड श्चद्भ.द्म फ्द्धह्द्गद्मह्व द्गह्यद्भह्य्न

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*समाप्त*