पवित्र, श्रद्धालु और धार्मिक बनें

हे मज्दा आहुर! आप सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के अनादि आलोक हैं। हम आपकी शरण आते हैं; इसलिए कि हमें पवित्र, श्रद्धालु और धार्मिक बनाएँ।

हे अधिष्टाता! हमें विश्वप्रेम और कर्त्तव्यनिष्ठा के पथ पर ले चलिए। जब हमारा मन पाप की ओर झुके और फिसलने के लिए मचले तो इतना सहारा देना कि उन विषमताओं को हटाने वाला, भक्तिभरा आलोक हमारे अंतःकरण में उदित हो सके।

हे मज्दा! आपका यह संकेत विस्मरण न हो जाए कि धर्मनिष्ठ ही श्रेय को प्राप्त करता है। आपकी इस वाणी को हमारे ज्ञानी हर जिज्ञासु के अंतस्तल तक पहुँचाने में समर्थ हों। अज्ञानियों को इतना बल मत देना कि वे लोगों को देर तक पथ भ्रष्ट करते रह सकें। आप हमें बहुत देते हैं, पर इतना और भी दें कि पवित्र बुद्धि, आत्मसंयम और सद्भावों के साथ जुड़े हुए आनंद का आस्वादन कर सकें।

हे अंश! आप हमें उस संपदा से सुसंपन्न कर दें, जो आत्मा को ज्ञान के प्रकाश और सत्कर्मों के आनंद से भरा-पूरा बनाए रहती है।

—  जिंदावस्ता


प्रेम से ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति

प्यार की संवेदना ईश्वर की प्रत्यक्ष सहानुभूति एवं अभिव्यक्ति है। हलचल तो जड़ पदार्थों में भी होती है। परमाणु, जीवाणु और विषाणु भी चलते, फिरते, जीते और हलचलें करते हैं, पर उन्हें आत्मा के चेतनायुक्त नहीं गिना जाता। कारण कि चल-बल के रहते हुए भी उनमें भावना का समावेश नहीं होता। भावनाओं से संपन्न चेतना का ही दूसरा नाम आत्मा है। आत्मा की परमात्मा के रूप में परिणिति तब होती है, जब उसमें प्यार का अमृतभरा निर्झर लहराने लगता है। प्रेमी प्रकृति को ईश्वर की प्रतिध्वनि-प्रतिच्छाया कहा जाए तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

नीरस, रूखे, निष्ठुर, शून्य और शुष्क प्रकृति के मनुष्य जीवित तो कहे जा सकते हैं, पर उनमें उस सद्भावनायुक्त सरसता का अभाव रहता है, जिसे सहृदयता कहते हैं। सहृदयता का ही दूसरा नाम प्रेम-प्रकृति है। यह जिस भी अंतःकरण में उगेगी, वहाँ चंदन जैसी शीतल सुगंध उमँगती रहेगा। ऐसे व्यक्ति इस धरती के वरदान हैं। स्थिर, शांति और प्रगति उन्हीं के अस्तित्व से जुड़ी रहती है।

अपनी आत्मा की परिधि जो जितनी विस्तृत कर सकता है, वह उतना ही प्रेम व्यवहार की व्यापकता का परिचय दे सकता है। दूसरों में अपनी आत्मा का, अपने में दूसरों का अस्तित्व समाया हुआ अनुभव करना ही वह उद्गम है, जहाँ से प्रेम भावनाओं का आविर्भाव होता है। परायापन जहाँ होगा, वहाँ उपेक्षा बरती जाएगी और उदासीनता रहेगी, पर जहाँ अपनापन जोड़ लिया गया हो, वहाँ गहरी दिलचस्पी पैदा होगी। अपने आपे को सुखी-समुन्नत बनाने का प्रयास हर कोई सहज स्वभाव से करता है। आत्मीयता की बूँदें जितने क्षेत्र में बरसेंगी, उसमें उल्लास की हरियाली निश्चित रूप से उगेगी।

अधिकार में आई हुई वस्तुओं को अपना माना जाता है। जिनसे कुछ प्राप्त होने की आशा है अथवा जिनके साथ कारणवश मोहबंधन बँध गए हैं, वे सभी प्रिय लगते हैं। प्रिय पदार्थों और प्रियजनों का सान्निध्य भी प्रिय लगता है। उनके सुख-संतोष में भी अपने को जैसी ही प्रसन्नतादायक अनुभूति होती है। आनंद का समस्त परिवार प्रेम के केंद्रबिंदु से ही विनिर्मित और विकसित होता है। रुग्ण और अभावग्रस्त दुखी मनुष्य भी प्रियपात्रों को देखकर खिल उठते हैं, यह सदा देखा जाता है। वैभव के विस्तार एवं निकटवर्त्ती परिजनों में जितनी ममता होती है, उतना ही उनका सान्निध्य प्रिय लगता है। यदि हम इस आत्मीयता की परिधि को अधिक व्यापक और विस्तृत बना सके तो अपनी सारी दुनिया हर्षोल्लास से भर सकती है।

समस्त सद्गुणों का मूल प्रेम है। जो अपने से प्रेम करेगा, उसे व्यक्तित्व के सद्गुणों से, सत्प्रवृत्तियों से  सुसज्जित करना ही होगा। सद्ज्ञान का आहार आत्मा को देना ही पड़ेगा, जो अपने से प्यार करेगा, जिसे अपने उज्जवल भविष्य की आशा है। उसके लिए एक मार्ग राजमार्ग यही प्रतीत होगा कि संयम और सदाचार से शरीर को और परिष्कृत विवेकदृष्टि से अपने मनःक्षेत्र को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने में संलग्न हो।

आत्मा का प्रकाश जितने क्षेत्र में विस्तृत होगा, उतने में अपना आपा बिखरा दिखाई देगा। उसे स्वच्छ, सुरक्षित और समुन्नत बनाने के लिए अंतःकरण में अदम्य स्फुरणा उठेगी। सेवाधर्म उसका सहज स्वभाव बन जाएगा। जब अपने समान ही दूसरों को भी सुखी-संपन्न बनाने की आत्मभावना विस्तृत हो उठेगी, तो अपनी ही भाँति उन्हें भी सुखी-समुन्नत बनाने के लिए ऐसी उत्कंठा जगेगी, जिसे रोकना या दबाना संभव ही न हो सके।

प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। यदि वह स्वार्थपरता और संकीर्णता से सना नहीं है, पवित्र और प्रखर है तो उसे पाकर मनुष्य महान से महानतम होता चला जाएगा और अपने में नर में नारायण की झाँकी करेंगा।


आत्मविभूतियों की उपलब्धि का आधार

भौतिक पदार्थों के माध्यम से मिलने वाला इंद्रिय सुख, अहंकार की तृप्ति करने वाला गौरव, शरीर का बल-आरोग्य, बुद्धि एवं प्रतिभा की शिक्षा-प्रखरता; यह सब सांसारिक विभूतियाँ कहलाती हैं। शरीर और मन के सम्मिश्रण से बना हुआ कायकलेवर इन्हीं की इच्छा-आकांक्षा करता रहता है। वे जिसे, जितनी मात्रा में मिल जाती हैं, वह अपने को उतना ही सफल मानता है।

आत्मचेतना जब अपना वास्तविक स्वरूप और लक्ष्य भूलकर कायकलेवर में रम जाती है तो इसकी इच्छाएँ और चेष्टाएँ भी उसी परिधि में घूमती रहती हैं। शरीराभ्यास ही जिसकी आत्म अनुभूति बन गया है, वह आगे की बात सोचे भी कैसे? प्रगति सदा उसी क्षेत्र में होती है, जिसमें इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति नियोजित रहती हैं। यह दोनों ज्ञानशक्ति की चेरी हैं। जब ज्ञान-भूमिका में यह बात जम जाए कि इस इंद्रियसमूह और जीवधारीमात्र हैं, तो वह भ्रांत मान्यता-मज्ञान के रूप में अंतःकरण पर छाई रहेगी। सोचने और करने की परिधि इतने ही दायरे में सीमित रहेगी जिसे माया, तृष्णा, वासना एवं क्षुद्र महता कहते हैं। आमतौर से नरतनधारी भी इसी निकृष्ट अंतःचेतना में जकड़े रहते हैं। फलस्वरूप उनका जीवनक्रम पेट, प्रजनन और अहंता की परितृप्ति में ही संलग्न रहता है। मानव जन्म का बहुमूल्य अवसर उसी जंजाल में गुम जाता है, समय निकल जाने पर अनंतकाल तक पश्चात्ताप करते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

मानव जीवन की यह दयनीय दुर्दशा है। ईश्वर-अनुदान का यह निर्मम उपहास है। जो मनुष्य जन्म अपने लिए स्वर्गमुक्ति जैसी देव उपलब्धियों का कारण बन सकता था, जिसके प्रकाश से असंख्य दिग्भ्रांतो को दिशा मिल सकती थी। वह पशु-प्रयोजनों की क्षुद्र प्रवृत्तियों में विनष्ट हो जाए तो उसे कभी पूरी न हो सकने वाली क्षति ही कहा जाएगा। नर-पशु जैसी प्रवृत्तियों में उलझे रहना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना है। बुद्धिमान कहे जाने वाले मानव की यह विद्रूप मूर्खता है। न जाने कितनी आशाओं के साथ नर-कलेवर का अनुदान भगवान ने दिया है। इसे पूरी तरह भुलाकर निकृष्टता का आँचल पकड़ लिया जाए और कुत्साओं, कुंठाओं में अपने आपको बाँध लिया जाए तो इस रीति-नीति को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है।

अध्यात्म दर्शन का सारा ढाँचा इस एक प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है कि मनुष्य अपने स्वरूप और लक्ष्य को समझे और उस राह पर चले जो भगवान ने उसके लिए विशेष रूप से विनिर्मित की है। इस सृष्टि को सुंदर, सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने में अपने सहायक की तरह भगवान ने मनुष्य को बनाया है, उसे प्रचुर सुख-साधन दिए हैं और आवश्यकताएँ न्यूनतम रखी हैं, ताकि वह सुविधापूर्वक निर्धारित प्रयोजन पूरा करता रह सके; पर इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाए कि लोभ और मोह जैसे मनोगत विदूषक उसे बहकाकर कहीं से कहीं ले जाते हैं और कुछ का कुछ बना देते हैं। अध्यात्म दर्शक का सृजन इसीलिए हुआ है कि वह मनुष्य को पथ भ्रष्टता अपनाने से उत्पन्न विभीषिकाओं के संबंध में निरंतर सजगता उत्पन्न करता रहे।

मन:शोधन की, आत्मबोध की प्रक्रिया पूरी करने के लिए ही स्वाध्याय सत्संग जैसी धर्म-धारणाएँ विनिमित हुई हैं। उपासना, साधना, तपश्चर्या के विविध विधि-विधानों से लेकर धर्मानुष्ठानों के अगणित कर्मकांडों तक के सारे क्रिया-कृत्य इसलिए हैं कि उनके माध्यम से भौतिकतापरायण पशु-प्रवृत्तियों को आत्मवादी आस्थाओं में परिणत किया जा सके। मनीषी और तत्त्वदर्शी इस रहस्य का समय-समय पर उद्घाटन करते रहे हैं। उपनिषदों की ब्रह्मविद्या इसी मर्म चर्चा से भरी पड़ी है। देवाराधन के विधान प्रकारांतर से अपने ही श्रद्धातत्त्व के विकास की भाव विज्ञान समर्थित पद्धति है। देवता वस्तुतः मनुष्य  का अपना अस्तित्व ही है। उसका जो जितना परिकार कर लेता है, उसे उसी स्तर का देव-अनुग्रह उपलब्ध होता रहता है। प्रखर आत्मबल का ही दूसरा नाम देव-वरदान है। साधनाओं की समग्र-संहिता आत्मबल संपादन के लिए है। आत्मविज्ञान के विद्यार्थी को यह जानना ही चाहिए कि ईश्वरीय विभूतियों और सिद्धियों के लिए किसी अनुनय-विनय से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उसके लिए पात्रता का विकास ही एकमात्र उपाय है।

जितनी मात्रा में हम ईश्वर के चरणों में अपने को समर्पित करते हैं, उतनी ही मात्रा में ईश्वर हमारे चरणों में लोटता दिखाई पड़ता है। आत्मिक प्रगति की सफलता में एकमात्र बाधा यही है कि हम ईश्वर के सामने याचक बनकर उपस्थित होते हैं। अपने भौतिक सुखों में अधिक वृद्धि करने के लिए दांत निपोरते हैं, ईश्वर इस कृपणता और कृतघ्नता पर खीजता है। वह देने के स्थान पर यह पूछता है जो दिया गया था, उसका कितना सदुपयोग हुआ? यदि पिछले अनुदान दुरुपयोग के गर्त्त में पटक दिए गए तो आगे और अधिक किस बिरते पर माँगने की जुर्रत की जा रही है? ईश्वर माँगता है कि जो दिया गया, उसे निर्धारित लक्ष्य के लिए प्रयुक्त करो। तथाकथित भक्त माँगता है, मुझे और अधिक सुविधा तो प्रदान करो; पर यह न पूछो कि उन्हें किस कार्य में लगाया जाएगा। विग्रह यहाँ से शुरू होता है। भक्त भगवान से और भगवान भक्त से इसी विग्रहबिंदु पर बेतरह टकराते हैं और एकदूसरे की शिकायत अधिक-से-अधिक कटुशब्दों में करते रहते हैं। यह स्थिति जब तक बनी रहेगी, तब तक ईश्वरीय अनुग्रह की आशा, दुराशामात्र ही बनी रहेगी। आत्मबल को ही दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुग्रह कहा जा सकता है। पात्रता ही समस्त सिद्धियों की जननी  है। यह तथ्य जिनने समझ लिया, उनके लिए यह भी अविदित न रहेगा कि आध्यात्मिक तेजस्विता एवं प्रखरता प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए। आत्मा और परमात्मा को परासर जोड़ने वाला गोंद केवल उत्कृष्ट भावना स्तर ही है। जो उसे जितनी मात्रा में विकसित कर लेगा, वह उतना ही ईश्वर के निकट पहुँचेगा और उसकी विभूतियों का उत्तराधिकार उपलब्ध करेगा।

शरीर के माध्यम से होने वाली साधनाएँ शरीर का शोधन करती हैं । जप-तप, व्रत-उपवास, प्रायश्चित, हवन, तीर्थयात्रा, नेति-धोति,वस्ति-वज्रोली जैसी साधनाओं का प्रयोजन शरीर को आत्मकल्याण की दिशा में रुचि लेने के लिए सधाना है। स्वाध्याय-सत्संग, मनन-चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।

उपासना का सार है— सर्वसंपन्न ईश्वर को अपना घनिष्टतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर-अर्पण करके उस पर दिव्यसत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर  नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाए, वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाए उसमें ईश्वरीय गौरव-गरिमा की झाँकी मिलती हो। आत्मबोध का तात्पर्य ही यह है कि अपने 'अहं' का सच्चिदाऽनंद आत्मा के रूप में हर घड़ी अनुभव किया जाए और शरीर तथा मन को परिधान, कलेवर, उपकरण, वाहनमात्र माना जाए। शरीरगत लोभ और मोह से जुड़े हुए दृष्टिकोण को अज्ञानांधकार माना जाए और उससे छूटने का प्रयास किया जाए। जो अपने को आत्मा मानेगा, वह स्वभावतः शरीरगत लोभ और मनोगत मोह की अपेक्षा आत्मा का हितसाधन करने वाली उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्राथमिकता देगा। जिसने कायकलेवर के साथ पक्षपात करते रहने की, मोह-प्रवृत्ति को निरस्त करने और आत्मा के साथ न्याय करने का निश्चय किया होगा। उसे कम-से-कम इतना विवेक विभाजन तो करना ही पड़ेगा कि जीवन की उपलब्धियों में से आधी शरीर सुविधा के लिए और आधी आत्मकल्याण के लिए नियोजित रहे। बुद्धि, श्रम, समय, धन, वैभव से लेकर महत्त्वाकांक्षाओं तक में यह आधे-आधे का बँटवारा होना चाहिए। जितना मस्तिष्क भौतिक स्वार्थ-साधन में जुटे कम-से-कम आधा चिंतनकाल आत्मकल्याण की योजना बनाने में भी खरच होना चाहिए। कमाई का आधा अंश शरीर को, आधा आत्मा के लिए खरच किया जाए। समय और श्रम को भी इसी प्रकार विभक्त किया जाए और अंतरंग में जितनी आकांक्षाएँ लौकिक सुख के लिए उठती हैं, कम-से-कम उतनी ही आत्मकल्याण के लिए उठनी चाहिए। पारमार्थिक भावनाओं का वेग स्वार्थ-साधन से किसी भी प्रकार कम नहीं होना चाहिए। जो उतना साहस कर सके समझना चाहिए कि उसे आत्मवादी देवपक्ष में खड़ा होने का अवसर मिल गया।

आत्मा और परमात्मा का समन्वय इसी पृष्ठभूमि पर संभव होता है। आत्मबल का संग्रह और ईश्वर-अनुग्रह का अनुभव इससे कम मूल्य पर कभी, किसी को नहीं हो सका है। वासना और तृष्णा की सड़ी हुई कीचड़ में आकंठ डूबे हुए नर-कीटक तो ईश्वर का स्वरूप तक समझने में असमर्थ रहते हैं, फिर भला उसे प्राप्त तो कर ही कैसे सकेंगे?

जिन्हें आत्मकल्याण, ईश्वर-अनुग्रह, ब्रह्मतेजस्, जीवन लक्ष्य जैसे महान प्रयोजनों का सचमुच ध्यान हो और उन्हें प्राप्त करने की वस्तुतः आकांक्षा हो, उन्हें अपने दृष्टिकोण और क्रियाकलाप में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहिए। कायकलेवर से ऊँचे उठकर आत्मानुभूति के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। इंद्रिय सुखों के लिए, तृष्णा और लिप्सा के लिए, जीने से इनकार करना चाहिए। लोभ और मोह, पेट और प्रजनन ही कहीं जीवनोद्देश्य तो नहीं बने हुए हैं, इनका विश्लेषण करना चाहिए। पूजा-अर्चा की सार्थकता तभी है, जब उनका प्रभाव चिंतन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता के समावेश जैसा दिखाई पड़े। इस कसौटी पर आत्मवादी को अपनी अंतरंग स्थिति की निरंतर परख करते रहना चाहिए।

स्मरण रखा जाए, उपासना का अर्थ याचना नहीं है। भूलना नहीं चाहिए कि जो कुछ आत्मिक विभूतियाँ  मिलने वाली हैं, उनका उद्गम अपना ही अंतरंग है। भीतर की महानता ही बाहर सिद्धियों, समृद्धियों और विभूतियों के रूप में पल्लवित होती है। स्वर्ग और मुक्ति से लेकर देव-अनुग्रह के विविध अनुदान-वरदान केवल अपनी पात्रता के ही प्रतिफल हैं। आत्मचिंतन, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के उपक्रम ही तप-साधना के, उपासना-अर्चा के मूल मर्म हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अमर फल आत्मदेवरूप कल्पवृक्ष को सींचने-संजोने से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। जिसने ब्रह्मविद्या के इस मर्म को समझ लिया, उसी के हाथ आत्मिक विभूतियाँ लगने की आशा की जानी चाहिए।


(कहानी)

सोने की खानों के आस-पास जलाशयों में पर्याप्त मात्रा में स्वर्ण-अंश जब भूगर्भवेत्ताओं ने देखा तो उसके कारण की जाँच की। मालूम हुआ कि कुछ माइक्रोव-बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव स्वर्ण को खाते हैं और उनमें गंधक का मिश्रण करके एक ऐसा स्वर्ण थायो सल्फेट बनाते हैं, जो पानी में घुल सकता है। सोवियत विज्ञान एकेडेमी के शोधकर्त्ताओं द्वारा थायोनिक और स्पोरस बैक्टीरिया समूहों को स्वर्ण में से सोना निकालकर जलाशयों में भेजने का उपक्रम चलता रहता है, ताकि अन्यत्र के लोग भी उससे लाभ उठा सकें और एक स्थान पर उसका केंद्रीकरण विग्रह-विद्रोह उत्पन्न न करें। साम्यवादी कहते हैं— “उनका वर्ग अदृश्य समझे जाने वाले जीवाणुओं में भी मौजूद है— इसका प्रमाण है।”

—  कामरेड स्पोरस माइक्रोव


एक पैसे का दान

अंबे! आज मैंने सहस्र स्वर्णमुद्राओं का दान दिया है। सुन नहीं रहीं क्या? बाहर मेरी जय-जयकार हो रही है। मेरे इस पुण्य पर अवश्य ही दान शिरोमणि स्वर्गीय पिता प्रसन्न होंगे?

वृद्धा ने पुत्र चंद्रपीड़ की ओर पीड़ाभरी दृष्टि डाली और पुन: आरण्यक के स्वाध्याय में लीन हो गई। पुत्र को माँ की यह उपेक्षा अखरी तो, पर वह अपनी अप्रसन्नता अपने अंदर ही दबाकर चुपचाप वहाँ से चला गया।

चंद्रपीड़ ने दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही निःशुल्क भोजनशाला प्रारंभ करने की घोषणा की। द्वारावती से अनेक नर-नारी प्रातःकाल से अन्नपूर्णा पहुँचने लगे। पाकशाला में हर किसी के लिए इच्छित रस और खाद वाले व्यंजन प्राप्त करने की पूर्ण व्यवस्था थी। सायंकाल तक की गणना के अनुसार सात सहस्र अभ्यागतों ने अन्नपूर्णा में भोजन ग्रहण किया, सहस्र स्वर्णमुद्राओं का खरच आया। चंद्रपीड़ ने सोचा आज माँ अवश्य प्रसन्न होंगी। घर पहुँचा, उस समय उसे देखकर ही यह बताया जा सकता था कि उसमें किसी बड़ी सिद्धि का अहंकार व्याप्त हो रहा है।

जननी! चंद्रपीड़ ने उच्च स्वर में कहा— “आपने सुना होगा आज चंद्रपीड़ ने सात सहस्र अभ्यागतों का सुरुचिपूर्ण व्यंजनों से सत्कार किया है। द्वारावती के घर-घर में यही चर्चा गूँज रही है कि चंद्रपीड़ के समान और कोई भी दानी इस दुनिया में नहीं रहा। आज तो मेरे स्वर्गीय पिता अवश्य ही प्रसन्न होंगे।”

वृद्धा की आँखों में कहीं भी खुशी का भाव नहीं था। अन्यमनस्क भाव से वह उठी और अपने स्वाध्याय-सदन में प्रविष्ट होकर अध्ययन में तल्लीन हो गई। चंद्रपीड़ अंतपीड़ा से कराह उठा। माँ का रूखापन उसे अच्छा नहीं लगा तथा उसने कहा— “कुछ नहीं।” विचार-मंथन के सागर में डूब गया, चंद्रपीड़ और उसी स्थिति में उसे कब निद्रा आ गई पता भी नहीं चला।

सवेरा हुआ, चंद्रपीड़ के द्वार पर भारी भीड़ जमा है, लोग तरह-तरह की याचनाएँ लेकर पहुँच रहे हैं। चंद्रपीड़ उन सबकी बातें सुन-सुनकर किसी को अन्न दे रहा है, किसी को वस्त्र, किसी को उसने गौवें दान दी, किसी को स्वर्णमुद्राएँ। यही क्रम अर्निशि चलता रहा तो भी उसे माँ से प्रशंसा का एक शब्द भी सुनने को नहीं मिला।

चंद्रपीड़ मर्माहत हो उठा। उसने द्वारावती का संपूर्ण वाणिज्य अपने भाइयों में वितरण कर दिया। शरीर में आवेष्ठित वस्त्रों को छोड़कर अपने लिए उसने कुछ भी नहीं लिया। इसी स्थिति में वह घर से निकल पड़ा और कई दिन तक भूखा-प्यासा  रहकर वह राजगृही  जा पहुँचा।

जीवन रक्षा के लिए आज चंद्रपीड़ को चाकरी करनी पड़ी। प्रातः से सायंकाल तक कठोर परिश्रम करने के बाद उसे दो पैसे मिले। उन्हें लेकर वह अभी भोजन की तलाश में निकला ही था कि उसकी एक अपंग से भेंट हो गई। उस निर्धन को भी प्रातःकाल में अन्न नसीब नहीं हुआ था। चंद्रपीड़ ने मुट्ठी खोली, एक सिक्का उसके हाथ में दिया, एक से स्वयं लेकर अन्नाहार किया।

रात को जीवन भर में सर्वाधिक सुखद नींद आई। स्वप्न में उसने देखा, माँ उसके शीश पर बैठी आशीर्वाद दे रही है और कह रही है— “तात! दान का श्रेय यश नहीं, आत्मसंतोष है। परिश्रमपूर्वक कमाई का एक अंश निरहंकार भाव से केवल सत्पात्र को ही देने से दान की सार्थकता है, तुम्हारे पिता ने आजीवन यही किया।” चंद्रपीड़ माँ की अब तक की उपेक्षा का आशय समझ गया।


सृष्टि के कण-कण में जगमगाती दिव्य ज्योति

एक से अनेक का अध्यात्म सिद्धांत विश्व-ब्रह्मांड में संव्याप्त ग्रह-नक्षत्रों पर पूर्णतया लागू होता है। वे सभी एक महा-अणु के विस्फोट के विखरावमात्र हैं। पदार्थ की मूलसत्ता परमाणुओं के रूप में अपनी धुरी— पर कक्षा में तथा अग्रगामी क्रम से निरंतर आगे ही बढ़ने का प्रयत्न कर रही है। ग्रह-नक्षत्र अपने केंद्रीय तारकों की, तारक, महातारकों की परिक्रमा कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सब इस विशाल आकाश में फैलते भी जा रहे हैं। गणितशास्त्री कहते हैं कि, “यह फैलाव गोलाई का परिभ्रमण लौटकर अपने स्थान में लौट आने के सिद्धांत का अनुगमन करेगा और जहाँ से चला था, वहाँ जाकर सुस्ताएगा, भले ही इसमें कितना ही विलंब लगे।” गणित यह भी बताता है कि जीव जिस ब्रह्म से प्रादुर्भूत हुआ है, उसी के पास लौट जाने के लिए प्रयत्न कर रहा है और देर-सबेर में अपने उद्गम तक जा पहुँचने का लक्ष्य प्राप्त कर ही लेगा।

एक ही ब्रह्मांड से अनेक पिंड-अंडो की, ग्रह-नक्षत्रों से लेकर परमाणुओं की उत्पत्ति न केवल अध्यात्म मानता है; वरन विज्ञान भी उसी बात को स्वीकार करता है।

अंतरिक्ष विद्याविशारदों ने नीहारिकाओं और तारक, ग्रह-उपग्रहों के बारे में कई प्रकार के निष्कर्ष और प्रतिपादन प्रस्तुत किए हैं। कान्ट, न्यूटन, चैम्बर, लिन, मोल्टन, जेम्स जीन्स, जैफरे, हाएल, लिटिलपन, आदि के सिद्धांतों का थोड़े हेर-फेर के साथ निष्कर्ष यह है कि सृष्टि के आदि में एक तारे से दो तारे हुए। उन दो तारकों की आपसी खींचतान एवं लड़-झगड़ के कारण उनके खंड-उपखंड होते चले गए। वे घूमे, सिकुड़े, सघन हुए, हलचलों में उतरे और ग्रह-उपग्रहों का विशाल ग्रह परिवार बनकर खड़ा हो गया।

अनंत तारकमंडल में हमारा सूर्य भी एक छोटा-सा तारा है।  इस ब्रह्मांड में ऐसे भी अनेक तारे विद्यमान हैं, जो सूर्य से भी अनेक गुने बड़े हैं। सूर्य परिवार में 9 मुख्य ग्रह, लगभग एक सहस्र अवांतर ग्रह, अनेक पुच्छल तारे एवं उल्का समूह हैं। सूर्य तारे का यह संपूर्ण परिवार, उसके मध्य का विशाल आकाश तथा अपनी-अपनी कक्षाओं में गमन करने हेतु उन सबके द्वारा घेरा गया आकाश। यह सब मिलकर एक सौरमंडल कहलाता है।

सौरमंडल के ग्रहों का आकार, सूर्य से उनका अंतर एवं उनके सूर्य का परिभ्रमण में लगने वाले समय का विवरण इस प्रकार है—

अपने सूर्य जैसे लगभग 500 करोड़ ताराओं, सौरमंडल तथा अकल्पनीय विस्तार वाले धूल तथा गैस-वर्तुलों के मेघ मिलकर एक आकाशगंगा बनती है। ऐसी 10 करोड़ से अधिक आकाशगंगाओं तथा उनके मध्य के अकल्पनीय आकाश को एक ब्रह्मांड कहा जाता है। यह ब्रह्मांड कितने हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रश्नकर्त्ता से ही उलटा प्रश्न पूछना पड़ेगा — आपके नगर में रेत के कण कितने हैं? मनुष्य की बुद्धि एवं कल्पना इस स्थान पर थक जाती है, इसीलिए विज्ञान ने उसे 'अनंत' कहा है। अध्यात्मवाद ने इस समस्त रचना को ही नहीं, उसके स्वामी, नियंता,  रक्षक को भी 'अनंत' नाम से ही संबोधित किया है —

अनंत आकाश में स्थित ग्रह-तारकों की विशालता और उनकी परिभ्रमण-कक्षा के विस्तार की कल्पना करने से पूर्व हमें अपने सौरमंडल में स्थित नवग्रहों पर दृष्टि डालनी चाहिए और देखना चाहिए कि असंख्य सौरमंडलों में से छोटा-सा तारा अपना सूर्य— आदित्य कितने बाल-परिवार को अपने साथ लिए फिरता है।

बुद्ध— व्यास 3000 मील, सूर्य से दूरी 3 करोड 60 लाख मील, सूर्य की परिक्रमा में लगने वाला समय 82 दिन।

शुक— व्यास 7800 मील, दूरी 6 करोड 70 लाख मील, अवधि 224 1/2 दिन।

पृथ्वी— व्यास 7920 मील, दूरी 9 करोड 30 लाख मील अवधि 365 1/4 दिन।

मंगल— व्यास 4200 मील, दूरी 14 करोड 10 मील परिम्रमण 687 दिन।

गुरु— व्यास 8700 मील, दूरी 48 करोड़ 30 लाख मील, परिभ्रमण समय 12 वर्ष।

शनि— व्यास 7400 मील, दूरी 88 करोड़ 60 लाख मील परिभ्रमण समय 29 1/2 वर्ष।

युरेनस— व्यास 31000 मील, दूरी 180 करोड़ मील, परिभ्रमण समय 84 वर्ष।

नेपच्यून— व्यास 33000 मील, दूरी 280 मील, परिभ्रमण समय 164 1/2 वर्ष।

यम— व्यास 3000 मील, दूरी 370 करोड़ मील परिभ्रमण समय 248 वर्ष।

अपने सौरमंडल की एक सदस्य अपनी पृथ्वी भी है। उसकी स्थिति का विहंगावलोकन करते हुए सामान्य बुद्धि हतप्रभ होती है। फिर अन्य विशालकाय ग्रह-नक्षत्रों की विविध विशेषताओं पर ध्यान दिया जाए तो प्रतीत होगा कि इस संसार में छोटे से लेकर बड़े तक सब कुछ अद्भुत और अनुपम ही है। सृष्टिकर्त्ता की कृति-प्रतिकृति को समझने के लिए मानवी बुद्धि का प्रयास सराहनीय तो है, पर निश्चित रूप से उसकी समस्त चेष्टाएँ सीमित ही रहेंगी। अपनी पृथ्वी के भीतर तथा बाहर जो रहस्य छिपे पड़े हैं, अभी उनमें से कणमात्र ही जाना-समझा जा सका है, जो शेष है, वह इतना अधिक है कि शायद उसे जानने में मानव जाति की जीवन अवधि ही समाप्त हो जाए।

पृथ्वी का मध्यकेंद्र बाह्य धरातल से 6435 किलोमीटर है। पर उसके भीतर की स्थिति जानने में अभी प्रायः 2800 मीटर तक ही पृथ्वी तक का ही पता चलाया जा सका है। मध्यकेंद्र का तापमान 6000° शतांश होना चाहिए। 62 मील की गहराई पर तापमान 3000 अंश शतांश होगा। इस तापमान पर किसी पदार्थ का ठोस अवस्था में रहना संभव नहीं, अस्तु यह निर्धारित किया गया है कि 62वे मील से लेकर 3960 मील पर अवस्थित भूगर्भ केंद्र तक का सारा पदार्थ पिघली हुई स्थिति में होगा। समय-समय पर फूटने वाले ज्वालामुखी और भूकंप इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।

भूगर्भ केंद्र के पदार्थ पिघली हुई— लचीली स्थिति में होने चाहिए। इसका एक कारण यह भी है कि पृथ्वी के धरातल के एक मील नीचे-ऊपर की पृथ्वी का दबाव प्रायः 450 टन प्रतिवर्ग फुट पड़ता है। बढ़ते-बढ़ते यही दबाव पृथ्वी-केंद्र पर 20 लाख टन प्रति वर्ग फुट हो जाएगा। दवाव का यह गुण होता है कि वह पदार्थ के आयतन (विस्तार) को घटाता है। रुई के ढेर को दबाने से उसका विस्तार छोटा रह जाता है। यों भीतर का ताप आयतन बढ़ाने का प्रयत्न करेगा, पर साथ ही बाहरी दबाव उसे रोकेगा भी। इन परस्पर विरोधी शक्तियों के कारण भीतर एक प्रकार के तनाव की स्थिति बनी रहेगी और उस स्थान का पदार्थ लचीला ही रहेगा।

पृथ्वी की आयु कितनी है, इसका निष्कर्ष पाँच आधारों पर निकाला गया है (1) प्राणियों का विकास परिवर्तन का सिद्धांत (2) परत चट्टानों के निर्माण की गति (3) समुद्र का खारापन (4) पृथ्वी के शीतल होने की गति (5) रेडियोधर्मी तत्त्वों का विघटन के आधार तक पृथ्वी की आयु लगभग 200 करोड़ वर्ष ठहरती है, पर यह अनुमानमात्र ही है। इस संदर्भ में मतभेद बहुत है, उनमें 12 करोड़ वर्ष से लेकर 900 करोड़ तक की पृथ्वी की आयु होने की बात कही गई है।

पृथ्वी का यह घोर तापयुक्त हृदयकेंद्र बहुत विशाल है। इसकी त्रिज्या 2100 मील है। इस भाग को 'बेरीस्फियर' कहते हैं।

भूगर्भ विज्ञान के अनुसार पृथ्वी गोल है। केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कुछ पिघली हुई है। भूमध्य रेखाक्षेत्र में कुछ उभरी हुई है। पृथ्वी का व्यास 7900 मील है। पर्वतों की सर्वोच्च चोटी प्राय: 5.5 मील ऊँची और समुद्र की अधिकतम गहराई 7 मील है।

यह तो मात्र पृथ्वी की बनावट संबंधी जानकारी हुई, उससे संबंधित समुद्र, पर्वत, वायुमंडल, ऊर्जा, चुंबकत्व आदि की चर्चा इतनी बड़ी है कि अब तक की जानकारियाँ न्यूटन के शब्दों में सिंधुतट पर बालकों द्वारा बीने गए सीप-घोंघों की तरह ही स्वल्प है।

सृष्टि के अंतर्गर्भ में छिपे हुए ज्ञात और अविज्ञात रहस्यों की ओर जब दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि उसका रचयिता सचमुच ही 'महतो महीयान' है। उसका महत्त्व इस सृष्टि के रूप में अपनी लीलाविलास से मानवी बुद्धि को चकित-चमत्कृत कर रहा है। यदि उस महत्ता के समुद्रीजीव भी अपनी सत्ता को विसर्जित कर दें, तो अगले ही क्षण आज का अणु बन सकता है और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।


शक्ति-शृंखला की एक और कड़ी लेजर किरणें

शक्ति के कितने ही स्थूलस्रोत ढूँढ़ निकाले गए हैं, पर वे सभी हलके और उथले हैं। आग, भाप, तेल, रसायन एवं बिजली आदि के माध्यम से इन दिनों यांत्रिक शक्ति प्राप्त की जाती है और उससे विविध प्रयोजन पूरे किए जाते हैं। यंत्रयुग से पूर्व यह शक्ति मानवी श्रम और पशु श्रम के आधार पर प्राप्त की जाती थी। स्पष्टतः माध्यम जितने स्थूल होंगे, उतनी ही उनकी क्षमता भी स्वल्प रहेगी।

आकाशस्थ अदृश्य शक्ति-धाराओं को पकड़ने और प्रयुक्त करने में जितनी सफलता मिलती जा रही है, उतनी ही अरिगम शक्ति करतलगत होती जा रही है। रेडियो विकरण,  ऊर्जा तथा प्रकाश-कंपनों के वर्ग की एक उच्चस्तरीय शक्ति कुछ ही दिनों पूर्व लेजर किरण के रूप में प्राप्त हुई है। इस माध्यम से एक-से-एक बढ़कर ऐसे आश्चर्यजनक कार्य संपन्न किए जा रहे हैं, जो कुछ दिन पूर्व तक अंततः कठिन या असंभव माने जाते थे।

आकाशव्यापी 'लेजर'  किरण एक नए शक्तिस्रोत के रूप में मनुष्य के हाथ आई हैं। उनका प्रयोग करके असंभव जैसे कार्यों को संभव बनाने की बात सोची जा रही है। अणुबमों के विस्फोट और उद्जन शक्ति के उत्पादन में अभी प्रायः 10 लाख डिग्री तापमान उत्पन्न करने की जरूरत पड़ती है। यह बहुत बड़ा और बहुत कठिन चरण है। इसके पूरा किए बिना अभी अणु-विस्फोट से उत्पन्न शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता, पर कुछ ही दिनों में लेजर किरणों के प्रयोग से यह कार्य सरल बना लिया जाएगा।

अभी तक लेजर किरणों का उत्पादन बाहरी शक्ति तथा किरणों की शोध द्वारा किया जाता था, पर अब उन्हें रासायनिक क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किया जा सकेगा और उनकी क्षमता को भी बढ़ाया जा सकेगा। कारनेल विश्वविद्यालय न्यूयार्क ने भारी उद्जन गैस, फ्लोरिन गैस और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस के सम्मिश्रण से लेजर किरणें उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त कर ली है।

लेजर किरणों को इन दिनों कई उपयोगी कार्यों में प्रयोग किया जा रहा है। भूगर्भ की गहरी खुदाई, टाँका लगाना, बहुत बारीक नाप-जोख जैसे कार्य इससे लिए जाते हैं। हीरा संसार का सबसे कठोर पदार्थ है, लेकिन लेजर किरणों द्वारा उसे अमरूद की तरह तराशकर फेंक दिया जाता है। सुरंगों की खुदाई में उनके द्वारा बहुत महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ पुरी की गई हैं। इसका प्रभाव इतना सही, सूक्ष्म और सधा हुआ होता है कि बाल में भी छेद किया जा सके। संचार, नौकानयन, खोज-खबर और अंतरिक्ष यात्रा से लेकर नपे-तुले बहुत सावधानी वाले खतरनाक ऑपरेशनों में इन किरणों का उपयोग किया जा रहा है। ग्रहों की दूरी नापने के सबसे सही पैमाने के रूप में उन्हीं का प्रयोग किया जा रहा है। अगले दिनों वे संभवत: अंधो के लिए आँखों का काम दे सकें। लेजर किरणों से प्रभावित एक छड़ी हाथ में लेकर यह अंधे लोग चला करेंगे और वह जादू की छड़ी आस-पास के वातावरण की पूरी जानकारी उन्हें दे दिया करेगी, फिर उन्हें नेत्रहीनता के कारण उत्पन्न कठिनाइयों में से अधिकांश का हल मिल जाएगा।

लेजर किरणों का मुख्य कार्य है — प्रकाश की शक्ति को असंख्य गुना कर देना। उसके प्रयोग से सूर्य के धरातल जितनी असह्य चमक पृथ्वी तल पर उत्पन्न की जा सकती है, भले ही उससे धरती भाप बनकर अंतरिक्ष में ही विलीन क्यों न हो जाए।

यह भौतिक जगत में संव्याप्त एक भौतिक शक्ति-किरण की बात हुई। ऐसी अनेक धाराएँ आकाश में भरी पड़ी हैं और वैज्ञानिक उनकी संभावनाओं तथा उपलब्धियों की पूर्व कल्पना करके यह आशा करते हैं कि अगली शताब्दी में मनुष्य के पास इतनी असीम शक्ति होगी कि वह प्रकृति के साधारण क्रम-प्रवाह को इच्छानुसार बदल— पलट सके।


हम हाइड्रोजन गैस जैसे हलके रहें

ईश्वर सबमें घुला-मिला है। विशुद्ध ब्रह्मतत्त्व को अलग से देखा नहीं जा सकता। उसकी झाँकी किसी व्यक्ति प्रतिमा, चित्र आदि के माध्यम से ही की जा सकती है। ठीक यही स्थिति हाइड्रोजन की है। वह सबसे हलकी गैस है, इसलिए अकेली नहीं पाई जाती, वह किसी-न-किसी पदार्थ में घुल-मिलकर ही रहती है। एकाकीपन उसे सुहाता ही नहीं। कहीं वह पानी में मिली होगी, कहीं वनस्पति घी में, कहीं पेड़-पौधों में, कहीं खनिज पदार्थों में। संसार का कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं, जिसमें न्यूनाधिक मात्रा में हाइड्रोजन मिली हुई न पाई जाए।

हाईड्रोजन के परमाणु सबसे हलके होते हैं। उसके केंद्र में केवल एक प्रोटोन होता है और केवल एक इलेक्ट्रोन चक्कर काटता है। उसका परमाणु केवल दो टुकड़ों में विखंडित किया जा सकता है।

मानव शरीर में पानी की मात्रा 60 प्रतिशत है और पानी में हाइड्रोजन की मात्रा दो-तिहाई है। इसका अर्थ हुआ हमारा अस्तित्व शरीर 40 प्रतिशत हाइड्रोजन का बना है। आकाश में चमकने वाले अधिकांश तारे, जिनमें एक हमारा सूर्य भी है हाइड्रोजन के ही बने हैं। अपने सौरमंडल के गुरु, वरुण, शनि, यूरेनस, नेपच्यून में हाइड्रोजन की मात्रा अन्य ग्रहों की अपेक्षा कहीं अधिक है।

हलकापन तुच्छ अथवा दयनीय नहीं माना जाना चाहिए। जिसके ऊपर व्यक्तिगत पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ जितना हलका होगा, वह उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकेगा। बोझिल गृहस्थी भार ढोते-ढोते तो उसी कुचक्र में आदमी को मरते-खपते रहने के अतिरिक्त आगे बढ़ने का और कोई रास्ता नहीं बचा रहता। हलकी हाइड्रोजन गैस इसीलिए सर्वोपरि महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है कि वह अधिकाधिक भारमुक्त रहती है। मन में जिसके ऊपर कामनाओं का, महत्त्वाकांक्षाओं का जितना अधिक बोझ लदा होगा, वह बंदर जैसी उछल-कूद करके कुछ संग्रह कर सकता है और बालकों जैसा मोद मना सकता है, फिर भी इसके लिए जिन अंतर्द्वंदों में उलझे रहना पड़ता हैं, वे बेतरह थका देते हैं। हलका मन रखकर खिलाड़ी की भावना से किए हुए सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तर के कार्य सरल भी होते हैं और सफल भी।

जहाँ भी चमक दिखाई पड़े, वहाँ यह हलकापन ही उभरता समझा जाना चाहिए। सूर्य चमकीला है, साथ ही पृथ्वी की तुलना में कहीं अधिक हलका भी। जिसने अहंकार का बोझ उतारकर नम्रता एवं विनयशीलता का शिष्ट हलकापन धारण कर लिया, समझना चाहिए उसने महानता प्राप्त करने का मर्म समझ लिया।

हाइड्रोजन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ज्वलनशीलता है। जरा से ताप में वह जलने लगती है। जब जलती है तो ऑक्सीजन के साथ मिलकर पानी बन जाती है। यह पानी ही जीवन है। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार इस धरती पर जीवन सबसे पहले पानी में ही पैदा हुआ। वनस्पतियों से लेकर प्राणियों तक के शरीरों में अधिक अंश जल का और कम अंश ठोस पदार्थों का होता है। इन सबका जीवन पानी पीकर ही स्थिर रहता और बढ़ता है, यदि वह न मिले तो फिर किसी का भी जीवित रहना संभव न रह सकेगा। पानी में एक-तिहाई ऑक्सीजन और दो-तिहाई हाइड्रोजन है। इसका अर्थ यह हुआ कि धरती पर पाए जाने वाले जीवन तत्त्व में दो-तिहाई भाग हाइड्रोजन का है।

अनाचार और अनौचित्य को देखकर क्षुब्ध हो उठना उज्ज्वल अंतःकरण का चिह्न है। अनीति से घृणा होनी ही चाहिए। अवांछनीयता से न केवल असहयोग किया जाए, वरन उसके विरुद्ध संघर्ष भी खड़ा किया जाए। भगवान ने मनुष्य के अंदर हाइड्रोजन जैसी ज्वलनशीलता इसीलिए दी है, पर यह सब होना शांतचित्त एवं संतुलित मनःस्थिति में ही चाहिए। अन्यथा जोश में होश खो बैठने से ऐसी औंधी गतिविधियाँ अपना ली जाएँगी, जिनसे अनाचार को मिटाना तो दूर, उलटे स्वयं को ही आवेशग्रस्त स्थिति के कारण हानि उठानी पड़ेगी।

हलकापन, सौमनस्य पानी की तरह बरसता है, बहता है और सर्वत्र शीतलता, हरीतिमा एवं तृप्ति की परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है। हाड्रोजन जैसे हलके विचित्र स्वभाव के व्यक्ति सर्वत्र शांति, शीतलता एवं सरसता की धारा ही प्रवाहित करते हैं।

हवाई जहाजों के आविष्कार में इसी जानकारी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही कि हाइड्रोजन हलकी होती है और हलकापन ही, ऊपर उठता है — ऊँचा चढ़ता है।

अठारहवीं सदी के अंत में फ्रांस के गोल्फियर भाइयों ने ऐसा गुब्बारा बनाया, जिसके सहारे आदमी आकाश में उड़ सकता था। पीछे जर्मनी के काउंट जैपलीन ने आदिम हवाई जहाज ‘जैपलीन’ बनाया। 'ग्राफ' नामक जैपलीन ने पानी की परिक्रमा करके संसार को चकित कर दिया। इन दोनों ही आविष्कारों में हाइड्रोजन की ऊष्मा उठ सकने की शक्ति का ही प्रयोग किया गया था। उसके बाद अन्य प्रयोग होते रहे और वर्त्तमान हवाई जहाजों का ढाँचा खड़ा हो गया ।

ऊँचा उठना हलकेपन पर निर्भर है। भारी तो नीचे ही गिरेगा। धन-संपदाओं से लेकर पद, सत्ता और बुद्धिमत्ता का अहंतापूर्ण भारीपन अपने ऊपर लादे रहने वाला कभी उच्चकोटि के महामानवों की पंक्ति में नहीं बैठ सकता। वायुयान आकाश में ऊँचे उड़ते हैं, समस्त वाहनों की तुलना में अधिक वेग से चलते हैं। मनुष्य भी वायुयान की भूमिका संपादित कर सकता है, आँखों की पहुँच से परे भी ऊँचाई तक पहुँच सकता है और इतनी तीव्रता से प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है, जिसकी तुलना में सामान्य मनःस्तर के प्रबल पुरुषार्थ और मनोयोग को भी पिछड़ा पड़ा रह जाना पड़े। अंतःकरण का हलकापन कितनी महान संभावनाएँ अपने साथ जोड़े हुए है, इसकी एक झाँकी हाइड्रोजन गैस के सहारे चलने वाले वायुयानों को देखकर की जा सकती है।

वनस्पति घी का आज पूरे जोर-शोर के साथ प्रचलन है। चिकनाई की तीन-चौथाई आवश्यकता इसी से पूरी होती है। असली घी तो एक-चौथाई बचा है, सो भी दुम दबाकर भागने की तैयारी में है। यह वनस्पति घी क्या है? विशुद्ध रूप से हाइड्रोजन गैस का चमत्कार। मूँगफली आदि के मामूली तेलों को गंधहीन सफेद और असली घृत से भी बढ़िया रवादार बना देने का जादू इस हाइड्रोजन गैस द्वारा ही किया हुआ होता है। गैस के चूल्हे अब हर बड़े शहर में उपलब्ध हैं और ईधन के धुँए के झंझट से छुट्टी ही मिल गई। यह इसी गैस का चमत्कार है।

हाइड्रोजन ठंडा करके तरल बनाया जा सकता है। अधिक शीत में वह ठोस भी हो जाता है। किसी भी रूप में रहे, वह अपने हलकेपन की विशेषता बनाए ही रहेगा। ऑक्सीजन की तुलना में वह 16 गुना हलका होता है। जिस बर्तन में एक सेर पानी आ सकता है, उसमें एक छटाँक ही हाइड्रोजन भरा जा सकेगा।

जल के रूप में जीवनदाता और हलकेपन में अनुपम यह हाइड्रोजन परशुराम की तरह उग्र भी है। अधिक-से-अधिक उग्र और ज्वलनशील, सर्वनाशी, आग्नेयास्त्र हाइड्रोजन बम बना ही है। उससे अधिक घातक अस्त्र अभी तक और कोई नहीं बना है।

तेल को घी बना देने की, तुच्छ को महान बना सकने की क्षमता हाइड्रोजन की तरह दुर्बुद्धि के भार से विमुक्त मानवों में ही पाई जाती है। शीतलता को बनाने और बढ़ाने में भी उसका योगदान सराहनीय माना जाता रहेगा। ढुल-मुल बहते-हिलते पानी जैसे अस्थिर मन को हाइड्रोजन की तरह हलकेपन का स्नेह-सौजन्य ही निष्ठावान सुस्थिर बनाता है। जहाँ ऑक्सीजन का सोलह सेर प्रयास काम करेगा, सामान्य व्यक्तित्व 16 जुटेंगे, वहाँ हलके चरित्र-व्यवहार और मनःस्तर का व्यक्ति अपनी स्वल्प शक्ति खरच करके ही वह प्रयोजन पूरा कर लेगा। हाइड्रोजन की तरह श्रेष्ठ व्यक्तित्व भी अपने में हलकापन ही भरे रहते हैं। वे भारीपन की तुलना में सर्वत्र अधिक सफल होते हैं। प्रसिद्ध है कि मोटे, भारी मनुष्यों की तुलना में हलके, पतले लोग अधिक निरोग और अधिक दीर्घजीवी होते हैं।

उपयुक्त अवसर पर वे उत्साहवर्द्धक शीतलता प्रस्तुत करते हैं और जहाँ आवश्यकता होती है, वह अपनी विस्फोटक उग्रता का ही परिचय देते हैं। सज्जनों की श्रेष्ठता, अनाचार के उन्मूलन और सदाचार के परिपोषण में हाइड्रोजन की ही तरह उभयपक्षी भूमिका संपादित करती है।


सत्ता एवं संपदा का सदुपयोग

महाराज रघु ने कितने ही युद्ध लड़े और अपने राज्य का चक्रवर्त्ती विस्तार किया, साथ ही राजकोष में विपुल संपदा भी बढ़ गई। इस सफलता पर दृष्टिपात करने और भावी योजनाएँ बनाने के लिए राज्य परिषद् की बैठक हुई। मंत्रिगण, शासनसंचालक और प्रमुख आमात्य सभी उस गोष्ठी में उपस्थित थे।

रघु ने बताया — “इतने युद्ध न रक्तपात के मनोरंजन के लिए लड़े गए हैं और न आपा-धापी के अहंकार की वृद्धि के लिए। शासकों के विलास-वैभव के लिए भी युद्ध के देवता को जगाया नहीं गया। उसका मात्र उद्देश्य उच्छृंखल अव्यवस्था को एक सदुद्देश्ययुक्त अनुशासन में परिणत करना था। विशृंखलित जनसमूह को एक सूत्र में पिरोने और संगठित लोकशक्ति को सत्पथगामिनी बनाने के लिए ही राज्य विस्तार किया गया है।”

उपस्थित आमात्यों ने इस सदुद्देश्य को जाना तो पहले भी था; पर अब रघु के विश्लेषण से यह जाना कि चक्रवर्त्ती शासन के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को भी निबाहना होगा। ‘कहना कुछ और करना कुछ’ जैसा भेड़ियाघसान ऐसे आदर्शवादी शासन में चल सकना संभव नहीं। रघु ने अपनी बात आगे जारी रखते हुए कहा — “राजकोष को बढ़ाने में ही हमें संलग्न नहीं रहना; वरन उसे तेजी से घटाना भी है। कर से जो कोष जमा होता है, उसमें न्यूनतम ही हम शासनाधिकारी अपने लिए उपयोग करें और शेष को लोक-कल्याण प्रयोजनों के लिए वापस कर दें।“

आमात्यों ने समझ लिया कि जनकल्याण की विविध योजनाएँ अगले दिनों आरंभ होंगी और उनमें राज्यकोष चुक जाएगा।

कोषाध्यक्ष की चिंता बढ़ी। उन्होंने उदास होकर पूछा — “राजन! शत्रुओं के आक्रमण होने पर युद्ध लड़ने पड़ते हैं और उसके लिए विपुल धनराशि व्यय करनी पड़ती है। जब कोष खाली हो जाएगा तो सैन्य प्रयोजनों की आवश्यकता कैसे पूरी होगी?”

रघु नरेश ने बात को उसी गंभीरता से समझा और निश्चित शब्दों में कहा— “सशक्त लोकशक्ति अपने आप में एक सेना है। समुन्नत राष्ट्र का हर नागरिक एक सैनिक होता है। यदि हम अपनी प्रजा को सशक्त बना डालें तो फिर कोई बहुत बड़ी अतिरिक्त सेना रखने की आवश्यकता न पड़ेगी। यथार्थता को एक स्वर से स्वीकार किया गया और राज्य परिषद् लोक-मंगल की अनेकों योजनाएँ बनाने में लग गई। शिक्षा, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक, ग्राम पंचायत, कृषि, पशुपालन, परिवहन, सिंचनशिल्प, व्यवसाय, न्याय आदि अनेक विभागों का पुनर्गठन किया गया। गुरुकुलों को विपुल धनराशि अलग से दी गई, जिससे लोकनायकों की महती आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य जीवंत उत्पादन वहाँ से हो सके। शासनतंत्र के सभी सदस्य एक मन और एक लगन से उस प्रयास में जुट पड़े। कुछ ही वर्ष बीते होंगे कि रघुराज्य की तुलना स्वर्ग से की जाने लगी। प्रजा को लगा, मानो यह शासन उसे दैवी वरदान जैसा मिला। जनता उत्साहपूर्वक कर देती थी, पर जनमंगल की योजनाएँ निरंतर बढ़ती ही जाती थी, सो संचित कोष घटता ही चला गया। जब वह चुकने की स्थिति में पहुँचा तो कोषाध्यक्ष ने महाराज के सामने स्थिति का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और बताया कि शिक्षासंचालक महामुनि कौत्स, गुरुकुलीय राशि राज्यकोष से न मिल सकने के कारण खाली हाथों वापिस जा रहे हैं। विद्यालय अगले दिनों कैसे चलेगा, इस चिंता से वे भी चिंताग्रस्त हो रहे हैं। रघु ने दूसरे ही दिन घनाधीश कुबेर के राज्य पर चढ़ाई कर दी और उनका विपुल कोष लूटकर निराश लौटने वाले कौत्समुनि को विपुल धन दिया, ताकि वे राज्य की शिक्षा योजना को और भी अधिक विस्तृत कर सकें। तत्त्वज्ञानियों की गोष्ठी में इस अनैतिक कहे जा सकने वाले आक्रमण एवं अपहरण को भी नीतिसम्मत ही ठहराया गया।


(कहानी)

घटना 1914 की है। वैज्ञानिक टामस अल्बा एडीसन की प्रयोगशाला और कारखाना धू-धूकर जल रहा था। उसकी लपटें आकाश छूने के लिए होड़ कर रही थीं। एडीसन उन लपटों में अपनी आशाओं को जलता देख रहा था। पास ही उसका पुत्र खड़ा था। इस भयंकर अग्निकांड को देखकर वह तो स्तब्ध रह गया।

एडीसन ने अपने पुत्र से कहा— “देखते क्या हो? जाओ, अपनी माँ को बुला लाओ। उससे कहना कि जीवन में फिर कभी ऐसा दृश्य देखने को न मिलेगा।”

कुछ देर बाद उनकी पत्नी भी आ गई। उसने कहा— “बीस लाख डॉलर के कीमती यंत्रों के साथ आपके द्वारा संपूर्ण जीवन में जो आविष्कार किए गए, उनके संपूर्ण कागजात भी तो इसी प्रयोगशाला में थे, वह भी अग्नि को समर्पित हो गए। अब क्या होगा?”

“पहले तो ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम सबकी भूलें भी इसमें जलकर राख हो गई हैं। अब हम नए सिरे से अपने कार्य का आरंभ करेंगे, प्रत्येक हानि भी तो अपने साथ कुछ-न-कुछ लाभ छिपाकर लाती है।”

आविष्कारक दंपत्ति ऐसे सहज रूप से उस अग्निकांड को देखते रहे, जैसे उनका उससे कोई सरोकार ही नहीं।


मानवी मस्तिष्क पर नियंत्रण— एक वरदान भी एक अभिशाप भी

विज्ञान जगत की मान्यता है कि अगले पचास वर्षों में सबसे महत्त्वपूर्ण शोध जीव विज्ञान और मस्तिष्क विज्ञान की ही होगी और उन्ही के आधार पर विश्व के भाग्य एवं भविष्य का निर्णय— निर्धारण होगा।

शरीर-रचना, स्वास्थ्य-संवर्द्धन एवं चिकित्सा-क्षेत्रों की खोजों के फलस्वरूप इतना ही हो सकता है कि काया को मजबूत, निरोग और दीर्घजीवी बनाया जा सके, पर यह कोई बड़ी बात नहीं है। अपितु इस सफलता के साथ-साथ एक विपत्ति भी सामने आ खड़ी होगी। प्रजननक्रम रुका नहीं तो इस सफलता के साथ-साथ वंशवृद्धि की गति बढ़ेगी। देर से मरने वाले लोग नवागतों की जगह घेरे रहेंगे और बढ़ती आबादी से ऐसे नए संकट उत्पन्न होंगे, जिन्हें देखते हुए कमजोरी, बीमारी से भरे दिन ही याद रहेंगे और वे ही अतीत की स्मृति के साथ सराहे जाने लगेंगे।

शरीर नहीं, मानव जीवन का सार उसके मस्तिष्क में सन्निहित है। बौद्धिक दृष्टि से जो जैसा है, उसे उसी स्तर का नापा, आँका जाएगा। अगले दिनों विज्ञान की शोधें मानवी मानसिक स्थिति पर नियंत्रण स्थापित कर सकने में सफल होंगी तो कोई अपनी इच्छानुसार सोच नहीं सकेगा। उसे वहीं सोना पड़ेगा, जिसके लिए उसे वैज्ञानिक दबाव ने बाध्य किया है।

इलेक्ट्रिकल स्टीक्यूलेशन आफ ब्रेन (ई. एस. वी.) पद्धति के अनुसार, कई एशियन विश्वविद्यालयों ने आंशिक रूप से मस्तिष्क की धुलाई (ब्रेन वाशिंग) में सफलता प्राप्त कर ली है। अभी यह बंदर, कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, चूहे जैसे छोटे स्तर के जीवों पर ही प्रयोग किए गए हैं। आहार की रुचि, शत्रुता, मित्रता, भय, आक्रमण आदि के सामान्य स्वभाव की जिन परिस्थितियों में, जिस प्रकार चरितार्थ किया जाना चाहिए। उसे वे बिलकुल भूल जाते हैं और विचित्र प्रकार का आचरण करते हैं। बिल्ली के सामने चूहा छोड़ा गया तो वह आक्रमण करना तो दूर उससे डरकर एक कोने में जा छिपी। क्षणभर में एकदूसरे पर खूनी आक्रमण करना, एक-आधे मिनट बाद परस्पर लिपटकर प्यार करना, यह परिवर्तन उस विद्युत-क्रिया से होता है, जो उनके मस्तिष्कीय कोषों के साथ संबद्ध रहती है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू हो सकती है। मानव मस्तिष्क अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत होता है, उसमें प्रतिरोधक शक्ति भी अधिक होती है, इसलिए उसमें हेर-फेर करने के लिए प्रयास भी कुछ अधिक करने पड़ेंगे और पूर्ण सफलता प्राप्त करने में देर भी लगेगी; पर जो सिद्धांत स्पष्ट हो गए हैं, उनके आधार पर यह निश्चित हो गया है कि मनुष्य को भी, जैसा चाहे सोचने, मान्यता बनाने और गतिविधियाँ अपनाने के लिए विवश किया जा सकता है। निर्धारित रसायन तत्त्वों को पानी में घोलकर पिलाया जाता रहे तो किसी तानाशाह शासक की इच्छानुकूल समस्त प्रजा बन सकती है। फिर विचार-प्रसार की आवश्यकता न रहेगी; वरन अन्न, जल, औषधि आदि के माध्यम से कुछ रसायन भर लोगों के शरीर में पहुँचाने की आवश्यकता पड़ेगी। वे मस्तिष्क में पहुँचकर वैसा ही परिवर्तन कर देंगे जैसा वैज्ञानिकों या शासकों को अभीष्ट होगा, तब घोर अभावग्रस्त स्थिति में भी जनता अपने को रामराज्य जैसी सुखद स्थिति में अनुभव करती रह सकती है। यदि लड़ाकू पीढ़ी बनानी हो तो उस देश का हर नागरिक दूसरे देशों पर आक्रमण करने के लिए आतुर हो सकता है।

चाहे हम सो रहे हों या जग रहे हों, हर समय तीन पौंड भारी मस्तिष्क, मेरुदंड एवं लगभग दस अरब तंत्रिकाओं द्वारा देह की समस्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन करता रहता है। उसे करीब 20 वाट विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, जो ग्लूकोज एवं ऑक्सिजन से प्राप्त होती है।

वैज्ञानिकों की दृष्टि में हर विचार, हर आकांक्षा और हर अनुभूति एक विद्युत हलचल अथवा रासायनिक-प्रक्रिया है। इस क्रियाकलाप को इलेक्ट्रो एनसिफेलो ग्राफ ( ई. सी. जी.) यंत्र द्वारा जाना जा सकता है और यह समझा जा सकता है कि मस्तिष्क में किस स्तर की विचारधारा प्रवाहित हो रही है।

इन दिनों विज्ञानवेत्ता मानवी मस्तिष्क पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए जिन शोधों में संलग्न हैं, जिन आविष्कारों को प्रत्यक्ष करने एवं जिन उपकरणों को विनिर्मित करने में प्रयत्नशील हैं, वे काफी जटिल हैं। उनमें यह आशंका भी है, यदि यह नियंत्रण प्रयास त्रुटिपूर्ण रह गया तो जिस पर प्रयोग किया गया है, वह मानवी सभ्यता से भिन्न किसी देवी-दानवी स्तर को अपनाकर स्वयं विचित्र सिद्ध हो सकता है और विचित्र परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। इस आशंका से किस प्रकार बचा जाए, यह पहेली शोधकर्त्ताओं को बेतरह हैरान किए हुए है।

यदि उनके आविष्कार एक बार कोई असाधारण विद्युत तरंग व्यापक क्षेत्र में फैलाकर लोगों की विचारशैली को किसी विशेष दिशा में मोड़ दें, मस्तिष्कीय संरचना एवं प्रवाह-प्रक्रिया में हेर-फेर उत्पन्न कर दें तो फिर उनका प्रभाव वंशपरंपरा बनकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता ही चला जाएगा। एक बार सरल संरचना को किसी बड़े झटके से मोड़ा-तोड़ा जा सकता है, पर बार-बार यह प्रयोग सफल नहीं होगा। गीली लकड़ी को एक बार मोड़कर किसी खास शकल का बनाया जा सकता है, पर जब वह उस स्थिति में मजबूत हो जाए तो बार-बार मोड़ना संभव न होगा। मस्तिष्कीय संरचना प्रकृति-प्रदत्त क्रम के अनुसार गीली लकड़ी की तरह है, पर पीछे जब उसे रेडियो सक्रिय ऊर्जा की भट्टी से तपाकर एक ढाँचे में ढाल दिया जाएगा तो पीछे उसमें भिन्न प्रकार के परिवर्तन कर सकना सरल न रहेगा।

प्राचीनकाल में मस्तिष्कों की संभाल-सुधार-प्रक्रिया ऐसे लोग संपन्न करते थे, जिन्होंने अपने मस्तिष्क को इसके लिए समर्थ और प्रशिक्षित बना लिया हो। योग-साधना, तपश्चर्या, प्रगाढ़ तत्त्व, चिंतन एवं परमार्थपरायणता का आश्रय लेकर किसी भी उर्वर मस्तिष्क को इस योग्य बनाया जा सकता है कि वह अपने प्राण-प्रवाह से समीपवर्त्ती लोगों को सुचिंतन के लिए उत्तेजित कर सके और सद्भावनाओं से ओत-प्रोत गति के लिए बाध्य कर सके। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि यही कार्य करते थे। अब उसे विज्ञानवेत्ता यंत्र-उपकरण के माध्यम से, विद्युत-विकरण द्वारा कार्यांवित करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

टैक्सस विश्वविद्यालय के रावर्ट थाम्सन और जेम्स मैक कौनेल वैज्ञानिकों ने प्लेनेरिया नामक जीव पर परीक्षण करके यह सिद्ध किया कि विद्युत उपकरणों की सहायता से मस्तिष्कीय क्षमता को घटाया और बढ़ाया जा सकता है। कैलीफोनिया विश्वविद्यालय के डा. एलन जेकवसन ने प्रशिक्षित चूहों के मस्तिष्क में से 'आर. एन. ए.' रसायन निकालकर अनाड़ी चूहों के मस्तिष्क में पहुँचाया तो अनाड़ी भी प्रशिक्षितों की तरह बुद्धिमान बन गए।

बुढ़ापे के साथ घटती स्मरणशक्ति की रोक-थाम करने के लिए अभी-अभी मैग्नीशियम पेमोलिन (माइलर्ट) नामक औषधि बाजार में आई है। साथ ही यह प्रयास भी जारी है कि कोई विचार मस्तिष्क पर बेतरह सवार हो गया हो तो उसे किस प्रकार भुलाया जाए। स्मृतियाँ भी यदि धुंधली न पड़े और आरंभकाल की तरह आगे भी सतेज बनी रहें तो समझना चाहिए कि एक सप्ताह में ही वह पागल हो जाएगा। मृत्युशोक जैसे आघात अपनी तीव्र स्थिति में कुछ मिनट ही रहते हैं, उसके बाद वे धुँधले और सह्य बनते जाते हैं, पर यदि वे यथावत् बने रहें तो मस्तिष्कीय चेतना को पक्षाघात ही मार जाएगा। उत्तेजित स्थिति की भाँति ही स्मृति की प्रखरता भी एक विपत्ति है, उसे यथास्थिति धूमिल करना भी अपेक्षित होता है। ऐसे रोगियों के लिए भुलाने की दवाएँ ईजाद की गई हैं।

मिशीवान विश्वविद्यालय के डा. वार्ड एग्रानोफ ने सुनहरी मछलियों पर यह प्रयोग किया कि उन्हें यदि भोजन के बाद प्यूरोमाइसिन नामक औषधि खिला दी जाए तो वे यह भूल जाती हैं कि वे भोजन कर चुकीं। कुछ कुत्तों को स्मृतिनाशक दवा खिलाई गई तो वे अपने घर और उस मालिक को भी भूल गए, जिसे वे बहुत प्यार करते थे। यह प्रयोग अभी मनुष्यों पर एक सीमा तक ही सफल न हुए हैं और दवा का असर रहने तक ही कारगर रहते हैं, पर सोचा यह भी जा रहा है कि किन्हीं प्रियजनों की मृत्यु, अपमानजनक घटना, शत्रुता या भयंकर क्षति की वित्त को विक्षुब्ध करते रहने वाली दुःखद घटनाओं को स्थाई रूप से विस्मृत कराने के लिए मस्तिष्क के उस भाग को मूर्छित कर दिया जाए, जहाँ वे जमकर बैठी हुई हों। इसी प्रकार मंदबुद्धि लोगों के लिए स्मरणशक्ति बढ़ाने के उपाय औपधि जगत में खोजे जा रहे हैं, यदि यह सफल हो सके तो छात्रों को पाठ याद करने के श्रम से छुटकारा मिल जाएगा और वे एक बार पुस्तक पढ़कर ही परीक्षा भवन में पूरे उत्साह और विश्वास के साथ प्रवेश कर सकेंगे।

खाद्य पदार्थ केवल रक्त-माँस ही नहीं बनाते, उनका सूक्ष्म अंश मस्तिष्कीय चेतना में रुझान भी उत्पन्न करता है। खाद्य पदार्थों की सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी प्रकृति का निर्धारण इसी आधार पर हुआ है कि अंततः मानवी चेतना पर उनका भावनात्मक प्रभाव क्या पड़ता है और वे चिंतन के प्रवाह को किस दिशा में मोड़ते हैं। दैनिक खाद्य पदार्थों में भक्ष्य-अभक्ष्य का विभेद भारत में इसी दृष्टि से होता रहा है। इसके अतिरिक्त यज्ञचरु, पंचामृत, सोमरस, ब्रह्मकल्प सरीखे देवहव्य भी विनिर्मित करने की प्रक्रिया भी धार्मिक कर्मकांडों के साथ संपन्न की जाती रही है, जिसका सेवन करने से मनुष्य को प्रकृति में भरे हुए दोष-दुगुणों का निष्कासन और सद्भाव-अभिवर्द्धन का उद्देश्य पूरा हो सके। देवप्रसाद वितरण के पीछे यही प्रयोजन सन्निहित है। खाद्य पदार्थों की मूलभूत सूक्ष्म सात्विकता के साथ-साथ यदि उन में मंत्रविधान एवं आत्मबल समन्वय का अन्य उपाय जोड़ दिया जाए तो वे देवहव्य भी वांछनीय विचार परिवर्तन संपन्न कर सकते हैं। मस्तिष्कीय चिकित्सा की यह अनोखी लगने वाली पद्धति प्राचीनकाल में बहुप्रचलित रही है और योगी-तपस्वियों द्वारा उसका लाभ असंख्य जनसमूह को दिया जाता रहा है।

मस्तिष्क को उद्दीप्त करने के लिए रसायनों के प्रयोग की परंपरा बहुत पुरानी है। सोमरस से लेकर मदिरा आसव, ब्राह्मी, गाँजा, चरस, भांग, अफीम, तमाखू, चाय, काफी से लेकर अब एल. एस. डी. तक की विविध मादक-प्रक्रियाओं का यही आधार है। अब मानसिक उद्दीपन को शांत और शिथिल करने के भी रासायनिक उपाय ढूँढ लिए गए हैं। ट्रक्विलाइजरों से केमिस्टों की दुकानें भरी पड़ी हैं। उनकी बिक्री दिन-दिन जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि वे औषधियाँ एक अपरिहार्य आवश्यकता बनने जा रही हैं।

राकलेण्ड स्टेट हॉस्पिटल न्यूयार्क के डॉ. नाचान क्लाइन ने सर्पगंधा बूटी से 'एजिमेलिन' नामक रसायन निकाला था। इससे उद्दीप्त मस्तिष्क को शांत करने में बहुत सफलता मिली। पीछे इस रसायन को और भी परिष्कृत करके पिप्राडोल, क्लोर प्रोमेजीन, मेप्रोवोमेट जैसी दवाओं का तांता बँध गया। अब इन शामक रसायनों के सहारे मष्तिष्क पर छाई चिंता, भय, उद्वेग, आवेश जैसी परेशानियों को एक गोली के साथ गले से नीचे उतारा जा सकता है और आराम के साथ चैन की नींद सोया जा सकता है। पूर्वकाल में दुःख-उद्वेगों से संतप्त लोग वैराग्य धारण करते थे और तप करके वनवासी बनते थे; भजन, पूजन करते थे। अब यह सारी आवश्यकता 'ट्रेंक्विलाइजर'  की शामक गोलियाँ आसानी से पूरी कर सकती हैं। हो सकता है अगले दिनों झगड़ालू पतियों की पत्नियाँ चाय के साथ जरा-सा शामक रसायन खिलाकर उनकी बक-झक से पीछा छुड़ा लिया करें।

शरीरशास्त्रियों के विश्लेषण के अनुसार क्रोध, आवेश, चिड़चिड़ापन और विक्षोभ एक प्रकार का शारीरिक रोग है, जो यूरिक ऐसिड की मात्रा बढ़ जाने के कारण उत्पन्न होता है। सीगामिलर, रीजेन ब्लूम, केली आदि वैज्ञानिकों के कथनानुसार क्रोधी मनुष्यों में बढ़े हुए यूरिक ऐसिड का कारण एक हाइपोजैन्थिन ग्वागिन फोस्फोराइवोसिल ट्रान्सफरेस नामक ऐंजाइन की कमी पड़ जाना है। यह रसायन अक्सर पुरुषों में अधिक घट जाता है। स्त्रियों में इसकी उतनी कमी नहीं पड़ती। यही कारण है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष अधिक क्रोधी और चिड़चिड़े पाए जाते हैं। यदि यह ऐंजाइम शरीर में प्रविष्ट कराया जा सके तो यूरिक ऐसिड की मात्रा घट सकती है और क्रोधी स्वभाव का मनुष्य हँसमुख बन सकता है।

सिर में चोट लगने से स्मृति गायब हो जाने की अथवा अनिद्रा, मंदबुद्धि जैसे संकट उत्पन्न— उठ खड़े होने की घटनाएँ घटित होती रहती हैं। किसी प्रकार, किसी विशिष्ट विद्युत आघात से कालिदास जैसे मंदबुद्धि अत्यंत प्रखर, कुशाग्र बुद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

आदमी का सिर एक प्रकार का जादुई भंडार है। इसमें इतनी जानकारियाँ भरी रहती हैं कि यदि किसी मानवकृत कंप्यूटर में उतना ज्ञान संग्रह किया जाए तो धरती के क्षेत्रफल जितने चुंबकीय टैप की उसमें आवश्यकता पड़ेगी, किंतु इसे उभारना, उत्तेजित करना डी. एन. ए. (डी-ऑक्सीराइबो न्यूक्लिक ऐसिड) के या आर. एन. ए. (राइबो न्यूक्लिक ऐसिड) के एक इंजेक्शन से ही संभव हो सकता है। स्वीडन के गोडेनवर्ग युनिवर्सिटी के प्राध्यापक होलगर हाइडेन ने यह सिद्ध किया है कि मानवी मस्तिष्क की स्थिति पत्थर की लकीर नहीं है, उसकी क्षमता को रासायनिक पदार्थों की सहायता से घटाया-बढ़ाया और सुधारा-बिगाड़ा जा सकता है।

मानवी मस्तिष्क की मोड़-तोड़ करने के लिए भौतिकी ऊर्जा-प्रवाह का उपयोग करने के खतरे समझे जाने चाहिए। चेतन के ऊपर जड़ का आधिपत्य जमाने का प्रयोजन यदि सफल हो गया तो देर-सबेर में वह खतरा ही सामने आएगा, जिसमें सत्ता के लालची सारी विश्वचेतना को अपनी मानसिक दासता में जकड़ लें। जिनके अंतःकरण आज आदि से अंत तक भौतिकवादी स्वार्थपरता में निमग्न हैं, वे इसी परिधि में सोचेंगे और इसी प्रकार के कदम बढ़ाएँगे। मस्तिष्कीय चेतना पर नियंत्रण करने की सफलता अंततः मानवी सभ्यता के उत्कर्ष भाग को हनन ही करेगी, इसलिए इस प्रयोग को उसी स्तर पर विकसित किया जाना चाहिए, जिस प्रकार कि प्राचीनकाल में किया जाता रहा है। कुछ मनस्वी लोग अपने मस्तिष्क और व्यक्तित्व को ही ऐसा संयंत्र बनाएँ, जिसमें लोक-मानस को उत्कृष्टता की दिशा में मोड़ने की क्षमता भरी हुई हो। मस्तिष्कीय नियंत्रण पर व्यापक सफलता यदि प्राप्त करनी ही है तो वह आत्मविज्ञानियों द्वारा उपलब्ध की जानी चाहिए।


मनुष्य शरीर की बिजली और उसके चमत्कार

मनुष्य एक प्रकार का अंडा है, जिसके भीतरी केंद्र में जर्दी रहती है और चारों ओर सफेद मांसल पदार्थ। मनुष्य के शरीर को जर्दी कह सकते हैं और उसके चारों ओर फैले हुए तेजोवलय को सफेदी कह सकते हैं। इस दृश्य और अदृश्य दोनों को मिलाकर एक पूर्ण व्यक्तित्व बनता है। असल में यह व्याख्या भी त्रुटिपूर्ण है। मनुष्य जितने क्षेत्र में अपना प्रभाव फेंक सकता है और जितने क्षेत्र से प्रभाव ग्रहण कर सकता, उतने को मनुष्य का संबंध क्षेत्र ही कहा जाएगा। यह परिधि असीम है, इसलिए मनुष्य को भी असीम या अनंत ही माना गया है।

पृथ्वी का दृश्य-पिंड छोटा है, पर उसका वायुमंडल, चुंबकत्व, रेडियो-क्षेत्र, अंतर्गही आदान-प्रदान की परिधि को मिलाकर देखा जाए तो लगेगा कि ब्रह्मांड परिवार की विशालकाय मशीन का वह एक सुसंबद्ध पुर्जामात्र है। विश्व परिवार से पृथक होकर पृथ्वी का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी विश्वचेतना की शृंखला की एक कड़ीमात्र ही है। घड़ी का छोटा पुर्जा तभी तक उपयोगी है, जब तक वह घड़ी के साथ जुड़ा है, अलग रहकर वह कूड़ा-कचरामात्र है। मनुष्य अपने को एकाकी मानता भले ही रहे, पर तथ्य यह है कि उसका वैभव, सुख एवं प्रगति- प्रयास विश्वचेतना पर ही पूर्णतया निर्भर हैं। आत्मा— उसका कलेवर शरीर— शरीर के इर्द-गिर्द छाया हुआ तेजोवलय— तेजोवलय में सन्निहित सूक्ष्मशक्तियों की हलचलों की अकल्पनीय परिधि— यह सब मिलकर ही मनुष्य की विशालता समझी जानी चाहिए। कायकलेवर की ससीमता और विश्व-ब्रह्मांड की असीमता के बीच की कड़ी यह तेजोवलय ही है, जो मनुष्य के चारों ओर छाया रहता है। आँखों से दीखते हुए भी उसकी भूमिका इतनी आश्चर्यजनक है कि उसे दृश्यकाया से भी अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए। शरीर मर जाता है; पर यह तेजोवलय फिर भी विद्यमान रहता है। भूत-प्रेतों के रूप में उसी की हलचलें देखी जाती हैं। हो सकता है, कोई व्यक्ति कहीं जन्म ले चुका हो और उसका तेजोवलय स्वतंत्र रूप से काम कर रहा हो, प्रेतात्मा की भूमिका निबाह रहा हो ।

धरती और आकाश में काम करने वाली दृश्य एवं अदृश्य शक्तियाँ अपने आप में एकाकी अथवा पूर्ण नहीं हैं। वे दूसरों के अनुदान, संयोग, समन्वय से बनी हैं। अणु की सत्ता जिस रूप में सामने आती है, वह उसकी आपकी एकाकी कमाई नहीं है। उसमें भूतल ही नहीं, अन्य-अन्य लोकों का भी अद्भुत अनुदान जुड़ा होता है अन्यथा आणविक गतिविधियाँ मात्र हलचल बनकर रह जाएँ, उनके द्वारा कोई उत्साहवर्द्धक प्रयोजन पूरा न हो सके।

यही बात मानवी व्यक्तित्व के बारे में भी है। जीवकोषों से विनिर्मित यह घटक यदि अनेकों दूरववर्त्ती सत्ताओं का कृपापात्र न हो तो संभवतः वह क्षुद्र जीवधारी से अधिक कुछ भी न बन पाता।

जड़ अणुओं की गति एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न करती है, उसमें जब चेतनसत्ता का समावेश होता है, तो जीवन का— जीवधारियों का आविर्भाव होता है। ध्रुवों के क्षेत्र में चुंबकीय तूफान उठते रहते हैं,  जिनका प्रकाश ‘अरोरा बोरीलिस’ तेजोवलय के रूप में छाया रहता है। इसे पृथ्वी के साथ अन्य ग्रहों की सूक्ष्म हलचलों का मिलन-स्पंदन कह सकते हैं। यही है, वह पृथ्वी का ग्रहों के साथ प्रणय-परिणय, जिसके फलस्वरूप कुंती के पाँच पुत्रों की तरह पाँच की विविध-विध हलचलें जन्म लेती हैं और उनके क्रियाकलाप एक-से-एक बढ़कर अद्भुत और शक्तिशाली बने हुए सामने आते रहते हैं।

समुद्र का खारा जल जब धातु विनिर्मित नौकाओं तथा जलयानों से टकराता है तो उससे विद्युत तरंगे उत्पन्न होती हैं। नौकाविज्ञानी इस अनायास होते रहने वाले विद्युत उत्पादन से परिचित रहते हैं और उसकी हानिकारक-लाभदायक प्रतिक्रिया से सतर्क रहते हैं।

ठीक इसी प्रकार शरीरगत जीवाणु भी ईथर एवं वायुमंडल में भरे विद्युत-प्रवाह से टकराते रहते हैं और विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जीवकोषों में उन धातुओं तथा रसायनों की समुचित मात्रा रहती है, जो आघातों से उत्तेजित होकर विद्युत-प्रवाह उत्पन्न कर सके। यही कारण है, हर मनुष्य में गरमी ही नहीं रहती; वरन विद्युत-प्रवाह की अनेक स्तरों की धाराएँ बहती रहती हैं। इन्हें यंत्रों द्वारा भली प्रकार परखा-जाना जा सकता है।

मानवी चुंबकत्व विश्वव्यापी ब्रह्मसत्ता के साथ एक तंतुनाल द्वारा जुड़ा रहता है। विष्णु की नाभि में से कमल का उत्पन्न होना और उसके पुष्प पर ब्रह्मा जी का अवतरण, परमात्मा और आत्मा के बीच संबंध-सूत्र की इसी शृंखला का अलंकारिक चित्रण है। गर्भस्थ बालक माता के साथ इसी नालतंतु द्वारा जुड़ा रहता है। नाभि को मध्यकेंद्र माना गया है। नवजात शिशु का नाभि-नाल प्रसव के उपरांत ही बाहर आता है और उसे काटकर दोनों को पृथक करना पड़ता है।

मनुष्य के कान सीमित स्तर के ध्वनि-प्रवाह को ही सुनते हैं; किंतु पशुओं में ऐसी चेतना पाई जाती है, जिसके आधार पर वे उन ध्वनियों को भी सुन सकें जिन्हें सुनने में मनुष्य असमर्थ रहता है। यंत्रों द्वारा ऐसी सीटी बजाई जा सकती है, जिसे मनुष्य तो अनुभव न करें, पर कुत्ता आसानी से सुन सके और उसकी बुलाहट पर दौड़ा आवे। मालिक की आवाज को वह इतनी दूर से सुन सकता है, जितना कि सामान्य मनुष्यों के लिए सुनना सर्वथा असंभव है।

मेज पर एक कोरा कागज बिछाइए। उसके ऊपर एक चुंबक रखिए। एक फुट की ऊँचाई से लोहे का बुरादा धीरे-धीरे बरसाइए, देखा जाएगा कि लोहकण एक विशिष्ट क्रम के अनुसार गिर रहे हैं। यह क्रम चुंबक की बल-रेखाओं के अनुरूप होगा। कागज पर चुंबक की अंतःस्थिति कागज पर गिरे लोहे के बुरादे से भली प्रकार स्पष्ट हो रही होगी।

मनुष्य भी एक प्रकार का चुंबक है, वह अंतरिक्ष से बरसने वाले अनेक भले-बुरे अनुदानों को अपनी आंतरिक स्थिति के अनुरूप स्वीकार-अस्वीकार करता है। वह जैसा कुछ स्वयं है, उसी का चुंबकत्व उसे इस विश्व-ब्रह्मांड में अपनी जैसी सूक्ष्मधारा-प्रवाह से अनायास ही संपन्न, सज्जित करता रहता है।

शरीरविज्ञानियों का मत है कि सामान्यतया किसी मनुष्य की मृत्यु जब घोषित की जाती है, तब भी उसकी पूर्ण मृत्यु नहीं होती। रक्त-प्रवाह रुक जाने के बाद प्रायः 5 मिनट के बाद मस्तिष्क अपना काम करना बंद करता है, इसीलिए कृत्रिम श्वास-प्रश्वास-क्रिया करके मृततुल्य व्यक्ति के हृदय की भाँति पुनः आरंभ कराने का प्रयत्न किया जाता है। मृत्यु क्रमिक होती है, पहले मस्तिष्क मरता है, फिर अन्य अवयव मरते हैं। सबसे अंत में बाल तथा नाखून मरते हैं। फ्रांस राज्यक्रांति के समय एक विद्रोही का सिर काटा गया। सरकारी रिकार्ड में उल्लेख है कि कटा हुआ सिर बहुत देर तक इस तरह होठ और मुँह चलाता रहा, मानो वह कुछ कह रहा हो। पुराने जमाने में जब तलवारों से लड़ाइयाँ लड़ी जाती थी। कटे हुए सिर वाले धड़ उठ खड़े होते थे और हाथ में लगी तलवारों को हवा में चलाते थे। इसी प्रकार कटे हुए सिर भी उछलते देखे गए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कानूनी मृत्यु के बाद भी किसी रूप में देर तक जीवन बना रहता है। मरणोपरांत भी क्रियाकलाप चलते रहने वाली इस सत्ता को आत्मवादी तेजोवलय ही मानते रहे हैं।

मस्तिष्क के मध्यभाग से प्रकाशकणों का एक फब्बारा-सा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एक वृत्त बनाती हैं और फिर अपने मूल उद्गम में लौट जाती हैं। यह रेडियो-प्रसारण और संग्रहण जैसी प्रक्रिया है। ब्रह्मरंध्र से छूटने वाली ऊर्जा अपने भीतर छिपी हुई भावस्थिति को विश्व-ब्रह्मांड में ईथर कंपनों द्वारा प्रवाहित करती रहती है। इस प्रकार मनुष्य अपनी चेतना का परिचय और प्रभाव समस्त संसार में फेंकता रहता है। फुहारे की लौटती हुई धाराएँ अपने साथ विश्वव्यापी असीम ज्ञान की नवीनतम घटनात्मक तथा भावनात्मक जानकारियाँ लेकर लौटती हैं, यदि उन्हें ठीक तरह समझा जा सके, ग्रहण किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति भूतकालीन और वर्त्तमानकाल की अत्यंत सुविस्तृत और महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है। व्यक्ति में प्रवाह ग्रहण करने की और प्रसारित करने की जो क्षमता है, उसका माध्यम यह ब्रह्मरंध्र अवस्थित ध्रुव-संस्थान ही है। पृथ्वी पर अन्य ग्रहों का प्रचुर अनुदान आता है तथा उसकी विशेषताएँ अन्यत्र चली जाती हैं। यह आदान-प्रदान का कार्य ध्रुवकेंद्रों द्वारा संपन्न होता है। शरीर के भी दो ध्रुव हैं, एक मस्तिष्क, दूसरा जननगह्वर। चेतनात्मक विकरण मस्तिष्क से और भक्तिपरक उर्जा-प्रवाह जननगह्वर से संबंधित है। सूक्ष्म आदान-प्रदान की अतिमहत्त्वपूर्ण प्रक्रिया इन्हीं केंद्र के माध्यम से संचालित होती है।

शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप तेजोवलय की स्थिरता बनती है। यदि स्थिति बदलने लगें तो प्रकाश-पुँज की स्थिति भी बदल जाएगी। इतना ही नहीं समय-समय पर मनुष्य के बदलते हुए स्वभाव तथा चिंतन स्तर के अनुरूप उसमें सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं। सूक्ष्मदर्शी उसकी भिन्नताओं को रंग बदलते हुए परिवर्तनों के रूप में देख सकते हैं। शांति और सज्जनता की मनःस्थिति हलके नीले रंग में देखी जाएगी। विनोदी, कामुक, सत्तावान, वैभवशाली, विशुद्ध व्यवहार, कुशलस्तर की मनोभूमि पीले रंग की होती है। क्रोधी, अहंकारी, क्रूर, निष्ठुर, स्वार्थी, हठी और मूर्ख मनुष्य लालवर्ण के तेजोवलय से घिरे रहते हैं, हरा रंग सृजनात्मक एवं कलात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है। गहरा बैंगनी चंचलता और अस्थिर मति का प्रतीक है। धार्मिक ईश्वरभक्त और सदाचारी व्यक्तियों की आभा केशरिया रंग की होती है। इसी प्रकार विभिन्न रंगों का मिश्रण मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव के परिवर्तनों के अनुसार बदलता रहता है। यह तेजोवलय सदा स्थिर नहीं रहता। बदलती हुई मनोवृत्ति प्रकाश-पुँज के रंगों में परिवर्तन कर देती है। यह रंग स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं। मनोभूमि में होने वाले परिवर्तन शरीर से निसृत होते रहने वाले ऊर्जा कंपनों की घटती-बढ़ती संख्या के आधार पर आँखों को अनुभव होते हैं। वैज्ञानिक इन्हें ‘फ्रीक्वेन्सी आफ दी वेब्स ’ कहते हैं।

दिव्य दर्शन (क्लेयर वाइन्स), दिव्य अनुभव (साइकोमैन्ट्री), प्रभाव-प्रेषण (टेलिपैथी), संकल्प प्रयोग (सजैशन) जैसे प्रयोग थोड़ी आत्मशक्ति विकसित होते ही आसानी से किए जा सकते हैं। इन विद्याओं पर पिछले दिनों से काफी शोधकार्य होता चला आ रहा है और उन प्रयासों के फलस्वरूप उपयोगी निष्कर्ष सामने आए हैं। परामनोविज्ञान, अतींद्रिय विज्ञान, मैटाफिजिक्स जैसी चेतनात्मक विद्याएँ भी अब रेडियो विज्ञान तथा इलेक्ट्रोनिक्स की ही तरह विकसित हो रही हैं। अचेतन मन की सामर्थ्य के संबंध में जैसे-जैसे रहस्यमय जानकारियों के परत खुलते जाते हैं, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता जाता है कि नर-पशु लगने वाला मनुष्य वस्तुतः असीम और अनंत क्षमताओं का भंडार है। कठिनाई इतनी भर है कि उसकी अधिकांश विकृतियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में पड़ी हैं। यदि उन्हें खोजा जाएगा और परिपुष्ट किया जा सके तो पेट और प्रजनन में संलग्न नर-कीटक एक प्रचंड शक्तिकेंद्र की तरह अपनी सत्ता और महत्ता का परिचय दे सकता है।


(कहानी)

मुनि कौत्स ने जल से आधा भरा कमंडल सामने प्रस्तुत करते हुए ब्रह्मचारियों से पूछा— “बताओ यह भरा है या खाली।“

उत्तर देते हुए छात्रों में से किसी ने उसे आधा भरा बताया, किसी ने आधा खाली।

मुनि ने समझाया— “तात! यही दृष्टिभ्रम संसार में संव्याप्त है। जो रिक्तता के अभाव को देखते-सोचते हैं, वे दुखित-उद्विग्न रहते हैं और जिनने उपलब्धियों को समझा, उन्हें आज संतोष करने और कल की आशा रखने के लिए आधार मिल जाएगा।”

“कमंडल कितना खाली है यह मत सोचो; यही देखो कि वह कितना अधिक भरा हुआ है।”


उपगुप्त का आत्मदान

"लोक की मुझे कोई चिंता नहीं तात! अपना बाल्यकाल मैंने ज्ञानार्जान में बिताया, शील-सौजन्य खोया नहीं, फलत: जो इंद्रियाँ स्वेच्छाचारिणी होकर व्यक्ति को पतन की ओर खींच ले जाती हैं, वह मेरी सहयोगिनी बनीं, मैं उनका स्वामी बना। मेरी आध्यात्मिक उपलब्धियाँ, मेरा समर्थ जीवन और इस अवस्था तक सरस, सफल, स्निग्ध जीवन इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। फिर मुझे अपने लोक की चिंता क्यों होने लगी।" आचार्य शाणवास ने यह कहते-कहते पुनः एक दीर्घ निःश्वास छोड़ी और अंतरिक्ष की गहराइयों में अपनी दृष्टि जमाकर पुन: कुछ सोचने लगे। गृहस्थ मैंने योग-साधना की भाँति बिताया। बात उस समय की है जब उपगुप्त स्नातक थे। उनकी संपन्नता से अधिक उनके सौंदर्य की घर-घर चर्चा हुआ करती, राजकुमारियाँ तक उपगुप्त को वरण करने का स्वप्न देखा करती थीं।

उपगुप्त ने आचार्य का शीश उठाया, उन्हें औषधिपान कराते हुए कहा — भगवन! तब फिर क्या आप परलोक की बात सोच रहे हैं? आपका जीवनक्रम इतना भव्य रहा है कि परलोक के लिए चिंता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता?”

"हाँ वत्स!" — आचार्य शाणवास ने उत्तर दिया। “मैंने जीवन में किसी का जी नहीं दुखाया। प्रतारणा का भाव भी कभी मेरे समीप नहीं आया। अपने तप-साधन द्वारा अर्जित ज्ञान और शक्ति का एक-एक कण मैंने दीन-दुःखी आत्माओं के उत्थान में लगा दिया। परमात्मा न केवल वाणी; वरन मेरे रोम-रोम में व्याप्त है, तब फिर मैं परलोक के प्रति अनाश्वस्त होऊँ, यह कैसे हो सकता है?”

“योग्य समझें तो अपनी व्यथा को यहीं कहते हुए जाएँ, देव! हम अकिंचन आपकी कोई भी इच्छा पूर्ण कर सकें तो यह हमारे लिए सौभाग्य की तो बात होगी ही, हमारा जीवन भी धन्य हो जाएगा?”

इतना कहकर उपगुप्त उनके समीप ही आसन पर बैठकर आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। सैकड़ों नेत्र निर्निमेष आचार्यश्री के प्रभामय मुखमंडल की ओर देख रहे थे। आचार्यश्री शाणवास अभी भी उसी चिंतन मुद्रा में थे। शिष्यों की जिज्ञासाओं को अधीर होते देख शाणवास किंचित मुस्कराए, मानो दबता हुआ सूर्य अब भी अपनी प्रखरता सिद्ध करना चाहता हो।

दृष्टि में एक क्षण करुणा के साथ आशा का समन्वय परिलक्षित प्रतीत हुआ। शाणवास ने अर्थमीलित दृष्टि को पूरा खोल दिया, शिष्य-समुदाय कुछ और आगे बढ़ आया। अब महर्षि कहने लगे— “अवुस! मेरे जीवन की साधना अब अपने प्रभाव में आ रही है। जनमानस को मैं जिस दिशा में ढालना चाहता था, धर्मतंत्र को जो तेजस्वी और प्रभावशाली स्वरूप देना चाहता था, वह परिस्थितियाँ अब उभरकर आईं, जब मुझे अपना शरीर त्याग करना पड़ रहा है। मृत्यु से प्यार करने वाले तुम्हारे वृद्ध आचार्य के मन में कुछ भी दुःख और क्षोभ नहीं, किंतु मानवता का भविष्य मुझे पीड़ित कर रहा है। एक ही आशंका है, धर्मतंत्र कहीं अपने प्रौढ़काल में नष्ट या पथभ्रष्ट तो नहीं हो जाएगा?”

शिष्यगण चुप हो गए। किसी से कुछ कहते नहीं बन पड़ रहा था। अब आचार्यश्री अपना उत्तर चाहते थे और शिष्यगण अपना बचाव। तभी उपगुप्त खड़े हुए और बोले— “गुरुदेव! आपकी अंतर्वेदना व्यर्थ नहीं जाएगी, मैं विश्वास दिलाता हूँ कि सांसारिक सुख और आकर्षणों से अप्रभावित रहकर आजीवन अविवाहित रहकर लोक-मंगल के कार्य में ही रत रहूँगा। धार्मिक पुनर्प्रतिष्ठा ही आज से मेरा जीवन लक्ष्य होगी?”

शाणवास की आँखें चमक उठीं। आश्वस्त आचार्य ने धीरे-धीरे आँखें मूंद लीं, सदैव के लिए आँखें मूंद लीं। उनके मुखमंडल पर चिंता-उद्विग्नता नहीं, संतोष प्रतिभासित हो रहा था कि मेरे पीछे आर्यपरंपरा का निर्वाह यथावत चलता रहेगा।


एक सज्जनता अपनाएँ, सहृदय बनें

प्रेम अंतःकरण का अमृत है। जिनकी भावनाएँ स्नेहसिक्त होती हैं, वे उन अनुभूतियों से आनंदित रहते हैं और दूसरों पर उसके छींटे छिड़ककर उन्हें उल्लास प्रदान करते है। प्रेम एक चुंबक है, जिससे सहवर्गी तत्त्व अनायास ही खिचते चले जाते हैं। यदि प्रेम-भावना के साथ आदर्शवादिता भी जुड़ी हुई हो तो अपना संपर्क-क्षेत्र श्रेष्ठ व्यक्तित्वों, श्रेष्ठ तत्त्वों के साथ सघन होता चला जाएगा। बुरी प्रकृति के, किंतु प्रेमी स्वभाव के लोग, बुरी चांडाल-चौकड़ी के सरगना बने हुए देखे जाते हैं, यहीं बात अच्छी प्रकृति पर भी लागू होती है, मधुरता और ममता के साथ यदि सज्जनता भी जुड़ी हुई हो तो फिर निश्चय ही अपने को देवसमाज के सम्मानित सदस्य के रूप में पाया जाएगा।

दर्पण में अपनी ही छाया दिखाई पड़ती है। कुरूप छाया दृष्टिगोचर हो तो दर्पण पर क्रुद्ध होना बेकार है। अपनी मुखाकृति जैसी होगी, वैसी ही सूरत सामने खड़ी होगी। दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने में आवश्यक हेर-फेर करना होगा, अन्यथा मनमर्जी की दुनिया देखने के सपने कभी साकार न हो सकेंगे। अक्सर होता यह है कि अपने दुर्गुणों की प्रतिक्रिया ही अवांछनीय परिस्थितियों के रूप में इर्द-गिर्द घूमती रहती है। यदि अपने में आवश्यक सुधार कर लिया जाए तो दूसरों में भी उस परिवर्तन का आभास सहज ही होने लगेगा।

रूखे, नीरस और स्वार्थी व्यक्ति दूसरों से सघन सत्कार एवं गहरा सहयोग प्राप्त नहीं कर सकते। अपनी असलियत यदि खोटों से भरी है तो वह दूसरों को भी उदासीन-असहयोग एवं उपेक्षा-अवज्ञा करने वाला बना देगी। सच्चाई और आत्मीयता की विशेषताएँ जिनमें भरी रहती हैं, आमतौर से उन्हें दूसरों की शिकायतें कम ही करनी पड़ती हैं। सच तो यह है कि जिन्हें दूसरे लोग अनुपयुक्त मानते हैं, वे भी उनके साथ अनुकूलता और सद्भावना का परिचय देते देखे जाते हैं।

आलसी और अस्त-व्यस्त लड़के ही प्रश्न पत्र कड़ा होने से लेकर, शिक्षा अथवा शिक्षकों को दोष देते हैं; जबकि उन्हीं परिस्थितियों में दूसरे परिश्रमी और मनोयोग से पढ़ने वाले अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं। कठिनाइयों से अवरोध तो होता है, पर इतना नहीं कि प्रबल-पुरुषार्थ से उनका समाधान न हो सके। जिंदगी में कटुता एवं विषमता के अवसर कम नहीं होते, पर उन सबसे बड़ा संकट यह है कि कदम-कदम पर अमंगल की आशंका से ग्रसित रहा जाए। हीनता, निराशा, भीरुता और अशुभ की कल्पनाएँ मनुष्य का स्वत्व निचोड़ लेती है, वह आंतरिक दृष्टि से खोखला एवं कुरूप बन जाता है। ऐसी मनःस्थिति को देखकर समीप आई हुई सफलता उलटे कदम वापिस लौट जाती है।

व्यक्तित्व का वजन बढ़ाने में बहुमूल्य साधनों का भी महत्त्व हो सकता है, पर निश्चित रूप से वह उन पर अवलंबित नहीं है। जिसके पास अमीरी प्रदर्शित करने वाला ठाठ-बाट है, लोग सहज ही उसके बड़प्पन को आँकते हैं, पर दूसरा पक्ष यह भी है कि उच्चस्तरीय व्यक्तित्व को अभावग्रस्त स्थिति में भी पूजा जाता है। संतो और मनीषियों की यही परंपरा रही है। संपत्ति-साधनों से रहित होते हुए भी उनके सद्गुणों को समझा गया और उन्हें श्रद्धा के साथ नमन किया गया। अमीरी का ठाठ-बाट आरंभिक प्रभाव छोड़ता है, उसके चका-चौंध में हतप्रभ होकर लोग सोचते हैं, जिसके पास इतनी दौलत है कि वह लापरवाही के साथ खरच कर सके, वह जरुर ही कोई भाग्यवान होना चाहिए, पर असलियत खुलते देर नहीं लगती। दुर्गुणी व्यक्ति इतनी उलझनों से उलझा होता है कि निकट आने पर गरीब मनुष्य भी अपनी तुलना में उसे कहीं अधिक दुर्भाग्यग्रस्त पाता है। गुणों की गरिमा चिरस्थाई है, पर उसकी अनुभूति देर में और गहरा संपर्क बनने पर ही होती है। इतना होते हुए भी उससे उत्पन्न श्रद्धा प्रतिक्रिया चिरस्थाई होती है और गहरी भी। इसके विपरीत चेहरे को चमक, वाचालता एवं अमीरी के ठाठ-बाट के कारण आरंभ में ही तत्काल उत्पन्न होने वाला प्रभाव कुछ ही देर में तिरोहित होने लगता है और उसका अंत होते देर नहीं लगती। व्यक्तित्व की गरिमा और जीवन स्तर की महिमा बढ़ाने के लिए सद्गुणों की संपदा संचय करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

जीवनक्रम में प्रामाणिकता का समावेश ‘सादा जीवन उच्चविचार’ का आदर्श अपनाने से ही हो सकता है। सादगी शालीनता की निशानी है। उद्धत वेश बनाकर या भड़कीला ठाठ-वाट जमाकर दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने या धाक जमाने की बालचेष्टा में कितने ही व्यक्ति बहुत धन और समय खरच करते हैं और तरह-तरह को विडंबनाएँ आए दिन रचते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि सामान्य मनुष्य के भीतर भी एक ऐसी विशेषता रहती है, जिसके आधार पर उसे वस्तुस्थिति समझने में देर नहीं लगती। जिस प्रकार शारीरिक रुग्णना को कीमती पोशाक के भीतर भी छिपाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार ठाठ-वाट का झीना आवरण भीतरी दुर्बलताओं को छिपाने में सफल नहीं होता। दंभ के आधार पर बड़ा आदमी बनने के प्रयास जब प्रकट होते हैं तो उनकी दुर्गंध से घृणा ही उत्पन्न होती है और दंभी व्यक्ति को बड़त्पन प्राप्त होना तो दूर, उस प्रामाणिकता से भी वंचित होना पड़ता है, जो सामान्य लोगों को भी सहज-स्वाभाविक रूप से उपलब्ध रहती है।

जितना समय, धन और मस्तिष्क बड़प्पन का ढोंग रचने में खरच किया जाता है, उसकी उपेक्षा कहीं अधिक प्रयत्न से वास्तविकता से भरी महानता कमाई जा सकती है। सादगी में यदि स्वच्छता और व्यवस्था जुड़ी हुई हो तो वह कम खरच की होते हुए भी मंहगे मोल पर खरीदी गई ‘अमीरी’ की अपेक्षा कहीं अधिक वजनदार सिद्ध होती हैं।

दूसरों को प्रभावित करने के लिए प्रदर्शन के साधन जुटा लेना पर्याप्त नहीं, किसी को चका-चौंध से क्षणभर के लिए चमत्कृत तो किया जा सकता है, पर श्रद्धा और विश्वास से भरा सम्मान प्राप्त करने के लिए चरित्र और चिंतन की गहराई ही काम आती है। अतिभावुकों की बात अलग है, सामान्यतया विश्वास उपलब्ध करने के लिए प्रामाणिकता की कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। इस अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण वही हो सकता है, जिसने आदर्शो को आग में तपाकर अपने व्यक्तित्व को प्रखर एवं परिपक्व बनाया है। इस मार्ग पर चलते हुए ‘बड़ा आदमी’ बना नहीं जाता है।

व्यवहार कुशलता, सहनशीलता, मधुरता और उदारता का समन्वय व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण उत्पन्न करता है, जिससे अपने संबंध, संपर्क, परिवार को स्नेह-सोहार्द्र के बंधनों में बाँधकर रखा जा सकता है। अभावग्रस्त परिवारों में भी यदि ऐसा स्नेह-सौजन्य हो तो वहाँ स्वर्ग जैसी सरसता बरसती है और अभावजन्य असुविधाओं का पता भी नहीं चलता। इसके विपरीत प्रचुर साधनसंपन्न लोग भी दोष-दुर्गुणों से ग्रसित रहने के कारण खिन्न और क्षुब्ध रहते हैं। स्वार्थपरता और संकीर्णता की दुष्प्रवृत्तियाँ जहाँ, जितनी मात्रा में बड़ी-चढ़ी होंगी, वहाँ नारकीय वातावरण उतने ही विस्तार के साथ बिखरा होगा। प्रसन्नता और प्रामाणिकता दोनों ही सद्भावसंपन्न वातावरण में ही उत्पन्न होती, बरती और चिरस्थाई रहती हैं।

दया और सहानुभूति में, आनंद का रहस्य छिपा पड़ा है। मन में जितनी स्नेहसिक्तता कम होती है, वचन उतने ही रूखे और कर्कश निकलते हैं। साँप की तरह फुसकारने वाले और जलते पलाश की तरह चिनगारियाँ बिखेरने वाले कटुभाषी व्यक्ति हर जगह पाए जाते हैं। वे न केवल अपने को; वरन दूसरों को भी क्षुब्ध करते हैं।

जड़े दिखाई नहीं पड़ती, पर पेड़ का अस्तित्व उन्हीं पर निर्भर रहता है। जीवन की जड़े कर्त्तव्यपालन के तंतुओं के रूप में बिखरी हुई देखी जा सकती हैं। प्रेम के जल से इन्हें सींचा जाता है और आत्मसंयम की खाद पाकर वे परिपुष्ट होती हैं। जीवन का वटवृक्ष कितना विशाल, कितना हरित और कितना सघन होता है, यह इस बात पर निर्भर है कि उसकी जड़ें सींचने में कितना प्रयास किया गया।

मिट्टी का बरतन खरीदने वाला उसे बजाकर परखता है कि वह कहीं से फूटा तो नहीं है। फूटा होगा तो बजाने पर उसकी आवाज ही वस्तुस्थिति बता देती है। जीभ से निकलने वाले शब्द किसी व्यक्ति के फूटे या रद्दी होने की बात निरंतर प्रकट करते रहते हैं। नीरस व्यक्ति ही कर्कश शब्द बोल सकते हैं। जिस व्यक्तित्व की जड़ें गहरी हैं, उसकी वाणी ऐसे शब्द निसृत करती है जो वक्ता के गौरव को बढ़ाएँ और सुनने वाले में उत्साह उत्पन्न करें। सुसंस्कृत व्यक्ति अपनी वाणी को संस्कारित करते हैं और मतभेद अथवा क्षोभ उत्पन्न होने का अवसर आने पर भी वाणी को कुत्सित नहीं ही होने देते।

सच्ची बात लोगों को कटु लगती है, ऐसा कहा-सुना जाता है, पर यह अंशतः ही सत्य है। जिनके स्वार्थों पर सत्य के प्रकटीकरण से सीधी चोट पहुँचती है, ऐसे लोग सही कथन पर रुष्ट भी हो सकते हैं, पर यदि बोलने की शैली में स्नेह-सद्भावना मिली है और जिससे कहा जा रहा है, उसके सम्मान की रक्षा का भी ध्यान रखा जाए तो सत्यवचन कभी संकट उत्पन्न नहीं करता। प्रेम मिश्रित सत्य यदि सद्भावनापूर्वक सुधार की आशा से कहा गया है, उसमें समाधान एवं सुझाव है, तो कोई कारण नहीं कि किसी के मन पर उसकी चोट पहुँचे और शत्रुता उत्पन्न होने का संकट उत्पन्न हो। किसी को यह कहा जाए कि तुमने अनीति से धन अर्जित किया है और कृपणतापूर्वक जोड़ा है तो उचित न होगा। यह कहना ज्यादा अच्छा है कि आपने जो कमाया है, उसका श्रेष्ठ उपयोग यही हो सकता है कि उसका एक महत्त्वपूर्ण अंश आप लोक-मंगल के कार्यों में लगाकर श्रेय के भागी बनें। इससे चोट पहुँचाएँ बिना सुझाव देकर वह श्रेष्ठ हल उपस्थित किया जा सकता है, जिसके आधार पर वर्त्तमान स्थिति में जो सर्वोत्तम हो सकता है, उसे किया जा सके।

जीवन की सफलता और सार्थकता का भवन छोटे-छोटे सद्गुणों की ईटों और सतर्कता के गारे चूने में चूना जाता है, यदि हम जीवन को महत्त्वहीन न समझें और उसके सदुपयोग का समुचित ध्यान रखें तो उस लक्ष्य तक सहज ही पहुँच सकते हैं, जिसके लिए यह मनुष्य जीवन की महान विभूति उपलब्ध हुई है।


सद्वाक्य

यह संभव नहीं कि कोई व्यक्ति पशुप्रवृत्तियों से खेलता रहे और अंततःपूर्ण पतित न हो जाए। झूठ के साथ खिलवाड़ भी मत करो, इससे तुम अपने मन की कोमलता गँवा बैठोगे। जिसे अपना साथ सुरम्य रखना होता है, वह खरपतवार को उखाड़ने में हिचक नहीं करता।


अपना और संसार का संबंध इस तरह समझें

पाँच ज्ञानेंद्रियाँ पदार्थ के स्वरूप का अनुभव कराती हैं। विज्ञान के अनुसार पदार्थ वह है, जिसमें भार अथवा गुरुत्वाकर्षण होता है। इस स्तर की वस्तुओं का अनुभव इंद्रियों से अथवा यंत्रों से होता है; किंतु पदार्थ का सूक्ष्मस्वरूप ऐसा है, जिसमें भार नहीं, गतिमात्र होती है। इसे आकर्षण तथा अन्वेक्षण कह सकते हैं। इनकी अनुभूति मन, बुद्धि, चित्त, अहंकाररूपी चार सूक्ष्म इंद्रियों द्वारा होती है। यह कार्य मन:संस्थान के चार अवयवों द्वारा पूरा होता है, इसलिए मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को भी पदार्थ— पदार्थों की अनुभूति का उपकरण माना है और उन्हें भी सूक्ष्म इंद्रियों की श्रेणी में ही रखा गया है। मन का कार्य कल्पनाएँ करना, उनमें आकर्षक रंग भरना है। बुद्धि, मन के एकपक्षीय चिंतन का उभयपक्षी विवेचन करती है। संभव-असंभव, हानि-लाभ आदि के सभी पहलुओं पर विचार करके उपयोगी निर्णय करने में सहायता करती है। चित्त दीर्घकालीन अभ्यास-संपर्क के आधार पर स्वभाव, रुचि एवं अनुकूलता को स्थिरता उत्पन्न करता है। अहंकार, अपनेपन का भाव, शरीर, मन, वस्तु अथवा व्यक्तियों में आरोपित करके उन्हें रुचिर बनाता है। उसकी मात्रा घट जाने पर उपेक्षा, उदासीनता, विस्मृति उत्पन्न होती है और विकृति-विग्रह उत्पन्न होने पर घृणा-द्वेष की स्थिति बनती है। निर्जीव-नीरस वस्तुओं में सजीवता एवं सरसता की अनुभूति कराने वाला यह अहंकार ही है। संसार के स्वरूप निर्धारण में, उन्हें जानने-समझने में पाँच ज्ञानेंद्रियों की भाँति ही यह मनःसंस्थान के चार चेतनाकेंद्र भी काम करते हैं, अतएव उन्हें भी अनुभूति उपकरणों में ही गिना गया है। हमारा समस्त ज्ञान इन्हीं उपकरणों के आधार पर टिका हुआ है।

मनुष्यों की भिन्न मनःस्थिति के कारण एक ही तथ्य के संबंध में परस्पर विरोधी मान्यताएँ एवं रुचियाँ होती हैं। यदि यथार्थता एक ही होती तो सबको एक ही तरह के अनुभव होते। एक व्यक्ति अपराधों में संलग्न होता है, दूसरा परमार्थ-परोपकार में। एक को भोग प्रिय है, दूसरे को त्याग। एक को प्रदर्शन में रूचि है, दूसरे को सादगी में। एक विलास के साधन जुटा रहा है, दूसरा त्यागपथ पर बढ़ रहा है। इन भिन्नताओं से यही सिद्ध होता है कि वास्तविक सुख-दुःख, हानि-लाभ कहाँ है, किसमें है, इसका निर्णय किसी सार्वभौम कसौटी पर नहीं, मनःसंस्थान की स्थिति के आधार पर दृष्टिकोण के अनुरूप ही किया जाता है। यह सार्वभौम सत्य यदि प्राप्त हो गया होता तो संसार में मतभेदों की कोई गुंजायश न रहती। मनःसंस्थान जो अनुभव कराता है, उसमें भी इंद्रियज्ञान से कम नहीं, वरन अधिक ही भ्रांति भरी पड़ी है।

सुख और दुःख की अनुभूति सापेक्ष है। दूसरे की तुलना करके ही स्थिति के भले-बुरे का अनुभव किया जाता है। कोई मध्यस्थिति का व्यक्ति अमीर की तुलना में गरीब है; किंतु महादरिद्र की तुलना में वह भी अमीर है। ज्वरपीड़ित व्यक्ति स्वस्थ मनुष्य की तुलना में दुःखी है, पर कैंसरग्रस्त की तुलना में सुखी। शरीरपीड़ा की कुछ अनुभूतियों को छोड़कर शेष 80 प्रतिशत दुःख और सुख सापेक्ष होते हैं। उसी स्थिति में एक व्यक्ति अपने को सुखी अनुभव कर सकता है और दूसरा दुःखी। इन विभिन्न निष्कर्षों के आधार पर सत्य को पहचानना कठिन है।

नाम और रूप भी अनित्य हैं। बालकपन में किसी को मुन्ना, पप्पू आदि कहते हैं। युवावस्था में घर के लोग उसका नाम लेते हैं। ऊँचा पद पाने पर लोग मात्र पदाधिकारी का ही संबोधन करते हैं, नाम को जानने या उच्चारण करने की भी आवश्यकता नहीं समझते। संत-महात्माओं का नाम उसका परिचय रह जाता है। धर्म बदल लेने पर भी नाम बदल जाता है। कई व्यक्ति स्वयं ही अपनी पसंद का नाम बदल लेते हैं। कई समाजों में वधू का नया नामकरण सुसराल वाले करते हैं और उसके पितृगृह का नाम विस्मृत कर दिया जाता है ।

रूप भी एक ही जन्म में न जाने कितने बदल जाते हैं। प्रसवकाल के समय का, शैशव का, कुमारावस्था का, यौवन का, वृद्धावस्था का, स्वस्थ और रुग्ण स्थिति का अंतर यदि देखा जाए, उस समय के फोटो हों तो यह पहचानना कठिन हो जाएगा कि यह एक ही व्यक्ति के चित्र हैं। अभिनेता न जाने कितने वेश और रूप बदलते हैं। 'बहुरूपिया' बनने की तो एक स्वतंत्र कला ही है। किसी व्यक्ति के रूप भी स्थिर नहीं, अस्तु नाम की तरह ही रूप की अस्थिरता को देखते हुए उस आधार पर भी किसी की स्थिरता का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

बाह्यजगत में विद्यमान पदार्थों का स्वरूप निर्धारण हम ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से करते हैं। इसी प्रकार उनके प्रिय-अप्रिय, उपयोगी-अनुपयोगी होने का निर्धारण मनःसंस्थान के आधार पर किया जाता है; पर यह स्पष्ट है कि इंद्रियों की तरह ही मनःचेतना भी अपूर्ण, भ्रांत, सापेक्ष और अभ्यस्त प्रकृति के आधार पर बनी होती है। अस्तु उनके आधार पर उपलब्ध ज्ञान, उस समय प्रतीत तो सत्य ही होता है, पर यदि शारीरिक-मानसिक स्थिति बदल जाए तो अनुभव भी भिन्न प्रकार के होने लगते हैं। स्वप्न और जागृति में जो अंतर है, वही अपनी स्थिति बदलने पर वस्तुत: व्यक्ति की परिस्थिति भी परिवर्तित स्तर की प्रतीत होने लगती है। इसी हेर-फेर को देखकर वेदांत इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यहाँ जो कुछ देखता है, प्रतीत होता है, वह अवास्तविक है। यथार्थता के कोषों दूर है, भ्रांत और मिथ्या है।

अपने आपे के संबंध में, व्यक्तित्व के संबंध में जो धारणाएँ बनती हैं, वह भी स्थायी नहीं होती, परिस्थिति के अनुसार उन्हें भी बदलते देर नहीं लगती। एक सेनापति यदि विजेता होता है तो उसका व्यक्तित्व भिन्न होता है और पराजित होकर युद्धबंदी बन जाने पर उसकी स्थिति सर्वथा भिन्न हो जाती है। हारे हुए, जीते हुए, फेल और पास, लाभ और घाटे से प्रभावित, सम्मानित-अपमानित, सुहागिन और विधवा के व्यक्तित्व में जो परिवर्तन तुरंत ही उपस्थित हो जाता है, वह देखते ही बनता है। अज्ञानग्रस्त कुमार्ग मार्ग जब सद्ज्ञान भूमिका में प्रवेश करके अपना चिंतन और कर्तृत्व बदल डालता है तो उसका नर से नारायण स्थिति में हुआ परिवर्तन देखते ही बनता है। पदासीन और पदमुक्त स्थिति के अधिकारी में जो अंतर उत्पन्न होता है, उसे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि व्यक्तित्व के कितने भारी परिवर्तन होते रहते हैं। राजा को रंक, यशस्वी को निंदास्पद और बलिष्ठ को लकवाग्रस्त हो जाने पर जो उलट-पुलट होती है, उसे देखकर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्तित्व नाम की कोई वस्तु स्थिर नहीं है। उसमें परिवर्तन होते हैं, होते रह सकते हैं।

हवा और पानी के वेग की परस्पर उथल-पुथल के कारण बबूले उठते हैं। समुद्र की लहरों के परस्पर टकराव से झाग उत्पन्न होते हैं। यह बबूले या झाग यों अलग सत्ता के रूप में दिखाई पड़ते हैं; पर गहराई से देखा जाए तो वह जलीय उथल-पुथल की प्रतिक्रियामात्र हैं, उनका कोई अलग से अस्तित्व नहीं है। ब्रह्म और प्रकृति के संयोग-वियोग से ही संसार के विविध पदार्थों का सृजन-समापन होता रहता है। यहाँ न कुछ बनता है, न नष्ट होता है, जो है वही प्रकृतिगत हलचलों के कारण अपना नाम-रूप बदलता रहता है।

जिन पदार्थों के प्रति हम अत्यंत आकर्षित, उत्सुक रहते हैं, वे वस्तुतः क्या हैं? इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रतीत होता है कि जो देखा-समझा जा रहा है, वह यथार्थ नहीं है।

संसार पदार्थों से बना है। पदार्थ अणुओं से बने हैं। अणु परमाणुओं से— परमाणु इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि विखंडों से और वे विखंड तरंगों के घनीभूत रूप हैं। विज्ञान बताता है कि यह जगत तरंगों का परिणाम है, तरंगमय है, तरंग ही है। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श की तन्मात्राएँ और विचार- विवेचना, अभिव्यक्ति, अनुभूति, अभिव्यंजना आदि के पीछे केवल तरंगें काम करती हैं। यहाँ तरंगों के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं है।

प्रकृति में परम सत्ता का निरंतर संयोग, मिलन, संस्फुरण, आदान-प्रदान, आकर्षण-विकर्षण ही तरंगें बनकर गतिशील रहता है और वह गति ही पदार्थ बनकर सामने आती रहती है। जो दीखता है, उसके मूल में केवल तरंग स्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो प्रिय-अप्रिय है, उसमें आत्मानुभूति की मात्रा की घट-बढ़ की उथल-पुथल के अतिरिक्त और कहीं कुछ भी नहीं है। जड़-चेतन के समस्त परमाणु एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के अनुरूप एक दिशा में चलते जा रहे हैं। उस प्रवाह का कोई चाहे तो समुद्रतट पर बैठकर उसकी हिलोरों का आनंद ले सकता है। भ्रमग्रस्त हर नई लहर के आने का लाभ और जाने की हानि समझता हुआ हँसने-रोने का प्रलाप कर सकता है। नियति का क्रम अपने ढंग से चलेगा, किसी के सोचने का तरीका क्या है, इसकी उसे परवाह नहीं। हाथी अपनी राह चलेगा ही, कुत्ते उसका स्वागत करें या रोष दिखाएँ, यह उनकी मरजी। प्रकृति की स्वसंचालित व्यवस्था हाथी की तरह ही चलेगी, यहाँ हर वस्तु का रूप बदलेगा। आज का सृजन-संयोग कल विनाश एवं वियोग का रूप धारण करेगा। अपरिवर्तनवादी आकांक्षा अधूरी ही रहेगी। यहाँ स्थिरता के लिए कोई स्थान नहीं। जो संग्रह एवं स्थायित्व के अभिलाषी हैं, उन्हें निराशा भरे पश्चात्ताप के अतिरिक्त और क्या हाथ लगेगा?


व्यक्तित्व के विकास में आनुवांशिकी स्तर स्पर्श करना होगा

अपने को, संतान को, परिवार को, समाज को सुखी-समृद्ध बनाने के लिए हमें यह सोचना होगा कि इसके लिए धन से भी अधिक ऊँचा आधार है — व्यक्तित्व। विकृत व्यक्तित्व वाले मनुष्य प्रचूर सुविधा-साधनों के रहते हुए भी, न स्वयं सुखी रह पाते हैं और न अपने स्वजन-संबंधियों को चैन से रहने देते हैं। इसी के विकास के लिए साधारणतया आहार, व्यायाम, उपकरण, प्रशिक्षण, वातावरण आदि को पर्याप्त माना जाता है; पर वास्तविकता यह है कि इतने से कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। यदि बात इतनी भर रही होती तो साधनसंपन्न लोग यह सारे साधन सहज ही जुटा सकते थे और व्यक्तित्वसंपन्न बन सकते थे; पर ऐसा कहाँ होता है। वे इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अभावग्रस्त लोगों से भी पिछड़े एवं गए गुजरे सिद्ध होते हैं।

विज्ञान ने सूक्ष्म से सूक्ष्मतर परतों में प्रवेश करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि जिस प्रकार बीज में सन्निहित अदृश्य विशेषताएँ अवसर पाकर वृक्ष के रूप में विकसित होती हैं, उसी प्रकार कोशिकाओं के गर्भ में सन्निहित वंशानुक्रम की विशेषताएँ ही व्यक्तित्व बनकर पल्लवित होती हैं। शरीर और मन का स्तर बहुत कुछ परंपरागत होता है। यह परंपराएँ पूर्वजों के प्रत्यक्ष जीवन पर नहीं, परोक्ष, अदृश्य एवं अविज्ञात स्तर पर अवलंबित रहती हैं। यदि सचमुच ही किसी को अपना व्यक्तित्व विनिर्मित करना हो, अपनी संतान को सुविकसित व्यक्ति के रूप में प्रतिभासंपन्न बनाना हो तो उसके लिए, प्रगति के लिए आवश्यक माने जाने वाले बाह्य उपकरणों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए; वरन वंशानुक्रम से संबंधित उस सूक्ष्मस्तर का स्पर्श करना चाहिए, जिनके स्फुरण से ही बहिरंग जीवन की अनेक विशेषताएँ विकसित होती हैं।

आनुवंशिकी-अंवेषणों से यह अधिकाधिक स्पष्ट होता चला जा रहा है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए उपयुक्त समझे जाने वाले आहार-विहार, शिक्षा-साधन जैसे माध्यमों की तुलना में वे तत्त्व हजारों गुने अधिक प्रबल हैं, जो परंपरागत-प्रक्रिया के आधार पर कोशिकाओं के अंतर-भूमिका के अत्यंत गहन मर्मस्थल में गुँथे रहते हैं।

फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेन को पैंतालीस वर्ष की आयु में पित्ताशय में पथरी की बीमारी हुई। उनके पिता के यह रोग पच्चीस वर्ष की आयु में आरंभ हुआ था। मोटेतौर से यह बात समझ में नहीं आती कि उनके जन्म के समय जब पिता को वह बीमारी नहीं थी तो बच्चे— उसकी संतान को कैसे हो सकती है? पर अब इस रहस्य पर से परदा उठ गया है। मात्र माता-पिता का रज-वीर्य ही बालक के स्वास्थ्य, मनःस्तर का सृजनकर्त्ता नहीं है, वरन वंश-परंपरा में चली आने वाली जीन्स के साथ जुड़ी हुई वे विशेषताएँ पीढ़ियों के निर्माण में अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती हैं। मान्टेन की पित्ताशय की पथरी उसकी कई पीढ़ियों से चली आ रही थी। भले ही वह प्रकट रूप से दिखाई न पड़ती हो, पर सूक्ष्म 'जीन्स' में, छाया रूप में वह विशेषता मौजूद थी जो अनुकूल अवसर आते ही फलने-फूलने लगी।

मधुमेह वंश-परंपरागत हो तो भी इन्सुलीन के इंजेक्शनों के सहारे उसके रोगी को खड़ा रखा जा सकता है। बालकों का ‘गैलेक्टोसीमिया’ पैतृक जीन्स से संबंधित होता है। बाहरी कारणों से वह कदाचित ही होता है। वह जीन जब गेल-आई-पी-यूरी डायल ट्रान्सफेरास एंजाइम नहीं बनने देता तो बच्चे दूध में रहने वाली मिठास— गैलेक्टोस पचा नहीं पाते, फलत: वह खून में जमा होती रहती हैं। वह जिगर में इकट्ठी होकर बच्चे का पेट खराब कर देती है और बहुत करके उसे मार ही डालती है। ऐसा ही एक दूसरा रोग है— एक्रोडर्मेटाइटिस ऐंटेरोपैथिका। यों इनका इलाज भी किया ही जाता है, पर पैतृक विकृतियों को धारण किए हुए जीन्स जिन रोगों का सृजन करती हैं, वे बड़े हठीले और कष्टसाध्य होते हैं। आँख-मिचौनी खेलते रहते हैं और जब भी दाव लगता है फिर उभरकर खड़े हो जाते हैं।

आँख का कैंसर— ‘रेटीनोब्लास्टोमा’, जीन्सदोष का ही परिणाम है। निकट दृष्टि— ‘मायोपिया’, सारे परिवार को होते देखा गया है। प्रकृतिगत प्रभावों की असाधारण शृंखला का समावेश आनुवंशिकी- क्षेत्र तक पहुँच जाए तो अद्भुत परिवर्तन देखे जाते हैं। बौनेपन का कारण यही है। सिर और धड़ का आकार सामान्य और हाथ-पाँव छोटे रह जाना विलक्षण आकृति के अधिक या न्यून अंग-प्रत्यंगों वाले बालक ऐसे ही जीन्स उत्परिवर्तन के परिणाम हैं। माता-पिता में इस प्रकार की कमी होने से ही ऐसे अविकसित बालक नहीं होते; वरन उनमें जीन्स की एकोंड्रोप्लासिया-आपत्ति ही कारण होती है। ऐसे अविकसित बच्चे मरते जल्दी हैं, यदि बच भी गए तो वंशवृद्धि में असमर्थ होते हैं। ऐसी महिलाएँ यदि गर्भधारण कर लें तो फिर न जच्चा का कुछ ठिकाना रहता है, न बच्चा का।

बेशक परिस्थितियों का महत्त्व है। परंपरागत विकृतियों को अच्छा आहार, अच्छा रहन-सहन, अच्छी जलवायु से बहुत कुछ नियंत्रण में रखा जा सकता है, फिर भी विकृत आनुवंशिकता इतने से ही निर्मूल नहीं हो जाती, इसके लिए अधिक गहरे और अधिक प्रभावी उपचार काम में लाने पड़ते हैं। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाए तो पीढ़ियाँ ऐसी बनती हैं, जिसे दुर्भाग्य या अभिशाप ही कहा जा सके।

शारीरिक विकास के लिए आहार-विहार, जलवायु की प्रतिक्रिया को चीरकर आनुवंशिकी तत्त्व अपनी मौलिक विशेषता स्थिर रखे रह सकते हैं। पूर्वजों की प्रतिच्छाया सहज ही संतान में परिलक्षित हो सकती है।

माता-पिता दोनों ही देखने में स्वस्थ हों, पर बालक में जिस पक्ष की 'जीनी' का वर्चस्व यदि पैतृक रूप से रुग्ण हो तो उसका प्रभाव कभी भी उभर सकता है। बालक ऐसे रोगों से ग्रसित हो सकता है, जिनका निराकरण साधारण दवा-दारू से संभव ही न हो सके। वंशवृद्धि की दृष्टि से हाड़-माँस की स्वस्थता का बहुत अधिक मूल्य नहीं है। बाहर से मजबूत और सुडोल एवं सज्जन दीखने वाला व्यक्ति भी अपने कोषाणु गर्भ में ऐसे गुणसूत्रों से भरा हो सकता है, जिसका प्रजनन शारीरिक अथवा मानसिक रुग्णताग्रसित हो, अस्तु सुसंतति के लिए न केवल वर-वधू की तात्कालिक शारीरिक-मानसिक स्थिति पर ही दृष्टिपात करना आवश्यक होता है; वरन उसकी पैतृक परंपराओं को भी देखने-समझने की आवश्यकता पड़ती है। 'खानदान' का इतिहास, सुसंगति की दृष्टि से अतीव महत्त्वपूर्ण होता है।

विकासवादी डार्विन का विवाह उसकी चचेरी बहन से हुआ था। परंपरागत विशेषताओं का प्रकटीकरण उसने अपने परिवार में देखा, उसको यही कहना पड़ा— वंश-परंपरा विज्ञान बड़ा ही आश्चर्यजनक है। इस रहस्य की खोज बहुत दिनों से चल रही थी। चेकोस्लोविया के पादरीमंडल ने आनुवंशिकता पर प्रकाश डाला था। पीछे उसे अणु विज्ञान की तरह महत्त्वपूर्ण माना गया और डॉ. खुराना प्रभृति अंवेषकों ने तत्संबंधी शोधों से समस्त विश्व का ध्यान इस ओर आकर्षित कर लिया।

परंपरागत शारीरिक विशेषताओं का पीढ़ियों तक गतिशील रहना प्रत्यक्ष है। वे भली भी हो सकतीं हैं और बुरी भी। बात उतने तक ही सीमित नहीं है; मानसिक, भावनात्मक, चारित्रिक तथा अन्यान्य प्रकार की विशेषताएँ भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती देखी गई हैं।

शरीर में लगभग 700 प्रकार के ऐंजाइम पाए जाते हैं। इनकी न्यूनाधिकता ही प्रायः शरीर-संचालन के सारे क्रियाकलाप संपन्न करती हैं। इन ऐंजाइम का स्तर गुणसूत्रों की प्रेरणा से ही गिरता-उठता है। इनकी पूर्ति दवाओं में सम्मिलित ऐंजाइम शरीर में पहुँचाकर की जाती है। मधुमेह में इन्सुलीन प्रायः गोलियों और इंजेक्शनों से पहुँचाया जाता रहता है, पर उसका प्रभाव क्षणिक रहता है। एक बार के आहार में ही वह मात्रा समाप्त हो जाती है, फिर दूसरी मात्रा लेनी पड़ती है, पर यदि गुणसूत्रों में सन्निहित मूलस्रोत सुधारे जा सके तो ही यह किसी स्थायी रूप से दूर की जा सकती है।

आनुवंशिकी-प्रक्रिया में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाने पर संतानों के शरीर और मन विचित्र प्रकार से विकृत हो सकते हैं। यह विकृतियाँ जिनमें आरंभ होती हैं, उन्हें पता नहीं चलता, पर संतान पर उनका प्रभाव परिलक्षित होता है। कुछ विकृतियाँ धीरे-धीरे पलती रहती हैं और कई पीढ़ियों के उपरांत प्रकट होती हैं। गर्भ-स्थापन एवं गर्भ-विकासकाल में रही हुई विकृतियाँ भी विलक्षण आकार-प्रकार की पीढ़ियाँ प्रस्तुत करती हैं।

करबेरा डी बुट्रैडी नामक स्पेन के एक गाँव में सभी व्यक्तियों के हाथ-पैरों में अतिरिक्त उंगलियाँ हैं। 6 से कम तो किसी के भी हाथ-पैरों में नहीं हैं। किसी के सात-आठ भी हैं। सारे गाँव में एक वृद्ध ही ऐसा था जिसके पैर-हाथों में मिलाकर बीस ही उँगलियाँ थीं। कहा जाता है कि यह परंपरा एक 6-6 उँगली वाले दंपत्ति का विवाह होने से चल पड़ी और उन्हीं के रक्त सम्मिश्रण से यह वंशक्रम चल पड़ा।

फ्रांस में ट्रूर कुइंग गाँव में केमेन्ट नामक एक लड़की सन् 1793 में पैदा हुई। वह 15 वर्ष की आयु तक ठीक प्रकार जीवित रही, उसकी एक ही आँख थी और वह दोनों आँखों के मध्यस्थान पर थी। प्रकृति के इस अद्भुत करतब को देखने लोग दूर-दूर से आते थे। चीन के चिहली नगर में शी स्वान के शरीर का चमड़ा पारदर्शी था। शरीर के भीतर कहाँ, क्या हो रहा है और कौन कल- पुर्जा क्या काम कर रहा है, उसे इसी तरह देखा जा सकता था, जैसे पारदर्शी काँच के आर-पार देखा जा सकता है। यह सन् 1389 में पैदा हुआ और 1464 में मरा। इन 75 वर्षों में उसका अद्भुत शरीर दर्शकों के लिए एक आश्चर्य का विषय बना रहा।

फेंक फोई नगर की ग्रेटेल नामक महिला के मुख में दो जीभ थीं, पर वह बोल एक से भी नहीं सकती थी। वह पूर्णतया गूँगी थी।

शांसी प्रांत का गवर्नर लूचिंग— जो कुछ समय राज्यमंत्री भी रहा, में एक शारीरिक विशेषता भी थी। उसकी दोनों आँखों में दो-दो पुतलियाँ थीं, पर इससे उसकी दृष्टि में कोई अंतर नहीं पड़ा। दो पुतलियों के कारण दूना दीखता हो, सो बात भी नहीं थी; पर उनके कारण कोई दृष्टिदोष भी उत्पन्न नहीं हुआ था, वे अन्य सामान्य मनुष्यों की तरह ही देखते-भालते थे।

इन उदाहरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता कि गुणसूत्रों का मर्म यदि और भी अधिक स्पष्ट हो जाए तो वर्त्तमान आकृति-प्रकृति से भिन्न प्रकार के मनुष्यों की नई सृष्टि रची जा सकती है। आज मानवी काया में जो कमियाँ प्रतीत होती हैं, उन्हें अगले दिनों इच्छानुसार सुधारा-संभाला जा सकता है। यह कार्य शल्य चिकित्सा, आहार विज्ञान एवं मस्तिष्कीय शिक्षण-प्रशिक्षण का नहीं, वरन आनुवंशिकी विज्ञान का है। उस संदर्भ में यदि समुचित ज्ञान प्राप्त हो सके तो, सुधार-परिवर्तन का विधान जाना जा सके तो, मनुष्य को अभीष्ट विशेषताओं से सुसंपन्न बनाया जा सकता है और न केवल व्यक्तिविशेष को; वरन उसकी पीढ़ियों को भी सुधारा जा सकता है। इस दिशा में जो आरंभिक प्रयत्न वैज्ञानिकों ने किए हैं, उनमें उत्साहवर्द्धक सफलता भी मिली हैं।

पाँचवी अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिकी कांग्रेस में प्रो. एच. जे. मूलर ने 'क्ष' किरणों की सहायता से जीनों में परिवर्तन ला सकने का अपना प्रतिपादन प्रस्तुत किया था, तब से अब तक इस दिशा में बहुत प्रगति हो चुकी है और प्रतीत होता है कि इस विज्ञान के आधार पर धरती के जीवधारियों की आकृति तथा प्रकृति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकेगा।

प्रयोत्ताओं ने मक्खियों की चित्र-विचित्र ऐसी नस्लें उत्पन्न कर ली हैं जो अपने पूर्वजों से बहुत कम मिलती-जुलती हैं। वनस्पतियों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए हैं और पशुओं की नसलों में भारी सुधार हुए हैं। मैक्सिकों बोने गेहूँ को भारत में सोनेरा 64 शरवती गेहूँ के रूप में समुन्नत किया गया है। इसी प्रकार अन्य अनाजों में इच्छानुसार लंबी या बौनी जातियाँ पैदा की गई हैं। गेहूँ, जौ, मक्का, धान, ज्वार, मूँग आदि की अब कई नसलें ऐसी आई हैं, जिनमें पोषकतत्त्व कहीं अधिक हैं। इसी प्रकार आँधी-तूफान से बचाने के लिए कम ऊँचाई की फसलें पैदा करने में भी अच्छी सफलता मिल रही है। शूकरहित बालें बदली गई हैं, ताकि उनका भूसा जानवरों के गले में चुभन पैदा करने के दोष से मुक्त हो जाए।

एन्टीबायोटिक्स दवाओं में काम आने वाली फफूँदों में रहने वाली उपयोगी अमिनो-अम्ल ‘लाइसिन’ की मात्रा पहले बहुत कम रहती थी, पर अब उसमें प्रायः एक हजार गुनी तक वृद्धि कर ली गई है, इसलिए दवाओं की आवश्यकतापूर्ति अपेक्षाकृत सरल हो गई है। बैक्टीरिया की जातियों में सुधारने में भी सफलता मिली है। कृत्रिम क्लोरेला पौधा भविष्य में पौष्टिक खाद्य-समस्या का हल करने में जल्दी ही महत्त्वपूर्ण योगदान देने लगेगा। फल, शाक, घास, अनाज, फूल तथा वनस्पतियों में ऐसे सुधार हुए हैं, जिनसे उनकी उपयोगिता में कई गुनी वृद्धि हो सके। जानवरों की दूध देने की तथा श्रम करने की शक्ति बढ़ रही है, साथ ही उनके शरीर घटाए जा रहे हैं, ताकि कम स्थान में उनके निवास तथा कम खुराक में इनके गुजारे की समस्या हल हो सके।

इन परीक्षणों में सफलता प्राप्त करते हुए आनुवंशिकी वैज्ञानिक अब इस प्रयास में हैं कि मनुष्य जाति को अब की अपेक्षा भविष्य में अधिक परिष्कृत बनाया जाए, रोगों और विषों की जो अवांछनीय मात्रा वर्त्तमान पीढ़ी के मनुष्यों में प्रविष्ट हो गई है और पग-पग पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करती रहती है; उसका परिशोधन हो सकना सैद्धांतिक रूप से संभव मान लिया गया है। वे प्रयोग जल्दी ही कार्यान्वित होंगे, जिनके आधार पर निरोग और सर्वांग-सुंदर मानव पीढ़ी को विकसित किया जा सके। इन्हीं प्रयोगों में अधिक विकृत वर्ग का वंध्याकरण भी सम्मिलित है, ताकि विभीषिकाओं से इसी बीच छुटकारा पा लिया जाए।

इतना ही नहीं, मस्तिष्क की प्रखरता और स्वभाव की शालीनता भी गुणसूत्रों में आवश्यक हेर-फेर के आधार पर संभव हो सकेगी। तब अपराधी तत्त्वों से निपटने में खरच होने वाली शक्ति को सृजनात्मक कार्यों में लगाने के लिए लगाया जा सकेगा और कर्त्तव्यपालन तथा शिष्टाचार निर्वाह के लिए धर्मोपदेश करने की भी कोई आवश्यकता न रहेगी, क्योंकि वे तत्त्व जन्मजात रूप से सबको प्राप्त होंगे और उनका आचरण बिना प्रयास स्वसंचालित रीति से होता रहेगा।

पशुओं में से आजकल जो निरर्थक और हानिकारक बने हुए हैं, उन्हें इस प्रकार बदला जा सकेगा, जिससे वे स्वयं सुखपूर्वक रह सकें और मनुष्य भी उनसे लाभ उठा सकें। जीव-जंतुओं में विचारशीलता तो निश्चित रूप से बढ़ सकेगी और वे अनपढ़ न रहकर अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित, सामाजिक और शांति प्रकृति के बनकर संसार को सुव्यवस्थित बनाने में सहायता कर सकेंगे।

आनुवंशिकी विज्ञानवेत्ता जो कुछ अंवेषण एवं सुधार-परिवर्तन का प्रयत्न कर रहे हैं, उसका आधार मात्र भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों एवं उपकरणों तक ही सीमित है, जबकि वह मर्मस्थल उससे कहीं अधिक गहरा है। गुणसूत्रों की प्रकृति बदलने के लिए चेतनाशक्ति का प्रयोग ही अंततः सफल होगा, क्योंकि भौतिक विज्ञान अधिक-से-अधिक गुणसूत्रों का कलेवर बदल सकता है, उसकी मूल प्रकृति में हेर-फेर करने की सफलता उसे कभी कदाचित ही मिल सकेगी।

प्राचीनकाल में व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलने और पीढ़ियों को परिष्कृत बनाने में अध्यात्म विद्या का, आत्मशक्ति का प्रयोग-उपयोग किया जाता रहा है।

भविष्य में इस महती आवश्यकता की पूर्ति चैतन्य आत्मिक क्षमता द्वारा ही की जा सकेगी। इसके लिए ऐसे महामानवों का निर्माण किया जाना चाहिए, जो अपनी प्रचंड आत्मिक ऊर्जा को विकसित करने में सफलता प्राप्त करके अपने साथ-साथ समस्त मानव जाति की ठोस प्रगति के लिए आवश्यक आनुवंशिकी परिवर्तन कर सकने में सफल-समर्थ हो सकें।


अर्थशास्त्र और अध्यात्म शास्त्र का लक्ष्य एक है

अर्थशास्त्र के निष्कर्ष यह हैं कि व्यक्ति और समाज को समुन्नत-सुविधा-साधनसंपन्न बनाने के लिए (1) उत्पादन बढ़ाने (2) पूँजी को उपयोगी कार्यों में लगाने तथा (3) संपत्ति के उचित वितरण का ध्यान रखे जाने में पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए। यदि इन सबमें आलस्य-प्रमाद बरता जाएगा अथवा अव्यवस्था फैलाई जाएगी तो अर्थसंकट की विपत्ति का सामना करना पड़ेगा और सबको अकारण ही अवांछनीय स्थिति में पड़ना पड़ेगा। विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्री इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सर्वसाधारण का ध्यान उत्पादक श्रम की आवश्यकता की ओर मोड़ा जाए। डॉ. फेयर चैल्ड, प्रो. पेन्सेन, प्रो. ऐली, प्रो. कोशर, प्रभृति विद्वानों का मत है कि संसार में गरीबी और मँहगाई का प्रमुख कारण यह है कि उत्पादन विलासिता की सामग्री का हो रहा है, जीवनोपयोगी वस्तुओं का नहीं। विलासी उत्पादन का भी महत्त्व है, पर उसकी मात्रा इतनी अधिक न होनी चाहिए कि जीवनचर्या के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी पड़ने लगे। संपन्न लोगों को विलासी वस्तुओं की आवश्यकता हो सकती है, पर गुजारा भर प्राप्त कर सकने वाले बहुसंख्यक जनसमुदाय को तो वही चीजें चाहिए, जो निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकता पूरी कर सकें।

उत्पादक श्रम की ओर हम सबका ध्यान आकर्षित होना चाहिए। श्रम तो कितने ही व्यक्ति करते हैं, पर उसका स्तर उत्पादक श्रेणी में गिना जाने लायक क्वचित ही होता है। उत्पादक श्रम में जितनी अरुचि या उपेक्षा बरती जाएगी, उतनी ही जीवनोपयोगी वस्तुओं की मात्रा घटती जाएगी और उनके अभाव में लोगों को आर्थिक तंगी, महंगाई तथा अभावग्रस्तताजन्य अनेक कष्ट सहने पड़ेंगे। अध्यात्मशास्त्र के नियम भी अर्थशास्त्र की ही तरह हैं, उनका निष्कर्ष है कि (1) व्यक्तित्व, प्रतिभा और सामर्थ्य को निरंतर बढ़ाया जाए। (2) संपत्ति और विभूतियों को सत्प्रयोजन में लगाया जाए। (३) ज्ञान और तप से जो लोग ऊँचे उठें, उनकी उपलब्धियों से समस्त समाज को लाभांवित होने दिया जाए। यदि इन तथ्यों का ध्यान न रखा जाए तो आत्मबल, अवांछनीय आसुरी दिशा में भी लग सकता है और रावण, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर जैसे तपस्वी भी विनाशकारी विभीशिकाएँ उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए मात्र साधना, उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न किया जाए; वरन यह भी देखा जाए कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।

(1) भूमि (2) श्रम (3) पूँजी (4) संगठन (5) साहस; इन पाँच साधनों को प्रधान उत्पादक उपकरण माना गया है। इनका उपयोग कहाँ, किस तरह हो रहा है, इस पर कड़ी दृष्ठि रखी जानी चाहिए। अन्यथा इनका दुरुपयोग विघातक उत्पादन भी खड़े कर सकता है और उनसे विपत्तियों की विभीषिका सहने के लिए विवश होना पड़ सकता है, इच्छानुसार कुछ भी उत्पादन करने लगने की स्वतंत्रता को सीमित ही किया जाना चाहिए। समाज और राष्ट्र का कर्त्तव्य है कि विलासी प्रसाधनों पर नियंत्रण रखें और हानिकारक वस्तुएँ उत्पन्न करने की निर्बाध छूट को सहन न करें।

प्रो. टामस, जेवन्स, डॉ. मार्शल, प्रभृति श्रम विशेषज्ञ यही कहते रहे हैं कि कोई निठल्ला न रहे, कोई हराम की कमाई न खाने पाए, किसी को बेकार न रहना पड़े, तभी किसी देश की आर्थिक स्थिति सुव्यस्थित रह सकती हैं। हेग विश्वविश्वालय के स्वास्थ्यविज्ञानी डॉ. अलवर्ट ने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी वर्त्तमान विकृतियों का बहुत बड़ा कारण श्रम-व्यवस्था में व्यतिरेक को माना है। उनका कहना है कि समुचित श्रम की न्यूनाधिकता ही कायिक और मानसिक स्वास्थ्य-संतुलन को नष्ट करने का प्रधान कारण है। व्यक्ति के जीवनक्रम में ऐसे श्रम का समुचित स्थान रहना चाहिए, जिसमें उपयोगी एवं आवश्यक तत्त्वों का बाहुल्य हो, साथ ही उसकी मात्रा भी स्वास्थ्य-संतुलन की दृष्टि से इतनी न रहनी चाहिए, जो न न्यून हो और न अधिक।

अध्यात्मशास्त्र का मंतव्य यह है कि हर व्यक्ति को अपने कायिक और मानसिक क्षेत्र को उर्वर भूमि मानकर उसमें सद्गुणों की, सत्कर्मों की, सत्स्वभाव की कृषि करनी चाहिए। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की बहुमूल्य फसलें उगानी चाहिए। मात्र धन ही संपदा नहीं है, असली कमाई कृषिफार्मों, कारखानों आदि में ही नहीं होतीं; वरन वास्तविक दौलत तो कायकलेवर एवं मन: संस्थान में उपार्जित की जाती है। प्रतिभा, समर्थता और गरिमा को बढ़ाने के लिए भी उसी लगन और तत्परता के साथ पुरुषार्थ किया जाना चाहिए, जिस मनोयोग से कि धन कमाई के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा जाता है, व्यक्ति और समाज को समुन्नत बनाने के लिए धन से भी बढ़कर प्रतिभाशाली और उच्च चरित्र वाले नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रत्येक व्यक्ति को निर्वाह के लिए श्रम करके आजीविका उपार्जन करनी पड़ती है। पूर्वकाल में आजीविका के प्रचुर साधन सर्वत्र सरल थे। कृषि और पशुपालन के लिए प्रचुर भूमि उपलब्ध थी। वस्त्र, बर्तन, औजार, वाहन, कागज, औषधि जैसी वस्तुओं का उत्पादन परस्पर विनिमय करके प्राप्त हो जाता है। श्रमिकों को अपने निज के अथवा दूसरों के कामों से आजीविका प्राप्त कर लेने की सुविधा थी; पर अब विशालकाय यंत्रों के निर्माण ने, पूँजी के केंद्रीकरण ने, भाप-तेल एवं विद्युत शक्ति ने आजीविका के विशाल स्रोत अपने अधिकार में कर लिए हैं। चंद लोगों के हाथ में इतने साधन आ गए हैं कि वे अगणित लोगों द्वारा कमाई जाने वाली आजीविका स्वयं ही कमा लें। अनेक लोगों द्वारा हो सकने वाला श्रम तथा उत्पादन अपने कल-कारखानों के आधार पर स्वयं ही कर लें। इससे एक ओर कुछ लोग धनकुबेर होते चले जाते हैं और कुछ के लिए आजीविका का द्वार अवरुद्ध हो जाता है। समाज और सरकार का कर्त्तव्य है कि उस अव्यवस्था को रोकें अन्यथा आर्थिक स्वेच्छाचार के कारण गरीब अधिक गरीब और अमीर अधिक अमीर होते चले जाएँगे। इतना ही नहीं, आजीविका के अभाव में अगणित लोगों को भूखा मरना पड़ेगा।

मनोबल बढ़ाने के लिए दुस्साहस और दुष्कर्मों का अवलंबन अवांछनीय है। असुर पक्ष में तांत्रिक — वाममार्गी उन उपायों को बेहिचक प्रयुक्त किया जाता है, जिनकी गणना न्याय-नीति की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। उनके संप्रदायों में पशुबलि-प्रथा प्रचलित है। कहीं-कहीं साधनारत व्यक्ति मादक द्रव्यों का भी सेवन करते हैं। कापालिक और अघोर संप्रदायों में ऐसे कृत्य भी मनस्वी एवं तेजस्वी बनाने के लिए काम में लाए जाते हैं, जिन्हें अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। कई सिद्धयोगी अपनी सिद्धियों को, अपने को चमत्कारी— सिद्ध— प्रख्यात करने में अथवा स्वर्गमुक्ति के व्यक्तिगत लाभ में ही खरच कर डालते हैं। अर्थशास्त्र की तरह अध्यात्मशास्त्र का भी यही नियम है कि विशिष्ठ उत्पादन की वह पूँजी, जो निर्वाह खरच से बच जाए, ऐसे ही कामों में लगाई जानी चाहिए, जिससे अतिरिक्त उत्पादन बढ़ने में सहायता मिले, भले ही पूँजी धन के रूप में हो अथवा विभूतियों के रूप में।

अर्थशास्त्री प्रो. वेनहम और प्रो. मार्शल इस बात के पक्ष में हैं कि जिस प्रकार आचरण में नैतिक-अनैतिक का अंतर किया गया है और समाज-व्यवस्था में न्याय-अन्याय का वर्गीकरण किया गया है। उसी प्रकार उत्पादन में वांछनीय और अवांछनीय का विभाजन किया जाना चाहिए। ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए, जिनके कारण अवांछनीय उत्पादन की दिशा में बढ़ने वालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़े। साथ ही यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि उपयोगी उत्पादन के लिए उत्सुक लोगों की अड़चनें सरल बनाने के लिए सरकार एवं समाज का सहयोग उपलब्ध रहे।

प्रो. मिल ने सक्रिय और निष्क्रिय दो भागों में पूँजी का विभाजन किया है। ऐसी इमारतें, जो दर्शनीय तो हैं; पर किसी प्रकार का लाभ उत्पन्न नहीं करती, उनकी दृष्टि में निष्क्रिय हैं। वे कहते हैं— “भले ही कोई संस्थान धार्मिक या सांस्कृतिक संस्थान ही हो, पर उनका स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि वे उत्पादन की व्यवस्था भले ही न जुटाएँ; पर प्रेरणा तो करें ही। जो उपयोगी उत्पादन से विरक्ति पैदा करते हैं, उन कार्यों एवं व्यक्तियों को निष्क्रिय स्तर का गिना जाना चाहिए। सक्रिय पूँजी वह है, जिसके कारण संपदा, आजीविका एवं सुविधा-साधनों की अभिवृद्धि में सहायता मिलती है।”

धन की ही भाँति प्रतिभा, ज्ञान और परमार्थ का उत्पादन निरंतर किया जाना चाहिए। यह आत्मिक क्षेत्र की सक्रियता है। जिस तरह सामर्थ्य रहते हुए भी कुछ लोग बाल-बच्चे कमाऊ हो जाने, बाल पक जाने, संपत्ति बहुत होने का बहाना करके यदि निष्क्रिय पड़े रहते हैं, तो यह एक प्रकार का सामाजिक अपराध है। इससे राष्ट्रीय उत्पादन घटता है, संपदा और समृद्धि घटती है और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी पर पड़ता है। रोगी-अपंगों का निष्क्रिय होना क्षम्य हो सकता है, पर जो सशक्त और समर्थ हैं, उन्हें व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से नहीं, समाजगत उन्नति को ध्यान में रखते हुए अपना श्रम-पुरुषार्थ उसी तरह जारी रखना चाहिए, जिस तरह समझदार कृषक या व्यापारी अभावग्रस्त न होने पर भी अधिक वृद्ध हो जाने पर भी आजीवन कार्य-संलग्न रहते हैं।

डॉ. एडम स्मिथ, प्रो. मार्शल, प्रो. टामस, प्रो. चैपमैन व्यक्ति पूँजी अभीष्ट मात्रा में रख सकने के अधिकार को तो स्वीकार करते हैं, पर वे कहते हैं कि उसे अवरुद्ध करके निष्क्रिय बना देने का अधिकार किसी संपत्तिवान को नहीं होना चाहिए। पूँजी को उत्पादक कार्यों में सतत संलग्न रहना चाहिए, साथ ही वे व्यवसाय ऐसे होने चाहिए, जिनसे प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रधानता मिल सके। विलासी उत्पादन की मात्रा इतनी रहनी चाहिए, जिससे उपयोगी उत्पादन में अड़चन उत्पन्न न हो।

प्रो. फिशर और प्रो. बैनहल संपत्ति का अर्थ उन पदार्थों से लेते हैं, जो जनता की आवश्यकता पूरी करें। रत्न, सोना, चाँदी, मुद्रा को धन का परिवर्तन माध्यम कह सकते हैं, वस्तुतः वह अपने आप में स्वतंत्र रूप से धन नहीं है।

प्रो. टामस, प्रो. चैपमैन और डॉ. मार्शल उसी पूँजी को और उसी व्यवसाय को आदर्श मानते हैं, जो जनता की उचित आवश्यकताओं को पूरी करने की व्यवस्था जुटाए। पूँजी चाहे व्यक्तिविशेष के पास हो अथवा किसी संगठन के पास, उनकी मात्रा का महत्त्व नहीं। राष्ट्रीय दृष्टि से उसी संपत्ति की गणना की जानी चाहिए, जो जन-सुविधा के साधन जुटाने में संलग्न रहे।

ज्ञान की संपदा जिनके पास हैं, वे उसको उदार धनी-मानियों की तरह लोक-मंगल के लिए नियोजित करने का सत्साहस दिखाएँ। ढलती उम्र में बच्चों के समर्थ हो जाने अथवा रिटायर होने पर आमतौर से लोग बेकारी, मटरगश्ती में दिन काटते हैं, यह समाज का ऋणभार-बैठने की तरह ही हेय है। किसी की भी प्रगति एकाकी प्रयत्न से नहीं हो सकती, जो भी ऊँचा चढ़ा या आगे बढ़ा है, उसे समाज के सहयोग से ही इस प्रकार लाभांवित होने का अवसर मिला है, अस्तु उसका कानूनी न सही, नैतिक उत्तरदायित्व यह है कि जब भी अवसर मिले, समाज का ऋण चुकाने के लिए अपने बचे हुए समय, ज्ञान एवं प्रभाव को लोक-मंगल के लिए प्रयुक्त करें। जमीन में सोना गाड़ने अथवा जेवर लटकाए फिरने वाले लोग जिस तरह पूँजीगत लाभ से समाज में उद्योग-व्यवसायों में गतिरोध उत्पन्न करते हैं, उस लाभ से अनेकों को रोजी प्राप्त करने में अवरोध उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार आत्मिक एवं बौद्धिक संपदासंपन्न लोग भी यदि अपनी विभूतियों को अपने या परिवार तक के लिए ही अवरुद्ध करते हैं तो उससे मानव समाज की प्रगति में बाधा ही उत्पन्न होती है। विभूतिवान व्यक्ति यदि अपने को मिला विशेष ईश्वरीय अनुदान विलासी प्रयोजनों में खरच कर डालते हैं, स्वयं के शौक-मौज तक सीमित रहते हैं तो समझना चाहिए कि भले ही यह सामान्य प्रचलन जैसा दिखे, आत्मिक दृष्टिकोण के अनुसार इस रीति-नीति को गर्हित ही ठहराया जाएगा।

उत्पादन की तरह ही वितरण-व्यवस्था का भी महत्त्व है। उत्पादन को यदि कुछ लोग अपने कब्जे में करके रोके रखें और उपभोक्ताओं को उनके लिए तरसाकर मनमाने दाम वसूल क तो यह एक प्रकार से समाजद्रोह ही होगा। जिस प्रकार पूँजी को गतिशील रहना चाहिए, उसी प्रकार उत्पादन को उपभोक्ता के लिए तुरंत उपलब्ध होने की भी व्यवस्था रहनी चाहिए। अवरोध चाहे पूँजी का किया जा रहा हो, चाहे वस्तुओं को संग्रह करने का, दोनों ही अर्थ-व्यवस्था को ही नहीं— सामाजिक और नैतिक संतुलन को भी गड़बड़ा देता है। डॉ. सैम्युअल के शब्दों में— “पूँजी और उत्पादन में अवरोध उत्पन्न होने से वैसी ही अव्यवस्था उत्पन्न होती है जैसी श्वास-प्रश्वास, रक्ताभिषण एवं मल-विसर्जन में अवरोध उत्पन्न होने पर शरीर पर संकट आता है।”

मनुष्य केवल धन ही नहीं कमाता, उसके उपादन में अन्य अनेक ऐसी विशेषताएँ भी सम्मिलित हैं जो वैयक्तिक एवं सामाजिक सुख-शांति को बढ़ाने में धन से भी अधिक कारगर सिद्ध होती हैं। धन के वितरण का लाभ सर्वसाधारण तक पहुँचाने के लिए साम्यवाद और आत्मवाद दोनों ही एक स्वर से समर्थक हैं। ठीक इसी प्रकार मनुष्य के पास यदि अन्य प्रकार की विशेषताएँ और विभूतियाँ हैं तो उसका प्रसार— वितरण अधिक व्यापक क्षेत्र में होना चाहिए। उससे अधिक लोगों को लाभांवित होना चाहिए। इन प्रतिपादनों का अर्थशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र दोनों ही समान रूप से समर्थन करते हैं। इससे स्पष्ट है कि दोनों का क्षेत्र भले ही भिन्न हो, लक्ष्य एक है।


सरस्वती-साधना का एक प्रकार— सार्थक संभाषण

मनोभाव संपूर्ण शरीर को प्रभावित करते हैं। क्रोध, आवेश, भय, शोक, वियोग जैसे अवसरों पर नेत्र, होठ, कपोल बिना बोले ही मनःस्थिति प्रकट कर देते हैं। भीतर जो कुछ उमड़-घुमड़ रहा है, उसकी छाया चेहरे पर झाँकती रहती है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं, शरीर काँपता है। इससे स्पष्ठ है, आंतरिक भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। भूख और नींद गायब हो जाती है। आवेशग्रस्त व्यक्ति का दिल जोरों से धड़कने लगता है, दम फूलता है, सिर चकराता है, गला सूखता है और प्यास बार-बार लगती है। इससे स्पष्ट है कि मन की स्थिति का प्रभाव सारी देह पर पड़ता है, इस प्रभाव को यदि सूक्ष्म रूप में देखना हो तो उसे वाणी के साथ जुड़े हुए रहस्यमय कंपनों के साथ आसानी से देखा-समझा जा सकता है।

यों ठग और धूर्त्त व्यक्ति मीठी बातें बना और प्रलोभन भरे आश्वासन देकर भोले लोगों को ठगने में भी सफल हो जाते हैं, पर वह प्रभाव केवल उन्हीं उथली मन:स्थिति के लोगों पर पड़ता है, जो केवल शब्दों के अर्थ भर को समझते हैं और प्रलोभन में बिना आगा-पीछा सोचे, यथार्थता का विश्लेषण किए बिना ही फिसल पड़ते हैं। ठगी के शिकार आमतौर से ऐसी बालबुद्धि के लोग ही होते हैं। जहाँ थोड़ी भी सतर्कता बरती जाए और यथार्थता ढूँढने के लिए थोड़ा-सा भी तर्क-वितर्क किया जाए, तो वस्तुस्थिति सामने आ जाती है और ठगों से बचा जा सकता है। यह व्यावहारिक ज्ञान की बात हुई। आगे चलकर यदि सूक्ष्मबुद्धि और प्रखर आत्मचेतना की कसौटी पर कसने की क्षमता विकसित कर ली जाए, तो किसी की भी वाणी सुनकर उसके साथ जुड़े हुए प्रभाव एवं व्यक्तित्व को आसानी से समझा जा सकता है।

वाणी में जानकारी का ही आदान-प्रदान नहीं होता। व्यक्तित्वों की विशेषताओं का भी परस्पर परिवर्तन होता है। सद्भावसंपन्न व्यक्ति भले ही किसी को उपदेश न दें, उनके साधारण शब्दोच्चार में भी जो मिठास, सौजन्य और सदुद्देश्य घुला रहता है, वह ऐसा हृदयस्पर्शी होता है कि सुनने वाले उससे बहुत कुछ प्राप्त करते जाते हैं और वह ऐसा होता है, जिससे उद्वेगों के समाधान में भारी योगदान मिल सकें। यों उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तित्व बिना वाणी के भी अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। उनके नेत्रों की ज्योति एवं चेहरे पर बनने बाली भाव-भंगिमा एवं समस्त शरीर से निकलने वाली तेजोवलय ऊष्मा सहज ही अपना काम करती रहती है और संबद्ध वातावरण को प्रभावित करती है। इस प्रभावशीलता का अधिक प्रसारण वाणी द्वारा होता है। सद्भावसंपन्न वाणी जिनके लिए बोली गई है, उन्हीं पर नहीं; वरन विराट-ब्रह्मांड में सुविस्तृत होकर अपना प्रभाव जड़-चेतन पर छोड़ती है। इस दृष्टि से गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि कोई प्रत्यक्षतः कुछ अधिक काम करते हुए न दिखाई पड़ने वाले व्यक्ति भी इस संसार में व्यापक क्षेत्र तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं और यदि वे सद्भावसंपन्न हैं तो वाणीमात्र से संसार की महती सेवा-सहायता करते हैं। इसके विपरीत दुर्भावनाग्रस्त मन, अपनी वाणीरूपी तीर-तरकस से प्रहार करते हुए लोक-मानस को क्षत-विक्षत करता है और संसार को भारी हानि पहुँचाता है। पानी में फेंका हुआ एक ढेला हजारों लहरें उत्पन्न करता है, इसी प्रकार शब्दोच्चारण के साथ अंतरिक्ष में प्रवाहित होता हुआ व्यक्तित्व अपनी सुगंध-दुर्गंध से व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करता है।

कटु-कर्कश शब्दों के साथ जुड़ी हुई दुर्भावना सबसे पहली हानि वक्ता की ही करती है। उग्र मनःस्थिति काया का सारा ढाँचा लड़-खड़ाकर रख देती है। वाणी के साथ जब वह भूकंप-विस्फोट की तरह बाहर निकलता है तो उससे बाहरी क्षेत्र ही धूल-धूमयुक्त नहीं होता, वरन वह विस्फोटस्थल भी क्षत-विक्षत होता है। क्रोधी, ईर्ष्यालु, निंदक, छिद्रांवेषी, निराश, पलायनवादी प्रकृति के मनुष्य दूसरों को भी चोट पहुँचाते हैं और खिन्न-उद्विग्न करते हैं, पर सबसे अधिक हानि वे अपनी ही करते हैं। दुर्भावग्रस्त मनःस्थिति वाले व्यक्ति को देर-सवेर में शारीरिक और मानसिक रोगों का शिकार बनना ही पड़ता है। कहना न होगा कि व्यक्ति अपने और अपने समीपवर्त्ती लोगों के लिए अभिशाप ही सिद्ध होता है।

पिछड़े वर्गों की उनकी अपनी त्रुटियों में गंदगी और व्यसनग्रस्तता को मुख्य माना जाता है; पर यदि गहराई से विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि गाली-गलौज, कलह-तिरस्कार, असभ्य और अस्त-व्यस्त शब्दोच्चारण भी उन्हें गई गुजरी स्थिति में डाले रहने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। बालकों पर यह पारिवारिक वार्त्तालाप असाधारण प्रभाव डालता है और उन परिवारों की पीढ़ियाँ उसी स्तर की ढलती चली जाती हैं। दूरदर्शी लोग व्यक्ति के विकास की विधि बताते हुए प्रथम चरण वाणी के परिष्कार को बताते हैं। सभ्यता और संस्कृति का प्रथम सोपान शिष्ट, सौम्य, संतुलित और सद्भावसंपन्न वाणी के उच्चारण से ही आरंभ होता है। असंबद्ध और असंतुलित वचन बोलने वाले कभी सम्मानास्पद नहीं बन सकते, उन्हें ओछा-पिछड़ा और अनुत्तरदायी ही माना जाता रहेगा।

मनःस्थिति का चुंबकत्व वाणी द्वारा अपना प्रभाव बाहरी क्षेत्र पर छोड़ता है और अपने स्तर के व्यक्ति तथा वातावरण को समेटकर सहज ही इर्द-गिर्द जमा करता रहता है। कुभाषी की आंतरिक दक्षता कभी भी उसे सरस और उल्लासभरे जीवन का आनंद न लेने देगी। दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया विरोध, विग्रह, निंदा, असहयोग, अविश्वास आदि के रूप में ही सामने आ सकती है और उनके कारण प्रगति-पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं।

उपनिषद् के ऋषि ने परब्रह्म के सम्मुख अपनी अतिमहत्त्वपूर्ण आकांक्षा व्यक्त करते हुए कहा है— ‘जिह्वा में मधुमत्तमा’, मेरी वाणी मिठास से भरी हुई हो। सचमुच यदि कोई मधुरवचन बोलने का अभ्यास कर ले तो प्रगति-पथ के अनेक अवरोधों का सहज ही समाधान हो सकता है। प्रशंसापरक और उत्साहवर्द्धक शब्द बोलकर यदि किसी में नवजीवन संचार किया जा सके तो निस्संदेह यह सहायता दे, बड़े-से-बड़े धन-सहयोग की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकती है। खोए हुए आत्मविश्वास को यदि जगाया, जमाया और बढ़ाया जा सके तो इससे बढ़कर और कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। सद्भावसंपन्न व्यक्ति अपने स्तर के अनुरूप ऐसे ही परामर्श देते हैं, जिन्हें यदि आंशिक रूप से समझा, अपनाया जा सके तो उत्कर्ष की दिशा में तेजी से बढ़ा जा सकता है।

ऋग्वेद में एक आर्यवचन आता है, जिसमें कहा गया है कि जहाँ वाणी छानकर बोली जाती है, वहाँ विभूतियाँ दौड़ती हुई चली आती हैं। जहाँ शहद रहता है, वहाँ मक्खियाँ सहज ही खिंचती चली आती हैं। वाणी का यह प्रभाव होना ही चाहिए कि उच्चारणकर्त्ता के समीप सफलताओं का पर्वत इकट्ठा होता चला जाए। छानकर वाणी बोलने का अर्थ है— सोच-समझकर प्रभाव-परिणाम पर विचार करते हुए, विवेकपूर्वक सदुद्देश्ययुक्त बोलना। वस्तुतः ऐसा बोलना ही सार्थक है। कटु और विद्वेषयुक्त भाषण से तो मौन रहना अथवा मूक होना अधिक उपयुक्त है।

भगवान ने कान दो दिए हैं और जीभ एक। इसका अर्थ है— हम सुनें अधिक बोले कम। भावार्थ यह है कि चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में जो सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त संस्कारसहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है, उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका सम्मान गिरा देती है; किंतु यदि अमृतवचन बोले जाए तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्त्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं। विवेक, तथ्य और दूरदृष्टि एवं सदुद्देश्य के सम्मिश्रण के साथ किए गए शब्दोच्चार को सरस्वती कहा गया है। जिह्वा पर सरस्वती के आवर्तन का अलंकार यह संकेत करता है कि सज्जनता का बहुत कुछ परिचय उनकी मधुमयी वाणी से प्राप्त होता है।

कामकाजी बातों के अतिरिक्त जहाँ भावोत्तेजक एवं विचार-परिष्कार की दृष्टि से जो भी वार्त्तालाप किया जाता है, वह वस्तुतः जप का ही एक प्रकार है। जप का उद्देश्य है; अमुक शब्दावली को बार-बार कहते रहने के फलस्वरूप मंत्र में सन्निहित विचारधारा को हदयंगम करना— परिपक्व बनाना।  का पाठ, भक्तिगीतों का गायन इसी दृष्टि से किया जाता है। यह प्रयोजन समय-समय पर विचार-विनिमय अथवा परामर्शपरक आदान-प्रदान से भी संभव हो सकता है। अपने और दूसरों की सद्भावनाओं को उभारने वाला, सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने वाला, शब्दोच्चार करने वाला व्यक्ति मौन-साधन एवं जप-उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्त्ता का भी कल्याण करते हैं, लोक-मंगल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।

संत विनोबा ने पंढरपुर सर्वोदय सम्मेलन के एक प्रवचन में वाणी की उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था— “ .......... मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। .... जो किया है आप लोगों ने किया है, मैंने तो जप किया है; भूदान का जप किया तो भूदान मिला। संपत्तिदान का जप किया तो संपत्तिदान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूँ, न दान करता हूँ, न तप करता हूँ;  मैं तो केवल जप ही करता हूँ और जप से मेरे सारे काम बन जाते हैं।”

शतपथ ब्राह्मण की उक्ति है कि, “जनसमाज का मैल धोने वाला शब्द-प्रवाह ही सारस्वत मंत्र है। सरस्वती के अनुग्रह से अनेकों सिद्धियाँ मिलती हैं, अष्टसिद्धि और नवऋद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के उपासनात्मक कर्मकांडों का अपना महत्त्व है, पर सर्वजनीन सारस्वत मंत्र वह शब्दोच्चार है, जिसे सत्प्रयोजन के लिए, सद्भावना, विवेकशीलता और मधुरासम्मिश्रित करके बोला गया हो। इस स्तर का भाषण, चाहे वह स्वल्प शब्दों का ही क्यों न हो, सब कल्याण की परम श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।


सृजनात्मक चिंतन— सुख-संतोष का आधार

सुखी और प्रसन्न दिखाई पड़ने वाले मनुष्यों का यदि आंतरिक विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि साधनों, सफलताओं या परिस्थितियों के कारण नहीं, वे अपनी सुखद कल्पनाओं के आधार पर उत्साह और आनंद से भरे रहते हैं।

सुखद साधनों की उपलब्धि के साथ जिनने अपनी प्रसन्नता को जोड़ा होगा, वे सदा खिन्न एवं असंतुष्ट ही दिखाई पड़ेंगे; क्योंकि मनचाही परिस्थितियाँ किसी को भी प्राप्त नहीं होतीं। आकांक्षाओं की सीमा नहीं, चाहना कितनी बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं, उस पर कोई अंकुश नहीं। पर सफलताएँ तो व्यक्तित्व के निर्माण और पुरुषार्थ के नियोजन पर निर्भर रहती हैं; अस्तु वे आकांक्षाओं की तुलना में सदा कम ही रहेंगी। इस कारण को लेकर भी कोई कितना ही दुःखी और असंतुष्ट रह सकता है।

अभीष्ट वस्तुएँ, अभीष्ट परिस्थितियाँ, अभीष्ट सफलताएँ— तभी तक रुचिकर लगती हैं, जब तक वे मिल नहीं जातीं। प्रतीक्षा में ही रस रहता है। मिल जाने पर उसकी सरसता अनायास ही विदा हो जाती है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने, मुकदमों में जीतने, पुत्र होने, मकान बनाने आदि की अभिलाषाएँ जब तक पूरी नहीं होतीं, तभी तक वे आकर्षक लगती हैं, जब वे पूरी हो जाती हैं तो उनमें कुछ भी आनंद शेष नहीं रह जाता। तब वे भारमात्र एवं नीरस बन जाती हैं। अतृप्ति जब तक रहती है, तब तक ही आशाभरा उत्साह रहता है। कन्या के लिए उपयुक्त घर, वर मिलने और विवाह आयोजन ठीक प्रकार संपन्न होने की चिंता तथा व्यवस्था में जो दौड़ रहती थी, उसका विवाह होने के उपरांत सहज ही अंत हो जाता है। तब ऐसी शिथिलता आती है, मानो कुछ करने के लिए ही शेष न रह गया हो।

आनंद की अनुभूति का सारा आधार मनःस्थिति पर निर्भर है, जो उपलब्ध है, उसे निरख-परखकर देखें और उनके साथ अपनी तुलना करें जिन्हें इतना भी मिला हुआ नहीं है, तो प्रतीत होगा कि अपनी स्थिति ऐसी है, जिस पर संतोष ही नहीं, गर्व भी किया जा सके। किंतु इसके विपरीत आकांक्षाओं की तुलना में जो अभाव प्रतीत होते हैं, उन्हीं पर ध्यान केंद्रित रहे और सुसंपन्नों की तुलना करते हुए अपनी स्थिति को हेय समझते रहा जाए, तो असंतोष एवं विक्षोभ के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

भविष्य की आशापूर्ण संभावनाओं का चिंतन करते रहने से सुखद-स्वप्न आँखों के आगे तैरते रहते हैं और कई बार वे इतने मधुर होते हैं कि सुसंपन्न लोगों की तुलना में अधिक उल्लास उमगता रहता है।

माना कि भावी सुसंभावनाएँ निश्चित नहीं हैं, पर यही क्यों मान लिया जाए कि कुकल्पनाएँ ही सही सिद्ध होंगी। सौभाग्य संदिग्ध हो सकता है; पर दुर्भाग्य ही कहाँ निश्चित है। दो अनिश्चितों में से यदि किसी को कल्पना-क्षेत्र में बिठाना ही पड़े तो चुनाव सुसंभावनाओं का ही करना चाहिए। भूतकाल की जो उपलब्धियाँ अब हाथ नहीं रहीं, उनके बारे में सोचते रहने से यही प्रतीत होगा कि जो हाथ था, वह चला गया और संपदा लुट गई, पर यदि भावी संभावनाओं और सफलताओं के ताने-बाने बुनने की आदत डाल ली जाए और आगत उपलब्धियों के लिए प्रयास, स्वागत का ठाठ-बाट खड़ा किया जाए तो लगेगा कि अगले दिनों आनंद और उल्लास की घड़ियाँ द्रुतगति में दौड़ती हुई निकट चली आ रही हैं।

सोचने की आदत निषेधात्मक, निराशाजनक, हानिसंबद्ध एवं विपत्ति-चिंतन की पड़ जाए तो पग-पग पर दुःख-दुर्भाग्य के घेरे में अपने को घिरा हुआ अनुभव किया जाएगा; पर यदि सृजनात्मक एवं सुसंभावनाओं के चिंतन की दिशा मिल जाए तो हर किसी को, अपने को, हर घड़ी सुखी-संतुष्ट एवं आशा-उत्साहभरे स्वर्गीय वातावरण में रहने की अनुभूति होती रहेगी।


यह बलिदानियों की वेला है

Akhandjyoti - 1973 - February


संगीत का शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

गायन को एक प्रकार का योगाभ्यास एवं वक्ष तथा कंठ संस्थान के समीपवर्त्ती अवयवों का महत्त्वपूर्ण व्यायाम माना गया है। भारतीय संगीतशास्त्र के आचार्यों के अनुसार, गायन में आवाज नाभिकेंद्र से उठती है, ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है, तालु, कंठ, फुफ्फुस, हृदय, आमाशय, यकृत एवं आँतों को प्रभावित करती हुई, एक गतिचक्र बनाती हुई, पुनः अपने उद्गम स्थान— नाभि तक पहुँचती है। यह गतिचक्र अपने प्रभाव क्षेत्र के सभी अवयवों का न केवल व्यायाम-प्रयोजन पूरा करती है, वरन उनमें प्राणवायु का अतिरिक्त अनुदान भी देती है।

यों मोटेतौर से यही प्रतीत होता है कि आवाज कंठ, तालु, जिह्वा, ओष्ठ आदि के सम्मिलित संचालन से निकलती है; पर यह बात मात्र वार्त्तालाप के बारे में ही सत्य है। गायन में एक विशेष प्रकार के खिंचाव, तनाव एवं उल्लास की जरूरत पड़ती है और वह एक स्नायु विद्युत के रूप में नाभिकेंद्र से उद्भुत होती है। उस उद्भव के साथ न केवल स्वर-संधान होता है, वरन षट्चक्रों के, उपत्यिकाओं के, त्रिविधि ग्रंथियों के सुप्त संस्थान भी जागृत होते हैं। इस प्रकार गायन न केवल गायक के लिए भावोद्दोलित करके आनंदित करता है; वरन आंतरिक अवयवों का व्यायाम होते रहने से उसके स्वास्थ्य-संरक्षण एवं आंतरिक दिव्य शक्तियों की प्रसुप्त स्थिति को जागरण में परिवर्तित करने का लाभ भी मिलता है। शरीर और मन को उभयपक्षी शक्ति प्रदान करने की जिस सरलता और अधिकताभरी क्षमता गायन में है, उतनी और किसी में नहीं। भावनात्मक उल्लास के प्रवाह में उसके मानसिक तनावों एवं अवसादों का भी निवारण होता रहता है।

गायन की तीन लय हैं— द्रुत, विलंबित, मध्यमा। द्रुत अर्थात तीव्र गति का गायन। इससे जीभ, कंठ, वक्ष और हृदय का विशेष व्यायाम होता है। विलंबित अर्थात स्वर को खींचकर गाना। इसका प्रभाव स्वरवाहिनी नलिकाओं को खोलता और सुदृढ़ बनाता है। मध्यमा अर्थात सामान्य गायन। इसकी प्रतिक्रिया स्नायुमंडल, नाड़ी-संस्थान, हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर होती है। जिनके जो अवयव दुर्बल हैं, वे उसके अनुरूप लय चुनकर एक प्रकार से आंतरिक अवयवों की सहज चिकित्सा कर सकते हैं।

हास्यरस, वीररस, शृंगाररस, शांतरस आदि नौ रस गायन के माने गए हैं, उनके लिए विशेष राग-रागनियाँ और विशेष समय का निर्देश किया गया है। समय, राग और रस— इनके सम्मिश्रण से एक विशेष प्रकार का ध्वनि-प्रवाह उत्पन्न होता है और उससे अगणित मानसिक रोगों की चिकित्सा हो सकती है।

शरीर पाँच तत्त्वों से बना माना जाता है। आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार, उसकी गतिविधियाँ वात, पित्त, कफ के अनुसार दबती-उभरती रहती हैं। बायोकैमिक चिकित्सा में बारह नमक शरीर के संचालक और आरोग्य के आधार हैं। होम्योपैथी में विषतत्त्वों की विवेचना की गई है। क्रोमोपैथी (सूर्य चिकित्सा) में सात रंगों की न्यूनाधिकता स्वास्थ्य के संतुलन-असंतुलन का कारण है। स्वरशास्त्र के अनुसार, कायकलेवर में सप्तसूक्ष्मनाद उठते रहते हैं, इन्हें स्थूलजगत में सप्तस्वरों के रूप में पहचाना जाता है। सूक्ष्मस्वरूप के दबने-उभरने से जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य असंतुलन उत्पन्न होता है, उसे स्वर विज्ञान के आधार पर उपयुक्त गायनों के विधान से संतुलित किया जा सकता है।

ऋतुओं के अनुरूप विशिष्ठ गायनों के विधान में भी ऐसे ही रहस्य छिपे पड़े हैं। बसंत ऋतु में बसंत राग, वर्षा में मेघ-मल्हार आदि के लिए संकेत हैं। जिस प्रकार प्रातःकाल, प्रभात राग एवं भक्तिरस की उपयोगिता मानी गई है, उसी प्रकार दिन-रात के विभिन्न समयों में विभिन्न राग एवं रस उपयोगी माने गए हैं, यह व्यवस्था ऐसे ही मनमानी नहीं है; वरन इसके पीछे शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य के महत्त्वपूर्ण आधारों का समावेश है।

सामान्यतया गायन को एक आकर्षक, मनोरंजनमात्र माना जाता है; पर यदि उसके संबंध में अधिक गहराई तक उतरा जाए तो प्रतीत होगा कि वह शारीरिक एवं मानसिक रोग-निवारण एवं शक्ति-संवर्द्धन का भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। विभिन्न रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों को समय तथा कष्ट के अनुरूप गायन-विद्या बताकर लाभांवित किया जा सकता है। जिनका स्वास्थ्य साधारणतया ठीक है, किंतु किन्हीं हृदय, फुफ्फुस आदि विशेष अवयवों को परिपुष्ट करना हो तो उनके लिए भी गायनों का अवलंबन लिया जा सकता है। खिलाड़ी एवं पहलवानों की सफलता हृदय एवं फुफ्फुसों की बलिष्ठता पर निर्भर रहती है, यह प्रयोजन वे उपयुक्त गायन विधि अपनाकर पूरी कर सकते हैं।

गायन के अतिरिक्त वाद्य संगीत की अपनी महत्ता है। गायन जिन्हें नहीं आता, वे वाद्य की ध्वनिलहरियों के सहारे उपयुक्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यदि स्वयं बजाना आता हो तो उनके सहारे सिर, गरदन, कंधे, छाती, पेट आदि का उपयोगी व्यायाम हो सकता है। क्रमबद्ध और तालबद्ध क्रियाकलाप से उत्पन्न होने वाली शक्ति-धाराओं के संबंध में जिन्होंने पढ़ा-सुना है, वे सहज ही यह समझ सकते हैं कि वाद्य यंत्र बजाने के साथ-साथ जो तालक्रम चलता है, उसके कैसे उपयोगी स्पंदन उठते हैं और उनसे किस प्रकार मनुष्य लाभांवित होता है। बाँसुरी-शहनाई प्रभृति बाजे तो एक प्रकार से गायन द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों की ही आवश्यकता पूरी करते हैं। जो लाभ गायन का है, वह मुँह से बजाए जाने वाले बाजे भी दे सकते हैं।

गायन और वाद्य यदि स्वरशास्त्र के अनुरूप हों तो उसका सुनने वालों पर उपयोगी प्रभाव पड़ता है। जो न गाना जानते हैं, न बजाना; वे अपनी शारीरिक-मानसिक स्थिति के अनुरूप स्वरलहरी उपयुक्त अवसर पर, उपयुक्त मात्रा में सुनकर भी बहुत हद तक लाभांवित हो सकते हैं। संगीत के संबंध में यदि आवश्यक शोध की जाए तो उससे शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य के अभिवर्द्धन में बहुत सहायता ली जा सकती है। इस प्रकार के प्रयोग योरोप एवं अमेरिका के वैज्ञानिक कर भी रहे हैं और उन्हें आशाजनक सफलता भी मिली है। दुधारू पशुओं को दुहते समय अमुक ध्वनि का संगीत सुनाकर अधिक दूध प्राप्त करने में बहुत सफलता मिली है। मानसिक रोगियों पर भी संगीत से आश्चर्यजनक लाभकारी प्रभाव होने का निष्कर्ष सामने आया है। पेड़-पौधों की उन्नति में भी संगीत की प्रभावी शक्ति सिद्ध हुई है। अन्ना मलय विश्वविद्यालय के वनस्पतिविज्ञानी डॉ. टी. सी. एन. सिंह ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि ध्वनि-तरंगों द्वारा पेड़-पौधों की— फसलों की उन्नति में आशाजनक सहायता मिल सकती है।

अमेरिकी संगीत चिकित्सक डॉ. हार्ल्स एस्टले ने अपनी उस प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने का प्रयत्न किया है। उनने लगातार बीस वर्ष इसी पद्धति से चिकित्सा की है और बताया है कि ऐलोपैथी द्वारा रोगमुक्त होने वालों की अपेक्षा संगीत उपचार से अच्छे होने वालों का अनुपात कहीं अधिक है। विशेषतया मानसिक रोगों में तो वह अचुक काम करती है। मांसपेशियों और नाड़ी-संस्थान की गड़बड़ी तो निश्चित रूप से अन्य उपायों की अपेक्षा, संगीत द्वारा अधिक सफलतापूर्वक और अधिक जल्दी अच्छी की जा सकती है।

पूर्व जर्मनी के मोटिंगन नगर के संगीत द्वारा चिकित्सा करने वाले डॉ. जौहान्म शूमिलिन ने अपने प्रयोगों और अनुसंधानों से यह सिद्ध किया है कि मनुष्यों की तरह ही बीमार पशुओं को भी संगीत-उपचार से रोगमुक्त किया जा सकता है। उन्होंने अनुभवों और परीक्षणों का विस्तृत विवरण प्रकाशित करते हुए यह बताया है कि, किस प्रकार बिना दवा-दारू के ही कितने कष्टसाध्य रोगों से ग्रस्त मनुष्यों ने ही नहीं; वरन पशुओं ने भी रुग्णता से छुटकारा पाया।

चिकित्साशास्त्र के साथ-साथ भूतकाल में विभिन्न प्रकार से संगीत का उपयोग होता रहा है। मिस्र के चिकित्सक दवा-दारू करने के अतिरिक्त संगीतमय मंत्रों का भी उच्चारण करते थे। अफ्रीका के वन्य-प्रदेशों की आदिवासी जातियाँ विशेष प्रकार की ध्वनियाँ मुख से उच्चारण करके विभिन्न रोगों का उपचार करने में दक्ष रही हैं। डेविड हार्प नामक संगीतकार सम्राट सॉल को असाध्य रोग से मुक्त करने में अपनी वाद्यकला को पूर्णतया सफल सिद्ध कर चुका है। होमर के अनुसार यूलीसेस को प्राणघातक रोग से संगीत-उपचार से ही मुक्ति मिली थी।

इटालियन नृत्य ‘टैरेनटेला’ के बारे में प्रसिद्ध है कि जब वह नृत्य आरंभ होता है तो दर्शक आवेश में आ जाते हैं और वे स्वयं भी अपनी मान-मर्यादा को छोड़कर नृत्य करने लगते हैं। इस नृत्य में विशेष प्रकार के संगीत की ही प्रधानता रही है।

मानसोपचार में अब संगीत ध्वनि-प्रवाह को बहुत महत्त्व दिया जाने लगा है। पाश्चात्य देशों के प्रायः सभी मानसिक रोगों के अस्पतालों में इस प्रकार का प्रबंध है कि विभिन्न स्तर के पागलों एवं सनकियों को विशेष प्रकार की संगीत-ध्वनियों से भावविभोर कर दिया जाए। इससे उनका उन्माद घटता है और मनःस्थिति में आशाजनक सुधार होता है। दंतचिकित्सकों ने भी अब इस पद्धति को अपने व्यवसाय में उपयोग करना आरंभ किया है। दाँत उखाड़ने, इंजेक्शन लगाने एवं ऑपरेशन करने की कठिन घड़ियों में संगीत उनका मानसिक स्तर संतुलित बनाए रहता है और दंत चिकित्सा के कठिन क्षण सहज ही निकल जाते हैं।

संगीत की विशेष प्रकार की ध्वनि-तरंगों के साथ नृत्य मुद्राएँ मिलकर सोना-सुगंध के सम्मिश्रण जैसा प्रभाव उत्पन्न करती हैं। घुँघरूओं— पायलों की झंकारें,  नृत्य-प्रवाह में थिरकते हुए चरण जब विशेष प्रकार की संगीतलहरियों के साथ लहराती हैं तो उससे नर्तक ही नहीं, दर्शक भी किसी अतिमानवी लोक में विचरण करते हुए पाते हैं। उस भावविभोरता की स्थिति में मन पर जमे हुए तनावों का भार सहज ही हलका होता है और उलझी हुई मनःस्थिति सहज ही सुलझने लगती है। यों नृत्य का एक स्वतंत्र शास्त्र भी है, पर वस्तुतः वह संगीत के साथ ही जुड़ा हुआ है। यों गायन और वाद्य, व्याकरण और साहित्य की तरह दो अलग-अलग पक्ष भी हैं, फिर भी उन्हें परस्पर संबद्ध एवं पूरक ही माना जाता है, सो शृंखला की तीसरी कड़ी नृत्य भी है। यह समन्वय एक विशेष प्रकार के ऐसे प्राणायाम का सृजन करता है, जो जीवन में उल्लासभरी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। आमतौर मे गायक, वादक और नर्तक स्वस्थ ही नहीं; प्रफुल्लित, स्फूर्तिवान, सुकोमल एवं सुरम्य-मनोहर भी होते हैं।

युद्धों में संगीत का सदा से प्रयोग होता रहा है। सैनिकों में शौर्य, साहस एवं लड़ने का उत्साह- पराक्रम जगाने में वाद्यों की उपयोगिता सदेव स्वीकार की जाती रही है। महाभारत के सूत्रधार भगवान कृष्ण ने स्वयं पाँच जयशंख बजाकर युद्ध-उद्घोष किया था। बिगुल, नगाड़े, भेरी, मृदंग, बीन, झाँझ जैसे बाजों के उपयोग का वर्णन युद्ध-इतिहासों में मिलता है। वर्त्तमान शताब्दी में इस दिशा में और भी अधिक प्रगति हुई है। युद्ध-वाद्यों की शृंखला में ऐसे बाजे विनिर्मित हुए हैं, जो भयभीत और कायरों की नसों में भी मरने-मारने का आवेश भर सकें।

इतना ही नहीं, शत्रुपक्ष के सैनिकों में निराशा, शिथिलता एवं भयग्रस्तता उत्पन्न करने वाली ध्वनिलहरियाँ भी उत्पन्न की गई हैं और उनसे प्रतिपक्षी को परास्त करने में एक सीमा तक अच्छी सफलता मिली है। युद्धबंदियों के बीच ऐसी ध्वनियाँ बजाई जाती हैं, जिससे वे भविष्य में युद्ध करने योग्य ही न रह जाएँ और उनसे भविष्य में किसी पराक्रम की आशा न की जाए।


तपश्चर्या— समृद्धियों और विभूतियों की जननी

शरीर और मन की भौतिक लालसाओं एवं सुखाकांक्षाओं को विरत करके, आत्मकल्याण के मार्ग में नियोजित करने का नाम ही तप है। चिरसंचित अभ्यास, शरीर-सुविधा एवं मन की लिप्सा तृप्त करने में निरत रहने का है, वही प्रिय लगता है। उसी में प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति का परिवर्तन ही तप है।

जिस प्रकार भोगवाद— मायाग्रस्त मनुष्य तृष्णा और वासना में निरत रहकर श्रेय-साधना की उपेक्षा करते रहते हैं, उसी तरह आत्मकल्याण के लिए कटिबद्ध होने की श्रेयसाधक प्रधानता देते हैं और सुख-सुविधाओं की उपेक्षा करते हैं। इसके लिए पुराने ढर्रे को बदलना पड़ता है और नया अपनाना पड़ता है। जंगली जानवरों को पालतू बनाने में बहुत श्रम करना पड़ता है। उनकी पुरानी आदतें भुलानी पड़ती हैं और नए अभ्यास कराने होते हैं। इस प्रशिक्षण के साथ, उनके साथ कठोरता का व्यवहार भी करना पड़ता है। इसी कठोरता का नाम तप-साधना है।

भोगवादी मनःस्थिति में जो कार्य प्रिय लगते थे, वे आत्मवादी स्थिति में अरुचिकर बन जाते हैं और उन क्रियाकलापों में रस आता है, जो पहले कष्टकारक और निरर्थक प्रतीत होते थे। यह परिवर्तन कहने में सरल हो सकता है; किंतु व्यवहार में कठिन है। इस कठिनाई को स्वाभाविक और सरल बनाने के लिए विविध-विधि तप-साधनाएँ करनी पड़ती हैं।

शरीर से तप-तितीक्षा और मन से स्वाध्याय, चिंतन-मनन इन दोनों के समन्वय से तप का प्रयोजन पूरा होता है। इसलिए स्वाध्याय को भी तप का अंग माना गया है।

परमार्थ के लिए सेवा-साधना में जुट जाना और अपनी प्रतिभा, बुद्धि, संपदा आदि को लोक-मंगल के लिए नियोजित करना भी तप-साधना है। इसी तप-साधना से अंतरात्मा निर्मल और शक्तिशाली होती है। उसी के द्वारा आत्मकल्याण, ब्रह्मसाक्षात्कार एवं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। शास्त्र कहता है—

तपसा   तापयेद्देहं    पितृदेवांश्च  तर्पयेत्।

तपसा स्वर्गमाप्नोति तपसा विंदते महत् ।। 11.21.10 ।।

क्षत्रियो   बाहुर्वीर्येण  तरेदापद   आत्मनः।

धनेन   वैश्यः शूद्रस्तु  जपहोमैर्द्विजोत्तमः।। 11.21.11 ।।

अतएव  तु  विप्रेन्द्र  तपः  कुर्यात्प्रयत्नतः।

शरीरशोषणं  प्राहुस्तापसास्तप  उत्तमम् ।। 11.21.12 ।।

शोधयेद्विधिमार्गेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः।

—  देवी भागवत (पुरश्चरण प्र०)

तपस्या से देह को तपावें। तपस्या से ही स्वर्ग मिलता है। तपस्या से महान प्रयोजन की पूर्ति होती है। तपस्वी के द्वारा की हुई पूजा से ही देवता और पितरों की तृप्ति होती है।

क्षत्रिय लोकहित के लिए किए गए पराक्रम से, वैश्यधन से, शूद्रसेवा से और ब्राह्मण जप-होम की सहायता से भी तपश्चर्या कर सकते हैं।

तपस्या के लिए निरंतर प्रत्यशील होना चाहिए। शरीर की तितीक्षा कराने से ही तपस्या होती है। उसके लिए अन्नशुद्धि और चांद्रायण कृच्छ आदि विधान करने चाहिए।

तपस्यध्ययने      युक्तो      भवेद्भूतानुकम्पकः।

तपसा   स्वर्गमाप्नोति  तपसा विंदते  महत् ॥30॥

तपोयुक्तस्य  सिद्ध्यन्ति  कर्माणि नियतात्मनः।

—  देवी भागवत

स्वाध्यायपूर्वक तपश्चर्या करें। लोक-मंगल का ध्यान रखें। तपस्या में निरत, स्थिर बुद्धि व्यक्ति के समस्त सत्कर्म सफल होते हैं।

यथा   रथोऽश्वहीनस्तु   यथाश्वो   रथहीनकः ।

एवं   तपश्च  विद्या  च  संयुतं  भैषजं भवेत् ।।

उभाभ्यामपि  पक्षाभ्यां  यथा खे पक्षिणां गतिः।

यथैव  ज्ञानकर्मभ्यां  प्राप्यते  ब्रह्म शाश्वतम् ।।

विद्यातपोभ्यां सम्पन्नौ ब्राह्मणो योगतत्परः ।।

— हारीतस्मृति

जैसे बिना घोड़े का रथ और बिना रथ का घोड़ा निरर्थक है। उसी प्रकार तप और विद्या की संगति है। जैसे दो पंखों से ही पक्षी उड़ते हैं, उसी तरह ज्ञान और कर्म द्वारा ब्रह्म को प्राप्त किया जाता है। विद्या और तप के साथ योग-साधना में तत्पर होने की ही सार्थकता है।

अस्मिँल्लोके  तपस्तप्तं  फलमन्यत्र  भुज्यते ।

ब्राह्मणानामिमे   लोका  वृद्धे  तपसि  संयताः ।।

—  महाभारत

इस लोक में जो तपस्या की जाती है, उसका फल परलोक में भोगा जाता है। इस प्रकार एक ही तपस्या ऋद्ध और समृद्ध के भेद से दो प्रकार की है।

तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टि । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः।

—  शिक्षावल्ली तैत्तरीय 9

पौरशिष्ठ तपोनित्य ऋषि का कथन है कि, “तप ही श्रेष्ठ है।” मौदगल्य नामक ऋषि ने कहा—“स्वाध्याय ही सर्वश्रेष्ठ है। स्वाथ्याय और तप एक ही है।”

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।

—  मुण्डक 1-9

जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उस ब्रह्म का तप ज्ञानमय है।

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात् ।

एतैरुपाययैर्यतते यस्तु विद्वां स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।

—  मुण्डक 3/2/4

वह आत्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होती है। प्रमादियों को भी नहीं। तपरहितों को भी नहीं। केवल ज्ञानवान और साधनरत ही उसे प्राप्त करते हैं।

एतेनैव    जिता    लोकास्तपसा   नारदादिभिः ।

शाकमन्ये   परे  मूलम्   फलमन्ये  पयः  परे ।।78।।

घृतमन्ये       परे      सोममपरे     चरुवृत्तयः ।

ऋषयः   पक्षमश्नन्ति  केचिद्भक्ष्याशिनोऽहनि ।।79।।

हविष्यमपरेऽश्नन्त:     कुर्वन्त्येव     परं     तपः ।

अथ   शुद्ध्यै   रहस्यानां  त्रिसहस्त्रं  जपेद्विजः ।।80।।

—  देवी भागवत

इसी प्रकार के तप से नारद आदि ने लोक जीत लिए। इनमें से कुछ ने मूल-फल और कुछ ने केवल दूध का ही आहार किया। कुछ घृत पीकर ही रहते थे, कुछ ने केवल सोमपान और कुछ ने चरुभक्षण ही किया था। कुछ ने प्रति पखवारे एक बार ही भोजन किया और कुछ नित्यप्रति भिक्षान्न का भोजन करते थे। बहुतों ने हविष्यान्न का ही भोजन किया था। इस प्रकार बहुतों ने घोर तप किया था। पापों के शोधनार्थ तीन सहस्र गायत्री का जप करना चाहिए।

कृशानुं       जुह्वति    श्रद्दधाना:।

सत्यव्रता      हुतशिष्टाशिनश्च ।।

गवां    लोकं  प्राप्यते   पुण्यगन्धं।

पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम् ।।

—  महा० वन०

जो तप से कृश हो, सत्यव्रत का पालन करते हुए प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं और हवन से बचे हुए अन्न का भोजन करते हैं, वे पवित्र सुगंध से भरे हुए गौओं के लोक में जाते हैं और वहाँ परमसत्य परमात्मा का दर्शन करते हैं।

अप्यभ्यक्तः। अलंकृतः सुहितः सुखे शयने शयानः। स्वाध्यायमधीत आ हैव स नखाग्रेभ्यस्तप्यते।

—   श० प० 11/5/7/4

भले ही मनुष्य वस्त्र, आभूषण, अलंकर, सुख-शैय्या, सुस्वादु भोजन आदि से अलंकृत हो, पर यदि वह स्वाध्याय-निरत है तो उसे नख-शिख तक तप संलग्न ही समझना चाहिए।

तपश्च दानं च शमो दमश्च ह्रीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा ।

स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुसांम् ।।

सर्वाणि चैतानि यथोदितानि तपःप्रधानान्य भिमर्शकेन ।

—  मत्स्यपुराण

ययाति ने कहा— “तप, दान, शम, दम, लज्जा, आर्जव और समस्त प्राणियों पर दया— ये सात ही पुरुषों के महान द्वार हैं, जिनको स्वर्गलोक के भी संतलोग कहा करते हैं। ये सब जो भी उदित किए गए हैं, वे तपः प्रधान ही होते हैं अर्थात इन सभी में तपश्चर्या की ही प्रमुखता हुआ करती है।

तप के लिए वृद्धावस्था की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। शिथिल शरीर तो अपने आप में भार हो जाता है, उस समय कुछ बन पड़ता। इसके लिए उपयुक्त समय तो युवावस्था ही है। भगवान कृष्ण कहते हैं—

त्वया  साधु  समारम्भि  नवे  वयसि  यत्तपः।

ह्रियन्ते  विषयैः प्रायो वर्षीयांसोऽपि मादृशाः।।

—  किरातार्जुनीयम् 11/10

हे अर्जुन! युवावस्था में ही तपश्चर्या प्रारंभ करना उचित है। बुढ़ापे में तो मुझ जैसे ब्राह्मण को भी विषयों की माया सताती है।

तप के द्वारा जिसने अपने आत्मकल्याण का प्रयोजन पूरा किया है, वही दूसरों के उद्धार में समर्थ होता है। ऐसे महामानवों का संपर्क, सान्निध्य, अनुग्रह जिन्हें प्राप्त होता है, वे भी धन्य हो जाते हैं।

संसारेऽस्मिन्मनुष्याणां     भ्रमतामतिसङ्कटे ।

भवद्विधैः समं सङ्गो जायते न तपस्विनाम् ।। 45.5 ।।

यद्यहं    सङ्गमासाद्य   भवद्भिर्ज्ञानदृष्टिभिः ।

न   स्यां  कृतार्थस्तन्नूनं  न मेऽन्यत्र कृतार्थता ।। 45.6 ।।

प्रवृत्ते   च   निवृत्ते   च   भवतां  ज्ञानकर्म्मणि ।

—  मार्कण्डेय पुराण

इस विपत्तिभरे विश्व में जीव ऐसे ही भ्रमग्रस्त भ्रमण करता रहता है। उनके भाग्य में ज्ञानवान तपस्वियों का संपर्क कहाँ है।

हे तपस्वी! आप जैसे ज्ञानवान तपस्वी को पाकर भी यदि मेरा कल्याण न हुआ तो अन्यत्र कहीं हो भी नहीं सकता।


तनाव का परिणाम विस्फोट ही होता है

जीवन शांत और संतुलित परिस्थितियों में चलना चाहिए। प्रयत्न यह होना चाहिए कि अपने को परिस्थितियों के अनुकूल और परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढाला जाए। तनाव, दबाव, आवेश और उत्तेजना की स्थिति से यथासंभव बचा जाए। मानसिक संतुलन यदि सही हो और दृष्टिकोण दूरदर्शितापूर्ण रखा जाए तो विपन्न दीखने वाली परिस्थितियों में भी वह मार्ग खोजा जा सकता है, जिस पर चलते हुए गुत्थियों को सुलझाया जाना संभव हो सके। हलका-फुलका जीवन भले ही अधिक संपन्नता और तथाकथित प्रगति की दृष्टि से कुछ कमजोर मालूम पड़े, पर आंतरिक शांति को देखते हुए वह सामान्य स्थिति की अपेक्षा अधिक श्रेयष्कर और संतोषजनक सिद्ध होता है। दवाब और तनाव न केवल मानव जीवन में; वरन पृथ्वी जैसी भारी-भरकम और स्वस्थ-संतुलित सत्ता में भी विस्फोट उत्पन्न करता है। पृथ्वी से ज्वालामुखी फुटते रहते हैं, भूकंप आते रहते हैं। इसका कारण या तो भीतर दबाव होता है या बाहरी। व्यक्ति विद्रोही बनता है, जब उस पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। चींटी जैसे दुर्बल प्राणी को भी सताया जाए तो वह भी काटने पर उतारू हो जाती है। इस तथ्य को हमें ध्यान में ही रखकर चलना चाहिए कि न अपने भीतर उद्वेगों का तनाव उत्पन्न करें और न समाज में शोषण-उत्पीड़न, अन्याय-अत्याचार को अवांछनीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होने दें, अन्यथा पृथ्वी से समय-समय पर फूटते रहने वाले भूकंपों तथा ज्वालामुखियों का पग-पग पर सामना करना पड़ेगा।

पृथ्वी की गहराइयों में पिघली हुई चट्टानें (मैग्मा), उसमें घुली हुई अतितप्त जलवाष्प जैसे तत्त्व भरे पड़े हैं। ऊपर की पृथ्वी का इन पर अत्यधिक दबाव रहता है; पर ताप का फैलाव भी बाहर फूटने के लिए जोर लगाता रहता है। जब कभी, जहाँ कहीं पृथ्वी के धरातल का दबाव कम हो जाता है, तभी वह तप्त वाष्पीय द्रव बाहर फूट पड़ता है और भीतर के पदार्थों को बाहर ले आता है। यह ज्वालामुखी फूटने का प्रधान कारण है। सोडा-वाटर की बोतल खोलने पर जिस तरह उसका झाग बाहर निकल पड़ता है, उस तरह भीतरी मैग्मा बाहर आकर 'लावा' के रूप में उड़ता, बिखरा, जमता देखा जाता है।

जिस प्रकार शरीर में कुछ नाड़ियाँ मोटी और कुछ बहुत पतली होती हैं, उसी प्रकार ज्वालामुखी विस्फोट के लिए भूगर्भ केंद्र से उभरने वाले बड़े और चौड़े मार्ग ज्वालामुखी उगलते हैं; पर कभी-कभी बहुत पतली नाड़ियाँ भी जहाँ रास्ता पाती हैं, वहाँ से घूमती-फिरती सुविधाजनक स्थान पर जा फूटती हैं। उनके दबाव से उस क्षेत्र का पानी भी फब्बारे की तरह ऊपर उभर आता है अथवा वे तप्त धाराएँ पहले से ही बहते हुए जल में मिल जाती हैं, यही हैं तप्त झरने। इनमें भूगर्भ से ऊपर आए हुए अनेक पदार्थ भी घुले रहते हैं। चाक, रेत, गंधक, फिटकरी आदि सामान्य वस्तुओं से लेकर जहरीले आर्सनिक तक उन स्रोतों में उभरकर आते हैं और इर्द-गिर्द जमा होते रहते हैं।

कुछ ज्वालामुखी केवल धुँआ देते हैं। इन्हें 'फ्युमेअर' कहते हैं। धुँए के इन उद्गारों में प्रायः 80 प्रतिशत जलवाष्प, 20 प्रतिशत कार्बन द्विओषिद, उपहरिकाम्ल जैसी वस्तुएँ पाई जाती हैं। इनका अधिकतम तापमान 650 डिग्री श० होता है। कोहे सुलतान (बिलोचिस्तान) का गंधकीय 'फ्युमेअर' प्रसिद्ध है। अलास्का में कातमी पर्वत के समीप फ्युमरोल क्षेत्र में इस प्रकार के छोटे-बड़े लगभग दस हजार धुँआरे हैं। जावा में कार्बन द्विओषिद से भरी ‘मृत्यु घाटी’ भी विख्यात है। अमेरिका में इन फ्युमरोली की अतितप्त वाष्प से विद्युत उत्पादन  का लाभ भी उठाया जाता है। मिट्टी के तेल वाले क्षेत्रों में पंक ज्वालामुखी भी देखे जाते हैं, वे कभी गरम कभी ठंड होते हैं। उनकी उछाल 6 मीटर से 125 मीटर तक पाई जाती हैं। सिंध के दक्षिणी भाग, बर्मा की इरावती घाटी तथा अराकान तट पर कामरी एवं चेटुवा द्वीपों में इनकी बहुत बड़ी संख्या है।

मानव जीवन में तनाव से उत्पन्न विद्रोह तभी तक रुका रहता है, जब तक उसे फूटने का अवसर नहीं मिलता। पृथ्वी की अंतःव्यथा यह प्रतीक्षा करती रहती है कि कब और कहाँ खाली स्थान मिले और उसे तोड़कर किस प्रकार बाहर निकलें। आहार-विहार के असंयम से उत्पन्न शारीरिक अंतर्वेदनाएँ— जैसे ही अवसर मिलता है, रोगों के रूप में फूट पड़ती हैं। मानसिक घुटन का भी यही हाल है, जैसे ही स्थिति असह्य हो जाती है, मनुष्य ऐसे काम करने पर उतारू हो जाता है, जिन्हें दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। यह स्थिति न आने पाए, इसके लिए जो समय से पूर्व संतुलन बनाए रहने के लिए तत्पर रहते हैं, उन्हें इस प्रकार के विद्रोहात्मक विस्फोटों का सामना नहीं करना पड़ता।

अन्वेषक सेपर के अनुसार पृथ्वी पर क्रियाशील एवं महत्त्वपूर्ण ज्वालामुखियों की संख्या 430 है। इनमें से 275 उत्तरी गोलार्ध में और 155 दक्षिणी गोलार्ध में हैं। इनमें से भी अधिकांश समुद्रों में स्थित हैं। मृत ज्वालामुखियों की संख्या हजारों हैं। कुछ नए ज्वालामुखी समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं।

कई बार तो ज्वालामुखी विस्फोटों के साथ शीतल समझे जाने वाले जलस्रोत भी विद्रोही हो उठते हैं। तनावजन्य विद्रोह पर न केवल गरम प्रकृति के लिए उतारू रहते हैं, पर कई बार शांत प्रकृति को आग उगलने के लिए बाध्य होना पड़ता है। तप्त जलकुंड और गरम पानी के फब्बारे इसी स्तर के होते हैं। वे शांति चाहते हैं, पर विवशताएँ उन्हें बाध्य करती रहती हैं, उसे अंतर्द्वंद्व में रुक-रुककर उबलने के रूप में देखा जा सकता है। कई गरम जल के फब्बारे अथवा ज्वालामुखी इसी प्रकार रुक-रुककर विस्फोट करते रहते हैं।

राजगीर (पटना), सीताकुंड (मुंगेर), वक्रेश्वर (वीरभूमि), मणिकर्ण (कुल्लू), ज्वालामुखी (काँगड़ा), ताता-पानी (पूंछ) के तप्त झरने प्रसिद्ध हैं।

‘गेसर’  झरने उन्हें कहते हैं जो फब्बारे की तरह जमीन में से ऊपर उछलते हैं। आश्चर्य यह है कि यह बीच-बीच में विश्राम करने के लिए शांत हो जाते हैं और इसके बाद फिर उभरते हैं तो उनकी उछाल-ऊँचाई यथापूर्व होती है। विश्राम का समय भी प्रायः नियमित होता है।

यलोस्टोन पार्क का प्रसिद्ध 'ओल्ड फेथफुल' गेसर 65 मिनट विश्राम लेकर उछलता है और उसकी ऊँचाई हर बार 150 फुट ही रहती है। अन्य गेसरों की विश्राम अवधि तथा ऊँचाईयाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। न्यूजीलैंड का पोहुत गेसर भी इसी प्रकार का विश्वप्रसिद्ध है।

यह विद्रोह सदा हानिकारक ही नहीं होते। क्रांतियाँ यों विध्वंसक-विनाशक दीखती हैं, पर देखा यह भी गया है कि उस आँधी-तूफान ने बहुत-सा कूड़ा-करकट, झाड़-बुहारकर साफ कर दिया और उपयोगी परिस्थितियों का नवनिर्माण सामने आया। ज्वालामुखी यों प्रकटतः हानिकारक ही दीखते हैं और स्थानीय एवं सामयिक हानि भी उस तोड़-फोड़ से प्रत्यक्ष दीखती है, पर उसके साथ-साथ यह लाभ भी जुड़ा रहता है कि नए वातावरण में, नए प्रकार की उपलब्धियों का पथ-प्रशस्त हो।

ज्वालामुखी मनुष्य जीवन के लिए लाभदायक भी है और हानिकारक भी। ये हित-अहित करते ही रहते हैं। उनके विस्फोट से अपार धन, जनहानि होती है। उनकी राख तथा अनुर्वर वस्तुएँ बहुत- सी भूमि को निर्जीव बना देती हैं। वहाँ न जीव रह सकते हैं, न वनस्पति उग सकती है। विषैला धुँआ वायुमंडल को विषाक्त करता है। पंक ज्वालामुखियों की दलदल भी एक प्रकार के संकट ही हैं।

इसके साथ ही ज्वालामुखियों के सृजनात्मक लाभ भी हैं। पृथ्वी के गर्भ से पुष्ट उर्वर मिट्टी की विशाल मात्रा धरातल पर आने से सहस्रों वर्ग मील भूमि उपजाऊ बनती है। नैपिल्स की खाड़ी, विसुवियस ज्वालामुखी के कारण ही उर्वर बनी है और उस उपलब्धि के कारण सारा इलाका मालामाल हो गया, सघन आबादी बस गई है। वाशिंगटन एवं आरेगन लावा-पठार भी ऐसे ही उर्वर एवं घने ज्वालामुखियों की कृपा से ही बने हैं।

भूगर्भ के गहन अंतराल में छिपे हुए बहुमूल्य खनिज, जो खुदाई करने पर संभवतः कभी भी मनुष्य के हाथ न लगते, ज्वालामुखियों के कारण ही ऊपर आते हैं। लोहा, ताँबा, सीसा, गंधक, प्युमिस, सरीखी खनिज-संपदा ज्वालामुखी-विस्फोट की अंतरंग हलचल के कारण मीलों ऊपर उठ आती हैं, तब मनुष्य उन्हें आसानी से खोद निकाल सकता है। हीरा, पन्ना जैसे रत्न भूगर्भ के उच्च तापमान में ही बनते हैं और विस्फोटक हलचलों के कारण नीचे से ऊपर आते हैं।

भूगर्भ विस्फोटों के कारण छोटी-बड़ी झीलें भी बनती हैं, जिनका जल कितनी ही नदियों को जन्म देता है। समुद्र में जा गिरने वाले जल को रोककर प्राणियों के प्रयोजन में लगाने का काम झीलें ही करती हैं। उनसे प्रचुर आर्थिक लाभ होते हैं। इस प्रकार ज्वालामुखियों का यह झील-अनुदान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

हमें आंतरिक और बाह्यजीवन में शांति की कामना और चेष्टा करनी चाहिए; पर साथ ही इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि यह अनुचित तनाव और दबाव किसी भी क्षेत्र में बढ़ा तो विस्फोट और विद्रोह ही खड़ा होगा। भले ही उसका परिणाम हानिकारक हो या लाभदायक।

आज महासमुद्रों में डूबे भूखंड, हिमाच्छादित ध्रुवप्रदेश, कभी भरे-पूरे महादेश थे। आज जहाँ हिमालय की चोटियाँ हैं, वहाँ कभी 'टिथिम' महासागर लहराते थे। पृथ्वी के आदि स्वरूप से लेकर आज की स्थिति तक आने में जो विशाल परिवर्तन भूलोक में हुए हैं, उनके पीछे विशालकाय भूकंपों का ही हाथ है।

भूकंपों के चार कारण हैं— (1) पृथ्वी के बाह्य धरातल पर लगने वाले प्राकृतिक आघात, (2) भूगर्भ में ज्वालामुखियों का विस्फोट, (3) भू-रचनात्मक आघातों से उत्पन्न हलचलें, (4) मनुष्यकृत आघातों के कारण।

हिमाच्छादित पर्वत चोटियों के टूटकर गिरने से, समुद्रों में डूबे पर्वत-खंडो के टूटकर गिरने से, समुद्री तरंगों के तटों पर टकराने से, भूतल पर इतने प्रचंड वेग से आघात होते हैं कि पृथ्वी कंपित हो उठती है, इन्हें प्राकृतिक आघातों से उत्पन्न भूकंप कहते हैं।

ज्वालामुखियों के प्रचंड विस्फोट के आघात से पृथ्वी के अंतःभागों में शक्तिशाली कंपन उठते हैं और विस्फोटजन्य भूकंप उत्पन्न होते हैं।

शांति और संतुलन की तरह विद्रोह और विस्फोट भी अपनी जगह आवश्यक है। प्रकृति के गर्भ में इस प्रकार की परस्पर विरोधी हलचलें अकारण नहीं होतीं। उसके पीछे कुछ ठोस कारण रहते हैं। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में भी शांति और अशांति देखी जाती है, इसके कारण हमें समझने चाहिए और उन कारणों के अनुरूप प्रतिक्रिया का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।


आशा, आस्था और आत्मीयता के तीन महासत्य

इस दुनिया में तीन बड़े सत्य हैं — (1) आशा (2) आस्था और (3) आत्मीयता। जिसने सच्चे मन से इन तीनों को जितनी मात्रा में हृदयंगम किया, समझना चाहिए कि सफल जीवन का आधार उसे उतनी ही मात्रा में उपलब्ध हो गया।

उज्जवल भविष्य की आशा हमें नहीं ही छोड़नी चाहिए। यदि मनोरथ आदर्शों पर आधारित है तो उसकी पूर्ति में संदेह नहीं ही करना चाहिए। रात्रि होती है, सच है; पर क्या यह सच नहीं कि उसके बाद दिन का उदय होना भी सुनिश्चित है। बीज बोया जाता है, तब लगता है कि उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया, पर जिन्हें आशामयी दृष्टि प्राप्त है, वे अपनी हर दृष्टि से देखते हैं कि इस गलने में भी सुविकसित और उज्जवल भविष्य की संभावना विद्यमान है। बीज को मोटी दृष्टि से ही गला हुआ कहा जाएगा, वस्तुत: यह विशाल वृक्ष में उसकी कष्टकर परिणतिमात्र है। आज की अभावग्रस्त या कष्टकर स्थिति को स्थायी नहीं माना जाना चाहिए और यह विश्वास रखा जाना चाहिए कि जब तक इस धरती पर अरुणोदय की प्रक्रिया निरंतर दुहराई जाती रहेगी, तब तक यह संभावना भी बनी ही रहेगी कि आज असुखद स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति कल ऊँचे उठने की, आगे बढ़ने की संभावनाएँ अपने में सँजोए ही रहेगा। उपयुक्त अवसर आने पर वह आज की विपन्नताओं को परास्त करके कल की संभावनाओं का अधिकारी बनेगा। आज की असफलता के अंधकार को वेधकर, जिसकी दृष्टि कल की ज्योर्तिमयी सफलताओं की दिव्य किरणें झाँकती देख सकती हैं, वस्तुतः वही सच्चा आस्तिक है।

आस्था का अर्थ है— विश्वास। अपने पर विश्वास, अपने उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास, आदर्शों पर विश्वास और आदर्शों के सत्परिणाम पर यही विश्वास; चतुर्विधि आस्थाएँ हैं, जिन्हें अपनाकर मनुष्य आँधी-तूफानों के बीच अपने स्थान पर स्थिर रह सकता है। आस्थाविहीन व्यक्ति ही तिनके की तरह इधर-उधर उड़ते-फिरते हैं। आकर्षणों और प्रलोभनों के उतार-चढ़ाव उन्हें ही विचलित करते हैं; पर जिनने आदर्शों की आस्थाओं के साथ अपने को बाँध लिया, उत्कृष्टता की चट्टान पर अपना आसन जमा लिया, वे अपने स्थान पर रावण की सभा में जमे हुए अंगद के पैर की तरह मजबूती के साथ गढ़े-अड़े रहते हैं, उन्हें उखाड़ने-पछाड़ने की क्षमता किसी में भी नहीं होती।

आत्मीयता का सत्य ऐसा है, जिसके प्रकाश में केवल आनंद की ही अनुभूति होती है। इस संसार में एक ही वस्तु प्रिय है— ‘अपनापन’। इसे जो जितना व्यापक— विस्तृत बना लेता है, वह अपने आनंद की परिधि को उतना ही विस्तृत बना लेता है। आत्मविकास का चिह्न यही है कि हम अपने आपको विशाल क्षेत्र में विकसित हुआ देखें। जड़-चेतन को अपनी ही आत्मा का स्वरूप समझें और हर किसी में अपनी सत्ता को प्रतिभाषित अनुभव करें। जब दूसरों के दुःख अपने दुःख बन जाएँ और अपने सुख को दूसरों में बाँटने की आतुरता उभरने लगे, तो समझना चाहिए कि आत्मज्ञान ने अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। आत्मविकास उसी का समझा जाना चाहिए जो अपने शरीर, मन और परिवार की सीमित संकीर्णता से आगे बढ़कर, विश्व परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्य एवं दायित्व का अनुभव करता है। ऐसे व्यक्ति में ही ईश्वर की ज्योति अवतरित होती है। आत्मवान व्यक्ति ही प्रकारांतर से इस संसार में भगवान की भूमिका संपादित करते हैं।

हम आशावान बनें। आस्था को सुदृढ़ रखें। आत्मीयता का अधिकाधिक विस्तार करें। इन तीन महासत्यों को अधिकाधिक मात्रा में अपनाने के अपने प्रयास इतने प्रखर बनाएँ कि आत्मा का स्तर परमात्मा जैसा ही बने, निखरे।


नियत समय पर कार्य करना सफलता का अमोघ सोपान

अब्राहम लिंकन जब प्रातःकाल टहलने जाते थे तो लोग अपनी घड़ियाँ मिला लेते थे कि समय क्या है। उनका समय, नियम और क्रम पूर्णतया व्यवस्थित था, उसमें कभी यत्किंचित ही अंतर आता था, इसलिए लोग उनके पैरों की एक विशेष प्रकार की आवाज से समझ लेते थे कि यह लिंकन ही जा रहा है और बिस्तर पर पड़े-पड़े ही घड़ियों में यदि कुछ फर्क होता तो उसे ठीक कर लेते थे।

घड़ियाँ सभी के पास होती हैं, पर उनसे समय पर उठने और काम करने की समुचित प्रेरणा किसी-किसी को ही मिलती है; पर मनुष्य के भीतर एक ऐसा स्वसंचालित क्रोमोमीटर है कि यदि उसे थोड़ा सजीव और सक्रिय बना लिया जाए, तो न केवल सही समय बता देता है, वरन ठीक समय पर निर्धारित कार्य करने के लिए भी बाध्य कर देता है। लिंकन की असली घड़ी यही सक्रियता थी। यों उनके घर कीमती घड़ियों की भी कमी नहीं थी।

अन्य जीव-जंतु तो इसी आंतरिक घड़ी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ चलाते हैं। मुर्गा आमतौर से लगभग प्रातः 4 बजे बाँग देता है। उसके पास मशीनी अलार्म-घड़ी भले ही नहीं, पर भीतर वह मौजूद है, साथ ही ऐसी भी है जो न कभी खराब होती है और न मरम्मत को भेजनी पड़ती है। मुर्गे का आंतरिक क्रोमोमीटर समय की जानकारी उसे करा देता है और बाँग लगाने की ड्यूटी पूरी करने के लिए विवश कर देता है।

पालतू तोते या कुत्ते को यदि कुछ दिनों नियत समय पर भोजन दिया जाता रहे तो वह उसके अभ्यस्त हो जाएँगे और यदि किसी दिन उन्हें उस समय भोजन न मिले तो अपनी मांग प्रस्तुत करते हुए चिल्लाने या उछल-कूद करने में लग जाएँगे।

घनघोर घटाएँ छाई रहने पर भी पक्षी प्रभातकाल होते ही चहचहाने लगते हैं और सूर्य-अस्त होने का समय आते ही अपने घोंसलों में सोने के लिए चले जाते हैं। जंगलों में सियारों के चिल्लाने का एक नियत-निर्धारित समय होता है। वे हर रात को उसी समय बोलते हैं।

चिड़ियाँ दाना चुगने उड़ जातीं हैं, पर साथ ही उन्हें यह भी याद रहता है कि घोंसले के बच्चों को किस समय भोजन देना है। वे चोंच में मुलायम बीज या कीड़े लेकर ठीक समय पर घोंसलों में आती रहती हैं और उनके बच्चे बिलकुल उसी समय आहार की प्रतीक्षा करते हैं। समय से कुछ मिनट पहले तक वे घोंसलों में ऐसे ही पड़े सुस्ताते रहते हैं।

दैनिक घड़ी का ही नहीं, ऋतुओं और महीनों की स्थिति भी भीतरी अलार्म टाइमपीस निर्धारित उत्साह उत्पन्न करने और नियत काम पर लगने की प्रेरणा करती है। प्रायः सभी जीव-जंतुओं के गर्भाधानकाल निर्धारित हैं, मादाएँ लगभग उन्हीं दिनों उत्तेजित होती हैं और एक जाति का प्रजननकाल लगभग एक ही काल में होता है। मछलियों से लेकर छोटे कीड़े-मकोड़ों तक यही व्यवस्था चलती है। पशु-पक्षियों में तो यह काल-निर्धारण सही ही रहता है। उन पालतू पशुओं की बात अलग है, जिन्हें उनके मालिकों ने अपनी प्रकृति के विपरीत कार्य करने के लिए बाध्य किया है। पक्षियों के घोंसले बनाने में, मकड़ी को जाला तनने में एक नियत अवधि पर ही संलग्न देखा जाता है।

सैलानी पक्षी प्रायः वर्ष में एक समय ही अपनी दूरवर्त्ती यात्राएँ आरंभ करते हैं और अभीष्ट अवधि पूरी होते ही इस तरह वापस लौटते हैं, मानो किसी ने उनका प्रोग्राम कलैंडर के आधार पर नियत— निर्धारित करके रखा हो।

मनुष्य शरीर और मन की भी यही स्थिति है, यदि उसकी क्रम-व्यवस्था रोज-रोज बदली-बिगाड़ी न जाती रहे तो एक नियत ढर्रा जम जाता है और वही अपने ढर्रे पर ठीक तरह चलता रहता है। भूख, प्यास, शौच, निद्रा, जागृति आदि की इच्छाएँ प्रायः ठीक समय पर उठती हैं। इतना ही नहीं, भीतरी अवयव उसके लिए सावधानी के साथ अपनी तैयारी में जुट जाते हैं। खाने का समय होते ही मुँह के, पेट के, आँतों के, यकृत के रासायनिक स्राव अनायास ही स्रावित होने लगते हैं। अपनी ड्यूटी को यथासमय निबाहने में वे सामर्थ्यभर व्यतिरेक नहीं होने देते। चाय, सिगरेट, पान आदि की तलब अपने समय पर ही उठा करती है।

यदि हम दिनचर्या नियत— निर्धारित कर लें और उस पर सावधानी के साथ चलते रहें तो देखा जाएगा कि शरीर ही नहीं, मन भी उसके लिए पूरी तरह तैयार रहता है। पूजा-उपासना, साहित्य- सृजन, व्यायाम आदि के लिए यदि समय निर्धारित हो तो देखा जाएगा कि सारा कार्य बड़ी सुंदरता और सफलतापूर्वक संपन्न होता चला जाता है। इसके विपरीत, यदि आए दिन दिनचर्या में उलट-पुलट की जाती रहे तो अंतरंग की स्वसंचालित प्रक्रिया अस्त-व्यस्त एवं अनभ्यस्त हो जाएगी और हर कार्य शरीर से बलात्कारपूर्वक ही कराया जा सकेगा और वह औंधा-सीधा ही होगा, उसकी सर्वांगपूर्णता की संभावना आधी-अधूरी ही रह जाएगी।

इच्छा, श्रम और व्यवस्थापूर्वक हम कई कार्य करते हैं। यह बाह्य व्यवस्था कार्यों में जितनी सफलता उत्पन्न करती है, उससे अधिक अंतरंग की स्वसंचालित कार्यपद्धति का योगदान होता है। यदि वस्तुतः हम किसी कार्य को अधिक सुंदर, सुव्यवस्थित और सफल देखना चाहते हैं तो नियत समय पर निर्धारित कार्यक्रम में संलग्न होने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि वह व्यवस्था अभ्यास के रूप में परिणत हो सके। हमारे खाने और सोने का समय निर्धारित होना चाहिए। इसमें अव्यवस्था फैलाते रहना, अपने अच्छे-भले स्वास्थ्य की जड़ें खोखली करने के समान है। यदि भोजन नियत समय पर नहीं किया जा सका तो उत्तम यही है कि उस पारी की नागा कर दी जाए और दूसरी पारी का समय जब आए तब कुछ खाया जाए। समय-कुसमय खाने की अपेक्षा तो एक समय बिना खाए रह जाना अधिक श्रेयस्कर है। कई व्यक्ति बहुत रात गए घर लौटते हैं और एक-दो पहर बिताकर तब कहीं खाना खाते हैं। इसमें व्यस्तता नहीं, अव्यवस्था और प्रमाद ही मुख्य कारण होता है। यदि घर लौटना नहीं हो सका, तो जहाँ कहीं भी भोजन का समय हो जाए, वहीं भोजन का प्रबंध कर लेना चाहिए। इससे न केवल अपने स्वास्थ्य का; वरन पत्नी तथा उन लोगों का भी आरोग्य नष्ट होने से बचाया जा सकता है, जो देर से आने वाले के इंतजार में स्वयं भी भूखे बैठे रहते हैं।

देर से सोना और देर से उठना ऐसी ही बुरी आदत है, जिसके साथ आंतरिक टाइमपीस की सोई संगति नहीं खाती। मनुष्य की प्रकृति दिवाचर है। उसे दिन में काम करना और रात में सोना चाहिए। रात को जागना और दिन में ऊँघना, यह निशाचरों, हिंस्र जंतुओं तथा चोर-बदमाशों के उपयुक्त आदत है। इससे बचा जा सके तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा बहुत हद तक हो सकती है। प्रातःकाल सभी पशु-पक्षी तरोताजा होकर उठते हैं और उत्साहपूर्वक अपने कामों में लग जाते हैं। मनुष्यों के लिए भी यही उपयुक्त है। आत्मसाधना के लिए तो ब्रह्ममुहूर्त्त ही सर्वोत्तम है। इस समय उपासना जितनी अच्छी तरह हो सकती है, उतनी अन्य किसी समय नहीं। देर तक सोते रहने वाले मंदबुद्धि, आलसी, रुग्ण और दरिद्र बनते चले जाते हैं। यह तथ्य सर्वथा माननीय है।

जीवधारियों की प्रवृत्ति में एक अत्यंत रहस्यमय और अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया नियत समय पर निर्धारित कार्य करते रहने की है। जो उसे जानते एवं मानते हैं, वे अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर बिना अनावश्यक दवाब डाले, महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करते चले जाते हैं और सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं।


सद्वाक्य

भाप को काबू में रखकर उसका सदुपयोग करने से शक्तिशाली इंजन बनते और भारी काम करते हैं। विचारों की शक्ति भाप से बढ़कर है, यदि उसे केंद्रित और दिशा-नियोजित किया जा सके तो मनुष्य वह कर गुजरे, जिसकी सहज कल्पना भी नहीं की जा सकती।


क्या हमारे अनुभव, निष्कर्ष सही है

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्।

कश्चिद्धीरः             प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।।

—  कठो. 2/1/1

अर्थात— “स्वयंभू परमात्मा ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर निर्मित किए हैं, इसलिए बाह्य वस्तुएँ ही देखी जाती हैं, अंतरात्मा नहीं देखी जाती। किसी मेधावी ने ही अमृतत्त्व की कामनाकर चक्षु आदि को भीतर की ओर प्रेरितकर अंतरात्मा के दर्शन (अनुभव) किए हैं।”

हम बाह्यजीवन के बारे में, सुविस्तृत संसार के बारे में बहुत कुछ जानते हैं; पर आश्चर्य की बात यह है कि अपने संबंध में, अपनी सत्ता और महत्ता के संबंध में बहुत ही कम जानते हैं। बहिर्मुखी जीवन व्यस्त रहता है और यथार्थता के समझने की न तो आवश्यकता समझता है और न अवसर पाता है। यदि अपने स्वरूप, लक्ष्य और कर्त्तव्य का ठीक तरह भान हो जाए और संसार के साथ अपने संबंधों को ठीक तरह जान-सुधार लिया जाए तो यह साधारण दीखने वाला मानवी अस्तित्व, महानता से सहज ही ओत-प्रोत हो सकता है।

जीवनयापन करने के लिए हमें नौ उपकरण प्राप्त हैं—  (1) नेत्र (2) जिह्वा (3) नासिका (4) कान (5) त्वचा (6) मन (7) बुद्धि (8) चित्त (9) अहंकार, इन्हीं के माध्यम से हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इस ज्ञान को ही यथार्थ मानते हैं; पर थोड़ी गहराई के साथ देखा जाए तो प्रतीत होगा कि यह सभी उपकरण एक सीमित और सापेक्ष जानकारी देते हैं, इनके माध्यम से मिली जानकारी न तो यथार्थ होती है और न पूर्ण; इसलिए उन अपूर्ण साधनों से मिली जानकारी को सही मान बैठना 'भूल' ही कही जाएगी। वेदांत की भाषा में इस अपूर्ण जानकारी को 'स्वप्न'— मिथ्या कहकर उसकी वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

संसार में अनेक कारणों से अनेक शब्द कंपन उत्पन्न होते रहते हैं, इन ध्वनि-तरंगों की गति भिन्न-भिन्न होती है। मनुष्य के कान केवल उतने ही ध्वनि कंपन पकड़— सुन सकते हैं, जिनकी गति 33 प्रति सैकिंड से लेकर 40 हज़ार प्रति सैंकिंड के बीच में होती है। इससे कम या ज्यादा गति वाले कंपन अपने कानों की पकड़ में नहीं आते। इस परिधि के बाहर विचरण करने वाला शब्द-प्रवाह इतना अधिक है, जिसकी तुलना में सुनाई देने वाले शब्दों को लाख-करोड़वाँ हिस्सा कह सकते हैं। इतनी स्वल्प ध्वनि को सुन सकने वाले कानों को शब्द-सागर की कुछ बूँदों का ही अनुभव होता है। शेष के बारे में वे सर्वथा अनजान ही बने रहते हैं। इस अपूर्ण उपकरण के माध्यम से, ध्वनि के माध्यम से विचरण करने वाले ज्ञान को सर्वथा स्वल्प ही कहा जा सकता है और उतने से साधन से मिलने वाली जानकारी के आधार पर वस्तुस्थिति समझने का दावा नहीं कर सकते।

त्वचा के माध्यम से मिलने वाली जानकारी भी कानों की तरह ही अपूर्ण होती है, साथ ही भ्रांत भी। हाथ पर एक मिनट तक बरफ रखे रहें, इसके बाद उसी हाथ को साधारण जल मे डुबोएँ: लगेगा पानी गरम है। इसके बाद हाथ पर कुछ देर कोई गरम चीज रखे रहें,  इसके बाद हाथ को उसी पानी में डुबाएँ, प्रतीत होगा पानी ठंडा है। जल एक ही तापमान का था, पर बरफ अथवा गरम चीज रखने के बाद हाथ डुबोनें पर अलग-अलग तरह के अनुभव हुए। ऐसी त्वचा की गवाही पर क्या भरोसा किया जाए, जो कुछ-का-कुछ बताती है। ठंड और गरमी की न्यूनाधिकता का अंतर भी त्वचा एक सीमा तक ही बनाती है। अत्यधिक गरम या अत्यधिक ठंडी वस्तु में तापमान या शीतमान का जो अंतर होता है, उसे त्वचा नहीं बता सकती। ऐसी सीमित शक्ति वाली त्वचा इंद्रिय के माध्यम से हम समग्र सत्य को समझ सकने में कैसे समर्थ हो सकते हैं ?

अपनी आँखें सघन रात्रि में घोर अंधकार का अनुभव करती हैं। कुछ भी देख नहीं सकतीं, पर उसी स्थिति में उल्लू, चमगादड़, बिल्ली, चीता आदि प्राणी भली प्रकार से देखते हैं। विज्ञान कहता है कि जगत में प्रकाश सर्वदा और सर्वत्र विद्यमान है। अंधकार नाम की कोई चीज इस दुनियाँ में नहीं है। मनुष्य की आँखें एक सीमा तक के ही प्रकाश-कंपनों को देख पाती हैं, जब प्रकाश की गति मनुष्य की नेत्रशक्ति की सीमा से कम होती है तो उसे अंधकार प्रतीत होता है।

आकाश में अनेक रंगों के भिन्न-भिन्न गति वाले प्रकाश-कंपन चलते रहते हैं। मनुष्य के नेत्र उनमें से केवल सात रंगों की स्वल्प जितनी प्रकाश-तरंगों को ही अनुभव कर पाते हैं और शेष को देखने में असमर्थ रहते हैं। पीलिया रोग हो जाने पर वस्तु पीली दीखती है। ‘रैटिनाइटिस पिग मैन्टोजा’  रोग हो जाने पर एक सीधी रेखा धब्बे या बिंदुओं के रूप में दिखाई देती है। आकाश को ही लीजिए, वह हमें नीली चादर वाला, गोलाकार पर्दे जैसा लगा दीखता है और लगता है उसमें समतल तारे टँगें हुए हैं, पर क्या वह ज्ञान सही है? क्या आकाश की सीमा उतनी ही है, जितनी आँखों से दीखती है? क्या तारे उतने ही छोटे हैं, जितने कि आँखों को प्रतीत होते हैं? क्या वे सब समतल बिछे हैं? क्या आकाश का रंग वस्तुतः नीला है? इन प्रश्नों का उत्तर खगोलशास्त्र के अनुसार नहीं ही हो सकता है; पर इन आँखों को क्या कहा जाए, जो हमें यथार्थता से सर्वत्र भिन्न प्रकार की जानकारी देती हैं और भ्रम में डालती हैं।

यही हाल नासिका का है। हमें कितनी ही वस्तुएँ गंधहीन लगती हैं, पर वस्तुत: उनमें गंध रहती है और उनके स्तर अगणित प्रकार के होते हैं। कुत्तों की नाक इस गंधस्तर की भिन्नता को समझती है और बिछुड़ जाने पर अपने घर तक उसे पहुँचा देती है। प्रशिक्षित कुत्ते इसी गंध के आधार पर चोरी, हत्या आदि अपराध करने वालों को ढूँढ निकालते हैं। यही बात सुगंध-दुर्गंध के भेदभाव से संबंधित है। प्याज, लहसुन आदि की गंध कितनों को बड़ी अरुचिकर लगती है, भोजन में थोड़ी-सी भी पड़ जाने से उल्टी-सी आती है; पर कितनों को इसके बिना भोजन में जायका ही नहीं आता। यही बात सिगरेट, शराब आदि की गंध के बारे में भी है। इन परिस्थितियों में नासिका के आधार पर यथार्थता का निर्णय कैसे किया जाए?

जिह्वा स्वादों की जो अनुभूति कराती है, वह भी वस्तुस्थिति नहीं है। खाद्य पदार्थ के साथ मुख के स्राव मिलकर एक विशेष प्रकार का सम्मिश्रण बनाते हैं, उसी को मस्तिष्क स्वाद के रूप में अनुभव करता है। यदि वही वास्तविकता होती तो नीम के पत्ते मनुष्य की तरह ऊँट को भी कड़वे लगते और वह भी उन्हें न खाता। ऊँट को नीम की पत्तियों का स्वाद मनुष्य की जिह्वा- अनुभूतियों से सर्वथा भिन्न प्रकार का होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पदार्थों का वास्तविक स्वाद जीभ पकड़ नहीं पाती, भिन्न-भिन्न प्राणी अपनी जीभ बनावट के अनुसार उसका स्वाद अनुभव करते हैं। कच्चा माँस मनुष्य के लिए अरुचिकर होता है; पर इसी को माँसभोजी पशु बड़ी रुचिपूर्वक खाते हैं। मलीन वस्तुओं को मनुष्य की जीभ सहन— स्वीकार नहीं कर सकती, पर शूकर को उसमें प्रिय स्वाद की अनुभूति होती है। मुँह में छाले हो जाने पर, बुखार या अपच रहने पर अथवा ‘गुड़मार बूटी’ खाकर रसना मूर्छित कर देने पर वस्तु के स्वाद का अनुभव नहीं होता। इस अधूरी जानकारी वाली जिह्वा इंद्रिय को सत्य की साक्षी के रूप में कैसे प्रामाणिक माना जाए ?

मुसलमान दार्शनिक फारावी का कथन है— “प्रत्येक वस्तु सत्तास्वरूप है। पदार्थ के पीछे एक गति ही नहीं, चेतना भी है। यह गति और चेतना न केवल पदार्थों में, वरन प्राणधारियों में भी काम करती है। फिर जड़-चेतन से संयुक्त उस विशाल ब्रह्म के पीछे सत्ता क्यों न होगी?  इस संभावना को अनुमान और प्रमाण दोनों से जाना जा सकता है। इसके अतिरिक्त परमात्मा को प्रमाणित करने के लिए और क्या सबूत चाहिए?”


मंत्रविद्या ध्वनि विज्ञान पर आधारित है

प्राचीनकाल में किसी देश पर कोई दूसरा राजा आक्रमण करता था तो उसकी सैन्य गतिविधियों को जानने के लिए पृथ्वी से कान सटाकर यह पता लगाया जाता था कि हलचल किस दिशा में, कितनी दूरी पर हो रही है। ध्वनि के बारे में यह समझा जाता है कि वह वायु के माध्यम से सुनी जाती है; पर तथ्य यह है कि पृथ्वी की ध्वनिग्राहक और प्रसारक शक्ति वायु से कहीं अधिक है।

आमतौर से शब्दों को सुनने के लिए कानों का प्रयोग किया जाता है, पर कानों की सामर्थ्य बहुत स्वल्प है। इसका एक कारण तो यह है कि ध्वनियाँ एक जैसी नहीं होती। कुछ के कंपन ही ऐसे होते हैं जो हमारे कानों के परदों से टकराकर मस्तिष्क द्वारा अनुभव की जा सकने जैसी हलचलें उत्पन्न कर सके। जो इस स्तर की होती हैं, उन्हें ही कान सुन सकते हैं। दूसरा कारण यह है कि वे कानों की पकड़ में आ सकने योग्य स्तर की होते हुए भी बहुत दूरी के कारण इतनी हलकी और झीनी पड़ जाती है कि कान उनका ठीक तरह अनुभव न कर सकें। कानों की पकड़ से बाहर की इन ध्वनियों को सुनना कई दृष्टि से आवश्यक है। रचनात्मक प्रयोजनों के लिए इनकी उपयोगिता है, साथ ही आपत्ति से बचने के लिए भी इनकी आवश्यकता है।

मेघों की दूरगामी हलचलों को मोर के कान सुन लेते हैं और वह उस पूर्वसूचना की अभिव्यक्ति, अपनी प्रसन्नता प्रकट करने वाली आवाज में बार-बार करता रहता है। मकड़ी को वर्षा का पूर्वाभास होता है और वह अपने जाले बनाने-समेटने का उपक्रम उसी आधार पर करती है। मकान गिरने की पूर्व हलचलें बिल्ली के कान आसानी से सुन लेते हैं और वह किसी दीवार के गिरने या छत के बैठने से पहले ही अपने बच्चों को ले भागती है। मनुष्य ने इस आवश्यकता की पूर्ति वैज्ञानिक उपकरणों के ध्वनिसंवेदक-यंत्रों के माध्यम से की है।

इस दिशा में वैज्ञानिक प्रगति का प्रथम चरण इसी मान्यता को लेकर आगे बढ़ा था कि वायु की अपेक्षा पृथ्वी की ध्वनिग्राहक शक्ति अधिक है। द्वितीय महायुद्ध में शत्रुसेना की हलचलों को जानने के लिए एक ऐसा यंत्र बना था, जो पृथ्वीतल पर थोड़ा गाड़ दिया जाता था, थोड़ा ऊपर रहता था, इसमें अभ्रक का खोल और भीतर पारा भरा रहता था। दो नलियाँ उससे निकलती थीं और दोनों कानों में लगाई जाती थीं। जिस तरह हृदय की घड़कन जानने के लिए छाती पर 'स्टेथोस्कोप' लगाकर भीतर की स्थिति जानी जाती है, ठीक उसी प्रकार वह यंत्र भूतल पर हो रही दूरवर्त्ती हलचलों की जानकारी देता था।

पीछे आकाश में भरी विद्युत ऊर्जा और कंपनों को समझने वाले यंत्र चले। इनमें प्रमुख था — 'माइक्रासफोन'। यह आकाश में हो रही हलचलों को पकड़ता था। शत्रुसेना की बारूदी हलचलें इससे सहज ही सुनी जा सकती थीं। बंदूक या तोप दागने में तीन प्रकार की आवाजें होती हैं। पहली आवाज उस समय होती है जब नली से बाहर गैस निकलती है, दूसरी तब जब हवा में गोली सनसनाती हुई दौड़ती है, तीसरी तब जब गोली निशाने से टकराती है। इन तीनों का पृथक्करण कानों द्वारा संभव नहीं, क्योंकि यह हलचलें इतनी तेजी से होती हैं कि कान और मस्तिष्क उसका भेद समझने में समर्थ नहीं होते; किंतु यंत्रों से यह वर्गीकरण आसानी से हो जाता है और पता चल जाता है कि बारूदी अस्त्र कितनी संख्या में, कितनी दूरी पर, किस स्तर की गोलाबारी कर रहे हैं।

पृथ्वी और आकाश के अतिरिक्त पीछे जल की सतह पर दौड़ती हुई ध्वनियों द्वारा भी जानकारियाँ प्राप्त करने की चेष्टा की गई और सफलता मिली। पानी के जहाजों और पनडुब्बियों की हलचलें समुद्र की सतह पर दौड़ती हैं। पृथ्वी की भाँति इस जल सतह के साथ जुड़ी हुई ध्वनि-प्रेरणा से भी यह जाना जाने लगा कि कहाँ, कितनी दूर पर, किस स्तर की क्या हलचल हो रही है।  इस जानकारी के स्रोत खुल जाने पर समुद्रयुद्ध में सतर्कता बरतने का द्वार खुल गया। जर्मन पनडुब्बियों ने द्वितीय महायुद्ध में जो आतंक खड़ा किया था, उससे एक बार ऐसा लगने लगा था कि समुद्र साम्राज्य का अधिपति अब जर्मनी ही बन गया है; किंतु उस आतंक को विज्ञान की उपलब्धि ने समाप्त कर दिया, जिसके कारण पनडुब्बियों की रहस्यमय हलचलों का न केवल पता ही लगा लिया गया, वरन उन्हें कारगर ढंग से नष्ट भी कर दिया गया। इसके लिए हाइड्रोफोन यंत्र के अविष्कार ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही।

पानी की सतह पर जो ध्वनि कंपन दौड़ते हैं, उनकी प्रतिक्रिया उसी मूल उद्गम की ओर लौटती है, जहाँ से वह उत्पन्न हुई थी। हाइड्रोफोन की विद्युत उसी प्रतिध्वनि का पीछा करती है और यह बता देती है कि प्रस्तुत ध्वनि-प्रवाह का उद्गम किस आकृति-प्रकृति का है।

अब वायुयान-जलयान ही नहीं, धरती के भीतर और ऊपर जो कुछ भी है, उसे आँखों से देखने की जरूरत नहीं है, वह सारी जानकारी ध्वनी कंपनों के आधार पर नहीं जानी जा सकती है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, गरमी इन सबको अब मात्र जड़तत्त्व नहीं समझा जा रहा, वरन उनके साथ चलने वाले ध्वनि-प्रवाहों की अपनी महत्ता है, उन प्रवाहों की अभी जो हलचलें हो रही हैं, इतना ही जाना जा सका है। यह शोध जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-ही-वैसे हर तत्त्व एक बोलती— बात करती इकाई की तरह अपने इर्द-गिर्द छिपे रहस्यों का उद्घाटन करता दिखाई देगा।

घटनाएँ ध्वनि का रूप धारण करती हैं। ध्वनि और प्रकाश ऐसे दो आधार हैं, जिनके आधार पर स्थूल को सूक्ष्म में और सूक्ष्म को स्थूल में परिवर्तित किया जा रहा है। अंतरिक्ष में विविध स्तर के ध्वनि कंपन निरंतर गतिशील रहते हैं, यदि किसी को कर्णेंद्रिय से अधिक उच्चस्तर की श्रवणशक्ति मिल जाए तो वह श्रवणातीत ध्वनियों को सुन-समझ सकता है। चोर, भूत तथा वर्त्तमान में घटित हुए दूरवर्त्ती अथवा समीपवर्त्ती घटनाओं को जान-समझ सकता है। नादयोग के अभ्यासी इसी शक्ति को जगाते हैं और सूक्ष्मजगत में हो रही हलचलों के आधार पर भूत, वर्त्तमान तथा भविष्य का वह ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, जो सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर होता है। ध्यानयोग से यही प्रयोजन प्रकाश के रूप, धारणाओं के माध्यम से पूरा किया जाता है।

मंत्रशक्ति के द्वारा संभव हो सकने वाले चमत्कारों की पृष्ठभूमि में ध्वनि विज्ञान के सिद्धांत ही काम करते हैं। एक विशेष मनःस्थिति में, परिष्कृत शरीर स्थिति में, विशेष कर्मकांड एवं विशेष उच्चारण अपने ढंग की एक विलक्षण शक्ति उत्पन्न करते हैं। उसे मंत्रशक्ति कहा जाता है, इसका प्रयोग कारतूस भरी बंदूक की तरह किया जा सकता है। सूक्ष्मध्वनि-प्रवाह को समझकर जहाँ रहस्यमय अविज्ञात को ज्ञात बनाया जा सकता है, वहाँ इसी ध्वनिशस्त्र का प्रहार करके अवरोधों और दुरित-दुर्गमों को भी चूर्ण-विचूर्ण किया जा सकता है। मंत्रविद्या एक प्रकार से ध्वनि विज्ञान का ही महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।

हारमोनियम या पियानो में ‘स्वरसप्तक’ कीबोर्ड तथा उनसे जुड़ी हुई रीड होती हैं। कीबोर्ड की रीड दबाते हैं, तो संबंधित केंद्रों से विभिन्न प्रकार के स्वर निकलते हैं। उस कुँजी दबाने के क्रम को यदि लयबद्ध किया जा सके तो इच्छित राग-रागनियाँ बजती हैं। मुख एक प्रकार का कीबोर्ड है, उसमें से विभिन्न शब्दों के उच्चारण मेरुदंड स्थिति षट्चक्रों पर प्रभाव डालते हैं। यों वार्त्तालाप में असंबंध उच्चारण होता रहता है, पर यदि जप की शैली में कुछ नियत शब्दगुंथल बार-बार क्रमबद्ध रूप से दुहराए जाते रहें तो वह जप-प्रक्रिया षट्चक्र संस्थानों को तरंगित एवं झंकृत करती हैं। यही कंपन साधानात्मक क्रिया-कृत्यों की हलचलों के साथ मिलकर एक ऐसी दिव्य चेतनधारा उत्पन्न करते हैं, जिसका प्रयोग अभीष्ट प्रयोजनों के लिए सफलतापूर्वक किया जा सकता है।


सरस्वती-साधना का एक प्रकार— सार्थक संभाषण

मनोभाव संपूर्ण शरीर को प्रभावित करते हैं। क्रोध, आवेश, भय, शोक, वियोग जैसे अवसरों पर नेत्र, होठ, कपोल बिना बोले ही मनःस्थिति प्रकट कर देते हैं। भीतर जो कुछ उमड़-घुमड़ रहा है, उसकी छाया चेहरे पर झाँकती रहती है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं, शरीर काँपता है। इससे स्पष्ठ है, आंतरिक भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। भूख और नींद गायब हो जाती है। आवेशग्रस्त व्यक्ति का दिल जोरों से धड़कने लगता है, दम फूलता है, सिर चकराता है, गला सूखता है और प्यास बार-बार लगती है। इससे स्पष्ट है कि मन की स्थिति का प्रभाव सारी देह पर पड़ता है, इस प्रभाव को यदि सूक्ष्म रूप में देखना हो तो उसे वाणी के साथ जुड़े हुए रहस्यमय कंपनों के साथ आसानी से देखा-समझा जा सकता है।

यों ठग और धूर्त्त व्यक्ति मीठी बातें बना और प्रलोभन भरे आश्वासन देकर भोले लोगों को ठगने में भी सफल हो जाते हैं, पर वह प्रभाव केवल उन्हीं उथली मन:स्थिति के लोगों पर पड़ता है, जो केवल शब्दों के अर्थ भर को समझते हैं और प्रलोभन में बिना आगा-पीछा सोचे, यथार्थता का विश्लेषण किए बिना ही फिसल पड़ते हैं। ठगी के शिकार आमतौर से ऐसी बालबुद्धि के लोग ही होते हैं। जहाँ थोड़ी भी सतर्कता बरती जाए और यथार्थता ढूँढने के लिए थोड़ा-सा भी तर्क-वितर्क किया जाए, तो वस्तुस्थिति सामने आ जाती है और ठगों से बचा जा सकता है। यह व्यावहारिक ज्ञान की बात हुई। आगे चलकर यदि सूक्ष्मबुद्धि और प्रखर आत्मचेतना की कसौटी पर कसने की क्षमता विकसित कर ली जाए, तो किसी की भी वाणी सुनकर उसके साथ जुड़े हुए प्रभाव एवं व्यक्तित्व को आसानी से समझा जा सकता है।

वाणी में जानकारी का ही आदान-प्रदान नहीं होता। व्यक्तित्वों की विशेषताओं का भी परस्पर परिवर्तन होता है। सद्भावसंपन्न व्यक्ति भले ही किसी को उपदेश न दें, उनके साधारण शब्दोच्चार में भी जो मिठास, सौजन्य और सदुद्देश्य घुला रहता है, वह ऐसा हृदयस्पर्शी होता है कि सुनने वाले उससे बहुत कुछ प्राप्त करते जाते हैं और वह ऐसा होता है, जिससे उद्वेगों के समाधान में भारी योगदान मिल सकें। यों उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तित्व बिना वाणी के भी अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। उनके नेत्रों की ज्योति एवं चेहरे पर बनने बाली भाव-भंगिमा एवं समस्त शरीर से निकलने वाली तेजोवलय ऊष्मा सहज ही अपना काम करती रहती है और संबद्ध वातावरण को प्रभावित करती है। इस प्रभावशीलता का अधिक प्रसारण वाणी द्वारा होता है। सद्भावसंपन्न वाणी जिनके लिए बोली गई है, उन्हीं पर नहीं; वरन विराट-ब्रह्मांड में सुविस्तृत होकर अपना प्रभाव जड़-चेतन पर छोड़ती है। इस दृष्टि से गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि कोई प्रत्यक्षतः कुछ अधिक काम करते हुए न दिखाई पड़ने वाले व्यक्ति भी इस संसार में व्यापक क्षेत्र तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं और यदि वे सद्भावसंपन्न हैं तो वाणीमात्र से संसार की महती सेवा-सहायता करते हैं। इसके विपरीत दुर्भावनाग्रस्त मन, अपनी वाणीरूपी तीर-तरकस से प्रहार करते हुए लोक-मानस को क्षत-विक्षत करता है और संसार को भारी हानि पहुँचाता है। पानी में फेंका हुआ एक ढेला हजारों लहरें उत्पन्न करता है, इसी प्रकार शब्दोच्चारण के साथ अंतरिक्ष में प्रवाहित होता हुआ व्यक्तित्व अपनी सुगंध-दुर्गंध से व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करता है।

कटु-कर्कश शब्दों के साथ जुड़ी हुई दुर्भावना सबसे पहली हानि वक्ता की ही करती है। उग्र मनःस्थिति काया का सारा ढाँचा लड़-खड़ाकर रख देती है। वाणी के साथ जब वह भूकंप-विस्फोट की तरह बाहर निकलता है तो उससे बाहरी क्षेत्र ही धूल-धूमयुक्त नहीं होता, वरन वह विस्फोटस्थल भी क्षत-विक्षत होता है। क्रोधी, ईर्ष्यालु, निंदक, छिद्रांवेषी, निराश, पलायनवादी प्रकृति के मनुष्य दूसरों को भी चोट पहुँचाते हैं और खिन्न-उद्विग्न करते हैं, पर सबसे अधिक हानि वे अपनी ही करते हैं। दुर्भावग्रस्त मनःस्थिति वाले व्यक्ति को देर-सवेर में शारीरिक और मानसिक रोगों का शिकार बनना ही पड़ता है। कहना न होगा कि व्यक्ति अपने और अपने समीपवर्त्ती लोगों के लिए अभिशाप ही सिद्ध होता है।

पिछड़े वर्गों की उनकी अपनी त्रुटियों में गंदगी और व्यसनग्रस्तता को मुख्य माना जाता है; पर यदि गहराई से विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि गाली-गलौज, कलह-तिरस्कार, असभ्य और अस्त-व्यस्त शब्दोच्चारण भी उन्हें गई गुजरी स्थिति में डाले रहने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। बालकों पर यह पारिवारिक वार्त्तालाप असाधारण प्रभाव डालता है और उन परिवारों की पीढ़ियाँ उसी स्तर की ढलती चली जाती हैं। दूरदर्शी लोग व्यक्ति के विकास की विधि बताते हुए प्रथम चरण वाणी के परिष्कार को बताते हैं। सभ्यता और संस्कृति का प्रथम सोपान शिष्ट, सौम्य, संतुलित और सद्भावसंपन्न वाणी के उच्चारण से ही आरंभ होता है। असंबद्ध और असंतुलित वचन बोलने वाले कभी सम्मानास्पद नहीं बन सकते, उन्हें ओछा-पिछड़ा और अनुत्तरदायी ही माना जाता रहेगा।

मनःस्थिति का चुंबकत्व वाणी द्वारा अपना प्रभाव बाहरी क्षेत्र पर छोड़ता है और अपने स्तर के व्यक्ति तथा वातावरण को समेटकर सहज ही इर्द-गिर्द जमा करता रहता है। कुभाषी की आंतरिक दक्षता कभी भी उसे सरस और उल्लासभरे जीवन का आनंद न लेने देगी। दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया विरोध, विग्रह, निंदा, असहयोग, अविश्वास आदि के रूप में ही सामने आ सकती है और उनके कारण प्रगति-पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं।

उपनिषद् के ऋषि ने परब्रह्म के सम्मुख अपनी अतिमहत्त्वपूर्ण आकांक्षा व्यक्त करते हुए कहा है— ‘जिह्वा में मधुमत्तमा’, मेरी वाणी मिठास से भरी हुई हो। सचमुच यदि कोई मधुरवचन बोलने का अभ्यास कर ले तो प्रगति-पथ के अनेक अवरोधों का सहज ही समाधान हो सकता है। प्रशंसापरक और उत्साहवर्द्धक शब्द बोलकर यदि किसी में नवजीवन संचार किया जा सके तो निस्संदेह यह सहायता दे, बड़े-से-बड़े धन-सहयोग की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकती है। खोए हुए आत्मविश्वास को यदि जगाया, जमाया और बढ़ाया जा सके तो इससे बढ़कर और कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। सद्भावसंपन्न व्यक्ति अपने स्तर के अनुरूप ऐसे ही परामर्श देते हैं, जिन्हें यदि आंशिक रूप से समझा, अपनाया जा सके तो उत्कर्ष की दिशा में तेजी से बढ़ा जा सकता है।

ऋग्वेद में एक आर्यवचन आता है, जिसमें कहा गया है कि जहाँ वाणी छानकर बोली जाती है, वहाँ विभूतियाँ दौड़ती हुई चली आती हैं। जहाँ शहद रहता है, वहाँ मक्खियाँ सहज ही खिंचती चली आती हैं। वाणी का यह प्रभाव होना ही चाहिए कि उच्चारणकर्त्ता के समीप सफलताओं का पर्वत इकट्ठा होता चला जाए। छानकर वाणी बोलने का अर्थ है— सोच-समझकर प्रभाव-परिणाम पर विचार करते हुए, विवेकपूर्वक सदुद्देश्ययुक्त बोलना। वस्तुतः ऐसा बोलना ही सार्थक है। कटु और विद्वेषयुक्त भाषण से तो मौन रहना अथवा मूक होना अधिक उपयुक्त है।

भगवान ने कान दो दिए हैं और जीभ एक। इसका अर्थ है— हम सुनें अधिक बोले कम। भावार्थ यह है कि चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में जो सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त संस्कारसहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है, उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका सम्मान गिरा देती है; किंतु यदि अमृतवचन बोले जाए तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्त्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं। विवेक, तथ्य और दूरदृष्टि एवं सदुद्देश्य के सम्मिश्रण के साथ किए गए शब्दोच्चार को सरस्वती कहा गया है। जिह्वा पर सरस्वती के आवर्तन का अलंकार यह संकेत करता है कि सज्जनता का बहुत कुछ परिचय उनकी मधुमयी वाणी से प्राप्त होता है।

कामकाजी बातों के अतिरिक्त जहाँ भावोत्तेजक एवं विचार-परिष्कार की दृष्टि से जो भी वार्त्तालाप किया जाता है, वह वस्तुतः जप का ही एक प्रकार है। जप का उद्देश्य है; अमुक शब्दावली को बार-बार कहते रहने के फलस्वरूप मंत्र में सन्निहित विचारधारा को हदयंगम करना— परिपक्व बनाना।  का पाठ, भक्तिगीतों का गायन इसी दृष्टि से किया जाता है। यह प्रयोजन समय-समय पर विचार-विनिमय अथवा परामर्शपरक आदान-प्रदान से भी संभव हो सकता है। अपने और दूसरों की सद्भावनाओं को उभारने वाला, सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने वाला, शब्दोच्चार करने वाला व्यक्ति मौन-साधन एवं जप-उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्त्ता का भी कल्याण करते हैं, लोक-मंगल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।

संत विनोबा ने पंढरपुर सर्वोदय सम्मेलन के एक प्रवचन में वाणी की उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था— “ .......... मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। .... जो किया है आप लोगों ने किया है, मैंने तो जप किया है; भूदान का जप किया तो भूदान मिला। संपत्तिदान का जप किया तो संपत्तिदान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूँ, न दान करता हूँ, न तप करता हूँ;  मैं तो केवल जप ही करता हूँ और जप से मेरे सारे काम बन जाते हैं।”

शतपथ ब्राह्मण की उक्ति है कि, “जनसमाज का मैल धोने वाला शब्द-प्रवाह ही सारस्वत मंत्र है। सरस्वती के अनुग्रह से अनेकों सिद्धियाँ मिलती हैं, अष्टसिद्धि और नवऋद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के उपासनात्मक कर्मकांडों का अपना महत्त्व है, पर सर्वजनीन सारस्वत मंत्र वह शब्दोच्चार है, जिसे सत्प्रयोजन के लिए, सद्भावना, विवेकशीलता और मधुरासम्मिश्रित करके बोला गया हो। इस स्तर का भाषण, चाहे वह स्वल्प शब्दों का ही क्यों न हो, सब कल्याण की परम श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।


अपनों से अपनी बात— प्राण-प्रत्यावर्त्तन का उद्देश्य एवं स्वरुप

जन्म देकर ही जननी निवृत्त नहीं हो जाती, वरन उन उत्तरदायित्वों को भी निभाती है जो शिशु-शावकों के प्रति उसके कंधो पर सहज ही आ जाते हैं। मानव जननी भ्रूणकलल को उदर में नौ मास रखकर अपने ही रस-रक्त से सींचती है। पिता द्वारा विनिसृत एक शुक्राणु पर लगभग तीन सेर का कलेवर माता के शरीर में से निकलकर चढ़ता है। माता अपने सर्वश्रेष्ठ सारतत्त्व से इस कलल का सिंचन, अभिवर्द्धन, परिपोषण करती है। न केवल शरीरगत रासायनिक द्रव; वरन चेतनात्मक गुण-कर्म-स्वभाव की, ज्ञान तथा भावना की वह पूँजी भी उदरस्थ शिशु को अनुदान में मिलती है, जो उसने चिरकालीन चिर-प्रयत्नों से संचित की होती है। माता का यह अनुदान यदि न मिले तो पिता का प्रजनन-प्रयास सर्वथा निष्फल ही रहेगा।

जन्म देकर ही मानव माता निवृत्त नहीं हो जाती; वरन स्वरूप कुछ बदल जाने पर भी उत्तरदायित्व प्रकारांतर से यथावत् बना रहता है। गर्भस्थ भ्रूण को वह नालतंतु के माध्यम से रसरक्त पहुँचाती थी, अब वह प्रक्रिया स्तनपान द्वारा चलती है। लालवर्ण रक्त का ही समानांतर प्रतिनिधि दूध होता है। माता की छाती से निकलने वाले रक्त में मातृसत्ता का प्रायः समग्र प्रतिनिधित्व सन्निहित रहता है। जननी के शरीर में जो रसायनिक संपदा है और चेतना में जो ज्ञान-गरिमा है, उसका सारतत्त्व माता अपने वक्षस्थल से निसृत दुग्ध माध्यम से बालक को पिलाकर सींचती है। यह अनुदान नवजात शिशु को तब तक अनवरत रूप से मिलता रहता है, जब तक की उसका पाचनतंत्र अन्य खाद्यसामग्री ग्रहण करने और पचाने में समर्थ नहीं हो जाता।

यह सूक्ष्म-प्रकिया की बात हुई, स्थूल-प्रक्रिया भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। लालन-पालन, भरण-पोषण से संबंधित अगणित एवं विविध-विधि क्रियाकलाप उसे निरंतर पूरे करते रहने पड़ते हैं। उसकी ममता और सतर्कता ही अबोध शिशु को जीवित रहने और सुव्यवस्थित रीति से विकसित होने का अवसर देती है। स्पष्ट है कि स्नेह, सुरक्षा और सुव्यवस्था का समुचित प्रबंध न हो तो बालक के लिए निरोगी एवं दीर्घजीवी रह सकना प्रायः अशक्य ही बन सकता है। मानव शिशु जन्मजात रूप से स्वावलंबी नहीं होता, उसे पग-पग पर माता की सहायता विशेष रूप से और पिता आदि अभिभावकों की साधारण रीति से निरंतर अपेक्षित होती है।

अध्यात्म जगत में यही भूमिका अपने शिष्य के प्रति गुरु को निबाहनी पड़ती है। पौधा भले ही भूमि से, बीज से,  खाद-पानी से जन्मता-पलता हो; पर माली की भूमिका उसके जीवन-विकास में कम नहीं होती। शीत-आतप से बचाने, समयानुसार खाद-पानी के साधन जुटाने, पशुओं द्वारा उदरस्थ कर लिए जाने से बचाने, काट-छाँटकर सुंदर, शोभायमान बनाने में माली की भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण होती है कि उसके बिना अतिकठोर स्तर के पेड़-पौधे ही स्वावलंबी हो सकते हैं। काट-छाँट के बिना वे भी जंगली स्तर के ही रहेंगे। क्रमबद्ध शोभा-सौरभ तो उनमें कदाचित ही रह पाए। व्यक्तित्व को समग्र रूप से विकसित और व्यवस्थित बनाने में गुरु की भूमिका कुशल माली जैसी ही होती है। प्राचीनकाल में भारत का हर नागरिक देवोपम जीवन जीता था। यहाँ का हर नागरिक भूदेव कहलाता था। भारतभूमि तैंतीस कोटि देवताओं की, देव नागरिकों की— स्वर्गादपि गरीयसी क्रीड़ास्थली थी। इसका अधिकांश श्रेय उन गुरुजनों को था, जो छात्रों को अपने आश्रमों, गुरुकुलों के दिव्य वातावरण में रखकर उन्हें सुशिक्षित ही नहीं, सुसंस्कृत भी बनाते थे।

यह सब भौतिक शरीर का, भौतिक जीवन का क्रियाकलाप हुआ। व्यक्ति की अध्यात्म सत्ता एवं महत्ता का अपना अद्भुत क्षेत्र है। उसमें भी माता की और गुरु की भूमिका का निर्वाह तत्त्वदर्शी गुरु को करना पड़ता है। एकाकी जीवधारी जीवन-लक्ष्य तक पहुँचने का साहस क्वचित-कदाचित ही कर पाते हैं। साधारणतया उन्हें वैसा ही सहयोग अपेक्षित होता है, जैसा नर शिशुओं को माता का एवं बहुमूल्य वृक्षपादपों को कुशल माली का।

प्राचीनकाल में गुरु की गरिमा अत्यधिक उच्चस्तर की थी, उसे ‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुरेव महेश्वर। गुरुरेव परब्रह्म........ ’ के पद पर श्रद्धापूर्वक आसीन किया जाता था और गुरु गोविंद की तुलना करने वाले भावनाशील श्रद्धालु,  गुरुगौरव को प्राथमिकता देते थे। इसका आधार भी है और कारण भी। नर-कीटक को, नर-पशु को— नारायण एवं पुरुषोत्तम स्थिति तक पहुँचा देने का योजनाबद्ध प्रयास करने वाली, अणु को विभुसंज्ञा प्रदान करने वाली, आत्मा को परमात्मा के सदृश बना सकने वाली कलाकार— मानवी कल्पना को जिस भी सम्मान से सम्मानित किया जाए कम है। गुरु ऐसा ही कलाकार है जो तप-साधना की अतिकष्टसाध्य-प्रक्रिया अपनाकर अपने को ऐसी प्रचंड अग्नि के रूप में विकसित करता है, जिसके संपर्क में आने वाला सहज ही तत्सम बन जाए। इसके लिए उसे आत्मनिग्रह की, आत्मसंवर्द्धन की अग्निपरीक्षा में होकर जन्म- जन्मांतर तक आत्मशोधन करना पड़ता है। तब कहीं वह इस स्थिति में बनता है कि अपनी बहुमूल्य संचित संपदा परम निस्वार्थ भाव से अधिकारी शिष्य को प्रदान करके उसे अपनी समकक्षता का गौरव उपलब्ध करा सके। परमार्थ का यह चरमबिंदु है।

गुरुवर्ग के कई स्तर हैं। शिशु का संरक्षण-शिक्षण करने वाले अभिभावक गुरुजन हैं। अक्षरज्ञान देने वाले अध्यापक भी गुरु ही कहे जाते हैं। उपनयन प्रभृति संस्कार कराने वाले पुरोहित भी मंत्रदीक्षा गुरु हैं। विभिन्न कला-कौशल सिखाने वाले कलागुरु कहलाते हैं। शिक्षार्थी को अनेकों विषय पढ़ाने पड़ते हैं और मनुष्य पग-पग पर अनेक माध्यमों से ज्ञान एवं अनुभव संचय करता रहता है। इन सजीव एवं निर्जीव पिंड-घटकों को भी गुरुसंज्ञा मिलती है। भगवान दत्तात्रेय ने चौबीस गुरु बनाए थे। इनमें चील, कौआ, कुत्ता, मकड़ी प्रभृति निम्नस्तरीय जीव-जंतु भी सम्मिलित थे। जिससे कुछ सीखा जाए वह गुरु, जो सीखे वह शिष्य। यह मोटी परिभाषा सर्वत्र प्रचलित है। इस आधार पर हर व्यक्ति के ज्ञात-अविज्ञात, पूजित-अपूजित अनेकों गुरु होते हैं। इस लेख में चर्चा उपरोक्त स्तर के गुरुजनों की नहीं हो रही, क्योंकि वे एक छोटी सीमा तक ही किसी को कुछ सिखा सकने में समर्थ होते हैं। उनका बुद्धिकौशल जिस स्तर का है, वे उतना ही मार्गदर्शन कर सकते हैं। मार्गदर्शन करना भर उनका उत्तरदायित्व है, वे इस कर्त्तव्य से बँधे नहीं हैं कि उनके छात्र समुचित प्रगति कर ही सकें। इसकी कोई अतिरिक्त क्षमता भी उनमें नहीं होती। मेधावी छात्र अपनी कुशलता से जितना सीख सकें और अपने पुरुषार्थ से जितना बढ़ सकें, उतनी ही सफलता उनके हाथ रहती है। सीखने और सिखाने की प्रक्रिया इसी परिधि तक सीमित रहती और समाप्त होती है। इससे अधिक की आशा न कोई गुरु अपने शिष्य से करता है और न किसी शिष्य को उससे अधिक अपेक्षा उस भौतिक गुरु से रहती है।

यहाँ चर्चा उपरोक्त स्तर के गुरुवर्ग की नहीं हो रही, वरन उनका विवेचन किया जा रहा है जो कीट और भृंग का उदाहरण प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हैं। जलती अग्नि में जो वस्तु डाली जाती है, वह जल्दी या देर में उसी के सदृश अग्निरूप हो जाती है। यही परम गुरु का कौशल अनुदान है। इसी को अग्निदीक्षा कहते हैं। इसके लिए आत्मबलसंपन्न गुरु चाहिए, साथ ही शिष्य के लिए आत्मोत्सर्ग का माता जैसा प्रबल वात्सल्य भी होना चाहिए। विद्वत्तामात्र से यह कार्य नहीं हो सकता, इसके लिए प्रचंड तप-साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल-संपदा की प्रचुर पूँजी का, प्रचुर संग्रह आवश्यक है।

युग परिवर्तन की इस पर्ववेला में अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऐसी आत्मबलसंपन्न विभूतियों की आवश्यकता पड़ेगी जो भौतिक साधनों से नहीं, अपने आत्मबल से जनमानस के विपन्न प्रवाह को उलट सकने का साहस कर सकें। यह कार्य न तो व्यायामशालाएँ-पाठशालाएँ पूरा कर सकती हैं और न शस्त्रसज्जा से— अर्थसाधनों से पूरा हो सकता है। इसके लिए ऐसे अग्रगामी लोकनायकों की आवश्यकता पड़ेगी जो मनस्वी और तपस्वी बनने में अपना गर्व-गौरव अनुभव करें और जिनकी महत्त्वाकांक्षाएँ भौतिक बड़प्पन से हटकर आत्मिक महत्ता पर केंद्रीभूत हो सकें। भौतिक लाभों के लिए लालायित, लोभ-मोह के बंधनों में आबद्ध व्यक्ति इस स्तर के लाभ से लाभांवित कदाचित ही हो सकें।

मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की यह पुण्यबेला है। इसमें महामानवों को महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहनी पड़ेगी। वे ही अग्रगामी बनेंगे और असंख्यों को अपने पीछे अनुगमन की प्रेरणा देंगे। इतिहास के आकाश में ऐसे ही महामानव उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनंतकाल तक चमकते हैं। इन्हीं का निर्माण इन दिनों अभीष्ट है। महाकाल ने उन्हीं का आह्वान किया है,  युग की आत्मा ने उन्हीं को पुकारा है। ऐसी सत्ताएँ इस समय भी मौजूद हैं। दुर्भाग्य ने उन पर मलीनता का आवरण आच्छादित कर दिया है। अंधकार में वे अपना कर्त्तव्य देख-समझ नहीं पा रहे हैं और साहसिकता के अभाव में, उस दिशा में कदम बढ़ा नहीं पा रहे हैं, जिसके लिए उनमें समुचित पात्रता पहले से ही मौजूद है।

शान्तिकुञ्ज में इन्हीं दिनों आरंभ होने वाली प्राण-प्रत्यावर्त्तन शृंखला का यही प्रयोजन है। इसे भूतकालीन उस ऋषि-प्रक्रिया की पुनरावृत्ति कहा जा सकता है, जिसमें आत्मसंपदा से सुसंपन्न पुरोहित अपने शिष्य-यजमानों को क्रमबद्ध प्रक्रिया के अनुसार ऊँचा उठाते और आगे बढ़ाते थे। शरीर को जन्म देने वाली माता जिस प्रकार अपना उत्कृष्ट जीवन-रस निचोड़कर नगण्य से भ्रूणकलल को एक समर्थ मानव बनाती है, ठीक उसी प्रकार का उत्तरदायित्व व्यक्ति की आत्मिक प्रगति में समर्थ गुरुजन वहन करते हैं। माता का सहज वात्सल्य इस प्रकार का अनुदान देने के लिए उसे बाध्य करता है। नारीसुलभ प्रजनन सामर्थ्य जब परिपक्व हो जाती है तो प्रकृति उसे इसके लिए उकसाती है। कामेच्छा इसी प्रकृति-प्रेरणा का नाम है। तपस्वियों में भी एक समय ऐसी ही शुभेच्छा उत्पन्न होती है, वे भी एक समय प्रौढ़ता-परिपक्वता की स्थिति में होते हैं और उन दिनों उनकी मस्ती देखते ही बनती है। ऋतंभरा प्रज्ञा और तप-तेजस् की प्रखरता वैयक्तिक कलेवरों को तोड़-फोड़कर असीम में अपना उपार्जन उत्सर्ग करने के लिए लालायित हो उठती है। शान्तिकुञ्ज में चल रहे प्राण-प्रत्यावर्त्तन-प्रवास के पीछे गुरुदेव की ऐसी ही अंतःस्थिति को आँका जाना चाहिए। उनकी इन दिनों की योग्यता एवं परिपक्वता को देखते हुए उनके मार्गदर्शक ने प्राण-प्रत्यावर्त्तन के लिए सामयिक निर्देश उचित ही दिया है।

गुरुदेव अपनी उपार्जित शक्ति का महत्त्वपूर्ण अंश इन एक हजार आत्मीयजनों में विनिसृत करेंगे। साथ ही इस बीजारोपण से उत्पन्न अंकुर को भविष्य में भी सोचने-सँभालने का प्रयत्न करेंगे। माता के गर्भ में बालक कुछ समय रहता है, प्रत्यावर्त्तन की अवधि उसी प्रकार की है। गर्भस्थ शिशु को माता से जिस स्तर का अनुदान मिलता है, उससे हलका नहीं; वरन कुछ भारी ही यहाँ भी मिलेगा।

प्रसव के उपरांत माता नवजात शिशु के प्रति अपने कर्त्तव्य का अंत नहीं मान लेती; वरन उसके द्वारा उत्पन्न की गई मलीनता और अव्यवस्था को धोती-सँभालती रहती है। साथ ही उसके परिष्कार-परिपोषण के साधन जुटाती रहती है। प्रत्यावर्त्तन-प्रक्रिया के माध्यम से विनिर्मित शिशुओं का भी गुरुदेव आजीवन इसी प्रकार का ध्यान रखेंगे, उनके प्रति अपना कर्त्तव्यपालन करेंगे। यह कहने की आवश्यकता नहीं है।

इतना महान अनुदान प्राप्त करने वाले हजार बड़भागियों को हर दृष्टि से सौभाग्यशाली ही माना जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जिन्हें इस स्तर की वस्तु मिले, उनके ऊपर भी कुछ कर्त्तव्य, उत्तरदावित्व आते हैं। पात्रता विकसित करने के लिए उन्हें भी कुछ साहस करना पड़ता है। गुरुदेव ने स्वयं इसी प्रकार का मूल्य चुकाया है। जिन्हें उच्चस्तरीय आलोक मिलेगा, वे स्वयं ही देवोपम रीति-नीति अपनाने में आकुलता अनुभव करेंगे। पशु जीवन जी सकना उनके लिए संभव ही नहीं रहेगा।

कहने की आवश्यकता नहीं कि पात्रता के अनुरूप न्यूनाधिक अनुदान भी इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले को मिलेगा। प्रभु-प्रयोजनों के लिए जो जितना आत्मसमर्पण कर सकेगा, वह उसी स्तर की ज्योति से भी अपने को आलोकित अनुभव करेगा।

प्राण-प्रत्यावर्त्तन की सत्र-शृंखला इन्हीं दिनों शान्तिकुञ्ज में आरंभ हो रही है। एक समय में 20-25 से अधिक व्यक्ति नहीं बुलाए जा सकते। बैटरी की शक्ति के अनुसार ही बल्ब जलते हैं। एक समय में इससे अधिक व्यक्तियों को कुछ महत्त्वपूर्ण अनुदान नहीं दिया जा सकता। कुल मिलाकर पाँच वर्षों में एक हजार सुसंस्कारी आत्माओं का परिपोषण करने का निश्चय किया गया है। बिहार हजारीबाग के हजारी किसान की बात पिछले अंको में छपती रही है। गुरुदेव भी इतने ही आम्रवृक्षों का, कल्पवृक्षों का उद्यान लगाकर अपना कर्त्तव्य पूरा करने वाले हैं। इसके लिए उपयुक्त पात्रता का ध्यान रखा जाएगा।

प्राण-प्रत्यावर्त्तन सत्रों के लिए कइयों ने आवेदन किए हैं, कई बुलाहट की प्रतीक्षा में हैं। इन दोनों ही वर्गों में से गुरुदेव यह देख रहे हैं कि वे कौन हैं, जो आत्मबल का अनुदान उसी प्रयोजन के लिए चाहते हैं, जिसके लिए कि वह अनादिकाल से मिलता रहा है। ऋषियों को ईश्वर का अजस्र अनुदान प्राप्त हुआ, वे परम सिद्धपुरुष थे। अपने अनुग्रह से उन्होंने अगणित प्राणियों का कल्याण किया; पर अपने लिए कुछ नहीं माँगा। आत्मपरिष्कार, आत्मसंतोष ही क्या कम है जो निरर्थक भौतिक जाल-जंजाल के लिए इससे आगे भी तृष्णा संजोए रखी जाए। संत अपरिग्रही होते हैं, अपने लिए निर्वाह के स्वल्प साधन ही उन्हें पर्याप्त प्रतीत होते हैं। न अहंता की लिप्सा उन्हें व्याकुल करती है, न लोभ से— वासना-तृष्णा से उनका अंतःकरण विक्षुब्ध रहता है। ऐसे शांत, संतुष्ट, विवेकवान और दूरदर्शी अंतरात्मा पर ही परमात्मा की प्रचंड धारा अवतीर्ण होती है। स्वर्ग में गंगा का अवतरण शिवजी की जटाओं में हुआ था, हमारी अंतःस्थिति शिवजी की जटाओं जैसी पवित्र और निर्मल होनी चाहिए।

उदाहरण स्पष्ट है। गुरुदेव ने भौतिक कामनाएँ  छोड़ी और महानता पर अपने को उत्सर्ग किया। यही वह प्रथम चरण था, जिससे मुग्ध होकर उनके मार्गदर्शक दौड़ते हुए चले आए और अपना आंतरिक रसतत्त्व उन्हें गोवत्स की तरह निचोड़कर पिला दिया। यही राजमार्ग उन लोगों के लिए खुला पड़ा है जो कुछ महत्त्वपूर्ण विभूतियाँ— उलब्धियाँ चाहते हैं। महान व्यक्ति वैभवरहित नहीं होते। सिद्धियाँ विभूतियों की छायामात्र होती हैं। महामानव अपने लिए वैभव का उपभोग नहीं करते, यह उनकी महानता एवं उदारता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे निर्धन, निर्बल या निस्तेज रहते हैं। वे स्वार्थ से मुँह मोड़कर परमार्थ की ओर कदम बढ़ाते हैं, वैभव उनके पीछे-पीछे दौड़ता है। छाया की ओर मुँह करके दौड़ने वालों से प्रकाश पीछे छूटता जाता है और छाया भी हाथ नहीं आती, किंतु जब प्रकाश की ओर कदम बढ़ाए जाते हैं तो छाया अनायास ही अनुगामिनी बन जाती है। परमार्थपरायण, श्रेयानुगामी अपनी तप-साधना त्याग, बलिदान से आरंभ करते हैं; किंतु पाते इतना अधिक हैं कि स्वयं धन्य बनते हैं और अपने युग के इतिहास को चिरस्मरणीय— अभिनंदनीय बनाते हैं।

घोषित किया जा चुका है कि प्रत्यावर्त्तन की प्रक्रिया कुल मिलाकर 6 दिन की रहेगी। प्रथम दिन आगंतुकों के परिचय का है। इसी दिन वे अपनी भौतिक और आत्मिक समस्याओं का विवरण प्रस्तुत कर देंगे। साथ ही वर्त्तमान जीवन के सभी पापकर्मों को भी बता देंगे। यह पहला दिन है। इस आधार पर उन्हें परिष्कृत जीवन की दिशा में अग्रसर होने का परामर्श एवं सहयोग दिया जा सकेगा। इसके बाद दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवा — यह पाँच दिन विशुद्ध प्राण-प्रत्यावर्त्तन के हैं। इनमें साधकों को अधिकांश समय मौन, एकांत सेवन, ढीला शरीर और खाली मन रहना होगा। शौच-स्नान जैसे अनिवार्य कार्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों एवं चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा जाएगा। भोजन यथासमय उपलब्ध होता रहेगा। ध्यान और चिंतन की एक विशेष शैली नियत— निर्धारित है, जो उसी समय बताई जाएगी। मुख्यतः शरीर और मन की स्थिरता और शांति को स्थिर रखने पर ही ध्यान दिया जाएगा। एक से दूसरे में शक्ति का हस्तांतरण होते समय ऐसी स्थिरता आवश्यक है। रक्तदान के समय, इंजेक्शन लगने के क्षणों में, ऑपरेशन की घड़ियों में रोगी को हिलने-डुलने नहीं दिया जाता, उसे निश्चल रहना पड़ता है। उथल-पुथल करने से तो सारा प्रयत्न ही गड़बड़ा जाता है। इन चार दिनों में साधक मन:स्थिति को स्थिर कैसे रखे, इसी एक प्रयास में उसे तत्पर कैसे रहना है; यह बता— सिखा दिया जाता है।

कहा जा चुका है कि प्रत्यावर्त्तन में जादू, चमत्कार आदि का कौतूहल जैसा कुछ प्रत्यक्ष अनुभव शरीर को या इंद्रियों को नहीं होना है। यह प्रकरण विशुद्ध आध्यात्मिक है, अस्तु अंतःकरण यह निरंतर अनुभव करेगा कि उस पर रखे हुए मल आवरण और विक्षेप के भार हलके हो रहे हैं। स्वच्छता और निर्मलता का, प्रकाश और प्रसन्नता का समावेश हो रहा है, यह धुलाई-प्रकरण की अनुभूति है। इन्हीं दिनों रंगाई भी चलेगी। इस संदर्भ में लगेगा कि अपने भीतर कुछ नया भरा जा रहा है। गर्भवती को तुरंत अनुभव होता है कि वह भारी हो चली, उस पर भार लद गया। अपनी निजी सत्ता में किसी अतिरिक्त सत्ता का समावेश हो चला। एकाकीपन की समाप्ति और युग्म की अनुभूति विवाह संस्कार के साथ जुड़ी रहती है। प्राण-प्रत्यावर्त्तन के दिनों में भी ऐसा ही लगता है कि जीवन से कोई अतिरिक्त सत्ता जुड़ और गठ गई है। एकाकीपन का स्थान युग्म-संवेदना ने ले लिया है। यह रंगाई है। रंगाई और धुलाई की अनुभूतियाँ इन चार दिनों में ज्वार-भाटे की तरह अंतःकरण के गहन स्तल में उथल-पुथल करती रहेंगी। यद्यपि शरीर और मन को यथासंभव अधिक-से-अधिक शांत और स्थिर रखने का प्रयास बराबर किया और कराया जाता रहेगा। हलचलों का केंद्र गहनतम अंतराल ही रहेगा। इसके लिए ये आवश्यक भी हैं। शरीर और मन को ऊपरी सतह की उथल-पुथल से बचाने के लिए पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता रहे।

एक घंटे के सामूहिक शिक्षण और कुछ समय व्यक्तिगत संपर्क का क्रम चलेगा। प्रत्यक्ष संपर्क इतना ही होगा, यों परोक्ष संपर्क गुरुदेव इन पूरे दिनों ही बनाए रहेंगे। बैटरी चार्ज करने की घड़ियों में बिजली की धारा का लगातार संचरण रहता है, वह क्रम यहाँ भी चलेगा। चार दिन इसी क्रम से व्यतीत होंगे।

छटा दिन उन लोगों की सुविधा के लिए है जो समीपवर्त्ती तीर्थस्थान देखने के इच्छुक हैं। ऋषिकेश, लक्ष्मणझूला, हरिद्वार, कनखल यह चारों ही स्थान एक दिन में आसानी से देखे जा सकते हैं। इसके बाद सभी को शान्तिकुञ्ज छोड़ देना चाहिए, अधिक ठहरने के लिए आग्रह नहीं करना चाहिए। स्थानसंबंधी व्यवस्था उतनी ही है कि प्रत्यावर्त्तन के दिनों में निर्धारित संख्या में ही ठहरना संभव हो सके। अधिक दिन ठहरने का आग्रह करना प्रकारांतर से उन लोगों के लिए कठिनाई उत्पन्न करना है, जो उनकी ही तरह कुछ प्राप्त करने के लिए कष्ट सहकर और खरच करके आए हैं।

अपने साथ स्त्री-बच्चों को लेकर नहीं आना चाहिए, न साथी-संगियों का जोर-जुगाड़ मिलाकर चलना चाहिए। इससे मूल प्रयोजन ही नष्ट हो जाएगा। कथा-वार्त्ता, तीर्थयात्रा, सत्संग समारोह जैसा यहाँ कुछ नहीं है, जिसमें अन्य लोगों को रस मिले। वे बैठे-ठाले यहाँ के निर्धारित व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करेंगे और वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा, जिसके लिए इस अत्यंत उच्चस्तरीय साधन-व्यवस्था का क्रम बनाया गया है। तीर्थयात्रा के लिए साथी-सहचरों के साथ आना हो तो अन्यत्र ठहरना चाहिए और निर्धारित समय पर दर्शन-परामर्श करके चले जाना चाहिए। इसी प्रकार किन्हीं भौतिक प्रयोजनों की बात मन में हो तो प्रत्यावर्त्तन के दिनों अधिक समीपता, घनिष्ठता का लाभ उठाकर अपना प्रयोजन सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। भौतिक सहायता भी हम लोग करते रहे हैं और करते रहेंगे। उनके लिए स्पष्ट रूप से कहना चाहिए। प्रत्यावर्त्तन के उच्चस्तर को भौतिक महानता प्राप्ति के छोटे लाभों के साथ जोड़कर इसका महत्त्व और मूल्य नष्ट नहीं करना चाहिए।

इन 6 दिनों में धुलाई की ओर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मैले कपड़ों पर रंग नहीं चढ़ता। टट्टी में सने बच्चे को गोदी में कोई नहीं उठाता। भगवान की शरण में जाने से पूर्व मनुष्य को स्वच्छ बनना पड़ता है। पापपंक में लिपटा हुआ मन किस प्रकार अब तक की मलीनताओं के भार से छुटकारा पाए और भविष्य में निर्मल बने रहने के लिए क्या रीति-नीति अपनाए, इसके लिए आवश्यक स्थिर विवेक और प्रखर साहस इन्हीं दिनों उत्पन्न किया जाएगा, ताकि आत्मबल का अभिवर्द्धन भविष्य में बिना किसी अवरोध के होता रहे और जीवन-लक्ष्य तक इसी जन्म में पहुँचा जा सके।

ऐसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राण-प्रत्यावर्त्तन की हैं। जिनने सचमुच ही आत्मिक प्रगति का महत्त्व और स्वरूप समझ लिया हो और उसी दिशा में चलना हो, जिसमें गुरुदेव स्वयं चले हैं तथा अपने परम प्रिय स्वजनों को चलाना चाहते हों, उन्हें अपने आवेदनों पर पुनर्विचार करना चाहिए। आगत आवेदनों पर विचार किया जा रहा है और इस पाँच वर्ष की अवधि में किसको, कब बुलाया जाना है, इसका निर्धारण किया जा रहा है। जिन्होंने इस अनुदान को हलकी दृष्टि से देखा हो, कोई कौतुक-कौतुहल माना हो अथवा भौतिक लाभ प्राप्त करने का चोर दरवाजा समझा हो, उन्हें स्वयमेव ही अपने नाम वापिस ले लेने चाहिए और जिन्होंने संकोचवश अपने नाम नहीं दिए हैं, किंतु अपने अंतःकरण में अभीष्ट लक्ष्य की दिशा में चलने की आकुलता अनुभव करते हैं, वे निःसंकोच अपने नाम भेज दें। यों बिना लिखे भी कुछ बलात् घसीटकर बुलाया जाएगा; पर अच्छा और उचित यही है कि अधिकारी पात्र अपने नाम शान्तिकुञ्ज — सप्तसरोवर हरिद्वार के पते पर पत्र द्वारा नाम नोट करा दें और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें कि इन पाँच वर्षों में यथाक्रम जब उनका नाम आवेगा, तब समयानुसार उपस्थित होंगे। स्थान सीमित और संख्या अधिक होने से क्रमानुसार ही आने-बुलाने का सिलसिला चलेगा, इसलिए न तो किसी को उतावला, न निराश होना चाहिए, जिन्हें जितनी देर लगे उतने समय तक अपनी पात्रता बढ़ाने के लिए आत्मशोधन और लोक-मंगल की साधना अधिक तत्परतापूर्वक बढ़ाएँ। इसी अनुदान पर तो अनुदान का उच्चस्तरीय लाभ उठाया जाना संभव हो सकता है।


सृजनात्मक चिंतन— सुख-संतोष का आधार

सुखी और प्रसन्न दिखाई पड़ने वाले मनुष्यों का यदि आंतरिक विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि साधनों, सफलताओं या परिस्थितियों के कारण नहीं, वे अपनी सुखद कल्पनाओं के आधार पर उत्साह और आनंद से भरे रहते हैं।

सुखद साधनों की उपलब्धि के साथ जिनने अपनी प्रसन्नता को जोड़ा होगा, वे सदा खिन्न एवं असंतुष्ट ही दिखाई पड़ेंगे; क्योंकि मनचाही परिस्थितियाँ किसी को भी प्राप्त नहीं होतीं। आकांक्षाओं की सीमा नहीं, चाहना कितनी बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं, उस पर कोई अंकुश नहीं। पर सफलताएँ तो व्यक्तित्व के निर्माण और पुरुषार्थ के नियोजन पर निर्भर रहती हैं; अस्तु वे आकांक्षाओं की तुलना में सदा कम ही रहेंगी। इस कारण को लेकर भी कोई कितना ही दुःखी और असंतुष्ट रह सकता है।

अभीष्ट वस्तुएँ, अभीष्ट परिस्थितियाँ, अभीष्ट सफलताएँ— तभी तक रुचिकर लगती हैं, जब तक वे मिल नहीं जातीं। प्रतीक्षा में ही रस रहता है। मिल जाने पर उसकी सरसता अनायास ही विदा हो जाती है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने, मुकदमों में जीतने, पुत्र होने, मकान बनाने आदि की अभिलाषाएँ जब तक पूरी नहीं होतीं, तभी तक वे आकर्षक लगती हैं, जब वे पूरी हो जाती हैं तो उनमें कुछ भी आनंद शेष नहीं रह जाता। तब वे भारमात्र एवं नीरस बन जाती हैं। अतृप्ति जब तक रहती है, तब तक ही आशाभरा उत्साह रहता है। कन्या के लिए उपयुक्त घर, वर मिलने और विवाह आयोजन ठीक प्रकार संपन्न होने की चिंता तथा व्यवस्था में जो दौड़ रहती थी, उसका विवाह होने के उपरांत सहज ही अंत हो जाता है। तब ऐसी शिथिलता आती है, मानो कुछ करने के लिए ही शेष न रह गया हो।

आनंद की अनुभूति का सारा आधार मनःस्थिति पर निर्भर है, जो उपलब्ध है, उसे निरख-परखकर देखें और उनके साथ अपनी तुलना करें जिन्हें इतना भी मिला हुआ नहीं है, तो प्रतीत होगा कि अपनी स्थिति ऐसी है, जिस पर संतोष ही नहीं, गर्व भी किया जा सके। किंतु इसके विपरीत आकांक्षाओं की तुलना में जो अभाव प्रतीत होते हैं, उन्हीं पर ध्यान केंद्रित रहे और सुसंपन्नों की तुलना करते हुए अपनी स्थिति को हेय समझते रहा जाए, तो असंतोष एवं विक्षोभ के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

भविष्य की आशापूर्ण संभावनाओं का चिंतन करते रहने से सुखद-स्वप्न आँखों के आगे तैरते रहते हैं और कई बार वे इतने मधुर होते हैं कि सुसंपन्न लोगों की तुलना में अधिक उल्लास उमगता रहता है।

माना कि भावी सुसंभावनाएँ निश्चित नहीं हैं, पर यही क्यों मान लिया जाए कि कुकल्पनाएँ ही सही सिद्ध होंगी। सौभाग्य संदिग्ध हो सकता है; पर दुर्भाग्य ही कहाँ निश्चित है। दो अनिश्चितों में से यदि किसी को कल्पना-क्षेत्र में बिठाना ही पड़े तो चुनाव सुसंभावनाओं का ही करना चाहिए। भूतकाल की जो उपलब्धियाँ अब हाथ नहीं रहीं, उनके बारे में सोचते रहने से यही प्रतीत होगा कि जो हाथ था, वह चला गया और संपदा लुट गई, पर यदि भावी संभावनाओं और सफलताओं के ताने-बाने बुनने की आदत डाल ली जाए और आगत उपलब्धियों के लिए प्रयास, स्वागत का ठाठ-बाट खड़ा किया जाए तो लगेगा कि अगले दिनों आनंद और उल्लास की घड़ियाँ द्रुतगति में दौड़ती हुई निकट चली आ रही हैं।

सोचने की आदत निषेधात्मक, निराशाजनक, हानिसंबद्ध एवं विपत्ति-चिंतन की पड़ जाए तो पग-पग पर दुःख-दुर्भाग्य के घेरे में अपने को घिरा हुआ अनुभव किया जाएगा; पर यदि सृजनात्मक एवं सुसंभावनाओं के चिंतन की दिशा मिल जाए तो हर किसी को, अपने को, हर घड़ी सुखी-संतुष्ट एवं आशा-उत्साहभरे स्वर्गीय वातावरण में रहने की अनुभूति होती रहेगी।


यह बलिदानियों की वेला है

Akhandjyoti - 1973 - February


यह बलिदानियों की वेला है (Kavita)

Akhandjyoti - 1973 - February


स्वामी रामतीर्थ जी (कहानी)

स्वामी रामतीर्थ उन दिनों अमेरिका के दौरे पर थे। अनेक स्थानों पर गोष्ठियों तथा प्रवचनों का आयोजन हो रहा था। भारतीय संस्कृति के अमूल्य सिद्धांतों की व्याख्या से अमेरिका निवासी बड़े प्रभावित हो रहे थे। एक दिन स्वामीजी का प्रवचन समाप्त होने पर एक महिला आई और विषादयुक्त वाणी में अपने विचार व्यक्त करने लगी।

“स्वामी जी! मेरा एक ही पुत्र था। थोड़े दिन पूर्व उसकी मृत्यु हो गई। मैं विधवा हूँ, किसी भी तरह चित्त को शांति नहीं मिलती, जीवन में निराशा-ही-निराशा दिखाई देती है। आप कोई ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे जीवन को शांति मिल सके।”

“आपको शांति की पुनः प्राप्ति हो सकती है और अपने जीवन में आनंद का अनुभव कर सकते हैं; पर हर वस्तु का मूल्य चुकाना पड़ता है। क्या आप सुख-शांति की पुनः प्राप्ति हेतु कुछ त्याग करने को तैयार हैं?”

“बस आपके आदेश देने की देर है। मैं अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हूँ।”

“पर इतना ध्यान रखना कि आपके देशवासी भौतिक वस्तुओं पर अधिक ध्यान देते हैं। वहाँ डॉलर और सेन्ट के त्याग से काम नहीं चलेगा। यदि आप सचमुच तैयार हैं तो मैं कल स्वयं ही आपके निवासस्थान पर उपस्थित होऊँगा।”

दूसरे दिन स्वामी रामतीर्थ एक हब्शी बालक को अपने साथ लेकर उस महिला के घर पहुँचे। बिजली का बटन दबाया; घंटी बजी, दरवाजा खुला और वह महिला सामने आ खड़ी हुई।

“स्वामी जी! आपने बड़ी कृपा की, जो मेरे घर पधारे।”

“माता! यह रहा तुम्हारा पुत्र। अब इसके सुख-दुःख का ध्यान रखना और पालन-पोषण करना तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है।”

उस काले लड़के को देखकर वह महिला सिहर उठी— “स्वामी जी! यह हब्शी बालक मेरे घर में प्रवेश कैसे कर सकता है? गोरी माँ काले लड़के को अपना पुत्र कैसे बना सकती है?”

“माँ! यदि इस बालक के लालन-पालन में आपको इतनी कठिनाई अनुभव हो रही है तो सच्चे सुख और शांति को प्राप्त करने का मार्ग तो और भी कठिन है।”


सद्वाक्य

असत्यों का, मतभेद केवल सत्यों से ही नहीं होता। उनमें प्रायः आपस में भी नहीं बनती।


सद्वाक्य

एक भारतीय धर्मशास्त्री ने वर्ट्रेंड रसैल से भेंट की और अपना परिचय देते हुए अपनी पिछली 6 कई पीढ़ियों का इतिहास सुना डाला।

रसैल महोदय ने व्यंग करते हुए कहा— “हम यदि पूर्वजों की गाथाएँ गाते चले जाएँ तो वहाँ जा पहुँचे जहाँ हमारे पूर्वज वानर थे।”


सद्वाक्य

जो सदा दूर क्षितिज पर आँखें गढ़ाए रहते है और जमीन को देखकर कदम बढ़ाते है, उन्हीं को सही राह मिलती है। जीवन उसके सम्मुख अपने नुकसान खोलता है जो उसे जीत ले। हार मान लेने पर जो मिले उसे अंगीकार मत करो। जब तक पर्वत की छोटी छू न लो तब तक उसकी ऊँचाई मत नापो, बाद में तुम देखोगे कि वह उससे कहीं नीची थी जितनी दूर खड़े लोग समझते थे।


(कहानी)

काम को समय पर, जल्दी, उत्साहपूर्वक, मनोयोग के साथ करना चाहिए। दीर्घसूत्रता अपनाकर अनावश्यक समय भी नष्ट नहीं किया जाना चाहिए; पर साथ ही ऐसी हड़बड़ी और उतावली भी नहीं बरतनी चाहिए कि जल्दी प्राप्त करने के लालच में उलटी हानि उठानी पड़े।

महत्त्वपूर्ण कार्यों में तत्परता की तरह ही संजीदगी और धैर्य की भी आवश्यकता पड़ती है। जिस कार्य में, जितना समय आवश्यक है, उतना तो लगना ही चाहिए। उससे अनुभव और अभ्यास बढ़ता रहता है और निर्धारित कार्य को अधिक सुंदरता और सरलता के साथ कर सकना संभव होता है। अनभ्यस्त स्थिति में एकदम छलाँग लगाने की उतावली उपयोगी सिद्ध नहीं होती। उत्साह के साथ विवेक और लगन के साथ धैर्य भी आवश्यक है।

समुद्र में जो मछलियाँ बहुत गहरे पानी में पैदा होती और बढ़ती हैं, उनके लिए समुद्र की ऊपरी सतह पर एकदम पहुँच जाने का प्रयत्न करना घातक सिद्ध होता है। वे अपने अभ्यास को बढ़ाती हुई क्रमशः ऊपर की सतह पर आने का प्रयत्न करें और बदलती हुई दबाव की स्थिति के अनुरूप शरीर की सहनशक्ति को बढ़ाती चलें, तो ही उनका ऊपर चढ़ने का क्रम ठीक पड़ता है; अन्यथा एकदम ऊपर चढ़ दौड़ने वाली मछली समुद्र की सतह पर आते-आते फट जाती है। तल और सतह में जो अंतर है, उसकी असमानता अनभ्यस्त स्थिति में ऐसा ही दुष्परिणाम पैदा करती है।

समुद्र में बहुत नीचे तक गोता लगाने वाले गोताखोर अक्सर ऊपर चढ़ने में अति उतावली करते हैं। फलतः उन्हें 'वेण्डस' नामक रोग हो जाता है। वह या तो उन्हें अपंग कर देता है या मार डालता है।

डॉ. वर्ट ने गोताखोरों के 'वेण्डस' रोग पर अनुसंधान करते हुए पाया कि यह जलीय दबाव के उतावलीपूर्ण अतिक्रमण का परिणाम है। जल का दबाव उनके रक्त में नाइट्रोजन भरे रखता है; पर जब वे ऊपर आती हैं तो वह नाइट्रोजन तेजी से बाहर निकलता है। यह झटका ही उपरोक्त बीमारी का कारण बनता है। डॉक्टर हाल्डन ने भी इसी मत की पुष्टि की और गोताखोरों को सलाह दी कि जलीय दबाव को ध्यान में रखते हुए अपनी चाल धीमी कर दें, ताकि परिवर्तित परिस्थितियों को सहन करने में शरीर अपने को तत्पर करने का अवसर प्राप्त करता चले।

मनोयोग और श्रम की महत्ता बहुत है, पर साथ-ही-साथ धैर्य की उचित मात्रा भी रहनी चाहिए।


(कहानी)

एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक, सर विलयम जोन्स उन दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज थे। संस्कृत पढ़ने की उन्हें उत्कट इच्छा थी; पर उन दिनों बंगाल में कट्टरता का पूरा जोर था। कोई पंडित किसी 'मलेच्छ' को संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए तैयार न हुआ।

अंततः काफी वेतन पर रामलोचन नामक एक पंडित तैयार हुए। उनने कई शर्त लगाई। छात्र पढ़ने से पूर्व कुछ न खाए। लाने के लिए पालकी का प्रबंध हो। जिस कमरे में पढ़ा जाए, वह हिंदू नौकर द्वारा गंगाजल से घोटा जाए।  के अलग वस्त्र हों आदि आदि।

यह सब शर्तें सर जोन्स ने स्वीकार की और वे विद्याप्राप्ति के लिए की जाने वाली तप-साधना की कठिनाइयाँ मानकर इन सब शर्तों को स्वीकार करते रहे और अंततः संस्कृत भाषा के विद्वान बनकर  अपनी संस्था को महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न कर सकने में समर्थ बना सके।


सद्वाक्य

धन कुबेर हैनरी फोर्ट ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जहाँ तक मैं समझा हूँ, जीवन एक सतत यात्रा है। इसमें कहीं कोई पड़ाव नहीं। जो सोचता है, मुझे करना था कर चुका, समझना चाहिए, वह अवनति की ओर जा रहा है। गतिशील रहना ही जीवन का चिह्न है।”


(कहानी)

सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति— मानव। परम पिता परमात्मा का पुत्र— युवराज। फिर भला उसके साहचर्य में रहने के लिए कौन इच्छुक न होगा?  घड़ी के मन में भी यही इच्छा हुई और मानव को देखकर बुदबुदाई— “मुझे घड़ी के नाम से पुकारा जाता है, मैं तुम्हारी सहचरी बनना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे जीवन को नियमित और कर्मरत बनाऊँगी। रात हो या दिन, गर्मी हो या जाड़ा; मैं अपनी सुख-सुविधाओं की तनिक भी चिंता न कर अपना सर्वस्व तुम्हारे चरणों में न्योछावर कर दूँगी। मेरी सहायता से तुम समय का महत्त्व जान सकोगे, कहने की बात नहीं, मेरे सहयोग से न जाने तुम क्या से क्या बन जाओगे। ‘टिक-टिककर’ मैं तुम्हें सदैव सचेत करती रहूँगी, ताकि तुम्हारे जीवन के मूल्यवान क्षण व्यर्थ ही नष्ट न हो जाएँ।”

मानव भला क्यों मना करता, घड़ी की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। वह मानव की सहचरी बन गई। हर क्षण वह उसके पास रहती है। कभी दाएँ हाथ में तो कभी बाएँ हाथ में, कभी जेब में तो कभी कमरे में,  कभी दीवार पर तो कभी मेज पर। स्थिति यहाँ तक आ गई कि बड़े-बड़े शहरों में ऊँची मीनारों पर बैठकर बताने लगी, कि समय और जल का प्रवाह कभी अवरुद्ध नहीं होता, इस जीवन में जो करना चाहो कर लो, फिर यह मानव शरीर मिलेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता।

घड़ी अपना वचन निभाने के लिए कृतसंकल्प है। वह पूरी-पूरी चेष्टा कर रही है, पर सफलता और विफलता तो मनुष्य पर निर्भर है। उसने घड़ी को सहचरी बनाया जरूर है; पर उसका साथ निभाने में अपने को असमर्थ पा रहा है। इसका परिणाम जो होना था, वही हुआ और हो रहा है। घड़ी शोभा और फैशन की वस्तु बनकर रह गई और मनुष्य उसका भार ढोने वाला तथा आवश्यकता की पूर्ति करने वाला बनकर रह गया है। यदि मानव घड़ी का सच्चा सहचर बन सका होता तो आज उसकी इतनी दयनीय स्थिति न होती।


सद्वाक्य

जो स्वार्थी हैं, उनका पतन एक न एक दिन जरूर होगा। जो सेवापरायण हैं, उन्हें पतन के  लिए अवसर और अवकाश ही कहाँ मिलेगा?

पतित व्यक्ति पहले सत्यविमुख होता है। पीछे अंधकार में प्रवेश करता है; क्योंकि पाप अंधेरे में ही हो सकता है। असत्य और अंधकार, यही तो दो पतन के अवलंबन हैं।

— महात्मा गाँधी


सद्वाक्य

फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूगो ने लिखा है— “ईश्वर ने यदि मनुष्य को पीछे की ओर

लौट चलने के इरादे से बनाया होता, तो उसकी आँखें आगे की ओर न बनाकर पीछे की ओर

बनाई होती।”


(कहानी)

अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, बेबीलोनिया, फारिस आदि जीतता हुआ सिकंदर भारत पर चढ़ दौड़ा। एक के बाद दूसरे देश पर उसकी विशाल सेना इस तरह विजय प्राप्त करती चली जा रही थी, मानो वह विश्वविजय करके ही रहेगी। भारत के जिस बेश पर दूसरे दिन चढ़ाई होने वाली थी, उसकी सारी तैयारी एक दिन पहले ही कर ली गई थी।

राजा को भी यथासमय उसका पता लग गया। सो उसने हारने और मरने से पूर्व एक बार सिकंदर से मिलने की योजना बनाई और कूच आरंभ होने से पहले ही वह वहाँ जा पहुँचा। उसने अपने को राजदूत बताया और मिलने की इच्छा प्रकट की।

सिकंदर ने इसमें कुछ अनुचित न समझा कि राजदूत से भेंट की जाए। वह आया और यही कहा— “राजा आपसे संधि करने को तैयार हैं। वे केवल इतना ही चाहते हैं कि आप उनका आतिथ्य स्वीकार करें और अपने मुख्य आमात्यों समेत भोजन वहाँ ही करें।”

पहले तो यह आशंका हुई कि घर लेजाकर कोई धोखा न किया जाए; पर उस राजा के धार्मिक विचार सर्वत्र प्रख्यात थे, सो सिकंदर ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और सुरक्षा-व्यवस्था के साथ मुख्य आमात्यों सहित राजमहल में जा पहुँचा। भोजनशाला सुसज्जित बनाकर रखी गई थी। सिकंदर आया और उसे ससम्मान यथास्थान बिठा दिया गया।

भोजन का जो थाल परोसा गया, उसमें सोने-चाँदी के सिक्के और हीरे, मोती, जवाहरात भरे थे। सिकंदर ने आश्चर्य से पूछा— “इनसे पेट कैसे भरेगा?”

राजा ने कहा— “ठीक है, पेट तो अन्न से ही भरता है; पर आपकी भूख तो कुछ और ही है। जिसके लिए आप व्याकुल हैं, उसी को परोसना मैंने उचित समझा। इसी के लिए तो आप इतने देशों पर आक्रमण करते और रक्त बहाते हुए यहाँ तक चले आए हैं।

राजा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा— “यदि रोटी से ही पेट भर सका होता तो वह आपके देश मैसिडोनिया में ही क्या कम थी।”

सिकंदर को अपनी स्थिति पर बड़ी ग्लानि हुई और वह वापिस लौट गया।


(कहानी)

एक राजा! दुःखी और उदार! चिंतित इतना, कि रात को गहरी नींद तक नहीं आती। राज्य के मंत्री तथा निजी चिकित्सक उसे प्रसन्न रखने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न करने लगे। प्रयत्न क्यों न करते?  राजा जो ठहरा राज्य का। किसी ने कहा— “यदि राज्य के सबसे सुखी और प्रसन्न व्यक्ति को ढूँढकर उसकी कमीज राजा को पहना दी जाए तो उसकी खोई हुई प्रसन्नता लौट सकती है। अनेक मंत्री तथा नौकर-चाकर सुखी व्यक्ति की खोज में निकल पड़े। सब सोचते, जो यह कार्य सबसे पहले कर दिखाएगा; उसकी कार्यक्षमता का प्रभाव राजा पर पड़ेगा और कहीं राजा खुश हो गया तो मुह माँगा पुरस्कार मिलेगा।”

एक दिन सड़क के किनारे अपने राम में मस्त एक सज्जन मिल गए। यद्यपि उन्होंने राजा के सम्मुख जाने को बहुत आना-कानी की; पर विवश थे, जाना पड़ा। राजा के सम्मुख उपस्थित हुए। जब राजा राज्य के सबसे प्रसन्न व्यक्ति से मिले तो उनकी भी खुशी का ठिकाना न रहा, वह तो चिल्ला पड़े— “अच्छा! तुम हो सबसे सुखी व्यक्ति, फिर तो कितने ही लोग तुमसे ईर्ष्या करते होंगे। लाओ-लाओ! तुम्हारी कमीज कहाँ है, मैं भी उसे पहनकर अपनी उदासीनता तथा चिंताओं से मुक्त हो जाऊँ।”

“राजन! आप कमीज की बात कहते हैं, मेरे पास तो उत्तरीय तक नहीं। रमतायोगी और बहता पानी जैसा मेरा जीवन है।”  राजा समझ गया कि सुख वस्तुओं में नहीं, संतोष में है।


यह बलिदानियों की वेला है (Kavita)

Akhandjyoti - 1973 - February


(कहानी)

नेहरू जी एक बार कानपुर के प्रताप कार्यालय में गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने गए। विद्यार्थी जी वहाँ थे नहीं,  प्रतीक्षा में नेहरू जी को बैठना पड़ा।

मेज पर कागज बेतरतीब बिखरे पड़े थे। इस प्रतीक्षा के समय में नेहरू जी ने वे सभी कागज तरतीब से जमाए और कपड़े से मेज-कुरसी पर जहाँ-तहाँ जमी सारी धूल साफ कर दी। विद्यार्थी जी लौटे तो उन्होंने नेहरू जी से क्षमा माँगी और आगे से मेज साफ रखने की आदत बना ली।


(कहानी)

वर्षों पूर्व की बात है। अमेरीका में सर विलियम ओसलर नेयेल विश्वविद्यालय के छात्रों को भाषण देते समय चिंता दूर करने का एक अनुभवपूर्ण उपाय बताया— “मेरी प्रसन्नता और उत्तम स्वास्थ्य का रहस्य यह है कि मैं दिन के कमरे में बंद रहा हूँ।” सबने उत्सुकता से पूछा— “दिन के कमरे में बंद रहने से आपका क्या मतलब है?” उन्होंने अपना अभिप्राय स्पष्ट करते हुए उत्तर दिया— “दिन के कमरे में बंद रहने का मतलब स्पष्ट है, प्रत्येक दिन को सुबह से सायंकाल तक अच्छे-से-अच्छे तरीके से व्यतीत करने का प्रयास करना। उसमें उचित श्रम, कर्त्तव्यपालन और मनोरंजन का ध्यान रखना और अधिकाधिक आनंद मनाना। यही एक दिन का कमरा है। मैं अपने आपको इसी में बंद रखता हूँ। एक-एक दिन इस प्रकार सुनियोजित ढंग से व्यतीत होते-होते मेरे जीवन के बहुत से वर्ष बड़े ही सुख-शांतिमय ढंग से गुजरे हैं।  मैं चाहता हूँ कि आप भी दिन की परिधि में बंद रहना सीखें। अपने मस्तिष्क के शेष कमरों को बंद रखें, जिनमें आपके जीवन की बहुत-सी पुरानी कटु अनुभूतियाँ, दुःखद बातें और नाना प्रकार की चुभने वाली स्मृतियाँ दबी पड़ी हैं। आप इन अनुभूतियों को किवाड़ों में बंद कर दीजिए। भूतकाल की दुःखभरी संचित पीड़ा, वेदना और हाहाकार की काली परछाई अपने मुस्कराते हुए वर्त्तमान जीवन पर मत जाने दीजिए। इसी प्रकार भविष्य के लिए भय और चिंताओं से भी अपने को मुक्त कीजिए और केवल आज को ही सुंदर बनाने का संकल्प कीजिए।

“वर्त्तमान ही हमारा है। हमें तो पहले आज की परवाह करनी चाहिए। यह सुंदर-सुहावना आज। यह उल्लासपूर्ण आज ही हमारी अमूल्य निधि है। यह आज ही हमारे हाथ में है। यह हमारा साथी है। इस आज की ही प्रतिष्ठा कीजिए। आज के साथ खूब खेलिए, कूदिए, मस्त रहिए और इसे अधिकाधिक उत्साहपूर्ण और उल्लासपूर्ण बनाइए।”


(कहानी)

ब्राह्मणपुत्र ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूरी करके घर लौटा। आँगन में आकर माता के चरणस्पर्श किए और पूछा— “पिताजी कहाँ हैं?”  उन्होंने अंदर की ओर संकेत से ही बता दिया।

ब्रह्मचारी अंदर गया। पीछे का दरवाजा खुला था; पर पिताजी का कहीं पता न लगा। परिवार वाले चिंतित हुए। गाँववालों ने भी खोज-बीन की। पूरा वर्ष बीतने पर पिताजी घर लौट आए। पुत्र ने पूछा — “आप कहाँ चले गए थे?”

पिता ने कहा— “जब तुम ब्रह्मचर्य आश्रम से लौटकर अपनी माँ के चरणस्पर्श कर रहे थे, उस समय मैं तुम्हें देख रहा था। मैंने तपस्या से जगमगाते हुए तुम्हारे दीप्तललाट को देखा। तेजस्वी मुखमंडल अपनी आभा बिखेर रहा था। उसी क्षण मेरी आत्मा ने जब अपने को टटोला तो पाया कि मैं तुम्हारा प्रणाम लेने योग्य नहीं।”

“इतने वर्षों से सांसारिक संघर्ष में रत रहने के कारण मेरा चरित्र मलिन हो गया था, अतः विलंब करना मैंने उचित नहीं समझा और पीछे के द्वार से तपस्या हेतु मैं वनगामी हो गया। एक तपस्वी से प्रणाम कराने का पात्रत्व जब मुझमें आ गया तो मैं घर लौट आया। वर्ष भर में मेरी तपस्या पूरी हुई। अब तुम सहर्ष मेरे चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हो।”


सद्वाक्य

धरती के देवता वे हैं जो अपने अनुकरणीय आचरण से दूसरों में सत्पथगमन की प्रेरणा भरते हैं।