अनुशासन सीखिये

एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।

ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।


भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें

भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह बर्बाद ही होगी किसी के काम न आ सकेगी।

भावनाओं में भक्ति का स्थान बहुत ऊँचा है। उसका सहारा लेकर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है। किन्तु यदि उसे एक कल्पना-आवेश मात्र मन बहलाव रहने दिया जाय तो उससे किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।

रविशंकर महाराज ने आज के भक्तों की तीन रोगों से ग्रसित गिनाया है (गाना) (2) रोना (3) दिखावा।

भजन कीर्तन के नाम पर दिन-रात झाँझ बजती और हल्ला होता है। गाना वही सार्थक है जो विवेक पूर्वक गाया जाय जिसमें प्रेरणा हो और उसे हृदयंगम करने का लक्ष्य सामने रखा गया हो। जहाँ केवल कोलाहल कही उद्देश्य हो वहाँ, भक्ति का प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा।

रोना-अर्थात् संसार को शोक-संताप से भरा भव सागर मानना। इस दुनिया से छुटकारा पाकर-किसी अन्य लोक में जा बसने की कल्पना, अपने आपसे भागने के बराबर है। भगवान के सुरम्य उद्यान का सौंदर्य निहार कर आनंद विभोर होने की भक्ति-भावना यदि विश्व के कण-कण में संव्याप्त भगवान को देखने की अपेक्षा सर्वत्र दुःख और पाप ही देखें तो इसे बुद्धि विपर्यय ही कहा जायेगा। भक्ति भाव नहीं। पलायन नहीं-भक्ति का तात्पर्य दुखों का निराकरण एवं दुखियों की सहायता करना है। जहाँ। केवल घृणा का विषाद छाया रहे वहाँ भक्ति की आत्मा जीवित कैसे रहेगी। अपने को आर्त और दुखी के रूप में प्रस्तुत करने वाला इस कुरूप चित्रण से अपने सृष्टा को ही अपमानित करता है।

भक्ति का तीसरा छंद है-दिखावा इन दिनों धार्मिक आडम्बर पहाड़ जितना बढ़ चला है पर उसकी मर्म संवेदनाएँ हृदयंगम कर सकने वाले लोग कितने है?

धर्म का आडम्बर अब इतना अधिक बढ़ता चला जा रहा है कि कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि हम धर्मयुग में रह रहे हैं। कथा, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, पारायण, लीला, सम्मेलन आदि के माध्यम से जगह-जगह विशालकाय आयोजन होते हैं और उनमें एकत्रित विशाल भीड़ को देखने से प्रतीत होता है कि धर्म रुचि आकाश छूने जा रही है, पर जब गहराई में उतर कर देखते हैं तो लगता है कि यह धर्म दिखावा बहुत से लोग अपनी आंतरिक अधार्मिकता को झुठला कर आत्म प्रवंचना करने के लिए अथवा लोगों की दृष्टि में धार्मिक बनने के लिए रच कर खड़ा करते हैं। यह आवरण इसलिए खड़े किये जाते हैं ताकि उनकी यथार्थता पर पर्दा पड़ा रहे और लोग उन्हें उस ऊँचे स्तर का समझते रहे जिस पर कि वे वस्तुतः नहीं हैं।

कुछ लोग वस्तुतः इन आयोजनों को सद्भावना के साथ सदृश्य के लिए भी करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि धर्म आवरण का आरंभिक प्रयाग भक्ति-भावना लाभ तो मिलेगा जब आस्थाओं और क्रिया-कलापों में उच्च स्तरीय परिवर्तन संभव हो। इस कार्य के लिए उपयुक्त पथ प्रदर्शक वे हो सकते हैं जिनने अपने को मन, वचन, कर्म से सच्चा भक्त बनने में सफलता प्राप्त की हो और इस श्रेय पथ में प्रगति का प्रकाश वे ही पा सकते हैं जिन्होंने आवरण से आगे बढ़कर अपने आपको सुधारने सँभालने के लिए उत्कट प्रयास किया हो।

भावनाओं की शक्ति की भक्ति मार्ग में यदि नियोजन किया जा सके तो मनुष्य इतनी प्रगति कर सकता है जिससे उसकी अपूर्णता, चरम पूर्णता में परिणत हो सके।


Quotation

विवेकहीन उत्साह तूफान से घिरे जहाज की तरह है जिसके डूबने की आशंका हर क्षण बसी रहेगी।


उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण

उच्च स्तरीय साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।

सर्वोच्च साधन स्तर अद्वैत स्थिति का है। इसमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वर प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी जब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का प्रथमता का अंत न होगा। लययोग ही समाधि की-मुक्ति की-परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।

उच्च स्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँस पेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किस आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं जैसा शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए बाधक होते हैं।

यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नीले आकाश है। सर्वत्र परम शांति दायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय ता शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की - उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।

शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए।

भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय। जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

इस संयोग की वेला में आनन्दानुभूति उठानी चाहिए। माता पुत्र का -प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है उससे भी अधिक तृप्तिदायक यह आत्म परमात्म मिलन है। इस मिलन की प्रतिक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया ओर उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर की इच्छानुसार गतिशील रहे। अपनी कोई इच्छा में अपनी इच्छा मिलनी जाय। परमेश्वर जिसमें प्रसन्न हो वो सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए-किया गया भजन तो वेश्यावृत्ति है।

कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्या वंदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।”

इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर किया जा सके उतना संभव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण-हंस की आत्म सत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काल कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए आत्म-कल्याण के लक्ष्य को तिलाञ्जलि नहीं दी जानी चाहिए।

मृत्यु को, आयुष्य की क्षण भंगुरता को, विषयों की मृग मरीचिका को , कुछ भी साथ न जाने वाले वैभव की निरर्थकता को यदि मनुष्य गंभीरतापूर्वक समझे तो उसकी आँखें खुले कि क्या करना चाहिए था और क्या किया जा रहा है? किधर चलना चाहिए था और किधर चला जा रहा हैं। जीवन और मृत्यु दोनों एक दूसरे के साथ इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि किसी के कभी भी नीचे ऊपर होने में तनिक भी आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। यह वस्तुस्थिति समझ में आये तो हर व्यक्ति अपने बहुमूल्य क्षणों का ठीक प्रकार उपयोग करना सीखे, और उन निरर्थक बाल-क्रीड़ाओं में न उलझे जिनमें आमतौर से लोग अपने को घुलाये भुलाये रहते हैं। मृत्यु की विस्मृति ही वह कारण है जिसने नर जनम के श्रेष्ठतम सदुपयोग के प्रति उदासीनता उत्पन्न कर रखी है।

मनन का दूसरा अर्थ है- आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का संबंध , श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव-अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय इसी केंद्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचंड ह बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव-बंधनों छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।

भजन अर्थात् ईश्वरीय सत्ता के साथ आत्म सत्ता का समीकरण-परस्पर विलय समन्वय की अनुभूति। मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण जीवन-लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या पृथक-पृथक सुविधा के समय और शांत एकांत स्थान में, सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान, चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।

भाव साधना का तीसरा चरण है- चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जनम-हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की -समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जनम है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय संपदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ देने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।

प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक की समयचर्या निर्धारित करनी चाहिए। नित्य कर्म, विश्राम, उपार्जन से लेकर परमार्थ प्रयोजनों तक के लिए उचित रीति से समय विभाजन किया जाय। उपार्जन के और परिवार पोषण के उत्तरदायित्व अभी जिनके कंधों पर पर हैं उन्हें भी आठ घंटा कमाने के लिए, छः घंटा सोने के लिए, चार घंटा नित्य नैमित्तिक कर्मों के लिए लगाकर साँसारिक प्रयोजनों के लिए अधिकतम 20 घंटे ही खर्च करने चाहिए। शेष 4 घंटे जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने चाहिए।

हर क्रिया के साथ एक विचारणा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। क्या कार्य, किस लाभ प्रयोजन के लिए किया जा रहा है, उसमें रुचि या उत्साह किसलिए है, इसका कुछ न कुछ कारण आकर्षण होना ही चाहिए। मनोगत आकांक्षा और शरीरगत क्रिया दोनों के सम्मिश्रण से समग्र कर्म बनता है, उसी के आधार पर संस्कार बनते हैं पाप पुण्य का निर्धारण होता है और कर्मफल की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। भाव रहित क्रिया तो मात्र उछल कूद भर होती है। हमें अपने पर क्रिया-कलाप के साथ उच्च आदर्शों से भरी-पूरी भावना नियोजित रखनी चाहिए, पत्नी को अपने संरक्षण में रखी गई ईश्वर की पुत्री समझा जाना चाहिए और वह पिता के घर से जिस स्थिति में आई थी उसकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सुयोग्य, सुविकसित, प्रसन्न, प्रफुल्लित बनाने का प्रयास निरंतर करते रहने की बात सोचनी चाहिए। यदि उसके प्रति कर्तव्य, स्नेह, सौजन्य बरसाया जाता रहा तो वह पत्नी भौतिक सुविधा और आत्मिक प्रगति की दोनों ही दृष्टि से बड़ी सुखद, श्रेयस्कर सिद्ध होगी।

बादलों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरभित पुष्प माना जाय और उन्हें माली तरह सींचा, सँभाला जाय। अपनी संपदा, बुढ़ापे की लकड़ी वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र यदि उन्हें माना समझा जायेगा तो वे ही बालक बंधन रूप सिद्ध होंगे और लोक-परलोक में विविध विधि दुर्गति का करण बनेंगे। दृष्टिकोण का अंतर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण, परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेगा जब कि परिष्कृत चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा-गृहस्थयोग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहिन आदि का भरा-पूरा कुटुंब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन, सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गई रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का-अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिए उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगने वाला अधिकांश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।

शरीर को भगवान का मंदिर-भगवान के प्रयोजनों में काम आने वाला वाहन माना जाय और उसे स्वस्थ सुव्यवस्थित बनाने वाले क्रिया-कलाप अपनाये जाये तो शरीर यात्रा के लिए किया गया पुरुषार्थ प्रकाराँतर से ईश्वर की सेवा, पूजा स्तर का ही रहेगा। उपार्जन में यदि ईमानदारी, उचित लाभ, जनता की आवश्यकता पूर्ति, परिवार व्यवस्था के लिए श्रम एवं साधना के रूप में किया जाय तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, वृद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया-कृत्य ही माना जाएगा शरीर को यदि वासना, प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलता पूर्वक सजाया पोषा और बलिष्ठ कारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जाएगा भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है तो वह परमार्थ है किंतु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है तो वही सामान्य दीखने वाली प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।

तात्पर्य यह है कि दिन भर की समस्त कार्य-पद्धति के साथ उच्चकोटि की भावनायें नियोजित रखी जायें। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट कर ली जाय जिसमें दिन भर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रखी जाने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहें। यह कागज मेज़ पर या जेब में रखा रहे। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घंटे करते रहा जाय। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिली कितनी असफलता। सफलता के लिए प्रसन्न हुआ जाय और जो भूलें हुई हो उन्हें दूसरे जनम में -दूसरे दिन सुधारने के लिए अधिक सतर्कता जागृत की जाय।

रात्रि को सोने के लिए जब बिस्तर पर जाया जाय तब संन्यास जैसी भावनाओं को हृदयंगम किया जाय। जो कुछ कर्तव्य थे वे ईश्वर के सौंपे हुए थे, ईमानदारी से पूरे किये गये। जो शेष हैं उन्हें ईश्वर पूरा करेगा। कुटुंब परिवार, धन, वैभव आदि सब भगवान का था उसकी धरोहर उसे सौंप कर निश्चिंतता पूर्वक निर्लिप्त मन से अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा मृत्यु की गोद में शयन किया जा रहा है। अंतिम मृत्यु के लिए यह श्रेष्ठतम साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शांति और सद्गति ही मिलेगी।

चिंतन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कर देता है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को संग लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो सदा लड़ने और अड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों की लंबी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठें कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गंभीरता पूर्वक ऊहापोह आरंभ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरंभ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।

उच्चस्तरीय भावनात्मक साधना के लिए भजन, मनन और चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।


अपनी आत्मा सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं।

सुकरात कहते थे कि- सबसे बड़ा ज्ञान है-अपने को पहचानना।” हम बहुत कुछ जानते हैं पर अपने बारे में अनजान ही बने हुए हैं। अपने स्वरूप और लक्ष्य को भूलकर सचमुच हम अज्ञानग्रस्त रहते हैं और भवबंधनों में बँधते हैं। हमें किस तरह सोचना, रहना और करना चाहिए यदि इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम कर लें- तद्नुरूप आचरण करें तो समझना चाहिए कि आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया और जीवन को सार्थक बनाने वाला मार्ग अपना लिया।

यूनान के स्तोइक दर्शन के अनुसार भी ब्रह्म एवं जगत दो भिन्न सत्ता नहीं है। यह संसार ब्रह्म का सजीव शरीर है। सृष्टि में संव्याप्त शक्ति एवं चेतना का बीज यह सर्वव्यापक ब्रह्म सत्ता ही है। स्तोइक दार्शनिक एपिकतेतु ने प्राणि मात्र में ईश्वर का प्रकृति अंश विद्यमान् प्रतिपादित किया है और विश्व बंधुत्व पर जोर देते हुए मानव मात्र को एक पिता की संतान भाई-भाई के रूप में माना है।

अद्वैतवाद के व्याख्याता आद्य शंकराचार्य ने वेदांत की संक्षिप्त व्याख्या इन शब्दों में की है- मनुष्य को सर्वप्रथम अपने में ब्रह्म चेतना की अनुभूति करनी चाहिए, तदुपरान्त जड़ चेतन जगत में अपनी ही आत्मा का विस्तार अनुभव करना चाहिए। एक ह आत्मा को सबमें संव्याप्त की दृढ़ अनुभूति होने पर अपने पराये का भेद कहाँ संभव है?

भौतिक जगत में आर्थिक, जातीय, सामाजिक राजनैतिक एवं बौद्धिक आधार पर ही समता एकता स्थापित करने के प्रयत्न चलते रहते हैं।

गीता कहती है-

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो विजुगुप्सते॥

यस्मिन सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।

तत्रः को मोहः शोकः एकत्वमनुपश्यतः॥

जो सब जीवों में अपनी ही आत्मा देखता है तथा किसी भी जीव के प्रति जुगुप्सा, निंदा, द्वेष आदि का भाव ही नहीं रह पाता।

‘समस्त जीवों में एक ही आत्मा समाया हुआ है, ऐसा जानकर जिस ज्ञानी पुरुष के लिए समस्त संसार अपना ह स्वरूप आत्मस्वरूप-हो जाता है, उस एक आत्मतत्त्व का अनुभव करने ले को किसका भय, किसका मोह, किसके लिए शोक होगा?

विद्या विनय सम्पने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव शवपाके च पंडिताः समदर्शिनः॥

‘अर्जुन! जो व्यक्ति ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ते, चाँडाल आदि सभी जीवों में एक ही आत्मतत्त्व का दर्शन करता है, वही पंडित है।’

अद्वैतवाद को दूसरे शब्दों में एकात्मवाद-एक जीववाद’ कहा जा सकता है, भेद-भाव मिटाकर एकता उत्पन्न करने की प्रेरणा वेदांत सिद्धांत की है। मनुष्य-मनुष्य के बीच जो ऊँच-नीच नर-नारी धनी-विभेद फैले हुए हैं उन्हें हटाने और सर्वजनीन एकता समता स्थापित करने के लिए वेदांत प्रतिपादित एकान्तवाद का-अद्वैतवाद का ही विस्तार करना पड़ेगा। उसमें ईश्वर और जीव के बीच का ही भेद-भाव नहीं मिटाया गया है वरन् प्राणियों के बीच जो विभेद की दीवारें हैं उन्हें भी गिराया गया है।

‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की वेदांत आस्था मनुष्य में दया, करुणा, स्नेह, सद्भाव, सौजन्य का उदर कर सकती है। नागरिकता, सामाजिकता का विकास ममता और आत्मीयता के साथ जुड़ा हुआ है। इस भावना का जितना अधिक विकास होगा उतनी ही व्यक्ति की महानता बढ़ेगी और समाज की शांति, समृद्धि एवं सुस्थिरता में अभिवृद्धि होगी। अपने पास आत्मीयता का पारस हो तो हर लोहे जैसी कलूटी और अल्प मूल्य वस्तु को -व्यक्ति को -सोने जैसा सुंदर और बहुमूल्य स्तर का बनाया जा सकता है।

एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ स्नेह, सौजन्य का व्यवहार वहीं तक कर सकता है जहाँ तक कि उसकी ममता का प्रकाश फैल रहा हो। “आत्मोपम्येन न सर्वत्र सम पश्यति योऽर्जुन” की मनःस्थिति वाला व्यक्ति ही दूसरों के सुख में अपने सुख की अनुभूति कर सकता है। ऐसी मनोभूमि में ही कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में लोकसेवी, परमार्थ परायण, उदार, सज्जन बन सकता है। संयम और त्याग की आकांक्षा ऐसी ही मनःस्थिति में बन पड़ेगी।

उपनिषद् ने कहा- द्वितीया द्वै भयं भवति’ अर्थात् दूसरे से ही भय होता है। संसार में -परमेश्वर से यदि अपनी आत्मीयता समाविष्ट कर ली जाय तो जैसे ही परायापन मिटेगा वैसे ही ‘अभय’ का आनंद मिलता बढ़ता चला जायेगा।

जीवन का सबसे बड़ा रस प्रेम है। विभिन्न व्यक्ति या पदार्थ तभी प्रिय लगते हैं जब उनसे प्रेम होता है। उदासीनता या उपेक्षा जहाँ भी होगी वहाँ सूनेपन का -निरर्थकता का-अनुभव होगा, जिस वस्तु से भी आत्मीयता हट जायेगी वही नीरस, निष्प्राण लगने लगेगी। प्रिय न कोई पदार्थ है न व्यक्ति, अपना आपा ही सबको प्रिय है। वह जहाँ कहीं-जिस किसी पर भी प्रतिबिम्बित होता है। वही सुंदर, सुखद और प्रिय लगने लगता है। यदि सर्वत्र प्रिय पात्रों से भरी दूरियाँ दीखती हो तो उसका एक ही उपाय है कि आत्मीयता के- प्रेम भावना को अधिकाधिक व्यापक, विस्तृत किया जाय। यह आत्म विस्तार न केवल वैयक्तिक आनन्दानुभूति अभिवर्धन की दृष्टि से भी आवश्यक है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अंतर्राष्ट्रीय शांति, समृद्धि सिद्धांत व्यक्तिगत प्रेम भावनाओं के विस्तार पर ही निर्भर है।

मनुष्य के विकास की सर्वोच्च अवस्था वह , जहाँ “उसके सभी संदेह तथा वासनायें ‘सदैव के लिए नष्ट हो जाती है, हृदय की समस्त स्वार्थपूर्ण ग्रंथियाँ खुल जाती हैं तथा कारण-कार्य का-अनंत क्रम उसके लिये समाप्त हो जाता है।”

मुंडकोपनिषद् 21218 में ऋषि ने इसी स्थिति का दिग्दर्शन इस प्रकार कराया है-

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।

क्षीयन्ते यास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥

इस ब्रह्म चेतना से परिपूर्ण जीवन मुक्ति स्थिति को प्राप्त करने में अस्तित्व के अंत का भय करना निरर्थक है, वस्तुतः वह तो पूर्ण अभय की स्थिति है। डर तो दूसरे से होता है जहाँ केवल अपना ह आपा बिखरा पड़ा हो वहाँ। भयभीत होने या आशंका करने की कोई गुँजाइश नहीं है।


महात्मा गाँधी तब वर्धा में थे (Kahani)

महात्मा गाँधी तब वर्धा में थे। आश्रम का नियम था कि हर किसी को अपने जूठे बर्तन स्वयं माँजने थे। मात्र मेहमानों को ही थाली छोड़ने की छूट थी पर प्रायः होता यह था कि सभी आगन्तुक भी अपने-अपने बर्तन साफ कर देते थे।

एक बार हिंदी साहित्य परिषद के कई सदस्य आये हुए थे। भोजन के उपरांत और सब लोगों ने तो अपनी थालियाँ साफ कर दी पर एक सज्जन ने जूठी थाली वहीं छोड़ दी। उसे कौन धोये? अभी सब ताक ही रहे थे कि महादेव भाई ने लपक कर थाली उठाई और हाथों हाथ धो डाली। गाँधी जी को किसी ने यह बात बताई तो वे बोले मेरे पास रहने का इतना प्रभाव तो पड़ना ही चाहिए।


मनुष्य की तेजस्विता का अंतर्निहित स्रोत भंडार

मानवीय चुम्बकत्व को तेजोवलय के रूप में अनुभव किया जा सकता है। यों समस्त शरीर में उसकी मात्रा रहती है और वह आवाज की तरह दूर क्षेत्र में जाते जाते हलका पड़ता जाता है। शरीर से निकलते ही यह विद्युत धारा तीव्र होती है इसलिये स्पर्श का अधिक प्रभाव पड़ता है। जिनके शरीर में अधिक प्रखर तेजोवलय होता है उनकी समीपता उतनी ही अधिक प्रभावशाली होती है। यह ‘वलय’ भला भी हो सकता है और बुरा भी। अपने-अपने ढंग का आकर्षण एवं प्रभाव दोनों में रहता है, इसी के कारण आमतौर से समीपवर्ती व्यक्ति अथवा पदार्थ प्रभावित होते रहते हैं।

यह तेजोवलय चेहरे पर सबसे अधिक मात्रा में रहता है। देवताओं के चित्रों में उनके के आस पास सूर्य जैसा चमकदार एक घेरा चित्रित किया जाता है यह इसी अदृश्य तेजोवलय का चित्रण है। आँखों से इसकी लपटें उठती रहती हैं, जीभ भी जब शब्दोच्चारण करती है-विशेषतया किसी भावावेश में तब भी इस तेजस् के स्फुल्लिंग उड़ते देखे जा सकते हैं। ज्ञानेन्द्रियों का जमघट तथा मस्तिष्क का वित्त भंडार एक ही जगह है इसलिये चेहरा सबसे अधिक आकर्षक एवं प्रभावशाली रहता है। मोटे तौर पर चेहरे को देखकर दूसरे लोग बहुत कुछ जानने समझने में सफल होते हैं। आकृति देखकर मनुष्य की पहचान करने वाले सूक्ष्मदर्शी नाक, कान आदि की बनावट को नहीं वरन् चेहरे के इर्द-गिर्द उमड़ते घुमड़ते तेजोवलय को ही परखते हैं और उसी के आधार पर व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व का प्रभाव परिचय प्राप्त करते हैं।

चेहरे की तरह तेजोवलय का एक केंद्र जननेन्द्रिय क्षेत्र में छाया रहता है। पर चूँकि उसमें प्रजनन संबंधी आकर्षण अधिक रहता है इसलिये उस वलय का प्रभाव यौन आकर्षण उत्पन्न करने वाला होता है भिन्न लिंग की समीपता में वह तेजस् उत्तेजित नहीं होता। इन अड़चनों को देखते हुए ही कटि क्षेत्र से वहाँ भी चेहरे की अपेक्षा मात्र कम नहीं होती। पर उपरोक्त बाधाओं ने उसे सीमित प्रयोजन के लिये ही उपयोगी रहने दिया है,, दाम्पत्य स्तर पर भी उसका लाभ मिलता है, इस असुविधा के कारण ही उसे ढका हुआ, केवल प्रणय प्रयोजन के लिये सीमित अवरुद्ध किया गया है।’ यदि यह दोष न होता तो यह तेजोवलय चेहरे पर छाये रहने वाले तेजोवलय से न्यून नहीं अधिक ही प्रभावशाली सिद्ध होता। चेहरे का तेजोवलय इस प्रकार के बंधन प्रतिबंध से मुक्त है। वह जैसा भी भला-बुरा होगा अपने निकटवर्ती क्षेत्र को- संपर्क आने वाले व्यक्तियों तथा स्पर्श व्यवहार में आने वाले पदार्थों को प्रभावित करता है। जिस प्रकार जीवाणु एक से दूसरे शरीर में प्रवेश करते रहते हैं उसी प्रकार यह तेजोवलय विद्युत मंडल समीपवर्ती क्षेत्र में अपनी मानसिक एवं आत्मिक स्थिति का प्रकाश प्रभाव फैलाता रहता है।

चुम्बक का स्पर्श करने से साधारण लोहे से भी चुंबक की विशेषता उत्पन्न हो जाती है। प्रचंड प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों में भी ऐसी ही मानवी विद्युत भरी पड़ी रहती है। उनके परामर्श न सहयोग का भी समीपवर्ती लोगों को लाभ मिलता है पर सबसे बड़ा लाभ उस तेजोवलय का होता है जो अपनी शक्तिशाली क्षमता को निरंतर निसृत करता रहता है और जो भी उस संपर्क सान्निध्य की लपेट में आता है उसे देखते-देखते बदलने में प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के दर्शन, चरणस्पर्श, आशीर्वचन, दृष्टिपात में जो सत्परिणाम विद्यमान् रहते हैं उसमें उनका प्रकाशपुँज तेजोवलय ही काम करता रहता है। दूसरे शब्दों में इस सूक्ष्म सत्ता को ही अदृश्य व्यक्तित्व कह सकते हैं। दृश्य व्यक्तित्व शरीर के रंग, रूप सुडौलता, अंगों की बनावट आदि पर निर्भर रहता है, पर अदृश्य व्यक्तित्व पर इस दृश्य स्थिति का कोई प्रभाव नहीं होता है। कोई काला कुरूप दुर्बल, वृद्ध व्यक्ति भी अत्यंत तेजस्वी और प्रतिभा का धनी हो सकता है। जबकि वह बाहर से उपहासास्पद ही लगेगा। इसके विपरीत सुंदर और आकर्षक नवयौवन सम्पन्न काया का व्यक्ति हेय और हीन स्तर का हो सकता है। आँखों को आरंभिक दर्पण में काय कलेवर के अनुरूप किसी की वस्तुस्थिति समझने में भ्रम हो सकता है पर जैसे ही उसकी यथार्थता अनुभव की जाएगी वह भ्रम दूर हो जाएगा वास्तविक व्यक्तित्व के आधार पर उसका मूल्यांकन किया जाने लगेगा।

साधारणतया रंग रूप का आकर्षण हर किसी को मुग्ध मोहित करता है पर यदि तेजोवलय तद्नुरूप न हुआ तो कुछ ही समय में वह मूल्यांकन बदल जाता है। रूपवान् काया में विषधर सर्प जैसी विद्रूपता प्रकट हो जाती है और कुरूपों को अष्टावक्र, सुकरात , गाँधी की तरह सिर आँखों पर बिठाया जाने लगता है। शरीर की कुरूपता सज्जा-साधना से एक हद तक छिपाई भी जा सकती है पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता। जिनका अंतःकरण थोड़ा जागृत हो चला है और किसी की भीतरी स्थिति समझने देखने योग्य जिनकी सूक्ष्म दृष्टि जागृत हो गई है वे रंग, रूप की उपेक्षा करके तेजोवलय में संव्याप्त सुंदरता एवं कुरूपता को देख सकते हैं और उसी के अनुरूप किसी के प्रति श्रद्धालु अश्रद्धालु होने की आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी-गर्मी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किये रहना ही है। भीतर की शक्ति बाहर निकल कर बिखरने न पाये इसके लिये वस्त्रों का आवरण चढ़ाया जाता है। नग्न शरीर रहने वाले साधु संन्यासी भी शरीर पर भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इसका कारण सामाजिक मान्यता भी है पर आत्मिक कारण यह है कि कोई शरीर नग्न होने की दशा में अपनी शक्ति तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बखेरता रहेगा, साथ ही दूसरों के भले-बुरे प्रबल प्रभावों से अपने को बचा भी न सकेगा। नग्न शरीर पर धूप का प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार दूसरों का चुंबकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है। रेशम एवं ऊन शारीरिक विद्युत पर आवरण डाले रहने की क्षमता अधिक होती है इसलिए प्रायः पुरश्चरण परक प्रबल साधना प्रयोजनों में सूती वस्त्रों की अपेक्षा ऊनी या रेशमी कपड़ों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। यहाँ एक बात और नोट कर ली जानी चाहिए कि वध करने के उपरांत भेड़ों की उतारी हुई ऊन अथवा कीड़ों को उबाल कर उन्हें मार डालने के उपरांत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक प्रयोजनों काम आने लायक नहीं रह जाता। वध के समय निकला हुआ चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता है। शरीरगत विद्युत के आवागमन में प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमता तो ऐसे ऊन या रेशम में हो सकती है पर उनसे उच्च आध्यात्मिक प्रयोजन में तो उलटी बाधा ही पड़ेगी। उससे तो धुला हुआ सूती वस्त्र ही अच्छा है।

वस्त्रों तथा अन्य उपयोग में आने वाली वस्तुओं के बारे में भी यहीं बात है। भली या बुरी प्रकृति के मनुष्य उन वस्तुओं पर अपना प्रभाव अधिक छोड़ते हैं जिन्हें वे अधिक रुचिपूर्वक प्रयोग करते हैं। सच्चे साधु संतों की माला, जनेऊ, खड़ाऊँ, लँगोटी आदि को कोई व्यक्ति उपहार आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त कर लेते हैं और उनके प्रभाव से देर तक लाभान्वित होते रहते हैं कलम, घड़ी, अँगूठी, बटन जैसी वस्तुओं का भी ऐसा ही महत्त्व है। भगवान बुद्ध का एक दाँत लंका में सुरक्षित है। हजरत मुहम्मद साहब का एक बाल काश्मीर की किसी मस्जिद में रखा है। शरीर के साथ जुड़े हुए अवयव, बाल या नाखून अपना महत्त्व रखते हैं। उनके माध्यम से तान्त्रिक लोग भले-बुरे प्रयोग करते हैं।

व्यक्तित्व पर तेजोवलय की भारी छाप रहती है। प्रायः यह जनम-जन्मान्तरों के अभ्यास, प्रयास एवं संस्कार के आधार पर विनिर्मित होता है पर मनुष्य अपनी स्वतंत्र चेतना का उपयोग करके उसे बदल भी सकता है। सामान्य स्तर के लोग इस बने बनाये तेजोवलय के अनुसार अपना स्वभाव और कर्म बनाये रहते हैं। पर मनस्वी लोग अपनी सुदृढ़ संकल्प शक्ति से अपनी अभ्यस्त आंतरिक एवं बाह्य स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन भी कर सकते हैं। तब विनिर्मित तेजोवलय में भी वैसा ही परिवर्तन हो जाता है। उसके रंगों में कम्पनों की चाल में इस परिवर्तन का हेर-फेर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। सुकरात कहते हैं प्रकृतिः मैं कुख्यात हत्यारा ही हो सकता था पर मैंने प्रयत्न पूर्वक अपने को बदलने में सफलता प्राप्त की।

देखा गया है कि कई व्यक्तियों में रास्ता चलते मित्रता हो जाती है। अपरिचित होते हुए भी वे ऐसा अनुभव करते हैं। मानो चिर-परिचित हों- और पास आये, बात किये बिना रह ही नहीं सकते। इस अनायास आकर्षण के पीछे पूर्व जन्मों का संबंध परिचय भी हो सकता है पर प्रत्यक्ष कारण दोनों के तेजोवलय की समानता है जो एक दूसरे को समीप खींचती रहती हैं। बात की बात में वे परस्पर परिचित, घनिष्ठ और विश्वस्त बन जाते हैं। तर्क के आधार पर यह आकर्षण भावुकता मात्र प्रतीत होता है और ऐसी जल्दबाजी में खतरे की आशंका की जा सकती है। पर तथ्य इतने प्रबल होते हैं कि इन सम्भावनाओं को निरस्त करते हुये घनिष्ठता उत्पन्न कर ही देते हैं, उसी प्रकार यह भी देखा जाता है कि स्वजन संबंधी से भी अकारण अरुचि रहती है और उसकी समीपता में कष्टकर अनुभूति ही होती रहती है। ढूँढ़ने पर वैसा कुछ कारण प्रतीत नहीं होता तो भी ऐसी विषमता बनी ही रहती है। इसमें तेजोवलय के कम्पनों की गति में ऐसी असाधारण विपन्नता ही प्रधान अवरोध होती है। इसी को कवियों ने “प्रकृति मिले मन मिलता है, अनमिल से न मिलाय’ की उक्ति के साथ चित्रित किया है। यह -प्रकृति’ मात्र आहार-बिहार वेष-भूषा आदि की समानता पर निर्भर नहीं रहती वरन् कारण गहरा होता है, इसे तेजोवलय के स्तर की समानता में ही खोजा जा सकता है। अनुशासन के पालन एवं उल्लंघन में प्रायः इसी समानता असमानता के कारण उत्तेजन, उत्साह मिलता है।

योग साधना के आत्मविश्वास का अभिवर्धन और तप तितीक्षा द्वारा तेजोवलय के प्रखरीकरण का प्रयोजन पूरा किया जाता है। यह दोनों ही उपलब्धियों ऐसी है जिनके आधार पर भौतिक और आत्मिक जीवन का आशातीत और आश्चर्यजनक विकास संभव हो सकता है।


जीवन स्वेच्छा से वरण करते है (Kahani)

जो आदर्श के मार्ग पर चलने का कष्टकर जीवन स्वेच्छा से वरण करते हैं, वे न केवल स्वयं ऊँचे उठते हैं। वरन् मनुष्यता का स्तर ऊँचा उठाते हैं।

अब धर्म भी एक शौकीनों की चीज बनता चला जाता है। घर में तरह के सुसज्जा साध और जी बहलाने वाले उपकरण रहते हैं, उसी तरह धर्म को भी घर के एक कोने में स्थान देने की आवश्यकता समझी जाती है। शौकीनी सुसज्जा में विभिन्न स्तर की वस्तुयें इकट्ठी करना पड़ती हैं, सभ्यता ने धर्म को भी एक ऐसा ही उपकरण समझना आरंभ किया है और कितने ही लोग अपने कई तरह के शोकों में एक शौक धर्म चर्चा का भी सम्मिलित कर लेते हैं।

यह स्थिति धर्म जैसे जीवन तत्व का उपहास करना है। स्नान घर सजाकर रखने मात्र से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी नहीं होती। रसोई घर में आवश्यक वस्तुयें जमा कर देने भर से क्या भूख बुझ सकती है। पलंग भर बिछा रहे तो क्या बिना सोये नींद पूरी हो जायेगी?

दूसरों की दृष्टी में धर्मात्मा बनकर अपनी आंतरिक अधार्मिकता को छिपाने के लिए आवरण ओढ़ना किस काम का? यदि धर्म के प्रति सचमुच आस्था हो तो उसे न केवल दृष्टिकोण में वरन् क्रिया कलाप में भी समाविष्ट करना चाहिए। अन्यथा यह कम बुरा है कि हम अपना अधार्मिकता को उसी रूप में खुला रहने दें और धार्मिक बनने का दंभ न करें। इससे अधर्म के साथ दंभ को जोड़ने की दुहरी तो न बढ़ेगी


मूर्ति पूजा का औचित्य

विदेशों में भारतीय संस्कृति की दिग्विजयी यात्रा से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद की कीर्ति भारत के कोने-कोने में फैल गई। उनको वक्तृत्व शैली और अध्यात्म के तर्क संगत प्रतिपादन से प्रभावित होकर काशी के तत्कालीन नरेश ने स्वागत के लिए आमंत्रित किया।

स्वामी जी अद्वैत-वेदांत के प्रकाण्ड पंडित थे। उनकी विचारधारा के संबंध में बात-चीत चली। नरेश मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे और स्वामी जी प्रबल समर्थक थे। अध्यात्म साधना की प्रथम कक्षा वे मूर्तिपूजा को ही मानते थे परंतु निर्गुणोंपासक और विभिन्न मतवादियों से भी उन्हें कोई विरोध नहीं था। अपने सिद्धांतों का वे प्रतिपादन अवश्य करते थे परन्तु दुराग्रह नहीं।

मूर्तिपूजा की चर्चा छेड़ते हुए काशी नरेश ने कहा- “अद्वैत वेदांत की विचारधारा से मूर्तिपूजा का मेल तो नहीं बैठता है फिर आप इसका समर्थन क्यों करते हैं।"

स्वामी जी ने कहा- परमात्मा शक्ति स्वरूप और शक्ति को कोई आकार नहीं दिया जा सकता है यह बात ठीक है परन्तु मैं खुदी मूर्तिपूजा को आत्म साधना का प्रथम सोपान समझता हूँ

‘आपके विचारों में ही विरोधाभास आपके अनुयायियों में कई भ्रान्तियाँ पैदा कर सकता है इसलिए किसी भी बात को केवल भावना के कारण ही स्वीकार नहीं करना चाहिए- काशी नरेश ने उपदेश दिया।

स्वामी जी बोले- मैंने मूर्ति पूजा में भावना नहीं तथ्य पाया है।’

‘भला इसमें क्या तथ्य। निर्गुण निराकार परमात्मा का कोई आकार कैसे निश्चित किया जा सकता है।’

‘ईश्वर का कोई आकार नहीं परन्तु साधना उपासना की सुगम पद्धति यही है कि मन को स्थिर करने के लिये ईश्वर की धारणा किसी मूर्ति रूप में की जाये।’

‘यह तो मिथ्या संतोष हुआ'- नरेश ने आशंका की-इसके माध्यम से आत्मोन्नति कैसे संभव होगी।

‘वस्तुतः मिथ्या संतोष नहीं है। ईश्वर सर्वव्यापी है तो मूर्ति में क्यों नहीं होगा-स्वामी जी ने समाधान दिया।

स्वामी जी उनके दुराग्रही प्रतिपादन को तोड़ गये थे। महल के भीतर की दीवारों पर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित वीर पुरुषों के चित्र टाँगे थे। शायद वे उक्त नरेश के पूर्वजों के रहे होंगे।

स्वामी जी ने एक चित्र की इंगित करते हुए कहा- ‘यह चित्र किन का है। जरा इसे उतरवाकर मँगाइये।’

राजा के अनुचरों ने तत्काल वह चित्र उतारा ओर स्वामीजी को दिया। काशी नरेश ने बताया- ‘यह चित्र मेरे परदादा महाराज का है।’

क्या आपने अपने जीवन में इन्हें देखा है- स्वामीजी ने प्रश्न किया।

‘जी नहीं- नरेश ने उत्तर दिया।

‘तो फिर क्या आप इस चित्र पर थूक सकते हैं’- स्वामीजी ने कहा-आपको थूकना चाहिए। थूकिए।’

‘नहीं थूक सकता- नरेश ने कहा- ये हमारे पूजनीय हैं।

स्वामीजी ने कहा- आपने तो इन्हें देखा नहीं है। फिर इन्हें श्रद्धापात्र कैसे मानते हैं और फिर यह तो मात्र चित्र है इन पर थूकने में धृष्टता कैसी होगी।

बात काशी नरेश की भी समझ में आ रही थी परंतु फिर भी वे थूकना नहीं चाहते थे। स्वामी जी बोले-आप इस चित्र के प्रति पूज्यभाव रखते हैं। यद्यपि इस चित्र पर थूकने से आपके परदादा का कुछ नहीं बिगड़ेगा और यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह चित्र पूरी तरह आपके परदादा के शरीर की प्रतिकृति भी नहीं हैं इसी प्रकार प्रतिमा के प्रति अपना विश्वास और श्रद्धा भाव रखना आवश्यक है। ईश्वर शक्ति है, चेतना है पर सामान्य जन का मन ऐसे अमूर्त के प्रति एकाग्र हो पाना दुस्तर है, इसीलिए मैं मूर्तिपूजा में विश्वास रखता हूँ।


मनुष्य में अलौकिक क्षमतायें भरी पड़ी हैं।

अतींद्रिय विज्ञानी प्रो. काइरो (शीरो) के संबंध में संसार भर के आत्मवादी परिचित हैं। उन्होंने न केवल इस संबंध में बहुत कुछ लिखा ही है वरन् यह सिद्ध भी किया है कि मनुष्य में असामान्य दिव्य शक्तियाँ भी अंतर्निहित हैं। प्रो. काइरो का जनम सन् 1866 में आयरलैण्ड में हुआ। उसे कीरो, चीरो, कैको, शीरों आदि नामों से भी पुकारते हैं। भारत भ्रमण में उसने कई आत्मविद्या विशारदों कर सेवा की भविष्य ज्ञान की अद्भुत सिद्धि प्राप्त की एक दिन इंग्लैण्ड की ईष्ट एंड स्ट्रीट सड़क के सहारे एक दीवार पर अंकित हाथ चित्र को देखकर काइरो ने पुलिस को सूचना दी कि यह किसी ऐसे हत्यारे का चित्र है जिसने अपने पिता की हत्या की है। पुलिस को पहले तो विश्वास न हुआ पर खोजबीन की गई तो वह हत्यारा पकड़ लिया और भविष्य कथन अक्षरशः सही सिद्ध हुआ। इसकी ख्याति योरोप भर में फैली और लोग उसकी भविष्य वाणियों से लाभ उठाने लगे।

सन् 1863 में वह अमेरिका पहुँचा और फिफ्थ एवेन्यू न्यूयार्क में ठहरा वहाँ भी उसकी बहुत ख्याति थी। अमेरिका के दैनिक पत्र 'न्यूयार्क वर्ल्ड’ ने संवाद संपादक महिला को यथार्थता का पता लगाने भेजा। महिला ने काइरो के सामने चित्रों का एक अलबम रखा और उन व्यक्तियों का विवरण बताने के लिए कहा। काइरो उनका विस्तृत परिचय इस प्रकार बताते चले गये। मानो वे सभी उनके पूर्व परिचित हों। अंत में एक चित्र को देखकर उन्होंने कहा-यह आपका प्रेमी जल्दी ही हत्याओं के अभियोग में पकड़ा जाएगा और जेल में पागल होकर मरेगा। अच्छा हो आप समय से पूर्व उससे पीछा छुड़ालें। संपादक महिला इस अप्रत्याशित कथन पर अवाक् रह गई पर कुछ ही दिन में बात सही निकली।

यह घटना ‘न्यूयार्क वर्ल्ड’ ने पूरे दो पृष्ठो पर छापी। इससे काइरो की ख्याति बहुत बढ़ी। संसार भर में समय -समय पर महत्त्वपूर्ण मामलों में उससे परामर्श लिए जाने लगे।

‘पिक्चर आफ डोरियनडे, के लेखक ‘आस्कर वाइल्ड’ का भविष्य कथन करते हुए कायरो ने कहा आप जल्दी ही जेल जायेंगे और आजीवन कारावास का दंड भोगेंगे। उस समय वाइल्ड ने यही कहा यह सर्वथा असंभव है आप शायद मुझे डरा कर कुछ रकम ऐंठना चाहते हैं। कायरो वहाँ यह कर कर उठ आये नहीं, एक पैसा भी नहीं पर कुछ ही दिन में उनकी पोल खुली और एक भयंकर मुकदमें में उन्हें आजीवन कारावास का दंड मिला।

सन् 1867 में रूस के सम्राट जार ने उन्हें अपना हस्त चित्र भेजा पर यह प्रकट नहीं किया कि यह किसका हाथ है। चित्र की पीठ पर उन्होंने लिख भेजा यह व्यक्ति आज से बीस वर्ष बाद अपने समस्त अधिकार खो बैठेगा और परिवार सहित रोमांचकारी मृत्यु से मरेगा।’ पढ़ कर सम्राट जार सन्न रह गये। वह पत्र उनके कागजों में सुरक्षित रहा और समयानुसार ठीक घटना घटित हुई।

इंग्लैण्ड के सम्राट ऐडवर्ड के संबंध में उनके राजतिलक की तारीख, प्राण घातक बीमारी, की बातें सही निकलीं। महारानी विक्टोरिया के कायरों ने उकसा मृत्यु दिवस लिख कर दे दिया था जो उसके निजी कागजों में पाया गया। अष्टम एडवर्ड की प्रणय लीला और राज त्याग की प्रसिद्ध घटना की घोषणा वे वर्षों पहले कर चुके थे।

भारत के विशिष्ट व्यक्तियों में से ऐनी बीसेंट, स्वामी विवेकानंद मोतीलाल नेहरू, कर्नल आर्थर, लार्ड किचनर आदि के हाथ देखे थे और बताया था उससे वे लोग बहुत प्रभावित हुए थे। अपनी विश्व का भविष्य पुस्तक में उनने भारत की स्वतंत्रता, गृहयुद्ध, पाकिस्तान की स्थापना, शरणार्थी समस्या, सांप्रदायिक हिंसा के संबंध में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में वर्णन लिखा है ओर वह अक्षरशः सच होकर रहा।

यह अलौकिक क्षमता किन्हीं में अनायास ही उभरी हुई दृष्टिगोचर होती है तब उसका कारण यही प्रतीत होता है कि इस जन्म में न सही उनने भूतकाल में उन प्रसुप्त बीजांकुरों को सींच-सींच कर बड़ा किया होगा और अब अनायास ही वे उस संपदा से सुसज्जित दीख पड़ते हैं।

13 अगस्त 1631 के ‘न्यूयार्क हैराल्ड’ और ‘ट्रिब्यून’ आदि दैनिक पत्रों में यह खबर बड़े दुःख की टिप्पणियों के साथ छपी कि 72 वर्षीय ऐंजलो फेटी फोमी का स्वर्गवास हो गया। वह कार्क का बना आदमी समझा जाता था।

कार्क की लकड़ी सबसे हलकी होती है और वह सबसे अधिक सरलता पूर्वक पानी पर तैरती रहती है। कहते हैं कि ऐंजलो में भी कुछ ऐसी ही विशेषता थी। यद्यपि उसके द्वारा उसके शरीर की परीक्षा की जाती रही कि आखिर उसमें ऐसी क्या अलौकिकता है जिसके कारण वह पानी पर इतने अनोखे ढंग से तैर सकता है।

ऐंजलो इटली मोची का लड़का था। उसे पानी पर तैरने का भारी शोक था। उसके बाप ने इसके लिए उसे रोका, न मानने पर एक दिन तो उसकी बुरी तरह पिटाई भी कर दी। लड़का भाग खड़ा हुआ। तब वह दस वर्ष का था। उसने पानी के जहाज पर एक छोटी सी नौकरी प्राप्त कर ली और बाप से छिप कर अमेरिका के लिए रवाना हो गया।

जहाज अपने रास्ते चला जा रहा था कि एक तट पर कोई व्यक्ति डूबता उतराता अपनी प्राण रक्षा की गुहार कर रहा था। ऐंजलो से यह न देखा गया और वह अपने जहाज पर से धमाक से अथाह समुद्र में कूदा और देखते -देखते उस डूबते व्यक्ति तक तीर की तरह तैरता हुआ पहुँचा और 200 पौण्ड भारी उस आदमी को घसीट कर यथा स्थान पहुँचा दिया। जहाज के नाविक लड़के के इस दुस्साहस पर क्षुब्ध थे। उन्होंने नाव खोली और उसे बचाने के लिए तैयारी की तब तक अपना काम निपटा कर ऐंजलो वापिस आ गया और रस्से के सहारे चढ़ कर अपनी जगह पर पहुँच गया। नाविक स्तब्ध थे कि यह लड़का क्या है कमाल है।

आगे चलकर उसकी जल तरण सिद्धि अमेरिका भर में एक जादू-चमत्कार की तरह देखी जाती रही उसने कितने ही दुस्साहस भरे सार्वजनिक प्रदर्शन किये। जिनकी चर्चा उन दिनों प्रायः सभी अखबारों में भरी रहती थी। जब कि सतह पर बिना हाथ पैर हिलाये घंटों आराम से तैरते रहना इसके लिए साधारण काम था। कुर्सी के साथ रस्सों से बाँध कर गहरे पानी में फेंका जाना , हाथ पैरों से मानो लोहे का वजन बाँधकर पानी में डाल दिया जाना, ऐसे कृत्य थे जिसे देखने वाले यही सोचते थे कि अब उसका बच सकना असंभव है, फिर भी जल से वह गेंद की तरह उछलता-कूदता बाहर निकला तो उसे कार्क का बना आदमी कहा जाने लगा और न्यूयार्क वर्ल्ड जैसे अखबारों ने उसके करतबों को दाँतों तले उँगली दबाने जैसे आश्चर्य बताया।

'वाशिंगटन हैराल्ड' की प्रकाशिका स्वर्गीया इलेग्नर मेडिट एक मध्याह्न विश्राम करने के लिए बिस्तर पर झपकी ले रही थी। लगभग अर्धनिद्रा की स्थिति में उसने अपने पति कैस्सी को चारपाई के पास खिन्न मुद्रा में खड़े देखा। वे पुलिस के बड़े अफसर थे। पदों के अनुरूप पदक प्रतिष्ठा प्रतीक उनकी वर्दी में टके हुए थे। लगता था बहुत उतावली में थे। कुछ ही क्षण में खड़े दिखाई दिये और उसके बाद वे मुड़े और अचानक हवा में गायब हो गये।

यह अर्ध स्वप्न श्रीमती मेरिट के लिए हड़बड़ा देने वाला था। वे समझ नहीं सकतीं कि यह सब क्या था सामान्य स्वप्न ऐसे ही हलकी फुलकी स्मृति छोड़ते हैं पर इस अनुभूति न तो उन्हें हिला ही दिया। भागी हुई दफ्तर में गई और उस दृश्य का विवरण सुनाया। कार्यकर्ताओं ने इसे मात्र एक घटना भर समझा और उसे विशेष महत्त्व नहीं दिया।

दूसरे दिन तार आया कि उनके पति की अचानक मृत्यु हो गई। मृत्यु ठीक उसी समय हुई जिस समय कि उन्हें झपकी लेते समय उस आत्मा के आगमन की अनुभूति हुई थी।

न केवल जीवित स्थिति में वरन् मरणोत्तर जीवन में भी मनुष्य की सत्ता अपनी अलौकिक क्षमता का परिचय देती रहती है। स्थूल शरीर न रहने पर भी सूक्ष्म शरीर से अपनी गति विधियाँ जारी रख सकती है और संबंधित व्यक्तियों से संपर्क बनाये रह सकती है। साधारण मनः स्थिति के व्यक्ति मरणोत्तर जीवन में शांत हो जाते हैं किंतु यदि मनः स्थिति प्रखर हो तो उसका सूक्ष्म शरीर लगभग वैसा ही समर्थ रह सकता जैसा कि जीवन काल में स्थूल शरीर था।

हीडर डालजेस्ट पत्रिका के नवंबर 67 अंक में जान राविन्स का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने लंदन से आक्सफोर्ड जाते समय वेस्ट वेकोम्बे नामक गाँव के होटल में ठहरने और वहाँ पर एक महिला प्रेतात्मा से भेंट होने का विवरण प्रकाशित किया है।

एक गोरी युवती की आश्चर्य जनक हरकतों के बारे में जब होटल के मालिक जानबूझ से उन्होंने पूछा तो बताया गया कि यह विचित्र हरकतों वाली महिला जीवित नहीं वरन् मृतात्मा है। इसका नाम सुक्की है। यह इसी होटल में कुछ समय पूर्व कर्मचारी थी। बहुत सुंदर थी। उसने एक अमीर यात्री से शादी पक्की कर ली इस पर उसे चाहने वाले होटल के अन्य कर्मचारी उससे जल गये और भारी चोट पहुँचा कर उसे मार डाला। तब तो वह आत्मा इसी होटल के इर्द-गिर्द रहती है और वहाँ ठहरने वालों को अपने अस्तित्व का परिचय विचित्र विचित्र ढंग से देती रहती है।

सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘फेट के अगस्त 68 के अंक में पृष्ठ 61 पर डाॅ. नाटेली एम.डी. का एक लेख छपा है। उन्होंने अपने मरीजों में से कासाबलानका [मोरक्को] केहेनरी डेलाटे का एक विचित्र विवरण प्रकाशित कराया है।

उपरोक्त मरीज के शरीर में एक महिला प्रेतात्मा प्रवेश करती थी। जब उसका आवेश आता तब आवाज पूर्ण तया बदली हुई और नारी जैसी प्रतीत होती। वह महिला आत्मा इस युवक रोगी पर आसक्त थी और उसके साथ रहने की आकांक्षा व्यक्त करती थी। जब तक यह आवेश रहता-रोगी अपने आपे की सुध-बुध भूला रहता। कई चिकित्सा शास्त्रियों के कई तरह के उपचार किये पर रोगी दिन-दिन दुबला ही होता गया और मरणासन्न स्थिति तक जा पहुँचा। जेब डॉक्टरों ने असमर्थता प्रकट कर दी तब मंत्र-तंत्र का सहारा लिया गया और संभवतः इसी उपाय से उसका निस्तारण भी हुआ।

आये दिन सामने आते रहने वाले इस प्रकार के घटना, क्रम, तथ्य, एवं अनुभव यह बताते हैं कि मनुष्य मात्र माँस पिंड नहीं है और शारीरिक क्षमता तक ही उसका वर्चस्व सीमित नहीं है। आज उसकी सत्ता अत्यंत रहस्यमयी व्यापक सम्भावनाओं से ओत-प्रोत है। यदि उसे विकसित होने का अवसर दिया जा सके तो वह अपने अस्तित्व इस रूप में भी परिणत कर सकती है जिसे अलौकिक और अद्भुत कहा जा सके।


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दार्शनिक पास्कल ने मनुष्य का विश्लेषण करते हुए कहा है- “एक ऐसा बेवकूफ जो अपना सबसे बड़ा दुश्मन है और अपने को ही सबसे अधिक सताता।” नीत्से का कथन है- ‘मनुष्य अर्थात् एक ऐसा सृजन कर्ता जो एक क्रीड़ा तक नहीं बन सकता पर जिसने हजारों ईश्वर बना डाले। रूसो ने आदमी के बारे में लिखा है वह जनम के समय तो स्वतंत्र पैदा हुआ पर उसके बाद उसका हर हिस्सा जंजीरों से जकड़ गया।’ एल्टुअस हक्मलेने उसे ‘बड़बड़ाते रहने वाले बन मानुष कहा है। राबर्ट फास्ट कहते हैं-माँ बीस वर्ष लगाकर जिसे मनुष्य बनाती है पर बीबी बीस मिनट में ही उसे मूर्ख बना देती है।’


समाज सेवा में परमार्थ ही नहीं स्वार्थ भी सन्निहित है।

अध्यात्म का मुख्य उद्देश्य है आत्मा का विस्तार करना। आत्मा के विस्तार का अर्थ है-संपूर्ण प्राणियों को भगवान का प्रतिरूप मानकर उनके साथ स्नेह सौजन्य और ममता भरा हितकारी व्यवहार करना तथा प्राणिमात्र की सेवा में स्वयं को विस्मृत कर देना।

वस्तुतः जितने भी जप-तप संयम-साधन अनुष्ठान आदि किये जाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य भी यही है कि आत्म विस्तार किया जाये। परंतु साधारणतया लोग माला के मनके फिरा कर और भगवान पर थोड़े से पत्र पुष्प चढ़ाकर ही यह सोच लेते हैं कि पूजा का उद्देश्य पूरा हो गया। परंतु वे गहरे भ्रम में पड़े हुए हैं। माला फिराने की क्रिया मात्र से आध्यात्मिक प्रगति कदापि संभव नहीं। जिस प्रकार किसी जीने पर चढ़ने के लिए क्रमशः पहली, दूसरी सीढ़ी चढ़कर ही सबसे ऊँचे सोपान पर पहुँचा जा सकता है। उसी प्रकार अध्यात्म की सर्वोच्च सीढ़ी पर पहुँचने के लिए जप-तप तो प्रथम सीढ़ी मात्र-साधन मात्र है। जप का प्रारंभिक उद्देश्य भगवान के चरणों में चंचल मन को एकाग्र करना है। पूजा-पाठ तो आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक आँशिक प्रयत्न मात्र है।

आध्यात्मिक उन्नति की कसौटी है इंद्रिय-संयम तथा मनोनिग्रह। जिस प्रकार किसी रथ में दश घोड़े हों और वे सभी दश विभिन्न दिशाओं की और दौड़ने लगें तो रथ नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा उसी प्रकार ये दस इंद्रिय रूपी घोड़े यदि अपने-अपने विषयों की और दौड़ने लगे तो आध्यात्मिक उन्नति का रथ भी चरमरा कर टूट जाएगा उन्नत बनने के लिये इंद्रियों पर संयम रखना अत्यंत आवश्यक है। इच्छाओं और वासनाओं की नदी शुभ और अशुभ दो मार्गों पर दौड़ती है। हम सभी का यह पुनीत मानवोचित कर्तव्य है कि उसे प्रयत्न पूर्वक शुभ तथा लोकोपकारी मार्ग पर ही दौड़ायें। अपने वैयक्तिक स्वार्थ और वासनाओं को गौण बनाकर, उनमें शक्तिक्षय न कर सामाजिक अभ्युदय के लिए शक्ति, प्रतिभा और श्रम नियोजित करें।

जब सुंदरता, कुरूपता के प्रति कोई आकर्षण न रहे, रूखे-सूखे भोजन या षट् रस व्यंजन दोनों में समानता लगे, कटु वचन सुनकर भी क्रोध न आये, बड़े से बड़े प्रलोभन में भी लाभ न हो, हानि-लाभ से मन विचलित न हो, असफल होने पर भी निराशा न हो तब समझना चाहिए कि मन और इंद्रियाँ वश में हो गये हैं।

आत्मविकास के लिए राग-द्वेष मोह-मत्सर काम-क्रोध लोभ, अहंकार आदि का त्याग परमावश्यक है। इन मनोविकारों पर जब तक नियंत्रण न किया जायेगा तब तक न तो आत्मशक्ति ही मिलेगी और न पूजा-उपासना ही फलवती होगी।

मनों विकारों पर विजय प्राप्त करने का सरल तथा सही उपाय ही है कि हम जनसेवा का भाव लेकर कार्यक्षेत्र में उतर पड़े। समाज में सक्रिय रूप से कार्य करते समय सुख-दुःख मान-अपमान , हानि-लाभ क्रोध-द्वेष आदि के अनेकों अवसर आयेंगे अनेकानेक कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों में से होकर गुजरना होगा। ये अवसर ही यह मापदण्ड हैं जिनसे मनुष्य की परख होती है। क्रोध, लोभ, मोह आदि की परिस्थितियाँ आने पर भी ये मनोविकार मन को व्यग्र न बनायें तभी समझना चाहिए कि सच्चे अर्थों में हम संयमी बन गये हैं।

मनोविकारों को जीत कर जैसे-तैसे मनुष्य जनसेवा की ओर बढ़ता है, उसके गुण-कर्म और स्वभाव का परिष्कार होता जाता है तथा आचार-विचार निर्मल बनाते जाते हैं। आचार-विचार पवित्र हो जाने से आत्मविकास तथा आत्मविस्तार स्वतः ही हो जाता है। और तब समस्त समाज, राष्ट्र और विश्व उसका अपना परिवार बन जाता है। तथा साधक सच्चिदानंद परमात्मा की उपलब्धि कर लेता है। इस प्रकार जनसेवा के मंगलमय मार्ग का अवलंबन करने से स्वार्थ तथा परमार्थ दोनों की साधना पूरी हो जाती है।


महानता के साथ अवरोध भी जुड़े हुए हैं

ढर्रे का- बेजोखिम का जीवन क्रम बिताते रहना इतना सरल तो है पर उससे यह हानि भी है कि ऊँचे उठने और आगे बढ़ने की संभावना समाप्त हो जाती है। ढीले-पोले और साहस रहित व्यक्ति जोखिम उठाने से डरते हैं। उनका यह डर कठिनाइयों से शायद किसी हद तक बचा भर देता हो पर नई कठिनाई यह उत्पन्न करता है कि नीरस, निर्जीव और हेय स्थिति को पार करने के सारे द्वार प्रायः बंद ही हो जाते हैं। यों कठिनाइयों से सर्वथा बचे रहना तो डरपोक लोगों के लिए भी संभव नहीं, क्योंकि प्रकृति हर किसी में नव जीवन और नव स्फूर्ति भरने के लिए उठक पटक की आवश्यक समझती है। सीधी उँगली से घी कहाँ निकलता है। दुस्साहस के बिना कोई अग्रगामी कहाँ रहता है।

भूगर्भ शास्त्रियों के अनुसार विशाल हिमालय का जनम थोड़ा-थोड़ा करके तीन बार में हुआ। मुख्य हिमालय-जिसे हिमालय का हृदय भी कहते हैं। अब से 5 करोड़ वर्ष पूर्व ‘टीथिस’ समुद्र की तली से उभरा। इसके बाद 2 करोड़ वर्ष पश्चात् लघु हिमालय और उसके 2 करोड़ वर्ष बाद बाह्य हिमालय उस स्थान पर उभरा जहाँ आजकल देहरादून, हरिद्वार, शिमला, नैनीताल प्रकृति नगर बसे हुए हैं।

महान् हिमालय पर्वतमाला का विस्तार 2400 किलो मीटर है। इसे चार खंडों में विभक्त किया जा सकता है (1) पंजाब हिमालय- गिलगिट के समीप सिंधु नदी के मोड़ से सतलज नदी तक 560 किलो मीटर लंबा खंड इसकी सबसे ऊँची चोटी नागा शिखर 26620 फीट ऊँची है। (2) ‘कुमायूँ हिमालय’- सतलज से लेकर काली नदी तक 320 किलो मीटर लंबा खंड, इसके पाँच बड़े शिखर हैं। गंगोत्री शिखर 21700 फीट, केदार नाथ 22770 फीट। बद्रीनाथ 23160 त्रिशूल 23160, नंदा देवी 25645 [3] नेपाल हिमालय - काली नदी से तीस्ता नदी तक 800 किलो मीटर लंबा है। इसके चार बड़े शिखर हैं गोसि अनथक 26261, धौलागिरी 26765, कंचन जंघा 28140, गौरीशंकर [एवरेस्ट] 26141 फीट। [4] आसाम हिमालय-तीस्ता नदी से नामचा बरवा के समीप ब्रह्मपुत्र नदी तक 720 किलो मीटर लंबा। इसके दो शिखर ऊँचे हैं कुलाकाँगड़ी 24754, नामचा वरवा 25445 फीट।

पर्वतों की यह ऊँचाई अनायास ही नहीं मिल गई। इसके लिए उन्हें प्रकृति की उठक पटक का समाना कर सकने का दुस्साहस ही अपनाना पड़ा है।

पर्वत, धरती आदि काल से ही उत्पन्न नहीं हुए हैं। वे बीच-बीच में बढ़ते उगते और नष्ट होते रहे हैं। आदि काल में धरती का जो स्वरूप था उसमें अब भारी अंतर आ गया है। पृथ्वी पर निरंतर काम करने वाली प्राकृतिक शक्तियाँ, प्रवाहमान जल, ज्वालामुखी, भूकंप तथा विभिन्न दिशाओं में क्रियाशील अकल्पनीय दबाव यह सब प्राचीन पर्वतों के विलीन और नये पर्वतों के जन्म के लिए उत्तरदायी है। उदाहरणार्थ 5 करोड़ वर्ष जहाँ ‘टीथिस’ सागर लहराता था अब वहाँ उन्नत मस्तक हिमालय पर्वत खड़ा है। कितने ही पर्वत विशाल ज्वालामुखी विस्फोटों के साथ निकले हुए लावा से बने हैं। धरती में दरारें पड़ने से नीची कमजोर मिट्टी धुल जाती है और मजबूत खड़ी रहती है इस प्रकार बने पर्वतों को अवरोधी वर्ग का माना जाती है। चट्टानों के साथ जुड़ी मिट्टी जब जल प्रवाह में बह जाती है इस प्रकार बने पर्वतों को अवरोधी वर्ग का माना जाता है तो स्थिर चट्टानें खड़ी मिट्टी रह जाती हैं इन्हें ‘विभक्त’ वर्ग के पर्वत कहते हैं। वायु और जल की प्रवाही हलचलों से पूर्व धरातल पर अन्यत्र की मिट्टी तथा रोड़ों की तह जमा होती चली जाती है इन्हें परतदार पर्वत कहते हैं। पर्वत रचना इतिहास में 3 पर्वत निर्मात्री भयंकर हलचलों की चर्चा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 37॥ करोड़ वर्ष पूर्व की कैलोडीयन हलचल, 30 करोड़ वर्ष पूर्व की हरसीनियन हलचल और 12॥ करोड़ वर्ष की अल्पाइन हलचल ऐसी विकट थी कि उन्होंने पिछले सहस्रों पर्वतों को विस्मृति के गर्त में धकेल दिया और उनको जन्म दिया जो आज हमें उभरे उठे हुए दिखाई पड़ते हैं।

प्रगति के पथ पर जोखिम भी हैं। उसमें हानि भी सहनी पड़ती है और खतरा भी उठाना पड़ता है। दुस्साहसी लोग सदा इसके लिए तैयार रहते हैं। जोखिमों से जूझना भी उन्हें एक उत्साहवर्धक खेल प्रतीत होता है।

कोमलता को कठोरता में परिणत करने की प्रक्रिया ही साधारण मिट्टी को पर्वतीय को पर्वतीय चट्टानों के रूप में परिणत करती है। प्रौढ़ता की दिशा में इसी प्रकार चला जाता है कि सरलता की अपेक्षा कठोरता का स्वागत किया जाय और उसे अपनाया जाय।

धरती भिन्न-भिन्न प्रकार के भूखंडों से मिलकर बनी है। कहीं सुदृढ़ चट्टानें है तो कहीं दुर्बल परतदार चट्टानें। अभी कितनी चट्टानों का रूप अधपका है और वे क्रमशः अपनी कच्चाई दूर करने प्रौढ़ता की दिशा में विकसित हो रही है। इसके कारण भीतर ही भीतर कई तरह की घट-बढ़ होती रहती है। पाँच करोड़ वर्ष में कम आयु वाली पर्वतमालाओं के क्षेत्र में अधिक भूकंप आते हैं क्योंकि वहाँ अभी कच्चेपन को पक्केपन में बदलने की प्रक्रिया चल रही है। भारत का हिमालय, योरोप का आल्पसा, अमेरिका राकेज-जापान का फ्युजीयामा पर्वत अभी किशोरावस्था में है। यौवन और प्रौढ़ता प्राप्त करने के लिए अभी इन्हें बहुत ऊँचा उठना और आगे बढ़ना है। तब तक उनके नीचे भूकंप के लिए उत्तरदायी हलचलें होती ही रहेंगी। इन्हें भू रचना भूकंप के वर्ग में गिना जा सकता है।

जिन्हें महानता के उत्तरदायित्व सँभालने का उत्तरदायित्व उठाना पड़ता है उन्हें प्रकृति के आकर्षण विकर्षण का भी सामना करना पड़ता है। मित्रों और शत्रुओं की बाढ़ समान रूप से बढ़ती है। समुद्रों को भी उस स्थिति का सामना करना पड़ता है। सूर्य और चंद्रमा, समुद्र की अथाह जलराशि को देखकर विक्षुब्ध होते हैं, और उसे प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं। प्रतिभायें एक कोने में चुपचाप पड़ी नहीं रह सकती। वे पड़ी रहना चाहें तो प्रकृति उन्हें वैसा नहीं करने देती। सुदूर आकाश में रहने वाले सूर्य चंद्र अकारण ही समुद्र जल को प्रभावित करते हैं और उसकी सतह पर ज्वार-भाटा उठते रहते हैं। इतना सब होते हुए भी समुद्र अपना संतुलन नष्ट नहीं होने देता महान् व्यक्तियों पर जहाँ महान् कार्य संपन्न करने के उत्तरदायित्व रहते हैं वहाँ उन्हें अनुकूलता प्रतिकूलता सहने के लिए भी कटिबद्ध रहना पड़ता है।

समुद्र जल का निश्चित समय पर -नियमित रूप से ऊपर उठना ‘ज्वार’ और नीचे उतरना ‘भाटा’ कहलाता है। खुले सागरों में प्रायः सभी तटों पर पूरे दिन में दो बार हलके ज्वार-भाटा आते हैं। पूर्णिमा’ और अमावस्या की वे विशेष रूप से उग्र होते हैं। सप्तमी अष्टमी के दोनों पक्षों में उन्हें मध्यम स्तर के ढंग में देखा जा सकता है।

सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्ति इस उतार-चढ़ाव का मूल कारण है। सूर्य की आकर्षण शक्ति यद्यपि चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से ढाई करोड़ गुनी अधिक है तो भी चंद्रमा की अपेक्षा प्रायः 405 गुनी दूर होने के कारण सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी पर प्रायः दूना आकर्षण चंद्रमा का ही होता है। अस्तु सागरों में अपने ही अंगों से आप संतानें उत्पन्न करते रहने वाला यह क्रीड़ा अपनी वंश वृद्धि इसी प्रकार करता रहता है और उनका विशाल कुटुंब परिवार धीरे-धीरे एक द्वीप के फिर द्वीप समूह के रूप में बढ़ता चला जाता है। भारी होने पर वे समुद्र की तली में बैठते जाते हैं और प्रवाल पर्वत सुदृढ़ चट्टानों का रूप धारण कर लेते हैं। ज्वार भाटे तथा पवन द्वारा उन की सह पर कीचड़ रेत, बीज, वनस्पति पटकते रहते हैं फलस्वरूप वे हरे-भरे पेड़-पौधे से आच्छादित साधारण समुद्री द्वीपों की तरह दिखाई पड़ते हैं। भारतीय प्रायः द्वीप के दक्षिणी छोर पर -आस्ट्रेलिया के उत्तर पूर्व तट पर - हवाई द्वीप के समीप विकनी द्वीप में अच्छे प्रवाल देखे जा सकते हैं छुट-पुट उनका अस्तित्व तो अनेक स्थानों पर है।

अमावस्या तथा पूर्णिमा को चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य प्रायः एक ही रेखा पर रहते हैं। इन दो तिथियों को सूर्य तथा चंद्रमा की आकर्षण शक्ति अपेक्षाकृत अधिक सशक्त होती है फलतः अधिक ऊँचे ज्वार भाटे आते हैं। कृष्ण पक्ष तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी अष्टमी तिथियों को सूर्य पृथ्वी रेखा चंद्र पृथ्वी रेखा से 60 अंश का कोण बनाता है, तब भी ज्वार-भाटा आते तो हैं पर अधिक ऊँचे नहीं होते। पृथ्वी तथा चंद्रमा दोनों के घूमने के कारण आवृत्ति छः-छः घंटे की न होकर 6 घंटा 12॥ कि मिनट की होती है। इस प्रकार दो ज्वार और दो भाटे कुल 4 क्रियायें 24 घंटे 50 मिनट में संपन्न होती है। अर्थात् ज्वार-भाटे के दैनिक समय में 50 मिनट की देरी होती जाती है। यदि आज ज्वार 5 बजे आया है कल 8 बजकर 50 मिनट पर परसों 6 बजकर 40 मिनट पर यही क्रम आगे भी चलेगा। सब जगह ज्वार भाटा एक ही समय पर नहीं आते आकर्षण शक्ति के प्रभाव की घट-बढ़ से विभिन्न स्थानों पर उनके समय अलग-अलग रहते हैं। ज्वार का प्रधान कारण चंद्रमा ही है।

पृथ्वी का जो क्षेत्र चंद्रमा के समीप है वहाँ चंद्रमा को आकर्षण शक्ति पृथ्वी के केंद्रापसारी बल से अधिक होती है अतएव चंद्रमा की दिशा में समुद्र तल पर खिंचाव बढ़ जाता है। पृथ्वी का जो क्षेत्र चंद्रमा से दूर है वहाँ चंद्रमा की आकर्षण शक्ति पृथ्वी के केंद्रापसारी बल से कम होती है फलतः चंद्रमा से विपरीत दिशा में खिंचवा क्रियाशील हो जाता है। इस प्रकार एक ही समय में दो विपरीत दिशाओं में ज्वार उठते हैं। एक पूर्वी गोलार्ध में दूसरा पश्चिमी गोलार्ध में। सुविस्तृत जलराशि में इस प्रकार की परस्पर विरोधी दो सक्रियता और परिणाम वह होता है जो हमें ज्वार-भाटा के रूप में दिखाई पड़ता है। इस प्रकार प्रत्येक 24 घंटे 50 मिनट में दो विपरीत दिशाओं में दो बार ज्वार-भाटा आते हैं।

समुद्र को ज्वार-भाटों का निरंतर सामना करना पड़ता है वह न कभी उनसे खिन्न होता है न असंतुलित वरन् अपने कंधों पर आये हुए अनेक उत्तरदायित्वों में से एक भार, ज्वार-भाटों का समाना करने का -अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं से जूझने का भी और जोड़ लेता है और परिस्थितियों से धैर्य साहस एवं संतुलन के साथ निपटता रहता है।

समुद्र की तरह ही थलभूमि को भी आंतरिक विग्रह और बाह्य प्रतिरोधों का सामना करना पड़ता है। इसका प्रमाण भूकंपों के रूप में आये दिन हम देखते रहते हैं। इन भूकंपों से जहाँ पृथ्वी को हानि सहनी पड़ती है वहाँ उन्हीं से ऐसी परिस्थितियाँ भी बन जाती है जिन पर से हानि के गर्भ में छिपे लाभ का भी आभास प्राप्त किया जा सके।

सूर्य तपा, शीतलता, पवन-हिमिनद आदि कारणों से जमीन के भीतर और बाहर की वस्तुयें इधर से उधर हटती, गिरती रहती हैं, इससे वजन का पूर्व संतुलन बिगड़ जाता है जैसे कि तराजू के पलड़ों का वजन घटने बढ़ने से वे ऊपर नीचे होते रहते हैं इसे ही भूकंप का रचना परिवर्तन कारण कहते हैं।

अत्यंत भार ढोने वाली माल गाड़ियाँ- उनकी तीव्र गति, परमाणु बमों का विस्फोट आदि मानवीकृत आघात हैं। उल्कापात, व्रजाघात जैसे कई प्रकृतिगत आघात भी ऐसे भयंकर होते हैं कि उनके कारण भूकंप उत्पन्न हो जाते हैं। भूकंप मापक यंत्र-सीस्मॉग्राफ से यह जाना जा सकता है कि पृथ्वी पर भूकंप कहाँ हुआ उसकी गति क्या थी, क्या कारण था और उसका उद्गम स्त्रोत धरती के किस परत में कितनी गहराई पर था।

जिस प्रकार हवा से पेड़ों के पत्ते हिलते रहते हैं उसी प्रकार भूकंपों से धरती का कोई न कोई भाग प्रायः हिलता रहता है। औसतन प्रत्येक तीन मिनट में पृथ्वी पर कहीं न कहीं एक भूकंप आ जाता है। सौभाग्य से सभी भूकंप विनाशकारी नहीं होते। भूगर्भ स्थित चट्टानों के अचानक इधर-उधर हट जाने से जो आघात पृथ्वी की भीतरी गहराइयों में उत्पन्न होते हैं उन्हीं के झटके धरती के बाह्य धरातल को झकझोरते हैं यही भूकंप है, धरती जैसे-जैसे ठंडी होती जाती है वैसे ही वैसे भूगर्भ में सिकुड़न पैदा होती है, उसके कारण पड़ने वाली दरारें पदार्थों को इधर से उधर करती है। गहराई के भीतर होने वाली उठक-पटक को हम भूकंप के रूप में अनुभव करते हैं।

पिछले 300 वर्षों का विनाशकारी इतिहास रोमांचकारी है। सृष्टि के आदि से अब तक निरंतर चलती आ रही इस भूकंपों की शृंखला ने कितनी धन जन की हानि की होगी यह अकल्पनीय है। पिछले कुछ ही दिनों की भूकंप प्रतिक्रिया का विवरण इस प्रकार है-

सन् 1765 लिस्बन [पुर्तगाल] 5000 व्यक्ति मरे पूरा नगर नष्ट। सन् 1817 नेपल्स [इटली] 12000 व्यक्ति मरे। 1861 मिनोओवरी [जापान] 7000 व्यक्ति मरे दोनों नगर नष्ट।1867 शिलाँग [आसाम] 10000 मरे। 1605 काँगड़ा 20000 मरे। 1608 सिसली 76000 मरे। 1615 मध्य इटली 30000 मरे 370 गाम तथा नगर नष्ट। 1623 टोकियो [जापान] 14000 करे। 1623 काँसू [चीन] 100000 मरे। 1634 उत्तरी हार 12000 मरे। 1635 क्वेटा [विलोचिस्तान] 60000 मरे। घायल मनुष्यों की संख्या मृतकों से कम कम चार गुनी आँकी जानी चाहिए पशु धन का भी भारी विनाश हुआ। इसके अतिरिक्त मकान, कारखाने तथा दूसरी प्रकार की जो आर्थिक क्षति हुई उसका ठीक से अनुमान लगाया जा सकना कठिन है। निश्चित रूप से वह संपदा अत्यंत विशाल परिणाम में होगी। यह अत्यंत विशालकाय भूकंपों की बात है। छुटपुट रूप से तो वे कहीं न कहीं आते ही रहते हैं और उनके कारण धन न की हानि होती ही रहती है।

मानव जाति सृष्टि के आदि काल से ही ऐसे प्रकृति प्रकोपों का सामना करती रही है। फिर भी साहस, धैर्य, और ध्वंस के खंडहरों पर निर्माण की मानवी प्रकृति ने कुछ ही समय में उस ध्वंस की क्षति पूर्ति कर ली है। कोई आघात ऐसा नहीं होता जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सके। अधीर मनुष्य उसका मूल्य चुकाने और प्रतीक्षा करने को तैयार न होने के कारण निराश हो बैठते हैं पर जहाँ शौर्य और साहस है वहाँ ध्वंस का तांडव समाप्त होते ही सृजन का प्रयास दुर्गति से आरंभ हो जाता है।

न धरती घात प्रतिघातों से बच सकीं है और न समुद्र की जलराशि। प्रकृति के हिलोरों में झूलने वो हर किसी को आगे और पीछे बढ़ने हटने के झोंके लेने पड़ते हैं। अधीर और क्षुद्र उससे बेतरह भयभीत होकर रोते, चिल्लाते हैं पर बहादुर लड़के मेले ठेलों में आने वाले चरखे पर झूलने की तरह ऊपर नीचे आने जाने जाने का आनंद उत्साह पूर्वक उठाते हैं। महत्वाकांक्षी, प्रगतिशील एवं बड़े उत्तरदायित्व वहन करने के लिए समुद्यत लोगों को तो भूकंपों-ज्वार भाटों का सामना अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। पर्वतों के उच्च शिखरों का व्यक्तिगत महानताओं का निर्माण भी इस प्रक्रिया का सामना करने पर ही संभव होता है।


रुचि के अनुरूप ढाला है (Kahani)

मैंने अपने भगवान का अपनी कल्पना मान्यता और रुचि के अनुरूप ढाला है साथ ही यह आशा भी की है कि वह मेरी इच्छानुसार सोचेगा और चलेगा।

पर जब देखता हूँ कि दूसरों के ईश्वर मेरी मान्यता और कल्पना से बहुत हद तक भिन्न हैं, उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति भी मेरी कल्पना के भगवान से ताल-मोल नहीं खाती।

लगता है हर आदमी ने अपना भगवान अपने ढंग से गढ़ा हैं उसकी निज की आकांक्षाओं और मान्यताओं के ढाँचे में ढाला गया है। लगता है हर व्यक्ति अपनी ही अर्हता को ईश्वर का आवरण पहना कर पूजने रिझाने में लगा हुआ है।

काश सबके भगवान एक होते और उस सार्वभौम एकता ध्यान में रखते हुए एक ऐसा भगवान गढ़ा जाता जो व्यक्ति के इशारे पर चलने को तैयार न होकर-अपने इशारे पर लोगों को चलाने के लिए विवश करता।


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संसार को सुखी समुन्नत बनाने का सरल तरीका यह है कि हमें जो काम सौंपा गया है उसे उत्कृष्टतम स्तर का बनाने में प्राणपण से जुट आयें। -जीन ऐजीली


आनुवांशिकी प्रगति में आत्मबल का प्रयोग करना होगा

निकट भविष्य में जीन के रासायनिक संश्लेषण का सबसे अधिक प्रभाव चिकित्सा प्रणाली पर पड़ेगा। तब गोली, कैप्सूल, मिक्चर, इंजेक्शन घटिया दर्जे के प्रयास माने जायेंगे और रोग का मूल कारण जीनों की विकृतियों में तलाश किया जाएगा आजकल जिस तरह किन्हीं विकृत या टूटे-फूटे अंगों की चीर-फाड़ करे उन्हें सुधारा जाता है या नये अंग का आरोपण किया जाता है उसी प्रकार जीनों की मरम्मत-स्थानान्तरण या प्रत्यारोपण की प्रक्रिया काम में लाई जाय करेगी और उस इलाज का परिणाम पीढ़ी दर पीढ़ी देखने को मिला करेगा। रोगों की तह में जिन ऐंजाइमों या जीव रसायनों की कमी कीटाणुओं में पाई जाया करेगी तब उसी की पूर्ति की जटिल किंतु रामबाण व्यवस्था बनाई जाया करेगी।

कारण यह है कि अब ताब, पित्त कफ़ का प्रकोप, रोग कीटाणुओं का आक्रमण, आवी, वादी, खाकी, विष, असंतुलन, आयुर्वेदिक एलोपैथी, तिब्बी, होमियोपैथी चिकित्सा पद्धतियाँ गये युग की पुरातन पंथी मूढ़ मान्यतायें बनती चली जा रही हैं और आनुवांशिकी विज्ञान यह सिद्ध कर रहा है कि कोशिकाओं के गर्भ में अंतर्निहित गुण सूत्रों में रुग्णता और आरोग्य की आधार शिलायें सन्निहित हैं। रूस के उज़्बेकिस्तान प्रांत में प्रायः सभी लोग शतायुषी होते हैं वरन् इससे भी अधिक जीते हैं जबकि उनके आहार-विहार में साधारण लोगों की अपेक्षा कुछ भी विशेषता नहीं है।

इसी प्रकार बंगालियों की नस्ल दुबली और पंजाबियों, सीमा प्राँतियों की नस्ल मजबूत पाई जाती है। रोगी और निरोग भी प्रायः परम्परागत विशेषताएँ धारण किये रहते हैं। कुछ शारीरिक रोग और मनोविकार वंश परम्परागत पाये जाते हैं। एकाध पीढ़ी के अंतर से वे दबते उभरते भी रहते हैं। दोनों की विकृतियाँ परस्पर मिल-जुलकर नये-नये कायिक और मानसिक रोगों का सृजन करती हैं। कई बार उसकी जड़े इतनी गहरी होती हैं कि दवा दारु का उन पर कोई स्थिर प्रभाव नहीं होता, कितने ही रोगियों पर हर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग प्रायः असफल ही रहते हैं और लगता है चिकित्सा व्यवसाय मात्र अटकल–पच्चू सिद्धांतों पर खड़ा किया गया है अन्यथा छोटी-मोटी बीमारियों के उन्मूलन में वह क्यों असफल रहता है।

अब शरीर शास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं कि सुदृढ़ स्वास्थ्य की उपलब्धि एवं रोगों की निवृत्ति के लिए ‘जीन ‘ बीजों तक पहुँच बनानी पड़ेगी और वहाँ जड़ जमाये पीढ़ी विकृतियों जड़ उखाड़ सकने की वहाँ नये आशा भरे बीज जमाने की विद्या प्राप्त करने की तैयारी करनी पड़ेगी। समग्र स्वास्थ्य की समस्या इसके बिना हल नहीं सकेगी। औषधि उपचार और शल्य क्रिया की पहुँच पत्ते धोने सींचने की तरह है। जड़ की स्थिति सुधारे बिना शरीर वृक्ष की हरियाली संदिग्ध ही बनी रहेगी।

यों-शरीर कोषाणुओं से बना है, पर उसका आरंभ एक कोष से होता है। यह एक भी दो आधे-आधे टुकड़ों से मिलकर बना होता है। इन टुकड़ों में एक माता का भाग होता है-एक पिता का। यह आरंभिक जीवन कोष-जैव रसायनों का एक सम्मिश्रण मात्र है। इसके चारों और एक खोल चढ़ा रहता है। इस खोल के भीतर जीव द्रव [प्रोटोप्लाज्म] के दो भाग हैं। बीच का गहरा भाग ‘कोष केंद्र’ [न्यूक्लियस] कहलाता है। उसके चारों ओर एक हल्का शुक्र कीटाणु [साइटोप्लाज्म] है।

मनवा कोष के अंतर्गत 46 आकारों के होते हैं- जिन्हें ‘क्रोमोसोम’ कहते हैं। अणु खुर्दबीन से देखा जाय तो क्रोमोसोम के भीतर हजारों कीड़े रेंगते दिखाई देंगे उन्हें ‘उत्पत्ति कण’ [जीनी] कहते हैं।

प्रत्येक कोशिका में 23+23=46 गुणसूत्र पाये जाते हैं। पर अपवाद रूप से किसी किसी में मूल संख्या 23 से तीन गुने अर्थात् 69 भी पाये जाते हैं।

गुणसूत्रों की विकृतियाँ और रुग्णतायें ही अक्सर कष्ट साध्य और असाध्य रोगों के रूप में उभरती हैं। मामूली बुखार खाँसी आहार-बिहार की गड़बड़ी से हो सकते हैं। पर जब बीमारी गहराई में घुसी बैठी होती है- उसकी जड़ कोशिकाओं के अंतरंग में प्रविष्ट हो जाती है तो साधारण रासायनिक पदार्थों की पहुँच वहाँ तक नहीं हो पाती और शुद्ध उत्पादन की तरह रुग्ण उत्पादन भी भीतर चलता रहता है। बहुत बार तो यह कोशिकागत गुणसूत्रों में बैठी हुई रुग्णता विकृत आकृति एवं प्रकृति बन ने लगती हैं।

स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर दीर्घ जीवन तक के सूत्र इन्हीं कोशिकाओं के उस कक्ष में भरे पड़े हैं जिन्हें ‘जीन’ कहते हैं। इनकी आश्चर्यजनक क्षमता का एक छोटा सा प्रमाण तब प्रत्यक्ष देखा जाता है जब वे विकास का लक्ष्य सामने रखकर अपने विस्तार में प्रवृत्त होते हैं।

आश्चर्य तो देखिये भ्रूण कलल आरंभ करते समय पहली युग्म कोशिका का भार एक ओंस के दस लाखवाँ भाग की बराबर होता है पर 285 दिनों में वह भार लगभग सात पौण्ड हो जाता है। यों युवा शरीर में 70 खरब कोशिकाएँ पाई जाती है नव जात शिशु में भी वे खरबों की संख्या क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी होती है। एक से अनेक और लघु से विराट् बनने का यह कैसा अद्भुत उपक्रम है।

कोशिकाओं के प्रमुख तीन भाग होते हैं [1] केंद्रक [2] जीव-द्रव (3) कोशिका भित्ति। कोशिका के भीतर के पदार्थ का बाहर आना या बाहर वाले का भीतर जाना इस भित्ति में होकर ही होता है। यह भित्ति अनुपयुक्त पदार्थों को भीतर जाने में अवरोध का काम करती है। जीव द्रव जैसे वैज्ञानिकों की भाषा में साइटोप्लाज्म कहते हैं, कोशिका के बढ़ने, बेकार पदार्थ को बाहर निकालने एवं साँस लेने का काम करती है कोशिका द्रव के मध्य में एक घना, गाढ़ा पदार्थ होता है जिसे कोशिका नाभि अथवा केंद्रक कहते हैं। यह पूरी कोशिका का नियंत्रण एवं निर्देशन भी करता है। जीवन के समस्त रहस्य इस नाभिक में ही छिपे हैं। इसी के निर्देश पर विभिन्न कोशिकाएँ अपने-अपने अंगों के निर्माण के विभिन्न क्रिया कलापों में संलग्न रहती है। आमतौर से सभी जीवधारियों में यही क्रम चलता है। अमीबा और बैक्टीरिया जैसे निम्न श्रेणी के जीव ही इसके अपवाद हैं। उनमें विखंडन से ही नये जीव का निर्माण आरंभ हो जाता है। नाभिक के दो भाग हुए कि दो जीवों का अस्तित्व तैयार। उसका जनम, जनन, परिवर्तन और मृत्यु का सिलसिला ऐसे ही चल पड़ता है। साधारणतया दो जनन कोशिकाओं का परस्पर मिलन भी किसी जीव जाति की पीढ़ियाँ बनाने और बढ़ाने का आधार रहता है।

इन कोषों के- जींस को- विकसित एवं परिष्कृत किया जा सकता है। यह प्रयोजन मानव शारीरिक उधेड़ बुन से नहीं वरन् मानसिक ऊर्जा का संवेग तीव्र करने से संपन्न हो सकता है। पशुओं और पेड़-पौधों में इस स्तर की उलट पुलट भौतिक प्रयोगों से भी एक हद तक संभव हो गई है पर मनुष्य की कायिक स्थिति में भी हेर-फेर किया गया है प्रकृति की जिसमें स्वस्थता की मूलभूत क्षमता भी सम्मिलित है- प्रबल मनः शक्ति की ही अपेक्षा करती है। यदि मनोबल तीव्र हो तो संकल्प शक्ति एवं चित्त की एकाग्रता के आधार पर संपन्न किये जाने वाले ध्यानयोग जैसे उपायों से कोशिकाओं की अंतरंग स्थिति में हेर-फेर किया जा सकता है।

विश्व के समस्त जीवधारियों के शरीर इन कोशिकाओं की सूक्ष्म इकाइयों के मिलने से ही बने। एक कोशिका वाले अमीबा से लेकर विशालकाय हाथी तक के शरीरों में इन कोशिकाओं की ही ईंटें लगी हैं। इस सिद्धांत को स्कलीडन और थियोडन नामक जर्मन वैज्ञानिकों ने और भी अधिक स्पष्ट रूप से सिद्ध कर दिया।

एक औसत कोशिका का आकार व्यास एक सेंटीमीटर का दो हजारवाँ भाग होता है। देखते-देखते इनमें से लाखों करोड़ों मरती और जन्मती रहती हैं। माता और पिता से सिर्फ दो नन्ही कोशिकाएँ सारे पैतृक गुणों का सार लेकर आपस में मिलती हैं और उसी मिलन के आधार पर एक नये प्राणी का सृजन होता है। ये दो नन्ही कोशिकाएँ जब इंजीनियरिंग के सिद्धांत पर एक शानदार शरीर बनाने में जुट जाती है और सफलता पूर्वक अपना कार्य भ्रूणावस्था में आरंभ करके प्रजनन स्थिति आने तक बहुत कुछ पूरा कर लेती है।

पादरी ग्रेगर जोहान मेडेल के मटर पर किये गये और डच वैज्ञानिक ह्यूगोदर्वी के मक्का पर किये गये प्रयोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कोई जीव स्वतः ही संतान की विशेषताएँ उत्पन्न नहीं करता वरन् उसके पीछे कोशिकाओं में सन्निहित पीड़ियों में संगृहीत संस्कार काम करते रहते हैं। प्रो. वेटसन ने इस तथ्य पर और अधिक प्रामाणिक प्रकाश डाला। जर्मनी के कोरेंस और आस्ट्रिया के शेरमाक वैज्ञानिकों के प्रयास से आनुवांशिकी विज्ञान पर और अधिक प्रकाश पड़ा और वह इस स्थिति में पहुँचा कि उस पर विश्व भर के वैज्ञानिक अधिक गंभीरता पूर्वक और अधिक सुनिश्चित पद्धति के अनुसार विचार कर सकें।

डॉ० स्टेवार्ड के तत्वावधान में चल रही अमेरिकी जीव शोध ने गाजर की कुछ कोशिकाओं से पूरा गाजर का पौधा बनाने में सफलता प्राप्त कर ली है। गाजर की विभिन्न कोशिकाओं में प्रायः एक ही तरह के जीन होते हैं वस्तु उसका एक कोषाणु समग्र गाजर के रूप में सहज ही परिवर्धित हो सकता है।

चिकित्सा शास्त्री तब चकित रह जाते हैं जब शारीरिक मानसिक दृष्टि से स्वस्थ प्रतीत होने वाले माता-पिता की गोद में भी विद्रूप बालक आ जाते हैं। उसी प्रकार उस स्थिति में भी आश्चर्य होता है जब पिछड़ी हुई शारीरिक, मानसिक, आर्थिक स्थिति में भी कीचड़ से कमल उत्पन्न होते हैं। इसका कारण अनेक पीड़ी ऊपर के किसी पूर्वज की वह विशेषता ही उभरी होती है जो एक दो ऊपर की पीड़ियों में कहीं दबी ही पड़ी रही और उस प्रकार की विचित्रता का कोई आभास तक नहीं मिला।

इस प्रकार की विकृतियों की चिकित्सा तभी संभव है जब कोशिकाओं के मर्म स्थल तक पहुँच सकना और गुण सूत्रों में हेर-फेर कर सकना संभव हो सके। यह सफलता मिल सके तो ही इच्छानुसार संतान लड़की या लड़का पैदा कर सकने वाली बात में कोई तुक है। यदि पुरुष के एक्स प्रकृति के गुण सूत्र मूर्छित और यदि प्रकृति के सशक्त किये जा सके तो ही शर्तिया पुत्र उत्पन्न होने वाली आकांक्षा पूरी हो सकती है। यदि पुरुष के एक्स गुण सूत्र अधिक सक्रिय हों तो उसके द्वारा उत्पादित संतान केवल कन्यायें ही कन्यायें हो सकती हैं।

कुछ खूँख्वार प्रकृति के अपराधियों का जब शारीरिक विश्लेषण किया गा तो उनमें तीन-तीन ‘वाई’ गुण सूत्र पाये गये। वकील ने अपने इन अपराधी मुवक्किलों के पक्ष में बहस करते हुए कहा इसमें दोष उनका नहीं यह आनुवांशिकी प्रेरणा का फल है इसलिए जिस प्रकार पागलों को छोड़ दिया जाय।

गर्भ स्थापना और उससे कन्या या पुत्र का जन्म होना अथवा बन्ध्या नपुंसक रहना इन्हीं ‘जींस’ की स्थिति पर निर्भर है। मनोवाँछित संतान प्राप्ति का स्वप्न दवादारु के आधार पर देखा भले ही जाता रहे पर वह सार्थक, साकार उसी दिन होगा जब आनुवांशिकी विज्ञान के अंतराल में उतर कर जींस एवं गुण सूत्रों की गतिविधियों पर नियंत्रण करने में सफलता प्राप्त कर ली जायेगी।

नारी के दोनों गुण सूत्र एक्स वर्ग के होते है॥ यदि उनमें एक-एक ही सक्रिय और मूर्छित हो तो फिर उसे कभी कोई संतान न होगी, उसे बंध्या ही रहना पड़ेगा। गर्भाशय की छोटी-मोटी खराबी के कारण यदि संतानोत्पादन नहीं हो रहा है तो उसका उपचार डाक्टर कर सकते हैं पर यदि गुण सूत्रों में कोई विकृति है तो उसे चिकित्सा शास्त्र की अब तक की उपलब्धियों से सुधारा नहीं जा सकता। उसके लिए उस समय की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जबकि चिकित्सा विज्ञानी ‘जीनों’ का उपचार, आप्रेशन, स्थानान्तरण अथवा निराकरण कर सकने की क्षमता प्राप्त कर लें। गर्भपात की दुर्घटनाओं में गर्भाशय की खराबी की अपेक्षा गुण सूत्रों की गड़बड़ी का कारण अधिक रहता है। यदि स्त्री को दो एक्स सूत्रों की अपेक्षा तीन एक्स हो तो फिर उसमें से नारीतत्त्व को कोमलता एवं उमंगें चली जायेंगी और वह नपुंसक जैसी मानसिक और शारीरिक स्थिति में होगी। पुरुष में यदि एक की बजाय दो एक्स हो तो वह ‘ल्माइने फेल्टर’ का शिकार हो जाएगा और लौकिक तथा मानसिक दृष्टि से अविकसित ही रहेगा। अमेरिका में 400 में से प्रायः एक लड़का इस प्रकार की कमी का शिकार पाया जाता है।

वैज्ञानिक सोचते हैं कि कुछ बाधायें दूर हो जाये तो एक गाँधी से अनेक गाँधी बन सकते हैं। इसी प्रकार एक ही आइंस्टीन या कनेडी के सहारे अनेक आइंस्टीन कनेडी प्रयोगशाला में बनाये जस सकते हैं इसमें जहाँ लाभ है वहाँ रावण, कंस , हिटलर जैसे त्रासदायक व्यक्तित्व की प्रतिलिपियाँ कोई उपजाने लगे तो तो अपरिहार्य संकट भी खड़ा हो सकता है।

भारतीय तत्वेत्ता मनोबल एवं आत्मबल की उस क्षमता से परिचित थे जिसके आधार पर गुण सूत्रों -जीन शृंखलाओं से परिचित थे जिसके आधार पर गुण सूत्रों -जोन शृंखलाओं को दिशा दे सकना पूर्णतया संभव था। उसी आधार पर वे अपनी स्वतंत्र पीढ़ियाँ विनिर्मित करते थे। ये अमैथुनी होती थी। नर-नारी के संपर्क में मात्र गर्भ कलल की स्थापना हो सकती है और उसका प्रतिफल शिशु जन्म के रूप में सामने आ सकता है पर आत्मिक प्रवाह में बहाने और बहने का उपक्रम यदि बन सके तो व्यक्तित्व का मर्म स्थल ही बदल सकता है। गुरु परम्परा से भी अपने यहाँ गोत्र चलते हैं और वे पिता की तरह प्रामाणिक होते हैं कारण स्पष्ट है। प्रजनन शृंखला से बढ़ चढ़कर प्रत्यावर्तन शृंखला हैं। आत्मिक विद्युत की भट्टी में तपाकर किये जाने वाले रासायनिक परिवर्तनों की तरह मनुष्य के व्यक्तित्व में भी आत्मवेत्ता परिवर्तन उत्पन्न कर सकते हैं और उसे कुछ से कुछ बना सकते हैं। आनुवांशिकी विज्ञान यदि विकसित होता रहा तो एक दिन उसी स्थान पर जा पहुँचेगा जहाँ आत्मविद्या के ज्ञाता साधना तपश्चर्या के आधार पर पहुँचते रहें हैं। आत्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान की प्रगति यदि यथावत् होती हरे तो वह दिन दूर नहीं जब मनुष्य की शारीरिक , मानसिक विकृतियों को ही दूर नहीं किया जा सकेगा वरन् व्यक्ति को सर्वांग सुंदर और अपूर्णताओं से मुक्त होने का स्वपन् किया जा सकेगा।


नोबेल पुरस्कार विजेता (Kahani)

नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात लेखक विलियम फाकनर किसी जमाने में मिसिपिसी डाकखाने में एक मामूली क्लर्क थे।

उन दिनों बहुमूल्य जीवन का बहुमूल्य उपयोग करने के लिए उनकी आत्मा बहुत तड़पती थी, पर वेतन देने वाले अधिकारी जरा भी अवकाश डाक सेवा के अतिरिक्त और कुछ करने के लिए देने को तैयार न थे।

एक दिन वे बहुत उद्विग्न हो उठे और भविष्य की आजीविका का बिना कुछ विचार किये इस्तीफा लिखने बैठ गये। आवेश में लिखा वह इस्तीफा पोस्ट मास्टर जनरल के पास पहुँचा और वहाँ उसे स्वीकार भी कर लिया गया। इसके बाद वे साहित्य सृजन के काय में दत्तचित्त होकर लग गये। वह आवेश भरा इस्तीफा राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा है और पर्यटकों के लिए वह एक कौतूहल की ही पूर्ति नहीं करता- एक प्रेरणा और दिशा भी देता है। इस्तीफा में लिखा है-

“पेट पालने के लिए दूसरों पर आश्रित रहना, उनके इशारों पर चलना तो पड़ता ही है, पर मेरे लिए यह असह्य है कि पैसे के लिए ही बिका रहूँ और जिंदगी के कीमती क्षणों को ऐसे ही गँवाता, बर्बाद करता रहूँ। अब इस सर्व स्वीकृत ढर्रे पर चलते रह सकना मेरे लिए संभव न हो सकेगा। मैं कुछ ऐसा करूँगा जो मुझे करना चाहिए। सो यह लीजिये मेरा इस्तीफा।”


भीड़ का नहीं- न्याय का राज्य चले

उन दिनों भीड़ का राज्य था। यों नाटक न्याय का ही रचा जाता था। पर भीड़ की चिल्लाहट में इंसाफ की आवाज इतनी धीमी पड़ती थी कि कोई उसे सुन ही न पाता था।

सोचने के चलते हुए ढर्रे को बदलने की क्या जरूरत है? और परम्पराओं को बदलने की अधार्मिकता क्यों अपनाई जाय? पुरातन पंथी यह मानते थे और यही कहते थे। उन्हें यह तनिक भी नहीं रुचा कि ईसा ऐसा कुछ कह जिसमें प्रचलित मान्यताओं के प्रति अनास्था उत्पन्न होती ही। इसी का धर्म प्रचार उन्हें अधर्म जैसा लगा। वे कहते थे जो चल रहा है उसे चलने देना ही धर्म परम्परा है। उसे कोई तोड़े नहीं।

ईसा के तीखे उपदेश लोगों की धर्म भावनाओं को नई दिशा दे रहे थे। सुनने वालों को यथार्थता और परंपरा के बीच का अंतर बना रहे थे पुरातन पंथियों के लिए इस प्रकार के प्रयास सदा रोष का कारण बनते रहे हैं। ईसा भी उससे बच न सके।

उस वर्ष का महायाजक ‘हन्ना’ था। धर्म पुरोहित ही अभियोग बनाते थे और हाकिम दंड देता था हन्ना चाहते थे कि ढर्रे में अवरोध उत्पन्न करने वाले ईसा का प्राण दंड मिले। सो उनके अधीनस्थ पुरोहितों ने जाकर उन्हें पकड़ा और महायाजक के सामने उपस्थित किया।

याजक ने पूछा- मैंने जो कुछ कहा है खुले में और विरुद्ध विद्रोह करने के उपदेश दिये हैं।

ईसा ने कहा - मैंने जो कुछ कहा है खुले में और मंदिरों के आँगन में कहा है- सो सुनने वालों से ही पूछिए कि क्या मैंने ऐसा कुछ कहा है।

एक पुरोहित ने ईसा को चाटा मारा और कहा- महायाजक के सामने बढ़ चढ़ कर बोलता है?

ईसा ने कहा- मैं कुछ झूठ कहता हूँ तो कहो मैंने क्या झूठ बोला। बिना कारण मारने से क्या होगा?

पुरोहित मंडली के गवाह आगे आये। उनने कहा- यह कहता है पुराने मंदिरों के स्थान पर नये मंदिर खड़े होने चाहिए। पुराने राजा के स्थान पर नये रजा का शासन स्वीकार करना चाहिए।

ईसा ने कहा- मैंने मंदिरों का नहीं, उनकी आड़ में पलने वाली अधार्मिकता का विरोध किया है और धरती के राजा के विरोध में नहीं स्वर्ग के राजा के शासन के बारे में कहा है। यदि मैं धरती के राजा का विद्रोह करता तो मेरे पास भी सैनिक होते और इस प्रकार निहत्था न पकड़ा जाता।

महायाजक ने प्रतिवादी की एक न मानी और दोष लगाने वालों की बातों पर ही कान धरते रहे। उन्होंने अपराध वालों की बातों पर ही कान धरते रहे। उन्होंने अपराध लगाते हुए प्राण दंड देने की सिफारिश के साथ ईसा को न्यायाधिकारी पीलातुस के पास भेजा दिया।

पीलातुस ने छानबीन की और ऐसा कुछ न पाया। वह चाहते थे इस निर्दोष को दंड न दिया जाय। पर भीड़ ने चिल्लाकर कहा ईसा विद्रोही है, उसे फाँसी लटकाया जाना चाहिए। न्यायाधिकारी ने पूछा- क्या कोड़े लगाने की सजा से काम चल सकता है? भीड़ ने कहा- नहीं,, नहीं॥

भीड़ का बोल बाला था। न्याय तो काष्ठपुतली मात्र था। राज्य तो अविवेकियों की भीड़ कर रही थी। पीलातुस ने अपनी कुछ चलती न देखी तो एक उपाय सोचा। ईसा गलील प्राँत का नागरिक है सो उसे संहिता के अनुसार उसी देश के राजा को दंड देने का अधिकार है। अस्तु उसे गलील प्राँत के राजा हैरोदेश के पास भेजना चाहिए। उन्होंने वैसा ही किया भी।

राजा हैरोदेश ने गहराई के साथ पूरी छानबीन की पर ईसा पर कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ। सो उन्होंने बंदी को पीलातुस के पास वापिस भेजते हुए लिखा- मेरी राय में वह न तो अपराधी है और न दंड का अधिकारी।

पीलातुस, निर्दोष को दंड नहीं देना चाहते थे पर भीड़ की चिल्लाहट प्राण दंड से कम पर राजी नहीं हो रही थी। सो खीज़ कर न्यायाधिकारी ने कहा- तुम्हें जो दीखे से करो। मुझे विवश न करो।- पर भीड़ भला क्यों मानने लगी उसने कहा हमारी इच्छानुसार दंड देने में ही तुम्हारी भलाई है।

भीड़ के राज्य में न्यायाधिकारी की क्या चलती। ईसा को क्रूस की ओर घसीटा जाने लगा तो पीलातुस ने एक और प्रयत्न किया। उस दिन पर्व का दिन था। पर्व पर एक अपराधी को क्षमादान किये जाने की प्रथा थी। सामने दो अपराधी थे एक हत्यारा डाकू, वरअब्बा, दूसरे ईसा। दोनों में से न्यायाधीश ईसा को छोड़ना चाहते थे। पर भीड़ चिल्लाई- वरअब्बा को भले ही छोड़ दिया जाय पर ईसा को तो क्रूस पर ही चढ़ना चाहिए।

न्याय की एक न चली, हुआ वही जो भीड़ ने चाहा। क्रूस की ओर घसीटते हुए ईसा को सिपाहियों ने कोड़े मारे, लात घूँसे लगाये, थूका काँटों की टोपी पहनाई और तरह तरह से सताया। भीड़ को खुश करने को उत्सुक सिपाहियों के लिए इनके सिवाय और कोई उपाय था भी नहीं।

संसार में सदा से बहु संख्यक अविवेकी लोग ही रहे हैं। विचारशील की संख्या उनसे सदा कम रहती है सो भीड़ की बात जहाँ चलती है वहाँ न न्याय की बात चलती है और न औचित्य को मान्यता मिलती है। भीड़ जो चाहे सो करले, अब ऐसी स्थिति आ जाय तो न कोई तथ्य को देखता है और न सत्य को।

प्रवाह का विरोध करने के लिए बहुत बड़ा आत्मबल चाहिए। उथले आदमी सत्य का समर्थन तभी तक करते हैं जब तक वैसा करना निरापद लगता है, जब भीड़ के प्रकोप में अपने ऊपर भी जाँच आती दीखती है तो वे भी उखड़ जाते हैं।

ईसा के बारह शिष्य थे। इस कठिन अवसर पर वे सभी भाग कर कहीं जा छिपे। एक शिष्य पतरस न्यायालय के आँगन तक साथ गया। महायाजक के नौकरों ने कहा- क्या तू भी ईसा का साथी है। तो उसने कसम खाकर कहा मैं तो उन्हें जानता तक नहीं। दस शिष्यों का कहीं पता न था। बारहवें ने एक और चमत्कार किया था- उसने संकट की घड़ी आने से पूर्व ही सरकारी मुखब्बर बन कर ईसा को पकड़वा दिया और तीस रुपया इनाम लिया। उसका नाम था- यहूदा

यों बाद में ईसा की महानता को सब ने समझा भीड़ ने भी। तीस रुपये में गुरु को बेचने वाले यहूदा ने वे रुपये महायाजक को वापिस लौटा दिये और स्वयं आत्म ग्लानि की पीड़ा से बचने के लिए फाँसी लगा कर आत्म हत्या कर ली। वे खूनी रुपये महायाजक ने भी वापिस नहीं लिए और उन्हें खेत में गढ़वा दिया। खून से सने रुपए जिसमें गाढ़े गये थे वह खूनी खेत अभी भी अपने में अंतर्कथा भरे जहाँ का तहाँ पड़ा है।

भीड़ में इतनी कहाँ होती है कि वह विवेक पूर्ण निर्णय कर सके। आवेश के प्रवाह में लाग किधर भी बहते रहते हैं। इसलिए भीड़ की माँग को नहीं, न्याय की पुकार को मान्यता मिलनी चाहिए। ईसा पवित्र बलिदान से निकला यह निष्कर्ष अनंत काल तक आकाश में गूँजता रहेगा।


पं. मोती लाल नेहरू (Kahani)

पं. मोती लाल नेहरू अपने पुत्र जवाहरलाल नेहरू को विदेश में शिक्षा दिलाने की योजना बना रहे थे। उनके मित्र ने कहा- इस पर कितना खर्च आयेगा मोतीलाल ने हिसाब लगाकर बताया-एक लाख रुपया।

मित्र ने कहा-इतना पैसा तो आप लड़के के नाम से बैंक में जमा कर दे तो उसके लिए स्थाई आमदनी की उतनी सुविधा हो सकती है जितनी विदेश पढ़ने से भी नहीं मिलेगी।

मोतीलाल जी ने कहा मैं अपने पीछे हराम खाऊ नहीं- सुयोग्य संतान छोड़ जाना चाहता हूँ और यह प्रयोजन बैंक पूँजी से नहीं स्वशिक्षा से ही संभव हो सकता है।


संगठन और सहयोग पर सृष्टि-व्यवस्था टिकी है।

यह समझना भूल है कि व्यक्ति एकाकी भी पर्याप्त है। उसकी सरी विशेषताएँ सहयोग संगठन प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। शरीर देखने पर एकाकी है वस्तुतः वह अनेक अंग-प्रत्यंगों का- कोशिकाओं और नाड़ी तंतुओं प्रभृति अनेक घटकों का समूह मात्र हैं। इनमें से एक भी पुर्जा यदि अस्त व्यस्त हो जाय तो देखते-देखते सुदृढ़ प्रतीत होने वाला काय कलेवर आधि-व्याधियों से ग्रस्त दीन दुर्बल हो जाता है।

परिवार के छोटे से देश प्रदेश में -घर घोंसले में व्यवस्था, विश्राम और आनंद-उल्लास का लाभ मिलता है। एकाकी व्यक्ति कितनी ही सुविधाओं से सम्पन्न क्यों न हो, परिजनों के अभाव में किसी शून्यता और रिक्तता का ही अनुभव करता रहेगा। इस प्रकार सामाजिक सहकारिता से रहित, मात्र अपने ही गोरखधन्धों में उलझा रहने वाला व्यक्ति क्रमशः स्वार्थी और संकीर्ण ही नहीं नीरस और कर्कश भी बनता जाता है। सहकारिता का स्नेह सौजन्य जिसे नहीं मिला, सेवा सहायता के आधार पर जिसने अपने आत्म भाव को विस्तृत नहीं किया, वह आत्मिक आनंद से तो वंचित रहेगा ही भौतिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण प्रगति का मार्ग अवरुद्ध ही अनुभव करेगा।

न केवल मानव जीवन में वरन् प्रकृति के हर क्षेत्र में यह संगठन और सहयोग की प्रक्रिया चल रही है। जड़ चेतन जगत इसी आधार पर परस्पर सुसम्बद्ध है और अपने क्रम से आगे चल रहा है, यदि इस विधि व्यवस्था में अंतर पड़ जाय तो समझना चाहिए कि अगले ही क्षण घोर अव्यवस्था की अंधकार पूर्ण स्थिति सामने आकर खड़ी होने वाली है।

परमाणु के बारे में पूर्ण मान्यता यह थी कि वे एकाकी और अपने आप में पूर्ण हैं। पर पीछे पता चला कि परमाणु भी एक परिवार सत्ता की तरह है और उसके साथ भी एक के भीतर परतें जुड़ी हुई हैं।

सन् 1803 में जान डाल्टन ने परमाणुवाद के सिद्धांत को जन्म दिया। उनका कहना था कि-प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है परमाणु अविभाज्य है और उसकी क्रिया से विभाजित नहीं हो सकता। सारे परमाणु आकार, रूप, भार आदि में समान होते हैं। लेकिन अलग अलग तत्त्वों के परमाणुओं के गुण, आकार, रूप , मात्रा आदि अलग-अलग होते हैं। जो दो परमाणु मिलते हैं तो वे पूर्ण संख्या में मिलते हैं। खंडों में नहीं। परमाणु के खंड नहीं होते। परमाणु न उत्पन्न किये जा सकते हैं और न वे नष्ट होते हैं।

डालटन के परमाणु सिद्धांत अर्वाचीन शोधों ने बहुत अंशों में झुठला दिये हैं। डालटन की कल्पना थी कि परमाणु विभाजित नहीं हो सकते हैं परंतु अब द्रव्य को परमाणुओं से भी सूक्ष्म कणों से बना हुआ ज्ञात किया गया है। परमाणु धन और ऋण विद्युत कणों के बने होते हैं। जिन्हें प्रोटोन और इलेक्ट्रान-कहते हैं। अतः परमाणु इलेक्ट्रान और प्रोटोन आदि में विभक्त हो सकते हैं। यह भी आवश्यक नहीं कि किसी तत्व के समस्त परमाणु समान हों और यह भी आवश्यक नहीं कि दो विभिन्न तत्त्वों के परमाणु भिन्न-भिन्न ही हों, वे समान भी हो सकते हैं।

रेडियम और उसकी किरणों को आरंभ में स्व निर्भर माना गया था पर अब उसके अंतर्गत भेद विभेदों की परतें स्पष्ट होती चली जा रही हैं। आज की रेडियम संबंधी मान्यता में उनके तीन विभाजन हैं। [1] अल्फा [2] बीटा [3] गामा किरणों की त्रिविधि प्रकृति में विशेषता प्रकृति में रेडियम विभक्त हैं। उनकी अपनी-अपनी विशेषता और क्षमता है, फिर भी वे तीनों परस्पर मिली जुली ही रहती हैं और उनका समन्वय ही रेडियम का समग्र अस्तित्व विनिर्मित करता है।

धातु कण और प्राणियों के मूल उत्पादक तत्व भी अब इस रूप में देखे समझे जाने लगे हैं। कि वे न केवल जीवंत ही हैं वरन् परस्पर सहयोग भी करते हैं और मिल-जुलकर एक अस्तित्व का परिचय देते हैं। पदार्थों के समस्त रूपों में धातुओं के कण ही सबसे भारी होते हैं। तब भी उनमें जीवन विद्यमान् है। भारतीय विज्ञान वेत्ता प्रो० जे० सी० बोस ने रायल इंस्टीट्यूशन के सामने यह प्रमाणित किया था कि माँस पेशियों की तरह हो धातुओं में भी हलके किस्म का जीवन विद्यमान् है। उन्होंने विभिन्न वनस्पतियों में जीवन ही नहीं संवेदना भी सिद्ध की और प्रमाणित किया कि मिट्टी पत्थर भी निर्जीव नहीं हैं। उर्वरा भूमि तो अनेक प्रकार के बैक्टीरियों जैसे सूक्ष्म कृमियों को जन्म देती रहती है और उनका पोषण करती है, इन्हीं का अग्रिम विकास धरती पर उगी वनस्पतियों के रूप में दिखाई देता है।

रसायन क्षेत्र पर दृष्टिपात करें तो भी यही संगठन और सहयोग का - परस्पर मिलन और समन्वय का सिद्धांत मूर्तिमान् होता दिखता है।

छः तत्त्वों का सम्मिश्रण ऐसा भी हो सकता है जिसमें वे परस्पर पूरी तरह आत्मसात् हो जायें और अपना-अपना अस्तित्व खोकर एक नये यौगिक के रूप में विकसित होने लगें।

यथा- मैग्नेशियम को हवा में जलाने से सफेद राख बनती है। इस राख का एक ‘यौगिक’ कह सकते हैं क्योंकि उसमें आक्सीजन और मैग्नेशियम का सम्मिश्रण पाया जाता है। इसी प्रकार पानी भी दो तत्त्वों से मिलकर बनता है उसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का सम्मिश्रण है। कोयले को जलाने से कार्बन डाई आक्साइड बनता है वह भी एक यौगिक है।

रासायनिक प्रीत उसे कहते हैं जिसमें दो पदार्थ मिल कर एक रस हो जाते हैं यह भी एक यौगिक प्रक्रिया ही है। दो के मिलने से तीसरी वस्तु बनने की यह भी एक प्रक्रिया है।

यथा- लोहा और गंधक गर्म करने पर मिल जाते हैं और यौगिक बनाते हैं। गंधक और पारा मिला देने से भी ऐसा ही मिश्रण होता है। यह मिलन कई प्रकार का होता है। सोडियम के टुकड़े का पानी में डालने पर दोनों के कणों में पारस्परिक मिलन होता है और उससे हाइड्रोजन गैस बनती है। नमक के घोल और सिल्वर नाइट्रेट का घोल मिलाने से सिल्वर बनता है। ताँबा और नाइट्रिक एसिड मिलाने से ताम्र नाइट्रेट बनना आदि।

मिश्रण उसे कहते हैं जिसमें कुछ पदार्थ आपस में मिलकर ऐसे दीखते हैं मानो वे परस्पर घुल-मिल गये पर वस्तुतः ऐसा नहीं होता, उनमें पृथकता बनी रहती है। कोई अपना अस्तित्व नहीं खोता, और न उनके मिलने से कोई तीसरी चीज बनती है। आवश्यकतानुसार उन्हें पृथक किया जा सकता है। बाहर से एकता भीतर से पृथकता की यह मिश्रण पद्धति रसायन क्षेत्र में आसानी से देखी जा सकती है।

नमक, मिट्टी और लोहे के बुरादे को मिलाकर एक मिश्रण बनाया जा सकता है। खड़िया, कोयला, शकर आदि मिलाकर एक चीज बन सकती है। अल्कोहल जल और नारियल का तेल मिलाकर एक नई जैसी चीज का अस्तित्व सामने आता है। गंधक, शोरा और कोयला मिलाने से बारूद बनती है। यह मिश्रण प्रयोगशाला में आसानी से पृथक किये जा सकते हैं।

जीव रसायन (डी.एन.ए.) भी न्यूक्लिओ टाइड वर्ग के चार अन्य रसायनों का सम्मिश्रण हैं। इनके नाम है (1) एडिनिन (2) गुआनिन (3) लाइमीन (4) साइटोसीन। न्यूक्लिक एसिड के विभिन्न खंडों को जो विभिन्न गुणों को निर्धारित करते हैं जीन करते हैं। रासायनिक दृष्टि से प्रत्येक जीन’ न्यूक्लिक एसिड का बना होता है।

गैसों की विधि व्यवस्था को गौर से देखा जाय तो उनमें से पारस्परिक सहयोग के कारण उत्पन्न होने वाली क्षमता और विशेषता का परिचय पग-पग पर प्राप्त होता है। नाइट्रोजन जीवधारियों और पौधों के शरीर की वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक तत्व है। वह वायुमंडल में प्रचुर मात्रा में विद्यमान् भी है पर आश्चर्य इस बात का है कि शरीर या पौधे हवा के नाइट्रोजन को सीधा ग्रहण नहीं कर सकते।

वायुमंडल का नाइट्रोजन विद्युत प्रभाव से आक्सीजन में मिलकर नाइट्रिक अम्ल बनाती है और पृथ्वी तल पर गिरकर धरती के अन्य लवणों से क्रियान्वित होकर नाइट्रेट में परिणत होती है। इतनी लंबी प्रक्रिया में से गुजरने के बाद तब कहीं नाइट्रोजन इस योग्य बनती है कि उसे प्राणियों के शरीर और पौधे सोखकर आत्मसात् कर सकें।

पौधों के नाइट्रेट लवणों में प्रोटीन बनाते हैं। वनस्पति, उसकी पत्ती, फल-फूल खाकर उसके उस तत्व को प्राणी अपने शरीर में ग्रहण करते हैं। जानवर मल और मूत्र के द्वारा बहुत सा नाइट्रोजन धरती को लौटा देते हैं। जो उनके शरीर में बचा रहता है। वह मरने के बाद सड़ने या जलने पर फिर लौटकर धरती को या वायुमंडल को मिल जाता है। इस प्रकार वायुमंडल का नाइट्रोजन जल, वनस्पति, प्राणी, धरती और फिर वायुमंडल में भ्रमण करके एक सुव्यवस्थित चक्र की तरह घूमता रहता है।

आकाश स्थित नाइट्रोजन वायु का बादल बिजली की सहायता से वर्षा के साथ खाद बनकर धरती पर आना, पृथ्वी के संयोग से उसका वनस्पति के रूप में उगना, वनस्पतियों का प्राणियों द्वारा भक्षण किया जाना और उसका प्रोटोन जैसे उपयोगी पदार्थों में परिवर्तित होना। मलमूत्र द्वारा उसका फिर धरती पर आना, वस्तुओं की सड़न से उसका फिर आकाश में लौटना,

यह एक ऐसा चक्र है जो निरंतर चलता रहता है इसे जीवन चक्र भी कह सकते हैं इसे धरती पर सजीवता बनाये रखने में नाइट्रोजन की महान् भूमिका भी कह सकते हैं।

उसके अतिरिक्त पौधों को नाइट्रोजन प्राप्त होने का एक और भी तरीका है। सेम, बटला, मटर जैसी जाति के पौधों की पतली जड़ों में अत्यंत सूक्ष्म बैक्टीरिया कीड़े रहते हैं उनमें यह विशेषता है कि वे वायुमंडल से सीधे नाइट्रोजन लेते हैं और उसे नाइट्रेट बना देते हैं। जिन्हें पौधे आसानी से आत्मसात् कर लेते हैं।

सहअस्तित्व का - परस्पर सहयोग का यह अनोखा उदाहरण है। कीड़े पौधों को खुराक देते हैं और पौधे कीड़ों को। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के लिए जीवन के साधन प्रदान करते रहते हैं।

पृथ्वी में भी कुछ ऐसे सूक्ष्म कीड़े रहते हैं जो पदार्थों में से नाइट्रोजन बनाते हैं और वायुमंडल से जितना अंश धरती निवासियों का प्राप्त होता है उसे वापिस करते रहते हैं।

वायुमंडल में नाइट्रोजन का बहुत बड़ा भंडार है। धरती की सतह से दो सौ मील तक की ऊँचाई में जो वायु का आवरण है उसमें 75 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस का भाग है। जिस तरह ऑक्सीजन श्वास नलिका से फेफड़े तक जाकर रक्त की अशुद्धि दूर कर उसे शुद्ध बनाती है उसी तरह नाइट्रोजन मनुष्यों , पेड़ पौधों तथा अन्य जीवधारियों के भोजन की व्यवस्था जुटाती है। जैसे आटा ऐसे ही कच्चा नहीं खाया जा सकता उसकी रोटी बनाकर खाने से काम चलता है उसी तरह नाइट्रोजन सीध भोजन नहीं हे, उसके कारण प्रोटीन तथा दूसरे पदार्थ बनते हैं और वे हमारे आहार का प्रयोजन पूरा करके जीवन रक्षक ही सिद्ध होते हैं।

चाहे जन-जीवन की बात हो चाहे प्रकृतिगत जड़ समझे जाने वाले पदार्थों की, सबके मूल में एक ही प्रधान तथ्य काम करता दिखाई पड़ेगा संगठन और सहयोग। जहाँ इस प्रक्रिया को जितना अधिक अपनाया जाएगा वहाँ उतना ही अधिक उत्कर्ष एवं असुखकर परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।


टामस कूपर (Kahani)

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध विद्वान् टामस कूपर अंग्रेजी भाषा का शब्द कोष तैयार करने में लगे थे। काम में वे इतने खोया रहते था कि घर की बातों का ध्यान नहीं नहीं रहता था।

उनकी पत्नी इस व्यस्तता से बहुत चिढ़ती थी। एक दिन उसने लिखे हुए सारे कागज जलाकर राख कर दिये।

कूपर जब घर लौटे और अपना आठ साल का परिश्रम इस तरह नष्ट देखा तो उनने केवल इतना ही कहा-तुमने आठ साल का काम मेरे लिए और बढ़ा दिया।

इसके बाद वे शब्दकोष को नये सिरे से लिखने में फिर निमग्न हो गये।


हम आत्म गरिमा का अनुभव करे और किसी से न डरें

अथर्व वेदीय पिप्पलाद संहिता के प्राण सूक्त में निर्भयता का संकल्प ऐसा है जिसे बार बार दुहराया जाना और पाठ किया जाना अभय रहने का आत्म विश्वास करता है।

डरना केवल दो से चाहिए एक ईश्वर के न्याय से और दूसरे पाप- अनाचार से। जो इन से डरता, बचता रहेगा उसे और किसी से डरने की आवश्यकता न पड़ेगी आत्म बोध और आत्म बल का ज्ञान न होने के कारण लोग छोटे-छोटे कारणों को लेकर चिन्ताग्रस्त, आशंकित, आतंकित एवं भयभीत होते हैं। इस भीरुता को हेय ठहराते हुए प्राणसूक्त में हमने निम्नांकित मंत्रों में यही निर्देश दिया गया है कि अपने को देशवासियों की पंक्ति में बिठाये, और उन्हीं की तरह निर्भय उल्लसित जीवन जिये।

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥1॥

जिस प्रकार द्यौ और पृथ्वी न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। उसी तरह हे प्राण तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।

यथा वायुश्चान्तरिक्ष च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥2॥

जिस प्रकार वायु और अन्तरिक्ष न किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। उसी तरह हे प्राण तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।

यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥3॥

जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा न किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। उसी तरह हे प्राण तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।

यथा हश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥4॥

जिस तरह दिन और रात न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। उसी तरह हे प्राण तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।

यथा धेनुश्चानंवांश्च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥5॥

जिस तरह गाय और बैल किसी से न तो डरते हैं और न क्षीण होते हैं। उसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।

यथा मित्रश्च वरुणश्च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥6॥

जिस तरह मित्र और वरुण न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। इसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।

यथा ब्रह्म चक्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥7॥

जिस तरह ब्रह्म और क्षत्र न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। इसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।

यथेन्द्रश्चेन्द्रियं च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥8॥

जिस तरह इन्द्र और इन्द्रियाँ न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होती है। इसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।

यथा वीरं च वीर्यं च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥9॥

जिस तरह वीर और शौर्य न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। इसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।

यथा प्राणश्चापानश्च न बिभीतो न रिष्यतः।

एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः ॥10॥

जिस तरह प्राण और अपान न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं। इसी तरह हे प्राण न तो तू डर और न क्षीण हो।


क्या हम जीवित है? क्या हम जीवितों जैसे काम करते है?

तत्व वेत्ता सेन्टपाल ने कहा था- हम जीवित है। जीवितों जैसे कार्य करते हैं। हमारा जीवन ईश्वर के लिए है। सचमुच वैसा ही है भी। मात्र हलचल करने वाली वस्तुओं से हम भिन्न नदी, पर्वत, बादल, वृक्ष, वनस्पति आदि हलचल भर करते हैं। उन्हें अपनेपन का ज्ञान नहीं आत्म बोध के अभाव में वे जड़ कहलाते हैं। यो जड़ कोई भी वस्तु इस धरती पर नहीं है, जीवन का न्यूनतम अंश कण-कण में विद्यमान् है। यदि ऐसा न हो तो उसे व्यवस्थित रूप से अपनी गतिविधियों को चला सकना कठिन हो जाता।

हम जिन्दा है वे जानते हैं। मनुष्य अपने आपको जीवित अनुभव करता है। अपनी सत्ता से परिचित है। स्वयं के लिए बहुत कुछ सोचता और बहुत कुछ करता है। जो विचार पूर्वक कार्य करता है उसी को कार्यकर्ता कहा जा सकता है। अन्यथा प्रकृति स्वयं गतिशील है और प्रभाव क्षेत्र में हर किसी को गतिशील रखती है। न वह चैन से बैठती है न किसी को बैठने देती है। यहाँ किसी को विश्राम नहीं, किसी को चैन नहीं हरकत किये बिना कोई अपने अस्तित्व का परिचय दे ही नहीं सकता, अपने स्वरूप को बनाये भी नहीं रह सकता। पूर्ण स्थिरता और प्रलय एक ही बात है। जिस क्षण हृदय का, कोशिकाओं का, ज्ञानतन्तुओं का कार्य रुकेगा, उसी क्षण हम मृत्यु की गोदी में शयन कर रहे होगे।

कार्य करने से मतलब है विचार पूर्वक कार्य। किसी प्रयोजन के लिए- किसी आकांक्षा की पूर्ति के लिए काम करना स्वचालित रक्त संचार श्वास- प्रश्वास आकुंचन, प्रकुञ्चन, जैसी शरीर की अन्तरंग क्रिया- प्रक्रिया के अतिरिक्त और सब कुछ विचार पूर्वक ही किया जाता है। इस लिये उसे कर्म कहा जाता है। कर्म यह है जिसका फल भोगने के लिए विवश होना पड़े

हम अपने आपको जानते है- अपने अस्तित्व से परिचित है इसीलिए जीवित है। विचार, इच्छा और बुद्धि का उपयोग करके- परिणाम को ध्यान में रखते हुए काम करते हैं इसलिए ‘कर्म रत’ भी है। कार्य भी करते हैं। भले ही तात्कालिक और दूरगामी परिणामों का विभेद करने वाली विवेक बुद्धि का जागरण न हुआ हो तो भी जो कुछ किया जाता है उसमें समझ- बूझ की भली बुरी मात्रा रहती है। यह कर्त्तव्य का चिह्न है। इसमें कर्म परायणता छिपी हुई है। निस्संदेह हम जीवित ही नहीं कर्मरत भी है। काम भी करते हैं।

सेन्टपाल की उक्ति का तीसरा चरण है जीवन ईश्वर के लिए है। थोड़ी गहराई से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि हम अपनी अलग अहंता और अलग स्वार्थ परता में मानसिक दृष्टि से उलझे भर भले ही रहे पर वस्तुतः सृष्टि क्रम सुसंचालित शृंखला का अविच्छिन्न अंग मात्र बनकर रहना पड़ रहा है। स्वार्थ की चिन्तनात्मक शृंखला हम ईश्वर की इच्छानुसार चलने के लिए उसकी सृष्टि संचालन प्रक्रिया का एक घटक भर रहने के लिए बलात् बाध्य है।

अन्न का उत्पादन, उसका उपयोग और उसकी पुनः खाद के रूप में परिणति सृष्टि की क्रम शृंखला है। हम उस ईश्वर इच्छा में व्यवधान उत्पन्न कर ही नहीं सकते। अन्न अथवा अन्य जीवनोपयोगी उत्पादन स्वयं करने अथवा उस कार्य में लगे लोगों के सहायक बनने के लिए हम विवश है हमारी आजीविका उपार्जन इसके अतिरिक्त और किस काम के लिए है? अन्न- वस्त्र आदि जीवनोपयोगी सुविधाएँ कमाने के लिए और उनकी सहायता सुविधा जुटाने में ही प्रकारान्तर से हमारी कमाई खर्च हो जाती है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादन बुद्धि में संलग्न रहना ही पड़ेगा आजीविका कमानी ही होगी और जो भी उपार्जन क्रम होगा वह उत्पादन की धुरी पर घूम रहा होगा और उस उत्पादन का प्रयोग अन्ततः जीवधारियों की जीवन यात्रा में ही हो रहा होगा। क्या कोई उम्र ईश्वरेच्छा का उल्लंघन करने में समर्थ है? घोर स्वार्थी और समाज विरोधी को भी इस प्रकृति शृंखला का उल्लंघन कर सकने की छूट नहीं है।

उत्पादन का उपयोग करने के लिए हम बाध्य है। भूमि अन्न खाद्य पदार्थ उगाती है। हम उसका उपभोग किए बिना रह ही नहीं सकते। वृक्षों से आक्सीजन उपजती है उसे साँस में ग्रहण किये बिना किसी प्रकार गुजारा नहीं यदि मनुष्य साँस से कार्बन डाई आक्साइड गैस न छोड़े तो पेड़ पौधों को खुराक न मिले। ईश्वर की सृष्टि को चलाने के लिए यह अनिवार्य है कि वे परस्पर पूरक स्तर की वायु छोड़े और ग्रहण करे। इनमें से कोई भी इस नियति का उल्लंघन नहीं कर सकता।

उत्पादन का हर प्राणी उतना ही उपभोग करे जितना कि उसके लिए नियत निर्धारित है यह सृष्टि क्रम है। मनुष्य चार रोटियाँ ही खा सकता है। कुछ छटाँक अन्न ही उसके हिस्से में आया है। कोई भी ऐसा नहीं कर सकता कि मानवी खुराक से सौ पचास गुना अधिक आहार कर सके। शरीर पर वस्त्र धारण की सीमित मर्यादा है। सौ गज कपड़े का कुर्ता कौन पहन सकेगा? धन तथा सुविधा सामग्री की कोई बर्बादी तो कर सकता है पर उपभोग के लिये एक नियत क्रम व्यवस्था की मर्यादाओं में बंधकर ही उसे रहना पड़ेगा

आहार करके धरती का जो स्वत्व उपयोग में लाया गया है उसे खाद रूप में पृथ्वी को वापिस करना जरूरी है। इसलिए मल त्याग किये बिना कोई चारा नहीं शरीर में प्रयुक्त पंचतत्व अपना कार्य पूरा करने पर पुनः अपने विशाल सागर में मिल जाते हैं। मृतकाया को सड़ गल कर नष्ट होना ही पड़ता है और प्रकृति को पंच तत्व व्यवस्था में अपने ढंग से काम करने देना होता है। कौन है जो ईश्वर के लिए बने शरीर और कर्म में व्यवधान उत्पन्न कर सके।

प्राणी बाध्य है सृष्टि क्रम से अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए विवश रखा गया है। पेट की भूख, इन्द्रियलिप्सा, उन्नति की महत्त्वाकाँक्षा यौन आकर्षण, सन्तान के प्रति वात्सल्य की क्षुधाएँ ऐसी है जो मनुष्य को जंजीरों में बाँधकर उस दिशा में घसीटती चली जाती है जिसके लिए ईश्वर ने उसे नियत किया है। गंभीरता से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि हमारी शारीरिक और मानसिक परिस्थिति जिस स्तर की बनाई गई है उसी के अनुरूप जाने के लिए काम करने के लिए हमें विवश होना पड़ता है। अर्थात् ईश्वर के लिए उसकी सृष्टि व्यवस्था चलाने के लिए हम बाध्य है। वन प्रदेश को अत्यन्त सघन होने देने के लिए वन्य पशुओं का अस्तित्व, बन पशुओं की बाढ़ रोकने के लिए हिंस्र जन्तुओं का सृजन। हिंस्र जन्तुओं की स्वल्प प्रजनन शक्ति तथा परस्पर द्वेश विग्रह की प्रवृत्ति के कारण संख्या वृद्धि पर नियन्त्रण। यह क्रम शृंखला बताती है कि यहाँ जो कुछ हो रहा है ईश्वरीय इच्छा के अनुरूप ईश्वर की सृष्टि को संचालित रखने के लिए हो रहा है इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तत्त्वदर्शी यह कहते रहे है कि जो कुछ हो रहा है ईश्वर की इच्छा से हो रहा है।

यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या मनुष्य कृत दुष्टता, स्वार्थपरता, भी ईश्वर की इच्छानुसार है? क्या मनुष्यों द्वारा बरती जाने वाली दुर्भावनाएँ और दुष्प्रवृत्तियाँ भी ईश्वरेच्छा की प्रतीक है?

हमें एक स्वर से कहना चाहिए--- नहीं - नहीं प्रत्येक मनुष्य के अन्तः करण में एक धीमी आवाज उठती रहती है जो उसे मानवी गरिमा के अनुरूप सद्भाव अपनाने, एवं सत्कर्म करने के लिए निरन्तर प्रेरणा देती रहती है। दुष्कर्म करते ही आत्मग्लानि की इतनी प्रबल प्रतिक्रिया होती है कि उसे सहन करना असह्य हो जाता है। उस आत्म प्रताड़ना से बचने के लिए ही आमतौर से कुमार्ग गामी लोग प्रताड़ना से बचने के लिए ही “गम गलत” करने की दुहरी विडम्बना करते रहते हैं। सत्कर्म करने पर एक दिव्य संतोष भीतर ही भीतर अनुभव होता है। इसी लाभ को प्राप्त करने के लिए सन्त, तपस्वी, योगी, ज्ञानी, परोपकारी, महामानव इतना कष्ट उठाते और आदर्शवादी अनुकरणीय गतिविधियों की कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाते हैं।

ईश्वर ने मनुष्य को सोचने और करने की स्वतंत्रता दी है। इसलिए कि उसे उत्तरदायित्व समझने वाला माना गया है। इस अपेक्षा की हमें रक्षा करनी ही चाहिए। यदि नहीं करते तो उस दुर्गति के भागी बनते हैं जो नियति क्रम में अवरोध उत्पन्न करने की होती रहती है। भोजन तो किया जाय पर मल त्याग को रोक दिया जाय, साँस ली तो जाय पर छोड़ी न जाय तो इस अवरोध का दुस्साहस कर्ता बेतरह मारा जाएगा ठीक इसी प्रकार मनुष्य का जीवन ईश्वर के लिए है- उसके प्रयोजनों के लिए है- के तथ्य से विमुख होकर कोई व्यक्तिगत संकीर्णता स्वार्थपरता के अवरोध उत्पन्न करेगा तो वह बेहिसाब पिटेगा। बुरी तरह घायल होगा रुदन करेगा और वे मौत करेगा आज यही हो रहा है। ईश्वरीय विशेष प्रयोजन के लिए मानव जीवन है, उसे इतना अधिक समुन्नत और सुविधा सम्पन्न अकारण ही नहीं बनाया गया है। इस संरचना के पीछे सृष्टि को अधिक समुन्नत सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने की ईश्वरीय आकांक्षा जुड़ी हुई है। जो इस प्रयोजन की उपेक्षा करेगा वह दुहरे घाटे में रहेगा। न तो स्वार्थ साधन से सुख प्राप्ति का मनोरथ पूरा कर सकेगा और न ईश्वर के निमित्त जीने के राज मार्ग पर चलते हुए जो आनन्द उठाया जा सकता था उसे उठाया जो सकेगा। इसलिए दूरदर्शिता इसी में है कि हम जीवन को ईश्वर के लिये जिये।

तत्व वेत्ता सेन्टपाल की दिव्य दृष्टि ने व्यक्ति और विश्व के पारस्परिक सम्बन्धों पर गहराई से विचार विवेचन करते हुए यह निष्कर्ष सहज ही निकाला है कि हम जीवित है, जीवितों जैसे कार्य करते हैं। हमारा जीवन ईश्वर के लिए है। प्रकृति हमसे यह सारा क्रिया-कलाप बहिरंग जीवन में अनिवार्य रूप से करा रही है। प्रश्न केवल अन्तरंग जीवन का है। अपनी स्वतन्त्र चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तव्य की क्षमता को भी यदि हम इस दिशा में नियोजित करते तो सच्चे अर्थों में यह कहा जा सकेगा कि हम जीवित है। जीवितों जैसे काम करते हैं और जीवन ईश्वर के लिये जीते हैं।


पादरी आशीर्वाद देना भूल गया (Kahani)

पादरी नित्य समुद्र को आशीर्वाद देने जाता था। एक दिन उसने देखा कोई तरुण नाविक किसी जलपरी की लाश को अपने बाहुपाश में कसे मरा पड़ा है।

पादरी आशीर्वाद देना भूल गया, उसने क्रोध से झल्ला कर कहा- हटाओ इन कलुष ग्रस्त लाशों को इस पवित्र स्थल से और उन्हें मरघट के एक गंदे कोने में गाढ़ दो।

ऐसा ही किया गया। वे लाशें कूड़े के ढेर में गाढ़ दी गई। वे सड़ गई और दो पुष्प गुल्मों के रूप में उग कर सारे मरघट को सुगन्ध से महकाने लगी।

उस दिन गिरजे में उत्सव था। धूप दानी मग धूप और पवित्र जल का अभिसिंचन करके पादरी धर्मोपदेश में निमग्न था और बता रहा था कि पापियों पर स्वर्ग के पिता का शाप किस किस तरह उतरता है। यह तो उसे याद ही नहीं रहा कि ईश्वर का स्वभाव क्रोध नहीं वह तो प्रेम है- अनन्त प्रेम।

धर्मोपदेश की ओर भक्तों ने ध्यान नहीं दिया वे तो वेदी पर पड़े हुए पुष्पों की अलौकिक मादकता से उत्पन्न मस्ती में झूम रहे थे।

पादरी ने सेवकों से पूछा- यह फूल किसने चढ़ाये? कहाँ से पाये? किसके है?

माली ने रुँधे गले से कहा- कूड़े के ढेर में सड़ी मरघट की दो लाशों पर जो झाड़ उगे है उन्होंने मरघट की तरह गिरजा घर को भी महका दिया है।

पादरी की आँखों से दो अश्रु बिन्दु लुढ़क पड़े पूजा की वेदी पर बिखरे हुए उन पुष्पों पर।


जिन्दगी जीनी हो तो इस तरह जिये

जीवन अपने लिए एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। जिसके प्रत्येक पृष्ठ से एक से एक बढ़ कर काम शिक्षायें हमें पढ़ने को मिल सकती है।

कल क्या बीती और कल का दिन कैसे गुजरा इन पर गहराई से विचार करे तो उसमें अनेकों शिक्षाप्रद अनुभव ऐसे मिल सकते हैं जो दूसरों के उपदेश सुनने या विद्वानों को पुस्तकें पढ़ने से भी अधिक कारगर सिद्ध हो सकते है?

कल के समय का जिस प्रकार उपयोग किया गया, और उससे जो पाया गया उससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता था? जिन नासमझियों के कारण कल कई झंझटों में फँसना पड़ा क्या उनसे बचा नहीं जा सकता था? कल किस अवसर पर क्या ऐसे अदूरदर्शी कदम उठ गये जो समझदारी का समय रहते उपयोग करने से टल सकते थे और कुछ किया जा सकता था जो अधिक सुखद और श्रेयस्कर होता? इस प्रकार के प्रश्न यदि अपने आप से पूछे तो सहज ही वे उत्तर सामने आयेंगे जो आगे के लिए ध्यान में रखे जाने पर भावी उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

जीवन का रसास्वादन वे लोग नहीं कर पाते जो अपने लिए ही जीते हैं। खुदगर्जी के तंग दायरे में जीना एक प्रकार की लानत है जो आदमी पर हर घड़ी आत्म ग्लानि की तरह बरसती रहती है। कई व्यक्ति खुदगर्जी की राह अपना कर अधिक सुख साधन इकट्ठे कर लेते हैं दूसरों की तुलना में ज्यादा मालदार लगते हैं। इतना होने पर भी ऐसे लोगों को एक ऐसे अभाव से दुखी रहना ही पड़ेगा जो सामूहिक और पारमार्थिक गतिविधियाँ अपनाये बिना मिल ही नहीं सकता। अपने लिए ही जीना अपनी सुख सुविधाओं की ही बात सोचना वस्तुतः मनुष्य का मानसिक बौनापन है। ओछे और उपहासास्पद ही गिने जाते रहेंगे जहाँ व्यक्तित्व की परख होगी वहाँ उन्हें फिसड्डी ही ठहराया जायेगा। जिन्दगी को प्यार करने वाले लोग अपनी सुव्यवस्था के साधन जुटाने के साथ-साथ यह भी करते हैं कि उन्हें दूसरों के लिए कुछ सोचने और करने का अवसर भी मिलता रहे।

दूसरों के दुःख दर्द में हिस्सा बटाना चाहिए पर वह उतना भावुकता पूर्ण न हो कि अपने साध नहीं नष्ट हो जाये और अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय। आमतौर से उदार व्यक्तियों को ऐसी ही ठगी का शिकार होना पड़ता है। दूसरों को उबारने के लिये किया गया दुस्साहस सराहनीय है पर वह इतना आवेश ग्रस्त न हो कि डूबने वाला तो बच न सके उलटे अपने को भी दूसरे बचाने वालों की ओर निहारना पड़े उदारता के साथ विवेक की नितान्त आवश्यकता है। मित्रता स्थापित करने के साथ वह सूक्ष्म बुद्धि भी सचेत रहनी चाहिए जिससे उचित और अनुचित का सही और गलत का वर्गीकरण किया जाता है। भावुक आतुरता के साथ यदि उदारता को जोड़ दिया जाये तो उससे केवल धूर्त ही लाभान्वित होगे और उन्हें ढूँढ़ सकना संभव ही न होगा जो इस प्रयोग के लिये सर्वोत्तम हो सकते थे। जीवन का आनन्द मैत्री रहित नीरस और स्वार्थी व्यक्ति नहीं ले सकते इस तथ्य के साथ यह परिशिष्ट और जुड़ा रहना चाहिए कि सज्जनता के आवरण में छिपी हुई धूर्तता की परख की क्षमता भी उपार्जित की जाय। ऐसा न हो कि उदारता का कोई शोषण कर ले और फिर अपना मन सदा के लिये अश्रद्धालु बन जाये।

दूसरों के लिये हमें बहुत कुछ करना चाहिए यह ठीक है। पर यह भी कम सही नहीं कि हमें दूसरों से प्रतिदान की अधिक आशाएँ नहीं करनी चाहिए हर किसी को अपने ही पैरों पर खड़ा होना होता है और अपनी ही टाँगों से चलना पड़ता है। सवारियाँ भी समय समय पर मिलती है दूसरों का सहयोग भी प्राप्त होता है। पर वह इतना कम होता है कि उससे जीवन रथ को न तो दूरी तक खींचा जा सकता है और वह तेज चाल से चल सकता है। काम तो अपनी ही टाँगे आती है। खड़ा होने के लिए अपनी ही नस नाड़ियों माँसपेशियों और हड्डियों पर वजन पड़ता है। यदि वे चरमराने लगे तो फिर दूसरे आदमी कब तक कितनी दूर तक हमें खड़ा होने या चलने में सहायता कर सकेंगे?

जो भी योजना बनाये उसमें आत्म निर्भरता का ही प्रधान भाग रहना चाहिए। दूसरों की सहायता के आधार पर जो क्रिया-कलाप खड़े किये जाते हैं वे आमतौर पर अधूरे और असफल ही रहते हैं। दूसरों का सहयोग भी मिलता ही है पर वह आगे तब आता है जब अपनी पात्रता और प्राथमिकता सिद्ध कर दी जाय। ऐसा स्वावलम्बी लोग ही कर सकते हैं वे ऐसी व्यावहारिक गतिविधियाँ अपनाते हैं जो आज की परिस्थितियों, आज के साधनों से अपने बलबूते खड़ी की जा सकती हो। भले ही इस प्रकार का शुभारम्भ छोटे रूप में हो पर उसमें यह संभावना भरी पड़ी है कि उस छोटे काम में बरती गई तत्परता और सावधानी के आधार पर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध की जा सके। यही से दूसरों का सहयोग द्वार खुलता है। भला कोई कैसे पसन्द करेगा कि किसी हवाई कल्पना की उड़ान में उड़ने वाले शेखचिल्ली के नीचे अपनी उँगली फँसा दे और अपनी कीमती सहायता को जोखिम में डालने का खतरा अंगीकार करे।

सहयोग देने की तरह सहयोग लेने की भी आवश्यकता रहती है। पर निर्भर अपने ही पक्षधर रहना चाहिए। इतनी बड़ी बात सोची ही क्यों जाय? इतना बड़ा स्वप्न देखा ही क्यों जाय जिसमें दूसरों का सहयोग न मिलने पर खीज़ या निराशा ही पल्ले बँधे?

कठिनाइयों से कोई बच नहीं सकता। जीवन इतना सरल नहीं है कि उसे गुप-चुप बिना किसी झंझट के जिया जा सके। हमें वह साहस एकत्रित करना ही होगा कि आये दिन नाम रूप बदल कर आने वाली कठिनाइयों का सामना और समाधान करने की सूझ-बूझ परिपक्व होती रहे। शान्ति की आकांक्षा अशान्ति को परास्त करके पाई गई विशय के रूप में की जानी चाहिए। बिना झंझट का सरल और सुख सुविधाओं से भरा पूरा जीवन क्रम एक मधुर कल्पना भर है व्यावहारिक वास्तविकता नहीं जीवन का निर्माण ही खुद इस तरह हुआ है कि उस्तरे की तरह उस पर बार-बार धार रखने की रगड़ से वास्ता पड़ता रहे। जो इस यथार्थता का सामना नहीं करना चाहता, सरलता को ही शान्ति मानता है उसे खाली हाथ ही रहना पड़ेगा अपना शरीर और मन भी क्या कम अशान्ति उत्पन्न करते हैं। नगर निवासियों की तरह ही वनवासी और सक्रियों की तरह ही निष्क्रिय भी क्षुब्ध रहते हैं। उलझनों का स्वरूप बदला जा सकता है पर उनसे न ता कोई गृही बच सकता है और न वैरागी। शान्ति तो उन्हें ही मिल सकती है जो अशान्ति से टकराने की कला के अभ्यस्त और पारंगत बन चुके है।

उत्साह और उल्लास बना रहने के लिए यह आवश्यक है कि अपने सामने कोई दूरगामी लक्ष्य रहे और यहाँ तक पहुँचने के लिए सोचने और करने के लिए बहुत कुछ काम सामने रहे। जीवन का आनन्द तभी तक है जब तक उसने सामने कुछ काम है। जिस दिन व्यक्ति पूर्णतया निश्चित होता है उस दिन या तो वह परमहंस होता है या जड़ मध्यवृत्ति के व्यक्ति के लिए यह स्थिति निरानन्द है और उसमें निराशा एवं निष्क्रियता मिश्रित थकान की ही अनुभूति होगी। उसे सोचना या करना भले ही कुछ न पड़े पर साथ ही आशा एवं तत्परता की ओर प्रेरित करने वाले उल्लास भरे प्रकाश से वंचित ही रहना पड़ेगा

जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डालने की इच्छा इसलिए होती है कि उत्तरदायित्व का वजन उठाना कायर और कमजोरों को बहुत भारी प्रतीत होता है। वे पगडंडी ढूँढ़ते हैं और ऐसे सरल रास्ते बच निकलने की बात सोचते हैं जिसमें अपने ऊपर कुछ बोझ न पड़े पर वस्तुतः इसमें भटकाव के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। उत्थान और पतन का ही नहीं।, सुख और दुःख का उत्तरदायित्व भी हमें अपने ऊपर लेना चाहिए और सफलता असफलता की अपनी ही जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है। वर्तमान में जो परिस्थितियाँ सामने खड़ी है उनमें यत्किंचित् दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं पर अधिकतर अपनी ही रीति-नीति और गतिविधियों की प्रतिक्रिया सामने रहती है। भविष्य में भी जो कुछ होना या बनना है उस में भी अपने ही क्रिया-कलापों के प्रतिफल सामने होगे। दूसरों का सहयोग अवरोध एक सीमा तक ही हमारा भला बुरा कर सकता है। तथ्य यह है कि अपना व्यक्तित्व ही हर दिशा में प्रतिध्वनि की तरह गूँजता है।

किन्हीं असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने की अपेक्षा यह अधिक लाभदायक है कि हम अपनी उन त्रुटियों को ढूँढ़े जिनके कारण सफलता से वंचित रहना पड़ा इसी तरह प्रगति की दिशा में जितने कदम बढ़ सके उनके पीछे उस सुव्यवस्थित रीति-नीति को समझे जिसे अपना कर हम स्वयं ही नहीं और भी कितने ही लोग आगे बढ़ सकने में समर्थ हुए हैं। सद्गुण ही किसी को ऊँचा उठा सकते ओर आगे बढ़ा सकते हैं। यह रहस्य जिन्हें विदित हो सका वे अपने को परिष्कृत करने में जुटते हैं ताकि एक के बाद दूसरी उत्कर्ष की परतें खुलती चलें।


विवाद उठ खड़ा हुआ (Kahani)

देव सभा में यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि ब्रह्मा , विष्णु, रुद्र इन तीनों देवताओं में बड़ा कौन है? तर्क वितर्क बहुत चलते रहे पर अन्तिम निष्कर्ष कुछ नहीं निकला।

समस्या का हल भृगु को सौंपा गया। उन्होंने परीक्षा की विधि निर्धारित की ओर क्रमशः तीनों देवताओं के निवास स्थानों के लिए चल पड़े

पहले ब्रह्मा जी के यहाँ पहुँचे वे सृष्टि रचना और वेद व्याख्यान में लग रहे थे। भृगु जी उन्हें बिना प्रणाम किये समीप के आसन पर गंदे पैरों से जा बैठे।

ब्रह्मा जी कुद्ध हुए और अशिष्टता बरतने के लिए उन्हें बहुत बुरा भला कहा। भृगु देव उठ कर चुप-चाप चल दिये।

अब वे शंकर जी के पास पहुँचे वे पार्वती को कथा सुना रहे थे।

भृगुजी ने वहाँ भी ऐसी ही अशिष्टता बरती बिना प्रणाम अभिवादन किये पार्वती के आसन पर उनसे सट कर जा बैठे।

यह उद्धत आचरण शिवजी को बहुत बुरा लगा और वे आग-बबूला हो गये। त्रिशूल उठाकर उन्हें मारने दौड़े, भृगु जी को जान बचा कर भागना पड़ा

अब विष्णु की परीक्षा होनी थी। भृगुजी विष्णु लोक पहुँचे। वहाँ उन्हें शेष शैया पर सोते देखा तो जगाने के लिए एक लात उनकी छाती में मारी।

विष्णु भगवान हड़बड़ा कर उठ बैठे। उनके चरण सहलाते हुए नम्रता पूर्वक बोले गुरुदेव आपके कोमल चरणों को मेरे कठोर हृदय से टकराने से कष्ट तो नहीं हुआ। कहिए मुझ सेवक के लिये क्या आज्ञा है।

भृगुजी गद्-गद् हो गये और बोले बड़प्पन की परीक्षा करने निकला था। सज्जनता और नम्रता से अशिष्टता और उद्धतता को जीतने की महानता तलाश करने कई जगह फिरा पर मिली आपके ही पास।

भृगुजी के निष्कर्ष से विष्णु भगवान को तीनों लोकों में बड़ा घोषित कर दिया गया।


संगीत शब्द ब्रह्म की स्वर साधना

अणु परिवार की गति विधियों से आगे की शोध करने पर पता चला है कि अपनी धुरी पर तथा कक्षा पर घूमने वाले परमाणु घटकों को जो दिशा, प्रेरणा एवं क्षमता प्राप्त होती है उसका उद्भव एक अतीव सूक्ष्म शक्ति है जिसे ध्वनि का प्रारूप कह सकते हैं।

प्रकृति की प्रेरक शक्ति के अन्तराल में एक प्रकार के स्पन्दन होते हैं। इनकी घड़ियाल में हथौड़ी मारने से उत्पन्न होने वाली टंकार से तुलना कर सकते हैं। टंकार के बाद जो झनझनाहट होती है उसे दिव्य दर्शियों ने ओंकार ध्वनि कहा है। निरन्तर यही ध्वनि सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में गतिशील रहती है। इसी को प्रकृति ब्रह्म का संयोग कहते हैं, इसी आघात प्रतिघात से सृष्टि की समस्त हलचलों का आरम्भ अग्रगमन होता है। अणु को गति यही से मिलती है। एक सत्ता का बहुसंख्यक विकिरण- एकोऽहम् बहुस्याम की उक्ति के अनुसार इसी मर्म बिन्दु से आरम्भ होता है। विन्दुयोग और नादयोग की नाभि यही है, यही स्वर संस्थान नादयोग है, शब्दब्रह्म का अपनी माया-स्फुरणा इच्छा के साथ चल रहा यही संयोग आकार के रूप में निसृत होकर परा और अपरा प्रकृति के गहन गह्वर में जड़ चेतन गतिविधियों का सृजन करता है।

दीवार घड़ी का चलता हुआ पेण्डुलम, एक बार हिला दिया जाय तो घड़ी में चाबी रहते वह अपने क्रम से निरन्तर हिलता ही रहता है। ठीक उसी प्रकार एक बार आरम्भ हुई सृष्टि स्वसंचालित प्रक्रिया के अनुसार अपना कार्य करती रहती- अपनी धुरी पर एक बार घुमाये हुए लट्टू की तरह देर तक घूमती रहती है। इसका संचालक शब्द ब्रह्म की वह मूल ध्वनि है जिसे ॐकार कहते हैं। जिस प्रकार एक सूर्य में सात रंग की किरणें निसृत होती है उसी प्रकार स्वरब्रह्म अपने को सात स्वरों में विभक्त करता है। वाद्ययन्त्रों में उसे सरगम ध्वनि क्रम से बजाया जाता है। योगसाधना में राजयोग, हठयोग, प्राणयोग, शक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग का नाम दिया जाता है। शरीर में इसी को षट्चक्र और सप्तम ब्रह्मरंध्र - सहस्र कमल के रूप में गिना जाता है। सप्तऋषि, सप्तलोक, सप्तसागर, सप्तमेरु, सप्तदेव, सप्ततीर्थ, सप्तसाधना के रूप में ब्रह्मविद्या का विस्तार हुआ है। भौतिकी विज्ञान भी सात भागो में ही विभक्त है।

इन सबको मिलाकर स्वसंचालित सृष्टि क्रम की अन्तः स्फुरणाओं को ब्रह्म संगीत कह सकते हैं। इसी का अलंकारिक उल्लेख कृष्ण की बंसी, शंकर के डमरू, सरस्वती की वीणा के रूप में किया जाता है। सरस्वती की वीणा मानवी काया का मेरुदण्ड- शंकर का डमरू धधकता हुआ हृदय कहा जा सकता है। लप-डप को, धड़कन को, शंकर का डिम-डिम घोष कहा गया है। श्वास नलिका में वायु का आवागमन ‘सोऽहम्’ की ध्वनि में कृष्ण बाँसुरी के रूप में निनादित होता है। इड़ा, पिंगला और आरोह अवरोह मेरुदंड की वीणा में सप्त व्याहृतियों के सप्त स्वरों की झंकार उत्पन्न करते हैं और उसे कुंडलिनी सर्पिणी की सप्त जिव्हाओं से सप्त नादों के रूप में उद्भूत हुआ सुना जाता है। नादयोग के साधक सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के माध्यम से घण्टा नाद, शंख नाद, वेणु नाद, मेघ नाद, निर्झर प्रवाह आदि के रूप में सुनने का प्रयत्न करते हैं और उस आधार पर सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में चल रही अगणित गतिविधियों के ज्ञाता बनते हैं। इन स्वर निनादों के साथ जो अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है वह प्रकृति पर आधिपत्य स्थापित करने और उसे अपनी अनुयायी- संकेत गामिनी बनाने में सफलता प्राप्त करता है। योगविद्या में स्वर विद्या का अपना स्थान है। स्वर शास्त्र स्वर योग की साधना विज्ञान में महत्त्वपूर्ण स्थान है। नासिका द्वारा चलने वाले सूर्य चन्द्र स्वरों को माध्यम बनाकर कितने ही साधक प्रकृति के अन्तराल में प्रवेश करते हैं और वहाँ से अभीष्ट मणिमुक्तक उपलब्ध करते हैं।

पशु-पक्षियों से लेकर छोटे कीड़े-मकोड़े तक के उच्चारण में एक क्रमबद्धता रहती है। संगीतकारों के गायन वादन क्रम से न सही वे सभी एक निर्धारित ध्वनि प्रवाह के अनुसार ही अपना उच्चारण करते हैं। प्रातः काल चिड़ियों की चहचहाहट में एक स्वर क्रम रहता है उसी से वह कर्णप्रिय लगती है। मुर्गे की बाँग, कोयल की कूक, मोर, कौआ, पपीहा, तीतर आदि पक्षियों की वाणी अपने ढंग और क्रम से चलती है। पशुओं में भेड़ का मिमियाना, गधे का रेंकना, घोड़े का हिनहिनाना, हाथी का चिंघाड़ना, शेर का दहाड़ना, कुत्ते का भौंकना क्रमबद्ध रहता है। किसी भी पशु की किसी भी पक्षी की आवाजें सुनी जाये उनमें एक व्यवस्थित क्रम जुड़ा हुआ प्रतीत होगा। छोटे कीड़ों में भी यही बात देखी जाती है, झींगुर रात भर बोलते हैं, झिल्ली की झंकार उठती है उसे सुनने वाले अनुभव कर सकते हैं कि निद्रा लाने वाली एक मनोरम स्वर लहरी इन तुच्छ से कीटकों के माध्यम से सुनाई जाती है। मनुष्य के कानों की पकड़ से बाहर प्रायः प्रत्येक जीवधारी द्वारा निसृत होती है और पेड़ पौधों से लेकर जड़ समझे जाने वाले पदार्थों तक से एक प्रश्वास जैसी निरन्तर स्वसंचालित स्वर क्रम निरन्तर निनादित होता रहता है।

सेनाएँ जब किसी पुल को पार करती है तो उन्हें आज्ञा दी जाती है कि लैफ्ट राइट क्रम के अनुसार कदम मिलाकर न चले। क्योंकि कदम मिलाकर चलने से एक ऐसी प्रचण्ड शक्तिशाली ध्वनि उत्पन्न होती है जो अमुक स्थिति में उन पुलों को ही गिरा सकती है। बिजली की तड़कन शब्द से बड़ी- बड़ी आलीशान इमारतें कोठियाँ फट जाती है। धड़ाके की आवाज से कानों के पर्दे फट जाते हैं। इस शक्ति का यदि क्रमबद्ध रूप से उपयोग किया जा सके तो शारीरिक मानसिक स्वस्थता के लिए ही नहीं सृष्टि के अनेक पदार्थों और संसार की बहुमुखी परिस्थितियों एवं वातावरणों को आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित किया जा सकता है।

वेदों का अवतरण शब्द ब्रह्म के सहित हुआ है। स्वर अपौरुषेय है इसलिए वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है। प्रत्येक वेद मंत्र को ऋचा एवं छन्द कहा जाता है उससे उसकी स्वरबद्धता स्पष्ट की गई है। वेदों के गायन की ध्वनि पद्धतियों को ही सामगान कहते हैं। सामवेद के अपने मंत्र तो उँगलियों पर गिनने जितने ही है शेष प्रायः सभी अन्य तीन वेदों से लिये गये है और उनका संकलन विशिष्ट स्वर लिपियों के साथ किया गया है। किसी समय सामगान वैदिक साधना पद्धति का प्रधान अंग था। इसी आधार पर स्व , पर कल्याण के अनेकों प्रयोजन सिद्ध होते थे। वेद मंत्र में जो शिक्षायें सन्निहित है वे तो साधारण है, उनसे भी अधिक स्पष्ट और प्रभावी शिक्षायें, स्मृतियाँ तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थों में मौजूद है। वेद मंत्रों का महत्त्व मात्र उनके अर्थों या निर्देशों तक सीमित नहीं है वरन् उनकी गरिमा उन शक्तियों में अन्तर्निहित है जो इन ऋचाओं के सस्वर उच्चारण से प्रादुर्भाव होती है।

सूक्ष्म विज्ञानी जानते हैं कि रक्ताभिषरण, श्वास-प्रश्वास आकुंचन प्रकुञ्चन का शरीर में निरन्तर चलने वाला क्रिया-कलाप विभिन्न प्रकार की स्वर ध्वनियाँ उत्पन्न करता है और उन्हीं के तरंग प्रवाह से जीवन गति चलती है। नादयोग के पूर्वार्द्ध में साधक अपनी कर्णेन्द्रिय का संयम करके इन्हीं ध्वनियों को सुनता है और सपेरे एवं अहेरी की रीति अपनाकर मन रूपी मृग एवं सर्प को वश में करता है। कहा जा चुका है कि सृष्टि के विभिन्न क्रिया-कलापों को संचालित करने वाली भौतिक शक्तियाँ तथा भावनात्मक अभिव्यंजनाएँ सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में मूलतः ध्वनि प्रवाह बनकर ही कार्य कर रही है। यह ध्वनि प्रवाह संख्या में सात है। शरीर में भी इनकी संख्या सात है और सृष्टि के अन्तराल में भी वे सात ही है। वेद मंत्रों की स्वर संरचना इसी तथ्य को ध्यान में रखकर हुई है। उनका विधिवत् उच्चारण जहाँ प्राण धारियों में विभिन्न स्तर की स्फुरणाएं उत्पन्न करता है वहाँ सृष्टिगत हलचलों के मूल में चल रहे स्पन्दनों के साथ भी अपना सम्बन्ध बनाता है। इसी आधार पर वेद मंत्रों के आश्चर्यजनक प्रभाव प्रकट होते हैं। शाप वरदान की शुभ के अभिवर्धन और अशुभ के निराकरण की जो शब्दश्रुति में भरी पड़ी है उसका आधार यह वैदिक स्वर विज्ञान ही है। लय योग के साधक ‘अनहद नाद’ के नाम से इसी व्याख्या करते हैं और नाद बिन्दु योग को आधार मानकर परब्रह्म के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करते हैं। सिद्धियाँ और विभूतियाँ इसी तादात्म्य से स्पष्ट होती है। प्राचीनकाल में समय -समय पर वेद-मंत्रों के सस्वर उच्चारण का प्रयोग स्वरविद्या के रूप में- मानवी व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए उससे उत्पन्न अवरोधों का समाधान करने के लिए किया जाता रहा है। प्रयत्न किया जाय तो उस विज्ञान को पुनर्जीवित करके वैसा ही लाभ फिर उठाया जा सकता है जिससे व्यक्तित्व में देवत्व का उदय और समाज में स्वर्गीय परिस्थितियों का अवतरण किया जा सके।

फ्राँसीसी प्राणि शास्त्री वास्तोव आन्द्रे ने थलचरों, जलचरों और नभचरों पर विभिन्न ध्वनि प्रवाहों की- स्वर लहरियों की होने वाली प्रतिक्रियाओं का गहरा अन्वेषण किया है तदनुसार वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि संगीत प्रायः प्रत्येक जीवधारी के मस्तिष्क एवं नाडी संस्थान पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालता है, उनकी प्रकृति और मनः स्थिति के अनुरूप यदि संगीत बने तो उन्हें मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक उत्साह प्राप्त होता है। किन्तु इनकी कर्णेन्द्रिय को कर्कश लगने वाली अरुचिकर ध्वनियाँ बजाईं जाये तो उससे उन्हें अप्रसन्नता होती है और स्वास्थ्य संतुलन भी बिगड़ता है। किस प्राणी की किस स्थिति में किस प्रकार का संगीत क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है उसका अध्ययन करने जर्मन प्राणि शास्त्री यह आशा करत है कि भविष्य में विभिन्न जीवधारियों की मनः स्थिति में आशाजनक परिवर्तन समय समय पर किया जा सकेगा। हिंस्र पशुओं को भी कुछ समय के लिए शान्त किया जा सकेगा और अवांछनीय जीवों को उनके लिए अरुचिकर सिद्ध होने वाली ध्वनियाँ करके उन्हें दूर भगाया जा सकता है। इसी प्रकार उन्हें कई प्रवृत्तियों में संलग्न और उदासीन बनाने का कार्य भी संगीत के माध्यम से किया जा सकता है।

सर्प का बीन की नाद पर मुग्ध होकर लहराने लगना, हिरनों का अहेरी का वाद्य सुनकर खड़े हो जाना, प्रसिद्ध है। वाद्य बाल वृद्ध सभी को आकर्षित करता है। उसे प्रत्येक उत्सव आयोजन में स्थान दिया जाता है। मनोरंजन में तो उसका स्थान किसी न किसी प्रकार रहता ही है। थके हारे लोग इस माध्यम से नवीन स्फूर्ति प्राप्त करते हैं। संगीत शब्दब्रह्म की स्वर साधना है उससे मनुष्यों का ही नहीं समस्त प्राणियों का श्रेय साधन हो सकता है और सर्वत्र उल्लास, आनन्द का विस्तार हो सकता है।


भजन में लीन हुआ मन (Kahani)

भगवत् भजन में लीन हुआ मन ऐसे ही भासित होता है जैसे तपा हुआ कुन्दन। फिर वहाँ वासना का एक भी कण नहीं जम पाता।

जिस समय संत तुकाराम भंडारा पर्वत पर अपनी साधना में लीन थे- एक स्त्री अपने रूप पाश में बाँधने के उद्देश्य से वहाँ आई। संत तुकाराम ने एक अभंग में उसे जो उद्बोधन दिया उसने उस स्त्री का मन ही पलट दिया। वे कहते हैं “ परस्त्री मेरे लिए रुक्मिणी माता के समान है, इसलिए हे माता! तुम जाओ और मेरे लिए कुछ प्रयत्न मत करो, हम तो विष्णु के दास है। मुझसे तुम्हारा यह पतन देखा नहीं जाता। तुम आगे कभी ऐसी अपवित्र बात मुख से मत निकालना। “ और उस कामासक्ता रमणी को इस प्रकार रुक्मिणी माता बनाकर संत ने उसे विदा कर दिया।


दीर्घायु और सरस जीवन की पगडंडी

पैरिस के सारवोन विश्वविद्यालय की 80 वर्षीय विशिष्ट छात्रा अंग्रेजी और जर्मन भाषा का अध्ययन करती रही और शिक्षा क्षेत्र में अपना अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करती रही। बर्फ जैसे श्वेत बालों वाली महिला का दंत रहित और झुर्रियों से भरा हुआ चेहरा चमकती हुई आँखों के कारण अपने ढंग के विशेष आकर्षणों का केन्द्र था। उक्त महिला के तीन पुत्र, सात पोतियाँ और एक परपोती थी। पढ़ाई उसने वहाँ से आरम्भ की जहाँ से उसने साठ वर्श पूर्व गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हुए उसने छोड़ी थी।

इस वृद्ध छात्रा का कहना है कि कुछ ध्येय लेकर आरम्भ किया हुआ काम ही जीवन की सरलता स्थिर रख सकता है। निरुद्देश्य समय काटने वाले लोग शारीरिक दृष्टि से भले ही अपना अस्तित्व बनाये रहे मानसिक दृष्टि से गिरते और मरते ही चले जाते हैं। वह चाहती थी कि मौत के दिन उसका जीवन आशा और उत्साह युक्त क्रिया कलापों में लगा रहे, इसलिए उसने यही निश्चय किया कि विद्याध्ययन जैसे रुचिकर कार्य में वह अन्तिम साँस चलने तक लगी रहे।

कई व्यक्ति काम से बचने का प्रयत्न करते हैं और निठल्लेपन को सौभाग्य या आनन्द का केन्द्र मानते हैं। अपने छोटे-छोटे कार्यों तक को स्वयं न करके दूसरों पर आश्रित रहते हैं। न उनके सामने कोई लक्ष्य होता है न दिशा। जैसे तैसे समय काटने के लिये निरर्थक कार्यों या व्यक्तियों का सहारा ताकते हैं। जिन्हें सक्रियता में रुचि है और सोद्देश्य क्रमबद्ध जीवन क्रम के परिणामों को समझा है वे इस प्रकार के निठल्लेपन को एक गई गुजरी आदत मानते हैं।

आयु के अनुसार श्रम का स्तर एवं स्वरूप बदला जा सकता पर हर हालत में संलग्नता और तत्परता तो बनी ही रहनी चाहिए। पूर्णतया निरर्थक व्यक्ति तो कभी भी नहीं बन सकता। अन्धे और रोगी भी कुछ न कुछ उपयोगी शारीरिक या मानसिक श्रम कर सकते हैं यदि श्रम के प्रति निष्ठा हो- सक्रियता का महात्म्य विदित हो तो हर शारीरिक स्थिति में कुछ न कुछ ऐसा, काम ढूँढ़ा जा सकता है, जिसके आधार पर आर्थिक, परमार्थिक, बौद्धिक, अथवा दूसरे प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त हो सके। जीवन मनः स्थिति का प्रमाण परिचय उसकी उत्साह भरी क्रियाशीलता के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता है। जिसे श्रम करने से डर लगता है उन कामचोरों को ऐसा जीवित मनुष्य कहा जा सकता है जो जिन्दा तो है पर जिसे जिन्दगी के आनन्द का कुछ भी ज्ञान नहीं।

रूस के अजरवेजान प्रान्त के लोग दीर्घ जीवी होते हैं वाकू नगर में एक 159 वर्षीय वृद्ध शिराली मिसलीमोव का सम्मान समारोह मनाया गया तो वह अपने गाँव से 6 मील दूर पैदल चलकर वहाँ पहुँचा। यह वृद्ध किसान अपना भेड़ पालने का काम भली प्रकार कर लेता है और हर घड़ी किसी न किसी काम में लगा रहता है।

रूस सरकार ने कुछ वर्श पूर्व ऐसे ही एक 158 वर्षीय किसान मखमूद इवाजोव को सम्मानित किया है। अखबारों के संवाददाता जब उससे इस दीर्घजीवन का रहस्य पूछने गये तो उसने इतना ही कहा कि वह दिमागी उथल-पुथल और क्षोभ विक्षोभों से दूर रहा है- शान्ति पूर्ण और हँसी खुशी से दिन गुजारता रहा है, संतोषी बनने और साथियों के साथ हिल-मिलकर रहने की राह पर चला है और हर घड़ी अपने काम में दिलचस्पी लेते हुए सक्रिय रहा है। नियमितता और समय की पाबन्दी उसकी आदत रही है। इसके अतिरिक्त और कोई रहस्यमयी बात या क्रिया याद नहीं आती जो उसके दीर्घजीवन का विशेष कारण कही जा सके।

वस्तुतः इन्हीं सामान्य गतिविधियों में शारीरिक और मानसिक आरोग्य एवं आनन्द का रहस्य छिपा पड़ा है।


वाणी सोच समझकर और विचार पूर्वक बोलें

प्रतीत होता है कि जीभ ही शब्द बोलती है और कंठ से ही स्वर निकलता है। पर गहराई से देखने पर प्रतीत होता है कि शब्दोच्चारण के पीछे सारा कार्य कलेवर और मनः संस्थान काम कर रहा होता है। बात करते समय कमर से ऊपर के अंगों में प्रायः स्पन्दन होता है। वाणी के साथ अगणित भाव और प्रभाव होते हैं। वे इतने जटिल और सूक्ष्म होते हैं कि मात्र ध्वनि के आधार पर उनकी समग्र अभिव्यक्ति संभव नहीं हो सकती है। चेहरे की इंच इंच जगह प्रयत्न करती है कि जो अभिप्राय शब्दों की सीमित शक्ति से व्यक्त नहीं हो सकता उसे नेत्र, कपोल, होंठ, दाँत, भवें आदि मिलकर उस कमी को पूरा करें और सामने उपस्थित व्यक्ति को वह प्रयोजन समझायें जो वक्ता का है। उच्चारण के समय हाथ, उंगलियां , कंधे भी विचित्र मुद्राओं में हलचल करते रहते हैं। इसका प्रयोजन भी उच्चारण में अभिव्यक्ति को प्रकट करने की जो कमी रह गई है उसे पूरा करना ही होता है।

यह तो अभिव्यक्ति की बात हुई। मूलतः शब्द का स्पन्दन बहुत गहराई से होता है। आध्यात्म शास्त्र में इसका स्थान ‘नाभि’ माना गया है। हृदय की वाणी , अन्तः करण की स्फुरणा’ जैसी उक्तियों में यही बताने का प्रयत्न किया जाता है कि मुख से जो कहा गया है उसका सम्बन्ध भाव संस्थान के साथ भी जुड़ा हुआ है। इतना ही नहीं उच्चारण की पृष्ठभूमि बनाने में हृदय , फुफ्फुस, नाडी संस्थान, स्नायु मंडल, आँतें, आमाशय, वृक्क, यकृत आदि का महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध रहता है। योग विज्ञान ने नाद का उद्भव षट्चक्रों और एक सौ आठ उपहल्का चुल्लिकाऐं- ग्रन्थियों के सम्मिलित संस्थान से होता है। इसके लिए उसके साथ पूरा व्यक्तित्व ही जुड़ा होता है। वाणी का रहस्यमय विश्लेषण किया जाये तो उससे किसी व्यक्ति के शारीरिक , मानसिक और भावनात्मक स्तर को भली प्रकार जाना जा सकता है। असल में वाणी के साथ पूरा व्यक्तित्व ही बोलता है और उच्चारण की परिधि शब्दों के अर्थ तक ही सीमित नहीं होती, वरन् उसके साथ ऐसा विचित्र प्रभाव भी जुड़ा होता है जिसे समझने के लिये कर्णेन्द्रिय ही पर्याप्त नहीं होती है। उसके लिए मनः चेतना के सूक्ष्म स्तर को विकसित करना होता है।

साधारण वार्तालाप में कंठ, जीभ और मस्तिष्क का सीमित प्रयोग होता है इससे जानकारियों का आदान-प्रदान होता है और उस आदान-प्रदान को किन भली बुरी अभिव्यक्तियों के साथ ग्रहण किया है इसका परिचय मिलता है। यह वैखरी वाणी कहलाती है। दैनिक व्यवहार में इससे भी काम चल जाता है। यो इससे अधिक सफलता तभी मिलती है जब व्यक्ति का आकर्षण जुड़ा हुआ हो तथा वह सुनने वाले को प्रभावित करने योग्य हो।

वैखरी वाणी का उपयोग विभिन्न लौकिक क्रिया कलापों में होता है। सफल नेता, सफल वक्ता इसी आधार पर बना जा सकता है कि वाणी को हृदयग्राही बनाने में कितनी सफलता प्राप्त कर ली गई। कहना न होगा कि प्रगति के लिए दूसरों के साधन सहयोग की भी अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है और उस क्षमता का विकास बहुत करके इस बात पर निर्भर रहता है कि अभीष्ट प्रयोजन के लिए वाणी को किस प्रकार कितनी मात्रा में प्रभावोत्पादक बनाया जा सकता है। सफल अध्यापक इसी विशेषता के विकसित होने पर थोड़ी पढ़ाई में भी इतना कुछ समझा देते हैं कि छात्र पर्याप्त मात्रा में ज्ञान संवर्द्धन में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सके।

वाणी के और भी गहरे स्तर है जिन्हें मध्यमा, परा और पश्यंती कहा गया है उनमें शब्दों का उच्चारण स्वल्प होते हुए भी उनके साथ व्यक्तित्व की प्रचण्ड क्षमता का अधिकतम समावेश होता है। प्रतिभा वालों के संपर्क में पहुँचने वाले लोग उसी प्रभाव से प्रभावित होते हैं। ऋषियों के आश्रम में सिंह और गाय के साथ साथ रहने की बात प्रसिद्ध है। गुरुकुलों में रहने वाले अन्तेवासी प्रायः अपने प्राचार्य के ढाँचे में अपना समग्र व्यक्तित्व ढाल लेते थे। इसलिए उन्हें अपने पिता का पुत्र होने से भी अधिक श्रेय और गौरव गुरु का मिलता था। शिक्षा पद्धति प्रायः सभी गुरुकुल में एक जैसी रहते हुए भी किन्हीं शिक्षा संस्थान की उपलब्धियाँ उच्च स्तर की होती थी, वहाँ के छात्र प्रखर व्यक्तित्व लेकर निकलते थे इसका कारण पाठ्य विधि को नहीं शिक्षकों के व्यक्तित्व को ही समझा जाता था। वे वाणी अधिक बोले या कम इससे कुछ खास अन्तर नहीं आता था। अनुभूतियों को स्वरूप शब्दों में अथवा बिना शब्दों का सहारा लिए मौन रूप में भी प्रकट और प्रेरित किया जा सकता है।

सत्संग और सान्निध्य का अभिप्राय यही है कि प्रभाव शाली व्यक्तियों के प्राणिक ऊर्जा से निकट निवासी लोग अधिकाधिक लाभ उठा सके। आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति लोगों के पास जाकर अथवा उन्हें अपने पास बुलाकर उन्हें लाभान्वित होने का अवसर इसी आधार पर देते थे। इस प्रभाव प्रत्यावर्तन में प्रधानतया वाणी ही प्रमुख माध्यम होती थी। गुरु मंत्र, आशीर्वाद, परामर्श में शब्द कम होते थे किन्तु प्रभाव अधिक होता था। इससे स्पष्ट है कि शब्दों के साथ उच्चारण कर्ता की उच्चस्तरीय स्फुरणाएं, क्षमताएँ एवं अभिव्यक्तियाँ प्रचुर मात्रा में रहती है। इसके बिना कोरी बकवास का कुछ अधिक प्रभाव परिणाम नहीं हो सकता।

अनावश्यक अस्त-व्यस्त और अवांछनीय बक-झक करते रहना विकृत व्यक्तित्व का चिह्न है। इसी बात को कुछ यो भी कह सकते हैं कि बकवादी लोग अपने व्यक्तित्वों को विकृत कर लेते हैं। बोलना सीमित होना चाहिए, सोद्देश्य होना चाहिए मुँह खोलने से पूर्व विचार कर लेना चाहिए इस कार्य के लिए क्या बोलना हैं और उसके लिए अपनी अन्तः चेतना को तदनुकूल बना लिया जाय। यदि ऐसा किया जा सके तो उसका प्रभाव परिणाम निस्सन्देह आशा जनक होगा। थोड़े से शब्द ही बहुत काम कर सकेंगे। इससे समय बचेगा, शक्ति बचेगी और सुनने वाला उसे अच्छी तरह समझने तथा पचाने में समर्थ हो सकेगा ‘आँधी -तूफान की तरह शब्दों की झड़ी लगाने वाले- इन शब्दों को हाँकने वाले और बकवास की रेल लगाने वाले’ आत्म प्रवंचना करके अपनी योग्यता पर आप प्रसन्न हो सकते हैं, पर उसका प्रभाव परिणाम अत्यन्त स्वल्प होता है। उच्चारण में हुआ अपव्यय शब्दों के साथ जुड़ी शक्ति को बिखेर देता है और वक्तृत्व की क्षमता क्षत विक्षत अस्त व्यस्त और प्रभावहीन हो जाती है।

आत्मविद्या में मौन को बहुत महत्त्व दिया गया है। उसे वाणी का तप माना गया है। वाक् को देवी सरस्वती कहा गया है। शाप और वरदान देने की क्षमता उसमें भरी पड़ी है। सम्मोहन और विस्फोट के तत्व उसमें भरे पड़े है और वे नगण्य प्रतीत होते हुए भी इतने महत्त्वपूर्ण है कि उनका परिणाम अपने लिए एवं दूसरों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला हो सकता है। मंत्र विज्ञान का आविर्भाव इसी आधार पर हुआ है। उपासक का पहला काम अपने अन्तरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र व परिष्कृत बनाता है ताकि प्राणऊर्जा आध्यात्मिक विद्युत का भण्डार उसके अन्दर भरा पूरा रह सके। इसके उपरान्त मन की एकाग्रता एवं भावनात्मक श्रद्धा विश्वास का पुट देकर चेतना प्रवाह को एक विशेष दिशा में गतिशील किया जाता है। यह दोनों आधार सुदृढ़ करते चलने वाले मंत्र जपकर्ता अपनी वाणी के माध्यम से अभीष्ट प्रयोजन के लिए आवश्यक शक्ति का आविर्भाव करते हैं। बार -बार के उच्चारण से मंत्र के शब्द प्रवाह स्थूल और सूक्ष्म अंग प्रत्यंगों में अपनी प्रतिध्वनि के साथ द्रुतगति से उमड़ते घुमड़ते रहते हैं फलस्वरूप अपने को सिद्ध पुरुष जैसी स्थिति में अनुभव कर सके और दूसरों को उस उत्पादित ऊर्जा द्वारा लाभान्वित कर सके।

गाली गलौज, कर्कश, कटु भाषण, अश्लील मजाक , कामोत्तेजक गीत, निन्दा चुगली, व्यंग, क्रोध एवं आवेश भरा उच्चारण, वाणी की रुग्णता प्रकट करते हैं। ऐसे शब्द दूसरों के लिये मर्मभेदी नहीं होते वरन् अपने लिए भी घातक परिणाम उत्पन्न करते हैं। विज्ञान वेत्ता बताते हैं कि उच्चारित शब्द मुख से निकलने के बाद पहला प्रभाव उस पद छोड़ता है जिसके लिये उसे कहा गया है। उसके बाद वह समुद्र की लहरों की तरह समस्त ब्रह्माण्ड में दौड़ पड़ता है और एक लम्बी यात्रा करने के बाद शब्दबेधी बाण की तरह अपनी मूल उद्गम स्थल पर लौट आता है और वही विसर्जित होता है। यदि उच्चारित शब्दावली दुर्भाव भरी हो तो उससे विश्व ब्रह्माण्ड में अवांछनीय हलचलें उत्पन्न होगी जीवधारियों और प्रकृति पदार्थों पर हानिकारक प्रभाव पड़ेगा, उन्हें क्षति पहुँचेगी। इसके उपरान्त वह उसका अन्त विसर्जन अपने आप में होगा तो उसकी हानि कारक प्रतिक्रिया अपने को ही भुगतनी पड़ेगी इस प्रकार कटुभाषी व्यक्ति दूसरों को ही नहीं अपने आप को भी घायल करता है और वाणी के दुरुपयोग से अनाड़ी द्वारा किए गए शस्त्र-संचालन की तरह सर्वत्र विग्रह ही उत्पन्न करता है।

कटुभाषी व्यक्ति अपनी ही तरह अपने परिवार का भी भारी अहित करते हैं। वयस्क लोग जो कटु शब्दों के अर्थ और प्रहार को समझते हैं उत्तेजित होकर विद्रोही बनते हैं और कटुभाषण के पीछे छिपे हुए सदुद्देश्य, सदुपदेश को भी मानने से इनकार कर देते हैं। आत्म सम्मान पर जिसके भी चोट पहुँचेगी वह विद्रोही बनेगा। और उस आघात का बदला अवज्ञा के रूप में लेगा। इस प्रकार कटुभाषी का रोष प्रकट करना न केवल व्यर्थ ही जाता है वरन् उलटी हानिकारक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करता है उससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में तनिक भी सहायता नहीं मिलती। परिवार में विग्रह और विद्रोह उत्पन्न करने के दोषी उसके कटुभाषी सदस्य ही होते हैं।

छोटे बच्चे शब्दों को अर्थ भले ही न समझे पर उसके प्रभाव से अपनी सुकोमल संवेदन शक्ति के कारण और भी अधिक प्रभावित होते हैं उनके व्यक्तित्व के सही विकास में भारी अवरोध घर का क्रोध युक्त वातावरण ही उत्पन्न करता है जिन घरों में बात बात पर चख चख झक झक होती रहती है उन घरों में पलने वाले बालक बड़े होने पर कभी सुयोग्य और सुविकसित नहीं हो सकते। इन तथ्यों को यदि बारीकी से समझा जाय तो यह सहज ही अनुभव हो सकेगा कि व्यक्ति और परिवार और समाज की सुव्यवस्था में वाणी का भारी योगदान है अतः बोलते समय हमें काफी सोच विचार के बाद ही कुछ उच्चारण करना चाहिए।


Quotation

कौन कितना आगे बढ़ा यह नहीं वरन् महत्त्व की बात यह है कि किस तरह आगे बढ़ा यदि हाथों ने बिना दूसरों का ग्रास छीने और पैरों ने बिना दूसरों का सिर कुचले प्रगति की है तो ही उस बढ़ने की सार्थकता है। - टॉलस्टाय


अब्राहमलिंकन दैनिक कार्यों से (Kahani)

अब्राहमलिंकन दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर सुबह ही सुबह अपने जूतों पर पालिश कर रहे थे। उनका एक मित्र आया। एक राष्ट्रपति को अपने जूते पर पालिश करते देख तो उसे लगा जैसे उसकी आँखें धोखा खा रही है। आखिर उस पर न रहा गया तो बोला- लिंकन! यह क्या करते हो। तुम्हें अपने जूतों पर स्वयं पालिश करनी पड़ती है।

‘तो क्या तुम दूसरों के जूतों पर पालिश करते हो।’ कुछ देर के लिए कमरा कह कहो से गूँज उठा। मित्र ने कहा- मैं तो जूतों पर पालिश स्वयं न करके दूसरों से करवा लेता हूँ।

‘मेरी समझ में दूसरों के जूतों पर पालिश करने से भी यह बुरी बात है अपने जूतों पर किसी मनुष्य से पालिश करवाई जाये। इतने छोटे- छोटे कार्यों के लिए हमें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए।’

लिंकन की बात सुनकर मित्र के पास उत्तर के लिए अब शेष ही क्या रह गया था?


स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन

मन बैसाखी गधे की तरह है जिसे नहला धुला देने पर भी मलीनता प्रिय लगती है और दूसरे ही दिन धूलि में लौटकर फिर पहले जैसी गंदगी में लिपट जाता है। हाथी की आदत भी ऐसी ही होती है। नदी तालाब में बैठा स्वच्छ होता रहेगा पर जब बाहर निकलेगा तो सूँड़ में रेत भर कर सारे बदन पर डाल लेगा। न जाने गंदगी में इन्हें क्या मजा आता है?

मन की आदत भी ऐसी ही गंदी है। स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले। पर यह ज्ञान देर तक नहीं ठहरता किसी मुर्दे की जलाने जाते हैं तब मरघट में श्मशान वैराग्य’ उठता है। काया नाशवान् होने की बात सूझती है और लगता है इस क्षणभंगुर जीवन के लिए क्या बुराइयाँ ओढ़नी क्या पाप करने। क्या अहंकार करना- किस बात पर इतराना। उस समय तो यही ज्ञान जंचता है पर घर आते आते वह वैराग्य न जाने कहाँ हवा में उड़ जाता है और उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगते हैं।

यही स्थिति सदा बनी रहे तो ज्ञान, परमार्थ की बात बेकार है। चिकने घड़े की तरह यदि श्रेष्ठता भीतर घुसे ही नहीं तो बाहर की लीपा-पोती से क्या काम चलेगा। ज्ञान की सार्थकता तो तब है जब उसका प्रभाव अन्तः करण पर पढ़े और जीवन की रीति- नीति बदले। ऐसा न हो सका तो पढ़ने सुनने के - पोथी के बेंगने भूख को कहाँ बुझाते हैं।

हमें यह ध्यान में रखकर चलना चाहिए कि मन की मलीनता बढ़ाने के लिए कुछ बड़े और लगातार प्रयत्न करने पड़ते हैं तब कही वह काबू में आता है। घोड़े को सही रास्ते पर चलाने के लिए उसके मुँह में लगाम लगानी पड़ती है और हाथ में चाबुक रखना पड़ता है ऐसा ही प्रबन्ध मन के लिए किया जा सके तो ही वह रास्ते पर चलेगा।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।


कानून न्याय की आत्मा का हनन न करने पाये

व्यक्ति का समाज के प्रति और समाज का व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य है उसकी मर्यादाओं का निर्धारण नीति शास्त्र, नागरिकशास्त्र और समाजशास्त्र के अंतर्गत हो जाता है। प्राचीन काल में इन्हीं का संक्षिप्त सार लेकर धर्मशास्त्र के व्यवहार पक्ष का निर्धारण हुआ था। मनुष्य की लिप्साएं और लालसाएं बहुधा अत्यन्त तीव्र हो उठती है और उस आवेश में यह भुला दिया जाता है कि उचित और अनुचित के भेद को ध्यान में रख कर ही स्वार्थों की पूर्ति की जानी चाहिए। इसी आवेश पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सदाचार परक मर्यादाओं की स्थापना की गई है।

थामस एक्वीनास ने कहा था- ईश्वर की इच्छा के द्वारा संचालित संसार में शाश्वत नियम कार्य कर रहे है। कानून का- न्याय व्यवस्था का आधार इन्हीं नैतिक नियमों पर निर्धारित करना चाहिए। विचारक गोटियस ने सार्वभौम एवं सर्वजनीय न्याय व्यवस्था को ही आदर्श माना है और कहा है कि उसका आधार ईश्वरीय निर्देश समझने वाले मानवी अन्तः करण के उच्च स्तर से निकले ‘प्राकृतिक नियम’ ही होने चाहिए।

योरोप में केल्सन और कोहलेर प्रभृति विचारकों की इस बात को भी महत्त्व दिया गया कि उच्च आदर्शवादिता को आधार मानकर केवल सज्जनों के योग्य न्याय व्यवस्था बन सकती है। दुष्ट- दुरात्मा वर्ग के लिए प्रतिशोधात्मक और प्रतिबंधात्मक कठोरता अपनाया जाना भी आवश्यक है।

प्लेटो और ऐरिसटाटिल ने न्याय के आधार पर न्याय के सिद्धान्त पर काफी विचार विवेचन किया है। वे प्राकृतिक न्याय- नेचुरल जस्टिस- के सार्वभौमिक और प्रचलित न्याय- कन्वेंशनल जस्टिस के अन्तर को बताते हुए कहते हैं कि प्राकृतिक न्याय के अनुसार जो किसी से उधार लिया गया है उसे वापिस किया ही जाना चाहिए किन्तु प्रचलित न्याय का सिद्धान्त यह है कि तीन या छः वर्श बाद उन देनदारी से कानूनी छुटकारा मिल सकता है। प्राकृतिक न्याय शाश्वत है उसे धर्म या नीति अथवा ईश्वर आज्ञा की संज्ञा दी जा सकती है किन्तु प्रचलित न्याय सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाये जाते हैं और वे समय-समय पर बदलते रहते हैं।

जूरिस प्रूडेन्स मर्म वेत्ता सालमंड और पोलक ने अपराध की परिभाषा में एक कड़ी और जोड़ी कि मात्र दूसरों को हानि पहुँचाना ही नहीं अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा करके समाज की व्यवस्था और विकास क्रम में बाधा पहुँचना भी एक अपराध है। तब से इस तथ्य को भी कानून की धाराओं में सम्मिलित कर लिया गया।

शेनेरिस का कथन है कि कानूनों का पालन मात्र आतंक या राज्य आज्ञा से ही नहीं हो सकता उसे वास्तविक मान्यता तभी मिलती है जब जनता उसे उचित समझती और पसन्द करती है। वे कहते है- कानून ही न्याय हो ऐसी बात नहीं, पर इतना मानना पड़ेगा कि न्याय की रक्षा के लिए कानून के अस्त्र का प्रयोग किसी न किसी रूप में करना ही पड़ेगा

ऐसे प्रसंग भी आते हैं जब लोग व्यक्तिगत कर्तव्य उत्तरदायित्वों की अवज्ञा करके ऐसे कर्म करते हैं जिनसे दूसरों के उचित अधिकारों का हरण होता है एवं सामाजिक अव्यवस्था फैलती है। यदि उन दुराचरणों की ऐसे ही उपेक्षा की जाय तो अपराधी तत्व अपना मार्ग निर्बाध पाकर और भी अधिक दुस्साहस करने पर उतारू हो जाते हैं। इसलिए समाज की अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ अपराध नियन्त्रण भी एक आवश्यक माना गया है। राजसत्ता द्वारा ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि मर्यादाओं का उल्लंघन करके अनाचरण करने वालों को अपराधी ठहराया जाय। उन्हें पुलिस पकड़े, न्यायालय विचार करे और दण्ड विधान करके उनको समाज की नाराजगी से अवगत कराये और दूसरों को अवगत कराये कि किसी का अनाचरण समाज को सहन स्वीकार नहीं। उसे सार्वजनिक तिरस्कार का- कष्ट साध्य दण्ड प्रताड़ना का भागी बनना ही पड़ेगा फलस्वरूप वह सर्वसाधारण की दृष्टि में अवांछनीय व्यक्ति ही गिना जाएगा और लोगों के विश्वास के अभाव में पग -पग पर जन असहयोग का अनुभव करके अपने प्रगति पथ को अवरुद्ध अनुभव करेगा। समाज इतनी प्रताड़ना देता है। लोक जीवन को पहुँचाई गई क्षति का प्रतिशोध लेना हो तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

आस्टिन ने कानून की पद्धतियों का वर्गीकरण करते हुए- 1. मानसिक चेतना- साइकिक अवेयरनेस 2. उद्देश्य - मोटिव 3. मंशा- इन्टेन्शन को ध्यान में रखकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की बात कही है। आस्टिन ने ईश्वर के प्रति, समाज के लिए राज्य के प्रति और स्वयं अपने प्रति कर्तव्य का पालन करने के लिए हर नागरिक को प्रतिबंधित माना है और सौंपे हुए अथवा स्वीकार किये कर्तव्यों की उपेक्षा अवहेलना करना एवं लापरवाही बरतने को भी अपराधों की श्रेणी में ही गिना है।

दण्ड विधान के तीन सिद्धान्त है- 1. प्रतिबंधात्मक- प्रीवेन्टिल थ्योरी 2. सुधारात्मक- रिफारमेटिव थ्योरी 3. भय उत्पादक- डिटरेण्ट थ्योरी।

प्रतिबंधात्मक थ्योरी के अंतर्गत दंड विधान संभावित अपराधी को, अपराध के लिए उद्यत होने से रोकता है। सुधारात्मक थ्योरी से अपराधी को समाज के अनुरूप ढलने के लिए अभ्यस्त एवं तत्पर बनाने का प्रयास किया जाता है। भय उत्पादक थ्योरी के अनुसार व्यक्ति के साथ निर्मम व्यवहार करके दूसरों का आतंकित करने का प्रयास किया जाता है ताकि और लोगों को वैसा करने की हिम्मत न पड़े कानून में हृदय परिवर्तन के तत्व नहीं है। वह न्यूनतम नैतिकता के विरुद्ध आचरण करने भर के विरुद्ध है।

परम्पराओं पर स्वीकृति की मुहर लगा देने वाले ऐसे कानून भी कम प्रचलित नहीं है जिनका न्याय अथवा विवेक से कतई सम्बन्ध नहीं है। पुरुषों को कई स्त्रियो का अधिकार होना किन्तु स्त्रियो को उस अधिकार से वंचित करना- जाति या धर्म विशेष को अतिरिक्त सुविधाएँ देना- गुलाम प्रथा जैसी परिपाटियों का सहन करना, सामाजिक कुरीतियों का हानियाँ अनैतिकताओं जैसी होने पर भी उन्हें पुराने ढर्रे के अनुकूल चलने देना भले ही बहुसंख्यकों को अभीष्ट हो पर उससे न्याय तत्व की रक्षा नहीं होगी। बहुसंख्यकों की अनुचित इच्छा को भी अल्प संख्यक वहन करे यह औचित्य नहीं। भले ही कानून में उस अवांछनीयता को सहन या स्वीकार किया गया हो।

दंड, किसे कितना इस विधि व्यवस्था के अनुसार दिया जाय, इसका दर्शन शास्त्र ‘जूरिस प्रूडेन्स’ कहलाता है। इस विधि विधान के अनुसार अपराध के कारण, स्वरूप एवं परिस्थितियों पर विचार करके यह निर्धारण करना पड़ता है कि अपराध किस मनः स्थिति में - किस परिस्थिति में किया गया। यह विवेचन किये बिना मात्र अपराध का ब्रह्म स्वरूप देखकर भावावेश में हल्के या कठोर दण्ड की व्यवस्था कर दी जाय तो वह व्यक्ति और समाज के प्रति अन्याय ही होगा। न्याय तो अपराधी को ही मिलना चाहिए। उसे उतना ही दण्ड मिलना चाहिए जितना कि वह अन्तरंग और बहिरंग दृष्टि से भ्रष्ट हुआ है।


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हे भिक्षुओं, जब तक तुम संयमी रहोगे, मित्र भाव रखोगे, मिल बाँटकर खाओगे सत्य और धर्म पर दृढ़ रहोगे तब तक असीम विपत्तियाँ आने पर भी तुम्हारी पराजय नहीं होगी। - बुद्ध

कानून पत्थर की लकीर नहीं है। क्रिया के बदले क्रिया प्रस्तुत कर देना न्याय की विडम्बना भर है, कोई समय था जब चोरी करने वाले के हाथ काट लिये जाते थे, राजद्रोह में मृत्यु दंड दिया जाता था। व्यभिचारी की आँखें फोड़ दी जाती थीं। खून का बदला खून के रूप में लिया जाता था। कोणे मार कर चमड़ी उखाड़ देने से लेकर मल द्वार में कील ठूँसकर, कुत्तों से माँस नुचवाने की, तड़पा-तड़पा कर देर में मारने वाली नृशंस दण्ड प्रक्रियाओं का प्रचलन था। शासन के अतिरिक्त व्यक्ति भी अपना बदला चुकाने में स्वतंत्र थे। इसमें राज्य कुछ हस्तक्षेप नहीं करता था। उस जमाने में कानून थे तो पर उनमें क्रिया के बदले क्रिया का ही सिद्धान्त कार्य करता था। उन दिनों प्रायः शासकों ओर पुरोहितों की इच्छा ही कानून थी। वे चाहे जिस अपराध पर चाहे जो दृष्टिकोण अपना लेने में प्रायः स्वतन्त्र ही थे। ऐसी दशा में न्याय का ब्रह्म स्वरूप भी जो दीखता हो- उसके आतंक से लोगों को आतंकित कितना ही कर दिया जाता हो पर उस तत्व की रक्षा नहीं होती थी जिसे ‘न्याय की आत्मा’ कहना चाहिए और जिसे प्राप्त कर सकना स्वस्थ समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए उपलब्ध होना ही चाहिए। विधि विज्ञान- जूरिस प्रूडेन्स- इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।

सालमंड कानून का औपचारिक उद्गम स्थल राज्य के संकल्पित निश्चय- बिल आव दी स्टेट को मानते हैं और उसे नागरिकों द्वारा शिरोधार्य करने का परामर्श देते हैं , पर यह तभी सम्भव है जब वह संकल्पित निश्चय वस्तुतः “राष्ट्र” का हो। अनेक छल, छद्म अपनाकर एक छोटा गुट किसी प्रकार चुनाव जीत लेता है और सत्ता पर अधिकार जमा लेता है, ऐसी दशा में उसके बनाये हुये कानून किस प्रकार राष्ट्र की आत्मा का संकल्प मान लिये जाये? और यदि वे अनुचित है तो कैसे जन मानस उनके सामने नत मस्तक हो जाय? अधिनायकों- राजवंशियों तथा सैनिकों द्वारा हथियायी निरंकुश सत्ता को तो राष्ट्र का संकल्प मानना और भी अधिक उपहासास्पद है, ऐसी दशा में उनकी इच्छानुसार बनाये गये कानूनों का पालन करने के लिए जनसाधारण को विवश भले ही किया जाय उसे हृदयंगम या स्वीकार्य नहीं बनाया जा सकता है।

टीलियालाजिकल वर्ग के विचारक यह माँग करते हैं कि कानून बनाने के अधिकार राजसत्ता को नहीं वरन् इसके लिए निष्पक्ष और दूरदर्शी विचारकों को एक स्वतंत्र न्याय संस्था रहे। राजसत्ता पर आरुढ वर्ग अपने लोगों के लिए लाभदायक ऐसे कानून भी बना सकता है जो अनुचित एवं अन्याय युक्त हो। पाउण्ड ने इस बात पर जोर दिया है कि न्याय को यदि ढकोसला ही न बनाये रहना हो तो उसकी वर्तमान परिधि को विस्तृत किया जाना चाहिए। चुनाव जीतने वाले अथवा सत्तारूढ़ दल की इच्छा ही कानून बन जाय तो मानव की वह माँस पूरी नहीं हो सकेगी जिसके लिए कानून विज्ञान का सृजन हुआ है।

भूतकाल में प्रचलित परम्पराएँ ही कानून थी। यह सोचने की जरूरत नहीं समझी जाती थी कि उन प्रथाओं एवं मान्यताओं में औचित्य का अंश कितना था। रोमन ला का लैक्सटैलियानिस सिद्धान्त यह कहता था- अपनी रक्षा आप करो। उसमें ‘जैसे को तैसा’ आधार की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि - जितनी चोट तुम्हें लगी है बस उतनी ही चोट तुम आक्रमणकारिता के ऊपर लगा सकते हो। नकली सिक्का बनाने वाले को उबलते पानी में डालकर मार डालने, विवाहित स्त्री का चुम्बन लेने पर होठ सी देने, कर्ज अदा न करने पर ऋणी को गुलाम की तरह बेच कर वसूली करने, राजकर्मचारियों के साथ अभद्रता करने वालों के अंग काट लिये जाते थे। उन दिनों की यह न्याय व्यवस्था तब उचित समझी जाती थी। हो सकता है आज की विधि व्यवस्था भविष्य में अनीति युक्त समझी जाय। साम्यवादी विचारक इसी प्रकार सोचते भी है। वे प्रचलित कानूनों को निहित स्वार्थों को खुल खेलने की मान्यता देने वाली पद्धति भर मानते हैं। वर्तमान न्यायालय उनकी दृष्टि में न्याय की आत्मा से बहुत दूर है।

आधुनिक विधि वेत्ता सामान्य समझदारी विवेक, प्राकृतिक न्याय, युक्ति तर्कवाद, सुविधाजनक वास्तविकता सार्वजनिक नीति, जनहित, मानवता आदि तथ्यों को ध्यान में रखकर न्याय सिद्धान्तों के निर्धारण पर बल देते हैं और इसकी सामयिक विवेचना का निर्णय राजसत्ता के हाथों में सौंपते हैं। राज्य की प्रभुसत्ता सार्वजनिक हित के संरक्षण में विनिर्मित होनी चाहिए तभी वह विधि निर्धारण कर सकेगी अन्यथा डाकुओं के गिरोह की तरह यदि किसी वर्ग विशेष ने बलात् शासन तंत्र पर कब्जा कर लिया है तो उसके कानून न्यायालयों में प्रयुक्त होने पर भी न्याय की आत्मा का संरक्षण न कर सकेंगे मानव अधिकारों के सार्वभौम शाश्वत स्वरूप की रक्षा की कानून व्यवस्था में समुचित सुरक्षा होनी ही चाहिए।

विचारक सैग्विनी कहते हैं किसी जमाने में मनुष्यों को खरीदने बेचने की गुलाम प्रथा को कानूनी मान्यता प्राप्त थीं। राजसत्ता ने उसके समर्थन में नियम बनाये थे और न्यायाधीश उसी आधार पर फैसले करते थे इतने पर भी उनसे न्याय की आत्मा के साथ न्याय हुआ यह नहीं कहा जा सकता।

फक्शनल स्कूल शैली के विचारक डीन पाउण्ड ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि न्यायाधीश की स्वतन्त्र चेतना को बाधित न किया जाय। राजसत्ता उसे यह भी निर्णय करने दे कि अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली परिस्थितियों को भी दोषी ठहराया जाय और उन्हें भी निरस्त करने के लिए आवश्यक सुझाव अथवा आदेश दे सकने का भी न्यायाधीशों को अधिकार दिया जाय। जिस व्यवस्था में अधिक लोगों को अधिक सुख मिले, उसकी दृष्टि में कानून का लक्ष्य वही होना चाहिए।

आस्टीन ने कर्त्तव्य, अधिकार, हानि, दण्ड, अधिवाचना की व्याख्या करते हुए कानून सर्वदेशीय और सर्वकालीन तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया है पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। कोई कानून सर्वजनीन, सर्वकालीन सर्वदेशीय एवं शाश्वत नहीं हो सकता उसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होता है और होना चाहिए।

समाज में सुरक्षित जीवन, उचित व्यवस्था की स्थिरता एवं पारस्परिक विवादों के निपटारे के लिए कानून का विकास हुआ है। पर देखना यह है कि मात्र अपराधी को दोषी दण्डनीय मानकर अपराधों का निराकरण किया जा सकता है? क्या समाज व्यवस्था के दोष व्यक्ति को अपराध करने के लिए विष या प्रोत्साहित नहीं करते? यह सामाजिक पक्ष जब तक विकृत बना रहेगा तब तक अपराधों की शृंखला भी गुप्त या प्रकट रूप से चलती ही रहेगी। विद्वान् केल्सन ने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि न्याय तंत्र में न्यायाधीश एक यांत्रिक इकाई मात्र है। उसे राजसत्ता द्वारा निर्धारित निर्देशों को ही सब कुछ मानना पड़ता है और न्याय प्रकृति की उपेक्षा करनी पड़ती है। नियम निर्धात्री राजसत्ता न तो निर्दोष होती है और न निभ्रान्त। दोषयुक्त कानूनों के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड दिया जा सकता है जो वस्तुतः अपराधी न हो अथवा उसे अपराध करने के लिए विवश किया गया हो।


बरगद का विशाल वृक्ष (Kahani)

बरगद का विशाल वृक्ष नदी के किनारे खड़ा था। यात्री उसके नीचे सुस्ताया और विशालता को सराहता हुआ चला गया।

कुछ ही दिन बाद लौटकर फिर उसी रास्ते आया। पर वहाँ पेड़ नहीं था। यात्री को अचम्भा हुआ और उसने वहाँ के निवासियों से उस पेड़ के न रहने का कारण पूछा?

लोगों ने बताया पेड़ बढ़ा तो जरूर था पर अन्दर से उसकी जड़ खोखली हो गई थी। एक हलका सा तूफान आया और उसे उखाड़ कर फेंक गया।

यात्री रास्ते भर यही सोचता रहा। बाहरी विशालता ही नहीं- अन्दर की गहराई भी आवश्यक है।


प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ भी सर्वथा सत्य कहाँ है?

प्रत्यक्षवादी भौतिक विज्ञान को आदि बुद्धिजीवी वर्ग में सघन मान्यता मिली है। हर बात प्रत्यक्ष की कसौटी पर कसी जाती है और यह देखा जाता कि जो कहा जा रहा है वह इन्द्रियगम्य और बुद्धिगम्य है या नहीं? इस कसौटी पर अध्यात्म और धर्म जब कसे नहीं जा सकते तो कहा जाता है कि अध्यात्मवाद आस्तिकता एवं धर्म धारणा मिथ्या है।

श्रद्धा और तत्व चिंतन को झुठलाते समय बुद्धिवादी यह भूल जाते हैं कि जिस तर्कवाद - और प्रत्यक्षवाद को माध्यम बनाकर वे सत्य की परख करने चले है, वह आधार भी कम लचर नहीं है। उसमें आये दिन परिवर्तन होते रहते हैं। इतना ही नहीं जो कुछ देखा समझा जाता है वह भी कदाचित ही सर्वथा सत्य होता है।

सूर्य का प्रकाश तब चमकता है जब धरती के इर्द-गिर्द वायुमंडल एवं धूलि किरणों से इसकी किरणें टकराकर तिरछी चलती है। वायुहीन शून्य आकाश में सूर्य किरणें चलती ही है पर प्रकाशित नहीं होती। प्रकाश का प्रकटीकरण तब होता है जब उसके टकराने के लिए कुछ माध्यम मिले।

आवश्यकतानुसार अन्तरिक्ष में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए कुछ वैज्ञानिक उपकरण प्रस्तुत करने पड़ते हैं। फिर भी पृथ्वी पर जिस तरह प्रकाश में हर वस्तु सभी तरह दीख पड़ती है वैसा अन्तरिक्ष में नहीं होता। वहाँ कुछ का कुछ दीखने की कठिनाई बनी रहती है।

प्रकाश एक सेकेण्ड में एक लाख छियासी मील की चाल से चलता है और इस चाल से सूर्य के प्रकाश को हम तक आने में आठ मिनट लग जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सूर्य की वास्तविक स्थिति को कभी भी नहीं देखते, वरन् उसे आठ मिनट पहले वाले ही स्थिति देख पाते हैं। यह भ्रम अधिक दूरवर्ती तारों के बारे में और भी बढ़ता जाता है। उनमें से कोई-कोई तो ऐसे है जो सैकड़ों वर्षों पूर्व अपना अस्तित्व तक समाप्त कर चुके, मर गुजर गये, किन्तु उनका प्रकाश तब से चलकर अब कही पृथ्वी पर आ पहुँच आ रहा है, इसलिए वे अभी भी उगते अस्त होते दीखते हैं।

विशिष्ट कोणों पर रखी गई कुछ वस्तुएँ तो अन्तरिक्ष में उत्पन्न किए गए कृत्रिम प्रकाश में बिलकुल ही गायब हो जाती है। कुछ विचित्र प्रकार की दीखती है। बड़े-बड़े गोले छोटी बिन्दी जितने लगते हैं, एक बड़ा कटोरा झुकी हुई लकीर जैसा लगता है। बेलनाकार मोटी छड़ें - समानांतर रेखाओं में फैलती सिकुड़ती और अदृश्य होती प्रतीत होती है। अन्तरिक्ष में उत्पन्न प्रकाश कई बार इतना चमकीला होता है कि नंगी आँखों से देखने पर मनुष्य आँखों से अन्धा तक हो सकता है। किसी वस्तु के हर पक्ष को देखने के लिए कई दिशाओं से यदि प्रकाश पैदा न किया जाये तो फिर उसका स्वरूप ठीक से समझा या देखा ही न जा सकेगा। गैलीलियो ने यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य स्थिर है। इससे पूर्व लेक्शन के मतानुयायी पृथ्वी को स्थिर और सूर्य का चक्कर लगाता हुआ मानते थे। फिर यह माना जाने लगा कि पृथ्वी और सूर्य दोनों ही घूमते हैं। बाद में यह सुधार और जोड़ दिया गया कि समस्त सौरमण्डल एक महासूर्य की परिक्रमा करता है। इतना ही नहीं ऐसे-ऐसे असंख्य महासूर्य एक ध्रुव तारे की प्रदक्षिणा करने में संलग्न है। अभी यह खोजा जाना शेष है कि ब्रह्माण्ड का ध्रुव केन्द्र अब की मान्यता की अनुसार स्थिर है अथवा वह भी आकाशस्थ तारा समूह के साथ किसी अज्ञात लक्ष्य की ओर दौड़ा जा रहा है।

सत्रहवीं शताब्दी में न्यूटन व हाइजन ने प्रकाश की प्रकृति पर अलग-अलग दो नियम बताये। न्यूटन के सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश की किरणों में छोटे-छोटे कण होते हैं तथा वे कण जब आँखों की पुतली ‘रेटिना’ से टकराते हैं तो हमें प्रकाश का ज्ञान होता है। हाइजन के सिद्धान्तानुसार प्रकाश में छोटी-छोटी तरंगें - वैव्स- होती है जो प्रकाश किरण -‘बीम’ - के साथ-साथ में आगे बढ़ती है। दोनों ही सिद्धान्त एक दूसरे से भिन्न है। अठारहवीं सदी में न्यूटन का निष्कर्ष और उन्नीसवीं सदी में हाइजन का सिद्धान्त सही माना गया। आज इन दोनों सिद्धान्तों पर भी कई और नये विचार भी रखे गये है। मूर्धन्य वैज्ञानिक इन दिनों यह आशा करते हैं कि निकट भविष्य में आधुनिक मान्यता की अपेक्षा अधिक सही सिद्धान्त प्रकाश के सम्बन्ध में सामने आने वाला है।

वस्तुतः सभी प्रतिपादन अपने समय के पूर्ण सत्य है। क्योंकि तब की परिस्थितियों के अनुसार इतना ही सोचा जा सकना और निष्कर्ष निकाला जा सकना संभव था। मनुष्य जाति की ज्ञान भूमिका क्रमशः इसी प्रकार विकसित होती चली आयी है और एक -एक करके पूर्ण सत्य की प्राप्ति की दिशा में चलने का क्रम जारी रहा है। जितनी मंजिल पार कर ली गई अभी उससे बहुत अधिक चलना शेष है। इसे यथाक्रम ही पूरा किया जा सकेगा। हमें अधिक परिष्कृत ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने मस्तिष्क के द्वार खुले रखने चाहिए। यह आग्रह कभी भी नहीं करना चाहिए कि जो कुछ जाना समझा गया है वही पूर्ण या पर्याप्त है।

अनेक वैज्ञानिक मान्यताएँ ऐसी है जो भूतकाल में अपने समय की सर्वोत्तम और निर्भ्रान्त मान्यताएँ समझी जाती थी, पर अब विज्ञान ने प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते हुए उन्हें भ्रान्त सिद्ध करके झुठला दिया है।

किसी समय सौरमण्डल का केन्द्र पृथ्वी को माना जाता था। 2. तारों का भौतिकीय स्पेस किसी समय सिकंदर काल के रेखा गणितज्ञ ‘यूक्लिड’ के अनुसार माना जाता था 3. गृह नक्षत्र मनुष्यों के जीवन तथा देश काल को प्रभावित करते हैं। 4. पृथ्वी चपटी है। 5. पृथ्वी कुछ हजार वर्श ही पुरानी है। 6. ऊपर से गिराने पर हलकी वस्तुओं की अपेक्षा भारी वस्तुएँ जल्द नीचे गिरेगी। 7. कोई वस्तु तभी गति करेगी जब उस पर कोई बल लगाया जायेगा। 8. ब्रह्माण्ड की समस्त संहति (दी टोटल एकाउण्ट आफ मास इन दी यूनीवर्स) स्थिर है। 9. पदार्थ ऊर्जा में नहीं बदल सकता। 10. प्रकृति शून्य का अस्तित्व नहीं रहने देना चाहती, उसे भरने दौड़ती है। 11. जीवों की किस्में अपरिवर्तनीय है। 12. पानी और हवा स्वतन्त्र एवं अविनाशी तत्व है। 13. परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी और विखण्डित होने वाली इकाई है।

तर्क और प्रमाण की- प्रत्यक्ष अनुसंधान की आवश्यकता एवं उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। पर यह मान बैठना कि” जो कुछ इस परिधि से बाहर है वह सब कुछ मिथ्या है- उचित नहीं इस आधार पर तो यह सिद्ध कर सकना भी कठिन है कि जिन्हें हम पिताजी कहते हैं क्या वे सचमुच वे ही हमारे वास्तविक जन्मदाता है।

हमें एक सीमा तक ही प्रत्यक्षवाद को मान्यता देनी चाहिए। उच्चस्तरीय आदर्शवादिता, नीति, निष्ठा की तरह अध्यात्म और धर्म के सिद्धान्त भले ही इन्द्रियगम्य न हो पर उनने परिणाम प्रतिफल देखते हुए यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जाना चाहिए कि वे न तो प्रत्यक्ष है और न ही अविश्वस्त


श्री गोपालचन्द्र घोष (Kahani)

बहुत समय तक प्रयत्न करने पर भी श्री गोपालचन्द्र घोष को भाव-समाधि न होती थी। जब कि अनेक व्यक्तियों को हो रही थी। एक दिन उन्होंने अपनी यह निराशा श्री रामकृष्ण परम हंस के सम्मुख प्रकट की। श्री रामकृष्ण परम हंस ने कहा , “तू बड़ा कम बुद्धि का है निराशा या दुःख की क्या बात है? क्या तू समझता है कि भाव-समाधि होने से सब कुछ हो जाता है। क्या यही सबसे बड़ी चीज है? सच्चा त्याग भाव और परमात्मा में पूरी आस्था उससे भी बड़ी चीज है। भाव-समाधि न सही। उच्च भावों का विकास करो। उस नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) को देखो न, भाव-समाधि की चिन्ता किये बिना ही अपने, त्याग, विश्वास, निष्ठा और आस्था के कारण कितना तेजवान और उन्नत मन वाला तरुण है। “

श्री गोपालचन्द्र घोष का भ्रम दूर हो गया और वे प्रसन्नता पूर्वक मनोविकास में तत्पर हो गये।


धर्म को दिमागी बीमारी बताने वाली भ्रान्त मनोवृत्ति

फ्रायड ने धर्म को एक प्रकार की व्यापक दिमागी बीमारी- यूनीवर्सल अवसेशनल न्यूरा सेस माना गया है वे अपनी ‘दी फ्यूचर आफ एन इल्यूजन’ में लिखते हैं - “ जब मनुष्य अपने आपको बाह्य प्रकृति और अन्तः प्रवृत्ति के झकझोरों का सामना करने में असमर्थ पाता है तो अपनी असहाय अन्तः व्यथा को ठण्डा करने के लिए धर्म का सहारा लेता है। “

धर्म अवांछनीय है और काम प्रवृत्ति मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। इन दो प्रतिपादनों से खुले अनाचार को छूट मिलती है। थोड़े कर्मकाण्डों और प्रथा प्रचलनों को अलग रखकर देखा जाये तो धर्म विशुद्ध रूप से नीति शास्त्र है उसमें नागरिक शास्त्र और समाज शास्त्र के अस्तित्व से इनकार कर देना और किनारे पर पड़े हुए सीप घोंघों को ही समुद्र सम्पदा मान बैठना भूल है।

धर्म को अनुपयोगी इसलिए कहा जाने लगा है कि उसमें पूर्वाग्रह, रूढ़िवादिता एवं साधारण कर्मकाण्डों का अत्युक्ति पूर्ण माहात्म्य भर दिया गया है। निहित स्वार्थों से प्रेरित धर्माचार्यों के अन्धविश्वास ने ऐसे तत्व धर्मक्षेत्र में घुसेड़ दिये है जिनसे उनका व्यक्तिगत लाभ तो खूब होता है पर श्रद्धालु के पल्ले समय और पैसे की बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता यदि यह दोष निकाल दिया जाय तो धर्म का नैतिक एवं सामाजिक पक्ष अपने असली स्वरूप में आ सकता है उसका बुद्धिवाद का हर पक्ष एक स्वर से समर्थन कर सकता है। मनोविज्ञानी धर्म को मनः चेतना पर अनावश्यक और अवांछनीय भार डालने वाला जब बताते हैं तब वस्तुतः उसका मंतव्य उसी धर्म विडम्बना की कटु आलोचना करना होता है जो आज पाखण्ड के रूप में सभी सम्पदाओं में समान रूप से अपना रखी है।

मनोविज्ञान वेत्ता विलियम जेम्स, डीवे, तयाजुंग ने धर्म में नैतिक अनैतिक - एवं यथार्थ भ्रान्त तत्त्वों के संशोधन की आवश्यकता पर बल दिया है वे कहते हैं जब तक धर्म के शुद्ध और अशुद्ध पक्षों का वर्गीकरण न किया जाएगा तब तक उसके पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा जाता रहेगा। उसकी संतुलित विवेचना भी संभव न हो सकेगी और न इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकेगा कि धर्म की उपयोगिता में कितना तथ्य है।

स्पष्ट है कि यह समीक्षा धर्म प्रवंचना की ही है। यह धर्म तत्व अपने मूल रूप में परिष्कृत स्तर का बन सके तो उसे मनोविज्ञान दर्शन के आधार पर भी अनावश्यक एवं भारभूत न ठहराया जा सकेगा।

धर्म के मूल तत्त्वों को भूलकर जो स्थानीय और सामयिक धर्म प्रवर्तकों में खो जाते हैं वे ही धर्म को बदनाम करते हैं। पूर्वजों के कुछ आचरण और निर्देश अपने समय में ठीक समझे और कहे जाते होगे पर बदली हुई परिस्थितियों में उनका यथावत् बने रहना सम्भव नहीं। शाश्वत में धर्मतत्त्व का मूल दर्शन ही है। उसके आचरण में अन्तर होते रहते हैं। यदि तत्व को भुलाकर किसी समय के धर्माचरण को ही मुख्य मान लिया जाय अथवा अमुक धर्म प्रवर्तक की उक्तियों अथवा गतिविधियों को सनातन मान लिया जाय तो फिर धर्म प्रतिभागी ही बन जाएगा और कालान्तर में विकृत होकर विग्रह ही उत्पन्न करेगा।

मनोविज्ञान को जिस प्रयोजन के लिए आज - कल प्रयोग किया जाता है वह उसके मूल शब्दार्थ का एक बहुत छोटा भाग ही प्रकट करता है। अंग्रेजी में जिसे साइकोलॉजी कहते हैं इसका मूल अर्थ है आत्मा का विज्ञान। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले सन् 1950 में रुडोल्फ गोमेकले ने किया। मूल रूप में यह यूनानी भाषा के साइके और लोगंस शब्द से मिल कर बना है। साइके का अर्थ है - आत्मा। लोगंस कहते हैं चर्चा अथवा विज्ञान। जिस संदर्भ में आत्मा की चर्चा या विवेचना की जाय उसे साइकोलॉजी कहा समझा जाना चाहिए। प्लेटो और अरस्तू इसी अर्थ में प्रयोग करते रहे है।

मनोविज्ञान की परिभाषा करते हुए कुछ दार्शनिक इस प्रकार कहते है-

मनोविज्ञान वह विवेचना है जो व्यवहार के पीछे छिपे मानसिक दिशा की जानकारी कराता है। - जेम्स ड्रेवर

जीवन के सम्मुख प्रस्तुत होने वाली परिस्थितियों एवं वस्तुओं के सम्बन्ध में जो प्राणी की प्रतिक्रिया होती है उसी का विश्लेषण मनोविज्ञान है। - चार्ल्स ई. स्किनर

वातावरण से प्रभावित व्यक्ति की विभिन्न मनः स्थितियों के स्वरूप की जानकारी को मनोविज्ञान कह सकते हैं। - वुडवर्थ

मानवी चिन्तन एवं कर्तृत्व के पीछे छिपी अचेतन मन की गतिविधियों का नाम मनोविज्ञान है। - ब्रिजेज

मनोविज्ञान मानवी अनुभवों एवं व्यवहारों का तात्त्विक दिग्दर्शन है। - थाउलस

त्याग, बलिदान, सेवा, तपस्या की कष्ट साध्य प्रक्रिया को अपनाने में कितने ही व्यक्ति असाधारण आनन्द, संतोष एवं गर्व अनुभव करते हैं यह समष्टि मन की ही तुष्टि है। पाशविक मन तो इसी प्रकार के कदम उठाने की कभी कल्पना ही नहीं कर सकता। भोग की लालसा मात्र शोषक स्वभाव को ही परिपुष्ट करेगी। प्रेम जैसे अध्यात्म तत्व से तो ऐसे लोगों को सर्वथा वंचित ही रहना पड़ेगा प्रेम तो उदारता ओर आत्मदान की भूमि पर ही विकसित होता है, जिसे अपने ही भोग की आपाधापी पड़ी है उसे शोषक का दृष्टिकोण ही पल्ले पड़ेगा और कुत्साओं में ग्रस्त रहने के अतिरिक्त उसके हाथ और कुछ न लगेगा।

विकसित व्यक्तित्व और प्रखर प्रतिभा की प्रशंसा सर्वत्र कही सुनी जाती है, यह और कुछ नहीं केवल समष्टि गत मन के विकास की व्यक्तिगत जीवन में दीख पड़ने वाली झाँकी मात्र है। सुगठित चरित्र निष्ठा, मनस्विता, दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता, तत्परता एवं साहसिकता के रूप में हम केवल समष्टि मन की प्रौढ़ता का ही दर्शन करते हैं। इसकी तुलना उन भोग परायण नर कीटकों से नहीं की जा सकती जो तुच्छता के कारण गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से पग-पग पर घृणित और पतित सिद्ध होते रहते हैं। आत्मा का संदेश, ईश्वर का प्रकाश जिन्होंने सुना, देखा है वे समष्टि मन की प्रौढ़ता का प्रसाद ही अनुभव करेंगे

मन की भोंड़ी और उथली परत के नीचे दो और मन है- अतीन्द्रिय मन और समष्टिगत मन। अचेतन मन के यह दो भाग कितने महत्त्वपूर्ण है इसे मनस्वी और मनःक्षेत्र की साधना करने वाले लोग ही जान सकते हैं। चेतन मन के स्वरूप और प्रभाव से सभी लोग परिचित है। उसे सुयोग्य बनाने के लिए अध्ययन, अनुभव, परामर्श, मनन, चिन्तन आदि उपयोग को अपनाया जाना चाहिए। अचेतन मन की गरिमा और सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए मनः शास्त्री जितने गहरे उतरते जाते हैं, उतना ही यह अनुभव करते हैं कि इस रत्नागार में छिपी बहुमूल्य सम्पदा इतनी अपार और असीम है जिनकी कल्पना तक कर सकना कठिन है।

अतीन्द्रिय मन में वे समस्त सम्भावनायें विद्यमान् है जिनका योगी तपस्वी तथा सिद्ध पुरुषों के चमत्कारों तथा सिद्धि साधनों के संदर्भ में वर्णन किया जाता है। परोक्ष जगत में जिन अनैतिकताओं और अति मानवी उपलब्धियों की चर्चा होती रहती है उनका बीज मूल इस अचेतन मन में ही प्रसुप्त स्तर पर पड़ा होता है, जो उसे जागृत कर लेते हैं वे उस अद्भुत को भी प्रत्यक्ष करते रहते हैं जो साधारण तथा असंभव और अप्रत्याशित समझा जाता है।

समष्टि मन को दूसरे शब्दों में विश्वात्मा कह सकते हैं। प्राणि मात्र में एक ही दिव्य ज्योति विभिन्न रंग रूपों और आकार प्रकारों में चल रही है। सामूहिकता, सद्भावना, प्रेम, उदारता, सेवा, संयम, ममता जैसी उच्च प्रवृत्तियाँ इसी स्तर के प्रस्फुरण से विकसित होती है। तुच्छ से नरपशु को महामानव के रूप में परिणत कर देने का श्रेय इसी मनः स्तर को है। अनीति की ओर बढ़ते कदमों को यही अन्तः प्रेरणा रोकती है। अतीन्द्रिय और समष्टि मन की अन्तः स्फुरणाओं के प्रभाव से ही व्यक्ति ऋषि, दृष्टा, तत्त्वज्ञानी , देवदूत एवं अवतारी बनता है। समष्टि मन का प्रभाव ही समाज सेवा, लोक मंगल एवं चरित्र निर्माण के रूप में देखा जाता है ओर अतीन्द्रिय मन की विभूतियों का सौंदर्य अतिमानवों के- देवदूतों के रूप में यत्र-तत्र बिखरा हुआ देखा जा सकता है।

उथले स्तर की मनः विकृतियों को ही समग्र मानसिक चेतना मान बैठने वाले ही यह कह सकते हैं कि “ पशु प्रवृत्तियों के दमन से मानसिक रोगों की उत्पत्ति होती हैं। इसलिए उन्हें खुल खेलने देना चाहिए और नैतिकता, अनैतिकता , मर्यादा, उच्छृंखलता का विचार नहीं करना चाहिए। “ यह प्रतिपादन वस्तुतः मनुष्य के घृणित और वीभत्स स्तर की ही वकालत है और उसे पशु एवं पिशाच बनने का निर्लज्ज प्रोत्साहन है। यदि यह बात सत्य रही होती तो मानवी संस्कृति का जो विकास अब तक हो सका है वह कदापि संभव न रहा होता, फिर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के लिए संयम और सद्भाव के लिए मनुष्य चरित्र में कोई स्थान ही न रहा होता।

सच तो यह है कि नैतिक भावनाओं का उन्नयन मन को अत्यन्त संबल एवं उत्पादक बना देता है और ऐसे आनन्द, संतोष से भर देता है जिसकी तुलना में काम वासना सरीखी पशु प्रवृत्तियों का तुष्टिकरण तुच्छतम ही प्रतीत हो सकता है। धूप जहाँ नहीं पहुँचती वहाँ सीलन रहती है, प्रकाश जहाँ नहीं होता वहाँ अँधेरा छाया रहता है। ठीक इसी प्रकार समष्टि मन के मूर्छित पड़े रहने पर स्वार्थवादी एवं इन्द्रिय परायण अहंता जग पड़ती है और उसकी ललक, वासना तृष्णा की पशु चेष्टाओं में भटकती रहती है। फ्राइड सरीखे मनोविज्ञानी इसी भटकाव को मनुष्य की मूल प्रवृत्ति मान बैठे है। वे यह नहीं सोच सके कि उनके निष्कर्ष मानवी महानता को पतनोन्मुख बनाने का कितना घातक परिणाम प्रस्तुत करेंगे

मनः शास्त्री जुग ने समष्टि मन की क्षमता पर बहुत प्रकाश डाला, उसका कहना है कि इसी की प्रेरणा से वे सभी गतिविधियाँ उत्पन्न होती है जिनके आधार पर मनुष्य और समाज का सराहनीय रूप बनता है। वस्तुतः यही मूल प्रवृत्ति है। देवत्व यही है। सतोगुण एवं आत्मबल इसी को कहते हैं। वातावरण की गंदगी मन पर जमते रहने पर एक अनैतिक परत भी जमती रहती है। पर उसके उन्मूलन में भी दैवी प्रवृत्ति निरन्तर संलग्न रहती है। सद्गुरु की शिक्षा एवं आत्म-प्रेरणा के रूप में इसी संशोधन परिष्कार को आत्मवेत्ता चित्रित करते रहे है। समष्टि गत आकांक्षाओं के प्रतिकूल उच्छृंखलता एवं अनैतिक आचरण करने वालों को न केवल राजसत्ता द्वारा, सामाजिक घृणा द्वारा दण्ड मिलता है वरन् आत्मताड़ना द्वारा अनेकों शारीरिक मानसिक रोगों की उत्पत्ति भी होती है। यह तथ्य अब दिन-दिन अधिकतम स्पष्ट होते चले जा रहे है और उच्छृंखलतावादी मनोवैज्ञानिक प्रतिपादनों की निरर्थकता स्वयं सिद्ध बनती चली जा रही है।

जिस प्रकार धान के ऊपर अनुपयोगी छिलका चढ़ा होता है उसी प्रकार किसी- किसी के मन की ऊपरी परतें भी ऊबड़-खाबड़ हो सकती है। पर यह आवश्यक नहीं कि सुसंस्कृत वातावरण में जन्मे और पले व्यक्ति भी अशुद्ध चिन्तन की व्याधि से ग्रसित हो। आज के उचित वातावरण में बहु संख्यक लोगों की मनोवृत्तियों में पशु प्रवृत्तियों का बाहुल्य हो सकता है। संभवतः फ्रायड से यही भूल जान या अनजान में हुई है वे मनुष्य को कामुकता की कीचड़ में सड़ते रहने वाले कृमि-कीटक मात्र ही समझ सके है। वस्तुतः मानवी सत्ता की गरिमा उससे कही ऊँची है जैसा कि उनने समझा है।

पाश्चात्य दार्शनिक मन और आत्मा के बीच का भेद समझ सकने में प्रायः समझ सकने में असफल रहे है। उनमें से अधिकतर दोनों को एक ही मानते हैं। हीगिल और उनके अनुयायियों ने यही प्रतिपादित किया है कि मन की अन्तर्मुखी प्रवृत्ति धारा का नाम आत्मा है। आर्थर शोयन हार और इमेनुल काण्ट ने आत्मा और मन के भेद को कुछ अधिक स्पष्ट किया है। फिर भी वे इसे विभेद को उतना आगे तक नहीं ले गये है जितना कि भारतीय तत्ववेत्ता कहते हैं।

भौतिक विज्ञान इतना ही मानता है कि मनुष्य को पूर्वपक्ष भूतकाल उसके माता-पिता पितामह, आदि पूर्वजों के साथ जुड़ा है और उतर पक्ष भविष्य पुत्र- पौत्रों के साथ। भौतिकवादी अपने अलावा अपने वंश परिवार को ही सुख समृद्धि सोच सकता है पर आत्मवादी की परमात्मा के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को निबाहने की बात ध्यान में रखनी पड़ती है। वह समाजनिष्ठ होता है जब कि भौतिकवादी की महत्वाकांक्षाएं अपने घर परिवार तक सीमित होकर रह जाती है।

मनोविज्ञान वस्तुतः दर्शन शाखा की ही एक शाखा है। इस शाखा की भी तीन प्रशाखाएँ है 1. जड़वादी अथवा अचेतनवादी - फ्रायड का सिद्धान्त 2. चेतनवादी- जुंग का सिद्धान्त। 3. व्यवहारवादी - मेग्डगल का सिद्धान्त। यदि वह वर्गीकरण कार्यक्षेत्रों के स्तर पर किया जाये तो उसे 1. वैयक्तिक 2. सामाजिक 3. सैद्धान्तिक 4. व्यावहारिक इन चार भागो में विभक्त करना पड़ेगा मानव मनोविज्ञान को बालकों, प्रौढ़ों, महिलाओं, वृद्धों को ध्यान में रखकर भी विभाजन रेखाएँ खड़ी की गई है। और व्यापार , चिकित्सा, कानून, शिक्षा, शासन आदि से सम्बन्धित कितने ही प्रयोजनों के लिए स्वतन्त्र शासनों के रूप में प्रतिपादित किया गया है।

अतीन्द्रिय मन के सम्बन्ध में कभी यही सोचा जाता था कि यह दैवी अनुग्रह का वरदान चमत्कार है। अब यह स्पष्ट हो चला है कि मंत्रों और देवताओं के माध्यम से जो कुछ प्राप्त किया जाता है वह वस्तुतः कही बाहर से नहीं आता वरन् भीतर से ही उदय होता है। मंत्रों में, साधन अनुष्ठानों में अलौकिक क्षमता मानी जाती है उसके उद्गमस्थल अचेतन मन की यही उच्चस्तरीय परत है। मंत्र, देवता या साधना विधान किसी के लिए फलप्रद होते हैं। किसी के लिए नहीं, इसका एक मात्र कारण साधक के अतीन्द्रिय मन की परिस्थितियों का ऊँचा नीचा स्तर ही है। अलौकिकताओं का ध्रुव केन्द्र यही मर्म स्थल है। ब्रह्मबिन्दु इसी को कहते हैं।


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बुढ़ापा एक आदत मात्र है। कार्य व्यस्त आदमी के पास इतना समय नहीं आता कि इस बेकार की आदत को अपनाये। - आन्द्रे मोर्वा

सर ओलीवर लाज, मेडम वैवेटस्की, प्रभृति तत्त्ववेत्ता अतीन्द्रिय विज्ञान की आधुनिक शोध में महत्त्वपूर्ण कार्य कर चुके है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, परोक्षानुभूति, परिचित विज्ञान, परकाया प्रवेश जैसे कितने ही प्रयोग प्रत्यक्ष प्रयोग शालाओं में होते हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म को अब टोना टोटका नहीं माना जाता वरन् उसके आधार को विज्ञान सम्मत स्वीकार कर लिया गया है। कितने ही व्यक्ति समय समय पर प्रकाश में आते रहते हैं जो मनुष्य में अलौकिकताओं की संभावना को हर कसौटी पर प्रमाणित कर सके। यह सारी परिधि अतीन्द्रिय मन की अद्भुत शक्ति सामर्थ्य पर ही प्रकाश डालती है। भूतकाल का इतिहास तो इस ब्रह्मविद्या की महत्ता से भरा पड़ा है। वह दिन दूर नहीं जब अतीन्द्रिय विज्ञान के शोध कर्ता मनुष्य की महान् महत्ता को अब की अपेक्षा सहस्रों गुनी अधिक अद्भुत सिद्ध कर सकेंगे तब प्रकृति के नई चेतना जगत के एक से एक बढ़ कर महत्त्वपूर्ण रहस्यों का उद्घाटन मात्र मानवी शरीर एवं मन रूप यंत्र से ही सरल संभव हो सकेगा।

मनोविज्ञान आज भले ही भ्रान्तियों के उलझन में उलझ गया हो पर आशा करनी चाहिए यथार्थता अगले दिनों प्राप्त कर ली ही जायेगी और पशु प्रवृत्तियों से ऊँचा उठाकर ही मनुष्य को देव स्तर तक पहुँचाने में मनः शास्त्र अपनी उचित भूमिका सम्पादन करेगा।


वृद्ध माता-पिता यह करुण विलाप करते पाये जाते हैं (Kahani)

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध पत्र ‘स्पेकलेटर’ ने इस देश के आश्रय हीन वृद्धों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘ब्रिटेन में लाखों वृद्ध माता-पिता यह करुण विलाप करते पाये जाते हैं कि भगवान उन्हें जल्दी इस दुनिया से उठा ले, जिन बच्चों को उन्होंने बड़े लाड़-प्यार से पाला पढ़ाया था वे उनकी वृद्धावस्था में जब तनिक भी सहायता, सहानुभूति नहीं रखते और परित्यक्त की तरह भुला देते हैं तो उसे आश्रय विहीन जीवन जीना पड़ता है। अति जीर्ण स्थिति में जब शरीर पराश्रित जैसी स्थिति में होता है तब उनका यह चाहना उचित है कि उनके पाले पोसे बालक सहायता करे, और सहानुभूति बरते पर जब वे पूर्णतया अपने को उपेक्षित पाते हैं तो यही सोचते हैं कि इस दुनिया से कृतज्ञता उठ गयी और यहाँ केवल तभी तक जीना चाहिए जब तक अपने हाथ पाँव काम करे। ‘

लंदन की स्वास्थ्य पत्रिका 'ब्रिटिश मेडिकल जनरल’ ने लिखा है - पाँच वर्श पूर्व जहाँ अस्पतालों में भर्ती पागल 54421 थे वहाँ उनकी संख्या बढ़कर अब 644043 हो गई है।


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इसका एक बड़ा कारण पारिवारिक जीवन का असंतोष भी है। हाथ पाँव चलने तक लोग अपनी आजीविका पर गुजर करते हैं अपनी शारीरिक आवश्यकताएँ स्वयं सम्भालते हैं पर वृद्धावस्था में जब शरीर की शक्ति और आमदनी चुक जाती है तो उन्हें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। संतानें इन अनुत्पादक अभिभावकों को ‘आफत’ मानती है और इनसे जैसे बने पीछा छुड़ाना चाहती है। अपनी दयनीय दुर्दशा पर क्षुब्ध होकर वे अक्सर पागल हो जाते हैं या आत्महत्या कर बैठते हैं।

कोरीनर डॉ० मिलने ने बताया कि उन्हें एक वर्श में 400 मृत शरीरों की परीक्षा करनी पड़ी उनमें से 180 आत्महत्या करके मरे हुए वृद्ध लोग थे। दुखी वृद्धावस्था के संताप जिन्हें पागल बनाते और आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं ऐसे लोगों की संख्या दिन- दिन बढ़ती ही जाती है।

आध्यात्मवादी उदार दृष्टिकोण में वृद्धों और असहायों की सेवा सहायता करने की गुँजाइश है। भौतिकवादी अर्थशास्त्र में जब अनुत्पादक गाय बैलों को तुरन्त कसाई के हवाले करने का जोर-शोर से प्रतिपादन किया जाता है तो उसी मान्यता से प्रभावित पीढ़ी को किस मुँह से यह कहा जाए कि उन्हें वृद्ध माता-पिता की सेवा सहायता करनी चाहिए। आत्मवादी मान्यताओं की आवश्यकता बुद्धिवादी वर्ग शायद तब समझे जब उसे स्वयं उस प्रकार की असहाय स्थिति का सामना करना पड़े पर तब तक उसे विचार परिवर्तन के लिये बहुत देरी हो चुकी होती है।


मंत्रों की सफलता वाक् पर निर्भर है।

मुख में से निकलने वाली अपनी अन्तरंग मनः स्थिति का बाह्य जगत को परिचय देती है और उसे प्रभावित करती है। सामान्य जीवन में उसकी कितनी उपयोगिता है और उस शक्ति के कुण्ठित होने पर कैसी असहाय स्थिति होती है इसे किसी गूँगे और मुखर व्यक्ति के तुलनात्मक अन्तर को देखकर सहज ही माना जा सकता है।

मधुर संयत और सुसंस्कृत वाणी को वशीकरण मंत्र बताया गया है। उसके आधार पर पराये अपने हो जाते हैं। दूसरों का स्नेह, सम्मान, और सहयोग अर्जित करना संभव होता है। प्रगति के असंख्य द्वार खुलते हैं। वाणी के परिष्कृत प्रभाव का लौकिक जीवन की प्रगति और प्रसन्नता में कितना अधिक योगदान होता है इस पर जितना अधिक विचार किया जाय उतनी ही अधिक गरिमा स्पष्ट होती जाती है।

आत्मिक शक्ति संचय की साधना में से वाणी को प्रधान माध्यम ही मानना चाहिए। स्कूली अध्यापकों और छात्रों तक की शिक्षा प्रक्रिया वाणी के आधार पर ही चलती है। विद्या का- ब्रह्मविद्या का आधार भी वही हैं। सत्संग, प्रवचन, कथा, कीर्तन, स्तवन, जप आदि के लिए वाणी ही माध्यम है।

वाणी का दुरुपयोग भी हो सकता है और सदुपयोग भी। कटु वचन, अपमान, तिरस्कार, व्यंग, निन्दा, चुगली जैसा व्यवहार किया जाय तो शत्रुता बढ़ती है और वैर, विरोध असहयोग एवं संघर्ष का वातावरण ही उत्पन्न होता है। उसकी प्रतिक्रिया अपने लिए विग्रह, उद्वेग एवं अशान्ति का कारण बनती है।

सदुपयोग से - मधुर - स्नेहसिक्त, हितकर वचन बोलने से सत्य बोलने - सद्भावना व्यक्त करने से - दूसरों को भी प्रगति पथ पर बढ़ने - में सुख शान्ति का आधार प्राप्त करने में - सहायता मिलती है और अपने को भी उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप सम्मान, सहयोग, स्नेह, सद्भाव प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह सुखद स्थिति जीवन में उल्लास एवं आनन्द का ही आविर्भाव करती है।

इससे आगे बढ़कर आत्म - कल्याण - श्रेय साधना के लिए मंत्र विद्या का समस्त आधार वाणी की पृष्ठभूमि पर ही आधारित है। मंत्रविद्या का जो कुछ भी चमत्कार कहा, सुना और देखा जाता है उसका आधार वाणी ही है। सत्य, मौन, अभक्ष्य अवरोध, जप आदि की साधना पद्धतियाँ सामान्य समझी जाने वाली वाणी को असामान्य ‘वाक्’ में परिणत करती है। उसकी अद्भुत शक्ति जड़ जगत को हिला सकने और चेतन जगत से व्यापक भाव प्रवाह उत्पन्न कर सकने में समर्थ होती है। इसलिए वाक् साधना को आत्मविद्या का प्रधान आधार माना गया है।

मंत्र की जो कुछ महिमा है उसका आधार वाणी को ‘वाक्’ रूप में परिणत कर देना है। इसके लिये मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता का समन्वय करना पड़ता है कि वाणी को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा जप किये गये मंत्र भी जल जायेंगे और बहुत संख्या में बहुत समय तक जप , स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट फल न मिलेगा। परिष्कृत जिह्वा में वह शक्ति रहती है जिसके बल पर किसी भी भाषा का - कोई भी मंत्र प्रचण्ड और प्रभावशाली हो सकता है। उसके द्वारा उच्चारित शब्द मनुष्यों के अन्तस्थल को असीम अन्तरिक्ष को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकता। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी परिमार्जित जिह्वा को ‘सरस्वती’ कहते हैं। साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति की - दीक्षा की - महत्ता समझनी चाहिए। वाक् साधना को अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रथम चरण मानना चाहिए और समझना चाहिए कि जो इस प्रयोजन को पूरा कर सकेगा वही मंत्रविद्या का - प्रार्थना उपासना का लाभ उठा सकेगा। वाणी के अशुद्ध रहते उपासना की सफलता संदिग्ध ही रहेगी इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो जप अनुष्ठान आदि की प्रक्रिया के साथ -साथ वाणी के परिष्कार की बात भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझनी होगी और उसको भी साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -

तीक्ष्णोषवो ब्राह्मणा हेतिमन्तो,

यामस्यन्ति शरव्यां न सा मृषा।

अनुहाय तपसा मन्युना चोत,

दूरादेव भिन्दन्त्येनम् ॥

- अथर्व 5।18।9

जीभ जिसकी प्रत्यंचा है उच्चारण किया हुआ शब्द जिसका बाण हैं। संयम जिसका वाणाग्र है, तप से जिसे तीक्ष्ण किया गया है, आत्मबल जिसका धनुष है, ऐसा ब्राह्मण अपने मंत्र बल से समस्त देशद्रोही तत्त्वों को बेध डालता है।

जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाड् ,

नाड़ीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः।

तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् ,

हृद्बलै र्धनुभि र्देवजूतैः ॥

- अथर्व 5।18।8

आत्मबल रूपी धनुष, तप रूपी तीक्ष्ण बाण लेकर तप और मन्यु के सहारे जब यह तपस्वी ब्राह्मण मंत्रशक्ति का प्रहार करते हैं तो अनात्म तत्त्वों को दूर से ही बेध कर रख देते हैं।

अस्मानं चिद् ये विभिदुर्वचोंभिः।

- ऋग्वेद 4।16।9

उन शक्ति सम्पन्न उपकरणों ने पत्थरों को भी फोड़ डाला।

यत् त आत्मनि तन्वां घोरमस्ति.................

सर्वं तद्वाचापहन्मो वयम्।

- अथर्व 1।18।9

तेरे शरीर में जो अनिष्ट है उन्हें मंत्र पूत वाणी से हम नष्ट करेंगे।

तामेतां वाचं यथा धेनुं वत्सनोपसृज्य प्रत्तां।

दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान् कामान् अदुह्रन् ॥

- जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण

जिस प्रकार बछड़ा गाय का दूध पीता है उसी प्रकार देव पुरुष दिव्य वाणी का आश्रय लेकर समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं।

मंत्र शक्ति की महत्ता वाक् शक्ति पर निर्भर है। इस वाक् को स्वर भी कहते है-- साम भी और सरस्वती भी। यदि इसे शुद्ध एवं सिद्ध कर लिया गया तो फिर मंत्र के चमत्कार का प्रकट होना सुनिश्चित है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए मंत्र से भी बढ़कर ‘वाक्’ की प्रशंसा की गई है। कारण स्पष्ट है। परिष्कृत वाक् ही मन्त्रों की सार्थकता बनाती है। भ्रष्ट वाणी से किये हुए मन्त्रानुष्ठानों को सफलता कहाँ मिलती है।

अस्थि वा ऋक्।

- शतपथ 7।5।2।25

मंत्र तो हड्डियाँ मात्र है।

प्राणो वै स्वरः।

- ताण्डय ब्राह्मण 24।11।9

प्राण तो स्वर है।

एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुष्टु प्रयुक्तः

स्वर्गे लोके च काम धुग भवति।

- श्रुति

एक ही शब्द की तात्त्विक अनुभूति हो जाने से समस्त मनोरथों की पूर्ति हो जाती।

वाक्य सिद्धिद्धिधां प्रोक्ता शापानुग्रह कारिका।

- शक्ति पंचकम्

वाक् सिद्धि दो प्रकार की होती है एक शाप देने वाली दूसरी वरदान देने वाली।

स या वाचं ब्रह्म त्वपास्ते यावद्वाचो गतं

तत्रास्य यथा कामचारो भवति।

छान्दोग्य 7।2।2

जो वाणी को ब्रह्म समझ कर उपासना करता है उसकी वाणी की गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।

वाक् को ब्रह्मस्वरूप माना गया है। वही ब्रह्म की ब्रह्मविद्या की अविच्छिन्न शक्ति है। देवता उसी के वश में रहते हैं। उच्चारण और स्वर में यही अन्तर है कि उच्चारण कंठ, होठ, जीभ, तालु, दाँतों की संचालन प्रक्रिया से निकलता है और वह विचारों का आदान - प्रदान कर सकने भर में समर्थ होता है। पर स्वर अन्तः करण से निकलता है। उसमें व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और भाव समुच्चय भी ओत - प्रोत रहता है। इसलिए मंत्र को स्वर कहा गया है। वेद पाठ में उदात्त - अनुदात्त स्वरित की उच्चारित प्रक्रिया का शुद्ध होना ही इसी ओर संकेत करता है। साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक् शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप अनुष्ठान से ही है।

यामाहुर्वाचं कवयो विराजम्।

- अथर्व 7।2।5

समस्त संसार का निर्माण करने वाली यह विराट् वाक् ही है।

यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक्।

- ऋग् 10।114।8

जहाँ तक ब्रह्म विस्तृत है, उतनी ही वाक् विस्तृत है।

विराट् वाक्।

- अथर्व 9।15।24

यह वाक् विराट् है।

यावद् ब्रह्म विश्ठितं तावती वाक्।

- ऋग् 10।114।8

जितना बड़ा ब्रह्म है, उतनी ही विशाल वाक् है।

तद्यत् किचार्वाचीनं ब्रह्मणं स्तद् वागेव सर्वम्।

- जै0 उ॰ 1।11।1।3

ब्रह्म के पश्चात् वाक् ही उत्पन्न हुई।

वाग् वै विष्वकर्मशिः वाचा हीदं सर्व कृतम्।

- यजु 1 3।58

वाक् ही विश्वकर्मा ऋषि है। उसी ने यह संसार बनाया।

प्रजापतिर्वा इदमेक आसं तस्य वागेव स्वमासीत् वाग् द्वितीया स ऐक्षतेमामेव वाच विसृजा।

इयं वा इदं सर्व विभवन्त्येश्यतीति।

- ता. ब्रा. 20। 14

प्रजापति अकेले थे। उनके पास ‘वाक्’ ही एक संपत्ति थी। उनने विचार किया मैं इस वाक् को प्रखर करूं। यही सब कुछ बन जायेगी।

तिस्रो वाचो प्रवद ज्योति रभा।

- ऋग् 7।101।1

उस वाक् का ज्योति रूप में दर्शन होता है।

स्वरूप ज्योति रेवान्तः परावागतपायिनी।

- महाभारत

यह वाक् ज्योति रूप में परिलक्षित होती है।

आगमोक्तं विवेकाच्च द्विधा ज्ञानं तथोच्यते ॥

शब्दब्रह्माऽऽगमय परं ब्रह्म विवेकजम्।

- अग्निपुराण

एक शब्द ब्रह्म है दूसरा परब्रह्म। शास्त्र और प्रवचन से शब्दब्रह्म और विवेक मनन चिन्तन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

शब्द ब्रह्माणि निष्णातः पर ब्रह्माधिगच्छति।

- शतपथ

शब्द ब्रह्म को ठीक तरह जानने वाला ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त करता है।

वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे वाच इर्त्सवममृतं यच्च मर्त्यम्।

- शतपथ

वाक् सृष्टि का मूल तत्व है। यह मनुष्य लोक का अमृत है। शब्दों में जो शक्तियाँ भरी है वे अद्भुत है।

वाक् शक्ति की आराधना यदि ठीक प्रकार की जा सके तो मन्त्र शक्ति के प्रार्थना के - वरदान, आशीर्वाद के- जड़ चेतन जगत को प्रभावित करने के - सिद्धि साधना के समस्त प्रयोजन उसी तरह पूर्ण हो सकते हैं जैसे कि शास्त्रों में लिखे है। वरिष्ठ साधकों की तरह आज भी साधना के वैसे ही प्रतिफल मिल सकते हैं। शर्त केवल एक ही है- वाक् साधना का महत्त्व समझा जाय और उस पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाय।


अपनों से अपनी बात

वसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा त्यौहार

वसन्त पर्व अब अति निकट आ गया। यह अंक परिजनों के हाथ में पहुँचने के लगभग एक महीने के उपरान्त 8 फरवरी को बसन्त पंचमी का पुनीत त्यौहार है। उसे गत वर्श की भाँति इस वर्श भी भाव भरी श्रद्धा और उत्साह आवेश भरी तत्परता के साथ मनाया जाना चाहिए। अपने परिवार का यह सबसे बड़ा त्यौहार है। इसलिए आयोजनों की - समारोहों की दृष्टि से उसे सर्वोपरि सर्व प्रथम स्थान दिया जाता रहा है।

बसन्त पर्व ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती का जन्म दिन है। सृष्टि के आदि काल में मनुष्य को इसी शुभ अवसर पर विद्या बुद्धि का- ज्ञान सम्वेदना का अनुदान प्राप्त हुआ था। जीवन का एक अंश तो जड़ पदार्थों में भी है- कृमि कीटक भी जीवितों की श्रेणी में आते हैं और अचेतन की - प्रेरणा से विविध - विधि हलचलें करने से निरत रहते हैं। मनुष्य को इन सबसे ऊँची स्थिति मिली है इसका एकमात्र कारण क्रमबद्ध - सोद्देश्य चिन्तन प्रेरणा ही है। यदि यह विशेषता उसमें न रही होती तो अनेक बातों में कितने ही जीवधारियों की तुलना में वह गया गुजरा हेटा - ठहरता। शरीरगत कोमलता और दुर्बलता को देखते हुए वह प्रकृति से संघर्ष करते हुए अपना अस्तित्व भी कठिनाई से बनाये रह सकता था। किन्तु सोद्देश्य चिन्तन चेतन का जो वरदान मिला, उसने उसे धन्य बना दिया। इस धरती पर जो शोभा सौंदर्य भरा व्यवस्था क्रम चल रहा है उसमें मानवी बुद्धि वैभव का योगदान कम नहीं है। दूसरे शब्दों में इसी बात को यों कह सकते हैं कि विश्व - वसुधा की शोभा गरिमा में भगवती सरस्वती के ही अनुग्रह ने चार चाँद लगाये है। मनुष्य को सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में जो गौरव मिला है उसके पीछे भगवती वीणा - पाणि की अनुकम्पा ही झाँक रही है।

जिसका अजर अनुग्रह पाकर नर पशु में - विभूतिवान् मानव का उदय हुआ उस सरस्वती माता के धरती पर अवतरण का शुभ दिन निस्सन्देह हमारे परम सौभाग्य का दिन है। उसे कृतज्ञता भरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाना चाहिए। सो मनाया भी जाता रहा है। चिरकाल से वसन्त पर्व विविध - विधि आयोजनों के साथ सम्पन्न किया जाता है। प्रकृति उन दिनों अपने आन्तरिक उल्लास को उभारती है - वन-संपदा पर यौवन का उन्माद छाया रहता है। पतझड़ के खंडहरों की कुरूपता समाप्त करते हुए पल्लवों की शोभा आभा से वृक्षावली लद जाती है। प्राणियों में भीतर ही भीतर एक अभिनव हलचल का संचार होता है। कोकिल गूँजती है, भ्रमर गूँजते हैं , हर जीवधारी एक गुदगुदी अनुभव करता है। प्रणय निवेदन से लेकर - हास - परिहास तक की उल्लास अभिव्यक्तियों का बाहुल्य बिखरा पड़ा दीखता है। लगता है कोई मधुर उन्माद जड़ चेतन में नई उमंग, तरंगों की धारा लहलहाने में अदृश्य रूप में संलग्न है।

मनुष्यों में भी यह अभिव्यक्ति सहज ही उभरती , उफनती दीखती है। उत्साह उमंगता है और उस दिशा में वह निकलता है जिस दिशा में मनुष्य की सहज रुचि होती है। हर व्यक्ति उन दिनों अपनी हलचलें तेज करता है, अचेतन सत्ता वृक्षों के पतझड़ को ही नवजीवन प्रदान नहीं करती - मनुष्यों के भीतर भी वही हलचल गतिशील होती है ओर वह भी ढर्रे के कोतर में से सिर बाहर निकाल कर कुछ आगे बढ़ने - कुछ ऊँचा उठने के लिए पंख फड़फड़ाता है। जिसे जितना अवसर मिलता है अपने स्तर के अनुरूप कुछ करता ही है। लेखा - जोखा न रखने के कारण भले ही उसका प्रत्यक्ष विवरण अविज्ञात बना रहे पर हर जीवधारी के कुछ कदम प्रगति की दिशा में बढ़ते ही है - मनुष्य के भी। कौन किस दिशा में कितना बढ़ा , यह उसके चेतनात्मक स्तर पर निर्भर है पर प्रकृतिगत प्रेरणा उसे यथा अवसर मिलती ही है और उससे कुछ न कुछ अग्रगमन होता भी है।

भगवती सरस्वती के जन्म दिन को परा और अपरा प्रकृति के दिव्यलोकों में किन मधुर सम्वेदनाओं के साथ मनाया जा रहा है इसका परिचय जड़ और चेतन जगत की प्रकट एवं अप्रकट मृदुल सम्भावनाओं को देखकर सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। सरस्वती पर्व का यही उद्देश्य है। विद्या की, कला की देवी का अभिवन्दन इसी रूप में वसन्त पर्व पर होता है। सृष्टि के आदि में अनगढ़ मनुष्य विद्या के आधार पर बुद्धि को, और कला के आधार पर भावनाओं को समुन्नत बनाने के लिए तत्पर हुआ था और अब तक वही क्रम निरन्तर क्रमिक विधि व्यवस्था के साथ बढ़ता चला आ रहा है। वस्तुतः यही है समग्र मानवी प्रगति का तात्त्विक इतिहास - रहस्यमय इतिहास। इन चेतनात्मक उपलब्धियों के बिना मनुष्य न तो कुछ बन सकता था और न भविष्य में कुछ बन या रह सकता था।

सरस्वती पूजन की विविध विधि , व्यवस्थाओं के पीछे यही प्रयोजन सन्निहित है कि सर्वतोमुखी प्रगति के जिस आधार को अपनाकर इतनी प्रगति की जा सकी है उसे और भी अधिक अग्रगामी बनाया जाय - उसे और भी अधिक व्यवस्थित एवं परिष्कृत किया जाय। प्रगति के उद्गम को देखा परखा जाय और उसमें और भी अधिक ऊँचे स्तर का लाभ उठाने के लिए आवश्यक सरंजाम जुटाया जाय।

बसन्त पर्व - भारतीय समाज में अति महत्त्वपूर्ण त्यौहार है। विशेषतया विज्ञ समाज में उसे उच्चस्तरीय प्रमुखता दी जाती है। धनवान् दिवाली को - शक्तिवान विजयदशमी को - विनोदी होली को - तपस्वी श्रावणी को - छात्र गुरु पूर्णिमा को अधिक मान देते हैं पर जिन्हें विद्या और कला की गरिमा का ज्ञान है वे सभी सरस्वती पूजन को समान रूप से महत्त्व देते हैं। कला के उपासक - विद्या के आराधक अपनी श्रद्धा भरी भाव अभिव्यंजना सरस्वती के जन्म दिवस पर व्यक्त करने के लिए किसी न किसी प्रकार के उत्सव का आयोजन करते हैं। भारत में ही नहीं संसार भर में यह परम्परा प्रचलित है। बसन्त पर्व अपने देश की ही साँस्कृतिक परम्परा का अविच्छिन्न अंग नहीं है अपितु उसे सार्वभौम पर्व कह सकते हैं। प्रायः सभी देशों में अपने - अपने ढंग से उसे मनाया जाता है। बसन्तोत्सव के विविध विधि क्रिया - कलापों का परिचय संसार के किसी भी देश में किसी न किसी स्तर पर प्राप्त किया जा सकता है।

युग - निर्माण परिवार के लिए यह दुहरी प्रेरणा का पर्व है। एक तो सहज सनातन प्रक्रिया के अनुरूप हम लोग प्रबुद्ध वर्ग की श्रेणी में आते हैं जिसमें विवेक बुद्धि और सद्भाव सम्वेदनाओं को सर्वोपरि स्वीकारा गया है। संजीवनी विद्या - जीवन कला के हम लोग उपासक आराधक है इसलिए स्वभावतः सरस्वती पर्व को बसन्त पंचमी के लिए मनाया ही जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त और भी बड़ी बात यह है कि अपने मिशन का जन्म इसी दिन हुआ है। युग - निर्माण अभियान - नव - निर्माण आन्दोलन का श्रीगणेश जिस दिन हुआ वह बसन्त पर्व की ही पुण्य बेला थी।

यह अनायास आकस्मिक रूप नहीं हुआ वरन् एक सुनिश्चित मुहूर्त के रूप में ही उस शुभारम्भ को किया गया। मुहूर्त विद्या में यदि कुछ तथ्य हो तो उस आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि ऋतु पर्वों की तरह कोई आध्यात्मिक पर्व भी हो सकते हैं और उनमें दिव्य चेतनाओं की मेघ माला बरसने की अनुमति हो सकती है। यदि श्रावणी वर्षा के स्वागत का पर्व हो सकता है तो विद्या और कला के दिव्य कारणों का बाहुल्य बसन्त के दिन रहना भी आश्चर्यजनक नहीं है। उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त कार्य करने के निर्णय जिस आधार पर किये जाते हैं उसी आधार पर युग परिवर्तन का ब्रह्म मुहूर्त में किसी उपयुक्त घड़ी में होना उपयुक्त ही है। कहना न होगा कि युग सन्ध्या का मंगलाचरण यदि बसन्त पर्व को हुआ तो उसे स्वर्ण सुयोग ही कहा जायेगा।

युग प्रभात का रहस्यमय उदय उद्भव जिस दिन हुआ जिस दिन गुरुदेव को उनके मार्ग - दर्शक ने भागीरथी तपश्चर्या की प्रेरणा का उद्बोधन आह्वान प्रस्तुत किया और उस निर्देश को शिरोधार्य करने के लिए गुरुदेव तत्क्षण उद्यत हो गये सर्व विदित है कि पन्द्रह वर्श की आयु में गुरुदेव में अपनी चौबीस वर्षों में सम्पन्न होने वाली उग्र गायत्री तपश्चर्या आरम्भ की और वे एकनिष्ठ भाव से समग्र श्रद्धा नियोजित करके उसी प्रकार तत्पर रहे जिस प्रकार कि गंगावतरण का लक्ष्य लेकर भागीरथ ने कठोर तप साधना की अग्नि में प्रवेश किया था। हर वर्श एक गायत्री महापुरश्चरण प्रारम्भ करके चौबीस वर्षों में उस साधन शृंखला की चौबीस कड़ियाँ पूरी की गई। जिसके आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ प्राप्त हो सकी। कहना न होगा कि इसी पूँजी के बल पर उन्होंने युग परिवर्तन की प्रचण्ड धाराओं को द्रुतगति से प्रवाहित कर सकने में आशातीत सफलताएँ प्राप्त की।

गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिन हम बसन्त पर्व को ही जानते मानते हैं। यो उनका शरीर आश्विन मास में जन्मा था पर उन्होंने कभी पार्थिव काया का मूल्य स्वीकार नहीं किया - वे आरम्भिक पन्द्रह वर्षों को ऐसे ही पशु जीवन के दिन मानते हैं। असली जन्म तो उसी दिन हुआ जिस दिन उन्होंने श्रेय साधना का प्रकाश प्राप्त किया और परमार्थ पर कदम बढ़ाया इसी प्रकाश के - इसी प्रवाह के प्रतीक प्रतिनिधि रूप में उनका अवतरण प्रस्तुत हुआ। निर्दिष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्हें कई प्रकार के क्रिया - कलाप अपनाने पड़े पर दिशा एक सीधी रेखा की तरह ही बनी रही। वे अपनी उसी निर्दिष्ट पथ पर बिना क्षण भर भी प्रमाद किये अनवरत रूप से चलते ही चले आ रहे है और निश्चित है कि अन्तिम साँस रहते उसी एक कार्य में निरत रहेंगे यह शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन हुआ इसलिए गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिन भी - युग - निर्माण आन्दोलन के जन्म दिन के साथ अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है। हम सब अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन जो गुरुदेव के प्रति - युग निर्माण मिशन के प्रति निष्ठा रखते हैं उनके जन्म दिन को उसी श्रद्धा और उमंग के साथ मानते मनाते रहे है।

गुरुदेव की व्यक्तिगत और सार्वजनिक गतिविधियों का प्रत्येक अध्याय बसन्त पर्व के दिन आरम्भ होता रहा है। वे अपने एक वर्षीय कार्यक्रम निर्धारित करते रहे है। वैयक्तिक साधना उपासना का क्रम निर्धारण उन्होंने सदा बसन्त पंचमी को किया है और ठीक एक वर्श में उस पूर्व निश्चित योजना को पूर्ण कर लिया। उस दिन वे अपने ऊपर दिव्य प्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होना स्वीकार करते हैं और कहा करते हैं कि यह दिन हर वर्श एक नया सन्देश देकर नव प्रभात की तरह उनके अन्तरंग अन्तरिक्ष में आविर्भूत होता है। इसी प्रकाश को वे ईश्वरीय मार्ग-दर्शन के रूप में अंगीकार करते हैं और तदनुसार एक वर्श के लिए उठाये जाने वाले कदमों का निर्धारण करते हैं।

उनके प्रत्यक्ष कार्यक्रमों के बारे में यही बात रही है। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण कार्य का आरम्भ उन्होंने बसन्त पर्व से ही किया है। पन्द्रह वर्श की आयु में गायत्री महापुरश्चरण की शृंखला का आरम्भ - अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन - गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास - सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का संकल्प - वेदों के अनुवाद का श्रीगणेश - युग-निर्माण पत्रिका का आरम्भ - मराठी, अंग्रेजी गुजराती आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन - युग- निर्माण प्रेस की स्थापना - गायत्री परिवार एवं युग- निर्माण परिवार का प्रारम्भ - शान्तिकुञ्ज का संस्थापन प्रभृति अनेकों ज्ञात और अविज्ञात कार्य गुरुदेव द्वारा आरम्भ किये गये। मंगल कार्यों का शुभारम्भ इसी वसन्त पर्व में होता रहा है।

यह सब अनायास आकस्मिक रूप से नहीं हुआ वरन् एक परम मंगलमयी शुभ घड़ी के रूप में इस पर्व को समझा गया है। इसका कारण यो उस दिन दैवी चेतना का बाहुल्य - प्रकृति की हर श्रेष्ठ कार्य के लिए अनुकूलता अथवा युग परिवर्तन के लिए महाकाल की स्फुरणा का प्रादुर्भाव जैसे अविज्ञात सूक्ष्म कारण हो सकते हैं। पर हमें तो उस आरम्भ को गुरुदेव के आत्मबोध पर्व के रूप में मानना और युग-निर्माण अभियान के जन्म दिन के रूप में ही मानना अधिक प्रेरणास्पद हो सकता है। विद्या और कला की मस्तिष्कीय और हृदयगत चेतना को उभारने की ही अपनी कार्य - पद्धति है। यह प्रेरणाएँ सरस्वती पर्व से - बसन्त पंचमी से - सहज ही सम्बन्धित है।

अखण्ड - ज्योति की सदस्यता - युग निर्माण परिवार के प्रति संबद्धता - एवं गुरुदेव की प्रगाढ़ आत्मीयता के आधार पर हम लाखों भावनाशील व्यक्ति एक अत्यन्त भाव भरी किन्तु सुदृढ़ शृंखला में बँधे हुए है। प्रत्यक्ष रूप में हम सब अपने घर, परिवारों और व्यवसाय उत्तरदायित्वों की प्रत्यक्ष जिम्मेदारियों के साथ भी जुड़े बँधे है पर इतनी ही छोटी सीमा तक कोई सीमित नहीं है। सहज ही परिवार का प्रत्येक सदस्य यह अनुभव करता है कि वह शरीर यात्रा से सम्बन्धित क्रिया कलापों की ही सीमा में अवरुद्ध नहीं वरन् ईश्वर प्रदत्त इस विशेष अवसर के लिए सौंपी गई जिम्मेदारियों से भी वह बंधा हुआ है। युग - निर्माण परिवार की सदस्यता हम सबको इसी जिम्मेदारी को निबाहने के लिए निरन्तर उद्बोधन ओर प्रोत्साहन करती रहती है।

बसन्त पर्व उसी स्नेह शृंखला में आबद्ध होने की व्रत शीलता का उद्बोधन कराने हर वर्श आता है। और यह सन्देश प्रस्तुत करता है कि इस देव परिवार की सदस्यता के साथ उनकी जो जिम्मेदारियाँ है उनका निर्वाह करने के लिए विगत की अपेक्षा आगत में कुछ और भी महत्त्वपूर्ण कदम उठाये जाने चाहिए कर्मकाण्ड के आधार पर स्थूल गुरु दीक्षा के बंधन में आबद्ध भले ही न हो पर उनके व्यक्तित्व, प्रतिपादन एवं प्रकाश से हम सभी प्रभावित है। भावनात्मक एवं बौद्धिक स्तर पर हम में से प्रायः सभी उनके अनुगमन की चेष्टा करते हैं। यह सम्बन्ध सूत्र भले ही भौतिक दृष्टि से उतना प्रत्यक्ष उतना आकर्षक न हो पर अन्तः करण के मर्म स्थल में उठने वाली दिव्य स्फुरणाओं के साथ उसकी सघनता असंदिग्ध रूप से है। जब कभी हम एकाकी एवं शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होते हैं तो देखते हैं कि माता के दूध की तरह एक भाव भरी और शक्तिशाली धारा अपने अन्तरंग में निरन्तर झरने लगी है और एक अभिनव प्रकाश किरण अपने आलोक से अन्तःकरण को आलोकित करने लगी है। इस अनुदान को हम चाहे तो गुरुदेव के उस सहज स्नेह की प्रतिक्रिया मान सकते हैं जिसके साथ हम अनायास ही सघन घनिष्ठता के साथ बंध गये है। गुरुदेव के साथ अपने सम्बन्ध सूत्र को हम चाहे तो इन्हीं अनुभूतियों के रूप में निरन्तर करते रह सकते हैं।

इन तथ्यों पर दृष्टिपात करते हुए बसन्त पर्व न केवल भगवती सरस्वती का - युग-निर्माण अभियान का- गुरुदेव का जन्म दिन रह जाता है वरन् उसी परिवार के सघन सदस्य होने के नाते अपनी दिव्य चेतना की स्फुरणा का भी जन्म दिन बन जाता है। महान् सम्बन्धनाओं के उस दिव्य आलोक का भी जन्म दिन मान सकते हैं जो क्रमशः अधिक दीप्तिमान होता चला आ रहा है और अन्ततः जीवन लक्ष्य की चरम अवधि तक पहुँच देने का आश्वासन देता है। इस अवसर पर हमें अपनी पुण्य अभिव्यक्तियों को अवरुद्ध नहीं करना चाहिए वरन् उन्हें ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने के लिए उत्साह भरा उपक्रम करना चाहिए।

इन सब तथ्यों पर जितनी अधिक गंभीरता से विचार करते हैं उतना ही यह आवश्यक हो जाता है कि बसन्त पर्व पर अपनी भाव स्फुरणा को प्रस्फुटित - विकसित होने का अवसर मिलना ही चाहिए। इसके लिए उस दिन अधिकाधिक ऐसा आत्मचिन्तन करना चाहिए जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अधिकाधिक बल एवं उत्साह प्रदान कर सके। सूक्ष्म जगत में दिनों दिन एक ऐसा दैवी प्रवाह एवं प्रकाश उभर रहा है जो हर जीवन अन्तःकरण में गुदगुदी उत्पन्न करता है और ऊँचा उठने - आगे बढ़ने - के लिए दुलारता, पुचकारता है। सीप की तरह यदि हम तनिक भी मुँह खोल सके तो इन दिनों झर रही कई स्वाति बूँदें उसमें गिर सकती है और कई मोती गर्भ में आ सकते हैं। गुरुदेव पर जो दैवी अनुग्रह बरसते रहे है वे ही अपने लिये भी सहज उपलब्ध है। आवश्यकता केवल उन प्रबल भाव भाव-संवेदनाओं की है जिनके आधार पर उपलब्धियों को हृदयंगम और आत्मसात् कर सकना सम्भव हो सके।

ऐसी दिव्य सम्वेदनाओं का आह्वान करने के लिए अभी से तैयारी आरम्भ की जानी चाहिए। सूर्य उदय होने से कुछ समय पूर्व ही ब्राह्ममुहूर्त का प्रभात काल प्रस्तुत हो जाता है हम में से प्रत्येक को यह अंक पहुँचने पढ़ने के दिन से ही भीतर एक ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए कि बसन्त पर्व के आस-पास कुछ अतिरिक्त दैवी प्रकाश के दर्शन का लाभ मिल सके। इस अवसर को ऐसे ही उपेक्षा अवस्था में चला नहीं जाने देना चाहिये अपने स्वरूप, कर्तव्य और भविष्य के बारे में हम में से प्रत्येक को इन दिनों कुछ अतिरिक्त ही आत्म चिन्तन करना चाहिए।

हम अपने को ईश्वरीय चेतना के अत्यधिक निकटवर्ती क्षेत्र में रहने वाली आत्माओं में से एक अनुभव करे और उस तथ्य को समझे कि युग परिवर्तन अभियान महाकाल की ऐसी स्फुरणा है जो असंदिग्ध रूप में अगले दिनों पूर्ण ही होकर रहेगी। पेट और प्रजनन के लिए भूतकाल में अनेकों जन्म मिल सकते हैं पर इस जन्म को एक ऐसी पवित्र धरोहर के रूप में ही माना जाना चाहिए जो मानव जाति के भविष्य निर्माण में बढ़े चढ़े योगदान प्रस्तुत करने के लिए ही उपलब्ध हुआ है। इन दिनों लोक मंगल के लिये कुछ साहसिक कदम बढ़ाने के लिये जो हूक अन्तःकरण में उठती रहती है उसे विशुद्ध रूप से आत्मा की पुकार अथवा ईश्वरीय आह्वान उद्बोधन मानना चाहिए और उसकी अवज्ञा उपेक्षा करते रहने की भूल को तत्काल सुधारने का साहस उत्पन्न करना चाहिए।

बसन्त पर्व हम सबके लिये आत्मबोधन का - आत्मोत्कर्ष का प्रेरणा पर्व बन सके इसके लिये हमें अपनी मनः स्थिति को अभी से विकसित परिष्कृत करने में लग जाना चाहिए। अब से लेकर बसन्त तक का समय प्रभातकालीन ब्रह्ममुहूर्त समझना चाहिए और हर दिन इस प्रकार से पुण्य चिन्तन में व्यतीत करना चाहिए जिसकी पृष्ठभूमि में देव जीवन में अपने को अधिक गतिशील बनाने का आवश्यक साहस मिल सके।

बसन्त पर्व मनाने का दूसरा कार्य उस अवसर पर कुछ समारोह आयोजन करने के रूप में सम्पन्न किया जाना चाहिए। जिनमें थोड़ी प्रतिभा है - सार्वजनिक जीवन का अनुभव है - उन्हें युग- निर्माण सम्मेलन के सार्वजनिक समारोह का कुछ न कुछ स्वरूप बनाना ही चाहिए। छोटा गायत्री यज्ञ इन सम्मेलनों के साथ जुड़ा ही रहना चाहिए। यज्ञ वह स्थूल कर्मकाण्डात्मक प्रक्रिया है जिसे अगले दिनों व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में गहराई तक प्रवेश करने से ही नव-निर्माण का प्रयोजन पूरा होगा इसलिये इस प्रतीक प्रतिष्ठा को छोटे या बड़े रूप में प्रदर्शित किया ही जाना चाहिए। लाल मशाल का सम्बल किसी न किसी रूप में अपने हर आयोजन में - स्थापित किया जाना चाहिए। लाल मशाल को ध्वजारोहण मंच पर चित्र के रूप में हर आयोजन में स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

आयोजन कहाँ किस रूप में मनाया जा सकता है यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय किया जाना चाहिए। प्रभात -फेरी, जुलूस, जलयात्रा, रात्रि को दीप दान, यज्ञ, स्थानीय ज्ञानघटों की एक चौकी पर स्थापना और उनका पूजन, सुन्दर यज्ञशाला का निर्माण, सम्मेलन के निकटवर्ती क्षेत्र में वक्ताओं एवं गायकों की आवश्यक तैयारी के लिए साहित्य देना, लाउडस्पीकर व्यवस्था, मंच तथा यज्ञ के उपकरण पर्चे विज्ञापन, ऐलान ऐसे क्रिया कलाप, आयोजनों के लिए आवश्यक होते हैं और घर-घर आकर जन सम्पर्क करके वह वातावरण बनाना पड़ता है जिसमें अधिक लोग अधिक उत्साह के लिए उस आयोजन में सम्मिलित हो सके।

मिल-जुलकर इसके लिये प्रयास किया जाय तो सभी लगभग एक महीना बाकी है इसमें अच्छे समारोह की तैयारी हो सकती है। जन-शक्ति और धन-शक्ति जुटाने को तत्पर हुआ जा सकता है। पर यदि उत्साह अथवा सहयोग की कमी दिखाई पड़े तो भी व्यक्तिगत प्रयास से छोटा हवन और सम्पन्न क्षेत्र के लोगों को आमन्त्रित करके कम से कम एक विचार गोष्ठी जैसा आयोजन तो कर ही लेना चाहिए। जागृत भावनाओं और जीवन्त आस्थाओं की यह कसौटी चुनौती समझी जानी चाहिए कि बसन्त पर्व पर हर परिजन से किसी न किसी प्रकार छोटे बड़े उत्सव आयोजन की कुछ व्यवस्था बन सकी या नहीं। गायत्री तपोभूमि से उस अवसर पर प्रतिनिधि या वक्ता बुलाने की माँग नहीं करनी चाहिए क्योंकि वहाँ बहुत थोड़े प्रचारक है और आयोजनों की संख्या हजारों तक जा पहुँचती है। मिशन के अनुरूप बोल सकने या गा सकने के लिए योग्य व्यक्ति स्वयं ही तलाश करने होते हैं और उन्हें तैयारी के लिये पहले से ही साहित्य देना पड़ता है। प्रेरक कविताओं को मधुर स्वर से गा सकने योग्य छात्रों अथवा वयस्कों को यदि पहले से ही तैयार किया जाय तो उत्साह वर्धक कविता सम्मेलन तो हर जगह हो सकता है और उससे भी मिशन की प्रेरणा को व्यापक बनाने में एक सीमा तक अच्छी सहायता मिल सकती है। इस प्रयोजन के लिए युग-निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित कविता पुस्तकें बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

दीवारों पर वाक्य लेखन , विद्यार्थियों का वितरण, पोस्टर का चिपकाया जाना जैसे कई कार्य स्थानीय उत्साह की अभिवृद्धि में सहायक हो सकते हैं। जहाँ अभी तक शाखा संगठन नहीं बने है वहाँ इसी समय उनकी स्थापना हो जाना चाहिए। जहाँ संगठन है वहाँ उन्हें अधिक व्यवस्थित और अधिक सक्रिय बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिये।

इन सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य बनाने और बढ़ाने के लिए उन्हीं दिनों टोली बनाकर निकलना चाहिए पुराने सदस्यों से तो चन्दा वसूल करना ही चाहिये नये सदस्य बनाने का अभियान भी आरम्भ करना चाहिए। यह पत्रिकाएँ ही गुरुदेव की वाणी है वे अधिक लोगों तक मिशन का प्रकाश पहुँचा सके इसके लिये अनिवार्य रूप से यह आवश्यक है कि उनकी प्रेरणा को नियमित रूप से ग्रहण करते रहने वालों की संख्या बढ़ाई जाय और यह कार्य मात्र पत्रिकाओं की सदस्य संस्था बढ़ाने से ही सम्भव हो सकता है। बसन्त पर्व तक कौन कितने सदस्य बनाता है इसके लिये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चलनी चाहिए। लक्ष्य यह रहना चाहिए कि अगले वर्श अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या कम से कम पाँच गुनी अवश्य हो जाय। इसके लिये हम सब अपना व्यक्तिगत कर्तव्य यह माने कि अपनी भाव भरी श्रद्धांजलि अधिक सदस्य बनाने और बढ़ाने के रूप में प्रस्तुत करेंगे

मिशन के स्वरूप से अभी बहुत कम लोग परिचित है। प्रबुद्ध व्यक्तियों- प्रतिभाशाली वर्ग में- विभूतिवानों में अब इसका क्षेत्र विस्तृत व्यापक किया जाना चाहिए इसके लिये पिछले ही महीने पच्चीस - पच्चीस पैसे मूल्य के चार ट्रैक्ट छिपे है। यह एक रुपये का सैट यदि अपने क्षेत्र के विचारशील लोगों में अधिक उत्साह के साथ पढ़ाया जाय तो कुछ ही समय में अधिक महत्त्वपूर्ण लोगों का - अधिक महत्त्वपूर्ण मात्रा में सहयोग उपलब्ध हो सकता है। जिस प्रकार झोला पुस्तकालयों द्वारा मिशन की प्रेरणाएँ व्यापक बनाने का क्रिया-कलाप चलता है उसी प्रकार इस महीने इन चार ट्रैक्टों द्वारा युग-निर्माण आन्दोलन का स्वरूप समझाने के लिये उपरोक्त ट्रैक्टों के आधार पर प्रयास किया जाना चाहिए।

आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिन्तन मनन 2. बसन्त पर्व पर किसी न किसी प्रकार छोटे या बड़े आयोजन 3. अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं की सदस्य संख्या अभिवर्धन 4. नये छपे प्रचार ट्रैक्टों द्वारा अपने क्षेत्र में युग-निर्माण अभियान के स्वरूप का प्रचार परिचय, यह चारों ही क्रिया कलाप पूरे करने के लिये हम उत्साह पूर्वक जुट पड़े तो उसका परिणाम इस प्रकार सामने आ सकता है जिसके आधार पर निर्दिष्ट लक्ष्य की दिशा में आशातीत सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके।


गुरु और शिष्य (Kahani)

गुरु और शिष्य शहर से बाहर घने जंगल में एक झोपड़ी बनाकर रहते थे। जंगल में चूहे अधिक थे अतः दिन में तो नहीं पर रात में झोपड़ी में घुस आते और गुरु की नींद हराम कर देते। चूहों को कुछ नहीं मिलता तो धार्मिक ग्रन्थों को ही काट जाते। गुरु ने सोचा ऐसे काम चलने वाला नहीं है अतः उन्होंने एक बिल्ली पाल ली।

बिल्ली के डर से चूहे झोपड़ी में प्रवेश नहीं करते और गुरु शिष्य का जीवन भी निश्चिन्तता के साथ बीतने लगा। बिल्ली गुरु से बहुत हिल-मिल गई थी। हर समय उनके आगे पीछे ही घूमती रहती। वह खाना खाने बैठते तो बिल्ली सामने बैठ जाती, पर उसमें यह अच्छाई थी भोजन सामग्री भले ही खुली रहे बिल्ली उसमें मुँह न डालती थी।

सुबह शाम गुरुजी जब साधना के लिए बैठते तो वह उनकी गोद में आकर बैठ जाती और उनका ध्यान टूट जाता अतः साधना के लिए बैठते समय पास में बिछे तख्त के एक पाये में उसे बाँध देते। इस तरह बिल्ली गुरु के पास भी बनी रहती और साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती कुछ दिनों के बाद गुरु, और उनके वियोग में बिल्ली दोनों ही इस संसार से विदा हो गये। अब मार्ग दर्शन के लिए अनेक अनुयायियों ने उनके शिष्य के पास जाना शुरू कर दिया। सुबह-शाम उनके आसन पर बैठकर शिष्य ने साधना प्रारम्भ कर दी, पूर्व का अभ्यास न होने के कारण शिष्य का मन न लगता। 10-15 मिनट की साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।

शिष्य अपनी कमजोरी पर गम्भीरता से विचारने लगा। गुरु के समस्त क्रिया-कलापों पर एक विहंगम दृष्टि डालने से उन्हें पता चला कि वह तो एक बिल्ली पाले हुए थे और उसे ध्यान के समय पास में ही बाँध लेते थे। जरूर मुझे भी ऐसा यत्न करना चाहिए। वह अपने भक्तों के पास गये और एक बिल्ली ले आये। उनके भक्त भला साधारण सी बात के लिए मना करते?

उनका ऐसा ख्याल था कि पास में बिल्ली बाँधने से साधना में एकाग्रता बनी रहती है। अनेक शिष्य गुरु की आदतों की इसी प्रकार नकल करते हैं और कार्य-कारण के सम्बन्ध को समझने की कोशिश नहीं करते। इस तरह की नकल व्यर्थ प्रत्येक व्यक्ति को गुरु के मार्ग दर्शन में अपनी प्रकृति तथा क्षमतानुसार साधना मार्ग विकसित करना चाहिए। अविवेकी ढंग से किया गया अनुकरण सफलता की ओर अग्रसर नहीं करता।


तरने वाले कहाँ है?


तरने वाले कहाँ है? (Kahani)

आग की पिघली नदी में, तैरने वाले कहाँ है?

बिछ रही बारूद सिकता की तरह से हर डगर में,

फँस रहा संसार सारा, ध्वंस की उठती लहर में?

द्वेष की सरिता तटों को लाँघ, उफनाई हुई है,

मील से उखड़े विटप हैं, बाढ़ वह आई हुई हे,

इस गरल के पर्व का फल लूटने वाले कहाँ हैं?

आग की पिघली नदी में, तैरने वाले, कहाँ हैं?

त्रस्त मानव के दुःखों की, चीत्कारों की कहानी,

ढल रहा फौलाद, घर्घर-नाद से आकाश चुप है,

व्योम तक अणु-घुल उड़ती, सिंधु के उच्छवास चुप है,

यंत्र पीडित्रत इस सदी से जूझने वाले कहाँ हैं?

आग की बहती नदी में, तैरने वाले कहाँ हैं?

मत भस्मासुर उठाये हाथ, इतना बढ़ गया है,

बुद्धि का उद्दण्ड बेटा, चंद्रमा पर चढ़ गया है!

रौंदने को सतत् आतुर, दूर मंगल की सतह को,

मनुज के द्दग देखते हैं, आग बरसाती सुबह को,

विश्व-मंगल का सवेरा, मेंटने वाले कहाँ हैं?

आग की बहती नदी में, तैरने वाले कहाँ हैं?

मंत्र की महिमा, पराजित, यंत्र-विषधर कर रहे हैं,

धूम्र के फूत्कार दंशित, स्वप्न, मनु के मर रहे हैं,

ये विषैले नाग, भू का प्राण- सागर पी रहे हैं

मंत्र-सृष्टा दिव्य दृष्टा, दीन बनकर जी रहे हैं,

यज्ञ से युग-व्याल का विष कीलने वाले कहाँ हैं?

आग की पिघली नदी में ,तैरने वाले कहाँ हैं?

भौतिकी सैलाब में, डूबी हुई सारी धरा हैं,

डालते पतवार, जिनकी बाहुओं का आसरा हैं,

तो अमृत के पुत्र बोलो, कौन फिर माँरुी बनेगा-विश्व-नैया का खिवै, कौन जो, साथी बनेगा?

नाश की घुमड़ी घटाये, मोड़ने वाले कहाँ हैं?

आग की पिघली नदी में तैरने वाले कहाँ हैं?

*समाप्त*