मानवी महानता को जीवित ही रहना चाहिए

मनुष्य जन्म पशु जीवन से इसलिए श्रेष्ठ और ऊँचा माना गया है कि उसमें पेट-प्रजनन से आगे बढ़कर-ऊँचा उठकर, कुछ सोचने और करने की ईश्वर प्रदत्त विशेषता विद्यमान है। दूसरे प्राणी यह सब नहीं कर पाते। उन्हें शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करने भर में अपने सारे क्रिया-कलापों को सीमित रखना पड़ता है। बलपूर्वक उनसे कोई लाभ उठाने की बात दूसरी है पर पशु जानबूझ कर-स्वेच्छा भावना से किसी का उपकार करने की-दूसरों को दूसरों को सूखी बनाने की बात प्रातः कम ही सोचते हैं। सोचते हैं तो वह परिधि सन्तान एवं साथियों तक सीमित होकर रह जाती है। दूरदर्शिता का आश्रय लेकर सुविस्तृत विश्व में शान्ति सुविधा बढ़ाने की बात वे कहाँ सोच पाते हैं? और ऐसा कुछ कहाँ कर पाते हैं? इसी विवशता के कारण पिछड़े प्राणि वर्ग को हेय स्थिति में समझा जाता रहा है और मनुष्य की स्थिति उनसे अच्छी बताई जाती रही है।

मानवी महानता के प्रधान आधार यही हैं-कि वह अपने को आदर्श बनाये उत्कृष्ट चिन्तन प्रक्रिया को अपनाये और ऐसे कार्य करे जिनमें भले ही उसे त्याग करना पड़े अथवा कष्ट सहना पड़े किन्तु दूसरों की समाज और युग की सेवा के लिए बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत कर सके। इस स्तर के जीवन को ही मानव-जीवन की गौरव गरिमा के साथ अलंकृत और सम्मिलित किया जा सकता है।


प्रस्तुत विकृतियाँ और उनके निराकरण का एकमात्र आधार

युग परिवर्तन की महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए भावनाशील व्यक्तियों के प्रबल पुरुषार्थ के साथ उठ खड़े होने का ठीक यही समय है। बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियों का प्रवाह क्रम इतना प्रचण्ड है कि यथा-स्थिति बनाये रहना किसी भी दृष्टि से वाँछनीय नहीं। जन-मानस में विकृतियाँ इस कदर बढ़ती जा रही हैं कि उनके विद्रूप विस्फोट कभी भी विपत्ति खड़ी करके रख देंगे।

अपराधों की दुष्प्रवृत्तियाँ प्रत्यक्ष और परोक्ष स्तर पर इतनी बढ़ती जा रही हैं कि अब किसी घोषित सदाचारी के भी छद्म दुराचारी होने की आशंका रहती है। लगता है चरित्र निष्ठा कोई तथ्य न रहकर वाक-विलास को-परस्पर उपदेश करने में काम आने वाली चर्चा चर्या- बनकर रह गई है।

एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति अविश्वास चरम सीमा तक बढ़ता जा रहा है। किसी को किसी का भरोसा नहीं-न जाने कौन आज मित्र बनकर कल शत्रु जैसा अप्रत्याशित आक्रमण कर बैठे, इससे हर किसी का दिल दहलता रहता है। पति और पत्नी के बीच की गई पवित्र प्रतिज्ञाएँ एक मखौल जैसी बन गई हैं। छोटे-छोटे कारणों को लेकर कितनी ही परित्यक्ता बनादी जाती हैं और कितनों का प्राण हरण कर लिया जाता है। ऐसे पैशाचिक-कृत्य अब अपवाद नहीं रहे। विवाह के समय देखे गये सुखद स्वप्नों को रौरव नरक में परिणत होते हुए अगणित सधवाएँ देखती हैं और खून के आँसू बहाती हुई विवशता भरी दुर्दशा के बीच मौत के दिन गिनती हैं। सुखद और सन्तुष्ट दाम्पत्य जीवन का आनन्द किन्हीं विरले ही सौभाग्यवानों को मिलता है अन्यथा कामुक दृष्टि की प्रधानता के कारण पवित्र विवाह-संस्था का लगभग दम ही घुट चला है।

पिता पुत्र के सम्बन्ध अब नाम मात्र के रह गये हैं। जब तक वयस्क नहीं होते तभी तक बेटे रहते हैं। जैसे ही पर उगे-विवाह हुआ-आजीविका से लगे, वहीं माता-पिता और भाई-बहिनों का रिश्ता प्रायः समाप्त ही हो जाता है। परिवार संस्था जब समस्त संसार में टूट गई तो अकेले भारत में ही वह कब तक चलती? पशु पक्षियों के बालक भी कहाँ अपने माता-पिता को सँभालते हैं-और पिता माता भी सन्तान के कब कुछ आशा करते हैं, ऐसी दशा में मनुष्य ही उस बन्धन में क्यों बँधे? उपेक्षा का आरम्भ सन्तान की ओर से भले ही हुआ हो पर उसकी प्रतिक्रिया तो माँ-बाप पर भी होती ही है। पाश्चात्य देशों में पति-पत्नी के बीच- बाप-बेटे के बीच ऐसा कोई आधार नहीं कि कोई किसी से आड़े समय में भी सहायता की आशा कर सके। जब पशु जीवन में ही प्रवेश करना लक्ष्य बन गया तो फिर परिवार संस्था के बीच उच्च आदर्श कब तक जीवित रह सकते थे? कहना न होगा कि घर-परिवार अब एक होटल, कम्यून-केन्टीन जैसे बनते इस छोटी प्रयोगशाला में प्रस्तुत रहने और स्वर्गीय अनुभूतियों का प्रत्यक्ष आनन्द प्रस्फुटित होते रहने वाली स्थिति अब कहाँ किस परिवार की है?

असंयमी मनुष्य अहिर्निशि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी बजाता रहता है। नशेबाजी से अब कोई बिरला ही बचा होगा। तमाखू और चाय अब मात्र-जल जैसी आवश्यकता बन गई है। चटोरेपन ने आहार को लगभग विष स्तर का बना दिया है जिसे खाकर जीवन धारण का प्रयोजन पूरा नहीं होता वरन् वह उलटा जीवन को खाता है। कामुकता किशोरावस्था आरम्भ होने से पहले ही पनप उठती है और बहुमूल्य जीवन रस का क्षरण उस अबोध एवं अपरिपक्व स्थिति में ही आरम्भ हो जाता है। ऐसी दशा में जवानी और बुढ़ापा गांठ जोड़ करके साथ-साथ आने लगे हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। यौवन आने से पूर्व ही शरीर का दीन दुर्बल रोग ग्रसित स्थिति में देखी जा सकती है। अब दवा और डाक्टर दैनिक आवश्यकताओं में जुड़ गये हैं, इनकी सहायता के बिना किन्हीं बिरलों की ही काया का छकड़ा आगे धकेला जाता है।

मनोविकारों की तो हद ही हो गई है। शरीर टूट रहे हैं ये तो प्रत्यक्ष है ही। मनों के भीतर कितनी विषाक्त विकृतियाँ धँस पड़ी हैं, इसे थोड़ी गहराई में उलट-उलट कर देखा जाय तो लगेगा कि मनुष्य जैसी गुण, कर्म स्वभाव वाली- विचारणा, अभिरुचि और आकाँक्षा वाले- व्यक्तियों को उँगलियों पर गिन सकने जितनी संख्या में भी ढूंढ़ निकालना कठिन है। सब की अपनी अपनी सनकें हैं-अपनी-अपनी उद्दण्ड आदतें। मर्यादाओं के बाँध तोड़कर उच्छृंखलता का पानी भयावह बाढ़ों को पीछे छोड़ रहा है। क्रोध,आवेश उत्तेजना से ग्रसित मनःस्थिति तनिक सी बात पर खून खराबी के लिए बाहों चढ़ाकर फिरती देखी जा सकती हैं। खीज,ईर्ष्या, प्रतिशोध और विद्रोह का असुर अपने आदिम अस्त्रों से सुसज्जित होकर कहीं पर भी श्रोणित-तर्पण प्रस्तुत करता देखा जा सकता है। हत्याओं और आत्म हत्याओं का सिलसिला इतनी द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है मानो यह भी साधारण, स्वाभाविक जीवन का एक अंग ही बनने जा रहा हो। सभ्यता का आवरण ओढ़े हुए मानत-प्राणी आदिमकालीन हिंस्र पशुओं की स्थिति में लौटने के लिए कितना आकुल-व्याकुल हो रहा है यह देखत हुये अवाक् रह जाना पड़ता है और सोचना पड़ रहा है कि प्रगति के कदम आगे की ओर बढ़ रहे हैं या पीछे की ओर।

चिन्ता, निराशा, आशंका असुरक्षा एवं अविश्वास से बचा हुआ स्वच्छ मन अब किसी विरले को ही दृष्टिगोचर होगा। सन्तुलित दृष्टिकोण लेकर वस्तुस्थिति समझ सकने वाले और यथार्थता का मूल्यांकन कर सकने वाले लोग अब ढूंढ़े नहीं मिलेंगे। जिसे देखो अहंकार भरे आक्रोश और आवेश-पक्षपात और पूर्वाग्रह में ग्रस्त मिलेगा। ऐसी दशा में विवेक की-न्याय की-औचित्य की दुहाई देना अरण्य रोदन जैसा निरर्थक बनकर रह जाता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले जंगली कानून का जहाँ बोलबाला हो वहाँ आतंकवादी, गुण्डागर्दी ही मनमानी करेगी, यही सब कुछ हो रहा है। थोड़े से आतंकवादी अपने क्षेत्र पर इस तरह छाये मिलेंगे मानो विरोध प्रतिरोध की उन्हें कोई आशंका, सम्भावना ही न रह गई हो। हर भले आदमी के लिए इज्जत बचाकर जिन्दा रह सकना कठिन बन गया है। न्याय की चर्चा तो बड़ी सुन्दर है पर इसे प्राप्त कर सकना-ईश्वर को प्राप्त कर सकने से भी अधिक दुर्लभ है। सर्व साधारण को न्याय मिल सके ऐसी आज की स्थिति नहीं है और न सरकारी मशीनरी ही उस प्रयोजन को पूरा करा सकने में समर्थ है। ऐसी दशा में सदुद्देश्यों पर से-आदर्शों पर से मनुष्य की निष्ठा प्रायः उठती सी चली जा रही है। लोग अनास्थावान बनते चले जा रहे हैं।

यह दयनीय स्थिति हमें अपने चारों ओर बिखरी दिखाई पड़ेगी और थोड़ा ध्यान देने पर प्रतीत होगा कि मनुष्य जाति कितनी दयनीय दुर्दशा में फँस गई है। यो सज्जनों का-सत्प्रवृत्तियों का-सद्भावनाओं का सर्वथा अभाव नहीं है। सुविस्तृत मरुस्थल में जहाँ तहाँ हरियाली उगी हुई और छोटी शीतल सरोवर भी देखी जा सकती है पर इन दृश्यों को अपवाद ही कहा जा सकेगा। सामान्य स्थिति जो बन चुकी है और उसमें बिगाड़ के तत्व जिस क्रम से बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए दुखदायी निराशा भरी अंधियारी आसमान से उतरती चली आ रही है ऐसा ही मान जायगा।

सुधारवादी तत्वों की स्थिति और भी उपहासास्पद है। धर्म, अध्यात्म, समाज एवं राजनीति के क्षेत्रों में सुधार एवं उत्थान के नारे जोर शोर से लगाये जाते हैं पर उन क्षेत्रों में जो हो रहा है-जो लोग कर रहे हैं उसमें कथनी और करनी के बीच जमीन आसमान जैसा अन्तर देखा जा सकता है, ऐसी दशा में उज्ज्वल भविष्य की आशा धूमिल ही होती चली जा रही है। विज्ञान के द्वारा साहित्य और कला के द्वारा-मूर्धन्य व्यक्तित्वों द्वारा जो भूमिका प्रस्तुत की जा रही हैं उनसे सत्परिणामों की आशा नहीं बँधती- वरन् निराशाजन्य दुष्परिणामों की ही आशंका बढ़ती है। देश-देश की राजनीति में जो शतरंज बिछी हुई है उसमें एक-दूसरे को मात देने के लिए पुरी दुरभि-संधियाँ संजोये हुए प्रवीण शकुनि अपनी-अपनी जगह मजबूती से जमे बैठे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। कब किसी दिन विश्व-युद्ध फट पड़े और कब अणु आयुधों के प्रहार से संचित-सभ्यता का सर्वनाश प्रस्तुत हो जाय कुछ कहा नहीं जा सकता। यह विभीषिका कल-परसों ही अपने सर्वभक्षी विकराल रूप में सामने खड़ी दृष्टिगोचर हो सकती है और ब्रह्माँड के इस अनुपम सौंदर्य वाले पृथ्वी-पिण्ड को महाप्रलय ग्रस सकती है।

हम आज ऐसे ही विपत्ति भरे क्षणों में जीवन-यापन कर रहे हैं। प्रश्न फिर बही सामने आते हैं कि क्या यथास्थिति बनी रहने दी जाय? क्या हम सब ऐसे ही समय की प्रतीक्षा में ऐसे ही हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें? अपने को असहाय, असमर्थ अनुभव करते रहें? और स्थिति बदलने के लिए किसी दूसरे पर आशा लगाये बैठे रहें? मानवी पुरुषार्थ कहता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। बदलाव के लिए बड़े लोग आगे न आएं तो भी निराश नहीं होना चाहिए वरन् हम छोटे लोगों को ही मिल-जुलकर कुछ करना चाहिए। दिवाली की काली अमावस्या को जब मृत्तिका के तनिक-तनिक से दीपक दीपपर्व का उत्साहवर्धक आभा में बदल सकते हैं तो हम भावनाशील और कर्मनिष्ठ व्यक्ति क्या कुछ नहीं कर सकते?

इन परिस्थितियों में हमें निष्क्रिय पर्यवेक्षक के रूप में नहीं बैठा रहना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि इतिहास में क्या कभी ऐसे प्रसंग पहले भी आये हैं और आये हैं तो उस स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए क्या उपाय बरते गये हैं। इस सम्बन्ध में सब उपयुक्त तुलनात्मक स्थिति त्रेता के अन्त में बढ़ी हुई असुरता से की जा स्थिति को बदलने के लिए दो राजकुमार जटा-जूट बाँधकर आगे आये और उनका साथ देने के लिए रीछ-बानरों की सेना अपने प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो गई। इतिहास साक्षी है कि असम्भव कही जा सकने वाली घटनाएँ सामने आई। समुद्र पर पुल बँधा और दुर्दांत दैत्यों का अन्त ईंट-पत्थरों द्वारा लड़ने वाली वानरी सेना द्वारा कर दिया गया। अब भी उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है होनी चाहिए।

आज रीछ-बानरों की तरह प्राण-पण से असुरता से जूझने वाले भावनाशील और कर्मनिष्ठ व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो हलके-फुलके ढंग से, यश लिप्सा के लिए लोकसेवा का आडम्बर करने नहीं, वरन् उससे महान प्रयोजन के लिए अपने को गलाने-खपाने के व्रत संकल्प लेकर ही आगे आयें। ऐसे व्यक्तित्व यदि मिल सकें तो व्यक्ति, परिवार और समाज को- हर क्षेत्र को जकड़े हुए प्रस्तुत अन्धकार अपने समीपवर्ती अन्धकार का खा सकता है तो कोई कारण नहीं कि युग परिवर्तन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपने के खपा देने वाले परिष्कृत व्यक्तित्व समय पर छाई हुई विभीषिकाओं को उलटकर न रख सकें।

इस संदर्भ में भारत की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा भी है- वानप्रस्थ। उस गौरव गरिमा के दिनों में प्रायः प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति अपने जीवन का उत्तरार्द्ध इसी प्रयोजन के लिए समर्पित करता था कि समय की विकृतियों पर उगते ही कुठाराघात किया जाय और सर्वतोमुखी उत्कर्ष की सत्प्रवृत्तियों को अभिसिंचित करने में अनवरत रूप से संलग्न रहा जाय। वानप्रस्थ जीवन का उद्देश्य यही था कि समाज को गिराने, मिटाने वाली विकृतियों को खुली छूट न दी जाय वरन् उन्हें निरस्त करने के लिए एक दल निरन्तर क्रियाशील बना रहे। टूट-फूट की मरम्मत करने वालों की व्यवस्था के बिना विशाल इमारतें यों देर तक सुरक्षित नहीं रह सकतीं इसी प्रकार उत्कृष्ट लोक सेवकों की आवश्यकता को झुठलाया नहीं जा सकता। प्राचीनकाल में उस आवश्यकता की पूर्ति वानप्रस्थ आश्रम करता था।

हमें वानप्रस्थ आश्रम को पुनर्जीवित करने में पूरी शक्ति लगानी चाहिए ताकि युग की अवाँछनीय स्थिति को बदलने में समर्थ कर्मठ एवं सुयोग्य व्यक्तियों की कमी न रहे। यह किया जा सका तो युग बदला जा सकेगा और प्रस्तुत अन्धकार को चीरकर रख देने वाला प्रकाश निश्चित रूप से उत्पन्न किया जा सकेगा।


अपनी महान परम्पराओं को खोकर ही हम दीन हीन बने हैं।

प्राचीन भारत की सर्वतोमुखी गौरव गरिमा समस्त विश्व में संव्याप्त थी। इस भूमि का महान उत्पादन संसार के कोने-कोने तक आलोक उत्पन्न करता था और उससे समस्त मानत जाति लाभान्वित करता था। ज्ञान और विज्ञान की-सम्पत्ति की समर्थता का कोई पक्ष ऐसा न था जिससे इस देश के नररत्न सुसम्पन्न न रहते हों। यह महान उपलब्धियां इतनी आकर्षक एवं उपयोगी थीं कि उन्हें सीखने समझने के लिए संसार भर के लोग यहाँ आते थे। सच्चे अर्थों में भारत ही उन दिनों विश्वविद्यालय था। आवश्यकतानुसार यहाँ की प्रतिभायें अन्यान्य देशों की व्यवस्था बनाने और सुधारने के लिए जगद्गुरु-चक्रवर्ती शासक, विज्ञानवेत्ता एवं सम्पदा सम्पन्न व्यक्तित्वों के रूप में उपस्थित होती थी। भारतीय महामानवों के इस अनुदान से समस्त विश्व किसी समय कृतकृत्य था।

आज की स्थिति सर्वथा बदल गई। अन्न से लेकर शास्त्रों तक के लिए हम परमुखापेक्षी हैं। हमारी शिक्षा आवश्यकता विदेशी पूरी करते हैं। चिकित्सा तक आत्मनिर्भर नहीं। यह तो भौतिक सम्पत्ति की बात रही। आत्मिक क्षेत्र की दशा और भी अधिक दयनीय है। अनुशासन, वचन पालन, समय की नियमितता, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक-उत्तरदायित्व, देशभक्ति शिष्ट व्यवहार जैसी मानवोचित विशेषताओं की कसौटी पर हमारा जन-जीवन खरा नहीं खोटा ही सिद्ध होता है। स्वच्छता जैसी प्राथमिक मानवी आवश्यकता तक से हम अभी परिचित नहीं हो पाये हैं। सामाजिक कुरीतियाँ, मूढ-मान्यताएँ एक प्रकार से देश की जड़े खोखली कर चुकी हैं नर−नारी की असमानता -वंश जाति के आधार पर बरती जाने वाली ऊँच-नीच की मान्यता लगभग एक करोड़ लोगों द्वारा अपनाया गया भिक्षा व्यवसाय विवाहों की प्राणघातक खर्चीली धूम-धाम, जैसे कुष्टव्रण राष्ट्र की काया को किस प्रकार अपंग, कुरूप और कलंकित किये हुए हैं यह देख कर दर्द उठता है। जिस देश में शिक्षा 20 प्रतिशत हो-80 प्रतिशत अशिक्षित भरे पड़े हों, वहाँ विविध भ्रष्टाचारों का पनपना स्वाभाविक है। धर्म से लेकर राजनीति तक में धूर्त विडम्बनायें अपनी जड़े दिन-दिन अधिक गहरी घुसाती चली जा रही हैं इन परिस्थितियों में हम अन्तर्द्वन्द्वों में-गृह युद्ध जैसी स्थिति में रहते हुए प्रगति से वंचित ही रह सकते थे- रह रहे हैं।

प्राचीन काल की महान प्रगति और आज की अवगति की तुलना पर्वत शिखर और गहरे गर्त से की जा सकती है। भौतिक दृष्टि से जो खोया सो दुखद है उसकी क्षति पूर्ति आसानी से हो सकती है। पर मर्म भेदी दुख उस आत्मिक स्थिति के पतन का है जिसके कारण इस देश का प्रत्येक घर नर-रत्नों की खान बना हुआ था, जिसके कारण समस्त विश्व अपने उत्कर्ष के लिए आशा भरे सहयोग की अपेक्षा करता था।

यह अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है कि धर्म और अध्यात्म का कलेवर भूतकाल की अपेक्षा इन दिनों घटा नहीं बढ़ा है। धर्म संगठनों की, धर्मध्वजी महन्त मठाधीशों की-देवाराधन कर्मकाण्डों की भी धूम है। मन्दिर तो इस तेजी से बनते चले जा रहे हैं मानो उन्हीं की संख्या वृद्धि पर धर्म की आधारशिला रखी हुई हो। इतना सब होते हुए भी धर्म की आत्मा क्यों मर गई? उसकी सड़ी लाश ही हमारे हाथ क्यों रह गई?

इन प्रश्नों का समाधान ढूँढ़ने के लिए गहराई में उतरने और विस्तृत विवेचन करने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि हमारे आश्रम धर्म की रीढ़ टूट गई और प्राचीन भारत की गौरव गरिमा की स्थिति अपंग जैसी हो गई। भारतीय धर्म को दूसरे शब्दों में वर्णाश्रम धर्म कह सकते हैं चार आश्रमों की सुदृढ़ आधार शिला पर अपनी संस्कृति का भवन खड़ा किया गया था। जब तक वे स्तंभ बने रहे तब तक गौरव-गरिमा भी गगनचुंबी बनी रही। जब उसमें विग्रह संकट उत्पन्न हुआ तो सारा ढाँचा ही लड़खड़ा गया और धर्म विडम्बनाओं की अवाँछनीय विकृतियाँ ही हमारे हाथ रह गई।

अब एक ही वर्ण शेष तीन वर्ण है-वैश्य। और एक है आश्रम जीवित है गृहस्थ। शेष तीन वर्ण मर गये तीन आश्रमों का भी अन्त हो गया। हर व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य धन है। त्यागी-वैरागी भी प्रकारान्तर से उसी कुचक्र के इर्द-गिर्द घूमते देखे जा सकते हैं। आकाँक्षाओं का केन्द्र अब सम्पत्ति ही बन कर रह गया है। वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति उसी से तो होती है। इसके अतिरिक्त अन्त कुछ लक्ष्य किसी का नहीं दीखता। ऐसा दशा में यह कहना अत्युक्ति न होगा कि वर्ण-धर्म सिमट कर वैश्य-वर्ण में सीमित हो गया है। ठीक इसी प्रकार आश्रम धर्म की दुर्गति हुई है। स्कूल में जाते-जाते अबोध बालक काम कुचेष्टाएँ सीख जाते -हैं पास-पड़ोस में उन्हें अश्लील गालियाँ सीखने को मिल जाती हैं घर बाहर कामुकता की विविध प्रकृतियां बचपन में ही गृहस्थ की दीक्षा दे देती हैं और उसमें क्रमशः वृद्धि ही होती रहती है। किशोरावस्था परिपक्व होने से पहले ही बच्चे अपना बहुत हद तक आत्मघात कर चुके होते हैं। स्मरण शक्ति की कमी, चेहरे की निस्तेजता, काया की दुर्बलता और मानसिक उद्वेगों का बाहुल्य देखते हुए यह सहज ही समझा जा सकता है कि उन पर क्या बीती है। समय से पूर्व गृहस्थ की किसी भोंड़ी और फूहड़ प्रकृति का जो दुष्परिणाम होना चाहिए उसे अपने हर बालक पर काली घटाओं के रूप में छाया देखते हैं। बाल-विवाह तो और भी कोढ़ में खाज का काम करता है। जिन्दगी के अन्त तक कामुकता-प्रजनन, अर्थोपार्जन, कुटुम्बचर्या के अतिरिक्त कभी कोई बात सूझती ही नहीं। समस्त प्रकृतियां इसी केन्द्र पर केन्द्रीभूत रहती हैं। होश संभालने के दिन से लेकर होश बन्द होने की घड़ी तक गृहस्थ स्तर की आकाँक्षाएँ ही मनःक्षेत्र को आच्छादित किये रहती है। ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि चार आश्रमों में से तीन समाप्त हो गये। ब्रह्मचर्य-वानप्रस्थ और संन्यास की परम्पराएँ नष्ट हो गईं। केवल एक ही आश्रम बचा है गृहस्थ साधु-संतों की मनोदशा और गतिविधियों को देखते हुए उन्हें भी भगवाँ वस्त्र धारी गृहस्थ ही कह सकते हैं तीन पाये टूट जाने पर एक के ऊपर खड़ी की गई चारपाई की जो डाँवाडोल स्थिति होनी चाहिए-वही है आज भारतीय समाज की। इन परिस्थितियों में भौतिक आर्थिक स्थिति की स्थिरता की कुछ बात तो सम्भव भी है पर आत्मबल पर टिकी हुई उन महानताओं की आशा नहीं की जा सकती जिन पर प्राचीन भारत का महान गौरव आधारित रहा है।

वर्ण-धर्म के अनुसार ब्राह्मण वर्ण को नैतिक और सामाजिक स्थिति की सुदृढ़ता बनाये रखने का उत्तर दायित्व सम्भालना पड़ता था। धर्म और अध्यात्म का उपासना और साधना का-विशाल काय-कलेवर मनुष्य की आन्तरिक महानता में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि का लक्ष्य रखकर ही खड़ा किया गया है। नीति-निष्ठ, कर्तव्य परायण और समाजसेवी व्यक्तित्वों का विकास ही धर्म धारणा का- अध्यात्म-दर्शन का एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वर की समीपता और प्रसन्नता प्राप्त करने का आधार लेकर चलने वाले मनुष्य को आत्म-परिष्कार और उदार ममता विस्तार का अवलम्बन स्वीकार करना पड़ता है। इस तरह प्रकारान्तर से आस्तिकता और ईश्वर भक्ति-धर्म धारणा और तपश्चर्या का चरम प्रयोजन मनुष्य में देवत्व का अवतरण ही बनता है। ब्राह्मण वर्ग इसी प्रयोजन की पूर्ति में अपने को खपाता था। एक सुयोग्य वर्ग के सदस्य जब बड़ी संख्या में जन-समाज के भावना स्तर को सम्भालने में अपने अस्तित्व को समर्पित करदें तो कोई कारण नहीं कि जन-जीवन में उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व का बाहुल्य न रहे। आज ऐसा ब्राह्मण कहां है? जाति पांति के नाम पर वामन कहलाने वाले व्यक्ति करोड़ों की संख्या में होने पर भी उनमें, ब्रह्मपरायण आत्मायें ढूँढ़ निकालना बहुत ही कठिन है। अब ब्राह्मण जीवन का आदर्श प्रत्यक्ष प्रस्तुत करने वाले लोगों की संख्या लगभग शून्य के स्तर पर जा पहुँची है। पेट्रोल के अभाव में मोटर क्या चलेगी? आग के अभाव में भोजन कैसे पकेगा? पानी के अभाव में प्यास कैसे बुझेगी? ब्राह्मण के अभाव में जन-मानस में धर्म का अस्तित्व कैसे जीवित रहेगा। आदर्शवादी धर्मधारणा को उपेक्षित कर देने के बाद जनसमाज में नर-पशुओं के अतिरिक्त और किस वर्ग का अस्तित्व दृष्टिगोचर होगा।

चारों वर्ण सिमटकर वैश्य बन जायं, ब्रह्मसत्ता का अस्तित्व मिट जाय यह भारतीय संस्कृति के उस भूल-भूत आधार की कपाल-क्रिया है, जिस पर कि विश्व-मानव को देवस्तर पर पहुँचाने की किसी समय सफल चेष्टा की गई थी। कितने दुर्भाग्य की बात है कि तैंतीस कोटि देवताओं की जनसंख्या वाले-इस देव मानवों के देश में- देव-पुरोहितों का- ब्राह्मणों का इस प्रकार दयनीय अन्त देखना पड़े। उसका परिणाम पतनोन्मुख समाज को दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पड़े रहने की विभीषिका के रूप में देखना पड़े।

यहाँ जन्म के आधार पर अपने को ब्राह्मण करने और कहाने का अभिमान करने वाले जाति वालों की चर्चा नहीं हो रही है। वे तो अभी भी करोड़ों हैं और प्रजनन की दृष्टि से किसी से पीछे न रह कर दिन-दिन बढ़ ही रहे हैं। यहाँ चर्चा कर्म-ब्राह्मणों की हो रही है। पोथी-पत्रा के सहारे आजीविका कमाने वाले लोगों की भी यहाँ गणना नहीं की जा रही है। यहाँ ब्राह्मण को अभिप्राय उस वर्ण से है जो अपने अस्तित्व को लोकमंगल के लिए- भावनात्मक उत्कृष्टता अभिवर्धन के लिए, अपने आपको तिल-तिल करके जलाता है। अपनी सत्ता का पूर्णतया समर्पित करता है। यह वर्ण अपना व्यक्तित्व अत्यन्त उच्चकोटि का समान आदर्शवाद में ओत-प्रोत करके आरम्भ करता है और क्रमशः उसकी परिणत लोक-मंगल एवं लोकशिक्षण की विविध प्रकृतियों के अभिवर्धन में दृष्टिगोचर होती है। ब्राह्मण की तात्विक परिभाषा के अंतर्गत ऐसे ही व्यक्तित्व आते हैं। ब्राह्मणत्व का आधार जन्म नहीं कर्म है। आज लोग जन्म से वर्ण मानते है।, वे ऐसी ही भूल करते हैं जैसी किसी को जन्म से ही वकील, डाक्टर, प्रोफेसर अथवा चार-डाकू, व्यसनी, दुर्गुणी आदि मानने वाले करते हैं। जन्म से तो मनुष्य सिर्फ नर-पशु ही पैदा होता-है पीछे जो कुछ वह बनता है उसी के आधार पर उसका वर्ण विभाजन होता है। उसी तथ्य को ध्यान में रखने हुए ऊपर की पंक्तियों में ब्राह्मणत्व के अभाव और व्यापक दुष्परिणाम की चर्चा की गई है।

आश्रम धर्म की महत्ता वर्ण धर्म से भी अधिक महत्व पूर्ण है। उसके अनुसार प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को बाध्य किया गया है कि अपना आधा जीवन व्यक्तिगत एवं पारमार्थिक उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे। ब्रह्मचर्य अवधि मस्तिष्क को- शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए विद्याध्ययन एवं संवर्धन के क्रिया कलापों में लगे इसके पीछे जोशीले खून की विविध उमंगों एवं महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए गृहस्थी बसाये- अर्थ उपार्जन करें-परिवार का सुसंचालन करे, समाज की भौतिक प्रगति में योगदान दें अर्थ उपार्जन का एक बड़ा अंश लोकोपयोगी कार्यों में देकर सत्प्रवृत्तियों का पोषण करें। इस प्रकार आधा जीवन-ब्रह्मचर्य और गृहस्थ-आश्रम की परिधि में रहकर भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति में लग जाता है और उससे व्यक्तिगत एवं सामाजिक आवश्यकताओं की अपने स्तर की-आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं।

जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ प्रयोजनों में लगाया जाना चाहिए। यह हमारी साँस्कृतिक परम्परा है। वानप्रस्थ और संन्यास की परिपाटी इसी प्रयोजन के लिए है। आधी आयु बीत जाने पर आत्म-कल्याण एवं परमार्थ प्रयोजन में जीवन धारा मोड़ दी जानी चाहिए। यही वस्तुतः दूसरा जन्म है। आदर्शवादी जीवन-नीति को स्वीकार करने वाले द्विज कहलाते रहे हैं और भौतिक लिप्साओं में निमग्न व्यक्ति अत्यन्त अछूत रह कर उपहासास्पद तिरस्कृत समझे जाते रहे हैं। जीवन के उत्तरार्द्ध को देव भाग माना गया है, जो उसे भी पशु प्रवृत्तियों के आगे फेंक दें उसे धार्मिक परिभाषा के अनुसार इसी हेय वर्ग में गिना जा सकता है।

पूर्वार्ध में भौतिक प्रगति का लक्ष्य रख कर जो प्रक्रिया अपनाई जाती है लगभग उसी की पुनरावृत्ति उत्तरार्ध में होती है। ब्रह्मचारी विद्याध्ययन और स्वास्थ्य संवर्धन इसलिए करता है कि उसे गृहस्थ के संचालन में सहायता मिलेगी। वानप्रस्थ में नये सिरे से उस ज्ञान का उपार्जन अध्ययन करना पड़ता है जो आत्म-कल्याण एवं लोकमंगल के लिए नितान्त आवश्यक है। ऐसा ज्ञान क्रमबद्ध रूप से पहले कभी दत्तचित्त से नहीं किया होता इसलिए वानप्रस्थ में स्वाध्याय को- अध्यात्म तत्व दर्शन को- लोक स्थिति के स्वरूप एवं समाधान नये सिरे से- सांगोपांग विधि अपनाना पड़ता है। उसे ज्ञानयोग की साधना कहते हैं। वानप्रस्थ मनोबल आत्मबल सम्पादन करने के लिए योगाभ्यास, तपश्चर्या तितिक्षा, मनो-निग्रह की रीति नीति य अपना कर अपनी आन्तरिक प्रखरता प्रदीप्त करता है। ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ दोनों ही अपने-अपने स्तर का अध्ययन और स्वास्थ्य संवर्धन करते हैं। अन्तर इतना ही रहता है कि पूर्वार्ध की चेष्टाएँ होती हैं भौतिक प्रयोजनों के लिये उत्तरार्ध की मनोबल आत्मबल बढ़ाने के लिये।

वानप्रस्थ की अवधि का एक अंश ज्ञान सम्पादन एवं योगाभ्यास परक तपश्चर्या में लगता है और दूसरा अंश लोकमंगल की सेवासाधना में प्रयुक्त होता है। उसे लोकशिक्षण के लिए परिव्राजक की तरह भ्रमण करना होता है। उन दिनों शरीर में उतनी समर्थता भी रहती है कि दौड़-धूप के प्रयोजन पूरे कर सके सुदूर क्षेत्रों में आवागमन कर सके और कष्टसाध्य सेवाकार्यों को अपने बलबूते क्रियान्वित कर सके। सत्प्रवृत्तियों में जनसाधारण के साथ कन्धे से कन्धा लगाकर कदम मिलाकर कार्य कर सके। इसलिए वानप्रस्थी को ज्ञान सम्पादन और योगाभ्यास में आधे से कम समय लगाकर आधे से अधिक समय प्रत्यक्ष लोकसेवा कार्यों में समर्पण करना होता है।

आध्यात्मिक प्रौढ़ता और परिपक्वता वानप्रस्थ की अवधि पूरी करने की उपरान्त आती है। उसी आत्मिक यौवनकाल को संन्यास कह सकते हैं। आयुष्य के चौथे भाग में शरीर शिथिल हो जाता है, भागदौड़ की क्षमता वहीं रहती- कष्ट साध्य योग-साधन भी नहीं बन पड़ते। तब एक स्थान पर बैठ कर गुरुकुल चलाने जैसे सरल कार्य उन्हें चलाने होते हैं। उपासना में ध्यान प्रक्रिया ही मुख्य रह जाती है।

प्रकारान्तर से जीवन के परमार्थ-परायण उत्तरार्ध का दो स्थितियों में रहने के कारण कार्य-विभाजन दो विभागों में कर दिया गया है। जब तक शरीर में जान रहे तब तक स्वाध्याय, तपश्चर्या और सेवासाधना की दौड़-धूप। जब शरीर अशक्त-असमर्थ हो जाय तो एक स्थान पर बैठ कर अध्यापन, प्रवचन,सत्संग जैसे सेवा साधनों को तथा ध्यान−धारणा परक उपासना की पूर्ति। वस्तुतः दोनों का लक्ष्य एक ही है-शरीर की स्थिति के अनुरूप कष्ट साध्य एवं सरलतम कार्यों का विभाजन किया गया है।

आश्रम धर्म में यह उत्तरार्ध ही भारतीय धर्म की महानतम सम्पदा रही है उसी पूँजी के बल पर इस देश के नागरिकों का स्तर देवोपम रहा है और यह भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। ज्ञानवान, प्रतिभावान् परिष्कृत भाव सम्पदा से सुसम्पन्न परम निस्वार्थ लोकसेवियों की भारी सेना जीवन क्रम के सी उत्तरार्ध मंच से निकल रही है। वही विकृतियों से जूझी है। उसी ने सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया है। जन-मानस को पतनोन्मुख होने से उसी ने बचाया है। आदर्शवादी व्यक्तित्वों को विकसित करने में उसी की प्रमुख भूमिका रही है। अनुकरणीय सत्कर्मों का बाहुल्य उसी के प्रयास से सम्भव हुआ। धर्म सेवा ने ही असुरता को हराया और देवत्व को जिताया है। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति जहाँ भी रहेगी वहाँ रह क्षेत्र में प्रगति और समृद्धि के ही सुखद प्रतिफल दिखाई देंगे। यही है प्राचीन भारत की गौरव गरिमा का रहस्य। वर्णाश्रम धर्म के आधार पर बिन वेतन के- न्यूनतम निर्वाह लेकर समाज की अति महत्वपूर्ण प्रतिभायें आगे आती थीं और मानव जाति के सर्वतोमुखी उत्कर्ष के लिए अपने को समर्पित करती थीं। इतनी बड़ी पूँजी के आधार पर यदि भारत भूमि विश्व की मुकुट मणि बन कर रही हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। उन महान परम्पराओं को खोकर हम मणि हीन सर्प की तरह निर्जीव और निस्तेज बनकर कूड़े के ढेर में पड़े हैं तो इसमें भी कुछ अनहोनी बात भ्रष्ट करने पर यह दुर्गति होनी ही थी जिसने हमें अत्यन्त कष्टकर त्रास के चंगुल में बेतरह जकड़ लिया है।


वर्णाश्रम धर्म की महान पृष्ठ भूमि

यों वर्ण-धर्म का भी अपना महत्व है। उससे श्रम एवं उत्तरदायित्वों का विभाजन होता है और एक वर्ग अपने लिए निर्धारित कार्य पद्धति निश्चित करके उस दिशा में वंश परम्परा युक्त विशेषताएँ उत्पन्न करता है। पूर्वज जिस कार्य को करते रहे हैं उसे भावी संतान भी अधिक अच्छी तरह कर सकती है। अध्यापक के बच्चे अपेक्षाकृत अच्छे अध्यापक बन सकते हैं और व्यापारी के बालकों में व्यावसायिक कुशलता का होना स्वाभाविक है। जो चर्चा जो क्रिया, जो परिस्थिति सामने रहती हैं- परम्परागत वली आती है उसमें पीढ़ियाँ स्वयमेव अधिक सुविधा अनुभव करती हैं और कुशलता बढ़ाती चलती हैं। व्यवसाय एवं श्रम-विभाजन का भी संतुलन बना रहता है; बेकारी नहीं बढ़ती। ऐसी कितनी ही विशेषताएँ थीं जिन्हें ध्यान में रखते हुए वर्ण-व्यवस्था को भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में निर्मित विकसित किया गया था।

दुर्भाग्य को क्या कहा जाय-जिसने वर्ण व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण समाज-प्रक्रिया को, एक समाज को, खंड–विखंडों में काट कर फेंक दिया। अदूरदर्शिता पूर्ण—अनीति मूलक और अत्यन्त अहित कर ऊँच-नीच मान्यता का जन्म दिया और एक समाज के ऐसे असंख्य टुकड़े बँट कर बिखर गये जो परस्पर रोटी बेटी तक का व्यवहार करने के लिए तैयार नहीं। वर्ण-व्यवस्था का मूल स्वरूप अब लगभग नष्ट हो गया है उसके स्थान पर बिरादरी-वाद की विकृति ने जड़ जमाती है। जाति में से उपजाति की विष बेलें फूटती और फैलती चली गई हैं। यह जंजाल राष्ट्रीय जीवन में अन्तः कलह की भूमिका प्रस्तुत कर रहा है। धर्म, व्यवसाय, राजनीति आदि सब में बिरादरी-वाद का बोल-बाल है। प्रान्तवाद- भाषावाद की तरह की अब जाति-पाँति का सम्प्रदायवाद भी भीतर ही भीतर आग की तरह सुलग रहा है और राष्ट्रीय एकता को भस्मसात् करने की विभीषिका उत्पन्न करता जा रहा है।

ऐसी दशा में वर्ण व्यवस्था पर नये सिरे से विचार करना पड़ेगा और उसमें मौलिक एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन करने होंगे। जन्म-जाति की वर्तमान मान्यताओं का उन्मूलन करना पड़ेगा। मनुष्य-मनुष्य के बीच बिरादरी के नाम पर जो ऊँच नीच की भेड़चाल चल पड़ी है उसे हटाना होगा। व्यवसाय के आधार पर वंशपरम्परागत जाति चल सकती है और भले बुरे कर्मों के आधार पर ऊंच-नीच का निर्धारण किया जा सकता है। इन क्राँतिकारी परिवर्तनों से निश्चित ही वर्ण-व्यवस्था का समयानुकूल पुनर्निर्धारण होगा। आज जो स्थिति है उसके रहते वर्णधर्म का समर्थन करना-उसे प्रोत्साहित करना आत्मघाती ही हो सकता है।

जातियाँ अपनी पंचायतें करके विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों में फैली हुई कुरीतियों का उन्मूलन कर सकती हैं, और उपजातियों की बेड़ी काट कर जाति में जाति में-जाति का बंधन काट कर महाजाति में परिणत होने के लिए कदम बढ़ा सकती हैं। मात्र इस एक ही प्रयोजन के लिए जाति-संगठनों अथवा सम्मेलनों का समर्थन किया जा सकता है अन्यथा उस विभेद की उपयोगिता अब नष्ट ही हो गई। जब तक नये सिरे से पुनर्निर्धारण न हो जाय, वर्ण-व्यवस्था के संबंध में हमें उदासीन ही रहना होगा। प्राचीन परंपरा के अनुसार वर्ण-धर्म की उपयोगिता कितनी ही बड़ी क्यों न हो-भविष्य में उसका कितना ही अच्छा उपयोग क्यों न किया जाय पर आज की स्थिति में इस क्षेत्र में विषबेल जैसी विकृतियों की झाड़ियाँ उग पड़ी हैं उन्हीं से निपटना पड़ेगा।समर्थन एवं अभिवर्धन की बात तो इसके बाद ही सोची जा सकेगी।

आश्रम-व्यवस्था में वैसी कठिनाई नहीं है। वह आयुष्य विभाजन की शाश्वत, सनातन और सार्वभौम प्रक्रिया है। उस पर आँच आने का प्रश्न नहीं। सामयिक विकृतियों में थोड़ा सा ही हेर फेर कर देने से वह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानत-जाति की महती सेवा करने में पुनः समर्थ हो सकती है। बाल-विवाह की प्रथा हटा दी जाय-अध्ययन और स्वास्थ्य-संवर्धन किशोरावस्था के अनिवार्य कर्तव्य ठहरा दिये जायं-शिक्षा-पद्धति में मानवोचित गुणों के समावेश का प्रबन्ध कर दिया जाय, तो ब्रह्मचर्य आश्रम पुनः पूर्वकाल जैसा ही प्रशस्त हो सकता है। परिवार संस्था में कर्तव्य और उत्तरदायित्वों का वर्गीकरण करके सुनियोजित आचार संहिता का निर्धारण करेगा जिससे परिवार के किसी सदस्य के न तो उचित अधिकारों का अपहरण हो और न निठल्ले बैठकर खाने की प्रवृत्ति पनपे। उपार्जन करने और उपार्जन न करके वालों का तालमेल न्यायोचित आधार पर बिठाया जाय। बच्चों की संख्या न बढ़ने देने के सम्बन्ध में कठोर दृष्टि रहे। बड़े लड़के अपनी वधू को लेकर अलग हो जायं और छोटे भाई बहिनों का ख्याल न रखें,इस स्वार्थी प्रवृत्ति पर नियन्त्रण किया जाय। घरों में घुटन के आतंक का वातावरण न रहकर एक सहयोग-समिति जैसी हँसती खेलती परिस्थितियाँ रहें तो अपने परिवार स्वर्ग बन सकते हैं। अर्थ व्यवस्था में सभी का परामर्श और सहयोग रहे। शिक्षा और संस्कार का घरों में आवश्यक वातावरण रहे बच्चों को कहानियों के माध्यम से जीवन की दिशा देने वाला मार्ग दर्शन मिलता रहे, तो भारत की संयुक्त परिवार वाली पद्धति समस्त संसार के लिए अनुकरणीय बन सकती है। परिवार-संस्था संसार के लिए टूट रही है, भारत में उसका स्वरूप अभी मजबूत है; यदि उसे व्यवस्थित और परिष्कृत बना लिया जाय तो समस्त विश्व को एक ऐसी दिशा मिल सकती है जिससे श्रेष्ठ समाज के निर्माण की आधी समस्या हल हो जाय। व्यक्ति और समाज के बीच की अत्यन्त महत्वपूर्ण कड़ी-परिवार संस्था है। उसे सुनियोजित करके ही समाज का पुनर्निर्माण संभव हो सकता है। इस दृष्टि से गृहस्थाश्रम का पुनर्निर्माण यदि एक व्यवस्थित आन्दोलन के रूप में चलाया जा सके तो प्राचीनकाल की आश्रम-व्यवस्था में चार चाँद लग सकते हैं। परिष्कृत गृहस्थ को घर में स्वर्ग के अवतरण की भूमिका के रूप में देख जा सकता है।

संन्यास का जो स्वरूप इन दिनों है शायद उसमें आमूलचूल ही परिवर्तन करना पड़ेगा। निठल्ले व्यक्ति लाल, पीले कपड़े पहन कर अपनी हेय गतिविधियों से समाज की जो कुसेवा करते हैं उससे केवल हानि ही हानि हाथ लगती है। भिक्षा-व्यवसाय अपने देश में जिस ढंग से पनपा है वह किसी समय देश के लिए चिन्ता, लज्जा और कलंक की बात होगी। साधु सन्तों ने प्राचीनकाल की तरह लोकोपयोगी जीवन जिया होता और उसकी गति विधियाँ सृजनात्मक रही होतीं तो अब 56 लाख से बढ़कर 80 लाख तक जा पहुँचे इस वर्ग का भार भी उठाया जा सकता था। पर जिस प्रयोजन को लेकर वे चलते हैं उसमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है, इसीलिए ऐसी आशा भी नहीं रही कि वे समाज से जितना लेते हैं कम से कम उतना अनुदान तो लौटा ही सकेंगे। इस निराशाजनक स्थिति में संन्यास का सार्वजनिक समर्थन नहीं किया जा सकता। कुछ सुयोग्य और आदर्शवादी सन्त प्राचीनकाल की आश्रम व्यवस्था का आदर्श जीवित रखने के लिए दृष्टि गोचर होते रहें तो इतने से ही हमें सन्तोष करना होगा।

आश्रम-धर्म के अंतर्गत सबसे महान और सबसे महत्वपूर्ण आश्रम इन दिनों वानप्रस्थ ही हो सकता है। प्राचीनकाल में भी उसी की गरिमा सर्वोत्कृष्ट थी। व्यक्ति अपना आधा जीवन भौतिक प्रयोजनों के लिए रख कर चढ़ते खून के उभारों को सही दिशा में खर्च कर लेता था। परिवार संस्था की सेवा करता था। राष्ट्र की भौतिक समृद्धि के अभिवर्धन में योगदान देता था। पुरुषार्थ के बढ़े-बढ़े अवसरों के सहारे अनेक उपयोगी सफलताओं का सृजन करके प्रगति शील सम्भावनाएँ प्रस्तुत करता था। धन, श्रम एवं समर्थन से सत्प्रवृत्तियों का पोषण करता था। ब्रह्मचर्य भौतिक जीवन की तैयारी और गृहस्थ उसकी परिणति-इस प्रकार एक में ज्ञान दूसरे में कर्म-एक में संचय, दूसरे में प्रयोग का जोड़ा बनता था और इन दोनों आश्रमों की संयुक्त शृंखला समाज के मौलिक स्वरूप को आदर्श, उत्कृष्ट एवं सुसंपन्न, सुदृढ़ बनाने के लिए बहुत कुछ करती थी। राष्ट्र में सर्वतोमुखी समर्थता फूटती थी। प्रगति और समृद्धि के बहुमुखी प्रयोजन ब्रह्मचारी और गृहस्थ का सुसम्बद्ध युग्म ही पूर्ण करता था। इसलिए उसकी उपयोगिता सर्वमान्य समझी जाती रही है और समझी रहेगी।

जीवन का उत्तरार्ध भारतीय संस्कृति के निर्माणकर्ता मनीषियों की दृष्टि से परमार्थ-प्रयोजनों के लिए ही नियत निर्धारित किया गया है। इसमें व्यक्ति और समाज दोनों का आत्यन्तिक हित साधन सन्निहित है। पूर्वार्ध व्यतीत कर लेने के उपरान्त व्यक्ति की इन्द्रिय-जन्म वासनाओं और मनोविकार से संबद्ध तृष्णाओं की निरर्थकता का तब तक भली भाँति अनुभव हो चुकता है और उसकी लिप्सा-लालसाएं आयु ढलने के साथ-साथ तृप्त नहीं तो शिथिल अवश्य हो लेती हैं। लोभ और मोह के आवेशों का खोखलापन स्पष्ट हो लेता है। ऐसी दशा में आन्तरिक उद्वेगों की धमाचौकड़ी घट जाने से अन्तः स्थिति में विवेक और संतुलन की इतनी मात्रा उत्पन्न हो जाती है कि आत्मकल्याण एवं परमार्थ-प्रयोजन के लक्ष्य की ओर शान्ति, स्थिरता एवं गम्भीरता पूर्वक कदम बढ़ा सकें।

ऐसी आयु में आत्मा को आनन्द विभोर कर देने वाली ब्रह्मविद्या का तत्व-चिन्तन मनन, स्वाध्याय और निदिध्यासन संभव हो जाता है। आत्मबोध और तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।

उत्तरार्ध में जिस वानप्रस्थ आश्रम की उपयोगिता मनीषियों ने जोर देकर प्रतिपादित की है उसका दूसरा चरण है- तप साधना, योगाभ्यास। आत्मा पर चढ़े हुए कषाय कल्मष और मल, आवरण एवं विक्षेपों का निवारण निराकरण इसी अग्नि संस्कार द्वारा संभव होता है। दबी हुई आन्तरिक प्रखरता इसी मार्ग पर चलने से निखरती है। आत्मबल के सम्पादन का प्रधान मार्ग तप ही तो है तपस्वी ही प्रकारान्तर से तेजस्वी होता है- अन्तः क्षेत्र में- पंचकोशों में-षटचक्रों में-तीन शरीरों में जो एक से एक अद्भुत विभूतियाँ दबी पड़ी हैं, उन्हें सुषुप्त मूर्छना से उवार कर प्रखर एवं प्रचण्ड बनाने का मार्ग तप ही है। योग के बिना आत्मा को परमात्मा से जोड़ो नहीं जा सकता और जब तक ईश्वरीय समर्थन-सहयोग प्राप्त न हो तब तक महामानवों की--ऋषि भूमिका में प्रवेश करना कठिन पड़ता है। आत्मा को--देवात्मा बनाते हुए उसे परमात्मा स्तर तक पहुँचा देना, योग-साधना द्वारा ही संभव है। इसलिए तप-साधना का परम पुरुषार्थ भी करना पड़ता है। श्रेयार्थी के लिए तपस्वी जीवन की रीति-नीति अपनानी ही पड़ती है। ब्रह्म-तेजस उसी से निखरता है। इसी बलिष्ठता के--समर्थता के आधार पर व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को खेता हुआ लक्ष्य तक ले पहुँचता है और साथ ही उसमें बिठा कर अनेकों को पार कर सकता है।

ब्रह्मविद्या की उपलब्धि और योगाभ्यास परक तपश्चर्या के अतिरिक्त परमार्थ जीवन का तीसरा चरण है-- सेवा-साधना। भौतिक सेवा-साधना तो धनी मानी लोग कर सकते हैं पर जन-मानस में उत्कृष्टता को बोना, उगाना और बढ़ाना केवल ब्रह्म परायण लोगों के लिए ही संभव होता है। उसे बकवादी वक्ता पूरा नहीं कर सकते। धर्मशाला, मन्दिर, प्याऊ, सदावर्त, विद्यालय, चिकित्सालय, उद्योगशाला, व्यायामशाला जैसे अर्थसंभव परमार्थ प्रयोजन धनीमानी लोग ही करते हैं। उनके धन का सदुपयोग भी ऐसे ही कार्यों का जन-मानस में आरोपण, अभिवर्धन केवल उच्च कोटि के परमार्थ-परायण व्यक्ति ही कर सकते हैं। धन-लोलुप प्रचारक तो लोकरंजन भर कर सकते हैं। उनकी उछल कूद सुनने वालों का कौतूहल ही तृप्त कर सकती है। किसी को बदल सकना उनके लिए अशक्य है। जिसने अपने को ही नहीं बदला वह दूसरों को कैसे बदलेगा। वक्ताओं और प्रचारकों की सेना हर संस्था द्वारा भरती की जाती है पर उसमें प्रोपेगेण्डा एवं धन उपार्जन के अतिरिक्त और कोई भाल नहीं होता। ऊँचा उठाने और परिवर्तन करने के लिए ऐसे व्यक्तित्व ही समर्थ हो सकते हैं जो स्वयं ऊँचे उठे हैं जिन्होंने अपना परिवर्तन किया है। समाज की इस महती सेवा साधना को ज्ञानवृद्ध-तपस्वी एवं सेवा परायण वानप्रस्थ ही पूरा कर सकते हैं। उन्हें ही करनी भी होगी।

जीवन के पूर्वार्ध की आनन्द-उपलब्धियाँ अपने ढंग की हैं-उन्हें जाना समझा गया है इसलिए उनका आकर्षण सर्व विदित है पर उत्तरार्ध की सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप यदि जिया जा सके तो उसका आनन्द-आकर्षण पूर्वार्ध की तुलना में अत्यन्त उच्चकोटि का और उत्कृष्ट स्तर का होगा। कठिनाई एक ही है कि उस क्षेत्र में प्रवेश करके अपनी दिव्य अनुभूतियों का रसास्वादन सर्वसाधारण पर प्रकट कर सकें ऐसे व्यक्ति दृष्टिगोचर ही नहीं होते।

बचपन के खेल-कूद, आमोद-प्रमोद, निश्चित मनः स्थिति-बड़ों का स्नेह-संरक्षण, उत्साह भरी प्रकृति, मनोवृत्ति, अभिनव काय-कलेवर का सौंदर्य-उल्लास देखते ही बनता है। इसलिए बचपन की याद बुढ़ापे में बेतरह सताती रहती है। पढ़ने और खेलने के अल्हड़ दिनों का स्मरण बार-बार आता रहता है। यह आनन्द अपने ढंग का अनोखा ही था।

युवावस्था की मादकता भी अपने ढंग की अनोखी ही होती है। अर्थ उपार्जन का गौरव, दाम्पत्य जीवन के गुह्य आकर्षण की कसक, पिता बनने का गर्व, परिपुष्ट शरीर की साहसिकता, बढ़-चढ़ कर किये गये पुरुषार्थों का श्रेय सम्मान जैसी अगणित उपलब्धियाँ यौवन काल की हैं। दिवानी जवानी कुछ ऐसी ही होती है जिस में पैर धरती पर नहीं जमता-वे अधर में चलते हैं और आसमान में बिना पंखों के उड़ते हैं। कल्पनाओं, कामनाओं और आकाँक्षाओं की सघन घटायें मस्तिष्क के अन्तरिक्ष में ऐसी उमड़ती घुमड़ती हैं कि हर घड़ी सावन बरसता सरसता रहता है। जिससे झगड़ना पड़ा उसके प्रति रोष-प्रतिशोध भी ऐसा गर्जन तर्जन करता है मानो आज नहीं तो कल प्रलय ही प्रस्तुत की जानी है। ऐसे सुहावने होते हैं दिन-जवानी के। बुढ़ापा जब उसकी याद करता है तो आठ-आठ आँसू रोता है। जरा जीर्ण अवस्था सामने आने पर मनुष्य कितनी अन्तर्व्यथा अनुभव करता है इस तथ्य को देखकर यह सहज ही जाना समझा जा सकता है कि जवानी के दिनों का कितना अधिक मूल्य महत्व है। भौतिक उपलब्धियाँ और और सरसताएं इन्हीं दिनों तो ऐसी ललक उत्पन्न करती हैं जिससे मनुष्य मदान्ध मादकता में खोया भोया रहता है।

भौतिक जीवन की सरसता जीवन के पूर्वार्ध में अपनी पूर्णाहुति सम्पन्न कर लेती है। उत्तरार्ध-सांसारिक दृष्टि से रुग्णता, पीड़ा, असमर्थता, अपमान और उपेक्षा की अवधि है। ज्ञानेन्द्रियां साथ छोड़ती जाती हैं और कर्मेन्द्रियों की शिथिलता बढ़ती है। अनुपयोग भारभूत। निठल्ला और उपेक्षित उपहासास्पद जीवन काटना कठिन हो जाता है। एक-एक दिन भारी पड़ता है। गुजरे हुए दिन याद आते हैं तो कांटे जैसे, डंक जैसे चुभते हैं। खीज बढ़ती है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन आता है। यहां जायं, वहां बैठें ऐसे ही ताना-बाना बुनते रहते हैं पर चैन कहीं नहीं- जहां भी जायं उपेक्षा अवज्ञा ही हाथ लगती है।

जीवन का उत्तरार्ध भौतिक दृष्टि से अपने लिए कष्ट कारक और परिवार के लिए क्रमशः अधिकाधिक भार भूत होता चला जाता है। वे दिन भी निकट आते हैं जब स्वयं भगवान से मौत माँगनी पड़ती है और घर वाले मन ही मन वैसी प्रार्थना कामना करते हैं। इस हेय स्थिति के आने से पूर्व यदि समय रहते सजग हो सका जाय और अध्यात्म भूमिका में प्रवेश करके अपनी गतिविधियों को वानप्रस्थ स्तर की बना लिया जाय तो प्रतीत होगा कि नया जन्म हो गया। पूर्वार्ध जितना आनन्दमय और शानदार था उससे हजार गुनी अधिक प्रसन्नता और सरसता प्रदान करने वाली संजीवन मूँरि हाथ लग गई। वानप्रस्थ की विधि व्यवस्था दूरदर्शी ऋषि मनीषियों ने इसी दृष्टि से बनाई और उसे साँस्कृतिक जीवन प्रक्रिया में अत्यन्त उच्चकोटि का स्थान दिया है।


वानप्रस्थ द्वारा व्यक्ति और समाज का अभिनव निर्माण

वानप्रस्थ परम्परा ढलती आयु का अर्थ सर्व श्रेष्ठ सदुपयोग प्रस्तुत करती है। व्यक्तिगत हितसाधन की दृष्टि से यह अत्यन्त बुद्धिमत्ता पूर्ण कदम है। शरीर और मस्तिष्क थक जाने से वह आयु न तो भौतिक आकर्षणों में निरत रहने योग्य रहती है और न किन्हीं बढ़ी-चढ़ी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकने योग्य पुरुषार्थ जैसी शेष रहता है ऐसी दशा में भी यदि युवावस्था जैसी ललकें अपनाये रहा जाय तो जर्जरता और मृत्यु की- खीज और निराशा को-अधिकाधिक समीप ही बुलाया जा सकता है।

ढलती उम्र में भी कामुकता की खिलवाड़ करने वाले निश्चित रूप से बेमौत मरते हैं। रुग्णता और अशक्तता के गर्त में औंधे मुँह गिरते हैं। ढलती उम्र में चेहरे पर पड़ी हुई झुर्रियाँ उसे अनाकर्षक बना देती हैं तब वह तरुण साथी में कोई उत्साह पैदा नहीं कर सकता। चटोरापन भी ढलती उम्र में रही-बची पाचन क्रिया को नष्ट भ्रष्ट करके रख देता है। नई पीढ़ी अपने हाथों सत्ता चाहती है, उसे न दी जाय तो घर में विग्रह उत्पन्न होता है। परामर्श, मार्गदर्शन, सहयोग और नियन्त्रण का उत्तर दायित्व स्वयं वहन करते रहें और काम करने का बोझ लड़कों पर डालें तो उनकी शिक्षा भी होती है और अपना बोझ भी हलका होता है। अत्यधिक तृष्णा मग्न रह कर कमाई की आपाधापी में लगे रहें तो उस मानसिक तनाव से ब्लडप्रेशर, दिल के दौरे, मधु-मेह, अनिद्रा, आदि कितने ही रोग घेरते हैं।

ढलती आयु नये स्तर का आनन्द उठाने और नया जीवन जीने की दृष्टि से ही उपयुक्त होती है। आध्यात्मिक और पारमार्थिक गति-विधियाँ अपनाकर जीवन के उत्तरार्ध को इतना मृदुल और सरस बनाया जा सकता है मानो नवीन जन्म ग्रहण किया गया है। जिस प्रयोजन के लिए यह शरीर मिला है-मानव-जन्म का जो परम लक्ष्य है वह पूर्वार्ध में यत्किंचित् ही पूरा हो पाता है। अधिक उत्तम सुअवसर तो उत्तरार्ध में ही मिलता है। मानसिक उभार उतर जाने और परिवार का भार हलका हो जाने से मन भी अच्छी तरह लगता है और चित्त के डाँवाडोल होने की-लुढ़कने फिसलने की आशंका भी कम रहती है। मरण का दिन समीप आता देख कर परमार्थ की पुण्य पूँजी संग्रह करने के लिये- उत्कंठा जागृत होती है और अधिक गम्भीरता पूर्वक दिव्य जीवन की उन गति-विधियों को अपनाया जा सकता है जो चढ़ती उम्र में प्रायः अरुचि कर और कठिन लगती थीं।

ब्रह्मविद्या की तत्व-दर्शन ज्ञान साधना-योगाभ्यास की तप साधना- लोक-मंगल की सेवा साधना यह तीनों अमृतमयी देव सरिताएं मिलकर गंगा-यमुना-सरस्वती के मिलन,संगम का प्रयोजन पूरा करती हैं और तीर्थराज प्रयाग जैसी त्रिवेणी इस जीवन में प्रादुर्भूत होती हैं। यह अभिनव आनन्द अपने ढंग का अनोखा है और ऐसा है जिससे बालकपन किशोरावस्था और यौवन में जो अर्जित किया गया था उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आनन्दमयी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती हैं- होती हैं। सम्पदाओं से विभूतियों का स्तर हलका नहीं भारी ही है। इसलिये पूर्वार्ध में जो उपार्जित किया गया था उसकी तुलना में उत्तरार्ध की कमाई का मूल्य भी अधिक ही आता है। ऐसी दशा में परमार्थ परायण उत्तरार्ध में प्रवेश करने वाले को बाल्यकाल और यौवन के चले जाने का पश्चाताप नहीं करना पड़ता वरन् यही अनुभव होता है कि वह अल्हड़पन चला गया सो अच्छा ही हुआ, यह ढलती आयु ऐसे अनुदान-वरदान लेकर आई हे जिनका इस गघापचीपी के दिनों में मिल सकना कठिन है। ऐसे चिन्तन के रहते किसी को पूर्वार्ध के बीत जाने से दुःखी होने पछताने की जरूरत नहीं पड़ती। वरन् यह अधिक महत्वपूर्ण अवसर हाथ लगते का सन्तोष ही होता है।

यह सब तो हुआ व्यक्तिगत हित-साधन की दृष्टि से वानप्रस्थ आश्रम का महत्व। जब सामाजिक दृष्टि से विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि किसी देश या समाज के उत्कर्ष की समस्त आशायें और संभावनायें इसी केन्द्र पर केन्द्रित हैं। योजनाएं बनाते हैं, बना सकते हैं पर सबसे बड़ी कठिनाई एक ही होती है कि उन्हें कार्यान्वित कर सकने वाले सुयोग्य व्यक्ति मिलने ही नहीं। फलस्वरूप वे कागजों में लिखी और मस्तिष्कों में बिखरी रह कर ही हवा में विलीन हों जाती हैं।

लोक निर्माण का कार्य इतना सरल नहीं है कि उसे किसी भी ऐरे-गैरे के सुपुर्द किया जा सके। उसके लिए अनुभवी, सुयोग्य, ईमानदार, सक्षम, लगनशील और प्रभाव शाली कार्यकर्ता चाहियें। ऐसे लोग संस्थाओं के पास भी नहीं हैं उनसे भी ओछी प्रकृति के यश लोलुप व्यक्ति भरे पड़े हैं। सरकार के पास भी उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं। जन-सहयोग के बिना कोई योजना सफल नहीं हो सहयोग जुटाना ऐसे व्यक्तित्वों का ही काम है जिनके प्रति सहज श्रद्धा उभरती हो। सरकारी कर्मचारियों की भर्ती जिन उपाधियों के आधार पर होती है वे जन संपर्क कार्यकर्ता की योग्यता का आधार नहीं हो सकती हैं। अनुभवहीन लड़के जिनकी आयु पच्चीस वर्ष से भी कम है उप महान उत्तरदायित्वों को निभा सकेंगे यह कहना कठिन है। फिर वहाँ रौब-दौब; ठाट-बाट, ऐंठ-अकड़ रिश्वत खुशामद का इतना बोलबाला रहता है कि भारत जैसे पिछड़े देश की जनता का ताल-मेल उनसे बैठता ही नहीं। न सही अर्थों में जन संपर्क बनता है-न जन सहयोग मिलता है ऐसे ही कागजी खाना पूरी चलती रहती है। अफसर मौज मजा करते हुए-भत्ता बनाते और समय काटते रहते हैं। यह स्थिति जब तक रहेगी तब तक सरकार की योजनाएं कितनी ही अच्छी क्यों न हों उनसे कुछ ठोस कार्य न हो सकेगा। प्रगति का सरकारी अभियान रुका ही पड़ा रहेगा।

लोककल्याण के लिए विनिर्मित संस्थाओं की स्थिति और भी अधिक दयनीय है। यश प्रशंसा के लिए थोड़ी विज्ञापन वाली करना महत्वाकाँक्षी लोगों के लिए एक धन्धा बन गया है। तरह-तरह के आडम्बर-सभा सम्मेलन-संगठन संस्थान-जुलूस, पोस्टरों की इन दिनों बहुत धूम है। नित नई संस्थाएं बनती और बिगड़ती रहती है। पदों के लिये लड़ने मरने वाले-पर्दे के पीछे कई तरह के स्वार्थ साधन करने वाले लोगों का सार्वजनिक संगठनों में बोलबाला है। विविध संस्थाओं का ढाँचा कागज से बने रावण की तरह विशाल कलेवर तो बनाये खड़ा है, पर भीतर ही भीतर खोखली पोल भरी पड़ी हैं। यही कारण है कि काम नहीं के बराबर और आडंबर पहाड़ के बराबर दृष्टिगोचर होता है। प्रगति के विभिन्न प्रयोजनों को लेकर बने हुये इतने अधिक संस्था संगठनों तथा कथित लोक-सेवियों, नेताओं के रहते एक इंच भी आगे खिसक सकना सम्भव न हो सके तो समझना चाहिए कि आडम्बर ने यथार्थता को कुचल-मसल कर रख दिया है।

इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति का एक ही कारण है सद्भावना सम्पन्न सुयोग्य एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं का अभाव। मिशन अनेक बने हुए हैं और बन रहे हैं पर मिशनरियों का कहीं पता नहीं। ऐसी दशा में लोकशक्ति को जगाना लोकमंगल का प्रयोजन पूरा कर सकना किस प्रकार सम्भव होगा।

जनता की स्थिति भी अब अजीब बन चली है। वक्ताओं और नेताओं की कथनी तथा करनी में जमीन आसमान जितना अन्तर देखकर अपीलों तथा धुँआधार भाषणों का असर ही समाप्त हो गया। स्पीचें सुनने या तो लोग आते ही नहीं-आते हैं तो उथला मनोरंजन मात्र करके पल्ले झाड़ते हुए वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ से आये थे। जब नेता और अभिनेता एक ही पंक्ति में गिने जाने लगें तो यह आशा कैसे की जाय कि जनता उनका कोई कष्टसाध्य अनुकरण स्वीकार करेगी। अब हड़तालें कराना भर एक काम जैसा है जिसे कोई भी नेता आसानी से करा सकता है। जिसमें कुछ त्याग और सुधार की कष्ट साध्य बात हो उसे मानना तो दूर, कोई सुनने तक को तैयार नहीं। ऐसी स्थिति बन जाने में मात्र जनता की अनास्था ही दोषी नहीं है वरन् अधिक खोट उन लोकसेवियों का है जिनने अपने को अविश्वासी सिद्ध करने के साथ-साथ उच्च आदर्शों से भी लोकनिष्ठा डगमगा दी है।

इस अभाव की पूर्ति उज्ज्वल चरित्र, सुसंस्कृत और निस्वार्थ लोकसेवा निरत व्यक्ति ही अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर कर सकते हैं। ऐसे नेतृत्व का उत्पादन वानप्रस्थ आश्रम की ही खदान से होता रहा है और हो सकता है। यदि वानप्रस्थ की पुण्य परम्परा चल पड़े तो एक से एक बढ़कर सुयोग्य और भावनाशील लोकसेवी विभिन्न सत्प्रवृत्तियों में संलग्न दृष्टिगोचर हो सकते हैं। और बिना वेतन भार उठाने जनता को ऐसे कार्यकर्ता लाखों की संख्या में मिल सकते हैं जो अवाँछनीयताओं के विरुद्ध मोर्चाबन्दी पर काटकर कर लड़ने के लिए साहसी शूर वीरों की भूमिका प्रस्तुत कर सकें। रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किन्हीं लोगों के द्वारा होगा। अवैतनिक सेवा साधना में संलग्न उच्चकोटि के सुशिक्षित एवं अनुभवी व्यक्ति जिस कार्य को भी हाथ में लेते हैं वह जनता का अजस्र सहयोग उपलब्ध करते हैं और निश्चित रूप से सफल होते हैं। नवनिर्माण की बहुमुखी प्रवृत्तियों में संलग्न होकर ऐसे लोग देश को कितनी जल्दी आगे बढ़ा सकते हैं- ऊँचा उठा सकते हैं- इसकी कल्पना मात्र करने से आंखें चमकने लगती हैं।

नवनिर्माण की- पुनरुत्थान की सभी दिशाएं सूनी पड़ी हैं। शिक्षा, संस्कृति, समाज,स्वास्थ्य, आजीविका, विनोद जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र जनसहयोग से ही समुन्नत और सुव्यवस्थित हो सकते हैं। सरकार का मुँह ताकते रहने और शासन को गाली देने से दबे हुए असन्तोष को व्यक्त होने का अवसर मिल सकता है और उससे थोड़ा जी हलका हो सकता है पर काम कुछ नहीं बनेगा। बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संव्याप्त गगनचुम्बी विकृतियों के विरुद्ध मोर्चा खड़ा कर सकना और उससे जूझ कर विजय प्राप्त कर सकना केवल लोकशक्ति के लिए ही सम्भव है। उसी को गठित, सुदृढ़ और परिष्कृत करना होगा यही है आज का अतिशय महत्वपूर्ण कार्य, जिसे बिना कल की प्रतीक्षा किये, आज ही आरम्भ करना चाहिए। हजार वर्ष की बौद्धिक और राजनैतिक गुलामी के उपरान्त अपना देश उठा है उसकी आर्थिक और राजनैतिक समस्याएं भी हैं-पर सबसे बड़ी समस्या बौद्धिक और चारित्रिक हैं। इस दिशा में न तो पिछले दिनों कुछ सोचा गया है और न किया गया है। संकटों की जड़ हैं। जाति-पाँति के नाम पर राष्ट्र हजारों टुकड़ों में बँटा पड़ा है- हर जाति अपने आप में एक ऐसी स्वतन्त्र इकाई बन गई है मानों दूसरी जाति वालों से उसे कुछ लेना देना ही न हो। ऊँच-नीचे की मान्यताओं ने एक तिहाई मनुष्यों का पद दलित और दो तिहाई लोगों को मिथ्या अहंकार से ग्रसित बना रखा है। नारी को मनुष्योचित नागरिक अधिकार अभी कहाँ प्राप्त हैं वह कैदी का, दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने के लिए बाध्य है। लड़की-लड़कों को बीच कितना अन्तर है। विवाह शादियों में होने वाला खर्चा देश के आर्थिक मेरुदण्ड को तोड़ कर रखे दे रहा है। अंधविश्वासों और कुरीतियों में कितना समय, कितना श्रम, कितना धन और कितना मनोयोग नष्ट होता है इसे देखकर रुलाई आती है।

अस्सी प्रतिशत अशिक्षितों का, अस्सी प्रतिशत छोटी देहातों में रहने वालों का देश वस्तुतः कितना पिछड़ा पड़ है इसे शहरों से दूर बसे छोटे देहातों की झोंपड़ियों में जाकर ही देखा समझा जा सकता है। जिस प्रगति की डींगें हाँकी जाती हैं वे केवल बीस प्रतिशत आबादी वाले शहरों तक ही सीमित हैं। राजनैतिक और सामाजिक उछल-कूद इन्हीं थोड़े से लोगों तक सीमित है। अखबारी धुंआधार प्रचार केवल इसी छोटे क्षेत्र तक सीमित है। असली भारत अस्सी प्रतिशत बहुमत वाला देहाती अशिक्षा ग्रस्त कुरीतियों और कुण्ठाओं से जर्जर देश ता अभी सदियों पुराने पिछड़ेपन से ही संत्रस्त है। उठना तो उसी को है। उठाना तो उसी को है। उस समुद्र में घुसे कौन? और कौन गहरे गोते लगा कर मोती की तलाश करे?

इन प्रश्नों का उत्तर वानप्रस्थ परम्परा के पुनर्जागरण पर ही पूर्णतया अवलम्बित है। भारत न तो अमेरिका है न इंग्लैण्ड। यहाँ ऊँचे वेतन देकर मिशनरी नौकर रखने और पिछड़े देहातों में जाकर काम करने के लिए प्रचुर धन उपलब्ध नहीं है, और न सरकारी साधन ही उतने हैं। हों भी ता नौकरशाही के वर्तमान ढर्रे को देखते हुए यह आशा करना बालू में से तेल निकालना है कि वे साधन रहित देहातों में जाकर उनमें घुलेंगे और जनशक्ति के सहयोग से पुनर्निर्माण के कार्यों में लगेंगे। देहाती दवाखानों में जाने के लिये नौसिखिये डाक्टर तक तैयार नहीं होते। सरकारी नौकरी तो जागीर है उसे पाकर भी पंखा और मेज-कुर्सी छोड़नी पड़ी तो फिर बात ही क्या रही? नौकरी करने का लाभ ही क्या रहा? इस मनोवृत्ति के रहते सरकार भी कुछ कर नहीं सकती। लोकनिंदा से बचने के लिये समाज-कल्याण का खर्चीला आडम्बर खड़ा कर देना भर उससे बस की बात है, सो करती भी है। करेगी भी।

राष्ट्र-निर्माण की समस्याएं अगणित हैं। देश बहुत अधिक विस्तृत क्षेत्र में बिखरा पड़ा है। अशिक्षा और यातायात के साधन ऐसे अवरोध हैं जिनके कारण असली भारत से-पिछड़े भारत से बौद्धिक तथा प्रत्यक्ष संपर्क साधना तक कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में सबसे बड़ी सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता एक ही सामने उपस्थित होती है- सुयोग्य, भावनाशील अवैतनिक और सेवा की उत्कट लगता के साथ राष्ट्र-निर्माण में जुट पड़ने वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं की इस अभाव को पूरा किये बिना कोई गति नहीं-कोई राह नहीं-कोई आशा नहीं। इस प्रयोजन को वानप्रस्थ परम्परा का पुनर्जागरण करके ही पूरा किया जा सकता है। यदि इस दिशा में एक प्रबल और सुव्यवस्थित आन्दोलन खड़ा किया जा सके तो इस धर्म प्राण देश में-प्राचीन संस्कृति की रक्षा की भाव-प्रेरणा से प्रेरित अगणित व्यक्ति आगे आ सकते हैं। और उस सृजन सेना से देखते-देखते द्वापर में उँगली पर गोवर्धन उठाये जाने के तरह-त्रेता में सेतुबन्ध बाँधे जाने की तरह वह चमत्कार सम्भव हो सकता है जिसके आधार पर राष्ट्र का पिछड़ापन-प्रचण्ड प्रगतिशीलता में परिणत हुआ देखा जा सके।

भारत में धर्म, अध्यात्म और संस्कृति के प्रति अभी भी आस्था का सर्वथा अभाव नहीं हुआ है। भौतिकवादी विचारधारा ने नास्तिकवाद को प्रोत्साहन अवश्य दिया है और धर्मध्वजी वर्ग के कुकर्मों ने जन मानस में धर्म के प्रति उपेक्षा अवज्ञा एवं आक्रोश का भाव अवश्य पैदा किया है। इतना सब होने पर भी स्थिति अभी इस सीमा तक नहीं पहुँची है कि धार्मिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये आरम्भ किये गये प्रचण्ड अभियान को सर्वथा उपहासास्पद ठहरा दिया जाय और उसकी प्रतिक्रिया उदासीनता एवं निराशा के रूप में सामने आये हर धार्मिक व्यक्ति वृद्धावस्था में शान्ति प्राप्त करना और परमार्थ साधना की बात सोचता अवश्य है भले ही परिस्थितियाँ उसे वैसा अवसर ही न होने दें। जिनमें थोड़ा उत्साह है वे साधु-बाबाओं के आश्रय में दिन काटते-रामनाम जपते और तथा कथित सत्संग में उलझे देखे जा सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों की संख्या गिनी जाय तो वह लाखों तक अभी भी पहुँचेगी। यदि इन्हें सही मार्ग दर्शन मिला होता तो वे आत्म-कल्याण के साथ लोकमंगल क्षेत्र में प्रवेश कर सकते थे और निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकते थे।

परम्परा का राजमार्ग मौजूद है। भावनाओं का अभाव नहीं। परमार्थ के प्रति आस्था अपनी जगह यथावत् विद्यमान है। इसलिये यदि वानप्रस्थ को पुनर्जीवित किया जाय-उसके लिए ओजस्वी आह्वान किया जाय आगे आने वाले व्यक्तियों का उचित प्रशिक्षण और मार्ग दर्शन किया जाय तो कोई कारण नहीं कि लाखों की संख्या में प्रचण्ड क्षमता सम्पन्न लोकसेवी कार्य क्षेत्र में उतारे न जा सकें यह सम्भावना मूर्तिमान हो सकती है होनी चाहिए। तदनुसार विश्वास पूर्वक यह आशा भी की ही जा सकती है कि राष्ट्र के सर्वतोमुखी नवनिर्माण के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा-उपयुक्त कार्यकर्ताओं की कमी दूर होकर रहेगी और धरती पर स्वर्ग अवतरण का मनुष्य में देवत्व के उदय का स्वप्न साकार होकर रहेगा।


आत्म कल्याण की समग्र साधना और उसका स्वरूप

आत्म-कल्याण का जीवन लक्ष्य प्राप्त करना प्रत्येक भावनाशील भारतीय को स्वभावतः अभीष्ट है। इसके लिए प्रत्येक धर्म ,प्रवृत्ति का व्यक्ति उत्सुक रहता है, उपाय भी पूछता और ढूँढ़ता है- कुछ न कुछ करता भी है, पर दुर्भाग्य यात्रा के आरम्भ में ही आ खड़ा होता है जब कि उसे भ्राँत मान्यताओं में उलझा दिया जाता है। यों अपना देश भ्रान्तियों का देश है, यहाँ हर दिशा में इतनी मूढ़ मान्यताएं जड़ जमाये बैठी हैं मानों हम एक लाख वर्ष पुराने आदिमकाल में रह रहे हाँ। हमारा समाज शरीर गलित कुष्ठ के पीड़ितों जैसा हो रहा है। इसमें इतने सड़न भरे व्रण उभरे हुए हैं कि स्थिति कई बार तो निराशाजनक दीखने लगती है। ऊँचे-नींव, मूल जाति-प्रथा, विवाहों में होने वाले अपव्यय और नारी के प्रति चल रहे अन्याय और भिक्षा-व्यवसाय को जन मान्यता मिलने की थोड़ी सी बातों पर ही ध्यान दें तो पता चलेगा कि वह कितने भयावह गर्त दलदल में है- और इनमें धंसे-फंसे समाज को कितना कुछ सहन करना पड़ सकता है- सहना पड़ रहा है।

धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में यह दुर्गति और भी आगे बढ़ी-बढ़ी है। इसलिए वह और भी अधिक कष्टप्रद है। पानी से मैल धोया जाता है पर यदि पानी ही मैल से भरा हो तो फिर धुलाई का क्या परिणाम निकलेगा। धर्म को साबुन और अध्यात्म को पानी कह सकते हैं। व्यक्ति और समाज की धुलाई, सफाई इसी आधार पर हो सकती है, पर यदि इन्हीं में मैल भर जाय तो फिर धुलाई से स्वच्छता उपलब्ध होने की बात कैसे बनेगी।

जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के ईश्वर की प्राप्ति के, सम्बन्ध में इन दिनों जो मान्यताएं प्रचलित हैं वे बहुत ही भोंड़ी-फूहड़ और अवैज्ञानिक है। उनमें न कोई तथ्य है, न दर्शन, न आधार। भजन करो और मुक्ति पाओ, का नारा ऐसा ही है जैसे कोई चिल्लाने लगें, लाटरी खरीदो और अमीर कहलाओ। इस नारे में भाग्य और चांस की कौड़ी सीधी पड़ जाने पर कुछ तो आशा रहती ही है पर जो नारा इन दिनों धर्म-क्षेत्र में जोर-शोर से लगाया जा रहा है वह पूर्णतया थोथा है। भजन करो और मुक्ति पाओ वाली बात यदि सही होती तो देश में जो 56 लाख से बढ़ कर अब 80 लाख धर्मध्वजी हो गये हैं वे मुक्ति पा लेते और अपने व्यक्तित्व में ऐसी प्रखरता सिद्ध करते जिससे भारत तो क्या समस्त विश्व का कल्याण हो गया होता है। मनुष्य तो क्या- समस्त प्राणिवर्ग ने राहत पाई होती। मुक्त वर्ग का व्यक्तित्व लगभग ईश्वर के समतुल्य ही होता है उसकी प्रतिभा और सत्ता न केवल उस उपलब्धि वाले मनुष्य का ही कल्याण करती है वरन् वह अपने देश, धर्म, समाज और संस्कृति ही नहीं युग का भी उद्धार कर सकती हैं।

यह सही है कि आर्ष ग्रन्थों में भजन की महिमा एक स्वर से गाई है और आप्त पुरुषों ने भजन का महत्व परिपूर्ण समर्थन के साथ प्रस्तुत किया है, पर साथ ही उसके साथ कुछ विशिष्ट आधार भी जुड़े हुये हैं, जिनके सहारे ही भजन रूपी बीज वचन फलदायक हो सकता है। बीज के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता।

मात्र माला सटकने की तोता रटन्त भजन का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकती। पुराण पुस्तकों के पन्ने उलटने से स्वाध्याय की उद्देश्य पूर्ति नहीं होती। घर छोड़ देने भर से कोई वैरागी नहीं हो सकता। परमार्थ पथ पर चलने वालों को इतनी सी बालक्रीड़ा करके सन्तुष्ट नहीं होना पड़ता उन्हें और भी ऐसा बहुत कुछ करना पड़ता है जिससे अन्तः चेतना का स्तर महा मानव की ऊँचाई तक पहुँच सके। उपासना केवल पूजा की कोठरी तक सीमित नहीं रह सकती, उसे लोक सेवा के रूप में विकसित होना पड़ता है। यदि यह तथ्य भजन करने वालों को विदित रहा होता तो वे बेचारे निष्क्रिय दिनचर्या अपना कर ऐसे ही कुछ शब्दों की तोता रटन्त से सन्तुष्ट होकर एक कौने में बैठे मौत के दिन गिनने में न लगे रहते। उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व से समाज सर्वथा वंचित होकर न रह जाता है। भजन की उपासना की, उथली परिभाषा में यदि लोग न उलझाये गये होते, इन्हें यथार्थता का बोध कराया गया होता और परमार्थ जीवन के साथ जुड़े हुए परम पुरुषार्थ है के लिए अभीष्ट उत्साह उत्पन्न किया गया होता तो हमारे देश के 80 लाख, भजन को घोषित व्यवसाय बताने वाले भजनानन्दी, अपने में और अपने समाज में प्रचंड प्रखरता प्रस्तुत कर रहे होते। उससे भजन और भजनानंदी दोनों ही धन्य हो जाते हैं। जिस धर्म और अध्यात्म में भजन का गौरव गाया है उसके चरणों पर भी संसार मस्तक झुकाता है, पर ऐसा हुआ कहाँ-एक अंग की पूर्णता मान बैठने से उपहासास्पद स्थिति उत्पन्न होती है, वहीं हमारे भजनानन्दी वर्ग की हो रही है।

अग्नि पर भोजन पकता है तो ठीक है पर साथ ही अग्नि और जल की व्यवस्था भी की जानी चाहिए अन्यथा अकेली अग्नि जुटा लेने से किसी का पेट न भरेगा। किसान को बीज ही नहीं खाद और पानी का भी प्रबन्ध करना पड़ता है। अध्ययन में मनोयोग के अतिरिक्त लेखनी और वाणी का उपयोग भी होता है। पहलवान के लिए व्यायाम अकेला ही पर्याप्त नहीं उसे पौष्टिक भोजन और संयम, ब्रह्मचर्य पालन भी करना होता है। औषधि अकेली ही रोग नष्ट नहीं करती, परहेज और परिचर्या का भी ध्यान रखना पड़ता है। हम अन्न खाकर ही जीवित नहीं रह सकते पानी और हवा भी चाहिए। इमारत अकेली ईंटों से नहीं चुनी जाती उसमें चूना और लकड़ी की भी आवश्यकता पड़ती है। आग अपने आप नहीं जलती रह सकती उसे ऑक्सीजन भी चाहिए और ईंधन भी। मोटर अपने आप नहीं चलती उसके लिए पेट्रोल भी चाहिए और ड्राइवर भी। कारखाने मशीन, पूँजी और श्रमिकों को त्रिविधि व्यवस्था होने पर ही चलते हैं। शरीर, शिर, धड़, और पैर के तीन भागों में विभक्त है। ईश्वर, जीव और प्रकृति के समन्वित प्रयास से यह संसार बना है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का त्रिवर्ग सुजन, पोषण और संहार ही त्रिविधि गति विधियों का संचार करके विश्वव्यापी हलचल का आधार बना हुआ है। सर्दी, गर्मी, वर्षा की तीन ऋतुएं- शैशव, यौवन और वृद्धता- सत्, रज, तम्- सत्य, शिव, सुन्दर- सत्, चित, आनन्द को त्रिविधि दिव्य धारायें परस्पर अत्यन्त सघनतापूर्वक गुंथी हुई है। उसी प्रकार ज्ञान-योग, कर्मयोग और भक्तियोग के सहारे ही जीवनलक्ष्य की प्राप्ति होती है। ब्रह्मविद्या- तपश्चर्या और लोकसेवा के त्रिविधि आधार लेकर ही समग्र को भजन की समग्रता कह सकते हैं। नाम-जप उसी भजन विज्ञान का एक बहुत छोटा सा पुर्जा है। मात्र पेण्डुलम हाथ में रहने से घड़ी द्वारा टाइम देखने की आवश्यकता पूरी नहीं होती।

भजन की समग्रता और यथार्थता हर किसी धर्म प्रेमी को समझाई जानी चाहिए और हर भजन प्रेमी को इस भ्रम जंजाल से निकाला जाना चाहिए कि वह अमुक मन्त्र-देवता या कर्मकाण्ड को करते रहने मात्र से पूर्णता तक पहुँच सकता है। जिह्वा से कुछ शब्दों का उच्चारण और शरीर तथा पूजा उपकरणों के इधर-उधर हेरा-फेरी जैसे स्वल्प श्रम-साध्य, बाल-कौतुक से आत्म-कल्याण और ईश्वर प्रगति जैसे महान प्रयोजन को प्राप्त नहीं किया जा सकता। बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए महँगा मूल्य चुकाना पड़ता है। सस्ते में-सरलतापूर्वक मूल्यवान विभूतियाँ नहीं पाई जा सकतीं। उपासना क्षेत्र में घुसी सट्टेबाजी की प्रवृत्ति हटाई जानी चाहिए और बताया जाना चाहिए- धन से लेकर ईश्वर तक हर घड़ी उपलब्धि के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ से कम में कुछ कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती।

शरीरबल सम्पादन के लिए पहलवान को जो करना पड़ता है उससे कम नहीं वरन् अधिक ही चेष्टा आत्मबल सम्पादन के लिए आवश्यक है। सफल कृषक विद्यार्थी-व्यवसायी और अन्वेषी लोगों की पुरुषार्थ का अनुकरण ही आत्मबल सम्पादन करने के लिए भी किया जाना चाहिये। बालक्रीड़ा मात्र में मन नहीं बहलाना चाहिए। कम श्रम और कम समय में बढ़ी-बढ़ी उपलब्धियाँ पाने में अत्युत्साही ही तो शेखचिल्ली जैसे उपहासास्पद बनते हैं। किसी समझदार धर्म-प्रेमी को उथलेपन का परिचय देकर अपने को उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए।

यह तथ्य और यह धर्म अध्यात्मिक क्षेत्र में भली प्रकार समझ लिया जाय तो सस्ता सौदा बेचने वाली दुकानें बन्द हो जाएंगी और लूट के माल से बनी बनने के सपने देखने वाले- बेपर की उड़ाने छोड़कर यथार्थता की भूमि पर विचरण करना आरम्भ कर देंगे। उस स्थिति में सम्भव है कायर, मुफ्तखोर और सस्ती खरीद के लिए आकुल लोगों की भीड़ छँट जाय और यथार्थवादी सीमित संख्या में ही दृष्टिगोचर होने लगें पर इससे एक भारी लाभ होगा कि जो भी अध्यात्म मार्ग के पथिक रहेंगे वे न तो अपने को भटका हुआ अनुभव करेंगे और न खाली हाथ रहेंगे।

भजन कम किया जाय या ज्यादा, पूरा समय लगाया जाय या थोड़ा समय लगाया जाय यह बात पीछे की है पर हर उपासना प्रेमी को यह समझ ही लेना चाहिए कि मात्र मन्त्र-जप या पूजा-परक कर्मकांड आत्म-कल्याण की साधना का बहुत छोटा अंग हैं। उतने भर को पूर्णता मानकर बैठे रहना घातक है। भजन करना हो तो उसके साथ स्वाध्याय का- जीवन-शोधन का और सेवा-साधना का अनिवार्य समावेश उसी प्रकार होना चाहिए जिस तरह कि पूजा में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, जल आदि के उपकरणों को एकत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भजन एक जीवन नीति है- कुछ क्षणों में पूरी हो जाने वाली हलचल नहीं। इस सत्य को अध्यात्मिक जगत में जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।

व्यस्त और गृहस्थ-जीवन में जिन्होंने थोड़ी बहुत उपासना करने का क्रम बनाया है उन्हें भी इस सिद्धान्त को ध्यान में रखकर चलना चाहिये। भगवान का भजन-ध्यान उनकी संक्षिप्त योगाभ्यास प्रक्रिया है। गायत्री-जप के साथ ही सविता देवता की ज्ञान-ज्योति का अवतरण अपने रोम-रोम में होने का ध्यान करने के लिए सर्वसाधारण को कहा जाता रहा है। सामान्य उपासना की दृष्टि में यह उत्तम पूजा-पद्धति है। जप-ध्यान के उपरान्त सूर्यार्घ चढ़ाया जाय और भावना की जाय वह जल मेरे व्यक्तित्व का प्रतीक है। जिसे सूक्ष्मात्मा- सविता के चरणों में समर्पित किया जा रहा है। भगवान इसे स्वीकार करे और भाप, वर्षा, ओस, बूंदें, बनाकर इसे विश्व की सुख साधना के लिए उन्मुक्त आकाश में छितराते। यज्ञ में जो उद्देश्य वसोधरा का है वही दैनिक जप में सूर्यार्घ का है। व्यष्टि का समष्टि में समर्पण-स्वार्थ का परमार्थ में समापन- यही हे आत्मा की परमात्मा में परिणति, ईश्वर प्राप्ति या ब्रह्मा-निर्वाण अथवा भव बन्धनों से मुक्ति इसी का नाम है। उपासना के समय पूजन, जप, ध्यान, सूर्यार्घ आदि भजन कृत्यों को इसी उद्देश्य से किया जाना चाहिए। संक्षिप्त योगाभ्यास की पूर्ति यह दैनिक पूजा-प्रक्रिया किसी हद तक कर देती है। व्यस्त जीवन में भी इतना क्रम तो चलना ही चाहिए।

किन्तु स्मरण रखा जाय यह कृत्य भी एकाकी ही है। इससे समग्र साधना की उद्देश्य पूर्ति नहीं होती। नित्य मन पर चढ़ने वाले दूषित वातावरण के बुरे प्रभाव की गन्दगी बोने के लिए स्वाध्याय का- मनन-चिन्तन का प्रयोग नित्य, नियमित रूप से करना चाहिए। जीवन को परिष्कृत और उदार बनाने की प्रेरणा भरने वाला साहित्य स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।

भजन का तीसरा चरण है सेवा-साधना। कहना न होगा कि इस युग में सबसे अधिक आवश्यकता और सबसे अधिक महत्वपूर्ण परमार्थ जन-मानस का भावनात्मक परिष्कार ही है। समस्त उलझने, निकृष्ट विचारणा ने ही उत्पन्न की हैं और अब, या हजार वर्ष बाद जब भी विश्व-शान्ति की आधारशिला रखी जायगी तब विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने वाले क्रिया-कलापों को ही प्राथमिकता दी जायेगी। हमारी सेवा-साधना का लक्ष्य ज्ञान यज्ञ का विस्तार ही होना चाहिए। विचार क्रान्ति वह प्रधान आवश्यकता है जिसकी शाखा-प्रशाखाएं अवाँछनीयताओं के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में फूटती दिखाई पड़ेंगी। हर धर्म प्रेमी को ईश्वर भक्त को-उपासना परायण और ज्ञान-यज्ञ के विस्तार में अपना योगदान देना चाहिए और सेवा धर्म का पालन करते हुए आत्म-विस्तार के चरम-लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए।

यह त्रिविधि साधना-पद्धति व्यस्त और गृहस्थ लोगों के लिए हैं। जिनकी भावनाएँ जितनी प्रखर हो चली हैं उन्हें उसी स्थिति के अनुरूप उपरोक्त तीनों कार्यों में बढ़ा-चढ़ा श्रम, साहस करना चाहिए। वानप्रस्थ जीवन में इन तीनों चरणों की पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय लगाना और अधिकाधिक अभिरुचि के साथ-प्रगाढ़ निष्ठा के साथ मनोयोग केन्द्रित करना पड़ता है। उपासना परक योगाभ्यास और तप साधना की दृष्टि से पंचकोशों का अनावरण और षटचक्रों का वेधन बहुत ही उपयुक्त प्रयोग, इसमें मनोविज्ञान और साधना विज्ञान के अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यों का समावेश है सिद्धियों और विभूतियों की आशाजनक सम्भावना उस क्षेत्र में समाविष्ट है। कौन साधक क्या साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।

ज्ञान-साधना के बारे में भी यही बात है। किसी व्यक्ति का पूर्व ज्ञान किस स्तर का है उसे देखते हुए आगे की शिक्षा-प्रक्रिया निर्धारित की जाती है। इतने पर भी यह स्पष्ट हे कि आत्म-परिष्कार और लोकसेवा के मार्ग में आने वाली समस्याओं का समाधान करने की रीति-नीति जानना ही इस प्रशिक्षण का उद्देश्य होता है। उसी परिधि में की जाने वाली ज्ञान-साधना का महत्व है। प्राचीनकाल के ग्रन्थों को पढ़ते रहने का जाल-जंजाल इतना बड़ा है कि उसे अनेक जन्मों में भी पार नहीं किया जा सकता। शिक्षा सोद्देश्य होनी चाहिए- वानप्रस्थों की भी।

सेवा साधना के लिए इन दिनों हमें एक ही केन्द्र पर केन्द्रित होना है- ज्ञान यज्ञ, ज्ञान-यज्ञ, ज्ञान-यज्ञ। विचार-क्रान्ति- विचार-क्रान्ति। चूँकि अपना कार्य भावनाओं के परिष्कार से सम्बन्ध रखता है इसलिए उसके साथ अध्यात्म की पृष्ठभूमि ही रह सकती है। धर्म का तत्व दर्शन ही इस प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। भावनाओं का स्पर्श करने और उन्हें मोड़ने उभारने के लिए धर्म-चिन्तन और धर्म कलेवर को ही आधार बनाना होगा। यह कार्य न राजनैतिक स्तर पर हो सकता है और न सामाजिक आर्थिक आधार पर समझाने से काम बन सकता है। यह उथली पृष्ठभूमियाँ हैं- जिन्हें अपनाकर किसी को आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता। नवनिर्माण के लिए सर्वसाधारण को कुछ त्याग करने, कुछ कष्ट सहने के लिए ही तो बाध्य किया जायगा। इसके बिना सर्वतोमुखी सुजन की आवश्यकता पूरी हो ही नहीं सकती। जन-मानस में इस प्रकार की उत्कृष्टता केवल धर्मक्षेत्र की भावुकता ही उत्पन्न कर सकती है। इसलिए वानप्रस्थों की सेवा-साधना की दिशा धर्म-कलेवर को पृष्ठभूमि बनाकर ज्ञान-यज्ञ की- विचार-क्रान्ति की ज्योतिर्मय प्रखरता उत्पन्न करना ही हो सकता है। उन्हें इसी परिधि में रहकर विभिन्न सेवा साधनों में संलग्न होने की तैयारी करनी पड़ती हैं।


देव जीवन का अवसर और आयुष्य

द्विजत्व का प्रतीक यज्ञोपवीत माना जाता है। आदर्श पूर्ण जीवन जीने का व्रत धारण करना- होश संभालते ही आवश्यकता हो जाता है। भारतीय धर्म परम्परा के अनुसार हर भावनाशील व्यक्ति को पेट प्रजनन के लिए नहीं, जीवन लक्ष्य की, ईश्वर की प्राप्ति के लिए जीना, चाहिए और इसके लिए जैसे ही बालक में थोड़ी विचारशीलता का उदय हो वैसे ही उसके कन्धे पर यह स्मृति- जिम्मेदारी लाद देनी चाहिए कि वह प्रलोभनों और आकर्षणों में भटक न जाय वरन् हर घड़ी यह ध्यान रखे कि उसे किसी विशेष प्रयोजन के लिए नरजन्म मिला है और उसकी पूर्ति के लिए सतत् जागरुकता अपनाये रहने की आवश्यकता है। यज्ञोपवीत संस्कार का यही उद्देश्य है। संसार में संव्याप्त अज्ञान से लड़ने वालों को ब्राह्मण, अशक्ति से लड़ने वालों को क्षत्रिय और अभावों को हटाने में प्रवृत्ति रखने वाले वैश्य कहलाते हैं। सोद्देश्य जीवन ही साँस्कृतिक गौरव गरिमा के उपयुक्त है। वासना-तृष्णा का लक्ष्य बना कर जीने वाले, पेट और प्रजनन से आगे की बात न सोचने वाले हेय अन्त्यज कहलाते हैं। ऐसे लोग न तो यज्ञोपवीत पहनने का साहस करते हैं और न ठूँस-ठाँस करके उन पर वह लादा ही जाता है।

बचपन में यज्ञोपवीत पहना भर दिया जाता है उसकी चरम परिणति का अवसर आता है पूर्वार्ध जीवन के बाद। यों ब्रह्मचारी और गृहस्थ में भी उच्च दृष्टिकोण ही रखा जाना चाहिए और व्यक्ति निर्माण तथा परिवार निर्माण की आवश्यकता उन दिनों भी पूरी की जानी चाहिए, पर प्रखर परमार्थ जीवन तो तभी दृष्टिगोचर होता है जब शरीर, मन और परिवार की परिधि से साहस पूर्वक आगे कदम बढ़ा कर लो मंगल की- विश्व मानव की- सेवा साधना में सर्वतोभावेन तत्पर होकर अनुकरणीय आदर्श उपस्थिति किया जाता है। यज्ञोपवीत धारण के समय ली गई परमार्थ परायणता की, इस जन्म में दूसरा जन्म लेने की- द्विजत्व प्रतिज्ञा बहुत समय तक छोटे पौधे के रूप में रहने के पश्चात् वानप्रस्थ स्थिति में ही फल−फूलों से लदती है। व्यावहारिक क्रियान्वित एवं प्रत्यक्ष मूर्तिमान हुई परिलक्षित होती है। असम में द्विजत्व के योग्य क्षमता ढलती आयु में ही उत्पन्न होती है।

प्रकृति प्रदत्त जन्म धारण सरल है इसमें प्राणी को स्वयं कुछ करना नहीं पड़ता। नियति का प्रवाह जन्म लेने-बढ़ने और मरने के लिए विवश करता है तो प्राणधारी के लिए इसी धारा में बहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। इसमें साहस की आवश्यकता नहीं पड़ती सब कुछ अपने क्रम से- अपने ढर्रे से होता चला जाता है। साहस की परीक्षा तब होती है जब मनुष्य अपने प्रचण्ड मनोबल को समेट कर प्रकृति प्रदत्त पशु जन्म की धारा उलट कर मनुष्य कृत जन्मान्तर उपस्थित करता है और अपनी भावनात्मक प्रखरता के आधार पर पशु योनि का परित्याग कर देवयोनि में प्रवेश करता है। वानप्रस्थ इसी परम पौरुष का- भावनात्मक दुस्साहस का- नाम है। इसे स्वेच्छा बलिदान कर कहते हैं।

युद्ध मोर्चे पर शत्रु की संगीन से सीना छिदवान आसान है, क्योंकि उसमें सैनिक का उद्देश्य शत्रु का शिर काटना और विजय श्री का वरण करना रहता है- वह उमंगे और आशाएं इसी स्तर की लेकर चलता है। यह संयोग की ही बात है कि वह आकाँक्षा पूरी न हो सके और उलट कर अपना ही शिर कटना पड़े। आत्म बलिदानी की मनोदशा इससे कहीं अधिक साहसिक होती है। वह आरम्भ से ही अपने पन का- भौतिक महत्वकाँक्षाओं का परित्याग करके चलता है और अपनी समग्र सत्ता को प्रभु चरणों पर सर्वतोभावेन समर्पण करने की शपथ लेकर चलता है। अपने लिए नहीं भगवान के लिए जीता है। महज स्वभाव मिल सकने वाली सुविधाओं का भी स्वेच्छा से परित्याग करता है संयम की आग में अपने को तपाता गलाता है। उपभोग के लिए जो प्रस्तुत है उसकी और से मन को समेटता है और उपलब्धियों को दुःखी संसार के लिए छोड़ कर उदारमना स्थिति प्रज्ञ की- परमहंस अवधूत की भूमिका में प्रवेश करता है।

इस वैराग्य बलिदान के लिए कायर और कृपण स्तर का व्यक्ति तैयार नहीं हो सकता। यह तो शूर वीरों का- दुस्साहसियों का वीर बलिदानियों का मार्ग है जिस पर काँटे कुचलते हुए-पैरों को लहूलुहान बनाने की हिम्मत करने के लिए हिम्मत समेटने वाले ही चल सकते हैं। कल्पना जल्पना तो ऐसे उदात्त जीवन की कितने ही करते रहते हैं पर अग्नि परीक्षा की घड़ी देखकर हौसला किसी विरले से ही आगे बढ़ाने का बन पड़ता है। भारतीय धर्म की महान परम्परा यही रही है कि आदर्श जीवन की शपथ लेने वाले हर ब्रह्मचारी को उत्तरार्ध में वैसा साहस करना चाहिए। एक जन्म प्रकृति ने दिया सो ठीक है। दूसरा आदर्श वादी जन्म अपने साहस पुरुषार्थ को समेट कर लेना चाहिए। वानप्रस्थ इसी विद्या का नाम है।

वानप्रस्थ यों एक संस्कार भी है। षोडश संस्कार में पुँसवन, सीमान्त, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, उपनयन, आदि की गणना है, इसमें हर्षोत्सव मनाये जाते हैं। अमुक कर्मकाण्ड किये जाते हैं और बालक को कुछ दिशा शिक्षा देते हैं। जिस प्रकार अन्य संस्कार कराये जाते हैं इसी प्रकार वानप्रस्थ कृत्य की परम्परा भी निबाही जानी चाहिए साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके साथ ही कुछ महान कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व कन्धे पर आते हैं। बचपन के संस्कार प्रशिक्षण स्तर के थे उनमें उद्बोधन और सम्भावनाओं की ही प्रधानता थी पर वाह संस्कार के साथ शिर पर महान उत्तरदायित्वों का बोझ आता है एक नये परिवार का श्री गणेश करना ही तो विवाह है। ठीक इसी प्रकार वानप्रस्थ के भी उत्तरदायित्व महान है इस प्रवेश द्वार में कदम रखने वाले को प्रभु समर्पित जीवन जीने का व्रत धारण करना पड़ता है और विश्व वसुधा को अपना घर परिवार मान कर सार्वजनीन सुख-शान्ति एवं समृद्धि प्रगति के लिए अपनी विभूतियों का समर्पण करना होता है। अपनी मानसिक और शारीरिक गति-विधियों उसी दिशा में प्रशिक्षित एवं अग्रसर करनी पड़ती है। निस्संदेह यह देव-जीव में प्रवेश कराने की अभिनव भूमिका है जिसका निर्वाह करने वाले के लिए मानवता शत-शत नमन करती रहती है।

भारतीय संस्कृति के अनुसार जीवन का उत्तरार्ध देव भाग है उसका उपयोग देव प्रयोजनों के लिए ही होना चाहिए। पूर्वार्ध को भौतिक अल्हड़पन की तृप्ति में लगाया गया सो ठीक है। दुस्तर उभारों में उतना भाग लग गया सो ठीक है। उन दिनों इन्द्रियों के घोड़े और मन के मयूर अपनी मस्ती में होते हैं। आगा पीछा देखते सोचते नहीं। नियन्त्रण कठिन पड़ता है ऐसा दशा में बाढ़ का उफान तर जाने तक की प्रतीक्षा में बैठे रहना बुरा नहीं है। फिर व्यक्ति निर्माण और परिवार निर्माण के काम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यौवन आने से पूर्व की अवधि इसी के उपयुक्त है कि कठिन जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकने योग्य साधन जुटाये जायं। शिक्षा प्राप्त न हो सकी तो अशिक्षित रहने के पग-पग पर ठोकर खानी पड़ेगी। संयम व्यायाम से शरीर पुष्ट न किया गया अनुभव अनुशासन न सीखा गया तो गृहस्थ जीवन में उपार्जन तथा अन्य प्रकार के उत्तरदायित्वों का निर्वाह कैसे होगा?

परिवार संस्था का संचालन एक उन्नयन किसी पूरे राष्ट्र समाज को संभालने सुधारने की एक छोटी प्रतिकृति है। उसे चाहें तो गृहस्थ का निर्वाह लोकसेवा की छोटी प्रयोगशाला कह सकते हैं। महत्वकांक्षाएं कई बार बड़ी प्रबल होती है। उन पर नियन्त्रण करना साधारणतया कठिन होता है। स्वप्नों में बहुत सुन्दर और आकर्षक दीखने वाली ललकें और लिप्साएं प्रायः स्वर्ण परी सी लगती है और उन्हें पाने भोगने के लिए अल्हड़मन बेतरह मचलता है। पर जब वे निकटवर्ती अनुभव में आती हैं तो स्पष्ट जा जाता है कि वे दूर से देखने में ही आकर्षक थीं। निकट आने पर तो उनमें जलन और निराशा के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।

वित्तैषणा- पुत्रेषणा और लोकेषणा के पीछे आदमी रावण जैसा फिरता है। वन लिप्सा- इंद्रियभोग और अहंकार की पूर्ति के लिए मचलने वाला मन जब उन विष कण्टकों के संपर्क में आता है तो नशा उतर जाता है- भ्रम टूट जाता है- और तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि मृग-तृष्णा के अतिरिक्त इस जाल जंजाल में कुछ पा नहीं। दूसरों के बताने समझाने से यह यथार्थता गले नहीं उतरती, ठोकर खाकर जब अनुभव हो जाता है तब कहीं मन मानता है और वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त मनोभूमि बन जाती है।

यों वानप्रस्थ का समय ढलती आयु के साथ जोड़ा गया है। पर वस्तुतः उसका सीधा संबन्ध ढलती मनोभूमि के साथ है। नशों की खुमारी जब भी उतर जाय तभी इस परम शुभ सदुद्देश्य को अपनाने का शुभ मुहूर्त हो सकता है। आयु का पैमाना मोटेतौर पर ही निर्धारित किया गया है। प्राचीन काल में सौ वर्ष की सहज आयुष्य थी। तब पूर्वार्ध पचास वर्ष का होता था। पच्चीस वर्ष ब्रह्मचर्य-पच्चीस वर्ष गृहस्थ के लिए नियत थे। पचास वर्ष वाद वानप्रस्थ ले लिया जाता था। अब वैसी स्थिति नहीं रही। सौ वर्ष कान जीता है। पचहत्तर तक भी कोई विरले पहुँचते हैं। इसे ही परम आयु अब माना जाना चाहिए। इसका आधा तो सैंतीस वर्ष ही हुआ। पुराने अनुपात में अब यही उत्तरार्ध है- इसी को ढलती आयु कह सकते हैं। इसी अवधि तक पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्ति मिलना कठिन समझा जाय तो उत्तरार्ध में से भी और कटौती की ला सकती हैं। आधे के स्थान पर एक तिहाई से भी संतोष किया जा सकता है।

पचहत्तर वर्ष का दो तिहाई धर परिवार में गुजारा जाये तो कम से कम पचास से पचहत्तर तक के पच्चीस वर्ष तो वानप्रस्थ संन्यास की मिली जुली प्रक्रिया में लगाये जाने चाहिए। यह अन्तिम अवधि मानी जानी चाहिए। जिनके लिए इससे पहले ही साहसिक कदम बढ़ाया जाना संभव है उन्हें इस दिशा में रुकने झिझकने की कोई बात नहीं। पचहत्तर का आयुष्य भी ध्रुव सत्य नहीं। मौत तो कभी भी सामने आ खड़ी हो सकती है और पल भर में गर्दन मरोड़ कर रख सकती है। आये दिन नौजवानों की लाशें मचलती मचकती आँखों के आगे से निकलती है और श्मशान में शरण पाती दिखाई देती रहती है। अपने लिए पचहत्तर की आयु को लक्ष्मण रेखा मान बैठना यथार्थ चिन्तन नहीं है। इस दृष्टि से उस विभाजन अवधि को पहले की ओर तो कितना ही खिसकाया जा सकता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि यथा सम्भव पीछे नहीं ही हटानी पड़े। कितने ही छोटे बच्चे पालन पोषण के लिए शेष हों और पूरा समय उनके लिए उपार्जन करने में संलग्न रहे बिना काम न चलता होती बात दूसरी है।

आयुष्य की दृष्टि से पचास वर्ष की आयु मोटे तौर पर ही निर्धारित की गई है। मन के उफानों पर यदि इससे पहले ही अंकुश स्थापित कर लिया जाय, तृष्णाएं और वासनाएं सिमट सकने की स्थिति बन जाय, परिवार के आर्थिक उत्तरदायित्व से पूर्व संचित सम्पत्ति के आधार पर अथवा घर के दूसरे लोगों के सहारे उपयुक्त व्यवस्था बन जाय, आश्रितों के भरण पोषण का क्रम यथावत् चलता रह सके उतना ही उत्तम है। मनुष्य जन्म की एक-एक बड़ी एक-एक साँस-हीरे मोतियों से तोलने लायक है, इसकी बहुमूल्य सम्पदा में से पेट प्रजनन जैसे पशु कर्मों के लिए जितना अंश कम बर्बाद हो उतना ही उत्तम है।

यों परमार्थ परायणता हर आश्रम में-हर आयु में- हर स्थिति में किसी प्रकार- किसी स्तर पर चलती रह सकती है। पर उसमें समग्र संलग्नता की स्थिति जब बन सके तो उसे वानप्रस्थ कह सकते हैं। यह अविवाहित जीवन के पश्चात् गृहस्थ का उल्लंघन करके भी हो सकता है। किन्तु एक बार गृहस्थ में प्रवेश कर लेने के बाद पत्नी तथा बच्चों की शारीरिक मानसिक सुव्यवस्था बनाये बिना-उन्हें अनाथ निराश्रित छोड़ कर भावावेश में भाग निकलना अनुचित है। यदि गृहस्थ में प्रवेश कर लिया गया है तो तब तक प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी जब तक यह संतोष न हो जाय कि परिवार व्यवस्था यथा क्रम चलती रहेगी। अच्छा तो यही है कि अपने बालकों के शिक्षा, आजीविका और विवाह के तीनों उत्तरदायित्वों से समय रहते स्वयं ही छुटकारा प्राप्त कर लिया जाय इसके लिए पूर्ण तैयारी यही होनी चाहिए कि प्राचीनकाल की भाँति तीस पैंतीस वर्ष की आयु के उपरान्त बच्चे पैदा करना बन्द कर दिया जाय। और पचास पचपन तक रिटायर होते-होते उन सभी को स्वावलम्बी बना दिया जाय। संतोष पूर्ण निश्चिन्तता समय से पूर्व तैयारी करने वालों को ही मिलती है।

जिन्हें समय रहते समझ नहीं और देर तक बच्चे जनते रहे, उनकी संख्या बढ़ाते रहे उनके लिए, कुछ अपवाद ही शेष रह जाते हैं। पूर्व संचित सम्पत्ति से बच्चों के स्वावलम्बन तक का काम चल सके तो भी निवृत्ति मिल सकती है- यह एक मार्ग है। दूसरा यह है कि बड़ी सन्तान को आरम्भ से ही यह शिक्षा दी जाय कि वह मातृ ऋण और पितृऋण से अपने छोटे भाई बहिनों के लालन पालन का उत्तरदायित्व वहन करते हुए उऋण होने के आदर्श पर आस्था रख सके। आज के स्वार्थी वातावरण में प्रायः बड़े बच्चे माता पिता का आर्थिक शोषण करने के उपरान्त जैसे ही स्वावलम्बी बनते हैं वैसे ही अपनी नव वधू को लेकर अलग हो जाते हैं और गुलछर्रे उड़ाने की चाल चलते हैं। पितृ ऋण चुकाने की बात वे कभी स्वप्न में भी नहीं सोचते वरन् जो कुछ उनके पास और बचा खुचा है उसे भी किसी न किसी बहाने हड़प लेने के लिए घात लगाते रहते हैं। छोटे भाई बहिनों की ओर उनकी तनिक भी ममता नहीं होती। उत्तराधिकार सम्पदा में हिस्सेदार होने के कारण वे उन्हें काँटे की तरह खटकते हैं। ऐसी सन्तान मनुष्य के उस हेय अज्ञान का दारुण दण्ड ही है जिसके कारण उन्हें उठती उम्र में संतान का मुख देखे बिना चैन ही नहीं पड़ता था और उस उपार्जन के बिना सब कुछ सूना जैसा अनुभव करते थे। लोग यह समझ ही नहीं पाते कि इस घोर कलियुग में संतानों की संख्या बढ़ाना अपने गले में एक से एक कड़ा फाँसी का फन्दा लगाने की बराबर कष्ट कर ही हो सकता है।

वे सौभाग्यशाली हैं जिनके बच्चे मातृऋण और पितृऋण चुकाने के लिए छोटे भाई बहिनों के स्वावलम्बन का उत्तरदायित्व श्रद्धा पूर्वक निबाहें और अपनी पत्नी को इसके लिए सहमत करे। अपनी संतानें बढ़ाने में जल्दबाजी न करें और भाई बहिनों की सेवा सहायता से निवृत्त होकर ही संतान बढ़ाने के नये खर्च बढ़ाने की बात सोचें। जो हो, यदि किन्हीं को पितृऋण चुकाने के लिए तत्पर संतान मिले और वे स्वावलम्बी होकर अपने भई बहिनों को संभाले तो भी वानप्रस्थ के परमार्थ जीवन का सुअवसर किन्हीं सौभाग्यवानों को मिल सकता है। यह है तो आज के वातावरण में कठिन-फिर भी असम्भव नहीं है।

पूर्व तैयारी का एक तीसरा तरीका यह हो सकता है कि पत्नी को सुशिक्षित और स्वावलम्बी बनाया जाय। वह अध्यापिका आदि कार्य अपना कर आजीविका कमाने लगे तो वह भी बड़े बेटे की तरह अपने पति को निश्चित होकर परमार्थ जीवन का सौभाग्य लेने के लिए अवसर दे सकती है। पर यह सम्भव तभी है जब उस पर न्यूनतम संतान संख्या का भार पड़ा हो। बहुत बच्चों की अनेक समस्याओं का तो वह भी अकेली निर्वाह नहीं कर सकती। आखिर पेट भरना ही तो काफी नहीं होता बच्चों के लिए और भी बहुत कुछ करना सहना पड़ता है उसमें पति के योगदान की आवश्यकता झुठलाई नहीं जा सकती।

पारमार्थिक जीवन जीने के लिए व्रत धारण करने वाले नर नारी ऐसा भी कर सकते हैं कि विवाह तो करें पर सन्तानोत्पादन के झंझट से बचे रहें। ऐसी स्थिति में भी वे सुविधा पूर्वक किसी भी आयु में वानप्रस्थ में प्रवेश कर सकते हैं। जिन्हें संयोग वश संतान ही नहीं मिली है उनके सौभाग्य की हजार मुख प्रशंसा की जानी चाहिए और यह माना जाना चाहिए कि उन्हें ईश्वर की ऐसी अतिरिक्त अनुकम्पा प्राप्त हुई जिसके आधार पर वे चाहें तो अत्यन्त सरलता पूर्वक देव जीवन का परिपूर्ण आनन्द लाभ ले सकते हैं।


Quotation

खादते मोदते नित्यं शुनकःशूकरः खरः। तेषामेषा को विशेषों वृत्तिर्येषातु तादृशी॥

खाते और मौज करते तो कुत्ते, शूकर और गधे भी है यदि मनुष्य की भी यही वृत्ति रहे तो फिर मनुष्य और पशु में क्या अन्तर रहा?


उत्तम मध्यम और कनिष्ठ स्तर का वानप्रस्थ

वानप्रस्थ एक महान जीवन दर्शन की व्यवहार प्रक्रिया में प्रत्यक्ष परिणति है। चिन्तन और दर्शन प्रायः मस्तिष्कीय विलासिता तक-बौद्धिक ऊहापोह तक सीमित होकर रहते देखे गये हैं। उच्च स्तरीय चिन्तन को आदर्शवादी रीति नीति में अपनाना कष्ट साध्य होता है, उसमें सुविधायें छिनती हैं और ऐसी प्रयत्न चेष्टा बढ़ती है जिसमें दूसरों की सूख शाँति की बढ़ती होकर अपना प्रत्यक्ष एवं भौतिक लाभ नहीं के बराबर ही दृष्टिगोचर होता है।

आदर्शवादी विद्या व्यक्तित्व को महान एवं श्रद्धास्पद बनाती है, उससे आन्तरिक सन्तोष मिला है, आत्म-कल्याण की पृष्ठभूमि बनती है- समाज को समुन्नत बनाने का अवसर मिलता है तो सब ठीक है, पर प्रत्यक्ष सुख सुविधायें तो घटती ही हैं। स्थूल दृष्टिकोण वालों लिए प्रत्यक्ष ही सब कुछ है- भौतिक लाभ ही लाभ है- इन्हें यह समझना और समझाना कठिन है कि लौकिक वैभव को घटा कर परमार्थ प्रयोजन में संलग्न होना बुद्धिमत्ता है। दुनियादार आदमी को यह समझाना बहुत कठिन है कि अपने शरीर मन और परिवार से आगे बढ़ कर अन्य किसी के हितसाधन की बात भी सोची जा सकती है। प्रत्यक्ष लाभ का उत्सर्ग परोक्ष परमार्थ के लिए छोड़ा जा सकता है। इन दिनों आदर्शों की बात बढ़-चढ़ कर होती है पर उस तर्क वितर्क में संलग्न व्यक्ति भी इसे वाक् विलास भर मानत हैं। आदर्शों को व्यवहार में उतारना भी सम्भव हो सकता है। इस पर कोई विरले ही विश्वास करते हैं। दूसरों को त्याग बलिदान की नसीहत देना सरल है पर जब अपने लिए वैसा करने की बात सामने आती है तो सहज ही बोलती बन्द हो जाती है।

वानप्रस्थ को, आदर्श के व्यवहार में परिणत करने का महान उत्तरदायित्व बहन करना पड़ता है। इसलिए उसे यथार्थ ब्रह्मवेत्ता कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। सच्चे अर्थों में उपदेशक, वक्ता, व्यास और प्रचारक भी वहीं है। क्योंकि वक्तृताएं मात्र जानकारी बढ़ा सकती है-गुदगुदी उत्पन्न कर सकती है पर प्रेरणा तो अनुकरणीय आदर्श सामने उपस्थित देखने पर ही मिलती है। नीचे गिराने का काम तो वाणी से लेखनी से भी सध सकता है पर ऊँचा उठाने में सफल वही हो सकता है जो स्वयं ऊँचाई तक चढ़ सकता है। जो स्वयं डूब रहा है वह दूसरे डूबने वाले को क्या उबारेगा, जो स्वयं मलीनता ग्रसित है वह दूसरों को स्वच्छ कैसे करेगा। वानप्रस्थ की लोक कल्याण साधना का शुभारम्भ अपने आप से आरम्भ होता है। वह सर्वसाधारण के सामने अपना आदर्श उपस्थित करते हुए यह सिद्ध करता है कि त्याग और सेवा की बात मात्र बकझक नहीं है वह ऐसी व्यावहारिकता भी है जिसे प्रत्यक्ष करके दिखाया जा सकता है दैनिक जीवन में घोला और घुलाया जा सकता है।

वानप्रस्थ का चरम लक्ष्य उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्त्व को दैनिक जीवन में उतारते हुए जहाँ जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाना है वहाँ सर्वसाधारण को यह विश्वास दिलाना भी ही उच्च आदर्शों में व्यवहारिक जीवन में उतारना न केवल सरल है वरन् सुखद और शान्तिदायक भी है। लोकशिक्षा का यही प्रभावशाली तरीका है। समग्र पुनरुत्थान और अभिनव निर्माण के लिए जन साधारण को कुछ कष्ट उठाना, त्याग करना और अनुदान प्रस्तुत करना ही पड़ेगा। इसी पूँजी से ही प्रगति का भवन बनेगा। लोगों को आदर्शों की बातें तो सुहाती हैं पर उस दिशा में बढ़ने के लिए जो अनुदान प्रस्तुत करना पड़ता है, उसके लिए कोई साहस नहीं करता फलतः लम्बी-चौड़ी योजनाओं को दीमक चाटती रहती है। जनता को सृजन प्रयोजन के लिए अपना योग-दान देने के लिए रजामन्द करना हर किसी का काम नहीं है, उसे प्रभावशाली ढंग से वही कर सकता है जिसने स्वयं वैसा कदम उठाकर दिखाया है। वानप्रस्थ अपनी भूमिका द्वारा वह अधिकार प्राप्त करे जिसके बलबूते लोगों को देश, धर्म, समाज संस्कृति के लिए कुछ अनुदान प्रस्तुत करने के लिए कहा और मनाया जा सके। ऐसे ही नेतृत्व की सदा से आवश्यकता रही है। सफलता उसे ही मिली है- अनुगमन उसी का किया गया है। भौतिक लाभ कमाने में निरत नेता के मुख से त्याग बलिदान के उपदेश शैतान के मुँह बाइबिल वाचन की तरह अटपटे ही लगते हैं- उपहासास्पद ही बनते हैं। युग-नेतृत्व की महती आवश्यकता वानप्रस्थ ही पूरी करता रहा है उसे ही करने का अधिकार भी है।

प्राचीन काल के संन्यास को अब वानप्रस्थ में ही विलीन होना पड़ेगा। उस वेष में अवाँछनीय व्यक्ति इतने अधिक घुस पड़े हैं कि संचित प्रतिष्ठा को समाप्त प्राय करके रख दिया। फिर इन दिनों संन्यास के साथ अकर्मण्यता मुफ्तखोरी-सेवाधर्म से विमुखता और आडम्बर अन्धविश्वासों के विस्तार की विडम्बना ने स्थिति सर्वथा बदल दी है। भिक्षा व्यवसाय अब जन आक्रोश का केन्द्र बनने जा रहा है। वस्त्र रंगने मात्र से राजसी निर्वाह प्राप्त करने के लिए अधिकार को अगले दिनों कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा और धर्म परम्परा की दुहाई देने से भी चमड़ी को बचाया न जा सकेगा। अस्तु संन्यास को वानप्रस्थ में विलीन करके एक सहज सुलभ परमार्थ जीवन प्रक्रिया को अपनाने से ही काम चलेगा। वही इस युग के अनुकूल है और उपयुक्त भी।

वानप्रस्थ का सामान्य स्वरूप यह है- व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को जीवन-निर्वाह के सादगी पूर्ण बिन्दु तक सीमित करके संयमी और मितव्ययी जीवन जिया जाय। संतानोत्पादन न किया जाय। आन्तरिक स्तर को परिष्कृत करने के लिए सद्ज्ञान संचय एवं तप−साधना का आश्रय लिया जाय। इसके अतिरिक्त जन-मानस में युगान्तरकारी परिवर्तन लाने के लिये ज्ञान-यज्ञ की ज्वालायें प्रचण्ड बनाने की सेवा साधना में अनवरत रूप से तत्पर रह जाय। यही है वानप्रस्थी जीवन दर्शन। उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में लगाना आवश्यक हो जाता है, अतः एवं यह आवश्यक है कि पारिवारिक उत्तरदायित्वों का भार या तो बिल्कुल ही न हो- यदि हो तो यह इतना कम हो कि परमार्थ प्रयोजन की विधि व्यवस्था के लिए अवकाश और मनोयोग की कहने लायक मात्रा हाथ में रह सके।

शरीर और परिवार की सज्जा व्यवस्था में संलग्न क्षमता एवं उत्कंठा को समेट कर ही परमार्थ प्रयोजन में लगाया जा सकता है। यदि पूर्व पक्ष में मनोयोग जुटा जकड़ा रहे तो क्षमता का महत्वपूर्ण अंश उसी में खप जायेगा, तब परमार्थ की बात अत्यन्त स्वल्प मात्रा में ही सम्भव हो सकेगी। वस्तुतः वानप्रस्थ का उत्तरदायित्व गृहस्थ जीवन की अपेक्षा कई गुना भारी और विशाल है। इसलिए उसमें शक्ति एवं साधनों का भी अत्यधिक मात्रा में लगाना अभीष्ट है। यह बचत तभी हो सकती है जब लोभ और मोह की भावनात्मक दुर्बलताओं से पिण्ड छूटे और घर परिवार की जिम्मेदारियों का छकड़ा खींचने से दम मारने लायक राहत मिल सके। इसलिए वानप्रस्थ की पात्रता में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि व्यक्ति के पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हुए कि नहीं, परमार्थ प्रयोजन के लिए समय और मन का महत्वपूर्ण अंश बचा सकता है या नहीं। यह गुत्थी सुलझाये बिना वानप्रस्थ की बात बनती नहीं यह आदर्शवादी छलाँग लगाना उन्हीं के लिए सम्भव है जिन्होंने अपने लौकिक उत्तरदायित्वों को हलका करने की स्थिति प्राप्त कर ली है।

वानप्रस्थ का संस्कार कृत्य सरल है। यज्ञ, देव-पूजन, सम्भ्रान्त सज्जनों की उपस्थिति, व्रत धारण कोपीन एवं दण्ड धारण, पीत परिधान, जल कलशों का अभिषेक, मंगल ऋचाओं का उच्चारण, विवेचन, प्रवचन, प्रभृति क्रिया-कृत्यों के साथ का यह संस्कार एक दो घण्टे में सम्पन्न हो जाता है। प्रतीकात्मक कम से कम एक अथवा सभी सुविधानुसार पीले वस्त्र धारण करना उपयुक्त माना गया है। अपने आपको उद्बोधन और जनता को उस व्यक्ति के स्तर का परिचय पीत वस्त्रों के आधार पर होता है इसलिए उनकी उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्राचीनकाल में वानप्रस्थ में पत्नी तो साथ रखी जा सकती थी- पत्नी के साथ रहा जा सकता था पर ब्रह्मचर्य धारण करना अनिवार्य था। समय की स्थिति को देखते हुये इन दिनों सन्तानोत्पादन पर ही प्रतिबन्ध रहना चाहिए। वीर्य रक्षा की उपयोगिता उन्हें स्वयं समझनी माननी चाहिये पर इस पर अनिवार्यता का बन्धन न रहे तो अधिक उत्तम है, उससे उन्हें समय कुसमय होने पर व्रत भंग करने का पश्चाताप न करना पड़ेगा। ब्रह्मा-दृष्टि से इतना ही व्रत धारण एवं कर्म-काण्ड पर्याप्त है। मूल बात गतिविधि परक है- परमार्थ प्रयोजनों में समय एवं मनोयोग की मात्रा बढ़ानी ही पड़ती है। यह कटौती घर परिवार की व्यस्तता में से- मन को तृष्णा, लालसा में से ही तो करनी पड़ेगी। इसलिए वानप्रस्थ का मूल-भूत परिवर्तन यहीं से आरम्भ होगा। इसी केन्द्र बिन्दु से दिशा बदलेगी।

वानप्रस्थ के परमार्थ पथ प्रदेश को तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है। उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ। सर्वोत्तम, अधिक श्रेष्ठ, एवं श्रेष्ठ के उतार चढ़ाव इस महान प्रक्रिया में भी हो सकते हैं।

सर्वोत्तम वह स्थिति हे जिसमें पारिवारिक उत्तरदायित्वों को अन्य विश्वस्त एवं निष्ठावान परिजनों पर छोड़ कर स्वयं पूरा समय परमार्थ प्रयोजन में लगाने के लिए तत्पर हो जायें। कुछ समय इस अभिनव जीवन प्रणाली की विधि व्यवस्था का तात्विक अध्ययन और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करें और फिर विश्व-मानव की सेवा साधना में जुट जायें। दिनचर्या का ऐसा निर्धारण होना चाहिए जिसमें स्वाध्याय और योग साधना तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवा-कार्यों में लगा रह। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व-मानव की सेवा साधना एक ही है, जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की की विचार-क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही, शिल्प, चिकित्सालय,मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ, सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए- विचार-क्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार भावनात्मक नवनिर्माण। इसी से संबद्ध सेवा कार्य हाथ में लिए जाएं। यह कार्य प्रत्यक्ष में नहीं देखा जाता और उसका परिणाम इमारतों की तरह आँखों के सामने नहीं आता इसलिए उथली तबियत के लोग उस दिशा में उदासीन देखे जाते हैं और ऐसे कार्य पकड़ते हैं जिन्हें आँखों से देखा-जाना जा सके। इस संकटकाल में आपत्ति धर्म की तरह हमें केवल ज्ञान-यज्ञ की महान प्रक्रिया को ही सामने रखना चाहिए। वानप्रस्थ की सेवा साधना का प्रत्येक कदम इसी दिशा में उठना चाहिए।

सर्वोत्तम स्तर के वानप्रस्थ-परिव्राजक स्तर की जीवन चर्या अपनाते हैं। वे आश्रम बनाकर नहीं बैठते वरन् जहाँ भी सत्प्रवृत्तियों के अंकुर उगे हुए है उन्हें सींचने के लिये यत्र-तत्र भ्रमण करते हैं। लोग आरम्भिक उत्साह में कई तरह की सत्प्रवृत्तियाँ आरम्भ करते हैं। पीछे जोश ढीला पड़ते ही वे मुरझाने लगते हैं। यही बात व्यक्तिगत उत्साह पर लागू होती है। कितने ही व्यक्ति आवेश पूर्वक परमार्थ पथ पर चलने के लिए अग्रसर होते हैं, पीछे भी ढील हो जाते हैं। इस प्रकार व्यक्तियों का- सत्प्रवृत्तियों का मुरझाना आरंभ हो जाता है। आकाँक्षा रहते हुए भी शिथिलता कुछ करने नहीं देती। ऐसी प्रवृत्तियों और ऐसे व्यक्तियों से संपर्क बनाकर उनमें उत्साह उत्पन्न करना और पुनः जागृति करने के लिए उपदेश करना ही नहीं कन्धे के कन्धा कदम से कदम मिलाना भी आवश्यक होता है। यहीं कार्य वानप्रस्थी को निरन्तर करना पड़ता है। नये क्षेत्रों में जागृति पैदा करना भी उचित है पर पहली आवश्यकता उन पौधों को है जो उगे तो सही पर खाद पानी के अभाव में मुरझाते, झुलसते चले जाते हैं। नये आरोपण की अपेक्षा इन मुरझाये हुओं को सींचना आवश्यक है। वानप्रस्थ की परिव्रज्या तपस्वी जीवन का अनिवार्य अंग थी। उससे पूर्वकाल के साधू-ब्राह्मण और वानप्रस्थ इसी के लिये अपने को तत्पर समर्पित करते रहे हैं। बादल जहाँ-तहाँ जाकर बरसते हैं वानप्रस्थ की परिव्रज्या भी बादलों को वर्षा रूप में बदल कर अपने अस्तित्व का श्रेष्ठतम समापन करने के रूप में ही अपना आदर्श उपस्थित करती है। घर परिवार की चिन्ताओं से निवृत्त होकर दीर्घकालीन एवं निश्चित परिव्रज्या को निकल पड़ना-लगभग उसी स्तर का है जिस प्रकार भूत-काल में शत्रु की विशाल सेना से निपटने के लिए थोड़ से सैनिक ‘जुहार’ प्रथा के अनुसार किले से शिर पर कफ़न बाँध कर निकलते थे और लड़ते-लड़ते इसी शत्रु सेना में अपने को खपा देते थे। दसों दिशाओं में संव्याप्त असुरता के विरुद्ध वानप्रस्थी सेना को उसी महान परम्परा का अनुसरण करना पड़ता है॥ विचार-क्रान्ति की तलवार चलाते हुए उनके सिर कटे, रुण्ड भी उठ-उठ कर लड़ते हैं।

मध्य स्तर के वानप्रस्थी वे हैं जिनके लिए अपने घर परिवार के बीच रहते हुए-अपने समीपवर्ती क्षेत्र में काम करना अधिक सुविधा जनक पड़ता है। इसमें वे परिवार को मार्ग-दर्शन, परामर्श नियन्त्रण और सहयोग का लाभ भी यथासम्भव देते रहते हैं। सुविधाजनक जीवन यापन का सुयोग भी मिलता रहता है और समीपवर्ती परिचित क्षेत्र में अपना काम भी करते रहते हैं। मुख्य काम वे परमार्थ प्रयोजन को ही मानते हैं ओर उसी में अपन मनोयोग भी लगाते हैं। परिवार की देख-भाल तो एक सरल स्वभाव चलते रहने वाला गौण कार्य होता है। कोई विशेष अड़चन आ जाय तो बात दूसरी है अन्यथा उनका अपनी रुचि का विषय परमार्थ ही होता है। अपने समय,श्रम और मनोयोग का उसी में लगाते हैं। घर रहते हुए भी जल में कमल जैसी स्थिति ही बनाये रहते हैं। एकान्त निवास के लिए घर में या किसी निकटवर्ती देवालय आदि में अपना निवास रखते हैं जिससे अपने विरक्त स्तर का भान निरन्तर होता रहे।

कनिष्ठ स्तर का वानप्रस्थ वह है जिसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह भी जुड़ा हुआ है। बच्चे छोटे हैं, पत्नी शारीरिक अथवा मानसिक दृष्टि से रुग्ण है। अन्य विवशताएं ऐसी हैं जिनमें घर छोड़ कर अन्यत्र जा सकना सम्भव नहीं। परिवार के लिए आजीविका उपार्जन करने से भी छुटकारा नहीं ऐसी स्थिति में भी कनिष्ठ वानप्रस्थ लिया जा सकता है किन्तु उसमें भी दो शर्तें तो पालनी ही पड़ती है। एक यह कि सन्तानोत्पादन उत्तम और मध्यम वानप्रस्थी की तरह ही बन्द कर दिया जाय और कम से कम चार घण्टे प्रतिदिन अपने समीपवर्ती क्षेत्र में ज्ञानयज्ञ सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में लगाते हैं। साधारणतया 7 घण्टे सोने के लिए, पाँच घण्टे फुटकर कामों के लिए और आठ घण्टे आजीविका उपार्जन के लिए नियत रखे जायँ तो इन बीस घण्टों में शारीरिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भली प्रकार निबाही जा सकती हैं और चार घण्टे का समय परामर्श प्रयोजन के लिए बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। मन मुर्दा हो गया हो तो बात दूर अन्यथा कोई भी भावनाशील व्यक्ति इतना समय सदुद्देश्य के लिए निकाल सकता है और लगा भी सकता है। आमतौर से लोग ढेरों समय ऐसे ही आलस्य प्रमाद में नष्ट करते रहते हैं यदि मुस्तैदी से पूरा मन लगाकर काम करने की आदत हो तो घिस-घिस पूरा समय नष्ट करा देती है और फुरसत न मिलने की शिकायत बनी रहती है-उसका कोई कारण न रह जाय। घरेलू काम भी आसानी से निपट जायें और परमार्थ के लिये भी चार घण्टे निकल आवें। इन सन्तानोत्पादन की बन्दी और चार घटे ज्ञानयज्ञ के लिए समय दान का जो साहस कर सके वे भी कनिष्ठ स्तर का वानप्रस्थ ले सकते हैं। प्रभु समर्पित जीवन भी गहन आस्था रखते हुए घर परिवार को संरक्षक माली मुनीम जैसी ईश्वरीय नियुक्ति की मान्यता अपने सम्बन्ध में रख सकते हैं। छुट्टी के दिनों परिव्रज्या के लिये अधिक दूर तक जा सकते हैं किन्तु साधारण समय में समीपवर्ती संपर्क क्षेत्र ही उनकी परिव्रज्या की परिधि बना रह सकता है। इतना साहस कर सकने वाले भी ढलती आयु के श्रेष्ठतम सदुपयोग वानप्रस्थ का एक सीमा तक लाभ उठा सकते हैं।


Quotation

मा भवाज्ञो भव ज्ञन्त्वं जहि संसारभावनाम्। अनात्मन्यात्मभावेन किमज्ञ इव रोदिषि॥

कस्तवायं जड़ो मूको देहो माँसमयोऽशुचिः। मदर्थ षुखदुः खाभ्यामवशः परिभूयसे॥

अहो नू चियं सत् सत्यं ब्रह्म तद्विस्मृतं नृणाम्। महोपनिषद् 4 128129 130

अज्ञानी न बनो, नाशवान पदार्थों के लिए इतने उद्विग्न मत होओ, उनके लिए मत बिलखो यह जड़ देह तुम्हारा कोई स्थिर सम्बन्धी नहीं है। यह तो माँस का पिण्ड भर है। घोर अपवित्र है तुम इसके लिये इतने बेचैन क्यों हो? परम सत्य की भूल के इस देह-जाल में जकड़े हुए क्यों तड़पते हो?


परमार्थ जीवन की समग्र शिक्षा साधना

गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व किशोरावस्था में विद्याध्ययन और स्वास्थ्य संवर्धन ही नहीं उपार्जन और परिवार व्यवस्था की क्षमता भी विकसित करनी पड़ती है। सर्वथा अयोग्य और अक्षम व्यक्ति यदि गृहस्थ में प्रवेश करे तो अचानक शिर पर आ पड़ने वाले भारी उत्तरदायित्वों का निर्वाह कठिन हो जायगा। तब संभव है वह उस कार्य में असफल सिद्ध हो और गृहस्थी एक जंजाल बनकर रह जाय।

वानप्रस्थ में भी यही आवश्यकता सामने रहती है। यह भी एक अनभ्यस्त जीवनचर्या है। पढ़ा सुना कितना ही कुछ क्यों न हो, अनुभव और अभ्यास के बिना सब कुछ काल्पनिक ही रहता है। कल्पनायें कितनी ही भावपूर्ण एवं सदुद्देश्य प्रेरित क्यों न हो-जब तक वे व्यावहारिकता के क्षेत्र में न उतरेंगी-लक्ष्य पूरा कर सकने योग्य सक्षम न बनेंगी। डाक्टर इंजीनियर; ड्राइवर, चित्रकार सेनापति, आदि महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वाह मात्र पुस्तकें पढ़ने या उन विषयों पर मनन चिन्तन करते रहने से संभव नहीं हो सकता। व्यावहारिक अनुभव के लिए क्रियात्मक शिक्षा प्राप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। दर्जी, मोची, धोबी, कुम्हार, लुहार, सुनार, जुलाहे, रंगरेज जैसे सामान्य शिल्प भी वर्षों अभ्यास करने के उपरान्त अपने कार्य में निष्णात हो पाते हैं तो यह कैसे संभव हो सकता है कि वानप्रस्थ लेकर अनभ्यस्त परमार्थ जीवन के क्रिया-कलाप को सुसम्पादित किया जा सके। इसलिए भी व्यावहारिक शिक्षा और अनुभव, अभ्यास की कम आवश्यकता नहीं होती। मात्र संस्कार का कर्मकाण्ड पूरा कर लेने और मन चाही रीति-नीति अपनाये रहने से तो इस महान प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो सकती। लकीर पीटनी हो तो बात दूसरी है।

वानप्रस्थ प्रक्रिया की अभिनव जीवन पद्धति को अपनाने का श्रीगणेश करते हुए उसका सुयोग्य प्रशिक्षण प्राप्त करा आवश्यक है। इसके लिए व्यवस्था जुटाई जानी आवश्यक थी सो जुटा भी दी गई है। सातों ऋषियों की तपस्थली-गं की सात धाराओं के पुण्य-प्रवाह के दिव्य स्थान-हिमालय के शुभारम्भ पर अवस्थित सत सरोवर हरिद्वार का शान्ति-कुंज ऐसे ही प्रयोजनों के लिए बना है। सुसंस्कारी मनोभूमि के व्यक्तित्वों को यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के अनुदान मिले हैं और अनेकों ने अभिनव प्राण संचार की समर्थ प्राण चेतना लेकर उच्चस्तरीय जीवनक्रम में साहस भरा प्रयाण आरम्भ किया है। वह क्रम अपनी गति से चलता रहे साथ ही वानप्रस्थ जीवन की समग्र शिक्षा की प्रबन्ध विधि-व्यवस्था चल पड़े ऐसा सुयोग बन रहा है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए चालीस कमरे इन्हीं दिनों बन रहे हैं उनमें दो-दो शिक्षार्थी आसानी से रह सकेगी इस प्रकार लगभग 80 वानप्रस्थ शिक्षार्थियों का प्रशिक्षण भी साथ-साथ चलता रहेगा। कहना न होगा कि यह स्थान अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त ही सिद्ध होगा। स्थान की दृष्टि से उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि असंदिग्ध और असामान्य है। साधना और शिक्षा के समुचित साधन यहाँ उपलब्ध रहेंगे। शिक्षा का अभाव एवं स्तर यहाँ ऐसा नहीं होगा जिससे किसी को असन्तोष हो। स्नेह और सौजन्य भरा वातावरण भी ऐसा है जिसके कारण घर छोड़कर वहाँ पहुँचने वालों को उदासीनता प्रायः नहीं ही होती। अधिक न सही पर कम आत्मीयता का वातावरण भी यहाँ नहीं है। ऐसी दशा में ब्रह्म-विद्या की तत्वदर्शी ज्ञान सम्पादन, योगाभ्यास एवं तप साधना की अभीष्ट मात्रा में उपलब्धि यहाँ सहज ही हो सकती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति और समाज की वर्तमान समस्याओं का स्वरूप एवं समाधान इस तरह सीखा, समझा जा सकेगा कि उस आधार पर लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को अभीष्ट सफलता प्राप्त करने में विशेष कठिनाई का अनुभव न करना पड़।

धर्म मंच लोक-शिक्षण का महान प्रयोजन लेकर चलने वाले को कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियों में आने वाले उतार चढ़ावों की जानकारी तथा पग-पग पर आने वाली बाधाओं और कठिनाइयों के निवारण का क्रम मालूम हो तो सेवा-साधक का मार्ग सहज ही सुलभ हो जायगा। इस अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को अनेक विचारों के अनेक स्तरों के, व्यक्तियों से पाला पड़ता और उनकी असंख्य शंका–कुशंकाओं का समाधान करना पड़ता है, इस स्थिति का सामना कर सकने के लिए पूर्ण तैयारी होना चाहिए। अध्ययन और चिन्तन जितना विशाल होगा उतना ही समाधान कर सकने की क्षमता सुविस्तृत होगी।

वानप्रस्थ को लोक-शिक्षण की भूमिका का निर्वाह अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। अतएव उन्हें प्रवचन कला का ज्ञान और अभ्यास होना ही चाहिए। गोष्ठियों सम्मेलनों और समारोहों पर उपस्थित जन-समूह को दिशा देनी पड़ती है। पर्व और संस्कारों का प्रचलन युग-निर्माण मिशन ने अत्यन्त उत्साह -पूर्वक किया है। और उनमें उद्बोधन करना अनिवार्य हो जाता है । अन्यान्य संस्थाओं धारा विविध प्रयोजनों के लिए आयोजित समारोहों भी युग-निर्माण मिशन के कार्यकर्त्ताओं को आदरपूर्वक आमन्त्रित किया जाता है और कुछ कहने के लिए अनुरोध किया जाता है। इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता अतएव अपने मिशन को अन्यान्य संस्थानों के दृष्टि कोण के साथ तालमेल मिशन बिठाते हुए प्रस्तुत कना पड़ता है इसलिए आवश्यक तैयारी पहले से ही होनी चाहिए। अन्यथा सभी को बड़ी निराशा होती है। वक्तृत्व की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता वरन् सच तो यह है कि विचार-क्रान्ति का अस्सी प्रतिशत अशिक्षितों के अपने देश में वाणी का प्रखर प्रयोग करके ही हम विचार-क्रान्ति का उद्देश्य पूरा कर सकते हैं। इस संदर्भ में प्रवचन शैली का अभ्यास ही पर्याप्त नहीं है वरन् विचारों की क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित शृंखला भी मस्तिष्क में पहले से ही भली प्रकार जमी रहनी चाहिए ताकि समय पर अविरल प्रवाह के साथ बिना रुके हिचके अपनी बात कही जा सके।

सेवा-साधना के शिक्षा संदर्भ में प्रवचन प्रक्रिया को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उसे न केवल सिद्धान्त रूप में वरन् व्यावहारिक अभ्यास में भी इस प्रकार समाविष्ट किया जाता है कि सेवा-साधना में निरत वानप्रस्थ को प्रवचन का अवसर आने पर झेंप झिझक का सामना न करना पड़े।

शान्ति कुँज में वानप्रस्थ शिक्षा विद्यालय का शिक्षा सत्र छह-छह महीने का रखा जायगा। आरम्भिक सत्र 1 जनवरी 74 से आरम्भ होकर 30 जून तक चलेगा। इसके उपरान्त दूसरा छह महीने का सत्र 1 जुलाई से 30 दिसम्बर 74 तक चलेगा। यही क्रम लगातार जारी रहेगा। हर वर्ष दो सत्र सम्पन्न हुआ। करेंगे। शिक्षण क्रम में वानप्रस्थ के तीनों अनिवार्य अंकों को समुचित समावेश है।

ब्रह्मविद्या के तत्व-दर्शन का सहारा लेकर सद्ज्ञान सम्पादन के लिए उपयोगी पाठ्यक्रम दर्शन-गीता, रामायण, महाभारत आदि आर्षग्रन्थों और ऋषि-मुनियों के- देव अवतारों आप्त पुरुषों के अभिवचनों का आधार लेकर आत्मा और परमात्मा तथा जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति और पूर्ति संबन्धी सभी आवश्यक तथ्यों से शिक्षार्थियों को अवगत कराया विकृतियाँ इन दिनों चल पड़ी हैं उनके प्रचलन में क्या दुरभिसंधियाँ जुड़ी रहीं इसके तथ्य प्रस्तुत किये जाते हैं। ताकि प्रचलित भ्रम-धारणाओं के अन्धकार को चीरते हुए यथार्थ अध्यात्म का स्वरूप स्वयं समझ सकना दूसरों को समझा सकना इस शिक्षण पद्धति में पूरी तरह समाविष्ट रहेगा। सांगोपाँग, वेद-शास्त्र दर्शन-उपनिषद् तो छह महीने में नहीं सिखाये-पढ़ाये जा सकते पर उनका सारतत्व और मर्म इस थोड़ी सी अवधि में ही इतनी मात्रा में हृदयंगम करा दिया जायगा-जिसे असन्तोष जनक और अपर्याप्त न कहा जा सके।

इसी प्रकार इन्हीं छह महीनों में गायत्री-उपासना की उच्चस्तरीय भूमिका में वानप्रस्थी साधकों का प्रवेश कराया जायगा। जप, अनुष्ठान-परक, गायत्री-उपासना के क्रिया-योग से प्रायः सभी परिजन परिचित हैं। उसकी साधना भी दैनिक और सामयिक-क्रम पद्धति के अनुसार करते-कराते रहे हैं। अब अगली कक्षा में प्रवेश करना होगा ओर भाव-भूमिका’ यथा शक्ति भूमिका के उच्चतर और उच्चतम साधना-विधानों का अवगाहन करना होगा।

गायत्री के पाँच मुख पाँच चरण प्रख्यात हैं। इन्हें अन्नमय कोश, प्राणमयकोश,मनोमय कोश, विज्ञानमय काश,आनन्दमय कोश, समझा जाना चाहिए। इन्हीं पाँचों स्तरों में मूलाधार-चक्र के कुण्डलिनी केन्द्र को छोड़कर पाँच कोशों और पाँच चक्रों की साधना के लिए जिन पाँच योगों, की तपश्चर्या करनी पड़ती है उन्हें लययोग, प्राणयोग, बिन्दुयोग, ऋजुयोग और नादयोग कह सकते हैं। इन पाँच योगों की भौतिक और आध्यात्मिक प्रतिक्रियाओं को पाँच देवसत्ताओं के नाम से जाना जाता है। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पौराणिक अलंकार वर्णन में जिन महिमा महात्म्यों का वर्णन किया गया है उन्हें प्रकारान्तर से इन पाँच कोशों की पाँच चक्रों की, पाँच योगों की प्रखरता ही समझनी चाहिए। पंचमुखी गायत्री साधना का उच्चस्तरीय उपक्रम यही है। इसका प्रारम्भिक आभास-अभ्यास प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों में भी कराया जाता है, किन्तु बार दिनों में तो मात्र झाँकी ही मिल सकती है-परिचय ही हो सकता है। उस साधना के लिए अधिक और अनवरत श्रम समय चाहिए। इस प्रकार के अभ्यास इस छह महीने की तपश्चर्या अवधि में ही सम्भव हैं। गं-तट, हिमालय का क्षेत्र, सात ऋषियों की तपोभूमि के अतिरिक्त उपयुक्त मार्गदर्शन संरक्षण का सुयोग उन दिनों मिलाता रहने से प्रयास की सफलता असंदिग्ध ही रहेगी।

आहार विहार योगियों जैसे नियम प्रतिबन्धों से जकड़ी हुई ऋषि जीवन-प्रक्रिया साधकों के मल आवरण विक्षेपों के निवारण, निराकरण में कितनी अधिक सहायक हो सकती है उसे प्राप्त वचनों से ही नहीं अनुभव से भी जानने का जो सुअवसर मिलेगा उसे हर साधक अपना अभिनव सौभाग्य ही अनुभव करेगा। शारीरिक दृष्टि से तपस्वी रीति-नीति अपनाने वाले को स्वभावतः कुछ कष्ट रहता है पर उसकी भरपाई मानसिक सन्तोष और आत्मिक उल्लास के रूप में सहज ही हो जाती है। तप साधता से निखरा हुआ व्यक्तित्व देव भूमिका को अनुभूति कराता है-इस प्रकार उस कष्ट साध्य प्रणाली को अपनाने पर भी किसी को यह प्रतीत नहीं होता हक घाटा उठाया जा रहा है। तपे हुए स्वर्ण जैसी आभा लेकर ऐसे व्यक्तित्व जब जन-संपर्क में उतरते हैं तो उन्हें अपनी प्रतिभा और प्रभावी क्षमता का स्पष्ट अनुभव होता है। जिस कार्य में हाथ डाला जाय-जिस दिशा में कदम बढ़ाया जाय उसमें सफलता ही मिलती चली जाय तो यही निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि तपश्चर्या व्यक्तित्व को प्रखर और ज्योतिर्मय बनाने की विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है।

ब्रह्मज्ञान साधना और योग-तपश्चर्या का स्वर्ण सुयोग यों जितनी लम्बी अवधि तक मिलता रह सके उतना ही मनुष्य का सौभाग्य है पर इस आपत्तिकाल में आपत्ति धर्म का पालन करते हुए सेवा-साधना भी तो करनी ही है। युग-वेदना के बिलखते क्रन्दन को भी तो अनसुना नहीं किया जा सकता। जलती हुई मान्यता को दम तोड़ते हुए भी तो नहीं देखा जा सकता इन दिनों लम्बी योग-साधना और ज्ञान-साधना तक सीमित होकर कोई भावनाशील जीवन्त आत्मा बैठ ही नहीं सकती। अग्निकाण्ड की ज्वालायें बुझाने में समस्त आवश्यक कार्य छोड़कर जुटना पड़ता है, इसी प्रकार समय की विभीषिकाओं और विकृतियों से निपटे बिना भी काम नहीं चल सकता। हर वानप्रस्थ को धर्मक्षेत्र में-कुरुक्षेत्र’-में उतरना ही पड़ेगा। गाँडीव शर-सन्धान से इस आपत्तिकाल में किसी परमार्थ प्रेमी को छुट्टी मिल ही नहीं सकती। आत्म-कल्याण के साधन जुटाने में थोड़ी प्रतीक्षा भी की जा सकती है पर आपत्तिधर्म का सामयिक कर्तव्य तो हर हालत में पालन करना ही पड़ेगा। विश्व-कल्याण की तुलना में आत्मकल्याण का उपेक्षित भी किया जा सकता है।

यों सेवा साधना भी विशुद्ध रूप में एक योग-साधना ही है। सद्विचारों में सत्प्रवृत्तियों में निमग्न रहना किसी उच्चस्तरीय तप के कम महत्वपूर्ण नहीं। दूसरों के आन्तरिक स्तर को ऊँचा उठाना उनके जीवनक्रम को मुख-शान्ति में ओतप्रोत करने के लिए दिया गया श्रेष्ठतम अनुदान ही है। इसे उच्चस्तरीय पुण्य परोपकार ही कहा जायेगा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के सृजन, सिंचन में बहाये गये स्वेद-बिन्दुओं को परब्रह्म को अमृतजल से स्नान कराना है। भगवान का प्रत्यक्ष स्वरूप वस्तुतः यह मूर्तिमान विश्व ही तो है। पिछड़ेपन से बूझकर हम रीछ-वानरों जैसी त्रेता कालीन शूर वीरता का ही परिचय देते हैं। जीवन और आदर्शों के बीच जो समुद्र जैसा व्यवधान खड़ा हो गया है, इस खाई को पाटने में प्रवृत्त होना रामादल द्वारा पत्थर के ढेले इकट्ठे करके समुद्र पुल बनाने की त्रेताकालीन पुनरावृत्ति ही है। हनुमान अंगद, जामवन्त, नल-नील की-अर्जुन भीम की- बुद्ध, गान्धी, रामदास, गोविंदसिंह विवेकानन्द की पुण्य प्रक्रिया अपना कर वस्तुतः हम युग-साधना में ही प्रवृत्त रहते हैं। उसे किसी भजन या तप से कम महत्व का नहीं माना जा सकता। अतएव वानप्रस्थ साधकों को सेवा साधना में भी संलग्न किया जाना अनिवार्य है। ज्ञान-यज्ञ को ज्योतिर्मय बनाने के लिए-विचार क्रान्ति की चिनगारी को दावानल स्तर तक ले जाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।

इस सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वानप्रस्थों की शिक्षा पद्धति का समय विभाजन किया गया है। वे छह महीने हरिद्वार रहें-इसके उपरान्त प्रशिक्षित एवं प्रामाणिक युग-निर्माता के रूप में लोक-मंगल के अभियान को अग्रगामी बनाने के लिए निकल पड़े। उन्हें नया कार्यक्षेत्र तलाश भी नहीं करना पड़ेगा। युग-निर्माण परिवारों की चार हजार शाखाओं को सक्रिय और अग्रगामी बनाने के लिए एक-एक वानप्रस्थ की स्थायी आवश्यकता है। इस प्रकार चार हजार वानप्रस्थों के लिए बनाया कार्यक्षेत्र तो उनकी प्रतीक्षा में आंखें बिछाये बैठा है। विदेशों में भारतीय संस्कृति को मिशनरी बड़ी आतुरता पूर्वक आमन्त्रित की जा रही है। यदि लोक-सेवा को की संख्या बढ़े तो शतसूत्री युग-निर्माण योजना को कल ही गगनचुम्बी बनाया जा सकता है। देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए न्यूनतम एक लाख लोकसेवी चाहिए। समस्त विश्व की आवश्यकता को ध्यान में रखा जाय तो यह संख्या एक करोड़ तो होनी ही चाहिए। परिवार की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने के कारण वे अवैतनिक रूप में कार्य कर सकेंगे और जनता उनके भोजन वस्त्र का खर्च अत्यन्त प्रसन्नता और कृतज्ञता पूर्वक वहन करेगी। परिपक्व आयु की शालीनता, लम्बी अवधि का व्यवहारिक अनुभव, वानप्रस्थ महापीठ में रहकर ज्ञान-साधना तथा तपश्चर्या के आधार पर विकसित प्रतिभा-नव-निर्माण के उपयुक्त सेवा साधना का उपयोगी प्रशिक्षण-इन सब विभूतियों से सज्जित वानप्रस्थ लोक-निर्माण की महती आवश्यकता पूर्ण कर सकने में सर्व समर्थ सिद्ध हो सकते हैं।

यों वानप्रस्थ संन्यास की लकीर पीटते हुए मरे मुर्दे जहाँ-तहाँ निकम्मी लाशों की तरह गिरे पड़े और सड़ते हुए देखे जा सकते हैं। गृह-कलह से ऊबे हुए-पग-पग पर अपमानित होते हुए- आलस और प्रमाद से अपनी आदतों को घिनौनी बनाये हुए चैन की साँस लेने और मुफ्त की रोटी तोड़ने के लिए जिस तिस आश्रम में जगह घेरे पड़े पाये जा सकते हैं। उलटी-सीधी माला सटक लेने और जिधर–तिधर देवदर्शन की मटर गश्ती करते हुए- तथा कथित सत्संगों में ऊँघते हुए इस स्तर के हजारों लाखों व्यक्ति जहाँ-तहाँ पाये जा सकते हैं। कोई वानप्रस्थ का बाना पहने है किसी ने संन्यास के कपड़े रंग लिए हैं। इन भूभार जीवित मृतकों की संख्या में और वृद्धि करना अपना तनिक भी उद्देश्य नहीं। हमें तो तेजस्वी, मनस्वी, कर्मवीर और आत्म कल्याण तथा विश्व-कल्याण में प्रबल पुरुषार्थ के लिए जुट पड़ने वाले परमार्थ परायण व्यक्तित्व चाहिएँ। उन्हीं को वानप्रस्थ में प्रवेश करने का आमन्त्रण दिया जा रहा है।


वानप्रस्थ सेवा साधना का स्वरूप और दर्शन

स्पष्ट है कि वानप्रस्थ परक परमार्थ जीवन में प्रवेश करने वालों को जहाँ ज्ञान साधना और योग साधना द्वारा आत्मबल सम्पादन करना है वहाँ लोक मंगल के लिए अपनी विभूतियों को समर्पित करते हुए विश्व मानव को अधिकाधिक श्रेष्ठ समुन्नत बनाने में निरत निमग्न भी रहना है। जिन्हें सेवा धर्म पर आस्था न हो मात्र जप तप और निवृत्ति परक एकान्त सेवन अथवा सुख चैन के, बिना झंझट भरे दिन काटने हो, उन्हें इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए। वह स्थिति मरण काल आदि के निकट आ जाने पर थके हारे और अशक्त असमर्थ लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकती है। इसे वैराग्य निवृत्ति संन्यास आदि अन्य किसी नाम से भले ही पुकारा जाय-परम तेजस्वी वानप्रस्थ के साथ तो नहीं ही जोड़ा जा सकता।

मनुष्य को जहाँ समाज प्रदत्त अगणित सुख सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहाँ उसे इस उत्तरदायित्व से भी लाद दिया गया है कि वह सामाजिक उत्कर्ष के लिए बढ़-चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करे और लोक सेवा की दृष्टि से इतना कुछ कर दिखाये जिससे उस पर चढ़ा हुआ भारी ऋण किसी न किसी प्रकार चुकता अथवा हलका हो सके। जो इस उत्तरदायित्व की उपेक्षा करता है वह समाज द्रोही कहा जा सकता है।

अध्यात्म के दार्शनिक दृष्टिकोण के आधार पर देखा जाय तो मनुष्य को जो कुछ विशेषताएं अन्य प्राणियों से अधिक दी हैं वे विशुद्ध रूप से पुत्र और प्रिय हैं। सबको समान अनुदान देना उसके लिए सामान्य न्याय था। पर मनुष्य को सबसे अधिक विभूतियां मिली हैं, उन्हें मौज मजा करने के लिए दिया गया पक्षपात पूर्व उपहार नहीं माना जाना चाहिए वरन् ऐसी पवित्र अमानत माना जाना चाहिए जिसका उपयोग विश्व वसुधा को समुन्नत और सुविकसित बनाने में ही किया जाना चाहिए। ईश्वर ने मनुष्य को अपने वरिष्ठ सहकारी के रूप में इसीलिए सृजा है कि विश्व व्यवस्था में उसकी अति महत्वपूर्ण भूमिका एवं उपयोगिता संभव हो सकें ।

चौरासी लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलने और उसका सदुपयोग करके जीवन लक्ष्य प्राप्त करने का अवसर अतिशय सौभाग्य माना जाना चाहिए। इस संदर्भ में प्रमाद करने पर फिर चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ता है। इस शास्त्र प्रतिपादन के ध्यान में रखने पर भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मानव जीवन एक अद्भुत उपलब्धि है और उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में ही होना चाहिए। पेट प्रजनन जैसे पशुकर्मों में उसका न्यूनतम भाग ही लगना चाहिए।

उपरोक्त सभी दृष्टिकोणों से लोकमंगल के लिए बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करना मनुष्य का परम पवित्र कर्तव्य ठहरता है। पूजा-पत्री के कर्मकाण्डों की टन्ट-घन्ट में मन को इस प्रकार बहकाना उचित नहीं कि नाम रट से पाप कट जायेंगे और ईश्वर मिल जायगा। यह सर्वथा निस्सार विडंबना है जीवन लक्ष्य की पूर्ति और ईश्वर प्राप्ति जैसी महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए मनुष्य को विश्व मानव की सेवा साधना में उच्चतम भावनाओं और प्रबल पराक्रम भरी चेष्टाओं के साथ संलग्न होना पड़ता है। इस राजमार्ग को छोड़ कर और किसी पगडंडी से जीवनोद्देश्य की पूर्ति हो नहीं सकती।

वानप्रस्थ जीवन इसी परमार्थ प्रयोजन की पूर्ति के लिए नियत निर्धारित है। उत्तरार्ध आयु को लोकमंगल के लिए समर्पित करके उन महान उत्तरदायित्वों को पूरा किया जा सकता है जो सामाजिक ऋण से उऋण होने के लिए-ईश्वर प्रदत्त बहुमूल्य अनुदान का सही उपयोग करने के लिए और चौरासी लाख योगियों में भ्रमण करने के उपरान्त मिले अलभ्य अवसर का सदुपयोग करने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। यह प्रयोजन लोकमंगल में ही प्रवृत्त होने से ही सम्भव हो सकता है। विश्व मानव की सेवा साधना से बढ़ कर ईश्वर की भक्ति पूजा और नर जन्म की सार्थकता का और कोई मार्ग है भी नहीं। सच पूछा जाय तो ज्ञान साधना और योग साधना की उपयोगिता भी इसी दृष्टि से है कि इन उपायों से परिष्कृत किये गये व्यक्तित्व द्वारा अधिक उच्चकोटि का आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सके।

वानप्रस्थ को लोकसेवा के जिस क्षेत्र को हाथ में लेना पड़ता है वह जन मानस का भावात्मक परिष्कार ही है। स्पष्ट है कि संसार की समस्त समस्याएं मानवी चिन्तन की विकृतियों ने ही उत्पन्न की हैं। उनका समाधान आज या हजार वर्ष बाद जब भी होगा, लोक प्रवृत्तियों के अधोगामी प्रवाह को उलट कर ऊर्ध्वगामी बनाने से ही संभव होगा। भौतिक सम्पदायें एवं सुविधाएं चाहे कितनी ही क्यों न बढ़ाली जायं यदि दृष्टिकोण में विकृतियाँ भरी होंगी तो बढ़ी हुई सम्पदा-विनाश सर्वनाश के सर जाम में ही बढ़ाली करेगी- सर्वनाश का दिन ही निकट लायेंगी। इसलिए धन वैभव की भौतिक सुख सुविधाओं की अभिवृद्धि का कार्य दूसरे लोगों पर छोड़ कर वानप्रस्थ को एक ही अछूता काम हाथ में लेना चाहिए कि उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए आवश्यक वातावरण एवं उत्साह किस प्रकार उत्पन्न किया जायं। ज्ञान यज्ञ एवं विचार क्रान्ति इसी प्रक्रिया को कहा जा सकता है यह नींव यदि ठीक तरह भरली जाय तो नवयुग-निर्माण का भवन खड़ा करने की आधी समस्या सुलझ जायगी। तब अनायास ही अगणित रचनात्मक एवं संघर्षात्मक क्रियाकलाप उठ खड़े होंगे और जो अधर्म के उन्मूलन एवं धर्म के संस्थापन का ईश्वरीय प्रयोजन सहज ही पूरा करेंगे।

लोकशक्ति की प्रचण्डता और प्रखरता का हमें अनुभव करना होगा और संघबल उत्पन्न करके उसे सृजनात्मक प्रयोजनों में संलग्न करना होगा। यह कार्य इतना महान और इतना समर्थ है कि उसकी तुलना किसी अपराजेय दैत्य से ही की जा सकती है जन शक्ति का देव जिस मोर्चे पर भी डट जायगा उसे जीत कर ही लगा। उसके सामने बड़ी से बड़ी शक्ति को भी झख मारनी पड़ती है।

दुर्गा अवतरण की कथा प्रसिद्ध है। असुरों के मुकाबले जब देव हारने लगे तब प्रजापति ने देवताओं की एकत्रित करके उनकी शक्ति का एक-एक अंश इकट्ठा किया उस संचय से दुर्गा विनिर्मित करदी। दुर्गा ने अपने प्रचंड पराक्रम से देखते देखते शुंभ−निशुंभ, महिषासुर, मधुकैटभ जैसे दुर्दान्त दैत्यों का उन्मूलन करके रख दिया। इस प्रकार देवताओं का संकट दूर हुआ। ठीक इसी प्रकार की त्रेता कालीन कथा वह है जिसमें असुरों से संत्रस्त ऋषियों ने अपना रक्त एकत्रित करके एक घड़े में बंद किया और जमीन में गाढ़ दिया। राज जनक का हल उस घड़े से टकराया और उसमें से सीता नामक बालिका निकली। विख्यात है कि सीता के कारण ही लंका काण्ड प्रस्तुत हुआ और असुरों को समग्र निराकरण सम्भव हो गया। यह कथाएं जन शक्ति की प्रचण्डता का रहस्योद्घाटन करती हैं और बताती कि बड़े से बड़े संकट-विग्रह संघशक्ति के सामने धराशायी होकर रहते हैं।

इतिहास के पृष्ठ इसी तथ्य के प्रतिपादन से रँगे पड़े हैं। रीछ वानरों द्वारा समुद्र का पुल बांधना और प्रतापी दानव का परास्त किया जाना वस्तुतः जन शक्ति की ही विजय है। ग्वाल-वालों की लाठी का सहारा लेकर कृष्ण ने उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था। भगवान बुद्ध के ढाई लाख शिष्य समस्त विश्व में प्रव्रज्या के लिए, निकले थे और व्यापक हिंसा पर विजय प्राप्त करके धरती के कौने-कौने में अहिंसा धर्म की प्रतिष्ठापना की थी । गान्धी की सत्याग्रही सेना ने प्रतापी इंग्रेजी सल्तनत की पाताल तक गहरी जमी हुई जड़ों को उखाड़ कर किस चमत्कारी ढंग से फेंका इसका विवरण विश्व विख्यात है। फ्राँस की रूस की- चीन की- अमेरिका की- आयर लैण्ड की- इटली की राज्य क्रांतियों के इतिहास जिसने पढ़े हैं हैं उन्हें भली की विदित है कि साधन सम्पन्न सरकारें किस प्रकार न शक्ति की टक्कर के सामने बारे के महल की तरह धराशायी हो गई। तब से लेकर अब तक न जाने कितने ताज तख्तों को संगठित जनता ने गेंद की तरह उछाल कर कूड़े करकट के ढेर में फेंक दिया है। भारत के राजाधिराजों की कैसी दुर्गति हुई यह देख कर कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि भगवान के बाद दूसरी समर्थ सत्ता के रूप में जन शक्ति की ही गणना की जा सकती है। अन्य पार्टियों के मुकाबले में काँग्रेस के हाथों शासन सौंपने का श्रेय जनमत को ही है। यदि वह चाहे तो उसे गद्दी से उतार कर किसी को भी बिठा सकता है।

यदि तो राजनीति एवं शासन सत्ता के संदर्भ में जन शक्ति की चर्चा हुई। वानप्रस्थी परमार्थ जीवन की दिशा राजनीति नहीं- समाज संरचना है। बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष है। सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन एवं सर्वतोमुखी विकृतियों का उन्मूलन अपना लक्ष्य है। इस प्रयोजन के लिए भी जन शक्ति को ही उभारने, सुधारने और दिशा देने की आवश्यकता पड़ेगी। युग-निर्माण जैसे महान प्रयोजन की अगणित आवश्यकताओं की पूर्ति लोकशक्ति को साथ लिये बिना और किसी प्रकार हो ही नहीं सकती। इसलिए वानप्रस्थी सेवा साधना में जन संपर्क बढ़ाना जीवन्त एवं भावनाशील व्यक्तित्वों को ढूँढ़ना-उन्हें दिशा देना, साथ लेना और नव-निर्माण में संलग्न कर देना यही है समग्र क्रिया पद्धति जिसमें लोकमंगल के समस्त आधारों को सन्निहित समझा जा सकता है।

धर्म के प्रति जन आस्था की जो थोड़ी सी संलग्नता है उसका चमत्कार आँखों के सामने है। कुछ समय पूर्व इस देश में 56 लाख धर्म व्यवसायी थे, नई जनगणना के अनुसार वह संख्या 80 लाख हो गई । जन गणना में जिन्होंने धर्म को व्यवसाय कोष्टक में नहीं लिखाया है, जिनकी आधी चौथाई आजीविका इसी क्षेत्र से चलती है, उनकी संख्या भी इससे कम नहीं हो सकती। इस प्रकार पूरे अधूरे धर्म व्यवसायी लोगों की संख्या डेढ़ करोड़ तक जा पहुँचती है। जनता किसी दबाव जबरदस्ती से नहीं वरन् स्वेच्छा और प्रसन्नता पूर्वक इनका व्यय भार वहन करती है जो सहज ही न्यूनतम पाँच करोड़ रुपया प्रतिदिन जा पहुँचता होगा। पाँच करोड़ प्रतिदिन अर्थात् वर्ष में 1800 करोड़-180 अरब। कितनी बड़ी धनराशि है यह। यह तो धर्म क्षेत्र में संलग्न मनुष्यों का निर्वाह व्यय हुआ। इसके अतिरिक्त लगभग 1 लाख मन्दिरों का खर्च ,तीर्थ यात्राओं में खर्च होने वाली विपुल धन राशि भी कम से कम इतनी तो होगी ही। इस प्रकार वह राशि 360 अरब वार्षिक हो जाती है। सोमवती अमावस्या पर गंगा जमुना इन दो नदियों के स्नान को ही लें उनके उद्गम से लेकर विलय स्नान तक कम से कम एक करोड़ व्यक्ति तो अवश्य ही उस पर्व पर स्नान करने जाते होंगे। एक व्यक्ति के ऊपर मार्ग व्यय, काम का हर्ज, भोजन, दान पुण्य आदि का खर्च बीस रुपये के हिसाब से 20 करोड़ रुपया होता है। ऐसी-ऐसी चार पाँच सोमवती अमावस्याएं वर्ष में पड़ती हैं उनका खर्च 1 अरब तक जा पहुँचता है। इसके अतिरिक्त कथा, कीर्तन यज्ञ, समारोह, भोज भंडारे आदि का हिसाब तैयार किया जाय तो वह राशि भी न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचेगी। इस प्रकार देखने पर उपेक्षित जैसा लगने वाला धर्म क्षेत्र ही इतनी धन सम्पत्ति खर्च करा लेता है श्रम और समय लगा लेता है जितना कि तरह-तरह के दबाव डालने वाली सुसंगठित सरकार भी लगा नहीं पाती। सरकारी टैक्स लोग कुड़कुड़ाते हुए देते हैं पर धर्म टैक्सों को स्वेच्छा से देते हैं और पास में न होने पर कर्जा उधार करके भी लगाते हैं।

यहाँ धर्म के नाम पर लगने वाले धन और श्रम का समर्थन खंडन नहीं किया जा रहा है सिर्फ यह बताया जा रहा है कि लोक रुचि की एक लहर कितने प्रचुर साधन बात की बात में प्रस्तुत कर सकती है। तमाखू, चाय और सिनेमा जैसे व्यसनों में जितना पैसा और श्रम लगता है उसकी नाप तौल भी धर्म एवं शासन पर पड़ने वाले खर्च के ही समतुल्य आँकी जा सकती है यह लोक रुचि की प्रतिक्रिया का परिचय मात्र है। यदि इसी लोक रुचि को अभिनव सृजन की दिशा में मोड़ा जा सके तो जो कार्य असम्भव दीखने-हैं साधनों के अभाव में जिन कार्यों का हो सकना कठिन लगता है वे चुटकी बजाते प्रस्तुत हो सकते हैं और अनहोनी-होनी बन कर सामने जा सकता है।

पाँच सौ घरों के एक छोटे से गाँव की बात लें। वहाँ हर परिवार में औसतन पचास पैसे की तमाखू अवश्य पी जाती होगी। पाँच सौ घरों के पचास पैसे अर्थात् ढाई सौ रुपया प्रतिदिन। महीने का ये साड़े सात हजार। वर्ष में 90 हजार। यदि उस गाँव के लोग स्वेच्छा से तमाखू छोड़ दें वह धन ग्राम की उन्नति में लगाने का संकल्प करलें तो हर वर्ष 90 हजार रुपये की आय से स्कूल, हाईस्कूल, कन्या पाठशाला, सड़क, सफाई, कुआँ, तालाब आदि कितने ही नये रचनात्मक काम हर साल खड़े किये जा सकते हैं, और कुछ हो वर्षों में वह गाँव योरोप के गाँवों जैसा समुन्नत दीख सकता है। तमाखू छोड़ने की बात हटा भी दें तो भी जिस परिवार में पाँच छह आदमी रहते हैं, उसमें पचास पैसा अर्थात् दो कप चाय का मूल्य-खर्च कर देना कुछ भारी नहीं पड़ेगा। आधा किलो अनाज को घर परिवार में रोज चूहे ही बिगाड़ देते हैं। यदि लोक रुचि गाँव सुधार के लिए उमगाई जा सके तो हर वर्ष नब्बे हजार (लगभग एक लाख रुपया) सृजन कार्यों के लिए बिना किसी अधिक कठिनाई का अनुभव किये उपलब्ध हो सकता है। सरकार का मुँह ताकते रहने पर हर गाँव के लिए 1 लाख रुपया वार्षिक का विकास अनुदान मिल सकना शायद कभी भी संभव न हो सके।

श्रमदान की बात लें। पाँच सौ घरों के गाँव में डेढ़ हजार वयस्क व्यक्ति माने जा सकते हैं। वे एक-एक घण्टा श्रमदान ग्राम सुधार के लिए देने लगें तो डेढ़ हजार घण्टे का श्रम मुफ्त में मिला। सात घण्टे का दिन मानें तो डेढ़ हजार घण्टे से लगभग दो सौ मनुष्यों का दिन भर का पूरा श्रम होता है। दो सौ व्यक्ति नित्य अपना श्रम समर्पण करें तो एक वर्ष में इतना अधिक कार्य हो सकता है। जिसे देखते हुए आश्चर्य चकित रह जाना पड़े।

ऊपर की पंक्तियों में जन शक्ति के महादैत्य की क्षमता का थोड़ा सा आभास कराया गया है। उसे जगाया- संगठित किया जाना और सृजन के महान लक्ष्य में नियोजित किया जाना, कठिन दीखता अवश्य है पर वैसा है नहीं। पचास करोड़ की आबादी वाले देश में एक लाख सुयोग्य और भावनाशील वानप्रस्थों का मिल जाना न तो कठिन है और न असम्भव। 80 लाख धर्म व्यवसायी जिस देश में उद्भिज घास-पात की तरह उग पड़ें वहाँ युग के उद्बोधन पर एक लाख वानप्रस्थ न निकले यह थे और गाँधी को भी सत्याग्रह आन्दोलन में समाज संस्कृति के पुनरुत्थान की बात यदि विचारशील वर्ग में गले उतारी जा सके तो एक लाख वानप्रस्थों के लिए की गई युग पुकार उपेक्षित न रहेगी। साँस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए यदि समुचित उत्साह पैदा किया जा सके तो सृजन सेना का नेतृत्व करने लिए इतने वानप्रस्थ सहज ही अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देंगे।

इन वानप्रस्थों का एक ही काम होगा जन-जागरण लोक शक्ति का गठन-जन मानस का परिष्कार-भावनाशील लोगों का चयन और उन्हें लोकमंगल के लिए प्रवृत्त होने का प्रोत्साहन-मार्गदर्शन। यह एक काम ही इतना बड़ा है जिससे संबन्धित विविध क्रिया-कलापों में वानप्रस्थ वर्ग को निरन्तर लगा रहेगा पड़ेगा। यह कार्य जिस सीमा तक पूरा होने लगेगा उसी अनुपात में अगणित रचनात्मक और संघर्षात्मक क्रिया कलाप पनपते दिखाई देंगे और समाज की विभिन्न समस्याओं को स्थानीय उपाय उपचारों के आधार पर हल करने में निरत होंगे।

कहना न होगा कि यह समस्त क्रिया-कलाप धर्म धारणा पर ही आधारित होना चाहिए। भावना स्तर का स्पर्श कर सकना धर्म और अध्यात्म दर्शन के लिए ही सम्भव है। राजनीति समाज संगठन, अर्थोन्नति आदि आधार की पुनरुत्थान के हो सकते हैं पर भारत जैसे अस्सी प्रतिशत अशिक्षितों और घोर देहातों में रहने वाले लोगों के लिए वे आधार उतने हृदयग्राही न हो सकेंगे जितने धर्म आधार। भारत की वर्तमान परिस्थितियों में नव-निर्माण के समग्र अभियान की सफलता धर्म आस्था का अवलम्बन लेकर ही प्राप्त की जा सकती है। यों मानव तत्व में उत्कृष्टता की स्थापना का प्रयोजन अन्ततः परिष्कृत धर्म धारणा के आधार पर ही संभव हो सकता है।


त्रिविधि साधना पद्धति का अधिक स्पष्टीकरण

वानप्रस्थ जीवन के नित्य-कम में ब्रह्मविद्या के तत्व दर्शन का स्वाध्याय अनिवार्य रूप से जुड़ा रहना चाहिए। साथ ही योगाभ्यासी तपश्चर्या का क्रम भी स्नान, भोजन, शयन की तरह प्रभातकालीन आवश्यक क्रिया-कलाप में सम्मिलित रहना चाहिए। आत्मिक प्रखरता बनाये रहने और बढ़ाते रहने के लिए यह दोनों प्रयोग सामान्य स्वास्थ्य रक्षा के लिये आहार और विहार की सुव्यवस्था बनाये रहने की भाँति ही आवश्यक माने जाने चाहिये, वातावरण में अनैतिक और अवाँछनीय विषाक्तता की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि यदि उसका नित्य निवारण परिशोधन न किया जाय तो किसी भली चंगी मनोभूमि का ढलान पतनोन्मुख दिशा में चल पड़ेगा। प्रवाह की धार काटने के लिये मल्लाह अपने डाँड़े मुस्तैदी के साथ लाते रहते हैं तब कहीं नाव इस पार से चल कर उस पार तक पहुँचती है। प्रमाद बरतें तो नाव कहीं से कहीं जा पहुँचेगी। स्वाध्याय द्वारा विचारणा में सहज ही घुस पड़ने वाली विषाक्तता का समाधान होते रहने पर ही सामान्य मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा स्थिर रखी जानी सम्भव है।

स्वाध्याय को तप कहा गया है। तप की ऊष्मा मलीनताओं के जलाती है। आत्म-चिंतन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के क्षेत्रों में प्रखरता उत्पन्न करने के लिए स्वाध्याय से बढ़ कर और कोई सहायक साधन कदाचित ही होगा। इसके लिए ऐसी पुस्तकों का सहारा लेना चाहिए जो उपरोक्त प्रयोजन सही रूप से पूरा कर सकने की क्षमता से पूर्ण हों। प्राचीन ग्रन्थों का कथा पुराणों का पृष्ठपेषण लकीर पीटने की तरह करते रहें तो उससे समय तो बहुत नष्ट होगा पर हाथ कुछ न लगेगा। भाषा संस्कृत हो या हिन्दी, मराठी। पुस्तक पुराने जमाने की लिखी हुई यो या अब की, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। अध्यात्म तथ्यों को सही रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता जिस भी साहित्य में हो वह स्वाध्याय के लिए उपयुक्त माना जाना चाहिए।

अधिकारी मार्गदर्शकों के सान्निध्य में क्रमबद्ध शिक्षण यों अधिक अग्रगामी रहता है पर वैसी सुविधा उन श्रेय साधकों को निरन्तर नहीं मिल सकती जिन्हें लोकमंगल की सेवासाधना के संदर्भ में परिव्राजक क्रम-व्यवस्था अपनानी है। आज यहाँ ता कल वहाँ, हर जगह अधिकारी मार्ग दर्शक कहाँ हैं? ऐसी दशा में सद्ग्रन्थों का , स्वाध्याय ही सत्संग की- तत्वदर्शी प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी कर सकता है। एकान्त अवकाश के समय मनन चिन्तन भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जो पढ़ा समझा गया हे उस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना-मान्य आदर्शों का जीवन में उतारने की विधि-व्यवस्था सोचना, यही है मनन चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।

योगाभ्यास की दृष्टि से गायत्री महामन्त्र की साधना सर्वोत्तम है। इन चौबीस अक्षरों के शब्द गुँथन में एक से एक बढ़ कर उच्चस्तरीय शक्ति केन्द्रों का समावेश है। भावना और विचारणा के परिशोधन का उद्देश्य यह महामन्त्र आश्चर्यजनक रीति से सम्पन्न करता है। यों साधारण उपासना में इस महामंत्र का जप और परम तेजस्वी सविता-देवता का ध्यान-रोम-रोम में ज्योति किरणों का अवतरण, समावेश की अनुभूति के साथ किया जाता रहे तो उससे भी आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।

इससे आगे बढ़कर पाँच कोशों की साधना है। लययोग-प्राणयोग- विन्दुयोग-नादयोग-ऋजुयोग के आधार पर ऐसा अतिरिक्त साधनाक्रम भी बनाया जा सकता है जो क्रमिक रूप से चक्रबेधन, कोशों के अनावरण की दिव्य सम्भावनाओं का मूर्तिमान करता रहें यह गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय साधना ही है जिसे पौराणिक भाषा में पंचमुखी वेदमाता की पंचदेव साधना कहते हैं। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पाँच देव माना है तात्विक दृष्टि से उन्हें सर्वसमर्थता, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, सृजन, अभिवर्धन और विवर्तन का प्रचण्ड क्षमता-सम्पन्न आत्मबल भी कह सकते हैं।

उपनिषदों की भाषा में गायत्री की उच्चस्तरीय साधना ही यम द्वारा नचिकेता को बताई गई रहस्य पूर्ण पँचाग्निविद्या है। पाँच अग्नियाँ अनन्य शक्ति के ऊर्ध्व लोकों तक फैली हुई ज्योतिर्मयी ऊर्जा ही है। उन्हें ब्रह्मतेजस् के रूप में साधना परायण लोग धारण करते हैं और आत्मा में परमात्मा का अवतरण सम्भव एवं प्रत्यक्ष बनाते हैं। यह साधनाएं हर साधक के लिए उसके स्तर के अनुरूप थोड़ी हर-फेर जैसी होनी स्वाभाविक है। उनकी आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् परिव्राजक साधक उस विधान को स्वयमेव अग्रगामी बनाते रह सकते हैं।

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर योगसाधन का क्रम एक घंटा क्रमबद्ध रूप से चलता रह सके तो सामान्यतया पर्याप्त कहा जा सकता है। स्वाध्याय के लिए अवकाश का कोई एक घण्टा दिनचर्या में सम्मिलित रहना चाहिए। इन्द्रियों का दमा और मनोगत लिप्साओं का शमन करते हुए संयम, सादगी और तितीक्षा भरी जीवनचर्या नियमित निर्धारित करली जाय तो उसे सामान्यतया उपयोगी तपश्चर्या कहा जा सकता है। आलय और प्रमाद को-असंयम और असंतुलन को निरस्त करके स्वभाव एवं अभ्यास को परमार्थ परायण जीवन के उपयुक्त विनिर्मित करना यही तो तपश्चर्या का मूल भूत उद्देश्य है। किसे, किस प्रकार की कितनी, तपश्चर्या किस स्थिति में कैसे करनी चाहिए। इसमें भी शारीरिक, मानसिक एवं क्रियाकलाप संबन्धी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भिन्नता रहेगी। इस तप संदर्भ में भी योगाभ्यास की तरह ही निर्धारण करते समय किसी अनुभवी मार्गदर्शक से परामर्श कर लिया जाय तो अधिक सही अधिक उपयुक्त क्रम व्यवस्था बन सकती हैं।

स्वाध्याय और योगाभ्यास में सामान्यतया एक एक घण्टा लगाने के उपरान्त शेष समय उस युग के वानप्रस्थ को लोक मंगल की सेवासाधना में लगाना चाहिए। विश्वमानव का भावनात्मक स्तर ऊँचा उठाने के लिये किये गये प्रयासों को विशुद्ध रूप से पूजा आराधना में ही सम्मिलित किया जाना चाहिये। संसार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन ऐसा कर्मयोग है जिसे साधना क्षेत्र में प्रचलित किसी भी क्रिया कलाप से हलके स्तर का नहीं गिना जा सकता। वरन् सच तो यह है कि युग धर्म के अनुरूप यही सर्वोत्तम तपश्चर्या है। जप तप से तो अकेले अपना ही कल्याण होता है किन्तु लोकमंगल में निरत ब्रह्मपरायण महामानव तो अपनी यह पुण्य साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं। उदारता को देखते हुए लोकसेवकों को किसी ज्ञानसाधक, योगी तपस्वी, भगवद् भक्त से कम नहीं वरन् बहुत अधिक ऊँचा ठहराया जायगा जो अपने प्रयास का लाभ स्वयं न उठा कर विश्व कल्याण के लिए समर्पित करता है उसकी आन्तरिक महानता निश्चित रूप से अधिक और अति प्रशंसनीय कही जायगी।

योग साधनाओं में तीन ही प्रधान हैं। देव समुदाय में ब्रह्मा-विष्णु, महेश की जिस प्रकार प्रधानता है उसी प्रकार भावयोगों में तीन ही प्रमुख है। (1) ज्ञानयोग (2) भक्तियोग (3) कर्मयोग। वानप्रस्थ साधना में इन तीनों का समुचित समावेश होना चाहिये। ब्रह्मविद्या परायण होकर स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है। योगाभ्यास और तपश्चर्या को गायत्री शक्ति स्रोतों पर अवलम्बित साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है। आहार, निद्रा, स्नान जैसे अनिवार्य शरीर धर्म का पालन करने के उपरान्त जो समय बचता है उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाने वाला साधन अनवरत रूप से भगवद्भक्ति में निरत कहा जा सकता है। उसे सच्चा वैरागी, योगी, तपस्वी, भक्त अथवा ऋषिकल्प जो भी कहा जाय, सार्थक कथन ही होगा।

लोकमंगल की साधना की यों असंख्य धारा दिशाएं हो सकती हैं। जनता की आर्थिक समृद्धि, स्वास्थ्य संवर्धन जल व्यवस्था, धर्मशाला, मन्दिर, तालाब, प्याऊ, अस्पताल जैसे कितने ही उपयोगी कार्य भी लोककल्याण कारक ही कहे जायेंगे पर आज की आपत्तिकालीन स्थिति में हमारा पूरा ध्यान उन्हीं प्रयासों पर केन्द्रित होना चाहिए जो विचारों के झकझोरने-भ्रान्त-धारणाओं और विकृत मान्यताओं एवं निकृष्ट अभिरुचियों से जनमानस को विरत कर सकने में समर्थ हो सकें।

हमें यह हजार बार सोचना और समझना चाहिए कि चिन्तन को उत्कृष्टता की दिशा न मिली तो बढ़ी हुई सम्पत्ति का परिणाम विपत्ति के अतिरिक्त और कुछ न होगा। बढ़ा हुआ शरीर-बल गुण्डागर्दी की, बढ़ा हुआ धन व्यसन-व्यभिचार की, बढ़ा हुआ बुद्धिबल-उपद्रव उत्पातों की अभिवृद्धि करेगा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम आज के शरीरबल सम्पन्न धनी मानी, सत्ताधारी और सुशिक्षितों की गतिविधियों को देखकर सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। सद्भाव संवर्धन के लिए प्रयास न किये जाने का ही यह परिणाम है जो सम्पत्तिवानों और विभूतिवानों द्वारा अपनाई गई विघातक दुरभि संधियों के रूप में सामने प्रस्तुत है। वैभव और वर्चस्व का दुरुपयोग देख कर कई बार खीज में यह कहना पड़ता है कि इन बलवानों धनवानों और विद्यावानों की अपेक्षा रुग्ण, निर्धन एवं अनपढ़, समाज के लिये कम हानिकारक है।

लोक सेवा के नाम पर आज सरकारी और गैर सरकारी प्रयत्न भौतिक सुविधाओं के अभिवर्धन में ही पूरे जोर-शोर से लगे हुए हैं। विचार परिष्कार की महती और प्रधान आवश्यकता की ओर किसी का भी ध्यान नहीं है। इस स्थिति में वानप्रस्थों की सेवा साधना की दिशा, मात्र एक ही दिशा में चलनी चाहिए-विचार शोधन, भाव परिष्कार-विवेक संवर्धन, विचार क्रान्ति एवं ज्ञानयज्ञ का यही लक्ष्य हैं। उन्हें इसके अतिरिक्त इधर नहीं देखना चाहिए और इमारतों रूप में दीख पड़ने वाली विज्ञापन बाजी के आकर्षण बनते हुए मानवता की ठोस सेवा में प्रवृत्ति होना चाहिए। भले ही उस सेवा साधना का दृश्य रूप सामने न आने के कारण लोकेषणा से वंचित रहने का त्याग ही क्यों न करना पड़ता हो। जब घन और कामुकता की वित्तैषणा और पुत्रेषणा छोड़ दी तो वानप्रस्थों की लोकेषणा के लिए दृश्यमान भौतिक सुविधा संवर्धक कार्यों से ललचाकर ज्ञानयज्ञ से विमुख होने का उथलापन क्यों अपनाना चाहिए।


Quotation

अजानन् माहात्म्यं पततुशलभो दीप दहने। स मीनोप्यज्ञाना द्वडिश युतमश्नातु पिशितम्॥

विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्याल जटिलान्। न मुँचामः कामानहह गहनो मोह महिमा॥

मोह के वशीभूत होकर पतंगा दीप पर गिरकर जल जाता है, मछली कटिये का माँस खाकर अपने प्राणों का नाश करती है। ठीक ही है, मोह की महिमा अति कठिन है, तभी तो लोग जान-बूझकर इन दुःखदायी विषयों की अभिलाषा नहीं छोड़ते।

धर्ममंच का आधार लेकर जनमानस के परिष्कार की सुव्यवस्थित क्रिया पद्धति युगनिर्माण की शतसूत्री योजना के अंतर्गत बहुत पहले से ही घोषित की जा चुकी है। उस पर ध्यान पूर्वक विचार किया जाय तो लोकशिक्षण के लिए ढेरों कार्यक्रम सामने प्रस्तुत दिखाई पड़ेंगे उनमें से जिन्हें जहाँ जिस प्रकार कार्यान्वित किया जा सके उसकी विधि व्यवस्था स्थानीय परिस्थितियों और कार्यकर्ताओं की क्षमता को ध्यान में रख कर बनाई जानी चाहिए।सर्वत्र एकरूपता तो नहीं हो सकती। क्षेत्रीय स्थिति के अनुरूप कार्यक्रमों में भिन्नता तो रहेगी ही पर मूल सिद्धान्त सर्वत्र एक ही रहेगा। दुर्बुद्धि का-दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन किया जाना चाहिए। रूढ़िवादिता, अन्धा मान्यता एवं पूर्वाग्रहों के साथ जुड़ी हुई दुष्ट मूढ़ता के विरुद्ध मोर्चा खड़ा करने के लिये प्रथम चरण विचार-क्रान्ति के रूप में ही उठाया जाय। चूँकि अपना कार्य क्षेत्र धर्म एवं अध्यात्म है इसलिए इस प्रक्रिया को ज्ञानयज्ञ के सौम्य नामकरण के साथ संबोधित किया जाना अधिक उचित उपयुक्त है।

प्रतिगामी हाथों से शक्तिशाली धर्मक्षेत्र को छीन कर प्रगतिशील हाथों में सौंप देना वानप्रस्थी का प्रधान कार्य होना चाहिये। धर्म परम्पराओं को प्रगतिशील रूप देने के लिए बहुत कुछ करना शेष है। वाणी का- प्रवचन शक्ति का उपयोग करने के लिए सत्यनारायण कथा की एक दिन वाली-रामायण कथा-गीता कथा की सात दिन वाले साप्ताहिक धर्मानुष्ठान की क्रियापद्धति कितनी उत्तम है उसे प्रत्यक्ष अनुभव करके देखा जा सकता है। होली, दिवाली, बसन्त पंचमी, विजयादशमी आदि पर्वों को सामूहिक रूप से मनाया जाय और उन परंपराओं के साथ जुड़ी हुई महान प्रेरणाओं को जनसाधारण के साथ प्रस्तुत किया जाय तो लोकमानस में क्रान्तिकारी हलचलें उत्पन्न की जा सकती है। परिवार संस्था को सुविकसित समुन्नत बनाने एवं अवाँछनीय प्रचलनों से राहत दिलाने के लिए संस्कारों के माध्यम से अत्यन्त तेजस्वी मार्ग दर्शन प्रस्तुत किया जा सकता है, विवाह संस्कार के समय सम्पन्न होने वाले कर्म काण्डों की यदि किसी मनस्वी द्वारा व्याख्या हो सके तो दाम्पत्य जीवन का-गृहस्थ जीवन कर तत्वदर्शन इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है कि वन-वधू ही नहीं उत्सव में उपस्थित अन्य लोग भी अपने गृहस्थ परिवार की आधारशिला का पुनर्निर्धारण कर सके।

जन्मदिन और विवाह दिन मनाने की परम्परा कितनी प्रेरणाप्रद है उन छोटे-छोटे आयोजनों में वैयक्तिक उत्कर्ष के लिये-दाम्पत्य जीवन की सुव्यवस्था के लिए कितना प्रबल प्रेरणा मिलती है उसे कुछ ही आयोजनों का परिणाम देखकर सहज ही जाना सकता है।

छोटे बड़े गायत्री यज्ञों के साथ जुड़े हुए युगनिर्माण सम्मेलनों में अनैतिक अवाँछनीयता एवं दुष्प्रवृत्तियों के परित्याग का जो प्रतिज्ञा अनुदान जुड़ा रहता है। उसमें उन धर्मोत्सवों का स्वरूप व्यक्ति और समाज की अभिनव संरचना करने में दूरदर्शिता पूर्ण कदम ही कहा जा सकता ह। इन आयोजनों में जाति और लिंगभेद की समाप्ति के जो दृश्य सामने रहते हैं। उनसे जनता में रूढ़िवादिता को उखाड़ फेंकने के लिये अभिनव साहस का संचार होता है।

धर्म मंच के सहारे ऊपर जिन कार्यक्रमों का संकेत है उनके अतिरिक्त भी स्थानीय परम्पराओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप और भी बहुत कुछ किये जा सकते हैं। धार्मिक मेलों का आरम्भ करके जहाँ उन उत्साह का संचार हो सकता है वहाँ उस प्रेरणा प्रद वातावरण से प्रभाव ग्रहण करने के लिए आकर्षित किया जा सकता है। वहाँ विक्रेता और खरीदारी को लाभान्वित करने के बात बन सकती है। लोकरंजन के साथ लोकमंगल के कितने ही क्रियाकलाप करते हैं। गायत्री यज्ञो के साथ नियत तिथि पर हर वर्ष मेला लगाने की प्रभा जहाँ भी चल रही हैं तथा नवनिर्माण की बहुमुखी हलचलों को व्यापक बनाने में आशातीत सफलता मिली है वानप्रस्थों के परिव्रज्या प्रवास में इस प्रकार के आयोजन सहज ही आयोजित होते चल सकते हैं यह बात पिछले अनुभवों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दी है।


युग निर्माण परिवार के वानप्रस्थ क्या करेंगे?

धर्ममंच के माध्यम से लोक-शिक्षण से ही रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों का भी संचालन हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष परिचय युग निर्माण परिवार की चार हजार शाखाओं के क्रियाकलाप को देखकर सहज ही समझा देखा जा सकता है पर्व-संस्कार, जन्म दिन, विवाह दिन, गायत्री यज्ञ, सत्यनारायण कथा, रामायण कथा, रामायण कथा, गीता कथा, नवरात्रि जप अनुष्ठान, प्रभृति, कार्यक्रमों में उपस्थित होने वाली जनता को व्यक्ति निर्माण परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण की विविध विधि प्रेरणायें दी जाती है। उस प्रोत्साहन में लोग अपनी अवाँछनीय विचार धाराओं एवं प्रवृत्तियों को बदलते हैं। धर्म-शिक्षण के साथ-साथ दिये गये दिशा निर्देश से क्रमशः जीवन के मोड़ में परिवर्तन होते हैं और उन बदले हुए व्यक्तित्वों द्वारा विभिन्न स्तर की लोकोपयोगी गतिविधियों का सृजन अभिवर्धन सामने आता है।

युग-निर्माण योजना का लक्ष्य बौद्धिक-क्रान्ति, नैतिकक्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के त्रिविधि परिष्कार प्रस्तुत करते हुये इसी धरती पर स्वर्ग के अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय करना है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये आयोजनों की- प्रवचन उद्बोधन की आवश्यकता पूर्ति के लिए छोटे-बड़े धर्मानुष्ठानों एवं सम्मेलन, आयोजनों की व्यवस्था की जाती है। इसके अतिरिक्त साहित्य का भी आधार ज्ञानयज्ञ की लपटें ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए पूरे उत्साह के साथ लिया जाता है। कहना न होगा कि इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए युग-निर्माण योजना ने अभूतपूर्व एवं अनुपम साहित्य का सृजन एवं प्रकाशन किया है। लगभग 100 दो रुपये मूल्य की 200 पच्चीस पैसा मूल्य की ओर लगभग 100 चालीस पैसा मूल्य की छोटी-बड़ी सर्वांग सुन्दर पुस्तकें छापी है इन 400 पुस्तकों में त्रिविधि क्रान्ति के व्यक्ति निर्माण परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के समस्त बीजाँकुर लहलहाते हुए देखे जा सकते हैं।

युग निर्माण परिवार के सदस्य दस पैसा नित्य अपने निजी घरेलू पुस्तकालय के लिए बचाते हैं उससे सहज ही परिजनों के घर-घर में ज्ञान मन्दि पुस्तकालय बन जाते हैं। एक घण्टा समय दान इन सभी सदस्यों को ज्ञानयज्ञ के लिए देना पड़ता है। इसमें वे झोला पुस्तकालय चलाते हैं अपने परिचय एवं संपर्क-क्षेत्र में घर-घर जाकर यह पुस्तकें पढ़ाने ओर वापस लाने में प्रतिदिन लाखों मनुष्यों को इस सत्साहित्य के पढ़ने का लाभ बिना कुछ खर्च किये मिलता रहता है। इस संदर्भ में कई भाषाओं में प्रकाशित होने वाली अपनी सात पत्रिकाएं भी महत्वपूर्ण कार्य करती है ये लगभग एक लाख छपती है। पर उनके पाठक चार-पाँच लाख से कम नहीं। हर पत्रिका कम से कम पाँच व्यक्तियों द्वारा तो चावपूर्वक पढ़ी ही जाती है।

जहाँ दस सदस्य होते हैं वहाँ शाखा संगठन स्थापित हो जाता है। संगठन अपने सदस्यों में घनिष्ठता उत्पन्न करने-सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने का प्रयत्न करता है और इस देव समाज को कुछ रचनात्मक कार्य आरम्भ करने के लिए प्रोत्साहित करता है। आम तौर से इस शाखा संगठन के पास एक धकेल गाड़ी होती है। जिस पर लादकर चल-पुस्तकालय घर-घर ले जाया जाता है पुस्तकें पढ़ाने और वापिस लेने का क्रम चलता है। कोई खरीदना चाहे तो इन पुस्तकों को खरीद भी सकता है। दूसरा कार्य हर शाखा में संध्याकालीन 2 घण्टे का युग-निर्माण विद्यालय चलता है, जिसमें मिशन का विचार-पद्धति और कार्य पद्धति से शिक्षार्थियों को अवगत कराया जाता है। शाखाएं ही अपने क्षेत्र में पर्व आयोजन तथा दूसरे प्रकार के समारोह सम्मेलन एवं विचार गोष्ठियों का क्रम चलाती है। व्यक्तिगत एवं सामूहिक उपासना का उत्साह एवं वातावरण उत्पन्न करती है।

प्रचार साहित्य के अंतर्गत 100 विज्ञाप्तियाँ छपी है ओर 40 पोस्टर प्रकाशित किये गये है। विज्ञप्तियाँ मुफ्त बाटी जाती है और पोस्टर उपयुक्त स्थानों पर चिपकाये जाते हैं। अपरिचित लोगों को मिशन की प्रेरणाओं में परिचित कराने के लिए यह दोनों ही माध्यम बहुत ही प्रेरक एवं आकर्षक सिद्ध हुए है। इस अत्यन्त सस्ते प्रचर साहित्य हो लाग उदारता ओर भावनापूर्वक मँगाते एवं वितरित करते हैं। इस आधार पर हर महीने लाखों नये लोगों को प्रेरणा प्राप्त होती है। दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने की उमंग में शाखाओं ने समीपवर्ती ग्रामों की दीवारों को बोलती पुस्तकों के रूप में परिणत कर दिया है यह प्रचार-प्रक्रिया निरर्थक नहीं जाती, वरन् जन साधारण को विदित होता है कि नवनिर्माण का कोई प्रचण्ड अभियान चल रहा है सुधार ओर पुनर्निर्माण की भावना, आकाँक्षा रखने वाले वर्गों को कही कोई समुचित आधार विद्यमान है, यह जानकारी मिलती है-तद्नुसार से स्वयं तलाश करते हैं और मिशन के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर प्रगति के पथ को ओर भी अधिक प्रशस्त करते हैं।

जिन शाखाओं के साधन अधिक विकसित हो गये है उन्हें समर्थ स्तर की माना जाता है वे स्थानीय उत्तर दायित्व तक सीमित न रहकर समीपवर्ती क्षेत्र को संभालती है इनके पास लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, रिकार्डप्लेयर, स्लाइड प्रोजेक्टर आदि प्रचार यन्त्र होते हैं यज्ञ आयोजनों युग-निर्माण सम्मेलनों के लिए आवश्यक साधन उपकरण पण्डाल, बिछावन, गैसबत्ती, जुलूस-पोस्टर आदि साधन रहते हैं जिससे छुट-पुट प्रचार समारोह आये दिन सम्पन्न होते रहते हैं और उस क्षेत्र में जागृति बनी रहती है। समर्थ शाखाओं अपने निजी भवन ज्ञान मन्दिर नाम से बनाने आरम्भ कर दिये है उनमें पूजा वेदी पर गायत्री का चित्र अथवा लाल मशाल की प्रतिष्ठापना रहती है इस भावन, पुस्तकालय, वाचनालय, प्रौढ़ पाठशाला, सत्संग आदि के लिए काम आता है।

युग-निर्माण आन्दोलन का कार्यक्षेत्र प्रधानतया देहात है है शहरों में पहले से ही इतने ज्यादा संगठन और आन्दोलन खड़े कर लिए गये है कि इस जंजाल से जनता भ्रमग्रस्त होकर इन कार्यों में अरुचि एवं उपेक्षा प्रदर्शित करने लगी है। अप्रामाणिक वक्ताओं की बकवास से अब प्रचार-तन्त्र शहरों में भी प्रभावशाली नहीं रहा वरन् लोगों को मूर्ख बनाने वाला स्टन्ट कहकर उसे उपहासास्पद ठहराया जा रहा है। सौभाग्य यह है कि यह बीमारी देहातों में नहीं पहुँची। पहुँच भी नहीं सकती थी क्योंकि वहाँ यातायात के साधन, शानदार स्वागत समारोह के उपकरण, सहज ही चन्दा इकट्ठा कर लेने का माध्यम नहीं है देहाती मस्तिष्क में घुस सकने लायक उनके पास कुछ कहने जैसी बात है भी नहीं। ऐसी दशा में तथा -कथित आंदोलनों और संगठनों में देहातें प्रायः अछूती ही पड़ी है। युग-निर्माण आन्दोलन ने अपना कार्यक्षेत्र इसी अछूते किन्तु असली भारत की बनाया है। देहातों में ही उसकी गतिविधियाँ बिखरी हुई दिखाई पड़ेगी। शहरों में तो कदाचित ही कही उसकी चर्चा देखने सुनने को मिले। शहरी अखबारों में भी योजना के प्रचार समाचार छपने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। क्योंकि जहाँ उनका प्रचार है वहाँ अपना कार्य क्षेत्र नहीं। जहाँ अपना कार्य क्षेत्र है वहाँ वे अखबार नहीं पहुँचते। अस्तु शहरी चर्चा में नव निर्माण अभियान का वर्णन विस्तार न होना स्वाभाविक ही है। फिर उसकी आवश्यकता भी क्या है? उससे प्रयोजन भी क्या सिद्ध होता है?

देहातों में प्रवचन की अपेक्षा स्वभावतः संगीत अधिक लोकप्रिय होता है इसके लिए पुरानी संगत मंडलियों को नये गीतों का अभ्यास कराकर इस योग्य बना दिया गया है कि वे अपने क्षेत्र में क्षेत्रीय भाषा में नव निर्माण की उमंगे उत्पन्न कर सके। इस दिशा में एक कार्य यह भी है कि स्कूली छात्र-छात्राओं में से जिनके कंठ मधुर हैं, उन्हें प्रेरक कविताएँ याद करा दी गई है।

जहाँ कहीं भी अपने आयोजन होते हैं वहां यह छात्र वर्ग-अध्यापक वर्ग कविता सम्मेलनों का ऐसा आकर्ष उपस्थित कर देते हैं जिससे बिना किसी खर्च के सुनने वालों को मन्त्रमुग्ध रखा जा सके। संगीत विद्यालय जहाँ तहाँ चल रहे है। एकांकी नाटकों का प्रचलन बढ़ रहा है। ऊँचे पेड़ों पर लाउडस्पीकर बाँध कर रिकार्डप्लेयर के रिकार्डों से तथा गायकों द्वारा प्रभातकाल में जो गीत दूर-दूर तक सुने जाते हैं उनसे नई उमंगे उत्पन्न होती है।

यह प्रचारात्मक क्रिया-कलाप हुए रचनात्मक कार्यों में- शाक उत्पादन, वृक्षारोपण, श्रमदान, स्वच्छता, पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, कुटीर उद्योग जैसे कितने ही कार्य हाथ में लिए गये है ओर आगे बढ़ाये गये है। संघर्षात्मक आन्दोलनों में नशा-निवारण, माँसाहार, निषेध, मृतक-भोज, भूत-पलीत, शकुन-मुहूर्त जैसे कार्य हाथ में लिये गये है। विवाह-शादियों के नाम पर होने वाले भारी अपव्यय, धूमधाम एवं देन-दहेज की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए जी तोड़ प्रयत्न किये जा रहे है। सामूहिक विवाहों के उमंग भरे आयोजनों में सम्मिलित होकर लोग एक स्थान पर अनेकों विवाह बिना किसी देन दहेज के करते हैं तो दर्शकों का भी हौसला बढ़ता है और वे बिना खर्च आदर्श विवाह आयोजनों की व्यवस्था अपने-अपने ढंग से बिठाते हैं। कुपात्रों को भिक्षा देने का निषेध करके भिक्षा व्यवसाय के प्रति मुफ्तखोरी का आकर्षण घटा है और वे मेहनत मजदूरी करके पेट पालने के लिए विवश हुए है।

रिश्वत, भ्रष्टाचार, चोरबाजारी, जमाखोरी, खाद्यपदार्थों में मिलावट, भावताव में छल-प्रपंच भरी घिसघिस के विरुद्ध उग्र वातावरण बनाया जा रहा है। राजनैतिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए वोटरों को प्रशिक्षित किया जा रहा है कि वे चरित्रवान, आदर्शवादी और परखे हुये लोगों को ही बोट दिया करे। बाल-विवाह, अनमेल-विवाह के विरुद्ध अपने ढंग के प्रचार एवं संघर्ष चल रहे है। अस्तु इस प्रकार के प्रचलन अब तेजी से घटते-मिटते जा रहे हैं। जन्मजाति के आधार पर बरती जाने वाली ऊँच-नीच और छूत-छात की मान्यता पर करारे प्रहार किये गये है महिलाओं को पुरुषों के समतुल्य स्थिति तक पहुँचाने तक और उन्हें मानवोचित नागरिक अधिकार दिलाने के लिये प्रबल प्रयत्न हो रहे है कन्या पाठशालाओं से लेकर प्रौढ़ महिलाओँ की शिक्षा व्यवस्था के लिए शिक्षण संस्थान प्रायः सभी समर्थ शाखाओं से चला रखे है महिला मंडल अपने अपने क्षेत्र में नवजागरण का ऐसा शंख फूँक रहे है कि नारी को अपने पिछड़ेपन पर स्वयं असन्तोष उत्पन्न हो और वह सुधार प्रयासों में प्रचण्ड उत्साह लेकर स्वयं ही अग्रसर होती दिखाई पड़ने लगे।

पिछड़े लोगों के लिए बालकों के लिए अनेक रचनात्मक कार्य जहाँ-जहाँ चल रहे है ओर अपनों को काम मिल सके, वे वाधिक स्थिति में भी कुछ कमा सकें, ऐसे साधन खड़े हो रहे हैं। गो संवर्धन के- गोरस उपयोग के लाभों की सर्वसाधारण को जानकारी कराई गई है और जनता को इस उपयोगी कार्य में अधिक उत्साह दिखाने के लिए प्रेरित किया गया है। गोबर जलाया न जाय उसे खाद के लिये ही काम में लाया जाय यह तथ्य कृषक वर्ग द्वारा सर्वत्र स्वीकार कर लिया गया है।

यह सामान्य परिचय है - युग निर्माण शाखाओं में चल रहे क्रिया-कलाप का। कर्मठ कार्यकर्त्ताओं ओर सक्रिय सदस्यों की एक बड़ी सृजन सेना देश भर में नवनिर्माण का पुण्य प्रयोजन पूरा करने में लगी है। सृजन के लिए आरम्भिक प्रयास लोक-शिक्षण के रूप में किया जाता है, पर जैसे-जैसे उसकी जड़े मजबूत होती है, वैसे-वैसे नये रचनात्मक एवं संघर्षात्मक क्रिया-कलापों का विस्तार हर क्षेत्र में दृष्टिगोचर होता चला जाता है।

इतने पर भी एक बड़ी कठिनाई यह है कि शाखाओं एवं कार्यकर्त्ताओं को जो कुछ करना पड़ता है अपने ही पैरों पर खड़े होकर करना पड़ता है। बाहर से उत्साह उत्पन्न करने एवं मार्गदर्शन करने के लिए कोई प्रतिभावान व्यक्ति उन तक नहीं पहुंचते। फलतः उत्साह कभी बढ़ता है कभी शिथिल पड़ता है ओर कभी कभी तो बुरी तरह समाप्त हो जाता है। जो शाखाएँ आज पूरे जोश से काम कर रही है वे भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी इसका कुछ निश्चय नहीं रहता। जोश ज्वार-भाटे की तरह चढ़ता रहता है उसमें स्थिरता लाने के लिये आवश्यक है। कि प्रभावशाली मार्ग दर्शक केन्द्र से जाते रहे और सक्रिय सदस्यों एवं कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को साथ लेकर कन्धे से कन्धा भिड़ाकर काम करें- कदम से कदम मिलाकर चलने का उपक्रम बनाकर शिथिलता के वातावरण का उमंग भरे उत्साह में परिवर्तन करें। यदि ऐसी प्रेरणा वृष्टि होती रहे तो न कोई शाखा मुरझाने पाये और न किसी सृजन सेना के अदम्य उत्साह शिथिलता आये। यह कार्य वानप्रस्थों को निबाहना चाहिए। सक्रिय शाखाओं में जाकर कुछ महीने डेरा डाला। हर सृजन सैनिक से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित कर और उसकी शिथिलता का निराकरण करके सक्रियता उत्पन्न करें।

स्थानीय शाखायें अपने ढंग से कार्य करती रहती है। अनुभवी वानप्रस्थ उन्हें कठिनाइयों का निवारण और प्रत्येक का पथ प्रदर्शन भलीभांति करा सकते हैं समीपवर्ती शाखा सदस्यों के लिये प्रशिक्षण शिविर जैसी व्यवस्था जुटा सकते हैं। प्रचारात्मक, रचनात्मक ओर संघर्षात्मक कार्यों के साथ रहकर व्यावहारिक ज्ञान करा सकते हैं। इस प्रकार शाखा संगठनों को आवश्यक प्रशिक्षण से लाभान्वित करने का बहुत बड़ा काम अनुभवी वानप्रस्थों द्वारा हो सकता है। आवश्यक अवधि तक एक समर्थ शाखा में रहकर फिर अन्य शाखाओं में उसी क्रिया-कलाप को अग्रगामी बनाने के लिए जा सकते हैं। इस प्रकार एक दूसरी शाखा में जाते रहने की प्रक्रिया वानप्रस्थों के लिए और शाखा संगठनों के लिए हर दृष्टि से उत्साह वर्धक सिद्ध होगी। एक वानप्रस्थ के चले जाने के उपरान्त उस स्थान की पूर्ति के लिए नए वानप्रस्थ पहुँचते रहे तो नवीनता में नवीन व्यक्तित्वों से शाखाओं को अधिक प्रकाश मिलता रह सकता है।

ये युग-निर्माण भी बनाने पड़ेंगे। जन सागर का मन्थन करके चौदह नहीं चौदह कोटि उत्कृष्ट चिन्तन और कर्तृत्व में निरत लोक सेवी धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, में खड़े किये जा सकें तभी धरती पर स्वर्ग के वातावरण प्रस्तुत करने वाले नवयुग का अवतरण सम्भव होगा। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए वाणी और लेखनी के माध्यमों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता पर उससे भी बड़ी आवश्यकता उन व्यक्तियों की है जो अपने तप त्याग से परिष्कृत और आदर्शानुयायी व्यक्तित्व की छाया दूसरों पर छोड़ कर उन्हें महामानव नर-रत्न स्तर का बनने के लिए उत्साहित कर सके। यह कार्य वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रविष्ट हुये लोग ही अधिक अच्छी तरह सम्पन्न कर सकते हैं।

रेल के संचालन में इंजन की प्रथम आवश्यकता है। डिब्बों में यदि कुछ में खराबी आ जाय तो उन्हें हटाकर भी रेलगाड़ी चलती रह सकती है। पटरी भी ठोक पीटकर दूसरी लगाई जा सकती है। पर इंजन की आवश्यकता को प्रथम प्रश्रय ही देना पड़ेगा। वह खराब हो जाय तो फिर सारा कार्य ठप्प ही पड़ जायगा। वानप्रस्थ स्तर के प्रबुद्ध और परिपक्व नेतृत्व में ही जन मानस को प्रेरणाप्रद दिशा मिली है और अन्धकार को चीरकर प्रकाश उत्पन्न कर सकने वाले लोग उभर कर ऊपर आये है।

भारत के कौने-कौन से ऐसे प्रखर नेतृत्व की माँग है जो स्टेज पर बैठकर बन्दरों जैसा अभिनय करने को अपनी लोकेषणा तृप्त करके सन्तुष्ट नहीं रहे वरन् कार्यक्षेत्र में उतरकर बच्चे-बच्चे को साथ लेकर चले। उन्हें कन्धे से कन्धा भिड़ाकर कदम से कदम मिला कर चलना सिखाये। निरहंकारी, लोकेषणा से विमुक्त वानप्रस्थों से यह आशा सहज ही की जा सकती है कि वे आदर्शवादी व्यक्तियों के मणि मुक्तक तलाशे को ही नहीं उन्हें अपनी खराद पर तराश छील कर पहलदार हीरों की तरह इस स्तर का बना सके जिसे देखकर हर किसी का मन मुग्ध हो जाय। जौहरियों जैसा धन्धा अपनाने वाले- नर-रत्नों के उत्पादक और उन्नायक वानप्रस्थ विश्व मानव की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। यह सुनिश्चित और सुस्पष्ट है।


कतिपय अति उपयोगी कार्य जो जन संपर्क से ही सम्भव होंगे

युगनिर्माण परिवार की सबसे बड़ी और सबसे महत्व पूर्ण माँग यह है कि उन्हें परिष्कृत स्तर के प्रतिभाशाली ऐसे मार्गदर्शक मिले जो वाक् चातुर्य दिखाने तक हुकुम ओर हुकूमत चलाने तक ही सीमित न हरे वरन् कार्यकर्ताओं को अपने साथ कदम से कदम मिला कर चलाते हुए लोक मंगल के विभिन्न मोर्चे सम्भालने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करे। यदि यह आवश्यकता पूरी हो सके तो आज की चार हजार शाखायें इतना बड़ा काम कर के दिखा सकती है कि बौद्धिक-नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के विभिन्न प्रयोजन जो आज मुरझाये, कुम्हलाये और मूर्छित पड़े है सहज ही अंकुरित, प्रस्फुटित और हरे-भरे हो सकते हैं।

यह तो हुई अपनी शाखा संगठनों की बात, पर क्षेत्र इतने तक ही सीमित नहीं है युगनिर्माण योजना का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है उसके दिशा विस्तार की अगणित संभावनायें अभी भविष्य के गर्भ में छिपी पड़ी है। धर्म-मंच का आधार लेकर लोक-शिक्षण जन-जागरण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन का कार्य ही न दिनों अपने शाखा संगठनों द्वारा हो रहा है। गतिविधियाँ प्रायः इसी परिधि तक सीमित है। रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यों के अगले कदम उठाये जाने ही चाहिये, इसकी प्रतीक्षा दसों दिशाएं कर रही है। जनमानस को झकझोरने के लिए अभी अनेक आधारों को हाथ में लिया जाना अभी लगभग अछूता ही पड़ा है उसके लिये इतने अधिक रचनात्मक कदम उठाने है जो अब तक की सफलता की अपेक्षा सहस्रों गुने अधिक बड़े विस्तार का साधन सरंजाम जुटा सके।

साहित्य को ही ले उसमें कितना कुछ करने को पड़ा है सृजन की दिशा देने वाला साहित्य अभी मुट्ठी भर मात्रा में ही लिखा और छपा है की इसकी तुलना में अभी हजारों गुने बड़े लेखन तथा प्रकाशन की आवश्यकता है। कथा साहित्य तो अभी छुआ ही नहीं गया जब कि प्रचार प्रयोजन के लिए उसी की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्पष्ट है कि कथा-साहित्य ही सबसे अधिक छपता और बिकता है। लोकरंजन की आवश्यकता उपन्यास और कहानियाँ ही पूरी करते हैं पुस्तक विक्रेता बतायेंगे कि तीन चौथाई बिक्री कथा-साहित्य की ही होती है। इस क्षेत्र में क्रान्तिकारी उद्देश्य लेकर प्रवेश करना पड़ेगा और कथा उपन्यासों की एक नई शृंखला खड़ी करनी पड़ेगी। संसार के अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ कथा साहित्य का अपनी भाषा में अनुवाद कराना पड़ेगा। कोई चीज मूलतः एक भाषा में लिखी भले ही जाय पर उसका अनुवाद एवं प्रकाशन भारत की चौदह मान्यता प्राप्त भाषाओं में होना चाहिए। इसके लिये साधन सम्पन्न प्रेम की- समुचित पूँजी वाले प्रकाशक की ओर निरन्तर सृजन साधना में निरत साहित्यकारों की आवश्यकता पड़ेगी यह साहित्य-तन्त्र इतना बड़ा है जिसके लिए सुयोग्य कष्ट और भावनाशील स्तर के हजारों लाखों कार्यकर्ताओं का के सहज ही खपाया जा सकता है। इसमें करोड़ों की पूँजी लगनी है। तथा व्यावसायिक विक्रय क्षेत्र को सम्भालने वाले कितने ही छोटे -बड़े संस्थान खड़े किये जाने है। उन्हें गाँव गाँव फैलाया जाना है कथा साहित्य का भारत की चौदह भाषाओं में ही नहीं संसार की समस्त भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाश किया जाना है। इसके लिए केंद्रीय कार्यालय मार्ग दर्शन भले ही करे पर उसे सहस्रों स्थानों में-सहस्रों शाखा प्रशाखाओं में विभक्त करके बनाया बढ़ाया जा सकता है।

ऊपर की पंक्तियों में मात्र कथा साहित्य पर प्रकाश डाला गया है वस्तुतः अभिनव सृजन की आवश्यकता पूरी करने वाले साहित्य की अगणित धाराएं अभी अछूती ही पड़ी है। महिला जागरण को ही ले, उसकी पृष्ठभूमि विनिर्मित करने वाला साहित्य कहाँ है? पाक-विद्या और कढ़ाई, बुनाई की छुट-पुट पुस्तकों के अतिरिक्त महिला क्रान्ति को दिशा देने वाले साहित्य को किसने लिखा है - किसने छापा है? पूरे बाजार में ढूंढ़ने पर मुश्किल से उथले स्तर की बीस-दस पुस्तकें मिलेगी जब कि इस संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सहस्रों प्रेरक पुस्तकों की आवश्यकता है शिशु-कल्याण पर भी किसने कलम उठाई है। मेंढक नानाओं और परी की कहानियों की ही भरमार है। बालकों के मस्तिष्क को आदर्शवादी अंगुलि निर्देश करने वाला आरम्भिक साहित्य प्रचुर मात्रा में होना चाहिये पर वह है कहाँ? उसका तो श्रीगणेश ही होना है।

धर्म और अध्यात्म के नाम पर केवल कूड़ा कबाड़ा ही बिकता पाय जायगा। आत्मा की भावनाओं की भूख और प्यास बुझाने वाले तत्वदर्शन प्रबुद्ध वर्ग की महती आवश्यकता है उसकी पूर्ति हो सके तो परमार्थ की दिशा में चलने की आकुल आत्माओं को सही दिशा मिल सकेगी भी और पग-पग पर प्रस्तुत भटकाव से भावनाओं और साधनों की होने वाली दयनीय बर्बादी को रोका जा सकेगा। कलम तो इस दिशा में भी उठनी है इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य, सदाचार, परिवार, अर्थ-विज्ञान, कुटीर उद्योग, कृषि, पशुपालन, आहार-बिहार, लोकसेवा, समाज विज्ञान, मन’शास्त्र आदि असंख्य विषयों पर ऐसा साहित्य लिखा जाना है जो नवयुग की पृष्ठभूमि विनिर्मित करने में सहायक हो सके।

अब तक जो लिखा गया है छापा गया है - उसका आधार प्रायः भौतिकतावादी पाश्चात्य दर्शन है, जिसमें उत्थान का नहीं, पतन का ही दिशा-निर्देश भरा पड़ा है। अवाँछनीयता की तुलना में वाँछनीयता को जब तक खड़ा न किया जायगा तब तक बौद्धिक क्षेत्र में वह रही उलटी गंगा में उलटी रीति से बहने का ही कमजोरी रहेगा। बौद्धिक क्रान्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिये हमें न केवल कथा साहित्य वरन् व्यक्ति को प्रभावित करने वाले समस्त आधार को उत्कृष्टता की दिशा देने वाले साहित्य का सृजन करना पड़ेगा। सृजन ही नहीं, प्रकाशन, मुद्रण और विक्रय के विभिन्न साधन जुटाने पड़ेंगे।

वानप्रस्थों में यदि कुछ प्रखर व्यक्तित्व हो तो वे इस प्रकार के तन्त्र खड़े करने में सहायता कर सकते हैं। स्वर्गीय जयदयाल जी गोयन्दका और स्वर्गीय वीर हनुमान प्रसाद पोद्दार का यहाँ स्मरण अनायास ही हो आता है गीता प्रेस की स्थापना करके उनने अपने ढंग का एक आदर्श खड़ा किया। ऐसे ऐसे सहस्रों प्रकाशन तन्त्र खड़े किये जाने है ओर उनके लिए उपरोक्त स्वर्गीय आत्माओं का अनुसरण करने वाले सहस्रों ऐसे अनुभवी एवं सुयोग्य व्यक्ति अग्रगामी होने है जो अपनी सारी चेतना को उसी पुण्य प्रयोजन में खपा सके। कल-कारखाने खड़ा करने वाले उद्योग पतियों जैसे दिमाग इस तन्त्र को खड़ा करने में अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं क्योंकि पूँजी, उत्पादन, विक्रय श्रमिक एवं विक्रय व्यवस्था प्रभृति सभी कार्य इस क्षेत्र में भी बड़े उद्योग-धंधों जैसे ही है तन्त्र खड़ा करने में बड़ी प्रतिभाएं चाहिये पर उसके अंतर्गत जो हजारों लाखों प्रमाणिक और भावनाशील कार्यकर्ता विविध प्रयोजनों के लिये अभीष्ट होंगे उनकी पूर्ति भी कम महत्व की नहीं। उन्हें ढूंढ़ना और प्रवृत्त करना कार्य क्षेत्र में उतरने वाले का ही काम है। यह प्रयोजन वानप्रस्थ पूरा कर सकते हैं।

जन-मानस को बौद्धिक और भावनात्मक दृष्टि से झकझोरने वाले आधारों में साहित्य के बाद दूसरा नम्बर गायन का आता है लोकगीत छोटे-छोटे देहातों में यही याद रखे जाते हैं और मस्ती के साथ गाये जाते हैं। कविताओं को गुनगुनाते और उनके रस प्रवाह में बहते अगणित भावुक हृदय सर्वत्र देखे जाते हैं फिल्म गीत बच्चे-बच्चे की जबान पर चढ़े हुए हैं। गायन-गोष्ठियां जगह-जगह रस बरसाती रहती हैं। प्रायः हर आयोजन में कविता पाठ से लेकर गीत वाद्यों का समुचित स्थान रहता है। गीत-काव्यों का किसी जमाने में भारी सम्मान था। सिनेमा कितना ही गीत क्षेत्र पर हावी क्यों न हो गया हो अभी भी गीत काव्यों की सरसता समाप्त नहीं हुई है। उसे रुचिपूर्वक अपनाया जाता है और जहाँ प्रबन्ध है वहाँ उसके लिए धन भी खर्च किया जाता है संगीत विद्यालय कितने ही चलते हैं स्कूली पाठ्यक्रम में संगीत को भी मान्यता है संगीत में मात्र खाद्य ही तो नहीं होता गायन भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। इस क्षेत्र पर आदर्शवादी नियन्त्रण ने रहने से कामुकता की घुस पैठ सफल हो गई। हेय स्तर का भ्रान्ति-जंजाल भी उस क्षेत्र में जड़ जमाकर बैठ गया। प्रायः सारा संगीत क्षेत्र आज जम-मानस को विकृत करने में ही लगा हुआ है, यदि इसकी धारा उलट कर सृजनात्मक चेतना उत्पन्न करने में लगाई जा सके तो पतनोन्मुख मनोवृत्तियों को आदर्शवादी चिन्तन और कर्तव्य की दिशा में सहज ही मोड़ा जा सकता है और उसका आश्चर्यजनक परिणाम आंखों के आगे प्रस्तुत देखा जा सकता है।

इस संदर्भ में भी लगभग साहित्य-तन्त्र जैसा ही गीत-तंत्र खड़ा करना होगा। लोकगीतों की सुलभ संगीत की आवश्यकता प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा में अनुभव की जा रही है। इसके लिये गीतों का निर्माण और प्रकाश एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। सरकारी मान्यता प्राप्त भाषाएं तो अपने देश में 14 ही है पर क्षेत्रीय भाषाओं की संख्या तो 400 से ऊपर पहुंचती है हर क्षेत्र में अपनी-अपनी शब्दावली ओर स्वर प्रक्रिया लोकप्रिय है। इन सबमें गीतों का निर्माण और प्रकाशन, तथा विक्रय का क्रय बनाया ऐसा कार्य है जिसको अशिक्षित और देहाती क्षेत्र में उपयुक्त चेतना उत्पन्न करने की दृष्टि से मूर्धन्य प्रमुखता मिलनी चाहिए।

संगीत मंडलियाँ, संगीत विद्यालय, बनने चाहिएँ। अभिनय के साथ गीत-काव्यों को प्रस्तुत करने वाले अभिनय मंडल कितना क्रान्तिकारी काम कर सकते हैं इसकी कल्पना करने मात्र से सिहरन उत्पन्न होती है। स्पष्ट है कि संगीत अभिनय देखने सुनने के लिए सर्वत्र आबाल वृद्ध जनता अत्यधिक संख्या में अनायास ही आकर्षित ओर एकत्रित होती है। सुनने वालों की भीड़ एकत्रित करने के लिए सभा सम्मेलन विविध प्रकार के प्रचार करते हैं पर गीत अभिनय की जहाँ व्यवस्था होती है वहाँ बिना किसी आमन्त्रण के इतनी भीड़ जमा होती है जिसका नियन्त्रण करना कठिन हो जाता है लोकरंजन के साथ यदि लोक मंगल की घनिष्ठता और बुद्धिमत्ता की भी जोड़ा जा सके तो बौद्धिक क्रान्ति की - भावनात्मक उत्कर्ष की महती आवश्यकता सहज की पूरी की जा सकती है।

गीत पुस्तकों का सृजन और प्रसार ही इस दिशा में पर्याप्त नहीं वरन् ऐसी संगीत मंडलियाँ एवं अभिनय मंडलियों का गठन भी आवश्यक है जो देहाती क्षेत्र में लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करते हुए लोकमंगल के लिये प्रचण्ड उत्साह उत्पन्न कर सके। शहरों की बात दूसरी है, वहाँ सिनेमा ने जड़ जमाली है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि 80 प्रतिशत भारतीय क्षेत्र में सिनेमा की कोई पहुँच पकड़ नहीं है। यह क्षेत्र अभी भी बिलकुल खाली पड़ा है। सम्पन्नता की वृद्धि के साथ साथ उस क्षेत्र में सुरुचिपूर्ण मनोरंजन साधनों को भी माँग है। रामलीला रामलीला के नाम कुछ ऐसा वैसा चलता भी है और जिन्होंने वैसे अभिनय संस्थान बना रखे है वे निरंतर व्यस्त भी रहते हैं और धन भी कमाते हैं यदि युग की आवश्यकता के अनुरूप परिष्कृत साधनों से सम्पन्न ऐसी मंडलियाँ बनाई जा सके तो उनका स्वागत करने के लिये उससे कही अधिक क्षेत्र तैयार मिलेगा जितना कि सिनेमा में अब तक घेर पाया है।

वानप्रस्थों का जन-संपर्क इस क्षेत्र में रुचि लेने वाले लोगों को प्रोत्साहित कर सकता है। वे उनकी व्यवस्था जुटाने में सहायता कर सकते हैं और शुभारम्भ को प्रौढ़ता तक पहुंचाने में अपना मार्ग दर्शन एवं सहयोग देकर युग की एक उपयोगी आवश्यकता पूरी कर सकने में सफल हो सकते हैं।

सुरुचिपूर्ण चित्रों का, आदर्श वाक्यों के प्रकाशन प्रचलन का आरम्भिक श्री गणेश युगनिर्माण योजना ने किया है पर उसका विस्तार अभी हजारों गुना होना शेष है हर घर में प्रेरणाप्रद वाक्य और सद्भावना उभारने वाले चित्र टाँगे जाने की पृष्ठभूमि बन सके तो उससे लोक-चिन्तन की दिशा उलटने में भारी सहायता मिल सकती है।

रेडियो का प्रचलन बढ़ जाने से यो ग्रामोफोन पीछे पड़ गया, पर अभी भी हर उत्सव आयोजन में लाउडस्पीकरों से रिकार्ड बजाये सुनाये जाते हैं। रेडियो वाले भी बहुत करके संगीत सुनाने के नाम पर रिकार्ड ही बजाते रहते हैं यदि प्रेरक रिकार्ड सुलभ हो तो कोई कारण नहीं कि उनकी आवाज वातावरण में गूँजती न सुनाई पड़े। कोई कारण नहीं कि उनकी गुनगुनाहट सर्व साधारण की जीभ पर नाचती थिरकती दृष्टिगोचर न हो। नवनिर्माण की प्रेरणा से भरे हुये ग्रामोफोन रिकार्ड बनाने की योजना का आरम्भ भी युगनिर्माण योजना ने किया था आरम्भ में 100 रिकार्ड बनाने की योजना थी ताकि फैल फूट कर उनके विक्रय ओर प्रसार की सुव्यवस्थित और सुविस्तृत योजना चलाई जा सके, हर जगह अपने विक्रय केन्द्र खोले जा सके। इस योजना के अंतर्गत रिकार्ड बने भी वे बहुत लोकप्रिय हुये और पहला निर्माण हाथों हाथ बिक गया। नये निर्माण के लिए एक लाख रुपयों की पूँजी आवश्यक हुई, जिसे जुटाया न जा सका और योजना जहाँ की तहाँ पड़ी रह गई। भले ही व्यवसाय आधार पर सही, यदि इतनी पूँजी की व्यवस्था हो सके तो अभी भी उस योजना को कार्यान्वित किया जा सकता है और उसका बौद्धिक क्रान्ति के क्षेत्र में एक नया अध्याय जुड़ सकता है।

उपरोक्त स्तर के ऐसे अनेक कार्य है जो जन-जागरण की महती भूमिका प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके लिये व्यक्तियों और साधनों की कमी नहीं रह सकती। पर कठिनाई यह है कि प्रेरणा और पुकार अपने स्थान पर खड़ी चीखती चिल्लाती रहती है और उपयोगी व्यक्तित्व तथा प्रचुर साधन दूसरे स्थान पर मरे-मूर्छित पड़े रहते हैं दोनों को एक दूसरे से मिलाने की कड़ी कही जुड़ ही नहीं पाती। समय-समय पर पत्रिकाओं में लेख भर छप जाते हैं। इतने भर से कुछ कारगर प्रयोजन पूरे नहीं हो सकते हैं। यह सब तो कार्य क्षेत्र में उत्तर कर साधनों की आवश्यकता के साथ गठबन्धन कराने के लिए गहरी ढूंढ़-खोज करने पर - अभीष्ट संपर्क साधनों पर ही सम्भव हो सकता है यह कड़ी जोड़ने में वानप्रस्थों की परिव्रज्या अपने ढंग की अनोखी भूमिका प्रस्तुत कर सकती है। महत्वपूर्ण योजनाएँ जो अनव्याही बैठी है उनके हाथ पीले हो सकते हैं और इस प्रकार के अभिनव सृजन सामने आ सकते हैं जिनके आधार पर समग्र उत्कर्ष का विश्वास सुनिश्चित सम्भावना बनकर राष्ट्र के आंगनों में किलकारियाँ भरने लगे।

भावनात्मक उत्कर्ष के संदर्भ में एक और भी महत्वपूर्ण तथ्य है - सिनेमा। सर्वविदित है- भारत में जितनी भी कुल मिलाकर अखबारों की ग्राहक संख्या और रेडियो सुनने वालों की संख्या है उसके सम्मिलित योग से भी अधिक सिनेमा देखने वालों की दैनिक संख्या बैठती है। इनके दर्शकों में घटिया से घटिया और बढ़िया से बढ़िया स्तर के लोग होते हैं । प्रचार की दृष्टि से सिनेमा क्षेत्र की तुलना और कोई माध्यम नहीं कर सकता। यदि प्रेरक फिल्में बनने लगे तो वे अवश्य ही अच्छी तरह चलेंगी ओर निहित स्वार्थों द्वारा फैलाया हुआ यह क्रम सर्वथा निराधार सिद्ध होगा कि “भारतीय जनता कुरुचिपूर्ण चित्र ही देखती है। दर्शकों में ओछे और फूहड़ लोग ही अधिक है।” इन्हीं दिनों कुछ अच्छे आदर्शवादी फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बनाने वाले लोगों की बोलती बन्द हो गई है वे सिनेमा दर्शकों की कुरुचिपूर्ण और स्तर विहीन सिद्ध करने वाले अपने पुराने प्रलाप को वापिस लेने के लिए विवश हुए है।

जन जागरण की-व्यापक विकृतियों के उन्मूलन की आवश्यकता पूरी कर सकने वाली अत्यन्त प्रेरक फिल्म बनाई जा सकती है और उनके निर्माताओं को यह विश्वास दिलाया जा कसता है कि आदर्शवादी उद्देश्य लेकर इस क्षेत्र में प्रवेश करना घाटे का नहीं वरन् लाभ के साथ-साथ यश और पुण्य कमाने का यह तीन गुना लाभदायक कार्य है। पूँजी को उपयोगी ओर लाभदायक उद्योगों की प्यास है पर उसे दिशा दर्शन नहीं मिलता। प्रभावशाली अर्थ क्षेत्र से परिचित वानप्रस्थ उपयुक्त व्यक्तियों को लिमिटेड या प्राइवेट स्तर के ऐसे अर्थ संस्थान खड़े करने के लिए बना सकते हैं जो फिल्म उद्योग क्षेत्र में आदर्शवादी सिद्धान्तों के साथ प्रवेश करके युग की महान सेवा करने के लिए अग्रसर हो। ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं जो लोकमानस के परिष्कार में अनुपम योगदान कर सकते हैं। वानप्रस्थों का जन संपर्क इस प्रकार के अनेक आधार भी धर्म प्रचार के साथ-साथ ही प्रस्तुत करता रह सकता है।


यह पुण्य परम्परा अग्रगामी बनाई जाय

देश में मिशनोँ की कमी नहीं, वे पहले से ही बहुत थे। तब तो और भी नित्य नये बनते और खुलते चले जा रहे है। यो इन सभी के पीछे सदुद्देश्यों के घोषणा पत्र छपे रहते हैं पर इनमें अधिकाँश का निर्माण व्यक्तिगत यश लोलुपता की पूर्ति के लिए होता है अमुक व्यक्ति की परोपकारी- लोक सेवी- श्रेय साधकों में गणना होने लगे, जनता उन्हें जाने और सम्मान प्रदान करे- संचित सम्मान के आधार पर प्रकारांतर से आर्थिक लाभ व दूसरे लाभ उठाये-प्रायः ऐसे ही छोटे कारण नई-नई संस्थाओं को जन्म देते हैं। इतने पर भी उन ठोस मिशनों की संस्था संगठनों की, कमी नहीं जो वस्तुतः सदुद्देश्य को लेकर ही विनिर्मित हुए है और जिनके पीछे व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ नहीं वरन् विशुद्ध परमार्थ भावनाएँ ही काम करती है। उन्हें तो बढ़ना और फलना फूलना ही चाहिए था पर दुर्भाग्य इस बात का है कि बरसाती मेढक भले ही बन्द हो जाते पर उनका विकास तो होना ही चाहिए था, जो ठोस आधार और उच्च उद्देश्य को लेकर चले है। प्रगति-प्रवाह उनका भी अवरुद्ध हो जाना निश्चय ही एक दुखद विडम्बना है।

कारण की गहराई से तलाश करने पर निष्कर्ष एक ही उभर कर आता है कि मिशन तो है पर मिशनरियों का पता नहीं।” महत्व संस्थानों का नहीं उन व्यक्तियों का है जो बीज की तरह गल कर संगठनों के विशाल वृक्ष विनिर्मित करते हैं। त्याग और बलिदान का खाद पानी पाये बिना-प्रखर व्यक्तित्वों का श्रम संरक्षण पाये बिना किसी मिशन का फलना फूलना संभव नहीं। नींव में मजबूत पत्थर भरे हो तो ही सुदृढ़ इमारत खड़ी हो सकेगी यह कार्य मिशनरी अपने समय श्रम का हाड़-माँस का- त्याग बलिदान का अनुदान देकर ही पूरा करते हैं और उसी पोषण को पाकर मिशन विशालकाय वट वृक्ष के रूप में परिणत विकसित होते हैं यह आवश्यकता पूरी न की जा सकी तो फिर संस्थापित मिशनों में से किसी का भी समुचित विकास न हो सकेगा वह लैटरपैड, रजिस्टर और बोर्ड की विडम्बना में ही उलझे हुए जहाँ अवरुद्ध पड़े रहेंगे।

इस संदर्भ में ईसाई मिशनरियों का उदाहरण सामने है। उनमें प्रायः सभी सुशिक्षित और प्रतिभावान होते हैं। वे चाहते तो सहज ही सुख सुविधा भरी परिस्थितियों में रह सकते थे किन्तु उच्च भावनाओं से प्रेरित होकर वे कष्ट साध्य जीवन स्वीकार करते हैं और पिछड़े हुए लोगों के साथ, साधन रहित क्षेत्रों में सेवा साधना निरत रहते हुए- बिना ऊबे-उकताये जिन्दगी गुजार देते है। उच्च भावना और सहृदय सेवा साधना की इस कसौटी पर हमारे साधु बाबा खरे नहीं उतरते। एक लाख ईसाई मिशनरी आज समस्त विश्व में अपने धर्म की अभिवृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं। हिन्दू धर्म जितना खर्च अपने धर्म आडंबरों पर करता है उससे कही कम ईसाई मिशनों का खर्च है। हमारे साधु 56 लाख से बढ़ कर 80 लाख हो गये। कहाँ एक लाख पादरी कहाँ अस्सी लाख साधु। अस्सी गुनी यह जनसंख्या यदि भावना सम्पन्न रही होती तो 9 लाख गाँवों का कायाकल्प हो गया होता हर गाँव पीछे प्रायः 12 बाबा जी आते और उनके द्वारा सेवा एवं सुधार के विभिन्न प्रयोजनों की ऐसी पूर्ति हो सकती थी जिससे ग्रामीण क्षेत्र में स्वर्ग की आभा बिखरी हुई दिखाई देती। इतनी जन शक्ति भारत में तो क्या समस्त विश्व में हिन्दू धर्म की गौरव गरिमा ना कर सकने में समर्थ हो गई होती। ईसाई मिशनरियों की अपेक्षा हमें अस्सी गुनी सफलता मिलती। देश का एक बालक भी विधर्मी ने बनता वरन् संसार की आध्यात्मिक क्षुधा बुझाते हुए हम भारतीय तत्व दर्शन की छाया में अगणित आकुल आत्माओं को शान्ति प्रदान कर सकने में समर्थ हो गये होते।

सन्तों की बात जाने भी दें तो भी लोक सेवा के सार्वजनिक क्षेत्र में उदात्त भावना। सम्पन्न कार्यकर्ता रहे होते तो सदुद्देश्य पूर्ण मिशनों को ऊर्ध्वगामी बनने का समुचित अवसर मिल गया होता। सरकार स्वयं एक मिशन है। यदि शासकीय कर्मचारियों में मिशनरी जैसी भावना रही होती तो वे उस महान संस्था के माध्यम से न जाने कितना बढ़ा-चढ़ा लोक कल्याण इन्हीं आज की अभाव ग्रस्त परिस्थितियों में कर सकने में समर्थ हो गये होते। जनता स्तर पर चल रहे धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक तथा अन्यान्य प्रकार के संस्था संगठनों - मिशनों द्वारा इतना उत्कर्ष हो गया होता जिसके बल पर देश का वातावरण कैसे से कैसा बन गया दिखाई पड़ता। पर दुर्भाग्य एक ही है मिशन बहुत हैं- मिशनरी नहीं। सेवा का आडम्बर कागज के बड़े रावण की तरह गगनचुम्बी बन कर खड़ा है पर सहृदय सेवा साधना की आन्तरिक पीड़ा किसी-किसी में ही कसकती दिखाई देती है स्पष्ट है कि जब तक मिशनरियों की आवश्यकता पूरी न की जायगी तब तक सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में केवल निर्माण ओर उत्थान की निर्जीव हल-चले भर होती रहेगी उनके पीछे प्राण प्रेरणा का अभाव बना रहा तो कोई ठोस परिणाम सामने न आ सकेगा। पिछड़ापन दूर करने का स्वप्न साकार न हो सकेगा। प्रगति की स्वर्णिम कल्पनाएं कभी भी मूर्तिमान न बन सकेंगी।

हमारा प्रबल प्रयास ऐसे मिशनरी उत्पन्न करने का होना चाहिए जो यश लोलुपता से प्रेरित होकर नहीं आन्तरिक प्रेरणा से-आत्मा की परमात्मा को प्राप्त करने की आकाँक्षा से- सेवा क्षेत्र में उतरें और धर्मधारणा एवं ईश्वरीय पूजा मान कर पवित्रतम मनःस्थिति में तत्परता प्रदर्शित करे। त्याग और बलिदान को जो योग साधना एवं तपश्चर्या के स्तर की श्रेय साधना माने। ऐसे लोग ही अपनी उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता के आधार पर विश्व मानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे। कहना न होगा कि वानप्रस्थ परम्परा इसी महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुई थी। उसका पुनः प्रचलन कर सकना यदि सम्भव हो सके तो निश्चित रूप से मिशनरी वर्ग की अभाव पूर्ति हो सकेगी और हमारा श्मशान जैसा सार्वजनिक क्षेत्र हरे भरे उद्यान का रूप धारण कर सकेगा।

आज की विश्वव्यापी मानवी दुर्दशा पर जिन्हें वस्तुतः दुख है, जिनके मन में विकृतियों के प्रति सचमुच आक्रोश है, जिन्हें उत्कर्ष-उत्थान के नवयुग में तथ्यतः आस्था हो-उनका पवित्रतम कर्तव्य यह हो जाता है कि मिशनरी उत्पन्न करने की महान परम्परा वानप्रस्थ का सच्चे मन से समर्थन करे और उसे कार्यान्वित होने के लिए आवश्यक वातावरण विनिर्मित करे। अनुभवी, भावना सम्पन्न, सुयोग्य, कर्मठ एवं अवैतनिक लोक सेवियों की विशाल काय सेना और किसी प्रकार गठित, विनिर्मित हो ही नहीं सकती।

वानप्रस्थ में प्रवेश करने की आवश्यकता और उपयोगिता लेखों ओर भाषणों में बताई समझाई जाती रही है। उसके लिए अनुरोध आह्वान किया जाता रहा है पर लोभ और मोह ग्रस्त मनः स्थिति में ऊपर उठना-सुविधाजनक अभ्यस्त परिस्थितियों को छोड़ना-कष्टसाध्य कार्यपद्धति अपनाना प्रायः सम्भव ही नहीं हो पाता। गृहकार्यों से जिन्हें निवृत्ति मिल चुकी है वे भी चैन के दिन काटने के सिवाय और कुछ सोचते ही नहीं। परमार्थ का प्रसंग आता है तो नाम जप और कथा सत्संग के हलके फुलके खेल-खिलौनों से मन बहला लेते हैं। प्रबल प्रेरणा के अभाव में कोई साहसिक कदम बढ़ा सकना उनके लिए संभव ही नहीं होता। अतएव वानप्रस्थ में प्रवेश का आह्वान ऐसे ही हवा में छितरा जाता है। अब हमें यथार्थताओं का सामना करना पड़ेगा। अस्तु सृजन-सेना की आवश्यकता पूर्ति के लिए कुछ बढ़े-चढ़े कारगर प्रयास करने के लिए कटि बद्ध होना होगा। इस संदर्भ में एक आवश्यक कार्य है कि अपने क्षेत्र में जिनकी भी स्थिति वानप्रस्थ में प्रवेश कर सकने के उपयुक्त हो उनके साथ संपर्क बढ़ाये एक-एक कदम उन्हें सिखाये समझाये और स्थिति यहाँ तक आये कि उन्हें सक्रिय रूप से परमार्थ परायण होने के लिए उत्साह, उमंगे और बचे खुचे कूड़े करकट जैसी समय की खाद बन विश्व वाटिका को सुविकसित बनाने के लिए समुचित हो सके।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य की इस प्रयोजन में सक्रिय अभिरुचि लेनी चाहिए। अपने संपर्क क्षेत्र में जो भी उसके लिए उपयुक्त हो उन्हें इस अंक को आग्रह पूर्वक पढ़वाना चाहिए। बार-बार चर्चा करनी चाहिए ओर बात को क्रमिक रूप से इस प्रकार आगे बढ़ाना चाहिए कि उनका मन जीवन लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाने की आवश्यकता अनुभव करने लगे। अपने घर के ढलती आयु के लोगों के लिए यह सुविधा उत्पन्न करनी चाहिए कि वे चाहे तो शेष जिम्मेदारियों को घर के अन्य जिम्मेदार लोगों के कन्धों पर आर्थिक रूप से या पूरी तरह से छोड़ते हुए निश्चिन्तता पूर्वक अग्रगामी कदम बढ़ा सके। इसके लिए न केवल ढलती आयु वालों को तैयार करना चाहिए वरन् उनके बड़े लड़कों को छोटे-भाइयों को भी तैयार करना चाहिए। यदि छोटे बच्चों की जिम्मेदारियों से पूरी निश्चितता मिल गई है तब तो बात की दूसरी है अन्यथा बड़े लड़कों या भाइयों का सहयोग अपेक्षित हो सकता है। सच्चे मित्र या अन्य सम्बन्धी भी इस प्रकार का सहयोग कर सकते हैं। घर में खेती की-ब्याज भाड़े की-आमदनी कामचलाऊ मात्रा में हो तब तो सरलता और भी अधिक रहती है।

संचित पूँजी को बच्चों के स्वावलम्बी बनने तक पूरी तरह खर्च कर डालने से भी बात बनती हो तो ऐसा सोचना भी सराहनीय है। बेटे पोतों को बैठे-बैठे खाने के लिए जो धन उत्तराधिकार में छोड़ा जाता है वह निरर्थक है। उन्हें स्वावलम्बी जीवन जीने देना चाहिए और उनकी शिक्षा शादी होने की अवधि तक संचित सम्पदा समाप्त कर देने की बात सोचनी चाहिए। यह बुद्धिमत्ता पूर्ण कदम है। इससे बच्चे स्वावलम्बी ही नहीं सद्गुणी भी बनेंगे, साथ ही अपने लिए परमार्थ प्रयोजन में जीवन लगा सकना सरल हो जायगा। इस प्रकार के सुझाव देकर प्रभावशाली व्यक्ति अपने परिचय क्षेत्र में से कई उपयुक्त लोगों को वानप्रस्थ की प्रेरणा दे सकते हैं उनकी समस्याओं को सुलझाने में मदद देकर पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

अपनी स्वयं की तैयारी हमें इसी स्तर पर करनी चाहिए उपयुक्त समय आने तक आवश्यक उत्तरदायित्वों से कैसे निपटा जाय, इसकी पूर्व योजना मस्तिष्क में घुमड़ती रहे तो कुछ न कुछ मार्ग समय आने तक निकल ही सकता है। दूसरों को प्रेरणा देने का सबसे अच्छा मार्ग अपनी भावी योजना को समय से पूर्व सभी को बता देने से भी बहुत काम हो सकता एक तो कदम बढ़ाते देख कर दूसरों को भी उसी मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहन प्राप्त होता है।

पत्नी को गृह प्रबन्ध के लिए बेटे पोतों की देख भाल के लिए छोड़ा जा सकता है बीच-बीच में घर आते रहने की पूरी तरह छूट रहती है ऐसी दशा में उन्हें न कोई अड़चन अनुभव होनी चाहिए और न आपत्ति करनी चाहिए। विचारशील महिलाएँ अपनी थोड़ी सी सुविधा के लिए अपना अपने पति का समाज का कल्याण रोकने में बाधक नहीं बनती। अधिक अविवेक या मोह ग्रस्तता हो तो उन्हें समझाया जा सकता है कि साधु संन्यासी बन कर सदा सर्वदा के लिए घर छोड़कर भाग निकलने जैसी कोई बात नहीं हो रही है कदम इतना भर है कि घर के कार्यों से अधिक समय परमार्थ प्रयोजनों के लिए दिया जाय।

पहले ही बताया जा चुका है कि जो परिवार की ओर से पूर्ण निश्चित है वे दूर क्षेत्रों में परिव्राजक बन कर अधिक समय बाहर जा सकते हैं। जिनके ऊपर घर की जिम्मेदारियाँ शेष है वे घर परिवार की देखभाल करते हुए प्रतिदिन चार घण्टा या अधिक समय अपने क्षेत्र में लोक मंगल का कार्य करने में लगा सकते हैं ऐसे लोगों को तो घर छोड़ने जैसी कोई बात है ही नहीं। अस्तु काम चलाऊ व्यवस्था यदि बनी रहती है तो मोहवश घर परिवार वालों को इस पुण्य व्रत धारण में बाधक नहीं ही बनता चाहिए। पूर्व तैयारी के रूप में यदि पत्नियों को कमाऊ स्वावलम्बी एवं परिवार व्यवस्था में प्रवीण अनुभवी बनाया गया है तब तो और भी अधिक सरलता रह सकती है।

यों पत्नियों को साथ रख कर भी वानप्रस्थ प्रक्रिया चल सकती है। पति-पत्नी मिलकर और भी अधिक कार्य कर सकते हैं पर यह हो तभी सकता है जब पत्नी को पहले से ही सेवा भावी एवं सुयोग्य बना लिया गया हो। अयोग्य और सेवा संदर्भ में अड़ंगे अटकाते रहने वाली पत्नी को साथ लेकर वानप्रस्थ के लिये निकल पड़ना तो मूल प्रयोजन को ही नष्ट करना है हाँ, यदि घर पर उनके रहने की व्यवस्था न हो तो मथुरा या हरिद्वार रह कर वे भी सेवा परायण कार्य पद्धति में प्रवृत्त रहने की शर्त पर निवास कर सकती है। बैठे ठाले रोटी तोड़ने की बात तो वहाँ भी नहीं बनेगी।

इन गुत्थियों को सुलझाते हुए वानप्रस्थ में प्रवेश करने की सुविधा अनेक व्यक्ति प्राप्त कर सकते हैं। आमतौर से परिस्थितियों की गुत्थियाँ उतनी जटिल नहीं होती जिन्हें सुलझाया न जा सके मूल कठिनाई मनुष्य की स्वार्थ परता, संकीर्णता ओर नस नस में भरी मोह ग्रस्तता की होती है सेवा धर्म का महत्व अपने देश में कोई समझता भी नहीं। किसी के मन में परमार्थ की बात आती है तो फिर बात छत से गिर कर छजली पर अटक जाने जैसी बन जाती है। भजन करना और स्वर्ग मुक्ति पाना लोगों को सबसे सरल और सस्ता तरीका प्रतीत होता है सो उन बालक्रीड़ाओं में उलझ कर जीवन लक्ष्य की पूर्ति और ईश्वर प्राप्ति जैसे महान प्रयोजनों पूर्ति के सपने देखने लगते हैं। सेवा धर्म की बात उन्हें सूझती ही नहीं- आत्मचिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के तथ्य उनके सामने रहते ही नहीं। ऐसी दशा में वानप्रस्थ की उपयोगिता बेचारे समझ भी कैसे सकेंगे।

बहुत हुआ तो निवृत्ति और शान्ति प्राप्ति के बहाने किसी आश्रम में कमरा बना कर जिन्दगी के सड़े मरे दिन गुजारने के लिए जा पड़ते हैं और देश दर्शन की कथा भजन की लकीर पीटते हुए समय गुजरते हैं। इन दिनों वानप्रस्थ संन्यास की यही अर्ध मृतक जैसा जीवन कम है कई चतुर लोग तो अपनी प्रचुर सम्पत्ति बेटे-पोतों को बाँट जाते हैं ओर भिक्षा की रोटियाँ खाकर प्रकारांतर से घर वालों को ही लाभान्वित करते हैं। ऐसी मोह ग्रस्त विडम्बना को उपहासास्पद ही कहा जा सकता है। जरा जीर्ण मनुष्य घर वालों से सेवा लेने का व्यावहारिक मार्ग छोड़ कर अपना भार किन्हीं आश्रमों पर डाले तो यह लोक सेवा कहाँ हुई यह तो समाज पर उलटा भार बढ़ाना हुआ। वानप्रस्थ तो उस आयु में लिया जाना चाहिए जब कि कम से कम दस पन्द्रह वर्ष तो कस कर काम कर सकने की क्षमता शरीर और मन में शेष रह गई हो।

उपरोक्त तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें उपयुक्त व्यक्तियों को प्रेरणा देते हुए वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करना चाहिए। उन्हें प्रारम्भिक प्रशिक्षण के लिए छह महीना शांतिकुंज रहने के लिए भेजना चाहिए। आमतौर से शिक्षार्थी अपना भोजन व्यय स्वयं उठाते हैं। जो लगभग पचास रुपया मासिक पड़ता है। पर जिनकी स्थिति यह व्यय भार वहन करने की नहीं है उनके लिए अन्य उपाय सोचा जा सकता है जो लोग स्वयं वानप्रस्थ लेने की स्थिति में नहीं है किन्तु दूसरों को इससे लाभान्वित करना चाहते हैं वे ऐसे वानप्रस्थ शिक्षार्थियों के लिए शिक्षा काल की अर्थ व्यवस्था जुटाने में सहायता कर सकते हैं।

वानप्रस्थ के लिए ढलती आयु की बात-उत्तरार्ध की बात - पचास वर्ष से आगे की बात-मुख्यतया इसीलिए सोची गई है कि तब तक घर परिवार की जिम्मेदारियों से बहुत कुछ छुटकारा मिल जाता है। जिनके सामने इस प्रकार की अड़चन नहीं है उनके लिए आयु सम्बन्धी प्रतिबन्ध का कोई महत्व नहीं। मौत तो कभी हो सकती है। इसलिए पूर्वार्ध तक किशोर स्थिति या नव यौवन से भी गिना जा सकता है और वह समय भी वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त हो सकता है। मनःस्थिति यदि वित्तेषणा, पुत्रेषणा लोकेषणा से ऊँची उठ गई है। सम्पन्नता, विषय लोलुपता और यश लिप्सा की ललक यदि काबू में आ गई है और परिवार की जिम्मेदारियों का भार नहीं है तो हर आयु वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त हो सकती है।


नारी उत्कर्ष के लिये महिला वानप्रस्थों की आवश्यकता

आमतौर से यह समझा जाता है कि वानप्रस्थ-संन्यास आदि माध्यमों का अवलम्बन लेकर परमार्थ जीवन में प्रवेश करने का अधिकार केवल पुरुषों को ही है, महिलाओं को घर गृहस्थी के काम ही सँभालने चाहिए। परिवार के उत्तरदायित्वों से निवृत्ति मिलने की स्थिति होने पर भी उन्हें घर में ही रहना चाहिये। अधिक से अधिक यह सोचा जा सकता है कि यदि पति वानप्रस्थ ग्रहण करे तो उसकी सेवा-सहायता के लिए वह भी साथ जा सकती है। इन्हीं मान्यताओं का प्रचलन रहने के कारण अपने देश में परमार्थ परायण महिलाओं की संख्या अत्यन्त स्वल्प ही दृष्टिगोचर होती हैं फिर कही कोई है भी तो उनका कार्यक्षेत्र किसी कुटी आश्रम तक सीमित रह रहा होगा-परिव्राजक जीवन बिताने की रीति-नीति अपनाने का साहस कोई बिरली ही कर पा रही होंगी।

इस स्थिति को बदला जाना चाहिए और वातावरण ऐसा उत्पन्न किया जाना चाहिये, कि उत्तरदायित्वों से निवृत्त महिलाओं को भी विश्व मानव के पुनरुत्थान अभियान में उत्साहपूर्वक नियोजित किया जा सके।

सर्वविदित है कि सामान्यतया समस्त संसार में और विशेषतया भारतवर्ष में नारी को मानवी अधिकार की दृष्टि से दूसरे दर्ज का नागरिक माना जाता है। उसकी गणना पुरुष की उपयोग सामग्री में की जाती है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक उसे वाधिक-प्रतिबन्धित स्थिति में कारागृह के कैदी की तरह पुरुष की दया पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना पड़ता है। प्रजनन का अतिरिक्त उत्तरदायित्व उसे ही वहन करना पड़ता है, शिशु पोषण का भार उसी पर पड़ता है- इस स्थिति में वह उपार्जन की क्षमता खो बैठती है। पुरुष उसे रोटी देता है, उसके बदले में वह उस पर इतने अमानवीय प्रतिबन्ध लगता है, जो पशुओं से भी गये बीते होते हैं।

पशु वर्ग में मुँह पर घूंघट डालने का- स्पष्ट शब्दों के साथ मुँह न खोल सकने का प्रतिबन्ध कहाँ है? पर मनुष्य समाज में वैसी प्रथा प्रचलित है और उसे कुलीनता का चिन्ह माना जाता है व्यभिचार की बात ले तो पुरुष को उस संदर्भ में खुली छूट है पर यदि नारी से कभी कोई ऐसा कदम उठा जाय तो उसकी खैर नहीं। परित्याग किये बिना या प्राण लिए बिना पति को- ससुराल वालों को- चैन ही नहीं। दोष अकेली नारी का ठहराया जाता है, मानो पुरुष पर तो उस तरह का कोई प्रतिबन्ध था ही नहीं। पाप, दोष और दण्ड की भागिनी तो अकेली नारी ही है। विवाह की आचार संहिता में भी ऐसे ही जमीन आसमान जैसे अन्तर रखे गये है। पुरुष कई विवाह कई बच्चों के रहते हुये भी कर सकता है। पर नारी इस प्रकार के अधिकारों से वंचित है। विधुर और विधवा के लिए विवाह की आचार संहिता एक जैसी कहाँ है?

नारी को सुसज्जा एवं श्रृंगार की अनुगामिनी बनाने के लिए पुरुष की कामुक, कुचेष्टा ही उत्तरदायी है। चूँकि उसे रमणी और कामिनी का कलेवर अधिकाधिक आकर्षक एवं उत्तेजक चाहिए इसलिए नारी को ऐसे मनोवैज्ञानिक जाल-जंजाल में फंसा दिया गया है कि वह पुरुष की इच्छापूर्ति के लिए कठपुतली का अभिनय स्वेच्छापूर्वक करने लगे। नारी की प्रशंसा उसके यौवन और सजधज के साथ जोड़ दी गई है। ऐसी दश में उसे अपनी मनःस्थिति ऐसी ही ढालनी पड़ी है ताकि वह अधिकाधिक आकर्षक दीखने लगे। इसमें कितनी करुणाजनक विवशता और पराश्रियता दृष्टिगोचर होती है। बेचारी कितनी पर मुखापेक्षी हो गई इसे देखकर रुलाई आती है। यदि शृंगारिकता आवश्यक ही थी तो पुरुषों को भी वैसी ही टीपटाप भरी चित्र विचित्र स्थिति में रहना चाहिए था। उसकी केश सज्जा-हाथों में मेंहदी, शिर पर बिन्दी मांग में सिन्दूर और पैर में बिछुए- होठों पर लाली आंखों में काजल लगाकर ही घर से बाहर निकलना चाहिए था सुसज्जा और शृंगारिकता यदि अच्छी बात है तो नारी की तरह ही वह भी उसे क्यों न अपनाये?

बाध्य सन्तानोत्पादन ने नारी के स्वास्थ्य को कितना जर्जरित करके रख दिया है-प्रसव में कितनी बड़ी संख्या में वे आये दिन मक्खी-मच्छरों की तरह प्राण गँवाती हैं इस प्रथा प्रचलन में आये हुए हत्याकाँड को देख कर छाती फटती है। रुग्ण नारी को भी बख्शा नहीं जाता कि वह जो कष्ट सह रही है उसे वहन करने से छुटकारा मिलने तक वह प्रजनन के अतिरिक्त कष्ट से बची रह सके। उसकी विवशता दुहरा त्रास सहने के लिए बाध्य करती है और अन्ततः अकाल मृत्यु की गोद में जाकर ही उसे पुरुष के अत्याचार से छुट्टी मिलती है।

लम्बा चौड़ा दहेज देने की स्थिति पिता की न हो-लड़की उर्वशी के कम रंग रूप वाली हो-काली कुरूप हो तो उसे रद्दी नीलामी माल की तरह हर जगह दुरदुराया जाता है बेचारी को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है। ऐसी लड़कियां आजीवन कुमारी रहती। बूढ़ों के गले मढ़ी जाती- आत्म-हत्या करती और ऐसी ही किन्हीं दर्दनाक स्थिति में पड़ी पाई जाती है लड़कों को तो रूप की प्यास है चमड़े का रंग और नख-शिख का बनाव यदि वेश्या नर्तकियों से मिलता जुलता हो तो ही वह वर महोदय की आंखों में चढ़ेगी अन्यथा विवाह के दिन से लेकर मौत के दिन तक उसे पग-पग पर अपमान और उपेक्षा की लाठियों से ही पीटा जाता रहेगा। कुत्ते की तरह रोटी के टुकड़े किसी प्रकार मिलते रहे तो बात दूसरी है। ऐसी घटनाओं की संख्या कम नहीं जिसमें कुरूप वधू से पिण्ड छुड़ाकर सुन्दर नई नवेली लाने के लिए उस बेचारी के प्राण हरण कर लिए गये। ससुराल के वातावरण में वधू अकेली पड़ती है- वहाँ उसका कोई अपना नहीं होता, ऐसी दशा में उसकी जान ले लेने के अनेक मन्द एवं तीव्र तरीकों में से कोई आसानी से अपना लिया जाता है। पिता विवाहित लड़की को घर रखने में अपनी बेइज्जती समझता है, ससुराल में उसकी आवश्यकता नहीं- ऐसी दशा में बाधित मरण ही उसे दयनीय स्थिति से छूटने का रास्ता रह जाय तो इसे कितनी मर्मवेधी स्थिति कहा जायगा। गोदी में आये बच्चों के पालन का कोई आश्रय न देखकर नारी को आजीवन अनवरत पददलित स्थिति शिरोधार्य करने के लिए बाध्य होना पड़े तो इसे परिस्थितियों पर पिशाच का खूनी पंजों वाला साम्राज्य छाया हुआ ही माना जा सकता है।

ऐसे ही अनेक कुचक्रों में चिर अतीत से पिसती चली आ रही नारी को भी नव-युग से न्याय पाने की आशा करनी चाहिए। उसके साथ बरते जाने वाले निर्मम शोषण का अन्तर होना चाहिए। प्रगति के द्वारा उसके लिए भी खुलने चाहिए। मानवी अधिकार की प्रकाश किरणें उस तक भी पहुँचनी चाहिए। यह कार्य अनायास ही सम्पन्न नहीं हो सकता। अनीति से त्राण किसी देश या समाज को ऐसे ही अपने आप मिल गया हो ऐसा कहाँ हुआ है? कब हुआ? जो अनीति, प्रथा परम्परा बन कर औचित्यों को संज्ञा तक जा पहुँचती है, उसकी जड़े उखाड़ना कितना कठिन पड़ता है इस तथ्य को सहज ही समझा जा सकता है। इसके लिए प्रचारात्मक और संघर्षात्मक विविध मोर्चे खड़े करते रहते हैं। नारी के पुनरुत्थान में उससे कही अधिक बड़े और गहरे प्रयास करने पड़ेंगे जैसे कि राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए समय-समय पर करने पड़े है।

नारी को न्याय मिले-उसे अनीति उत्पीड़न से राहत मिले-मानवी अधिकारों का वह भी उपयोग कर सके इसके लिए सदियों पुरानी मूढ़ताओं और दुष्टताओं से लोहा लेना पड़ेगा। नारी को इस योग्य बनाना पड़ेगा कि वह अपनी दयनीय स्थिति को समझ सके और उससे त्राण पाने के लिए आकुलता जागृत कर सके। इसके लिए आरम्भिक कदम नारी शिक्षा ही हो सकती है। ऐसी शिक्षा जो न केवल अक्षर ज्ञान कराके उसे नौकरी चाकरी कर सकने लायक ही बना भर दे वरन् उसे अपनी आत्मा और स्थिति का भी स्मरण दिला सके। कुछ कर गुजरने की हिम्मत और दिशा प्रदान कर सके। इसके लिये कितना कुछ करने के लिए आकाश जैसा विशाल काय कार्यक्षेत्र सामने पड़ा है पर उसे संभाल सकें ऐसे देव-मानवों का सब ओर घोर अभाव ही दीख रहा है।

नारी सेवा के नाम पर उन्हें कटाई सिलाई सिखा देने की उद्योगशालाएँ जहाँ-तहाँ खुलती दिखाई पड़ती है। मानो नारी को दुःख एकमात्र रोटी न मिलने का ही हो। इसी प्रकार शिक्षाशालाएँ भी यहीं तक अपना कर्तव्य पूरा कर लेती हैं कि लड़कियां उपाधि धारी बनकर अच्छा घर वार पा सकें या आवश्यकतानुसार नौकरी कर सकें। इस अधूरी शिक्षा से उनकी दयनीय सामाजिक दुर्दशा का अन्तर कहाँ हुआ? पेट भरने को तो पहले भी विधवाएँ चक्की, चरखा आदि का आश्रय लेकर गुजारा कर लेती थी अब भी वे रोटी बनाने, वर्तन माँजने का धन्धा अपनाकर अशिक्षित होने पर भी गुजारा कर सकती है। प्रश्न गुजारे का नहीं-उनकी आत्मा को जगाने का-सामाजिक अत्याचारों से मुक्ति दिलाने का है। इस युग की असली नारी शिक्षा का प्रयोजन यही होना चाहिए, और उसके लिए प्रौढ़ पाठशालाएँ नारी चल-पुस्तकालय, विचारगोष्टियां, सुधार वादी महिला संगठन, महिला जागरण का साहित्य प्रकाशन, चित्र प्रदर्शनियाँ आदि की विशाल शृंखला चलनी चाहिये। कढ़ाई, बुनाई सिखाने के स्कूल पर्याप्त नहीं।

ऐसे अर्थ-तन्त्र खड़े होने चाहिए जो निराश्रित नारी द्वारा उत्पादन कराये और उसकी खरीद विक्रय का सारा उत्तरदायित्व स्वरूप वहन करे। कार्यकर्त्री महिलाओं आवास-निवास एवं प्रशिक्षण का प्रबन्ध करे ताकि पीड़ित नारी को वहाँ आश्रय लेकर अपने बच्चों सहित राहत भरा जीवन जी सकने की सुविधा मिले। इस प्रयोजन के न जाने कितने प्रचार-कितने अधिक संस्थान खड़े करने पड़ेंगे। महिला जागरण के लिये-पुरुषों में न्यायबुद्धि उत्पन्न करने के लिए-समाज कर्णधारी नर-नारी के बीच प्रस्तुत असमानता हटाने को सहमत करने के लिए-न जाने कितने बड़े प्रयास करने पड़ेंगे। नारी पुनरुत्थान की योजनायें। इतनी गहराई के साथ खड़ी की जा सके तभी कुछ काम चलेगा। ऊपर की लीपा-पोती तो एक विनोद मात्र बनकर रह जायगी।

यह कार्य कौन करे? इन प्रयासों का नेतृत्व किसके हाथ में हो? इसका उत्तर सही उत्तर प्राप्त करने के लिए नारी का ही मुँह तकना पड़ेगा। उसे ही अग्रिम पँक्ति में खड़ा करना पड़ेगा। पुरुष का इसमें प्रबल समर्थन होना ही चाहिए। आवश्यक साधन उसे ही जुटाने चाहिए। पीढ़ियों से चले आ रहे पाप का प्रायश्चित वह उसी प्रकार कर सकेगा कि नारी जागरण के प्रचण्ड आन्दोलन खड़े करने के लिए वह अधिक से अधिक ध्यान केन्द्रित के और अधिक से अधिक साधन जुटाये। इतने पर भी इस महा अभियान का प्रत्यक्ष नेतृत्व नारी के ही हाथ में रहना चाहिए। अग्रिम पंक्ति में उसे ही खड़ा होना चाहिए। नारी से सीधा संपर्क स्थापित कर सकना-घरों में प्रवेश कर सकना-महिलाओं से जी खोलकर बाते कर सकना-उन्हें साथ लेकर चल सकना केवल नारी के लिए ही सम्भव हो कसता है वर्तमान स्थिति में-भारत जैसे पिछड़े देश में-पुरुष वर्ग के लिए इस क्षेत्र में अधिक गहरा प्रवेश कर सकना कठिन है।

लेख का आरम्भ महिलाओं के वानप्रस्थ की चर्चा के साथ हुआ था। वर्तमान परिस्थिति पुकारती है कि महिलाओं को नारी जागरण का व्रत लेकर अधिकाधिक मात्रा में वानप्रस्थी बनना चाहिए ओर जिस प्रकार पुरुषों के लिए पुरुषवर्ग में कार्यक्षेत्र खुला पड़ा है उसी प्रकार अछूते नारी क्षेत्र में प्रवेश करके उन्हें अपने विशिष्ट कर्तव्य पालन में जुट जाना चाहिए-पुरुषों को लैक्चर झाड़ने के लिए पहले से ही पुरुष उपदेशकों की भीड़ बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं उसी में कुछ नारियाँ भी घुस पड़े तो नारी के प्रति सहज आकर्षण होने का मनोविज्ञान उन्हें कुछ अधिक स्वागत प्रदान कर सकता है पर उससे काम कुछ न बनेगा। महिला प्रचारिकाओं का अपना अछूता क्षेत्र ही संभालना चाहिये और उसी के संदर्भ में सोचना, करना चाहिये। यो वे पुरुषों को भी आवश्यकतानुसार उद्बोधन करें-इसके लिये कोई बन्धन नहीं है पर स्मरण रहे वह उनका मुख्य कार्यक्षेत्र नहीं है संभालना तो उन्हें नारी जागरण को मोर्चा ही चाहिए, उनके प्रवचन एवं कर्तृत्व का केन्द्रबिन्दु नारी कल्याण की महती आवश्यकताओं की पूर्ति को ही निर्धारित किया जाना चाहिये इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए महिला वानप्रस्थिनियों की बहुत बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी। सो उसकी पूर्ति के लिए प्रत्येक विचारशील को प्रबल प्रयत्न करना चाहिए।

पुरुषों की तरह महिला वानप्रस्थों की भी दो श्रेणियाँ हो सकती है एक वे जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व अभी शेष है और जो घर परिवार की देखभाल करते हुए अपने स्थानीय क्षेत्र में नारी जागरण के लिए थोड़ा-बहुत समय निकालती रह सकती है दूसरी वे जो देशव्यापी धर्म-शिक्षण के लिए दूर-दूर तक जा सकने की सुविधा से सम्पन्न है जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व दूसरों के कंधों पर चल गये और बिना कठिनाई के परिव्राजक स्थिति अपना सकती है इसके अतिरिक्त महिला वानप्रस्थों का एक तीसरा वर्ग भी हो सकता है। जो अपने पति वानप्रस्थों के साथ कंधों से कन्धा मिलाकर काम करती रह सके। कुछ साधन सम्पन्न महिलाएँ छात्रावासों को अथवा सुयोग्य सम्बन्धियों को बच्चों के उत्तरदायित्व सँभालकर भी सेवाक्षेत्र में उतर सकती है।

विधवाओं, परित्यक्ताओं ओर बड़ी आयु वाली कुमारियों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिनके लिए अब विवाह के द्वार एक प्रकार से बन्द ही हो चुके है। बच्चों के उत्तरदायित्व जिन पर नहीं है उनके लिये इस आत्म कल्याण ओर सेवा साधना पवित्रतम कार्यक्षेत्र ईश्वरी वरदान की ही तरह मंगलमय माना जा सकता है। सन्तान न होने का लाँछन लगाकर जिनके पति दूसरा विवाह करने के लिए आतुर है, उनके दुष्कर्म को खुल खेलने देने के लिए विचारशील महिलाएँ रास्ता खाली कर सकती है और रोज के ताने सुनती हुई अपने को बिना आग के जलते रहने से बचा सकती है। ऐसी महिलायें समझ सकती है। मानो प्रस्तुत असुविधाजनक स्थिति ईश्वर ने उन्हें इसी विशेष प्रयोजन के लिए वरदान रूप में प्रदान की है। यदि भौतिक लालसाओं से होकर वे इस प्रकार की भावनात्मक उत्कृष्टता अपनाने वाला साहस एकत्रित कर सके तो समझना चाहिये उनका दुर्भाग्य सच्चे अर्थों में सौभाग्य बन गया। इससे वे अपना ही नहीं समस्त मानव समाज का नारी समाज का हित साधन करती हुई धन्य बन सकेगी।

प्रशिक्षण पुरुषों की तरह नारी वानप्रस्थों का भी आवश्यक है कम से कम उन्हें छह महीने आत्मशोधन की स्थित तपश्चर्या करनी चाहिए और अपने लिये उपयुक्त सेवा धर्म की कार्यपद्धति का ज्ञान संचित करना चाहिये। जिन्हें परिव्राजक बनना है। उन्हें दो महिला सहेलियों के रूप में जोड़ बनाकर रहना होगा। एकाकी महिला प्रचारिका की बात अपने देश में उतनी उपयुक्त नहीं। दो महिलाओं का जोड़ा जहाँ परस्पर एक दूसरे के लिये दैनिक कार्य कलाप में सहयोगी सहायक हो सकता है वहाँ कार्यक्षेत्र में मिलजुल कर काम करते हुये नारी सुलभ संकोच शीलता की कठिनाई भी सामने न आवेगी। दोनों मिलजुल कर एक-दूसरे को उत्साह देती रहेंगी और परामर्श विचार विमर्श द्वारा उपयोगी निष्कर्ष निकालती रहेंगी। सबसे बड़ा लाभ इस जोड़ प्रक्रिया का यह है कि उनकी चरित्रनिष्ठा पर किसी कुतर्की को भी उँगली उठाने का अवसर न मिलेगा। एकाकी कार्य करने वाली महिलायें यदि आयु की दृष्टि से सफेद बालों की स्थिति में नहीं पहुँची है तो लोग काना-फूसी भी कर सकते हैं। पर दो की जोड़ी बनाकर रहने वाली महिलाएं उस तरह की चर्चा में भी पूर्णतया सुरक्षित रह सकती हैं। अच्छा तो यह है कि जिन्हें वानप्रस्थ लेना हो वह अपनी एक परिचित सहेली को भी तैयार करके जोड़ी के साथ कदम बढ़ाये। यदि वे ऐसी उपयुक्त साथिन स्वयं नहीं ढूंढ़ सकेगी तो शांति कुंज उसके लिये प्रयत्न करेगा और जोड़ी के साथ ही उन्हें बाहर जाने का साधन जुटायेगा। जिन्हें अपने घर ही रहकर-स्थानीय क्षेत्र में काम करना है उन्हें इस प्रकार की जोड़ी ढूंढ़ना अनिवार्य नहीं। यो साथिन के साथ सुविधा का रहना तो स्पष्ट और निश्चय ही है।


वानप्रस्थ एक शास्त्र मर्यादा-धर्म मर्यादा

वानप्रस्थ परम्परा की महत्ता शास्त्रकारों ने एक स्वर में गाई है ओर भावनाशील धर्मप्रेमियों को निर्देश दिया है कि वे ब्रह्मचर्य, और गृहस्थ के जीवन के पूर्वार्ध में पूरे कर ले। इसके उपरांत ढलती आयु को परमार्थ प्रयोजन के लिये समर्पित कर दे। उत्तरार्ध का श्रेष्ठतम सदुपयोग शास्त्रकारों ने यही बताया है कि उसे ज्ञान-साधना तपश्चर्या एवं लोकमंगल की परिव्राजक प्रक्रिया में लगते हुए आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का प्रयोजन पूरा कर ले। परिवार के बचे हुए उत्तरदायित्व बड़े ओर स्वावलम्बी लड़कों को सौंपे जा सकें इसके लिये उन्हें पहले से ही प्रशिक्षित करना चाहिए। तभी वे इस भार को उचित रीति से वहन कर सकने की मनःस्थिति में हो सकेंगे।

वानप्रस्थ परम्परा के संबंध में शास्त्रकारों के कुछ निर्देश इस प्रकार है -

ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भूत्वा बनी भवेत्। बनी भूत्या प्रब्रजेत्। - शतपथ ब्राह्मण

ब्रह्मचर्य आश्रम पूरा होने पर गृहस्थ में प्रवेश करें। गृहस्थ की अवधि पूरी होने पर वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करे और धर्म प्रचार के लिए परिभ्रमण करें।

एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत् स्नातको द्विजःबने बसेत् नियतो यथावत् विजितेन्द्रियः। -मनु.

विद्याध्ययन और गृहस्थ के उपरान्त इन्द्रियजयी हो कर वानप्रस्थ में प्रवेश करे।

गृहृस्थस्तु यदा पश्येत् वाली पलितमात्मनः अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्। -मनु 912

जब गृहस्थ को यह दिखाई पड़े कि चमड़ी पर झुर्रियां पड़ने लगी-बाल सफेद होने लगे और पुत्र भी गृहस्थ वन गया तो उसे घर छोड़ कर वानप्रस्थ में प्रवेश करना चाहिए।

पुत्रे सर्व समासज्य वसेन् आग्रामास्य माश्रिताः। -मनु 41246

गृहस्थ उत्तरदायित्व पुत्र पर छोड़ कर ममता रहित होकर वनवास के लिए चले पड़े।

गृहस्थः सोमयाज्ञे पुत्रं पौत्रं च दृष्टवात पुत्रादीन गृहे संस्थाप्य मौयंडम कृत्वा। प्राजापत्यं कृच्छचरेत्। बसन्ते शुक्ल पक्षे पुण्यर्क्षो पलिया सार्धवनाज्ञम याति।

वैखानस गृहसूत्र 61219

धर्मकृत्यों में निरत गृहस्थ बिताने के बाद पुत्र के पुत्र हो जाने पर संतान को गृह भार सौंप कर मुण्डन प्रजापत्यकृच्छ करते हुए शुभ समय में वानप्रस्थ प्रवेश करें।

जीवनस्थ चतुर्थाराँ परभार्थे नियाजयेत्। वैराग्यं विषयात्कृत्वा लोभ मोहौ परित्यजेत्॥

जीवन का चतुर्थांश परार्थ में व्यतीत करे। विषय से वैराग्य की ओर अग्रसर होकर लोभ और मोह को त्याग दे।

अनासक्तेः सुकर्त्तव्ये ममता बन्धन। स्वयम्। कृत्वा परिणतं युक्तया स्वाध्याय निरत भवेत्॥

सत्संगे चात्मसंलग्नो भवेत् सार्थक जीवनः। गृहस्योत्तरदायित्वयं प्रहृष्टमनसा श्रियेत्॥

ममता के बन्धन को अनासक्त कर्त्तव्य में परिणत कण स्वयं स्वाध्याय, सत्संग, उसी प्रकार आत्मचिन्तन है संलग्न होवे। यह वानप्रस्थ आश्रम की रीति-नीति है।

स्कन्धरोरुत्तरे स्वस्य योग्याधिकारिणः शनैः। मनसः वामना तृष्णे द्वेष दुर्भावने तथा॥

दूरी कृत्य भवल्लग्नः साधनोपा सनादिषु। निरतो लोक सेवायाँ स्वेन्द्रियाणि नियन्त्रयेत्॥

घर का उत्तरदायित्व प्रसन्नचित से अपने योग्य उत्तराधिकारी के कंधों पर डाल दे। वह वानप्रस्थ में प्रवेश करें।

मन से वासना, तृष्णा, द्वेष, दुर्भाव दूर कर अपनी साधना उपासना आदि में संलग्न होवे। लोक सो में तत्पर होता हुआ अपनी इंद्रियों का नियन्त्रण करे।

सदाध्यात्मिक सम्पतिः संचयेल्लोक सेवया। समयस्य विशिष्टाँशं शुभकार्ये नियोजयेत्॥

विश्वं मत्वाऽऽत्मरुपं यत् शिक्षक वद् गृहाद्धहिः। जीवनस्यास्य साफल्यं वैराग्योपरितिष्ठति॥

वानप्रस्थ सदैव आध्यात्मिक सम्पत्ति को लोक सेवा से संचित करे। विश्व को आत्मस्वरूप मानकर शिक्षक की भाँति घर से बाहर समय का विशिष्टाश शुभ कार्य में लगावे क्योंकि इस जीवन की सफलता निस्वार्थ भाव पर निर्भर है।

निवृत्ति प्रधान वानप्रस्थ को स्वार्थ मुक्ति तथा दूसरी अध्यात्म विभूतियों का केन्द्र विन्दु माना गया इस संदर्भ में महर्षि चरक का मन्तव्य माननीय है।

निवृत्त्किपवर्गस्तत्पकं तत्प्रशात्तं तदत्रकं तद् ब्रह्म समीक्षः तत्रमुमुक्षूणाँमुदयनानि व्याख्यास्यामः। चरक श. 5190

निवृत्ति ही अपवर्ग है यही अपवर्ग श्रेष्ठ है यही शान्त है यही कभी कष्ट न होने वाला अक्षर है यही ब्रह्म है यही मोक्ष है इसी में मुमुक्षु, आत्माओं के लिए अभीष्ट प्राप्ति का मार्ग है।

वानप्रस्थ जीवन का क्रिया-कलाप, उद्देश्य ओर आचार व्यवहार क्यों हो? इस प्रश्न का उत्तर अनेक धर्म शास्त्रों में विस्तार पूर्वक बताया गया है।

विमुक्तादार संयौगे विमुक्ताः सर्व संकर्रः। विमुक्ता सर्व पापैश्च चरन्ति मुनयो बने।

महाभारत अनुशासन पर्व काम सेवन को छोड़ कर, पापोँ का प्रायश्चित कर के-वानप्रस्थ बन प्रदेश में निवास करे और परिभ्रमण करता रहे।

एतासाँ ऋषि वनस्थानामूर्चीणामिक सागरात्। विविधानाँ विचित्राणाँ लतानमिव माधवे। भव्य जितमनोमोहा, दृष्ट लौक परावराः। जीवनमुक्ता भ्रमन्तीह प्रबुद्धावा उदुम्वराः।

सागर में उत्पन्न हुई लहरों की भाँति उद्यान में उत्पन्न हुई लताओं की भाँति-वानप्रस्थ ऋषि जीवन मुक्त बन कर रहते हैं और जगत का कल्याण के लिए भ्रमण करते हैं।

बनेषुच विहृत्यैव तृतीय भाग मायुष। चतुर्थमानुषो भागं त्यक्त्वा संगात्परिव्रजेन्।

आयु के तीसरे भाग का आरम्भ होने पर वानप्रस्थ ग्रहण करे। आत्म-ज्ञान के लिए यह सुअवसर अभ्यास के उपयुक्त ही है।

वानप्रस्थ ग्रहण करते समय जो प्रतिज्ञा की जाती है उस संकल्प में उस आश्रम के उद्देश्य प्रयोजन एवं कार्यक्रम का स्पष्ट निर्देश है-

न्यायं बदामि उभयलोका हतं गदामि। लाकौ अतीत्य परमार्थ युज्ञ स्वतीमि॥

शंसामि यम्ननु निर्देज्ञन आर्या मेव। गृहपवीत हृष्ट हृदयाः तप अर्थार्य वर्याः।

मैं न्याय का अनुसरण करते हुए भाषण करूंगा। लोक और परलोक सुधारने वाले प्रवचन करूंगा। आत्मकल्याण और समाज कल्याण में निरत रहूँगा। समष्टि के श्रेय साधन में लगूँगा। यज्ञादि सत्कर्मों का उत्थान करूंगा। उत्साह पूर्वक आर्य-धर्म का विस्तार करूंगा।

आनये तमारभस्व सुकृताँ लोकमपि गच्छतु प्रजानन्। तीर्त्वा तमाँसि बहुधा महान्त्यजो नाकमाक्रमताँ तृतीयाम्। अथर्व 615124

ब्रह्मचर्य आश्रम में बल बुद्धि-गृहस्थ आश्रम में परिवार निर्माण के उपरान्त तीसरे वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता हूँ। तपश्चर्या और ज्ञानार्जन सहित परमार्थ साधन करूंगा।

पुरुषों की तरह ही महिलायें भी वानप्रस्थ में प्रवेश कर सकती है। पति पत्नी दोनों साथ इस पुण्य प्रयोजन में संलग्न हो सके तो उसकी शास्त्रकारों ने पूरी छूट दी है। यो पत्नी से कष्टसाध्य तपस्वी जीवन के लिए आवश्यक तितीक्षा न हो- शिक्षा, योग्यता और भावना के अभाव में उस महान व्रत धारण में कठिनाई अनुभव हो तो घर रहना भी अच्छा है। पति को एकाकी जीवन साधना करने में सुविधा हो तो उन्हें वैसा करने देना चाहिए।

वैरवनसा नाम पत्नी वाऽपत्नी वा शुभे क्षणे तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्ति मन्त स्वतेजसा। -वैखानस गृह्यसूत्र

वैखानस- वानप्रस्थ- पत्नी सहित अथवा वनवास निवास करते हैं। तीव्र तपश्चर्या करते हैं और आत्म-तेज को करते हैं।

संत्यज्य ग्राम्य माहारं सर्व चैव परिच्छदम् पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य बन गच्छेत्सहैववा। मनु 913

रजोगुणी आहार बिहार छोड़ कर वानप्रस्थी जीवन में प्रवेश करे। पुत्रों पर पत्नी की जिम्मेदारी सौंप दे अथवा उसे भी साथ ले जाय।

विधवाएं और कुमारियाँ भी उपयुक्त अवसर पर वानप्रस्थ ले सकती हैं। कुन्ती विधवा थी, किन्तु अपने जेठ जिठानी धृतराष्ट्र और गान्धारी के वानप्रस्थ लेने पर वे स्वयं भी वानप्रस्थी बन गई और उनका सहयोग करने के लिए स्वयं भी उनके साथ रही। इसकी तैयारी करते हुये उन्होंने अपने पुत्र युधिष्ठिर को अपना वानप्रस्थ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा -

श्वश्रू श्वशुरयोः कृत्वा श्रुश्रूषाँ वन वसिनोः तपसा शोषयिष्यामि युधिष्ठर कलेवरम्। -महाभारत

हे युधिष्ठिर, अब मैं वनवासी सार-ससुरवत (जैठ-जिटानी की सेवा करके तपस्वी जीवन व्यतीत करूंगी। उनने भी वनवास में ही अपना जीवन तप पूर्वक बिताया।

कुमारी कन्यायें भी परिपक्व आयु में वानप्रस्थ ले सकती है तपस्विनी सुलभ का उदाहरण इस आर्ष पद्धति की स्पष्ट कर देता है।

तपस्विनी सुलभ ने राजा जनक को अपना परिचय देते हुए कहा-

साहं तस्मिन् केलेजाता भर्तर्यसति याद् विधे विनोतावान प्रस्थेषु चरार्भ्यका मुनिव्रतम्। -महाभारत

मैं कुलीन जन्मी। योग्य पति न मिलने से विवाह न हो सकता। तब मैंने वानप्रस्थ की दीक्षा लेली। अब मैं मुनिव्रत धारण करके परिव्राजक बन कर विचरण करती हूँ।

वानप्रस्थ को एकान्त नदी तट, पुण्य-तीर्थ नगर ग्राम के न अति समीप न अति दूर प्राकृतिक वातावरण में तप साधना करने के लिए निर्देश किया है। सुयोग्य विद्वान तपस्वियों से अभीष्ट मार्ग-दर्शन, प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। इस शास्त्र निर्देश के अनुरूप एवं उपयुक्त स्थान पर ही शांतिकुंज बना है। हिमालय की गोद, गंगा तट, सप्त ऋषियों की तपोभूमि प्रमुख तीर्थ होने के साथ-साथ एकान्त एवं प्राकृतिक वातावरण भी वहाँ तपश्चर्या एवं ज्ञान साधना की दृष्टि से भी अभीष्ट सुविधायें यहाँ सहज ही उपलब्ध है वानप्रस्थी साधना के लिए उपयुक्त स्थान चुनने के संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत इस प्रकार है-

स्व आश्रम वानप्रस्थोक्त सदाचार विद्वच्छिक्षतः फलमूलोकान्वित तपोवनं प्राप्यरम्यदेशे ब्रह्मघोष समन्वित...... नदी तीर्थे ग्रामेनगरे नातिदूरे वापि सुशोभन कृत्वा। शाँडिल्योपनिषद्

वानप्रस्थ के उपयुक्त आचार व्यवहार को जाने। विद्वानों के आश्रय में ज्ञान साधना करे। फल, मूल, पुष्प, जल की सुविधा वाले नदी तट, तीर्थ आदि पवित्र स्थान में निवास करे। स्थान ग्राम नगर से अति दूर न हो। प्राकृतिक उपयुक्त हो।

सज्जनोचित जीवन यापन करने की प्रक्रिया यही है कि वह अपनी क्षमताओं ओर प्रतिभा को तपश्चर्या में आत्मशोधन आत्म विकास में- लगावें। इस तपश्चर्या से शान्ति सन्तुलन प्रतिभा ओर महत्ता प्राप्त करे। स्वयं बंधनों से छूटे ओर दूसरों को बन्धनों से छुड़ाये। यह सारे प्रयोजन जीवन के क्रमिक विकास को वानप्रस्थ स्तर तक पहुँचाते हुए सहज ही प्राप्त हो सकता है। शास्त्रकारों ने उसी पर जोर दिया है उसी के लिए आग्रह किया है।

सज्जनः तपसोभूयात् तापसः शान्ति माप्नुयात् शान्तिमुच्येत् बन्धेभ्यो मुक्तश्चान्यान् विमोचयेतु। -महाभारत

सज्जन तपस्वी बने तपस्वी शान्ति पावे। शान्त लोग भवबंधनों से मुक्त हों। जीवन मुक्त दूसरों को भवबन्धनों से मुक्त करें।


अपनों से अपनी बात

मानवी उत्कृष्टता उसके शरीर, बल, धन, पद, शिक्षा, वैभव आदि पर टिकी हुई नहीं है, वरन् उसकी अन्तःस्थिति पर अवलम्बित है। महामानव साधन संपन्न लोगों को नहीं कहते, वरन् उन्हें माना जाता है जिनके गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता की समुचित मात्रा विद्यमान है। आत्मबल ही सबसे बड़ा बल है। जहाँ वह होगा वहाँ अन्य बलों का अभाव अखरेगा नहीं। आन्तरिक विभूतियों को ही सबसे बड़ी सम्पदा माना गया है, उन्हीं के सहारे मनुष्य स्वयं ऊँचा उठता है और दूसरों को आगे बढ़ाता है।

किसी देश की असली सम्पदा वहाँ के नर-रत्नों-महामानवों की गणना एवं स्थिति के आधार पर ही आंकी-नापी जाती है। कोई देश या समाज अन्य किसी कारण से गिरता उठता नहीं- उसके उत्थान पतन का प्रावधान कारण वहाँ के नागरिकों का चारित्रिक एवं भावनात्मक स्तर ही होता है। विश्व का भविष्य इन दिनों अन्धकारमय दीख रहा है तो इसका एकमात्र कारण अपने युग के मनुष्यों का भावनात्मक स्तर निकृष्ट कोटि का बन जाता ही है। उसमें परिवर्तन लाया जा सके तो प्रकृति प्रदत्त अनुदानों का मिलजुल कर बाटा खाया जा सकता है। और स्नेह-सहयोग की नीति अपनाकर सुख शान्तिपूर्वक कहा जा सकता है। दुष्टता और दुर्बुद्धि ही हे जिसके कारण विकास के लिए काम आ सकने वाले साधनों को विनाश के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। और जानबूझ कर विपत्ति को आमन्त्रित किया जा रहा है।

उत्कर्ष की बात सोचने पर उसके प्रधान साधन पर भी ध्यान देना होगा। परमार्थ परायण प्रक्रियाओं के उत्पादन और अभिवर्धन को प्रधानता देनी होगा। सुख-साधनों के उत्पादन में निरत संस्थान एक छोटी सीमा तक ही सुख-शान्ति का अभिवर्धन कर सकेंगे। चेतन मानव-प्राणी का यथार्थ सुख-सम्वर्धन तो भावनात्मक सम्पदा ही कर सकती है। स्वतन्त्रता संग्राम की विजय का श्रेय उस काल के थोड़े से महामानवों को ही दिया जा सकता है जिन्होंने अपने महान व्यक्तित्व की छाप जनता के अन्तःकरण पर छोड़ी ओर अपने आह्वान पर त्याग-बलिदान की अग्रिम पंक्ति में आ खड़े होने की लाखों मनुष्यों में प्रेरणा भर दी। यह कार्य वाचाल या उथले लोग नहीं कर सकते हैं लम्बी चौड़ी कागजी योजनाएँ भी स्वराज्य नहीं दिया सकती थी। स्पष्ट है कि हर महत्वपूर्ण कार्य प्रखर प्रतिभाओं के आधार पर ही सम्पन्न होता है। विशेषतया युग-परिवर्तन जैसे-नवनिर्माण जैसे महान प्रयोजनों के लिए इस आवश्यकता की पूर्ति एक प्रकार से अनिवार्य ही हो जाती है।

देश की-विश्व को सुख-शान्ति के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए सच्चे और सुयोग्य आदर्शवादी एवं लोक सेवी प्रतिभाओं की ही आगे आना पड़ा है। आज वे है नहीं तो गाड़ी आगे कैसे बढ़े। दूसरों पर अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने और यश-लिप्सा की पूर्ति के लिए जब-तब बरसाती मेंढक सेवा के स्वरों में टर्राते सुने जाते हैं पर जैसे ही उन्हें अभीष्ट लाभ में कमी दिखाई देती है वैसे ही चुप ही नहीं हो जाते वरन् उसी कार्य की जड़ तक काटते देखे जाते हैं। जिसकी कि कल तक जोर-शोर से आवश्यकता बता रहे थे। ऐसे लोगों की सेवा विडम्बना, कौतुक कौतूहल भर की होती है। ठोस काम तो उन्हीं से बनता है जिन्होंने अपने व्यक्तित्व में आदर्शवादिता को कूट-कूट कर भरा हो ओर सेवा धर्म को आत्मा एवं ईश्वर की समुन्नतता का पवित्रतम और उच्चतम आधार अंगीकार किया हो।

युग-निर्माण योजना का लक्ष्य यही रहा है। शतसूत्री कार्यक्रमों को आगे रखकर भावनाशील लोगों को सेवाधर्म अपनाने और अपनी क्षमता, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुरूप लोकमंगल के लिए अधिक से अधिक करने के लिए आग्रह, अनुरोध किया गया है । प्रसन्नता की बात है कि वह आह्वान, अनुष्ठान नहीं किया गया और उत्साहवर्धक संख्या में कर्मठ कार्यकर्ता सृजन सेना में भरती होकर भावनात्मक पुनर्निर्माण के विविध मोर्चों पर अड़ने और लड़ने को कटिबद्ध होकर आये। धर्मतंत्र का अध्यात्म आधार का सहारा इसीलिए लिया गया कि इस प्रयोजन के लिए कदम बढ़ाने वाले चरित्रनिष्ठा, आदर्शवादिता और परमार्थ परायणता, आडम्बर न ओढ़े और इन महान आस्थाओं को अन्तःकरण के गहन स्तर तक उतारकर तब आगे आये। स्पष्टतः मानवी आस्था के मर्मस्तर का स्तर धर्म और अध्यात्म के आधार पर ही किया जा सकता है।

युग निर्माण अभियान में संलग्न सृजन सेना के सैनिकों में अब तक प्रधानतया वे ही लोग है जिन्हें परिवार निर्वाह के लिए आजीविका उस उपार्जन में निरत रहते हुए निर्वाह परक कठोर श्रम करना पड़ता है। स्वभावतः उनके पास थोड़ा ही समय बचता है इसी बचत की पूँजी पर अब तक मिशन के क्रिया-कलापों को अग्रगामी बनाया जा सकता है। प्रारम्भ इतने से भी बुरा नहीं था पर अब कार्य क्षेत्र द्रुतगति से बढ़ता जा रहा है। अभियान में प्रखरता आ रही है और जन-मानस में हुलास-उल्लास का ऐसा वेग उत्पन्न हो रहा है जैसे यदि सही मार्गदर्शन और समुचित प्रोत्साहन मिल सके तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकते हैं। युग-परिवर्तन के स्वप्न मूर्तिमान तथ्य के रूप में सामने आकर खड़े हो सकते हैं।

उत्कृष्ट स्तर के सेवाभावी महामानवों की विश्व के कौने-कौने में भारी मार्ग है। सबसे बड़ा दुर्भिक्ष नहीं का है सर्वत्र त्राहि-त्राहि उन्हीं के अभाव में मची हुई है। नव-निर्माण अभियान की फसल भी उन्हीं के बिना सकुचाई मुरझाई खड़ी है। समय की पुकार के स्वर तीखे होते जा रहे है और अनिवार्य आवश्यकता यही सामने खड़ी है कि अधिक भावनाशील-अधिक सुयोग्य-अधिक आत्म-बल सम्पन्न अधिक प्रशिक्षित-अधिक कर्मठ लोक-सेवियों की बहुत बड़ी सेना कुरुक्षेत्र में उतारी जाय। युग-निर्माण के प्रस्तुत गृहस्थ कार्यकर्ता एक सीमा तक ही उस बढ़ती आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं परिवार का निर्वाह उनके लिए प्रधान समस्या हैं इसके रहते यदि वे कार्य क्षेत्र में समग्र रूप से उतरे तो अनिवार्य रूप से परिवार निर्वाह के लिए वेतन चाहिए। हजारों लाखों पूरे समय के कार्यकर्त्ताओं के निर्वाह का व्यय इस महंगाई के जमाने में कितना अधिक हो सकता है यह समझना कठिन नहीं। चूँकि मिशन रूढ़िवादी मूढ़ताओं को लेकर तो खड़ा नहीं है जिसके लिए धर्म भीरु लोगों को उल्टी सीधी पट्टी पढ़ाकर पैसा झटका जा सके। यह प्रबुद्ध और विचारशील लोगों का समुदाय है ऐसे स्तर के लिए मध्यम वृति के होते हे वे दान के नाम पर यत्किंचित् ही यदा-कदा दे सकते हैं। ऐसी दशा में वेतन-भोगी कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या भी कार्यक्षेत्र में नहीं उतरी जा सकती।

ऐसी दशा में युग की आवश्यकता पूरी करने के लिए भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम एवं मौलिक आधारों को ही पुनर्जीवित करना पड़ेगा और उसी राह पर चलना पड़ेगा जिस पर चलते हुए भारत भूमि को देव भूमि बनाने का, विश्व का समग्र नेतृत्व करने का अवसर मिला था। उच्चस्तरीय कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की स्वर्ण खदान वानप्रस्थ आश्रम ही है संन्यास तो चौथे पन की जराजीर्ण अवस्था में लिया जाता है तब तक आदमी का कचूमर निकल चुका होता है ओर वह मौत के दिन पूरे कर सकने की स्थिति में ही रह जाता है। कुछ काम कर सकने की क्षमता प्रौढ़ावस्था में ही रहती है। जीवन का मध्याह्न परिवार प्रयोजन के लिए खर्च करने के बाद ढलती आयु में व्यक्तित्व का समग्र निर्माण करने एवं सेवा-धर्म अपनाने का उपयुक्त अवसर रहता है। तब तक शरीर के कुछ जान भी रहती है और मन में उत्साह भी। अस्तु प्राचीनकाल की भाँति ही आज भी वानप्रस्थ के लिए जन साधारण में गहन आस्था ओर प्रचुर उत्साह उत्पन्न करने की आवश्यकता है। यदि यह प्रवाह उभर आये तो देखते-देखते सुयोग्य आदर्शवादी एवं लोक-सेवा संलग्न कर्मवीरों की सेना युग की आवश्यकता पूरी करने में संलग्न दिखाई दे सकती है।

इस तथ्य पर हमें पूरी तरह ध्यान देना होगा कि प्रस्तुत दृष्प्रवृत्तियों से लड़ने को एक बड़ी सेना की आवश्यकता है जो भले ही रीछ-बानरों जैसी हो पर उसमें आदर्शवादिता की त्याग-बलिदान की भावभरी उमंगें हिलोर अवश्य ले रही है। इसके लिए उन प्रबुद्ध लोगों का द्वार खटखटाना पड़ेगा जिनकी आवश्यक परमार्थ बुद्धि के साथ-साथ पारिवारिक स्थिति भी ऐसी हो कि बिना वेतन लेने की आवश्यकता अनुभव किये अपनी प्रतिभा का अनुदान विश्व-मानव के चरणों में समर्पित करते हुए हिचक अनुभव न हो। इसी स्तर के लोगों को वानप्रस्थ आदर्श को पुनर्जीवित किया जा सके तो विश्व की विषम परिस्थितियों में क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न कर सकना कुछ कठिन न रह जायगा। मानव जाति को वर्तमान दयनीय स्थिति में उबारते हुए विश्व का कायाकल्प कर सकना आज भले ही कठिन लगता हो पर जब वानप्रस्थ प्रवाह को पुनर्जीवित किया जा सकना सम्भव हो जायेगा तो जटिल गुत्थिओं का सरल हल सहज ही निकल आवेगा।

धर्म और अध्यात्म के उपासना और साधना के चरित्र और परमार्थ के पुण्य प्रयोजनों का समन्वय करते हुए लोक-निर्माण में प्रवृत्त होने की पुण्य परम्परा इन दिनों युग-निमार्ण परिवार ने ही आरम्भ अथवा पुनर्जीवित की है सृजन सेना में संलग्न हजारों लाखों कर्मयोगी सके प्रत्यक्ष प्रमाण है। अब तो कदम और भी आगे बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है। तो उसकी पूर्ति भी हमें ही करनी पड़ेगी। अधिकाधिक समय लोक-मंगल के लिए समर्पण करने वाले सुयोग्य एवं अवैतनिक परमार्थ परायण व्यक्तियों की न दिनों जो महती आवश्यकता अनुभव की जा रही हैं उसकी पूर्ति भी हमें करनी होगी। महानता का पथ अपनाया है तो एक के बाद एक बड़ी और कड़ी कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने के लिए हमें ही आगे आना होगा। वानप्रस्थ परम्परा एक प्रकार से लुप्त हो गई। मुंहखोर बाबाजी तो 59 लाख से बढ़कर 80 लाख हो गये पर जिन्हें कर्मयोगी का उत्तरदायित्व निबाहना पड़ेगा,ऐसे वानप्रस्थ देश भर में कुछ हजार तो क्या सैकड़ों तक ही सीमित दिखाई पड़ेंगे। उनमें भी सेवा धर्म अपनाने वाले तो गिने चुने ही होंगे शेष तो तथा कथित शान्ति और एकान्त की उधेड़ बुन में जहाँ तहाँ माला घुमाते ओर दिन काटते ही दिखाई देंगे। इनका निवृत्त मार्ग और वैराग्य ही विचित्र विलक्षण है जिसमें अकर्मण्यता के अतिरिक्त ओर कुछ सार दृष्टिगोचर ही नहीं होता।

पुण्य परम्पराओं के पुनर्जागरण की अपनी महती चेष्टाओं में एक कड़ी वानप्रस्थ को पुनर्जीवित करने की भी पुरी करनी चाहिए। देश विदेश में जनजागरण का शंख फूंकने वाले धर्म और अध्यात्म की उपयोगिता अपने प्रखर व्यक्तित्व को प्रामाणिकता के रूप में सिद्ध करने वाले महामानवों को अभीष्ट मात्रा में यदि हम विश्व कल्याण के लिए उपस्थित कर सके तो यह बहुत बड़ी बात होगी। युगनिर्माण परिवार की महानतम उपलब्धि ही इसे कहा जा सकेगा।

हममें से प्रत्येक को यह देखना चाहिए कि क्या अपनी निज की स्थिति ऐसी है इस पुण्य-परम्परा को अपनाने के लिए अपने को अनुकरणीय आदर्श के लिए प्रस्तुत कर सकने वाले अग्रगामी महामानवों की पंक्ति में खड़ा हो सकना सम्भव बन जाय। यदि स्थिति ऐसी हो तो शुभारम्भ के रूप में साहस अपने में जुटाना चाहिए। यदि वैसी स्थिति न हो तो भी यह सोचना चाहिए कि निकट भविष्य में जब भी स्थिति उपयुक्त हो जायगी तब इस पुण्य प्रयोजन के लिए निश्चित रूप से अपने को प्रस्तुत करेंगे। ढलती आयु में लम्बी-चौड़ी महत्वाकांक्षाएं हमें नहीं संजोनी चाहिए वरन् आत्मकल्याण और विश्वकल्याण के लिये अपने समर्पण की बात को सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा पूर्ति मानकर चलना चाहिए। इस प्रकार आज अथवा कल परसों हमीं लोग इतना कुछ कर सकेंगे जिस पर भारत भूमि को- भारतीय संस्कृति को अपना मस्तक गर्व और गौरव के साथ ऊँचा कर सकने का अवसर मिल जाय।

अपने घर परिवार सम्बन्धी और मित्रों में से जो इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकने की मन स्थिति एवं परिस्थिति में हो उन्हें उसके लिए परामर्श देना और प्रोत्साहित करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। बड़े बच्चे यदि समर्थ एवं स्वावलम्बी हो गये हो तो उन्हें भी सलाह देनी चाहिए कि पिता के उत्तरदायित्वों को पूरी ईमानदारी के साथ अपने कन्धों पर वहन करने की वे तत्परता प्रदर्शित करे। इस प्रकार वे जहाँ पितृ ऋण से उऋण होते हैं वहाँ संसार को एक महती आवश्यकता पूर्ण करने से भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। पिता पुत्र ही नहीं दूसरे स्वजन सम्बन्धी भी परस्पर ऐसी ही सहायता कर सकते हैं सम्मिलित परिवार में एक सदस्य को छुट्टी देकर उसके उत्तरदायित्वों को घर के दूसरे सदस्य सहज ही निभा सकते हैं। छोटे-भाई आगे बढ़ कर बड़े भाई को छुट्टी दे सकते हैं। जिनके पास गुजारे का प्रबन्ध है उनके पीछे सुव्यवस्था बनाये रहने की जिम्मेदारी कोई मित्र स्वजन उठा सके तो वह भी कम महत्व की बात नहीं है। जिनके बच्चे नहीं हुए है उन्हें तो इस सौभाग्य का समुचित लाभ उठाने के लिये अत्यधिक जोर दिया जा सकता है। यदि वे बच्चे के लिए लालायित फिरते हैं गोद लेने के फेर में फिरते हैं तो उन्हें इस अविवेक के लिए धिक्कार भी जा सकता है।

कई नारियाँ भी ऐसी हो सकती है जो लोक सेवा की क्षमता से सम्पन्न है और पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुकी है उनके लिये इस मार्ग का अवलम्बन करना उचित है नारी समाज के पुनरुत्थान का काम नारियाँ ही अग्रिम पंक्ति में खड़ी होकर कर सकती है जहाँ तहाँ साधु−संतों में भी कुछ बीजाँकुर सेवा साधना के पाये जाते हैं। ऐसा अंकुर जहाँ भी हो उसे सींचा जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि भिक्षा अन्न खाकर तो किया हुआ भजन भी उस अन्नदाता के हाथों बिक जायगा ऐसी विडम्बना से क्या लाभ? सेवा साधना में प्रवृत्त रहना हो तो ही भिक्षा अन्न की सार्थकता है ऐसी स्थिति में रह कर थोड़ा भजन करना हो अधिक ईश्वर अनुग्रह प्रदान कर सकना है आशा तो कम ही है पर कई बार पत्थरों पर भी पेड़ उगते देखे गये है। प्रयत्न करने पर सन्त वर्ग में भी कुछ तो सेवा साधना की ओर मोड़े ही जा सकते हैं।

यह एक बड़ा काम है कि हम अपने क्षेत्र में वानप्रस्थ के लिए आवश्यक वातावरण बनाये और उपयुक्त व्यक्तियों को प्रोत्साहन देकर आगे लायें। आवश्यक नहीं कि पूरा समय देकर परिव्राजक बन कर दूर क्षेत्रों में भ्रमण कर सकने वाले प्रथम श्रेणी के वानप्रस्थ ही सब हो घर पर रह कर अपने क्षेत्र में काम करने के लिए अधिक समय देते रहने वाले द्वितीय श्रेणी के वानप्रस्थ भी अभीष्ट प्रयोजन की एक बड़ी सीमा तक पूरा करते रह सकते हैं। दोनों श्रेणियों में से जो जिस स्तर के लिये उपयुक्त हो उन्हें उसके लिए तैयार करना चाहिए।

जिनकी योग्यता शिक्षा, प्रतिभा नगण्य है, जो जरा जीर्ण हो चुके है उनके लिए अपने घर रहना ही सर्वोत्तम है अपनी स्थिति के अनुरूप वे अपने आस-पास ही जो बन पड़े सेवा कार्य करे। उनके वानप्रस्थ की मनःस्थिति रखना ही पर्याप्त है। बाहर जाकर ज्ञानयज्ञ जैसे महत्वपूर्ण कार्य को वे कहाँ सम्भाल पायेंगे? सेवा करने की अपेक्षा अपने निर्वाह का भार बाहर वालों पर डालेंगे, उन्हें घर छोड़ने के लिए प्रोत्साहन देकर दिग्भ्रान्त नहीं करना चाहिए। स्वभावतः इस महंगाई के जमाने में एक आदमी के खाने पहनने पर साठ सत्तर रुपये से कम खर्च नहीं पड़ता। यदि इससे अधिक मूल्य की सेवा कर सकना सम्भव न हो तो फिर जनता पर भार बनकर पुण्य के स्थान पर पाप क्यों कमाया जाय? वानप्रस्थ के लिये हर किसी को नहीं ऐसे व्यक्तियों को ही प्रोत्साहित करना चाहिए जिनमें सेवा क्षमता की मात्रा पर्याप्त हैं ऐसे लोगों के पास घर की आजीविका है तब तो उस सेवा साधना के दिनों में भी खर्च अपना ही करना चाहिए ताकि पुण्य परमार्थ का समुचित संचय हो सके। वैसा प्रबन्ध न हो तो अधिक से अधिक भोजन, वस्त्र जैसी निर्धन देश के स्तर का निर्वाह सामग्री ही उपलब्ध की जा सकती है। इससे अधिक कमाने पर संचय करने की बुद्धि लेकर तो इस पवित्र क्षेत्र में किसी को प्रवेश ही नहीं करना चाहिए। धर्म को व्यवसाय बनाकर चलने वालों की तो घोर भर्त्सना ही की जा सकती है। वेतन, पारिश्रमिक या दान-दक्षिणा लेने की जिन्हें आवश्यकता प्रतीत हो उन्हें वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रवेश नहीं ही करना चाहिए।

प्रयत्न यह भी किया जा रहा है कि वानप्रस्थों को अपना स्थाई निवास केन्द्र भी हरिद्वार ही बन जाय। कार्य क्षेत्र में अधिक दिन काम करने के उपरान्त वे वहीं लौटकर निवास विश्राम किया करें। वर्ष में कुछ महीने अपनी योग साधना तपश्चर्या एवं ज्ञान सम्पदा का अभिवर्धन किया करे। इस प्रकार हर वर्ष कुछ समय आत्मशोधन एवं आत्म-विकास का विशेष क्रम अपनाते हुए कार्य क्षेत्र में नई स्फूर्ति एवं नई शक्ति के साथ प्रवेश किया करे। उतने समय उनके निवास, विश्राम, भोजन आदि की अभी सुविधाएं आश्रम में उपलब्ध रहें।

जिनकी पत्नी अथवा माता आदि एकाध आश्रित है उनको भी वे इस वानप्रस्थाश्रम में छोड़कर जा सकते हैं उनके निर्वाह शिक्षण की व्यवस्था यहाँ चलती रहेगी ओर वे निश्चिन्तता पूर्वक कार्य क्षेत्र में काम करते रहे सकेंगे। अच्छा तो यह होता कि छोटे गृहस्थ वालों के परिवार का निर्वाह और प्रशिक्षण की यही व्यवस्था होती और जिनके पीछे छोटा परिवार है वे भी निश्चिन्त होकर सेवा क्षेत्र में उतर कर अपनी प्रतिभा से समाज को लाभान्वित कर सके। यह बड़ी व्यवस्थाएँ है। इनको बड़े साधन चाहिये। यदि वे जुट सके तो निश्चित रूप से ऊँचे स्तर के लोक-सेवकों की संख्या ओर भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध कर सकना सम्भव हो जायगा। अभी तो केवल वानप्रस्थों के शिक्षण की ही व्यवस्था बनाई जा सकती है।

वानप्रस्थ प्रशिक्षण के लिए शांतिकुंज, सप्तसरोवर हरिद्वार में प्रबन्ध किया जा रहा है 100 वानप्रस्थों के प्रशिक्षण के लिए स्थान की व्यवस्था हो रही है। पाठ्यक्रम छह महीने का रखा गया हैं भोजन व्यय शिक्षार्थी स्वयं ही बहन करेंगे ऐसी आशा की गई है। पर कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनके पास वैसी व्यवस्था न हो और शिक्षा से वंचित रहना पड़े। ऐसे लोगों की सहायता उन्हें करनी चाहिए जो स्वयं तो वानप्रस्थ लेने की स्थिति में नहीं है। पर दूसरों को सुविधा देकर उनके मार्ग की अड़चन आर्थिक रूप से छल करने में समर्थ है। ऐसा प्रबन्ध बन पड़ने में भी अनेक सुयोग्य सेवा-भावी किन्तु आर्थिक अड़चन के कारण मन मसोस कर बैठने वालों का पथ प्रशस्त हो सकता है।

साधना पाठ्यक्रम छह महीने के है जो माघ सुदी पूर्णिमा ओर श्रावण सुदी पूर्णिमा से तदनुसार 6 फरवरी 74 से और 6 अगस्त 74 से आरम्भ होंगे। किन्तु जो लोग अभी बहुत अधिक व्यस्त उतने समय की छुट्टी नहीं पा सकते। प्रथम श्रेणी का परिव्राजक वानप्रस्थ भी जिन्हें लेना नहीं उनके लिए काम-चलाऊ विशेष शिक्षण सत्र छह सप्ताह का लाभ करेगा। उसकी व्यवस्था 15 मई से 30 जून तक और 25 नवम्बर से 30 दिसम्बर तक ही हुआ करेगी। पर चूँकि वानप्रस्थ विद्यालय का प्रबन्ध फरवरी 74 से होने जा रहा है अस्तु विशेष शिक्षण रात्र की व्यवस्था 25 मई 74 से ही आरम्भ हो सकेगी।

वानप्रस्थ विद्यालय में प्रवेश हर किसी को चाहे जब न मिल जाय ऐसा संभव न हो सकेगा। इसके लिये विद्यालयों में प्रवेश पाने के ढंग से ही अपने समग्र परिचय के साथ आवेदन पत्र ही भेजना चाहिए और स्वीकृति मिलने के बाद ही आवश्यक तैयारी करनी चाहिए। इसके लिये अलग से फार्म आदि अभी नहीं छपाये गये है। इसी अंक में अगले पृष्ठ पर एक प्रश्नावली छपी है उसका अधिकाधिक विस्तार पूर्वक उत्तर देना चाहिए। इसी आधार पर प्रवेश देने के लिए विचार किया जायगा। स्वभावतः शिक्षार्थियों की संख्या बहुत अधिक होगी-स्थान बड़ी कठिनाई से एक सौ का बनाया जा सका है। ऐसी दशा में किस-किस सत्र में प्रवेश मिले इसके लिए प्रतीक्षा भी करनी पड़ सकती है आवश्यक नहीं कि सभी आवेदन कर्त्ताओं को प्रथम सत्र में ही आमन्त्रित कर लिया जाय।

वानप्रस्थ परम्परा के पुण्य प्रवाह को पुनः गतिशील बनाने की महत्ता को यदि समझा जा सके तो स्वभावतः अपना कर्तव्य हो जाता है कि इसे प्रखर एवं अग्रगामी बनाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करने की तत्परता में कुछ कमी न रखे।


वानप्रस्थ प्रशिक्षण के लिए पत्र व्यवहार का आधार

युग-निर्माण परिवार के सदस्यों में ऐसे भावनाशील लोगों की कमी नहीं होगी जो जीवनोद्देश्य की पूर्ति के साहसिक कदम उठा सकने की मनःस्थिति में भी हो, ओर जिनकी पारिवारिक स्थिति इसके लिए अवरोध भी उत्पन्न न करती हो। ऐसे लोगों को युग-देवता का साँस्कृतिक पुनर्जागरण का- यह आमन्त्रण स्वीकार करना ही चाहिए कि वे आत्म कल्याण के साथ विश्वकल्याण के वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करे। व्रत धारण करके परमार्थ क्षेत्र में उतरे और समय की आवश्यकता पूरी करने के लिये अपनी अभिनव भूमिका प्रस्तुत करे।

वानप्रस्थ विद्यालय का शुभारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा तदनुसार 3 फरवरी 74 में होगा। सत्र छह महीने के होंगे। प्रथम सत्र 3 फरवरी से आरंभ होगा दूसरा 6 अगस्त 74 से। यह पूर्ण निवृत्त प्रथम श्रेणी के वानप्रस्थों के होंगे। प्रथम सत्र में 50 ऐसे शिक्षार्थी लिये जायेंगे जो 6 महीने का पाठ्यक्रम पूरा करेंगे। जिनके पास अभी स्वल्प अवकाश है और पूर्ण निवृत्ति में देर है उनके घर रह कर त्रिविध साधना क्रम चलाने वाले द्वितीय श्रेणी के वानप्रस्थ का विशेष शिक्षा पत्र 3 सप्ताह का होगा जो 25 मई से 30 जून 74 तक चलेगा। इसमें 50 शिक्षार्थी लिये जायेंगे। इसी प्रकार इनका दूसरा सत्र 25 नवम्बर से 30 नवम्बर तक चलेगा, उसमें भी 50 छात्र ही लिए जायेंगे। इस प्रकार 100 प्रथम श्रेणी के और 100 द्वितीय श्रेणी के शिक्षार्थियों की शिक्षा व्यवस्था प्रथम वर्ष की गई है। आगामी वर्षों में यह संख्या स्वभावतः कई गुनी होकर रहेगी। स्थान सम्बन्धी तथा दूसरे साधन जुटते ही यह संख्या भविष्य में तेजी से बढ़ाई जाती रहेगी। यों ऐसे वानप्रस्थ श्रम की व्यवस्था भी विचाराधीन है जिसे सेवा समर्पित लोग अपना स्थायी घर मान सके और जब इच्छा या आवश्यकता हो वहाँ अपने घर की तरह ही निवास कर सकें। इस प्रयोजन के उत्तर संक्षेप में नहीं वरन् अधिकाधिक विस्तार में लिखने चाहिए ताकि उन पर गम्भीरता से विचार किया जा सके और समुचित परामर्श दिया जा सके। जिन्हें उत्साह है वे इस प्रकार का पत्र व्यवहार अभी भी आरम्भ कर सकते हैं।

प्रश्नावली -

(1) आयु-तिथि? (2) स्वास्थ्य की स्थिति आरम्भ से लेकर अब तक का विवरण (3) शरीर से कार्य करने की वर्तमान क्षमता का स्पष्टीकरण (4) कोई शारीरिक या मानसिक रोग हो तो उसकी चर्चा (5) तमाखू पीने जैसी कोई आदत हो तो उसकी उल्लेख (6) स्कूली शिक्षा एवं स्वाध्याय अर्जित ज्ञान (7) समय-समय पर अपनाये गये व्यवसाय और उनकी सफलता असफलता के उल्लेख (8) परिवार का विवरण पत्नी की स्थिति-संतानों की संख्या उनकी आयु बच्चों के स्वावलम्बी परावलम्बी होने का विस्तृत विवरण (9) यदि कुछ सन्तान अभी स्वावलम्बी नहीं हो पाई है तो उनके निर्वाह का भावी प्रबन्ध किस प्रकार होगा? (10) आर्थिक स्थिति का अधिक स्पष्ट ऐसा उल्लेख जिसके आधार पर भावी अर्थव्यवस्था पर खुले दिमाग से ठीक तरह सोच-विचार किया जा सके। (11) अब तक के सेवा कार्यों का अनुभव तथा विवरण (12) जिनके ऊपर परिवार का उत्तरदायित्व जाना है उनको मनःस्थिति तथा परिस्थिति की चर्चा (13) अपनी साधना, उपासना तथा स्वाध्याय रुचि का अब तक का प्रयास एवं परिणाम (14) गायन एवं भाषण की वर्तमान क्षमता (15) वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी क्या कुछ समय घर-परिवार को सम्भालना पड़ेगा, यदि हो तो किसे समय तक और किस कारण? (16) अब तक के उल्लेखनीय ऐसे कार्यों का विवरण जिन्हें प्रशंसनीय अथवा निन्दनीय कहा जा सके (17) किसी राजनैतिक या धर्म-सम्प्रदाय के प्रति अपना विशेष रुझान-लगाव (18) किस भाषा पर किस स्तर का अधिकार है। (19) आपकी पत्नी का इस कदम में क्या रोल होगा? आप के परिवार वालों का इस कदम के सम्बन्ध में क्या रुख रहेगा। (20) आप किस सत्र में कितने समय शिक्षण प्राप्त करेंगे। शिक्षण काल में अपना व्यय भार आप स्वयं ही बहन करेंगे न?

इन बीस प्रश्नों के अतिरिक्त भी कोई महत्व पूर्ण बात हो तो उसका भी उल्लेख करना चाहिए। इस विवरण को आवेदन पत्र माना जाय। इस आधार पर आरम्भ हुआ पत्र व्यवहार ही प्रवेश सम्बन्धी अन्तिम निर्णय का आधार बनेगा।


कण-कण में चेतन मुस्काता

(बाबू लाल जैन ‘जलज’)


कण-कण में चेतन मुस्काता (Kavita)

आत्म चेतना यदि न जगाती, मंजिल में ही सोता रहता, मन मन्दिर में छाया रहता, दिन में ही भीषण अँधियारा।

जीवन जलता रहता क्षण-क्षण, अहंकार के अंगारों में, द्वेष दम्भ का ताना-बाना, बुनता रहता पतझारों में।

हरा भरा साधो का सावन वियावान जंगल बन जाता- मानवता यदि वाँह न गहती, गिरते को मिलता न सहारा॥

उलझे सूतों को सुलझाते, सारा जीवन ही चुक जाता, यश-अपयश की धूप छाँव में, मंजिल का कुछ पता न पाता।

लाभ-लोभ लिप्सा का अंकुर, धरती का पीपल बन जाता, साथ न देता यदि साहस तो, तोड़ न पाता तम की कारा॥

ले जाते बटमार लूटकर, सदाचार संयम की थाती, त्याग तपस्या को फसलों को, खेतों में दीमक चर जाती।

मारा मारा फिरता रहता, दुष्प्रवृत्तियों के जंगल में, नहीं टोकता यदि विवेक तो, जीवन बन जाता बनजारा॥

प्यार न होता अगर हृदय में, मानव मन पत्थर बन जाता, अन्तस में यदि दया न होती, बुद्ध प्रुद्ध नहीं बन पाता।

गहरे में यदि नहीं पैठता, हाथ न लगाता जीवन मोती, ज्ञान-सूर्य यदि पथ न दिखाता, मंजिल का मिलना न किनारा॥

सेवा भाव न जागृत होता, करुण पुकार न यदि सुन पाता, व्यथा-कथा यदि सुनी न होती, जीवन-तप निष्फल हो जाता।

हाथ पकड़ती अगर न ममता, समता का कुछ बोध ने होता, साँसों की गति एक न होती, बढ़ता अगर न भाई चारा॥

नयन मूँद कर, हृदय खोल कर, जिस दिन पढ़ी धर्म की भाषा, अपने आप समझ में आई, जीवन दर्शन की परिभाषा।

आत्मा की आवाज गूँजती, कण-कण में चेतन मुस्काता, एक समान दिखाई देता, मन्दिर मस्जिद और गुरुद्वारा॥

*समाप्त*