भौतिकवाद की बढ़ोतरी हमें विश्वयुद्धों के कढ़ाव में तले जाने के लिए, कड़ी पकड़ के साथ घसीटती ले चल रही है। असुरक्षा की जंजीरों में कसा हुआ हमारा अस्तित्व सराय के यात्री की तरह घड़ियाँ गिन रहा है। इस विषाक्त स्थिति से बचने के लिए, अंतःदृष्टि को जागृत करके सारी स्थिति पर नए सिरे से विचार करना होगा और वह रास्ता खोजना पड़ेगा, जिस पर चलकर मानवी अस्तित्व और आस्था को जीवित रखा जा सके ।
विनाश की ओर चल रही अंधी घुडदौड़ से हमें विरत होना चाहिए और उस दिशा में लौटना चाहिए, जिसमें आदमी, आदमी की तरह शांति और संतोष के साथ रह सकता है। यह राह धर्म के साथ कदम मिलाकर चलने की ही हो सकती है। धर्म से मेरा अभिप्राय मत-मतांतरों से नहीं; वरन आत्मा की जागृत चेतना से है। मृत्यु के मरघट की तुलना में यदि जीवन के अस्तित्व एवं आनंद को महत्त्व दिया जाता हो तो आंतरिक उत्कृष्टता को, दृष्टिकोण की ऊँचाई को और धर्म के पुनर्जागरण की विद्या अपनाने के अतिरिक्ति और कोई रास्ता नहीं।
प्राण-प्रत्यावर्तन , अर्थात प्राण-चेतना का आदान-प्रदान किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है— लघु का महान के साथ, आत्मा का परमात्मा के साथ, प्राण का महाप्राण के साथ।
आत्मा वस्तुत: महान परमात्मा का एक छोटा घटक है। बीजरूप से उसमें वे समस्त संभावनाएँ और क्षमताएँ विद्यमान हैं, जो उसकी मूलसत्ता में है। वृक्ष की समस्त विशेषताएँ बीज में भरी रहती हैं, छोटे से दाने के अंदर पूरे पेड़ का स्वरूप और क्रियाकलाप अंतर्निहित रहता है। अवसर पाते ही यह बीज विकासोन्मुख होता है और उसकी विभूतियाँ अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। यों देखने में बीज की सत्ता और वृक्ष की स्वरूपसत्ता एकदूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की मालूम पडती है। बीज का मूल्य कानी-कौड़ी और पेड़ की कीमत मुहर-अशर्फी होती है। अंतर स्पष्ट है; पर कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षण ऐसे भी आते हैं, जब बीज के भीतर एक विचित्र हलचल उत्पन्न होती है, वह अपना दाने जैसा अकिंचन स्वरूप खोता है और गल-बदल अंकुर, फिर पौधा, फिर वृक्ष बनने के लिए विचित्र प्रकार के क्रियाकलाप अपनाता है। यह परिवर्तन का काल थोड़ा ही होता है। बीज को डालने और अंकुर का रूप धारण करने की काया-कल्प जैसी प्रक्रिया कुछ ही दिनों की होती है। इनके बाद बीज की सत्ता समाप्त हो जाती है और वृक्ष का अस्तित्व अपने ढंग से काम करने लगता है। इसी हलचल भरी उथल-पुथल को प्रत्यावर्तन कह सकते हैं।
प्राण उस इकाई का नाम है, जो मनुष्य के काय-कलेवर के अंतगर्त काम करती है और चेतना की क्रिया का रूप धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करती है। जीवसत्ता चेतनायुक्त है, उसमें प्रेरणाओं का आलोक ज्योतिर्मय है। मस्तिष्कसहित शरीर, काय-कलेवर की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह निर्धारित क्रियाकलापों को कुशलतापूर्वक संपन्न कर सके। दोनों के संयोग से ही जीवनयात्रा चलती है। जीव की आकांक्षा और शरीर की क्रियाशीलता का समन्वय ही जीवन की विभिन्न हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जीव चेतना और शरीर जड़; दोनों का समिश्रण जिस स्तर पर, जिस केंद्रबिंदु पर होता है— उसे ‘प्राण’ कहते हैं। और भी स्पष्ट करें तो चेतना और क्रिया की सम्मिश्रित स्थिति को जड़ और चेतन के मिलनकेंद्र को प्राणतत्त्व कह सकते हैं। मोटे रूप से जीवधारी की भौतिक सत्ता को प्राण रूप में ही देखा जाता और समझा जा सकता है। सरल विश्लेषण की दृष्टि से जीवन तत्त्व का दूसरा नाम प्राण भी दिया जा सकता है। इसी सत्ता की प्रधानता देखते हुए जीवधारी को ‘प्राणी’ कहते हैं। प्राण जब अपना काम बंद कर देता है तो जीव तथा शरीर की सत्ताएँ यथावत् विद्यमान रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है और कहा जाता है— प्राण निकल गए।
व्यक्ति के भीतर जो लघु एवं असीम प्राण है, वह समष्टि में समाए हुए असीम महाप्राण का एक लघु अंश है, जैसा कि परमात्मा का एक घटक— आत्मा। बिंदु वस्तुतः सिंधु का ही एक घटक है। बादल समुद्र से जल लाकर भूमि पर बरसाते हैं। जमीन पर गिरते ही वह इस उधेड़ बुन में लग जाते हैं कि किस प्रकार वह सिंधु तक पहुँचे। भूमिगत तुच्छ नलिकाओं से होती हुई, नदी-सरोवरों को पार करती हुई, वह अंततः इस प्रयास में सफल हो जाती हैं कि समुद्र में अपनी सत्ता मिलाकर असीम और अनंत स्तर के आनंद का उपभोग करें। जीव की स्थिति भी यही है, वह ब्रह्म का एक घटक है। तुच्छता एवं ससीमता में बेचेनी रहना स्वाभाविक है। समस्त संभावों और असंतोषों का समाधान असीमता की स्थिति आने पर ही मिल सकता है। इसी प्रयास में जीवधारी लगा रहता है; पर सही मार्ग मिलने से भटकाव की स्थिति, उलझन भरी भूल-भुलैयों में घुमाती है।
प्राण-प्रत्यावर्तन का तात्पर्यं है— काय-कलेवर में काम करने वाली ससीम प्राणसत्ता का अनंत-असीम में संव्याप्त महाप्राण को महत्ता के साथ आदान-प्रदान। लघु का महान में समापन और महान का लघु में आधिपत्य। महाप्राण को दूसरे शब्दों में अतिमानुष्य या अतींद्रिय आलोक कह सकते हैं। लघुप्राण जब महाप्राण की सत्ता में अपना समर्पण करता है तो स्वभावत: महाप्राण को उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए अपना कदम बढ़ाना पड़ता है। जीव जिस कदर परमेश्वर में घुलता है, उसी अनुपात से ईश्वर का आलोक जीवधारी में जगमगाने लगता है, इसलिए पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वर की उपलब्धि दोनों को एक ही तथ्य के दो पहलु माना जाता है। जितने अंश में हम अपनी स्वार्थ-संकीर्णता का परित्याग करते हैं, ठीक उसी अनुपात में महान की महत्ता का आच्छादन हमें घेर लेता है।
आत्मा और परमात्मा के बीच का संबंध-सूत्र भावनात्मक चुंबकत्व के आधार पर जुड़ता है। दो चेतनाओं के बीच की कड़ी यही है। हम उत्कृष्टतम भावनाओं को अपने अंतःकरण में स्थान देकर ही परमात्मसत्ता को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं और उसके साथ आबद्ध हो सकते हैं। आमतौर से हमारा भावना स्तर मृत न सही तो मूर्छित स्थिति में ही पड़ा रहता है। पेट और प्रजनन, वासना और तृष्णा, लोभ और मोह, स्वार्थ और अहंकार की सड़ी कीचड़ से एक कदम आगे अपना चिंतन और कर्तृत्व बढ़ता ही नहीं। ऐसी दशा में अंतःकरण को पोषण मिल ही नहीं पाता और वह भूख-प्यास से संत्रस्त मृतप्राय: स्थिति में ही पड़ा रहता है। शरीर की, बुद्धि की, संपत्ति की, सत्ता की दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बहुत बढ़े-चढ़े एवं सफल- श्रेयाधिकारी पाए जाते हैं। भावना की दृष्टि से, जिनमें अभीष्ट कोमलता जीवंत रह रही हो, ऐसे कोई विरले ही दीखते हैं। यंत्रवत् जीवन जीने वालों को इसकी कुछ आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। शरीरगत सुदृढ़ता और बुद्धिगत कुशलता से ही उन्हें सांसारिक सुविधाएँ मिल जाती हैं। उत्कृष्टता, आनंद का न उन्हें अनुभव होता है और न उस तरह के वातावरण का प्रोत्साहन मिलता है। ऐसी दशा में भाव-भूमिका का मृतप्राय: स्थिति में पड़ा रहना स्वाभाविक है।
कहना न होगा कि परमात्मा असीम शक्ति, शांति का केंद्र है। उसके साथ संबद्ध होकर, हम समस्त सीमाओं को लाँघकर, असीम और समस्त अभावों को परास्तकर अनंत वैभववान बन सकते हैं। ऋषि और देवदूत वस्तुतः इसी स्तर के होते हैं। जन्मजात रूप से वे भी अन्य सबकी भाँति सामान्य ही होते हैं; पर भावना को विकसित करके अपनी क्षुद्रता को असीम में जोड़ देते हैं। जुड़ी हुई दो वस्तुएँ एक ही हो जाती हैं। ईश्वर के साथ जुड़ा हुआ जीव — महाप्राण के साथ जुड़ा हुआ प्राण लगभग एक ही— समतुल्य हो जाते हैं। आत्मिक विकास की दिशा में बढ़ते हुए जीवसत्ता, सिद्धियों और विभूतियों की दिव्य संपदाओ से लद जाती हैं।
विवेकसंगत और शास्त्रसम्मत साधना-पद्धतियाँ, एक ही प्रयोजन पूरा करती हैं कि अंतःकरण की प्रसुप्त उच्च भावनाओं को जगाएँ, उन्हें दिशा दें और इतना आत्मबल उत्पन्न करें, जिसके सहारे लोभ और मोह के बंधनों को तोड़ते हुए मनुष्य उत्कृष्ट चिंतन को ह्रदयंगम और आदर्श कर्तृत्व को क्रियान्वित करने के लिए आंतरिक और बाह्य अवरोधों को तोड़ता हुआ कटिबद्ध हो सके। उपासना के अनेकों विधि-विधान प्रचलित हैं, पर उनका एकमात्र उदेश्य यही है। कर्मकांडो, साधना उपक्रमों की बालपोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय शिक्षा-व्यवस्था की जाती है। सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं, केवल मुगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं, पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछूता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रियाकलाप अथवा वस्तुओं का हेर-फेर भर जुड़ा रहता है, वे प्राय: बालक्रीड़ा बनकर ही रह जाती हैं। उनसे कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान संभव हो सके, आत्मा और परमात्मा के परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगे; यही है — प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया, जिसकी व्यवस्था इन दिनों शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में चल रही है और उपयुक्त साधकों को क्रमशः थोड़ी-थोड़ी संख्या में बुलाया जा रहा है। यह प्रत्यावर्तन-साधनाक्रम यदि सही रीति से संपन्न हो सके, तो तत्काल उसका प्रतिफल देखा जा सकता है। जीवन का जो कुछ भी भला-बुरा स्वरूप है, वह मनुष्य के चिंतन और कर्तृत्व की प्रतिक्रियामात्र है। उत्थान और पतन की अंतःस्थिति का प्रतिबिंबमात्र कहना चाहिए। विक्षोभ और उल्लास का तात्त्विक विवेचन किया जाए तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर रख सकते हैं और आंतरिक स्तर में हेर-फेर संभव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अंतःनिष्ठा एवं आकांक्षा-प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो बाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया। भीतरी परिवर्तन का बाह्य जीवन पर परिवर्तन- प्रभाव देखने को न मिले, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज का दुःखी कल सुखी बन सकता है, आज का पतित कल प्रातः स्मरणीय और अभिवंदनीय बन सकता है, आज का उलझन भरा व्यक्ति कल समुन्नत और संतोषजनक स्थिति का आनंद ले सकता है। यह परिवर्तन सांसारिक घटनाक्रम के हेर-फेर से नहीं हो सकता, जैसा कि आमलोग समझते हैं। इसके लिए एकमात्र अंतःचेतना के स्तर में ही उलट-पुलट होनी चाहिए।
शास्त्रीय साधनाएँ इसी प्रयोजन को पूरा करती हैं। देखने में उनमे भी तपश्चर्या, योग-साधना एवं विधि-विधानों का ही बाह्य कलेवर गठित होता है; पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष की ध्यान-धारणा अत्यंत सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना-विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं— शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं; वरन भावभरी मन:स्थिति में संपन्न किया जाए।
प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों में यों 6 घंटे तथा दस प्रकार के विभिन्न साधना-विधान करने पड़ते हैं; पर उनके साथ-साथ यह तथ्य भली प्रकार ह्रदयंगम करा दिया जाता है कि क्रिया-कृत्य को ही सब कुछ न मान बैठें, उसके भीतर गहराई तक प्रवेशकर और जिस साधना के साथ भावना जुड़ी हुई है, उसे आत्मसात करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयत्न इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रतिबिंबित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलतापूर्वक संपन्न होता चला जाता है। इस अंतःस्फुरणा को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढर्रे को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार, किस दिशा में, क्या परिवर्तन किया जा सकता है? तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है। कहना न होगा कि परिष्कृत प्रक्रिया में जब, जिस क्षण भी प्राण-प्रतिष्ठा होती है, उसी क्षण मनुष्य की क्षुद्रता, महानता में परिणत हुई दीखने लगती है। इस स्थिति में वह अपने लिए और दूसरोँ के लिए एक अनुपम वरदान बनकर सामने आता है। उसकी पिछली उलझन भरी जीवनचर्या और नवोदित प्रगतिशीलता की जब तुलना की जाती है; तो यह स्पष्ट अनुभव होता है कि वस्तुतः व्यक्तित्व में भारी हेर-फेर हुआ है और प्राण-प्रत्यावर्तन ने एक तथ्यपूर्ण यथार्थता का रूप धारण किया है। लघु से महान बनने के उपरांत गुण, कर्म, स्वभाव में और तदनुरूप परिस्थितियों में जो अंतर होना चाहिए, वह जब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा तो यह संदेह करने का कोई कारण न रह जाएगा कि साधना में सिद्धि न जाने मिलती हैं या नहीं।
/akhandjyoti/edition/1973/June/3
तैत्तिरीयोपनिषद् की तृतीय वल्ली (भृगु वल्ली) में एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण आख्यायिका आती है। उसमें पंचकोशो की साधना पर मार्मिक प्रकाश डाला गया है।
वरुण के पुत्र ने अपने पिता के निकट जाकर प्रार्थना की कि, “अधीहि भगवो ब्रह्मेति।” अर्थात— हे भगवान! मुझे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दीजिए। वरुण ने उत्तर दिया— “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति यत्प्रन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति।” अर्थात— हे भृगु! जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और अंत में जिसमें विलीन हो जाते हैं, तू उस ब्रह्म को जानने की इच्छा कर।
पिता के आदेशानुसार पुत्र ने, उस ब्रह्म को जानने के लिए तप आरंभ कर दिया। दीर्घकालीन तप के उपरांत, भृगु ने अन्नमय जगत (स्थूलसंसार) में फैली ब्रह्म की विभूति को जान लिया और वह पिता के पास पहुँचा।
वरुण ने भृगु से फिर कहा— “तपसो ब्रह्म विजिझासस्वतपो ब्रह्मेति।” अर्थात— हे पुत्र! तू तप करके ब्रह्म को जानने का प्रयत्न कर, क्योंकि ब्रह्म को तप द्वारा ही जाना जाता है।
भृगु ने फिर तपस्या की और ‘प्राणमय जगत’ की ब्रह्मविभूति को जान लिया और वह पिता के पास पहुँचा। वरुण ने फिर उसे तप द्वारा ब्रह्म को जानने का उपदेश दिया।
पुत्र ने पुन: कठोर तप किया और ‘मनोमय जगत’ की ब्रह्मविभूति से अभिज्ञान प्राप्त कर लिया। पिता ने उसे फिर तप में लगा दिया। अब उसने विज्ञानमय जगत की ईश्वरीय विभूति को प्राप्त कर लिया, अंत में पाँचवी बार भी पिता ने उसे तप में ही प्रवृत्त किया और भृगु ने उस आनंदमयी विभूति को भी उपलब्ध कर लिया।
‘आनंदमय जगत’ की अंतिम सीढ़ी पर पहुँचने से किस प्रकार पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। इसका वर्णन करते हुए ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’ की तृतीय वल्ली के पाँचवे मंत्र में बताया गया है कि—
“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्—आनंदाद्ध्येवखल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसविशन्तीति। सैषाँ भार्गवी वारुणी विद्या परमेव्योंमन् प्रतिष्ठिता।”
अर्थात— उस (भृगु) ने जाना कि आनंद ही ब्रह्म है। आनंद से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनंद से ही जीवित रहते हैं और अंत में आनंद में ही विलीन हो जाते हैं।
उपनिषद्कार ने उपरोक्त आख्यायिका में ब्रह्मानंद, परमानंद, आत्मानंद में ही ब्रह्मज्ञान का अंतिम लक्ष्य बताया है। आनंदमय जगत के कोश में पहुँचने के लिए तप करने का संकेत किया है। कोशों की सीढ़ियाँ जैसे-जैसे पार होती है, वैसे ही वैसे ब्रह्म की उपलब्धि निकट आती जाती है। आगे बताया है कि—
“सय एवं वित् अस्माल्लोकात्प्रेत्य, ऐतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतम् प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं विज्ञान मयमात्मानमुपसंक्रामति, एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।”
अर्थात— इस प्रकार जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है, वह इस अन्नमयकोश को पार करता है, इस प्राणमयकोश को पार करता है, इस मनोमयकोश को पार करता है, इस विज्ञानमयकोश को पार करता है, इस आनंदमयकोश को पार कर सकता है।
तैत्तिरीयोपनिषद् की अच्छी वल्ली में आनंद की मीमांसा करते हुए कहा गया है कि कोई मनुष्य यदि पूर्ण स्वस्थ, सुशिक्षित, गुणवान, सामर्थ्यवान एवं समस्त संसार की धन-संपत्ति का स्वामी हो तो उसे जो आनंद हो सकता है, उसे एक मानुषी आनंद कहते हैं। उससे करोड़ों-अरबों गुने आनंद को ब्रह्मानंद कहते हैं। 1— ब्रह्मानंद का ऐसा ही वर्णन शतपथ ब्राहमण 15/17/31 में तथा वृहदारण्यक उपनिषद् 4/3/33 में भी आया है।
पंचमुखी गायत्री साधना, पंचकोशों की साधना है। एक-एक कोश की, एक-एक ब्रह्मविभूति हैं। ये ब्रह्मविभूतियाँ वे सीढ़ी हैं, जो साधक को अपना सुखास्वादन कराती हुई अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए अग्रसर करती हैं।
जीवन जैसी बहुमूल्य संपदा कीट-पतंगो की तरह व्यतीत करने के लिए नहीं है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते हुए नर-तन बड़ी कठिनाई से मिलता है। इसको तुच्छ स्वार्थ में नहीं, परमार्थ में लगाना चाहिए। गायत्री साधना ऐसा परमार्थ है, जो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर देता है।
यदि विचार किया जाए तो यह आश्चर्य और खेद का विषय है कि ऐसा साधन सुलभ होने पर भी केवल पेट भरने और निकृष्ट भोग करने की स्थिति में ही पड़ा रहे अथवा इससे भी नीचे उतरकर छल, कपट, चोरी, ह्त्या आदि जैसे जघन्यकृत्य करके, नरकवास करने के दंड का भागी बन जाए। ईश्वर ने हमको इस कार्यभूमि में मुख्यतः इसलिए भेजा है कि हम सत्कर्म और सात्विकी साधना तथा उपासना करके दैवी मार्ग पर अग्रसर हों और जीवन को उच्चतर बनाते हुए अपने महान लक्ष्य को प्राप्त करें। दैवी मार्ग को अपनाने और जीवन को शुद्ध, पवित्र, परोपकारमय बनाने में ऐसी कोई बात नहीं है, जो हमारी प्रगति में बाधास्वरूप सिद्ध हो। गरीब-से-गरीब और सांसारिक साधनों से रहित व्यक्ति भी इसको अपना सकता है और गायत्री उपासना तथा सेवामय जीवन के द्वारा निरंतर ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। इसके लिए मुख्य आवश्यकता श्रद्धा, लगन व दृढ़ आत्मविश्वास की ही है, जिसको मनुष्य अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है।
पैङ्गल्योपनिषद् में लिखा है—
अथान्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानंदमया: पंचकोशा: । अन्नरसेनैव भूत्वाऽन्नरसेनाभिवृद्धिं प्राप्यान्नरसमयपृथिव्यां यद्विलीयते सोऽन्नमयकोश: । तदेव स्थूलशरीरम् । कर्मेन्द्रियै: सह प्राणादिपंचकं प्राणमयकोश: । ज्ञानेन्द्रियै: सह मनो मनोमयकोश: । ज्ञानेन्द्रियै: सह बुद्धिविेज्ञानमयकोश: । एतत्कोशत्रयं लिङ्गशरीरम् । स्वरूपाज्ञानमानन्दमयकोश: । तत् कारणशरीरम् ।।3।।
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय यह पाँच कोश हैं । अन्न से बनने वाला, अन्न से बढ़ने वाला, अन्नमय धरती में समा जाने वाला यह अन्नमयकोश है । इसी को स्थूलशरीर कहते हैं। पाँच प्राण और पाँच कर्मेंद्रियों से मिलकर प्राणमयकोश बना है। ज्ञानेंद्रियाँ और मन के मिलने से मनोमयकोश बनता है। ज्ञानेंद्रियाँ और बुद्धि मिलने से विज्ञानमयकोश बना है। इन तीनों के मिलने से सूक्ष्मशरीर बना है। जिसके कारण ज्ञान होता है, वह आनंदमयकोश है। इसी को कारणशरीर कहते हैं।
अस्थिस्नाय्यवादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् ।
योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिण: ।।21
तत: प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरस्थित: ।
ततो मनोमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरस्थित: ।।22
ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरस्थित: ।
आनंदमय आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरस्थित: ।।23
योऽयमन्नमय: सोऽयं पूर्ण: प्राणमयेन तु ।
मनोमयेन प्राणोऽपि तथा पूर्ण: स्वभावत: ।।24
ततो मनोमयो ह्यात्मा पूर्ण: ज्ञानमयेन तु ।
आनन्देन सदा पूर्ण सदा ज्ञानमयेन सुखी ।।25
तथानन्दमयश्चापि ब्रह्मणान्येन साक्षिणा ।
सर्वान्तरेण पूर्णश्च ब्रह्म नान्येन केनचित् ।।26
— कठ रुद्रोपनिषद् 21से 26
प्राणियों में यह स्थूल अन्नमय शरीर दिखाई दे रहे हैं। इससे पृथक एक प्राणमय शरीर है। इससे आगे मनोमय शरीर है, फिर विज्ञानमय और उसके भीतर आनंदमय शरीर है। प्राणमय से अन्नमय पूर्ण होता है। मनोमय से प्राणमय पूर्ण होता है। विज्ञानमय से मनोमय पूर्ण होता है और आनंदमय शरीर मनोमय शरीर को पूर्ण करता है। इन पाँच शरीरों से ऊपर एक सर्वव्यापी सर्वांतर्यामी, परब्रह्म है। वह अपने आप पूर्ण है, उसे अन्य कोई पूर्ण नहीं करता।
गायत्री महामंत्र का दार्शनिक और साधनात्मक पक्ष कितना प्रखर है; यह कहने की आवश्यकता नहीं। इन चौबीस अक्षरों में जिन तथ्यों और प्रेरणाओं का समावेश है, उस आधार पर इस महामंत्र को संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वदर्शन, सबसे छोटा, किंतु सबसे महान सार्वभौम धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। इन अक्षरों पर जितना विचार किया जाए, उतने ही बहुमूल्य मणि-मुक्तक हस्तगत होते हैं। इसमें भरी शिक्षाएँ देश, काल, धर्म, जाति से ऊपर हैं। इसमें विश्वमानव के लिए आत्मिक एवं भौतिक रीति-नीति अपनाने का उच्चस्तरीय ऐसा मार्गदर्शन किया गया है, जिसे अपनाने पर अभाव और अशांति का कहीं कोई कारण शेष रह ही नहीं सकता।
गायत्री मंत्र का दूसरा पक्ष शक्ति-साधना है। भौतिक शक्तियाँ विद्युत, भाप, अणुऊर्जा आदि के यंत्र-उपकरणों द्वारा गुप्त की जाती है और उससे विविध-विधि, सुविधा-साधन उपलब्ध किए जाते हैं। आत्मिक शक्तियों के समस्त स्रोत मानवी काय-कलेवर में विद्यमान हैं। चेतन की क्षमता जड़ की तुलना में असंख्यगुनी अधिक है। चेतन्य शक्तियों ने जड़ जगत को बनाया है और वे ही उसका नियंत्रण करती हैं। रेलगाड़ी कितने ही मूल्य की क्यों न हो, वह चेतन ड्राइवर के बिना निरर्थक ही बनी रहेगी। विश्व में संव्याप्त चेतन-सत्ता के औजार-उपकरणों को ही जड़ जगत में काम करने वाले शक्ति-प्रवाहों में गिना जा सकता है। अनंत अंतरिक्ष में बिखरी हुई चेतन ब्रह्मसत्ता से संपर्क कैसे बनाया जाए और उन विभूतियों से व्यक्ति को, विश्व को, कैसे लाभान्वित किया जाए, इसके समस्त रहस्य और उपकरण मनुष्य के काय-कलेवर में भरे पड़े हैं। इन महान संबंध-सूत्रों को उपयोग करने के विधि-विधान को ही साधना-विज्ञान कहते हैं।
चेतनात्मक ब्रह्मसत्ता से संपर्क स्थापित करने और उससे उपयोगी विभूतियाँ उपलब्ध करने की विद्या ही साधनात्मक योग-प्रक्रिया है। इसी को ब्रह्मविद्या कहते हैं। दिव्य चेतना के अभीष्ट अवतरण का विज्ञान ही साधना उपक्रम है। इसके लिए यों अन्य विधि-विधान भी प्रचलित हैं; पर सर्वोत्तम सर्वसुलभ और समुचित फलप्रद साधना गायत्री महामंत्र के शक्ति पक्ष की ही है।
गायत्री उपासना के दो पक्ष हैं— सामान्य और असामान्य। सामान्य उपासनाओं में सर्वसाधारण के लिए सुगम पड़ने वाले दैनिक नित्यकर्म में प्रयुक्त होने वाले तथा नवरात्रि आदि पर्वों पर किए जाने वाले छोटे-बड़े अनुष्ठान आते हैं। उच्चस्तरीय असामान्य साधनाओं में वे उपक्रम आते हैं, जिन्हें गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में गायत्री योग-साधना संदर्भ में बताया— समझाया गया है।
उच्चस्तरीय गायत्री साधना को पंचकोशी साधना कहते हैं। गायत्री माता की कुछ मूर्तियाँ तथा तस्वीरें ऐसी भी मिलती हैं, जिनमें उनके पाँच मुख दिखाए गए हैं। अलंकारिक रूप में उन्हें पंचकोश कह सकते हैं। मानवी सत्ता का एक ही काय-कलेवर इंद्रियगम्य है। इसे अन्नमयकोश कहते हैं। इसके भीतर क्रमशः अधिक सूक्ष्म होते चले गए कलेवरों की परतें भी हैं। केले के तने में, प्याज की गाँठ में एक के भीतर एक परत होते हैं। मानवी सत्ता में भी ऐसी ही परतें हैं, इनमें एक अन्नमयकोश देखा जा सकता है। शेष चार प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, आनंदमयकोश सूक्ष्म— अद्रश्य हैं। शरीर के अंतर्गत बाहुबल और मनोबल आते हैं। श्रम, पुरुषार्थ एवं बुद्धिबल से हम कितना कुछ उपार्जन-उपयोग करते हैं, यह स्पष्ट है। संसार की साधना-संपदाएँ इसी एक कोश की उपलब्धियाँ हैं। शेष चार सूक्ष्मकोश, द्रश्यमान स्थूलकोश की तुलना में असंख्य गुने अधिक बलिष्ठ हैं। उनमें जो अदृश्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, उनका लेखा-जोखा ले सकना सामान्य बुद्धि के लिए प्राय: असंभव ही है। योगियों, सिद्धपुरुषों, ब्रह्मज्ञानियों, तत्त्ववेत्ताओं, महामानवों की अलौकिक क्षमताओं का यदा-कदा विवरण सुना-देखा जाता है, जो नहीं सुना-देखा गया, वह और भी अधिक विस्तृत एवं रहस्यपूर्ण है। इस समस्त अलौकिकता को अदृश्य कोशों का जागरण- प्रतिफल ही कह सकते हैं। इन दिव्य आवरणों में ज्ञान और विज्ञान के अनिर्वचनीय शक्तिस्त्रोत दबे पड़े हैं, उनका प्रयोग-उपयोग जाना जा सके तो मनुष्य निश्चित रूप से सामान्य भूमिका का अतिक्रमण करके असामान्य बन सकता है।
पंचकोशों का अनावरण— जागरण, गायत्री महामंत्र की उच्चस्तरीय पंचकोश साधना से संबधित है। इसके लिए सरल विधि-विधान प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र की साधना-पद्धति में समन्वित किया गया है। चार दिन के सत्र में इसकी भूमिका इस प्रकार अभ्यस्त करा दी जाती है कि उसे भविष्य में नियमित साधना का अंग बना लिया जाए तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की आत्मबलवर्द्धन की दिशा में क्रमिक, किंतु तीव्र प्रगति की जा सकती है। विशिष्ट प्रगति करने वाले इसी मार्ग पर चलते हुए कुंडलिनी जागरण जैसी महान उपलब्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
मानवी काय-कलेवर में षट्चक्रों का अस्तित्व है। इन्हें सिद्धियों और विभूतियों के रक्तभंडार कहा जाता है। देव सत्ताओं के द्वारा महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान इन्हीं केंद्रों द्वारा होता है। कुंडलिनी जागरण-प्रक्रिया— षट्चक्रबेधन के साथ जुड़ी हुई है। इस चक्रबेधन प्रक्रिया को पंचकोश अनावरण का ही दूसरा विधान कह सकते हैं। षट्चक्रों के नाम— (1) आज्ञाचक्र (2) विशुद्धाख्यचक्र (3) अनाहतचक्र (4) मणिपुरचक्र (5) स्वाधिष्ठानचक्र (6) मूलाधारचक्र हैं। इनके अतिरिक्त एक मूर्धन्यचक्र है, ब्रह्मरंध्र स्थित सहस्त्रारचक्र। इसे जोड़ें तो वे 6 न रहकर 7 हो जाते हैं। वस्तुतः कुंडलिनी का अग्निकुंड मूलाधारचक्र भी सहस्त्रारकमल के स्तर का ही है। इन दोनों को काया का उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव भी कह सकते हैं। सर्वविदित है कि पृथ्वी पर जो अंतग्रही ब्रह्मांडीय आदान-प्रदान होता है, उसके यह दोनों ध्रुव ही आधार हैं। बिजली के प्लग में दो पिनें होती हैं, इन्हें स्विच के छिद्रों में ठूस देने पर करेंट चालू हो जाता है। ठीक इसी प्रकार पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच भौतिक शक्तियों का महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान इन ध्रुवकेंद्रों द्रारा ही होता है। सूक्ष्मशरीर में अवस्थित यह मूलाधारचक्र दक्षिण ध्रुव की और सहस्त्रारचक्र उत्तरी ध्रुव की भूमिका संपन्न करता है। महासर्पिणी और महासर्प का निवास इन्ही दोनों में हैं। उनका मिलन-संयोग मनुष्य को अतिमानव बना देता है।
यहाँ कुंडलिनी जागरण तथा षट्चक्रबेधन प्रक्रिया का वर्णन अप्रासंगिक होगा। कहा इतना भर जा रहा है कि यदि मूलाधार के तथा सहस्त्रार के दो ध्रुवों को अतिरिक्त स्थिति में मान लिया जाए तो शेष पाँच ही रह जाते हैं। इन पाँचों चक्रों को, पाँच कोशों का प्रतीक कह सकते है। दोनों को परस्पर अविच्छिन्न रूप से संबद्ध कहा जा सकता है। (1) अन्नमयकोश— आज्ञाचक्र (2) प्राणमयकोश— विशुद्धाख्यचक्र (3) मनोमयकोश— अनाहतचक्र (4) विज्ञानमयकोश— मणिपुरचक्र (5) आनंदमयकोश— स्वाधिष्ठानचक्र। इस प्रकार कोश और चक्र परस्पर संबद्ध ही समझे जा सकते हैं।
प्रत्यावर्तन सत्र में जो साधनाक्रम निर्धारित है, उसे पंचकोश जागरण भूमिका कह सकते हैं और उसी दिशा में चलते रहने से षट्चक्र-प्रस्फुरण, कुंडलिनी जागरण, त्रिविध ग्रंथीवेधन, जीवनमुक्ति, भावसमाधि आदि अनेकानेक योग सिद्धियों की उपलब्धि का अनुदान मिलना संभव मान सकते हैं।
प्रत्यावर्तन साधना को प्रकारांतर से पंचकोशों के जागरण की उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होने वाले समस्त साधन-सूत्र इसमें क्रमबद्ध रूप से भली प्रकार जोड़ दिए गए हैं। उच्चस्तरीय शिक्षा के प्रथम अध्याय के रूप में इसे अपेक्षायुक्त सुगम रखा गया है। क्रमिक उन्नति के साथ अगले दिनों और भी अधिक कठिन, साथ ही अधिक समर्थ साधनाओं का मार्गदर्शन भी अधिकारी साधक यथासमय प्राप्त कर सकते हैं।
अन्नमयकोश के परिष्कार के लिए विशेष आहार है, जो इस साधना सत्र में सम्मिलित होने वाले साधकों को मिलता है। अन्न शुद्धियों के लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ किया जाता है। गंगाजल से ही भोजन बनता है और वही पीया जाता है। बनाने तथा परोसने में जिन व्यक्तियों का संपर्क रहता है, उससे वह सहज ही संस्कारवान हो जाता है। पंचगव्य का सेवन प्रायश्चित की दृष्टि से आवश्यक ही माना गया है। इस स्तर की जो भी व्यवस्थाएँ बन पड़ी हैं, इस प्रकार बनाई गईं हैं, जिनसे मन को सहज ही उच्चस्तर की दिशा में घसीटने वाले हविष्यान्न का लाभ साधकों को उपलब्ध होता रहे और उनके अन्नमयकोश में समाधानकारक परिर्वतन प्रस्तुत हो सके।
प्राणमयकोश की जागृति के लिए प्राणयोग का सरल; किंतु प्रभावी आधार सोऽहम् महामंत्र का अजपा जाप रखा जाता है। प्राण को महाप्राण में संयुक्त करने की यह उपयुक्त प्रक्रिया है। अनंत अंतरिक्ष में जिस श्वास-प्रश्वास क्रिया द्वारा चेतन्य विद्युत महाप्राण को खींचा जाता है, उसके लिए यों दस प्राणायाम अन्य भी हैं, पर उनमें सर्वश्रेष्ठ सोऽहम् के प्राणयोग को ही माना गया है। यह बिना जोखिम और बिना झंझट का भी है। पाँचो प्राण, (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) इसी प्रक्रिया के अंतर्गत सजग-समर्थ बनाए जा सकते हैं और पाँच उपप्राण— नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय भी इस साधना से परिष्कृत— समुन्नत होते हैं। आज की स्थिति में सर्वसाधारण के शारीरिक-मानसिक स्तर को देखते हुए प्राणयोग का सर्वसुलभ माध्यम सोऽहम् का अजपा जाप ही निर्धारित किया जा सकता है।
मनोमयकोश कि जागृति के लिए मनोनिग्रह के साधनाक्रम अपनाने पड़ते हैं। इसके लिए बिंदुयोग, त्राटक, प्रकाश-ज्योति का आज्ञाचक्र में अवतरण सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। मन का निवास मस्तिष्क में है और मस्तिष्क का नियंत्रण आज्ञाचक्र से होता है। शिव और दुर्गा के चित्रों में जो तीसरा नेत्र चित्रित है, वह इस महाकेंद्र में अवस्थित शक्तिसत्ता का परिचय देता है। भगवन शिव ने उपद्रवकारी मनजिस, मनोज, कामदेव को इसी दिव्य नेत्र का अनावरण करके भस्म किया था। मन कि उछल-कूद, कुमार्गगामिता को निरस्त, नियंत्रित करने के लिए आज्ञाचक्र को ज्योतिर्मय बनाना ऐसा साधनाचक्र है, जिससे मनोनिग्रह कि समस्या इस स्तर के अन्य सभी साधनों कि अपेक्षा अधिक अच्छी तरह हल हो जाती है।
बिंदुयोग की साधना इसी प्रयोजन के लिए है और साधक प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि उसका मनःक्षेत्र किसी ऐसे दिव्य प्रकाश से भर गया, जिससे मनोगत कुत्साएँ एवं उच्छृंखलताओं को हतप्रभ ही होना पड़ेगा। मनोजय कि दिशा में बिंदुयोग से— त्राटक द्वारा ज्योति अवतरण की ध्यान-धारणा से कितनी सहायता मिलती है, इसे अनुभव के आधार पर सहज ही जाना जा सकता है।
विज्ञानमयकोश की जागृति के लिए मध्यान्होत्तर दो साधनाएँ हैं— (1) आत्मबोध और (2) तत्त्वबोध। जीवन तथ्य की गरिमा, गंभीरता तथा यथार्थता को समझना, अनुभव करना ही विज्ञान है। दर्पण के माध्यम से अपने गर्हित और एक महत्तम स्तर का विचार- विष्लेषण किया जाता है और आत्मसत्ता को उच्चस्तरीय स्थिति तक पहुँचाने के लिए उभारा-उगाया जाता है। आत्मदेव को इष्टदेव में परिणत करने की आत्मबोध-साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है। वैराग्य, संन्यास, परमहंसगति, स्थितिप्रज्ञ अवस्था का उदय होता है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की उभयपक्षीय चेतना का उद्भव जिस अंत:करण में होगा, उसे विज्ञानमयकोश का सफल साधक ठहराया जा सकेगा ।
प्रत्यावर्तन साधनाक्रम में अभ्यंतरमयकोश की जागृति के लिए दो साधनाऐं— (1) खेचरी मुद्रा— जिह्वा को तालु से सटाकर ब्रह्मरंध्र में टपकने वाले अमृत बिंदुओ का रसास्वादन। (2) नादयोग और नादानुसंधान— इसके माध्यम से मन मयूर को नृत्य करने का, वेणुनाद पर चलने वाले रास-उल्लास का अनुभव कराते हैं और अंतःकरण को आनंद-उल्लास भरी भूमिका का रसास्वादन होता है।
साधना के तीन स्तर हैं— आरंभिक, माध्यमिक, उच्चस्तरीय। इन्हें प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल और कॉलेज कह सकते हैं। प्राइमरी स्कूल की त्रैत साधना है, जिनमें पंचतत्त्वों से बना प्रतिमास्वरूप भगवान, पूजारत पंचतत्त्वों से बना शरीर। पंचतत्त्वों की पूजा-सामाग्री, इस प्रकार यह पार्थिव पूजा प्रारंभिक साधना कही जाती है। देवालयों में, कर्मकांड उपचारों में यही प्रक्रिया काम आती है। कथा, कीर्तन, परिक्रमा, यात्रा, स्नान, तर्पण, प्रभृति विविध-विधि क्रियाकलाप इसी स्तर के हैं। यह बालकक्षा है।
द्वैत में ध्यान की प्रधानता है। भक्त और भगवान का परस्पर भावनाओं का आदान-प्रदान, सान्निध्य, सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य अनुभव इसी भूमिका से किया जाता है। इसे हाईस्कूल स्तर की द्वैत साधना कह सकते हैं।
अंतिम उच्चस्तरीय साधना अद्वेत की है। इसे कॉलेज कक्षा कह सकते हैं। इससे ब्रह्म और जीव का परस्पर समर्पण होता है। जीव अपनी सत्ता ब्रह्म में होमता है और ब्रह्म अपनी विभूतियाँ जीव पर उड़ेलता है। इस आदान-प्रदान में दोनों की ही तृप्ति होती है, इसे आत्मा और परमात्मा का विवाह-बंधन— ब्रह्म-संबंध कह सकते हैं। प्रत्यावर्तन सत्र की प्राय: सभी साधनाऐं इसी समर्पणयोग की पृष्ठभूमि विनिर्मित करती हैं, इसलिए उसे उच्चतम स्तर की वेदांतोक्त अद्वैत साधना कह सकते हैं। जिन्हें इन सत्रों में बुलाया गया है, उनकी पूर्वजन्मों की संचित तप संपदा इसी स्तर की समझी गई है और आशा की गई है कि पूर्वजन्मों की उपलब्धियों से आगे वे सामान्य साधनाक्रम का आश्रय लेकर द्रुतगति से आगे बढ़ सकेंगे और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
/akhandjyoti/edition/1973/June/6
गत अंक में अपनों से अपनी बात स्तंभ के अंतर्गत शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में चल रहे प्रस्तुत प्रत्यावर्तन सत्र की रूपरेखा बताते हुए उसके अंतर्गत चल रही दस साधना-प्रक्रियाओं की चर्चा की गई थी। चुँकि इस अंक में उसी संदर्भ में विशेष प्रकाश डाला जा रहा है, अतएव इस साधनाक्रम को संक्षिप्त में फिर एक बार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इससे संदर्भ-चर्चा एवं विवेचन-विश्लेषण को समझने में अधिक सुविधा होगी।
1.प्रात: 5 से 5.15:— शिथिलीकरण मुद्रा श्वासन— शरीर को बिना तनाव का बनाना, अधिकाधिक शिथिल करना, मृतक जैसी स्थिति में शरीर में ढीलापन लगना।
2. 5.15 से 5.30:— उन्मनी मुद्रा— मन को विचाररहित खाली कर देना। प्रलयकाल जैसी— नीचे नील जल ऊपर नील आकाश के बीच अपने को एकाकी बालक की तरह कमलपत्र पर पड़े हुए बहते जाने की भावना करना। संसार में वस्तुओं और व्यक्तियों का सर्वथा अभाव अनुभव करना, सर्वथा नीरवता का ज्ञान करना।
3. 5.30 से 6.30:— खेचरी मुद्रा— जिह्वा को तालू पर उलटकर ब्रह्मरंध्र से टपकने वाले आनंद और उल्लास को उभयस्तर की अमृत बिंदुओं का रसास्वादन करना। आनंद अर्थात— संतोष, हर्ष। उल्लास अर्थात— उर्ध्वगमन के लिए उमंग, उत्साह।
4. 7.30 से 8:— आधा घंटा—गायत्री मंत्र का पाँच मालाओं का जप। जपकाल में आधे समय मल-मूत्र सनी मलिनता के कारण, माता का अपनी गोद में न लेना। स्नान कराया जाना और पोंछा जाना। तदुपरांत माता कि गोद में प्रश्रय और प्यार-दुलार मिलना। जप के अंत में सुर्यार्घ्य देते हुए अपनी उपलब्धियों को जलरूप मानकर ब्रह्मवर्चस् के प्रतीक भगवान आदित्य के चरणों में समर्पित-विसर्जित करना।
5. 8 से 8.45:— पौन घंटा— सोऽहम्-साधना। आरंभ के पंद्रह मिनटों में श्वास के साथ-साथ ‘सो’ की तथा श्वास बाहर निकलते समय ‘हम्’ की ध्यान की भावना करना। उसके उपरांत श्वास के रूप में महाप्राण का शरीर के रोम-रोम में प्रवेश और ‘हम्’ के रूप में निकृष्ट स्तर की अहंता का बहिष्कार।
6. 8.45 से 9.30:— पौन घंटा— बिंदुयोग त्राटक। प्रकाश बत्ती पर दृष्टि जमाना। आँखे बंद करना और भ्रू-मध्य भाग— आज्ञाचक्र में प्रकाश-ज्योति का ध्यान जमाना। उस प्रकाश का शरीर के प्रत्येक अवयव एवं मन के प्रत्येक स्तर में प्रवेश अनुभव करना और अपनी सत्ता के कण-कण में दैवी प्रकाश की ज्योति जगमगाती अनुभव करना।
7. 9.30 से 10:— आधा घंटा— नादयोग का पूर्वार्ध। भगवान की बंशी जैसी पुकार, प्रेरणा में अपने के लिए आह्वान का आमंत्रण मानना और रास-नृत्य की तरह इश्वरीय संकेतो पर थिरकने लगने की भावविभोर स्थिति में पहुँचना।
8. 3 से 3.45:— पौन घंटा— आत्मबोध। दर्पण में अपनी छबि देखते हुए अब तक के अवरोधों के लिए, अपने को उत्तरदाई मानते हुए भर्त्सना करना और भविष्य में सत्यपथगमन के लिए अनुरोध-अनुग्रह करना। इसी कलेवर में शैतान और भगवान की परस्पर विरोधी सत्ताएँ अवस्थित देखना। दोनों में से एक को चुनना। आत्मसत्ता के भीतर समाए हुए इष्टदेव का अभिवंदन और प्रत्यक्ष करना। भविष्य में उसे देवस्तर का बनने का विश्वास करना। उसी उज्ज्वल स्वरूप को ईश्वर प्राप्ति का प्रत्यक्षीकरण मानना और उस स्तर के लिए अभी से श्रद्धांजलि समर्पित करना।
9. 3.45 से 4.30:— पौन घंटा— तत्त्वबोध। शरीर और आत्मा का पृथक्करण। अपने शरीर का मृतक स्थिति में कुत्ते, कौओं, कीड़ों द्वारा खाया जाना, जलाया, गाड़ा जाना देखना। अपने को किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर यह सब दृश्य देखने की स्थिति में रखना। शरीर और मन को आत्मा का वाहन-उपकरणमात्र समझना। उनके स्वार्थ और अपने स्वार्थ में अंतर करना। उपलब्ध क्षमता में से कितना अंश इन वाहनों के लिए रखना और कितना आत्मकल्याण के लिए रखा जाना चाहिए, इसका निर्णय करना।
10. 4.30 से 5:— आधा घंटा— नादयोग का उत्तरार्ध। इस बार उच्च दृष्टिकोण अपनाकर संसार में मनुष्यों में बिखरे हुए उत्कृष्टता के तत्त्व का अनुभव करना और विधेयात्मक दृष्टिकोण के— अनासक्त मन:स्थिति के फलस्वरूप मिलने वाले स्वर्गीय आनंद की अनुभूति में संगीत ध्वनि के साथ-साथ हर्षोल्लासभरे भाव, नृत्य में संलग्न होने की अनुभूति करना।
इन दसों साधनाओं पर ध्यान देने से प्रतीत होगा कि इनका भावपक्ष तत्त्वदर्शन के सारभूत सिद्धांतो का एक संतुलित समन्वय है। उसके ब्रह्मविद्या के चार आधार हैं— (1) आत्मचिंतन (2) आत्मसुधार (3) आत्मनिर्माण (4) आत्मविकास। इन चारों ही प्रयोजनों को यह साधना-पद्धति बहुत ही सुंदर, समुचित एवं संतुलित रूप से संपन्न करती है। साधना-उपक्रम के माध्यम से उस भाव-अभ्यास की यह रूप-रेखा है, जिसके आधार पर प्राण का महाप्राण एवं आत्मा का परमात्मा के रूप में विकसित हो सकना कठिन नहीं रहता, सरल हो जाता है।
इसी प्रकार साधना सत्र में सम्मिलित होने वाले साधकों को जिस दिनचर्या का पालन करना पड़ता है, उसे भी जीवनक्रम की संतुलित व्यवस्था की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण ही कह सकते हैं। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त्त में 4 बजे उठना, शौच-स्नान से 5 बजे तक निवृत्त हो जाना— एक ऐसा क्रम है, जो अभ्यास में आने पर एक घंटे में शरीर की स्व्च्छता से निवृत्त होकर आवश्यक कार्यों में जुटा जा सकता है और ऐसे ही आलस-प्रमाद में जो समय नष्ट होता रहता है, उसे बचाया जा सकता है। भोजन, विश्राम आदि की नियोजित दिनचर्या बनाई जाए, अपने काम स्वयं किए जाएँ। कपड़े धोने, सफाई संबधी अन्य काम स्वयं निपटाने की आदतें रखें। रात्रि को समय पर सो जाया जाए। तो इस नियमित व्यवस्था को अपनाकर हर मनुष्य अधिक काम कर सकता है, अधिक व्यवस्थित एवं निश्चिंत रह सकता है। घर-परिवार के तथा साथी-सहचर लोग प्रसन्न, संतुष्ट रह सकते हैं। साथ ही अधिक मात्रा में अधिक अच्छे स्तर का उपार्जन हो सकता है। नियमित दिनचर्या जीवन की सफलता का अतिमहत्त्वपूर्ण सूत्र है, जो लोग यह समझते हैं कि अधिक काम करने की वजह से अव्यवस्थित रहना पड़ता है। वे भारी भूल करते हैं। अव्यवस्था से काम का स्तर गिरता है, समय की बर्बादी होती है और लाभ को बढ़ाती नहीं घटाती है। व्यस्त, किंतु नियमित जीवनचर्या अपनाने वाले ही कुछ महत्त्वपूर्ण प्रगति कर सके हैं, यह ध्यान रखना चाहिए।
प्रत्यावर्तन सत्र में हर काम समय पर करने, हर वस्तु को संभालकर रखने और अपने हर कार्य में स्वच्छता-व्यवस्था प्रदर्शित करने का विशेष रूप से निर्देश देते रहते हैं। देखने में यह बहुत ही छोटी बातें हैं; पर इन छोटी आदतों पर भी व्यक्तित्व का आधार निर्भर रहता है। तिनके-तिनके जोड़कर ही पक्षी अपने सुंदर एवं सुदृढ़ घोंसला बनाता है। मनुष्य का प्रतिभाशाली और समुन्नत व्यक्तित्व भी समय के सदुपयोग और नियमित क्रम-व्यवस्था पर ही निर्भर रहता है ।
सत्र के दिनों में एकाकी निवास, एकांतचर्या, आश्रम की मर्यादा के भीतर ही रहना, घूमना, अनावश्यक बकवास न करना, केवल नितांत आवश्यक कार्यों के लिए वाणी खोलना, आदि छोटे-बड़े नियम प्रतिबंध ऐसे हैं, जो मोटी दृष्टि से साधारण जैसे भले ही प्रतीत हों; पर उनमें क्रम-व्यवस्था की शिक्षा है, जिसके आधार पर घर जाकर भावी जीवन के लिए नियमित और व्यवस्थित योजना बनाकर रहा और चला जा सकता है। यह छोटे-छोटे सूत्र मिलकर समुन्नत जीवन की नीव के सुदृढ़ पाषाण बन सकते हैं।
आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं योगशास्त्रं परं मतम्।।१७।।
— शिव संहिता 1/17
संपूर्ण शास्त्रों पर बार-बार विचार करने के उपरांत यह सुनिश्चित मत निर्धारित हुआ कि एक योगशास्त्र ही सर्वोपरि है।
ब्रह्मभूतः एवेह योगी चाऽत्मरतोऽमलः।
विषयेन्द्रियसंयोगात्केचिद्योगं वदन्ति वै।।
— अग्नि पुराण
आत्मा को निर्मल बनाकर, इंद्रियों का संयमकर, उसे परमात्मा के साथ मिला देने की प्रक्रिया का नाम योग है।
इन दिनों आश्चर्य इस बात का किया जाना है कि पौष्टिक भोजन और अत्यंत सुविधाजनक रहन-सहन उपलब्ध होने पर भी लोग क्यों रक्तचाप, ह्रदयरोग, अनिद्रा, मधुमेह, अपच जैसी बीमारियों में अधिकाधिक ग्रस्त होते चले जा रहे हैं। इस संदर्भ में की गई शोधों का एकमात्र निष्कर्ष है कि शरीर और मन पर हर घड़ी छाया रहने वाला तनाव ही इसका एकमात्र कारण है।
शांति के कारण मस्तिष्क में उद्वेग छाए रहते हैं। नशीला, उत्तेजक खान-पान, अनावश्यक उछल-कूद, बेतरह और बेतरतीब व्यस्तता के कारण स्नायु संस्थान में उत्तेजना छाई रहती है और वासनाएँ, दुश्चिंताएँ तथा दुर्भावनाएँ आदि आवेश मस्तिष्क में भरे रहते हैं। फलस्वरूप शरीर और मन की शक्तियों का अनावश्यक अपव्यय होता रहता है और स्थिति यहाँ तक बिगड़ती है कि विविध प्रकार के रोगों से शरीर एवं मन दोनों ही बुरी तरह ग्रसित हो जाते हैं। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बचने के लिए विशेषज्ञों का एक ही परामर्श है कि अविश्रांति से बचा जाए, काम भरपूर किया जाए; किंतु गहरे विश्राम की आवश्यकता को भी समझा जाए।
नैपोलियन बोनापार्ट और रावर्ट क्लाइव के दो उदहारण अनोखे हैं। वे युद्ध के दिनों दिन भर मोर्चे का संचालन करते थे और रात्रिभर योजनाएँ बनाते थे। कई-कई दिन उन्हें ऐसे ही बिना सोए गुजारने पड़ते थे। थकान को दूर करने के लिए वे दोनों ही एक अनोखा उपाय बरतते थे कि किसी पेड़ या दीवार का सहारा लेकर अपने प्रचंड संकल्पबल से शरीर को पूर्णतया शिथिल कर देते थे और निंद्रित, तंद्रित एवं मूर्छित स्थिति तक शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी पहुँचा देते थे। वह क्रिया प्रायः आधा घंटे में वे पूरा कर लेते थे और इसके बाद पूरी नींद सोने जैसी ताजगी लेकर फिर काम में जुट जाते। अकबर के बारे में कहा जाता है कि वह नित्य तीन घंटे ही सोता था। अर्जुन को गुडाकेश अर्थात निद्रा जीतने वाला कहा जाता है। वह भी बिना सोए काम में प्रवृत्त रहता था। कुंभकरण भी सोने के झंझट से बचकर छ: महीने जागने और एक दिन सोने का वरदान मागने चला था। गलती से ही शब्द उलटे निकल गए और वरदान की आकांक्षा अभिशाप में बदल गई।
यहाँ निद्रा की अनुपयोगिता नहीं बताई जा रही है और न अधिक जगने के लिए किसी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। स्वाभाविक आहार-विहार ही श्रेयस्कर होता है, इसलिए जवान आदमी को 6-7 घंटे गहरी नींद सोने की व्यवस्था बनानी ही चाहिए; किंतु विशेष उपचार के रूप में, अतिरिक्त आहार के रूप में सुविधानुसार शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास भी करते रहना चाहिए। इससे थकानजन्य क्षति की पूर्ति में भारी सहायता मिलती रह सकती है और शरीर को रुग्णताजन्य विपत्तियों से बचाया जा सकता है।
मस्तिस्क के संबंध में भी यही उपचार काम में लाया जा सकता है। कुछ समय यदि सब प्रकार के भले-बुरे विचारों से मस्तिष्क को खाली रखने का अभ्यास डाला जा सके तो उन आवेशग्रस्त उत्तेजनाओं से बचा जा सकता है, जो मानसिक संतुलन नष्ट करके मनुष्य को सनकी अथवा विक्षिप्त जैसी स्थिति में ला पटकती है, चिड़चिड़ा बनाती है और अनिद्रा जैसे अकालमृत्यु के अग्रदूत रोगों के जाल-जंजाल में फँसा देती है। जिस प्रकार शरीर को शिथिल करने की क्रिया स्नायु संस्थान की थकान मिटाती है, उसी प्रकार मस्तिष्क यदि आवेशग्रस्त हो रहा है अथवा बेतरह थक रहा है, सिर चकराने जैसी स्थिति बन रही हो तो मस्तिष्क एक प्रकार के विचारों से एकदम खाली का प्रयोग किया जा सकता है। यदि थोड़ी देर भी विचाररहित स्थिति में जा सके तो प्रत्यक्ष अनुभव होगा कि सिर का भार कितना हलका हो गया। जिन्हें अधिक मानसिक श्रम करना पड़ता है अथवा उत्तेजित करने वाली परिस्थितियों में रहना पड़ता है, उसके लिए मस्तिष्क को खाली करने का उपचार ‘रामबाण’ औषधि का काम दे सकता है।
योग-साधना की दृष्टि से तो यह उपचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ध्यान-धारणा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले इसे प्रथम सोपान गिन सकते हैं। ध्यान न जमने, मन का गहराई में प्रवेश न करने, इधर-उधर के विचार मस्तिष्क पर छाए रहने, चित्त के यहाँ-वहाँ उड़ते फिरने की उच्चस्तरीय साधनाओं को सबसे जटिल व्यवधान कह सकते हैं। यह दूर न किया जा सके तो मनोयोग के आधार पर संपन्न होने वाले साधनाक्रमों में सफलता नहीं मिल सकती। अस्त-व्यस्त मन:स्तर के लोगों को त्रैतवादी कर्मकांडपरक साधनाएँ बता दी जाती हैं, वे कथा-कीर्तन, यात्रा, परिक्रमा, पूजा-पाठ के उपक्रमों को, प्रधानतया शरीर को और यत्किंचित मन को लगाकर अपनी गाड़ी धकेलते रहते हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं का क्षेत्र ध्यान-भूमिका है, उसमें प्रवेश करने के लिए मानसिक स्थिरता आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए योगसाधक शरीर को ढीला और मन को खाली करने का अभ्यास करते रहे हैं। इसमें सफलता मिलने पर उनका आगे का क्रियाकलाप सरलतापूर्वक अग्रसर होने लगता है, तब ध्यान जमने की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती।
प्रत्यावर्तन सत्रों में सबसे पहले यही दो कदम बढ़ाए जाते हैं। प्रातः 5 से 5.30 तक शरीर को ढीला करना पड़ता है और 5.30 से 5.45 तक मस्तिष्क को खाली करने का अभ्यास किया जाता है। इसके पश्चात एक घंटे तक खेचरी मुद्रा के आधार पर अमृतपान शक्ति संचरण की साधना की जाती है।
शिथिलीकरण मुद्रा के लिए देह का सहारा देने वाला माध्यम होना चाहिए। आराम-कुर्सी इसके लिए सुविधाजनक रहती है। यों इसे लेटकर या पेड़, दीवार आदि का सहारा लेकर भी किया जा सकता है। इससे शिथिलता की अवस्था में इधर-उधर लुढ़कने की अड़चन नहीं रहती। दोनों हाथों की उगलियों के खाँचे आपस में मिला लेना चाहिए और उन्हें नाभि के नीचे वाले स्थान पर रखना चाहिए। इस स्थिति में बैठने के उपरांत शरीर को निद्राग्रस्त, मूर्छित, मृतक जैसी स्थिति में पूर्ण निष्क्रिय हो जाने की भावना करनी चाहिए। यह विचारणा जितनी अधिक गहरी होगी, उतना ही स्नायु संस्थान पर से तनाव घटेगा। स्वास्थ्य की दृष्टि से तो यह उपयोगी है ही, साथ ही ध्यान-धारणा की पूर्ण भूमिका का भी पथ-प्रशस्त हो जाता है। पंद्रह मिनट मनोयोगपूर्वक इस शवासन का प्रयोग करने से शरीर की स्थिति ऐसी बन जाती है, मानो वह योगाभ्यास के लिए ठीक तरह तैयार हो गया हो।
मन को खाली करने के लिए नीचे नील जल और ऊपर नील आकाश का ध्यान करना पड़ता है। सर्वत्र नीरवता अनुभव करनी पड़ती है और सोचना पड़ता है— प्रलयकाल के समान अब कहीं, किसी वस्तु या व्यक्ति का अस्तित्व नहीं रहा। प्रलयकाल के चित्र बाजार में मिलते हैं, उसमें नीचे नील जल, ऊपर नील आकाश है। जल के ऊपर कमलपत्र, उस पर एक छोटा बालक पैर का अगूँठा चूँसता हुआ बहता चला जा रहा है। यही ध्यान से मन को खाली करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। प्रलय के कारण जब कहीं कोई व्यक्ति या वस्तु शेष ही नहीं तो मन जाएगा किस पर? भागेगा कहाँ? अपना स्तर जब बालक जैसा ही है तो फिर कामनाएँ, वासनाएँ, तृष्णाएँ सताएँगी ही क्यों? अपने अंगूठे का रस पीकर जब स्वनिर्भर, आत्मतृप्ति का साधन मौजूद है तो फिर आकर्षित क्यों और किसकी ओर हुआ जाएगा?
उपरोक्त कल्पना-चित्र यदि ठीक प्रकार मन पर जम जाए तो मन का विचाररहित, सर्वथा खाली बना देना कुछ कठिन नहीं रहता। ऐसी स्थिति की अनुभूति होती है— मानो सिर पर लदे हुए पहाड़ जैसे भार उतर गए और चित्त हलकी-फुलकी शांति और संतोष कि स्थिति में रह रहा है।
इसके उपरांत खेचरी मुद्रा प्रशस्त हो जाती है। शरीर का ढीला और मन को खाली करना ध्यान-धारणा की पूर्व भूमिका है। इतना कर लेने के बाद किसी भी ध्यान का ठीक तरह जमाना सरल हो जाता है। इतना ही नहीं, सामान्य जीवन में भी इस अभ्यासक्रम की भारी उपयोगिता है। मस्तिष्क पर उद्दीप्त आकांक्षाओं का यह विपरीत अप्रिय परिस्थितियों का कई बार इतना अधिक दबाव बन जाता है कि अनिद्रा से लेकर आत्महत्या का उत्पात कर बैठने तक की स्थिति बन जाती है। इसी उद्विग्न्ता का शमन करने के लिए मन को खाली करने वाला उपचार जादू जैसा काम करता है। चढ़े हुए आवेशों को उतारने और मन को संतुलित करने में यह उपचार कितना सफल होता है, इसे कभी भी अनुभव करके देखा जा सकता है। इसी प्रकार शरीर पर रुग्णता, अधिक श्रम, अस्त-व्यस्तता आदि कारणों से पड़े हुए दबाव, तनाव का निराकरण करने के लिए शिथिलीकरण मुद्रा का प्रयोग कभी भी सरलतापूर्वक किया जा सकता है। योग-साधना में, ध्यान-धारणा में तो उसकी उपयोगिता असंदिग्ध रूप से है ही।
साढ़े पाँच से साढ़े छ: खेचरी मुद्रा का प्रयोग है। जिह्वा को उलटकर तालू से लगाना और ब्रह्मरंध्र में से टपकने वाले अमृत-बिंदुओं का तालु तथा जिह्वा के संपर्क स्थान पर अनुभव- आस्वादन करना— संक्षिप्त में यही खेचरी मुद्रा है। जिह्वा को जितना पीछे उलटा जा सके, उसके लिए सामान्य प्रयत्न करना चाहिए और तालु के गहरे स्थल से जितना सरलतापूर्वक संपर्क बनाया जा सकता हो, बनाना चाहिए। बहुत अधिक दबाव नहीं देना चाहिए, अन्यथा अनुभूति में उस कष्टकारक स्थिति के कारण बाधा पड़ेगी।
यों हठयोग में काली मिर्च, पीपल आदि का चूर्ण जिह्वा पर मलते हुए उसे अपेक्षाकृत लंबी बनाने का प्रयत्न किया जाना है, ताकि उसे अधिक दूरी तक पीछे लौटाया जा सके। जीभ के नीचे वाले तंतु को काटकर उसे अधिक लंबाई तक बढ़-चढ़ने के लिए तैयार करने का भी विधान है; पर आज कि स्थिति में वे दोनों ही प्रयोग अनुपयुक्त हैं। प्राचीनकाल में शरीर इतने शुद्ध थे कि उतना करने पर भी कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता था; पर आज कि दुर्बल और विकृत शारीरिक स्थिति में कोई भयंकर विग्रह उत्पन्न हो जाना संभव है। जिह्वा को कोई हानि पहुँच सकती है और नया उपद्रव खड़ा हो सकता है, जिससे लाभ के स्थान पर हानि ही पल्ले पड़े। हमें ऐसे जोखिम भरे प्रयोगों से सदा बचना चाहिए। सीमा उतनी ही रखनी चाहिए जिससे लाभ भले ही धीरे या कम हो, पर कोई अनावश्यक उपद्रव न उठ खड़ा हो। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त यही है कि जिह्वा को सरलतापूर्वक जितना उलटा जा सकता हो, उसे उलटकर तालू के गह्वर में जितना पीछे ले जाया सकता हो, ले जाया जाए।
जिह्वा को नोंक की तालू से सटाया जाता है। अमृताकर्षी तत्त्व इस अग्रभाग में ही रहते हैं। उस नोंक का और तालु का बहुत ही धीमी गति से घर्षण भी करना चाहिए। जननेंद्रियों के अग्रभाग जैसे ही उत्तेजक संवेदनाएँ इन मर्मस्थलों पर रहती हैं। नर जननेंद्रिय से जिह्वाग्र भाग की तुलना की जा सकती है और तालू-गह्वर की नारी जननेंद्रिय से संभोगजन्य उत्तेजना से परिचित हैं। यह संयोगजन्य मृदुलता अपने ढंग के अनोखी है। संभोग में विषयानंद मिलता है, इस संयोग में ब्रह्मानंद के आनंद, उल्लास, घर्षण, आध्यात्मिक श्वासोच्छास के रूप में अनुभव किए जा सकते हैं। विषयानंद में मिलने वाली तृप्ति की तुलना में ब्रह्मानंद की तुष्टि का स्तर कितना अधिक बढ़ा-चढ़ा है, इसका अनुभव साधक को कुछ ही समय के अभ्यास पर होने लगता है।
मनुष्य— ब्रह्मचेतना का परमप्रिय शिशु शावक है। गाय अपने छोटे बछड़े को दूध पिलाकर तृप्त और पुष्ट करती है, उसी प्रकार अनंत अंतरिक्ष में संव्याप्त ब्रह्मचेतना अपने बछड़े मनुष्य पर दिव्य अनुदानों की निरंतर वर्षा करती रहती है। जीव और ब्रह्म का यह आदान-प्रदान तालू के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में होता है। इस स्थान की कोमलता छोटे बालकों के मस्तिष्क में अधिक आसानी से देखी जा सकती है। इसे ब्रह्मकपाल भी कहते हैं, ठीक इसी के नीचे सहस्त्रारचक्र है। कुंडलिनी जागरण में इस केंद्र में सन्निहित ब्रह्मतेजस् को महासर्प कहते हैं। पौराणिक अलंकार में क्षीर सागर में सहस्त्र फन वाले महासर्प पर शयन करने वाले विष्णु का चित्रण इसी स्थान की वस्तुस्थिति समझाने के लिए किया गया है। लक्ष्मी अर्थात सिद्धियों और विभूतिओं की देवी, परा और अपरा विशेषताओं से युक्त महामाया, इसी स्थान पर अपने पति विष्णु के साथ प्रसुप्त अवस्था में पड़ी है। क्षीर सागर अर्थात मस्तिष्क में भरा हुआ मज्जा पदार्थ। शिवपुराण में इसी को कैलाश पर्वत, मानसरोवर झील, सर्पाषणयुक्त महाशिव के रूप में वर्णन किया गया है। निस्संदेह यह स्थान समस्त शरीर में अतिदिव्य है। आध्यात्मिक उत्तरी ध्रुव यही है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का केंद्र यही है। जीव और ब्रह्म का मिलन— मर्मस्थल यही है। खेचरी मुद्रा द्वारा इसी मर्मस्थल का स्पर्श करके वहाँ की प्रसुप्त स्थिति को जागृत किया जाता है।
शिवलिंग पर रुद्राभिषेक करने के लिए एक तिपाई रखी जाती है, उस पर जल भरे तीन घड़े रखे जाते हैं। हर घड़े के पेंदे में छेद होता है। पानी ऊपर से नीचे वाले घड़े में टपकता है और फिर अंत में वह बूंद शिवलिंग पर टपकती है। इस रुद्राभिषेक को खेचरी मुद्रा का मूर्तिमान प्रतीक चित्रण कह सकते हैं। ब्रह्मचेतना ऊपर वाला घड़ा— प्रकृति अंड-ब्रह्मांड। दूसरा घड़ा— ब्रह्मांड का बिंदु-प्रवाह पिंड में अवतरित होना। तीसरा घड़ा— जिह्वा शिवलिंग घट छिद्रों में कुशा ठुसी रहती है, ताकि जलबिंदु का आकार-प्रकार संतुलित क्रम से टपके। तालू को कुश का आच्छादन कह सकते हैं। घड़ो में जल भरा रहने पर भी कई बार कुशाएँ फूल जाने अथवा उनमें बालू, रेट आदि भर जाने से बूंदे टपकना बंद हो जाता है। तब उस कुशा को कुरेदकर बिंदु-प्रवाह ठीक करना पड़ता है। जिह्वा को तालू के साथ मंद घर्षण करके इसी द्वार को खोला जाता है और ब्रह्मांड में देहांड के बीच के टूटे हुए संचार-सूत्र को पुनः गतिशील किया जाता है।
जिह्वाग्र भाग चिंतनपरक मस्तिष्क और क्रियापरक काय-कलेवर के बीच आदान-प्रदान की कड़ी का काम करता है। ब्रह्मसंदेशों को व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत करने के लिए गतिशील बनाना खेचरी मुद्रा द्वारा सहज संभव होता है। उससे उभयपक्षीय प्रयोजन सिद्ध होते हैं। ज्ञान के रूप में विभूतियाँ उपलब्ध होती हैं और शक्ति के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों की अवतरण प्रक्रिया संपन्न होती है। साधक में तत्त्वदर्शन की ब्रह्मचेतना भी जागृत होती है और शक्ति अवतरण से वह समर्थ सिद्धपुरुष एक महामानव भी बनता है।
इस प्रयोजन को ज्ञान और कार्य के मिले हुए व्यावहारिक क्रियाकलाप ही पूरा कर सकते हैं। जीवन-साधना के पथ पर समग्र रूप से चलना भी एक साधना है और कितने व्यक्ति बिना योग-साधना के निर्धारित विधि-विधानों को अपनाए बिना भी महामानव देवदूत स्तर की परिष्कृत स्थिति प्राप्त कर लेते हैं; पर जिन्हें साधना विज्ञान पर निष्ठा है, उन्हें योगाभ्यास की प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण सहायता कर सकने वाली दृष्टिगोचर होती है। अस्तु समुन्नत जीवन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने के साथ-साथ वे योग-साधानाओं में भी तत्परता बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए खेचरी मुद्रा का असाधारण लाभ-प्रभाव और महत्त्व साधारण नहीं, असाधारण ही है।
प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया की ब्रह्ममुहूर्त्त साधना में सर्वप्रथम डेढ़ घंटे की खेचरी मुद्रा साधना है। इसमें पंद्रह मिनट शरीर को ढीला करना, पंद्रह मिनट मन को खाली करना और तदुपरांत एक घंटे जिह्वा को उलटकर तालू से लगाना, धीरे-धीरे सिहलाना और उस आधार पर अमृत बिंदु की मधुरता और ब्रह्मानंद की चरम संवेदना का अनुभव करना— सामान्यतया यही खेचरी मुद्रा है। यों उपरोक्त तीन कार्यक्रम प्रथक-प्रथक प्रतीत होते हैं; किंतु वस्तुतः वे एक ही हैं। शरीर को ढीला और मन को खाली किए बिना कोई ध्यान सही रूप से जम नहीं सकता। इसलिए इन पंद्रह-पंद्रह मिनट के दो उपक्रमों को तो खेचरी-साधना के साथ जुड़े हुए दो चरण ही कहना चाहिए, जिसके बिना गति आगे बढ़ती ही नहीं।
यह साधना ब्रह्म और जीव के बीच संबध-सूत्र को सुसंचालित करती है और उनके बीच आदान-प्रदान में जो अवरोध उत्पन्न हो गया है, उसे समाप्त करके संचार-शृंखला में पुनर्जीवन उत्पन्न करती है।
पेंडुलम गति में ही यह सारा विश्व अपना कार्य-संचालन कर रहा है। ह्रदय की धड़कन, श्वासोच्छ्वास, आकुंचन-प्रकुंचन कर्म, विश्राम प्रवृत्ति सभी शारीरिक क्रियाकलाप पेंडुलम गति से ही चल रहे हैं। रात-दिन, सर्दी-गर्मी, गति-अवगति, पदार्थ-प्रतिपदार्थ जैसे प्रकृतिगत स्पंदन भी इसी क्रम से चल रहे हैं। जन्म-मरण, उत्थान-पतन, देव-असुर, राग-द्वेष, पुण्य-पाप जैसे उभयपक्षीय जीवन की गतिविधियों को भी इसी के स्तर की मानी जा सकती है। गर्भाधान-प्रक्रिया के आघात-प्रतिघात इसी एक प्रकार से पेंडुलम स्तर के ही हैं। समुद्र में निरंतर उठने वाली लहरें, ज्वार-भाटे, कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, उदय-अस्त, प्रकाश और ध्वनि के तरंग-कंपन आदि की विविध-विधि विश्व हलचलों पर जिधर भी दृष्टिपात करते हैं, उधर ही यह प्रतीत होता है कि पेंडुलम गति के आधार पर मात्र घड़ियाँ ही नहीं चलती, यहाँ सब कुछ उसी रीति-नीति से गतिशील हो रहा है।
प्रकृति और पुरुष का संयोग-संभोगक्रम घड़ियाल पर हथौड़े की चोट पड़ने की तरह चलता है। यहीं से ॐकार ध्वनि की झंझनाहट-थरथराहट होती है। ईश्वर का स्वघोषित नाम ‘ॐ’ इसलिए है। पराप्रकृति के अंतराल में यही ॐकाररूपी आघात-प्रतिघात चलते रहते हैं। शक्ति वहीं से उत्पन्न होती है और सृष्टि में विविध-विधि हलचले उत्पन्न करती हैं।
परमात्मा का आत्मा के साथ निरंतर पेंडुलम गति से ही मिलन-संपर्क चलता रहता है। इस संस्पर्श की अनुभूति— (१) आनंद और (२) उल्लास के रूप में रहती है। सामान्य स्थिति में तो इसकी प्रतीति नहीं होती, पर खेचरी मुद्रा के माध्यम से उसे अनुभव किया जा सकता है। भगवान की मनुष्य को दो प्रेरणाएँ हैं। जो उपलब्ध है, उसकी गरीमा को समझते हुए, संसार के सुखद पक्ष का मूल्यांकन करते हुए— संतुष्ट, प्रसन्न और आनंदित रहना— यह है आनंद का स्वरूप। उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में साहस भरे कदम उठाने के लिए अदम्य उत्साह का, भाव-भरी उमंगो का उठना— यह है उल्लास। भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरंतर पेंडुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। मानव जीवन जैसी सृष्टि की अनुपम उपलब्धि को पाकर यदि अंत:करण आनंदित रहे और छोटे-मोटे अभावों की ओर अधिक ध्यान न देकर चारों ओर बिखरी हुई सदाशयता का अनुभव करते हुए, संतुष्ट-संतुलित रहे, तो समझना चाहिए, आनंद की उपलब्धि हो रही है। हर्षातिरेक में उछलने-कूदने या बढ़-चढ़कर शेखीखोरी की बातें करने का नाम आनंद नहीं है। उस स्थिति में दृष्टिकोण परिपक्व और परिष्कृत हो जाता है, इसलिए जिन अभावों और असफलताओं में दूसरे लोग उद्विग्न-उत्तेजित हो उठते हैं, उन्हें वह विनोद-कौतुक भर समझते हुए अपनी मन:स्थिति को संतुलित बनाए रहता है। जिनकी मनोभूमि ऐसी हो, उसे आनंद की प्राप्ति हो गई, ऐसा कहा जा सकता है।
संतुष्ट या प्रसन्न होने में एक दोष यह है कि अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलने के लिए जिस कठोर कर्मठता की जरूरत पड़ती है, उसे प्राय: भुला ही दिया जाता है। ऐसी भूल करने वाले अध्यात्मवादी प्राय: निकम्मे, निखट्टू, अकर्मण्य, आलसी, प्रभावी और बुराइयों, बुरी परिस्थितियों से समझौता कर लेने वाले भाग्यवादी— पलायनवादी बन बैठते हैं। उससे उनकी अपनी समग्र प्रगति का द्वार तो बंद हो ही जाता है, साथ ही समाज के लिए, प्रखर कर्त्तव्यपालन के लिए जो महान उत्तरदायित्व मनुष्य के कंधो पर होते हैं, वे भी अवरुद्ध हो जाने से लोक-मंगल के लिए मानवी योगदान में भी भारी क्षति पहुँचती है। इससे धर्मसंस्थापन को और अधर्म के निराकरण के ईश्वरीय प्रयोजन को भारी क्षति पहुँचती है। मनुष्य का अवतरण जिन महान कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वो का प्रचंड प्रयत्नशीलता के साथ निर्वाह करने के लिए हुआ है, यदि उनमें शिथिलता आ गई तो समझना चाहिए कि जीवित ही मृतक बन जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। यदि आनंद या संतोष की प्राप्ति किसी अध्यात्मवादी में इस प्रकार की अकर्मण्यता उत्पन्न कर दे, तो समझना चाहिए कि बिलकुल उलटा हो गया और अर्थ का अनर्थ बन गया।
उल्लास इस प्रकार की अवांछनीय मन:स्थिति बनने की गुजांयश नहीं छोड़ता। भगवान निरंतर आनंद के साथ-साथ उल्लास भी प्रदान करते हैं और उच्चस्तरीय प्रयत्नों के लिए प्रचंड कर्मठता अपनाने के लिए अदम्य स्फूर्ति एवं उमंग उत्पन्न करते हैं। उल्लास जब अपनी प्रौढ़ावस्था में होता है तो वह इतना प्रखर होता है कि प्रस्तुत कठिनाइयों, अभावों, अवरोधों की चिंता न करते हुई ईश्वरीय संदेश के अनुरूप अपनी रीति-नीति निर्धारण करने के लिए मचल उठता है। किसी के रोके नहीं रुकता। लोभ और मोह के भवबंधन यों सहज नहीं टूटते और कुसंस्कार तथा स्वार्थसंबंधी शुभचिंतक ऐसी भावनाओं को क्रियान्वित होने में पग-पग पर विरोध उत्पन्न करते हैं; पर जिसे उल्लास प्राप्त है, उसे आत्मकल्याण और ईश्वरीय निर्देशों के पालन की दिशा में ही अग्रसर होना होता है। कठिनाइयाँ क्यों आती हैं और रोक-थाम कौन-कौन करते हैं? उसकी चिंता नहीं करता। फलस्वरूप ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ वाली बात बन ही जाती है। जिसे उल्लास की उपलब्धि मिल गई, उसे महापुरुषों जैसे महान कर्त्तव्यपालन करते रहने के अनवरत अवसर निर्वाध गति से मिलते ही रहते हैं।
परमात्मा का सम्मिलन संवाद पेंडुलम गति से आनंद और उल्लास के रूप में आत्मा को प्राप्त होता है। भगवान किसी से वार्त्तालाप किसी शब्दावली में नहीं करते। वे बेकार की बकवास नहीं करते; वरन् अतिसंक्षिप्त में अतिमहत्त्वपूर्ण— सारभूत प्रेरणाएँ दो ही संकेतो में देते रहते हैं। टेलीग्राफ की डैमी ‘गर’ और ‘गटट’ दो ही ध्वनियाँ निकालती है और उसी से लंबे-चौड़े संवादों की शृंखला बनाती रहती है। हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति और क्षमता के अनुरूप अपनी कार्यपद्धति का निर्धारण कर सकता है, इसमें भगवान का हस्तक्षेप नहीं कि किसी उत्कृष्ट जीवनयापन के लिए अपनी दिनचर्या या क्रिया-प्रक्रिया क्या बनानी-अपनानी चाहिए, यह सब अपने निर्णय की बात है। भगवान केवल दिशा देते हैं। हिमालय का ह्रदय वेधकर गंगा-यमुना की पुण्य धराएँ प्रवाहित होती हैं और समुद्र से मिलने की दिशा में निरंतर चलती रहती हैं। कहाँ घाट, पुल या नहरे बनें? पानी का कहाँ, क्या उपयोग हो? यह दूसरों का काम है। हिमालय पवित्र धाराओं का सृजन करके उन्हें समुद्र में मिलने के लिए प्रेरणा देकर अपने उत्तरदायित्व से निवृत्त हो जाता है, ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी आत्मा को दो ही प्रेरणा देते हैं। अंत:जीवन में आनंदित रहो, बाह्यजीवन में भी उल्लास भरी उत्कृष्ट कर्मठता बरतो। दोनों प्रेरणाओं को कौन, किस प्रकार कार्यान्वित करे, यह निर्णय-निर्धारण करना मनुष्य का अपना काम है। इसके लिए उसे अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है, अस्तु इसके लिए व्यक्तिगत चिंतन की ही आवश्यकता पड़ती है।
खेचरी मुद्रा में जिह्वा को तालु से लगाने और धीरे–धीरे सहलाने पर जिस अमृत रसास्वादन का लाभ मिलने की चर्चा की गई, वह कभी-कभी मधु जैसी मिठास के रूप में अनुभव होती है। मनीषियों ने उसे सोमरस भी कहा है और बताया है कि उसमें मादकता होती है। आंतरिक मस्ती को भौतिक मादकता के समतुल्य माना जाए तो यह उसकी संगती बैठ ही जाएगी। उच्चस्तरीय भावनाओं का उद्वेग वस्तुतः एक अद्भुत मस्ती लिए हुए होता है। उसमें आनंद भी असीम रहता है और अवरोधों को कुचलते हुए निर्धारित दिशा में बढ़ चलने का साहस भी। इसलिए उस मस्ती को सोमरस की व्याख्या में वर्णित बहुचर्चित मादकता माना जाए तो वह अलंकारिक वर्णन कुछ अनुपयुक्त नहीं कहा जाएगा। जिह्वा को मधुरस प्रिय लगता है, अमृत को भी मीठा कहा गया है, खेचरी मुद्रा में जिह्वा और तालु के स्पर्श में कुछ इसी प्रकार की मिठासप्रधान स्वाद की अनुभूति होती है और लगता है, उसमें कुछ मस्ती मादकता भी है। सोमपान के आनंद की अनुभूति और उल्लास भरी साहसिकता किस प्रकार की होती है, इसे खेचरी मुद्रा का साधक अपने स्तर के अनुरूप यात्रा में अनुभव करता चलता है।
बीच-बीच में मुँह में पानी भर जाता है, उसे निगलते रहना चाहिए। जीभ जब थक जाती है तो उसे विश्राम देने के लिए बीच में कुछ मिनटों के लिए क्रिया को बंद भी कर देते हैं, चुँकि प्रत्यावर्तन सत्र में एक घंटे के लिए इसे रखा गया है, इसलिए बीच में विराम— विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। सामान्यतया दैनिक अभ्यास में इसे पंद्रह मिनट तक करना पर्याप्त होता है, तब उसे बीच में रोकना नहीं पड़ता।
खेचरी मुद्रा की सिद्धियों का हठयोगग्रंथो में विस्तारपूर्वक वर्णित है। यह बताया गया है कि उस साधना द्वारा किस प्रकार अलौकिक अतींद्रिय क्षमताएँ प्राप्त होती हैं। वर्षाऋतु आने पर जिस प्रकार सुखी हुई घास हरी हो जाती है, उसी प्रकार खेचरी मुद्रा द्वारा अनंत आकाश से चेतनतत्त्व की वर्षा कराई जाती है और उससे सुषुप्त मूर्छा में पड़े हुए महत्त्वपूर्ण शक्ति-संस्थान सहज ही सजीव होते हैं और मनोरम हरितमा के रूप में पुष्पित, सुगंधित, सुरभित दृष्टिगोचर होते हैं। अमृत का गुण मृतक को जीवित करना और जीवित को अमर बनाना है। यह दोनों ही लाभ परिक्षा रूप में खेचरी मुद्रा के साधक को मिलते हैं।
काय-कलेवर के अंतर्गत षट्चक्र, तीन ग्रंथियाँ, बावन उपत्यिकाएँ, सप्तलोक, सप्तदेव जैसे वे शक्तिकेंद्र अवस्थित हैं, जिन्हें यदि मूर्छा से विरत करके जागृत स्थिति तक पहुँचा दिया जाए तो मनुष्य अलौकिक और अद्भुत क्षमताओं से भरा-पूरा दृष्टिगोचर होने लगता है। इन सिद्धियों का स्तर व्यक्ति की सूक्ष्मसंरचना के अनुरूप होता है। जिसके शरीर और मन में जो विशेषताएँ प्रखर है, सिद्धियाँ भी उसी स्तर की मिलती देखी गई हैं।
सर्वविदित और हर किसी के लिए प्रत्यक्ष सिद्धि यह है कि खेचरी मुद्रा का साधक अंतर्मुखी बनता है और अपने अंतर का गहन निरीक्षण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि प्रगति और शांति के समस्त साधन अपने ही भीतर विद्यमान हैं। कषाय-कल्मषों ने उन्हें मृतप्राय: बनाया है। उसी से बाहर के व्यक्तियों की वस्तुओं का उत्थान-पतन का सुख-दुःख का कारण समझने के भ्रम में फँसना पड़ता है। यदि अंतरंग क्षेत्र को निखारा गया आत्मचिंतन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चतुर्विध महापुरुषार्थों का आश्रय लिया जाए, तो मनुष्य को लघु से महान बनने के मार्ग में फिर कोई अवरोध शेष नहीं रहा जाता। इस स्तर का प्रकाश मिल जाने पर फिर मनुष्य आत्मपरिष्कार की योजना बनाकर उसी को कार्यान्वित करने में संलग्न हो जाता है। इस दिशा में चल पड़ने वाले व्यक्ति का नर से नारायण बन जाना सुनिश्चित है। खेचरी मुद्रा हमें इसी स्तर के लाभों से लाभान्वित करती है।
प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया की ब्रह्ममुहूर्त्त साधना में सर्वप्रथम डेढ़ घंटे की खेचरी मुद्रा साधना है। इसमें पंद्रह मिनट शरीर को ढीला करना, पंद्रह मिनट मन को खाली करना और तदुपरांत एक घंटे जिह्वा को उलटकर तालू से लगाना, धीरे-धीरे सिहलाना और उस आधार पर अमृत बिंदु की मधुरता और ब्रह्मानंद की चरम संवेदना का अनुभव करना— सामान्यतया यही खेचरी मुद्रा है। यों उपरोक्त तीन कार्यक्रम प्रथक-प्रथक प्रतीत होते हैं; किंतु वस्तुतः वे एक ही हैं। शरीर को ढीला और मन को खाली किए बिना कोई ध्यान सही रूप से जम नहीं सकता। इसलिए इन पंद्रह-पंद्रह मिनट के दो उपक्रमों को तो खेचरी-साधना के साथ जुड़े हुए दो चरण ही कहना चाहिए, जिसके बिना गति आगे बढ़ती ही नहीं।
यह साधना ब्रह्म और जीव के बीच संबध-सूत्र को सुसंचालित करती है और उनके बीच आदान-प्रदान में जो अवरोध उत्पन्न हो गया है, उसे समाप्त करके संचार-शृंखला में पुनर्जीवन उत्पन्न करती है।
पेंडुलम गति में ही यह सारा विश्व अपना कार्य-संचालन कर रहा है। ह्रदय की धड़कन, श्वासोच्छ्वास, आकुंचन-प्रकुंचन कर्म, विश्राम प्रवृत्ति सभी शारीरिक क्रियाकलाप पेंडुलम गति से ही चल रहे हैं। रात-दिन, सर्दी-गर्मी, गति-अवगति, पदार्थ-प्रतिपदार्थ जैसे प्रकृतिगत स्पंदन भी इसी क्रम से चल रहे हैं। जन्म-मरण, उत्थान-पतन, देव-असुर, राग-द्वेष, पुण्य-पाप जैसे उभयपक्षीय जीवन की गतिविधियों को भी इसी के स्तर की मानी जा सकती है। गर्भाधान-प्रक्रिया के आघात-प्रतिघात इसी एक प्रकार से पेंडुलम स्तर के ही हैं। समुद्र में निरंतर उठने वाली लहरें, ज्वार-भाटे, कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, उदय-अस्त, प्रकाश और ध्वनि के तरंग-कंपन आदि की विविध-विधि विश्व हलचलों पर जिधर भी दृष्टिपात करते हैं, उधर ही यह प्रतीत होता है कि पेंडुलम गति के आधार पर मात्र घड़ियाँ ही नहीं चलती, यहाँ सब कुछ उसी रीति-नीति से गतिशील हो रहा है।
प्रकृति और पुरुष का संयोग-संभोगक्रम घड़ियाल पर हथौड़े की चोट पड़ने की तरह चलता है। यहीं से ॐकार ध्वनि की झंझनाहट-थरथराहट होती है। ईश्वर का स्वघोषित नाम ‘ॐ’ इसलिए है। पराप्रकृति के अंतराल में यही ॐकाररूपी आघात-प्रतिघात चलते रहते हैं। शक्ति वहीं से उत्पन्न होती है और सृष्टि में विविध-विधि हलचले उत्पन्न करती हैं।
परमात्मा का आत्मा के साथ निरंतर पेंडुलम गति से ही मिलन-संपर्क चलता रहता है। इस संस्पर्श की अनुभूति— (१) आनंद और (२) उल्लास के रूप में रहती है। सामान्य स्थिति में तो इसकी प्रतीति नहीं होती, पर खेचरी मुद्रा के माध्यम से उसे अनुभव किया जा सकता है। भगवान की मनुष्य को दो प्रेरणाएँ हैं। जो उपलब्ध है, उसकी गरीमा को समझते हुए, संसार के सुखद पक्ष का मूल्यांकन करते हुए— संतुष्ट, प्रसन्न और आनंदित रहना— यह है आनंद का स्वरूप। उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में साहस भरे कदम उठाने के लिए अदम्य उत्साह का, भाव-भरी उमंगो का उठना— यह है उल्लास। भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरंतर पेंडुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। मानव जीवन जैसी सृष्टि की अनुपम उपलब्धि को पाकर यदि अंत:करण आनंदित रहे और छोटे-मोटे अभावों की ओर अधिक ध्यान न देकर चारों ओर बिखरी हुई सदाशयता का अनुभव करते हुए, संतुष्ट-संतुलित रहे, तो समझना चाहिए, आनंद की उपलब्धि हो रही है। हर्षातिरेक में उछलने-कूदने या बढ़-चढ़कर शेखीखोरी की बातें करने का नाम आनंद नहीं है। उस स्थिति में दृष्टिकोण परिपक्व और परिष्कृत हो जाता है, इसलिए जिन अभावों और असफलताओं में दूसरे लोग उद्विग्न-उत्तेजित हो उठते हैं, उन्हें वह विनोद-कौतुक भर समझते हुए अपनी मन:स्थिति को संतुलित बनाए रहता है। जिनकी मनोभूमि ऐसी हो, उसे आनंद की प्राप्ति हो गई, ऐसा कहा जा सकता है।
संतुष्ट या प्रसन्न होने में एक दोष यह है कि अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलने के लिए जिस कठोर कर्मठता की जरूरत पड़ती है, उसे प्राय: भुला ही दिया जाता है। ऐसी भूल करने वाले अध्यात्मवादी प्राय: निकम्मे, निखट्टू, अकर्मण्य, आलसी, प्रभावी और बुराइयों, बुरी परिस्थितियों से समझौता कर लेने वाले भाग्यवादी— पलायनवादी बन बैठते हैं। उससे उनकी अपनी समग्र प्रगति का द्वार तो बंद हो ही जाता है, साथ ही समाज के लिए, प्रखर कर्त्तव्यपालन के लिए जो महान उत्तरदायित्व मनुष्य के कंधो पर होते हैं, वे भी अवरुद्ध हो जाने से लोक-मंगल के लिए मानवी योगदान में भी भारी क्षति पहुँचती है। इससे धर्मसंस्थापन को और अधर्म के निराकरण के ईश्वरीय प्रयोजन को भारी क्षति पहुँचती है। मनुष्य का अवतरण जिन महान कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वो का प्रचंड प्रयत्नशीलता के साथ निर्वाह करने के लिए हुआ है, यदि उनमें शिथिलता आ गई तो समझना चाहिए कि जीवित ही मृतक बन जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। यदि आनंद या संतोष की प्राप्ति किसी अध्यात्मवादी में इस प्रकार की अकर्मण्यता उत्पन्न कर दे, तो समझना चाहिए कि बिलकुल उलटा हो गया और अर्थ का अनर्थ बन गया।
उल्लास इस प्रकार की अवांछनीय मन:स्थिति बनने की गुजांयश नहीं छोड़ता। भगवान निरंतर आनंद के साथ-साथ उल्लास भी प्रदान करते हैं और उच्चस्तरीय प्रयत्नों के लिए प्रचंड कर्मठता अपनाने के लिए अदम्य स्फूर्ति एवं उमंग उत्पन्न करते हैं। उल्लास जब अपनी प्रौढ़ावस्था में होता है तो वह इतना प्रखर होता है कि प्रस्तुत कठिनाइयों, अभावों, अवरोधों की चिंता न करते हुई ईश्वरीय संदेश के अनुरूप अपनी रीति-नीति निर्धारण करने के लिए मचल उठता है। किसी के रोके नहीं रुकता। लोभ और मोह के भवबंधन यों सहज नहीं टूटते और कुसंस्कार तथा स्वार्थसंबंधी शुभचिंतक ऐसी भावनाओं को क्रियान्वित होने में पग-पग पर विरोध उत्पन्न करते हैं; पर जिसे उल्लास प्राप्त है, उसे आत्मकल्याण और ईश्वरीय निर्देशों के पालन की दिशा में ही अग्रसर होना होता है। कठिनाइयाँ क्यों आती हैं और रोक-थाम कौन-कौन करते हैं? उसकी चिंता नहीं करता। फलस्वरूप ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ वाली बात बन ही जाती है। जिसे उल्लास की उपलब्धि मिल गई, उसे महापुरुषों जैसे महान कर्त्तव्यपालन करते रहने के अनवरत अवसर निर्वाध गति से मिलते ही रहते हैं।
परमात्मा का सम्मिलन संवाद पेंडुलम गति से आनंद और उल्लास के रूप में आत्मा को प्राप्त होता है। भगवान किसी से वार्त्तालाप किसी शब्दावली में नहीं करते। वे बेकार की बकवास नहीं करते; वरन् अतिसंक्षिप्त में अतिमहत्त्वपूर्ण— सारभूत प्रेरणाएँ दो ही संकेतो में देते रहते हैं। टेलीग्राफ की डैमी ‘गर’ और ‘गटट’ दो ही ध्वनियाँ निकालती है और उसी से लंबे-चौड़े संवादों की शृंखला बनाती रहती है। हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति और क्षमता के अनुरूप अपनी कार्यपद्धति का निर्धारण कर सकता है, इसमें भगवान का हस्तक्षेप नहीं कि किसी उत्कृष्ट जीवनयापन के लिए अपनी दिनचर्या या क्रिया-प्रक्रिया क्या बनानी-अपनानी चाहिए, यह सब अपने निर्णय की बात है। भगवान केवल दिशा देते हैं। हिमालय का ह्रदय वेधकर गंगा-यमुना की पुण्य धराएँ प्रवाहित होती हैं और समुद्र से मिलने की दिशा में निरंतर चलती रहती हैं। कहाँ घाट, पुल या नहरे बनें? पानी का कहाँ, क्या उपयोग हो? यह दूसरों का काम है। हिमालय पवित्र धाराओं का सृजन करके उन्हें समुद्र में मिलने के लिए प्रेरणा देकर अपने उत्तरदायित्व से निवृत्त हो जाता है, ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी आत्मा को दो ही प्रेरणा देते हैं। अंत:जीवन में आनंदित रहो, बाह्यजीवन में भी उल्लास भरी उत्कृष्ट कर्मठता बरतो। दोनों प्रेरणाओं को कौन, किस प्रकार कार्यान्वित करे, यह निर्णय-निर्धारण करना मनुष्य का अपना काम है। इसके लिए उसे अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है, अस्तु इसके लिए व्यक्तिगत चिंतन की ही आवश्यकता पड़ती है।
खेचरी मुद्रा में जिह्वा को तालु से लगाने और धीरे–धीरे सहलाने पर जिस अमृत रसास्वादन का लाभ मिलने की चर्चा की गई, वह कभी-कभी मधु जैसी मिठास के रूप में अनुभव होती है। मनीषियों ने उसे सोमरस भी कहा है और बताया है कि उसमें मादकता होती है। आंतरिक मस्ती को भौतिक मादकता के समतुल्य माना जाए तो यह उसकी संगती बैठ ही जाएगी। उच्चस्तरीय भावनाओं का उद्वेग वस्तुतः एक अद्भुत मस्ती लिए हुए होता है। उसमें आनंद भी असीम रहता है और अवरोधों को कुचलते हुए निर्धारित दिशा में बढ़ चलने का साहस भी। इसलिए उस मस्ती को सोमरस की व्याख्या में वर्णित बहुचर्चित मादकता माना जाए तो वह अलंकारिक वर्णन कुछ अनुपयुक्त नहीं कहा जाएगा। जिह्वा को मधुरस प्रिय लगता है, अमृत को भी मीठा कहा गया है, खेचरी मुद्रा में जिह्वा और तालु के स्पर्श में कुछ इसी प्रकार की मिठासप्रधान स्वाद की अनुभूति होती है और लगता है, उसमें कुछ मस्ती मादकता भी है। सोमपान के आनंद की अनुभूति और उल्लास भरी साहसिकता किस प्रकार की होती है, इसे खेचरी मुद्रा का साधक अपने स्तर के अनुरूप यात्रा में अनुभव करता चलता है।
बीच-बीच में मुँह में पानी भर जाता है, उसे निगलते रहना चाहिए। जीभ जब थक जाती है तो उसे विश्राम देने के लिए बीच में कुछ मिनटों के लिए क्रिया को बंद भी कर देते हैं, चुँकि प्रत्यावर्तन सत्र में एक घंटे के लिए इसे रखा गया है, इसलिए बीच में विराम— विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। सामान्यतया दैनिक अभ्यास में इसे पंद्रह मिनट तक करना पर्याप्त होता है, तब उसे बीच में रोकना नहीं पड़ता।
खेचरी मुद्रा की सिद्धियों का हठयोगग्रंथो में विस्तारपूर्वक वर्णित है। यह बताया गया है कि उस साधना द्वारा किस प्रकार अलौकिक अतींद्रिय क्षमताएँ प्राप्त होती हैं। वर्षाऋतु आने पर जिस प्रकार सुखी हुई घास हरी हो जाती है, उसी प्रकार खेचरी मुद्रा द्वारा अनंत आकाश से चेतनतत्त्व की वर्षा कराई जाती है और उससे सुषुप्त मूर्छा में पड़े हुए महत्त्वपूर्ण शक्ति-संस्थान सहज ही सजीव होते हैं और मनोरम हरितमा के रूप में पुष्पित, सुगंधित, सुरभित दृष्टिगोचर होते हैं। अमृत का गुण मृतक को जीवित करना और जीवित को अमर बनाना है। यह दोनों ही लाभ परिक्षा रूप में खेचरी मुद्रा के साधक को मिलते हैं।
काय-कलेवर के अंतर्गत षट्चक्र, तीन ग्रंथियाँ, बावन उपत्यिकाएँ, सप्तलोक, सप्तदेव जैसे वे शक्तिकेंद्र अवस्थित हैं, जिन्हें यदि मूर्छा से विरत करके जागृत स्थिति तक पहुँचा दिया जाए तो मनुष्य अलौकिक और अद्भुत क्षमताओं से भरा-पूरा दृष्टिगोचर होने लगता है। इन सिद्धियों का स्तर व्यक्ति की सूक्ष्मसंरचना के अनुरूप होता है। जिसके शरीर और मन में जो विशेषताएँ प्रखर है, सिद्धियाँ भी उसी स्तर की मिलती देखी गई हैं।
सर्वविदित और हर किसी के लिए प्रत्यक्ष सिद्धि यह है कि खेचरी मुद्रा का साधक अंतर्मुखी बनता है और अपने अंतर का गहन निरीक्षण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि प्रगति और शांति के समस्त साधन अपने ही भीतर विद्यमान हैं। कषाय-कल्मषों ने उन्हें मृतप्राय: बनाया है। उसी से बाहर के व्यक्तियों की वस्तुओं का उत्थान-पतन का सुख-दुःख का कारण समझने के भ्रम में फँसना पड़ता है। यदि अंतरंग क्षेत्र को निखारा गया आत्मचिंतन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चतुर्विध महापुरुषार्थों का आश्रय लिया जाए, तो मनुष्य को लघु से महान बनने के मार्ग में फिर कोई अवरोध शेष नहीं रहा जाता। इस स्तर का प्रकाश मिल जाने पर फिर मनुष्य आत्मपरिष्कार की योजना बनाकर उसी को कार्यान्वित करने में संलग्न हो जाता है। इस दिशा में चल पड़ने वाले व्यक्ति का नर से नारायण बन जाना सुनिश्चित है। खेचरी मुद्रा हमें इसी स्तर के लाभों से लाभान्वित करती है।
/akhandjyoti/edition/1973/Jun/13
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प्रत्यावर्तन सत्र में प्रात: 6.30 से 7 तक आधा घंटा की गायत्री उपासना के पश्चात 7 से 7.45 तक सोऽहम्-साधना की प्राणयोग-प्रक्रिया है। इन दोनों में कमर को सीधी रखकर, पालथी मारकर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान-साधनाओं से शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है, इसलिए उनमें आराम-कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पड़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम्-साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरंतर उसका बीजरूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदंड को सीधा रखकर ही एवं पालथी मारकर ही बैठना पड़ता है।
श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवणशक्ति के सहारे अंतःभूमिका में अनुभव करना। यही है संक्षेप में ‘सोऽहम्-साधना’।
वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि-प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर-लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहाँ बाँस बहुत उगे होते हैं, वहाँ अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं। कारण कि बाँसो में कहीं-कहीं कीड़े छेद कर देते हैं और उन छेदों से जब हवा वेगपूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर-प्रवाह सुनने को मिलता है। वृक्षों से टकराकर जब द्रुतगति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रया है।
नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छिद्रों की तरह हैं। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है, पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलतापूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे स्वासोच्छ्वास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मंदगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोककर धीरे-धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। गहरी और पूरी सांस लेने से स्वभावत: नासिका छिद्रों से टकराकर उत्पन्न होने वाला ध्वनि-प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेंद्रियों की सूक्ष्मचेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।
चित्त को श्वसन-क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए और भावना को इस स्तर की बनानी चाहिए कि उससे श्वांस लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि-प्रवाह की मंद अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब सांस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम्’ ध्वनि-प्रवाह विनिसृत हो रहा है। आरंभ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती; किंतु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरांत इस प्रकार का ध्वनि-प्रवाह अनुभव में आने लगता है और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है, वरन आनंद का अनुभव होता है।
‘सो’ का तात्पर्य परमात्मा और ‘हम्’ का जीवचेतना समझा जाना चाहिए। निखिल विश्व-ब्रह्मांड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग-प्रत्यंग में जीवकोष तथा नाड़ीतंतु में प्रवेश करके उसको अपने संपर्क-संसर्ग का लाभ प्रदान कराता है। यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए और ‘हम्’ शब्द के साथ जीव द्वारा इस काय-कलेवर पर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए।
प्रकारांतर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मन:क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारणा है। जीव भाव अर्थात स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध, लोभ, मोह भरी मद-मत्सरता— अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा भी दिग्भ्रांत स्थिति का नाम ही जीव-भूमिका है। इस भ्रम-जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाए तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। काय-कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव-धारणा की बेदखली — यही है सोऽहम्-साधना का तत्त्वज्ञान। श्वास-प्रश्वास क्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम्’ ध्वनि के सहारे उसी भाव-चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रांति जैसी यह भाव-भूमिका है, जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलटकर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम्-साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंत:करण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
सोऽहम्-साधना के लिए प्रत्यावर्तन सत्र में पौन घंटा निर्धारित है। इसमें से आरंभ के पंद्रह मिनट श्वास-ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरंभ में अतिमंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमश: प्रखरता आती चली जाए। इसके उपरांत शेष आधा घंटे में चिंतन का स्तर यह होना चाहिए कि सांस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है; वरन प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगो के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए, उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थाई रूप से समाविष्ट हो गई। ह्रदय, फुफ्फुस, आमाशय, आंतें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित किया।
बाह्य अंगों ने पाँच ज्ञानेंद्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वही बोलेगी जो इश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना, चखना आदि इंद्रियजन्य गतिविधियाँ दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी। जननेंद्रिय का उपयोग, वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अनिवार्य आवश्यकता का धर्मसंकट सामने आ खड़ा होने पर ही किया जाएगा। हाथ-पाँव मानवोचित कर्त्तव्यपालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा, जिसे उच्च आदर्शो के प्रतिफल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी-अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएँ न जमने पाएँगी। अहंता का स्तर नर-कीटक जैसा नहीं नर-नारायण जैसा होगा।
यही हैं वे भावनाएँ जो शरीर और मन पर भगवान के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती हैं। यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए; वरन उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए कि इस भाव-परिवर्तन को क्रियारूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रियारूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों, अन्यथा स्वप्नदर्शी शेखचिल्ली ऐसे ही बैठे-ठाले मन-मोदक खाते रहते हैं। उनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सकता नहीं। सोऽहम्-साधना के पूर्वार्ध में अपने काय-कलेवर पर श्वसन-क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की, परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिंतन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रहकर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।
इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इंद्रिय-लिप्साओं का, आलस्य-प्रमाद जैसी दुष्कृतियों का, मन से लोभ-मोह जैसी तृष्णाओं का, अंतस्तल से जीव भावी अहंता का निवारण-निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यंत प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियाँ, निष्कृताएँ और दुष्टताएँ, क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही हैं, सभी पलायन कर रही हैं। यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरांत ही हलकापन— जो संतोष, जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरंतर बना रहता है, उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम्-साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बन गया।
भावोत्कर्ष की दृष्टि से जो ‘हम्’ साधना के साथ-साथ उपरोक्त भावचित्रों को मन:क्षेत्र पर अतिसघन चित्रित किया जाना चाहिए। इससे वह चिंतन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आंतरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाए, पर वस्तुतः आंतरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यंत महान ही है। अध्यात्म मूल्यांकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों सांसारिक दृष्टि से क्रियाव्यस्त व्यक्ति थे, पर अपने उदात्त दृष्टिकोण के कारण वे सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गए। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। यदि सोऽहम्-साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अंत:करण में जड़ जमा लें और वे कार्यरूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवनलक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
यों सोऽहम्-साधना का चमत्कारी प्रयोजन भी कम नहीं है। यह प्राणयोग की महती साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताए गए हैं। इन सब में प्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्-साधना’ में सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मंत्रो में गायत्री सर्वोपरि है, उसमें प्राणयोग के विविध साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायाम का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
षट्चक्रवेधन के लिए प्राणतत्त्व के वरमें ही छेद करने का काम करते हैं। आज्ञाचक्र तक नासिका द्वारा प्राणतत्त्व खींचने का कार्य एक ही ढंग से चलता है। पीछे उसके दो भाग हो जाते हैं — एक भावपरक, दूसरा शक्तिपरक। भावपरक में फेफड़ों में पहुँचा हुआ प्राण समस्त शरीर के अंग-प्रत्यंगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत् का निवारण संपन्न करता है। आज्ञाचक्र में एक दूसरी प्राणधारा पिछले मस्तिष्क को स्पष्ट करती हुई मेरुदंड में निकल जाती है। वही ब्रह्मनाड़ी का महाशक्तिनद है। इड़ा और पिंगला की दो विद्युत धाराएँ इसी में प्रवाहित होती हैं। वे मूलाधारचक्र तक पहुँचती हैं और सुषुम्ना सम्मिलन के बाद वापिस लौट आती हैं। षट्चक्र इसी मेरुदंड में स्थित ब्रह्मनाड़ी महानद के अंतर्गत पड़ने वाले भँवर हैं। इनमें ही लोक-लोकांतरों से, अतिमानवी शक्तिसंस्थानों से संबध मिलाने वाली रहस्यमय कुंजियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं। षट्चक्रों में से जो जितने रत्नभंड़ारों से संबध स्थापित कर ले, वह उतना ही महान बन सकता है। कुंडलिनीशक्ति को भौतिक और आत्मिक शक्तियों का आदान-प्रदान संपन्न करने वाली महत्तत्त्व भूमिका कह सकते हैं। उसका जागरण षट्चक्रवेधन के उपरांत ही होता है। चक्रवेधन के लिए प्राणतत्त्व पर आधिपत्य स्थापित करने वाले वेधक प्राणायामों का अभ्यास करना पड़ता है। जो प्राणायाम षट्चक्रवेधन में सहायता करते हैं, उनसे सोऽहम् का प्राणयोग सर्वप्रथम और सर्वसुलभ है। पंचकोषों के अनावरण का क्रम भी चक्रवेधन स्तर का ही है। उसके लिए भी प्राण-प्रखरता बढ़ानी पड़ती है। यह प्रयोजन भी सोऽहम्-साधना से ही पूरा होता है।
कहा जा चुका है कि सोऽहम् की भावना-साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदंड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है। सोऽहम्-साधना के हिमालय से मिकलने वाली गंगा-यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-संवर्द्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है। इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। शक्तिसंपन्न और भावोत्कर्ष की उभयपक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्म है। उसे प्राप्त करने में सोऽहम्-साधना कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है। इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
नासिका की वायु तत्त्व की तन्मात्रा गंध है। गंध के माध्यम से देवतत्त्वों की अनुभूति-साधना नासिका द्वारा ही होती है। सोऽहम्-साधना द्वारा गंध तन्मात्रा का विकास होता है और समय-समय पर अनायास ही दिव्य गंधों की अनुभूति होती है। इन गंधों में मन को प्रसन्न करना या कौतूहल दीखने जैसा साधारण लाभ नहीं; वरन वे विभूतियाँ भी भरी पड़ी हैं, जिनसे दिव्यशक्तियों और दिव्य सिद्धियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। सोऽहम्-साधना के लिए अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चंदन-कपूर आदि लेपकर, इत्र लगाकर, गुलाबजल छिड़ककर उस स्थान पर सुगंध उत्पन्न की जाती है। साधना के समय अनुभव किया जाता है। प्रस्तुत गंध नासिका में — मस्तिष्क में बस रही है। उसकी अनुभूति सहज ही हो रही है। ऐसा क्रम साधना के समय चलता रहे तो आगे चलकर साधना-स्थल से बाहर निकलने पर भी, गंध का कोई उपकरण न होने पर भी, दिव्य गंध आती रहेगी। यह नासिका की सूक्ष्म तन्मात्रा के जागरण का, एकाग्रता की अभिवृद्धि का चिह्न है। इससे सफलता से प्रसन्नता का बढ़ना स्वाभाविक है।
मनुष्यों में नेत्र का महत्त्व बढ़ गया है। इसके बाद जिह्वा तथा कर्णेंद्रियों की बात है। दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो नेत्र के बाद जननेंद्रिय को आवेशोत्पादक कहा जा सकता है; किंतु अन्य जीवधारियों में सबसे प्रबल और प्रधान नासिका ही होती है। वे गंध के आधार पर ही अपने जीवन संकट को गतिशील बनाए रहने में समर्थ होते हैं। आहार की खोज, यौन आमंत्रण, शत्रु से रक्षा, मौसम की जानकारी, रास्ता ढूँढना, अपने-विराने की पहचान जैसे आवश्यक कार्य पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े प्राय: नासिका के आधार पर ही पूरे करते हैं। गंध ही उनका मार्गदर्शन करती है और भटकावों से— संकतों से बचाती है। प्रशिक्षित कुत्ते अपनी घ्राणशक्ति के आधार पर ही अपराधियों को खोज निकालने का कार्य करते हैं। इसी शक्ति को विकसित कर लिया जाए तो अविज्ञात हलचलों और अतींद्रिय संकेतों को समझा जा सकता है। दिव्य लोकों में, दिव्यशक्तियों से देव आत्माओं से संबध मिलाने का एक अतिमहत्त्वपूर्ण माध्यम गंधानुभूति भी है, जिसे सोऽहम्-साधना के आधार पर जाना जा सकता है।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतंत्र शास्त्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चंद्र-सूर्य स्वर — शरीर और मन की स्थिति में ऋण और धन विद्युत के आवेश घटाते-बढ़ाते रहते हैं। इस स्थिति का सही ज्ञान रहने पर मनुष्य यह जान सकता है कि उसकी अंतःक्षमता किस कार्य को कर सकने में समर्थ अथवा क्या करने में असमर्थ है। अंतर्जगत की वस्तुस्थिति का सही ज्ञान होने पर मनुष्य के लिए ऐसा कदम सरल हो जाता है, जिसके आधार पर सफलता का पथ अधिक प्रशस्त हो सके। किस स्वर की स्थिति में मनुष्य दूसरों की क्या सहायता कर सकता है, इसकी जानकारी भी स्वरयोग से मिलती है। तदनुसार दूसरों की स्वल्प सहायता करके भी उन्हें आधिक मात्रा में लाभान्वित किया जा सकता है। सामान्य बुद्धि से जो अविज्ञात जानकारियाँ प्राय: नहीं ही जानी जा सकतीं, उन्हें भी स्वरयोग के माध्यम से अधिक खूबी और खूबसूरती से समझा जा सकता है।
स्वरयोग की साधना के यों कई अभ्यास हैं, पर उनमें अधिक सरल और अधिक सफल सोऽहम्-साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुंडलिनी जागरण, स्वर-साधन, गंधानुभूति भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं, जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
यस्मिन ज्ञाते सर्वमिदं ज्ञातं भवति निश्चितम् ।
तस्मिन् परिश्रमः कार्यः किमन्यच्छास्त्रभाषितम् ।। 18
— शिव संहिता 2/28
जिस एक के ही जानने से निश्चित रूप से सब कुछ जान लिया जाता है। उस एक के लिए ही परिश्रम करना चाहिए। अन्य शास्त्रों में भटकने से क्या लाभ?
साधना ग्रंथो में बिंदुयोग का उल्लेख विस्तारपूर्वक है। ध्यान के लिए किसी दीप विशेष पर मन को केंद्रित किया जाता है। देवताओं की प्रतिमाएँ उसी प्रयोजन के किए गढ़ी गई हैं। जब ध्यान साकार भूमिका की प्रथम कक्षा से ऊँचा उठकर प्रकाश तत्त्व पर केंद्रित किया जाता है तो उसे बिंदुयोग कहते हैं। बिंदुयोग अर्थात प्रकाश-केंद्र पर ध्यान-धारणा को केंद्रीभूत करके अंतर्जगत में दिव्य आलोक का आविर्भाव करना। योगाभ्यास में इसका प्रथम पाठ त्राटक-साधना के रूप में कराया जाता है। पीछे इसी का उच्चस्तर विकसित होकर आत्मज्योति एवं ब्रह्मज्योति दर्शन के रूप में परिणत विकसित हो जाता है, तब फिर किसी त्राटक के लिए प्रकाशोत्पादक दीपक आदि भौतिक उपकरणों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
बिंदुयोग की साधना के लिए प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में प्रात: आठ बजकर पैतालीस मिनट से लेकर नौ बजकर तीस मिनट तक पौन घंटे का समय निर्धारित है। सोऽहम्-साधना के उपरांत इस बिंदुयोग का ही क्रम आता है। त्राटक अभ्यास करना इस साधना का प्रथम चरण है। इसे पंद्रह मिनट करते और शेष आधा घंटा अपनी समग्र सत्ता को दिव्य प्रकाश से ओत-प्रोत स्थिति की अनुभूति में लगाया जाता है।
शरीर को ध्यानमुद्रा में शांत एवं शिथिल करके बैठते हैं। सामने प्रकाश-दीप रहता है। पाँच सेकिंड खुली आँख से प्रकाश-दीप को देखना, इसके बाद आँखें बंद करके भ्रूमध्य भाग में उसी प्रकाश आलोक को ज्योतिर्मय देखना। जब वह ध्यान आलोक शिथिल पड़ने लगे तो फिर नेत्र खोलकर पाँच सेकिंड प्रकाश-दीप को देखना और फिर आँखे बंद करके पूर्ववत् भ्रूमध्य भाग में प्रज्वलित ज्योति का ध्यान करने लगना। यही है त्राटक-साधना का स्वरूप, जो पौने नौ बजे से नौ बजे तक किया जाता है। इतने समय यों प्राय: ऐसी स्थिति बन जाती है, जिसके आधार पर देर तक भ्रूमध्य भाग में प्रदीप्त किए गए प्रकाश की आभा को समस्त शरीर में विस्तृत एवं व्यापक हुआ अनुभव किया जा सके।
पंद्रह मिनट त्राटक कर लेने के उपरांत प्रकाश-दीप की आवश्यकता नहीं रहती। अधखुले नेत्र, दोनों हाथों की उगलियाँ मिली हुईं, हथेलियाँ ऊपर की ओर करके उन्हें गोदी में रखना— यही है ध्यानमुद्रा। भगवान बुद्ध के चित्रों में प्रायः यही स्थिति चित्रित की जाती है। इस स्थिति में अवस्थित होकर भ्रूमध्य भाग में अवस्थित प्रकाश-पुँज की धारणा और अधिक प्रगाढ़ की जाती है। बिजली के बल्ब का मध्यवर्त्ती तार— फ्लामेंट, जिस प्रकार चमकता है और उसकी रोशनी बल्ब के भीतरी भाग में भरी हुई गैस में प्रतिबिंबित होती है। इससे बल्ब का पूरा गोला चमकने लगता है और उसका प्रकाश बाहर भी फैलता है। ठीक ऐसी ही भावना बिंदुयोग में करनी होती है।
भ्रूमध्य भाग में आज्ञाचक्र अवस्थित है। इसी को दिव्य नेत्र या तृतीय नेत्र कहते हैं। शंकर एवं दुर्गा के चित्रों में इसी स्थान पर तीसरा नेत्र दिखाया जाता है। पुराण-कथा के अनुसार इसी नेत्र को खोलकर भगवान शिव ने अग्नि— तेजस् उत्पन्न किया था और उससे विघ्नकारी मनोविकार कामदेव को जलाकर भस्म किया था। यह नेत्र हर मनुष्य में मौजूद है। शरीरशास्त्र के अनुसार इसे पिटयूट्री ग्रंथि कहते हैं। इसमें नेत्र जैसी सूक्ष्म संरचना मौजूद है। सूक्ष्मशरीर के विश्लेषण में यह केंद्र विशुद्ध रूप में दिव्य नेत्र है और उससे प्रकट-अप्रकट, दृश्य-अदृश्य, भूत-भविष्य सभी कुछ देखा-जाना जा सकता है। एक्सरेज द्वारा शरीर के भीतर की टूट-फूट अथवा किसी बंद बक्से के भीतर रखे आभूषणों का चित्र खींचा जा सकता है। इस दिव्य नेत्र की भी एक्सरेज मंत्र से तुलना की जा सकती है, यदि वह प्रदीप्त हो उठे तो घर बैठे महाभारत के दृश्य टेलीविजन की भाँति देखने वाले संजय जैसी दिव्यदृष्टि प्राप्त की जा सकती है और वह सब देखा जा सकता है, जिसका अस्तित्व तो है; पर चमड़े से बने नेत्र उसे देख सकने में समर्थ नहीं हैं।
इस नेत्र में अदृश्य देखने की ही नहीं, ऐसी प्रचंड अग्नि उत्पन्न करने की भी शक्ति है, जिसके आधार पर अवांछनीयताओं को, अवरोधों को जलाकर भस्म किया जा सके। शंकर जी ने इसी नेत्र को खोला था तो प्रचंड शिखाएँ उद्भूत हो उठीं थीं। विघ्नकारी कामदेव उसी में जल-बलकर भस्म हो गया था। बिंदुयोग की साधना को, यदि इस तृतीय नेत्र को ठीक तरह ज्योतिर्मय किया जा सके तो उसमें उत्पन्न होने वाली अग्निशिखा मनोविकारों को— अवरोधों को जलाकर भस्म कर सकती हैं। उसकी शक्ति व्याख्या है। यदि दार्शनिक व्याख्या करने हो तो उसे विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता का जागरण भी कह सकते हैं, जिसके आधार पर लोभ, मोह, वासना, तृष्णा, अहंता जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न हुए अगणित शोक-संतापों और विग्रह-उपद्रवों को सहज ही शमन या सहन किया जा सकता है।
पौराणिक गाथा के अनुसार पुरातनकाल में जब यह दुनिया जीर्ण-शीर्ण हो गई थी, उसकी उपयोगिता नष्ट हो गई थी, तब भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर प्रलय दावानल उत्पन्न किया था और ध्वंस के तांडव नृत्य में तन्मय होकर भविष्य में अभिनव विश्व के नवनिर्माण की भूमिका संपादित की थी। उस प्रलयकारी तांडव नृत्य का बाह्य स्वरूप कितना ही रोमांचकारी क्यों न रहा हो, उसकी चिंगारी शिवनेत्र से ही प्रस्फुटित हुई थी। बिजली जीवनक्रम में तथा समाजगत समिष्ट जीवन में भी ऐसी आवश्यकता पड़ सकती है कि प्रचलित ढर्रे में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक न हो जाए, जो चल रहा है उसे उलटना अनिवार्य बन जाए। यह महापरिवर्तन भी तृतीय नेत्र से दूरदर्शी विवेक संभव विचारक्रांति से ही संभव हो सकता है। शिवजी के द्वारा तांडव नृत्य के समय तृतीय नेत्र खोले जाने के पीछे महाक्रांति की सारभूत रूपरेखा का दिग्दर्शन है।
त्राटक करने के पंद्रह मिनट पूरे हो जाने के उपरांत भ्रूमध्य में प्रदीप्त ज्योति का ध्यान करते हुए यह धारणा करनी पड़ती है। प्रत्येक जीवाणु में, कण-कण और रोम-रोम में प्रकाश— आलोक की आभा प्रदीप्त होती है। अंधकार किसी भी कोने में छिपा नहीं रहा, उसे पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया गया है।
जिस प्रकार सोऽहम्-साधना में प्रत्येक अवयव को पृथक-पृथक ध्यान-भूमिका में सम्मुख लाया जाता था और उसमें प्राणशक्ति भर जाने का भाव किया जाता था। ठीक उसी प्रकार इस साधना में ह्रदय, फ्फुफुस, आँते, आमाशय, वृक्क, मस्तिष्क आदि अंग-प्रत्यंग में भरी हुई ज्वलंत ज्योति की अनुभूति की जाती है। प्रत्येक कोशिका एवं तंतु को आलोकित देखा जाता है। मष्तिष्क के चार परत माने गए हैं— मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। इन चारों को प्रकाश-पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है। अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को भ्रूमध्य केंद्र से निकलने वाले प्रकाश-प्रवाह से आलोकित अनुभव करना लगभग उसी स्तर का, जैसा कि प्रभातकालीन सूर्य निकलने पर अंधकार का हर दिशा से पलायन होने लगता है और समस्त संसार आलस्य-अवसाद छोड़कर आलोक, उल्लास, स्फूर्ति एवं सक्रिय उमंगो के साथ कार्यरत हो जाता है। बिंदुयोग की साधना जीवन सत्ता के कण–कण में प्रकाश उद्भव की अनुभूति तो कराती ही है, साथ ही उन अभिनव स्तर की हलचलें भी उभरती दृष्टिगोचर होती हैं।
अध्यात्म की भाषा में प्रकाश शब्द का उपयोग मात्र चमक के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता; वरन उसका अभिप्राय ज्ञान और क्रिया में सम्मिश्रित उल्लास भरी भावतरंगो में होता है। पंचभौतिक जगत में गर्मी और रोशनी के सम्मिलित को प्रकाश कह सकते हैं, किंतु अध्यात्म क्षेत्र में गर्मी का अर्थ सक्रियता और प्रकाश का अर्थ दूरदर्शी उच्चस्तरीय ज्ञान ही किया जाता है। प्रकाश की प्राप्ति की चर्चा जहाँ कहीं भी होगी वहाँ रोशनी चमकने जैसे दृश्य खुली या बंद आँखों से दीखना भर नहीं हो सकता, वहाँ इसका अभिप्राय गहरा ही रहता है। आत्मोत्कर्ष की भूमिका स्पष्टत: विवेकयुक्त सक्रियता अपनाने पर ही निर्भर है— भौतिक गर्मी या रोशनी से वह महान प्रयोजन कैसे पूरा हो सकता है।
त्राटक-साधना में अग्नि या बिजली के सहारे जलने वाले प्रकाश-दीप का प्रयोग आरंभिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ही किया जाता है। ध्यान-धारणा को प्रकाश का भौतिक स्वरूप भली प्रकार अपनाने का अवसर मिल जाए, बस इतनी भर आवश्यकता वह प्रत्यक्ष दीपक पूरी करता है। उससे आगे की मंजिल पूरी करने के लिए अग्नियुक्त प्रकाश को सद्ज्ञान प्रकाश में परिणत करना पड़ता है। आत्मोत्कर्ष प्रयोजन के साथ स्पष्टत: उसी का संबध भी है।
प्रकाश ध्यान के लिए आमतौर से घृतदीप जलाया जाता है। उसे सीने की सीध में रखा जाता है। दीपक के अभाव में मोमबत्ती जलाई जा सकती है, बिजली की मंद प्रकाश वाली बत्ती का भी प्रयोग हो सकता है। यदि बिजली काम में लानी हो तो उस पर नीला बल्ब लगाना चाहिए। इससे एक तो आँख पर अनावश्यक चमक नहीं पड़ती है, दुसरे— नीला प्रकाश शांतिदायक भी होता है। उसका प्रभाव साधक पर शांतिदायक प्रतिक्रया उत्पन्न करता है।
प्रभातकालीन सूर्य जब तक लाल-पीला रहे— त्राटक प्रयोजन के लिए काम में लाया जा सकता है। डूबते सूर्य का उपयोग नहीं हो सकता। पूर्ण चंद्रमा भी त्राटक के लिए उपयुक्त माना गया है। वैसे इन चमकदार पदार्थों की सहायता आरंभ में ही कुछ दिनों लेनी पड़ती है, पीछे तो भ्रूमध्य भाग में प्रकाश का आभास साधना पर बैठते ही अनुभव होने लगता है। कुछ समय तो यह ज्योति कई रंगों की तथा हिलती हुई दीखती है। पीछे स्वयमेव स्थिर एवं शुभ्रवर्ण की बन जाती है।
बिंदुयोग में आधा घंटे तक नौ से साढ़े नौ बजे तक यही धारणा करनी पड़ती है कि प्रकाशरूप परमात्मा का आलोक अंग-प्रत्यंग के कण–कण में, अंत:करण के प्रत्येक कक्ष परत में प्रकाशवान होता है। दिव्य चेतना की किरणें काय-कलेवर की प्रत्येक लहर पर प्रतिबिंबित हो रहीं हैं। विवेक की आभा फूटी पड़ रही है, सतोगुण झिलमिला रहा है, सत्साहस प्रखर-प्रचंड बनकर सक्रियता की ओर अग्रसर हो रहा है। अज्ञान के आवरण तिरोहित हो रहे हैं। भ्रमाने वाले और डराने वाले दुर्भाव, संकीर्ण विचार अपनी काली चादर समेटकर चलते बने। प्रकाश भरे श्रेयपथ पर चल पड़ने का शौर्य सबल हो उठा, अशुभ चिंतन के दुर्दिन चले गए। ईश्वरीय प्रकाश शरीर में सत्प्रवृत्ति और मन की सद्भावना बनकर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकने वाली काली निशा का अंत हो गया। भगवान की दिव्य ज्योति ने सर्वत्र अपना आधिपत्य जमा लिया।
आधे घंटे तक इन्हीं भावनाओं की प्रकाश-ज्योति के साथ संगति बिठाते हुए, अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को उज्ज्वल संभावनाओं के साथ आलोकित करनी वाली विविध कल्पनाएँ करनी चाहिए। यह चिंतन आत्मिक प्रखरता को दीप्तिमान बनाने असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है।
यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि बिंदु-साधना के समय उपरोक्त विचारधारा की सुविस्तृत शृंखला मस्तिष्क में घुमड़ते रहने से एकाग्रता नष्ट हुई। एकाग्रता की लययोग एवं समाधि-प्रक्रिया में ही आवश्यकता पड़ती है। शेष सभी साधनाओं में विचार-प्रवाह की एक दिशा बनाए रहना ही पर्याप्त होता है। गंगा हिमालय से निकलकर समुद्र में मिलने के लिए चलती है। यह दिशा-निर्धारण उसे लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है। प्रवाह में लहरें उत्पन्न हों, टकराव आएँ, भँवर पड़ें, मोड़ बने इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। एकाग्रता मुख्य नहीं, दिशा-प्रवाह का ही महत्त्व है। सरकस में काम करने वाले नटों की सारी सफलता उनकी एकाग्रता पर ही निर्भर रहती है। यदि वे ध्यान बटाएँ तो तार पर चलना, झूले पर उछलना जैसे करतव दिखा सकना संभव ही न हो सके। इन नटों को एकाग्रता की सिद्धि होती है, पर उन्हें योगी नहीं कह सकते। मीरा, चैतन्य, सूर, कबीर, रामकृष्ण परमहंस जैसे संत सदा भावविह्वल स्थिति में रहते थे और ‘घायल की गति घायल जाने’ जैसे शब्दों में अंतर की पीड़ा व्यक्त करते थे। उन्हें एकाग्रता कहाँ थी। उस पर भी उन्हें अयोगी नहीं कहा जा सकता। बिंदुयोग, प्राणयोग आदि प्रत्यावर्तन उपक्रम में आने वाली प्राय: सभी साधनाओं पर यही सिद्धांत लागू होता है। उनमें विचार-विस्तार का, भाव-प्रवाह का क्षेत्र अतिव्यापक है। अंत:भूमिका, परिशोधन, परिमार्जन और परिष्कार इसी समुद्र-मंथन में संभव है, इसलिए यहाँ एकाग्रता में कमी पड़ने की बात नहीं सोचनी चाहिए। साकार उपासना में तो पूजा-पाठ, स्तवन, जप आदि का पूरा उपक्रम ही बहुमुखी चिंतन के साथ जुड़ा हुआ है। जहाँ क्रिया होगी वहाँ भावविस्तार भी रहेगा ही। समग्र एकाग्रता तो पूर्ण निष्क्रियता वाली स्थिति में ही संभव है। ऐसी स्थिति समाधि स्थिति की पूर्ण भूमिका में ही उत्पन्न होती है।
बिंदुयोग में तथा अन्य प्रत्यावर्तन साधना-उपक्रमों में यथासमय ऐसी स्थिति स्वयमेव आती है, जिसमें योग-निद्रा जैसी अनुभूति होती है। सारे क्रियाकलाप ठप्प हो जाते हैं। जप में माला फेरना और मंत्रोच्चार बंद हो जाता है। जब स्थिति सुधरती है तो ऐसा प्रतीत होता है, झपकी लग गई थी, सो गए थे; पर वस्तुतः ऐसा होता ही नहीं, यह साधनाएँ ऊर्जा और ऊष्मायुक्त हैं। उसमें आवेश संभव नहीं, निद्रा की कोई संभावना नहीं। अस्तु उस स्थिति को विशुद्ध रूप में योगनिद्रा, समाधि स्तर की भूमिका ही समझा जाना चाहिए और ऐसी सहज एकाग्रता जब भी प्राप्त होती है, तब उसे सफलता का उत्साहवर्द्धक चिह्न मानते हुए स्थिति को यथावत बनाए रहना चाहिए। साधना उपक्रम भले ही रुका रहे, पर उसे सहज समाधि के दैवी अनुदान को अस्त-व्यस्त न किया जाए, यही उचित है। प्रत्यावर्तन साधना में एकाग्रता का नहीं प्रवाहक्रम की प्रखरता का महत्त्व है। इसी बिंदुयोग की प्रकाश-साधना करने वालों को अपने कलेवर के हर कक्ष में ज्योति अवतरण के साथ दिव्य भावनाओं के समावेश का चिंतन करते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करनी चाहिए।
नाद ब्रह्म अथवा शब्द ब्रह्म का अभिप्राय उस अनाहत ध्वनि से है, जो प्रकृति और पुरुष के संयोगस्थल से निरंतर प्रसृत और निनादित होती रहती है। ॐकार वही स्वयंभू ब्रह्मनाद है। उससे सप्तस्वर प्रस्फुटित हुए। श्रुतिशास्त्र में प्रयुक्त होने वाले उदात्त-अनुदात्तस्वरूप उसी के आरोह-अवरोह हैं। संगीतशास्त्र में आगे चलकर वे ही ‘सा रे ग म प ध नि’ के स्वर-सप्तक बन गए। सूर्यरथ के सप्त-अश्व उसके प्रभा-किरणों में सन्निहित रंग हैं। उसी प्रकार ब्रह्मनाद का ध्वनि-गुंजन सप्तधा स्वरलहरी में निनादित होता है।
यों सुनने में सप्तस्वर और उनके आरोह-अवरोह मात्र शब्द-ध्वनि का उतार-चढ़ाव प्रतीत होते हैं और उनका उपयोग वाद्य-गायन में प्रयुक्त होना भर लगता है; पर वस्तुत: उसकी सीमा इतनी स्वल्प नहीं है। मनुष्यकृत स्वरलहरी के अतिरिक्त प्रकृतिगत स्वर-प्रवाह जीवधारियों द्वारा विविध-विधि उच्चारण भी कम महत्त्व के नहीं है। मेघ-गर्जन, समुद्र-तर्जन, विद्युत-कड़क, वायु- सनसनाहट, निर्जन की साँय-साँय, अग्निशिखा की धू-धू, निर्झर निनाद, प्रकृतिगत ध्वनियाँ हमें समय-समय पर सुनने को मिलती रहती हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षी आवश्यकतानुसार अपनी-अपनी बोलियाँ बोलते हैं। रात्रि की नीरवता में झिल्ली की झंकार सुनते ही बनती है। सूर्योदय के समय पक्षियों के कंठ कितने प्रकार की, कितनी मधुर स्वरलहरियाँ प्रस्तुत करते हैं, उन्हें सुनकर मुग्ध हो जाना पड़ता है। लगता है, स्वरब्रह्म अपने अगणित ध्वनि-प्रवाहों में न जाने कितने भाव-भरे संकेतों और संदेशों को इस विश्व-ब्रह्मांड में भरता, बहाता रहता है।
यह सब आहात ध्वनियाँ हैं, जो कानों से सूनी जा सकती हैं। विज्ञान की पकड़ में वे ध्वनियाँ भी आ गई हैं, जो मनुष्य के कानों से सूनी जा सकने वाली मर्यादा से या तो ऊँची हैं या नीची। हमारे खुले कान उन्हें सुन नहीं सकते, फिर भी साधन-उपकरणों द्वारा उन्हें उसी प्रकार सुना जा सकता है जैसे खुली आँख से न देखने वाले लघुकाय जीवाणु माइक्रोस्कोप जैसे सूक्ष्मदर्शक-यंत्रों से भली प्रकार देखे जा सकते हैं। यह प्रकृतिगत ध्वनियाँ हैं। कान की पकड़ से बाहर होने के कारण ही इन्हें सूक्ष्म कहा जाता है, अन्यथा वस्तुत: यह स्थूल ही हैं, क्योंकि यंत्रो के माध्यम से उन्हें हमारे कान भी सुन-समझ सकते हैं।
इसमें ऊँचे स्तर की ध्वनियाँ वे ही हैं, जिन्हें जड़ जगत के अंड-परमाणुओं द्वारा स्पंदित नहीं कहा जा सकता। उनका संबंध चेतन जगत के जीवन-प्रवाह से है। उन्हें एक प्रकार से अतींद्रिय भी कह सकते हैं। उनका मूल स्रोत चेतना तत्त्व है, इसलिए उन्हें ब्रह्मवाणी भी कहते हैं। इन्हीं ध्वनियों का अलंकारिक वर्णन शिव के डमरू-घोष, सरस्वती के वीणा-वादन एवं कृष्ण के वंशी, दुर्गा के निनाद, तालनृत्य एवं भैरवनाद जैसे सरस उपाख्यानों और घटनाक्रमों के रूप में किया गया है।
यह दिव्य ध्वनियाँ अनंत अंतरिक्ष में बिना किसी प्रकृतिगत हलचल का आश्रय लिए स्वयमेव विनिसृत होती रहती हैं। ये चेतन हैं, दिव्य हैं। अलौकिक, अभौतिक और अतींद्रिय हैं, इसलिए उन्हें देववाणी भी कहते हैं। उन्हें ध्यानयोग के माध्यम से हमारा चेतन अंतःकरण सुन सकता है। श्रवण का संबंध कर्णेंद्रियों से है, अस्तु सूक्ष्म एवं चेतन श्रवण भी शब्द संस्थान के इसी प्रतिनिधि केंद्र का सहारा लेकर सुना जाता है। प्रत्येक इंद्रिय की तन्मात्राएँ स्थूल से सूक्ष्म का संबंध बनाती हैं। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श शरीर की पाँच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से पाँच तत्त्व के सान्निध्य से उत्पन्न होने वाली अनुभूतियों से ही हमें अवगत कराती हैं। यह स्थूल का सूक्ष्म की ओर गति का एक चरण हुआ, उसके अगले चरण विशुद्ध चेतन एवं अभौतिक हो जाते हैं। जिन दिव्य ध्वनि-प्रवाहों की चर्चा इन पंक्तियों में हो रही है, वह उसी चेतन जगत के उच्चस्तर से संबंधित हैं। ब्रह्मवाणी, देवध्वनि को इसी रूप में समझा जाए।
नादयोग का केंद्रबिंदु उपरोक्त पंक्तियों के आधार पर सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। योगशास्त्र के साधना-विधानों में एक महत्त्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बंद किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतींद्रिय जगत से आने वाले शब्द-प्रवाह को अंतःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेंद्रिय का, उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता है; पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनिलहरी सुनने के लिए, कर्णेंद्रिय और अंतःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते हैं।
प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में 9.30 से 10 बजे तक आधा घंटा नादयोग के अभ्यास का समय है। इसका प्रथम चरण अभ्यास के लिए इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि प्रत्येक साधक के एकाकी कक्ष में लाऊडस्पीकर के माध्यम से एक सुमधुर ध्वनि-प्रवाह पहुँचाया जाता है और साधक को कहा जाता है कि वह आराम कुर्सी पर शांतिपूर्ण स्थिति में शरीर और मन को साधकर इस ध्वनि-प्रवाह के साथ-साथ अपनी अंतःचेतना को भावविभोर स्थिति में बहाने का प्रयत्न करें। जिस प्रकार सपेरे द्वारा बीन बजाए जाने पर सर्प बिल में से निकल आते हैं और उस स्वरलहरी पर लहराने लगते हैं, उसी प्रकार इस संगीत-ध्वनि के साथ-साथ साधक अपने मन को लहराने का प्रयत्न करे।
कृष्ण द्वारा रात्रि की नीरवता में वंशी बजाए जाने और गोपियों के घर-बार छोड़कर उस रास आह्वान के लिए निकल पड़ने का सविस्तार वर्णन भागवत आदि पुराणों में वर्णित है। यह व्यावहारिक, सामाजिक, भौतिक व्यवस्था के सर्वथा प्रतिकूल होते हुए भी अध्यात्म परंपरा के पूर्णतया अनुकूल भी है। वस्तुतः कथा-गाथाओं में रहस्यमय पहेली की तरह गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का ही उद्घाटन किया गया है। रासलीला के पीछे नादयोग की व्याख्या-विवेचना ही सन्निहित है। भगवान वंशी बजाते हैं, मधुर रस चखाने का आह्वान करते हैं। गोपियाँ समस्त सांसारिक बंधनों को तोड़कर उस ओर दौड़ पड़ती हैं। संकेत आह्वान का स्वागत करती है और उसी के लिए आकुल-व्याकुल होकर अपना समर्पण कर देती हैं। अपना आपा खोकर दिव्य ध्वनि के साथ थिरकन, नाचना आरंभ कर देती हैं। यही तो रासलीला है। कृष्ण अर्थात परमात्मा वंशी-ध्वनि अर्थात ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए चल पड़ने का संकेत, गोपियाँ अर्थात आत्मा की भौतिक एवं आत्मिक संपदाएँ रासनृत्य अर्थात दिव्य संकेतों के अनुरूप कठपुतली जैसे भावविभोर आचरण हैं।
रासलीला में सम्मिलित गोपियों के आनंदमुग्ध होने का तथ्य सर्वविदित है। उसी का स्थूलरूप देखने-दिखाने के लिए जहाँ-तहाँ रासलीला के अभिनय किए जाते हैं। यों एक पुरुष के साथ इतनी नारियों का कामुक नृत्य न तो अभिनंदनीय ही हो सकता है और न अभिनीय। फिर भी आत्मा और परमात्मा के बीच आदान-प्रदान का जो भाव-भरा अलंकारिक चित्रण रासलीला में किया गया है, वह पहेली जैसा लगते हुए भी अर्थपूर्ण और तथ्यपूर्ण ही कहा जाएगा। रास की प्रधान नायिका राधा है और अन्य सभी सखियाँ-सहेलियाँ उनके साथ पूर्ण स्नेह-सहयोग के साथ सहनृत्य में तल्लीन होती हैं।
राधा अर्थात आत्मा, उनकी सहयोगिनी सखियाँ अंतरंग की सत्प्रवृत्तियाँ, बौद्धिक विभूतियाँ और सांसारिक संपदाएँ, क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, यह सभी आत्मा की आकांक्षा में स्नेहित सहयोग देती हैं। कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करती, अर्थात् आत्मा के परमात्मा से मिलने के सदुद्देश्य सत्प्रयत्नों को सफल बनाने के लिए अपना पूर्ण समर्पण, समग्र नियोजन प्रस्तुत कर देती हैं। आत्मा की दिव्य आकांक्षा की पूर्ति के लिए उनका पूरा-पूरा समर्थन मिलता है। यह स्थिति प्राप्त हो सके तो हर आत्मा को, हर राधा को रासलीला का दिव्य आनंद मिल सकता है। आत्मा और परमात्मा के मिलन का ब्रह्मानंद उपलब्ध हो सकता है।
नादयोग में कान को सूक्ष्मचेतना की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई पड़ती है। कई बार ये अतिमंद होती हैं, कई बार कुछ प्रखर। इनमें प्रायः कृष्ण की वंशी जैसी सर्प पकड़ने में काम आने वाले बीन जैसी ध्वनियाँ रहती हैं। रास में प्रयुक्त वेणुनाद की चर्चा ऊपर हो चुकी है। कुमार्गगामी भौतिक तृष्णा और वासना का विषपिंड मन एक प्रकार से विषधर सर्प है। उसे भी आनंद-उल्लास की दिव्य प्रेरणाओं के अनुगमन के रूप में लहराने का अवसर इस वेन की ध्वनि सुनने से मिल सकता है। सँपेरा विषधर सर्पों को पकड़ने के लिए बीन बजाता है। जब वह लहराने लगता है तो उसे चुपके से पकड़कर पिटारे में बंद कर लेता है। मन के निग्रह में, प्राणों के निरोध में, नादयोग का ध्वनि-प्रवाह बहुत सफल रहता है। दिव्य ध्वनि श्रवण के साथ-साथ उपरोक्त दो विचारधाराओं का अदल-बदलकर समन्वय करना चाहिए। भगवान के वेणुनाद पर राधा और उसकी सखियों का रासनृत्य करना और मनसर्प का इस दिव्यनाद में तन्मय होकर अपना आत्मसमर्पण कर बैठना, यही है नादयोग की विधि-साधना के साथ जुड़ा हुआ अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व दर्शन।
वंशी और बीन के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की ध्वनियाँ नादयोग के साधकों को सुनाई पड़ती हैं। इनकी संगति इस प्रकार बिठाई जा सकती है— भगवती सरस्वती अपनी वीणा झंकृत करते हुए, ऋतंभरा प्रज्ञा और अनासक्त भूमा के मृदुल-मनोरम तारों को झनझना रही है और अपनी अंतःचेतना में वही दिव्य तत्त्व उभर रहे हैं। भगवान शंकर का डमरू बज रहा है। उससे प्रलय के, मरण के संकेत आ रहे हैं और सुझाया जा रहा है कि इस नश्वर काया का अंत करने वाला तांडव किसी भी क्षण सम्मुख आ सकता है, इसलिए प्रमाद से न उलझा जाए, लक्ष्य की प्राप्ति में आलस्य एवं उपेक्षाभाव न बरता जाए। माया-मोह छोड़कर यथार्थता को समझा जाए। शंखनाद की ध्वनि को महाभारत के पांच जन्य का महाकाल के भैरवनाद का उद्घोष माना जाए और अनुभव किया जाए कि अब महाप्रयाण का ऐसा समय आ पहुँचा, जिसमें आनाकानी या सोच-विचार करने की गुजाइश नहीं है। युग की कर्त्तव्य की पुकार गूँज रही है और उभार रही है कि अविलंब जीवनोद्देश्य की दिशा में कदम बढ़ाया जाए। बिजली की कड़क, दावानल की धू-धू, बादलों की गर्जन, समुद्र का तर्जन इस संकेत को लेकर आते हैं कि अपनी गतिविधियों का कायाकल्प होना ही चाहिए। पशु स्तर को निरस्त करके दिव्य स्तर अपनाया ही जाना चाहिए और उस उलट-पुलट में जो उफान-तूफान प्रस्तुत होते हैं, उनका सामना किया ही जाना चाहिए। कभी झिल्ली की झंकार, कभी चिड़ियों की चहचहाहट के शब्द सुनाई पड़ते हैं, इन्हें छोटे जीवों द्वारा मानवी प्रमाद को हिला देने वाला उद्बोधन समझा जाए। जब इतने छोटे जीव अपने नियत-नियमित आनंद बिखेरने वाले क्रियाकलाप में निरत रहते हैं तो मनुष्य के लिए यह कैसे शोभनीय होगा कि वह जीवनोद्देश्य के साथ जुड़े हुए अपने महान कर्त्तव्य का परित्याग करके मात्र पेट और प्रजनन के लिए जीवन संपदा को कौड़ी मोल गवा देने की मूर्खता अपनाए?
नादयोग में कितने प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ सकती हैं, इनकी कोई सीमा नहीं। प्रायः परिचित ध्वनियाँ ही सुनाई पड़ती हैं, सो सूक्ष्मदर्शी साधक उनके पीछे उच्च संकेतों को विवेक-बुद्धि के द्वारा सहज संगति बिठा सकते हैं। कोयल की कुकन, मुर्गे की बांग, मयूर की पीक, सिंह की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ शब्द सुनाई पड़ें तो उनमें इन प्राणियों को उच्चारण समय की मनःस्थिति की कल्पना करते हुए, अपने लिए प्रेरक संकेतों का तालमेल बिठाया जा सकता है। कई बार रुदन, क्रंदन, हर्षोल्लास, अट्टहास, उच्छास जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं, उसे अपनी अंतरात्मा का संतोष-असंतोष समझा जा सकता है। कुमार्गगामी गतिविधियों से असंतोष और सत्प्रवृत्तियों का संतोष स्पष्ट है। आत्मनिरीक्षण करते हुए आत्मा को समय-समय पर अपनी भली-बुरी गतिविधियों पर संतोष-असंतोष प्रकट करने के अवसर आते हैं। इन्हीं की प्रतिध्वनि, हर्ष-क्षोभ व्यक्त करने वाले स्वरों में सुनाई पड़ती रहती है। किस ध्वनि के पीछे क्या संकेत, संदेश, तथ्य हो सकता है; उसे नादयोगी की सहज बुद्धि ही समयानुसार निर्णय करती चलती है। उसकी विस्तृत चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं। तथ्य इतना भर है कि इन दिव्य ध्वनियों में किसी-न-किसी स्तर की उच्च प्रेरणाएँ होती हैं और उन सबका प्रयोजन एक ही रहता है कि हमें आत्मा की स्थिति से ऊपर उठकर उच्च भूमिका के लिए द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिए— साहसपूर्ण कदम चढ़ाना चाहिए।
कानों के छिद्र बंद करके अंतर्जगत की दिव्य ध्वनियाँ सुनने की साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़कर सुविस्तृत अंतरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म-प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं। उनके स्पंदन हमारी कर्णेंद्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधक में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्मजगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। किसी व्यक्तिविशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के संबंध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है। अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है। यों शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श, की किसी भी प्रक्रिया के आधार पर बनी हुई साधना-पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है; पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्त्व है।
नादसंकेत वे सूत्र हैं, जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्तिस्रोतों के साथ हमारे आदान-प्रदान संभव हो सकते हैं। टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलेस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्त्ती व्यक्तियों के साथ अनुभूतियों का आदान-प्रदान करते हैं।
ठीक इसी प्रकार ईश्वर के विभिन्न शक्तिकेंद्रों के साथ इन विभिन्न ध्वनियों के माध्यम से संबंध मिला सकते हैं और इस स्थिति पर पहुँच सकते हैं कि अपनी बात ईश्वर तक पहुँचा सकें और उसके उत्तर प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं— यह ध्वनि-प्रवाह सड़कों का भार वाहनों का भी काम करते हैं। व्यक्ति की व्यथाएँ लादकर परमात्मा तक पहुँचाना और परमात्मा के अनुदान-वरदान लादकर व्यक्ति तक पहुँचाना भी इन ध्वनियों के माध्यम से संभव हो सकता है। सिद्धपुरुष प्रायः ऐसे ही साधना-माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़कर अभीष्ट आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।
भावनाशील मन:स्थिति के लोग नादयोग जैसी सुकोमल ध्वनियाँ भाव-संवेदनाओं के आधार पर सुन लेते हैं, पर यह हर किसी के लिए आवश्यक— अनिवार्य नहीं कि वह उस प्रकार का दिव्य श्रवण कर ही सके। किन्हीं-किन्हीं को बहुत करने पर भी ऐसी कुछ अनुभूतियाँ नहीं होतीं। उन्हें निराश होने की तनिक भी आवश्यकता है नहीं; वे अपनी अंतःचेतना को प्रत्यक्ष ध्वनियों के सहारे नादयोग जैसी स्थिति में ही उद्वेलित कर सकते हैं।
बिंदुयोग की प्रारंभिक साधना प्रकाश-दीप के माध्यम से होती है। बार-बार दीपशिखा देखने, आँखें बंद करने और भ्रूमध्य भाग में ध्यान जमाने की आवश्यकता पड़ती है, जब वह भूमिका परिपक्व हो जाती है, तो प्रकाश स्वतः दृष्टिगोचर होता है और दीपक की आवश्यकता नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार बाहरी वाद्य यंत्रों का सहारा लेकर नादयोग का साधनाक्रम आगे बढ़ाया जा सकता है। टेप रिकार्डर पर संगीत ध्वनियाँ भरी रह सकती हैं और उन्हें अपने साधना-कक्ष में सुनते हुए उपरोक्त अनुभूतियाँ जगाई जा सकती हैं। रिकार्ड प्लेयर पर कोई भाव-भरे स्वर-प्रवाह सुने जा सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि एक केंद्र स्थान पर वाद्य यंत्र बजते रहें और समीपवर्त्ती कक्षों में साधनारत साधक उनका श्रवण आनंद लेते हुए नादयोग का क्रम चलाते रहें। स्वयं भी इकतारा, सितार जैसे मृदुल वाद्य यंत्र बजाते हुए उस स्थिति में आत्मविभोर हो सकते हैं। झींगुरों की झंकार, चिड़ियों की चहचहाहट सुनने का प्रकृति सान्निध्य मिल सके तो वह सहज वाद्य भी उपयुक्त रहेगा। इस प्रकार के बाह्य माध्यमों का आश्रय लेकर भी नादयोग की साधना हो सकती है और यदि भावना स्तर प्रखर रहे तो उनसे भी उतना ही लाभ मिल सकता है, जितना कि कान के छेद बंद करके अंतःचेतना द्वारा दिव्य नाद सुनने से उपलब्ध होता है।
विभिन्न व्यक्तियों के मनःस्तर विभिन्न प्रकार के होते हैं। किन्हीं की कल्पनाशीलता, भावुकता बढ़ी-चढ़ी होती है और वे दिव्य दर्शन, दिव्य श्रवण, दिव्य रस, दिव्य स्पर्श का आनंद अधिक कोमलतापूर्वक उठा सकते हैं; पर किन्हीं का भाव स्तर काफी कठोर होता है, उन्हें बहुत प्रयास करने पर भी ऐसा कुछ अनुभव नहीं होता। इसमें संरचनामात्र का अंतर है। यह समझ बैठने का अवसर नहीं कि इनमें से आत्मिक-प्रगति के क्षेत्र में कौन सफल और कौन असफल रह रहा है।
साहसिकता और प्रखर चेतना का एक स्तर है, जिसे धन विद्युत आवेशों से बनी मनोभूमि कह सकते हैं। दूसरी मनोभूमि ऋण आवेशों से बनी होती है, उससे भावुकता बढ़ी-चढ़ी होती है, संवेदनाएँ बहुत उठती हैं और भावात्मक अनुभूतियाँ सहज ही उठती रहती हैं और कई बार वे इतनी प्रबल होती हैं कि निष्ठा को प्रत्यक्ष मूर्तिमान बनने का सहज अवसर मिल जाता है। उन्हें कतिपय प्रकार की दिव्य अनुभूतियाँ निरंतर होती रहती हैं। मृदुल और कठोर संरचनाओं का अपना-अपना महत्त्व है, पर प्रायः होता जन्मजात है। उसमें सुधार यत्किंचित ही हो पाता है।
जिनकी मानसिक संरचना कोमल होगी, उन्हें ध्यान-धारण के स्वल्प प्रयास ही बहुत कुछ अनुभव कराने लगेंगे, किंतु यदि संरचना कठोर हुई तो फिर कुछ अतिरिक्त अनुभव न हो सकेगा। इतना होने पर भी निराशा का कोई कारण नहीं। कठोर संरचना की स्थिति अपने ध्यान प्रयोजन स्थूल उपकरणों के माध्यम से जमानी चाहिए। दिव्य दर्शन का प्रयोजन मूर्तियों अथवा चित्रों को देखकर हो सकता है। दीपशिखा, सूर्य अथवा चंद्र का आश्रय लेकर भी वही प्रयोजन पूरा हो सकता है। दिव्य गंध के लिए कपूर, चंदन, इत्र आदि का प्रयोग हो सकता है। दिव्य रस के लिए मुख में मिश्री या कोई मिठास जैसी गोली रखी जा सकती है। स्पर्श के लिए शीत या ताप के लिए ठंडे घड़े या गरम अग्नि उपकरण का प्रयोग हो सकता है और नादयोग के लिए स्वयं इकतारा जैसा कोई वाद्य यंत्र सीखकर अथवा टेप रिकार्डर आदि का उपयोग करके वह प्रयोजन पूरा किया जा सकता है।
वायु का दवाव हलका होने और प्रशांत सागर के पानी में नमक की मात्रा अधिक रहने से उसमें ऊँची लहरें नहीं उठतीं; किंतु अटलांटिक सागर की स्थिति इससे भिन्न है, उसमें तूफानों की भरमार रहती है। कठोर मनःस्थिति की तुलना प्रशांत महासागर से और कोमल स्थिति को अटलांटिक के समतुल्य समझा जा सकता है। दोनों में किसी को श्रेष्ठ-निकृष्ठ नहीं ठहराया जा सकता, दोनों की ही अपनी विशेषताएँ हैं और दोनों को ही अपना महत्त्व प्रकट करने तथा प्रगति-पथ पर अग्रसर होने का पूरा-पूरा अवसर है। साधना-पद्धति में उसके माध्यम-उपकरण में यह हेर-फेर किया जा सकता है कि व्यक्ति की चेतना-स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसे अंतर्मुखी अथवा बहिर्मुखी की साधना-प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा जाए।
प्रायश्चित्यों की परंपरा में पंचगव्य प्राशन और हविष्यान्न का लेने का शास्त्रीय विधान है। यों जान-बूझकर किए गए पापों के लिए भारतीय धर्म में एकमात्र प्रतिकार यही है कि दुष्कर्मो द्वारा समाज को जो क्षति पहुँचाई गई हो उसी स्तर के लोकोपयोगी पुण्यकार्य करके उसकी पूर्ति की जाए, साथ ही विगत दुष्कर्मों के लिए पश्चात्ताप करते हुए ऐसे उपाय-उपचार भी किए जाते हैं, जिनसे अंतःकरण पर जमे हुए अवांछनीय कुसंस्कारों का निवारण-निराकरण भी हो सके।
इस प्रकार के शोधन उपचारों में पंचगव्य-प्राशन और हविष्यान्न सेवन की चिर परंपरा है। गोरस से समाविष्ट सतोगुणी संस्कारों का बाहुल्य सर्वविदित है। गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोभय, गोमूत्र इन पाँचों के सम्मिश्रण को पंचगव्य कहते हैं। दूध, दही और घृत की उपयोगिता सर्वविदित है। गोमूत्र की आयुर्वेद में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है और उसे उदररोगों तथा रक्तविकारों की अमोघ औषधि माना गया है। यह बात गोबर के संबंध में ही है। लीपने से स्थानशुद्धि और यज्ञाग्नि में प्रयुक्त होने के लिए उपलों की महत्ता बताई गई है। उसका तनिक-सा रस होम्योपैथी दवाओं की तरह कितने ही प्रकार के लाभ उत्पन्न करता है। पंचगव्य में यों गाय का दूध, दही, घृत ही प्रधान होता है। गोमूत्र और गोबर के रस की मात्रा अत्यंत स्वल्प रहती है। इस सम्मिश्रण को यों आरोग्य की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी माना जा सकता है, साथ ही भावनात्मक शोध-उपचार की दृष्टि से भी उसका महत्त्व कम नहीं है। प्रायश्चित विधानों में पंचगव्य-प्राशन का पग-पग पर निर्देश है।
हविष्यान्न में तिल, जौ, चावल इन तीन अन्नों की गणना है। इन्हें भी परम सात्विक सुसंस्कारों से युक्त माना गया है। यज्ञकार्य में आहुतियाँ देने के लिए इन तीनों का उपयोग होता है। सामयिक अन्न संकट के कारण इन दिनों उनकी मात्रा घटा दी गई है; पर प्रतीक रूप में उन्हें कुछ तो रखा ही जाता है। इन तीनों धान्यों को यज्ञ-सामग्री में प्रयुक्त होने वाली औषधियों की तरह ही प्रतिष्ठा दी गई है।
तपस्वियों के सामान्य आहार में इन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। कई तो गायत्री पुरुश्चरण जैसी लंबी तप-साधनाएँ इनमें से किसी एक अथवा तीनों के संमिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में भी इनको आधार मानकर चला जाए तो उससे शरीर और मन में सात्विकता का अंश और बढ़ेगा, साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
‘जैसा खाए अन्न वैसा बने मन’ वाला निष्कर्ष अक्षरशः सत्य है। कुधान्य खाकर, अभक्ष्य अपनाकर किसी की तप-साधना ध्यान-धारणा सफल नहीं हो सकती। ऐसा अन्न पेट में जाकर ऐसे उपद्रव खड़े करता है, जिनके कारण मन में न शांति रह पाती है और न स्थिरता। इस विग्रह के निवारण करने को साधक सबसे पहले अपने आहार में सात्विक तत्त्वों के समावेश का प्रथम प्रयास करते हैं। इस प्रयोजन के लिए हविष्यान्न से बढ़कर और किसी की उपयोगिता नहीं हो सकी। प्रायश्चित्य-प्रक्रिया के लिए हविष्यान्न एवं पंचगव्य लेने का निर्देश धर्मग्रंथो में पग-पग पर पाया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रायश्चित की आवश्यकता न होने पर भी सात्विक आहार की दृष्टि से भी इन दोनों की उपयोगिता है। यदि आहार में इनका पूरा या अधूरा स्थान रखा जाए तो मनःक्षेत्र में शरीर में निश्चित रूप से सात्विकता बढ़ेगी। इंद्रिय-लिप्सा पर नियंत्रण होगा और मनोनिग्रह का प्रयोजन सहज ही पूरा होने लगेगा।
प्रत्यावर्तन सत्र में इन दोनों को स्थान दिया गया है। प्रातःकाल जलपान में सर्वप्रथम आहार के रूप में पंचगव्य ही साधकों को दिया जाता है। इसके उपरांत ही वे कोई अन्य जलपान ले सकते हैं। मध्यान्ह को जौ, चावल और तिल की रोटी दी जाती हैं। यों साथ में चावल, दाल, दलिया जैसे सात्विक आहार की भी मात्रा रहती है, पर प्रथम आहार हविष्यान्न चरु का ही करना पड़ता है। मध्यान्हकालीन और सायंकालीन भोजन में, गंगाजल ही प्रयुक्त होता है और आहार के साथ गंगाजल ही पीने को दिया जाता है।
गंगा में शहरों के मल-मूत्र हरिद्वार के बाद ही पड़ते हैं। इससे ऊपर के जल में अभी गंदगी पड़ना शुरू नहीं हुआ है, इसलिए स्वभावतः उसमें गंगाजल की भौतिक विशेषता बनी रहती है। फिर सात ऋषियों की तपस्थली सप्तसरोवर— जहाँ ऋषियों के तप में विघ्न न पड़ने देने की बात को ध्यान में रखते हुए गंगा ने अपने को सात धाराओं में विभक्त कर लिया था, अपनी पवित्रता के लिए प्रसिद्ध है। शान्तिकुञ्ज का आश्रम इस पवित्रता को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है। यहाँ का गंगाजल हविष्यान्न, पंचगव्य के साथ प्रयुक्त किया जाय तो स्वभावतः इससे सतोगुणी प्रभाव बढ़ेगा और इससे साधना की प्रगति में योगदान मिलेगा।
साधकों को आहार बनाने, परोसने के लिए साधनापरायण हाथों का ही उपयोग होता है। ब्रह्मचर्य से रहने वाले शरीर ही इस आहार का स्पर्श करते हैं। इससे पूर्व उसे और भी अधिक सुसंस्कारी बनाने के लिए आध्यात्मिक उपचारों से संपन्न किया जाता है। उस पर निरीक्षण दृष्टिपात उन आँखों का रहता है, जिन्होंने प्रत्यावर्तन सत्र शृंखला का आधार खड़ा किया है।
अन्नमयकोश का पंचकोशी साधना में प्रथम स्थान है। अन्नमयकोश के परिष्कार के लिए सात्विक आहार की व्यवस्था बनाई जाती है। भगवान का भोग, प्रसाद लगाकर गायत्री मंत्र का उच्चारण करने के बाद भोजन आरंभ करने से आहार का स्तर औषधि रूप हो जाता है। नियत समय पर भूख से कुछ कम मात्रा में, प्रसन्नता और संतोष की मनःस्थिति के साथ यदि सामान्य भोजन किया जाए तो उसका प्रभाव शरीर की आरोग्य वृद्धि के लिए ही नहीं, मन की सात्विकता बढ़ाने की दृष्टि से भी यह अत्यंत प्रभावशाली है।
हविष्यान्न से बनी रोटी के साथ ब्राह्मी-आँवला की चटनी स्वाद और पाचन की दृष्टि से तो उपयुक्त है ही उममें मस्तिष्क को बल देने वाले टानिक भी हैं। आँवला रसायन है, उसमें बुढ़ापा रोकने का गुण है। च्यवनप्राश वलेह में आँवला ही प्रधान है। वृद्ध च्यवन ऋषि इन्हीं फलों को खाकर वृद्ध से तरुण हुए थे। ब्राह्मी भारत की बुद्धिवर्धक बूटी है। सतावरि, शंखपुष्पी, गोरख, मुँडीबच और ब्राह्मी इन पाँच बूटियों को सरस्वती की प्रतीक माना गया है। ये बुद्धिवर्धक हैं। ब्राह्मी इनमें सर्वोपरि है। हविष्यान्न के साथ जो चटनी दी जाती है उसमें ब्राह्मी-आँवला की मात्रा अधिक रहती है; पर साथ ही सरस्वती पंचक बूटियों का भी अनुपात संमिश्रण रहता है। इस प्रकार इसे एक मस्तिष्कीय बलवर्धक रसायन भी कह सकते हैं। ब्राह्मी-आँवला से बना हुआ तेल बालों को काला करता है, उनकी जड़ें मजबूत बनाता है। इससे स्पष्ट है — यह औषधी मस्तिष्क को कितना बल पहुँचाती है। स्मरण-शक्ति बढ़ाने और बुद्धि की बढ़ोतरी करने की दृष्टि से उपयुक्त यह वनस्पतियाँ भारत भूमि की अनुपम देन हैं। इनकी तुलना की औषधियाँ कदाचित ही अन्यत्र मिलती हों। आयुर्वेद शास्त्र में आंवले की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है, उसमें जितने उच्चकोटि के विटामिन होते हैं उतने शायद ही अन्य किसी फल में पाए जाते हों।
प्रत्यावर्तन सत्र में आने वाले साधकों को यों हविष्यान्न रोटी के साथ दी जाने वाली यह चटनी स्वास्थ्य की दृष्टि से भी एक महत्त्वपूर्ण रसायन आहार है; पर उसका मुख्य लाभ अंतःकरण चतुष्टय से संबंधित मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का स्तर तमोगुण, रजोगुण की भूमिका से ऊँचा उठाकर सतोगुणी स्तर तक पहुँचाता है। आहार का विश्लेषणमात्र शरीर के लिए लाभदायक-हानिकारक समझकर ही नहीं करना चाहिए; वरन यह भी देखना चाहिए कि उसका मन और बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है। अन्न का मन से संबंध सुनिश्चित है। साधना का प्राण सात्विक आहार है। कहना न होगा कि इस तथ्य का इन सत्रों में पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। पंचगव्य, हविष्यान्न, आँवला कल्क का त्रिविध संयोग इसी दृष्टि से है। इसके अतिरिक्त चावल, दाल, दलिया आदि के बनाने, शोधने, पकाने में इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है कि यह आहार-प्रक्रिया अन्नमयकोश को परिष्कृत करने में, मनःसंस्थान को उच्चस्तरीय बनाने की भूमिका ठीक तरह संपादित कर सके।
अध्यात्म का अर्थ है— अपने आपे का विज्ञान। पदार्थ विज्ञान का— साइन्स का अपना महत्त्व है। उसी के आधार पर मानवी प्रगति की, सुविधा-साधनों की अगणित उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकती हैं। उन्हीं के सहारे मनुष्य भौतिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़ा है और अन्य जीवधारियों की तुलना में अत्यधिक साधनसंपन्न बना है। अध्यात्म चेतना का विज्ञान है। मनुष्य के दो भाग हैं— एक जड़, एक चेतन। जड़ पंचतत्त्वों से बना शरीर है और चेतन आत्मा। जड़ शरीर के लिए जड़ जगत से साधन-उपक्रम प्राप्त होते हैं और उन्हें जुटाने के लिए भौतिक विज्ञान की विद्या अपनानी पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्मा को चेतना की प्रगति और समृद्धि के लिए चेतना विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है। अध्यात्म विज्ञान ब्रह्मविद्या का प्रयोजन इसी महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।
अध्यात्म विज्ञान के लक्ष्य हैं— आत्मकल्याण पूर्णता से परमात्म स्तर तक पहुँचना। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए चार चरण निर्धारित हैं। (1) आत्मचिंतन (2) आत्मसुधार (3) आत्मनिर्माण और (4) आत्मविकास। यह चार चरण हैं— (1) आत्मचिंतन अर्थात अपने चेतन, अजर-अमर शुद्ध चेतन स्वरूप का मान। शरीर और मन में अपनी स्वतन्य एवं प्रथक सत्ता की प्रगाढ़ अनुभूति। (2) आत्मसुधार अर्थात अपने ऊपर चढ़े हुए मल-आवरण विक्षेप कषाय-कल्मषों का निरूपण, निरीक्षण और सुसंपन्न स्थिति को विपन्नता में बदल देने वाली विकृतियों की समुचित जानकारी। (3) आत्मनिर्माण अर्थात विकृतियों को निरस्त करके उनके स्थान पर सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों की उत्कृष्ट कर्तृत्व और आदर्श कर्त्तव्य स्थापित करने का सुनिश्चित संकल्प एवं साहसिक प्रयास। (4) आत्मविकास अर्थात चिंतन और कर्तृत्व को लोक-मंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के लिए, न परमात्म स्तर पर विकसित होने के लिए अधिकाधिक संयम, तप, त्याग, बलिदान को संतोष एवं आनंद की अनुभूति। इन चार चरणों में आत्मकल्याण का लक्ष्य प्राप्त होता है।
आत्मकल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो कुछ करना पड़ता है, उसी का नाम उपासना एवं साधना के दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक-प्रगति यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इंद्रियजन्य वासनाओं और मनोवांछाओं की, तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, इसी प्रकार आंतरिक समाधान, संतोष, आनंद-उल्लास की असीम शांति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित संपदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों की राह यही है। महामानव, देवदूत एवं ऋषिकल्प स्थिति प्राप्त करने का यही आधार अवलंबन है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति इन्हीं प्रयत्नों से संभव होती है।
आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर करने वाले अध्यात्म विधि-विज्ञान की दो धाराएँ हैं— (1) आत्मदर्शन (2) विश्व दर्शन। इन्हें आत्मबोध एवं तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढ़ाचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिंतन एवं कर्त्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत की यही दो धाराएँ— पवित्र गंगा, यमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम-पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
प्रत्यावर्तन-साधना के अंतर्गत तीसरे प्रहर तीन से पाँच बजे तक चलने वाले तृतीय सोपान में आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय है। तीन से पौने चार, पौन घंटा— आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखा जाना ही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है; पर अपनी छवि लगभग उतनी ही बड़ी दीखनी चाहिए जितनी कि वह माप में होती है। छोटे दर्पण को दूर रखकर यों पूरा शरीर भी देखा जा सकता है, पर उसमें आकृति बहुत छोटी हो जाएगी, इससे काम नहीं चलेगा। इसीलिए सामान्यतया ऐसा ही करना पड़ता है कि डेढ फुट ऊँचा दर्पण किसी छोटी मेज पर इस तरह रख लिया जाए कि वह सामने लगभग ढ़ाई फुट की दूरी पर रहे। इस दर्पण में अपने स्वरूप को देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए।
वेदांत के स्वर्णिम-सूत्र आत्मसत्ता का निरूपण करते हुए कहते हैं— तत्त्वभास अयमात्मा ब्रह्मप्रज्ञानं ब्रह्म्— सोऽहम् शिवोऽहम् सच्चिदानन्दोऽहम्। इन विवेचनों में आत्मसत्ता को ब्रह्मसत्ता का एक अविनाशी अंश एवं घटक बताया गया है। वस्तुतः वह वैसा ही है भी; किंतु भ्रांतियों और मलीनताओं के कीचड़ में फँसाकर उसी तरह दयनीय बन गया, जिस प्रकार भारी दल-दल में गरदन तक फँसा हुआ हाथी अपने उद्धार का कोई रास्ता न पाकर हृदय-विदारक करुण-क्रंदन करता है। प्रायः हर दुनियादार मनुष्य की यही स्थिति है। बाहर से देखने में कोई साधनसंपन्न, वैभववान या प्रतिष्ठित सत्ताधारी भी हो सकता है; पर भीतर उसे कितने उद्वेग, आक्रीशों का सामना करना पड़ रहा है, इसका सही चित्रण संभव हो सके तो प्रतीत होगा कि अभावग्रस्त ही नहीं, संपत्तिवान भी दयनीय मनःस्थिति में अगणित व्यथा-वेदनाएँ सहते हुए निकृष्ट स्तर का जीवनयापन कर रहे हैं। बाहर संपन्नता भीतर विपन्नता यह कैसी विचित्र विडंबना है, पर पाई सर्वत्र जाती है। प्रायः हर दुनियादार व्यक्ति इन्हीं भवबंधनों से बँधा हुआ, दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का सताया हुआ, रुदन-क्रंदन करता हुआ, संक्षोभों की आग में जलता हुआ जी रहा है।
दर्पण में अपना स्वरूप देखते हुए आत्मबोध के साधक को अपनी इसी दयनीय स्थिति पर करुणा व्यक्त करनी चाहिए। ईश्वर का अविनाशी अंश इस धरती पर ईश्वरीय प्रयोजन पूरे करने के लिए, पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था; पर वह सब तो एक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जंजाल में फँस गया जिसे आटे के लोभ में गला फँसाने वाली मछली पिंजड़े में घुसे चूहे अथवा जाल में तड़पने वाले पक्षी के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है। यह विडंबना इतनी दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपनी स्थिति पर आठ-आठ आँसू बहाए जा सकते हैं।
परमात्मा ने मनुष्य को इतनी सुविधाएँ प्रदान की हैं, जितनी सृष्टि के किसी भी प्राणी को उपलब्ध नहीं। सोचना, बोलना, लिखना, पढ़ना, शिक्षा, शासन, वाहन, चिकित्सा, परिवार, उत्पादन, पाकविद्या, वस्त्र, अग्नि, औजार आदि के वे साधन जो गए गुजरे मनुष्यों को भी प्राप्त है, अन्य किसी प्राणी को कहाँ मिले हैं? यदि यह सब विलासिता के लिए ही दिया गया होता तो सृष्टि के कई कोटि प्राणी भगवान से शिकायत करते कि जबकि वह सभी का पिता है— सभी उसके समान प्रियपात्र पुत्र हैं तो अकेले मनुष्य को ही वे साधन क्यों दिए? अन्यों को क्यों वंचित रखा गया? न्याय और निष्पक्षता का तकाजा भी यही था। केवल मनुष्य को ही जब इतना वैभव अनुदान प्रदान किया गया है तो उसके पीछे निश्चित रूप से कुछ विशेष कारण होना चाहिए। वह कारण यही है कि मनुष्य भगवान के सहायक-मंत्री, मिनिस्टर, प्रशासकशिल्पी माली के रूप में उस विश्व-वसुधा के उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य, सुविकसित एवं समुन्नत बनाने में भरपूर योगदान करे। उसकी जीवन यात्रा इसीलिए सुलभ और सुविधाजनक बनाई गई है कि शरीर यात्रा पर न्यूनतम शक्ति खर्च करके अधिक मात्रा में अपना योगदान प्रस्तुत कर सकें। मिनिस्टरों एवं अफसरों को अधिक वेतन, अच्छे बङ्गले, मोटर नौकर आदि इसी लिए दिए जाते हैं कि वे अधिक मात्रा में अधिक अच्छी तरह, अधिक ऊँचे स्तर का काम कर सकें। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों से अतिरिक्त मिला है, वह इसी प्रयोजन के लिए है। यदि वह कर्त्तव्य विमुख होकर पशु-प्रवृत्तियों में फंसकर स्वार्थभरा संकीर्ण जीवनक्रम अपनाता है तो समझना चाहिए कि ईश्वर के उस आधार को ही नष्ट करता है, जिसके लिए उसका सजन किया गया था। ईश्वर का अंश अविनाशी राजकुमार ही वस्तुतः मानवी जीवात्मा है, उसे अपने कर्त्तव्य और लक्ष्य का ध्यान रखना ही चाहिए।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरांत एक बार ही मनुष्य जन्म मिलता है। वह चाहे तो ईश्वरीय निर्देश और अध्यात्म कर्त्तव्य का पालन करते हुए पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है, अपूर्णता से मुक्त होकर पूर्णता का वरण कर सकता है। यदि वैसा न करके पशुता एवं पैशाचिकता की दुष्प्रवृत्तियों में उलझ पड़े तो उसे फिर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने का दीर्घकालीन दुसह दुःख सहना पड़ेगा। औसत एक वर्ष की एक योनि मानी जाए तो चौरासी लाख वर्ष असीम कष्ट सहते हुए केवल एक बार पचास-चालीस वर्ष के लिए अनिश्चित अवधि के लिए मनुष्य शरीर मिलता है। यदि कोई चाहे तो उस अवधि का सदुपयोग करके भवबंधनों के कुचक्र से निकल सकता है अन्यथा फिर उतनी ही लंबी अवधि तक अपने सामने कोल्हू में पेले जाने और चक्की में पीसे जाने की स्थिति आँखों के सामने खड़ी है।
दर्पण के सामने बैठकर अपनी छवि शीशे में देखते हुए आत्मविश्लेषण किया जाता है। ईश्वर का अविनाशी राजकुमार विश्व में सुरम्य परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए नियुक्त किया गया, विशेष प्रतिनिधि पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने के सुअवसर से संपन्न सौभाग्यशाली यह है जो दर्पण में बैठा हुआ है। इसके काय-कलेवर में ईश्वर की समस्त शक्तियाँ और विभूतियाँ भरी पड़ी हैं। इसका एक-एक कण ऐसी विशेषताओं से सजोया गया है कि चाहे तो सहज ही महामानवों की, देवदूतों की पंक्ति में बैठ सकता है। सूक्ष्मरूप में मानव शरीर में समस्त देवताओं की ऋषियों की दिव्यसत्ता विद्यमान रहती है, उसे थोड़ा भी पोषण मिले तो यह बीज विशालकाय वट वृक्ष में परिणित होकर अपने को धन्य और विश्व मानव को सुसंपन्न बना सकता है। इसमें गाँधी, बुद्ध, ईसा, राम, कृष्ण बनने की परिपूर्ण संभावनाएँ विद्यमान हैं।
इतना सब कुछ होते हुए भी अवांछनीय गतिविधियाँ अपनाने के कारण यह दर्पण में बैठा हुआ महामानव किसी दयनीय दुर्दशा से ग्रसित हो रहा है, यह कैसे आश्चर्य और दुर्भाग्य की बात है। लोभ और मोह के, वासना और तृष्णा के, स्वार्थ और संकीर्णता के बंधनों ने इसे किस बुरी तरह जकड़ रखा है। जीभ और जननेंद्रियों का गुलाम बनकर इसने अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को किस बुरी तरह चौपट कर डाला। परिवार के उचित उत्तरदायित्वों को निवाहना और परिजनों को सुसंस्कृत बनाना तो कर्त्तव्य था, पर उनके लिए ही सब कुछ करना, उन्हीं की इच्छानुकूल चलना यह कहाँ की बुद्धिमानी थी। केवल चार-छह व्यक्तियों के इस छोटे समुदाय के लिए ही अपनी समस्त क्षमताओं को नियोजित कर देना और आत्मकल्याण के, देशधर्म, समाज-संस्कृति के समस्त कर्त्तव्यों से उसी निमित्त मुख मोड़ लेना यह कहाँ की समझदारी थी। कुत्साओं और कुंठाओं से ग्रसित जीवन का क्रम और स्वरूप बना लेने की उसी की पूरी जिम्मेदारी है, जो इस दर्पण में बैठा है। मकड़ी का जाला उसी ने बुना है और उसमें स्वयं ही फँसी है। वह चाहे तो जाले को समेटकर पेट में फिर वापिस भर सकती है और स्वच्छंद विचरण की, जीवनमुक्ति की स्थिति प्राप्त कर सकने में पूर्ण सफल हो सकती है।
दर्पण में दृष्टिगोचर प्रतिबिंब के सहारे आत्मविश्लेषण की, अधिक गहराई में प्रवेश किया जा सकता है और पतन से ऊँचे उठकर उत्थान के उच्चशिखर पर पहुँच सकने का पथ निर्धारण किया जा सकता है। भविष्य के लिए ऐसी सुसंतुलित गतिविधियों का निर्धारण किया जा सकता है, जिसमें भौतिक और आत्मिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह की सुसंतुलित गुंजायश बनी रहे। शरीर निर्वाह और परिवार उत्तरदायित्व निवाहे जाएँ सो ठीक है, पर इससे कम महत्त्व आत्मकल्याण के लिए जीवनोद्देश्य की पूर्ति का भी नहीं है। उसके लिए भी समय, श्रम, बुद्धि, प्रतिभा, धन, चिंतन एवं कर्तृत्व जैसी अपनी संपदाओं का एक बड़ा अंश लगना ही चाहिए। सब कुछ भौतिक जीवन ही नहीं है, समस्त विभूतियों को उसी पर निछावर नहीं कर दिया जाना चाहिए। कुछ आत्मा और परमात्मा द्वारा निर्देशित महान निर्देशों की पूर्ति के लिए भी लगाया जाना चाहिए। यह विभाजन यदि न हो सका तो इस दुर्भाग्यपूर्ण क्रियाकलाप को अपनाए रहने का परिणाम आज नहीं तो कल अनंत और पश्चाताप के रूप में ही सामने आवेगा। प्रतिबिंब के माध्यम से अपने आपको समझाया जाना चाहिए कि वह उचित-अनुचित का, लाभ-हानि का, बुद्धिमत्ता-मूर्खता का अंतर करना सीखें और समय रहे तो वह गतिविधियाँ अपनाए, जिससे शेष रही थोड़ी-सी आयु का सदुपयोग हो सके और अंधकारमय भविष्य में विभीषिका से बचा जा सके।
दर्पण एक माध्यम है आत्मबोध का। आमतौर से ही बाह्य जगत में इतने घुले और व्यस्त रहते हैं कि अपने एक प्रकार से भूल ही बैठे होते हैं। याद तो शरीर और मन की क्षुधा तृष्णा ही रहती है। आत्मा भी कोई होता है। हम भी आत्मा हैं। आत्मा के कुछ अपने स्वार्थ और कर्त्तव्य भी हैं क्या — यह बात पढ़ी-सुनी तो कई बार होती है; पर उसने तथ्य के रूप में कभी हृदय की गहराई तक प्रवेश नहीं किया होता। यदि आत्मबोध की यथार्थता अंतःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने की तरह आत्मोल के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।
यह भ्रम वे सिर-पैर का है कि उथली पूजा-उपासना के छुट-पुट कर्मकांड पूरे कर देने मात्र से ईश्वर की प्रसन्नता या आत्मकल्याण की आवश्यकता पूरी हो सकती है। ईश्वर न खुशामदी है, न रिश्वतखोर। उसे स्तोत्र पाठ के वाक् छल से भ्रमाया या पुष्पप्रसाद के लालच से लुभाया नहीं जा सकता। जीभ का उच्चारण और वस्तुओं की हेराफेरी जैसी बालक्रीड़ा आत्मकल्याण की। जीवनोद्देश्य की पूर्ति की, ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता किसी भी प्रकार पूरी नहीं कर सकती। इनका प्रयोजन मात्र इतना ही है जितना कि दर्पण के माध्यम से आत्मबोध स्तर तक पहुँचने का। अकेला दर्पण आत्मबोधन, आत्मदर्शन करा दे यह किसी भी प्रकार संभव नहीं। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्तृत्व अपनाते हए दिव्य जीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजापरक कर्मकांडों का महत्त्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
गीता की उस सूक्ति में ब्रह्मविद्या का सागर भरा हुआ है जिसके अनुसार अपना उद्धार आप ही किया जाता है, आत्मा ही मित्र की और आत्मा ही शत्रु की भूमिका सम्पादित करता है। माया ग्रस्त भव बन्धनों से जकड़ा हुआ आत्मा-अपने लिए और समस्त विश्व के लिए महान विपत्ति है। स्वर्गीय दृष्टिकोण और उन्मुक्त चिन्तन का अभ्यस्त आत्मा मूर्तिमान परमेश्वर है,वह स्वयं धन्य बनताहै और समस्त विश्व के लिए वरदान सिद्ध होता है। अस्तु आत्मोद्धार को ही परम पुरुषार्थ माना गया है। दर्पण की साधना इसी का पथ प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण योगदान करती है, गहित गतिविधियाँ और भ्रमग्रसित मान्यताएँ अपनाने के कारण अब तक के जीवन का जिस तरह अपव्यय हुआ उस दुर्भाग्य पर दुःखी होने का अवसर इस साधना से मिलता है। बिना समय गँवाए भूल को सुधार लेने, गतिविधियों के उलट देने की प्रचंड प्रेरणा उठती है। इस समुद्र-मंथन से भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारण करने पर अनमोल रत्न निकलते हैं और पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देने तथा कथित शुभ चिंतकों के दबाव को अस्वीकार करने की ऐसी दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है, जिससे परिष्कृत भावी गतिविधियों का नवनिर्माण सरल और संभव हो जाता है।
आत्मबोध की, आत्मविश्लेषण की साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इसके लिए प्रत्यावर्तन सत्र में जो पेंतालीस मिनट निर्धारित हैं, उनमें आत्मतत्त्व से संबंधित प्रायः सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है। आस्थाओं में आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए? गतिविधियों में, रीति-नीति एवं कार्यपद्धतियों में क्या उलट-पुलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु-प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है। यदि प्रस्तुत दिव्य संदेशों को अंतःकरण की गहन भूमिका में प्रतिष्ठापित किया जा सका और उन्हें क्रियारूप में परिणत करने का प्रबल-पराक्रमभरा आत्मबल उपलब्ध हो सका तो समझना चाहिए कि दर्पण के माध्यम से की जाने वाली आत्मबोध की साधना दैवी वरदान बनकर सामने आ गई।
424. आत्मानमेव मन्येत कर्त्तारं सुखदुःखयोः।
— चरक
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने को ही सुख और दुःख का कर्त्ता समझें।
आत्मानं विद्धि।
आत्मा को जानो
आत्मानमुपास्व।
आत्मा की उपासना करो।
कोऽहं कथमिदं किंवा कथं मरणजन्मनी।
विचारयान्तरेवं त्वं महात्तामलमेष्यसि ।। 5/58/32
— योगवशिष्ठ
मैं कौन हूँ ? यह जीवन क्यों है ? क्या है ? कैसे है ? जन्म और मरण का प्रयोजन क्या है ? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने वाला महानता को प्राप्त करता है।
स्ववासनादशावेशादाशाविवशतां गताः ।
दशास्वतिविचित्रासु स्वयं निगडिताशयाः ॥ 4/43/3
स्वसङ्कल्पानुसन्धानात्पाशैरिव नयन्वपुः ।
कष्टमस्मिन्स्वयम्बन्धमेत्यात्मा परितप्यते ॥4/42/32
स्वसङ्कल्पिततन्मात्रज्वालाभ्यन्तरवतिं च ।
परां विवशतामेति शृंखलाबद्धसिंहवत् ।। 4/42/34
— योगवशिष्ठ
जीव जो चाहता है, सो अपने आप ही उपलब्ध कर लेता है। प्रत्येक जीव में सृजन की चित्शक्ति विद्यमान है। कभी तप के रूप में, कभी देवता के रूप में स्वयं आत्मा ही अपनी इच्छाएँ आप पूरी करता रहता है। यहाँ कोई दूसरा हमारे भाग्य का निर्माता नहीं है। कोई वस्तु ऐसी नहीं, जो सत्कर्म और शुद्ध पुरुषार्थ से प्राप्त न हो सके।
सर्वशक्तिमयो ह्यात्मा यद्यथा भावयत्यलम् ।
तत्तथा पश्यति तदा स्वसङ्कल्पविजृम्भितम् ।।
— योगवशिष्ठ (6-1/33/41)
यह आत्मा समस्त शक्तियों से संपन्न है। यह अपनी संकल्पशक्ति से अपनी आवश्यकताएँ आप पूरी कर लेती है।
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविण (ग्वंग) सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥
— (तै० उप० 1/10)
“मैं इस संसार अथवा जीवन वृक्ष को हिलाने-चलाने वाला हूँ। मेरी कीर्ति पर्वत के समान ऊँची है। मैं वह सूर्य हूँ, जिससे ज्ञान का पवित्र प्रकाश उदय हुआ है। मैं वह हूँ, जिसे तात्त्विक अमृत कहते हैं। मैं दीप्तिवान संपदा हूँ। मैं दिव्य प्रज्ञा हूँ। मैं कभी नष्ट न होने वाला अमृत हूँ।” तत्त्ववेत्ता त्रिशंकु ने वेदशिक्षा का सार यही बताया।
चिदानन्दोऽस्म्यहं चेताश्चिद्घनश्चिन्मयोऽस्म्यहम् । ज्योतिर्मयोऽस्म्यहं ज्यायान् ज्योतिषां ज्योतिरस्म्य हम् ॥95
— ब्रह्मोपनिषद् 95
मैं चिदानंद हूँ। चेतन हूँ, चिद्घन और चिन्मय हूँ। ज्योतिर्मय हूँ। ज्योतियों में श्रेष्ठ ज्योति हूँ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
— गीता
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र और कोई वस्तु नहीं है।
ज्ञानतः सुलभः मुक्तिभुक्तिर्यज्ञादि पुण्यतः।
ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है और यज्ञादि पुण्यकर्मों से सांसारिक सुख प्राप्त होते हैं।
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत्।
बिना ज्ञान और विज्ञान के मोक्ष प्राप्त नहीं होती।
भ्रमग्रस्त— मायाबद्ध जीवनक्रम ही हमें अवांछनीय चिंतन और हेय कर्तृत्व में उलझाता है। इसी से वर्त्तमान पर शोक-संताप की घटाएँ छाई रहती हैं और इसी से भविष्य अंधकारमय बनता है। यदि अपने और संसार के संबंधो का पुनर्निर्धारण किया जा सके तो उस तत्त्वबोध के आधार पर सहज ही विचार-क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया-क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है। फलस्वरूप बाह्यजीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अंतःजीवन में आनंद और संतोष से मुक्ति जैसा आलोक ज्योतिर्मय हो सकता है।
प्रत्यावर्तन सत्र में आत्मबोध के पश्चात तत्त्वबोध की साधना है। आत्मा का स्वरूप समझने के बाद दूसरा कदम यही उठाना पड़ता है कि संसार के साथ अपने संबंधो का पुनर्निर्धारण करें। इसके लिए सुधार का पहला प्रयास आत्मा और काय-कलेवर के संबंधो में उत्पन्न हुई भ्रांति के निवारण के रूप में आरंभ करना पड़ता है।
ध्यानमुद्रा में अवस्थित होकर अपने और शरीर के पृथक्करण का भावचित्र मनःक्षेत्र में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ चित्रित करना ही पृथक्करण साधना है। भावना की जाती है कि शरीर में से प्राण निकल गया और किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर मृत शरीर को, उसकी मरणोत्तर स्थिति को गंभीरतापूर्वक देख रहा है। मरी हुई निर्जीव काया अकड़ गई। कहीं सुनसान जंगल में पड़ी है और उसे कौए, गिद्ध, सियार और कुत्ते नोंच-नाँचकर खा रहे हैं, बोटियाँ इधर-उधर छितरी पड़ी हैं। कुछ खाया, कुछ अधखाया मांस इधर-उधर छितरा पड़ा है। कुछ सड़ गया, उसमें कीड़े पड़ रहे हैं। सड़न की दुर्गंध उड़ रही है। हड्डियों का कंकाल टूटा-फूटा, अस्त-व्यस्त पड़ा है। यदि वह घर पर है तो उसे जलाने-गाड़ने की तैयारी हो रही है। लाश को चिता पर रख दिया गया। वह धू-धूकर के जलने लगी। मांस जलने-रँधने लगा, भुना मांसपिंड गठरी जैसा इकट्ठा होने लगा। कपाल जलने में देर लगाने लगा तो उसे संबंधियों ने बांस मारकर फोड़ दिया और वह भी कुछ देर में जलकर राख हो गया। राख हवा में इधर-उधर उड़कर अपना अस्तित्व गँवा बैठी। स्वजन-संबंधी कुछ समय रो-धोकर अपने काम में लग गए। महीने-पंद्रह दिन मरण की चर्चा होती रही, इसके बाद वह प्रसंग भी बंद हो गया— भुला दिया गया।
मरणकाल यह करने के बाद शरीर का अस्तित्व समाप्त होने तक के भावचित्र का जितना अधिक विस्तृत और वीभत्स चित्र, जितना अधिक देर तक देखा जा सके, उतना ही अच्छा है। प्रत्यावर्तन-साधना में इसके लिए पैंतालीस मिनट रखे गए हैं। महत्त्व को देखते हुए यह समय अधिक नहीं, कम ही है। कारण कि मृत्यु को एक प्रकार से भुला ही दिया गया है, यदि वह याद रहती तो निश्चित रूप से यह भी स्मरण ही रहता कि हमें परमेश्वर ने असाधारण विभूतियाँ देकर क्यों यह सुरदुर्लभ शरीर दिया है और उसके साथ क्या-क्या जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं। उन्हें पूरा करने के लिए कुछ किया जा रहा है या नहीं। अपने मन में यह भाव कभी उठते ही नहीं। दूसरों को मरते देखते हुए भी यही सोचते हैं कि अपने को तो लाख-करोड़ वर्ष जीना है। जल्दी क्या है, अभी तो जितना बन पड़े मौज-मजा कर लें, पीछे अगर मरना पड़ा तो तब कहीं लक्ष्य उद्देश्य की बात सोचेंगे।
मृत्यु की सच्चाई जो कभी भी सामने आकर खड़ी हो सकती है। हमारे सामने नग्न यथार्थता प्रस्तुत करती है और झकझोरती है कि यह सुरदुर्लभ सुअवसर ऐसे ही पेट-प्रजनन के पशु-प्रयोजनों में बर्बाद न किया जाए, इसका ऐसा उपयोग किया जाए जो दूरदर्शिता पूर्ण हो; परमात्मा का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म को निरस्त करने के लिए होता है। सृष्टि के अन्य जीवों की आँख से देखा जाए तो मनुष्य भी एक असीम सुविधा-साधनों से संपन्न अवतारी सत्ता ही है। उसी अंश-अवतार जैसी साधुता के परित्राण और दुष्कृतों के विनाश की भूमिका में सतत संलग्न रहना चाहिए। इस तथ्य का विस्मरण प्रायः इसीलिए हो जाता है कि हम मृत्यु का विस्मरण कर बैठे होते हैं और यह सोचते तक नहीं कि मरण निकट है और उपलब्ध अवसर को नष्ट किए बिना पूरी सजगता एवं तत्परता के साथ उस ईश्वरीय उद्देश्य में लगना चाहिए, जिसके लिए कि यह शरीर मिला है।
भगवान शंकर मरघट में निवास करते हैं। श्मशान की भस्म शरीर पर लपेटते हैं, गले में मुंडमाला पहनते हैं, भूत-प्रेतों को साथ रखते हैं। उन्हें मरण का देवता माना गया है। वे जीवन सहचरी के रूप में मृत्यु को साथ रखकर चलते हैं। इसी से मृत्युंजय कहलाते हैं। मृत्यु की प्रतिमा को सामने रखकर चलने वाला निश्चित रूप से मृत्युंजय ही बन सकता है। जिसे मरण के उपरांत आने वाली समस्याओं का ज्ञान है, जो उन्हें सुलझाने में निरत है, उसके लिए मृत्यु का स्वरूप पुराना कपड़ा बदलकर नया पहनने जैसा उत्साहवर्द्धक ही हो सकता है। ऐसी स्थिति प्राप्त की जा सके, इसके लिए मृत्युकाल के चित्र को अधिकाधिक स्पष्टता के साथ देखते हुए मायाग्रस्त मनःस्थिति को सुधारने का प्रयत्न किया जाता है।
शरीर और मन, यह दो औजार-उपकरण हैं— वाहन अथवा सेवक हैं, जो सौंपे गए उत्तरदायित्वों को निवाहने में समुचित सहायता कर सकें। बड़े अफसरों को मोटर की, ड्राइवर की सुविधा सरकार देती है, ताकि वे लंबे क्षेत्र में सुविधापूर्वक भाग-दौड़ कर सके। हमें उत्कृष्ट स्तर का शरीर और मन ऐसे उपकरण के रूप में मिले हैं कि निर्धारित कर्त्तव्यों को पूरा कर सकना अधिक सुविधा के साथ संभव हो सके। आत्मा और शरीर के बीच ही वाहन, सेवक, उपकरण, औजार और उसके उपयोगकर्त्ता स्वामी के बीच रहने वाला रिश्ता ही यथार्थ है। दोनों की सत्ता पृथक है, दोनों के स्वार्थ अलग हैं, दोनों एक नहीं हैं।
हमारे चिंतन में एक भारी भूल यह है कि शरीर और आत्मा को एक ही मान लिया गया है। हम अपने स्वरूप को भूल बैठे हैं और शरीर के साथ इतने रम गए हैं कि दोनों की सत्ता एक ही मानने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि शरीर के, मन के स्वार्थ अपने सुख-दुःख प्रतीत होने लगे हैं, जबकि वस्तुतः वे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर का स्वार्थ वासना में और मन का तृष्णा की पूर्ति में हो सकता है; पर आत्मा की शांति तो जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गए प्रयासों के साथ ही जुड़ी हुई है।
समुद्र के खारे जल में नमक और पानी दोनों मिले होते हैं, अतएव वह किसी काम में नहीं आता। यदि जल और नमक पृथक कर दिए जाएँ तो दोनों ही उपयोगी हो सकते हैं। यदि शरीर आत्मा का वाहन मात्र बनकर रहे तो उसे महामानव, देवदूत, ऋषि स्तर का बनने, सुखी एवं यशस्वी बनने का अवसर मिल सकता है। आत्मा को भी शांति सद्गति मिलेगी; पर यदि वे दोनों इकट्ठे हो जाते हैं, आत्मा अपना स्वरूप भूलकर शरीर स्तर की बन जाती है, तो वासना और तृष्णा की, लोभ और मोह की दल-दल में गहराई तक धँस जाना पड़ेगा और गहरी कीचड़ में गरदन तक फँसे हाथी की तरह दयनीय दुर्दशा के साथ गँवाना पड़ेगा।
आत्मबोध के साथ तत्त्वबोध ही दूसरा चरण है। आत्मा के साथ शरीर का, मन का, परिवार का क्या संबंध है, उसी का पुनर्निर्माण समझना चाहिए। ऋतंभरा प्रज्ञा प्राप्त हो गई और ब्रह्मज्ञान का जो महात्म्य बनाया गया है, वह समग्र रूप में करतल गत हो गया।
शरीर इसलिए मिला है कि उससे आदर्शवादी कार्य कराए जाए, मन इसलिए मिला है कि जीवनोद्देश्य को पूरा करने की योजनाएँ बनाएँ और अवरोधों की गुत्थियाँ सुलझाएँ। परिवार इसलिए मिला है कि सद्भावनाओं और सत्प्रवृतियों को सुविकसित करने, अपनी आंतरिक परिपुष्टता के लिए इस प्रयोगशाला में वैसा ही अभ्यास करते रहा जाए जैसा पहलवान अखाड़े में जाकर किया करता है। भगवान ने परिवार के कुछ लोगों को सुविकसित बनाने के लिए हमें संरक्षक की तरह नियुक्त किया है और माली की तरह इस छोटे उद्यान को सुरम्य बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा है। यह मान्यताएँ हम रखें तो इन तीनों में से किसी पर भी अपना आधिपत्य जमाने की आवश्यकता न मिले। तीनों के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने भर की बात याद रहे और यह चेष्टा बनी रहे कि इन आधारों की सहायता से अधिक अच्छी तरह जीवनलक्ष्य की पूर्ति किस तरह हो सकती है।
भ्रांतियों की भूलभुलैया हमें कुछ का कुछ दिखाती-बताती हैं, अतएव हम यथार्थता से विपरीत स्थिति में अपने को फँसा लेते हैं और न सोचने जैसा सोचने, न करने लायक करने लगते हैं, उसका परिणाम पग-पग पर अशांति, उद्विग्नता, खीज और खिन्नता के रूप में सामने आता है। यदि कर्त्तव्यपालन और सदुपयोग भर की बात ध्यान में बनी रहे तो हर स्थिति में प्रसन्न एवं संतुलित रहा जा सकता है। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग के अमृत, पारस एवं कल्पवृक्ष की त्रिविध सिद्धियाँ इसी स्तर की मनोभूमि में उपलब्ध होती हैं।
आत्मा को शरीर और मन से भिन्न मानने पर सहज ही यह विवेक जागृत होता है कि जीवन संपदा का कितना अंश इन वाहनों की आवश्यकता पूर्ति के लिए खर्च किया जाए और कितना निर्दिष्ट लक्ष्य की पूर्ति में लगाया जाए। न्यायोचित विभाजन हो सके तो समय, श्रम, बुद्धि, प्रतिभा एवं संपत्ति की ईश्वरप्रदत्त विभूतियों का एक बड़ा अंश आत्मकल्याण के लिए निकल सकता है। अन्यथा यदि अपना आपा काय-कलेवर में ही धुला-खपा दिया गया तो लोभ और मोह के अतिरिक्त आकांक्षा एवं क्रिया का सारा उपार्जन उसी को समर्पित करना पड़ेगा। शरीर और मन की लिप्सा में ही सुख दीखने लगेगा, ऐसी दशा में वासना और तृष्णा की भूख बुझाने में ही अपनी सामर्थ्य कम पड़ने लगेगी। आत्मकल्याण की बात तो बन ही न पड़ेगी।
तत्त्वबोध होने पर संबद्ध व्यक्तियों तथा समीपवर्त्ती क्षेत्र में फैली हुई दुष्प्रवृत्तियाँ आक्रमणकारी, क्रोध, उद्वेग, द्वेष और प्रतिशोध उत्पन्न नहीं करतीं; वरन शांतिपूर्वक सुव्यवस्थित रीति से विकृतियों के सुधारक्रम में जुट जाने की प्रेरणा करती हैं। डॉक्टर रोग को मारता है, रोगी को बचाता है। विवेकवान पाप को मिटाता है और पापी को बचाता है, जबकि अविवेकी मस्तिष्क रोग और रोगी में अंतर न करके, जहाँ भी प्रतिकूलता दीखती है वहीं आमक्रणकारी बनकर मार-काट फैलाता है। वह भूल जाता है कि कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जाता, सफाई तो स्वच्छ जल से होती है। क्रोध से नहीं, संतुलित सुधार-प्रक्रिया अपनाने से ही विकृतियों का समाधान होता है। संसार में फैली हुई विकृतियाँ हमारे लिए सेवा-साधना के सुधार-उपक्रम के लिए ही हैं। रोगी न रहे तो डॉक्टर की क्या उपयोगिता रहेगी। परमार्थपरायण पुरुषार्थ को प्रखर करने का सु-अवसर पाने के लिए ही संभव है। समीपवर्त्ती क्षेत्र में विकृति उत्पन्न हुई हो, ऐसा भी तो सोचा जा सकता है।
तत्त्वदर्शी यह भी जानता है कि पूजा-उपक्रमों का उद्देश्य ईश्वर को फुसलाकर भौतिक एवं आत्मिक वरदान झटक लेना नहीं; वरन उच्च भावनाओं और उच्च क्रियाशीलता के लिए आवश्यक प्रेरणा प्राप्त करना है ताकि व्यक्तित्व में दैवी तत्त्वों का अधिकाधिक समावेश करके पूर्णता की दिशा में द्रुतगति से बढ़ चलना संभव हो सके। जीवनोद्देश्य की पूर्ति छुट-पुट पूजा-पत्री मात्र से हो सकती है, ऐसा तत्त्वदर्शी नहीं मानता, अस्तु उसकी उपासना-साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम-धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकंपा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना-उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है।
शरीर और मन को आत्मा से पृथक मानने, उनके बीच स्वामी-सेवक जैसा संबंध स्पष्ट करने से भ्रमग्रस्तता के भवबंधनों से छुटकारा मिल जाता है। माया के आकर्षणों में खिचते फिरने की अपेक्षा विवेक के आधार पर मान्यताओं, आकांक्षाओं एवं क्रियाकलापों का पुननिर्धारण करना होता है। मृत्यु का सघन चिंतन काया में रमी हुई अंतःचेतना को अपनी वस्तुस्थिति समझने का अवसर देता है, अस्तु उसे अपनी विचारणा में उत्कृष्ट एवं क्रियाशीलता को आदर्श बनाने के अतिरिक्त बुद्धिमत्ता भरा मार्ग और कोई सझता ही नहीं। तत्त्वबोध की प्रतिक्रिया ऋतंभरा प्रज्ञा को उपलब्ध होने के रूप में सामने आती है और व्यक्ति भ्रांतियों के भवबंधनो से मुक्त होकर समुन्नत जीवनधारा के साथ प्रवाहित होता हुआ; अंततः आनंद और ऐश्वर्य उपलब्ध करता है।
प्रत्यावर्तन सत्र की साधनाएँ साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करती हैं। उनमें व्यक्ति और समाज के समग्र उत्कर्ष की संभावना सन्निहित है।
बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को अंतर्मुखी बनाने के लिए सत्र के चार दिनों में भरपूर प्रयत्न किया जाता है। मनुष्य जीवन भर बहिरंग समस्याओं में ही उलझा रहता है। बाहर ही सुख खोजता है, पदार्थों और परिस्थितियों की अनुकूलता के लिए व्याकुल रहता है और प्रसन्नता के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। फलतः कस्तूरी के मृग की तरह उसे असफलता ही मिलती है। एक कामना पूरी नहीं हो पाती कि दूसरी उससे भी प्रबल उग्रता के साथ उठ खड़ी होती है। एक कोने में अनुकूलता आती है तो दूसरे में और भी अधिक प्रतिकूलता उभर पड़ती है। एक धागा जुड़ता है तो दो टूटते हैं। ऐसे ही अशांति और अतृप्ति की सुरसा का मुँह भरने का प्रयास करने में हाथ मलता हुआ प्राणी इस संसार से विदा हो लेता है, पल्ले कुछ नहीं पड़ता। पाप और पश्चात्ताप की गठरी सिर पर लादकर ही उसे भगवान के दरवार में उपस्थित होना पड़ता है।
इस तथ्य को कोई बिरले ही जानते हैं कि प्रगति की सभी सम्भावनाएँ भीतर हैं। शक्ति के समस्त स्रोत अंतरंग में छिपे पड़े हैं। सुख और शांति परिष्कृत दृष्टिकोण पर निर्भर है। समस्याओं के उत्पन्न करने और सुलझाने के समस्त केंद्र अंतःकरण में हैं। बाह्य जीवन की अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ अपने आंतरिक स्तर की भली-बुरी प्रतिक्रियामात्र हैं, जिसने इस महासत्य को समझा है। वह बाह्य प्रयत्नों तक सीमित न रहकर अपनी अंतःसत्ता को समझने, सुधारने, बनाने और विकसित करने में ही संलग्न रहता है। इस दुहरे प्रयास के बिना उत्कर्ष की स्थिरता का समग्र समाधान किसी को भी, कभी भी मिल नहीं सकता।
आदत बाहर ही देखने, बाहर ही खोजने की पड़ी है। दूसरे भी यही करते हैं, अस्तु अपना स्वभाव एवं दृष्टिकोण भी वैसा ही बन जाता है। दूसरों की तरह चलने वाली अपनी भेड़चाल भी किसी शांतिमय समाधान तक नहीं पहुँचने देती। प्रत्यावर्तन सत्र के चार दिनों में इस भूल को सुधारने का प्रबल प्रयत्न किया जाता है। आश्रम से बाहर न जाओ, साधना-कक्ष से बाहर अकारण न भटकने, अनावश्यक वार्त्तालाप न करने के प्रतिबंध इसीलिए हैं। साधना में छह घंटे लगते हैं और दो घंटे प्रवचन सुनने को मिलते हैं। पंद्रह मिनट व्यक्तिगत परामर्श के हैं। इस प्रकार बाधित सवा आठ घंटे की प्रक्रिया साधक को अनिवार्य रूप से आत्मचिंतन में लगाए रहती है। निद्रा और नित्यकर्म के अतिरिक्त जो शेष समय बच जाता है, उसमें भी मनन और चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है। बाहर की बातें न सोचने की मनाही इसीलिए की गई है कि आत्मचिंतन में बाधा न पड़े। चार दिन तक संन्यासी जैसी मनःस्थिति में ज्ञान और वैराग्य की भूमिका में रहने का निर्देश इसीलिए किया गया है कि अंतर्मुखी स्थिति बनाने का अवसर जो प्रायः कभी भी नहीं मिलता, वह यहाँ मिल सके।
छोटे स्तर की पूजा-उपासना भी प्रायः बहिर्मुखी होती है। उसमें भगवान को अपने से बाहर मानकर स्तवन-पूजन किया जाता है और उसे किसी तीर्थ या लोक में मानकर वहाँ तक पहुँचाने का ताना-बाना बुनना पड़ता है। स्तवन-पूजन की मनुहार से उसे द्रवित, प्रसन्न करने की बात सोची जाती है। यह बालकक्षा विस्मृति को स्मृति में इसी की समीपता में लाने की दृष्टि से ही कुछ उपयोगी होती है, अन्यथा भगवान को प्राप्त तो भीतर ही करना पड़ता है। मिलन के लिए यही एकमात्र स्थान है। इससे बाहर तो दिव्य प्रकाश की अनुभूति कभी किसी को होती भी नहीं हैं। जीवनलक्ष्य को उपलब्ध करा सकने वाले समस्त स्रोत अंतःलोक में ही उद्भूत होते हैं। आत्मपरिष्कार की विद्या का नाम ही अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्म विद्या है। श्रय साधन के लिए इस क्षेत्र में गहराई तक उतरने के अतिरिक्त और कोई गति है ही नहीं।
प्रत्यावर्तन के साधक को बहिरंग जीवन में अब तक हुए पापों का ब्यौरा देना होता है और उस पर पश्चाताप करते हुए विश्वमानव को पहुँचाई गई क्षतिपूर्ति का प्रायश्चित्य करना पड़ता है। इसमें भावी जीवनक्रम की शुद्धता बनाए रखने का संकल्प भी सम्मिलित है। यही प्रक्रिया अंतरंग जीवन के लिए लागू होती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में फँसे हुए दोष-दुर्गुणों पर, कषाय-कल्मषों पर, मल-आवरण और विक्षेपों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए आत्मसमीक्षा पर उतारू होना पड़ता है और जो अवांछनीयताएँ भावनाओं में, मान्यताओं में, आकांक्षाओं में भर गई हैं, उन्हें भी निरस्त करने के लिए साहसिक कदम बढ़ाना पड़ता है। बहिरंग और अंतरंग जीवन को अधिकतम पवित्र और प्रखर बनाने की यह चेष्टा हेय स्तर के नर-कीटक को नर-नारायण स्तर तक पहुँचा देने में समर्थ होती है। अंगारा तभी तक ठंडा और काला दीखता है, जब तक उस पर राख की परत जमी रहती है। जैसे ही यह परत हटी कि अंगारा अपने असली रूप में उष्णता एवं चमक से भरा-पूरा दीखने लगता है। आत्मा की महत्ता को जिन दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों ने अवरुद्ध कर रखा है, यदि उन्हें हटा दिया जाए तो फिर सफल जीवन जीने में कोई व्यवधान शेष नहीं रहता और न स्वर्गमुक्ति एवं ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने में कोई अड़चन शेष रहती है।
परिष्कृत जीवन अपने लिए, अपने परिवार के लिए, समस्त संसार के लिए कितना मंगलमय होता है, इसे हर कोई प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, आदतों को बदल देने पर जीवन का बाह्यस्वरूप सहज ही बदल जाता है। मनुष्य में देवत्व उदय होने का परिणाम धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। उपासना और साधना का प्रयोजन इसी स्थिति को प्राप्त कराना है।
आत्मा का परिष्कृत स्वरूप ही परमात्मा है। उसे प्राप्त करने के लिए आत्मशोधन और आत्मविकास के दोनों पंखो से उड़ना होता है— दोनों पैरों से चलना होता है। प्रायश्चित्य प्रक्रिया से लेकर 6 घंटे की साधना दो घंटे का प्रवचन पंद्रह मिनट का परामर्श विशुद्ध रूप से इस एक ही प्रयोजन के लिए है। यदि यह पूरा हो सके तो नरक से स्वर्ग में पहुँचना, बंधन से मुक्त होना अविलंब संभव हो जाता है। अवांछनीय गतिविधियों में उलझी हुई अंतःचेतना जब अपना चिंतन और कर्तृत्व बदलने के लिए सहमत हो जाती है तो मनुष्य का कायाकल्प महामानव के, भूसुर के रूप में हुमा तत्काल दीख पड़ने लगता है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति इसी को कहते हैं। अपना आत्मा जिसे सबमें दीखने लगा, जिसने स्वार्थपरता और संकीर्णता की जंजीरें तोड़कर समस्त विश्व को परमात्मा का रूप माना और उसे समुन्नत बनाने के लिए आत्मसमर्पण का साहस किया, उसके लिए ईश्वरीय अनुकंपा दूर कहाँ रहती है ? वह तो स्वयं ईश्वर बन जाता है।
व्यक्ति निर्माण की दृष्टि से प्रत्यावर्तन-साधना को अत्यंत सफल प्रक्रिया कहा जा सकता है। प्रस्तुत मार्गदर्शन को जो जितनी मात्रा में अपना सकेगा, वह उसी अनुपात से अपने में देवत्व की ज्योतिर्मयी आभा जाज्वल्यमान अनुभव करेगा। दूसरों का स्नेह, सहयोग और सद्भाव उसी अनुपात में उस पर बरसेगा। प्रगति की बहुमुखी संभावनाओं का उतना ही द्वार खुला हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देगा।
कहना न होगा कि उस प्रकार की श्रेय साधना में निरत उच्चस्तरीय चिंतन और कर्तृत्व के अभ्यस्त व्यक्ति किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य संपदा सिद्ध हो सकते हैं। चरित्रवान, कर्मठ और आदर्शवादी लोग ही समाज को समुन्नत बनाते हैं। विश्वशांति में उन्हीं की भूमिका प्रमुख होती है। प्रत्यावर्तन-साधना की सफलता का सामाजिक परिणाम अत्यंत सुखद होगा। उनके हाथ में जो भी काम होगा उसे उच्चस्तरीय कर्मयोग भावना से पूरा करेंगे। फलतः व्यक्ति के सदाशयता पूर्ण अनुदान से समाज को, विश्व को, अत्यंत सुखद परिणामों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
आत्मा परमात्मा का अंश है। उसमें बीजरूप से वे सभी शक्तियाँ और संभावनाएँ भरी हुई हैं जो परमात्मा में विद्यमान हैं। स्थुलशरीर की पवित्रता के सत्परिणामों की चर्चा ऊपर हो चुकी है। उससे व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सुखद परिवर्तन होना नितांत स्वाभाविक है। उससे आगे सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर का प्रसंग आता है। वे दोनों ही कलेवर स्थूलशरीर की तुलना में असंख्य गुनी ऐसी क्षमताएँ दबाए पड़े हैं, जिन्हें अतींद्रिय, अलौकिक एवं अतिमानवी कहा जा सकता है। सिद्धयोगी, देवपुरुष एवं ऋषिकल्प व्यक्तित्व किसी भी क्षेत्र में कुछ भी काम करते हुए पाए जा सकते हैं। इनकी अंतःचेतना इतनी प्रचंड होती है कि वे न केवल अपना कल्याण करते हैं, वरन दूसरे असंख्यों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से महान कल्याण संपन्न करते हैं।
सूक्ष्मशरीर के पाँच कलेवर हैं, जिन्हें अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश एवं आनंदमयकोश कहते हैं। मूलाधार और सहस्रार को छोड़कर पाँच चक्र भी इन्हीं से संबद्ध हैं, इन्हें पाँच आण्विक विद्या का भंडार कहा जा सकता है। इन्हें अंतरिक्ष में संव्याप्त असंख्य शक्ति-धाराओं के साथ संबंध जोड़ने वाले ‘शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक्स संयत्र’ कह सकते हैं। आत्मा और परमात्मा के बीच अगणित आदान-प्रदान इन्हीं पाँच कोशों के द्वारा होते हैं। इन पर अधिकार करने वाला व्यक्ति अशक्ति और तुच्छता का उल्लंघन करके, असंभव को संभव बनाने वाले, अमृतपायी देवताओं की पंक्ति में जा विराजता है।
प्रत्यावर्तन सत्र में सूक्ष्मशरीर को परिष्कृत एवं बलिष्ठ बनाने की पाँच साधनाएँ हैं। इन्हें पाँच कोशों की, पाँच चक्रों की समग्र साधना कह सकते हैं। चार दिनों में उसी महायात्रा के संबंध में आवश्यक परिचय एवं अभ्यास करा दिया जाता है, ताकि क्रमशः उस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए अध्यात्म संपदाओं से संपन्न बना जा सके। चार दिन में साधना की पूरी मंजिल पार करके पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचना और सिद्धयोगी बन सकना तो असंभव है, उसके लिए समय और सतत श्रम चाहिए। इन थोड़े से दिनों में शिक्षण और अनुभव की इतनी आवश्यकता पूरी हो जाती है कि प्रगति प्रयाण की शांति सुव्यवस्था एवं सफलता के साथ द्रुतगति से आगे बढ़ाया जा सके।
प्रत्यावर्तन-साधनाक्रम में पांच योगों का समावेश है— (1) लययोग (2) बिंदुयोग (3) प्राणयोग (4) ऋजुयोग (5) नादयोग। इस एक ही साधनाक्रम में पाँच योग-साधनाएँ जुड़ी-गुथी हुई हैं। इन्हें पंचकोशों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्मसंबंध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं। लययोग से आनंदमयकोश बिंदुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमयकोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमयकोश की जागृति होती है। इसी साधना में पाँच चक्र भी जागृत होते चले जाते हैं।
इनमें से प्रत्येक योग की अपनी सिद्धियाँ हैं— खेचरी मुद्रा से अमृतत्व की, देवत्व की प्राप्ति, देवसत्ताओं के साथ आदान-प्रदान, बिंदुयोग से अदृश्य दर्शन, व्यक्तित्व में विद्युतीय प्रवाह का अभिवर्द्धन। प्राणयोग से स्थिरता, सुदृढ़ता, साहसिकता एवं तेजस्विता की वृद्धि, अभय एवं पराक्रम में कौशल। नादयोग से दिव्य श्रवण, वायरलेस जैसा चेतन स्तर उपयोगी सूझ का उठना। ऋजुयोग से आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति। सिद्धियों के यह संकेत भर हैं। वस्तुतः उनका सीमा-बेधन नहीं किया जा सकता। वे कितने प्रकार एवं कितने स्तर की हो सकती हैं, यह साधक की मनःस्थिति पर निर्भर है। दर्पण पर साधना करने के छोटे से विधान को ही लें, उसमें छायापुरुष सिद्धि की समस्त संभावनाएँ विद्यमान हैं। अपने ही स्तर का एक नया सूक्ष्मव्यक्तित्व उत्पन्न कर लेना छायापुरुष कहलाता है। पाँचकोशों में पाँच छायापुरुष तक सिद्ध कर लेने की गुंजाएश है, वे विश्वस्त एवं समर्थ सेवक का कार्य करने में निरंतर जुटे रह सकते हैं। बिंदुयोग से मैस्मरिज्म, हिप्नोटिज्म जैसी सफलताएँ मिल जाती हैं। प्राणयोग के सहारे प्राण चिकित्सा से कठिन रोगों को सरलतापूर्वक दूर करने में सफलता मिल सकती है।
प्रत्यावर्तन में सूर्यार्घदान तथा माता के गोदी में न लेने के पीछे जो भावनाएँ हैं, वे अध्यात्म मार्ग में महज ही बहुत ऊँचे तक पहुँचा देती हैं। गायत्री महामंत्र की अन्यान्य शक्तियों एवं सिद्धियों के बारे में तो कुछ कहना ही कठिन है। वस्तुतः भारतीय साधना-विज्ञान का वह प्राण है। मंत्रयोग की धुरी गायत्री साधना को ही कहा जा सकता है। प्रत्यावर्तन को तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो उसे गायत्री के पाँच मुखों के अलंकार चित्र में चित्रित पाँच कोशों की पंचयोग सम्मिश्रित साधना कह सकते हैं। यह जागृत कोश— (1) भवानी (2) गणेश ( 3) ब्रह्मा (4) विष्णु (5) महेशरूपी। पाँच देवता कहे जा सकते हैं। इस साधना की सफलता को प्रख्यात पाँच देवों के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले अनुदान वरदान के रूप में देख सकते हैं।
गायत्री का देवता सविता है। सविता को महातेजस्वी परब्रह्म का प्रतीक कह सकते हैं। सूर्यार्घदान में, सूर्योपस्थान में सविता देवता की उपासना के सूत्रों का समावेश है, उससे मनुष्य तेजस्वी, मनस्वी एवं प्रचंड ब्रह्मतेज संपन्न बन सकता है।
प्रत्यावर्तन-साधना के समय एकाग्रता पर जोर नहीं दिया जाता; वरन प्रत्येक साधना के साथ जुड़ी हुई विचारणा एवं भावना को सुविस्तृत करने वाला व्यापक चिंतन करने के लिए कहा जाता है। साधना और निर्दिष्टि दिशा में चलने की उन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने की विधि क्या हो सकती है? इसी की विस्तृत योजनाएँ साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है। एकाग्रता इस सत्र में आवश्यक नहीं मानी गई है।
एकाग्रता का भाव, समाधि का स्तर कारणशरीर को जागृत करने की साधनाएँ हैं। उसी में कुंडलिनी जागरण की समग्र प्रक्रिया जुड़ी रहती है। यह उन लोगों के लिए सुरक्षित है, जो प्रत्यावर्तन के माध्यम से सूक्ष्मशरीर को परिष्कृत करने की दूसरी मंजिल पूरी कर लेंगे। सामान्य गायत्री उपासना को प्राथमिक कक्षा कह सकते हैं। प्रत्यावर्तन-साधना का हाईस्कूल कक्षा, मंत्रदीक्षा और प्राणदीक्षा इन्हीं दो स्तरों का नाम है। इस साधना के साधक अपने को प्राणदीक्षा से दीक्षित अनुभव कर सकते हैं। कॉलेज-कक्षा, अग्निदीक्षा कहलाती है। उसमें साधक ब्रह्मभूत होता है, अपने को स्थितिप्रज्ञ की, जीवनमुक्त की, ब्रह्मसायुज्य की स्थिति में अनुभव करता है। इस स्तर की साधनाएँ प्राण-प्रत्यावर्तन के सफल साधक समयानुसार प्राप्त कर सकते हैं। क्रमिक प्रगति के साथ-साथ अग्रगामी उपलब्धियों का पथ स्वयमेव प्रशस्त होता चला जाता है।
प्रत्यावर्तन सत्र को एक प्रकार से उच्चस्तरीय अध्यात्म भूमिका का प्रवेश द्वार कह सकते हैं, इस आधार पर भावी जीवन में उपासना एवं साधना-उपक्रम को अपनाकर पूर्णता की दिशा में क्रमिक यात्रा जारी रखी जा सकती है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। चार दिन जितनी छोटी अवधि में इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो सकना असंभव है। एम.ए. पास करने में सोलह वर्ष लगते हैं और हर दिन छह-छह घंटे मनोयोगपूर्वक घोर परिश्रम करना पड़ता है। बगीचा लगाकर उसे फला-फूला देखने तक माली को कई वर्षों तक धैर्यपूर्वक कठिन परिश्रम करना पड़ता है। पहलवानी की साधना भी इसी प्रकार समयसाध्य है। आध्यात्मिक बचपन को पूरा करके प्रौढ़ता तक पहुँचाने जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति उपरोक्त सफलताओं की तुलना में कम नहीं, अधिक ही महत्त्व की हैं। अस्तु स्वभावतः उसके लिए अधिक श्रम एवं अधिक मनोयोग लगाते हुए परिपूर्ण तत्परता के साथ धैर्यपूर्वक सतत संलग्न रहना पड़ता है। हथेली पर सरसों जमाने जैसी यह बाजीगरी नहीं है। प्रत्यावर्तन इस महान निर्माण का उच्चस्तरीय शिलान्यासमात्र है। कार्य यहाँ समाप्त नहीं हो जाता, वरन आरंभ होता है।
चार दिन एकाग्रता का नहीं, एक दिशा में चिंतन-प्रवाह को बहाने का अभ्यास कराया जाता है। आमतौर से मन अनेक दिशाओं में मृगतृष्णा ग्रसित होकर दौड़ता रहता है। मुख्य कार्य है, दिशा देना। चिंतन एक ही दिशा में चलाने का पूर्वार्ध पूरा होने पर ही एकाग्रता का उत्तरार्ध पूरा हो सकता है। अस्तु साधकों को आरंभ में ही यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि मन, जप, ध्यान-क्रियाएँ आरंभ करते ही एकाग्र हो जाएगा। फिर एकाग्रता को उतना महत्त्व देने की आवश्यकता भी नहीं है, जितना कि लोग देने लगे हैं।
योग-साधना में एक स्तर ऐसा भी आता है, जब एकाग्रता की भी आवश्यकता पड़ती है; पर महर्षि पतंजलि ने साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को जिस-जिस चित्तवृत्तिनिरोध का निर्देश किया है, उसे चित्तनिरोध नहीं, चित्तवृतिनिरोध ही समझना चाहिए। यहाँ वृत्ति शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मन की वृत्तियाँ, दिशाएँ, रुचियाँ अगणित हैं, उनमें बेहिसाब उछल-कूद करने की अपेक्षा मन को एक दिशा में लगाया जाना चाहिए। दिशा-निर्धारण और उस दिशा में मनोयोग को नियोजित करना ही साधना मार्ग की बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर देना है, एकाग्रता तो बहुत बाद की और बहुत छोटी चीज है।
सूर्य की बिखरी किरणें जिस तरह आतिशी शीशे द्वारा इकट्ठी करने पर वे बिंदु केंद्रित हो जाती हैं और आग जलने लगती है, उसी प्रकार चित्त का निरोध भी विकेंद्रित बिखराव का केंद्रीकरण करता है और उससे विशेष लाभ होता है; पर यह सफलता मानसिक कौशल स्तर की है। कई व्यक्ति, कई प्रकार के शारीरिक करतव दिखाने में कुशल हो जाते हैं, उसी प्रकार एकाग्रता का मानसिक कौशल भी मेस्मरिज्म, हिप्नोटिज्म जैसे कई तरह के कौशल दिखा सकता है। सरकस में काम करने वाले नटों का सारा कौशल एकाग्रता पर ही केंद्रित है। तार पर चलने, झूले पर इधर से उधर उछलने जैसे कौशल एकाग्रता की साधना के बिना हो ही नहीं सकते। बहीखाते में लंबे मीजान सही-सही लगाते रहने वाले मुनीमों की कुशलता उनकी एकाग्रता पर ही निर्भर है। कवि, लेखक, चित्रकार एवं वैज्ञानिक आदि की सफलता भी एकाग्रता पर ही निर्भर है। इतने पर भी उन्हें योगी या आत्मिक-प्रगति में सफल व्यक्ति नहीं कह सकते हैं। मन का केंद्रीकरण उपयोगी तो हर क्षेत्र में है, पर वह अध्यात्म लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। मीरा, सूर, कबीर, चैतन्य आदि की साधनाओं में विरह की व्याकुलता है। गोपी कृष्ण-विरह में उसी रसानुभूति को उच्चस्तरीय लययोग-साधना बताया गया है, यद्यपि एकाग्रता का उसमें सर्वथा अभाव है। अपने स्तर का भाव भरा उद्वेग ही भक्तियोग की परिभाषा में योगाभ्यास का उच्च चरण माना गया है। प्रत्यावर्तन साधकों को अपनी मनोभूमि इसी स्तर की रखने के लिए कहा गया है। वे एकाग्रता को महत्त्व न दें; वरन यह देखें कि जिस साधना के साथ, जिस भाव-प्रभाव को जोड़कर रखा गया है, चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं। यदि प्रवाह की दिशा ठीक हो तो समझना चाहिए कि अभीष्ट प्रगति में आशाजनक सफलता मिल रही है।
वस्तुतः इन चार दिनों में पूर्व चिंतन की दिशा उलटनी पड़ती है और जीवनक्रम को परिष्कृत मार्ग पर चलाने के लिए अंतःकरण को तैयार करना पड़ता है। इतनी बड़ी भूमिका प्रखर चिंतन के आधार पर ही संभव हो सकती है। प्रत्यावर्तन के दिनों में यही करना पड़ता है। इन दिनों में अपनी विचारपद्धति और क्रियापद्धति दोनों का ही पुनर्निर्माण व पुनर्निर्धारण करना पड़ता है, इसलिए अवांछनीय रीति-नीति को हटाने और उच्चस्तरीय क्रियाकलाप को प्रतिष्ठापित करने के लिए इन दिनों ऐसा युद्धस्तरीय पराक्रम करना पड़ता है, जिसकी तुलना समुद्र-मंथन से, महाभारत संग्राम से की जा सके। ऐसी दशा में एकाग्रता के लिए न तो निर्देश दिया गया है और न उसकी आशा ही की गई है। आगे चलकर जब एकाग्रता आवश्यक होगी तब उसकी कुंजियाँ साधकों को यथासमय मिल जाएँगी और वह कठिन प्रतीत होने वाला कार्य अत्यंत सरलतापूर्वक संपन्न हो जाएगा।
प्रत्यावर्तन में प्रयुक्त होने वाले प्रायः सभी साधना-उपक्रमों के साथ प्रचंड चिंतन जुड़ा हुआ है। साधकों को उसी दिशा में अपने मनोयोग को नियोजित करना पड़ता है और इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि किस प्रकार अब तक की मूढ़ताओं, भ्रांतियों और अवांछनीयताओं को चिंतन और कर्तृत्व के क्षेत्र में से बहिष्कृत करके उनकी जगह उच्चस्तरीय परिवर्तन लाया जा सकता है। वस्तुतः चार दिनों इसी उखाड़-पछाड़ में, ध्वंस निर्माण में लगना पड़ता है। सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं के संचालक सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बिजली, व्यवसाय आदि की बहुमुखी प्रगति के लिए सुविस्तृत योजनाएँ बनाते हैं और उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, किस प्रकार किया जाना चाहिए, इसका ढाँचा खड़ा करते हैं। समझना चाहिए कि परिष्कृत जीवनक्रम का भावी निर्धारण करने के लिए इन चार दिनों में सुविस्तृत योजना बनाई जानी है और साधक को योजनाध्यक्ष की भूमिका निभानी है। यह कार्य समाधिस्थ या एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र करने से नही; वरन सुविस्तृत बहुमुखी गहन चिंतन से ही पूरा हो सकता है। अस्तु वही करने के लिए कहा भी जाता है।
खेचरी मुद्रा में जीभ को उलटने की और शरीर को शिथिल करके शिथिलीकरण की गायत्री उपासना में गंदे बच्चे को गोद में न लिए जाने वाले स्पष्टीकरण की, लघुप्राण को महाप्राण में परिवर्तन करने वाली सोहम्-साधना की, अंधकार का निराकरण करके दिव्य प्रकाश से रोम-रोम भर देने वाले बिंदुयोग की दिव्य संकेतों पर थिरकने की, भावभरी मनःस्थिति उत्पन्न करने वाले नादयोग की, आत्मबोध और तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
साधक इन सब तथ्यों को न केवल हृदयंगम करता है; वरन यह रूपरेखा भी बनाता है कि इन प्रेरणाओं के आधार पर भावी जीवनचर्या की कार्यपद्धति क्या होनी चाहिए? और आज की हेय स्थिति को उलटकर कल को परिष्कृत स्थिति में पहुँचने की संक्राति का अवतरण किस दूरदर्शिता और साहसिकता के साथ संपन्न होना चाहिए। साधक को इसी उहापोह में पूरी तरह निमग्न रहने के लिए कहा जाता है। यह दिशा-प्रवाह लगातार जारी रखें। निर्दिष्टि तथ्य पर अधिकाधिक व्यापक चिंतन किया जाए तो ही उसका कुछ निष्कर्ष निकल सकता है, इसलिए हर साधना-उपक्रम को माध्यम बनाकर समुद्र-मंथन जैसी मनःस्थिति रखने के लिए हर साधक को कहा जाता है। सोते-जागते उन्हें विचारों में डूबे रहने और परिवर्तन के लिए आवश्यक मार्ग ढूढ़ निकालने के लिए लगा रहा जाए तो समझना चाहिए कि अभीष्ट योग-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया।
इसमें दुहरा लाभ है। एक दिशा में लगातार पूरी गहराई के साथ सोचने का अभ्यास ही चित्तवृत्तिनिरोध माना गया है, इसका अभ्यास होना बहुत बड़ी बात है। इसके अतिरिक्त अध्यात्म की सफलता कल्पना लोक में उड़ते रहने में नहीं, व्यावहारिक जीवनक्रम में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के साथ जुड़ी हुई है। इस दिशा में यदि कुछ ठोस आधार खड़ा किया जा सके तो समझना चाहिए, प्रत्यावर्तन-साधना के ध्यानपक्ष के साथ जुड़ा हुआ मूल प्रयोजन पूरी तरह संपन्न हो गया। चित्त की एकाग्रता इन दिनों न अभीष्ट है और न आवश्यक, इसलिए इस संदर्भ में किसी से कुछ कहा, पूछा भी नहीं जाता।
कई बालबुद्धि के लिए अध्यात्म को 'जादू' भर मानते हैं। थोड़ी सी पूजा-उपासना से लंबी-चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति, किसी देव-दानव के दर्शन, कोई रोशनी चमकाना, शब्द सुनना, शरीर काँपना, भावावेशी उद्वेगों का आना जैसे कौतुक-कौतूहलों की आशा करते हैं और यदि कुछ ऐसा अजूबा दीख सके तो समझते हैं कि साधना सफल हुई। वस्तुतः बालबुद्धि प्रबुद्ध साधकों के लिए नितांत उपेक्षणीय और उपहास्यपद है। ऐसे अजूबे कोई मैस्मरिज्म विज्ञान का ज्ञाता किसी को भी क्षण भर में दिखा सकता है अथवा हिप्नोटिज्म का जानकार संवेदनाओं के आधार पर इस तरह के कौतूक-कौतुहल स्वयं भी देख सकता है। कई योगज्ञाता नौसिखिये साधकों को ऐसे ही कुछ अजूबे दिखाकर उनमें बाल उत्साह पैदा कर देते हैं, पर उनसे बनता कुछ नहीं। मैस्मरिज्म के प्रभाव मे कोई अनुभव करने लगे कि वह सिंह पर सवारी किए घूम रहा है तो इससे वस्तुतः कुछ भी लाभ न होगा; वरन उलटी एक नई भ्रांति बढ़ जाएगी। वह व्यक्ति कभी असली सिंह का सामना होने पर चढ़ने का प्रयास कर सकता है, क्योंकि उसने मैस्मरिज्म के प्रभाव से अपने को सिंह पर सवारी करने में सफल होते देख भी लिया था। इस भ्रमग्रस्तता में वह यदि असली सिंह पर चढ़ने का प्रयास करने लगे तो बेमौत मारा जाएगा। कई साधक अपने गुरुओं द्वारा ऐसे ही भ्रम-जंजाल में फंसा दिए जाते हैं। वे ईश्वरदर्शन से लेकर तरह-तरह के चमत्कारी अनुभव उन दिनों तो कर लेते हैं, पर पीछे देखते हैं कि जीवनक्रम की जटिलताओं में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। ऐसी दिशा में उन्हें यह सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि जो अजूबे देखे गए थे, वे बेसिर-पैर की भ्रांतियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं थे। उन्हें कुछ समय के लिए दृष्टिबंध की तांत्रिक उलझनों में उलझा भर दिया गया था।
प्रत्यावर्तन सत्र के बारे में भी कई बालबुद्धि लोग ऐसे ही किसी अजूबे की, कौतुक-कौतूहल की आशा कर सकते हैं; पर उसे निराशा में ही परिणत किया जाता है। इतना ही नहीं, उनकी इस भ्रमग्रस्तता का उन्मूलन भी किया जाता है कि अध्यात्म को चमत्कारी होना चाहिए। मान्यता, विचारणा, भावना और प्रक्रिया में परिवर्तन होना ही वस्तुतः सबसे बड़ा चमत्कार है। इसी आधार पर मनुष्य को देवता और आत्मा को परमात्मा बनने का अवसर मिलता है। आध्यात्मिक प्रगति की यथार्थता इसी केंद्र पर केंद्रित है।
आध्यात्मिक प्रगति की कसोटियाँ दो हैं — (1) स्वार्थमुक्ति। इन्हें किसने, कितना प्राप्त कर लिया, इसी आधार पर यह जाना जा सकता है कि किसने, कितनी सफलता प्राप्त की। स्वर्ग कोई स्थान नहीं; वरन लोक कहते हैं— दृष्टिकोण को। स्वर्ग सोचने का एक तरीका है, नरक चिंतन की एक पद्धति। मरने के बाद स्वर्ग में जाने की बातें सोचना आवश्यक है। यथार्थता यह है कि कोई भी, कभी भी अपने दृष्टिकोण में अभीष्ट परिवर्तन करके तत्काल स्वर्गलोक में प्रवेश कर सकता है और स्वर्गीय सुख-शांति का तत्काल रसास्वादन कर सकता है।
अपने अभावों और दूसरे के दोष-दुर्गुणों का चिंतन करते रहने से चिंतन में नरक प्रवेश करता है और उससे क्रोध एवं विक्षोभ उत्पन्न होता है। उद्धत अहंकार को प्रत्यक्ष असुर कहा जा सकता है, जिसके कारण अपने को दूसरों से ‘बड़ा’ सिद्ध करने की 'उत' सूझती रहती है। खर्चीली साज-सज्जा के आडंबर इसी आधार पर खड़े किए जाते हैं और दूसरों को सताने-गिराने में इस पैशाचिकता के कारण प्रसन्नता होती है। इस मनःस्थिति में उलझे हुए लोगों को पग-पग पर जिन विक्षोभों का, मनोविकारों का, शोक-संतापों का सामना करना पड़ता है, उसे नारकीय यातना कह सकते हैं। ऐसे ही लोग वासनाओं, तृष्णाओं, ऐषणाओं में डूबे रहते हैं और कुकर्मों में निडर होकर लगे रहते हैं। इस मार्ग पर चलने वालों को बाह्य और आंतरिक जीवन में जो मर्मभेदी ठोकरें लगती रहती हैं, इन्हें ही प्रत्यक्ष नरक के रूप में देखा-समझा जाना चाहिए।
स्वर्ग उस दृष्टिकोण का नाम है, जिससे मनुष्य अपनी उपलब्धियों को देखता है, पिछड़े प्राणियों की तुलना में उसे जो अधिक मिला है, उसके लिए संतोष अनुभव करता है। ईश्वर को धन्यवाद देता है और विविध-विधि लालसाओं में, तृष्णाओं में जलने की अपेक्षा जो मिला है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए जुट जाता है। कर्त्तव्य कर्म करने में अपनी अविचल निष्ठा को बहुत बड़ी संपत्ति मानकर गौरवान्वित होता है और बड़ा कहलाने की अपेक्षा महान बनने में संतोष अनुभव करता है। बाह्यजगत में श्रेष्ठता और सौंदर्य कम नहीं। उसे देखने-समझने पर कम आनंद नहीं मिलता। अपने ऊपर समाज के अगणित अहसानों को वह देख पाता है तो निरंतर कृतज्ञता से मन भरा रहता है। जिसे यह ज्ञान है कि दूसरों में भी ईश्वर का अंश है, वह किसी से न तो कटुवचन कहता है और न असभ्य व्यवहार करता है। उसके वचन और व्यवहार में स्नेहसिक्त आत्मीयता ही भरी रहती है। अनीति के विरुद्ध प्रबल संघर्ष करते हुए भी वह, शालीनता को हाथ से नहीं जाने देता। यह है परिष्कृत दृष्टिकोण जिसे दूसरा नाम स्वर्गलोक भी दिया जा सकता है। इस स्तर के लोग धरती के देवता कहलाते हैं और हर स्थिति में संतोष एवं शांति का अनुभव करते हैं।
(2) आध्यात्मिक प्रगति का दूसरा उपहार है— मुक्ति। मुक्ति किससे ? भवबंधनों से। भवबंधन क्या है? लोभ-मोह, वासना-तृष्णा, स्वार्थ-संकीर्णता, अविवेकशीलता-आत्मविस्मृति। इनसे छूटने के लिए मरने की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं। परिष्कृत, विवेकशील, दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने और उसे कार्यान्वित करने का प्रबल दुस्साहस इकट्ठा कर लेने भर से कोई भी व्यक्ति जीवनमुक्त हो सकता है। अपनी कुसंस्कारी मान्यताओं को जिसने उखाड़ फेंका, लोग क्या कहते और क्या करते हैं? यह देखने की अपेक्षा जिसने औचित्य और विवेक को मान्यता दी, इसी आधार पर अपना चिंतन एवं कर्तृत्व ढाला; समझना चाहिए कि इसकी जीवनकाल में ही मुक्ति हो गई। भ्रांतियों का निराकरण और उत्कृष्टता की समग्र स्वीकृति इसी का नाम जीवनमुक्ति है। इस स्थिति में पहुँचे हुए व्यक्ति ही सच्चे ईश्वर भक्त कहलाते हैं और ईश्वर, समतुल्य गौरव-गरिमा से सुसंपन्न बनते हैं।
प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को निकट भविष्य में इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का प्रत्यक्ष आनंद मिल सके, इसी का प्रयास किया जाता है और इस लक्ष्य के प्राप्त हो सकने की पूरी-पूरी संभावना रहती है।
चार दिन तक छह घंटे साधना करना एक विशेष अनुष्ठान है, जिसे सामयिक ही कह सकते हैं। सदा इस रीति को अपनाए रहना असंभव है। घर जाकर किस प्रकार साधनाक्रम चलाया जाना चाहिए, इसकी एक क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जाती है और आशा की जाती है कि वे भविष्य में आजीवन निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
प्रभु-समर्पित जीवन जिया जाए। अनासक्त कर्मयोगपरायण गतिविधियाँ ऐसी हों जिन्हें यज्ञीय जीवन की संज्ञा दी जा सके। यही अध्यात्मपरायण व्यक्तियों की रीति-नीति होनी चाहिए। इसमें उपासना के लिए एक घंटे का समय भी पर्याप्त है। साधना अहर्निश होनी चाहिए, एक क्षण भी साधना विरत नहीं जाना चाहिए। प्रमाद जहाँ भी, जब भी आएगा शैतान को चढ़ बैठने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय के लिए सो जाए तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतें तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। भावी साधनापद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्यावर्तन सत्र में साधकों को दी जाती है। क्रम प्रातः आँख खुलते ही आरंभ हो जाता है और जब तक नींद नहीं आ जाती तब तक चालू रहता है। इस साधन-प्रक्रिया में सूत्ररूप से वे सभी साधनाएँ समाहित कर दी गई हैं, जिन्हें प्रत्यावर्तन के दिनों में कराया-सिखाया जाता है।
प्रातःकाल आँख खुलने से लेकर बिस्तर छोड़ने तक प्रायः आधा घंटा लग जाता है। आलस, सुस्ती, अंगड़ाई और करवट बदलने में प्रायः इतनी देर तो लग ही जाती है। इन उनीदे क्षणों में यह विचारना चाहिए कि आज अपना एक ही दिन के लिए नया जन्म हुआ है। रात्रि को मृत्यु हो जाएगी। ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ वाला सत्र साधनात्मक जीवन जीने वालों के लिए स्वर्णक्षरों में लिखे जाने योग्य है। आज के दिन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है, इसका क्रम-विभाजन इन्हीं क्षणों में कर लिया जाना चाहिए। स्थूलशरीर (देह), सूक्ष्मशरीर (मन), कारणशरीर (भाव)। यह तीन कर्मचारी हमें मिले हैं। इन्हें क्रिया विचारणा-भावना भी कह सकते हैं। यह तीनों जब किसी एक काम में पूरे सहयोग और उत्साह के साथ जुटते हैं तो वह कार्य कर्मयोग की साधना जैसा पुण्य फलदायक बन जाता है। उसकी सुंदरता और सफलता देखते ही बनती है।
हर दिन को जीवन की बहुमूल्य संपदा मानकर, उसके सदुपयोग की दिनचर्या बिस्तर पर पड़े-पड़े ही इस प्रकार निर्धारित कर दी जानी चाहिए कि उसमें समय की बर्बादी के लिए कहीं कोई गुंजाएश न रहे। आवश्यकतानुसार बीच-बीच में विश्राम की व्यवस्था भी रखी जा सकती है; पर वह भी नियमित और निर्धारित होनी चाहिए। उठने से लेकर सोने तक का कसा हुआ, खिचा हुआ टाइम टेबल बनाना चाहिए और उसे मुस्तैदी के साथ निबाहा जाना चाहिए। शरीर को जो कार्य करना है, मन पूरी तरह उसमें तन्मय रहे। हर छोटा-बड़ा काम पूरे मनोयोग से किया जाए। दोनों के सहयोग से जो काम होते हैं, उन्हीं में कला-कौशल निखरता है, उन्हीं का स्तर उत्कृष्ट बनता है। काम ही ईश्वर की पूजा है। यदि अपना हर काम सुंदर, सुव्यवस्थित, सर्वांगपूर्ण और सही हो तो उसे कर्मयोग के स्तर पर ही रखा जाएगा। मन के निग्रह की असली साधना अपने दैनिक कार्यों में समग्र मनोयोग लगाने से ही संभव होती है। पूजा में भी यही अभ्यास काम दे जाता है। यदि हर काम आधे मन से करने की आदत होगी तो फिर पूजा ही तन्मयतापूर्वक कैसे संभव हो सकेगी?
शयनकक्ष में एक भगवान का चित्र रहना चाहिए, दूसरा बड़े साइज का दर्पण रहे। भगवान को उठते ही नमस्कार करना चाहिए और सद्बुद्धि की, कर्मनिष्ठा की याचना करनी चाहिए। उसके उपरांत दर्पण में अपने आपको देखते हुए लगभग वही ध्यान करना चाहिए, जो प्रत्यावर्तन सत्र में तीन बजे आत्मबोध की साधना करते हुए किया जाता था। आत्मदेव को सद्गुरु, परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्त्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊँचा उठाए, ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शांतिपूर्वक बढ़ चलना संभव हो सके।
इसके उपरांत स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए और एक घंटे के लिए नियमित उपासना पर बैठना चाहिए। इस एक घंटे के तीन भाग किए जा सकते हैं—(1) पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा (2) पंद्रह मिनट बिंदुयोग (ज्योति अवतरण), प्राणयोग (सोऽहम्-साधना) (3) आधा घंटा गायत्री जप— सूर्यार्घदान।
खेचरी मुद्रा में पांच मिनट शरीर को शिथिल करना, पाँच मिनट मन को खाली करना और पांच मिनट जिह्वा को उलटकर तालु में लगाने और सोमरस पान करने का विधान है। इसकी पूरी विधि खेचरी मुद्रा प्रकरण में लिखी जा चुकी है। दृष्टिकोण, उदेश्य तथा भाव-चिंतन वही ज्यों का त्यों है, केवल समय में ही कमी की गई है। प्रत्यावर्तन के दिनों में पंद्रह मिनट शिथिलीकरण, पंद्रह मिनट नाल जल का ध्यान करके मन को विचाररहित बनाया जाता था। वे दोनों कार्य पाँच-पाँच मिनट के कर दिए गए हैं। जिह्वा उलटकर दुनियादारी से भिन्न स्तर की अपनी रीति-नीति अपनाने का संकल्प है। उच्चस्तरीय चिंतन का केंद्र मस्तिष्क, उससे टपकने वाला आनंद (मानवी उपलब्धियों का संतोष), उल्लास (सत्पथ गमन की प्रबल प्रेरणा) भरा सोमरस हमें उपलब्ध होता है। जीभ उसे प्राप्तकर पाचन तंत्र में भेजती है और वह अमृतरस रक्त के साथ घुलकर क्रियापद्धति के रूप में परिणत होता है। इन्हीं भावनाओं को प्रखर बनाना खेचरी मुद्रा का सारतत्त्व है।
आज्ञाचक्र में प्रकाश का ध्यान और उस प्रकाश का रोम-रोम में समावेश, अंधकार का पलायन, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की स्थिति— यह सब है भ्रूमध्य भाग में प्रकाश चिंतन का लक्ष्य। आवश्यकतानुसार दीपक, मोमबत्ती, बिजली आदि का उपयोग प्रकाश स्थापना के लिए किया जा सकता है। पीछे यह ध्यान बिना प्रकाश उपकरणों के ही होने लगता है।
सोऽहम्-साधना में कुछ समय, सांस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ की अनुभूति। साँस के साथ महाप्राण का काया के कण-कण और मन के प्रत्येक परत में प्रवेश तथा आधिपत्य की स्थापना। ‘हम्’ के साथ लोभ, मोह भरे अहंकार का पलायन। यही है संक्षेप में सोऽहम्-साधना, जिसका विस्तृत वर्णन पिछले पृष्ठों में हो चुका है।
उपरोक्त बिंदुयोग और प्राणयोग की दोनों साधनाओं के लिए कुल मिलाकर पंद्रह मिनट हैं। प्रतिदिन करना हो तो दोनों साढ़े सात-सात मिनट की जा सकती है। अन्यथा यह तरीका भी अच्छा है कि एक दिन पंद्रह मिनट ज्योति अवतरण और दूसरे दिन सोऽहम्-साधना करते रहा जाए।
पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पंद्रह मिनट प्रकाश का ध्यान तथा सोऽहम्-साधना में लगाने से आधा घंटा हो जाता है, शेष आधा घंटा गायत्री की पाँच मालाएँ पूरी करने के लिए। गायत्री के पाँच मुख माने गए हैं। यह पाँच कोश हैं। हर कोश का जागरण करने के लिए एक माला। इस प्रकार पाँच मालाओं का जप उचित है। इससे कम करने में जितना चाहिए उतना शक्ति उद्भव नहीं होता। जप के आधे भाग में अपने मलीनताग्रस्त होने के कारण, माता की गोद में न पहुँच सकने का दुर्भाग्य और शेष आधे भाग में शुद्ध होने पर उस परम शक्ति का प्यार-दुलार मिलने की यथार्थता हृदयंगम की जानी चाहिए। जप के उपरांत सुर्यार्घदान जलकलश को सूर्य की दिशा में धार बाँधकर छोड़ना और परम तेजस्वी सविता देवता से प्रार्थना करना कि हमारे समर्पित व्यक्तित्व को भी जलधार की तरह स्वीकार करें और उसे वर्षा की अथवा ओस की बूंदें बनाकर विश्वशांति के लिए अनंत अंतरिक्ष में बिखेर दें। आधे घंटे के इस गायत्री जप समेत प्रातःकालीन उपासना का एक घंटा पूरा हो जाता है।
इसके उपरांत, प्रातःकाल से लेकर सोते समय तक अपने को निर्धारित दिनचर्या में जुटा देना चाहिए। शरीर, मन और भाव कहीं आलस्य-प्रमाद, मर्यादा व्यतिक्रम तो नहीं कर रहे हैं, इसका हर घड़ी ध्यान रखना चाहिए और जहाँ भी गड़बड़ी दिखाई पड़े, तत्काल टोकना-रोकना चाहिए। आवश्यक कारण आने पर तो दिनचर्या में हेर-फेर करने ही पड़ते हैं; पर उसमें आलस्य-प्रमाद के कारण व्यतिक्रम नहीं होने देना चाहिए। संतोष, मृदुलता और शांति के साथ हँसते-मुसकाते हुए अपना क्रियाकलाप पूरा करना चाहिए और हलका-फुलका चित्त रखना चाहिए। क्रोध और खीझ के, पतन एवं अनाचार के अवसर आने पर अपने को संभालने-समझाने में कुछ कसर नहीं रखनी चाहिए।
रात्रि को सोते समय बिस्तर पर जाकर दिन भर के कामों का लेखा-जोखा लेना चाहिए और गलतियों के कारणों पर विचार करते हुए, अगले दिन उन भूलों के संबंध में सतर्क रहने की अपने आप को चेतावनी देनी चाहिए।
सोने से पूर्व तत्त्वबोध की, पौने चार से साढ़े चार तक वाली पृथक्करण साधना की पुनरावृत्ति करनी चाहिए। शरीर आत्मा से पृथक हो गया। मरी हुई काया चारपाई पर पड़ी है। चारों पाय चार संबंधी हैं, जो उसे जलाने ले जा रहे हैं। आत्मा दूर खड़ा इस मरण को देख रहा है। संबद्ध व्यक्तियों एवं संपत्ति-साधनों को छोड़कर जीवात्मा अपने कर्मभोग भोगने के लिए अन्यत्र जा रहा है। मित्र-संबंधी मुख मोड़कर अपने धंधे में लगने जा रहे हैं। छोड़ी हुई संपत्ति को हराम में मिले मुफ्तमाल की तरह पीछे वाले लोग गुलछर्रे उड़ाने में खर्च कर रहे हैं। बँटवारे के लिए परस्पर एकदूसरे का सिर फोड़ रहे हैं। जिन वस्तुओं और व्यक्तियों को अपना समझा जाता था, वह लोभ और मोह निरर्थक साबित हुआ। मृत्यु ने नंगी सच्चाई सामने रख दी और भ्रांतियों का जाल-जंजाल टूटकर एक ओर बिखर गया। ‘अकेले आना अकेले जाना’ वाला तथ्य अक्षरशः सही सिद्ध हुआ। आँखों पर से परदा उठा तो, पर तब, जब सब कुछ हाथ से निकल गया। इससे पूर्व यदि मृत्युप्रदत्त ज्ञान मिल सका होता तो उपलब्धियों के सदुपयोग की बात सोची जा सकती थी। अब अगले जन्म में, कल के जीवन में ऐसा प्रयत्न करेंगे कि किसी वस्तु या व्यक्ति पर अधिकार जनाने की अपेक्षा उसके सदुपयोग की ही बात को ध्यान में रखकर सारे क्रियाकलाप निर्धारित किए जाए।
जब झपकी आने लगे तब नादयोग के अनुरूप भावना करनी चाहिए कि भगवान कृष्ण जिस प्रकार रात्रि की नीवरता में बंशी बजाते थे और गोपियाँ चुपचाप अपने घरवालों को छोड़कर रासलीला में निरत होकर दौड़ पड़ती थीं। उसी प्रकार परमात्मा के आह्वान पर आत्मा अपने प्रियतम से मिलने दौड़ पड़ती है। नादयोग की सीटी रात्रि में झींगुर बजाते रहते हैं, जुगनू इशारा करते रहते हैं। अपने अंतःकरण में भी वह नाद-निनाद भाव मान्यता के आधार पर सुना जा सकता है। इन भावनाओं के साथ, भगवान के साथ लिपटकर सोने के लिए आत्मा को निद्राग्रस्त होकर परम शांति लाभ करने के लिए समाधिस्थ हो जाना चाहिए। रात को कभी करवट बदलें, नींद खुले तो यह प्रतीत होना चाहिए कि भगवान हमारे साथ सो रहे हैं। इच्छानुसार भगवान का प्रतीक तकिया के अगल-बगल में रखा जा सकता है।
यही है, उठने से लेकर सोने तक की उपासना एवं साधना मिश्रित क्रियापद्धति, जिसे प्रत्यावर्तन सत्र में सम्मिलित होने वालों को घर जाकर निरंतरर अपनाए रहने के लिए कहा जाता है, इसमें प्रत्यावर्तन सत्र के दिनों की समस्त साधनापद्धति का परिपूर्ण, किंतु संक्षिप्त समावेश है।
आत्मविश्लेषण, आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार की प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग है— अपने पिछले जीवन की समीक्षा। इसमें जहाँ सत्कर्मों पर प्रसन्नता और संतोष का अनुभव होना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि अपने पापों और दुष्कर्मों पर भी गहरी दृष्टि डाली जाए और उनका पश्चात्ताप-प्रायश्चित किया जाए।
अध्यात्म दर्शन की सुदृढ़ मान्यता है कि कर्मों का फल अवश्यंभावी है। उस विधान से कोई भी यहाँ तक कि ईश्वर भी नहीं बच सका है। परमात्मा ने यह सृष्टिक्रम और नियम-व्यवस्था के अनुसार बनाया है। यहाँ सब कुछ एक विधान, अनुशासन के अनुरूप चल रहा है। वे नियम परमात्मा ने बनाए हैं, पर अपने को भी उन्हीं में आबद्ध कर लिया है। भले ही मर्यादाओं का उल्लंघन करने की क्षमता उसमें हो, पर वह वैसा करता अपने लिए भी नहीं है, अन्यथा उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता की अव्यवस्था सर्वत्र फैल जाएगी। विधान निर्माता ही विधान को तोड़ें तो फिर दूसरों को वैसा करने से कैसे रोका जा सकेगा?
भगवान राम ने छिपकर बाली को तीर मारा, जब राम का अवतार कृष्ण रूप में हुआ तो बालि ने बहेलिया बनकर तीर से कृष्ण का प्राण ले लिया। राम के पिता दशरथ ने श्रवणकुमार को तीर मारा, उसके पिता ने शाप दिया कि इस वधकर्त्ता को भी मेरी ही तरह पुत्रशोक में बिलखकर मरना पड़ेगा। वैसा ही हुआ भी। रामचंद्र जी अपने पिता तक की सहायता न कर सके, दशरथ पुत्रशोक में बिलख-बिलखकर मरे। सुभद्रा ने जब कृष्ण को उलाहना दिया कि तुम मेरे पुत्र अपने भानजे अभिमन्यु की भगवान होते हुए भी रक्षा न कर सके तो उन्होंने यही कहा— “प्रारब्ध बहुत कठिन है, उसे मिटाना मेरे बस की बात भी नहीं है।”
अज्ञानांधकार के युग में ये भ्रांतियाँ फैलाई अवश्य गई हैं कि अमुक नदीस्नान, तीर्थयात्रा, देवदर्शन, पूजा-पाठ, कथा-कीर्तन अथवा कर्मकांड से पापों का दंड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है, पर वैसा वस्तुतः है नहीं। उस कथन का अभिप्राय इतना ही हो सकता है कि पापवृत्तियों दुष्कर्मों की ओर बहाने वाली ललक घट या मिट जाए। कर्मदंड से बचने का एक ही उपाय है कि समय रहते उसका प्रायश्चित कर लिया जाए। प्रायश्चित का अर्थ भी कोई छुट-पुट कर्मकांड नहीं; वरन समाज को जो क्षति पहुँचाई है, उसकी पूर्ति करना है। हम ने गंदगी फैलाई है तो हमारा ही कर्त्तव्य है कि उसकी सफाई करें। रास्ते में गड्ढा खोदने वाले का ही कर्त्तव्य है कि उसे पाटे और राहगीरों के लिए टाँग टूटने का जो खतरा उत्पन्न किया है, उसे दूर करें। पश्चात्ताप करना भी उचित है, ताकि वैसी भूलें फिर न हों। ऐसे प्रसंगों में चंद्रायण व्रत सरीखे कुछ तप-साधन भी जुड़े रहने चाहिए।
चोरी करने वाला यदि सद्बुद्धि आने पर चुराया धन वापिस करने और अपनी भुल पर दुःख प्रकट करे तो उससे दुष्कर्म की भरपाई हो जाती है। कटुवचन बोलने पर जिसका जी दुःखा है, उसे संतुष्ट करने जितना भाव भरा अनुनय-विनय कर ले और उसके दुःखे हुए जी को हलका कर दे तो समझना चाहिए कि प्रायश्चित हो गया। जिसकी चोरी की थी, प्रायः उसको वही माल लौटाना संभव नहीं रहता। समय बीत जाने पर न वह वस्तुएँ रहती हैं और न व्यक्ति। ऐसी दशा में यही मानकर चलना पड़ता है कि समस्त समाज एक इकाई है, व्यक्ति उसके घटकमात्र हैं। व्यक्तियों को पहुँचाई गई अवांछनीय क्षति प्रकारांतर से समाज की ही क्षति है, अस्तु समाज को अतिरिक्त सुख पहुँचाकर उस पापकर्म की क्षतिपूर्ति की जा सकती है। पाप का बदला पुण्य से चुकाया जा सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार जितने वजन के पाप हुए हैं, प्रयत्न यह होना चाहिए कि उतने ही वजन के अतिरिक्त पुण्यकर्म किए जाएँ और पाप-पुण्य का पलड़ा बराबर किया जाए। इस प्रक्रिया का अवतिलंबन लेने से पापकर्मों के कारण अंतरात्मा पर जो अतिरिक्त भार पड़ गया था, उसे हलका किया जा सकता है।
प्रत्यावर्तन सत्र के हर साधक को समझाया जाता है कि उसे अपने सभी पाप स्मरण करने चाहिए और उन्हें पेट में गाँठ बाँधकर रखने की अपेक्षा कम-से-कम एक व्यक्ति को इस सत्र के संचालक को विस्तारपूर्वक घटनाक्रम के साथ बता देना चाहिए। इससे साधक का जी हलका होगा और प्रायश्चित करने की रीति-नीति का परामर्श मिलेगा।
मनोविज्ञानशास्त्र के अनुसार, दुरित-दुरावों की मानसिक ग्रंथियाँ बनती हैं और वे कालांतर में शारीरिक-मानसिक रोगों के रूप में फूटती हैं, व्यक्तित्व को विकृत करती हैं। अस्तु वे मानसिक रोगियों को अपना जीवनक्रम बिना दुराव चिकित्सक के सामने विस्तारपूर्वक वर्णन करने को कहते हैं। इस प्रकार रोगी जब सब कुछ भला-बुरा कर सकता है तो उसका जी हलका हो जाता है। अंतःचेतना पर पड़ा हुआ दबाव घट जाता है। फलस्वरूप रोगी का मानसिक कष्ट घट जाता है।
इस मनोवैज्ञानिक चिकित्सापद्धति में अध्यात्म चिकित्सा विज्ञान इतना और जोड़ता है कि मात्र कह देना ही काफी नहीं, वरन समाज को पहुँचाई क्षति की पूर्ति भी करनी चाहिए। अन्यथा वाणी से कह देने पर जी तो हलका हो जाएगा, पर किए गए पाप का अंतःकरण पर लदा हुआ बोझ हलका न हो सकेगा। उसका प्रायश्चित क्षतिपूर्ति के साहसिक कदम बढ़ाने से ही हो सकता है।
प्रत्यावर्तन सत्र में आने वालों को अपने अंतःकरण के दुराव-परतों को खोलने के लिए, भूलों की भविष्य में पुनरावृति न करने के लिए तथा क्षतिपूर्ति के लिए साहसिक कदम बढ़ाने को कहा जाता है। इस प्रकार आत्मशोधन का महत्त्वपूर्ण प्रयोजन पूरा होता है। यह पाप भार ही है जो उपासना में मन नहीं लगने देता, साधनाक्रम में विघ्न बनकर खड़ा होता है, चित्त का उच्चाटन करता है— श्रद्धा नहीं जमने देता। इस प्रकार उपासना की दिशा में उठाए गए कदम प्रायः लँगड़े-लूले, अधूरे-असफल रह जाते हैं। यदि आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया पहले अपना ली जाए तो कपड़े को धोने के बाद रँगने की तरह साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
पिछले किए हए दुष्कर्म मनोवैज्ञानिक ग्रंथि बनकर अंतःकरण में जम जाते हैं और चुपके-चुपके यह प्रयत्न करते हैं कि कोई आकस्मिक विपत्ति बुलाकर उस भार का परिशोधन कर डालें। विपत्तियाँ अनायास तो आती नहीं। उन्हें बुलाने के लिए किसी नई दुर्बुद्धि का सृजन होता है। उसी के फलस्वरूप संकट उत्पन्न होता है और पिछले पाप का कठोर दंड मिलता है। एक पाप दूसरे पाप की प्रेरणा देता है और जब तक वह मवाद निकल नहीं जाता, एक के बाद दूसरी फुंसियाँ उठती-फूटती रहती हैं। प्रगतिशील जीवन के पथ में यह भारी बाधा है। इसे दूर करने के लिए प्रायश्चित की तपश्चर्या अपनाना हर दृष्टि से उपयोगी है। व्यक्ति का मनःक्षेत्र जहाँ अवांछनीय भार से हलका होता है भावी कर्मभोगों से निश्चिंतता मिलती है, वहाँ समाज को भी लाभ होता है। प्रायश्चित के आधार पर किए गए पापकर्मों के बदले जो पुण्यकर्म किए गए हैं, वहाँ उत्पन्न हुई कुरूपता को सौंदर्य में बदलने का अवसर मिलता है। शुभकर्मों की परंपरा चलने से व्यक्ति द्वारा भूतकाल में चलाई पाप-परंपरा की काट हो जाती है। इस प्रकार समाज में पतनकारी जो तत्त्व उत्पन्न किए गए थे, उनका निराकरण भी पुण्यरूप सत्कर्म कर देते हैं।
पंचगव्य और हविष्यान्न (तिल, जौ, चावलों) को प्रत्यावर्तन सत्र के साधक प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। इसमें शास्त्रीय प्रायश्चित परंपरा का समावेश है। विधिवत् यह संस्कारित आहार, मन और शरीर के शोधन में बहुत सहायक होता है। चार दिन की तपश्चर्या साधना भी संचित मलीनता के निराकरण में सहायता करती है। शान्तिकुञ्ज का वातावरण भी शोधन और समाधान की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है। इस दृष्टि से कुछ बार तो यहाँ ऐसे ही हलका होता है, शेष के लिए पूण्य-संवर्द्धन के लिए कुछ साहस करने की विशेष विधि-व्यवस्था सोची जाती है।
प्रत्यावर्तन सत्र में सम्मिलित होने वाले साधक, संचालक को अपने दुष्कर्मों का विवरण लिखित अथवा मौखिक रूप से इस विश्वास के साथ प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वाले के अतिरिक्त वह विवरण अन्य किसी पर भी प्रकट न किया जाएगा। यदि लिखित है तो उसे एक दिन बाद वापिस कर दिया जाएगा। इस आत्मिक साहसिकता का प्रभाव तुरंत चित्त में हलकापन आने के रूप में दृष्टिगोचर होता है। प्रायश्चित के लिए प्रायः यही परामर्श दिए जाते हैं कि समाज में पुण्य-परंपराएँ प्रचलित करने के लिए उन्हें उतने या न्यूनाधिक वजन के सत्कर्म करने चाहिए, जितना कि पापकर्मों का भार है। पुण्य-प्रवृत्तियों का अभिवर्द्धन करने से कर्त्ता के चित्त में जो संतोष होगा, उससे स्वभावतः वे घाव भरेंगे जो दुष्कर्मों ने अंतःकरण में कर रखे थे और जो आत्मग्लानि के, आत्मप्रताड़ना के रूप में निरंतर कसकते और रिसते थे।
चोरी, व्यभिचार, बेईमानी, छल, क्रूरता जैसे दुष्कर्मों को पाप नाम से सहज ही जाना जाता है और उन अवांछनीय घटनाक्रमों का स्मरण भी सहज हो आता है, ये सामाजिक पाप हैं। आत्मिक पाप इससे भी बढ़े-चढ़े और भयावह हैं। हम आत्महत्या और ब्रह्महत्या करते रहते हैं और यह सोचते भी नहीं कि इस प्रकार के जघन्य कर्म हम निरंतर करते जा रहे हैं।
स्पष्ट है कि आत्मा को अगणित दुःखद योनियों में भ्रमण करने के उपरांत एक मनुष्य जन्म ही उद्धार के लिए मिला है। यदि यह सु-अवसर ऐसे ही पशु-प्रवृत्तियों में गवा दिया जाता है तो फिर उन्हें कष्ट भरी दुःखद योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा। आत्मा को सु-अवसर का लाभ उठाने से वंचित रखना और फिर उसी यंत्रणा भरे कुचक्र में दुःसह, दुःख सहने के लिए धकेल देना निश्चित रूप से आत्महत्या है। उसका प्रायश्चित लगभग चौरासी लाख वर्ष पर्यंत भोगना पड़ेगा। एक योनि में ओसतन एक वर्ष तो रहना ही पड़ेगा।
ब्रह्महत्या का तात्पर्य यहाँ ईश्वर के अरमानों को चकनाचूर कर देना है। उसने अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो असाधारण और अद्भुत अनुदान दिए हैं, उसका एकमात्र प्रयोजन यह है कि इसके अतिरिक्त विभूतियों का उपयोग वह उसके विश्व-उद्यान को समुन्नत-सुरभित बनाने के लिए करेगा, किंतु जब हम उसे अंगूठा दिखाकर लोभ, मोह की गंदगी चाटने में लग पड़ते हैं तो निश्चित रूप से परमात्मा के उस प्रयोजन की, अरमान की हत्या हो जाती है, जो उसने लगभग अपनी ही जितनी क्षमता वाला काय-कलेवर हमें देते समय सँजोया था। निश्चित रूप से यह ब्रह्म के अरमानों का हनन करने वाली ब्रह्महत्या ही कही जा सकती है।
भले ही विषपान करके आत्महत्या न की गई हो और साधु-ब्राह्मण का कत्ल करने जैसी ब्रह्महत्या न बन पड़ी हो, पर जिस रीति-नीति के साथ जीवन प्रक्रिया चलाई जाती रही है, उसे आत्महत्या और ब्रह्महत्या का सम्मिलित दुष्कर्म ही कह सकते हैं। यह पाप कम मात्रा में नहीं हुआ। जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग अब तक इसी कुचक्र में गँवाया जा चुका। यदि उस पाप की गरिमा और उसके दंड पर विचार करें तो रोमांचकारी विभीषिका सामने खड़ी दिखाई पड़ेगी। योनियों के कुचक्र में भ्रमण, आत्महत्या का और ईश्वर का चरम कोप ब्रह्महत्या का दंड होता है। इन दोनों प्रताड़नाओं से कितनी कष्टकारक व्यथाएँ सहनी पड़ सकती हैं, इसकी कल्पना की जाए तो चौरासी नरक के होने वाले उत्पीड़न की जो तस्वीरें बाजार में बिकती हैं, उससे हलका नहीं, भारी संकट ही सामने खड़ा दृष्टिगोचर होगा।
यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुट-पुट पूजा-पत्री या कर्मकांडी टंट-घंट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते हैं। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिंगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र हैं, जो दिशा निर्देश भर करते हैं। काम तो सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने और पुण्यकर्म करने से चलता है। पाप भी तो दुष्कर्मों से घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप से ही बने थे। पुण्य-प्रायश्चित भी उसी स्तर का घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। यदि पूजा स्तर के पाप हुए होते तो वे पूजा स्तर के पुण्य से कट सकते थे। कर्म की काट तो कर्म से ही हो सकती है, इसलिए प्रायश्चित द्वारा आत्मशोधन का, आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है। यहाँ वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी को भी न सुनने जैसा दुस्साहस किया गया था।
समग्र प्रायश्चित की दृष्टि से यही उचित है कि भावी जीवन का यह एक अविच्छिन्न क्रम बनाया जाए कि ईश्वरप्रदत्त विभूतियों का एक बड़ा अंश सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन के लिए लगाया करेंगे। 24 घंटा समय में से 8 घंटा कमाने के, 7 घंटा सोने के, 5 घंटा फुटकर कार्यों के लिए रख ले तो 20 घंटे भौतिक जीवन के लिए शरीर, मन और परिवार की आवश्यकता पूर्ति के लिए पर्याप्त होने चाहिए। शेष चार घंटे का श्रम परमार्थ-प्रयोजनों में लगाया जा सकता है। घर-परिवार के सदस्यों में एक सदस्य परमार्थ को भी जोड़ लिया जाए तो एक कुटुंबी पर खरच होने वाला व्यय, लोक-मंगल के लिए नियोजित हो सकता है। घर में एक बच्चा यदि और होता तो किसी प्रकार उसका भी पालन-पोषण करना ही पड़ता। यही बात परमार्थ-प्रयोजन के संबंध में सोचकर चला जाए तो अपनी कमाई का एक महत्त्वपूर्ण भाग उसके लिए निकाला जा सकता है।
इस युग का सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रधान परमार्थ एक ही है— ‘भावनात्मक नवनिर्माण’। इस युग की समस्त विकृतियाँ निकृष्ट चिंतन के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ दुर्भावनाओं की बेल पर लगने वाली फलियाँ ही हैं। विश्व का सर्वनाश करने के लिए समुन्नत असंख्य विभीषिकाएँ मनुष्य के निकृष्ट चिंतन ने ही उत्पन्न की हैं। उसका निराकरण एक ही उपाय से हो सकता है कि विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने में अग्निकांड पर जल डालने की तरह सब ओर से ध्यान हटाकर पूरी एकाग्रता के साथ जुट जाना चाहिए। अन्नदान, जलदान, धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, बगीचा लगाने जैसे कार्य पीछे भी हो सकते हैं। संपत्ति उपार्जन में थोड़ी सी ढील भी रखी जा सकती है, पर आपत्ति धर्म की तरह बौद्धिक अनाचार से लड़ने में युद्धकालीन संकट की तरह सारी शक्ति झोक दी जानी चाहिए। विचार-क्रांति की लाल-मशाल इसी प्रयोजन के लिए जल रही है। ज्ञानयज्ञ का आह्वान इसी युग पुकार का अनुसरण करने के लिए है। इन दिनों समस्त पुण्य-प्रवृत्तियों का प्रवाह इसी दिशा में गतिशील होना चाहिए। प्रायश्चित के लिए जितना भी साहस जगे, उसे पूरी तरह इसी दिशा में नियोजित कर दिया जाना चाहिए।
अब तक हुई आत्महत्या और ब्रह्महत्या का निराकरण करने के लिए आत्मकल्याण और ईश्वर अनुग्रह का वरदान पाने के लिए हमें पुण्य-प्रयासों को सर्वोत्तम प्रकार ज्ञानयज्ञ में निरत होना चाहिए और चोरी, व्यभिचार जैसे सामाजिक असाधारण दुष्कृत्यों के दंड से बचने के लिए उसी स्तर के कुछ साहसिक कदम बढ़ाने चाहिए। यह परामर्श प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को दिया जाता है। निश्चित रूप से इससे आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता है।
प्रत्यावर्तन सत्र को एक प्रकार से उच्चस्तरीय अध्यात्म भूमिका का प्रवेश द्वार कह सकते हैं, इस आधार पर भावी जीवन में उपासना एवं साधना-उपक्रम को अपनाकर पूर्णता की दिशा में क्रमिक यात्रा जारी रखी जा सकती है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। चार दिन जितनी छोटी अवधि में इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो सकना असंभव है। एम.ए. पास करने में सोलह वर्ष लगते हैं और हर दिन छह-छह घंटे मनोयोगपूर्वक घोर परिश्रम करना पड़ता है। बगीचा लगाकर उसे फला-फूला देखने तक माली को कई वर्षों तक धैर्यपूर्वक कठिन परिश्रम करना पड़ता है। पहलवानी की साधना भी इसी प्रकार समयसाध्य है। आध्यात्मिक बचपन को पूरा करके प्रौढ़ता तक पहुँचाने जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति उपरोक्त सफलताओं की तुलना में कम नहीं, अधिक ही महत्त्व की हैं। अस्तु स्वभावतः उसके लिए अधिक श्रम एवं अधिक मनोयोग लगाते हुए परिपूर्ण तत्परता के साथ धैर्यपूर्वक सतत संलग्न रहना पड़ता है। हथेली पर सरसों जमाने जैसी यह बाजीगरी नहीं है। प्रत्यावर्तन इस महान निर्माण का उच्चस्तरीय शिलान्यासमात्र है। कार्य यहाँ समाप्त नहीं हो जाता, वरन आरंभ होता है।
चार दिन एकाग्रता का नहीं, एक दिशा में चिंतन-प्रवाह को बहाने का अभ्यास कराया जाता है। आमतौर से मन अनेक दिशाओं में मृगतृष्णा ग्रसित होकर दौड़ता रहता है। मुख्य कार्य है, दिशा देना। चिंतन एक ही दिशा में चलाने का पूर्वार्ध पूरा होने पर ही एकाग्रता का उत्तरार्ध पूरा हो सकता है। अस्तु साधकों को आरंभ में ही यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि मन, जप, ध्यान-क्रियाएँ आरंभ करते ही एकाग्र हो जाएगा। फिर एकाग्रता को उतना महत्त्व देने की आवश्यकता भी नहीं है, जितना कि लोग देने लगे हैं।
योग-साधना में एक स्तर ऐसा भी आता है, जब एकाग्रता की भी आवश्यकता पड़ती है; पर महर्षि पतंजलि ने साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को जिस-जिस चित्तवृत्तिनिरोध का निर्देश किया है, उसे चित्तनिरोध नहीं, चित्तवृतिनिरोध ही समझना चाहिए। यहाँ वृत्ति शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मन की वृत्तियाँ, दिशाएँ, रुचियाँ अगणित हैं, उनमें बेहिसाब उछल-कूद करने की अपेक्षा मन को एक दिशा में लगाया जाना चाहिए। दिशा-निर्धारण और उस दिशा में मनोयोग को नियोजित करना ही साधना मार्ग की बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर देना है, एकाग्रता तो बहुत बाद की और बहुत छोटी चीज है।
सूर्य की बिखरी किरणें जिस तरह आतिशी शीशे द्वारा इकट्ठी करने पर वे बिंदु केंद्रित हो जाती हैं और आग जलने लगती है, उसी प्रकार चित्त का निरोध भी विकेंद्रित बिखराव का केंद्रीकरण करता है और उससे विशेष लाभ होता है; पर यह सफलता मानसिक कौशल स्तर की है। कई व्यक्ति, कई प्रकार के शारीरिक करतव दिखाने में कुशल हो जाते हैं, उसी प्रकार एकाग्रता का मानसिक कौशल भी मेस्मरिज्म, हिप्नोटिज्म जैसे कई तरह के कौशल दिखा सकता है। सरकस में काम करने वाले नटों का सारा कौशल एकाग्रता पर ही केंद्रित है। तार पर चलने, झूले पर इधर से उधर उछलने जैसे कौशल एकाग्रता की साधना के बिना हो ही नहीं सकते। बहीखाते में लंबे मीजान सही-सही लगाते रहने वाले मुनीमों की कुशलता उनकी एकाग्रता पर ही निर्भर है। कवि, लेखक, चित्रकार एवं वैज्ञानिक आदि की सफलता भी एकाग्रता पर ही निर्भर है। इतने पर भी उन्हें योगी या आत्मिक-प्रगति में सफल व्यक्ति नहीं कह सकते हैं। मन का केंद्रीकरण उपयोगी तो हर क्षेत्र में है, पर वह अध्यात्म लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। मीरा, सूर, कबीर, चैतन्य आदि की साधनाओं में विरह की व्याकुलता है। गोपी कृष्ण-विरह में उसी रसानुभूति को उच्चस्तरीय लययोग-साधना बताया गया है, यद्यपि एकाग्रता का उसमें सर्वथा अभाव है। अपने स्तर का भाव भरा उद्वेग ही भक्तियोग की परिभाषा में योगाभ्यास का उच्च चरण माना गया है। प्रत्यावर्तन साधकों को अपनी मनोभूमि इसी स्तर की रखने के लिए कहा गया है। वे एकाग्रता को महत्त्व न दें; वरन यह देखें कि जिस साधना के साथ, जिस भाव-प्रभाव को जोड़कर रखा गया है, चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं। यदि प्रवाह की दिशा ठीक हो तो समझना चाहिए कि अभीष्ट प्रगति में आशाजनक सफलता मिल रही है।
वस्तुतः इन चार दिनों में पूर्व चिंतन की दिशा उलटनी पड़ती है और जीवनक्रम को परिष्कृत मार्ग पर चलाने के लिए अंतःकरण को तैयार करना पड़ता है। इतनी बड़ी भूमिका प्रखर चिंतन के आधार पर ही संभव हो सकती है। प्रत्यावर्तन के दिनों में यही करना पड़ता है। इन दिनों में अपनी विचारपद्धति और क्रियापद्धति दोनों का ही पुनर्निर्माण व पुनर्निर्धारण करना पड़ता है, इसलिए अवांछनीय रीति-नीति को हटाने और उच्चस्तरीय क्रियाकलाप को प्रतिष्ठापित करने के लिए इन दिनों ऐसा युद्धस्तरीय पराक्रम करना पड़ता है, जिसकी तुलना समुद्र-मंथन से, महाभारत संग्राम से की जा सके। ऐसी दशा में एकाग्रता के लिए न तो निर्देश दिया गया है और न उसकी आशा ही की गई है। आगे चलकर जब एकाग्रता आवश्यक होगी तब उसकी कुंजियाँ साधकों को यथासमय मिल जाएँगी और वह कठिन प्रतीत होने वाला कार्य अत्यंत सरलतापूर्वक संपन्न हो जाएगा।
प्रत्यावर्तन में प्रयुक्त होने वाले प्रायः सभी साधना-उपक्रमों के साथ प्रचंड चिंतन जुड़ा हुआ है। साधकों को उसी दिशा में अपने मनोयोग को नियोजित करना पड़ता है और इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि किस प्रकार अब तक की मूढ़ताओं, भ्रांतियों और अवांछनीयताओं को चिंतन और कर्तृत्व के क्षेत्र में से बहिष्कृत करके उनकी जगह उच्चस्तरीय परिवर्तन लाया जा सकता है। वस्तुतः चार दिनों इसी उखाड़-पछाड़ में, ध्वंस निर्माण में लगना पड़ता है। सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं के संचालक सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बिजली, व्यवसाय आदि की बहुमुखी प्रगति के लिए सुविस्तृत योजनाएँ बनाते हैं और उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, किस प्रकार किया जाना चाहिए, इसका ढाँचा खड़ा करते हैं। समझना चाहिए कि परिष्कृत जीवनक्रम का भावी निर्धारण करने के लिए इन चार दिनों में सुविस्तृत योजना बनाई जानी है और साधक को योजनाध्यक्ष की भूमिका निभानी है। यह कार्य समाधिस्थ या एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र करने से नही; वरन सुविस्तृत बहुमुखी गहन चिंतन से ही पूरा हो सकता है। अस्तु वही करने के लिए कहा भी जाता है।
खेचरी मुद्रा में जीभ को उलटने की और शरीर को शिथिल करके शिथिलीकरण की गायत्री उपासना में गंदे बच्चे को गोद में न लिए जाने वाले स्पष्टीकरण की, लघुप्राण को महाप्राण में परिवर्तन करने वाली सोहम्-साधना की, अंधकार का निराकरण करके दिव्य प्रकाश से रोम-रोम भर देने वाले बिंदुयोग की दिव्य संकेतों पर थिरकने की, भावभरी मनःस्थिति उत्पन्न करने वाले नादयोग की, आत्मबोध और तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
साधक इन सब तथ्यों को न केवल हृदयंगम करता है; वरन यह रूपरेखा भी बनाता है कि इन प्रेरणाओं के आधार पर भावी जीवनचर्या की कार्यपद्धति क्या होनी चाहिए? और आज की हेय स्थिति को उलटकर कल को परिष्कृत स्थिति में पहुँचने की संक्राति का अवतरण किस दूरदर्शिता और साहसिकता के साथ संपन्न होना चाहिए। साधक को इसी उहापोह में पूरी तरह निमग्न रहने के लिए कहा जाता है। यह दिशा-प्रवाह लगातार जारी रखें। निर्दिष्टि तथ्य पर अधिकाधिक व्यापक चिंतन किया जाए तो ही उसका कुछ निष्कर्ष निकल सकता है, इसलिए हर साधना-उपक्रम को माध्यम बनाकर समुद्र-मंथन जैसी मनःस्थिति रखने के लिए हर साधक को कहा जाता है। सोते-जागते उन्हें विचारों में डूबे रहने और परिवर्तन के लिए आवश्यक मार्ग ढूढ़ निकालने के लिए लगा रहा जाए तो समझना चाहिए कि अभीष्ट योग-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया।
इसमें दुहरा लाभ है। एक दिशा में लगातार पूरी गहराई के साथ सोचने का अभ्यास ही चित्तवृत्तिनिरोध माना गया है, इसका अभ्यास होना बहुत बड़ी बात है। इसके अतिरिक्त अध्यात्म की सफलता कल्पना लोक में उड़ते रहने में नहीं, व्यावहारिक जीवनक्रम में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के साथ जुड़ी हुई है। इस दिशा में यदि कुछ ठोस आधार खड़ा किया जा सके तो समझना चाहिए, प्रत्यावर्तन-साधना के ध्यानपक्ष के साथ जुड़ा हुआ मूल प्रयोजन पूरी तरह संपन्न हो गया। चित्त की एकाग्रता इन दिनों न अभीष्ट है और न आवश्यक, इसलिए इस संदर्भ में किसी से कुछ कहा, पूछा भी नहीं जाता।
कई बालबुद्धि के लिए अध्यात्म को 'जादू' भर मानते हैं। थोड़ी सी पूजा-उपासना से लंबी-चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति, किसी देव-दानव के दर्शन, कोई रोशनी चमकाना, शब्द सुनना, शरीर काँपना, भावावेशी उद्वेगों का आना जैसे कौतुक-कौतूहलों की आशा करते हैं और यदि कुछ ऐसा अजूबा दीख सके तो समझते हैं कि साधना सफल हुई। वस्तुतः बालबुद्धि प्रबुद्ध साधकों के लिए नितांत उपेक्षणीय और उपहास्यपद है। ऐसे अजूबे कोई मैस्मरिज्म विज्ञान का ज्ञाता किसी को भी क्षण भर में दिखा सकता है अथवा हिप्नोटिज्म का जानकार संवेदनाओं के आधार पर इस तरह के कौतूक-कौतुहल स्वयं भी देख सकता है। कई योगज्ञाता नौसिखिये साधकों को ऐसे ही कुछ अजूबे दिखाकर उनमें बाल उत्साह पैदा कर देते हैं, पर उनसे बनता कुछ नहीं। मैस्मरिज्म के प्रभाव मे कोई अनुभव करने लगे कि वह सिंह पर सवारी किए घूम रहा है तो इससे वस्तुतः कुछ भी लाभ न होगा; वरन उलटी एक नई भ्रांति बढ़ जाएगी। वह व्यक्ति कभी असली सिंह का सामना होने पर चढ़ने का प्रयास कर सकता है, क्योंकि उसने मैस्मरिज्म के प्रभाव से अपने को सिंह पर सवारी करने में सफल होते देख भी लिया था। इस भ्रमग्रस्तता में वह यदि असली सिंह पर चढ़ने का प्रयास करने लगे तो बेमौत मारा जाएगा। कई साधक अपने गुरुओं द्वारा ऐसे ही भ्रम-जंजाल में फंसा दिए जाते हैं। वे ईश्वरदर्शन से लेकर तरह-तरह के चमत्कारी अनुभव उन दिनों तो कर लेते हैं, पर पीछे देखते हैं कि जीवनक्रम की जटिलताओं में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। ऐसी दिशा में उन्हें यह सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि जो अजूबे देखे गए थे, वे बेसिर-पैर की भ्रांतियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं थे। उन्हें कुछ समय के लिए दृष्टिबंध की तांत्रिक उलझनों में उलझा भर दिया गया था।
प्रत्यावर्तन सत्र के बारे में भी कई बालबुद्धि लोग ऐसे ही किसी अजूबे की, कौतुक-कौतूहल की आशा कर सकते हैं; पर उसे निराशा में ही परिणत किया जाता है। इतना ही नहीं, उनकी इस भ्रमग्रस्तता का उन्मूलन भी किया जाता है कि अध्यात्म को चमत्कारी होना चाहिए। मान्यता, विचारणा, भावना और प्रक्रिया में परिवर्तन होना ही वस्तुतः सबसे बड़ा चमत्कार है। इसी आधार पर मनुष्य को देवता और आत्मा को परमात्मा बनने का अवसर मिलता है। आध्यात्मिक प्रगति की यथार्थता इसी केंद्र पर केंद्रित है।
आध्यात्मिक प्रगति की कसोटियाँ दो हैं — (1) स्वार्थमुक्ति। इन्हें किसने, कितना प्राप्त कर लिया, इसी आधार पर यह जाना जा सकता है कि किसने, कितनी सफलता प्राप्त की। स्वर्ग कोई स्थान नहीं; वरन लोक कहते हैं— दृष्टिकोण को। स्वर्ग सोचने का एक तरीका है, नरक चिंतन की एक पद्धति। मरने के बाद स्वर्ग में जाने की बातें सोचना आवश्यक है। यथार्थता यह है कि कोई भी, कभी भी अपने दृष्टिकोण में अभीष्ट परिवर्तन करके तत्काल स्वर्गलोक में प्रवेश कर सकता है और स्वर्गीय सुख-शांति का तत्काल रसास्वादन कर सकता है।
अपने अभावों और दूसरे के दोष-दुर्गुणों का चिंतन करते रहने से चिंतन में नरक प्रवेश करता है और उससे क्रोध एवं विक्षोभ उत्पन्न होता है। उद्धत अहंकार को प्रत्यक्ष असुर कहा जा सकता है, जिसके कारण अपने को दूसरों से ‘बड़ा’ सिद्ध करने की 'उत' सूझती रहती है। खर्चीली साज-सज्जा के आडंबर इसी आधार पर खड़े किए जाते हैं और दूसरों को सताने-गिराने में इस पैशाचिकता के कारण प्रसन्नता होती है। इस मनःस्थिति में उलझे हुए लोगों को पग-पग पर जिन विक्षोभों का, मनोविकारों का, शोक-संतापों का सामना करना पड़ता है, उसे नारकीय यातना कह सकते हैं। ऐसे ही लोग वासनाओं, तृष्णाओं, ऐषणाओं में डूबे रहते हैं और कुकर्मों में निडर होकर लगे रहते हैं। इस मार्ग पर चलने वालों को बाह्य और आंतरिक जीवन में जो मर्मभेदी ठोकरें लगती रहती हैं, इन्हें ही प्रत्यक्ष नरक के रूप में देखा-समझा जाना चाहिए।
स्वर्ग उस दृष्टिकोण का नाम है, जिससे मनुष्य अपनी उपलब्धियों को देखता है, पिछड़े प्राणियों की तुलना में उसे जो अधिक मिला है, उसके लिए संतोष अनुभव करता है। ईश्वर को धन्यवाद देता है और विविध-विधि लालसाओं में, तृष्णाओं में जलने की अपेक्षा जो मिला है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए जुट जाता है। कर्त्तव्य कर्म करने में अपनी अविचल निष्ठा को बहुत बड़ी संपत्ति मानकर गौरवान्वित होता है और बड़ा कहलाने की अपेक्षा महान बनने में संतोष अनुभव करता है। बाह्यजगत में श्रेष्ठता और सौंदर्य कम नहीं। उसे देखने-समझने पर कम आनंद नहीं मिलता। अपने ऊपर समाज के अगणित अहसानों को वह देख पाता है तो निरंतर कृतज्ञता से मन भरा रहता है। जिसे यह ज्ञान है कि दूसरों में भी ईश्वर का अंश है, वह किसी से न तो कटुवचन कहता है और न असभ्य व्यवहार करता है। उसके वचन और व्यवहार में स्नेहसिक्त आत्मीयता ही भरी रहती है। अनीति के विरुद्ध प्रबल संघर्ष करते हुए भी वह, शालीनता को हाथ से नहीं जाने देता। यह है परिष्कृत दृष्टिकोण जिसे दूसरा नाम स्वर्गलोक भी दिया जा सकता है। इस स्तर के लोग धरती के देवता कहलाते हैं और हर स्थिति में संतोष एवं शांति का अनुभव करते हैं।
(2) आध्यात्मिक प्रगति का दूसरा उपहार है— मुक्ति। मुक्ति किससे ? भवबंधनों से। भवबंधन क्या है? लोभ-मोह, वासना-तृष्णा, स्वार्थ-संकीर्णता, अविवेकशीलता-आत्मविस्मृति। इनसे छूटने के लिए मरने की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं। परिष्कृत, विवेकशील, दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने और उसे कार्यान्वित करने का प्रबल दुस्साहस इकट्ठा कर लेने भर से कोई भी व्यक्ति जीवनमुक्त हो सकता है। अपनी कुसंस्कारी मान्यताओं को जिसने उखाड़ फेंका, लोग क्या कहते और क्या करते हैं? यह देखने की अपेक्षा जिसने औचित्य और विवेक को मान्यता दी, इसी आधार पर अपना चिंतन एवं कर्तृत्व ढाला; समझना चाहिए कि इसकी जीवनकाल में ही मुक्ति हो गई। भ्रांतियों का निराकरण और उत्कृष्टता की समग्र स्वीकृति इसी का नाम जीवनमुक्ति है। इस स्थिति में पहुँचे हुए व्यक्ति ही सच्चे ईश्वर भक्त कहलाते हैं और ईश्वर, समतुल्य गौरव-गरिमा से सुसंपन्न बनते हैं।
प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को निकट भविष्य में इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का प्रत्यक्ष आनंद मिल सके, इसी का प्रयास किया जाता है और इस लक्ष्य के प्राप्त हो सकने की पूरी-पूरी संभावना रहती है।
आत्मकल्याण के लिए, आत्मिक प्रगति के लिए, जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए, ईश्वरदर्शन अथवा परमात्मा की प्राप्ति के लिए यही एकमात्र मार्ग है कि उपासनारूपी चिकित्सा और साधनारूपी परिचर्या को जीवनक्रम का अविछिन्न अंग बनाया जाए। इसके लिए आरंभिक आयु में ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, यौवन में उपार्जन, गृहस्थपालन करते हुए भी सरलतापूर्वक ऐसी रीति-नीति अपनाई जा सकती है, जिसके आधार पर लोक और परलोक की भौतिक और आत्मिक क्षेत्र की उभयपक्षीय प्रगति का संतुलित आधार बन सके। सामान्य जीवनक्रम में ऐसे संतुलन की स्थापना संभव तो है ही, सहज भी है।
उससे आगे एक जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण काल आता है। लगभग पचास वर्ष की ढलती आयु का अवसर, आमतौर से लोग इस समय तो गृहस्थ के उत्तरदायित्वों से निवृत्त होने की परिधि पर होते हैं, अथवा बड़े बच्चे इस योग्य हो जाते हैं कि अपने छोटे भाई-बहनों की सूव्यवस्था में पिता का उत्तरदायित्व निभा सकें। किसी ने यदि अपने बच्चे को सुसंस्कृत बनाया होगा, उन्हें पुरखों द्वारा उपार्जित हराम की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाने का सब्जबाग न दिखाया होगा, तो वे अवश्य ही नीति और कर्त्तव्य का ध्यान रखेंगे। बेहिसाब लाड़-दुलार में ही तो बच्चों की आदतें बिगड़ती हैं और वे बड़े होने पर पाप के कोल्हू में पेलने का हर अवसर ढूँढ़ते हैं।
यदि ऐसी ही स्थिति पैदा कर ली हो तो बात दूसरी है, अन्यथा बड़े बच्चे अपने छोटे भाई-बहिनों की सेवा-सहायता करने में माँ-बाप के ऋण से उऋण होने का अवसर चूकते नहीं, वे उसे सुखद-सौभाग्य मानकर पूरी ईमानदारी और भावभरी शालीनता के साथ भली प्रकार निबाहते हैं।
कई बार स्वार्थी नवबधुएँ अपने पतियों पर यह दबाव डालती हैं कि वे अपने माँ-बाप या भाई-बहिनों की सहायता न करके उसी की विलासिता के साधन जुटाएँ। मोहांध युवकों की बात दूसरी है, समझदार लड़के इस प्रकार की संकीर्णता की जड़ आरंभ से ही काटते रहते हैं। दृढ़ शब्दों में वे इससे असहमति प्रकट कर देते हैं और नाराजी तक का खतरा उठाने को तैयार रहते हैं, तो स्वार्थी बहुएँ भी चुप हो जाती हैं। वे सिर पर तो तब चढ़ती हैं जब पति उनके नीचे कान कटाते रहते हैं और हिम्मत करके स्पष्ट बात कह देने में अपने को असमर्थ अनुभव करते हैं; पर आमतौर से ऐसे बेटे-बहू किन्हीं अभागों को ही मिलते हैं। भारत में अभी भी शालीनता मौजूद है और माँ-बाप का ऋण अपने छोटे भाई-बहनों की सेवा-सहायता के रूप में चुकाने की बात अभी भी मौजूद है। जब योरोप की तरह पूरी तरह माँ-बाप को तिलांजलि दी जाने लगेगी, वह दिन तो भारत में भी आ सकता है, पर लगता है, उसका विक्रांत कलियुग आने में अभी तो कुछ देर ही है।
जिन्हें मानव जीवन का महत्त्व विदित है और जिन्हें नर जन्म की सार्थकता संपन्न करने का ध्यान है, उन्हें यदि गृहस्थ बनाना पड़े तो इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं कि संतानोत्पादन तीस वर्ष तक की आयु पहुँचने तक बंद कर दें। बच्चे कम-से-कम उत्पन्न करें, ताकि पचास वर्ष की आयु पहुँचने तक बच्चों की जिम्मेदारियों से पूरी तरह छुटकारा पा लें और ढलती आयु को वानप्रस्थ की अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण साधना के लिए ठीक समय पर अपने को प्रस्तुत कर दें। दूरदर्शी व्यक्ति विवाह होते ही अपनी पलियों को स्वावलंबी बनाने के लिए कई प्रकार के रास्ते खोजते हैं। उन्हें अधिक प्रशिक्षित बनाकर अध्यापन आदि से कुछ आजीविका उपार्जित करने योग्य बना सके यदि गृहस्थ की कुछ जिम्मेदारियाँ बच भी जाए तो स्वावलंबी महिलाएँ उसका निर्वाह कर लेती हैं। जिनके पास खेती-बाड़ी, ब्याज-भाड़ा आदि की इतनी आमदनी है कि घर का खर्च चल सके, छोटे बच्चों का निर्वाह हो सके तो उनके लिए तो ईश्वरप्रदत्त स्वर्ण-सुयोग ही सामने है। परिवार के निर्वाह के योग्य जिनके पास साधन मौजूद हैं, फिर भी जिन्हें उपार्जन की धुन है, अधिक धनी बनने, अधिक संग्रह करने की ललक जिन्हें खाए जा रही है, वे तो ढलती आयु का भी कदाचित ही कुछ महत्त्वपूर्ण उपयोग कर सकें।
घंटे, आध-घंटे की पूजा-पत्री ही उनके मन बहलाने के लिए बहुत हो जाती है और वे इतने भर से ही जीवन के लक्ष्य की पूर्ति हो जाने की बात मान बैठते हैं, इन स्वल्प संतोषी लोगों की कल्पनाएँ जितनी सरल और सुखद होती हैं, उतनी ही निर्मूल और निरर्थक भी। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तो जीवनक्रम का सांगोपांग निर्धारण करना पड़ता है, पर पूरी जिंदगी ही एक क्रम व्यवस्था के अनुरूप जीना पड़ता है। इससे कम में आत्मकल्याण जैसी महान उपलब्धि की कोई सीधी पगडंडी ही नहीं। श्रेय पथ पर जीवन-साधना के राजमार्ग पर ही चलना पड़ता है। किसी पंथ, मंत्र, देवता या गुरु का सहारा लेकर बिना कठोर प्रयास के आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य तक पहुँच सकना सर्वथा असंभव ही है। यह तथ्य जिनकी समझ में आ जाता है, वे ही कुछ ठोस प्रयास कर पाते हैं, तदनुसार उन्हीं के हाथ कुछ काम की चीज लग भी पाती हैं। शेष तो ऐसे ही कल्पना-जल्पना की, बेपर की उड़ानें उड़ते रहने में ही समय गँवाते हैं।
कहना न होगा कि आत्मिक साधना के लिए परम पुरुषार्थ की अवधि वही है, जो वानप्रस्थ के लिए निर्धारित है। यही ठीक वह समय है, जिसमें मनुष्य की मनःस्थिति वस्तुतः कुछ ठोस वस्तु प्राप्त कर सकने की होती है। जिन्हें भगवान अपनी ओर खीचते हैं, उनके लिए इस ढलती उम्र का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने की मनःस्थिति और परिस्थिति बना देते हैं।
बचपन हँसी-खुशी की निश्चिंत और निर्द्वंद अवधि है। इसमें विद्या प्राप्तकर मस्तिष्क बल उपलब्ध करने, खेल-कूद, व्यायाम ब्रह्मचर्य से शरीर पुष्ट करने और अनुशासन, सौजन्य आदि सद्गुण सीखने का उपयुक्त अवसर है। युवावस्था, उत्पादन और व्यवस्था का समय है। रक्त का उभार कतिपय उमंगों के रूप में फुटता है, उसे मर्यादाओं में प्रवाहित करने की दृष्टि से यह समय इसी योग्य है कि मनुष्य द्वारा समृद्धि बढ़ाने और परिवार संस्था को समुन्नत बनाने में योगदान दिया जाए। व्यक्ति और समाज की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी 'परिवार' है। परिवार व्यवस्था के लिए जो साधन जुटाने पड़ते हैं, उनके लिए युवावस्था का सही सदुपयोग किया जाता है। इसके बाद वानप्रस्थ की अवधि आती है। इसे अमृत अवधि कहा गया है। महानता की फसल उगाने का, आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा करने का, मानव की सेवा-साधना में संलग्न होने का परमार्थ संपादन कर सकने का ठीक यही समय है। इसे गँवा देने के बाद एक प्रकार से कुछ हाथ रहता ही नहीं।
वर्णधर्म के अनुसार एक-एक चौथाई आयु, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के लिए लगाई जानी चाहिए। अब सौ वर्ष कौन जीता है। सत्तर पूरे कर सकना भी कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में हर विभाग 17.5 वर्ष का होना चाहिए और ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ में 35 वर्ष ही पूरे करने चाहिए; किंतु वर्त्तमान लोभ-मोहग्रस्त स्थिति में ऐसा कठिन लगता है। सौ वर्ष की आयु में से आधी अर्थात 50 वर्ष तक की ग्रहस्य के लिए रखी जा सकती है। इसके बाद पचास से साठ-पेंसठ वर्ष तक का ही समय ऐसा रह जाता है, जबकि शरीर और मन से कुछ तप-साधना कराई जा सके। पेंसठ वर्ष के बाद तो आमतौर से इंद्रियाँ, हाथ-पैर और मस्तिष्क इतने शिथिल हो जाते हैं कि जरा-जीर्ण स्थिति में किसी प्रकार एक स्थान पर बैठकर, सहायक की सहायता से दिन ही काँटे जा सकते हैं। प्राचीनकाल में यह असमर्थ स्थिति ही सन्यास की होती थी। भागदौड़ की, सेवा-साधना तथा पंचकोशों के अनावरण की कष्टसाध्य तपश्चर्या के अयोग्य वयोवृद्ध शरीर छूट-पुट ध्यान-भजन या उपदेश परामर्श के योग्य ही रह जाता है। संन्यास उसी विश्रामकाल के लिए उपयुक्त माना गया है।
जिस प्रकार भौतिक उपार्जन के लिए, भौतिक प्रगति के लिए यौवनकाल की गृहस्थ अवधि ही सर्वोत्तमकाल है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए ढलती आयु का वानप्रस्थ समय दैवी उपहार की तरह है। पचास से लेकर साठ-पेंसठ वर्ष की आयु तक में इस दिशा में जो प्रयास किए जा सके, उन्हीं में जीवन को धन्य बनाने वाले तत्त्व रहेंगे। वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति यौवन के उभार के दिनों पूरी हो चुकती है। यह अनुभव कर लिया जाता है कि इन विडंबनाओं में जो आकर्षण दीखता था, उनमें सार कितना है। इंद्रियाँ शिथिल होने लगती हैं, तृष्णाओं का दावानल बुझने को आता है, अनुभवों में परिपक्वता होती है, बुद्धि परिमार्जित हो चलती है, मृत्यु के दिन समीप दीखते हैं। स्वाध्याय- सत्संग, मनन-चिंतन और भजन में भी कुछ रस आने लगता है। बच्चों की जिम्मेदारियों से प्रायः छुटकारा मिल लेता है। सादगी का रहन-सहन अपनाने में कुछ विशेष कठिनाई नहीं होती। इन सभी अनुकूलताओं की दृष्टि से ढलती आयु ही अध्यात्म साधनाओं के उपयुक्त पड़ती है। यदि यह अवधि ऐसे ही निकल जाए तो पेंसठ-सत्तर की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शरीर का कचूमर निकल जाता है, तब जरा-जीर्ण शरीर ही एक भार बन जाता है। उसी लाश का वजन ढोना कठिन पड़ता है, तब आत्मकल्याण का पुरुषार्थ कर सकने योग्य कुछ बचा ही नहीं रहता। इसके बाद तो मौत से ही कुछ आशा की जा सकती है कि वह नया शरीर देकर इस योग्य बनाए कि नई क्षमता के सहारे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने योग्य, पुरुषार्थ कर सकना संभव हो सके।
प्रत्येक आत्मकल्याण प्रेमी श्रेय-साधक को समय रहते यह योजना बनानी चाहिए कि बह ढलती आयु में, कितनी जल्दी पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत होकर श्रेय-साधन में अपनी समस्त क्षमता को झोंक सके। पचपन वर्ष पर सरकारी नौकरी से निवृत्ति मिल जाती है। स्वेच्छया पेंशन तो इससे पहले भी संभव हो जाती है। बच्चों से स्वयं निवृत्ति मिल गई हो अथवा उनके उपयुक्त विकास की व्यवस्था घर पर मौजूद हो तो फिर साहसिक छलाँग यही लगाई जानी चाहिए कि इस अमृत अवधि का श्रेष्ठतम उपयोग जीवन-साधना के लिए समर्पित कर दिया जाए। यदि पूर्ण छुटकारे की स्थिति न हो, तो भी इतना तो करना ही चाहिए कि अपने समय तथा साधनों का एक बड़ा भाग इन प्रयोजनों में नियमित रूप से नियोजित किया जाए, जिनके लिए इस अमृत अवधि को नियत-निर्धारित किया गया है।
वानप्रस्थ का मतलब किसी जमाने में सघन अरण्यकों में रहना होता था। वहाँ उस समय की स्थिति के अनुरूप क्षमताएँ बढ़ाने वाली तपश्चर्या की जाती थी। अब स्थिति दूसरी है, अस्तु सनातन लक्ष्य की रक्षा करते हुए व्यवस्थाक्रम में थोड़ा हेर-फेर करना ही पड़ेगा। इन परिस्थितियों में यह उचित है कि घर-परिवार में पूरी तरह घुले रहने की अपेक्षा उससे कुछ दूरी बनाई जाए, भले ही देखभाल परामर्श का, आने-जाने का क्रम बना रहे; पर मनःस्थिति यह होनी चाहिए कि हम इस छोटे परिवार तक सीमित न रहकर विश्व-वसुधा की संपत्ति बन गए। अब अपने उत्तरदायित्व विश्वमानव की सुख-शांति के लिए अथक प्रयास करने की परिधि तक बढ़ गए हैं। अब अपना प्रधान कार्य आत्मोत्कर्ष है। इसके लिए उपासनात्मक तपश्चर्या और साधनात्मक सेवा-साधना में समय और शक्ति को पूरी तरह नियोजित करना है।
प्राचीनकाल में वानप्रस्थ में ब्रह्मचर्य अनिवार्य था, अब उसे शिथिल करके आवश्यक रखा जाना चाहिए। पचास वर्ष की आयु के बाद संतानोत्पादन तो शास्त्रीय दृष्टि से अवैध ही माना गया है। पूर्वकाल में भिक्षा पर अथवा कंद-मूल-फल आदि पर निर्वाह करते थे, अब वैसी परिस्थितियाँ नहीं रहीं। भिक्षा-अन्न में न तो सात्विकता है और न सम्मान। कंद-फल अब प्राकृतिक रूप से कहीं भी नहीं मिलते। कृषि की जाए तो बात दूसरी है, इसलिए निर्वाहि के लिए या तो अपने पूर्वसंचय में से लेना चाहिए अथवा श्रम उपार्जन करना चाहिए। सार्वजनिक सेवा के बदले निर्वाह लेना औचित्य की सीमा में ही आता है। यदि कमाऊ लड़के पितृ ऋण चुकाने की दृष्टि से कुछ भेजना चाहें तो उसमें भी औचित्य ही है। पेंशन आदि का प्रबंध हो तो और भी उत्तम है, ऐसी कोई व्यवस्था न हो तो उपयुक्त यही है कि समाज से जितने मूल्य का निर्वाह लिया जाए, उतने का श्रम करके ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे समाज का ऋण चुक सके। भार उलटा बढ़ने न लगे।
वेश की दृष्टि से पीला तौलिया या दुपट्टा कंधे पर रहे तो इससे प्राचीन वर्णाश्रम परंपरा का प्रतीक रक्षा के साथ-साथ स्वयं के लिए भी कर्त्तव्यबोध का माध्यम बना रहेगा और जनसाधारण को भी उस वृत्ति का परिचय मिलने के अनुरूप उपयुक्त सेवा ले सकने का अवसर मिलता रहेगा।
अधिक उपयुक्त यही है कि पूरी तरह पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्ति पाकर, पूरे समय के लिए वानप्रस्थ-साधना में लगा जाए, पर यदि परिस्थितियाँ वैसी छूट न दें तो भी इस अमृत अवधि का तकाजा यही स्वीकार करना चाहिए कि घर रहते हुए ही जितना अधिक समय इस साधना के लिए लगाया जा सकना संभव हो, उतना लगाया जाए। मन-मस्तिष्क पर परमार्थ उत्तरदायित्वों की संवेदना समुचित मात्रा में छाई रहनी चाहिए और चेष्टा यही रहनी चाहिए कि पूरा न सही, अधूरा प्रयास तो होता ही रहना चाहिए।
(1) वानप्रस्थ की अमृत अवधि परमार्थ जीवन में प्रखरता उत्पन्न करने का समय है। इसमें उसी स्तर के ज्ञान की बृद्धि करने के लिए शिक्षण एवं स्वाध्याय का माध्यम अपनाना चाहिए। (2) तपश्चर्या एवं योग-साधना द्वारा आत्मशक्ति का विकास करना चाहिए और (3) लोक-मंगल की सेवा-साधना द्वारा समाज का ऋण चुकाने, पुण्य संचय करने एवं ईश्वरीय स्नेह अनुदान पाने में संलग्न होना चाहिए। इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समय का विभाजन इस प्रकार होना चाहिए कि आधा समय स्वाध्याय, शिक्षण एवं तप-साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
किशोरावस्था में जो विद्याध्यन किया जाता है, वह भौतिक प्रगति एवं अर्थ-उपार्जन की दृष्टि से होता है। उस समय इसी की आवश्यकता रहती है, ताकि युवावस्था में ग्रहस्थ का उत्तरदायित्व निभा सकने की सामर्थ्य संचय हो सके। वानप्रस्थ में परमार्थ जीवन की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के योग्य ज्ञान-संपादन नए सिरे से करना पड़ता है। यह अधिकारी शिक्षकों के सान्निध्य में भी पाया जा सकता है और उपयुक्त स्वाध्याय से भी संभव है। अपना दुर्भाग्य यह है कि आज परमार्थ जीवन की कोई समग्र पाठ्य-विधि उपलब्ध नहीं। आमतौर से लोग ऐसे ही अगड़म-बगड़म बकवास, स्वाध्याय और सत्संग के नाम पर गले उतारते रहते हैं और उससे कुछ पाने के स्थान पर उलटा गँवाते रहते हैं।
यही बात उपासना के संदर्भ में भी लागू होती है। उपासना का उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों का निराकरणमात्र है। भगवान या किसी देवता को रिझाना नहीं। गुण, कर्म, स्वभाव में जिन विकृतियों का, दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो गया है, उन्हीं का निराकरण करना — यही है साधना का उद्देश्य। ऐसी साधना-विधि तो कहीं कदाचित ही दीख पड़ती है। आमतौर से लोग भजन के लिए नामोच्चार की तोतारट लगाए रहते हैं। भावनाविहीन क्रियाकांड में उलझे रहते हैं। फलस्वरूप अंतःचेतना का विकास होने का प्रयोजन तनिक भी नहीं होता। उलटे आलस्य-प्रमाद जैसी नई विकृतियाँ सिर पर चढ़ बैठती हैं। आत्मिक प्रगति का लाभ होना तो दूर और उलटी अवनति दृष्टिगोचर होती है। दुर्बुद्धि से मुक्ति पाने के नाम पर कर्त्तव्यनिष्ठा को ही छोड़ दिया जाता है। अकर्मण्यता और अस्त-व्यस्तता स्पष्टतः निकृष्ट कोटि के पापों में ही गिनी जा सकती है। यदि योगसाधक को इसी दयनीय स्थिति में उलझना पड़े तो समझना चाहिए, लक्ष्य से उलटी दिशा में ही वह चल पड़ा है।
सेवा-साधना तो आज विरक्त वर्ग में कहीं दीख ही नहीं पड़ती, जबकि परमार्थ का आधार ही जनमानस को ऊँचा उठा सकने वाले प्रयत्नों में संलग्न होता है। प्राचीनकाल में भारत की समग्र प्रगति का मेरुदंड वानप्रस्थ आश्रम ही था। नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक प्रगति एवं स्थिरता के लिए उसी वर्ग का बहुमूल्य योगदान मिलता था। परिपक्व बुद्धि, परिष्कृत दृष्टिकोण और निस्वार्थ सेवा का त्रिवर्ग जहाँ भी मिलेगा, वहीं वह शक्ति उत्पन्न होगी जो उच्चस्तरीय श्रद्धा को आकर्षित कर सके, अपने प्रभाव से जनमानस को झकझोर सके और लोक-प्रवृत्ति को महत्त्वपूर्ण दिशा दे सके। समाज का समग्र नेतृत्व वानप्रस्थवर्ग ही करता है। प्राचीन भारत की सर्वतोमुखी प्रगति का लेखा-जोखा लिया जाए तो प्रतीत होगा कि उस महान प्रगति की आधारशिला वानप्रस्थ आश्रम पर ही निर्भर रहती है। उज्वल चरित्र और सुविकसित चिंतन के कारण उनका व्यक्तित्व इस योग्य बनता था कि जनता का सफल और समर्थ मार्ग दर्शन किया जा सके। वाचालता के व्यवसायी तथाकथित नेता या धर्मोपदेशक वह प्रयोजन किसी भी प्रकार संपन्न नहीं कर सकते। लोकरंजन की उछल-कूद करने के अतिरिक्त थोथी वाचालता और कुछ कर भी तो नहीं सकती। प्रदर्शन के ओछे स्वाँगों में नहीं, परिष्कृत व्यक्तित्व के भीतर चलने वाली सेवा-साधना ही लोक-मानस का मर्मस्पर्श करने और उसका स्तर ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है। लोकसेवा का, जननेतृत्व का उद्देश्य इससे घटिया स्तर के लोग पूरा कर ही नहीं सकते। इस आवश्यकता की पूर्ति वानप्रस्थ आश्रम ही कर सकता है। आज की गई गुजरी स्थिति में जनजागरण के लिए, लोक-निर्माण के लिए, वानप्रस्थ संस्था को पुनर्जीवित किया ही जाना चाहिए।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए समय की महती आवश्यकता सामने यह आती है कि वानप्रस्थ परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए प्रचंड आंदोलन किया जाए और जहाँ इसके लिए उत्साह उत्पन्न हो, वहाँ उसे समुचित-परिष्कृत बनाने के लिए उपयोगी शिक्षण का, मार्गदर्शन का व्यवस्थित क्रियाकलाप का प्रबंध किया जाए। इसके बिना वह उत्पन्न हुआ उत्साह भी छितरा जाएगा अथवा अनुपयुक्त दिशा में भटककर उलटी अव्यवस्था उत्पन्न करेगा। आज यही हो भी रहा है। वानप्रस्थाश्रमों में बूढ़े की लाशें सड़ती दीखती हैं। घर छोड़कर वे नीरस वातावरण में पड़े दिन काटते रहते हैं। थोड़ी बहुत नाम-रट भले ही कर लेते हों, बाकी सारे दिन ऐसे ही आलस में पड़े दिन काटते हैं और अपनी क्षमताओं को विकसित करने के स्थान पर जंग लगे लोहे की तरह गलाते-घटाते रहते हैं।
वैराग्य के नाम पर हरामखोरी का पनपने लगना निश्चित रूप से व्यक्ति और समाज का एक महान दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। अपने देश में 56 लाख धर्मध्वजी हैं। सात लाख गाँवों को यह संभालते तो हर गाँव को आठ प्रशिक्षित लोकसेवी मिल जाते और वे देश को समग्र प्रगति के उच्चस्तर तक कुछ ही दिनों में पहुँचा देते। इतने लोकसेवकों के रहते सरकार का मुँह भी न तकना पड़ता और देश कहाँ से कहाँ जा पहुँचता। विश्वनिर्माण में हम कितनी बड़ी भूमिका संपादित करते; पर उस पलायनवादी प्रवृत्ति को क्या कहा जाए जो धर्म, अध्यात्म एवं वैराग्य के नाम पर जीवित आदमी को मृतक की स्थिति में ले जाकर पटक देती है। युग की पुकार है कि वानप्रस्थ को पुनर्जीवित किया जाए और उसमें प्राचीन जैसी प्रखरता लाई जाए। नर-रत्नों के निर्माण का, देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान का यही मार्ग है। युग की पुकार है कि जन नेतृत्व कर सकने योग्य उज्वल चरित्र और परिष्कृत ज्ञान वाले सेवापरायण व्यक्तित्व उत्पन्न किए जाएँ। समग्र प्रगति का प्रयोजन उन्हीं से पूरा होगा। इस प्रयास के बिना भारत जैसे छोटी देहात में बिखरे अशिक्षित देश को ऊँचा उठा सकना और किसी प्रकार संभव न होगा। युग की ज्वलंत समरूप और उसके समाधान को दृष्टि में रखते हुए वानप्रस्थ परंपरा को जागृत करने के लिए प्रचंड आंदोलन खड़ा करने का निश्चय किया गया है। जिनकी आयुष्य और स्थिति उसके लिए उपयुक्त है, उन्हें आत्मकल्याण एवं लोक-निर्माण की इस दिशा में साहसिक कदम बढ़ाने के लिए आग्रह किया जाएगा। पूरा या अधूरा जो जितना कर सके, ढलती आयु के लोगों को उसी दिशा में प्रेरित किया जाना चाहिए। लोभ-मोह की कीचड़ में से एक कदम पीछे हटाने के लिए जीवन लक्ष्य की पूर्ति की ओर एक कदम बढ़ाने के लिए वानप्रस्थ से बढ़कर व्यावहारिक और सही कदम दूसरा हो ही नहीं सकता। इस तथ्य से सर्वसाधारण को अवगत कराया ही जाना चाहिए, कराया ही जाएगा।
बहुत सोच-विचार के बाद यह निश्चय किया गया है कि वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त शिक्षण एवं साधना का क्रियाकलाप शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में चलाया जाए। अपने परिवार के, अनेक भावनाशील परिजन बहुत दिनों से इसकी आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं और उत्सुक हैं; पर कोई व्यवस्थितक्रम सामने न होने से वे घर पर ही जो कुछ उलटा-पुलटा अपनी बुद्धि, मर्जी और स्थिति के अनुरूप हो, करते रहते हैं। उन्हें जब सुव्यवस्थित क्रमबद्धता का अवसर मिलेगा तो उत्साह ही मिलेगा, संतोष ही होगा। आशा की जानी चाहिए, अगले पाँच वर्षों में एक हजार ऐसे वानप्रस्थ प्रशिक्षित किए जा सकेंगे, जो ज्ञान-संपदा तप-साधना से सुसंपन्न होकर आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक-मंगल का, विश्व के नवनिर्माण का प्रयोजन भी पूरा कर सकें।
यों शान्तिकुञ्ज में जगह बहुत कम है। उसमें भी इन दिनों 'प्रत्यावर्तन सत्र' के साधनाक्रम चल रहे हैं, फिर भी जो थोड़ी बहुत जगह किसी प्रकार काट छाँटकर निकाली जा सकी है, उससे कुछ ही दिन में ऐसा प्रबंध हो जाएगा कि एक सौ वानप्रस्थों की ज्ञान-संपदा एवं तप-साधना बढ़ाने के लिए समग्र प्रशिक्षण किया जा सके। यह बहुमूल्य अवसर ही है कि इन दिनों उपयुक्त शिक्षा मिलने की सुविधा भी मौजूद है। 'प्रत्यावर्तन सत्र' संभवतः पाँच वर्ष चलेंगे, तब तक साथ ही वानप्रस्थों की स्थिर शिक्षा-व्यवस्था का क्रम भी चलता रहेगा।
वानप्रस्थ शिक्षण के दो वर्ग हैं। एक उन लोगों का जो भविष्य में रहेंगे तो अपने घर ही, कार्य अपने ही क्षेत्र में करेंगे। दूसरे वे जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से पूर्णतया निवृत्ति पा चुके हैं और जिन्हें सारा देश, सारा विश्व ही अपना घर-परिवार दिखाई देता है, जो किसी परिवार या क्षेत्र तक सीमित न रहकर पूर्णतया प्रभू समर्पित जीवन जीना चाहते हैं। शिक्षण दोनों का एक ही स्तर का होगा। साधनाऐं दोनों को एक ही प्रकार की कराई जाएँगी, अंतर यह रहेगा कि घर रहने वाले लोग छै: महीने प्रशिक्षण प्राप्त करके अपने यहाँ वापिस लौट जाएँगे और जिन्हें समग्र साहस करना है, वे यहाँ के स्थाई निवासी माने जाएँगे।
वानप्रस्थ साधना के लिए अध्यात्म दर्शन का, साधना विज्ञान का अध्ययन करना नितांत आवश्यक है, चूँकि उन्हें शिक्षा-तपश्चर्या के अतिरिक्त बहुत सा समय सेवा-साधना में भी लगाना है, इसलिए व्यक्ति और समाज की आज की परिस्थितियों का जानना और प्रस्तुत समस्याओं को समझाने का मार्ग जानना भी किसी लोकसेवों के लिए नितांत आवश्यक है। नियमित अध्ययन में इन सभी तत्त्वों का गहरा समावेश रखा जाएगा। प्रत्येक शिक्षार्थी को शान्तिकुञ्ज में इस प्रकार के अध्ययन का अवसर मिलेगा।
तपश्चर्या के प्रति गायत्री साधना की उच्चस्तरीय, पंचकोशी साधना ही वानप्रस्थ के लिए सर्वोत्तम है। प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को इसी के सूत्ररूप में सिखाया जा रहा है। उसके अभ्यास की आरंभिक झाँकी ही चार दिनों में संभव हो सकती है। वानप्रस्थ साधकों को यह अनियार्य रूप से छः महीने करनी होगी, यों हर साधक की साधना में उसकी स्थिति के अनुरूप कुछ अंतर करना होता है, पर प्रयत्न यही किया जाएगा कि जिन पाँच योगों को प्रत्यावर्तन सत्र में आधार माना गया है, उनमें से एक या कई का अभ्यास कराया जाए। उचित मार्गदर्शन एवं संरक्षण में वैसा ही लाभ मिलता है, जैसा प्राचीनकाल के गुरुकुलों में छात्रों को मिलता था। वातावरण का प्रभाव होना स्वाभाविक है। हिमालय का द्वार गंगातट, सप्तऋिषियों की, तपस्थली की पुण्य सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त शान्तिकुञ्ज की स्थिति का अपना अतिरिक्त महत्त्व है। मार्गदर्शन और संरक्षण की सुविधा यहाँ जिस स्तर की है, वैसी कदाचित ही अन्यत्र कहीं पाई जा सके। ऐसी दशा में साधकों का छै महीने यहाँ रहना, उनके ज्ञान और तप का स्तर सचमुच ही बहुत ऊँचा उठा देगा। वे एक सशक्त व्यक्तित्व अपने भीतर उभरा हुआ अनुभव करेंगे।
सेवा-साधना में हर वानप्रस्थ को अपनी उपलब्धियों का आधा भाग नियोजित करना पड़ता है। इसके लिए युगनिर्माण शाखाओं का सुविस्तृत क्षेत्र खाली पड़ा है। सर्वत्र उनकी मांग है। शिक्षा और साधना की पूँजी लेकर वानप्रस्थों को उन्हीं क्षेत्रों में प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक शतसूत्री कार्यक्रमों को अग्रगामी बनाने के लिए भेजा जाएगा। वहाँ वे स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की सहायता करेंगे और स्वयं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। इस प्रकार जहाँ शिथिलता आने लगी है, वहाँ अभिनव चेतना का विकास-विस्तार तत्काल दीखने लगेगा। मुरझाए हुए शाखा-संगठन युगनिर्माण परिवार देखते-देखते हरे-भरे, फले-फूले दृष्टिगोचर होने लगेंगे। युग परिवर्तन के क्रियाकलाप में आवश्यक स्फूर्ति एवं सक्रियता उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित, परिष्कृत और तपस्वी वानप्रस्थों का कितना बड़ा योगदान हो सकता है। इसकी कल्पना मात्र से ही भावनाशीलों की आँखें चमकने लगेंगी।
जिन्हें अभी घर से पूर्ण छुटकारा नहीं मिला है, जिनकी स्थिति अपने क्षेत्र से बाहर जाने की नहीं है, वे जितना समय निकाल सकेंगे बताए गए कार्यक्रम के अनुसार अपना ज्ञानवर्द्धन, तप-साधना एवं सेवा प्रयास वे जारी रखेंगे। सुविधानुसार समय-समय पर आवश्यक शक्ति प्राप्त करने के लिए हरिद्वार आते रहेंगे। जिन्हें पूरे समय का प्रभु समर्पित जीवन जीना है, वे अपना स्थाई घर शान्तिकुञ्ज को मानेंगे। निर्धारित समय तक हर वर्ष शिक्षा तथा साधना के लिए आश्रम में रहेंगे और बताए गए क्षेत्र में सेवा का कार्य करने के लिए चले जाया करेंगे। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन की वे त्रिविधि उपलब्धियों को समग्र विधि- व्यवस्था के साथ पूरा करते हुए, जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए द्रुतगति से अग्रसर हो सकेंगे।
परिजनों में से प्रत्येक को इस महान रचनात्मक कार्य में दिलचस्पी लेनी चाहिए, जिनकी स्वयं की आयू, स्थिति इसके उपयुक्त हो उन्हें स्वयं को आगे बढ़ाने-धकेलने के लिए अंतःसंघर्ष आरंभ कर देना चाहिए। देवत्व को जिताने और असुरत्व को हराने में अर्जुन को नियुक्त किया गया है, अपने आंतरिक महाभारत का सूत्रधार बनने में अर्जुन की भूमिका निभाने में उन्हें आगे आना ही चाहिए, जिनकी स्थिति वानप्रस्थ साधना के उपयुक्त है। अपने परिचय क्षेत्र में जो लोग इस उपक्रम के उपयुक्त हों उनमें अभीष्ट साहस उत्पन्न करने के लिए साधना-संपर्क बनाना चाहिए।
यहाँ एक ही बात ध्यान रखनी है कि सड़े हुए मुर्दों का अजायबघर इस वानप्रस्थाश्रम को नहीं बनाया जाएगा। जरा-जीर्ण, रोगग्रस्त, मंदबुद्धि, दुर्गुणी, व्यसनी और आलसी लोग गृहकलह से बचने के लिए यहाँ जगह घेरने की बात सोचते हों तो उनकी बात नहीं बनेगी। विश्व को अभिनव नेतृत्व दे सकने के लिए, जिनमें आवश्यक उमंगें मौजूद हैं, जिनका शरीर और मन अभी तक अध्ययन, तपश्चर्या और सेवा-साधना के उपयुक्त है, उन्हीं को हरिद्वार आने की बात सोचनी चाहिए। मरे हुए लोग यहाँ जगह घेरकर बैठ जाएँगें तो जिंदा लोगों को लाभ लेने का रास्ता ही बंद हो जाएगा। गंगातट पर शांति के दिन काटने वालों को नहीं, अपनी प्रखर उपलब्धियों को विश्वात्मा के चरणों में समर्पित करने के लिए जिनकी स्फूर्ति, प्रतिभा और समर्थता फूटी पड़ रही है, आह्वान उन्हीं का किया जा रहा है। स्थान थोड़ा-सा ही तो है उसकी पूर्ति उपयुक्त व्यक्तित्वों से ही होनी चाहिए। उन्हीं से की भी जाएगी।
जिन्हें वानप्रस्थ पुनर्जीवन की प्रस्तुत योजना में दिलचस्पी हो, वे अपने सुझाव-परामर्श इस संदर्भ में भेजने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। जिन्हें इस योजना से लाभ उठाना है, सम्मिलित होना है, वे अपनी स्थिति का विवरण लिखते हुए पत्र-व्यवहार कर लें, ताकि उनकी स्थिति पर विचार करके उपयुक्त परामर्श दिया जा सके।
— माता भगवती देवी शर्मा
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या ।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषाऽऽवृतः ।।— अथर्व. 10-23-1
यह शरीर आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली देवपुरी अयोध्या है, जिसमें सोने का एक ज्योतिस्वरूप एवं स्वर्ग-सा रमणीय प्रकोष्ठ— मस्तिष्क है।
आत्मविश्लेषण, आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार की प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग है— अपने पिछले जीवन की समीक्षा। इसमें जहाँ सत्कर्मों पर प्रसन्नता और संतोष का अनुभव होना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि अपने पापों और दुष्कर्मों पर भी गहरी दृष्टि डाली जाए और उनका पश्चात्ताप-प्रायश्चित किया जाए।
अध्यात्म दर्शन की सुदृढ़ मान्यता है कि कर्मों का फल अवश्यंभावी है। उस विधान से कोई भी यहाँ तक कि ईश्वर भी नहीं बच सका है। परमात्मा ने यह सृष्टिक्रम और नियम-व्यवस्था के अनुसार बनाया है। यहाँ सब कुछ एक विधान, अनुशासन के अनुरूप चल रहा है। वे नियम परमात्मा ने बनाए हैं, पर अपने को भी उन्हीं में आबद्ध कर लिया है। भले ही मर्यादाओं का उल्लंघन करने की क्षमता उसमें हो, पर वह वैसा करता अपने लिए भी नहीं है, अन्यथा उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता की अव्यवस्था सर्वत्र फैल जाएगी। विधान निर्माता ही विधान को तोड़ें तो फिर दूसरों को वैसा करने से कैसे रोका जा सकेगा?
भगवान राम ने छिपकर बाली को तीर मारा, जब राम का अवतार कृष्ण रूप में हुआ तो बालि ने बहेलिया बनकर तीर से कृष्ण का प्राण ले लिया। राम के पिता दशरथ ने श्रवणकुमार को तीर मारा, उसके पिता ने शाप दिया कि इस वधकर्त्ता को भी मेरी ही तरह पुत्रशोक में बिलखकर मरना पड़ेगा। वैसा ही हुआ भी। रामचंद्र जी अपने पिता तक की सहायता न कर सके, दशरथ पुत्रशोक में बिलख-बिलखकर मरे। सुभद्रा ने जब कृष्ण को उलाहना दिया कि तुम मेरे पुत्र अपने भानजे अभिमन्यु की भगवान होते हुए भी रक्षा न कर सके तो उन्होंने यही कहा— “प्रारब्ध बहुत कठिन है, उसे मिटाना मेरे बस की बात भी नहीं है।”
अज्ञानांधकार के युग में ये भ्रांतियाँ फैलाई अवश्य गई हैं कि अमुक नदीस्नान, तीर्थयात्रा, देवदर्शन, पूजा-पाठ, कथा-कीर्तन अथवा कर्मकांड से पापों का दंड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है, पर वैसा वस्तुतः है नहीं। उस कथन का अभिप्राय इतना ही हो सकता है कि पापवृत्तियों दुष्कर्मों की ओर बहाने वाली ललक घट या मिट जाए। कर्मदंड से बचने का एक ही उपाय है कि समय रहते उसका प्रायश्चित कर लिया जाए। प्रायश्चित का अर्थ भी कोई छुट-पुट कर्मकांड नहीं; वरन समाज को जो क्षति पहुँचाई है, उसकी पूर्ति करना है। हम ने गंदगी फैलाई है तो हमारा ही कर्त्तव्य है कि उसकी सफाई करें। रास्ते में गड्ढा खोदने वाले का ही कर्त्तव्य है कि उसे पाटे और राहगीरों के लिए टाँग टूटने का जो खतरा उत्पन्न किया है, उसे दूर करें। पश्चात्ताप करना भी उचित है, ताकि वैसी भूलें फिर न हों। ऐसे प्रसंगों में चंद्रायण व्रत सरीखे कुछ तप-साधन भी जुड़े रहने चाहिए।
चोरी करने वाला यदि सद्बुद्धि आने पर चुराया धन वापिस करने और अपनी भुल पर दुःख प्रकट करे तो उससे दुष्कर्म की भरपाई हो जाती है। कटुवचन बोलने पर जिसका जी दुःखा है, उसे संतुष्ट करने जितना भाव भरा अनुनय-विनय कर ले और उसके दुःखे हुए जी को हलका कर दे तो समझना चाहिए कि प्रायश्चित हो गया। जिसकी चोरी की थी, प्रायः उसको वही माल लौटाना संभव नहीं रहता। समय बीत जाने पर न वह वस्तुएँ रहती हैं और न व्यक्ति। ऐसी दशा में यही मानकर चलना पड़ता है कि समस्त समाज एक इकाई है, व्यक्ति उसके घटकमात्र हैं। व्यक्तियों को पहुँचाई गई अवांछनीय क्षति प्रकारांतर से समाज की ही क्षति है, अस्तु समाज को अतिरिक्त सुख पहुँचाकर उस पापकर्म की क्षतिपूर्ति की जा सकती है। पाप का बदला पुण्य से चुकाया जा सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार जितने वजन के पाप हुए हैं, प्रयत्न यह होना चाहिए कि उतने ही वजन के अतिरिक्त पुण्यकर्म किए जाएँ और पाप-पुण्य का पलड़ा बराबर किया जाए। इस प्रक्रिया का अवतिलंबन लेने से पापकर्मों के कारण अंतरात्मा पर जो अतिरिक्त भार पड़ गया था, उसे हलका किया जा सकता है।
प्रत्यावर्तन सत्र के हर साधक को समझाया जाता है कि उसे अपने सभी पाप स्मरण करने चाहिए और उन्हें पेट में गाँठ बाँधकर रखने की अपेक्षा कम-से-कम एक व्यक्ति को इस सत्र के संचालक को विस्तारपूर्वक घटनाक्रम के साथ बता देना चाहिए। इससे साधक का जी हलका होगा और प्रायश्चित करने की रीति-नीति का परामर्श मिलेगा।
मनोविज्ञानशास्त्र के अनुसार, दुरित-दुरावों की मानसिक ग्रंथियाँ बनती हैं और वे कालांतर में शारीरिक-मानसिक रोगों के रूप में फूटती हैं, व्यक्तित्व को विकृत करती हैं। अस्तु वे मानसिक रोगियों को अपना जीवनक्रम बिना दुराव चिकित्सक के सामने विस्तारपूर्वक वर्णन करने को कहते हैं। इस प्रकार रोगी जब सब कुछ भला-बुरा कर सकता है तो उसका जी हलका हो जाता है। अंतःचेतना पर पड़ा हुआ दबाव घट जाता है। फलस्वरूप रोगी का मानसिक कष्ट घट जाता है।
इस मनोवैज्ञानिक चिकित्सापद्धति में अध्यात्म चिकित्सा विज्ञान इतना और जोड़ता है कि मात्र कह देना ही काफी नहीं, वरन समाज को पहुँचाई क्षति की पूर्ति भी करनी चाहिए। अन्यथा वाणी से कह देने पर जी तो हलका हो जाएगा, पर किए गए पाप का अंतःकरण पर लदा हुआ बोझ हलका न हो सकेगा। उसका प्रायश्चित क्षतिपूर्ति के साहसिक कदम बढ़ाने से ही हो सकता है।
प्रत्यावर्तन सत्र में आने वालों को अपने अंतःकरण के दुराव-परतों को खोलने के लिए, भूलों की भविष्य में पुनरावृति न करने के लिए तथा क्षतिपूर्ति के लिए साहसिक कदम बढ़ाने को कहा जाता है। इस प्रकार आत्मशोधन का महत्त्वपूर्ण प्रयोजन पूरा होता है। यह पाप भार ही है जो उपासना में मन नहीं लगने देता, साधनाक्रम में विघ्न बनकर खड़ा होता है, चित्त का उच्चाटन करता है— श्रद्धा नहीं जमने देता। इस प्रकार उपासना की दिशा में उठाए गए कदम प्रायः लँगड़े-लूले, अधूरे-असफल रह जाते हैं। यदि आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया पहले अपना ली जाए तो कपड़े को धोने के बाद रँगने की तरह साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
पिछले किए हए दुष्कर्म मनोवैज्ञानिक ग्रंथि बनकर अंतःकरण में जम जाते हैं और चुपके-चुपके यह प्रयत्न करते हैं कि कोई आकस्मिक विपत्ति बुलाकर उस भार का परिशोधन कर डालें। विपत्तियाँ अनायास तो आती नहीं। उन्हें बुलाने के लिए किसी नई दुर्बुद्धि का सृजन होता है। उसी के फलस्वरूप संकट उत्पन्न होता है और पिछले पाप का कठोर दंड मिलता है। एक पाप दूसरे पाप की प्रेरणा देता है और जब तक वह मवाद निकल नहीं जाता, एक के बाद दूसरी फुंसियाँ उठती-फूटती रहती हैं। प्रगतिशील जीवन के पथ में यह भारी बाधा है। इसे दूर करने के लिए प्रायश्चित की तपश्चर्या अपनाना हर दृष्टि से उपयोगी है। व्यक्ति का मनःक्षेत्र जहाँ अवांछनीय भार से हलका होता है भावी कर्मभोगों से निश्चिंतता मिलती है, वहाँ समाज को भी लाभ होता है। प्रायश्चित के आधार पर किए गए पापकर्मों के बदले जो पुण्यकर्म किए गए हैं, वहाँ उत्पन्न हुई कुरूपता को सौंदर्य में बदलने का अवसर मिलता है। शुभकर्मों की परंपरा चलने से व्यक्ति द्वारा भूतकाल में चलाई पाप-परंपरा की काट हो जाती है। इस प्रकार समाज में पतनकारी जो तत्त्व उत्पन्न किए गए थे, उनका निराकरण भी पुण्यरूप सत्कर्म कर देते हैं।
पंचगव्य और हविष्यान्न (तिल, जौ, चावलों) को प्रत्यावर्तन सत्र के साधक प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। इसमें शास्त्रीय प्रायश्चित परंपरा का समावेश है। विधिवत् यह संस्कारित आहार, मन और शरीर के शोधन में बहुत सहायक होता है। चार दिन की तपश्चर्या साधना भी संचित मलीनता के निराकरण में सहायता करती है। शान्तिकुञ्ज का वातावरण भी शोधन और समाधान की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है। इस दृष्टि से कुछ बार तो यहाँ ऐसे ही हलका होता है, शेष के लिए पूण्य-संवर्द्धन के लिए कुछ साहस करने की विशेष विधि-व्यवस्था सोची जाती है।
प्रत्यावर्तन सत्र में सम्मिलित होने वाले साधक, संचालक को अपने दुष्कर्मों का विवरण लिखित अथवा मौखिक रूप से इस विश्वास के साथ प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वाले के अतिरिक्त वह विवरण अन्य किसी पर भी प्रकट न किया जाएगा। यदि लिखित है तो उसे एक दिन बाद वापिस कर दिया जाएगा। इस आत्मिक साहसिकता का प्रभाव तुरंत चित्त में हलकापन आने के रूप में दृष्टिगोचर होता है। प्रायश्चित के लिए प्रायः यही परामर्श दिए जाते हैं कि समाज में पुण्य-परंपराएँ प्रचलित करने के लिए उन्हें उतने या न्यूनाधिक वजन के सत्कर्म करने चाहिए, जितना कि पापकर्मों का भार है। पुण्य-प्रवृत्तियों का अभिवर्द्धन करने से कर्त्ता के चित्त में जो संतोष होगा, उससे स्वभावतः वे घाव भरेंगे जो दुष्कर्मों ने अंतःकरण में कर रखे थे और जो आत्मग्लानि के, आत्मप्रताड़ना के रूप में निरंतर कसकते और रिसते थे।
चोरी, व्यभिचार, बेईमानी, छल, क्रूरता जैसे दुष्कर्मों को पाप नाम से सहज ही जाना जाता है और उन अवांछनीय घटनाक्रमों का स्मरण भी सहज हो आता है, ये सामाजिक पाप हैं। आत्मिक पाप इससे भी बढ़े-चढ़े और भयावह हैं। हम आत्महत्या और ब्रह्महत्या करते रहते हैं और यह सोचते भी नहीं कि इस प्रकार के जघन्य कर्म हम निरंतर करते जा रहे हैं।
स्पष्ट है कि आत्मा को अगणित दुःखद योनियों में भ्रमण करने के उपरांत एक मनुष्य जन्म ही उद्धार के लिए मिला है। यदि यह सु-अवसर ऐसे ही पशु-प्रवृत्तियों में गवा दिया जाता है तो फिर उन्हें कष्ट भरी दुःखद योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा। आत्मा को सु-अवसर का लाभ उठाने से वंचित रखना और फिर उसी यंत्रणा भरे कुचक्र में दुःसह, दुःख सहने के लिए धकेल देना निश्चित रूप से आत्महत्या है। उसका प्रायश्चित लगभग चौरासी लाख वर्ष पर्यंत भोगना पड़ेगा। एक योनि में ओसतन एक वर्ष तो रहना ही पड़ेगा।
ब्रह्महत्या का तात्पर्य यहाँ ईश्वर के अरमानों को चकनाचूर कर देना है। उसने अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो असाधारण और अद्भुत अनुदान दिए हैं, उसका एकमात्र प्रयोजन यह है कि इसके अतिरिक्त विभूतियों का उपयोग वह उसके विश्व-उद्यान को समुन्नत-सुरभित बनाने के लिए करेगा, किंतु जब हम उसे अंगूठा दिखाकर लोभ, मोह की गंदगी चाटने में लग पड़ते हैं तो निश्चित रूप से परमात्मा के उस प्रयोजन की, अरमान की हत्या हो जाती है, जो उसने लगभग अपनी ही जितनी क्षमता वाला काय-कलेवर हमें देते समय सँजोया था। निश्चित रूप से यह ब्रह्म के अरमानों का हनन करने वाली ब्रह्महत्या ही कही जा सकती है।
भले ही विषपान करके आत्महत्या न की गई हो और साधु-ब्राह्मण का कत्ल करने जैसी ब्रह्महत्या न बन पड़ी हो, पर जिस रीति-नीति के साथ जीवन प्रक्रिया चलाई जाती रही है, उसे आत्महत्या और ब्रह्महत्या का सम्मिलित दुष्कर्म ही कह सकते हैं। यह पाप कम मात्रा में नहीं हुआ। जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग अब तक इसी कुचक्र में गँवाया जा चुका। यदि उस पाप की गरिमा और उसके दंड पर विचार करें तो रोमांचकारी विभीषिका सामने खड़ी दिखाई पड़ेगी। योनियों के कुचक्र में भ्रमण, आत्महत्या का और ईश्वर का चरम कोप ब्रह्महत्या का दंड होता है। इन दोनों प्रताड़नाओं से कितनी कष्टकारक व्यथाएँ सहनी पड़ सकती हैं, इसकी कल्पना की जाए तो चौरासी नरक के होने वाले उत्पीड़न की जो तस्वीरें बाजार में बिकती हैं, उससे हलका नहीं, भारी संकट ही सामने खड़ा दृष्टिगोचर होगा।
यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुट-पुट पूजा-पत्री या कर्मकांडी टंट-घंट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते हैं। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिंगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र हैं, जो दिशा निर्देश भर करते हैं। काम तो सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने और पुण्यकर्म करने से चलता है। पाप भी तो दुष्कर्मों से घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप से ही बने थे। पुण्य-प्रायश्चित भी उसी स्तर का घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। यदि पूजा स्तर के पाप हुए होते तो वे पूजा स्तर के पुण्य से कट सकते थे। कर्म की काट तो कर्म से ही हो सकती है, इसलिए प्रायश्चित द्वारा आत्मशोधन का, आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है। यहाँ वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी को भी न सुनने जैसा दुस्साहस किया गया था।
समग्र प्रायश्चित की दृष्टि से यही उचित है कि भावी जीवन का यह एक अविच्छिन्न क्रम बनाया जाए कि ईश्वरप्रदत्त विभूतियों का एक बड़ा अंश सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन के लिए लगाया करेंगे। 24 घंटा समय में से 8 घंटा कमाने के, 7 घंटा सोने के, 5 घंटा फुटकर कार्यों के लिए रख ले तो 20 घंटे भौतिक जीवन के लिए शरीर, मन और परिवार की आवश्यकता पूर्ति के लिए पर्याप्त होने चाहिए। शेष चार घंटे का श्रम परमार्थ-प्रयोजनों में लगाया जा सकता है। घर-परिवार के सदस्यों में एक सदस्य परमार्थ को भी जोड़ लिया जाए तो एक कुटुंबी पर खरच होने वाला व्यय, लोक-मंगल के लिए नियोजित हो सकता है। घर में एक बच्चा यदि और होता तो किसी प्रकार उसका भी पालन-पोषण करना ही पड़ता। यही बात परमार्थ-प्रयोजन के संबंध में सोचकर चला जाए तो अपनी कमाई का एक महत्त्वपूर्ण भाग उसके लिए निकाला जा सकता है।
इस युग का सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रधान परमार्थ एक ही है— ‘भावनात्मक नवनिर्माण’। इस युग की समस्त विकृतियाँ निकृष्ट चिंतन के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ दुर्भावनाओं की बेल पर लगने वाली फलियाँ ही हैं। विश्व का सर्वनाश करने के लिए समुन्नत असंख्य विभीषिकाएँ मनुष्य के निकृष्ट चिंतन ने ही उत्पन्न की हैं। उसका निराकरण एक ही उपाय से हो सकता है कि विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने में अग्निकांड पर जल डालने की तरह सब ओर से ध्यान हटाकर पूरी एकाग्रता के साथ जुट जाना चाहिए। अन्नदान, जलदान, धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, बगीचा लगाने जैसे कार्य पीछे भी हो सकते हैं। संपत्ति उपार्जन में थोड़ी सी ढील भी रखी जा सकती है, पर आपत्ति धर्म की तरह बौद्धिक अनाचार से लड़ने में युद्धकालीन संकट की तरह सारी शक्ति झोक दी जानी चाहिए। विचार-क्रांति की लाल-मशाल इसी प्रयोजन के लिए जल रही है। ज्ञानयज्ञ का आह्वान इसी युग पुकार का अनुसरण करने के लिए है। इन दिनों समस्त पुण्य-प्रवृत्तियों का प्रवाह इसी दिशा में गतिशील होना चाहिए। प्रायश्चित के लिए जितना भी साहस जगे, उसे पूरी तरह इसी दिशा में नियोजित कर दिया जाना चाहिए।
अब तक हुई आत्महत्या और ब्रह्महत्या का निराकरण करने के लिए आत्मकल्याण और ईश्वर अनुग्रह का वरदान पाने के लिए हमें पुण्य-प्रयासों को सर्वोत्तम प्रकार ज्ञानयज्ञ में निरत होना चाहिए और चोरी, व्यभिचार जैसे सामाजिक असाधारण दुष्कृत्यों के दंड से बचने के लिए उसी स्तर के कुछ साहसिक कदम बढ़ाने चाहिए। यह परामर्श प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को दिया जाता है। निश्चित रूप से इससे आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता है।
जागकर भी न तंद्रा मिटे आसुरी।
जागरण ब्रह्मकालीन भी व्यर्थ है।।
जो उगे, पर न निशि का तमस हर सके।
वह सुबह की सुनहरी किरण व्यर्थ है।।
मंजिलें दूर होतीं मनुज से सदा।
और वरते उन्हें वीर ही सर्वदा ।।
मार्ग में ही रुके लक्ष्य पाए बिना।
तीव्र गतिमान भी, वह चरण व्यर्थ है।। वह सुबह...
उम्र संकल्प की लघु न होती कहीं।
आस्था की न बवारी हथेली रहीं।।
पूर्ण जिसको नहीं आदमी कर सके।
वह बड़े से बड़ा व्रतवरण व्यर्थ है।। वह सुबह..
ज्ञान वर्चस्व को, आन को, बान को।
वीर सर्वस्व मिज मानते शान को ।।
आत्म सम्मान का मूल्य देकर मिले।
स्वर्ण का, हीर का, एक कण व्यर्थ है ।। वह सुबह...
ताज पाषाण का भी बना प्राणमय ।
बन गए स्वर्ण के पत्र श्रीनाथमय ।।
विश्व की श्री न शोभा, न सुषमा बढ़े।
कीमती हो मगर आभरण व्यर्थ है।। वह सुबह...
जिंदगानी बनी काम के वास्ते ।
भाग्य से कर्म के सब जुड़े रास्ते ।।
काट दे व्यक्ति आलस्य में ही जिसे ।
जिंदगी का वही एक क्षण व्यर्थ है।। वह सुबह...
संत जीते सदा दूसरों के लिए।
मुस्कराते व्यथा वेदनाएँ पिए।।
कष्ट जिससे मिले यदि किसी और को।
आदमी का वही आचरण व्यर्थ है।। वह सुबह...
प्राण आहुति बने लोक-कल्याण में।
व्यक्ति लाखों मिटे विश्व निर्माण में ।।
लेख जिसका न इतिहास में हो सके।
बस, समझ लो कि ऐसा मरण व्यर्थ है ।। वह सुबह...
— मायावर्मा
नमस्यामो देवान्नतु हत विधेस्तेऽपि वशगा ।।
विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियत कर्मैकफलदः ।।
फलं कर्मायत्त किममरगणैः किं च विधिना ।।
नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ।6।
— भतृहरि
देवताओं को हम प्रणाम करते हैं, पर वह तो ब्रह्मा के आधीन हैं और ब्रह्मा भी हम को पूर्व कर्मानुसार फल देते हैं, इसलिए फल और ब्रह्मा दोनों ही कर्म के आधीन हैं। इस कारण हम कर्म ही को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, जिस पर कि ब्रह्मा का भी वश नहीं चलता।
न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसातले।
एक्यं जीवात्मानों रहुर्योमं योग विशारदाः।।
— (देवी भगवत)
अर्थात— “योग न में है, न पृथ्वी में और न रसातल में। योगतत्त्व के ज्ञाता जीवात्मा तथा परमात्मा की एकता को ही योग कहते है।”
वांछितार्थ फलं सौख्यामद्रियाणाञ्च मारणम्।
एतदुत्त्कानि सर्वाणि योगारुढस्य योगिनः।। 34
— शिव संहिता 4/34
अभीष्ट प्रयोजनों की प्राप्त सुख तथा इंद्रिय निग्रह। यह सब सफलताएँ योगसाधक को मिलती हैं।
योगहीनं कथं— ज्ञानं मोक्षदं भवतीह भो।
योगोपि ज्ञानहीनस्तु न क् षमो मोक्षकर्माणि।।
“तस्यमात्र ज्ञानं च योगं च मुमुक्षुर्द्द ढ़मभ्यसेत्।
— योगशिखोपनिषद्
“योगहीन ज्ञान और ज्ञानहीन योग कभी भी मोक्षप्रद नहीं होता। इसलिए ज्ञान और योग इन दोनों का ही मुमुक्षजन को दृढतापूर्वक अभ्यास करना चाहिए।”
आमं कुम्भमिवाम्भस्थो जीर्यमाणः सदा घटः।
योगानलेन संदह्च घटशुद्धि समाचरेत् ।।8।।
— घोणु संहिता
जैसे कच्ची मिट्टी का घड़ा जल भर देने से गलकर नष्ट हो जाता है; किंतु उसे पका लेने पर नष्ट नहीं होता, वैसे ही योगाग्नि में शरीर को पका लेने से काया शुद्ध, परिपक्व हो जाती है।
धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिार्शचरं गेहिनी ।
सत्यं सुनूरयं दया च भगिनी भ्राता मनःसंयम ।।
शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतम् भोजनः।
मेते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् भयं योगिनः ।।
अर्थात— “धैर्य जिनका पिता तथा क्षमा जननी है, चिरशांति जिनकी पत्नी है, सत्य पुत्र है, दया भागिनी है, मन का संयम भ्राता है, पृथ्वी ही जिनकी शैया है, दिशाएँ वस्त्र हैं, ज्ञानामृत भोजन है, जिसके ये सब कुटंबी हैं। ऐसे योगीजनों को किससे भय हो सकता है।
जिह्वाधो नाड़ीं संछिन्नां रसनां चालायेत्सदा ।
दीहहेन्नवती तेन लोहयंत्रेण कर्षयेन् ।।23।।
एवं नित्यं समभ्यासल्लम्बिका दीर्घताम ब्रजेत् ।
यावन्दच्छेद भ्रू वोर्मध्ये तथा गच्छति खेचरी ।।24।।
रसना तालुमध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत् ।
कपाल कुहरे जिह्वा प्रथिष्टा विपरीतगा ।।
भ्रू वोर्मध्ये गतां दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।।25।।
भावार्थ : — जिह्वा के नीचे और उसकी जड़ को मिलाने वाली जो नाड़ी है, उसको छेदता हुआ निरंतर रसना के अग्रभाग को परिचालित करे प्रतिदिन ऐसा करने से जिह्वा बढ़ी हो जाती है। क्रम से अभ्यास द्वारा जिह्वा को इतना लंबा करें, वह भौह के मध्य तक पहुँच जाए, जिह्वा को क्रमशः तालुमूल में ले जाएँ। तालु के बीच के गड्ढ़े को कपाल-कुहर कहते हैं। जिह्वा को इस कपाल-कुहर के मध्य में ऊपर को उलटी करके ले जाएँ और दोनों भौहों के मध्यस्थल को देखता रहे— इसे खेचरी मुद्रा कहते हैं।
— [घेरण्ड संहिता— तृतीयोपदेश]
अयं सूर्य्यः इवोपदृगयं सरांसि धावति।
— ऋग्वेद् 9/54/3
जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सौर्यमंडल को प्रकाशित करता है। यह सोम उसी तरह सारे विश्व में आच्छादित है। इन्हें ज्ञान के नेत्रों से देखा जाता है। इसका ध्यान सर्वविद्यासंपन्न विद्वान बनाता है।
अयं विश्वानि तष्ठिति पुनानो भुवनोपरि।
सोमो देवो न सूर्य्यः।।
— 9/54/3
यह सोमरस सूर्य कि भाँति समस्त भुवनों से ऊपर स्थित होकर संसार को पवित्र करते हैं।
बिंदु ब्रह्मसकृदृष्ट्वा मनस्तस्मिन्नियोजयेत्
स्वयमेव तु संपश्येद्देहे बिंदु च निष्कलम् ।
भ्रू दहरादुपरि सच्चिदानन्द तेजः कूट रुपम् ।
परब्रह्म अवलोकयन्तद्रू पो भवति गर्भजन्मजरा
मरण संसारभयात्संतारयेति तस्यात्तारक मिति।
— महायोग विज्ञान
भ्रूमध्य माग के ऊपर सच्चिदानंदमय तेज राशि विद्यमान है, उसे परब्रह्म कहते हैं। इस ब्रह्मबिंदु को देखने और उसमें मन लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त और कहीं मन न जाने दे। यह बिंदु ब्रह्म जन्म-मरण से छुड़ाता है, संसार सागर से पार करता है, इसलिए उसे तारक ब्रह्म भी कहते हैं। यह बिंदु ध्यान तारक योग भी कहलाता है ।
सं ज्यातिषा अभूमति स देवरभूमेत्यवतदाह।— श. 2/9/3/14
हम उस ज्योति में अपनी ज्योति मिलाकर ही देवतओं कि पंक्ति में बैठ सकने योग्य बनें ।
ध्यानात्मा साधकेन्द्रो भवति परपुरे शीघ्रगामी
मुनीन्द्रः सर्वज्ञः सर्वदर्शी सकलहितकर सर्वशास्त्रार्थवेत्ता।
अद्वैताचास्वादी विलसति परमापूर्वसिद्धिप्रसिद्धो
दीर्घायुः सोऽपि कर्त्ताः त्रिभुवनभवनै संहृतौ पालने च ।।35।।— षत्चक्र निरूपणम् 35
आज्ञाचक्र को सिद्ध कर लेने वाला दूरगामी बन सकता है, सूक्ष्म रूप धारण कर सकता है। परकाया प्रवेश कर सकता है। सबका हितकारी शास्त्रों का ज्ञाता ब्रह्मवेत्ता, प्रसन्नचित्त सिद्धि विद्याओं का ज्ञाता, दीर्घायु, लोकव्यवस्था में सहायता देने वाला बनता है।
यदाऽऽत्मतत्वेन ब्रह्मतत्वं
दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।— श्वेताश्वर 2/15
योग साधक आत्मा के द्वारा ही दीपक के समान प्रकाश युक्त ब्रह्मतत्त्व के दर्शन करता है।
नीहारघूमार्कानला निलानां
खद्योतविद्यत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरः सराणि
ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ।।11।।
— श्वेताश्वर 2/11
योगसाधक को कुहरा, धुआ, सूर्य, वायु, अग्नि,जूगनू, बिजली, स्फाटिक मणि, चंद्रमा जैसे कई प्रकाश दृश्य दिखाई पड़ते हैं । यह योग की सफता के चिह्न हैं।
सदा शिवोक्तनि सपादलक्ष
लयावधानानि वसन्ति लोके ।
नादानुसन्धानसमाधिमेकम्
मन्यामहे मान्यतमम् लयानाम् ।।
— योगतारावली भगवान शिव ने मन को लय करने की अगणित साधनाएँ बनाई हैं, पर उन सब में नादनुसंधान सबस सरल और श्रेष्ठ है।
सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा।
नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ।
— योगतारावली
यदि योग-क्षेत्र में प्राप्त करने की आकांक्षा हो तो सब ओर से मन हटाकर नाद-साधना में तत्पर होना चाहिए।
शिव गीता में भगवान शङ्कर इस भाव-साधना को ही सर्वोत्तम बताते हैं —
आत्मपूजासमा नास्ति पूजा रघुकुलोद्भव ।।
मत्सायुज्यमवाप्नोति चण्डालोऽप्यात्मपूजया ।।— शिव गीता
अपने आत्मा में जो पूजन करता है, उसकी बाराबर दूसरी पूजा नहीं। आत्मा में पूजन करने हारा।
चांडाल भी मेरे लोक को प्राप्त होता है। संपूर्ण शुभकर्म आत्मा ही के अर्पण करना, उसी का विचार करना पापाचरण न करना, यही आत्मा की पूजा है।
स होवाच बालाकिर्य एवैष आदर्शे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति ।
स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायां पुरुषस्तमेवाहवा अहमतमुपास इति
स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्दः पुरुषमन्वेति तमेवाहमुपास इति ।
— कोषीकि ब्रह्मयोग उपनिषद् 4/10
बालाकिर्य गार्य ने कहा — "इस दर्पण में स्थिति पुरुष की मैं ब्रह्मभाव से उपासना करता हूँ। प्रतिध्वनि में निहित पुरुष को ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ। गमनशील पुरुष के पीछे जो ध्वनिमुक्त पदचाप सुनाई पड़ती है, उसमें जो ब्रह्म है, उसी की मैं उपासना न करता हूँ।"
स होवाच बालाकिर्य एषैव छायायां पुरुषस्तमेवाहमुपास इति ।
स होवाच बालिकिर्य एवैष शारीरः पुरुष स्तमेवाहमुपास इति ।
स होवाच बालाकिर्य, एवष प्राज्ञ आत्मा येनैतत् सुप्तःस्वप्नयया चरति तमेवाहमुपास इति ।
देहधारी के साथ जो छाया रहती है, उस छाया पुरुष की ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ। यह जो पुरुष शरीर में निवास करता है, मैं उसे ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्व विचक्षणाः ।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ।।
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते ।।
— महायोग विज्ञान
अनेक विवेकवान व्यक्ति जो तत्त्वज्ञान में परिचित हैं, अपने आत्मपुरुषार्थ से ही अपना उद्धार कर लेते हैं। आत्मा ही आत्मा का गुरु है। प्रत्यक्ष और अनुमान के आधार पर विचारशील लोग अपना कल्याण आप कर लेते हैं।
आत्मा वा रे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छुतिः ।
सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी ॥३२॥
— शिव मंहिता १३२
आत्मा को सुनो, आत्मा का मनन करो। इस श्रुति के अनुसार प्रयत्नपूर्वक उस आत्मा की ही सेवा करनी चाहिए। वह बंधनों से छुड़ाती है ।
नास्ति ध्यानं बिना ज्ञानं नास्ति ध्यानमयोगिनः ।
ध्यानं ज्ञानञ्च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवार्णवः।।
ज्ञानं प्रसन्नमेकाग्रमशेषोपाधिवर्जितम् ।
योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्त्वेव सिद्ध्यति ।।
— महायोग विज्ञान
ध्यान बिना ज्ञान नहीं होता। न ध्यान बिना योग सधता है। ध्यान और ज्ञान दोनों के सहारे भवसागर पार किया जाता है। ज्ञान और एकाग्रता से उपाधिवर्जित मन प्रसन्न रहता है और योग-साधना से सिद्धि मिलती है।
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञान प्रसादेन विशुद्धसत्व
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ।।
— मुण्डक 3/1/8
वह परमेश्वर वाणी, नेत्र आदि इंद्रियों से नहीं देखा जाता, न उसे बाह्यक्रिया-कृत्यों से ही पाया जा सकता है। निर्मल अंतःकरण वाले ज्ञानवान ही ध्यानावस्था में उसका दर्शन करते हैं।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या ।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषाऽऽवृतः ।।— अथर्व. 10-23-1
यह शरीर आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली देवपुरी अयोध्या है, जिसमें सोने का एक ज्योतिस्वरूप एवं स्वर्ग-सा रमणीय प्रकोष्ठ— मस्तिष्क है।