कच्ची आस्तिकता से नास्तिक होना अच्छा

परमात्मा की नाम रट लगाना ही यदि आस्तिकता है तो मुझे नास्तिक कहलाने में कोई ऐतराज नहीं। मैंने यह सोचा और जाना है कि अपने आपको समझना और अन्तरात्मा को विकसित करना पूजा करने से अधिक श्रेयस्कर है। मैं अपने पर आस्था रखता हूँ पर अगाध श्रद्धा करता हूँ क्योंकि वही मेरा भगवान् है। मैं सोचता हूँ यदि अपने आपे को भगवान् बनाया जा सकें तो फिर आस्तिकता का असली प्रयोजन पूरा हो जाएगा पर यदि आस्तिकता की परिभाषा यह है कि व्यक्ति कितना ही निकृष्ट बना रहें और थोड़ा पूजा-पाठ करके अपने को पवित्र होने और समुद्यत होने का उद्देश्य पूरा हो सकता है तो मुझे उस मान्यता से इनकार करना होगा। और यदि यह मत-भेद मुझे नास्तिक घोषित करे तो अपने को नास्तिक कहलाने में भी मुझे कोई ऐतराज नहीं है।


पेड़ के सहारे बेल भी ऊपर चढ़ती है

वर्षा ऋतु आने पर बादल बरसते हे तो सूखे हुए नदी, नाले उफन पड़ते हैं। तालाब, पोखर भर जाते हैं और सर्वत्र जल ही जल भरा हुआ समुद्र जैसी हिलोरें ले रहा होता है।

उस प्रवाह में कूड़ा-करकट भी बहाने और तैरने लगता है। बड़े और भारी वृक्ष उस पानी के बहाव में कहीं से कहीं बहते हुए चले जाते हैं। कई बार तो उन लकड़ी के लट्ठों और बहते हुए पेड़ों पर बैठकर मनुष्य और पशु पक्षी पार हो जाते हैं। पर यह दृश्य और लाभ रहता तभी तक है जब तक कि वर्षा ऋतु रहती है और बादलों की अजस्र जल धार बरसती है।

कभी-कभी ऐसा सुअवसर आता है कि भगवान की इच्छा से कोई देवदूत महामानव धरती पर अवतरित होते हैं और वे सूखे संसार में हरियाली उत्पन्न करने के लिये अजस्र रूप में अमृत जैसी जलधारा बरसाते हैं। उस समय मरे हुए कीट पतंगों तक के बीज भी हरे हो जाते हैं और सब और जीवन लहलहाने लगता है। इस अवसर का लाभ उठाकर कितने ही सद्भाव सम्पन्न सहज ही भव सागर से पार हो जाते हैं। और अपने शुष्क जीवन को हरा-भरा बना लेते हैं।

भगवान् राम आये, रीछ, बानर तक तर गये। शबरी, अहिल्या, केवट, विभीषण ने लाभ लिया। भगवान् कृष्ण के समय गोप-गोपियों को सहज ही वह लाभ मिल गया जो दूसरों को कठिनाई से ही मिलता है। बुद्ध ने सामान्य मनुष्यों को ऋषि और अम्बपाली, अंगुलिमाल जैसों को महामानव बना दिया। गाँधी के समय कितने साधारण व्यक्ति ऐतिहासिक महापुरुष बन गये।

यह अमृत वर्षा कभी-कभी होती है। विवेकवान् व्यक्ति उस अवसर को पहचानने में और उसका लाभ लेने में चूकते नहीं। साधारण समय में सामान्य प्रयत्नों से जो पाया जाना किसी प्रकार सम्भव न होता वह ऐसे ही अवसरों पर मिल जाता है। चतुर किसानों वर्षा का लाभ लेते हैं, पर जो उस अवसर का महत्त्व नहीं जानते वे समय निकल जाने पर पछताते ही रह जाते हैं।

राम का सहारा लेकर हनुमान् ऊँचे उठे। कृष्ण का पल्ला पकड़ कर अर्जुन अमर हुए। बुद्ध के साथ आनन्द और अशोक की चर्चा होती रहेंगी। गाँधी के साथ विनोबा और जवाहरलाल जुड़े रहेंगे। रामकृष्ण परमहंस के साथ विवेकानन्द, समर्थ रामदास के साथ शिवाजी उसी तरह ऊँचे चढ़े जैसे पेड़ पर छाई हुई बेल भी आकाश को छूने लगती है।

स्वाति नक्षत्र की वर्षा का लाभ लेकर सीप में मोती, बाँस में बंसलोचन, केले में कपूर उत्पन्न होने की बात सूनी जाती है। पपीहा की चिर अतृप्ति उसी अवसर पर तृप्त होती है। जो चूक जाते हैं उन्हें एक वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। समय व्यक्ति के लिए नहीं लौटता-व्यक्ति को समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और जब तक वह आये तब तक सतर्कता और तत्परता बरतनी पड़ती है।

देवदूतों का अवतरण विश्व की समस्याओं को हल करने के लिये होता है। वे दुष्कृतों के विनाश और धर्म संस्थापन के लिए आते हैं पर ईश्वरीय प्रयोजन के साथ-साथ जागृत आत्माओं का कल्याण भी करते हैं।

जहाज में बैठाकर सैकड़ों हजारों को पार जाने का अवसर मिलता है पर एक बहती टहनी पर बैठकर कौआ भी पार नहीं हो सकता। स्वल्प सामर्थ्य वाले अपना तक कल्याण नहीं कर सकते दूसरों को क्या पार करेंगे। सकुशल और स्वल्प प्रयास में पार जाने वाले मजबूत नाव और सकुशल मल्लाह का सहारा लेते हैं और तैरना न जानते हुए भी, उफनती नदी को पार कर लेते हैं।

महामानवों का आश्रय जहाज का आश्रय लेकर पार जाने की तरह है। बुद्धिमान वे है जो ऐसे अवसर का ध्यान रखते हैं और यदि मिल जाय तो उसे चूकते नहीं।


विश्व ब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत ब्रह्मसत्ता

विश्व अस्तित्व की तीन इकाइयाँ मानी गई हैं-(1) ईश्वर , (2) जीव , (3) प्रकृति

ईश्वर तीन गुणा वाला है। सत् , चित , आनन्द तीन उसके गुण हैं। सत् अर्थात् अस्तित्व युक्त। जो है, था, जो रहेगा। उस अविनाशी तत्त्व को सत् कहते हैं। चित् अर्थात् चेतना। जिसमें सोचने , विचारने, निर्णय करने एवं भावाभिव्यक्ति युक्त होने की विशेषताएँ है और उसे चित् कहेंगे आनन्द-अर्थात् सुख, सन्तोष और उल्लास का समन्वय। ईश्वर अस्तित्ववान है, चैतन्य है तथा आनन्दानुभूति में भरा पूरा है। इसलिये उसे सच्चिदानन्द कहते हैं।

जीवन के दो गुण हैं-सत् और चित्। वह अस्तित्ववान है। ईश्वर से उत्पन्न अवश्य है पर लहरों की तरह उसकी स्वतन्त्र सत्ता भी है और वह ऐसी है कि सहज ही नष्ट नहीं होती। मुक्ति में भी उसका अस्तित्व बना रहता है और निर्विकल्प, विकल्प स्थिति में सारूप्य, सायुज्य, सालोक्य, सामीप्य का आनन्द अनुभव करता है। प्रलय में सब कुछ सिमट कर एक में अवश्य इकट्ठा हो जाता है फिर भी वह आटे की तरह एक दीखते हुए भी जीव कणों की स्वतन्त्र सत्ता बनी रहती है। मूर्छा, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्रा एवं समाधि अवस्था में भी मूलसत्ता यथावत् रहती है। मरणोत्तर जीवन में रहता ही है। इस प्रकार जीव की सत्-अस्तित्ववान स्थिति अविच्छिन्न रूप से बनी रहती है।

जीव का दूसरा गुण है-चित् चेतना उसमें रहती ही है। यह चेतना ही उसका ‘स्व’ है। अहंता- इगो- सैल्फ- आत्मानुभूति इसी को कहते हैं। तत्वज्ञानियों से लेकर अज्ञानियों तक में यह स्थिति सदैव पाई जाएगी ईश्वर में आनन्द परिपूर्ण है। जीव उसकी खोज में रहता है, उसे प्राप्त करने के लिए विविध प्रयास करता है। और न्यूनाधिक मात्रा में- भले बुरे रूप में उसी की प्राप्ति के लिये लालायित और यत्नशील रहता है।

प्रकृति में एक ही गुण है-सत् उसका अस्तित्व है। अणु परमाणुओं के रूप में-दृश्य और अदृश्य प्रक्रिया के साथ जगत की सत्ता के रूप में प्रकृति को देखा जा सकता है। ईश्वर और जीव दोनों की क्रिया-कलाप इस प्रकृति सघन होकर-पञ्च तत्त्वों की अपेक्षा एक महातत्व में विलीन हो जाती है। इस प्रकार जब, कभी इस विश्व ब्रह्माण्ड की लय प्रलय होगी तब ईश्वर के सत् तत्त्व में प्रकृति लीन हो जाएगी जीव चित् में घुल जाएगा और उसका अपना अतिरिक्त गुण आनन्द-यथावत्-बना रहेगा।

महासृष्टि के आरम्भ का क्रम भी यही है। तत्त्व-दर्शियों के अनुसार ब्रह्म में स्फुरणा होती है एक से बहुत होने की । वह अपने को अंश रूप में विभक्त करके एक से अनेक बनाता है और जीव सत्ता का अस्तित्व विनिर्मित होता है। स्फुरणा द्वारा जीवन की उत्पत्ति के बाद उसकी दूसरी उमंग आगे आती है। वह है-इच्छा आनन्द को निराकारिता को साकारिता में परिणत करने के लिये पदार्थ की आवश्यकता होती है। इच्छा का प्रतिफल ही आवश्यकता, आविष्कार और आविर्भाव के रूप में सामने आता है। यह प्रकृति है। स्फुरणा से जीव और इच्छा से प्रकृति का निर्माण करके बाह्य साक्षी और दुष्टा के रूप में सर्वत्र विद्यमान् रहता है और इस जगत की सारी प्रक्रिया की स्वसंचालित पद्धति को बनाकर अपने क्रिया कर्तव्य का आनन्द लेता है।

जीव और प्रकृति में ईश्वर समाया भी रहता है ताकि उनके मूलधर्म-गुण कर्म, स्वभाव, यथावत् अस्तित्व में बना रहे। क्रम और नियन्त्रण की-जन्म विकास और मरण की-जो क्रिया-प्रक्रिया चलती रहती है उसे सृष्टि में ईश्वर का समावेश कह सकते हैं। इतना होते हुए भी यह सब कुछ स्वचालित स्तर का बना हुआ है। हर काम में ईश्वर को हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता।


गेहूँ का सदुपयोग-रोग और दुर्बलता विनाशक

दैनिक जीवन में सीधे साधे ढंग से काम आने वाली वस्तुओं का महत्त्व हम भूल जाते हैं और कभी-कभी मिलने वाली, अजनबी तथा महँगी वस्तुओं को नियमित समझ कर अपनाने के लिए दौड़ते हैं।

गेहूँ को ही लीजिये वह रोज खाये जाने वाला अभ्यस्त अत्र है। पर उसका महत्त्व भी हम कहाँ समझते हैं और कहाँ उसका सदुपयोग करते है? गेहूँ का छिलका जिसे भूसी या चोकर कहा जाता है आमतौर से उसे छानकर फेंक देते हैं। और यह भूल जाते हैं कि उनमें बहुमूल्य जीवन तत्त्व विटामिन और खनिज-मिनिरल भरे होते हैं। एक आदमी के आटे में जितना चोकर निकलता है उतने में बाज़ार से खरीदे जाने वाले एक रुपया मूल्य से अधिक के विटामिन और मिनिरल होते हैं। यदि चोकर समेत रोटी खाई जाय तो पौष्टिक तत्त्व खरीदने के लिए औषधि विक्रेताओं का दरवाजा खटखटाने और रंग-बिरंगी शीशिया खरीदने में जेब खाली न करनी पड़े

एक दिन रात पानी में भिगोकर यदि गेहूँ खाया जाय तो उसमें सूखे गेहूँ की अपेक्षा तीन गुने अधिक पोषक तत्त्व बढ़ जाते हैं। गेहूँ की महत्ता के सम्बन्ध में कुछ दिन पूर्व डॉ० एन॰ विरामोर ने पुस्तक लिखी हैं। नाम है-Why Suffer? Answar what grass manna मूल्य तीस रुपया है। उसे निसर्गोपचार आश्रम, उसली कंचन (पूना) से प्राप्त किया जा सकता है।

इस पुस्तक में लेखिका ने गेहूँ की नव अंकुरित घास के रस में की अत्यधिक प्रशंसा का है और लिखा है-संसार में कोई रोग ऐसा नहीं जिसे इस घास के उपयोग से अच्छा न किया जा सकता हो। उन्होंने इसे बुढ़ापा दूर करने वाली महत्त्वपूर्ण पुष्टाई भी बताया है और उन अनुसंधानों का विवरण दिया है जिनमें कठिन रोगों पर इस रस के उपयोग से विजय प्राप्त की गई। वे इसे ‘हरे रक्त’ की उपमा देती है और कहती है यह रस मानव रक्त से 40 प्रतिशत मेल खाता है।

इस रस को बनाने की विधि इस प्रकार है-एक दर्जन मिट्टी के गमले या ऐसे ही कोई चौड़े बर्तन ले लीजिये। उनमें खाद और मिट्टी भर दीजिए। इनमें अच्छे किस्म का गेहूँ बो दीजिए। थोड़ा पानी डालिये और छाया में किसी बरामदे में इन गमलों को रख दीजिए। तीन-चार दिन में अंकुर उग आयेंगे और आठ-दस दिन में वे सात-आठ इंच बढ़ जायेंगे।

इनमें से 30-40 पौधे पहले दिन जड़ सहित उखाड़ लें। जड़ को काट कर फेंक दीजिए। बाकी घास को धोकर सिल पर थोड़े पानी के साथ पीस लीजिए। इससे लगभग आधे गिलास ठण्डाई जैसा रस बन जाएगा इसे छानकर पिया जाय। सुबह शाम दोनों समय यह रस पीना चाहिए। यह हर मर्ज की औषधि का काम देगा और पोषण में किसी कीमती फल के रस से कम उपयोगी सिद्ध न होगा। रस न निकालना हो तो उस घास के छोटे टुकड़े काटकर सलाद की तरह अथवा साग-सब्जी में मिलाकर खाये जा सकते हैं।

इस घास को सात-आठ इंच से बड़ा नहीं होने देना चाहिए। बड़े होने पर उनकी उपयोगिता घट जाती है। एक दर्जन गमलों की जरूरत इसीलिए पड़ती है कि जिस गमले से घास उखाड़ी गई है उसमें उसी दिन नया गेहूँ बो दिया जाय। इस प्रकार इन अंकुरों का ऐसा फेर बना रहे कि वे नियमित रह सकते हैं। रस ज्यादा देर नहीं रखा रहना चाहिए। धारोष्ण दूध की तरह उसकी उपयोगिता तुरन्त पीस छानकर पीने में ही है। दो घण्टा भी रखा रहने दिया जाय तो उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाएगी हाँ, घास इतनी जल्दी खराब नहीं होती वह एक दो दिन रखी रहने भी दी जा सकती है।

दूसरा लाभप्रद प्रयोग यह लिखा है-आधा कप गेहूँ धोकर किसी साफ बर्तन में दो कप पानी में भिगो दीजिए इसे बारह घण्टे बाद निकालिये और छानकर सुबह शाम दो बार पीजिए। गेहूँ का दलिया बना कर खायें।


मनुष्य का प्रचण्ड चुम्बकत्व और तेजोवलय

कभी-कभी जलयानों पर समुद्र और जलयान के सम्मिलित प्रभाव से एक शीतल अग्नि उत्पन्न होती है और वह जहाज के मस्तूल, रस्से तथा प्रत्येक भाग पर चमकती दिखाई देती है। यों यह एक प्रकार से विद्युत ही है पर हानि रहित है। इससे किसी वस्तु या व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचती। पुराने लोग इसे ‘सन्त एस्यो की अग्नि’ कहते थे और समझते थे कि यह जहाज पर कोई सृजनात्मक वरदान बरस रहा है। अब उसे ‘जलयान का प्रेत’ कहा जाता है। वैज्ञानिक विश्लेषण यह है कि समुद्रीय रासायनिक पदार्थ ,लहरों की तरंगें तथा जहाज की हल-चलें सब मिलाकर इस ज्योति का सृजन करते हैं और उस सूक्ष्म उत्पादन से सब मिलाकर जलयान की मजबूती को बल ही मिलता है।

कोहरे भरी रातों में आकाशस्थ तारागणों के इर्द-गिर्द एक धुँधली नीली झलक लिये हुए सफेद रोशनी का तेज मण्डल छाया रहता है। कभी-कभी वर्षा ऋतु में चन्द्रमा के चारों ओर भी प्रकाश का एक गोल घेरा दिखाई पड़ता है। इंजीनियर की भाषा में इसे ‘कोरोना’ कहते हैं। इसका कारण उन प्रकाश पुँज तारकों के उच्च तनाव का विकिरण अवरोध है। जलबिन्दु जब उनके प्रकाश ऊर्जा के क्रमबद्ध विस्तार में अवरोध उत्पन्न करते हैं तो इस प्रकार का चमकदार घेरा बन जाता है।

ठीक इसी प्रकार मनुष्य के चारों ओर एक तेजोवलय छाया रहती है। इसमें विद्युत कण, चुम्बकत्व, रेडियो विकिरण, चेतनायुक्त ऊर्जा भरी रहती है। इसे यन्त्रों से भी जाना व नापा जा सकता है और समीपवर्ती लोग इसे अपने शरीर और मन पर पड़ने वाले अदृश्य प्रभाव के आधार पर अनुभव कर सकते हैं। कई व्यक्तियों की समीपता अनायास ही बड़ी, सुखद, प्रेरणाप्रद और हितकर होती है, कइयों का सान्निध्य अरुचिकर और कष्टकर प्रतीत होता है इसका वैज्ञानिक कारण व्यक्तियों के शरीर से निकलने वाली इस ऊर्जा का पारस्परिक आकर्षण विकर्षण ही होता है। समान प्रकृति के लोगों की ऊर्जा घुलती मिलती और सहयोग प्रोत्साहन प्रदान करती है पर यदि समीपवर्ती व्यक्तियों की प्रकृति में प्रतिकूलता हो तो वह ऊर्जा टकराकर वापिस लौटेगी और घृणा, अरुचि, अप्रसन्नता, खीज़ सी प्रतिक्रिया उत्पन्न करेंगी।

श्मशान में कई बार धुँधले प्रकाश की गोलियाँ लहरें अथवा धुन्ध उड़ती देखी जाती है। शरीर के जल जाने पर मृत व्यक्ति का तेजोवलय किसी रूप में विद्यमान् बना रह सकता है कब्र में गाढ़े गये व्यक्ति की लाश सड़ जाने पर भी उसका तेजोवलय उस क्षेत्र में उड़ता रह सकता है इसे कभी-कभी आँखों से देखा जाता है और कभी उधर से निकलने वालों को रोमांच, कँपकँपी, धड़-करने के रूप में इसका असुखकर अनुभव होता है ऐसी अनुभूतियाँ भय और आशंका का भी कारण हो सकती है। पर कितनी ही बार पूर्ण निर्भय और मरणोत्तर सत्ता को अस्वीकार करने वाले व्यक्ति भी उस तरह की अनुभूति करते हैं और कहते हैं उन्हें उस क्षेत्र में कुछ अदृश्य हल-चल का आभास हुआ।

मरघट में तांत्रिक साधनाएँ करने, कापालिक के मृतकों की खोपड़ी को साफ करने, उससे जल पीने जैसी अघोर क्रियाओं के पीछे मृतकों की अवशिष्ट वलय ऊर्जा का उपयोग करने का सिद्धान्त ही कार्यान्वित होता है। उपयोग करते हैं वरन् किन्हीं अन्यों के शरीरों में ऊर्जा का दोहन भी करते हैं। पशुबलि जैसे घृणित कर्म इसी स्तर का लाभ उठाने के लिए किये जाते हैं।

मनुष्य की अन्तरंग प्राणशक्ति का वाह्य परिचय उसके तेजोवलय के आकार विस्तार एवं सघनता एवं चुम्बकीय प्रखरता के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। संवेदनशील व्यक्ति दूसरों के इस बाहर फैले हुए अन्तरंग व्यक्तित्व को आसानी से परख सकते हैं और उसके स्तर का पता लगा सकते हैं। कई बार यह वलय इतना तेजस्वी होता है कि समीपवर्ती क्षेत्र को अपने प्रभाव से भर देता है, इस सीमा में प्रवेश करने वाले वाले व्यक्ति इसी प्रवाह में वहन लगते हैं।

तपस्वियों के आश्रमों में हिंसक और अहिंसक प्राणी बैर भाव भूलकर प्रेम भाव से रहते देखे गये है। नेताओं में इस प्रकार की विशेषता प्रायः पाई जाती है। उनका आकर्षण लोगों को प्रभावित सहमत करता है। यदि यह प्रभाव उथला है तो सम्मोहित व्यक्ति थोड़े ही समय में उस प्रभाव से मुक्त होकर पूर्व स्थिति में आ जाते हैं। पर यदि उसमें सघनता हुई तो प्रभाव भी स्थायी बना रहता है। यह प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हर क्षेत्र में पाये जाते हैं। और साथियों को प्रभावित करते हैं। डाकुओं तक को साथी मिल जाते हैं और सामने आने पर प्रतिरोध करने वालों की घिग्घी बँध जाती है। रूप और सौंदर्य में शरीर की गति सुकोमल ऊँची रहती है, रुचिर लगती है नर्तकियाँ वार बंधुओं से लेकर छोटे बालकों की सुकोमलता में ऐसा आकर्षण पाया जाता है जो सम्पर्क में आने वालों का मन बरबस अपनी ओर खींचे इस आकर्षण के पीछे कोई गहरा कारण नहीं है मात्र तेजोवलय की वह प्रभाव शाली शक्ति ही काम करती है जिसके आगे दूसरे अनायास ही झुकते खिंचते चले जाते हैं। इस मानवी चुम्बकत्व को वैज्ञानिकों की भाषा में क्लेयर वाएन्स कहते हैं।

तेजोवलय सम्पूर्ण शरीर के इर्द-गिर्द छाया रहता है। पैरों की ओर उसका घेरा कम होता है क्रमशः वह अधिक चौड़ा होता जाता है और मस्तिष्क तक पहुँचते-पहुँचते उसकी चौड़ाई प्रायः ड्योढ़ी हो जाती है। बेर का फल जैसे नीचे पतला नोकदार होता है और उसका सिरा मोटा होता है लगभग इसी प्रकार से आसपास यह प्रकाश पुंज फैला रहता है। इसकी चौड़ाई शरीर से बाहर 3 से 7 फुट तक की पाई जाती है।

खगोल वेत्ता जानते हैं कि आकाश में अनेकों तारे ऐसे है, जिनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। हो सकता है कोई तारा हजारों वर्ष पूर्व मर गया हो पर उसका प्रकाश अपनी चाल से चलता हुआ अब पृथ्वी पर आना आरम्भ हुआ हो और आगे हजारों वर्ष तक चमकता रहे। जब कि उसकी मृत्यु चिरकाल पूर्व ही हो चुकी है। प्रकाश की गति प्रति सेकेण्ड 1 लाख 86 हजार मील हैं। इस चाल से अधिक उसकी दौड़ नहीं पर मनुष्य मन इससे भी अधिक द्रुतगामी है। राकेटों को चन्द्रमा तक पहुँचने में कई दिन लग जाते हैं पर मन तो वहाँ एक क्षण में पहुँच सकता है। यह ध्यान रखने की बात है कि मन मात्र कल्पना ही नहीं है, वरन् इसके साथ चेतनात्मक ऊर्जा जुड़ी हुई हो तो वह प्रकाश की तरह ही एक सशक्त तथ्य बन जाती है और वहीं कार्य करती है जो अन्तरिक्ष व्यापी ताप, चुम्बकत्व जैसी शक्तियाँ काम करती है।

यदि प्रकाश की गति उल्लंघन करके अपनी चेतनात्मक ऊर्जा आगे निकल जाय और वहाँ जा पहुँचे जहाँ अभी हजार वर्ष पूर्व निसृत हुई प्रकाश तरंगें नहीं पहुँच पाई है तो निस्सन्देह इस समय की समस्त घटनाएँ इस प्रकार प्रत्यक्ष देखी जा सकती हैं मानो अभी-अभी ही वे घटित हो रही है। यदि हमारी शक्तिशाली अचेतन विद्युत संस्थान ध्यान चेतना को इतना सक्षम बनायें कि प्रकाश की गति पिछड़ जाय तो कोई कारण नहीं कि हम चिर अतीत की घटनाओं, व्यक्तियों को देख समझ न सकें। इतना ही नहीं जो महामानव हजारों लाखों वर्ष पूर्व दिवं-गत हो गये उनके अन्तरिक्ष में उड़ते हुए तेजोवलय के साथ सम्बन्ध बना सकते हैं और वही लाभ ले सकते हैं जो उनके पास बैठने या उनका प्रभाव ग्रहण करने से सम्भव हो सकता है। उपरोक्त सफलता प्राप्त करने वाला व्यक्ति श्री कृष्ण जी के मुख से निकली हुई गीता उसी तरह सुन सकता है। जिस तरह अर्जुन ने समीप बैठ कर सुनी थी। शुकदेव जी द्वारा परीक्षित को सुनाई गई भागवत् को ज्यों का त्यों सुना जा सकता है। वशिष्ठ जी द्वारा राम को सुनाई गई योग वशिष्ठ को अभी भी इसी रूप में श्रवण कर सकना कठिन न रहेगा राम चरित्र और कृष्ण चरित्र की सारी घटनाएँ यथा क्रम देखी जा सकेगी। त्रिकाल दर्शी ऋषि इस विद्या में पारंगत हो चुके थे और उनके हाथ में बहुत कुछ-सब कुछ जानने की शक्ति थी। इतना ही नहीं वे भावी घटना क्रम की सम्भावनाओं को मोड़ बदल भी सकते थे इसके प्रमाणों से अनेक शास्त्र पुराण भरे पड़े हैं। वे उपलब्धियाँ भविष्य में भी प्राप्त की जा सकती है।

वर्तमान में विभिन्न स्थानों में घटित हो रहे घटना क्रमों को दिव्यदर्शी व्यक्ति देख या जान सकता है। परस्पर संवादों और सन्देशों का विनिमय कर सकता है। इतना ही नहीं अपनी यदि उसके पास कोई प्रेरक एवं उपयोगी क्षमता होगी तो उसे किसी दूसरे के लिए प्रेरित करके उसे लाभान्वित भी कर सकता है। किन्तु लिए तप साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल का सम्पादन नितान्त आवश्यक है। हम चाहें तो शरीर बुद्धि और धन जैसी सम्पदाओं की तरह आत्म शक्ति की विभूतियों भी सम्पादित कर सकते हैं और इसके आधार पर हमारा मानवी चुम्बकत्व-तेजोवलय-इतना प्रचण्ड हो कसता है कि व्यक्तियों तथा वस्तुओं को अभीष्ट मात्रा में प्रभावित किया जा सके और अपने आपको हर क्षेत्र में समर्थ सफल सिद्ध किया जा सके।


धर्म की राह पर चलने वाला (kahani)

राजा था दयालु और धर्म की राह पर चलने वाला,? जनता के कष्टों को दूर करने का सदैव प्रयत्न करता रहता था ओर राजकुमार का स्वभाव राजा से बिलकुल विपरीत था। उसे निरपराध नागरिकों को यातना देने में आनन्द आता था। स्वभाव से दुष्ट और निर्दयी, बोलने में भी कर्कश। बात बात में उसे क्रोध आ जाता था।

राजा अपने पुत्र की इन हरकतों से बहुत खिन्न था। उसने स्वयं सुधारने का प्रयास किया। रानी ने भी नीति के मार्ग पर चलाना चाहा। कितने ही अध्यापकों की नियुक्ति की गई पर सबने हार मान ली। जितने प्रयत्न सम्भव थे उतने किये गये। राज्य की जनता में विरोध बढ़ता जा रहा था। और उधर उम्र के साथ उत्पात बढ़ रहे थे। सभी लोग किसी न किसी तरह उससे मुक्त होना चाहते थे। भगवान बुद्ध तक बात जा पहुँची उन्होंने उसे भलाई की राह पर चलाने का निश्चय किया। उन्होंने राजकुमार को अपने पास नहीं बुलाया वरन् स्वयं उसके पास गये।

भगवान बुद्ध अपनी बात कहने में बड़े व्यवहार कुशल थे वह रोग के अनुकूल निदान ढूँढ़ने में सिद्ध हस्त थे। उन्होंने राजकुमार को धर्म का कोई पाठ नहीं पढ़ाया और न लम्बा-चौड़ा व्याख्यान दिया। नरक की यातनाओं का भय दिखाने की भी उन्होंने कोशिश न की। वह घूमते हुए उसे एक छोटे नीम के वृक्ष के पास ले गये और कहा ‘राजकुमार। इस वृक्ष का पत्ता तो तोड़ कर देखो कैसा?’

राजकुमार ने वैसा ही किया एक पत्ते को मुँह में डाला तो सारा मुँह कड़वाहट से भर गया। इतनी बात में ही वह आपे से बाहर हो गया। भगवान बुद्ध से तो उसने कुछ नहीं कहा पर अपने नौकर को आदेश देकर उस वृक्ष को जड़ से कटवा दिया।

‘अरे राजकुमार’ तुमने यह क्या किया।’

‘इस पौधे के लिए तो यही किया जाना चाहिए था। अभी से जब यह इतना कड़वा है तो बढ़ने पर इसकी क्या स्थिति होगी मैं समझता हूँ साक्षात विष हो जायेगा। अतः मैंने उचित ही किया जो अभी से उखाड़ फेंका।’ राजकुमार ने उत्तर दिया।

भगवान बुद्ध इसी अवसर की प्रतीक्षा में थे। उन्होंने गम्भीरता पूर्वक कहा ‘राजकुमार यदि तुम्हारे दुर्व्यवहार और अत्याचारों से परेशान होकर यदि जनता तुम्हारे से वही व्यवहार करने को विवश हो जाये जो तुमने नीम के पौधे के साथ किया, तो तुम क्या करोगे? वह दिन था कि भगवान बुद्ध द्वारा दिखाई राह पर राजकुमार चल पड़ा और फिर कभी बुराई की राह पर न गया।


हीरा बनें या कोयला यह अपनी मर्जी की बात है।

एक ही पदार्थ विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार का बन जाता है। मूल तत्त्व में विशेष अन्तर न होने पर भी परिस्थितियों ऐसा कुछ कर देती हैं जिससे उसके स्वरूप, गुण एवं मूल्य में जमीन आसमान जितना अन्तर उत्पन्न हो जाय।

कार्बन को ही लें। वही अमुक तापमान पर हीरा बन जाता है और बहुमूल्य होता है। पर यदि वैसी परि-स्थितियाँ न मिलें तो सामान्य स्तर में ही बना पड़ा रहने के कारण उसकी उपयोगिता जलाऊ कोयले के रूप में नगण्य ही रह जाती है। काजल भी उसी का एक रूप है। इसे थोड़ा अच्छी स्थिति में रहना पड़े तो हीरे जैसा उपयोगी न सही, कोयले की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी और मूल्यवान बन जाता है।

हीरा कार्बन का सर्वोत्तम शुद्ध रूप है। ग्रेनाइट उसका निखरा रूप है। फिर कोयला इसके बाद काजल, कोयले भी कई तरह के होते हैं। लकड़ी के मुलायम कोयले जो चौका चूल्हे को हलकी फुलकी आवश्यकता पूरी करते हैं। पत्थर के कोयले जो कलकारखाने और भट्ठियों के काम आते हैं। हड्डी का कोयला जो गन्ने के रस का मैल साफ करने जैसे रासायनिक काम में आते हैं।

ग्रेनाइट कार्बन का दूसरा स्फटिकीय स्वरूप है। यह नरम हल्का, रबादार और चमकीला होता है। सीलोन, कनाडा, साइबेरिया आदि देशों में यह पाया जाता है। सीसे की पेन्सिल बनाने, चिकनी मिट्टी की प्याली बनाने, मशीनों को चिकना करने में इसका प्रयोग किया जाता है। बिजली के कुछ उपकरणों में भी यह काम में आता है।

कोयलें की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। काजल उन पदार्थों को जलाने से बनता है जिनमें कार्बन की अधिकता होती है। तारपीन का तेल, पिच, पेट्रोलियम, कपूर तेल, लकड़ी कोयला आदि जलाने से काजल बनता है और उसका उपयोग काले रंग के रूप में विविध संमिश्रणं के साथ किया जाता है।

सभी मनुष्य यों एक ही स्तर के है। उनकी शरीर संरचना एक ही प्रकार की है चमड़ी के रंग एवं आकृति में जलवायु के भेद से अन्तर पड़ता है पर प्रकृति का निर्धारण एक ही स्तर का हुआ है। इतने पर भी उनके गुण कर्म स्वभाव में जमीन आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। कोई कीट पतंगों जैसा तुच्छ, और पशुओं जैसा पिछड़ा जीवन जीते हैं और कितनों की गरिमा इतनी बढ़ी-चढ़ी होती है कि अपने प्रभाव से वातावरण में भारी हेर फेर परिवर्तन कर सके। सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों में अपने ही समान स्थिति में घसीट ले जाने की क्षमता कितनों में ही होती है, वे स्वयं ही नहीं गिरते उठते वरन् अपने साथियों को भी अपनी ही तरह गिराते उठाते हैं।

मनुष्य मनुष्य के बीच पाया जाने वाला यह अन्तर न तो अकस्मात् होता है, न जन्मजात ही है और न उसमें भाग्य, भगवान का कोई हस्तक्षेप है। परिस्थितियों मनुष्य को बनाती बिगाड़ती हैं-गिराती उठाती है। उन परि-स्थितियों का सृजन हर व्यक्ति अपनी उत्कंठा आकांक्षा और रीति नीति के आधार पर कर सकता है। करता है।

हम चाहें तो यथास्थिति स्वीकार करके कार्बन के उपेक्षणीय स्तर पर पड़े रहे। कोयला बनकर जलते रहें अथवा काजल की तरह अपनी कालिमा से दूसरों को भी काला बनायें। प्रगतिशील मनुष्य ग्रेनाइट की तरह अपने कर्म कौशल का परिचय देते हैं और उन्नति की उपलब्धियों से स्वयं लाभान्वित होते हैं दूसरों के काम आते हैं। सबसे श्रेष्ठ वे हैं जिन्होंने ऊँचा तापमान स्वीकार किया-तप साधना से अपने को हीरे की तरह बहुमूल्य बनाया जहाँ रहे वहाँ का यश गौरव बढ़ाया। अपनी पसंदगी की ऐसी ही कोई स्थिति लोग जान अनजान में स्वयं ही चुनते हैं। तद्नुरूप वैसे ही उठते गिरते हैं।


दिव्य विभूतियाँ श्रद्धालु को ही प्राप्त होती हैं।

आत्मिक क्षेत्र में सबसे बड़ी शक्ति ‘श्रद्धा’ है। श्रद्धा, अन्धविश्वास, मूढ़ मान्यता या कल्पना लोक की उड़ान या भावुकता नहीं, वरन् एक प्रबल तत्त्व है। भौतिक जगत में विद्युत शक्ति की महत्ता एवं उपयोगिता से अगणित प्रकार के कार्य सम्पन्न होते देखे जाते हैं। यदि बिजली न हो तो वैज्ञानिक उपलब्धियों में से तीन चौथाई निरर्थक हो जायेगी ठीक इसी प्रकार आत्मिक जगत में श्रद्धा की बिजली की महत्ता है। मनोयोग और भावनाओं के सम्मिश्रण से जो सुदृढ़ निश्चय एवं विश्वास विनिर्मित होता है। उसे भौतिक बिजली से कम, नहीं वरन् अधिक ही शक्ति-शाली समझना चाहिए। आत्म निर्माण का विशाल काय भवन उच्च आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा की चट्टान पर ही खड़ा किया जाता है। जिसे उत्कृष्ट-दिव्य जीवन की गरिमा पर परिपूर्ण श्रद्धा न होगी वह छुट-पुट प्रयत्न करते रहने पर भी आत्मिक प्रगति के मार्ग पर दूर तक-देर तक चल न सकेगा। आये दिन तनिक तनिक सी बात पर उसके पैर लड़खड़ाते रहेंगे किन्तु जिसने यज्ञीय जीवन जीने की महत्ता अन्तरंग के गहन स्तर से स्वीकार कर ली उसे अभाव और कठिनाइयों की तनिक सी असु-विधा आत्मसन्तोष की महान् उपलब्धि के सामने कुछ भी कठिन दिखाई न पड़ेगी।

श्रद्धा को सदुद्देश्य के लिए नियोजित कर देने का नाम ही आत्म शक्ति है। आत्मबल की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया उन सिद्धियों के रूप में तत्काल देखी जा सकती है जो न केवल अपने को ही महान् बनाती है वरन् सम्पर्क में आने वालों को भी इतना लाभ पहुँचाती है जितना आर्थिक और शारीरिक प्रचुर सहयोग देने पर भी सम्भव नहीं हो सकता।

उपासना, साधना, तपस्या, देव अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उस श्रद्धा का परिपाक ही समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया-कलाप मात्र कर्म-काण्ड बनकर ही रह जायेंगे और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखाई देगा।

जिन्हें मन की सत्ता और महत्ता का ज्ञान है उन्हें यह भी विदित है चेतना जगत में जिस प्राण शक्ति की अजस्र महिमा गाई जाती है वह अन्तरिक्ष में संव्याप्त विद्युत, चुम्बक, ईथर, विकिरण आदि सामान्य भौतिक संव्याप्ति की संकल्प शक्ति के आधार पर विनिर्मित एक अद्भुत ऊर्जा ही है। प्राण और कुछ नहीं भौतिक प्रकृति और चेतनात्मक संकल्प शक्ति का समन्वय ही है। प्राण धारियों को जीवित रखने उनकी मानसिक हलचलों को प्रखर बनाये रहने का कार्य ‘प्राण शक्ति’ द्वारा ही सम्पन्न होता है। कहना न होगा। बौद्धिक तीक्ष्णता से मस्तिष्कीय लाभ मिल सकते हैं। किन्तु प्रतिभा, व्यक्तित्व, आत्म-बल जीवन जैसी विशेषताएँ श्रद्धासिक्त प्राप्त शक्ति ही उत्पन्न करती है। महामानव, देवदूत, ऋषिकल्प एवं नर नारायण के रूप में सामान्य व्यक्ति को परिणत कर डालने की क्षमता केवल श्रद्धासिक्त प्राण शक्ति में ही निहित रहती है।

श्रद्धा का अर्थ है- आत्मानुगमन। शरीर में इन्द्रिय सुखोपभोग की वासना, लिप्सा भरी रहती है। मन में तृष्णा और अहंता की लालसायें-कामनाएँ उफनती रहती है। इन्हीं की माँग पूरी करने के लिए प्रायः हमारे सारे क्रिया-कलाप होते रहते हैं। जीवन क्रम इसी परिधि में घूमता और खपता है। औसत आदमी की गाड़ी इसी ढर्रे पर लुढ़कती है। ऐसे कम ही लोग है जो अन्तःकरण से भाव संस्थान की स्थिति और शक्ति से परिचित हैं। हमारे अन्तरंग में परमात्मा की सत्ता प्रतिष्ठित है जो निरन्तर उन उच्च आदर्शों को अपनाने के लिए अनुरोध करती रहती है जिनके लिए बहुमूल्य मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा की पुकार-आत्मा की प्रेरणा, आत्म की दिशा का यदि अनुगमन किया जाय तो उस आनन्द उल्लास में अन्तः भूमिका इतनी अभिरुचि एवं तत्परता के साथ संलग्न हो जाती है कि वासना और तृष्णा उपहासास्पद बाल क्रीड़ा मात्र प्रतीत होने लगती है। तब मन के चंचल-चित के उद्विग्न होने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता।

आत्मबोध, आत्मानुगमन, आत्मोत्कर्ष की सम्मिलित मनः स्थिति का नाम ही श्रद्धा है। यों किसी मन्त्र, आदर्श, व्यक्ति, धर्म आदि के प्रति निष्ठा को भी श्रद्धा कहते हैं पर उसका उच्च स्तर आत्मानुगमन से ही जुड़ा रहता है। जो इस स्तर की प्रेरणा उत्पन्न कर सके भावना उमंग सके वही सच्ची श्रद्धा है। कहना न होगा कि आत्म शक्ति की सुसम्पन्नता केवल श्रद्धालु लोगों को ही उपलब्ध हो सकती है।

पशु-पक्षियों में कितनी ही विशेषताएँ ऐसी पाई जाती है। जो मनुष्यों में नहीं होती। इन विशेषताओं का कारण यह है कि वे अपने अचेतन का पूर्णतया अनुगमन करते हैं। प्रकृति की प्रेरणाओं का उल्लंघन नहीं करते। तर्क और विचार को वे मर्यादित रखते हैं। अवांछनीय चिन्तन से उत्पन्न बौद्धिक विकृतियों के वे शिकार नहीं होते। जीवन की नीति निर्धारित करने में वे अन्तरात्मा का निर्देश स्वीकार करते हैं। मनुष्य की अपनी विशेषताएँ है और मस्तिष्कीय क्षमताएँ असाधारण रूप से मिली है पर दुर्भाग्य यही है कि वह उसे सही दिशा में प्रयुक्त न करके उद्धत चिन्तन में उलझता है। फलस्वरूप बौद्धिक प्रखरता के लाभ से वंचित रहकर उलटा शोक सन्ताप में बँधा जकड़ा रहता है।

वैराग्य का अर्थ लोगों ने घर-वार छोड़कर माँगना-सफेद कपड़े छोड़कर लाल पीले पहन लेना मान लिया है, पर वस्तुतः वह एक मनः स्थिति है जिसमें कर्तव्य कर्म पूरे उत्साह से करते हुए भी मन असंयम, राग, द्वेष रहित बना रहता है। अनासक्त कर्मयोग की गीता में सुविस्तृत चर्चा है। स्थिति प्रज्ञ और निर्विकल्प स्थिति का वर्णन है। इसी को वैराग्य कह सकते हैं। खिलाड़ी की भावना से जीवन खेल खेलना और नाटक में अपने जिम्मे का अभिनय पूरे मनोयोग से सम्पन्न करना यही कर्मयोग है’ हानि लाभ और सफलता असफलता को बहुत महत्त्व न देकर अपनी उत्कृष्ट शैली पर गर्व और सन्तोष अनुभव करना, यही है अनासक्त मनः स्थिति। शरीर को आहार-विहार और मन को चिन्तन के लिए उत्कृष्ट सामग्री प्रदान करना यही है सन्तुलित जीवन क्रम की रीति-नीति इसे जहाँ अपनाया जाएगा वहीं आन्तरिक स्थिरता की वह पृष्ठभूमि बन जाएगी जिसमें ध्यान योग, लययोग जैसी ब्रह्म सम्बन्ध की साधनायें सफल हो सकें।

बाहरी भाग दौड़ में जो श्रम पड़ता है उससे अवयवों को अधिक गतिशील होने का अवसर मिलता है। व्यायाम करने वाले तथा श्रमिक लोग भारी श्रम करने पर भी स्वस्थ बने रहते हैं इसका कारण यह है कि वह श्रम परक दबाव बाहरी रहता है, विश्राम मिलते ही उस दबाव की पूर्ति हो जाती है। पर यदि अवयवों में आन्तरिक दबाव रहे तो उसका बहुत दबाव पड़ेगा पेट, शिर, दाँत आदि किसी अवयव में यदि दर्द हो रहा हो तो उस भीतरी उत्तेजना से शरीर के सारे ढाँचे पर बुरा असर पड़ेगा और बड़ी मात्रा में शक्ति क्षीण होगी। ठीक इस प्रकार इन्द्रिय भोगों की ललक से शारीरिक तनाव अधिक बढ़ता है, काम सेवन की क्रिया में जितनी शक्ति क्षीण होती है उससे कहीं अधिक काम चिन्तन में नष्ट हो जाती है। इसलिए मानसिक व्यभिचार शरीर भोग की अपेक्षा कहीं अधिक स्वास्थ्य विघातक सिद्ध होता है। यही बात अन्य इन्द्रिय भोगों की ललक लिप्सा के सम्बन्ध में है। संयम की महत्ता जहाँ साधारण स्वास्थ्य नियमों के अनुरूप है वहाँ उसका एक लाभ यह भी है कि वासनात्मक उत्तेजना से होने वाली क्षति से बचा जा सकता है और उस बचाव से स्वास्थ्य संवर्धन में भारी सहायता मिल सकती है। वासना शान्त रहे तो शरीर की अन्तरंग. स्थिति समुचित विश्राम लाभ करती रहेगी और जीवनी शक्ति को अनावश्यक क्षति न पहुँचेगी। ध्यानयोग के लिए तो ऐसी शरीरगत अन्तः शक्ति की नितान्त आवश्यकता पड़ती है।

भौतिक जीवन की अनेक समस्याओं को हल करने के लिए तर्क, आशंका, अविश्वास, सन्देह, काट-छाँट प्रमाण परिचय, तथ्य अतथ्य आदि अनेक कारणों की विवेचना करनी पड़ती है और तब भी मन शंका शंकित रहता है तथा पूर्व निर्णय के सही सुनिश्चित होने में सन्देह बना रहता है। यह मनःस्थिति लाभ हानि एवं उचित अनुचित के बीच के उपयोगी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए आवश्यक है पर यह स्थिति आध्यात्मिक क्षेत्र में भी बनी रहे तो अनिश्चित विश्वास के कारण वह शक्ति उत्पन्न न हो सकेगी जिसके आधार पर कि आत्मबल बढ़ाने-उच्च आदर्श अपनाने और श्रद्धयान्वितः पृष्ठभूमि बनाई जाती है। कहना न होगा कि यदि श्रद्धा विश्वास का ईंट चूना न जुटाया जा सका तो आत्मिक प्रगति का भवन खड़ा ही न हो सकेगा।

आत्मिक प्रगति के लिए हमें श्रद्धा का जागरण करना चाहिए। आत्मानुगामी बनना चाहिए। आत्म निर्देश रूप सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए। जो इतना साहस कर सकेगा-अपनी आकांक्षाओं को उत्कृष्टता की दिशा में नियोजित कर सकेगा, उसे वासना और तृष्णा की तूफानी आँधियों का सामना न करना पड़ेगा और शक्ति का निरन्तर होने वाला अपव्यय सहज ही बचना आरम्भ हो जाएगा आत्मिक पूँजी इसी प्रकार जमा होती है। भौतिक विक्षोभों से विरत रह सकना कठिन लगता भर है, वस्तुतः वैसा ही नहीं। यदि अपने अन्तरंग में प्रवेश करते रहने वाले विचारों का वर्गीकरण मात्र करते रहे उनके विश्लेषण विवेचन के लिए सजग तत्परता प्रदर्शित करें तो सहज ही वे अवांछनीय विचार पलायन करने लगेंगे जिनके झमेले में अशान्त अन्तःकरण कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने से वंचित ही बना रहता है।

विचारों के प्रवाह में अपनी अन्तःचेतना को न बहने दे वरन् सूक्ष्म निरीक्षण करने की क्षमता विकसित करें। दुष्टा की तरह अपने को मस्तिष्क से कहीं ऊँचे स्थान पर अवस्थित अनुभव करें और जिस तरह गड़रिया अपने बाड़े में घुसने वाली भेड़ों की गणना करता तथा स्थिति देखता है उसी तरह अलग बैठे हुए यह निरीक्षण करें कि मस्तिष्क में किस स्तर के विचार प्रवेश करते और जड़ जमाते हैं। उनका वर्गीकरण करने का जब थोड़ा अभ्यास हो जाएगा तब प्रतीत होगा कि उनमें से कितने उपयोगी और अनुपयोगी थे।

मन को अपना काम करने देना चाहिए। जो भी विचार आयें उठें उन्हें आने उठने देना चाहिए। प्रयास में उन्हीं रोकने की जरूरत नहीं है, यह कदम बहुत आगे चलकर उठाया जाना चाहिए। मानसिक परिष्कार का प्रथम चरण यह है कि मस्तिष्क की स्थिति रुचि, रुझान का वैसा ही निरीक्षण किया जाय जैसा कि डाक्टर मल, मूत्र रक्त श्लेष्मा आदि की जाँच पड़ताल करके शरीर की वस्तुस्थिति समझने का प्रयत्न करता है। आत्मविश्लेषण इसी स्तर का प्रयास है। इसे ठीक तरह पूरा कर लिया जाय तो मनोनिग्रह की तीन चौथाई समस्या सहज ही हल हो जाती है।

चोर का साहस वहीं होता है जहाँ उसे यह भय नहीं रहता कि कोई देख रहा होगा। सेंध लगाने से पूर्व चोर यह पता लगाते हैं कि कहीं किसी की दृष्टि उनके कुकृत्य पर है तो नहीं। यदि पता चल जाय कि लोग जाग रहें है या देख-भाल कर रहें है तो फिर चोरी करने का साहस ही न पड़ेगा और वह उलटे पैरों लौट जाएगा अवांछनीय विचार उसी मस्तिष्क में प्रवेश करते तथा जड़ जमाते हैं जहाँ आत्म निरीक्षण एवं आत्म विश्लेषण की दृष्टि से बेखबरी छाई रहती है। जहाँ जागरूकता होगी-देख-भाल ढूँढ़ परख चल रही होगी वहाँ कुविचार अपने आप ही लज्जा, भय और ग्लानि अनुभव करते हुए अपनी हरकतें बन्द कर देंगे।

जब हम सोचते हैं कि मस्तिष्क हमारा घर है। इसमें किसे प्रवेश करने देना है किसे नहीं यह निर्णय करना हमारा काम है तब मन की स्थिति ही बदल जाती है। अनाड़ी घोड़ा किसी भी दिशा में भागता है और कुछ भी हरकत करता है पर जब मालिक उसकी पीठ पर चढ़ लेता है और लगाम तथा चाबुक की सहायता से निर्देश करता है तब ही उसे अपना अनाड़ीपन छोड़ना पड़ता है , मस्तिष्क रूपी घर में तभी तक चमगादड़ों और अवावीलों के घोंसले रहते हैं जब तक गृह स्वामी उन्हें सहन करता है, पर जब यह निश्चय कर लिया जाता है कि घर को साफ सुथरा रखा जाएगा तो मकड़ी के जाले, बर्र के छत्ते, चमगादड़ों के अड्डे और अवावीलों के घोंसले बल पूर्वक कब्जा नहीं जमाये रह सकते एक भी झटके का सामना वे नहीं कर सकते और जगह खाली करने के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं सकते कुविचारों की स्थिति भी ठीक ऐसी ही है। यदि अन्तः चेतना यह निश्चय कर ले कि अपने घर में-मस्तिष्क में-उद्धत विचारों को स्थान नहीं दिया जाना है तो निश्चित रूप से वे अपनी जगह खाली कर देंगे। जहाँ ढुलमुल संकल्प होते हैं वहीं उनकी घुस पैठ चलती है, सुनिश्चित निर्देश होने पर राहगीरों को दूसरे का वह पर खाली करना ही पड़ता है जिसे खाली देखकर उन्होंने कब्जा जमा लिया था।

आत्म विज्ञानी सदा से श्रद्धा की महत्ता प्रचारित करते रहें है। श्रद्धा को साधना का प्राण बताते रहें है। देव सत्ता के अनुग्रह में-प्रत्यक्षीकरण में-श्रद्धा तत्त्व को ही आधार कहा जाता रहा है। यह प्रतिपादन अक्षरशः सत्य है। कष्ट साध्य कर्मकाण्डों में उलझे रहने पर भी अश्रद्धालु व्यक्ति प्रायः खाली हाथ ही रहते हैं। दैवी शक्ति तो अन्तः करण में अवतरित होती है और वहीं से सिद्धि सफलताओं के रूप में बहिरंग जीवन में प्रस्फुटित होती है। यदि अन्तः क्षेत्र अशान्त, उद्विग्न, विक्षुब्ध होगा तो फिर वह अवतरण सम्भव ही कैसे हो सकेगा। स्वच्छ हवाई पट्टी पर ही तो वायुयान उतरते हैं, खाई खड्डों में उनका उतरना कैसे हो? कामना ग्रस्त-मनोविकारों से अस्त-व्यस्त मनोभूमि ऐसी हो ही नहीं सकती, जिस पर उच्चस्तरीय विभूतियाँ बरसे और दिव्य सम्पदाओं से सम्पन्न करें । इसके लिए उपयुक्त मानसिक स्तर तो उन्हीं का होगा जिन्होंने भौतिक आकर्षण उद्वेगों से, दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों से अपने चिन्तन को बचा सकने में सफलता प्राप्त कर ली होगी। श्रद्धा इसी मनः स्थिति का नाम हैं। उसी को समस्त आत्मिक सम्पदाओं की जननी निर्झरिणी कहा गया है। श्रद्धालु ही आत्मकर्ता के लक्ष्य को पूरा करते देखे जाते हैं।


एक यात्री प्रवास पर जा रहा था (kahani)

एक यात्री प्रवास पर जा रहा था। रास्ते में उफनती हुई नदी पड़ी। पार कैसे किया जाय। नाव होती तो काम चलता। दृष्टि दौड़ाई तो पास के घाट पर नाव दिखाई पड़ी। वह वहाँ पहुँचा और पेड़ से बँधे हुए नाव के रस्से को खोलकर पार जाने का प्रयत्न करने लगा।

एक दूसरा मनुष्य वहाँ खड़ा था। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा-मल्लाह नहीं, डाँड नहीं, पतवार नहीं, तुम्हें नाव चलाना आता नहीं। फिर इस प्रकार केवल नाव के सहारे कैसे पार हो सकेंगे?

यात्री माना नहीं। उसने कहा नाव की महिमा हमने सुनी है। उस पर बैठकर पार जाने का महत्त्व सर्व विदित है। असंख्य मनुष्य इसी आधार पर पार हुए हैं, तो हम क्यों नहीं हो सकेंगे

दूसरा मनुष्य कहता ही रहा कि नाव की कितनी ही महिमा क्यों न हो-मल्लाह डाँड नहीं, पतवार आदि की शर्त उस पार होने के साथ जुड़ी हुई है। इसके बिना पार होना सम्भव नहीं..................।

यात्री ने एक नहीं सुनी और नाव में एकाकी बैठकर पार जाने के लिए चल पड़ा।

नाव थोड़ी दूर बही और भँवर में पड़ कर उलट गई। यात्री मरा और डूबने वाली नाव को भी अपयश का भागीदार होना पड़ा।

राम नाव की नाव में बैठकर पार जाना तो स्पष्ट है पर उसके साथ, सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों की-उपयुक्त मार्ग दर्शक की शर्त भी जुड़ी हुई है।


दिव्यलोकों से बरसने वाला शक्ति-प्रवाह

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी के उभय पक्षीय संतुलन केन्द्र बिन्दु हैं। अन्तरिक्ष का असीम विकिरण पृथ्वी के इर्द-गिर्द मण्डराता रहता है। उसका एक सीमित अंश ही भूतल को स्पर्श कर पाता है। धरती के बहुत ऊपर एक जटिल आवरण कवच चढ़ा हुआ है। प्राचीन काल में योद्धा लोग जिरह बख्तर पहन कर युद्ध में लड़ने जाते थे और शत्रु के प्रहारों से आत्मरक्षा करते थे उसी प्रकार का कवच सुदूर अन्तरिक्ष में पृथ्वी ने भी धारण कर रखा है। अंतर्ग्रहीय विकिरण उसी से टकरा कर इधर उधर छितरा जाते हैं, यदि यह आवरण न होता तो अन्तरिक्ष से बरसते रहने वाले अनियन्त्रित शक्ति प्रवाह उसे कब का नष्ट भ्रष्ट कर देते।

सौर मण्डल के अन्य ग्रह उपग्रहों में यही एक विशेष कमी-कमजोरी है कि उनके पृथ्वी जैसा आवरण कवच नहीं। अतएव उल्का उनसे टकराती रहती है। विकिरण उन्हें प्रभावित करते रहते हैं। इन्हीं आक्रमणों ने उन्हें निष्प्राण बना रखा है यदि उन्हें भी धरती जैसा कवच मिला होता तो वे भी अपनी पृथ्वी की तरह ही सुन्दर, सुरभित और सजीव बने हुए होते।

अंतर्ग्रहीय ऊर्जाएं पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में होकर छनी हुई उपयुक्त एवं आवश्यक मात्रा में ही प्रवेश करती है। तदुपरान्त पृथ्वी को अभीष्ट परिपोषण देने के उपरान्त दक्षिणी ध्रुव में होती हुई बहिर्गमन हो जाती है। एक सिरे से प्रवेश करके चूहा जिस प्रकार बिल के दूसरे सिरे से निकलता रहता है। उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में एक ऐसी चुम्बकीय छलनी है जो केवल उसी प्रवाह को भीतर प्रवेश करने देती है जो उपयोगी है। छलनी में बारीक आटा ही छनता है। और भूसी ऊपर रह जाती है। ठीक इसी प्रकार ध्रुवीय छलनी में भी पृथ्वी के लिए उपयोगी विकिरण अन्दर आते हैं और शेष को पीछे धकेल दिया जाता है।

उत्तरी ध्रुव पर यह छानने की क्रिया टकराव के रूप में देखी जा सकती है। इस टकराव से एक विलक्षण प्रकार के ऊर्जा कम्पन उत्पन्न होते हैं जिनकी प्रत्यक्ष चमक उस क्षेत्र में प्रायः देखने को मिलती रहती है उसे ध्रुव प्रभा या मेरु प्रकाश कहते हैं। इसका दृश्यमान प्रत्यक्ष रूप जितना अद्भुत है उससे अधिक रहस्यमय उसका अदृश्य रूप है। इस मेरु प्रभा का प्रभाव स्थानीय ही नहीं होता वरन् समस्त भूतल को वह प्रभावित करता है। भू गर्भ में-समुद्र तल में-वायु मण्डल में-ईश्वर के महासागर में जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती रहती हैं-चढ़ाव उतार आते हैं उनका बहुत कुछ सम्बन्ध इस ध्रुव प्रभा एवं मेरु प्रकाश से होता है। इतना ही नहीं उसकी हल-चलें प्राणधारियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। मनुष्यों पर तो उसका प्रभाव विशिष्ट रूप से होता है। सुविज्ञ लोग उस प्रभाव प्रवाह में से अपने लिए उपयोगी तत्त्व खींच लेने-धारण कर लेने में भी सफल होते हैं और उससे असाधारण लाभ प्राप्त करते हैं।

ध्रुव प्रकाश सेटेलाइट के समान होता है। यह उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में ज्यादा तेज होता है। उत्तरी ध्रुव पर कभी-कभी गर्मी भी हो जाती है। दक्षिणी पर नहीं। उत्तरी ध्रुव पर एस्किमो रहते हैं दक्षिणी ध्रुव में पेन्गुइन पक्षी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता यह पक्षी आगन्तुकों से बहुत प्रेममय व्यवहार करते हैं। उत्तरी ध्रुव पर धरती भीतर को धँसी है 14000 फुट गहरा समुद्र बन गया है जबकि दक्षिणी ध्रुव 16000 फीट उभरा हुआ है। उत्तर में बर्फ बहती है दक्षिण में स्थिर रहता है दक्षिण ध्रुव में रात धीरे-धीरे आती है सूर्य दक्षिणी क्षितिज के लिए बहुत थोड़ी देर के लिए जाता है। सूर्यास्त का दृश्य घण्टों रहता है अस्त हो जाने पर महीनों अन्धकार छाया रहता है केवल मात्र उत्तर की ओर कुछ प्रकाश दिखाई देता है। एक बार ध्रुव यात्री बायर्ट ने यहाँ सूर्य को बिलकुल हरे रंग का देखा ऐसा दृश्य इससे पहले किसी ने नहीं देखा था किरणों की वक्रता के कारण ऐसे विलक्षण दृश्य वहाँ प्रायः देखने को मिलते रहते हैं।

ध्रुवों पर सूर्य की किरणों की विचित्रता के फल-स्वरूप अनेक विचित्रताएँ दृष्टिगोचर होती है। दूर की वस्तुएँ हवा में लटकती हुई जान पड़ती है। टीले जितने होते हैं उससे कई गुना बड़े लगते हैं। कई बार सूर्य एक के स्थान पर कई-कई दिखाई देते हैं और इसी प्रकार चन्द्रमा भी बर्फ में , हवा में भी कई बार सूर्य दिखाई दे जाते हैं। यह सभी कृत्रिम सूर्य वास्तविक जैसे ही लगते हैं।

पृथ्वी का चुम्बकत्व जो कि पृथ्वी के कण-कण को, पृथ्वी में पाये जाने वाले जीवन तत्त्व को प्रभावित करता है वस्तुतः ब्रह्माण्ड से आने वाले एक प्रकार के शक्ति या तत्त्व प्रवाह के कारण है। यह प्रवाह उत्तर की ओर से आता है इसलिए उत्तरी ध्रुव पर भी गुण धर्म से अलग-अलग है सामान्यतः दोनों चुम्बकीय ध्रुवों की विशेषताएँ एक समान किन्तु एक दूसरे से भिन्न दिशा में होनी चाहिए किन्तु कई बातों में समानता होने पर भी दोनों की विशेषताओं में बड़ा अन्तर है।

उत्तरी ध्रुव एक गढ़ा है दक्षिणी ध्रुव गुमड़ा। उत्तरी ध्रुव की बर्फ दक्षिणी ध्रुव से अधिक गर्म होती है जल्दी गलने और जल्दी ही जमने वाली भी होती है। दक्षिणी ध्रुव उजाड़ क्षेत्र है यहाँ कुछ पक्षी जलचर के अतिरिक्त एक पंखहीन मच्छर भी पाया जाता है वह क्या खाकर जीता है और कैसे इतनी भयंकर शीत में जीवन धारण किये रहता है वैज्ञानिक इस प्रश्न का आज तक समाधान नहीं कर सकें।

उत्तरी ध्रुव में जीवन का बाहुल्य है पौधों तथा जन्तुओं की संख्या करोड़ों तक पहुँचती है। यहाँ दिन और रात समान नहीं होते 6-6 माह के भी नहीं होते-कई बार रात 80 दिन के बराबर होती है यह सबसे लम्बी राम होती है। क्षितिज के बीच सूर्य वर्ष में 16 दिन रहता है। यहाँ चन्द्रमा इतनी तेजी से चमकता है। कि उससे प्रकाश में दिन में सूर्य की रोशनी के समान ही काम किया जा सकता है।

कुछ मेरु प्रकाश विस्तृत और आकृति हीन होते हैं कुछ सजीव और हलचल करते हुए। कभी वे किरणों की लम्बाई के रूप में जाने पड़ते हैं कभी प्रभा और ज्वाला के रूप में कभी वह दृश्य बदलता हुआ कभी चाप, पड़ी और कोरोना के रूप में होता है तो कभी प्रकाश गुच्छे सर्च लाइट के समान। यह रात भर तरह-तरह के दृश्य बदलते हैं हर दृश्य और परिवर्तन सूर्य की अपनी आन्तरिक हलचल का प्रतीक होता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष अनुसन्धान के दौरान आया। उस समय यह प्रकाश सर्वाधिक अस्तित्व में आया और उसके विलक्षण आकार प्रकार देखने में आये स्मरण रहे भू-भौतिक वर्ष सूर्य के 11 वर्षीय चक्र के दौरान मनाया गया इस अवधि में सूर्य की आन्तरिक हलचल बहुत बढ़ जाती है यह प्रकाश मुख्यतः चुम्बकीय तूफान होता है जो पृथ्वी की सारी यांत्रिक क्रिया में क्रान्ति उत्पन्न करके रख देता है।

अनुसन्धान के दौरान यह पाया गया है कि सूर्य में जब तेज दमक दिखती है उसके एक दो दिन बाद ही मेरु प्रकाश भी तीव्र हो उठता है। यह बढ़ी हुई सक्रियता सूर्य-विकिरण तथा कणों की बौछार का ही प्रतीक होती है। शान्त अवस्था में भी यह सम्बन्ध बना रहता है पर प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता। यह कण अति सूक्ष्म इलेक्ट्रान (ऋण आवेश कण) प्रोट्रान (धन आवेश कण) होते हैं जो 200 से लेकर 10000 मील तक प्रति घण्टे की गति से दौड़ते हुए पृथ्वी तक आते हैं जबकि प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में कुल 8 ही मिनट लेता है इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी सूर्य की विद्युतीय शक्ति से सम्बद्ध है पृथ्वी स्वयं-एक चुम्बक की तरह है। चुम्बकत्व पार्थिव कणों में विद्युत प्रवाह के कारण पैदा होता है इससे स्पष्ट है कि पृथ्वी की चुम्बकीय क्षमता सूर्य के ही कारण है। यह कण पृथ्वी से हजारों मील ऊपर ही पृथ्वी के क्षेत्र द्वारा पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों की ओर मोड़ और प्रवाहित कर दिये जाते हैं-

मार्च तथा सितम्बर में (चैत्र तथा क्वार) में जबकि पृथ्वी का अक्ष सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है मेरु प्रकाश अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पड़ता है जबकि अन्य समय गलत दिशा के कारण प्रकाश लौटकर ब्रह्माण्ड में चला जाता है। यह वह अवधि होती है जब पृथ्वी में फूल फलों की वृद्धि और ऋतु परिवर्तन होता है। नवरात्रियों का सम्बन्ध इसी से हो सकता है उस समय सूर्य की यह विद्युत धाराएँ स्पष्ट और अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पड़ती है। प्रयोगों से यह भी सिद्ध हो चुका है। कि उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों में विद्युत धारा की चादरें जैसी ढकी रहती है।

एक ओर आश्चर्यजनक घटना वायुमण्डल की है वह सीटी जैसी ध्वनियों की। अनुमान किया जा रहा है कि यह आकाश में तड़ित विद्युत के कारण विद्युत चुम्बकीय तरंगें के कारण होता है। इससे वायुमण्डल में 7000 मील की ऊँचाई पर भी एक विद्युतमय गैस की उपस्थिति की सम्भावना व्यक्त की जा रही है ज्ञात नहीं यह सूर्य की शक्ति है या पृथ्वी की।

ध्रुव प्रभा एवं मेरु प्रकाश का धरती पर होने वाली विभिन्न हलचलों एवं परिवर्तनों से क्या सम्बन्ध है उसका अन्वेषण करने में विज्ञान वेत्ता संलग्न है। वे क्रमशः इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहें है कि मनुष्य के निजी पुरुषार्थ का महत्त्व एक बहुत छोटी सीमा तक ही सीमित है। बहुत करके तो अन्तरिक्ष और भूलोक के बीच चल रहे आदान-प्रदान पर ही निर्भर रहता है। धातुएँ-वनस्पतियाँ ऋतु परिवर्तन, जलवायु जैसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वों पर इन्हीं अदृश्य अभिवर्षण का प्रभाव रहता है। इतना ही नहीं वे प्राणियों की-शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। उस दृष्टि से स्वतन्त्र समझा जाने वाला प्राणि जगत् प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों की कठपुतली मात्र बनकर एक प्रकार से निर्यात नियन्त्रित ही बन जाता है।

एक बारगी यह स्थिति बड़ी दयनीय प्रतीत होती है। कि प्राणियों को नियति की कठपुतली मात्र बनकर रहना पड़े अंतर्ग्रहीय प्रवाह उसके सामने जो भी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे उसके सामने नतमस्तक होना पड़े

पर नृपत्व विज्ञान पर अधिक गहराई से विचार करने पर स्पष्ट होती है कि ध्रुवीय छलनी की तरह ही मानवी चेतना में भी एक अद्भुत विशेषता यह है कि वह प्रकृतिगत प्रवाहों में से जिसे चाहे स्वीकार एवं ग्रहण करे और जिसे चाहे अपने मनोबल की टक्कर मारकर इधर-उधर छितरा दें ऋतु प्रभाव, क्षुधा पिपासा एवं रोग-शोक के चढ़ाव उतारो तक से वह अपने संकल्प बल से अभीष्ट परिवर्तन कर सकता है। ऐसी दशा में वह नियति की कठपुतली न रहकर स्वतन्त्र चेतना और स्व भाग्य निर्माता का अपना गौरव अक्षुण्ण बनाये रह सकता है।

अध्यात्म दर्शन एवं साधना विज्ञान का प्रयोजन यही है कि मनुष्य की उस विशेषता को बलिष्ठ बनाया जाय तो प्रकृति गत प्रतिकूलताओं में उपयोगी एवं अनुकूल तत्त्वों को खींचकर अपनी आन्तरिक क्षमता बढ़ा सके और उसके आधार पर जीवन के हर क्षेत्र में सुसम्पन्न रह सके।

मनुष्य अपने आप में एक ब्रह्माण्ड है। मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरंध्र के अवस्थित सहस्रार चक्र को सर्प माना गया है। मनः संस्थान और काय कलेवर धरती है। मस्तिष्क को उत्तरी ध्रुव और मूलाधार स्थित कुण्डलिनी गह्वर को दक्षिणी ध्रुव माना जाता है। इन दोनों के बीच होते रहने वाले दिव्य आदान-प्रदान का माध्यम मेरु दण्ड है। इसमें चलने वाले इडा पिंगला और सुषुम्ना प्रवाह दूसरे शब्दों में पिंडगत ध्रुवा प्रभा एवं मेरुप्रकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

बिन्दु योग की प्रकाश साधना का उद्देश्य आत्म क्षेत्र में अदृश्य लोकों से अवतरित होते रहने वाले शक्ति प्रवाह की अभीष्ट मात्रा को आकर्षित एवं धारण करना है। यह दिव्य अवतरण ऊर्जा के अतिरिक्त ध्वनि रूप में भी होता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में ऊर्जा को ध्यानयोग द्वारा और ध्वनि को नादयोग द्वारा आकर्षित नियन्त्रित किया जाता है। ध्रुवीय मेरुप्रभा का भौतिक विज्ञानों ने केवल स्वरूप और प्रभाव ही जाना है वे अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके उन प्रचण्ड शक्ति धाराओं के प्रवाह भी आवश्यक हेर फेर कैसे किया जा सकता हैं, पर योग विज्ञानी जानते हैं, कि मानवी काया से धरती पर दिव्य लोकों से , दिव्य शक्तियों से जो प्राप्त हो सकता है और उस साधना उपचार के द्वारा किस प्रकार उपलब्ध किया जाय और उससे किस प्रकार देवोपम विभूतियों से लाभान्वित हुआ जाय।


समय की सम्पदा प्रमाद के श्मशान में न जलायें

हमारा बहुमूल्य ‘वर्तमान’ क्रमशः भूत बनता चला जा रहा है और हम यह देख समझ नहीं पाते कि प्रमाद द्वारा कितनी मूल्यवान सम्पदा का अपहरण किया जा रहा है।

भूत के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत डरावना होता है। कहते हैं कि मरने के बाद अशान्त व्यक्ति भूत बनता है। मरणोत्तर जीवन में क्या स्थिति होती है- कौन, क्यों और कैसे भूत बनता है और वह कैसा होता है यह सब कुछ अभी रहस्य के गर्भ में है। अन्वेषण के उपरान्त ही इस संदर्भ में कुछ सही निष्कर्ष निकलेंगे, समय की असामयिक और अशान्त मृत्यु के उपरान्त उसकी प्रति-क्रिया तथाकथित भूत से भी भयंकर होती है इस तथ्य को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।

जीवन की सूक्ष्म सत्ता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति समय के रूप में ही सामने आती है। समय का किस प्रकार-किस प्रयोजन के लिए उपयोग किया गया, इसी का लेखा-का महत्त्व और स्वरूप समझ सका और उसके सदुपयोग के लिए समग्र जागरूकता के साथ तत्पर हो गया समझना चाहिए उसे जिन्दगी मिल गई। अन्यथा इस ओर उपेक्षा बरतने वाले-अन्यमनस्क रहने वाले, क्रमिक आत्महत्या ही करते चले जाते हैं। बहुमूल्य मणि मुक्तकों को फटी थैली में भरकर चलने वाले, राह में उन्हें टपकाते जाते हैं और घर घर पहुँचते-पहुँचते उस निधि को गँवाकर खाली हाथ रह जाते हैं। इसी प्रकार समय के साथ उपेक्षा करने वाले अपने आपके साथ एक क्रूर मजाक करते हैं। अपने भविष्य के साथ यह एक मर्मभेदी व्यंग है कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों को ऐसे ही खोते गँवाते चला जाय।

हम क्रमशः मर रहें है। जीवन की सम्पदा का एक-एक दाना एक-एक क्षण के साथ समाप्त होता चला जाता है। बूँद-बूँद पानी टपकते रहने से भरा-पूरा किन्तु फूटा घड़ा कुछ ही समय में खाली हो जाता है। जीवन की रत्न सम्पदा हर साँस के साथ घटती चली जाती है। क्रमशः हमारा हर कदम मरण की ओर ही उठता है। आयुवृद्धि के साथ-साथ मरण का दिन निकट से निकटतम आता चला जाता है। जो दैवी वरदान जैसा अमूल्य था- जिसके आधार पर कुछ भी खरीदा पाया जा सकता था वह किस प्रकार गलता, जलता, टूटता और मिटता चला जा रहा है इसे देखने की न इच्छा होती है न फुरसत। फलतः हमारा अनुपम अस्तित्व भूत बनता चला जाता है। असामयिक इस प्रकार मृत्यु की भयंकरता तथाकथित भूत-प्रेतों से कम नहीं। जब समय के सदुपयोग और दुरुपयोग के परिणामों का तुलनात्मक अन्तर किया जाता है, तब प्रतीत होता है कि तत्परता और उपेक्षा के बीच देखने वाला नगण्य सा अन्ततः कितने भारी भिन्न परिणामों के रूपों में सामने आता है।

समय ही जीवन है। समय ही उत्कर्ष है। समय ही महानता के उच्चतम शिखर तक चढ़ दौड़ने का सोपान है। महाकाल की उपासना का जो स्वरूप समझ सका है उसी को मृत्युंजय बनने का सौभाग्य मिला है और किसी के साथ भी मखौल किया जा सकता है पर महाकाल के साथ नहीं। सिंह के दाँत गिनने की धृष्टता किसी को नहीं करनी चाहिए। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने, लतियाने की तरह है। जो समय गँवाता है वह प्रकारान्तर से अपने उत्कर्ष और आनन्द का द्वार ही बन्द करता है। मरण की दिशा में हम द्रुत गति प्रमादियों के पल्ले बँधता है पर जो जीवन सम्पदा से लाभान्वित होने के लिए जागरूक है उसे साँसों के बहुमूल्य मणि मुक्तकों का ध्यान रहता है और वे एक घड़ी भी निरर्थक नहीं गँवाते योजनाबद्ध दिनचर्या बनाते हैं और उस पर आरुढ रहते हैं। वे जानते हैं समय की सम्पदा को प्रमाद के श्मशान में जलाने वालों को आत्म प्रताड़ना की आग में बेतरह जलना पड़ता है।


कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना

जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ आत्म-निरीक्षण आत्म शोधन और आत्म विकास ही है। अन्तरंग क्षेत्र उपेक्षित पड़ा रहे तो बहिरंग में सुख-शान्ति की झलक कभी भी दृष्टिगोचर न होगी। इस भ्रम की निरर्थकता पग-पग पर अनुभव की जा सकती है। कि “जिसके पास जितने अधिक साधन हैं वह उतना ही अधिक सुखी होगा। यह मान्यता इसी हद तक सही है कि दूसरे लोग इस प्रकार का अनु-मान करते रह सकते हैं। अमीरों के सम्बन्ध में आमतौर से यही समझा जाता है। कि वे सर्व सुखी हैं पर यदि उनको समीप से देखा पढ़ा जाय तो प्रतीत होगा कि अभावग्रस्त लोगों की अपेक्षा भी वे अधिक गई गुजरी स्थिति में है। विश्व के सर्वोपरि धनकुबेर हेनरी फोर्ड ने मरते समय ईश्वर से प्रार्थना की थी कि उन्हें अगला जन्म किसी श्रमिक परिवार में ही मिलें सच बात यह है कि आन्तरिक उत्कृष्टता के अभाव में सम्पदा का परिणाम विषम ज्वरग्रस्त रोगी को भर पेट मिष्ठान्न पकवान खा जाने की तरह भयावह ही होता है। उदात्त दृष्टिकोण के अभाव में वे उस वैभव का दुरुपयोग ही करते हैं और व्यसनों की-अहंकार का पूर्ति में संलग्न होकर अपना सन्तुलन गँवाते है-सर्वनाश करते हैं।

परिष्कृत व्यक्तित्व अभाव ग्रस्त परिस्थितियों में भी प्रगति पथ पर अनवरत गति से चलता रह सकता है और सुख शान्ति अक्षुण्ण बनाये रह सकता है। इस तथ्य का प्रतिपादन न केवल अध्यात्म तत्त्वदर्शन ने विवेचनात्मक स्तर पर ही किया है वरन् ऋषियों ने जान-बूझ कर अभाव ग्रस्तता की परिस्थितियाँ वरण किये रहकर यह प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध किया है कि निर्धनता उनकी गरिमा सुविधा, शान्ति, प्रगति में किसी प्रकार बाधक नहीं। इसके विपरीत शारीरिक और मानसिक दृष्टि से व्यथा वेदनाएँ सहने वाले लोगों में साधन सम्पन्न लोगों की ही संख्या अधिक होती है। विक्षोभों के आघातों से पागल होने वाले और आत्महत्या करने वाले भी अधिकतर सुविधा सम्पन्न लोग ही होते हैं। अपराध और अनाचार भी खाते पीते लोग ही करते हैं। इससे सिद्ध है कि धन के भाव या अभाव के कारण कोई व्यक्ति भला या बुरा नहीं बनता-न सुखी या दुखी रहता है। व्यक्तित्व का सारा आधार दृष्टिकोण पर ही निर्भर है। साधन की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी, पर वह है तभी जब व्यक्ति का अन्तरंग परिष्कृत हो अन्यथा सर्प को दूध पिलाने की तरह बढ़ा हुआ वैभव व्यसन, व्यभिचार, अहंकार आदि दुर्गुणों की ही वृद्धि करता है।

आत्मबोध होने से व्यक्ति अपनी वस्तुस्थिति समझता है। वह क्या है, क्यों है और क्या करने से सुख शान्ति एवं प्रगति भरी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती है यह निश्चित हो जाता है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए संकल्प पूर्वक बढ़ चलने वाले लोगों की सामान्य कार्य पद्धति से ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग की साधना जुड़ जाती है। उन्हें अलग से कुछ बहुत बड़े कर्मकाण्ड नहीं करने पड़ते।

इन्द्रिय लिप्सा के लिए नहीं-जीवन धारण किये रहने के लिए जब आहार-विहार का सुनियोजित सुसंतुलित क्रम निर्धारण कर लिया जाता है तो फिर शरीर के रुग्ण बिनोवा जैसे दुर्बलकाय व्यक्ति 80 वर्ष की आयु तक पूर्ण सक्रिय बनें रहते हैं। यह केवल कर्मयोग की महत्ता है। स्वास्थ्य का विनाश अकारण नहीं होता, इन्द्रिय लिप्सा, असंयम, दिनचर्या में असन्तुलित क्रम, श्रम की न्यूनाधिकता जैसे कारण ही अस्वस्थता के मूल उद्गम है। जलवायु , रोग के कृमि आदि तो अत्यन्त स्वल्प मात्रा में ही रोगों के लिए उत्तरदायी होते हैं। अधिकतर तो मनुष्य आप ही रोगों को निमन्त्रण देता है और असंयम के घोंसले में उन्हें छिपाये रहते हैं। जिसने शरीर को ईश्वर का मन्दिर माना-लिप्साओं को शुद्र समझा-औषधि रूप सात्विक आहार किया- और सन्तुलित श्रम साधना का निर्धारण किया उसे अपना इस कर्मयोग का प्रतिफल सुदृढ़ आरोग्य और दीर्घ जीवन के रूप में मिलता ही रहेगा। शरीर के अनैतिक, अवांछनीय, असामाजिक, गर्हित कर्म न करने दिये जायें कुसंस्कार और गर्हित अभ्यास तथा दुष्ट दृष्टिकोण यदि कुकर्म करने के लिए प्रेरित करें तो उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया जाय। इसके लिए उपयुक्त साहस उत्पन्न करने के लिए व्रत, उपवास, अस्वाद, भूमि शयन, रात्रि जागरण, तप, तितीक्षा, पदयात्रा, मौन धारण, ब्रह्मचर्य, शीतोष्ण सहन जैसी धार्मिक साधनायें की जाती है। कर्मयोग का मूल प्रयोजन यही है कि शरीर को उच्छृंखल क्रिया कृत्य न करने दिये जाये, उसे औचित्य की मर्यादा में रहने के लिए ही अभ्यस्त और विवश किया जाय।

ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गति विधियों पर-विचार धाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य-ही चिन्तन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

शरीर के द्वारा होने वाले कर्मों को चमड़े की आँखों से देखा जा सकता है पर उनकी भलाई बुराई स्वयं समझी जा सकती है अथवा दूसरे बताते रहते हैं। स्थूल शरीर का क्रिया-कलाप स्थूल दृष्टि से समझा जा सकता है पर मानसिक हलचलें अदृश्य होती है उन्हें देखने समझने के लिए सूक्ष्म दृष्टि विकसित करनी पड़ती है। यही ज्ञान-योग है। मोटे तौर से धर्म, अध्यात्म दर्शन जैसे विषयों का पठन पाठन-श्रवण स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है लोग इसी के लिए कथा, प्रवचन सुनते हैं। ग्रन्थ पाठ भी उसी पुण्य प्रयोजन के लिए किये जाते हैं पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब निर्देश संकेत मात्र हैं- आधार नहीं। मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए किस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया हो इसके लिए अवतारों के, ऋषियों के-महामानवों के चरित्रों, एवं निर्देशों का श्रवण स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।

प्रेम का-भक्ति का-प्रकटीकरण सद्भावनाओं के रूप में होता है। इस अमृत उद्भव का प्रथम लाभ अपने आपको मिलता है। अपने ऊपर अत्याचार करते रहने का कुकर्म तत्काल बन्द करना पड़ता है। प्रेम योगी के अन्तःकरण में करुणा का स्रोत बहता है उसका लाभ पेट को मिलता है, जीभ के चटोरेपन के कारण जो पेट को निरन्तर उत्पीड़ित किया जाता रहा है उस पर इतना अत्याचार होता रहा है कि उसकी कराह, रुग्णता और दुर्बलता के रूप में कभी भी सुनी जा सकती है। जननेन्द्रिय का दुरुपयोग एक प्रकार से अभिशाप ही बनकर रहा है उससे अपना-अपनी पत्नी का स्वास्थ्य बेतरह खोखला हुआ है। इतने बच्चे जने गये है। जिनका उचित रीति से भरण-पोषण शक्य न था। दाम्पत्य क्षेत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन करके व्यभिचार का भी आश्रय लिया जाता रहा है इस आत्म अत्याचार का फल, शरीरबल, मनोबल और आत्मबल की अपार क्षति के रूप में भुगता जा रहा है। आत्म समीक्षा करते हुए सब कुछ खोखला ही खोखला प्रतीत होता है।

यह भूले पहले समझ में नहीं आती थी पर जब सद्-भावनाओं का , भक्तियोग का -उदय होता है तो शरीर के प्रति भी करुणा जगती है। पेट और जननेन्द्रिय पर किया जाने वाला अत्याचार करते रहने वाले कसाई जैसे हाथ तत्काल रुक जाते हैं। जिह्वा और जननेन्द्रिय का संयम अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है प्रतीत ही नहीं होता उसे तत्काल कार्यान्वित करना भी आरम्भ हो जाता है। औषधि रूप आहार की दृष्टि बनती है और ब्रह्मचर्य के प्रति कठोर रहने की बुद्धि जागृत होती है। दिनचर्या में ऐसा सन्तुलन स्थापित किया जाता है। जिसमें प्राकृतिक जीवन पद्धति का तनिक भी व्यक्तिक्रम न होता हो। नियमित और सात्विक आहार-विहार का निर्धारण करने को भक्तियोग साधना जब आरम्भ होती है तो काय कलेवर के रोम-रोम में विद्यमान् परमेश्वर पुलकित हो उठता है और आरोग्य का उपहार तत्काल देना आरम्भ कर देता है।

संयम शरीर में अवस्थित भगवान है सद्विचार मस्तिष्क में निवास करने वाला परमेश्वर है। अन्तरात्मा में उसकी और भी ऊँची झाँकी देखने हो तो सद्भावनाओं के रूप में देखनी चाहिए। ईश्वर दर्शन के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं , उसे अपने भीतर ही देखा जाना चाहिए उसे प्राप्त करने के लिए संयम, सद्विचार और सद्भाव का विकास करना चाहिए। यही है यथार्थ-सत्ता और चैतन्य-चित्त-परिष्कृत आत्मा-परमात्मा की उपलब्धि है। इसी का सद्भाव सम्पन्न आराधना का प्रतिफल है आनन्द। इसी भक्तियोग का साधक सच्चे अर्थों में जीवन लाभ प्राप्त करता है।

उच्च आदर्शों के प्रति इतनी सघन निष्ठा, भक्ति भावना ही कहीं जाएगी जो किसी भी भय या प्रलोभन के प्रस्तुत होने पर आत्मिक आकांक्षाएँ प्रदीप्त होना गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता को सबसे बड़ी सम्पदा समझना-वैभव बड़प्पन की उपेक्षा करके महानता के पथ पर अग्रसर होना-यही है सद्भाव सम्पन्न अन्तःकरण का लक्षण। भक्तियोगी इसी स्तर की भावनाओं से ओत-प्रोत रहता है। वह ईश्वर को-आदर्शों को-कर्तव्यों को एक ही तत्त्व के तीन रूप मानता है और तीनों के लिए समान रूप से अपनी सघन श्रद्धा को नियोजित किये रहता है। ऐसा भक्तियोगी ईश्वर को आत्म समर्पण करके-दैवी विभूतियों के सहज ही सुसम्पन्न बनता है। ऐसी आत्माएँ जीवन मुक्त-देवदूत-कहलाती हैं, उनके प्रकाश के सहारे असंख्य प्राणियों को उद्धार का अवसर मिलता है। स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों का परिष्कार करने के लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का साधना क्रम व्यावहारिक जीवन में उतारने से ही जीवन लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है।


संकट ग्रस्त जनता की सहायता (kahani)

अनावृष्टि से संकट ग्रस्त जनता की सहायता के लिए छत्रपति शिवाजी एक बाँध बनवा रहे थे। मजूरी करके सहस्रों व्यक्ति उदर पोषण का आधार प्राप्त कर रहे थे।

शिवाजी ने एक दिन उन्हें देखा तो गर्व से फूले न समाये कि वे ही उतने लोगों को आजीविका दे रहें है। यदि वे यह प्रयास न करते तो इतने लोगों को भूखा मरना पड़ता।

समर्थ गुरु रामदास उधर से निकले। शिवाजी ने उनका सम्मान, सत्कार किया और अपने उदार अनुदान की गाथा कह सुनाई।

समर्थ उस दिन तो चुप हो गये, पर जब दूसरे दिन चलने लगे तो शान्त भाव से एक पत्थर की ओर संकेत करके शिवाजी से कहा इस पत्थर को तुड़वा दो।

पत्थर तोड़ा गया तो उसके बीच एक गड्ढा निकला, उसमें पानी भरा था और एक मेंढकी कल्लोल कर रही थी।

समर्थ ने शिवाजी से पूछा-इस मेंढकी के लिए सम्भवतः तुमने ही पत्थर के भीतर यह जीवन रक्षा की व्यवस्था की होगी?

शिवाजी लज्जा से पानी-पानी हो गये और उनके मुख से यही निकला। अपनी सृष्टि की व्यवस्था भगवान स्वयं करते हैं-मनुष्य तो निमित्त मात्र है।


स्वर्ग और नरक में से हम जिसे चाहें चुने

स्वर्ग ऊपर आसमान से कितनी दूर है, कितना विस्तृत है और कितनी सुविधाओं से भरा है। यह बताना कठिन है पर यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि परिष्कृत दृष्टिकोण का व्यक्ति अपने आस-पास उतने क्षेत्र में आनन्द और उल्लास ही निरन्तर अनुभव करता रहेगा जितनी दूर तक कि वह देख या सोच सकें।

वस्तुएँ निर्जीव है। उनमें सुख है ना दुःख जिन पदार्थों में अपनी चेतना नहीं वे भला किसी चेतन प्राणी को किस प्रकार सुखी या दुखी बना सकते है? मनुष्य अपने सोचने के ढंग की प्रतिक्रिया ही सुख या दुःख के रूप में प्रतिध्वनित देखता सुनता है। जैसी कुछ भली बुरी अनुभूतियाँ हमें होती हैं वस्तुतः वह अपने ही चिन्तन और मन स्तर का प्रतिफल परिपाक, परिणाम है।

एक ही वस्तु को दो तरह से देखा जा सकता है। गिलास आधा भरा हो तो उस सम्पन्न भी कह सकते हैं और अभावग्रस्त भी। जितना भरा है उतनी उसकी सम्पन्नता है और खाली जगह अभाव। अपनी दृष्टि दोनों में से जिस पक्ष को महत्त्व देगी, गिलास की स्थिति उसी आधार पर सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य स्तर की गिनी जाएगी चूँकि गिलास आधा भरा हुआ है, इसलिए अभाव ग्रस्त अभागा कैसे कहा जाय? चूँकि वह आधा खाली है इस-लिए उसे सौभाग्यशाली भी कौन कहे? गिलास निर्जीव है, यह निर्णय करना अपना काम है कि उसे भाग्यवान कहें या अभागा। सुखी समझें या दुखी?

अपने को जो उपलब्ध है वह उतना अधिक है कि तथाकथित चौरासी लाख योनियों के जीवधारी उसे स्वर्गोपम और देवोपम ठहराते होगे मनुष्यों में ही करोड़ों ऐसे होगे जो उस स्थिति के लिए तरसते होगे, जिसमें हम रह रहे है। यदि उनकी दृष्टि से अपना मूल्यांकन करें तो प्रतीत होगा कि अपनी सम्पन्नता सन्तोषजनक है और हम स्वर्गीय परिस्थितियों में रह रहें है।

यदि सुविधा सम्पन्न लोगों की तुलना में अपने को लायें तोले तो निश्चित रूप से बहुत कमियाँ मालूम देंगी और उनके कारण अपने दरिद्र दुर्भाग्य पर क्षोभ उत्पन्न होता रहेगा। नरक विक्षोभ का ही तो दूसरा नाम है। हम अपना स्वर्ग और अपना नरक वस्तुतः स्वयं ही गढ़ते हैं। बदलते दृष्टिकोण स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग में भी सहज ही परिणत परिवर्तित करते रहते हैं।

इस संसार की सृष्टि जिस मिट्टी और पानी से की गई है उसमें शुभ और अशुभ-सत और तम-दोनों का सम्मिश्रण है। दोनों में से हम जिसे भी अपने लिए चुन सकते हैं। उपाय और अनौचित्य को देखें तो वह भी दुनिया भी कम नहीं पर यदि स्नेह सौजन्य और सद्भाव को खोजा जाय तो वह भी कम नहीं मिलेगा। अन्धकार के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता पर प्रकाश का परिमाण उससे कम नहीं अधिक ही है। हम प्रकाश में बैठे या अन्धकार में जा घुसे यह अपनी मनमर्जी की बात है। सत्प्रवृत्तियों के साथ-सद्भाव सत्पात्रों के साथ जो अपने को जोड़ेगा उसे लगेगा कि स्वर्गीय वातावरण कम नहीं-देव मानवों का अभाव नहीं-पर यदि देखने और ढूँढ़ने का केन्द्र बिन्दु बदल जाय और बुरे व्यक्तियों-बुरे कर्मों-पर अपनी अभिरुचि जमी रहें तो नारकीय दृश्य और सड़न भरी दुर्गन्ध से माथा चकराने लगेगा। दोनों स्थानों में से हम कहाँ बैठे, अभिरुचि को कहाँ केन्द्रित नियोजित करें यह पूर्णतया अपने हाथ की बात है। उद्यान में पुष्प खिलें रहते हैं और गोबर भी पड़ा रहता है। गुबरीले गोबर में जा चिपकते हैं और भ्रमर का गुँजन पुष्पों के आस-पास होता है। दोनों कीड़े एक ही खेत में अपनी अभिरुचि के अनुकम्पा परस्पर विरोधी परिस्थितियों में रहते और आकाश पाताल जैसे अन्तर की अनुभूतियाँ करते हैं, स्वर्ग और नरक दोनों सामने खुले पड़े है हम जिसे चाहें उसे चुन सकते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण के साथ स्वर्ग और अशुभ चिन्तन में नरक अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।


देवमानव का सृजन निकट भविष्य में ही होगा

सुसन्तति के संबन्ध में सामान्य तथा इतना ही समझा जाता है। यदि माता-पिता स्वस्थ सुन्दर हों तो उनकी संतान वैसी ही उत्पन्न होगी। यदि खान-पान अच्छा मिले-सुविधा शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो तो बच्चे विकसित बनेंगे। यह तथ्य एक अंश तक ही सीमित है। वस्तुस्थिति कुछ और ही है।

रज वीर्य के बहुत ही छोटे-खुली आँखों से न दीख पड़ने जितने नन्हे कण अपने भीतर उस ऐसी रहस्यमय परम्परायें जोड़े रहते हैं। जिनका सन्तान के शरीर और मन पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। यह परम्परागत सम्पत्ति कितनी ही पीड़ियों बाद भी उभर सकती है। उसी प्रकार पिता के पूर्वजों में रही कोई विशेषता भी सन्तान में प्रकट हो सकती है। यह ऐसी विलक्षण भी हो सकती हैं जिनका माता-पिता की तात्कालिक शारीरिक मानसिक स्थिति से कोई सीधा सम्बन्ध न हों।

माता पिता की शारीरिक मानसिक स्थिति से भिन्न एवं विपरीत प्रकार के बालकों के जन्मने का कारण ढूँढ़ते हुए जीव विज्ञानी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि रज एवं शुक्र कीटों के भीतर रहने वाले जीवाणुओं की परम्परागत सञ्चित सम्पदा अवसर पाकर फलित प्रकटित होती है और उसी से ऐसी विभिन्नताएँ सामने आती रहती है। अतएव सन्तान को सुयोग्य सुविकसित देखना हो तो माता-पिता की शारीरिक मानसिक स्थिति को पर्याप्त न मानकर वंश परम्परा की विशेषता पर भी ध्यान देना होगा।

जीनी के विभिन्न उपभागों द्वारा मनुष्य के विभिन्न अंग प्रत्यंग बनते हैं इस प्रक्रिया को अनुशासन में रखने के लिए शरीर में कुछ रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता होती हैं। जिन्हें ऐंजाइम कहते हैं। इन ऐंजाइम में वे संभावनाएँ व्यस्त रहती हैं जिनके ऊपर शरीर और मन में समयानुसार अनेकों भली बुरी विशेषताएँ उभरती रहती है।

प्रजनन के लिए काम आने वाला कोष केन्द्र दो अर्ध घटकों में विभाजित होता है। नारी वर्ग के कोष ‘अण्ड’ और पुरुष वर्ग के कोष शुक्राणु कहलाते हैं। इन दोनों का मिल नहीं मनुष्य के जीवन आरम्भ का श्रीगणेश हैं।

जीव कोष में 46 ‘क्रोमोसोम’ होते हैं। इन्हें तीतर–बितर करके पृथक्-पृथक् पहचाना जा सकता है। इनमें 44 तो नर नारी में एक जैसे होते हैं इनका कार्य शरीर निर्माण भर होता है। शेष दो नर मादा अलग-अलग होते हैं इन्हें सैक्स क्रोमोज़ोम कहते हैं। इन्हें वैज्ञानिकों की भाषा में ‘एक्स’ और ‘वाई’ कहते हैं। नर में एक एक्स और एक ‘वाई’ होती है पर मादा में दोनों ‘एक्स’ होते हैं। बालक बालिका का जन्म होना पूर्णतया नर की स्थिति पर निर्भर है। उसमें यदि ‘क्ष’ की प्रधानता होगी तो लड़का उत्पन्न होगा। इसमें मादा का कोई हाथ नहीं, क्योंकि उसमें तो सदा ‘क्ष’ कोष ही रहता है कन्याओं की अधिकता में आज जो नारी को दोष दिया जाता है वह सर्वथा गलत है। यह नर पक्ष ही है जिसमें यदि ‘क्ष’ कणों की प्रमुखता है तो कन्याओं ही कन्यायें होती रहेंगी। हाँ, माता-पिता में से किसी के अणु प्रबल होगे तो आकृति प्रकृति में उसकी प्रधानता लिए हुए बालक जन्मेगा।

वर्ण शंकर पद्धति को कुछ समय पूर्व अच्छा माना जाता था। भिन्न स्तर के रक्तों के सम्मिश्रण की वकालत इसलिए की जाती थी कि उसका दृश्य परिणाम अच्छा निकलता है। एक जाति का मिश्रण दूसरी से किया जाय तो शारीरिक परिणाम अच्छा निकलता है। घोड़ी की तुलना में हलका भले ही पड़े पर गधे से तो निश्चित रूप से मजबूत होता है। इसके शंकरत्व से गधा वर्ग को लाभ मिलता है। उसकी उन्नति का पथ प्रशस्त होता है। वृक्ष वनस्पतियों में भी यह प्रयोग किये गये है और फसलें उगाने में इसकी सफलता देखी गई हैं। इसलिए पिछले दिनों पूरे उत्साह के साथ वर्ण शंकर प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाता रहा है।

सन् 1865 में आस्ट्रिया की एक मठवासी वैज्ञानिक मंडली ने पादरी मेंडले के नेतृत्व में मटर की विभिन्न जातियों को वर्ण शंकर नस्लें पैदा करके उनमें अनोखी विशेषताएँ पैदा की उन्होंने सिद्ध किया कि पीड़ियों से चली आ रही परम्परा में कुछ मूल तत्त्व सन्निहित रहते हैं और कारण वश उन्हीं के दबने उभरने से विविध विशेषता सम्पन्न नस्लें प्रकाश में आती है। गुण सूत्रों की ओर इस शोध में महत्त्वपूर्ण संकेत था। इस शोध के अनुसार वे इतना अनुभव सम्पादन कर सकें कि मिश्रित जाति के पौधों में बदले हुए रंग , आकार , प्रकार , स्वाद , फूल आदि में सम्भावित परिवर्तन की पूर्व घोषणा कर देता और वह अनुमान प्रायः सही ही निकलता। मेंडेल द्वारा स्थापित वे एक शताब्दी से भी अधिक पुराने सिद्धान्त अभी भी उस क्षेत्र में प्रामाणिक माने जाते हैं

किन्तु यह उत्साह बहुत आगे तक न बढ़ सका। तात्कालिक थोड़ा दृश्यमान लाभ भर ही वर्ण शंकरत्व का होता है अन्ततः उसके दुष्परिणाम ही निकलते हैं। गधी और घोड़ी से उत्पन्न ‘खच्चर’ नपुंसक होते हैं उनकी पीढ़ियाँ आगे नहीं चलती। गधी और घोड़े के संयोग से उत्पन्न बच्चे तो माता पिता दोनों की तुलना में गये गुजरे होते हैं।

कलमी वृक्षों पर फल जल्दी, मीठे और बड़े तो जरूर आते हैं पर वे उतने गुणकारी नहीं होते। फिर उन वृक्षों का विकास एवं जीवन तो निश्चित रूप से अपेक्षाकृत स्वल्प होता है। इस प्रकार वह तात्कालिक लाभ अन्ततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है। इस दृष्टि से जातिगत वर्ण शंकरत्व की महिमा जो पिछले दिनों बहुत गाई जाती थी अब धूमिल पड़ गई है और जहाँ तक सुसन्तति का प्रश्न है, पूर्वजों की वंश परम्परा को ध्यान में रखने पर बहुत जोर दिया जाने लगा है।

आनुवांशिकी अन्वेषण में शोध कार्य की शृंखला में एक के बाद एक उपयोगी कड़ी जुड़ती ही चली गई है। हालैण्ड के वैज्ञानिक ह्यू गोदकी ने इस दिशा में बहुत कार्य किया। इस दिशा में मेंडल, फिशर हाल्डेन, राइट, सटन, मार्ग्रन ,हर्मन, मूलर, फेडरिक मीशर , लीनस पािलग, फ्राँसिस क्रिक, वाटसन, क्रिक, मार्शल निरेन वर्ग, राबर्ट-हाले प्रभृति वैज्ञानिकों ने विश्व के विभिन्न देशों में शोध संस्थानों के अन्तर्गत बहुत काम किया। अनेक विश्व विद्यालयों ने इस अन्वेषण को महत्त्व दिया। प्रयोगशालाओं बनाई तथा गुण सूत्रों के स्वरूपों को समझने तथा उनमें हेर-फेर करने की दिशा में आशाजनक प्रगति की। अमेरिका में काम कर रहे भारतीय मूल के डाक्टर हरगोविंद खुराना ने विस्कासिन विश्व विद्यालय में इस विषय में महत्त्वपूर्ण शोधें की और नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।

सुविकसित जातियाँ अपनी रक्त शुद्धि पर इसी दृष्टि से जोर देती रही है और उनमें अपने ही कुल वर्ग के अंतर्गत विवाह करने पर जोर दिया जाता रहा है। मिश्र के शासक कभी इस सम्बन्ध में बहुत कठोर थे। योरोप के राज्य परिवारों में इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाता रहा है। हिटलर ने जर्मन जाति को शुद्ध आर्य रक्त घोषित किया था और उस वर्ण की रक्षा पर जोर दिया था। भारत में रोटी बेटी के लिए जाति मर्यादायें स्थापित थी। इन प्रचलनों के मल में कुछ वैज्ञानिक तथ्य थे पर पीछे वे बातें ढकोसला मात्र रह गई। जाति-पाँति की प्रथा तो ध्यान में रही पर पीड़ियों में क्या क्या सूक्ष्म विशेषताएँ पनप रहीं है और इसकी खोज का कोई आधार न रहा, फलतः यह जाति के अन्तर्गत विवाह करने वाली बात भी रूढ़िवादिता मात्र सिद्ध हुई। उसका भी अभीष्ट सत्परिणाम देखने को नहीं मिला।

हीमोफीलिया, एल्केप्टी नूरिया, एल्केप्टोनमीह, सरीखे रोग अक्सर समोत्र विवाहों के कारण होते हैं। जाति और उपजाती के कठोर बन्धनों में बँधी जातियाँ क्रमशः दुर्बल होती चली जाती है।

ऐसी दशा में उभयपक्षीय संकट उत्पन्न होता है। न वर्ण शंकरत्व का समर्थन करते बनता है और न खण्डन। फिर सुसन्तति की समस्या-पीड़ियों का सुधार संवर्धन कैसे किया जाय?

इस सन्दर्भ में शोध निष्कर्ष यह निकले है कि रज वीर्य के सूक्ष्म स्वत्व गुण सूत्रों का परिष्कृतीकरण किया जाय, उन्हें नये स्तर पर सुधारा सँभाला जाय, उनमें समाविष्ट विकृतियों का नये आधार पर संशोधन किया जाय और इस परिशोधन के उपरान्त सुविकसित पीढ़ियाँ आरम्भ करने का श्रीगणेश किया जाय।

प्राचीन काल में सम्भवतः नियोग प्रथा इसी दृष्टि से था। सुयोग्य सन्तानोत्पादन में समर्थ नर नारी यदि परस्पर विवाह सम्बन्ध में नहीं बँधना चाहते थे तो भी सुसन्तति की उपलब्धि के लिए शारीरिक संयोग को वैध मान लेते थे। भारतीय धर्म ग्रन्थों में इस प्रकार के प्रचलन को मान्यता दी गई है। कुन्ती के पाँचों पुत्र उनके वैध पति द्वारा उत्पादित नहीं थे। व्यास द्वारा पाण्डु और धृतराष्ट्र को जन्म देना, शुकदेव की , शकुन्तला की उत्पत्ति कुछ ऐसे ही स्तर की थी। ऐसे अगणित उदाहरण उपलब्ध है। पर इस अनुकरण में भी वंश परम्परा की पूर्ण शुद्धि का निश्चय नहीं फिर दाम्पत्य जीवन की पवित्रता का भी व्यतिरेक होता है। किन्हीं उच्चस्तरीय प्रयोगों की बात दूसरी है पर यह प्रचलन भी सर्व सुलभ प्रथा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इससे व्यभिचारजन्य दुष्परिणाम से सुसन्तति प्राप्त करने की तुलना में होने वाले लाभ का कुछ विशेष महत्त्व न रह जाएगा

अस्तु यह मार्ग अधिक उपयुक्त है कि गुण सूत्रों को परिष्कृत करके सुसन्तति की प्रक्रिया आगे चलाई जाय। दशरथ जी को पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा सुसन्तति प्राप्त होने का उदाहरण उसी स्तर का है। भारत में उसके लिए पति पत्नी के लिए तप साधना को आधार बताया जाता रहा है। कृष्ण और रुक्मिणी द्वारा बद्रीनाथ धाम में बारह वर्ष तक तक तप करने की तपश्चर्या इसी उद्देश्य से की गई थी और उन्हें मनोवाँछित सन्तान प्रद्युम्न के रूप में प्राप्त हुई।

वंश परम्परा की महत्ता को अधिक प्रकाश में लाने वाले आनुवांशिक विज्ञान के क्रमिक अन्वेषणों में एक के बाद एक रहस्योद्घाटन किये है। जिनके आधार पर यह सम्भावना स्पष्ट हो सकी है कि अभीष्ट विशेषताओं से सम्पन्न मनुष्य का निर्माण सम्भव है। पैतृक दोष प्रवाह को हटाया भी जा सकता है और ये नर-नारी युग्मों की केवल विशेषताओं में ही विकसित हो सकती है और विकृतियाँ क्रमशः समाप्त की जा सकती है। यह उपलब्धियाँ भावी मनुष्य विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आशा की जानी चाहिए कि यदि प्रयास आगे बढ़ते रहे तो समुन्नत वर्ग का मनुष्य निर्माण कर सकना स्वप्न न रहकर एक तथ्य बन जाएगा

जेनेटिक (आनुवांशिकी) के विशेषज्ञ पियरेलुई और लैमार्क इस बात से सहमत है कि इस विज्ञान की सहायता से मानवी पीढ़ियाँ क्रमशः अधिक सुविकसित बनाई जा सकेंगी और वह दिन आएगा जब इस धरती पर ‘सुपरमैन’ (देव मानव) ही प्रधान रूप से पाये जायेंगे पर दो नोबेल पुरस्कार विजेता जैक मोनो और प्रो० निकोलाय दुबिनिन इस सम्बन्ध में बहुत संदिग्ध है। वे कहते हैं कि उन सबका सुधार परिष्कार कर सुपरमैन पीढ़ी का निर्माण तो अभी आकाश कुसुम ही कहा जा सकता है।

प्रयोग यह भी चल रहा है कि मनुष्य जाति की अगणित पीढ़ियों में घुसी विकृतियाँ का संशोधन करके परिष्कृत ‘जीन’ विनिर्मित करने की उपेक्षा-विभिन्न जीवों की विशेषताओं को लेकर एक ऐसा सम्मिश्रण बनाया जाय जिससे सर्वथा नये स्तर का जीवन तत्त्व बन सके और उसमें उन विशेषताओं का समावेश किया जाय जिनकी कि संसार को अगले दिनों आवश्यकता पड़ेगी।

जड़ समझे जाने वाले पदार्थों में जीवन तत्त्व होता है और उसे विकसित करके चेतन तत्त्व का सृजन किया जा सकता है। यह तथ्य अब ‘कृत्रिम जीन’ निर्माण हो जाने की सफलता ने प्रमाणित कर दिया है। अस्तु यह संभावना स्पष्ट हो चली है कि संसार के उपयोगी पदार्थों के स्वत्व लेकर अभिनव मनुष्य का निर्माण निकट भविष्य में हो सकेगा।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त डॉ० हरगोविंद खुराना ने अपने अन्वेषणों से सिद्ध किया है कि एक परीक्षण नलिका में जैविक रसायनों के सम्मिश्रण से ‘कृत्रिम जीन तैयार किया जा सकता है। अब वंश-वृद्धि के लिए प्राकृतिक जीन की अनिवार्य आवश्यकता नहीं रही। भविष्य में खिलाड़ी, विद्वान्, कलाकार, लड़ाकू आदि प्रकृति के मनुष्य इच्छानुसार उत्पन्न किये जा सकेंगे कृत्रिम तन्तुखण्ड भी ठीक वैसे ही है जैसे कि प्राकृतिक डीओक्सीरिवो न्यूक्लिक एसिड (डी० एन० ए०) के अणु।

कृत्रिम ‘जीन’ का निर्माण एक बड़ी दार्शनिक गुत्थी उत्पन्न करता है या सुलझाता है। अब तक जड़ चेतन का भेद इस आधार पर किया जाता रहा है कि जड़ वे हैं जिनमें चेतना नहीं। अब हर जड़ को चेतना मानना पड़ेगा या हर चेतन को जड़। शरीर और आत्मा के सन्दर्भ में आत्मवादी दर्शन यह परिभाषा करता रहा है कि शरीर जड़ है और आत्मा चेतन। पर अब कृत्रिम जीन का निर्माण यह सिद्ध करता है कि जड़ को विकसित करके चेतन की स्थिति में पहुँचाया जा सकता है। मूलतः हर जड़ में चेतना विद्यमान् है। इस प्रतिपादन से वेदान्त की अद्वैत मान्यता की पुष्टि भी होती है जिसके अनुसार इस जगत् को ब्रह्ममय बताया गया है और किसी ‘जड़’ के अस्तित्व से ही इनकार किया गया है।

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध प्रकृति शास्त्री डार्विन ने प्राणियों और वनस्पतियों के मूल अस्तित्व के सम्बन्ध में विशेष अध्ययन किया। 16 वीं शताब्दी के तृतीय और चतुर्थ दशक में उसने अपनी शोधों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न जीवों की विभिन्न उप जातियों के बीच गज़ब की समानताएँ और असमानताएँ विद्यमान् है। उसने अपने दो ग्रन्थों में यह प्रतिपादन किया कि-समस्त जीवधारी एक ही आदि जीव के विकसित और परिवर्तित रूप है। परिस्थितियों का सामना करने के लिए जीवों ने अपने आपमें आवश्यक परिवर्तन किये है। डार्विन का कथन यही हैं कि परिस्थितियों का दबाव और प्राणी की जीवित रहने की इच्छा इन दोनों तत्त्वों के समन्वय ही जीवों की अगणित आकृतियों और प्रकृतियों के उद्भव का मूल कारण है।

जब समस्त जीवधारी एक ही आत्मा सत्ता की शाखा प्रशाखा हैं और उनके बीच एकता की सघन सम्भावनायें विद्यमान् है तो फिर उनका पुनः विभाजन संयोजन करके क्यों नहीं एक ऐसी नई जाति का सृजन किया जा सकता है। जो आज की परिस्थितियों के अनुकूल उपयुक्त हो। वैज्ञानिक इस सम्भावना को स्वीकार करते हैं और इसके अभिनव उत्पादन की सूत्र शृंखलायें ढूँढ़ने में तत्परता पूर्वक संलग्न है। उनके मत से भावी पीढ़ियाँ शारीरिक और मानसिक दृष्टि से ऐसी उपयुक्तताओं से भरी पूरी बनाई जा सकेंगी जो संसार में शान्ति और प्रगति में सहायक सिद्ध हो सकें।

अध्यात्म विद्या इस प्रकार के सफल निष्कर्ष बहुत पहले ही निकाल चुकी है कि तप साधना से पति-पत्नी के शरीरों में विद्यमान् गुण सूत्र परिष्कृत किये जा सकते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही विकृतियों का निराकरण किया जा सकता है और साधना पूँजी से सुसम्पन्न व्यक्ति यदि ब्रह्मचर्य पालन की तरह ही सुसन्तति उत्पादन का प्रयोजन सामने रखें तो निस्सन्देह ऋषि परम्परा की पीढ़ियों का सृजन हो सकता है और आनुवांशिकी विज्ञान जिस महामानव के आदि पूर्वज को विनिर्मित करने में संलग्न है उसका प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। अध्यात्म और विज्ञान के सहयोग समन्वय से यह युगान्तर-कारी प्रयोग और भी अधिक सफलता एवं शीघ्रता से सम्पन्न हो सकता है।


Quotation

मैंने एक महिला को देखा, उसकी भाव भंगिमा को देखा और उसकी सन्तान के बारे में जान लिया, यद्यपि वह तब तक पैदा नहीं हुई थी।

एक महिला ने मुझे गौर से देखा और मेरे पुरखों के बारे में बता दिया, यद्यपि वे उसके जन्म से बहुत पहले ही मर चुके थे।

-खलील जिब्रान


जीवन को प्यार करो वह तुम्हें प्यार करेगा

शक्ति के स्रोत मनुष्य के भीतर छिपे पड़े है, पर कोई विरले ही हैं जो उन्हें समझते, अनुभव करते और काम में लातें है। यही है असफलताओं का कारण जिसे अक्सर लोग दूसरों पर थोपना चाहते हैं। आत्म प्रवंचना के रूप में दूसरों को भला बुरा कह कर कोई कुछ जी हलका कर सकता है पर उससे कुछ काम नहीं चलता। अवरोधों की मंजिल पार करते हुए प्रगति की दिशा में चलना और सफलता वरण करना उसी के लिए सम्भव है जो अपने को समझने सुधारने और समर्थ बनाने के लिए कटिबद्ध होता है।

इस संदर्भ में किसी भी विचारशील से पूछा जाय, वह एक ही उत्तर देगा कि प्रगति कोई दैवी वरदान नहीं है जो सहज ही किसी के गले में आकर लिपट जाती है, उसके लिए कठोर पुरुषार्थ और अटूट धैर्य एवं साहस का परिचय देना पड़ता है। जो इससे घबराते, कतराते हैं उन्हें निराशा भरी खोज से भीतर घुलते रहने और बाहर क्षोभ व्यक्त करते रहकर अपना और दूसरों का जी भारी करते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

आत्म कल्याण का मार्ग पूछने पर कोई तत्त्वज्ञानी सिर्फ एक ही परामर्श दे सकता है- “धर्म पर श्रद्धा रखो, नीति को आचरण में उतारो, अपना उद्धार आप करो। हँसी और मुस्कुराहट बिखेरो जो कार्य करना पड़े उसमें दूसरों की भलाई के तत्त्व जुड़े रखो। अपनी रीति-नीति ऐसी बनाओ जिस पर स्वयं को सन्तोष मिले और दूसरों को प्रेरणा।

सचमुच यही आत्म कल्याण का मार्ग है। इसी पर चलते हुए लोगों ने स्वर्ग और मुक्ति के द्वार में प्रवेश किया है और महामानवों की भूमिका निबाही है। सभी धर्म और सभी सन्त इसी का शिक्षण देते रहते हैं। इस सद्ज्ञान के उपदेश का लाभ केवल वे उठा सकते हैं जो कुछ कर गुजरने की हिम्मत रखते हैं। जिनने धर्म को कथन श्रवण भर तक सीमित रखा, सस्ते पूजा उपचारों से बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधी उन्हें निराश रहना पड़ा। मंत्र, देवता अथवा सिद्ध पुरुष सहायता तो करते हैं पर वह सहयोग सबके लिए सुलभ नहीं। वहाँ भी पात्रता की शर्त जुड़ी रहती है। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रबल पुरुषार्थ अवि-चार , धैर्य और अगाध श्रद्धा ही पात्रता की परीक्षा कसौटी मानी जाती रही है।

इन सब बातों पर विचार करने से निष्कर्ष एक ही निकलता है कि आत्म कल्याण और आत्म शान्ति के लिए हमें अपने ऊपर ही निर्भर रहना होगा जो करना चाहिए उसके लिए कटिबद्ध होना पड़ेगा। वे बाहर कहीं से भी सहज अनुदान में नहीं मिल सकते यदि कोई वरदान मिलते भी है तो उनके लिए भी पात्रता उत्पन्न करने की अनिवार्य शर्त तभी पूरी हो सकेगी जब आत्म निर्भरता के लिए अग्रगामी बना जाय। इसके अभाव में आत्मोद्धार की कल्पना जल्पना की विडम्बना में ही उलझे रहना पड़ेगा सफल लोग सदा से एक ही बात कहते रहें है। प्रगति के आधार अपने भीतर खोजो और उन्हें कार्यान्वित करो।

व्यवसाय क्षेत्र में सफल किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि उन्नति का मार्ग क्या है? तो वह यही कहेगा-अपने उत्साह को जगाओ और धैर्य पूर्वक सतत् श्रम में जुट जाओ। समृद्धियों का वरदान केवल उनके लिए सुरक्षित रखा गया है जिन्हें सम्पूर्ण मनोयोग और पुरुषार्थ के साथ काम करने का अभ्यास है। परिस्थितियाँ अपनी चाल से चलती हैं और बाधक भी बनती है, किन्तु यह समझ ही लिया जाना चाहिए कि कोई भी बाधा मनुष्य की संकल्प शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकती। सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच हुए लोगों में से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें आरम्भ में घोर निराशाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। उन दिनों की धीमी प्रगति को देखकर किसी भी हलके व्यक्तित्व का धैर्य टूट सकता था और वह अन्य असफल लोगों की तरह एक के बाद दूसरा रास्ता बदलते रहने की राह पर भटकता रह सकता था किन्तु अपने साहस और मनोबल को सुदृढ़ बनाये रहकर मनस्वी लोग अनवरत प्रयत्न करते हैं और अन्ततः सफल ही होकर रहते हैं।

तत्व दर्शियों का प्रत्येक विकासोन्मुख व्यक्ति को एक ही परामर्श रहा है- ‘अपनी परछाई से आगे देखो। जिस स्थिति में आज पड़े हो उससे बढ़कर उपलब्धियां पाने के सपने देखो।’ प्रस्तुत मनोभूमि और योग्यता से सन्तुष्ट न रहो। प्रगति की समस्त संभावनायें चिन्तन और व्यक्तित्व का स्तर ऊंचा उठाने के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं।

हम अपने आपको देखें, समझें, अपनी कमियों को तलाश करें और उन्हें सुधारने में लग जायें। यह विश्वास किया ही जाना चाहिए कि हर प्रगतिशील मनुष्य में पाई जाने वाली विशेषतायें अपने अन्दर बीज रूप में मौजूद हैं। यदि उन्हें सींचा संजोया जाये तो कोई कारण नहीं कि नगण्य दीखने वाला व्यक्तित्व और निराशाजनक वातावरण, उठता उभरता दिखाई न पड़े।

दूसरों की शिकायतें करने से कुछ लाभ नहीं। किसी का सद्भाव और सहयोग तभी मिलता है जब उसके सत्परिणाम का भरोसा हो। दीन दुखियों की क्वचित् सहायता ही उदारमना लोग करते हैं जबकि वे अपने व्यावसायिक साझीदार को जरूरत पड़ने पर अपनी बड़ी धन राशि निस्संकोच प्रस्तुत कर देते हैं। देखना चाहिए कि क्या हमने अपने को इतना प्रामाणिक और विश्वस्त बना लिया है जिससे यह आशा की जा सके कि सहयोग देने पर उसका सत्परिणाम ही निकलेगा। दूसरों की सहायताओं की आशा करने के लिए अपनी दीनता का अथवा कठिनाइयों का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं वरन् यह सिद्ध किया जाना चाहिए कि प्रगति के प्रचण्ड अभियान में हमें किसी की क्वचित् सहायता भर अभीष्ट है। सफलता तो इसके बिना भी मिल सकती है। जो यह सिद्ध कर सकता है उसी के लिए प्रचुर सहयोग के लिए दुनिया सहायता का द्वार खोलती है।

किसी समय के हेय और पिछड़ी स्थिति में पड़े हुए व्यक्तियों में से भी कितने ही ऐसे होते हैं जो अपने बलबूते पर प्रगति के उच्च स्तर तक जा पहुंचते हैं। मनस्वी लोगों की मान्यता होती है कि- ‘जो ललकारेगा उसे मिलेगा।’ ईसा कहते थे ‘जो खटखटायेगा उसके लिए खोला जायेगा।’ निस्सन्देह चुनौतियां स्वीकार करने वाले दुस्साहसी लोग ही जीवन मंथन में से कुछ मूल्यवान रत्न प्राप्त करते हैं। गहरे पानी में डुबकी लगाये बिना मोती कहां हाथ आते हैं?

गई गुजरी स्थिति में पड़े हुए लोग जब ऊंची सफलताओं के सपने देखते हैं तो स्थिति और लक्ष्य के बीच भारी अन्तर प्रतीत होता है और लगता है कि इतनी चौड़ी खाई पाटी न जा सकेगी। किन्तु अनुभव से यह देखा गया है कि कठिनाई उतनी बड़ी थी नहीं जितनी कि समझी गई थी। धीमी किन्तु अनवरत चाल से चलने वाली चींटी भी पहाड़ों के पार चली जाती है फिर धैर्य, साहस, लगन, मनोयोग और विश्वास के साथ कठोर पुरुषार्थ में संलग्न व्यक्ति को प्रगति की मंजिलें पार करने चलने से कौन रोक सकेगा?

ज्ञानियों का कथन है- अपने जीवन को प्यार करो- वह तुम्हें प्यार करेगा। अपने को सुन्दर बनाओ और सुविकसित होने का प्रयत्न करो। फिर देखो कि सुरम्य अनुकूलतायें और सघन सफलतायें किस तरह तुम्हारा स्वागत करने के लिए आतुर हो रही हैं।


टर्की का शासन (kahani)

टर्की का शासन जब कमाल पाशा ने संभाला तो उनने अपने मन्त्रियों से पूछा- टर्की राज्य भाषा बनने में कितना समय लगेगा? बहुत सोच विचारकर उन्होंने उत्तर दिया- कम से कम दस वर्ष। कमाल पाशा ने मन्त्रियों की ओर नजर तरेरी और फैसला घोषित करते हुए कहा- ‘समझ लीजिए दस वर्ष पूरे हो गये और कल सवेरे से तुर्की राज्य भाषा हो गई।’ उन्होंने अपना फैसला तत्काल लागू करने की व्यवस्था उसी समय बनादी।


जड़ और चेतन सूर्य की समानान्तर गतिविधियां

आत्मा की तुलना सूर्य से की गई है जीवात्मा का स्वरूप प्रकाशबिन्दु के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मरंध्र स्थित सूर्य सदृश तेजस्वी परब्रह्म का ध्यान करने की ध्यान पद्धति प्रख्यात है। अणु का नाभिक एक छोटा सूर्य है। अणुपरिवार की तुलना सौरपरिवार से की जाती है। दोनों की रीति-नीति एवं क्रिया प्रक्रिया प्रायः एक सी है। जीव और ब्रह्म की सत्ता भी इसी प्रकार तद्भव-तत्सम कही गई है।

सौरमण्डल महासूर्य और ध्रुवसूर्य की परिक्रमा करते हुए 4,32,000 वर्ष पश्चात उसी स्थान पर लौट कर आता है। यदि उस पुराने समय की ग्रह गणना किसी के पास सही हो तो द्वितीय आवृत्ति में भी वह ज्यों की त्यों मिलेगी। इसमें किंचित भी अन्तर न होगा। वर्ष गणना का अभी पूर्णतया सही हिसाब बन नहीं सका है। वर्ष और दिन की पूर्ण संगति न बैठने से कोई पंचांग सर्वांग पूर्ण नहीं बन सकता। जो अन्तर पड़ता है उसे सुधारने के लिए बार-बार घट बढ़ करनी पड़ती है। फिर भी वह कमी पूरी नहीं होती और जितना जितना समय बीतता जाता है, उतना ही पूर्व निर्मित ग्रहगणित पिछड़ जाता है और नये सिरे से उसकी गणना ग्रहों की स्थिति देखकर सही करनी पड़ती है। सही खांचा 4,32,000 वर्ष बाद ही बैठता है। इसलिए इस अवधि को एक युग माना गया है। वर्तमान युग की गणना भी इतने ही वर्ष की इसी आधार पर कही गई है।

जीवात्मा का चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करना सर्व विदित है। इस भ्रमण परिचय को पूरा करने के उपरान्त जीवन फिर मनुष्य योनि को प्राप्त करता है। मनुष्य को यह विशेष अवसर मिला हुआ है कि वह चाहे तो इस कुचक्र को तोड़ कर अपने उद्गम केन्द्र परमात्मा में लीन-लय हो सकता है। भौतिकसूर्य प्रकृतिगत नियम बन्धनों से बंधा है पर जीव सूर्य को यह सुविधा प्राप्त है कि वह अपने पुरुषार्थ के बल पर भव-चक्र की बन्धना रज्जु से मुक्ति प्राप्त कर अपना यात्रा प्रयोजन जल्दी ही पूरा करले।

मोटी दृष्टि से सूर्य, चन्द्रमा एवं तारक बहुत छोटे दीखते हैं पर उनका यथार्थ स्वरूप एवं विस्तार विदित होने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

मनुष्य की सत्ता और महत्ता सूर्य के समान ही असीम है। उसका वास्तविक विस्तार विश्व ब्रह्माण्ड के ही समकक्ष है। व्यक्ति का काय कलेवर सीमित हो सकता है पर उसका प्रभाव परिणाम असीम क्षेत्र को आच्छादित करता है। सम्पर्क में अपने वाले प्राणी तथा पदार्थ तो प्रखर व्यक्तित्व की ऊर्जा से प्रभावित होते ही हैं। उनकी संकल्प शक्ति एवं विचार धारा आकाश में प्रवाहित होकर असीम क्षेत्र पर अपना प्रभाव डालती है। सूर्य का क्रिया कलाप भी आत्मसत्ता के सदृश ही है।

सूर्य देखने में ही छोटा लगता है वैसे है वह बहुत बड़ा। धरती पर खड़े होकर देखें तो दिन में सूर्य और रात में चन्द्रमा दोनों ही लगभग एक सी गोलाई के लगते हैं पर इनमें अन्तर बहुत है। चन्द्रमा का व्यासमान 2160 मील है जबकि सूर्य का घेरा 8,31,000 मील का है इस सूर्य के इर्द-गिर्द भी उसकी कई परिधियां हैं। दूरबीन से देखने पर सूर्य के इर्द-गिर्द पीले गुलाबी रंग का एक वलय सा दिखाई पड़ता है। 10-15 हजार किलोमीटर की इस पट्टी को सूर्य का वर्ण मण्डल- क्रोमोस्फियर कहते हैं। लगभग 10,000 तापमान के इस क्षेत्र में कभी-कभी नुकीली ज्वालाएं उछलती हैं इनकी ऊंचाई 10,000 किलोमीटर तक उभरती देखी गई है।

सूर्य के प्रकाश का हम बहुत छोटा अंश ही देख समझ पाते हैं। अपनी पृथ्वी की ओर उसकी न्यूनतम किरणें ही आती हैं। वे बहुत अधिक मात्रा में तो अन्य दिशाओं में ही प्रवाहित होती रहती हैं। परमात्मा का एक स्वल्प सामर्थ्य अंश ही मनुष्य को- अपने भूलोक को मिला है। उसकी समग्र सत्ता जो अगणित ब्रह्माण्डों में बिखरी पड़ी है, इतनी अधिक है कि उसे ठीक प्रकार सोच सकना भी अपने लघुकाय मस्तिष्क के लिए सम्भव नहीं। फिर भी अपनी सत्ता को तो जाना समझा ही जा सकता है। आत्मस्वरूप का यदि बोध हो सके तो प्रतीत होगा कि परम चेतना की एक छोटी किरण होते हुए भी मानवी सत्ता कितनी प्रचण्ड है। इस प्रचण्डता का स्वरूप और उपयोग यदि समझा जा सके तो पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की संभावना मूर्तिमान् होकर सामने आये।

धरती पर सूर्य के समान प्रकाश का एक बँटा दस लाखवाँ भाग ही आता है। 6 लाख 66 हजार, 666 भाग तो दूसरी दिशाओं में वह प्रकाश बिखरता है और यहाँ उसकी सीमा का हमें कुछ पता ही नहीं है। सूर्य का किरीट-कोरोना-कितना विस्तृत और कितना प्रभावी है इसे जानने के लिए ‘कोरोना ग्राफ’ नामक यन्त्र कुछ समय पूर्व ही विनिर्मित हुआ है वह अथाह सूर्य सागर की थाह लेने का प्रयत्न कर रहा है।

सूर्य में समय-समय पर उठती रहने वाली ज्वालाएँ अपने आप में एक आश्चर्य है। एक विशिष्ट सूर्य ज्वाला 26 जुलाई 1646 को देखी गई थी। यह 10-10 मिनटों में लगभग तीन लाख मील फैल गई और कुछ सेकेण्ड के लिए उसके कारण सूर्य का प्रकाश तीस गुना अधिक हो गया। वह ज्वाला फिर वापस लौटी और सूर्य में ही समा गई। 13 दिसम्बर सन् 72 को भी एक ऐसा ही विस्फोट हुआ जिसमें सूर्य के पृष्ठ भाग में प्रभामण्डल से निकलते हुए भीमकाय बादल दिखाई पड़े। यह गैसों का विस्फोट पृथ्वी की अपेक्षा 20 से लेकर 40 गुना तक बड़ा था। और उसकी गति प्रति सेकेण्ड 660 किलो मीटर थी। ऐसी ज्वालाएँ अक्सर उठती रहती है। सन् 1646 में तो वे 40 बार उठी थी। खगोल विद्या विशारदों का मत है कि सूर्य के आलोक का जो क्षेत्र है वह भी नियमित और निश्चित नहीं जब ज्वालाएँ उभरती हैं तो वह बढ़कर 100 गुना तक अधिक विस्तृत हो जाता है। सूर्य का वर्ण मण्डल एक प्रकाश क्षेत्र ही नहीं चुम्बक क्षेत्र भी है। उसी में तो वह अपने सौर परिवार के ग्रहों को बाँधें जकड़े है। परिवार के दूरवर्ती प्लेटो प्रभृति ग्रहों तक प्रकाश स्वल्प पहुँचता है पर चुम्बकत्व वहाँ भी काम करता है और उस परिधि के ग्रह पिण्डों को पकड़े रहता है। इस प्रकार सूर्य का प्रभाव क्षेत्र बहुत बढ़ा और चूँकि सूर्य पृथ्वी की सीमा में आता है। इसलिए उसका किरीट आलोक एवं चुम्बकत्व वाला क्षेत्र भी पृथ्वी का हुआ। गाय खरीदी जाती है तो उसका छोटा बच्चा और रस्सा भी साथ ही आता है, उसका मोल भाव अलग से नहीं करना पड़ता।

सूर्य की तुलना में असीम अगणित शक्ति सम्पन्न परमात्मा की चर्चा तो कौन करे, आत्म सूर्य को भी यदि ठीक तरह समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि भौतिक ऊर्जा तथा प्रभा बिखेरने वाला सूर्य जितना बड़ा है- जितना सशक्त है उससे आत्मा की सीमा और गरिमा किसी प्रकार कम नहीं। आत्मा जब अपने स्वरूप में अवस्थित होकर शक्ति किरणें बखेरता है और विस्फोटक कदम उठता है तो उसका स्वरूप देखते ही बनता है। महामानव, ऋषि, देवदूत और अवतारी आत्माओं को ज्योतिर्मय स्थिति आश्चर्य जनक लगती अवश्य है पर वह मूलतः होती हर मनुष्य में समान रूप से है। उसे जो चाहें प्रयत्न पूर्वक चाहे जितनी मात्रा में विकसित कर सकता है।

सूर्य की तरह ही पृथ्वी का क्षेत्रफल भी निरन्तर बढ़ता हुआ अंकित किया गया है। सर्वतोमुखी प्रगति ही अन्ततः पूर्णता के रूप में परिणत होती है।

लन्दन के न्यूकैसेल्स विश्व विद्यालय में भौतिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो० के एम॰ क्रोर ने अपने शोध प्रबन्ध में यह सिद्ध किया है कि पृथ्वी रहस्यमय ढंग से गुब्बारे की तरह फूलती चली जा रही है। जब वह बनी थी तब उसका जो आदि रूप था उसकी अपेक्षा वह अब तक लगभग दूनी फूल चुकी है और भविष्य में उसका यह फैलाव क्रम तीव्र ही होता जाने वाला है।

आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचें है कि सौरमण्डल का फैलाव बढ़ रहा है। इतना ही नहीं यह समस्त ब्रह्माण्ड अपना विस्तार कर रहा है उसके क्षेत्रफल में आश्चर्य जनक वृद्धि हो रही है।

सर्वत्र विस्तार और विकास की ही हलचलें चह रही है फिर मनुष्य का आत्म विस्तार संकीर्ण स्वार्थ परता में सीमाबद्ध क्यों रहे?


घुटन एक प्रकार की आत्महत्या है।

कुछ रोग आहार विहार को अनियमितता से भी होते हैं। विषाणुओं के आक्रमण से छूत के रोग हो सकते हैं। हैजा, प्लेग, चेचक, फ्लू, खुजली जैसी बीमारियाँ एक से दूसरे को लगती और हवा पानी के सहारे अपना क्षेत्र बढ़ाती है सीलन और मच्छर मलेरिया उत्पन्नं करने के कारण होते हैं। नशेबाजी से फेफड़े की बीमारियाँ उपजती है। यह शारीरिक एवं भौतिक कारण हुए, पर सब रोग इसी तरह नहीं होते। शारीरिक कोई व्यतिक्रम या भौतिक विपरीतता उत्पन्न न होने पर भी मानसिक कारणों से ऐसे रोग हो सकते हैं जिन को आहार विहार की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

बात अचम्भे की लगती भर है पर है सीधी−सादी। हर कोई जानता है कि मस्तिष्क का पूरा नियन्त्रण सारे शरीर पर है, उसकी इच्छा से ही नाड़ी संस्थान काम करता है और ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से उसी का वर्चस्व छोटे से लेकर बड़े अंगों पर छाया रहता है। ऐसे उद्गम केन्द्र में असन्तुलन पैदा होता हो तो वह स्थानीय नहीं हो सकता, उसका प्रभाव ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अन्य अंगों तक भी पहुँचेगा और वहाँ भी रुग्णता की संभावना उत्पन्न होगी।

मानसिक घुटन को वाणी द्वारा या क्रिया द्वारा फुट कर बाहर निकलने का अवसर मिलना चाहिए। अन्यथा वह दबाव अनैच्छिक संस्थान की ओर मुड़ जाता है और शरीर में जो स्वसंचालित क्रियाएं होती रहती है उनमें वह घुटन वाला विष जा घुलता है। इससे सम्बन्धित अंगों में सिकुड़न एवं अकड़न पैदा होती है। यदि यह घुटन पेट की ओर मुड़ जाय तो आमाशय में सूजन होती है फिर जख्म बन जाते हैं। अल्सर इसी प्रकार का रोग है जिसमें शारीरिक कारण कम और मानसिक अधिक रहते हैं।

यदि शोक-सन्ताप का कोई कारण हो तो जोर से रो पड़ने या फूट-फुटकर बिलखने की इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए मानसिक आघात से उत्पन्न घुटन को बाहर निकाल देने का यही सरल और स्वाभाविक तरीका है। यदि लोक-लाज वश उस इच्छा को दबाकर अपने वीतराग या मनस्वी होने का ढंग किया जाएगा तो मानव स्वभाव की कमजोरियों पर तो विजय पाई न जाएगी और अनेक गड़बड़ियाँ पैदा करेगी। कोई विषैली चीज पेट में पहुँच जाय तो सीधा तरीका यही है कि उसे उल्टी या दस्त द्वारा बाहर निकल जाने दिया जाय यदि उसे निकलने का अवसर न मिला तो वह विष फिर अनेक भयंकर तरीकों से फूट कर निकलेगा और दस्त उल्टी जैसी कठिनाई की तुलना में अधिक कष्ट साध्य और समय साध्य होगा।

क्रोध में बक झक कर, जी की जलन शान्त कर लेना अच्छा है। पर यदि उस आवेग को मन में दबा लिया जाय तो वह घृणा या द्वेष के रूप में जड़ जमा कर बैठ जाएगा और शत्रुता का रूप धारण करके किसी अवसर पर विकराल प्रतिहिंसा का रूप धारण कर सकता है।

कामुक आकांक्षाओं को होली जैसे त्यौहार पर एक दो दिन उच्छृंखल नाच कूदकर-गा बजाकर निकाल देते हैं और जी हल्का कर लेते हैं। इसके विपरीत मन में काम विकार घुमड़ते रहें और बाहर से ब्रह्मचारी बनकर बैठा रहा जाय तो भीतर ही भीतर वह घुटन दूसरे रूप में फूटती है और कई प्रकार के शारीरिक , मानसिक रोग उत्पन्न करती है।

अच्छा यही है कि मन को ऐसा प्रशिक्षित किया जाय कि उसमें सौम्य सज्जनता ही स्वाभाविक हो जाय और विकार आकृतियों के लिए गुँजाइश ही न रहे। पर यदि क्रोध, शोक आदि आवेग उठ रहें हो तो उन्हें प्रकट होकर बाहर निकल जाने देना चाहिए।

कोई तो ऐसा सच्चा एवं विश्वस्त मित्र होना ही चाहिए जिसके सामने पेट के छिपे हुए हर रहस्य और भेद को प्रकट कर दिया जा सके। पिछले पापों को भी किसी ऐसे विश्वस्त से कह देना चाहिए जो उन्हें हर किसी से कह कर निन्दा का वातावरण तो न बनायें पर स्वयं सहानुभूति पूर्वक सुन लें। बदलें में घृणा भी न करे। छिपी बात को कह सकने योग्य उसे विश्वस्त समझा जाय इसके लिए मित्र की उदारता और आत्मीयता को सराहें ऐसे मित्रों का होना मनोविकारों की घुटन से पीछा छुड़ाने का अच्छा तरीका है। अपने किये हुए पाप का प्रायश्चित्त कर लेना तो सबसे ही उत्तम हैं उससे घुटन द्वारा होने वाली भयंकर सम्भावनाओं की तुलना में कही कम कठिनाई उठाकर, न केवल मन हल्का कर लिया जाता है वरन् कितने ही शारीरिक और मानसिक रोगों की जड़ भी कट जाता है।

मनः संस्थान में उत्पन्न घुटन विकृतियाँ भावनात्मक रोग उत्पन्न करती है। उन रोगों के अलग से लक्षण नहीं होते वरन् वे शारीरिक रोगों में मिलकर ही फूटते हैं। शारीरिक रोग यदि कायगत हों तो मामूली दवा-दारु ही उन्हें अच्छा कर देती है। पुराने समय में जब लोग सरल जीवन जिया करते थे; मन में प्रसन्नता, निष्कपटता और निर्द्वन्दता का सन्तुलन बनाये रहते थे तब आज जैसी मानसिक रोगों की बाढ़ न थी। उस जमाने में केवल काय कष्ट ही होता था अस्तु उनके उपचार में कोई कठिनाई नहीं होती थी। अब प्रत्यक्षतः शारीरिक रोग ही दिखते हैं पर उनके पीछे मानसिक रोगों की जटिल ग्रन्थियाँ उलझी होती हैं, जब तक वे न सुलझे, दवा क्या काम करें। मानसिक रोगों की दवाएँ अभी निकली नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि चिकित्सकों को चक्कर में डाल रखने वाले और दवाओं को झुठलाने रहने वाले रोगों का बाहुल्य औषधि उपचार की परिधि से बाहर निकलने लगे तो उसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं है।

भावनाएँ यदि निर्मल उदात्त और उच्चस्तरीय हों तो उनसे हर दृष्टि में लाभ ही लाभ है। अन्तःकरण मस्तिष्क और शरीर इन तीनों का ही पुष्टि होती है। परिस्थिति वश यदि शोक, क्रोध जैसे अवसर आ जाएँ और विवेक उनके समाधान में समर्थ न हो तो उसे स्वाभाविक रीति से प्रकट हो जाने देना चाहिए। जितना सम्भव हो उतना, मर्यादाओं का पालन किया जाय, विवेक द्वारा बड़ी दीखने वाली बात को छोटी करके उपेक्षा में डाल दिया जाय पर यदि वैसा न बन पड़े तो उसके प्रकटीकरण में भी हर्ज नहीं है।

कामवासना के पीछे मूल वृति हास्य, विनोद और क्रीड़ा कलोल की-कोमल भावनाओं की उत्तेजना का आनन्द लेने की होती है। उसे दूसरे रूप में प्रकट और परिणत किया जा सकता है। छोटे बालकों को खिलाने, दुलारने से भी सौंदर्य वासना और निर्मल हास-विलास की आवश्यकता पूरी हो जाती है। संगीत साहित्य जैसी ललित कलाओं का निर्माण ही इस आधार पर हुआ है कि उनसे भावनात्मक नीरसता को सरसता में परिणत होने का अवसर मिले। नर-नारी में भी निष्पाप हास्य विनोद चलता रह सकता है। कुटुम्ब में बहिन, भाई, देवर, भौजाई, चाची, भतीजे जैसे कई रिश्ते नर-नारी के बीच रहते हैं। इनमें परस्पर विचार विनिमय, हास्य-परिहास वार्तालाप चलता रहे तो नर-नारी की पूरक आकांक्षाएँ पवित्र स्तर पर पूरी होती रह सकती हैं और कामेच्छा का उदात्तीकरण होने से उन्हें भावनात्मक तृप्ति मिलती रह सकती है। पति पत्नी के बीच भी शरीरों को न्यूनतम मात्रा में ही गला कर-व्यंग विनोद, उपहास-परिहास की शालीन प्रक्रिया अपनाकर मनः क्षेत्र को उल्लास भरा रखा जा सकता है और वासना जन्य घुटन का सहज निष्कासन होता रह सकता है। इस स्थिति में ब्रह्मचर्य पालन कठिन नहीं पड़ता वरन् सरल हो जाता है।

भावनाओं का अनियन्त्रित उभार ठीक शरीर में चढ़े हुए बुखार की तरह है। बुखार में पाचन तन्त्र लड़-खड़ा जाता है। कोई अवयव उत्तेजित होकर अधिक काम कर रहा होता है कोई एकदम शिथिल पड़ गया होता है। ऐसे असन्तुलन में रोगी को दाह, प्यास, बेचैनी, दर्द आदि कितने ही कष्ट अनुभव होते हैं। भावनात्मक उभार को एक मस्तिष्कीय बुखार कहना चाहिए। कई बार वह तीव्र होता है कई बार मन्द। क्रोध शोक और बेकाबू होकर प्रकट होने वाले आवेग तीव्र बुखार है। चिन्ता, निराशा, कुढ़न, ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियाँ मन्द ज्वर है। आकांक्षाओं को इतनी बढ़ा लेना कि वर्तमान परिस्थिति में कार्यान्वित फलीभूत न हो सकें तो भी उनसे अतृप्ति जन्य क्षोभ उत्पन्न होता है और मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है। उन्नति के लिए प्रयत्न करना बात अलग है। और महत्त्वाकाँक्षाओं का पहाड़ खड़ा करके हर घड़ी असन्तोष अनुभव करना बिलकुल अलग बात है। कितने ही व्यक्ति उपलब्धियों के लिए व्यवस्थित प्रयास तो कम करते हैं, कामनाओं के रंग-बिरंगे स्वप्न देखते हैं। शेखचिल्ली की तरह लम्बी चौड़ी बातें सोचते रहना तो सरल है पर उन्हें फलीभूत बनाने के लिए योग्यता, साधन और परिस्थिति तीनों का ही तालमेल रहना चाहिए। इसके बिना महत्त्वाकाँक्षाएँ-ऐषणाएं केवल मानसिक विक्षोभ ही दे सकती है। इस प्रकार की उड़ानें उड़ते रहने वाले अन्ततः निराशा जन्य मानसिक रोगों के जाल जंजाल में जा फँसते हैं।

भावनात्मक विकृतियाँ शरीर के उपयोगी अंगों पर तथा जीवन संसार की क्रियाओं पर बुरा असर डालती है। उनके सामान्य क्रम को लड़खड़ा देती है और वह अवरोध किसी न किसी शारीरिक रोग के रूप में प्रकट होता है। पापी मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उससे ज्यादा अपनी करता है। दुष्कर्म कर लेना अपने हाथ की बात हैं पर उसकी प्रतिक्रिया जो कर्त्ताः के ऊपर होती है, और आत्मधिक्कार की, आत्म प्रताड़ना की, जो भीतर ही भीतर मार पड़ती है उसे रोकना किसी के बस में नहीं रहता। पाप-पुण्य के भले-बुरे फल मिलने की यही तो स्वसंचालित प्रक्रिया है। पाप कर्म के बाद अन्तःकरण में अनायास ही पश्चाताप और धिक्कार की प्रतिक्रिया उठती है। उससे शरीर और मन का सन्तुलन बिगड़ता है। दोनों क्षेत्र रुग्ण होते हैं। उसके फलस्वरूप जन-सहयोग का अभाव, असम्मान मिलता है। और सन्तुलन बिगड़ा रहने से हाथ में लिए हुए काम असफल होते हैं। इस सबका मिला-जुला स्वरूप शारीरिक मानसिक कष्ट के रूप में आधि-व्याधि बनकर सामने आता है। कर्मफल भोग की यही मनोवैज्ञानिक पद्धति है। इससे बचाव करने के लिए निष्पाप जीवन क्रम अपनाने की आवश्यकता है। जो पाप पिछले दिन बन पड़े है उनके प्रायश्चित्त के लिए किसी सूक्ष्मदर्शी आत्मविद्या विज्ञानी से परामर्श लेने की आवश्यकता है।

‘साइको सोमेटिक’ रोगों की बाढ़ इन दिनों बौद्धिक विकास के दुरुपयोग ने उत्पन्न की है। होना यह चाहिए कि यदि प्रबुद्धता के दुरुपयोग का खतरा हो वहाँ मानसिक विकास का प्रयास न किया जाय यदि वह अनुचित लगता है और मस्तिष्कीय विकास आवश्यक लगता है तो उसे सन्मार्गगामी बनाये जाने की समुचित तैयारी पहले से ही रखनी चाहिए। विकसित मस्तिष्क यदि दुष्प्रवृत्तियों से भरा रहा तो निश्चित रूप से वह अभिशाप सिद्ध होगा। और उसका दंड जटिल कष्ट साध्य, दुराग्रही साइकोसोमेटिक रोगों के रूप में भुगतना पड़ेगा। यह मानसिक रोग झक्कापन, सनक, आवेश, मतिभ्रम, अर्ध, विक्षिप्ताव्स्था, पागलपन आदि के रूप में भी हो सकते हैं और अन्य शारीरिक अवयवों में रोग उत्पन्न कर सकते हैं।

घुटन एक-न दीखने वाली-न समझ में आने वाली बीमारी हैं, पर इसका कुप्रभाव किसी भी भयंकर रोग से कम नहीं होता। अतृप्त और असन्तुष्ट मनुष्य, अपने आप ही अपने को खाता, खोता और खोखला करता रहता है। घुटन से बचा जाय। यदि अपनी भूल है-स्थिति का सही मूल्यांकन न करके काल्पनिक जाल-जंजाल बुन लिया गया है कि मकड़ी के जाले को तोड़कर यथार्थता के धरा-तल पर आना चाहिए और परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाकर मन का बोझ हलका करना चाहिए। यदि अपनी मान्यता सही है और दबाव डालकर आत्मा की आवाज का हनन किया जा रहा है तो फिर ऐसे आधिपत्य से इनकार करके अपना स्वतन्त्र रास्ता बनाना चाहिए फिर चाहे वह कितनी ही असुविधाजनक क्यों न हो। घुटन में दिन काटते हुए अन्तरात्मा और आत्मिक तीनों ही बल नष्ट होते हैं। इस प्रकार आत्महत्या की स्थिति से तो निकलना ही चाहिए भले ही उसमें कुछ बड़ा जोखिम उठाना पड़े। घुटन यदि आत्म प्रताड़ना की है तो उसे किसी विश्वस्त मित्र के आगे जी खोल कर कह ही देना चाहिए इस प्रकार वह धुँआ बाहर निकाल देने पर ही जी हलका हो सकता है।


स्वप्न आखिर है क्या बला?

कोई समय था जब हर स्वप्न में कुछ न कुछ अर्थ, रहस्य या सन्देश सन्निहित समझा जाता था, जो लोग स्वप्नों की व्याख्या कर सकते थे उन्हें बड़ा सम्मान मिलता था। ईसा की दूसरी शताब्दी में आर्तमिदोरस नामक एक इटली निवासी विद्वान् ने इस सन्दर्भ में एक पुस्तक लिखी थी पुस्तक का नाम था-ओजीरोक्रिटक-अर्थात् स्वप्नों की व्याख्या करने के सिद्धान्त। उन दिनों इसकी प्रतियाँ नकल करके बनाई जाती थी। पीछे पन्द्रहवीं शताब्दी में जब प्रेस का आविष्कार हुआ तो यह छपी और वह लोकप्रिय रहीं। इसके बाद और भी कई स्वप्न कोष छपे जिनमें हर स्तर के स्वप्नों की अकादरादिक्रम से व्याख्या होती थी।

पुराने जमाने में ऐसा समझा जाता था कि सोते समय आत्मा शरीर से निकल कर भ्रमण करने चला जाता है और वह वहाँ जो कुछ देखता है लौटकर पुनः शरीर में प्रवेश करने पर स्वप्न कहता है। उन दिनों गहरी नींद में सोये हुए किसी व्यक्ति को जगाना बुरा समझा जाता था क्योंकि जल्दी जगा देने से सम्भव है भ्रमणकारी आत्मा तत्काल शरीर में न लौट सके और उसकी मृत्यु हो जाय।

मनोविज्ञान शास्त्री शारीरिक या मानसिक परि-स्थितियों का विश्लेषण स्वप्नों के आधार पर करते हैं। जैसे गला घुटने या बोझ से दबने जैसे स्वप्न फेफड़े में खराबी उत्पन्न होने से उस प्रकार के रोग होने के संकेत करते हैं दो सोते आदमियों के हाथ में कलम थमा दी गई एक ने हाकी खेलने का और दूसरे ने मुगदर घुमाने का स्वप्न देखा। इसी प्रकार तीन सोते हुए आदमियों की हथेली पर रुई सहलाई गई एक ने बिल्ली की पूँछ हाथ ने पकड़ने के रूप में और दूसरे ने अपनी लड़की के बालों पर हाथ फिराने के रूप में उसी समय स्वप्न देखा। तीसरे ने मालिश होते हुए देखी। प्यासा आदमी स्वप्न में जलाशयों की तलाश में फिरता है और शौच की इच्छा होने पर टट्टी जाने के लिए स्थान तलाश करता है। वीर्य में गर्मी बढ़ जाने से काम सेवन और स्वप्न दोष होने की घटना अनेकों के साथ घटित होती है। यह शारीरिक स्थिति से सम्बन्धित स्वप्न के बढ़े-चढ़े प्रतीकात्मक रूप हैं। बालकों की तरह अचेतन मन भी बहुत कल्पनाशील होता। जरा से इशारे पर तिल का ताड़ गढ़कर खड़ा कर लेता है।

मनोविज्ञानी फ्राइड ने 1600 स्वप्न संग्रह करके उनके आधार पर एक बड़ी विवेचनात्मक पुस्तक लिखी है- स्वप्नों की व्याख्या। उसने यह निष्कर्ष निकाला है कि दबी हुई इच्छाएँ स्वप्न बनकर उभरती है। सभ्यता के साथ-साथ मनुष्य की कामनायें-आकांक्षाएँ , वासनाएँ और लिप्साएं भी बढ़ी है। वे अतृप्त रहने पर विद्रोही बनती है और स्वप्नों की अपनी अलग दुनिया रचकर उन्हें चरितार्थ करने का नाटक खेलती है। कामनाओं की न्यूनता से स्वभाव संतोषी बनता है। और अन्तःकरण में चैन रहता है अथवा इतनी सुविधा होनी चाहिए कि हर इच्छा तृप्त हो सके। दोनों ही बातें न बनें तो असन्तुष्ट मनः स्थिति में मानसिक ग्रन्थियाँ बनती हैं और वे ऊबड़-खाबड़ स्वप्न दिखाने से लेकर मनोविकार तक उत्पन्न करने का कारण बनती हैं।

स्वप्नों में आमतौर से इतना ही आधार रहता है कि वे मनुष्य की प्रवृत्ति और प्रकृति के अनुरूप दिशा में चलते हैं स्वप्नों का स्तर देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति के मन पर किन विचारों में आकांक्षा अथवा घृणा के रूप में आधिपत्य जमाया हुआ है। वह क्या चाहता है और किससे डरता बचता है। सपने आमतौर से इसी पटरी पर उड़ते लुढ़कते हैं।

कभी-कभी स्वप्न सत्य भी होते हैं। शुद्ध अन्तःकरण वाले, प्रातःकाल अदृश्य तथ्यों की जानकारी स्वप्न संकेतों से प्राप्त करते देखे गये हैं पर ऐसा होता प्रायः कम ही है।


अपने लिए दण्ड पुरस्कारों का विधान हम स्वयं ही करते हैं।

भगवान किसी को न तो दण्ड देता है और न पुरस्कार। वह केवल विधि व्यवस्था का विधायक और नियन्ता मात्र है। सृष्टि की क्रमबद्धता और समस्वरता को बनाये रखने भर का ध्यान रखता। व्यक्तिगत जीवन में उसका हस्तक्षेप नहीं के बराबर है। हर किसी को उसने यह पूरी आजादी दी है कि जो चाहे जिस तरह सोचे या करे। साथ ही विवेक का अनुदान देकर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चिन्तन का कर्तृत्व का स्तर ही उसके सामने दण्ड पुरस्कार के रूप में सामने आयेगा। स्वतन्त्रता दिशा अपनाने भर की है। पर जो कँटीले मार्ग पर चलेगा वह चुभन से बच न सकेगा यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया। धर्म शास्त्र, तत्त्व दर्शन और प्रमाण उदाहरणों से भरा इतिहास इसी यथार्थता को पग-पग पर प्रतिपादित करते रहें है।

घृणित कर्म करने वाले आप ही अपने को दण्ड देते हैं और सन्मार्ग पर चलने वाले अपनी गति विधियों के कारण स्वयं ही पुरस्कृत होते हैं। अनादि काल से यही स्वसंचालित क्रिया प्रतिक्रिया को सुसम्बद्ध शृंखला अपनी गति से चल रही है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुमार्ग पर चलने वाले सुख-शान्ति से रहें और सन्मार्ग अपनाने वालों को दुःख दारिद्रय से ग्रसित रहना पड़े। यदि ऐसा होता तो यहाँ उचित अनुचित के बीच कोई भेद ही न रह जाता और कोई कुकर्म से बचने एवं सत्कर्म अपनाने के लिए तैयार ही न होता। अधर्म का तात्कालिक आकर्षण यदि चिरस्थायी लाभ दे सका होता और उसके दुष्परिणाम की कोई आशंका न होती तो कदाचित् ही कोई व्यक्ति अधर्माचरण को अपनी प्रधान नीति बनाने से चूकता, तब शायद ही किसी को धर्म मार्ग अपनाने का उत्साह उत्पन्न होता और कदाचित् ही कोई उस कष्टसाध्य प्रतीत होने वाली प्रक्रिया को अपनाता।

ईश्वर ने मनुष्य को जितना स्वावलम्बी बनाया है उतना ही परावलम्बी भी। सर्व तन्त्र स्वतन्त्र मनुष्य नहीं ईश्वर नहीं है। ईश्वर इसलिए स्वतन्त्र है कि उसने नियम व्यवस्था बनाई है और उसने सर्व प्रथम अपने को बाँधा है। जहाँ विश्व का कण-कण किसी विधान से बँधा टूटने न पायें उन्हें तोड़ने का कोई दुस्साहस न करे इसलिए उसने अपने को भी प्रतिबन्धित किया है। पात्रता की मर्यादा का उल्लंघन करके वह न तो किसी को क्षमा प्रदान करते हैं और न किसी को भक्त अभक्त होने वे नाम पर राग, द्वेष की नीति अपनाता है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। बिजली मनुष्य की बहुत सेवा सहायता करती हैं-पर करती तभी तक है जब तक उसे विधि पूर्वक प्रयुक्त किया जाता है। अविधि पूर्वक व्यवहार करने पर यज्ञाग्नि भी होता को जला सकती है। प्रचुर खर्च करके बिजली के यन्त्रों को सुसज्जा एवं मनोयोग पूर्वक लगाने वाले भी यदि प्रयोगों में प्रमाद बरतें तो वह प्रतिष्ठापित विद्युत यन्त्र प्रयोक्ता के प्राण लिये बिना न छोड़ेंगे ईश्वर को कर्मफल की शृंखला में अग्नि या विद्युत के समतुल्य माना जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

कर्मफल तत्काल मिले ऐसी विधि व्यवस्था इस संसार में नहीं है। क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच कुछ समय का अन्तराय रहता है। बीज बोते ही फल-फूलों से लदा वृक्ष सामने प्रस्तुत नहीं होता। गर्भाधान के अगले क्षण ही प्रसव नहीं होता और प्रसव के उपरान्त तत्काल नवजात शिशु किशोर या प्रौढ़ नहीं बन जाता। अभिभावकों को उसके लिए धैर्य रखना होता है। बीज का फल वृक्ष और गर्भाधान का फल समर्थ सन्तान होता है यह सही है, पर यह भी सही है कि आरम्भ और परिणाम के बीच कुछ अन्तर अवश्य रहता है। हथेली पर सरसों बाजीगर ही जमा सकते हैं किसान को उसके लिए छः महीने तक साधना और प्रतीक्षा करनी पड़ती है। गाय के पेट में घास जाकर दूध में बदलती है इसे कौन नहीं जानता पर यह लाभ धैर्य पूर्वक ही उठाया जा सकता है। कोल्हू से तेल निकलने की तरह गाय को एक और घास खिलाने और दूसरी और दूध पाने की आशा की जाय तो सफलता न मिलेगी ठीक इसी प्रकार कर्म को फल के रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया कुछ समय चाहती है।

जन्म जात अपंग, बाधित, असमर्थ, मूढ़, रुग्ण व्यक्तियों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उद्धत आचरण करने वालों के प्रगति साधनों का प्रकृति ने किस प्रकार अपहरण कर लिया। बन्दूक का दुरुपयोग करने वालों का लाइसेन्स जब्त हो जाता है, इसी प्रकार मोटर चलाने में प्रमाद बरतने वालों का लाइसेन्स छिन जाता है। अपराधियों को न्यायालय में समाज में पृथक् रहने का यातना पूर्ण कारावास मिलता है और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते हैं। जन्मजात बाधितों को देखकर हम अनुमान लगा सकतीं है कि मिली हुई कर्म स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वालों से प्रकृति किस प्रकार प्रतिशोध लेती है।

सुविधाजनक प्रगतिशील वातावरण में-सुसंस्कारी परिवार में-जन्म होना पूर्वकृत सत्कर्मों का फल कहा जा सकता है। दुर्भागी व्यक्ति कुसंस्कारी परिस्थितियों में जन्म लेकर असुविधाजनक अड़चन भरे वातावरण में रहते हैं और प्रगति पथ पर बढ़ने में भारी अड़चन अनुभव करते हैं। इस विभेद के पीछे पूर्व जन्मों में संगृहीत शुभ अशुभ कर्म के परिणाम झाँकते देख सकते हैं। यों इन अड़चन भरी परिस्थितियों में भी सत्कर्म करने की-आगे बढ़ने की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है और कोई चाहे तो नियत अवरोधों को सहन करते हुए भी आगे बढ़ने ऊँचे उठने में सफल हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जिनमें अन्धे, अपंग, मूक, बधिर जैसी विषमताओं से ग्रसित लोगों ने इतनी उन्नति कर ली जिसे देखकर सर्व सुविधा सम्पन्न व्यक्तियों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा।

यदि इस संसार में ऐसी व्यवस्था रही होती कि तत्काल कर्मफल मिला करता तो फिर मानवी विवेक एवं चेतना की दूरदर्शिता की विशेषता कुण्ठित अवरुद्ध हो जाती। यदि झूठ बोलते ही जीभ में छालें पड़ जायें, चोरी करते ही हाथ में दर्द उठ खड़ा हो , व्यभिचार करते ही बुखार आ जाय, छल करने वाले को लकवा मार जाय तो फिर किसी के लिए भी दुष्कर्म कर सकना सम्भव न होता। एक ही निर्जीव रास्ता चलने के लिए शेष रह जाता। ऐसी दशा में स्वतन्त्र चेतना का उपयोग करने की-भले और बुरे में से एक को चुनने की विचारशीलता नष्ट हो जाती और विवेचना, ऊहापोह का बुद्धि प्रयोग सम्भव न रहता। तब दूरदर्शिता और विवेकशील की क्या आवश्यकता रहती और इसके अभाव में मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रतिभा का कोई उपयोग ही न हो पाता। बुरे कार्य के दुष्परिणाम और भले कार्य के सत्परिणाम समझने के लिए अंतःप्रेरणा, अध्यात्म तत्त्व दर्शन, धर्म विज्ञान नीति सदाचरण, श्रेय साधना का जो उपयोगी एवं आकर्षक सतोगुणी कलेवर खड़ा किया गया है उसकी कुछ आवश्यकता ही न रहती। सब कुछ, नीरस हो जाता है, यहाँ जो कौतुक दीख रहा है, बहुरंगी, कटु मधुर अभिव्यंजनाएँ सामने आ रहीं है उनमें कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर न होता। इन परिस्थितियों में से और कुछ लाभ भले ही होता मनुष्य की वह चेतनात्मक प्रतिभा कुण्ठित ही रह जाती जिसके कारण प्रगति पथ पर इतना आगे तक चल सकना सम्भव हो सका है।

कर्म का फल शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से कुछ विलम्ब से भी मिल सकता है पर आन्तरिक दृष्टि से तुरन्त तत्काल मिलता है। सद्भावनायें धारण करने वाला अन्तःकरण अपने आपमें अत्यधिक प्रफुल्लित रहता है। सुगन्ध विक्रेता बिना प्रयास किए निरन्तर उस महक का लाभ उठाता रहता है जिसके लिए दूसरे लोग तरसते ललचाते रहते हैं। सत्कर्म का सबसे बहुमूल्य लाभ आत्म संतोष है जिसे प्राप्त करने में तनिक भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सन्मार्ग पर चलने वाले का अन्तरात्मा अपने आप को प्रोत्साहन भरा आशीर्वाद देता रहता है। इस आधार पर बढ़ता हुआ आत्मबल मनुष्य की वास्तविक शक्ति को इतना अधिक बढ़ा देता है जिसकी तुलना उपनिषद्कार की उक्ति के अनुसार हजार हाथियों के बल से भी नहीं की जा सकती।

सद्भाव सम्पन्न सन्मार्गगामी का कोई स्वार्थवश कितना ही विरोधी क्यों न हो पर भीतर ही भीतर उसके लिए गहन श्रद्धा धारण किये रहेगा महात्मा गाँधी पर आक्रमण करने वाले गोड़से ने गोली दागने से पूर्व उनके चरण स्पर्श करके प्रणाम किया था। ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाने वाले लोग आँसुओं की धार से अपनी श्रद्धांजलि चढ़ा रहे थे। सुकरात को विष पिलाने वाले जल्लाद ने आत्म-प्रताड़ना से अपना माथा पीट लिया था।

महामानवों के पास भौतिक सम्पदायें भले ही न रहीं हों पर उनकी चरित्र निष्ठा, आदर्शवादिता और उदारता की पूँजी इतनी प्रचुर मात्रा में उन्हें विभूतिवान् बनाये रही हैं और वह वैभव इतना बढ़ा रहा है जिसके ऊपर धन कुबेर की सम्पन्नता को निछावर किया जा सके। ऋषियों के चरणों में राजमुकुट रखे देखकर यह समझा जा सकता है कि सन्मार्गगामी सर्वथा निर्धन नहीं होते, उनके पास अपने ढंग की ऐसी सम्पदा होती है जिसे पाकर मानव जीवन को सब प्रकार सार्थक एवं धन्य हुआ माना जा सके।

भौतिक विज्ञानियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि शारीरिक स्वास्थ्य का आधार मात्र पौष्टिक आहर एवं व्यायाम नहीं है वरन् मनःक्षेत्र की समस्वरता पर आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की नींव रखी हुई है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय रोगों के विशेषज्ञ यह कहते हैं कि अधिक मानसिक श्रम करने आदि के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं होते वरन् छल, प्रपंच, क्रूर दुराचरण जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ ही मन संस्थान में अन्तर्द्वन्द्व मचाती है और उन्हीं के फलस्वरूप अनिद्रा एवं सनक से लेकर उन्माद तक रोग अपने विभिन्न आकार प्रकार से उठ खड़े होते हैं। कोई समय था जब वात, पित्त, कफ़, आहार-विहार , कृमि कीटाणु ,छूत संक्रमण, ऋतु प्रभाव, गृहदशा भाग्य प्रारब्ध आदि को विभिन्न रोगों का कारण माना जाता था। वे बातें पुरानी हो गई मन शास्त्र के विज्ञानी अब उसे निष्कर्ष पर पहुँचे है कि अनैतिक, असामाजिक और अवांछनीय चिन्तन से इस प्रकार की घुटन से भर आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है, जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुँच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति-नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एक मात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञान वेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल करते है-पश्चात्ताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं। तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।

भारतीय धर्म शास्त्र आधि और व्याधि का अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध मानता रहा है। आधि अर्थात् मनः क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ जिस व्यक्ति में भरी होंगी वह शरीर और मस्तिष्क के रोगों से ग्रसित होता चला जाएगा और वे रोग मात्र औषधि चिकित्सा से कदापि अच्छे न हो सकेंगे कष्टसाध्य रोगों की एक श्रेणी कर्मजन्य भी होती है, उन्हें अन्तः क्षेत्र में जमी हुई दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। इन्हें पश्चात्ताप और प्रतिक्रिया द्वारा उखाड़ने का विधान है। असाध्य महारोगों के लिए यह प्रायश्चित्त चिकित्सा प्राचीन अध्यात्म विज्ञान और भौतिक मनोविज्ञान के आधार पर समान रूप से उपयुक्त मानी गई है। मान की निर्मलता से बढ़कर शारीरिक रोगों की निवृत्ति का और कोई कारगर उपाय नहीं है।

निश्चित रूप से मनुष्य एक स्वसंचालित यन्त्र है जो कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए परिणाम भोगने की शृंखला में मजबूती के साथ जकड़ा हुआ है। यदि हम सद्भावनाओं का-सत्प्रवृत्तियों का-चिन्तन और कर्तृत्व अपनाये तो सहज ही सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपना पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म दुष्कर्म के प्रतिफल है।


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बैठे हुए का भाग्य बैठा रहता है, उठता था बैठता नहीं, उठकर खड़े होने वाले का भाग्य उन्नति के लिए उठ खड़ा होता है। जो आलसी भूमि पर पड़ा सोया रहता है, उसका भाग्य भी सोता रहता है, जागता नहीं। जो देश-देशांतर में अर्जन के लिए चल पड़ता है। उसका भाग्य भी चल पड़ता है, दिन-दिन बढ़ता जाता है।


पात्रता प्रमाणित करें और विभूतियों का वरदान पायें

महा कवि शूमैन कहा करते थे-विभूतियों की अप्सरा उस यक्ष के साथ सहनृत्य करने के लिए अन्तरिक्ष में आतुर फिरती है जो अपनी कला को प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी सिद्ध कर सकें।

विविध स्तर की सफलताएँ जब सामान्य समझे जाने वाले लोगों को उपलब्ध होती है तो लोग उसे कोई चमत्कार समझते हैं पर तथ्य यह है कि वे अपने व्यक्तित्व के विकास में चुपचाप लगे रहते हैं। अपने गुण, कर्म और स्वभाव की मलीनता ही प्रगति पथ पर बढ़ चलने में सबसे बड़ी बाधा है। आत्म-निर्माण का ही दूसरा नाम भाग्य निर्माण है।

ज्ञानवान वह है जिसने आनन्द की खोज के मूल स्रोत अन्तःकरण में विद्यमान् होने की मान्यता परिपक्व कर ली है। दूरदर्शी वह है जिसने दूसरों का सहारा तकने की व्यथा से विरत होकर आत्म निर्भरता की गरिमा स्वीकार कर ली। विचारवान आपसी असफलताओं के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहराते वरन् गम्भीरता पूर्वक यह खोजते हैं कि किन त्रुटियों के कारण पिछड़ना पड़। जिनका ध्यान अपनी कमियों को समझने में ही लगा रहता है वे आत्म निरीक्षण कर्त्ताः यह साहस भी करते हैं कि सुधार के लिए क्या किया जाना चाहिए। जो अपने दुर्गुणों के दमन में साहस और शौर्य का परिचय देता है उसके सामने वह सब कुछ सरल हो जाता है जिसे साधारणतया दुर्लभ समझा जाता है।

यह उक्ति अक्षरशः सही सिद्ध होती है कि जो अपनी सहायता आप करता है उसी की सहायता ईश्वर भी करता है उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। अपने को सुयोग्य समुन्नत एवं परिष्कृत बनाने के लिए यदि हम कटिबद्ध हों तो वे प्रयास ही अपनी प्रामाणिकता के सबूत हो सकते हैं और उनसे प्रभावित होकर अन्यान्य व्यक्ति भी सहयोग के लिए उद्यत हो सकते हैं। ठीक प्रकार जोते सींचें गये खेत में बीज बोने के लिए बाहर के व्यक्ति भी अनुदान दे सकते हैं। पर ऊसर भूमि से तो उसका मालिक भी-कतराता है और कोठे में भरा बीज भी डालने का साहस नहीं करता। उस व्यक्ति की भला कोई क्यों सहायता करेगा जो हेय स्थिति में पड़े रहने में संतुष्ट है और दुर्भाग्य के सामने नतमस्तक होकर गिर पड़ा है। गन्दे गड्ढे में कोई सुगन्धित इत्र को डालने के लिए क्यों तैयार होगा?

दीनता की करुणा से द्रवित होकर दानी कुछ दे सकते हैं, उसमें गौरव दानी का है दीन का नहीं दरिद्रता का प्रदर्शन करके कुछ प्राप्त कर लिया जाय तो भी उसके साथ तिरस्कार तो जुड़ा ही रहता है। उपकृत होना स्वयं एक ऐसा भार है जिससे लदता चलने वाला व्यक्ति क्रमशः घटता और गिरता ही चला जाता है। गौरव गरिमा खोकर कुछ प्राप्त करना-अपने को दया पात्र सिद्ध करना और तब कुछ पाना वस्तुतः एक ऐसा घाटा है जिसकी तुलना बड़ी से बड़ी सम्पदा प्राप्त करने से भी नहीं की जा सकती।

ईश्वर की सच्ची और गहरी अनुकम्पा सदा से तपस्वी साहसी को ही मिलती रही है, उन्हीं को बढ़े-चढ़े दैवी अनुदान प्राप्त हुए है। अपने को दीन दरिद्र, असमर्थ और असहाय कहकर कोई अपनी अकर्मण्यता का ही परिचय दे सकता है। ऐसी दशा में यदि ईश्वर भी उनकी ओर से आंखें मीच ले, मुँह फेर ले तो आश्चर्य की बात ही क्या है?

हम पात्रता विकसित करें जीवन विद्या के कलाकार सिद्ध हों ताकि विभूतियों की अप्सरा हमारी प्रामाणिकता पर मुग्ध होकर सहनृत्य के लिए अन्तरिक्ष से उतर कर हमारे निकट आये और आनन्द उल्लास से निकटवर्ती वातावरण को भर दे।


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मंगों को कपड़ा देकर उनकी नदामत क्या करना? उनको काम दो जिससे वह निजी परिश्रम से कपड़ों के लिए धन पैदा करें। - महात्मा गांधी


संगीत के दुरुपयोग की निन्दा भर्त्सना

स्वरयोग की साधना-शब्दब्रह्म का अभ्यास वस्तुतः एक साधना है जिसका अवलम्ब लेकर मनुष्य अपने भीतर के ‘सुन्दर’ को ही नहीं ‘शिव’ और ‘सत्य’ को भी उल्लसित कर सकता है और उस आन्तरिक तृष्णा की तृप्ति कर सकता है जिसकी लालसा उसे विविध विविध कामनाएँ और प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती है। ‘संगीत’ के योगसूत्र में यही स्पष्ट किया गाय है। कि योग साधना के अनेक प्रकारों में नादयोग की स्वर साधना का भी महत्त्व पूर्ण स्थान है।

गीता में भगवान ने अपने को वेदों में सामवेद बताया है।

वेदानां समावेदोऽस्मि।’

सामवेद में भी सङ्गीत ही है पर उसमें पवित्र उद्देश्य और आदर्शों का समावेश है इसलिए उस स्वर लहरी को वन्दनीय और उपयोगी कहा गया है-

सामवेदः स्मृत पित्र्य स्तस्यात् तस्याशुचिर्घ्वनिः।

मनु0। 4।124

रुद्रः साममयोऽन्तेच तस्यात्तस्याशुचि र्ध्वनिः।

मार्कण्डेय पुराण 102।106

चिरअतीत में मनीषियों ने उसका विकास, विस्तार इस दृष्टि से किया था। लय और ताल का समन्वय करके वाद्य यन्त्रों को नहीं-अन्तरंग की स्वर वीणा को झंकृत करने का उपक्रम किया गया था। संगीत किसी समय भगवदोपासना का ही एक माध्यम था। सुनाने वालों में वह आत्मोल्लास जगाता था और उसे ‘कुत्सा’ से ऊँचा उठाकर ‘भूमा’ में प्रतिष्ठित करता था। अपनी इसी विशेषता के कारण वह लोक श्रद्धा का माध्यम रहा। सन्तों ने उसे प्राणप्रिय माना और उसके सहारे लक्ष्य पूर्ति की दिशा में सफल प्रयाण किया। इसमें इनका ही नहीं वरन् सुनने वाला का भी आत्मोत्कर्ष जुड़ा हुआ रहता था। सामगान के दिव्यदर्शी से लेकर देवर्षि नारद तक और अन्ततः वह पवित्र धारा अनेक सन्त साधकों में प्रवाहित होती हुई हरिदास एवं तानसेन तक चली आई। यह प्रवाह यथाक्रम चलता रहता और अपना स्तर यथा स्थान बनाये रहता तो उससे-भावनात्मक महानता की स्थिति उत्कृष्ट स्थिति में ही बनी रहती।

दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि पतन के सर्वभक्षी आक्रमण से संगीत भी बच नहीं सका। वह योगाभ्यास से नीचे उतरा और कला बना। इससे भी नीचे गिरा तो नट विद्या मात्र बनकर रह गया। आज वह इसी दयनीय दुर्दशा की स्थिति में पड़ा है।

संगीत को कला इसलिए बनना पड़ा कि वह लोक रुचि के पीछे चलकर आजीविका और प्रशंसा का माध्यम बन सके। यहाँ तक भी गनीमत थी। अन्य व्यवसायों की तरह ही संगीत भी किन्हीं पेशेवरों का पेशा रहे तो उन्हें व्यवहारिक जीवन की एक आवश्यकता मानकर गायक वादकों को साधक तो नहीं पर श्रमजीवी कहा जा सकता था। दुःखद स्थिति तब उत्पन्न हुई जब वह साधना तो दूर कला भी न रही और कुत्साओं के हाथ का खिलौना बनकर व्यसनी और व्यभिचारियों की तुष्टि-पुष्टि के काम आने वाली एक नशा भर बनकर रह गया। सामंतों और अमीरों की पशु प्रवृत्ति को अधिकाधिक उत्तेजित करने और उनके ‘पशु’ को अधिकाधिक उग्र बनाने भर के लिए जब उसने अपनी आत्मा को बेच दिया तो उस तत्त्वदर्शी की आत्मा बिलख-बिलख कर रोई होगी जिसने स्वर विज्ञान द्वारा नर को नारायण बनाने के सपने देखे होगे

मध्यकाल में संगीत अमीरों और बादशाहों का क्रीतदास था उसे उन्हीं के यहाँ आश्रय मिलता था। जनता की कुरुचि के बीच भी उसे स्थान मिला। इससे संगीत को धन और सुविधा साधन तो मिले-सस्ती वाहवाही भी हाथ लगी पर इसके लिए उसे महँगा मूल्य चुकाना पड़ा। ‘पीर को बावर्ची , भिश्ती को अन्ततः ‘खर’ बन जाना वस्तुतः एक दुःखद प्रसंग ही है। पुरोहित का यह पतन लौकिक दृष्टि से सुविधाजनक भले ही प्रतीत हो पर स्तर में आसमान से पाताल में जा गिरने जैसी यह दुर्दशा हर दृष्टि से लज्जाप्रद और दुर्भाग्य पूर्ण ही मानी जाएगी

अपने समाज में भगवद् भक्ति का भावोद्दीपक मनुष्य के देवत्व के जागरण का अविच्छिन्न अवलम्बन माना जाता रहा है। तदनुसार सन्तों, ब्राह्मणों, मनीषियों, धर्मोपदेशकों को भूसुर कहकर उनकी चरण धूलि मस्तक पर चढ़ाने की परम्परा रही है। संगीतकार इसी पंक्ति में बैठता था उसकी गणना इसी वर्ग में की जाती थी। स्वर साधक को योग-साधकों के बीच ही माना जाता था, उसे वैसी ही श्रद्धा प्रदान की जाती थी । कहना न होगा कि कभी किसी श्रद्धास्पद को रोजी-रोटी की शिकायत नहीं करनी पड़ी। रोटी की चिन्ता ने उन्हीं को खाया है जो आत्म विस्मरण के गर्त में गिर चुके। रोटी के नाम पर दौलत की हविस इन्हें सताती है जिन्होंने आन्तरिक गरिमा का विसर्जन करके विलासताओं ,लिप्साओं और अहंता की भौतिक तृप्ति के लिए व्याकुल रहने की दुष्प्रवृत्ति अपना लीं। कोई भी क्यों न हो- भले ही वह संगीतकार ही क्यों न हो इस स्तर पर उतरेगा तो वह अपना ही नहीं अपने संपर्क में आने वाले को भी पतन के गर्त में धकेलेगा।

इन दिनों कामुकता भड़काने वाली दृष्प्रवृत्तियों का ही दूसरा नाम संगीत बन गया है। स्वर साधना अब कला भी नहीं रही, वह नटनी, नर्तकी, गायकी वेश्या हरजाई है। उसका तन अब हर कोठे पर किसी भी कोढ़ी के आगे प्रमाणित होने के लिए सजा बैठा है। सन्त परम्परा-सामंतों के आश्रय में विकृत हुई तो अब हर कुत्साएं भड़काने वाली विडम्बना मात्र रह गई हैं। धन, वैभव तो वेश्याएँ भी कमाती हैं, तालियाँ बजने और वाहवाही सुनने का लाभ तो नग्निकाओं और विष कन्याओं को भी मिल जाता है ऐसी ही प्रशंसा यदि आधुनिक गीत वाद्य की कला को मिले तो उसे नियति का क्रूर व्यंग ही समझा जाना चाहिए। संगीत में सम्मोहन है। इसे ऋषियों के हाथ में ही रहना चाहिए। कुत्साओं की खिलवाड़ के लिए उसका प्रयुक्त किया जाना जनजीवन को विषपान ही करा सकता है। प्राणियों का वध करो के लिए अहेरी और सपेरे भी प्रयोग करते हैं। हिरनों को, साँपों को पकड़ने के लिए भी संगीत सम्मोहन का प्रयोग होता है पर वह न शुभ है और न श्रेयस्कर। शालीनता की दृष्टि से यह उचित नहीं कहा जा सकता कि संगीत जैसे शब्द योग को दौलत अथवा वाहवाही लूटने के प्रलोभन में लोक मानस का विनाश करने में प्रयोग किया जाय।

कामुकता एवं कुत्सा भड़काने जैसे दुष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया गया स्वर कितना अहितकर होता है इसकी एक कथा शतपथ ब्राह्मण में इस प्रकार आती है- त्वष्टा ऋषि ने ऋचा का उच्चारण करने में भूल की, उसका अवांछनीय रीति से दुरुपयोग किया। इसका फल बड़ा विपरीत निकला। त्वष्टा ने जिस प्रयोजन के लिए उच्चारण किया था वह तो पूरा न हुआ वरन् वृत्तासुर नामक एक देवघाती विकट महादैत्य उपज कर खड़ा हो गया और उसने भयंकर विभीषिकाएँ उत्पन्न कर दीं। आज ऐसे ही संगीत के दुरुपयोग ने समाज में अवांछनीय परिस्थितियाँ उत्पन्न की है।

जब कुत्साओं का पर्यायवाची संगीत बन गया तो विज्ञ समाज में उसकी सर्वत्र भर्त्सना की जाने लगी। औरंगजेब ने एक बार अपने राज्य में वाद्ययन्त्रों का जनाजा निकाल कर उन्हें कब्रिस्तान में दफना देने का आदेश दिया था और संगीतकारों को जन मानस को विलासी एवं पतनोन्मुख बनाने का अपराधी घोषित करके उन्हें देश निकाले की सजा दी थी।

पतनोन्मुख वासना प्रिय विलासी संगीत को भारतीय धर्म ग्रन्थों में भी घृणित त्याज्य एवं गर्हित घोषित किया है और इस प्रकार के विष मिश्रित दूध को पीने से बचने के लिए ही सर्वसाधारण को निर्देश दिया है। ऐसे अनेक अभिवचन यत्र-तत्र भरे पड़े है।

सम्भ्रान्त विज्ञ व्यक्तियों को भगवान मनु ने संगीत व्यसन से दूर रहने का परामर्श दिया है।

कामं क्रोधे च लोभं च नर्तन गीत वादनम्।

-मनु0 2।17

न नृत्येदथ्वा गायेत्र वादि-त्राणि वादयेत्। मनु 4।64

इन अभिवचनों से काम, क्रोध, लोभ जैसे दुर्गुणों की पंक्ति में ही गीत-नृत्य की गणना की गई है और उनसे बचने की शिक्षा दी गई है।

आगे चलकर उन्होंने संगीत जीवी व्यक्ति को अनाचारी, अधर्म, गर्हित, बताते हुए कहा है कि न तो उनके साथ पंक्ति में बैठकर भोजन करें और न उनका अत्र जल ही ग्रहण करें। उन्हें ब्राह्मण होने पर भी शूद्रवत् समझे। यह अभिप्राय व्यक्त करने वाले मनुस्मृति में निम्न श्लोक हैं-

कुशील वो ऽ वकीर्णी च वृषली पति रवेच।

एतान् विगर्हिताचाराना पांक्तेयान् द्विजा धमान्।

द्विजाति प्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत्।

-मनु0 3।155,167

स्तेन गायक योश्चात्र तक्ष्णों वार्धुषिकस्य च।

-मनु0 4।210

प्रेप्यन् वाधु षिकांश्चैव व्रिपान शूद्र वदाचरेत्।

8।102

ब्राह्मणो नैव गायेत्र नृत्येत्।

ब्राह्मण न तो गाये और न नाचे।

मनुस्मृति में नृत्य गान वाद्य को ‘तौर्यत्रिक’ संज्ञा देते हुए उसे त्याज्य कागज व्यसन कहा गया है।

तौर्यत्रिकं वृथाटया च कामजो दशको गणः।

- मनु0 7।47

व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत्।

- मनु0 7।4 5

इन दोनों ही निर्देशों में संगीत की भर्त्सना की गई है और उससे बचने के लिए कहा गया है।

संगीतकारों की गवाही को राजदरबारों में अप्रामाणिक मानने की बात मनु भगवान ने कहीं है और उन्हें अविश्वस्त ठहराया है।

न साक्षी नृपतिः कार्यो न कारुक कुशीलवौ। मनु 8।65

इसका कारण बताते हुए टीकाकारों ने बताया है कि वे लोभ, मोह में पड़कर अविश्वस्त आचरण कर सकते हैं। इसलिए उन्हें अप्रामाणिक माना जाय। यही मत याज्ञवल्क्य स्मृति 3।70 में नारद स्मृति 1।4।146 में व्यक्त किया गया है।

पद्मपुराण भूमि खण्ड 75।30 में राजा ययाति के महान् व्यक्तित्व और आदर्श राज्य का वर्णन किया गया है। साथ ही उनके पतन का कारण गीत वाद्य में रुचि लेने लगना भी बताया है।

कामस्य गीत लास्येन हास्येन ललितेन च।

मोहितो राज राजेन्द्रः काम संसक्त मानसः।

- पद्य पु॰ भू॰ ख॰ 77।1

कामुक गीत, वाद्य, नृत्य, हास्य विलास में राजा ययाति का मन मोहित हो गया और वे अपनी गरिमा खो बैठे।

श्रीमद्भागवत में साधु को संगीत सीखने , गाने एवं सुनने का निषेध किया गया है और कहा गया है कि इस कुचक्र में फँसकर वे अपनी हिरनों जैसी दुर्गति न करायें।

ग्राम्यगीतं न श्ररगुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित्

शिक्षेत् हरिणाद् वद्धान् सृगयो गीत मोहितम्।

भागवत् 11-8।17

अगले श्लोक में इसका प्रमाण देते हुए भागवतकार ने बताया है कि शृंगी ऋषि का पतन इसी कुचक्र में फँसने के कारण हुआ था।

बाणभट्ट ने अपने कादम्बरी ग्रन्थ में चन्द्रापीड आदर्श राज्य का वर्णन करते हुए लिखा है कि उस राज्य में ‘एणकानाँ गीत व्यसनम्’ हिरनों के अतिरिक्त और किसी को संगीत का व्यसन नहीं है।

वाल्मीकि रामायण में रावण की स्त्रियों के अनेक दूषणों में से एक यह भी गिनाया है कि वे संगीत परायण थीं।

नृत्य वादित्र कुशला राक्षसेन्द्र भुजाडकगाः।

-बा० रा० सुन्दर काण्ड 10।32

काचिद् वीणाँ परिष्वज्य प्रसुप्ता सम्प्रकाशिते।

10।37

अन्या कक्ष गते नैव मडडु के नासिते क्षणा।

10।38

विपंची परिगह्यान्याँ नियता नृत्य शलिनी।

इन सभी विवरणों में राक्षसियों को नाचने, गाने वाली, अनेक प्रकार के वाद्य यन्त्रों के साथ लटकाये रहना वाली, उन्हें साथ लेकर सोने वाली बताया गया है।

एक ओर असुर ललनाओं की इस काम संगीत व्यसन से ग्रस्त स्थिति का वर्णन है। दूसरी ओर भगवान राम भरत जी को अयोध्याकाण्ड 100।68 में संगीत व्यसन से सर्वथा दूर रहने का उपदेश देते हैं।

गायक वादकैश्चानथ्यैः संयोगः कामः।

-कौटिल्य अर्थशास्त्र 8।1।4

अर्थात् गायन, वादन कामोत्तेजक और अनर्थमूलक हैं।

नट नर्तकी विट वेश्याकुनृपेष्व नृताडम्बरं वक्तव्यः।

-वार्हस्पत्य अर्थशास्त्र 1-54

आचार्य बृहस्पति ने नट, नर्तक, वेश्या, कुनृप को समतुल्य रखते हुए इन आडम्बरों की भर्त्सना की है।

भरत नाट्य शास्त्र में संगीत को तीन भागों में विभक्त माना है-

“गीतं वाद्यं नर्तनं च त्रयं संगीत मुच्यंते”।

अर्थात् गाना, बजाना और नाचना तीनों को संगीत कहते हैं।

इसी ग्रन्थ के अन्त में उल्लेख है ऋषियों ने संगीत को शाप दिया और उसे शूद्रों का कार्य घोषित किया।

निब्रह्यणों निराभूतः शूद्रा चारो भविष्यति।’

36।34

अर्थात् वह विज्ञ व्यक्तियों से तिरष्कृत होगा एवं शूद्रों द्वारा अपनाया जाएगा

क्षेमेन्द्र रचित कला विलास ग्रन्थ में नृत्य गीतकारों को जनता के धन का अपव्यय कराने वाला और अर्थ व्यवस्था को नष्ट भ्रष्ट करने वाला बताया है-

अर्थो नाम जनानां जीवित मखिल क्रिया कलापस्य।

तं संहरन्ति धूर्ता छगल गला गायका लोके॥1॥

निःशेष कमला कर कोषं अग्ध्वापि कुमुदमा-स्वाद्य-क्षीणा गायन भृंगा मातंगा प्रणयतां यान्ति ॥2॥

अर्थात्-धन मानव जीवन की एक आवश्यकता है। पर बकरे के गले में लटकने वाले निरर्थक थन की तरह यह निकम्मे गायक, नर्तक उसे ऐसे ही झटक ले जाते हैं। ये लोग लक्ष्मी का भी खजाना खाली कर सकते हैं। निरन्तर फूलों का रस चूसते रहने पर भी अतृप्त ही रहते हैं। मत्त लोगों को ढूँढ़कर उनके वे मित्र बने रहने का प्रपञ्च रचते हैं।

चारुचर्या ग्रन्थ में गीत, वाद्य, विलास, व्यसनों की निन्दा करते हुए इन्हें शत्रु के समान घातक बताया गया है-

न गीत वाद्याभि रर्तिर्विलास व्यसनी भवेत्।

बीणा विनोद व्यसनी वत्सेशः शत्रुणा हतः।

उपरोक्त अभिवचनों में केवल कुत्सित संगीत की-वासना भड़काने में संलग्न कुरुचिपूर्ण संगीतकारों की ही भर्त्सना की गई है। सत्संगीत पर इस प्रकार के आक्षेप नहीं है। वह तो जन जीवन में भावनात्मक उत्कर्ष का ही पथ प्रशस्त कर सकता है। संसार भर के मनीषियों ने सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त होने वाले संगीत की महत्ता और आवश्यकता का एक स्वर से प्रतिपादन किया है। इस प्रकार के अभिवचनों में से कुछ इस प्रकार है-

संगीत से आत्मा की मलीनता धुलती है -आवेर वेच

गहराई में उतरो तुम्हें हर पदार्थ के अन्त में एक दिव्य संगीत उभरता दिखाई देगा। -कार्लाईल

संगीत आत्मा के ताप को शान्त कर सकता है -महात्मा गाँधी

संगीत में क्रूर हृदयं को भी कोमल बनाने वाला जादू भरा पड़ा है -जेम्स वाटसन

कितने ही महामानवों ने संगीत के सम्बन्ध में अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया है-

संगीत मानव की विश्व भाषा है। - लाँग फैलो

संगीत के पीछे-पीछे खुदा चलता है -शेखसादी

संगीत टूटे हुए हृदय की औषधि है -ए॰ हन्ट

संसार मुझसे चित्रों में बात करता है - मेरी आत्मा उसका उत्तर संगीत में देती है-रवीन्द्रनाथ

संगीत अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर सके, अपने सनातन स्वरूप को स्थिर रख सके इसके लिए हमें पूरा प्रयत्न करना चाहिए और उसे सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त होने देना चाहिए।


विवेकयुक्त दूरदर्शी बुद्धिमत्ता ही श्रेयस्कर है।

बुद्धि का अनुदान हमें इसलिए मिला है कि उस कसौटी पर खरे खोटे की परख करते रहें और जो उचित एवं उपयोगी है उसी को स्वीकार-अंगीकार करें। मन का काम इच्छा करना है। यह इच्छाएँ समीपवर्ती व्यक्तियों, घटनाओं एवं परिस्थितियों के आधार पर उत्पन्न होती है। आस-पास के सुखी समृद्ध लोग जो करते हैं उसी को करने दुहराने से अपने को भी वैसा ही बड़ा बनने की बात सूझती है। अनुकरण संसार का सबसे सरल कार्य है। तोता, मैना भी उच्चरित शब्दों को दुहराना सीख जाते हैं। बन्दर तक मदार की बताई नकल उतारने लगता है। और अनगढ़ मन बड़े कहलाने वालों की नकल उतारता है और दूसरों ने जिस भी सरल तरीके से सफलता पाई हो उसी के लिए ललचाता है। मनमर्जी पर चलने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि जो सोचा जा रहा है उसमें किंचित् लाभ के अतिरिक्त कहीं कोई भयानक हानि तो छिपी नहीं पड़ी है।

बुद्धि का काम है कि वह उन आवरणों को उठाकर दूरगामी परिणामों को देखें और यह निर्णय करे कि हमारे लिए आत्यन्तिक लाभ का मार्ग कौन सा है। कि जो आकर्षक होता है वह हितकर नहीं होता और जो हितकर होता है उसमें आकर्षण नहीं रहता। कभी-कभी हितकर और आकर्षक का समन्वय भी होता है, पर वह होता कम ही है।

मन की माँग है कि अधिक सरल के साथ अधिक सुविधा पाने की राह अपनाई जाय और इसमें यदि अनौचित्य अपनाना पड़ता हो तो उससे झिझकना नहीं चाहिए। मन की आतुरता तत्काल बढ़ी-चढ़ी सुविधा सफलता प्राप्त करने में रहती है, पर यह सम्भव है नहीं हर महत्त्वपूर्ण प्रयोजन समयसाध्य और श्रमसाध्य है। उसके लिए उपयुक्त साधन जुटाने के लिए उपयुक्त प्रयत्न अनवरत तत्परता पूर्वक करना पड़ता है। अधीर मन का बचपन इसके लिए सहमत नहीं होता फलतः वह रोज नये घर-घरौंदे बनाता बिगाड़ता रहता है। कितने महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति अपनी इसी बाल चंचलता के कारण अनेकों श्रेयस्कर प्रयासों को अपनाने के साथ ही दफनाने का भी उपक्रम करते रहते हैं और अन्ततः विविध प्रयासों के असफल होने की सूची देखते दिखाते दुर्भाग्य का रोना रोते रहते हैं।

हमें चंचल मन की बचकानी-बाल प्रवृत्ति नहीं अपनानी चाहिए। अनगढ़ मन का नेतृत्व स्वीकार नहीं करना चाहिए वरन् दूरदर्शी सद्बुद्धि का आश्रय लेना चाहिए और अपने चिन्तन को व्यवस्थित बनाने के लिए विवेकशीलता अपनानी चाहिए। दूसरे लोग अनीति मूलक गति विधियाँ अपनाकर भी क्षणिक सफलताएँ प्राप्त कर लेते हैं पर अन्त में उस कुमार्गगामिता का दुष्परिणाम भी कम नहीं भोगते । किसी भी बुद्धिमान और दूरदर्शी व्यक्ति को यह राह नहीं अपनानी चाहिए।

जीवन के बहुमूल्य क्षण इसलिए नहीं है कि दुष्प्रवृत्ति के दुष्परिणामों को अनुभव करने के उपरान्त जानें। उन्हें विवेक बुद्धि के आधार पर ही जान समझ लेना चाहिए और ऐसी रीति-नीति अपनाने का निर्णय करना चाहिए जिससे इस सुरदुर्लभ जीवन सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग हो सके। भौतिक सम्पदाओं की तुलना में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की विभूतियों को जो श्रेष्ठ ठहरा सके और उन्हीं के उपार्जन की प्रेरणा दे सकें वही सद्बुद्धि सराहनीय है। जिस विवेक के आधार पर आतुरता पर नियन्त्रण रखा जा सके और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए धैर्य और साहस के साथ अनवरत श्रम करने का उत्साह उत्पन्न हो सकें वही वन्दनीय है। सत् को ही स्वीकार करने वाले विवेक के साथ जुड़ी हुई सद्बुद्धि का आश्रय लेकर ही सच्चे अर्थों में सफल जीवन जिया जा सकता है।


हम हीलियम जितने हलके बनें

हलकापन यों उपेक्षणीय माना जाता है और भारीपन को हर दृष्टि से महत्त्व दिया जाता है, पर सर्वत्र ऐसी बात नहीं है। पतंगें और गुब्बारे आसमान में अपने हल्केपन के कारण ही उड़ते हैं। लकड़ी की नाव इसीलिए तैरती है कि उसके कण जल के कणों की तुलना में हलके होते हैं। चिकनाई भी पानी पर इसीलिए तैरती है कि वह अपेक्षाकृत हलकी होती है। भारी शरीरों की तुलना में हलके बदन वाले व्यक्ति ने केवल अधिक निरोग रहते हैं वरन् अधिक दीर्घजीवी भी होते हैं।

हवा में आक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, हाइड्रोजन आदि के विभिन्न अनुपात मिले होते हैं। इस सबसे हलकी होती है हीलियम गैस। यह हलकापन उसकी ऐसी विशेषता है जिनके कारण उसकी उपयोगिता और गरिमा अनेक गुना बढ़ जाती है।

हीलियम गैस पृथ्वी के वायुमण्डल में बहुत कम है। नाइट्रोजन के दस लाख अणुओं के पीछे कहीं एक का अनुपात उसका रहता है। पहले उसे सूर्य में विद्यमान् माना जाता था पर पीछे पता चला कि उसका एक स्वल्प अंश पृथ्वी के वायुमण्डल में भी मौजूद है। इसके कण न आपस में मिलते हैं। और न दूसरों के साथ संयोग करते हैं।

सूर्य के वातावरण में हीलियम की मात्रा 6 प्रतिशत है। अन्य तारों में भी उसका मात्रा लगभग इतनी ही पाई जाती है। सूर्य में 60 प्रतिशत हाइड्रोजन है जो निरन्तर भयंकर विस्फोट के साथ नष्ट होने के उपरान्त क्रमशः हीलियम में बदलती चली जा रही है। हीलियम के एक अणु में हाइड्रोजन के दो अणुओं से भी ज्यादा शक्ति होती है। संसार में हीलियम बहुत ही अधिक हलकी गैस है। साधारण हवा के एक कण के वजन पर हीलियम के सात कण तुल जायेंगे सबसे बड़ी खूबी उसकी यह है कि वह किसी भी तरह जलाई नहीं जा सकती। पर वह चमकती जरूर है। शून्य से 266 डिग्री सेन्टीग्रेड पर हीलियम द्रव हो जाती है। तापमान दो डिग्री और भी घट जाय तो वह ठोस होकर जम जाती है। यह ठण्डक पूर्ण शून्य से कुछ ही कम है।

जिनने अपने ऊपर परिवार की जनसंख्या का-चिन्ताओं और जिम्मेदारियों का भार जितना अधिक बढ़ा लिया होगा उनका जीवन संकट उतना ही भारी हो जाएगा और कठिनाई से आगे घसीटा जा सकेगा। कम वजन वाली हलकी सवारियाँ तेजी से दौड़ती है और उन्हें खींचने वाले वाहन बिना थके उत्साह पूर्वक अपना कर्तव्य निबाहते रहते हैं। मनुष्य यदि हलका-फुलका जीवन जिये-थोड़ी जिम्मेदारियाँ कन्धे पर रखे और बिना उद्विग्न हुए शान्त एवं स्थिर चित्त से काम करता रहे तो उसके काम भी अधिक होंगे और चित्त में हलकापन भी रहेगा।

संग्रहशील भारीपन डूबता है। वह अपने को भी नहीं उबार सकता तो दूसरों को क्या तारेगा। हलकापन तैर सकता है और दूसरों को तार-सकता है। सन्त और सज्जन अपरिग्रही रीति-नीति अपनाते हैं। और बोझिल तथा खर्चीली जिन्दगी नहीं जीते। यह हलकापन ही उनकी विशेषता है जिसके आधार पर परमार्थ परायण जीवन जीते हुए अपने कन्धों पर बिठाकर अनेकों को भव सागर से पार करते हैं।

गोताखोरी में अब हीलियम का उपयोग बढ़ने से गहरी डुबकी लगाने वालों का जीवन सुरक्षित हो चला है। कुछ समय पूर्व जब इस गैस का पता नहीं था तब समुद्री गोताखोर नाइट्रोजन के दबाव से बीमार हो जाते थे और कई बार मरते-मरते बचते थे। पर अब जब से आक्सीजन के साथ-साथ उन्हें हीलियम भी मिलने लगी है, उन्हें पहले जैसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। हम यदि हीलियम गैस की तरह हलके हो सकें तो सूर्य को प्राण और पृथ्वी को जीवन दे सकने में समर्थ हो सकते हैं।


अणुबम से बड़ा संकट - बढ़ता प्रजनन

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध विज्ञान वेत्ता डॉ० हाक्सले ने कलकत्ता में वैज्ञानिकों की एक गोष्ठी में कहा था- अणु विस्फोट से उत्पन्न विभीषिकाओं की समस्या से भी एक अधिक जटिल समस्या है- संसार भर में द्रुत गति से बढ़ती हुई जनसंख्या। हर वर्ष संसार में 50 करोड़ व्यक्ति नये बढ़ जाते हैं। यह संख्या समस्त पाश्चात्य देशों की वर्तमान आबादी के बराबर है।

‘इण्डिस्ट्रियल एफीसेन्सी आफ इण्डिया’ के विद्वान् लेखक प्रो० दास इस निष्कर्ष पर पहुँचें है कि भारत में आधी शताब्दी तक जनसंख्या की वृद्धि पूर्णतया रुकी रहे तभी यहाँ की आर्थिक और स्वास्थ्य समस्या हल होगी।

भारत के लिए तो अपनी इस बढ़ती हुई आबादी के लिए आहार देना और भी अधिक जटिल हो रहा है। सन् 43 में बंगाल में जो अकाल पड़ा था उसे भुलाया नहीं जा सकता। अत्र की कमी के कारण उसे छोटे से प्रदेश में 34 लाख व्यक्ति भूख से तड़प-तड़प कर मर गये थे।

भारत में आबादी की दृष्टि से संसार के सातवें भाग की जनसंख्या यहाँ रहती है। पर उसका क्षेत्रफल संसार के क्षेत्रफल का चालीसवाँ भाग मात्र है। विश्व सन्तुलन की दृष्टि से या तो भारत की जनसंख्या-विश्व जनसंख्या का रहना यहाँ आवश्यक हो तो उसे निर्वाह के लिए संसार का सातवाँ भाग भूमि मिलनी चाहिए। यदि असन्तुलन बना रहे तो दूसरे समुन्नत देशों की तुलना में आने के लिए भारत को उसी अनुपात से अधिक प्रयत्न पुरुषार्थ करना होगा जो उपरोक्त असन्तुलन में है। अर्थात् यहाँ की जनता समृद्ध देशों के नागरिकों की तुलना में लगभग छः गुनी तत्परता एवं श्रम निष्ठा अपनाकर ही समुन्नत वर्ग की पंक्ति में खड़ी हो सकती है।

भारतवर्ष विश्व के कुल भूभाग का लगभग ढाई प्रतिशत है। किन्तु आबादी विश्व जन गणना का 14 वाँ भाग है। औसत दुनिया की यदि एक मील भूमि में ढाई सौ व्यक्तियों को रहना पड़ता हो तो भारत में उतना ही जगह में 1400 व्यक्ति घुसे पड़े होगे अपने देश की भूमि को अन्य देशों की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक भार सहना पड़ता है।

विश्व की जनगणना तेजी से बढ़ रही है। इस बीसवीं शताब्दी के जो आँकड़े उपलब्ध है उनसे पता चलता है कि सन् 1601 की जनगणना में समस्त विश्व में 238 करोड़ मनुष्य रहते थे। वे सन् 1611 में 252 करोड़ हो गये और आबादी वृद्धि का औसत 13 प्रतिशत रहा। सन् 21 में यह आबादी लगभग उतनी ही रही। जर्मन युद्ध ने तथा उन्हीं दिनों फैली महामारियों ने संख्या बढ़ने नहीं दी। सन् 31 में शान्ति का समय आते ही यह संख्या 278 करोड़ हो गई, वृद्धि का औसत 27 हजार बढ़ा। सन् 41 में 1 में 318 करोड़ तक पहुंची और वृद्धि दर 38 प्रति हजार पहुंची। आगे इस क्रम में और तेजी आई। सन् 41 में 360 करोड़ हुई द 41 प्रतिशत पहुँची। 61 में संख्या 436 करोड़ दर 78 प्रति हजार। सन् 66 में 500 करोड़ संख्या और वृद्धि दर 61 प्रतिशत। इसी चक्रवृद्धि कम से बढ़ती हुई गति से अनुमान है कि अगले 72 के बाद 82 में होने वाली जनगणना में यह संख्या हजार करोड़ हो जायेगी। इसका अर्थ यह हुआ है कि अब कि अपेक्षा अगले बीस वर्ष में विश्व जनसंख्या दूनी होगी। किन्तु भूमि जितनी है उतनी ही रहेगी। ऐसी दशा में उस अब की अपेक्षा दूने लोगों के निवास के लिए, क्रिया कलाप के लिए तथा आहार ने के लिए विवश किया जाएगा

इन दिनों भारत की जनसंख्या 50 करोड़ है और जन्म दर हर वर्ष 41 करोड़ है और जन्म दर हर वर्ष 41 प्रति हजार के हिसाब से बढ़ती है। अपने यहाँ प्रति सेकेण्ड प्रायः 150 बच्चे पैदा होते हैं अर्थात् हर दिन 55 हजार नये बच्चे जन्म धारण करते हैं।

अपने देश में इन दिनों बच्चों की मृत्यु दर 10 प्रति हजार और बड़ी आयु के लोगों की मृत्यु दर 16 हजार है। दोनों को मिलाकर 26 प्रति हजार जबकि वृद्धि का क्रम 41 प्रतिशत। जन्म दर की तुलना में यह मृत्यु दर अत्यन्त स्वल्प है। बढ़ती हुई आबादी पर इससे कुछ अधिक नियन्त्रण नहीं होता। अपने देश में हर वर्ष इतनी आबादी बढ़ जाती है जिसे एक आस्ट्रेलिया को बराबर समझना चाहिए। हर वर्ष एक नये आस्ट्रेलिया के जुड़ने जितना उत्तरदायित्व वहन करना पड़े तो सोचा जा सकता है कि उसे सँभालने के लिए कितने साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ेगी।

अब आहार-विहार चिकित्सा आदि के साधन पहले की अपेक्षा अधिक है। फलस्वरूप मृत्यु दर पर काफी नियन्त्रण प्राप्त कर लिया गया हैं। 1650 में औसत आयु अपने देश में 32 वर्ष थी, सन् 66 में 50 वर्ष हो गई। इन पाँच वर्षों में आशा की जानी चाहिए कि वह कुछ और भी बढ़ा होगी। दीर्घ जीवन की दिशा में हम क्रमशः प्रगति कर रहें है यह प्रसन्नता की बात है पर साथ ही जन्म दर की वृद्धि को देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि इस सुधार ने आबादी की बढ़ोत्तरी में और भी अधिक तेजी लादी है।

संसार के भूमि उत्पादन के अंक 3.5 है जबकि भारत की भूमि 2.7 ही उत्पादन करती है। प्राकृतिक उर्वरा शक्ति और सुधरे हुए कृषि साधनों के आधार पर समुन्नत देशों ने अपना उत्पादन काफी बढ़ाया है। किन्तु पिछड़े देशों में वह कम है। फिर भी औसत 3.5 का बना हुआ है। भारत में चिरअतीत काल से कृषि कर्म होता रहा है। जबकि अन्य देशों में वह बहुत पीछे शुरू हुआ। अमेरिका में तो वह मात्र 200 वर्ष से ही आरम्भ हुआ है। भारत की बूढ़ी जमीन में प्राकृतिक उत्पादन क्षमता घट रही हैं। वंश वृद्धि के साथ-साथ पीढ़ी दर पीढ़ी भूमि का विभाजन होते जाने से उसके छोटे-छोटे टुकड़े होते चले जा रहें हैं। उनमें उत्पादन के कारगर साधनों की भी व्यवस्था नहीं हो सकती। ऐसी दशा में उत्पादन बढ़े तो कैसे बढ़े । 80 प्रतिशत किसान अशिक्षित हैं। उन्हें सुधरे साधनों को अपनाने के लिए न तो उतना उत्साह है न पूँजी विनियोग, ऐसी अनेक बाधाओं के कारण बहुत प्रयत्न करने पर भी उत्पादन का अंक 2.7 ही बना हुआ है।

खाद्य उत्पादन सन् 51 में साड़े पाँच करोड़ टन था। सन् 65 में बह सवा सात करोड़ टन हो गया। इन पाँच वर्षों में वह कुछ और भी बढ़ा होगा। किन्तु आबादी की बढ़ोत्तरी को देखते हुए यह खाद्य उत्पादन वृद्धि भी नगण्य है। खाद्य की खपत औसत प्रति व्यक्ति इन दिनों 12 ओंस छः छटाँक के करीब है। जबकि समृद्ध देशों के नागरिक इससे कहीं अधिक मात्रा में खुराक प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं उनके भोजन में भारतीयों के आहार की तुलना में पौष्टिक तत्त्व भी कहीं अधिक रहते हैं। घटिया और कम मात्रा में भोजन में भारतीयों के आहार की तुलना में पौष्टिक तत्त्व भी कहीं अधिक रहते हैं। घटिया और कम मात्रा में भोजन पा सकने की विवशता जहाँ उत्पादन की कमी के कारण रहती है, वहाँ एक कारण यह भी है कि इतने लोगों को अच्छा रोजगार देने की व्यवस्था भी अपने यहाँ नहीं हो पा रही है।

बेरोजगारी विभाग की रिपोर्ट है कि सन् 51 में 30 लाख लोग बेकार थे। सन् 65 में 310 लाख बेकार बढ़ गये। रोजगार देने के जो नये साधन खड़े किये जाते हैं वे औसत बढ़ोत्तरी की तुलना में कम ही पड़ते जाते हैं। समय की मग है कि हर वर्ष 130 लाख व्यक्तियों को नये रोजगार साधन उपलब्ध कराये जायें। काम करने योग्य तने ही नये नवयुवक हर वर्ष रोजगार काम माँगते हैं। यदि उन्हें निराश रहना पड़े तो निश्चित रूप से समाज में अगणित विकृतियाँ पैदा होगी।

वर्तमान गति से बढ़ती हुई आबादी की हर वर्ष राष्ट्र के समान नई माँग उपस्थित होती है इसकी नई आवश्यकता हर वर्ष काफी बढ़ी-चढ़ी होती है जिन्हें जुटाने के प्रयास प्रायः पिछड़ते ही चले जाते हैं। हर वर्ष बढ़ने वाली आबादी के 126500 नये स्कूल, 372500 नये अध्यापक, 2506000 मकान, 188, 774,000 मीटर कपड़ा, 12545000 क्विन्टल भोजन चाहिए। साथ ही 4,000000 व्यक्तियों को नई नौकरियाँ मिलनी चाहिए।

कृषि तथा अन्यान्य नये उत्पादन साधनों की इस समय तक जितनी वृद्धि हो सकी है तथा भावी सम्भावनाओं का लक्ष्य बनाया गया है उसे देखते हुए यह नितान्त आवश्यक है कि जन्म दर 41 प्रति हजार से घटाकर 24 प्रति हजार कर दी जाय। इन दिनों प्रायः 6 करोड़ दम्पत्ति प्रजनन प्रक्रिया में संलग्न है। उनकी संख्या घटे और इस प्रयास में विरति उत्पन्न की जाय।

आँकड़े बताते हैं कि जनसंख्या प्रायः 25 से 30 वर्षों के बीच दुगुनी हो जाती है। बीमारी, अकाल, दुर्बलता, युद्ध, प्रकृति प्रकोप आकर इस अवांछनीय उत्पादन को ठिकाने लगाते हैं। यदि पहले से ही सावधानी रखी जाय तो प्रकृति कोप क्यों जगे ओर उस विनाश का चीत्कार क्यों सुनने को मिले? संसार में विपत्तियाँ वे लोग बढ़ाते हैं जो धरती का बोझ उठाने की शक्ति का ध्यान न रखते हुए अन्धाधुन्ध सन्तान बढ़ाते चले जाते हैं। देखने में प्रजनन एक निर्दोष कृत्य मालूम होता है और एक हद तक मनोरंजक भी, पर यदि उस दिशा में अविवेकपूर्ण कदम उठाये गये है तो उसका दुष्परिणाम उन उत्पादकों के साथ-साथ समस्त समाज को भी भोगना पड़ेगा। सर्वत्र विजित और शोक-संताप का वातावरण उत्पन्न करना यदि पाप है तो अविवेकपूर्ण पूर्ण रीति से अनावश्यक सन्तान पैदा करना भी पाप ही माना जाएगा भले ही आज की प्रचलित मान्यता के अनुसार उसे पाप न माना जाता हो।


श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन (kahani)

हिन्दी भाषा के प्रसार से सम्बन्धित एक मुद्दे पर श्री गाँधी जी और श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन मतभेद हो गया। गाँधी जी कहते थे-हिन्दी वह भाषा है जो देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखी जाती है” टण्डन जी इस पक्ष में थे कि- “हिन्दी वह भाषा है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है “ देवनागरी के पक्ष में तमाम महाराष्ट्र ने गाँधी जी का तीव्र विरोध किया। फलस्वरूप पहले वाली परिभाषा रद्द कर दी गई और दूसरी परिभाषा ही प्रस्ताव में पारित हो गई।

इस बात को लेकर गाँधी जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन से इस्तीफा दे दिया और उसके स्थान पर “ हिन्दुस्तानी प्रचार सभा “ की स्थापना कर उसमें उन्हीं आदमियों को सदस्य बनाया जो हिन्दी के साथ उर्दू के भी पक्षपाती थे। प्रसार कार्य के लिए गाँधीजी के प्रभाव के कारण एक बैठक में आये एक को छोड़कर बाकी सभी सदस्यों ने गाँधीजी को अपना समर्थन देना स्वीकार कर लिया। किन्तु टण्डन जी की अनुपस्थिति के कारण गाँधी जी को इतना व्यापक समर्थन भी सन्तुष्ट नहीं कर सका।

गाँधी जी ने टण्डन जी को पत्र लिखकर अपनी व्यथा प्रकट की ओर उनसे आगामी बैठक में उपस्थिति होने का आग्रह किया। उनका यह विशेष पत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मन्त्री श्रीनाथ सिंह टण्डन जी के पास पहुँचें, उन्हें आशा थी कि टण्डन जी बापू का आग्रह ठुकरायेंगे नहीं टण्डन जी ने पत्र ध्यान से साथ पढ़ा, गाँधीजी के प्रति उन्होंने हार्दिक श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा-आप गाँधीजी से कह देना कि उन्हें आवश्यकता पड़े तो अपना शरीर काटकर एक सेर माँस उन्हें दे सकता हूँ किन्तु अपनी आत्मा का हनन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है और वे हिंदुस्तानी प्रचार सभा में गये ही नहीं गाँधीजी ने यह सुना तो उनके मुख से यही निकला कि मैं बहुमत की उपेक्षा कर सकता हूँ किन्तु यदि किसी का हृदय परिवर्तन नहीं कर सकता तो वह कार्य मेरे लिये असम्भव हैं, यह कहकर उन्होंने हिन्दुस्तानी प्रचार सभा से भी सम्बन्ध तोड़ लिया।


न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें

आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।


ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है।

शारीरिक और मानसिक उत्तेजनाओं आत्मिक-साधनाओं में अत्यन्त बाधक होती है। उनके कारण महत्त्वपूर्ण साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता रह सकें।

क्रिया-कलापों की भगदड़ से माँस पेशियों में-नाड़ी संस्थान में तनाव रहता है। बाहर से स्थिर होते हुए भी यदि शरीर के भीतर आवेश छाया रहा, तो उस उफान के कारण मन का स्थिर एवं एकाग्र रह सकना भी सम्भव न होगा। हठयोग में शरीर को जटिल स्थिति में डाले रहने की आवश्यकता हो सकती है पर ध्यानयोग की दृष्टि से वह सर्वथा अवांछनीय है अर्धपद्मासन , शीर्षासन, एक पैर से खड़ा होना, जल में बैठना, धूप में तपना, शीत में काँपना, ठण्ड के दिनों में ठण्डे जल से नहाना, गर्मियों में धूनी तपना जैसे शरीर पर दबाव डालने वाले साधन क्रम हठयोग एवं तान्त्रिक साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार , धारणा, ध्यान समाधि जैसे लययोग परक, अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस सन्दर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिका पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मन्त्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इस विधि विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता, क्योंकि चित्त वृत्तियाँ इन शरीरगत हलचलों में लगी रहती हैं- एकाग्रता हो तो कैसे हो।

आरम्भिक साधना प्रयास में केवल आदत डालने नियमितता अपनाने एवं रुचि उत्पन्न करने जितना ही लक्ष्य रहता है इसलिए उपासना में मनोरंजक-चित्त को एक नियत विधि व्यवस्था में लगाये रहने वाली विधियाँ उपयुक्त रहती है। शंकर जी पर बेलपत्र चढ़ाना परि-क्रम करना, धूप, दीप आदि से देव प्रतिमा का पंचोपचार पूजन’ स्तवन, पाठ, जप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनायें इसी स्तर की होती हैं, उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी महत्त्व करना होता है। तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निश्चेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव रहित शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलता है।

मन मस्तिष्क के बारे में भी यही बात है। उसमें हलचलें चल रही होगी, तरह-तरह के विचार उठ रहे होगे तो जल में उठती हुई हिलोरों की तरह अस्थिरता ही बनी रहेगी। स्थिर जल राशि में चन्द्र, सूर्य तारे आदि का प्रतिबिम्ब ठीक प्रकार दृष्टिगोचर होता है पर हिलते हुए पानी में कोई छवि नहीं देखी जा सकती। विचारों की हड़कम्प यदि मस्तिष्क में उठती रहें-तरह तरह की कल्पनायें घुड़दौड़ मचाती रहें तो फिर ब्रह्म सम्बन्ध की प्रगाढ़ता में निश्चित रूप से अड़चन पड़ेगी। मस्तिष्क जितना अधिक रहित-खाली होगा उतनी ही तन्मयता उत्पन्न होगी और आत्मा परमात्मा का मिलन संयोग अधिक प्रगाढ़ एवं प्रभावशाली बनता चला जाएगा

आकाश में जब बिजली कड़क रही हो या आँधी-तूफान का मौसम चल रहा हो तो हमारे रेडियो में आवाज साफ नहीं आती कंकड़ जैसे व्यवधान उठते रहते हैं और प्रोग्राम ठीक से सुनाई नहीं पड़ते। अन्तरिक्ष से भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक चेतनाओं का सुदूर क्षेत्र से मनुष्य पर अवतरण होता रहता है। ब्राह्मी चेतना एक प्रकार का ब्रोडकास्ट केन्द्र है जहाँ से मात्र संकेत, निर्देश, सूचनाएँ ही नहीं वरन् विविध प्रकार की सामर्थ्य भी प्रेरित की जाती रहती है। सूक्ष्म जगत में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है जहाँ सही रेडियो यन्त्र लगा है- जहाँ व्यक्ति ने अपने आपको सही अन्तः स्थिति में बना लिया है वहाँ यह सुविधा रहेगी कि ब्रह्म चेतना की विविध सूचनाओं को ग्रहण करके अपनी ज्ञान चेतना को बढ़ा सकें। इतना ही नहीं प्रेरित दिव्य शक्तियों अपने को असाधारण आत्म बल सम्पन्न बना सकें।

परन्तु यह सम्भव तभी है जब मनुष्य अपने मस्तिष्क को तनाव रहित-शान्त स्थिति में रखे। आँधी-तूफान कड़क और गड़गड़ाहट की उथल-पुथल रेडियो को ठीक से काम नहीं करने देती। मनुष्य का शरीर और मन उत्तेजित-तनाव की स्थिति में रहें तो फिर यह कठिन ही होगा कि वह ब्रह्म चेतना के साथ अपना सम्बन्ध ठीक से जोड़ सके और उस सम्मिलन की उपलब्धियों का लाभ उठा सके।

ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

मन मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना अपने पैर का अँगूठा अपने मुख से चूसना, इस प्रकार का प्रलय चित्र बाज़ार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु , हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता। अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुम्बकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जितना गहरा होगा उतना ही परस्पर लय होने की-सम्भावना बढ़ेगी इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव के ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय समर्पण पर एकात्म भाव पर निर्भर रहता है।

जटिल संरचना वाले कोमल तारों एवं पुर्जा से बने यन्त्रों का उपयोग बहुत साज सँभाल के साथ किया जाता है। उन्हें झटके धक्के लगते रहे तो कुछ ही समय में गड़-बड़ी उत्पन्न हो जाती है। ट्रांजिस्टर, रेडियो, टेप रिकार्डर घड़ी आदि संवेदनशील यन्त्र भारी उठक-पटक बर्दाश्त नहीं कर सकते उन्हें ठीक रखना हो तो सावधानी के साथ उठाने, रखने बरतने का क्रम चलाना चाहिए। यही बात शरीर और मस्तिष्क के बारे में है, यदि उन्हें स्वस्थ स्थिति में रखना हो तो तनावों और आवेशों से उनकी समस्वरता को नष्ट होने से बचाना ही चाहिए।

शरीर को मृत समान निर्जीव करने- काया से प्राण को अलग मानने- अर्धनिद्रित स्थिति में माँस पेशियों को ढीला करके आराम कुर्सी जैसे किसी सुविधा-साधन के सहारे पड़े रहने को शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। ध्यान-योग के लिए सही यही सर्वोत्तम आसन है। शरीर को इस प्रकार ढीला करने के अतिरिक्त मना को भी खाली करने की आवश्यकता पड़ता है। ऊपर नील आकाश-नीचे अनन्त नील जल-अन्य कोई पदार्थ, कोई जीव, कोई परिस्थिति कहीं नहीं, ऐसी भावना के साथ यदि अपने को निर्मल निद्रित मन वाले बालक की स्थिति में एकाकी होने की मान्यता मन में जमाई जाय तो मन सहज ही ढीला हो जाता है। इन दो प्रारम्भिक प्रयासों से सफलता मिल सके तो ही समझना चाहिए कि ध्यानयोग में आगे बढ़ने का पथ प्रशस्त हो गया।

संसारव्यापी शून्य नीलिमा की तरह ध्यानयोग में अपने हृदयाकाश को भी रिक्त करना पड़ता है। कामनायें-वासनायें-ऐषणाएं-आकांक्षाएँ , प्रवृत्तियाँ-भावावेश परक उद्विग्नतायें मन में जितनी उभर उफन रही होगी उतना ही अंतःक्षेत्र अशान्त रहेगा और एकाग्रता का-तन्मयता का-लय स्थिति का आधार अपनाकर हो सकने वाला ध्यान प्रयोजन पूरा न हो सकेगा।

मस्तिष्क पर क्रोध, शोक, भय, हानि, असफलता, आतंक आदि के कारण वश आवेश आते हैं पर वे स्थायी नहीं होते कारण समाप्त होने अथवा बात पुरानी होने पर शिथिल एवं विस्मृत हो जाते हैं। उनका प्रभाव चला जाता है। पर कामनाओं की उत्तेजना ऐसी है जो निरन्तर बनी रहती है और दर्द की तरह मनः संस्थान में आवेश की स्थिति बनाये रहती है। घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, आशंका, जैसे निषेधात्मक और लोभ, मोह, अहंता, वैभव, सत्ता, पद, यश, भोग, प्रदर्शनी जैसी भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की विधेयात्मक कामनायें यदि उग्र हों तो दिन-रात सोते जागते कभी चैन नहीं मिल सकता और अपना अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न उत्तेजित बना रहता है। यह स्थिति ध्यान साधना के लिये-ब्रह्म सम्बन्ध के लिये सर्वथा अनुपयुक्त है।

शरीर , मन और भाव संस्थान को जितना अधिक शिथिल, शान्त, रिक्त, किया जा सके उतनी ही आत्म साधना के उपयुक्त मनोभूमि का निर्माण होता है कहना न होगा कि ऐसी स्थिति का अभ्यास कर लेने का प्रथम चरण पूरा कर लिया उनके ध्यान की सफलता एक प्रकार से सुनिश्चित ही हो जाती है।


प्रताप हाजरा नाम के एक महाशय रहते थे (kahani)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के समय दक्षिणेश्वर में श्री प्रताप हाजरा नाम के एक महाशय रहते थे। उन्होंने साधुओं जैसा जीवन अपना रक्खा था। वे कभी-कभी रामकृष्ण परमहंस के साथ कलकत्ता जाकर सत्संग का लाभ उठाया करते थे।

एक बार वे स्वामी जी के साथ कलकत्ता जाकर जब लौटे तो अपनी अँगोछा वहीं एक भक्त के घर भूल आये।

स्वामी रामकृष्ण को जब यह पता चला तो उन्होंने हाजरा महाशय से कहा, “ऐसे भुलक्कड़ स्वभाव के कारण तो तुम कभी-कभी भगवान को भी भूल जाते होगे। जो नित्य प्रति के साँसारिक व्यवहार में सावधान नहीं रह सकता, वह आध्यात्मिक क्षेत्र में सावधानी बरत सकता है, इसमें सन्देह है। हाजरा महाशय स्वामी जी के कथन का आशय न समझ कर सफाई देते हुए बोले, “क्या बताऊँ महाराज! भगवान के भजन में लीन रहने से मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। “

स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने हाजरा महाशय की झूठी आत्म-श्लाघा समझ ली। वे दुखी होकर सोचने लगे साधु का नाम धर कर इतनी आत्म-प्रशंसा फिर प्रकट में बोले, “हाजरा तू धन्य है। जो थोड़े से जाप से ही इतना पहुँच गया कि साँसारिक विषयों की याद ही नहीं रहती। एक मैं ऐसा तुच्छ प्राणी हूँ जो दिन-रात भगवान के चरणों में ही ध्यान दिये रहता हूँ फिर भी आज तक न कभी अपना बटुआ कही भूला हूँ और न अँगोछा।

अब हाजरा महाशय को अपनी भूल का भान हुआ। वे स्वामी जी के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे।


जीवन-यज्ञ की रीति-नीति

सुगन्धित पदार्थों का हवन करना इस दिशा में इंगित करता है कि हम अपनी आन्तरिक सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को प्रसुप्त स्थिति में पड़ी न रहने दें उन्हें दीप्ति-मान और तेजस्वी बनाये। उन्हें सीमित क्षेत्र में प्रतिबंधित न रहने देकर विस्तृत और व्यापक बनायें।

हव्य वस्तुओं की विपुल मात्रा भण्डार में संगृहीत रहती हैं। इसका कुछ पुण्य नहीं। संग्रहकर्ता को इससे थोड़ा आर्थिक लाभ भर हो सकता है, जनसाधारण को लाभ तो अभी मिलता है जब वे वितरित की जाती है। हर मनुष्य के पास ऐसी विशेषताएँ होती है जिन्हें वह चाहे तो वितरित कर सकता है और असंख्यों को ऊँचा उठाने-आगे बढ़ाने एवं आनन्दित करने में सहायता कर सकता है। जहाँ ऐसी भावनाएँ और चेष्टाएँ उभर रहीं हों, समझना चाहिए जीवन को यज्ञमय बनाया जा रहा है।

चन्दन, कपूर आदि की सुगन्ध उनके जलन पर ही व्यापक बनती है अथवा उनकी सुवास रखे गये स्थान तक ही सीमित रहेगी। सद्गुणों को चाहे तो मनुष्य अपने निजी कामों तक सीमित रख सकता है, उससे उसका अपना हित साधन भी है पर जब कोई अपनी विभूतियों से दूसरों को लाभान्वित करने की परमार्थ प्रवृत्ति अपनाता है तो भले ही निजी लाभ सीमित होता दिखाई पड़े किन्तु असंख्यों को लाभ मिलने की जो मंगलमयी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें देखते हुए वह हानि नगण्य है जो अमीरी पर अंकुश रखने जैसी दृष्टिगोचर होती है।

अपने दोष दुर्गुणों को भस्मसात् करने के लिए अपनाया गया साहस और उठाया गया कदम वस्तुतः यज्ञीय धर्मानुष्ठान है। काठ-कबाड़ जहाँ-तहाँ बिखरा पड़ा रहे तो उससे क्या बनेगा पर जब वह अग्निदेव के संपर्क में आकर ज्योतिर्मय बनता है तो उसकी शक्ति देखते ही बनती है। एक जलती लकड़ी को अवसर मिले तो वह दावानल का रूप धारण कर सकती है और योजनों लम्बे जटिल जंगलों से भूखण्डों को स्वच्छ कर सकती है। उससे कितनी वस्तुएँ पकाई जा सकती हैं और कच्ची चीजों की तुलना में पकी चीजों का मूल्य महत्त्व अनेक गुना हो सकता है। अग्नि संस्कार के कारण जो उपलब्धियाँ प्राप्त होती है वे असीम है। पर यह सब लाभ मिलते तभी है जब अग्नि को ज्वलन्त होने का अवसर देने वाला ईंधन पर्याप्त मात्रा में मिल सके। अपनी बिखरी हुई अनगढ़ और अस्त-व्यस्त आदतों को जब उत्कृष्टता की अग्नि में ईंधन बनाकर होम दिया जाता है तो उससे ज्योतिर्मय अग्निदेव प्रकट होते हैं और उससे यज्ञ प्रयोजन की आवश्यकता पूरी होती है। जीवन यज्ञ का आयोजन इसी प्रकार सम्पन्न होता है। यज्ञ से स्वर्ग मिलता है। यह खुला रहस्य है। इसे हर कोई-कभी भी प्रत्यक्ष देख सकता है। नन्हा सा बीज जब यज्ञीय परम्परा अपना-कर गलने को तत्पर होता है तो उसका वह आत्मदान विशाल वृक्ष के रूप में चिरकाल तक यशगान करने के लिए गर्वोन्नत मस्तक करके खड़ा हो जाता है । कोई भी मनुष्य अपनी स्वार्थ भरी संकीर्णता की परिधि को तोड़कर विराट् के सम्मुख अपना आत्म समर्पण करके यह देख सकता है कि संग्रही परिग्रही की तुलना में उसने कितना अधिक प्राप्त कर लिया? उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ने के उत्सुक जल कण अग्नि के संपर्क में आकर अपना भारीपन गँवाते और हलके बनते हैं। जो जितना हलका होगा वह उतना ऊँचा उठेगा। जोहड़ का सड़ा पानी वरुण बनकर आकाश में उड़ता देखा जा सकता है पर उसके लिए ताप के सम्पर्क में आने-हलका बनाने और सीमा परिधि को तोड़कर विस्तृत क्षेत्र में विचरण करने की रीति तो अपनानी ही पड़ती है। यही यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप है। हम ताप सहने का साहस करें-हलके बनें और उन्मुक्त आकाश में विचरण करें तो तुच्छ दीखने वाला व्यक्ति देखते-देखते महामानव बन सकता है। ऐसा महामानव जो यज्ञ की तरह श्रद्धास्पद दिखाई पड़े और असंख्यों का हितसाधन कर सकने का श्रेय प्राप्त करें।


भगवती गंगा की दिव्य प्रवाह

मोटी दृष्टि से हर नदी एक जलधारा मात्र है। पर सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उनके साथ जुड़े हुए गुणों का प्रभाव और परिचय प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हिमालय यों एक पहाड़ मात्र है पर दिव्य दर्शियों ने उसमें आध्यात्मिक दिव्यता का प्रकाश देखा है, और उसके संपर्क में आकर आशातीत लाभ भी उठाया है। मेरी दृष्टि में हिमालय भी पत्थर , नदी, नाले, बरफ, वृक्ष, वनस्पति, पशु-पक्षियों का स्थल मात्र है पर उसकी आध्यात्मिक गरिमा इतनी असाधारण है कि उस क्षेत्र के सम्पर्क में आकर न जाने किस-किस ने क्या क्या पाया है।

देखने में सभी नदियाँ लगभग एक सी लगती हैं। जल की मात्रा एवं उपयोगिता की दृष्टि से उन्हें न्यूनाधिक महत्त्व भी मिलता है। पर आध्यात्मिक विशेषता उनमें से हर किसी में नहीं जन्मती गंगा भी यों एक नदी ही है और उसमें भी अन्यों जैसा ही जल बहता है। पर उसके अन्तराल में दिव्य प्रवाह का जो अजस्र स्रोत जुड़ा हुआ है उसके कारण उसमें प्रत्यक्ष देवत्व आ गया है। इस प्रभाव को कोई भी भावनाशील व्यक्ति अनुभव कर सकता है।

गंगा के दर्शन, आचमन, पान मात्र से पवित्रता का संचार होता है। गंगा जल को वर्षा तक रखे रहने पर भी उसका न सड़ना उसमें स्वास्थ्य वर्धक तत्त्वों का बाहुल्य रहना जैसी भौतिक विशेषताएँ तो अति सामान्य हैं। मूल लाभ है उसके साथ जुड़ा हुआ दिव्य प्रभाव। कुछ प्रदेश जलवायु की दृष्टि से बड़े उपयोगी माने जाते हैं। और लोग वहाँ आरोग्य लाभ करने की दृष्टि से जाते रहते हैं। गंगा तट आत्मिक आरोग्य लाभ करने की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है। वहाँ जितनी शान्ति मिलती है एकाग्रता एवं स्थिरता रहती है उतनी अन्यत्र दुर्लभ है।

आत्म शान्ति एवं तप साधना की सफलता के लिए गंगा तट का निवास-गंगाजल पान, गंगाजल स्नान अमोघ आधार है। जिनके लिए जितने समय तक इस प्रकार का लाभ उठा सकना संभव हो उन्हें उसके लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

गंगाजल का आध्यात्मिक महत्त्व शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है-

यत्र गंगा महाभागा स देशस्तत्तपोवनम्।

सिद्धक्षेत्रन्तु तज्ज्ञेयं गंगातीरं समाश्रितम्॥

कूर्मपुराण 47

जहाँ पर यह महाभाग गंगा है वह देश उसका तपोवन होता है। उसको सिद्ध जानना चाहिए।

स्नातानां तत्र पयसि गागें ये नियतात्मनाम्

त्ष्टीर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि।2।

पद्य पुराण

गंगा के जल में स्नान किये हुए नियत आत्मा वाले पुरुषों को जो तुष्टि होती है वह सौ बसन्त ऋतुओं से भी नहीं होती है। 20।

भुक्तिमुक्तिप्रदा गंगा सुखमोक्षाग्रतः स्थिता।

अनेकजन्मसंघातपांप पुं सांविनश्यति॥ 28॥

पद्य पुराण

मनुष्यों के समक्ष भक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली सुख से ही मोक्ष कारिणी गंगा स्थित है। इस महा महिमामयी गंगा के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक जन्मों के पापों का संघात नष्ट हो जाता है॥28॥

सम्प्राप्नोत्यक्षयं स्वर्ग गंगास्नानेन केशवम्।

यशों राज्यं लभेत्पुण्यं र्स्वगमन्ते परां गातिम् ॥5

पद्य पुराण

गंगा के जल में स्नान करने की बहुत बड़ी महिमा है। इसके करने से कभी नाश को न प्राप्त होने वाला स्वर्ग लोक का निवास मिल जाता है, भगवान श्री केशव के चरणों की प्राप्ति होती है, संसार में उत्तम यश प्राप्त होता है, राज्य का लाभ होता है और महान् पुण्य मिलता है तथा अन्त समय में स्वर्गलोक और परा गति होती है॥5॥

मुनयः सिद्धगन्धर्वा ये चान्ये सुरसत्तमाः।

गड.गतीरे तपस्तप्त्वा र्स्वगलोकेऽच्युताभवन्।11

पारिजातसमाः पुष्पवृक्षाः कल्पद्रु मोपमाः।

गंग्गाँतीरे तपस्तप्त्वा तत्रैर्श्वय लभन्ति हि।12।

तपोभिर्बहुभिर्यज्ञैर्प्रतैर्नानाविधैस्ताथा।

पुरुदानैर्गतिर्या च गंगा संसेवतां च सा॥13।

पद्य पुराण

मुनिगण- सिद्ध लोग- गन्धर्व वृन्द और जो अन्य देवों में परम श्रेष्ठ है वे गंगा के तट पर तपस्या करके स्वर्ग लोक में स्थायी रूप से निवास प्राप्त कर अच्युत होते ही वहाँ रहते है॥11॥ गंगा के तट पर तपश्चर्या करके वहाँ पर परम ऐश्वर्य का लाभ लिया करते हैं क्योंकि वहाँ पर जो पुष्पों वाले वृक्ष है वे पारिजात (देवतरु) के समान हैं और समस्त मनोकामना पूर्ण कर देने वाले कल्प वृक्षों के तुल्य होते है॥12॥ बहुत प्रकार के तपों से-यज्ञ और नानाप्रकार के व्रतों से तथा अधिक दानों से जो मनुष्य को गति प्राप्त होती है वही गति भागीरथी गंगा के जल में स्नानादि से प्राप्त होती है अतः इस गंगा की भली-भाँति सेवन करना चाहिए॥13॥

नास्ति विष्रगुसमं ध्येयं तपो नानशनात्परम्।

नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गंगासमा सरित्।

अग्नि पुराण

भगवान के समान काई आश्रय नहीं। उपवास के समान तप नहीं। आरोग्य के समान सुख नहीं । और गंगा के समान कोई जल तीर्थ नहीं है।

येषां मध्ये याति गंगा ते देशाः पावना वराः।

गतिर्गगा तु भूतानां गतिमन्वेषतां सदा।

गंगा तारयते चाभौ वंशौ नित्यं हि सेविता॥

गंगातीर्थ समुद्भूतमृद्वारी सोऽघटार्कतव्।

दर्शनात्स्पर्शनात्पानात्तथा गगंतिकीर्तनाँत्।

पुनाति पुण्यपुरुषाञछततशोऽथ सहस्रशः॥

अग्नि पुराण (गंगा)

जिन क्षेत्रों में होकर गंगा जाती है वे पवित्र है। गंगा सद् गति देने वाली है। जो उसका नित्य सेवन करते हैं वे अपने वंश सहित तर जाते हैं।

गंगा तट की मिट्टी धारण करना। गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल पान, गंगा नाम का जप करने से असंख्य मनुष्य पवित्र और पुण्यवान हुए है।

प्रधानांशस्वरुपा सा गंगा भुवनपावनो।

विष्णुविग्रहसंभूता द्रवरुपा सनातनी॥

पापिपापेध्मदाहाय ज्वलदग्नि रुवरुपिणी।

सुखस्पर्शा स्नानपानैर्निर्वाणपददायिनी॥

गोलोकस्थानप्रस्थानमुखसोपान रुपिणी।

देवी भगवत

विष्णु भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई परम पावनी गंगा तुम्हारा ही द्रव स्वरूप है। वह गंगा पापियों के पाप नाश करने में अग्नि ज्वाला के समान तथा निर्वाण पद देने में समर्थ वह तुम्हारे ही कारण है।

गंगायांच मृतोः स्वर्ग मोक्षचविन्दति।

या गातिर्योगयुक्तस्य सत्वस्थस्यमनीषिणः॥

सा गतिस्त्यजतः प्राणान्गडूयां तू शरीरिणः।

चान्द्रायणसहस्त्राणि यश्चरेत्कायशोधनम्॥

पानम् कुर्याद्यथेच्छ च गंगाम्भःस विशिष्यते।

पद्य पुराण

गंगा के समीप में मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य स्वर्ग का निवास और मोक्ष दोनों का लाभ प्राप्त किया करता है। जो गति योगाभ्यास में निरन्तर निरत एक योगी पुरुष की होती है और सत्व में सुस्थित एक महा मनीषी पुरुष की गति हुआ करती है वह गति उस पुरुष की भी होती है जो गंगा के तट पर अपने प्राणों का त्याग किया करता है। एक सशस्त्र चांद्रायण महाव्रत करके जो काया की शुद्धि की जाती है उससे भी अधिक यथेच्छ रूप से गंगा के जल का पान करने से होती है।

यद्यकार्यशतम् कृत्वाकृत्तम गंगाभिषेचनम्।

सर्वतत् तस्य गंगाम्भो दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥

सर्व कृतयुगे पुण्यम् त्रेतायां पुष्करं स्मृतम्।

द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्र गंगा कलियुगे स्मृता॥

-महाभारत

जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगा स्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापों को भस्म कर देता है। सतयुग में सभी तीर्थ पुण्य दायक होते हैं। त्रेता में पुष्कर का महत्त्व है। द्वापर में कुरुक्षेत्र विशेष पुण्य दायक है और कलि-युग में गंगा की अधिक महिमा बतायी गयी है।


कुण्डलिनी शक्ति जागरण का तात्त्विक आधार

आत्मिक विकास का मतलब है अपनी अहंता का क्षेत्र विकसित करना। आत्मा का परमात्मा से जुड़ना ही योग है। योग का फल सिद्धियों विभूतियों से लेकर स्वर्ग और मुक्ति की दिव्य सम्वेदना तक विकसित होता चला जाता है। योगी वही हो सकता है जो अहंता के जटिल आवरण को तोड़-फोड़ कर उसे विराट् के साथ जोड़ सकने में सफल हो सके।

ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। जिसने अनुनय विनय करके अथवा आग्रह प्रलोभन के आधार पर कुछ पाया जा सके। ब्रह्म चेतना की सत्ता समुद्र की तरह है उसमें वही आत्मसात् हो सकता है जो आत्म समर्पण के लिए साहस जुटाये। आत्म समर्पण का अर्थ है-अपनी अहंता, कृपणता, संकीर्णता का अन्त। इस दिशा में जो जितनी प्रगति कर सके उसे उतना ही आत्मोत्कर्ष का लाभ मिलता है। स्वार्थ को परमार्थ में विकसित करना-व्यष्टि का समष्टि पर उत्सर्ग करना यही है जीवन साधना का तात्त्विक आधार। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए विविध-विधि योग साधनाएँ की जाती है।

कुण्डलिनी योग को भौतिक और आत्मिक प्रखरता प्राप्त करने की समर्थ साधना माना जाता है। पृथ्वी मूलाधार स्थित शरीरगत शक्ति-सूर्य ब्रह्म रंध्र स्थित सहस्र दल कमल-इन दोनों के परस्पर सुयोग संयोग का नाम ही कुण्डलिनी जागरण है। साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान समाधि का षट्चक्र वेधन का हठयोग का मन्त्र साधना का सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी। पृथ्वी अर्थात् भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ मिलती है। स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ने का शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है। इसी को साधना क्षेत्र में पृथ्वी और सूर्य का संयोग कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।

अशक्तता और संकीर्णता एक ही तथ्य के दो नाम है। कुण्डलिनी साधना द्वारा भीतर भरे शक्ति स्रोत को उभारा जाता है और निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनन्त सामर्थ्य को अपने भीतर धारण किया जाता है। यह धारणा ही वह पात्रता है जिसके आधार पर दिव्य शक्तियों का साधक में अवतरण होता है। जब अपने अणु अस्तित्व को विराट् के विभु में समर्पित कर दिया जाय। यह समर्पण जितना यथार्थ और जितना प्रगाढ़ होता है। उसी अनु-पात से सफलता का पथ प्रशस्त होता चला जाता है।

कुण्डलिनी शक्ति एक होते हुए भी व्यक्ति तथा संसार के चेतन और जड़ जगत के अनेक प्रयोजन पूरे करती है। बिजली घर में विनिर्मित होने वाले विद्युत भण्डार का संग्रह एक ही प्रकार का है पर उसके द्वारा बत्तियाँ, पंखे, हीटर, कूलर, रेडियो आदि के अनेक प्रयोजन पूरे होते हैं और अनेक घरेलू प्रयोजन पूरे होते हैं और अनेक तरह के कल कारखाने चलते तथा अगणित प्रकार का उत्पादन करते हैं। इन क्रिया-कलापों के नाम रूप अनेक है। उनके बाह्य स्वरूपों की भिन्नता इतने अधिक प्रकार और स्तर की है कि किसी का किसी से कोई सीधा सम्बन्ध मालूम नहीं पड़ता। पहले चलने और रेडियो बजने के वाह्य स्वरूप में भारी अन्तर मालूम पड़ता है। एक मशीन से सिंचाई के लिए पानी निकलता है और दूसरी लोहा गलाने की भट्टी जलाती है दोनों में प्रत्यक्षतः कितना भारी अन्तर दीखता है पर बारीकी से देखने पर एक ही विद्युत भण्डार के यह विविध विधि क्रिया कलाप सिद्ध होगे ठीक इसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति एक विश्वव्यापी जीवन प्राण और समर्थ क्षमता के रूप में एक ही प्रकार की है पर उसके कार्य जड़ जगत में अलग प्रकार के और चेतन जगत में अलग प्रकार के दिखाई पड़ते हैं। चेतन जगत में इसकी क्रियाशीलता प्राणियों के जन्म, अभिवर्धन वृद्धावस्था, मृत्यु तथा अंग प्रत्यंगों के दृश्य एवं अदृश्य गतिविधियों के रूप में देखी जा सकती है। इच्छा, ज्ञान, क्रिया, स्वभाव, संस्कार, आदि के रूप में उसी महाशक्ति का प्रकाश फैला हुआ देखा जा सकता है। पंचतत्वों के विभिन्न सम्मिश्रणों चेतनाओं के अनेक विभाजनों का एकत्रीकरण तथा कर्मसंस्कारों के योग से जो अगणित योनियों में जन्म लेने वाले असंख्य आकृति प्रकृति के जीव उत्पन्न होते हैं। उनमें यह कुण्डलिनी शक्ति की चेतन जगत में चल रही गति विधियाँ ही कारण है जड़ जगत में पृथ्वी और आकाश में जो विदित और अविदित अनेक हलचलें उत्पन्न होती रहती है और परिवर्तनों से भरी चंचलता निरन्तर गतिमान रहती है; उसका कारण भी यही दिव्य सत्ता है। अणु परमाणुओं की द्रुत गामी हलचलों से लेकर ग्रह नक्षत्रों का चल वल, समुद्र के ज्वार भाटे, भूकम्प, ऋतु परिवर्तन, भू-गर्भ के अन्तराल में निरन्तर चल रहे हेर फेर, ईथर तत्त्व की सक्रियता आदि जड़ जगत में चल रही समस्त उथल-पुथल के पीछे यह कुण्डलिनी शक्ति ही काम करती है। उनका क्रिया-कलाप एक क्षण के लिए भी बन्द हो जाय तो महाप्रलय ही सामने होगी। तब यहाँ सब कुछ निर्जीव, नीरस, निष्क्रिय नितान्त नीरव और अन्धकार ही यहाँ शेष रह जाएगा सम्भवतः तब सारी आकृतियाँ बिगड़ कर पुनः निहारिकाएं उत्पन्न करने वाली धूमिलता में ही बिखर जायें और देखने अनुभव करने जैसा कुछ शेष ही न रहा जाय।

लकड़ी का टुकड़ा यदि अग्नि जैसा तेजस्वी बनना चाहता हो तो उसे अग्नि रूप बनने के लिए वर्तमान अस्तित्व गँवाना ही पड़ेगा बीज अपना अस्तित्व भी न खोना चाहे और विशाल वृक्ष बनने का लाभ भी लेना चाहे तो यह दोनों बातें न हो सकेंगी। संकीर्णता और आत्मिक प्रगति का जोड़ा मिल ही नहीं सकता। जो जितना स्वार्थी है उसे आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए उतनी ही कठिनाई अनुभव होगी। आत्मिक सिद्धियाँ हैं, तो पर उनका लाभ कृपणता और स्वार्थपरता के रहते उठाया नहीं जा सकता। जीवन साधना का तात्पर्य ही अहंता का विसर्जन है। पारमार्थिक दृष्टिकोण अपनाये बिना न जीवन लक्ष्य पूरा होता है और न कुण्डलिनी जागरण जैसी योग साधनाओं में सफलता मिलती है।

आध्यात्मिक चेतना में वृद्धि करने का मतलब है व्यष्टि से माइक्रोकाज्म को समष्टि मैकोक्राज्म से सम्बन्ध बनाते उसे घनिष्ठ करते हुए अन्ततः परस्पर दोनों का एक हो जाना। एक का दूसरे में विलीन हो जाना। जीवात्मा वस्तुतः विश्वात्मा-परमात्मा का ही एक अंग है। जो जिसका अंग है वह उसी में लीन होने का व्याकुल रहता है और जब तक वह प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता तब तक बेचैन ही रहता है। जल का भण्डार समुद्र है। समुद्र से ही बादल निकल कर सर्वत्र जल बरसाते हैं। यह बरसाया जल नदी, नाले झरने, तालाब, पृथ्वी के भीतर की नालियों आदि में होता हुआ यह प्रयत्न करता है कि वह समुद्र में जाकर मिले। जिधर भी पानी को ढलान दीखती है, उधर ही बहने लगता है। इस ढलान और प्रवाह का प्रयोजन उस बिखरे हुए जल अंशों को अपने मूल भण्डार समुद्र तक पहुँचा देना ही है। आत्मिक उन्नति का उद्देश्य जीव की इस गति में तीव्रता ला देता है जिस के आधार पर वह एक छोटा, टुकड़ा न रहकर अपने उद्गम में ला मिले और अपूर्णता खोकर पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर लें।

विश्वात्मा का केन्द्र सूर्य है। सूर्य मात्र चमकने वाला अग्नि का गोला ही नहीं उसमें प्राण शक्ति भरी है। इस विश्व में जीवन दीख रहा है उसका स्रोत यह सूर्य ही है। जिस प्रकार प्रत्यक्ष दीखने वाले जड़ शरीर के भीतर एक अदृश्य आत्मा रहता है, और उस आत्मा के कारण ही निर्जीव तत्त्वों से बनी हुई काया में जीवन प्रवाह लहराता है उसी प्रकार आँखों से दीखने वाले अग्नि पिण्ड सूर्य के निर्जीव कलेवर में एक समर्थ आत्मा विद्यमान् है उसे विश्वव्यापी जीवन तत्त्व भी कह सकते हैं। प्राणियों वनस्पतियों कृषि कीटाणुओं में जो कुछ हलचल दीख पड़ती है वह इसी विश्व जीवन की प्रतिक्रिया है जिसका मूल केन्द्र सूर्य है। इस सूर्य की प्राण सत्ता को आध्यात्म की भाषा में ‘कुण्डलिनी’ कहा जाता है। समष्टि के रूप में उसकी विश्वव्यापी सत्ता को सूर्य कुण्डलिनी कहते हैं, लोक लोकान्तरों का क्रिया कलाप इसी से संचालित हो रहा है। इसका एक अंश जो पृथ्वी को आच्छादित किये हुए है। और जिसका कर्तृत्व इसी धरती पिण्ड की गति विधियाँ संभालने तक ही सीमित है उसे पृथ्वी कुण्डलिनी कहते हैं एक ही सत्ता के दो भाग यह इस लिए दिखाई पड़ते हैं कि उसके कार्य क्षेत्रों की सीमा में लघुता और महत्ता जैसे अन्तर पड़ गया है। फिर भी एक दूसरे के पूरक है। पृथ्वी कुण्डलिनी वस्तुतः सूर्य कुण्डलिनी से ही अभीष्ट सामर्थ्य उपलब्ध करती है। चन्द्रमा चमकता तो है पर वह चमक उसकी अपनी नहीं सूर्य की है। फिर भी जब चन्द्रमा के माध्यम से वह चमक प्रस्फुटित होती है तो उसकी प्रकृति सूर्य जैसी उष्णता न रहकर शीतल बन जाती है। रंग उसका श्वेत न रहकर शीतल बन जाती है। यह अन्तर पड़ जाने के कारण उस चमक को धूप न वह कर ‘चन्द्रिका’ अथवा चाँदनी कहते हैं। पृथ्वी के कुण्डलिनी को भी इसी प्रकार माना जाना चाहिए। इन दोनों के संयोग से इस विश्व रूपी आकाश की सूर्य चन्द्रमा की भाँति शोभा बन रहीं है और रात्रि तथा दिन के दो भिन्न-भिन्न प्रयोजन भिन्न-भिन्न स्वरूप में पूरे हो रहें है।

वस्तुतः रात्रि को भी चन्द्रमा के माध्यम से सूर्य ही चमकता है। पर कहा और देखा द्वैत ही जाता है। चन्द्रमा और सूर्य की सत्ता पृथक ही प्रतीत होती है और एक अंश तक है भी ठीक-शक्ति भले ही, एक हो पर दोनों के आवरण तो दो ही है। सूर्य पिण्ड की रचना और चन्द्र पिण्ड की रचना का क्रम और स्वरूप अलग है भी। इसी प्रकार पृथ्वी कुण्डलिनी और सूर्य कुण्डलिनी की मूल-तथा एक सूत्र में आबद्ध होने पर भी पृथक-पृथक नामों से पुकारा जाय और अनुभव किया जाय तो इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है। सूर्य कुण्डलिनी का प्रतिनिधित्व मनुष्य शरीर में मस्तिष्क में अवस्थित सहस्रार चक्र करता है और पृथ्वी कुण्डलिनी की स्वरूप मूलाधार में विद्यमान् है। सूर्य ऊपर है और पृथ्वी नीचे। इसी प्रकार सूर्य कुण्डलिनी ऊपर है और पृथ्वी कुण्डलिनी नीचे। इन दो पृथक सत्ताओं में कुछ दूरी रहते हुए भी अति घनिष्ठ ही नहीं अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध बना हुआ है।

नर को नारायण बनने में तभी सफलता मिलेगी जब वह अनन्त चेतना के दिव्य शक्ति स्रोत सविता देवता से अपना सम्बन्ध जोड़ेगा। सूर्य कितना तेजस्वी है कितना समर्थ है यह जानने वाले सूर्य पुत्र बनने के लिए उसकी साधना कुण्डलिनी योग द्वारा करते तो है पर यह भूल जाते हैं कि अपनी सत्ता में दिव्य चेतना भी उसी मार्ग पर चलते हुए प्रखर बनानी होगी जिस पर चलते हुए एक तुच्छ सा अग्नि पिण्ड सविता के रूप में विकसित हुआ है।


स्वामी रामतीर्थ जापान गये (kahani)

स्वामी रामतीर्थ जापान गये। उन्होंने एक घर में गमला में देवदारु के पेड़ उगे देखे। यों तो वे छोटे और पतले थे पर तने देखने में पुराने मालूम पड़ते थे।

घर मालिक से उनने पूछा- यह पौधा कितने दिन का है-उसने उत्तर दिया दस वर्ष का। भारत में दस वर्ष में देवदारु का पेड़ बहुत मोटा और लम्बा हो जाता है फिर यह इतना छोटा कैसे रहा ये स्वामी जी ने फिर शंका की।

उस जापानी ने हँसते हुए कहा हम हर साल नीचे से इसकी जड़े काट देते हैं। अस्तु यह बढ़ नहीं पाता और छोटा ही बना रहता है।

स्वामी रामतीर्थ ने उपस्थित साथियों से कहा-इस पेड़ की तरह यदि मनुष्य को भी जड़े फैलाने का अवसर न मिले तो वह भी छोटा ही रह जाता है।


बाहरी सम्पदा आन्तरिक समृद्धि की छाया मात्र है

सुविधा और सम्पन्नता ढूँढ़ने के लिए दर-दर मारे फिरने की जरूरत नहीं। वह सब कुछ अपने ही भीतर है जो बाहर समझा और खोजा जाता है। जितना श्रम बाहर भटकने में किया जाता है यदि उतना ही उपलब्धियों को ढूँढ़ने और प्राप्त करने के लिए अन्तरंग क्षेत्र में किया जाय तो निराश होने का अवसर कभी भी न आयेगा। अपना आपा ही कल्पवृक्ष है। यदि उसे ठीक तरह सींचा और रखाया जा सके तो फिर जीवन में अभाव एवं अतृप्ति के कारण खिन्न रहने का कोई कारण शेष न रहेगा।

स्वास्थ्य के साधन बाहर नहीं है। पौष्टिक आहार बेचने वालों और हकीमों का दरवाजा खटखटाने से कुछ हाथ न लगेगा यदि उन्हीं के पास निरोगता और बलिष्ठता होती तो अमीरों ने उसे कब का खरीद लिया होता। तब कोई पुष्टाई विक्रेता और चिकित्सक न तो बीमार पड़ता और न कमजोर दीखता। पर ऐसा कहाँ होता है। अमीरों और हकीमों का परिवार ही अपेक्षाकृत अधिक रुग्ण और दुर्बल रहता है। यह सच्चाई इस तथ्य को स्पष्ट कर देती है कि आरोग्य वहाँ नहीं है जहाँ आमतौर समझा और खोजा जाता है।

आहार का संयम, ब्रह्मचर्य, नियमित दिनचर्या, श्रम विश्राम का संतुलन, मुसकान और मस्ती भरा स्वभाव इन पाँच उपचारों से आत्म देवता की पूजा करते रहने वाला अविच्छिन्न स्वास्थ्य और दीर्घजीवन का वरदान हाथों हाथ पा सकता है।

घनी बनने के लिए सट्टा, लाटरी, चोरी, बेईमानी करने या हराम की कमाई के दूसरे साधन टटोलने और उनमें निरत रहने वाले धनी कहाँ बन पाते हैं किसी प्रकार कुछ प्राप्त भी कर ले तो हवा में रखे कपूर की तरह देखते-देखते उसका उड़ जाना निश्चित है। चोर और बेईमानों में से कितने अमीर बन सकें है। किसने इस धन से सुख पाया है? अनीति उपार्जित पूँजी से किसका परिवार फला फूला है। सम्पन्नता वस्तुतः सद्गुणों से सम्बन्धित है। परिश्रमी, पुरुषार्थी, मितव्ययी, काम में मनोयोग और तत्परता बरतने वाले, साहसी धैर्यवान् क्रिया कुश-लता और अनुभव एकत्रित करने वाले जिस काम में भी हाथ डालते हैं उसी में लाभ होता है उसी में सफलता मिलती है। धनी बनने के लिए अपनी आदतों और योग्यताओं को संभालना पड़ता है। स्थिर और सुखद सम्पदा के संग्रह का यही एकमात्र मार्ग है। जो भीतर से समृद्ध है वही बाहर भी सम्पन्न रह सकेगा।

लोग न जाने कितनी-कितनी इच्छा आकांक्षाएँ संजोयें रहते हैं कितनी कामनाएँ करते और कितनी योजनाएँ बनाते हैं। पर यह भूल जाते हैं कि इस संसार के बाज़ार में हर सफलता हर किसी के लिए खुली होने पर भी यह शर्त तो है कि जिसके पास अपना कुछ होगा उसी को दुकान से मन पसन्द चीजें खरीदने की सुविधा रहती है। जेब खाली हो तो भला किस बाज़ार से किसे कुछ खरीदने का अवसर मिल सकता है। ललचाने, मन चलाने और हाथ मलते हुए वापिस लौटने वाले अक्सर खीजते और दुकानदारों पर दोष लगाते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि संसार दानियों और भिक्षुकों पर नहीं श्रमिकों और व्यापारियों के रीति-नीति पर चल रहा और टिक रहा है।

मैत्री, प्रशंसा, सम्मान, उच्च पद आदि की आवश्यकता अनुभव की जाती है। सुसंतति की अभिलाषा रहती है। पर यह नहीं सोचा जाता कि इन उपलब्धियों का मूल्य क्या है? जिसकी जेब खाली है, उसे कहाँ कौन, कुछ देगा। दर्पण में अपनी ही आकृति दिखाई देती है। दूसरे तो दर्पण की तरह है जिनमें अपनी ही छाया झाँकती दिखाई देगी। यदि हम अयोग्य अथवा दुर्गुणी है तो इस संसार में विपुल सम्पदा भरी रहने पर भी केवल अभाव और दुर्भाग्य ही अपने पल्ले पड़ेगा। जिन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण पाया है उन्होंने अपने को उसके योग्य बनाया है। प्रगति शीलता का, सुख समृद्धि का और कोई रास्ता है ही नहीं


अपनों से अपनी बात

युग निर्माता की भूमिका हमें ही निभानी है

यों मनुष्य जीवन भी अन्य प्राणियों की तुलना में अत्यधिक सुख सम्पदाओं एवं वैभव विशेषताओं से भरा हुआ है पर जिनके पास अतिरिक्त रूप से विभूतियाँ विद्यमान् हैं उन्हें और भी अधिक ईश्वर का कृपापात्र अपने को समझना चाहिए। और यह अनुभव करना चाहिए कि उन्हें यह अतिरिक्त किसी अतिरिक्त कार्य के लिए ही मिली हुई है।

सृष्टि का भार विस्तार बहुत बड़ा है। इसका संतुलन बनाये रखना और नियन्ता की गौरव गरिमा के अनुरूप उसका स्वरूप बनाये रखना एक बहुत बड़ी बात है। इसी प्रयोजन में सहायक बनने-सहायता पहुँचाने हेतु ईश्वर ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति के रूप में मनुष्य को सजा है। अन्यथा उसके लिए सभी प्राणी समान प्रिय होने के कारण समान रूप से अनुदान पाने के भी अधिकारी थे। मनुष्य को जो कुछ अधिक अतिरिक्त मिला है उसका प्रयोजन उसकी वैयक्तिक सुख सुविधाओं का अभिवर्धन नहीं वरन् यह है कि वह इन अतिरिक्त साधनों के आधार पर उसका हाथ बटाने में सृष्टि संतुलन के सुखद पक्ष को भारी बनाये रहने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके। विवेकवान मानव प्राणी को मात्र शरीर यात्रा के ताने बाने बुनने तक ही सीमित नहीं रचना चाहिए लोभ मोह के जाल जंजाल में जकड़ा नहीं रहना चाहिए वरन् उन तथ्यों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जो अतिरिक्त रूप में मिले हुए मानव जीवन की विशेषताओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं जीवन के स्वरूप, प्रयोजन, लक्ष्य और उपयोग का चिन्तन न किया जाय, उसे उपेक्षा के गर्त में डाले रहा जाय तो इस प्रमाद का परिणाम आज न सही अगले दिनों अनन्त पश्चाताप के रूप में ही भुगतना पड़ सकता है।

आत्मिक प्रगति की कसौटी एक यही है कि मनुष्य आत्मचिन्तन आत्मसुधार और आत्मविकास में कितना रस लेता है। यदि चिह्न-पूजा की तरह पूजा पत्री की थोड़ी सी लकीर भर पिटती है तो समझना चाहिए कि अभी बाल बुद्धि-बाल क्रीड़ा में ही निरत है ईश्वर की सच्ची उपासना के साथ ईश्वर का प्रगाढ़ अनुग्रह भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, जो आत्म बोध के रूप में ही हो सकता है।

भौतिक सुविधाएँ सम्पदाएँ मनुष्य अपनी सहज सुलभ क्षमता का सदुपयोग करके पाता रहता है और सतर्कता और तत्परता नहीं बरतता वह रोता कलपता रहता है-दीन दयनीय स्थिति में पड़ा रहता है उसमें ईश्वर का कुछ लेना देना नहीं। भौतिक उन्नति अवनति एवं सुख-दुःख की अनुभूति में मनुष्य का स्तर ही प्रधान कारण है। ईश्वर ने हर किसी को कर्म करने और तद्नुरूप फल पाने के लिए खुले रूप से छोड़ दिया है। हमें अपने सुव्यवस्थित जीवन क्रम का श्रेय पुण्य पुरुषार्थ को देना चाहिए और दुःख दारिद्र के पीछे भी अपने पिछले क्रिया-कलाप का मूल्यांकन करना चाहिए। इस झंझट में ईश्वर को अकारण ही सम्मिलित नहीं करना चाहिए।

ईश्वरीय अनुग्रह उन विभूतियों के रूप में है जो अति-रिक्त रूप में हमें मिली है। समस्त जीवधारी पेट की भूख और प्रजनन की ललक से पीड़ित होकर तद्नुरूप व्यवस्था जुटाने में अपने अपने ढंग की हलचलें करते रहते हैं और उसी कुचक्र में उलझे हुए जन्म से लेकर मरण पर्यन्त जीवन की लाश ढोते हैं। उतना ही स्तर यदि मनुष्य का भी रहे तो समझना चाहिए कि वह तात्विक विश्लेषण की दृष्टि से ‘नर पशु’ की संज्ञा में ही है। इससे आगे बढ़ने और ऊंचा उठने का सौभाग्य उसे मिला ही नहीं। इस स्तर के व्यक्ति कितने ही सुख-सुविधा सम्पन्न क्यों न हों उन्हें इस दृष्टि से दुर्भाग्य ग्रसित ही कहा जायेगा कि बहुमूल्य मानव जीवन के सदुपयोग की आत्म चेतना से वंचित रहकर केवल किसी प्रकार सांसें पूरी कर रहे हैं।

हर विवेकवान व्यक्ति को यह तथ्य अधिकाधिक गम्भीरता पूर्वक हृदयंगम करना चाहिए और उस पर हजार बार विचार करना चाहिए कि निर्वाह के अतिरिक्त उसे जो कुछ उच्चस्तरीय अनुदान मिले हैं वे मौज मजा करने के लिए नहीं- बेटे, पोतों को गुलछर्रे उड़ाने के लिए दौलत जमा करने के लिए नहीं- वरन् ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए हैं। कोई अमीर कोई गरीब- कोई अज्ञ कोई विज्ञ- बनकर रहे और इस दुनिया में विषमता विश्रृंखलता फैले यह अव्यवस्था ईश्वर को अभीष्ट नहीं, वह अपने सभी मानव पुत्रों को लगभग एक ही स्तर का निर्वाह करते हुए- समता को अपनाकर चलते हुए- देखना चाहता है। दूसरों की तुलना में अधिक विलासी और संग्रही होकर जीना स्पष्टतः जीवनोद्देश्य से विपरीत मार्ग पर चलना है। इस मनोवृत्ति के व्यक्ति पूजा पाठ की विडम्बना रचकर भी ईश्वरीय अनुग्रह का एक कण प्राप्त कर सकेंगे इसमें सन्देह ही समझना चाहिए।

आत्मबोध के अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह का प्रमाण दूसरा हो ही नहीं सकता। आत्मबोध के साथ यह व्याकुलता जुड़ी हुई है कि अतिरिक्त उपलब्धियों को उस प्रयोजन के लिये नियोजित किया जाये, जिनके लिए यह अतिरिक्त अनुदान दिया गया है। इस प्रकार की आन्तरिक पुकार को स्पष्टतः ईश्वर की वाणी समझा जाना चाहिए और जिसमें यह आत्मा की पुकार जितनी तीव्र हो उसे अपने को उतना ही बड़ा ईश्वर का प्रियपात्र अनुभव करना चाहिए। जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए जो जितना अधिक पुरुषार्थ कर सके- साहस दिखा सके उसे उतना ही बड़ा अध्यात्मवादी- ईश्वर परायण मानना चाहिए हमें नकलीपन से ऊंचा उठना ही होगा और सच्ची ईश्वर भक्ति का मार्ग अपनाकर वह सच्चा ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करना होगा जो मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति मिलने के आश्वासनों में नहीं उलझाता वरन् देवोपम महानता के पथ पर तत्काल अग्रसर करता है। साथ ही आत्म सन्तोष एवं आत्मोल्लास के वरदान से तत्काल सुसम्पन्न करता है।

विभूतिवानों को अपने अतिरिक्त सौभाग्य पर सन्तोष और गर्व अनुभव करना चाहिए उन्हें दूसरों की अपेक्षा अधिक उच्च पद और अधिक भारी उत्तरदायित्व सौंपा गया है, सेना में सिपाही बहुत होते हैं पर नायक, कप्तान, जनरल आदि के पद तो चुने और छंटे हुए व्यक्तियों को ही दिये जाते हैं। जिन्हें पेट और परिवार पालने से अधिक आगे बढ़ने की उत्कण्ठा एवं योग्यता प्राप्त है उन्हें मुक्त कण्ठ से ईश्वर का विशिष्ठ कृपापात्र एवं प्रतिनिधि समझा जाना चाहिए। इस कृपा को सार्थक बनाने के लिए उस स्तर के व्यक्तियों को लोभ और माह का अन्धकार चीरते हुए आगे बढ़ना चाहिए और अवरोधों को कुचलते हुए साहस पूर्वक उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर कि सच्चे भगवद् भक्त अनादि काल से चलते रहे हैं।

विभूतिवानों की गणना में भावनाशील, प्रतिभाशाली, विद्या-बुद्धि सम्पन्न, कलाकार, लोक नायक, विज्ञानी, राजनेता, घनीमानी, प्रभृति वर्ग के लोगों को गिना जाता है। जिन्हें अपने में इन विभूतियों का जितना अंश दृष्टिगोचर हो उन्हें अपने को ईश्वर का उतना ही विश्वास पात्र और उच्च पद पर नियुक्त प्रिय पुत्र मानना चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए कि वह इस धरोहर का श्रेष्ठतम उपयोग करने के प्रयत्न में कुछ कोर कसर न छोड़े।

सबसे बड़ा और सबसे प्रथम विभूतिवान व्यक्ति वह है जिसके अंतःकरण में उत्कृष्ट जीवन जीने और आदर्शवादी गतिविधियां अपनाने के लिए निरन्तर उत्साह उमड़ता है। ऐसा साहस होता रहता है जो लोभ, मोह के भवबन्धनों के रोके रुक ही न सके। व्यक्तिगत वासना, तृष्णा के जाल जंजाल में ही आमतौर से नर पशुओं की क्षमताएं गलती जलती रहती हैं। आमतौर से लोग परिवार वालों की मनोकामनाएं पूरी करते रहने में जुटे खपे रहते हैं। इस चक्रव्यूह को बेध सकना उन्हीं के लिये सम्भव है जिनके भीतर आत्मबोध का आलोक प्रस्फुटित होने लगा। भावनाशील व्यक्ति ही ऐसा साहस पूर्ण निर्णय करते हैं कि निर्वाह मात्र के साधनों से सन्तोष करेंगे और परिवार को उतना ही सम्पन्न बनाने तक अपने कर्तव्य की इतिश्री मानेंगे जितने में कि अपने समाज के औसत नागरिक को जीवनयापन करना पड़ता है। भावनाशीलता को दिव्य विभूति की सार्थकता के लिए इस प्रकार का साहसिक निर्णय नितान्त आवश्यक है अन्यथा परमार्थ के लम्बे-चौड़े सपने मात्र कल्पना ही बनकर रह जायेंगे।

वासना और तृष्णा- लोभ और मोह के पिशाचों का मुंह इतना सर्वभक्षी है कि मनुष्य अपना समय, श्रम, बुद्धि बल, मनोबल ही नहीं- दीन, ईमान, लोक परलोक होम देने पर भी इन्हें तृप्त नहीं कर सकता। इनका आकर्षण भी इतना प्रचण्ड है कि जो इनसे लिपटा उसे समय का एक क्षण एवं सम्पत्ति का एक कण भी किसी अन्य कार्य के लिये लगा सकना सम्भव नहीं होता। सत्कर्मों के लिए फुरसत न मिलने- समस्याओं में उलझे रहने और आर्थिक तंगी का बहाना करने- रोना रोने- के अतिरिक्त और कुछ करते धरते बनता ही नहीं। यदि निर्वाह मात्र से सन्तुष्ट रहने और परिवार के प्रति उचित कर्तव्य भर निभाने की सीमा में सीमित रहा जाये तो सामान्य स्तर का व्यक्ति भी जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये पर्याप्त अवसर प्राप्त कर सकता है और इतना कुछ कर सकता है कि उस अनुकरणीय आदर्शवादिता की मुक्त कण्ठ से सराहना की जा सके।

अध्यात्मवादी, धर्म परायण, त्यागी, तपस्वी, परमार्थी, सन्त सुधारक, ब्रह्मपरायण महामानव स्तर के देव पुरुष वही हो सकते हैं जिन्हें भावना की विभूति भगवान ने दी हो। कृपण और संकीर्ण लोगों को इस प्रकार का सौभाग्य मिल ही नहीं सकता। स्वार्थपरता का पिशाच उन्हें कुछ करने ही नहीं देता। यदि उसकी पकड़ से एक कदम आगे बढ़ा भी जाये तो वह दूसरे बाड़े में और भी अधिक मजबूत रस्सों से पकड़ कर जकड़ देता है। सांसारिक लोभ मोह से ऊंचा उठकर त्याग परमार्थ की बात सोचने वाले लोग भी प्रायः एक कदम ही चलने के बाद फिर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, चमत्कार, पूजा प्रतिष्ठा जैसे व्यक्तिगत लोभ ही फिर नये रूप में मार्ग को घेरकर खड़े हो जाते हैं। स्वार्थी मनुष्य इस लोक की सम्पदा के बदले परलोक की सम्पदा चाहने लगता है। यह विशुद्ध रूप से सट्टेबाजी है। छुट-पुट दान पुण्य करने वाले स्वर्ग में आलीशान भवन और अजस्र वैभव पाने के लिए दाव लगाते हैं। स्वार्थ पूर्ति के बिना चैन नहीं- संसार के पैसे का लोभ घटा तो स्वर्ग के ऐश्वर्य का लालच सिर पर सवार हो गया। कोल्हू के बैल की दिशा भर बदली घेरा ज्यों का त्यों ही रहा- चक्कर जैसे का तैसा ही लगता रहा। आमतौर से आज के तथाकथित अध्यात्मवादी और पूजा परायण व्यक्ति ऐसे ही एक बाड़े को छोड़कर दूसरे बाड़े में प्रवेश करते दिखाई पड़ते हैं। प्रत्यक्ष लाभ को परोक्ष लाभ के‍ लिये हलका झीना वे करते तो हैं पर हाथ कुछ नहीं आता। कल्पना लोक में विचरण करने वालों को जो मिलता है उससे अधिक उन्हें मिल भी क्या सकता है- मिलना भी क्यों चाहिए? इन कल्पना के घोड़े पर सवार लोगों की अपेक्षा तो वे लोग अधिक यथार्थवादी हैं जो कम से कम सांसारिक सुख सुविधाएं तो पाते भोगते रहते हैं। स्वार्थवादी संकीर्णता में जकड़े रहकर परलोक के वैभव का- सिद्धि चमत्कार का ताना-बाना बुनने में उलझ जाने वालों के हाथ से तो वह भी निकल जाता है। आत्मिक उत्कर्ष तो उन्हीं का होता है जिन्होंने अपनी क्षुद्रता को विशालता में परिणत किया होगा।

भावनाओं को यदि उत्कर्ष की दिशा में बढ़ चलने का अवसर मिले तो उसके लिये एक दिशा है वह है अपने चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का सघन समावेश करने की। चिन्तन की उत्कृष्टता की निरन्तर प्रेरणा यह रहती है कि उसका व्यक्तित्व आदर्श, उज्ज्वल और अनुकरणीय हो। ऐसा व्यक्ति संयम, सदाचार, कर्तव्य का पूरा-पूरा ध्यान रखता है और अपने पुरुषार्थ को प्रखर बनाकर मानवी क्षमता के सदुपयोग से सम्भव हो सकने वाली प्रगति को सर्वसाधारण के सम्मुख प्रमाण रूप में प्रस्तुत करता है। उत्कृष्ट चिन्तन हर घड़ी इसी प्रयास में लगा रहता है कि किस प्रकार गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर श्रेष्ठतम बनाया जाये, पुरुषार्थ को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाय। आत्म निर्माण में प्रचण्ड तत्परता को देखकर ही यह प्रमाण प्राप्त होता है कि चिन्तन का, वस्तुतः उत्कृष्टता का कितना अंश घुल-मिल सका है। भावना का अदृश्य पक्ष यही है।

भावनात्मक उत्कर्ष का दृश्य पक्ष है आदर्शवादी क्रिया-कलाप लोक मंगल-जन कल्याण-समाजोत्थान-सेवा साधना एवं परमार्थ प्रयोजन की गति-विधियों में इस तथ्य को गतिशील रहता देख जा सकता है। भावनाशील व्यक्ति स्वार्थ भरी संकीर्णता की सड़न में कृमिकीटों की तरह संतुष्ट रह ही नहीं सकता। उस उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले पक्षी की तरह अपना हर क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत दीखता है। विश्व मानव की समस्याएँ होती है। विश्व कल्याण में उसे अपना निज का स्वार्थ दिखाई पड़ता है। अस्तु निजी महत्त्वाकाँक्षाओं की ओर से उसे मुँह मोड़ना पड़ता है। पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा, की त्रि-विधि स्वार्थपरताएं उसे दुर्बुद्धिजन्य दुर्गन्ध मात्र प्रतीत होता है।

ऐसी व्यक्ति बड़प्पन की अभिलाषाओं को ठुकरा कर महानता का वरण करता है। शरीर गत लिप्साएं और परिवार गत लालसाओं पर विवेक युक्त नियन्त्रण रखता है और देखता है कि उसका जीवन इतने छोटे क्षेत्र में ही सड़ गल नहीं जाता है-व्यापकता क्षेत्र में भी कम से कुछ कर्तव्य है और वे तभी पूरे हो सकते हैं जब शरीर और परिवार को ही चरम लक्ष्य मान बैठने की क्षुद्रता से ऊपर उठ कर रहा जाय। ऐसे व्यक्ति घोर व्यस्तता के बीच परमार्थ प्रयोजनों के लिए पर्याप्त समय पाते हैं लोक मण्डल के कामों से उन्हें फुरसत न रहने का बहाना नहीं बनाना पड़ता। इसी प्रकार अभाव ग्रस्त स्थिति में भी वे अपनी रोटी का एक टुकड़ा विश्व की कुरूपता को सुन्दरता में परिणत करने के लिए खुशी-खुशी समर्पित करते रहते हैं। उन्हें दरिद्रता के कलेवर में अपनी कृपणता छिपाने की आत्म वंचना नहीं करनी पड़ती।

भावनाशील व्यक्तियों की कुछ न कुछ उपलब्धियाँ विश्व कल्याण के लिए समर्पित होती ही रहती है। ऐसे व्यक्ति सोचते हैं यदि कुटुम्ब में एक व्यक्ति और अधिक होता तो उसके भोजन वस्त्र का भी प्रबन्ध करना ही पड़ता। परमार्थ को घर का एक अतिरिक्त सदस्य मान लेने पर उसके ऊपर होने वाला खर्च अखरता नहीं वरन् अनिवार्य आवश्यकताओं में जुड़ जाता है। फिर न उसके लिए कटौती करनी पड़ती है और न हिंसक, कंजूसी की जरूरत रहती है। दुर्व्यसन तक जब अभ्यास में आ जाते हैं तो उनका खर्च अनिवार्य और स्वाभाविक प्रतीत होने लगता है यदि परमार्थ प्रयोजनों को भी जीवन क्रम में सम्मिलित कर लिया जाय तो वह न तो भारी प्रतीत होता है और न असह्य। वरन् सहज सरल गति से निर्धन स्थिति में भी यथा क्रम चलता ही रहता है।

यों भावनाओं के असंतुलित उभार कभी-कभी ज्वार-भाटे की तरह साधारण सी सामयिक परिस्थितियों को लेकर भी आवेश ग्रस्त हो जाते हैं। कभी करुणा और दयालुता का इतना उभार आता है कि जो कुछ पास में है इसी घटना या स्थिति पर निछावर कर दें। उफान ठंडा होते ही उस ओर से विमुख हो जाने और उपेक्षा बरतने में भी देर नहीं लगती। जरा सी बात इतनी चुभ जाती है कि आँसू रोक नहीं सकते। जरा सी हानि इतनी असह्य होती है कि सब कुछ सदा के लिए अन्धकारमय प्रतीत होता है। कभी कोई सफलता मिल जाय तो कल्पनाएँ आकाश के तारे चूमने लगती है। किसी के प्रति आकर्षण हो जाय तो वही सर्व गुण सम्पन्न देवता दिखाई पड़े और जरा सी खटक जाय तो फिर उसका स्थान राक्षस पिशाच से कम प्रतीत न हो। ‘मूड’ ही उनका प्रेरणा केन्द्र होता है। भावुकता की अत्यधिक प्रबलता वाले व्यक्तियों का भक्ति के बिना गुजारा नहीं। भक्तिभाव की एक लहर आ जाय तो नाचने कूदने लगे और ऐसे तन्मय दिखाई पड़े मानो समाधि में चले गये। वह बुखार उतरते ही आचरण ऐसा गिर जाय मानो अध्यात्म तो दूर साधारण सौजन्य से भी इनका कोई रिश्ता नहीं।

ऐसी चित्र विचित्र प्रकृति के आवेशों और उभारो के पालने में झूलने वाले कल्पना जीवी व्यक्तियों की इस संसार में कमी नहीं। मोटे तौर से इसी वर्ग के लोगों को भावनाशील माना जाता है और इन्हीं अस्त व्यस्त मनो-दशा वाले अर्ध विक्षिप्तों को’ भावुक कहा जाता है पर तथ्य नहीं है। भावनाशील व्यक्ति में विवेक शीलता और दूर दर्शिता की मात्रा अपेक्षाकृत कम नहीं अधिक ही होती है। वह लोभ और मोह के, वासना और तृष्णा के चारों जाल जंजालों के बन्धनों को तोड़ने का साहस दिखा सकता है और औचित्य को अपनाने में अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्र में उपस्थित होते रहने वाले अवरोध का साहस पूर्वक निराकरण कर सकता है।

चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता का प्रगाढ़ समावेश कर सकने में समर्थ मनस्विता और तेजस्विता की आवश्यकता पड़ती है। उसे अपनाने का जो शौर्य साहस प्रदर्शित कर सकें उसे भावनाशील कहा जाएगा दूसरे शब्दों में सदुद्देश्य के लिए दुस्साहस पूर्ण संकल्प करने वाले एवं उनके परिपालन में बड़े से बड़ा त्याग बलिदान करने के सुदृढ़ निश्चय को भावनाशीलता कह सकते हैं। सद्भाव सम्पत् व्यक्ति उच्चस्तर पर सोचते हैं और उच्च आचरण पर तत्परता पूर्वक कटिबद्ध अड़े खड़े रहते दीखते हैं। यदि ऐसा न होता तो भावना के खदान में से ही नर रत्न महामानव उपलब्ध होने का तथ्य कैसे मूर्तिमान् रहता? ऐतिहासिक महापुरुषों में से प्रत्येक अनिवार्य रूप से भावना शील रहा है। उसके अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आकांक्षा कोलाहल करती रहती है। क्रमशः वे इतनी प्रखर हो जाती है कि उन्हें तप्त किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। आत्मा की पुकार , अन्तः वेदना ईश्वर की वाणी इसी को कहते हैं। उसी आत्म प्रेरणा के प्रकाश में मनस्वी लोग साहसिक कदम उठते हैं। प्रस्तुत अवरोधों की उपेक्षा करते हैं। और क्रमशः प्रस्तुत लक्ष्य के पथ पर बढ़ते चले जाते हैं। और वह क्रमिक यात्रा उस व्यक्ति के ऐतिहासिक महामानवों के बाह्य क्रिया-कलाप भले ही भिन्न रहे हों पर उनका आन्तरिक विकास इस एक ही स्तर का रहा है। भावना की पूँजी के अतिरिक्त महानता ओर किसी प्रकार खरीदी ही नहीं जा सकती।

युग परिवर्तन के महान्-प्रयोजन की पूर्ति के लिए जिस पूँजी की सबसे प्रथम-सबसे अधिक मात्रा में आवश्यकता है वह” भावना’ ही है। इसका जागरण, अभिवर्धन किये बिना और किसी प्रकार युगधर्म की माँग को पूरा नहीं किया जा सकता। यों युग-निर्माण परिवार की शृंखला में ऐसी ही कड़ियाँ जोड़ी गई है जिनमें जन्म जन्मान्तरों से संचित भाव सम्पदा का समुचित अंश विद्यमान् है। पत्रिकाओं के ग्राहक अथवा किसी संगठन के सदस्य मात्र वे लोग नहीं है जो आज नव निर्माण के पुण्य प्रयोजन में लोक नायक की भूमिका सम्पन्न करने के लिए अग्रसर हो रहे है। यह परिवार अनायास ही इकट्ठा नहीं हो गया है वरन् किसी दिव्य दर्शी के जन सागर में से अपनी पैनी दृष्टि से ढूँढ़-ढूँढ़ कर इन मणि मुक्तकों को एकत्रित किया है और एक बहुमूल्य हार के रूप में उसे पिरोया संजोया हैं। युग-निर्माण परिवार के निर्माण का तात्त्विक स्वरूप यही है। जिसके पीछे कुछ ठोस आधार न हो उसे ठोक पीट कर भी कुछ अधिक नहीं बनाया बढ़ाया जा सकता। बालू के महल कहाँ खड़े होते हैं। लकड़ी के शस्त्र कहाँ काम देते हैं, खोटे सिक्कों से व्यापार कहाँ होता है? जिनमें महानता के रूप में परिणत हो सकने वाली भावना के तत्त्व विद्यमान् हैं, उन्हीं का संकलन संगठन युग-निर्माण परिवार के रूप में हुआ है। यदि ऐसा न होता तो उससे किसी बढ़ी चढ़ी युग भूमिका के सम्पादन की आशा कैसे की जा सकती थी। और यदि की भी जाती तो उसकी पूर्ति का आधार कैसे बनता?

बीजांकुर के रूप में जो भाव सम्पदा युग-निर्माण परिवार के सदस्यों में विद्यमान् है उसे उभारना और विकसित परिपक्व किया जाना आज की महती आवश्यकता है इन पंक्तियों द्वारा उसी का आह्वान उद्बोधन किया जा रहा हैं। परिजनों को अपने सम्बन्ध में हजार बार विचार करना चाहिए और देखना चाहिए कि वे कृमि-कीटकों के इस वर्ग से कहीं ऊँचे है जो मात्र पेट और प्रजनन के लिए ही जीते मरते हैं। आत्म बोध के रूप में यह अनुभव करना चाहिए कि वे उन नर पशुओं की श्रेणी में नहीं है जिनके लिए वासना और तृष्णा की परिधि से बाहर और कोई लक्ष्य उद्देश्य नहीं है। अहंता और ममता परिपोषण तक ही जिनकी गति विधियाँ सीमित है जिन्हें धन, भोग ओर अहंता की पूर्ति के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं ऐसे धरती के भार लोगों की गणना अन्धकार में भटकने वाले असुरों में ही होगी भले ही वे कितने ही वैभव सम्पत् क्यों न हों।

यदि युग-निर्माण परिवार के परिजन यदि उसी स्तर का जीवन जी सकें तो उनकी आदर्शवादिता-आध्यात्मिक काल्पनिक आत्म प्रवञ्चना मात्र मानी जाएगी उनकी पूँजी पत्री भी निर्जीव निष्प्राण गिनी जाएगी यदि बात इतने घटियापन के इर्द-गिर्द ही मंडराती रही लो इसे एक दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जाएगा क्षमता को न गति मिले न दिशा तो इसे दुर्घटना के अतिरिक्त और क्या माना जाएगा अपने परिवार के सदस्यों के प्रयास यदि महा-मानवों-युग निर्माताओं की दिशा में अग्रसर न हो सके तो यही कहा जाएगा कि हिमालय ही भूमिगत हो चला, समुद्र के सूखने की घड़ी आ गई। सामान्य मनुष्य पतनोन्मुख रहें यह सहन किया जा सकता है पर यदि आत्म सम्पदा महामानवों द्वारा नर पशुओं की स्थिति में पड़े रहना स्वीकार अंगीकार कर लिया जाय तो यह उन विभूतियों के लिए ही नहीं समग्र मानव जाति के लिए अभिशाप ही कहा जाएगा ऐसा अवसर हमें नहीं ही आने देना चाहिए। इस कायरता से तो ईश्वरीय निर्देश की विश्व मानव के उज्ज्वल भविष्य की-गुरुदेव के स्वप्नों की और जीवन लक्ष्य की अब मानना ही होगी। अपने परिवार की भावनाशीलता यदि प्रसुप्त, निष्क्रिय बनी रही-प्रखर न हो सकी तो यही कहना होगा कि आशा के अरुणोदय पर दुर्भाग्य पूर्ण ग्रहण जैसा अभिशाप लग गया।

अपने परिवार के हर परिजन को अपनी भाव सम्पदा का अवलोकन करना चाहिए उसे उठाना और उभारना चाहिए। चिन्तन में उत्कृष्टता का और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करना चाहिए। व्यावहारिक अध्यात्म वाद यही है। ईश्वर की पूजा अर्चा पर्याप्त नहीं वरन् भगवान को अपने में आत्मसात् करना चाहिए उसे जीवन सम्पदा का भागीदार , अधिनायक बनना चाहिए और उसके संकेतों पर प्रयुक्त होने के लिए अपनी समस्त उपलब्धियों का समर्पण करना चाहिए। बड़प्पन की भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं से मुँह मोड़ना चाहिए और महानता प्राप्त करने के लिए उसका मूल्य चुकाना आवश्यक है यह मान कर चलना चाहिए। देव मानव स्तर की जो भावनाशीलता उठती हों उसे स्वाध्याय सत्संग एवं मनन चिंतन में उभारना चाहिए। और इतना साहस एकत्रित करना चाहिए कि आन्तरिक दुर्बलताओं एवं बाहरी अवरोधों से जूझते हुए उस प्रयोजन में तत्पर हुआ जा सके जो युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने विशेष रूप प्रस्तुत हुआ है। हमें इस मिशन का साधारण समर्थन कर्ता सदस्य ही नहीं बने रहना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़ाकर सृजन सेना का ऐसा सैनिक बनना चाहिए जिसके पीछे अनुयायियों की एक बड़ी पंक्ति भी कदम से कदम मिला कर अग्रसर होती हुई दिखाई दें।

भावना की शक्ति जितनी ही उभरेगी-परिपक्व होगी उतनी ही प्रतिभा निखरती चली जाएगी प्रतिभाशाली व्यक्तियों की प्रखरता सभी को आकर्षित प्रभावित और मुग्ध करती है। हर कोई प्रतिभाशाली बनना चाहता है। क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों की सफलताएँ बहुत करके प्रतिभावानों को ही मिलती है। वे जिस कार्य को हाथ में लेते हैं उसे समग्र सजगता के साथ पूरा मनोयोग लगा कर पूरा करते हैं। फलस्वरूप बड़ी खूबसूरती के साथ सफल होता है। आधे अधूरे मन से उपेक्षा और अन्यमनस्कता के साथ किये गये काम अस्त-व्यस्त असंबद्ध होते हैं अस्तु उनका असफल अपूर्ण अथवा कुरूप होना भी स्वाभाविक ही है। ऐसे लोगों पर उदासी एवं निराशा छाई रहती है। दूसरे लोग उनकी भर्त्सना उपेक्षा करते हैं तिरस्कार उपहास का व्यवहार करते हैं। इन्हीं सब बातों का संमिश्रण असफल जीवन क्रम के रूप में दृष्टीगोचर होता है। प्रतिभाशाली इन अवमाननाओं से बचे रहते हैं। क्योंकि उनकी प्रखर भावनाशीलता क्रमशः सजग कर्मठता के रूप में बदलती चली जाती है। फलतः व्यक्तित्व में सर्वतोमुखी निखार उत्पन्न होता है, प्रतिभा इसी भाव परिपक्वता के नाम है। यदि युग-निर्माण परिवार के सदस्य अपनी भाव शीलता में प्रौढ़ता ला सके और उसे साहस एवं विवेक के साथ एकाग्र कर्मठता के साथ जोड़ सके तो प्रतीत होगा कि पिछले दिनों घटिया असफलता और तिरस्कृत उपेक्षित व्यक्तित्व किस तेजी से बढ़ता चला जा रहा है और कितनी चमक तथा तेजी अपनी गतिविधियों में उत्पन्न हो गई तदनुसार सफलताओं का अनुपात भी किस प्रकार कौतुक चमत्कार जैसा बढ़ गया।

कहा जाता रहा है कि मानव जाति के भविष्य निर्माण का यह अभियान विभूतियों की साधन सामग्री पर्याप्त मात्रा में जुटाने से हो सम्भव होगा। विभूतियों में भावना और प्रतिभा दो का महत्त्व अस्सी प्रतिशत है। शेष विद्या, कला, सम्पत्ति, सत्ता की विभूतियाँ तो बहिरंग है उन सब का सम्मिलित मूल्य बीस प्रतिशत है। संसार में जो कुछ महत्त्वपूर्ण होता रहा है उन घटना क्रमों के पीछे भावना की महत्ता सर्वोपरि रही है। ऐतिहासिक की महान् उपलब्धियों का श्रेय बहुत करके भाव उत्कृष्टता को ही दिया जाना चाहिए। भावना ही जब मनोयोग और पुरुषार्थ के साथ जुड़ कर प्रखर सक्रिय होती है तो उसी को प्रतिभा कहा जाता है। प्रतिभा जन्म जात भी हो सकती है पर जहाँ उसकी न्यूनता हो वहाँ मनस्वी भाव सत्पात्रता द्वारा उसकी पूर्ति सहज ही की जा सकती है।

अखण्ड ज्योति के परिजन अपने विशेष व्यक्तित्व और विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखें-अपनी भाव शीलता को उभारें सुधारें-चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता का समावेश करने के लिए तत्पर हों तो कोई कारण नहीं कि उनमें युग-निर्माताओं के उपयुक्त समर्थ क्षमता का उद्भव न हो। इस उपलब्धि से सम्पन्न होकर अपना छोटा सा परिवार उस महान् भूमिका का सहज ही सम्पादन कर सकेगा जिसके लिए उसका सृजन हुआ है।

मनुष्य जीवन महान् है। उसमें भी भावना सम्पन्नों का सौभाग्य असाधारण है। इन भावना सम्पन्नों में भी जिन्हें सामयिक ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए नियुक्त किया गया हो उन्हें अपने को हर दृष्टि से बड़भागी मानना चाहिए। इस ईश्वरीय अनुदान को सार्थक बनाने के लिए हमें अपनी भाव सम्पदा को अधिकाधिक परिष्कृत समुन्नत बनाने में जुट जाना चाहिए। चिन्तन और कर्तव्य को उच्चस्तरीय बनाया जाना चाहिए। जो इतना कर सकेगा उनकी प्रतिभा में निखार आते देर न लगेगी। युग परिवर्तन के लिए जिन विभूतियों की आवश्यकता है उनमें से भाव शीलता और तज्जनित प्रतिभा को समुचित मात्रा में हम सब सहज ही जुटा सकते हैं। सो उसके लिए अब बिना एक क्षण गँवाये अविलम्ब तत्पर हो ही जाना चाहिए।


युग शम्भु का गरल पान

(माया वर्मा)


युग शम्भु का गरल पान (kavita)

जब-जब दानवता होती उन्मत्त, वारुणी पीकर-तब-तब युग का शम्भु विश्व का गरल पिया करता है॥

नाग, झूठ, छल, छद्मों के, जब रोहित को डसते हैं।

और अन्धविश्वासों के घर विवश तथ्य बसते हैं॥

करते विश्वामित्र परीक्षण की जब भी तैयारी।

तभी बीच चौराहे पर बिकती शैव्या सी नारी॥

जब-जब सत्य कसौटी पर चढ़ता है खरा उतरने-तब-तब युग का हरिश्चन्द्र भी जन्म लिया करता है॥

समता और विषमता में जब जीत विषमता जाती।

अपने बल से जन-जीवन को जब वह विषम बनाती॥

मानव की आंखें टिकती जब एक मात्र कंचन पर।

उसके लिए भुला देता वह आत्मा के शाश्वत स्वर॥

जब-जब वृत्तासुरी असुरता चरम बिन्दु पर आती-तब-तब युग संत दधीचि, अस्थियाँ दान किया करता है॥

सगर सुतों सी यह जन शक्ति, त्यागती जब निष्ठा को।

मानस हंस-छोड़कर मोती, खाते जब विष्ठा को॥

ज्ञान और तप-संचम की चखती न वायु जीवन में-अनाचार-अज्ञान-अनैतिकता भरती जन-जन में॥

जब-जब आवश्यकता पड़ती ज्ञान गंग लाने की-तब-तब युग भागीरथ तप निरत जिया करता है॥

जब सम्मान भुला देता जग, चिर-जननी नारी का।

बढ़ता हाथ छिपी लज्जा पर जब अत्याचारी का॥

केवल भोग्या-रमणी रूप नारी का जब रह जाता।

नंगी तस्वीरें निहार, रो उठता स्वयं विधाता॥

जब-जब दुशासन उतारता द्रुपद सुता की साड़ी-तब-तब युग का कृष्ण तार में तार सिया करता है॥

हर युग में केवल कुछ ही दुष्प्रवृत्तियाँ छायी हैं।

किन्तु आज तो सारी ही बस एक साथ आयी हैं॥

इसीलिये आवाज लगाई हे चेतन मन वालों!

गिरती है दीवार संस्कृति की-तुम इसे बचा लो!!

जब-जब होता जग उद्भ्राँत-पतित-आक्रान्त-भयातुर-तब-तब युग का देव विश्व को अभय दिया करता है-तब-तब युग का शम्भु विश्व का गरल पिया करता है॥

*समाप्त*