Quotation

राजयोग के प्रति अमरीका में सर्वप्रथम उल्लेखनीय आकर्षण विवेकानन्द के कारण जागा। जून ......... में उन्होंने मिस एस. ई. वाल्डो को बोल-बोल कर राजयोग पर अपनी प्रसिद्ध टीका लिखाई। इसमें विलियम जेम्स प्रभृत अमरीकी शरीर शास्त्रियों का ध्यान आकृष्ट किया। टाॅल्सटाय में भी तभी राजयोग के प्रति उत्साह जागा था। किन्तु ऐसा लगता है कि राजयोग के प्रति अमरीकी मुख्यतः उसके शारीरिक स्वरूप के कारण ही आकर्षित हुए। यही प्रवृत्ति अमरीकियों में हठयोग के प्रति प्रचण्ड आकर्षण जगाती है।

वस्तुतः अमरीकी लोग योग को भौतिक उपयोगिता की दृष्टि से ही तौलते हैं। वे उसे भौतिक सामर्थ्य बढ़ाने वाले एक साधन के रूप में ही देखते हैं। अमरीकी जनता आकार में दैत्य के समान और बुद्धि में बालक के समान है। वह केवल उसी सृझ में रुचि लेती है जिससे उसे कोई भौतिक लाभ मिल सके। वहाँ तत्व मीमांसा और धर्म को बिगाड़ कर झूेठ वैज्ञानिक प्रयोगों का रूप दे दिया जाता है जिसका वास्तविक उद्देश्य होता है, सत्ता की, धन की, बल की, संसार-सुख की सिद्धि। विवेकानन्द इस तथ्य को शीघ्र ही समझ गये, इसी से उन्होंने वहाँ शीघ्र ही राजयोग पर व्याख्यान बन्द कर दिये और उनके व्याख्यानों का नया विषय ज्ञानयोग हो गया।

-रोम्याँ रोलाँ


कौन बड़ा कौन छोटा

मस्तिष्कीय तीक्ष्णता और बुद्धिमत्ता में भौतिक अन्तर है। मस्तिष्क रासायनिक पदार्थों की संरचना है। उसकी ललक अपने सजातीय पदार्थों का अधिकाधिक उपभोग करने की आतुरता के साथ जुड़ी रहती है। अस्तु मन इतना ही चाहता और सोचता है कि रुचिकर लगने वाले पदार्थों और प्रिय लगने वाले व्यक्तियों की अनुकूलता एवं बहुलता बनी रहे। चिन्तन और कर्म को इसी प्रयोजन में लगाये रहना ही ‘अक्लमन्दी’ की सीमा है। चतुरता यही सिखाती है। वह अपने क्षेत्र में जब उच्छृंखल होने लगती है तो कृपणता, धूर्तता और दृष्टता के रूप में बढ़ती और ऐसे अनाचारी कृत्य करती है, जिससे कर्ता को पतन, तिरस्कार, प्रतिशोध एवं प्रताड़ना का भाजन बनना पड़ता है। उपलब्धियों की मात्रा तो चतुरता के सहारे बढ़ जाती है, पर वह विग्रह और संकट ही खड़े करती है।

बुद्धि मानवी काया में आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी विशेषता है तथ्य खोजने और परिणाम सोच करने की क्षमता। विवेकशीलता और दूरदर्शिता इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का नाम है। भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान का निर्धारण करने की क्षमता के रहते मन को अचिन्त्य-चिन्तन तथा शरीर को अनर्थ आचरण करने की छूट नहीं मिल सकती। बुद्धिमान भविष्य का निर्माण करते है और उसके लिए मन की ललक लिप्सा पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ भी रहते है और सफल भी होते है।

अक्लमन्दी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। ऐसा परामर्श और सहयोग देने वालों की कमी नहीं। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव-बन्धन है। इस नाश पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बुद्धिमत्ता में ही है। बुद्धिमत्ता अर्थात् विवेकशीलता, दूरदर्शिता। इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।


करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है

युग सन्धि की इस अति महत्वपूर्ण बेला में जागृत आत्माओं के कन्धों पर कुछ विशेष कर्तव्य और उत्तरदायित्व आयें है। इनकी पूर्ति में उन्हें बिना असमंजस और प्रमाद अपनाये तत्परतापूर्वक लगना चाहिये। यह तथ्य गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिये कि युग समस्याओं एवं प्रत्यक्ष विभीषिकाओं के मूल में आस्था संकट ही प्रमुख कारण है। सुधार समाधान के लिये किये जाने वाले भौतिक प्रयत्नों से सहयोग देने के अतिरिक्त सूक्ष्मदर्शियों को अदृश्य के अनुकूलन, जन-मानस के परिष्कार एवं प्रज्ञा विस्तार के लिये विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। इन क्षेत्रों में इन दिनों प्रयत्नशीलता नहीं के बराबर है जबकि वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुए इन्हीं प्रयत्नों पर अधिकाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इस उपेक्षित किन्तु सर्वोपरि महत्व के कार्यक्षेत्र को अध्यात्म अभिरुचि के लोग सम्भालें, यही उपयुक्त है। युग परिवर्तन के इस विशिष्ट अवसर पर गायत्री परिवार के परिजन युग पुरश्चरण आरम्भ कर रहे हैं। जिसमें हर दिन 240 करोड़ गायत्री जब नैष्ठिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा। यह संकल्प प्रस्तुत गायत्री जयन्ती 13 जून 90 से आरम्भ होकर आगामी बोस वर्ष तक चलेगा। युग सन्धि की यही मध्य बेला है।

नैष्ठिक उपासकों को पाँच नियम पालन करने होते हैं (1) न्यूनतम पाँच माला गायत्री जप, शक्ति संचार साधना सहित। (2) गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घण्टे का मौन। (3) महीने में एक बार अग्नि-होत्र (4) आश्विन, चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान (5) दस अन्य व्यक्तियों को साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेंगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।

गायत्री महामन्त्र में सन्निहित ऋतम्भरा प्रज्ञा का आलोक ही नवयुग का आधार भूत कारण बनेगा। नवयुग के समस्त सूत्र संकेत एवं सन्देश महाप्रज्ञा में बीज रूप में विद्यमान हैं। इस आलोक को जन-जन तक पहुँचाने के लिये इन दिनाँक बड़े गायत्री शक्ति पीठों मझले प्रज्ञा पीठों और छोटे प्रज्ञा मन्दिरों का निर्माण हो रहा है। इनमें से प्रज्ञा मन्दिर सबसे सस्ता और हर गाँव में अति सरलतापूर्वक बन जाने योग्य है। प्रयत्न यह होना चाहिये कि यह छोटे देवालय हर गाँव में बन सकें और उनके माध्यम से युगान्तरीय चेतना का आलोक जन-जन के अन्तराल तक पहुँचाया जा सकना सम्भव हो सके।

युग संधि के इस प्रथम वर्ष में प्राणवान अग्रदूतों से अनुरोध है कि वे यह अंक पढ़ने के दिन से लेकर गायत्री जयन्ती तक का समय निजी कामों से अवकाश लेकर अपने परिचित क्षेत्र में जन-संपर्क के लिये निकलें। मिशन से परिचितों के और साधना में श्रद्धा रखने वालों के सर्वप्रथम दरवाजा खटखटायें नैष्ठिक उपासना की आवश्यक जानकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगा लें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अन्तरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्डलों की स्थापना के लिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं दिनों अनेकों प्रज्ञामन्डल बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पड़ेगा सभी जागृत आत्माओं से गायत्री जयन्ती तक की अवधि इस प्रयोजन के लिए समयदान करने के लिए इन पंक्तियों द्वारा विशेष अनुरोध किया जा रहा हैं।


आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करना ही पड़ेगा

डाक विभाग की अनियमित वितरण व्यवस्था के कारण गत कई मासों से अखण्ड ज्योति अत्यधिक विलम्ब से पहुँच रही है। अप्रैल की पत्रिका 2-3 अप्रैल को डाक घर से रवाना कर दी गई थी फिर भी अनेक स्थानों पर अप्रैल के अन्त तक नहीं पहुँची। बहुत-सी मार्ग में भी खो गई। इस अव्यवस्था से पाठकों को बड़ी असुविधा हो रही है- इसके लिए डाक अधिकारियों से हम बराबर वितरण व्यवस्था ठीक करने का अनुरोध कर रहे हैं।

इस सम्बन्ध में उच्च अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है, हम भी यहाँ से प्रयास कर रहे है। इस मास से पत्रिका भेजने की तारीख की मुहर पत्रिका के रैपर पर लगी रहेगी जिससे यहाँ की प्रेषण तिथि की निश्चितता हो सके। पाठकों से अनुरोध है यदि पत्रिका यहाँ से भेजने की तिथि के एक सप्ताह बाद पहुँचे (यद्यपि डाक तीन दिन के अन्दर बँट जाने का प्रावधान है) तो कृपया निम्न विवरण के साथ पोस्ट मास्टर जनरल उ.प्र. लखनऊ को मूल रैपर भेजने हुए-विलम्ब की जाँच का अनुरोध करें। चूँकि पत्रिकाएँ मार्ग में रुकती है। अतः स्थानीय डाक अधीक्षकों के नियन्त्रण क्षेत्र में नहीं आती।

प्रेषक- अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा-प्रेषक डाकघर गायत्री तपोभूमि मथुरा डाकघर

प्रेषक तिथि

प्राप्ति का डाकघर

प्राप्ति की तारीख

रजिस्टर्ड बण्डल की स्थिति में रजिस्ट्री संख्या-

प्रतियों की संख्या के साथ ही शिकायत की एक प्रति निम्न पते पर भी प्रेषित करें

महानिदेशक डाक तार नई दिल्ली।

जो प्रतियाँ न पहुँचे उनके सम्बन्ध में भी उक्त पतों पर पत्र व्यवहार किया जाये।

उक्त पतों पर जो भी शिकायतें भेजी जाये वे अपने डाक घर को हाथों हाथ दी जाय उन पर किसी प्रकार का डाक व्यय देय न होगा। शिकायत देने की रसीद सम्बन्धित डाक घर से प्राप्त कर ली जाये इस सम्बन्ध में डाकघर गाइड भाग-1, धारा-76 में स्पष्ट निर्देश है।

96. जनता की शिकायतों का प्रेषण

सेवा के खिलाफ डाकघर के किसी अधिकारी की भेजी गई वास्तविक शिकायतें जिनमें पहली शिकायतों के अनुस्मारक भी शामिल है, यदि किसी डाकघर या तार घर पर खुले रूप में यह किसी खुले लिफाफे में दी गई हो तो प्रेषण के लिए निःशुल्क स्वीकार की जायेगी।

जो भी पत्र-व्यवहार करें उसकी एक प्रति अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भी भेजने का अनुग्रह करें।


भला यह भी कोई सिद्धि चमत्कार है

दर्शन का लक्ष्य है परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करना धर्म का उद्देश्य है-आध्यात्मिक मूल्यों को भावनात्मक ढंग से स्वीकार करना। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि दर्शन विचारात्मक प्रयास है, जबकि धर्म व्यावहारिक। दर्शन सन्देह, तर्क, प्रमाण के समस्त उपादानों के सहारे सत्य को तौलना चाहता है जबकि धर्म आस्था, विश्वास, श्रद्धा तथा भक्ति द्वारा हृदय को स्नेह से अभिसिंचित करना चाहता है। धर्म तर्क से परे जाना चाहता है। जबकि दर्शन में तर्क की पूरी गुंजाइश है। धर्म भावना से परिपुष्टि होता है जबकि दर्शन विचारों से। वस्तुतः दोनों एक दूसरे के पूरक है। धर्म को दर्शन की आवश्यकता इसलिए है कि भावना प्रवाह में अन्धविश्वास असत्य बातों का समावेश होना सम्भव है। उनका निराकरण दर्शन की विचारणा द्वारा ही हो सकता है। दर्शन को धर्म की आवश्यकता इसलिए है। कि वैचारिक उड़ान जब तक जीवन का अंग नहीं बन जाती तब तक वह उपयोगी नहीं हो सकती। दोनों के सम्मिलन से ही अध्यात्म का समग्र स्वरूप बनता परिपुष्ट होता है।

मानव बुद्धि सीमित होते हुए भी विराट् को विराट बता सकने में सक्षम है। विराटता का प्रतिपादन भी तो बुद्धि विराट् का अनुभव करती है। अगली भूमिका भावनाओं की होती है। वह उस अनन्त सत्ता से संपर्क जोड़ती है। दर्शन की-विचारों की उपयोगिता यहाँ मात्र इतनी है। कि कहीं भावनाएँ तुच्छ को ही तो महान् विराट् नहीं समझ बैठी है। सीमित-असीम का भेद वृद्धि ही कर पाती है। ईश्वर ने बुद्धि का वरदान भी मनुष्य को इसीलिए दिया है, जिससे वह सत्यासत्य का निर्धारण कर सके। पक्षी अनन्त आकाश में उड़ते हैं अनन्तता की अनुभूति उन्हें उड़ने के पश्चात ही होती है। बिना प्रयास के अनन्त मान लेने बात अनुभूति नहीं भावकुता होगी। सच तो यह है कि गहन अनुभूतियाँ गहरे ज्ञान के पश्चात ही होती तथा टिकाऊ रहती है।उसके बिना धर्म के स्वास्थ्य स्वरूप का दिग्दर्शन कर सकना असम्भव है। दर्शन बौद्धिक स्तर पर किया गया वह प्रयास है जो अनुभूति की पृष्ठभूमि बनाता है इसकी गहराई में पहुँचने वाला व्यक्ति ही सच्चा धार्मिक हो सकता है। दर्शन धर्म को माँजता, संवारता तथा उसमें उग रहे झाड़-झंखाड़ों को काटता छाँटता है।

धर्म के सिद्धान्तों, मान्यताओं में जहाँ पूरे विश्व में विषमतायें दिखायी पड़ती है। वहीं विज्ञान के सिद्धान्तों में सार्वभौमिकता देखने को मिलती है। वैज्ञानिक चाहे एशिया के हों अथवा यूरोप के, सबसे विचारों में एकरूपता है। उनके फार्मूले एक है, उनकी भाषा एक है, सिद्धान्त एक है। उनमें आपसी सहयोग भी है। यही कारण है कि विज्ञान का इतना विकास सम्भव हो सका जबकि चारों और धर्मों में विषमताएँ दिखायी पड़ती हैं।

धर्म को यदि अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है तो उसे अपना स्वरूप ऐसा रखना होगा जो तर्क संगत, प्रामाणिक एवं उपयोगी हो। यह तथ्य धर्म की मूल सत्ता में आरम्भ से ही मौजूद है। दुराग्रहों ने उन्हें कुंठित किया था। तथ्य और सत्य जो जानना विज्ञान और दर्शन का उद्देश्य रहा है। फलतः वे फले-फूले और विश्व भर में अपनी एकरूपता बनाये रहे। धर्म को भी प्रगतिशील होना होगा इसके लिए एक ही उपाय है विज्ञान और दर्शन के सहारे अपने शाश्वत एवं उपयोगी स्वरूप का अभिनव प्रस्तुतीकरण।


योग साधनाएं हमें भीम बना सकती हैं।

पृथ्वी क्या है? इसका उत्तर रसायन शास्त्री उसका रासायनिक विश्लेषण करके इतना ही कह सकते है कि यह विभिन्न पदार्थ घटकों एवं तत्वों का समुच्चय मात्र है। बढ़े ढेले की तरह वह भी इस विशाल ब्रह्माण्ड की एक नन्ही सी इकाई भर वन कर अपना गुजारा कर रही है।

जीव विज्ञानी के लिए पृथ्वी की स्थिति अधिक जटिल और रहस्यपूर्ण है। पदार्थ और चेतन के समन्वय से बने हुए प्राणी दृष्टिगोचर तो असंख्यों होते हैं, पर यह विदित नहीं होता कि जीवन का उद्गम स्त्रोत क्या है ? धरती पर भरा हुआ पदार्थ जिन घटकों से बना है, उनमें हलचल भर ले। उनमें जीवन का कोई लक्षण नहीं है। फिर यह जीवन है क्या ? आता कहाँ से हैं ? पदार्थों के साथ क्यों जुड़ता बिछुड़ता है ? प्राणियों की सत्ता पदार्थ मूलक है या चेतना मूलक है ? आदि प्रश्नों की एक सुविस्तृत श्रृंखला ऐसी है। जिसके सम्बन्ध में रिचकाल से दार्शनिक एवं वैज्ञानिक माथा-पच्ची करते रहे हैं, किन्तु अभी तक किसी निर्विवाद तथ्य तक पहुँच सकना सम्भव नहीं हुआ है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पदार्थ ही अमुक परिस्थितियों में जीवन के रूप में विकसित हो जाता है। किन्तु प्रयोगों से अभी तक इस मत की पुष्टि नहीं हुई विशुद्ध पदार्थ से किसी प्राणी का सृजन सम्भव नहीं हो सका। चेतना का जहाँ पहले से ही अस्तित्व मौजूद है उसी को घटा-बढ़ाकर रूपान्तरण सम्भव हो सका है। नये सिरे से एक भी जीवाणु की संरचना सम्भव नहीं हो सकी। प्रयोग क्षेत्र की इस निराशा से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। कि चेतना एक स्वतन्त्र सत्ता हैं। पदार्थ उसका उपकरण है उद्गम नहीं।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीवन यदि स्वतन्त्र है तो उसका धरती पर अस्तित्व किस रूप में है अध्यात्म दर्शन के समाधान अलग है। पदार्थ विज्ञानी किसी प्रत्यक्ष तथ्य के बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकते। उनका अनुमान है कि जीवन धैर्य का अनुदान है। जो पृथ्वी को अनुग्रहपूर्वक उपलब्ध हुआ है।

जीवन है क्या? इसके उत्तर में तत्व-दर्शन और विज्ञान एक प्रकार से सहमत जैसे दिखते है कि जीवन एक प्रकार का विशिष्ट विद्युत प्रवाह है जिसमें जड़ और चेतन की दोनों विशेषताएँ विद्यमान है। इसकी परिकल्पना विचारशील चुम्बकत्व के रूप में की गई है। अध्यात्म भाषा में इसी को प्राण कहा जाता रहा है। प्राण का चेतन पक्ष पदार्थ को अपने चुम्बकत्व से प्रभावित करता है, उस पर अधिकार जमाता और उपयोग करता है। इतने पर भी उसकी निजी सत्ता मौलिक एवं स्वतन्त्र है। वह पदार्थ के वशवर्ती नहीं है।

प्राण की विवेचना दार्शनिकों नपे परब्रह्म की शक्ति प्रवाह के रूप में लगभग वैसी ही की है जैसी कि विज्ञानी पदार्थ की मूल-सत्ता परमाणुओं के रूप में नहीं तरंगों एवं कम्पनों के रूप में मानते हैं किन्तु विज्ञानी प्रमाण उनका प्रत्यक्षवाद अब तक इतना ही जान सका है कि जीवन सूर्य से उतरता है और वह पदार्थ को चुम्बकत्व के रूप में और जीवनधारियों को संकल्प के रूप में उपलब्ध होता है। पदार्थों में हलचल और प्राणियों में संकल्प की गतिविधियाँ अलग-अलग हैं फिर भी उनके मध्य बहुत कुछ प्रवाह साम्य देखा जा सकता हैं।

जहाँ तक चुम्बकत्व का सम्बन्ध है उसे कई दृष्टियों से पदार्थ जगत पर छाया हुआ विशिष्ट अनुशासन कह सकते हैं। धरती की भीतरी और बाहरी गतिविधियाँ उसी पर निर्भर है। अपनी धुरी पर घूमता-कक्षा में परिभ्रमण करना-अनायास ही नहीं होता रहता। इसमें उसका वह चुम्बकत्व ही कारण है जो भीतर से गति उभारता है और उसे अग्रगामी रहने के लिए आगे धकेलता है। पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा और उसके परमाणुओं की अन्तःसंरचना में उसी स्तर की भ्रमण चर्या का चलना यह बताता है। कि यह उसी चुम्बकत्व की करतूत है। पृथ्वी के शक्ति प्रवाहों का पर्यवेक्षण करने पर जाना जाता है कि पृथ्वी एक विशाल चुम्बक है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव उसके मध्य केन्द्र हैं। यह चुम्बक ऊपरी परत पर ही छाया हुआ नहीं है वरन् उसके अन्तराल में भी भरा पड़ा है और जब भी उसे अवसर मिलता है ऊपर आकर अपने अस्तित्व का परिचय देता है।

पिछले दिनों जो ज्वालामुखी पृथ्वी पर फूटे हैं और उनके लावे में लोहे के कण बहकर जम गये हैं। उनमें चुम्बक के वह गुण विद्यमान हैं जिनसे पृथ्वी के 60000000 वर्षों तक के चुम्बकीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मारशैक अलेक्जैंडर ने अपनी पुस्तक में लिखा है- भूतत्ववेत्ता जितना अधिक ज्ञात करते जाते हैं उनका यह विश्वास उतना ही स्पष्ट होता जाता है कि पृथ्वी के अनेक रहस्यों का उत्तर चुम्बकत्व में निहित प्रतीत होता है।

काफी समय तक वैज्ञानिकों की यह धारणा रही है कि चुम्बकत्व का केन्द्र उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव है किन्तु पिछली शताब्दियों में जिन दिनों नौ सेना का तेजी से विकास हुआ समुद्रों में तैरने वाले जहाजों ने पाया कि पृथ्वी के विषुवत वृत्तीय क्षेत्र में जाने पर दिक्सूचक (कम्पास) की सुई बिलकुल सीधी सिर के बल खड़ी हो जाती है। इस तथ्य की खोज ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी स्वयं में एक चुम्बक है। उसके गर्भ में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती हुई एक ऐसी चुम्बक धारा प्रवाहित होती रहती है। जिस तरह मनुष्य शरीर में उत्तरी ध्रुव मस्तिष्क और दक्षिणी ध्रुव मूलाधार को सुषुम्ना शीर्षक का विद्युत चुम्बकीय जीवन प्रवाह।

पिछले दिनों जब-जब पृथ्वी पर भयंकर चक्रवात या तूफान उमड़े यह पाया गया कि उस समय पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हुआ। उस स्थिति में न केवल मनुष्य अपितु जीव जन्तु तक बुरी तरह प्रवाहित होते हैं। भूकम्पों की सबसे अधिक अच्छी भविष्य वाणी उस क्षेत्र के पक्षियों तथा जीव-जन्तुओं की हलचलों से मिलता है। भूकम्प आने से पूर्व पक्षियों यहाँ तक कि सर्प जीवों का पलायन इस बात की पुष्टि करता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की सूक्ष्म हलचलें, जीवों के उस चुम्बकीय क्षेत्र को जिससे चिन्तन प्रादुर्भूत होता है प्रभावित करती है। अतएव पृथ्वी में व्याप्त चुम्बकत्व से जैव चुम्बकत्व में कोई न कोई साम्य अवश्य होना चाहिये।

इस दिशा में भूगर्भ शास्त्री गिर्ल्वट और मैक्सवेल के प्रयोगों का जिक्र करते हुये डाँ. अलेक्जैंडर मारशैक ने अपनी पुस्तक "पृथ्वी ओर अन्तरिक्ष” के पृष्ठ 121 में यह स्वीकार किया है। कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर नित्य सूर्य के किसी अज्ञात विकिरण का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव जिस क्रम में घटता बढ़ता है उसी क्रम में पृथ्वी के जीवन में भी हल्के-भारी परिवर्तन होते हैं अतएव कहना न होगा कि प्रत्यक्षतः मनुष्य की, जीवधारियों की अन्तःचेतना को भी सूर्य ही प्रभावित करता है।

सूर्य के सीधे अनुदान भी पृथ्वी को कम नहीं मिलते, पर उससे भी बड़ी उपलब्धि ब्रह्माण्ड किरणों की है। यह ब्रह्माण्ड किरणें यों अर्न्तगही मानी जाती हैं फिर भी उनका अनुदान पृथ्वी को सूर्य के माध्यम से ही मिलता है। बिजली उत्पादन केन्द्र से ट्रांसफार्मर और मीटरों में होती हुई चलने वाले उपकरणों तक पहुँचती हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्डीय किरणें भी सीधी समस्त पृथ्वी पर अनियन्त्रित रूप से बरस कर महाविनाश का खतरा उत्पन्न नहीं करतीं वरन् क्रमिक गति से भूलोक पर अवतरित होती है। यह अवतरण सर्वप्रथम ध्रुव क्षेत्र में होता है और फिर वहाँ से आवश्यकतानुसार प्राणियों और पदार्थों के लिए वितरित होता रहता है।

उत्तरी ध्रुव पर दृष्टिगोचर होने वाले मेरु प्रकाश को सूर्य का प्राण, अनुदान एवं ब्रह्माण्डीय किरणों के उपयोगी अवतरण का प्रतीक प्रतिनिधि कह सकते हैं। ब्रह्माण्ड किरणों और सूर्य अनुदानों का विशिष्ट पर्यवेक्षण करने पर पृथकता रहते हुए उनके भीतर अद्भुत साम्य पाया गया है। इससे प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्डीय किरणें धरती से सम्पर्क साधने से पूर्व सूर्य के सरोवर में स्नान कर लेती हैं और उसके रंग में रंगी हुई साड़ी पहन कर इस लोक में प्रवेश करती हैं। यदि वे निर्वस्त्र होकर बरसने लगे तो उस गुगुप्सा को सहन करना ही कठिन हो जाय।

मेरु प्रकाश ध्रुवों पर सर्वाधिक रहता है पूर्वी ग्रीनलैण्ड का वह भाग जहाँ एस्किमो लोग रहते हैं वहाँ का आकाश ही पृथ्वी के सामान्य आकाश से सर्वथा भिन्न है। वहाँ जाड़े के दिनों में प्रायः प्रतिदिन आकाश में रंग-बिरंगी दीप्तिवलियाँ देखते ही बनती है। दर्शक इस तरह आत्म विभोर हो उठते हैं मानो वह कोई स्वप्नों का स्वर्ग हो। ऐसे मेरु प्रकाश भूमध्य सागर में भी जब-तब अनायास देखने को मिल जाते हैं अलास्का, उत्तर कनाडा, अन्टार्कटिका, उत्तरी साइबेरिया तथा नार्वे में भी यदा-कदा देखने को मिलते हैं। वह दृश्य कितना विलक्षण होता है उसका वर्णन करते हुए- रोमन इतिहास कार लिवो ने लिखा है-इस क्षण आकाश एकाएक करोड़ों अदृश्य अग्निशिखाओं से दमकने लगा-लोग भयभीत हो उठे और आँख मूँदकर ईश्वर का भजन करने लगे। रोमन सम्राट ने तो यह समझा कि शहर में आग लग गई हैं अतएव उसने अति शीघ्र अग्नि शामक दस्ते भेज दिये। यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने इस मेरु प्रकाश को देखकर लिखा था-आकाश में विलक्षण आकृतियाँ खाइयाँ और भीषण अन्तराल लाल लाल रंग की दूर तक फैली चादर किसी इन्द्रजाल से कम नहीं लगता थी।

मेरु प्रकाश का जब-जब संपर्क स्थापित हुआ ऐसी मनोरम ध्वनियाँ सुनाई दी जो अद्भुत थी। उन्हें नक्षत्रों की ध्वनियाँ माना गया है, पर उनका अध्ययन सौर सक्रियता में ही अब तक सम्भव हो पाया है।

इस मेरु प्रकाश की संरचना के मूल में भी सूर्य ही है जिसके लिये सूर्य-संक्रान्ति काल को अध्ययन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया है।

मेरु प्रकाश अनेक प्रकार के होते है, प्रकाश की उद्दीप्ति, ज्वाला किरणों की चाप तथा पहियों जैसा कुछ अदृश्य, कुछ दृश्य और कहीं-कहीं उभयनिष्ठ अर्थात् मरुस्थल की-सी बनती बिगड़ती झिलमिल। रंगे विलक्षण एकदम सफेद जैसे आतिशबाजी सुर्ख पीलापन लिये हरे, नीले बैगनी तथा भूरे रंग के भी। जिस समय यह अस्तित्व में आते हैं, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो उठता हैं। उस समय वायुयानों के दिक् सूचक यन्त्र काम करना बन्द कर देते है ऐसी उड़ान को “अन्धी उड़ान” की संज्ञा दी गई है वायुयान चालक उससे हमेशा सावधान रहते हैं।

वैज्ञानिकों ने व्याख्या की है कि यह अलौकिक संरचना सूर्य के अति सूक्ष्म उत्सर्जित कणों इलेक्ट्रान तथा प्रोटानों की गति में अनायास परिवर्तन का प्रतिफल है सामान्य अवस्था में यह कण 1000 मील प्रति घण्टे की चाल चल सकते हैं जबकि असामान्य अवस्था में उनकी गति सूर्य प्रकाश की गति अर्थात् 186000 मील प्रति सेकेण्ड की गति से होती है। पृथ्वी की ओर चलते हुए वे अपने चुम्बकीय गुणों के कारण ध्रुवों की ओर मुड़ते हैं यह सामान्य प्रकाश की दिशा में हस्तक्षेप होता है, इसी कारण इस तरह के दृश्य दिखाई देने लगते हैं।

सूर्य द्वारा पृथ्वी पर बरसने वाले अनुदान का दृश्य रूप ध्रुवों का मेरु-प्रकाश और अदृश्य रूप में बरसने वाले चुम्बकत्व हैं। यह विभिन्न किरणों के रूप में धरती पर आता है और पदार्थों को विद्युत एवं प्राणियों को संकल्प का अनुदान देता है। इन अनुदानों का एक उदाहरण पराबैगनी किरणों का है। वे ही प्राणियों के निर्वाह के लिए आवश्यक रसायन विटामिन डी का उत्पादन करतीं तथा हानिकारक उत्पादनों को निरस्त करने में लगी रहती हैं।

सूर्य के माध्यम से धरती को जो मिलता है भविष्य में मानवी प्रयत्नों से उसमें घट-बढ़ हो सकेगी, ऐसी मान्यता है। जहाँ तक प्राण-प्रवाह का सम्बन्ध है वहाँ तो और भी बड़ी सम्भावनायें एवं आशाएँ विद्यमान हैं ब्रह्माण्डीय किरणें धरती को सीमित मात्रा में सीमित गति से प्राप्त होती हैं, पर यदि सूर्य को अनुकूल बनाया जा सके तो उसकी सिफारिश से विश्व भण्डार से इतने बड़े अनुदान मिल सकते हैं जिससे मनुष्य सृष्टा का युवराज न रहकर स्थानापन्न भी बन सकता है। सूर्य के प्रकाश को जितनी मात्रा पूरी करने में दो दिन लगते हैं उतनी यात्रा ब्रह्माण्डीय किरणें दस मिनट में पूरी कर सकती हैं। इनकी अनुमानित गति 28600010000000000 (दस अरब) मील प्रति सेकेण्ड की है। इस गति से चल सकना यदि किसी के लिए सम्भव हो तो वह समय की गति का अवरोध समाप्त कर सकता है और भूतकाल की परिस्थितियों के-उस समय के प्राणियों के साथ रह सकने का आनन्द ले सकता है। ब्रह्माण्ड के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचने में उसे कुछ ही समय लगेगा। सूर्य अक्षांश पर प्राय 27 दिन में एक बार इन किरणों का विशेष प्रभाव पड़ता है। उस दिन इस तारक को-पसीना छूटता और कँपकँपी आती है।

पृथ्वी के अस्तित्व का विश्लेषण करते हुए इस निर्जीव ढेले में पाई जाने वाली अगणित विशिष्टताओं का प्रधान आधार सूर्य ही सिद्ध होता है। सूर्य ही निमित्त है। उसे भी उपलब्ध ऊर्जा ब्रह्माण्डीय किरणों से मिलाती है। इतना जानने के बाद अन्तिम निष्कर्ष तक पहुँचने का एक ही कदम शेष रह जाता है कि यह ब्रह्माण्डीय किरणें आखिर क्या हैं ? और कहाँ से आती है। इसका उत्तर देर-सवेर में यही स्वीकार करना है कि जिस प्रकार सूर्य की सप्त किरणें होती हैं और उसी प्रकार ब्रह्म की ऊर्जा तरंगें ब्रह्माण्डीय किरणों के रूप में न केवल धरती का-सूर्य का, वरन् समस्त ब्रह्माण्ड का अस्तित्व बनाये रहने एवं अग्रगामी बनने के लिए अनुग्रह पूर्वक अभीष्ट सामर्थ्य प्रदान करती है। प्राण उन्हीं से बरसता है स्वरूप ओर बल, ज्ञान और संवेदन उसी के अनुदान हैं।

पृथ्वी की सत्ता सूर्य का अनुदान, ब्रह्माण्डीय किरणों का वैभव समझ सकने वाले ब्रह्म सत्ता की महत्ता भी स्वीकार कर सकते हैं। शोध प्रयत्नों की सर्वोच्च स्थिति नहीं हो सकती है कि परब्रह्म से सम्बन्ध साधा जाय-उसका अनुग्रह पाया जाय और अपनी सत्ता को उसी महत्ता के अनुरूप बनाया जाय जैसी की उन क्षमताओं के महान भाण्डागार-परब्रह्म परमेश्वर की है।


मनुष्य शरीर की बिजली और उसके चमत्कार

मनुष्य ने जबसे सोचना, समझना आरम्भ किया तभी से उसने अपने आसपास की चीजों को कौतूहल की दृष्टि से देखना और उनका रहस्य उघाड़ने का प्रयास शुरू किया। कौतूहल ओर रहस्य जानने की उत्कट लालसा तथा प्रयत्नों से ही ज्ञान विज्ञान का इतना विपुल और विस्तृत विकास सम्भव हुआ। कभी लगता है कि मनुष्य ने अमुक रहस्य या गुत्थी सुलझा ली लेकिन दूसरे ही क्षण पता चलता है कि सचाई कुछ और है तथा रहस्य अभी ज्यों का त्यों बना हुआ है। यही नहीं उसने रहस्य को जानने के लिए जो प्रयास किये, उन प्रयासों से जो तथ्य सामने आये उनमें और भी कई रहस्यपूर्ण गुत्थियाँ सामने आ गई। कुल मिलाकर यह कि दो हजार साल के ज्ञात-अज्ञात वैज्ञानिक अनुसंधानों, उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों और प्राप्त ज्ञान भण्डार के उपरान्त भी मनुष्य किसी क्षेत्र में यह दावा नहीं कर सकता कि उस क्षेत्र में उसने पूरी जानकारी प्राप्त कर ली है।

ज्ञान के विकास और रहस्यों को सुलझाने के इस दौर में कई बार ऐसा लगा कि अब सब कुछ जान लिया गया है और कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है। उदाहरण के लिए डार्विन ने जब विकासवाद के सिद्धान्तों को खोज निकाला और उसकी पुष्टि में अनेकों प्रमाण खोज लिए गये तो समझा जाने लगा कि पृथ्वी पर जीवन का विकास कैसे सम्भव हुआ, यह पूरी तरह जान लिया गया है। लेकिन आगे चलकर यह पता चला कि यह खोज तो बहुत ही आधी अधूरी है। इसके न केवल अपवाद मिले वरन् ऐसे तथ्य भी मिले जिनसे विकासवाद के सिद्धान्त ही संशयास्पद बन गये। जाॅन डार्विन ने परमाणु सिद्धान्त की व्याख्या की तो लगने लगा, पदार्थ की छोटी-से-छोटी इकाई के सम्बन्ध में जान लिया गया। लेकिन जल्दी ही यह धारणा नितांत भ्रम सिद्ध हो गई और परमाणु के सम्बन्ध में नये-नये तथ्य प्रकाश में आये। डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त धराशायी हो गया और जहाँ यह मान लिया गया था कि परमाणु के सम्बन्ध में अब कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है, वहीं अब यह माना जा रहा हैं कि परमाणु के सम्बन्ध में एक प्रतिशत भी पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हुई हैं।

पिछले बीस-तीस वर्षों में इतनी अधिक वैज्ञानिक जानकारियाँ एकत्रित की गई है, जितनी अब तक कभी भी नहीं हुई। इन अनुसंधानों और जानकारियों के आधार पर गत दो तीन दर्शकों को वैज्ञानिक प्रगति का युग कहा जा सकता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इन दो-तीन दशकों में विज्ञान अपने आपको जितना अपूर्ण और अधूरा अनुभव करने लगा है उतना पहले कभी नहीं था। वैज्ञानिकों की वर्तमान पीढ़ी निस्संकोच भाव से यह कह रही है कि हमने अब तक जितने रहस्य सुलझाये हैं, रहस्यों को सुलझाने की इस प्रक्रिया में उससे कहीं अधिक रहस्य पैदा हो गए हैं और कह नहीं सकते कि प्रकृति के ये रहस्य कभी सुलझ भी सकेंगे अथवा नहीं। रहस्यों के उलझते जाने की इस प्रक्रिया का मूल कारण चेतना के नियमों से अनभिज्ञता है। या यों कह सकते हैं कि चेतना के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि वह कब किस तरह का व्यवहार करेगी? इसलिए किसी व्यक्ति या चेतन प्राणी के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

भीड़ या व्यक्तियों और वस्तुओं के समुदाय के बारे में तो फिर भी अनुमान लगाये जा सकते हैं और वे अनुमान करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष अथवा वस्तु विशेष के सम्बन्ध में अनुमान लगाना तो दूर रहा कल्पना तक नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास जैसे शहरों में प्रतिदिन दस-पाँच दुर्घटनाएँ होती है। 20-25 व्यक्ति इन दुर्घटनाओं में मर भी जाते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि एक वर्ष में तीन-चार हजार दुर्घटनाएँ होगी और पाँच-सात हजार व्यक्ति मरेंगे इस तरह के आँकड़े इकट्ठे किये भी जाते हैं उनकी घोषणा भी की जाती है कि इस वर्ष इतनी दुर्घटनाएँ घटने की सम्भावना है। ये आँकड़े करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष या वाहन विशेष के सम्बन्ध में विचार किया जाय कि वह किसी दुर्घटना का शिकार होगा अथवा नहीं, तो इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन दुर्घटनाओं में से कौन-सी दुर्घटना किस व्यक्ति के साथ या किस वाहन की घटेगी।

विज्ञान जब तक अपना शोध अनुसंधान पदार्थ को जड़ मानकर करता रहा, तब तक वह दावे के साथ कहता रहा कि सचाई यह है। लेकिन पदार्थ का विश्लेषण करते-करते वैज्ञानिक अब वहाँ तक पहुँच गये हैं कि पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। अब पदार्थ बचा ही नहीं है। पदार्थ की परिभाषा यही की जाती है कि वह जड़ होता है, उसका आकार होता, वजन होता है निश्चित स्वरूप होता है। लेकिन पदार्थ का सूक्ष्मतम विश्लेषण करने के बाद यह परिभाषा ध्वस्त हो गई है। उदाहरण के लिए पदार्थ के सम्बन्ध में निश्चित धारणा थी कि अमुक परिस्थितियों का पदार्थ पर अमुक तरह का प्रभाव पड़ेगा और उस पर अमुक तरह की प्रतिक्रिया होगी। लेकिन अब इस सम्बन्ध में नये तथ्य सामने आये हैं और कहा जा रहा है कि सब कुछ अनिश्चित है।

पिछले दिनों कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) के क्षेत्र में हाइसेनबर्ग के अनिश्चय सिद्धान्त की बड़ी चर्चा हुई। उनके अनुसार एक ही समय में एक साथ एक ही तरह के करण किस तरह का व्यवहार करेंगे। यह नहीं जाना जा सकता। कण विशेष की गति और परिस्थिति के सम्बन्ध में भी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है। केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है और अनुमान कोई सही निकले यह कोई जरूरी नहीं है। अनेक प्रयोग किए गये कि किन परिस्थितियों में कौन-से कण किस तरह का व्यवहार करते हैं? एक ही परिस्थिति में एक ही प्रक्रिया से एक ही तरह के कणों का हजारों बार अध्ययन किया गया। लेकिन यह जान कर हैरानी हुई कि प्रत्येक बार हर कण का व्यवहार अनुमान से भिन्न था। यही नहीं पिछली प्रतिक्रिया भी नहीं दोहराई गई। इस आधार पर घोषणा की गई कि पदार्थ की जैसी परिभाषा की जाती रही है वैसा कोई पदार्थ इस जगत में है ही नहीं। दूसरे शब्दों में यह घोषणा की गई कि पदार्थ मर गया है। पहले कभी नास्तिक विचारक नीत्से ने यह घोषणा की थी कि ईश्वर मर गया है लेकिन अब विज्ञान को यह घोषणा करनी पड़ रही है कि पदार्थ मर गया है। अब वैज्ञानिकों को यह कहना पड़ रहा है कि पदार्थ विज्ञान से बार भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह और अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के अभी तक कोई उपाय नहीं ढूँढ़े जा सकते हैं। लेकिन वह क्षेत्र विज्ञान की सभी ज्ञात धाराओं का मूल स्त्रोत और नियन्त्रण कर्ता है।

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है कि, विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी और निश्चित सम्भावना है जो ज्ञानयुक्त और इच्छायुक्त हो। उसी के कारण विश्व की गतिविधियाँ अनियन्त्रित और अनिश्चित रूप से चल रही है।” डाॅ. मोर्डेल का कहना है कि अणु और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों के इस विचित्र व्यवहार से यही सिद्ध होता है कि कोई चेतन शक्ति है अवश्य, जिसके प्रभाव से ही अणु अथवा कणों का स्वभाव पकड़ में नहीं आता।

वह कौन-सी शक्ति हैं और किस प्रकार काम करती हैं ? उसके क्या नियम हैं ? कैसे वह पदार्थों को प्रभावित करती है? आदि प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास अभी नहीं है। इस सन्दर्भ में विख्यात वैज्ञानिक इंगोल्ड का कथन है कि, “जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही हैं। उसका वास्तविक स्वरूप समझने भमें अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ, अधूरी , अप्रामाणिक और असंतोषजनक है।”

इस प्रकार की तमाम रहस्यपूर्ण वैज्ञानिक गुत्थियों का संकलन करते हुए प्रख्यात विज्ञान लेखक एफ.एल. वोश्के ने एक पुस्तक लिखी है-द अनएक्सप्लेड”। इस पुस्तक में बोश्के ने जो प्रतिपादन किये हैं, उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि एक सच्चा वैज्ञानिक सब कुछ जान लेने का दावा कभी नहीं करता। बल्कि जैसे जैसे वह अपनी शोध साधना के क्षेत्र में गहरा उतरता जाता है उसे एक से एक रहस्यमय गुत्थियों का पता लगता है और अनुभव होता है कि प्रत्यक्षतः जगत जैसा प्रतीत होता है, वैसा तो वास्तव में कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ रहस्यपूर्ण है। यह बात और है कि भीड़ की सम्भावनाओं के समान पदार्थ के स्थूल नियमों का पता लगाकर विज्ञान उससे रुत्किचिंत लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच गया है। परन्तु सचाई कुछ और ही है इन स्थूल नियमों से लाभ उठाने के कारण यह भ्रम हो सकता है कि विज्ञान ने शायद सत्य को जान लिया हो। पर वैसा है नहीं। मोटी बातें जो दिखाई देती है उनका थोड़ा-सा परिचय भी पर्याप्त लाभ दे सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी वास्तविकता जान ली गई। सूर्य रोज उगता है, प्रकाश देता है, उस प्रकाश से सौर ऊर्जा के रूप में लाभ उठाया जा सकता है यह जान लेना ही पर्याप्त है। इसमें यह जानने से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है अथवा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है।

प्रकृति की स्थल गतिविधियों का अनुकरण करते हुए ही अब तक दिखाई पड़ने वाली मशीनी सैद्धान्तिक पहलुओं पर अभी भी मतभेद हैं। “द अनएक्सप्लेन्ड” के लेखक एफ.एल. वोश्के ने लिखा है कि विज्ञान के क्षेत्र में परस्पर विरोधी सिद्धान्तों का द्वन्द्व अनवरत चलता रहता है और सचाई क्या है, यह अभी भी अज्ञात है। उनके अनुसार चाहे दूरबीन से देखी जा रही आकाश गंगा हो, अथवा माइक्रोस्कोप से देखे जाने वाले, अन्वेषित किये जाने वाले जीवाणु-परमाणु वैज्ञानिक किसी भी क्षेत्र में एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके है।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है। उसके अनुभव, निष्कर्ष और ज्ञान नित्य निरन्तर विकसित परिमार्जित होते जा रहे हैं। अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। फिलहाल तो उसे अपनी पिछली गलतियाँ सुधारने से ही फुरसत नहीं है। अभी तक जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन किया जाता है, जब उन्हीं के सम्बन्ध में मान्यताएँ बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। जैसे-जैसे नये तथ्य सामने आते जायेंगे, नये निष्कर्ष और नये सत्यों तक विज्ञान पहुँचता जायेगा वैसे-वैसे वर्तमान कई नयी मान्यतायें बदलेगी। और उन तथ्यों का समर्थन होता जायेगा, जिन्हें भारतीय ऋषि-मुनियों ने पहले ही जान लिया था। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व चेतन की सर्वव्यापकता, ब्रह्म, की सत्यता को उद्घोषित किया था। सर्व खल्विद ब्रह्म, आत्मै वेद सर्व” “एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति” आदि घोषणाओं में इन्हीं सत्यों की घोषणा की गई है। कोई आश्चर्य नहीं कि कल को चलकर विज्ञान भी इन घोषणाओं का समर्थन करने लगे और इसकी पुष्टि के प्रमाण जुटाने लगे।

जो भी हो, इतना सही है कि प्रकृति और उसके अधिपति परमात्मा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना हर किसी के लिये सम्भव नहीं है। दोनों ही रहस्यपूर्ण है दोनों का या कहे दोनों के समुच्चय एक ब्रह्म का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसे स्थूल और सीमित साधनों उपकरणों द्वारा नहीं जाना जा सकता। न ही मनुष्य की सीमित सामर्थ्य के यह बस में है कि वह वस्तुस्थिति को जान सके। अस्तु, यह करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपने आसपास का यह सारा जगत अनेक रहस्यों के आवरण में लिपटा हुआ है। उसे जानना पूरी तरह समझना शायद ही कभी सम्भव हो सके। पूर्ण ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गया है, पूर्ण ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गाया है अपने को जानो अपने को देखो।” अपने अस्तित्व में अवश्य ही विराट् परमात्मा की झाँकी देखी जा सकती है।


रक्त परिवर्तन ही नहीं-भाव परिवर्तन भी

परमात्मा ने मनुष्य को सभी सामर्थ्यों और सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं से विभूषित कर इस पृथ्वी पर भेजा है। यदि अपने ही भीतर सन्निहित इन शक्तियों और सम्भावनाओं के स्रोतों को पहचान लिया जाये तथा उन्हें विकसित करने के लिए कटिबद्ध हुआ जाये तो कोई कारण नहीं कि परमात्मा का सबसे बड़ा पुत्र, ईश्वरीय अंश, राजकुमार आत्मा इसी दीन-हीन अवस्था में पड़ा रहे, इसके विपरीत जो लोग प्रगति और उन्नति के आधार बाहर तलाशते हैं, आगे बढ़ने और उन्नति करने के लिए दूसरों पर निर्भर करते हैं उन्हें यथास्थिति में ही पड़े रहना पड़ता है। किसी की सहायता और अनुदान उसका थोड़ा बहुत भला कर दे, सामयिक लाभ भले ही पहुँचा दें, परन्तु उससे बात बनती नहीं है वह सहायता अनुदान तो सामयिक उपचार ही सिद्ध हैं। इसीलिए कहा गया है कि ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते है। इस कथन का आशय यही है कि जो परमात्मा के दिये हुए अनुदानों, मानवी व्यक्तित्व में सन्निहित विशेषताओं को पहचानने में समर्थ होते है, उन्हें जागृत कर पाते है वही किसी दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति कर पाते है। क्योंकि परमात्मा ने उन्नति और प्रगति की समस्त संभावनाएँ प्रत्येक व्यक्ति को उसे निजी उपयोग हेतु ही दे रखी है, उसे इतना सामर्थ्यवान भी बनाया है कि वह प्रगति क्रम में आने वाले अवरोधों से जूझते हुए निरन्तर उन्नति करता रह सके।

उदाहरण के लिए परमात्मा ने मनुष्य ही इस नश्वर और मिट्टी का पुतला कही जाने वाली काया को ही इतना सशक्त और मजबूत बनाया है कि वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी अपना सन्तुलन बनाये रह सकती है और दीर्घकाल तक कार्य करती रह सकती है। आये दिनों इस तरह की घटनाएँ सामने आती रहती है। जिनसे यह तथ्य सिद्ध होता है। पिछले दिनों अमेरिका का एक हवाई जहाज समुद्र पर उड़ते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो गया। किसी मशीनी खराबी के कारण विमान में आग लग गई और वह समुद्र में गिर पड़ा। किसी प्रकार प्राण रक्षा न होते देखकर उसका पायलट जहाज के समुद्र में गिरने से पहले ही कूद पड़ा और जिस जगह जहाज का मलबा गिर रहा था वहाँ से दूर हटकर पानी में कूदा। दुर्घटनाग्रस्त जलते हुए वायुयान से कूदने के कारण उसे चोट तो बहुत आई फिर भी वह तैरता रहा और लगातार घण्टे तक तैरता हुआ बहुत बुरी तरह थकने के बाद किनारे तक पहुँचा। बुखार, निमोनिया, भूख, थकान, दर्द, चोट और बदहवासी के कारण उसकी बड़ी बुरी हालत हो गई थी और इसी हालत में उसे अस्पताल पहुँचाया गया। पायलट की स्थिति इतनी गम्भीर थी कि डाक्टर उसके अब तक बचे रहने पर आश्चर्य करते रहे। बचने की कोई सम्भावनायें न रहने के बावजूद भी वह पायलट अपनी जीवनी शक्ति के सहारे धीरे-धीरे अच्छा होता चला गया।

पोर्टलैण्ड में एक आठ वर्षीय बालक के साथ इन प्रकार की दुर्घटना घटी कि उसका बच पाना असम्भव ही लग रहा था। हुआ यह कि वह किसी प्रकार एक सड़क कूटने वाले तीन टन भारी इंजिन के नीचे आ गया। किसी को उसके बचने की आशा नहीं थी, पर उसकी जीवनी शक्ति ने काम किया और वह एक वर्ष अस्पताल में रहकर अच्छा हो गया। उसके पैर भले ही चलने लायक न हो सके पर उसकी जीवन रक्षा तो हो ही गई। न्यूयार्क की पन्द्रह मील ऊँची इमारत से एक बार दो वर्ष का बालक गिर पड़ा। इतनी ऊँचाई से गिरने के कारण हड्डियाँ बुरी तरह टूट जाने के बाद भी वह जीवित बचा रहा।

इस प्रकार की ढ़ेरों दुर्घटनायें जिनके शिकार होने वाले का जीवन बच पाना किसी भी स्थिति में असम्भव लग रहा था किन्तु मानवी काया में विद्यमान जीवनी शक्ति ने जोर मारा और लोग देखते ही देखते मृत्यु के जाल में से निकल कर बाहर आ गये। परमात्मा ने जीवन को निश्चित ही इस योग्य बनाया है कि वह कठिन से कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आत्म-रक्षा कर सके। परमात्मा ने मनुष्य की काया को यों ही नहीं बनाया है। उसने मानवीय व्यक्तित्व में तो प्रगति और उन्नति की तमाम सम्भावनायें भर ही दी है, उनके शरीर को भी इतनी विशेषताओं में परिपूरित बनाया है कि उसके समान विशेषताओं से भरा-पूरा कोई यन्त्र अभी तक नहीं बनाया जा सका है जो सभी परिस्थितियों में अपने आपको अनुकूल बना सके।

कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय में भौतिकी विभाग के प्राध्यापक डाॅ. क्रेग टेलर ने स्वयं अपने ऊपर प्रयोग कर के यह सिद्ध किया है कि संसार के सबसे अधिक गरम क्षेत्र में रहकर भी औसत स्वास्थ्य वाला व्यक्ति हफ्तों तक आसानी से जीवित रह सकता है। यदि स्नायु संस्थान अपेक्षाकृत अधिक समर्थ हो तो यह अवधि महीनों तक की हो सकती है। उल्लेखनीय है कि साधारणतया अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में अधिक से अधिक चौबीस घण्टे तक जीवित रह सकने की मान्यता प्रचलित है। डाॅ. टेलर ने अपने प्रयोगों द्वारा 220 डिग्री तक की गर्मी देर तक सहन करके दिखाई और वे 250 डिग्री का तापमान भी 15 मिनट तक सहन करने में सफल रहे। स्मरणीय है कि 100 डिग्री गर्मी में पानी भाप बन कर गायब होने लगती है।

मनुष्य कितनी गर्मी सह सकता है इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि वह अधिक से अधिक कितना शीत सह सकता है मेजर डोनल्ड ने इस सम्बन्ध में कई परीक्षण किये और बताया कि शरीर में शीत सहने की कोई अन्तिम सीमा नहीं है। उन्होंने बर्फीले पानी की शीत को घण्टों तक सहन करके दिखाया और यह भी प्रमाणित किया कि यदि किसी व्यक्ति ने शीत रक्षक सूट पहन रखा हो तो शीत से मृत्यु नहीं हो सकती। कहा जा सकता है मेजर डोनमन्ड ने पहले से ही इस तरह की व्यवस्था कर रखी होगी ओर यह अति रंजित प्रतिपादन किया हो। किन्तु किसी आकस्मिक दुर्घटना में भी मनुष्य के बच जाने की सम्भावना को क्या कहेंगे? द्वितीय महायुद्ध के दौरान ऐसी ही एक घटना घटी। इंग्लैण्ड का एक विमान चालक इस युद्ध के दौरान विपत्ति में फँस गया। उसके साथ दो और साथी भी थे। इन तीनों को भयंकर शीत वाले बर्फीले प्रदेश में भूखे प्यासे दम दिन गुजारना पड़े। इन लोगों के पास कपड़े भी गरम नहीं थे। बर्फीले हवाओं, तूफानों और आँधियों का सामना करते हुए ये तीनों व्यक्ति करीब दो सप्ताह की प्राणान्तक यात्रा करते हुए उस प्रदेश की सीमा ने बाहर बच सकने की स्थिति में पहुँचे।

बुखार के समय शरीर का तापमान अधिक बढ़ने लगता है तो डाॅक्टर लोग सिर पर बर्फ रखने की सलाह देते है ताकि बढ़ा हुआ तापमान कम हो सके। किन्तु इस प्रतिपादन को पिछले दिनों ब्रुकलिस (अमेरिका) की नर्स ने झुठला दिया जिसने 110 डिग्री बुखार को कई दिनों तक सहा। न केवल सहन किया वरन् बुखार से लड़ाई भी लड़ी ओर आखिर वह अच्छी हो गई। डाॅक्टर कह चुके थे कि इसका बचना सम्भव नहीं है। जब उसका बुखार ठीक होने लगा तो डाॅक्टर कहने लगे कि इतनी अधिक गर्मी सहने के कारण उसका दिमाग जरूर विक्षिप्त हो जाएगा। पर नर्स ने न तो मृत्यु को ही पास फटकने दिया और न ही अपना मानसिक सन्तुलन खोया।

आहार मनुष्य को जीवित रखने वाला प्रमुख साधन माना जाता है। दस बारह दिनों तक तो कोई व्यक्ति निराहार रह भी सकता है, पर इससे अधिक समय तक भूखे रहने पर स्वास्थ्य लड़खड़ाने सा लगता है। ज्यों-ज्यों अधिक दिन तक भूख का सामना करना पड़ता है, त्यों-त्यों स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है ओर कुछ ही समय में जीवन संकट उत्पन्न हो जाता है। किन्तु आयरिश स्वाधीनता युद्ध के उद्घाता टेटेन्स मेकस्विनी ने जेल में अनशन किया और 128 दिन तक निराहार रहकर मौत से जूझते रहे तथा अन्ततः विजयी हुए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सेनानी यतीन्द्रनाथ दास बिना भोजन किये दिन तक निराहार रहकर मौत से लड़ते रहे।

आपरेशन के समय कितने ही लोगों का एक-एक फेफड़ा, एक गुर्दा, जिगर का एक भाग और आँतों का एक हिस्सा काट कर अलग कर दिया जाता हैं इतने पर भी उनका जीवन क्रम आसानी से चलता रहता है। सामान्य स्थिति में मनुष्य शरीर का 36.6 तापक्रम डिग्री सेंटीग्रेड होता है। खून में शकर की मात्रा 0.1 होती है। रक्तचाप साधारण स्थिति में 100 से 140 मिली मीटर मरकरी काॅलम होता है। यह तापमान शरीर के भीतरी अवयवों का ही होता है। ठण्ड के दिनों में हाथ-पैरों का ताप तो डिग्री से भी कम रहता है फिर सारा कार्य यथावत् चलता रहता है, पर इससे अधिक भीतरी गर्मी नहीं गिरनी चाहिए और वह 45 से आग भी नहीं बढ़नी चाहिए अन्यथा जीवन संकट के भीतर ही हीटर और कूलर जैसी व्यवस्था है। शरीर का सचेतन नाड़ी संस्थान तापमान को सन्तुलित रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। मासपेशियाँ इससे ऊष्मा उत्पन्न करने कार्य करती है। उन्हीं से ऊष्मा बनती पकती और बढ़ती है। इनके अतिरिक्त हृदय, फुफ्फुस, वृक्क, यकृत आँतें आदि अंग भी एक प्रकार से भट्टी की तरह जलते और गर्मी पैदा करते है।

शरीर दिन-रात में 160 से 180 लाख कैलोरी ऊष्मा नित्य बाहर फेंकने का क्रम चलाता है। बिजली के हीटर भी प्रायः इतना ही ताप उत्पन्न करते है। जब कभी गर्मी कम पड़ती है, तो ठण्ड लगने लगती है। दाँत किटकिटाते हैं, अंग काँपते है। यह अतिरिक्त क्रिया-कलाप प्रकृति द्वारा अतिरिक्त गर्मी उत्पन्न करने के लिए घर्षणात्मक हलचल उत्पन्न करने के लिए आरम्भ किए जाते है।

रक्त भी शरीर में एक अच्छे ऊष्मा वाहक का काम करता है। ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए रक्त संचार पद्धति की द्रुतगामिता ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा करती है। यह रक्त यदि दौड़ता न हो तो गर्मी जहाँ बनी है वही बनी रहती है। ताप उत्पन्न करने वाले अवयव जलने लगते है और शेष ही शीत निवारण कठिन पड़ता है। रक्त दौड़ने का ही काम नहीं करता वरन् वह स्वयं गर्मी भी पैदा करता ओर गरम तो रहता हैं उसकी यह विशेषता हीटर और कूलर दोनों के प्रयोजन पूरे करती है। जब देह की गर्मी लगती है तो रक्त की दौड़ शरीर से गर्मी को बाहर फेंकने लगती है और जब ठंड प्रतीत होती है तो वह गर्मी शरीर के भीतर संचित रह कर अंशों को गरम करती है। इस प्रकार शीत ऋतु में ताप संचय का क्रम चलता है और अपना रक्त ही आवश्यक गर्मी की व्यवस्था बना देता है।

शरीर को भले ही मिट्टी का पुतला या नश्वर खिलौना कहा जाय पर वस्तुतः यह परमात्मा की या प्रकृति की ऐसी अनुपम कलाकृति है जिसकी तुलना में सृष्टि की और कोई वस्तु नहीं ठहरती उसकी रचना ऐसी है कि साधारण बीमारियाँ अथवा दुर्घटनायें कोई विशेष अनर्थ नहीं कर सकती। शरीर की यह तितिक्षा भक्ति अपने भीतर इतनी अधिक मात्रा में सँजोकर रखी हुई है कि मृत्यु जैसा संकट उपस्थिति होने पर भी जीवन की आशा की जा सकती है कहा जा सकता है कि मनुष्य की विपत्तियों और संकटों से कोई विशेष हानि नहीं पहुँचती है तो अपने ही मन के द्वारा बुने हुए जाल जंजालों बुज़दिली और साहस की दुर्बलताओं से। इसीलिए कहा गया है कि परमात्मा ने मनुष्य को अमित सामर्थ्य और अद्भुत सम्भावनाओं से भरपूर बनाया है इस तथ्य को समझने वाले विचारशील लोग प्रगति के साधन बाहर नहीं ढूँढ़ते वरन् भीतर खोजने है। अपने दोष दुर्गुण सुधारते है अस्त व्यस्त स्वभाव एवं कार्यक्रम क्रिया पद्धति को ठीक करते है तथा अभीष्ट दिशा में बढ़ चलने का पथ सहज ही प्रशस्त करते चलते है। अभ्युदय, अभ्युत्थान की समस्त सम्भावनायें मनुष्य के अपने भीतर ही विद्यमान है, जिसने इस तथ्य की वास्तविकता समझ ली स्वीकार कर ली वह अपने को सम्भाल सुधार कर अबोध गति से आगे बढ़ता चलता है।


वेदान्त संसार का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

ईश्वर की स्तुति में उसे त्वमेव माता व पिता ‘त्वमेव’ कहा जाता है। उसे नर और नारी दोनों के रूप में नमन किया जाता है। अर्धनारीश्वर के रूप में भगवान शिव का आध अंग नारी और आधा नर है। इससे स्पष्ट है कि परब्रह्म में नर, और नारी जैसा कोई मौलिक भेद नहीं है। आवश्यकता एवं भावना के अनुरूप एक ही सत्ता अपने अस्तित्व का परिचय दोनों लिंगों में देती रहती है।

आत्मा के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह परिस्थिति के अनुसार कभी नर बन जाता है कभी मादा। जो वस्त्र एक बार धारण कर लिया वह यदा ही उसी तरह बना रहेगा यह भी आवश्यक नहीं। साड़ी की काट छाँट कर कुर्ता बनाया जा सकता है। फटी हुई बनियान का कतर ब्योंढ़ करके रूमाल बनाया जा सकता है। आत्मा के सम्बन्ध में भी यही निर्यत है। स्वभाव एवं पसन्दगी के कारण कोई भी प्राणी नर या मादा बना रह सकता है। अभिरुचि एवं परिस्थिति बदल जाने पर यह लिंग भेद बदल भी सकता है। जो एक जन्य में नर था वह दूसरे जन्म में नारी बन गया है और नारी ने नर का चोला बदला। ऐसे उपाख्यानों की कथा, पुराणों में भरमार है।

एक ही शरीर में इस प्रकार के यौन परिवर्तन अनेकों होते रहते है। ऐसी घटनाओं की कमी नहीं जिनमें जन्म समय का लिंग बड़े होने पर पूर्णतया परिवर्तित हो गया। आरम्भ में चिन्ह बदले फिर परिवर्तन प्रबल हुआ और यौन परिवर्तन का आर्श्चयजनक दृश्य सामने आ खड़ा हुआ विदेशों में ऐसी घटनायें सरकारी अस्पतालों के रिकार्ड में हजारों की संख्या में दर्ज हो चुकी है। भारत में भी ऐसी घटनाओं की कमी नहीं। समाचार पत्रों में ऐसे समाचार छपते रहते है। जिनसे प्रतीत होता है कि लिंग परिवर्तन आश्चर्यजनक तो है पर असम्भव नहीं परिवर्तनों के अनेकानेक उपक्रमों में लिंग परिवर्तन भी एक मान्यता प्राप्त तथ्य बन गया है।

प्रकृति में इस प्रकार के अन्तरों के प्रमाण तो असंख्यों दृष्टिगोचर होते है जिनमें पुरुष के हाव-भाव स्वभाव, रुचि एवं गतिशीलता एवं सफलता नारी वाले क्षेत्र में ही दृष्टिगोचर होती रही। कितनी ही नारियाँ ऐसी होती है, जिनकी शरीर रचना भले ही प्रकृति प्रदत्त रही हो पर स्वभाव एवं पराक्रम की दृष्टि से उन्होंने पुरुषों जैसा जीवन यापन किया और उसी स्तर पर पराक्रम भी दिखाया।

हिजड़े वर्ग के लोग ऐसे ही होते है जिनकी आकृति और प्रकृति यौन प्रभाव की मर्यादा को तोड़कर सर्वथा विपरीत स्तर की होती है समलिंगी समागमों में दोनों की यौन संरचना एक जैसी रहते हुए भी प्रकृति में विपरीत स्तर भरा होता है।

कइयों में प्रत्यक्षतः तो ऐसे दृश्य दिखाई नहीं पड़ते पर भीतर ही भीतर चिन्तन एवं रुझान ऐसा चलता रहता है जिसे लिंग भेद की प्रतिक्रिया से विपरीत कहा जा सके। इस प्रकार के लक्षण यह बताते है कि आत्मा अपने कलेवर से असन्तुष्ट है और अगले दिनों अपना लिंग परिवर्तन करने के लिए भीतर ही भीतर बदलता और ढलता जा रहा है। संकल्प बल में परिस्थितियों के बदल डालने की परिपूर्ण क्षमता है उसके प्रमाणों में एक लिंग परिवर्तन को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

नर नारी का भेद स्थूल कलेवर तक सीमित है। काया में विद्यमान आत्मा न नर है और न ही नारी। उपनिषद् में वर्णन है-

नैव स्त्री न पुमानेषु न चैवार्थ नपुंसक।

यद मच्छरी मादन्ते तेन-तेन स युज्येन॥

यह जीवात्मा न तो स्त्री है न पुरुष है और न नपुंसक ही है। वह जिस शरीर को ग्रहण करता है उसी के सम्बद्ध हो जाता है।

इस तथ्य का परिचय कभी-कभी अनोखी घटनाओं द्वारा भी मिलता है। यौन परिवर्तन की घटनायें इस सत्य की पुष्टि करती है कि नर-नारी के बीच अन्तर कायिक धरातल तक ही है। आत्मा में दोनों के गुण विद्यमान है।

‘सोलन’ निवासी स्वर्णकार जियालाल को इस बात का दुःख बना रहता था कि उसके कोई पुत्र नहीं है। तीन लड़कियों में एक लड़की का नाम सुनीता है। माता-पिता को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बच्ची में पुरुष के चिन्ह हैं। स्थानीय अस्पताल में दिखाये जाने पर डाक्टरों ने सुझाव दिया कि सुनीता के सेक्स अंग पुरुष की भाँति है। आपरेशन द्वारा पुरुषत्व के चिन्हों को उभारा जा सकता है। स्वर्णकार जियालाल ने तत्काल निर्णय लिया तथा अपनी चार वर्षीय बच्ची को अस्पताल में भर्ती कर दिया। छः डाॅक्टरों के प्रयत्न से आपरेशन सफल रहा। सुनीता अब माता-पिता के लिए एक पुत्र की भूमिका सम्पन्न कर रही है।

इसी प्रकार की घटना अप्रैल 79 में कोल्हापुर के सिविल अस्पताल में घटी। सत्रह वर्षीय कुमारी रंजना कोल्हापुर से अठारह किमी दूर हतकना नगले के निकट स्थित ग्राम ‘हुपारी’ के रहने वाली है। उसे मासिक धर्म न होने के कारण माता-पिता सरकारी अस्पताल में लाये। परीक्षा करने पर डाक्टरों ने पाया कि रंजना में पुरुष के चिन्ह विद्यमान है। आपरेशन द्वारा उसका यौन परिवर्तन किया जा सकता हैं उनके परामर्श से रंजना के माता-पिता ने अनुमति दे दी। रंजना अब रणजीत के नाम से जानी जाती है। उसका स्वभाव पूर्णतया पुरुषों जैसा ही है।

इन घटनाओं द्वारा आत्मा अपनी भक्ति को बोध कराती तथा यह बताती है कि वह प्रकृति के नियमों से परे है। बन्धनों से जकड़ी काया में भी वह परिवर्तन कर सकने में समर्थ है जिसे सामान्यतया असम्भव और आश्चर्यजनक समझा जाता है। जीव-विज्ञान के नियम एवं मान्यताओं को भी यह घटनायें चुनौती देती तथा अन्त में विद्यमान सर्व समर्थ सत्ता आत्मा को बोध कराती है।

इन्दौर से प्रकाशित दैनिक पत्र नई दुनिया के अनुसार मार्च के अंक के अनुसार 12 मार्च 1979 के अंक के अनुसार ‘शहडोल’ के अस्पताल में एक चालीस वर्षीय व्यक्ति रामदीन हर्निया का आपरेशन कराने आया। डाक्टरों को यह देखकर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि रामदीन के पेट में एक पूर्ण विकसित गर्भाशय मौजूद है। इसे निकाल कर रीवाँ मेडिकल काॅलेज के संग्रहालय में रखा गया है।

प्रकृति भी असामान्य घटनाओं द्वारा आत्म सत्ता की समर्थता का परिचय देती तथा यह बताती है कि आत्मा के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।

इस प्रकार की घटनायें मनुष्यों में ही नहीं जीव जन्तुओं में भी देखी जाती है। अविकसित जीवों में तो इस सत्य का बोध और भी स्पष्ट रूप में मिलता है। उन्हें देखकर लगता है कि सृष्टा ने सृष्टि चक्र को सुचारु रूप में संचालन के लिए ही मात्र विकसित जीवों में नर-नारी का अन्तर पैदा कर दिया। अन्यथा कितने जीव तो एक ही शरीर में आरम्भ से ही नर नारी की विशेषताओं को धारण किए हुए है। केंचुआ इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। दोनों ही प्रकार के सेक्स अंग उसके अन्दर मौजूद होते हैं। कई जीव अपनी मर्जी के अनुसार लिंग धारण कर लेते है तथा अपने जीवन काल में अनेकों बार लिंग परिवर्तन करते देखे जाते है। ‘ओइस्टर’ नामक जन्तु नर के रूप में पैदा होता है। दो वर्षों के उपरान्त मादा बन जाता है। ‘ओरटन’ नामक जीव विज्ञानी ने अपने प्रयोग द्वारा पाया कि नर से मादा में परिवर्तित ‘ओइस्टर’ मादा की तरह ही अण्डे देने का कार्य करता हैं आश्चर्य यह है कि अण्डा देने के एक माह बाद वह पुनः नर में बदल जाता है।

मनुष्य ही नहीं अन्य जीव-जन्तुओं के उदाहरण इस बात के साक्षी है कि प्राणि मात्र में कार्य कर रही चेता नर-नारी कोई भी स्वरूप ग्रहण कर सकती है। अर्थात् वह इन विभेदों से रहित है।

नर और मादा में से किसी को भी न तो अपनी विशिष्टता पर अहंकार करना चाहिए और न हीनता अनुभव करने की आवश्यकता है। क्योंकि लिंग भेद शाश्वत नहीं परिवर्तनशील हैं जो आज एक कलेवर में है वह कल दूसरे में बदल सकता है। ऐसी दशा में दोनों के मध्य वरिष्ठ, कनिष्ठ की मान्यता बनाने अथवा सौभाग्य दुर्भाग्य जैसा अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। दोनों के मध्य एकता ही नहीं समता भी वाँछनीय है।


मुक्ति जीवन का परिष्कार भर है-अन्त नहीं

मृत्यु के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न धर्मों की भिन्न-भिन्न धारणायें है लेकिन एक विषय में सभी एकमत है कि मृत्यु का अर्थ जीवन का अन्त नहीं है। इसी आधार पर कुछ धर्मों ने मरने के बाद फिर से जन्म लेने की मान्यता को स्वीकार किया है और कुछ के मतानुसार मृत्यु एक ऐसी घटना है जिसमें चेता या प्राण सदा के लिए सो जाते है और सृष्टि के अन्त में फिर जाग उठते है इस दृष्टि से आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता को अन्यान्य धर्मों ने भी स्वीकार किया है लेकिन यह सिद्धान्त भारतीय दर्शन का तो प्राण ही है।

इसके साथ ही पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी जुड़ा हुआ है। जिसके अनुसार प्राणी को मरने के बाद फिर जन्म लेना पड़ता है। भारतीय दर्शन के अनुसार पुनर्जन्म की मान्यता के साथ कर्मफल का सघन सम्बन्ध है। जिन्हें भले या बुरे कर्मों का परिणाम तत्काल नहीं मिल सका, उन्हें अगले जन्म से कर्मफल भोगना पड़ता है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने पर पाप फल और दुष्कर्मों के दण्ड से डरने तथा पुण्य फल के प्रति आश्वस्त रहने की मनःस्थिति बनी रहती है। फलतः पुनर्जन्म के मानने वालों को अपने कर्मों का स्तर सही रखने की आवश्यकता अनुभव होती है और तत्काल फल न मिलने से किसी प्रकार की उद्विग्नता उत्पन्न नहीं होती। पिछले दिनों भौतिक विज्ञान की प्रगति से उत्पन्न हुए उत्साह के कारण यह कहा जाने लगा कि सत्य केवल उतना ही है, जितना कि प्रयोगशाला में सिद्ध हो सके। जो प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष नहीं हो सकता वह सत्य नहीं है।

चूँकि चेतना भी प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष नहीं किया जा सका इसलिए घोषित कर दिया गया कि शरीर ही आत्मा है और मृत्यु के बाद उसका सदा-सर्वदा के लिए अन्त हो जाता है। इस घोषणा के अनुसार मनुष्य को चलता फिरता पौधा भर कहा गया । यह मान्यता मात्र एक सिद्धान्त या प्रतिपादन भर बनकर नहीं रह सकती उसकी प्रतिक्रिया, चिन्तन और चरित्र पर भी होती है। पुनर्जन्म, कर्मफल, परलोक और पाप-पुण्य में आस्था जिस प्रकार व्यक्ति को दुष्कर्मों से बचाये रहती है उसी प्रकार शरीर को ही सत्य और आत्मा को मिथ्या मान लिया जाय तो लगता है कि पाप-पुण्य के पचड़े में पड़ने से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी सम्भव हो सके स्वार्थ सिद्ध किया जाना चाहिए।

अब जो प्रमाण सामने आये है और उनकी वैज्ञानिक गवेषणायें की गई है उनके अनुसार यह भ्रम ढहता जा रहा है कि जीवन चेतना का अस्तित्व शरीर तक ही सीमित है। यह धारणा भ्रम तो पहले भी थी, पर अब इस सचाई के प्रमाणों पर भी वैज्ञानिक ध्यान देने लगे है कि पुनर्जन्म वास्तव में एक ध्रुव सत्य है। पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि करने वाले अनेकानेक प्रमाण आ रहे है। भारत में तो इस सम्बन्ध में चिरकाल से प्रचलित विश्वास के कारण यह कहा जाता रहा कि पुनर्जन्म की स्मृति बताने वाले यहाँ के वातावरण से प्रभावित रहे होने या किसी कल्पना की आधी-अधूरी पुष्टि हो जाने पर यह घोषित किया जाता होगा कि यह बालक पिछले जन्म में अमुक था। यद्यपि इस तरह के प्रकरणों में जिस कठोरता के साथ जाँच पड़ताल की गई, उससे यह आशंका अपने आप ही निरस्त हो जाती थी। उदाहरण के लिए पिछले जन्म के सम्बन्धियों के नाम और रिश्ते बताने ऐसी घटनाओं का जिक्र करने जिनकी जानकारी दूरस्थ व्यक्तियों का भी नहीं रही, नितान्त व्यक्तिगत और पति-पत्नी तक ही सीमित बातों को बता देने, पिछले जन्म में जमीन में गाढ़ी गई चीजें उखाड़कर देने तथा अपने और पराये खेतों का विवरण बताने जैसे अनेक सन्दर्भ ऐसे है जिनके आधार पर पुनर्जन्म की प्रामाणिकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।

लेकिन भारत के बाहर भी इस तरह की घटनाओं पर गम्भीरता पूर्वक ध्यान दिया गया है और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से गवेषणा करने वालों में प्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक डाॅ. इवान स्टीवेन्सन का नाम लिया जाता है। यूनिवर्सिटी आफ वर्जीनिया मेडिकल सेंटर के मनोचिकित्सा विभाग में कार्यरत डाॅ. स्टीवेन्सन पुनर्जन्म की वास्तविकता को वैज्ञानिक ढंग से परखने का सिलसिला शुरू किया। सन् 1966 में इस विषय पर उनकी पहली पुस्तक ‘ट्वटी केसेज सजेस्टिव आफ रिइन्कार्नेशन’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के बाद उनकी तीन पुस्तक और प्रकाशित हुई जिनमें पुनर्जन्म की कई प्रामाणिक घटनाओं का विवरण देते हुए इस विषय का प्रतिपादन किया।

ये तीनों पुस्तकें अलग-अलग देशों में घटी घटनाओं के आधार पर लिखी गई है। एक में भारत में जन्मे ऐसे व्यक्तियों का विवरण है जिन्हें अपने पिछले जन्मों की याद रही। दूसरी में श्रीलंका और तीसरी पुस्तक में तुर्की की घटनाओं का विवरण है। इन तीनों पुस्तकों में कुल मिलाकर 1300 घटनाओं का वर्णन है, जिनकी वास्तविकता और प्रामाणिकता असंदिग्ध बताई गई है।

भारत में भी हाल ही में पुस्तक प्रकाशित हुई है ”लिविंग एण्ड डाईंग” इस पुस्तक में 3 सितम्बर 1969 को उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी कन्या का उल्लेख है। लड़की का नाम स्वर्णलता रखा गया। जब वह साढ़े तीन वर्ष की हुई तो उसके घर उसके पिता से मिलने के लिए कुछ सफाई करने वाले जमादार आये। उन्हें देखकर स्वर्णलता सुअर का गोश्त खाने की जिद करने लगी। ब्राह्मण परिवार में गोश्त अण्डे की बात तो दूर रही चींटी भी नहीं मारी जाती। फिर लता ने यह कहाँ सुना और सीखा? पिता जब उसे टालने और डपटने लगे तो स्वर्णलता ने बताया कि वह भी सफाई जमादारों की जाति की ही थी। उसने यह भी बताया कि उसका पूर्वजन्म का नाम शान्ति था और उसके पिता का नाम राजिन्दर था। उसने अपने पिछले जन्म के निवास ग्राम और घर का पता बताया, जो वर्तमान निवास में कुल दो किलोमीटर दूर ही था। उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई यह पूछा जाने पर स्वर्णलता ने बताया कि वह रोज पास ही रेलवे लाइन पर कोयले बीनने के लिए जाया करती थी। जिस दिन उसकी मृत्यु हुई वह रामनवमी का दिन था। उस दिन किसी बात पर पति से तकरार हो गई और उसके पति ने शान्ति को झाडू की मूँठ से पीटा। इससे वह बेहद दुःखी हुई। उसी दिन जब वह रेल की पटरी पर कोयले बीनने गई तो रेल के नीचे कुचलकर मर गई स्वर्णलता ने अपने पुराने परिवार और विशेषतः अपनी बेटी जिसका नाम गीता था और जो अविवाहित थी, देखने की हार्दिक इच्छा व्यक्त की।

स्वर्णलता ने जो भी बात बताई थी, उन सारी बातों की छानबीन प्रसिद्ध परामनोविज्ञान वेत्ताओं द्वारा की गई, जो ऐसे मामलों की पहले भी कई बार जाँच कर चुके थे, इन विशेषज्ञों ने जिन मामलों की पहले जाँच की थी उनका नीर-क्षीर विश्लेषण कर सच-झूठ को निष्पक्ष ढंग से प्रतिपादित किया गया। इसलिए उनके निष्कर्षों पर जरा भी सन्देह करने की गुंजाइश नहीं थी। अनुसन्धान करने वाले परामनोविज्ञानवेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वर्णलता ने जो कुछ भी बताया था वह अक्षरशः सच था। उन्होंने यह भी पाया कि पिछले जन्म के संस्कार उसके इस जन्म से भी विद्यमान थे। उन्होंने यह भी पाया कि अपनी पिछली जाति के अनुसार ही उसकी व्यक्तिगत आदतें भी थी। वह घर के दूसरे बच्चों से अलग-अलग ही रहती ओर यह कहकर उसने स्कूल जाने से भी इन्कार कर दिया कि वह तो नीच जाति की है। इसके साथ ही वह रेलगाड़ियों से भी बहुत डरती थी। सन् 1975 में उससे अनुसन्धान कर्ताओं ने आखिरी बार मुलाकात की। इस समय भी उसे अपने पिछले जन्म का स्मरण था, पर तब वह पहले की तरह बातें नहीं करती थी।

जून 1975 में जन्मी पुष्पा नाम की लड़की जब डेढ़ वर्ष की हुई तभी से एक घर की ओर इशारा करने लगी, जिसे बाद में उसने अपने पिछले जन्म का घर बताया बोलने योग्य होते ही उसने अपने आप को एक सिक्ख परिवार की बहू बताया ओर अपने बच्चों के नाम भी बताने लगी, वह अपने पिछले जन्म का नाम मनजीत कौर बताती थी। वह पूछने पर कि उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई मनजीत कौर (पुष्पा) ने भयभीत होकर कहा कि उसकी सास उसके पति को उल्टी सीधी पढ़ाती रहती थी और उसके कान भरती रहती थी। एक दिन तो उसका पति इस तरह भड़क उठा कि उसने मनजीत को चाकू से मार ही डाला। जब इन बातों की पुष्टि के लिए पुनर्जन्म में रुचि रखने वाले व्यक्तियों ने छानबीन की तो इस तथ्य को बिल्कुल सही पाया गया कि मनजीत कौर की पुष्पा के जन्म से ठीक चार वर्ष पहले हत्या कर दी गई थी।

हाल ही के 10-12 वर्षों में पुनर्जन्म के ये दो बहुचर्चित प्रमाण है। इसके अलावा भी अनेकानेक प्रमाण आये दिन सामने आते रहते है। डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपनी पुनर्जन्म सम्बन्धी तीन पुस्तकों में जिनमें करीब डेढ़ सौ पुनर्जन्म की घटनाओं का विवरण विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो उन देशों में घटी जहाँ आमतौर पर पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता। अमेरिका के कोलोराडीप्यूएली नामक नगर में रुथ सीमेनस नामक लड़की ने अपने पुनर्जन्म की घटनाओं को बढ़ाकर ईसाई धर्म के उन अनुयायियों को असमंजस में डाल दिया जो पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानते है। इस लड़की को मोरेवर्नस्टाइन नामक आत्म विशारद ने प्रयोग द्वारा उसी के पूर्वजन्म की अनेक घटनाओं का पता लगाया। प्रयोग के दौरान उसने बताया कि वह सौ वर्ष पूर्व आयरलैण्ड के पार्क नगर में पैदा हुई थी। उसका नाम ब्राइडी मर्फी था और उसके पति का नाम मेकार्थी था। रुथ सीमेन्स ने अपने विगत जन्म के बारे में जो भी बातें बताई उनकी जाँच की गई तो वे अक्षरशः सत्य पाई गई।

विलियम बाकर एवं केन्सन ने अपनी पुस्तक इन्कार्नेशन में ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण दिया है। जिनमें पुनर्जन्म में विश्वास न करने वाले परिवारों में जन्मे बच्चों को भी पूर्वजन्म की स्मृतियाँ थीं। बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये विवरणों से इस सिद्धान्त की पुष्टि ही होती है। बड़ी आयु हो जाने पर यद्यपि ऐसी स्मृतियाँ नहीं रहती या धुँधली पड़ जाती है, पर बचपन में बहुतों को ऐसे स्मरण बने रहते है जिनके आधार पर उनके पुनर्जन्म के सम्बन्ध में काफी जानकारी मिलती है। मोटे रूप में जीवात्मा के योनि परिभ्रमण का यह अर्थ समझा जाता है कि वह छोटे बड़े कृमि कीटकों पशु-पक्षियों की चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के बाद ही मनुष्य जन्म प्राप्त करता है। पुनर्जन्म की इन घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को दूसरा जन्म मनुष्य के रूप में ही मिलता हैं इसके पीछे तर्क भी है। जीव की चेतना का इतना अधिक विकास-विस्तार हो चुका होता है कि उतने फैलाव को निम्न प्राणियों के मस्तिष्क में समेटा नहीं जा सकता। बड़ी आयु का मनुष्य जिस प्रकार अपने बचपन के कपड़े पहनकर काम नहीं चला सकता उसी प्रकार मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद छोटी योनियों में प्रवेश करने से गुजारा नहीं चलता।

रही बात बुरे कर्मों के दण्ड की तो कर्मों का फल भुगतने के लिए दुष्कर्मों का अधिकाधिक दण्ड मनुष्य जन्म से ही मिल सकता है। मनुष्य को शारीरिक कष्ट से भी अधिक मानसिक यातनाऐं सहनी पड़ती है। शोक, चिन्ता, भय, अपमान, घाटा, बिछोह आदि से वह तिलमिला उठता है, जबकि अन्य प्राणियों को मात्र शारीरिक कष्ट ही होते है। मस्तिष्क अविकसित रहने के कारण उनमें भी उतनी तीव्र पीड़ा नहीं होती जितनी मनुष्यों को होती है। इस स्थिति में पापकर्मों का दण्ड भुगतने के लिए मनुष्य को निम्न योनियों में जाना पड़े यह आवश्यक नहीं। जो भी हो पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य और जितनी वह मान्यता सत्य है उतनी ही लोकोपयोगी भी। आत्मा की अमरता और मरणोपरान्त फिर से शरीर धारण करके कार्य क्षेत्र में उतरने की आस्था बनी रहे तो व्यक्ति दूर दर्शी विवेक अपनाये रह सकता है ओर उसे नैतिकता,, शालीनता तथा सामाजिकता के पालन की सहज प्रेरणा मिलती रहती है।


उच्छृंखला उल्का स्वयं नष्ट होती है और

भारतीय संस्कृति में संस्कारों पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। अनगढ़ व्यक्तित्व को सुगढ़ बनाने-ढ़ालने के लिए आदि कालीन ऋषियों ने संस्कारों की व्यवस्था बनायी। षोड्श संस्कारों के सृजन में ऋषियों का मूल प्रयोजन या मानवी चेतना पर सूक्ष्म विधि उन आदर्शों की प्रतिष्ठापना करना। जिनके द्वारा व्यक्तित्व परिष्कृत एवं श्रेष्ठ बनता हो। यह परम्परा पूर्णतया वैज्ञानिक थी। व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठ एवं शालीन बनाने में संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान होता था। ऋषियों की इस परम्परा में मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण का सशक्त आधार मौजूद है।

सभ्य एवं सुसंस्कृत संस्कृति की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। वे ऐसे आधार ढूँढ़े जा रहे है जो व्यक्ति को शालीन एवं समर्थ बनाते हो। शिष्टाचार सिखाने के लिए एट्टीकेट्स विद्यालय खोले जा रहे है। मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की बाध्य व्यवस्था भी बनायी जा रही है। यह सभी प्रयास इस बात के प्रमाण है कि संस्कारों की आवश्यकता इन दिनों भी पूर्व काल की तरह ही अनुभव की जा रही है।

इटली के मेंडले नामक विद्वान ने संस्कार शास्त्र पर आधारित एक शास्त्र की नींव डाली जिसे यूजेनिक्स कहा गया। हिन्दी में इसे सुसन्तान शास्त्र, अभिजनन शास्त्र कहते है। मेंडले के कार्यों से प्रेरणा लेकर इस सदी के आरम्भ में इंग्लैण्ड के विद्वान सर फानिक्स गाल्टन’ ने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग लन्दन विश्वविद्यालय को इस क्षेत्र में शोध के लिए दिया। इस विश्वविद्यालय में ‘यूजेनिक्स’ के शोध कार्य में अनेकों विद्वान लगे हुए है। यूरोप के अन्य देशों में भी यह शास्त्र लोकप्रिय हो रहा है। यूजेनिक्स के वंश परम्परा, विवाह आदि के सम्बन्ध में विस्तृत शोध चल रहा है। इसमें भारतीय संस्कृति में विवाह सम्बन्धी मर्यादाओं एवं निषेधाओं से सम्बन्धित सभी तथ्यों का समावेश हैं उस क्षेत्र में शोध कर रहे विद्वानों का कहना है कि “सन्तति को सुसंस्कारी एवं शरीर बनाने में प्रत्यक्ष उपदेशों प्रशिक्षणों का कम धार्मिक संस्कारों का अधिक योगदान होता है।”

मनोविज्ञान का यह सिद्धान्त है कि मनुष्य किसी भी बात के सामान्य उपदेशों प्रशिक्षणों अथवा परामर्शों द्वारा दिये गये निर्देशों की तुलना में अनुकूल वातावरण में शीघ्रता से सीखता है।

नाटक सिनेमा में देखे गये दृश्यों का भला-बुरा प्रभाव दर्शक के ऊपर स्थायी रूप से पड़ता है। मन की प्रकृति निम्नगामी होने के कारण स्वभावतः मनुष्य अच्छी प्रेरणाओं को ग्रहण नहीं कर पाता। कुप्रभाव से निम्नगामी प्रवृत्तियाँ अपनाता है। बच्चे अधिक सम्वेदनशील होते है। उत्तेजक, अश्लील दृश्यों का प्रभाव तो उनके मानस पटल पर स्थायी रूप से पड़ जाता है। फलस्वरूप वे भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं।

वातावरण का बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव ने मनोवैज्ञानिकों का ध्यान धार्मिक संस्कारों की ओर आकर्षित किया है। ‘यूजेनिक्स’ के शोध में लगे वैज्ञानिकों ने विश्व भर में प्रचलित सभी धर्म सम्प्रदायों में किये जाने वाले संस्कारों पर गहन शोध करना आरम्भ किया है। हिन्दू धर्म के संस्कारों की शोध में लगे एक वैज्ञानिक का कहना है कि इन संस्कारों की पृष्ठभूमि मनोवैज्ञानिक सूझबूझ पर बनी है। जिसमें व्यक्तित्व के समग्र विकास की पूरी-पूरी सम्भावना है। संस्कार मात्र कर्मकाण्ड नहीं, आत्म निर्माण के सशक्त माध्यम हैं। इनका नये सिरे से अध्ययन एवं व्यापक स्तर पर प्रचलन किया जा सके तो व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है।


क्या इसी शरीर का पुनर्जन्म सम्भव हो जायेगा

क्षुद्रता की भौतिकता और महानता को आध्यात्मिकता कहा जाता है। एक को अणु दूसरे को विभु कहते हैं। एक सीमित है दूसरा असीम। सीमित दृश्यमान होता है, असीम अदृश्य। पदार्थ का नाप-तौल आकार और आयतन है। भले ही वह आँख से नहीं देखा जा सके बुद्धि अथवा यन्त्र उपकरणों की सहायता से समझा जाय? किन्तु चेतना के सम्बन्ध में यह बात नहीं है, उसका क्षेत्र व्यापक है। उसका विस्तार सीमित नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि चेतना जितनी परिष्कृत होती जाती है उतनी ही सुविस्तृत होती और व्यापक बनती है। धूमिल होने पर ही वह संकीर्णता और कृपणता के दल-दल में फँसती है।

तत्व दर्शन के इस प्रतिपादन को तथ्य माना जा सकता है। इसके फलितार्थ पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि जिसे जड़ता जितना घेरे हुए होगी वह उतना ही स्वार्थी होगा। व्यक्तिगत लोभ लालच ही उसे जकड़ रहेंगे। क्षुद्र महत्वाकाँक्षा उस पर छाई रहेगी और ऐसे कृत्य कराती रहेगी जो आकर्षक लगते हुए भी व्यक्ति ओर समाज के लिए कल्याणकारी नहीं होते। सामान्य लोकजीवन ऊपर से नीचे की ओर ही प्रकृति के गुरुत्वाकर्षण से प्रेरित होकर अधोगामी प्रवाह में बहता रहता है। नर पशुओं का चिन्तन, निर्धारण, स्तर एवं भविष्य इसी स्तर का रहता है। वे दुःख देते ओर दुःख पाते अपना समय बिताते, गँवाते, अंधकार में गिरते मरते है। यह दैत्य परम्परा है।

इस तत्व दर्शन का दूसरा पक्ष है-ऊर्ध्वगमन इसी को उत्थान, उत्कर्ष, अभ्युदय आदि के नाम से पुकारते है। अग्नि की लपटें ऊपर उठती है। अपने प्रभावित वातावरण को भी गरम करती और ऊपर उठाती है ऊपर उठने का स्वरूप तीर की तरह आसमान में एक दिशा विशेष में उड़ते जाना नहीं, वरन् उपग्रहों की तरह धरती की परिक्रमा लगाने लगता है। समुद्र में भाप आरम्भ में ही ऊपर उठती है इसके बाद उसकी गतिविधियाँ अग्रगामी बनती और परिभ्रमण पर निकलती है। उन्मुक्त आकाश में पक्षियों की तरह परिभ्रमण करते और अपनी उदारता बरसा कर धरातल को कृतकृत्य करते हुए अपना अस्तित्व सार्थक करता है। भाप से लेकर सन्त महामानवों तक का यही नीति निर्धारण है। पवन, विद्युत, प्राण, ईथर जैसे तत्व व्यापक और गतिशील देखे जाते है। उनका अस्तित्व और कार्यक्षेत्र सीमा बंधनों में नहीं बँधता इसी को मुक्ति कहते है। मानवी सत्ता का लक्ष्य यही है।

उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने से यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि क्षुद्रता, संकीर्ण स्वार्थपरता और स्थानीय गतिविधियों एवं प्रत्यक्ष उपलब्धियों तक सीमित रहती है। जबकि महानता परमार्थ में रुचि लेती और वसुधैव कुटुम्बकम् की उदार गतिविधियों को अपनाती है। उसका कार्यक्षेत्र उतना ही विस्तृत होता है जितनी की उसकी उद्गम सत्ता है। परमात्मा असीम है। चेतना को जब जितना अवसर अपने मूल स्वरूप में विकसित होने को मिलता है तब वह उसी परिमाण में व्यापक, उदार एवं उदात्त बनने का प्रयत्न करती है।

व्यापकता को आकाश कहते है। आकाश जितना विस्तृत है उतना ही उपलब्धियों की दृष्टि से महान है। धरती पर जितना कुछ है उसकी तुलना में आकाश अनन्तगुना अधिक है। पृथ्वी की सत्ता और सौर मण्डल के विस्तार वैभव की दृष्टि से नगण्य है। ब्रह्माण्ड के विस्तार को देखते हुए उसका स्थान बाल की नोंक जितना भी नहीं रहता, पृथ्वी का वैभव स्वल्प, इसमें भी मनुष्य की सत्ता और सम्पदा को तो तुच्छता की दृष्टि से उपहासास्पद ही कह सकते हे। वैभव का अनन्त भाण्डागार आकाश में भरा पड़ा है। विकसित चेतनायें अपना सम्पर्क उसी से साधती और कार्यक्षेत्र उसी को बनाती हैं। यही है सच्चे अर्थों में वैभववान और प्रगतिशील बनने का भाग। महा पुरुषों की विश्व हित की प्रधानता देने वाली दृष्टि ही उन्हें प्रातः स्मरणीय बनाती है। अध्यात्मवादी अदृश्य जगत से अपना सम्बन्ध साधते और सिद्धियों की देव सम्पदा का प्रचुर परिमाण में उपार्जन करते हैं। यहाँ तक कि वैज्ञानिक भी प्रकृति के व्यापक रहस्यों को खोजते रहे है। कारखानों में ढलाई करने वाले कारीगर होते है वैज्ञानिक नहीं। सीमित श्रमिक या शिल्पी कहलाते हैं। असीम से सम्बन्ध जोड़ने वाले कलाकार, दार्शनिक, विज्ञानी एवं देवात्मा कहलाते है।

अदृश्य सम्पदा की दृष्टि से भी महान है और अनुभूति की दृष्टि से भी आनन्द मय। व्यक्ति के उत्थान में जितना श्रेय पुरुषार्थ का है उससे अधिक संव्याप्त वातावरण एवं अदृश्य के अनुदान का। विभूतियाँ परोक्ष से उपलब्ध होती है। इन दैवी सम्प्रदायों की गरिमा कल्पनातीत है। जो पाता है सो निहाल बनता हैं चन्दन वृक्ष की तरह उनका अस्तित्व समीपवर्ती सारे वातावरण को सुगन्ध से भरता रहता है।

युग परिवर्तन में प्रत्यक्ष पुरुषार्थ तो करने ही होंगे। बौद्धिक, नैतिक, और सामाजिक कान्ति के लिए लोकशिक्षण से लेकर रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रमों तक की अनेकानेक गतिविधियाँ अपनानी और क्रियान्वित करनी होगी। यह प्रत्यक्ष है। परोक्ष के अनुदानों का उसमें समावेश अत्यधिक आवश्यक है। प्रस्तुत विपत्तियों के कारण यदि प्रत्यक्ष ही रहे होते तो उनका समाधान मानवी पुरुषार्थ से सरलता पूर्वक हो गया होता, किन्तु तथ्य इसमें कही आग है अन्तरिक्ष की प्रतिकूलता असाधारण रूप से बाधक है। यह प्रकृति प्रदत्त है या मनुष्य कृत इस विवाद में पड़ने की अपेक्षा इस तथ्य को समझना आवश्यक है कि अदृश्य का अनुकूलन आवश्यक है। सूक्ष्म जगत में प्रतिपक्षी परिस्थितियाँ बनी रही तो सुरक्षा और सृजन के उद्देश्य अधूरे ही बने रहेंगे।

प्रत्यक्ष कारणों से जो समस्याएँ एवं विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं उनकी जानकारी प्रायः सभी को रहती है और साधनों के अनुरूप सुधार प्रक्रिया भी चलती है। पर इसके अतिरिक्त भी कुछ सोचना और करना शेष रह जाता है। इस दिशा में कुछ नया सोचने की सामग्री इन पृष्ठों पर मिलती है। इस प्रतिपादन का यदि महत्व समझा जा सके तो अगला कदम यही रह जाता है कि अन्तरिक्ष परिशोधन एवं अनुकूलन का उपाय भी किया जाय। प्रत्यक्ष पुरुषार्थ के साथ-साथ अदृश्य का अनुकूलन बन पड़ने पर ही वह स्थिति उत्पन्न होगी जिसमें समग्र समस्याओं का समाधान और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण सम्भव हो सके।

अध्यात्म का कार्य क्षेत्र अन्तरिक्ष है। व्यापक दृष्टि अपनाने की ब्रह्म विद्या में अभिरुचि एवं गतिशीलता को विश्वव्यापी बनाने की प्रेरणा भरी पड़ी है। साधना में अनन्त के साथ सम्बन्ध जोड़ा और और अदृश्य अनुदानों को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रत्यक्ष अनुदानों की तुलना में परोक्ष वरदान कितने अधिक समर्थ होते हैं इसे सभी जानते है।

स्वर्ग ऊपर है। देवता भी ऊपर रहते हैं। इस अलंकार का तात्पर्य उस उदात्त सत्ता की ओर संकेत करना है जो अन्तरिक्ष व्यापी है। जो व्यक्तित्व को महान और वातावरण को सुखद बनाने में समर्थ है। विज्ञान धरती पर प्रयोगशाला बनाते है पर खोजते अन्तरिक्ष को हैं। अध्यात्म में साधना तक उपचार तो शरीर और साधनों के सहारे ही किये जाते है किन्तु साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि जो मिलना है वह अन्तरिक्ष से बरसेगा और धरती पर उगेगा। दैवी अनुग्रह, साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।

अदृश्य का अनुकूलन युग परिवर्तन जैसे महान कार्य को सम्पन्न करने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मानवीय दृष्टिकोण में उत्कृष्टता के समावेश और प्रचलन प्रवाह में आदर्शों का अभिवर्धन। यही है मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण जिसके लिए अदृश्य में अन्तरिक्ष में सघन सम्पर्क साधने की आवश्यकता है। युग ‘सृजेताओं को रचनात्मक प्रत्यक्ष प्रयत्नों में इस अदृश्य के अनुकूलन को भी साथ लेकर चलना है।’


असत्य सदा अकल्याणकारी होता है

विज्ञान ने मनुष्य को कितनी ही साधन सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं और उसे पहले की अपेक्षा समृद्ध सम्पन्न बनाया हैं। उसकी शक्ति बढ़ी है और सामर्थ्य भी। विकास की गवेषणा करते समय वर्तमान शताब्दी को विज्ञान का युग कहा जाता है। परन्तु इस विज्ञान का एक और पहलू भी है वह है वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग और उस आधार पर खड़ी की गई साधन सुविधाओं से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण। यह प्रदूषण हवा, पानी और खाद्य वस्तुओं को विषाक्त कर किस प्रकार मानव-जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर रहा है? अब इस दिशा में भी गम्भीरता से विचार किया जाने लगा है।

उदाहरण के लिए वायु को ही लें। वह मनुष्य ही नहीं संसार के समस्त जीवित प्राणियों और वृक्ष वनस्पतियों के लिए आवश्यक महत्व है। सम्भवतः इसी लिए प्रकृति ने समस्त पृथ्वी मण्डल को वायु से आच्छादित कर रखा है। एक सामान्य व्यक्ति दिन भर में लगभग 35 पौंड वायु का सेवन करता है। यह मात्रा सारे दिन में ग्रहण ये गये अन्न और जल से आठ गुना अधिक है। इसी से प्रतीत होता है कि मनुष्य जीवन में वायु का महत्व समस्त खाद्य वस्तुओं में कितना अधिक है? अन्न और जल के अभाव में तो मनुष्य फिर भी कुछ समय तक जीवित रह लेता है किन्तु वायु के बिना तो कुछ ही क्षणों में उसके प्राण घुटने लगते है।

इसके साथ ही यह भी एक सत्य है कि जीवित रहने के लिए केवल अन्न और जल का होना ही पर्याप्त नहीं हैं, उसे स्वस्थ बनाये रखने के लिए स्वच्छ और पौष्टिक भोजन चाहिए। वह न मिले तो भी कोई कठिनाई नहीं है, किन्तु कम से कम भोजन और पानी गन्दा तथा सड़ा हुआ तो नहीं ही होना चाहिए। गन्दा और सड़ा भोजन कर लेने से जी मिचलाने लगता है और तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन में और तरह की त्रुटियाँ हो तो उसके विष शरीर में घुलते रहते हैं तथा कुछ समय बाद अपनी दूषित प्रतिक्रिया शारीरिक, मानसिक व्याधि के रूप में प्रकट करने लगते है। आठ गुना कम आवश्यक और सेवित दूषित अन्न के प्रदूषण की मात्रा में जब मनुष्य इतना प्रभावित हो सकता है, तब दूषित वायु मनुष्य के स्वास्थ्य पर कितना घातक दुष्प्रभाव डालती होगी? इनकी कल्पना नहीं की जा सकती।

विश्व के मूर्धन्य विचारक और मनीषी अब इस समस्या पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और मान रहे कि औद्योगीकरण तथा आधुनिक सभ्यता द्वारा मशीनी ढाँचे में ढाली जा रही मनुष्य की जिन्दगी जिन अभिशापों से त्रस्त हुई है, वायु प्रदूषण उनमें एक है और सम्भवतः सबसे प्रमुख भी। अमेरिका की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तथा राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के निर्देशक कथन है कि इन दिनों जिस गति से वायु प्रदूषण हो रहा है यदि यही क्रम कुछ और वर्षों चलता रहा तो मनुष्य को मारने के लिए किसी बड़े युद्ध की अथवा आणविक अस्त्रों के उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी वरन् वायु प्रदूषण ही इस काम को पूरा कर देगा।

वायु प्रदूषण के परिणाम कितने घातक हो सकते हैं? इस सम्बन्ध में आए दिनों चर्चाएँ तो चलाई जाती हैं किन्तु उसकी रोकथाम के लिए कोई बड़े प्रयास कम ही किये जाते है। अमेरिका में प्रति वर्ष 200 करोड़ टन दूषित तत्व वायु में मिलते रहते है। जर्मनी, फ्राँस, इटली, रूस, और ब्रिटेन भी इससे पीछे नहीं है। इन देशों में तथा विश्व के अन्य दूसरे देशों में उत्पन्न हो वाला प्रदूषण वायु को इतना विषाक्त बना रहा है, उसमें इतने प्रदूषण वायु को इतना विषाक्त बना रहा है, उसमें इतने विषैले तत्व घोल रहा है कि क्रम इसी प्रकार चलता रहा तो प्रदूषण के कारण पृथ्वी के भयंकर रूप से गर्म हो उठने की संभावना है और धुएँ के कारण प्राणियों के घुट-घुटकर मर जाने की आशंका है।

यह आशंका तो जब पूरी होगी तब होगी परन्तु इन दिनों वायु प्रदूषण जन जीवन पर अपना बुरा प्रभाव डालने से नहीं चूक रहा है। उन्नत, विकसित और आधुनिक देशों के महा नगरों की स्थिति देखी जाए तो प्रतीत होगा कि इस कारण वहाँ का जीवन आए दिन अस्त-व्यस्त होता रहता है। पिछले दिनों बी.बी.सी. के एक प्रसारण में बताया गया कि लन्दन की सड़कों पर नियुक्त ट्रैफिक पुलिस को अक्सर अपने चेहरे मास्क से ढकने पड़ते है। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि वहाँ की सड़कों पर दौड़ने वाले वाहन इतना धुँआ उगलते है कि कई बार दिन में ही धुँध छा जाती है। ट्रैफिक पुलिस के सिपाही यदि ऐसा न करें तो उनके लिए पाँच घण्टे खड़ा रह पाना मुश्किल हो जाय।

यही हाल जापान की राजधानी टोक्यो का है। वहाँ की सड़कों पर भी कई बार वाहनों की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि धुएँ के कारण छाई हुई धुंध से बचने के लिए सरकारी तौर पर घोषणा करनी पड़ती है। पिछले वर्ष इस तरह की घोषणा 120 बार की गई ओर ट्रैफिक पुलिस को आधा आधा घण्टे बाद अपनी ड्यूटी छोड़कर चौराहों की बगल में आक्सीजन टंकियों से साँस लेने के लिए जाना पड़ा।

यह धुँआ आदमी को घुट-घुट कर मरने के लिए बाध्य करेगा तब करेगा किन्तु दुष्प्रभाव विभिन्न रूपों में जन-स्वास्थ्य से अभी ही खिलवाड़ करने लगे जापान में सौ व्यक्तियों पीछे एक व्यक्ति अनिवार्य रूप से ‘ब्राकाँइटिस’ का रोगी है। इसका कारण और कुछ नहीं धुँआ ही है, जिसे मोटरकारें, रेलगाडियों और कल कारखानों की चिमनियाँ निरन्तर उगलती रहती है बढ़ते हुए औद्योगीकरण के कारण कई मानसिक रोग, कैंसर, हृदय रोग तथा यक्ष्मा जैसे राजरोग भी बढ़े हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान समिति के अनुसार इन रोगों की बाढ़ का एक बड़ा कारण हवा में घुला हुआ यह जहर है।

जर्मनी के उद्योग धन्धे प्रतिवर्ष 2 करोड़ टन विषाक्त द्रव्य हवा में उड़ाते हैं। इनमें कोयला ओर तेल जलाने से उत्पन्न हुई गैस तथा जमीन खोदकर इन पदार्थों को निकालते समय उड़ने वाली गैस प्रमुख है। अमेरिका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘डाइव मैगजीन’ में बताया गया है कि एक कार साल भर इतना धुँआ उगल देती है कि उसके कार्बन डाई आक्साइड से ईसाइयों के प्रसिद्ध चर्च सेंट पाल का गुम्बद दो बार कार्बन मोनो आक्साइड से तीन कमरों वाला बंगला नौ बार तथा नाइट्रोजन से एक डबल डेकर बस दो बार भरी जा सकती है । एक कार द्वारा सात वर्ष में उगले गये धुएँ का यदि सीसा छान लिया जाय तो वह एक गोताखोर के सीने को ढकने के लिए बनाये जाने वाले बख्तर के लिए पर्याप्त होगा।

यह नाप तौल तो एक कार से उत्पन्न होने वाले विषाक्त तत्वों के बारे में है, जबकि इस समय विश्व भर में करोड़ों कारें हैं। अकेले ब्रिटेन में डेढ़ करोड़ कारें और मोटर गाड़ियाँ हैं। अमेरिका के सम्बन्ध में कहते हैं कि कारों का उत्पादन बच्चों से भी ज्यादा होता है। जितनी देर में वहाँ पाँच बच्चे पैदा होते उतनी देर में वहाँ सात कारें बन कर तैयार हो जाती है। वहाँ के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने लिखा है कि पिछले वर्ष केवल कार मोटरों द्वारा 360 लाख टन धुँआ वायुमण्डल में छोड़ा गया तो यह भी एक तथ्य है कि पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन वायु प्रदूषण के लिए केवल तीस प्रतिशत ही जिम्मेदार हैं जबकि बाकी शतप्रतिशत वायु प्रदूषण ‘कल’ कारखानों और छोटी बड़ी फैक्ट्रियों द्वारा होता है।

इन स्रोतों से हवा में घुलने वाला विष मानव स्वास्थ्य पर तो प्रभाव डालता ही है अन्य जीव जन्तुओं को भी समान रूप से प्रभावित करता तथा प्राकृतिक स्रोतों को भी गन्दा ओर जहरीला बनाता है। अमेरिका तथा यूरोप के कतिपय देशों में इन दिनों पशु पक्षियों की प्रजनन क्षमता में भारी कमी आई है। लारेंड (मेरीलैंड) स्थित “ब्यूरो आफ स्पोर्ट फिशरीज एण्ड वाइल्ड लाइफ” संस्थान के दो वैज्ञानिक आर.डी.पोर्टर तथा एस.एन.वायत्रेयरने कुछ पक्षियों पर परीक्षण किए और पाया कि औद्योगिक महानगरों में तथा उनके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले पक्षी अन्य स्थानों पर रहने वाले पक्षियों से कम अण्डे तो देते ही है, वे अपने अण्डे स्वयं ही नष्ट भी करने लगते हैं इसके अतिरिक्त इन पक्षियों के अण्डों को ऊपरी पर्त अपेक्षाकृत पतली पाई गई और वे तनिक से आघात के कारण यहाँ तक कि उन्हें साँस लेने के लिए बैठने वाली मादा द्वारा हिलने डुलने भर से टूटने लगे।

वृक्ष वनस्पति वायु प्रदूषण के संकट को कम करने में कुछ सहायक होते है किन्तु इन दिनों बढ़ती हुई आबादी के लिए भरण-पोषण के उपयुक्त अन्न पैदा करने के लिए कृषि योग्य जमीन की भी माँग भी तो बढ़ी है। कृषि के लिए बढ़ती हुई जमीन की माँग को पूरा करने के लिए जंगल सफाया करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचता। सो, वहीं उपाय अपनाया जा रहा है। और वायु प्रदूषण की भयावहता कम करने लिए रहे बचे उपाय भी नष्ट होते जा रहे है।

वायु प्रदूषण के कारण होने वाली रासायनिक प्रक्रियाएँ वायु दुर्घटनाओं, बीमारियों का ही कारण नहीं बनेगी वरन् उससे भूकम्प ज्वालामुखियों के विस्फोट तथा समुद्र में तूफान जैसी प्राकृतिक विपत्तियाँ भी कहर ढायेंगी। गर्भस्थ शिशु पर तो इस प्रदूषण का प्रभाव अभी से पड़ने लगा है। अमेरिका के महानगरों में कुछ तथा टेढ़े-मेढ़े बच्चों की जन्म दर पिछले वर्षों से निरन्तर बढ़ती जा रही है। कुछ ही दिनों में वायु में घुले जहर से प्रभावित होकर खर-दूषण त्रिशिरा और मारीच जैसी कुबड़ी भयंकर विचित्र संतानें उत्पन्न होने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। वायु प्रदूषण मनुष्य जीवन को अनेक पहलुओं से दबोचता बढ़ रहा है और उसके कारण मनुष्य जीवन का अन्त बहुत ही निकट दिखाई देने लगा है। उससे कैसे बचा जाए? अब इस प्रश्न को उपेक्षित नहीं किया जा सकता।


अशुभ आशंकाओं का अभिशाप

आवरण और अनुबंधों की कमी नहीं। वे कष्ट कारक प्रतीत होते हैं और प्रगति पथ में अवरोध उत्पन्न करने के कारण खीझ भी उत्पन्न करते हैं। इतने पर भी एक तथ्य स्पष्ट है कि विशेष पुरुषार्थ के मूल्य पर विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त करने की व्यवस्था बनी रहनी ही श्रेयस्कर है। इससे प्रबल पुरुषार्थ को उत्तेजन मिलता है और अकर्मण्य को झकझोरने वाला वातावरण उत्पन्न होता है।

अवरोधों का अस्तित्व न हो और हर उपलब्धि हर किसी के लिए सम्भव रहा करे तो फिर साहसिकता और पुरुषार्थ परायणता की कोई आवश्यकता ही न रह जाएगी ऐसी दशा में सुविधा सम्पन्न लोगों का व्यक्तित्व भी गया गुजरा बन कर रह जाएगा। वे उन उपलब्धियों का आनन्द भी न ले सकेंगे, जिनकी अपेक्षा एवं कामना किया करते हैं। प्राप्त कर लेना ही सब कुछ नहीं है।

उपलब्धियों की सुरक्षा एवं उनके सदुपयोग की दूर दर्शिता भी सहज ही नहीं मिल जाती। उसके लिए भी पराक्रम चाहिए। भोजन मिल जाना ही सब कुछ नहीं है, उसे पचाने की क्षमता भी चाहिए। उपलब्धियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। सृष्टि व्यवस्था में बहुत कुछ बहुमूल्य है किंतु वह रहस्यमय बना रहता है। यह इसलिए है कि पुरुषार्थ की प्रतिद्वंदिता में उतरने वाले इस विशिष्ट का उपहार प्राप्त कर सकें और अन्यान्यों को वैसा ही करने का उत्तेजन दे सकें।

पृथ्वी के वातावरण एवं स्िल में सीमाबद्ध होने के कारण हमें प्रकृति की अनेकों सूक्ष्म शक्तियों का अनुभव नहीं हो पाता। बद्ध क्षेत्र से परे जाने के प्रयत्न में पता चलता है कि प्रकृति अपनी शक्तियों द्वारा किस प्रकार रास्ता रोके खड़ी है। उदाहरणार्थ पृथ्वी से चन्द्रमा पर जाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति से पार जाने के लिए 25 हजार प्रति घण्टे मील से चलने वाले राकेट की आवश्यकता होती है। इससे कम में प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण शक्ति से निकल सकना सम्भव नहीं है गति कम हो तो उल्टे हानि की सम्भावना होगी। राकेट कुछ दूर जाकर पुनः पृथ्वी की कक्षा में ही परिक्रमा करते हुए गिर जायेगा। दो सौ मील की ऊँचाई पर जाने पर हवा का दबाव समाप्त हो जाता है। अधिक ऊँचाई के लिए आक्सीजन साथ ले जाने की आवश्यकता होती है।

शून्य आकाश में तो हम हलके गुब्बारे की तरह तैरने लगते है। चन्द्रमा पर भी शरीर अत्यन्त हलका मालूम पड़ता है। वायु न होने के कारण निकटवर्ती ताप की आवाज भी नहीं सुनाई पड़ती। अन्य ग्रहों की परिस्थितियाँ भिन्न भिन्न हैं। इस कारण उन पर अनुभूतियाँ भी एक जैसी नहीं होंगी। इस ब्रह्माण्ड में अनेकों ग्रह नक्षत्र ऐसे हैं जहाँ वनज हवा की तरह हलका तथा पहाड़ जैसा भारी हो सकता है। यह वस्तुतः उस स्थान पर कार्य कर रही आकर्षण शक्ति के कारण होता है।

उदाहरणार्थ सूर्योदय सूर्यास्त के समय में परिवर्तन होने से पृथ्वी के मौसम भी बदल जायेंगे। हवा क दबाव न रहे तो हम आकाश में उड़ने लगेंगे। पृथ्वी के वातावरण में परिवर्तन होने अथवा इस क्षेत्र के परे जाने पर जिस प्रकार अनुभूतियों के स्तर भी बदल जाते हैं। उसी प्रकार सृष्टि जब तक स्थूल में केन्द्रित होती हैं, चेतना की असीम सामर्थ्यों का पता नहीं लग पाता। साधनात्मक उपचार ही वह तीव्र गति से चलने वाले राकेट हैं जो वस्तुओं के प्रचण्ड आकर्षण शक्ति से साधक को परे ले जाते तथा चेतना की गहराइयों में प्रविष्ट कराते हैं।

पृथ्वी के सीमाबद्ध वातावरण में बहुत कुछ है सीमित पराक्रम वालों को उतने से ही सन्तोष करना पड़ता है असीमता आनन्द लेने के लिए असीम साहस और असीम प्रयास की आवश्यकता होती है। इसी कटु सत्य का दर्शन पृथ्वी क इर्द गिर्द छाये हुए वातावरण और उससे ऊपर निकलने क प्रयास करने वालों की सफलताओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता है।


दबे हुए स्वर्ण भंडार, जो अभी किसी के हाथ लगे नहीं

यह सारा संसार सहकारिता के सिद्धान्त पर काम कर रहा है। यदि कोई यह विचार करे कि वह इस जीवन यात्रा में एकाकी ही रहकर अपना लक्ष्य पा लेगा तो यह असम्भव ही माना जाना चाहिए। सृष्टा ने इसी कारण असंख्यों ग्रह नक्षत्रों-तारामण्डलों एवं गुच्छकों का एक परिवार बसाया है। आपसी सहकार के आधार पर ही उनकी विधि व्यवस्था टिकी हुई है। यदि इनमें से एक भी ग्रह बिना दूसरे की चिन्ता किये अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करने लगे तो अन्त विनाशकारी ही होगा।

विश्व का एक छोटा सा संस्करण परिवार व्यवस्था के रूप में दीख पड़ता है। समाज की यह इकाई अपने आप में समग्र हो पाती है तो मात्र उसके सदस्यों की परस्पर सहजीवी भावना के कारण। परस्पर स्नेह, सौहार्द्र एवं सहयोग जिन्दा न रहे तो देखते-देखते बने बनाये संयुक्त कुटुम्ब विघटित होते चले जाते हैं। ऐसी ही कुछ व्यवस्था विश्व नियन्ता ने प्रकृति के अपने साम्राज्य में की है। कीट-पक्षी वृक्ष,पुष्प, मानव-वनस्पति इत्यादि परस्पर सहकारिता के आधार पर ही जीवन जीते हैं। अध्यात्म प्रतिपादन यह बताते हैं कि विराट् ब्रह्म की असीम चेतना ही चारों ओर व्याप्त है। लघुतम इकाई में संव्याप्त चेतना सहज स्वभाव है-स्नेह-सहयोग ‘ इकोलोजी ’ विज्ञान के अध्येता बताते हैं कि प्रकृतिगत सन्तुलन इसी स्नेह-सहयोग पर आधारित है।

मनुष्य का प्रतिक्षण साँस से प्राणवायु ग्रहण करना, उन वृक्षों के कारण सम्भव हो पाता है जो वातावरण में निरन्तर इसे उत्सर्जित करते रहते है। भले ही इसके लिये उन्हें बदले में कार्बनडाइआक्साइड के रूप में विष क्यों न पीना पड़े। वृक्षों का स्वयं का विकास, उनका फलना-फूलना भी कीट-पतंगों तथा पशु पक्षियों के समुदाय के सहयोग पर निर्भर है। सह-अस्तित्व के ऐसे अनोखे उदाहरण मनुष्य को प्रेरणा देते रहते हैं कि वह भी अकेला न रहकर परस्पर सहयोग की अपनी अन्तःवृत्तिः का विकास करें।

सृष्टा ने प्रकृति को अनगिनत रंगों से भर दिया है। दिन रात फूलों के बीच रह कर भी क्या कोई ऐसा बता सकता है कि फूलों से खुशबूनुमा रंग, मनमोहक गन्ध और मादक रस क्यों होते हैं? इसका समाधान हमें मिलता है फूल कीटों के उस अद्भुत साहचर्य को देखकर, जिसके कारण कीट उनकी वृद्धि में सहायक होते हैं। परागण प्रक्रिया के लिए फूलों को पक्षियों, पतंगों, कीटों की आवश्यकता होती है। पर यह सेवा एकांगी नहीं है। बदले में वह अपना मधुर मधु उन्हें छानकर पीने से दूसरे पौधे पर जाती है। साथ ही अपने परों और पैरों में उनका पराग लपेटकर यहाँ से वहाँ बिखेरती जाती हैं। फूलों का परिवार अपनी वंशवृद्धि इसी प्रकार करता है। शहद की मक्खी इसी पराग को अपने पुरुषार्थ से मधु में बदल देती है, जो मानव के लिए उपयोगी होता है। संगठन और सहयोग को इसी प्रक्रिया को अपना कर प्रत्येक घटक उत्कर्ष के पथ पर बढ़ता है।

फूल अपने मित्रों को रिझाने के लिए तरह-तरह के रंग रूप एवं गन्धों से अपने का सुसज्जित करते हैं। कई तो चटकीले रंगों की सज धज दिखाते है और कई अलग समय निर्धारित हैं। तेज आँधी तूफान में फूल स्वयं अपने पट बन्द कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आँधी तूफान में उनके सखा ये जन्तु टिक नहीं सकेंगे। कीटों तथा पक्षियों की घ्राणेन्द्रिय इतनी तीव्र होती है कि मीलों दूर से अपने पुष्प मित्रों का निमन्त्रण पाकर प्रेम की डोर से खिंचे चले आते हैं। जिन पेड़ों पर कभी फूल नहीं आते, वे पक्षियों-कीटों के द्वारा लना के ही पात्र होते हैं। ‘पौपलर’ ऐसा ही एक हीन वृक्ष है, जिस पर किसी भी पक्षी को नाज है। इसमें बसन्त में पत्ते तो नये आते हैं, पर फूल नहीं आते। ऐसे वृक्ष एकाकी एवं मनहूस व्यक्ति की तरह अर्ध विकसित रह जाते हैं। अपनी देने की के अभाव, असहयोग के कारण ही अपने प्रकृति वार के सदस्यों से उन्हें अवमानना का ही मुख देखना है।

बुलबुल को गुलाब पर एवं कुमरी को अशोक वृक्ष ही बैठना अच्छा लगता है। दोनों को ही अपने सखाओं पर नाज है। वृक्ष पर बैठा पक्षी-परिवार देखने को सुन्दर तो लगता ही है, उनका गान-चहकना प्रकृति प्रसन्नता की लहर फैला देता है। ये पक्षी गण मात्र प्रकृति में सौन्दर्य वृद्धि के लिए ही नहीं बल्कि अपनी के वृक्षों की वंश-वृद्धि हेतु भी मित्रता का सूत्र पड़े हुए है। सूक्ष्म, अल्प जीवन काल वाले पराग कणों का कम से कम समय में मीलों दूर तक इसी जाति के अन्य पुष्पों तक पहुँचाने का कार्य ये पक्षी गण करते हैं। मधुमक्खियाँ ‘क्रास पालिनेशन’ की प्रक्रिया में विशेष कार्य करती हैं। वे सामान्यता प्रति मिनट तीस फलों पराग लेती है और अपने पिछले पैरों से एक लाख पराग कण चिपका लेती हैं।

बहुत से वृक्ष ऐसे हैं, जिनके फल जमीन पर गिरकर बोये जाने पर मुश्किल से अंकुरित होते हैं। ये ही जब पक्षी मित्र के उदर में प्रवेश कर लेते हैं, तो कीट के साथ बाहर निकलने पर सहज ही अंकुरित हो जाते है। बीजों पर पक्षी के पेट में जो प्रतिक्रिया होती है, उससे उनकी उर्वरता में अत्यधिक वृद्धि होती देखी गई है। ऐसे बीजों से उत्पन्न वृक्ष पीपल, वट, नीम के रूप में कई बार ऐसे स्थानों पर पाये जाते हैं, जहाँ उनके उगने की कोई सम्भावना नहीं थी।

जीव जगत में कमेन्सल्स के रूप में कुछ खास किस्म के सूक्ष्म जीवाणु होते हैं। इनकी जीवन व्यवस्था भी ‘जियो और जीने दो' की समाजवादी व्यवस्था का आदर्श उदाहरण है। इन्हें अपने विकास के साधनों का कुछ ज्ञान नहीं होता। इसीलिए अपने आपको जीवित रखने एवं आजीविका के लिए इन्हें समाज के परिगणित, पिछड़े, पददलित व्यक्तियों की तरह साधनों की आवश्यकता होती है। इसे दूसरे सहयोगी महत्वपूर्ण जीवाणु ‘एमिनो एसिड’ का निर्माण कर पूरा करते है। ये एरोब्ज जीवाणु इस तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि मनुष्य को अपने ही नहीं, दूसरों के विकास का भी ध्यान रखना चाहिए।

कुछ पौधों की जड़ों में अत्यन्त सूक्ष्म बैक्टीरिया होते हैं। ये वायुमण्डल के नाइट्रोजन साइकिल से सीधे नाइट्रोजन खींच कर उसे नाइट्रेट के रूप में बदल देते हैं। इस परिवर्धित तत्व को पौधे आसानी से आत्मसात् कर लेते हैं। रेंगने वाले केंचुऐ इसी तरह मिट्टी को निगल कर उसे शरीर के अन्दर रासायनिक प्रक्रिया द्वारा विशिष्ट बनाकर मलद्वार से निकाल देते हैं जो बड़ी उपजाऊ हो जाती है।

प्रकृति जगत के ये अनेकानेक उदाहरण सहकारिता द्वारा एक दूसरे के विकास के सिद्धान्त का ही समर्थन करते है। पक्षी एवं वृक्षों का परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध पृथ्वी के सूक्ष्मजीवी बैक्टीरिया का वातावरण सन्तुलन को बनाये रखने में योगदान, वृक्षों द्वारा वातावरण संशोधन एवं प्राणवायु की वृद्धि से मानव के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण-ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें इकोलोजी विज्ञानी पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। सह अस्तित्व एवं परस्पर सहकार के ये ज्वलन्त उदाहरण मानव को सामाजिक जीवन में भी इन्हीं गुणों को उतारने के लिए अभिप्रेरित करते हैं।

चाहे जन समुदाय की बात हो, चाहे प्रकृतिगत जड़ समझे जाने वाले पदार्थों की, सबके मूल में एक ही तथ्य काम करता है। वह है संगठन और सहयोग। व्यक्तिगत विकास के साथ ही सामूहिक उत्कर्ष भी अनिवार्य है। इस प्रक्रिया का जितना अधिक अपनाया जा सकेगा- मनुष्य के लिए स्थायी सुख शान्ति, वाँछनीय एवं सुखकर परिस्थितियों के आधार ढूँढ़े जो सकेंगे। विश्व परिवार की कल्पना को साकार किया जा सकना तभी सम्भव हैं जब प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर से एक दूसरे के प्रति उदारता-आत्मीयता-सहकारिता के भाव उमड़े, अपनी नहीं सबकी प्रगति की कामना जन्म लेने लगे।


रक्त का स्तर और सदुपयोग

सरोवर में तरंगों की भाँति, सागर में लहरों की भाँति मन क्षेत्र में भी कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी वह शान्त सरिता की भाँति शान्त, मन्द और शीतल वायु का स्पर्श करता हुआ बहता है। तो कभी उसमें समुद्री ज्वार और चक्रवात की तरह जोर के उफान आते रहते हैं। मन का यही स्वभाव हैं ओर इसी विशेषता के कारण उसे चेतना का अंग कहा गया है। जो सदा सर्वदा ऐसी स्थिति में ही पड़ा रहे उसे जड़ नहीं तो ओर क्या कहा जायेगा। चेतन प्राणियों की चेतन सत्ता ही नहीं वस्तु, व्यक्ति ओर परिस्थिति की दशा भी एक जैसी नहीं रहती। प्रकृति जड़ वस्तुओं को भी नचाती रहती हैं। उनमें प्रकृति चक्र के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव होता है, वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। यह व्यक्ति की अपनी मनोदशा, मानसिक बनावट पर निर्भर है कि वह इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करे आर क्या न करे ? घटनाक्रम पर किस दृष्टि से सोचा जाय और किस दृष्टि से न सोचा जाए ? यह भी व्यक्ति की अपनी मानसिक बनावट पर निर्भर करता है।

जिन लोगों को सही दृष्टि से सोचना नहीं आता वह सामान्य परिस्थितियों में भी उद्विग्न ओर क्षुब्ध हो उठते हैं तथा जो सही ढंग से सोचना जानते हैं वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह समय हँसते-खेलते गुजार देते हैं। जिन्हें तैरना आता है वे विपरीत दिशा में हवा चलने पर, झंझा और तूफान आने पर, उद्दाम वेग से बाढ़ आई नदी में भी तैरकर पार हो जाते हैं ओर जो तैरना नहीं जानते वे शान्त, स्थिर जल में भी होशोहवास खो बैठते हैं ओर डूब मरते हैं। सही दृष्टि से सोचने की कला भी ऐसी ही है। यदि वह आ गई तो व्यक्ति सभी परिस्थितियों में शान्त, सन्तुलित और सन्तुष्ट रह लेता है ओर ठीक ढंग से सोचना नहीं आता, वस्तुओं ओर परिस्थितियों को उनके सही सन्दर्भ में देखना जिन्हें नहीं आता वे साधारण परिस्थितियों में भी उद्विग्न और दुःखी हो उठते हैं।

इसका क्या कारण है ? उत्तर एक ही है विचारों का प्रभाव, विचारों की शक्ति। विचार ही व्यक्तियों को प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने और साहसपूर्वक उन्हें चीरकर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं और विचार ही अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में व्यक्ति को निराश, हताश, ओर पस्त हिम्मत बना देते हैं। वस्तुतः विचार एक शक्ति है और शक्ति का भला या बुरा कैसा भी उपयोग किया जा सकता है। शक्ति का सदुपयोग होता है या दुरुपयोग यह उपयोग करने वाले पर निर्भर है। आग एक खाना भी पकाती है ओर उसी से मकान भी जलाया जा सकता है। विचार भी आग से कम नहीं है, वरन् अधिक ही है। उनसे परिस्थितियों और जीवन के गम्भीर व बड़े उतार-चढ़ावों को बड़ी आसानी से भी पार किया जा सकता है और उनके कारण सीधी-सपाट सड़क पर भी ठोकर खाकर गिरा जा सकता है।

विचारों की शक्ति के सम्बन्ध में प्रो. एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक ‘मिरेकल्स आफ नेचर’ में लिखा है- ‘प्रकाश की तुलना में विचार विद्युत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। इसे अभी यन्त्रों द्वारा मापा या देखा नहीं जा सका तो भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ है। उनकी गति ओर क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।’ वस्तुतः विचारों की शक्ति के कुछ साधारण से अनुभव ही हमें होते है। जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया, विचारों के प्रभाव का ज्ञान बहुत सामान्य ही हो पाता है। यद्यपि वह भी कोई कम नहीं है। फिर भी विचारों में कितनी शक्ति है ? इसका अनुमान लगा पाना अभी तक न विज्ञान के लिए सम्भव हुआ है ओर न ही कोई विचारक उसका अनुमान कर पाये हैं।

लुईरा क्राउन ने विचारों के शक्ति के सम्बन्ध में कहा है- ‘ताप, विद्युत आदि की ऊर्जा केवल भौतिक पदार्थों को ही नरम-गरम करती ओर उनमें परिवर्तन कर सकती है, किन्तु विचारों की शक्ति समूचे वातावरण से ही आर्श्चयजनक मात्रा में परिवर्तन कर सकती है। तना को प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में चारों का स्थान ही सर्वोपरि है। वे आने उद्गम स्थान को, विचार करने वाले को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं ओर फिर अपने समीप क्षेत्र पर प्रभाव डालते हुए असीम दूरी तक बढ़ते चले जाते है। उनकी सामर्थ्य का स्तर प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरूप करता है ओर उसी के अनुसार अन्यान्य व्यक्तियों, प्राणियों ओर यहाँ तक कि वस्तुओं का भी प्रभावित किया जा सकता है।

विचार शक्ति का वह अति सामर्थ्यवान स्तर गहन अनुसन्धान का विषय है। यहाँ चर्चा इतनी ही की जा रही है कि किस प्रकार कोई व्यक्ति इस शक्ति का उपयोग अपने सामान्य जीवन क्रम में करके सुखी व सन्तुष्ट रह सकता है ? विचारधारा को सही खा जाए तो कोई भी व्यक्ति किन्हीं भी परिस्थितियों में सुखी रह सकता है, और जीवन के किसी भी क्षेत्र में अवांछनीय कूड़ा-करवट अनुपयुक्त विचारों के रूप में भर लिया गया तो उनकी सड़ाँध से जीवन का एक-एक कण और एक-एक क्षण विषाक्त हो जाता है। शरीर सन्तुलन गड़बड़ा जाता है और साधारण जीवन की सामान्य समस्याओं का सही हल ढूँढ़ना भी सम्भव नहीं रह जाता।

मानवीय मस्तिष्क में उठने वाली विचारणाओं भाव तरंगों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है- एक सृजनात्मक ओर दूसरा ध्वंसात्मक। सृजनात्मक विचारों या भावनाओं में उन्हें लिया जा सकता है जो जीवन में आनन्द और सुख-सन्तोष की सृष्टि करते हैं। इस श्रेणी में प्रसन्नता, सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा आदि की गणना की जा सकती है। ध्वंसात्मक भावनाओं और विचारणाओं में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, निराश, खीझ आदि को गिना जा सकता है। जीव विज्ञानियों और मनःशास्त्रियों के अनुसार सृजनात्मक चिन्तन शरीरी पर उत्साहवर्धक अनुकूल प्रभाव डालता है और इसके विपरीत ध्वंसात्मक चिन्तन के कारण उद्विग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क किंकर्तव्यविमूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा हो जाती हैं। मकान में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पाते कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विचारने और उपाय ढूँढ़ने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्तायें, विचारणायें भभक उठती हैं।

दोनों स्तर के विचारों भावों का शरीर पर भी प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। प्रसन्नता की मनःस्थिति में मनुष्य की आँखें चमकने लगती हैं, चेहरा गुलाबी हो उठता है, गालों व पुलकन उभरी हुई दिखाई पड़ती है और समूचा मुख मण्डल दीप्तिमान हो उठता है। इस स्थिति में व्यक्ति सहज ही आकर्षक और सुन्दर प्रतीत होने लगता है। इसके विपरीत क्रोध और घृणा के आवेश में व्यक्ति काँपने और हाँफने लगता है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। चेहरे पर तनाव ओर उत्तेजना के लक्षण प्रत्यक्ष दिखाई देने लगते हैं। होठ सूख जाते हैं ओर मुँह से ऐसे शब्द निकलते हैं जिनसे न कुछ लाभ होता है और न ही किसी प्रयोजन की सिद्धि होती है। इसके विपरीत आरोप और अपमान का ऐसा वातावरण बनता है, बन जाता है कि दूसरों की अपेक्षा अपनी ही हानि अधिक होती है।

विचारों और भावनाओं की शक्ति को, उनके प्रभावों को समझना चाहिए तथा सही ढंग से विचार करने की शक्ति विकसित करनी चाहिए ताकि जीवन को सरस, सरल, सुखद तथा आनन्दपूर्ण बनाया जा सके।


अर्न्तगही जीवधारियों में स्नेह, सहयोग भी बढ़ेगा

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कई व्यक्तियों के नित्य सम्पर्क में आना पड़ता है और विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ व्यक्तियों का व्यवहार या कुछ परिस्थितियाँ मन को अनुकूल प्रतीत होती हैं और कुछ प्रतिकूल। अनुकूल व्यवहार अथवा परिस्थितियाँ पाकर सुखा होना स्वाभाविक है, उसी प्रकार प्रतिकूल व्यवहार या परिस्थितियाँ पाकर क्षोभ भी होता है। बहुधा यह क्षोभ इतनी उत्तेजना उत्पन्न करता है कि व्यक्ति अपने पूरे आवेग से उन परिस्थितियों को नष्ट कर देने के लिए चढ़ दौड़ता है। यह आवेग कई बार इतना तीव्र होता है कि व्यक्ति अपनी समझ बूझ और विवेक को ताक पर रखकर अपनी शक्तियों को नष्ट-भ्रष्ट करने लगता है। इस प्रकार की आवेगपूर्ण स्थिति को क्रोध भी कह सकते हैं।

क्रोध के समय व्यक्ति यह भूल जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। इस स्थिति में क्रुद्ध व्यक्ति अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को बड़ी बुरी तरह नष्ट कर चलता है। जब किसी व्यक्ति पर क्रुद्ध हुआ जाता है, कोई व्यक्ति दूसरे पर या परिस्थितियों पर क्रोध करता है तो वह दूसरे व्यक्ति में भी संचरित हो जाता है ओर ऐसी दशा में लड़ाई से लेकर आत्मघात जैसी स्थितियाँ बन जाती है।

क्रोध के सम्बन्ध में अब तक किये गये अध्ययनों के अनुसार एक स्वस्थ, शान्त व्यक्ति कमजोर, दुर्बल और तनावग्रस्त व्यक्ति ज्यादा क्रोधित होता है। कहावत प्रसिद्ध भी है कि ‘कम कुब्बत गुस्सा बहुत।’ वैसे नीति शास्त्रियों के अनुसार क्रोध करना आवश्यक भी है। किन्तु नीतिकारों ने जिस क्रोध को आवश्यक बताया है उसके सम्बन्ध में यह भी लिखा है कि वह विवेकपूर्ण होना चाहिए। यदि क्रोध को पूरी तरह त्याग दिया जाय तो अनीति, अन्याय का विरोध, दुष्ट तत्वों का दमन और असुरता का प्रतिकार किस प्रकार सम्भव होगा ? मनीषियों ने अनीति, अन्याय, दुष्टता और असुरता का प्रतिरोध करने के लिए सात्विक क्रोध का उपदेश किया है। पर मनोविकार के रूप में जिस क्रोध की यहाँ चर्चा की जा रही है वह निश्चित ही अमंगलकारी ओर हानिप्रद है। कवि बाणभट्ट ने इस मनोविकार के सम्बन्ध में कहा है, ‘अति क्रोधी मनुष्य आँख वाला होते हुए भी अन्धा ही होता है।’ वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-क्रोध प्राणों तलवार के समान है और सर्वनाश की ओर ले जाने वाली राह है।

क्रोध का मन की दूसरी दुःखकारी भावनाओं से गहरा सम्बन्ध है। यदि क्रोध शीघ्र ही समाप्त हो जाए तो उससे होने वाली शक्ति का क्षरण तत्काल रुक ही जाता है, पर यदि क्रोध मन की गहराइयों में पहुँचकर जम जाए तो वह बैर की भावनाएँ बन जाती है और दूसरों के गुण, प्रेम, भावना, उच्च संस्कार सब भूलकर प्रतिपक्षी का नुकसान करने, दूसरे को हानि पहुँचाने की बुरी भावना निरन्तर सताती रहती है। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार जब क्रोध आता है तो शरीर की आन्तरिक तथा बाह्य क्रियाएँ सभी प्रभावित होती है। इस स्थिति में कुछ रसायनों की उत्पत्ति अधिक होने लगती है ओर कुछ की कम। फलतः शरीर स्वास्थ्य को बुरी तरह क्षति पहुँचती है।

क्रोध आते ही शरीर की माँसपेशियाँ खिंचने लगती हैं। हाथ और पैर की माँसपेशियों में तो विशेष रूप से खिंचाव आता है क्योंकि लड़ाई की स्थिति में इन्हीं अंगों को सबसे ज्यादा जोखिम उठाना पड़ता है। चेहरे पर भी खिंचाव आने लगता है। माँसपेशियों के खिंचाव का परिणाम पूरे शरीर पर पड़ता है और हाथ-पैर तथा चेहरे के अतिरिक्त अन्य अंग भी खिंचने-सिकुड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त क्रोध की अवस्था में श्वसन संस्थान भी बहुत प्रभावित होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सब इस कारण होता है कि क्रोध की अवस्था में शरीर ऊर्जा का तेजी से क्षरण होने लगता है। इस क्षरित ऊर्जा की पूर्ति के लिए श्वसन क्रिया तीव्र हो जाती है। फेफड़े पहले की अपेक्षा अधिक क्रियाशील होने लगते हैं और साँस की गति बढ़ जाती है। साँस की गति बढ़ जाने से, तेजी से साँस लेने और तेजी से साँस छोड़ने के कारण शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक पहुँचने लगती है जो वहाँ उपस्थित भोजन से अतिरिक्त ऊर्जा का अवशोषण करती है।

क्रोध की स्थिति में शरीर अपनी सुरक्षा व्यवस्था के अनुसार विभिन्न परिवर्तन करता है। उस समय यकृत भी अधिक मात्रा में ग्लाइकोजिन निकालने लगता है। इस प्रकार जो अतिरिक्त ऊर्जा का क्षरण होता है। उसकी पूर्ति यदि न की जाय तो शरीर में कई विकार ओर रोग पनपने लगते है। उदाहरण के लिए ज्यादा क्रोध करने वालों को रक्तचाप तथा हृदय सम्बन्धी रोग होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है। यह तो सभी जानते है कि जब क्रोध आता है तो हृदय की धड़कन पर आम स्थिति की अपेक्षा कई गुना अधिक दबाव पड़ता है। इस स्थिति में हृदय की धड़कन बढ़ जाने के कारण शरीर में रक्त का परिभ्रमण भी पहले की अपेक्षा ज्यादा होने लगता है।

क्रोध की स्थिति में पाचन क्रिया भी विशेष रूप से प्रभावित होती है। एक प्रकार से उस समय तो पाचन संस्थान अपना काम करना ही बन्द कर देते हैं। उदर तथा आँत की क्रियाशीलता उस समय अत्यन्त मन्द पड़ जाती है। इस सम्बन्ध में किये गये अध्ययनों से यह निष्कर्ष सामने आए हैं कि अगर गुस्से की स्थिति में कुछ भी खाया जाय तो उसका पाचन नहीं होता है बल्कि उस समय पेट में जो भोजन रहता है उसका पाचन बन्द हो जाता है। कई लोगों को इसी कारण अत्यन्त क्रोध की अवस्था में उल्टियाँ होने लगती है। जी मिचलाने, उबकाई आने और पेट में भारीपन अनुभव होने की शिकायतें तो बहुतों को होती है।

क्रोध की अवस्था में यह भी देखा गया है कि मुँह एकदम सूख जाता है। उस समय मुँह के भीतर लार बनने की प्रक्रिया एकदम मन्द पड़ जाती है यही कारण है कि गुस्सा उतर जाने के बाद बहुतों को जोर की प्यास लगती है। कई लोग तो क्रोध की स्थिति में ही पानी पीते हैं। ‘पानी पी-पीकर कोसने’ की उक्ति सर्वविदित है। इस अवस्था में ठीक से बोलते भी नहीं बनता, क्योंकि मुँह की वे ग्रन्थियाँ जो बोलने में विशेष रूप से सहायक होती है, अकड़ने-जकड़ने लगती हैं और उस कारण शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं हो पाता। ‘त’ के स्थान पर ‘ट’ या ‘प’ के स्थान पर ‘फ’ जैसे शब्दों का उच्चारण न चाहते हुए भी हो ही जाता है।

आँखों पर भी क्रोध का प्रभाव पड़ता है। उस समय आँख की दृष्टि सीमा में फैलाव आ जाता है। यही कारण है कि बहुत अधिक क्रोध करने वालों को कई नेत्र रोग उत्पन्न हो जाते है। शरीर के विशेष अंगों पर क्रोध के प्रभाव की ही यहाँ चर्चा की गई है। वस्तुतः तो पूरा शरीर ही क्रोध से प्रभावित होता है और उस स्थिति का हजारों नसों पर दबाव पड़ता है। तंत्रिका तन्त्र भी इससे प्रभावित होता है।

इस सर्वनाशकारी क्रोध पर कैसे नियन्त्रण किया जाय ? बहुधा देख गया है क्रोध न करने का संकल्प लेने के बावजूद भी कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जब सारे संकल्प विकल्पों को तोड़कर क्रोध का आवेश उमड़ आता है। शान्त मनःस्थिति में ही यह अनुभव होता है कि क्रोध आया था। क्रोध पर विजय प्राप्त करने में ध्यान धारणा और शान्त चित्त से उपासना से बड़ी सहायता मिलती है।

मस्तिष्क को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों और अप्रिय व्यवहार में भी उत्तेजित न हो। उस शान्त और सन्तुलित मनःस्थिति का प्रभाव सामने वाले व्यक्ति पर तो पड़ता ही है, अपने व्यक्तित्व में भी दृढ़ता, शान्ति और प्रफुल्लता का अभिवर्धन होता है। कुल मिलाकर क्रोध पर विजय प्राप्त करना हजारों शत्रुओं को जीत लेने के बराबर है।


बुद्धं शरणं गच्छामि

संरक्षण और अनुशासन का कितना महत्व है इसे हम पृथ्वी के इर्द-गिर्द चढ़े हुए पर्यावरण को देखकर सहज ही जान सकते है।

शरीर पर जो चमड़ी की परत चढ़ी है उसे संरक्षण कह सकते हैं। इससे भीतर की रक्त, साँस सम्पदा को अपने स्थान पर बने रहने के सुरक्षा मिलती है। हवा में उड़ती रहने वाली विषाक्तता त्वचा के आवरण से ही भीतर नहीं पहुँच पाती अन्यथा धूलिकणों का सीधा प्रवेश रक्त माँस तक जा पहुँचता और उस कोमल शरीर सम्पदा का देखते-देखते विषाक्त एवं रुग्ण बना कर रख देता। साथ ही यह भी आशंका बनी रहती है कि भीतर की वस्तु तनिक सा दबाव पड़ते ही बाहर निकल कर इधर उधर छितराने लगती। त्वचा का संरक्षण ही है जो बहुमूल्य कायिक ढाँचे को सुसंचालित रखे रह रहा है।

अभिभावकों का संरक्षण न हो तो शिशुओं का निर्वाह एवं भरण-पोषण किस प्रकार सम्भव हो ? अनुशासन सिखाये बिना वे सभ्यता और शिक्षा का लाभ कैसे ले सकें ?

शासन देश का संरक्षण करता है ओर प्रजाजनों पर अनुशासन रखता है। नागरिकों को दुष्प्रवृत्तियों से रोकने और उपयुक्त किया-कलाप अपनाने की प्रेरणा देना एवं व्यवस्था जुटाना शासन का काम है। यदि वह इतना न कर सके तो स्वयं नष्ट होगा ओर समूचे प्रजाजनों को ले डूबेगा। अनुशासन और संरक्षण की व्यवस्था बने रहने से ही व्यक्ति और समाज को मर्यादा में रहने और प्रगति पथ पर अग्रसर होने का सुअवसर मिलता है। इन दो तत्वों को हटा दिया जाय तो फिर उच्छृंखलता, अव्यवस्था, विग्रह और विनाश के दृश्य ही उपस्थित होगे।

न केवल मनुष्यों पर वरन् समूची सृष्टि व्यवस्था पर उन्हीं दो दबावों का आधिपत्य है। ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह तारे इसी आधार पर गतिशील रहते और अपने-अपने अस्तित्व की रक्षा करते हैं। इसमें तनिक भी शिथिलता आने लगे तो वे अपनी कक्षाओं से भटक कर जिधर-किधर दौड़ने लगें -उन्हें परस्पर बाँधे रहने वाले अनुशासन आकर्षण समाप्त हो जायें। इस अराजकता में वे अपने अस्तित्व तक की रक्षा न कर सकेंगे। ब्रह्माण्ड के सुसंचालन में अनेकानेक शक्तियाँ और व्यवस्थाएँ काम करती है। उन सबमें मूर्धन्य आधार दो ही हैं, संरक्षण ओर अनुशासन। इनकी स्थापना के उपरान्त ही प्रगति एवं समृद्धि की अन्यान्य धाराओं का क्रियान्वित हो सकना सम्भव होता है।

अपनी पृथ्वी को ही लें। उसकी सत्ता और व्यवस्था के कण-कण में यही तथ्य दृष्टिगोचर होता है। जिधर भी दृष्टि डाली जाय उधर ही क्षण-क्षण में उसी संचालन सूत्र का परिचय मिलता है। जीवधारियों की अपनी नीति मर्यादा है। जो उसे पालते हैं, वे जीवित रहते और प्रगति करते है। जो व्यतिवम पर उतारू होते हैं- उच्छ्श्रृंखलता बरतते हैं वे स्वयं नष्ट होते हैं और सम्बद्ध प्राणियों तथा पदार्थों के लिए संकट उत्पन्न करते है। अणु-परमाणुओं से लेकर रासायनिक परिवर्तनों तक के मध्य में उसी व्यवस्था का आधिपत्य है। समूचा लोक व्यवहार इन्हीं सूत्रों पर आधारित है। शिथिलता एवं उच्छ्श्रृंखलता उत्पन्न होते ही अनेकानेक समस्याएँ और विभीषिकाएँ सामने आ खड़ी होती है।

नियन्त्रण भी प्रगति प्रयासों के साथ जुड़ा रहता है। नर नारी एक दूसरे के पूरक है। एक से दूसरे की अनेकों सुख सुविधाएँ मिलती है। किन्तु साथ ही एक-दूसरे की सुरक्षा सभी रखते, संरक्षण रखते तथा भीतरी बाहरी अवांछनीयता की रोकथाम करते है। दाम्पत्य जीवन के अनेकों लाभों में सुरक्षा और सुव्यवस्था मुख्य है उन्हें संरक्षण और अनुशासन भी कहा जा सकता है। इसे दोनों समान रूप से बरतते हैं। पत्नी व्रत और पतिव्रत इसी नैतिक सुनियोजन का नाम है।

पृथ्वी के ऊपर 5 किमी से 26 किमी तक जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते हैं तापक्रम कम हो जाता है। ओर अन्ततः -45 सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है। 5 किमी से 13 किमी का क्षेत्र ट्रोपोस्फीयर कहलाता है। इससे आगे ट्रैटोस्फीयर आरम्भ होता है जो 40 किमी तक है इस क्षेत्र में क्रमशः तापक्रम बढ़ता तथा-35 सेंटीग्रेड तक जा पहुँचता है। ओजोन की परत इसी क्षेत्र में होती है। 20 से 240 किमी तक का क्षेत्र ट्रेटापोज है। इसे रेडियोएक्टिव क्षेत्र भी कहा जाता है। रेडियोएक्टिव विकिरणों का सर्वाधिक तरंगदैर्ध्य 2500 इस क्षेत्र में पाया जाता है।

यह एक प्रकार की संरक्षण परतें हैं जिसके कारण अन्तरिक्ष के विकिरणों का धरती पर अनावश्यक प्रवेश न हो सके। साथ ही धरती की ऊर्जा एवं सम्पदा आकाश में उड़कर नष्ट भ्रष्ट न होने लगे।

वातावरण एक छाते की तरह हे जो हमें हानिकारक अन्तरिक्षीय विकिरणों से बचाता है। ओजोन जैसी सक्रिय गैसें अन्तरिक्षीय विकिरणों को रोकती तथा उनके हानिकारक प्रभाव से हमारी सुरक्षा करती हैं। अमेरिकी सर्वेक्षण द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि ऊँची हवाई जहाजों की उड़ानों से ओजोन की यात्रा वातावरण में कम होती जा रही है जिससे रेडियोएक्टिव विकिरणों ओजोन परत को छोड़कर पृथ्वी पर आ रही हैं। जिसके प्रभाव से चमड़ी में जलन, कैन्सर जैसी बीमारियाँ बढ़ रही है। पेड़ पौधों के विकास में बाधा पड़ती है। वातावरण में असामान्य परिवर्तन होता है। सूखा बाढ़, तूफान आता है। ओजोन परत सूर्य से उत्सर्जित 1650 से 3200 की तरंगदैर्ध्य वाली गामा किरणों को अवशोषित कर लेती है। सर्वविदित है कि ‘गामा’ किरणें विषैली होती है। पर सुपरसोनिक ट्रान्सपोर्ट एयरक्राफ्ट इस ओजोन रक्षा कवच को क्षति पहुँचाते हैं। जहाजों की ऊँची उड़ानों को रोकने के लिए अमेरिका द्वारा एक प्रोग्राम क्लाइमेटिक इम्पैक्ट एसेसमेन्ट भी चलाया गया था। सुपरसोनिक ट्रान्सपोर्ट से दो प्रकार की हानियाँ होती है। (1) यानों से निकलने वाली एक्जास्ट गैसें नाइट्रस आक्साइड, नाइट्रिक आक्साइड ओजोन से मिलकर आक्सीजन बनाते हैं (2) ऊँची उड़ान भरने वाला काॅन्कर्ड यान ऐरोसाल स्प्रे निकालता है जिसमें क्लोरीन की बहुलता होती है जो ओजोन के साथ क्रियाशील होकर आक्सीजन बनाता है। इस प्रकार ओजोन की रक्षा परत नष्ट होती जाती है। इस स्थिति को देखते हुए अमेरिका सरकार ने काॅन्कर्ड विमानों को अपने ऊपर से उड़ान भरने से रोक लगा दी हैं।

वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि घटती हुई ओजोन की यात्रा मानव जाति के लिए हानिकारक सिद्ध होती। ‘वातावरण में एक प्रतिशत ओजोन की कमी होने से रेडियोएक्टिव विकिरण जिसे यू.पी.वी. फलक्स कहते हैं, दुगुना हो जाता है । जिसके फलस्वरूप प्रतिवर्ष 200000 व्यक्ति कैन्सर के शिकार होते है। ओजोन की कमी के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी हो जाती है, जिसके कारण उनकी वृद्धि रुक जाती है। वातावरण में असन्तुलन पैदा होता है। नवीन आँकड़ों के अनुसार सन् २०२५ तक दुनिया की आबादी दुगुनी हो जाती है। जबकि अनाज की वृद्धि कम हो रही है। वर्तमान वृद्धि को देखते हुए हवाई उड़ानें 6 गुनी हो जायेंगी। वायु प्रदूषण कितनी तेजी से बढ़ रही है यह उपरोक्त आँकड़े बताते हैं। इसी का ध्यान में रखकर सी.ओ. ए.पी. प्रोगाम का गठन किया गया है।

सृष्टि क्रम एवं पृथ्वी का वातावरण एक संरक्षण नियन्त्रण व्यवस्था के अन्तर्गत ही सुरक्षित एवं गतिशील है। मनुष्य के लिए भी यह अनुशासन अभीष्ट है। उसे जब दूरदर्शी बुद्धिमता के साथ स्वेच्छा पूर्वक अपनाया जाता है तो उसे संयम कहते है। संयम की महिमा सर्वविदित है।


समय का मूल्य समझिये

अतीत को वापिस लाना जागरूकों का दायित्व

भारत के गौरव भरे अतीत का आधार भूत कारण तलाश करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यहाँ के महान जीवन दर्शन ने जन-जन को प्रभावित किया। उसे अपनाकर वे देवमानव बने और अपनी उत्कृष्ट क्रिया पद्धति से सम्पर्क क्षेत्र भारत तक सीमित था, तब यह भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाई। जब विश्व भर में बादलों की तरह जा पहुँचने क अवसर मिला तो उन देव मानवों ने उन सभी क्षेत्रों का समुन्नत ओर सुसंस्कृत बनाया जहाँ उन्हें खड़े होने को जगह मिल गई।

कहना न होगा कि उन दिनों अपना देश जगद्गुरू कहलाता था, भावनात्मक ओर बौद्धिक अनुदान देने के लिए जिसके पास प्रचुर ज्ञान सम्पदा के भण्डार हों, उसे अध्यापक मार्ग दर्शक एवं उदार अनुदानी का यह गौर सम्पदा पद मिलना ही चाहिए। उन दिनों भारत ने चक्रवर्ती शासक का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाया था यह भार कुशल व्यवस्थापक एवं समर्थ शक्तिवान ही वहन कर सकता हैं इस देश के महान नागरिकों में वह क्षमता प्रचुर परिमाण में विद्यमान थी, उन दिनों भारत ईस्वी सम्पदाओं का स्वामी था। समृद्धि और सन्मति का अन्योन्य सम्बन्ध है। सद्भावना और सत्प्रवृत्तियाँ के धनी सम्पन्न तो रहेंगे ही। दरिद्र उन तक पहुँच ही कैसे सकेगा जो स्वंयं वैभववान है वही तो दूसरों को कुछ देने में समर्थ हो सकेगा।

विश्व इतिहास भारत के अनुदानों का ऋणी है। जो बदला न माँगे, और अनुदानों की अनवरत वर्षा करे, उस के प्रति मानव अन्तःकरण को कृतज्ञ तो होना ही चाहिये उस देश को विश्व मानव की गहन श्रद्धा उपलब्ध होती है। अस्तु यहाँ के नागरिकों को देवता और उनके निवास क्षेत्र को स्वर्ग कहा जाना अत्युक्तिपूर्ण नहीं, सहज स्वाभाविक एवं स्तर के अनुरूप ही है।

आश्चर्य होता है कि उन दिनों आज की तुलना में साधनों का भारी अभाव था। वे सुविधायें थी ही नहीं, जिनका लाभ आज हर मनुष्य को मिलता है। नदियों के पुल, रेल, मोटर, वायुयान आदि के साधन न होने पर लम्बी यात्रायें कितनी कठिन रही होंगी। प्रेस, प्रकाशन, कागज आदि का प्रबन्ध न रहने पर विचार विस्तार कितना कठिन रहा होगा। बिजली न होने पर उद्योग कितने सीमित रहे होंगे डाक-तार रेडियो की व्यवस्था न होने पर कितना सीमित, महँगा और कष्ट साध्य रहा होगा, इसकी आज तो कल्पना भी कठिन है। विशाल उद्योगों ओर संयंत्रों का तब कहीं अता-पता भी नहीं था। आत्म रक्षा के लिए तीर-कमानों पर निर्भर रहना पड़ता था। दुर्भिक्ष पड़ने पर अन्न जल के अभाव में उस क्षेत्र के निवासी तड़प तड़प कर मर जाते थे। न परिवहन के साधन थे न साधनों का इतना बाहुल्य कि अपनी आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त बचत बाहर भेजी जा सकें। शिक्षा, चिकित्सा, कला, शिल्प आदि का जो थोड़ा बहुत विकास हुआ था उसका लाभ राज परिवार के लोग ही उठा पाते थे। भवन, वस्त्र, व्यंजन, विनोद के साधन सीमित थे। फलतः सम्पन्न लोगों को ही उनकी सुविधा मिलती थी। नकली दाँत ओर नकली आँख सर्व साधारण का तब कहाँ उपलब्ध थी, माचिस और सुई तक की सुविधा नहीं थी । अंगों का प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों की तब कहीं कल्पना भी नहीं थी। मुद्रा, बैंक, बीमा, जैसी सुविधाओं क न होने से अर्थव्यवस्था कितनी सीमित रही होगी, इसका अनुमान लगाना, उनके लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए जो वर्तमान और भूत का तुलनात्मक अध्ययन कर सकने में समर्थ है।

इतने पर भी पूर्वज कितने स्वस्थ, कितने समर्थ, कितने सम्पन्न, कितने उदार, कितने साहसी, कितने सुसंस्कृत और कितने पराक्रमी थे, इसका कारण ढूँढ़ने पर इसी तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि उन दिनों उत्कृष्ट जीवन दर्शन जन-जन के चिन्तन में आत-प्रोत था गति विधियों में आदर्शवाद अनुप्राणित था। चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। दृष्टिकोण को दर्शन कहते है। कर्तृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। भारत की आस्था अध्यात्म पर केन्द्रीभूत थी फलतः व्यक्तियों में महानता भरी रही। उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न को देवता कहते है। देवता स्वयं महान होते है। इसलिए उनके सहज अनुदान सम्पर्क क्षेत्र को समुन्नत बनाते रहते है। बादल, पारस, चन्दन की समीपता से मिलने वाले लाभों को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रह जाता कि किस प्रकार हमारे पूर्वज धन्य बनते और असंख्यों को धन्य बनाने का श्रेय सौभाग्य प्राप्त करते होंगे। कार्यों की संरचना तो समान थी, पर साधनों की नितान्त कमी रही, इतने पर भी अतीत की गौरव गरिमा का देखते हुए यह कहना पड़ता है कि उच्चस्तरीय जीवन दर्शन प्रत्यक्ष देव वरदान है। यह जिन्हें उपलब्ध होगा, उनकी गरिमा वैसी ही रहेगी, जिसकी चर्चा करने, सुनने में इतिहास विद्यार्थी पुलकित, गद्गद हो उठते है।

भारतीय अध्यात्म और दर्शन का सार तत्व इतना ही है कि शरीर की तरह आत्मा को भी महत्व देना और भौतिक सुख-साधनों की तरह ही आत्मिक सन्तोष और गौरव को महत्व देना, आत्मा का जानते है वे यदि उसको वरिष्ठता पर शरीर सज्जा जितना ध्यान दे सकें तो उनके लिए उभय पक्षीय प्रगति योजना बनाना और उसे कार्यान्वित कर सकना तनिक भी कठिन नहीं पड़ता शरीर की आवश्यकता सीमित है। उसकी पूर्ति स्वल्प श्रम और समय लगाने भर से अत्यन्त सरलता पूर्वक पूरी होती रह सकती है। इसके उपरान्त इतना कुछ बच रहता है जिसे आत्मोत्कर्ष में लगाना और फलस्वरूप देवोपम महानता उपलब्ध कर सकने में कहीं कोई कठिनाई शेष नहीं रह जाती। अवरोध एक ही है शरीर को सब कुछ मान लेना और उसी के सुख-साधनों की ललक में निमग्न रहना, यदि इस कुटेव से छूटा जा सके तो उस विवेक का उदय हो सकता है, जो आस्थाओं और आकांक्षाओं का उच्चस्तरीय बना कर नर को नारायण बना देता है।

प्राचीन काल में यही दूरदर्शी, विवेक शीलता अपनाई जाती है। वह परम्परा जब तक अपनाई गई तब तक गरिमा भी अक्षुण्ण रही, शिथिलता आई तो स्वार्थ परता की जड़ जमने लगी। एक सीढ़ी और नीचे उतरने पर व्यक्ति दादी लिप्सा ही सब कुछ बन गई। फलतः निकृष्टता के प्रवाह में लोक मानस बहने लगा। आज की अनेकानेक विकृतियों एवं विभीषिकाओं का मूल भूत कारण एक ही है आस्थाओं का अधोगामी होना, सभी जानते हैं कि मनःस्थिति कि अनुरूप परिस्थितियाँ बनती है। निकृष्ट दृष्टिकोण अपनाने की प्रतिक्रिया ही विपत्ति बन कर बरसती हैं आज हम बस इसी कुचक्र में फँसे अगणित संताप और संकट सह रहे है।

अभ्यस्त होने पर तो गन्दगी के बीच रहना भी रुचने लगता है। कई कैदी छूटते ही फिर जेल जाने की तैयारी करते हैं। नशेबाजों की अपनी दुनिया है। भिखारी अपनी आदतों में जकड़े होते है। अपराधियों को घिनौनी जिन्दगी भी अखरती नहीं। आज की हेय परिस्थितियाँ जिन्हें रुचने लगी है और ढर्रा अभ्यास में आ गया ह उनकी बात दूसरी है। अन्यथा जो पतन और उत्थान के मध्यवर्ती अन्तर का समझ सकें, जो लदी हुई परिस्थितियों की समीक्षा कर सकें, उन्हें यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि जिस स्तर का जीवन इन दिनों जिया जा रहा है, उसमें न सुविधा है, न शान्ति, न गौरव है न भविष्य। मात्र आदतों का कुचक्र ही जकड़े हुए है। दाद खुजाने ओर रक्त बहाने की विपन्नता भी कई बार रुचने लगती है और उससे छूटने की इच्छा नहीं होती। यह सब होते हुए भी जिस पर्यवेक्षक को यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि हम विपत्तियों में फँस गये हैं और विनाश की दिशा में बढ़ रहे है।

स्वास्थ्य दिन-दिन दुर्बल होता जा रहा है। रुग्णता के

पैने पंजे काया में गहराई तक घुसते जा रहे है। भीतर कुछ, बाहर कुछ का छद्म अन्तराल का सारा सन्तुलन गड़बड़ाये दे रहा है। दुहरा व्यक्तित्व अन्तर्द्वन्द्व खड़े करता है और उनसे अगणित उद्विग्नतायें एव सनकें उत्पन्न होती हैं। आम आदमी आज दिग्भ्रान्त, उद्विग्न, विक्षुब्ध होकर विक्षिप्तों जैसी मनःस्थिति लिए फिरता है। न चैन है न सन्तोष। न आशा है न उल्लास। सरसता और प्रसन्नता देने वाला मनःक्षेत्र जब श्मशान जैसा बीभत्स बन चले तो फिर जीवन का आनन्द समाप्त ही समझा जाना चाहिए।

आर्थिक अभाव हर किसी को खा रहा है। कम कमाने वालों की तरह अधिक कमाने वाले भी अर्थ संकट का रोना रोते हैं। पारिवारिक क्षेत्र में मात्र यौनाचार के कहीं कुछ आकर्षण दिखाई नहीं देता। न सहयोग न सौजन्य। न स्नेह है, न सद्भाव, भेड़ों के बाड़े की तरह परिवारों में घिचपिच ओर भीड़-भाड़ तो रहती है पर उनमें वह वातावरण कहीं नहीं दीखता, जिसके आधार पर घर घरौंदे स्वर्गीय संवेदनाएँ का रसास्वादन करते है। समाज से सम्पर्क तो रहता है पर उसका स्तर उचक्कों से आगे नहीं उठता। एक दूसरे पर घात लगाने और नीचा दिखाने की ही दुरभिसंधियाँ रचते रहते हैं। मित्रता के सहारे शत्रुता का कुछ ऐसा प्रचलन हो गया है कि साथी से भी सतर्क रहना पड़ता है। विश्वास और वफादारी की प्रथा ही उठती जा रही है और उसका स्थान कुटिलता को मिल रहा है। नीति और मर्यादा कहने सुनने भर के लिए बच रही है। अनास्था के वातावरण में अविश्वास, सन्देह, भय एवं आशंकाओं का घटाटोप ही छाया रहता है। नैतिक अराजकता में मानवी मूल्य अस्त-व्यस्त होते चले जा रहे है।

गतिविधियाँ और प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिनसे विनाशकारी भविष्य दिन-दिन निकट आता जा रहा है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कोलाहल घटन, रासायनिक खाद, कीट नाशक छिड़काव, जनसंख्या वृद्धि, अपराधों का

वर्गों के बीच छीना झपटी, राजनैतिक प्रतिस्पर्धा एवं अणुयुद्ध की तैयारी के फलस्वरूप जो घटित होने वाला है उसका अनुमान लगाने से यह तथ्य सामने आ खड़ा होता है कि विनाश की विभीषिका अब बहुत दूर नहीं रह गई। इन घटाओं में से हर एक ऐसी है जो इस छोटी सी धरती पर बसे हुए मात्र 800 करोड़ जनसमुदाय का अस्तित्व खतरे में डालने के लिए पर्याप्त है। फिर इनमें कई प्रबल हो उठें तो उनकी संयुक्त विनाश लीला सर्वनाश करके ही रहेगी।

व्यक्तिगत जीवन में घुसी विकृतियाँ ही, समाज गत विभीषिकाएँ बनती है। मनुष्यों का समुदाय ही समाज है। मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ ही संयुक्त होकर व्यापक परिस्थितियाँ बनती हैं। प्राचीनकाल में व्यक्ति के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टतावादी जीवन दर्शन ओत-प्रोत था। फलतः साधनों की कमी रहने पर भी उन दिनों देवत्व उभरा-उभरा फिरता था। आज सुविधाओं की कमी नहीं। शिक्षा और परम्परा का आश्चर्यजनक उत्कर्ष हुआ है। विज्ञान और व्यवसाय में ही नहीं कला और शिल्प में भी अभ्युदय के उच्च शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई है। इतने पर भी मनुष्य दिन-दिन दुर्बल दरिद्र एवं पतित होता चला जा राह है। वर्तमान संकटों में भरा भविष्य अन्धकारपूर्ण है। इस विषष्ठजा का दोष तो किसी पर भी जा सकता है, पर वास्तविकता एक ही है मनुष्य ने निकृष्ट जीवन दर्शन अपनाया और संकटों के दलदल में जा फँसा।

स्थिति में परिवर्तन लाया जाना आवश्यक है। यथा स्थिति नहीं रहने दी जा सकती। क्योंकि प्रवाह यथावत चलते रहने दी जा सकती। क्योंकि प्रवाह यथावत चलते रहने दी जा सकती। क्योंकि प्रवाह यथावत चलते रहने पर सर्वनाशी विनाश के गत में जा गिरना कुछ ही समय की बात रह जायेगी कोई नी चाहता कि ऐसा हो। मूर्धन्य विग्रही सत्ताधारी भी ऐसा नहीं चाहते। जिसने अनौचित्य को अपना कर अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारी है वह भी उपभोग और विलास भर चाहता है। विनाश नहीं, ऐसी दशा में सभी चिन्तित हैं कि प्रवाह को उलटा जाय, परिस्थितियों को सुधारा जाया हर किसी को उत्थान अभीष्ट है, पतन नहीं। विकास अभीष्ट है, विनाश नहीं। इतने पर भी कुचक्र ऐसा फँस गया है, जिसमें से निकलते नहीं बनता।

परिवर्तन और प्रगति के लिए जो सामुदायिक प्रयास चल रहे हैं, उनमें समृद्धि संवर्धन प्रमुख है। सुरक्षा व्यवस्था शिक्षा आदि भी उत्थान योजनाओं में सम्मिलित हैं, यह सभी प्रयत्न सराहनीय होते हुए भी निश्चित रूप से एकांगी हैं। चिन्तन और चरित्र को साथ सम्बद्ध व्यक्तित्व को परिष्कृत करने को भी समझा जाना चाहिए ही अनुभव किया जाना चाहिए कि जीवन दर्शन ही वह बीज है, जिसकी परिणित, परिस्थितियों का वृक्ष बनती है। दार्शनिक क्रान्ति के सहारे ही मनुष्य की आस्थाओं को ऊँचा उठाया जा सकेगा। उस क्षेत्र का उत्कर्ष ही चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्घि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेंगे।

युग परिवर्तन अभियान के अन्तर्गत इस उपेक्षित को उजागर करने ओर उसे अपनाने में जन-जन को सहमत करने के लिए प्रयत्न किये जा रहे है। इन्हें चिर पुरातन के साथ चिर नवीन की संगति बिठा देना भी कहा जा सकता है। विचार क्रान्ति की लाल मशाल इसी स्तर का आलोक वितरण कर रही है। लक्ष्य है-जन मानस का सद्भावनाओं का सम्वर्धन सत्प्रवृत्तियों का उभार, परिष्कार इस प्रयास में जितनी सफलता मिलेगी, उसी अनुपात से विभीषिकाओं का निराकरण और सुखद सम्भावनाओं का निर्धारण सहज क्रम से होता चला जायेगा।

युग परिवर्तन का तात्पर्य है-जीवन दर्शन में उत्कृष्टता का समावेश। यह जहाँ भी जितनी मात्रा में होगा, वहाँ परिवर्तन का एक लक्षण निश्चित रूप से प्रकट होगा। लोभ-लिप्सा में कटौती और उस बचत का सत्प्रवृत्तियों के समाधान में नियोजन। प्राचीन काल में वही होता रहा है। महत्वाकाक्षाओं को तृष्णा के गर्त में गिरने से रोका जाना और सामर्थ्य को सत्प्रयोजनों में लगाया जाना ही देव दर्शन है। भारतीय नागरिक श्रद्धापूर्वक इस अपनाते रह और आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याण का दुहरा लाभ उठाते हुए मनुष्य जन्म को धन्य बनाते रहे।

जीवन का आधा भाग शक्ति संचय एवं सम्पत्ति संवर्द्धन में लगाया जाना ही ब्रह्मचर्य ओर गृहस्थ है। शेष आधा जीवन सम्पदा परमार्थ प्रयोजन में लगाया जाना आवश्यक था। यही था वानप्रस्थ ओर संन्यास। आदर्शवादिता कहने सुनने तक सीमित रखने की वस्तु स्थिति नहीं है। इस प्रतिपादन की उपयोगिता क्रियान्वयन में ही है। उपासना का बीजारोपण जीवन साधना की उर्वर भूमि पर ही उगता और फैलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?

व्यक्ति और समाज को विनाश से बचाने और प्रगति पथ पर आगे बढ़ाने काएक ही उपाय है-मानवी जीवन दर्शन में क्रान्तिकारी परिवर्तन। इस परिवर्तन का स्वरुप है-सामर्थ्य का स्वार्थपरता में न्यूनतम और परमार्थ परायणता में अधिकतम उपयोग। सम्पदा का उपभोग नहीं उपयोग होना चाहिए। संग्रह नहीं वितरण लक्ष्य बनना चाहिए। अमीरी नहीं महानता बढ़ानी चाहिए। इसके लिए दूसरों को परामर्श देने की अपेक्षा अपने को तत्पर करना अधिक कारगर सिद्ध हो सकता है। युग-निर्माण परिवार के परिजनों से यह महान परिवर्तन अपने आप में आरम्भ करने के लिए कहा जा रहा है। प्राचीन काल जैसी सुखद परिस्थितियों को वापिस लौटाने का एक ही मार्ग है-पूर्वजों की परम्परा एवं संस्कृति का अनुकरण। इस मार्ग पर जागरुकों को अग्रिम पंक्ति में चलना है ताकि अनुकरण करने के लिए असंख्यों को पीछे आने का साहस जुटाना सरल सम्भव हो सके।


लेने वालों की नहीं-देने वालों की पंक्ति में खड़े हों

भूमि की उर्वरता बीज के सहारे, पेड़ पौधे बन कर प्रकट होती है। इस तथ्य को न समझने वाले, वृक्ष के विशाल रूप को ही सब कुछ मानते रहते है। व्यक्ति रूपी वृक्ष और समाज रूपी उद्यान के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष चर्चा जो भी होती है- पर तथ्य इसी ओर इंगित करेंगे कि भूमि में कितनी उर्वरता रही और बीजारोपण में कितनी कुशलता बरती गई। प्राचीन काल के उत्थान ओर आज के पराभव की तात्विक विवेचना कर सकना जिनके लिए सम्भव हो वे उसका कारण एक ही पायेंगे-जीवन दर्शन में परिवर्तन। जिन दिनों आस्था ओर आकाँक्षा में शरीर निर्वाह के लिए भौतिक उपार्जन ओर आत्म पोषण के लिए परमार्थ प्रयोजन पर समान रूप से ध्यान दिया जाता था, उन दिनों मनःस्थिति में उत्कृष्टता भरी रहती थी। फलतः कृर्तव्य का क्रम आदर्शवादिता में भरा रहता था। ऐसी दशा में परिस्थितियाँ सुख-शान्ति से भरी पूरी रहनी ही चाहिए थीं, रहीं भी।

आत्मा के प्रति उपेक्षा बरती जाय, उसे भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाय, तो फिर एकाकी शरीर पक्ष का मात्र सुविधा ही अपेक्षित रहेगी। आदर्शों का आत्मिक अंकुश हट जाने से वह उपभोग की लिप्सा और स्वामित्व की लालसा में कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वच्छन्दता बरतेगा और चस्का पड़ने पर उद्दण्डता अपनाने में भी नहीं चूकेगा। नीति पथ का अनुगमन छोड़ने पर जो विपत्तियाँ सामने आती हैं, वही हैं आज की विषम परिस्थितियाँ। विनाश को आमंत्रित यह विपन्नता ही करती है। आज के संव्याप्त संकट का तात्विक विवेचन इतना ही है।

समाधान ढूँढ़ना हो तो, जड़ तक जाना होगा, रक्त शुद्धि का उपाय किये बिना फोड़े-फुंसियों से छुटकारा पाना कठिन है। ऊपरी उपचारों से लीपा-पोती भर होती है। आवरण कमजोर होने पर एक छेद बन्द करते ही दूसरा अन्यत्र में खुल पड़ता है। समस्याओं का बाहरी उपचार कुछ क्षण के लिए ही थोड़ी रोक थाम कर सकता हैं। स्थायी समाधान के लिए जड़ की गहराई तक पहुँचना पड़ेगा। विपत्तियाँ आसमान से नहीं बरसतीं, वह मनुष्य द्वारा अपनाई गई रीति-नीति की प्रतिक्रिया भर होती है।

भले और बुरे परिणामों के उत्थान और पतन की पूरी पूरी जिम्मेदारी आस्था संस्थान के स्तर पर ही निर्भर रहती है। कोई उसे समझ पाये न समझे दूसरी बात है। व्यक्ति या समाज के सामने जो भी संकट है उसके बाह्योपचार और सामयिक समाधान भी होने चाहिए। पर यह न भुजा दिया जाना चाहिए कि उद्गम के छेद बन्द किये बिना फूटने वाली जलधारा इस सही, मार्ग से न उससे सही अपना रास्ता बनाती रहेगी। एक समस्या को हल करने से पूर्व ही नई उलझन उठ खड़ी होगी, इन दिनों यही हो भी रहा है। प्राचीन काल की साधन हीन परिस्थितियों में स्वर्गीय वातावरण का होना और आज देव दुर्लभ उपयोग सामग्री का बाहुल्य रहते भी दुःख दारिद्र में डूबना यही सिद्ध करता है कि उत्थान और पतन के मूल भूत कारण बाहर नहीं भीतर है। विपन्नताएँ चर्म चक्षुओं से बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर दीखती है। किन्तु तनिक सी गहराई में उतरते ही यह पता चल जाता है कि सारा प्रपंच दृष्टिकोण और दर्शन पर निर्भर है। ज्वालामुखी जैसे विस्फोट धरती की दरारों में से फूटते है। दुश्चिन्तन ही अगणित समस्याएँ उत्पन्न करता है।

भटकन को ही प्रयत्न माना जाय और उछल कूद में ही समाधान सोचा जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा गहराई तक उतरना और लोक चिन्तन की दिशा मोड़ने के लिए साहस जुटाना पड़ेगा। भले ही कितना ही कष्ट साध्य समय साध्य ओर श्रम साध्य क्यों न हो। युग समस्याओं के समाधान में यही नीति अपनानी होगी। सही निदान चिकित्सा बन पड़ती है और सही उपचार होने रोग निवृत्ति का सही आधार बनना है। आवश्यकता जीवन दर्शन में घुसे हुए विभ्रम को निरस्त करने की है। उसके स्थान पर जैसे ही दूरदर्शी विवेक की स्थापना होगी व काल जैसा स्वर्णिम युग सहज ही सामने आ खड़ा होगा।

भारतीय जीवन दर्शन का सार तत्व इतना ही है कि शरीर पोषण जितना ही महत्व, आत्मोत्कर्ष को भी दिया गया। इस सन्तुलन को बिगड़ने ने दिया जाय। शरीर पोषण के लिए उपयोगी साधन चाहिए, उनका सीमित उपार्जन और सीमित उपयोग करने की नीति अपनाई जाय, ताकि आत्मिक प्रगति के लिए समय, श्रम और विनोयोग की कुछ मात्रा बच सके। उपभोग और संग्रह की प्रवृति जब अनियन्त्रित हो जाती है तो वह वासना कहलाती है ओर लिप्सा बनकर उद्विग्नता, आतुरता का कारण बनती है। इसी प्रकार सम्बन्धित पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति अनावश्यक ममता जोड़ से स्वामित्व की अहंता बढ़ती है। सम्पत्ति का विपुल और कुटुम्बियों का धन-कुबेर बनाने का व्यामोह एक ऐसा जाल बुनते हैं, जिसमें जकड़ा हुआ मनुष्य चिन्तन और पराक्रम की दृष्टि से अपंग जैसा बनकर रह जाता है। उससे ऐसा कुछ सोचते नहीं बन पड़ता जिससे आत्मिक प्रगति, शान्ति शक्ति उपार्जित कर सकना सम्भव हो सके।

अन्तःक्षेत्र की, लोक चिन्तन की यही स्थिति जब बनी रहेगी विपत्तियों ओर विपन्नताओं का ताँता टूटने नहीं है। प्राचीन काल में अन्तःक्षेत्र की सुव्यवस्था परध्यान दिया गया था। फलतः भौतिक दृष्टि से सुखी, आत्मिक दृष्टि से समुन्नत बनने का दुहरा लाभ उनने लगा था। स्वयं धन्य बने और संसार को धन्य बनाया। आज संकीर्ण स्वार्थपरता खाये जा रही है। लोभ मोह के प्रेतों ने चिन्तन क्षेत्र पर पूरी तरह आधिपत्य कर लिया है। फलतः मनुष्य शरीरचर्या के अतिरिक्त कुछ सोचता ही नहीं। आत्म सत्ता को उसकी आवश्यकता का एक प्रकार से भुला ही बैठा है। उपभोग संचय और ममत्व के परिपोषण में ही सामर्थ्य का सारा स्त्रोत चुक जाता है। भीतर से खोखला बाहर से ढकोसला बना आज का मनुष्य अपने ओर दूसरों के लिए समस्या बन कर रह रहा है। अन्तः स्थिति के बदले बिना विषम परिस्थितियों का बदला जाना अति कठिन हैः

भारतीय जीव दर्शन की झाँकी एक दर्पण में करनी हो तो उसे वानप्रस्थ परम्परा में देखा जा सकता है। आधा समय, श्रम शरीर के लिए आधा, आत्मा के लिए नियोजित है। दोनों पहिये सही रहने पर गाड़ी ठीक तरह चलती है। दोनों टाँगों के सहारे यात्रा सही रूप में बन पड़ती है। स्वार्थ ओर परमार्थ का समन्वय होना ही चाहिए। मात्र परमार्थी शरीर यात्रा कैसे सँजोये। भाव स्वार्थी को शान्ति और प्रगति के दर्शन कैसे हो ? एकाकीपन की अपूर्णता असमंजस ही खड़ा किये रहेगी। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति का उभयपक्षीय प्रयोजन पूरा करने वाली यदि रीति-नीति अपनाई जाय तो लोक भी बनेगा और परलोक भी, सुख भी मिलेगा और सन्तोष भी, इसके विपरीत यदि आदि से अन्त तक लोभ-मोह ही छाया रहे तो समझना चाहिए कि वह सुख भी मृग तृष्णा की तरह दूर ही हटता चला जाएगा, जिसके लिए कि इतनी व्याकुलता बरती और अवांछनीयता अपनाई गई थी।

आम आदमी लोभ के लिए ही मरता और मोह के लिए ही खपता है फिर भी वह उनमें से एक को भी पूरा कर सकने में सफल नहीं होता। तृष्णा जहाँ की तहाँ बनी रहती है। कमाया सीमित ही जा सकता है। पर लिप्सा तो असीम है। खाई को मुट्ठी रेत से कैसे पाटा जाय? आग को ईधन से कैसे बुझाया जाय ? न अतृप्ति हटती न अशान्ति मिटती है। कोल्हू का बैल कैसे थकान से बचे ? इन्द्रिय तृप्ति में दाद जैसी खुजली भर है। व्यामोह में कुछ को देना और असंख्यों से छीनना होता है, इस नीति को अपनाने वाला आत्म प्रताड़ना से कैसे बचे ?

पूर्वजों का दृष्टिकोण स्पष्ट था। शरीर से काम लेना है, इसलिए स्वास्थ्य बनाये रहने भर की साधन सामग्री जुटानी हैं। सम्बन्धित कुटुम्बियों को स्वावलम्बी, सुसंस्कारी भर बनाना है, इसके लिए औचित्य की सीमा के अन्तर्गत स्नेह-सहयोग देने भर से काम चल जाता है। आवश्यक नहीं कि उनके लिए वैभव जमा किया जाये ऊँची पदवी पर पहुँचाया जाय। नागरिकों का औसत स्तर ही अपने सम्बन्धियों के लिए पर्याप्त माना जा सके तो उतनी चिन्ता न करनी पड़ेगी जितनी आज करनी पड़ती है। इसी औचित्य भरे दृष्टिकोण को सन्तोष कहते है। जो सन्तोषी है, वही सर्वदा सुखी रहता है।

दुःख तो दरिद्रता का नाम है। दरिद्रता उस पिछड़े दृष्टिकोण का नाम है जो वैभव ओर विलास की असीम कामना संजोये रहती है और अतृप्ति की आग बन कर निरन्तर जलाती है। दरिद्रता वस्तुओं की कमी को नहीं, तृष्णा की ललक को कहते हैं जो आत्म हीनता और अशान्ति बनकर तथा कथित सम्पन्नों पर भी छाई रहती है, यही असन्तोष उद्विग्नता बनकर उभरता और आवेशग्रस्त भूत पिशाचों की तरह कुकृत्य करता है यदि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ओर कुटुम्बियों का सुसंस्कारी स्वावलम्बन पर्याप्त माना जा सके तो हर किसी को आत्मिक प्रगति के लिए असीम पुरुषार्थ करने का अवसर मिल सकता है। भवबन्धन, मायापाश आदि के नाम से जिस तमिस्त्रा का अध्यात्म क्षेत्र में हेय वर्णन किया जाता है वह और कुछ नहीं मात्र विलास और स्वामित्व की वितृष्णा भर है इस भार के हलका होते ही आत्मा विश्व आकाश में स्वच्छन्द पक्षी की तरह विचरने का आनन्द लेने लगता है। इसी को जीवन मुक्ति कहते है।

यह न कठिन है, न सरल। जो वस्तु स्थिति का समझने और तदनुरूप जीवन नीति निर्धारित करने का साहस कर सके उसके लिए भव बन्धनों से मुक्ति पाना नितान्त सरल है। जिनने लोभ और मोह की हथकड़ी, बेड़ी कसकर जकड़ ली है उनके लिए व्यथा वेदना सहने ओर चिन्ता चिता में जीवित काया का जलाते रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। सफलता कितनी ही बड़ी क्यों न हों, उपलब्धियाँ किसी भी स्तर की क्यों न हों, तृष्णा से कम ही पड़ेगी और अतृप्ति घटाने में तनिक भी सहायता न करेंगी।

अपने महान पूर्वज इन शाश्वत तथ्यों से परिचित थे। इसलिए वे उत्कृष्टता अपनाते थे ओर वितृष्णा से बचते थे। फलतः उन्हें वैयक्तिक जीवन में उल्लास और उमंगों से भरे रहने का अवसर स्वल्प साधनों में ही मिल जाता था। कुटुम्बियों की अनावश्यक संख्या बढ़ाना वज्र मूर्खता का चिन्ह है। खाई खोदने और उसे पाटने का जंजाल बुने बिना जिनका काम चल सकता है वे प्रस्तुत कुटुम्ब के उत्तरदायित्व पूर्ण करना ही पर्याप्त समझते हैं। नये-नये भार लादते जाने क दुस्साहस करते हुए दुष्परिणामों का ध्यान रखते और उससे हाथ सिकोड़ते हैं। सन्तान वृद्धि कभी क्षम्य भी समझी जाती होगी पर आज की स्थिति में तो उसे अक्षम्य और अभिशाप ही कहा जा सकता है।

प्राचीन काल में भी गृहस्थ जीवन में भी थोड़ी सी अवधि ही सीमित सन्तानोत्पादन के लिए खुलती थी। शेष तीन चौथाई जीवन तो ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास में ही बीतता था। आज असीम ओर अनगढ़ सन्तानें किस प्रकार अपने अभिभावकों के लिए अभिशाप बन कर रहती हैं, इसे हर विवेकवान अच्छी तरह जानता हैं। प्राचीन काल में यह विवेक शीलता लोक प्रथा में सम्मिलित थी कि सन्तानोत्पादन का उतना ही दुस्साहस किया जाय, जितना कि उनके परिपोषण में लगन वाली सामर्थ्य से परमार्थ प्रयोजनों में घाटा न पड़ने पाये।

उन दिनों बड़ा भाई छोटे भाई-बहनों क उत्तरदायित्व सँभलता था और अभिभावकों की परमार्थ परायणता में जो उत्तरदायित्व बाधक बनते थे उन्हें अपने कंधों पर वहन करता था। आज तो अभिभावकों की सहायता करने की रीति ही बदल गई। उनसे जितना अधिक पाया जा सकें, उसे झपटना ही प्रचलन बनकर रह गया है। देने लेने वाले उसी के अभ्यस्त हो गये है। फलतः कुटुम्ब अव आत्म विकास का अभ्यास करने के माध्यम नहीं रहे। व्यामोह और अनाचार के जेलखाने बन कर रह रहें हैं।

उपयुक्त गुजारे भर का यदि पर्याप्त माना जा सके तो अर्थ संकट की शिकायत किसी को भी न करनी पड़ेगी घर के सभी लोग श्रम करें तो किसी एक पर उपार्जन का असीम भार क्यों पड़े ? सादगी और शालीनता की मितव्ययी रीति-नीति अपनाई जाय तो वे अनावश्यक खर्च क्यों बढ़े, जिनके लिए ऋणी, चिन्तित एवं अनीतिरत रहना पड़ता है संचय की निरर्थकता और अमीरी की दुष्परिणिति को ध्यान में रखा जा सके तो हर किसी के लिए हलका-फुलका जीवन जीना और परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत कुछ कर सकना सम्भव हो सकता है। आत्मिक प्रगति का अवसर वहीं मिलेगा, जहाँ इस प्रकार की मनःस्थिति एवं परिस्थिति बन रही होगी।

कितनों का ही संचित उपार्जन इतना होता है, जिस की बैंक ब्याज भर से निर्वाह क्रम अत्यन्त सरलता पूर्वक चलता रह सकता है, फिर भी अभागा मन न लोभ छोड़ता है न मोह। फलतः आत्मा को बलिष्ठ बनाने का वह सुअवसर मिल नहीं पाता, जिसे अपनाने वाला आत्म कल्याण ओर लोक महा मानवों जैसा अभिनन्दनीय जीवन जी सकता है। महा पुरुषों ओर नर पशुओं में मात्र इतना ही अन्तर हाता है कि एक पक्ष विवेक अपनाता ओर आदर्शों के लिए कुछ कर सकने की व्यवस्था बनाता है। दूसरा व्यामोह की सड़ी कीचड़ में फँसा हुआ रोता कलपता भर है, उससे उबरने का प्रयत्न नहीं करता। यही वह अन्तर है जिसमें एक जैसी स्थिति के दो व्यक्तियों में से एक महानता का गर्व गौरव प्राप्त करता है और दूसरा क्षुद्रता जन्य प्रताड़नायें निरन्तर सहता है।

यह एक और विडम्बना आड़े आती है। आत्म कल्याण के लिए एक सस्ता सा उपचार पूजा पाठ का मान लिया जाता है और सोचा जाता है कि इतने भर से भगवान को रिझाना और पक्षधर बनाना सम्भव हो सकेगा। वे वह भूल जाते हैं कि उपासना का तत्व दर्शन जीवन साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित्त हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रूप में विद्यमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रम ग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित्त जीवन साधना करने की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्मकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।

पूर्व पुरुष भ्रम ग्रस्त नहीं थे, वे उपासना भी करते थे ओर साधना भी। दोनों की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।

सामर्थ्य किसी के पास कम नहीं, सुविधा सबको समान रूप से उपलब्ध है। समय सबके पास पर्याप्त है। शरीर की श्रमशीलता ओर मन की विचारशीलता की दृष्टि से कोई भी दरिद्र नहीं। अपंगों को छोड़कर सभी स्वस्थ मनुष्य प्रायः एक जैसी स्थिति में है। भिन्नता इतनी है कि एक का जीवन प्रवाह उत्थान की दिशा में बहता है, दूसरे को पतन रुचता है। एक को उत्कृष्टता प्रिय है, दूसरे को सड़ी कीचड़ में रहने की आदत पड़ गई है। आस्था और आकाँक्षा का परिवर्तन सम्भव हो सके तो अपना यहीं मस्तिष्क अपनी इन्हीं परिस्थितियों में ऐसा मार्ग निकाल सकता है, जिस पर चलते हुए आज की तुलना में हजार गुन श्रेष्ठ स्तर की जीवनचर्या बन सके।

जिन्हें ऊँची ऊँची आध्यात्मिक डिग्रियाँ प्राप्त करनी हों, उन्हें तो अनंत-अनंत जाँच और परीक्षाएँ पास करनी पड़ती हैं। परन्तु ज्यादातर लोग परीक्षक को घूस देने की ही सोचते रहते है। श्री अरविन्द

कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि दृष्टिकोण बदला तो जीवन यापन की रीति-नीति में तत्काल अन्तर पड़ेगा। यही वह अन्तर है, जिसे आन्तरिक काया-कल्प कहा जाता रहा है। भीतर का परिवर्तन बाहर की परिस्थितियों में चमत्कारी परिवर्तन करता है। यही वह चमत्कार है जो भूतकाल के देव मानवों के जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। उत्कृष्टता की विभूतियाँ ऋद्धियाँ कहलाती है और दूसरों को ऊँचा उठाने वाली क्षमताओं को सिद्धियाँ कहते हैं। पूर्व पुरूषों ने उस मार्ग को अपनाकर अपने समय को सतयुग और अपने क्षेत्र को स्वर्ग बनाया था। हमें भी उसी मार्ग पर अनुगमन करने का साहस जुटाना है।


दुनिया की आर्श्चयजनक इमारतें-आर्श्चयजनक दृष्टिकोण

प्रवाह में बहना सरल पड़ता है, उसमें निजी निर्धारण और साहस की आवश्यकता नहीं पड़ती। नदी में पेड़ों से लेकर हाथियों तक बहते चले जाते है। चलते हुए ढर्रे के सहारे किसी भी दिशा को पकड़े हुए कहीं भी पहुँच जाना सम्भव है। आँधी आती है ओर पते-तिनके को पहुँचा दें, उसी का वे नियति मान लेते है।

यही गति उनकी भी होती है, जिनमें न विवेक है न साहस। उचित अनुचित का अन्तर तो कई समझते भी है किन्तु जा ग्राह्य है उसी को अपनाया जाय, ऐसा सोचते हुए भी वैसा करते नहीं बन पड़ता। इसे व्यक्तित्व का पिछड़ापन ही कहा जा सकता है। पराक्रम में प्रखर दीखते हुए भी कितने ही व्यक्ति नीति निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण में भारी भूल करते रहते है। स्वतन्त्र चिन्तन का अभ्यास न होने से इस सन्दर्भ में दूर तक जाने में अनख लगता है। प्रचलित ढर्रा स्वभाव का अंग बन जाता है, तो उस का अनुकरण ही सरल लगता है।

नये निर्णय करने में असाधारण सूझ-बूझ का परिचय देना पड़ता है, फिर जीवन क्रम की सूक्ष्म समीक्षा करना ओर उसे औचित्य की कसौटी पर कसना और फिर ढर्रे को उलटकर उत्कृष्टता की रीति-नीति अपनाना तो ओर भी कठिन पड़ता है। इसके लिए आत्मबल चाहिए। आम तौर से लोगों में शरीर बल ही होता है। किसी-किसी में मनोबल भी पाया जाता है। आत्मबल का तो एक प्रकार से अभाव ही दीखता हैं। इसके बिना आत्म निर्धारण हो नहीं पाता। इन्हीं कठिनाइयों से घिरी हुई मानवी सत्ता किसी दैत्य के जाल में फँसी हुई अधिक की मर्जी के सम्मुख सिर झुकाये बैठी रहती है। यही है प्रवाह क्रम, जिसमें औसत मनुष्यों का क्रम विधान और भाग्य बंधा रहता है।

मुट्ठी बाँधकर जन्म लेने और हाथ खोले मर जाने वाले असंख्यों का जीवन इसी प्रकार टूटे पत्ते की तरह अनिश्चित दिशा में उड़ता हुआ, प्रायः ऐसी स्थिति में समाप्त होता है, जिसे दुर्भाग्य के समतुल्य ही कहा जा सकता है।

भेड़ों की आँखें तो होती हैं, पर स्वतन्त्र चिन्तन की कभी रहने से उन्हें मुहावरे में अँधी कहते हैं। अंधी इसलिए कि झुण्ड जिधर भी चलता है, वे सभी बिना सोचे समझे उधर ही चलती जाती हैं। अगर उनके मार्ग में कोई कुआँ, खाई आवे तो एक के पीछे एक उसी में गिरती चली जाती है। स्वतन्त्र चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।

परम्परागत प्रवाह और समूहगत प्रचलन में अपना खिचाव और दबाव तो होता है, पर इतना नहीं कि उसे अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न हो। मछली में स्वतन्त्र निर्धारण की क्षमता होती है मूलतः वह शरीर से तुच्छ और बल में उपहासास्पद होते हुए भी धारा को चीर कर उल्टी भी लोट सकती है। इसमें उस का मनोबल ही चमत्कार प्रस्तुत करता है। शरीरगत शक्ति तो उस स्तर के अन्य जलचरों जितनी ही होती है। स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण ही वह विशिष्टता है जिसके सहारे किन्हीं भाग्यवानों को सामान्य स्थिति में रहते हुए भी महा मानव बनने और असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

मनुष्य महान सम्भावनाओं से भरा पूरा है। सृष्टा ने उसे अपने समतुल्य ही बनाया हैं। उसमें बीज रूप से इतनी समर्थता विद्यमान है कि उसे जगाने और उपयोग में लाने वाले कुछ ऐसा कर गुजरते हैं, जिसे देखकर साथियों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। दिशा निर्धारण मनुष्य को स्वयं करना पड़ता है। उस पर चलने का साहस समेटना भी उसी का काम है। आदर्शों के मार्गों पर चलने वाले निजी प्रयास से इतना ही पराक्रम प्रकट करते हैं, आगे की बात तो स्वयं ही बनती जाती है। हर दिशा में सड़कें और सवारियाँ मौजूद हैं, चलने का निर्णय स्वयं ही करना पड़ता है। साथियों की कमी किसी भी सड़क पर नहीं हैं। हर धर्मशाला में उसी दिशा में चलने वाले अनेकों मुसाफिर मिलते है और सहचरों में सहयोग भी बन जाता है।

मनुष्य जन्म जीवधारी के लिए असाधारण सौभाग्य है। इस सुअवसर का लाभ उठा सकने वाले कई ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त करत हैं, जिनके लिए असंख्यों तरसते रहते हैं। इसी जन्म में पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकना नितान्त सरल ओर सर्वथा सम्भव है। इसी जन्म में लोक सम्मान और जन सहयोग का लाभ प्रचुर परिणाम में कमाया जा सकता है। इतना प्रचुर जिसे भावी पीढ़ियाँ भी नत मस्तक होकर भावश्रद्धा के साथ प्रस्तुत करती रहे। इसी जन्म में दैवी अनुग्रह और अदृश्य सहयोग का लाभ उठाया जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति कठिन उनके लिए है, जो उस तक पहुँचने के मार्ग से अपरिचित है। सरल उनके लिए जो सफलता पाने वालों का अनुकरण करने का साहस करते है।

पानी स्वभावतः नीचे की ओर बहता है। समस्त नदी-नाले इसी क्रम से बह रहें है। ऊपर से नीचे कूद पड़ना सरल हैं। नीचे से ऊपर चढ़ना कठिन। कुँए से पानी ऊपर खींचने में कितने साधन जुटाने एवं श्रम करने की आवश्यकता पड़ती है। इसे सभी जानते हैं। यहाँ पशु प्रवृत्तियों का बाहुल्य है। क्योंकि निम्न स्तर के जीव धारियों का ही, इस धरती पर बाहुल्य है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते समय उसी स्तर के संस्कारों का संग्रह समुच्चय मनुष्य जन्म में भी बना रहता है। उच्च अवसर मिल जाने पर भी आदतें और इच्छायें, पुराने स्तर की बनी रहती हैं। फिर अधिकांशों की गति विधियाँ नर पशुओं जैसी ही चलती हैं। संचित कुसंस्कार और कुप्रवृत्तियों का प्रवाह मिलकर एक ऐसा ढर्रा बना देते हैं, जिसमें तथाकथित बुद्धिमान भी बुद्धिहीनों की तरह ही बहते चले जाते हैं।

प्रायः भवसागर से उबारने की प्रार्थना ईश्वर से की जाती है। पर भवसागर और कुछ नहीं अधोगामी दुष्प्रवृत्तियों का वह प्रवाह-प्रचलन है, जिसमें अधिकांश जन समूह बहता है। डूबते-उछलते वे किसी अनिश्चित दिशा में बहते चले जाते हैं और वहाँ जा पहुँचते हैं जहाँ अन्धकार और पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

पेट भरना अन्य प्राणियों के लिए एक समस्या है, क्योंकि उनकी शरीर रचना, बौद्धिक स्थिति एवं निर्वाह की आवश्यकता को देखते हुए अनवरत प्रयास करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। मनुष्य की संरचना इससे भिन्न है। वह शरीर यात्रा की उचित सामग्री अपने श्रम, कौशल और प्रस्तुत व्यवस्था के सहारे तनिक से प्रयास में उपलब्ध कर सकता है। पेट भरने , तने ढकने और छाया आश्रय पाने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। 6 इंच का पेट, 6 फुट की भुजायें अत्यन्त सरलता पूर्वक कुछ ही घण्टे के पुरुषार्थ से भर सकती है, पर मनुष्य का उसके लिए उद्विग्न रहना और सारा समय उसी में खपा देना विवेक दृष्टि से आर्श्चयजनक है। फिर भी देखा यही जाता है कि पेट की रट लगाये हुए, हर कोई अभावों का रोना रोते, हर व्यक्ति बेतरह उसी में व्यस्त पाया जाता है। इस व्यस्तता से न किसी के पास समय बचता है, और न अन्य कुछ सोचने की फुरसत रहती है।

परिवार प्राणियों के सहयोगपूर्वक विकसित होने की एक स्वस्थ परम्परा है। उसमें भार जैसा कुछ नहीं है। माली पेड़-पौधों का संजोता है। पेड़-पौधे माली की आवश्यकताएँ पूरी करते है। सह जीवन को एक अनोखा आनन्द परिवार है, वह भार तब बनता है, जब अचिन्त्य चिन्तन अपनाया जाता है। कर्तव्य पालन की बात भुला कर जब व्यामोह की अवांछनीयता अपनाई जाती है, तो परिजन दुर्गुणी और लोभी विलासी बनते जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए किये गए पक्षपात पूर्ण प्रयास भी कारगर सिद्ध नहीं होते, वरन् उल्टे पड़ते जाते है। हेय दृष्टिकोण के रहते प्रजनन बढ़ता ओर समस्याओं का बोझ सिर पर लदता जाता है। स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने की अपेक्षा जब परिजनों को सुविधाओं से लादने की दृष्टि रहती है तो फिर उस विष सिंचन से मात्र नरक का ही उत्पादन हो सकता है। आज परिवार में स्वर्ग की अनुभूति करने वाले भाग्यशाली कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। इस कारण परिवार संस्था का स्वरूप ही बदल गया। उनमें से अब नररत्न कहा निकलते है। पालने वाले ओर पलने वाले दोनों ही उस वातावरण में घुटन अनुभव करते है। जेलखाने सराय में भी लोग साथ रहते है। इसी स्तर के परिवार प्रकारान्तर से धुँआ और दुर्गन्ध बिखेरने वाले श्मशान ही बने रहते हैं। उस उल्टी स्थिति का कारण वह व्यामोह ही है, जिसमें असीम सुविधा जुटाना और प्रजनन बढ़ाना भर लक्ष्य रहता है।

प्रवाह यही है, औसत मनुष्य इसी में बहता रहता है। माँगा या बिना माँगा परामर्श इसी स्तर का मिल सकता है। जो करता ओर सोचता है वही उसका अभ्यास ओर विश्वास बन जाता है। ऐसी दशा में साथियों के परामर्श में ढर्रे पर लुढ़कते रहने और दिन काटते रहने से अधिक ऊँचे हो ही नहीं सकते। जो चल रहा है, जो सामने दीखता है, वह भी इसी स्तर का है। लोग अनीतिपूर्वक कमाते ओर अपव्यय में लुटाते ही दृष्टिगोचर होते है। आलस्य और विलास ही लोक रुचि का विषय है। दुर्व्यसनों ओर दुर्गुणों को प्रगतिशीलता का चिन्ह समझा जाता है। उदाहरण ढूँढ़ने हों तो निष्ठुरता , निर्दयता और कृतघ्नता अपनाये हुए स्वार्थ सिद्धि में निरत समुदाय ही इर्द गिर्द घूमता फिरता नजर आता है। यही है, वह प्रवाह जो दुर्बल मन वालों को अपने साथ घसीटता और अन्यों की तरह बहते चलने को विवश करता है। औसत मनुष्य की यही गति ओर यही नियति है। इसका परिणाम भी स्पष्ट है। दुर्बलता, रुग्णता, उद्विग्नता, दरिद्रता, विपन्नता से हर व्यक्ति संत्रस्त है। समस्याओं और चिन्ताओं का अन्त नहीं। आशंका, अतृप्ति से हर व्यक्ति भयभीत ओर कातर बना हुआ है। निराश ओर खीझ का असन्तुलन मनःक्षेत्र को अर्ध विक्षिप्त बनाये रहता है। मरण की समीपता ओर जीवन की असफलता को साथ मिलाकर देखने पर लगता है अलस्य अवसर हाथ से चला गया। भविष्य की आशा लगाकर भी जिया जा सकता है, पर जिसे वर्तमान से भी बढ़कर भविष्य भी अन्धकारमय दिखे उसकी व्यथा का अनुमान लगा सकना भी कठिन है।

नशे की खुमारी में वस्तुस्थिति को सोच सकना तक सम्भव नहीं रहता। अदूरदर्शिता की खुमारी भी विचित्र है। उसकी तुलना में सब नशे हलके पड़ते हैं। माया की चर्चा जब तब होती रहती है। आत्म विस्मृति और भवबन्धनों की दुःखद परिणति की भयानकता भी विज्ञजन दर्शाते रहते है इन सबका संकेत उस उनींदी मनःस्थिति से है जो जीवन के मूल्य, महत्व और सदुपयोग के सम्बन्ध में विचार करने तक का अवसर नहीं मिलने देती।

आत्मा-ज्ञान का महत्व शास्त्रकारों और आप्त पुरुषों द्वारा समय समय पर बताया जाता रहता है इसमें न तो कुछ जादू जैसी बात है और न चमत्कारी उपलब्धियों को रहस्य है। यह सीधी सी बात इतनी ही है कि उपलब्ध अवसर की गरिमा, आत्म सत्ता की प्रचण्ड क्षमता ओर उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना का गम्भीरता पूर्वक समझा जाय। प्रवाह में बहने वालों की दुर्गति को ध्यानपूर्वक देखा जाय और स्वतन्त्र चिन्तन अपना कर उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए उठ खड़े होना, यह ही है वह निर्धारण जिसका गुरु कृपा, ईश्वरीय अनुकम्पा साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।

इस श्रेय पथ पर आरम्भ से एकाकी चलना पड़ता है साथियों का असहयोग, विरोध, उपहास सहने की कठिनाई तो आरम्भ से ही रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है। यों उनके शुभचिन्तक होने से किसी प्रकार के सन्देह की गुँजाइश नहीं है, और न उनकी ममता, आत्मीयता ही कम होती है। अपने दृष्टिकोण से वे जा उचित समझते हैं, वही सलाह देते है दूरदर्शिता क अभाव में उनके लिए वह समझना सम्भव ही नहीं होता, जिस पर अत्यन्त हित साधन ओर उज्ज्वल भविष्य निर्भर हैं। अभ्यस्त संकीर्ण स्वार्थपरता की पशु प्रवृत्तियाँ, प्रचलन की परम्परा, जन जन द्वारा अपनाई जाने वाली रीति नीति और शुभ चिन्तकों का दबाव मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह बनता है, जिसमें से निकल सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव होता है जो स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण के सहारे अपना मार्ग स्वयं बना सके।

मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपलब्ध सौभाग्य का सदुपयोग कर सके। व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय निर्माण सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। जिसके सहारे ने केवल अपना वरन् अपने समय ओर सम्पर्क क्षेत्र का काया कल्प कर सकना भी बन पड़ता है। विशिष्टता ओर वरिष्ठता उपलब्ध करने के लिए इतना ही आन्तरिक परिवर्तन पर्याप्त है कि प्रवाह की अनुपयुक्तता को समझाया ओर उससे पृथक् अपन रास्ता अपना भविष्य आप बनाने का निश्चय किया जाय।

महानता अंपायर में उतना जोखिम, उतना कष्ट, उतना सन्तोष और उतना घाटा नहीं है जितना कि व्यामोह में संग्रह ओछी रीति-नीति अपनाने मे। उत्कृष्टता अपनाने में जो घाटा है उसे संयम ओर सन्तोष अपनाने भर से सहज ही पूरा किया जा सकता है। सादगी अपनाने, सन्तोष से रहने ओर व्यामोह से बचने में इतना ही घाटा है कि चकाचौंध उत्पन्न करने वाली विडम्बना नहीं बन पाती और आकाँक्षा को गुजरे ओर कर्तव्य पालन तक सीमित रखना पड़ता है।

अमीरी की वितृष्णा में जो जितनी कमी कर सके, अहन्ता का उन्माद जो जितना घटा सके वह उसी अनुपात से अपने भीतर महानता की सत्प्रवृत्तियाँ विकसित होती देखेगा। कहना न होगा कि महानता का मूल्य वितृष्णाओं पर अंकुश रखने के रूप में जो चुका सकेगा वह उतना बहुमूल्य सौभाग्य खरीदेगा ऐसे दूरदर्शी न भौतिक दृष्टि से घाटे में रहते हैं ओर न आत्मिक आनन्द उपलब्ध करने से वंचित रहते है। उन्हें दुहरा लाभ है। साँसारिक दृष्टि से वे व्यामोह ग्रस्तों की तुलना में कहीं अधिक और समुन्नत रहते है। उन्हें अपेक्षाकृत अधिक स्नेह सम्मान मिलता है। सच्चे मित्रो ओर सहयोगियों की उन्हें कमी नहीं रहती। साथ ही आत्मसन्तोष का लाभ अनायास ही मिलता रहता है जिसकी झाँकी मात्र पाने के लिए संसारी लोग न जाने कितना कमाते और कितना लुटाते रहते है।

अहंता की तृप्ति के लिए लोक सम्मान पान के उपाय खोजे जाते है। इसके लिए फिजूल खर्ची और उद्दण्डता का प्रदर्शन ही लोगों से बन पड़ता है। यदि इस मूर्खता से मुँह मोड़ा और शालीनता तथा उदारता का उपक्रम अपनाया जा सके तो निश्चय ही उतना गहरा लोक सम्मान मिलने लगेगा जिसके सहारे आत्म गौरव का आनन्द हर घड़ी मिलता रहे।

दैवी अनुग्रह ही याचना ओर अभिलाषा अनेकों करते रहते है। वे जानते हैं कि जो अपने पुरुषार्थ से नहीं मिलता वह दैवी अनुकम्पा से मिल सकता है। इसके असंख्यों उदाहरण भी है। भक्त गाथा का प्राचीन इतिहास और वर्तमान का प्रत्यक्ष अनुभव यह बताता है कि जो ईश्वरीय अनुकम्पा के अधिकारी बन सके, वे असाधारण उपलब्धियाँ करतलगत करने में भी सफल हुए है।

साधना के चमत्कारों की आधारशिला तो उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श चरित्र पर ही रखी गई है। ब्राह्मणत्व में उज्ज्वल चरित्र और साधुता में परमार्थ परायणता की अवधारणा है। जो व्यक्तित्व को जितना परिष्कृत करता जायेगा उसके नगण्य से पूजा उपचार, भी आर्श्चयजनक चमत्कारों का आधार बनते जायेंगे। उत्कृष्ट जीवन ही ईश्वरीय अनुदानों का ऋद्धि-सिद्धियों का आधारभूत कारण है, उसे जितना ज्यादा समझा जा सके उतना ही उत्तम है।

अशक्तों ओर परावलम्बियों का प्रवाह में बहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। किन्तु जो जागृत ओर जीवन्त है। विवेकी ओर साहसी हैं उन्हें ईश्वर से अमानत जीवन सम्पदा का उपयोग करने सम्बन्धी सर्वोपरि महत्व के प्रश्न का समाधान करने के लिए दूरदर्शिता का ही आश्रय लेना चाहिए। जा जीवन्त ओर जागृत है उन्हें उपलब्ध अवसर का सर्वोत्तम उपयोग करने की बात सोचनी ओर तदनुरूप नये कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए। इसके लिए आज का मुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है।


अगले दिनों हमें घास खाकर ही जीना पड़ेगा

रात्रि की गतिविधियाँ प्रभात होते ही बदल जाती हैं। सोने वाले जागते हैं और निष्क्रियता छोड़कर प्रस्तुत समस्याओं का सामना करने के लिए कटिबद्ध होते हैं। पक्षी घोंसला छोड़कर शरीरचर्या में प्रवृत्त होना पड़ता है। फूल खिलते हैं और अंकुर उगते हैं। दिनकर की ऊर्जा तमिस्रा को विदा करती है और निशाचर को अपनी हलचलें बन्द करने की सूक्त हैं। युग सन्धि की यह घड़ी पुण्य प्रभात जैसी है, उसमें अन्धकार युग की तमिस्रा का अन्त और आलोक ऊर्जा का आरम्भ प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

इस पावन बेला में मूर्धन्यों का कुछ विशेष कर्तव्य है, उन्हें मन्दिरों में आरती सँजोनी और शंख घड़ियाल बजाकर उनींदों में चेतना भरनी चाहिए। अचेतनों की गतिविधियाँ जो भी रहें, चेतन तो उदीयमान सूर्य के अभिमुख होते और सन्ध्या वन्दन करते ही दृष्टिगोचर होंगे। प्रभात पर जिनकी श्रद्धा हैं, वे उस पावन बेला का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सोच सकते हैं। जागकर स्वयं उठते और दूसरों को उठाते हैं। सौभाग्य की तरह उदीयमान आलोक की अवमानना कुछ अभागे ही करते हैं। अन्यथा जागरण की बेला में विवेकवानों के लिए एक ही मार्ग है। आज की आवश्यकताओं को समझना और उनकी पूर्ति में योजनाबद्ध क्रम बना कर जुट पड़ना।

व्यक्तिगत चिन्तन के लिए सर्वोपरि समस्या है जीवन का सदुपयोग। यह अलभ्य उपहार कुचक्र से निकल कर पूर्णता तक पहुँचने के लिए समस्त सुविधाओं से भरा पूरा है। उसने बड़ा स्वार्थ साधन दूसरा क्या हो सकता है कि वाह्य जीवन में बन्धन मुक्ति की अनुभूति का आनन्द उठाते हुए इस सुअवसर का लाभ उठाया जाये इसी समस्या का दूसरा पक्ष है प्रगति पथ पर अग्रगमन, अभिनव उपलब्धियों का रसास्वादन। यह सफलता भी आत्मिक क्षेत्र की ही है। भौतिक प्रगति की निर्वाह भरके लिए आवश्यकता है। इससे अधिक करनी हो तो वह सामूहिक सुविधा सम्वर्धन के रूप में ही श्रेयस्कर है। निजी सम्पदा औरत माप दण्ड से बढ़ने पर अनेकानेक विकृतियाँ उत्पन्न करती है। पेट में अधिक खाया गया भोजन और सामर्थ्य से अधिक उठाया गया वजन कितना कष्ट कारक होता है यह सभी जानते हैं। महत्त्वाकाँक्षाएँ आत्मिक क्षेत्र की होती हैं। लोभ और मोह की आग भड़काने वाले स्वयं जलते और जलाते भर है। आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा को परमार्थपरायणता कहते हैं। मनुष्य को ईश्वरीय अनुदानों का दूसरा उद्देश्य यही है कि वह उदार एवं सहृदयता का प्रमाण देकर अपनी विशिष्टता सिद्ध करे। इस प्रतियोगिता में जो जितने नम्बर लाता हैं, उसे उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुदानों का पुरस्कार मिलता है।

सामान्य जन पेट और प्रजनन के कुचक्र में ही फँसे मौत के दिन पूरे करते है। उन्हें न आगे की कुछ सूझती है और न अधिक की आवश्यकता अनुभव होती हैं। पर असामान्यों की बात दूसरी है, वे जीवन्तों की तरह अग्रगमन की बात सोचते हैं और उन्मुक्त आकाश में स्वतन्त्र चिन्तन एवं विशिष्ट साहस के दोनों पंख खोलकर लम्बी उड़ान भरते हैं। ईश्वरीय अनुग्रहों में महा मानव ऋषि कल्प, देवदूत अवतार जैसी कितनी ही ऐसी विभूतियाँ है। जिन्हें पाने वाला धन्य होकर रहता है। इन्हें पाने के लिए परमार्थ अपनाना पड़ता है।

परमार्थ का तात्पर्य है सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्द्धन सदाशयता का प्रचलन, पीड़ा और पतन का उन्मूलन यही है वह विशिष्टता जो क्षुद्रजनों के गले नहीं उतरती जो इस अग्नि परीक्षा में प्रवेश करने का साहस करते है वह खरे सोने की तरह अपना समुचित और सम्मानजनक मूल्य प्राप्त करता है। कृपणों की गर्दन पर संकीर्ण स्वार्थपरता लदी रहती है, फलतः बेल पर वार्थ की बात सोचते हैं और न ईश्वरीय अनुदानों के अधिकारी बनते हैं। प्रगतिशीलों को न क्षुद्रता भाती है, और संकीर्णता रचती हैं। वे अपना मार्ग आप बनाते और अपने पैरों पर आप चलते हैं। यही है प्रगतिशीलता की रीति नीति जो इसे अपनाते है, वे देव मानव होकर होती हैं।

सूरज तो रोज ही निकलता है और रोज ही अस्त होता हैं, पर जीवन प्रभात की पुण्य वेला उस दिन आती जिस दिन मनुष्य शान्त चित्त से अपनी स्थिति पर विचार करता और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए सिरे से सोचने और नये निर्धारण करने के लिए होता हैं। यह अवसर जिसे मिले उसे सच्चे अर्थों में सौभाग्यशाली कहा जाता है। ईश्वर का अनुग्रह इसी में बरसता है। सद्गुरू इसी रण में अपने अनुदान देते सौभाग्योदय इसी उपलब्धि को कहते हैं। आत्म जागरण आत्मोपलब्धि आदि अनेक नामों से इसे बखाना जाता है। ईश्वर दर्शन भी यही है। इस प्रभात की रचना करते हुए ही अन्तःकरण में तमसो मा ज्योतिर्गमय हूक उठती रहती है।

युग प्रभात विराट ब्रह्म की इच्छा और आवश्यकता निमित्त होता है। विनाश को निरस्त और विकास सशक्त करने के लिए अदृश्य जगत में अभिनव लहर उठती है तो उसकी प्रखरता और प्रचण्डता युग चेतना स्तर की होती हैं। भक्त लोग इसे अवतार मानते हैं। तत्वदर्शी इसी को युग अवतरण मानते हैं। नक का प्रकटीकरण इसी रूप में होता है, यही युग है। इस पुण्य बेला में जागरूकों को बुलाया जाता और वे अदृश्य प्रेरणा के दृश्य प्रयासों में अपनी भाव भूमिका निभाते हैं। इतिहास पुराणों के पृष्ठ इसी से भरे पड़े हैं कि अदृश्य की प्रेरणाओं को अपना जागरूकों ने अग्रदूतों का उत्तरदायित्व उठाया, सूर्य की प्रथम झाँकी पर्वत शिखरों पर चमकने वाली ही कराती हैं। मूर्धन्यों की गति विधियाँ सामान्यों वहीं रहतीं, वे शिखरों की तरह सर्वप्रथम हैं, और न केवल प्रभात का वरन् शिखरों के का भी परिचय देती हैं। दर्शक इस प्रथम दर्शन से विमुग्ध होकर शिखरों का भी नमन करते हैं।

कई बार सामान्य समय में भी जीवन प्रभात का सौभाग्य कइयों मिलता हैं, पर युग प्रभात में तो एक प्रवाह आता है और विशिष्टों को अनायास ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा देखा जाता हैं। जागने और जगाने की प्रक्रिया देवालयों में दूसरों से पूर्व ही चल पड़ती हैं। जागरूकों को देवात्मा कहा जाता हैं। वे जीवन्त देवालयों की श्रेणी में ही गिने जाते है।

युग सन्धि की इस पुण्य वेला में दृश्य क्षेत्रों में प्रभात का परिचय और दर्शन सहज ही मिलता हैं। जागृतों के अन्तःक्षेत्र में समुद्र मन्थन चल रहा है। वे ईश्वरीय अनुदान के रूप में उपलब्ध हुई मनुष्य जीवन की गरिमा का अनुभव इस प्रकार कर रहे हैं मानो निद्रा त्याग कर प्रथम बार अनसे सत्य को देखा हो। स्वार्थ सिद्धि के लिए उत्कृष्टता अपनाने और परमार्थ सिद्धि के लिए आदर्श पथ पर चल पड़ने में ही उन्हें कल्याण दिखता है, युग प्रभात को इसके लिए नया निमन्त्रण भेजा हैं। महान परिवर्तन की भूमिकाएँ समय समय पर देव मानवो ही निभाई है। इन दिनों भी उन्हीं का पुरुषार्थ जन नेतृत्व करेगा। अध्यापकों की बात दूसरी है, उनका काम छात्रों को समझाने के लिए वाणी का उपयोग कर लेने से चल जाता है, पर लोक मानस में उच्चस्तरीय प्रवृत्तियाँ उभारने के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करने के अतिरिक्त दूसरा चारा नहीं। यह कार्य जागरूकों का है। वे ही इस प्रयोजन को समय समय पर पूरा करते रहे हैं। इस आड़े समय में भी उन्हें अपनी पूर्व भूमिका निभानी है।

अंगद, हनुमान, नल, नील, गीध, गिलहरी की भूमिका निभाने वाली आत्माएँ मात्र त्रेता के लंका काण्ड में ही प्रकट हुई हों, ऐसी बात नहीं है, युग परिवर्तन के समस्त अवसरों पर उन देवदूतों ने विभिन्न आवरण ओढ़कर विभिन्न भूमिकायें पर उन देवदूतों ने विभिन्न सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप निभाई हैं। प्रस्तुत युग संधि भी ठीक ऐसी ही वेला है जिसका आपत्ति कालीन आमन्त्रण जीवन्तों के क्षेत्र में अनसुना किया ही नहीं जा सकता।

तमिस्रा के अवसान और आलोक के पुनरोदय के अवसर पर पूर्वजों की महान परम्पराओं का पुनर्जीवन होना स्वाभाविक है। कहना न होगा कि भारतीय तत्वदर्शन का मेरुदण्ड वह प्रचलन है, जिसमें जीवन को दो भागों में विभक्त किया गया है। आधे में शरीर यात्रा और आधे में ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति का विभाजन ही वर्णाश्रम धर्म है। यह क्रम जब तक चला अतीत का गौरव भी अक्षुण्ण रहा। जैसे जैसे कृपणता बढ़ने लगी वैसे वैसे तमिस्रा छाई। अब नव प्रभात के उदीयमान होते ही उन परम्पराओं का व्यवहार में उतरना भी स्वाभाविक है, जो मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कल्पना जल्पना नहीं रहने देती, वरन् यथार्थता में परिणित करती है।

जागरूकों में इन दिनों वे प्रवृत्तियाँ उभार की उच्च सीमा को छूती दिखाई पड़ती हैं जिन्हें अपना स्वयं का निर्धारण और दूसरों के लिए अनुकरण का पथ प्रशस्त करना है। अध्यात्म युग में लोक जीवन का यही क्रम होगा कि भौतिक लिप्साओं को नियंत्रित करें और आत्मिक विशिष्टताओं को उभारने में उतना पुरुषार्थ करें जो जन जन में अभिनव चेतना भरने के लिए समर्थ हो सके।

उच्चस्तरीय जीवन दर्शन अपनाने पर भी जन समाज को विपत्तियों और विभीषिकाओं से उबरने का अवसर मिलेगा। समृद्धि और शालीनता की उभयपक्षीय सुखद संभावनाएँ उत्कृष्टता अपनाने से ही सम्भव हो सकती हैं। इस दिशा धारा को अपनाने के लिए उपयुक्त लोक शिक्षण की व्यवस्था रहना प्रगति का प्रथम चरण हैं। इसके लिए युग प्रवक्ता चाहिए, जो मात्र वाणी से ही कहते सुनते न रहे, वरन् अथवा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध भी करें कि जो कहा जा रहा है वह सरल एवं व्यावहारिक ही नहीं वरन् सुखद एवं श्रेयस्कर भी हैं। प्रतिपादनों के अनुरूप प्रवक्ताओं का चरित्र एवं व्यक्तित्व न होगा तो उसका प्रभाव नहीं के बराबर ही होगा। लोग सुनेंगे तो सही पर अपनाने के लिए किसी की अन्तःप्रेरणा न उठेगी। दीपक को दीपक ही जलाता है और चरित्र ही चरित्र को प्रभावित करता हैं। जागरूक को अपना जीवन क्रम नवयुग की प्रयोगशाला के रूप में प्रस्तुत करना होगा जिसमें झाँक कर यह देखा जा सकेगा की आदर्शवादिता व्यावहारिक एवं उपयोगी भी हो सकती है या नहीं, यह विश्वास कराये बिना लोक मानस को न पुराना ढर्रा छोड़ने के लिए सहमत किया जा सकता है। और न नया अपनाने के लिए।

प्रतिपादनों और प्रवचनों का जमाना चला गया। पिछले दिनों आदर्शवादिता के समर्थन में इतना लिखा जा चुका है कि उनकी निरर्थकता को देखते हुए उसी की पुनरावृत्ति करने में कुछ सार दिखाई नहीं पड़ता। कारगर परिणाम निकलने की सम्भावना इसी एक तथ्य पर निर्भर हैं कि कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्धि करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, वरन् हर दृष्टि से लाभदायक भी है। दिग्भ्रान्त लोक मानस को इससे कम में इसके लिए सहमत नहीं कर सकते, जिसे किये जाने की आशा सँजोकर नव युग का स्वप्न देखा गया है।

आदर्शवादिता न केवल समाज कल्याण के लिए, ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं वरन् उससे स्वार्थ भी पूरी तरह सधता है। सादगी और संयम अपनाने में हानि इतनी भर है कि अन्धों में काना राजा बनने का अवसर नहीं मिलता। मूर्खों के बीच धूर्त जिस प्रकार अपनी नाक बढ़ाते और ठाठ बनाते देखे जाते है, उस बचकानेपन में कमी आने के अतिरिक्त और कहीं कोई बाटा नहीं हैं। लोभ और मोह की आग में ईधन की तरह जलने वाली क्षमताओं को तृष्णा के व्यामोह में से छुटकारा पाते ही इतनी बचत हो सकती है कि उसके सहारे आत्म कल्याण और लोक कल्याण का दुहरा प्रयोजन पूरा हो सके।

इसके लिए मात्र इतना ही करना पड़ता है कि अभ्यस्त इच्छाओं और आदतों का नये सिरे से पर्यवेक्षण कर सकने की सूक्ष्म बुद्धि अपनाई जाय, यह एक कदम हुआ। दूसरा यह है कि अनुपयुक्त को छोड़ने और औचित्य को अपनाने का इतना साहस संजोया जाय जिसमें संचित कुसंस्कारों और तथाकथित प्रियजनों को बाधक बनने का अवसर ना मिल सके। इन्हीं दो कदमों को उठाते हुए उस महान लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँचा जा सकता है जिसमें आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह से सम्बन्धित विपुल विभूतियाँ उपलब्ध करने का अवसर मिल सके।

हर व्यक्ति यह सोचता है कि वह बहुत व्यस्त एवं उत्तरदायित्वों से लदा है। इसलिए सत्प्रयोजनों में भाग लेने की स्थिति उसकी नहीं है। इस मान्यता में सार कम और भ्रम अधिक है। जिस प्रकार सोचने की आदत है और जिस प्रकार से समाधान चाहें गये हैं, उसी पर अड़े रहना हो तो बात दूसरी है अन्यथा हर समस्या के हजार समाधान हैं। एक प्रकार से बात न बनती हों तो उसे दूसरे प्रकार बनाया जा सकता हैं। एक रास्ता रुक गया हो तो दूसरे रास्ते जाया जा सकता है। आदर्शवादी रीति नीति अपनाने में परिस्थितियाँ उतनी बाधक नहीं होती जितनी की पूर्वाग्रहों के दलदल में फँसी हुई मनःस्थिति। दृष्टि बदलने और दूसरे मार्ग खोजने पर हर स्थिति के व्यक्ति को इतना अवसर मिल सकता है वह अपनी दिनचर्या में उन गतिविधियों का समावेश करने के लिए पर्याप्त अवसर प्राप्त कर सके।

एक नई दृष्टि से सोचा जाय कि विपत्ति की घड़ी आई, शरीर रुग्ण या अपंग हो गया तब अभ्यस्त ढर्रा छोड़कर कोई न कोई दूसरी राह खोजनी और गाड़ी किसी दूसरे रास्ते चलानी पड़ेगी । कई बार ऐसे कमाऊ व्यक्तियों की भी मृत्यु हो जाती है, जिनके सहारे गृह व्यवस्था चला करती थी। उन दिनों घबराने वाले यही देखते थे कि सब कुछ चौपट हो गया और उबरने का काई रास्ता शेष नहीं रहा। घबराहट दूर होने और शोकावेग हलका होने पर देखा जाता है कि दूसरा रास्ता निकल आया और रुका हुआ गतिचक्र फिर किसी रास्ते चल पड़ा। सृष्टा की इस विश्व व्यवस्था में हर घटक बहुमूल्य है। उसका अपना कार्य और उपयोग है। इतने पर भी दूसरी सचाई भी यथास्थान है किसी के भी न रहने पर यहाँ कहीं भी अवरोध उत्पन्न नहीं होता। गति चक्र अड़ता नहीं, वह एक रास्ता रुकते ही दूसरा नया रास्ता खोज लेता है। जिसने अपने ही सिर पर धरती लदी हुई समझी उसकी बात दूसरी है, पर जो तथ्यों से परिचित हैं वे जानते हैं कि दुर्घटनाओं की क्षतिपूर्ति होते रहने की यहाँ परिपूर्ण व्यवस्था विद्यमान है। यदि पुराने ढर्रे को बदल कर नये में प्रवेश करने की बात को भी दुर्घटना जैसी मान लिया जाय तो प्रतीत होगा कि उस परिवर्तन से जो भय प्रतीत होता था, जो आशंका दीखती थी वह सब कुछ काल्पनिक प्रतीत हुआ। व्यवस्था ने परिस्थितियों के साथ अपना तालमेल बिठा लिया और अपने हटते ही जो अनर्थ होने का भय था, वह सर्वथा निर्मूल सिद्ध हुआ।

यहाँ उनकी चर्चा है, जो वस्तुतः उत्तरदायित्वों से लदे हैं और जिन्हें सचमुच ही गाड़ी खींचनी पड़ती है ऐसे लोग भी यदि पूरी तरह युग प्रयोजनों में लगना चाहें तो भी उनका स्थान लेने लिए दूसरी सम्भावना मौजूद है। पर यहाँ तो उतनी बात भी नहीं हो रही है। इस समय तो इतने भर से काम चल सकता है कि लाभ और मोह की कीचड़ से उबारा जाय और निर्वाह तथा परिवार सम्बन्धी महत्त्वाकाँक्षाओं को थोड़ा हलका कर लिया जाय। जिस परमार्थ को असम्भव और निरर्थक माना जाता है, उसे उपयोगी और आवश्यक समझा जाय। इतना आन्तरिक परिवर्तन जो भी कर सकेंगे वे देखेंगे कि जीवन प्रभात और युग प्रभात में जागरूकों का जो कर्तव्य था, उसका परिपालन तनिक भी कठिन नहीं रहा। आदर्शवादी निर्धारण न केवल सरल है वरन् सुखद और श्रेयस्कर भी। इस तथ्य की सचाई की कोई भी कभी भी जाँच कर सकता है। इस प्रयोग परीक्षण के लिए आज जैसा उपयुक्त अवसर फिर कदाचित् ही कभी किसी को मिल सके।


गृहस्थ ने तनिक खिन्नता से कहा (kahani)

एकबार एक पुण्यात्मा गृहस्थ के घर एक अतिथि बनकर आये उनके शरीर पर सारे कपड़े काले थे। गृहस्थ ने तनिक खिन्नता से कहा “तुमने काले कपड़े क्यों पहन रखे हैं?” मेरे कामक्रोधादि मित्रों की मृत्यु हो गई है, उन्हीं के शोक में ये काले वस्त्र धारण कर दिए हैं। अतिथि ने उत्तर दिया।

गृहस्थ ने उक्त अतिथि को घर से बाहर निकाल देने का आदेश दिया, नौकर ने तत्काल आज्ञा पालन की । थोड़ी देर बाद उन्होंने अतिथि को वापिस बुलाया और पास आते ही फिर निकाल देने की आज्ञा दी इस प्रकार यह क्रम बार-बार चलता रहा। किन्तु अतिथि तनिक भी खिन्न न हुए अन्त में गृहस्थ ने अतिथि का सम्मान किया और अनुभव किया कि ये सच्चे इन्द्रियजित हैं।


असामयिक बुढ़ापा और उसका निवारण

कभी कभी कुछ प्रतिभायें ऐसी भी होती हैं, जो अन्तःप्रेरणा से उत्कृष्टता का वरण करती, संकल्प बल से उसे सींचती और अपने एकाकी पुरुषार्थ से लक्ष्य तक जा पहुँचती हैं। उन्हें दूसरों की सहायता नहीं लेनी पड़ती। हर व्यक्ति मूलतः इतना क्षमतासम्पन्न है कि सन्निहित विशिष्टताओं को प्रसुप्त से जागृत कर सकें, और उन्हीं के सहारे प्रगति पथ पर चलते हुए वह प्राप्त कर सकें, जिसके लिए कि मानवी अस्तित्व का निर्माण हुआ है।

तथ्यतः यही वस्तुस्थिति है। मनुष्य को न तो अपूर्ण बताया गया है और न दरिद्र, असहाय, पराश्रित। उगने और उठने की समग्र क्षमता उसमें विद्यमान है। फिर भी इसे दुर्भाग्य, माया चक्र, प्रपंच, व्यामोह अथवा और कुछ नाम देते हुए, यह माना जा सकता है कि इस सत्य को कोई विरले ही समझ पाते हैं। जो समझते हैं, उनमें से अधिकांश में इतना मनोबल नहीं होता कि प्रसुप्त वैशिष्ठ को जगायें और उसे चरमोत्कर्ष का साधन बनाये। आमतौर से सहकारी समाज का अभ्यस्त होने के कारण लोग वातावरण का प्रभाव ग्रहण करते और प्रवाह में बहते रहते हैं। संकल्प पूर्वक बने थोड़े होते हैं। अधिकांश को परिस्थितियाँ बनाती हैं। इस सचाई को गले उतारना ही होगा। इस व्यावहारिक कठिनाई को भी समझना ही होगा। जिस प्रकार आत्म पौरुष से उच्चस्तर पर पहुँच सकने की संभावना असंदिग्ध है, वहाँ दूसरा पक्ष यह भी है कि संगति का प्रभाव इतना अधिक होता है, जिसे सामान्य स्थिति में, सामान्य लोगों के लिए नियति की भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है।

विश्व विख्यात महामानवों में से अधिकांश को अपन लक्ष्य का निर्धारण और परिपोषण आत्म बल के सहारे स्वयं ही करना पड़ा है और वे अपने निश्चय पर आप आरुढ रह कर, अपना मार्ग स्वयं बनाते और अपने पैरों आप पार करते रहे हैं। परिस्थितियाँ उन्हें प्रभावित नहीं कर सकीं। अवरोधों ने उन्हें रोका तो, पर वे रुके नहीं न तो किसी ने सहयोग दिया न प्रोत्साहन। अपने को आप ही समझाते रहे, और अपने समर्थन से, आप आगे बढ़ते रहें। अन्ततः उस लक्ष्य तक पहुँचे जिसे दैवी अनुग्रह भाग्योदय अथवा चमत्कार माना है। वस्तुतः यह सब किसी का उपहार नहीं अपना ही पराक्रम है जिसे मनस्वी अपने बल बूते समग्र करते और सफलताओं पर अहंकार न करते हुए, नम्रता वश बड़ों का अनुदान कहते हैं।

श्रेय और सराहनीय तो यही स्तर है, पर किया क्या जाय यहाँ प्रौढ़ और परिपक्वों की भारी कमी है। परिवार में बच्चों का ही बाहुल्य होता है और उनका परिपोषण एवं परिष्कार बड़ों को ही करना पड़ता है। आत्म विकास के लिए उन्हें स्वतन्त्र छोड़ दिया जाय तो फिर वह स्वतन्त्रता उनके लिए महँगी पड़ेगी। निकृष्टता धूल की तरह हवा में उड़ती है, पर उत्कृष्टता सुगन्ध की तरह प्रयत्नपूर्वक अर्जित करनी पड़ती है। सभी जानते हैं कि परिवार की परिस्थितियाँ ही अधिकांश लोगों को बनाने बिगाड़ने की भूमिका निभाती हैं। स्वनिर्मित तो कोई विरले ही होते हैं। जिनने संचित कुसंस्कारों को घिरे हुए वातावरण और प्रियजनों के परामर्श को अनसुना करके कोई महान परिवर्तन प्रस्तुत किया हो ऐसे लोग भी संसार में हुए तो अनेकों हैं, पर उतनी साहसिकता हर किसी में प्रकट नहीं होती।

बुद्ध ने दिशा परिवर्तन अपने ही बलबूते किया था, उनके अनुयायियों में से भी अनेकों ने वही परम्परा अपनाई आनन्द, हर्षवर्धन, अंगुलिमाल, अम्बपाली आदि उनके निकटवर्ती जन्मजात रूप से तैसे नहीं थे, जैसे कि परिवर्तित स्थिति में विकसित हुए। अन्यान्य महा मानवों के सम्बन्ध में भी, यही बात कही जा सकती है। उन्हें परिस्थितियों ने बनाया। मनःस्थिति के आधार पर ही उनने ऊँची छलाँगें लगाई और वहाँ जा पहुँचे जहाँ अवस्थित लोगों को चमत्कारी सिद्ध पुरुष एवं महा मानव कहा जाता हैं। यह उदाहरण भले ही थोड़े हों, पर सिद्ध इसी सिद्धान्त को करते हैं कि मनुष्य का संकल्प और पुरुषार्थ यदि सुनिश्चित हो तो वह सूर्य को जमीन पर तो नहीं ला सकता पर आमतौर से जो असम्भव समझा जाता है, उसे सम्भव कर सकता है। इस पर भी यह मानना पड़ेगा कि ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं। अस्तु उन्हें अपवाद की श्रेणी में रखा और तथ्यों के प्रतिपादन में उन्हें प्रमाण कहा जा सकता है। सामान्य प्रचलन, अनुगमन और अनुकरण का ही मिलता है। समुदाय का प्रवाह और उसी में जन साधारण की बहाव प्रचलन उसी का देखा जाता है।

निकृष्टता का अपना आकर्षण है। गुरुत्वाकर्षण की तरह उसकी पकड़ सर्वत्र है। वह शक्ति बिना किसी प्रयत्न के उत्पन्न होती और उपलब्ध रहती है। किन्तु उत्कृष्टता को प्रयत्न पूर्वक उपार्जित करना और संकल्प पूर्वक पकड़ना पड़ता है। भौतिक उपलब्धियों की तरह ही आत्मिक विशिष्टताएँ भी पराक्रम ही नहीं वातावरण और साधन भी चाहती हैं। कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला शोध साहित्य आदि प्रगति प्रसंगों में जिनने भी सफलताएँ पाई हैं, उनमें एकाकी सूझ बूझ ही सब कुछ नहीं रही।इन्हें सहयोग, वातावरण एवं साधनों के लिए भी काफी दौड़-धूप करनी पड़ी है। जो इन्हें जुटा पाये वे सफल हुए, शेष के मनोरथ ऐसे ही मर गये। असफलता में निवारण की त्रुटि नहीं, वरन् साधनों की कमी ही प्रमुख अवरोध बनी है।

आत्मिक प्रगति को, इस संसार की, इस योजन की सबसे बड़ी सफलता कहा जा सकता है। इससे बढ़कर दूसरी उपलब्धि यहाँ अन्य कोई भी नहीं है। व्यक्तित्व की प्रखरता ही सच्चे अर्थों में वह विभूति है जिसके बदले किसी भी क्षेत्र की, किसी भी सफलता को खरीदा जा सकता है। व्यक्तित्व की दुर्बलता ही प्रकारान्तर से दरिद्रता कही जाती है। पिछड़ापन कोई किसी पर थोपता नहीं, अन्दर की कुसंस्कारिता ही उसे न्योता बुलाती है।

प्रगति शीलता आकाश से नहीं बरसती और न किसी से अनुदान उपहार में मिलती है। हर व्यक्ति उसे अपने आन्तरिक स्तर के अनुरूप संसार की खुली मण्डी में से खरीदता है। जिसके पास जिस स्तर की जितनी पूँजी है उसे उसी स्तर का विनिमय करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती। उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्ति जहाँ जाते हैं, वहाँ वे अपने लिए स्थान बनाते, सहयोग पाते, और सफल होते देखे जाते हैं। जबकि दीन दुर्बलों को जिस तिस पर आरोप लगाते व खीझ उतारते देखा जाता है। यों इनमें से कई वस्तुतः प्रताड़ित और परिस्थितियों के शिकार होने के कारण सहानुभूति के पात्र भी होते हैं,फिर भी व्यापक तथ्य यही मानना पड़ेगा कि व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही विभिन्न क्षेत्रों की सफलता अर्जित करती है।

शिक्षा का उद्देश्य भौतिक जानकारी और व्यवहार कुशलता उपार्जित करना है। सुशिक्षितों को आजीविका उपार्जन तथा किया कौशल में सुविधा रहती है। इसलिए शिक्षा प्राप्ति का प्रचलन भी है। उसकी उपयोगिता समझी और चेष्टा की जाती है, किन्तु दुर्भाग्य से विद्या की महता को क्रमशः विस्मृत ही किया जा रहा है। विद्या सुसंस्कारिता का नाम है। वह शिक्षा के साथ साथ भी चल सकती है और लिखने पढ़ने का प्रबन्ध न होने पर भी उसका आधार बन सकता है। प्राचीन काल में विद्यालयों का प्रबन्ध किया जाता था आज मात्र शिक्षालयों की भरमार है। जानकारी की कमी नहीं, किन्तु प्रतिभायें नहीं मिलती। इसका एक ही कारण है विद्यालयों का अभाव। शिक्षालयों की सीमा मस्तिष्कीय विकास और कौशल के अभ्यास तक सीमित है। सुसंस्कारिता का अपाजान विद्यालयों में ही हो सकता है। विद्यालय से तात्पर्य फिर एक बार भली प्रकार समझा जाना चाहिए। जहाँ सुसंस्कारिता के सम्वर्धन का वातावरण हो, विद्यालय उसी को कहा जाएगा। मात्र पाठ्यक्रम से संस्कार नहीं बनते, वह ढलाई तो ऐसी भट्टी के माध्यम से हो सकती है, जिसमें आदर्शवादिता का प्रशिक्षण नहीं प्रचलन की व्यवस्था रहने के कारण अभीष्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है।

प्राचीन काल से बालकों के लिए गुरुकुल और प्रौढ़ों के लिए आरण्यकों को व्यवस्था थी। उन्हीं खदानों से व्यक्तित्व सम्पन्न नररत्न निकलते थे । वे सच्चे अर्थों में कवद्यालय और विद्यार्धियों को क्या मिलना चाहिए इसका प्रत्यक्ष प्रभाव प्रस्तुत करते थे। जिस विद्या की महिमा सर्वस्व अपनाई जाती है वह मात्र अर्ककरी शिक्षा से कहीं अधिक ऊँची हैं। उसके लिए पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं शालीनता की विधि व्यवस्था को जीवन क्रम में उतारने का विशिष्ट प्रबन्ध करना है। उसके लिए उपयुक्त वातावरण अपेक्षित है। यह ऋषि कल्प अध्यापकों की व्यवस्था बनाने में संभव होती है। वातावरण प्रचलन का नाम है ।ऐसे विद्यालयों का अस्तित्व जब तक रहा इस देश के नागरिक देवत्व से सुसम्पन्न बने रहे। भले ही उनकी साक्षरता उतनी न रही हो जितनी कि आज कल बढ़ी चढ़ी दिखाई पड़ती है।

विद्या के प्रति उपेक्षा, विद्यालयों का अभाव और विद्यार्थी अभिरुचि का समापन यह तीनों ही मिलकर ऐसी दुःखद परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जिन्हें दुर्भिक्ष से भी बढ़कर कष्टकारक कहा जा सके। चतुरता की कमी नहीं, सुविधा साधन बहुत है। परिश्रमियों में से एक का गरीबी बेकारी की शिकायत नहीं हो सकती। इतने पर भी व्यक्तियों का अभाव बुरी तरह खटकता है। पिछड़े स्तर के लोगों की संख्या वृद्धि धरती के लिए भार और समाज के लिए संकट बनती जा रही है। वे प्रतिभायें कहीं से भी उभरती नहीं दीखती जो अपने उदाहरण प्रस्तुत करके शालीनता की गरिमा जन-जन के मन-मन में बिठा सकें। श्रेय और सफलता को देखकर ही सामान्य लोग ललचाते और अनुगमन के लिए चलते है। यदि उच्चस्तरीय नेतृत्व उपलब्ध रहा होता तो सदाशयता के मार्ग पर चल पड़ने वालो की कहीं कोई कमी न रहती।

प्रतिभा और पवित्रता के समन्वय को प्रखरता कहते हैं। कौशल और चरित्र को मिला देने से ही वह उत्कृष्टता बनती है जिसे पाकर मनुष्य का देवत्व उभरता और आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याण का प्रयोजन पूरा करता है। कहना न होगा कि यह विशिष्टता आत्म शिक्षा से तो कभी-कभी ही उपलब्ध होती है, गुरुकुलों और आरण्यकों के वातावरण में विद्याभ्यास करने में सहज सम्भव बनती है। इन दिनों उसी महान परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जिसमें विद्यालयों के लिए उपयुक्त केन्द्र संस्थानों की कमी नहीं पड़ने दी जाती है।

बच्चों के लिए गुरुकुल, निवृत्तों के लिए आरण्यक और गृहस्थों के लिए तीर्थ सेवन की त्रिविध व्यवस्था जिन दिनों अपनी प्रौढ़ावस्था में थी उन दिनों मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की बात कल्पना नहीं गिनी जाती थी। वरन पग-पग पर एक सहज स्वाभाविकता के रूप में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती थी। आज खदानें ही अवरुद्ध हो गई तो नर-रत्नों के दर्शन कहाँ से हो? युग समस्याओं का एक ही कारण है उच्च स्तरीय व्यक्तित्वों का अभाव, इस अभाव का कारण है विद्यालयों का न होना। यह फिर समझा जाना चाहिए कि शिक्षालयों और विद्यालयों में मौलिक अन्तर है। पढ़े गये डालने वाली फैक्ट्रियों की आज कमी नहीं, वे तेजी से बढ़ती भी जा रही हैं पर जिनका वातावरण नररत्नों को ढाल सकें ऐसे विद्या मन्दिरों के तो अब दर्शन ही दुर्लभ हो रहे है।

कई लोग घोषणा और चेष्टा तो करते है। बोर्ड और विज्ञापन भी इसी स्तर के बनाते है, पर बन उनसे भी कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि अध्यापकों का रीति-नीति का, विधि व्यवस्था का क्या क्रम होना चाहिए इसका स्वरूप न तो सूझता है और न वैसा प्रबन्ध करते, साधन जुटाते ही बन पड़ता है। फलतः वह बन ही नहीं पड़ता जो सोचा गया है, वैसे इस प्रकार सोचने की परम्परा ही नहीं है। शिक्षा का महत्व अर्थोपार्जन से अधिक भी कुछ हो सकता है, इसे जानते तो कई लोग हैं पर जो मानते भी हों ऐसों को ढूँढ़ निकालना दुस्तर है।

इस अभाव की पूर्ति के लिए, एक आरम्भिक प्रयास गायत्री नगर की आरण्यक व्यवस्था में किया गया है। शान्ति कुँज हरिद्वार की इस नव निर्मित इमारत में इसी जुलाई से प्रशिक्षण की उस परम्परा को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जिसमें गुरूकुल, आरण्यक और तीर्थ सेवन की त्रिविध व्यवस्था संजोई जाती थी। वह एक प्रयोग है। प्रयोगशाला का उद्देश्य उपलब्धियों को छोटे रूप में इस प्रकार प्रस्तुत करना होता है जिसे अन्य लोग बड़े परिणाम में अपनाकर लाभान्वित हो सकें। नर्सरी में अनेक प्रकार के पौधे उगाये जाते है। उद्यानों में कुछ ही पेड़ फलते है। गायत्री नगर को नर्सरी बनाया जा रहा है। वह प्रयोग शाला की भूमिका सम्पन्न करेगी।

गायत्री नगर में बसने के लिए सर्वप्रथम उन्हें बुलाया गया है जो उपयुक्त वातावरण बनाने और अध्ययक्ष की भूमिका निभाने में अपनी विशिष्टा का परिचय दे सके। यो शिक्षा का उद्देश्य अनगढ़ो को सुगढ़ बनाना है, पर सर्व प्रथम अनगढ़ इक्ट्ठे नहीं किये जाते, उन्हे सृघढ़ बनाने वाले शिल्पियों का प्रबन्ध करना पड़ता है। अस्पताल चालू करने से पूर्व डाक्टरों, नर्सो, कम्पाउण्डरों, ड्रेसरो, स्वीपरों का प्रबन्ध करना पड़ता है। कारखाने में उत्पादन चालू होने से पूर्व इमारत, मशीन, पूँजी, शिल्पी प्रबन्धक आदि की व्यवस्था बनाई जाती है। प्रथम चरण इसी प्रकार उठता है।

नव सृजन के लिए जन-मानस का परिष्कार आवश्यक हैं उसके लिए प्रखरता सम्पन्न व्यक्तित्व का नेतृत्व चाहिए। इस नेतृत्व को ढालना समय की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसी की पूर्ति के लिए गायत्री नगर को एक प्रयोगशाला, नर्सरी एवं पाठशाला के रुप में खडा किया गया है। उसमें पहली भर्ती उन्ही की का रही है जो जहाँ बसकर सर्वप्रथम अपने को ढाले और तदपरान्त उस अध्यापन का उत्तरदायित्व निवाहे जिसके ऊपर युग शिल्पियों की नई पीढ़ी को गड सकने की संभावना नाये निर्भर है।

युग देवता ने समस्त जागरुकों को नव सृजन में जुट पड़ने के लिए समय दान की माँग की है, जो व्यस्त है। वे अपने-अपने क्षेत्रों में नव सृजन के लिए कुछ काम करे और उसके लिए अपने दृष्टिकोण, व्यक्तित्व एवं क्रियाकलाप में प्रभावी तत्व उत्पन्न करने के लिए उस प्रशिक्षण में सम्मिलित हो जो गायत्री नगर में युग शिल्पियों की प्रतिभा निखारने के लिए चलेगा। किन्तु उससे पूर्व उन्हे सुयोग्य बनाया जायगा। जिन्हे अगले दिनों अध्ययन की, बनाने की क्षमता उत्पन्न करनी है। आरम्भ इसी वर्ग वातावरण को आमन्त्रित करके किया गया है।

वानप्रस्थ ही आरणयकों में टिकते थे, विद्यार्थी एवं व्यस्त लोगों का तो वहाँ आवागमन ही बना रहता था। जिनकी स्थिति पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त जैसी है, जिनके शरीर और मन में पुरुषार्थ की क्षमता शेष है। ऐस विचारशील लोगों की भर्ती की जा रही है। इसमें उच्च् शिक्षा आवश्यक नही, सदाशयता से भी काम चल जाएगा। क्योंकि पढाई नहीं भावानात्क एवं चारित्रिक होगी, जिनमें भावना विद्यमान है और अपनी क्षमता के अनुरुप श्रम करने से कतराते नहीं उन सभी को गायत्री नगर की प्राथमिक प्रशिक्षण व्यवस्था में आमत्रित किया गया है। वातावरण धन सकने में जो सहयोगी सिद्ध होंगे वे यहाँ स्थाई रुप से बस जायेंगे और प्रखरता सम्पन्न व्यक्तित्व डालने की इस प्रयोगशाला का एक अंक बनकर रहेंगे।


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एक अन्धा भीख माँगा करता था। जो पाई पैसे मिल जाते, उसी से अपनी गुजर करता, एक दिन एक धनी उधर से निकला उसे अन्धे के फटे हाल पर बहुत दया आई और उसे पाँच रुपये का नोट उसके हाथ पर रखकर आगे की राह ली।

उसने कागज को टटोल कर देखा और समझा किसी ने ठिठोली की है और उस नोट को खिन्न मन जमीन पर फेंक दिया। एक सज्जन ने नोट को उठाकर अन्धे को दिया और बताया यह पाँच रुपये का नोट है। तब वह प्रसन्न हुआ और उससे अपनी आवश्यकताएँ पूरी की। ज्ञान चक्षुओं के अभाव में हम भी परमात्मा के अपार दान को देख और समझ नहीं पाते है। पर यदि हमें जो नहीं मिला है उसकी शिकायत कना छोड़कर जो मिला है उसी की महत्ता को समझे तो मालूम पड़ेगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह काम नहीं अद्भुत है।


मानसिक असंतुलन शारीरिक रुग्णता का प्रमुख कारण

व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि बहुत ही संकीर्ण हो, और दायरा गूलर के भुनगे जैसा क्षुद्र बना लिया गया हो तो इन्द्रिय लिप्सा और संचय तृष्णा ही जीवन सम्पदा को निगल जाने के लिए पर्याप्त है। कोल्हू के दो बेलन गन्ने को पेलते निचोड़ते रहते है। मनुष्य जीवन का अमूल्य अवसर भी गन्ने की तरह लोभ-मोह की चक्की में पिसता और चकनाचूर होता रहता है। क्षुद्रता की संकीर्ण दृष्टि इतने में भी स्वार्थ सिद्ध मान सकती है। स्वास्थ्य को चौपट करने वाला स्वाद ही जिन्हें भारी लाभ प्रतीत होता है और जो भोजन की होली जलाते हुए विषयानन्द लूटते है, उनसे कोई क्या करे ? पर जिनमें तनिक भी दूर दृष्टि है वे यह अन्तर किये बिना नहीं रह सकते कि काया की तनिक सी, क्षण भर की गुदगुदी से स्वार्थ सधता है अथवा सुव्यवस्था एवं सुसम्भावना की दिशा अपनाने मे।

यदि वस्तुतः स्वार्थ सिद्धि ही अभीष्ट हो तो उसके लिए बड़ी दूर दर्शिता अपनाने और भविष्य की बात सोचने का भी कष्ट उठाया जाना चाहिए। सम्पदा कितनी ही आकर्षक क्यों न हो उसका उपयोग बहुत ही सीमित है उपभोग की छोटी सी मर्यादा है न उसका असीम भार उपयुक्त है और न संचय। दोनों ही मार्ग आकर्षक और बहु प्रचलित भले ही लगते हो, अन्ततः अनेकों विकृतियाँ एवं समस्याएँ उत्पन्न करते है। सच्चे अर्थों में लाभान्वित होने का एक ही रास्ता है, व्यक्तित्व का निर्माण। इसी को अध्यात्म की भाषा में आत्मोत्कर्ष, आत्म कल्याण कहते है। इस दिशा में जो जितना सफल हो सका समझना चाहिए उसने उतना ही वैभव कमाया। हीनता से ग्रसितों को न सम्पदा सुख देती है और न अनुकूलता से प्रगति होती है।

व्यक्तित्व ही पारस है, जो जिस वस्तु, व्यक्ति, तथ्य या लक्ष्य से स्पर्श करता है उसे स्वर्ण जैसा सम्मानित कर देता है व्यक्तित्व ही अमृत है, जिसकी अमरता के साथ जुड़ी हुई गरिमा क्षमता एवं निश्चिन्तता के तत्व विद्यमान है। व्यक्तित्व ही कल्प वृक्ष है जिसके सम्पर्क में आने वाले हर दृष्टि से लाभान्वित होते रहते है इस संसार में अगणित सम्पदाएँ सफलताएँ विद्यमान है। श्रेय-सम्मान देने के लिए संसार आतुर है। न सहयोगियों की कमी है। न समर्थकों और न अनुयायियों की, किन्तु वह समस्त विभूतियाँ मात्र व्यक्तित्ववानों के लिए सुरक्षित है। यहाँ तक कि परलोक और दैवी अनुग्रह भी उन्हीं की प्रतीक्षा स्वर्ग एवं वरदान देने के लिए घड़ियाँ गिनता रहता है।

अंधे के हाथ बटेर पड़ना और आसमान से हीरे बरसने लगना दूसरी बात है। पर साधारण नियम यही चलता है कि भौतिक क्षेत्र की प्रतिभाएँ अपने स्तर की सफलताएँ पाती है और आत्मिक क्षेत्र की अपने ढंग की सिद्धियाँ उपार्जित करती है। हीनता तो दोनों ही क्षेत्रों में तिरस्कृत होती है। उपहारों और अनुदानों का लाभ प्रत्यक्ष में भी विशिष्टों को ही मिलता है। वरदान और विभूतियाँ परोक्ष में भी वरिष्ठों के ही पल्ले पड़ती है। शेष असफलताओं का दोष जिस तिस पर मढ़ते हुए मन मसोसते और किसी प्रकार जी हलका करते, दिन गुजारते है। तो भिन्न-भिन्न प्रकार की, पर उनका उपार्जन एक ही सिद्धान्त पर आधारित है मनस्वी और तपस्वी अपने-अपने ढंग के विशिष्ट और वरिष्ठ ही तो होते है।

देवाराधन के सम्बन्ध में इन दिनों भारी भ्रान्ति यह चल पड़ी है। कि अदृश्य के अनुदान स्तवन-पूजन भर से मिल सकते है। देवता पूजा बटोरते और वरदान बखेरते रहते है। जबकि तथ्य सर्वथा भिन्न है। उपासना जीवन साधना का पथ प्रशस्त करती है। अर्थात् व्यक्तित्व सम्पन्न बनने का मनोविज्ञान और क्रियापरक आधार खड़ा करती है। यह प्रगति जिस स्तर की होती है। उसी अनुपात से परिष्कृत पुरुषार्थ निखरता है। यही है साधना से सिद्धि की सीधी सादी, सरल एवं सुनिश्चित प्रक्रिया साधक की यथार्थता और सफलता उसकी व्यक्तित्व सम्पन्नता के आधार पर ही आँकी जाती है।

अब तक जितने भी साधकों ने सिद्धि प्राप्त की हैं, उनका पुरुषार्थ निर्धारित कर्म काण्डों से जुड़ा तो रहा है पर वे इतने भर से सन्तुष्ट नहीं हुए। सिद्ध पुरूषों की प्रतिभा पग-पग पर अपनी प्रखरता का परिचय देती है। वह और कही से कटोरी हुई नहीं होती। वरन् बूँद-बूँद कर के संचित की हुई होती है। पहलवान, विद्वान, धनवान अपना वर्चस्व योजनाबद्ध पुरुषार्थ से चिर प्रयत्न से अर्जित करते है। ठीक यही मार्ग व्यक्तित्ववान, आत्मवान बनने का भी है। सबसे लिए एक ही राज मार्ग है। यहाँ पगडंडियाँ किसी के लिए भी नहीं है। शार्टकट ढूँढ़ने वाले पाते कुछ नहीं, झाड़ियों में उलझते, भटकते और निरर्थक थकने के अतिरिक्त और कुछ उनके पल्ले नहीं पड़ता।

प्राचीन काल के देव युग में इन तथ्यों को जन-जन ने समझा और आस्था पूर्वक अपनाया था। अस्तु वे दूर-दर्शी नीति अपनाते थे। गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता अर्जित करते थे। वही उनकी वास्तविक पूजा थी। जिसके सहारे स्वयं आनन्द पाते और दूसरों को सहारा देकर ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने का सौरभ बखेरते थे। वे जानते थे जीवन अनन्त है। इस जन्म की संचित सुसंस्कारिता ही अगले जन्म में अधिक उच्च स्थिति प्रदान कर सकती है। वैभव देखा भर जा सकता है उसे कोई निगल नहीं सकता। अनावश्यक मात्रा में निगलने वाले को उल्टी और दस्त का त्रास सहना पड़ता है। किन्तु वर्चस्व के बारे में ऐसी बात नहीं है।

सुसंस्कारिता का वर्चस्व ही व्यक्तित्व के कण-कण में घुसता और बसता है, फलतः वह सारी सम्पदा शरीर के बाद भी साथ रहनी है और संचित निधि की तरह भविष्य को अधिकाधिक उज्ज्वल एवं सुखद बनाती चली जाती है सुसंस्कारिता का संचय इस लोक की ही तरह परलोक में भी प्रचुर परिमाण में श्रेय देता और समुन्नत बनाता रहता है।

अपने साथियों, सम्बन्धियों की जितनी सहायता उन्हें सुसंस्कारी बना कर दी जा सकती है उतनी और किसी प्रकार नहीं। कहना न होगा कि यह प्रयोजन चन्दन की तरह स्वयं सौरवान बनकर समीपवर्तियों को श्रेयाधिकारी बनाने की तरह ही पूरा हो सकता है। साथियों को समझाते रहने या दवाते रहने से व्यक्तित्ववान नहीं बनाया जा सकता यह कार्य तो जलते दीपक द्वारा पूरा दीपक जलाये जाने की तरह ही सम्पन्न होता है। प्रियजनों का हित साधन जिन्हें वस्तुतः अभीष्ट हो उन्हें अपने को साँचा बनाकर, उनकी उपयुक्त ढलाई करने के रूप में ही प्रयोजन की पूर्ति करनी चाहिए।

अतीत की महान गरिमा का सार तत्व उस समय की समुन्नत सुसंस्कारिता पर निर्भर था। अध्यात्म को आज तो जादूगरी माना जाता है, पर उन दिनों उसका सीधा-साधा अर्थ गुण, कर्म स्वभाव से उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ाने के निमित्त बनाये गये तत्व दर्शन को हृदयंगम करना और व्यवहार में उतारना भर था। विभिन्न साधनायें उसी एक प्रयोजन की पूर्ति के लिए की जाती थी। व्रत, संयम, तप, दान आदि के धर्मानुष्ठानों से संचित संस्कारों का निराकरण और उत्कृष्ठानो से संचित संस्कारों का निराकरण और उत्कृष्टता का उच्चस्तरीय अवधारण ही लक्ष्य था। सत्संगों में यही कहा और स्वाध्याय में यही पढ़ा जाता था। कि अभ्यस्त पशु-वृत्तियों को निरस्त करने के लिए अनवरत अभ्यास किया जाय साथ ही ऐसा क्रिया कलाप अपनाया जाय, जिससे आदर्शवादिता समझने समझाने तक सीमित न हरे, वरन व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बन सके। ईश्वर भक्ति से लेकर योगाभ्यास और तप-साधना के पीछे इसी एक लक्ष्य की पूर्ति का उद्देश्य सन्निहित है। चिंतन और मनन का महात्म्य इसीलिए बनाया गया है कि उससे आत्म सुधार और आत्म निर्माण के दोनों पक्ष पूरे होते है स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।

आरती का इतिहास एक शब्द में जन-जन द्वारा उत्कृष्टता अपनाये जाने और उसे आदर्शवादी प्रयोजनों में प्रयुक्त करने की घटनाओं का समुच्चय मात्र है। पूर्वजों के महान कर्तृत्व इसी आधार पर बन पड़े। उनकी क्षमताओं और विशिष्टताओं का ऋद्धियों और सिद्धियों का उद्गम एक ही रहा है। कि चिन्तन और चरित्र को उच्चस्तरीय बनाने में इन दिनों आशाजनक सफलता पाई गई। संसार भर के अनेकानेक उपाय-उपचारों से जो विविध विधि सेवा की जा सकी उसका विवरण विश्व इतिहास के पन्ने-पन्ने पर अंकित है साधन हीन परिस्थितियों में यह सब कैसे बन पड़ा। इसका एक ही उत्तर है - उन दिनों उत्कृष्टता अपनाने में भाव भरी अभिरुचि ओर दूसरे से आगे बढ़ने की स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा। इसी प्रवाह प्रचलन ने उस समय के देवता, युग और उन परिस्थितियों को स्वर्गोपम बनाया था। उन दिनों सच्चे अर्थ में स्वार्थ भी साता और हाथों हाथ फल देने वाले परमार्थ का भी पूरा लाभ उठाया गया। उन दिनों आज की तरह आदर्शवादिता का मार्ग कठिन या असम्भव नहीं समझा जाता था। किन्तु उसकी सरलता, सुविधा और सुखद प्रतिक्रिया को देखकर हर किसी को यह विश्वास रहता था कि समृद्धि एवं प्रगति का मात्र यही एक मार्ग है।

यह प्रचलन किस प्रकार सम्भव हुआ ? निकृष्टता की पशु प्रवृत्तियाँ सदा से गुरुत्वाकर्षण की तरह हर किसी को अधोगामी बनाने का दवाब डालती है। तो उन दिनों लोग किसी प्रकार उत्कृष्टता के मार्ग पर चलते रहे ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर, उन दिनों के विद्या मन्दिरों पर दृष्टि जमती है। साक्षरता की दृष्टि से उन दिनों आज जैसी सुविधा नहीं थी, पर विद्या मन्दिरों की कही कभी न थी। ऋषिकल्प देवता निवृत्तों के लिए आरण्यक, बालकों के लिए गुरुकुल और गृहस्थों के लिए तीर्थ सेवन की त्रिविध सूत्र श्रृंखला का सुनियोजित संचालन करते थे उस त्रिवेणी में स्नान करने का जन-जन को अवसर मिलता था। “काक होहिं पिक बकहु मराला” के अलंकारिक प्रतिपादन में जिस त्रिवेणी संगम का महत्व बताया गया है वह वस्तुतः वह लोक शिक्षण की विविध प्रक्रिया ही है जिससे उच्चस्तरीय प्रेरणा पाने और अभ्यास का लाभ लेने के लिए समुचित अवसर प्राप्त करने की सुविधा रहती है।

ब्राह्मण सीमित क्षेत्र के यजमानों का क्रमबद्ध शिक्षण करते थे। और सन्त बादलों की तरह परिभ्रमण करते और जहाँ तहाँ बरसने का क्रम जारी रखते थे। फलतः निकृष्टता से जूझना और उत्कृष्टता को उभारना उतना कठिन नहीं रह जाता था जैसा कि आज प्रचलन के अभाव में प्रतीत होता है।

युग परिवर्तन की इस पुण्य बेला में नये सिरे से कुछ सोचने की आवश्यकता है, नया क्रम अपनाने की। चिर पुरातन को नित नवीन के साथ जोड़ देने से भली प्रकार काम चल जाएगा। जिस मार्ग पर चल कर पूर्वजों ने देवोपम गरिमा अर्जित की थी, वह अपने लिए भी नितान्त सम्भव है जिस प्रयोग को लाखों वर्षों तक खरा और उपयोगी पाया गया उसकी पुनरावृत्ति में किसी हिचक की आवश्यकता नहीं है। विपत्तियों और विभीषिकाओं में फँस जाने का एक मात्र कारण सदाशयता के राज मार्ग से भटक जाना भर है। भूल को सुधारा जा सकता है और उसी राज मार्ग को अपनाने का विवेक दर्शाया जा सकता है। जो भूतकाल की तरह आज भी अपनी विशिष्टता सिद्ध करने में पूर्णतया सक्षम है।

इस पुनरावर्तन में अखण्ड-ज्योति के प्रबुद्ध परिजन अन्यान्यों से एक कदम आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभा सकते है। प्राचीन तत्वदर्शन को जीवन व्यवहार में उतारने की अभिनव प्रयोगशाला गायत्री नगर के रूप में खड़ी की गई है। अब इसमें देव परिवार बसाने का दूसरा चरण उठाया जाना है इस धरती को उस साधना में प्रवृत्त किया जायेगा जिसमें भूत कालीन प्रचलनों को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न प्रमुख है स्पष्ट है कि साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा का चतुर्विध उपचार ही व्यक्तित्व निर्माण का, आत्मविकास का, ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित आधार है, इससे कम से वास्तविक आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं, इस प्रक्रिया को अपनाने के उपरान्त और कुछ अधिक खोजने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

अध्यात्म की चमत्कारी प्रतिक्रिया सिद्ध करने में प्राचीन काल में भी उन्हीं की प्रमुख भूमिका रही है जो आकर्षणों और दबावों से मुक्ति पा चुके। वानप्रस्थ उसी परिस्थिति का नाम है जिसमें व्यामोह की दलदल में फँसे रहने की अपेक्षा ऊँचा उठने का मन चलता और साहस उठता है कहना न होगा कि प्राचीन काल में अतौत को महान बनाने की प्रमुख भूमिका रही हैं अब उसी युग को वापिस लाना है जो उसकी स्तर की भूमिका निभा सके उसी को ही फिर आगे आना होगा। वानप्रस्थ का पुनर्जीवन ही युग परिवर्तन का ठोस आधार है क्योंकि लोक शिक्षण की प्रक्रिया वक्ताओं से नहीं प्रतिभाओं के सहारे सम्पन्न होगी। अध्यात्म क्षेत्र की प्रतिभाओं में उन साहसिकों की गणना होती है जो उच्च स्तरीय प्रतिपादनों को अपने ऊपर उतारने की पहल करते है।

(1) पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त (2) आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी (3) शरीर और मन से सक्षम (4) आदर्श वादी जीवन-चर्या अपनाने के लिए मनोबल सम्पन्न की चार विशेषताओं से युक्त परिजनो को गायत्री नगर में बसने के लिए आमन्त्रित किया गया हैं यहाँ की शिक्षण पद्धति में मात्र पाठ्यक्रम पूरा करने तथा अमुक संख्या में जप-तप कर लेने जितना भर सीमित नहीं है। वरन् व्यक्तित्व को परिष्कृत करने वाले समग्र अध्यात्म की समन्वित जीवनचर्या अपनाने के लिए कटिबद्ध रहना है। प्रयोग शाला का प्रथम परीक्षण इसी रूप में सम्पन्न होगा कि जो भर्ती हो, वे अपना व्यक्तित्व उभारें। इसके उपरान्त दूसरों को उठाने और आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व सँभाले। लोक शिक्षण की यही पद्धति अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत कर सकने में सफल हो सकती है।

महान अध्यात्म परम्पराओं को पुनर्जीवित करने एवं देव युग को वापिस लाने के लिए आज की परिस्थिति में क्या करना होगा और उसका प्रभाव परिणाम किस रूप में प्रस्तुत होगा इस परीक्षण के लिए गायत्री नगर में देव परिवार बसाया जा रहा है इसमें सम्मिलित होने वालो को अग्रगामी, अग्रदूतों की पंक्ति में खड़ा होने का अवसर मिलेगा। उत्कृष्टता के ढाँचे में असंख्यों को ढालने के लिए अपने को जो सुदृढ़, संयंत्र सिद्ध कर सकेंगे वे समय को पहिचानने और उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त समय को पहिचानने और उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त भूमिका सम्पन्न करने वाले सौभाग्यवानों में गिने जायेंगे।


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राजा जनक की सभा में अष्टावक्र ने अपने वक्र शरीर के लिए अपमानित अवस्था दूर करने का निश्चय किया। श्रुति ने बताया इस जगत का निर्माण ब्रह्मा ने किया है। पालन करने वाले विष्णु है और संहार करने वाले महेश्वर शंकर है। उनकी शरण जाने से ही कल्याण सम्भव है।

अष्टावक्र ने ब्रह्मा की उपासना प्रारम्भ की। वर्षों तक अन्न जल आदि का परित्याग कर उन्होंने विधि का अर्चन किया। उनकी तपश्चर्या से अभिभूत ब्रह्मा प्रकट हुए और पूछा-वत्स तुमने आह्वान किस हेतु किया ?

आप विधाता है अष्टावक्र ने पूछा-आप की सृष्टि का सृजन करते हो ? निःसन्देह में हो-ब्रह्मा बोले ? तो फिर आपने मुझे विकलांग क्यों बनाया। क्या आपको सुन्दर सृष्टि रचने का ज्ञान नहीं? अष्टावक्र के शब्दों की रुष्टता स्पष्ट प्रकट थी। पर ब्रह्मा जी निर्विकार रहे-बोले तात यह तो तुम्हारे अपने प्रारब्ध का फल है।

“प्रारब्ध” - यदि आप सृष्टा होकर भी प्रारब्ध के दास है तो मुझे आपसे और कुछ नहीं कहना आप जा सकते हो।

एक दिन भगवान शंकर भी प्रकट हुए। अष्टावक्र ने भगवान शिव को प्रणाम कर कहा-मृत्युंजय आपके लिए सृष्टि में कुछ असम्भव नहीं। शीघ्रता कीजिये मेरे इस विकृत शरीर का नाश कर बस लज्जाजनक जीवन यंत्रणा से मुझे मुक्त कीजिये।

भगवान शंकर मुस्कराये और बोले वत्स! मैं संहारक हूँ अवश्य, पर बस प्रारब्ध पर ही ऐसा कर सकता हूँ, अपने भीतर देखो, अपने प्रारब्धों की खोज कर उन्हें सुधारो तो जो वस्तु तुम मुझसे चाहते हो वह स्वतः प्राप्त कर लोगे।


अपनों से अपनी बात

गायत्री नगर में देव परिवार, बसाने की योजना, निश्चित रूप से अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को उपयुक्त समय पर उपयुक्त कदम उठाये जाने के रूप में स्वभावतः प्रिय लगेगी। तिनी मनःस्थिति और परिस्थिति उसके लिए उपयुक्त है। वे उसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न भी करेंगे। ऐसे लोगों को कुछ बातें विशेष रूप से जानने योग्य है।

(1) यह शुभारम्भ गायत्री जयन्ती तारीख 23 जून से प्रारम्भ होगा। जिन्हें स्वीकृति मिले वे तारीख 22 की शाम तक मथुरा पहुँच जायें।

(2) प्रथम परीक्षण 34 दिन का होगा। गुरुपूर्णिमा 29 जुलाई की है, उस दिन स्थायी प्रवेश मिलेगा। इस अवधि में उपयुक्तता और अनुकूलता की जाँच पड़ताल दोनों पक्ष कर सकेंगे।

(3) प्रवेशार्थी अपनी पिछली जीवनचर्या एवं अपनी वर्तमान परिस्थितियों का विस्तार पूर्वक उल्लेख करे। शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक, पारिवारिक एवं आर्थिक सभी परिस्थितियों का विवरण लिख रहना चाहिए। विवरण एवं परिचय इतना विस्तृत हो कि प्रवेशार्थी की मनःस्थिति एवं परिस्थिति की जानकारी अधूरी न कही जा सके।

(4) घर से निवृत्त होकर मन मौजी छुट्टियाँ मनाने की दृष्टि से कोई न आवे। यह मानकर चलना चाहिए कि सैनिकों जैसे अनुशासन, साधनों जैसे तप-साधन के निमित्त अपने को नये ढाँचे में ढालने के लिए अभीष्ट कठिनाइयाँ सहने के लिए जाया जा रहा है। स्वच्छन्द विचरण और मन चाहे निर्धारण करने की सुविधा यहाँ नहीं है ।

(5) निवृत्त व्यक्ति पत्नी सहित भी रह सकते है। भोजन अपने हाथ बनाने की पूर्ण सुविधा है। आश्रम के सहकारी भण्डार में दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएँ मिल जाती है।

(6) जिनके पास अपने आजीविका स्त्रोत परिवार के भरण पोषण जितने मौजूद है वे बच्चों सहित भी आ सकते है। निवास की समुचित सुविधा है। साथ ही आश्रम के गुरुकुल में बालकों के लिए उपयुक्त शिक्षण व्यवस्था मौजूद है।

(7) गुरुपूर्णिमा के उपरान्त सभी साधक अपना भोजन स्वयं पकायेंगे तब तक के दिनों तक आश्रम के भोजनालय में सम्मिलित रहने की व्यवस्था की गई है।

(8) प्रवेशार्थियों को साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चार कार्यक्रमों में अपनी दिनचर्या ढ़ालनी है। विश्राम, भोजन, व्यायाम आदि नित्य कर्मों में बँटा हुआ समय इन्हीं चार कार्यक्रमों में साधक की स्थिति देखते हुए तदनुरूप विभाजित किया जायेगा। यह निर्धारण हर व्यक्ति की स्थिति का पर्यवेक्षण कराने के उपरान्त ही किया जायेगा।

(9) देव-परिवार के प्रवेशार्थी तारीख 30 तक आवेदन पत्र, शान्तिकुंज हरिद्वार के पते पर भेजकर स्थान सुरक्षित करा ले। सीमित स्थान पूरे हो जाने पर, बाद वालों को जगह न मिल सकेगी।

सत्रों सम्बन्धी तीन सूचनायें

(1) इस बार देव परिवार के प्रशिक्षण की नई विधि व्यवस्था आरम्भ होने से सारा ध्यान प्रयत्न इसी एक प्रक्रिया के सुसंचालन पर केन्द्रित रहेगा। इसलिए जुलाई, अगस्त, सितम्बर में परिव्राजक सत्र, महिला सत्र एवं संगीत सत्र, साधना सत्र स्थगित रहेंगे उसके उपरान्त ही उन्हें आरम्भ किया जा सकेगा। अस्तु इन तीन महीनों के लिए अन्य वर्ग के शिक्षार्थी आवेदन पत्र न भेजे।

(2) ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सदस्यों का एक पाँच दिवसीय काम-काजी सत्र तारीख 25 से 26 जून तक चलेगा। संस्थान के सदस्य हो उसमें भाग ले सकेंगे। जो आने चाहें, स्वीकृति प्राप्त कर लें।

(3) कन्या प्रशिक्षण सदा की भाँति 1 जुलाई से आरम्भ होगा। प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु 26 वर्ष और शिक्षा मैट्रिक कर दी गई है, कम पढ़ी और कम आयु की लड़कियाँ यहाँ की भारी शिक्षा विधि को गले उतार नहीं पाती। इस वर्ष से लड़कियों के मिल जुल कर, छोटे-छोटे जत्थों में अपना भोजन आप बना लेने की विशेष सुविधा की गई है। छात्राएँ 25 मई तक स्वीकृति प्राप्त कर लें।


राम की महिमा अपरम्पार

(मंगल विजय)


राम की महिमा अपरम्पार (kavita)

जल में, थल में, जड़-चेतन में, गूँज रही झंकार

राम की महिमा अपरम्पार, राम की महिमा अपरम्पार।।

खेलता है जब बालक खेल, जुटा कंकर, पत्थर, खपरैल।

बसाकर तब झूठी दुनिया, बिठाता है यथार्थ से मेला।।

खेल जब तक भी चलता रहे।

खेलती अधरों पर मुस्कान।।2।।

किन्तु जब आती घर की याद। त्याग देता हर हर्ष विषाद।

खत्म कर देता सारा खेल, बसाई दुनिया को बरबाद।

खेल ही था, सारा खिलवाड़।

उसे रहता है इतना भान।।3।

न रखता बालक मन में गाँठ, खेल के राग-द्वेष की बात।

भुला तेरे मेरे का भाव, स्नेह आपस में लेता बाँट।।

यही निश्छल, निर्मल व्यवहार।

बालकों के जीवन की शान।।4।।

बाल हठ को हमने दी मात, न छोड़ा नश्वरता का साथ।

दुराग्रह से चिपटे हम रहे, मौत न भी जब पकड़े हाथ।।

गये हम चिर यथार्थ को भूल।

रहे अपने से ही अनजान।।5।।

नरक कर डाली अपनी सृष्टि, बन्द हो गई स्वार्थवश दृष्टि।

हुये जब हम इतने स्वार्थान्ध, दिखाई दी ही नहीं समष्टि।।

देव बन सकता था जो मनुज।

वही बन गया हाय! शैतान।।9।।

राम की महिमा अपरम्पार, राम की महिमा अपरम्पार।।

*समाप्त*