आध्यात्मिकता-निष्क्रियता नहीं सिखाती’

अध्यात्म निष्क्रियता नहीं सिखाता और न जो कुछ हो रहा है उसे देखते सहने, करते रहने की प्रेरणा उसमें है। शान्ति का अर्थ चुप बैठना नहीं है। कर्त्तृत्व और प्रगति की ओर से मुँह मोड़ लेने का अध्यात्म दर्शन के साथ सम्बन्ध जोड़ना ब्रह्म विद्या के महान तत्व दर्शन पर लांछन लगाना है।

भेड़े मिमियाती भर है- असत्य नहीं बोलती, खरगोश किसी की हिंसा नहीं करते, उन्हें न तो सत्यवादी कहते हैं और न अहिंसा साधक। अन्धे, बहरे, गूँगे न अशुभ देखते हैं, न अशुभ सुनते हैं, न अशुभ बोलते हैं, उन्हें मुनि नहीं कहा जाता। गहरी नींद में अशुभ क्रिया नहीं होती, तो क्या उसे पुण्यार्जन का समय कहें?

अध्यात्म की प्रेरणा लौकिक और पारलौकिक सुख सिद्धि के लिये कठोर धन एवं मनोयोग को नियोजित करना है। अशुभ विचारों और अशुभ आचारों को निरस्त करने के लिए जो घोर पुरुषार्थ करना पड़ता है- आध्यात्मिकता को उसी से जुड़ा हुआ मानना चाहिए।


निकट भविष्य में अध्यात्म युग आकर रहेगा

इतिहास मर्मज्ञ डा. टायनवी से एक पत्रकार ने पूछा- निकट भविष्य में जब वैज्ञानिक प्रगति के कारण मनुष्य को सहज ही सस्ते मूल्य पर प्रचुर सुविधायें मिलने लगेगी, तब वह बैठे ठाले अपना समय किस प्रकार बिताया करेगा? इस प्रश्न के उत्तर में टायनवी में कहा- “ उसके पास काम करने का इतना बड़ा और इतना महत्वपूर्ण क्षेत्र खाली है, वह क्षेत्र ऐसा है जिसमें प्रगति होते हुए भी भौतिक सुविधायें उसके लिये सुखद न रह कर दुःखद बनती जायेगी। यह उपेक्षित क्षेत्र अध्यात्म का है। चिन्तन को परिष्कृत करने वाला क्षेत्र भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की अपेक्षा बड़ा भी है और व्यापक भी। सुविधाओं की अभिवृद्धि के कारण जो समय बचेगा, उसे आगामी पीढ़ियाँ अध्यात्म उत्पादन में लगाया करेगी। संगीत, साहित्य कला के माध्यम से विचारों का परिष्कार करने की आवश्यकता अनुभव की जायेगी और भावनात्मक सहयोग एक के द्वारा दूसरे को मिलता रहे, इसकी आवश्यकता अनुभव की जायेगी। इसलिए मानवी अन्तरात्मा की भूख बुझाने के साधन जुटाने में अगली पीढ़ियों को लगना होगा। चैन करने और मौज उड़ाने की वर्तमान हविस की निरर्थकता होने पर मनुष्य को अंतर्मुखी प्रवृत्तियों के जागरण का अधिक उपयोगी प्रयास करने में जुटना पड़ेगा। बेकारी या शून्यता उत्पन्न नहीं होने पायेगी।

मनुष्य बुद्धिमान है वह विनाशकारी परिस्थिति उत्पन्न होने से पूर्व ही सजग हो जाने और राह बदलने का अभ्यस्त है। आदिम काल से लेकर अब तक उसने सामने अगणित उतार चढ़ाव आये है। उनमें से कितने ही तो जीवन मरण की चुनौती जैसे अवसर थे। परिस्थितियाँ नहीं बदल सकती तो अपने को बदला जाय, इस निष्कर्ष पर पहुँचने में उसे देर तो लगती है पर विवशता उसे परिवर्तन स्वीकार करने के लिए बाध्य कर देती है तो वह अपना संतुलन बिठा लेना भी जानता है।

आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति ने मानवी इतिहास में एक नया और विचित्र अध्याय जोड़ा है। भौतिक सुविधा साधनों के विस्तार के साथ इस प्रगति में यह असुविधा भी जुड़ी हुई है कि नियंत्रण के अभाव में यह विकास उन्मत्त हाथी की तरह सर्वभक्षी विनाश की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करेगा।

उदाहरण के लिए परिवार नियोजन के सुविधा-साधन चल पड़ने से जहाँ अनावश्यक वंश वृद्धि रोकने का उपाय हाथ लगा है वहाँ एक नई समस्या यौन स्वेच्छाचार की बढ़ गई है। अनावश्यक और अवांछनीय संतानोत्पादन से डर कर नर-नारी संयम बरतने के लिए विवश होते थे। पर अब वैसी सतर्कता बरतने की जरूरत नहीं रही और पर्दे के पीछे कुछ भी करते रहने की छूट मिल गई। इस नये पतन के मार्ग खुल जाने से सार्वजनिक स्वास्थ्य को क्षति पहुँचने और दाम्पत्य जीवन की पवित्रता एवं वफादारी घट जाने की विभीषिका सामने आने की बात स्पष्ट है। समय ही बतायेगा कि परिवार नियोजन के विकसित साधनों ने मानव जाति की सेवा अधिक की या कुसेवा?

चमत्कारी औषधियों से तत्काल पीड़ा शमन का तो पथ प्रशस्त हुआ पर उनके कारण रोग निरोधक जीवनी शक्ति का भण्डार चुकने की हानि भी तो कम नहीं हुई। रासायनिक खादों ने उत्पादन बढ़ाया पर भूमि का बन्ध्यत्व और अखाद्य तत्वों के उदरस्थ होने की क्षति भी तो उपेक्षणीय नहीं है। अणुशक्ति से ऊर्जा की आवश्यकता सस्ते मूल्य और प्रचुर परिमाण में पूरी हो सकती है पर परमाणु भट्ठियों की राख को कहाँ डाला जाय? इस उलझी हुयी समस्या का समाधान नहीं मिल रहा है। अणु अस्त्रों ने तृतीय युद्ध को रोक रखा है, यह ठीक है , पर यह भी गलत नहीं कि कोई एक सनकी सारी दुनिया को जला देने वाली माचिस जलाकर बारूद के ढेर पर फेंक सकता है। आक्रमण की शक्ति आधुनिक हथियारों ने बहुत बढ़ा दी है। उनके कारण बड़े देश छोटों को सहज ही उदरस्थ कर सकते हैं। शोषण और उत्पीड़न के पुराने ढर्रे के वीभत्स तरीके अब काम में नहीं लाये जाते पर कुचक्र ऐसा चल पड़ा है जिसमें स्वेच्छा पूर्वक शोषण स्वीकार करने के अतिरिक्त अन्य चारा नहीं रह जाता। पुराने लोग नारी को भोग्य बनाये रहने के लिए अमानुषिक प्रतिबंधों का प्रयोग करते थे अब उसके सामने प्रलोभन इतने रख दिये गये है कि उसे स्वेच्छापूर्वक अवांछनीय समर्पण करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता सरल नहीं दीखता।

मनुष्य की स्थिति उस भूखे चूहे जैसी है जो रोटी का टुकड़ा देख कर पिंजड़े में कैद होता है- उस मछली जैसी है जिसे आटे की गोली मरण निमंत्रण स्वीकार करने के लिये बाध्य करती है। प्रचार तंत्र इतना समर्थ हो गया है कि जन-मानस को उस दिशा में सहज ही घसीट कर ले जाया जा सकता है, जिसमें निहित स्वार्थों की स्वार्थ लिप्सा पूरी होती है। लाखों करोड़ों लोग मनुष्य द्वारा मनुष्य को मारे जाने की कला को उत्साह पूर्वक सीख रहे है और उसमें पारंगत बन रहे हैं। चित्रों और पुस्तकों में कुत्सित विषाक्तता की मात्रा दिन-दिन बढ़ती जा रही है, इस सफलता का कारण प्रकाशकों की वह धन लिप्सा है जिसे भोली जनता की पशु प्रवृत्तियाँ भड़का कर सरलता पूर्वक पूरी कर लेते हैं। फिल्मों के क्षेत्र में प्रगति इसी आधार पर हो रही है और भारतीय अभिनय पाश्चात्य नग्न निर्लज्जता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने के लिए आतुर हो रहा है।

वैज्ञानिक प्रगति ने निस्सन्देह सुविधा साधनों का असाधारण विस्तार किया है। प्रतियोगिता के कारण वे अधिक सस्ते और अधिक सुविधाजनक बनते जा रहे हैं। सहज ही उनका उपयोग उपभोग करने की ललक को भड़कना ही है। साथ ही यह भी निश्चित है कि इस प्रलोभन पथ पर अन्धी दौड़ लगाता हुआ मनुष्य औंधे मुँह गिरेगा और प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा सहस्रों गुना अप्रत्यक्ष क्षतिग्रस्त होगा।

वैज्ञानिक उपलब्धियों के पीछे उनके अविवेक पूर्ण उपयोग की काली छाया भी जुड़ी हुई है। यदि ढर्रा वर्तमान धुरी पर ही घूमता रहा तो निकट भविष्य में ही इस प्रगति को विकृति ठहराना पड़ेगा। तब इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि मानव बुद्धिमत्ता ने विज्ञान क्षेत्र में जो प्रगति की थी उसकी सबसे बड़ी मूर्खता दुर्भाग्य भरी अभिशाप स्थिति सिद्ध हुई।

किन्तु मानव की गरिमा पर विश्वास रखते हुए हमें आशा करनी चाहिए कि दूरदर्शिता का यह अभाव ढेर तक न बना रहेगा। विवेक से विमुखता सदा नहीं रही है। सुविधा साधनों के चकाचौंध में आँखें अधखुली ही न बनी रहेगी। समय के थपेड़े वस्तु स्थिति समझने के लिए विवश करेंगे। यह तथ्य अनजाना न बना रहेगा कि निरंकुश शक्ति जब अवांछनीयता के पथ पर चढ़ दौड़ती है तो सर्वनाश किये बिना रुकती नहीं। उचित और अनुचित का भेद किये बिना जो पाया सो खोया- जो भाया सो आया वाली नीति अपनाकर यदि लक्ष्य विहीन अन्धी दौड़ लगाते रहेंगे तो यह तथाकथित प्रगति विघातक ही सिद्ध होगी। आज यह तथ्य उपहासास्पद भी लग सकता है पर कल जब वस्तु स्थिति बन कर सामने आवेगी तो सर्वग्राही विभीषिका से बचने का मार्ग सोचना ही पड़ेगा।

शक्ति और साधनों को उच्छृंखल प्रयोग चन्द लोगों के लिए कुछ समय लाभदायक हो सकता है पर सर्व साधारण को इससे अपार क्षति उठानी पड़ेगी। मानवी स्नेह-सद्भाव के तार टूट जायेंगे और मर्यादाओं के उल्लंघन का उत्साह नीति और न्याय की चिरसंचित सभ्यता को मटियामेट करके रख देगा।

क्या मनुष्य जाति अपने हाथों सामूहिक आत्महत्या करेगी? आदिमकालीन नर-पशु को सृष्टि को मुकुटमणि बनाने वाली सद्भाव संस्कृति का अन्त इस प्रकार दुःखद दुर्भाग्य के साथ हो जायेगा? समय-समय पर संकटों से बच निकलने वाली मानवी सूझ-बूझ का क्या अब उपयोग होना संभव नहीं? इन प्रश्नों पर विचार करते हुए यह सहज स्वीकार नहीं हो सकता कि संकट का सामना नहीं किया जा सकता या नहीं किया जाना चाहिए।

निश्चित रूप से विज्ञान पर अंकुश स्थापित करने वाले ‘अध्यात्म दर्शन का अगले दिनों उसी प्रकार विकास होगा जिस प्रकार इन दिनों वैज्ञानिक प्रगति के लिए- सुविधाओं के अनियंत्रित उपभोग के लिए प्रयास किया जा रहा है। यह ठीक है कि हम प्रकृति पर विजय का लोभ नहीं छोड़ सकते हैं पर यह भी ठीक है कि उस विजय का स्वच्छन्द उपभोग बहुत महँगा पड़ेगा। संतुलन के बिना कोई गति नहीं। विज्ञान पर अध्यात्म का अंकुश स्थापित किये बिना - तूफानी गति से उठने वाली समस्याओं का कोई समाधान नहीं।

एकांगी भौतिक प्रगति ने स्वच्छन्दतावाद के चंगुल से फंसकर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है जिसमें स्वस्थ समाज की सारी विशेषताएँ एक-एक करके नष्ट होती चली जा रही है। बेशक, सुविधाएँ बढ़ रही है पर आन्तरिक क्षेत्र में ऐसी रिक्तता और शून्यता उत्पन्न हो रही है जिसमें मानवीय अन्तरात्मा को विक्षिप्त एवं विद्रोही जैसा बना दिया है। हिप्पीवाद के रूप में वह प्रतिक्रिया फूट रही है। उच्च आदर्श, मात्र प्रवंचना के रूप में ही जा सकते हैं तो उनका अन्त क्यों न कर दिया जाए? हिप्पीवाद ऐसी ही निषेधात्मक निराशा की उपज है मानवता के गिरते हुए मूल्यों का समाधान इस रूप में खोजा जा रहा है कि या तो इस छोर पर पहुँचाया जाय या उस छोर पर। जब निरकुंश स्वच्छन्दतावाद बढ़ता ही जाना है तो पर्दे के पीछे आँख मिचौनी क्यों की जाये? उसे नये युग की नयी सभ्यता क्यों न मान लिया जाये? जब जंगली कानून को भीतर ही भीतर मान्यता मिल रही है तो उसका खुला प्रदर्शन करने में क्या हानि है? इस माँग में और कुछ हो या न हो - ईमानदारी जरूर है। इस ईमानदारी के कारण मानवी विवेक को विचार करना पड़ेगा कि क्या मनुष्य को निरुद्देश्य और निरंकुश गतिविधियाँ अपनाने से समाधान मिल सकेगा। निश्चित रूप से यह एक विघटित और दिशा हीन समाज की कल्पना है जिसके दुष्परिणामों का विवरण तैयार करने पर दिल दहलने लगता है।

मानवी इतिहास इस बात का साक्षी है कि समय समय पर आने वाली समस्याओं और विभीषिकाओं का सामना करने के लिए आवश्यक सूझ-बूझ का परिचय दिया जाता रहा है, भविष्य में भी वैसा ही रहेगा। वैज्ञानिक प्रगति के चरण आगे बढ़ेंगे- उसके स्वच्छन्द उपयोग के कारण उत्पन्न हुआ सर्वग्रासी संकट भी सामने प्रस्तुत होगा ही, सभ्यता को खोकर पनपे हुए स्वेच्छाचार के कारण जो विग्रह उत्पन्न होगा वह यथास्थिति नहीं बनी रहने देगा वरन् समाधान कारक निर्णय की माँग करेगा। उस माँग को पूरी किये बिना काम चलेगा ही नहीं।

सदाशयता की प्रेरणा से न सही, विवशता के दबाव से सही, आत्मरक्षा और चैन से रहने देने की दृष्टि से सही। निर्णायक समाधान यही सामने आयेगा कि जड़ जगत की सम्पदाओं और शक्तियों की तरह ही चेतनात्मक विभूतियों का भी अभिवर्धन किया जाय सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों को विकसित किया जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अगले दिनों उसी स्तर पर प्रयत्न करने होगे जिस पर कि आज वैज्ञानिक प्रगति के लिए मानवी श्रम, कौशल, धन एवं मनोयोग नियोजित किया जा रहा है। एकाकी प्रगति को संतुलित बनाने के लिए निकट भविष्य में यदि आध्यात्मिक प्रगति का अभियान तूफानी द्रुत गति से सामने आये तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। समय की माँग पूरी करने वाली और मानवी विवेक को जीवित रहने की यह एक सहज साक्षी और स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही होगी।


हम अन्तरिक्ष को ही नहीं, अन्तर को भी खोजे

विज्ञान कली महिमा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, उसकी सार्थकता तभी है जब वह विकृतियों और विभीषिकाओं के जाल जंजाल में उलझी हुई मानवता के परित्राण में सहायक सिद्ध हो सके।

विज्ञानी शोधकर्ताओं और उनकी आश्रयदात्री सरकारों तथा संस्थाओं को इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि संसार की दृष्टि से जितनी खोज हो चुकी वह पर्याप्त है। इस पृथ्वी को भून डालने के लिए और प्राणियों का अस्तित्व सदा के लिए मिटा देने वाले साधन अब पर्याप्त है। यदि समस्त ब्रह्माण्ड को नष्ट करना हो तो बात दूसरी है यदि पृथ्वी ही अपना कार्य क्षेत्र हो तो जितना धन और धन विघातक शोध कार्यों पर लग चुका वही पर्याप्त है। अब सृजन की दिशा में ही वैज्ञानिक अन्वेषणों और प्रयोगों का क्रम चलना चाहिए।

युग की समस्याओं पर दूरगामी तत्व दृष्टि से विचार करने वाले चिन्तक डा. वेस्टलेक ने अपने निष्कर्ष लाइफ थेटेण्ड- जीवन संकट- नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराये है। उन्होंने अपनी चिन्ता और वेदना व्यक्त करते हुए कहा- पुराना युग जा तो रहा है पर क्या आ नहीं रहा। उत्क्रान्ति के मोड़ पर खड़ा हुआ मानव अब सर्वनाश की ओर बढ़ेगा या आत्मिक प्रगति की ओर मुड़ेगा यह धूमिल है। यही घड़ियाँ है जिनमें उसे अपने जीवन और मरण में से एक का चयन करना पड़ेगा।

विज्ञान क्रमशः जड़ पदार्थों की मूलशक्ति को पकड़ने और उँगली के इशारे पर चलाने के लिए आतुर होता जा रहा है जहाँ पहुँचने पर पदार्थों का ही सर्वनाश हो जायेगा और विज्ञान के लिए कुछ करना ही शेष न रह जायेगा।

विज्ञान की दिशा अब मानवी अस्तित्व, चिन्तन, आस्था ,दृष्टि एवं आकांक्षा के द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया को खोजना चाहिए। जड़ पदार्थों को जिस उत्साह से खोजा जा रहा है उसी उत्साह से चेतना की भावसत्ता का अन्वेषण किया जाना चाहिए। और ऐसे तथ्य सामने लाने चाहिये जिससे मनुष्य अपनी शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक सत्ता का सही प्रयोग कर सके साथ ही जो भौतिक पदार्थ उपलब्ध है उनका श्रेष्ठतम उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है इसकी रीति-नीति निर्धारित करने वाले विज्ञान के प्रामाणिक तथ्य विज्ञान को ही प्रस्तुत करने चाहिए। सदाचरण के प्रति डगमगाती जा रही निष्ठा इस प्रकार के शोध कार्यों से पुनः स्थापित की जा सकती है। परस्पर मिल जुल कर रहने और स्नेह सौहार्द भरा उदार व्यवहार करने में घाटा नहीं वरन् लाभ यह तथ्य थोड़े से प्रयत्नों से भौतिक विज्ञान के आधार पर ही प्रतिष्ठापित किया जा सकता है और अध्यात्म की उच्चस्तरीय दार्शनिक मान्यताओं को विज्ञान को ठोस समर्थन मिल सकता है। इस लक्ष्य को सामने रख कर यदि विज्ञानी अपना शोध कार्य प्रारम्भ करे तो उसमें उस पाप का प्रायश्चित हो सकता है जिसके कारण मानवी सभ्यता के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया है आदर्शवादी संस्थाएँ लड़खड़ाने लगी है।

स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर इस संसार की हर समस्या का कारण और निवारण मनुष्य की आन्तरिक स्थिति में जुड़ा हुआ है। अब उसी क्षेत्र में शोध अन्वेषण के लिए हमारा उत्साह मोड़ा मरोड़ा जाना चाहिए।

होम्योपैथी के आविष्कर्ता उसे हानीमन कहते थे- रोग का नहीं रोगी का इलाज किया जाना चाहिये।

डा. वाच इस नतीजे पर पहुँचे है कि जब तक भौतिक और आत्मिक संतुलन बना रहेगा तब तक मनुष्य निरोग रहेगा जब इस संतुलन में गड़बड़ी पैदा होगी तो बीमारियों का अड्डा शरीर में जमने लगेगा एक के बाद दूसरे रोग का क्रम चलता रहेगा।

डा. होप ने कहा है- पाप और बीमारी में कोई अन्तर नहीं है। सच्चा चिकित्सक रोगी को दवा देकर छुटकारा नहीं पा सकता, वरन् उसे रोगी की आन्तरिक विकृतियों को भी समझना देखना होगा। इसके बिना अधूरी चिकित्सा के आधार पर रुग्णता का उन्मूलन नहीं किया जा सकेगा।

मनुष्य को रासायनिक उत्पादन मान कर चलने से काम नहीं चलेगा। अनैटमी - फिजियोलॉजी- पैथालॉजी- मालिक्यूलर बायोलॉजी - साइकोलॉजी आदि विज्ञान की धाराएँ हमें भौतिक शरीर की संरचना की जानकारी दे सकती है और उसके उतार चढ़ावों सम्बन्धी मार्ग दर्शन कर सकती है, पर मनुष्य इतना ही तो नहीं है। आस्थाएँ और आकांक्षाएँ ही उसे दिशा देती है और इसी रीति-नीति पर व्यक्तित्व का स्तर निर्भर रहता है। हमें उस आत्मा का विज्ञान भी समझना चाहिए जिसका चेतनास्तर और शारीरिक क्रिया-कलाप पर पूरी तरह नियंत्रण है।

सिद्धान्त रहित वैज्ञानिक शोध और प्रयोग हमें विपत्ति में ही फँसाता चला जायेगा। कला-कला के लिये की तरह यदि विज्ञान-विज्ञान के लिये ही, सीमाबद्ध कर दिया गया और उसके पीछे कोई आदर्श न रहे तो फिर इस प्रगति से मनुष्य की विपत्तियाँ ही बढ़ेगी।

वेल्स यूनिवर्सिटी के डा. होलमन ने कहा है- आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की एक देन है- कैन्सर। नशेबाजी का बढ़ता हुआ व्यसन मनुष्य की जीवनी शक्ति का बेतरह क्षय कर रहा है भीतर से खोखले बने हुए मनुष्य तनिक सी प्रतिकूलता में उलटे हो जाते हैं और विषाक्त वातावरण की विभीषिका उन्हें सहज ही अल्सर रक्तचाप, अनिद्रा, धड़कन, गैस, अपच, मधुमेह, सनक, आवेश आदि शारीरिक मानसिक रोगों से ग्रसित कर लेती है। अब तो कैन्सर जैसा प्राण घातक और तड़पा-तड़पा कर मारने वाला रोग भी इस सभ्यता प्रदत्त अनुदान में से ही एक बन गया है। इस पर शारीरिक मानसिक रुग्णता की अभिवृद्धि का प्रभाव सामाजिक रुग्णता के रूप में भी सामने आ रहा है। आक्रमण, अपहरण, बलात्कार, व्यभिचार, छल की बढ़ती हुई घटनाएँ बताती है कि वैयक्तिक विकृति बढ़ने से सारा समाज उससे किस प्रकार प्रभावित होता है।

प्रगतिशील समझे जाने वाले देशों में शुद्ध अन्न, शुद्ध जल और शुद्ध वायु का मिलना दिन-दिन कठिन से कठिनतर होता चला जा रहा है इस तथ्य को ध्यान में रख कर स्वास्थ्य विज्ञानी बेतरह चिन्तित हो रहे है इन दिनों बंद डिब्बों में, यंत्र निर्मित, सुरक्षित रह सकने योग्य भोजन की भर मार है। रसायनों और मशीनों द्वारा बनाया गया- सिन्थैटिक फूड- सारूप भोजन- उत्साह पूर्वक बनाया और खाया जा रहा है। पर प्राकृतिक उत्पादन की तुलना में इसे ‘मृतक’ ही ठहराना पड़ रहा है कि विज्ञापन और पैकिंग की तड़क-भड़क से लोगों को बहकाया फुसलाया जा सकता है पर तथ्य तो जहाँ के तहाँ रहेंगे। फैक्टरी फार्मिंग से स्वास्थ्य सम्बन्धी स्थिरता और सुविधा का स्वप्न तथ्यों की कसौटी पर निरर्थक ही सिद्ध हो रहा है।

कारखानों और वाहनों में जितना ईंधन इन दिनों जलाया जा रहा है और उससे जितनी अतिरिक्त गर्मी उत्पन्न हो रही है उसका संकट कम करके नहीं आँका जाना चाहिए। वर्तमान क्रम चलता रहा तो आगामी 25 वर्षों में वातावरण में कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा अत्यधिक बढ़ जायेगी और उसकी गर्मी से ध्रुव प्रदेशों की बर्फ तेजी से पिघलने लग जायेगी। इसका प्रभाव समुद्र तल ऊँचा उठने के रूप में सामने आता जायेगा और वह क्रम यथावत चला तो सारी बर्फ गल जाने पर समुद्र का जल लगभग 400 फुट ऊँचा उठ जायेगा। और वह संकट धरती का प्रायः आधा भाग पानी में डुबोकर रख देगा। वह आज के क्रम से बढ़ती हुई समुद्री संकट को 25 वर्ष बाद उत्पन्न करना आरम्भ कर देगी और 400 वर्षा में वह संकट उत्पन्न हो जायेगा, जिसके कारण आज वैज्ञानिक उत्साह को मानवी विनाश के लिए उदय हुआ अभिशाप ही माना जाने लगे।

इंजनों में धक्के करने के लिए पैट्रोल में शीशा मिलाया जाता है किन्तु उससे जो जहरीला धुँआ होता है उससे वायुमण्डल की विषाक्तता बढ़ती जा रही है।

अमेरिका के कल कारखानों के विषैले अवशेष, इन दिनों जलाशयों में गिराये जा रहे हैं। इसके कारण वह जल मानवी प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्त बनता चला जा रहा है। नदी , तालाबों के जल जीव बेतरह मर रहे हैं। अनुमान है कि वर्तमान क्रम में आगामी पच्चीस वर्षों में उस देश में शुद्ध जलाशयों के दर्शन दुर्लभ हो जाएँगे। कारखानों से, तेल वाहनों से निकलने वाला धुँआ आसमान में एक प्रकार का कुहरा बन कर छाया रहता है और वह श्वास सम्बन्धी अनेक बीमारियाँ पैदा करता है।

‘डेली टेली ग्राफ’ के सम्पादक ने सत्ताधारियों से पूछा है- कुछ लोग कम समय में जेट विमान द्वारा जल्दी अटलांटिक पार करने इस सुविधा के लिए करोड़ों लोगों की नींद जेट की भयंकर ध्वनि के कारण क्यों बिगाड़ी जा रही है?

आदमी के कान साधारणतः 60 डेसीबल की आवाज सहन कर सकता है जब कि रेले, मोटरें कारखाने लाउडस्पीकर आदि के कारण 120 डेसीबल तक की आवाज पैदा होती है। यह शोर आदमी के मानसिक सन्तुलन को बिगाड़ कर ऐसी अर्ध विक्षिप्तता उत्पन्न करता है जिससे आत्म हत्या की, अपराधों की, सनक उद्दण्डता और गैर जिम्मेदारी की प्रवृत्ति बनाये। चन्द लोग अधिक सुख सुविधा उपार्जन कर सके इसलिए शरीर उत्पन्न करने वाले माध्यमों का बढ़ते जाना- समग्र मानव जीवन के लिए संकट उत्पन्न करना ही तो है।

अधिकाधिक लाभ कमाने के लोभ ने अधिकाधिक उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित किया है। मानवी रुचि में अधिकाधिक उपयोग की ललक उत्पन्न की जा रही है ताकि अनावश्यक किन्तु आकर्षक वस्तुओं की खपत बढ़े और उससे निहित स्वार्थों को अधिकाधिक लाभ कमाने का अवसर मिलता चला जाय। इस एकांगी घुड़दौड़ ने यह भुला दिया है कि इस तथाकथित प्रगति और तथाकथित सभ्यता का सृष्टि संतुलन पर क्या असर पड़ेगा। इकॉलाजिकल वेलेन्स गवां कर मनुष्य सुविधा और लाभ कमाने के स्थान पर ऐसी सर्प-विभीषिका को गले में लपेट लेगा जो उसके लिए विनाश का संदेश ही सिद्ध होगी। एकांगी भौतिकवाद अनियंत्रित उच्छृंखल दानव की तरह अपने पालने वाले का ही भक्षण करेगा। यदि विज्ञान रूपी दैत्य से कुछ उपयोगी लाभ उठाना हो तो उस पर आत्मवाद का नियंत्रण अनिवार्य रूप से करना ही पड़ेगा।

हमारा धर्म ‘आत्मा के राज्य में प्रवेश’ करने पर जोर देता रहा है। उपनिषद्कार ने अपने को जानने और परिष्कृत स्थिति प्राप्त करने का कल्याण साधन बताया है। हम अन्तरिक्ष में उड़ते हैं पर यह भूल जाते हैं कि अन्त की खोज उससे भी अधिक आवश्यक है।


ब्रह्मा जी की दो लड़कियाँ (kahani)

ब्रह्मा जी की दो लड़कियाँ थी- एक कल्पना दूसरी यथार्थता। दोनों जिद कर रही थी हमें प्रधानता मिलनी चाहिए। बात पितामह तक पहुँची। उनने दोनों को प्यार से पास बुलाया और कहा जो तुममें से पहले आसमान छू कर दिखाये उसी को प्रधानता मिला करेगी।

कल्पना क्षण भर में उछली और आसमान छू लिया  पर उसके पैर धरती पर न थे अधर में लटकी थी।

यथार्थता की बारी आई वह जमीन पर मजबूती से खड़ी तो थी पर बहुत प्रयत्न करने पर भी आसमान छूना उसके लिए संभव न हो सका।

ब्रह्मा जी ने कहा- तुम दोनों मिल कर ही प्रधानता पाने की अधिकारिणी हो सकती हो। अलग-अलग रहने पर तुम दोनों का एकाकीपन असफल और उपहासास्पद बना रहेगा।


शक्ति तो आत्मबल में सन्निहित है।

असुरों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त देवसभा के सदस्य अपने-अपने पराक्रम की चर्चा कर रहे थे कि किसी ने सभा भवन का दरवाजा खटखटाया। झरोखों में से देखने पर -बाहर कोई भयानक आकृति खड़ी दिखाई दे रही थी और गरज रही थी द्वार खोलो-द्वार खोलो।

तेजस्वी जातवेदस् अग्नि को भेजा गया। उनने द्वार खोला और नम्रता पूर्वक पूछा- देव आप कौन है? किस कारण अनुग्रह किया?

प्रश्न का उत्तर दिये बिना आगन्तुक ने पलट कर पूछा- तू कौन है?

अग्नि ने कहा- मैं जातवेदा हूँ। मैं हर वस्तु को जला देता हूँ।

आगन्तुक हंस पड़ा और एक तिनका सामने रखते हुए कहा- तो ले कम से कम इस तिनके को तो जला।

अग्नि हतप्रभ खड़े थे। लगता था वे निष्प्राण निस्तेज हो। तिनके को जलाने का उपक्रम कई बार किया पर वे सफल न हो सके। और उदास होकर वही भूमि पर बैठ गये।

दरवाजे पर इस प्रकार झंझट होते देख- दूसरे तेजस्वी देवता पवन स्थिति को समझने के लिए वहाँ पहुँचे। जो देखा उससे अवाक् रह गये। सूर्य के समान तेजस्वी आगन्तुक ने पूछा- महाभाग? आपका पुण्य परिचय?

अतिथि ने प्रश्न का उत्तर दिये बिना, फिर उलट कर पूछा- तू कौन है?

डरते सहमते उन्होंने कहा- मुझे वेगवान यातरिश्वा कहते हैं। मैं बहता हूँ और अपने साथ बहुतों को बहा ले जाता हूँ।

अतिथि की हँसी रुक न सकी- उनने वही तिनका चुनौती की तरह सामने रखा और कहा तो ले इस तिनके को उड़ा कर दिखा।

यातिरिश्वा हारे-हारे से खड़े थे। कुछ तो कर रहे थे पर करते बन पड़ा नहीं। लगा तिनका बहुत भारी है और वे उसे उड़ा नहीं सकेंगे। हार कर पवन भी जातवेदा की बगल में सिर झुकाकर बैठ गये। और नख से भूमि कुरेदने लगे।

अग्नि और पवन के वापस न लौटने पर देवसभा में आतंक छाया और वरिष्ठ नायकों की स्थिति समझने के लिए द्वार पर जाना पड़ा। वरुण और अन्तरिक्ष ने परिचय पूछा और आगन्तुक ने वही पद्धति दोहराई। एक ने कहा मैं गला देने वाला वरुण हूँ दूसरे ने कहा- सब को उदरस्थ करने वाला अन्तरिक्ष। दोनों के सामने तिनका पड़ा था। पर वे न तो उसे गला सके और न उदरस्थ कर सके निदान उन्हें भी अपने वरिष्ठजनों की बगल में बैठ जाना पड़ा।

अब परम तेजस्वी अतिथि स्वयं ही आगे बढ़ा और सिंहासन पर बैठे हुए इन्द्र से पूछा- असुरों पर विजय करने का अभियान करने वाला इन्द्र तू ही है? क्या तू अपनी शक्ति का परिचय दे सकता है? साथियों की दुर्गति इन्द्र के सामने थी। वे क्या उत्तर देते। जीवित होते हुए भी वे मृतक जैसे बने हुए थे।

स्तब्धता को भंग करते हुए तेजवान आगन्तुक ने स्वयं ही अपना परिचय दिया- मैं महायज्ञ हूँ- मुझे सर्व शक्तिमान ब्रह्मा कहते हैं - आह्वान के रूप में मुझे जाना जाता है। मेरी सत्ता में ही जड़ चेतन में समर्थता चेतना और गतिशीलता रहती है। देवताओं पंचतत्वों के बने कलेवरों और उपकरणों की प्रशंसा मत करो। ब्रह्मा ही बल है। प्रशंसा उसी की करो, महत्ता उसी की समझो। आराधना उसी की करो।

आगन्तुक महायज्ञ अपनी मात्र शिक्षा देकर द्युतिमान आभा के साथ अंतरिक्ष में विलीन होने लगा तो देवसभा के सदस्यों ने अहंकार छोड़ कर उसी की वरिष्ठता स्वीकार की और प्रणपात के अनन्तर उस महायज्ञ-आत्मबल की आराधना उपासना करने लगे।


अवरोधों से जूझने में मनुष्य पूर्णतया समर्थ है।

परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेने की मानवी क्षमता अद्भुत है। उसे जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है उसी के अनुरूप अपनी रुचि प्रकृति को ही नहीं शारीरिक क्षमता को भी ढाल बदल लेता है।

कई व्यक्ति वर्तमान ढर्रे को बदलते हुए बहुत डरते घबराते हैं और सोचते हैं इस परिवर्तन को सहन कर सकना उनके लिए संभव न होगा। विशेषतया ऐसी आशंकाएँ तब की जाती है जब सुविधाजनक जीवन में से निकल कर किसी महान उद्देश्य के लिए कष्टसाध्य जीवन प्रक्रिया अपनाने की जरूरत पड़ती है।

निस्संदेह सेवा साधना और परमार्थ प्रयोजनों का मार्ग सुख-सुविधाओं से भरा हुआ नहीं है , उसमें अपेक्षाकृत अधिक श्रम करना पड़ता है और सुख-सुविधाओं में कटौती करनी पड़ती है। यह कटौती उस समय तक बड़ी भयानक प्रतीत होती है जब तक उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया जाता। तैरना जिसने नहीं सीखा है उसे पानी में घुसना संकट को निमंत्रण देने जैसा प्रतीत होता है पर जब वह शिक्षार्थी तैरना सीखने के लिए जल में प्रवेश करता है और हाथ पैर चलाना आरम्भ करता है तो लगता है कि न तो पानी में घुसना उतना संकटापन्न था और न तैरने की प्रक्रिया उतनी जटिल थी। अभ्यास हर कठिनाई को सरल बना देता है।

मनुष्य की तितिक्षा शक्ति का अन्त नहीं वह उन परिस्थितियों में भी जीवित ही नहीं संतोष तथा आनन्द पूर्वक जीवन यापन कर सकता है जो अनभ्यस्त लोगों को मृत्यु जैसी भयानक प्रतीत होती है।

शीत सम्बन्धी सहन शीलता को ही लिया जाय तो उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की सर्दी दिल दहलाने वाली है। जहाँ सदैव असह्य शीत पड़ती हो और सर्वत्र बर्फ की मोटी परतें ही नजर आती हो, जीवनोपयोगी कोई साधन सुविधा न हो वहाँ मनुष्य का देर तक निर्वाह कैसे हो सकता है, यह प्रश्न सहज ही हल नहीं हो सकता। पर जब संकल्पवान मनुष्य किसी लक्ष्य को लेकर वहाँ रहने की ठान, ठान लेते हैं तो वहाँ ठहर सकने के सारे साधन जुट जाते हैं इतना ही नहीं निवास करने वालों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति भी उसी ढाँचे में ढल जाती है।

दक्षिणी ध्रुव प्रदेश का शोध करना इसलिए आवश्यक हो गया कि वहाँ से पृथ्वी के गहन रहस्यों का पता लगाया जा सकना- अन्तर्ग्रही विकिरण के धरती पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना- एवं उस क्षेत्र में दबी पड़ी प्रचुर धातु सम्पदा को हथियाना सरल हो सकता है। इन तथ्यों को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक हो गया कि उस प्रदेश में शोधकर्ता वैज्ञानिकों का दल देर तक निवास करने के लिए तैयार हो और उत्साह पूर्वक अपनी खोज जारी रखे।

दुस्साहसी मनुष्य समय-समय पर प्रतिकूल परिस्थितियों में लड़ने के अपने शौर्य साहस का परिचय देता रहा है। ध्रुव सम्बन्धी खोज के लिए भी वह साहस आगे आया और उस हिमाच्छादित प्रदेश में बस्ती बसा कर रहना स्वीकार कर लिया गया। यह कार्य कई वर्षों से चल रहा है और सुविधा पूर्ण जीवन यापन करने वाले अब इस असुविधा भरी परिस्थितियों के न केवल अभ्यस्त हो गये है वरन् आनन्द भी अनुभव करते हैं।

दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले भू भाग में सदा ही प्रायः दो सौ मील प्रति घण्टे की चाल वाले बवंडर तूफान चलते रहते हैं। वहाँ का तापमान शून्य से 125 डिग्री नीचे रहता है। चारों ओर बर्फ जमी रहती है, जमीन के कही दर्शन तक नहीं। नीरवता का साम्राज्य है। चारों और सन्नाटा और सुनसान। सूर्यास्त के समय वहाँ ऐसी चित्र-विचित्र और भयंकर आकृतियों वाली ज्योतियाँ चमकती है कि देखने वालों का दिल दहल जाय।

वैज्ञानिक इस क्षेत्र में जहाँ पहुँचे है और वहां की खोज बीन से धरती आकाश से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों का पता लगाने में जुटे हुए है। इस शोध में बारह राष्ट्रों के वैज्ञानिकों का सहयोग है। ब्रिटेन, अमेरिका और रूस के वैज्ञानिकों ने अपने स्थायी कैम्प डाल दिये है।

दक्षिणी ध्रुव का धरातल ऐसा है कि वहां हलका खेमा गाड़ा जाय तो भी हर साल जमीन में 6 फुट धँस जायेगा। इस कठिनाई से बचने के लिए वैज्ञानिकों के डेरे गाड़ते समय जहाजों में रख कर पत्थर ले जाये जाते हैं और उन पर खेमे गाड़ दिये जाते हैं ताकि धँसने की अड़चन अपेक्षाकृत कम उठानी पड़े। इस क्षेत्र में केवल पेन्गुइन पक्षी ही रहते हैं जो वहाँ पहुँचें वैज्ञानिकों की हलचलें कौतूहल पूर्वक देखने के लिए अक्सर पास में आकर पंक्ति बद्ध खड़े हो जाते थे। जब धूप निकलती है तो सारा क्षेत्र चौंधिया देने वाली नमक से भर जाता है। बर्फ में जहाँ-तहाँ सैकड़ों फुट गहरे गड्ढे भी है जो भूले भटके को सदा के लिए शीत समाधि दे सकते हैं।

यहाँ काम कर रहे शोधकर्ता चमड़े के कपड़े पहनते हैं और दुहरे तिहरे गरम मोजे। फिर भी ठण्ड की अधिकता से चेहरा पर सफेद दाग पड़ जाते हैं। डीज़ल, तेल, बिजली के उपकरण, खाद्य पदार्थ लेकर वहाँ जहाज पहुँचते रहते हैं। वस्तुओं के ढोने के लिए हलके टैंक भी वहाँ पहुँचा दिये गये है। अतः वहां शोधकर्ताओं की कुछ-कुछ घरों की बस्तियाँ बनाली गई है जिनके नाम विर्डस्टेशन, मैकमर्डो, अमण्डसन स्काट, एल्सवर्थ, हैलट आदि नाम है। इन्हीं बस्तियों में लगे संयन्त्र, उन संभावनाओं की खोज-खबर लाने में निरत है जो अगले दिनों संसार के भाग्य और भविष्य निर्माण करने में महती भूमिका सम्पादित कर सकते हैं।

दक्षिणी ध्रुव में ग्रीष्मऋतु जनवरी, फरवरी में होती है। तब वहाँ सिर्फ इतनी ठण्ड रह जाती है जितनी कि हम लोगों ने कभी भयानक कड़ाके की सर्दी अनुभव की होगी। माल लेकर जलयान वहाँ इसी ग्रीष्मऋतु में पहुँचते हैं। इस प्रदेश का क्षेत्रफल प्रायः भारत से पाँच गुना अधिक है। यहाँ से आबादी वाले स्थान के बीच काफी दूरी है। दक्षिणी अफ्रीका का अन्तिम छोर कोई दो हजार मील और अफ्रीका का सबसे निचला भाग 4 हजार मील पड़ता है अब तक की खोज खबर से यह बात स्पष्ट हो गई है कि इस भूभाग के नीचे सोना, ताँबा, टिन, कोयला, लोहा जस्ता अभ्रक सीसा, यूरेनियम, क्रोफाइट आदि धातुओं का विपुल भण्डार भरा है। इस सम्पदा को निकाला जा सके तो उससे संसार की समृद्धि में भारी बढ़ोत्तरी हो सकती है।

यदि इस प्रदेश को यातायात के उपयुक्त बना लिया गया और उधर से वायुयानों और जलयानों का गुजरना संभव हो गया तो पृथ्वी के एक भाग की यात्रा अपेक्षाकृत काफी सरल, सस्ती और जल्दी की हो जायेगी।

यदि इस क्षेत्र में मनुष्य की पहुँच सरल हो गई तो यहाँ से दक्षिणी गोलार्धों का सैनिक नियन्त्रण आसानी से हो सकेगा। राकेट, भारी वायुयान आदि का संचालन भी वहां से सरल पड़ेगा। अमरीका से अफ्रीका की ओर और आस्ट्रेलिया से दक्षिणी अमेरिका की हवाई उड़ाने भी कम दूरी की रह जायेगी। अन्तरिक्ष यान यदि इसी क्षेत्र में छोड़ें जाएँ तो बहुत सरलता रहेगी। समस्त धरती की सूचनाएँ इस एक जगह पर इकट्ठी करना पृथ्वी के अन्य भागो की अपेक्षा यहाँ अधिक सुगम पड़ेगा। धरती पर सर्वत्र फैले परमाणुओं और इलेक्ट्रान किरणों का क्षेत्र ध्रुवों पर बहुत ही कम है। यहाँ कास्मिक किरणों की अधिकता के कारण शोधकार्यों के लिए यह स्थान बहुत उपयुक्त है।

यही बात उत्तरी ध्रुव के सम्बन्ध में भी है। वहाँ के कुछ क्षेत्र की संरचना बहुत जटिल है और उसमें प्रवेश करने वाले वैज्ञानिक फूँक-फूँक कर पाँव धर रहे हैं। इतने पर भी वहाँ मनुष्य जाति का अस्तित्व बहुत पहले से बना हुआ है। वैज्ञानिक तो जब तब और जहाँ तहाँ जाते हैं पर आश्चर्य इस बात का है कि उस सर्वथा अभावग्रस्तता से भरे और घोर शीत के वातावरण में भी मनुष्य चिरकाल से रह रहा है और उस गला डालने जैसी शीत विभीषिका को चुनौती देता हुआ जीवन यापन कर रहा है।

विज्ञानी पीटर स्कालेण्डर ने उत्तरी ध्रुव प्रदेश के चिर निवासी एस्किमो लोगों की जीवनचर्या के सम्बन्ध में गहरे अनुसंधान किये है और पता लगाया है कि इन लोगों ने शीत सहने की ही क्षमता एकत्रित नहीं की है वरन् उससे निबटने के लिए ऐसी तरकीबें भी निकाली है जिससे उनकी विज्ञान बुद्धि को सराहें बिना नहीं रहा जा सकता। उदाहरण के लिये वे बर्फ की सतह पर बर्फ से ही अपने लिए घर बनाते हैं जो काफी गर्म रहते हैं कारण कि उनके भीतर जो हवा कैद रहती है उसे ईंधन या मनुष्य शरीर की गर्मी से जितना गरम कर दिया जाता है वैसी स्थिति देर तक बनी रहती है और गर्मी का लाभ अनायास ही मिलता रहता है। परिस्थितियों ने यह वैज्ञानिकता किस प्रकार इन एस्किमो लोगों को प्रदान कर दी यह अचम्भे की ही बात है। मोमबत्ती की तरह जलने वाली चर्बी भरी मछली को वे न जाने कहाँ से ढूँढ़ निकालते हैं और अपनी प्रकाश सम्बन्धी आवश्यकता पूरी करते हैं आमतौर से अधिक ठण्ड में रहने वाले की हाथ पाँवों की उँगलियाँ गल जाती है किन्तु एस्किमो लोगों के शरीर ने अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लिया है। उनका रक्त प्रवाह शीत के प्रतिरोध करने जितना ही तीव्र हो जाता है। लम्बे दिनों में जब तब आठ से तीस मिनट की झपकियाँ लेते रहते हैं और अपनी नींद पूरी करते हैं लम्बी रातों में वे कई-कई दिनों तक सोते रहने का आनन्द लेते रहते हैं।

शीत प्रदेशों में रहने वाले लोगों के रक्त में लाल रुधिर कणिकाएं अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होती है अतः वे आक्सीजन की अधिक मात्रा अपने में संग्रह कर लेते हैं। इसी विशेष संचय के बल पर टुंड्रा जैसे बर्फीले प्रदेशों में भी मनुष्य का रहना सम्भव हो सका। ध्रुव प्रदेश पर एस्किमो लोगों का पीढ़ियों में रहते चले आना इस तथ्य का परिचायक है कि मानव शरीर की संरचना किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति के अनुरूप अपने को ढाल सकने में समर्थ है।

उत्तरी ध्रुव सम्बन्धी खोजे काफी आगे बढ़ चली है और यह आशा की जा रही है कि उस विशाल भूभाग पर कब्जा कर सकने पर कुबेर जैसी विपुल सम्पदा मनुष्य के हाथ लग सकती है। साथ ही पृथ्वी की रहस्यमयी गतिविधियों को समझ कर मानवी सुविधा के ऐसे साधन स्त्रोत निकाले जा सकते हैं जो अभी तक उपलब्ध नहीं है। ध्रुवप्रदेश के निकटवर्ती हिमाच्छादित प्रदेशों में भी शीत की कमी नहीं। वहाँ भी शोध कार्य चल रहा है और पता लगाया गया है कि साइबेरिया में सुवर्ण, अलास्का में पेट्रोल, उन्गावा में लोहा, उत्तरी कनाडा में ताँबा प्रचुर परिमाण में बर्फ की मोटी परतों के नीचे दबा पड़ा है। वह दौलत यदि हाथ लग सके तो मानवी सम्पदा में अत्यधिक वृद्धि हो सकती है।

जिस प्रकार भौतिक सम्पदा सुविधा और जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के असह्य शीत को चुनौती देते हुए दुस्साहसी लोगों ने वहाँ अड्डा जमाया है उसी प्रकार उच्च आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए- नव निर्माण जैसे महान लक्ष्यों के लिए साहस भर कदम बढ़ा सकते हैं। यदि वे इस दिशा में सचमुच चल पड़े तो समय बतायेगा कि उस मार्ग में आने वाली असह्य असुविधाओं की जो कल्पना की गई थी, भूतकाल में आदर्शवादी लोग त्याग बलिदान का मार्ग अपना कर भी संतुष्ट जीवनयापन करते रहे हैं। अभी भी उस उस राह को अपनाने वालों के लिए असुविधा को सुविधा में बदल देने वाली तितीक्षा, प्रकृति प्रदत्त तितीक्षा शक्ति हर किसी में भरी पड़ी है। जो बढ़ चलेंगे उनकी आशंका भरी कठिनाइयाँ समय आने पर अति सरल ही प्रतीत होगी।


धर्मधारणा को आचरण में उतारा जाय

नीति का वचन है- शास्त्र पढ़ कर भी लोग मूर्ख होते हैं। शास्त्रज्ञ तो वह है जो उनके निर्देशों का पालन करता है। औषधि के गुणानुवाद गाने से रोग निवृत्त नहीं होता। इसके लिए तो उसे सेवन करने से ही काम चलेगा।

स्वाध्याय और सत्संग का महत्व इसलिए माना गया है कि पढ़े हुए आप्त वचन और सुने हुए सदुपदेशों को हृदयंगम करके मनुष्य अपनी त्रुटियों को सुधारे तथा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करे। मूल प्रयोजन किसी वस्तु के पन्ने उलटना अथवा किसी के मुख से निकले वचनों का सुनना नहीं है। यह तो पुण्यफल प्राप्त करने का साधन है साध्य नहीं। शास्त्रों का पाठ पुण्य भी हो सकता है पर वैसा होगा तभी जब उसको-उसके उपयुक्त अंश को जीवन क्रम में उतारा जाय। यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ केवल अक्षरों को ही पढ़ लिया गया तो वह एक उपयोगी समय क्षेप भर है। शहद को बहुविधि चर्चा सुनने का तभी लाभ हो सकता है, जब उसे उपलब्ध और सेवन किया जाय। यदि मधु के गुण बताने वाली पुस्तक को पढ़ भर लिया गया है तो भला मधु सेवन से मिलने वाला लाभ कैसे प्राप्त होगा? किसी धर्म शास्त्र के पाठ का कितना ही अधिक महत्व क्यों न बताया जाता रहा हो वह सही तभी सिद्ध होगा जब उसकी प्रेरणा जीवनक्रम को उत्कृष्टता की दिशा में अधिक तत्परता पूर्वक अग्रसर होने की प्रेरणा दे सके।

यही बात किसी संत या महापुरुष के दर्शन करने और उसके प्रवचन करने पर लागू होती है। कोई कितना ही बड़ा योगी या सन्त क्यों न हो उसके दर्शनमात्र से किसी को कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं हो सकता और कान के पर्दे से टकरा कर हवा में उड़ जाने वाले प्रवचन कोई पुण्यफल प्रस्तुत कर सकते हैं। दर्शन अथवा श्रवण को अपने आप में पूर्ण मान बैठना भारी भूल है। वे जीवनोत्कर्ष की दिशा में प्रेरणा देने वाले हो सकते हैं और यदि वे व्यक्तित्व का अनुकरण कर सकता हो तो ही वह महात्म्य वर्णन सिद्ध होगा जिससे सन्त दर्शन अथवा कथन श्रवण का पुण्यफल बताया गया है। सत्संग का प्रयोजन यह है कि श्रेष्ठ लोगों ने अपना व्यक्तित्व ढालने में और कर्तव्य प्रखर करने में क्या और कैसे प्रयास किये है उन्हें निकटवर्ती अध्ययन -अन्वेषण द्वारा हृदयंगम करने का प्रयास करे। जिन्होंने गहराई में उतर कर समुद्र में प्रवेश किया है उन्हीं ने मोती पाये है जो किनारे पर बैठ कर समुद्र का दर्शन करते हैं उन्हें समुद्र की संगति का उथला संतोष भले ही हो जाय कुछ कहने लायक उपलब्धि उनके हाथ लगने वाली नहीं है।

धर्म की सार्थकता धारणा अथवा निष्ठा में है। जो किया कृत्य हमें सन्मार्ग पर बढ़ चलने की प्रेरणा दे सके उन्हीं को सार्थक कहा जाएगा। धार्मिक कर्म काण्डों का एक मात्र तात्पर्य यह है कि उन्हें पूरा करने के साथ जो उच्च भावनाएँ उस प्रयोजन के साथ जुड़ी रहती है उन्हें विशेष मनोयोग पूर्वक समझा जाय और उन्हें निष्ठा पूर्वक जीवन की गतिविधियों में समाविष्ट किया जाय। समस्त कर्म-काण्डों का विधान इसी एक उद्देश्य के लिए हुआ है। तथ्य की गहराई में प्रवेश न करके यदि उथली समझ में यह मान बैठा जाय कि वह क्रियाकृत्य ही पुण्य फल ही प्राप्ति करा सकता है तो यह भयंकर भूल ही होगी। भोजन बनाने का क्रिया कृत्य कितना ही व्यवस्थित क्यों न हो उसका लाभ तभी है जब बनायी हुई रसोई को खाया भी जाय। व्यंजनों की प्रदर्शनी देख कर अथवा लाभ कर भूख नहीं बुझाई जा सकती और न धर्मकृत्यों की विधि व्यवस्था जुटाने मात्र से आत्मिक प्रगति अथवा आत्मशान्ति का लक्ष्य पूरा होता है। मुख्य लाभ तो आचरण का है उसी की प्रेरणा देने के लिए सत्संग, स्वाध्याय, संतदर्शन, कथाप्रवचन एवं विविध विधि धर्मकृत्यों का प्राविधान किया गया है।


मनुष्य की अतीन्द्रिय और अद्भुत क्षमताएँ

स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक भाषण में कहा था- मुझे एक बार एक मनुष्य के बारे में बताया गया जो किसी का प्रश्न सुनने से पूर्व ही उसका उत्तर देता था। मुझे उत्सुकता हुई मैं अपनी मित्र मण्डली के साथ वहाँ पहुँचा। उसने एक कागज हम सब को दे दिया। हमने अपने प्रश्न सोच लिये। हमें कागज खोलने को कहा गया। मेरी सोची संस्कृत की पंक्तियाँ ज्यों की त्यों उस कागज पर लिखी मिली। यही नहीं मेरे साथी ने अरबी भाषा का काव्य सोचा था। वह भी ठीक उसी तरह लिखा मिला। हमारे तीसरे साथी जो जर्मन डाक्टर थे, उन्होंने भी किसी जर्मन डाक्टरी पुस्तक का वाक्य अपने मन में सोचा था वह भी उनके कागज पर ज्यों का त्यों लिखा मिला। इस आश्चर्य के बाद भी मेरा मन सोचता रहा कि कही मैंने धोखा तो नहीं खाया। कई बार मैं उसके पास अधिक गहरी परीक्षा करने की दृष्टि से गया और हर बार आश्चर्य में डूबा हुआ वापिस आया।

कुछ वर्ष पूर्व इच्छाशक्ति के चमत्कारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के लिए डा. राल्फ एलेक्जेण्डर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन मैक्सिको नगर में किया था। इस प्रदर्शन में प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्रों के प्रतिनिधि और अन्यान्य वैज्ञानिक, तार्किक, बुद्धिजीवी तथा संभ्रान्त नागरिक आमंत्रित किये गये थे। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों को किसी भी स्थान से- किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसी ही शक्ल दी जा सकती हैं। बादलों को बुलाया और भगाया जा सकता है।

नियत समय पर प्रदर्शन हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर प्रयोगकर्ता ने देखते देखते घटाएँ बुला दी और दर्शकों की माँग के अनुसार बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशाओं में बखेर देने और उनकी चित्र-विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया। इस अद्भुत प्रदर्शन की चर्चा उन दिनों अमरीका के प्रायः सभी अखबारों में मोटे हैडिंग देकर छपी थी।

उपरोक्त प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए एक प्रसिद्ध विज्ञानी एलेन एप्रागेट ने ‘साइकोलॉजी’ पत्रिका में एक विस्तृत लेख छाप कर यह बताया कि मनुष्य की इच्छा शक्ति अपने ढंग की एक सामर्थ्यवान् विद्युत धारा है और उसके आधार पर प्रकृति की हलचलों को प्रभावित कर सकना पूर्णतया विधि सम्मत है। इसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए।

वस्तुओं को इच्छाशक्ति द्वारा प्रभावित करने का अब एक स्वतन्त्र ही विज्ञान बन गया है जिसे साइकोकिनास्रिस कहते हैं। इस लम्बे शब्द का संक्षिप्त है- सी. के.। इस विज्ञान पक्ष का प्रतिपादन है कि ठोस दीखने वाले पदार्थों के अंतर्गत भी विद्युत अणुओं की तीव्रगामी हलचलें जारी रहती है। इन अणुओं के अंतर्गत जो चेतना तत्व है उसे मनोबल की शक्ति तरंगों द्वारा प्रभावित नियंत्रित और परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार भौतिक जगत पर मनः शक्ति के नियन्त्रण को एक तथ्य माना जा सकता है। डा. एलेक्जेण्डर के इस संदर्भ में गहरे प्रयोग ‘ओरीलिया’ कस्बे में क्रमबद्ध रूप से चल रहे हैं। कई शोधकर्ता और शिक्षार्थी उनके इस शोध प्रयोजन में सम्मिलित है।

एक व्यक्ति के विचार दूरवर्ती दूसरे तक पहुँच सकते हैं और उसे प्रभावित कर सकते हैं यह तथ्य अब असंदिग्ध हो चला है। न केवल अनायास घटित होने वाली घटनाएँ ही इसकी साक्षी है वरन् प्रयोग करके यह संभव बनाया जा सका है कि यदि समुचित इच्छाशक्ति का समावेश हो और मनुष्यों के बीच घनिष्ठताओं की कमी न हो तो उनके विचारों का वायरलैस उनके बीच विचारों का आदान प्रदान करते रह सकने में समर्थ हो सकता है।

सान फ्रांसिस्को में ट्रक ड्राइवर था लुई फिशर उसकी पत्नी का नाम था- हैजल रेफर्टी। दोनों में एक दिन डट कर झगड़ा हुआ और वे दोनों फिर कभी न मिलने की कसम खाकर उस शहर को ही छोड़कर अन्यत्र चले गये ताकि फिर कभी एक दूसरे का मुँह न देख सके।

गुस्से में वे चले तो गये पर जल्दी ही अपनी भूल अनुभव करने लगे कि उन्हें तनिक से आवेश में आकर इतना बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए था। जैसे-जैसे दिन बीतते गये, दोनों की बेचैनी बढ़ती गई। और ऐसा उपाय ढूँढ़ने लगे कि साथी को ढूँढ़ पावे। पर दोनों में से किसी को किसी का पता न था।

एक दिन सबेरे आठ बजे हैजल ने रेडियो पर प्रसारित सूचना सुनी। लुई इसी लामऐजिल्स शहर में है वह तुम्हारा इंतजार ग्रिफिथ की वेधशाला पर बैठा कर रहा था। ठीक ऐसी ही रेडियो एनाउन्स लुई ने सुना- ग्रिफिथ की वेधशाला पर सीढ़ियों पर बैठी हैरिस तुम्हारा इन्तजार कर रही है। दोनों ही तत्काल दौड़ पड़े और जैसे ही नियत स्थान पर पहुँचे कि परस्पर मिलन हो गया। दोनों फूट-फूट कर रोये और फिर कभी विलग न होने की प्रतिज्ञा करके वापस अपनी जगह पहुँच गये।

मिलन की पृष्ठभूमि बनाने वाला रेडियो प्रसारण था। पर एक ही समय में दो प्रकार का प्रसारण क्यों? लुई को हैरिस से मिलने की और हैरिस को लुई से मिलने की पृथक्-पृथक् शब्दावली क्यों? एनाउन्स करने वाला कौन? पूछने पर उनने बताया कि ऐसा कोई प्रसारण किसी रेडियो ने नहीं किया फिर यह सूचना उनके कानों ने कैसे सुनी जो शब्दशः सत्य निकली। परामनोविज्ञान वेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अतीन्द्रिय चेतना ऐसा ताना-बाना बुन सकती है जिसके अनुसार दो घनिष्ठ व्यक्तियों के विचार एक से दूसरे तक इस तरह पहुँच जाये मानो वे एक दूसरे से प्रत्यक्ष वार्तालाप कर रहे हो।

अतीन्द्रिय विज्ञान के शोधकर्ताओं के सामने फ्रेड की एक घटना बहुत ही दिलचस्पी से विश्लेषण का विषय बनी रही है जिसके कारण उसे न केवल अपनी पत्नी के बहाने ऐसे संकेत मिले थे जो दुर्घटना एवं विभीषिका का भी पूर्वाभास देते थे। शोधकर्ता उस घटना को अन्तः चेतना का एक रहस्योद्घाटन ही मानते हैं जो किसी महत्वपूर्ण घटना का पूर्व परिचय देने और विपत्ति से सतर्क करने का कार्य भी कर सकती है।

अटलांटिक महासागर के केरोबियन द्वीप हिस्पानोलिया के पश्चिम में वेस्टइण्डीज द्वीप-समूह में एक सुरम्य स्थान है- हेटी। इस क्षेत्र पर 17 वीं शताब्दी में फ्रांसीसियों ने कब्जा किया था और अफ्रीकी गुलामों को पकड़ कर उसे सरसब्ज किया था। इस प्रदेश में एक व्यापारी फ्रेड स्पेडलिंग कुछ खरीद बेच करने के लिए अक्सर आया जाया करता था।

22 अगस्त 1964 की बात है। फ्रेड अपनी मोटर से हेटी की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में ऐसा भयानक तूफान आया जैसा उस क्षेत्र में कभी नहीं आया था, इसमें 138 जाने गई थी। फ्रेड उस अन्धड़ में फंस गया पर आखिर आगे तो चलना ही था- अपने होटल तक पहुँचने के लिए वह नक्शे की सहायता से आगे बढ़ने लगा। मोटर चलाई तो उसने सुना कि पत्नी की आवाज हवा में गूँज रही है और चीख-चीख कर कह रही है पीछे लौटो- यह रास्ता खतरनाक है। फ्रेड को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसकी पत्नी हजारों मील दूर अमेरिका में है उसकी आवाज यहाँ क्यों आयी। फिर भी उसे आवाज बार-बार सुनाई पड़ती रही जिसमें पीछे लौटने का आग्रह किया जा रहा था।

कुछ ही घंटों में फ्रेड एक नदी के पुल पर पहुँच गया। पुल पार करने की वह तैयारी कर ही रहा था कि समुद्र के दबाव से वह पुल चरमरा कर वह पड़ा और टूटे छप्पर की तरह उस उफनती जल राशि में डूबते पत्ते की तरह बहता चला गया। यह भयानक दृश्य उसने देखा तो काँप उठा, यदि एक क्षण पूर्व उसने पुल पर मोटर बढ़ा दी होती तो उसका अस्तित्व ही मिट जाता। मोटर लौटाई और सवेरे का इन्तजार करते हुए खुले मैदान में रात बिताई सवेरा होने पर वह रास्ता बदल कर अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचा। उसके दिमाग में यह रहस्य छाया ही रहा कि पत्नी की आवाज खतरे की चेतावनी देने और पीछे लौटने का आग्रह करती हुई बार-बार सुनाई क्यों पड़ रही थी।

फ्रेड जब अमेरिका वापिस पहुँचा तब उसे मालूम हुआ कि ठीक उसी रात उसकी पत्नी ने सपना देखा कि उसका पति हेटी के भयानक जंगल में तूफान में फंस गया। आगे गहरी नदी है उसमें उसकी मोटर डूबने ही वाली है। इस दृश्य से वह बेतरह घबराई और सोते-सोते ही चीख पड़ी- फ्रेड वापिस लौटो- खतरे से बचो।

यह एक रहस्य ही था कि हजारों मील दूरी पर रह रही पत्नी को एक ही समय में ऐसी अनुभूतियाँ हुई जो न केवल भविष्य बताती थी वरन् एक की स्थिति का दूसरे को तत्क्षण आभास भी देती थी।

पूर्वाभास की अनेक घटनाओं में एक निम्नलिखित घटना भी है जिसमें पूर्ण स्वस्थ रहते हुए भी मृत्यु का पूर्वाभास मिला और अक्षरशः सत्य निकला।

उत्तर प्रदेश - मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील में ग्राम सवाई के निवासी एक लोकप्रिय समाज सेवी गजराज सिंह को अपनी मृत्यु का आभास चार दिन पूर्व मिल गया था यो वे कुछ रुग्ण तो थे पर चलने फिरने तथा साधारण काम-काज करते रहने में समर्थ थे। उन्होंने घर वालों को चार दिन पूर्व अपने मृत्यु का समय बता दिया था और मरघट में जाकर अपने हाथ से जमीन साफ करके दाह कर्म के लिए स्थान निर्धारित किया था। लकड़ी, कफ़न यहाँ तक कि जमीन लीपने के लिये गोबर तक समय से पूर्व ही मँगा कर रख लिया था। यो वे अन्न खाते थे पर चार दिन पूर्व उन्होंने दूध और गंगा जल पर रहना आरम्भ कर दिया। आस-पास के गाँवों के लोगों को बुलाकर उन्होंने आवश्यक परामर्श दिये। मृत्यु का ठीक समय मध्याह्नोत्तर दो बजे था सो उन्होंने हर किसी को भोजन करके निवृत्त होने के लिये आग्रह पूर्वक प्रेरित किया। आश्चर्य यह कि मृत्यु ठीक उनके घोषित समय पर ही हुई और मरने से पन्द्रह मिनट पूर्व तक पूर्ण स्वस्थ जैसी स्थिति में बातें करते रहे।

ब्रिटिश साइकिक रिसर्च सोसायटी ने श्री मायर्स की अध्यक्षता में ऐसी खोजे की है जिनसे मनुष्य में सन्निहित अतीन्द्रिय क्षमता का रहस्योद्घाटन होता है। जिसे मनुष्य में देव दानव का आवेश अथवा जादू टोने की सिद्धि कहा जाता है- यह वस्तुतः अतीन्द्रिय क्षमता ही है जो आमतौर से प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है, किन्तु अभ्यास से जगाई जा सकती है। कभी-कभी यह अनायास ही जागृत हो जाती है और व्यक्ति में ऐसी अद्भुत विशेषताएँ उत्पन्न हो जाती है जो आमतौर से हर किसी में नहीं देखी जाती।

परा-मनोविज्ञान के गुणात्मक यात्रात्मक और मनः संचारण के तीनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि मनुष्य मानसिक दृष्टि से इतना ही सीमित नहीं है जितना कि वह कामकाज और दैनिक जीवन में दिखाई पड़ता है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ हर किसी में विद्यमान है। वे प्रसुप्त इसलिए रहती है कि उन्हें काम नहीं करना पड़ता। यदि यह आवश्यकता अनुभव की जाने लगे कि इनका जागरण होना ही चाहिए तो ऐसी परिस्थितियाँ सहज ही विकसित होने लगेगी जिनसे व्यक्ति परोक्षानुभूति की उन विशेषताओं से संपन्न हो चले जो आज अद्भुत एवं चमत्कारी समझी जाती है।

परा-मनोविज्ञान की इन दिनों तीन प्रमुख शोध दिशायें है। 1. साइकोकिक नेसिस (सी. के.) मनोगति मानसिक स्पन्दन शीलता। 2. एक्सट्रा सेन्सरी परशेपशन (ई. एस. पी.) अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष बोध। 3. इन कारपोरेल पर्सनल एजेन्सी- अमूर्त व्यक्ति परक अभिकरण।

अतीन्द्रिय अनुभूति की यथार्थता सिद्ध करने वाले आये दिन अगणित प्रमाण मिलते रहते हैं। इस क्षमता को विकसित कर सकना भी सम्भव है। इस तथ्य पर की गई खोजो ने परा-मनोविज्ञान को अधिक गहरे अन्वेषण करने के लिए प्रोत्साहित किया है। टेलीपैथी पारेन्द्रिय ज्ञान-विचार संचार- ल्यैसर वायन्स-अपरोक्षानुभूति प्रिकागनीशन- पूर्व संज्ञान अब स्वतन्त्र शास्त्र बन चले है। कुछ समय पूर्व इनकी यथार्थता पर सन्देह किया जाता था। पर अब विज्ञान क्रमशः इन्हें ऐसे प्रामाणिक तथ्य मानता चला जा रहा है जिसकी खोज भौतिकी के अन्य क्रियाकलापों को जानने की तरह ही आवश्यक है। सेन्सरी चेतना के सम्बन्ध में जितनी जानकारी अब तक मिली है। उससे स्पष्ट है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच में पड़ी हुई गोपनीयता की दीवार उठ सकती है और एक दूसरे की न केवल अन्तः स्थिति की जाना जा सकता है वरन् कायिक उपकरणों का प्रयोग दूरस्थ रहते हुए भी भावनात्मक आदान प्रदान कर सकता है। लहरे अलग दीखती भर है पर उनमें सागर का क्षार एवं ताप जुड़ा ही रहता है। प्रत्येक लहर अपने से पिछली वाली से कुछ लेती है और अगली वाली को कुछ देती है। व्यक्तिगत चेतना के बारे में यही बात है। प्रत्यक्षतः मनुष्य सामाजिक प्राणी है वह समाज से ही बहुत कुछ पाता है और अपनी हलचलों से समाज को प्रभावित करता है। यह शास्त्र की बात हुई। मनोविज्ञान शास्त्र की अतीन्द्रिय शाखा इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि विश्व मानस एक अथाह और असीम जल राशि की तरह है। व्यक्तिगत चेतना उसी विचार महासागर की एक नगण्य सी तरंग है। विश्व मानस से ही व्यक्ति विविध विधि चेतनाएँ उपलब्ध करता है और फिर अपनी विशेषता सम्मिलित करके फिर उसे वापिस उसी समुद्र को समर्पित कर देता है।

अध्यात्म शास्त्र में समस्त प्राणियों में एक ही चेतना का अस्तित्व बताया गया है। काय कलेवर की दृष्टि से अलग दीखते हुए भी वे वस्तुतः आत्मिक दृष्टि से एक है। व्यक्तिगत मौलिकता और स्वभावी विभिन्नताएँ कई बार एक दूसरे से विपरीत स्तर की मालूम पड़ती है फिर भी प्रकृति में न केवल साम्य है वरन् पारस्परिक सम्बन्ध भी है जिसे पूर्णतया अलग कर सकना सम्भव ही नहीं हो सकता। ऐसे मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती, जो अन्य मनुष्यों से सर्वथा स्वतन्त्र हो कर अपना अस्तित्व कायम रखे रहे।

निकट भविष्य में मनुष्य को अतीन्द्रिय क्षमता का और भी अधिक रहस्योद्घाटन होगा। तब मनुष्य की सत्ता के बारे में जाना जा सकेगा कि वह उतना ही नहीं है जितना कि शारीरिक और मानसिक क्षमता के आधार पर जाना समझा जाता है। मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमताओं का भी भण्डार है और यदि उन्हें जागृत किया जा सके तो उसे वह संज्ञा प्राप्त हो सकती है जो आज देवताओं को उपलब्ध है।


रेल की पटरी (kahani)

रेल की पटरी सोच में बैठी थी मेरे पास स्थिरता तो है पर गति का सर्वथा अभाव है।

इंजन उदास खड़ा था। उसमें गति तो थी पर स्थिरता का न होना बहुत खल रहा था।

अपनी-अपनी अपूर्णता दोनों ने समझी और निश्चय किया परस्पर एक दूसरे के पूरक बनेंगे और मिलजुल कर काम करेंगे।

गतिरोध दूर हो गया और अभावजन्य असन्तोष भी चल गया। उसी दिन से लेकर पटरी और इंजन दोनों ही गौरवान्वित हो रहे हैं।


चींटियों की अनुकरणीय समाज व्यवस्था

मनुष्य में बुद्धिमतां तो है पर उसका विकास तभी होता है जब दूसरों की सहायता मिले। पढ़ायें प्रशिक्षित किये बिना, कोई मनुष्य या बालक क्रिया कुशल नहीं हो सकता। यदि उचित सहयोग संपर्क न मिले तो जन्मजात बुद्धिमतां रहने पर भी मनुष्य अविकसित परिस्थितियों में पड़ा रह सकता है अथवा कुसंग में कुमार्गगामी हो सकता है।

इस दृष्टि से चींटियाँ मनुष्य से कही आगे है, उन्हें प्रकृति ने ऐसी अद्भुत सूझबूझ दी है कि बिना किसी शिक्षा दीक्षा के वे इतना सुंदर सुव्यवस्थित जीवनयापन करती है कि उनकी सुरुचि अनुशासनशीलता और बुद्धिमतां पर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है।

मनुष्य के यदि चींटी बन सकना सम्भव रहा होता तो वह उनके वर्ग में सम्मिलित होकर देखता कि चींटियों की सभ्यता और संस्कृति मनुष्य समाज की अपेक्षा कितनी अधिक प्रगतिशील और बढ़ी-चढ़ी है।

चींटियों की बाहर से छोटी सी बाँबी को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन है कि इसके भीतर अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से लम्बी-लम्बी सड़कें , गलियाँ, दरवाजे कोठे- कमरे और अन्तःपुर बसे हुए है। किसी कुशल शिल्पी के तत्त्वावधान में यह सब बनाया गया प्रतीत होता है। जरा से बिलों के भीतर उतर कर यह देखा जा सकता है कि उनके भीतर कितनी सघन बस्तियाँ बसी हुई है और कितनी बड़ी आबादी का निवास है। प्रायः एक टीले के नीचे बने हुये चींटियों के उप नगर की निवासी चींटियाँ इतनी होती है जितनी दिल्ली बम्बई की।

अपने गाँव नगर के निवासियों को हर चींटी भली प्रकार पहचानती है। एक भी बाहर वाली घुस आवे और उसे तुरन्त पहचान लिया जावेगा और मार कूटकर उसे वापिस खदेड़ दिया जाएगा।

एक भी चींटी कभी बेकार नहीं बैठती। उन्हें आराम हराम है। वे समूह बना कर काम करती है और हर अपने क्रिया-कलाप में कीर्तिमान स्थापित करने के लिए पूरे उत्साह धैर्य और संतोष के साथ लगी रहती है। मानो कर्म की सुव्यवस्था ही एक मात्र उनकी महत्त्वाकाँक्षा हो। गौर से देखे तो प्रतीत होगा कि उनका एक दल एक रास्ते जा रहा है तो दूसरा दल उसी मार्ग से वापस लौट रहा है। लौटने वालियों के मुँह में अनाज, कीड़ा, घास-फूस कुछ न कुछ जरूर होगा। यह संग्रह अपने लिए नहीं पूरे परिवार के लिये करती है। खाद्य संग्रह, गृह निर्माण प्रायः इस भाग दौड़ का उद्देश्य होता है। घायलों और बीमारों की सेवा सहायता से लेकर अण्डे बच्चों के परिपोषण तक के लिए भी उनकी गतिविधियाँ चलती है। बिल में पानी भर जाने या कोई संकट उपस्थित होने पर वे नया स्थान ढूँढ़ने , बनाने और स्थानान्तरण के साथ-साथ संग्रहित माल असबाब ढोने की आपत्ति कालीन व्यवस्था भी बनाती हैं। कही चीनी का बड़ा भण्डार दीख पड़े और कोई स्वादिष्ट कीड़ा हाथ लग जाये तो फिर दैनिक कार्यों को बदल कर उस लाभ से लाभान्वित होने का प्रयत्न करती है। वे उसे तत्काल खाने नहीं बैठ जाती वरन् उसमें से क्वचित् जलपान करके बिल में जमा करने के लिए जुट जाती है और सुविधानुसार उसे स्वाद और सन्तोष पूर्वक खाती है।

चींटियों के तीन वर्ग है 1. रानियाँ 2. राजा लोग 3. बाँदियाँ। रानी एक ढेर में चार पाँच से अधिक नहीं रहती। वे औसत चींटी से मोटी तगड़ी होती है, उनका कार्य केवल बच्चा उत्पन्न करना होता है। अस्तु बाहर निकलने घूमने की भी उन्हें फुरसत नहीं होती। नर्सें, दाइयाँ, रसोइया, चौकीदार उसके पास मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं।

अण्डों को सेने का काम बाँदियाँ करती हैं। प्रसव होते ही वे उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाती है और जब तक बच्चे बड़े न हो जाय तब तक बाँदियाँ उनका अपने बच्चों जैसा ही लालन-पालन करती है। अण्डे में से एक नन्ही सी ‘इली’ निकलती है यह जमीन पर पड़ी कुनमुनाती रहती है। भूखी होने पर मुँह खोलती है तो मौसियाँ तुरन्त उनके मुँह से कोमल और सुपाच्य ग्रास रख देती है। उपयुक्त समय पर वे इन बच्चों को सहारा देकर घुमाने भी ले जाती है।

बाँदियाँ न विवाह करती है न बच्चे देने के झंझट में पड़ती है। उन्हें नियत कर्त्तृत्व पालन में गृहस्थी बसाने से अधिक संतोष रहता है।

राजाओं के पंख उगते हैं वे बिलों से निकल कर उड़ान भरते हैं। जैसे ही वे उड़ें पक्षी उन पर झपट पड़ते हैं और बात ही बात में उदरस्थ कर जाते हैं। कुछ के पंख टूट जाते हैं और भारी होने के कारण घर लौटने में असमर्थ रह कर प्राण गँवाते हैं। जो लौट आते हैं वे अपने पर नोंच कर फेंक देते हैं और अन्य साथियों की तरह रहने में ही कल्याण मानते हैं। व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षा कितनी महँगी पड़ती है उसे वे अनुभव द्वारा भली प्रकार सीख लेते हैं और फिर अकेले आकाश छूने की सनक के सदा के लिए त्याग देते हैं।

चींटियाँ बस एक ही स्थान पर नहीं रहती। जब उनका नगर बस जाता है उसमें निवास, गोदाम, चिकित्सालय, सड़कें, गलियाँ आदि सभी कुछ बन जाता है और खाने के लिए पर्याप्त खाद्य भण्डार हो जाता है तो नर चींटियाँ यह अनुभव करती है कि अब दल में निठल्लापन आ जायेगा और आरामतलबी से श्रमशीलता की आदत घट जायेगी। इस संकट को टालने के लिए राजा नये नगर बसाने के लिए निकल पड़ते हैं और जब उपयुक्त भूमि मिल जाती है तो रानियों को साथ लेकर नई जगह में चले जाते हैं। बाँदियाँ वफादार साथी की तरह उनके पीछे चल पड़ती है और नये सिरे से नया नगर बसाने और आवश्यक उपकरण जुटाने में लग जाती है, इस प्रकार अमीरी और आरामतलबी से उत्पन्न होने वाले संकटों से बचकर अपनी कर्म निष्ठा बनाये रहती है। पुराना नगर छोड़ने और नया देश बसाने का उनका यह क्रम निरन्तर चलता ही रहता है, वे एक जगह बहुत समय नहीं रहती।

अमेरिका में पाई जाने वाली अटा चींटी खेती−बाड़ी भी करती है, वह अपनी रुचि के बीज जमा करके पास की नम जगह में गाड़ती है और उगने वाली फसल की निराई गुड़ाई करती रहती है। जब फसल पकती है तो उसका एक एक दाना वे अपने बिलों में जमा कर लेती है। ये चींटियाँ पास पड़ोस के किसानों की फसल पर भी चढ़कर पके हुये बीज तोड़ती और ढोकर घर में जमा करने में भी प्रवीण होती है।

चींटी ही नहीं दीमक भी अपने आकार प्रकार को देखते हुए इतनी कर्मशील और दूरदर्शी है कि उसके क्रिया-कलाप से मनुष्य कुछ सीख समझ सकता है और अपनी वैयक्तिक एवं सामाजिक स्थिति में उपयोगी सुधार कर सकता है।

दीमकों में अधिकाँश अन्धी होती है तो भी उनकी स्मरणशक्ति लगभग आँखों जैसी ही सहायता करती है और वे बिना भटके अपना जीवन क्रम चलाती रहती है। आँखों वाली दीमक उनकी कठिनाई को समझती है और स्वयं हटकर उनके लिये रास्ता देती है और समय पर उन्हें अतिरिक्त सहायता पहुँचाती है।

दीमकों के बिलों के ऊपर जो मिट्टी का आच्छादन होता है वह इतनी मजबूती और कुशलता से बना होता है कि वर्षा का पानी उसमें प्रवेश करके उनमें निवास करने वाली दीमकों की कोई क्षति नहीं कर पाता। छोटे मोटे नाले झरनों के ऊपर से वे ऐसे मजबूत पुल बनाती है कि वर्षों तक उस रास्ते उनका आना जाना इधर उधर हो सके। इस प्रकार के जल अवरोध को दूर कर सकने में भी सफल होती है। छोटी सी दीमक की गतिविधियाँ लम्बे चौड़े आकार वाले मनुष्य के लिए अनुकरणीय है।


दीर्घजीवन प्रकृति का सहज सरल उपहार

रूस के शरीर विज्ञानी इवान पन्नोविच पावलोव लम्बे और स्वस्थ जीवन की संभावनाओं पर तीस वर्षों तक शोध प्रयास में निरत रहे और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कार्य व्यस्त दिनचर्या आदमी को सक्रिय ओर निरोग बनाये रहती है। उद्योगी मनुष्य सत्तर वर्ष की आयु तक भली प्रकार कार्य क्षम रह सकता है किन्तु यदि उसे पचपन वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होकर ऐसे ही बैठे ठाले दिन बिताने पड़े तो उसका स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो जाएगा। कई तरह की बीमारियाँ उपजेगी और मस्तिष्क में बेसिर पैर की सनक उठने लगेगी। बुढ़ापा जरा-जीर्ण अवस्था का नाम नहीं वरन् उस स्थिति का नाम है जिसमें भविष्य के सम्बन्ध में उत्साहवर्धक सपने देखना बंद हो जाता है और निराशा आकर घेरने लगती है। बुढ़ापे के सम्बन्ध में अक्सर हम यह सोचते हैं कि बुढ़ापा जीवन का एक ऐसा समय है जब कि मनुष्य आलसी, निष्क्रिय तथा अनुत्पादक हो जाता है। पर सत्य तो यह है कि संसार के कुछ सर्वोत्तम काम मनुष्य ने बुढ़ापे के उपद्रव के बावजूद अपनी ढलती उम्र में सफलता के साथ किया है। इतिहास से उन सब बड़ी उपलब्धियों को यदि निकाल दिया जाय जो कि, मनुष्य ने साठ, सत्तर या अस्सी वर्ष की अवस्था में प्राप्त किया, तो दुनिया की इतनी बड़ी क्षति होगी, जिसकी पूर्ति नहीं हो सकेगी।

इस संदर्भ में पश्चिम एवं भारत के वे कुछ महान पुरुष उल्लेखनीय है, जिनकी रचनात्मक शक्ति का हास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और अपने बुढ़ापे में बड़े महत्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की।

ऐसे महान पुरुषों में कुछ ये है- महान दार्शनिक संत सुकरात, प्लेटो, , होमर आगसृस, खगोल शास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनी वर्ड्सवर्थ, वैज्ञानिक थामस अलमा, लेखक निकास कोपरनिकस विख्यात वैज्ञानिक न्यूट्रनप, सिसरो, अल्बर्ट आइन्स्टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, महात्मा , महात्मा गाँधी तथा जवाहर लाल नेहरू।

महात्मा सुकरात सत्तर वर्ष की उम्र में अपने महत्वपूर्ण तत्व दर्शन की विशद व्याख्या करने में जुटे हुए थे। यही बात प्लेटो के सम्बन्ध में भी थी। वे अस्सी वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। इक्यासी वर्ष की अवस्था में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।

सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व तिरसठ वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘ट्रीटजि आन गोल्ड एज’ की रचना की। केरो ने अस्सी साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी। कवि गोथे ने अपने जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि के रूप में अपनी महान रचना फास्ट के लिखने कार्य तिरासी वर्ष की उम्र में मृत्यु के कुछ समय पहले ही पूरा किया था।

अलबर्ट आइन्स्टीन की तरह ही जो कि अन्तिम दिन तक बराबर काम करते रहे, सेमुयल मोर्स ने टेलीग्राफ आविष्कार की अपनी प्रसिद्ध के बाद अपने को व्यस्त रखने के लिए अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों में लगाया रखा। बर्नार्डशा अपनी अन्तिम बीमारी तक लेखक के रूप में बहुत सक्रिय बने रहे। महात्मा टॉलस्टाय अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद भी इतनी चुस्ती, गहराई और प्रभावशाली ढंग से लिखते रहे कि उसकी बराबरी आधुनिक यूरोप के किसी लेखक द्वारा नहीं की जा सकती।

व्हिक्टर ह्यूगो तिरासी वर्ष की अवस्था में अपनी मृत्यु तक बराबर लिखते रहे। वृद्धावस्था उनकी अद्भुत शक्ति तथा ताजगी में कोई फर्क नहीं कर सकी।

टेनसिन ने अस्सी वर्ष की अवस्था में अपनी रचना क्रॉसिगं दी वार दुनिया को प्रदान किया। राबर्ट ब्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने सत्तर साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहिले ही दो सर्वसुन्दर कविताएँ रेभरी और एपीलाग टू आसलेन्डो लिखी।

राजनीति के क्षेत्र में विंस्टन चर्चिल, बेंजामिन फ्रेंकलिन, डिजरैली, ग्लेटस्टोन, आदि ऐतिहासिक पुरुष अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने हुए अपने देश की अमूल्य सेवा में अनवरत रूप से लगे रहे।

अभी हाल के इतिहास में महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू ऐसे महान पुरुष भारतवर्ष में हो गये है, जो अपनी वृद्धावस्था में अन्तिम समय तक देश और पीड़ित मानवता की अटूट सेवा पूरी चुस्ती एवं शक्ति के साथ बराबर करते रहे।

ढलती उम्र की विशिष्ट उपलब्धियों एवं रचनात्मक कार्यों का श्रेय केवल पुरुषों तक ही सीमित नहीं है। महिलाओं का भी इसमें पूरा हक है।

महारानी विक्टोरिया ने अपनी बहुत बड़ी जिम्मेदारियों को ब्यासी वर्ष की अवस्था तक कुशलता के साथ निभाया। मेरी समरमिले ने ब्यासी साल की आयु में परमाणु तथा अणुवीक्षण यंत्र सम्बन्धी विज्ञान पर उपयोगी एवं बहूमूल्य रचना प्रकाशित की। मिसेज लूक्रेरिया मार सत्तासी वर्ष की उम्र तक महिलाओं को ऊपर उठाने तथा विश्वशान्ति के लिये अथक रूप में निस्वार्थ सेवा कार्यों में जुटी रही।

भारतवर्ष में श्रीमती सरोजिनी नायडू एवं मिसेज एनी बिसेण्ट ने अपनी वृद्धावस्था तक देश तथा मानवता की अमूल्य सेवाएँ की, जो कि चिरस्मरणीय रहेगी।

इस तरह से सैकड़ों उदाहरण दुनिया के इतिहास से दिये जा सकते हैं, जिनसे यह विचार बिलकुल ही खोखला एवं तथ्यहीन साबित होता है कि उनसठ-साठ वर्ष की आयु तक में जीवन के काम समाप्त हो जाते हैं और उसके बाद का समय अपने तथा समाज के हित में कोई उपयोगी, एवं महत्वपूर्ण कार्य करने के लिये सक्षम नहीं होता है।

पेरिस की 80 वर्षीय महिला सान्द्रेवच्की पिछले दिनों सारवोन विश्वविद्यालय की विशिष्ट छात्रा थी। उन्होंने 60 वर्ष पूर्व छोड़ी हुयी अपनी कक्षा की पढ़ाई फिर आरम्भ की। इस महिला के तीन पुत्र तथा सात नाती नातिन और एक ‘परनाती’ था। इस प्रकार वह परदादी बन गई थी तो उसने जर्मन और अंग्रेजी भाषा पढ़ने के लिये उत्साह प्रदर्शित किया ओर विश्वविद्यालय में भर्ती हो गई। प्राचार्य को उसने भरती का कारण बताते हुए कहा- लम्बे जीवन के अनुभवों के आधार पर मैं इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि आदमी की मशीन लगातार चलते रहने पर ही वह काम करने लायक रह सकती है। उपयोगी काम में लगे रहने पर ही सामान्य स्वास्थ्य को स्थिर रखा जा सकता है। अध्ययन से मेरा मस्तिष्क और शरीर दोनों ही निरोग एवं उत्साह की स्थिति में रह सकेंगे।

बड़ी उम्र हो जाने पर भी मनुष्य के अरमान यदि मरे न हो तो वह बहुत कुछ कर गुजर सकता है। डार लिंगटन ब्रुक 74 साल की उम्र में फौज में भरती हुआ और कई लड़ाइयाँ लड़ने पर सकुशल बचा रहा। अन्ततः वह 112 वर्ष की उम्र में मरा।

अमेरिकन मेडिकल ऐसोसिएशन के अध्यक्ष डा. फ्रेडरिक श्वार्टज ने एक शोध प्रबन्ध प्रकाशित करते हुए कहा है- मनुष्य आयु या परिश्रम के कारण बूढ़े नहीं होते वरन् अपनी अन्यमनस्क, एकाकी मनोवृत्ति के कारण टूटते और मरते हैं। आमतौर से लोग जब तक काम धन्धे से लगे रहते हैं तब तक स्वस्थ रहते हैं किन्तु जैसे ही वे ठाली हो जाते हैं और निष्प्रयोजन दिन काटना आरम्भ करते हैं वैसे ही उन्हें सौ बीमारियाँ धर दबोचती है।

डा. फ्रेडरिक ने एक 84 वर्ष के व्यापारी का विवरण लिखा है कि वह अपने कारोबार में सदा व्यस्त रहा और पता भी न चला कि उसे कोई बीमारी है पर जब वह रिटायर हुआ तो डाक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में मुद्दतों पुरानी दसियों बीमारियाँ घुसी पड़ी है। जिनकी तरफ कभी उनका ध्यान नहीं गया था।

संसार के सबसे अधिक दीर्घजीवी मनुष्यों के सम्बन्ध में अनुसंधान करने वाले इतालवी विशेषज्ञ कार्लोसरतोरी का कथन है कि इस समय संसार में सबसे अधिक आयु वाली बोलोविया निवासी एक महिला है जिसकी उम्र 203 वर्ष है। इसके बाद सोवियत नागरिक का दूसरा नम्बर है वह 195 वर्ष का है। तीसरे नम्बर पर ईरान का एक बूढ़ा है जिसने 190 वर्ष पार कर लिये।

उपरोक्त विशेषज्ञ ने दीर्घ जीवन के अनेक कारणों में से सब से प्रमुख संतुलित और निरन्तर श्रम को बताया है। उसका कहना है कि लोग अधिक मेहनत के कारण उत्पन्न थकान से उतने नहीं मरते जितने कि हराम खोरी और काम चोरी के कारण अल्प आयु में ही मौत के शिकार होते हैं।

कारनेल विश्वविद्यालय के प्राणि शास्त्री डा. एम मैकके ने कुछ चूहों को भर पेट भोजन दिया और निश्चित रहने की सुविधा दी। वे तीव्र गति से वयस्क और मोटे तगड़े तो हुए पर 730 दिन से अधिक नहीं जी सके। इसके विपरीत उन्होंने कुछ चूहे ऐसे भी पाले जिन्हें मात्रा कम किन्तु पौष्टिक तत्वों की दृष्टि से उपयुक्त भोजन दिया। वे उतने तगड़े तो नहीं हुए पर फुर्तीले भी अधिक थे, और जीवित भी प्रायः डयौढे समय तक रहे। अपने प्रयोगों के आधार पर उनका निष्कर्ष मनुष्यों के सम्बन्ध में यह है कि कम कैलोरी का सादा और कम भोजन किया जाय तो मनुष्य आसानी से 250 वर्ष जीवित रह सकता है। इसी प्रकार विज्ञानी जार्ज टायसन का कथन है आहार विहार सम्बन्धी आदतों को सुधार लिया जाय तो सहज ही चिरस्थाई यौवन का आनन्द लिया जा सकता है।

सन 1967 में चिकित्सा शास्त्र का नोबुल पुरस्कार दो ब्रिटिश वैज्ञानिकों डा. हाजकिन और हक्सले को दिया गया। तीसरे वैज्ञानिक आस्ट्रेलिया के डा. एक्सल्स थे जिन्होंने शरीर में विचार प्रक्रिया की महत्वपूर्ण जानकारी दी है।

अमरीकी वैज्ञानिकों ने 50 वर्ष की आयु से अधिक कई व्यक्तियों पर परीक्षण किये ओर यह पाया कि जब मनुष्य का सारा शरीर थक जाता है तब भी मस्तिष्क नहीं थकता। अधिकाँश परीक्षणों से मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आयु बढ़ने के साथ मानसिक शक्ति में किसी प्रकार का ह्रास नहीं होता, यदि होता है तो वह कम से कम मानसिक कार्य करने से ही होता है। मस्तिष्क को अधिक क्रियाशील रखने वालों की बौद्धिक शक्ति में अन्तर नहीं आता भले ही शरीर थक जाता हो।

दीर्घ जीवन सरल है और स्वाभाविक। उसके लिए किसी विशेष प्रयत्न या उपचार की आवश्यकता नहीं है। सुसंतुलित स्वास्थ्य और निरोग लम्बे जीवन के लिये इतना ही पर्याप्त है कि मनुष्य अपने रहन सहन और आहार विहार को प्रकृति के अनुकूल नियमित और व्यवस्थित रखे। मस्तिष्क की उद्विग्नता एवं आवेशों की आग से बचाये रहे। हंसता-हंसाता हलका फुलका और सीधा सरल जीवन क्रम जिसने अपनाया उसे प्रकृति का सहज उपहार दीर्घजीवन-अनायास ही मिला है। हमें भी मिल सकता है।


Quotation

प्रदानं प्रचछन्नं गृहमुपगतें सम्भ्रमविधिः प्रियं कृत्वा मौनं, सदसि कथनं चाप्युपकृते। अनुत्सेको लक्ष्मयाँ निरभिभवसाराः परकथाः, सताँकेनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्॥

दान को गुप्त रखना, घर पर आए मनुष्य का सत्कार करना, परोपकार करके मौन रहना, दूसरों के किये हुए उपकारों को सभा में वर्ग न करना, धन पाकर गर्व न करना और पराई चर्चा निरादर की बात वचा कर करना, यह असि-धार के समान कठिन व्रत धारण करना महापुरुषों का सहज स्वभाव होता है।


क्या हम वस्तुतः अभावग्रस्त और दरिद्री हैं?

आमतौर से हम उन्हीं वस्तुओं और परिस्थितियों का चिन्तन करते हैं जो अपने पास नहीं है। चिन्ता, व्यग्रता और खिन्नता का कारण प्रायः अभावग्रस्तता का चिन्तन ही होता है। रुग्णता या दुर्घटना जैसी विपत्तियाँ तो कभी कभी ही आती है। जिन परिस्थितियों में जीवन दूभर हो गया हो ऐसे अभाव भी कभी असाधारण आपत्ति में फंस जाने पर ही आते हैं। भूख से तड़प कर या ठंड से सिकुड़ कर अन्न, वस्त्र के अभाव में भी मरने वाले कुछ तो हो ही सकते हैं पर इतने नहीं जिससे मानवजाति के शोक संतापों में उन्हें प्राथमिकता दी जा सके।

अधिक से अधिक एक चौथाई दुःख ही ऐसे माने जा सकते हैं जिनके पीछे कुछ कारण या तथ्य होते हैं। शेष तीन चौथाई तो अचिन्त्य चिन्तन के आधार पर गढ़े गये होते हैं। आमतौर से लोग अपने को अभाव ग्रस्त मान कर दुःखी रहते हैं। अमुक व्यक्ति के पास कितने साधन है, उतने हमारे पास कहाँ? उसके जैसे ठाठ-बाट हम कहाँ बना पाते हैं, हमारा परिवार अमुक समुन्नत परिवार जैसा धनीमानी कहाँ है? यही चिन्ताएँ आमतौर पर लोगों को सताती रहती है। परोक्ष रूप से हम ईर्ष्या की आग में जलते रहते हैं और दैन्य दारिद्रय भरे दुर्भाग्य पर आँसू बहाते हैं।

चिन्तन की इस विकृति को हटाकर यदि अपने से पिछड़े लोगों के साथ तुलना करे तो प्रतीत होगा कि जहाँ लाखों से हम पिछड़े हुए है वहाँ करोड़ों की अपेक्षा अधिक सुविधा जनक समुन्नत स्थिति में भी है। ऐसे लोग दुनिया में कम नहीं जिन्हें हमारी जैसी स्थिति मिल जाय तो अपने को बहुत भाग्यवान समझे और फूले न समाये।इन लोगे के साथ यदि तुलना की जाय तो प्रतीत होगा कि अपनी स्थिति अभावग्रस्तता की नहीं साधन सम्पन्नता की है।

वस्तुतः हम अभाव ग्रस्त नहीं है। इस संसार में कीड़े मकोड़े जीव जन्तुओं और पशु पक्षियों की करोड़ों अरबों जातियाँ मौजूद है। क्या बोलने, सोचने, लिखने, पढ़ने, गृहस्थ बनाने, उपार्जन, चिकित्सा, वाहन, संचार जैसे साधन किसी और को प्राप्त है? भोजन आच्छादन निवास और गृहस्थ के सुनिश्चित साधन किसी और को प्राप्त है? भूतल पर निवास करने वाले समस्त प्राणधारियों की तुलना में क्या हमारी स्थिति ऐसी नहीं है जिस पर संतोष व्यक्त कर सके? यदि हम इन्हीं पिछड़े जीवों में से एक होते तो किसी दुखी से दुखी मनुष्य को भी देखकर यही सोचते कि यह कितना सुखी और साधन सम्पन्न है। उसकी दृष्टि से यदि हम अपने को देख सके तो यह समझते देर न लगेगी कि सुख संतोष के इतने अधिक साधन प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली मनुष्यों में से हम भी एक है।

चिन्तन की अद्भुत क्षमता मानव प्राणी को नियति का एक ऐसा उपहार है जिसे अद्भुत और अनुपम कह सकते हैं उसमें सुख और सन्तोष के समस्त आधार मौजूद है। साथ ही असीम प्रगति की एक से एक बढ़ी-चढ़ी संभावनाएं भी विद्यमान है। यदि हम चिन्तन प्रक्रिया का सही उपयोग सीख सके तो केवल स्वर्गीय हर्षोल्लास से भरे पूरे दिन बिता सकते हैं वरन् अभीष्ट दिशा में उच्चतम प्रगति का भी पथ प्रशस्त कर सकते हैं।


मंत्र साधना और उसकी रहस्यमय शक्ति

योगी अरविन्द ने कहा है ग्रह नक्षत्रों की संरचना से लेकर विज्ञान के अनेकानेक रहस्यों का उद्घाटन करके मनुष्य ने बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है। किन्तु यदि हमारे पास मनुष्य की आत्मा को समझ सकने वाला यंत्र रहा होता तो प्रतीत होता कि उस महत्त्व के सामने पदार्थ विज्ञान की समस्त उपलब्धियाँ नगण्य है।

मनुष्य की प्रकट और अप्रकट शक्तियों में से एक अति महत्वपूर्ण शक्ति है उसकी वाणी। वाणी के सहारे वह ज्ञानार्जन करता है, एक की जानकारी दूसरे को मिलती है और विविध विधि साँसारिक क्रिया-कलाप चलते हैं। वाणी का भौतिक महत्व असंदिग्ध है। दूसरों को मित्र बनाने और शत्रु बनाने का उल्लास और रोष उत्पन्न करने का जितना काम वाणी करती है उतना कर सकने वाला संसार में और कोई आधार नहीं है।

वाणी का आध्यात्मिक आधार और भी अधिक महत्वपूर्ण है। मंत्राराधन इसी प्रकार की रहस्यमयी प्रक्रिया है जिसके आधार पर मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रगति और दूसरों की सहायता की पृष्ठभूमि बनती है। यदि यह साधना ठीक प्रकार की जा सके तो उस रहस्यमयी शक्ति का प्रचुर परिमाण में उत्पादन किया जा सकता है जो मनुष्य के भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों को आश्चर्यजनक सफलताओं से भर सकती है। मंत्रशक्ति में चमत्कारों का प्रधान आधार है- शब्द। शब्द शक्ति का स्फोट। इसके साथ ही साधक की शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्थिति की पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। इन सब के समन्वय से ही वह प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे मन्त्र शक्ति का चमत्कार कहा जा सके।

शब्दोच्चारण में जिह्वा, ओष्ठ, दाँत, तालु, कण्ठ आदि मुख से सम्बन्धित कई अवयवों का संचालन होता है तब कही पूर्ण ध्वनि निकलती है। केवल जिह्वा का ही अवलम्बन हो तो मनुष्य भी पशु-पक्षियों की तरह थोड़ी सी ही ध्वनियों का उच्चारण कर सके। उनके शब्दोच्चारण से मुख अवयव गति ही नहीं करते वरन् उनकी हलचल सूक्ष्म शरीर के रहस्यमय केन्द्रों को भी प्रभावित करती है। शठ चक्र, तीन ग्रन्थियों, तीन नाड़ियाँ, दश प्राण, चौवन उपत्यिकाओं, आदि को सूक्ष्म शरीर के अति महत्वपूर्ण संस्थान कहने चाहिये। उनको सक्रिय एवं जाग्रत बनाने में मंत्र के अक्षरों का प्रवाह महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करता है।

टाइप राइटर यंत्र की कुञ्जियाँ पर उँगली दबाते ही दूर रखे कागज पर तीलियां गिरनी आरम्भ हो जाती हैं और अक्षर छपने लगते हैं। हारमोनियम की कुञ्जियों पर उँगली रखते ही रीड़ खुलती है और स्वर गूँजने लगते हैं। ठीक यही प्रक्रिया मन्त्रोच्चारण में होती है। मुख में होने वाली हरकत सूक्ष्म शरीर के विभिन्न शक्ति संस्थानों पर प्रहार करके उनमें विशिष्ट हलचल उत्पन्न करती है तदनुसार साधक की अन्तः में जागरण एवं स्फुरण के ऐसे दौर आते हैं जिनके सहारे चमत्कारी दिव्य शक्तियाँ जाग्रत हो सके और साधक व्यक्ति ऐसी विभूतियों से भर सके जैसी कि सर्वसाधारण में नहीं पाई जाती।

मोटे तौर से शब्द का प्रयोजन कर्णेन्द्रिय के माध्यम से कतिपय प्रकार की जानकारियाँ मस्तिष्क तक पहुँचाना भर समझा जाता है पर बात इतनी खोटी नहीं है। शब्द की शक्ति पर जितना गहरा चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। आज की यांत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझ रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। यंत्र भी ऐसी कर्णातीत ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं जो आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित परिणाम उत्पन्न कर सके।

संगीत अब मनोरंजन मात्र नहीं रहा वरन् उसे एक महत्वपूर्ण शक्ति स्वीकार कर लिया गया है। संसार के सुविकसित अस्पतालों में संगीत ध्वनि प्रवाह का पूरा लाभ रोगियों को दिया जा रहा है। पशुओं का दूध बढ़ाने में- पौधों को अधिक विकसित करने में संगीत का प्रयोग उत्साहपूर्वक किया जा रहा है। जापान में बच्चों में सहृदयता और अनुशासनप्रियता बढ़ाने के लिये आरम्भिक स्कूलों से ही संगीत का प्रशिक्षण किया जा रहा है। संगीत वस्तुतः ध्वनि प्रवाह का एक विशेष क्रम मात्र है। मंत्र को भी इसी आधार पर विनिर्मित समझना चाहिये। उनके अक्षरों के चयन का क्रम तथा उच्चारण का अनुशासन दोनों को मिला कर एक प्रकार से विशिष्ट संगीत का ही प्रादुर्भाव होता है। उसके द्वारा साधक को अतिरिक्त विशेषताओं को सम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। इसका आत्मबल प्रचण्ड बनता है और अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति का पथ प्रशस्त होता है।

मंत्रों की विशेषता शब्दों के एक विशेष क्रम से चयन गुँथन में है। वे ध्वनि विज्ञान के एक विशेष नियम क्रम के अनुरूप गढ़े होते हैं जिनका एक ही प्रवाह से देर तक उच्चारण करने से एक विशेष स्तर की ऊर्जा उत्पन्न होती है। हाथों को एक ही गति से रगड़ने पर वे बात ही बात में गरम हो जाते हैं। कुछ एक शब्दों को एक ही क्रम में- एक ही गति से- एक ही स्वर में उच्चारित किया जाय तो उसकी प्रतिक्रिया से न केवल उस व्यक्ति का शरीर और मन वरन् समीपवर्ती वातावरण भी उत्तेजित हो जायेगा। किसी किसी को मंत्र देवता का साक्षात्कार होता है और सफलता का आशीर्वाद सुनाई पड़ता है। यह स्थूल कानों से स्थूल आँखों से नहीं होता वरन् पूर्णतया सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म इन्द्रियाँ ही उसकी अनुभूति करती है फिर भी कई बार उसमें इतनी प्रखरता होती है कि उस घड़ी स्थूल जैसा ही दर्शन या श्रवण अनुभव में आता है आवश्यक नहीं हर मंत्र सिद्धि से हर किसी को श्रवण या दर्शन मिले, पर विश्वास और निष्ठा को परिपक्वता, उत्साह एवं मनोबल का अनुभव अवश्य होता है। सफलता व्यक्त करने वाली प्रसन्नता चेहरे पर और विजय उपलब्धि की चमक साधक की आँखों में चमकती हुई स्पष्ट देखी जा सकती है। इन सफलता सूचक अनुभूतियों को स्फोट कहा गया है।

मंत्र की भाव भूमिका चुम्बकत्व उत्पन्न करती है और स्फोट उसे असंख्य गुना विस्तृत एवं सशक्त बनता हो। अणु का आरम्भिक विस्फोट सामान्य होता है उसके चारों ओर घिरा वातावरण ही गुणन शक्ति उत्पन्न करके उसे अति भयंकर बनाता है। यही प्रक्रिया मंत्र में भी होती है। मंत्र में सन्निहित भावना, कर्मकाण्ड के साथ जुड़ी श्रद्धा तप साधना से उत्पन्न, शब्द शक्ति का प्रचण्ड प्रवाह जैसी अनेकों रहस्यमयी मंत्राराधन की विशेषताएँ मंत्र को जागृत करती है और निष्ठावान् साधकों को सिद्ध मांत्रिक के स्तर पर ले जाकर पहुँचा देती है।

यहाँ एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि मंत्राराधन में प्रयुक्त होने वाले हर उपकरण में- पदार्थ में , अवयव में- दिव्य सत्ता का आवाहन करना पड़ता है और उसे सामान्य पदार्थ न रहने देकर देव आयुध के रूप में प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। स्नान के जल में तीर्थों का, आत्मा का अवतरण कराने वाले मंत्रों का उच्चारण जल में वरुण देव सहित अन्य देवों का आवाहन है। इस प्रकार श्रद्धासिक्त जल से स्नान करने पर साधक की निष्ठा में गहरा पुट लगता है। आसन, माला, पंचतत्व, दीपक, चन्दन पुष्प आदि उपकरणों के प्रयोग में मंत्रोच्चारण एवं अमुक क्रम विधान अपनाने की जो परम्परा है उसे निरर्थक नहीं माना जाना चाहिए। यथा क्रम करने से वे सामान्य लगने वाली वस्तुएँ उस विशेष चेतन स्तर की बनती है जिसकी कि मंत्र प्रयोग में आवश्यकता है। इष्ट देव की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा -षोडशोपचार पूजन जैसी व्यवस्थायें उसी दृष्टि से है कि गहन श्रद्धा का आरोपण उस पार्थिव प्रतीक को समर्थ सत्ता का प्रतिनिधि बनाकर प्रचण्ड प्रेरणा देने का प्रयोजन पूरा कर सके।

साधक को अपने अंग-प्रत्यंग में न्यास मन्त्रों द्वारा विविध देव शक्तियों की प्रतिष्ठापना करनी पड़ती है। पवित्रीकरण, आचमन प्राणायाम, न्यास का प्रयोजन सूक्ष्म स्थूल और कारण शरीरों को परिशुद्ध बनाता है। शरीर और मन का परिमार्जन करने के लिए मंत्र जप प्रारम्भ करने से पूर्व कई तरह के कर्मकाण्ड विधान करने होते हैं इनमें से बहुत से अपने में देव भाव की स्थापना के लिये होते हैं। यह प्रयोग साधन में प्रयुक्त होने पर उपकरणों को सफलता में सहायक रहने योग्य बनाते हैं।

ध्वनि की ऊर्जा विज्ञान सम्मत है। यदि श्रव्य-ध्वनि औडिबल साउण्ड- लगातार चालू रखी जाय तो उससे कुछ ही समय में पानी खोलने जितनी गर्मी पैदा हो जायेगी।

मन्त्र से भावनायें और विचारणाएँ जुड़ी रहती हैं और एक ही विचारधारा को लगातार मस्तिष्क में स्थान देते रहने से वह चिन्तन प्रक्रिया पर सवार हो जाता है और एक चिरन्तन प्रवाह का रूप धारण करता है। यह मार्ग मस्तिष्कीय प्रशिक्षण एवं परिवर्तन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। इससे मन को किसी विशेष भूमिका में रमण करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। विकृतियों को सुधारा जा सकता है और अभिरुचि तथा प्रकृति में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह अर्थ चिन्तन को स्थान देते हुये मंत्र अनुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।

शब्दशक्ति का स्फोट मंत्र शक्ति की रहस्यमय प्रक्रिया है। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयानक शक्ति की जानकारी हम सभी को है। इन शब्द कम्पन घटकों को विस्फोट अणु विखण्डन की तरह हो सकता है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्व दर्शी मनीषी तथा दिव्य दृष्टा मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उनका जपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मंत्राराधन वस्तुतः शब्दशक्ति का विस्फोट ही है।

शब्द स्फोट से ऐसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती है जिन्हें कानों की श्रवण शक्ति से बाहर की कहा जा सकता है। शब्द आकाश का विषय है। योगी वायु उपासक है। उसे प्राणशक्ति का संचय वायु के माध्यम से करना पड़ता है। इस दृष्टि से मांत्रिक को योगी से भी वरिष्ठ कहा जा सकता है। सच्चा मांत्रिक योगी से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही शक्तिशाली हो सकता है।

मंत्र-साधना में जहाँ शब्द शक्ति का विस्फोट होता है। विस्फोट में गुणन शक्ति है। मंत्र में सर्व प्रथम देवस्थापन की सघन निष्ठा उत्पन्न की जाती है। यह भाव चुम्बकत्व है। श्रद्धा शक्ति के उद्भव का प्रथम चरण है। इस आरम्भिक उपार्जन का शक्ति गुणन करती चली जाती है और छोटा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। विचार का चुम्बकत्व सर्व विदित है। इष्ट देव की- मंत्र अधिपति की शक्ति एवं विशेषताओं का स्तवन, पूजन के साथ स्मरण किया जाता है और अपने विश्वास में उसे सर्वशक्ति सत्ता एवं अनुग्रह पर विश्वास जमाया जाता है। निर्धारित कर्मकाण्ड विधि विधान के द्वारा तथा तप साधना कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुहा शक्ति के करतल गत हो जाने को भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर लेती है।

मंत्र से दो वृत बनते हैं एक को भाववृत्त और दूसरे को ध्वनिवृत्त कह सकते हैं। लगातार की गति अन्ततः एक गोलाई में घूमने लगती है। ग्रह नक्षत्रों का अपने-अपने वृत पर घूमने लगना इसी तथ्य से संभव हो सका है कि गति क्रमशः गोलाई में मुड़ती चली जाती है। पिण्ड ब्रह्माण्डों की गति तथा आकृति गोल है उसका कारण गतिशीलता है। पहाड़ों से टूटे शिला खंड नदी प्रवाह में बहते-बहते गोलाकार बनते जाते हैं और छोटे बनने वाले बालू कणों के रूप से परिणत हो जाते हैं।

मंत्रजप में नियत शब्दों को निर्धारित क्रम से देर तक निरन्तर उच्चारण करना पड़ता है। जप यही तो है। इस गति प्रवाह के दो आधार है एक भाव और दूसरा शब्द। मंत्र के अंतराल में सन्निहित भावना का नियत निर्धारित प्रवाह एक भाववृत्त बना लेता है वह इतना प्रचण्ड होता है कि साधक के व्यक्तित्व को ही पकड़ और जकड़ कर उसे अपनी ढलान में ढाल ले। मंत्र विद्या को व्यक्तित्व का स्तर बदलने के लिये सफलता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। कितने ही दोष दुर्गुण हटाये और मिटाये जा सकते हैं। सद्गुण सत्कर्म और सद्भाव के अभिवर्धन का लाभ मिल सकता है। शारीरिक और मानसिक रुग्णताओं से मुक्ति दिलाने में मंत्र विद्या का आशातीत उपयोग हो सकता है।

ज्ञानवृत्त और शब्दवृत्त दोनों ही अपने-अपने ढंग की शक्तियाँ संजोये हुये है। वे ऐसी भी है कि अन्याय व्यक्तियों को तथा परिस्थितियों के प्रवाह को उलट पुलट कर सकें। विष्णु के हाथ में लगा हुआ चक्रं सुदर्शन आत्मबल की प्रचण्ड क्षमता की ओर ही इंगित करता है। मंत्र की वृत परिधियाँ दूसरों के मनः स्तर को बदलने में और परिस्थितियों के कारण बने हुये वातावरण को पलटने में भी चमत्कारी सफलता उत्पन्न कर सकती है।

चेतना का अनन्त सागर वृत्तियों आवृत्तियों और पुनरावृत्तियाँ की लहरों में लहलहा रहा है। इन्हीं के चक्रव्यूह में इच्छा, क्रिया और कर्मफल बनकर हमें कही से कही घसीटें फिरती है। इसी चक्र जाल को बेधन करके हम जीवन मुक्त बनते हैं। यही जीवन का परम लक्ष्य है। इस दिशा में चलने वाले को भवबन्धनों की झाड़ियाँ काटते हुए चलना पड़ता है। मंत्र को समझने से जिस तथ्य को वह हृदयंगम कर पाता उसे मंत्रशक्ति का वृत, ट्रैक्टर या बुलडोजर के पहियों की तरह काटता चला जाता है।

मन्त्रानुष्ठानों में प्रायः अग्निहोत्र एक आवश्यक अंग होता है। सुगन्धित सामग्री जलाकर वायु को सुवासित कर लेना अलग बात है और यज्ञानुष्ठान दूसरी। यज्ञानुष्ठान में प्रयुक्त होने वाली समिधा, हव्य सामग्री, अग्नि चाहे जहाँ से चाहे जैसी नहीं ली जा सकती। जिस वृक्ष को जिस डाली को समिधा के लिए प्रयुक्त करना है उसकी स्थिति और पवित्रता को परखना पड़ता है। शुभ घड़ी में शुद्धता पूर्वक उसे अभिमंत्रित कुल्हाड़ी से काट कर लिया जाता है। सूखी डाली को नियत लम्बाई मुटाई में यज्ञकर्ता ही काटते हैं और अग्नि में डालने से पूर्व उनमें फिर प्राण प्रतिष्ठा करते हैं तब कही वे लकड़ियाँ समिधा कहलाने योग्य बनती है जहाँ तहाँ से ज्यों-त्यों लकड़ी लेकर हवन कुण्ड से झोंक देना हो तो ईंधन जलाने जैसा हुआ। उसके द्वारा प्रज्वलित अग्नि में चमत्कार नहीं देखा जा सकेगा।

अग्नि होत्र में प्रयुक्त होने वाले हव्य पदार्थों के बारे में भी यही बात है उन्हें विधान शृंखला के माध्यम से पवित्र बनाया जाना चाहिए। अग्नि को भी इसी प्रयोजन के लिये विधि साक्षी प्रज्वलित करके कुण्ड में प्रतिष्ठापित करना चाहिए। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले पात्र अमुक काष्ठ के अमुक आकार प्रकार के बनने है यह झंझट अकारण नहीं है। होत्र को स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहिन कर बैठना पड़ता है और अनुशासन में रहकर ही आहुति देने का क्रम पूरा करना पड़ता है। निर्धारित यज्ञ प्रक्रिया एवं मन्त्रोच्चारण की विधि व्यवस्था को अपनाना पड़ता है। इन प्रयोजनों में स्वेच्छाचार वर्जित है। उसमें विधि व्यवस्था का उल्लंघन करना न केवल श्रम को व्यर्थ बना देता है वरन् कई बार तो अवांछनीय प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

अग्निहोत्र की चर्चा यहाँ इसलिए की गई है कि वह भी मंत्राराधन के अन्तगतं आता है। उसी का एक विशेष प्रयोग है। यज्ञोच्चार के विभिन्न पक्षों में जिस प्रकार पवित्रता, सतर्कता रखी जाती है और भावशक्ति दिव्य प्रतिष्ठापना की जाती है उसी प्रकार मंत्राराधन के प्रत्येक पक्ष में बरती जानी चाहिये- मात्र जप करने में जुट पड़ना और उसके साथ जुड़ी हुई पूर्व परिस्थितियों को निरर्थक मानकर उपेक्षा करना ठीक न होगा।


प्रसिद्ध चिकित्सक (kahani)

लुकमान तब प्रसिद्ध चिकित्सक नहीं एक अमीर के यहाँ घरेलू नौकर मात्र थे।

अमीर इस नौकर से तो खुश था, पर ईश्वर को अक्सर गालियाँ देता रहता और कहता कि उसने मुझे कई बार कठिनाइयों में डाला है।

एक दिन अमीर ककड़ी खा रहा था, उसे वह कडुआ लगी तो नौकर को दे दी। लुकमान ने उसे बड़े चाव के साथ खा लिया, मानो वह स्वादिष्ट ही हो।

अमीर ने पूछा- भला ऐसी कडुआ ककड़ी तुमने ऐसी रुचि पूर्वक कैसे खा ली?

लुकमान ने कहा- आप मेरे मालिक है- रोज ही स्वादिष्ट भोजन देते हैं, एक दिन कुछ कडुआ दे दिया तो उसे आप की कृपा स्वीकार करने में क्यों आनाकानी करूँ?

अमीर को अपनी भूल याद आई। ईश्वर ने अनेक सम्पदायें और सुविधायें दी है फिर यदि कभी कोई कटु लगने वाला अनुदान भी वह देता है तो उसकी सद्भावना पर सन्देह क्यों किया जाय?


आनन्दित रहने के पर्याप्त कारण हमारे सामने मौजूद हैं।

एन्थोनी ने प्रेम में, ब्रूट्स ने कीर्ति में, सीजर में साम्राज्य में आनन्द ढूँढ़ा पर इनमें से पहले को अपमान दूसरे को घृणा और तीसरे को कृतघ्नता ही हाथ लगी और उनमें से तीनों के सपने धूलि में मिल गये। आनन्द किस वस्तु की कीमत पर खरीदा जा सकता है इसकी नाप-तौल करते हैं कि धरती पर कही कुछ ऐसा नहीं है जिसके बदले आनन्द खरीदा जा सके, वह कभी किसी को मिला है तो उस आत्मज्ञान के बदले ही मिला है जो जीवन को उत्कृष्ट स्तर का बनाये बिना चैन ही नहीं लेने देता।

वायरन कहते थे- ‘ जो आनन्द चाहते हैं उन्हें आनन्द बाँटना चाहिए। ‘ उनका वितरण उन्हीं के पास वापिस लौट आवेगा। जीवन की इस महान उपलब्धि को तलाश करने के लिए कही बाहर जाने की जरूरत नहीं है। जो इतना कर पाते हैं उन्हें अपने अन्तर से आनन्द का ऐसा निर्झर फूट कर प्रवाहित होता हुआ दिखाई पड़ता है जो न केवल अपने को, समीपवर्तियों को- वरन् दूरवर्तियों को भी उल्लास से ओत-प्रोत कर दे।

हम मुख को कभी मलीन न करे, सदा हँसमुख रहे और अनुभव करे कि शोक-संताप का हमारे लिए इस संसार में कही जन्म ही नहीं हुआ हैं। परिस्थितियाँ सदा अपने हाथ में नहीं होती घटनाक्रम हमारी चाही रीति-नीति से हो चले यह आवश्यक नहीं। कई बार ऐसे संयोग जुट जाते हैं जिनके कारण न चाहते हुए भी विपन्न स्थिति का शिकार होना पड़ता है।

एमर्सन का यह कथन अनुभव की कसौटी पर कसने के बाद व्यक्त किया हुआ है कि आनन्द का इत्र दूसरों पर छिड़कने वाले अपने आप को भी सहज सुगन्धित बना लेते हैं। आत्मगौरव को संजोये रखने वाले आमतौर से प्रसन्नचित्त पाये जाते हैं क्योंकि वे वस्तुओं के भाव-अभाव को महत्व न देकर अपनी मानवोचित सत्प्रवृत्तियों को बढ़ी-चढ़ी सम्पदा मानते हैं और उसी संचय से अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यदि परिस्थितियाँ अपने अनुकूल नहीं हो सकती तो हम परिस्थितियों के अनुकूल बन सकते हैं, उनके साथ ताल मेल बिठा सकते हैं और यह सब बिना आदर्शों को गिराये घटाये किया जा सकता है।

आनन्द किसी वस्तु विशेष पर निर्भर नहीं। ऐसा पाक्षिक हर्ष तो वस्तु के मिलने तक ही जीवित रहता है जैसे ही वह मिली कि तिरोहित हुआ और अधिक अच्छी चीज पाने के लिए नया लालच उत्पन्न हुआ। परिस्थितियों की अनुकूलता का आकर्षण भी तभी तक रहता है जब तक कि प्रतिकूलता के साथ-साथ उसकी तुलना की जाती है। यदि ऐसा न किया जाये तो हर सुखद परिस्थिति फीकी और नीरस होती चली जायगी। अमीरों की पीठ में फूलों की पंखुड़ियाँ भी चुभने लगती है जब कि किसान ऊबड़-खाबड़ खेत में छाया के नीचे बाँह का तकिया बनाकर गहरी नींद का आनन्द लेता है।

संसार में सौंदर्य कम नहीं और न सुरुचि का ही घाटा है सज्जनों की संस्कृतियाँ भी चारों ओर बिखरी पड़ी है। उपकारकर्ता और सहयोगियों की सूची बहुत बड़ी है जिनके आधार पर कि हम अब तक प्रगति और सुविधा के विविध साधन समय-समय पर प्राप्त करते रहे हैं। यदि उस सब पर दृष्टिपात करे तो इस संसार में इस जीवन में आनन्द की अनुभूति कराने वाले अगणित कारण हमें सहज ही मिल सकते हैं।


सज्जनता और शालीनता की विजय यात्रा

एक राजा ने अपने राजकुमार को किसी दूरदर्शी मनीषी के आश्रम में सुयोग्य शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा। उसे भर्ती कर लिया गया और पढ़ाई चल पड़ीं। एक दिन मनीषी ने राजकुमार से पूछा तुम क्या बनना चाहते हो यह तो बताओ? तब तुम्हारा शिक्षा क्रम ठीक बनेगा।

राजकुमार ने उत्तर दिया- वीर योद्धा।

मनीषी ने उसे समझाया यह दोनों शब्द तो एक जैसे है, पर इसमें अन्तर बहुत है। योद्धा बनना है तो शस्त्र कला का अभ्यास करो और घुड़सवारी सीखो। किन्तु यदि वीर बनना है तो नम्र बनो और सब से मित्रवत व्यवहार करने की आदत डालो।

सबसे मित्रता करने की बात राजकुमार को जंची नहीं और असंतुष्ट होकर अपने घर वापिस चला गया। पिता ने लौटने का कारण पूछा तो उसने मन की बात बात दी। भला सबके साथ मित्रता बरतना भी कोई नीति है?

राजा चुप हो गया। पर जानता था उसे जो कहा गया है सच है। कुछ दिन बाद राजा अपने लड़के को साथ लेकर घने जंगलों में वन-विहार के लिए गया। चलते-चलते शाम हो गई। राजा को ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। उठा तो देखा कि उसकी अँगूठी में जड़ा कीमती हीरा निकल कर पथरीले रेत में गिर कर गुम हो गया है। हीरा बहुत कीमती था, सो राजा को बहुत चिन्ता हुई, पर किया क्या जाता, अँधेरी रात में ढूँढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी।

राजकुमार को एक उपाय सूझा। उसने अपनी पगड़ी खोली और वहाँ का सारा पथरीला रेत समेट कर उसकी पोटली में बाँध लिया और उस भयानक जंगल को जल्दी पार करने के लिए निकल पड़े।

रास्ते में सन्नाटा तोड़ते हुए राजा ने पूछा- हीरा तो एक छोटा सा टुकड़ा है उसके लिए इतनी सारी रेत समेटने की क्या जरूरत थी? राजकुमार ने कहा- जब हीरा अलग से नहीं मिलता तो यही उपाय रह जाता है कि उस जगह की सारी रेत समेटी जाय और फिर सुविधानुसार उसमें से काम की चीज ढूँढ़ ली जाय।

राजा चुप हो गया। किन्तु कुछ दूर चल कर उसने राजकुमार से पूछा कि फिर मनीषी अध्यापक का यह कहना कैसे गलत हो गया कि सबसे मित्रता का अभ्यास करो। मित्रता का दायरा बड़ा होने से ही तो उसमें से हीरे ढूँढ़ सकना सम्भव होगा।

राजकुमार का समाधान हो गया और वह फिर उसी विद्वान के आश्रम में पढ़ने के लिए चला गया।

गाँधी जी ने इसी मैत्री नीति को व्यवहार दर्शन बनाकर बड़े पैमाने पर परिणत किया। सत्याग्रह के प्रथम चरण में मतभेद से निपटने का आग्रह करने से पूर्व विपक्षी के प्रति अपने मन में सघन आत्मीयता उत्पन्न करने की आवश्यकता बताई थी। संघर्ष शोषण और साम्राज्यवाद के विरुद्ध था -अंग्रेजों के प्रति घृणा को आधार मानकर उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम की रणनीति नहीं बनाई थी। यही कारण था कि एण्डूज जैसे विचारशील अंग्रेज उनके साथ थे। इस सिद्धान्त का प्रयोग परीक्षण अहिंसात्मक सत्याग्रह के दिनों में हुआ था। कसौटी पर यही सिद्ध हुआ कि वह परीक्षण निष्फल नहीं गया। नम्रता, शालीनता और मित्रता की नीति अपना कर हम घृणा और हिंसा का प्रयोग करने की अपेक्षा घाटे में नहीं वरन् नफे में ही रहते हैं। घृणा मूलक आक्रमण करके विपक्षी को परास्त कर भी दिया जाय ता भी द्वेष की ऐसी गहरी खाई शेष रह जाती है जो समय-समय पर खुलती फूटती रहती है और इतना विद्रूप विघटन उत्पन्न करती है जो विजय को पराजय से भी गई-गुजरी बना देती है। काया को शस्त्रों से जीता जा सकता है पर हृदय को जीतने के लिए स्नेह और शालीनता के अतिरिक्त और कोई शस्त्र काम नहीं दे सकता। सच्ची विजय किसी को विवश करने में नहीं वरन् उसकी अन्तः चेतना की दिशा मोड़ देने में है। यह कठिन कार्य सज्जनता और सघन आत्मीयता की भावना के सहारे ही सम्पन्न हो सकता है।

ईसा ने अपने किसी प्रवचन में इस तथ्य को अधिकाधिक स्पष्ट किया था। उनका कथन है- नम्रता ही धन्य है क्योंकि अन्ततः विजय उसी की होगी। सत्य के अतिरिक्त स्थायित्व और किसी में नहीं। मनुष्य-मनुष्य के बीच में अनादि काल से चली आ रही आत्मीयता की सघन कड़ी ऐसी सच्चाई है। इसे परिष्कृत करने पर हम एकाकी और निर्बल नहीं रहते। हमारा सहयोगी परिवार बढ़ता है और बैर विरोधी की दीवारें झीनी पड़ती है।

योगी भर्तृहरि ने नीति शतक में विजय का आधार मित्रता का और प्रगति का माध्यम नम्रता को बताया है। साथ ही यह भी कहा है कि परमार्थ सब से बड़ा स्वार्थ है। इस दूरदर्शिता भरी नीति का संभवतः उतावले और ओछे लोगों के लिए मूल्यांकन कर सकना संभव न हो सके पर जो मानव प्रकृति और परम्परा से परिचित है उनके लिए यह जानना कठिन नहीं होना चाहिए कि सज्जनता और शालीनता से व्यक्ति और समाज की अगणित कठिन समस्याओं का सरल समाधान निकाला जा सकता है।,

शरद पूजा हमारा विजय पर्व है। उस शुभ अवसर पर प्राचीनकाल में विजय यात्राएँ आरम्भ की जाती थीं। यो विजय का अर्थ किसी क्षेत्र पर रक्तपात भरे आतंक से आधिपत्य जमा लेना भी समझा जाता रहा है और उस नृशंस उन्माद में निरत लोगों को शूर वीरों की उपाधि भी दी जाती रही है। पर गहरी दूरदर्शिता का, शस्त्र ‘पूजा’ का , अर्थ- प्रेम, मैत्री नम्रता और शालीनता में ही करता रहा है। सज्जनता की विजय ही विजय यात्रा की सफलता है। शरद पर्व पर विजयादशमी मनाने का आध्यात्मिक प्रयोजन यह है कि हम अपने उदास आचरण द्वारा विकृत व्यक्तित्वों और भयावह संकटों का शाश्वत हल ढूँढ़ निकाले।

भगवान बुद्ध भी हिंसा के वर्चस्व से दुःखी थे। वे पाप और अनाचार को निरस्त करने के लिए व्याकुल थे। अनाचार से कैसे लड़ा जाय इसके लिये उन्होंने घोर तप किया और अन्ततः कारगर शस्त्र ढूँढ़ निकाला- अहिंसा से हिंसा पर विजय पाने की बात जब उन्होंने कही तो उसे समझना और स्वीकार करना सर्व साधारण के लिए बहुत कठिन पड़ा। इतिहास बताता है कि युद्ध की विजय यात्रा में मैत्री नीति इतनी अधिक कारगर सिद्ध हुई जितनी कि उनके द्वारा यदि सैन्य नीति अपनाई जाती तो वह उतना फलप्रद होती।

नम्रता को, कायरता का और आक्रमण को वीरता का चिन्ह माना जाता है पर यह मान्यता सही नहीं। आवेश में आकर हत्या या आत्महत्या, सहज ही की जा सकती है। पर पराये को अपना मानने और विद्रूप को संतुलित करने में असाधारण साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। उतावली में कुछ भी तोड़-फोड़ कर गुजरना सहज है पर कठोर पाषाण को हृदयग्राही देव प्रतिमा गढ़ने में कलाकार के कुशल हाथ ही सफल होते हैं। ध्वंस को नहीं सृजन को यदि विजय माना जाय तो हमें मैत्री , नम्रता और सज्जनता की नीति ही कारगर ही प्रतीत होगी।


आध्यात्मिकता का स्वरूप प्रयोजन फलितार्थ

आध्यात्मिकता का अर्थ है उस चेतना पर विश्वास करना जो प्राणधारियों को एक के साथ दूसरे से जोड़ती है, सुख संवर्धन और दुख निवारण की स्वाभाविक आकांक्षा को अपने शरीर या परिवार तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक विस्तृत बनाती है। अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता के विस्तार के रूप में किया जा सकता है। प्रेम ही परमेश्वर है का सिद्धान्त यहाँ अक्षरशः लागू होता है। अन्तरात्मा की सघन पिपासा, प्रेम का अमृतपान करने की होती है। छल का व्यापार प्रेम, आश्वासन के सहारे ही चलता है। वासना के आकर्षण में प्रेम की संभावनाएँ ही उन्माद पैदा करती है। उसकी यथार्थता इतनी मार्मिक होती है प्रेम देने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों ही धन्य हो जाते हैं।

मानवी अन्तः करण की मूल प्रवृत्ति उदार और पवित्र है। इसीलिए उसे ईश्वरीय चेतना कहा गया है। मनुष्य स्वभावतः स्वार्थी नहीं है और न उद्धत न कृपण। उसमें उदारता की असीम मात्रा भरी पड़ी है। पवित्र जीवन के साथ जुड़े गौरव की सहज अनुभूति सब को रहती है। स्वयं पवित्र न बना जा सके तो भी दूसरे महामानवों के सामने सहज ही सिर झुक जाता है और श्रेष्ठता के पक्ष में अथवा सहज समर्थन व्यक्त करना होता है।

आध्यात्मिकता और आस्तिकता एक ही लक्ष्य के दो प्रयोजन है। ईश्वर की दार्शनिक व्याख्या मानवी अन्तः करण में विद्यमान उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के रूप में ही की जा सकती है। कर्त्तृत्व पालन में अभिरुचि और अवांछनीयता से निवृत्ति की प्रेरणा को ईश्वरीय प्रेरणा माना गया है। करुणा और उदारता की स्नेहिल सद्भावनाएँ जब अपनी सुविधाओं को दूसरे अधिक जरूरतमन्दों के पक्ष में छोड़ने की- दूसरों के कष्ट अपने ऊपर ओढ़ने की त्याग बलिदान भावना को आस्तिकता की प्रत्यक्ष परिणति माना गया है। ईश्वर निष्ठा और भक्ति का यही फलितार्थ है।

साम्प्रदायिक आस्तिकता दूसरी वस्तु है। उसमें ईश्वर को एक व्यक्ति विशेष मान कर स्तुति प्रशंसा अथवा भेंट पूजा का प्रलोभन देकर प्रसन्न किया जाता है ओर धन, संतान, सफलता सम्मान तथा स्वर्ग मुक्ति जैसे मूल्यवान अनुदान बिना मूल्य देने के लिए आग्रह किया जाता है। दार्शनिक विवेचना में इस भक्तिमार्गी आस्तिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। वेदान्त ने आत्मा के परिष्कृत स्तर को ही परमात्मा माना है और उत्कृष्टता से भरा पूरा अन्तः करण ही ब्रह्म लोक है। अपनी महानता पर विश्वास और तद्नुरूप श्रेष्ठ आचरण का अवलम्बन, यही है सच्ची आस्तिकता। इसी के परिपोषण में साधना और उपासना का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है।

वैज्ञानिक जानते हैं कि इस विशाल विश्वब्रह्माण्ड के अगणित ग्रह पिण्डों के अन्तगतं चलने वाली चित्र विचित्र हलचलों के बीच एक सुव्यवस्थित तारतम्य है। प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियाँ अणु परमाणुओं से लेकर ग्रहपिण्डों तक को एक दूसरे के साथ घनिष्ठता पूर्वक जोड़ती है। चेतन जगत में भी यही नियम काम करते हैं। मन्दमति एवं निकृष्ट स्तर वाले लोगों की बात दूसरी है जिसका व्यक्तित्व उभरा और निखरा होगा उसे अपनी अन्तः चेतना एवं गतिविधियों का निर्धारण इसी आधार पर करना होगा कि सीमितता क्रमशः असीमता में विकसित होती चले। स्वार्थ को सुविस्तृत करके निस्वार्थ स्तर पर जा पहुँचे। विभिन्न काय कलेवरों में बिखरी हुई चेतना को एक सत्ता के रूप में देखने की दार्शनिक दृष्टि आत्मवत् सर्वभूतेषु की अनुभूति में परिणत होती है और छोटे परिवार तक मोह निमग्न रहने के स्थान पर वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श विचार व्यवहार में ओत-प्रोत रहता है।

अनेकता में समाविष्ट एकता की झाँकी कर सकना ही ईश्वर दर्शन है। सृष्टि का प्रत्येक सजीव और निर्जीव घटक एक दूसरे से प्रभावित ही नहीं होता परस्पर पूरक ही नहीं है वरन् अभिन्न भी है। एक की संवेदना दूसरे को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। जब यह स्वतः सिद्ध सत्य चेतना के गहन मर्मस्थल तक प्रवेश कर जाय और निरन्तर इसी स्तर की अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि अध्यात्म और जीवन का समन्वय हो चला।

व्यक्तिवादी पृथकता, स्वार्थगत संकीर्णता, दोषपूर्ण अहंकारिता, कृपण संग्रह शीलता और कुटुम्बियों तक मोह ममता की सीमाबद्धता जितनी ही सघन होगी व्यक्ति उतना ही अनात्मवादी माना जायेगा। पूजा से अध्यात्म के अभिवर्धन में सहायता मिल सकती है पर दोनों को एक नहीं कह सकते। धर्म और ईश्वर के नाम पर प्राणीवध के कुकृत्य होते हैं। पूजा करने वालों में असामाजिक और अवांछनीय तत्वों की मात्रा कम नहीं है। पुजारी और अध्यात्मवादी निश्चित रूप से एक पंक्ति में नहीं बिठाये जा सकते।

पूजा की इति श्री अमुक कर्मकाण्डों की पूर्ति के साथ ही हो जाती हैं। किन्तु आध्यात्मिक व्यक्ति के अन्तरंग और बहिरंग जीवन में व्यावहारिक हेर-फेर करने के लिए विवश करती है। आत्मसंयम , इन्द्रिय निग्रह, मर्यादा-पालन सादगी, सज्जनता, नम्रता, चरित्र गठन, कर्तव्य पालन, धैर्य , साहस और संतुलन जैसी अनेक सत्प्रवृत्तियाँ अन्तरंग आध्यात्मिकता के वृक्ष पर फल-फूले की तरह अनायास ही लदने लगती है। ऐसे व्यक्ति को महामानव स्तर के उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सुसम्पन्न देखा जा सकता है।

बहिरंग जीवन में आध्यात्मिकता की प्रतिक्रिया श्रमशीलता, स्वच्छता, सुव्यवस्था, सद्व्यवहार, ईमानदारी, शालीनता, न्यायनिष्ठा , जनसेवा, उदारता जैसे आचरणों में प्रकट होती है। मर्यादाओं का उल्लंघन वे करते नहीं साथ ही अनीति को सहन भी नहीं करते। अवांछनीयता के विरुद्ध उनका संघर्ष अनवरत रूप से चलता रहता है। न वे किसी से अनावश्यक मोह बढ़ाते हैं और न किसी का स्नेह सद्भाव से वंचित करते हैं।

आध्यात्मिकता को प्राचीन भाषा में ब्रह्मविद्या कहते हैं यह उत्कर्ष चिन्तन और आदर्श कृत्य को एक परिष्कृत जीवन पद्धति है। जिसे अपनाने पर भीतर संतोष और बाहर सम्मान की वे उपलब्धियाँ प्राप्त होती है जिन पर कुबेर और इन्द्र जितने वैभव को निछावर किया जा सके। व्यक्तित्व की पूर्णता और प्रखरता का सारा आधार आध्यात्मिकता पर ही अवलम्बित माना जा सकता है।


मृत्यु से क्यों तो डरें और क्यों घबराये?

स्वामी विवेकानन्द ने मृत्यु के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए कहा था- जब मैं मृत्यु के सम्बन्ध में सोचता हूँ तो मेरी सारी कमजोरियाँ विदा हो जाती है। उस कल्पना में न मुझे भय लगता है न शंका सन्देह भरी बेचैनी अनुभव होती है तब मेरे मन में उस महायात्रा की तैयारी के लिए योजनाएँ भर बनती रहती है। मरने के बाद एक अवर्णनीय पुँज का साक्षात्कार होगा इस कल्पना से मेरा अन्तराल पुलकन और सिहरन से गदगद हो जाता है।

मरने से डरने का कारण केवल मनुष्य की वह भीरुता और भयभीत मनः स्थिति है जो अपरिचित स्थिति में जाने और एकाकी रहने की आशंका से उभरती है। सम्बन्धित व्यक्तियों अथवा वस्तुओं से सम्पर्क छूट-टूट जायेगा यह डर भी मनुष्य को मौत से बहुत डराता है। पर जिसने मर कर देखा है उनका कथन है कि मौत में डरने की कोई बात नहीं है।

मरने से पूर्व कैसा अनुभव होता है यह मनुष्य की अन्तः स्थिति पर निर्भर है। वह आजीवन जैसा सोचता रहा है अन्तिम अनुभूतियाँ क्षण भर में प्रस्तुत हुआ उसी का सार तत्व कहा जा सकता है। किन्हीं को प्रकाश दीख पड़ता है , किन्हीं को मृदुल संगीत सुनाई देता है किन्तु कुछ को दम घुटने और डूबने जैसी अकुलाहट भी होती है। प्राणिशास्त्र विलियम हण्टर ने मरने से पूर्व मन्द स्वर में कहा था- यदि मुझ में लिखने की ताकत होती तो विस्तार से लिखता कि मृत्यु कितनी सरल और सुखद है।

डिट्रोयट (अमेरिका) के अख़बार में उस पार शीर्षक से लेखमाला कुछ समय पूर्व छपी थी उसमें उन लोगों के अनुभव संस्मरणों का संकलन था जो मरने के बाद भी जी उठे थे। इन संस्मरणों में एक अनुभव मियानी निवासी लिनमेलविन का है जिन्होंने बताया कि मृत्यु से पूर्व उन्हें तीव्र ज्वर के कारण मस्तिष्क में भारी जलन हो रही थी कि अचानक सब कुछ शान्त हो गया और मैं शान्ति और शीतलता अनुभव करती हुई हवा में तैरने लगी। अपने चारों ओर मुझे रंगीन और सुहावना लगा। किन्तु यह स्थिति अधिक नहीं रही। किसी ने मुझे पुनः शरीर में धकेल दिया और जीवित हो उठी। देखा तो पाया मरे मृत शरीर को दफनाने के लिये परिवार के लोग आवश्यक तैयारी करने में लगे हुये थे। मर कर फिर जी पड़ने पर उन्होंने भी प्रसन्नता अनुभव की, खासतौर से मेरी छोटी लड़की ने।

टिट्राइज आन सस्पेडेस ऐन्टी मेशन नामक ग्रन्थ के लेखक बोस्टन निवासी डा. मूर रसेल फलेचर ने लगातार 25 वर्षों तक इस तथ्य का अन्वेषण किया कि मरने के उपरान्त मनुष्य को किस प्रकार की अनुभूति होती है। मैसाचुसेटस मेडिकल सोसाइटी के वे आजीवन अग्रणी नेता रहे। इस संदर्भ में उन्हें ऐसे लोगों से भी वास्ता पड़ा जो कुछ समय मृत रहने के उपरान्त पुनः जीवित हो उठे थे। ऐसे लोगों को खोज कर डा. फलेचर ने उनके बयान लिये और उन्हें अपनी पुस्तक में छापा।

इन बयानों में एक गानर्निर नगर निवासी श्रीमती जान डी. ब्लेक का है। वे तीन दिन तक मृत स्थिति में पड़ी रही थी। डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था पर कुछ लक्षण ऐसे थे जिनके कारण घर वालों ने उन्हें दफनाया नहीं और पुनर्जीवन की प्रतीक्षा में लाश को सम्भाले रहे। तीन दिन बाद वे जी उठी। पूछने पर उनने बताया वे एक ऐसे लोक में गई जिसे परियों का देश कह सकते हैं। वहां बहुत आत्माएँ थी जिसमें उसकी मृत सहेलियाँ भी थी वे बिना पैरों के आसमान में उड़ती थीं और सब प्रसन्न थीं।

वरमान्य- हद्रिगेट की एक अध्यापिका ने भी कुछ समय मृत रहने के बाद पुनर्जीवन पाया था उसने बताया मृत्यु देश के सभी निवासी प्रसन्न थे। किसी के चेहरे पर विषाद नहीं था। सभी आमोद प्रमोद में मग्न थे।

वोस्टन से सेन्टजान जाने वाला जलयान समुद्र में डूबा तो उसमें से केवल एक लड़की बची। पानी में एक घण्टा डूबी रहने के बाद लहरों के साथ किनारे पर लगी। डा. फलेचर को उसने बताया मृत्यु और जीवन के बीच का समय उसने सुनहरे प्रकाश के बीच बड़े आनन्द के साथ बिताया।

हृदय की धड़कन बन्द हो जाना और साँस का रुक जाना आमतौर से मृत्यु का चिन्ह माना जाता है, पर अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह दोनों क्रियायें कृत्रिम रूप से भी जारी रखी जा सकती है। आपरेशन करते समय रोगी की हृदय की धड़कन बंद हो जाने पर डाक्टर लोग कृत्रिम रूप में धड़कन चालू कर देते हैं। असली मृत्यु मस्तिष्कीय कोशों को अपना काम अन्तिम रूप से बन्द करने पर होती है।

मस्तिष्क को खुराक रक्त त्वचा आक्सीजन से मिलती है। जहाँ यदि यह दोनों चीज न पहुँचे तो मस्तिष्क के लिये देर तक काम करते रहना सम्भव नहीं होता। अधिकतम वह छः मिनट बिना नये रक्त और आक्सीजन के पुरानी संचित पूँजी के आधार पर कार्य रत रह सकता है। इस बीच श्वास और रक्त की उपलब्धि पुनः आरम्भ हो जाय तो वह प्रायः आधा घण्टे में अपने पुराने ढर्रे पर आ सकता है किन्तु यदि अधिक देरी हो जाय तो मरण निश्चित ही है।

मृत्यु उतनी कष्टप्रद नहीं है जितनी कि समझी जाती है। मरने का ठीक समय आने से पूर्व बेहोशी आने लगते हैं और पीड़ा के समस्त लक्षण विदा हो जाते हैं। आमतौर से बूढ़े लोग शान्ति और संतोष पूर्वक मरते हैं और जवानी में अधिक बेचैनी होती है यह उद्विग्नता उनकी महत्त्वाकाँक्षाओं की अतृप्ति के कारण होती है। जिनके सपने जितने अधूरे रहते हैं वे मरते समय उतने ही बेचैन पाये जाते हैं। मौत का डर भी कई बार मरने वालों को व्यथित कर देता है।

मरने के समय सामान्यतः शरीर का तापमान 98.6 फारेनहाइट होता है। इसके बाद वह एक घण्टे में डेढ़ डिग्री के हिसाब से गिरने लगता है। इस आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि मृत्यु हुए कितना समय बीत गया। मृत्यु के उपरान्त माँसपेशियाँ ढीली पड़ती हैं। शरीर भी धीरे-धीरे ठण्डा होता है। इसके बाद लाश में सड़न आरम्भ हो जाती है। रक्त का लाल रंग बदल कर मटमैला और पतला हो जाता है।

यदि मरते समय व्यक्ति को काँच के बक्स में मजबूती से बंद कर दिया जाय तो कुछ समय में सन्दूक कही न कही से टूट जायेगा और दरार पड़ जाएगी। इसे आत्मा का अन्तरिक्ष में पलायन माना जाता है। पर विज्ञानी इसका कारण शरीर में होने वाले रासायनिक तथा गैसीय परिवर्तनों को मानते हैं। मरने के बाद किसी का चेहरा विकृत और किसी का शान्त दिखाई पड़ता है। इसका कारण यह समझा जाता है कि मृतक की आत्मा शान्त या उद्विग्न स्थिति में विदा हुई। पर वैज्ञानिकों की दृष्टि में ऐसा सोचना निरर्थक है। जीवित अवस्था में मस्तिष्क का, मनोभावों का दबाव चेहरे की माँसपेशियों पर रहता है और वह भाव भंगिमा से प्रकट होता रहता है किन्तु वह दबाव जब हट जाता है तो माँसपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं यह शिथिलता ही चेहरे की विकृति के रूप में दीखती है। मृतक की चेतना का अन्त ही माँसपेशियों को उनकी बनावट के आधार पर शिथिल कर देता है ओर ये किधर भी लुढ़क पड़ती हैं, देखने वाले इस दृश्य को अपने-अपने ढंग से सोचते हैं। वस्तुतः मृतक की मुखाकृति का उसके मरण काल में दुखी या संतुष्ट होने का अनुमान लगाना निराधार है। शिथिलता के कारण चेहरे की माँसपेशियाँ किधर लुढ़की पड़ी रही मृतक के चेहरे को देख कर अनुमान लगाया जाना चाहिए।

पूर्ण मृत्यु अचानक ही नहीं हो जाती। यह तीन किश्तों में तीन बार में धीरे-धीरे होती है। इन किश्तों को 1. स्लेनिकल 2. बायोलॉजिकल 3. सेल्युलर कहते हैं।

प्रथम स्लेनिकल मौत वह है जिसमें साँस , धड़कन एवं मस्तिष्कीय विद्युत लहरों का प्रवाह रुक जाता है। इस स्तर पर मरे हुए व्यक्ति को हृदय की मालिश जैसे उपचारों से पुनर्जीवित किया जा सकता है।

दूसरी बायोलॉजिकल मौत वह है जिसमें कुछ अंग विसंगठित होते हुए भी इस स्थिति में बने रहते हैं कि विद्युत संसार से उनमें पुनः हलचल उत्पन्न की जा सके। और तीसरी अन्तिम मौत रुक सके।

तीसरी सेल्युलर मौत वह है जिसमें शरीर के कोश विगलन की स्थिति में पहुँच जाते हैं और फिर किसी भी स्थिति में जीवन वापिस लौटने की संभावना नहीं रहती।

कई बार तो यह तीनों मौतें कुछ ही घण्टों के अन्तर से आ जाती हैं किन्तु कई बार पहली मौत से तीसरी तक पहुँचने में दो दिन लग जाते हैं। हिन्दू समाज में मृतक के समीप रोने धोने उसे स्नान आदि क्रियाकृत्य कराने और श्मशान ले जाने आदि कार्यों में इतना समय लगाने की परम्परा है कि मृतक तीनों मौतें पूरी कर चुका हो।

मस्तिष्कीय विद्युत तरंगों को मापने वाले यंत्र ‘इलेक्ट्रो एन्सिफेलो ग्राफ’ का निष्कर्ष यह है कि मरने के समय मस्तिष्क की विद्युत तरंगें मंद होती चली जाती हैं और गहरी मूर्छा आने लगती है। उस स्थिति में मृतक को कोई स्मरण रह सके ऐसा संभव नहीं है।

यदि मनुष्य आरम्भ से ही मृत्यु को जीवन का अन्तिम अतिथि मान कर चले, उसकी अनिवार्यता को समझे और अपनी गतिविधियाँ इस स्तर की बनाये रखे जिससे मृत्यु के समय जीवन व्यर्थ जाने का पश्चाताप न हो तो मृत्यु हर किसी के लिए सरल एवं सुखद हो सकती है। थकान मिटाने के लिए निद्रा की गोद में जाना जब अखरता नहीं तो कोई कारण प्रतीत नहीं होता कि कुछ अधिक लम्बी निद्रा प्रदान करने वाली मृत्यु से न कोई डरे न घबराये।

जार्ज वाशिंगटन मरने लगे तो उनने कहा- मौत, आ गई, चलो अच्छा हुआ, विश्राम मिला। हेनरी थोरो ने शान्त और गंभीर मुद्रा में कहा- मुझे संसार छोड़ने में कोई पश्चाताप नहीं है। कोहन्स ने और भी अधिक प्रसन्नता व्यक्त की तथा कहा- लगता है मेरे बदन पर फूल ही फूल छा गये। हेनरी ने मृत्यु के समय अलंकारिक भाषा में कहा- बत्तियाँ जला दो, मैं अन्धकार में नहीं जाऊँगा। विलियम ने अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करते हुए कहा- मरना कितना सुखद है। स्वामी दयानन्द ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मरण के क्षणों का स्वागत किया और कहा- ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हुई।


Quotation

“तू किसी को मत मार, तू मेरे समीप पवित्र मनुष्य हो कर रह। जंगलों के प्राणियों का वध करके उनका मांस मत खा।” —ईसा


बुढ़ापा प्रगति में बाधक नहीं होता

ऋतुओं की तरह शरीर में भी समयानुसार परिवर्तन होते हैं। परिवर्तनों में पिछली स्थिति की तुलना में कुछ अच्छाई होती है कुछ बुराई। सर्दी और गर्मी की तुलना की जाय तो दोनों में कुछ अपना महत्व होगा ओर कुछ कठिनाई जुड़ी होगी। जवानी और बुढ़ापे की तुलना भी इसी प्रकार है। जवानी में शरीर बल की अधिकता होती है और जोश की भी किन्तु संजीदगी और समझदारी कम पाई जाती है। बुढ़ापे में बुद्धिबल विवेक और दूरदर्शिता परिपक्व होती है किन्तु शरीर दुर्बल होता जाता है। लाभ-हानि की तुलना करते हुए यही कहा जा सकता है कि दोनों अपने-अपने स्थान पर उपयोगी है। न एक के लिए दुःख मनाया जा सकता है और न दूसरी को सर्वगुण सम्पन्न कहा जा सकता है।

काम की दृष्टि से सर्दी -गर्मी में कोई खास अन्तर नहीं है। दोनों में ही कुछ सुविधाएँ बढ़ती है कुछ असुविधा। इसी प्रकार जवानी और बुढ़ापे का अपना ढर्रा है। काम का स्तर और ढर्रा बदला जाय तो बुढ़ापे में भी आदमी बिना थके इतना काम कर सकता है कि उसे जवानी की तुलना करते हुए कोसने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़े।

लुडोविको जब 115 वर्ष के हो गये तो उन्होंने अपने लम्बे जीवन के कारणों पर प्रकाश डालने वाली आत्मकथा लिखने की आवश्यकता अनुभव की और उन्होंने उस महत्वपूर्ण पुस्तक को धीरे-धीरे लिख ही डाला। सुकरात ने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है, अस्तु उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी। यह क्रम उन्होंने मरते दिनों तक जारी रखा।

रोम के राज नेता केटो जब अस्सी वर्ष के थे तो उन्होंने समझा कि उन्हें अच्छा भाषा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। अस्तु इसी क्रम में उन्होंने ग्रीक की विधिवत् पढ़ाई आरम्भ की।

सर हेनरी स्पेलमैन अग्रगण्य विज्ञानवेत्ता हुये है। वे 60 वर्ष तक दूसरी तरह के काम करते रहे। इस उम्र में उन्हें वैज्ञानिक बनने की सूझी सो उन्होंने साइंस की पुस्तकें पढ़ना आरम्भ की और उस दिशा में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें उच्चकोटि की वैज्ञानिक सफलताएँ प्राप्त की। इटली का प्रख्यात उपन्यासकार बोकेशियो को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह दिलचस्पी के साथ जुटा और अन्ततः मूर्धन्य कलाकार बनकर चमका।

फ्राँस के राजनेता कालवर्ट ने 60 वर्ष के उपरान्त कानून की कक्षा में अपना नाम लिखवाया और वह बूढ़ा विद्यार्थी अपने युवक साथियों से किसी विषये में पीछे नहीं रहा। ओग्लिवो की ख्याति होमर के सफल अनुवादक के रूप में है। वे 50 वर्ष की आयु में ग्रीक भाषा आरम्भ करने वाले विद्यार्थी बने, इसके उपरान्त साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया। वे पचास वर्ष की आयु तक दर्शन शास्त्र से अपरिचित रहे। रुझान इसके बाद ही उत्पन्न हुई और वह उन्हें विश्व ख्याति बना कर ही रही।

संसार के कोने-कोने में ऐसे उदाहरण भरे पड़े है जिनमें वयोवृद्ध व्यक्तियों द्वारा अपने पुरुषार्थ उत्साह और साहस जगाकर प्रगति की मंजिल इतनी तेजी से पूरी की जितनी कि नई उम्र के नवयुवक भी नहीं कर पाते। वृद्धावस्था में किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं है। यदि साहस और उत्साह कायम रखा जा सके तो आयु का अवरोध किसी के मार्ग में अड़चन उत्पन्न नहीं कर सकता।


हिंसा के आतंक पर स्नेह-सौजन्य की विजय

प्यार बड़ा है या क्रूरता? मनुष्य बड़ा है या पशु? साहस बड़ा है या भय? इन प्रश्नों का उत्तर दर्शनशास्त्र के आधार पर प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय तो उलटे उलझन में फँसना पड़ेगा। तर्क कभी इस पक्ष का समर्थन करेगा कभी उस पक्ष का। प्रमाण कभी इस पलड़े को भारी करेंगे कभी उस पलड़े को। बुद्धि की अनिश्चयात्मकता प्रसिद्ध है, वह मान्यताओं, अभिरुचियों और पूर्वाग्रहों की गुलाम होती है। भीतर स्थान जिधर ढुलकता है बुद्धि के समर्थन में जुट जाती है।

तथ्यों के निर्णय का अच्छा तरीका प्रयोग है। कुछ साहसी लोगों ने इस तरह के प्रयोग किये है कि क्या जन्मजात हिंसा प्रवृत्ति के क्रूरकर्मा पशुओं को स्नेह और सद्भावना के वातावरण के रख कर सौम्य और स्नेहिल बनाया जा सकता है। क्या वे अपनी मूल प्रवृत्ति को छोड़ कर स्नेह सौजन्य के अनुरूप अपने को बदलने के लिए तैयार हो सकते हैं। भय को साहस परास्त कर सकता है और पशुता को मनुष्यता निरस्त कर सकती है।

वन्य पशु विशेषज्ञ डेस्माँड वेकडे ने अपनी पुस्तक ‘गारा याका’ में उस मादा चीता का वर्णन किया है जिसे उन्होंने एक झाड़ी में पाया था और अपनी बेटी की तरह पाला था।

घटना क्रम इस प्रकार है कि एक दिन डेस्माँड महोदय वेचुआना लैण्ड की पूर्वी सीमा पर शाशी और लिम्पोपो के दुआवे पर निरीक्षण के लिए गये। उन दिनों नदियों के संरक्षित वन प्रदेश के वार्डन थे और वन्य पशुओं की देख भाल रखने की जिम्मेदारी उनकी थी। इस प्रयोजन की पूर्ति के इस क्षेत्र में दौरे करके की कर सकते थे।

उस दिन एक मोटे मगरमच्छ ने पानी पीते हुए चीते पर हमला किया और देखते-देखते उसका सिर चबाते हुए पानी में घसीट में ले गया। वे इस घटनाक्रम के मूक दर्शक न रहे उन्होंने गोली चलाई और पानी में धँसे हुए मगरमच्छ का काम तमाम कर दिया। पर बच चीता भी न सका उसने पानी से बाहर निकलते निकलते दम तोड़ दिया। यह मादा चीता थी उसके थनों से दूध टपक रहा था इससे स्पष्ट था कि वह नव प्रसूता है।

डेस्माँड महोदय उसके बच्चों का पता लगाने मादा के पैरों के चिन्हों के सहारे उस झाड़ी के पास पहुँचे जिसमें एक दूसरे से सटे तीनों बच्चे बैठे थे। उनकी उम्र मुश्किल से एक दो सप्ताह की ही रही होगी। डेस्माँड उन्हें उठा कर ले आये। एक को जीवित रखा जा सका। वह मादा थी। नाम रखा गया ‘गारा याका’ उसकी उछल कूद और शैतानी को देखते हुए यह नाम उनके नौकरों ने रखा था। जिसका अर्थ होता है ‘भूखे चुड़ैलों की माँ’। नाम व्यंग में रखा गया था पर पीछे वह प्रचलित हो गया वह उसी नाम से पुकारने पर उत्तर भी देती थी।

झाड़ी में से लाकर डेस्माँड ने यह प्रयोग भी किया है कि उनकी नव प्रसूत कुतिया रेक्स चीते के बच्चों को अपनी दत्तक संतान मानने लगे और दूध पिलाने तथा पालने लगे। उसने दूध तो नहीं पिलाया पर साथ-साथ रहना और अपने बच्चों के साथ खेलने देना स्वीकार कर लिया। वातावरण ने उसे दूसरी कुतिया ही बना दिया था। वह रेक्स के साथ इतनी घुल-मिल गई थी और वैसी ही आदतों में इतनी अधिक ढल गई थी कि आकृति से भले ही वह चीता की जाय प्रकृतिः कुतिया ही बन कर रह रही थी।

गारा याका अपने पालक के साथ शिकार करने जाती और कई बार तो बब्बर शेरों से उलझ जाती और उनके छक्के छुड़ाती। पालतू प्रकृति के कारण लड़ने से डरने की कमजोरी उसमें नहीं ही आने पाई। इतने पर भी मनुष्य के साथ उसका व्यवहार आजीवन सौम्य और सज्जनोचित ही बना रहा।

दो साल की होने पर गारा याका ने शैशव और किशोरावस्था पार करके यौवन में प्रवेश किया। उसमें भाव भंगिमा और हरकतों में विचित्र प्रकार का परिवर्तन दिखाई पड़ने लगा। अन्ततः उसे चीतों के बाहुल्य वाले जंगल में छोड़ दिया गया। जहाँ उसने अपना सहचर ढूँढ़ निकाला और सुहाग रात मनाने के लिए लगभग दस सप्ताह उधर ही निवास करती रही। इस बीच में समय-समय पर डेस्माँड उसकी देख-भाल करने जाते रहे उन्होंने जब भी पुकारा वह अपने प्रेमी को छोड़कर दौड़ी आई और जो आमिष उपहार उसे दिये गये उन्हें लेकर अपने साथी के पास वापिस लौट गई।

यह प्रणयकाल दस सप्ताह तक चला। साथी की आवश्यकता पूरी होने पर फिर अपने पुराने घर में उसका आना जाना आरम्भ हो गया पर यह सब अधिक दिन न चला क्योंकि पशु प्रकृति के अनुसार उसे प्रसव के लिए सघन झाड़ियों वाला एकान्त क्षेत्र ही अनुकूल पड़ता था। प्रसूतिग्रह वह बना ही रही थी कि सिंहनी ने उस पर बुरी तरह हमला कर दिया और कई जगह से घायल कर दिया। डेस्माण्ड उसकी खोज खबर बराबर रखते थे। घायल होने की बात जैसे ही पता चली वे स्टेचर पर लाद कर उसे घर लाये। जहाँ उसने दो बच्चों को जन्म दिया उनका पालन भी नाना ने उसी प्रकार किया जैसे कि अपनी वनबेटी ‘गारायाका’ का किया था।

उपरोक्त प्रयोग अफ्रीका की जायआडमसन के उस परीक्षण की शृंखला में आता है जिसमें उसने सिंहों और चीतों को खुले वातावरण में पाल कर संसार को यह बताया कि स्नेह और विश्वास की शक्ति अपरिमित है उन्हें ठीक उसी प्रकार प्रयोग किया जा सके तो बर्बरता को सौजन्य के प्रमुख नत मस्तक ही होना पड़ेगा।

ऐसा ही एक प्रयोग माइकेला का है जिसने हिंसक पशुओं को स्नेहिल प्रकृति का बनाने के प्रयोग किये और उसमें आश्चर्यजनक सफलता पाई।

अमेरिकन युवती माइकेला ने अविवाहित रहने का निश्चय किया था ताकि वह स्वच्छन्दता पूर्वक संसार के बन प्रदेशों और वनजीवों की समीपता का आनन्द ले सके। उसे वनजीवों से बहुत प्यार था, जिनमें बहुत जाति के कुत्ते, बिल्लियाँ, लोमड़ी, नेवले, तोते, बन्दर, चूहे, खरगोश, साँप, गिरगिट आदि सम्मिलित थे। आगे इस दिशा में बहुत कुछ देखने करने की आकांक्षा संजों रखी थी और यथासंभव प्रकृति के पुत्रों के सान्निध्य में रहने में वह अधिक समय लगाती भी थी।

उसे आशा नहीं थी कि इस सनक में कोई पुरुष साथी भी उसे मिल सकता है। पर भाग्य ने सहारा दिया तो वह भी मिल गया। न्यूयार्क में एक भोज में सम्मिलित हो गई तो ठीक ऐसी ही प्रकृति का युवक मिल गया नाम था आर्मान्ड डेनिस। दोनों में घनिष्ठता बढ़ी और वह इस समाधान के साथ चरम परिणति पर पहुँची कि दोनों विवाह तो करेंगे किन्तु बच्चे पैदा नहीं करेंगे। उनका विवाह वस्तुतः प्रकृति निरीक्षण के अनोखे आनन्द को दो साथियों द्वारा मिल कर अधिक हर्षोल्लास युक्त बनाने का एक उद्देश्यपूर्ण समझौता मात्र था। विवाह के बाद दोनों ने और भी अधिक उत्साह के साथ अपना शौक बढ़ाया। अंग्रेज के प्रसिद्ध फिल्म किंग सालोमनड् माइन्स में जिस चालाक लोमड़ी ने तरह-तरह के करतब दिखाये थे वह वस्तुतः डेनिस दम्पत्ति की ही पालतू थी।

इस परिवार का एक जोरदार सदस्य था अफ्रीकी तेंदुआ। जिसका नाम उन्होंने तुशुर्द रखा। यो साधारण लोग उसे चीता ही कहते थे क्योंकि आमतौर से लोग यह फर्क नहीं जानते कि चीते के मुँह पर लम्बी धारियाँ होती है, उसके बाल बड़े और कड़े होते हैं जब कि तेंदुआ के मुँह पर चित्तियाँ होती हैं और बाल मखमल जैसे मुलायम। तुशुर्द छोटा बच्चा ही मिला था। जिस प्यार और वातावरण में उसे पाला गया उसमें वह इस प्रकार ढल गया मानो कोई पालतू कुत्ता ही हो। माइकेला के पीछे वह अक्सर दुम हिलाते हुए घूमते ही देखा जाता। उछल कर अपनी मालकिन की गोद में जो बैठना उसे बहुत भाता था कभी -कभी मस्ती के जोश में आता तो उसके हाथ पैर चबाने का उपक्रम करने लगता पर क्या मजाल दाँत या पंजे की कोई खरोंच तक किसी अंग में लग जाय। उसके प्यार भरे व्यवहार ने साथ में पले हुए अन्य प्राणियों को पूर्णतया निर्भर बना दिया था, जब भी उन्हें अवसर मिलता दूर तुशुर्द कं साथ खेलने का ऐसा आनन्द लेते मानो वे एक ही जाति बिरादरी के परस्पर भाई बहिन हो।

तेंदुए पालने में सफलता प्राप्त कर लेने के उपरान्त माइकेला ने दो चीते के बच्चे पाले। चीते अपेक्षाकृत अधिक दुष्ट होते हैं जहाँ उनमें 60 मील प्रति घंटा की चाल से दौड़ सकने की क्षमता होती है वहां उनकी धूर्तता भी कम नहीं होती। शिकार को पकड़ने में उनकी स्फूर्ति जितना काम करती है इससे ज्यादा उनकी वह बुद्धि काम करती है जिसकी सूझ-बूझ शिकार को धोखे में डालकर गफलत का लाभ उठाने में आश्चर्यजनक काम करती है। चीते के बच्चे पालने में उसे रेमंड हुक नामक व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ी जो हिन्दुस्तान में राजाओं के यहाँ रहकर चीते पालने की विद्या सीख चुका था।

इन चीते के बच्चों का नाम रखा गया लुनी और मुनी। यो वे पल गये और तुशुर्द की तरह जंजीर में बँध कर खुली जगह में घूमने के अभ्यासी भी हो गये।

झालड रियासत से सम्बद्ध श्री बद्रीप्रसाद जायसबाल को शिकार खेलते समय एक दो महीने का चीते का बच्चा मिल गया, उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक पाला। जंजीर से बाँधे रखना पर्याप्त था, उसे पिंजड़े में बंद करने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। जंजीर में बाँधकर नदी स्नान कराने एवं गाड़ी में बिठा कर जायसबाल उसे बाहर ले जाया करते और इस सैर सपाटे में वह प्रसन्न भी खूब होता। पीछे पालक को अपनी कठिनाइयों के कारण उसे चिड़िया घर भेजना पड़ा। वहां वे जब कभी उसे देखने जाते तब प्रसन्नता प्रकट करता और कूँ कूँ करते हुए पास आने और चाटने का प्रयत्न करता।

यह प्रयोग हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाते हैं कि हिंसा का आतंक कितना ही बड़ा क्यों न हो वह स्नेह और सद्भाव की प्रचण्ड शक्ति के आगे नत मस्तक होकर ही रहेगा।


Quotation

“तू किसी को मत मार, तू मेरे समीप पवित्र मनुष्य हो कर रह। जंगलों के प्राणियों का वध करके उन का माँस मत खा।” -ईसा


च्युअंगत्सी (kahani)

चीन का दार्शनिक च्युअंगत्सी तालाब के किनारे बैठा मछलियाँ पकड़ रहा था।

राज्यमंत्री ने उनकी कीर्ति सुनी और मिलने आये थे। उनने कहा यह छोटा काम छोड़िये। हमारे साथ चलिए। ऊँचा सरकारी पद मिलेगा। च्युअंगत्सी ने तीन हजार वर्ष पुराने एक राजा की कथा सुनाई जिसकी समाधि में सोने की डिब्बी में रख कर एक पवित्र केकड़ा गाढ़ा गया था। मंत्री ने वह कथा सुनी थी। सो बोला- बेचारे अभागे केकड़े ने सोने की डिब्बी में बंद होकर क्या पाया? अच्छा था वह पानी में ही पूछ हिलाता रहता और वहाँ सुख चैन से मरता जीता। च्युअंगत्सी खिल-खिलाकर हँस पड़े और बोले क्या आप मुझे उस केकड़े से भी अधिक अभागा बनाना चाहते हैं।


नेता नहीं सृजेता चाहिये

समय की माँग आन्दोलनकारी नेताओं की नहीं, ऐसे लोक शिक्षकों की है जो जनमानस में जागरण का आलोक उत्पन्न करने का अनवरत प्रयत्न करने में अथक रूप से लगे रहे। आन्दोलनों के आवेश विक्षोभ पैदा करते हैं। आक्रोश में तोड़-फोड़ ही हो सकती है। सृजन संभव नहीं। सृजन के लिए सघन अध्यवसाय चाहिए।

निश्चित रूप से ध्वंस सरल होता है और सृजन कठिन है। निर्माण में बुद्धि कौशल की- नैष्ठिक श्रमशीलता की और प्रयत्नपूर्वक जुटाये जा सकने वाले साधनों की आवश्यकता पड़ती है। सृजन तो सृजन के ढंग से ही होगा, उसे कुशल शिल्पी अपने कठिन श्रम और तादात्म्य मनोयोग से ही पूरा कर सकते हैं। सो भी तब तक उनका धैर्य और साहस भी लगन के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहे।

आन्दोलनकारी जन चर्चा का विषय बनता है- स्टेज पर उछल कूद कर वह अपनी विशिष्टता की छाप दूसरों पर छोड़ता है। जन संपर्क से कतिपय परोक्ष लाभ उठाता है। जीभ की कसरत और दिमागी सूझ-बूझ का अभ्यास होने से थोड़ा सा समय देकर सस्ती नेतागिरी कोई भी अर्जित कर सकता है। अपने को लोक हितैषी सिद्ध करने के लिए लोगों को किसी भी सामने प्रस्तुत कठिनाई का दोष किसी दूसरे पर मढ़ कर सहज ही भड़काया जा सकता है और भीड़ को संघर्ष रत किया जा सकता है। कल परसों तक का अविज्ञात व्यक्ति किसी तोड़-फोड़ के आक्रोश भड़काने में सफलता प्राप्त करके आज का धुँआधार नेता बन सकता है। इस नेता उत्पादन ने देश का जनमानस और जनजीवन अशान्त, अव्यवस्थित और दिग्भ्रान्त करके रख दिया है। नेताओं की वृद्धि अब अपराधी तत्वों की वृद्धि की तरह एक संकट भरी समस्या बन कर सामने आ रही है।

इसलिए समय की पुकार है कि नेता नहीं सृजेता चाहिये। ऐसे निस्वार्थ सेवा परायण जो यश लोलुपता से दूर रह कर जन-जागरण का- व्यक्ति निर्माण का- कार्य पूर्ण श्रद्धा और तत्परता के साथ करते रह सके। जो भाषण से नहीं वरन् अपने चरित्र से दूसरों को उसी उत्कृष्टता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा दे सके। लोक शिक्षण को सघन संपर्क और ममता भरी सद्भावना की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य वही कर सकता है जिसने हृदय को दूसरों के साथ जोड़ देने वाली आत्मीयता उत्पन्न कर ली है। यह श्रम साध्य, समय साध्य कार्य है। उत्कर्ष की शिक्षा देने का अधिकारी वही होता है जो अपना उत्कर्ष करने का मंजिल पर काफी दूर तक आगे बढ़ सकने की- तप साधना कर सकने की- अग्नि परीक्षा उत्तीर्ण कर ले।

ध्वंस पहले ही बहुत हो चुका उसमें नेताशाही तोड़-फोड़ की एक कड़ी और जोड़ देने से कुछ बनेगा नहीं बिगड़ेगा ही। बनता तो सृजन से ही है। सृजन शक्ति का मर्म समझने वाले और उस पर अगाध विश्वास लेकर त्याग बलिदान के आदर्श प्रस्तुत करते हुए अग्रसर होने वाले मानवता के शिल्पी ही आज चाहिए। समय सृजेताओं की माँग कर रहा है।


हम बिच्छू की तरह अपनी मातृसत्ता को समाप्त न करें

पृथ्वी की भी स्वाभाविक मृत्यु अन्य ग्रह नक्षत्रों के समान अपने नियत क्रम और नियत समय पर हो सकती है। पर लगता है उसके बच्चे अपनी माँ को समय से पहले ही मार डालने के लिए आतुर हो रहे हैं। बिच्छुओं में ऐसा ही होता है उसके बच्चे ही माता के पेट को खा-पीकर साफ कर देते हैं। लगता है मनुष्य भी धरती को जल्दी ही मौत के मुँह में जल्दी से जल्दी धकेल देने के लिए आतुर हो रहा है। इस संदर्भ में उसे बिच्छू बच्चों जितना भी लाभ नहीं मिलने वाला है। माँ को खाकर बिच्छू बच्चे जीवित बने रहते हैं। पर मनुष्य का दुर्भाग्य इतने तक भी सीमित नहीं रहने देगा, धरती का अन्त होने के साथ-साथ मनुष्य को भी अपना अस्तित्व गँवाना पड़ेगा। इस स्थिति को मनुष्य जाति का महामरण भी कहा जा सकेगा।

परमाणु विस्फोट, कारखाने, द्रुतगामी वाहन, जंगलों को काटना, घास वाले क्षेत्र का घटना यह सारे उपद्रव इन दिनों लाभदायक समझे जाते हैं और उत्साहपूर्वक लोग इन प्रयासों में जुटे है। विभिन्न प्रयोजन के लिए अग्नि जलने की- और उसमें जीवाश्म युक्त ईंधन झोंके जाने की गति निरन्तर तीव्र होती जा रही है। फलस्वरूप तथा कथित वैज्ञानिक प्रगति से पहले वाले कुछ समय पूर्व के और अब के वायुमण्डल में 15 प्रतिशत कार्बनडाइ गैस तथा 15 प्रतिशत आक्सीजन घटने का अन्तर पड़ गया। अर्थात् 30 प्रतिशत अशुद्धता बढ़ गई। अशुद्धता की यह बढ़ोत्तरी उसी क्रम से चलती रही तो फिर हम अपनी धरती को ही शुक्र या मंगल की स्थिति में चली जाने के लिए विवश कर देंगे।

स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के अन्तरिक्ष विज्ञानी वान. आर. एश्लेमन ने पृथ्वी के वायुमण्डल में इन दिनों बढ़ रहे असंतुलन पर चिन्ता व्यक्त की। पिछले सौ वर्षों से लकड़ी कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन को बहुत बड़े परिमाण में जलाया जा रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि वायुमण्डल में लगभग 15 प्रतिशत कार्बनडाइ गैस की मात्रा बढ़ गई है। इसके अतिरिक्त जीवाणुओं की संख्या घट जाने से उनके द्वारा उत्पन्न की जाने वाली आक्सीजन की उत्पत्ति लगभग उतनी ही अर्थात् 15 प्रतिशत ओर घट गई। यह दोहरी हानि अपनी धरती के लिए भावी संकट के लिए बढ़ती आ रही विभीषिकाओं की पूर्व चेतावनी है।

मनुष्य का प्रधान आहार ‘आक्सीजन’ है। अन्न, जल की अपेक्षा अनेक गुनी ‘आक्सीजन’ वह साँस द्वारा ग्रहण करता है। जीवन की आधारशिला यह प्राणवायु ही है। अन्न जल के बिना कुछ समय गुजर बसर हो सकती है पर शुद्ध वायु के बिना क्षण भर भी गुजारा नहीं। मनुष्य सब से अधिक खपत आक्सीजन की ही करता है। दुर्भाग्यवश हम जंगलों का सफाया करके उनके स्थान पर बड़े शहर तथा कल कारखाने खड़े करते चले आ रहे हैं। एक ओर तो वृक्ष वनस्पति कटने से आक्सीजन का उत्पादन कम होता है, दूसरी ओर कल-कारखाने तथा तेल वाहन अपने धुँऐ से कार्बनडाइ गैस की मात्रा बढ़ाते हैं। आक्सीजन का घटना और कार्बनडाइ गैस का बढ़ना न केवल मानव प्राणी के लिए वरन् भूमंडल की वर्तमान स्थिति के लिए भी संकट उत्पन्न करेगा।

जीवों और वनस्पतियों की उपस्थिति पृथ्वी के वर्तमान वातावरण को रासायनिक रूप से संतुलित बनाये हुए है। यदि यह संतुलन नष्ट हो जाय तो फिर अपनी धरती भी अन्य ग्रह नक्षत्रों से अत्यधिक ठण्डी या गर्म होकर वैसी ही निर्जीव हो जायेगी।

पृथ्वी, शुक्र तथा मंगल इन तीनों ग्रहों की रचना एक ही समय एक ही मूल-भूत पदार्थ से हुई है। आरम्भ में हाइड्रोजन और हीलियम का उनमें समान बाहुल्य था किन्तु शुक्र और मंगल के वायुमण्डल में उपयोगी तत्व स्थिर न रह सके। वे अन्तरिक्ष में उड़ गये। धरती के इन दो सहोदरों की स्थिति मृतप्राय हो गई।

अब शुक्र और मंगल के वायुमंडलों में कार्बनडाइ आक्साइड गैस का बाहुल्य है। उनमें नाइट्रोजन की मात्रा 20 प्रतिशत से भी कम है मंगल के वायुमंडल का घनत्व पृथ्वी की तुलना में प्रायः सौ गुना कम है और शुक्र के धरातल की वायु गरम पतले द्रव रूप में है। जिसका घनत्व पानी से दस गुना कम है।

मंगल के वायुमंडल में कार्बनडाइ गैस का सघन आवरण नहीं है इसलिए सूर्य से मिलने वाली गर्मी वहाँ ठहरती नहीं और आकाश में उड़ जाती है। अस्तु वहाँ अत्यधिक ठंडक है।

शुक्र पर कार्बनडाइ गैस का घना तथा ऊँचा आवरण है। सूर्य से जो गर्मी शुक्र के धरातल पर पहुँचती है उसे वह वायुमंडल वहाँ रोक लेता है और वापिस अन्तरिक्ष में नहीं लौटने देता अस्तु वहाँ गर्मी बढ़ती ही जाती है। शुक्र और मंगल के वायुमंडल ने ही उन्हें अधिक गर्म या अधिक ठंडा बना कर निर्जीव परिस्थितियों में ला पटका है।

पृथ्वी की स्थिति इन दोनों से भिन्न है। यहाँ सूर्य की गर्मी को उचित मात्रा में ग्रहण करने की और शेष को अन्तरिक्ष में वापस लौटा देने की क्षमता है। इसी से यहाँ शीत-ताप का संतुलन बना हुआ है और प्राणियों के जन्मते बढ़ते रहने की परिस्थितियाँ बनी हुई है।

अपने वायुमंडल को सन्तुलित बनाये रहने में जीवाणुओं का भारी योगदान है। अपनी धरती के इर्द-गिर्द जितना निर्जीव पदार्थ भरा पड़ा है उसकी तुलना में प्रायः एक करोड़ गुना जीवाणु पदार्थ है। यदि जीवाणु सत्ता घटने लगे तो वायुमंडल में आक्सीजन की तथा अन्य पदार्थों की मात्रा घट जायेगी। सघनता बढ़ी तो गर्मी बढ़ेगी और झीनापन आया तो शीत का आधिपत्य जम जायेगा वायुमंडल के वर्तमान संतुलन का बिगड़ना भविष्य में पृथ्वी को भी शुक्र और मंगल की स्थिति में ही धकेल देगा, तब यहाँ जीवधारियों के अस्तित्व की सम्भावना न रह जायेगी।

वायुमंडल की जीवनोपयोगी स्थिति कायम रहे इस के लिए यह आवश्यक है कि दृश्य और अदृश्य जीवसत्ता का अस्तित्व स्थिर रहे। इससे पृथ्वी पर न केवल गर्मी बढ़ेगी वरन् कार्बनडाइ गैस बढ़ जाने से प्राणियों का जीवन कठिन हो जायेगा। आक्सीजन के अभाव में वे क्रमशः दुर्बल, सुस्त अविकसित और अल्पजीवी होते चले जायेंगे। यही विपत्ति अन्तरिक्ष में -और भूतल पर विचरण कर रहे आँख से न दीख पड़ने वाले जीवाणुओं की होगी। आखिर गैसीय आहार तो उन्हें भी चाहिए। दमघोटू परिस्थितियों में तो न केवल जीवधारी ही समाप्त होगे वरन् जीवसत्ता भी अपना अस्तित्व गँवाती चली जायेगी।

बुद्धिमान समझा जाने वाला मनुष्य आज प्रगति शीलता के नशे में मन्दमति हो रहा है उसे तत्काल अधिकाधिक साधन सुविधायें प्राप्त करने की धुन है। इस सनक में वह भावी जीवन-मरण की सम्भावनाओं को एक प्रकार से उपेक्षित ही करता चला जा रहा है। किन्तु वह दिन दूर नहीं जब यह तथाकथित प्रगतिशीलता बहुत महँगी पड़ेगी।

वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक उन्नति के नाम पर हम जो कुछ कर रहे है देखना चाहिए कि वह बालकों जैसी एकांगी आतुरता तो नहीं है विशेषतया तब तो इस अन्धी दौड़ को और भी अधिक गम्भीरता के साथ परखा जाना चाहिए जब कि इस भूतल के लिए और समस्त मानवजाति के लिये ही संकट उत्पन्न कर रही हो। सामूहिक रूप से संपन्नता के अत्युत्साह के कारण समस्त संसार के लिए संकट उत्पन्न हो रहा है और व्यक्तिगत जीवन में उसी रीति-नीति को अपनाकर व्यक्तित्व के स्वस्थ विकास की सम्भावनाओं को धूमिल किया जा रहा है। अच्छा हो समय रहते हम अपनी इस अविवेकशीलता से कदम पीछे हटा ले।


हमारी प्रगति का अन्त महामरण में होगा

कोई जमाना था जब युद्ध में भी नीति अनीति का ध्यान रखा जाता था। बिना हथियार वाले पर भागते पर- स्त्री, बच्चों , बूढ़ों ओर रोगियों पर हमला नहीं किया जाता था। खेतों, व्यापार और वस्तुओं को नुकसान नहीं पहुँचाया जाता था। सतीत्व को छेड़ा नहीं जाता था। रात्रि में युद्ध नहीं किया जाता था। चेतावनी देने- हथियार थामने का अवसर देने पर जो लड़ने के लिए सामने आये उसी से युद्ध नीति के आधार पर लड़ाई होती थी। लड़ने के इच्छुक योद्धा आपस में लड़ते थे। जो लड़ने के अयोग्य है उस पर आक्रमण करना तो कायरता पूर्ण हत्या ही गिनी जाती थी। युद्ध -क्षेत्र में योद्धा उतरते थे हत्यारे नहीं।

कत्लेआम का रणनीति में समावेश होना बर्बरता के युग में प्रवेश करना है। यो नादिरशाह, औरंगजेब, चंगेजखान द्वारा इस नीति का आरम्भ कर दिया गया था। किसी देश पर हमला करके वहाँ के निर्दोष नागरिकों को गाजर-मूली की तरह कत्ल करना कृषि, सम्पत्ति और कल-कारखाने नष्ट करना, लूट खसोट में जो भी मिले उसे झपटना , युवा स्त्रियो की वासना पूर्ति के लिए और तरुणों को पशुओं की तरह गुलाम बनाने के लिए पकड़ना एक सामान्य बात हो गई। बर्बरता का कोई पक्ष ऐसा नहीं रहा, जिसे युद्ध कौशल में सम्मिलित न कर लिया गया हो। दोषी निर्दोष में वध्यः अवध्यः में कोई अन्तर होता है, इस तथ्य को भुला कर जो लड़ाइयाँ लड़ी जाती है उन्हें बर्बर हत्याकांड के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा।

यो पिछले दिनों रूस और अमेरिका के बीच एक रक्षा संधि हुई है जिसमें दोनों देशों में अधिक लम्बे दूर मारक और घातक विस्फोटकों की संख्या घटाने पर सहमति प्रकट की है पर वह एक चाल मात्र है। स्थान घिरने और गिनती कम होने पर भर की सुविधा मिलेगी उससे संहारक शक्ति में कोई कटौती नहीं आने वाली है। अमेरिका के डिफैन्स सेक्रेटरी मेल्विन लायर्ड ने कहा- समझौता व्यर्थ है हमें जिन्दा रहना है तो पनडुब्बियों से फेंकी जाने वाली दूर मारक मिसाइलें बनानी ही होगी, नहीं तो रूस हमें खा जायेगा। अखबारों ने समझौते का मजाक उड़ाते हुए कहा इससे हमें आणविक सर्वोच्चता की नीति को आणविक न आत्मनिर्भरता कहने लगेंगे। अब अणु शस्त्रों की दौड़ क्वान्टिटी में न होकर क्वालिटी में होगी।

विश्व के हर नागरिक स्त्री-पुरुष-बच्चे के लिए 20 टन बारूद तैयार है। बच्चा पैदा होने पर उसकी आवाज जितनी देर में उसकी माँ के कानों में पहुँचती है उतनी देर में उस जैसे बीस की जीवन सत्ताओं का अन्त कर देने वाली अणुशक्ति आज के कारखानों में उत्पन्न हो जाती है। इसका विस्तृत विवरण ब्रिटिश कास्टिंग कारपोरेशन द्वारा बनाई गई वृत फिल्म दिडैथ गेय में दिखाया गया है।

सन 1999 में विश्व के 120 देशों की एक सर्वेक्षण समिति ने शस्त्रों पर संसार भर में होने वाले खर्चे का लेखा जोखा एकत्रित किया था तदनुसार संसार भर में जमा हुआ शस्त्रों का मूल्य सन 1967 तक 136500 करोड़ रुपयों पहुँच चुका था। इसके बाद अब तक जो उत्पादन हुआ तो उसे कम से कम दूना तो कहा ही जा सकता है।

सन 67 के आँकड़े बताते है- संसार के हर मनुष्य पीछे मारने वाली सामग्री 420 रुपया लागत की जमा हो चुकी है। संसार भर में 142 देश है उनमें से 28 देश ऐसे है जिनकी प्रति व्यक्ति पीछे औसत आय 420 से कम है। इनमें एक भारत भी शामिल है। अनुमान है कि यह व्यय इसी शताब्दी में 300000 करोड़ से ऊपर निकल जायेगा। यह राशि इतनी बड़ी होगी कि यदि सौ रुपये के नोटों की माला बनाई जाय तो वह धरती से चन्द्रमा तक की दूरी की साड़े सात वार परिवार कमा कर लेगी।

दरिद्रता मिटाने के लिए विश्व भर में जितना धन खर्च किया जाता है उसकी तुलना में शस्त्रों पर 20 गुना अधिक खर्च होता है। स्वास्थ्य पर खर्च होने वाली राशि से यह तीन गुना अधिक है। इस धन से दो करोड़ लोगों के निवास के लिए बढ़िया मकान बना कर दिये जा सकते हैं।

युद्ध में आदमी को मारने की लागत दिन-दिन महँगी होती चली जा रही है। जूलियस सीजर के जमाने में एक सैनिक मारने में सिर्फ 5 खर्च आते थे। नेपोलियन के जमाने में यह दो हजार तक हो गई थी। प्रथम युद्ध में अमेरिका ने एक व्यक्ति मारने पर डेढ़ लाख रुपया खर्च किया। दूसरे युद्ध में यह लागत दस गुनी बढ़ गई। अभी वियतनाम युद्ध में हर गोरिल्ला को मारने में 13 लाख रुपया खर्च का औसत आया है।

अमेरिका का प्रमुख उद्योग युद्ध सामग्री का उत्पादन है। द्वितीय युद्ध के बाद उसने 20 लाख रायफलों, 1 लाख मशीनगनें, 1 लाख लड़ाकू जहाज 20 हजार टैंक, 30 हजार प्रक्षेपणास्त्र 2500 पनडुब्बियों दूसरे देशों को बेची है। यह संख्या इस बीच दुगुनी हो गई हो तो कुछ भी अचम्भे की बात नहीं है। सन 71 में अमेरिका का युद्ध बजट 77.5 अरब रुपया था अब वह जल्दी ही 100 अरब वार्षिक सीमा तोड़ कर आगे बढ़ जायेगा।

तीर, तलवार, बन्दूक और तोपों का जमाना अब चला गया, उन साधनों से थोड़ी-थोड़ी संख्या में मनुष्य मरते थे और चलाने वाले के पराक्रम एवं कौशल की परीक्षा होती थी। अब तो एक दुर्बल बीमार के लिए भी यह संभव हो गया है कि वह समस्त सृष्टि का नामोनिशान मिटाकर रख दे। विशाल क्षेत्र को प्राण रहित बना दे। मिसाइल-एन्टीमिसाइल -बनते चले जा रहे हैं। इन पर लाद कर अणुबम संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक भेजा जा सकता है और प्रयोगशाला की कोठरी में बैठे हुए बटन दबाने मात्र से किसी भी क्षेत्र का सर्वनाश किया जा सकता है।

अमेरिका में अणु प्रहार कर सकने की सामर्थ्य वाले केन्द्रों की संख्या अब से कुछ वर्ष पूर्व 4300 थी। सन् 75 तक वह 11000 हो जायेगी। रूस में ऐसे केन्द्र तो 2000 ही है पर उनमें गुण परक श्रेष्ठता बढ़ाने के प्रयत्न तेजी से चल रहे हैं।

पिछले दिनों जितने अणु अस्त्र बने चुके थे उनसे इस सुन्दर पृथ्वी को 14 बार ध्वस्त किया जा सकता था। पर तब से अब तक तो वह क्षमता लगातार बढ़ती ही चली आ रही है। और अनुमान लगाया जाता है कि इन अणुओं से अपनी जैसी 50 धरती एक साथ चूर्ण विचूर्ण करके आकाश में धूलि की तरह उड़ाई जा सकती है। संसार में लगभग 4 अरब मनुष्य रहते हैं इनमें से प्रत्येक को मारने के लिये 10-10 टन बारूद का ढेर जमा करके रख लिया गया है।

बारूद के अतिरिक्त जितने भी जहरीले रसायन भी इतने बने है कि हवा या पानी में उन्हें मिला देने से भी प्राणि जगत का अस्तित्व धरती पर से मिटा देने का उद्देश्य सहज ही पूरा हो सकता है। अकेले ‘आटपुलिन्स’ रसायन का संचित भण्डार ही इस प्रयोजन को आसानी से पूरा कर सकता है।

इस बारूद के ढेर पर कभी भी छोटी सी गरमा-गरमी से चिंगारी लग सकती है। क्यूबा संकट के समय, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने दाँत पीसते हुए रूस से कहा था- “ क्यूबा से निकल जाओ वरना ............. रूस ने जवाब दिया था कि- यह अन्तिम अवसर होगा जब तुम अमेरिकी हमारे साथ ऐसा कर सकोगे।

लंदन की एक वैचारिक विचार गोष्ठी में अणु विशेषज्ञ प्रो. बैरी कामनर ने कहा था - टेक्नोलॉजी द्वारा प्रकृति के साथ असामान्य छेड़-छाड़ करने का वर्तमान क्रम यदि इसी तरह जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब यह धरती मनुष्यों के रहने योग्य ही नहीं रहेगी। प्रकृति आज हमारी रक्षक है पर संतुलन बिगड़ जाने पर वह हमारी भक्षक बन जाएगी। प्रकृति की खोज करना और उसके रहस्यों से लाभान्वित होना तो ठीक है पर इससे पहले हमें यह निश्चित करना चाहिए कि संतुलन बिगाड़ने की सीमा तक छेड़खानी नहीं की जायेगी। अविवेक पूर्ण ढंग से हवा पानी और मिट्टी को बिगाड़ते चले जाना, इस धरती पर रहने वाले समस्त प्राणियों का जीवन संकट में डालना है।

17 जनवरी 1965 की बात है। एक अमरीकी बमवर्षक स्पेन के आकाश में 32 हजार ऊँचाई पर उड़ रहा था। उस पर चार हाइड्रोजन बम लदे थे। दुर्भाग्यवश वह सामने से आते एक दूसरे वायुयान से टकरा गया। फलतः दोनों विमान नष्ट हो गये और उनके सात कर्मचारी मारे गये। जहाजों का मलबा एक छोटे से गाँव पालोमरेस के इर्द-गिर्द छितरा गया। तीन हाइड्रोजन बम भी वही गिरे। उनमें से एक तो साबित रहा पर दो में दरारें पड़ गई। दूसरे बम से प्लेटोनियम की रेडियो धर्मी धूल निकली और आस-पास के क्षेत्र पर छा गई। तीसरे की दरार में से प्लेटोनियम की जहरीली गैस निकल कर हवा में फैलने लगी।

इस दुर्घटना के समाचार से सारे योरोप और अमेरिका में हलचल मच गई। अमेरिका के अणुशक्ति आयोग के वैज्ञानिक और इंजीनियर स्पेन दौड़े उन्होंने रेडियो धर्मी प्रभाव से प्रभावित 385 एकड़ भूमि की सारी जमीन को गहराई तक खोदा और 16000 टन भूमि को वहाँ से हटाया। चौथा बम कहाँ गया? लगातार खोज करने के बाद 80 दिन उपरान्त पता चला कि वह स्पेन तट से पाँच मील दूर समुद्र के अन्दर 2500 फुट गहराई पर डूबा पड़ा है। तब कही लोगों के जान में जान आई।

चौथा हाइड्रोजन बम 1500 पौण्ड भारी बारह फीट लम्बा था। उसमें हिरोशिमा पर गिराये गये बम से 5000 गुनी अधिक शक्ति थी। इसे बाहर निकालने में 3600 टैक्नीशियन और 18 जहाज लगे। समुद्र तल में फँसे हुए इस बम को निकलना इतना जटिल था कि अमेरिका का कुशल तम टैक्नीशियनों को मुहिम सभा लेनी पड़ी। इस बीच दो सौ जहाज दिन-रात आकाश का पहरा देते रहे। भय था कि वह बम कही रूसियों के हाथ न लग जाय। फटने पर दूर-दूर तक समुद्र रेडियो धर्मी हो सकता था और उधर से गुजरना असंभव बन सकता था।

यह अन्तर्राष्ट्रीय ऐसी घटना थी जिसे छिपाया नहीं जा सकता है। ऐसी ढेरों घटनाएँ है जिन्हें छिपा लिया गया है। फिर भी उनमें से कुछ ऐसी रही है जो किसी प्रकार प्रकाश में आ गई। एक बार दक्षिण कैरोलिना राज्य के आकाश पर उड़ते हुए हाइड्रोजन बम वाले जहाज में कुछ खराबी आई फलतः एक बम निकल कर जमीन पर गिरा और फूट गया। अधिकृत रूप से यह स्वीकार किया गया कि जार्जिया और उत्तर कैरोलिना दो बिना फटे बम कही गिर कर खो गये है, अनेक विमानों ने दुर्घटनाग्रस्त होने पर अपनी अणु सामग्री समुद्रों में गिराई है इसका उल्लेख सरकारी गुप्त कागजों में मौजूद है। अनेकों घटनाएँ ऐसी है जिनका उल्लेख नहीं किया गया। जैसे एक अणु बम न्यू मैक्सिको राज्य के क्षेत्र में गिर पड़ा था उसकी चर्चा अधिकृत सूची में नहीं है।

केवल परमाणु परीक्षणों की ही बात पर विचार करे तो उसके खतरे भी कम नहीं आँके जा सकते हैं। अब तक जितने परीक्षण हो चुके है उनका दुष्परिणाम भी असंख्य लोगों को कितनी ही पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा। यदि अणु युद्ध नहीं भी हो किन्तु परीक्षणों का वर्तमान सिलसिला इसी क्रम से चलता रहे तो उससे सर्वनाश की विभीषिका बढ़ती ही चली जायेगी। परीक्षणों से निकलने वाले रेडियो सक्रिय तत्व मारक विष ही होते हैं। वे हवा, पानी और वनस्पतियों के सहारे शरीर में प्रवेश करते हैं और रक्तचाप, कैन्सर जैसे जटिल रोग उत्पन्न करते हैं। अणु विशेषज्ञ डा. रैल्कलाफ ने चेतावनी दी है कि मनुष्य में रेडियो सक्रियता की जितनी शक्ति है उसका उल्लंघन परीक्षण की वर्तमान शृंखला करती चली जा रही है। यह कदम न रुके तो हम सब बिना युद्ध के इस परीक्षण युद्ध के विनाश गर्त में गिर कर ही समाप्त हो जायेंगे। अनुमान है कि प्रत्येक अणु परीक्षण देर सवेर में 50 हजार मनुष्यों की अकाल मृत्यु का कारण बनता है। यो वह फैलती तो हजारों तक जायेगी और न्यूनाधिक मात्रा में उस क्षेत्र के निवासियों को भयानक रुग्णता में ग्रसित करेगी और वह संकट पीढ़ी-दर पीढ़ी चलेगा।

तृतीय महायुद्ध में परमाणु शक्ति का उपयोग होगा। इस दशा में दोनों पक्षों में से एक भी नहीं बचेगा। पूर्व व्यवस्था यह बन चुकी है कि आक्रमण होने के कुछ सेकेंडों के भीतर ही प्रत्याक्रमण करके प्रतिपक्षी का नाम निशान मिटा दिया जाय। तैयारियों को देखकर लगता है कि ऐसा महाविनाशक युद्ध कभी न कभी होकर रहेगा। संभव है इसके उपरान्त हजारों लाखों वर्ष बाद इस पृथ्वी को हरी-भरी होने का अवसर आये।तब उस पीढ़ी के लोग आत्मघाती लोगों की प्राचीन सभ्यता का पता लगाने के लिए उत्सुक होगे। उस उत्सुकता को दूर करने के लिए अमेरिका में एक ऐसा कैप्सूल जमीन के नीचे दबा दिया गया है जिसके द्वारा अपनी प्रगतिशील पीढ़ी की प्रगति का कुछ आभास उन लोगों को भी मिल सके।

न्यूयार्क विश्व मेले के अवसर पर धरती के नीचे 800 पौण्ड भारी एक टाइम कैप्सूल दफनाया गया है, इसमें इस समय मानवी सभ्यता एवं प्रगति को प्रायः सभी जानकारियाँ सूत्र रूप में संग्रह की गई है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका जैसी पुस्तकें तथा इस युग की परिस्थिति का परिचय देने वाले चित्र माइक्रो फिल्म बना कर संक्षिप्त किये गये है। कैप्सूल को 50 फुट गहरे गड्ढे में ऐसी व्यवस्था बना कर गाढ़ा गया है जिससे वह आगामी 5 हजार वर्ष तक सुरक्षित रह सके। यह मंजूषा 711 फीट लम्बी नली के रूप में है। उसकी अन्तः रचना क्रोमार्क कैप्सूल गिलास ऊन की गद्दी, जब अवरोधक अस्तर, पाइरेक्स शीशे का भीतरी, खोल, क्रोमार्क आई वोल्ट के क्रमबद्ध शृंखला संजों कर की गई है और ध्यान रखा गया है कि भूमि के अन्दर की नमी और गर्मी उसे प्रभावित न करने पाये। ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विश्व विख्यात 53 विद्वानों ने इस में भरी जाने वाली सामग्री की रूपरेखा तैयार की है।

इसी बड़े कैप्सूल का एक छोटा परिशिष्ट भी है जो 300 पौण्ड भारी तथा 811 इंच व्यास का है। इसका बाहरी खोल आधा इंच मोटा है। जो वस्तुएँ कम महत्व की है और बड़े कैप्सूल में नहीं समा सकी है वे इसमें रखी गई है। इन दोनों मंजूषाओं को पीटस वर्ग (पेन्सिल वेनिया) के वेस्टिंग हाउस कारपोरेशन ने तैयार किया है।

यह अच्छा ही है कि बुद्धिमान और प्रगतिशील कहा जाने वाला मानव अपनी बुद्धिमतां की कब्र भी स्वयं बना कर रखने का भी महत्वपूर्ण कार्य अपने हाथों से ही पूरा करले।


असमर्थता प्रकट करते हुए (kahani)

स्वामी रामतीर्थ सन्यास से पूर्व जिस मुहल्ले में रहते थे उसमें वैश्याएं भी रहती थी। मुहल्ले वालों ने सरकार को अर्जी दी कि इन वैश्याओं को यहाँ से हटाया जाय। अर्जी पर हस्ताक्षर करने के लिए रामतीर्थ से भी कहा गया।

उनने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहा- मैंने आज तक यहाँ कोई वैश्या नहीं देखी। हर घर में इधर तो मृदुल मनोहर बहने ही रहती हैं।


आकाश की तरह हमारी चेतना की उच्च परतें

भूतकाल में जो कुछ जाना या माना गया था उसे सच ही माना जाय यह आवश्यक नहीं। ज्ञान अनन्त है। सत्य असीम है। उसका एक अंश ही मनुष्य की सीमित बुद्धि के लिए जान सकना संभव है। प्रगति की क्रमबद्ध यात्रा पर चलते हुए हम सत्य के अधिक निकट पहुँचते जाते हैं। इसलिए हमें सत्य की हर नई किरण का स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। पूर्वाग्रहों पर अड़कर बैठ जाना और जो कहा जाता रहा है उसी को सच मानते रहना बुद्धिमतां का चिन्ह नहीं है।

कभी धरती को केन्द्र और अन्य ग्रह तारकों को उसकी परिक्रमा करता हुआ माना जाता था। आकाश को चादर की तरह चपटा माना जाता था पर अब वैसी मान्यता नहीं रही चन्द्रमा की गणना अब नव- ग्रहों में से हटा कर पृथ्वी के एक उपग्रह में कर दी गई है। सौर मंडल में तीन ग्रह और नये सम्मिलित हो गये है।

आकाश के बारे में अतीतकाल के लोग विभिन्न मान्यतायें रखते रहे है यूनानी लोगों की मान्यता थी कि बादलों में निवास करने वाले देवताओं का सारे आकाश पर राज्य है वह लोहे की तरह कड़ा है और धरती के कन्धों पर टिका है।

मैक्सिको वासी 22 आकाश मानते थे धरती से ऊपर 13 आकाश स्वर्ग है जिनमें से सिर्फ पहला ही आँखों से दीखता है। धरती के नीचे 9 आकाश है जो नरक है।

दक्षिण अमेरिका के रेड इण्डियन सात आकाश मानते हैं जिनमें से पाँच पृथ्वी के ऊपर दो नीचे है। वे इनके रंग भी भिन्न बताते हैं क्रमशः नीला, हरा, पीला, लाल, सुनहरा, बैंगनी और सफेद। इन सब के अधिपति अलग आकृति-प्रकृति के देवता लोग है।

आकाश यों तो एक और अनन्त है ऊँचाई के अनुपात में उसकी स्थिति में जो अन्तर पड़ता जाता है उसे ध्यान में रखते हुए गणनाकर्ताओं ने उसका भी परतों के हिसाब से विभाजन कर दिया है।

पृथ्वी के धरातल से लगभग 1000 मील ऊँचाई तक भारी हलकी हवा का अस्तित्व है। इस ऊँचाई को चार भागो में विभक्त किया गया है-

(1) ट्रोपोस्फीयर (क्षोभमंडल ) यह समुद्र सतह से 35 हजार फुट तक है। समस्त वायु का लगभग तीन चौथाई वजन इसी क्षेत्र में है। हमारे जीवनोपयोगी तत्व का अधिकाँश भाग इसी क्षेत्र में भरा पड़ा है। आसानी से साँस ले सकना 20 हजार फुट तक ही संभव है। इससे ऊपर उठना हो तो आक्सीजन का यास्कि चेहरे पर बाँध कर ही उड़ सकते हैं। इस ऊँचाई पर बर्फानी हवाएँ चलती है जिनके कारण मुँह और कान के अवयव तक काँपने लगते हैं और बोलना ही नहीं सुनना भी कठिन हो जाता है। बोलने, सुनने की कठिनाई तो इससे ऊपर भी बने रहेगी। ऊपर क्रमशः हवा पतली हो जाती है- जिसमें मुँह के लिए ध्वनि कम्पनों को छोड़ सकना कठिन है। बोलने का प्रयत्न करने पर सिर्फ गो गो सरीखी कुछ ऐसी आवाज निकलेगी जैसी कोई जीव जन्तु बोलते हैं।

(2) स्ट्रोटोस्फीयर (समतापमंडल) क्षोभमंडल की 35 हजार फुट ऊँचाई पार करने के उपरान्त स्ट्रोटोस्फीयर का क्षेत्र आरम्भ होता है जो धरती से 65 मील की ऊँचाई तक चला जाता है। 45 हजार फुट से ऊपर खुला शरीर नहीं जा सकता। इसके लिये एयरकन्डीशन जेट या बी- 36 किस्म का वायुयान चाहिए। यदि वहाँ कोई प्राणी खुला घूमे तो हवा का दबाव कम होने से उसकी नसें फट जायेगी। मस्तिष्क विक्षिप्त हो जाएगा। इस परिधि में ऐसे आवरण जोड़ना आवश्यक है जिनके कारण वायु का उतना ही दबाव बना रहे जितने का शरीर अभ्यस्त है। समुद्र की गहरी सतह में रहने वाले जल-जन्तुओं को यदि ऊपर ले आया जाय तो जल का दबाव कम हो जाने से वे गुब्बारे की तरह फट जायेंगे। उपरोक्त ऊँचाई पर कोई प्राणी यदि बिना आवरण होगा तो स्वभावतः वह भी गुब्बारे की तरह फट कर आकाश में छितरा जाएगा।

16 हजार मील की ऊँचाई पर ब्रह्माण्ड किरणों की वर्षा शुरू हो जाती है। वे इतनी घातक होती है कि देखते -देखते मृत्यु उपस्थित कर दे। अच्छाई यही है कि धरती तक पहुँच ही नहीं पाती ऊपर आकाश में अवरुद्ध होती है इससे ऊपर का आकाश ही इन्हें रोक लेता है इस परत पर तो छुट-पुट बूंदा–बांदी ही कर पाती है।

(3) ओजोनोफीयर (ओजोन मंडल) यह पृथ्वी से 20-25 मील ऊँचाई पर है। नीचे वाले आकाश की शून्य से 67 डिग्री नीचे की ठण्ड अचानक 170 डिग्री फारेन हीट गर्मी में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ गाढ़ी आक्सीजन है। जो सूर्य द्वारा फेंकी गई ब्रह्माण्ड किरणों और अल्ट्रावायलेट किरणों को रोक कर अपने में आत्मसात् कर लेती है। इसी किरणें सीखने की किया के कारण आक्सीजन इतनी गरम हो जाती है। चालीस मील ऊपर जाने पर कभी रात नहीं होती है।

(4) एक्साफीयर- यह अन्तिम आकाश अत्यन्त भयावह है। यहाँ घोर अन्धकार छाया रहता है। रंग बिरंगी रोशनियों के तूफान उठते हैं। पानी खोलने की गर्मी 212 डिग्री फारेनहाइट होती है पर यहाँ तो वह अंक 4000 डिग्री जा पहुँचता है। यह गर्मी कल्पनाशक्ति से बाहर की है। पृथ्वी के अयन मंडल की ऊपरी परत से सूर्य की ब्रह्माण्ड किरणों और अल्ट्रावायलेट किरणों के साथ घोर संघर्ष होता है। वे नीचे उतारना चाहती है। वायु की तरह उन्हें रोकती है।

इस परत की वायु इतनी पतली होती है कि तोप छोड़ने की आवाज भी निकटवर्ती को सुनाई न पड़ेगी। विदित है कि अनन्त आकाश में किन्हीं ग्रह नक्षत्रों के टूटे हुए खण्ड उल्काओं के रूप में उड़ते रहते हैं वे कभी-कभी घूमते घामते पृथ्वी के अयन मंडल में आ धंसते हैं इनकी चाल प्रायः 170000 मील प्रति घण्टा होती है। उनमें कोई तो मटर के दाने जितनी ही होती है कोई बहुत बड़ी। इनमें से जो बड़ी होती है उनका जलना तारे टूटने के रूप में हमें रात को दिखाई पड़ता है। कुछ उल्कायें बहुत बड़ी होती है और जलते भुनते अपना कुछ अंश धरती तक भी पहुँचा देती है वह टुकड़ा भी कई बार धरती से टकरा कर गहरा गड्ढा बना देता है।

स्पष्ट है कि आकाश के ऊँचे स्तर पर हवा हलकी और पतली पड़ती जाती है साथ ही सूर्य एवं अन्य ग्रहों का वह प्रभाव अधिक रूप से परिलक्षित होता है जो भूतल पर बहुत कम मात्रा में आ पाता है उसे तो मध्यवर्ती आच्छादन ही बीच में रोक लेते हैं।

मानवीय सत्ता भी अनन्त आकाश की तरह ही सुविस्तृत है। उसके ऊँचे परत क्रमशः धूल, धुँध और सघन भारीपन में प्रयुक्त होते जाते हैं। और अन्ततः वह स्तर आ जाता है जिसमें ब्रह्म के प्रकाश और प्रभाव को अधिक स्पष्टता पूर्वक समझा जा सके। नीचे स्तर पर रह रही अन्तः चेतना भारीपन और ओछेपन से ही लदी रहती है किन्तु जब भावनाओं की उच्च भूमिका में उठा जाता है तो क्रमशः हम अधिक उज्ज्वल एवं वशिष्ठ अनुभूतियों का रसास्वादन करते हैं। ऊँचा उठने वाले ही वह देखते और पाते हैं निम्न भूमिका में पड़े हुए लोगों के लिये वह आश्चर्यजनक ही है पर उपलब्ध कर सकना संभव नहीं।


मनुष्य शरीर की चमत्कारी विद्युत शक्ति

मनुष्य के शरीर में विद्युत शक्ति का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के आधार पर मस्तिष्कीय क्रियाकलाप, पाचन-तंत्र रक्ताभिषरण, आकुंचन , प्रकुञ्चन, मल विसर्जन निद्रा, जागरण आदि के विविध क्रियाकलापों का संचरण होता है। मन और बुद्धि की दौड़ में यही बिजली काम करती है। ओजस्, आत्मबल, मनोबल, साहस एवं प्रतिभा के रूप में इसी विद्युत शक्ति को विशिष्ट प्रयोजन पूरे करते हुए देखा जा सकता है।

साधारणतया मानवी शरीर में काम करने वाली बिजली चेतना स्तर की होती है। उसे प्राण कहते हैं। उसकी अपनी विशेषताएँ है। पर जिस तरह भौतिक बिजली झटका मारती है, चिनगारियाँ उत्पन्न करती है वैसा स्वरूप उसका नहीं होता। जड़-चेतन के अन्तर में इतना फर्क रहना तो स्वाभाविक भी है।

किन्तु कभी-कभी ऐसे प्रमाण भी सामने आते हैं जिनमें मनुष्य शरीर की बिजली- भौतिक बिजली की तरह काम करती देखी जाती है। झटका देने और चिनगारियाँ उत्पन्न करने का काम करते हुए भी कई बार मनुष्य शरीर पाये गये है। शरीर-विज्ञान के इतिहास में ऐसे अनेक विवरण उपलब्ध है, जिनसे सिद्ध होता है कि विशेष परिस्थितियों में शरीर की विद्युत शक्ति अपने सूक्ष्म स्वरूप में आगे बढ़कर स्थूल बिजली का भी रूप धारण कर लेती है और जिस प्रकार किसी शक्तिशाली बैटरी, मैगनेट या जनरेटर की समीपता से आघात का अनुभव होता है वैसे ही उन शरीरों का स्पर्श करने से भी अनुभव होता है। ऐसी घटनाएँ इतिहास में थोड़ी सी ही है पर है अवश्य।

सोसाइटी आफ फिजीकल रिसर्च की रिपोर्ट है कि केवल अमेरिका में ही 20 से अधिक बिजली आदमी है। शोधकर्ता कोलराडो निवासी डा. डब्ल्यू. पी. जोन्स के अपने सहयोगी डा. नार्मन लोग के साथ इस संदर्भ में लम्बी शोध की और इस नतीजे पर पहुँचे कि शरीर की कोशिकाओं के नाभिकों की बिजली उनके आवरण ढीले पड़ने के कारण बाहर फैलने लगती है तब उस शरीर के ऊपर परत पर बिजली का प्रवाह दौड़ने लगता है। वस्तुतः नाभिकों में अनन्त विद्युत शक्ति का भण्डार तो पहले से ही है।

शोधकर्ता जोन्स स्वयं ही एक विद्युत मानव ही थे, वे नंगे पैरों धरती पर चलकर भू-गर्भ की धातु खदानों का पता लगाने में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते रहे। धातुओं से बनी वस्तुएं अपने आप उचकने खिसकने लगती और सोते हुए बच्चे झटका लगने से डरकर चिल्लाने लगते। यह विद्युत प्रवाह उसके स्वयं के लिए और घर वालों के लिए एक समस्या बना रहा। दर्शकों और अन्वेषकों का कौतूहल अवश्य रहा।

अमेरिका के मोन्टाना राज्य के अंतर्गत मेडालिया नगर में जेनी मोरेन नामक लड़की के शरीर में ऐसी विद्युत शक्ति थी कि जो उसे छूता जोरदार झटके का अनुभव करता। अँधेरे में उसका शरीर स्पष्ट प्रकाशवान दिखाई पड़ता। अँधेरी रात में वह अपने शरीर से निकलने वाले प्रकाश के सहारे ही रास्ता तय कर लेती और उसके साथ वाले भी किसी जीवित लालटेन के साथ चलने का अनुभव करते।

अमेरिका में डेनी मोरेन नामक युवती चलता-फिरता बिजली घर थी। एक लड़के से उसने दोस्ती जमाने की कोशिश की तो युवक एन्थोनी एस्क्रम्पूर छूते ही झटका खाकर औंधे मुँह खाकर गिर पड़ा और बिजली के प्रवाह से उसकी अँगूठी में जड़ा हुआ चमकीला नग काला पड़ गया। इससे पूर्व उससे प्यार करने के चक्कर में एक बिल्ली अपनी जान गँवा चुकी थीं। उसके स्पर्श मात्र से 100 वाट का बल्ब जल उठता था। धातु से बनी वस्तुओं को वह छू नहीं पाती थी। जैसे ही ऐसी कोई वस्तु छूती उसके शरीर में चिपक जाती और फिर उसे छुड़ाना कठिन हो जाता। यह लड़की 30 वर्ष की आयु तक जी और एकान्त कमरे में उसने कैदी का जीवन बिताया। वह किसी दूसरे कमरे में घुसती तो बत्तियाँ अपने आप जलने लगती।

कनाडा के स्वास्थ्य इतिहास में ओण्टोरयो क्षेत्र के अंतर्गत बोण्डन की एक 17 वर्षीय लड़की का वर्णन है जिसके शरीर में से बिजली की धारा निकलती थी। जो भी उसे छूता झटका अनुभव करता। उसके कमरे में प्रवेश करने वाला व्यक्ति मस्तिष्कीय दृष्टि से अपने को अशक्त अनुभव करने और झपकी लेने लग जाता था।

मास्को निवासी कुमारी नेल्सा माइखेलोवा नामक रूसी महिला को ऐसी शक्ति प्राप्त है कि वह अपनी तीखी नजर का प्रयोग करके चलती हुई घड़ी की चाल रोक देती है- उसे तेज या मंद कर देती है। कम्पास की सुई को इधर-उधर कर देती है। इतना ही नहीं, मेज़ पर रखी वस्तुओं को वह बिना छुए इधर से उधर कर देती है।

रूस के प्रमुख समाचार पत्र ‘प्रावदा’ के संवाददाता ने नेल्सा से भेंट की तो उसने अपने चमत्कार दिखाये। कारण और रहस्य बताते हुए उसने इतना ही कहा- यह अत्यधिक एकाग्रता और इच्छा-शक्ति के प्रयोग का प्रतिफल है। उसके करतबों की फिल्म ली गई है, ताकि वैज्ञानिक उसका अध्ययन कर सके। वैज्ञानिकों ने इसे मस्तिष्कीय विद्युत की गुरुत्वाअकर्षण तथा इलेक्ट्रो मैगनेटिक शक्ति की विद्यमानता निरूपित किया है। इस संदर्भ में अधिक विचार करने वाले अन्वेषकों का कहना है कि इस प्रकार की विद्युत शक्ति मनुष्य के पास मौजूद है और वह नेल्सा की तरह देर तक अभ्यास करने के बाद उसे विकसित करने में सफलता प्राप्त कर सकता है।

फ्रांस के मेडिकल टाइम्स एण्ड गजट में एक ऐसे बच्चे की रिपोर्ट छपी थी, जिसके शरीर में झटका देने जितनी बिजली प्रवाहित होती थी। लियोन्स नगर में उत्पन्न हुआ यह बच्चा 10 महीने जिया, उसे इतने दिनों बहुत सावधानी से जिन्दा रखा जा सका। क्योंकि उसे छूते ही जमीन पर पटक देने वाला झटका लगता था। उसके स्पर्श में आने वाले सभी उपकरण लकड़ी, काँच आदि के थे और कपड़े रबड़ के पहनाये गये थे। जब वह मरा तो 10 सेकेंडों तक उसके शरीर से हल्की नीली प्रकाश किरणें निकलती देखी गई।

फ्राँस के जोलिया क्षेत्र में सोंदरवा कस्बे में जन्मे एक ऐसे बालक की रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग ने नोट की है, जिसके शरीर से बिजली की तरंगें उठती थी। जब वह मरने लगा तो डाक्टरों ने प्रकाश की तीव्र किरणें निकलती और अन्ततः मंद होकर समाप्त होते देखी थी।

आस्ट्रेलिया से एक बाईस वर्षीय युवक न्यूयार्क इलाज कराने के लिये लाया गया था। उसके शरीर की स्थिति बिजली की बैटरी जैसी थी। जब यह बिजली मंद पड़ जाती तो वह बेचैनी अनुभव करता। जिन चीजों में फास्फोरस अधिक होता उन मछली सोव आदि पदार्थों को ही वह रुचि पूर्वक खाता था, सामान्य लोगों का आहार तो वह मजबूरी में ही करता था।

कोलोराडो क्षेत्र के अंतर्गत लेडबिली निवासी डब्ल्यू. पी. जोन्स नामक व्यक्ति के शरीर में कुछ ऐसी विशेषता थी कि वह जमीन के नीचे की धातुओं को अपने शरीर में उत्पन्न होने वाली सनसनी के आधार पर पहचान लेता। भिन्न प्रकार की धातुओं के कारण उसके शरीर में भिन्न प्रकार की सनसनी होती थी। उस अनुभव के आधार पर वह यह बता देता था कि जहाँ वह खड़ा है, उसके नीचे अमुक धातु की खदान इतनी गहराई पर है। पहले तो उसके इस कथन का मजाक उड़ाया जाता रहा। पीछे जब उसकी बात खरी उतरी तो कई भू-स्वामियों ने उसकी सहायता से खदानें पाई, जिनमें सोने की खाने भी शामिल थी। जोन्स को इसमें हिस्सा मिला और उसने प्रसिद्धि के साथ साथ सम्पत्ति भी कमाई।

रूस के भौतिक शास्त्री प्रो. लाखसोव ने मनुष्य शरीर से निकलने वाले विद्युत स्फुल्लिंगों को टिमटिमाते दीपकों की तरह अपने विशेष यंत्र पर अंकित किया। वैसे खुली आँखों से इस प्रकार का प्रकाश दिखाई नहीं पड़ता, फिर भी उसका अस्तित्व होता है और मशीनों की सहायता से उसे देखा जा सकता है।

इस प्रकार की घटनाएँ अन्यान्य देशों में हुई होगी, पर वे शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों की जानकारी में न पहुँचने से अविज्ञात ही बनी रही होगी। कई बार उन्हें भूत-प्रेत या कोई रोग विशेष समझकर उपेक्षित कर दिया होगा। चूँकि इस प्रकार के प्रवाहों का घटना-बढ़ना उस व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि किसी व्यक्ति में यह शक्ति उभरी हो, किन्तु उसे विभिन्न परिस्थितियों में रहने के कारण उस विशेषता से वंचित रहना पड़ा हो।

दक्षिण पूर्व अमेरिका की नदियों में पाई जाने वाली ‘इल’ नामक मछली में डेढ़ सौ अश्व-शक्ति तक की बिजली पाई जाती है। यदि इसका ठीक तरह से उपयोग किया जा सके तो इतनी ताकत से एक अच्छा-खासा कारखाना चल सकता है। वह अपनी इस शक्ति को आवश्यकतानुसार घटा बढ़ा लेती है। इस शक्ति का उपयोग वह अपने शिकार पर या शत्रु पर आक्रमण करने के लिए करती है। ज वजह झटका खाकर मूर्च्छित हो जाता है तो इल उसे आसानी से उदरस्थ कर लेती है। इस प्रकार का अद्भुत शरीर विद्युत धारण किये हुए अन्य कितने ही पशु-पक्षी तथा छोटे कीड़े-मकोड़े पाये जाते हैं।

मानवी विद्युत झटका भले ही न मारती हो, पर उसकी चेतना युक्त प्रभावशाली शक्ति असाधारण होती है। किन्हीं-किन्हीं का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक और मोहक होता है, उनकी आँखें और मुखाकृति सहज ही दूसरों का मन अपनी ओर खींचती है। इसमें रंग- रूप की बनावट उतना कारण नहीं होती, जितनी कि व्यक्तित्व में से ओतप्रोत आकर्षण चुम्बकीय शक्ति।

शरीर में यह मानवी विद्युत आकर्षक व्यक्तित्व के रूप में देखी जाती है और मन क्षेत्र में उसका उभार, साहस, विवेक, संतुलन, मुस्कान आदि के गुणों के रूप में देखा जाता है। मनोबल, ओज, शौर्य के रूप में जब वह विकसित होता है तो समीपवर्ती लोगों पर गहरी छाप छोड़ती है। लोग उसका अनुगमन करने और आदेश मानने को बाध्य होते हैं।

शरीर, मन और अन्तः करण में काम करने वाली विद्युत शक्ति के अभिवर्धन और सदुपयोग का विधान प्रक्रिया का नाम ही योग-साधना है। विभिन्न प्रकार के तप-साधन इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं। प्राणवान व्यक्तियों के समीप रहकर उनके विद्युत प्रवाह का लाभ उसी प्रकार उठाया जा सकता है कि चन्दन वृक्ष के समीप उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी सुगन्धित युक्त होने का लाभ उठाते हैं। मौन, एकांत सेवन और ब्रह्मचर्य जैसी साधनाएँ इसलिए है कि वह विद्युत भण्डार निरर्थक कार्यों में खर्च न होकर संग्रहित रखा जा सके। महान व्यक्तित्वों का सान्निध्य सम्पर्क अपने आप में एक बड़ा लाभ है। बिना सत्संग और परामर्श के भी ऐसा सम्पर्क स्वल्प प्राण व्यक्तियों के लिये अमृत वर्षा जैसा अति महत्वपूर्ण अनुदान प्रस्तुत करता है। स्पष्ट है कि आग और बिजली के सम्पर्क में आने वाली वस्तुओं में यदि ग्रहण करने की शक्ति हो तो वे भी उसी स्तर की बन जाती है।

प्रयत्न करने पर यही चेतन चुम्बकत्व के - आत्मबल के रूप में विकसित हो सकता है और आगे चलकर योग साधना की सिद्धियों और देव अनुग्रह से मिलने वाली विभूतियों के रूप में सामने आता है। तपश्चर्या तितीक्षा और कष्टसाध्य साधना पथ पर दूर तक चल सकना, इस आत्मबल के सहारे ही सम्भव होता है। विकसित स्तर का यही आत्मतेज सूक्ष्म जगत में काम करने वाली दिव्य शक्तियों को खींच लाता है और उस व्यक्ति की हथेली पर लाकर रख देता है।


हल्कापन ही ऊँचाई और गहराई तक ले पहुँचता है.....

ऊपर उठने के लिये और ऊँचा उड़ने के लिये हल्कापन आवश्यक है। जो जितना भारी है, वह उतना ही असमर्थ रहेगा और महत्वपूर्ण उड़ाने उड़ने की प्रतियोगिता में अपने को अयोग्य पायेगा।

पक्षी इसलिए आकाश में उड़ पाते हैं कि उन्हें हल्केपन का वरदान मिला है। इसलिए वे उन्मुक्त आकाश में स्वच्छन्द विचरण कर सकते हैं और लम्बी उड़ाने भर सकते हैं। मनुष्यों पर भी यह सिद्धान्त लागू होता है कि उसने यदि परिवार के उत्तरदायित्वों का वजन न बढ़ाया हो तो छोटी गृहस्थी के हल्के उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए समुन्नत जीवन का निर्माण करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। पर यदि परिवार की संख्या बहुत बढ़ा ली होगी तो उन्हीं का निर्वाह साधन जुटाने में सारी शक्ति चुकती रहेगी और भार का दबाव ऊँचा उठ सकने योग्य कुछ पुरुषार्थ न करने देगा। जब समय और शक्ति बचेगी ही नहीं तो कुछ महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकने की बात ही कैसे बनेगी?

लोभ और मोह के भार जिसके मन को बोझिल किये हुए है उनके लिए रेंगते हुए दिन काटना ही शक्य है महानता के पथ पर चल सकने योग्य ऐसे व्यक्तियों के पास न उमंग होती है न उत्साह न साहस। कारण कि पहले से ही तृष्णा का पर्वत जितना भार उनके ऊपर लदा होता है। भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का वजन भी इतना अधिक होता है कि जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिये आवश्यक उड़ाने भर सकना उनके बस से बाहर की बात होती है। पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा का भार इतना भारी है कि पृथ्वी का वजन उठाने वाले शेषनाग का कचूमर निकल जाय। इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण विचारों से जिसने अपने को लाद लिया है वे भारवाही मनुष्य रोते कलपते किसी प्रकार मौत के दिन ही पूरे करते है। उत्थान और उत्कर्ष की बात न तो वे सोच पाते हैं और न वैसा कुछ करते उनसे बन पड़ता है।

इस दृष्टि से पक्षी सौभाग्यशाली है कि भगवान के उनकी संरचना हलकी रखी है, भारमुक्त रखा है। इसी देवी वरदान के कारण वे उन्मुक्त आकाश में स्वच्छन्द विचरते हैं और जीवन का आनन्द लेते हैं।

आकाश में उड़ने वाले पक्षी की कार्य क्षमता इस बात पर निर्भर है कि उसकी हड्डियाँ- शेष शरीर की तुलना में कितनी हलकी है। ऊँचे उड़ सकने और देर तक आसमान में मंडराते रहने पक्षियों के अस्थि पिंजर बहुत ही हलके होते हैं। कई बार तो हड्डियों का वजन पंखों से भी कम होता है। जिनकी हड्डियाँ भारी होती हैं वे अपने उड़ सकने की क्षमता गँवाते चले जाते हैं। मुर्गा जाति की हड्डियाँ भारी होते जाने की कठिनाई ने ही उन्हें उड़ने की क्षमता से वंचित कर दिया है। शुतुरमुर्ग जैसे-जैसे वजनी होता गया वैसे वैसे उसकी उड़नशीलता प्रायः पूरी तरह समाप्त हो गई। पक्षी एक तो यो ही हलके होते हैं, साथ ही उनके भीतर हवा भरी रखने की विशेष थैलियाँ भी होती हैं इन्हीं के कारण उन्हें उड़ सकने की क्षमता प्राप्त होती है।

हर प्राणी के लिए आकाश में उड़ना संभव नहीं हो सकता। इसके लिए शरीर में कुछ विशेष प्रकार की अनुकूलता होनी चाहिए भारी संरचना वाले शरीरों में यदि पर उग भी आवे तो भी उन्हें उड़ाने में सफलता प्राप्त करने में भारी कठिनाई अनुभव होगी। प्राणी जितना भारी होगा उसको आकाश में उड़ने के लिए उतना ही प्रबल उत्थापन बल- डाइनैमिक लिफ्ट चाहिए। इसके लिए उसी अनुपात से पंख अधिक बड़े और अधिक मजबूत होने चाहिए। फिर उन्हें चलाने के लिए वैसी ही सुदृढ़ और भारी माँसपेशियों की जरूरत पड़ेगी। इस चक्र को पूरा करने में प्राणी और भी अधिक भारी हो जायेगा, तब अधिक भार संवहन के लिए उस पंख उपजाने की प्रणाली में और भी अधिक जटिलता पैदा हो जाएगी। मनुष्य को यदि उड़ना ही हो तो उसे 140 फुट लम्बे पंख लगाने और उसी के अनुरूप शरीर में शक्ति उत्पादन की जरूरत पड़ेगी।

शुतुरमुर्ग जाति के सैकड़ों पक्षी उड़ने की क्षमता से मुक्त पंख होते हुए भी इसी लिए वंचित होते चले गये कि उनका अस्थियाँ, नाडी संस्थान, तथा माँस आवरण क्रमशः अधिक भारी होता चला गया।

पक्षी इसी लिए आकाश में उड़ सकते हैं कि उनका शरीर बहुत हलकी सामग्री से बना होता है। उनके पर ऐसी, कठोर चिकनी स्ट्रीम साइन्ड सतहों का निर्माण करते हैं जो वायु के दबाव को चीरती हुई अपने लिए रास्ता बना सके। पक्षियों की हड्डियाँ खोखली होती है, उनमें वायु भरी होती है जिससे इनका भार कम हो जाता है किन्तु मजबूती में कोई कमी नहीं आती।

बिलकुल ठोस पदार्थों की तुलना में उसी वजन के मुड़े हुए एवं ब्रेस्ड पदार्थों की मजबूती कही अधिक होती है। इमारतों में काम आने वाले लोहे के गार्डर पूरी तरह चौकोर ठोस न होकर नीचे ऊपर से चपटे और बीच में पतले होते हैं इससे उनकी मजबूती घटती नहीं बढ़ती है। पक्षियों की खोखली हड्डियाँ देखने समझने में कमजोर लग सकती है पर वस्तुतः वे अपेक्षाकृत अधिक ही मजबूत होती हैं। आघातों को सहने के लिए प्रकृति के इन हड्डियों के इधर-उधर सहायक पुस्ते भी लगा दिये है। चोंच की हड्डी सबसे मजबूत होती है वह वह भी वजन में हलकी होती है।

पक्षी पोले अण्डे देते हैं और घोंसलों में उन्हें सेते है। यदि उनका भ्रूण पेट में बढ़ता पलता तो फिर मादा के लिए उतना भार वहन करते हुए उड़ान भर सकना संभव नहीं रहता। अण्डे को भी पक्षी देर तक गर्भाशय में नहीं रखते। मुर्गी का अण्डा केवल 26 घण्टे ही माता के पेट में रह कर बाहर निकल आता है।

ऊँचा उठने और ऊपर उड़ने के लिए यह भी आवश्यक है कि उसे तीव्र दृष्टि प्राप्त हो। ऊपर उड़ने वाला ओछी दृष्टि का हो तो उड़ान का न तो आनन्द मिलेगा और न लाभ। दिव्यदृष्टि- दूरदर्शिता- के आधार पर ही प्रगतिशीलता- सम्पन्नता और विभूति सत्ता को किसी उपयोगी काम का बनाया जा सकता है। पक्षियों की तरह ऊँचा उठने वाले मनुष्यों को भी तीव्र दृष्टि का दूरदर्शिता का अभाव नहीं होता।

उड़ने वाले पक्षियों की आँखों में तीव्र दृष्टि न हो तो वे उड़ते हुए भूमि या वृक्षों पर मिल सकने वाले आहार जल निवास विश्राम आदि के साधन धुँधली दृष्टि होने पर देख ही नहीं सकेंगे और उनका जीवन जटिल हो जाएगा।

मनुष्य की आँखें सामने की ही वस्तु देख सकती है किन्तु अधिकाँश पक्षियों की आँखें इस तरह से बनी होती है कि वे अगल बगल से दो भिन्न प्रकार के दृश्य एक ही समय में एक साथ देख सके। कुछ तो पीछे की ओर भी देख सकते हैं।

पक्षियों की आँखों पर तीन पलक होते हैं। इससे पुतली की सुरक्षा होती है। बूँदें पड़ने पर चलती मोटर का ‘वाइपर’ जिस प्रकार शीशे को साफ करता है उसी प्रकार पुतली पर चढ़ा हुआ निचला पारदर्शी पलक आँख की सफाई और सुरक्षा करता रहता है। पक्षी की दूर दृष्टि अक्षुण्ण रहे इसके लिये यह व्यवस्था आवश्यक भी है। मनुष्य की आँख में सबसे अधिक संवेदनशील भाग- मैक्युलर एरिया में लगभग दो लाख कोशिकाएँ होती है किन्तु बाज़ की आँख की संवेदी गर्त फोवीन में कोशिकाओं की संख्या पन्द्रह लाख होती है। इसी अनुपात से उसकी दृष्टि भी साढ़े सात गुना अधिक होती है। यही बात अन्य पक्षियों के सम्बन्ध में भी है।

उड़ने में ही नहिं, पानी पर तैरने की सुविधा भी उन्हें इन हड्डियों के हल्केपन के कारण ही प्राप्त होती है। फुदकते हुए- उछल उछल कर जल्दी चल सकना भी हलकी हड्डियों वाले पक्षियों के लिए ही संभव होता है। शरीर का भारीपन, उड़ना, डुबकी लगाना तो दूर दुरित गति से दौड़ सकना भी संभव बना देती है। जलचरों की शरीर रचना में भी यही तथ्य काम करता है, माँस की तुलना में उनकी भी हड्डियाँ हलकी होती है। उनके भीतर का पोलापन और लचक के कारण ही जल जीवन संभव होता है। उनकी साँस लेने की प्रणाली भी ऐसी होती है जिसमें वे वायु दबाव में बच सके।

मनुष्य और पक्षियों की तुलना करते हुए गति की मंदता और तीव्रता का विश्लेषण माँस पेशियों की स्थिति पर भी निर्भर है। पक्षियों की अधिकाँश माँस पेशियाँ उनकी छाती में होती है जब कि मनुष्य शरीर का अधिकाँश माँस कमर से नीचे ही लदा रहता है।

चाहे ऊपर उठना हो चाहे गहराई में उतरना हो दोनों ही दिशाओं में महत्वपूर्ण प्रगति करने की आकांक्षा वालों को नभचरों और जलचरों की तरह हलका होना चाहिए। जिसका भौतिक भार जितना हलका होगा उसके लिए महती प्रगति का पक्ष उतना ही अधिक प्रशस्त रहेगा।


Quotation

जिस देश में आन्तरिक कलह उमड़ते हैं, वह गृह युद्ध से जर्जरित होकर इतना दुर्बल बन जाता है कि बाहरी शत्रुओं के मुकाबले पराजय की विपदा सहन करे। जिस व्यक्ति के भीतर अन्तर्द्वन्द्व भरे रहते हैं उसकी भीतरी उलझने ही आवश्यक शक्तियों को समाप्त कर देती है। बाह्य जीवन में कोई बड़ी सफलता पाना उनके लिए संभव ही नहीं रहता।

पक्षी जाल में अचानक ही नहीं फंस जाते। फंदे में पैर मजबूती से जकड़ जाने का कारण यह होता है कि तनिक भी फँसाव अनुभव करते ही बेतरह घबराते और फड़फड़ाते हैं पर उसी से फन्दा कड़ा हो जाता है और वे जान गँवा बैठते हैं। यदि पैर फँसते ही वे कठिनाई को समझ जाय और जो उँगली फँसी है उसे धीरे से निकालते तो जाल में फँसने वालों में से अनेकों को छुटकारा मिल सकता है। पर उस उद्वेग को क्या कहा जाय जो आपत्ति का सूत्रपात होते ही आवेश उत्पन्न कर देता है। असंतुलन यह भुला देता है कि उलझन को सुलझाने के लिए क्या किया जाना चाहिए।

अपने अन्तर को उद्वेगों में बचाओ। धीरज वान और दूरदर्शी बनो ताकि अन्तर्द्वन्द्वों से अपनी शक्ति दबा कर प्रगति पथ के अवरोधों को हटा सको। अप्रिय प्रसंगों और अवांछनीय परिस्थितियों में भी अपना संतुलन न खोओ। धैर्य-विवेक और साहस के सहारे संसार की किसी भी विपत्ति का सामना किया जा सकता है। —सन्त फ्राँसीसी


अभ्यास किया जाय तो हवा में उड़ा जा सकता है।

सन 1902 में बंगाल के एक साधु अगस्तिया ने हठ योग की एक प्रतिज्ञा की। प्रतिज्ञा यह थी कि वह लगातार 10 वर्ष तक अपना बाँया हाथ उठाये ही रहेगा कभी नीचे नहीं गिरा।

और सचमुच ही वह लगातार 10 वर्षों तक बिना हिलाए हाथ ऊँचा किये रहे। इस बीच एक चिड़िया ने समझा यह किसी पेड़ की टहनी है सो उसने बड़े मजे के साथ योगी के उठाये हुए हाथ की हथेली पर घोंसला बना लिया और उस पर अण्डे भी दिये। हाथ की हड्डियाँ सीधी मजबूत हो गई, मुड़ना बंद हो गया और इस तरह हाथ बेकार हो गया किन्तु योगी का कहना था कि इससे उसे कोई कष्ट नहीं हुआ। योग की ऐसी साधनाओं के पीछे कोई दर्शन नहीं है यदि कुछ है तो इतना ही कि तितीक्षा पूर्ण अभ्यास के द्वारा मनुष्य चाहे तो अपने शरीर की सामान्य क्रियाओं को असामान्य बना सकता है।

शरीर में एक नन्ही सी सुई चुभ जाती है तो बड़ा कष्ट होता है किन्तु सिंगापुर के एक भारतीय योगी ने जिसका उल्लेख एवन्डर बुक आफ स्ट्रेन्ज फैक्ट्स में भी है, अपने शरीर में नक्की 50 भाले आर-पार घुसेड़ लिये और इस अवस्था में भी वह सब से हँस हँस कर बातचीत करता रहा लोगों ने कहा यदि आपको कष्ट नहीं हो रहा हो तो थोड़ा चलकर दिखाइये। इस पर योगी ने 3 मील चलकर भी दिखा दिया। उन्होंने बताया कि कष्ट दरअसल शरीर को होता है, आत्मा को नहीं। यदि मनुष्य अपने आपको आत्मा में स्थित कर ले तो जिन्हें सामान्य लोग यातनाएँ कहते हैं वह कष्ट भी साधारण खेल जैसे लगने लगते हैं।

इसका एक उदाहरण विन्ध्याचल के योगी गणेश गिर ने प्रस्तुत किया। उन्होंने एक बार अपने होठों के आगे ठोड़ी वाले समतल मैदानी हिस्से में थोड़ी गीली मिट्टी रख कर उसमें सरसों बो दिये जब तक सरसों उगकर बड़े नहीं हो गये और उनकी जड़ों ने खाल चीर पर अपना स्थान मजबूत नहीं कर लिया तब तक वे धूप में चित्त लेटे रहे।

“साहिब अल्लाह शाह” नामक लाहौर का एक मुसलमान फकीर 600 पौण्ड से भी अधिक वजन की मोटी लोहे की साँकलें पहने रहता था। वृद्ध हो जाने पर भी अपने अभ्यास के कारण इतना वजन भार नहीं बना। पंजाब में वह “साँकल वाला” और जिगलिग के नाम से आज भी याद किया जाता है। उसकी मृत्यु के बाद साँकलों की तौल की गई तो वह 670 पौण्ड निकली।

यह तो भारतवर्ष के हठयोगियों की बातें है अन्य देशों में भी अभ्यास द्वारा अर्जित ऐसी विचित्रताएँ देखने को मिल जाती है जो इस बात की प्रतीक है कि मनुष्य कुछ विशेष परिस्थितियों में पैदा अवश्य किया गया है किन्तु यदि वह चाहे तो अपने आपको बिलकुल बदल सकता है।

इक्का जाति के राजा अटाहुल्लापा ने अपने कानों में वजनदार छल्ले डालकर उन्हें 15 इंच तक बढ़ा लिया था। सारा शरीर सामान्य मनुष्य का होते हुए भी कान हाथी के से कान लगते थे।

सिख सम्राट सरदार रणजीतसिंह के दरबार में प्रसिद्ध भारतीय योगी सन्त हरदास ने जनरल वेन्टूरा के सम्मुख अपनी जीभ को निकाल कर माथे का वह हिस्सा जीभ से छूकर दिखा दिया जो दोनों भौहों के बीच होता है।

सन्त हरदास बता रहे थे कि जीभ को मोड़ कर गरदन के भीतर जहाँ चिड़िया होती है उस छेद को बंद कर लेने से योगी मस्तिष्क में अमृत का पान करता है। ऐसा योगी अपनी मृत्यु को जीत लेता है। अंग्रेजों का कहना था कि जीभ द्वारा ऐसा हो ही नहीं सकता। इस पर संत हरदास ने अपनी जीभ को आगे निकाल रख दिया उन्होंने बताया कि कुछ औषधियों द्वारा जीभ को सूत कर इस योग्य बनाया जाता है।

सरसजिंगा- अफ्रीका के हब्शियों में अपने ओठ बढ़ाने की प्रथा है इसके लिए वे लकड़ी की तश्तरियाँ बनाकर उनसे ओठों को बाँध देते हे ओठ जितना बढ़ते जाते हैं बड़ी तश्तरियाँ बाँध दी जाती है और इस प्रकार कई स्त्रियाँ तो 14-15 इंच अर्थात् सवा फुट व्यास की ढक्कनदार तश्तरी की तरह बढ़ा लेती है।

फिजी द्वीप के निवासी एक त्योहार मनाते हैं उस दिन उन्हें आग पर चलना पड़ता है। इसे अभ्यास भी कहा जा सकता है और आत्मविश्वास की शक्ति भी, कि वे लोग दहकते आग के शोलों पर घंटों नाचते रहते हैं किन्तु कभी ऐसा कोई अवसर नहीं आता कि उनके पैर जल जाते हो।

आयरन ड्यूक आफ वेलिंग्टन कंसास राज्य अमेरिका के जान डब्ल्यू हार्टन ने पेट में न जाने कहाँ की आग पैदा कर ली थी कि नाश्ते में 40 पौंड तरबूजा खा लेने के बाद भी सोडा की बोतलें टूटे शीशे, अण्डों के छिलके और केले के अनगिनत छिलके चबा जाते थे। एक बार एक इंजीनियर द्वारा चुनौती दिये जाने पर उन्होंने भरपूर भोजन करने के बाद सीमेन्ट का पूरा कट्टा खा लिया और उसे इस स्वाद के साथ साथ एक एक चम्मच भक्षण किया जैसे छोटे बच्चे प्रेम पूर्वक शक्कर या मिठाई खाते हैं उन्होंने यह भी कहा मैं कुछ और अभ्यास करूँ तो इतनी ही मात्रा में विष तक खाकर दिखा सकता हूँ।

भारतीय योगी चाँगदेव की योग-गाथायें सारे भारतवासी जानते हैं एक एक कर चौदह बार उन्होंने मृत्यु को वापस लौटाया। उनकी आयु 1400 वर्ष की हो गई थी। ईसामसीह के समय से लेकर 12 वीं शताब्दी सन्त ज्ञानेश्वर के समय तक उनकी गाथाओं के उल्लेख मिलते हैं। वह शेर की सवारी किया करते थे और शेर को हाँकने के लिए जहरीले साँप की चाबुक लिये रहते थे। एक बार उनको हवा में स्थिर रहने की चुनौती दी गई तब महाराष्ट्र के एक गाँव में उन्होंने हजारों लोगों के सम्मुख भाषण देने का प्रस्ताव किया। एक एक कर 14 चौकियाँ रखी गई सबसे ऊपरी चौकी पर बैठकर उन्होंने प्रवचन प्रारम्भ किया। पीछे उनके पूर्व आदेशानुसार शिष्यों ने एक एक कर सभी चौकियाँ हटा ली। लोगों ने उनकी जय जयकार की तो वे बोले भाइयों! इसमें मेरा कुछ बड़प्पन नहीं योग क्रियाओं के अभ्यास द्वारा मनुष्य चाहे तो पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है सितारों की तरह हवा में अधर लटक कर संसार का दृश्य देखता रह सकता है।


गुरु कुल के दो छात्र (kahani)

गुरु कुल के दो छात्र आपस में झगड़ रहे थे। दोनों अपनी विद्या प्रतिभा और बलिष्ठता की चर्चा करते हुए अपने बड़प्पन का प्रतिपादन कर रहे थे और अपने को बड़ा सिद्ध कर रहे थे।

विवाद आचार्य तक पहुँचा, उन्होंने सहानुभूति पूर्वक कहा- बच्चों बड़प्पन की निशानी है विनयशीलता और शालीनता। तुम लोगों में से जो अपनी तुच्छता और दूसरे की महत्ता का मूल्याँकन कर सके वही बड़ा है।

छात्रों का सिर झुक गया, उन्होंने अहन्ता और दृष्टता के लिए परस्पर एक दूसरे से क्षमा माँगी।


अपनों से अपनी बात

युग निर्माण का दूसरा चरण परिवार निर्माण

युग निर्माण अभियान का प्रथम चरण आत्म निर्माण है। अभियान का दूसरा निर्माण है- परिवार निर्माण। आमतौर से हर मनुष्य परिवार बना कर रहता है जो लोग विवाह नहीं करते वे भी माँ-बाप बहिन-भाई आदि के साथ रहते हैं वह भी परिवार ही तो हुआ। स्त्री बच्चों तक ही तो परिवार की सीमा अवरुद्ध नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं वैरागी, सन्त, महात्मा तक जमात-संगत बना कर रहते हैं। आश्रम, सम्प्रदाय, मण्डली बनाते हैं। गुरु शिष्यों की परम्परा चल पड़ती है और परिवार बन जाता है। छात्र और अध्यापकों का सम्बन्ध वस्तुतः एक परिवार ही है। प्राचीनकाल में गुरुकुल इसी आदर्श पर चलते थे। थोड़ी उदार दृष्टि का विकास हो तो यह परिधि देश, धर्म आदि की सीमा लाँघती हुई विश्व परिवार पर जा सकती है तब वसुधैव कुटुम्बकम् एक कल्पना नहीं व्यावहारिक सत्य दृष्टिगोचर होता है। पूर्ण एकाकी तो जड़, मृतक अथवा परमहंस ही रह सकता है सामान्य मनुष्य का जहाँ तक प्रश्न है उसे परिवार बना कर ही रहना पड़ता है। स्नेह-सहयोग का जब तक आदान-प्रदान हो तब तक आत्मा की अतृप्ति का समाधान मिलता नहीं।

परिवार एक प्रकार से छोटा राष्ट्र है। सुविस्तृत का छोटा संस्करण है। युगनिर्माण की क्षमता विकसित करने के लिए हमें परिवार निर्माण की पाठशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। भोजन वस्त्र की- शौक मौज की शिक्षा सुविधा की व्यवस्था बनाये रहने से ही परिवार की आवश्यकता पूर्ण नहीं हो जाती वरन् उस छोटे से क्षेत्र में ऐसा वातावरण बनाना पड़ता है जिसमें पलने वाले प्राणी हर दृष्टि से समुन्नत सुसंस्कृत बन सके। अधिक खर्च करने अधिक सुविधा साधन रहने से- नौकर, चाकरों की व्यवस्था रहने से घर साफ-सुथरा और सुसज्जित रह सकता है। सम्पन्नता के आधार पर बढ़िया भोजन-वस्त्र ऐश आराम विनोद मनोरंजन के साधन मिल सकते हैं। किन्तु व्यक्तित्व को समग्र रूप से विकसित कर सकने वाले सुसंस्कार केवल उपयुक्त वातावरण में ही सम्भव हो सकते हैं। ऐसा वातावरण कही बना बनाया नहीं मिलता- न कही खरीदा जा सकता है, उसे तो स्वयं ही बनाना पड़ता है।

प्राचीन काल के गुरुकुलों की बात दूसरी भी वहाँ उत्कृष्टता का वातावरण बना हुआ रहता था, घर परिवार में जो कमी रहती थी , उसकी पूर्ति वहां हो जाती थी, ऋषि अपने ज्ञान कर्म और प्रभाव से विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण की आवश्यकता पूरी किया करते थे। पर अब वैसे गुरुकुल , विद्यालय भी कहाँ है? इसे यदि पूरा न किया गया, घर में सुसंस्कृत वातावरण न बनाया जा सका, परिष्कृत परम्पराओं का प्रचलन न किया जा सका तो उस घर में रहने, पलने वाले लोग भूत वेताल बन कर ही रहेंगे। स्वास्थ्य , शिक्षा, चतुरता की दृष्टि से वे कितने ही ही अच्छे क्यों न हो, मानवी सद्गुणों से वंचित ही रहेंगे। कोई कितना कमाता है- कितना बड़ा कहाता है यह बात अलग है और किसका व्यक्तित्व कितना समुन्नत है, यह प्रश्न बिलकुल अलग है। सुख शान्ति पूर्वक रहने और अपने साथियों को प्रसन्न संतुष्ट रखने के लिए बड़प्पन की ही नहीं - महानता की आवश्यकता पड़ती है। उसी का उपार्जन मानव-जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। कोई परिवार इस दिशा में कितना सफल होता है उसकी उतनी ही सार्थकता मानी जा सकती है।

घर के वातावरण में यदि अवांछनीयताएँ, विकृतियाँ फैली पड़ी है तो इसका एकमात्र कारण सत्प्रवृत्तियाँ, सद्भावनाएँ उत्पन्न कर सकने वाले वातावरण का अभाव है। अन्धकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं, प्रकाश का अभाव ही अंधकार है। ठीक यही बात पारिवारिक वातावरण पर लागू होती है जहाँ सद्भावनाओं को आरोपित पल्लवित न किया गया होगा वहाँ दुर्भावनाओं की दुष्प्रवृत्तियों की कँटीली झाड़ियों उगेंगी ही। बाहरी दृष्टि से लड़-झगड़ या मनोमालिन्य के दूसरे स्थूल कारण भी हो सकते हैं। उनका निवारण भी किया जा सकता है फिर भी आन्तरिक दुर्बुद्धि जहाँ बनी हुई है वहां द्वेष और क्लेश के लिए कुछ बहाने सामने आते ही रहेंगे और दुर्गन्ध भरी नारकीय सड़न उत्पन्न करते ही रहेंगे। ऐसे घर परिवार में रह कर कोई व्यक्ति न तो सुखी-संतुष्ट रह सकता है और न जीवन में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकने योग्य गुण, कर्म, स्वभाव का अभ्यस्त हो सकता है।

अवांछनीय वातावरण में पलने वाले प्राणी हेय और गई गुजरी स्थिति में ही जिन्दगी गुजारते हैं। अधिक पैसा अधिक ठाठ-बाट और अधिक वैभव पाकर आदमी दूसरों को आकर्षित आतंकित कर सकता है पर उसकी सुख शान्ति में तनिक भी वृद्धि नहीं होती। आनन्द और उल्लास तो केवल सुसंस्कारी व्यक्तियों के हिस्से में ही आता है। वे ही स्वयं संतुष्ट रहते हैं और साथियों का आनन्द देते हैं। अभागे लोग पैसे को ही सब कुछ मानते और उसी के लिए मरते खपते हैं। विवेकवान जानते हैं कि परिष्कृत दृष्टिकोण से सद्भावनाओं से बढ़कर और कोई आनन्ददायक वस्तु इस संसार में नहीं है इसलिए वे इसके उपार्जन अभिवर्धन पर ध्यान देते हैं? भले ही पैसे की दृष्टि से उन्हें गरीबों की श्रेणी में ही क्यों न रहना पड़े।

परिवार निर्माण का अपना प्रयोजन इतना भर ही नहीं है जितना कि ग्रह -विज्ञान की प्रचलित पुस्तकों में बताया पढ़ाया जाता है। परिवार निर्माण की दृष्टि से भी यह आरम्भिक और उचित कदम है। पर उतना भर कर लेने पर भी कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। अमीर लोग गृहसज्जा के लिए नौकर रखते भी हैं। सफाई, व्यवस्था और सजावट के लिए नौकर चाकर मौजूद है तो वह कार्य हो ही जाएगा। कुशल गृहणियाँ भी यदि निरालस्य, स्फूर्तिवान् और सुरुचिपूर्ण प्रकृति की हो तो वे जागरूक रह कर चलते फिरते गन्दगी एवं अव्यवस्था को हटाती समेटती रहती है। बात की बात में सब कुछ सुन्दर सुव्यवस्थित बन जाता है।

वस्तुतः कूड़ा करकट तो दिमागी गन्दगी का नाम है। फूहड़ प्रकृति ही घर में सर्वत्र अव्यवस्था फैलाये रहती है। कामों को आधा-अधूरा छोड़ने की आदत का नाम गन्दगी है। जिसकी प्रकृति में पूरा काम निपटा कर आगे बढ़ाने की आदत जुड़ गईं है उसे कुछ सिखाना नहीं पड़ता। घर का सामान, बर्तन, फर्नीचर, दीवारें, छतें, कमरे, कोठरी, नाली, पकाने, पुस्तकें, खाद्य पदार्थ आदि किस तरह संभाले सँजोये इसकी शिक्षा का नाम ही इन दिनों स्कूलों में ‘गृह विज्ञान’ के नाम से पढ़ाया जाता है। वह व्यवहार ज्ञान है इतना सब कुछ जान लेने पर भी यदि आलसी और फूहड़ प्रकृति स्वभाव का अंग बनी रहे तो फिर पढ़ा-पढ़ाया बेकार है।

गृहविज्ञान पढ़ाने वाली अध्यापिकाओं के घर जब नरक जैसी गन्दगी और अस्त-व्यवस्था से भरे दीखते हैं, तब यही मानना पड़ता है कि जानकारी प्राप्त कर लेने से कुछ बनता नहीं, मूल बात स्वभाव के परिष्कार की है। यदि वह किसी प्रकार संभव हो सके तो सर्वथा निरक्षर होने पर भी गृह-सज्जा की समस्त आवश्यकताएँ बिना किसी के सिखाये पढ़ायें भी अपनी भौतिक सूझ-बूझ से सम्भव सम्पन्न हो सकती है। निर्धनता , रुग्णता और व्यस्तता रहने पर भी जहाँ सुरुचि जीवित होगी, वहाँ सुन्दरता और सुसज्जा अनायास ही बनी रहेगी। इसके विपरीत आलस और फूहड़ प्रकृति अनेक सहायकों तथा साधनों के रहते हुए भी पग-पग पर बिखरी हुई कुरूपता, कुरुचि और गन्दगी का परिचय देती रहेगी।

इन पंक्तियों में यह नहीं बताया जा रहा है कि घर को साफ-सुथरा रखने के लिए किस प्रकार क्या करना चाहिए। दीवारों की पुताई , फर्नीचर पर वार्निस, कपड़ों की धुलाई, पर्दों की रंगाई, झाड़ पोंछ और चीजों का यथावत रखना, पुस्तकों में लिखा भले न हो, पर उसकी वास्तविक शिक्षा दैनिक -अभ्यास से ही मिलती है। जिन घरों में यही होता रहता है, उनमें पलने वाली लड़कियाँ जहाँ भी जाती है, वही सुरुचि पूर्ण सुसज्जा बात ही बात में बना देती है। वैसी आदत न हो तो फिर हर बात कहने-सुनने और डाँटने-डपटने की आवश्यकता पड़ती रहेगी। गृह-सज्जा जैसा छोटा विषय भी मूलतः घर के सदस्यों की प्रकृति से जुड़ा है। उसका स्तर यदि सुधरा हो तो कोई बिना पढ़ी महिला लैक्चर देना भले ही न जानती हो, व्यवहार रूप से इतना कुछ करके दिखा सकती है कि गृहविज्ञान पढ़ाने वाली प्रोफेसर भी सिर झुका के रह जाय। हम इसी सुरुचि के विकास को घर की सुव्यवस्था को मूल-भूत कारण मानकर चलना चाहिए और उसी के विकास का उपयुक्त वातावरण तैयार करना चाहिए।

परिवार निर्माण वस्तुतः एक दर्शन है- क्रियाकलाप तक उसे सीमित नहीं रखा जा सकता। जिस प्रकार की व्यवस्था अभीष्ट हो उसके लिए परिवार के लोगों की मनः स्थिति का निर्माण किया जाना चाहिए। यह प्रयोजन तभी सफल हो सकता है, जब अपना मनोयोग समय और श्रम उसके लिए नियमित रूप से लगाया जाय। यह अभिरुचि, तत्परता एवं संलग्नता तब उत्पन्न हो सकती है, जब परिवार निर्माण की आवश्यकता को गंभीरता पूर्वक समझा जाय और यह सोचा जाय कि इस महान उत्तरदायित्व का निर्वाह करना कितना अधिक महत्वपूर्ण है। मनः स्थिति पर प्रभाव डालने की क्षमता केवल उन्हीं में होती है, जो अन्तः क्षेत्र का स्पर्श करे। विशेषतया स्वभाव और दृष्टिकोण में परिष्कृत परिवर्तन के लिये तो ऐसे ही शिक्षक की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा शिक्षक बाहर से ढूँढ़ना बेकार है, यह कार्य हमें स्वयं ही करना पड़ेगा। परिवार निर्माण का कार्य अपने अतिरिक्त बाहर के लोगों से नहीं कराया जा सकता। आज की स्थिति में इसी तथ्य को हमें पूरी तरह रखना चाहिए। दूसरे, कुछ सामयिक परामर्श दे सकते हैं या क्षणिक प्रभाव डाल सकते हैं। सुसंस्कारों की जड़ जमाने के लिए जिस अध्यवसाय की दीर्घकालीन और अनवरत आवश्यकता पड़ती है, उसकी पूर्ति कोई बाहर का व्यक्ति कब तक और कहाँ तक करेगा?

प्रश्न इतना भर नहीं है कि परिवार का वातावरण अच्छा बनाया जाय और परिजनों को सुसंस्कृत स्तर तक पहुँचाया जाय। एक केवल एक पक्ष है। परिवार निर्माण का दूसरा पक्ष और भी अधिक महत्वपूर्ण है। वह है- अपनी निज की आदतों, आस्थाओं और गतिविधियों का निर्माण नियंत्रण करना। जलाशय में घुसे बिना तैरना कहाँ आता है। व्यायामशाला में प्रवेश किये बिना पहलवान कौन बनता है? पाठशाला में भर्ती हुए बिना सुशिक्षित कौन बनता है? व्यक्तियों के सम्पर्क में आकर ही अपने गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का अभ्यास किया जाता है। एकाकी चिन्तन, मनन, अध्ययन, प्रवचन करते रहने से केवल बौद्धिक समाधान मिलता है। सत्प्रवृत्तियाँ परिपक्व तो अभ्यास से होती है। अभ्यास के लिए उपकरण चाहिए। जिन लोगों के बीच हमें रहना पड़ रहा है, उन्हें परिष्कृत बनाने के लिए प्रयास करना वस्तुतः अपनी प्रकृति को ही सुधारना है। बेझिझक बात करनी हो तो बात दूसरी है- यदि सचमुच किन्हीं पर बदलने योग्य प्रभाव उत्पन्न करना है तो उसका एक मात्र उपाय अपनी स्थिति का प्रभाव डालने योग्य बनना ही हो सकता है। अपने व्यक्तित्व को उतना प्रामाणिक बनाना पड़ेगा कि जिसके संपर्क में आया जाय- उस पर छाप पड़े। परिजनों के माध्यम से अपनी शालीनता एवं क्रिया-कुशलता को विकासोन्मुख बनाना है। इस प्रकार परिवार निर्माण की दिशा में किये गये प्रयास- केवल कुटुम्बियों की सार्थक सेवा ही सम्पन्न नहीं करते, वरन् अपने व्यक्तित्व को भी निखारते हैं। परिवार निर्माण दुहरी सफलता प्रस्तुत करता है। सुसंस्कृत परिजन न केवल अपने लिए, वरन् निर्माणकर्ता के लिए भी आनन्द भरे अनुदान प्रस्तुत करते हैं। मेंहदी पीसने वाले के हाथ रंग जाते हैं, वाली उक्ति के अनुसार उस कार्य में संलग्न व्यक्ति को आत्म निर्माण का लाभ भी मिलता ही है।

आजीविका उपार्जन के अतिरिक्त कुछ समय हमें परिवार-निर्माण के लिए भी नियमित रूप से देना चाहिए। यह एक उच्च कोटि का मनोरंजन है। ताश, शतरंज, गपशप, सिनेमा, मटरगश्ती, यारबाजी, आलस्य अनुत्साह पूर्वक काम करने की मन्दगति आदि व्यसनों और प्रमादों में हमारा बहुत सा समय नष्ट होता है। हिसाब लगाया जाय तो प्रतीत होगा कि समय की यह बर्बादी बहुत बड़ी है। इतनी अधिक है कि उसे बचाकर ही परिवार निर्माण के अनेक महत्वपूर्ण कार्य करने का अवसर प्राप्त किया जा सकता है और फुरसत न मिलने का बहाना निरर्थक सिद्ध हो सकता है। मनोरंजनों में सबसे बढ़िया, सबसे सार्थक, सबसे हल्का और सबसे सरल परिवार निर्माण ही है। इसमें न केवल अपना ही, वरन् साथ-साथ सारे घर परिवार को मनोरंजन होता है। उसकी आड में प्रशिक्षण इतना अधिक हो जाता है कि कोई विद्वान् अध्यापक भी उतना नहीं कर सकता।

परिवार-निर्माण के दो पक्ष है- एक व्यावहारिक क्रिया परक और दूसरा दार्शनिक -दृष्टिकोण परक। हमें दोनों ही तथ्यों का अपनी क्रिया प्रक्रिया में समुचित समावेश करके चलना होगा। व्यावहारिक कार्यक्रम में घर की सुव्यवस्था, सुन्दरता एवं सुसज्जा पर ध्यान दिया जाना चाहिए। स्वयं साथ लगने से दूसरों में उत्साह पैदा होता है, अन्यथा सृजनात्मक कार्यों में रूखापन समझा जाता है और उसे भार-बेकार समझकर कभी काटने की मनोवृत्ति रहती है। आदेश-निर्देश देते रहने से बात बनती नहीं। प्रयोजन तब पूरा होता है, जब स्वयं आगे चला जाय और कन्धे से कन्धा लगाकर काम करने के लिए दूसरों को आमन्त्रण दिया जाय। ‘अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दीखता’ वाली कहावत ऐसे हर काम पर लागू होती है। जितने कितनों का ही सहयोग अभीष्ट होता है। इंजन आगे चलता है तो डिब्बे पीछे लुढ़कने लगते हैं। परिवार-निर्माण के लिये बनाये गये व्यवस्था क्रम में हमें स्वयं ही इंजन की भूमिका सम्पादित करनी चाहिए।

आजीविका उपार्जन और सार्वजनिक सेवा के अतिरिक्त शेष समय घर रहते हुए भी व्यतीत करना चाहिए और उसे परिवार-निर्माण में लगाना चाहिए। इस समय का क्रियात्मक उपयोग यह है कि सफाई सुव्यवस्था एवं सुसज्जा के कार्यों में हर दिन कुछ न कुछ कार्य निर्धारित रखा जाय। कूड़ा-कचरा और गन्दगी हर समय उत्पन्न होती है। इसलिए बार-बार बुहारी या कपड़े या झाड़न प्रयुक्त करना पड़ता है। काम को आधा-अधूरा छोड़ने और चीजों को अस्त-व्यस्त पड़ी रहने देने की बुरी आदत घर में प्रायः सभी को किसी न किसी मात्रा में होती है। बच्चों में यह दोष आमतौर से पाया जाता है। अस्तु आज की व्यवस्था और सफाई कल तक यथावत नहीं बनी रहेगी, उसे बार-बार संभालना पड़ता है। चीजों को यथास्थान, करीने से रखना- झाडू और झाड़न का बार- बार उपयोग करना- बर्तनों का माँजना, कपड़ों का धोना ऐसा काम है जिन्हें समय-समय पर करते रहना पड़ता है। टूट-फूट भी होती रहती है। मरम्मत में कुशल होना सद्गृहस्थ का आवश्यक क्रिया कौशल हैं। जब जो वस्तु टूटती-फूटती दिखाई पड़े, उसे अविलम्ब सुधार-संभाल देना चाहिए। कपड़ा जहाँ से फटा है, वहाँ तुरन्त सी दिया जाय तो वह हानि नहीं होगी , जो कई दिन उपेक्षा करते रहने से उसकी जिन्दगी समाप्त हो जाने के रूप में सामने आती है। घर में कुछ स्थान गंदगी के होते हैं। बर्तन साफ करने, मल-मूत्र त्यागने के साथ-साथ कूड़ा जमा करने के स्थान आमतौर से गन्दे पड़े रहते हैं और उनमें सड़न, बदबू, गन्दगी पैदा होती रहती है। गन्दी चीजों से दूर रहने की आदत गन्दगी पैदा होती रहती है। गन्दगी से जूझते रहने रहने से ही सफाई को स्थापित किया जा सकता है, उससे दूर रहने की अपेक्षा से तो वह और अधिक बढ़ती चली जायेगी। स्वच्छता से प्रेम करना उसी का सार्थक है, जो गंदगी हटाने को उत्साह का परिचय दे सके। घर के सभी लोगों में प्रवृत्ति पैदा करनी चाहिए। गंदगी एवं कुरूपता विरोधी मोर्चे पर लड़ने के लिए घर के हर सदस्य में शौर्य, साहस उत्पन्न करना चाहिए। क्या शरीर, क्या वस्त्र, क्या सामान, क्या पर सब कुछ ऐसा सुन्दर, सुव्यवस्थित रखा जाय , मानो कोई बड़ा अफसर आज ही इन सब चीजों का मुकाबला करने के लिए आ रहा हो। सफाई और सुरुचि संवर्धन इसी अभियान का दूसरा पक्ष है। मकान की दीवारें अपने हाथों आसानी से पोती जा सकती है। मेज़पोश, पर्दे आदि रंगने में कहाँ अधिक देर लगती है। घर के लोगों को साथ में लगाकर स्वच्छता और सुसज्जिता में हर दिन एक घण्टा भी लगाया जाय तो उसकी हर वस्तु सुरुचि पूर्ण रह सकती है और वहाँ सुसंस्कृत वातावरण का आभास मिलता रह सकता है।

बात सफाई और शोभा सुन्दरता भर की नहीं हो रही है, वरन् यह कहा जा रहा है कि परिवार के हर सदस्य में सुव्यवस्था के लिए तत्परता बरतने की आदत होनी चाहिए। यह आदत वस्तुओं को सुन्दर ढंग से रखने तक ही सीमित नहीं रह सकती, वरन् चिन्तन एवं कर्तव्य के अन्यान्य क्षेत्रों तक विकसित होकर मनुष्य को जागरूक और तत्पर बनाये रखने में असाधारण रूप से सहायता करती है। छोटे कामों से घृणा न करना सुव्यवस्था को उत्पादक मनोरंजन मानना, ठाली समय का उपयोग करना, आलस्य प्रमाद का हावी न होने देना, काम को अधूरा न छोड़ना, सुसज्जा की अभिरुचि बढ़ाना जैसे अनेकों गुण ऐसे परिवार में बढ़ते हैं, जो देखने में छोटे लगते हैं, पर प्रकृति के अंग बनकर सामने प्रस्तुत कार्यों को सही ढंग से करने पर मिलने वाली सफलता का अंग बनते हैं। टूटी चीजों की मरम्मत करना यो एक गृहशिल्प भी है, उससे अधिक बचत भी है, पर आदत के रूप में बड़ा लाभ यह है कि बर्बादी तनिक भी न होने दी जाय। वस्तुओं से अधिकाधिक काम लिया जाय। कहावत है कि “जो टूटे को बनाना और रूठे को मनाना जानता है, वह बुद्धिमान है। “ निर्माण, सृजन और सुधार की मनोवृत्ति टूटी वस्तुओं की मरम्मत करने और भदरंग चीजों को चमकाने के प्रयास के साथ-साथ विकसित होती है। घर आँगन में, गमलों में, टोकरी और पेटियों में फल-फूल एवं शाक भाजी लगाये जा सकते हैं। इसमें शोभा भी है और आर्थिक लाभ भी। इससे भी बड़ा लाभ उत्पादन, पोषण और संरक्षण की मनोवृत्ति विकसित होने का है, सद्गुणों को ऐसे छुट-पुट प्रयासों के सहारे ही विकसित किया जा सकता है।

परिवार में सद्ज्ञान की अभिवृद्धि की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए। परिजनों को कूप मण्डूक नहीं रहने देना चाहिए। जीवन की- समाज की समस्याओं से अपरिचित रहना ऐसी भूल है, जिसके कारण कभी- कभी ऐसी ठोकरें खानी पड़ती है, जो आदमी को चित पट करके रख दे। रूखे, नीरस और निर्देशात्मक उपदेशों को प्रायः व्यंग , उपहास एवं अवज्ञा में धकेल दिया जाता है। कथा-कहानी के माध्यम से घुमा-फिराकर शिक्षा दी जाय तो उसमें मनोरंजन आकर्षण भी रहता है और परोक्ष रूप से दी गई शिक्षा का चित्त पर प्रभाव भी पड़ता है। अखबारों से ऐसे समाचार चुने जा सकते हैं, जिनमें कुछ शिक्षा सामग्री हो। उनकी समीक्षा करते रहे तो ऐसे ज्ञान की वृद्धि हो सकती है, जो जीवन-विकास में- लोक -व्यवहार में उचित मार्ग दर्शन दे सके। जो पढ़े-लिखे है, उन्हें प्रेरक पुस्तकें पढ़ते रहने के लिए भी कहा, समझाया और प्रोत्साहित किया जा सकता है। स्वाध्याय के लिए सामग्री और समय की व्यवस्था बनाकर हम घर के पढ़े लिखे सदस्यों के लिए बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष का द्वार खोल सकते हैं। पढ़े सदस्य प्रतिदिन अवकाश वाले निर्धारित समय में निर्दिष्ट पुस्तक प्रसंग पढ़कर सुनाया करे और आगे चलकर वही आदत परिवार प्रशिक्षण में अभिरुचि बनकर विकसित हो सकती है। सुनाते रहने वालों को सुयोग्य वक्ता बनने का- झेंप झिझक से पिण्ड छुड़ाने का- सुअवसर प्रदान कर सकती है।

घर में आस्तिकता का वातावरण रहना चाहिए। हर सदस्य को भगवान का स्मरण और नमन करने की आदत होनी चाहिए। आस्तिकता के साथ अनेक मान्यताएँ जुड़ी रहती है, सुसंस्कृत व्यक्तित्व विकसित करने की दृष्टि से दैनिक जीवन में आस्तिकता को परिपुष्ट बनाने वाली उपासना के लिए कुछ न कुछ स्थान होना ही चाहिए। किसी उपयुक्त स्थान पर गायत्री माता का चित्र टाँगा जाय और यह नियम बनाया जाय कि दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व उस प्रतिमा का अभिनन्दन करके- कम से कम पाँच मंत्र जाप करके तब आगे बढ़ा जाय। बच्चे स्कूल जाते समय, स्त्रियाँ चूल्हा जलाते समय, पुरुष दफ्तर, दुकान पर जाते समय यह नमन अभिनन्दन चित्र के सामने खड़े होकर कर सकते हैं। इसमें दो मिनट का समय लगता है। उससे आस्तिकता के संस्कार जमते और बढ़ते हैं। इसका परिणाम दृष्टिकोण में उच्चस्तरीय आदर्शों को समाविष्ट रहने का लाभ मिलता है। सायंकाल सामूहिक रूप से आरती करने की- संगीत सहगान की परम्परा डाली जाय तो एक उत्साह एवं सद्भाव संवर्धक वातावरण बनता है।

घर के सदस्य अपने-अपने कामों में ही व्यस्त न रहे, वरन् एक दूसरे को सुनने-समझने तथा सहयोग देने-लेने की स्थिति में भी रहे, ऐसी परम्पराएँ पुनः प्रचलित करनी चाहिए। अधिक पढ़े- कम पढ़ो को पढ़ायें। साथ खेले, साथ टहलें, जिसको जो आता हो- वह दूसरों को सिखाये। भोजन साथ-साथ बैठ कर करे। कभी- कभी रसोई बनाने में ही सब लोग साथ-साथ जुट जाये। कपड़े धोने में एक साबुन लगाये तो दूसरा धोये। इस प्रकार छोटे-बड़े कामों में सर्वथा एकाकीपन रखने की अपेक्षा मिल-जुलकर करने की सहयोगी सहकारी प्रवृत्ति पनपेगी और उसका अच्छा परिणाम सामने आयेगा। बच्चों को ऐसी आदत डालनी चाहिए कि कोई मिठाई आदि आवे तो मिल-बाँटकर खावें, एकाकी अथवा अधिक खाने का आग्रह न करे। भोजन परोसने में रुचि लेने से भी उदारता के बीज जमते हैं। अपने को हथियाये रहना और दूसरे का छीनने का प्रयत्न करना- जैसी संकीर्णता पनपने नहीं देनी चाहिए। जेवर भी एक से दूसरे स्त्रियो में उलटते-पलटते रहे तो इससे विषाक्त आपाधापी की जड़ कटती है। हारी-बीमारी में - हर दुख सुख में एक दूसरे का पूरा ध्यान रखे। हर सदस्य एक दूसरे को शिष्ट सम्बोधन के साथ पुकारे। ‘तू’ को असभ्य बोली माना जाय। बड़े भी छोटों को ‘तू’ न कहे। ‘तुम’ एवं ‘आप’ का सम्बोधन और नाम के आगे ‘जी’ लगाने का प्रचलन किसी परिवार को सभ्यतानुयायी सिद्ध करता है। गाली-गलौज कटु वचन, व्यंग, उपहास, चीखना, रूठना, क्रोधावेश में भरना, मार-पीट करना, अपना सिर धुनना - असभ्य और अवांछनीय व्यवहार घोषित किया जाये और वैसा आचरण करने वाले की भर्त्सना की जाय। वैसा बार-बार न होने पाय इस पर कड़े प्रतिबन्ध लगाया जाय और ऐसी उद्दण्डता की पूरे परिवार द्वारा चेष्टा की जाय। मतभेद और विरोध संघर्ष के अवसर आने पर भी शिष्टाचार का उल्लंघन न होने दिया जाय। बुराई रोकने के लिये अशिष्टता बरती जाय तो फिर सुधार कम और बिगाड़ ही अधिक होगा।

अपव्यय किसी को न करने दिया जाय। उक्ति आवश्यकताओं की पूर्ति की जानी चाहिए, पर पैसे को उलीचने और फूँकने की आदत नहीं पड़ने देनी चाहिए। लाड़ चाव में बच्चों को अपव्ययी बना देना- उन्हें भावी जीवन में दुख दारिद्रय का शाप देना है। पैसा कमाने में उतनी बुद्धिमतां नहीं, जितनी उसका खर्च करने में। स्वास्थ्य शिक्षा की उपयोगी आवश्यकताएँ पूर्ण करने में कुछ भी खर्च किया जा सकता है, पर विलासिता, ऐयाशी एवं शान-शौकत के नाम पर अवांछनीय अपव्यय एक पाई का भी नहीं होने देना चाहिए। अमीरी की शान फिजूलखर्ची के रूप में जो इन दिनों बढ़ रही है, उसे रोकना चाहिए। सादगी का सीधा सम्बन्ध सज्जनता से है- यह समझना और समझाना चाहिए। पैसा उड़ाने फूँकने के लिए नहीं, अपनी अथवा दूसरों की उपयोगी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए है। यह तथ्य जब तक समझा न जाएगा, तब तक व्यक्तित्व में ओछापन ही भरा रहेगा।

परिवार को एक सहयोग- समिति के रूप में विकसित करना चाहिए। जिसका हर सदस्य अपने कर्तव्य और अधिकार की मर्यादाओं को समझे। न तो कोई पिसता रहे और न किसी को मटरगश्ती करने दी जाय। बड़े -बूढ़े भी ठाली बैठकर अपना अधिकार एवं सम्मान न समझे, वरन् सामर्थ्य भर श्रम करते हुए परिवार के विकास में समुचित योगदान करे। विचार-स्वतन्त्रता का सम्मान किया जाय। हराम की कमाई खाने का लालच किसी में पैदा न होने दिया जाय। परिवार के हर सदस्य को स्वावलम्बी बनाया जाय। पूर्वजों की संचित सम्पत्ति पर गुजारा करना अशक्तता और लोलुपता का लज्जास्पद कृत्य माना जाय। पूर्वजों की संचित पूँजी सामाजिक कार्यों के लिए दान कर दी जाय। यही श्राद्ध की परम्परा है। उत्तराधिकार में प्रचुर सम्पदा छोड़ भरना- अपने बच्चों का पतन हनन करना है। उन्हें सुयोग्य स्वावलम्बी बनाया जाय और अपने परिश्रम की कमाई पर गुजारा करने में स्वाभिमान अनुभव करने दिया जाय। औलाद सात पीढ़ी तक बैठकर खाती रहे, ऐसा संचय करना- वस्तुतः समाज का हक मारना है। अतिरिक्त सम्पदा पर तत्त्वतः समाज का ही अधिकार होना चाहिए, उसे लोक-मंगल में ही खर्च होना चाहिए। समर्थ बालकों को हराम की कमाई न तो खाली चाहिए और न उन्हें दी जानी चाहिए। इस तथ्य को जिस परिवार में समझ लिया जाएगा, वह सम्पन्न भले ही न हो सुसंस्कृत अवश्य माना जाएगा।

हमें समझना चाहिए कि परिवार एक पूरा समाज, एक पूरा राष्ट्र है। भले ही उसका आकार छोटा हो, पर समस्याएँ वे सभी मौजूद है- जो किसी राष्ट्र या समाज के सामने प्रस्तुत रहती है। प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति का जो बात अपने देश को समुन्नत बनाने के लिए सोचनी करनी चाहिए, वही सब कुछ किसी सद्गृहस्थ को परिवार-निर्माण के लिए करनी चाहिए। एक कुशल माली जिस तरह अपने उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने के लिए अथक परिश्रम करता है- हर पौधे पर पूरा ध्यान रखता है, उसे सींचता छाँटता है, उसी प्रकार परिवार के हर सदस्य को सुसंस्कृत बनाने के लिए उसके साथ नरम, कठोर व्यवहार करते रहना चाहिए। उपार्जन और यारबाजी में ही आम तौर से लोग अपना अधिकाँश समय गुजारते हैं। फलतः परिवार की उपेक्षा होती रहती है और उसमें ऐसे विषबीज पनपते रहते हैं, जिनके कारण आगे चलकर कुटुम्ब दुष्प्रवृत्तियों का फूट-फिसाद का शिकार होकर नष्ट- भ्रष्ट ही हो जाय।

अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास करने के लिए- गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए- परिवार-निर्माण के कार्यक्रम को एक उपयोगी- प्रयोग प्रकरण मानना चाहिए। यह छोटे रूप में देश-सेवा समाज-सेवा , विश्व-सेवा ही है। अपना और परिवार के सदस्यों का कल्याण तो इसमें ही है। कहना न होगा कि इस प्रयोग में सफलता प्राप्त करने के लिए अपना निर्माण भी करना है। इस प्रकार युग- निर्माण का दूसरा चरण- परिवार निर्माण- अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में एक अति महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होता है।


उद्धार करने की बात (kahani)

कीचड़ में लोटते और गंदगी चाटते उस सुअर को घिनौना जीवन जीते देखकर नारद जी को बड़ी दया आई, वे उसका उद्धार करने की बात सोचने लगे।

महर्षि उस वराह के पास पहुँचे और स्नेह पूर्वक बोले- इस घिनौनी रीति से जीना गर्हित है। चलो, तुम्हें स्वर्ग पहुँचा देते हैं।

नारदजी की बात सुनकर वराह तैयार हो गया और उनके पीछे-पीछे चलने लगा।

रास्ते में उस स्वर्ग के बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई, सो पूछ ही बैठा- ‘वहाँ खाने, लोटने और भोगने की क्या-क्या वस्तुएँ है?

नारदजी उसे स्वर्ग का मनोरम वर्णन विस्तार पूर्वक बताने लगे। कौतूहल पूर्वक वह उन्हें सुनता रहा। बात पूरी हो चुकी तो उसने दूनी जिज्ञासा पूर्वक पूछा- खाने के लिए गंदगी- लोटने को कीचड़ और सहचर्या के लिए वराह-कुल है या नहीं?

महर्षि ने असमंजस में पड़ते हुए कहा- मूर्ख! इन निकम्मी चीजों की वहाँ क्या जरूरत है? वहाँ तो देवताओं के अनुरूप वातावरण है और वैसे ही श्रेष्ठ पदार्थ सुसज्जित है। उन्हें पाकर के जीवधारी धन्य हो जाते हैं।

वराह को नारदजी के उत्तर से कोई समाधान नहीं मिला। भला मैले की टोकरी, गन्धयुक्त कीचड़ और वराह- कुल के बिना भी सुख मिल सकता है?

सुअर ने आगे चलने से इनकार कर दिया और वह वापिस लौट पड़ा। नारदजी भी यह सोचते हुए आगे बढ़ गये कि प्राणी का आन्तरिक ऊँचे उठे बिना उसे उत्तम स्थिति का लाभ मिल सकना संभव भी कैसे हो सकता है।


एलोपैथी के अदूरदर्शी आधार

यह सच है कि एलोपैथी के अंतर्गत सर्जरी ने आश्चर्यजनक प्रगति की है और निरन्तर की शोध ने शरीर शास्त्र के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करने का अवसर दिया है। तुरन्त चमत्कार दिखाने वाली औषधियाँ भी इसके पास है। इतना होते हुए भी उसकी आधार भूत रीति-नीति ऐसी है जिससे रोगी को आरम्भिक लाभ के बावजूद अन्ततः घाटा ही उठाना पड़ता है।

एलोपैथी ग्रीक भाषा का संयुक्त शब्द है। इसमें दो शब्द जुड़े है - एलीस अर्थात् दूसरा। पाथोस अर्थात् दुख। एलोपैथी अर्थात् वह विज्ञान जो एक के साथ दूसरा दुख पैदा करता है। प्रस्तुत अर्थ को अमेरिका की डब्ल्यू. वी. साउण्डर्स कम्पनी द्वारा प्रकाशित “अमेरिकन इलस्ट्रेड मेडिकल डिक्शनरी में- वेक्टर के प्राचीन शब्द कोष में- आक्सफोर्ड डिक्शनरी में- लंदन से प्रकाशित स्टेडमैन्स मेडिकल डिक्शनरी में- समान रूप से पुष्टि की गई है। सबने एलोपैथी शब्द का लगभग एक ही अर्थ लिया है- एक बीमारी का इलाज करने के लिए दूसरी बीमारी पैदा करना।

यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कीचड़ में पैर फिसल जाने पर उसकी लज्जा से बचने के लिए पूरे पैर को कीचड़ में लोट-पोट कर लेना। एक हाथ में दर्द उठे तो दूसरे हाथ में हथौड़ा मार लेना। घर के एक कोने में आग लगने की कुरूपता मिटाने के लिए पूरे घर में आग लगा देना। घर में घुसे चोर से निपटने के लिए डाकू को आमन्त्रण पूर्वक बुला लाना।

रोग के आक्रमण की आशंका रहने पर शरीर में उस बीमारी की स्थिति स्वेच्छापूर्वक पैदा कर ली जाती है। चेचक, हैजा, क्षय आदि के निवारण के लिए सुरक्षा के टीके लगा कर उसी बीमारी को इम्यूनिटी के रूप में पैदा किया जाता है, रोग निवारण के लिये एंटीबायोटिक दवाएँ ली जाती है। एण्टी का अर्थ है- विरुद्ध। बायोटिक्स का अर्थ है’ जीवन। ग्रीक लैटिन के इस संयुक्त शब्द का अर्थ है Detri mental hazardous to Life. जीवन घातक।

इंग्लैण्ड में पागल खानों के अध्यक्ष डा. मार्टिन राथ ने डाक्टरी संघ द्वारा प्रकाशित ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में एक लेख लिख कर पागलपन सम्बन्धी चिकित्सा में औषधि उपचार की असफलता स्वीकार करते हुए लिखा है- पागलों को इन पागलखानों में प्रायः ऐसे ही दिन काटने पड़ेंगे क्योंकि हमारे पास उनकी बीमारी का कोई समुचित इलाज नहीं है।

फ्राँस के डाक्टर ई. वाल्टेयर ने एलोपैथी के सबसे तेज विष- सबसे अच्छी दवा के सिद्धान्त पर करारे व्यंग किये है। डा. डब्ल्यू. एच. हाइट के एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान के मूल भूत सिद्धान्तों को अपूर्ण और अनुमानों के आधार पर खड़ा किया गया बताया है। हीलिंग एण्ड कान्क्वेस्ट आफ पेन के लेखक डा. जे. ओल्डफील्ड ने लिखा है। वर्तमान चिकित्सा विज्ञान अभी प्रयोग मात्र है। इसमें वैज्ञानिक अंध विश्वास जैसे तथ्य भरे पड़े है।

प्रस्तुत रोग की निवृत्ति के अत्युत्साह में जो तीव्र विषों से भरी दवाएँ रोगी को दी जाती है वे कुछ ही समय अपना जादू दिखा कर बाद में ऐसी नई विकृतियाँ उत्पन्न करती है जो पहले रोग से भी भयंकर हो। मलेरिया के इलाज में प्रयुक्त कुनैन ने कितने ही लोगों को कान बहने और आजीवन बहरे रहने का व्यथा से घेर लिया। जल्दी बुखार उतारने की दवा ने दो दिन तो चमत्कार दिखाया पीछे रोगी को लकवा का शिकार बनना पड़ा। ऐसी घटनायें आये दिन देखने को मिलती रहती है। एलोपैथी के प्रति बढ़ते हुए अन्धविश्वास के पीछे उस अदूरदर्शिता को भी समझा जाना चाहिए जो आरम्भ में चमत्कारी दिखा कर पीछे के लिए अधिक घातक दुष्परिणाम छोड़ती है।


मानवी अन्तःकरण हूँ

(माया वर्मा)


मानवी अन्तःकरण हूँ (kavita)

क्यों नहीं मुझको रुलाये? विश्व मानव की व्यथायें ॥ मैं श्रद्धा का आभरणं हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ ॥ जब किसी की आँख रोती, सिसक कर आँचल भिगोती। अश्रु वे मेरे लिए है, सीप के अनमोल मोती ॥

बाँट कर ममता- सरसता-तृप्त हो -वह आचरण हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ ॥ बस, कलेवर ही नया है, सुत पिता पर ही गया है। मोम - से उर से निसृत, होती तथागत- सी दया है॥

तम निराशा का जहाँ पर मैं वही भास्कर किरण हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ॥ जब धरा पर द्वेष पलता- क्लेश में इनसान जलता। लिप्त हो जाता उसी में- पथ नहीं अपना बदलता॥

मार्ग में जो गढ़ता नया तब- मैं वही पहला चरण हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ॥ गिर रही है सभ्यताएँ- टूटती शुभ मान्यतायें, मिट चली संस्कृति- मनुज- क्या बन गया- कैसे बताये॥

दे सके जीवन किसी को-आज मैं ऐसा मरण हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ॥ स्वाति कण बन कर झड़ुँगा, प्यार जन मन में भरुँगा। जी सके मानव जहाँ- वह - युग नया निर्मित करूंगा॥

काल का सहचर-सृजन-संकल्प के व्रत का वरण हूँ। मानवी अन्तः करण हूँ ॥

*समाप्त*