ईश्वर भक्त की कसौटी

जीवात्मा की तुलना विकास एवं पतन के संदर्भ में बीज से की जा सकती है। बीज की तीन ही गतियाँ होती है। पहली तो यह कि वह गलना सीखे और विकसित हो पौधे के रूप में स्वयं को परिणति कर विधाता की श्एकोहं बहुस्यामिश् घोषणा के अनुरूप अनेकों बीजों को जन्म दे। दूसरी गति यह कि वह पिसकर आटा बन जाये। आहार रूप में जीवधारियों के काम आये और अन्त में विष्ठा में परिणति होकर उपेक्षित हो खाद बन जाय। तीसरी गति यह कि वह भीरु, संकीर्ण वन सतत् अपने को बचाने की बात सोचता रहे और अन्त में सड़न-सीलन द्वारा नष्ट हो जाये।

मनुष्य की भी इसी प्रकार तीन गतियाँ है। गलकर परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न हो अनेकों के काम आए। स्वयं यशस्वी जीवन जिए एवं अन्यों को ऊँचा उठाए। दूसरी गति यह कि अपने शरीर एवं परिवार की परिधि में आबद्ध हो पेट-प्रजनन तक की समस्याओं की पूर्ति में ही उलझा रहे। पशु स्तर की जिन्दगी बिताए और घिनौनी स्थिति को प्राप्त हो। तीसरी गति है- संकीर्णता एवं स्वार्थ परता। जिससे न तो स्वार्थ ही सधता है न परमार्थ। अति कृपण स्वार्थ बुद्धि वाले ऐसे व्यक्ति सबसे हीन योनि को प्राप्त होते है।

मानव जीवन की सार्थकता, उपलब्ध क्षमताओं की तारीफ तभी है जब वह प्रथम गति का वरण कर देव मानव बनने का प्रयास करे। गलकर पुष्पित, पल्लवित हो अनेकों को सन्मार्ग गामी बनाए। रास्ते तीनों ही खुले है। जो जिसे चाहे, अपनाकर अपनी गति को प्राप्त कर सकता है।

नित्य दैनन्दिन व्यवहार में यही तो हम देखते भी है।


समग्र सुख-शान्ति की स्थापना धर्म धारण से ही सम्भव होगी

एक राजा था। उसने राज्य के ज्ञानियों की परीक्षा करने के लिए एक विचित्र उपाय अपनाया। एक बकरा पाला। घोषणा की कि जो इसका पेट भर देगा उसे हजार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार मिलेगा। बकरे को कोई भी सवेरे से शाम तक अपने साथ ले जा सकता है और पेट भर सकता है। शाम को यह राजा ही जाँचेगा कि पेट भरा कि नहीं।

घोषणा सुनकर बहुतों का उत्साह उभरा। काम जरा सा और सरल भी। इनाम इतना बड़ा। अनेकों लालायित हुए और उसे कर दिखाने का आवेदन लेकर राज दरबार में आये।

राजा ने सभी के नाम नोट कर लिए और बारी-बारी एक-एक बकरा सभी को मिलने का वायदा करते हुए निश्चित दिन बता दिया।

अब सिलसिला शुरू हुआ। जिसकी बारी थी वह ले जाता और साधारण सी घास न खिलाकर -गेहूँ, चने आदि के पौधे खिलाता पूरी छूट देता और बढ़िया से बढ़िया हरियाली सामने रखता। शाम को इस आशा से दरबार पहुँचता कि उसे इनाम जरूर मिलेगा। पर परीक्षा के समय सभी को निरुतर होना पड़ता। राजा द्वारा जब घास सामने रखी जाती तो बकरा आदत के अनुसार उसे खाने लगता। फलतः उसका भूखा होना सिद्ध हो जाता।

रोज की इस घिस-घिस का रहस्य एक विचारशील ने समझा और नया उपाय सोच लिया। वह बकरे को खेत में ले गया और घास खाने के लिए जैसे ही उसने मुँह खोला वैसे ही एक छड़ी उसके मुँह पर जड़ दी। सारे दिन यही चलता रहा। बकरे को कुछ भी खाने का अवसर न मिला। वरन् वह खाने का प्रयत्न करते ही मार पड़ने के डर से इतना भयभीत हो गया कि चराने वाले के हाथ में छड़ी देखकर मुँह खोलना तो दूर उलटा मुँह फेर लेता और उसकी ओर पीठ कर लेता।

नई परिस्थिति में बकरे ने नई आदत अपना ली। तो वह व्यक्ति भूखे बकरे को लेकर राजदरबार में पहुँचा। रोज वाली परीक्षा की गई। बकरे के सामने घास थी। पर सामने ही चराने वाला छड़ी लेकर खड़ा रहा। भयभीत बकरे ने खाना तो दूर उलटे उस ओर से मुँह फेर लिया और पीठ करली।

दर्शकों ने तालियाँ बजाई और चराने वाला विजयी घोषित हुआ और उसे सहस्र स्वर्ण मुद्राओं को इनाम मिल गया।

प्रसंग समाप्त हो जाने पर सभी विज्ञजन बुलाये गये। राजगुरु ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा अपना मन बकरा है। उसे भोग विलास की हरी घास खाने की रुचि है। इतने पर भी उसका पेट भरता नहीं, चाहे कितना ही कुछ क्यों न मिले। जैसे ही नई वस्तु सामने आती है वह आदत के अनुसार अपनी अतृप्त ललक का परिचय देता है और पेट भरा होने पर भी नये को खाने के लिए मचल पड़ता है। उसे तृप्त नहीं किया जा सकता भले ही कितना ही चारा क्यों न डाला जाता रहे।

उपाय एक ही है-रोकथाम करने का और छड़ी जमाने का। छड़ी जमाना अर्थात् अनुपयुक्त के दुष्परिणामों का बोध करना। यह अपने अनुभव से भी सीखा जा सकता है और दूसरों की दुर्गति का परिचय कराने पर भी। मन को मारना हो तो उसे संयमी बनाने और सही रास्ते पर चलने के लिए बाधित करने का उपयुक्त उपाय है। सरकस के जानवर वे रिंग मास्टर के हन्टर के इशारे पर करतब दिखाना सीखते है। मन को भी कड़े अंकुश, अनुशासन और प्रतिरोध से ही काबू में लाया जाता है।


पूर्वाग्रहों पर अड़ कर न बैठें

सर्वेश्वर की उस सत्ता को प्रेम का- श्रद्धा का पर्याय माना गया है। शास्त्रकार ने कहा है-रसों वैसः । यह रस क्या है ? वस्तुतः यह रस उस अनुभूति का नाम है जिसके आस्वादन मात्र से आत्मा को परम सत्ता से मिलन संयोग जैसी असीम तृप्ति होती है। यह रस प्रेम रस ही तो है। ईश्वर का साक्षात्कार जब भी होता है, अन्तःकरण से शाश्वत प्रेम के निर्झर के फूट पड़ने के रूप में ही होता है। यह अगोचर सत्ता रस से भरपूर है, जहाँ आदर्शवादी उमंगों का समुच्चय विद्यमान है, घट-घटवासी वह सर्वव्यापी सत्ता अपना अस्तित्व भाव सम्वेदना, करुणा, परमार्थ के रूप में सतत् प्रकट करती रहती है। भक्त को क्या चाहिए? अपने अन्दर उस स्तर की श्रद्धा-भावनाओं की उत्कृष्टता ही तो वह गुण है जिसे विकसित कर भगवत् सत्ता का प्यार मिलता है। यही उसकी प्यास है, जो तृप्त अन्तःकरण को शान्त कर उसे श्रेष्ठता के पथ पर चलने को प्रेरित करती है।

भगवत् सत्ता से प्रेम किसी भौतिक आदान-प्रदान पर नहीं, आध्यात्मिक लेन-देन पर निर्भर है। भक्त को कुछ त्यागना पड़ता है और भगवान को अनुदान पाने वाले की गरिमा को ध्यान में रखना होता है। इस स्थिति में दोनों परस्पर पूरक बन जाते है । यह घनिष्ठता ही प्यार कहलाती है जो आदर्शों के परिपालन हेतु भक्त को पर्याप्त आत्मबल देती, उत्कृष्टता उभारती और सन्मार्ग पर चलने हेतु सहयोग देती है। इस प्रेम में पाने की नहीं, सतत् उत्सर्ग करने की- देते रहने की आतुरता बनी रहती है।

ईश्वर भक्त का परस्पर सम्बन्ध भावनात्मक आदान’-प्रदान का है। यह परम सत्ता श्रद्धा-प्रगाढ़ निष्ठा दृढ़ विश्वास का समुच्चय है। जहाँ भी ये तत्व इकट्ठे होंगे, वही दैवी चमत्कार उत्पन्न होगा। एकलव्य का मृतिका का गुरु और रामकृष्ण का काली इन्हीं तत्वों के अभिवर्द्धन से अनुप्राणित हुए व सामर्थ्यवान बने थे। मीरा का गिरिधर गोपाल इन्हीं का घनीभूत मूर्त रूप था। वस्तुतः भाव-श्रद्धा का सम्मिलित रूप ही भक्ति है। दोनों एक-दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं। श्रद्धारहित भक्ति तो ढोल के समान पोल व आडम्बर मात्र है। ऐसी पंगु भक्ति में कोई सामर्थ्य नहीं होती। इसे सामर्थ्यवान बनाने के लिए श्रद्धा एवं अगाध निष्ठा का समन्वय अपरिहार्य है।

निश्छल हृदय से की गई प्रार्थना भक्ति का ही एक रूप है, किन्तु दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। प्रार्थना वेदनापरक होती है, जबकि भक्ति मस्तीपरक। दोनों प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से ईश्वर साक्षात्कार के ही मार्ग है, पर उनके स्वरूप में थोड़ी भिन्नता है। लक्ष्य दोनों का एक ही है। भक्त अपनी गहन भक्ति के द्वारा भगवान से तादात्म्य जोड़ता है, वह ईश-चिन्तन में इतना मस्त हो जाता है कि उसे परिस्थिति, काल एवं स्वयं की भी सुधि नहीं रहती, दोनों के बीच की भिति टूट जाती है और भक्त-भगवान एक हो जाते है। चेतना रहते हुए भी वह ब्राहा चेतना से विलग हो अपने इष्ट में पूर्णतः लीन हो जाता है। तब सर्वत्र उसे अपना अधिष्ठात्रा ही नजर आता है, समस्त जड़-चेतन उसी के प्रसार-विस्तार रूप में दिखाई पड़ते है। अपने पराये की परिधि समाप्त हो जाती है। स्व का सीमा बन्धन टूटना ही भक्ति का चरमोत्कर्ष है। भक्त-भगवान का मिलन संयोग इसी स्थिति में होता है।्र्र

प्रार्थना में आत्मा की कसक होती है। घोर निराशा, असफलता, दरिद्रता अथवा दारुण दुःख में जब प्रार्थी की पुकार अन्तःकरण से प्रस्फुटित होती है, तो वह विधाता के पास पहुँचे बिना नहीं रहती। इस कातर-पुकार से भगवान या तो स्वयं प्रार्थी की सहायता के लिए दौड़े चले आते है अथवा किसी अन्य माध्यम से उसे समाधान प्रदान करते है, उसकी रक्षा करते एवं सहयोग देते है।

संपर्क-सूत्र इसी स्तर का होने से अभ्यर्थी की आवाज भगवान तक पहुंच जाती है, और भगवान की ओर से तभी उसका उत्तर भी प्राप्त होता है, अन्यथा उथले मन से लोभ-लिप्सा युक्त याचना तो अनसुनी ही रहती है। चूँकि विधि-विधान सम्बन्धी यह सत्ता भली-भाँति जानती है कि याचक फरेबी है और अन्यान्य मनुष्यों की तरह विधाता को भी भ्रमित करना चाहता है। सस्ती प्रार्थना के बदले अपने आपको न बदलने वाले बहूमूल्य उपहार के आकांक्षी आत्म-प्रवंचना में पड़े रहते समय गँवाते देखे जाते है। विधाता का यह शाश्वत नियम है कि वे ऐसे पाखण्डियों का साथ नहीं देते। उन्हें तो निश्छल और पवित्र मन वालों से प्रेम है, जो आडम्बरहीन है, उन्हें ही उनका अनुग्रह प्राप्त होता है।

अस्तु सच्चे मन से की गई प्रार्थना निरर्थक नहीं जाती, उसका कोई-न-कोई जवाब अवश्य मिलता है। एकबार रामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने उनसे पूछा कि क्या हर प्रार्थना सार्थक होती है? उनने उत्तर दिया “ अन्तःकरण से की गई सच्ची पुकार भगवान तक अवश्य पहुँचती है, वह बेकार नहीं जाती, भक्त को उसका उत्तर भी प्राप्त होता है।

शिष्य का शंका समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने आगे कहा “ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रहा”, अर्थात् ब्रहा अनन्त अपरिमित है। वह समस्त जड़-चेतन में उसी प्रकार रमा हुआ है, जैसे इस संसार में वायु के अणु। निराकार जल से जैसे साकार बर्फ जम जाती है, उसी प्रकार प्रार्थना रूपी शीतलता से उस अगोचर ईश्वर-सत्ता का साक्षात्कार किया जा सकता है। वह सत्ता सर्वज्ञ है, सर्व-शक्तिमान है। हम उसके आगे अबोध बालक से है। हमें सदा उसका नाम स्मरण करते रहना चाहिए, अपने अंतर्मन में उसे सदा बिठाये रखना चाहिये।

प्रार्थना की शक्ति के चमत्कारी परिणामों को भले ही विज्ञान सम्मत न माना जाय, इन्हें प्रमाण रूप में नित्य घटते देखा जा सकता है। आये दिन ऐसे अनेकों प्रसंग प्रकाश में आते व परमसत्ता की इस अलौकिकता का परिचय देते रहते है।

जापान में जोसुदा कस्बे में एक किशोरी सपरिवार रहती थी। नाम था येन। उसके पास किसी देवी की एक छोटी प्रतिमा थी। वह ऐसी सुघड़ थी, मानो साक्षात् देवी ही विराजमान हो। येन उससे बहुत प्यार करती थी। उसे सदा अपने कमरे में पलंग के सिरहाने एक छोटी मेज पर रखती थी और रात में सोते वक्त बहुत देर तक उससे बाते करती रहती, जैसे मूर्ति सचमुच उसकी बाते सुन रही हो। प्रतिदिन का यही उसका क्रम था।

दुर्दैव से एक बार वह बीमार पड़ी। आरम्भ में बीमारी को सामान्य समझकर घरवालों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और स्वतः ठीक हो जाने की उम्मीद से छोड़ दिया, किन्तु मर्ज बढ़ता ही गया। घर वालों को चिन्ता हुई, तो उसे योग्य डॉक्टरों से दिखाया गया, मगर बीमारी उन्हें भी समझ नहीं आयी। येन बिल्कुल कंकालवत् बन गई। अब वह अपने कमरे में पलंग पर लेटी-लेटी देवी की प्रतिमा के सामने रोती रहती और उससे मूक प्रार्थना करती रहती। निरन्तर वह शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होती जा रही थी। एक सप्ताह तक सब कुछ सामान्य क्रम में चलता रहा। एक सप्ताह बाद एक दिन अचानक मूर्ति की आंखों से आँसू झलकते दिखाई पड़े। आश्चर्य की बात जब से प्रतिमा ने रोना प्रारम्भ किया, येन उत्तरोत्तर ठीक होने लगी। देवी की प्रतिमा चौबीस घंटे रोती रहती, जिससे उसके नीचे बिछा कपड़ा पूरी तरह भीग जाता।

यह घटना बिजली की तरह चारों ओर फैली। बड़े-बड़े डॉक्टर व वैज्ञानिक भी उस दृश्य को देखने के लिए वहां उपस्थित हुए। उन्होंने आँसू का रासायनिक विश्लेषण किया। मानवी आँसू के ही सारे घटक उस जल में भी पाये गए। जब तक येन पूर्णतः ठीक नहीं हो गई; मूर्ति रोती रही। जिस दिन वह पूर्ण स्वस्थ हुई, प्रतिमा ने भी उस दिन से रोना बन्द कर दिया। इस घटना से जनसाधारण को प्रार्थना की शक्ति-सामर्थ्य पर विश्वास दिलाया, अनेंको में ईश्वर-निष्ठा विकसित की।

ऐसी ही एक घटना एक अमरीकी साहित्यकार के साथ घटी। अपटान सिनक्लेयर अपने जमाने के जाने-माने साहित्यकार थे। अमरीका में इनकी खूब ख्याति थी। विचारों से ये धार्मिक और ईमानदार प्रवृत्ति के थे। भगवान में इनकी गहरी आस्था थी और प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-प्रार्थना किया करते।

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- “ प्रार्थना करते-करते मैं भाव-विभोर हो जाया करता था। इस स्थिति में मेरे अन्तरंग से बार-बार एक आवाज उभरती ‘ सिन! तुम अपनी आस्था और निष्ठा को बनाये रखना। मैं देखता हूँ, कि तुम्हारी पत्नी कुछ संशयवादी है, किन्तु तुम अपने विश्वास को घटने मत देना। यदि तुम्हारी आस्था डगमगाई, तो फिर हमसे नहीं मिल पाओगे। सिनक्लेयर का कहना है कि यद्यपि यह वाणी स्थूल रूप में नहीं होती थी, फिर भी मुझे उसके एक-एक शब्द स्फुट सुनाई पड़ते।”

इसी पुस्तक में एक अन्य संदर्भ के साथ उन्होंने लिखा है कि एकबार उनकी पत्नी गम्भीर रूप से बीमार पड़ी। उनका निवास एक ऐसे गाँव से था, जहाँ से शहर काफी दूर पड़ता था। पत्नी को तत्काल शहर के किसी अस्पताल में दाखिल कराने के लिए कोई परिवहन-सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी और न गाँव में कोई डॉक्टर-हकीम ही था। सबसे बड़ी परेशानी तो यह थी कि मर्ज रात में यकायक उत्पन्न हुआ और देखते-देखते गम्भीर बन गया। दूसरी बात, उन्हें इस नये मकान में आये अभी दो ही सप्ताह हुए थे। अतः आसपास के लोगों से भी पूरा परिचय नहीं हो पाया था। इस स्थिति में बीमारी की बात किससे कहे? सोच-विचार कर देखा उपाय अब एक ही शेष था- ईश्वर। वे ही अब इस कठिन परिस्थिति में एकमात्र सहारा रहे गये है -वह विचार कर उनने प्रार्थना शुरू कर दिया।

वे स्वयं एक कमरे में थे और बगल वाले कमरे में उनकी पत्नी मरणासन्न अवस्था में पड़ी थी। रात भर वह बैठे ईसा की मूर्ति के सामने प्रार्थना करते रहे। सवेरा होने तक वे अभ्यर्थना करते रहे। यहाँ तक कि सूर्योदय हो गया, धूप चढ़ने लगी, तब भी वह बैठे ही रहे। अन्ततः पत्नी की पगध्वनि से सिनक्लेयर की तन्द्रा टूटी। पत्नी ने देखा, उनकी आंखों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी। पत्नी को स्वस्थ देख आर्श्चयमिश्रित प्रसन्नता में उसने पूछा-” नैन्सी, जो कुछ में देख रहा हूँ , क्या वह सच है? क्या सचमुच तुम ठीक हो गई हो? नैन्सी ने हामी भरी और रात घटी एक विलक्षण घटना का उल्लेख किया। उसने बताया-’ प्रार्थना में आपके बैठने के करीब दो घण्टे के करीब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे कोई दिव्य प्रकाश मेरे अन्दर प्रवेश कर गया हो। इसी के बाद से मेरी तकलीफें धीरे-धीरे घटने लगी। एक घण्टे बाद मेरे स्वास्थ्य में काफी सुधार हुआ, किन्तु इसी बीच नींद आ गई। अभी-अभी जब नींद खुली तो मुझे आपके प्रार्थना में बैठने की याद आयी और आपको देखने के लिए यहाँ चली आयी।

अपनी भारत भ्रमण यात्रा के दौरान पाल ब्रण्टन एक बार बनारस पहुँचे। वहाँ उनकी एक प्रसिद्ध ज्योतिषी सुधी बाबू से भेंट हुई। बातचीत से ज्ञात हुआ कि सुधी बाबू अब अपने परिवार में अकेले है और यही अपने मकान में रहते है। ब्रण्टन महोदय ने जब उनकी ज्योतिष विद्या के बारे में पूछा, तो उनने कहना आरम्भ किया-” बचपन में मैं बहुत मन्द बुद्धि था। कुछ भी पढ़ता तुरन्त भूल जाता । परीक्षाओं में असफल रहता। इससे माँ-बाप बराबर झिड़की दिया करते। कुछ समय तक तो मैं इसे सहता रहा पर जब प्रतिदिन यही क्रम बन गया, तो मैं परेशान हो उठा और इसके लिए भगवान से मौन प्रार्थना करने लगा। अभ्यर्थना से मेरा हृदय कभी-कभी बुरी तरह टूट जाता। लेकिन अन्दर से सदैव यही स्फुरणा मिलती रही कि “ प्रार्थना निरन्तर करते रहना। कभी मुझे भूलना नहीं”। इस अंतर्ध्वनि से मेरा हृदय इतना भावुक हो उठता, कि प्रायः मैं रो पड़ता। लम्बे समय तक मेरा यह क्रम चलता रहा। अचानक एक दिन मुझे एक स्वप्न दिखाई पड़ा। सपने में एक दिव्य पुरुष मुझसे कह रहे थे -’तुम ज्योतिष का अध्ययन शुरू करो, सफलता मिलेगी।’ तभी से मैंने अपना सारा ध्यान ज्योतिष पर केन्द्रित कर लिया। ज्योतिष शास्त्र की दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन और संग्रह आरम्भ किया। उसी प्रार्थना का परिणाम है कि आज मेरा भवन ज्योतिष शास्त्र की एक अनुपम लाइब्रेरी के रूप में परिणित हो गया है, ज्योतिष विद्या की अनेकों अच्छी व दुर्लभ पाण्डुलिपिया के रूप में मुझे यह ज्ञान सम्पदा मिली है। सुधी बाबू ज्योतिष में इतने निष्णान्त थे कि मात्र सामान्य अंक गणना द्वारा हर व्यक्ति का जीवन-वृत्तांत बता देते थे।

गाँधीजी प्रार्थना को आत्मा का आहार मानते थे। उनके अनुसार यह अध्यात्म का पहला कदम है। इसमें खरा उतरने के बाद ही व्यक्ति आगे के सोपानों का श्रेयाधिकारी बन सकता और सफलता पा सकता है। उनका कहना था, अध्यात्म की शुरुआत आत्म-परमात्मा तत्वों के अस्तित्व स्वीकारोक्ति से ही होती है। इसके बाद ही इसकी गहराई में प्रवेश का सुयोग बनता है। अपने अन्दर इन तत्वों को परिपुष्ट और सुविकसित बनाने के लिए वे प्रार्थना-उपासना सेवा को ही प्रमुख मानते थे और आत्मा को इन्हीं उपचारों से पोषण प्राप्त होने की बात कहते थे।

हालीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता पीटर सेलर्स के जीवन में भी एक अद्भुत घटना घटी थी। आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व की बात है। वे अपने दो इंजिन वाले विमान द्वारा बरमूडा त्रिकोण पार करने का प्रयास कर रहे थे। अमेरिका के पूर्वी तट की ओर स्थित इस रहस्यमय त्रिभुज के बारे में पहले कई रहस्यमय घटनाक्रम प्रकाश में आ चुके थे। फिर भी खतरों से खेलने वाले आकल्ट के प्रेमी इस व्यक्ति ने अपनी उड़ान जारी रखी। उन्हें पता था कि उड़न तश्तरी से लेकर वायुयान गायब होने जैसे कई प्रसंग इससे जुड़े है। इन प्रसंगों पर सोचते सोचते वे लगभग इस त्रिभुज को पारकर ही चुके थे कि उन्हें लगा, वायुयान उनके नियन्त्रण के बाहर जा रहा है। वह बड़ी तेजी से नीचे गिरने लगा जबकि एल्टीट्यूड मीटर सही रीडिंग दे रहा था। उनका कहना था उन्हीं क्षणों में उन्हें अपनी भारत यात्रा के दौरान एक हिन्द योगी द्वारा सिखाये गये गायत्री मन्त्र का स्मरण हो आया। आसन्न मृत्यु संकट से ध्यान हटाकर वे पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ इस मन्त्र का सतत् जाप करने लगे। जप के समय आंखें बन्द थी प्रार्थना चल रही थी लेकिन इंद्रियां विमान के नियन्त्रण में संलग्न थी। जब कुछ क्षणों बाद उनकी आंखें खुली तो उन्होंने देखा कि खतरा टल चुका है, वे जीवित है और उनका विमान उस त्रिभुज को पारकर बरमूडा द्वीप पर आ चुका है इस अनुभूति को उन्होंने अमेरिका के मुख्य पत्रों में प्रकाशित करवाया व लिखा कि “ इस मन्त्र के जप में ईश प्रार्थना में अद्भुत शक्ति सामर्थ्य है। मैंने तो इसकी अनुभूति मात्र की है। वैज्ञानिक यदि जप प्रक्रिया व प्रार्थना शक्ति के परिणामों पर अनुसन्धान कर सके तो यह सबसे बड़ा शोध कार्य होगा।”

सुप्रसिद्ध लेखक एरिकवाँन डैनिकन ने अपनी पुस्तक “मिरेकल्स ऑफ गोडस” में अनेकों ऐसे चमत्कारों का वर्णन किया है जो प्रार्थना की प्रतिक्रिया स्वरूप अभी भी घटते देखे जा सकते है। इनमें से एक फ्रांस के “लाँर्डिस” स्थान से सम्बन्धित घटना यहाँ उल्लेखनीय है। इसे न केवल ईसाई वरर्न सभी धर्म समुदाय एक तीर्थ मानते है। दुनिया के कोने-कोने से लाखों की संख्या में जन समुदाय प्रतिवर्ष यहाँ एकत्र होते देखा जा सकता है। इस स्थान पर एक कन्या वनेर्डेट ने 28 वी शताब्दी में प्रार्थना द्वारा ईसा से साक्षात्कार किया था।

वस्तुतः सभी धर्म मतावलम्बियों ने प्रार्थना शक्ति को ईश्वरीय सता से साक्षात्कार का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना है। भगवान की आकृति कुछ भी हो, श्रद्धा-भक्ति से की गई प्रार्थना के द्वारा उसके साथ निश्चित ही तादात्म्य बिठाया जा सकता है। आत्मिक प्रगति का लक्ष्य इन दोनों के समन्वय से ही पूरा होता है। भक्तियोग की साधना तत्काल प्रतिफल देने वाली है, लेकिन इसका क्रम ज्ञानयोग, कर्मयोग की सिद्धि के बाद आता है। श्रद्धा को श्रेष्ठता से प्यार माना गया है एवं भक्ति को उदार आत्मीयता एवं सेवा सज्जनता। पात्रता प्राप्ति के बाद की गयी निश्छल प्रार्थना निश्चित ही अपने सुपरिणाम दिखाती है साधक को धन्य बना देती है।


जो ईश्वर से डरेगा, उसे और किसी से नहीं डरना है

चिन्तन से चरित्र और चरित्र से व्यवहार बनता है। व्यवहार ही कर्म है। कर्म से परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। पदार्थों का संचय और अनेकों का सहयोग सत्कर्मों के आधार पर ही सम्भव होता है। सत्कर्म और कुछ नहीं सद्विचारों के ही प्रतिफल है। प्रगति के सुविस्तृत वृक्ष का उद्भव जिस बीज के अंकुरित होने के कारण होता है। उसे उपयुक्त दिशा में बहने वाला विचार प्रवाह कह सकते है।

विचारो की दो दिशा धाराएँ है एक विधेयात्मक दूसरी निषेधात्मक। इंजन आगे भी चलता है और पीछे भी। कृत्यों में सत्कर्म भी सम्मिलित है और दुष्कर्म भी। ज्वार-भाटे की तरह उत्थान और पतन की भी विधा इस संसार में गतिशील है। पुण्य और पाप का स्वर्ग नरक इन्हीं के आधार पर विनिर्मित होता है। विचारो को सही दिशा दे सकना ही परम पुरुषार्थ माना गया है।

अपने आपको दीन, दुःखी, दरिद्र, दुर्भाग्यग्रस्त मानते रहने का जी हो तो इसका बहुत ही सरल तरीका यह है कि अपने से अधिक सुखी समुन्नत लोगों के साथ तुलना करने लगिये। स्थिति पिछड़ी हुई दिखाई पड़ती रहेगी। इसके विपरीत यदि वर्तमान स्थिति में ही सुखी सम्पन्न, सौभाग्यवान मानने का मन हो तो वैसी मान्यता बन जाने में भी कोई देर नहीं लगेगी। अपने से दुःखी दरिद्रों के साथ तुलना कीजिए। तुरन्त प्रतीत होगा कि हम लाखों करोड़ों से कही अधिक अच्छी स्थिति में है। कुबेर भी अपने को दरिद्र कह सकते है क्योंकि उनसे अच्छी स्थिति लक्ष्मी के पति लक्ष्मी नारायण तो होगे ही। इसी प्रकार ऋषि कल्प लोगों को अपने कमण्डल जैसे उपकरणों में भी कुछ अनावश्यक और किसी को डालने योग्य प्रतीत हो सकता है। यह सब विचारो का चमत्कार है। वे जैसे भी होगे वैसी ही अनुभूति होगी और मान्यता बनेगी। वस्तुतः मनः स्थिति ही परिस्थिति का बोध कराती है।

भविष्य के सम्बन्ध में अन्धकार और संकट में भरी पूरी संभावनाएं मजे में गढ़ी जा सकती है। कल्पना पर कोई रोक-टोक नहीं। उन्हें जैसा भी चाहे गढ़ा जा सकता है। इसके समर्थन में तर्क, तथ्य, कारण और उदाहरण भी ढूंढ़े जा सकते है। फुन्सी बढ़कर कैन्सर बन जाने के- जुकाम बिगड़कर तपेदिक होने के कारण ऐसे अनेकों उदा-हरण मिलते है जिनमें लोगों के प्राण चले गये। कोई चाहे तो फुन्सी उठते या जुकाम होते ही उसके बढ़कर भयंकर होने और मरण होने की बात मन में बिठाई जा सकती है। मान्यता की पुष्टि के लिए उस प्रकार की घटनाओं का स्मरण करते रहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि आशावादी विचार पद्धति हो तो उन उदाहरणों की भी कमी नहीं जिनमें असाध्य समझे गये रोगी भी अच्छे हुए और बाद में लम्बी अवधि तक जिये है। दोनों में से किस स्तर की कल्पना की जाये, यह पूर्णतया अपनी मर्जी की बात है। बाते दोनों ही सही और दोनों ही गलत है। यथार्थता यह है कि भविष्य का किसी को बोध नहीं! बात कोई निश्चित नहीं। भवितव्यता को भगवान को पता हो सकता है। मनुष्य उससे पूर्व ही -अघटित घटनाओं की कल्पना के सहारे किसी भी स्तर की गढ़ सकता है और समय पर आने से पूर्व भी उद्विग्न या प्रसन्न रह सकता है। दोनों में से किसे चुना जाये यह अपनी मर्जी की बात है।

जिस स्तर के विचार मस्तिष्क में घूमते रहते है वैसी ही अभिरुचि एवं आकाँक्षा ढलने लगती है। धीरे-धीरे वैसा ही स्वभाव बन जाता है । क्रिया पद्धति भी वैसी ही ढलने लगती है । साथी सहयोगी भी उसी स्तर के जुटने लगते है फलतः समूचा वातावरण ही उस स्तर का बन जाता है जैसों का मनःक्षेत्र में चिन्तन प्रवाह बहाया गया। अभिरुचि में सृजनात्मक शक्ति है वह अपने अनुरूप सरंजाम जुटाने में बहुत हद तक सफल होती रहती है। चोर जुआरी अपने जैसों की चाण्डाल चौकड़ी जुटा लेते है। वे उन्हें ढूंढ़ लेते है या उस प्रकृति वाले खोजते-खोजते पास आ पहुंचते है। सन्त सज्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनकी देव मण्डली में बनती और घनिष्ठता बनी रहती है। विभिन्न स्तर के समुदाय, क्लब, संगठन इसी आधार पर खड़े होते है। उसके लिए कोई बहुत बड़ा प्रयत्न नहीं करना पड़ता। प्रकृति एक जैसों को एक जगह इकट्ठा कर देती है। पशु पक्षियों तक में ऐसा होता है तो मनुष्यों में ऐसा क्यों न होगा। स्वर्ग और नरक के अनुरूप और अनुकूल प्रकृति के लोग उपयुक्त परिस्थितियों में जा पहुँचते है। सृष्टि व्यवस्था इस प्रयोजन में सहज सहायता करती रहती है।

एक ही परिस्थिति में एक ही जगह जन्मे दो व्यक्तियों के दिशा धाराओं में क्रिया और सफलताओं में आश्चर्य-जनक जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया गया है। इसका कारण और कुछ नहीं उनकी विचार भिन्नता भर है। परिस्थितियां मनुष्य को कुछ बनाती है यह आँशिक सत्य है। केवल दुर्बल लोगों के मनोभूमि पर ही यह उक्ति लागू होती है। हवा के साथ तिनके और पत्ते उड़ते है। यह जितना सही है, उससे ज्यादा सही है लोग झाड़ियां काटकर राह बनाते और दुर्गम पर्वतों पर जा चढ़ते है। मनोबल का चुम्बकत्व ऐसा प्रचण्ड है कि अपने अनुरूप साधन एवं सहयोग अर्जित कर सके। मनस्वी लोग अनुकूल वातावरण बनाने या फिर खोजते-खोजते यहाँ तक जा पहुंचते है।

प्रगतिशील महामानवों की जीवनचर्या का तात्विक विश्लेषण करने पर यह तथ्य सभी पर समान रूप से लागू होता है कि दिशाधारा का निर्माण सृजनात्मक विचार पद्धति ने किया। वे उन पर दृढ़ रहे। प्रतिकूलताओं में भी मान्यताओं के दीपक जलते रहे। निर्धारित लक्ष्य की ओर नियमित रूप से बढ़ते रहे। मार्ग में अड़चने आयी, निरुत्साहित करने वालों की कमी नहीं रही, फिर भी वे विचलित नहीं हुए। कदम तो कभी धीरे कभी तेज उठे पर वे रुके नहीं। संकल्प बल साथ देता रहा। फलतः वे वहां पहुँचे जहां उन्हें समुचित ध्येय तथा सम्मान मिल सका। ठीक यही बात उन पर भी लागू हुई है, जो हेय चिन्तन के कुचक्र में फंसे रहे, कुसंग में निरत रहे, दुर्व्यसनों के अभ्यस्त बने और क्रमशः अनुपयुक्त मार्ग पर एक के बाद दूसरा कदम उठाते चले गये। परिणति अत्यन्त दुःख दायी हुयी। पतन और पराभव के गर्त में गिरे और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़ा करते चले गये। मोटे रूप में इन दोनों के मध्यवर्ती अन्तर घटनाक्रमों परिस्थितियों और सहयोगियों के साथ भी जुड़ता है किन्तु वास्तविकता यही थी कि मनः स्थिति ने परिस्थितियाँ गड़ी और उत्थान पतन के सरंजाम जुटा दिये। जिन्हें वातावरण घसीटता रहता है वे एक ही सीमा तक ही आगे-पीछे हट या बढ़ जाते हे। असाधारण स्तर की भली या बुरी प्रगति में मनुष्य की विचारधारा ही प्रमुख भूमिका निभाती है।

आमतौर से साधनों को महत्व दिया जाता है और परिस्थितियों को उत्थान-पतन का निमित्त कारण माना जाता है। पर वस्तुतः वैसा है नहीं। यदि ऐसा ही होता तो हेय परिस्थितियों में जन्मे लोग सदा वैसे ही बने रहते। जो सम्पन्न परिस्थितियों में जन्मे वे सुविधाओं के आधार पर कही से कही जा पहुँचते। पर ऐसा होता नहीं। मनः स्थिति ही दिशा विशेष में जीवन क्रम को धकेलती है और फिर दौड़ती रेल के पीछे उड़ते पत्तों की तरह साधन और सहयोग भी अनायास ही खिंचते जुटते चले आते है। मनुष्य मनोबल का धनी है। इसी के सहारे वह अपनी दुनिया वैसी बना लेता है जैसा कि उसने चाहा है। अपने को ढालने और धकेलने की क्षमता हर किसी में विद्यमान है। उसका उपयोग निषेधात्मक और विधेयात्मक विचारो के रूप में पतन या उत्थान के निमित्त किया जाता रहता है। सफलताएं इसी आधार पर मिलती है।


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वचनों का बवण्डर भले ही समुद्र जितना विस्तृत क्यों न हो, उससे आत्मा की प्यास नहीं बुझती। इसके लिए कर्म के चुल्लू का प्रयोग करना पड़ेगा, भले ही वह आकार में छोटा हो।


अचेतन मन की व्याधियाँ और उनका निराकरण

यदि परब्रह्म की परिभाषा की व्याख्या करनी हो तो सृष्टि के कण-कण में संव्याप्त नियम चेतना, अनुशासन व्यवस्था को देखना होगा। सूक्ष्म दृष्टि से देखने वाले पार्टिकल फिजिक्स के ज्ञाता कहते है कि पदाथर्र के न दीख पड़ने वाले छोटे कणों से लेकर जीवाणु-विषाणु तक एवं तारा मंडलों के समूहों में गतिमान फोटान-लवसान कणों तक के बीच एक अत्यन्त सजग अनुशासित विधि-व्यवस्था कार्यरत दिखाई पड़ती है। इकॉलाजी के इसी पक्ष को नियामक सत्ता को विज्ञान की दृष्टि में ईश्वर कह सकते है। आस्तिकता का यही एक प्रमाण ऐसा है जिसे पूर्णतः विज्ञान सम्मत कहा जा सकता है।

नास्तिकतावादी दर्शन के प्रणेता-नीत्से ने आज से कोई सौ वर्ष पूर्व घोषणा की कि “ ईश्वर अब अन्तिम रूप से मर गया है। उसका प्रादुर्भाव अब अतिमानवों की पीढ़ी के रूप में होगा। “ उसने कहा था कि तलाशने का कितना भी प्रयास किया जाये, ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं दिखता। इस घोषणा ने एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में तहलका तो मचा दिया पर वैज्ञानिकों को ईश्वर परब्रह्म की सही व्याख्या हेतु अनुसन्धान हेतु भी प्रेरित किया। पदार्थ विज्ञान के ज्ञाता जब “ यूनिफिकेशन ऑफ कोर्सेज” की चर्चा करते है तो ऊर्जा के रूप में पदार्थ में छिपी चेतना के स्वरूप की एक झाँकी देख पाते है एवं जितना इस रहस्य को खोजने का प्रयास करते है उतना ही गहरा इसे पाते है।

गत सौ वर्षों की वैज्ञानिक प्रगति का इतिहास पदार्थ भौतिकी के उद्भव विकास का नहीं, कण-कण में संव्याप्त चेतन सता की प्रगति का इतिहास कहा जा सकता है। पदार्थ दिखाई पड़ता है, लेकिन उसमें छिपी ऊर्जा दृष्टिमान नहीं है। शरीर दृष्टिगोचर होता है लेकिन आत्मा नहीं। कारण यह है कि पदार्थ व शरीर स्थूल है, अतः वह स्थूल नेत्र से दृष्टिगोचर हो जाता है तथा सहज ही उस पर विश्वास हो जाता है। इसके आगे सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत मन आता है, जिसकी क्रिया से तो हमस ब परिचित होते है, परन्तु उसे प्रत्यक्ष देखना सम्भव नहीं। इसी तरह अति सूक्ष्म आत्मा को देखना तो और भी दुष्कर है।

कोई चीज दीखती नहीं इससे उसके अस्तित्व को झुठलाया नहीं जा सकता। मनुष्य की तो देखने व सुनने की भी सीमा है। एक खास वेवलेन्थ पर ही हम देख अथवा सुन सकते है। इससे कम अथवा अधिक वेवलेन्थ की ध्वनि अथवा दृश्य हमारे किसी काम के नहीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार मनुष्य के कान केवल उतने ही ध्वनि कम्पन पकड़ सुन सकते है, जिनकी गति 33 प्रति सेकिण्ड से लेकर 40 प्रति सेकिंड के बीच होती है। जबकि ब्रह्मांड से इससे अधिक गति के कम्पन जो शरीर को नुकसान पहुंचा सकते है, सदा गुँजित होते रहते है। 75 डेसीबल की ध्वनि मनुष्य के लिए असहा हो जाती है। आमतौर से आपसी बातचीत का क्रम 10-20 डेसीबल पर चलता है। 150 डेसीबल पर शरीर में भारी विक्षोभ उत्पन्न होता है। एक तारे के टूटने मात्र से भयंकर गर्जना होती है, जो हमें बहरा बना दे सकती है परन्तु वह हमें सुनाई नहीं देती।

पानी में विद्यमान अगणित जीव-जन्तु, आसमान में छाए असंख्य तारे इन आंखों की पकड़ में नहीं आते। सूर्योदय सूर्यास्त के समय आसमान में छाया रंग-बिरंगा वातावरण दृष्टि भ्रम ही होता है। वस्तुतः वहाँ कोई रंग का अस्तित्व नहीं होता। सिनेमा में सिलसिले वार चलने वाला दृश्य गतिशीलता का खेल है। उसकी गति के कारण हम दो चित्रों के बीच के अन्तर को समझ नहीं पाते। रेगिस्तान में मृग मरीचिका का उदाहरण सर्वविदित है, जहाँ दृष्टि भ्रम के कारण सरोवर के अस्तित्व का बोध होता है। चन्द्रमा से देखने पर पृथ्वी आसमान में दिखती है। सूर्य का रंग वास्तव में श्वेत होता है, परन्तु वायुमंडल के धूलि कण के कारण वह लाल-सा प्रतीत होता है। अनन्त आकाश से विद्युत चुम्बकीय किरणें सतत् पृथ्वी पर बरसती रहती है। इन्हें विज्ञान की भाषा में ‘कास्मिक रेज’ कहते है। मनुष्य को इसका कभी भान नहीं होता।

विज्ञान ने अब स्वीकारा है कि यह जगत वास्तव में तरंगों का समुच्चय है। एक शब्द में यहाँ जो कुछ भी है सब तंरगमय है। जो भी दीखता अथवा जिसकी अनुभूति होती है, वह सब क्वाण्टा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। भौतिक विज्ञान में पार्टिकल फिजिक्स के अनुसार प्रत्येक पदार्थ की संरचना इलेक्ट्रॉन , प्रोटान के आधार पर हुई है। इससे यह पता चलता है कि जगत की हरेक वस्तु एक दूसरे से सम्बन्धित ही नहीं वरन् एक ही है। जड़ चेतन सभी में एक ही सता विद्यमान है तथा सबका उद्गम केन्द्र भी वही है। दूसरी तरफ शक्ति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों का जीवन काल एक सेकिंड का दस करोड़वां हिस्सा तथा गति 1 लाख 96 हजार मील प्रति सेकिंड बताई गई है। अतः इनके मापन में वैज्ञानिक असमर्थता व्यक्त करते है। फिर भी इस ओर और भी अधिक शोध प्रयास करने की आवश्यकता को अनुभव किया गया है। क्वाण्टम थ्योरी विशेष रूप से इस विषय से सम्बन्धित अध्ययन में ही संलग्न है। यह थ्योरी शक्ति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों का अध्ययन विश्लेषण करती है। डॉ0 यूनान पी0 विग्नर ने चेतना की जानकारी प्राप्त करने हेतु इसे एक महत्वपूर्ण माध्यम बतलाया है।

शोध निष्कर्ष के रूप में सर ए0एस॰ एड्रिगन का कथन है कि ‘ भौतिक पदार्थों के अन्तराल में एक चेतन शक्ति क्रियाशील है, जिसे उसका प्राण-जीवन का आधार माना जा सकता है। अब तक हम इसके स्वरूप से अवगत नहीं हो सके है, पर उसके अस्तित्व को नहीं झुठलाया नहीं जा सकता। मैक ब्राइट ने भी अपना अध्ययन निष्कर्ष इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि परोक्ष जगत् में एक ज्ञानयुक्त एवं इच्छायूक्त सत्ता के होने की पूरी सम्भावना है। विश्व की समस्त गतिविधियां उसी से संचालित है। मोर्डेल ने कहा है कि ‘ अणु और पदार्थ के कणों का व्यवहार से यह स्पष्ट होता है कि परोक्ष जगत में कोई चेतन शक्ति क्रियाशील है।

प्रख्यात वैज्ञानिक इंगोल्ड ने भी कहा है - ‘सृष्टि से क्रियाशील चेतन शक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझने में अभी हम असमर्थ है।’

भारतीय तत्वदर्शियों ने इस विषय में महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किये है। उनने चेतना के व्यापक स्वरूप के विषय में यह दर्शन प्रतिपादित किया था-

एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूता धिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।

अर्थात्- वही एक देव सभी प्राणियों में अन्तरात्मा रूप में व्याप्त तथा समस्त कर्मों का नियामक संचालक है। निर्गुण होते हुए भी चेतना शक्तियुक्त है। समस्त क्रिया-कलापों का साक्षी है।

ईशोवस्योपनिषद् में भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलता हे ‘ वह गतिमान है, स्थिर भी है। दूर है और निकट भी है। वह हरेक के अन्दर और बाहर भी स्थित है।’ स्पष्ट है कि ऐसा सर्वव्यापक स्वरूप चेतन शक्ति विद्युतीय ऊर्जा का हो सकता है।

वैज्ञानिकों ने तो मात्र इतना ही कहा है कि उनके वर्तमान साधनों में ईश्वर के अस्तित्व का परिचय नहीं मिलता। यह कभी नहीं कहा कि यह उनका अन्तिम निष्कर्ष है, ज्ञान की चरम सीमा है, जो जान लिया है वही अन्तिम है। विनम्र शब्दों में कहे तो यह कि विज्ञान दुराग्रही नहीं है। भविष्य में सम्भावित नयी खोजो के लिये उसका द्वार हमेशा से खुला रहा है। बचपन का विज्ञान किशोरावस्था से गुजरकर अब जैसे-2 प्रौढ़ हो रहा है, जानकारियाँ अधिक संभावनाओं से भरी, संशोधित एवं नितनूतन उपलब्ध होती जा रही है। हर नवीन शोध पिछली को नकारती ही नहीं नये प्रतिपादन प्रस्तुत कर आगे बढ़ती है। ऐसी व्यवस्था न होती तो विज्ञान कैसे प्रगति कर पाता? उसकी शोध अनुसंधान के अनेकानेक विषयों में एक खोज ईश्वर ने की, विधि-व्यवस्था का संचालन करने वाले नियन्ता की भी है।

दर्शन शास्त्र के अनुसार ईश्वर का “ श्एकोहं बहुस्यामिश् का उद्घोष इस बात का प्रमाण है कि ब्रहा चेतना एक ही है। बिजली की धारा से जिस तरह अनेकानेक कार्य किये जा सकते है, उसी तरह ब्राहा चेतना का उपयोग अनेकों रूप में प्रकट होता हे। स्थूल का अस्तित्व भी बिजली के आधार पर टिका रहता है। ठीक इसी प्रकार निराकार ब्रहा शक्ति को प्रत्यक्ष जगत को क्रियाशीलता में अनुभव किया जा सकता है तथा प्रत्यक्ष जगत का प्राणाधार भी वही होता है।

ऋषियों ने इस जगत के गूढ रहस्यों का अध्ययन, यंत्रों के आधार पर नहीं, आत्मज्ञान के आधार पर किया है। उनने प्रमाणित कर दिखाया था कि जो मनुष्य के भीतर है वही बाहर भी है तथा जो बाहर है वही भीतर भी है। उनने मानव मात्र के अन्तराल की खोज को समस्त ब्रह्मांड की खोज बतलाई थी। एक शब्द में उनने इसे ‘आत्मिकी ‘ कहा था। जिसका भावार्थ है अपने आप को-अपने अन्तरंग में छिपे गूढ रहस्यों को जानने की साधना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ध्यान-साधना का रास्ता सुझाया गया था।

जल की सतह पर यदि हलचल मची हो तो उसकी परत को देखना सम्भव नहीं। ठीक उसी प्रकार मन में ज्वार-भाटे उठते रहे तो उसके अन्तराल में सन्निहित दिव्य चेतना का अनुभव अत्यन्त मुश्किल है। इसके लिए तो संयमित व एकाग्र मन की आवश्यकता है जो ध्यान-साधना से सम्भव है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे अपनी मनः शक्ति को माया रूपिणी प्रकृति को समझने में समय नष्ट न करके दिव्यात्मा के अनुभवों की खोज में प्रयुक्त करें, जिससे परम सत्य की जानकारी तथा मानव जीवन के परम उद्देश्य का उद्घाटन हो सके।


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ईश्वर क्या है, कहाँ है? युगों-युगों से मनीषी यह जिज्ञासा उठाते व समाधान खोजते रहे है। ऋग्वेद का ऋषि कहता है” एको विश्वस्य भवनस्य राजा” वह सब लोकों का एकमात्र स्वामी है तथा “ तस्मिन् ह तस्युमं वनानि विश्वा” उस परमात्मा में ही सम्पूर्ण लोक स्थित है। उपनिषद्कार कहते है-” ईश्वर को आंखों से कोई नहीं देख सकता, किन्तु हममें से पवित्र मन वाला हर कोई अपनी विमल बुद्धि से ईश्वर को देख सकता है।” वैज्ञानिकों ने भी सृष्टि के प्रणेता ज्येष्ठ माने जाने वाले परब्रह्म को भी अपनी अन्वेषक दृष्टि से देखा व अपना अभिमत व्यक्त किया है।


मनुष्य चाहे तो नर पिशाच भी बन सकता है

जे0 कृष्णमूर्ति कभी भगवान थे, पर अब इंसान हो गये। यह एक अचम्भे की बात है। इंसानों में से अपने को भगवान घोषित करते हुए अनेकों देखे और सुने गये है, पर ऐसा कदाचित् ही कही हुआ हो कि भगवान ने अपना ईश्वरीय चोला उतार फेंका हो और मात्र इंसान रह गये हो।

यह कथा जे0 कृष्णमूर्ति की है। इन्हें थियोसोफिकल सोसायटी ने नया मसीहा घोषित किया था। बाइबिल के एक प्रसंग में ईसा मसीह का दुबारा प्रकट होने का जिक्र है। समय का वर्णन भी ऐसा ही है, जिसकी संगति इस शताब्दी से खाती है।

एक अवकाश प्राप्त ब्राह्मण अफसर के घर जे ॰ कृष्णमूर्ति का जन्म हुआ। योरोप में ख्याति प्राप्त अध्यात्म नेता लेडवीटर ने अपने दिव्यज्ञान के सहारे घोषणा की िकइस बालक में ईसा मसीह की दिव्य आत्मा है। इस घोषणा पर विश्वास किया गया और बालक को अधिक योग्य बनाने के लिए उसकी शिक्षा-दीक्षा की गई, उन्हें इंग्लैण्ड ले जाया गया। वयस्क होने पर उन्हें फ्राँस की सोरबीन यूनिवर्सिटी में पढ़ने भेजा गया। चुपके -चुपके उनकी ख्याति फैलायी गयी, फलतः उनके भक्तों की कोई कमी न रही।

सन 1928 में कैंब्रिज नगर के एर्डे किले के मैदान में एक सम्पन्न भक्त ने अपनी पाँच हजार एकड़ भूमि इस नये मसीहा को भेंट की। ताकि भक्तजनों के लिए एक साधक सम्पन्न नगर उस पर बसाया जा सके।

पर यह सिलसिला बहुत दिन न चल सका। कृष्णमूर्ति के कितने ही स्वागत-समारोह हो चुके थे, उनमें वे नपी-तुली बाते कहते थे और बताये हुए तौर-तरीके पर बैठते थे, पर हैम्पशायर के वुक्स वुड पार्क में एक नया धमाका हुआ। उस समारोह में उनने अपनी पोल स्वयं खोल दी और कहा कि “ न तो मैं मसीहा हूँ, न कोई विचित्र व्यक्ति। दूसरों की तरह में साधारण आदमी हूँ। मुझसे किसी चमत्कार की आशाएँ कोई न करे। आप लोग अपने जैसा ही एक सामान्य व्यक्ति मुझे माने। मसीहा अपने सिवाय अपने लिए और कोई नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति ऊँचा उठा, तो वह अपने प्रयास -पुरुषार्थ से स्वयं ही ऊँचा उठा है। मेरे सम्बन्ध म अब तक की मान्यताओं को बदल दें, किसी भ्रम में न रहे। मैं भगवान नहीं, मात्र इंसान हूँ।

इनका यह भाषण धमाके जैसा था। जो उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाए बैठे थे, उन पर एक प्रकार से तुषारापात हो गया। भगवान के ईसा नये अवतार के सम्बन्ध में जिनने बड़े-बड़े सपने देखे थे, उनकी आंखें खुल गई।

साथ ही सत्य के अन्वेषकों को एक बड़ा सहारा मिला। जो उठा है अपने ही कर्मों या पुरुषार्थ से उठा है। जो गिरा है, उसे उसके कर्म ने ही गिराया है। दूसरे किसी को सलाह भर दे सकता है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि अपने बलबूते किसी का उद्धार करे।

जे ॰ कृष्णमूर्ति के इस भाषण से धर्मक्षेत्र में व्यापक हलचल मच गई। अवतार की आशा पर बहुत कुछ पाने की जो आशा लगाये बैठे, उनके सपनों का बालू का महल ढह गया। जिनने उन्हें भगवान बनाया था और उनके सहारे बहुत खेल खड़ा करने की आशा कर रहे थे, उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। इसके बाद जे0 कृष्णमूर्ति ने साधक वेश-भूषा में सत्य का उद्घाटन करते हुए अपना प्रचार प्रारम्भ किया कि हर मनुष्य आत्म-निर्भर है, अपने विचारो और कार्यों से वह उठ या गिर सकता है। अभी भी वे यही कर रहे है।


समुद्र की तरह हमारा अन्तरंग भी महान है

भगवान बुद्ध से उनके शिष्यों ने निर्वाणावस्था में हुई उपलब्धियों के बारे में प्रश्न पूछे- तो उनने कोई उत्तर न दिया, मौन ही रहे। इस पर शिष्यों ने अपने-अपने ढंग से अनुमान लगाये। बुद्ध ने सोचा कि वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे है और वे अनिश्चय की स्थिति में रहे हे। व्याख्याकारों ने बाद में उनके इस मौन को शून्यवाद ठहराया और आत्मा-परमात्मा तथा संसार के सम्बन्ध में उनकी मान्यता अनिश्चित ठहराई।

गहराई में उतरकर देखने वालों ने बुद्ध मान्यता को भाव दर्शन रूप में निरूपित किया है। वे इस संसार को तथा जीवन ब्रहा को व्यक्ति विशेष की निर्धारित मान्यताओं के अनुरूप बताते थे और जीवन तथा संसार को भाव लोक कहते थे। अनुभूतियाँ भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न प्रकार की इसी आधार पर होती है।

एक व्यक्ति अपने को चोर मानता है। वह उसी स्तर के सहयोगी तलाश करता हे। उन्हें ही बुद्धिमान मानता है। इसका ताना-बाना बुनता है। घर आकर पत्नी को सावधान करता है कि सर्वत्र चोरों की भरमार है। ऐसा न हो कि सामग्री कोई चुरा ले जाय। जो चुराकर लाया है वह ऐसे छिपाकर रखता है कि किसी पर भेद न खुले।

ऐसे व्यक्ति के लिए संसार एक अच्छा खासा चोर ़़़थोक है। वह अपने असली स्वरूप को लोगों की आंखों से छिपाता है। कल्पनाएँ वह इसी स्तर की करता और योजनाएं इसी संदर्भ की बनाता है। वह उसका स्व-निर्मित लोक है जिसमें जिन्दगी भर निर्वाह करते रहने की पूरी गुँजाइश है।

एक व्यक्ति विलासी है। उसकी दृष्टि उपभोग सामग्री पर ही लगी रहती है। सुविधा और सुन्दरता की ललक बनी रहती है। वह ऐसे ही वातावरण से सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसों से ही घनिष्ठता साधने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कामुक साहित्य पढ़ने, वैसी ही फिल्में देखने और उन्हीं प्रसंगों की चर्चा कहने सुनने में उसे रस आता है। किस इन्द्रिय के द्वारा, किस प्रकार रसास्वादन किया जा सकता है, इसी की कल्पनाएँ उठती रहती है। चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है। सम्पदा का बड़ा भाग इसी में खर्च हो जाता है। विलासी लोगों की जीवनचर्या कहाँ किस प्रकार बीतती है। वे किस प्रकार क्या साधन जुटाते है इसी की खोज-खबर में आंख-कान लगे रहते हे। इस संदर्भ का संचित ज्ञान अनुभव इतना इकट्ठा हो जाता है कि उन्हें विलास का विश्व कोश कहा जा सके। ऐसे लोगों का संसार ‘विलास संसार’ है।

क्चक्रियो की एक अलग ही दुनिया है। उन्हें छल प्रपंच के बिना चैन नहीं। किसी मजबूरी से विवश होकर वे दुरभिसंधियां गढ़ते हो, ऐसी कोई बात नहीं होती । न वे भूखे होते है न दरिद्र न जरूरतमंद न संकटग्रस्त। तो भी उनका चिन्तन ऐसे सरंजाम जुटाने में लगा रहता है इसमें आदि से अन्त तक चकमेबाजी और तिकड़म भिडाने का जाल बुना गया हो।

योग्यता की दृष्टि से वे गये-गुजरे नहीं होते। उपलब्ध बुद्धिमता को यदि वे किसी उपयुक्त कार्य में लगाना चाहे तो उससे कही अधिक सफलता प्राप्त कर सकते, जितनी की छल-बल से करते है। पर किया क्या जाय? उनकी विवशता है। वे अपने विनिर्मित छद्मलोक में ही प्रसन्न भी रहते है और कई बार चतुरता का गर्व भरा बखान भी करते है।

सन्त, सज्जन, लोक सेवी, परमार्थ परायण, महा-मानवो की दुनिया अन्यान्यों से सर्वथा भिन्न है। उन्हें न लोभ सताता है न मोह। न वासना का नशा चढ़ा होता है न तृष्णा की आग में झुलसते है। सीधा, सौम्य, सादगी का जीवन जीते है और उच्च विचारो में रमण करते है। उनके मित्र सहयोगी उसी स्तर के होते है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से उनका परिकर देवोपम बना रहता है। उत्कृष्ट सोचते और आदर्श को कार्यान्वित करते है। असहयोगी , विरोधी, हंस उड़ाने और मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं रहती। तो भी वे किसी के परामर्श सहयोग की परवाह न करते हुए एकाकी अपने मार्ग पर चलते है। दूसरे लोग जहाँ धन, वैभव अर्जित करने में जिन्दगी गुजार देते है वहाँ उनको इस कोल्हू में पिलने की इच्छा नहीं होती।

एक घर में रहने वाले सदस्यों को खान-पान रहन-सहन तो एक जैसा ही होता है पर संसार सबका अलग-अलग। छोटे बच्चे खेल खिलौने में रमते है। किशोरों की मस्ती का क्या कहना? पग-पग पर रोकना पड़ता है नहीं तो आसमान में उड़ने लगे और हवा में तैरने लगे। जरा जीर्ण वयोवृद्धों का मन कहा अटका रहता है वे क्या चाहते है, उसका भाव चित्र तैयार किया जा सके तो प्रतीत होगा उनकी दुनिया कितनी नीरस और कष्टसाध्य है। मौत के दिन भयभीत रहकर भी गिनते रहते है। युवकों की रंगरेलियो उमंगों और महत्वाकांक्षा योजनाओं का संसार ही अलग है। वे न जाने क्या-क्या करना और क्या-क्या बनना चाहते है। दिन भर सजते और दर्पण देखते है।

सयानी लड़की किसी घर की रानी होने का सपना देखती है और लड़का स्वर्ग पर उतरकर किसी परी के आंगन में नाचने के साज संजोता है। नारी तो जिस तेजी से अपने केंचुल बदलती है उसे देखकर आश्चर्य होता है। अभी-अभी प्रतियोगिताएँ जीतने वाली छात्रा- कुछ ही महीने बाद घूँघट लगाये वधू- साल छः महीने के भीतर जननी , बाद में गृह स्वामिनी और दिन बीतने नहीं पाते है कि सास बनकर स्वामित्व वधू के हवाले करती है। इन विभेदों के बीच असाधारण अन्तर होता है।

मृतकों का मरणोत्तर जीवन और भी विचित्र होता है। गर्भ में निवास करने वाले भ्रूण की परिस्थितियाँ और भी विलक्षण होती है। रोगी कितना कमजोर और असहाय होता है। दरिद्र पर क्या बीतती है। अपराधी क्या सोचता है। शासक का गर्व किस भाषा में बोलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पंच तत्वों से बनी और धरती आकाश के बीच बसी एक ही प्रत्यक्ष दुनिया में कितने लोग मान्यताएं संजोए बैठे है।

इस दुनिया में मात्र मनुष्य ही नहीं रहते। पशु-पक्षी, सरीसृप, कीट-पतंग और सूक्ष्म जीवी समुदाय के प्राणियों की भी अनेकानेक उपजातियां है। इनके शरीर और मन अपने ढंग के बने है। इनकी इच्छाएँ, आवश्यकताएँ, रुचियाँ, सम्वेदनाएँ, समस्याएँ, और क्षमताएँ ऐसी है जिनके भाव चित्र तैयार किया जा सके तो इन सबके बीच उतना ही अन्तर है जितना कि लोक-लोकांतरों के मध्य पाई जाने वाली भिन्नताओं के बीच पाया जाता है । स्वर्ग और नरक की कोई तुलना नहीं। प्राणियों के मध्य भी ऐसी ही अगणित प्रकार की दुनिया बनी और बसी हुई है। उनमें समता कम और भिन्नता अत्यधिक है।

वैज्ञानिक और दार्शनिकों का अनुसन्धान निर्धारण और भी अधिक विचित्र है। वैज्ञानिक यहाँ अणु-परमाणुओं की आंधियां भर चलते देखते है। ताप, प्रकाश और शब्द की उद्देश्य तरंगें इस जगत में हलचलों की जन्मदात्री है। वे न कभी चैन से बैठती है और न बैठने देती है। पदार्थ स्थिति विशेष में जीवन बन जाता है। जब तक जीवन तब तक आत्मा। यह सब कुछ स्वयंभू और सनातन है। प्रकृतिगत अनुसंधान ही परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश वही हो सकता है। यही है वैज्ञानिक का पदार्थ परिकर और आत्म-वैभव। उनका संसार विस्तृत है पर साथ ही आधारभूत कारण की दृष्टि से इतना ही सीमित है।

दार्शनिक को कण-कण में चेतना दीखती है। इन सबमें ब्रह्म ही ओत-प्रोत है। चेतना अदृश्य और और जड़ उसका दृश्य स्वरूप है। जड़ को चेतना जैसी हलचलें करने और गुण धर्म के क्षेत्र में सुस्थिर करने का कारण परब्रह्म का अनुशासन निर्देश नहीं निमित्त कारण है। जड़ को वह कभी दृश्य तो कभी अदृश्य रूप में परिणति कराता रहता है।

कुछ बातों से असहमत होते हुए भी दोनों कुछ स्थानों पर सहमत है। यह जो कुछ दिखता है लगता है वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं। यह पदार्थ और प्राणी के बीच होने वाले आदान-प्रदान की वास्तविक अनुभूति है। गन्ना रसायन विशेष से बना है जिह्वा के रसों का समन्वय होने के उपरान्त उसकी जानकारी मस्तिष्क के मिठास के रूप में लगती भर है। नीम हमें कड़वा लगता है पर ऊँट उसे बड़े चाव पूर्वक खाता है। नीम का वास्तविक स्वाद कैसा है यह कुछ भी कहा नहीं जा सकता। यही बात स्वरूप के सम्बन्ध में भी है। हाथी को मनुष्य अपने से कई गुना बड़ा दीखता है आश्चर्य नहीं। इन्द्र धनुष जैसा कि हम देखते हे वैसा किसी भी स्थान पर होता नहीं। मात्र पानी की बूंदों पर सूर्य किरणों की प्रतिक्रिया भर वैसा बोध कराती है।

संसार कैसा है? उसका रस, रूप और गुण बताना कठिन है। यह हर किसी की अपनी-अपनी अनुभूति का विषय है। इसमें इसकी इंद्रियों, मस्तिष्कीय संरचना, मान्यता आदि निर्मित कारण होते है। अतएव कहा जा सकता है कि यह संसार भाव लोक है। हर प्राणी की अपनी मान्यता और भावना है। समझने का अपना तन्त्र और रुझान।

हर व्यक्ति अपनी दुनिया अपनी मनः स्थिति एवं पवित्र स्थिति के समन्वय से गढ़ता है। उसे जब चाहता है तब बदल लेता है। सुख में दुःख और दुःख में सुख भासने लगता है। विषयों की प्रतिक्रिया दुःखदायी प्रतीत होती है और तपश्चर्या की परिणति की कल्पना करके व्यक्ति दुःख उठाते हुए भी प्रसन्नता व्यक्त करता है।

यह संसार भाव लोक है। हर किसी का पृथक पृथक भी। साथ ही छूट एवं सुविधा भी है कि वह उसका स्वरूप एवं स्तर चाहे तब बदल ले। इसलिए कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य एवं संसार का निर्माता आप है। ब्रह्मा ने यह ब्रह्मांड एवं उसका विधान अनुशासन बनाया यह ठीक है। प्रकृति का सूत्र संचालन भी इसका कारण हो सकता है। इतने पर भी यह तथ्य जहाँ का तहाँ है कि हर किसी की अपनी दुनिया निराली है वह निजी की भावनाओं के अनुरूप ही सुन्दर और कुरूप बनता है। भगवान बुद्ध ने उसकी व्याख्या विवेचना में मौन रहकर ठीक ही किया था।


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अपनी-अपनी विचारणा और भावना के अनुरूप हर व्यक्ति स्वयं अपने भाव-लोक का सृजन करता है। ब्राहा परिस्थितियां कुछ भी हो, जैसी तरंगें अपने चहुँ ओर आन्दोलित होती रहेगी, वैसी ही अनुभूतियां होगी, मनः स्थिति की प्रतिक्रिया बाहर आकर परिलक्षित होगी। परोक्ष जगत की यह एक अद्भुत संरचना है जिसे स्वतः आंखें देख तो नहीं सकती, उनकी अनुभूति अवश्य कर सकती है। इसे बदलना, अनुकूल बना लेना हर मनुष्य के लिए अपने पुरुषार्थ के बलबूते सम्भव है।


तथ्य का सत्य के प्रति समर्पण

मन को एकाग्र करने से बिखरी हुई शक्ति का एकीकरण होता है। बिखराव से क्षमता अस्त व्यस्त होती ह; पर उसे एकाग्र करने से क्षमता का केन्द्रीकरण होता है। केन्द्रित होने से शक्ति का उद्भव होता है। सूर्य किरणें बिखरी हुई हो तो उनसे सामान्य ताप की अनुभूति होगी किन्तु यदि काँच पर थोड़े से क्षेत्र की भी किरणें इकट्ठी करली जाये तो आग जलने लगेगी। बारूद को बिखरी हुई स्थिति में जलाया जाये तो एक चमक भर उठेगी; किन्तु बारूद को बन्दूक की नली में केन्द्रित करके जलाने से गोली का निशाना लगता है।

ध्यान आँख बन्द करके बैठने भर का नाम नहीं। आँख तो बन्द करनी पड़ती है ताकि बहुमुखी मन अन्तर्मुखी हो सके। किन्तु मात्र इतना ही ध्यान के लिए पर्याप्त नहीं है। आंखें बन्द करने के उपरान्त भी कल्पनाओं की दौड़ जारी रखी जा सकती है? ऐसी दशा में ध्यान कहाँ हुआ। आंखें बन्द, कल्पना लोकरचा और उसमें भ्रमण किया जा सकता है। ध्यान का उद्देश्य समेटना और समेटे हुए को केन्द्रीभूत करना है। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि ध्यान की दिशा में कदम बढ़े।

यह सृष्टि तीन पदार्थों की बनी है। ताप, ध्वनि और प्रकाश। इन्हीं की तरंगें निकलती , बिछुड़ती और नाना प्रकार के पदार्थों की रचना करती है। ध्यान में इन तीनों को पकड़ना और एक स्थान पर केन्द्रित करना होता है। तीनों का सम्मिश्रण ॐ होता है। उसकी ध्वनि स्वरूप है ॐ अथवा ओउम् दोनों में से कोई भी ध्वनि ध्यान के लिए चुनी जाती है। अब मात्र ओंकार के अक्षरों को ही पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए वरन् उसे सूर्य के मध्य में अवस्थिति गोलाकार ध्यान करना चाहिए। यह प्रकाश मात्र गोल न हो वरन् उसमें प्रचण्ड गर्मी का समावेश होना चाहिए। ऐसी और लक्षण वाली ध्वनि जिसके चारों ओर गोलाकार गर्म प्रकाश हो; ध्यान के लिए उपयुक्त है। प्रकृति के इन त्रिविध झलको को आंखें बन्द करके सब ओर से मन एकाग्र करके ध्यान करना चाहिए।

इन तीनों माध्यमों का अर्थ प्रयोजन भी ध्यान रहे। अज्ञान को अंधकार की उपमा दी गई है। प्रकाश स्वरूप ओंकार मन के अंधकार को हटाता है। अनेक प्रकार की भ्रांतियां मन में छाई रहती हे। प्रकाश उन सबका निराकरण करता है। ओंकार में नाम और रूप दोनों है। इष्टदेव का जप स्मरण करने के लिए कोई न कोई इष्टदेव नियत करना पड़ता है। इसके लिए ओंकार की शब्द ध्वनि और आकृति काम दे जाती है। ओंकार सार्वभौम है। उसे सभी धर्मों और संप्रदायों में समान मान्यता दी गई है। अब तीसरी विशेषता ओंकार की ताप है। ताप अर्थात् ऊर्जा। ऊर्जावान को मनस्वी, ओजस्वी तेजस्वी कहते है।

ओंकार जप ध्वनि के साथ उसकी ऊर्जा आभा और आकृति का ध्यान करने से इन तीनों विशेषताओं का समावेश होता है जो ओंकार में सन्निहित है। यों ओंकार एक अक्षर है, पर व्याकरण शास्त्र के हिसाब से वह तीन भी हो जाता है अ उ म् । तीनों के सम्मिश्रण से ओउम् बना। जप ध्यान के लिए एक भर पर्याप्त है। ताप , शब्द और आभा यही इन अक्षरों के अर्थ है। ध्यान करते समय भी इन तीनों तथ्यों का समावेश होना चाहिए। तब यह पूर्ण हो जाता है। इसमें ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों का समावेश हो जाता है। इसी त्रिक से संसार बना है। मन यदि कही भागे तो उन तीनों में से किसी की परिधि में गया माना जाय और उसे परब्रह्म की एकता की परिधि माना जाय। आंखें बन्द करने का तात्पर्य है अन्तर्मुखी होना। अन्तर्मुखी होने के उपरान्त ध्वनि ताप और आभा युक्त ओंकार पर अपने ध्यान एकत्रित किया जाये। ध्यान योग की यह सर्वोत्तम साधना है।


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हम न तो पीठ देख सकते है और न बुराई। इसलिए यह कार्य दूसरों द्वारा किया गया है तो उसे वस्तुस्थिति समझने का लाभ उठाये।


स्नेहशीलता और सहकारिता की सार्वभौम सत्यवृत्ति

चेतन प्रकृति एवं मनुष्य सहित अन्य जीवधारियों के बीच सृष्टि से एक ऐसी विधि-व्यवस्था विनिर्मित की है, जिसे परस्पर अन्योन्याश्रित अनुशासन नाम दिया जा सकता है। सारा जीवजगत न केवल अपने दैनन्दिन क्रिया-कलापों अपितु विकास हेतु उस प्राण सम्पदा से जुड़ा हुआ है जो समष्टि रूप में उसके चारों ओर विद्यमान है। मानव, पादप वृक्ष-वनस्पति, जीव -जन्तु सभी इस चक्र में एक-दूसरे से जुड़े हुए है। यह पर्यावरण चक्र ही जीव-जगत की सुनियोजित कार्यपद्धति के लिये उत्तरदायी माना जाता है।

इस व्यवस्था में कही भी तनिक व्यतिरेक आने पर मानव द्वारा उसमें छेड़छाड़ किये जाने पर परिणतियाँ विषम होती है। मनुष्य को आधि-व्याधियों से जूझना पड़ता है। पर्यावरण संतुलन अस्त-व्यस्त हो जाता है। अन्ततः आकाश के पोले ईथर भाण्डागार में भरी ये प्राण सम्पदा है क्या? एवं किस प्रकार जीवधारियों को प्रभावित करती है, इस पर वैज्ञानिकों ने भी गहराई से अनुसंधान किया है एवं अपना अभिमत व्यक्त किया है।

जीवधारी जिस वातावरण में रहते है, वह कितनी विपुल ऊर्जा सम्पदा अपने अंतराल में छिपाये हुए है, इसकी सहज ही कल्पना नहीं होती। हम निरन्तर ब्राहा वातावरण से श्वास खींचते व छोड़ते रहते है। प्राणवायु रूपी आक्सीजन यदि थोड़ी देर न मिले तो जीना दूभर हो जाय। सारे शरीर की गंदगी अन्यान्य मार्गों के अतिरिक्त कार्बनडाइ आक्साइड के रूप में प्रश्वास द्वारा एक व्यक्ति के द्वारा हर मिनट 15 से 20 बार छोड़ी जाती है। मोटे रूप में यही व्यक्ति का पर्यावरण से आदान-प्रदान क्रम माना जाता है। तनिक गहराई से देखे तो पाते है कि हर जीवधारी एक समर्थ एवं सशक्त विद्युत मण्डल से घिरा हुआ है। आयनोस्फियर की सबसे निचली परत पृथ्वी से साठ किलोमीटर दूरी पर है। दोनों के मध्य स्थित इस आयन मण्डल में लगभग 5 बोल्ट प्रति मीटर के औसत से विद्युत का दबाव बना हुआ है। हर व्यक्ति को घेरे एक सूक्ष्म विद्युत रूपी कवच प्राण ऊर्जा का समुच्चय है एवं यही शरीरगत गतिविधियों एवं मस्तिष्कीय क्रिया-कलापों पर अपना सर्वाधिक प्रभाव डालता है।

विद्युत आवेश धन व ऋण दो में बँटा होता है। मनुष्य के लिए ऋण विद्युतधारी आयन्स मात्रा का अधिक-कम होना ही बहुत बड़े परिवर्तन का कारण बन जाता है। ये ऋण आयन्स श्वास से भी अंदर जाते है एवं त्वचा से भी। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश की गति के समकक्ष चलने वाले फोटोन्स के समरूप न्यूट्रोनो कण माइण्डान्स भी सूक्ष्म रूप से बिना किसी प्रतिरोध के शरीर एवं मस्तिष्क के विद्युतमण्डल से आदान-प्रदान करते है।

सबसे पहले कैलीफोर्निया के अलबर्ट पाल क्रूगर ने आज से कुछ वर्ष पूर्व यह प्रतिपादित किया था कि शरीर व मस्तिष्क में सूक्ष्म रस़्त्रावो की वृद्धि तथा स्फूर्ति एवं सक्रियता के लिये ऋण आयनों का वायुमंडल में होना अत्यधिक आवश्यक है। यह प्रभाव पूरी तरह इन आवेशित कणों की मात्रा पर निर्भर है। धन आवेशित कणों का जब बाहुल्य होता है, व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है, चिड़चिड़ापन , थकान एवं एकाग्रता में कमी नजर आती है। जैसे ही वातावरण में ऋण कण बढ़ा दिये जाते है तनाव क्रमशः कम होने लगता है एवं व्यक्ति की चैतन्यता स्फूर्ति में वृद्धि आ जाती है।

मनुष्य के चारों ओर जन्म के बाद गर्भावस्था से बाहर आते ही ऋण आयन का घेरा बन जाता है एवं अन्त तक यही उसे प्राण का शक्ति पुँज बनाते हुए जीवन शक्ति उसमें फूँकता रहता है। जैसा कि सभी जानते है कि गर्भ में स्थित भ्रूण के लिये विधाता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है ताकि वह रज्जु से जुड़कर माँ से पोषण पाने के अतिरिक्त “एम्नियाटिक द्रव्य रूपी” अपने कवच से भी रासायनिक आदान-प्रदान करता रहे। यह थैली न केवल ‘शाँक एक्जार्वर’ की भूमिका निभाती है, वरन् इसमें विद्यमान विद्युतकण, एंजाइम्स आदि का भ्रूण से आदान-प्रदान क्रम बराबर चलता रहता है। गर्भकाल के समापन के तुरन्त बाद अत्यधिक प्रतिकूलताओं से भरे, विद्युतभवियुक्त वातावरण में उसका आगमन होता है यहाँ उसे ऋण आयन का यह गोला सुरक्षा प्रदान करता है। भारतीय अध्यात्म मतानुसार इसे प्राणमय कोश को बहिरंग में अभिव्यक्त होने वाला रूप माना जा सकता है।

वैज्ञानिक मतानुसार स्वच्छ वायु में प्रति घन सेण्टीमीटर 1500 से 4000 आयन्स होते है। चूकि पृथ्वी का आवेश ऋण प्रधान है, इस वायु कवच में भी ऋण-धन का अनुपात 90 ‘ 10 होता है। प्रदूषण रहित नैसर्गिक वायुमण्डल, हरीतिमा-स्वच्छ झरनो से युक्त स्थानों पर ऋण आयन्स अधिक होते है। ऐसे वातावरण में रहने वाले व्यक्तियों की जीवनी शक्ति, मनोबल अधिक होने से रोग-शोक इन्हें नहीं सताते एवं ये सदैव स्वास्थ्य लाभ कर विधेयात्मक चिन्तन में लीन होते देखे जाते है। औद्योगीकरण, जनसंख्या का बाहुल्य, निर्वानीकरण एवं प्रदूषण से ऋण आयन्स घटते चले जाते है। धन आयनों की मात्रा अधिक होने से श्वास से ली जाने वाली वायु भी विकारयुक्त होती है। चूकि ये सीधे मानवी काया एवं मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाहों पर प्रभाव डालते है, मनुष्य के दैनन्दिन क्रियाकलाप इनकी कमी व धन आयनों की बढ़ोत्तरी से निरन्तर प्रभावित होते है।

वैज्ञानिकों ने शिथिलता, बेचैनी तनाव आदि मिटाने के लिये उपरोक्त सिद्धान्त के आधार पर “ऋण आयन जनरेटर “ बनाए है, जो निरन्तर वायु को शुद्ध कर मनुष्य के आसपास ऋण आवेश का कवच विनिर्मित करते रहते है। ये जनरेटर चालू होते ही 3500 ऋण एवं 100 धन आयन्स प्रति घन सेमी पैदा करते है एवं बंद होने पर लगभग 5-6 घण्टे तक 550 ऋण व 500 धन आयन्स का अनुपात आसपास के वातावरण में बनाये रखते है। अब वैज्ञानिक भी सेनीटोरियम, बड़े-बड़े निर्णय लेने वाले अधिकारियों के कार्यालयों आदि के आसपास कृत्रिम झरने, फव्वारे आदि लगाकर, हरीतिमा को स्थान देते है।

मात्र परिस्थितियाँ ही मानव के आयन मण्डल का निर्धारण नहीं करती। यह भी पाया गया है कि किन्हीं किन्हीं व्यक्तियों में मन के बेचैन, तनावग्रस्त होने पर उनके आसपास का विद्युतमण्डल ही बदल गया। ऋण आयनों का स्थान धन आयनों ने ले लिया। इसके लिए उन्हें एक इलेक्ट्रॉन भर से मुक्ति पानी होती है। रोगग्रस्त व्यक्तियों एवं प्रारम्भिक लक्षणों का विश्लेषण करने वाले चिकित्सकों का कहना है कि मन को विचार तरंगों के अनुरूप ही बाहर का आयन मण्डल और शुद्ध भाषा में कहे तो आभा मण्डल बदलता रहता है। न्यूयार्क विश्वविद्यालय के डॉ0 फ्रेंक हाँकिन्शायर एवं राकफेलर विश्वविद्यालय के डॉ0 जोनाथन चैरी ने विश्लेषण कर पाया है कि तनाव, थकान, एकाग्रता में कमी, असमय चिड़चिड़ापन जैसे जैसे रोगी के अंदर विकसित होने लगते है, उसका आयन मण्डल अपना आवेश खोकर धनात्मक होने लगता है। कई रोगियों में तो इस विश्लेषण के आधार पर ही इन मनोविकारों की जिनके सम्बन्ध में रोगी बहुधा मौन देखे जाते है तथा भावी प्रतिक्रियाओं की पहले से भविष्यवाणी की जा सकती है।

वैज्ञानिकों का कथन है कि केन्द्रीय स्नायु संस्थान की क्रिया प्रणाली बड़ी वैचित्र्य पूर्ण है। पुरुषों से स्वचालित संस्थान (ए॰ एन॰ एस0) में ऋण आयनों को धन में बदलने के अवसर अधिक पाए जाते है, इसी कारण वे रोगी भी जल्दी होते है। इसमें परिस्थितियों का क्रम, मन-मस्तिष्क की बनावट का अधिक हाथ होता है। इनकी तुलना में स्त्रियां भावुक होते हुए भी दृए स्वचालित संस्थान होने के नाते कम रोगी होती देखी जाती है।

मनः स्थितिजन्य आयन्स के प्रभाव एवं पर्यावरण से उत्पन्न होने वाले रोग कारक आयन्स की प्रतिक्रियाओं को जानने के बाद एक विलक्षण प्रसंग की चर्चा भी यहाँ अभीष्ट हो जाती है, जिसकी आज पश्चिम में बड़ी चर्चा है। ‘इलविण्डस’ (बुरी हवाओं का बहना) के रूप में मौसम में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन इन दिनों समाचारों की सुर्खी में है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कथन है कि नमी से भरी तेज पूरबी हवाएँ कभी-कभी वातावरण में अनायास ही धनात्मक आयन्स का अनुपात बढ़ा देती है। ‘वेदरिंग’ नामक पुस्तक में स्टीफन रोजेन लिखते है कि जब ये हवाएं संव्याप्त प्रदूषण एवं पर्यावरण असंतुलन के कारण बहती है तो क्षय रोगियों में प्रसुप्त रोग के उभर आने, मिर्गी का दौरा आने के अवसर बढ़ जाते है। दक्षिणी हवाएँ रक्त का थक्का जमने का समय कम कर देती है जिससे शरीर में कही भी अनायास रक्त स्राव एवं लकवे का प्रकोप हो सकता है। ऐसा उनके साथ घटते अधिक देखा जाता है जिनके आसपास ऋण आवेश की मात्रा पूर्व से ही क्रम हो स्विट्जरलैंड, बवेरिया जैसे आल्पस पर्वत की तलहटी में बसे क्षेत्रों को “फोहेन” नाम दिया गया है। वहाँ जब ये हवा बहती है सड़क पर दुर्घटनाएँ अनायास ही बढ़ जाती है। लोग घरों में रहना पसंद करने लगते है जब तक कि हवा का प्रभाव समाप्त न हो जाय।

अब सभी इस अभिमत को मानने लगे है कि रोगों का कारण जानने के लिये विस्तृत सूक्ष्म पर्यवेक्षण अनिवार्य है। इससे भावी घातक व्याधियों से बचना भी संभव है एवं वाँछित आयन मण्डल विकसित कर नैसर्गिक जीवन क्रम अपनाकर जीवनीशक्ति का बढ़ाया जाना भी शक्य है। व्यवहार विज्ञानी एवं प्रख्यात स्नायु विशेषज्ञ इस सम्बन्ध में पूर्वार्त्त दर्शन में वर्णित साधना उपक्रमों की चर्चा करते हुए कहते है कि इनके माध्यम से अपने बहिरंग वातावरण को ऋण आवेशयुक्त बनाना संभव है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि योगसाधना के द्वारा प्राण ऊर्जा का सम्वर्धन भली प्रकार सम्भव है। इसके लिये उचित वातावरण मिल सके तो ठीक, नहीं तो आत्मशोधन एवं साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती है। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की - शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा का सदुपयोग सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित हैं। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।


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वैज्ञानिकों का मत है कि मानवी काया व मस्तिष्क जिन सूक्ष्म रस-स्रावों से प्रभावित होती है, वे मनुष्य के आसपास के वातावरण में स्थित ऋण आयनों की मात्रा के अनुपात पर निर्भर करती है। जब भी धन आवेश इस आभा मण्डल में बढ़ता है, तामसी प्रवृत्तियां उभरने लगती है। तनाव जन्म लेता है व कई साइकोसोमेटिक बीमारियां जन्मती है। ऋण आयन प्रकृति के साहचर्य में रहने वालों के आभामण्डल में अधिक होते है। वे ही व्यक्ति की स्फूर्ति, चेतनशक्ति एवं सक्रियता बढ़ाते है।


नर और नारी के बीच की खाई न्यायोचित नहीं

औरंगजेब जब मरने लगा तो उसने कई मुल्लाओ को बुलाया कि मुझे अपने तीन पाप बहुत भारी पड़ते है, आप लोग किसी तरह उन्हें खुदा से माफ करा दे। तीन पाप थे 1. पिता को जेल में बन्द करा देना 2. दारा वगैरह भाइयों का कत्ल करा देना तथा 3. सूफी सन्त सरमद का सिर उतरवा लेना। गुनाह माफ हुये या नहीं यह तो ईश्वर ही जाने पर यह स्पष्ट है कि मरते समय उसे इन पापों का रंज अवश्य था।

सरमद सूफी सन्त थे। वे मध्य एशिया से भारत व्यापार के लिए आये थे। पहले वे सिन्ध में तिजारत करते रहे, साथ ही सूफी पन्त का प्रचार भी। जन्मतः वह यहूदी थे। बाद में मुसलमान हुए। और अन्त में वेदान्त धर्म के अनुयायी हुए। दारा उनकी भक्ति और विद्वता से बहुत प्रभावित थे। औरंगजेब ने जब दारा का कत्ल करा दिया तो उसे यह भय बराबर बना रहा कि दारा के मित्र और जनता में अत्यन्त लोकप्रिय सरमद कही उसके लिए कोई संकट खड़ा न करे। वे उसकी आंखों में काँटे की तरह खटकने लगे।

एक दिन औरंगजेब सरमद के पास से गूजरे। देखा कि वे नंग-धडंग पड़े है। कम्बल दूर पड़ा है। औरंगजेब ने फड़ककर पूछा- नंगा क्यों पड़ा है, पास में पड़े कम्बल से बदन क्यों नहीं ढक लेता, सरमद ने कहा -इतनी कृपा आप ही कर दे। मुझे तो बन नहीं पड़ता। औरंगजेब ने कम्बल उठाया तो उसके नीचे उन सबके सिर थे जिन्हें उसने कत्ल कराया। औरंगजेब के बूते कम्बल न उठा। तो सरमद ने कहा- तू ही बता- तेरे पापों को ढकना ज्यादा जरूरी है या अपने बदन को ढकना।

सरमद का दिल्ली की जनता पर असाधारण प्रभाव औरंगजेब से देखा न गया। उसके इशारे पर मुल्लाओ ने इल्जाम लगाया कि वह अधूरा कलमा पढ़ता है। अदालत में पेश किया गया तो वहाँ भी उसने वह अधूरा ही सुनाया ‘ला इला इललिलाह’ जिसका अर्थ होता है। सभी दोषी है। शेष अंश जो शेष रह गया था। वह था। मुहम्मद ‘ रसूलिल्लाह’। सरमद का कहना था कि मैंने अभी तक देवदूत का दर्शन नहीं किया। जिन्हें देखता हूँ , दोषी पाता हूँ। इस कथन पर मुल्लाओं की अदालत में सरमद को दोषी पाया गया और उसका सिर उतार लेने का हुक्म हुआ। सरमद का सिर काट लिया गया। जब सिर कटा तो उसमें से तीन बार आवाज निकली ‘- ‘ला इला इललिलाह’। सरमद सच्चे विश्वास की इस गवाही को देख कर सभी दंग रह गये।

जिस दिन सरमद का सर कटा उस दिन पूरी दिल्ली में रंज मनाया गया। न किसी के घर में चिराग जला न चूल्हा। बादशाह के सामने कोई कुछ कर ही नहीं सकता था, पर इतना सभी ने अनुभव किया कि एक बेगुनाह सच्चे फकीर का कत्ल हुआ।

औरंगजेब के मन पर उस अन्याय का बोझ जिन्दगी भर लदा रहा और अब वह मरा तो भी उसे वह गुनाह बेतरह अखरता रहा।

सूफी सन्त अपनी भक्ति भावना के लिए भारत भर में लोकप्रिय रहे। अजमेर के ख्वाजा भी सूफी थे। जिनकी दरगाह पूजने हिंदू; मुसलमान सभी जाते है। सूफी धर्म के सिद्धान्त; हिंदुओं के वेदान्त दर्शन, से पूरी तरह तालमेल खाते है। सरमद की कब्र दिल्ली में है जिन्हें उनका इतिहास स्मरण है उन सब के सिर उस स्थान के समीप जाकर झुक जाते है।


बुरे समय की दुष्प्रवृत्तियाँ

वैभव को आम आदमी शक्ति और सौभाग्य का चिह्न मानता है किन्तु वस्तुस्थिति का विवेचन करने पर प्रतीत होता है कि शरीरगत बलिष्ठता का महत्व वैभव की तुलना में की अधिक है। सम्पदा के बल पर प्रतिभा नहीं खरीदी जा सकती, किन्तु प्रतिभावान पराक्रम और साहस के बल पर उपार्जित करते और संपत्तिवान बनते देखे गये है।

शरीर सौष्ठव से भी बढ़कर बुद्धिमता को समझा जाना चाहिए। कुरूप और अपंग स्तर के अष्टावक्र, सूर-दास स्तर के व्यक्ति भी वरिष्ठों में गिने गये इसके विपरीत सुन्दर और बलिष्ठ दिखने वाले अनाचारी अपराधी भी घृणा और भर्त्सना के कारण बनते है। बुद्धिमानों में से कितने ही ऐसे हुए है जो देखने में दुर्बल या कुरूप लगते है फिर भी उनके सम्मान में कमी नहीं हुई।

बुद्धिमता का एक पक्ष चातुर्य है। व्यवहार कुशल, मिलनसार और परिस्थितियों को ताड लेने वाले सामान्य जनों की तुलना में नफे में रहते है। किन्तु देखना यह है कि ‘व्यक्तित्व’ को मानव जीवन जीवन की सर्वोपरि विशेषता है क्या वह भी मात्र मस्तिष्कीय कुशाग्रता के सहारे उपलब्ध हो सकता है? यहाँ उत्तर ना में देना होगा और कहना पड़ेगा कि मानवी महानता व्यक्ति की भाव सम्वेदना, आदर्शवादिता एवं संयमशीलता पर निर्भर है। यही है वे अवलम्बन जो सामान्य योग्यता और परिस्थिति वालों को भी महानता के उच्च पद पर पहुँचाने में समर्थ होते है।

आवश्यक नहीं कि शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ और विशाल स्तर के प्राणी बुद्धिमान भी हो। इसी प्रकार यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर बुद्धिमान भावनाशील संकल्पवान भी होगा। इतने पर भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाली और स्तर ऊँचा उठाने के लिए संकल्प एवं उमंग को वरिष्ठता दी जाती है। उसकी ऊर्जा एवं प्रेरणा से प्राणी प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए भी अनुकूलता उत्पन्न करने में सफल होते है। इसके विपरीत आलसी प्रमादी प्रकृति के बलिष्ठता एवं सुविधा से सम्पन्न होते हुए भी परिस्थितियों से लोहा लेने में परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढालने में प्रयत्नरत न होने के कारण अपनी सता तक गँवा बैठते है।

डायनोसौर अपने समय के धरती पर पाये जाने वाले प्राणियों में सर्वाधिक संख्या में, शरीर की दृष्टि से दैत्याकार, स्वभाव से क्रूर, विकसित एवं बुद्धिमान प्राणी माने जाते थे। एक अरब 40 करोड़ वर्ष पूर्व पाया जाने वाले ब्रैकियोन्सीरस की ऊँचाई पाँच मंजिली इमारत के बराबर थी। व्हेल से कई गुना भारी छोटे मस्तिष्क वाला यह भीमकाय प्राणी स्वतन्त्र विचरण करता था। डायनासोर्स में सबसे अधिक शक्तिशाली टाइनैनोसोरस थे। इनकी ऊँचाई दो मंजिले भवन के बराबर थी। दाँतेदार जबड़ों वाला, मशीनों जैसा शक्तिशाली विध्वंसक विशालकाय सिर के होते हुए भी इनका मस्तिष्क बहुत छोटा था। सात करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी का वातावरण बदल गया और डायनोसौर इस परिवर्तित वातावरण में अपने को अधिक समय तक जीवित नहीं रख सके और क्रमशः प्रकृति की गोद में विलुप्त हो गये।

जिन छोटे-छोटे स्तनधारी जीवों को डायनोसौर निगल जाते थे, दुश्मनों का आतंक समाप्त होते ही परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालने में समर्थ हो गये। इनकी मस्तिष्कीय क्षमता डायनासोर्स की बुद्धिमता से 20 गुनी अधिक थी फिर भी परिस्थितियों के चंगुल से फंसकर असहाय बने विनष्ट होते रहे। इनमें से अधिकांश प्राणी दैत्यों के शिकार बनकर अपनी जाति वंश तक को समाप्त कर बैठे। मैदानी भागो को छोड़कर जंगल की ओर आकर्षित होने लगे। इनमें से कुछ हवा में उड़ने लगे और चमगादड़ बन गये। कुछ ने समुद्र को चुना तथा व्हेल तथा डाल्फिन बन गये। अधिकाँश प्राणियों ने अपने निवास के लिये पृथ्वी के धरातल को पसंद किया और जंगली जीवन व्यतीत करने लगे। इनमें से कुछ प्राणियों ने पेड़ पर चढ़ना सीखा उसी पर रहने लगे जिनसे बाद में बन्दरों, लंगूरों का विकास हुआ। शारीरिक और मस्तिष्कीय क्षमता का विकास क्रमशः पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा।

बुद्धिमता की अभिवृद्धि के लिए यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क के आकार का उसमें भरे पदार्थों का भी विस्तार हो। भार एवं विस्तार एक बात है और तीक्ष्णता सूक्ष्मता दूसरी। यह मानना ठीक नहीं कि आकार में बड़ा होने पर भी कोई मस्तिष्क अधिक बुद्धिमता का परिचय दे सकता है। मनुष्य का सिर आरंभ से ही प्रायः उतना ही लम्बा-चौड़ा और भारी रहा है जैसाकि आदि काल में भी। मानवी प्रगति का उद्गम इसी भावना सम्वेदना से समझा जा सकता है। इस मर्म केन्द्र का विस्तार होने पर अगले दिनों मनुष्य सच्चे अर्थों में बनेगा। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में मानवी विकास की दिशाधारा इसी ओर गतिशील होगी।

बौद्धिक क्षमता में मनुष्य अब चरम सीमा पर पहुँच गया हो, ऐसी बात नहीं है । वैज्ञानिकों की मान्यता है कि मनुष्य शब्द ही विकास की अन्तिम शब्दावली नहीं है वरन् विकास का वह मूल स्रोत है जिससे नये और उच्चतर जीवन का प्राकट्य प्रादुर्भाव होना सुनिश्चित है। मनुष्य अपने पूर्वजों से कुछ न कुछ हमेशा ग्रहण करता आया है और भविष्य के लिए अधिकाधिक विचार संचयन, उद्यमशीलता, बुद्धिमता अपनाने का प्रयत्न करता रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में मनुष्य का जो बौद्धिक उत्तराधिकारी आने वाला है वह बायोलाँजिकल न होकर कल्चरल होगा। धरती पर आने वाला यह बौद्धिक जीवन एगहेड होगा जो आकृति में मनुष्य जैसा होगा। इसका क्रेनियम अपेक्षाकृत बड़ा और मराल घूर्नियर होगा और इसके रहन-सहन जीवनयापन की शैली मोहक और शानदार होगी।

जीवन के स्वरूप और उसकी प्रकृति को समझने तद्नुसार समग्र व्याख्या कर सकने में विज्ञान असफल रहा है। आधुनिक जैविकी, जीवन की मात्र कुछ हलचलों, भौतिक रासायनिक क्रियाओं के आधार पर उसकी व्याख्या करती है। जीवन के मूलभूत गुणों -पोषण, पाचन, चयापचय,श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन और गति से जीवित अजीवित जड़, चेतन का विभेद किया जाता है। अमीबा जैसे एक कोशीय प्राणी से लेकर मनुष्य तक की जैविक प्रक्रियाओं में ‘गति’ को प्रमुख माना गया है। चलते रहना ही प्राणियों का स्वभाव है।

विकास की दृष्टि से मनुष्य को सभी प्राणियों से सर्वाधिक बुद्धिमान, कार्य कुशल, एवं सक्षम माना गया है। जैविक प्रक्रियाओं के समान होते हुए भी मनुष्य को समस्त जीवधारियों में शिरोमणि और अग्रदूत इस आधार पर माना गया है कि उसकी बुद्धिमता, बोलने, सोचने, और उसे क्रिया के रूप में परिणति करने की क्षमता अन्य प्राणियों से असंख्य गुणा बड़ी है। फिर भी निम्न श्रेणी के जंतुओं की बुद्धिमता को भी उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता।

वर्तमान मनुष्य की गतिविधियों क्रिया-कलापों को देखकर उसकी बुद्धिमता पर सन्देह होने लगा है। सहयोग सहकार के राजमार्ग से भटककर संघर्षात्मक विध्वंसात्मक रवैया-तौर -तरीके अपनाते हुए हर बुद्धिमान को देखा जाता है। बुद्धिमान होने की न्यायसंगत पहचान है- प्रोत्साहित करना। कनाडा के सुप्रसिद्ध एन्थापौला जिस्ट आर॰ वी0 ली0 के अनुसार बुद्धिमान होने का अर्थ है-पारस्परिक आदान-प्रदान, सहयोग-सद्भाव जिसके आधार पर मानव सभ्यता की आधारशिला टिकी है।

वैभव, शरीर, मस्तिष्क, ज्ञान, कौशल आदि को देखकर किसी को भी प्रगतिशील , समर्थ एवं बलिष्ठ नहीं माना चाहिए। न किसी की साज-सज्जा देखकर उसके सौभाग्य को सराहा जाना चाहिए। वरन् ध्यान इसी तथ्य पर केन्द्रित करना चाहिए कि सच्ची प्रगति आन्तरिक वरिष्ठता के साथ जुड़ी हुई है। यह बढ़ेगी तो मनुष्य हर क्षेत्र में बढ़ेगा किन्तु अन्तरंग की दुर्बलता बनी रही और दुर्गति निश्चित है। प्राणी के उत्कर्ष और अपकर्ष के इतिहास पर एक दृष्टि दौड़ाकर इस तथ्य को और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है।


संगीत साधना में समर्पित दो महामानव

अब तक ज्योतिषी,सामुद्रिक शास्त्री ही हस्तरेखा देखकर यह बताया करते थे कि भाग्य या भविष्य क्या है। जन्म कुण्डली की तरह हस्तरेखा देखकर भी भूत भविष्य की सम्भावना का कथन किया जाता था। अब शरीर विज्ञानी इस आधार पर स्वास्थ्य की स्थिति और स्वभाव की स्थिति का निष्कर्ष निकालने लगे है। राग परीक्षा के लिए वैद्य नाडी देखते रहे और नाखूनों की सफेदी देख रक्ताल्पता का निष्कर्ष निकाला जाता था। सरकारी दस्तावेजों में हाथ के अँगूठे के छाप लेकर व्यक्ति की सही पहचान की जाती है। दो व्यक्तियों के अंगूठे एक जैसे नहीं मिलते। इसलिए हस्ताक्षरों के जाली होने की सम्भावना तो रहती है, पर अंगूठा छाप में यह संदेह नहीं रहता कि वह व्यक्ति कोई दूसरा तो नहीं है।

अब तक हाथ की बनावट के सम्बन्ध के सोचा जाता है कि यह शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का विवरण भी प्रस्तुत करती है, इसलिए हाथ की रेखाएँ और उसकी कोमलता देखकर डॉक्टरों ने किसी व्यक्ति को क्या रोग है और उसकी मानसिक स्थिति क्या है इसकी परीक्षा करना आरम्भ कर दिया है। कई शरीर शास्त्रियों का मन्तव्य है कि हाथ देखकर किसी का व्यक्तित्व भली प्रकार समझा जा सकता है।

शरीर की अंग रचना में हाथ सबसे अधिक संवेदनशील है। उसके विभिन्न क्षेत्रों की रेखाएँ नीची-ऊंची रहती है। मोटे तौर पर रेखाओं की बनावट प्रायः समान रहती है, पर बारीकी से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि उनमें काफी हेर-फेर होता रहता है। न केवल हथेली की रेखाएँ वरन् अंगुलियों के पोरबे, नाखून, हथेली का पीछे वाले बाल कई तरह से सिकुड़ता-फैलता और ऊँचा, नीचा, उभार, गहरा होता रहता है। जिन्हें इसका अनुभव है उन्हें विभिन्न रोगियों की स्वास्थ्य सम्बन्धी भूत, वर्तमान और भविष्य का पर्यवेक्षण करने में कोई कठिनाई नहीं होती।

योरोप और अमेरिका म अब हस्त विज्ञान के सम्बन्ध में कितने ही चिकित्सा विशेषज्ञों की खोजे चल रही है। वे ज्योतिषियों, समुद्र शास्त्रियों की तरह मात्र रेखाएँ नहीं देखते वरन् हाथ के हर भाग में होते रहने वाले उतार-चढ़ाव का निरीक्षण करते रहते है। उनका कथन है कि पैथाँलाजी की दृष्टि से हाथ अकेला ही वह विवेचन प्रस्तुत करता है जिना कि रक्त, मूत्र, मल, थूक, एक्सरे आदि की परीक्षा की जानकारी से प्राप्त होती है। इस आधार पर की गई चिकित्सा अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी सिद्ध हुई है। इस विज्ञान में डॉ0 गार्डन, ई॰ हेल, डॉ0 हर्डेयन, डा0 स्मिथ, डा0 ईवान, डा0 हिरनेक ने ख्याति प्राप्त की है।

न्यूयार्क स्थित स्टेटेन हाईलैण्ड अस्पताल कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के पामिस्ट्री शोध विभाग ने कीरो की पामिस्ट्री में एक नयी शृंखला जोड़ी है। कीरो ने हस्त रेखाओं द्वारा ग्रहगणित का ऊहापोह किया था और बताया था कि हाथ की रेखाएँ तथा विशेष स्थानों के उठाव देखकर रेखाओं की लम्बाई तथा सीधापन तिरछापन जानकर किसी का भविष्य जाना जा सकता है कि उसका भूतकाल कैसा रहा है और भविष्य कैसा होने जा रहा है।

उस शोध में एक नयी शृंखला अब यह जुड़ी है कि मनुष्य किसी रोग से पीछा छुड़ा चुका है और किस नये रोग की सम्भावना में प्रवेश कर रहा है। यह जानकारी शारीरिक ही नहीं मानसिक क्षेत्र की भी हो सकती है। कि मनः क्षेत्र में कौन व्यक्ति श्रेष्ठता या निकृष्टता की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह एक बड़ी बात और बड़ी सम्भावना है जिसकी गहरी खोज होनी चाहिए।


हम अपना गुरुत्वाकर्षण बनाये रखें

दृश्यमान स्थूल आयामों के अतिरिक्त दिन्-काल के बोध रूप में एक अतिरिक्त अविज्ञात आयाम भी होता है। इनकी जानकारी जब वैज्ञानिकों को इस सदी के प्रारम्भिक दशकों में हुई तो उससे न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मन सम्बन्धी भी अनेकों रहस्यमय जानकारियाँ उभर कर सामने आई। प्रारम्भ में छाया वैज्ञानिक चिन्तन को घेरा हुआ कुहासा, ज्यों ही क्रमशः मिटता चला जा रहा है, विचारणात्व बोध को मानवी स्वास्थ्य से जोड़ पाने में क्रमशः वैज्ञानिकों को सफलता हस्तगत होती जा रही है।

जैसे हम देश काल, कण-प्रतिकणों के विराट् साम्राज्य को साकार रूप नहीं दे सकते मात्र कल्पना ही कर पाते है ठीक उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के मनस् रूपी अदृश्य आयाम की, विचारो के स्वरूप की मात्र कल्पना ही कर पाते है। पिछले दिनों “मनुष्य दीर्घायुष्य कैसे बने,” इस मुद्दे पर जब स्वास्थ्य विज्ञानियों ने अनुसंधान क्रम आरम्भ किया तो उन्हें भौतिकी के सापेक्षवाद सिद्धान्त को मानवी काया एवं चिन्तन पर आरोपित कर, इस माध्यम से विचारो के बोध जगत का मनुष्य के जीवकोशों एवं चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाय लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ0 अर्नेस्ट बर्जर ने “आयोडियोरिफयर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते है कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सकीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।

दिक्, काल सम्बन्धी सापेक्षवाद की मनीषी आइन्स्टीन की वर्षों पुरानी मान्यता पर आज के वैज्ञानिक जितनी गहराई से चिन्तन करते है, उन्हें अनेकानेक नई अनुभूतियाँ होती, नये चिन्तन के आयाम खुलते चलते जाते है। आइन्स्टीन की जन्म शदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे है। “बायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप आफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ द मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डा नोजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।

सापेक्षवाद की परिकल्पना के विषय में लिखते हुए काल्डर लिखते है कि इसे ‘सापेक्षता’ के स्थान पर इसके विपरीत “इनबेरिएन्स थ्योरी” (स्थिरता या अपरिवर्तनीयता) नाम देना अलबर्ट आइन्स्टीन ने सर्वाधिक उपयुक्त समझा था। उन्होंने “रिलेटिविटी” की नहीं अपितु “एब्साँल्यूट” की खोज की थी, एवं इस पर वे बराबर जोर देते रहे। वैज्ञानिक उस परम सत्य (एब्साल्यूट) की शोध करने वालों की वृहद शृंखला की कड़ी भर है, इसका बोध कराने के लिए उन्होंने रिलेटिविटी (सापेक्षिकता) नाम का प्रयोग भर किया था। उनका कथन था कि पदार्थ तो “जमी हुई ऊजा’”भर है। ऐसे में दृश्यमान मस्तिष्कीय पदार्थ को ही सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए। इस जमी ऊर्जा का रूपांतरण चतुर्थ आयाम में जब विचार तरंगों के रूप में होता है तो वे अति शक्तिशाली ऊर्जा प्रवाह में बदल जाती व आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है। आइन्स्टीन पर शोध करने वाले पिछले दशक के वैज्ञानिकों का मत है कि क्वाण्टा-बेव-पार्टिकल के समुच्चय उस आयनोस्फियर की तरह की आइन्स्टीन मनः क्षेत्र की इसी जमी ऊर्जा को विचार प्रवाह के प्रभा-मण्डल आयडियोस्फियर के रूप में हर व्यक्ति पर छाया हुआ मानते थे। इसका नेगेटिव व पॉजिटिव होना ही व्यक्ति के स्वयं के चिन्तन, स्वास्थ्य एवं प्रभावोत्पादकता पर तथा आसपास के वातावरण पर तद्नुरूप प्रभाव डालता है, ऐसा उनका मत था।

महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन के अनुसार विचार तरंगों के कम्पन इतने तीव्र होते है कि उन्हें मापा नहीं जा सकता, मात्र उस तीव्रता एवं उसके सापेक्ष नहीं परम होने का बोध भर किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार आइन्स्टीन का विश्वास था कि मानवी विचार तरंगों के परिप्रेक्ष्य में उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को देखा जाना चाहिए। उनका मत था कि स्वास्थ्य सम्बन्धी घटनाएँ अनुभव बोध-रूपी विचार लोक में घटती है। इसमें व्यतिरेक जब भी होता है, जीवनी शक्ति लड़खड़ाती है एवं रोग मनुष्य को आ घेरते है-कोशिकाएँ जल्दी बुढाने लगती है, मनुष्य स्वतः प्राकृतिक रूप में अथवा रोगों का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।

यह विचारणीय तथ्य है कि अलबर्ट आइन्स्टीन एक भौतिकीविद् थे न कि चिकित्सा शास्त्री। लेकिन स्पेस टाइम की उनकी परिकल्पना, अनुभव-बोध एवं विचार मण्डल (आयडियास्फियर) की संरचना के माध्यम से उन्होंने रोगों के कारणों के सिद्धान्त एवं दीर्घायुष्य होने के स्वरूप को सूत्र रूप से 1813-14 में लिख कर रख दिया था।

आज हम पाते है कि वस्तुतः हमारे दैनन्दिन जीवन की घटनाओं के मूल में तेजी से दौड़ लगाने वाले विचार मण्डल के गति प्रवाह की कितनी महती भूमिका है। रूसी चिकित्साशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक डाँ पावलोव ने चूहे से लेकर मनुष्यों तक के ऊपर किए गए परीक्षणों के आधार पर यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला था कि हर व्यक्ति के अन्दर किसी कार्य को करने की शीघ्रता से करने-न करने, आवश्यकता की महता समझने -न समझने, का बोध कराने वाली एक घड़ी होती है जो समय-समय पर उसके द्वारा विनिर्मित विचार के अनुरूप उसे चेतावनी देने का कार्य करती है। अवचेतन में यह सतत् क्रियाशील रहती व मनुष्य को निर्णय लेने हेतु विवश करती रहती है। पावलोव का मत है कि हमारी इस आन्तरिक घड़ी को जब शीघ्रता से किसी कार्य को करने का बोध होता है तो वह एक निश्चित गति लय पर काम करने वाली आकुँचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास आदि प्रक्रियाओं कही कम्पन गति तीव्रकर देती है। संतुलित मनःस्थिति वाले मन से संचालित शरीर की सभी क्रियाओं का संचालन करता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि समय की गतिशीलता का बोध विचारो पर प्रभाव डालकर रोगों के होने-न होने के रूप में अपनी अभिव्यक्ति करता है। जिन व्यक्तियों पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता एवं यह तनाव को जन्म देता है उन्हें टाइप ए इनडिविजुअल कहा गया है। ऐसे व्यक्ति मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में बहुत महत्वाकाँक्षी होते है एवं स्वयं को उच्च लक्ष्यों हेतु समर्पित कर सफलता हस्तगत करने की पात्रता रखते है। लेकिन जो स्वयं को संतुलित नहीं रख पाते, वे तनाव का सामना करने में अक्षम बने रहते है एवं बहुधा हृदय रोगों के शिकार होते है। अन्तर्मुखी प्रवृत्ति वाले ये व्यक्ति सर्वदा अपने बोध-अनुभूति के आयाम में कुछ कर गुजरने की, लक्ष्य-पूर्ति की कामनाओं से घिरे रहकर बेचैनी एवं व्यथा युक्त जीवन जीते है। यहाँ तक विश्राम अवस्था में भी उनकी हृदय की गति व रक्त चाप अधिक होता है। एड्रीनलीन, नारएड्रीनलीन, सिरोटोनिन, इन्सुलिन जैसे हारमोन्स सर्वदा उत्तेजना बनी रहने के कारण हरी सिकनेस से ग्रस्त इन व्यक्तियों के रक्त में सतत् स्रावित होते है। इन टाइप ‘ए’ व्यक्तियों में आमाशय में अम्लाधिक्य, श्वास गति की वृद्धि, सारी माँस-पेशियों में तनाव, स्वेद ग्रंथियों से पसीने का सतत् बहना जैसे लक्षण अधिक पाये जाते है। इन लक्षणों को जो सारे कायतंत्र को प्रभावित करते है-”टाइप सिन्ड्रोम” नाम दिया गया है।

वैज्ञानिक द्वय कैनेथ ब्रेचेर एवं डेनिस शियामा ने अपने शोध निष्कर्षों में लिखा हैकि टाइप ‘ए’ व्यक्तियों को अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह समय की द्रुतगामी चाल के प्रति चिन्तित न रहकर मध्यवर्ती समय बोध का जब अभ्यास कराया गया हो तो उनके रस द्रव्यों के स्रावों की गति में 25 ये 40 प्रतिशत कमी होती देखी गयी। बायोफीडबैक द्वारा भी निर्देशन प्रक्रिया से तनाव की प्रक्रिया में उन्हें मदद मिली। अब चिकित्सक औषधि उपचार के स्थान पर “समय कम नहीं है”, “जीवन में जीने हेतु पर्याप्त समय”, “जल्दबाजी की कोई आवश्यकता नहीं” , जैसे सम्मोहन परक निर्देश देकर उन्हें ऐसी अनुभूति कराते है कि वे वस्तुतः वर्तमान में जी रहे है, किसी से पिछड़ नहीं रहे। औषधि उपचार की तुलना में यह उपचार अधिक कारगर पाया गया है।

वास्तविकता यही है कि हममें से बहुसंख्य व्यक्ति जाने अनजाने इस “टाइप सिन्ड्रोम” के शिकार हो जाते है। कारण केवल यही है कि हम वर्तमान में जीना नहीं जानते, आगत को सामने देखते हुए तुरन्त उसे पाने की चेष्टा करते है। जो कुछ दृश्यमान है, उससे परे बोध अनुभूति का जो आयाम विचार मण्डल के रूप में हमारे चारों ओर छाया रहता है, उसे हम वाँछित दिशा में मनोबल के सहारे बनाते रह सकते व तद्नुसार जीवन जी दीर्घायुष्य प्राप्त कर सकते है। यह जीवन बहुत लम्बा है, उसमें कई दिन है, उसमें भी कई घण्टे, मिनट, व सेकिंड है। यदि इनका भलीभाँति सुनियोजन कर चिन्तन प्रवाह को सही दिशा दी जा सके तो अकारण रोगग्रस्त न रह कर समस्वरता से भरी हँसी-खुशी की उपलब्धियों से भरी पूरी जिन्दगी जीने में समर्थ हो सकते है।

कल्पना लोक में विचरण करने वाले -दिवास्वप्न देखने वाले तो स्वयं वैज्ञानिक मनीषी आइन्स्टीन के अनुसार इस त्रिआयामीय जगत को विकृत रूप में देखते हुए स्वयं पर आरोपित कर फलितार्थ भोगते है। आधुनिकता से इस युग में “एंजीग वार्धक्य” को टालकर दीर्घायुष्य प्राप्त करने की सही तकनीक मनोवैज्ञानिक कार्न गुस्ताव के अनुसार समय बोध के आयाम में सही चिन्तन करने की ही है। इस तथ्य को हृदयंगम करने वाले ऋषि-मुनि गण सदैव इस सूक्ष्म आयाम में ही जीवन जीते व अपने जीवन की सीमित अवधि को असीम बना लेते थे। उसी उपक्रम का आश्रय लेकर आज भी आयुष्य को बढ़ा पाना एवं रोगों को टाल पाना संभव है, इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए।


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चिकित्सा विज्ञानियों में आदिकाल से आयुष्य बढ़ाने हेतु नवीन खोजे करने की प्रतिस्पर्धा रही है। नवीनतम प्रतिपादन पिछले दिनों कुछ वैज्ञानिकों ने साईस डाइजेस्ट पत्रिका में प्रकाशित किया। उनका मत है कि “आयोडियोरिफयर” नाम से एक चतुर्थ आयाम हर व्यक्ति के चहुँ ओर संव्याप्त होता है। यह आयोडियोरिफयर, बायोरिफयर की ही अनुकृति है। परोक्ष जगत का द्वार खोलने वाला यह चौथा आयाम ऐसा है जिसके प्रवाहों को अनुकूल बनाकर व्याधियों से बचना एवं दीर्घायुष्य को प्राप्त करना सम्भव है। सम्भव है अगले दिनों योग साधना से इस आयाम में पहुँचने की होड़ मचने लगे एवं “एजींग” (वार्धक्य) पर नियंत्रण में वैज्ञानिक-अध्यात्मवादी सफल हो जाये।


सौर परिवार के सदस्यों का पारस्परिक आदान-प्रदान

इस सृष्टि से सब कुछ नियमित और अनुशासित ढंग से चल रहा है। स्वच्छन्दता और उच्छृंखलता यदा-कदा दीखती तो है पर थोड़ी गहराई में उतरते ही उसके पीछे भी कोई न कोई अनुबन्ध काम करता दिखाई देता है। साइबेरिया के पक्षी वहाँ मौसम अनुकूल न रहने पर हजारों मील की यात्रा करके भारत आ जाते है और परिस्थिति बदलते ही वे उसी क्रम से वापस लौट जाते है। कुछ जाति की मछलियाँ प्रजनन की उमंग आते ही हजारों मील की लम्बी यात्रा पर निकल पड़ती है और जहाँ उनके लिए अनुकूलता है वहाँ पहुँच कर अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करती है। यह सब इस प्रकार होता है कि मानो उसके लिए किसी ने पहले से ही प्रशिक्षित किया हो अथवा समय पर किसी सशक्त ने हण्टर लेकर वह कष्ट-साध्य काम उससे कराया हो।

सूर्य चन्द्र ग्रह नक्षत्र अपनी गतिविधियों में समय चक्र्र का बिना रंच मात्र व्यवधान किये पालन करते है। इतना ही नहीं वे अपने परिभ्रमण मार्ग पर चलते रहने में भी राई रत्ती चूक नहीं करते है। ऋतुएँ अपने समय पर आती है और अवधि पूरी होते ही चली जाती है। सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का क्रम ही ऐसा है मानो नियति ने इस सुनिश्चित व्यवस्था को बहुत समझ-बूझकर बनाया हो। अणु परमाणुओं के गर्भ कलेवर मग जो क्रम चलता है उसमें सौर मण्डल का नियम अनुशासन और विधि-विधान भली प्रकार लागू होता है।

मनुष्य को ब्राहा जीवन में इच्छानुसार काम करने की एक सीमा तक छूट मिली हुई है। उसमें व्यतिरेक बरतने पर राजदण्ड, समाज दण्ड, प्रकृति दण्ड के हण्टर बरसने लगते है। फिर आन्तरिक क्रिया-कलापों में तो कही कोई अव्यवस्था है ही नहीं। रक्त प्रवाह, धड़कन, पाचन, शयन, जागरण, ग्रहण, विसर्जन की प्रक्रिया सुनियोजित रीति से चलती रहने तक ही जीवन स्थिर रहता है।

गर्भावस्था में स्त्रियो की हृदय की धड़कन होती तो न्यूनाधिक है पर भ्रूण की चेतना उसे प्रति मिनट 72 के हिसाब से सुनती है। उस अवधि में बच्चे को उन्हें सुनने का इतना अधिक अभ्यास हो जाता है कि उसके बिना चैन न पड़े। जन्मने के बाद भी उसे ऐसे अवसरों की तलाश रहती है जिनमें प्रति मिनट 72 धड़कने लयबद्ध रूप से सुनने का अवसर मिले। जब भी ऐसा अवसर आता है उसे असाधारण प्रसन्नता होती है।

समय के अनुशासन में मनुष्य का भीतरी ढांचा मजबूती के साथ कसा हुआ है। मांसपेशियों का आकुँचन , प्रकुंचन , श्वास-प्रश्वास, निमेष-उन्मेष आदि में यदि तालबद्धता रहती है तो मनुष्य प्रसन्न भी रहता है और निरोगी भी। पर जब भी अस्त-व्यस्तता चढ़ती और मनुष्य स्वच्छन्दता बरतकर निर्धारित क्रम बिगाड़ता है तो क्रमबद्धता लड़खड़ाने के कारण उसे अनेकानेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। प्रकृति के अन्य जीव-जन्तु उस समय सारिणी का परिपालन करते है। एक मनुष्य ही हे जो दिनचर्या में अनियमितता बरतता है और अनेकों परोक्ष कठिनाईयां बटोर लेता है।

प्राणायाम प्रक्रिया से इसी तालबद्धता से संबंधित समय सारिणी का अभ्यास किया जाता है। उस संदर्भ में जितनी प्रवीणता प्राप्त होती जाती है उतनी ही कायिक स्थिरता, सुदृढ़ता और दक्षता बढ़ती देखी जाती है।

सृष्टि क्रम नियमबद्ध अनुशासन का परिपालन करते हुए चल रहा है। मनुष्य के लिए भी मर्यादा पालन और नियम निर्धारण आवश्यक है। स्वच्छन्दता का उदत्त उपयोग करने वाले अहंकारी देर तक मनमर्जी नहीं चला सकते। अच्छा हो वस्तुस्थिति को समझे और अनुशासित नियमित जीवन जीने की आदत डाले।


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जीवन को शक्तिशाली बनाने के तीन सूत्र हैं- आत्म-ज्ञान, आत्म-संयम और आत्म-सम्मान।


हंसने और रोने की अभिव्यक्ति दबायें नहीं

मनुष्य के लिए ठीक तरह सोचना और करना तभी सम्भव होता है जब तक उसकी बुद्धि सावधान होती है। बुद्धि भ्रष्ट होते ही सारा चिन्तन लड़खड़ा जाता है। उलटा सोचता है और उलटे ही काम करता है। फलतः परिणाम भी उलटे होते है। सारे प्रयास सत्परिणाम उत्पन्न करने के स्थान पर उलटी विपत्ति खड़ी करते है। अस्तु मनुष्य का सर्वप्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि बुद्धि को भ्रष्टता की दलदल में न फंसने दे।

इस सम्बन्ध में गीता की उक्ति है-

यदा ते मोह कलिलं बुद्धिर्व्धतरिष्यति। त्दा गन्तेसि निवदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य श्र॥

अर्थात्- भगवान अर्जुन से कहते है जब तेरी बुद्धि मोह रूपी दल-दल से निकल आवेगी। जब उस रास्ते पर चलेगा जो करने वालों और सुनने वालों सभी के लिये श्रेयस्कर है।

बुद्धि भ्रष्ट कैसी होती है? वह किस दल-दल में फस जाती है। इसका कारण और निवारण बताया है।

धन का लालच लोभ कहलाता है और व्यक्तियों के प्रति असाधारण लगाव मोह। यह मोह ही बुद्धि को मगर की तरह निगल जाता है । मनुष्य की अपनी आवश्यकताएँ तो बड़ी सीमित है। उनकी सूची बनाई जायी, और उतने साधन जुटाये जाये तो यह सब सरलतापूर्वक जुट जाता है। सात्विक आवश्यक और उपयोगी का ध्यान रखा जाय तो वे इतनी सरल होती है कि अपने निजी परिश्रम से उतना सब दो चार घण्टे में ही उपार्जित हो सकता है। वासना की लिप्सा पहनाने पर शरीर की आवश्यकताएँ भी बढ़ जाती है। बहुत ही विलासी साधन की आवश्यकता पड़ती है। बहुत परिश्रम भी अभीष्ट है। तो भी आदमी जितना कमा सकता है उसे देखते हुए शरीर की शोभा सज्जा की एक सीमा है और वह इतनी अधिक नहीं है कि उसके लिए पूरा जीवन ही निछावर करना पड़े।

न पार हो सकने वाला दलदल तो मोह का है। मोह को ममता भी कहते है। मेरे पन का विस्तार इतना बड़ा हो सकता है कि उसकी पूर्ति हो सकना कठिन है। कुटुंबियों, मित्रो, की परिधि तो और भी बड़ी है। अपनी संपत्ति, जायदाद, वाहन, नौकर आदि का विस्तार कितना भी किया जा सकता है। यह मोह है। जिन्हें मेरा कह सके उनकी सूची बनाई जाय तो वह इतनी बड़ी हो सकती है कि बुद्धि की मर्यादा छोटी पड़ जाय। बुद्धि अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुरूप ही उपार्जन का ताना-बुना बुन सकती है। परिश्रम के सहारे तो वह थोड़ा सा ही हो सकता है। चोरी, बेईमानी के आधार पर कमाने की भी हर व्यक्ति की सीमा होती है। सत्प्रयोजन में साधनों का कितना ही व्यय किया जा सकता है। पुण्य परमार्थ की कोई सीमा नहीं। किन्तु मात्र संग्रह या उपभोग करना हो तो बहुत बड़ा झंझट है। ऐसा संग्रह अहंकार को बढ़ाना है, पर उसके साथ में इतने झंझट है कि यह मोह ममता बहुत भारी पड़ती है और विनाश का कारण बनती है।

मोह ममता निजी प्रयोजनों से आगे बढ़कर जब कुटुंबियों, संबंधियों तक में फैलती है तो उसकी सीमा और भी बढ़ जाती है। फालतू कमाने वाले के कुटुंबियों की सीमा नहीं रहती। सगे तो स्त्री पुत्र आदि थोड़े ही होते है। बिना सगे भी सगे बन बैठते है और अपने को सम्बन्धी सिद्ध करते हुए फालतू सम्पदा पर अपना अधिकार जताते है। हिस्सेदारी की माँग करते है। जब अनावश्यक धन संग्रह है ही तो उसे चाटुकारों में वितरण करके उनसे प्रशंसा सुनने, आत्मीयता की दुहाई कान में पड़ने का लोभ भी संवरण नहीं होता। इसके लिए जितने भी साधन एकत्रित करे कम है।

बुद्धि के उपयोग करने के लिए यह मोहजन्य ताना-बाना इतना सुविस्तृत होता है कि इतनों के लिए सोचने और करने के अतिरिक्त कुछ बचता ही नहीं। बीज का विकसित रूप पौधा है। चिन्तन का विकसित रूप कर्म है। कर्म से साधन एकत्रित होते है। जो एकत्रित है उसी को तो वितरण किया जायेगा। सामान्य मनुष्य बुद्धि को मोह जाल में फंसाये रहता है। पूरा जीवन इसी में खप जाता है। सारी योजनाएँ इसी की बनती है। अवांछनीय उपार्जन जितना पेचीदा है उससे अधिक उसका उपभोग और वितरण है। इन दोनों कामों में आदि से अन्त तक अनौचित्य भरा रहता है। अतएव उसकी गुत्थियों को सुलझाना लोभ की पूर्ति में भी कठिन पड़ता है। मोह को लोभ का बड़ा भाई बताया गया है । जिन्हें अपना मानकर धन दिया जाता है उनके सम्बन्ध में यह इच्छा भी होती है कि यह हमारा कहना माने। लेने को तो हर कोई तैयार है पर मानने को कदाचित ही कोई तैयार होता है।

आत्म-कल्याण के लिए, पुण्य परमार्थ के लिए, जीवन को सार्थक बनाने के लिए मानव परायणता के लिए भी बुद्धि और कर्म की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य इतने सरल नहीं है कि तनिक से पूजा-पाठ को चिन्ह पूजा भर में सम्भव हो सके। इसके लिए जीवन को एक विशेष ढाँचे में ढालना होता है। उच्चस्तरीय कर्म व्यवस्था अपनानी पड़ती है। इस निमित्त बुद्धि का नियोजन उससे भी अधिक चाहिए जितना कि लोभ और मोह के निमित्त लगाना होता है। यह लगे कैसे? जो कुछ है वह तो सारा मोह रूपी दलदल में फँसा रहता है।

आत्म कल्याण के लिए साधारण बुद्धि से भी काम नहीं चलता। इसके लिए प्रज्ञा, मेधा चाहिए। विवेकवान दूरदर्शिता अभीष्ट होती है। इस स्तर की बुद्धि उपजे कैसे? उसका एक ही उपाय है कि उसे मोह रूपी दलदल में से किसी प्रकार बाहर निकाला जाय। यह दलदल ही समस्त मेघा को उदरस्थ कर जाता है। इसलिए परमार्थिक जीवन के लिए प्रथम आवश्यकता इस बात की है कि चिन्तन को मोह-ज्ञान में से निकाला जाय। सौम्य, सात्विक, सरल, निर्लोभ, निर्मोह जीवन का लक्ष्य बनाया जाय। गीता की यही उक्ति ऐसी है जिसे अपनाये बिना और कोई गति नहीं।


स्वामी विवेकानंद जी का जवाब (kahani)

स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका की सड़क से गुजर रहे थे तो उनकी विचित्र वेशभूषा को देखकर लोग उन्हें मूर्ख समझने और मजाक बनाने लगे। अपने पीछे आती हुई भीड़ के सम्मुख स्वामीजी रुके और उनने पीछे मूडकर कहा-सज्जनों! मेरी वेशभूषा को देखकर आश्चर्य मत करो। आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है। पर मैं जिस देश से आया हूँ वहाँ कपड़ों से नहीं मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।


अपराधी प्रवृत्ति के स्रोतों को बन्द किया जाये

आनन्द की तलाश में लोग जहाँ-तहाँ मारे फिरते और तितली की तरह एक फूल से दूसरे फूल पर बैठते है। असंतुष्ट रहने पर अन्यत्र उड़ते और वहाँ से भी दूर के ढोल सुहावने होने का आक्षेप लगाते हुए किसी अन्य स्थान के लिए चल पड़ते है। असफलता वहाँ भी छाया की तरह साथ चलती है। जिस स्थान, व्यक्ति या परिस्थिति को कभी बहुत ही आकर्षक माना गया था, वह संपर्क साधने के उपरान्त वैसा निकलता नहीं जैसा कि मिलन से पूर्व सोचा गया था। यह अतृप्ति ,जन्म अशान्ति ही मनुष्य के पीछे प्रेत, पिशाच की तरह फिरती रहती है। आनन्द की खोज में व्याकुल और उसकी उपलब्धि के लिए आतुर मनुष्य बहुत कुछ करने पर भी उसे प्राप्त न कर सके तो उसे विडम्बना ही कहा जायेगा।

क्या इस संसार में आनन्द है ही नहीं या फिर उसकी कल्पना करके लोग हैरान फिरते रहते है? या फिर उसके स्थान, केन्द्र की जानकारी न होने-प्राप्त करने के उपाय से अपरिचित होने के कारण यह असफलता हाथ लगती है? इन प्रश्नों पर विचार आवश्यक है।

निराशावादी दार्शनिकों ने इस जन्म-मरण की रोग-शोक की वितृष्णाओं से भरा-पूरा भी बताया है। यहाँ सर्वत्र दुःख ही दुःख होता है कइयों का पाप और पतन भर की झाँकी मिली है और स्वर्ग जैसे किसी दूर स्थान में जाकर संतापों से त्राण पाने की बात कही है। कइयों को यहाँ सब कुछ भ्रम मात्र दृष्टिगोचर हुआ है जो घटित हो रहा है जो सामने है उसे माया कहाँ है। माया से छूटने के लिए वह वे आत्म केन्द्रित या ब्रहा विलीन होने की बात सोचते है। यह पलायन भर है। निराशा और निरानन्द की मनःस्थिति में प्रायः ऐसे ही तर्क सूझते है और ऐसे उपाय गढ़ने पड़ते है। निराशा के विक्षोभ में लोग आत्महत्या कर लेते है। जीवन और संसार को शोक संताप का जाल-जंजाल मानकर उससे भगाने की बात सोचना प्रकारान्तर से दार्शनिक आत्म हत्या ही है।

तथ्यों पर गंभीरता से विचार करने पर वस्तुस्थिति वैसी प्रतीत नहीं होती जैसी कि निराशावादी मनःस्थिति में सूझ पड़ती है। सृष्टा ने इस संसार को असाधारण परिश्रम और मनोयोग के साथ सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में गढ़ा है। यहाँ सर्वत्र ही आनन्द भरा पड़ा है। सत् चित् आनन्द स्वरूप ने सत् तो अपने तक सुरक्षित रखा है किन्तु चित-चेतना को-आनन्द की उपलब्धि के लिए साधनों की कमी नहीं रहने दी है। प्रस्तुत हल-चलो के पीछे कही भी आनन्द को झाँकते देखा जा सकता है। शर्त एक ही है कि तत्व और तथ्य को देख समझ पाने की दृष्टि का उन्मीलन बन पड़ा हो। आंखों में पट्टी बाँध लेने पर तो दिन में भी अंधेरा दिखता है। नीरसता और निराशा की दृष्टि लेकर तो आनन्द की अनुभूति का सुयोग, मिल ही कैसे सकेगा?

दार्शनिक लिंक ने अपनी पुस्तक ‘विश्व विवेचन’ में मनुष्य के चारों आरे बिखरी हुई हलचलों और परिस्थितियों की चर्चा बड़ी हृदयग्राही शैली में की है वे कहते है- विषमान आनन्द को देख न पाना मनुष्य की अपनी समझने की भूल है। भाव संवेदनाओं की सौंदर्य दृष्टि न होने से ही उस आनन्द से वंचित रहना पड़ता है। जो अपने इर्द-गिर्द ही वायु मण्डल की तरह सर्वत्र घिरा पड़ा हैं।

प्रभात काल में टहनियों पर चहकती और घास पर फुदकती चिड़ियों के कलरव सुनकर क्यों आनन्द की अनुभूति नहीं होनी चाहिए? उषा काल की लालिमा और बहती शीतल पवन को जो आनन्दी दृष्टि से देख सके उसके अन्तस् में क्यों उल्लास नहीं उठना चाहिए? आकाश कितना सुन्दर है। नीली चादर पर लटकते मणि मुक्तकों जैसे चाँद सितारे क्या रात्रि से किसी कलाकार की कलाकृति का परिचय नहीं देते? दिन में सूरज और रात्रि में चाँद से जो गरम और ठण्डी रोशनी बरसती है उसके साथ तादात्म्य मिला सकने वाले की क्या उल्लास भरी उमंगों का रसास्वादन नहीं होता। मखमली चादर की तरह धरातल पर बिछी हुई घास की समीपता से जिसके मन में पुलकन नहीं उठती, उसके भाग्य का ही दोष है कि इतना कुंठित दृष्टिकोण लेकर इस संसार में जन्मा और जिया।

शीतकाल में अंगीठी के आगे बैठकर तापना और गर्मी के दिनों में ठण्डे पानी से नहाना क्या कम सुखद है। रात्रि की माता की गोद में सुख पूर्वक विश्राम लेने थकान मिटाने और नई स्फूर्ति पाने का हर दिन जो संयोग मिलता है उसे कम महत्व का न माना जाय? दिन भर विनोद भरे कामों में जुटे रहना और समीपवर्ती क्षेत्र से चित्र-विचित्र हलचलों होते देखना किसी मनोरंजक मेले ठेले की बहार लूटने से क्या कुछ कम है? चलते-फिरते और बोलते-गाते खिलौनों की तरह जो प्राणि समुदाय अपने आस-पास मंडराता और आनन्द बिखेरता रहता है उसके पीछे झाँक सकने वाले उल्लास को देख सकने भर की कमी है। इसकी पूर्ति होते ही फिर कही कोई जगह ऐसी शेष न रह जाये जहाँ आनन्द का अनुभव न हो सके।

मिठाई और मिर्च के अपने-अपने जायके है। रात और दिन का अपने-अपने ढंग का आनन्द है। ज्वार−भाटों में से दोनों ही महत्व उपयोग एवे सौंदर्य है। यहाँ घटित अच्छा भी होता है और बुरा भी। जन्म, मरण लाभ और हानि एक दूसरे के पूरक बनके रहते है। नर और नारी की भिन्नता रहने से किसी का क्या बिगड़ता है। हो सकता है इनमें से किसी को प्रिय अप्रिय लगे पर इससे क्या परिवर्तन और संतुलन बिठाने वाली इस भिन्नता में आनन्द की कही किसी प्रकार कमी नहीं है।

हैरान अपना ही अनगढ़ दृष्टिकोण करता है। जो विद्यमान है उसमें से अशुभ ढृढने पर मिल सकता है। सृष्टि की विशेषता ही ऐसी है कि उसके किसी भी पक्ष को अपनी परख के अनुसार भला या बुरा समझा जा सकता है। मृत्यु एक के लिए सर्वनाशी प्रलय है तो दूसरे के लिए प्रभु मिलन का, नवीन जन्म धारण का शुभ सुयोग। कौन किन प्रसंग की व्याख्या करे, यह अपने-अपने चिन्तन या स्वभाव पर निर्भर है।

कस्तूरी मृग के नाभि में सुगंध भरी होती है पर वह उसे अन्यत्र खोजता और मारा-मारा फिरता है। इसमें थकान, खीज और निराशा ही उसके हाथ लगती है। मृग तृष्णा वाला उदाहरण भी ऐसा है। चाँदनी रात में बिखरे बालू को जलाशय समझकर कुलाचे भरने वाले हिरन भी ऐसी ही खेदजनक स्थिति में समय गँवाते रहते है। हममें से भी आनन्द की खोज करने वालों में से अधिकाँश को ऐसी ही मनःस्थिति और परिस्थिति होती है।

यह संसार जड़ पदार्थों से बना है। वे मूलतः निर्जीव और निरानन्द है। आनन्द का आरोपण तो उन पर मानवी भाव संवेदना के आधार पर किया जाता है। यदि ऐसा न होता तो एक ही नारी को कामिनी और दूसरे को कल्याणी क्यों दीखती। एक विलास के लिए मरता है और दूसरा तपश्चर्या में आनन्द में सराबोर रहता है। यह और कुछ नहीं दृष्टिकोण का ही विभेद है।

नीरसता, अन्यमनस्कता, निराशा और कुछ नहीं मात्र मनुष्य को संकुचित और असंस्कृति दृष्टिकोण की ही परिणति है। जब तक उसमें सुधार परिवर्तन नहीं होगा तब तक आनन्द की अपेक्षा दिवा स्वप्न जैसी दुराशा ही बनी रहेगी।

आनन्द भीतर से उमंगता है वह भाव संवेदना और शालीनता की परिणति है। बाहर की वस्तुओं में उसे खोजने की अपेक्षा, अपनी दर्शन दृष्टि का परिमार्जन होना चाहिए। इतना बन पड़े तो नजर उठाते ही हर वस्तु और, हर व्यक्ति और घटना में अपने-अपने ढंग का रसास्वादन होने लगेगा। हो सकता है कि कुछ घटनाएँ हमें सुधारने और झगड़ने के लिए उकसाये कुछ सहन-शीलता, और दूरदर्शिता की परीक्षा करे, और कुछ उल्लास भरी अनुभूतियों में परितृप्त करे। इतनी भिन्नता और विचित्रता के रहते हुए भी इस संसार में आनन्द की कमी दृष्टिगोचर नहीं होगी। अनुकूलता और प्रतिकूलता के भी अपने-अपने रस और अनुभव आस्वादन है।


विचारों को सृजन की दिशा में नियोजित रखा जाये

पराक्रमः- शरीर का हर अवयव, कोश, ऊतक निरन्तर क्रियाशील है। रक्त परिभ्रमण, श्वास-प्रश्वास, मल विसर्जन आदि कार्य निरन्तर चलते रहते है। गति हर कार्य की अलग-अलग है, पर कोई क्रिया-कलाप कभी रुकता नहीं। आंतें, मस्तिष्क, गुर्दे आदि सतत् क्रियाशील है। वास्तविकता तो यह है कि गतिशीलता की कमी ही बुढ़ापा, एवं गति रुक जाना मृत्यु है।

इसे अच्छी तरह जीव कोश के स्तर पर देखा जा सकता है। कोशों की बाहरी झिल्ली, सेलमेम्ब्रेन सतत् क्रियाशील है। यदि कुछ क्षणों के लिये यह झिल्ली कोश के भीतर से सोडियम को निकालना बन्द कर दे तो कुछ मिनटों में जीवकोश की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं, कोश के अंदर विद्यमान साइटोप्लाज्म नामक जीवित पदार्थ सतत् चलता रहता है, एक ही स्थान पर नहीं बैठा रहता। हरेक जीवकोश में इस तरह द्रव्य में सतत् रासायनिक क्रियाएँ चलती रहती है।

रोग वैज्ञानिकों के अनुसार और कुछ नहीं, शरीर में चल रही अनेक क्रियाओं में से एक या कुछ या रुक जाना शिथिल पड़ जाना ही है। जब भी ऐसा अंग विशेष में होता है तो वह विकार उसी अवयव में होता देखा जाता है। किन्तु शरीर का एक अंग होने के कारण वह शरीर पर प्रभाव डालता ही है। सारा शरीर विभिन्न लक्षणों के माध्यम से अपनी व्यथा प्रकट करता है। हृदय की माँस-पेशियों का जब कोरोनरी धमनियों से रक्त नहीं मिलता, थक्का रक्त-प्रवाह में बाधक बन जाता है तो हार्ट अटैक तुरन्त होता है। अपनी पुकार माँसपेशियाँ हंदय के दर्द के रूप में प्रकट करती है।

मनुष्य के लिए सतत् क्रियाशील बने रहना ही उसके अंग अवयवों के पराक्रम का प्रतीक है। यही अक्षुण्ण स्वास्थ्य की कुँजी है। यदि किसी कारण वश वह अधिक समय तक बिस्तर पर पड़ा रहे तो उसे अनेकों रोग आ घेरते है। सक्रिय, कर्मठ नजर आता मनुष्य देखते-देखते बूढ़ा हो जाता है। हड्डियों में कैल्शियम की मात्रा घट जाती है तथा वह घुलघुलकर मूत्र मार्ग से निकल कर बाहर आने लगता है। कभी-कभी यही कैल्शियम जमकर पथरी को जन्म देता है। निरन्तर लेटे रहने के कारण मूत्र संस्थान में संक्रमण की दर भी बढ़ जाती है, फेफड़ों में से वायु निष्कासन उचित ढंग से नहीं हो पाता तथा उनमें कभी-कभी पानी भर जाता है तथा त्वचा पर ब्रण हो जाते है जिसे ‘बेडसोर’ कहते है।

हृदय की गति को पेसमेकर नामक एक विशेष ऊतकों का समुच्चय संचालित करता है। यदि यह काम करना बंद कर दे तो हृदय की धड़कन बंद होने -मृत्यु होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। कुछ मिनटों तक तो ‘कण्डक्शन टीश्यू’ अपनी भूमिका पेसमेकर रूप में निभाने का प्रयास करते है, पर मुल प्रेरणा स्त्रोत यदि निर्देश भेजना तत्काल आरम्भ न करे तो मृत्यु निश्चित है। हृदय का यह पराक्रम ही उसे जीवन भर चौबीसों घण्टे चलते रहने वाले पम्प की भूमिका निभाने में समर्थ बनाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण शरीर तंत्र में देखे जा सकते है जो उनकी वैयक्तिक एवं सामूहिक क्रियाशीलता का परिचय देते है। इन्हीं के बलबूते वह स्फूर्ति व जीवनी शक्ति का अस्तित्व पराक्रम के रूप में सामने प्रत्यक्ष देखा जाता है।

प्रत्यावर्तनः- काय तन्त्र की इस कर्मशाला का हर कोश अवयव निरन्तर गतिशील ही नहीं रहता आदान-प्रदान के सतत् चक्र में घूमने की भूमिका भी बखूबी निभाता है। त्वचा के कोश निरन्तर झड़ते व नये आते रहते है। हर सताईसवे दिन शरीर की समग्र त्वचा (सरफेस एरिया) 108 वर्ग मीटर है, की बाहा सतह इपीडमींस के सभी कोश बदल जाते है। इनका स्थान नये सेल्स ले लेते है। रक्त के लाल कण एक नियत अवधि तक जीने के पश्चात् मृत्यु को प्राप्त होते है, उसका स्थान नवीन रक्त कोशिकाएँ ले लेती है।

जल चक्र भी शरीर की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। अम्ल व क्षार के रक्त में अनुपात के अनुरूप रक्त आयतन बनाये रखने के लिये पानी ग्रहण करने व विसर्जन की प्रेरणाएँ उठती रहती है। सारी प्रक्रिया एक सूक्ष्म हारमोन इलेक्ट्रो-लाइटस एन्जाइम तन्त्र द्वारा संचालित होती है जो निरन्तर गतिशील रह प्रश्वास, पसीने एवं मूत्र के माध्यम से इस चक्र को नियोजित करता है। यही तथ्य खनिज तन्त्र पर भी लागू होता है। अस्थियों में जमे कैल्शियम का समुच्चय तो नहीं, अठारह प्रतिशत भाग बदलकर नया हो जाता है। एक प्रकार से यह सारे कंकाल तन्त्र का नूतन काया कल्प है।

नित्य नूतनता तथा अपरिग्रह की भावना विधाता ने मानवी काया के साथ ऐसी संजो दी है, कि जीवन सरस, गतिशील बना रहता है। प्राकृतिक जीवन जिया जा सके तो प्रफुल्लता बनी रहती है, काय तन्त्र अपनी प्रत्यावर्तन प्रक्रिया चालू रखता है एवं किसी वस्तु का न कही अभाव प्रतीत होता है, न कभी अनावश्यक जमाव हो पाता है। यह परिवर्तन चक्र इकॉलाजी के अनुशासन में बँधे सारे जीव जगत पादप समुदाय में पाने जाने वाले अनुशासन तन्त्र का ही अंग है। इसे रासायनिक आधार पर नहीं, विधि-व्यवस्था के एक समग्र सिस्टम के रूप में समझना होगा। पेड़-पौधे निरन्तर ट्रान्सपिरेशन प्रक्रिया द्वारा नीचे से जल खींचते व ऊपर वायुमण्डल में छोड़ देते है, नूतन पत्तियाँ हर वर्ष बदल कर अपना काया-कल्प करते रहते है। यह व्यवस्था प्रत्यावर्तन द्वारा ही बनायी गयी है।

जीव-जन्तु भी हर वर्ष शीत ऋतु में शीत-निद्रा में चले जाते है। वे ऐसा शीत ऋतु से बचने के लिये नहीं करते। वैज्ञानिक श्री पेन्ग्रेले तथा श्री एडमण्डसन का कथन है कि शीत निद्रा में जाने वाले जानवर अपनी आन्तरिक घड़ी से चालित होते है न कि ब्राहा मौसम से। वह निर्देश देती है तब शरीर हाइबरनेशन में चला जाता है। इस समाधि से उठने के बाद शरीर में नये जन्म के समान स्फूर्ति उभर आती है। सम्भवतः योगीजन इसी कारण, हिम समाधि, कल्प साधना, एकान्त सेवन की प्रक्रिया सम्पन्न करते थे, ताकि वर्ष में एक बार प्रत्यावर्तन होता चले एवं आयुष्य बढ़ती रहे।

अनुशासनः- नियमित, अनुशासित बने रहना जीवन के लिये उतना ही जरूरी है जितना कि पारस्परिक सहकार, गतिशीलता एवं प्रत्यावर्तन। इस गुण को शरीर के अंग-अंग में क्रियाशील देखा जा सकता है।

यदि हृदय सतत् क्रियाशील रहे पर यह सक्रियता अनियमित हो, 70 से 80 बार प्रतिमिनट धड़कन के रूप में न होकर एरिदमिक (लय-ताल रहित) हो तो हृदय की कार्य क्षमता में असामान्य कमी आ जाती है एवं वह सारे शरीर को प्रभावित करती है। हृदय रोगी न भी हो पर उसकी धड़कन अनियमित हो तो रोगी तुरन्त “कार्डिक फैल्योर” की स्थिति में चला जाता है। अनुशासित विधि-व्यवस्था का यह क्रम श्वास संस्थान से लेकर मूत्र विसर्जन संस्थान तक सभी स्तर पर एक समान लागू होता है।

हर स्वर, ताल अथवा उच्चारित शब्दों की निर्माण प्रक्रिया में ऊपरी श्वास संस्थान के ‘वोकल कार्डस्’ ही नहीं अपितु जिव्हा, तालु, नासिका, होंठ आदि सभी अवयवों का एक नियमित क्रम से सिकुड़ना एवं फैलना उत्तरदायी होता है। इसी प्रकार विचारे गये शब्दों को लिपिबद्ध करने में हाथ की 15 से भी अधिक मांसपेशियां एक नियमित क्रम में आकुँचन-प्रकुँचन करती है। इस क्रम में गड़बड़ाने पर अक्षर लिख पाना संभव नहीं।

जीव कोश के स्तर पर तो यह नियमन-अनुशासन का क्रम और भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। हर जीव कोश में डी0एन0ए0, आर॰ एन॰ ए॰ जैसे सूक्ष्म प्रोटीन घटक होते है। हर प्रोटीन में सैकड़ों अमीनो अम्ल एक नियमित क्रम से लगे होते है। ग्लूकोस के एक अणु में न्यूनतम बीस से भी अधिक ऐंजाइमों को एक नियमित क्रमबद्ध सहयोग से तोड़ने पर ऊर्जा प्राप्त होती है जिसे कैलोरी कहा जाता है एवं सारा शरीर व्यापार चलता है।

ये तो मात्र कुछ उदाहरण है। शरीर में किसी भी क्रिया को नियमितता के किसी भी पहलू से देखा जाने पर वह खरा सिद्ध होता है। शरीर के सारे क्रियाकलाप एक रिदमिक (लय ताल युक्त) विधि-व्यवस्था से आबद्ध है। शरीर रोगी तब होता है जब इस अनुशासित व्यवस्था में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होता है।

एकात्मभावः- का अर्थ है पारस्परिक भावनात्मक सद्भाव। शरीर के खरबों जीवकोश कार्य पद्धति तथा बनावट की दृष्टि से भिन्न-भिन्न प्रकार की जटिलताओं से भरे है। रेटिना (आँख का भीतरी पर्दा) एवं हड्डियों के कोशों, न्यूरान्स, रक्त के लालकण, प्रोटीन निर्माता, इम्यून कोश तथा लीवर के कोशों की परस्पर तुलना की जाय तो उनके क्रिया-कलापों तथा आकृतियों में जमीन-आसमान जितना अन्तर मिलेगा। कहाँ रेटिना के सूक्ष्मतर कोश एवं कहाँ हड्डियों के बड़े कोश, कहाँ लाल रक्त जो मात्र 120 दिन जीते है व कहाँ मस्तिष्क के न्यूटान जो जन्मने के बाद ही मरते है। यह विविधता सारे शरीर में संव्याप्त पाई जाती है। इसके बावजूद ये सभी परस्पर मित्र भाव रखते है। शरीर को कोई चोट पहुँचने, ताप बढ़ाने जीवाणु के आक्रमण की स्थिति में सभी मुकाबले हेतु समान रूप से तैयार रहते है। हृदय तीव्रगति से रक्त की पम्पिंग प्रारम्भ कर देता है। इम्यून संस्थान एण्टी बाडिज बनाने लगता है। मास-पेशियां सक्रिय हो जाती है। मस्तिष्क चेतना प्रखर हो जाती है एवं यकृत के कोश जल्दी-जल्दी मेटाबाँमिक क्रियाएं सम्पन्न करने लगते है। सहकारिता एवं पारिवारिकता की भावना की प्रत्यक्ष झाँकी शरीर में सहर्ष देखी जा सकती है।

हृदय मात्र अपनी ही चिन्ता नहीं करता, वह सारे शरीर के अंग अवयवों को आवश्यकता-परिस्थिति अनुसार रक्त पहुँचाने के लिए उत्तरदायी है। गुर्दा यदि शरीर में एक भी है, दूसरा रोग विशेष के कारण काम न करे, या निकाल लिया जाय तो एक ही दो की भूमिका निभाने लगता है। शरीर के इस एकात्मभाव के आधार पर ही शरीर बाहरी घुसपैठियों से अपनी रक्षा कर पाता है, आवश्यकता आ पड़ने पर रसायन स्रावों से लेकर जीवकोशों, एण्टी बाँडिज सभी को जंग में खपा देता है।

शरीर को मात्र रासायनिक पदार्थों का समुच्चय मानने कहने वाले यह देखे कि काया के अन्तराल में चलती रहने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ किस प्रकार पदार्थ के सामान्य गुण धर्म के आधार पर सम्भव हो पाती है? पदार्थ अपनी नियत ब्राहाकृति को धारण किये रह सकता है, पर उसमें यह क्षमता नहीं है कि परिस्थितियों को देखते हुए अपनी रीति-नीति में परिवर्तन करता रह सके, न ही उसकी यह विशेषता है कि उच्चस्तरीय आदर्शों को अपने क्रिया-कलाप में सम्मिलित रख सके। पदार्थ का अतिरिक्त उपयोग हो पाना तभी सम्भव है, जब उसके मूल में कोई चेतनात्मक शक्ति या प्रेरणा काम कर रही हो। स्वचालित माने जाने वाले यन्त्र रोबोट आदि भी तभी अभीष्ट प्रयोजन पूरा करते है जब उसके पीछे कोई विचारशील व्यक्ति निर्देशन एवं सूत्र संचालन कर रहा है।

जीवन के पीछे आत्मा की-परम सत्ता की शक्ति मानने के लिए अब उन व्यक्तियों को अपनी पूर्वाग्रह की मान्यता में परिवर्तन करना पड़ेगा जो प्रकृति को सर्वोपरि सत्ता और परमाणु को सर्व समर्थ घटक मानते रहे है, जिन्हें आत्मा या परमात्मा की क्षमता, उपयोगिता एवं आवश्यकता प्रतीत होती है।

ईशोपनिषद के आठवें मन्त्र में ऋषि कहते है-

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापबिद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् यदधाच्छोश्वतीभ्यः समाभ्यः॥

“ वह स्वयंभू (ईश्वर) सर्वत्र है, शुद्ध है, सूक्ष्म काया रहित, मांसपेशियां रहित, पवित्र, पाप रहित, कवि-क्रान्ति दर्शी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है। उसने चिरन्तर प्रजापतियों को अपने अपने काम सौंप दिए है।” वेदान्त की यही मान्यता जो आत्मा के पवित्र, शुद्ध एवं परम-सत्ता के अविच्छिन्न अंश होने की घोषणा करती है, हर वैज्ञानिक के लिए एक प्रेरणा भरी चुनौती है।

विज्ञान प्रत्यक्षवाद की दुहाई देता है। उसे ऐसी प्रत्यक्षवादी चुनौतियाँ भी मिल सकती है जो पदार्थ की सर्व समर्थ स्वावलम्बी सता के सम्बन्ध में अपनी मान्यता बदले कि काया की सामान्य कार्य पद्धति के पीछे कितने रहस्य छिपे हुए है। ऐसे रहस्य जो शरीर को, उसके क्रियाकलाप को मात्र भौतिक मानने से स्पष्ट करते है। यह शरीर परक क्रिया-कलाप अन्तः से उठने वाली स्फुरणा की ही अभिव्यक्ति है जो अनेकानेक रूपों में दिखाई पड़ती है। आत्म सत्ता और परमात्म सत्त की एकात्मता एवं जटिल संरचना के इस सुसंचालन पर कबीर ने लिखा है-

जो चरिखा अरिजाय, बढैया ना भरै। मैं कातो सूत हजार, चरखुला जिन जरै॥

इस रहस्यवादी सन्त ने चरखे के क्रिया-कलापों में भी ईश्वरीय लीला संदोह की अनुभूति की और कहा है “यदि चरखा जल भी जाय तो उसका बनाने वाला बढ़ई नहीं मर सकता, पर यदि मेरा चरखा न जलेगा तो मैं उससे हजार सूत कातूँगा।

शरीर की सहकारिता, संघर्ष, सामंजस्य, पराक्रम, प्रत्यावर्तन, अनुशासन और एकात्मभाव नामों से वर्णित गुण परक वृत्तियां तथ्यों के साथ यही सिद्ध करती है कि शरीर के पीछे के रसायनों की ही हलचलें काम नहीं करती, उसका सूत्र-संचालन ऐसी अदृश्य शक्ति के माध्यम से होता है जो शरीर ही नहीं, इस समस्त विश्व वैभव का भावात्मक आधार पर सूत्र संचालन करती है।


Quotation

संग्रह का अन्त बिखराव है। अभ्युदय के अनन्तर अवसान आता है। संयोग की परिणति वियोग है। इस परिवर्तन चक्र पर घूमते हुए संसार में स्थिर तो एकमात्र “धर्म” ही है।


कैंसर प्रकृति विरोधी आचरण का दुष्परिणाम

लोंगफैलो कहते थे कि “ बचपन और यौवन के आनन्द की तरह ही वृद्धावस्था भी आनन्द और उत्साह भरी है। आयु के हर पहलू की अपनी-अपनी उपयोगिता है। बच्चे कुछ कमाई नहीं करते उनसे युवकों जैसे पुरुषार्थ भी नहीं बन पड़ते तो भी यह कहा नहीं जा सकता कि बचपन निरर्थक या निरानन्द है। ठीक इसी प्रकार वृद्धावस्था भी दुःखदायी नहीं है और न ऐसी है जिसे निरर्थक कहा जा सके।”

वृद्धावस्था और थकान दो अलग-अलग चीज है। बुढ़ापा निरानन्द आता है, यह मानना गलत है। मन बूढ़ा होता है न जवान। वृद्धावस्था की अपनी उपयोगिता है। परिपक्व ज्ञान और अनुभव जिस स्थिति में मनुष्य के पास एकत्रित हो, उसके बारे में यह सोचा नहीं जाना चाहिए कि यह आयु बेकार है। मात्र दौड़ना ही जवानी नहीं है। जिन दिनों कोई व्यक्ति परिपक्व बुद्धि का होता है वह अवधि जवानी से किसी प्रकार कम मूल्यवान नहीं है।

सिर पर सफेद बाल और चेहरे पर झुर्रियों का होना किसी व्यक्ति का मूल्य घटाता नहीं वरन् बढ़ाता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के पास संकल्पित अनुभव अन्य अवस्था वालों की तुलना में सम्मान पाने के लिए बहुत कुछ है। वह अपने अनुभव के सहारे परामर्श दे सकता है जिसके लिए अन्य आयु वाले तरसते रहते है।

हँसने और हँसाने की कला याद हो तो वयोवृद्ध अन्य आयु वालों की तुलना में अधिक प्रसन्न दीख पड़ते है। मात्र जवानी की मजबूती और फुर्ती ही सब नहीं है। वृद्धावस्था की गम्भीरता का अपना महत्व है। परिश्रम करने पर ही वृद्धजन ऐसे परामर्श दे सकते है जिनके सहारे अधिक लाभान्वित होना बन पड़े। सौजन्य और शालीनता सीखने के लिए हर आयु के व्यक्ति को वृद्ध जनों के पास जाना पड़ता है।

जो थकान, निराशा और खीज अनुभव करता है वस्तुतः वह बूढ़ा है भले ही वह आयु की दृष्टि से जवान ही क्यों न हो। इसी प्रकार वह जवान है जिसमें आशा, उत्साह और हिम्मत मौजूद है भले ही उसके चेहरे का बुढ़ापा झलकता है।

करने योग्य काम अलग-अलग है। बचपन और जवानी की मजबूती और फुर्ती अपने समय पर सराहने योग्य है। किन्तु बुढ़ापे की सुन्दरता किसी प्रकार कम नहीं आँकी जा सकती। शरीर थका हुआ हो किन्तु मन में उत्साह हो तो ऐसा व्यक्ति सुन्दर भी लगता है और हर किसी के लिए आनन्ददायक और उत्साहवर्धक।

कितने व्यक्ति ऐसे होते है जिनने अभी-अभी जवानी में प्रवेश किया है। रूपवान और धनवान भी है किन्तु जिन पर निराशा छाई है। जिन्हें भविष्य अन्धकार भरा दिखता है। जिन्हें अपनों से और विरानो से शिकायत ही शिकायत है। ऐसे लोगों के चेहरे पर मुर्दनी छाई रहती है।

सम्मान दूसरे नहीं देते मनुष्य अपनी इज्जत अपने आप करता है। जिसने अपने सद्गुणों से तौर तरीका ऐसा बना रखा है जिसकी इज्जत की जा सके तो समझना चाहिए कि उसकी उपयोगिता हर अवस्था में समझी जाएगी। बुढ़ापे के कारण कोई निरुपयोगी नहीं माना जाता। जिसने अपनी आदतें, गतिविधियां ऊँचे स्तर की रखी है , उन्हें कभी ऐसा बुढ़ापा नहीं देखना पड़ेगा जिसकी इज्जत में कमी पड़े।


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विवेक पूर्वक सोचो, बोलो और करो। इतना बन पड़े तो समझो कि ईश्वर की प्रार्थना सही अर्थों में की जा रही है।


हम अन्तःकरण की वाणी सुनें और उसका अनुकरण करें

बाइबिल के ‘लूका’ संवाद में ईसा और मरियम का संवाद आता है। ईसा कही गायब हो गये। इनके माता-पिता खोजते फिरे। बहुत दिन बाद मिले तो मरियम ने कहा -तुम्हें खोजने के लिए हमें कितना दुःख उठाना पड़ा। तुम कहाँ चले गये थे? ईसा ने उत्तर दिया आप दुःखी न हों। मुझे तो अपने असली बाप के काम में लगे रहना है। इसके बाद ईसा कही चले गये और तीस वर्ष तक कुछ पता न लगा। बाइबिल में भी इन अज्ञातवास के तीस वर्षों की कोई चर्चा नहीं है।

आधुनिक खोज कर्ताओं ने उन तीस वर्षों का विवरण खोज निकाला है कि वे भारत में तीर्थयात्रा और धर्मशास्त्र का अध्ययन करते रहे। जो उन्होंने इस अवधि में सीखा उसी को उन्होंने अपने देश लौटकर धर्मोपदेश के रूप में कहना आरम्भ किया।

उन दिनों भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार था। बुद्ध काल को बीते मात्र 500 वर्ष ही तब तक हुए थे। रूसी विद्वान निकोलस नारोविच ने लगातार चालीस वर्ष खोज करके उन प्रमाणों को खोजा है जो ईसा के तीस वर्षा का विवरण प्रस्तुत करते है। इस सामग्री को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अननोन लाइफ ऑफ जीसस’ में प्रकाशित किया है। साक्षी के रूप में उन्होंने तिब्बत में एक बौद्ध विहार में ताड पत्रों पर लिखा हुआ, ग्रन्थ प्रस्तुत किया है। जिसमें ईसा की भारत यात्रा में विभिन्न स्थानों के पर्यटन और अध्ययन का विवरण है। ईसा व्यापारियों के एक झुण्ड के साथ भारत आये यहाँ उन्होंने वैष्णव, जैन और बौद्ध विद्यालयों में धर्मशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। कुछ दिन वे जगन्नाथ पुरी रहे। चूँकि वे शूद्रों से मेल-जोल रखते थे इसलिए पुरोहित लोग नाराज हुए। फलतः वे उस विद्यालय को छोड़कर अन्यत्र चले गये।

प्रसिद्ध इतिहासकार मिशचन्द्र दत्त ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री आफ सिविलाइजेशन इन एशियाँट इण्डिया” में विस्तार पूर्वक सिद्ध किया है कि ‘ईसाई धर्म बौद्ध धर्म की अनुकृति है’ वापस लौटने पर ईसा एसोसियन धर्म में दीक्षित हो गये वह वैराग्य प्रधान था। ईसा ने संन्यास लिया, इसी झंझट में ईसा को मृत्युदण्ड सहना पड़ा।

आर्थर लिलि ने अपनी पुस्तक ‘बुद्धिज्म इन क्रिस्टनडम’ में ईसा के जीवन की घटनाओं और सिद्धांतों का बुद्ध धर्म से तालमेल बिठाया है। इस पुस्तक में धर्म पद और बाइबिल के बहुत से उद्धरणों का एक साथ तालमेल बिठाया है।

अजीज कुरैशी से अपनी पुस्तक “क्राइस्ट इन काशीर” में लिखा है कि उन दिनों ईसा ही नहीं यहूदियों का एक बड़ा समुदाय काशीर में बस गया था। जिनमें बहुत से लोग अभी भी गूज्जर जाति के रूप में बस रहे है।

एक रूसी विद्वान ‘रोरिक’ ने अपनी पुस्तक ‘हार्ट आव काशिया’ में लिखा है -ईसा के जीवन का एक बड़ा भाग भारत और तिब्बत में व्यतीत हुआ। डाक्टर स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘मिस्टीकल लाइफ आफ जीसस’ और दुराई स्वामी आयंगर द्वारा लिखित ‘लोंग मिसिंग लिंक्स’ और मारवेल में ऐसे अनेकों प्रमाणों का संकलन है जिसमें ईसा का निवास एवं अध्ययन भारत के धर्मविद्यालयो में हुआ बताया है।

ईसा को मृत्यु दण्ड तो दिया गया पर न्यायाधीश पीलातुस ने उन्हें चतुरतापूर्वक बचा लिया और वे बाद में भी अपना काम करते रहे।

भविष्य पुराण प्रसंग 3 अध्याय 22 के श्लोक 22 से 26 तक ऐसा ही उल्लेख है जिसमें ईसा का भारत में लम्बे समय तक निवास और अध्ययन का वर्णन है।


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सत्य बोलने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह याद नहीं करना पड़ता कि किससे, कब, क्या कहा था?....


दान अहसान नहीं परम पवित्र धर्म कर्त्तव्य है

यो तो मानव शरीर के हर अंग, अवयव का महत्व है। शरीर के विभिन्न क्रिया-कलापों में उनकी छोटी-बड़ी भूमिका है। पर उन सबमें मस्तिष्क का अपना अलग स्थान है। वह न केवल मूर्खों पर अवस्थित है वरन् मूर्धन्य गतिविधियों का संचालक भी है। आमतौर पर उससे सोचने-विचार करने, स्मृति रखने निर्णय लेने जैसे काम लिये जाते है पर मस्तिष्क की सामर्थ्य उतने तक ही सीमित नहीं है। सूक्ष्म शक्तियों का वह ऐसा भाण्डागार है जिसका एक अत्यन्त छोटा भाग ही सामने आता तथा प्रयुक्त हो पाता है। अपने भीतर अद्भुत शक्तियों को दबाये एक ऐसे ही मानसिक केन्द्र की जानकारी वैज्ञानिकों को मिली है, जिसमें रहस्यमय शक्तियों के होने-उभरते रहने की संभावना व्यक्त करते है। जिसे योग विज्ञानी चिर पुरातन काल से आज्ञा चक्र -तृतीय नेत्र कहते रहे है तथा महान संभावनाओं से युक्त बताते रहे है, सम्भवतः वह केन्द्र यही कही स्थित हो।

दोनों भौहों के मध्य में स्थिति कोण-समूह को योग-विज्ञान में आज्ञाचक्र कहा गया है। यह दिव्य दृष्टि का एक महत्वपूर्ण संयंत्र है। यह रेडियो सेट के उस अति सूक्ष्म क्रिस्टल या चुम्बक-घटक से कही अधिक सूक्ष्म और समर्थ है, जो अदृश्य तथा अश्रव्य ध्वनि तरंगों को अपनी ओर खींचता है-उन्हें पकड़ता है और पुनः उन्हें दृश्य एवं श्रव्य कंपनों में परिवर्तित कर देता है। अदृश्य को देखने तथा अश्रव्य को सुनने की सामर्थ्य इस आज्ञा चक्र में है। संजय ने इसी के माध्यम से महाभारत के विविध दृश्य देखे थे तथा गीता के उद्बोधनो को सुना था। इसे ही शिवनेत्र कहा गया है जिससे भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था।

वेदों तथा उपनिषदों में आज्ञाचक्र को छठी इन्द्रिय अर्थात् अतीन्द्रिय क्षमताओं का समुच्चय कहा गया है। जागरण की स्थिति में इसके द्वारा दूरस्थ घटनाओं को देखा तथा सुना जा सकता है, मनोविज्ञान वेत्ता जिसे ई॰ एस॰ पी0 नाम से पुकारते है।

मनः शास्त्रियों का मत है कि स्वप्नावस्था में सामान्यतया आंखें बंद रहती है।अन्य ज्ञानेंद्रियां भी विश्राम की स्थिति में होती है। कामेन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती है। उस स्थिति में दोनों भौहों के बीच ही आप्टिक चिआज्मा के आस-पास की कोशिकाएँ सक्रिय होती तथा विविध स्वप्नों की अनुभूति कराती है। स्वप्नों में मनुष्य का दाँया मस्तिष्क सक्रिय होता है, वह विभिन्न प्रकार की बाते करता सुनता तथा अन्य तरह की चेष्टाएँ भी करता है। यह तथ्य इस पक्ष पर प्रकाश डालता है कि हर व्यक्ति बिना आँख कान के भी देखने-सुनने की दिव्य सामर्थ्य रखता है। स्वप्नों के पूर्वाभास के माध्यम से उस क्षमता का छोटा-सा परिचय भर मिलता है।

स्नायु वैज्ञानिकों ने अपने परिचय में पाया है कि आज्ञाचक्र का जहाँ केन्द्र है, वहां स्थित आप्टिक चिआज्मा के समीप की कोशिकाओं से निरन्तर इलेक्ट्रो मैगनेटिक तरंगें निकलती रहती है। इसकी क्षमता सामर्थ्य एक्सरे लेजर किरणों से भी अधिक मानी जाती है। आज्ञाचक्र की सूक्ष्म विद्युत तरंगें ही परोक्ष जगत का दर्शन कराती है। इनकी सहायता से किसी भी व्यक्ति को मनःस्थिति भावना, कल्पना, इच्छा, आकाँक्षा आदि के विषय में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अपनी ही नहीं दूसरों की अभिरुचि एवं प्रकृति को भी तृतीय नेत्र की सामर्थ्य के सहारे बदलना सम्भव है। अदृश्य सहायकों एवं पितरों से भी संपर्क साधना इस यौगिक तृतीय नेत्र-आज्ञाचक्र के सहयोग से संभव है।

आज्ञाचक्र केंद्र की सूक्ष्मग्राही संवेदनशीलता तथा विलक्षणता की योगशास्त्र में तो प्रतिपादित किया ही गया है, अब तो अगणित मनोविज्ञान के प्रयोगों से यह प्रामाणित भी हो चुका है कि यह वह केन्द्र है जिसके द्वारा दिव्य दर्शन, दूर दर्शन, भूत भविष्य का ज्ञान, पूर्वाभास, विचार जैसे कार्य सम्पन्न हो सकते है। उनका मत है कि इस केन्द्र से निकलने वाली सूक्ष्म किन्तु प्राणवान् भाव तरंगों के द्वारा सम्मोहन मैस्मेरिज्म जैसे कार्यों को भी कर पाना संभव है।

नूतन विकासवाद के प्रवक्ता कुछ वैज्ञानिकों का अभिमत है कि बहुत समय पूर्व मस्तिष्क के मध्य दोनों भौहों के बीच एक तीसरे नेत्र का अस्तित्व था, जो बाद में ग्रन्थि के रूप में बदल गया। पीनियल ग्रन्थि उस तीसरे नेत्र का ही बदला रूप है जो अपने भीतर अगणित रहस्यों को छिपाए हुए है। मनुष्य में इसका वजन मुश्किल से एक या दो मिलीग्राम होता है। पर इस छोटी सी रचना का शरीर के विकास एवं उसकी हलचलों में भारी योगदान है। एकमात्र यही ऐसी ग्रन्थि है जिसमें तन्त्रिका कोशिकाएँ विधिवत् मस्तिष्कीय कोशों की तरह पायी जाती है। यदि इस ग्रन्थि का संतुलन बिगड़ जाय तो अनेकों प्रकार की शारीरिक-मानसिक समस्याएँ पैदा हो सकती है।

असन्तुलन की स्थिति में शारीरिक प्रौढ़ता शीघ्र आ धमकती है। जननाँग तेजी से बढ़ने लगते है। ग्रन्थि के हारमोनों के असंतुलन से विकास अवरुद्ध हो जाता है। जीवन पर्यन्त का अभिशाप लद जाता है। शरीर एवं मस्तिष्क का विकास बंद हो सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि पीनियल ग्रंथि रक्त में शक्कर की मात्रा के माध्यम से “ग्रोथ “ को संतुलित बनाये रखने में पिट्यूटरी ग्रंथि तथा पैन्क्रियाज की मदद करती है। इस ग्रंथि का नियंत्रण एड्रीनल तथा थाइराइड ग्रंथियों पर भी रहता है।

वैज्ञानिकों ने अपनी खोजो में पाया है कि मनुष्येत्तर कितने ही जीव-जन्तु ऐसे है जिनमें तीसरे नेत्र का अस्तित्व स्थूल रूप में विद्यमान है। अपने दैनन्दिन कार्यों में वे उस नेत्र का उपयोग उसी प्रकार करते है जैसे कि सामान्य मनुष्य आंखों का करता है। न केवल देखने बल्कि समय, दिशा, मौसम , प्रकृति की घटनाओं का भी अनुमान ये अपने तृतीय नेत्र से लगा लेते है।

वैज्ञानिकों की खोज से यह भी मालूम हुआ है कि ठण्डे खून वाले प्राणियों में इस क्षेत्र की कोशिकाएँ थर्मास्टेट का काम करती है। उनके शरीर का तापक्रम एक-सा नहीं रहता, बदलता रहता है। गर्मी में गरम और ठण्ड से ठण्डा। उनकी इस विलक्षणता के कारण उन्हें तापक्रम की खबर रहती है तथा समय-समय पर स्थान परिवर्तन के लिए निर्देश देती रहती है।

प॰ जर्मनी में हुई खोजो का निष्कर्ष है कि तीसरी आँख कुतुबनुमा का भी काम करती है। दूसरे पशु-पक्षी दिशा का अनुमान अपने इसी चुम्बक के आधार पर लगा लेते है। पृथ्वी चुम्बकत्व एवं जैव चुम्बकत्व दोनों की तरंग गति समान है, यह इससे सिद्ध होता है कि मनुष्यों में भी अपवाद रूप से किन्हीं-किन्हीं में यह कुतुबनुमा क्रियाशील बताया गया है। जिस प्रकार साइबेरिया से आने वाले आव्रजक पक्षी अपनी दिशा स्वयं ढूंढ़ते एवं आस्ट्रेलिया फिर वापस अपने निवास स्थान पर पहुँच जाते है, मनुष्यों में भी यही बोध विद्यमान होता है।

मानवी विलक्षणता के परिचायक किसी अंग का उपयोग न हो तो एनाटामी की दृष्टि से वेस्टीजियल आँर्गन (निरर्थक अंग) कहा जायेगा। यही विडम्बना पीनियल पीटुचरी एक्सिस एवं हाइपोथैलेमिक उत्तको के साथ हुई है। सामान्य नजर आने वाले क्रिया-कलापों में असामान्य सामर्थ्य छुपी पड़ी है, किन्हीं-किन्हीं में यह फूट पड़ती है तो उन विभूतियों का परिचय मिलता है। वस्तुतः ये अपवाद नहीं है। ध्यान-धारणा द्वारा योग-अनुशासनों के माध्यम से इस केन्द्र को जगाकर असीम सामर्थ्यों को हस्तगतगर परोक्ष से सीधे सम्बन्ध जोड़ पाना संभव है।


उपार्जन का संग्रह नहीं वितरण किया जाये

मानवी संरचना के नर-नारी के दो भेद प्रत्यक्ष है। इतने पर भी यह विभाजन रेखा ऐसी नहीं है जिसे शाश्वत या सुस्थिर कहा जा सके। आत्मा जाति और लिंग रहित है। परिस्थितियों और संकल्पों के कारण ही वह अपना रूप गिरगिट की तरह बदलती रहती है। जो आज नर है, वह कभी नारी रहा हो इसमें आश्चर्य नहीं है। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि जो आज नारी है भविष्य में नर को चोला पहन ले। नाटकों के पात्र आच्छादन परिधान बदलकर कभी नर तो कभी नारी बनते रहते है। जो कार्य सामयिक हो सकता है, उसका स्थायी रूप से बन पड़ना भी सम्भव है।

ऐसी कितनी ही पौराणिक गाथाएं है जिनमें एक ही व्यक्ति को नर और नारी की दोनों ही भूमिकाएं सम्पन्न करते हुए बताया गया है। एक ही शरीर में एक साथ दोनों प्रकार की आकृति होने की बात शिव के अर्द्धनारीश्वर में दृष्टिगोचर होती है। शिखण्डी आकृति से नर और प्रकृति से नारी था। अभी भी हिजड़े इसी प्रकार के होते है। उनकी जननेंद्रियां नपुंसकों जैसी होती है पर उनका स्वभाव आचरण नारियों में इतना अधिक मिलता’-जुलता है कि कई बार तो पहचानना तक कठिन हो जाता है। उसी प्रकार अनेकों ऐसी महिलाएँ देखी गयी है जो शरीर संरचना की दृष्टि से नारी होते हुए भी आचरण सारे मर्दों जैसे करती है।उन्हे न तो नारी जैसे वस्त्र अच्छे लगते है और न इस प्रकार का जीवन यापन करने में कोई उत्साह होता है।

इन उदाहरणों से प्रकट है कि नर और नारी का विभाजन जीवात्मा की अभिरुचि, आदत या परिस्थिति के अनुरूप होता है। वह चाहे तो उसे प्रयत्नपूर्वक बदल भी सकता है।

लिंग परिवर्तन की घटनाएँ तो पहले भी रहती थी पर उन दिनों इसकी कोई खोज-बीन नहीं होती थी और लज्जा का प्रसंग होने के कारण वह गोपनीय भी रखी जाती थी। पर अब वैसी बात नहीं रही। लिंग परिवर्तन की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती है। वस्तु स्थिति का पर्यवेक्षण करने वाले इसमें कोई छल प्रयोजन भी नहीं देखते, विधाता की विचित्रता ही देखते है।

खड़गपुर बंगाल में एक उन्नीस वर्षीय विद्यार्थी आपरेशन द्वारा लड़की बनाया गया। उसके शरीर में दोनों ही जननेंद्रियां थी, पर मूत्र त्याग वह ऐसे छिद्र से करता था जो लड़कियों में ही होती है। एक दिन उसका पेट फूला तो अस्पताल पहुँचाया गया। मालूम पड़ा कि मूत्राशय की नली पुरुष छिद्र से हटकर नारी अवयव के साथ जुड़ गई है। आपरेशन से उसे ठीक किया तो वह लड़की बन गया।

तेलवाडा के कैनाल अस्पताल में एक पच्चीस वर्षीय किसान युवक के पेट का आपरेशन किया गया। वह दर्द से चिल्लाता रहता था। आपरेशन करने पर प्रतीत हुआ कि उसके पेट में गर्भाशय था और मासिक धर्म का रक्त बाहर न निकल सकने के कारण दर्द होता था। आपरेशन करके रास्ता बना दिया गया तो वह ठीक हो गया। पुरुष जननेन्द्रिय नाम मात्र की थी सो उसे हटाया नहीं गया। अब वह लड़का विधिवत लड़की घोषित किया गया। ऐसी एक नहीं, अनेकों घटनाएँ प्रकाश में आती है जो जनसामान्य को चौकाती है।

बम्बई के प्लास्टिक सर्जन डा0 मानकेशा के अस्पताल में दो युवक आपरेशन के उपरान्त युवती बने है। इनमें से एक मेहाम 23 वर्ष का और फैलिद 22 वर्ष का था। बहुत समय से वे दोनों अपने में नारी स्तर का परिवर्तन होने जैसी हलचलें अनुभव कर रहे थे फलतः अस्पताल में दाखिल हुए। उनकी मान्यता सही पाई गई। थोड़े अंग परिवर्तन के उपरान्त उनका लिंग बदल गया। एक का नाम मैरिन और दूसरे का फरह रखा गया जो उनके पुराने नामों से मिलते-जुलते है।

बनारस के सर सुन्दरलाल अस्पताल में एक नपुंसक स्तर के लड़के को कई छोटे आप्रेशनों के उपरान्त युवती घोषित कर दिया गया है। उसकी चाल तो लड़कियों जैसा थी पर छोटा मूत्र मार्ग लड़की जैसा था। अस्पताल के सर्जन फणीन्द्र त्रिपाठी ने केस अपने हाथ में लिया और शल्य क्रिया द्वारा उसे पूर्ण नारी बना दिया गया।

आस्ट्रेलिया में ऐसी कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आई है और किए गए यौन आप्रेशनों के उपरान्त परिवर्तित लिंग के अनुरूप जीवन क्रम बनाने और विवाह करने में सफल रहे है।

लंदन के पुलिस विभाग में नर के नारी बन जाने का नया घटनाक्रम सामने आया है। वजपार्ट नगर का एक पुलिस अधिकारी बीमारी की लम्बी छुट्टी लेकर अस्पताल में पड़ा रहा। उसे जननेंद्रियों में अवरोध और सूजन की शिकायत थी। निदान आपरेशन में नारी जननेन्द्रिय उभर कर प्रकट हो गई। उसे नारी घोषित कर दिया गया और नाम मेरी दिया। पुलिस में उसकी नौकरी बनी रही पर ड्यूटी बाहर न जाकर दफ्तर में ही रहने की दी गई है।

समलिंगी विवाहों का प्रचलन अब बढ़ रहा है। ऐसे केसो से उनमें से एक का रुझान भिन्न लिंग जैसा पाया गया हे। ऐसे लोग इस प्रकार के अनुबंध में संतोष भी अनुभव करते है। न्यूयार्क की एक घटना है। बच्चे को जन्म देकर एक व्यक्ति की पत्नी मर गयी। उस पुरुष की छाती से दूध आने लगा। बच्चे को वह पिलाने भी लगा। स्थिति को और भी अधिक ठीक करने के लिए उसने डॉ0 लियोवेलियन के अस्पताल में दाखिला लिया और दूध ग्रंथियों को अधिक जाग्रत करने का आपरेशन कराया। वह अब नारी की तरह बच्चे को दूध पिलाता है पहले की अपेक्षा दूध की मात्रा बढ़ गई है। इस व्यक्ति का लिंग परिवर्तन तो नहीं हुआ पर अपने बच्चों के लिए माता और पिता दोनों की आवश्यकता पूरी करता रहा।

इस प्रकार के घटनाक्रमों में नर का नारी बनने के प्रसंग अधिक देखने को मिलते है। इसका अर्थं यह नहीं कि नारियाँ बनती ही नहीं पर तुलनात्मक दृष्टि से नर के नारी बनने जैसे उदाहरण ही अधिक देखने में आते है।

मनोवैज्ञानिक इसका कारण यह बताते है कि नर के मन पर नारी का सौंदर्य आकर्षण अधिक छाया रहता है। वह उसकी निकटता के लिए अधिक आतुर पाया जाता है जबकि नारी में नर के प्रति आकर्षण एक सीमा में ही एवं संयत होता है। गृहस्थ प्रवेश के उपरान्त वह नाम मात्र का रह जाता है । वह गृह लक्ष्मी या माता होने में गौरव अनुभव करती है और रमणी-कामिनी की भूमिका अन्यमनस्क भाव से ही निभाती है। कितनी ही विधवाएँ अपना वैधव्य बिना किसी दाग धब्बे के बिता लेती है।

विधवाओं का दाम्पत्य जीवन उतना सरल संतोषजनक न होते हुए भी पतिव्रत धर्म भली प्रकार निभता रहता है। इससे प्रकट है कि नारी का नर के प्रति न तो उतना आकर्षण होता है और न सतत् चिन्तन। जबकि आम आदमी के शिर पर अवसर न मिलने पर भी कामुक कामनाओं का भूत चढ़ा रहता है। यह ललक ही अचेतन मनमे पड़ी रहने पर उसे शिखण्डी स्तर की ओर धकेलते-धकेलते अन्ततः लिंग परिवर्तन जैसी स्थिति तक पहुंचा तक देती है। यह शरीर परिवर्तन भर है।

आत्मा का जाति-लिंग से ऊपर होने का तथ्य स्पष्ट है। चिन्तन और व्यवहार का अभ्यास ही उसे किसी वर्ग विशेष में रहने का आदी बनाता है। यदि संकल्प उलटे तो परिवर्तन तत्काल न सही देर-सवेरे में होने की संभावना रहेगी ही। इसी प्रकार लिंग विशेष के आधार पर किसी को वरिष्ठ-कनिष्ठ मानने की मान्यता भी भ्रामक है,यह स्पष्ट हो जाना चाहिए।


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मित्रता करते तो कितने ही है पर उसे किससे करे और किस प्रकार निभाये, इसे बिरले ही जानते है। फलतः मित्रताएँ टिकती ही नहीं। वे टूटती और वैमनस्य बढ़ाती रहती है।


अन्धाधुन्ध प्रजनन हर दृष्टि से अदूरदर्शिता पूर्ण

ग्रह नक्षत्रों का परिवार भी मानवी परिवार की तरह नियति की एक विशिष्ट शृंखला में बंधा हुआ है। इन पिण्डगोलको में दृश्य और अदृश्य स्तर के पारस्परिक आदान-प्रदान क्रम अनेकानेक रूप में चलते रहते है। अपना सौर-मण्डल भी एक सद्गृहस्थ की तरह मिल-जुलकर निर्वाह करता और मिल बाँट कर रखा है। विशाल ब्रह्मांड में विद्यमान अगणित सौर मण्डल अपने-अपने ध्रुव केंद्रों की प्रदक्षिणा करने के साथ-साथ किसी अविज्ञात किन्तु महान लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से बढ़ते चले जाते है।

अकल्पनीय दूरी पार करके धरती पर ग्रह-नक्षत्रों का आदान-प्रदान अदृश्य स्थिति में शक्य है। ऊर्जा किरणें ही प्रकाश की गति से भी तीव्र चाल से दौड़ लगाती हुई सीमित अवधि में धरती तक सतत् आती रहती है। यदि उनका आकार अन्तरिक्ष यानों जैसा ठोस दृश्यमान हो तो निश्चय ही लोक-लोकांतरों के बीच आदान-प्रदान अति कठिन ही बना रहेगा। यही कारण है कि प्रकृति-सम्पदा का अंतर्ग्रही आदान-प्रदान तरंग स्तर का होने के कारण अदृश्य ही बना रहता है।

ब्रह्मांड में अधिकाँश ग्रह गोलक निर्जीव हैं। इतने पर भी इस विशाल परिकर में अगणित ऐसे भी लोक है जिनमें जीवन विद्यमान है, जिनमें धरती जैसी ही सजीवता विद्यमान है। इनमें से कुछ ऐसे भी है जिनकी सभ्यता, सम्पदा एवं वैज्ञानिक विभूति मनुष्य लोक की तुलना में कही अधिक विकसित है। सजातियों के मध्य आकर्षण एवं सद्भाव होना स्वाभाविक है। विकसित सभ्यता वाले लोक-लोकांतरों के निवासी निश्चय ही इस भूलोक से परिचित हो और संपर्क, सद्भाव एवं आदान-प्रदान के लिए आतुर रहते हो तो कोई आश्चर्य नहीं ।

प्रमाण मिलते है कि अन्य लोकों के चैतन्य प्राणी जो संभवतः बुद्धि और विज्ञान के क्षेत्र में कुछ अधिक आगे बढ़े होगे, भूलोक से संपर्क स्थापित करने के इच्छुक एवं प्रयत्नशील है। इस संदर्भ में अधिक प्रामाणिक साक्षी ऐसे अन्तरिक्ष यानों की है जो धरती तक जाते एवं अपना अस्तित्व का प्रमाण-परिचय देते रहते है। संभवतः पिछली शताब्दियों में भी उनका आवागमन रहा हो और उपेक्षा के कारण उसे नोट न किया गया हो पर इस शताब्दी में उन्हें बड़ी संख्या में अधिक व्यापक क्षेत्र में देखा गया है। इन्हें ‘उड़न तश्तरी’ (यू0 एफ॰ ओ0) के नाम से जाना जाता है। पर है वे दृश्यमान अन्तरिक्ष यान ही। किसी विकसित सभ्यता ने लम्बी यात्रा करने वाले-द्रुतगामी वाहनों का आविष्कार कर लिया प्रतीत होता है। उड़न तश्तरियों की सता को इसी रूप में मान्यता मिल रही है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जीवन विज्ञान के प्राध्यापक डा0 जार्ज वाल्ड के अनुसार हमारी आकाश गंगा में ही एक अरब ग्रह है इससे परे एक अरब अन्य आकाश गंगाएं है जिनमें से प्रत्येक में एक अरब ग्रह है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन सभी ग्रहों में एक से पाँच प्रतिशत तक ग्रहों में जीवन अवश्य विद्यमान है।

अमेरिका के मैरीलैड विश्वविद्यालय के रासायनिक विकास संस्थान के निर्देशक डा0 सिरिल पोन्नेमपेरुमा ने भारतीय विज्ञान काँग्रेस में बताया कि ब्रह्मांड में संदेश प्राप्त करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि हमारे ही नभ मण्डल में दस लाख सभ्यताएँ अस्तित्व में है जिनका अध्ययन करने के लिए विशाल कम्प्यूटराज्इड उपकरणों का प्रयोग वे कर रहे है।

सन 1947 में अमेरिका के पश्चिमी तट रार्कामा के निकट मोटर बोट में बैठे दो रक्षक एच॰ ए॰ डहल तथा फैड॰ एल॰ कै्रसवैल समुद्र तट की निगरानी कर रहे थे। अचानक आकाश में दो हजार फुट की ऊँचाई पर गोल आकृति की प्रकाशमान छः मशीनें दिखाई दी। पाँच मशीनें एक के चारों ओर घूम रही थे। धीरे-धीरे नीचे उतरकर 500 फुट की ऊँचाई पर ही रुक गई । तभी डहल ने अपने कैमरे निकाल फोटो लेने के लिए कैमरे का स्विच दबाया ही था कि अचानक बीच वाली मशीन फट गई। दोनों अंगरक्षक तुरन्त छलाँग लगाकर पास की एक गुफा में घुस गए पर उनके साथ का कुत्ता वही मर गया। कुछ देर बाद बाहर निकलने पर देखा कि मशीन के टुकड़े तट पर बिखरे थे जो चमकीले एवं गरम थे। उनकी बोट में लगे ट्राँसमीटर भी जाम हो गए थे।

निरीक्षक दल ने वाशिंगटन के उक्त टापू पर फैले 20 टन धातु के टुकड़ों को एकत्र कर परीक्षण किया तो ज्ञात हुआ कि ये टुकड़े सोलह धातुओं के सम्मिश्रण से बने है जिन पर कैल्शियम की मोटी चादर चढ़ी है। वैज्ञानिक इनके नाम बता पाने में असमर्थ रहे एवं अभी तक उनका विश्लेषण संभव नहीं हो पाया है।

‘मेलबोर्न’ 24 अक्टूबर 79 को बीस वर्षीय युवा विमान चालक फ्रेडरिक वाके ने आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया के बीच उड़ान भरी। उसने अधिकारियों से बताया कि वह 137 मीटर की ऊँचाई पर किंग आईसलैण्ड के पास से उड़ रहा है और उसके विमान के ऊपर बहुत तेज गति से एक तश्तरी जैसी आकृति की लम्बी वस्तु उड़ रही है जिसके भीतर हरी रोशनी का प्रकाश आ रहा है। यान सहित लुप्त होने के पूर्व फ्रेडरिक के अन्तिम शब्द थे “मेरे विमान के इंजन में रुकावट आ रही है तथा वह विचित्र यान अब भी मेरे विमान के ऊपर छाया है।” इसके बाद रेडियो पर धातु के जोरों से टकराने का शोर सुनाई पड़ा तथा विमान का नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूट गया। मेलबोर्न हवाई अड्डे से अनेक जहाजों ने खोज के लिए उड़ान भरी लेकिन दुर्घटना का कोई चिन्ह न मिला।

ऐसे अनेकों उदाहरण अमेरिका के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा गठित यू0 एफ॰ ओ॰ विभाग में संग्रहित देखे जा सकते है जिनमें यान चालको, वायरलैस आपरेटरो के अन्तिम शब्द टेप रिकार्डेड है एवं जिनका कोई चिन्ह निश्चित स्थान पर न मिला, मात्र रेडियो धर्मिता से भरे वातावरण को छोड़कर। कई हैलिकाप्टर चालक सहित इस तलाश में गायब हो चुके है। वे कहाँ, किस लोक में गमन कर गए, कोई जानकारी वैज्ञानिकों के पास इस सम्बन्ध में नहीं है।

25 अगस्त 1976 की बात है। अमेरिका के नार्थ डकोटा प्रान्त में एक वायु सेना अधिकारी को रेडियो तरंगों द्वारा संदेश भेजने में अचानक बाधा का सामना करना पड़ा। खोजबीन करने पर पता चला कि इसी समय एक उड़न तश्तरी गहरे लाल रंग के प्रकाश बिखेरती ऊपर नीचे उड़ रही थी। इस समय रैडार ने भी दस हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ती हुई एक गोल तश्तरी की सूचना दी। थोड़ी देर बाद यह उड़न तश्तरी दक्षिण की ओर मूड गई और यह अनुमान लगाया गया कि कोई 15 मील की दूरी पर वह पृथ्वी पर उतर गई है। उस स्थान पर वायु सेना की टुकड़ी पहुँची तो वह आठ मिनट पहले ही वहां से गायब हो चुकी थी। इस बीच दूसरी तश्तरी उत्तर की ओर दिखाई दी, उसे भी राडार ने देखा पर जब तक दस्ता उधर दौड़े वह भी गायब हो गई। इस आँख मिचौनी को राडार पर तो देखा जाता रहा, लेकिन इस सम्बन्ध में कोई सूत्र वैज्ञानिकों के हाथ नहीं लगा।

25 अक्टूबर 1977 की शाम को कनाडा के समुद्री तट पर शागहार्बर के सैकड़ों निवासियों ने आकाश में कोई चमकदार उड़ती हुई वस्तु देखी। देखते ही देखते वह समुद्र सतह पर जाकर विलीन हो गई। 20 मिनट के भीतर ही पुलिस कर्मचारी एक जहाज और आठ नावों सहित उस स्थान पर निरीक्षण करने पहुँच गए। वहाँ ‘सर्चलाइट’ के तेज प्रकाश में वे केवल समुद्र के एक स्थान से पीला झाग निकलता देख सके। दो दिनों तक सैनिक गोताखोर उस स्थान पर गोता लगाते रहे पर वहाँ किसी वस्तु या उड़न तश्तरी का प्रमाण नहीं मिला।

ये घटनाक्रम अभी ही नहीं, काफी पूर्व से घटते रहे है। 13 मई 1927 का दिन था। फातिमा नगर लिस्बन (पुर्तगाल) से कोई 62 मील दूर। “कारंवा द इरिया” नामक झरने के समीप तीन बालक लूसिया, फैकिस्को मार्तो और जेसिन्तो मार्तो अपने जानवर चरा रहे थे कि एक यान से अन्तरिक्ष यात्री उतरे और उन बच्चों से बातचीत की। बालक भाषा तो समझ न सके। यह घटना उन्होंने अपने अभिभावकों को सुनाई किन्तु इससे वे सहमत नहीं हुए। किन्तु ठीक एक माह बाद 13 जून को फिर एक अन्तरिक्ष यान आया उसमें से कुछ यात्री उतरे अबकी बार सम्मोहन किरण जैसी फंकी। बालकों से कुछ कहा। बालक समझे तो नहीं पर हाव-भाव से ऐसा लगा कि कह रहे हो कि तुम बहुत अच्छे लगते हो। फिर 13 जुलाई को इस घटना की पुनरावृत्ति हुई। अब यह बात सारा नगर जान चुका था। जो हजारों दर्शक उस स्थान पर जमा हो गये थे, उन्हें निराशा हाथ लगी। कुछ नहीं दिखाई दिया। अब अगली 13 तारीख के इंतजार में 70000 नगर निवासी नदी के किनारे जमा हो गये। थोड़ी ही देर में बादलों के बीच से कोई चौंधियाने वाली वस्तु आकाश से पृथ्वी की ओर जाती दिखाई दी वह तेज घूमती तश्तरी नुमा कोई चाँदी जैसी धातु से निर्मित वस्तू थी। भीड़ के समक्ष उस दिन वह ठहरी नहीं । सूरज की तरफ जाकर लुप्त हो गई। देखने वालों का कहना था कि उसकी गति प्रकाश से भी अधिक थी। उन दिनों वैज्ञानिक प्रगति इतनी नहीं हुई थी अतः शोध की दिशा में कोई विशेष कदम नहीं उठ रहे।

सन 1930 में प्लूटो ग्रह की खोज करने वाले अन्तरिक्ष विज्ञानी क्लाइड डब्ल्यू टाम्बा ने कहा था “मैंने व मेरी पत्नी ने उड़न-तश्तरियां आकाश में उड़ती देखी है। मैं उन पर, अंतर्ग्रही सभ्यता के अस्तित्व पर पूरा विश्वास रखता हूँ।” इंग्लैण्ड के अन्तरिक्ष विज्ञानी एच॰ पर्सी विल्किस ने भी 1935 में 500 फीट व्यास की उड़न तश्तरी देखने का विवरण ‘साइंस पत्रिका’ में दिया था।

अब वैज्ञानिकों के पास अन्तरिक्ष के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। अपने सौर-मण्डल में विद्यमान अनेकानेक ग्रहों पर वे जीवन की संभावनाएँ बताते है। यह अकारण नहीं हो सकता कि विकसित सभ्यता वाले अन्यान्य ग्रहवासी इस छोटे से ग्रह पृथ्वी के बारे में जानने को उत्सुक न हो। जब मनुष्य चन्द्रमा पर जा सकता है, एवं चैलेन्जर सोयुज, सैल्यूत यानों द्वारा अन्तरिक्ष में प्रयोगशाला खड़ी कर सकता है, अन्य ग्रहों के निवासी अपने यान यहाँ क्यों नहीं भेज सकते? अभी-अभी ‘नेचर’ एवं साइंस पत्रिका में छपे प्रख्यात एस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो0 कोनाल्ड बे्रस के अनुसार “आने वाले रेडियो संदेशों से ही पता लगता है कि दिक्-काल की परिधि से ऊपर विकसित सभ्यता वाले ग्रह पिण्ड है, जहाँ जीवन है। बरमूडा त्रिकोण जैसे स्थानों से संभवतः नमूने के रूप में पृथ्वी वासियों को -उनके यानों को परीक्षण के लिये वे ले जाते है।” कुछ भी हो, हमें अकेले के ही सौर मण्डल वासी होने का गर्व नहीं करना चाहिए अभी जानकारी नहीं मिली तो अर्थ तो निकलता नहीं कि ऐसी एक और पृथ्वी का या कई जीवनधारी ग्रहों का अस्तित्व ही नहीं है। ये घटनाएँ इसी की साक्षी है।


Quotation

आधुनिक तकनीकी विकास से मनुष्य यदि यह समझे कि वह वैज्ञानिक प्रगति के शिखर पर जा पहुंचा तो यह उसका भ्रम है। उसकी इस मान्यता को झुठलाने एवं अधिक प्रगतिशील अंतर्ग्रही सभ्यताओं का प्रमाण देने हेतु समय-समय पर ऐसे घटनाक्रम घटित होते है जिनका प्रत्यक्षवादी कोई उत्तर नहीं दे पाते। परोक्ष में जो है जो जाना नहीं जा सका, उसका अस्तित्व भी हो सकता है। इस तथ्य को पूर्वाग्रहों को छोड़कर मानना ही श्रेयस्कर है। शोध प्रक्रिया चलती रहे किन्तु परोक्ष के रहस्यों को नकारा नहीं जाना चाहिए।


प्रगति के पथ पर मर्यादित कदम ही बढ़ाये जायें

आमतौर से अनुभव और अनुकरण के आधार पर लोग जीवन की गाड़ी अभ्यस्त लकीर पर चलाते है। दैनिक समस्याओं के समाधान भी इसी आधार पर होते है। बुद्धि का कोल्हू इसी जाने-माने ढर्रे पर चलता रहता है। अक्ल इसी सीमा में काम करती है।

किन्तु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि बुद्धि की सीमा इतनी ही छोटी परिधि में काम कर सकती है। यदि उसे अवसर मिले तो ऐसी सूझ-बूझ का परिचय दे सकती है जिसे देखकर दांतों तले उँगली दबाना पड़े।

बुद्धि के भण्डार में से अनोखी एवं मौलिक सूझ-बूझ के मणि मुक्तक की निकलते रहे है , निकल सकते है। पर उसकी शर्त एक ही है कि कुछ विशेष करने की व्याकुलता उसके सामने हो। कोई असाधारण कठिनाई सामने खड़ी हो, समस्या सुलझ न रही हो, अथवा इतनी तीव्र लगन हो जो किसी उपाय से लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आकुल हो। विशेष सूझ-बूझो का भण्डार ऐसी ही मनःस्थिति एवं परिस्थिति में खुलता है।

स्विट्रलैण्ड के सुकारे क्षेत्र पर समीपवर्ती सामंतों ने हमला बोल दिया। उन दिनों, मर्द किसी काम से बाहर गये हुए थे। महिलाएँ ही गाँव में रह रही थी। आक्रमण से बचने के लिए उन्होंने विचित्र सूझ-बूझ का परिचय दिया।

अन्धेरा होते ही बकरियों के सींगों में उनने जलती मशालें बाँध दी और उन्हें पहाड़ से नीचे की ओर खदेड़ दिया। दुश्मन के सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ रहे थे उन्होंने मशालें लेकर आते प्रेत देखे और भाग खड़े हुए। इस प्रकार महिलाओं की सामयिक सूझ-बूझ ने मोर्चा जीत लिया।

फारस के राजा ने पड़ोसी छोटे राज्य पर हमला किया। उस राज्य का राजा फरमैनिस संघर्ष करने की स्थिति में नहीं था। उसके पास सैनिक भी कम थे और अस्त्र-शस्त्र भी थोड़े। आत्म-रक्षा का कोई उपाय न देखकर उसने सूझ-बूझ से काम लिया। सभी सैनिकों और नागरिकों को रात्रि के अन्धेरे में सुरक्षा खाई खोदने में लगा दिया। रात भर फावडे चलते रहे। दिन निकलने से पहले ही खाई को सूखे घास-पात से ढक दिया गया। सवेरा होते ही आक्रमणकारी विजय की सुनिश्चित सम्भावना देखकर तेजी और मस्ती के साथ दौड़े। फलतः वे धड़ाधड़ खाई में गिरते चले गये। खाई में गिरे और वापस लौटे सैनिकों का बहूमूल्य सामान जो सुरक्षा सैनिकों के हाथ लगा, वह दस करोड़ डालर का था।

फ्राँस के लैण्डेसीज नगर में सेना घिर गई थी। आक्रमणकारी सैनिकों के दल ने इस प्रकार घेराबंदी कर रखी थी कि भीतर रसद नहीं पहुंच सकी और घिरे हुए नागरिक तथा सैनिक मरने लगे।

बचाव का एक विचित्र उपाय जनरल डुवलै ने अपनाया। उसने घोड़ों की पीठ पर रेत के बोरे बाँधे और उसके नकली हाथ लगाकर भाले कस दिये। अन्धेरा होते ही घोड़ों के झुण्ड शत्रु की सेना में घुस पड़े। रात्रि में असली नकली की पहचान नहीं हो सकी और उस अप्रत्याशित घुड़-दौड़ से घबराकर आक्रमणकारी मोर्चा छोड़ भाग खड़े हुए।

होलीलैण्ड में एक किला फतह नहीं हो रहा था। लगातार दो वर्ष तक आक्रमण चलता रहा पर प्रवेश का अवसर न मिला। इस पर सेनापति रिचार्ड ने एक नई सूझ-बूझ का परिचय दिया। किले की दीवारों में मधुमक्खियों के प्रायः एक सौ छते लगे थे। उन सभी को उडा दिया गया। उड़ती मक्खियों ने किले के प्रहरियों पर हमला बोला तो जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपने भागे। अवसर देखकर आक्रमणकारी सैनिक किले में घुस पड़े और किला फतह हो गया।

यदि अवरुद्ध मार्ग को खोलने के लिए विवेक बुद्धि जाग्रत हो और घबराहट का असंतुलन आड़े न आये तो ऐसी सूझ-बूझ हर किसी में उत्पन्न हो सकती है जो परम्परागत ढर्रे की अपेक्षा नया उपाय सोचे , नया मार्ग खोजे और सफलता प्राप्त करके रहे।


साधक को न अकेलापन खलता है, न असफलता अखरती है।

जिस भूभाग पर हम रहते है उसका विस्तार लगभग सत्रह करोड़ वर्ग मील है एवं उसका तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका है। मात्र जल से भरा हुआ कुल क्षेत्र 13 करोड़ 13 लाख वर्ग मील पड़ता है। अन्तरिक्ष का विस्तार आसीन है। जैसे-जैसे ऊपर की ओर बढ़ते है अन्तरिक्ष की परिधि उसी अनुपात में बढ़ती प्रतीत होती है। प्रकृति की सम्पदाएँ जितनी पृथ्वी के गर्भ और उससे जुड़े वातावरण में सिमटी है उसकी तुलना में अन्तरिक्ष में कही अधिक परिमाण में सन्निहित है। अस्तु विस्तार की दृष्टि से ही नहीं वरन् भौतिक सम्पदा की दृष्टि से भी अन्तरिक्ष पृथ्वी की अपेक्षा कही अधिक सम्पन्न है।

ऐसी स्थिति में अन्तरिक्ष विज्ञान का महत्व भू-विज्ञान की तुलना में कही अधिक बढ़ जाता है। जल और थल की तरह मनुष्य यदि चाहे तो अन्तरिक्षीय खोज में एक और कड़ी जोड़कर ग्रहों की गति और स्थिति से पृथ्वी के वातावरण तथा प्राणि जगत को जो किस प्रकार अनुकूलताएं और प्रतिकूलताएँ सहन करती है, इस जान-कारी से लाभान्वित हो सकता है। प्राचीन-काल में ज्योतिर्विज्ञान आज के भौतिक विज्ञान की भांति सुविकसित था। ग्रहों की गतिविधियाँ तथा उनकी सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं के बारे में जानकारी ऋषिगणों को भली प्रकार उपलब्ध रहती थी। फलतः वे अनुकूलताओं से लाभ उठाने तथा प्रतिकूलताओं से बचने का मार्ग निकाल लेते थे। मनुष्य जाति ने विज्ञान की अनेक शाखा विकसित करके प्रगति पथ पर बढ़ चलने में अप्रतिम सफलता पाई है। ऐसी दशा में उनके साथ जुड़े हुए सूत्रों और आदान-प्रदानो के सम्बन्ध में मनुष्य की जानकारी की विशद होनी चाहिए।

भौतिक विज्ञान ने अन्तरिक्ष का महत्व समझा है। सर्वविदित है कि वायु एवं जल की अथाह सम्पदा आकाश के पोले ईथर में भरी है। विज्ञान के ज्ञाता इस तथ्य से परिचित है कि बिजली रेडियो, लेसर आदि की तरंगें आकाश में संव्याप्त होती है। ध्वनि, ताप, प्रकाश आदि की तरंगें आकाश में प्रवाहित होती है तथा अंतर्ग्रही अनुदान भी उसी क्षेत्र में मिलते है। ऐसे अनेकानेक आधार है जिनसे स्पष्ट है कि भूमण्डल की तुलना में अन्तरिक्षो में विद्यमान साधन सम्पदा का महत्व और स्तर असंख्य गुना अधिक है।

अध्यात्म वेता अनादि काल से ही अपनी गतिविधियों को अन्तरिक्ष पर केन्द्रीभूत रखे रहे है। उनकी सामर्थ्यों का उत्पादन क्षेत्र अदृश्य जगत-सूक्ष्म जगत रहा है। ऋद्धि-सिद्धियाँ और आध्यात्मिक विभूतियाँ दिखाई तो प्रत्यक्ष रूप में पड़ती है किन्तु इनका उपार्जन परोक्ष जगत से ही संभव हो पाता है। मानवी अन्तराल में तो उसकी बीज सता भर विद्यमान है। साधना की तो जाती है अन्तराल में, पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।

वैज्ञानिकों को लेसर से लेकर मृत्यु किरणों तक एक से बढ़कर एक शक्तियाँ आज आकाश से ही उपलब्ध हो रही है, जो सृजन अथवा ध्वंस का-दोनों का ही उद्देश्य पूरी करती रही है। इन दिनों रेडियो, तार, टेलीफोन, टेलीविजन आदि संचार यंत्रों में छोटे-छोटे उपग्रहों से अनेक देशों में काम लिया जा रहा है जो पूर्णतया सफल रहा है। यह पद्धति सरल और सस्ती भी पड़ रही है। अब मौसम में इच्छानुकूल हेर-फेर की बात भी सोची जा रही है। ऋतुओं पर नियंत्रण कर गर्मी-सर्दी बढ़ा लेने, इच्छानुकूल क्षेत्र में वर्षा कराने के प्रयोग परीक्षण भी चल रहे है। यदि वे सफल रहे तो मानवी सुविधा सम्वर्धन में भारी प्रगति हो सकती है । इस स्वप्न को साकार करने में वैज्ञानिक प्रतिभाएँ जी-जान से लगी हुई है। उन्हें सफलता भी मिली है। लेकिन उज्ज्वल सपनों के साथ जुड़ा हुआ एक निराशाजनक पक्ष भी है। वह है-आविष्कारों एवं तकनीकी विकास से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण संकट का। इस दृष्टि से पिछली प्रगति अधिक महँगी पड़ी है।

विषाक्तता बढ़ने से आकाश में प्रदूषण इतना बढ़ गया है जिसके रहते मनुष्यों और प्राणियों को दुर्बलता और रुग्णता का अभिशाप सहते अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाने के अतिरिक्त कोई चारा न रहेगा। अंतर्ग्रही असंतुलनों में भी वृद्धि हुई है। प्रकृति प्रकोप इन्हीं दिनों अधिक परिमाण में दृष्टिगोचर हो रहे है। पृथ्वी अन्य ग्रहों के प्रभावों से निश्चित ही प्रभावित होती है। सौर मण्डल के चक्र में बँधी होने के कारण पृथ्वी का वातावरण भी अन्यान्य ग्रहों पर प्रभाव डालता है। अस्तु असंतुलनों और प्रकृति विपदाओं में मनुष्य द्वारा प्रदूषित पृथ्वी के वातावरण का भी सहयोग हो सकता है, ऐसा पर्यावरण विशेषज्ञ मानने लगे है।

विषाक्तता के परिशोधन का कोई कारगर उपाय नहीं सूझ रहा। “किंकर्तव्यविमूढ़” की भाँति वैज्ञानिक यह सोच रहे है कि संव्याप्त आणविक एवं अन्यान्य कचरे को अनन्त अन्तरिक्ष के किसी सुदूर कोने में फेंककर छुट्टी पा ली जाये। यह युक्ति मनुष्य के लिए कोई हानिकारक प्रभाव उत्पन्न नहीं करेगी, यह संदिग्ध है। अन्तरिक्षीय क्षेत्र में बढ़ते हुए तकनीकी कदमों के साथ बढ़ते उपग्रहों की संख्या भी भावी विभीषिकाओं का एक निराशाजनक पहलू प्रस्तुत करती है, जिसे नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता।

भौतिक विज्ञान तथा उसका तकनीकी ज्ञान प्राचीन काल में इतना सुविकसित न था। पर जिन उपलब्धियों के लिए अन्तरिक्ष विज्ञानी प्रयत्नशील है वे सारे प्रयोजन ज्योतिर्विज्ञान द्वारा गणना के माध्यम से पूरे कर लिए जाते थे। अन्तरिक्ष के अन्तराल में ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति , अनुदान तथा उनके हानिकारक प्रभावों की जानकारी ज्योतिर्विज्ञान देता था। आत्म-विज्ञान उनसे लाभ उठाने, प्रतिकूलताओं से सुरक्षा उपचार की विधि व्यवस्था जुटाता था। अतीत की खोई हुई इस महान विधा ज्योतिर्विज्ञान की विलुप्त कड़ियों को ढूंढ़ने की पुनः आवश्यकता है। इस विज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हो सके तो विज्ञान से कदम से कदम मिलाकर चलते हुए-बिना किसी क्षति के अन्तरिक्ष जगत से एक से बढ़कर एक भौतिक एवं अन्यान्य अनुदानों के रूप में लाभान्वित हो सकना संभव है।


लघु कहानी– मौन व्रत

चार साधकों ने एक सप्ताह तक मौन व्रत पालन की प्रतिज्ञा ली और किसी एकान्त आश्रम में साथ -साथ रहने लगे।

दूसरे दिन दीपक का तेल चुकने लगा तो एक ने नौकर से कहा”तेल डाल दे।” दूसरे ने देखा तो व्रत तोड़ने की उलाहना देते हुए बोला -”प्रतिज्ञा के अनुसार तुम्हें बोलना नहीं चाहिए था।” तीसरे ने दोनों को डाँटा और कहा “ व्रत निभाते हो या चें-चें करते हो।”

इतना सुनने पर चौथे से भी रहा न गया और दर्प भरे शब्दों में बोल पड़ा- “अकेला मैं ही हूँ जो बोल नहीं रहा।”

यही है आज की स्थिति। लोग दूसरों के दोष बताते तो है, पर भूल जाते है कि स्वयं भी तो वही गलती नहीं कर रहे।


अपनों से अपनी बात

प्रस्तुत समय की समस्याओं की तुलना समुद्र में बहते रहने वाले उस हिम खण्ड से की जा सकती है जिसका एक तिहाई से भी कम भाग ऊपर तैरता दिखाई देता है एवं शेष पानी में डूबा अदृश्य बना रहता है। जो नाविक इस तथ्य से अनभिज्ञ होते है, वे अनजाने विशाल समुद्र में अपने जहाजों को इनसे टकरा देते है एवं जीवन तथा सम्पदा खो बैठते है। आज जो दृश्यमान है, वही सब कुछ है, यह सोचने की आत्म-प्रवंचना हमें नहीं करना चाहिए। युद्धोन्माद , जघन्य स्तर के अपराध, पवित्र स्थलों का आश्रय लेकर धर्म के नाम पर हिंसा व अलगाववाद की दुहाई, सम्प्रदायवाद, जातीय आधार पर टिकी राजनीति के राजघरानों के जमाने के षडयंत्र एवं दुरभि सन्धियाँ बीसवीं सदी के इस सातवें-आठवें दशक की कुछ त्रासदी भरी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ है। इन्हें देखते-देखते गत पच्चीस वर्षों से हम मोटी चमड़ी के हो गये है। अब हमें ये समस्याएं नजर नहीं आती , जीवन का अभिन्न अंग लगती है। लेकिप जो भुक्त भोगी है, वे बहुसंख्य है एवं वे समस्याओं का समाधान किसी भी स्थिति में चाहते कि विश्व-वसुधा की नैया युग विभीषिकाओं के इस आइसबर्ग से टकरा-टकरा कर चूर-चूर हो जाए। नियन्ता भी यह नहीं चाहता। चाहता होता तो सृष्टि रचता ही क्यों? उस परमसत्ता को एक ही इच्छा है कि मानवी पराक्रम -आत्मबल स्वयमेव उभर कर आए और इन विध्वंसक शक्तियों से मोर्चा ले। श्रुति का कथन सच है कि आत्मबल का पूरक परमात्म बल है। वह परमसत्ता तभी अपनी भूमिका निभाने आगे आती है जब मनुष्य अपने सारे प्रयास कर थक जाता है एवं रक्षा हेतु गुहार लगाता है।

जो समझदार है, वे समय की इस विषमता को भली-भाँति समझते है। वे जानते है कि बड़े राष्ट्रों द्वारा अस्त्र एकत्र कर लेने का अर्थ है-सामूहिक आत्मघात। बढ़ती जनसंख्या एवं संव्याप्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रदूषण की परिणति भी वे जानते-भली भांति समझते है। वे इस तथ्य से भी अवगत है कि पूँजी के आधार पर विलासिता की पृष्ठभूमि पर एवं चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व-तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा-चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ्राँस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूंखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरम्भ किया तब पोलैंड तो उसने पहले ही दाँव में धूर्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती । विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे। हिटलर ने अपनी शक्ति, सैनिक बल, धन इस कार्य में अधिक नष्ट करना उचित न समझा। सुरा-सुन्दरी के नशे में डूबे फ्रांसीसियों ने मात्र चौबीस घण्टे में आत्म समर्पण कर दिया और हिटलर फ्रांस में अपना झण्डा फहराकर नये मोर्चे की तैयारी करने लगा। तत्कालीन विचारकों ने चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्म समर्पण कर दिया।

जिन्हें भगवान ने थोड़ी भी समझ दी है वे भली-भाँति जानते है कि आज सारे विश्व की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी द्वितीय विश्व युद्ध के समय थी। राष्ट्रीयता, नैतिक अनुशासन मात्र किताबों में लिखने के लिये रह गया है। अश्लील साहित्य हमारे अपने ही देश में नहीं सारे विश्व में इतनी बड़ी मात्रा में छपता व नित्य पढ़ा जाता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। नशीली दवाओं की खपत नित्य बढ़ती चली जा रही है। हशीश, कोकीन, चरस, गाँजा, हिरोइन जैसी घातक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़े नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक(केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती है।

समाचार पत्रों ने पत्र-पत्रिकाओं ने भी मानो नैतिक अनुशासन के पतन में भागीदार बनने का दायित्व अपने हाथों में ले लिया है। मात्र वे ही समाचार प्रकाश में आते है जिनसे अन्यों को, उन्हीं का अनुकरण करने की प्रेरणा मिले। राज्य प्रमुखों-राष्ट्राध्यक्षों-प्रशासनिक कर्मचारी वर्गों में ईमानदारी का अंश उतना ही है जितना कि पानी मिले दूध का नहीं हो सकता। ये एक ओर देश भक्ति की दुहाई देते है, दूसरी ओर क्षेत्रवाद जातिवाद का नारा लगाते है। आज एक दल में है तो कल अन्तरात्मा की पुकार परा दूसरे दल में पहुँच कर निष्ठावान होने की शपथ गीता पर हाथ रख कर लेते है। एक वर्ग उनका रह जाता है जिन्हें हम अर्थतन्त्र की बागडोर संभालने वाले पूँजीपति नाम दे सकते है। अपनी मनमर्जी से मिलावट, रिश्वतखोरी, का आश्रय लेकर चरित्रहीन व्यक्ति धन-कुबेर बन बैठे उन सभी को अंगूठा दिखाते नजर आते है जो दिन भर मेहनत कर आधा पेट भरने लायक रोटी भी नहीं कमा पाते।

लेकिन अब यह स्थिति अधिक दिन तक चलने वाली नहीं है। भले ही बहुसंख्यक व्यक्तियों की स्थिति उन बकरों की तरह हो, जिन्हें कसाई ग्रह ले जाने से पूर्व घास खिलायी जा रही हो व वे आगत के प्रति अनभिज्ञ हों, एक ऐसा वर्ग भी है जो भले-बुरे परिणामों को समझता व विश्व के नव निर्माण हेतु अपना पुरुषार्थ जुटाता है। भले ही इसमें उन्हें तात्कालिक हानि दिखाई पड़े वे विषम परिस्थितियों से जूझने हेतु विलम्ब न कर मोर्चा जुटाते एवं ऐसी रण-नीति बनाते है जिनसे अनीति अभाव एवं अज्ञान मिटे, सतयुगी प्रकाश धरती पर आए।

भारतभूमि सदा से युग परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आयी है। समय-समय पर पूर्वानुमानों एवं दिव्य दृष्टि के आधार पर अपना मत व्यक्त करने वाले देश-विदेश के मनीषियों ने कहा है कि जब-जब भी दैवी विपत्तियां बढ़ी है एवं मानव आसुरी आचरण में प्रवृत्त हुआ है, इस देवभूमि से उद्भूत दिव्यात्माओं ने ही युग परिवर्तन की महती भूमिका निभायी है। स्वतन्त्रता संग्राम में जितना ध्येय प्रत्यक्ष क्रियाशील क्रांतिकारियों एवं स्वाधीनता सैनिकों को दिया जाता है, उससे अधिक इन दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों ने उन सिद्ध महापुरुषों को दिया है जिन्होंने वातावरण बनाने हेतु तप-साधना की, परोक्ष में क्रियाशील रहे। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द से लेकर रामतीर्थ, योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि का नाम इसी संदर्भ में लिया जाता है। जिनका नाम इस सूची में नहीं है, वे सदा से उत्तराखण्ड की कंदराओं में तप साधना में निरत है एवं सारे लीला संदोह को देख रहे है जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में पड़ने वाला है।

परिवर्तन शब्द कहने-सुनने में सरल है, रुचिकर भी तथा अभीष्ट भी। किन्तु विडम्बना एक ही है कि लगभग असंभव तो नहीं किन्तु कष्टसाध्य इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिये न तो साधन जुटाने से काम चल सकता है, न ही अनथक परिश्रम से कोई प्रयोजन सध सकता है। इस प्रयोजन की पूर्ति हेतु तो आदर्शवादी श्रद्धा का उथला नहीं गहरा स्तर चाहिए। यह जब तक न होगा सारे बाहोपचार निरर्थक है। युग बदल सकने में समर्थ इस बहूमूल्य पूँजी का भाण्डागार मानवी व्यक्तित्व के गहन अन्तराल में छिपा पड़ा है जिसे कुरेदने, उभारकर प्रखर बनाने भर की आवश्यकता है। यही समस्त समस्याओं का समाधान है। यदि आस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन हो, उनका सुनियोजन हो गया तो मानना चाहिए कि श्रुति की मान्यतानुसार कलियुग चला गया एवं सतयुग का पदार्पण हो गया।

हम इसी आशावादी दृष्टिकोण के साथ उन चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में सहभागी बने है कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जाएगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता-क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जाएगा। महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन जन-जन के मन-मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्य का संचालन करेगा जिनके हाथी में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते है कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है। विचार-क्रान्ति शब्द तो अच्छा है किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असंभव को संभव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी पन्द्रह वर्षों से सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतम्भरा रूप का -आद्य शक्ति का अवलम्बन कर लिया है, उसमें लाखों-करोड़ों को अपना सहयोगी बनाया है। प्रत्यक्ष जितना किया जा सकता था, हो चुका। वह पृष्ठ भूमि तैयार हो चुकी जो नियन्ता को अभीष्ट थी। मौन-नितान्त एकाकी पुरुषार्थ क्या कुछ कर सकेगा, अन्त में श्रद्धा का बीजारोपण कर कैसे वाँछित प्रयोजन कर सकेगा, इसे विश्व स्तर पर देखा जा सकना अगले दिनों सम्भव होगा।

इतिहास भी इस तथ्य का साक्षी है कि जब-जब भी बिगाड़ बेकाबू हुआ है, उसे नियंत्रित करने हेतु महाकाल रूपी महाव्रतों की मार ही सफल हो पाई है। प्रकारान्तर से इसे भगवान के अवतार की संज्ञा भी दी जा सकती है। अदृश्य युग प्रवाह का विनिर्मित होना ही प्रज्ञावतरण है। समझ जब काम नहीं करती, तब अदृश्य जगत से-परोक्ष के व्यवस्था उपक्रम से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस धरती को महाविनाश के गर्त में जाने नहीं देगा। जिसकी इच्छा से इस सृष्टि का प्रारूप बना व मानव रूपी युवराज जन्मा, उसे जगती का वर्तमान चोला ही पसन्द है यह सोचना नासमझी है। नियन्ता ने सदैव संतुलन स्थापित करने हेतु दौड़ लगाने का अपना वचन निबाहा है।

इन दिनों भले ही प्रत्यक्ष में तमिस्रा का व्यापक साम्राज्य संव्याप्त नजर आता हो। वह दैवी सता निराकार रूप में देखते-देखते एक छोटा-सा सूरज उगाकर सारी परिस्थितियाँ उलट सकती है। हरीतिमा रहित ठूंठों पर वासन्ती बहार ला देना उसके लिए बाँये हाथ का खेल है। इसके लिए ऋषिमहामानव सदा-सदा से ही अवतरित होते रहे है। वर्तमान क्रिया-कलापों में उस दैवी चेतना के सक्रिय क्रियान्वयन को ज्ञान-चक्षुओं द्वारा देखा जा सकता है। अन्यथा यह उमंग कैसे उठती, जिसने इस दैवी मिशन को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। जो इतना समझते है, वे इस आश्वासन को भी सुनिश्चित समझे कि समय बदलेगा, नासमझी का स्थान विवेकशीलता लेगी और समग्र सूत्र-संचालन सोय मूर्धन्यों के हाथों से निकलकर जागृतात्माओं के हाथों में आएगा। हमारी अन्तर्मुखी एकाकी साधना को उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।


चोर की आंखें खुल गयी (kahani)

बाप बेटे चोरी को गये। बाप अभ्यस्त था और बेटा नौसिखिया। बेटे को कुएँ की मुँडेर पर खेत मालिक की खोज खबर रखे रहने की चौकीदारी के लिए बैठा दिया और स्वयं फसल काटने में लग गया। इससे पूर्व बेटे को बता दिया गया था कि मालिक आता दीखे तो इशारा कर देना ताकि हम लोग भाग चले।

खेत कटने लगा। बाप काम में लग गया। लड़के ने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो खेत का मालिक तो नहीं दिखा पर संसार का मालिक सर्वत्र सर्वव्यापत नजर आया। सो वह चिल्लाया, पिताजी हमें तुरन्त भागना चाहिए। देखने वाले ने देख लिया।

दोनों बेतहाशा दौड़े। बहुत दूर जाने पर रुके तो बाप ने बेटे से पूछा, वह कौन था, कहाँ था जिसने हमें देखा। लड़के ने आसमान की उंगली उठाकर उस सर्वव्यापी की ओर इशारा किया जो हर किसी को देखता है और करनी का फल दिये बिना मानता नहीं।

चोर की आंखें खुल गई और उसने आगे से चोरी करना बंद कर दिया।


“ऐसे नहीं बनो रे”

(मंगल विजय ‘विजय’)


“ऐसे नहीं बनो रे” (Kavita)

तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये। महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिए॥

‘मिलन’ विश्व की तरुणाई से, बूढ़े मन का कब होता है। महाप्राण के आलिंगन में, कब प्राणों का शव होता है॥

महाप्राण से महामिलन को, यौवन भरा उफान चाहिये। तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये॥

लेती आई मजा मिलन का, सदा-सदा से नयी जबानी। बूढ़े प्राण रहे बहलाते अपने को, सुन कथा, कहानी॥

अगर चाहिए मजा मिलन का, तो वैसा सामान चाहिये।। महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये॥

प्राणवान होने का परिचय दे हम मुस्काने बिखरा कर। संघर्षों की भरी जवानी से अपना यौवन टकराकर॥

महाप्राण दे स्वयं निमन्त्रण, और अधिक क्या मान चाहिये। तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये।

महामिलन से मिली सुधा का, जन-मानस को पान करा। जन-मानस के सुप्त प्राण को, शंखनाद कर चलो जगाये।

युग के प्राणों को लहराने, प्राण-सुधा का पान चाहिये। महाप्राण से महामिलन को अरे! मचलते प्राण चाहिये॥

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*समाप्त*