सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें

ईश्वर ने मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर उसे अलग−अलग क्षणों में टुकड़े−टुकड़े करके दिया है। नया क्षण देने से पूर्व वह पुराना वापिस ले लेता है और देखता है कि उसका किस प्रकार उपयोग किया गया। इस कसौटी पर हमारी पात्रता कसने के बाद ही वह हमें अधिक मूल्यवान क्षणों का उपहार प्रदान करता है।

समय ही जीवन है। उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। वे क्षण हमारे सामने ऐसे ही खाली हाथ नहीं आते वरन् अपनी पीठ पर कीमती उपहार लादे होते हैं। यदि उनकी उपेक्षा की जाय तो निराश होकर वापिस लौट जाते है किन्तु यदि उनका स्वागत किया जाय तो उन मूल्यवान संपदाओं को देकर ही जाते है जो ईश्वर ने अपने परम प्रिय राजकुमार के लिए भेजी है।

जीवन का हर प्रभात सच्चे मित्र की तरह नित नये अनुदान लेकर आता है। वह चाहता है उस दिन का शृंगार करने में इस अनुदान के किये गये सदुपयोग को देख कर प्रसन्नता व्यक्त की जाये।

उपेक्षा और तिरस्कार पूर्वक लौटा दिये गये जीवन के क्षण−घटक दुखी होकर वापिस लौटते हैं। आलस्य और प्रमाद में पड़ा हुआ मनुष्य यह देख ही नहीं पाता कि उसके सौभाग्य का सूर्य दरवाजे प्रति पर दिन आता है और कपाट बन्द देख कर निराश वापिस लौट जाता है।

—रवीन्द्रनाथ टैगोर


स्वल्प साधन—कठिन मार्ग

चलते−चलते संध्या का झुटपुटा हो गया। समय के रथ पर सवार भगवान भास्कर अस्ताचल गामी होने लगे। अमावस्या की अन्धकारमयी रात्रि थी। हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता था। अभी मञ्जिल दो कोस दूर थी। पास ही साधु की एक कुटिया थी। वह वहाँ पहुँचा और बड़े दीन भाव साधु से निवेदन करने लगा—’महात्मन् मुझे अपनी मंजिल पर समय पहुँचना है। अन्धेरी रात है। बीहड़ मार्ग है। यदि मैं आज न पहुँच सका तो जीवन का अलभ्य अवसर मेरे हाथ से निकल जायेगा। ऐसे विपत्तिकाल में आप मेरी सहायता कीजिये।’

‘कुटिया में रखा सकते दीपक यदि आपके काम आ सके तो सहर्ष ले जा सकते हो। शाम का भोजन मैं कर ही चुका। केवल विश्राम करना है उसके लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता भी नहीं।

यात्री प्रसन्न हुआ। उसे एक सहारा मिल चुका था। उसने दीपक उठाया और चल पड़ा मंजिल की ओर। दो−चार खेतों को ही पार किया होगा कि उसके कदम मंजिल की ओर न बढ़ कर कुटिया की ओर लौट पड़े। दीपक को यथास्थान रखते हुए उलाहने के स्वर में यात्री ने कहा—’इस दीपक का क्षीण प्रकाश चार−पाँच कदम से आगे पहुँचता ही नहीं फिर मैं दो कोस की मंजिल को कैसे तय करूंगा। जीवन का स्वर्ण अवसर भले ही खो जाये इस क्षीण प्रकाश के सहारे यात्रा करके मैं अपने जीवन को संकट में नहीं डालना चाहता। महात्मन्! मुझे तो आप अपनी कुटिया में रात बिताने की आज्ञा दीजिये। मैं एक किनारे पड़ा रह कर रात्रि काट लूँगा। विश्वास करें मेरे रहने से आपकी साधना में किसी प्रकार की बाधा न आयेगी। सुबह होते ही मंजिल की ओर तेजी में कदम बढ़ाकर पहुँचने का प्रयास करूंगा।’

यात्री को ठहरने में भला साधु को क्यों आपत्ति होती। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। यात्री थका हुआ तो था ही सोते ही गहरी नींद में खो गया। लगभग एक घण्टे के बाद एक अन्य यात्री उधर से निकला। हाथ में दीपक था जो क्षीण प्रकाश बिखेरता हुआ उसके मार्ग को प्रशस्त करता जा रहा था। यात्री ने कुटिया की ओर एक दृष्टि डाली और बिना रुके आगे बढ़ने लगा। साधु कुटी से बाहर आया। उसने यात्री को रोकते हुए कहा—’ऐसा लगता है कि आप लम्बी यात्रा तय करके आ रहे हैं। काफी थक गये होंगे। दिन भर के भूखे, प्यासे होंगे। क्यों न रात्रि भर यही विश्राम कर लें, प्रातःकाल होते ही यहाँ से चले जाना। एक अन्य यात्री भी कुटिया में विश्राम कर रहा है। दोनों का साथ हो जायगा, बातचीत करने से रास्ता कब कट गया पता भी न चलेगा।’

साधु ने पुनः पूछा—आपके हाथ में यह छोटा सा दीपक है। जिसका क्षीण प्रकाश है। क्या इस प्रकाश में आगे बढ़ते हुए भय नहीं लगता। क्या रास्ता साफ दीख जाता है?’

‘इसे आप क्षीण प्रकाश कहने है।’ यात्री ने आश्चर्य कहा—’यह प्रकाश तो मुझसे सदैव चार−पाँच कदम आगे ही रहता है। कठिनाई नहीं होती। आन देख नहीं रहे इसी के सहारे मैं दो कोस की यात्रा कर आया हूँ और अब आगे तो उतना ही और चलना भर है।’

साधु अपने प्रश्न से सन्तुष्ट था। वह यात्री के मनोबल की परीक्षा ले चुका था। उसने आशीर्वाद देते हुए कहा—’वत्स! तुम्हारी यह यात्रा बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो ऐसी मेरी शुभ कामना है।

यात्री के पास अधिक कहने−सुनने के लिए समय कहाँ था। वह तो दीपक के क्षीण प्रकाश में आगे बढ़ गया। जब कि स्वल्प प्रकाश और घने अन्धकार को उलाहना देने वाला विराम की निद्रा में लम्बी चादर तान कर सो रहा था।क्या हम ईश्वर देख सकते हैं−उससे वार्तालाप कर सकते हैं। इस प्रश्न का उत्तर नहीं में भी दिया जा सकता है और हाँ में भी। नहीं उस स्थिति में जब ईश्वर को कोई आसमान में ठहरा हुआ और मनुष्यों जैसी आकृति प्रकृति का मान कर चला जाय। यह विशुद्ध भावनात्मक कल्पना है जो सम्भवतः ध्यान की एकाग्रता अथवा उत्कृष्टतम मानव का स्वरूप निर्धारण करते हुए उसके सदृश बनने की लक्ष्य स्थापना के लिए की गई प्रतीत होती है उसके अनेक नाम रूप ही नहीं गुण स्वभाव की भारी भिन्नता वाले अगणित स्वरूप भी यही बताते हैं कि यह यथार्थता नहीं काल्पनिक स्थापना है। यदि ईश्वर की कोई यथार्थ आकृति होती तो वह सूर्य, चन्द्र आदि की तरह समस्त विश्व में एक ही प्रकार की दृष्टिगोचर होती। तब देश जाति एवं सम्प्रदायों द्वारा प्रस्तुत अनेकानेक ईश्वरीय आकृतियाँ क्यों दिखाई पड़तीं। तब इन ईश्वरों के बीच मान्यताओं और क्रियाकलापों का जमीन, आसमान जितना अन्तर क्यों रहता।

ऐसे काल्पनिक ईश्वर को देखना और उससे वार्तालाप करना यदि किसी के लिए सम्भव हो सके तो उसे उसका भावातिरेक ही कहा जायगा। अपनी कल्पना और आस्था का समन्वय भी कम विचित्र नहीं है। उससे अन्धेरे में खड़ी झाड़ी भूत बनकर हमें इतना डरा देती है कि प्राण−घातक संकट आ उपस्थित हो। भूत−पलीतों के विविध क्रिया−कौतुक मनुष्य की सघन कल्पनाओं के अतिरिक्त और क्या है? ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी संकल्प शक्ति एवं आस्थाओं स मिश्रित भावुकता के आधार पर गढ़ा जा सकता है। उसके दर्शन भी हो सकते हैं और वार्तालाप भी हो सकता है पर इसका परिणाम कुछ नहीं। कल्पना की परिपुष्टि कल्पना के आधार पर कर लेने का रात्रि स्वप्न अथवा दिव स्वप्न किसी का कुछ प्रयोजन पूरा नहीं कर सकता। ऐसे भावुक लोगों की कमी नहीं जो अपने कल्पित देवी−देवताओं के अक्सर दर्शन करते रहते हैं। वे कभी स्वप्न में दिखाई पड़ते हैं, कभी अर्ध जागृत अवस्था में। यदि वह दर्शन वास्तविक रहे होते तो इतना बड़ा देव अनुग्रह प्राप्त करने वाले के व्यावहारिक जीवन में, स्तर में तथा परिस्थितियों में अन्तर अवश्य पड़ा होता। देवता जिस पर इतने प्रसन्न हों कि दर्शन देने दौड़े आवें, उस पर वे अन्य कृपायें भी अवश्य करेंगे और उसका स्तर देवोपम बना देंगे। पर यदि वैसा कुछ नहीं होता और दर्शनों का सिलसिला चलता रहता है तो यथार्थवादी इतना ही कह सकता है कि विनोद की एक अच्छी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि हाथ लग गई।

इस स्तर के ईश्वर का दर्शन करने की बात सोचना बालबुद्धि से अधिक और कुछ नहीं है। वैसा लाभ किसी को मिल भी जाय तो उससे किसी उच्च प्रयोजन की सिद्धि की आशा नहीं करनी चाहिए। विवेकवान व्यक्ति इस जंजाल में नहीं उलझते वरन् तत्व−चिन्तन की गहराई में उतर कर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अनन्त में संव्याप्त दिव्य चेतना का लाभ ही ईश्वर हे। मनुष्य और इस ईश्वर का मिलन स्थल मानवी अन्तःकरण ही हो सकता है। व्यक्ति की समाविष्ट दिव्य चेतना का केन्द्र स्थल उसका अन्तःकरण ही है। सजातीय के साथ ही सजातीय का मिलना सम्भव है। आत्मिक−चेतना ही ईश्वरीय चेतना के समकक्ष है। अस्तु उन्हीं दोनों का पारस्परिक मिलन सम्भव हो सकता है। हाड़−माँस से बनी शरीर सत्ता और उसके साथ जुड़ी हुई इंद्रियां स्वयं जड़−पदार्थों से बनी हैं अस्तु वह जड़ पदार्थों को ही देख सकती या अनुभव कर सकती हैं। यदि ईश्वर जड़ पदार्थों का बना अचेतना स्थूल वस्तुओं जैसा रहा होता तो ही आँख से उसे देखना और कान से उसकी आवाज सुनना सम्भव हो सकता था। अस्तु जिस प्रकार एक मनुष्य दूसरे को देखता है या अपनी कहता उसकी सुनता है उस स्तर का दर्शन अथवा वार्तालाप सम्भव नहीं हो सकता।

अर्जुन ऐसा ही आग्रह कर रहा था कि मुझे भगवान का दर्शन करना है। इस पर कृष्ण न कहा यह चर्म चक्षुओं से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए उसे दिव्य चक्षु दिये गये। दिव्य चक्षु अर्थात् दिव्य दर्शन, तत्व दर्शन, विवेक। उसी के माध्यम से अर्जुन ने इस विराट् विश्व ब्रह्माण्ड के दर्शन किये थे। वैसे ही हमारे लिए भी सम्भव हो सकता है। यदि प्रत्यक्ष ईश्वर देखना हो तो यह विश्व उसी का स्वरूप देखा जा सकता है और उसके अन्तराल में सन्निहित विश्वात्मा को परमात्मा सत्ता के रूप में भाव सम्वेदना के क्षेत्र में दर्शन इस प्रकार ही सम्भव है।

उससे वार्तालाप करना हो तो सत् शास्त्रों के स्वाध्याय में—महा मान करके सत्संग सान्निध्य में—तत्व दर्शन के मनन चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते−फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ानें उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते हैं। भ्रम जंजाल गढ़ कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जायेंगे जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा कल्लोल, हास−विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कलपना की उड़ानें सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी यह भी सत्य है।

ईश्वर दर्शन उचित भी हैं और आवश्यक भी। पर उस लाभ से लाभान्वित तभी हुआ जा सकता है जब उसके लिए उपयुक्त स्थान चुने और आधार अपनायें। मानवी अन्तःकरण ही वह स्थान है जहाँ उत्कृष्ट भावनाओं एवं विचारणाओं के रूप में मनुष्य और परमेश्वर का मिलन सम्भव हो सकता है। उसी मिलन में वार्तालाप की भी पूरी सम्भावना विद्यमान है। मिलन और वार्तालाप की दोनों आवश्यकताएँ एक ही स्थान पर एक ही समय पूरी हो सकती है। इसके लिए अपने अन्तःकरण को छोड़कर अन्यत्र भटकने की जरूरत नहीं है। प्रतीक पूजा का आधार इसी लिए लिया जाता हे कि हमारी जड़ विमूढ़ चेतना क्रमशः ईश्वर के सान्निध्य में पहुँचें इसके लिए श्रद्धा उगाये और तादात्म्य होने के लिए अभ्यास जुटाये। इससे आगे की मंजिल पूरी करने के लिए तो हमें बहिरंग जड़ जगत में से अपने को समेट कर अन्तरंग क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए ही कदम बढ़ाने पड़ते हैं। इट पत्थरों के बने देवालयों में स्थापित पाषाण प्रतिमाएँ आरम्भिक श्रद्धा जागरण की दृष्टि से ही उपयुक्त होती है वे ईश्वर प्राप्ति का—उसके दर्शन अथवा वार्तालाप का उद्देश्य पूरा नहीं करा सकतीं। इसके लिए तो उसी तीर्थ में जाना पड़ेगा जहाँ ईश्वरीय प्रकाश की सीधी किरणें आती हैं और जिसे अंतःकरण के नाम से जाना जाता है। सच्चा देवमन्दिर अपना अन्तः क्षेत्र ही है उसी में अन्तःकरण रूपी सजीव देवप्रतिमा प्रतिष्ठापित है। इसी मर्म स्थल से संपर्क बनाकर हम अपने अध्यात्म लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन के महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें इस सुनिश्चित स्थान के साथ ही गहन संपर्क बनाना होगा।

अपने भीतर ही वह सत्ता विद्यमान है जो हमारा श्रेष्ठतम मार्ग दर्शन कर सके और समस्त समस्याओं का हल प्रस्तुत कर सके। अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटा सकना भी पूर्णतया उसकी सामर्थ्य के अंतर्गत है। इस सत्ता केन्द्र का नाम अन्तःकरण है। मनुष्य और ईश्वर का जब कभी—जितना कुछ भी संपर्क बनेगा इस केन्द्र स्थल पर बनेगा। आत्मा और परमात्मा की प्रणयकेलि का सुसज्जित एकान्त उद्यान यही है। वस्तुतः ईश्वर की सत्ता और महत्ता अत्यन्त व्यापक है उसे अचिन्त्य और अनिर्वचनीय कहा जा सकता है।

सुविस्तृत ब्रह्माण्ड में—ग्रह नक्षत्र में एक से दूसरे की दूरी कितनी अधिक है इसकी गणना अंक देखते ही बुद्धि चकरा जाती है और उनकी भ्रमण कक्षाओं के क्षेत्र की कल्पना की जाय तो बुद्धि को प्रतीत होगा कि इतने विस्तार का चिन्तन तक उसके लिए असम्भव है। मानवी जानकारी से बाहर भी न जाने कितनी निहारिकाएँ और होंगी, वे जितने घेरे को स्पष्ट करती होंगी, उनके भीतर भिन्न−भिन्न प्रकार की परिस्थितियां और शक्तियाँ काम कर रही होंगी? उनमें रहने वाले जड़ चेतन पदार्थों की स्थिति में कितनी भिन्नता और कितनी विशेषता होगी उनका सबक नियन्त्रण संचालन का सूत्र संचालन का सूत्र संभालने वाला कितना कार्य किस प्रकार करता होगा? इन सब प्रश्नों पर जब विचार करना आरम्भ करते हैं। तो तत्वदर्शी मनीषियों की तरह हमें भी अचिन्त्य,अनिर्वचनीय अनादि,नेति नेति आदि कहकर अपनी चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है। समग्र ईश्वर का प्राप्त करना तो दूर उसके विस्तार सम्बन्धी कल्पना तक कर सकना हमारे लिए शक्य नहीं।

ईश्वर को “अणोरणीयान् महती महीयान्” कहा गया है। महती महीयान् को प्राप्त कर सकना अपने साधनों को देखते हुए सम्भव नहीं। हम उसकी अणोरणीयान् सत्ता से ही संपर्क बना सकते हैं और इस मर्मस्थल में तादात्म्यता प्राप्त करके अपनी व्यापकता भी ईश्वर की तरह ही असीम बना सकते हैं। ब्रह्म वेत्त इसी प्रयास की तरह ही असीम बना सकते है। ब्रह्म वेत्ता इसी प्रयास में निरत रहे हैं और उन्होंने तत्व ज्ञान के मार्मिक रहस्योद्घाटन करते हुए यही कहा है कि ईश्वर से संपर्क बनाने का एकमात्र सही स्थान सही स्थान अन्तःकरण ही हो सकता है।

आमतौर से हमारी अभिरुचि ब्रह्म जगत में बिखरी पड़ी रहती है। तरह तरह की वस्तुओं के आकर्षण में मन भ्रमर जहाँ जहाँ संपर्क होने पर तरह तरह के स्वादों की अनुभूति होती है। इन स्वादों की रसानुभूति के लिए जी मचलता रहता है। इससे आगे और एक कदम बढ़ा तो जिन वस्तुओं या व्यक्तियों में आत्मीयता आरोपित कर ली गई थी उन्हें छाती से चिपकाये रहने की एक ओर ललक पैदा कर ली जाती है। इन दोनों प्रक्रियाओं को तृष्णा और वासना कहते है। बहिर्मुखी जीवन की अहंता इन्हीं के माध्यम से तृप्त होती है। बड़प्पन पाने क की लालसा उससे ऐसे उद्धत आचरण कराती है जिनके लिए साधन जुटाते रहना जीवन का समग्र रस निचोड़ देने पर भी स्वल्प मात्रा में ही सम्भव होता है। आकाँक्षाओं की तुलना में तृप्ति नगण्य जितनी ही मिल पाती है। बहिर्मुखी चिन्तन में निरत और लिप्सा, लालसाओं के साधन जुटाने में व्यत मनुष्य के लिए यह सम्भव ही नहीं हो पाता कि अन्त क्षेत्र में प्रवेश करके वहाँ करके वहाँ भरे पड़े अमृत भण्डार को कल्प वृक्ष को पारस को देखने और समझने में समर्थ हो सके। जब इतना ही नहीं बन पड़ो उस रतन भण्डार को कुरेद कर बहुमूल्य रत्नों को प्राप्त कर सकना तो बन ही कैसे पड़ेगा?

ईश्वर को प्राप्त कर सकना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। इससे बड़ी सम्पदा एवं उपलब्धि दूसरी हो ही नहीं सकती। विश्व की समस्त विभूतियों के अधिपति के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने पर उसकी समस्त सत्ता से भी अपना सम्बन्ध बन जाता है। इसी स्थिति में जो पहुँच गया उसके लिए हर वस्तु करतल गत हो गई। उसे और कुछ प्राप्त कर सकना शेष नहीं रह गया। इस स्थिति की गरिमा को देखते हुए तत्वदर्शी ईश्वर प्राप्ति का महात्म्य वर्णन करते रहे हैं और विचारवान लोगों को उस उपलब्धि के लिए प्रयत्न करने की प्रेरणा देते रहे हैं। स्वाध्याय सत्संग −मनन चिन्तन− योग तप आदि के समस्त साधन,उपचार,ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये हैं।

यह ईश्वर कहाँ मिले? कैसे मिले? इस प्रश्न का उत्तर बालबुद्धि के प्राथमिक विद्यार्थियों को पूजा परक बाह्योपचारों की ओर इशारा करके दिया जाता है। इन्हें तीर्थयात्रा,देव दर्शन, नदी स्नान,व्रत उपवास,दान पुण्य,कथा कीर्तन,विधान कर्मकाण्ड आदि के साधन बताये जाते है। पर जिन्हें विवेक जन्य प्रौढ़ता प्राप्त हो गई उन्हें दूसरी बात बतानी पड़ती है उन्हें अन्तः भूमिका में प्रवेश करने अन्त करण को टटोलने के लिए कहा जाता है। वस्तुतः ईश्वरीय सत्ता के साथ संपर्क बना सकना और उस संपर्क बना सकना और उस संपर्क के साथ जुड़े हुए अनुदानों को प्राप्त कर सकना अन्तःकरण के इस सजीव तीर्थ में ही संभव होता है जिसकी की तुलना में बहिरंग जगत के समस्त साधन अनुदान तुच्छ पड़ते है। ईश्वर का दर्शन,वार्तालाप कर सकना इसी स्थान पर सम्भव हो सकता है।


सबसे बड़ी उपासना

विष्णु भगवान बड़ी एकाग्रता के साथ एक चित्र बनाने में निमग्न थे। उनके पास आस पास ब्रह्मा महेश और इन्द्र कैसे अनेक देवता खड़े थे। वह सब इसी प्रतीक्षा में थे कि विष्णु का कार्य पूरा हो तब अपनी आत क हैं। उन्होंने तो अपनी दृष्टि उठाकर भी न देखा। कई दिनों के भ्रमण करने के पश्चात देवर्षि नारद भी वैकुण्ठ में पधारे और उसी भीड़ में आकर खड़े हो गये

विष्णु की यह तन्मयता नारद को बहुत अखरी, ऐसा भी कौन सा आवश्यक कार्य है जिसे छोड़कर आगन्तुक ऋषि और देवताओं से बात नहीं की जा सकती। विष्णु की इस उपेक्षावृत्ति को नारद ने अपना अपमान माना। उन्होंने आवेश में आकर लक्ष्मी को पूछ ही लिया −’देवि’ आज इतनी तन्मयता के साथ प्रभु किस प्रेमी का चित्र बना रहे हैं। उनका की इस निमग्नता न आज तो शिष्टाचार के सामान्य नियमों को भी एक ओर रखवा दिया है ‘

“आज परब्रह्म के सबसे बड़े भक्त का चित्र बनाने में लीन हैं। इसकी भक्ति आपसे कहीं बढ़कर है ‘ लक्ष्मी ने सहज भाव में उत्तर दया।

विष्णु की दृष्टि आगन्तुकों का सम्मान करे और उनके आने का प्रयोजन पूछे उससे पूर्व ही नारद जी उल्टे पाँव भूलोक की ओर चल पड़े थे आज वह असन्तुष्ट और खिन्न थे। वे कितने ही दिनों तक खोये खोये से घूमते रहे।

एक दिन वह गाँव के बाहरी रास्ते से निकल रहे थे। चमड़े की तीव्र दुर्गन्ध उनके चरणों की गति को और तीव्र कर रही थी। उन्होंने जैसे ही दृष्टि उठाई, पशु चर्मों से घिरा एक मैला कुचैला चमार दिखाई दिया। नारद जी समझ गये न हो यह विष्णु का परम भक्त है। जिसका चित्र उस दिन बड़ी निमग्नता के साथ बनाया जा रहा था। अनिच्छित उनके चरण नहीं रुक गये। तीव्र दुर्गन्ध के कारण वह चमार के पास तो न जा सके। उनके मन में जिज्ञासा जाग्रत हुई कि इसकी दिनचर्या का निरिक्षण तो करना ही चाहिये। वे दूर खड़े नाक पर हाथ लगाये उसके कार्यों को ध्यान पूर्वक देखने लगे।

चमड़े के ढेर को साफ करते करते शाम हो गई। नारद ने सोचा शायद यह अब किसी मन्दिर जायेगा या अपने निवास पर ही भगवान का नाम स्मरण करेगा, पर उसके द्वारा ऐसा कुछ भी न हुआ। अब तो उनके क्रोध की सीमा न रही। वह सोचने लगे कि एक अधम चमार को मुझसे श्रेष्ठ बताकर लक्ष्मी ने मेरा अपमान किया है। कहीं भक्त ऐसे होते हैं? रात्रि का गहन अन्धकार बढ़ने के साथ नारद के मन की खिन्नता और बढ़ने लगी।

उन्होंने आवेश में आकर विष्णु को शाप देने के लिये जैसे ही बाहु का ऊपर उठाया कि पीछे से किसी शक्ति ने उनके हाथ को पकड़ लिया −’देव’ आप भक्त की दिनचर्या को देखने के लिए इतना धैर्य धारण किये रहे तो क्या उसकी उपासना के उपसंहार तक नहीं रुक सकते? उसे थोड़ा समय और दीजिये फिर आपकी जो इच्छा हो वैसा कीजिये।’

नारद ने जैसे ही मुड़कर देखा लक्ष्मी पीछे खड़ी थीं। भक्त के रहस्य को बीच में ही छोड़ना उचित न समझ वह रुके रहे। लक्ष्मी अपना बात कहकर अदृश्य हो गई।

चमार तो अपने कार्य में लगा ही था। जब रात अधिक होने लगी तो उसने चमड़े के सारे ढेर को समेटा। जितना चमड़ा दिन भर में साफ कर लिया था, उसे एक गठरी में बाँधा। और जो चमड़ा साफ न हो पाया था उसे एक ओर समेट कर रखा। फिर एक मैला कपड़ा लेकर सिर से पैर तक अपने पसीने को पोंछकर घुटनों केवल झुक का गठरी के सामने बैठ गया और हाथ जोड़कर भाव विभोर हो कहने लगा − ‘प्रभो’ मुझ पर कृपा करना मैं बिना पढ़ा चमार आपकी पूजा करने के ढंग को भी नहीं जानता मेरी आप से यही विनय है कि मुझे कल भी ऐसी ही सुमति देना कि आज की तरह ही आपके द्वारा दी गई चाकरी को ईमानदारी के साथ पूर्ण कर सकूँ।’


आदर्श विहीन प्रगति हमारा सर्वनाश करके ही छोड़ेंगी

हम दिशा विहीन लक्ष्य विहीन प्रगति की दिशा में अन्धी दौड़ दौड़ रहे हैं। सृजन का नहीं विनाश का लक्ष्य हमारे सामने हैं बुद्धिमत्ता और कुशलता में अपनी पीढ़ी ने भूतकाल के समस्त कीर्तिमान को पीछे छोड़ दिया है। एक से एक बड़े आविष्कार होते जा रहे हैं और उपलब्धियों के चमत्कारी अम्बार लगते जा रहे हैं। जिनके हाथ में यह प्रगति आई है। वे चाहते हैं कि इस धरती आकाश पर उन्हीं का वर्चस्व है। जो उनके पीछे न हों उन्हें जीवित न रहने दिया जाए। जो समर्थों के शोषण का प्रतिरोध करे उसका नाम निशान मिटा दिया जाए। यह आसुरी अहंता नित नये ऐसे आविष्कार कर रही है। जो मरण को सस्ते से सस्ता, सरल से सरल और विशाल से व्यापक बना सके।

जापान पर गिराये गये बम आज के विकसित अणु आयुधों की तुलना में छोटे बच्चे मात्र थे अब उस दिशा में बहुत प्रगति हो चुकी हैं। सन् 54 में विकनी क्षेत्र में जो परीक्षण हुआ था उस विस्फोट की शक्ति हिरोशिमा पर फेंके गये बम की तुलना में 600 गुनी अधिक थी। रूसी अधिनायक श्श्चचेव ने एकबार कहा था कि उनके देश ने इतना बड़ा अणु आयुध बना लिया हैं। जिसका परीक्षण तक कर सकना सम्भव नहीं हो सका। यदि उसका विस्फोट उत्तरी ध्रुव पर किया जाय तो संसार में एक नये समुद्र का जन्म हो जायगा और उसमें ब्रिटेन, फ्राँस जैसे योरोप के कई देश देखते देखते डूब जायेंगे।

ठीक इसी प्रकार का दावा अमेरिका सैनिक अनुसंधान विभाग के अध्यक्ष जनरल गोविन ने किया है। उनका कथन है। कि रूस पर किया गया अणु आक्रमण उसका नामोनिशान नक्शे पर से मिटा देगा। साथ ही योरोप,जापान तथा एशिया के एक बड़े भाग को प्रभावित किये बिना न रहेगा।

अणु बमों से हाइड्रोजन बमों की शक्ति अधिक है। जो काम कितने ही अणु बम मिलकर करते हैं। वह एक ही हाइड्रोजन बम कर सकता है। इसलिए अणु विज्ञान की अधिक विकसित स्थिति में भावी महायुद्ध हाइड्रोजन बमों से ही लड़े जायेंगे। उनके महा विस्फोट की चार प्रति क्रियाएं होती हैँ −(1)धमक (2)ताप (3) न्यूकलीय अभिक्रिया (4) रेडियो धर्मा विकिरण।

एक माध्यम आकार के हाइड्रोजन बम की धमक छः मील के घेरे की वस्तुओं को पूर्णतया नष्ट कर देगी। वरन मील तक गम्भीर नुकसान पहुंचायेगी और 25 मील के घेरे में सामान्य भूकम्प जैसी टूट फूट होगी।

ताप का प्रभाव−10 मील के घेरे तक के प्राणियों में से 65 प्रतिशत तत्काल मर जायेंगे। 17 मील के घेरे में रहने प्राणी इतने जल जायेंगे कि उन्हें कराहते कलपते देर सवेरे में मौत के मुंह में ही जाना पड़ेगा।

रेडियो सक्रियता नापने की इकाई राण्टेजन कहलाती है इसे संक्षेप में ‘आर’ कहते हैं। इसकी 30 इकाइयाँ हीं मनुष्य के लिए असहनीय बन जाती हैं उतने भर प्रभाव से मनुष्य कुछ ही दिनों में मर जाते है। छोटे प्राणियों की मौत तो और भी जल्दी होती है।

इस रेडियो धर्मा प्रभाव को जान लेने के बाद वह समझना सरल पड़ेगा कि एक हाइड्रोजन बम से निकली सक्रियता कितने क्षेत्र में कितनी भयानक हानि उत्पन्न करेगी। उस विस्फोट से बारह मील तक 5000,100 मील तक 2300,150 मील तक 600 और 250 मील तक 30 इकाई रेडियो सक्रियता फैलाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मरण संकट उत्पन्न करने वाली रेडियो सक्रियता 250 मील के घेरे में फैलेगी।

रसायन युद्ध के डायरेक्टर राथ्स वाइन्ड ने अपने ग्रन्थ ‘टमारोज वेपन्स’ में निकट भविष्य में प्रयोग होने वाले रासायनिक अस्त्रों का वर्णन किया है। और कहा है कि किसी स्थान पर खड़े होकर गैसें छोड़ी जाँय तो वे बहती हवा के साथ मिलकर किसी बड़े देश को एक दिन में अधमरपा कर सकती है।

अणु आयुधों की तरह ही रासायनिक आयुधों का प्रयोग परीक्षण भी खतरे से खाली नहीं है। जरा सी भूल से वे भी भयंकर उत्पात खड़ा कर सकते है। सन् 68 में उराह परीक्षण केन्द्र द्वारा सैरीन गैस खिड़की जा रही थी। अचानक उत्तर पर्व की हवा चल पड़ी और गैसें ने 20 मील दूर के एक भेड़ पालन,केन्द्र की सात हजार भेड़ों का तत्काल काम तमाम कर दिया। उसके प्रभावित सहस्त्रों रोगी मनुष्य अस्पतालों में भरती हुए और उनमें से अधिकाँश मर गये।

इससे पूर्व डेनवर रासायनिक शस्त्र अनुसंधान केन्द्र का कचरा निकटवर्ती जलाशयों में पहुँचने से जलचरों और पक्षियों का भारी विनाश हुआ था। इतना ही नहीं उस पानी को पीकर अगणित पालतू और वन्य पशु मर गये। इस केन्द्र का क चरा एक कुआँ खोदकर गाढ़ा गया तो उस क्षेत्र में भयंकर भूचाल आया।

फ्रांसीसी वैज्ञानिक मार्सेल फेतिजा और मिचेल मागा ने अपने निबन्ध द−टोक्यिय आर्सेनल में तृतीय महायुद्ध में विषैली गैसों के प्रयोग की सम्भावना इस आधार पर की है कि वे अणु आयुधों की अपेक्षा सस्ती है और आसानी से प्रयोग की जा सकती है द्वितीय युद्ध में इन गैसों को जर्मनी ने बड़ी मात्रा में बनाया था पर उनका प्रयोग नहीं हो सका। अब उनके बहुत सुधार कर लिए गये हैं तद्नुसार किसी बड़े क्षेत्र की जनता की सेना को रुग्ण, मूर्छित से किसी इलाके के वृक्ष वनस्पति समाप्त किये जा सकते हैं− पानी विषैला किया जा सकता है और ऐसा बनाया जा सकता हैं कि उधर से गुजरना असम्भव हो जाय। एल0एस0डी0 जैसे मादक किसी नगर के जलाशय में घोल दिये जाते तो उसे पीकर सारा नगर उन्मत्त पिक्षित जैसा हो सकता है। ब्रह्माण्ड किरणों में से मृत्यु किरण जैसे कई ऐसी है जो कि सी क्षेत्र को प्रवेश करने के अयोग्य अना सकती है। ये प्रचण्ड दावानल उत्पन्न करके सब कुछ मारक कर सकती है।

कारोलिस्का इन्स्टीटयूट स्काटहोम के प्रो0 कार्ल गोरान हेडेन ने अपने लेख ‘दइन्फैक्शन डस्ट क्लाउड’ बताया है कि बादल में कुछ रसायन छिड़क कर उसे वर्षा के अयोग्य बनाया जा सकता है और उस इलाके में सूखा पड़ने से मनुष्य पशु पक्षी और वनस्पति के लिए जीवन संकट उत्पन्न किया जा सकता है। इसी प्रकार रोग कीटाणुओं को हवा में बखेर कर कोई देश रोग अविकसित देशों के लिए सम्भव न हो सका तो वहाँ के लोग ऐसे ही रोते कराहते मर जायेंगे।

लंदन विश्व विद्यालय कि प्रो.एम.डबल्यू. थ्रिग ने अपने लेख ‘रोवोज आन द मार्च’ में कहा है भविष्य में हाड़−माँस के मनुष्यों का स्थान यान्त्रिक दैत्य ग्रहण करेंगे और वे बिना अपनी जान की परवा किये अति भयानक यन्त्रों का प्रयोग करते हुए किसी से भी −कहीं भी −लड़ने के लिए दनदनाते हुए जाया करेंगे। मनुष्य सैनिक उनसे लड़ने में बहुत हेटे पड़ेंगे।

प्रथम महायुद्ध में फ्रांस ने जर्मनी पर विषैली गैसों के गोले दागे। जवाब में जर्मनी ने फ्राँस की ये प्रस छावनी पर क्लोरी गैस का बादल छोड़ा फलस्वरूप 5 हजार सैनिक मरे, दस हजार घायल हुए और बचे खुचों में भगदड़ मच गई। उस युद्ध में 17000 सैनिकों ने रसायन युद्ध लड़ा। जिसमें लाख मरे और 12 लाख घायल हुए।

यों सन् 1926 में एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता भी गैस आयुधों का प्रयोग न करने के सम्बन्ध में हो चुका है। पर वह प्रकार से निरर्थक ही है। अमेरिका ने तो तब भी उस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये थे। उस प्रतिबन्ध को बहुत कम देशों ने माना और आवश्यकतानुसार उस संधि का उल्लंघन मनमाने ढंग से करते रहे।

कुनी नोवल ने अपनी पुस्तक ‘विक्टर चार्ली’ में और रिचार्ड उडमैंन ने ‘सेन्ट लुई पोस्ट’ पुस्तक में उन रोमाँचकारी रासायनिक प्रहारों को वर्णन किया है जो अमेरिका द्वारा वियतनाम पर किये गये थे। कोको−डाइलिक और टाई क्लोरोफेन्वस्यामेटिक रसायन छिड़क कर वहाँ के घने जंगल नष्ट कर दिये गये धान, रबड़, आलू और सब्जियों की फसलें और ऐलिफन्टा घास नष्ट कर दी गई। इससे मनुष्यों और पशुओं का ही जीवन दुर्लभ नहीं हुआ वरन् उस क्षेत्र के वन्य पशुओं का ही जीवन दुर्लभ नहीं हुआ वरन् उस क्षेत्र के वन्य पशु और पक्षी भी समाप्त हो गये। जमीन बंजर हो गई और वर्षा का कटाव बढ़ जाने से उपजाऊ भूमि खार बेहड़ बन गई।

विषैली गैसों की अधिकाधिक घातक किस्में ढूँढ़ने की खोज में अमेरिका हर वर्ष 60 करोड़ डालर खर्च करता है। मेरीलैण्ड, अरकन्सास, इण्डियाना, कोलेरेडी, उटाह की प्रयोगशालाओं में बीस हजार कर्मचारी काम करते हैं और अब तक उस कार्य पर 20 खरब डालर से अधिक लागत लग गई है।

कनाडा ब्रिटेन और अमेरिका के विष गैस उत्पादन को चार भागों में विभक्त किया जाता है (1) भीड़ नियंत्रक (2) मनो रसायन (3) निष्क्रियता जनक (4) घातक और मारक।

मारक गैसों में ‘सैरीन’ इतनी घातक है कि उसकी एक बूँद से सैकड़ों व्यक्तियों का सफाया हो सकता है। इसके संपर्क में आते ही मनुष्य इठने लगता है, उलटी आती है, बेहोशी होती है और आधे घण्टे के भीतर दम तोड़ देता है। इस गैस में न रंग होता है न गन्ध। इसलिए उसे पहचाना भी नहीं जा सकता कि उसे कहाँ बखेरा गया है कहाँ नहीं।

निष्क्रिय बनाने वाली गैसों में ‘सी. एन.’ मुख्य है। इससे श्वाँस नली बेकार हो जाती है—मनुष्य हांफने लगता है और घुटन अनुभव करता है। खाँसी आती है और आँसू निकलते हैं, छाती जकड़ती है। इसके संपर्क में आया मनुष्य अर्ध मृतक होकर गिर पड़ता है—उसके लिए लड़ना—हथियार चलाना बिलकुल सम्भव नहीं रहता, एक मिनट से भी कम समय में वह अपने प्रभाव क्षेत्र में निष्क्रियता का साम्राज्य स्थापित कर देती है।

मनो रासायनिक गैसों में ‘बीन्जेड’ मुख्य है। इसके प्रयोग से मनुष्य गूँगा बहरा और अर्ध−विक्षिप्त जैसा हो जाता है। नशेबाज की तरह वह वेसिलसिले की हरकतें करता है। लड़ना उससे बन ही नहीं पड़ता। इससे भी अधिक उन्मादकारी गैस एल. एस. डी. पे बनाई गई है वह मानसिक सन्तुलन को पूरी तरह नष्ट कर देती है पर है इतनी महँगी कि उसे बड़े परिमाण में नहीं बनाया जा सके।

भीड़ नियन्त्रक गैस को आमतौर से अश्रु गैस कहते हैं। इसे भी सरकारें दंगाइयों को भगाने के लिए प्रयोग करती है। इसकी सुधरी किस्म ‘डी. एम.’ और ‘एच. डी.’ हैं। इनके संपर्क से सिर दर्द, उलटी, छाती में लकड़न उत्पन्न होती है और यदि वह साँस में अधिक पहुँच जाय तो मौत भी हो जाती है। इसका प्रयोग अमेरिका ने वियतकाँग छापामारों के विरुद्ध किया था और उन्हें भारी संख्या में हताहत किया था।

रूस में भी विषैली गैस के बड़े−बड़े संयंत्र लगे हैं। द्वितीय महायुद्ध के बाद टावन गैस बनाने को जर्मनी मशीनें रूस चली गई थीं और उसी के सिद्धान्त पर नये कारखाने वहाँ खड़े किये गये हैं। छोटे हथगोलों से लेकर प्रक्षेपणास्त्रों से छोड़े जाने वाले विशालकाय बमों तक जहरीली गैसों से भरकर बनाये गये हैं।

अब तक इन गैसों का कितनी जगह प्रयोग हो चुका है—वियतनाम में हजारों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। लाखों यहूदियों को बन्द कमरों में दम घोटकर मारा गया है। यमन में मिश्र वालों ने इसका प्रयोग किया था और दो हजार मनुष्य मारे थे।

अमेरिका में कीटाणु युद्ध की प्रयोगशालाएँ ‘प्रूविंण्ग्राण्डस’ कहलाती हैं। वे फ्लोरिडा के एलगिन पर और कैलीफोर्निया के चीनालेक पर बनी हैं। उन क्षेत्रों में सेना के अधिकारी यह प्रयोग करते रहते हैं कि जल थल और नम के क्षेत्रों में किस प्रकार कीटाणु युद्ध लड़ा जा सकता है। आक्रमण करने और बचने का बेहतर तरीका क्या हो सकता है।

महामारियाँ फैलाने वाले कीटाणुओं का उत्पादन, संग्रह और प्रयोग किस प्रकार हो सकता है इसकी शोध करने में अमेरिका के 70 विश्व विद्यालयों में सुसम्पन्न प्रयोगशालाएँ लगाई गई हैं।

जीव विषों की शृंखला में एक के बाद एक प्रबल कड़ी जुड़ती चली जा रही है। ड्रक्सले (प्रलय कीट) बम पहले से ही बहुचर्चित है। उसके परिवार में एन्थ्रेक्स डडडड, बाटुलस्क, दुलरिमिया, राकी माउन्टेन, सिट्ठोकोसिस, रिफ्टवैली, एन्सफेलो मायटिटिस आदि और भी जीवाणु रसायन सम्मिलित हो गये है। इनके सहारे मनुष्यों और पशुओं में तरह−तरह की ऐसी महामारियाँ फैलाई जा सकती है जो सैकड़ों मील की भूमि को जीवधारियों से रहित बना दें। तेज बुखार, बेहोशी पेचिश, उल्टी, प्लेग, पक्षाघात, हैजा, निमोनिया, दर्द टाइफाइड, जैसी बीमारियाँ इतनी द्रुत गति से और इतने आवेश से फैलती है कि डाक्टर और अस्पताल कुछ भी कर सकने में प्रायः असमर्थ ही रहते है। पीड़ितों को बुरी तरह दिनों तक कराहते हुए दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में मरना पड़ना है। यह मौत गोली लगने से महँगी पड़ती है। छूत के भय से कुटुम्बी या पड़ोसी भी रोगी को असहाय छोड़ देते है। जीवाणु आक्रमणों में आक्रांत रोगियों में से 62 प्रतिशत तो तीन दिन के भीतर ही मर जाते है शेष 35 प्रतिशत एक महीना तक खींच ले जाते है। जो बच भी रहे वे अपंग असमर्थ और पीड़ितों व्यथित रहकर ही मौत के दिन पूरे करते हैं।

द्वितीय महायुद्ध के दिनों ब्रिटेन ने स्काटलैंड के समीप के छोटे द्वीप गुइनार्ड पर ‘एन्थ्रेक्स’ नामक विषाणु प्रयोग परीक्षण के लिए छिड़के थे। उस बात को लगभग 30 वर्ष हो चले पर अभी भी वह द्वीप उन कीटाणुओं से आक्रान्त है। अभी अगले सौ वर्ष तक उस क्षेत्र के उन कीटाणुओं से मुक्त होने की सम्भावना नहीं है। तब तक कोई प्राणधारी वहाँ जीवित न रह सकेगा।

ब्रिटिश विज्ञान शास्त्री गार्डरैटरे टैलर ने अपनी पुस्तक ‘द वायलाजिकल टाइम बम’ पुस्तक में कीटाणु युद्ध की विभीषिकाओं का दिग्दर्शन कराते हुए लिखा है कि अब इन आयुधों के प्रहार से यह सम्भव हो गया है कि किसी देश को शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्थायी तौर से दुर्लभ बना कर शताब्दियों तक पराधीन रखा जा सके। यह कितनी चिन्ताजनक, दयनीय और अमानवीय स्थिति होगी। अमेरिका कृ मि विज्ञानी साल्वेडोर लूरिया ने यह आशंका व्यक्त की है कि अब सिर फिर राजनेता ही नहीं—सामान्य रसायन वेत्ता भी किसी देश अथवा समस्त विश्व को बर्बाद करने की शक्ति से सुसज्जित हो गये है। इससे सार्वभौम विनाश को रोक सकना और भी अधिक जटिल हो गया है।

‘वी आल फाल डाउन’ पुस्तक में अणु युद्ध और जीवाणु युद्ध की विस्तृत तुलना की गई है और बताया गया है कि अणु आयुधों की अपेक्षा विष आयुध अधिक सस्ते अधिक प्रभावशाली है। अणु प्रहार से किसी क्षेत्र लाभ नहीं उठा सकता। इसके विपरीत रासायनिक युद्ध में केवल जीवधारी मरंगें और उस क्षेत्र की सम्पदा को आक्रमणकारी हस्तगत कर सकेगा। अणु आयुधों का निर्माण बहुत जटिल और खर्चीला है उस पर सम्पन्न देशों का ही अधिकार रहेगा पर रासायनिक आयुध छोटे और गरीब देश भी कम खर्च में बना सकते है। इस प्रकार छोटे देश भी अपने ढंग कि इन सन्ते हाइड्रोजन बमों से सुसज्जित हो जायेंगे और आत्मघात पर उतर आये तो शत्रु देश का ही नहीं सारे विश्व का विनाश कर सकते है।

इनके प्रयोग के दूर मारक प्रक्षेपणास्त्रों की भी जरूरत नहीं है। एक आदमी छोटी अटैची में रख कर कहीं चला जाय और चुपके से जीवाणुओं को हवा का रुख देखकर छोड़ दें तो सुविस्तृत क्षेत्र को लुञ्ज−पुञ्ज बनाकर रख देगा।’वाशिंगटन विश्व विद्यालय के कीटाणु महा निर्देशक डा. वेरी कामनगर ने कहा है कि जीवाणु आयुधों की तुलना में अणु आयुध बच्चों के खिलौने जैसे रह गये है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष डा. ब्रोक चिशोल्य ने कहा था— विषाणु दैत्य का प्रयोग चौराहे की भीड़ के हाथ में चला जाने से अब विश्व विनाश का खतरा और भी अधिक व्यापक बन गया है।

परमाणु बम, हाइड्रोजन बम की विभीषिका अपने स्थान पर जहाँ की तहाँ है। इस महाविनाश के दैत्यों में रासायनिक गैसें और कीटाणु आयुध और सम्मिलित हो गये है। बेचारी मानवी सभ्यता संव्यस्त है कि इस बुद्धिवादी प्रगति से अपनी प्राण रक्षा के लिए वह क्या करें? क्या न करें?


Quotation

हर व्यक्ति उपभोक्ता है, इसलिए उसे उत्पादक भी होना चाहिए।


रीति शक्ति का उपयोग और दीर्घ जीवन

अन्य ग्रहों की यात्रा के अनुसंधान कार्य में जहाँ नये−नये उपकरण, नई−नई जानकारियाँ प्रकाश में आई वहाँ एक बड़ा लाभ मनुष्य के शरीर स्वास्थ्य के गहन अध्ययन और मनुष्य शरीर को रोगों से बुढ़ापे से और प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों से बचाये रखने के लिए नये−नये आश्चर्यजनक अनुसंधान प्रकाश में आये और इन नई शोधों से मनुष्य जीवन की सौ वर्षीय अवधि को बढ़ाकर न केवल जाना सम्भव हो गया।

बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं का, विषाणुओं का भय अब साल दो साल का ही रहा है, विकिरण के दुष्प्रभाव से अब जो पोशाकें पहनी जाया करेंगी वह बचा देगी, भोजन कोई समस्या नहीं है। वैज्ञानिक परीक्षण कर रहें है एक दिन आयेगा जब पृथ्वी पर जाने वाली मनुष्य जाति अपने ही उच्छिष्ट का उपयोग जीवन धारण के लिए कर लिया करेगी। यह भी सम्भव है कि बहुत स्वल्पाहार वर्षों तक के भोजन की आवश्यकता पूरी कर दिया करें। दीर्घजीवन और अमरत्व के लिए जीवित कोषों की सुरक्षा भर की समस्या थी उसे अब “क्रियोजेनिक्स” विज्ञान (शीत विज्ञान)ने हल कर दिया। ऊपर जिस प्रयोग की चर्चा की गई है वह “क्रियोजेनिक्स” का ही चमत्कार है।

इससे पूर्व कि इस तरह के प्रयोगों की ओर अधिक चर्चा करें इस “क्रियोजेनिक्स” विज्ञान को समझ लेना चाहिए। यह विज्ञान है अति शीत अवस्था में वस्तुओं का “रूपांतरण” और सुरक्षित स्थायित्व(प्रियर्वेशन)। पानी जिस तापक्रम पर जमकर बर्फ बन जाता है उसे शून्य डिग्री कहते हैं उस शून्य से नीचे भी यदि ताप को गिराते चलें जायें और माइनस 273 अंश(अर्थात् शून्य से भी 273 अंश) नीचे गिरा दें इसे अति शीत अवस्था कहेंगे इस अवस्था में आक्सीजन, नाइट्रोजन तथा हाइड्रोजन जैसी गैसें भी तरल अवस्था में आ जाती है। अन्तिम शीतावस्था 4597 अंश की है और इस अवस्था में तो पदार्थों की परमाणविक क्रियायें ही रुक जाती है उस रुकी हुई स्थिति में एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ तक में अर्थात् तांबे को सोने, सोने को प्लैटिना में बदलना सम्भव हो जाता है।

इस परम शीत अवस्था में यदि नाइट्रोजन को तरल कर लिया जाये और उस पर रक्त को सुरक्षित रखा जाये तो वह रक्त थक्का बनने से पहले ही जम जायेगा और उसे कितने ही वर्षों को सुरक्षित रखा जाना सम्भव हो जायेगा। इस अवस्था में जीवित कोषों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचता। हिमालय के 25000 फुट से भी ऊँचे से भी ऊँचे के कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ इतनी शीत रहती है वहाँ कई स्थानों पर भालू बर्फ के नीचे दब जाते है और 6 महीने बर्फ के नीचे दबे रहते हैं। जब गर्मियां आती है और उनके ऊपर की बर्फ पिघल कर बह जाती है तो वे फिर जीवित हो जाते हैं। हिमालय में अनेक अमर आत्माओं का वास बताया जाता है वह प्राणों की ऊष्मा और अति शीत अवस्था में जीवित कोषों के सुरक्षित बनें रहने के समन्वय का ही फल है। यह केवल योगी के लिए ही सम्भव का ही फल है। यह केवल योगी के लिए ही सम्भव होता है पर प्राण−विद्या की योगसाधना हर किसी के लिए सम्भव है और भारतवर्ष में इसी विद्या के बल पर कभी लोगों ने हजारों वर्ष से अधिक की आयु पाई हो तो इसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। आज वह सम्भावनायें प्रायोगिक तौर पर सत्य हो रही हैं।

लेनिनग्राड (रूस) के वैज्ञानिक डा. एल लोजिनलोजिनस्की ने 1964 में यह प्रयोग मक्के के कुछ कीटाणुओं पर किया। उन्होंने परम शून्य डिग्री से कुल 4 अंश ऊपर 269 अंश सेन्टीग्रेड पर हीलियम को तरल बनाकर इन मृत कीटों का क्रमशः डडडड प्रदान की गई तो 20 कीटों में से 13 फिर से जीवित हो गये। प. जर्मनी के वैज्ञानिक ने नाइट्रोजन को द्रव बनाकर उसमें मेंढकों को डुबा दिया और उन्हें काफी समय तक डूबा रहने दिया गया पीछे उन्हें भी गर्मी प्रदान की गई जिससे वे फिर जीवित हो गये। अमेरिका वैज्ञानिक ने एक स्टरलेट को इस स्थिति में लगातार चार दिन तक मृत अवस्था में रखकर जिन्दा कर दिया। 5 मछलियों को लगातार 25 घण्टे तक परम शून्य स्थिति में रखकर जिन्दा करके यह सिद्ध कर दिया गया कि शरीर एक अवस्था में यथावत स्थिति में रखा जा सकता है यदि प्राण क्षुब्ध न हों तो शरीर धारी को निद्रा जैसी स्थिति में रखकर पुनः जीवित कर देना एक सामान्य बात है।

सबसे आश्चर्यजनक प्रयोग था सोवियत वैज्ञानिक कोप्तरेव का उन्होंने 25000 वर्ष पूर्व हुए एक हिमायत के समय दबे हुए कुछ जल कीट जिन्हें डाफनियाँ कहा जाता है को निकाल कर उन्हें क्रमिक गर्मी देकर फिर से जीवित कर यह सिद्ध कर दिया कि पुराणों में जो हजारों वर्षों की डडडड का उल्लेख है वह विज्ञान की सीमा के अंतर्गत है कलाप−कल्पना नहीं। प्राणों को शरीर में सुरक्षित बनायें रखने और शरीर को वाह्य−वातावरण से बचाये रखने की जा सकें तो मनुष्य प्रस्तुतः अवस्था में नहीं चेतना अवस्था में ही हजारों वर्ष का जीवन जी सकता है और अब वह समय आ भी समीप गया है जब लोगों की आयु पुराण काल के लोगों की तरह लम्बी होगी। तब मुख्य समस्या रोगों से बचाव और दैनिक जीवन व्यापार की नहीं होगी वरन् यह होगी कि इतनी लम्बी आयु आखिर काटी कैसे जाये?

अमरत्व भले ही अभी आत्मा की चेतना तक सीमित माना जाय पर शरीर को अधिकाधिक समय तक जीवित रह सकने वाला बनाया जा सकता है। यदि दुष्ट दुरुपयोग से इस दीर्घजीवन को अभिशाप बनाया जाय तो बात दूसरी है अन्यथा उसके सदुपयोग की बात सामने हो तो मानव जीवन के महान अनुदान का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है और उसके परमार्थ प्रयोग द्वारा संसार का

शीत की शक्ति का उपयोग करके मनुष्य पुराण काल में वर्णित आश्चर्यजनक उपलब्धियों के करतल गत किया जा सकता है। वैज्ञानिक प्रगति के साथ−साथ मनुष्य अपनी सत्ता फिर पुराण पुरुष के रूप में प्रकट सकता है, तब वह अर्जुन की तरह इन्द्रलोक जाकर विद्या पढ़ेगा। मेघनाथ की तरह अन्य ग्रहों में जाकर वहाँ के राज्य जीता करेगा। त्रिशंकु की तरह किसी 10-20 मील व्यास वाले किसी क्षुद्र ग्रह में बैठ कर ब्रह्माण्ड के नजारे देखा करेगा। लम्बी आयु इसी में खपेगी। बुध की यात्रा 210 दिन में होती है, शुक्र जाने के लिए 262 दिन चाहिए। इतने दिन जानें में इतने ही दिन आने में लगेंगे तो आखिर वहाँ 10-20 वर्ष तो घूमना ही चाहिए मंगल की यात्रा 518 दिन में सम्भव है तो बृहस्पतिवार और शनि की क्रमशः

शीत की शक्ति का उपयोग करके मनुष्य पुराण काल में वर्णित आश्चर्यजनक उपलब्धियों के करतल गत किया जा सकता है। वैज्ञानिक प्रगति के साथ−साथ मनुष्य अपनी सत्ता फिर पुराण पुरुष के रूप में प्रकट सकता है, तब वह अर्जुन की तरह इन्द्रलोक जाकर विद्या पढ़ेगा। मेघनाथ की तरह अन्य ग्रहों में जाकर वहाँ के राज्य जीता करेगा। त्रिशंकु की तरह किसी 10-20 मील व्यास वाले किसी क्षुद्र ग्रह में बैठ कर ब्रह्माण्ड के नजारे देखा करेगा। लम्बी आयु इसी में खपेगी। बुध की यात्रा 210 दिन में होती है, शुक्र जाने के लिए 262 दिन चाहिए। इतने दिन जानें में इतने ही दिन आने में लगेंगे तो आखिर वहाँ 10-20 वर्ष तो घूमना ही चाहिए मंगल की यात्रा 518 दिन में सम्भव है तो बृहस्पतिवार और शनि की क्रमशः


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मनुष्य उसी काम को ठीक तरह कर सकता है—उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है—जिसकी सफलता में उसका सच्चा विश्वास है।

—स्वेट मार्टेन


भीतरी का खोखलापन और सड़ी जडे

दो पेड़ एक ही क्षेत्र में उगे हुए थे। एक बहुत विशालकाय था—दूसरा मामूली और छोटा था। दोनों की तुलना करने पर सहज ही बड़े वाला गौरवशाली प्रतीत होता था।

एक दिन अन्धड़ का तूफान आया। उसने उस क्षेत्र के अनेकों पेड़ उखाड़ दिये? कितनों की ही शाखाएँ तोड़ कर धराशायी कर दी। अंधड़ की इस तोड़−फोड़ का शिकार वह विशालकाय वृक्ष सबसे पहले हुआ जो देखने में सबसे ऊँचा था और सुविस्तृत भी। इतने पर भी कितने ही मामूली पेड़ अपनी जगह यथास्थान खड़े थे। तूफान उन्हें कुछ भी क्षति नहीं पहुँचा सका।

बड़ा पेड़ धराशायी हो गया और उसके पास ही खड़ा सामान्य वृक्ष बिना तनिक भी क्षति−ग्रस्त हुए यथावत खड़ा रहा दर्शकों ने इस आश्चर्य को देखा और रहस्य भरें कारण को तलाश करने का प्रयत्न किया।

गहराई से खोज बीन करने पर पता चला कि सुविस्तृत दीखने वाला पेड़ भीतर ही भीतर खोखला हो गया था और उसकी जड़े सड़ गल गई थीं। इसके विपरीत छोटे पेड़ की ऊँचाई तो कम थी पर उसकी मोटी और मजबूत जड़े काफी गहराई तक जमीन में घुस गई थीं और अपनी खुराक समेटने में मुस्तैदी के साथ लगी हुई थीं।

आँधी तूफान आते ही रहे है और आते ही रहेंगे। प्रिय और अनुकूल परिस्थितियाँ आजीवन बनी रहें—कभी दुख भरे क्षति के अवसर सामने न आयें ऐसा हो ही नहीं सकता। जीवन दुख और सुख के हानि और लाभ के ताने बाने से बुना है। धूप छाँह की तरह अभी अनुकूल अभी प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और चली जाती है। इस संसार में सब कुछ अस्थिर है—हर चीज बदल रही हैं। जन्म और मरण का चक्र अनवरत गति से चल रहा है। प्रिय के बाद अप्रिय के बाद प्रिय का चक्र अपनी धुरी पर बना किसी के सुख दुख की प्रतीक्षा किये घूमता ही रहता है, उसे रोका नहीं जा सकता। सदा सुखद परिस्थितियाँ बनी ही रहें— यह आशा करना व्यर्थ है। गतिशील जगत को यथास्थिति बनें रहने की अगति में बाँधे रह सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। परिवर्तन की प्रक्रिया किसी के बूते भी रुकी नहीं है— कोई उसे रोक भी न सकेगा।

जो भीतर से खोखले है वे बाहर से वैभवशाली दीखते हुए भी दुर्बल हैं। उन्हें जरा−सी प्रतिकूलता तोड़ मरोड़ कर रख देती है। उन्हें उखड़ते और धराशायी होते देर नहीं लगती। इसके विपरीत जिनकी जड़े गहरी है जिनने अपने आपको इस संसार सागर में निरन्तर उठते रहने वाले ज्वार−भाटों की सन्तुलित मति से देखना सीखा है वे ही समुद्र तट पर बैठ कर उछलती, उमड़ती लहरों का आनन्द लेते हैं। मजबूत पकड़ उन्हीं को होती है और परिस्थितियों का सामना करने में वे ही समर्थ होते हैं। सम्पत्ति की भाँति विपत्ति भी क्षणिक ही होती है। विपन्नता के बाद भी सम्पन्नता की नई दिशा मिलती है भले ही वह पहले जैसी परिस्थितियों से भिन्न प्रकार की हो।

जिसने सम्पन्नता की तरह विपन्नता का भी स्वागत कर सकने का—उनसे निपटने का मनोबल एकत्रित किया है उसकी जड़े गहरी हैं। अन्धड़ आते और जाते रहते है पर उसे तोड़ नहीं पाते। इसके विपरीत बाहरी वैभव की विशालता निरर्थक सिद्ध होती है यदि भीतर खोखलापन घुस पड़ा हो और आशा भरी साहसिकता की जड़े गल गई हों तो एक ही आघात में उखड़ कर धराशायी होना निश्चित है। बाहरी दुनिया की जानकारी चाहे कितनी ही अधिक क्यों न प्राप्त करली जाय पर अपने सम्बन्ध में आवश्यक ज्ञान प्राप्त किये बिना वह बहुत कुछ जानना भी अधूरा रहेगा। यह ठीक है कि हमें साँसारिक वस्तुओं तथा परिस्थितियों से पाला पड़ता है और उनके सहारे प्रगति अवनति का आधार बनता है—इसलिए दुनिया की जानकारी अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करना आवश्यक है। यह भी ठीक है कि संपर्क में आने वाले और विविध सूत्रों से अपने जीवन−क्रम में जुड़ें हुए व्यक्ति हमें असाधारण रूप से प्रभावित करते है—उनकी गतिविधियों का अपनी प्रसन्नता अप्रसन्नता के साथ सघन सम्बन्ध रहता है इसलिए उनके सम्बन्ध में ध्यान देना एवं व्यवस्था बनाना आवश्यक है। पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का सही तरह निर्वाह किया जा सके, इसलिए लोक व्यवहार की जानकारी संग्रह की जानी चाहिए।

यह दोनों ही बातें आवश्यक हैं। इसलिए उनसे सम्बन्धित जानकारियाँ बढ़ाने और परिस्थितियों के साथ सफलता पूर्वक निपटने के साधन जुटाने में निरत रहना भी आवश्यक है। साँसारिक ज्ञान की उपयोगिता सर्वमान्य है। स्कूल कालेजों से लेकर सभा गोष्ठियों तक विविध विधि क्रिया−कलाप इस प्रयोजन के लिए चलते हैं। साहित्य सृजन और प्रचार तन्त्र इसी निमित्त खड़े किये जाते हैं विचार विनिमय परामर्श और भावनात्मक आदान−प्रदान के लिए लेखन और वाणी के उपयोग अनेक होंगी उतनी ही बुद्धि प्रखर होगी और प्रतिभा निखरेगी। सफलताओं की दिशा में इन्हीं साधनों के सहारे ही तो आगे बढ़ा का जाता है।

इतना सब होते हुए भी यदि अपने सम्बन्ध में अभीष्ट ज्ञान प्राप्त न किया जा सका तो समझना चाहिए कि संसार में सम्बन्धित सुविस्तृत ज्ञान अपूर्ण और अपंग रह गया। अपने सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने का तात्पर्य है आत्म−ज्ञान। मोटी जानकारियाँ तो अपने सम्बन्ध में सभी को होती हैं। नाम, पता, वंश, स्वास्थ्य, शिक्षा, धन, परिवार, पद आदि के सम्बन्ध में पूछने पर कोई भी व्यक्ति आसानी से अपना परिचय दे सकता है पर यह तो बहिरंग परिचय हुआ। भौतिक जानकारी रही। आत्मज्ञान का तात्पर्य इससे गहरा है। अपनी सत्ता का तात्विक स्वरूप—जीवन का लक्ष्य—अन्तः चेतना की गरिमा—इच्छा और संकल्प शक्ति का महत्व—आदतों एवं आस्थाओं की प्रतिक्रिया आदि कितनी ही जानकारियाँ ऐसी है जिन्हें यदि ठीक तरह हृदयंगम न किया जाय तो व्यक्तित्व का विकास सम्भव न हो सकेगा। प्रस्तुत समस्याओं का हल न निकाला जा सकेगा और कोई कहने लायक जीवन—लाभ भी उपलब्ध न किया जा सकेगा। अपूर्ण और अविकसित—विपन्न और उलझे टूटे हुए व्यक्ति प्रायः वही होते हैं जिन्हें अपनी आन्तरिक विशेषताओं और क्षमताओं के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी से वंचित रहना पड़ा।

चुम्बक लौह कणों को खींचकर अपने इर्द−गिर्द इकट्ठा कर लेता है। मनुष्य का आन्तरिक व्यक्तित्व ऐसा अद्भुत चुम्बक है कि सजातीय परिस्थितियों एवं व्यक्तियों को अनायास ही अपने निकट जमा कर लेता है। भली या बुरी परिस्थितियाँ अनायास ही कहीं से नहीं टपक पड़ती। मनुष्य की निज की जैसी भी स्थिति होती है उसी के अनुरूप समस्त परिकर धीरे−धीरे बनता रहता है और उनका एकत्रीकरण विशिष्ट परिस्थितियों के रूप में सामने आती है। जैसे भी कुछ हम होते है वस्तुतः वैसा बनने का बनाने का पूरा−पूरा उत्तरदायित्व अपना ही रहा होता है। व्यक्तियों तथा परिस्थितियों का योगदान तो उसमें नगण्य जितना ही रहता है।

मनुष्य जिस प्रकार—जिस दिशा में सोचता है—उसी प्रकार की उसकी जानकारी बढ़ती है और क्षमता विकसित होती है। संपर्क बनता है और साधन जुटते है। जो कुछ सोचा जाता रहेगा क्रमशः उसी दिशा में प्रगति होती जायगी। प्रगति की दिशा में सोचा जाय अथवा अवगति की दिशा में यह पूर्णतया अपने हाथ की बात है पर उस प्रतिफल से बचा नहीं जा सकता है। व्यक्ति कर्म करने में स्वतन्त्र है—हाँ फल प्राप्त करने में उसे नियति का पराधीन रहना पड़ता है। अशुभ चिन्तन करते रहें और समुन्नत परिस्थितियाँ प्राप्त हो जायँ यह नहीं हो सकता। यदि हेय स्तर के विचार मन में भरें रहेंगे तो कुकर्म करने की सुविधाएँ बढ़ती चलेगी और निकृष्ट स्तर का कर्तव्य दुखद दुष्परिणामों को दल−बल सहित सामने लाकर खड़ा कर देंगे। इस तथ्य को यदि ठीक तरह समझ लिया जाय तो जिस स्थिति में रहना या पहुँचना अभीष्ट हो उसी प्रकार के विचारों का संचय करने और निरन्तर मस्तिष्क में भरें रहने का सर्वप्रथम कदम बढ़ाना पड़ेगा। चिंतन की अवगति एवं अस्त-व्यस्तता को यदि देखा समझा न जायें उसमें सुधार परिवर्तन न किया जाय तो बाह्य क्षेत्र में भी अभीष्ट परिवर्तन सम्भव न होगा। जैसे विचार होते है वैसा जीवन का स्वरूप बनता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि जैसा बनता है उसी स्तर के विचारों की मनः क्षेत्र में स्थापना की जानी चाहिए।

विचारों के आधार पर क्रिया−कलाप की दिशा बनती है। दोनों के समन्वय से अभ्यास या स्वभाव बन जाता है। मन के रुझान को स्वभाव और शरीर के अभ्यास को आदत कहते हैं। स्वभाव और आदतों का नाम ही व्यक्तित्व है। विचारणाओं की असंख्य धाराएं इस संसार में बिखरी पड़ी हैं। वे एक दूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की है। उनमें से किन्हें अपनाया और किन्हें दूर रखा जाय यह निर्णय करना आस्थाओं का काम है। मूल मान्यताएँ इन्हीं को कहते हैं। हमें क्या बनना है —क्या करना है—क्या प्रिय है—क्या हितकर है जैसे महत्वपूर्ण निर्णय आस्थाओं के क्षेत्र में ही किये जाते हैं। बुद्धि इन निर्णयों का सहज समर्थन करने लगती है। उसका काम आस्थाओं के पक्ष में तर्क प्रमाण, उदाहरण आदि एकत्रित करके कुशल की तरह अपने ग्राहक का केस तैयार करना होता है। बुद्धि के निर्णय स्वतन्त्र नहीं होते, उनके पीछे संचित आस्थाओं के साथ पूरा−पूरा पक्षपात जुड़ा रहता हैं। निष्पक्ष चिन्तन कर सकने वाले तत्वदर्शी विवेकवान तो कोई विरले ही होते हैं।

हमें क्या बनना है—क्या प्राप्त करना है यह निष्कर्ष आस्थाएँ ही प्रस्तुत करती हैं। इस निर्णय को कार्यान्वित करने के लिए पहले मस्तिष्कीय शक्तियाँ आगे आती है इसके बाद शरीर की हलचलें भी उसी दिशा में चल पड़ती है सबको समान वस्तुएँ या समान परिस्थितियाँ प्रिय नहीं होती। लोगों की अभिरुचियों में जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। वह दूसरे को फूटी आँखों भी नहीं सुहाता। यह अन्तर पूर्णतया स्वनिर्मित है। भले ही हम उसे आगत या दैव प्रदत्त मानें। वस्तुतः प्रकृति प्रदत्त मूलभूत प्रवृत्ति शरीर रक्षा के मोटे प्रयोजन पूरे करने तक ही सीमित है। व्यक्तित्व को ढालने और उसे दिशा देने का काम पूरी तरह अपनी चेतना ही करती है। इस मर्मस्थल को सही रूप से समझा जा सके और उसे अवांछनीयता से हटा कर दूरगामी श्रेय साधना में लगाया जा सके तो समझना चाहिए कि आत्मज्ञान और आत्मबल की प्रखरता सिद्ध हो गई।

आमतौर से लोग बाह्य परिस्थितियों को ही प्रगति अवगति का—सुख दुख का कारण मानते हैं। इसलिए बाह्य साधनों को तलाशते अथवा मनुष्यों या देवताओं के अनुग्रह की याचना करते रहते है। असफलताओं या कठिनाइयाँ आती है तो भी ये किसी कारणों को अथवा व्यक्तियों को दोषी ठहराते है। सस्ते छूटने के लिए बेचारे ग्रह नक्षत्रों को—अथवा भाग्य प्रारब्ध को दोषी ठहरा कर सन्तोष कर लेते हैं। घटना क्रम गुजर चुका हो और जो हो चुका उसे बदला न जा सकता हो तो भाग्य प्रारब्ध की बात करना मन समझाने की दृष्टि से बुरा नहीं है। पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं। किसी का भी भाग्य पूर्व निश्चित नहीं है। प्रयत्नों और परिस्थितियों के आधार पर पूर्व कल्पनाओं, सम्भावनाओं आशंकाओं एवं योजनाओं में जमीन आसमान जैसा अन्तर हो सकता है। प्रारब्ध की बात पर जार दिया जाय जो वह भी पूर्व कृत कर्मों का प्रतिफल ही ठहरता है। ताजी या बासी का विवाद भर ही पुरुषार्थ और प्रारब्ध का झंझट है। कल के पुरुषार्थ को आज का प्रारब्ध परिपाक मानना पड़ता है। प्रारब्ध भी तो हम स्वयं ही बनाते हैं।

प्रस्तुत परिस्थितियों से छुटकारा और अभीष्ट आकाँक्षाओं का आधार निर्माण यह दोनों का कार्य हम सरलता पूर्वक स्वयं ही सम्पन्न कर सकते है। इसके लिए करना इतना भार पड़ेगा कि आत्म निरीक्षण की गहराई में उतरें-अपनी आस्थाओं और अभिरुचियों को टटोले—विचार प्रवाह की समीक्षा करे और आदतों का विश्लेषण करने में सूक्ष्म बुद्धि के सहारे जुट जायें। यह आत्म समीक्षा जितनी ही प्रखर होगी उतनी ही सरलता पूर्वक यह समझ में आ जायगा कि प्रस्तुत अवगति के मूलकारण अन्तः क्षेत्र में क्या-क्या हैं—और उन्हें किस प्रकार बदला—सुधारा जा सकता है। अन्तः प्रदेश को सुधारने और बदलने में यदि सफलता मिल सके तो समझना चाहिए कि भविष्य में जो कुछ बनने की आकाँक्षा है उसके लिए रुका हुआ मार्ग खुल गया और प्रगति की संभावना सुनिश्चित हो गई।

भौतिकवाद का अर्थ है सुख साधनों को बाहर खोजना और उसके लिए साधन जुटाना। अध्यात्मवाद का तात्पर्य है अभीष्ट प्रयोजन के लिए आन्तरिक क्षमताओं को विकसित एवं व्यवस्थित बनाना। यदि भौतिक प्रगति ही लक्ष्य हो तो भी यह आवश्यक है कि उसके लिए मान्यताओं, विचारणाओं एवं आदतों को तदनुरूप ढाला जाय। प्रगति की दिशा कुछ भी क्यों न हो सफलता इसी आधार पर मिलेगी। ऊपर से थोपी हुई मात्र समेटे हुए साधनों के आधार पर प्राप्त की गई सफलता न तो स्थिर रहेगी और न लाभदायक सिद्ध होगी। दूसरों के सहारे या आकस्मिक कारणों से यदि कुछ सफलता मिल भी जाय तो उससे दूरगामी प्रगति का आधार नहीं बनता और न आत्म सन्तोष का गर्व गौरव भरा आनन्द ही उपलब्ध होता है।

उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन ढालने—महामानव की भूमिका में विकसित होने—एवं अध्यात्म लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सर्व प्रथम साधना, अपनी आस्थाओं—विचारणाओं और आदतों को उसी स्तर का विनिर्मित करना पढ़ता है। कदाचित वैसा लक्ष्य न हो और भौतिक सफलताएँ ही प्राप्त करने तक बात सीमित रखी जानी है तो भी सफल मनोरथ मनस्वी पुरुषार्थी व्यक्तियों के व्यक्तित्व का गहन पर्यवेक्षण करते हुए हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि जा बनना हो उसके अनुरूप आवश्यक है। सफलताएँ चाहे आत्मिक हों चाहें भौतिक, उनके लिए गुण, कर्म, स्वभाव की अनुकूलता का होना अनिवार्य हैं।

वाह्य जगत की जानकारियाँ अधिकाधिक मात्रा में एकत्रित करते रहने में कुछ हर्ज नहीं पर उस ज्ञान के उपार्जन में भी दत्त-चित्त रहना चाहिए कि व्यक्तित्व का विकास ही सर्वतोमुखी प्रगति का केन्द्रबिन्दु है। इसलिए आत्म ज्ञान का गहनतम अनुशीलन होना चाहिए। अवाँछनीय मान्यताएँ एवं आस्थाएँ तो अन्तः स्थल में नहीं जमी बैठी हैं इन्हें परखना चाहिए और बुद्धि को यथार्थवादी समीक्षा कर सकने योग्य बनाना चाहिए। जो इतना कर सकेगा उसके लिए यह भी सम्भव होगा कि अभीष्ट प्रयोजन के लिए आवश्यक क्षमता उत्पन्न करने के लिए मनोयोग पूर्वक जुट जायें और जिन अयोग्यताओं एवं अभावों के कारण मार्ग अवरुद्ध पड़ा था उस व्यवधान का सरलता की किसी दिशा में बढ़ चलने का द्वार खोलता है। यह उपलब्धि आत्म ज्ञान के आधार पर ही प्राप्त की जाती है। इसलिए हमारी उपलब्धियों में उसे प्रथम स्थान की विभूति का स्थान दिया जाना चाहिए।


Quotation

भरोसा रखो कि वह जो एकान्त में तुम्हारी गलतियाँ बताये, तुम्हारा मित्र है, क्योंकि बदले में वह तुम्हारी अरुचि और घृणा पाने का खतरा उठाता है। कुछ ही लोग हैं जो अपनी बुराई कह सकते हैं, हर आदमी अपनी अधिकतर प्रशंसा में ही आनन्द पाता है और यह उन कमजोरियों में से हैं, जो सारी मानव जाति में है।


सौंदर्य की कुँजी अपनी हाथ में है

सुन्दरता अथवा कुरूपता शरीर की बनावट या चमड़ी के रंग तक सीमित नहीं है वरन् उसका सीधा सम्बन्ध दृष्टिकोण से है। सौंदर्य एवं कुरूपता की परख करनी हो तो किसी मनुष्य के दृष्टिकोण को देखकर ही करनी चाहिए।

आलसी और अवसादग्रस्त व्यक्ति कुरूपता का प्रतिनिधि है वह अपनी प्रकृति-प्रदत्त सुन्दर आकृति को भी इस बेतरह अस्त-व्यस्त रखेगा कि देखने वाले का उसमें घिनौनापन टपकता हुआ प्रतीत हो। आँख, नाक, कान, मुख आदि से जो श्लेप्मा निरन्तर निस्सृत होती रहती है, यदि उसे सही रूप से बार साफ करते रहने का ध्यान न रखा जाय तो जमता हुआ नितान्त घृणास्पद और दुर्गन्ध युक्त बन जायगा और उस व्यक्ति के पास बैठने को भी जी न करेगा। चमड़ी का रग सफेद और आकृति वह सुन्दरता होते हुए भी आलस्य, उपेक्षा और अस्त व्यस्तता का आचरण सारी स्थिति उलट देगा और प्रकृति-प्रदत्त सुन्दरता सहज ही कुरूपता में बदल जायगी।

इसके विपरीत कई व्यक्ति रंग एवं आकृति की दृष्टि से वैसे नहीं होते जिन्हें प्रचलित सौंदर्य मान्यता की कसौटी पर प्राथमिकता मिल सके, फिर भी वे बड़े करीने के होते है। हर अंग को स्वच्छ रखते हैं। वस्त्र सस्ते कम या फटे पुराने हों उन्हें धोकर सींकर, करीने के साथ इस प्रकार पहनते हैं मानों प्रकृति ने उन्हें सुरुचि की सम्पदा समुचित मात्रा में जन्मजात उपहार की तरह प्रदान की हो। उत्साह उनके चेहरे से टपकता है। व्यवस्था बुद्धि का दर्शन उनकी करती हैं। चलने-फिरने, उठने-बैठने एवं बोलने-बात करने से लेकर सामान्य क्रिया कृत्यों में सुसंस्कारिता टपकती है और प्रतीत होता है कि अपनी स्थिति मानवी गौरव के अनुरूप बनाये रखने का समुचित ध्यान रखा जा रहा है ऐसे व्यक्ति आकृति में आकर्षण न रहने पर भी अपनी गरिमा व्यक्त करते हैं और उनका व्यक्तित्व संपर्क में आने वालों पर छा गया प्रतीत होता है।

दार्शनिक सुकरात का काला कलूटापन प्रख्यात है, पर इससे उनके व्यक्तित्व की गरिमा घटने की कोई बात नहीं बनी। ऋषि अष्टावक्र का शरीर आठ जगह से मुड़ा-तुड़ा काना कुबड़ा था इस पर भी जनक प्रभृति गुण ग्राही उनका मूर्धन्य मान करते थे। द्रौपदी का एक नाम कृष्णा भी है। कृष्णा का अर्थ है काली कलूटी। इस पर भी पाँचों पाँडवों पर उसका शासन चलता था अपनी गुण गरिमा के कारण उनका वर्चस्व इतना विकसित था कि उसका प्रभाव पाण्डव परिवार के सभी सदस्यों को स्वीकार करना पड़ता था।

प्रकृति-प्रदत्त सुन्दरता की घटाना बढ़ाना यत्किंचित ही संभव हो सकता है। किन्तु दृष्टिकोण से सौंदर्य का समावेश करके कुरूप से कुरूप व्यक्ति भी अपनी सुन्दरता को मूर्धन्य स्तर तक पहुँचा सकता है। स्वच्छता, शालीनता, सुव्यवस्था का यदि समुचित ध्यान रहे और चेहरे पर सन्तोष प्रसन्नता एवं स्नेह सद्भावना की मुसकराहट छाई रहे तो कुरूप से कुरूप आकृति वाला व्यक्ति भी इतना सुन्दर प्रतीत होगा कि उसे देखते-देखते किसी का भी जी न भरे। ऐसे व्यक्तियों का न केवल शरीर वरन् भाषण व्यवहार एवं व्यवस्था क्रम भी इतना मनोरम होता है कि शरीर गत कुरूपता की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। इस शालीनता के साक्षी उनके व्यवहार में आने वाले पदार्थ एवं उपकरण तक देते रहते है।

आकृति सुन्दर है या असुन्दर इस पर न तो किसी को गर्व करना चाहिए और न खिन्न होना चाहिए। हर किसी को समझ लेना चाहिए कि स्थिर एवं प्रभावशाली सौंदर्य की चाबी अपने ही हाथ में है जीवन-क्रम को सुसंस्कृत दृष्टिकोण के साथ सँजोया जा सके तो सुन्दरता हमारी अनुगामिनी बनकर रह सकती है।


और नारी में कोई छोटा बड़ा नहीं

नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। दोनों अधूरे पक्षों के मिलन से पूर्ण इकाई बनती है इसलिए गाड़ी के दो पहियों की तरह उन्हें परस्पर मिल −जुलकर ही चलना होता है स्नेह,सौजन्य और सद्भावना,सद्−व्यवहार के आधार पर ही मैत्री की नींव मजबूत होती है। विवाह बन्धन और परिवार निर्माण की प्रक्रिया इसी धुरी पर धूमती है।

नर−नारी सहयोग के लिए हथकंडों को काम में नहीं लिया जाना चाहिए। नारी को बार−बार सन्तानोत्पादन करना पड़ता है इसलिए वह बलिष्ठता की दृष्टि से स्वभावतः कुछ हलकी पड़ेगी। शिशु पालन एवं गृह व्यवस्था के दोनों उत्तरदायित्व इतने बड़े हैं कि उनका ठीक तरह भार सम्भालना उसी के लिए सम्भव हो सकता है जो अहर्निश उस कार्य में दत्त−चित्त होकर लगा रहे। नियति ने यह कार्य नारी के जिम्मे किया है। ऐसी दशा में उसे स्वतन्त्र उपार्जन के लिए अतिरिक्त अवकाश कहाँ से मिलेगा। चूँकि पुरुष शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत परिपुष्ट होता है और धन उपार्जन करता हैँ उसी से उसे अपने को ज्येष्ठ और नारी को कनिष्ठ नहीं मान लेना चाहिए। थोड़ी बारीकी से देखा जाय तो भावनात्मक −कोमलता,सरसता,गृह व्यवस्था और शिशु निर्माण का कार्य इतना महान है कि बलिष्ठता एवं उपार्जन क्षमता को उस पर निछावर किया जा सकता है।

सहयोग से रहें तो ठीक अन्यथा दोनों अपने आप में परस्पर पूर्ण भी हैं दबाव और आतंक के आधार पर बँधे हुए बन्धनों की अपेक्षा तो उनका एकाकीपन भी बुरा नहीं है। उनका पारस्परिक सहयोग हर दृष्टि से उपयोगी है पर यह सोचना नहीं चाहिए कि किसी का काम किसी के बिना रुक जायगा। यहाँ तक कि वे संतानोत्पत्ति की दृष्टि से भी किसी समय स्वावलंबी थे और समय पड़ने पर सृष्टि उत्पादन का क्रम वे एकाकी भी चला सकते है।

प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने ईसा के जन्मे से तीन सौ वर्ष यह कहा था कि −”स्त्री और पुरुष आरम्भ में एक ही व्यक्तित्व में समाये हुए थे। किन्तु देवताओं की क्रोधाग्नि ने उनको अलग−अलग कर दिया। तब से वे दोनों एक दूसरे के साथ पुनः सम्मिलित होने के लिए लालायित हैं”

प्रसिद्ध जीव विज्ञानी क्रयू ने कहा है कि प्लेटो के इस कथन से बढ़कर सुन्दर यौन आकर्षण की ओर कोई व्याख्या हो नहीं सकती।

मनुस्मृति के अध्याय 1 श्लोक 32 में कहा गया है− “विधाता ने अपनी देह को विभक्त करके आधे अंश से पुरुष का और आधे से स्त्री का सृजन किया “

महादेव शिव को अर्धनारीश्वर कहा गया है भगवान् कृष्ण को भी आधे शरीर से राधा आवे से कृष्णा का समन्वय बताया गया हैं और उसी तरह चित्रित भी किया गया है।

सृष्टिगत पदार्थों को ही नहीं जीवों को भी द्वंद्वात्मक माना गया है। यहाँ प्रत्येक वस्तु दोनों भाव पाये जाते है विधु त धारा तक श्रम और धन आवेशों के समन्वय से विनिर्मित है। हर पदार्थ या जीव का एक पक्ष नर है एक पक्ष नारी। परिस्थिति वश जब जो पक्ष उभर आता है तब उस प्रकार की संज्ञा मिल जाती है।

प्रजनन की समर्थता का विकास दो अति सूक्ष्म ग्रन्थियों के रूप में होता हैं जिन्हें सेक्स ग्लोन्डस अथवा गोन्डेस कहते है भ्रूण में इन्हीं के कारण लिंग भेद उत्पन्न होता है। नर में यह अण्डकोष बनाती है और स्त्री में डिंबाणु। इन ग्रन्थियों से होने वाले रस प्रवाह को ‘सेक्स हारमोन’ कहते हैं।

जीवधारी की देह में जो कोष है उनमें नर और नारी तत्व के विकसित होने की पूर्ण समानता और पूर्ण संभावना रहती है। उपरोक्त ग्रन्थियाँ और उनके प्रवाह द्रव ही लिंग भेद का आधार उत्पन्न करते हैं।

कुछ प्राणी ऐसे भी होते है जिनमें आधी देह स्त्री लक्षण युक्त होती है और आधी में पुरुष के लक्षण विकसित होते है। ऐसे प्राणियों को गाइनेन्ड्रामार्फ के गिना जाता है।

प्राणि−जगत में ऐसे दृष्टान्त हैं जिनमें नर और मादा अलग−अलग न रहकर एक ही व्यक्तित्व में समाये हुए रहते है। केंचुए आदि निम्न जीव इसी श्रेणी के है वे न नर हैं न नारी। भोग के समय वे स्त्री और पुरुष दोनों के रूपों व्यवहार करते है। इससे भी नीची श्रेणी के जीवों में अमैथुनी प्रजनन का क्रम प्रचलित है अमीबा बैक्टीरिया आदि इसी वर्ग में आते है, वे अपनी काया को विखंडित करके नई पीढ़ियाँ उत्पन्न करते रहते है।

ऐसे मुर्गियाँ होती हैं जो बिना नर संयोग के अण्डे देती है। यद्यपि उन अण्डों से बच्चे नहीं निकलते,पर ऐसे भी पक्षी है जो बिना संभोग के सन्तान उत्पन्न करते है। कई मछलियां तथा कीड़े भी इसी प्रकार के होते है।

तर्क शास्त्र की पुस्तक ‘न्याय कुसुमाञ्जलि’ में भी सृष्टि का आरम्भ अर्मथुनि प्रजनन के रूप में हुआ सिद्ध किया गया है।

आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रन्थ सुश्रुत में उल्लेख हैँ कि बिना पुरुष संस्पर्श के मातृ गर्भ द्वारा मनुष्य का जन्म सम्भव है।

जीवों के क्रियोन्नति के पथ पर बहुत आगे चल लेने के उपरान्त जीवों में लिंग भेद उत्पन्न हुआ हैं। रति कर्म के लिए उपयुक्त अवयव,आधार तथा आकर्षण −आनन्द का विकास तो अभी भी केवल उच्चस्तर के प्राणियों में ही हैं। निम्न वर्ग के जीव तो ऐसे ही उदर क्षुधा के समय भोजन की तरह ही शरीर स्फुरता की यत्किंचित पूर्ति करते हुए गर्भ धारण और प्रजनन कार्य करते रहते हैं। इसमें उन्हें किसी विशेष आकर्षण की अनुभूति नहीं होती।

अमैथुनी प्रजनन प्रक्रिया को जीव विज्ञानी ‘पारथीनो जेनेसिस’ कहते है। यह स्वीकार किया जा चुका है कि वंश वृद्धि के लिए यौन सम्बन्ध अनिवार्य नहीं और प्राणि जगत में ऐसे भी दृष्टान्त हैं जहाँ दो जीवों के मिलने से एक नवीन जीव की उत्पत्ति होती है।

एडिनवटा विश्व विद्यालय के प्राध्यापक क्रयू महोदय का क थन है यौन आकर्षण का उद्देश्य मात्र वंश वृद्धि ही नहीं है उसके पीछे अनेक प्रकार के चुम्बकीय आधार भी काम करते हैं। प्राणी तत्ववेत्ता एलवार्डिस ने इसे और भी अधिक बल पूर्वक सिद्ध किया है कि वह मात्र सन्तानोत्पादन कर्म की प्रेरणा तक सीमित नहीं है।

यह तथ्य यह बताते है कि प्रत्येक मनुष्य हर दृष्टि से स्वावलंबी और परिपूर्ण है यहाँ तक कि प्रजनन प्रक्रिया की आवश्यकता पूरी करने की दोनों पक्षों में एकाकी क्षमता मौजूद है और वे बिना एक दूसरे की सहायता के भूतकाल में ऐसे उत्पादन करते रहे हैं और करते रह सकते हैं। ऐसी दशा में किसी को किसी का परावलम्बी मानने की आवश्यकता नहीं है।

अध्यात्म तत्व दर्शन की दृष्टि से आत्मा एक समान ही उसे नर या नारी के कलेवर में लपेटती है यदि वह उस रुझान को बदल दें तो अगले ही जन्म में उसका लिंग परिवर्तन हो सकता है। अधूरे उत्साह और संकल्प बल से लिंग परिवर्तन की आकाँक्षा करने वाले नपुँसक वर्ग के होते है। पर यदि वह आकाँक्षा तीव्र हो तो यह परिवर्तन सुनिश्चित हो जाता हैँ लिंग परिवर्तन के चिन्ह प्रकट होने पर आपरेशन द्वारा पूर्ण बदलाव होने के समाचार आये दिन समाचार पत्रों में छापते रहते है। वे यही बताते हैं कि नर और नारी जीवन की सामयिक अभिरुचि मात्र है जो आवश्यकतानुसार बदल भी जा सकती है। इस स्थिति में किस को छोटा या बड़ा समझने को पराश्रित या परावलम्बी मानने की कोई आवश्यकता नहीं है।


VigyapanSuchana

मैंने यूरोप और एशिया के प्रायः सभी धर्मो का अध्ययन किया है उन सब में हिंदू धर्म ही सर्वश्रेष्ठ दिखाई दिया। मेरा विश्वास हैं कि भविष्य में समस्त संसार को इसके सामने शिर झुकाना पड़ेगा

−रोम्याँ रोला


काम प्रवृत्तियों का नियंत्रण परिष्कृत अन्तः चेतना से

भारतीय तत्व वेत्ताओं ने कामोत्तेजना को मनोजमनसिज आदि नाम देकर बहुत पहले ही यह स्वीकार कर लिया था कि यह उद्वेग शारीरिक हलचल नहीं मानसिक उभार है। यदि मन पर नियंत्रण किया जा सके− उसे ईश्वर भक्ति,कला,साधना एवं आदर्श, निष्ठा में नियोजित किया जा सके तो युवावस्था में भी शरीर और मन से ब्रह्मचारी रहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि शारीरिक नियन्त्रण तो निभाया जाय पर मानसिक उत्तेजना उभरती रहे तो ब्रह्मचर्य का वह लाभ न मिल सकेगा जैसा कि साधन ग्रन्थों में उसका महात्म्य बताया गया है। दृष्टि कोण में परिवर्तन ही इन्द्रिय का प्रधान आधार है। आहार−विहार के संयम से तो उसमें थोड़ी सी सहायता भर मिलती है।

आमतौर से यह समझा जाता है कि सुन्दरता या परिपुष्ट स्थिति के नर नारी अधिक काम तृप्ति करते होंगे एवं वैज्ञानिक तथ्यों के विपरीत है। मनुष्य की चेतनात्मक विद्युत शक्ति ही कामोत्तेजना उत्पन्न करती है और उसी की प्रबलता से यौन−तृप्ति एवं उत्कृष्ट प्रजनन का सम्बन्ध रहता है भ्रम अब दूर होता चला जा रहा है कि शरीर गठन का कामोल्लास से सीधा सम्बन्ध सम्बन्ध है। वह जिस आयु में भी − जिस मात्रा में उल्लसित रहेगी उसी स्थिति में कामोद्वेग उठते रहेंगे और तृप्ति तथा प्रजनन की सफलता भी उसी अनुपात से सामने आती रहेगी।

भूमध्य भाग में अवस्थित पिट्यूटरी ग्रन्थि एक विशेष प्रकार के हारमोन उत्पन्न करती है, जो कामोत्तेजना की वृद्धि तथा यौन अवयवों की परिपुष्टि करते हैं। विशेषज्ञ हर्मन्शन का कथन है ‘कामुकता को भावुकता का ऐसा आवेश कह सकते हैं जिसे प्रजनन हारमोनों की प्रबलता उत्पन्न करती है’। इसी आधार पर लोगों में न्यूनाधिक कामोत्तेजना पाई जाती है। हो सकता है कि कोई पूर्ण स्वस्थ पूर्ण भी हो, इसके विपरीत दुर्बल शरीर में कही आवेश अनियन्त्रित स्थिति में उभर रहा हो।

शिकागो मनोविश्लेषण संस्थान के डा. थेरेसी वेनेडेक्र तथा जीव रसायन शास्त्री डा0 स्टीन ने मासिक धर्म को जल्दी तथा देरी का,न्यूनता तथा अधिकता से होना हारमोन स्राव के साथ अति घनिष्ठता के साथ जुड़ा हुआ बताया है। रजोदर्शन के कुछ पहले से लेकर कुछ दिन पश्चात तक नारी प्रवृत्ति में आमतौर से भावुकता और उत्तेजना बढ़ जाती है। दिनों वे अधिक चंचल होती है। या तो यौन उत्तेजना की बात सोचती है या फिर खीज, झुझलाहट अथवा आक्रोश प्रकट करती है। गृह कलह प्रायः इन्हीं दिनों अधिक होता है। महिलाओं द्वारा किये जाने वाले अपराधों में तीन चौथाई इन्हीं दिनों होते हैं।

मेडिकल न्यूज ट्रिव्यून नामक लन्दन से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र डा0एन0एन जोफरी का एक अन्वेषण लेख छापा हैं जिसमें उन्हें प्रकाश और उष्णता के प्रभाव से जल्दी यौवन उभर आने का उल्लेख किया। कई जीवों को गरम और प्रकाश के वातावरण में रखने पर उनमें युवावस्था जल्दी उभरी।

ब्रिटेन के एक दूसरे साप्ताहिक पत्र ‘लान्सेट’ में यह विवरण प्रकाशित हुआ है कि इंग्लैंड का तापमान क्रमशः बढ़ रहा है अब वहाँ पहले जितनी ठण्ड नहीं पड़ती। फलस्वरूप लड़कियाँ जल्दी रजस्वला होने लगी है और लड़कर हर वर्ष में चार मास पहले रजस्वला होने लगी है इसी प्रकार संतानोत्पादन समर्थता भी पहले की अपेक्षा अब कम आयु में परिपुष्ट होने लगी है।

आहार−विहार और वातावरण की गर्मी बढ़ जाने से नर −नारियों में काम प्रवृत्ति तीव्र होने की मान्यता पुरानी हो गई। अब शरीर शास्त्री इस नये निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि उत्तेजनात्मक चिन्तन से जो मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह उमड़ते हैं वे ही यौन लिप्सा में मनुष्य को बलात् प्रवृत्त करते है। यह विद्युत धारा घटाई भी जा सकती है और बढ़ाई भी। तदनुसार संयम और असंयम के लिए पृष्ठभूमि अपने ही प्रयास से बन सकती है। इसके लिए सोचने का तरीका बदलने भर से काम नहीं चलता हारमोन प्रवाह क की रोकथाम कर सकने वाली अन्तःचेतना का बलिष्ठ होना भी आवश्यक है। जो योगाभ्यास जैसे उपायों से ही सम्भव है। यह उमंगे श्रृंगार रस का वातावरण बनाने से उठती है किन्तु मुख्यतया वे उस अन्तः चेतना पर निर्भर हैं, जिन्हें हारमोन स्राव का जन्मदाता कहा जा सकता हैं।

पुत्र या पुत्री के उत्पन्न होने में भी उस आवेश विद्युत का ही प्रधान हाथ रहता है। सामान्यतया शु्रक कीटाणुओं और रज अण्ड की स्थिति को गर्भ धारण के लिए उत्तरदायी माना जाता है और यह कहा जाता है कि पुत्र जन्म के लिए और कन्या जन्म के लिए अलग अलग कीटाणुओं का हाथ रहता हैं।

शरीर शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि नर के शुक्राणुओं में मादा और नर जाति के जीवाणु पाये जाते हैं जबकि नारी रज में केवल एक ही प्रकार के नारी जाति के जीवाणु रहते हैं। इन दोनों के मिलने से गर्भ बीज सफल हुआ तो लड़की की और यदि उसका नर बीज सफल हुआ तो लड़के के की उत्पत्ति होती है। मोआ सिद्धान्त सभी प्राणियों में यही लागू होता है इसलिए कन्या या पुत्र की उत्पत्ति के लिए नर शरीर को ही उत्पत्ति के लिए नर शरीर को ही उत्तरदायी माना जाता है। इस संदर्भ में नारी सर्वथा निष्पक्ष निर्दोष है।

शु्रक में उभयपक्षीय जीवाणुओं में से एक वर्ग को यदि निष्क्रिय बनाया जा सके तो संतान अभीष्ट लिंग की उत्पन्न हो सकती है। इस सिद्धान्त को ध्यान में रखकर ऐसी औषधियों की खोज बहुत दिन तक चली जिनके आधार पर एक पक्ष के जीवाणु मूर्छित बनाये जा सके। इन प्रयोगों में सफलता न मिलने ने रतिक्रिया के समय प्रयुक्त हो सकने वाले ऐसे रसायन तैयार कि ये जो एक वर्ग के जीवाणुओं को मूर्छित कर सकें पर यह प्रयोग भी असफल ही रहा।

रूपी महिला वैज्ञानिक वी0एन0श्रोडर ने अपने साथी एन0के कोलस्तोव की सहायता से यह अन्वेषण किया कि बौर्य बीज बिजली की ऋण और धन धाराओं से प्रभावित होते है। शरीर में यदि एक वर्ग को ही बिजली कहें तो एक वर्ग के शुक्र बीज विशेष रूप से उत्तेजित होंगे और दूसरे वर्ग के मन्द स्थिति में पड़े रहेंगे। धन बिघु नर बीजों को और दूसरे वर्ग के मन्द स्थिति में पड़े रहेंगे। धन विद्युत नर बीजों को और ऋण धारा नारी बीजों को उत्तेजित करती हैं। उन्होंने ‘एलेक्ट्री फोटेसिस’ कर सहायता से बीजाणुओं का पृथक्करण करके खरगोशों से संतानोत्पादन कराया परिणाम आशाजनक रहा।

इंग्लैंड के शेरीलेवीन और अमेरिका के मेनुयल गोडिन ने भी इस दिशा में प्रयोग किये। वे पूर्ण सफलता तक तो नहीं पहुँचे पर यह प्रतिपादन पूर्ण विश्वास के साथ व्यक्त कर सकें कि निकट भविष्य में अभीष्ट लिंग की सन्तान उत्पन्न कर सकना सम्भव हो जाय हो ऐसे आधार हाथ लग गये हैं।

उपरोक्त प्रतिपादन यह सिद्ध करते हैं कि शुक्राणुओं में से किस वर्ग के कीटक प्रबल होंगे और किस लिंग का बालक जन्म देंगे इसकी बागडोर उन कीटाणुओं की संरचना में रहने वाली रासायनिक विशेषता पर निर्भर नहीं है वरन् उस विद्युत प्रवाह पर निर्भर है जो अमुक वर्ग के कीटाणुओं को उत्तेजित करती है। अब औषधि सेवन कराके नपुँसक का पौरुवान बनाने की बात व्यर्थ माना जाती है और इसी प्रकार उन औषधियों का झुठला दिया गया है कि जो पुत्र या कन्या उत्पन्न कराने का दावा करती हैं। आधुनिक तम मान्यता यह है कि मानव शरीर अन्तः क्षेत्र में प्रवाहित रहने वाली विद्युत शक्ति का स्तर डडडड नारी का रज का न केवल गर्भाधान की स्थिति में लाता है वरन् उसी पर पुत्र या कन्या का जन्म भी निर्भर है।

कोलम्बिया विश्व विद्यालय के प्रसूति शास्त्र के अध्यापक डा0 लंड्रस शेटल्स ने एक हजार मनुष्यों के शुक्राणु संग्रह करके उन पर विभिन्न प्रकार के परीक्षण किये। वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि क्रोसोसा कणों कणों का विद्युत धारा द्वारा इस स्तर तक प्रभावित किया जा सकता है कि उनसे इच्छित लिंग की सन्तान पैदा कराई जा सके।

फ्लैडलफिया मेडिकल सेन्टर ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अधिक मात्रा में और अधिक सक्षम जीवाणुओं की उत्पत्ति कामोत्तेजना की मन्द अथवा तीव्र स्थिति पर निर्भर है अन्य मनस्क मनःस्थिति में हुए संयोग से उत्पादन जीवाणु भी निष्क्रिय और निस्तेज ही पाये गये हैं। ऐसे निस्तेज निराश गर्भाधान से मनस्वी और प्रतिभाशाली बालक उत्पन्न नहीं हो सकते।

अधिक संख्या में सन्तानोत्पादन शरीर की रासायनिक स्थिति पर निर्भर नहीं है वरन् हारमोन उत्तेजना से सम्बन्धित है। रासायनिक दृष्टि से जिस स्थिति का एक शरीर बन्ध्यस्य ग्रस्त होगा उसी स्थिति का दूसरा शरीर बहु प्रजनन की अति भी कर सकता है। ऐसे शरीरों का विश्लेषण करने पर उनके आन्तरिक विद्युत प्रवाह को ही उस भिन्नता के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।


संपत्तियां ही नहीं, विभूतियाँ भी कमायें

जीवन में धन संपत्ति की कमाई का भी महत्व है पर उतना ही जिससे शरीर यात्रा का आवश्यक निर्वाह होता रहे—अथवा पारिवारिक उत्तरदायित्वों को उस स्तर पर पूरा किया जा सके जिसमें अपने देश के औसत निवासी को गुजर करनी पड़ती है। भौतिक कमाई के लिए इस सीमा के अंतर्गत जो चेष्टाएँ की जाती हैं उनका औचित्य है। जिस शरीर के उपकरण से जीवन यात्रा चलानी है उसे पोषण तो देना ही चाहिए और जिस परिवार के साथ हमारे कर्तव्य उत्तरदायित्व जुड़े हैं उसका निर्वाह भी चलना ही चाहिए।

शरीर जब तक है तब तक ही भौतिक कमाई का उपयोग है। शरीर ही इस उपार्जन का उपयोग करता है। किन्तु जीवन इतने में ही समाप्त नहीं हो जाता, वह तो अनन्त है, आगे भी चलने वाला है। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि जिस प्रकार कल−परसों की शारीरिक आवश्यकताऐं पूरी करने के लिए आज से ही कुछ कमाने और बचाने की चिन्ता है, वैसी ही चेष्टा अनन्त जीवन की लम्बी अवधि में काम आने वाली कुछ सामग्री संचित की जानी चाहिए। यदि आत्मा की यात्रा का महत्व ही न समझें और उसे शान्ति पूर्वक गतिशीलता रहने के लिए आवश्यक साधन जुटाने की उपेक्षा करें तो यह भयंकर भूल होगी। शरीर सुविधा के साधन जुटाने में अहिर्निशि जुटे रहें। जो काया कल−परसों नष्ट होने वाली है उसकी तत्कालीन सुविधाओं का संचय हमें आवश्यक प्रतीत हो और आत्मा की लम्बी यात्रा के साधन जुटाने में उपेक्षा बरती जाय तो इसे अदूरदर्शिता पूर्ण ही कहा जायगा।

मृत्यु के उपरान्त जीवन समाप्त नहीं हो जाता यह सुनिश्चित है। उसके बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है उसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं। शरीर त्यागने के बाद आत्मा खाली हाथ नहीं जाता वरन् उसके साथ भी बहुत सी सूक्ष्म वस्तुएँ चली जाती हैं। वन, परिवार, पद, वैभव जैसी भौतिक वस्तुएँ जहाँ की तहाँ रह जाती हैं, वे आत्मा के साथ नहीं जातीं। शरीर भी गल या जल कर ऐसे ही समाप्त हो जाता है। मस्तिष्क भी शरीर का ही एक अंग है। सरकस के नट जिस प्रकार हाथ पैरों को कई तरह की कलाबाजी दिखाने के लिए प्रशिक्षित कर लेते है उसी प्रकार को भी शिक्षा−शिल्प अथवा कलाकौशल में प्रवीण बना लिया जाता है। जिस प्रकार मरने के बाद शरीर के अन्य अंग यही नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार मस्तिष्क और उसका शिक्षा कौशल भी जीवन लीला समाप्त होने के साथ ही नष्ट हो जाता है।

अनन्त जीवन के साथ रहने वाली वस्तुओं में ‘संस्कार’ ही मुख्य है। संस्कार अर्थात् अन्तःकरण में जमी हुई प्रगाढ़ आस्थाएँ और परिपक्व आदतें। जीव की चेतन सत्ता के साथ यह संस्कार ही सघन रूप से इतने घुले मिले रहते हैं कि उन्हें अस्तित्व का एक अंग ही कहा जा सके। यह संस्कार ही आगामी जन्म के आधार होते हैं। इसी परिपक्व प्रकृति की दिशा में आत्मा की लालसा भटकती है तदनुरूप उसका प्रचण्ड चुम्बकत्व लगभग उसी स्तर की परिस्थितियों में—उसी स्तर की काया में जन्म ग्रहण कर लेता हैं। आत्मा स्वसंचालित यन्त्र की तरह हैं। उसके भीतर ही वह व्यवस्था मौजूद है जो अपने भाग्य एवं भविष्य का निर्धारण स्वयं कर सके। इसके लिए किसी अन्य द्वारा दण्ड पुरस्कार देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

कहा जाता है कि मरने के बाद चित्रगुप्त के दरबार में जीव को उपस्थित होना पड़ता है। वहाँ उसके कर्मफल का लेखा−जोखा लेकर तदनुसार स्वर्ग−नरक को—पुनर्जन्म की व्यवस्था की जाती है। यह चित्रगुप्त का दरबार कहीं अन्यत्र नहीं अपने ही अन्तःकरण में विद्यमान है। हमारी आस्थाएँ—आकाँक्षाऐं एवं गतिविधियाँ जिस दिशा में चलती है जो सोचती है और करती हैं उनका सार तत्व अन्तःकरण के भीतरी पर्त पर जमा होता रहता है। इन्हीं को कर्म बीज कहते हैं, इन्हीं को संस्कार कहा जाता। वे अपने स्थान पर सुरक्षित भण्डार की तरह जमा होते रहते हैं। मरण के उपरान्त अनुकूल अवसर पाते ही वे संस्कार उभर आते है और उनकी प्रतिक्रिया सहज ही सामने आती चली जाती है।

जीवित अवस्था में चिन्तनशील जागृत मस्तिष्क अपने विचार−प्रवाह में बहता रहता है। शरीरगत क्रिया−कलापों की स्नायविक उत्तेजना भी चेतना पर छाई रहती है। इस दबाव से मूल संस्कार अचेतन मनः क्षेत्र में दबे पड़ें रहते हैं। तब उन्हें उतना अधिक उभरने का अवसर नहीं मिलता, थोड़ा बहुत जो मिलता है, उसके अनुसार तत्काल कर्मफल भी मिलने लगते हैं।

आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से कितने ही शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते है यह वैज्ञानिक तथ्य अब भली प्रकार स्पष्ट हो गया है। आधे से अधिक बीमारियाँ ऐसी होती हैं, जिनकी चिकित्सा दबा−दारु के द्वारा सम्भव ही नहीं होतीं। उनका निवारण केवल आन्तरिक कुसंस्कारों के निराकरण से ही सम्भव होता है। असाध्य समझे जाने वाले शारीरिक और मानसिक रोगों की सूची अब दिन−दिन लम्बी होती जाती है। इनका निवारण कर सकने में चिकित्सा विज्ञानी अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं, क्योंकि अन्तःकरण के गहन स्तर में जमे हुए उन कुसंस्कारों को पकड़ना—उखाड़ना उनके साधनों में नहीं आता, जो उन असाध्य रोगों के करण कारण बने होते हैं।

इसी प्रकार जीवन में अन्यान्य कष्टकर परिस्थितियाँ इन्हीं कुसंस्कारों के करण उपस्थिति होती रहती है। चोरी की आदत के कारण लोक सम्मान चला जाना, जेल भुगतना और सहयोग से वंचित हो जाना कितना कष्टकारक और कितना प्रगति बाधक होता है? इसे भुक्त भोगी भली प्रकार जानते हैं। सामान्य कामों में भी पग−पग पर असफलताएँ मिलना अस्थिर चित का ही प्रतिफल होता है यह अस्थिरता अनायास ही पीछे नहीं पड़ जाती वरन् संचित कुसंस्कारों की एक व्यवस्थित प्रतिक्रिया ही होती है। ऐसे−ऐसे कितने ही अवरोध और संकट जीवन−क्रम में आये दिन उपस्थित होते रहते हैं जिन्हें अपने ही अन्तःकरण में संचित कुसंस्कारों की प्रतिक्रिया कह सकते हैं।

चेहरे में आकर्षण, वाणी में अभाव, आँखों में चमक, कार्यों में स्फूर्ति जैसी कितनी ही विशेषताओं का यदि विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह सारी विशेषताएँ संचित सुसंस्कारों का ही फल हैं वे ही हमें निष्कृष्ट परिस्थितियों में धकेलते हैं और वे ही प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचा देने वाले साधन जुटाते हैं।

यह तो जीवित अवस्था की बात हुई। संस्कारों का प्रभाव व्यक्तित्व के उत्कृष्ट एवं निष्कृष्ट स्तर में समाविष्ट देखा जा सकता है और उनके आधार पर उत्थान−पतन का आधार बनता हुआ अनुभव किया जा सकता है। मरणोत्तर जीवन में यही संस्कार—सम्पदा साथ रहती है शरीर और मस्तिष्क का तनाव दबाव हल्का पड़ते ही यह संस्कार उभरते है और प्राणी को स्वर्ग एवं नरक जैसे दृश्य दिखाते हैं—अनुभव कराते हैं। अपना स्वर्ग−नरक हम विकसित होकर अंकुर एवं पौधें की स्थिति प्राप्त होती है। तो मृतात्मा अनुभव करता है कि उसे कुसंस्कारों का दण्ड और सुसंस्कारों का पुरस्कार मिल रहा है। नरक और स्वर्ग की अनुभूतियों का आधार यही होता है।

पुनर्जन्म कहाँ मिले? किस प्रकार के परिवार में अथवा कैसे वातावरण में जन्म मिलें? इसकी व्यवस्था भी अपना ही स्वसंचालित चेतना यन्त्र संस्थान स्वयं ही कर लेता है। इसके लिए अन्य किसी बाहरी न्यायाधीश या नियन्त्रणकर्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती! इतने अधिक प्राणियों के—इतने अधिक कर्मों का लेखा−जोखा रखना और उनके लिए दण्ड, पुरस्कार, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि की व्यवस्था करना अन्य किसी बाहरी व्यवस्थापक के लिए सम्भव नहीं है। यह सारा कार्य अपनी ही अन्तः चेतना निपटाती है मरने के बाद तर्क−बुद्धि समाप्त हो जाती है। भीतर कुछ बाहर कुछ का झंझट नहीं रहता। भले या बुरे जैसे भी कुछ संस्कार जमें होते हैं उन्हीं के अनुरूप आकांक्षाएं उभरती है और उभार का आकर्षण अभीष्ट परिस्थितियों के साथ पुनर्जन्म का ताल−मेल बिठा देता है। जीवित मनुष्य में दुहरा व्यक्तित्व रहता है। उसकी आकांक्षा कुछ और रहें और व्यक्ति कुछ और करे यह सम्भव है पर मरणोत्तर काल में वह स्थिति नहीं रहती। इसलिए यदि निष्कृष्ट संस्कार जमें होंगे तो निष्कृष्ट व्यक्तियों अथवा निष्कृष्ट परिस्थितियों की ओर ही खिंचाव रहेगा और जीव उसी वातावरण में उसी स्तर के शरीर में जन्म ग्रहण कर लेगा। तर्क−बुद्धि रहती तो शायद वह निष्कृष्ट संस्कारों के कारण मिलने वाली निष्कृष्ट परिस्थितियों की हानि भी सोचता और अपने स्वाभाविक स्तर से भिन्न प्रकार की उत्कृष्ट परिस्थिति में जन्म लेने की चेष्टा करता, पर स्थिति में वैसा सम्भव नहीं रहता। एक ही व्यक्तियों—एक ही रुचि—एक ही चेष्टा का वर्चस्व इन दिनों रहता है। भौंरा फूल पर जर बैठता है और गुबरीला कीड़ा गोबर तलाश करता है। इसके लिए न उसे किसी की सलाह लेनी पड़ती है और न कोई जोर जबरदस्ती करता है। वे कीड़े अपनी प्रकृति के अनुरूप ही परिस्थिति ढूंढ़ लेते हैं और वहाँ जाकर सन्तोष करते हैं। ठीक इसी प्रकार अन्तः चेतना अपने संचित संस्कारों के अनुरूप जन्म ग्रहण कर लेती है। इसमें रहने से सुख मिला या दुख यह तो तब पता चलता है जब जिस योनि में जन्म लिया गया है उसमें रहने के बाद दूसरे प्राणियों के साथ अपनी तुलना कर सकने की बुद्धि विकसित होती है।

अगले जन्म का स्थान शरीर, वातावरण बनाकर ही वे संस्कार समाप्त नहीं हो जाते वरन् उस जन्म में अनेकानेक प्रेरणाओं, आकांक्षाओं एवं प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन भी वे ही करते है। यदि वह संचालन हेय स्तर का ही रहा होगा तो उस प्राणी को उसकी प्रतिक्रिया नाना प्रकार के कष्ट संकटों के रूप में भुगतनी पड़ेगी यदि वह सूक्ष्म संचालन श्रेष्ठ स्तर का हो रहा होगा तो उस जीव को सुखद एवं सुसम्पन्न परिस्थितियों का लाभ मिल रहा होगा। पतित एवं उत्कृष्ट निन्दित एवं सम्मानास्पद—दरिद्र एवं समुन्नत—दुखी एवं प्रसन्न रखने वाली परिस्थितियों का कारण यही अदृश्य आंतरिक सूत्र संचालन ही होता है जिसे दूसरे शब्दों में “समुच्चय” भी कह सकते हैं।

असल में ये संस्कार ही व्यक्तित्व का मूलभूत आधार होते हैं। उन्हीं को प्रारब्ध, विधि का विधान, ईश्वर इच्छा, कर्मफल आदि की गहन पृष्ठ भूमि कह सकते हैं हमारे ऊपर कोई बाहरी शक्ति कुछ थोपती नहीं है। इस संबंध में ईश्वर भी निस्पृह है। उसे अथवा साक्षी इसलिए कहा गया है कि वह किसी की प्रगति, अवनति में सहायक अथवा बाधक नहीं होता। एक व्यवस्था उनकी बना दी। स्वसंचालित चेतना यन्त्र फिट कर दिया अब उसका उत्तरदायित्व समाप्त हो गया। प्राणी अपने स्वतन्त्र कर्तव्य के आधार पर उठते गिरते है और सुख−दुख सहन करते हैं। कुछ भी कर गुजरने की छूट मनुष्य को पूरी तरह दी गई है, पर साथ ही प्रतिफल एवं प्रतिक्रिया भुगतने के लिए उसे बाध्य विवश कर दिया गया है। ईश्वरीय न्याय, कर्मफल, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म विधि−विधान, प्रारब्ध योग आदि अदृश्य जगत के प्रतिपादनों का यदि रहस्योद्घाटन करना हो तो उसका समाधान इस संस्कार संचय के केन्द्रबिन्दु में ही सन्निहित दृष्टिगोचर होगा।

भविष्य को उज्ज्वल एवं अन्धकारमय बनाने वाले इन सुसंस्कारों एवं कुसंस्कारों का संचय पूर्णतया अपने हाथ की बात है। इनका संचय हम अपनी आज की आस्थाओं आकाँक्षाओं एवं क्रिया−पद्धति में सुधार करके सहज ही किया जा सकता है। यह भली प्रकार समझ लिया जाना चाहिए कि धोखा बाहर वालों को दिया जा सकता है अपने आपको नहीं। दुहरी चाल अन्य लोगों से चली जा सकती है अपने आपे को भुलाया नहीं जा सकता। मूल अन्तः चेतना का जो स्तर होगा ठीक उसी के अनुरूप संस्कारों का फोटोग्राफ खिंचेगा। दुष्प्रवृत्तियों में निरत रहकर अन्तः चेतना में सुसंस्कारों के पर्त जमाये जा सकें यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता वहाँ सत्य का ही निर्वाह होता है। चालाकी और किसी के भी साथ की जा सकती है अपने आपे को ठग सकना और उसे उलटी पट्टी पढ़ा सकना किसी के लिए भी शक्य नहीं है। सत्य रूपी नारायण का अन्तःकरण पर अविछिन्न आधिपत्य है। वहाँ यथार्थता के अतिरिक्त और किसी नीति का प्रवेश नहीं हो सकता। सुखदायी संस्कारों को संचय करना हो तो अपने आस्था केन्द्र को उच्चस्तरीय आदर्शों से ओत−प्रोत करना होगा। उसी स्तर की आस्थाएँ, भावनाएँ नये सिरे से जमानी पड़ेगी। इसके लिए पुराने कुसंस्कारों को उखाड़ना पड़ेगा। उन्हें हटाकर रिक्त हुए स्थान पर ही तो सुसंस्कारों का बीजारोपण किया जा सकेगा।

लोह और मोह की पशु−प्रवृत्तियों से हमारी अन्तः 26 अखिल 26 चेतना घिरी हुई है। वासना और तृष्णा की शरीरगत लिप्साओं से आगे की किसी बात में अपनी रुचि है ही नहीं। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। भौतिक दृष्टि से दूसरों की तुलना में बड़े बनने की अहंता ही उद्धत कर्म करती है। इन्हीं उलझनों में चिन्तन और कर्म में निरत रहते है। इन हलचलों के जो संस्कार अन्तः चेतना पर जमेंगे वे निश्चित रूप से आसुरी ही होंगे। उनका प्रति फल उस जीवन में एवं मरणोत्तर काल में दुखदायी विपत्तियों की ही वर्षा करेगा। अपनी करनी का फल हमें भुगतना ही पड़ेगा, भले ही उन संकटों का दोष किसी दूसरे पर मढ़ते हुए हम आत्म प्रवंचना करते है।

शरीर की सामयिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली सम्पदा को कमाना उचित है पर सुसंस्कारों की विभूतियों की उपेक्षा करना अदूरदर्शिता पूर्ण है वर्तमान काया तो कुछ भी समय ठहरने वाली है अनन्त जीवन तो जीवात्मा को ही जीना पड़ेगा। उसमें केवल सुसंस्कारों की पूँजी ही काम देगी। धन वैभव के खोटे सिक्के उस यात्रा में किसी भी प्रकार सहायक सिद्ध न हो सकेंगे

सुसंस्कार किसी पूजा पाठ या कर्मकाण्ड से नहीं जम सकते। कथा-कीर्तन से लेकर तीर्थयात्रा तक के क्रिया कृत्यों से भी वह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। योगाभ्यास और तप साधना की शारीरिक, मानसिक कसरतें भी उस आवश्यकता की पूर्ति नहीं करती। इन समस्त आचरणों का मूल उद्देश्य एक ही है उच्चस्तरीय आस्थाओं, आकाँक्षाओं, आदर्शों की अन्तःकरण में इतनी सघन स्थापना जिसकी प्रेरणा से अपनी गतिविधियाँ केवल श्रेष्ठ सत्कर्मों की दिशा में ही गतिशील रह सकें। इस प्रयोजन को जीवन साधना से ही पूरा किया जा सकता है। निरन्तर सत्-चिन्तन और श्रेष्ठ कर्मों के साथ अपने को बाँधे रहकर ही हम सुसंस्कारों की सम्पत्ति उपार्जित कर सकते है और उस आधार पर अपने उज्ज्वल भविष्य का सुखद निर्माण कर सकने में सफल हो सकते है।


सत्यवादन घाटे का सौदा नहीं

“मुझे इस सुनहरे रंग के मेमने की आवश्यकता है। तुम इसके बदले जितना धन चाहोगे मैं देने को तैयार हूँ।”

परशिया के राजा ने हंगरी के राजा मत्थियस के गड़रिये को प्रलोभन देते हुए कहा।

‘मैं राजसिंहासन के सम्मुख असत्य भाषण नहीं कर सकता। यह सब राजा की भेड़े है मैं उनकी आज्ञा के बिना किसी के स्पर्श पर देने को तैयार नहीं हूँ “गड़रिये ने उत्तर दिया।

गड़रिये बड़ा ईमानदार और सत्यवादी था। हुआ यह कि उस दिन परशिया के राजा अपनी अविवाहित युवा पुत्री के साथ मत्थियस के अतिथि बने। बातों ही बातों में गड़रिये की चर्चा निकल पड़ी। मत्थियस ने अतिथि को बताया −कि गड़रिया हमेशा सत्य भाषण करता करता हैं।

बड़े से बड़े प्रलोभन भी उसे विचलित नहीं कर पाते। यही कारण है कि पिछले कितने ही वर्षों से वह मेरे पास कार्य कर रहा है”

“असम्भव! ऐसा हो ही नहीं सकता।”

“यदि मैं उसने असत्य भाषण न करवा सका तो आधा राज्य हर जाऊँगा।”

“और यदि वह असत्य बोल गया तो मैं आधा राज्य हार जाऊँ गा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा आपके सामने करता हूँ।” मत्थियस ने जोशा में कहा।

रात्रि के भोजनोपरान्त परशिया का राजा अपने शयन कक्ष में आया और पलंग पर लेटे−लेटे काफी रात तक यही सोचता रहा कि इस गड़रिये से कैसे असत्यवादन करवाया जाये। फिर उसे ध्यान आया कि आज शाम को जब वह भेड़े चराकर वापस लाया था तब उनमें एक छोटा सा मेमना सुनहरे रंग का था। यदि अधिक से अधिक धन का प्रलोभन देकर उसे खरीद लिया जाये तो उस मेमने सुनहरे रंग का था। यदि अधिक से अधिक धन का प्रलोभन देकर उसे खरीद लिया जाये तो उसे मेमने के गायब होने की कोई कल्पित कहानी गढ़ कर राजा के सम्मुख कहनी होगी। जिससे मत्थियस का अहं चूर चूर हो जायेगा।

कंचन से अधिक प्रलोभन कामिनी का होता है। ऐसा सोचकर राजा ने अपनी अपूर्व सुन्दरी कन्या को गड़रिये के पास भेजा। उसे इस बार पूर्ण विश्वास था कि हमारा बार खाली न जायेगा। बड़े बड़े ईमानदार और संयमी व्यक्ति तक कंचन और कामिनी के प्रभाव में प्रभाव में आकर फिसलते देखे गये है। फिर वह तो एक साधारण−सा पशु−पालक है। राज कन्या गड़रिये के पास जाकर कहने लगी— “तुम्हारी भेड़ों में यह छोटा सा मेमना देखने में कितना सुन्दर लगता है। काश! यह प्यार मेमना मेरे पास होता तो मैं इस और लाड़−दुलार से रखती। इसके केश और मेरी केश राशि में कितना साम्य है। तुम यह मेमना मुझे दे दो। इसके बदले तुम जितना द्रव्य चाहोगे मैं तुम्हें अपने पिता से दिलवा दूँगी। और मैं सदा तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगी। भद्र, पुरुष मेरा प्रस्ताव स्वीकार लो। मैं तुम्हारे लिए एक शीतल पेय भी लायी हूँ। “

गड़रिये को उस पर समय प्यास लग रही थी। उसने राजकुमारी के हाथ से जल−पात्र लेते हुए कहा−”मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम प्रलोभन देकर इस मेमने को लेना चाहती हो। पर मैं किसी भी मूल्य पर अपनी ईमानदारी और जिम्मेदारी बेच नहीं सकूँगा।”

गड़रिये ने पात्र को ओठ से लगाया और उसे रिक्त करके राजकुमारी को वापस कर दिया। वह समझ गया कि यह मधुर जल नहीं वरन् तीखी मदिरा है। शनैःशनैः उसे मूर्छा आने लगी। मौका पाकर राजकुमारी ने उस मेमने को उठा लिया और राजभवन वापस आ गई। पिता ने जब पुत्री को गोदी में मेमना देखा तो वह खुशी से चीख पड़ा −”बेटी! तुमने आज मेरे मन की मुराद पूरी करदी अब मैं मत्थियस, परक्षिया के राजा, उनकी युवा पुत्री तथा अन्य कई मन्त्री भी बैठे चर्चा कर रहे थे। युवा पुत्री तथा अन्य कई मन्त्री भी बैठे चर्चा कर रहे थे। उसी समय गड़रिया आया। उसने सबको उचित अभिवादन कर बड़े शिष्टाचार के साथ कहा −”राजन! आज मैंने सुनहरे मेमने को उससे भी सुन्दर मेमने से बदल लिया है। मेरा विश्वास है कि अपने लिये यह घाटे का सौदा नहीं है,और वह सुन्दर मेमना यह रहा,गड़रिये ने राजपुत्री की ओर संकेत करते हुए।

सारी बातें सामने आई। परशिया के राजा का सारा प्रयास व्यर्थ गया। एक सामान्य से गड़रिये की ईमानदारी और सत्यवादिता पर सब मुग्ध थे। परशिया नरेश अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार आधा राज्य हार चुके थे। मत्थियस ने यह जीता हुआ राज्य गड़रिये को देते हुए कहा− “वत्स! तुम्हारी कर्त्तव्य निष्ठा से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।आज तुमने मेरे सम्मान की बहुत बड़ी रक्षा की है। मैं भी तुम्हें अपने राज्य का एक भाग पुरस्कार स्वरूप प्रदान करता हूँ। और तुम अब दोनों खण्डों के राजा हुए।”

परशिया का राजा खड़ा हो गया उसने कहा−”ईमानदारी और कर्त्तव्य मनुष्य का सबसे बड़ा गुण हैं। मैं ऐसे ही वर की तलाश अपनी लड़की क लिए कर रहा था। मुझे ऐसा साहसी और सत्यव्रती युवक बहुत खोज के बाद पहली बार मिला है। अतः मैं अपनी कन्या क हाथ भी इसके हाथों में सौंप कर अपने भर को कम करना चाहता हूँ परशिया के राजा ने अपनी पुत्री का हाथ उस गड़रिये के हाथ में देकर बड़ी प्रसन्नता तथा सन्तोष का अनुभव किया। गड़रिये से राजा बनने वाले सम्राट इनो सेन्य की कथा−गाथा अभी भी मध्य एशिया के देशों में बड़े श्रद्धा भाव के साथ कही सुनी जाती है।


Quotation

सर्वथा निर्दोष व्यक्ति अथवा सर्वथा निर्दोष काम एक उचित तथ्य है जिसके लिए हम सबको निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिये पर साथ ही यह भी नहीं भूल जाना चाहिए कि सर्वथा निर्दोष तो केवल परमेश्वर है।

मनुष्यों में कुछ न कुछ खामी पाई जाएगी और काम भले ही उच्च उद्देश्य के लिए किये गये हों काम करने वालों की त्रुटियों के कारण कहीं न कहीं त्रुटि पूर्ण रहेंगे। इस कटु तथ्य को ध्यान में रखते हुये हमें अधिक उपयुक्त और अधिक सही कामों के साथ ताल−मेल बिठाने की नीति अपनानी पड़ेगी। इसी में व्यावहारिकता है और इसी में सुविधा। रहना पड़ेगा। यह क्षुब्धता तब और भी अधिक बढ़ जाएगी जब वे अपने व्यक्तित्व और क्रिया कलाप की खामियाँ देखने का प्रयत्न करेंगे कि और अनुभव करेंगे कि वे जैसे हैं और जो करते हैं वह भी सन्तोषप्रद नहीं हैं। −वाल्टेयर


बड़े कार्य करें

यह करूंगा−−वह करूंगा ऐसी घोषणाएं करते फिरना निरर्थक है। यह निश्चित नहीं कि जो करने के लिए आज कहा जा रहा है उसे अगले दिन किया भी जा सकता है या नहीं। कल संयोग वश ऐसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं कि जो कल करने की घोषणा की गई है वह सम्भव ही न रहें।

अप्रत्याशित घटना क्रम का घटित हो जाना असम्भव नहीं कोन जाने अपना शरीर आज जिस स्थिति में हैं कल उसमें रहेगा भी या नहीं। बीमारी और मौत का आक्रमण कब किस पर हो जाय इसे कोन जानता है। ईश्वर न करे अपना शरीर ही कल दस याग्य न रहे कि घष्ए को कार्यान्वित किया जा सके। इसी प्रकार अन्य ऐसी घटनाएँ भी घटित हो सकती हैं जो अपने भविष्य कथन को निरस्त कर दें। चोरी, अग्निकांड, दुष्काल, घाटा आदि ऐसे हो दरिद्र बना कर रख दें। तब उन घोषणाओं की पूर्ति कैसे हो सकेगी जो आज की सुसंपन्न स्थिति को ध्यान में रखकर की गई थी।

भविष्य अनिश्चित है। नियति के गर्भ में कितनी मृदुल और कितनी दुखद सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं इसे कौन जानता है कल हम क्या करेंगे क्या नहीं—यह निर्णय आज नहीं कल ही किया जा सकता है। समय से पूर्व तो उसकी घोषणा करना तो बचकानापन है। आज तो हमें वही सोचना−−वही कहना और वही करना चाहिए को आश्वासन देना सम्भव है। भविष्य के लिए किसी को आश्वासन देना व्यर्थ है। देना ही हो तो इस शर्त के साथ देना चाहिए कि आज जैसी परिस्थिति कल भी बनी रही तो वह किया जा सकेगा जो आज कहा जा रहा है।

बूढ़े मनुष्य भूतकाल के घटनाक्रम में बहुत दिलचस्पी रखते हैं ओर बीती हुई बातों की चर्चा बड़े उत्साह के साथ करते या सुनते हैं। उनका श्रेष्ठ समय भूतकाल ही था जो अब गुजर गया। वर्तमान नीरस है ओर भविष्य डरावना, इसलिए सुखानुभूति के लिए उन्हें मधुर भूतकाल का स्मरण करते हुए चैन मिलता है। कुछ विचित्र व्यक्ति ऐसे भी होते है जिन्हें दुखों की स्मृति भी ओर विपत्तियों की चर्चा करके अपने घाव हरे करते हैं और अभ्यस्त दुखी मनः स्थिति का जागृत करके विलक्षण प्रकार का आनन्द लेते है। सुखद हो अथवा दुखद जिन्हें भूतकाल जिन्हें भूतकाल की स्मृतियाँ ही सुहाती हैं—कथा पुराणों से लेकर व्यक्ति गत स्मृति की तथा स्वजन संबंधियों की पिछली चर्चाएँ जिन्हें सन्तोष देती हैं समझना चाहिए कि वे बूढ़े हो गये। उनका मन बुढ़ापे से ओत−प्रोत हो गया। भले ही ऐसे लोग आयु की दृष्टि से अधेड़ या युवक दिखाई पड़ते हों।

बालकों का स्वभाव भविष्य की कल्पनाएँ करते रहना होता है। चूँकि उनका भूतकाल कुछ महत्वपूर्ण नहीं था और न उसका स्मरण ही उन्हें होता वर्तमान भी अस्थिरता और अनिश्चितता से भरा रहता है, इसलिए अनेक लिए चिन्तन का एकमात्र आधार भविष्य ही रह जाता है। उसी पर वे तरह−तरह के सुखद आरोपण करते हैं। भविष्य में यह पावेंगे—वहाँ जावेंगे—यह खायेंगे—यह करेंगे जैसी चर्चाएँ ही उनके मुँह सुनी जाती हैं। वे कल्पनाओं को ही वास्तविकता समझने लगते हैं और सम्भावनाओं की सुनिश्चितता का ऐसा बाना पहनाते हैं मानों जो कुछ वे सोच या कह रहे हैं अवश्य ही वैसा होकर रहेगा। उनके इस भोलेपन पर अभिभावक रस लेते हैं, पर साथ ही उस बचपन पर हँसते भी हैं जिसकी कल्पना और यथार्थता के बीच में कितनी बड़ी खाई होती डडडड बाल–कल्पनाओं और घोषणाओं का यदि कोई लेखा−जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि वे जितनी भोली भाली और मृदुल थीं उससे अधिक वे अवास्तविक भी थीं।

सुविकसित व्यक्तित्व वाले प्रौढ़ व्यक्तित्व को न तो बूढ़ों की तरह भूत उपासक होना चाहिए ओर न बालकों की तरह भविष्य वक्त बनने का उपहासात्मक उपक्रम बनाना चाहिए। यथार्थवादी होना चाहिए और वर्तमान पर सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। प्रौढ़ता में ही वह साहस होता है जो वर्तमान की कठिन चुनौती को स्वीकार कर सके।

वर्तमान,आज की जटिल समस्याओं को लेकर सामने आता है और सामाधान के ऐसे हल चाहता है जो प्रबल पुरुषार्थ और प्रखर मनोबल के आधार पर ही ढूंढ़े निकाले जा सकते है पौरुष जितना गौरवशाली है उतना ही उन उत्तरदायित्वों से लदा हुआ भी है जो मनस्वी एवं दूरदर्शी आन्तरिक स्थिति होने पर ही निबाहे जा सकते हैं।

कल क्या करना है − इसकी रूपरेखा सामने रहनी चाहिए ताकि उस आधार पर वर्तमान प्रयासों को अग्रसर किया जा सके। किन्तु भविष्य को सुनिश्चित मानकर नहीं चला जाना चाहिए। मनुष्य की अकेली इच्छा ही सब कुछ नहीं है −परिस्थिति कल बदल सकती है और आज की इच्छा भी कल किसी कारण शिथिल हो सकती है। ऐसी दशा में दूसरों को आकर्षक आश्वासन देने या आशान्वित करने का मूल्य ही कितना रह जाता है।

भविष्य में यह करने की इच्छा है इस प्रकार विचार व्यक्त करने में और उस संदर्भ में दूसरे से परामर्श लेने में हर्ज नहीं। भावी योजनाएँ बनती है और बनाई जाती हैं सो उचित भी हैं और आवश्यक भी। पर मैं यह कर ही लूँगा ऐसा उद्घोष नहीं करना चाहिए। हाँ वैसा करने के लिए शक्ति भर और पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करने का संकल्प किया जा सकता है और उस निश्चय को कार्यान्वित करने में तत्परता पूर्वक जुटा जा सकता है। ऐसे साहसिक प्रयत्नशीलता सम्भवतः अपने आज के संकल्प को बहुत हद तक पूरी भी रह सकती है। तब सफलता जितनी भी मिल सकी वह प्रशंसनीय कही जा सकता। इसके विपरीत यदि लम्बी−चौड़ी उद्घोष किये गये हैं और वे आवेश मात्र सिद्ध हुए तो इससे अपना शिर लज्जा से नीचा होगा और दूसरों को व्यंग करने का अवसर मिलेगा।

उचित यही है कि हम आज की बात सोचे ओर आज के काम आज ही निपटाने क प्रयत्न करें। आज के उत्तरदायित्व भी इतने बड़े और इतने अधिक हैं कि उनकी पूर्ति सही रीति से कर सकने में बढ़े चढ़े प्रयास, साहस, साधन, और बुद्धिबल को नियोजित करने ही कुछ काम चलता है हमें इसी केन्द्र पर अपने को केन्द्रित करना चाहिए।,कोई सत्कर्म करना है तो आज ही करना चाहिए। महा प्रभु ईसा कहते थे कि जो सत्कर्म करना है सो आज ही कर। बांये हाथ में जो दान के लिए है उसे दाहिने हाथ मत लेजा। ऐसा न हो कि इस फेर बदल में तेरा मन बदल जाय और जो देना चाहता है वह न दे सके।’ बुद्धि मान सदा से यही कहते रहे है कि −सौ मन कथनी की अपेक्षा एक सेर ‘करनी’ का महत्व अधिक है। घोषणाएँ करते फिरने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम अपनी सदाशयता का परिचय आज की कर्मनिष्ठा द्वारा व्यक्त करें।’

जीभ छोटी बनाई गई है हाथ बड़े। जीभ एक है और हाथ दो। यह अनुपात इसलिए रखा गया है कि हम कहें कम, करें अधिक। क्रिया ही किसी की सद्भावना का सच्चा प्रमाण है जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है। जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है और वह उन्माद उतरते ही पिछली बात को बदल भी सकती है पर क्रिया तो क्रिया ही रहेगी। संकल्प में जितना अन्तर हैं उतना घोषणा और क्रिया में भी रहता है आमतौर पर लम्बी चौड़ी घोषणाएँ आवेशग्रस्त ही करते है अत्युत्साह की मनः स्थिति में प्रायः स्थिति में प्राय यह स्मरण नहीं रहता कि जो कहा जा रहा है उसे कल कार्यान्वित किया भी जा सकेगा या नहीं। जो न किया जा सके उनके कहने से क्या लाभ? जो कहने को जी चाहती ही उसके पीछे दूरगामी चिन्तन −उपयुक्त साधन ओर अविचल संकल्प −बल हो तो ही घोषणा के लिए कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा जो बन पड़ेगा वह अधिक से अधिक तत्परता एवं सदाशयता के साथ करते इतना कथन ही पर्याप्त हैं।


पेट और अन्न एक दूसरे को कैसे आत्मसात् करते हैं

शरीर के अवयवों की क्रिया−प्रक्रिया में यों एक स्वसंचालित रीति−नीति मात्र प्रतीत होती है पर उसमें भी नैतिक एवं अध्यात्म सिद्धान्तों का समुचित समावेश है।

यदि मनुष्य बाहर से न सही अपने भीतर अंग−प्रत्यंगों की गतिविधियों को देखकर कुछ कुछ शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न करे तो जीवन की महत्वपूर्ण गुत्थियों को सुलझाने का प्रखर मार्ग दर्शन मिल सकता है। पेट और अन्न का परस्पर सम्बन्ध भी ऐसा हैं जो प्रेम के स्वरूप और उसकी प्रतिक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता हैं।

आमाशय माँस जैसी दुष्पाच्य वस्तुओं को पचा लेता है इसका कारण उसकी ग्रन्थियों में से निरन्तर स्रवित होते रहने वाला हाइड्रोक्लोरिक ऐसिड है। वह एक तीव्र तेजाब है जो कपड़ों पर गिर पड़े तो उन्हें तुरन्त जला दे, पर यह अचम्भा ही है कि यह अम्ल जिस माँस में से रिसता है—जहाँ भरा रहता है वहां कुछ जलता नहीं— हाँ बाहर से आया हुआ माँस उसी माँस के गड्ढे में गल जाता है।

शरीर में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं का क्रम भी अद्भुत हैं। पेट जितने 38 डिग्री फाल−हीट की ताव पर यदि किसी प्रयोगशाला में कार्य वर्षों में सम्पन्न हो सकेगा वह कुछ घण्टों में ही शरीर पूरा कर लेता है।

इतनी तीव्र गर्मी और तेजाबी रासायनिक क्रिया को यह जरा सी माँस की थैली किस प्रकार सहन करती रहती है। इस तरह का कोई मानव निर्मित उपकरण नहीं बन सकता। उसमें इतनी सहन शक्ति हो ही नहीं सकती। जिसे इतना कठोर काम करना पड़े वह उपकरण देर तक स्थिर रह ही नहीं सकता है। किंतु हमारा पेट है जो जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त अपना काम अनवरत रूप से करता ही चला जाता है।

पेट की प्रकृति ही मनुष्य प्रकृति होनी चाहिए। उत्तेजना, चिन्ता और विपत्ति के क्षण यदि निरन्तर भी बने रहे और अपना अस्तित्व यदि पेट की थैली जैसा तुच्छ और साधन रहित दिखाई देता हो तो भी यह विश्वास रखा जाना चाहिए कि उसकी मूलभूत संरचना उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों द्वारा सम्पन्न हुई है। उसमें अकूत सामर्थ्य भरी पड़ी है और वह सब कुछ सहन कर सकने में समर्थ है, सहन ही नहीं वरन् उसके सामने आते रहने वाले व्यवधान टलते रहने और उसका अस्तित्व अक्षुण्ण बने रहने की व्यवस्था है। ऐसी दशा में न अधीर होने की जरूरत है न चिन्तित होने की वरन् इतना पर्याप्त है कि अपनी संरचना की विलक्षणता और उसके सृजेता की महत्ता पर विश्वास रखते हुए अपने निर्धारित क्रिया−कलाप में हँसते−खेलते पत्थर रहा जाय।

भोजन कितना मूल्यवान, पौष्टिक, स्वादिष्ट था यह बाहरी उपलब्धि स्वरूप है, महान वह क्रिया है जो अन्न को रक्त के, बल के रूप में बदलती है। मुँह में चबाये जाते समय जीभ की ग्रन्थियों में बहुमूल्य तरल पदार्थ निकलता है और वह भोजन में मिल जाता है। इसके बाद संपर्क में आये हुए उस आहार का स्वागत सत्कार होता है। घर में प्रवेश करते ही उसे अनुदान दिया गया इसके बाद आगे बढ़ाने की सारी व्यवस्था जुटाई गई। मुँह से लेकर आमाशय तक पहुँचने के लिए 10 इञ्च लम्बी नली है उसे पार कराने के लिए माँस पेशियाँ जुट पड़ती हैं और उसे हाथों पर बिठाकर वह यात्रा लगभग 5 सेकेंड में पूरी करा देती हैं। प्रत्येक ग्रास के साथ द्वारपाल इसी स्वागत सत्कार भरी प्रक्रिया का परिचय देकर नव आगन्तुक ग्रास का मनमोह लेते हैं और उसे आमाशय की प्रयोगशाला में पहुँचा देते हैं।

पेट में उससे कुछ लिया नहीं जाता वरन् देने की ही क्रिया चलती रहती है। पित्त—पैन्क्रीएस जैसे रस उस आगन्तुक को भरपूर मात्रा में खिलाये−पिलाये जाते हैं। इतनी आत्मीयता पत्थर को भी पसीजने योग्य बना सकती है पर बेचारे आहार ग्रास की तो विसात ही क्या है। वह भी अपनी प्रकृति और स्थिति को बदलना आरम्भ करता है और अन्न का कार्बोहाइड्रेट अब ग्लूकोज और प्रोटीन में बदलना आरम्भ हो जाता है। इस बदलाव के बाद उसकी अगली यात्रा आरम्भ होती है। अभी वह बदला भर है। अपने आपको पेट के लिए समर्पित करने की संभावना भर उत्पन्न हुई है। स्थिति अभी भी नहीं आई। स्वार्थ का परमार्थ में−अहं का समर्पण में बदल जाना बहुत बड़ी परिणति है। इसके लिए लम्बी मंजिल पार करनी पड़ती है और लम्बी साधना जुटानी पड़ती है। पेट वही सब तो करता रहता है। उसकी अपनी तपस्या ही अन्न देवता को वरदान देने के रूप में विवश करती है तब कहीं जाकर वह रक्त बनता है।

आँतों की माँस पेशियाँ एक मिनट में तीन बार के क्रम से सिकुड़ती फैलती हैं उस आमाशय के प्रभाव से प्रभावित—स्वल्प परिवर्तित आहार को आगे बढ़ाने के यात्रा छोटी आँतों की है। उस यात्रा में पग−पग पर उपहार दिये जाते रहते हैं। आगे बढ़ने में सहारा देना यही एक रीति−नीति वहाँ निर्धारित रहती है। आँतें अपने अन्त−करण का रस निचोड़ कर उस पर बरसाती चलती है। इस वातावरण में अन्न, भाव−विभोर हो जाता है। उसका रोम−रोम द्रवित हो जाता हैं। सद्व्यवहार हिंस्र पशुओं और दुष्ट दानवों को भी बदल देता है फिर जिनमें अपना सौजन्य भी मौजूद हैं उन्हें बदलने वाली परिस्थितियाँ बदल कर ही छोड़ती हैं।

आँतों की लम्बी यात्रा में जब आहार इतना पच जाता है कि वह लेते−लेते लज्जित होकर देने के लिए आतुर होने लगे तो उसका वह अनुरोध भी स्वीकार किया जाता है। स्नेह करने वाला अनुदान प्रस्तुत करता है सो ठीक पर उसका रंग इतना गहरा होता है कि प्रिय पात्र को भी वैसा ही अनुदान देने में संकोच नहीं पड़ता वरन् उसका अन्तःकरण भी वैसा ही आतुरता ग्रस्त हो जाता है जैसा कि प्रथम पग उठाने वाले ने साहस पूर्वक उठाया है। पेट और अन्न के भाव भरे आदान−प्रदान में यही रीति−नीति चलती है। आँतों की राह आगे चलने वाला अन्न अपने को अनुदान के रूप में प्रस्तुत करता है। यह अनुदान पेट यकायक स्वीकार नहीं करता वरन् बड़ी मनुहार के साथ थोड़ा−थोड़ा करके ग्रहण करता हैं।

छोटी आँतों में खाइयाँ, गड्ढे और अंकुर होते हैं। इनका काम है पचे हुए भोजन के उपयोगी अंश को चूसना और उसे शुद्धि के लिए अन्यत्र भेजना। निकम्मे अंश को बाहर निकाल फेंकना।

मनुष्य में उत्कृष्टता की यात्रा विद्यमान है। उसी को स्वीकार किया जाना चाहिए और उसे भी परिष्कृत किया जाना चाहिए। हर मनुष्य में कुछ निकम्मापन भी मौजूद है। उसे अस्वीकार किया जाय। उसकी प्रतिक्रिया विरोध के रूप में खड़ी करने की अपेक्षा उपयुक्त यह है कि उस अंश को उपेक्षित बहिष्कृत कर दिया जाय।

यही है दूसरों को आत्मसात करने का तरीका। पेट इस विद्या प्रवीण है। उसका अन्न के प्रति यही व्यवहार है। जो अपने पास है उसे प्रिय पात्र के ऊपर रुचि मन से उड़ेलता चला जाता है उसकी प्रतिक्रिया यह होती है कि अन्न को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व ही समाप्त करना पड़ता है वह प्रेमी के साथ रहना ही स्वीकार नहीं करता वरन् उसी के रंग रूप में परिणित हो जाता है, वही बन जाता है। हम यदि ईश्वर को अपना बनाना चाहें, तो उसके साथ वही व्यवहार करे जो पेट अन्न के साथ करता है। जिन स्वजन साथियों को अपना बनाना है, उन्हें अपने आत्मसात् कर सकने की उदारता, मृदुलता, सद्भावना अपने भीतर पैदा की जानी चाहिए तभी अभीष्ट सफलता मिलती है। देने के लिए कृपणता और लेने के लिए आतुरता की नीति अपना कर मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहता है। प्रेम क्षेत्र में तो कृपणता को असफलता ही मिलती है।


Quotation

“अध्यात्म और व्यवहार अलग−अलग अन्धे और पंगु के समान है। दानों अलग रहकर मंजिल नहीं पा सकते। दोनों का संयोग ही योग है।”

—आचार्य तुलसी

व्यसंग सबसे बुरे और सबसे घिनौने डडडड की लोग यह सोचते रहते हैं कि उनके डडडड संग्रहित होगी उसी हिसाब से स्वडडडड बढ़ेगा। लोग उनके भाग्य और डडडड बड़प्पन का गौरव प्रदान अनेकों को बढ़−चढ़कर बहुमूल्य संपदा डडडड प्रोत्साहन दिया। वे उस संचय डडडड लोगों की आँखों को चौंधियाने का डडडड सम्भव है उनके आस−पास घिरे डडडड समर्थन भी किया हो और प्रशंसा डडडड अन्ततः इसका क्या परिणाम हो डडडड सके और न समझ सके।

डडडडत प्रदर्शक ईर्ष्या को जन्म देता है। डडडड करने के लिए अनेकों के मुँह में से डडडड जैसे भी बने वैसे उसे हथियाने के डडडड का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार डडडडन्त्रित करने का श्रेय या दोष उस संग्रह और उसके उद्धत प्रदर्शन को डडडड है।

डडडड इतिहास इसी प्रकार का है। वह जहाँ भी गया, जहाँ भी रहा अपने साथ विपत्ति भी लेकर गया और उसे रखने वाले के लिए प्राणघात की विपत्ति संजोये रहा। शाहजहां ने ‘तख्त ताऊत’ इसलिए बनवाया था कि वह संसार के सबसे वैभवशाली लोगों में गिना जा सके। उसकी पीढ़ियाँ उस पर बैठ कर पुरखों के पुरुषार्थ के गीत गाती रहें, पर वैसा हो न सका जैसा कि चाहा गया था। वैभव का संपादन करने वालों की दुर्भाग्य से एक आँख कानी होती है। वे एक पक्षी—एकाँगी विचार कर पाते हैं यह नहीं देख सोच पाते कि सम्पत्ति संग्रह का एक विपरीत पक्ष भी है और वह इतना घातक है कि महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति को अत्यंत कष्टकारक परिस्थितियों में सदल देता है।

कोहिनूर हीरे का इतिहास भी बड़ा विचित्र और विलक्षण है। भागवत पुराण में उसका उल्लेख स्वमतक मणि के रूप में मिलता है। द्वारिका के एक नागरिक सत्राजित के पास वह था। कृष्ण ने उससे कहा यह मणि राजा के योग्य है। उसे महाराज उग्रसेन के पास पहुँचाना चाहिए। सत्राजित एस पर तैयार न हुआ तो घटना−क्रम ने दूसरा ही मोड़ ले लिया। सत्राजित का भाई प्रसेनजित उसे सदा छाती से लगाये फिरता था एक दिन सिंह ने प्रसेनजित को मार कर वह मणि छीनी, सिंह को रीछ ने मारकर उस पर कब्जा जमाया। रीछ की भी खैर नहीं रही। श्री कृष्ण ने रीछ को परास्त किया उसने न केवल मणि को वरन् उसकी बेटी को भी हथिया लिया। श्री कृष्ण भी उसे पाकर चैन से न बैठ सके और बहेलिये के हाथों मारे गये। उसके बाद वह पाण्डु वंशियों के पास पहुँचा। परीक्षित, जन्मेज, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिम्बसार, अशोक, ब्रहद्रथ, पुष्य मित्र—एक के बाद एक के पास पहुँचने की कथाएँ भी बड़ी कष्टकर हैं। उसका हस्तान्तरण शान्ति और सद्भावना पूर्ण नहीं हुआ वरन् दुरभि संधियाँ और हत्याएँ ही उसे इधर−उधर लिये फिरीं।

कनष्कि, चन्द्रगुप्त, हर्षवर्धन के बाद डडडड यशोवर्मा के पास पहुँचा। उनके वंशज राजा रामदेव पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और मालव देश को पद दलित करके उस हीरे को हथिया लिया। इसके बाद दिल्ली के बादशाहों के अधिकार में वह देर तक बना रहा। इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद उसकी बगम दिल्ली छोड़कर आगरा आ गई थी। उस पर हुमायूं ने हमला कर दिया। इज्जत बचाने के लिए बेगम को हीरा हुमायूँ की भेंट करना पड़ा।

हुमायूँ की मौत सीढ़ी पर से फिसलने के कारण हो गई पीढ़ियों तक उसके वंशजों के पास बना रहा। मुहम्मदशाह पर ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने हमला कर दिया और उसकी पगड़ी में छिपा हीरा झटक कर अपने कब्जे में कर लिया। नादिरशाह के मुँह से उसे देखते ही शब्द निकला—कोह—ए—नूर—अर्थात् प्रकाश का पर्वत। इसे लेकर प्रचुर सम्पदा के साथ वह वापिस लौटा तो रास्ते में भयानक तूफान में उसकी सेना तथा सम्पदा का बड़ा भाग नष्ट हो गया। नादिरशाह चैन से न बैठ सका। उसके मतीजे अलीकुली खाँ ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उसका यह लाभ अफगान सेनापति अहमदशाह अब्दाली से न देखा गया उसने अलीकुली खाँ को मौत के घाट उतारा और कोहनुन अपने कब्जे में कर लिया।

अहमद शाह अब्दाली के बाद उसका पुत्र तैमूर शाह इस हीरे का अधिकारी बना। वह जब मरा तो अपने पीछे 23 बेटे छोड़ गया। उनमें सत्ता के लिए तुमुल युद्ध हुआ। उसमें जमान शाह जीता। उससे छीनने के लिए उसके विश्वासी भाई महमूदशाह ने ही उसे कैद में डाल दिया और मन्त्रणा देकर आँखें निकलवालीं। महमूद को कुचल कर शाहशुजा ने उसे पाया। शाहशुजा कैद में पड़ा हुआ था। उसने अपनी मुक्ति के लिए पंजाब के महाराज रणजीतसिंह से अपनी बेगम के द्वारा प्रार्थना कराई और बदले में कोहिनूर देने का वायदा किया। महाराज ने काबुल के वजीर फतह खाँ को साथ लेकर शाहशुजा को छुड़ाया। शाहशुजा ने छूटने पर हीरा देने में आनाकानी की तो उसे महाराज ने यन्त्रणा देकर विवश कर दिया। उसे देना तो पड़ा पर वह अन्य हीरों के साथ भाग खड़ा हुआ और अंग्रेजों से जा मिला।

महाराज रणजीत सिंह के मरने के बाद उनका राज्य अंग्रेजों के हाथों में चला गया और साथ ही वह बहुमूल्य हीरा भी। महारानी विक्टोरिया के ताज में उसे और भी खूबसूरत बनाकर जड़ा गया। इसे तराशने और चमकाने में योरोप के कुशलतम रत्न−शिल्पी 38 दिन तक लगे रहे और उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बनाया।

कोहिनूर प्रख्यात है—बड़ा है इसलिए उसकी चर्चा भी बड़ी है। छोटी−मोटी रत्न राशियाँ भी ऐसी ही विपत्ति सँजोये हुए मिलेंगी। चूँकि छोटी सम्पदाएँ छोटे लोगों के पास होती हैं और उनकी प्रतिक्रिया एवं विपत्ति भी ऐसी होती है जो सम्बद्ध लोगों को तो पूरी तरह संत्रस्त करे पर ऐतिहासिक घटनाओं में अपना स्थान न पा सके। हस्र छोटे और बड़े अनावश्यक संग्रह का प्रायः एक जैसा ही होता है।

ऐसी ही दुर्गति शाहजहाँ के उन अरमानों की हुई जिनमें वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनकर गौरवशाली बनने के स्वप्न देखता रहता था। तख्त ताऊस (मयूर सिंहान−) शाहजहाँ ने बनवाया था, उसमें 12 करोड़ रुपये के रत्न जड़े थे उसके निर्माण में सात वर्ष लगे और तत्कालीन श्रेष्ठतम रत्न शिल्पियों ने उसे बनाने में अपना पूरा श्रम, समय एवं मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पाँच खम्भों पर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था। पाये ठोस सोने के बने थे। खम्भों पर दो−दो मोर नृत्य करते हुए बनाये गये थे। प्रत्येक जोड़े के बीच में हीरे—लाल, मोती, पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक−एक पेड़ था। बैठने के स्थान तक पहुँचने के लिए तीन रत्न जटित सीड़ियां थीं। उसमें कुल मिलाकर ग्यारह चौखटे थीं। मीनाकारी का स्वर्ण छत्र देखते ही बनता था। तख्त ताऊस को अपने समय की अद्भुत और बहुमूल्य कलाकृति माना जाता था।

जिन अरमानों के साथ शाहजहाँ ने उसे बनाया था वे पूरे न हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब ने उसे पकड़ कर कैद में डाल दिया। औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हुआ। मुहम्मद शाह राज्याधिकारी था। उस पर ईरान का नादिरशाह चढ़ दौड़ा और भारी लूट−खसोट के अतिरिक्त तख्त साऊस भी फारस उठा ले गया। उसी के कुटुंबी कुर्दा ने नादिरशाह की हत्या कर दी और उसका सारा माल असबाब छीन लिया और जिसमें यह मयूर जड़ित सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े−टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बाँट दिया। बटवारे में उस शानदार शामियाने का भी कतरव्यौंत कर लिया जो उस सिंहासन के ऊपर ताना जाता था और, रत्नों की झिलमिलाहट में आकाश में चमकने वाले सितारों की बहार देता था।

इसके कुछ समय बाद ईरान की सत्ता आगामुहम्मद शाह ने सम्भाली। उसने नादिरशाह के लुटेरे वँशजों को पकड़ कर भारी यातनाएँ दीं और लूट का सारा माल उगलवा लिया। इस वापिसी में तख्त ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। जौहरियों ने उन टुकड़ों को जोड़−तोड़कर एक नया तख्त ताऊस बनाया। इसके बाद भी वहाँ अराजकता और गृह युद्ध का सिलसिला चलता रहा और उसे फिर लूट लिया गया। रत्नों को उखाड़ लिया और कीमती पत्थरों को भविष्य में फिर कभी काम में लाने की दृष्टि से समुद्र में किसी खास जगह छिपा दिया गया। छिपाने वाले उस स्थान को बता नहीं सके और वे अवशेष अभी भी ईरान के समुद्र तट के निकट उथली जल राशि में छिपे पड़े हैं। ढूँढ़−खोज से अभी तक उनका पता नहीं चल सका।

अहंकारी मनुष्य न जाने कब तक सम्पत्तिवान होने पर बड़ा आदमी बनने की साघ सँजोये रहेगा। रावण,हिरण्यकश्यप से लेकर नेपोलियन, सिकन्दर तक इसी मूर्खता में अपनी प्रतिभा को नष्ट कर चुके और दुखदायी अन्त देख चुके। हमारी आँखें यदि उन अनुभवों से खुल सकें और संग्रह की अपेक्षा सदुपयोग के लिए अपना उपार्जन प्रयुक्त कर सकें तो कितना अच्छा हो।


सन्त एकनाथ (kahani)

सन्त एकनाथ के पिता का श्राद्ध दिन था। उस दिन बहुत से पकवान , मिष्ठान  और स्वादिष्ट व्यंजन बने। व्यंजनों की महक मुहल्ले भर में फैल रही थी। पड़ोस में अछूता के घर थे। उनके बच्चों ने व्यंजनों की चर्चा सुनी तो उन्हें पाने के लिए लालायित हो गये। आपस में कहने लगे—हमारे भाग्य में यदि ऐसे ब्राह्मण होना बदा होता तो हम भी इन व्यंजनों को पाते।

एकनाथ ने वह चर्चा सुन ली। उनसे रहा न गया और तत्काल दौड़ते हुए गये, जाकर सब अछूत बच्चों को लिवा लाये और उन्हें ब्राह्मणों के स्थान पर बिठाकर आदर पूर्वक भोजन करा दिया।

स्पष्ट था कि निमन्त्रित ब्राह्मण यह सहन न करेंगे कि उनसे पहले ही अछूतों को भोजन करा दिया जाय। सो सन्त ने दुबारा अलग से रसोई बनवाई और आमन्त्रित ब्रह्मदेवों को सम्मान सहित नियत समय पर बुलाया।

पर चर्चा तो पहले ही फैल चुकी थी कि ब्राह्मणों के आने से पूर्व ही अछूत बालक भोजन कर चुके हैं। सो निमन्त्रित ब्राह्मणों में से कोई आने को तैयार न हुआ, सभी ने इसे अपना अपमान माना और जाने से इनकार कर दिया।

ब्रह्मभोज न हो तो श्राद्ध पूरा कैसे हो? पितरों की हव्य−कव्य कैसे मिले? असमंजस में सारा एकनाथ परिवार डूबा बैठा था।

पूजा में प्रतिष्ठापित भगवान् ने यह देखा सो वे बोल ही पड़े। ब्रह्मभोज तो पहले ही हो चुका। यदि पितरों को ही खिलाना है तो स्वयं उपस्थित होंगे। उनकी थाली लगाओ न।

थाली लगाई गई। सभी पितर सूक्ष्म शरीर से आये और अपना भाग ग्रहण करके प्रसन्नता पूर्वक वापिस चले गये। अछूत बालकों के रूप में असली ब्राह्मणों को समय से पूर्व ही भोजन करा देने की उन्हें प्रसन्नता थी—अप्रसन्नता नहीं।


भक्तों की दरिद्रता

जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया। वह दौड़ी−दौड़ी ओघड़दानी शंकर के पास गयीं और कहने लगीं−”भगवन्! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पसीजता। कम−से−कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।”

“शुभे! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?”

शंकर ने हँसते हुए कहा।

“तो क्या तुम्हारे भक्तों को उद्रपूर्ति के लिए भोजन को आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?”

“परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।”

भगवान शंकर के आदेश को देर थी कि पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली—”बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?”“अवश्य भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगा कर उपक्रम करने लगा। ‘बेटा! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।” भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया। भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। ‘वत्स! तुम कहाँ जा रहे हो? भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं। मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।’

प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा—’अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शाँत करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैला कर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।

पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा मैं सर्वशक्ति मान हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।

भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में शिर झुकाया और कहा—यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन−दुखियों के लिए लगाता रहे और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।

पार्वती जी एवमस्तु कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुसकराते हुए कहा—भद्रे, मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं। भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।


Quotation

सूखी उसे नहीं कहा जाना चाहिए जिसे दूसरे लोग सुखी समझते हैं। असल में सुखी वह है जो अपने सन्तुष्ट है।


हृदय रोगों का कारण और निवारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षण के अनुसार एक लाख के पीछे 456 मौतें हृदय रोगी की है। केन्सर की विभीषिका का नम्बर इसके बाद आता है। अन्य सब रोगों का नम्बर इसके बाद का है।

हृदय के दौरे क्यों आते हैं और उनका उपचार क्या हो सकता है यह जानने से पहले हमें इस महत्वपूर्ण अवयव की संरचना की थोड़ी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

हृदय चार कक्षों में विभक्त है।दाई ओर के दो का काम यह है कि वे रक्त को फेफड़ों में भेजकर उसमें आक्सीजन का सम्मिश्रण करायें। बाईं ओर के दो कक्षों का काम यह हे कि शुद्ध रक्त को सम्पूर्ण शरीर में भेजें। दो निकास नलियाँ हृदय से निकलती है। (1) पल्मोनरी आटंरी−धमनी, (2) एओर्ट−महाधमनी, पहली फेफड़ों तक जाती है और दूसरी शेष शरीर को। महाधमनी में ऐसे वाल्व होते हैं जो एक ही दिक्षा में खुले और बन्द हों। उसी विशेष व्यवस्था के कारण रक्त उल्टा नहीं लौट सकता।

बुढ़ापे से लेकर आहार−बिहार तक की विकृतियाँ और दुश्चिन्तायें जैसे कारण मिलकर हृदय रोप उत्पन्न करते हैं। खराबी फरीर में अधिक चार्दी वाले रसायन कोलेस्टेरोल−इकठ्ठा होने से आरंभ होती है। इससे धमनियों में जकड़न−आर्थेरोस्वलेरोसिस की शिकायत बढ़ती है। नाड़ियाँ मोटी और बड़ी होती चली जाती है। दूसरी ओर रक्त में चर्बो केंथक्के−थ्रोम्विन− बढ़ते है और वे इन कड़ी नाड़ियों में उलझते हैं। जब तक नाड़ियों में कोमलता रहती है तब तक वे रबड़ की तरह रहती है पर जब ते अकड़ जाती है तो उनकी फूलने फलने की क्षमता कुण्ठित हो जाती है। इसी दशा में थक्के जब अड़ जाते हैं तो रास्ता रुक जाता है और दिल का दौरा सामने आप्त है। नाड़ियों में बढ़ने वाली कठोरता अन्ततः हृदय की कठोरता−स्टेनाकार्डिया−में परिणत होती है और वह कठोरता जब रक्त भिषरण में अड़चन उत्पन्न करती है तो स्थानीय संघर्ष उठ खड़ा होता है और सूजनया घाव का जन्म देता है। इसी परिस्थिति का डाक्टरों की भाषा में मायोकार्डियल इन्फ केशन कहते हैं। क्रमिक रूप से बढ़ती हुई यह विकृतियाँ हृदय रोगों की छोटी−बड़ी साध्य असाध्य−स्थिति के रूप में जानी जाती है।

दिल के दौरे के यों अनेक कारण और अनेक स्वरूप हो सकते है पर ‘हार्ट अटैक’ नाम से प्रचलित व्यथा में अधिकाँश रोगियों को एक ही कठिनाई का सामना करना पड़ता कि हृदय को रक्त लाने ले जाने वाली नाड़ियों का पीलापन घट जाता है और उनकी दीवारें कठोर हो जाती है। एक ओर तो नाड़ियों की यह सिकुड़न तथा कठोरता ओर दूसरी ओर सक्त में चर्बी की तथा खून की फूटकी सी बढ़ने लगती है। यह फुअकी रक्त नाड़ियों में अटके जाती है तो हृदय के और भूख में तड़प कर मरने लगता है। यह तड़पन त्रिल के दर्द के रूप में प्रकट होती है। यह आँशिक क्षति हुई। नसों पर श्रम जन्य दबाव न पड़े तो आहिस्गी के साथ उस अवरोध का कोई न कोई मार्ग निकाल देती है। ऐसा भी हो जाता है कि जो दूसरी नाड़ियाँ उस क्षुधित स्थान को रक्त पहुंचाती थी्रं अधिक सक्रिय होकर अवरोध अड़ गया था उसमें कुछ अधिक बड़ा संकट न रहें।

कभी−कभी हृदय की कोई दीवार ही घायल हो जाती है या कोई अंग ठीक तरह काम कर सकने के अयोग्य हो जाता है तब भी दिल में दर्द या दौरे पड़ने लगते है। बूढ़ा और कमजोर है और उसकी चाल घटने−बढ़ने से लेकर सक्त के अवरोध तथा घर्षण से सह्य या असह्य पीड़ा होने लगती है। कहना न होगा कि हृदय की विपत्ति का प्रभाव समस्त शरीर पर पड़ता है। रक्त का शोधन आर संभरण ठीक तरह न होने पर अंगों को न तो उचित मात्रा में रक्त मिलता और न वह आवश्यक शक्ति देने योग्य शुद्ध होता है ऐसी दशा में शिर चकराने से लेकर पसीना छूटने तक अनेकों प्रकार के उपद्रव विभिन्न स्थानों पर उठ खड़े हो सकते हैं। हृदय का दौरा पड़ने पर शरीर की प्रायः सभी स्वाभाविक क्रिया−प्रक्रियायो लड़खड़ा सकती है।

हृदय रोगों के यों अनेकों भेद, उपभेद हैं पर उनमें तीन मुख्य है−(1) ऐजाईनर पैक्टोरिस, (2) कोरोनरी थ्रोम्बोसिस,, (3) कोरोनरी ऐम्वोलिज्म। कोरोनरी ऐम्वोलिज्म।

ऐंजाइना पैक्ओरिस में दर्द अधिक होता है, रोगी जोर से चिल्लाता है और बेहोश हो जाता है। दर्द का फै लव सरने के दाँये−बाँये, कन्छे, गर्दन और बाजू तक बढ़ जाता है। ऐसे दौरे अक्सर का करत−करते पड़ जाते है। ब्लड़ प्रेसर, डाइविटिज, मिफ लिस जैसे रोग पहले से मौजूद हों तो वे इसे आमंत्रित करते रहते है।

कोरोनरी थ्रोम्बोसिस का दर्द हल्का और लगातार कई दिनों तक टिकने वाला होता है। इस तरह के दौरे प्रायः 40 वर्ष से ऊपर के लोगों पर ही इसका आक्रमण होता है। पसीना छूटना, मुँह से लार गिरना, जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

कोरोनरी एम्बोलिज्म उस स्थिति में जिसमें कोई रक्त की फुटकी हृदय नाड़ी में अड़ी होती हो, हड्डी टूटने पर उस जगह से हवा का रक्त के साथ मिलकर बुलबुला उत्पन्न करना और उसका हृदय में रुक जाना भी इस उपद्रव का कारण होता देखा गया है।

दिल के दौरे का एक कारण फ्योक्रमो साइटोमा एक प्रकार का ट्यूमर भी जो एड्रीनल रस ग्रन्थि में जाया जाता है। मानसिक तनाव बना रहने पर यह संकट भी उत्पन्न होता है और उसका प्रभाव दिल के दौरे तक जा पहुँचता है। अधिक दिमागी काम करने वाले अथवा परेशान रहने वाले ही बहुत करके इस व्यथा से जकड़ जाते है।

हृदय का दौरा पड़ने पर डॉक्टर अपने ढंग से अपना काम करने में लग जाता है। वे उस कारण को ढूँढ़ते हैं।

जिसके कारण व्यथा की उत्पत्ति हुई है। परीक्षण निरीक्षण, इसके बाद दवा−दारु, विश्राम, निद्रा और उतने पर भी कुछ न बन पड़े तो आपरेशन या निकम्मा दिल को हटाकर किसी दूसरे का उस स्थान पर फिट करना; पर देख गया है कि सामयिक उपचार करने के उपरान्त भी जड़ नहीं कटती और दौरे बार−बार पड़ने रहते हैं कुछ दिन विराम मिलने के बाद बीमारी फिर र उभर आती है।

इन रोगों का निदान करते हुए—रक्त भिषण के कारण उत्पन्न विद्युत प्रवाह की स्थिति जाँचने का काम इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम से लिया जाता है। दिल की किसी माँस पेशी के मर जाने से लेकर अवरोध एवं घाव होने तक की स्थिति का पता इस परीक्षा से बनने वाले ग्राफों द्वारा चल जाता है। कार्डि एकमानीटर की क्षमता इससे भी अधिक है वह टेलीविजन के पर्दे पर आने वाली तस्वीरों की तरह दिल की हरकत के चित्र प्रस्तुत करता रहता है।

हृदय के कक्षों में नलियाँ डालकर अन्दर का दबाव जानने का प्रयत्न किया जाता है और रक्त के स्तर का पता लगाया जाता है इस प्रक्रिया को कार्डियेक कैथेटेरा−इजेशन कहते हैं। हृदय में रंग का प्रवेश करके उसके फोटोग्राफ लेना और आन्तरिक स्थिति का पता लगाना ऐंगियो कार्डियोग्राम कहा जाता है। ऐसी ही अन्य परीक्षा प्रक्रियायें हैं जिनके द्वारा हृदय पर कहाँ क्या बीत रही है इसका विवरण जाना जाता है।

दिल का दौरा पड़ने पर चिकित्सक प्रधानतया एक ही काम करते हैं कि रोगी को अधिकाधिक विश्राम करने करने की सलाह देते हैं, यहाँ तक कि करवट बदलने जैसे श्रम में भी दूसरों का सहारा लेने की व्यवस्था करते हैं। स्थिति के अनुसार पूरे या अधूरे विश्राम की व्यवस्था इसलिए कराई जाती है कि रोगी पर शारीरिक श्रम के कारण पड़ने वाले दबाव से उसे बचाया जाय। शारीरिक श्रम स्वभावतः रक्त के अधिक तेज बहाव की माँग करता है इससे दिल पर बोझ पड़ता है और कष्ट के शमन करने में कठिनाई पड़ती है इसलिए ऐसी परिस्थिति में विश्राम अनिवार्य हो जाता है। दर्द घट जाने पर भी रोगी को निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए वरन् क्षत अंगों को अपनी स्वाभाविक स्थिति में आने तक काम न करने की छुट्टी दी जानी चाहिए। दिल के रोगी दर्द की अधिकता से नहीं आक्सीजन के अभाव से मरते हैं। श्रम बढ़ेगा तो आक्सीजन का खर्च भी बढ़ेगा। रक्त उसे पूरा हो जाय इसलिए दौरा पड़ने दिनों में तो रागी को अधिकाधिक विश्राम करना ही चाहिए और आगे भी जीना चढ़ने, दौड़ने, भारी वजन उठाने जैसे श्रमसाध्य कार्यों से बचना चाहिए। औषधि के रूप में भी इस अवसर पर ऐसी दवाएँ दी जाती हैं जो तन्द्रा एवं निद्रा की स्थिति पैदा करें और रोगी की बेचैनी तथा चिल्लाहट बन्द हो जाय। खाने कि की दवाएँ हों या सुई लगाने की उसमें तन्द्रा निद्रा लाने वाले तत्व आशय रहेंगे। विपत्ति की घड़ी में यह काम चलाऊ उपचार एक प्रकार से आवश्यक हो जाता है।

थके को विश्राम देना—घाव भरने के लिए क्षत−विक्षत स्थान को बिना हिलाये−डुलाये पड़ा रखने उचित भी है। उदर रोगों में उपवास कराके जिस प्रकार उस क्षेत्र को पुनः कार्य के लिए समर्थ बनाया जाता है ठीक उसी प्रकार तन्द्रा उत्पन्न करने वाली औषधियों द्वारा अथवा रोगी को वैसा करने का निर्देश देकर चिकित्सक लोभ क्षति पूर्ति कराते हैं।

ऐड्रिनेलिन, डिजिटेलिस, मेफेन्टिन, आदि औषधियों का डाक्टर लोग समय पर प्रयोग किये जा रहे हैं। नकली दिल बनाये और लगाये जा रहे हैं। एक का दिल निकाल कर दूसरे के सीने में फिट करने के भी कई प्रयोग हुए हैं। दिल की मालिश, से लेकर स्थानीय गड़बड़ी का छोटा ऑपरेशन तक के अनेक उपचार कार्यान्वित किए जा रहे हैं। रूसी विशेषज्ञ प्रो. क्यास्नी कोव, चेकोस्लो− वाकिया के डा. केरोल सिक्का प्रो. नेगोवस्की डा. फासँमान आदि विशेषज्ञों ने हृदय चिकित्सा के नये आधार और नये उपकरण प्रस्तुत किये हैं।

छुट−पुट आपरेशन तो कभी−कभी सफल हो जाते हैं पर हृदय प्रत्यारोपण की दिशा में शरीर शास्त्रियों का अत्यधिक उत्साह होने पर भी अभी उस दिशा में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिली है। शरीर ने अपने ऊपर दूसरे दिल का आधिपत्य सहन और स्वीकार नहीं किया है।

अमेरिका में 9 व्यक्तियों का, दक्षिण अफ्रीका में 4 का और भारत में 2 का दिल एक से दूसरे को लगाया गया है। यह पंक्तियाँ लिखी जाने तक 22 आपरेशन इस प्रकार के हुए हैं। आगे यह संख्या बढ़ती ही जायगी।

वूस्टर पम्पी को नकली हृदय के रूप में विकसित किया गया है। अमेरिका में 2500 व्यक्ति इसी के सहारे अपने हृदय की गाड़ी, लुढ़का रहे हैं। गैस एण्डटेंकेक्टोनी प्रक्रिया से भी बहुत लोग लाभान्वित हुए हैं।

चिकित्सकों के सहयोग तथा चिकित्सा उपचार की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है। पर उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि हृदय रोगों के मूल कारणों को समझा जाय और उनको समय रहते रोका जाय ताकि इस महारोग की विभीषिका पर अंकुश रखा जा सके। आग लगने पर पानी डालने के लिए दौड़ना अच्छा है, पर इससे भी अच्छा यह है कि आग लगने ही न देने की सावधानी बरती जाय।

यदि हम शारीरिक और मानसिक स्थिति को सन्तुलित बनाये रह सकें तो निश्चित रूप से ऐसी सुदृढ़ता और सशक्त ता बनी रहेगी जिसके रहते किसी हृदय को रोगों की व्यथा से ग्रसित न होना पड़े।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संसार भर में इन दिनों हृदय रोगों की वृद्धि का कारण मानसिक उद्वेगों को बताया है। बढ़ती हुई नशेबाजी और कामुकता भी इसका एक बड़ा कारण है। अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों में कुपोषण, गरीबी जैसे अभाव जन्य कारण नहीं हैं फिर भी वहाँ हृदय रोग पिछड़े कहे जाने वाले देशों की अपेक्षा अनास्था, अशान्ति, अनिश्चितता और असंयम जन्म उद्वेगों का दिन−दिन उभरते जाना ही कहा जा सकता है।

हृदय विशेषज्ञ डा. ह्वाकनेन्स का कथन है कि— डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड दिल के रोगों को बढ़ा रहा है। यदि लोग इतनी ही राशि, फल सब्जियों पर खर्च करने लगें और अपनी खाने सम्बन्धी आदतें सुधार लें तो न केवल दिल के दौरे से वरन् अन्य रोगों से भी रक्षा हो सकती है और सुखपूर्वक जिया जा सकता है।”

हावार्ड विश्वविद्यालय केम्ब्रिज (मेसाचूसेटस) की हृदय रोग अन्वेषी परिषद द्वारा डा. होवार्ड वी.स्प्राग के नेतृत्व में जो शोध कार्य चल रहा था उसकी रिपोर्ट 1923 पृष्ठों में प्रकाशित हुई है उसमें जहाँ संरचना संबंधी खराबियों से उत्पन्न होने वाले हृदय रोगों की चर्चा है वहाँ मानवी रहन−सहन को भी दोषी ठहराया गया है और कहा गया है कि ‘यदि लोग हलका, हरा और सुपाच्य भोजन किया करें, दिनचर्या उद्वेगों से बचे रहें नशेबाजी से परहेज रखें तो बढ़ते हुए हृदय रोगों के संकट से तीन चौथाई मात्रा में छुटकारा मिल सकता है।

एडिनवरा विश्वविद्यालय के डा. पैसमोर ने बढ़ते हुए हृदय रोगों के कारण तलाश में लम्बा समय लगाने के उपरान्त निष्कर्ष निकाला है कि—”समृद्धिशाली देशों में एक ऐसा समाज बनता जा रहा है जिससे कम से कम शारीरिक श्रम करना पड़ता जो करते हैं वह मानसिक ही होता पर उसमें शारीरिक परिश्रम के लिए कोई स्थान नहीं रहता। लिफ्टों पर नीचे ऊपर उतरने−चढ़ने मोटरों पर चलने तथा दूसरी आवश्यकताओं के लिए यन्त्रों पर निर्भर रहने से शरीर के बहुमूल्य अवयवों को जंग लगना शुरू हो जाती है। आराम अच्छा तो लगता है पर उसका अभिशाप भयंकर विपत्तियों के रूप में सामने आता है इनमें दिल की बढ़ती हुई को अग्रणी कहा जा सकता है।”

दिल के दौरे से मरने वाले लोगों में 63 प्रतिशत अमीर, 25 प्रतिशत मध्यम वर्ग के और 11 प्रतिशत डडडड लोग होते हैं। यहाँ अमीरी और गरीबी का वर्गीकरण आराम तलबी और श्रमशीलता के आधार पर किया गया है।

हैडिलवर्ग (जर्मनी) के हृदय विशेषज्ञ डा. हिमेंज हुव्समैन ने पश्चिमी वर्लिन में हुई मेडीकल काँग्रेस में अपना निष्कर्ष सुनाते हुए कहा—हृदय रोगों का सम्बन्ध उतना शारीरिक कारणों से नहीं जितना मानसिक परिस्थितियों से है। देखने में यह लगता है कि यह एक माँस पिण्ड है और उसे शारीरिक कारण ही रुग्ण कर सकते हैं पर गहरी खो उससे आगे जाती हैं और वे कहती हैं कि मानसिक घुटन एवं उत्तेजना का सबसे बुरा प्रभाव दिल पर पड़ता है इसलिए अधिक भावुक अथवा घुटन भरी परिस्थितियों में रहने वाले लोग अधिक मात्रा में हृदय रोगों से ग्रसित पाये जाते हैं। आहार−बिहार सम्बन्धी दोष न होते हुए भी— शरीर रचना में कोई गड़बड़ी न रहते हुए भी अनेकों रोगियों को हृदय रोगों से ग्रसित पाया जाता है। उसका कारण उनकी घुटन भरी असंतुष्ट मनःस्थिति में ही देखा जाना चाहिए और उनके उपचार के लिए दवादारू तक सीमित न रहकर उनके चिन्तन में सुधार एवं परिस्थिति परिवर्तन के रूप में भी किया जाना चाहिए।

मस्तिष्कीय उथल−पुथल शरीर के संवेदनशील संस्थान को अस्त−व्यस्त करके रख देती है। स्नायु संस्थान की नेत्री ‘वेगस’ सन्त्रिका को लड़खड़ा देने वाले मानसिक विक्षोभ ही होते हैं। इससे सारा नाड़ी संस्थान ही गड़बड़ा जाता है और फिर उस गड़बड़ी का अन्त हृदयजन्य रोगों के रूप में परिणत होता है। स्नायु रोग न्यूरोसिस, अति रुधिर तनाव—हाइपर टेन्शन—हृदय काठिन्य—स्टेनोकार्डिया—अन्ततः विविध स्तर हृदय रोग बन कर मनुष्य के सामने मृत्यु जैसी विभीषिका उत्पन्न करते है।

यदि मानसिक आवेगों उद्वेगों और मनोविकारों से बचकर रहा जा सके, विचारों में प्रौढ़ता विकसित करके जीवन में आये दिन प्रस्तुत होते रहने वाले उतार−चढ़ावों से हँसते−खेलते निबटते रहने की कला सीखी जा सके तो हृदय रोगों की आधी समस्या सहज ही हल हो सकती है। यह प्रयोजन अध्यात्म तत्व ज्ञान के आधार पर ही पूरा हो सकता है। अस्तु हृदय रोगों से सुरक्षित रहने और दौरा पड़ने पर मनोबल बढ़ाकर भीतरी साहस को बनाये रहने वाले अध्यात्म तत्व ज्ञान का भी महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है।


योग और उसकी उपयोगिता

आत्मा और परमात्मा को—जड़ और चेतन को—प्रकृति और पुरुष को जोड़ देने की प्रक्रिया का नाम योग है। यह ज्ञान और कर्म के दो युग्मों में विभक्त है। ज्ञान योग वह है जो चिन्तन को हेय स्तर से ऊँचा उठाकर देव स्तर तक ले जाता है और मनोवृत्तियों को ब्रह्म चेतना में नियोजित करता है। कर्म योग वह है जिसमें दैनिक क्रिया−कलाप को परमार्थ प्रयोजन के आधार पर संचालित किया जाता है। शरीर और मन को पूर्व संचित पशु संस्कारों से विरत करके दिव्य जीवन के लिए अभ्यस्त करने की जो शारीरिक, मानसिक व्यायाम पद्धतियाँ हैं वे भी योगाभ्यास के नाम से प्रसिद्ध हैं। आसन प्राणायाम, जप, ध्यान, व्रत, तप, मुद्रावंध आदि साधनायें उसी स्तर की हैं।

ज्ञान और कर्म की दोनों ही धाराऐं जब पशुस्तर से ऊँची उठकर देवस्तर की ओर अग्रसर होती हैं तो उसे समग्र योग साधना कहते हैं। केवल स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान प्रभृति, ज्ञान पक्ष तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया अपूर्ण एवं एकांगी है। इसी प्रकार जिन्होंने चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।

बिजली के ठण्डे और गरम दो तार जब मिलते हैं तब विद्युत प्रवाह संचालित होता है। इसी प्रकार ज्ञान और कर्म का—भावना और साधना का स्तर समान रूप से—समन्वित रूप से—आगे बढ़ाया जाता है तो योग साधना की समग्र प्रक्रिया पूर्ण होती है और उसका वह लाभ मिलता है जो सच्चे योगियों को प्राप्त होता रहा है। अध्यात्म शास्त्र में वर्णित योग साधना का महत्व ऐसी ही सर्वांगपूर्ण साधना से सम्पन्न होता है।

योग के महत्व महात्म्य की कुछ चर्चा इस प्रकार मिलती है—

अभ्यासात्कादिवर्णानि यथाशास्त्राणि बोधयेत्। तथा योगं समासाद्य तत्त्वज्ञानंच लभ्यते॥ —धेरण्ड संहिता 125

जैसे क ख ग ध से अक्षरारंभ का अभ्यास करते हुए शास्त्रज्ञ, विद्वान बन जाते हैं, वैसे ही योग का अभ्यास करते−करते तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाता है।

ज्ञान और कर्म के उभय युग्मों के समन्वय को योग से योग की प्राप्ति कहा जाता है।

योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। योऽप्रमत्तस्तु योगे न सयोगी रमते चिरम्॥ —महायोग विज्ञान

योग साधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ पाता है।

तथेति स होवाच—

योगेन योगो ज्ञातव्या योगो योगात् प्रवर्धते। याऽप्रतत्तस्तु योगेन स रपते चिरम्॥1॥ पौभाग्य लक्ष्म्युपनिषद्1

उन्होंने कहा—योग से योग की अभिवृद्धि होती है। योग के द्वारा ही योग को जानना चाहिए। योग में ही दत्त चित्त रहने वाला व्यक्ति चिर शान्ति उपलब्ध करता है।

योग न तो कठिन है, न अशक्य है वह सर्व साधारण के लिए सुलभ है। इस मार्ग पर न्यूनाधिक जितना भी चला जा सके उतना लाभ ही है। हानि की तो आशंका है ही नहीं।

युवा बृद्धोऽतिवृद्धों वा व्याधितो दुर्बलोऽपि वा। अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति सर्वयोगेष्वतन्द्रितः॥

न वेषधारणं सिद्धेः कारणं न च तत्कथा। क्रियैव कारणं सिद्धेः सत्यमेतन्न संशयः॥ —हठयोग प्रदीपिका 1।64-66

युवा वृद्ध, अति वृद्ध, रोगी, दुर्बल कोई भी योगाभ्यास करके सिद्धि प्राप्त कर सकता है॥64

सिद्धि वेष धारण से नहीं मिलती। केवल पढ़ने, सुनने से भी काम नहीं चलता। अभ्यास करने से ही सफलता मिलती है यह निस्संदेह है।66

एते गुणाः प्रवर्तन्ते योगमार्गकृ तश्रमैः। यस्माद्योगं समादाय सर्वदुःखबहिष्कृतः॥ ब्रह्म विद्योपनिषद 58

योगाभ्यास में जो श्रम किया जाता है वह निरर्थक नहीं जाता। प्रयत्नपूर्वक की हुई साधना समस्त दुख, शोकों का निवारण कर देती है।

यह न सोचना चाहिए कि वृद्ध होने पर सब कार्यों से निश्चिन्त होकर योग साधना करेंगे वरन् सही बात तो यह है कि जब तक शरीर और मन समर्थ है तब तक युवावस्था में ही इस पुरुषार्थ को कर गुजरना चाहिए। भगवान कृष्ण ने युवा अर्जुन की योग साधना को प्रशंसनीय एवं उचित बताते हुए कहा—

त्वया साधु समारम्भि न वे वयसि यत्तपः ह्नियन्ते विषयैः प्रायो वर्षीयासोऽपि यादृशाः, (किरातर्जुनीयम्)

“हे अर्जुन! यौवन में तपश्चर्या आरम्भ करके तूने ठीक ही किया है। मेरे जैसे बूढ़े पुरुषों की भी विषय अपनी ओर अकर्षित करते हैं।

साधयेद्या चतुर्वर्ग सैवास्ति नुसाधना॥ —मनु

जिससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही सधते हों, वही सच्ची योग साधना है।

पशु−पक्षी भी मनुष्य के समान ही जीवधारी हैं। उन्हें भी परमेश्वर ने पैदा किया हुआ है उनका पोषण भी हमारी ही तरह धरती माता से मिलता है। सब प्राणियों का एक पिता है—परमेश्वर और एक ही माता है—धरती। इसलिए थोड़ा विशाल दृष्टि से देखें तो प्रतीत होगा कि प्राणी आपस में भाई−भाई ही हैं। विकसित अविकसित का अन्तर तो मनुष्य−मनुष्य के बीच भी पाया जाता है इससे उनके सम्मान एवं अधिकार में कोई अन्तर नहीं आता। मानव मात्र के प्रति जिस प्रकार उदार व्यवहार और सद्भाव बरतने की आवश्यकता समझी जाती है उसी प्रकार उस ममता, आत्मीयता का विकास क्रमशः समस्त जीव−जगत में होना चाहिए। आत्मा का समग्र विकास और विस्तार मनुष्य तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् उसे प्राणिमात्र तक व्यापक होना चाहिए।

अकारण हम दूसरे जीवों को न सताये। माँसाहार जैसे घृणित कर्म से बचें। जब कि प्रकृति ने हमें भरपूर मात्रा में उपयोगी खाद्य प्रदान किये हैं तो क्यों किसी का प्राणघात करें, क्यों किसी के चीत्कार का शाप ओढ़ें और क्यों अपने ऊपर निर्दयता−निष्ठुरता का कलुष पोतें। पालतू पशुओं के साथ अभी और अधिक सहानुभूति पूर्ण सहृदयता का व्यवहार विकसित होना चाहिए और वन्य जीवों की स्वतंत्रता में व्यर्थ ही बाधक नहीं बनना चाहिए।

पशु−पक्षियों को पालतू और प्रशिक्षित बनाने का प्रयास किया जाय तो वे हमारे लिए बाधक न रहेंगे वरन् सहयोगी के रूप में काम करके हमारी समृद्धि और शाँति में सहायता प्रदान करेंगे। उन्हें नष्ट करने पर उतारू न रह कर यदि मानवी प्रयत्न अन्य प्राणियों को प्रशिक्षित करने में लग जायँ तो न केवल प्राणिमात्र के बीच सद्भावना का विस्तार हो सकता हैं वरन् विश्वव्यापी चेतना तत्व को अधिक गति से विकास की दिशा में बढ़ चलने का अवसर भी मिल सकता है। प्राणियों को प्रशिक्षित करने के लिए जहाँ भी प्रयत्न हुए हैं वहाँ आशाजनक सफलता मिली है।

संसार के विभिन्न भागों में विभिन्न आकृति−प्रकृति के वानर पाये जाते हैं। अफ्रीका का गुयेरेजा कोलोवस बन्दर शरीर में तो तीन फुट का ही होता है पर उसकी पूँछ शरीर से भी अधिक लम्बी अर्थात् साड़े तीन फुट होती है। हाथी जो काम सूंड से लेता है लगभग वैसा ही यह पूँछ से लेता है। दक्षिणी अमेरिका के हाडलर वानर का स्वर बहुत तीखा होता है दो मील दूर तक उसकी आवाज सुनी जाती है और क्रोध, हर्ष, पीड़ा कामोन्माद आदि की अनुभूतियाँ उसकी वाणी से सहज ही पहचानी जा सकती हैं। दक्षिणी अमरीका के अमेजन क्षेत्र में पाये जाने वाले सिवाइड्स वानर, गिलहरी और उल्लू की आकृतियों के सम्मिश्रण से बने हुए अपने ढंग के अनोखे प्रतीत होते हैं।

निशाचर डोरोकोलिस, लम्बी दाड़ी वाला साकी, देखने में सुन्दर और अकल का पुतला केपूचिन मनुष्य के साथ कुत्ते की तरह ही घुल−मिल जाता है वह बर्तन धोना, कपड़े सुखाना, झाड़ू लगाना, बिखरी चीजों को सँभाल कर रखना,पंखा झलना, घर की रखवाली जैसे छोटे−मोटे घरेलू काम करने में मालिकों की सहायता करता है। ड्राइंग का अभ्यास करा दिया जाय तो वह खड़िया हाथ में लेकर सीखी हुई आकृति बिलकुल सही बना देता है। वूली बन्दर पर भेड़ जैसी ऊन होती है। मकड़ी की तरह हाथ पैर और पूँछ के सहारे यह एक डाली से दूसरी डाली पर उलटी सीधी चाल से चढ़ता उतरता और उछलता रहता है इसलिए इस बावन का नाम स्पाइडर मंकी पड़ा है। गले की अतिरिक्त थैली में ढेरों फालतू आहार भर कर फिरते रहने वाले बन्दर बोर्नियों में अधिक होते हैं। पूर्वीय गोलार्ध में पाये जाने वाले मैकेक और रहसीस जीवनी शक्ति और सन्तुलित मानसिक क्षमता वाले होते हैं अन्तरिक्ष उड़ान में एक समय इन्हीं का उपयोग किया गया जा था कुत्ते के जैसे मुँह वाले वेवून अरब देशों में पाये जाते हैं वे पेड़ पर चढ़ने की अपेक्षा जमीन पर रहने में सुख, सरलता अनुभव करते हैं।

जर्मन प्राणिशास्त्री कोलर ने अपने पालतू चिंपेंजी ‘सुलतान’ की बुद्धिमत्ता बढ़ाने के लिए उसे कितनी ही गुत्थियाँ सुलझा सकने और अड़चनों का सही हल निकालने के लिए प्रशिक्षित किया था। वह अलमारी खोलकर अपने काम की चीजें निकालता और फिर उसे बन्द कर देता था। लम्बे बाँस के सहारे ऊँची टँगी हुई चीजें उतारना उसे अच्छी तरह आता था ऐसे ही वह और भी कई बुद्धिमानी के काम करता था।

मैडम कोट्स का पालतू चिंपेंजी रंगों के भेद उपभेद समझता था और प्रायः तीस तरह के हलके गहरे रंगों का वर्गीकरण कर लेता था। रेखागणित की आकृतियों को पहचान लेने में भी उसने कुशलता प्राप्त करली थी। क्यूवा में मादाम अब्रू के पास एक विनोदी चिंपेंजी था। वह जब पुरुषों को पास आते देखता तो अपनी मादा को फौरन छिपा लेता, किन्तु कोई स्त्री पास आती तो मादा को प्रसन्नता पूर्वक फिरने देता।

गोरिल्ला वनमानुषों में अग्रणी है। उसकी ऊँचाई छै फुट होती है किन्तु दोनों हाथों को मिलाकर लम्बाई नौ फुट तक जा पहुँचती है। वजन 400 से 600 पौण्ड। यह दो−ढाई इंच मोटी लोहे की छड़ आसानी से तोड़−मरोड़ कर फेंक सकता है। इसकी पकड़ में किसी जानवर का कोई अंग आ जाय तो उसे एक ही झटके में उखाड़ कर फेंक सकता है। संसार प्रसिद्ध फिल्म ‘किंग काँग‘ में प्रमुख करतब एक भीम काय गोरिल्ला कर है। इस फिल्म को अत्यधिक ख्याति मिली।

इस जाति का दूसरा वानर चिंपेंजी अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होता है उसकी हर क्रिया से बुद्धिमत्ता और विचारशीलता टपकती है। अकारण उसे बेतुकी हरकतें करते नहीं पाया जायगा। परिवार भी उसका व्यवस्थित रहता है। एक नर के साथ कई मादाएं सुख और सुरक्षा पूर्वक जीवनयापन करती हैं। पालतू चिंपेंजी के साथ कभी पेचीदगी भरी स्थिति उपस्थित करदी जाय तो वह सहज ही सुलझा लेता है।

जर्मनी में कुछ समय पूर्व एक विश्वविख्यात घोड़ा था—’क्लेवर हान्स’ वह जर्मन भाषा में पूछे गये गणित के छोटे−छोटे प्रश्नों का उत्तर अपनी टाप के खटके मार कर देता था और दर्शक उसकी गणितज्ञ बुद्धि को देखकर चकित रह जाते थे। अमेरिका और फाँस में भी इस तरह के कई घोड़े हो चुका हैं। इनकी बुद्धिमत्ता जाँचने के लिए पशु मनोविज्ञानी थार्नडाइक ने गम्भीर अध्ययन किये हैं कि बुद्धि पर मनुष्य की ही बपौती नहीं है, वह बीज रूप में दूसरे जीवों के भीतर भी मौजूद है और यदि उन्हें उपयुक्त अवसर मिले तो वे भी अपनी बुद्धिमत्ता को बड़ी हद तक विकसित कर सकते हैं।

तंजानिया (अफ्रीका) में पशु अभियन्ता मि. जार्ज के मकान के पास ही पेड़ पर एक गिलहरी ने घोंसला बना रखा था। संसर्ग के प्रभाव से इस गिलहरी ने अपने में ऐसी आदतें उत्पन्न कर ली थीं जिसमें देखने वालों को बड़ा कौतूहल होता था। शराब का चस्का उसे लग गया था। वह चुपके से आती और घर में रखी शराब की बोतलों के कार्क खोल कर मद्य पान का आनन्द लेती। यह गिलहरी प्रायः अपना भोजन इस परिवार से ही प्राप्त करती थी अस्तु उसे समय और स्वाद का अभ्यास हो गया था। नियत समय ही वह भोजन करती और जो वस्तुयें खाने की शिक्षा दी गई थी उन्हें ही चुनकर ग्रहण करती। उसने ‘कमोड में ही टट्टी जाना सीख लिया था। जब भी मल त्यागना होता नियत स्थान पर जाकर अपनी हाजत पूरी करती इधर−उधर मल विसर्जन करते उसे कभी नहीं देखा गया।

मास्को के एक इञ्जीनियर आनातोली वाइकोव ने दो कबूतरों को मशीनों के अच्छे और खराब पुर्जे पहचानने और उनका अन्तर बता सकने की शिक्षा दी। इस पहचान का आधार त्रुटिपूर्ण पुर्जों से अलग ढंग के ऐसे कम्पनों का निकलता था जो बहुत ही संवेदनशील मशीनों से पहचाने जा सकते थे। कबूतर उस अन्तर को समझने में अभ्यस्त हो गये और अपने पाली वालों की अच्छी सहायता करने लगे।

वाइकोव ने लिखा है—प्रशिक्षित कबूतर जिस बारीकी से याँत्रिक खराबी को पकड़ सकते हैं उतनी जानकारी देने वाले निर्देश उपकरण बहुत ही कठिनता से बनाये जा सकेंगे।

शिशुमार नामक मत्स्य जाति का जल का बहुत ही प्रेमी और सहयोगी प्रकृति का होता है। प्रयत्न करने पर वह मनुष्य के साथ हिलमिल जाता है और खुशी से पालतू बनकर रहने लगता है। जापानी मत्स्य विशेषज्ञ मसाइकी नहाजमा का कथन है कि “यदि शिशुमार थल चर होते तो वे मनुष्य के लिए कुत्तों से भी अधिक स्नेही, सहयोगी सिद्ध होते।” वे अपने परिवार के साथ बहुत ही सज्जनता भरा व्यवहार करते हैं।

शिशुमार कोई तीस तरह की ध्वनियाँ अपने मुख से निकाल सकते हैं और उनके आधार पर अपनी मनः− स्थिति का दूसरों को परिचय दे सकते हैं। शिकार पकड़ने के लिए दौड़ते समय वे कुत्ते की तरह भौंकते है। सफल होने पर बिल्ली की भाँति म्यांऊ−म्यांऊ करके खुशी जाहिर करते हैं। पेट भरने पर वे डकार लेते हैं। चटाख की ध्वनि के साथ होठ चाटते हैं। विरोधियों को डराने के लिए पटाखा चलने जैसी आवाज करते हैं।

सिखाने पर वे कई तरह के खेल करते हैं। सीटी बजाने पर उसका जवाब सीटी बजाकर देते हैं। शिशुमार को ‘सिटासियन’ वंश का ह्वोल जातीय समझा जाता है। दिशा बोध और शब्द ज्ञान की उसे अच्छी जानकारी होती है। 25 गज दूरी से फेकी हुई वस्तु को वह इस तेजी से पकड़ सकता है मानो उस वस्तु के साथ ही वह उड़कर आया हो। समुद्री खोज के लिए गहरे सागर तल में बने हुए अमेरिका खोज केन्द्र−सीलैव−2 के लिए एक कुशल कार्यकर्ता के रूप में पालतू शिंशुमार ‘टैफी’ ने असाधारण सहायता की थी। थके हुए गोताखोरों को उनकी कमर में बँधी रस्सी मुँह से पकड़ कर जहाज तक पहुँचा देने में पालतू शिशुमार बड़ा कौशल दिखाते हैं। वे मनुष्य की तरह हँस भी सकते हैं।

ब्रिटिश नौ सेना से रिटायर होकर नीरेकौक के विचिंग्रहम स्नान में फिलिप वेयरे ने अपने आठ एकड़ के खेत में घरेलू चिड़ियाघर बनाया। उसका उद्देश्य पशु−पक्षियों की प्रकृति का अध्ययन और उनकी नस्लों को सुन्दर सुविकसित बनाने का मार्ग खोजना था। अपने विषय में रुचि पूर्वक तन्मय हो जाने के कारण वेयरे ने दुर्लभ पशु−पक्षी प्राप्त किये और उनकी प्रकृति के बारे में नई−नई जानकारियाँ प्राप्त कीं। चिड़ियाघर की ख्याति फैली तो दर्शकों के झुण्ड भी अपने कौतूहल की तृप्ति के लिए वहाँ आने लगे और टिकट की आमदनी से चिड़िया घर का खर्च चलने में सहायता मिलने लगी। मत्स्य विशेषज्ञ स्टेटर ने विभिन्न प्रकार के संगीत के मछलियों पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों का पर्यवेक्षण किया है। कुछ ध्वनियाँ तो मछलियों की इतनी प्रिय लगीं कि वे उन्हें सुनकर उछलने−कूदने और नाचने लगतीं। कुछ ध्वनियाँ उन्हें बिलकुल पसन्द न आई और वे जब बजती तो उपेक्षा पूर्वक मुँह मोड़ कर अन्यत्र चली जातीं। संगीत की विभिन्न ध्वनियों ने उसके शरीर पर भी भिन्न और विचित्र प्रभाव डाले। एक प्रकार के संगीत ने तो उनका वजन और विस्तार बढ़ाने में बहुत सहायता की। एक ध्वनि के कारण उनकी प्रजनन क्रिया दूनी हो गई तथा कहीं अधिक अंडे दिये।

डा. फ्रेंड वाडन ने मछलियों को रंग पहचानना सिखाया और यातायात के नियमों का अभ्यास कराया, वे अपने मालिक और दर्शक का अन्तर करना सीख गई। मिनो जाति की मछलियाँ यह समझने लगीं कि किस प्रकार की आवाज सुनकर उन्हें क्या आचरण करना चाहिए।

प्रो. जे. पी. फ्रोलोफ ने मछलियों को संगीत सुनने का शौकीन बनाने में सफलता प्राप्त की है। वे तालाब में बिजली के तार डालते और संगीत के रिकार्ड बजाते रहे। आरम्भ में मछलियों ने थोड़ा ही ध्यान उस ओर दिया किन्तु धीरे−धीरे उसकी पूरी शौकीन हो गई जैसे ही संगीत की ध्वनि होती वे चारों ओर से वहीं इकट्ठी हो जातीं और ध्वनि केन्द्र को लपकने का प्रयत्न करतीं।

उन्होंने एक तालाब में कुछ मछलियाँ पालीं। भोजन नियत समय पर दिया जाता और चारा डालने से पूर्व घंटी बजाई जाती। थोड़े दिन में घण्टी और चारे का सम्बन्ध वे समझ गई। जब भी समय कुसमय घंटी बजती तभी वे चारे के लिए दौड़ क र इकट्ठी हो जातीं।

पशु−पक्षियों को अपने ही प्राणि परिवार का सम्मानित सदस्य समझ कर उन्हें सुखी−समुन्नत और प्रशिक्षित बनाने की दिशा में यदि हमारी प्रवृत्ति मुड़ सके तो न केवल जीव जगत का उपकार होगा वरन् मानवी उदारता और सद्भावना का एक सुखद अध्याय प्रारम्भ होगा। विश्व चेतना में सदाशयता की वृद्धि करने के प्रयास करके मनुष्य घाटे में नहीं वरन् नफे में ही रहेगा। नये सहयोगियों का नया सद्भाव पाकर मानवी प्रगति में नया उभार ही आवेगा।


रोग के साथ रोगी को भी मार डालना उचित न होगा

विचारशीलता का तकाजा यह रहा है कि रोग को मारना चाहिए रोगी को नहीं। अपराध और अपराधी में अन्तर किया जाना चाहिए। अपराध एक प्रवृत्ति है और अपराधी एक सत्ता। दोनों को एक ही समझ लिया जाय और अपराध के प्रति अपने रोष के आवेश में अपराधी को भी समाप्त करने की योजना बनाई जाय तो यह रोग जैसी ही भूल होगी।

प्रवृत्तियाँ सामयिक होती हैं साथ ही अस्थिर भी। उनके उतार−चढ़ाव परिस्थिति वश आते रहते हैं। कई बार बाहरी घटनाऐं सामने की उलझनें अथवा असन्तुलित मनःस्थिति मनुष्य को ऐसे क्रूर कर्म करने के लिए घसीट ले जाती है जैसा करना उसकी मूल प्रकृति में सम्मिलित नहीं था। नशे की बदहवासी में मनुष्य न जाने क्या−क्या कहता और क्या−क्या करता है, पर नशा उतर जाने के बाद वह स्थिति नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार आवेशों की स्थिति में मनुष्य न जाने क्या−क्या कहता और क्या करता है पर वह उन्माद उतरते ही उस असन्तुलित स्थिति में किये गये कुकर्मों के प्रति पश्चात्ताप भी कम नहीं होता।

अपराधी मनःस्थिति आवेश ग्रस्तता है—मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति नहीं। ज्वर एक आवेश है जीवन क्रम नहीं। सभी आवेश एक आपत्तिकालीन विपत्ति के समान होते हैं। उनसे बचने और बचाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। यों आपत्तिग्रस्त को हटा देना या मिटा देना भी एक उपाय हो सकता है पर वह है बड़ा महंगा। अपना कोई स्वजन रोगी हो तो चिकित्सा, परिचर्या चिन्ता आदि से बचने का एक उपाय यह भी हो सकता है कि उस रोगी स्वजन को मार डाला जाय। ‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’ वाली उक्ति के अनुसार इस उपाय का भी समर्थन किया जा सकता है। पर, दूरदर्शिता यही कहेगी केवल रोग को हटाया जाय, रोगी को तो जीवित रहना चाहिए। इसी मान्यता के कारण चिकित्सकों, चिकित्सालयों और औषधि निर्माण की गतिविधियाँ चल रही हैं। यदि रोग और रोगी दोनों को ही साथ−साथ मिटा देने वाली बात सही होती तो बीमारों के लिए वध गृह ही विनिर्मित किये जाते और चिकित्सा प्रक्रिया के लिये झंझट भरे आधार खड़े नहीं किये जाते।

अपराधियों से अपना पाला पड़ते रहना स्वाभाविक है। क्योंकि अपच की तरह अनाचार भी अब एक सभ्यता जन्य रोग हो गया है। वह एक फैशन बन गया है। नेक की के बदले बदी—मैत्री के बदले छल और विश्वासघात मिलने की बात पग−पग पर देखी जा सकती है। आतंकवादी, अपराधी, अनाचारी और आततायी तत्व अब बेहिसाब बढ़ रहे हैं। उनके उपद्रव आये दिन कुहराम मचाये रहते हैं। प्रतिरोध के अभाव में उनकी बढ़ती हुई उच्छृंखलता को गले उतारना खून का घूँट पीने के समान कष्टसाध्य होता है।

ऐसी दशा में आक्रमण का उत्तर प्रत्याक्रमण भी हो सकता है। आत्म−रक्षा के लिए इस प्रकार की छूट कानून ने भी दी है और न्याय की आचार संहिता ने भी। पुलिस कानून और न्यायालयों की संरचना उसी उद्देश्य के लिए की गई है। समाज शास्त्र और नागरिक शास्त्र के अनुसार यह मानवी कर्त्तव्य घोषित किया गया है कि आततायी तत्वों का मिल−जुल कर सामना किया जाय। एक को सताया जा रहा है तो दूसरे सब लोग उसका प्रतिरोध करने के लिए उठ खड़े हों। अनीति कर्त्ता का न हो कोई समर्थन करे और न सहयोग दे। इतना ही नहीं, यह सोचकर चुप भी न बैठें कि हमें दूसरों के झंझट में पड़ने से क्या लाभ? जिस पर बीते वह भुगते। इस असामाजिक मनोवृत्ति के कारण ही हर भले मानुष को एक−एक करके गुण्डा तत्वों का शिकार होना पड़ता है और थोड़े से आतंकवादी सौम्य जनता की विशाल जनसंख्या को चुनौती देते रहते हैं और किसी को भी अपने उत्पात का शिकार बनाते रहते हैं। उद्दंड और अपराधी प्रवृत्तियों को पनपने के लिए आवश्यक खाद−पानी—जनसमाज की इस कायरता और स्वार्थपरता भरी उपेक्षा वृत्ति से ही मिलता है। यदि अपराधों के प्रति सर्वत्र सजगता रहे—एक पर अनीतिपूर्वक किया गया आक्रमण समस्त मानव जाति पर किया गया हमला माना जाय तो कहीं भी किसी पर भी किये गये अभ्यास को अपने ऊपर किया गया अनाचार ही माना जायगा। सामूहिक प्रतिरोध के सामने मुट्ठी भर अपराधियों को—अपराधों को—ऐड़ी के नीचे रगड़ कर रख दिया जा सकता है।

अपराधों को रोकने के लिए, अपराध कर्ताओं की दुष्टता से निपटने के लिए आवश्यक जनमत जागृत किया जाना चाहिए और जन सहयोग जुटाया जाना चाहिए। सरकारी विभाग भी यदि सहयोग करे तो उसे लेना चाहिए।

पर यह सभी उपाय फुन्सी उठने के उपरान्त मरहम पट्टी करने के बराबर हैं। मूलोच्छेदन की प्रक्रिया यह नहीं है। रक्त शुद्धि की रीति−नीति बरतना वह वास्तविक उपाय है जिससे न फुन्सी उठे और न मरहम लगानी पड़े। अपराधी को दण्ड देना दुर्घटना के उपरान्त किया जाने वाला उपचार मात्र है। इससे समस्याओं का स्थायी हल नहीं हो सकता। अपराधी मनोवृत्ति उत्पन्न होने के कारणों को ढूँढ़ना होगा और शाँत चित्त से उन उपायों को खोजना होगा जिससे रोग को मारने और रोगी को बचाने का उद्देश्य पूरा हो सके।

आज का अपराधी कल सज्जन बन सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखा ही जाना चाहिए। भूतकाल में बाल्मीकि अंगुलिमाल, अजामिल, विल्व मंगल, अशोक आदि अगणित अपराधी प्रवृत्ति वालों का आमूल चूल परिवर्तन संभव बताने वाले उदाहरण सामने आते रहे हैं। वैसा होना अभी भी—कभी भी संभव हो सकता है। इसलिए अपराधों के सामयिक दमन की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी यह दृष्टि रखनी ही होगी कि वह आवेशग्रस्तता आखिर पैदा क्यों होती है? उसकी जड़ कहाँ है? और उसके मूलोच्छेदन के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए?

पहला उपाय यही है कि हम अपराध और अपराधी के बीच का अन्तर समझें और विश्वास करें कि मनुष्य पत्थर का नहीं मोम का बना है उसकी आकृति न सही प्रकृति तो बदली ही जा सकती है। आज का अपराधी कल सज्जन बन सकता है और बनाया जा सकता है। इस मान्यता को सुदृढ़ बनाकर ही यह सोचा जा सकता है कि दण्ड के अतिरिक्त भी कोई उपाय इस दिशा में किये जा सकते हैं। जब तक हम आतंक के प्रति रोष का एक मात्र प्रतिशोध ही सोचते रहेंगे तब तक वह विवेक बुद्धि कार्यान्वित न हो सकेगी जो चिकित्सा उपचार की आवश्यकता का प्रतिपादन करती है।

आमतौर से सज्जन तत्व अपराधी प्रकृति के लोगों से दूर रहते हैं वे सोचते हैं उससे उन्हें भी बुरा समझा जाने लगेगा और लोग सन्देह करेंगे या उँगली उठावेंगे। यह सोचना उचित नहीं कि अस्पताल में अहर्निश सेवा साधना में संलग्न डाक्टरों, कंपाउंडरों, नर्सों और सेवकों को भी रोगी ही समझा जायगा। अफ्रीका के नरभक्षी आदिवासियों के बीच सुसंस्कृत त योरोपीय पादरी स्थायी रूप से जा बसे और उन्हें सुधारने में बहुत हद तक सफल हुए। उन पादरियों को किसी ने नरभक्षी नहीं कहा। यदि वे ऐसा अपडर, डरा करते तो उनकी इस सज्जनता को दुर्बल और अधूरा ही माना जा सकता था। पिछड़े लोगों को ऊँचा उठाने के लिए उन्हीं के बीच बसना आवश्यक है और अपराधियों के अन्तःकरण को छूकर उनकी कोमल भावनाओं को जगाने के लिए उनके बीच रहना भी आवश्यक है। दूर रहकर यदा−कदा उपदेश देने की लकीर पीट देने से झूठा मनोविनोद किया जा सकता है उसका कुछ स्थायी लाभ नहीं हो सकता।

अपराधियों के सुधार के लिए इन दिनों कई प्रकार के प्रयत्न चलते हैं सुधारगृहों कीद धूम है। जेलों को भी सुधार गृह कहा जाता है और कुछ उसी तरह की व्यवस्था भी बनाई जाती है। अनैतिक वातावरण में फँसी हुई नारियों के उद्धार के लिए भी नारी सुधार गृह स्थापित हैं। बाह्य उपचार की दृष्टि से यह सब कुछ ठीक है पर भीतरी पोल को भरने के लिए ऐसे चरित्रवान आदर्शवादी और कर्मनिष्ठ व्यक्तियों की जरूरत है जो सुधार 48 डडडड डडडड डडडड हो पूरा न कर अपने व्यक्तित्व की छाप उन पर डालें। आग ही गर्मी पैदा कर सकती है। अग्नि की लपटों को व्यक्त करने वाली रंग−बिरंगी स्याहियों से छपा चित्र उस प्रयोजन को पूरा नहीं कर सकता। चरित्र सुधार के लिए कर्मचारी नियुक्त नहीं किये जा सकते। जिसके पास जो चीज स्वयं ही न होगी वह दूसरों को क्या देगा। सुधारगृहों में पब्लिक सर्विस से चुने हुए पच्चीस वर्ष से कम आयु के अनुभव हीन लड़के अफसरी कर रहे होंगे तो इससे किसी बड़े परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। ऐसा चुनाव यदि करना ही हो तो उनके जीवन की पुस्तक के पिछले पृष्ठों को पलट कर ही किया जाना चाहिए। इस कार्य के लिए अति संतुलित, अति धैर्यवान ही नहीं अत्यन्त सुदृढ़ और परखे हुए चरित्र के अनुभवी व्यक्तित्व ही किसी कदर उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

बात सुधारगृहों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए क्योंकि वहाँ तो कोई तब पहुँचता है जब उसका अपराध सिद्ध हो जाता है। यह स्थिति तो फोड़ा पककर फूटने और नासूर बनने जैसी बहुत बाद की स्थिति है। आरंभ इससे बहुत पहले होना चाहिए। जहाँ भी—जिस क्षेत्र में भी अपराधियों के पनपने की आशंका हो सेवाभावी तत्वों के आत्म−विज्ञापन के प्रलोभन से बचकर उन्हीं लोगों के बीच अड्डा जमाना चाहिए।

कल−कारखानों के मजदूर बचे हुए समय में जो कुछ करते हैं, जिन प्रवृत्तियों में व्यस्त रहते हैं वे सुखद नहीं हैं। उनके लिए उपयोगी वातावरण हो तो उस बचे समय में अपनी क्षमतायें बढ़ाने और उपयोगी विनोद मनोरंजन करने में लग सकते हैं। छात्रावासों में उपयोगी वातावरण निर्माण कर सकने वाले लोग यदि रह सकें तो वहाँ उफनती रहने वाली उच्छृंखलता सृजनात्मक सौमनस्य में बदल सकती है। ठाली बैठे लोग ही खुराफात सोचते और अकर्म करते हैं। बेकारी का समय आजीविका उपार्जन में प्रयुक्त हो सके ऐसा कुछ न भी बन सके तो ऐसा तो कुछ किया ही जा सकता है जहाँ वे लोग शान्तिपूर्वक समय काटते हुए गुत्थियों को सुलझाने वाला प्रकाश प्राप्त कर सकें। पिछड़े समझे जाने वाले अनेक स्थल अपने समाज में इसी प्रकार के हैं जहाँ सुधार की लकीर पीटने को नहीं उत्कर्षकारी वातावरण बना सकने वाले व्यक्तित्वों को डेरा डालकर बैठ जाने की जरूरत है।

अपने देश के सुधारवादी लोगों की एक भारी दुर्बलता यह है कि वे अपना विज्ञापन करने वाला कोई न कोई स्वतन्त्र अड़ंगा खड़ा करते रहते हैं। कोई नई संस्था गढ़े बिना उन्हें चैन ही नहीं पड़ता। एक आदर्श सुधार संस्था बनाने की सनक में उनका सारा श्रम और सारा उत्साह खर्च हो जाता है और तो भी वह ढाँचा ठीक तरह खड़ा नहीं हो पाता जहाँ निवास करने के लिए पिछड़े हुए लोग आवें और सुधार का लाभ प्राप्त करें। अपने देश का सुधारवादी उत्साह कुछ न कुछ नया शिगूफा खड़ा करने में ही लालायित रहता है। इसके मूल में आत्म−ख्याति का जितना पुट रहता है उतना सेवा−भावना का नहीं। यह ओछापन यदि छूट जाय तो सेवाभावी लोग नई−नई संस्थायें रचने की अपेक्षा उन क्षेत्रों में जाकर बसने लगें जहाँ पिछड़ापन किसी उपदेशक की नहीं ऐसे साथी−सहयोगी की बाट जोह रहा है जो उन्हीं में घुल−मिलकर आत्मीयता उत्पन्न करे और अपनी जलती ज्योति से उनके बुझे हुए दीपक जलावें।

कबीर ने जुलाहे का, रैदास ने चमार का, नामदेव ने दर्जी का, धन्धा अपनाया और उस वर्ग के पिछड़े लोगों को ऊँचा उठाने में अपने को खपा दिया क्या यह आदर्श हम सुधारवादियों के लिए उपयोगी नहीं हो सकता?

जटिल रोगियों के लिए अस्पताल की उपयोगिता हो सकती है और अत्यन्त बिगड़े हुए लोगों को सुधारगृहों ने भी बाधित किया जा सकता है पर स्वास्थ्य शिक्षा तो व्यापक होनी चाहिए उसी तरह चरित्रनिष्ठा के लिए भी सुविस्तृत वातावरण बनाया जाना चाहिए तभी रोग से लड़ने और रोगी को बचाने का प्रयोजन पूरा हो सकेगा। अपराधों से हमें द्वेष हो सो ठीक है पर अपराधी से बिना घृणा किये भी हम उसे स्नेह−सद्भाव प्रदान करते हुए सुधारने में बहुत हद तक सफल हो सकते हैं।


पीछे की ओर नहीं आगे की ओर देखकर चलें

पुराने जमाने से जो चला आ रहा है—पुराने लोगों ने जो कहा है, वही ठीक है। ऐसी मान्यता मानवी प्रगति की पवित्र धारा के अवरुद्ध करने के समान है। हमारे पूर्वजों ने जो कहा हैं, सोचा और माना था वह उससे भिन्न था जो उनके पूर्वज जानते—मानते और करते रहे थे। यदि ऐसा न होता तो हम आदिम सभ्यता से एक कदम भी आगे न बढ़ पाते। पत्थर रगड़ कर अग्नि पैदा करने और पशु−चर्म के परिधान लपेटने की आदिम उपलब्धि में वस्तुतः उस युग की क्रान्तिकारी उपलब्धि थी क्योंकि इससे भी पहले वाले आदिम लोग आग और परिधान का भी आविष्कार नहीं कर सके थे उन्हें पशु−पक्षियों की तरह विहंग रहकर जहाँ−तहाँ में से आहार प्राप्त करने के लिए भ्रमण करना पड़ता था और निर्वाह के साधन प्राप्त करने के लिए प्राणों को हथेली पर रखकर संघर्षरत रहना पड़ता था।

हम क्रमशः आगे बढ़े हैं। पूर्वजों के अनुभवों और प्रयासों से लाभ उठा कर आगे अधिक सुविधा के साधन प्राप्त करने का प्रयास सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनवरत रूप से चला है। ज्ञान की अगणित धाराएँ इसी प्रकार आये बढ़ी हैं। भाषा और लिपि का वर्तमान रूप न तो एक व्यक्ति ने बनाया है और न एक समय में विनिर्मित हुआ है। पीढ़ियों के बाद पीढ़ियाँ उस उपलब्धि को क्रमशः अधिक विकसित परिष्कृत करती रही हैं और हम वहाँ पहुँच पाये हैं जहाँ आज हैं। आगे इस दिशा में और भी प्रगति होने जा रही है। अग्रगमन की यह धार कभी भी अवरुद्ध होने वाली नहीं है। अपूर्णता से पूर्णता की ओर जाने वाले अत्यन्त विस्तृत मार्ग पर हम काफी दूरी पार कर चुके पर जो शेष है उसकी तो कल्पना कर सकना भी अपनी तुच्छ बुद्धि के लिए सम्भव नहीं।

जो पूर्व काल में कहा गया था वही पूर्ण सत्य है। उससे आगे कुछ सोचने, ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं इस प्रकार की बौद्धिक जड़ता को अपनाकर हम महान् सत्य को तुच्छता के सीमा बन्धनों में जकड़ने का प्रयत्न करते हैं। यह सत्य का अपमान है। हमें बौद्धिक जड़ता में अवरुद्ध नहीं होना चाहिए। प्रगति के उस प्रवाह को कुण्ठित नहीं करना चाहिए जिसके साथ बहते हुए वर्तमान स्थिति तक पहुँचना सम्भव हुआ है और भविष्य में जिस अवलम्बन को अपनाये रहकर हम क्रमशः सत्य के अधिकाधिक निकट पहुँच पा सकते हैं। पूर्णता की ओर प्रगति के लिए सत्य की शोध करने में उत्साह बना रहना आवश्यक है।

यह संसार परिवर्तनशील है। यह सब कुछ बदल रहा है। आगे बढ़ने के लिए पीछे वाले पैरों को उठाया जाना जरूरी है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मृत्यु की शृंखला ही इस संसार को सुन्दर, स्वच्छ और गतिशील बनाये हुए है। जड़ता से तो अगति की कुरूपता ही उत्पन्न होगी।

सामाजिक ढर्रे जब बहुत पुराने हो जाते हैं तब उनमें जीर्णता और कुरूपता उत्पन्न होना स्वाभाविक है। किसी समय का कोमल बालक कभी जराजीर्ण रुग्ण और अर्धमृत बन जाता है। बच्चे से जो आशा की जाती थी वह वृद्ध से नहीं की जा सकती। सामाजिक ढर्रे जब बने होंगे तब वे भी पुरातन की तुलना में अत्यन्त क्राँतिकारी लगते होंगे, पर आज तो वे भी पुराने हो गये यदि वे अपनी उपयोगिता खो बैठें तो, इसमें कुछ आश्चर्य करने की बात नहीं है।

हमें दुराग्रही नहीं होना चाहिए। पीछे मुड़−मुड़कर देखने से क्या काम चलेगा। चलना तो आगे है इसलिए दृष्टि आगे की ओर ही रखें। वर्तमान और भविष्य का ताल−मेल मिलाते हुए सोचें। जो उचित है उसे विवेक के आधार पर निर्णय करें। पुरातन के साथ संगति मिलाकर चलना समय की गतिशीलता को अवरुद्ध करने की बात सोचने जैसा उपहासास्पद है।


बाहर खोजें या अन्दर तथ्य एक ही है

पदार्थ भौतिक विज्ञानी ने सत्य को वस्तुओं में सन्निहित समझा और वह उनके अन्तराल में छिपी प्रकृति शक्तियों को खोजने में लग गया। इस खोज में वह जितना ही गहरा उतरा उतना ही अधिक आश्चर्यचकित रहता चला गया। एक−एक करके उसके सामने ऐसे अद्भुत शक्ति स्रोतों का रहस्योद्घाटन होता गया जिनकी सम्भावना कभी उसकी कल्पना में भी नहीं आई थी। उसे लगा यह विश्व जितना अद्भुत है उतना ही अनन्त भी। शायद इस वस्तु जगत की विलक्षणता को पूरी तरह समझ सकना मनुष्य की तुच्छ बुद्धि और नगण्य शोध उपकरणों द्वारा कभी भी सम्भव न हो सकेगा। प्रकृति की विशालता, सूक्ष्मता और शक्ति सम्पन्नता तो अचिन्त्य जैसी लगती है।

वैज्ञानिक अपने शोध कार्यों में निरत रहा—क्रमशः एक के बाद दूसरे चरण में कुछ अधिक भी पाता चला गया किन्तु उसने यह उत्साह शिथिल कर दिया जिसके अनुसार उसे प्रकृति के समस्त रहस्य जानने थे और भौतिक जगत की समस्त शक्तियों को करतलगत करना था।

योगी अन्तः जगत को खोजता चला गया। सामान्य जीवन क्रम में आन्तरिक क्षमता का जितना उपयोग साधारणतया होता रहता है—उसकी अपेक्षा उसकी शोधक दृष्टि ने जब गहराई में प्रवेश किया तो देखा गया कि जितना सोचा जाता रहा है उससे कहीं अधिक समर्थता और सम्भावना अपने भीतर भरी पड़ी है। योगी आश्चर्यचकित रह गया।

चेतना का विशाल सागर इस ब्रह्माण्ड में बिखरा पड़ा है। उसी ने पदार्थ को उत्पन्न किया और उसमें विविध−विधि विलक्षणताएँ भर दीं—उनके अन्तराल में एक से एक अद्भुत क्षमताएँ नियोजित कर दीं प्रकृति जगत में सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर प्रदेश में प्रवेश करते हुए भौतिक विज्ञानी ने जो कुछ देखा था—और जैसा कुछ अवाक् कर देने वाला वैभव देखा था आत्म विज्ञानी की अनुभूति उससे भी अधिक स्तब्ध कर देने वाली थी। चेतन ने ही तो जड़ को उत्पन्न किया है। शिशु की तुलना में उसकी जननी की सामर्थ्य जितनी अधिक होती है उससे असंख्य गुना अनुपात जड़ और चेतन के बीच पाया गया। वैज्ञानिक जो प्राप्त करता चला जा रहा था—योगी ने उससे कम नहीं अधिक ही पाया। विज्ञानी को प्रकृति विजय पर जिस गर्व गौरव को प्राप्त करने की आशा थी योगी की आशाएँ उसकी तुलना में अत्यधिक ऊंचाई तक चली गई। वह सोचने लगा अनन्त चेतना के साथ संपर्क मिला कर तुच्छ प्राणी अनन्त शक्ति सम्पन्न उसी प्रकार बन सकता है जिस प्रकार वर्षा की एक बूँद समुद्र में अपने आपको घुला कर विशालकाय सागर के रूप में अपने अस्तित्व को सुविस्तृत बना लेती है।

विज्ञानी यह सोचता था कि प्रकृति की गहराई में जितना गहरा उतरा जायगा उतने ही शक्ति शाली आधार हाथ लगते चले जायेंगे और अनन्त उसे सृष्टि का अधिपति एवं संचालनकर्ता नियामक बनने का अवसर मिल जायगा। प्रकृति पर विजय प्राप्त करके वह उत्पादक, पोषक एवं परिवर्तनकर्त्ता की ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भूमिका निभा सकेगा। उसके हाथ में जितना ही कर्तृत्व होगा जितना आज प्रकृति पुरुष के हाथ में दिखाई देता है।

योगी की कल्पना भी कुछ−कुछ इसी से मिलती−जुलती थी। उसकी यह आशा बलवती होती चली जा रही थी कि अनन्त चेतना के अधिपति के साथ स्वल्प चेतना की भागीदार बनाया जा सकता है और चित् शक्ति प्राणियों की प्रवृत्ति का जैसा अद्भुत सूत्र−संचालन कर रही है उसका उत्तराधिकार साधना द्वारा उपलब्ध किया जा सकता है। आत्मा को परमात्मा के स्तर पर पहुँचाया जा सकता है।

प्रकृति गत परमाणुओं के भीतर विद्यमान ‘नाभिक’ के भीतर इतना समर्थता संव्याप्त है कि एक ही अणु की सामर्थ्य एक ग्रह पिण्ड का अभिनव सृजन करने में पूरी तरह समर्थ है अथवा एक पूरे नक्षत्र को चूर्ण विचूर्ण करके आकाश में उड़ा सकती है। जब यह तथ्य विज्ञानी की समझ में आया तो उसने नये सिरे से सोचना आरम्भ किया—समस्त जगत में बिखरी पड़ी अनन्त शक्तियों की खोज में भटकने की अपेक्षा एक परमाणु को केन्द्र बनाकर उस पर अपने शोध को सीमाबद्ध किया जाय? क्यों न एक ही अणु विश्लेषण से समस्त सृष्टि का रहस्य जान लिया जाय? जितनी गहराई तक विचार किया उतना ही यह विचार अधिक युक्ति संगत प्रतीत हुआ और वह सुविस्तृत क्षेत्रों में यत्र तत्र विशालकाय शोध संस्थानों को स्थापित करने की योजना छोड़कर परमाणु के मध्य में रहने वाले ‘नाभिक’ का अन्वेषण करने में दत्त−चित्त हो गया।

यही हाल योगी का भी हुआ। आरम्भ में वह अनेक देवताओं की अनेकानेक शक्तियों पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए भयानक तन्त्रानुष्ठानों की योजना बना रहा था—पीछे उसने ब्रह्म उपासना की बात सोची और ब्रह्मवर्चस् उपलब्ध करके आत्मा को परमात्मा के सिंहासन पर बिठाने की तैयारी की। इसकी योजना और भी सुविस्तृत थी। इसके लिए विशालकाय यज्ञानुष्ठानों का आयोजन करना था। तप−साधना और योगाभ्यास की वैसी प्रक्रिया बननी थी जो चेतना के समुद्र को मथकर रख दे। पौराणिक समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे योगी ने ब्रह्म मंथन करके न जाने कितने रत्न पाने का स्वप्न देखा था। इसका कुछ ठीक से पता नहीं चल सका।

विशालता के विस्तार से थकी बुद्धि विज्ञानी को अणु के अन्तराल में छिपे ‘नाभिक’ तक सीमाबद्ध होने की बात पर सहमत हो गई थी। योगी को भी यहीं लौटना पड़ा। विशाल ब्रह्म की परिधि अनन्त ब्रह्माण्डों से भी अधिक थी। उसे समग्र रूप से प्रभावित करना और उसके उत्तरदायित्वों को अपने कंधे पर लेना तभी तक अच्छा लगता रहा जब तक उसने अपनी तुच्छता पर विचार नहीं किया। अहम् की स्वल्प सीमा और परम् की असीम सत्ता का जब तुलनात्मक निरीक्षण किया तो योगी की बुद्धि भी थक कर बैठ गई और सोचने लगी जब पिण्ड के भीतर ही ब्रह्माण्ड की सत्ता बीज रूप से विद्यमान है और आत्मा के केन्द्र पर ही परमात्मा के समस्त तत्व केंद्रीभूत हो रहे हैं तो क्यों न अपने निरीक्षण परीक्षण में सीमित हुआ जाय? जब अन्त की प्राप्ति का प्रतिफल ही वही को प्राप्त करना हो सकता है तो अपनी आराधना करने में ही क्या हर्ज है। योगी आत्म साधना में लग गया उसने ब्रह्मोपासना को ध्यान में रखकर बनाई गई विशालकाय योजनाओं का परित्याग कर दिया।

विज्ञानी अपनी शोध में लगा रहा, योगी अपनी साधना में। दोनों इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि विराट् की उपलब्धि के लिए विराट् पर केन्द्रित होने से काम चल सकता है। दोनों ने कुछ दिन एक और भी तथ्य खोजा कि अन्तः का प्रवेश और बहिः का उन्मेष दोनों अन्ततः एक ही स्थान पर जा पहुँचते हैं।

बहिः की विशालता में भटक कर सत्य और तथ्य को प्राप्त करना दोनों को ही कठिन लगा, उनने निश्चय किया अन्तः को ही खोजना उपयुक्त है और सरल भी।

तब से अब तक दोनों ही सत्य शोधक अपने−अपने ढंग से—साधना में निरत हैं। यह समझते हुए भी कि वे दो तथ्यों को खोज रहे हैं और दो दिशाओं में जा रहे हैं। वस्तुतः उनका प्रयास एक ही दिशा में हैं।

प्रजापति ने दोनों को ही सराहा, दुलारा और दोनों का उत्साह अपना−अपना काम करते रहने के लिए उभारा वे जानते थे कि बाह्य को खोजने वाला अन्तः की चरम सीमा तक पहुँच कर ही सकेगा और जो अन्तः को खोज रहा है उसका समाधान विराट् बहिः का स्पर्श किये बिना हो नहीं सकेगा। प्रकृति की उपासना पुरुष तक पहुँचे बिना पूर्ण न हो सकेगी और न पुरुष की उपासना प्रकृति की उपेक्षा करके पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेगी।

अखण्ड−ज्योति परिवार के परिजनों को—उन जागृत आत्माओं को उस मणिमाला के बहुमूल्य मुक्त क माना जाना चाहिए जिन्हें युग देवता का अवतरण अभिषेक करते हुए सर्व प्रथम गले में पहनाया जाता है।

इस परिवार के सदस्य मात्र एक पत्रिका के ग्राहक पाठक नहीं है वरन् उनके व्यक्तित्व में चिरकालीन सुसंस्कारों की एक अति महत्वपूर्ण सम्पदा जुड़ी हुई है। यदि ऐसा न होता तो पिछले कुछ ही समय में उसने युग परिवर्तन की दिशा में इतने अद्भुत कदम न उठाये होते जिसे निकट से देखने वालों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण कभी एक सुखद स्वप्न भर समझा जाता था अब वह एक तथ्य सामने आ रहा है। अपना परिवार अगले दिनों नव निर्माण की दिशा में जो भूमिका सम्पादित करने जा रहा है वह ऐतिहासिक साहसिकता भावी पीढ़ियों द्वारा चिरकाल तक भुलाई न जा सकेगी।

अखण्ड−ज्योति परिवार को−जागृत आत्माओं को कुछ विशेष प्रशिक्षण, परामर्श, प्रकाश एवं अनुदान प्राप्त करने के लिए पिछले अंकों में आह्वान किया गया है। सन् 74 की अखण्ड ज्योति में अपनों से अपनी बात स्तम्भ के अंतर्गत परिजनों को ऐसा ही आमन्त्रण भेजा गया है।

प्रकाश पूर्ण प्रशिक्षण के लिए आह्वान—आमन्त्रण

वाला प्रकाश और आत्मबल प्राप्त करने का जो अवसर सामने है उसकी उपेक्षा न की जाय। समय निकल जाने पर पश्चात्ताप ही हाथ रह जाता है।

प्रबुद्ध परिजनों को इस अलभ्य प्रशिक्षण योजना में स्वयं आगे बढ़ कर सम्मिलित होने का प्रयास करना चाहिए। व्यस्तता और कठिनाइयों के रहते हुए भी इस अवसर क लाभ लेना चाहिए। साथ ही यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि उपयुक्त अन्य व्यक्तियों को भी इसके लिए प्रोत्साहित किया जाय। उपयुक्त शब्द का इसलिए प्रयोग किया गया है कि अधिकारी और सत्पात्र व्यक्तियों को समुचित लाभ मिल सके। जागृत आत्माओं के लिए इस विशिष्ट अवसर में, प्रायः ऐसे लोग कौतूहलवश अथवा सकाम स्वार्थों की पूर्ति के लिए घुस पड़ते हैं जिनका लक्ष्य आध्यात्मिक प्रगति अथवा महान उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं है। ऐसे लोगों की घुसपैठ रोकने और अधिकारी पात्रों को अवसर से लाभ उठाने के लिए उपयुक्त सत्पात्रों को ही प्रवेश मिल सके तभी मूल प्रयोजन की पूर्ति होगी।

प्रशिक्षण के लिए पाँच स्तर की सजग आत्माओं का आह्वान किया गया है—(1)साधना पथ पर चलते हुए आत्म−बल प्राप्त करने वालों के लिए पाँच−पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्र, (2) लोक−मंगल के लिए समय दे सकने वाले युग−निर्माण कर्त्ता सैनिकों के लिए दो−दो महीने के वानप्रस्थ सत्र (3) सुशिक्षित एवं स्वाध्यायशील विचारकों के लिए पन्द्रह−पन्द्रह दिन के लेखनी सत्र (4) मधुर कण्ठ एवं संगीत में गति रखने वाले प्रचार प्रयोजन के लिए उपयुक्त स्थिति वाले व्यक्तियों के लिए तीन−तीन महीने के संगीत सत्र (5) महिला जागरण में रुचि लेने वाली—हलके डडडड उत्तरदायित्वों वाली—शिक्षित महिलाओं के लिए तीन−तीन महीने के नारी उत्थान सत्र।

जिनकी स्थिति इन पाँचों में से किसी में सम्मिलित होने के कारण उपयुक्त हो उन्हें उसके लिए अपना विस्तृत परिचय लिखते हुए आवेदन पत्र भेजने चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए।

प्रशिक्षण शृंखला में ‘प्रत्यावर्तन सत्र’ उनके लिए है जिन्हें आत्म−बल सम्पादन के लिए साधनात्मक मार्ग−दर्शन अपेक्षित है। उन्हें पाँच दिन की—पंचाग्नि विद्या का वह प्रशिक्षण मिलेगा जो कठोपनिषद् में वर्णित है और यम के द्वारा नचिकेता को प्राप्त हुआ था। अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश के अनावरण को ही चक्रवेधन भी कहते हैं। कुण्डलिनी जागरण इसे साधना क्रम की चरम परिणति है। यह साधना डडडड जीवन में रहते हुए—सामान्य कार्य व्यवसाय चलते हुए भली प्रकार होता रह सकता है। इसके लिए पंच दिन का प्रशिक्षण निर्धारित है। जो लोग पहले से ही गायत्री उपासना के अभ्यस्त रहे हैं उन्हीं के लिए यह उपयुक्त रहेगा। सर्वथा प्रारम्भिक उपासना आरम्भ करने वालों को यह सब हजम न होगा इसलिए इस वर्ष में उन्हें को भाग लेना चाहिए जो कम से कम एक वर्ष नियमित रूप से गायत्री उपासना कर चुके हों। आशा की जानी चाहिए। इस साधना—क्रम, परामर्श एवं आत्मिक अनुदान ने त्रिविध प्रक्रिया के साथ सम्पन्न प्रशिक्षण के आधार पर आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ चढ़ने के जिज्ञासु समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

प्रत्यावर्तन रूपों में गत वर्ष जिन्हें सम्मिलित होने का अवसर नहीं मिला था, वे अब पुनः आवेदन पत्र भेज कर इस वर्ष सम्मिलित हो सकते हैं। पुराने आवेदन पत्रों को पड़े हुए बहुत दिन बीत जाने के कारण अब वे रद्द कर दिये गये हैं

दूसरा प्रशिक्षण ‘वानप्रस्थ’ स्तर का हैं। दूसरे शब्दों में इसे युग−निर्माण सेना के सृजन सैनिकों की शिक्षा−दीक्षा कहनी चाहिए। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके और शेष जीवन लोक−मंगल के लिए दे देना चाहते हैं वे वरिष्ठ वानप्रस्थ हैं। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे नहीं हुए हैं जिन्हें अभी घर परिवार को सम्भालना शेष है वे थोड़ा−थोड़ा समय देकर नव−निर्माण की युग साधना में संलग्न रहेंगे।

वानप्रस्थ की सैद्धान्तिक शिक्षा शान्ति−कुञ्ज में एक−एक मास की चलेगी। इसके बाद वरिष्ठ वानप्रस्थों को कई−कई महीनों के लिए और कनिष्ठ वानप्रस्थों को कम से कम एक महीने के कार्य क्षेत्र में अपनी व्यावहारिक शिक्षा पूर्ण करने के लिए जाना पड़ेगा। पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त लोग कई महीने बाहर रहने की तैयारी करके आयें और कनिष्ठ वानप्रस्थ कम−से−कम दो महीने की। छुट्टी तो उन्हें सवा दो महीने की लन चाहिए ताकि पूरे दो महीने शिक्षा में और एक सप्ताह आने जाने में लगाने में कोई अड़चन उपस्थित न हो।

इस प्रशिक्षण में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के त्रिविध उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाई जाने वाली प्रचारात्मक, रचनात्मक, संघर्षात्मक कार्य−पद्धति का सांगोपांग प्रशिक्षण किया जायगा। धर्म मंच से जन−जागरण का प्रयोजन कैसे पूरा हो सकता है और उसके लिए सृजन सेना के सैनिकों को अपने में क्या−क्या क्षमताएँ उपार्जित करनी चाहिए यह सब सीखने का अवसर मिलेगा। वक्तृत्व कला का आवश्यक अभ्यास कराया जायगा और यह बताया जायगा कि उन्हें लोक नेतृत्व के लिए अपनी क्षमता किस प्रकार बढ़ानी चाहिए। व्यक्ति एवं समाज के सामने प्रस्तुत समस्याओं से निपटने के लिए किस स्थिति में—किस प्रकार क्या कदम उठाने चाहिए। यह जानकारियाँ एक महीने की सैद्धान्तिक शिक्षा में पाई जा सकती है इन प्रशिक्षणों का व्यावहारिक रूप कार्य क्षेत्र में—शाखा संगठनों में जाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उस अवधि को भी शिक्षा में ही सम्मिलित रखा गया है।

गृह निवृत्त वानप्रस्थ अधिकाधिक समय कार्यक्षेत्र में रहेंगे और कनिष्ठ वानप्रस्थों को दो महीने के शिक्षण काल में भी एक महीने बाहर रहना पड़ेगा और भविष्य में हर वर्ष एक महीना घर से बाहर जन−जागृति का पुण्य प्रयोजन पूरा करने के लिए देते रहना होगा। लोक−मंगल की युग साधना के लिये जिनके मन में भावनाएँ उमड़ती हैं उन्हें इस वानप्रस्थ शिक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित होने पर एक अत्यन्त उपयोगी प्रकाश प्राप्त होगा, यह निश्चित है।

तीसरा सत्र—लेखनी शक्ति का जन−जागरण के लिये प्रयोग कर सकने की क्षमता संपन्न लोगों के लिये है। इसमें के वल वे लोग ही लिये जायेंगे जिनकी शैली समुचित स्तर की है, जो विचारक प्रकृति के हैं और स्वाध्यायशील रहे हैं। जिन्हें पहले से भी कुछ लिखते रहने का अभ्यास रहा है। ऐसे ही लोगों को स्वल्प अवधि में निखार देकर पत्र−पत्रिकाओं में लिखने तथा युगान्तरकारी साहित्य सृजन के महत्वपूर्ण कार्य में जुटाया जा सकता है। इन सत्रों में छात्रों को सम्मिलित कर सकना सम्भव न होगा। लेखन के लिए दीर्घकालीन स्वाध्याय होना आवश्यक है। मात्र स्कूली अक्षर ज्ञान से वह विचारकता उत्पन्न नहीं हो सकती जो कुशल और सफल लेखन के लिए आवश्यक है। कभी सुविधा हुई तो छात्रों और नव−युवकों को भी इस प्रकार के शिक्षण की व्यवस्था करेंगे अभी तो प्रौढ़,स्वाध्यायशील और अनुभवी ही इस दिशा में संक्षिप्त मार्ग−दर्शन देकर कार्यक्षेत्र में उतारने की बात है।

यह शिक्षण वर्तमान स्थिति में पन्द्रह−पन्द्रह दिन का है। आवश्यकतानुसार उसे एक महीने का भी किया जा सकेगा। शिक्षा अवधि पन्द्रह दिन की ही है पर तैयारी इस प्रकार की करके भी आना चाहिए कि आवश्यकतानुसार यदि एक महीने रुकना पड़े तो उसमें भी कठिनाइयों न हो।

चौथा शिक्षण संगीत का है। सुगम संगीत पद्धति से निरन्तर परिश्रम करके तीन महीने में इतनी योग्यता हो सकती है कि युग गायक की—भजनोपदेशक की आवश्यकता पूरी की जा सके। जिनके गले मधुर हैं जिन्हें पहले से भी कुछ गाने बजाने का अभ्यास रहा है उन्हें ही उसमें प्रवेश मिलेगा। संगीत प्रक्रिया से सर्वथा अनजान, कण्ठ की मधुरता से रहित लोग इसमें प्रवेश करेंगे तो उन शिक्षार्थियों और अध्यापकों का श्रम, समय बेकार ही नष्ट होगा। इसी प्रकार जो शौकिया अपने व्यक्ति गत मनोरंजन के लिए संगीत सीखना चाहते हैं उनके लिये भी गुंजाइश नहीं है। यह शिक्षण तो केवल उनके लिए आरम्भ किया जा रहा है जिनकी स्थिति प्रचार कार्य में घर से बाहर समय समय पर जाते रहने और जन−जागृति का प्रयोजन पूरा करते रहने के लिये उपयुक्त है। जिनके लिये प्रचार कार्य में बाहर जाते रहना सम्भव नहीं उन्हें व्यक्ति गत योग्यता वर्धन के लिये अपने स्थानीय संगीत शिक्षकों से ही संपर्क बनाना चाहिए। शान्ति−कुञ्ज की समस्त शिक्षाएँ जन−जागरण में परमार्थ बुद्धि से भाग लेते रहने के लिये व्याकुल लोगों के लिये ही है।

भारत की पचास प्रतिशत जनसंख्या नारी समाज के रूप में दयनीय एवं पिछड़ी स्थिति में पड़ी हुई है। उसे ऊँचा उठाने के लिए विशेष प्रयत्नों की आवश्यकता है। नारी संगठन—नारी परिष्कार—नारी शिक्षण के त्रिविध आन्दोलन हमें अगले दिनों खड़े करने ही पड़ेंगे। इसके लिये ऐसी महिलाओं की आवश्यकता पड़ेगी जो शिक्षित भी हों और नारी जागरण आन्दोलन में भाग ले सकने की स्थिति में भी हों। ऐसी महिलाओं के लिये तीन−तीन महीने के शिक्षण सत्र चलाये जा रहे हैं।

जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं हैं वे वर्तमान शाखा संगठनों में जाकर नारी जागरण की त्रिविध प्रवृत्तियों का आरम्भ करने के लिये स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षित करेंगी। उनके प्रयास से देशव्यापी नारी आन्दोलन का शुभारम्भ एवं अभिवर्धन होगा। जिनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है वे घर से बाहर जाकर काम कर सकती हैं, पर रास्ता उनके लिये भी बन्द नहीं है जो घर, परिवार के उत्तरदायित्वों से घिरी हुई हैं। वे स्थानीय महिला प्रौढ़ पाठशाला चला सकती हैं जो अगले दिनों हर शाखा संगठन में मध्याह्न काल दो से पाँच तक तीन घण्टे के लिये चलाया ही जाना चाहिए। युग निर्माण शाखाओं के कार्यकर्ता अपने घर की सुशिक्षित महिलाओं को यदि इस प्रयोजन के उपयुक्त समझे तो तीन महीने के प्रशिक्षण के लिये भेज सकते हैं। उन्हीं महिलाओं को प्रवेश मिलेगा जो बिना बच्चों के शिक्षा में आ सकती हैं। बच्चों के साथ शिक्षणक्रम चल सकना असम्भव है।

इस तीन मास में महिलाओं को सुगम संगीत का आवश्यक ज्ञान कराया जायगा और कई प्रकार के गृह−उद्योग सिखाये जावेंगे, प्रायः सभी प्रकार की घरेलू सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, बिस्कुट, डबलरोटी, लेमजूस, टॉफी आदि बनाना, रबड़ की मुहरें बनाना, साबुन, मोमबत्ती, स्याही, सुगन्धित तेल तथा तरह−तरह के खिलौने बनाना जैसे, वे गृह−उद्योग भी सिखा दिये जायेंगे जिससे महिलाएँ अर्थ उपार्जन करके स्वावलम्बी भी बन सकें।

नारी जागरण के लिए जहाँ भी प्रशिक्षण आरम्भ होगा वहाँ सुगम संगीत का—सिलाई आदि गृह−उद्योगों का—तथा नारी जीवन से सम्बन्धित पारिवारिक तथा अन्यान्य समस्याओं का समाधान सिखाया जायगा। इसके लिये सभी आवश्यक शिक्षाएँ इन तीन महीने के सत्रों में प्रस्तुत की जायेंगी। ताकि प्रशिक्षित महिलाएँ अपने क्षेत्र में नारी जागरण की महती युग आवश्यकता को पूरा कर सकने में समर्थ हो सकें। वे कुशल संगठन कर्त्री एवं प्रचारिका होकर लौटे ऐसा शक्ति भर प्रयास किया जायगा।

उपरोक्त पांचों शिक्षाएँ अगले दिनों शांतिकुंज में चलती रहेंगी। शिक्षार्थियों की संख्या—समय क की माँग—प्रशिक्षण सुविधा इन तीनों ही बातों को ध्यान में रखते हुए सत्र के समय घोषित किये जा सकेंगे। पहले से ही उनका स्थिर कार्यक्रम बन सकना सम्भव नहीं। हाँ छै−छै महीने के कार्यक्रम घोषित किये जाते रहेंगे। अभी−अभी अगली छमाही के लिये जो कार्यक्रम निर्धारित किये गये हैं। वे इस प्रकार हैं—

25 मई से 8 जून तक पन्द्रह दिवसीय प्रथम लेखनी सत्र।

10 जून से 24 जून तक द्वितीय लेखनी सत्र।

1 जुलाई से 30 सितम्बर तक प्रथम महिला शिक्षण सत्र।

1 अक्टूबर से 30 दिसम्बर तक द्वितीय महिला शिक्षण सत्र।

27 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक तृतीय लेखनी सत्र।

1 जुलाई से 22 अक्टूबर तक पाँच−पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्र—लगातार।

20 नवम्बर से 20 दिसम्बर तक वानप्रस्थ शिक्षण सत्र।

संगीत शिक्षण सत्र का समय अभी निर्धारित नहीं किया गया है। छात्रों की संख्या तथा प्रशिक्षण व्यवस्था के अनुरूप उसका समय पीछे घोषित किया जायगा।

उपरोक्त सभी सत्रों में के वल उन्हें ही प्रवेश मिलेगा जो अखण्ड−ज्योति पत्रिका के कम−से−कम एक वर्ष से नियमित पाठक रहे हों—जिन्हें कोई छूत की तथा दूसरों को कष्ट देने वाली खाँसी, दमा, दस्त आदि की बीमारी न हों—जिनमें आलस्य, आवेश, अनुशासन हीनता जैसे दुर्गुण न हों।

शान्ति−कुञ्ज में पर्यटकों एवं दर्शनार्थियों के लिए ठहरने क की व्यवस्था नहीं है। जिन्हें व्यक्ति गत भेंट परामर्श के लिए आना हो वे पहले धर्मशाला आदि में अपने ठहरने का प्रबन्ध करें पीछे निश्चित होकर मिलने आये मिलने का समय एक बजे से पाँच बजे के बीच में ही रहता है और मौसम के अनुरूप उसमें थोड़ा हेर−फेर होता रहता है। दर्शनार्थी बाल−बच्चों समेत यहाँ ठहरने की बात सोच कर आने लगें तो फिर समझना चाहिए कि शिक्षण सत्रों का चलना असम्भव हो जायगा। इसलिये अनिश्चिततापूर्वक यह प्रतिबन्ध लगाना पड़ा है।

उपरोक्त सत्रों में जिन्हें आना हो उन्हें आना (1) नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) व्यवस्थायें (6) पारिवारिक उत्तरदायित्वों का विवरण (7) अखण्ड−ज्योति के नियमित पाठक चले आने क की अवधि (8) अब तक के क्रिया−कलापों का उल्लेख (9) शरीर का रुग्णता और आलस्य, अवज्ञा, आवेश एवं अनुशासनहीनता जैसे दुर्गुणों से रहित होने की पुष्टि (10) शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त जो कर सकने की सम्भावना हो उसका पूर्वाभास इन दस प्रश्नों का विस्तार पूर्वक उल्लेख करना चाहिए। बिना अपना विस्तृत परिचय दिये किसी सत्र में प्रवेश की स्वीकृति माँगने वालों के आवेदन पत्रों पर विचार किया जा सकना सम्भव न होगा।

अखण्ड−ज्योति परिवार के जिन परिजनों को उपरोक्त प्रयोजनों में अभिरुचि हो उन्हें उस प्रशिक्षण व्यवस्था से लाभ उठाने के लिये आग्रह पूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा है, और आशा की जा रही है कि जागृत आत्माएँ इस अवसर का उपयोग करके अपना और अपने समाज का महत्वपूर्ण हित साधन कर सकने में समर्थ हो सकेंगी।


महामना मालवीय जी (kahani)

महामना मालवीय जी से एक विद्वान ने कहा, “महाराज, आप मुझे सौ गालियाँ देकर देख लें, मुझे क्रोध नहीं आयेगा।”

मालवीय जी ने मुसकराते हुए कहा, “आपके क्रोध की परीक्षा होने से पहले ही मेरी जवान गन्दी हो जायेगी। मैं ऐसा क्यों करूं?”


VigyapanSuchana

गायत्री तपोभूमि मथुरा में युग−निर्माण विद्यालय का आगामी सत्र 1 जुलाई से आरम्भ होगा। यह वर्ष तक चलेगा। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य स्वावलम्बी, चरित्रवान लोकसेवी उत्पन्न करना है।

जीवन जीने की कला—उत्कृष्ट चरित्र, उत्तम स्वास्थ्य, परिष्कृत गुण, कर्म स्वभाव की सैद्धान्तिक शिक्षा तथा व्यावहारिक अभ्यास कराने के लिए शिक्षा प्रक्रिया में प्रधान स्थान दिया गया है ताकि शिक्षार्थी स्वयं समुचित स्तर को जीवनयापन करते हुए समीपवर्ती वातावरण में सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन कर सकें। बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के लिए धर्म मंच का उपयोग करके किस प्रकार नया समाज बनाया जाय इसकी व्यावहारिक शिक्षा भी दी जाती रहेगी। आत्म−निर्माण और समाज निर्माण दोनों का ही इसे प्रभावशाली समन्वय कहा जा सकता है।

आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण उद्योगों का समावेश रहेगा।

(1)प्रेस उद्योग का सांगोपांग शिक्षण−कम्पोज, छपाई, प्रूफ रीडिंग, बाइंडिंग, रबड़ की मुहरें बनाना आदि।

(2) बिजली उद्योग—नये रेडियो बनाना तथा पुरानों की मरम्मत, बिजली का फिटिंग, जली मोटरों के कोइल बाँधना, पंखा, हीटर आदि बिजली की मशीनों की मरम्मत।

(3) सामान्य उद्योग—साबुन, मोमबत्ती, सुगन्धित तेल, स्याहियाँ बनाना, तरह तरह के खिलौने बनाना, टूटी−फूटी वस्तुओं की मरम्मत, शाक−वाटिका उगाना आदि।

भोजन व्यय शिक्षार्थी को स्वयं उठाना पड़ेगा। जिन्हें इस प्रशिक्षण में रुचि हो युग−निर्माण विद्यालय, मथुरा से आवश्यक जानकारी, नियमावली, आवेदन फार्म आदि मँगालें।


गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थरत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्ति गत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1.गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 12)

प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियाँ का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)

द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री−स्मृति, गायत्री−संहिता, गायत्री−उपनिषद्, गायत्री−पारायण, गायत्री−हृदय, गायत्र−पञ्जर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू. 4)

तृतीय भाग—गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)

2.गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 5)

प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू. 2) 50

द्वितीय भाग—(सामूहिक गायत्री हवन)—गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया जलयात्रा, मण्डप−प्रवेश, वेदी−पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि−विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 2) 50

3.गायत्री चित्रावली

विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 2)50

4.गायत्री मंत्रार्थ

अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के कि ये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 2)

5.गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य

1 छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट—तिरंगे कवरों वाले 32−33 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—

1−गायत्री का स्वरूप और रहस्य 2−गायत्री की गुप्त शक्ति 3−सर्वसुलभ गायत्री साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

2.संक्षिप्त गायत्री हवन—सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मू. 30 पैसे।

3.दैनिक गायत्री साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 30 पैसे।

4.गायत्री चालीसा 10 पैसे।

5.युग−निर्माण का सत्संकल्प—मू. 5 पैसे।

*समाप्त*