बहस करते समय अगर आप अपना मुँह न बिगाड़ें, तो आप की बहस भी सुन्दर हो सकती है। —एडीसन
समुद्र में असंख्यों लहरें उठती हैं—उनका अस्तित्व अलग-अलग होता है। हर लहर पर एक स्वतन्त्र सूरज चमकता दिखाई देता है, इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस भिन्नता के भीतर एक अविछिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है। एक ही सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता है। इन प्रतिबिंबों की अनेकता के कारण कितने ही सूर्यो की सत्ताएँ सिद्ध नहीं होती। हवा और जल के संयोग से उत्पन्न होते रहने वाले बबूले एक-दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।
मनुष्य की संख्या करोड़ों में है। उनकी देह तथा आकृति-प्रकृति में भी अन्तर है। इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त विश्वात्मा के अविछिन्न अंग अवयव हैं। माला के मध्य पिरोये हुए सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकता के बन्धनों में बाँधे हुए है। देखने में हम एक दूसरे से पृथक लग सकते हैं,पर हमारा अस्तित्व पूर्ण तथा एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी जीवन एक क्षण के लिए भी सम्भव नहीं। सकते। दूसरे का सहयोग पाये बिना अपना निर्वाह किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।
प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना की अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत उद्देश्य है। समष्टि की इकाई ही व्यष्टि हे। समाज का एक पुर्जा ही मनुष्य है। इस मान्यता को अपनाकर आत्मोपभ्येन सर्वत्र की दृष्टि हम विकसित करें और आत्मा को विश्वात्मा का घटक मात्र माने तो वह जीवन लक्ष्य प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर की उपलब्धि कहते हैं।
विराट् नगर के राजा सुकीर्ति के पास एक लौह शृंग नामक विशालकाय हाथी था। युद्ध कला में वह बड़ा प्रवीण था। राजा जब युद्ध करने जाते तो उसी पर बैठते। सेना के आगे चलने वाला पर्वताकार लौह शृंग अपनी क्रुद्ध मुद्रा में शत्रु पक्ष पर जो प्रचंड हुँकार के साथ आक्रमण करता तो देखते-देखते विपक्षियों के पाँव उखड़ जाते। इस प्रकार कितने ही युद्ध लौहशृंग के युद्धकौशल ने सहज ही जिताये थे।
समयचक्र के अनुसार लौहशृंग वृद्ध होने लगा। उसकी चमड़ी झल गई और युवावस्था वाला पराक्रम चला गया। अब वह हाथीशाला की शोभामात्र बन कर रह गया था। पहले जहाँ उसकी सेवा में कई-कई सेवक रहते थे और पर्याप्त भोजन मिलता था। उस सब में कमी हो गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन पानी की व्यवस्था करता सो भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा-प्यासा रहना पड़ता।
एक दिन लौहशृंग बहुत प्यासा था। हाथीशाला में प्रबन्ध न देखकर वह चुपके से प्यास बुझाने के लिए चल पड़ा और पुराने परिचित तालाब में पहुँचकर उसने भरपेट पानी पिया, प्यास बुझाई और गहरे जल में जाकर शान्तिपूर्वक स्नान किया।
दुर्भाग्य से उस तालाब में कीचड़ बहुत थी। वृद्ध हाथी उसमें फँस गया। निकलने का जितना प्रयास करता उलटा उतना ही फँसता जाता। निदान वह गरदन तक घुस गया।
यह समाचार राजा को मिला तो वे बहुत दुखी हुए। अपने प्यारे हाथी को बचाने के लिए उन्होंने अनेक प्रयत्न कराये पर वे सभी निष्फल हुए। उसे बाहर न निकाला जा सका। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्यु मुख में जाते देखकर सभी दुखी थे।
एक चतुर वयोवृद्ध सैनिक ने राजा के सम्मुख जाकर अभिवन्दन के साथ निवेदन किया कि उसे अवसर मिलता के हाथी को कीचड़ से बाहर निकाला जा सकता है। सैनिक को आज्ञा मिल गई।
इस सभी प्रयत्न करने वालों को वापिस बुलाया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेषभूषा पहनाई। वही वाद्य यन्त्र मंगाये जो लड़ाई के समय बजते थे। हाथी के सामने युद्ध नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे मानो वे शत्रु पक्ष की ओर से लौह शृंग की ओर बढ़ते चले आ रहे हैं।
यह दृश्य देखा तो वृद्ध हाथी को यौवन काल का जोश आ गया, क्रोध से वह काँपने लगा। जोर से चिंघाड़ लगाई और इन शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए वह पूरी शक्ति के साथ टूट पड़ा।
इस आक्रमण मुद्रा में न जाने कहाँ से उसमें इतना बल आ गया कि कण्ठ तक जिस कीचड़ में फँसा हुआ था उसे रौंदता हुआ क्षण भर में तालाब के तट पर आ खड़ा हुआ।
इस युक्ति की सभी ने बड़ी प्रशंसा की। वृद्धावस्था में भी इतना बल होने के कारण हाथी की भी सर्वत्र सराहना हुई। युक्ति कार को बहुमूल्य पुरस्कार मिले और राजा की खिन्नता प्रसन्नता में बदल गई। हाथी भी जीवन रक्षा का अवसर मिलने से सन्तुष्ट था।
उपरोक्त कथा तथागत ने अपने शिष्यों को सुनाई और उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा—भिक्षुओ, संसार में मनोबल ही सबसे प्रथम है। उसकी सहायता से असम्भव दीखने वाले काम पूरे हो सकते हैं। दुर्बल, साधन रहित और आपत्तिग्रस्त भी मनोबल के सहारे अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त कर सकता है।
सोने को अग्नि में डालकर उसमें घुसी हुई मिलाकर एवं कुरूपता को दूर किया जाता है। इस अग्नि संस्कार से ही उसकी आभा निखरती है—प्रामाणिकता सिद्ध होती है और बाजार में उचित कीमत उठती है। यदि तपाने के झंझट से बचा जाय तो सोने और पीतल में कोई अन्तर ही सिद्ध न किया जा सकेगा।
मनुष्य की महान् विभूतियों को प्रकट एवं प्रखर बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वह तप, साधना के अग्नि संस्कार को सहन एवं स्वीकार करे। तप का अर्थ है—सदुद्देश्य के लिए उस हद तक बढ़ चलना जिसमें भौतिक कष्टों की हँसते-खेलते उपेक्षा की जा सके। इस तथ्य को जीवन प्रक्रिया में उतारने के लिए कुछ प्रयाग अभ्यास भी करने पड़ते हैं। बलिष्ठ बनने के लिए व्यायामशाला में जाने और कई तरह की कसरतें करनी पड़ती हैं। आत्मबल सम्पन्न तपस्वी जीवन की भूमिका में विकसित होने के लिए कई तरह के ऐसे कर्मकाण्ड अपनाने पड़ते हैं जो अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें। इन्हीं व्यायाम साधनाओं को तपश्चर्या का बहिरंग कलेवर कह सकते हैं।
व्रत, उपवास, शीतजल स्नान, धूप आतप सहना, धूनी तपना, नंगे पाँव चलना, देर तक खड़े रहना, कठोर आसन लगाकर बैठना, कम सोना, सवारी का उपयोग न करके पैदल चलना, स्वल्प वस्त्र धारण, केश न कटाना, मौन रहना, भूमि शयन, नमक, शक्कर आदि के स्वादों का त्याग ब्रह्मचर्य जैसे क्रिया-कलापों को तप साधना में गिना जाता है। जो इन उपचारों का क्रियान्वित करते है वे तपस्वी कहलाते हैं। तप का महात्म्य अध्यात्म शास्त्रों में भरा पड़ा है। तप के प्रताप से देव शक्तियों के द्रवित होने और अभीष्ट वरदान प्रदान करने के कितने ही पौराणिक उपाख्यान, पढ़ने और सुनने के मिलते। तपस्वी का सम्मान करने के लिए हमारी सहज श्रद्धा उमड़ती है। जबकि दूसरे लोग सुख-सुविधाओं का तनिक भी त्याग नहीं कर सकते तब तपस्वी इन कष्ट साध्य क्रिया-कलापों को खुशी-खुशी अपना लेता है उसमें उसकी संकल्प शक्ति की प्रखरता स्पष्ट है। दूसरे लोगों की तुलना में वह स्वतंत्र निर्णय करने और जन सामान्य के प्रचलित ढर्रे का व्यक्ति क्रम करने में समर्थ है यह विशेषता तो स्पष्ट ही सिद्ध होती हैं। इस साहसिकता के सामने यदि मानवी श्रद्धा नत-मस्तक होती है तो उसे सर्वथा उचित ही कहा जायगा।
तपश्चर्या का बहिरंग ढाँचा किस उद्देश्य के लिए तत्व-दर्शियों ने किस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया, इस तथ्य पर गहराई के साथ विचार करने की आवश्यकता है। यदि यह सब निरुद्देश्य रहा होता तो उसे मात्र उत्पीड़न ही कहा जाता दूसरों की हत्या करने की तरह आत्म-हत्या भी अपराध है ठीक इसी तरह दूसरों को उत्पीड़न देने की तरह अपने आपका सताना भी आत्म-उत्पीड़न कहा जायगा और उसकी निन्दा की जायगी। ऐसा हुआ भी। पारसी धर्म में उपवास को निन्दनीय ठहराया गया है क्योंकि इससे आत्म-कष्ट होता है। ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति भी रोगी को उपवास कराने के पक्ष में नहीं है। फ्राइड प्रभृति मनोविज्ञानी ब्रह्मचर्य को आत्म प्रताड़ना कहते है और उसकी ढेरों हानियाँ गिनाते हैं। सर्दी-गर्मी का दबाव, अंगों की तोड़-मरोड़, असुविधापूर्ण रहन सहन अपनाकर जीवन शक्ति का अपव्यय जैसे अनेकानेक तर्क इस पक्ष में पड़ते हैं कि तप साधना की कष्ट साधना हानिकारक है। बुद्ध चरित्र में आता है कि तथागत जब कठोर उपवासों द्वारा डडडड को अत्यन्त दुर्बल बना चुके तो एक देव कन्या ने प्रकट होकर उन्हें मध्यम मार्ग पर जाने और इस दुराग्रही कष्ट प्रयोग को छोड़ देने के लिए सहमत किया। उसने सितार का उदाहरण देकर यह भी कहा था कि तारों को अधिक खींचने से वे टूट जाते हैं और वीणा की उपयोगिता नष्ट हो जाती है। शरीर को सताने का भी यही परिणाम होता है। इस तथ्य पूर्ण परामर्श को भगवान बुद्ध ने अंगीकार किया था और वे मध्यम मार्ग स्वयं अपनाकर दूसरों को भी “मज्झम मग्ग“ (मध्यम मार्ग) पर चलने का उपदेश करने लगे थे।
शरीर को बलिष्ठ बनाना एक लक्ष्य है, उसकी प्राप्ति के लिए व्यायामों में अमुक प्रकार के अमुक सीमा तक किये जाने चाहिए। इसकी उपयोगिता से कोई इनकार नहीं कर सकता, पर यदि अत्युत्साह के आवेश में अमुक व्यायामों को ही चमत्कारी मान बैठा जाय और सब छोड़कर उन्हीं को पकड़ बैठा जाय तो इससे लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता मिलने के स्थान पर उलटी बाधा पड़ेगी। व्यायाम के साथ साथ उपयुक्त आहार-बिहार रहन-सहन, दिनचर्या भी आवश्यक है। इन सब बातों की उपेक्षा करके अकेले व्यायाम पर चिपट पड़ना असन्तुलित प्रयास ही कहा जायगा। बलिष्ठता प्राप्ति के लिए व्यायाम प्रक्रिया का उपयोग एक बात है और अमुक व्यायाम को सर्व सिद्ध दाता मानकर उसी पर लट्टू हो जाना बिलकुल दूसरी बात। तप, साधना में अक्सर ऐसी ही भूल की जाती है। यह भुला दिया जाता है कि इन प्रयोजनों का आविष्कार आविर्भाव किस निमित्त किया गया है और उसका कितना उपयोग—किस दृष्टिकोण से करने पर कितना लाभ हो सकता है? यह समस्त पृष्ठभूमि ध्यान में रखते हुए ही यदि तप साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे जिनका वर्णन तप विज्ञान के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
तप साधन के समस्त व्यायाम उपचार इसलिए बनाये गये हैं कि आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया अपनाने में स्वभावतः कितनी ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें हँसते-खेलते, सहन करते रह सकना अपने स्वभाव का अंग बन जाय। उस तरह की कष्ट साध्य जीवन प्रणाली अभ्यास में उतर कर सहज स्वाभाविक बन जाय। स्पष्ट है कि न्यायोपार्जित आजीविका सीमित ही रहेगी। फिर उदार व्यक्ति की अन्तरात्मा भी तो निष्ठुर पाषाण जैसी न रहेगी उसे सत्प्रयोजनों के लिए अपनी आजीविका का एक अंश अनिवार्य रूप से खर्च करते रहना पड़ेगा। सीमित आजीविका और परमार्थ प्रयोजनों का अतिरिक्त भार इन दो कारणों से आदर्शवादी को प्रायः दूसरों की तुलना में आर्थिक तंगी में ही रहना पड़ता है। विलासी रीति-नीति बहुत ही खर्चीली होती है। उसकी पूर्ति के लिए अनीति उपार्जन एवं सत्प्रयोजनों की ओर से निष्ठुर कृपणता ही अपनानी पड़ती है। इसके बिना विलास के लिए—संग्रह के लिए प्रचुर पूँजी जुटेगी ही नहीं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आदर्शवादी को आरम्भ से ही मितव्ययी रीति-नीति अपनानी पड़ती है, उसे विदित रहना है कि ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का प्रथम अध्यात्म सिद्धान्त उसी आधार पर बना है कि जो उच्च विचारों की आदर्शवादिता अपनाना चाहता हो उसे प्रथम साधना मितव्ययता की—सादगी की—गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगे जिनमें अध्यात्मवादी जीवन पद्धति का निर्वाह सम्भव हो सके।
तपश्चर्या के बहिरंग उपचारों में से अधिकाँश ऐसे कष्ट सामने आते हैं उनका पूर्वाभ्यास करके मनोभूमि एवं शरीर स्थिति को अनुकूल बना लिया जाय। जिसे अभावग्रस्त स्थिति अखरेगी नहीं बही प्रसन्नता पूर्वक सादगी भरी शालीनता के साथ जीवनयापन कर सकेगा। ऐसी स्थिति में उसे बिना अनीति उपार्जन की अपेक्षा किये—सत्कर्मों के लिए आवश्यक खर्च में बिना कृपणता बरते, बड़ी सरलता और प्रसन्नता के साथ अपना ढर्रा चलाते रह सकना सम्भव हो जायगा। तपश्चर्या के अभ्यास इस प्रमुख प्रयोजन को भली प्रकार पूरा करा सकने की सफलता प्रदान करते हैं।
व्रत, उपवास में नमक शक्कर जैसी स्वादिष्टता को छोड़ने का—प्रयोजन यह है कि स्वल्प, सस्ता एवं सादा भोजन भी यदि मिलता रहे तो वह गरीबी की स्थिति अखरे नहीं। न्यायोपार्जित आजीविका में से सत्प्रयोजनों का अंश दान निकाल कर जो बच जाय, उस रूखे-सूखे को अमृत मानकर गुजर कर ली जाय। ऐसी सादगी का अभ्यस्त व्यक्ति अर्थ प्रलोभन के लिए दुष्कर्म करने से सहज ही बच जाता है और सन्मार्ग पर चल सकने योग्य मनोभूमि को अक्षुण्ण रख सकता है। गरीबी में जो कठिनाई आती है उसमें आहार सम्बन्धी सादगी, सस्तापन एवं स्वल्प मात्रा को गिना जा सकता है। व्रत, उपवास इसी अभ्यास के लिए है। नमक, शक्कर जैसे स्वादों को छोड़कर रूखे-सूखे पर गुजर करने का अभ्यास करना आदर्शवादी मोर्चे की प्रथम लड़ाई में सफलता पूर्वक लड़ सकने की क्षमता प्रदान करता है।
आदर्शवादी को इन्द्रिय लिप्सा का नियन्त्रण करना पड़ता है। उनके उभार मनुष्य का मस्तिष्क उद्विग्न करते हैं और उन वासनाओं की पूर्ति के लिए चिन्तन, समय, श्रम, मनोयोग, कौशल एवं धन का बहुत बड़ा अंश नष्ट करना पड़ता है। ब्रह्मचर्य की बात इसी दृष्टि से है। कामुकता की प्रेरणा से पत्नी ढूँढ़ना—पत्नी के बच्चे होना-बच्चों के उत्तरदायित्व का गरदन तोड़ कर रख देने वाला भार पड़ना, कितना जटिल और कितना कठिन होता है इसे प्रत्येक भुक्त भोगी भली प्रकार जानता है। राई रत्ती जितनी वासना का विस्तार इतना अधिक होता चला जाता है कि मनुष्य अपनी शत प्रतिशत शक्ति को उसी जंजाल में झोंक देने के उपरान्त भी सन्तोषजनक स्थिति की परिवार व्यवस्था नहीं जुटा पाता और बेतरह रोता-कलपता संसार से विदा होता है। यदि कामुकता पर नियन्त्रण रखा जा सके तो जीवन की समस्त सम्पदा को कोल्हू में पेल कर उसका एक-एक बूँद तेल जो गृहस्थ में जलाना पड़ता है उसकी बचत सहज ही हो जाय और उस बचत से आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण का उद्देश्य सहज ही पूरा किया जा सके।
आज के जमाने में जनसंख्या की वृद्धि विश्व की सबसे भयंकर विभीषिका है। अणुयुद्ध से समस्त मानव समाज के नष्ट होने की तरह ही जनसंख्या वृद्धि के कारण इस धरती पर से मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाने का खतरा सामने है। वर्तमान गति से संतानोत्पादन जारी रहा तो अगले कुछ ही वर्षों में समस्त वायुमण्डल विषाक्त हो जायगा। अन्न के बिना लोग तड़प-तड़प कमर भूखों मरेंगे और चलने-फिरने तक को जगह न बचेगी। तब लोग मक्खी, मच्छरों की तरह जन्मते-मरते और मनुष्य स्तर को समाप्त करते दिखाई देंगे। इन आज की परिस्थितियों में सन्तान के सीमा बन्धन युग की अनिवार्य आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए ब्रह्मचर्य ही सर्वोत्तम उपाय है।
शक्तियों को सदुद्देश्य में लगाने के लिए—जनसंख्या संकट से लड़ने के लिए—ब्रह्मचर्य को मूर्धन्य स्थान प्राप्त है। इनसे न केवल शारीरिक, मानसिक समर्थता का लाभ है वरन् उपरोक्त दो लाभ ऐसे ही हैं जिन्हें आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक स्थिरता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान दिया जा सकता है। कामुकता पर नियन्त्रण करने को ब्रह्मचर्य प्रवृत्ति को इसलिए सम्मानास्पद स्थान प्राप्त है। अनुष्ठानों क समय अथवा ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ संन्यास की अवधि में ब्रह्मचर्य को आवश्यक माना गया हैं। विधुरों और विधवाओं के लिए भी इसे उपयोगी माना गया है। पतिव्रत, पत्नीव्रत आदि के बन्धन इसी दृष्टि से हैं। गृहस्थ से भी अधिकाधिक संयम बरतने का निर्देश इन्हीं कारणों से है। ब्रह्मचर्य की तप साधना अकारण नहीं है। उनके पीछे जिस उद्देश्य की पूर्ति का समावेश है उसे ध्यान में रखकर चला जाय तो अमुक समय तक ब्रह्मचर्य पालन की लकीर पीटने को ही पर्याप्त न माना जायगा वरन् इस दृष्टिकोण के अनुसार अपना और अपने प्रभाव क्षेत्र का अमुक स्तर बनाने का प्रयत्न किया जायगा।
वाणी का मौन तथा सीमित एवं उपयोगी शब्दों का उच्चारण प्रतिबन्ध मन्त्र जप यह दोनों ही प्रयोजन वाणी पर नियन्त्रण करने की दृष्टि से हैं। आवेशग्रस्त, कटु, दुर्वचन न बोलें—छल, व्यंग, तिरस्कार एवं गिराने वाले शब्दों का उच्चारण न करें। उच्चारण का प्रत्येक शब्द श्रेयस्कर सदुद्देश्य के लिए बोला जाय, उसमें स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश होगा।
जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए जहाँ एक पक्ष 6 व्यक्ति गत जीवन को श्रेष्ठ, संयमी, सदाचारी बनाने का है वहाँ दूसरा पक्ष यह भी है कि अपनी विभूतियों का अधिकाधिक समर्पण लोक-मंगल के लिए किया जाय। मात्र संयमी सदाचारी तो पेड़ पत्थर भी होते हैं। वे किसी का कुछ बिगाड़ते नहीं और न अनैतिक आचरण करते हैं। मनुष्य की मर्यादा की रक्षा इसी में हैं कि वह पशु और पिशाच जैसे अवाँछनीय आचरण न करे।
मनुष्य जीवन इसलिए मिलता है कि इस सृष्टि को सुरम्य समुन्नत बनाने के लिए अधिकाधिक तत्परता का परिचय दिया जाय। अपनी सम्पदाओं और विभूतियों को इसी दिशा में अधिकाधिक मात्रा में नियोजित किया जाय। स्वार्थ की पशु प्रवृत्ति से ऊँचा उठकर परमार्थ की पुण्य प्रवृत्ति में संलग्न होना ही मानव जीवन की सार्थकता का दूसरा पक्ष है। इस दिशा में जो जितना चल सका समझना चाहिए कि उसने मनुष्य जन्म के लक्ष्य को समझा और उसे पूरा करने की दूरदर्शिता का परिचय दिया। इस आदर्शवादी रीति-नीति को अपनाने के लिए जिस साहसिकता का परिचय देना पड़ता है वह है—दुनियादारी से भिन्न प्रकार की रीति-नीति अपनाने में भय या संकोच का अनुभव न करना। अंधी भेड़ों की तरह एक के पीछे एक खड्डे में गिरते-मरते जाने का क्रिया-कलाप अपनाने से इनकार करना और इसके बदले व्यंग उपहास सहने के लिए समुद्यत रहना।
शिर के—दाढ़ी के बाल बढ़ाना-मुण्डन कराना-पंचकेश रखना—सामान्य वेषभूषा छोड़कर लँगोटी, तहमद आदि बाँधना जैसे जन-स्तर से भिन्न प्रकार की वेषभूषा धारण करना। पत्तल पर या हाथ पर खाना,कमण्डल से पानी पीना, धातु के बर्तनों का प्रयोग न करना—जैसे उपकरणों का विनियोग तप साधना के प्रकरण में इसीलिए सम्मिलित किया गया है कि समृद्ध एवं विलासी लोगों के अनुकरण के लिए मचलने वाली आन्तरिक दुर्बलता के पिण्ड छुड़ाया जा सके और जन प्रवाह से भिन्न स्तर का अपना स्वतन्त्र निर्णय स्वतन्त्र आचरण कार्यान्वित कर सकने का साहस प्रदर्शित किया जा सके, लोगों के व्यंग उपहास से अप्रभावित रह सकने का मनोबल विकसित किया जा सके। आदर्शवादी परम्परा अपनाने वाले में इस प्रकार का शौर्य, साहस होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
सर्दी सहना, गर्मी सहना, भूमि पर सोना, उघाड़े बदन और नंगे पैरों रहना—कठोर आसन लगाकर बैठना, खड़े रहना जैसे कठोर कर्म इस मनःस्थिति को विकसित करते हैं कि कष्ट सहिष्णुता को परमार्थी जीवन की एक अनिवार्य साधन माना जाय। स्वार्थ का परमार्थ पर उत्सर्ग करने के लिए यही करना पड़ता है। त्याग, बलिदान का परिचय दिये बिना आत्मकल्याण की साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किये बिना परमार्थ साधना सम्भव हो ही नहीं सकती। पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान पुण्य करते रहने का कृपण प्रदर्शन लोगों के बहकाने और आत्म प्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है। सच्चे आत्मवादी को तो त्याग, बलिदान के अंतिम चरण तक पहुँचना पड़ता है उसकी निष्ठा एवं श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
अनिवार्य निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सुख-सुविधाओं को—सम्पत्तियों और विभूतियों को विश्वमानव को लिए समर्पित रहना है इसी का नाम प्रभु समर्पित जीवन है। इसी को शरणागति कहते हैं। ईश्वर भक्ति इससे कम साहस से हो ही नहीं सकती। इस मनःस्थिति को विकसित करने के लिए अनेकानेक तपश्चर्याओं के अभ्यास कराये जाते हैं। कहना न होगा कि तप साधना से निखरा हुआ व्यक्तित्व अपने आप में एक देवता होता है और उसके अपने ही चमत्कार वरदान इतने अधिक होते हैं कि तपस्वी को देवोपम सिद्ध पुरुष की संज्ञा दी जा सके।
तप साधना के इस उद्देश्य को समझा जा सके और इन बहिरंग क्रिया-कलापों को उसी दृष्टि से कार्यान्वित किया जा सके तो समझना चाहिए कि तपश्चर्या सार्थक हुई अन्यथा लकीर पीटने भर को निरुद्देश्य किया जा रहा हो तो उसे समझना चाहिए कि वह आत्म प्रताड़ना की निरर्थक कष्टकर विडम्बना भर है।
प्रकृति के अन्तराल में छिपी विद्युत शक्ति का परिचय शडडडड पूर्व लगा लिया गया है डडडड अब उसका उपयोग मनुष्य जीवन की घनिष्ट सहडडडड के रूप में किया जा रहा हैं कभी अग्नि की—पशु शक्ति की क्षमता को हस्तगत करके मनुष्य को बड़ा सन्तोष हुआ था, सचमुच उसकी प्रगति में इन दोनों ने बड़ा योगदान दिया। इन शताब्दियों में बिजली की शक्ति ने संसार के भौतिक विकास में असाधारण सहायता की है। भाप, तेल, गैस की सहायता से शक्ति प्राप्त करने की बात अब पिछले जमाने की बात हो गई। अगले दिनों अणु शक्ति और लेसर किरणों के प्रयोग को प्रधानता मिलने वाली है।
इन समस्त शक्ति स्रोतों से भी अद्भुत एक और शक्ति है जिसको और न जाने क्यों हमारा ध्यान गया ही नहीं। वह हैं—मानवी विद्युत। यह अधिक गहराई के साथ समझा जाना चाहिए कि प्राणियों के शरीरों में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति ही उनके शरीर संस्थान को अधिक समर्थ एवं सुविकसित बना सकती है। कहना व होगा कि सुविकसित व्यक्तित्व संसार की समस्त शक्ति सम्पदाओं से हमारे लिए बढ़-चढ़कर उपयोगी सिद्ध हो सकता है। भौतिक जगत में अग्नि, भाप, गैस, तेल, बिजली, अणु विस्फोट, लेसर आदि का जो महत्व है उससे कहीं अधिक उपयोगिता सजीव प्राणियों के लिए उस बिजली की है जो उनका शरीर में पाई जाती है। मनुष्य में भी इस विद्युत शक्ति का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है।
शरीर की संचार प्रणाली का मूल आधार क्या है? इसका डडडड माति सूक्ष्म कारण ढूँढ़ने पर वे शरीर डडडड डडडड निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पेशिया में काम करने वाले स्थिति तक ऊर्जा ‘पोटेन्शियल’ काडडडड था उसके साथ डडडड रहने वाले आवेश—इन्टेन्सिटी-कडडडड जीवन संचार में बहुत बड़ा हाथ है। इन विद्युत धाराओं का वर्गीकरण तथा नामकरण—सीफेलीट्र डडडड इजेमिल न्यूरैलाजिया की व्याख्या-चर्चा के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ताप विद्युतीय संयोजन—थर्मोलैरिक कपलिंग—के शोधकर्ता अब इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानव शरीर का सारा क्रिया कलाप इसी विद्युतीय संचार के माध्यम से गतिशील रहता है।
पृथ्वी के इर्द-गिर्द एक चुम्बकीय वातावरण फैला हुआ है। अकेला गुरुत्वाकर्षण कार्य ही नहीं उससे और भी कितने ही प्रयोजन पूरे होते हैं। यह चुम्बकत्व आखिर आता कहाँ से है-उसका उद्गम स्नोत कहाँ है? यह पता लगाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह कोई बाहरी अनुदान नहीं वरन पृथ्वी के गहन अन्तराल से निकलने वाला शक्ति प्रवाह हैं।
लोहे की सुई यदि धागे में बाँधकर अधर लटकाई जाय तो उसका एक सिरा उत्तर की ओर दूसरा दक्षिण की ओर होगा। दिशा निर्देशक यन्त्र (कम्पास इसी आधार पर बनते हैं डडडड ही जीव-जन्तु अपने महत्वपूर्ण कार्य इसी चुम्बकीय प्रवाह के आधार पर पूरे करते रहते है। कितने ही पक्षी ऋतु परिवर्तन के लिए डडडड बन कर सहस्रों मील लम्बी उड़ाने मरते हैं। वे धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा पहुँचते है। इनकी उड़ाने प्राय रात में होती हैं। उस समय प्रकाश जैसी कोई इस प्रकार की सुविधा भी उन्हें नहीं मिलती जिसमें वे यात्रा लक्ष्य की दिशा जान सके। यह कार्य उनकी अन्तःचेतना पृथ्वी के इर्द-गिर्द फैले हुए चुम्बकीय घेरे में चल रही हलचलों के आधार पर ही पूरा करती हैं। इस धारा के सहारे वे इस तरह ही पूरा करती हैं। इस धारा के सहारे वे इस तरह उड़ते है मानो किसी सुनिश्चित सड़क पर बन रहे है।
टरमाइट कीड़ा अपने घरों का निर्माण तथा उनका प्रवेश द्वारा सदा निर्धारित दिशा में ही बनते है। इसके पीछे ही उनकी आन्तरिक सम्वेदना द्वारा पृथ्वी के चुम्बकीय प्रवाह को पहचानने की सफलता ही काम करणी है।
जैवसैलो का सूत्र विभाजन कार्य उसके मध्य बिन्दु में चलता है उसमें यही दिशा ज्ञान काम करता हैं। क्रोमो जोम की गति ‘सैल’ के मध्यवर्ती ध्रुव की दिशा की ओर रहती है। उसे दिशा ज्ञान कैसे रहता है? इस प्रश्न का उत्तर भी यही रहता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय प्रवाह को हमारे जीव सैल की आन्तरिक सत्ता अनुभव कर सकती है और उसी आधार पर अपनी गतिविधि का निर्धारण कर सकती है।
चुम्बक और विद्युत यों प्रत्यक्षतः दो पृथक-पृथक सत्ताएँ है पर वे परस्पर अविछिन्न रूप से सम्बद्ध हैं और समयानुसार एक धारा का दूसरी में परिवर्तन होता रहता है। यदि किसी ‘सरकिट’ का चुम्बकीय क्षेत्र लगातार बदलते रहा जाय तो बिजली पैदा हो जायगी। इसी प्रकार लोहे के टुकड़े पर लपेटे हुए तार में से विद्युत धारा प्रवाहित की जाय तो वह चुम्बकीय शक्ति सम्पन्न बन जायगी।
मनुष्य शरीर में बिजली काम करती हैं यह सर्वविदित है। इलेक्ट्रो कार्डियोग्राफी तथा इलेक्ट्रोन इनसिफैलोग्राफी के द्वारा इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हमारी रक्त नलिकाओं में लौह युक्त ‘हिमोग्लोविन’ परस्पर चिपके रहते हैं, उसी प्रकार हमारी जीव सत्ता सभी जीव कोषों को परस्पर सम्बन्ध किये रहती है और उनकी संमिश्रित चेतना से वे समस्त क्रियाकलाप चलते हैं जिन्हें हम जीवन संचार व्यवस्था कहते हैं।
शरीर में चमक, स्फूर्ति, श्रम, रुचि, ताजगी, उमंग,उत्साह, शौर्य, साहस जैसी जो प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं उनके पीछे मानवी विद्युत की अभीष्ट मात्रा का होना ही आँका जा सकता है। मनस्वी, तेजस्वी, ओजस्वी, तपस्वी जैसे शब्दों से ऐसे ही लोगों को सम्बोधित किया जाता है। ऐतिहासिक व्यक्तियों की पंक्ति में ऐसे ही लोग खड़े होते हैं। भौतिक उपलब्धियां उन्हीं को पल्ले पड़ती हैं। यहाँ तक कि आतंकवादी खलनायक भी इसी शक्ति के सहारे अपने भयानक दुष्कर्मों में सफलता प्राप्त करते हैं। ऐतिहासिक महामानवों में से प्रत्येक को इसी अन्तः शक्ति का सहारा मिलता है और वे महान् कार्यों में साहसपूर्वक आगे बढ़ते चले जाते हैं।
मानवी शरीर के शोध इतिहास में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख है जिनसे यह सिद्ध होता है कि किन्हीं-किन्हीं शरीरों में इतनी अधिक बिजली होती है कि उसे दूसरे लोग भी आसानी से अनुभव कर सके। यों हमारा नाड़ी संस्थान पूर्णतया विद्युतधारा से ही सञ्चालित होता है। मस्तिष्क को जादुई बिजलीघर कह सकते हैं, जहाँ से शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंगों की गतिविधियों का नियन्त्रण एवं सञ्चालन होता है। पर वह बिजली ‘जीव विद्युत’ वर्ग की होती है और इस तरह अनुभव में नहीं आती जैसी कि बत्ती जलाने या मशीनें चलाने वाली बिजली। शरीर में काम करने वाली गर्मी से विभिन्न अवयवों की सक्रियता रहती है और वे अपना-अपना काम करते हैं। यह कायिक ऊष्मा वस्तुतः एक विशेष प्रकार की बिजली ही है। इसे मानवी विद्युत कह सकते हैं। इतने पर भी वह यान्त्रिक बिजली से भिन्न ही मानी जायगी। वह अपना प्रभाव शरीर सञ्चालन तक ही सीमित रखती है। इससे बाहर उसका प्रभाव अनुभव नहीं किया जाता, किन्तु कुछ अपवाद ऐसे भी देखने में मिले हैं जिनमें शरीरगत ऊष्मा ने याँत्रिक बिजली की भूमिका निबाही है और उस व्यक्ति को एक चलता-फिरता बिजलीघर सिद्ध किया है।
मानवी शरीर की विलक्षणताओं की चर्चा करते हुए उन प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख अवसर किया जाता रहता है जिनकी यथार्थता सुविज्ञ लोगों ने पूरी जाँच पड़ताल के बाद घोषित की हैं। मनुष्य शरीर में भी याँत्रिक बिजली की आश्चर्यजनक मात्रा हो सकती है, इसके कितने ही उदाहरण सर्वविदित हैं। कोलोंराडी प्रान्त के लेडीवली नगर में के . डबल्यू. पी. जोन्स नाम का एक ऐसा व्यक्ति हुआ है जो जमीन पर चलकर यह बता देता था कि जिस भूमि पर वह चल रहा है उसके बीच किस धातु की—कितनी गहरी तथा कितनी बड़ी खदान है। उसे जमीन में दबी भिन्न धातुओं का प्रभाव अपने शरीर पर विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से होता था। अनुभव ने उसे यह सिखा दिया था कि किस धातु का स्पन्दन कैसा होता है। अपनी इस विशेषता का उसने भरपूर लाभ उठाया। कइयों को खदानें बता कर उनसे हिस्सा लिया और कुछ खदानें उसने अपने धन से खरीदीं और चलाई। अमेरिका का यह बहुत धन-सम्पन्न व्यक्ति इसी अपनी विशेषता के कारण बना था।
आयरलैंड के प्रो. वैरेट इस बात के लिए प्रख्यात थे कि वे भूमिगत जलस्रोतों तथा धातु खदानों का पता अपनी अन्तःचेतना से देखकर बता देते थे। इस विशिष्टता से उन्होंने अपने देशवासियों को बहुत लाभ पहुँचाया था। आस्ट्रेलिया का एक किसान भी पिछली शताब्दी में इस विद्या के लिए प्रसिद्धि पा चुका है, वह दो शंकु वाली टहनी हाथ में लेकर खेतों में घूमता फिरता था और जहाँ उसे जलस्रोत दिखाई पड़ता था वहाँ रुक जाता था। उस स्थान पर खोदे गये कुओं में प्रायः पानी निकल ही आता था। भारत के राजस्थान प्रान्त में एक पानी वाले महाराज जिन्हें माधवनन्द जी कहते थे अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर कितने ही सफल कुएँ बनवा चुके थे।
भूमिगत अदृश्य वस्तुओं को देख सकने की विद्या को रेब्डोमेन्सी कहते है। इस विज्ञान की परिधि में जमीन में दबे खनिज रसायन, जल, तेल आदि सभी वस्तुओं को जाना जा सकता है। किन्तु यदि केवल जल तलाश तक ही वह सीमित हो तो उसे ‘वाटर डाउनिग कहेंगे।
आयरलैंड के विकलो पहाड़ी क्षेत्र में दूर-दूर तक कहीं पथरीली थी। प्रो. वेनेट ने खदान विशेषज्ञों के सामने अपना प्रयोग किया वे कई घण्टे उस क्षेत्र में घूसे अन्ततः वे एक स्थान पर रुके और कहा—केवल 14 फुट गहराई पर यहाँ एक अच्छा जलस्रोत हैं। खुदाई आरम्भ हुई और पूर्व कथन बिलकुल सच निकला। 15 फुट जमीन खोदने पर पानी की एक जोरदार धारा वहाँ से उबल पड़ी।
मनुष्येत्तर अन्य प्राणियों में भी यह विद्युत शक्ति पाई जाती है, उनके शरीर में, मस्तिष्क में ऐसे विशिष्ट अवयव पाये जाते हैं जिनमें शरीरगत विद्युत अपना काम करती है और वे आश्चर्यजनक जीवन पद्धति अपनाये रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसी अद्भुत संरचना को देख-परखकर उसकी नकल के सहारे कुछ ऐसे आविष्कार किये है जो अपनी उपयोगिता के लिए प्रख्यात हैं।
मधुमक्खियों की नेत्र रचना देखकर विज्ञानवेत्ता पोलारायड ओरिसन्टेशन इंडिकेटर नामक यन्त्र बनाने में समर्थ हुए हैं। यह ध्रुव प्रदेश में दिशा ज्ञान का सही माध्यम है। उस क्षेत्र में साधारण कुतुबनुमा अपनी उत्तर, दक्षिण दिशा बताने वाली विशेषता खो बैठते हैं तब इसी यन्त्र के सहारे उस क्षेत्र के यात्री अपना काम चलाते है।
समुद्री तूफान आने से बहुत पहले ही समुद्री बतके आकाश में उड़ जाती हैं और तूफान क परिधि के क्षेत्र से बाहर निकल जाती हैं। डालफिन मछलियाँ चट्टानों में जा छिपती हैं, तारा मछली गहरी डुबकी लगा लेती हैं और ह्वेल उस दिशा में भाग जाती हैं, जिसमें तूफान न पहुँचे। यह पूर्व ज्ञान इन जल-जन्तुओं का जितना सही होता है उतना ऋतु विशेषज्ञों के बहुमूल्य उपकरणों को भी नहीं होता। मास्को विश्व-विद्यालय ने इन्हीं जल जन्तुओं के अत्यन्त सूक्ष्म सूचना ग्राहक कानों की नकल पर ऐसे यन्त्र बनाये हैं जो अन्तरिक्ष में होने वाली अविज्ञात हलचलों की पूर्व सूचना संग्रह कर सकें। ऐसा अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि प्रवाहों को सुन समझ लेने से ही सम्भव होता है।
जीव-जंतुओं की विशिष्ट क्षमताओं का आधार उनकी ऐसी संरचना में सन्निहित है जो मनुष्यों के हिस्से में नहीं आई है। अब विज्ञान मनुष्येत्तर विभिन्न प्राणियों की शारीरिक एवं मानसिक संरचना में जुड़ी हुई अद्भुत विशेषताओं को खोजने में संलग्न है। इसका एक स्वतन्त्र शास्त्र ही बन गया है जिसका नाम है—’वायोनिक्स’। इसे स्पेशल पर्पस मैकेनिज्म-विशेषोद्देश्य व्यवस्थाएँ भी कहा जाता है।
किसी अँधेरे कमरे में बहुत पतले ढेरों तार बँधे हों उसमें चमगादड़ छोड़ दी जायें तो वह बिना तारों से टकराये रात भर उड़ती रहेंगी। ऐसी इसलिए होता है कि उसके शरीर से निकलने वाले कम्पन तारों से टकरा कर जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं उन्हें उसके संवेदनशील कान सुन लेते है और यह बता देते हैं कि तार कहाँ बिखरे पड़े हैं। बिना आँखों के ही उसे इस ध्वनि माध्यम से अपने क्षेत्र में बिखरी पड़ी वस्तुएँ दीखती रहती है।
मेढ़क केवल जिन्दा कीड़े खाता है। उसके सामने मरी और जिन्दी मक्खियों का ढेर लगा दिया जाय तो उनमें से वह चुन-चुनकर केवल जिन्दा मक्खियाँ ही खायेगा। इसका कारण मृतक या जीवित माँस का अन्तर नहीं वरन् यह है कि उसकी विचित्र नेत्र संरचना केवल हलचल करती वस्तुएँ ही देख पाती है स्थिर वस्तुएँ उसे दीखती ही नहीं। मेरी मक्खी को किसी तार से लटका कर हिलाया जाय तो वह उसे खाने के लिए सहज ही तैयार हो जायगा।
उल्लू की ध्वनि सम्वेदना उसके शिकार का आभास ही नहीं कराती ठीक दिशा दूरी और स्थिति भी बता देती हैं फलतः वह पत्तों के ढेर के नीचे हलचल करते चूहों पर जा टूटता है और एक ही झपट्टे में उसे ले उड़ता है।
गहरी डूबी हुई पनडुब्बियों में रेडियो संपर्क निरंतर कायम रखना कई बार बड़ा कठिन होता है क्योंकि प्रेषित रेडियो तरंगों का बहुत बड़ा भाग समुद्र का जल ही सोख लेता है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए मछली में सन्निहित उन विशेषताओं को तलाश किया जा रहा है, जिसके आधार पर वह जलराशि में होने वाली जीव जन्तुओं की छोटी-छोटी हलचलों को जान लेती हैं और आत्मरक्षा तथा भोजन व्यवस्था के प्रयोजन पूरे करती हैं।
रैटलसाँप तापमान के अत्यन्त न्यून अन्तर को जान लेता है। चूहे, चिड़िया आदि के रक्त का तापमान अत्यन्त नगण्य मात्रा में ही भिन्न होता है, पर यह साँप उस तापमान के अन्तर को जानकर अपना प्रिय आहार चुनता है। यह कार्य वह गन्ध के आधार पर नहीं अपने ताप मापक शरीरी अवयवों द्वारा पूरा करता है। वैज्ञानिकों ने इसी संरचना को ध्यान में रखते हुए इन्फ्रारेड किरणों का उपयोग करके तापमान के उतार चढ़ावों का सही मूल्यांकन कर सकने में सफलता प्राप्त की है।
पनडुब्बियों को पानी के भीतर देर तक ठहरने के लिए आक्सीजन की अधिक मात्रा अभीष्ट होती है और बनने वाली कार्बन-डाइ-आक्साइड को बाहर फेंकने की जरूरत पड़ती है। यह दोनों कार्य पानी के भीतर ही होते रहें तभी उसका अधिक समय समुद्र में रह सकना सम्भव हो सकता है। मछली पानी से ही आक्सीजन खींचती है और उसी में अपने शरीर की कार्बन गैस खपा देती है। यह पनडुब्बियों के लिए भी सम्भव हो सके इसका रास्ता मछलियों की संरचना का गहन अध्ययन करने के उपरान्त ही प्राप्त किया जा सकता है।
हवाई जहाजों की बनावट में पिछले चालीस वर्षों में अनेकों उपयोगी सुधार किये गये हैं। उसके लिए विभिन्न पक्षियों की संरचना और क्षमता का गहरा अध्ययन करने में विशेषज्ञों को संलग्न रहना पड़ा है। भुनगों की शरीर रचना के आधार पर वायुयानों में दूरदर्शन के लिए प्रयुक्त होने वाला एक विशेष यंत्र ‘ग्राउण्ड स्पीड मीटर’ बनाया गया है। भुनगों के आंखें नहीं होती वे अपना काम विशेष फोटो सेलों से चलाते हैं। वही प्रयोग इस यन्त्र में हुआ है अटलांटिक सागर के आर-पार रेडियो प्रसारणों को ठीक तरह पहुँचाने का रास्ता बतलाने में जिन कम्प्यूटरों का प्रयोग होता है वे कई बार असफल हो जाते हैं क्योंकि मौसम की प्रतिकूलता रेडियो तरंगों में व्यवधान उत्पन्न करती है, अस्तु ध्वनि प्रवाह के लिए नये रास्ते ढूँढ़ने पड़ते हैं। इस कार्य के लिए चींटी की मस्तिष्कीय संरचना अधिक उपयुक्त समझी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चींटी के मस्तिष्क की तुलना में हमारे वर्तमान कम्प्यूटर अनपढ़ बालकों की तरह पिछड़े हुए हैं।
मानवी विद्युत को अध्यात्म विज्ञान में ओजस्, तेजस् एवं ब्रह्मवर्चस, कहा गया है। इसे विकसित करने की प्रक्रिया योग-साधना एवं तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी ‘चित् शक्ति ‘ के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया हैं कि मनुष्य शरीर में सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संस्थानों को जागृत करके मनुष्य देवस्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजनों में बिजली का जो उपयोग है उससे कहीं अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप, आधार और उपयोग जानने के लिए हमें विशेष उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने चाहिए।
घायल भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े थे और उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा में मृत्यु के दिन गिन रहे थे।
समय काटने के लिए उन्होंने धर्मचर्चा को माध्यम बनाया। वे जो कहेंगे सो सारगर्भित ही होगा यह सोचकर कौरवों और पाण्डवों के परिवार के बचे हुए लोग उपदेश सुनने के लिए नित्य ही एकत्रित होते।
उस दिन पितामह न्याय, औचित्य और कर्त्तव्य की शिक्षा दे रहे थे। कथन महत्व का था। पर द्रौपदी उसे सुनकर हँसने लगी।
प्रवचन रोककर पितामह ने हँसने वालों की ओर निहारा। मुँह से हाथ ढके द्रौपदी ही मुस्करा रही थी। कारण समझते देर न लगी। भीष्म ने स्तब्धता भंग करते हुए कहा—निस्सन्देह, यह शिक्षा देने का उपयुक्त समय तभी था जब कौरवों द्वारा भरी सभा में तेरे वस्त्र खींचे जा रहे थे। किन्तु वैसा न कर सका। क्योंकि उन दिनों कौरवों का पाप-अन्न खाकर निर्वाह करता था और मेरी बुद्धि उन्हीं के हाथों बिक गई थी। अब वह अशुद्ध रक्त घावों में होकर बह गया तो शुद्ध शरीर में रह रहे शुद्ध मन द्वारा यह शुद्ध प्रवचन भी दिये जा रहे हैं।
अन्न के मन और कर्म पर पड़ने वाले प्रभाव को लोगों ने समझा। भीष्म की उस विवशता को समझते हुए द्रौपदी भी चुप हो गई और प्रवचन का प्रवाह आगे चलने लगा।
सन्त बिनोवा ने अपने एक प्रवचन में कहा—जीवन में तीन चीजें होती हैं—प्रकृति, विकृति और संस्कृति। भूख लगने पर खाना प्रकृति है, जरूरत से ज्यादा खा लेना विकृति है और भूख लगने पर भी सामने आये हुए भूखे अतिथि को अपना खाना खिला देना संस्कृति है। दूसरे की सन्तुष्टि के लिए अपने भोजन को स्वेच्छापूर्वक प्रसन्न मन से त्याग देना सर्वोत्तम व्रत है। अनाज खाना प्रकृति है। फलाहार करना संस्कृति है और फलों की शराब बनाकर पीना विकृति है। कई बार विकृति को संस्कृति मान लेने की भूल करते हैं। जरूरत न होने पर भी किसी को आग्रह करके ज्यादा खिलाने में संस्कृति नहीं, विकृति है। लोग उसे संस्कृति समझते हैं। जैसे-जैसे विज्ञान की तरक्की होगी, वैसे-वैसे विकृति क्षीण होगी संस्कृति बढ़ेगी।
मेरे पेट में लड्डू हजम करने की क्षमता नहीं है, फिर भी मित्र लोग अगर आग्रह से मुझे लड्डू खिलाते जाँय तो सभी दर्शक यह समझेंगे कि यह प्रेम का दर्शन है। लेकिन सच तो यह है कि वह प्रेम नहीं दुश्मनी है। देखने वाले नहीं समझ सकते कि लड्डू की मार कितनी भयंकर होती है। उससे कभी-कभी आप्रेशन या मृत्यु की भी नौबत आ सकती है। कल वैज्ञानिक साधनों द्वारा पेट का चित्र लिया जा सके और यह बताया जा सके कि लड्डू खिलाने का आग्रह नहीं रखेंगे।
लोग मुझे पड़ाव पर पहुँचने के बाद पूछते हैं कि यहाँ आपको किसी प्रकार की तकलीफ तो नहीं है। इस पर मैं कहता हूँ कि गाँवों में कुत्तों के भौंकने तथा शहरों में रेडियो के भौंकने से तकलीफ होती है। भगवान् ने शान्ति के लिए रात्रि का प्रगाढ़ अन्धकार पैदा किया है जिसका स्पर्श आँखों को होते ही आराम मालूम पड़ता है। लेकिन इन दिनों लोगों ने अन्धेरे को भी आग लगा दी है। शहर में जिधर देखो उधर आग लगी हुई दिखाई देती है। इसे मैं संस्कृति नहीं मानता। जहाँ प्रकाश की जरूरत हो वहाँ प्रकाश होना अच्छा है, लेकिन बिना ही जरूरत के प्रकाश बनाये रखना विकृति है।
विज्ञान की तरक्की का मतलब लोग समझते हैं कि सारे कच्चे मकान पक्के बन जायेंगे। एक मंजिलें मकान कई मंजिलें बन जायेंगे, लेकिन ऐसी बात नहीं है। विज्ञान बढ़ने से मनुष्य को हवा, सूरज की रोशनी आदि की महिमा मालूम पड़ेगी। फिर मनुष्य स्वयं आसमान के नीचे सोना चाहेगा, पैदल चलेगा, खेतों में काम करेगा तथा कुदरत के साथ संपर्क बढ़ाना अच्छा समझेगा।
इन दिनों सभ्यता के नाम पर सारे शरीर को कपड़े से ढक लेने का रिवाज हो गया है। इससे कहा जाता है कि कपड़े का स्टैन्डर्ड बढ़ गया है और हवा तथा सूरज की रोशनी का स्टैन्डर्ड घट गया है। अब सवाल यह है कि मनुष्य के लिए ज्यादा कपड़ा मुफीद है या हवा एवं सूरज की रोशनी? पक्के मकान चाहिए या हवादार मकान? हम कुदरत से दूर जा रहे है, इसलिए हमें वापस लौटना चाहिए।इन दिनों संदूक के जैसे पक्के मकान बनाये जा रहे हैं, वहाँ न खुली हवा मिलती है, न सूरज की रोशनी। मकान वालों को सूर्योदय का मान भी नहीं होता। इसीलिए वे अपने घरों में प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें टाँगते हैं और रखते हैं टेबल पर फ्लावर प्लाट में कागज के फूल। कितनी कृत्रिमता है यह। इससे बेहतर तो यही था कि सभी लोग खुली हवा के बीच बगीचे में रहते।
खाना हजम करने के लिए उठक-बैठक आदि व्यायाम किये जाते हैं। व्यायाम के नाम पर आदमी पचास बार उठता है और बैठता है। किसान को तो यह सारा पागलपन ही मालूम होता होगा। इस प्रकार से उठने-बैठने के बजाय कुदाली लेकर खेतों में क्यों नहीं जाते? खेत में काम करने को मजदूरी मानते हैं, इसीलिए इन कृत्रिम उपायों का इस्तेमाल किया जाता है और इन्हें ही फिर संस्कृति, कलचर तहजीब, सभ्यता आदि का नाम दिया जाता है।
आक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज से शिक्षा पाकर आने वाले लोग ज्यादा तनख्वाह माँगते हैं, यह एकदम अवैज्ञानिक बात है। ज्यादा तनख्वाह तो उन्हें मिलनी चाहिए जो कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित हैं शिक्षित लोगों के पास बुद्धि है। खाने, पीने, पहनने ओढ़ने और साधारण व्यवहार करने का जीवन दर्शन है। वे बीमारी से बचना और बीमारी आ जाने पर कैसे क्या करना यह सब जानते हैं। इसलिये वास्तव में उनका खर्च कम है। लेकिन अशिक्षितों को जीवन का रहन-सहन मालूम नहीं हैं। उन्हें बीमारी आदि अवसरों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। वे हर तरह से मजबूर हैं। उनकी अवस्था को देखते हुए शिक्षितों को ही समाज से यह कहना चाहिए कि “लोगों ने हमारी शिक्षा पर ज्यादा खर्च किया है, इसलिए हमें जरा कम तनख्वाह दीजिये और ज्यादा तनख्वाह उन्हें दीजिये जिन पर शिक्षा के लिये ज्यादा खर्च नहीं हुआ है।” पर आज तो शिक्षित लोग इस तरह की माँग करने के बजाय उलटी यह माँग करते हैं कि हमारी शिक्षा पर ज्यादा खर्च हुआ इसलिए अब सारे गृह-जीवन पर भी और ज्यादा खर्च होना चाहिए।
शिक्षा हमें जीने का सही तरीका सिखाती है।
यदि शिक्षित होने के बाद भी हम जीने की कला न सीख पायें तो वह शिक्षा किस काम की?
आज पढ़े लिखे लोग सड़कों पर बेकार घूमते हैं, यह सुनकर मुझे ताज्जुब होता हैं। उनसे तो एक अनपढ़ किसान ही भला, जो कमाकर रोटी खाने की कला तो जानता है। हमें शिक्षा की वास्तविकता समझनी चाहिए।
लंका में रावण को मारने के बाद राम हवाई जहाज में बैठकर अयोध्या की ओर निकले। हवाई जहाज जब पञ्चवटी के ऊपर से जा रहा था, तब सीता ने कहा कि—”मैं जब यहाँ रहती थी, तब मैंने कुछ पेड़ यहाँ लगाये थे। वे अब किस स्थिति में है; यह देखने की मुझे इच्छा है।” हवाई जहाज नीचे लाना पड़ा सीता ने वे पेड़ देखे, वे अच्छी तरह से बढ़ रहे हैं, यह देखने के बाद फिर वे लोग अयोध्या की ओर निकल पड़े। सीता को उन पेड़ों की क्यों इतनी चिन्ता थी? क्योंकि उन पेड़ों की ओर वह उपासना बुद्धि से देखती थी। सीता के वहाँ से जाने के बाद वहाँ के ऋषियों ने उन पेड़ों की उपासना जारी रखी और निभा लिया।
इस तरह से पेड़ उपासना के साधन हैं। उपासना के लिए लोग मन्दिर में जाते हैं। वहाँ हवा भी नहीं होती हैं। पेड़ों पर से फूल निकालकर मूर्ति पर चढ़ाते हैं—उसे उपासना कहते हैं। बहने वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की जो पूजा करती हैं, वह अच्छी उपासना है। पेड़ में तो पूजा सजी हुई है। वहाँ भगवान् का दर्शन करना चाहिए। पेड़ को हमने पानी दिया, अर्थात् पेड़ की पूजा हुई। अब पेड़ पर सुन्दर फूल आये यानी पेड़ की पूर्ण यथायोग्य पूजा हुई।
शहर के लोग पंगु हैं, देहात के लोग अन्धे हैं। अन्धों ने पंगुओं को अपने कन्धे पर बिठाया हैं। पंगु लोग जिस दिशा में ले जायेंगे, उस दिशा में अन्धे जाते हैं। इसके बदले में हमें सक्षमों का, समर्थों का सहारा चाहिए, उसी के लिए यह योजना सुझायी है। “तू अपूर्ण, मैं अपूर्ण”, दोनों मिलकर पूर्ण बनेंगे,इस तरह गणित की पूर्णता हमें नहीं चाहिए। तू पूर्ण, मैं पूर्ण दोनों मिलकर परिपूर्ण होना चाहिए। उपनिषद् में कहा ही है, ‘वह पूर्ण है, यह पूर्ण हे, पूर्ण से निष्पन्न होता पूर्ण है।’ जीवन में ऐसी परिपूर्णता आनी चाहिये इस तरह से जैसे हर एक को विद्या, आरोग्य, आहार, हवा मिलनी चाहिये, उस तरह से जैसे हर एक को खेती की उपासना चाहिये। यह मनुष्य की आध्यात्मिक और भौतिक आवश्यकता है।
यह संसार ईश्वर निर्मित है। वही इसका अधिपति है। सभी पदार्थ, सभी प्राणधारी उस आधार पर विनिर्मित हुए हैं कि उससे इस सृष्टि की शोभा-सुषमा बढ़े और अचेतन को अधिक चेतन बनने का—अविकसित को अधिक विकसित होने का अवसर मिले। प्रिय और उपयुक्त लगने वाले पदार्थ एक प्राणी इसलिए हैं कि विश्व की, सुख-शान्ति को समुन्नत होने में सहायता मिल। अप्रिय, अनुपयुक्त, अवांछनीय एवं अवरोधात्मक तत्व इसलिए हैं कि उनसे बचने बचाने के संदर्भ में कुशलता, सजगता एवं समर्थता बढ़ाने के अवसर मिलते रहें। नीति संवर्धन आत्मिक प्रगति के लिए जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक अनीति उन्मूलन भी है। उस उभय-पक्षीय क्रिया-प्रक्रिया को अपनाकर ही सृष्टि सौंदर्य से लेकर प्रगति प्रयोजन के विविध क्रिया-कलाप सम्पन्न होते हैं। यदि संसार में केवल एक उपयुक्त पक्ष ही रचा गया होता तो यहाँ किसी के करने सोचने के लिए कुछ बचता ही नहीं सब कुछ नीरस हो जाता और सर्वत्र निष्क्रियता दृष्टिगोचर होती। सृष्टि में सत्-असत् का निर्माण सर्वथा उपयुक्त ही किया गया है भले ही वह हमें प्रिय-अप्रिय-सुखद-दुखद के रूप में उपयुक्त, अनुपयुक्त स्तर का भला बुरा ही क्यों न प्रतीत होता हो। भले में जहाँ सुख, सन्तोष की अनुभूति मिलती है, वहाँ बुरे और दुखद से जूझते हुए अपनी प्रतिभा का सजग एवं सदाशयता को प्रखर बनाने का समुचित अवसर मिलता है। सुख ईश्वर की दया है और दुख उसकी कृपा। यह दोनों ही वरदान मनुष्य के लिए प्रकारान्तर से उपयुक्त ही नहीं आवश्यक भी हैं।
ब्रह्मविद्या आत्मा की—परमात्मा की—जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने का उपयुक्त उपाय एवं चिन्तन पथ-प्रशस्त करती है। यह कल्प-वृक्ष जिसे प्राप्त हो गया वह उपयुक्त और अनुपयुक्त परिस्थितियों से समान रूप से लाभान्वित हो सकता है और हरी भली-बुरी परिस्थिति में खट्टे-मीठे आनन्द का अनुभव करता रह सकता है। बिना अन्तः विक्षोभ का सामना किये मात्र अपनी आन्तरिक विभूतियों के आधार पर किस तरह सुखी, संतुष्ट रहा जा सकता है, इस कला का नाम ब्रह्मविद्या है। वस्तुओं पर—
व्यक्तियों पर सुखोपलब्धि की मान्यता मृग-तृष्णा के समान कभी पूरी न हो सकने वाली भ्रान्ति है, इसलिए उसे माया कहते हैं। अन्धकार और प्रकाश की तरह ब्रह्मविद्या और माया का विरोध है। जहाँ एक होगी वहाँ दूसरी रह ही न सकेगी।
ब्रह्मविद्या मानवी अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करने की हर्ष-विषाद के आवेशों को शान्त सन्तुलन में बदलने वाली—परावलंबन को स्वावलंबन में परिवर्तित करने वाली इस जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसलिए तत्वदर्शियों ने ब्रह्मविद्या की महत्ता पग-पग पर दर्शायी है और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए परिपूर्ण प्रोत्साहन दिया है। स्वर्ग और मुक्ति इसी ब्रह्मविद्या के दो मधुर फल बताये हैं। उसी को अमृत और पारस भी कहा गया है।
अमृत इसलिए कि इस ज्ञान को प्राप्त करने वाले अपने आपको अविनाशी आत्मा अनुभव करता है, शरीर के मरण को दुखद नहीं मानता, साथ ही ऐसी योजनाएँ बनाता है जो अनेक जन्मों में पूरी होने पर भी अधीरता या निराशा उत्पन्न न करें। ब्रह्मज्ञान को पारस इसलिए कहा गया है कि लोहे जैसी घटिया परिस्थितियाँ और ओछे व्यक्तित्व भी उस दृष्टिकोण के प्रभाव से स्वर्ण जैसे सुन्दर एवं बहुमूल्य बन जाते हैं। मानव जीवन में सन्निहित अगणित विभूतियों से लाभ उठा सकने योग्य कुशलता एवं दूरदर्शिता ब्रह्मविद्या द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। साथ ही उस लक्ष्य की पूर्ति भी इसी तत्व-दर्शन के सहारे हो सकती है जिसके लिए कि यह सुरदुर्लभ नर शरीर उपलब्ध हुआ है।
ब्रह्मविद्या की महिमा बताते हुए शास्त्र कहता है—
परा यया तदक्ष रमाधिगम्यते। —मुण्डक 1।1।5
जिस ज्ञान के द्वारा परमात्मा को तात्विक रूप से जाना जाता है, उसे पराविद्या कहते है।
यह ब्रह्मविद्या परिष्कृत चिन्तन पर—सद्ज्ञान पर आधारित है। इसके लिए उच्चचरित्र निष्ठा वाले सत्कर्म परायण, तत्वदर्शी गुरुजनों के पास जाना चाहिए और चिन्तन, समय, तप एवं सत्कर्मों के सहारे उसे न केवल मस्तिष्क में वरन् जीवन के समय क्रिया-कलाप में समाविष्ट करना चाहिए। जो ज्ञान व्यावहारिक जीवन का अंश बन सके वस्तुतः वहीं सच्चा ज्ञान है। कहा गया है—
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वांगानि सत्य मायतनम्।—केन 4।8
उस ब्रह्मविद्या के तीन आधार हैं—(1) तप, (2) संयम (3) सत्कर्म। वेद उस ब्रह्मविद्या के अंग हैं। सत्य को प्राप्त करना उसका उद्देश्य।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम्। —नारद परिव्रजकोपनिषद् 9।13
यह ब्रह्मविज्ञान (1) आत्मज्ञान और (2) तपश्चर्या पर आधारित है।
साँसारिक ज्ञान—आजीविका उपार्जन एवं आहार विहार जैसे भौतिक प्रयोजनों की ही एक सीमा तक पूर्ति कर सकता है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता, जो कि उच्चस्तरीय सफलताओं की आधार शिला है—तात्विक दृष्टि मिलने से ही प्राप्त होती है। साँसारिक ज्ञान चाहे कितना ही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो शान्ति और प्रगति का चिरस्थायी पथ प्रशस्त नहीं कर सकता। इसके लिए ब्रह्मज्ञान का—आत्मज्ञान का—ही आश्रय लेना पड़ता है।
आत्मा को अपने आपको—अपने स्वरूप, हित बौद्धिक लक्ष्य को समझने की—हृदयंगम करने की बौद्धिक प्रक्रिया का नाम ज्ञान’ है। इसी ज्ञान को प्राप्त करना जीवन को सार्थक बनाने वाला परम पुरुषार्थ है। अस्तु ज्ञान का महत्व और महात्म्य बताते हैं। आत्मा की प्राप्ति ही परमात्मा की प्राप्ति है। आत्मबोध और ईश्वर दर्शन में मात्र शब्दों का ही अन्तर है। आत्मा का उच्चस्तर की परमात्मा है। अपने आपको देव चिन्तन और देव कर्म में नियोजित कर देना ही ईश्वर भक्ति —योगसाधना एवं तपश्चर्या है। सारा साधना विज्ञान और तत्व-दर्शन इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस संदर्भ में आप्त वचन इस प्रकार हैं—
प्रतिबेधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्य विद्यना विन्दतेऽमृतम्। —क न 2।4
आत्मा से परमात्मा को जाना जाता है ज्ञान के द्वारा ही अमृतत्व प्राप्त होता है। दिव्य ज्ञान को ही अमृत के रूप में जाना जाता है।
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा, सम्यक् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
तप, सत्य, ज्ञान और संयम से आत्मा की प्राप्ति होती हैं।
एतद्वै सत्येन दानेन तपसाऽनाशकेन ब्रह्मचर्येण निर्वेदनेनानाशकेन षडंगेनैव साधयेदेतत्त्रय वीक्षेत दमं दानं दयामिति न तस्य प्राण उत्क्रामन्त्यैव समवलीयन्ते ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्यतिय एवं वेद। —सुवालोपनिषत 3।3
उस परब्रह्म को सत्य, तप, त्याग, उपवास, ब्रह्मचर्य और वैराग्य इन छै साधनों से जानना चाहिए। दम, दान और दया इन तीन कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए। इस मार्ग को अपनाने वाला आत्मा-तत्व में लीन हो जाता है वह पथ-भ्रष्ट नहीं होता।
सत्येन लभ्यस्तपसाह्येष आत्मा सम्यक् ज्ञानेन ब्रह्मचर्य्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्म्मयो हि शुदघो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः॥ (3 मुण्ड के 1।5)
यह परमात्मा सत्य, तपस्या, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य द्वारा सर्वदा लब्ध होता हैं। शरीर के भीतर ज्योतिर्मय, शुद्ध परमात्मा विराजमान है जिसे निर्दोष यति लोग दर्शन करते हैं।
यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनै तमेव विदित्वा मुनिर्भवति। —वृहदा. 4 अ. 4. ब्रा. 22
यज्ञ, दान, विषयवासना, त्याग रूप, तपस्या द्वारा इसी (परमात्मा) को जानकर (मनुष्य) मुनि होता है।
जिसे ईश्वर की अनुभूति होती हैं, वह उस परब्रह्म की सद्गुण, सत्कर्म, सद्विचार एवं सत् स्वभाव रूपी किरणों को, विभूतियों को अपने में धारण करता चला जाता है और ब्रह्म जानने वाला ब्रह्मवत् बन जाता है। उसे मायाबद्ध भव कीटकों की तरह ‘निकृष्ट जीवन जीने स्तर की उठाती है जैसी कि प्रभु के अनुग्रह प्राप्त सच्ची ईश्वर भक्त में उठनी चाहिए।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। —तैत्तरीयोपनिषद् 2 वल्ली 1
ब्रह्म सत्यस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है और अनन्त स्वरूप है।
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वेः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य प सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति॥
हे सोम्य! जो मनुष्य उस अविनाशी परमेश्वर को जान लेता है वह सर्वज्ञ होता है, परमेश्वर में लीन हो जाता है। उसी परमेश्वर में सर्व प्राण, पञ्चभूत सभी इन्द्रियाँ और विज्ञानात्मा आश्रित हैं।
ब्रह्मविदाप्नोति परम्। —तैत्तिरियोपनिषदि 2 वल्ली 1
ब्रह्म का पहिचानने वाला परम पद प्राप्त होता है।
ओजोऽसि, सहोऽसि, बलयसिं, भ्राजोऽसि, देवानाँ धामनामाऽसि, विश्वयसि, विश्वायुः सर्वयसि, सर्वायुरभि भूः।—कत्व
आप ही ओज रूप, क्षमाशील, बलवती, तेजस्विनी, दिव्य-ज्योति, विश्वरूपा, प्राणियों की प्राण और व्याप्त जीवन हैं।
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति नचेदिहा वेदीन्महती बिनाष्टि। भतेषृ भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्मा- ल्लोका दमृता भवन्ति॥ —तलवकारोपनिषदि 13
इस लोक में यदि ब्रह्म को जाने तो संगति है और यदि यहाँ न जाने तो महाविनाश है। धीर लोग प्रत्येक वस्तु में उसे विशेष रूप से चिन्ता करके इस लोक से जाकर अमृत होते हैं।
स्वर्ग मोक्ष, ब्रह्मलोक आदि का शास्त्रों में वर्णन है वे कोई स्थान, स्वरूप या क्रिया-कलाप नहीं है। अज्ञान का समाधान होने पर जो शुद्ध दृष्टि और निर्मल विवेक उदय होता है, उसी को स्वर्ग, मुक्ति आदि नामों से पुकारते हैं।
लोग ईश्वर का अस्तित्व मस्तिष्क मात्र से स्वीकार करते है—हृदय से नहीं। जानते भर हैं—मानते नहीं। यदि ईश्वर का अस्तित्व सच्चे मन से हृदयंगम किया जाय और आत्मा का कल्याण परमात्मा के सामीप्य अनुग्रह में माना जाय तो फिर मनुष्य न तो कुमार्गगामी हो सकता है और न काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर के पाश में बँधा हुआ वासना-तृष्णा की कीचड़ में फंस स सकता हैं। जिसे आत्म-कल्याण की, ईश्वरीय अनुग्रह की आकाँक्षा है उसके लिए उत्कृष्ट स्तर का जीवनयापन करना ही एकमात्र मार्ग रह जाता है। ऐसे ही सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियों में निरत ईश्वर भक्त, परमात्मा की प्राप्ति का आनन्द लेते और जीवन लक्ष्य प्राप्त करते हैं।
ऐसे ईश्वर भक्तों की भक्ति ईश्वर को करनी पड़ती है। ऐसे सच्चे भक्त जहाँ उस परमेश्वर को बुलाते हैं वहाँ वह निश्चित रूप से दौड़ा आता है। ऋग्वेद इस तथ्य को साक्षी देते हुए कहता हैं।
भारतीय धर्म शास्त्रों में पग-पग पर मरणोत्तर जीवन के तथ्य का प्रतिपादन किया गया है। गीता में बार-बार इस बात का उल्लेख किया गया है कि शरीर छोड़ना वस्त्र बदलने की तरह है। प्राणी को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। शुभ कर्म करने वाले श्रेष्ठलोक को—सद्गति को प्राप्त करते हैं और दुष्कर्म करने वालों को नरक की दुर्गति भुगतनी भुगतनी पड़ती है।
वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय- नवानि गृह्णाति नरोऽपिरोण। तथा शरीराणि विहाय- जीर्णान्यान्यानि संयाति नवानि देही॥
—गीता 2। 22
“जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग करके नया वस्त्र धारण करता है, इससे वस्त्र बदलता है, कहीं मनुष्य नहीं बदलता, इसी प्रकार देहधारी आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करता हैं।”
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥ —गीता 4।5
‘ अर्जुन! मेरे और तुम्हारे तुम्हारे अनेक जन्म बीत गये हैं। ईश्वर होकर मैं उन सबको जानता हूँ, परन्तु हे परंतप! तू उसे नहीं जान सकता।”
प्राप्य पुण्यकृताँ लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनाँ श्रीमताँ गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ —गीता 6।41
योगभ्रष्ट अर्थात् साधना पूरी होने के पहले मृत्यु को प्राप्त हुआ योगी, स्वर्ग से ब्रह्मलोक तक अपने पुण्य के अनुसार किसी लोक को प्राप्त कर अनेक वर्षों तक वहाँ के भोगों को भोगता हैं। भोग समाप्त होने के बाद फिर भूतल पर श्रीमन्त और पवित्र कुल में जन्म धारण करता है, जिससे वहां वहाँ शेष अपनी—साधना पूरी कर सके।
ईसाई और मुसलमान वर्ग में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है। वे प्रेत अस्तित्व को भी नहीं मानते। हिन्दू समाज के बारे में कहा जाता है कि उनके धार्मिक विश्वासों के आधार पर पुनर्जन्म और प्रेत अस्तित्व की किम्बदन्तियों को घटना-क्रम बताकर तिल का ताड़ बना दिया जाता है, पर अब उन लोगों के बीच भी ऐसे अनेकों प्रमाण पाये गये हैं जिनसे मरणोत्तर जीवन की पुष्टि होती है और मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बने रहने का सिद्धान्त जाति धर्म की परिधि लौधकर सार्वभौम सत्य के रूप में सामने आता जाता है।
इन्डोनेशिया के प्रायः सभी समाचार पत्रों में उस देश की एक मुस्लिम महिला तजुत जहाराफोना का विवरण विस्तारपूर्वक छपा था जिसके पेट में 18 महीने का बालक है और वह अंग्रेजी, फ्रेंच, जापानी तथा इंडोनेशियाई भाषाएँ बोलता है। उसकी आवाज बाहर सुनी जा सकती है। उसकी डाक्टरी जाँच बारीकी से की गई। यहाँ तक कि इस देश के राष्ट्रपति सुहार्तो स्वयं उस महिला से मिलने और चमत्कारी बालक के सम्बन्ध में बताई जाने वाली बातों की यथार्थता जाँचने पहुँचे थे।
सेवनान और तुर्की के मुसलिम परिवारों में तो पुनर्जन्म की स्मृतियाँ ऐसी सामने आई जिनकी प्रामाणिकता परामनोविज्ञान के शोधकर्ताओं ने स्वयं जाकर की और जो बताया गया था उसे सही पाया। लेवनान देश का एक गाँव कोरनाइल। वहाँ के मुसलमान परिवार में जन्मा एक बालक, नाम रखा गया अहमद। बच्चा जब दो वर्ष का था तभी से अपने पूर्व जन्म की घटनाओं और सम्बन्धियों के बारे में बुदबुदाया करता था। तब उसकी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। कुछ बड़ा हुआ तो अपना निवास ‘खरेबी और नाम बोहमजी बताने लगा।’ तब भी किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। एक दिन सड़क पर उसने खरेबी के किसी आदमी को निकलते देखा उसने उसे पहचानकर पकड़ लिया विचित्र अचम्भे की बात थी।
पता लगने पर पुनर्जन्म के शोधकर्ता वहाँ पहुँचे और बड़ी कठिनाई से बालक को उसके बताये गाँव तक ले जाने की स्वीकृति प्राप्त कर सके। गाँव 40 कि.मी. दूर था। रास्ता बड़ा कठिन और सर्वथा अपरिचित। फिर भी वे लोग वहाँ पहुँचे। लड़के के बताये बयान उस 25 वर्षीय युवक इब्राहिम बोहमजी के साथ बिलकुल मेल खाते गये जिसकी मृत्यु रीढ़ की हड्डी के क्षय रोग से हुई थी। तब उसके पैर अशक्त हो गये। पर इस जन्म में जब वह ठीक तरह चलने लगा तो बचपन से ही इस बात को बड़े उत्साह और हर्ष के साथ हर किसी से कहा कि वह अब भली प्रकार चल फिर सकता है।
खरेबी में जाकर उसने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्र, परिचितों को पहचाना उनके नाम बताये और ऐसी घटनाएँ सुनाई जो सम्बन्धित लोगों को ही मालूम थीं और सही थीं। उसने अपनी प्रेयसी का नाम बताया। मित्र के टूक दुर्घटना में मरने की बात कही। मरे हुए भाई भाउद का चित्र पहचाना और पर्दा खोल कर बाहर आई लड़की के पूछने पर उसने कहा तुम तो मेरी बहिन ‘हुडा’ हो।
तुर्की के अदाना क्षेत्र में जन्मा इस्माइल नामक बालक जब 1॥ वर्ष का था तभी वह अपने पूर्व जन्म की बातें सुनाते हुए कहता मेरा नाम अवीत सुजुल्मस है। अपने सिर पर बने एक निशान को दिखाकर बताया करता कि इस जगह चोट मार कर मेरी हत्या की गई थी। जब बालक पाँच वर्ष का हुआ और अपने पुराने गाँव जाने का अधिक आग्रह करने लगा तो घर वाले इस शर्त पर रजामन्द हुए कि वह आगे-आगे चले और उस गाँव का रास्ता बिना किसी से पूछे स्वयं बताये। लड़का खुशी-खुशी चला गया और सबसे पहले अपनी कब्र पर पहुँचा। पीछे उसने अपनी पत्नी हातिश को पहचाना और प्यार किया। इसके बाद उसने एक आइसक्रीम बेचने वाले मुहम्मद को पहचाना और कहा तुम पहले तरबूज बेचते थे और मेरे इतने पैसे तुम पर उधार हैं। मुहम्मद को पहचाना और कहा तुम पहले तरबूज बेचते थे और मेरे इतने पैसे तुम पर उधार हैं। मुहम्मद ने वह बाल मंजूर की और बदले में उसे बर्फ खिलाई।
जगद्विख्यात सामुद्रिक शास्त्र ज्ञाता कीरो के पिता का जिस समय देहान्त हुआ उस समय उनकी शक्ति बहुत क्षीण हो गई थी और इसलिए वे कुछ आवश्यक बातें समाप्त हो गई। कुछ महीने पश्चात् कीरो संयोगवश एक प्रेतात्मा ने आकर उनको बतलाया कि हमारे परिवार से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज लन्दन के डेविस एण्ड सन सालिसिटर’ के यहाँ रखे हैं। उनका दफ्तर स्ट्रेण्ड में गिर्जाघर के पास एक तंग सड़क पर है, जिसका नाम मैं भूल गया हूँ। तुम उनके यहाँ जाकर उन कागजात को ले आना।”
“दूसरे दिन कीरो उस सड़क पर पहुँचे और बहुत देर परिश्रम करने के बाद वह कार्यालय मिल गया। उसके पुराने मालिक तो मर चुके थे, पर उस कारवार को किसी अन्य वकील ने खरीद लिया था। नये मालिक ने पहले तो इतने पुराने कागजात को जल्दी ढूँढ़ सकने में असमर्थता प्रकट की, पर जब कीरो ने उसके क्लर्क को पुरस्कार देने की बात कही तो उसने पुराने बण्डलों में से आधा घण्टा मेहनत करके उन दस्तावेजों को निकाल दिया।”
वर्जीनिया विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डाक्टर इवान स्टीवेन्सन ने पुनर्जन्म की स्मृति से सम्बन्धित घटनाओं की जाँच-पड़ताल करने के सम्बन्ध में समस्त संसार का दौरा किया है। इस संदर्भ में वे भारत भी आये थे और उन्होंने यहाँ अनेकों घटनाओं की गंभीरता पूर्वक जाँच की और उनमें से अधिकाँश को पूर्ण विश्वस्त बताया। इनकी खोज में दो घटनाएँ और भी अधिक आश्चर्यजनक थीं। कन्नौज के निकट जन्मे एक बालक के शरीर पर गहरे घावों के पाँच निशान जन्म काल से ही थे वह कहता था पिछले जन्म में शत्रुओं ने उसकी हत्या चाकुओं से गोद कर की थी यह उसी के निशान हैं। जाँच करने पर पूर्व जन्म में जहाँ उसने बताया था सचमुच ही उस नाम के व्यक्ति की चाकुओं से गोद कर हत्या किये जाने का प्रमाण था। ठीक इसी से मिलती-जुलती एक पूर्व जन्म स्मृति तुर्की के एक बालक की थी, जिसकी शत्रुओं ने छुरे से हत्या की थी। उसके शरीर पर घावों के निशान मौजूद थे और पुलिस के रिकार्ड में बताये गये व्यक्ति की हत्या ठीक उसी प्रकार किये जाने का विवरण दर्ज था, जैसा कि उस बालक ने बताया था। डा. इवान स्टीवेन्सन ने समस्त विश्व में इस प्रकार के प्रामाणिक विवरण प्राप्त किये हैं। अन्य देशों की अपेक्षा भारत में ऐसे प्रमाण इसलिए अधिक मिलते हैं कि यहाँ की संस्कृति में पुनर्जन्म की मान्यता सहज ही सम्मिलित है, इसलिए स्मृति बताने वाले बालकों को उस तरह डाँटा डपटा नहीं जाता जैसा कि पुनर्जन्म न मानने वाले ईसाई मुसलमान धर्म वाले देशों में, वहाँ इस तरह की स्मृतियों की जाँच पड़ताल करना तो दूर, बताने वाले पर धर्म विरोधी के प्रति साजिश का आक्रमण होने की बात सोचकर उसे चुप कर देना ही ठीक समझा जाता है।
ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डिक्सन स्मिथ बहुत समय तक मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में अविश्वासी रहे। पीछे उन्होंने प्रामाणिक विवरणों के आधार पर अपनी राय बदली और वे परलोक एवं पुनर्जन्म के समर्थक बन गये। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यू लाइट आन सरबाइवल’ में उन तर्कों और प्रमाणों को प्रस्तुत किया है जिनके कारण उन्हें अपनी सम्मति बदलने के लिए विवश होना पड़ा।
पेरिस के अन्तर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक सम्मेलन में सर आर्थर कानन डायल ने परलोक विज्ञान को प्रामाणिक तथ्यों से परिपूर्ण बताते हुए कहा था उस मान्यता के आधार पर मनुष्य जाति को अधिक नैतिक एवं सामाजिक बनाया जा सकना सम्भव होगा और मरण वियोग से उत्पन्न शोक-सन्ताप का एक आशा भरे आश्वासन के आधार पर शमन किया जा सकेगा।
निस्सन्देह मरणोत्तर जीवन की मान्यता के दूरगामी सत्परिणाम हैं। उस मान्यता के आधार पर हमें मृत्यु की विभीषिका को सहज सरल बनाने में भारी सहायता मिलती है। नैतिक मर्यादा की स्थिरता के लिए तो उसे दर्शन शास्त्र का बहुमूल्य सिद्धान्त कह सकते हैं।
अध्यात्मवेत्ता स्वामी रामतीर्थ अमेरिका में महिलाओं की शंकाओं का समाधान कर रहे थे। धर्म की अनेक गुत्थियाँ सुलझाते जा रहे थे। तब तक युवती पूछ बैठी-’कृष्ण अधिकतर गोपियों के मध्य रहते थे। क्या युवतियों के मध्य घिरा रहने वाला व्यक्ति पवित्र हो सकता है? ‘इसमें भी कोई शंका की बात है? व्यक्ति के चरित्र का सम्बन्ध तो उसके विचारों से है। विचारों की पवित्रता उसे कभी विचलित नहीं होने देती।’
‘मैं इस बात पर विश्वास नहीं करती।’ इतना सुनते ही बिना कुछ कहे सुने स्वामीजी अपना आसन छोड़ भागने लगे। काफी दूर निकल जाने पर वह खड़े होकर पीछे की ओर देखने लगे। उनमें से अधिकतर महिलाएँ स्वामी जी के पीछे-पीछे दौड़कर आ रही थीं। जब वे सभी महिलाएँ निकट आ गई तो स्वामी जी ने पूछा—’अच्छा बताइये क्या मैं अपवित्र हो गया॥’ ‘नहीं! बिलकुल नहीं!! फिर योगिराज कृष्ण को गोपियों से घिरे रहने पर कैसे अपवित्र कहा जा सकता है।’
स्वस्थ शरीर और दीर्घजीवन का सम्बन्ध साधारणतया खान-पान, व्यायाम आदि से माना जाता है, पर वस्तुतः समग्र आरोग्य मनुष्य की मनःस्थिति पर आधारित है।
जो मन से स्वस्थ है वह शरीर से भी स्वस्थ रह सकता है। यदि मनःक्षेत्र में उद्वेग और आवेश भरे हुए हैं तो रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनका निवारण पौष्टिक आहार एवं चिकित्सा उपचार से भी सम्भव न हो सकेगा।
यदि मन स्वस्थ हो तो बाह्य कारणों से उत्पन्न हुई रुग्णता अधिक समय न ठहर सकेगी उसका निराकरण जल्दी ही हो जायगा, शरीर संरचना में वे रोगों का समाधान स्वयमेव होता रहे।
मन में भरी दुर्भावनाएँ एवं दुष्प्रवृत्तियाँ मात्र मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहतीं उनकी प्रतिक्रिया ज्ञान तंतुओं के माध्यम हैं। इस अंतर्ग्रही विष को शरीर संरचना भी दूर नहीं कर सकती। सम्वेदनाएँ तो प्रकृति को ढालती हैं, मनोविकार धीरे-धीरे शरीर के समस्त अंगों को अपने दुष्प्रभाव से प्रभावित करते चले जाते हैं और उनका परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में सामने आता है। निरोग और दीर्घजीवी बनने के लिए मनःक्षेत्र को पवित्र और प्रगतिशील बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता है।
योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ और काकभुसुण्डि जी के सम्वाद का एक रोचक कथा प्रसंग आता है। वशिष्ठ जी पूछते हैं—हे काकभुसुण्डि आप इतने काल तक दीर्घजीवी और युवा किस कारण रहे हैं।
इसके उत्तर में काकभुसुण्डि कहते हैं—’मैं सदा आत्म-भाव में तन्मय रहता हूँ। मनोरथों में शक्ति नष्ट नहीं करता। चिन्ता और विषाद में नहीं फँसता। भविष्य के लिए आशंकाएँ नहीं करता। मन को आवेशग्रस्त नहीं होने देता। सबको समान मानता हूँ। मोह और प्रमाद से दूर रहता हूँ। बीती दुर्घटनाओं से दुखित नहीं रहता। दूसरों के सुख दुख में ही सुखी-दुखी होता हूँ। प्राणिमात्र के प्रति सुहृद सहायक रहता हूँ। विपत्ति में न धैर्य खोता हूँ और न सम्पत्ति से उन्मत्त बनता हूँ। यह मेरे दीर्घजीवन तथा अक्षययौवन का कारण है।
अकाल मृत्यु और रुग्णता का आधार शास्त्रकारों ने मानसिक असंतुलन को ही बताया है और कहा है जिसे दीर्घजीवन एवं समग्र आरोग्य अपेक्षित हो उन्हें अपने चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बनाने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ अभिवचन इस प्रकार हैं—
न देवानामति व्रतं शंतात्मा च न जीवित। —ऋग्वेद
देवताओं के नियमों का उल्लंघन करके कोई दीर्घजीवी नहीं हो सकता।
इह लोके विशुद्धा च कीर्तिरायुर्विवर्द्धिनी। —महाभारत
शुद्ध कीर्ति प्राप्त करने के साथ-साथ आयु भी बढ़ती हैं।
मृत्यो न किमच्छक्यं स्त्वमेको मारयितुँ बलात्। मारणीयस्य कर्माणि तर्त्कतुणीति नेतरत्॥
हे मृत्यु तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी भी मनुष्य को नहीं मार सकती। लोग किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मों से मरते हैं।
आचाराल्लभते ह्यायुराचारा दीप्सिता प्रजाः
आचाराद्धन मक्षप्य माचारो हन्त्य लक्षणम। —मनुस्मृति
आचार से दीर्घ आयु सुसन्तति और लक्ष्मी प्राप्ति होती हैं। आचार से अशुभ अनिष्ट दूर होते हैं।
मानव जीवन समुद्र की तरह महान् है। उसमें सन्निहित सम्पदाओं और विभूतियों का कोई वारापार नहीं। हुआ है। कारण कि गहराई में उतर कर यह नहीं खोजा गया कि हमारे समीप ही कितनी महिमामयी सम्पदा प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है और थोड़ा प्रयत्न करने से ही उसका समुचित लाभ उठाया जा सकता है। मनुष्य जीवन की ऊपरी परतें जिन्हें हम आमतौर से जानते पहचानते हैं नगण्य मूल्य महत्व की हैं। उपेक्षणीय गई-गुजरी स्थिति जैसा ही समुद्र तल दिखाई पड़ता है लगभग वैसा ही अभावग्रस्त दरिद्र और गया-गुजरा जीवन स्तर अपना भी होता है। समुद्र की गहराई में उतरने का साहस भी कोई बिरले ही कर पाते हैं जो करते हैं वे निहाल बनते हैं। इसी प्रकार जीवन सम्पदा को समझने और उसे उपलब्ध करने के लिए जो मनस्वी कटिबद्ध हो जाते हैं, वे मोती निकालने वाले गोताखोरों की तरह बहुमूल्य सम्पत्ति प्राप्त करने का आनन्द लेते हैं।
समुद्र सम्पदा और धरती की समृद्धि की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सागर निश्चित रूप से कहीं अधिक धनवान है। खनिज पदार्थों को ही लें तो पता चलता है कि उसका वैभव कितना बढ़ा-चढ़ा है।
कनाडा के ‘माइनिंग जनरल मासिक पत्र में दिये गये आँकड़ों के अनुसार समुद्र जल में से अकेला नमक निकाला जा सके तो उसकी इतनी मोटी परत बन जायगी जिसे समूची पृथ्वी पर बिछाने से उसकी ऊँचाई कोई 500 फुट हो जाय।
समुद्र में जो पानी भरा है उसका आयतन 33 करोड़ घन मील है। एक घन मील समुद्री पानी का विश्लेषण किया जाय तो उसमें लाखों टन खनिज पदार्थ मिलेंगे फिर समस्त समुद्री जलराशि का मूल्याँकन कितना विस्तृत होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।
साधारण नमक की मात्रा समुद्र जल में सबसे अधिक है। इसके बाद क्रमशः मैग्नेशियम क्लोराइड, मैग्नेशियम सल्फेट, कैल्शियम सल्फेट, कैल्शियम सल्फेट, कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नेशियम ब्रोमाइड, फ्लोरिन, बेरियम, आयोडीन, आर्सनिक, रुविडियम, चाँदी, सोना, रेडियम आदि का नम्बर आता है।
ब्रोमीन जैसे बहुमूल्य खनिज की तो धरती पर एक प्रतिशत मात्रा ही शेष रह गई है शेष 99 प्रतिशत तो समुद्र में जा पहुँची। समुद्री पौधे तथा जीव-जन्तु जिस पौष्टिक खुराक के आधार पर अपनी जीवन यात्रा चलाते हैं वह ‘आयोडीन’ समुद्र जल में प्रचुर मात्रा में भरा पड़ा है उसकी आवश्यकता मनुष्य को भी कम नहीं है। पोटाश जिसकी वनस्पतियों को नितान्त आवश्यकता है समुद्र के गर्भ में हिमालय जितनी मात्रा में भरी पड़ी है। ताँबा इतना है कि अकेले उसी से धरती पर धातुओं की आवश्यकता भली प्रकार पूरी हो सकती है।
समुद्र में स्वर्ण कणों की मात्रा आश्चर्यजनक है। एक घन मील जल से प्रायः तीन लाख किलो सोना निकाला जा सकता है। फिर पूरी तीन करोड़ घन मील जलराशि से कितना सोना प्राप्त हो सकता है इसकी कल्पना करने मात्र से हमारी आँखें चमकने लगती हैं।
सोवियत वैज्ञानिकों ने 52 दिन आर्कटिक सागर में बनी प्रयोगशाला में बिताने केग उपरान्त कुछ ही समय पूर्व यह घोषणा की थी कि पूर्वी साइबेरिया के समुद्र क्षेत्र में सोने का विशाल भण्डार छिपा हुआ है। इस स्वर्ण राशि को निकाला जा सकता है। अब प्रयोग यह चल रहे हैं कि ऐसी विधियाँ ढूँढ़ निकाली जायँ जिससे जलराशि से स्वर्ण को पृथक करने का खर्च उतना न पड़े जितना कि इस समय पड़ता है। इस दिशा में अभीष्ट सफलता मिल गई तो रु स की स्वर्ण सम्पदा सबसे ऊपर होगी।
जर्मन रसायनवेत्ता फ्रिज हैवर ने इस दिशा में काफी प्रयत्न किया था वह समुद्र से स्वर्ण निकाल कर जर्मनी को ‘सोने की लंका बनाने का प्रयत्न कर रहा था कि महायुद्ध छिड़ जाने से उसके सपने पीछे पड़ गये और उन प्रयासों में शिथिलता आ गई।
हम बारहसिंगा की तरह कस्तूरी की तलाश में इधर-उधर दौड़ते हैं और निराश होकर थकान साथ लेकर घर लौटते हैं। कस्तूरी हिरन को जब यह पता चलता है कि सुगन्ध का केन्द्रबिन्दु उसकी नाभि में है तो वह चैन से बैठता है और पेट पर मुँह रखकर तृप्तिदायक आनन्द का रसास्वादन करता है। जीवन संपदा का मूल्य समझने वाले—उसका पर्यवेक्षण करने वाले—इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं—यदि हम अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को परिष्कृत कर लें तो उन छिपी हुई शक्तियों और विशेषताओं से सम्पन्न हो सकते हैं जो सर्वतोमुखी प्रगति का ‘महत्वपूर्ण आधार अपने गर्भ में सँजोये हुए हैं।
समुद्र तल में छिपी हुई सम्पदा को निकालने के लिए वैज्ञानिक प्रयास उत्साह पूर्वक आरम्भ हुए हैं और यह माना गया है कि बहुमूल्य खनिज सम्पदा तथा खाद्य-सामग्री प्रचुर परिमाण में समुद्र मंथन से प्राप्त हो सकती है। जीवन समुद्र को भी यदि उपेक्षित न पड़ा रहने दिया जाय, उसके अन्वेषण उपयोग का प्रयत्न किया जाय तो हमारी भौतिक एवं आत्मिक दरिद्रता सहज ही दूर हो सकती है।
पुराण गाथा के अनुसार थल निवासियों ने अभीष्ट समृद्धि प्राप्त करने के लिए किसी समय समुद्र मंथन किया था और उसमें से कौस्तुभ मणि, कामधेनु, लक्ष्मी, ऐरावत, अमृत आदि उपयोगी वस्तुएँ निकाली थीं। अब लगता है हमें पुनः समुद्र मंथन करना पड़ेगा क्योंकि धरती की सम्पदा क्रमशः चुकती जा रही है और उपयोगी सामग्री बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए उपयुक्त मात्रा में न मिलने के कारण भूतल निवासी क्रमशः दरिद्र होते जा रहे हैं।
समूची पृथ्वी का क्षेत्रफल 196,940,000 वर्ग मील है। इससे से 139,715,000 वर्ग मील भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। उसकी गहराई इतनी अधिक है कि समुद्र तल से ऊँची उठी हुई धरती और पहाड़ों को यदि उस जलराशि में डुबो दें तो वह समस्त थल संपदा 12000 फुट गहरे पानी में जाकर बैठ जायगी।
हम थलचरों ने इतना ही पर्याप्त समझा कि आँखों से धरती पर जो दिखाई देता है उसी का उपयोग करने में लगे रहें। यदि सूक्ष्म दृष्टि से जल सम्पदा की सम्भावनाओं पर ध्यान दिया गया होता तो प्रतीत होता कि प्रत्यक्ष की तुलना में अप्रत्यक्ष का विस्तार वैभव कहीं अधिक है। प्रत्यक्ष स्थूल जीवन की तुलना में हमारे सूक्ष्म जीवन की आन्तरिक सम्पदा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं।
मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अगले दिनों धरती माता पर निर्भर रहने से काम नहीं चलेगा। बालकपन बीतता जा रहा है। उसे समुद्र पिता की सहायता से अपनी प्रौढ़ता के उपयुक्त सहारा लेना पड़ेगा। समुद्र से मछलियों के रूप में माँसाहारियों के लिए और वनस्पतियों के रूप में शाकाहारियों के लिए विपुल मात्रा में भोजन मिल जायगा। छिछले पानी में ऐसी वनस्पतियाँ उगाई जाने वाली हैं जो शाक-भाजी की, पशुओं के चारे की, मसालों की, औषधियों की आवश्यकताएँ पूरी कर सकें। निकट भविष्य में मछली पकड़ने की विद्या में अधिक अच्छी किस्म की अधिक मात्रा में—उपयुक्त स्थानों में मछलियाँ पैदा करने का प्रयत्न भी सम्मिलित किया जाने वाला हैं। यह कृषि सुविस्तृत समुद्र क्षेत्र में अधिक सफलता और सरलता के साथ सम्पन्न हो सकता है।
समुद्री खोज के लिए वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में ‘वाईस्केप’ ‘आटोगिरोस’ जैसे जल संस्थान अपना महत्वपूर्ण कार्य करते रहे हैं, अब ऐसे तैरते द्वीप तैयार किये जा रहे हैं जिन पर निर्वाह की सुविधा ही नहीं वरन् उन पर आजीविका उपार्जन के भी साधन बने रहें और वहाँ के निवासी स्वावलम्बी जीवन उसी प्रकार जी सकें जिस प्रकार समुद्री द्वीपों में रहने वाले इस समय जीते हैं। अणु शक्ति के कारखाने तथा एकाँत शोध कार्यों के लिए तो ऐसे तैरते द्वीपों की आवश्यकता विशेष रूप से समझी जा रही है।
समुद्र का खारेपन दूर किया जा सके और उस निरर्थक जलराशि को शुद्ध करके पेयजल के रूप में परिणत किया जा सके तो धरती का एक सुविस्तृत भाग जो आज अनुपयोगी स्थिति में पड़ा हैं, कल उपजाऊ बन सकता है। उस पर करोड़ों मनुष्यों और पशुओं का निर्वाह हो सकता है। धरती निवासियों की सुविधा में एक नई कड़ी जुड़ सकती है। मनुष्य जीवन में कषाय-कल्मषों की तरह धुला हुआ खारेपन यदि हटाया जा सके तो उसकी निर्मलता सर्वत्र श्री समृद्धि, शान्ति एवं प्रगति का वातावरण उत्पन्न कर सकती है।
सोलहवीं सदी में साम्राज्ञी एलिजावेथ ने 10 हजार पाउण्ड का पुरस्कार उस वैज्ञानिक को देने की घोषणा की थी जो समुद्री जल को नमक रहित करने की सस्ती विधि का आविष्कार कर सके। उनके जीवन काल में ऐसा कोई दावेदार सामने न आया। पीछे टेलीफोन के आविष्कर्ता ग्राह्मबेल ने भी इस दिशा में बहुत माथापच्ची की पर वे भी कृत-कार्य न हो सके। अब यह माना गया है कि सूर्य किरणों की ऊर्जा को एकत्रित करके उसकी गर्मी से उड़ाया हुआ समुद्री पानी पेय जल बन सकता है।
ब्रिटिश आणविक ऊर्जा प्राधिकार ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि समुद्र जल का खारेपन पृथक करके उसे पीने योग्य बनाना अब उतना महंगा और कठिन नहीं रहा जितना कि कुछ समय पहले समझा जाता था। इसके लिए किसी अतिरिक्त ईधन को जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सूर्य की ऊर्जा इतनी विपुल मात्रा में उपलब्ध होती हैं कि उससे समुद्र जल को पीने योग्य बनाया जा सके। बिखरी ऊर्जा का केन्द्रीकरण नतोदर काँचों से तथा दूसरे उपकरणों से किया जा सकता है और उससे भाप बना कर उड़ाने का अथवा बर्फ जमाने एवं पिघलाने का प्रयोजन सरलता पूर्वक पूरा हो सकता है।
इस दिशा में प्राधिकार ने जो अन्वेषण एवं प्रयोग किये हैं उनका विवरण करते हुए यह बताया है कि यदि इस दिशा में अधिक ध्यान दिया जाय तो मनुष्य जाति की एक महती आवश्यकता पूर्ण करने में आशातीत सफलता मिल सकती है।
लवण मिश्रित जल को शुद्ध एवं पेय बनाने के लिए चल रहे प्रयोगों में आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक अग्रणी हैं। उस सूखे महाद्वीप को अधिकाधिक जलीय सुविधा उपलब्ध हों इसके लिए ऐसे प्रयोग वहाँ आवश्यक भी हैं।
इस जलशोधक पद्धति को ‘सिरोथम’ नाम दिया गया है। शोधकर्ताओं में प्रमुख हैं—डा. डोनाल्ड उन्होंने अपने देश में पाये जाने वाले खारी झरनों तथा झीलों का पानी नव आविष्कृत आई.सी. आई. नामक रसायन के द्वारा शुद्ध करने में सफलता प्राप्त की है। अन्य देशों में पानी उबाल कर भाप बनाने की पद्धति काम में लाई गई है पर वह बहुत महंगी पड़ती हैं। आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक का नव-निर्मित रसायन पानी में डाल दिया जाता है और वह नमक चूस लेता हैं। इसके बाद उसे धोकर फिर चूसने योग्य बना दिया जाता है। बड़ी मात्रा में यह रसायन खारी झीलों में डाला जाता रहता है और उसे धोकर शुद्ध किया जाता रहता है इस प्रकार सस्ती विधि से खारी पानी मीठा बनने लगता है। यह विधि छोटे जलाशयों के लिए तो ठीक बैठी है पर समुद्र की विशाल जलराशि को पीने योग्य कैसे बनाया जाय इसका कारगर हल अभी भी नहीं निकला है। ऐसी ही गहरी खोजें मानव-जीवन के समुद्र में से दोष दुर्गुणों के निराकरण के लिए की जानी चाहिए। उसमें घुले हुए पाप अनाचार के खारेपन को हटाकर उज्ज्वल चरित्र नर-पशु को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाया जाना चाहिए। जो प्रयत्न समुद्र को खोजने और उससे लाभ उठाने के लिए किये जा रहे हैं उसी स्तर के प्रयत्न यदि मानव-जीवन को—मनुष्य-समाज को परिष्कृत बनाने के लिए किये जाँय तो उस दिव्य संपदा से विश्व वसुधा में स्वर्गीय सुख सम्पदा का बाहुल्य सर्वत्र बिखरा हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। सूर्य ऊर्जा से जब खारी पानी को मीठे पेयजल में बदला जा सकता है तो कलुषित स्थिति में पड़े हुए मनुष्य जीवन को तप साधना की ऊष्मा से पवित्र और परिष्कृत क्यों नहीं बनाया जा सकता। इन प्रयत्नों में भी हमें वैज्ञानिक उत्साह जैसी ही तैयारी के साथ संलग्न होना चाहिए।
देश में खिलाफत आन्दोलन चल रहा था फिर इलाहाबाद उसकी चिनगारी से कैसे बचता? संगम थियेटर में महिला सभा का आयोजन किया गया। हिन्दू, मुस्लिम सभी महिलाओं की अधिक संख्या में आने की सम्भावना थी। मुस्लिम समाज में पर्दा अधिक किया जाता है। अतः उनकी बैठक व्यवस्था किस प्रकार की जाये। यह एक विवाद का विषय था।
अनेक नेताओं ने अपने-अपने ढंग के सुझाव दिये एक सुझाव था कि वक्त, भाषण देते समय आँखों से पट्टी बाँध ली। गाँधीजी इस प्रस्ताव पर बहुत हँसे। उन्होंने इस सुझाव को अस्वीकृत कर दिया। उन्होंने यह कहा—’मैं अपना पूरा भाषण नीची दृष्टि करके दूँगा अतः किसी को देखने का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी कार्यकर्ताओ ने मुस्लिम महिलाओं के बैठने के स्थान के आगे चिकें लगा दी ताकि वक्त की सीधी दृष्टि श्रोताओं की ओर न पहुँच सके।
सभा की कार्यवाही प्रारम्भ हुई। पहला भाषण मौलाना मोहम्मदअली का था, उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँधकर अपनी बात शुरू की। उसके बाद महात्मा गाँधी का नम्बर आया। वे मंच पर बोलने के लिए खड़े हुये। नीची दृष्टि करके उन्होंने अपना भाषण शुरू किया। वे थोड़ी ही देर बोल पाये होंगे कि चिक के पीछे बैठी महिलाएँ एकदम सामने आकर अन्य महिलाओं के बराबर बैठने लगीं।
कमला नेहरू की माताजी भी आगे बैठकर भाषण सुन रहीं थी उन्होंने पूछ ही लिया—’आप लोगों के लिए पर्दे की इतनी अच्छी व्यवस्था की गई थी फिर उसे तोड़कर आप आगे क्यों आ गई? कम से कम गाँधी जी का भाषण तो शान्ति से सुन लिया होता।’
उन्होंने एक स्वर में कहा—’कहीं पीरों और फकीरों से भी पर्दा किया जाता हैं। पर्दा तो साँसारिक लोगों के लिए हैं।’ आप उनके भाषण का यहाँ बैठकर आनन्द लें, फिर हम ही वहाँ क्यों बैठें?’
संघर्ष अरुचिकर भले ही लगे पर है आवश्यक से भी आगे बढ़कर अनिवार्य। जड़ता को चेतना में परिणत करने की प्रक्रिया संघर्ष के साथ ही आरम्भ होती हैं।
प्राणियों की माता के गर्भ में भ्रूण की कलल के रूप में स्थापना लिए रति-क्रिया के साथ आरंभ होती है वह प्रत्यक्ष ही संघर्ष है। संघर्ष असुविधाजनक भले ही हो पर है आनन्ददायक इस तथ्य को मैथुन कर्म के साथ जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। शिशु जन्म के समय भी यही प्रक्रिया कार्यान्वित होती है। बालक उदरकारा तोड़कर जब उन्मुक्त वातावरण में विचरण करने के लिए आतुर होता है तो उसका संकल्प एवं प्रयास प्रसव पीड़ा के रूप में दृष्टिगोचर होता है। माता को भी उस संघर्ष प्रकरण में योगदान देना पड़ता है—कष्ट उठाना पड़ता है। इसके कटु प्रसंग की उपेक्षा करने की बात सोची जाय तो प्रजनन सम्भव ही न हो सकेगा।
शरीर के भीतर चल रही समस्त क्रियाएँ लगभग उसी स्तर की हैं जैसी कि रई से दही विलोकर उसमें से मक्खन निकालने की मंथन प्रक्रिया होती हैं। श्वास का आवागमन, माँस पेशियों का आकुंचन-प्रकुँचन, रक्त भिषरण प्रभृत अनेकों शरीरगत क्रिया-कलाप ही जीवनीशक्ति उत्पन्न करते हैं और उसी बिजली से हमारी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों का सञ्चालन होता हैं। जिस क्षण यह मंथन संघर्ष रुकेगा उसी क्षण मृत्यु सामने जायगा। निष्क्रियता और मृत्यु एक ही तथ्य के दो नाम हैं।
समुद्र में ज्वार-भाटे आते हैं और लहरें उठती हैं इसीसे सागर क्षेत्र में शुद्धता और संजीवता रहती है यदि जल पूर्णतया स्थिर हो जाय तो उसका विषाक्त होना निश्चित है। जोहड़ और तालाबों का पानी इसीसे सड़ता हैं कि उनकी गतिशीलता रुक जाती हैं। छोटे-छोटे झरने अपनी शुद्धता बनाये रहते हैं, इसका कारण उनका प्रवाह हैं। भूमि के साथ-वायु के प्रवाह के साथ टकराती हुई जलधारा बहती है, यह टकराव ही उसकी शुद्धता को अक्षुण्ण रखता है। टकराव से मुँह मोड़ने की भीरु ता आते ही शक्ति और प्रगति के द्वार बन्द हो जाते हैं।
हवा में उपयोगी तत्व इसलिए विद्यमान हैं कि वह चलती हैं। बंद तहखानों और पुराने कुंओं में वही हवा प्राणघातक-विषाक्त ता से भर जाती है। इसका एकमात्र कारण गतिशीलता में अवरोध उत्पन्न होना है। जिन्हें आरामतलबी भाती है, जो निष्क्रियता को शान्ति अथवा चैन का नाम देते हैं, वे जानते नहीं कि संघर्ष में रहने वाली कठिनाई की तुलना में यह गतिहीनता और भी अधिक महंगी पड़ेगी। उसमें शारीरिक और मानसिक रुग्णता की इतनी बड़ी विभीषिका छिपी पड़ी हैं जिसका एक अंश भी व्यस्त सक्रियता में नहीं होता। देखा गया है कि कर्मठता से मुँह मोड़ते ही अधेड़ आयु के व्यक्ति तेजी से वृद्धता के गर्त में गिरते हैं और जल्दी ही मौत के मुँह में चले जाते हैं इसकी अपेक्षा यदि वे अन्त तक सक्रिय बने रहते तो निश्चय ही अधिक स्वस्थ रहते और अधिक दिन जीते।
भौतिक विज्ञान ने माना है कि परमाणुओं की द्रुतगामी हलचलें ही पदार्थों को उपजाती, बढ़ाती और बदलती हैं। संसार में अनेकानेक हलचलों की जन्मदात्री आणविक द्रुतगामिता ही है यदि सृष्टि के परमाणु निष्क्रिय हो जाय तो फिर सर्वत्र भयानक नीरवता और स्तब्धता के अतिरिक्त कहीं कुछ दृष्टिगोचर न होगा। भयंकर शून्यता ही सर्वत्र बिखरी पड़ी होगी। किसी पदार्थ अथवा प्राणी का अस्तित्व शेष न रहेगा। परमाणुओं का व्यस्त हलचलों की संघर्षशीलता में संलग्न रहने का प्रतिफल ही हम अपने संसार के सुरम्य अस्तित्व के रूप में पाते हैं। झंझट से बचने और चैन की वंशी बजाने की बात यदि प्रकृति के तत्व सोचने लगें तो समझना चाहिए महाप्रलय की घड़ी आ पहुँची।
जीवनोपयोगी विविध वस्तुओं की उपलब्धि में संघर्ष शीलता ही प्रधान कारण है। धरती का पेट चीर कर अन्न और फल उगाये जाते हैं। उर्वर भूमि भी कब किसी का घर धान्य−धान्य से धरती है। शिल्पी, श्रमिक और कलाकारों को कठोर श्रम−साधना करनी पड़ती है। इसके बिना उनको उपयोगी उत्पादन सम्भव ही न होगा। मशीनों के घूमते हुए चक्के ही कारखाने चलाते हैं और आवश्यक वस्तुएँ विनिर्मित होती हैं।
इस संसार में आक्रमणकारी सत्ताओं का अस्तित्व इसलिए है कि जागरूकता और समर्थक तत्वों को हटा और मिटा दिया जाय। प्रकृति का अशक्त ता सहन नहीं। निष्क्रियता की कुरूपता उसे फूटी आँखों नहीं सुहाती। राजकीय कानून में सामाजिकता की मर्यादा उल्लंघन करने वाले क्रिया−कलाप को दण्डनीय अपराध माना गया है। प्रकृति के कानून इससे सूक्ष्म हैं उनमें आलसी और प्रमादी भी अपराधी हैं। अकर्मण्य, निष्क्रिय, हरामखोर और डरपोक व्यक्ति भी प्रकृति को असह्य हैं। वह उन्हें उसी तरह उखाड़ फेंकती है जिस प्रकार माली और किसान की कुदाली अनावश्यक खर पतवार का उन्मूलन करने में निरन्तर निरत रहती है। यह अप्रिय लगने वाला प्रसंग यदि न चले कि किसान के लिए फसल का लाभ लेना और माली का फल उत्पन्न करना सम्भव ही न हो सकेगा। बलिष्ठता का सौंदर्य बनाये रहने के लिए दुर्बलता की कुरूपता हटाने की प्रक्रिया चाहे निष्ठुर क्रूर−कर्म जैसी ही क्यों न लगे प्रकृति के कानून में उसका समावेश पूरी तरह हो रहा है। यहाँ संघर्ष रत शक्ति उपासक तत्वों को ही हँसते−हँसाते निर्वाह करने की छूत है। रुदन की औषधि तो विनाश की शीशी में ही भर दी गई है।
मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू जैसे नगण्य सत्ता वाले हेय प्राणी उनके जीवन को चुनौती देते हैं जिन्हें गन्दगी से लड़कर स्वच्छता उत्पन्न करने वाले संघर्ष में रुचि नहीं। हवा में उड़ने वाले क्षय आदि के विषाणु केवल उन फेफड़ों में अड्डा जमाते हैं जिन्होंने श्वास प्रक्रिया का समुचित उपयोग न करके दुर्बलता ओढ़ रखी है। हवा में इतनी के विघातक तत्व उड़ते हैं कि देखते−देखते किसी को भी मृत्यु मुख में धकेल सकते हैं। उनसे हमारी रक्षा उतनी ही मात्रा में— उतनी ही देर तक होती है जितनी कि प्रतिरोधक समर्थता अपने भीतर रहेगी। इसमें न्यूनता आते ही विषाणुओं का आक्रमण दुर्बल स्थिति के अनुपात से होता हुआ चला जायगा। निष्क्रियता का नाम ही दुर्बलता है और दुर्बलता का प्रधान कार्य आक्रमणकारी तत्वों को आमन्त्रित करके अपने काया−कल्प का साधन जुटाना ही होता है। दुर्बलता को स्वयं अपना जीवन भारी पड़ता है उसे आत्म−हत्या करके अपनी वर्तमान असन्तुष्ट स्थिति से पिण्ड छुड़ाने और नई सशक्त स्थिति प्राप्त करने की आतुरता रहती है।
संसार में अवाँछनीय और असामाजिक तत्वों की कमी नहीं। चोर, डाकू, छली, प्रपंची, दुष्ट, दुराचारी हर जगह विद्यमान हैं। पर वे हर किसी पर आक्रमण नहीं करते— हर कोई उनका शिकार नहीं बनता। जिसे वे असावधानी, दुर्बल, अस्त−व्यस्त, असुरक्षित पाते हैं उसी पर हमला करते हैं। सक्रियता और जागरूकता से उलझने में उन्हें भी डर लगता है और झंझट का सामना करने से कतरा कर वे भी वहाँ घात लगाते हैं जहाँ दाल गलती है। अवाँछनीय तत्वों से निपटने के लिए संघर्षशील मनोवृत्ति और प्रतिरोधात्मक सामर्थ्य का अभिवर्धन आवश्यक है। शक्ति का सञ्चय होता रहे— सामर्थ्य का प्रदर्शन बन पड़े तो वह अवसर ही न आवेगा जिसमें संघर्ष करने की आवश्यकता पड़े। आक्रमणकारी तत्वों से सुरक्षा की गारन्टी इसी रूप में हो सकती है कि हमारी जागरूकता और समर्थता इस स्तर तक बढ़ी रहे कि हमला करने से पहले किसी को हजार बार विचार करना पड़े।
सुरक्षा और प्रगति के लिए समर्थता का सञ्चय आवश्यक है। यह सशक्त ता संघर्ष रत होकर ही उपार्जित की जा सकती है। समुद्र युगों से शान्त पड़ा था। देवता और असुरों ने उसके मंथन का संकल्प किया और साधन जुटाये। इस दुस्साहस को देखकर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और वे सहायता देने के लिए स्वयं दौड़े आये। कूर्मावतार लेकर पीठ पर भारी पर्वत को धारण किया और उस प्रयोजन की पूर्ति को अपने परोक्ष सहयोग से असम्भव बनाया। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले और उन्हें पाकर मनुष्यों और देवताओं को धन्य बनने का अवसर मिला। यदि वह प्रबल प्रयास किया ही न गया होता तो समुद्र किसी को कोई उपहार देने वाला न था, यद्यपि वे सभी सम्पदाएँ उसके भीतर अनादि काल से दबी पड़ी थीं पर उनका लाभ मिलना तभी सम्भव हुआ जब प्रचण्ड प्रयास की संघर्ष चेष्टा उभर कर आगे आई।
यह संसार एक समुद्र है इसमें न जाने कितने रत्न भरे पड़े हैं, उन्हें प्राप्त करने की सुविधा हर किसी को उपलब्ध है। शर्त एक ही है कि लाभान्वित होने की आकांक्षा प्रबल प्रयत्नशीलता और अवरोधों के साथ धैर्यपूर्वक लड़ने की साहसिकता से युक्त हो। मात्र अभिलाषाएँ करते रहना निरर्थक हैं। स्वप्नदर्शी कल्पना लोक में विवरण करने वाले मनोरथ कितने ही करते रहें पर प्राप्त कुछ न कर सकेंगे। उपलब्धियाँ तो प्रचण्ड सक्रियता चाहती हैं और उसका उद्भव प्रखर मनोबल की पृष्ठभूमि पर ही होता है। अभावों की पूर्ति के लिए आवश्यक साधन जुटाना उनके लिए कठिन नहीं पड़ता। जो अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए कृत संकल्प हैं। उनकी सूझ−बूझ, ढूँढ़−खोज और भागदौड़ जब समग्र तत्परता के साथ सक्रिय होती है तो एक के बाद एक एक ऐसे आधार मिलते चले जाते हैं जिनके सहारे लक्ष्य की पूर्ति तक द्रुत अथवा मंदगति से आज नहीं तो कल पहुँच सकना सम्भव हो सके।
दूसरों से उदार व्यवहार की आशा करना व्यर्थ है। यह संसार बहुत चतुर है। सहायता उनकी करता है जिनसे प्रतिफल की आशा होती है। निस्वार्थ करुणा भी अभी जीवित तो है पर वह कभी−कभी बरसात की बिजली की तरह ही चमक उत्पन्न होने की प्रतीक्षा में आकाश की ओर ताकते रहना व्यर्थ है। हमें घर में ही आग जलाने के साधन जुटाने चाहिएँ। प्रयोजन उन्हीं से सिद्ध होगा। दूसरे लोग कृपा करके हमारी सहायता करें और संकट से उबारें यह सोचना व्यर्थ है। यहाँ अच्छी जमीन में ही किसान अपना बीज बोता है। अनुत्तीर्ण होते रहने वाले छात्र की उसकी निर्धनता पर द्रवित होकर छात्रवृत्ति कौन देता है। अशक्त रहकर तो हम देर तक दूसरों की थोड़ी सहानुभूति तक नहीं पा सकते।
हमें अपने भीतर तलाश करना चाहिए। वहाँ अगणित विशेषताओं के बीज मौजूद हैं। उन्हीं को ढूँढ़ने बढ़ाने और उपयोग में लाने के लिए तत्पर हो जाँय तो भूतकाल के दुर्भाग्य को भविष्य के सौभाग्य में आसानी के साथ बदला जा सकता है। यह सम्भव तभी होगा जब संघर्षशील मनोवृत्ति को विकासोन्मुख किया जाय। योगाभ्यासी, तपस्वी, साधनारत व्यक्ति अपने आपे से लड़ने को अपनी आन्तरिक अशक्त ता से जूझने की दिशा में ही तो अग्रसर होते हैं।
जिसने जो कुछ पाया है वह अपनी ही प्रबल सक्रियता का परिणाम रहा है। जो अवाँछनीय है— अपर्याप्त है−अनुपयुक्त है उससे हमें साहसिक शूरवीरता के साथ लड़ने के लिए तत्पर होना चाहिए। इस संघर्ष से ही हम अभीष्ट मनोरथों की पूर्ति कर सकेंगे। इस अप्रिय जीवित रहने के लिए संघर्ष रत होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
इस संसार में पाने योग्य बहुत कुछ है, पर वह सब उनके लिए सुरक्षित है जो बलवान हैं। बल की उपासना करने के बाद ही अन्य देवताओं की आराधना में सफलता मिल सकती है।
हर वस्तु को मूल्य चुका कर लिया जाय, इस दुनिया के बाजार में यही नियम है। अधिकारियों की भर्ती होती रहती है पर उनमें लिए वे ही जाते हैं जो प्रामाणिकता एवं पात्रता सिद्ध कर सकते हैं। खाली हाथ निकले तो खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा। बाजार में कितने ही मूल्यवान पदार्थ भले ही पड़े हों पर खाली हाथ व्यक्ति के लिए कुछ भी प्राप्त कर सकने का द्वार बन्द ही रहेगा।
सफलताओं के रंगीन सपने देखने में जितनी कल्पना शक्ति का प्रयोग किया जाता है उतना ही यदि इस तथ्य पर विचार करें कि अपनी योग्यता किस प्रकार बढ़े और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने योग्य क्षमता का अभिवर्धन कैसे हो? तो समझना चाहिए कि आकाँक्षा पूर्ति का अधिकाँश आधार बन गया। अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने के लिए अच्छी मन स्थिति का निर्माण करना आवश्यक है। विकसित व्यक्तित्वों की पूँजी द्वारा ही इस संसार में ऐसा कुछ पाया कमाया जा सकता है जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके।
दुर्बलता एक अभिशाप है जिस पर हर दिशा से विपत्तियाँ टूटती हैं। प्रकृति नहीं चाहती कि उसकी श्रेष्ठ संरचना में सड़े−गले कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें। दुर्बलता का ही दूसरा नाम कुरूपता है। हमारी आँखें उसे पसन्द नहीं करतीं फिर प्रकृति ही यह क्यों स्वीकार करेगी कि इस संसार में उस कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें जो आन्तरिक समर्थता का मूल्य नहीं समझते और बाहर की उपलब्धियों की आकाँक्षा से उद्विग्न रहकर संसार में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। आलसी और अकर्मण्य के लिए संकटों और अभावों से छुटकारे का कोई उपाय नहीं। जो अपनी उपेक्षा करता है उसे हर दिशा से उपेक्षा और तिरस्कृत ही हाथ लगती है।
दुर्बल शरीर को नई−नई किस्म की बीमारियाँ दबोचती हैं। डरपोक को डराने के लिए जीवित ही नहीं मृतक भी भूत−पलीत बनकर ढूंढ़ते−खोजते आ पहुँचते हैं। आततायियों को अपनी शिकार पकड़ने के लिए कायरों की तलाश करनी पड़ती है। शंकाशील लोगों को बिल्ली भी रास्ता काटकर डरा देती है। अरबों, खरबों मील दूर रहने वाले ग्रह−नक्षत्र भी अपनी प्रकोप मुद्रा उन्हीं को दिखाते हैं जिन्हें अकारण भयभीत होने में मजा आता है। अन्यथा वे बेचारे व्यक्ति विशेष का बिगाड़ उपकार करना उनके बस से सर्वथा बाहर की बात है। दुर्बलताग्रसित व्यक्ति वस्तुतः अपने आपसे ही डरता है, उसकी भय−भीरुता देखकर दूसरे विदूषक भी चिढ़ाने का मजा लेने के लिए आ धमकते हैं।
अपनी दुर्बलताओं को खोजें, उनसे घृणा करें और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए जुट जाँय। समर्थता की उपासना करें। शरीर को बलवान बनाने की योजना बनायें और मन में जमे हुए भीरुता के समस्त आधारों को निरस्त कर दें। प्रगति का आरम्भ भीतर से करें ताकि उस अन्तः भूमि में उगाये अंकुर को समुन्नत व्यक्तित्व एवं वैभव के रूप में सुविकसित देखा जा सके।
पशुओं की रक्षा, प्राणि जगत के सन्तुलन को स्थिर रखने के लिए आवश्यक है। सिंह,व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं की असन्तुलित अभिवृद्धि को प्रकृति, प्रकोप के माध्यम से स्वयं ही नियन्त्रित करती रहती है। यदि मनुष्य उनके विनाश पर उतर पड़े तो फिर न केवल यह धरती का आँगन इन चलते−फिरते खिलौने से रहित होकर सौंदर्य हीन हो जायगा, वरन् प्राणि जन्य सन्तुलन बिगड़ जाने से अन्य अनेक प्रकार के संकट आ खड़े होंगे। पशुओं के खुरों से, पंजों से वन्य प्रदेशों की जमीन की खुदाई, गढ़ाई, कुटाई होती रहती है फलस्वरूप उसमें वनस्पति उगाने की क्षमता बनी रहती है। पोली जमीन उनकी भागदौड़ से कड़ी होती है और आँधी में उड़ने से—वर्षा में बहने से बच जाती है और खार−खड्डे नहीं बनते। वन्य पशुओं का मलमूत्र उस क्षेत्र की जमीन में उपयोगी खाद देता रहता है और वहाँ की उर्वरता बनी रहती है।
वन्य पशुओं की रक्षा के लिए चिरकाल से प्रयत्न होते रहे हैं। सहज ही माँस और चर्म प्राप्त करने के लोभ में मुफ्तखोर शिकारी पशु−वध का क्रूर व्यसन अपनाने को सहज ही प्रोत्साहित हो जाते हैं। बराबरी की बुद्धि और बल वाले के साथ तो युद्ध करना महँगा पड़ता है अल्प बुद्धि और वन्य पशु−पक्षियों को तीर, बन्दूक जैसे अस्त्रों के सहारे लुक−छिपकर प्रहार करने और उन्हें मार गिराने में लगता है—हृदय हीन मनुष्य अपनी बहादुरी का भी अनुभव करता है और उस कायरतापूर्ण हत्या पर गर्व भी करता है। इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों ने शिकार का शौक बढ़ाया और उसकी चपेट में पशु−पक्षियों का इतना अधिक नृशंस संहार आरम्भ हो गया कि धरती पर से इन निरीह प्राणियों का अस्तित्व समाप्त हो जाने की ही आशंका उत्पन्न हो गई।
अफ्रीका को बसाते समय यूरोपियनों ने जिस प्रकार उस क्षेत्र के प्राणियों का संहार किया उसकी कथा यदि सामने लाई जाय तो उस महाविनाश के दृश्य हृदय हीनों के भी कलेजे कँपा सकते हैं। शिकारियों के लिए उन दिनों अफ्रीका स्वर्ग था। उनकी गोलियाँ निरन्तर आग बरसतीं और एक−एक शिकारी गिरोह दिन भर में हजारों पशुओं को धराशायी कर देता। सिंह, व्याघ्र, चीते, गेंडे, हाथी, जिराफ आदि के चमड़े से सारा योरोप ढक गया; धातुओं और वस्त्रों के स्थान पर इस सस्ते और सुन्दर चमड़े की हर चीज बनने लगी और लगने लगा कि अब योरोप के नर−नारी चर्माच्छादन से ही ढक जायेंगे। वन्य पशुओं के रक्त माँस में उन दिनों अफ्रीकी जंगलों का दृश्य बूचड़खाने जैसा बना दिया गया था। यह तो एक काल और स्थान की बात हुई। साधारणतया सस्ती वीरता और मुफ्त का माल पाने के लोभ ने धूर्त मनुष्य को शिकार का शौकीन बनाया और उस आधार पर वन्य पशुओं का भयावह विनाश होता रहा।
इस विभीषिका को रोकने के लिए समय−समय पर विचारशील समाज नायकों ने प्रतिबंधात्मक प्रयत्न किये हैं। बौद्ध और जैन धर्मों ने अध्यात्म और नीति की पृष्ठभूमि में अहिंसा का प्रचार किया और मनुष्यों की ही तरह पशु-पक्षियों के साथ भी करुणा प्रदर्शित करने की प्रेरणा दी। सम्राट् अशोक ने इस संदर्भ में कुछ कड़े प्रतिबन्ध लगाये थे उनका उल्लेख उपलब्ध शिलालेखों में मिलता है।
इंग्लैंड के शासक तृतीय हेनरी ने सन् 1217 में वन्य पशुओं के रक्षा सम्बन्धी कानून बनाये थे। फ्राँस ने भी सन् 1844 में ऐसा ही कानून बनाया। चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने पक्षियों को अन्धाधुन्ध मारने का निषेध किया था।
अमेरिका में वन जीवों की सुरक्षा के लिए 40 संरक्षित अभय उद्यान हैं। दक्षिण अफ्रीका में आठ हजार वर्ग मील का क्रूनार राष्ट्रीय क्षेत्र इसी प्रकार का संरक्षित प्रदेश है। कांगो से ऐसा संरक्षित प्रदेश 50 हजार वर्ग मील का है। केनिया—अफ्रीका का नेशनलपार्क प्रसिद्ध है। उस क्षेत्र में दुर्लभ पशु-पक्षियों का उन्मुक्त विचरण देखने के लिए संसार भर के यात्री वहाँ पहुँचते हैं। कनाडा, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही शिकार प्रतिबन्धित वन प्रदेश है। स्वीडन एक छोटा सा देश है पर वहाँ भी 14 राष्ट्रीय उद्यान पशु बिहार के लिए बने हुए हैं। स्विट्जरलैंड, इटली, स्पेन, फिनलैंड, आस्ट्रिया, पोलैंड, चेकोस्लाविया आदि देशों ने भी इसी प्रकार वन्य पशुओं को संरक्षण प्रदान किया है। शहरी चिड़ियाघरों में थोड़े से पशु-पक्षी देखने से भी बच्चों का मनोरंजन होता है पर सुविस्तृत वनों में हाथी, सिंह, चिंपेंजी, गैंडा, कंगारू जेबरा, जिराफ आदि कि उन्मुक्त जीवनचर्या देखकर जा आनन्द आता है वह अनोखा ही है। उसके लिए हजारों की संख्या में दर्शक उन संरक्षित वन प्रदेशों में पहुंचते हैं और उस यातायात से सरकारों को, व्यवसायियों तथा श्रमिकों को अच्छा लाभ होता है।
वन्य पशु-पक्षी मनुष्य के शत्रु नहीं मित्र हैं। उनके द्वारा होने वाले उपकारों की यादें गहराई से छानबीन की जाय तो प्रतीत होगा कि वे पालतू पशुओं से कम उपयोगी नहीं हैं। यदि उनके वध करने पर हम उतर आयें तो फिर ऐसी क्षति का सामना करना पड़ेगा जो वन्य पशुओं के माँस चर्म से होने वाले लाभ की तुलना में अत्यधिक महंगी पड़ेंगी।
जब फीजी द्वीप बसाया गया तो वहाँ चूहे और कौओं के अभाव से खेतों में होने वाले कीड़े फसल को बुरी तरह बर्बाद करने लगे। रासायनिक घोल छिड़कने जैसे उपचारों से जब कोई काम चलता न दीखा तो भारत से चूहे और कौए पकड़ कर वहाँ ले जाये गये और बसाये गये जब कहीं जाकर कीड़ों का उपद्रव काबू में आया।
शिकार का व्यसन अपनाकर लोग अपनी कुशलता अथवा बहादुरी का प्रमाण देना चाहतें हैं पर वे नहीं जानते कि इस क्रूर कर्म के द्वारा वे न केवल अपनी आन्तरिक निष्ठुरता ही बढ़ा रहे हैं वरन् इस सुन्दर संसार को कुरूप बनाने का भी अपराध कर रहे हैं। शिकार का वर्तमान क्रम जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पशु-पक्षियों का इस संसार से अस्तित्व ही मिट जायगा।
बवरशेर अब भारत में सिर्फ गुजरात के गीर वन में ही एक बहुत छोटी संख्या में ही सीमित रह गये हैं। चीतों की कई जातियाँ नष्ट हो गईं गेंडे सिर्फ आसाम में ही पाये जाते हैं और उनकी संख्या 5,00 से अधिक नहीं हैं। सिक्किम का बारहसिंगा लुप्त हो गया। मारखोर, काले हिरन, थारबकरी, गवाज जैसे वन्य पशुओं की नसल भी अब समाप्त होने ही जा रही है। फरिस्टर चैम्पियन ने भविष्य वाणी की थी कि भारत में वन्य जीवों का भविष्य अन्धकारमय है उनकी आशंका सही सिद्ध होती दीख रही है। इस संकट का सामना करने और वनजीवों की रक्षा का आन्दोलन करने के लिए भारत में—नीलगिरी गेम एसोसियेशन इण्डियन बोर्ड आफ बाइन्ड लाइफ—वाइल्ड लाइफ सोसाइटी और बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने कुछ प्रयत्न भी किया पर उनके कागजी प्रयास कुछ अधिक कारगर न हो सके। शिकारियों की प्रकट और अप्रकट गतिविधियाँ तेजी से दुर्लभ वन्य जीवों का विनाश करने में लगी हुई हैं।
गेंडे की हर चीज उपयोगी होती है और महंगी बिकती है। एक ओंस सींग का मूल्य लगभग एक हजार रुपये होता है। एक चिड़ियाघर ने भारतीय गेंडा दंपत्ति का मूत्र बेचकर 700 पौंड (लगभग चौदह हजार रुपये) कमाये थे। गेंडे के चमड़े की ढाल, तीर, तलवार की लड़ाई के दिनों में सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साधन थी। हकीम लोग गेंडे के सींग की भस्म को नपुँसकता के लिए प्रयोग करते रहे हैं।
गेंडा प्रायः 50 वर्ष जीता है। गर्भ में वह 19 महीने रहता है। पन्द्रह वर्ष की आयु में वह जवान हो जाता है। हर गेंडा अपनी अलग दुनिया बसाकर रहता है। 100 एकड़ की जमीन में सन्तोषपूर्वक गुजर कर लेता है,पर इतने में किसी दूसरे का प्रवेश पसन्द नहीं करता। मार्च का महीना उसे गृहस्थी बसाने की आवश्यकता अनुभव कराता है पर मतलब निकल जाने के बाद उन्हें तलाक देकर एकाकी रहना ही अधिक सुविधाजनक प्रतीत होता है।
पक्षियों की लुप्त जातियों में कोटुक्क, मोरर्निगद्रव, ट्रम्परस्वन, हूपिंकक्रेन, एक्सिमो करलू, आइवरी वर्ड, वुडपिकर, वेहाऊ पेटरेल, फ्लोमिंगो को भी शुमार किया जाता है। कभी वें धरती के विभिन्न भागों में बहुलता के साथ पाये जाते थे पर अब उनके दर्शन कभी−कभी ही होते हैं।
न्यू फाउंडलैंड तथा आइसलैंड क्षेत्र का निवासी पक्षी ‘ग्रेट आक’ अपने सुहावने परों के लिए प्रख्यात था। शिकारियों ने उसका वंश ही नष्ट कर दिया।
हंस से बड़ा किन्तु उसी जाति का पक्षी ‘डोडो मारीसस टापू में रहता था पर अब तीन सौ वर्षों से उसकी जाति ही समाप्त हो गई।
न्यूजीलैंड में शुतुरमुर्ग की जाति का एक और पक्षी था मोआ। यह 12 फुट ऊँचा था पर उड़ नहीं सकता था। अब संसार से सदा के लिए विदा हो गया। इसी प्रकार कत्थई रंग की चितलीदार मैना ‘सडल वैक’ भी अब न्यूजीलैंड से समाप्त हो गई।
नेपाल की करनाली घाटी में पाँच हजार फुट ऊँचाई पर पाया जाने वाला पक्षी स्पाइनी वैवलर अब कहीं देखने को नहीं मिलता।
डेढ़ सौ वर्ष पूर्व पैसेजर पिजन नीले रंग का कबूतर चिड़ियों की तरह झुण्ड बनाकर आसमान में उड़ता था। उनकी इतनी बहुलता थी कि सूरज बादलों की तरह ढक जाता था, पर अब वे सुन्दर पक्षी एक प्रकार से लुप्त हो गये। उस जाति का पक्षी सन् 1914 में अन्तिम बार देखा गया था।
जलकुक्कुट की जाति का शुतुरमुर्ग की तरह उड़ने में असमर्थ एक पक्षी ‘नोट तिनस’ अब से पचास वर्ष पूर्व न्यूजीलैंड में बहुलता के साथ पाया जाता था, पर अब वह लुप्त नहीं देखा गया।
भेड़−बकरियों के बच्चे और छोटे खरगोशों तक को चोंच में पकड़ कर उड़ जाने वाला बड़ा गिद्ध ‘काण्डर’ कभी कैलीफोर्निया के जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। पर अब 1949 के बाद उसके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं और उसे लुप्त मान लिया गया है।
ह्वेल मछली का शिकार जिस तेजी से हो रहा है उसे देखते हुए हर्मन मेलविन ने ‘मोवीडिका’ में लिखा है—पिछले तीस वर्षों के अन्दर समस्त संसार में नीज ह्वेल की आबादी एक लाख से घटकर अब मात्र एक हजार रह गई है। उनके प्रजनन के मुकाबले शिकार कहीं अधिक तेजी से हो रहा है ऐसी दशा में संसार से उसके अस्तित्व का अन्त होता ही दीखता है।
पालतू पशु−पक्षियों को तो माँस के लिए काटा मारा ही जा रहा था थोड़े वन्य पशु−पक्षी बचे थे लगता है अब उनकी भी खैर नहीं। यह स्थिति कितनी दुखद सिद्ध होगी इसे आज भले ही न समझा जा सके पर भावी पीढ़ियाँ तब उस क्षति के कारण होने वाले दुख का अनुभव करेंगी सौर उस महाविनाश को धिक्कारेंगी, जिसे हम इन दिनों उत्साह पूर्वक चला रहे हैं।
जो व्यक्ति ऊँचे विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी अकेले नहीं हो सकते।
—फिलिप सिडनी
यह सही है कि सज्जनता मानव−जीवन की अमूल्य निधि है। सज्जनता का प्रतिफल सुगन्धित पुष्पों से सुमधुर फलों से लदे पेड़−पौधों के रूप में सामने आता है। व्यक्तित्व को श्रेष्ठ और महान् बनाने का अवसर सज्जनता ही प्रदान करती है। सद्गुणों और सत्कर्मों की परम्परा का विकास सज्जनता के क्षेत्र में ही होता है।
किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एकांगी सज्जनता अपर्याप्त और अपूर्ण है। उसके साथ यह व्यवस्था रहनी चाहिए कि दुष्ट दुर्जनता के प्रकोप से सज्जनता के उद्यान को बचाया जा सके। खेत में फसल उगाने वाले किसान और फलों का उद्यान पर भी उतना ही ध्यान देते हैं जितना कि पौधे की सिंचाई पर।
यदि बाड़ न लगाई जाय तो जंगली जानवरों के झुण्ड उस हरियाली पर ललचाते हुए हमला बोल देंगे और एक ही रात में उस सारे प्रयत्न को मटियामेट कर देंगे जो लगातार बहुत समय तक मनोयोग पूर्वक श्रम करके उत्साह वर्धक फसल के रूप में सामने खड़ा था। यह सोचना बेकार है कि हम सज्जन हैं तो सारी दुनिया सज्जन ही रहेगी। इस संसार में भले और बुरे तत्व अनादि काल से हैं और दोनों में संघर्ष क्रम भी पुरातन है। इसलिए दुष्टता द्वारा सज्जनता पर आक्रमण होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। असुरों द्वारा देवों पर अकारण आक्रमण करते रहने के घटना क्रम से पुराणों, इतिहासों के पन्ने रँगे पड़े हैं। अब भी वही क्रम चल रहा है और आगे भी चलेगा।
किसान और माली की समझदारी से हर सज्जनता प्रेमी को बहुत कुछ सीखना चाहिए। जानवर आक्रमण करेंगे ही—फसल चौपट होगी ही—यह सोचकर कोई किसान न तो फसल बोना बन्द करता है और न कोई माली पौधे लगाने से हाथ खींचता है। यह आवश्यक है, क्योंकि संपन्न श्रीवृद्धि के लिए उस उत्पादन उपार्जन के बिना काम चल ही नहीं सकता। जानवर अपनी आदत छोड़ देंगे, फसल पर हमला न करेंगे यह आशा करना व्यर्थ है। कृषि और उद्यान के आरोपण का क्रम भी समाप्त नहीं किया जा सकता। बीच का मार्ग एक ही है कि भेड़ पर मजबूत और कँटीली बाड़ लगाकर सुरक्षा को तोड़कर भीतर न घुस सके यदि घुसने का दुस्साहस भी करे तो बाड़ में लगे हुए काँटे उन्हें लोहू−लुहान करते हुए पीछे लौटने के लिए बाध्य करदें।
भलमनसाहत की अपनी उपयोगिता और महत्ता है। उदर सहयोग का अपना स्थान है किन्तु यह भूल नहीं जाना चाहिए कि वह इतना भावुक और इतना मृदुल नहीं होना चाहिए कि आक्रमणकारी उसका अनुचित लाभ उठाने के लिए लालायित रहने लगे और निर्बाध रीति से उल्लू सीधा हो जाने की बात सोचने लगे। सज्जनता के साथ समर्थता जुड़ी होनी चाहिए।
सज्जन का जागरूक एवं साहस भी आवश्यक है। कहाँ उदारता का व्यवहार होना चाहिए और कहाँ कठोरता का—किस पर विश्वास किया जाना चाहिए—किस पर अविश्वास। इस अन्तर को समझे बिना यदि हर किसी के साथ—हर समय उदारता ही बरती जायगी तो उसे अपूर्ण, अधूरी, अविकसित, असमर्थ एवं एकाँगी सज्जनता ही कहा जायगा। इससे घाटे में भी रहना पड़ सकता है और मूर्ख भी बनना पड़ सकता है।
हम सज्जन बनें। शालीनता सीखें। सद्व्यवहार को स्वभाव का एक अंग बनायें जहाँ आवश्यकता हो सेवा और उदारता का भी परिचय दें। उदारता, आत्मीयता बरतना और दूसरों का विश्वास करना भी बुरा नहीं है। पर यह सब एकाँगी नहीं होना चाहिए। हमें पैनी दृष्टि से यह भी देखना चाहिए कि कहीं हमारी सज्जनता को आक्रमणकारियों द्वारा कमजोर तो नहीं मान लिया गया है और वे इसी आधार पर लूट−खसोट के लिए प्रोत्साहित तो नहीं हो रहे हैं। सज्जनता के साथ शारीरिक बल, मनोबल, संगठन बल के वे सभी आधार जुड़े रहने चाहिए जो दुर्जनों को सज्जन बनने के लिए विवश कर सकें।
माँसाहार मनुष्य की आत्मिक और शारीरिक दोनों ही प्रकृतियों के विपरीत है। मानवी अन्तरात्मा दयालुतत्वों से बनी हुई है किसी कष्ट पीड़ित को देखकर उसमें सहज करुणा उत्पन्न होती है। दूसरों के दुख में दुखी और दूसरों के सुख में सुखी होने की उसकी आन्तरिक विशेषता है। इसे वह हटा−मिटा नहीं सकता।
प्राणियों का प्राणहरण करके अपने लिए भोजन जुटाने में उसकी आत्म−सत्ता व्यथित एवं उद्विग्न ही हो सकती है। स्वाद, बल आदि का कोई भी बहाना क्यों न बनाया जाय आत्मग्लानि और आत्मप्रताड़ना को शान्त नहीं किया जा सकता है। जबकि माँस से स भी अधिक बलवर्धक और स्वाद परक पदार्थ संसार में प्रचुर परिमाण में एवं सस्ते मूल्य में उपलब्ध हैं तब माँस की ओर लपकना केवल आसुरी वृत्ति को तुष्ट करना ही एकमात्र कारण हो सकता है। ऐसे लोगों की अन्तःचेतना सदा अपने को अपराधी ही अनुभव करती रहेगी। पुण्य−पाप की मान्यता मात्र धार्मिक सिद्धान्तों के आधार पर ही नहीं मनःशास्त्र के आधार पर भी खरी सिद्ध होती है। आत्म−हनन करने वाले अनेक अप्रत्यक्ष आधारों पर आधि−व्याधियों से ग्रसित होते रहते हैं और अपने कुकर्मों का समुचित दण्ड भोगते रहते हैं।
भौतिक दृष्टि से — शरीर रचना के साथ आहार की संगति बिठाने वाली प्रकृति व्यवस्था की दृष्टि से भी मांसाहार मनुष्य प्राणी के लिए किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं बैठता। मनुष्य की शरीर रचना शाकाहारी प्राणियों जैसी है माँसाहारियों जैसी नहीं।
माँस पौष्टिक और मनुष्य के लिए उपयोगी खाद्य−पदार्थ इस मूढ़ मान्यता को अब वैज्ञानिक शोधें निरन्तर झुठला रही हैं और बता रही हैं कि वह अखाद्य है, अभक्ष्य है। इसे खाकर लोग स्वास्थ्य बढ़ाते नहीं गँवाते हैं।
अमेरिका के आहार शास्त्री एल. एच. एन्डरसन ने अपने भोजन विज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थ में लिखा है—”हम सभ्यताभिमानियों के हाथ, मूक और उपयोगी पशुओं के रक्त से रंगे है। हमारे माथे पर उनके खून का कलंक है। हमारा पेट एक घिनौना कब्रिस्तान है। शरीर की दुर्गन्ध हमारे मुख से निकल रही है। क्या यही मानवोचित आहार है। आहार के नाम पर परमात्मा की हँसती−खेलती कृतियों को चीत्कार भरे क्रन्दन में धकेल देना यह भूख बुझाना नहीं, राक्षसी वितृष्णा का परिपोषण करना है।
मनुष्य की प्रकृति शाकाहारी है या माँसाहारी इसका पता लगाना हो तो उसकी शरीर रचना पर ध्यान देना होगा। शाकाहारी प्राणियों की आँतें लम्बी होती हैं और माँसाहारियों की अपेक्षाकृत छोटी। मनुष्य की आँतें बन्दर जैसे शाकाहारियों के स्तर की होती हैं। शाकाहारियों की आँतें उनके शरीर की लम्बाई में 22 प्रतिशत होती हैं और माँसाहारियों की 5 प्रतिशत। अन्नाहार करते मनुष्य की आँतें घास खाने वालों की तुलना में कुछ छोटी अवश्य हो गई हैं फिर भी 12 प्रतिशत से कम नहीं होतीं। ऐसी दशा में उसे माँसाहारी वर्ग में नहीं गिना जा सकता।
माँसाहारियों के दाँत लम्बे नुकीले और कुछ पीछे की ओर मुड़े होते हैं ताकि वे शिकार को पकड़ने और मारने में सफल हो सकें। उनके जबड़े ऊपर नीचे उठ बैठ सकते हैं इधर−उधर घूम नहीं सकते। उनकी लार में स्टार्च पचाने के लिए आवश्यक एनजीम और टियालिन बहुत कम होते हैं। इसमें स्थान पर उनकी पाचन ग्रन्थियों में हाइड्रोक्लोरिक एसिड मिला रहता है इसके कारण शिकार की हड्डियां भी माँस की तरह ही लचीली बन जाती हैं शिकारियों की दाढ़ें अधिक होती हैं ताकि वे वनस्पति आहार को चबा सकें। इन कसौटियों पर कसने में मनुष्य विशुद्ध शाकाहारी सिद्ध होता है उसकी शरीर रचना में प्रकृति ने एक भी विशेषता वैसी पैदा नहीं की है जो माँसाहारियों में पाई जाती है।
माँसाहारी प्राणियों के बच्चे आँख मूंदे पैदा होते हैं। शाकाहारियों की आँखें खुली होती हैं।
माँसाहारियों के शरीर से पसीना नहीं निकलता उनकी जीभ तथा पैरों के तलवों से पसीना आता है।
मांसाहारी जीभ से चाट−चाटकर पानी पीते हैं और शाकाहारी घूँट−घूँटकर पीते हैं। उनकी आंखें इस तरह बनी होती हैं कि अन्धेरे में भली प्रकार देख सकें। शाकाहारी जैसा दिन में देख पाते हैं वैसा उनकी आंखें अंधेरे में चमकती हैं, शाकाहारियों की नहीं।
शाकाहार और माँसाहार का तुलनात्मक अध्ययन करने में अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग लगा देने वाले योरोपीय शोधकर्ताओं में डा. होग, प्रो.वेल्ब, एफ. ई. निकलस, एरनाल्ड इहरिट, के नाम प्रख्यात हैं। उनने अपने निष्कर्षों में एक स्वर से स्वीकार किया है कि माँसाहार की पुष्टाई और उपयोगिता के बारे में जो अन्ध−विश्वास फैला हुआ है वह निरर्थक है। शाकाहार की तुलना में वह कहीं अधिक दुष्पाच्य है साथ ही उससे जो कुछ शरीर को प्राप्त होता है वह स्तर की दृष्टि से बहुत ही घटिया होता है और विजातीय द्रव्य में परिणत होकर नाना प्रकार के अस्वास्थ्य कर उपद्रव खड़े करता है।
माँसाहार के पक्ष में यह दलील दी जाती है कि उसमें प्रोटीन और चिकनाई अधिक रहने से वह शरीर के लिए अधिक पोषक सिद्ध होता है यह दोनों तत्व ऐसे हैं जो कतिपय शाकाहारी खाद्य पदार्थों में माँस से भी कहीं अधिक मात्रा में रहते हैं। वनस्पति वर्ग अपने एनीयोएसिडो के सहारे ही तो प्राणियों को प्रोटीन प्रदान करता है। वही अनुदान वह सीधा मनुष्यों को भी देता है। माँस खाकर जिन तत्वों को प्राप्त करने की बात कही जाती है वे सभी वनस्पति वर्ग से उसी प्रकार प्राप्त किये जा सकते हैं जिस प्रकार माँस के लिए मारे गये पशुओं से प्राप्त किया था।
सीधी प्रोटीन या सीधी चर्बी खाकर हम उन्हें पचा नहीं सकते हैं। उपयुक्त पाचन के लिए दो बातों की आवश्यकता है, एक तो यह कि वे आहार के साथ उचित अनुपात में घुले मिले हो दूसरे यह कि उनके साथ खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट आदि आवश्यक रसायनों का समुचित सम्मिश्रण हो। इस स्थिति के खाद्य−पदार्थ ही पेट के पाचक रसों के साथ मिलकर पचने योग्य बनते हैं। सीधी चिकनाई लाने लगें तो अपच हो जायगा इसी प्रकार अनुपात से अधिक मात्रा में खाई गई प्रोटीन भी दुष्पाच्य होगी और उसका अनावश्यक भार पेट पर पड़ेगा। माँस में प्रोटीन और वसा की मात्रा अधिक तो अवश्य होगी है पर उनका सन्तुलन मनुष्य के पेट के उपयुक्त न होने से वह लाभ नहीं मिलता जो माँसाहारी प्राणी उन्हें ठीक प्रकार पचा कर प्राप्त कर सकते हैं।
माँस एसिड वर्ग का आहार है। उससे शरीर में खटाई बढ़ती है। शाकाहारी खाद्य अलक्लाइन वर्ग में आता है। मनुष्य शरीर में क्षार वर्ग अधिक होना चाहिए न कि खटाई वर्ग। एसिड बढ़ने से पेट में सड़न पैदा होती है और उससे कितने ही प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
अपनी मौत मरे हुए प्राणियों का माँस अखाद्य समझा जाता है क्योंकि उसमें सड़न उत्पन्न हो जाती है। पर यह सड़न तो वध करने के उपरान्त काटे हुए माँस में भी उत्पन्न हो जाती है। तत्काल काटे हुए माँस में सड़न न होने की बात भी कही जा सकती है पर जिसे काटे हुए कई घण्टे या कई प्रहार हो गये उसकी स्थिति और अपनी मौत मरे माँस की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं होता। सड़न के सारे चिह्न कसाई की दुकान में टाँगे माँस में भी आसानी से देखे जा सकते हैं।
बाहर से स्वस्थ दीखने वाले मनुष्यों के शरीर में कितने ही प्रकार के रोग कीटाणु पाये जाते हैं। बाहर से मोटा दीखने वाले पशु के शरीर की आन्तरिक स्थिति सर्वथा निरोग होगी, यह नहीं कहा जा सकता। यदि उसमें कोई रोग थे तो निश्चय ही वे माँस खाने वालों के शरीर में प्रवेश करेंगे और उसे बीमारियों से ग्रसित बना देंगे।
प्राणियों के शरीर में मलविसर्जन की क्रिया निरन्तर होती रहती है। साँस, पसीना तथा इन्द्रिय छिद्रों से निकलने वाले मल शरीर की विषाक्त ता को बाहर करते रहते हैं। मोटे तौर से 60 प्रतिशत उपयोगी अंश और 40 प्रतिशत बाहर फेंकने योग्य विकृत पदार्थों की मात्रा शरीर में भरी रहती है। काटे जाते समय जितना विषाक्त अंश भरा ही रहता है जिसे काटने के बाद बाहर निकलने का अवसर नहीं मिलता। अस्तु माँस में 40 प्रतिशत विषाक्त एवं मल वर्ग का पदार्थ भी विभिन्न नस−नाड़ियों में भरा रहता है। खाने वालों की जहाँ 60 प्रतिशत पोषक पदार्थ मिल सकते हैं वहाँ मात्रा से भी सीमित लाभ ही मिलता है किन्तु विषैली वस्तुओं की तनिक सी मात्रा भी शरीर में पहुँच कर भयंकर उत्पन्न कर देती है।
आहार विद्या विशेषज्ञ डा. एम. बी. गंडी का कथन है माँस में रहने वाली चर्बी ऐसे तत्वों से भरी होती है, जो मनुष्य शरीर में प्रवेश करने के बाद कितने ही प्रकार की विकृतियाँ खड़ी करते हैं। डाक्टर वाल्डेन ने योरोप में बहुप्रचलित शूकर माँस के विरुद्ध चेतावनी दी है और कहा है−उसमें रहने वाले ‘ट्रिकीनोसिस कृमि’ पकाने के बाद भी जीवित रहते हैं और खाने वाले के शरीर में प्रवेश करके स्नायविक बीमारियाँ पैदा करते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय शाकाहार संघ के उपाध्यक्ष डाक्टर वुडलेण्ड ने एक योजना बनाई थी कि स्वास्थ्य प्रदर्शिनियों का संसार भर में आयोजन किया जाय और उनके दरवाजे पर हाथी खड़ा करके दर्शकों को यह बताया जाय कि यह संसार का सबसे बलिष्ठ प्राणी विशुद्ध शाकाहारी होता है।
जर्मनी के रेगन्सवर्ग और आग्सवर्ग स्थानों पर स्वास्थ्य विशेषताओं के दो बार हुए सम्मेलनों में उपयुक्त आहार विषयक चर्चा में इसी बात पर जोर दिया गया कि जिन्हें शारीरिक श्रम कम करना पड़ता है ऐसे बुद्धिजीवियों को चिकनाई कम मात्रा में ही सेवन करनी चाहिए।
माँस के बारे में सम्मेलनों का बहुमत इसी पक्ष में था कि उसमें पाया जाने वाला ‘कोलोस्टरेन पदार्थ रक्त में चिकनाई ही नहीं कैल्शियम की भी अनावश्यक मात्रा बढ़ा देता है। जो सन्तुलित स्वास्थ्य की दृष्टि से अहितकर है।
एलेजिन विश्व−विद्यालय बवेरिया के प्रो. हीनिंग और प्रो.स्कोइन का कथन है कि—माँस की तुलना में सोयाबीन गेहूँ, काजू आदि से प्राप्त की गई चिकनाई कहीं अधिक सुपाच्य एवं निर्दोष होती है।
सर्वविदित है कि प्राणियों के शरीर में निरन्तर विष उत्पन्न होते हैं और वे साँस, श्वेद मल−मूत्र एवं अन्याय छिद्रों द्वारा बाहर निकलते रहते हैं। निकलने का अर्थ यह नहीं कि वे पूर्णतया बाहर निकल जाते हैं। जितना अंश निकलता है उससे कई गुना भीतर भरा रहता है जो नये उत्पन्न होने वाले मल द्वारा धकेले जाने पर समयानुसार बाहर निकलता है। आँतों में विशेषता बड़ी आँत में जो मल रहता है उसमें सड़न की काफी अम्लता रहती है। वहीं प्रायः अनेक प्रकार के विषाणु पलते रहते हैं। मूत्राशय का भी यही हाल है। मल−मूत्र स्वयं गन्दे और विषैले रहते हैं जहाँ वे भरे रहते हैं वे स्थान भी मलगृह,मूत्रगृह की तरह ही गंदगी और विषाक्त ता से भरे रहते हैं। उनका प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता ही है। इन सब कारणों से शरीर के भीतर उत्पन्न और सञ्चित मलों का एक बड़ा भण्डार भरा रहता है। उनकी छाया माँस पर रहती ही है।
माँस निर्दोष या निर्विष खाद्य−पदार्थ नहीं है, पर सर्वविदित हैं। मनुष्यों की तरह पशुओं के शरीर में भी रोग कीटाणु भरे रहते हैं और उनका निवास माँस में अधिक स्थायित्व के साथ रहता है। इसके खाने−वाले उससे बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते। पशु−वध के उपरान्त तो मृत शरीर में यह सड़न और भी तीव्रता के साथ बढ़ती है। कुछ घण्टे पश्चात् ही उसमें सड़न के लक्षण प्रकट होने लगते हैं जो धीरे−धीरे बढ़ते हुए उसे पूर्णतया अखाद्य बना देते हैं। तत्काल का काटा हुआ माँस ही जब विष भंडार होता है तो वह जितनी देर रखे हुए हो जायगी उतना ही वह और भी अधिक विषैला होता चला जायगा।
डा. रोगर ने माँसाहार और शाकाहार की प्रतिक्रियाओं पर अनेक प्रयोग किये हैं। उन्होंने कुछ चूहों को अनाज पर और कुछ को माँस पर रखा। माँसाहारी सूजा हुआ पाया गया जबकि अन्नाहारी चूहे पूर्ण स्वस्थ थे।
माँस में प्रोटीन तो है, पर सोयाबीन के बराबर नहीं। उसमें कैल्शियम और लोहे की मात्रा भी बहुत स्वल्प है। लोहे का अधिक भाग रक्त में रहता है जो काटने के साथ ही बहकर निकल जाता है। कैल्शियम हड्डियों में रहता है जो खाई नहीं जाती। माँस में उतना ही लोहा है जितना उतने वजन के पालक में। खजूर,अञ्जीर,चोकर, किशमिश आदि में तो माँस से भी कहीं अधिक लोहा है। कैल्शियम अधिक से अधिक इतना होता है जितना मैदे की रोटी में।
कभी−कभी लोग अर्थशास्त्र की दुहाई देते हुए यह कहते हैं कि खाद्य समस्या हल करने के लिए—अन्न की बचत करने के लिए माँसाहार की उपयोगिता है। यह दलील भी नितान्त लचर है। माँस खाने के लिए जो पशु पाले जाते हैं वे उतनी जमीन की उपज उदरस्थ कर देते हैं जितनी से माँस की तुलना में कहीं अधिक अनाज उत्पन्न किया जा सकता है। प्रो. रिचार्ड बी. ग्रेक ने विस्तृत सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला है कि शाकाहारी व्यक्ति के लिए डेढ़ एकड़ जमीन से गुजारे के लायक खाद्य सामग्री प्राप्त हो जाती है, जबकि माँसाहारी के लिए ढाई एकड़ प्रति व्यक्ति चाहिए। कारण यह है कि पशु मनुष्य की तुलना में प्रायः बीस गुना भोजन करते हैं। वे अपने जीवन काल में जितना चारा खाते हैं उसका दो हजार वाँ भाग ही खाने योग्य माँस दे पाते हैं। काटने पर भी उनका 65 प्रतिशत भाग तो चमड़ी, हड्डी, सींग, खुर, आँतें, रक्त, मल आदि भाग अखाद्य रहता है। खाने योग्य माँस तो प्रति पशु बीस किलो के लगभग ही पड़ता है। इस प्रकार माँस की दृष्टि से पाले गये अधिक भूमि की उपज खाते हैं और स्वल्प मात्रा में खाद्य उत्पन्न करते है। अतएव वे खाद्य समस्या को सुलझाते नहीं वरन् उलझाते हैं।
अण्डे के बहुत गुण गान किये जाते हैं पर यह स्पष्ट है कि उसका सफेदी वाला भाग जो 60 से 70 फीसदी तक होता है वह आमाशय और आँतों में पहुँचकर सड़न उत्पन्न करता है। आमाशय के रस स्राव को कुण्ठित करता है और पेप्सिन के प्रतिकूल, प्रतिक्रिया होती है उतना ही दूध,हरी सरसों की पत्ती, सन्तरा, सहजन, गाजर, शलजम, पालक में भी आसानी से ही पाया जा सकता है। उनके द्वारा इन वस्तुओं को प्राप्त करना अपेक्षाकृत सुपाच्य ही रहता है।
माँसाहार की प्रकृति को ‘गुनाह बेलज्जत’ उक्ति के साथ जोड़ा जा सकता है। उससे आत्मिक, शारीरिक आर्थिक हर प्रकार की हानि ही हानि है। स्वाद तो सिर्फ मसालों का होता है। माँस का मूल स्वरूप तो इतना अधिक कुरुचि पूर्ण, दुर्गन्ध युक्त तथा बुरे स्वाद का होता है कि उसे खाना तो दूर देखना तक मनुष्य की आंखें पसन्द नहीं करती। हर दृष्टि से अनुपयोगी पदार्थ को अपनी प्रकृति में सम्मिलित करके न जाने हम क्या लाभ देखते और सोचते हैं।
बीमार पड़ते ही हम दवादारू की खोज में दौड़ पड़ते हैं और एक के बाद दूसरे डाक्टर के पास इस तरह बेतहाशा दौड़ते हैं मानो दवाओं के न मिलने से ही बीमारियाँ पैदा हुई हों और डाक्टरों के हाथ में उन्हें दूर करने का जादू भरा हो।
हमारी आहार−बिहार सम्बन्धी भूलों के दण्ड स्वरूप बीमारियाँ आती हैं, उनका उद्देश्य देह में भीतर भरे हुए विषों को निकाल बाहर करना होता है। रुग्णता के क्षणों में हमें पेट, मस्तिष्क तथा दूसरे अवयवों को विश्राम देना चाहिए ताकि रोग निवारण के लिए प्रकृति द्वारा जो भीतर ही भीतर प्रबल प्रयत्न किये जा रहे हैं, उनको सहायता मिल सके।
दवाएँ—विशेषता ऐलोपैथिक दवाएँ रोगों को उभार कर बाहर निकलना रोकती हैं और उन्हें भीतर ही भीतर दबाने का प्रयत्न करती हैं। इससे दुहरी हानि है। दबाया हुआ विष किसी अन्य रोग के नाम से फूटकर फिर बाहर निकलता है। इस प्रकार एक रोग दूर नहीं होने पाता तब तक दूसरा नया आकर खड़ा हो जाता है। दूसरी हानि यह है कि यह दबाने वाली दवाएँ स्वयं ऐसे रसायनों से बनी होती हैं जो स्वयं विषाक्त होते हैं। विष से विष को मारने के प्रयास में पिछला विष तो निकल नहीं पाता उलटा उपचार की विषाक्त ता मिलकर उसे दूना कर देती हैं।
यह दवाएँ तात्कालिक चमत्कार दिखाकर पीड़ित को चकित तो जरूर करती हैं, पर उसके मूल कारण का समाधान करने में तनिक भी सहायता नहीं करतीं, वरन् उस व्यथा की जड़ें और भी अधिक गहरी कर देती हैं इस प्रकार तीव्र औषधियों के प्रयोग का वर्तमान प्रचलन वस्तुतः रोग निवारण में सहायक न होकर अन्ततः उसमें वृद्धि करने वाला ही सिद्ध होता है।
चिकित्सकों के लिए उचित था कि वे रोगी को उसकी रुग्णता का कारण समझाते और जिन भूलों की वजह से बीमारी आई है उसे सुधारने के लिए—सरल स्वाभाविक आहार−बिहार अपनाने के लिए समझाते। उपचार की दृष्टि से विश्राम, उपवास का परामर्श देते और आवश्यकता पड़ती तो हानि रहित जड़ी−बूटियाँ तथा मिट्टी, पानी वायु, ताप आदि की उपचार प्रक्रिया से सामयिक कष्ट को हलका करने का प्रयत्न करते। पर रीति−नीति उलटी ही अपनाई गई है। उतावला मरीज तत्काल अपना कष्ट दूर करने की इच्छा से इलाज कराने का प्रयत्न करता है किन्तु होता ठीक विपरीत है। दवाइयों की विषाक्त ता और भरमार उसे एक प्रकार से अनेकों बीमारियों से सदा के लिए ग्रसित बना देती है।
इस स्थिति का लाभ उठाकर कुछ चिकित्सक अपने आपको सम्पन्न बना सकते है, पर समझदार डाक्टरों ने सदा औषधियों के श्रम जंजाल को निरस्त किया है और उनसे होने वाली हानियों से सर्वसाधारण को परिचित कराया है। मूर्धन्य ऐलोपैथी डाक्टर अपने लिए ईमानदारी का कर्त्तव्य समझते हैं कि वे दवाओं को अत्युत्साह पूर्वक दिये और खाये बिना भी रोगों दूर हो सकते हैं, यदि आहार−बिहार का बिगड़ा हुआ क्रम सुधार लिया जाय। दुनिया में अनेक प्रकार के अन्ध−विश्वास फैले हुए हैं उन्हीं में से एक यह भी है कि दवा में जादुई गुण होते हैं और उनके बिना रोगों से निवृत्ति नहीं हो सकती। इस बहम का निराकरण किया जाना चाहिए और तीव्र औषधियों के दुष्परिणामों से होने वालों हानियों से सर्वसाधारण को बचाया जाना चाहिए।
लन्दन अस्पताल के बड़े सर्जन और इंग्लैंड के बादशाह के व्यक्ति गत चिकित्सक सर फ्रेडरिक ठीब्ज कहा करते थे कि मैं ऐसे युग की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जिसमें लोग बीमार पड़ने पर दवा अवश्य ही लेने की बुरी आदत को छोड़ देंगे।
सरजान फारव्स का कथन है—कुछ लोग दवा से अच्छे होते हैं किन्तु उससे भी अधिक बिना दवा के अच्छे होते हैं। इन दिनों से भी भाग्यवान वे हैं जो लगातार दवा लेते रहने पर भी जिन्दा बने रहते हैं।
डा. वेकर कहते थे—बुखार से मरने वालों की संख्या उतनी नहीं होती जितनी बुखार दूर करने की दवाओं से मरने वालों की।
कान्सास चिकित्सा विश्व विद्यालय के विश्व विख्यात डाक्टर जेम्से डी. राइजिंग ने अपनी पुस्तक पोस्ट ग्रेजुएट मेडीशन’ में लिखा है— अब औषधि उत्पादक कारखाने तेजी से बढ़ रहे हैं, उसी अनुपात से बीमारियाँ भी बढ़ रही हैं। बीमारियाँ उत्पन्न करने वाले समस्त कारणों की तुलना में दवाओं से उत्पन्न बीमारियों का अनुपात कहीं अधिक है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सर वाल्टर लौडन ब्राउन ने मेडीकल सोसाइटी आफ इन्डिविजुअल साइकोलॉजी के अधिवेशन में अपने निष्कर्ष के अनुसार दूरी ईमानदारी के साथ कहता हूँ कि हम डाक्टर लोग जनता के लिए सबके लिए अधिक खतरनाक हैं। हम काल्पनिक आधारों पर ऐसी चिकित्सा करने लगते हैं जिससे रोगियों को एक नये जंजाल में फँस जाने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं मिलता।
विश्व विख्यात चिकित्सा विज्ञानी जोशिया ओलफील्ड ने अपने ग्रन्थ ‘हीलिंग एण्ड लेकर आफ पेन’ में स्पष्ट किया है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति, मात्र रोगों के लक्षण बदलती है और उन्हें पुराना तथा असाध्य बनाती है।
न्यूजीलैंड के रेडियम चिकित्सा विज्ञानी डाक्टर उलरिक विलियम लन्दन के चिकित्सा शास्त्री ईवान्स, फ्राँसीसी शरीर विशेषज्ञ डा. मेजी रसायनशास्त्र पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले डा. लुई पोलिंग की वर्तमान चिकित्सा पद्धति पर मिलती−जुलती एक जैसी ही सम्मतियाँ हैं। उन लोगों ने अपने−अपने ढंग से इस चिकित्सा क्रम की भर्त्सना करते हुए कहा है—यहाँ सब कुछ अनुमान, कल्पना, प्रयोग की अनिश्चित स्थिति में ही चल रहा है।
इन दिनों पैन्सिलन और ऐस्पिरिन की धूम है। ये दवाएँ अन्धाधुन्ध प्रयोग में आ रही हैं। अकेले अमेरिका में अकेली ऐस्पिरीन लगभग चार हजार टन खाई जाती है उसके लिए दो अरब डालर उस देश में खर्च होते हैं।
‘ब्रिटिश मेडीकल जनरल’ और ‘जनरल आफ अमेरिकन मेडीकल ऐसोसियेशन’ जैसी प्रख्यात चिकित्सा पत्रिकाओं में ऐसे कई लेख उदाहरणों समेत छपे हैं जिनमें बताया गया है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अन्धाधुन्ध प्रयोग का कितना भयानक दुष्परिणाम रोमियों को भुगतान पड़ता है।
फिलाडेफिया के डाक्टर राबर्ट वाइज ने सल्फाड्रग और टैट्रासाईक्लीन वर्ग की औषधियों के बारे में प्रकाश डालते हुए कहा है—रोग कीटाणु आरम्भ में तो इनसे मरते है,पर पीछे वे इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि मरने की अपेक्षा वे इन दवाओं के प्रभाव से और भी अधिक बलवान बनकर रोगी का विशेष अहित करते हैं।
स्टैप्टोमाइसिन के प्रयोग से श्रवण शक्ति का घट जाना क्लोर— स्फेनिकोल से अस्थिक्षय एवं रक्त विकार होना अब एक स्पष्ट तथ्य की तरह सर्वविदित होता जा रहा है। ‘लासेन्ट’ पत्रिका में एक बीमार गाय का पेन्सलिन इन्जेक्शनों से उपचार का वह समाचार छपा है जिसमें बताया गया है कि गाय तो अच्छी हो गई, पर उसका दूध पीने वाले चर्म रोग से ग्रसित हो गए।
सल्फानोयाइड और एंटीबायोटिक दवाओं के अन्धाधुन्ध प्रयोग के साथ जुड़े हुए खतरे की भी हमें जानकारी होनी चाहिए। रॉयल हॉस्पीटल लन्दन के रोग कीटाणु विशेषज्ञ डा. ए. मेलविन रेमजे ने विश्व विख्यात चिकित्सा पत्रिका ‘मेडीकल वर्ल्ड’ में एक लम्बा लेख लिखकर एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति चिकित्सकों के अत्युत्साह के विरुद्ध गम्भीर चेतावनी दी है और कहा है ये दवाएँ रोग कीटाणुओं को मारती तो हैं, पर उससे कम हानि उन स्वस्थ कणों को भी नहीं पहुँचाती जो जीवन रक्षा के आधार स्तम्भ हैं।
डाक्टरी पत्रिका ‘लासेन्स’ के सम्पादक ने एंटीबायोटिक दवाओं के कारण उत्पन्न नये रोगों का विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि अस्पतालों में भर्ती रोगियों में कितनों को इन्हीं दवाओं के कारण आँतों की सूजन सरीखे नये रोगों का शिकार बनना पड़ता है। इसी पत्र ने एक अन्य लेख में ‘पेनिसिलीन’ के अन्ध भक्त को भी लताड़ा है। ‘मेडिकल वर्ल्ड’ में छपे एक लेख में बताया गया है कि किस प्रकार ‘पेनिसिलीन’ के अधिक प्रयोग से सहस्त्रों व्यक्तियों की जाने जाती हैं।
अमेरिका में एंटीबायोटिक दवाओं की प्रतिक्रिया जानने के लिए की गई जाँच में अस्पतालों में भर्ती रोगियों में से इन दवाओं द्वारा उत्पन्न विकृतियों के शिकार पाये गये—मरीज 2995 थे, जिनमें से 1070 को अत्यन्त उग्र प्रतिक्रिया का शिकार होना पड़ा और 901 ने तो उसी जंजाल में फँसकर अपनी जान ही गँवादी। ‘जनरल आफ अमेरिकन मेडीकल एसोसियेशन में छपे डा. डबलू−हेरल के लेख में भी यह प्रकाश डाला गया है कि किस तरह एंटीबायोटिक दवाएँ पिछले रोग पर चमत्कार दिखाने के साथ ही नई बीमारियों का श्रीगणेश करती हैं। अब इस तथ्य को चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वाले मूर्धन्य विज्ञानी गम्भीरतापूर्वक अनुभव करने लगे हैं कि जितने लोग सामान्य रोगों के शिकार होकर रोगी बनते हैं उनसे अधिक संख्या उन लोगों की है जो दवाओं की
विषाक्त ता के कारण रोगी बना दिये गये हैं।
डा. ई. आर. बोसली का कथन है कि—तेज दवाओं के उपयोग का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि रोगी की पाचन−प्रणाली सदा के लिए अस्त−व्यस्त हो जाती है और वह स्थायी रूप से पेट की बीमारियों का शिकार हो जाता है।
राज्य चिकित्सक डा. केरम सक्सेने ने अपने ग्रन्थ ‘वायस आफ ए फिजीशियन एण्ड ग्रोन थ्रे इन् प्रैक्टिस’ ग्रन्थ में लिखा है— मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि अपनी मौत से एक तिहाई मरते हैं, दो तिहाई व्यक्ति तो औषधियों के असामयिक और अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करने के कारण मौत के मुँह में चले जाते हैं।
जर्मनी में नींद की गोली थैलिडोमाइल, अमेरिका में कैंसर की दवा केबिओजोन, फ्राँस की डाइ−आइडोएकिल, दवाएँ कुछ दिनों बड़े उत्साह से चमत्कारी बताकर विज्ञापित की गई और अन्धाधुन्ध बिकीं, पर पीछे उनकी हानिकारक प्रतिक्रिया सामने आई तो फिर उन्हें उन देशों की सरकारों ने प्रतिबन्ध लगाकर बन्द कराया।
वर्ल्ड हैल्थ आर्गनिजेशन के द्वारा आयोजित जेनेवा के एक अन्तर्राष्ट्रीय चिकित्सक सम्मेलन में एवर्डीन युनिवर्सिटी के प्रोफेसर ए. जी. मैकग्रेगर ने बताया कि डाक्टर लोग ज्यों−त्यों वे रोगी को कम से कम औषधियाँ लेने की सलाह देते हैं। वे जानते हैं कि तात्कालिक रोग शमन करने में सफल होने पर भी अन्ततः वे रोगी का अहित ही करती हैं।
कैरोलिस्का इन्स्टीट्यूट आफ स्टाफ होम के प्राध्यापक बी. यवनेस ने बढ़ती हुई औषधि खपत पर चिन्ता व्यक्त करते हुए सुझाव दिया है कि डाक्टरों का हर पांचवें साल एक रिफ्रेसर कोर्स होते रहना चाहिए ताकि वे नित नई सामने आती रहने वाली दवाओं के परिणामों पर गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते रह सकें।
नार्वे के डायरेक्टर जनरल आफ हैल्थ सर्विसेज डा. कार्लइवैंग का कथन है कि—’डैनजर्स मेडीसिन एज— खतरनाक औषधि युग में रह रहे हैं। औषधियाँ बड़े जोर−जोर की विज्ञापनबाजी के साथ जन्मती हैं और पाँच वर्ष के भीतर ही वे अपनी मौत मर जाती हैं। नई आविष्कृत औषधियों की जो चमत्कारी, प्रशंसा की जाती है वह व्यवहार में आने पर गलत सिद्ध होती है।
डा. इवाँग ने कहा है कि हमें ‘नोन केमिकल’ चिकित्सा पर ध्यान देना चाहिए और रोगियों को दवाओं का अधिक आदी न बनाकर उन्हें आहार सुधार, रहन−सहन में परिवर्तन श्रम प्रोत्साहन सन्तुलित, मनःस्थिति एवं सरल वातावरण रखने की शिक्षा देकर उन्हें स्वस्थ रहने का रहस्य समझना चाहिए।
पेरिस की नेशनल एकेडेमी आफ मेडिसिन के प्रोफेसर जे. वेमोल ने भोजन, वस्त्र के बाद तीसरा खर्च औषधियाँ का बनते जाने की बात पर चिन्ता प्रकट की है और डाक्टरों को जनता से वह कहने की सलाह दी है कि ‘आप हमारी सलाह तो लीजिए पर अपनी चिकित्सा आप कीजिए।’
डवलिन मेडीकल कालेज के अध्यक्ष ऐलनथामसन ने ‘प्रेक्टिश्नर’ पत्र में अपना एक लेख छपाते हुए संसार के चिकित्सकों से अपील की है कि वे रोग विशेषज्ञ बनने की अपेक्षा अपनी रुचि स्वास्थ्य संरक्षण के तथ्यों को गहराई तक समझने में लगायें और उन निष्कर्षों से बीमार पड़ने वालों को वास्तविक राहत प्रदान करें।
प्रख्यात फ्रांसीसी विद्वान वाल्टेयर ने प्रचलित चिकित्सा अन्धेर पर व्यंग करते हुए कहा था—’हम ऐसी दवाओं का उपयोग करते है जिनके बारे में हमें बहुत थोड़ा ज्ञान है। इन दवाओं का ऐसे शरीर पर उपयोग करते हैं जिनके बारे में हमारी जानकारी उससे भी थोड़ी है। आश्चर्य यह है कि इन दवाओं का ऐसे रोगों के लिए प्रयोग करते हैं जिनके सम्बन्ध में हम नहीं की बराबर जानते हैं।
वियना के एक स्वास्थ्य अधिकारी डा. स्कीड अपने युग के जर्मनी के मान्य चिकित्सक माने जाते थे। उन्होंने नगर के जनरल हॉस्पीटल में कुछ समय तक एक अद्भुत प्रयोग किया। उन्होंने सभी रोगों के सभी मरीजों को केवल घास का काढ़ा पिलाया। इसका नतीजा भी ठीक वही निकला जो उस अस्पताल के पिछले मरीजों पर प्रयुक्त होने वाली कीमती दवाओं के प्रयोग का हुआ था।
इस प्रयोग को प्रस्तुत करने का उनका मन्तव्य यह था कि लोगों के यह बताया जा सके कि प्रकृति अपने ढंग से अपना रोग निवारण का कार्य निरन्तर करती रहती है औषधियों को जो श्रेय मिलता है वह निरर्थक है। कीमती औषधियाँ और घास के काढ़े में कोई अन्तर नहीं है। जो श्रेय बहुमूल्य समझी जाने वाली औषधियों को मिलता है वही घास के काढ़े को भी मिल सकता है।
यह विश्व शक्ति रूप है। उसके कण−कण में शक्ति का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। उक नगण्य से परमाणु का जब विस्फोट किया जाता है तो पता चलता है कि उसके गर्भ में कितनी प्रचण्ड सामर्थ्य भरी पड़ी थी। फिर इन अणु−परमाणुओं के संगठन से बने पदार्थों की क्षमता का तो कहना ही क्या?
हमें शक्ति की तलाश है वह अवश्य मिल जायगी। जो वस्तु प्रचुर परिमाण में सर्वत्र बिखरी पड़ी है, उसके मिलने में किसी को क्या और क्यों कठिनाई होगी। नित नये आविष्कार हो रहे हैं और उनसे विभिन्न स्तर का सुविधाएं उत्पन्न करने वाली क्षमताएँ हस्तगत की जा रही हैं यह प्रसन्नता की बात है। यह खोज जितनी अधिक की जायगी—जितनी ही हमारी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति का नियोजन इन शोध प्रयत्नों में होगा, उतने ही प्रकृति के रहस्यमय परत खुलते चले जायेंगे। मनुष्य जितने स्तर की— जितनी अधिक मात्रा में शक्ति की आवश्यकता अनुभव करेगा उसे सहज ही मिल जायगी। जो मौजूद ही है− सर्वत्र बिखरा ही पड़ा है उसके ऊपर से पर्दा उठा देना कुछ कठिन भी नहीं था। जो कठिनाई थी वह प्रबल आकाँक्षा और प्रबल पुरुषार्थ के साथ तीव्र मनोयोग लगाने से सहज ही दूर भी हो जायगी। ईश्वर का राजकुमार अपने को सर्वशक्ति मान अनुभव करने लगे तो यह उसके लिए सरल स्वाभाविक ही है।
सूर्य की सप्तरंगी किरणों में से लाल रंग की किरणों से एक विशिष्ट धारा उत्पन्न की गई है ‘लेसर’ यह इतनी प्रचण्ड है कि उसकी सशक्त ता अपने स्तर की अनोखी एवं अभूतपूर्व ही कही जा सकती है। अणु विस्फोट से उत्पन्न विकिरण और लेसर प्रवाह का स्वरूप एवं प्रवाह भिन्न स्तर का है पर जहाँ तक मारक एवं दाहक शक्ति का सम्बन्ध है लेसर को ही प्रधान मानना पड़ेगा। दूषित विकिरण उत्पन्न न करने के कारण उसके उपयोग को और भी अधिक प्रमुखता दी गई है।
सामान्य स्थिति में प्रकाश किरणों मेले−ठेले में चलने वाली अनियन्त्रित भीड़ की तरह होती है जबकि ‘लेसर’ उत्पादन युक्त समान दिशा में— समान गति से चलने वाले सैनिकों की तरह कहा जा सकता है। भीड़ और सैनिकों शक्ति में जो अन्तर रहता है वही सामान्य प्रकाश किरणों और लेसर किरणों के बीच समझा जा सकता है।
लेसर किरणों का क्रिया−कलाप अद्भुत है। इनके द्वारा इस्पात की एक मोटी चादर में बहुत ही बारीक छेद कराना था जो उसने एक सेकेंड के हजारवें भाग जितने नगण्य समय में बड़ी फुर्ती से पूरा कर दिया। वे किरणें 6000 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान की थीं। छेद के स्थान के बुरादे को उन्होंने हवा में भाप बना कर उड़ा दिया। इसी प्रकार एक मजबूत हीरे में भी उनके द्वारा बहुत पतला छेद बात की बात में कर दिया। अमेरिकी डाक्टरों ने इन किरणों के द्वारा आँख जैसे नाजुक अंग के ट्यूमर को एक सेकेंड के दस लाख वे भाग में जलाकर नष्ट कर दिया। जबकि उसकी आपरेशन प्रक्रिया बड़ी कठिन मालूम पड़ती थी। निकट भविष्य में लेसर की एक किरण के सहारे टेलीफोन की एक साथ एक करोड़ वार्ताऐं की जा सकेंगी और टेलीविजन के एक हजार कार्यक्रम एक साथ प्रसारित किये जा सकेंगे। अंतर्ग्रही खोज−बीन के लिए अब खर्चीले राकेट भेजने न पड़ेंगे इन किरणों के द्वारा सौर−मण्डल के ही नहीं उससे बाहर के ग्रह नक्षत्रों में खोजा, परखा जा सकेगा।
खतरनाक लेसर किरणों को पालतू और सरल बनाकर विद्युत उत्पादन जैसे सामान्य उपयोग के योग्य बनाने के प्रयत्न किये गये हैं। अब तक प्रयुक्त हुए ‘लाल दण्ड’ उपकरण के स्थान पर एक नया माध्यम अर्ध चालक गैलियम आसनाइड विनिर्मित किया गया है जो शक्ति की उतनी ही सीमित मात्रा उत्पन्न करेगा जिसे लोकोपयोगी कार्या में प्रयुक्त किया जा सके।
लेसर उत्पादन का प्रमुख माध्यम ‘लालमणि’ है। यह एल्युमीनियम और आक्सीजन का योगिक मात्र है। एल्युमीनियम के पाँच हजार परमाणुओं में एक क्रोमियम का होता है, यही है लेसर उत्पादन की भूमिका का प्रमुख नट−नायक। यह अणु समुदाय संसार के अनन्त अंतरिक्ष में असीम मात्रा में बिखरा पड़ा है, उसके अस्तित्व का मान तक नहीं होता। जब उनके विशिष्ट वर्ग को विशिष्ट रीति से विशिष्ट प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाता है तो साधारण से असाधारणों के विकास उत्पादन का आश्चर्यचकित करने वाला प्रतिफल लेसर किरणों की तरह सामने आ खड़ा होता है।
एकता और एक रूपता की शक्ति का मूर्तिमान रूप ‘लेसर’ किरणों के रूप में सामने आया है। सामान्य प्रकाश के अंतर्गत सात रंग होते हैं और उन रंगों की किरणों छोटी−बड़ी ही नहीं होतीं वरन् बिखरी बिखरी रहती हैं। अपनी चाल तथा कलाएँ भी अलग−अलग रखने की विश्रृंखलता में उलझी हुई वे अपनी ढपली अपना राग बनाती और डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग−अलग हांडियों में पकाती रहती हैं फलतः उनसे गर्मी और रोशनी भर का नगण्य-सा प्रयोजन पूरा हो पाता है।
‘लेसर विज्ञान में पदार्थ की ऊर्जा का एक स्तर, एक लक्ष्य, एक स्वरूप, निर्धारित करने में सफलता प्राप्त की है फलतः उसके हाथ में अप्रत्याशित शक्ति स्रोत लग गया है इन किरणों का ताप 18000 सेंटीग्रेड है जिसकी तुलना में सूर्य भी ठण्डा प्रतीत होता है। इसका पूरा प्रयोग जहाँ भी किया जायगा वहाँ की हर वस्तु भाप बनकर हवा में उड़ जायगी।
चार इंच मोटा लाल रंग का एक यन्त्र सज्जित उपकरण लेजर किरण उत्पादन का प्रधान माध्यम है। उसमें क्रोमियम परमाणु प्रकाश के हरे अथवा पीले वर्ण को उत्तेजित किया जाता है। इसके लिए डिस्चार्ज लैंप द्वारा एक सेकेंड के हजारवें भाग जितने समय में प्रकाश उत्पन्न करके शुद्ध लाल रंग का प्रकाश प्राप्त किया जाता है। अब तक जो लेसर किरणें प्राप्त की गई हैं उनकी अधिकतम मोटाई एक इंच के दस लाखवें भाग के बराबर है। भविष्य में इतनी अधिक समर्थ और बलिष्ठ धाराएँ प्राप्त करने की आशा की गई है।
सकता है उसे इन लेजर किरणों ने पलक झपकते जितने समय और श्रम से पूरा करके दिखा दिया। इसीसे अनुमान लगाया जा सकता है—इन किरणों की अप्रत्याशित और अकल्पनीय शक्ति का।
रचनात्मक एवं समृद्धि अभिवर्धन के कार्या में इसका सदुपयोग होने पर जितना लाभ मिलने की कल्पना की गई है उससे भी अधिक आशंका दुरुपयोग के कारण उत्पन्न होने वाले सर्वनाश की है। लेसर किरणों से अचूक निशाना साधा जा सकेगा और जहाँ अणुबम गिराना हो वहाँ निश्चित रूप से निराया जा सकेगा। आकाश में उड़ते वायुयान ही नहीं अन्तर्ग्रही खोज पर निकले हुए राकेट भी जलाकर भस्म किये जा
सकेंगे। मृत्यु किरण के रूप में जहाँ भी उसकी प्रचण्ड धाराएँ छोड़ी जायेंगी वह भूखण्ड, खण्डहर वीरान के रूप में भी अपना चिन्ह अवशेष नहीं छोड़ेगा वरन् वहाँ की सारी वस्तुएँ हवा में भाप बनकर उड़ जायेंगी और उनकी कोई अता−पता शेष न रहेगा।
सकेंगे। मृत्यु किरण के रूप में जहाँ भी उसकी प्रचण्ड धाराएँ छोड़ी जायेंगी वह भूखण्ड, खण्डहर वीरान के रूप में भी अपना चिन्ह अवशेष नहीं छोड़ेगा वरन् वहाँ की सारी वस्तुएँ हवा में भाप बनकर उड़ जायेंगी और उनकी कोई अता−पता शेष न रहेगा।
प्रार्थना का अर्थ है ईश्वर के साथ सभावण करना और आत्म शुद्धि के लिए प्रकाश प्राप्त करना। जिससे ईश्वर की सहायता से अपनी कमजोरियों पर हम विजय प्राप्त कर सकें। —महात्मा गाँधी
पुराने जमाने में गाय और घोड़ा जंगल में एक साथ बड़े प्रेम से रहते थे। वहाँ घास की तो कमी न−थी। कभी−कभी दोनों साथ−साथ काफी दूर तक निकल जाते। घास चरते रहते और किसी वृक्ष की छाया में बैठकर अपने सुख−दुख की बातें भी कर लेते। उन दोनों के सम्बन्ध अधिक समय तक मधुर न रह सके, किसी छोटी बात को लेकर उनमें कहा सुनी हो गई।
घोड़ा सोचने लगा—’किसी भी तरह गाय को तंग करना चाहिए। उसे मजा चखाना चाहिए ताकि वह समझ सके कि घोड़ा कोई साधारण पशु नहीं है उससे बिगाड़ा कर जंगल में चैन से नहीं रहा जा सकता।’ वह सोचते−सोचते आदमी के पास गया और कहने लगा—’शायद आपको मालूम नहीं कि गाय के थनों अमृत के समान मीठा दूध भरा पड़ा है। यदि आप उसे पकड़ लेंगे तो दोनों समय आपको उसका दूध मिलता रहेगा। उस जैसा निरीह और सीधा पशु इस जंगल में तो मैंने कोई देखा नहीं।
‘बात तो तुम्हारी ठीक है। पर वह तो बहुत तेज दौड़ती है। उसके सींग भी होते हैं। मैं उसे किस प्रकार पकड़ूंगा।’
‘आदमी होकर भी जरा सी बात में घबड़ा गये। वह मुझसे तेज नहीं दौड़ सकती। आप मेरी पीठ पर बैठकर उसे पकड़ सकते हैं।’
आदमी को इसमें क्या घाटा था? इससे अच्छा परामर्शदाता और सहयोगी मिलना भी कठिन था। उसने घोड़े को लगाम लगाई। उस पर सवार हुआ और थोड़ी ही देर में गाय को पकड़ लिया। अब गाय और घोड़ा दोनों ही मनुष्य के दास बन चुके थे। दूसरों को हानि पहुँचाने वाला स्वयं भी उस हानि से बचकर कहाँ निकल पाता है?
अपनी प्राण−शक्ति को यदि हम मितव्ययता पूर्वक खर्च करें तो जीवन को लम्बा और निरोग बनाने में उसका उपयोग कर सकते हैं और इस बचत से कुछ महत्वपूर्ण उपार्जन कर सकते हैं।
प्राण−शक्ति का सबसे अधिक अपव्यय अनावश्यक भोजन भार वहन करने से होता है। शरीर रक्षा के लिए सरल और स्वल्प भोजन की आवश्यकता होती है किन्तु हम दुष्पाच्य रूप में अधिक मात्रा में उसे ग्रहण करते हैं। सोचते हैं कीमती, स्वादिष्ट और अधिक भोजन करने से बलिष्ठ बनेंगे पर होता ठीक उलटा है। गरिष्ठ और प्रचुर भोजन जितनी शक्ति उत्पन्न करता है उससे कहीं अधिक अपने पचाने में खर्च करा लेता है अस्तु हम प्रतिदिन घाटे में रहते हैं और अन्ततः दिवालिया बनकर असमय में ही जीवनलीला समाप्त कर देते हैं।
प्राण कहाँ से आता है? उसके उपलब्धि स्रोत कहाँ हैं? यह तलाश करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि यह बहुमूल्य सम्पदा हमें शुद्ध वायु,निर्मल जल, सात्विक आहार, सूर्य संपर्क, गहरी नींद संतुष्ट मनःस्थिति से प्राप्त होती है। इन शक्ति स्रोतों की जितनी उपेक्षा करेंगे, उनसे जितने दूर रहेंगे उसने ही क्षीण होते चले जायेंगे? कमाई कम और खर्च अधिक करने पर कोई व्यवसाय ठीक तरह नहीं चलता फिर जीवन व्यवसाय ही कैसे चलेगा?
हर काम की सीमा है। मर्यादा में रहकर ही स्थिरता प्राप्त हो सकती है। सामर्थ्य से अधिक काम करना—साधनों से असंबद्ध महत्वाकाँक्षाऐं गढ़ना— भोगासिक्त में निमग्न होकर इन्द्रियों से अधिक काम लेना, दिनचर्या की नियमितता का ध्यान न रखना आदि बातें देखने सुनने में कोई बहुत बड़ी गलतियाँ नहीं मालूम पड़ती, पर वे छोटी होने पर भी चिनगारी की तरह हमारे हँसते−खेलते जीवनोद्यान में आग लगा देने के लिए पर्याप्त है। नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला अपनी प्रामाणिकता खो बैठता है और जनसहयोग से वञ्चित होता चला जाता है। व्यक्ति गत जीवनचर्या में मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला उस बहुमूल्य सम्पदा को खोता चला जाता है जिसके आधार पर सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं की पृष्ठभूमि बनती है।
विषपान से आत्म−हत्या करने वाले की रक्षा कौन कब तक करेगा? जिनने नशे पीकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने पर कमर ली है उनकी प्राण−शक्ति कब तक स्थिर रहेगी। उत्तेजक मसाले भी एक प्रकार के विष ही हैं। वासनात्मक उत्तेजनाओं से मन को निरन्तर उद्विग्न करते रहने से हम अपनी ही सुसंचित जीवन सम्पदा का क्षरण करते चले जाते हैं और अपने ही पापों का फल भोगने के लिए रुग्णता, अशक्त ता एवं अकाल मृत्यु के नरक में जा मिलते हैं।
दार्शनिक कन्फ्यूशियस ठीक ही कहते थे—जो मितव्ययता के नियम को भंग करेगा वह अन्त में दुसह दुख सहता हुआ मरेगा। उनकी यह उक्ति प्राण−शक्ति के अपव्यय के सम्बन्ध में सोलहों आने सच उतरती है। हम अपनी ही जीवन सामर्थ्य से खिलवाड़ करते हैं— उसे अनावश्यक रूप से बर्बाद करते हैं ऐसी दशा में पग−पग पर ठोकर खाने और अशान्त असफल रहने का दुष्परिणाम भोगें तो आश्चर्य ही क्या है?
नैष्ठिक साधकों को अनवरत मार्ग−दर्शन
अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों को यह प्रेरणा निरन्तर दी जाती रहती है कि वे अपनी रुझान आत्मज्ञान एवं आत्मबल बढ़ाते के लिए मोड़े। भौतिक समृद्धि की तरह ही आत्मिक प्रगति की बातें सोचें। इसके लिए उपासनात्मक क्रिया−प्रक्रिया और जीवन निर्माण साधना पर भी उसकी उपेक्षा नहीं की है और उनमें से अधिकाँश ने अपने आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया है। अपनी प्रेरणा परक चेष्टा भी निरन्तर चलती रही है और स्वजनों को इस संदर्भ में समय−समय पर आवश्यक उत्साह एवं प्रकाश दिया जाता रहा है।
अब इस दिशा में अधिक सुव्यवस्थित रीति से क्रमबद्ध प्रयत्न करने का निश्चय किया गया है। जिन्हें आत्मिक प्रगति के लिए उपासना एवं साधना में सुस्थिर उत्साह है उन्हें क्रमिक विकास के लिए नियमित मार्ग−दर्शन करने की व्यवस्था बनाई गई है। गत दो अंकों में इस संदर्भ में कुछ लिखा जाता रहा है। साधना मार्ग में समुचित अभिरुचि रखने वालों की अलग से सूची बनाई जा रही है। वर्ष में दो बार उनके कार्या का लेखा−जोखा लेने और तदनुरूप भविष्य के लिए आवश्यक परामर्श देते रहने का निश्चय किया गया है।
इसके लिए बसन्त पञ्चमी (माघ शुक्ल पञ्चमी) गुरुपूर्णिमा (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा) दो पर्व निर्धारित किये गये हैं। धार्मिक परम्परा के अनुसार इन दो पर्वों का महत्व हर दृष्टि से अति उच्चकोटि का है। इन पर्वों पर परिवार के लाखों परिजनों से व्यक्ति गत मिलना तो नहीं हो सकता,पर पत्रों का आदान−प्रदान तो सम्भव ही है। इससे भी काम चल सकता है। परिजनो को हर साल इतना किराया भाड़ा खर्च करके समय निकालकर र वर्ष में दो बार हरिद्वार आ सकना कठिन है और अपने लिए भी इतने अधिक लोगों को ठहराने का—भेंट परामर्श का प्रबन्ध कर सकना असम्भव है। अस्तु पत्र व्यवहार को ही सुविधाजनक एवं पर्याप्त माना गया है।
जून, जुलाई के अंकों में इसी संभव के अंतर्गत कुछ प्रश्न गये हैं और कुछ निर्देश दिये गये हैं।
जून के अंग में उपासना एवं साधना प्रक्रिया किस प्रकार चल रही है? भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन−क्रम किस स्थिति में रह रहा है? यह पूछा गया है और जुलाई के अंग में ऐसे दस सूखकर निर्देश दिये गये हैं जिनके आधार पर वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का उच्चस्तरीय निर्वाह कर सकने की दिशा में अधिक तेजी से कदम बढ़ाये जा सकें।
वर्तमान स्थिति क्या है? तथा निर्देशों को अपनाने के लिए प्रयास क्या है? इन दोनों बातों की आवश्यक जानकारी जिनकी मिलेगी उनके सम्बन्ध में अधिक गहराई से विचार कर सकना और व्यक्ति गत परामर्श अधिक मनोयोग पूर्वक दे सकना भी अपने लिए सम्भव हो जायगा। यदि वह आदान−प्रदान क्रमबद्ध रूप से चल पड़ा तो निश्चित रूप से अधिकाँश परिजनों को अपनी आध्यात्मिक प्रगति का पथ अधिक व्यवस्थित रीति से और अधिक तीव्रगति से प्रशस्त हुआ अनुभव होता रहेगा।
जून अंक में पूछे गये प्रश्नों और जुलाई अंक में दिये गये निर्देशों को कार्यान्वित किये जाने संबंधी जान−कारियाँ परिजन उत्साह पूर्वक भेज रहे हैं। जिनके पत्र अभी नहीं आये हैं उनके इस महीने में अवश्य आ जायेंगे ऐसी आशा की गई है। इन उत्तरों के आधार पर अखण्ड ज्योति परिवार के नैष्ठिक उपासकों की सूची बन जायगी और उनके साथ आदान−प्रदान का एक व्यवस्थित क्रम चल पड़ेगा। यह प्रक्रिया निश्चित रूप से अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगी, ऐसी आशा है। इस सूची में पिछले प्राण—प्रत्यावर्तन सत्रों में आये हुए— आगे आने वाले—वानप्रस्थ तथा आय शान्ति−कुञ्ज में आये शिक्षार्थी तो होंगे ही जो अन्य होंगे उन्हें भी अगले दिनों एकबार हरिद्वार बुलाने के लिए प्रयत्न किया जायगा। ताकि कुछ समय साथ−साथ रह सकने का अवसर भविष्य के लिए अधिक घनिष्ठ आत्मीयता का सृजन कर सके और आदान−प्रदान की श्रृंखला को अधिक सुदृढ़ बना सके।
पत्रों का उत्तर तो यहाँ से दिया ही जाता है। आमतौर से सभी स्वजन जवाबी पत्र भेजने की आवश्यकता अनुभव करते हैं और इससे उत्तर भेजने में पड़ने वाले एक बहुत बड़े आर्थिक दबाव से संस्था को बहुत हदतक राहत मिल जाती है और उत्तर देना अधिक सुविधाजनक हो जाता है। यों उत्तर किसी के भी नहीं रोके जाते विशेषतया उनके, जो आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए प्रयत्नशील हैं।
पत्रों में संक्षिप्त बात ही लिखी जा सकती है। अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान विस्तारपूर्वक कर सकना उसमें सम्भव नहीं होता। संक्षिप्त में लिखे गये प्रश्न और संक्षिप्त उत्तर एक सीमा तक ही समाधान करते है। बहुत प्रयत्न करने पर भी वार्ता अधूरी रह जाती है। इस कठिनाई का समाधान करने के लिए इस वर्ष से एक नई व्यवस्था यह सोची गई है कि शान्तिकुंज का एक प्रतिनिधि नैष्ठिक अध्यात्म पथ के पथिकों के यहाँ जाया करे और उनकी आत्मिक जिज्ञासाओं का समाधान एवं आवश्यक मार्ग−दर्शन किया करे। हमारा प्रतिनिधि कब पहुँचेगा इसकी पूर्व सूचना स्थानीय किसी एक व्यक्ति को देदी जाया करेगी। वह अन्य सब साधकों को सूचना देकर उन्हें एकत्रित कर लिया करेंगे और सामूहिक एवं व्यक्ति गत परामर्श के आधार पर वह सब वैचारिक आदान−प्रदान कर लिया जाया करेगा जो हरिद्वार आने पर ही सम्भव हो सकता है। पत्र−व्यवहार में अपूर्णता रह जाती है—स्थिति का सही रूप में मूल्याँकन नहीं हो पाता उस कमी को प्रतिनिधि द्वारा विवरण जानकर अथवा परामर्श करके बहुत कुछ जाना जा सकता है। इस प्रकार वह प्रतिनिधि हमारे और साधकों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की आवश्यकता पूरी करता रह सकेगा। जानकारियों का अच्छा आदान प्रदान इस माध्यम से सम्भव हो सकेगा।
भजनोपदेशकों के लिए संगीत सत्र
शान्ति−कुञ्ज में तीन−तीन महीने के संगीत सत्र आरम्भ होने की सूचना कुछ समय पूर्व छपी थी। वे अब 1 अक्टूबर से आरम्भ होने जा रहे हैं।
इस संदर्भ में कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है। यह सब केवल इस दृष्टि से आरम्भ किये जा रहे हैं कि जन−जागरण की आवश्यकता पूरी करने के लिए उत्साही भजनोपदेशक तैयार किये जा सकें। विचार क्रान्ति इस युग की महती आवश्यकता है। जन−मानस का भावनात्मक नव−निर्माण करने के लिए अपने देश में प्रवचनों से अधिक गायन के अधिक सफल होने की संभावना सुनिश्चित है इस दृष्टि से यह आवश्यकता वर्षों से अनुभव की जा रही थी कि विचार गोष्ठियों, सम्मेलनों में प्रवचन करने के लिए वक्त तैयार करने के अतिरिक्त लोक−मानस को झंकृत कर सकने योग्य गायक—भजनोपदेशक भी उत्पन्न किये जाँय। उनके समुचित किन्तु स्वल्पकालीन प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाय। संगीत सत्रों के आरम्भ करने की योजना इसी दृष्टि से बनाई गई थी।
कुछ समय पूर्व संगीत सत्रों सम्बन्धी सूचना अखण्ड−ज्योति में छपी थी। उसमें सम्भवतः उपरोक्त स्पष्टीकरण अच्छी तरह नहीं हो पाया। अस्तु आवेदन कर्ताओं में से कई थे जिनका उद्देश्य व्यक्ति गत शौक की पूर्ति तक सीमित था। जिस तरह कई अन्य कलाएँ लोग अपनी निजी योग्यता बढ़ाने अथवा विनोद की दृष्टि से सीखते हैं उसी तरह उनने इसे भी ‘समझा’ है और यह ध्यान में नहीं रखा है कि मिशन का उद्देश्य मात्र जन−जागरण है और उसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए शान्ति−कुञ्ज में विविध प्रकार के प्रशिक्षण आरम्भ किये गये हैं। वानप्रस्थ शिक्षण—महिला जागरण सभी शिक्षण उनके लिए हैं जिनके अन्तःकरणों में युग की महती आवश्यकता पूरी करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण योगदान कर सकने की उमंग है। जिनकी इच्छाएँ व्यक्ति गत योग्यता बढ़ा कर निजी लाभ लेने तक सीमित हों उनके लिए उपरोक्त सभी सत्र निरर्थक हैं। ठीक यही बात संगीत सत्रों पर भी लागू होती है। जिनकी परिस्थिति एवं मनःस्थिति घर से बाहर जा सकने की—जन−जागरण की—विचार क्रान्ति की युग पुकार के लिए अपना कुछ योगदान कर सकने के उपयुक्त है उन्हीं के लिए संगीत सत्र शिक्षण में सम्मिलित होने की उपयोगिता है। ऐसे लोगों के लिए ही इतनी झंझट भरी व्यवस्था का उत्तरदायित्व मिशन अपने कन्धों पर उठाना चाहता है। शौकीनी की दृष्टि से गाना−बजाना सीखने भर में रुचि रखने वालों के लिए कोई साधन जुटाना अपने लिए प्रकार से असम्भव ही है।
गत वर्ष संगीत सत्र की छपी सूचना के आधार पर जिनने अपने आवेदन पत्र भेजे थे उनसे तथा नये आवेदन कर्ताओं से वस्तु स्थिति को समझ कर ही अपने प्रार्थना पत्र नये सिरे से भेजने का अनुरोध है।
शिक्षार्थी अपना प्रार्थना−पत्र निम्न सूचनाओं सहित भेजें (1)पूरा नाम पता (2) आयु (3) शिक्षा (4)व्यवसाय (5) शारीरिक और अनुशासन प्रिय एवं होने की सूचना (6) निर्व्यसन अनुशासन प्रिय एवं सौम्य स्वभाव होने की घोषणा (7) कण्ठ की मधुरता (8) अब तक के संगीत प्रयत्नों का विवरण (9) भजनोपदेशक की भूमिका निबाहने के लिए घर से बाहर जा सकने की स्थिति का विस्तारपूर्वक उल्लेख।
सत्र तीन−तीन महीने के हैं। प्रथम सत्र अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर 74 में चलेगा। आगे भी वे इसी क्रम से चलते रहेंगे। छात्रों में इतनी योग्यता उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जायगा कि वे गायन एवं वाद्ययन्त्रों की सहायता से कुशल भजनोपदेशक की—युग गायक की भूमिका का निर्वाह कर सकें।
शान्तिकुंज में चल रहे प्रत्येक प्रशिक्षण के सम्बन्ध में एक ही परम्परा चलती रही है कि शिक्षार्थियों के निवास, भोजन, शिक्षा उपकरण आदि की व्यवस्था बनाई गई है और आशा रखी गई है कि शिक्षार्थी अपना भोजन व्यय भार स्वयं उठायेंगे। किन्तु यह अनिवार्य शर्त नहीं है। जो शिक्षार्थी पूरा खर्च उठा सकने में असमर्थ हैं वे कम भी दे सकते हैं, या बिना दिये भी शिक्षा पा सकते हैं। आर्थिक असमर्थता के कारण किसी को भी शिक्षा से वञ्चित न होना पड़े इसकी व्यवस्था यहाँ आरम्भ से ही चली आ रही है। यों दो बार भोजन करने दो बार चाय का प्रबन्ध रहने में 60) मासिक से अधिक ही लागत खर्च आता है कम नहीं। अक्टूबर से आरम्भ होने वाले प्रथम सत्र में मात्र 25 छात्र लिए जाने हैं। इसलिए जिन्हें आना ही जल्दी आवेदन भेजें ताकि यथा समय स्वीकृति प्राप्त करके आवश्यक तैयारी का अवसर उन्हें मिल सकें।
टैप रिकार्डरों द्वारा प्रचार की अभिनव योजना
गुरुदेव अब साधारणतया शांतिकुंज ही रहते हैं। अपनी मार्ग−दर्शक का बुलावा आने पर हिमाच्छादित तपोवन में जाते हैं। कभी विदेशों में भी जाना पड़ता है, इसके अतिरिक्त वे भारत में हरिद्वार छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते।
कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके प्रवचनों में आग होती है। सुनने वालों के अन्तस्तलों को उनकी वाणी स्पर्श करती है और मृतकों में भी अभिनव जीवन संचार होता है। पर अब तो वह वाणी केवल शान्ति− कुंज में ही सुनने को मिल सकती है। अखण्ड−ज्योति पत्रिका तथा पुस्तकों से ही उनका सत्संग हो सकता है। वे लोग जो हरिद्वार नहीं पहुँच सकते उनकी वाणी से निकलने वाली मर्मस्पर्शी प्रेरणाओं का लाभ लेने से वञ्चित ही रह जाते हैं। यह एक ऐसा अभाव गत तीन वर्षों से उत्पन्न हो गया है जिससे सारा युग−निर्माण परिवार खिन्न हैं।
इस अभाव की पूर्ति के लिए एक मध्यवर्ती मांग निकाला गया है। गुरुदेव के विभिन्न मार्मिक विषयों पर पौन−पौन घण्टे के प्रवचन टैप कराये जा रहे हैं। उन्हें प्राप्त किया जा सकेगा और व्यक्ति गत रूप से तथा सामूहिक रूप से उन्हें सुविधानुसार सुना या सुनाया जा सकेगा। गायत्री यज्ञों में, विचार गोष्ठियों में, युग−निर्माण सम्मेलनों में निश्चित रूप से यह प्रवचन बड़े उत्साह पूर्वक सुने जायेंगे। पर्व त्यौहारों के समारोहों एवं षोडश संस्कारों—जन्म दिनों के अवसरों पर तद्नुकूल प्रेरणा देने वाले यह टैप निश्चित रूप से बड़े चाव के साथ सुने जायेंगे।
छात्रों, अध्यापकों, किसानों, मजदूरों महिलाओं, व्यापारियों, कलाकारों, राजनेताओं, साधु−ब्राह्मणों, युवकों, वृद्धों, धनियों, निर्धनों धर्म−प्रेमियों, लोकसेवियों आदि विभिन्न वर्गों से बहुत कुछ कहना गुरुदेव को हैं। इन विभिन्न वर्गों के लिए, विभिन्न प्रेरणाओं से युक्त टैप तैयार किये जा रहे हैं। उन्हें जाना कितना प्रेरक हो सकता है यह बात कहने से नहीं अनुभव करने से ही समझी जा सकती है।
जनता से गुरुदेव का वाणी जन्य संपर्क एक प्रकार से टूट ही चुका है उसे पुनर्जीवित करने के लिए यह टैप रिकार्डरों के माध्यम से उनका सन्देश जन−साधारण तक पहुँचाने की प्रक्रिया निश्चय ही एक प्रकार से नव−जीवन का संचार करेगी—अभिनव उत्साह उत्पन्न करेगी। इस टैप योजना का युग−निर्माण परिवार की शाखाओं द्वारा भरपूर स्वागत किया जायगा।
कुछ समय पूर्व युग−निर्माण योजना द्वारा 10 ग्रामोफोन रिकार्ड बनाये गये थे। उनका उत्साह पूर्वक स्वागत हुआ। पर वह योजना अधिक लोकप्रिय एवं उपयोगी सिद्ध न हो सकी। क्योंकि कोई भी गीत कितना ही उत्तम क्यों न हो दस−पाँच बार सुन लेने के बाद फीका लगने लगता है और बार−बार पुराने क्षेत्र में वह उपेक्षित बन जाता है। जो उत्साह उन रिकार्डों को खरीदते समय था वह एक दो महीने में ही समाप्त हो जाता है।
हर महीने नये−नये रिकार्ड बनाते रहने की योजना है तो अच्छी पर है बहुत खर्चीली। उस योजना को नियमित रूप से चलाने—रिकार्ड डीलरों को बेचने की व्यवस्था बनाने के लिए कई लाख रुपये की पूँजी चाहिए। शाखाऐं हर महीने नये−नये रिकार्ड खरीदती पिछले दिनों की अपेक्षा रिकार्डों की लागत भी ड्यौढ़ी दूनी हो गई है।
गायनों की रिकार्ड व्यवस्था कम खर्च में चालू रखने की सरल विधि यह ढूँढ़ निकाली गई है कि—’टेप रिकार्डर यन्त्र पर बजाये सुनाये जा सकने की विधि अपनाई जाय। एक साधारण टैप पर प्रायः गाने टैप हो जाते हैं। उन्हें लाउडस्पीकरों की सहायता से ठीक उसी प्रकार सुनाया जा सकता है जिस प्रकार ग्रामोफोन के रिकार्ड सुनाये जाते हैं। पुरानी आवाज को मिटाकर उसकी जगह पर नये गाने रिकार्ड किये जा सकते हैं। उसी पुरानी टैप की पूँजी में वर्षों तक नये−नये गाने बदले और सुने जा सकते हैं।
इस व्यवस्था को नियमित रूप से चलाते रहने के लिए शांति–कुंज में प्रबन्ध कर दिया गया है। इसका स्वरूप टैप लाइब्रेरी जैसा है। यहाँ युग−मिशन के अनुरूप अत्यन्त प्रेरक नये−नये गायनों के टेप बहुत ही मधुर एवं आकर्षक वाद्य यन्त्र सहित विनिर्मित होते रहेंगे। इनकी एक क्रमबद्ध श्रृंखला रहेगी। इसमें अनावश्यक प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ेंगी, आते−ज्ञाते व्यक्तियों के हाथों अथवा प्रवचन टेप करवा कर मँगाने की व्यवस्था चाहे जब हो सकती है। स्टॉक में किन−किन गायनों के टैप तैयार रखे हैं इनकी सूची मँगाई जा सकेगी और अपनी पसन्द के टैप किये जा सकेंगे।
टैप यदि डाक पार्सल से मँगाने हों तो उसका खर्च भी मँगाने वालों को देना होना। यह खर्च आसानी से सहन किये जा सकने जितना है। हरिद्वार शिक्षण शिविरों के लिए लोग आते ही रहते हैं। उनके हाथों बदलवाना अधि सुविधाजनक है, उसमें पोस्ट पार्सलों के—आने−जाने के खर्चे की भी बचत हो जाती है।
चूँकि बाजार में विभिन्न प्रकार के टैप रिकार्डर बिकते हैं। उनमें कठिनाई यह रहती है कि एक मेकर की मशीनों पर दूसरे मेकर द्वारा रहती है कि एक मेकर की मशीनों नर दूसरे मेकर द्वारा तैयार किये टैप बजने में बड़ी अड़चन उत्पन्न करते हैं। जिस यन्त्र पर टैप किया गया है उसी पर बजना ठीक पड़ता है इस दृष्टि से सबसे अधिक प्रचलित टिकाऊ और प्रयोग में सरल ‘कैसेट’ सिस्टम के टेप रिकार्डरों को चुना गया है। शांति–कुंज में उसी पर टैप कराये जा रहे हैं। अस्तु जिन्हें नियमित रूप से यहाँ के टैप प्राप्त करने हों उन्हें उसी मेकर के टेप रिकार्डर अपनी शाखाओं में मँगाने चाहिए। इनकी बाजारू कीमत इन दिनों प्रायः 700)से 1500) तक विभिन्न मेकरों की होगी।
जिनके पास ‘स्थूल’ सिस्टम के टैप रिकार्डर हैं वे अपने टेप रिकार्डर सहित शांति–कुंज पहुँचकर प्रवचन एवं संगीत टेप कर सकें ऐसी व्यवस्था भी की जायेगी। जिन परिजनों के पास अच्छे टेप रिकार्डर हैं और जो अपने निकटवर्ती क्षेत्र के सदस्यों को अपने टेप से उनके टेप रिकार्डरों पर प्रवचन आदि टेप कराने की व्यवस्था कर सकते हैं उन्हें विशेष रूप से प्रारम्भिक ‘टेपिंग‘ के अपनी स्थिति स्पष्ट करदें तो भाषण टेप कराने की तिथियाँ उन्हें सूचित की जा सकेंगी।
विचार गोष्ठियों में—सत्संगों में—सम्मेलन, आयोजनों में मिशन के अनुरूप गायनों की आवश्यकता पड़ती है। शाखाएँ अक्सर प्रातःकाल प्रभाती के रूप में लाउडस्पीकरों की सहायता से प्रेरक गीत अपने−अपने क्षेत्रों में सुनाने की व्यवस्था कर रही हैं। किसी ऊँचे स्थान पर लाउडस्पीकर के चोंगे लगा दिये जाँय। नीचे रिकार्ड बजते रहें तो उसकी ध्वनि प्रातःकाल की निस्तब्धता में दूर−दूर तक सुनाई पड़ती है। घर बैठे लोग उस प्रेरणा का आनन्द लेते हैं। विशेष अवसरों पर—उत्सव आयोजनों पर भी यह गायनों का ध्वनि प्रसारण बड़ा उपयोगी रहता है। अब इसके लिए बार−बार नये−नये रिकार्ड खरीदते रहने के खर्च से बचा जा सकता है और टैप रिकार्डरों के माध्यम से यह प्रयोजन सहज ही पूरा किया जा सकता है।
अगले दिनों यज्ञ आयोजन एवं युग−निर्माण सम्मेलन होने हैं इनमें अन्य खर्चो के साथ (1)स्लाइड प्रोजेक्टर खरीदने के लिए 700) की (2) लाउडस्पीकर खरीदने के लिए 400) की और टैप रिकार्डर तथा टेपों के लिए 900) की राशि भी जोड़कर रखनी चाहिए। यह 2000) की राशि हर शाखा को उपरोक्त तीनों प्रचार उपकरण खरीदने के लिए सम्मिलित करके रखनी चाहिए। चलते−फिरते पुस्तकालय—ज्ञान रथ−बना लेने के उपरांत इन प्रचार उपकरणों का खरीदना हर शाखा के लिए नितान्त आवश्यक कर्त्तव्य है। आशा की जानी चाहिए कि अगले वर्ष हर समर्थ शाखा के पास उपरोक्त उपकरण होंगे और वे अपने−अपने क्षेत्र में नवयुग विचारधारा का प्रचार सञ्चार उत्साह पूर्वक करने में समर्थ हो सकेगी। टैप रिकार्डर खरीदना भी इसी योजन का अति महत्वपूर्ण अंग माना जाना चाहिए।
उपरोक्त तीनों योजनाओं के सम्बन्ध में पत्र व्यवहार शांति–कुंज पो. सप्त सरोवर’ हरिद्वार के पते पर किया जाना चाहिए।
*समाप्त*