प्रजातन्त्र पद्धति के जन्म दाता दार्शनिक रूसो अपनी गरीबी के दिनों में किसी छोटी घरेलू नौकरी में लगे हुए अपना निर्वाह करते थे। मालिक के घर एक प्रीतिभोज हुआ। अतिथि गण किसी ऐतिहासिक घटना पर चर्चा करे रहे थे। बात मतभेद से बढ़कर विवाद तक पहुँच गई। चाय परोसते हुए रूसो ने नम्र शब्दों में अपनी वृ्रप्तटता के लिए क्षमा माँगते हुए उन पुस्तकों के संदर्भ बताये जिनमें विवाद के विषय पर प्रमाण का उल्लेख था। पुस्तक मँगाई गई और समाधान मिल गया।
घरेलू नौकर की इतनी विद्वता देखकर आगंतुकों ने उससे पूछा−भला तुमने किसी विद्यालय में शिक्षा पाई। रूसो और भी नम्र हो गये। उनने इतना ही कहा − मैंने मुसीबत के स्कूल में शिक्षा पाई हैं क्योंकि वहीं किसी प्रतिभा का निखारने के लिए सबसे उपयुक्त शिक्षा केन्द्र रहा है।
बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। सामान्य स्थिति में वे दिखाई नहीं पड़ती, पर जैसे ही बीज के उगने की परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं वैसे ही यह तथ्य अधिकाधिक प्रकट हो जाता है। पौधा उगता है—बढ़ता और वृक्ष बनता है। उससे छाया, लकड़ी, पत्र, पुष्प, फल आदि के ऐसे अनेक अनुदान मिलने लगते है, जो अविकसित बीज से नहीं मिल सकते थे।
मनुष्य की सत्ता एक बीज है, जिसमें विकास की वे सभी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं जो अब तक उत्पन्न हुए मनुष्यों में से किसी को भी प्राप्त हो चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति की मूलसत्ता समान स्तर की है; अन्तर केवल प्रयास एवं परिस्थितियों का है; यदि अवसर मिले, तो प्रत्येक व्यक्ति उतना ही ऊँचा उठ सकता है, जितना कि इस संसार का कोई व्यक्ति कभी भी आगे बढ़ सका। भूतकाल में जो हो चुका है, वह शक्य सिद्ध हो चुका। सुनिश्चित सिद्धि तक उपयुक्त साधना पर पहुँचने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। बात आगे की सोची जा सकती हैं। जो भूतकाल में नहीं हो सका, वह भी भविष्य में हो सकता है। मनुष्य की सम्भावनाएँ अनन्त हैं। भूत से भी अधिक शानदार भविष्य हो सकता है, इसकी आशा की जा सकती है—की जानी चाहिए।
मनुष्य की अपनी सत्ता में अनन्त सामर्थ्य और महान सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। उन्हें समझने और विकसित करने के लिए सही रीति से—सही दिशा में अथक एवं अनवरत प्रयास करना—समस्त सिद्धियों का राज मार्ग है, ऐसी सिद्धियों का, जो उसकी प्रत्येक अपूर्णता को पूर्णता में परिणत कर सकती हैं।
भारत में अध्यात्म की तरह ही विज्ञान पर भी गहन अनुसंधान होते रहे हैं और शोध-प्रयासों द्वारा जड़ तथा चेतन प्रकृति के रहस्यों को जानने– उनसे लाभान्वित होने का प्रयत्न करते रहे हैं। महाभारत में जिन दिव्य अस्त्रों के चलाये जाने का वर्णन है, वे आज के विकट बारूदी तथा छोटे आणविक हथियारों से किसी प्रकार कम नहीं हैं।
अश्विनीकुमार कुशल शल्य चिकित्सक थे। उनके विश्पला की कटी हुई जांघ को सीकर जोड़ा था। च्यवन ऋषि की अन्धी आँखों की ज्योति लौटाई थी तथा वृद्धता को युवावस्था में बदला था। रामायण काल में सुषेण वैद्य की चर्चा मिलती है, जिनने लक्ष्मण की, शक्ति आघात से प्राण-रक्षा की थी।
नल-नील द्वारा समुद्र पर पुल बनाये जाने की वास्तुकला अद्भुत थी। शिखण्डी का यौन-परिवर्तन स्थूलकर्ण नामक यक्ष चिकित्सक ने किया था। ईसा से पूर्व समस्त संसार को शून्य की जानकारी न थी। एक हजार लिखना होता, तो 1000 के स्थान पर दस बार X लिखना पड़ता था, शून्य के आविष्कार ने गणित-जगत में एक क्रांति ही उत्पन्न कर दी। अंकगणित भारत से अरब और अरब से योरोप पहुँचा। अंकों को ‘हिन्दसा’ अर्थात् भारत से आया हुआ, इसी आधार पर कहा जाने लगा। ज्यामिति के बारे में कहा जाता है कि वह यूक्लिड से आरम्भ हुई,पर वास्तविकता यह नहीं है। तंत्र ग्रंथों में यन्त्र-चक्रों का उल्लेख एवं आयस्तक में विविध आकृतियों के कुण्डों का विधान ज्यामिति शास्त्र के अनुरूप ही बनाने का विधान है। भारत चिरकाल से इस विद्या में निष्णात रहा है।
आश्वलायन द्वारा खगोल विद्या का– पालकाट्य द्वारा पशु चिकित्सा का– पंचाल वाभव्य द्वारा काम-विज्ञान का– हारीत द्वारा विष चिकित्सा का– वोधकन द्वारा रेखागणित का– लाट्यायन द्वारा कृमिशास्त्र का– चरक द्वारा औषधि-विज्ञान का– सुश्रुत द्वारा शल्य चिकित्सा का– नागार्जुन द्वारा रसायन विद्या का– व्याडिका द्वारा वायुयान विद्या का– वृद्ध श्रृंगधर द्वारा शस्त्रविद्या का– यास्क द्वारा भाषा-विज्ञान का जिस तत्परता के साथ विकासा– विस्तार किया गया, उसे, उन साधनहीन परिस्थितियों को आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है।
आर्यभट्ट ने पहली बार यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया, कि पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा करती है। न्यूटन से 600 वर्ष पूर्व भाष्कराचार्य पृथ्वी में आकर्षण शक्ति होने की बात प्रमाणित कर चुके थे। अनेक सौरमण्डल इस ब्रह्माण्ड में हैं; यह जानकारी भारतीयों की थी।
आइन्स्टीन ने समय को सूर्य की गति का सापेक्ष बताया है। उनका कथन है कि हर सौर मण्डल का समयक्रम पृथक−पृथक होता है। यह वहाँ के ग्रहों की कक्षा एवं परिभ्रमण गति पर निर्भर रहता है। सापेक्षवाद का यह रहस्य भारत में बहुत प्राचीन काल से विदित था। पौराणिक गाथा है कि राजा रेवत अपनी पुत्री रेवती के लिए उपयुक्त वर पृथ्वी पर न मिलने के कारण ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी से परामर्श करने गये। वहाँ सभा में हा हा− हू हू− गंधर्वों का नृत्य चल रहा था। रेवत थोड़ी देर वहाँ बैठकर वह नृत्य देखते रहे और समारोह समाप्त होने पर ब्रह्माजी से अपना प्रयोजन कहने लगे। ब्रह्माजी ने कहा तुम्हें यहाँ आये हुए आधी घड़ी ही लगी है, पर पृथ्वी पर तो दो युग बीत गये। इस वर्णन से स्पष्ट है कि सापेक्षवाद के सिद्धान्त की भारतीयों को चिरकाल से जानकारी थी।
कोई समय था, जब हमारे मन से लोकोपयोगी तथ्यों को ढूँढने और संसार को विविध−विधि अनुदान देने की महत्वकांक्षाएँ उफनती रहती थीं, तब हमने वे कार्य किये, जिनके लिए संसार नतमस्तक है। आज हम व्यक्तिगत स्वार्थ-साधनों तक सीमित हैं; फलतः जातीय तेज समाप्त हो गया और वह प्रतिभा नष्ट हो गई, जो हमें सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में अग्रसर करती थी। संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचे उठकर उदात्त चिन्तन अपनाये बिना महानता प्राप्त करने का और मार्ग नहीं। यह तथ्य जितनी जल्दी समझ लिया जाय, उतना ही उत्तम है।
एलबर्ट स्वाइत्जर ने अपनी पुस्तक ‘रेबरन्स फाँर लाइफ’ में व्यक्त किया है। कि हम जिन्दगी को इसलिए प्यार करते हैं कि उसमें जीवनी शक्ति मौजूद है। हम जीना चाहते हैं। − इसलिए कि जीवन तत्व में पृथक रहने पर तो केवल अन्धकार ही शेष रह जायगा। हम जीना चाहते हैं−इसलिए कि जीवन तत्व से पृथक रहने पर तो केवल अन्धकार ही शेष रह जाएगा। जीवन रहित स्थिति की कल्पना भी अत्यन्त कष्ट साध्य है। इसलिए मरणोत्तर जीवन की मान्यता को त्याग नहीं जा सकता। हिन्दुओं का पुनर्जन्म, मुसलमानों का प्रलय जागरण− नास्तिकों का जीवाणु नवीनीकरण आदि परस्पर विरोधी मान्यताओं के बीच यह एकरूपता विद्यमान है कि हमारा आत्यन्तिक विनाश नहीं हो सकता,जीवन किसी न किसी रूप में हमारे साथ जुड़ा ही रहेगा। हमें जीवन रहित स्थिति में कभी भी किसी भी स्थिति में करना पड़ेगा।
जार्ज बर्नार्डशा ने जीवन का विश्लेषण करते हुए लिखा है− ‘जिसे एक निश्चित समय के लिए, निश्चित जिम्मेदारी के साथ हमारे हाथों में सौंपा गया है। अगली पीढ़ी के हाथों में इसे सौंपने से पहले मैं चाहता हूँ कि यह पूरे आलोक के साथ जले और उनका मार्ग दर्शन करे जिन्हें प्रकाश के अभाव में निराशा भरा जीवन जीना पड़ रहा है।’
मनुष्य अन्यों के प्रति संवेदना शून्य होता चला जा रहा है।
लिप्सा एवं अहंता की पूर्ति उसे स्नेह−सहयोग का रसास्वादन करने की तुलना में अधिक मधुर लगने लगी है। दार्शनिक हेमिनावे की दृष्टि में यह मनुष्यता की पराजय है जो विनाश से कम दुर्भाग्य पूर्ण नहीं। वे कहते हैं अगले दिनों मनुष्य विनाश से बचा भी रहा, किन्तु पराजय के बन्धनों में बँध गया तो उसकी जीतित स्थिति में भी मृत्यु की ही सड़न भर जाएगी। सड़े और मरे हुए आदमी यदि साँस लेने और चलते फिरते जीवधारियों की स्थिति में अपना अस्तित्व बनाये भी रहे तो भी इस धरती पर मानवी सौंदर्य का तो अभाव हो ही जाएगा। संवेदना की व्यापकता के बिना बाहर से सम्पन्न और कुरुर ही बना रहेगा।
जर्मन दार्शनिक हारमन हेजी ने अपने उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ का समापन करते हुए लिखा है कि जड़ और चेतन में कोई अन्तर नहीं। विकास क्रम से आगे बढ़ता हुआ पत्थर चेतन बनता है। चट्टान से धूलि− धूलि से कीड़ा और कीड़े से पशु−पशु से मानव − मानव से सन्त और देवता बनकर क्रमशः प्रगति की सीड़ियाँ पार करना जाता है। पत्थर बुद्ध बनता है −बन सकता है − प्रश्न केवल समय की दूरी का है। प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए ही हम सब यहाँ तक आये हैं। जो पिछड़े हैं उन्हें हम तक पहुँचना है और हम जहाँ हैं वहाँ से उस स्थान तक बढ़ेंगे जहाँ तक कि संसार की श्रेष्ठतम चेतना का विकास हुआ है। जीवन की सफलता इसी मार्ग पर चलते हुए सम्भव होगी।
जीवन का अशुभ पक्ष जो इन दिनों हमारे सामने है वस्तुतः बहुत ही कुत्सित,निराशाजनक और विक्षोभ कारी है। तत्वदर्शी टालस्टाय ने जन समाज के साथ ही अपनी भी विडंबना भरी −दुरंगी मन स्थिति और क्रिया पद्धति को विश्लेषण भरी −दुरंगी मन स्थिति और क्रिया पद्धति का विशेषण किया तो वे तिलमिला उठ। एक बार तो वे इस जीवन छद्म से इतने रुष्ट हुए कि अपने आप को गोली मारने पर तक उतारू हो गये।
लियो टालस्टाय साँसारिक दृष्टि से सुसम्पन्न व्यक्ति थे। स्टीफेन ज्विग ने लिखा है वे अपने साथियों से सवरे अधिक स्वस्थ थे। उनकी प्रतिभा और बौद्धिकता आज स्विनी थी। कला में अनोखी ताजगी। बड़ी जमींदारी के स्वामी होने से आर्थिक सुविधा की −कुलीन प्रतिष्ठा की− विश्व विख्याती लेखक होने से प्राप्त ख्याति की −पत्नी और परिवार की,उन्हें सब प्रकार सुविधा थी साँसारिक दृष्टि से कोई ऐसा कारण न था जिसके आधार पर उन्हें दुखी या अभाव ग्रस्त ठहराया जा सकें।
फिर भी जब उन्होंने जीवन के अन्तरण में धूसी हुई कुत्साओं और कुण्ठाओं का सूक्ष्म पर्यवेक्षण किया, तो लगा कि बाहर की चमक−दमक होते हुए भी अन्तर में घोर अन्धकार छाया हुआ। कुरूपता और दरिद्रता का कुहराम मचा रहा हैं। वे इस स्थिति में इतने खिन्न हुए मानो कोई भयंकर दुर्घटना का शिकार उन्हें होना पड़ा हो। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है−चिन्तन की गहराई में उतर कर आत्म−निरीक्षण करने पर लगता है −जीवन की धारा रुक गई और अशुभ में अंग−अंग को जकड़ लिया। किसी काम में मन लगता,सब कुछ उजड़ा और नीरस दिखाई पड़ता है।
उन दिनों वे बहुत निराश और उद्विग्न दिखाई पढ़ते थे। जीवन जिसे हम प्यार करते है और जीना चाहते हैं क्या यही है,क्या हम वस्तुतः मलीन हैं और मलीनता में ही मरना खपना चाहते है, यदि ऐसा ही है तो फिर सौंदर्य,कला एवं आदर्श की बात क्यों की जाय? भीतर और बाहर एक ही क्यों न रहा जाय
टालस्टाय ने जीवन के अंधेरे पक्ष को जितना अधिक देखने का प्रयत्न किया उतने ही वे अधिक निराश होते गये। एक समय में उनकी आत्म−ग्लानि चोटी तक जा पहुंची थी और लगता था कि वे कहीं आत्महत्या न कर बैठे। उनने अपनी शिकारी बन्दूक इसलिए ताले में बन्द करके चाबी कहीं अन्यत्र पहुँचा दी थी कि कहीं वे उसकी नली अपनी ही कनपटी पर रखकर घोड़ा न दबा दें।
जीवन का विचित्र विश्लेषण करते हुए उनने उन दिनों लिखा था −ये अनुभव कहते हैं कि अनेक और अन्य किसी के जीवन में कोई रस नहीं है। जीवन सिवाय पीड़ा मौत तथा निरन्तर क्षय के और कुछ नहीं हैं। ऐसे जीवन का कोई अर्थ है? मैं खोज रहा हूँ कि क्या जीवन में कोई रस और तथ्य हैं? यदि वह न मिला तो इस विडम्बना पूर्ण जिन्दगी का अन्त कर डालने का मैंने निश्चय कर लिया हैं। निराशा से छूटने के लिए जरूर किसी दिन अपने को गोली मार लूँगा
टालस्टाय अपने आप से बार−बार पूछते थे −मैं क्या जी रहा हूँ −मेरे अस्तित्व का क्या प्रयोजन हो सकता है− मुझे कैसे जीना चाहिए −क्या मौत का चारा बनने से बचा नहीं जा सकता। इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए उन्होंने शोपनहार − प्लेटो कान्ट −पास्कल और प्रख्यात दार्शनिकों को अत्यन्त गहराई के साथ पढ़ा और यह समझने क प्रयत्न किया कि वस्तुतः जीवन हैं क्या? अन्तर अन्तरंग और बहिरंग में इतना ज्यादा अन्तर किस कारण उत्पन्न हो गया।
दार्शनिकों से समाधान न पाकर टालस्टाय धर्म की ओर मुड़े। श्रद्धा की खोज में अन्त करण को टटोलते हुए वे एक दिन रो पड़े और सहसा चखते हुए बोले −प्रभु मुझे धर्म के अचल में ढक लो −मुझे शान्ति दो −भक्ति से मुझे सरस कर दो ताकि जीवन को समझ सकूँ और उसके रस का आस्वादन कर सकूँ।
धर्म की गहराई में वे उतरे तो पाया कि वह अलग है जो ईसा में कहा था और वह अलग है जो पादरियों द्वारा अपने शिष्य भक्तों को कहा समझाया जा रहा है।
टालस्टाय जीवन की,जीवनोद्देश्य की खोज गहराई तक करते रहे। इसके लिए उन्होंने बहुत समय तक अपने परम प्रिय साथी−यश और धन प्रदान करने वाले लेखन कार्य का भी बन्द रखा। जब जीवन का कोई उद्देश्य न दो, रोटी खाना इंद्रिय भोगों में निरत रहना और अपने सहित सबको झुठलाना,सताना ही यदि जिन्दी है तो उसे जीने से क्या? जब मनुष्य की भावना और विवेकशीलता ऊँची हो सकती हैं तो उसकी क्रिया में वैसा विवेकशीलता ऊँची हो सकती है तो उसकी क्रिया में वैसा ही दर्शन क्यों न होना चाहिए? यदि वैसा सम्भव न हो फिर जीने का आनन्द ही क्या रहा और उससे लाभ ही क्या मिला।
अपने युग के तत्वदर्शी ऋषि टालस्टाय लम्बे विचार मन्थन के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि वर्तमान युग का अवाँछनीय वातावरण मनुष्य को दुष्टवृत्तियों के लिए आकर्षित और प्रेरित करता है इसी से जीवन मलीन बन जाता है। मूलतः वह मलीन है नहीं। जीवन को जीवन की तरह जीने का अवसर मिल इसके लिए जन मानस में धर्म निष्ठा को समुचित स्थान मिल सके ऐसा सामाजिक वातावरण बनाया जाना चाहिए।
जीवन वस्तुतः छद्म है नहीं। मनुष्य ने अपने आपको भुलाकर − बहक कर उसे गर्हित बना लिया है। यदि वह अपनी भूल को समझने और सुधारने के लिए तत्पर हो सके तो वस्तुतः वह महान ही बनकर रहेगा जैसा कि वह मूलतः है भी।
जापान के महाकवि नागूची की एक कविता है जिसमें वे कहते हैं। सूर्य का तेज,चन्द्रमा का सौंदर्य तारों की छवि, वायु का वेग बनाया गया था पर जब उसने अपने को मिट्टी का ढेला भर माना तो आसमान की आँखों से आँसू छलके और वेदना बिजली बनकर तड़पी, देवताओं के चेहरे उदास हो गये और सृजेता की वेदना बह निकली −हाय,मनुष्य ने अपना स्वरूप क्यों भुला दिया।
सुकरात का यह अन्तिम कथन प्रसिद्ध है कि−मैं एथेन्सवासी या यूनानी नहीं, वरन् विश्व नागरिक हूँ।
,लोभ −मोह की संकीर्णता से ऊपर उठकर जब दूरदर्शी विवेक को अपनाया जाता है तो यह सोचना पड़ता है कि हम थोड़े लोगों के लिए प्रयोजनों के लिए नहीं जन्मे हैं। हमें विश्व परिवार को पीड़ा और पतन के वर्तमान दुर्दशा से उबार कर विश्व नागरिक बनकर जीना है और उसी के लिए मरना खपना है।
मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं,पश्चात वह अपने आपको जाने और जीवन की गरिमा को समझते हुए उसके सदुपयोग का प्रयत्न करे।
महर्षि व्यास ने मनुष्य तत्व का रहस्योद्घाटन करके हुए एक मर्म वचन कहा है। वे लिखते हैं −’गुह्म ब्रहतदिदं ब्रवीमि’। नहि मानुषात। अर्थात् एक भेद भरी बात बताता हूँ। इस संसार में मनुष्य से बढ़कर श्रेष्ठ और कहीं कुछ नहीं हैं।
यदि जीवन का मूल्यांकन किया जा सके और प्रलोभनों से मुक्त होकर दिव्य जीवन जीने के लिए कटिव हुआ आनन्द हमारी अपनी मुठ्ठी में ही कैद है।
राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित एक विचार गोष्ठी में संसार के 25 प्रमुख विचारकों और विशेषज्ञों ने वेनिस में एकत्रित होकर सन् 2000 तक घटित हो सकने वाली महत्वपूर्ण संभावनाओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार विमर्श किया। जिसका विवरण ‘स्प्रिंग वर्लेग‘ पत्रिका में और यूनेस्को बुलेटिन से प्रकाशित हुआ हैं। कहा गया है कि —
(1) अगले बीस वर्षों में अमीर देशों की सम्पन्नता और गरीब देशों की दरिद्रता इस अवधि में द्रुतगति से बढ़ेगी। फलस्वरूप दोनों के बीच खाई बढ़ती चली जायगी और गरीब देश सम्पन्न राष्ट्रों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ करेंगे।
(2) जनसंख्या की विभीषिका को सर्वत्र समझा जायगा और मानवी बुद्धि अपनी दूरदर्शिता का परिचय देकर अन्धाधुन्ध प्रजनन को स्वयं रोक देगी। बच्चे बढ़ने के दुष्परिणाम हर मनुष्य अपनी व्यक्ति गत असुविधा बढ़ने के रूप में भी अनुभव करेगा और सार्वजनिक अहित भी उसके सामने होगा।
(3) पानी की कमी बढ़ती जायगी उसका समाधान समुद्र जल का मीठा बनाना ही रह जायगा। इसलिए विज्ञान का अगले दिनों यही प्रमुख लक्ष्य होगा।
(4) ऊर्जा को अधिक मात्रा में संग्रह करके रख सकने की तरीका ढूंढ़ लिया जाएगा ताकि बिजली भंडारों से सुविधानुसार शक्ति को खर्च किया जाता रहे।
(5) विश्व सरकार बनाने और विश्व नागरिकता की भावना विकसित करने के लिए अधिक प्रयत्न होंगे।
(6) शिक्षा −प्रणाली में असाधारण परिवर्तन होंगे।
(7) स्वसंचालित यन्त्रों वाले देशों में श्रमिकों को सप्ताह में 25 घण्टे ही काम दिया जा सकेगा।
(8) वायु प्रदूषण,जल प्रदूषण एवं अस्त्र प्रतिद्वन्दता पर नियन्त्रण करने के सार्वभौम प्रयत्नों का प्रचलन।
विशेषज्ञों की राय यह है कि यह संभावनाएँ स्पष्ट हैं। वर्तमान परिस्थितियाँ का तकाजा यह कदम उठाने के लिए मनुष्य को विवश कर देगा और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसे यह कदम उठाने ही पड़ेंगे।
वर्तमान परिस्थितियों के फलितार्थों की दृष्टि से उपरोक्त संभावनाएं कल्पना की उड़ान नहीं वरन् यथार्थ रोक्त सम्भावनाएँ कल्पना की उड़ान नहीं वरन् यथार्थ सम्भावनाएँ ही समझ में आती है महाविनाश का विकल्प यही हो सकता है कि समय रहते समस्याओं के समाधान ढूँढ़ निकाले जाँय। बढ़ती हुई आबादी एवं बढ़ती हुई वैज्ञानिक प्रगति ने असंख्य समस्याओं को जन्म दिया है। उनके कारण एक ओर संसार को अधिक वैभववान बनने का अवसर है वहाँ यह भी संकट है कि यदि उन्हें सुनियोजित न किया गया तो यही बढ़ोत्तरी महाविनाश का कारण बनेगी। उपभोग्य सामग्री के अभाव में बढ़ी हुई जनसंख्या बेमौत मरेगी। दूसरी ओर विज्ञान के विनाश के साधन में प्रयोग कर,कोई भी सिर फिरा आदमी उनका दुरुपयोग करके मानवी अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त कर सकता है।
बड़े कारण दो हैं। पर इनके कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएँ अगणित है। जिनने समस्त मानव जाति को उद्विग्न संत्रस्त कर रखा है। इन दोनों का कारण है मानवी दुर्बुद्धि− अदूरदर्शिता। दाम्पत्य जीवन का उच्च स्तरीय आनन्द लेते हुए ही जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सकता है और वैज्ञानिक प्रगति से −संसार से दरिद्रता, अशिक्षा एवं पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है। यदि मानवी दुर्बुद्धि रोका जा सके और उसका स्थान सद्भावना को−विवेकशीलता को −मिल सके तो उलझी हुई गुत्थियाँ सुलझ सकती है विवेकशीलता को मिल सके तो उलझी हुई गुत्थियाँ सुलझ सकती है और वे सारा चिन्ताएँ दूर हो सकती हैं जिनके कारण राष्ट्रसंघ के सदस्य चिन्तातुर है और तरह तरह के उपाय सोच रहे हैं।
मोड़ने के रेडियो लॉजिकल स्कूल के तीन शोधकर्ता निष्कर्ष निकालने में सफल हुए कि व्यक्तित्व के विकास −अंगों का सामर्थ्य तथा चिकित्सा उपचार में मानवी चेतना में विद्यमान विद्युत शक्ति का गहरा योगदान रहता है प्रगति अथवा अवगति के विविध घटना क्रमों में इस मानवी विद्युत शक्ति की घट−बढ़ को ही प्रधान भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है। क्षत विक्षत अवयवों की पूर्ति में जो आन्तरिक शक्ति काम करती है उसे नियोप्लासिया विद्युत व्यवस्था के रूप में जाना जा सकता है।
निद्रा के सम्बन्ध में बहुत पहले इतना ही जाना गया था कि मात्र थकान मिटाने की सामान्य नित्य प्रक्रिया है। अब पता चला है कि मस्तिष्क का सचेतन भाग अचेतन स्थिति में इसलिए चला जाता है कि अचेतन मस्तिष्क को अन्तरिक्ष में प्रवाहित विद्युत धाराओं में से अपने उपयोग का अंश संग्रह सम्पादित करने का अवसर मिल जाय। ‘एरियल’ रेडियो तरंगों को पकड़ता है। निद्रावस्था में हमारा अचेतन मस्तिष्क उसी स्थिति का बन जाता है और आकाश से इतनी विद्युतीय खुराक प्राप्त कर लेता है जिसमें शारीरिक और मानसिक क्रिया−कलापों का सञ्चालन ठीक प्रकार सम्भव हो सके। निद्रा की पूर्ति न होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो गड़बड़ी उत्पन्न होती है उसे अभीष्ट मात्रा में विद्युतीय खुराक न मिलने की ‘विभुक्षा’ कहा जा सकता है।
हिन्दू धर्म के आचार सूत्रों में सिर उत्तर की ओर करके सोने का निर्देश है। हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रन्थ क्षुलचन आरुख में भी ऐसा ही उल्लेख है। जापानी तत्वदर्शी एवं डुचटिल भी यही बात करते रहे। ऐलोपैथी के जन्मदाता हिप्पोक्रेट्स ने भी ऐसा ही प्रतिपादन किया है। यह दिशा और निद्रा का सम्बन्ध स्थापन सम्भवतः इसी आधार पर है कि पृथ्वी का चुम्बकीय प्रवाह जिधर प्रवाहित होता है उसके साथ हम टकराव उत्पन्न न करे और उस लाभ से सञ्चित न रहे जो अनुकूलता की स्थिति में रहने सहज ही उपलब्ध होता रहता है।
जिस प्रकार शरीर में रक्त शुद्धि, पाचक ऊष्मा, स्नायु परिपुष्टता आदि से सुदृढ़ता एवं निरोगता अक्षुण्ण रहती है, ठीक उसी प्रकार मानवी विद्युत शक्ति की प्रचुरता से मानसिक सन्तुलन स्थिर रहता है। विवेक तथ्य चिन्तन, कला−कौशल शौर्य, साहस जैसे सद्गुणों का बाहुल्य रहता है। ओजस्विता एवं मनस्विता उसी का नाम है। दूसरे शब्दों में इसे प्रचण्ड संकल्प शक्ति भी कह सकते हैं उसी से आन्तरिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है और उसी के आधार पर उस पुरुषार्थ की उपलब्धि होती है जो कठिन परिस्थितियों को चीरते हुए सुदूर लक्ष्य तक ले पहुँचने में समर्थ होता है। योग और तप की साधना इसी मानवी विद्युत शक्ति को बढ़ाने के लिए की जाती है।
भौतिक लौह−चुम्बक से ही लोग परिचित होते हैं यह तथ्य कम ही लोगों को मालूम है कि उससे भी कहीं अधिक ऊँचे स्तर का एक और जैव चुम्बक होता है जिसे वैज्ञानिकों की भाषा में एनिमल मैगनेट कहते हैं।
भूतकाल में भी इस शक्ति का लोगों को पता था। उसका उपयोग शारीरिक और मानसिक रोगों की निवृत्ति के लिए किया जाता रहा है। सिर पर हाथ फेरना कंधे सहलाना, पीठ थपथपाना प्रकारान्तर इसी जैव चुम्बक का दुर्बलों एवं रोगियों को समर्थ व्यक्तियों द्वारा लाभ पहुँचाने का एक विधान है। गुरु−शिष्यों को, अभिभावक—बच्चों को स्नेह सिक्त आशीर्वाद देते समय प्रायः ऐसी ही अभिव्यक्तियाँ करते हैं। स्नेहीजनों के प्रति, परिपक्व व्यक्तित्व के प्रति वात्सल्य पूर्वक न केवल मुख से, मन से शुभ कामनाएँ व्यक्त करते हैं वरन् अपने हाथ से स्पर्श भी करते हैं, इससे शक्ति शाली पक्ष की विद्युत धारा हल्के पड़ने वाले छोटों के शरीर एवं मनःक्षेत्र में प्रवेश करके उन्हें शक्ति प्रदान करती है। हाथ न फेरने पर भी पैर छूकर यह अनुदान छोटे लोग बड़ों से अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। भारत में गुरुजनों के चरण स्पर्श करके प्रणाम करने की प्रथा में यह महत्वपूर्ण तथ्य सन्निहित है।
यूनानी चिकित्सा के परिष्कर्त्ता पैपिरस ने सिर पर हाथ फिरा कर रोग चिकित्सा करने की पद्धति को शास्त्रीय रूप दिया है। बादशाह पाइरस और वैस पैसियन को कठिन रोगों से मुक्ति ऐसे ही प्रयोगों से मिली थी। फ्राँस के सम्राटों में फ्राँसिस प्रथम से लेकर चार्ल्स दशम तक की चिकित्सा में जैव चुम्बक का प्रयोग−शक्ति शाली प्रयोक्ताओं द्वारा होता रहा है। इन प्रयोगों में हाथ का उपयोग अनिवार्य नहीं। विशिष्ट दृष्टिपात से भी यह सब हो सकता है।
सन् 1600 में स्काचमेन मैक्सवेल ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि ब्रह्माण्ड व्यापी एक जीवनी शक्ति का अस्तित्व मौजूद है। प्रयत्न करके उसकी न्यूनाधिक मात्रा अपने में भी भरी जा सकती है और उसे स्व−पर उत्कर्ष में मन चाहे ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। यह दुधारी तलवार, भले ही नहीं, बुरे उद्देश्य के लिए भी काम में लाई जा सकती है। मैक्सवेल से पहले, विद्वान गोक्लेनियस अनेक तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध करता रहा था कि मनुष्य की अन्त शक्ति का प्रमुख आधार उसकी वह जीवन्त शक्ति है जिसे चुम्बकत्व के स्तर की समझा जा सकता है। वान हेलमान्ट ने मानवी चुम्बक शक्ति का शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगियों पर सफल प्रयोग करने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी उसे पीड़ितों का मसीहा यह सिद्ध पुरुष कहा जाने लगा था।
इटली का विज्ञानी सेटानेली अठारहवीं सदी के प्रारंभ में दृढ़ता पूर्वक मानवी कलेवर में भरे हुए विद्युतीय विकिरण का अस्तित्व सिद्ध कर चुका था। मैस्मरेज्म के आविष्कर्ता डाक्टर मेस्मर ने अपने जीवनकाल सन् 1734 से 1815 तक इसी दिशा में शोधें की और उस विद्या को क्रमबद्ध विज्ञान का रूप दिया। इससे पूर्व जो प्रतिपादन एवं प्रयोग हो चुके थे उन्हें जानने के बाद ही डाक्टर मैस्मर ने इस दिशा में कुछ अधिक कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त की थी। आगे चलकर उसके शिष्य काँस्टेट युसिगर ने इस विज्ञान में सम्मोहन विद्या की एक नई कड़ी जोड़ी और कृत्रिम निद्रा लाने एवं उस स्थिति में विशिष्ट मन स्थिति उत्पन्न करने की चमत्कारी विधि खोज निकाली। उसे हिप्नोटिज्म नाम दिया गया।
फ्राँस के मनीषीं ‘ला फान्टेन’ और डा. ब्रेड़ ने हिप्नोटिज्म को और भी परिष्कृत रूप दिया। सारे योरोप में उसकी चर्चा हुई। रोगियों को कृत्रिम निद्रा में पहुँचा कर ऐसे कितने ही आपरेशन किये गये जिनमें रोगियों को किसी प्रकार की कष्ट अनुभूति नहीं हुई। अमेरिका में न्यू आरलीन् तो इन प्रयोगों का केन्द्र ही बन गया। मानवीय विद्युत की सिद्धि और उसके उपयोग की विधि को ‘इलेक्ट्रो वायोलाजिकल्स’ नाम दिया गया। सन् 1850 में अमेरिकी डा. ‘डार्लिंग‘ और फ्राँसीसी डा. ‘द्रुरान्ड डे ग्रास’ ने जैव चुम्बकत्व के सफल प्रयोगों से आपने संसार भर के विज्ञान वेत्ताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। ली वाल्ट ने जीव विद्युत के आधार पर चिकित्सा करने की प्रामाणिक विध बताने वाली अपनी पुस्तक 1866 में प्रकाशित की। उसके प्रयोगों का परीक्षण करने जिन तीन बड़े शोध संस्थानों ने भाग लिया। उनके नाम हैं (1) दि स्कूल आफ चारकोट (2) दि स्कूल आफ नेन्सी (3) दि स्कूल आफ मेस्मेरिस्ट। इन संस्थानों के प्रयोगों ने तथ्य की प्रामाणिकता में चार चाँद लगा दिये।
क्या लौह चुम्बक का भी मनुष्य शरीर पर कुछ प्रभाव हो सकता है इस संदर्भ में आँशिक सफलता ही मिली। मनुष्य चुम्बकत्व की अपनी अलग ही जाति और किस्म है। वह सजातीय स्तर पर ही अधिक प्रभावित होता है और उपयुक्त प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यो कुछ तो प्रभाव लौह−चुम्बक का भी पड़ता है।
मैस्मरेज्म और हिप्नोटिज्म यों पर्यायवाची शब्द मान जाते हैं पर वस्तुतः उनमें भारी अन्तर है। हिप्नोटिज्म किसी को सम्मोहन निद्रा में ले जाने और उससे अंतर्मन की संवेदनाएँ उगलवाने अथवा दिये हुए निर्देशों के अनुरूप अनुभव करने के लिए किया जाता है। यह अनुभव वास्तविक भी हो सकते हैं और अवास्तविक भी। जैसे संमोहन ग्रस्त व्यक्ति को लकड़ी दिखाकर उसे भयंकर सर्प जैसा अनुभव कराया जा सकता है। साधारण मिट्टी खाकर वह चीनी जैसा मिठास अनुभव कर सकता है।
मैस्मरेज्म मानवी विद्युत शक्ति का रोग निवारण तथा दूसरे प्रयोजनों के लिए उपयोग करने कि विधि का नाम है। इसे वियना (आस्ट्रिया) के डा. मेस्मर फ्रेडरिक ने आविष्कृत किया था। उनका प्रतिपादन है कि मनुष्य के शरीर में चुम्बकत्व भरा पड़ा है। जो आंखों से एवं उँगलियों के पोरुओं से बाहर निकलता रहता है। इस प्रवाह से अपने निज के लिए तथा दूसरों के लिए उपयोगी लाभ उठाया जा सकता है। मोडात्र्यूज् तथा काउण्ट पुलीगर ने इस संदर्भ में गहरी खोजें कीं और सिद्ध किया कि यह सामान्य समझी जाने वाली उपेक्षित मानवी विद्युत शक्ति बड़े काम की है आर इसके प्रयोग स महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। जर्मन विद्युत विज्ञानी रींकन वेक ने इसे एक विशेष अग्नि के रूप में सिद्ध किया और उसे “औरा” नाम दिया। मुख मण्डल के इर्द गिर्द तथा प्रजनन अंग में उसकी विशेष उपस्थिति सिद्ध की। नाड़ी संस्थान एवं स्नायु मण्डल को उसका उत्पादन कर्त्ता माना। अगले शोध कर्त्ताओं ने इसकी उत्पत्ति का केन्द्र मस्तिष्क क्षेत्र में बताया।
सम्मोहन विद्या किसी जमाने में जादू मन्त्र में गिनी जाती थी। हिप्नोटिज्म यों मैस्मरेजम से भिन्न प्रकार का विज्ञान है तो भी मिलती जुलती प्रक्रिया के कारण दोनों को एक ही स्तर पर गिना जाने लगा है।
हाँगकाँग में अमेरिकी चिकित्सक आर्नोल्ड फर्स्ट ने अपने एक प्रदर्शन में कई रोगियों को सम्मोहन विधि के अनुसार इतनी गहरी निद्रा में पहुंचाया कि छोटे आपरेशन बिना कष्ट की अनुभूति के सरलता पूर्वक किये जा सके। वह विधि सिखाई जिसके सहारे वे जबड़े को औषधि से सुन्न किये बिना ही बिना कष्ट के दाँत उखाड़ सकें।
जोहान्सवर्ग—दक्षिण अफ्रीका के टारा अस्पताल में डा. बर्नार्ड लेविन्सन के कितने ही रोगियों को हिप्नोटिज्म द्वारा निद्रित करके बड़े आपरेशन किये। रोगी क्लोरोफार्म सुँघाने की तरह ही बेहोश पड़े रहे और बिना हिले जुले आपरेशन कराते रहे। इस बेहोशी के बीच भी एक विलक्षण बात यह देखी गई कि रोगी डाक्टरों के वार्तालाप को सुनता रहा और होश में आने पर उनने वे बातें दुहरा दीं। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि सम्मोहन निद्रा से मस्तिष्क के कुछ भाग ही निद्रा ग्रस्त होते हैं और शेष भाग अपना काम करते रहते हैं।
अठारहवीं सदी के अँग्रेज शरीर विज्ञानी जम्स ब्राइड ने सम्मोहन स्थिति को ‘नर्वस स्लीप’ माना है और कहा है नाड़ी संस्थान में उथल−पुथल करने के लिए इस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
रहस्यमय व्यक्ति को सम्मोहित करके उसके पेट के सारे भेद उगलवाये जा सकते थे। इन प्रयोगों से द्वितीय महायुद्ध के समय ‘हिप्नोटाईज्ड इण्टेलीजेन्स’ को एक विशेष युद्ध कौशल की तरह प्रयोग किया जाने लगा। दूसरे पक्ष पर इसका प्रयोग करने किन्तु अपनों को बचाने के सम्बन्ध में उन दिनों बहुत−बहुत चेष्टाएं की गई।
भौतिक बिजली द्वारा तरह−तरह के उपयोगी यंत्र चलाने की विधि से परिचित होकर हमने बहुत लाभ उठाया है। मनुष्य शरीर की बिजली की क्षमता से भी यदि हम परिचित हो सके और उसका उपयोग जान सके तो इससे व्यक्तित्वों के विकास में असाधारण योगदान मिल सकता है। इतना ही नहीं उसके द्वारा बढ़ी हुई शक्ति वाले लोग कम शक्ति वालों की विविध विधि सहायताएँ भी कर सकते हैं।
जो बदला लेने की बात सोचता है, वह अपने ही घाव को हरा रखता है जो कि अब तक कभी का अच्छा हो गया होता।
—बेकन
सेठ जी पर लक्ष्मी की कृपा थी। उनका व्यापार, व्यवसाय अच्छी उन्नति कर गया था लाखों, करोड़ों का कारोबार होता था, तिजोरियाँ सोने−चाँदी से सदा भरी रहतीं। ईश्वर की कृपा से उन्हें चार सुन्दर पुत्र प्राप्त हुए थे। चारों ही एक से एक बढ़कर चतुर थे। घर सब प्रकार के आनन्दों से परिपूर्ण था।
बेटे बड़े हुए और उनके धूम−धाम के साथ विवाह किये गये। बहुएँ अपने साथ खूब दान−दहेज लाई। सेठजी और सेठानी प्रसन्नता से फूले न समाते थे।
समय का चक्र बड़ा प्रबल है। आज जहाँ आनन्द है, कल वहाँ दुख हो सकता है, आज जहाँ बाग है, कल वहाँ मरघट हो सकता है। सेठ जी के आनन्द से भरे हुए घर में भी विनाश की छाया झाँकने लगी। बहुओं में मनमुटाव बढ़ने लगा। स्त्रियों के मनमुटाव की छूत पुरुषों में पहुंची और वे भी एक दूसरे से असन्तुष्ट रहने लगे। भीतर ही भीतर सब में रोष था, कभी−कभी वह लड़ाई के रूप में बाहर भी प्रकट होने लगा।
एक दिन सेठ जी ने स्वप्न देखा कि दिव्य रूप धारण किये हुए तेज मूर्ति लक्ष्मी जी उनके घर को छोड़कर अन्यत्र जाने की तैयारी कर रही हैं और मन्द स्वर से कह रही है—”पुत्र, मैं तेरे यहाँ बहुत दिन रही पर अब यहाँ नहीं रहूँगी।” सेठजी लक्ष्मी के अनन्य सेवक थे। जीवन भर उन्होंने उसी की उपासना की थी, जब उन्होंने यह देखा कि मेरी सम्पदा जा रही है, वेदना से तड़फड़ा कह वे लक्ष्मी के चरणों में लोट गये और फूट−फूटकर रोने लगे। लक्ष्मी को उन पर दया आ गई। उनने कहा—’पुत्र मेरा जाना तो निश्चय है, पर तेरी भक्ति को देखकर एक वरदान तुझे दे सकती हूँ। मुझे छोड़कर अन्य जो वस्तु चाहे सो तू माँग ले।
स्वप्न में ही सेठ जी ने कहा—माता इस समय मेरा चित्त स्थिर नहीं है। मैं शोक से व्याकुल हो रहा हूँ, इस लिए क्या माँगू क्या न माँगू इसका ठीक निर्णय नहीं कर सकता। आप कल तक का अवसर मुझे दें। कल मैं माँग लूँगा। लक्ष्मी जी दूसरे दिन फिर स्वप्न में दर्शन देने का वचन देकर अन्तर्धान हो गई। सेठजी का स्वप्न टूटा तो उनका कलेजा धकधका रहा था।
प्रातः काल सेठ जी ने अपने सब पुत्रों और पुत्रवधुओं को बुलाया और रात के स्वप्न का सारा हाल कह दिया। उस जमाने में लोगों के मन अधिक गन्दे न होते थे, इसलिये उन्हें जो दिव्य स्वप्न दिखाई देते थे वे प्राय सत्य ही होते थे। सबको विश्वास हो गया कि स्वप्न सत्य ही है। अब सब विचार करने लगे कि लक्ष्मी जी से क्या माँगना चाहिए। लड़कों में से किसी ने कोठी, किसी ने मोटर, की ने कुछ किसी ने कुछ माँगा। इसी प्रकार बेटों की बहुएँ भी सन्तान, आभूषण, महल आदि माँगने लगीं। किन्तु छोटे बेटे की बहू ने नम्रता पूर्वक कहा—पिताजी मेरी सलाह तो यह है कि आप ऐक्य’ का वरदान माँगें। हम लोग चाहे जिस परिस्थिति में रहें पर सब में प्रेम बना रहे और सब मिल−जुलकर रहें।
छोटी बहू की बात सेठ जी को पसन्द आ गई। रात को उन्होंने लक्ष्मी जी से यही वरदान माँगा कि—माता! हम लोग चाहे जैसे दुख−सुख में रहें, परन्तु सब में प्रेम−भाव बना रहे सब मिल−जुलकर रहें। लक्ष्मी इस याचना को सुकर अवाक् रह गई। उनने कहा—यही तो मेरे जाने का कारण था। कलह और द्वेष के कारण ही तो मैं तुम लोगों के यहाँ से जा रही थी, पर जब तुम्हें यह वरदान दूँगी तो किस प्रकार जा सकूँगी? लक्ष्मी जी वचनबद्ध थीं, उन्हें यह वरदान देना पड़ा। परन्तु साथ ही अपने चले जाने का विचार भी छोड़ देना पड़ा। क्योंकि जिस परिवार में प्रेम और संगठन है, लक्ष्मी उसे छोड़कर जा ही नहीं सकती।
मनुष्य यो देखने में हाड़ माँस का पिण्ड दिखाई पड़ता है पर वस्तुतः वह चेतना का पुञ्ज है। इस चेतना में ही उसका व्यक्तित्व घुला रहता है। इसी को उसका अस्तित्व अथवा वास्तविक मूल्य कहा जा सकता है। चेतना ही जीवन है। प्राण के निकल जाने पर शरीर सड़ने लगता है और उसकी जल्दी ही अंत्येष्टि करनी पड़ती है।
इस चेतना के बारे में हमें अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और सीखना चाहिए कि किस प्रकार उस विकृति स्थिति से उबारा और परिष्कृत दिशा में अग्रसर किया जा सकता है।
मानवी चेतना को मनोविज्ञान वेत्ताओं ने तीन भागों में बाटा है (1) सचेतन कान्सस−(2) अर्द्धचेतन−सबकान्सस (3) अचेतन—अनकान्सस। सचेतन—वह जो हमारी विवेक बुद्धि के रूप में काम करता है अर्द्धचेतन वह जो रक्त संचार—श्वास−प्रश्वास—आकुञ्चन−प्रकुञ्चन आदि शरीर की सञ्चालन प्रक्रियाओं का नियन्त्रण करता है। अचेतन वह जिसकी गहन पर्तों में हमारे भूत कालीन संस्कार सुमुप्त अवस्था से जमे पड़े रहते हैं और अवसर पाकर सजग होते रहते हैं।
सचेतन का तीन भागों में विभक्त किया गया है (1) ज्ञान डडडड नालिज—(2) भावात्मक फीलिंग—(3) कार्या−डडडड विलिग।
विद्वान जुंग ने चेतन स्तर को पाँच भागों में बाँटा है (1) सम्वेदना (2) उनने उनमें से प्रत्येक के कई उपभेद भी गिनाय है।
किसी वस्तु की पहले हमें जानकारी प्राप्त होती है फिर उसके सम्बन्ध में प्रिय या अप्रिय इच्छा उत्पन्न होती है इसके उपरान्त उसे पाने, हटाने या उपेक्षा करने की क्रिया आरम्भ होती है। इस दृष्टि से प्राथमिकता ज्ञान की है। इच्छ और क्रिया का उदय इसके उपरान्त होता है।
विचार उठने से लेकर किसी निर्णय निष्कर्ष पर पहुँचने तक चेतना द्वारा उस पर कितने ही दृष्टिकोणों से विचार कर लिया जाता है। साधारणतया इन परखों के लिए जाँच पड़ताल के कुछ आधार मन क्षेत्र में प्रस्तुत रहते हैं इन आधारों को (1)समानता (2)विपरीतता (3) समीपता (4) बारम्बारता (5) नवीनता (6)प्रबलता (7) प्राथमिकता। इन्हीं आधारों पर हमारे तक—पक्ष−विपक्ष की सम्भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं। अपने या दूसरों के अनुभवों के सहारे—प्रमाण साक्षी ढूँढ़कर— संभावनाओं का कल्पना चित्र खड़ा करके हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जो इच्छा उठ रही है किस हद तक और किस प्रकार पूरा किया जा सकता है।
छोटे बच्चों में इच्छा एवं कल्पना की ही भर−मार रहती है। तर्क−वितर्क करके किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए गुण अवगुण समझाने वाले दृष्टिकोण का उनमें विकास नहीं होता अस्तु उनकी कल्पनाएँ मधुर या भयानक होते हुए भी वे कुछ निर्णय नहीं कर पाते। किसी दिशा में उनके अंग भी इच्छा पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियायें कर नहीं पाते। उनके अंग कोमल होते हैं डडड ठीक है पर उससे भी अधिक बड़ा अशक्तता का कारण निर्णायक शक्ति का अभाव ही होता है।
अन्य जीव−जन्तुओं के सचेतन मन की अपेक्षा अचेतन—अधिक समर्थ होता है। इसलिए उनके परम्परागत चिर−सञ्चित अनुभव जो अभ्यास या संस्कार के रूप में जमे होते हैं उपयोगी निर्णय सहज ही कर देते हैं। उन्हें कब क्या करना है इसका निष्कर्ष निकालने के लिए बहुत सोच−विचार नहीं करना पड़ता—का सहारा नहीं लेना पड़ता। उनकी सहज चेतना ही आवश्यक मार्ग दर्शन कर देती है। किन्तु मनुष्य के बारे में यह बात नहीं है। उसका सचेतन प्रबल होता है और अचेतन की हर बात को सहज ही स्वीकार नहीं करता। उनके लिए परिस्थितियों और सम्भावनाओं के भले−बुरे पक्षों को समझकर अन्तिम फैसला करना चाहता है। इसलिए निर्णायक मार्ग दर्शन अचेतन के हाथ से निकल कर सचेतन के कन्धों पर चला जाता है। इसी विशेषता के कारण उसे मननशील मनुष्य—कहा जाता है। मनुष्य के सर्वांगीण उत्कर्ष ने उसे अनेक परिस्थितियों और समस्याओं से निपटने के लिए बाध्य किया है इसलिए उसकी चेतना का भी बहुमुखी विकास हुआ है। अन्य जीवों के सामने वैसा कुछ उन्हें मात्र शरीर यात्रा के सम्बन्ध में ही सोचना पड़ता है आहार, विश्राम, सुरक्षा एवं प्रजनन की समस्याओं को सुलझाने के अतिरिक्त उन्हें अधिक कुछ नहीं सोचना पड़ता। उनका समाज बहुत छोटा और निर्माण या संचय उन्हें नहीं करना पड़ता। अस्तु मस्तिष्क को अधिक कुछ सोचने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। आवश्यकता को आविष्कारों की जननी कहा गया है। चेतनात्मक विकास से मनुष्य को लाभान्वित कराने का श्रेय उसकी परिस्थितियों एवं समस्याओं को ही है जिन्हें उसने अपने क्रमिक विकास के साथ−साथ अनवरत रूप से आगे बढ़ाया है।
मनोविज्ञानी ड्रमंड एवं मैलोने यह मानते हैं कि चिंतन की प्रखरता जो सामान्यतया सचेतन मन की दक्षता प्रतीत होती है वस्तुतः अचेतन द्वारा प्रदत्त की हुई होती है। अचेतन एवं तिजोरी है जिसमें उपयोगी और अनुपयोगी सभी प्रकार के रस विष भरे होते हैं उनमें से जिन्हें आगे कर लिया गया होगा वे ही सचेतन पर अधिकार जमा लेगी और उसकी अभीष्ट दक्षता प्रखर करती चली जायेंगी। बुद्धिमान, विवेकशील, दूरदर्शी और निर्णय लेने वाले और सही ढंग से काम करने वाले व्यक्ति वस्तुतः अचेतन की गहरी पर्तों से ही अपनी इन विशेषताओं को उपलब्ध करते हैं।
जे. डब्ल्यू. ब्रिज ने बताया है कि व्यक्तित्व को पतनोन्मुख और अस्त−व्यस्त बनाने की प्रक्रिया भी अनजाने ही चलती रहती है। अचेतन में सब कुछ भला−भला ही जमा नहीं है वरन् पाशविक कुसंस्कार भी उसमें सत्प्रवृत्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में जमे रहते हैं। बगीचे में जितने उपयोगी पेड़−पौधे होते हैं उससे कहीं काटा−छाँटा न जाय तो फिर उपयोगी पेड़ों का विकास क्रम रुक जायगा यही बात मनःक्षेत्र में उगी हुई प्रवृत्तियों के बारे में लागू होती है। अवांछनियताओं पर नियन्त्रण न किया जाय—उनकी उपेक्षा बरती जाय तो वे सत्प्रवृत्तियों की अपेक्षा कहीं आगे बढ़ती हैं। इस बढ़ोतरी से घिरा हुआ व्यक्ति डडड वार, अस्त−व्यस्त अदूरदर्शी और कुमार्गगामी बन जाता है।
सिगमंड फासड का मत यह है कि अव्यक्त मनःक्षेत्र ही व्यक्तित्व का आधार भूत कारण है। मनुष्य जैसी भी कुछ है उसकी जड़ अचेतन में गहराई तक घुसी हुई पाई जायगी।
सचेतन को शिक्षा, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन आदि द्वारा प्रशिक्षित एवं परिष्कृत किया जा सकता है पर अचेतन पर इन प्रक्रियाओं का बहुत थोड़ा प्रभाव पड़ता है। उसे निरन्तर के दीर्घकालीन अभ्यास ही प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से तत्व वेत्ताओं ने कितने ही प्रकार की विशिष्ट साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं। आसन, प्राणायाम, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य,मौन, तप आदि क्रिया करके अभ्यासों का दीर्घकालीन सेलव भी अचेतन मन को उत्कृष्ट स्तर का बनाने में सहायक होता है। लोहे को गर्म करके ही अभीष्ट आकृति में ढाला जा सकता है। अचेतन को अवांछनीय स्थिति से छुड़ा कर परिष्कृत स्तर का बनाने के लिए योग और तप जैसे उपायों का अवलम्बन लेना पड़ता है।
सचेतन और अचेतन की किसी ऊँचे पर्वत के शिखर और उसकी तलहटी से उपमा दी जा सकती है। शिखर दूर से दीखता है और सूर्य प्रकाश से चमकता है जब कि घाटी की तलहटी दबी छिपी और अँधेरी पड़ी रहती है। समुद्र में तैरने वाले आइस वगं पर्वतों का बहुत बड़ा भाग पानी में डूबा रहता है जो ऊपर उभर रहता है वही दीखता है। ठीक इसी प्रकार हम किसी का व्यक्तित्व एवं बुद्धि−कौशल ही देख समझ पाते हैं जबकि उसकी वास्तविक स सत्ता एवं पूँजी अव्यक्त मनःक्षेत्र में ही दबी छिपी होती है। नाटक के पात्र जब रंगमञ्च पर आते है तो वे आकर्षक सज डडडड में होते हैं पर उसकी तैयारी उन्हें उस ग्रीन रूप में करनी पड़ती है जिसे दर्शक देख नहीं पाते। अव्यक्त मन एक प्रकार का ग्रीन रूप है जिसमें व्यक्तित्व सँजोया जाता है। परिचय क्षेत्र में तो उस तैयारी की साधारण सी जानकारी भर मिलती है। यदि किसी का अव्यक्त मन देखा समझा जा सका होता तो पता चलना कि वस्तुतः यह व्यक्ति अपने यथार्थ रूप में क्या?
मूल्य व्यक्तित्व की तीन परतें होती हैं(1) अह—ईगो (2) परिष्कृत चेतना—सुपर ईगो (3) इदम् ‘इड’—बहिरंग समूह चेतना।
अहम् वह स्तर है जिसमें हमें आत्म−सत्ता का बोध होता है। परिष्कृत वह जिसमें आदर्शों के अपनाने एवं विशिष्ट बनने की आकाँक्षा प्रबल रहती है। इद्म् वह जो अपने परिवार एवं समाज के साथ जुड़ा रहता है। परिस्थितियों के अनुरूप अपने सम्बन्ध में सुख दुख की—उत्थान−पतन की—मान्यताएँ बदलता रहता है। इसी संदर्भ में स्त्री−पुरुष की मान्यता भी है। प्राणी अपने को नर या नारी मान लेता है तो डडडड के अनुरूप उसकी विचारणा एवं चेतना ढलने लगती है। यौन अवयवों का विकास इस मान्यता के अनुरूप ही होता है। पुराना शरीर छोड़ने पर भी यह मान्यता बनी रहती है और अगले जन्म में उसी वेग में जन्म ग्रहण कराती है। जो पुनर्जन्म नहीं मानते उनके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि रज−वीर्य के गुण सूत्रों में पाये जाने वाले जीवाणुओं की संज्ञा में पाई जाने वाली प्रबलता भ्रूण पे नर−नारी के लक्षण पैदा करती है। शरीर की स्थिति के अनुरूप प्राणी अपना आपको नर−नारी डडडड का मानता है यह बात स्थूल विश्लेषण की दृष्टि से ही सही है। गहराई तक उतरा जाय तो यह पता चलता है कि जीवधारी की सूक्ष्म सत्ता में जो नर या नारी की मान्यता घुसी होती है वही उसमें लिंग भेद के लक्षण उत्पन्न करती है।
अपने सम्बन्ध में जैसी भी मान्यताएँ अचेतन में जमी हुई होगी हमारा जीवन संकट उसी दिशा में अग्रगामी होगा और परिस्थितियाँ उसी प्रकार की बनती ढलती अभीष्ट दिशा में प्रगति की जा सकती है पर अन्त क्षेत्र की अनवरत प्रेरणा से तो मनुष्य अनायास ही स्वसंचालित यन्त्र की तरह आगे बढ़ता जाता है। अन्त स्थिति के अनुरूप बाह्य साधनों का विकसित होते जाना और उसी दिशा में अनवरत प्रगति होते जाना सहज स्वाभाविक है।
अचेतन मन की व्याख्या स्नायु सिद्धान्त—न्यूरोलॉजी−कल थ्योरी एवं मानसिक सिद्धान्त—सायकोलॉजीकल संस्थान की उत्तेजना से अचेतन मन की स्थिति बनती या बदलती सिद्धान्त वाले यह कहते हैं कि मन स्थिति का शरीर पर पूरा नियन्त्रण है। मन जिस दिशा में चलेगा शरीर को उसी ओर चलना पड़ेगा। यह पक्ष मृत्यु तक को स्वनिर्मित या स्वेच्छित बताता है जबकि यह कहना सुनना बहुत अजीब सा लगता है।
उपरोक्त दोनों मान्यताओं का समन्वय विद्वान मार्टिन प्रिंस ने किया है वे मनो स्नायु सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। उनकी साइको न्यूरोलॉजीकल थ्योरी—स्नायु संस्थान और अचेतन मन के समन्वय पर ही व्यक्तित्व की कोई दिशा धारा निर्धारित होना मानते है। दोनों पक्षों को अपूर्ण ठहराते है और कहते इनमें से किसी एक की गति−विधियाँ अपूर्णता और अस्त−व्यस्तता के रूप में ही बनी रहती है।
व्यापारिक जीवन में जो क्रिया−कलाप मनोयोग पूर्वक देर तक अपना या गया है वही संस्कार बनकर अचेतन में समा जायगा और फिर उसी की प्रेरणा से व्यक्तित्व की अनेक धाराओं एवं क्रियाओं का प्रवाह बढ़ेगा। अचेतन अत्यन्त शक्ति शाली होते हुए भी स्वनिर्मित नहीं है हमारे दीर्घकालीन मनोयोगों एवं क्रिया−कलापों से ही उसका निर्माण एवं परिवर्तन होता है।
मस्तिष्क के बुद्धि संस्थान को विकसित करने के लिए जिस प्रकार मस्तिष्क को शिक्षित और हाथों को अभ्यस्त करने का दीर्घकालीन प्रयत्न किया जाता है उसी प्रकार अचेतन को पाशविक कुसंस्कारों से मुक्त करके देवोपम अन्त स्थिति प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक साधना क्रम अपनाना पड़ता है। योग और तप का महत्व इसी दृष्टि से है। जिनका अनाड़ी मस्तिष्क प्रगति में बाधक है उसी प्रकार असंस्कृत अचेतन भी व्यक्तित्व को विकसित होने के मार्ग में प्रधान अवरोध है। ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार सामान्य प्रशिक्षण प्रयासों की उपयोगिता समझी गई है उससे भी अधिक आवश्यकता अचेतन को परिष्कृत करने के लिए योग एवं तप की समझी जानी चाहिए।
शेख उस्मान मुस्लिम धर्म के ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उन्होंने अपने उस्ताद निजामुद्दीन औलिया से अनेकों मानवोचित गुणों का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। शेख उस्मान का कुरानशरीफ पर अच्छा अधिकार था। मानव की सेवा ही उनके जीवन का प्रमुख अंग था। अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को वे सदा धर्मानुकूल आचरण करने का ही परामर्श देते रहते थे।
शेख उस्मान यह भी नहीं चाहते थे कि अपनी सेवाओं के बदले समाज से रोटी, कपड़ा प्राप्त किया जाये। वह सुबह शाम एक−एक घण्टे के लिए सड़क के किनारे अपनी छोटी सी दुकान लगाकर बैठ जाते और शलगत, चुकन्दर, आलू आदि की सब्जी बनाकर बेच देते। जो कुछ पैसा प्राप्त हो जाता उसमें उनके परिवार का पालन−पोषण हो जाता। यदि कोई व्यक्ति उन्हें खोटा सिक्का दे जाता तो भी वे उसे जान−बूझकर रख लेते और उसके बदले में सब्जी दे देते। वह अच्छी तरह जानते थे कि यदि मुद्रा चलन में एक भी खोटा सिक्का है तो वह आ जाता है तो वह धोखा देकर किसी व्यापारी को चलना चाहता है। व्यापारी अपनी ग्राहक को भेड़ता है इस तरह एक व्यक्ति दूसरे को और दूसरा तीसरे को देकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।
शेख उस्मान के पास पहुँच कर खोटा सिक्का आगे न बढ़ता था। वह उसे अपने पास रख लेते थे। उनके इस व्यवहार से लोगों में यह धारणा बन गई थी कि शेख को खोटे−खरे सिक्के की परख नहीं है। परिणामस्वरूप जब तब अनेक व्यक्ति खोटा सिक्का लेकर आते और बदले में अच्छा सिक्का ले जाते या छुट्टे कराकर उसके पैसे ले जाते।
शेख का जीवन समाप्त होने को आया। अन्तिम दिन खुदा बन्द करीम की याद करते हुये आकाश की तरफ मुँह करके बोले—’मेरे परवर्दिगार! तुझसे मेरी स्थिति छिपी नहीं है। लोग मेरे पास खोटे सिक्के लेकर आया करते थे मैं बदले में उन्हें हमेशा सब्जी देता रहा। किसी का खोटा सिक्का मैंने वापिस नहीं किया। सम्भव है तेरे इस नाचीज बन्दे से भी कितने खरे बन्दे होंगे उनमें मुझ जैसा एक खोटा बन्दा भी कहीं पड़ा रहेगा। मेरे रहीम! मुझ पर रहम करना।’
सूर्य की गर्मी से समुद्र जल की ऊपरी सतह गरम हो जाती है और वह गरम पानी ध्रुवों की आकर्षण शक्ति से खिंचकर उत्तर या दक्षिण की ओर भागने लगता है। नमक की मात्रा इस ऊपरी सतह से नीचे खिसक कर तली वाले पानी में बढ़ जाती है। वह इतना गाढ़ा और भारी हो जाता है कि एक तरह से अचल बनकर ही रहता है। जिस प्रकार धनीमानी और सुविधा सम्पन्न वर्ग के लोग सम्पत्ति पाकर अचल हो जाते है। उनकी प्रगतिशीलता नम्रता और गर्मी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही जड़ता, यह अधिक नमक घुला नीची सतह का पानी भी पकड़ लेता है। ऊपरी सतह में गर्मी रहती है—श्रमशीलता और कर्मठता की गर्मी मनुष्य को भी हलका−फुलका और गतिवान बनाये रहती है यही बात समुद्र की ऊपरी सतह के जल के बारे में भी है।
धरती पर जल 70 प्रतिशत है। थल केवल 30 प्रतिशत है हम इस थल की उधेड़−बुन में ही लगे रहते है उसी को—जो आँखों से दिखाई पड़ता है— सब कुछ मान बैठे है। चमकीला चन्द्र खिलौना हमारे आकर्षण का केन्द्र बना और पर्वत जितनी धन राशि खर्च करके वहाँ तक पहुँचने का प्रयत्न किया गया। विडम्बना यह है कि जो आँखों से दिखाई नहीं पड़ता वह समुद्र गर्भ अत्यधिक उपयोगी—बहुमूल्य और निकटवर्ती होते हुए भी उपेक्षा पात्र बना रहा। यदि उसके सम्बन्ध में भी आकाश की तरह खोज की गई होती तो मनुष्य ने अब की अपेक्षा कहीं अधिक सुविधा एवं सम्पत्ति को करतल गत कर लिया होती पर इस मानवी बुद्धि स्थूलता को क्या कहा जाय जो प्रत्यक्ष पर ही ध्यान देती हैं और उसे महत्व हीन समझती है जो आंखों से ओझल है। आन्तरिक जीवन—विचार सम्पन्नता का वैभव भी कब हमारी समझ में आता है मात्र कागज के नोट बटोरने में ही जिन्दगी का बहुमूल्य भाग ऐसे ही अस्त−व्यस्त और नष्ट−भ्रष्ट हो जाता है।
समुद्र की गहराई और उसकी भीतरी बनावट आश्चर्य जनक है। उसके भीतर प्राय 40 हजार मील लम्बी तो पर्वत श्रृंखलाएँ ही फैली हुई हैं। दूसरी ओर सामान्य तल से काफी गहरी और 8 से 30 मील तक चौड़ी खाइयाँ भी सर्वग्रासी मुँह फाड़े सहस्रों मील जगह घेरे पड़ी है। मनुष्य का अन्तरंग भी कितनी ही विकासोन्मुख ऐसी पतन की महागर्त दुष्प्रवृत्तियों का विस्तार भी कम नहीं है।
सन् 1873 में अन्वेषक ‘चैलेञ्जर’ ने अटलाँटिक महासागर का एक नक्शा तैयार किया था उन दिनों वह सर्वांगपूर्ण माना गया था अब उसमें बहुत सुधार कर दिये गये हैं। प्राचीन काल में मानवी चेतना के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा चुका है पर उसे अन्तिम नहीं कहा जा सकता क्रमिक विकास की प्रक्रिया ने अब चेतना तत्व सम्बन्धी ऐसे रहस्यों का उद्घाटन किया है जिनसे पूर्व प्रतिपादनों में चार चाँद ही लगे हैं।
अटलाँटिक सागर यों एक है पर उसके गर्भ में फैली हुई श्रृंखलाओं ने भीतर ही भीतर दो भागो में विभक्त कर रखा है। इस विभाजन का प्रभाव उस समुद्र के जल बहाव को भी प्रभावित करनी है। यद्यपि यह विभाजन आंखों से या साधारण उपकरणों से समझ में नहीं आता तो वह है तो है ही। मनुष्य सत्ता यों एक है पर उसके भीतर देवता और असुर का विभाजन स्पष्ट है। इन दोनों में जिसकी जितनी ऊँचाई चौड़ाई होती है उसी आधार पर जीवन दिशा प्रभावित एवं गतिशील होती है। उन्नति अवनति का—दिशा निर्धारण का—सारा आधार इसी भीतरी स्थिति पर ही निर्भर रहता है यों देखने में यही लगता है कि परिस्थितियों ने एवं चेष्टाओं ने ही सब कुछ करके रख दिया है। समुद्र की पर्वत श्रृंखलाएं जल प्रवाह को गति देती हैं और मानवी अंतरंग की शुभ अशुभ स्थिति उसे किसी दिशा विशेष में बढ़ने के लिए बाध्य कर देती है।
शोध कर्त्ता हैरी हेस ने प्रशान्त महासागर का सर्वे क्षण करते हुए उस समुद्र के गर्त में ऐसे 15 द्वीप ढूँढ़े हैं जो कभी पानी से ऊपर थे किन्तु धरातल की उथल-पुथल के कारण वे समुद्र में डूब गये। ऐसे हजारों अभागे द्वीपों के सम्बन्ध में प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं जो कभी भूतल की शोभा बढ़ा रहें थे किन्तु अब अतल की गहराई में जाकर सब की दृष्टि से ओझल हो गये और अपनी प्राकृतिक सौंदर्य सुषमा से वंचित बन गये। ठीक इसी तरह आज के कितने ही भूखण्डों को किसी समय का समुद्र तल घोषित किया जा चुका है। ऐसे कितने ही हिमाच्छादित पर्वत हैं जो कभी समुद्र में डूबे पड़े थे। प्रवृत्तियों के उछाल प्रबल परिस्थिति बनकर सामने आते हैं और व्यक्तियों को नीचे से ऊपर उठाते अथवा ऊपर से नीचे गिराते देखे जाते है प्रकृतिगत उथल-पुथल थल को जल में और जल को थल में बदल सकती है। आन्तरिक उथल-पुथल भी यदि कल्पना मात्र न रहकर प्रचण्ड संकल्प शक्ति के रूप में उदय हो तो आज की अपेक्षा कल का जीवन क्रम आश्चर्यजनक रीति से बदला हुआ पाया जा सकता है और उसके दूरगामी परिणामों को देखकर अजनबी दर्शक अवाक् रह कसता है।
हिन्द महासागर में 8 हजार फुट ऊँची और 3600 मील लम्बी एक पर्वत शृंखला है। वह अण्डमान द्वीप समूह के समानान्तर चलती है। यह इन्डोनेशिया ओर भारत तक फैले हुए समुद्र को भीतर ही भीतर दो भागों ढूँढ़ निकालने वाले नाविक अलफानमी निकि तिन का दावा था कि यह पर्वत शृंखला अति प्राचीन काल में भूभाग थी और आस्ट्रेलिया, अफ्रीका तथा एशिया को एक ही थल भाग बनाये हुए थी। इस भूखण्ड के समुद्र तल में डूब जाने के कारण यह तीनों महाद्वीप अलग अलग बने। पहले इतनी बड़ी भूमि तक ही विस्तार वैभव की शृंखला में जुड़ी हुई थी।
समाज और परिवारों की संयुक्त प्रक्रिया कितनी सुविधाजनक एक कितनी शक्ति शाली है इसे मानने में किसी की कोई आपत्ति नहीं हो सकती। संगठन की—एकता की शक्ति इस समय की मूर्धन्य सामर्थ्यों में से एक हैं। किन्तु दुर्भाग्य इसे कहीं भी अक्षुण्ण नहीं रखता। आये दिन बँटवारे होते रहते है और इसका दुखदायी परिणाम दुर्बलता एवं विश्रृंखलता के रूप में सामने आते रहते हैं। असुविधाएँ बढ़ती हैं और अड़चने खड़ी होती है जैसी कि अफ्रीका एशिया और आस्ट्रेलिया की अर्वाचीन पृथकता-और प्राचीन एकता की तुलना करने से स्पष्ट हो जाती है। थोड़ा सा भूखण्ड डूबा—स्वयं मरा और पीछे वालों के लिए अड़चनें खड़ी कर गया। ठीक इसी प्रकार कुछ स्वार्थी तत्व व्यक्ति गत महत्वाकांक्षाओं के लिए एकता को नष्ट करने पर उतारू हो जाते हैं। समझते हैं सबके साथ रहने में नहीं उछल कर चलने और अलग रहने में लाभ है। इसका परिणाम क्या हो सकता है यह इस पर्वत शृंखला से पूछना चाहिए जिसने सामान्य से असामान्य बनने की उछल—कूद की और छब्बे बनने की इच्छा वाले चौवे के दुवे रह जाने वाली उक्ति चरितार्थ करके रह गई। वह स्वयं डूब गई—अपनी स्थिति दयनीय बना गई साथ ही उन भूखण्डों के लिए चिर कालीन विपन्नता खड़ी कर गई जो पृथक-पृथक उपरोक्त तीन महाद्वीपों के रूप में दिखाई पड़ते हैं और जिनका अलगाव असंख्यों के लिए असंख्य समस्याएँ उत्पन्न कर रहा है। भारत पाकिस्तान का विभाजन भी इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है।
हिन्द महासागर की सबसे अधिक गहराई पाँच मील नापी गई है जो दक्षिण पश्चिम आस्ट्रेलिया के समीप है। इस क्षेत्र के समुद्र तल में काला मैंगनीज—लोहा, तांबा, टिन, निकिल, जस्ता मालीवडेतम आदि धातुओं का प्रचुर भण्डार जमा पड़ा पाया गया है। मलेशिया और इन्डोनेशिया के बीच टिन धातु का इतना बड़ा भण्डार है जितना सारी पृथ्वी पर भी नहीं है। यह धातु संपदा उथले समुद्रों में अपेक्षाकृत कम अनुपात में पाई जानी है।
गहराई और सम्पदा का सीधा सम्बन्ध है। उथले,ओछे मनुष्य अपनी तड़क भड़क दिखाते फिरते तो हैं पर उनका व्यक्तित्व दिवालिये, कंगालों जैसा रहता हैं। जिसमें गम्भीरता—गहराई, शालीनता, गरिमा और दूरदर्शिता है उन्हीं भारी भरकम कहे जाने वाले—महान समझे जाने वाले व्यक्तित्वों में अनेकों स्तरों की सम्पदाएँ एवं विभूतियाँ पाई जाती हैं। वैभव दिखाई भले ही न पड़े पर आवश्यकतानुसार उसका उपयोग कभी भी हो सकता है। अगले दिनों जब धरती वालों को धातुओं की कमी पड़ेगी तब निश्चित रूप से इसी समुद्र तल में छिपे भण्डार को ऊपर लाया जायगा। परिष्कृत व्यक्तित्व गहरे समुद्रों की तरह हैं उनकी महानता यो विज्ञापित भले ही न होती हो पर अवसर आने पर उसका बहुमूल्य उपयोग हो सकता है और उस उपयोग से संसार को असंख्य प्रकार के लाभों से लाभान्वित होने का अवसर मिल सकता है।
जड़ और चेतन की एकता सिद्ध करने वाला एक अद्भुत प्राणी समुद्र में पाया जाता है जिसे ‘कोरल पालिप्स’ कहते हैं। बोतल जैसी आकृति का लिवलिवा यह प्राणी किसी समुद्री चट्टान को पकड़ कर बैठ जाता है। कन्ही जाता आता नहीं। उसमें विचित्र आकर्षण शक्ति होती है। उसी से उस क्षेत्र में बिखरी रहने वालर कोरेलिनेसी नामक समुद्री वनस्पति खिंचती चली आती हैं और उस कीटक के शरीर में लिपट कर आत्मसात होती रहती हैं। कीड़ा बढ़ता रहता है और मूँगे की चट्टान बनती रहती हैं। या चट्टानें बढ़ते-बढ़ते ऐसे मजबूत और विशालकाय द्वीपों का रूप धारण करती रहती है जिनका भारी तूफान और भूकम्प भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मूँगा बहुमूल्य पदार्थ है जो सस्ते रत्नों में गिना जाता है और चाव पूर्वक गरीब अमीरों द्वारा आभूषणों के साथ धारण किया जाता है।
मूँगा जड़ भी है और चेतन भी। चेतन इसलिए कि उसकी उत्पादक सत्ता सजीव है। जड़ इसलिए कि उसे निर्जीव चट्टान की तरह देखा और काम में लाया जा सकता है। यह समस्त विश्व जड़-चेतन सत्ता से उसी प्रकार समन्वित है जैसा कि मूँगा। जड़ के बिना जड़ की हलचलें संभव नहीं। इसलिए जड़ बुद्धि संसार को पदार्थ मात्र मानती है और सचेतन प्रज्ञा के लिए यह समस्त पसारा चेतन ब्रह्म सत्ता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
परिस्थितियों और साधनों की प्रगति के लिए आवश्यकता असंदिग्ध है पर साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यह सहायता व्यक्ति गत चुम्बकत्व के बिना किसी के भी पास खिंचती हुई नहीं आ सकती। मूँगा कीट कहीं जाता नहीं अपने आकर्षण से ही आहार के उपयुक्त वनस्पतियों को घसीट कर पास बुला लेता है और वे सहज ही अपनी वरमाला उस प्रचण्ड पुरुषार्थी के गले में डालकर समर्पित होती चली जाती हैं। घास के समर्पण और मूँगा के चुम्बकत्व को अन्योन्याश्रित देखा जा सकता है और यह अनुभव किया जा सकता है कि दोनों पक्ष एकाकी रहने पर नितान्त दुर्बल थे पर उस एकाकार स्थिति ने कैसा चमत्कार परिणाम प्रस्तुत किया। तुच्छ सी घास मूँगा जैसी बहुमूल्य बन गई और अपने में चुम्बकत्व उत्पन्न करके वह तुच्छ सा कीटक विशालकाय एवं प्रशंसा पात्र रत्न द्वीप बन गया। जिन व्यक्तित्वों ने अपने में मूँगा कीट जैसा चुम्बकत्व उत्पन्न किया वे स्वयं धन्य बने और अपने साथी सहयोगियों को धन्य बनाया। इस रहस्यमय प्रशिक्षण को मूँगा कीट उन बुद्धिमान कहलाने वाले मनुष्यों के सामने प्रस्तुत करते रहते हैं जो समुन्नत बनने के इच्छुक तो हैं पर प्रगति के मूल्यवान सिद्धान्ती से प्रायः अपरिचित ही बने रहते हैं।
जब जिन्दगी के कगारों की हरियाली सूख जाय-प्रकाश के बुझने पर गहरी अँधियारी छा जाय—घनिष्ट मित्र और स्वजन मुँह मोड़कर चले जाँय—आसमान की सारी नाराजी मेरी तकदीर पर बरसने लगे—तो हे मेरे प्रभु, तुम इतना तो अनुग्रह करना ही कि मेरे होठों पर मुसकराहट की उजली रेखाएँ धूमिल न होने पायें; मुख पर खिन्नता की कलुषता चढ़ती न आये।
—महाकवि नागोची
दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं जो मानवी दुस्साहस के रहने पूरा न हो सके। मनुष्य की देश में न तो शक्ति की कमी है और न उसकी मानसिक सम्भावनाएँ सीमित हैं। उनके रहते वह जो कुछ भी कर गुजरे कम हैं। उत्साह, साहस और विवेक का समन्वय यदि एक केन्द्र पर इकट्ठे किये जा सकें तो उनकी समन्वित क्षमता निस्सन्देह असम्भव को सम्भव बना सकती है।
एलेन गेरबा नामक एक फ्राँसीसी नवयुवक ने निश्चय किया कि वह एक छोटी-सी नाव लेकर जिव्राल्टर से न्यूयार्क तक की 4200 मील लम्बी यात्रा अकेले ही पूरी करेगा। यह निश्चय उसने किसी सनक में नहीं किया, वह यह दिखाना चाहता था कि एकाकी मनुष्य भी अपने आप में कितना समर्थ है और कोई भी अकेला व्यक्ति अपने बलबूते पर दुस्साहस जैसे दीखने वाले कठिन कार्य अपने साहस, धैर्य और विवेक के सहारे किस प्रकार पूरे कर सकता हैं।
यों जिव्राल्टर से न्यूयार्क का रास्ता बड़े जलयानों के लिए 3000 मील का है, पर अटलांटिक महासागर में तो तूफानी हवाएँ चलती हैं उनसे बचने के लिए छोटी नावों को 1200 मील का चक्कर काटकर जाना पड़ता है। इसलिए वह 4200 मील हो जाता है। यों नावे इतना रास्ता लगातार चलती रहने पर तीन महीने में पार कर सकती हैं, पर गेरबा ने चार महीने लायक खाद्यपदार्थों तथा आवश्यक उपकरणों का संग्रह किया और एकाकी यात्रा का सारा साधन जुटाया उसके दोस्त इस खतरनाक दुस्साहस में न पड़ने के लिए बहुत समझाते रहे पर उसने किसी की एक न सुनी।
सन् 1844 में स्लोकम एक नाविक ने अपने हाथी एक छोटी नाव बनाकर उस पर विश्वयात्रा की थी। इसीसे गेरबा ने प्रेरणा ग्रहण की। वह कहता था उससे पहले जब एकाकी विश्वयात्रा की जा चुकी है तो वह उससे कहीं मजबूत नाव के सहारे और कहीं छोटी यात्रा अकेले ही क्यों नहीं कर सकता। गेरबा एक सिविल इंजीनियर था, पर उसने इस साहसिक यात्रा के लिए अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़ दी और अपने प्रयास में जुट गया और अंततः वह 6 जन 1922 को अपनी यात्रा पर निकल ही पड़ा।
कुछ ही आगे यात्रा बढ़ी होगी कि तूफानों में नाव के तिकोने पाल के चिवड़ उड़ा दिये। हिलोरे इतनी तेज होती कि स्टोव जलाना कठिन हो गया एक दिन तो उसके हाथ ही जल गये। एकबार तो वर्षा का पानी सुरक्षित खाद्य भण्डार तक घुस गया और सारी भोजन सामग्री भिगो दी। सोने-जागने की—आहार सफाई की व्यवस्थाएँ जुटाते हुए आँधी-तूफान भरे समुद्र में एकाकी यात्रा की कठिनाइयों ने सभी व्यवस्था नष्ट कर दी।
एक दिन तूफान में जब नाव डगमगाने लगी और डूबने का खतरा सामने आया तो उसने एक बल्ली पर चढ़कर जान बचाई। कई बार ऐसे अवसर आये जब नाव के उलटने में देर नहीं रही और कई दिन ऐसे बीते जिनमें जिन्दगी और मौत के बीच घमासान लड़ाई होती रही, पर जीत जिन्दगी की ही हुई। रास्ते भर नाव की टूट-फूट की मरम्मत भी उसी को करनी पड़ती थी। समुद्री रोग का आक्रमण हुआ। इन सब कठिनाइयों के बीच उसने कभी भी हिम्मत नहीं हारी और साहस के साथ कठिनाइयों से जूझता हुआ अपने लक्ष्य की ओर अनवरत डडडड ति से आगे बढ़ता ही चलता रहा।
दुदेव से संघर्ष करती हुई गेरवा की नाव 101 दिन की अनवरत यात्रा पूरी करके जिव्राल्टर से न्यूयार्क के लागआयलेण्ड बन्दरगाह पर पहुँची, उपस्थित भारी भीड़ ने उसके दुस्साहस के प्रति हर्षोन्मत्त होकर स्वागत किया और यह प्रेरणा ग्रहण की कि यदि साहस सजीव हो तो एकाकी व्यक्ति भी दुदेव से जू्रझ सकता है—दुस्साहसों में सफल हो सकता है और असम्भव जैसी लगने वाली बात को सम्भव बना सकता है।
जिस स्थिति को मरण कहा जाता है क्या हम उस समय सचमुच ही मर गये होते है? मरने पर हम कहाँ चले जाते हैं और क्या करते हैं इसका निश्चित निर्णय अभी संदिग्ध स्थिति में हैं। फिर भी इतना तो एक प्रकार से निश्चय ही हो चुका है कि मरने के उपरान्त भी जीवसत्ता किसी न किसी रूप में बनी ही रहती हैं—और कुछ न कुछ करती ही रहती है। मृत्यु के साथ जीवन का अस्तित्व सर्वथा समाप्त नहीं हो जाता।
कई बार तो डाक्टरों की परख के अनुसार पूर्ण मृत्यु घोषित कर दिये जाने पर भी शरीरों में जीवन रहता पाया गया है और मृतकों के पुनः जीवित हो उठने के प्रमाण सामने आये हैं।
एडिनवरी के एक होस्टल में एक लड़की बीमार होकर मरी। डाक्टरों ने उसे मृतक घोषित कर दिया, पर होस्टल का वार्डन उसकी आकृति की देखकर जीवित ही कहता रहा और उसने लाश को तब तक दफन नहीं होने दिया जब तक कि उसमें सड़न उत्पन्न न हो जाय। आमतौर से तीसरे दिन लाशें सड़ने लगती हैं, पर उस लड़की का शरीर तेरह दिन तक वैसा ही रखा रहा। चौदहवें दिन लड़की ने करवट बदली और साँस ली इसके बाद धीरे-धीरे अच्छी हो गई।
एक घटना आस्ट्रिया की इससे भी विचित्र है। अपने मृत मालिक की ताबूत में रखी हुई लाश की पहरेदारी उसके पालतू कुत्ते ने आरम्भ कर दी। किसी को वह पास डडडड फटकने देता था और समीप जाने का प्रयत्न करता उसे काटने को दौड़ता। तीसरे दिन जब ताबूत डडडड ले जाया जा रहा था तो कुत्ते ने कन्धा देने वालों के पैर काट लिये। इस पर ताबूत गिरकर टूट गया। देखा गया कि मृतक की सांसें चल रहा हैं। उसे वारिस घर लाया गया। तब लोगों ने समझा कि कुत्ता अपनी अतीन्द्रिय शक्ति से यह जान रहा था कि उसका मालिक मृतक नहीं बना हैं।
न्यूयार्क की वह घटना डाक्टरों की दुनिया में बहुचर्चित है जिसमें एक मृतक का पोस्टमार्टम करते समय मुर्दा उठकर बैठ गया था और उसने डाक्टर का गला पकड़ लिया था। डाक्टर भयभीत होकर गिर पड़ा और दिल की धड़कन बन्द होने से मर गया किन्तु वह मुर्दा छुरी के घाव को भी सहन करके धीरे-धीरे अच्छा हो गया।
घटना कलकत्ता की हैं। उन दिनों सन् 1896 में अँग्रेजी राज्य था। कई अंग्रेज अधिकारी एक दिन गप-शप कर रहे थे कि उनमें से एक फ्रेंकलेसली का सिर मेज पर झुकता चला आया और देखते-देखते दम तोड़ गया। उसके कुटुम्बी तथा पूर्वज भी दिल के दौरे से ही मरे थे। फ्रेंकलेसली का भी यही हस्न हुआ। मृत शरीर के प्रचलित रस्म पूरे करने के बाद उसे कुनूर के कब्रिस्तान में दफना दिया गया। उसका परिवार उटकमण्ड में रहता था कई अन्य कुटुम्बी भी वहीं दफनाये गये थे। इसलिए परिवारी यही चाहते थे कि इस लाश को परिवार की अन्य लाशों के समीप ही लफन किया जाय। लाश को स्थानान्तरण करने की तथा लाश के लिए स्थान प्राप्त करने की दौड़धूप में कई महीने लग गये।
लाश को स्थानान्तरण करने की क्रिया जब कभी होती है तो यह आवश्यक होता है कि ताबूत खोलकर मृतक को वस्त्र आदि के सहारे पहचाना जाय। लेसली का डडडड भी खोला गया तो देखने वाले चकित रह गये लाश चित लिटाई गई थी उसके हाथ क्रूस की आकृति बनाकर छाती पर रखे गये थे। पर अब तो वह औंधे मुँह लेटा था। कमीज चिथड़े-चिथड़े फटी हुई थी। नया पहनाया हुआ पेन्ट भी घुटनों पर से फटा हुआ था। आँख पर कई जगह खरोंचें थीं तथा मुँह से निकला हुआ खून जमकर सूख गया था। इन चिह्नों से यही अनुमान लगाया गया कि मृतक का प्राण ताबूत में फिर से लौटा होगा। उसने निकल भागने के प्रयत्न किये होंगे किन्तु वैसा सम्भव न हो सकने के कारण दम घुटकर वह मर गया होगा।
इटली में मान्टुआ नगर के समीप मजोला ग्राम में भी ऐसी ही एक घटना घटी। लावरीनिया मेर्ली नामक एक गर्भवती महिला की मृत्यु मृगी का विकट दौरा आने के कारण हो गई। लाश को ताबूत में बन्द कर दिया गया। उसके कुटुम्बियों के आने के इन्तजार में दो दिन लाश बिना दफनाये रखी रहने दी गई। जब वे आये और अन्तिम दर्शन के लिए ताबूत खोला तो देखा गया कि मृतक ने बाहर निकलने के लिए भारी प्रयत्न किया है इसमें उसका शव क्षत विक्षत हुआ है। इतना ही नहीं उसने सात महीने के गर्भ को जन्म भी दिया है। जच्च-बच्चा दोनों ही दम घुटने से मरे। हालाँकि मृत्यु की घोषणा कुशल डाक्टर की परीक्षा के बाद की गई थी इस घटना में मृत्यु के बाद फिर से जीवन लौट आने की बात सिद्ध हुई। यह घटना 3 जुलाई सन् 1890 की है।
अभिलेखों में ऐसी ही एक घटना पादरी श्वार्त्स की है। भारत के एक देहाती प्रिशन में काम करते हुए उसकी मृत्यु हुई। कुटुम्बियों के इके होने तक लाश को रखा रहने दिया गया और तीसरे दिन अंत्येष्टि की व्यवस्था बनी। जब परिवार के लोग रस्म के अनुसार प्रार्थना के भजन गा रहे थे तो देखा गया कि मृतक के भी होठ हिलने लगे और वह भी मन्द स्वर से उस भजन को गाने में साथ देने लगा। यह जीवन चिह्न देर तक नहीं रहे उसकी फिर मृत्यु हो गई, पर इसमें सन्देह नहीं कि वह एकबार मृत्यु के मुख से फिर वापिस लौट आया था।
हिम प्रदेशों में ठण्ड के दिनों में रीछ बर्फ में दबकर जम जाते हैं। तब उनमें जीवन के बहुत कम चिह्न शेष रह जाते हैं। यहाँ तक कि श्वाँस किया और दिल की धड़कन भी अनुभव में नहीं आती। इस स्थिति में पड़े रहने के बाद गर्मी आते ही वे सजीव होने लगते हैं और साधारण रीति से काम करने लगते हैं।
शरीर को घोषित मृत्यु केवल इतना ही सिद्ध करती है कि अब शरीर में पंचतत्वों की स्थिति इस योग्य नहीं रही कि उससे जीवितों जैसा काम लिया जा सके। वह सड़ने जा रहा है फिर भी उसके भीतर या बाहर शरीराभिमानी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। मृत्यु के समय तरह-तरह के धर्मोपचार इसीलिए किये जाते हैं कि शरीर और आत्मा का सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद होने की स्थिति में प्राणी को अत्यधिक अशांति का अनुभव न हो वह शान्तिपूर्वक इस शरीर त्याग के आघात को सहन कर सके।
मृत शरीरों को सुरक्षित रखने की प्रथा मिश्र आदि में रही हैं। इसके पीछे भी यही तर्क काम कर रहा था कि आत्मा के किसी अंश की उपस्थिति शरीर के साथ बनी रहने के कारण वह अपने प्रियजनों के निकट बना रहेगा। शरीर का कोई अंश सुरक्षित रखने की बात भी इसी दृष्टि से सोची गई थी। भगवान् बुद्ध के कुछ दाँत और हजरत मुहम्मद साहब के कुछ वाल अभी तक सुरक्षित रखे हुए हैं। मृत शरीर पर कब्र या समाधि बनाने को प्रथा भी इसी आधार पर हैं। अंत्येष्टि के उपरान्त हड्डियाँ एवं भस्म को गंगा आदि पवित्र तीर्थों में बहाने के सम्बन्ध में यही सोचा जाता है कि शरीर के साथ आत्मा का यदि कुछ सम्बन्ध जुड़ा होगा तो घर-परिवार की अपेक्षा गंगा आदि तीर्थों में उस सारे सरंजाम का चला जाना अधिक श्रेयस्कर है।
अमेरिका में कई शरीरों को अभी भी लम्बे समय तक के लिए शीतल रसायनों के साथ इसलिए सुरक्षित रखा गया है कि उन्हें निश्चित अवधि तक शारीरिक थकान दूर करने का अवसर मिल जाय और फिर से वे जीवित हो सके। यह तथ्य यह संकेत करते हैं कि जीवन अनत है और वह मृत शरीर के साथ भी किसी कदर—किसी समय तक अपना अस्तित्व बनाये रहता है यदि कोई ऐसा उपाय हाथ लग सके तो मतृ शरीर की असमर्थता दूर करदें तो शरीरों का बार-बार मर-मरकर जीवित होना सम्भव हो सकता है जैसा कि मरने की घोषणा कर देने के उपरान्त शरीरों के पुनर्जीवित हो उठने की बात कितने ही प्रमाणों द्वारा सिद्ध है।
अन्ध-विश्वास को अब उपहासास्पद और अग्राह्य माना जाता है और उन लोगों को पिछड़ेपन का शिकार माना जाता है जो तथ्यों एवं प्रमाणों से सिद्ध न हो सकने वाली बातों पर विश्वास करते हैं।
अन्ध-विश्वास की मोटी परिभाषा है बिना प्रमाण युक्त कारणों की किन्हीं मान्यताओं को स्वीकार कर लेना। इस संदर्भ में मनीषियों के अन्यान्य प्रतिपादन भी हैं। रॉयल इन्स्टीट्यूट ऑफ लंदन में विज्ञान और अध-विश्वास विषय पर अपना निबन्ध पढ़ते हुए रेवेन्डर चार्ल्स किंग्सले ने उसे ‘अज्ञात का भय’ सिद्ध किया। उनका मतलब शायद उस देवी-देवताओं या भूत-प्रेतों से था जो भेंट-पूजा ऐंठने के लिए डराने, धमकाने और आतंकित करने वाले माने जाते हैं। पर उनका यह प्रतिपादन भी एकाकी था। प्राचीन यूनान में प्रत्येक नदी, वृक्ष, पर्वत आदि में देवात्मा मानी जाती थी और उससे मात्र शुभ-कामना की आशा की जाती थी। यह आत्माएँ डराती नहीं, वरन् स्नेह, सहयोग प्रदान करती हैं। यूनानियों की देव-मान्यता अन्ध विश्वास कही जा सकती है, पर उसका कारण ‘अज्ञात का भय’ नहीं माना जा सकता।
नेशनल कालेज आयरलैंड के प्राध्यापक सर वैरेट ने काये और कारण की संगति बिठाये बिना किन्हीं मान्यताओं को अपना लेना अन्ध-विश्वास बताया है। इस परिधि में अनेकानेक धार्मिक प्रचलन और कथा-पुराणों में बताये हुए संदर्भ भी आ जाते हैं। शकुन एवं मुहूर्त भी इसी वर्ग के हैं। छींक हो जाने, की काम बिगड़ने की सूचना मानस यद्यपि बहु प्रचलित मान्यता है, पर खोजने पर ऐसा कोई कारण समझ में नहीं आता जिसमें छींक आने और काम बिगड़ने की परस्पर संगति बिठाई जा सके।
भूतकालीन मान्यताओं को यदि तथ्य पूर्ण नहीं सिद्ध किया जा सके तो उन्हें अग्राह्य ठहरा देना चाहिए, इस सिद्धान्त पर इन दिनों बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत जोर हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि जो तथ्य आज उपलब्ध हैं वे ही अन्तिम हैं, आगे ऐसे आधार प्रस्तुत नहीं होंगे जिनसे आज अन्ध-विश्वास समझी जाने वाली बातें कल तथ्यपूर्ण सिद्ध हो सकें। तर्क, विवेक, कारण और प्रमाणों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए पर चिन्तन में यह गुंजाइश भी छोड़ी जानी चाहिए कि शोध की प्रगति किन्हीं भूतकालीन मान्यताओं को सही भी सिद्ध कर सकती है। उचित यही है कि हम प्रमाणित सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए मस्तिष्क को इसके लिए खुला हुआ रखें कि अतीत की अध्यात्म सम्बन्धी मान्यताओं को भविष्य में सही सिद्ध हो सकने की सम्भावना है। सामाजिक कुरीतियों के रूप में जो हानिकारक प्रचलन हैं उन्हें निस्संकोच हटाया जाय, पर अध्यात्म मान्यताओं के सम्बन्ध में उतावली न बरती जाय। तत्वदर्शी ऋषियों के अनुभव सहज ही उपहासास्पद नहीं ठहरा दिये जाने चाहिए और उन्हें तत्काल अन्ध-विश्वासों की श्रेणी में नहीं गिन लेना चाहिए।
पिछले दिनों योग सम्बन्धी प्राचीन मान्यताओं को अप्रामाणिक ठहराने वालों को अपनी बात पर पुनर्विचार करना पड़ा है और अत्युत्साह हो खण्डन प्रवृत्ति से पीछे हटना पड़ा हैं।
डा. मेस्मर की मैस्मरेज्म और जेम्स व्रेयड की हिप्नोटिज्म जब प्रयोगशाला में सही सिद्ध होने लगी, तब उस आधार पर रोगियों को बेहोश करके आपरेशन किये जाने लगे और अचेतन मस्तिष्क का चमत्कारी उपयोग किया जाने लगा तो योग की इन शाखाओं को मान्यता मिली और समझा जाने लगा कि मानवी विद्युत् से सम्बन्धित अन्य प्रतिपादनों में भी तथ्य हो सकता है और वे अगले दिनों प्रमाणित ठहराये जा सकते हैं।
क्लौरिंगटन ने ‘ईविल आई’ सिद्धान्त के अनुसार यह सिद्ध किया है कि नेत्रों में वेधक दृष्टि होती है और उसे विशेष उपायों से समुन्नत करके दूसरों को अच्छे या बुरे प्रभाव के अन्डडडड लाया जा सकता हैं। यह सिद्धान्त लगभग उसी स्तर का है जिसके अनुसार नजर लगने’ की पुरानी मान्यता को अन्ध-विश्वास ठहरा दिया गया है।
चार्ल्स वाइविन ने इच्छा शक्ति एवं एकाग्रता की शक्ति को जादुई चमत्कारों से लेकर शारीरिक मानसिक रोगों की निवृत्ति तक के लिए प्रयुक्त करके दिखाया करके दिखाया और बताया है कि यह शक्ति मानवी क्षमताओं में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके प्रयोग से व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली बनाने की दिशा में आशातीत सफलता पाई जा सकती है और अपने में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कर सकते हैं जिन्हें अद्भुत कहा जा सके। इस संदर्भ में उनके प्रयोगों ने दर्शकों को चकित कर दिया है। यह मन्त्र शक्ति के सम्बन्ध में कहे जाने वाले चमत्कारी वर्णनों की पुनरावृत्ति है।
सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च के अध्यक्ष जी एन. टीरेल ने अपनी खोजों में ऐसे प्रमाणों के पहाड़ लगा दिये हैं जिनमें प्रेतात्माओं के अस्तित्व एवं क्रिया-कलाप के लगभग वैसे ही प्रमाण मिले हैं जैसे कि जीवित मनुष्यों के होते हैं। ठीक इसी प्रकार की शोधें स्प्रिचुवाल सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन की है उसके संचालक भी अपनी संग्रहित प्रमाण सामग्री में प्रेतात्माओं के अस्तित्व को इस प्रकार सिद्ध करते हैं जिन्हें बताने के कारण झाड़-फूँक करने वाले ओझा लोगों का अथवा भूत-प्रेत की बातें करने वालों को अन्ध-विश्वासी कहा जाता रहा है।
स्वप्नों के मिथ्या होने की बात बुद्धिजीवी वर्ग में कहीं जाती है। पर जब कितने ही उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिनमें स्वप्न को देखी गई बात यथार्थ निकली अथवा तब परामनोविज्ञान के विश्लेषणकर्ताओं को मनुष्य की अतीन्द्रिय शक्ति का स्वप्नों के साथ एक सीमा तक डडडडला रहने की बात स्वीकार करनी पड़ी। स्वप्न फल बताने वालों को अन्ध-विश्वासी ही कहा जाता रहे, आज के प्रस्तुत प्रमाणों को देखते हुए यह बात न्याय संगत प्रतीत नहीं होती।
मेन्टल टेलीपैथी—क्लेयर वायस आदि ऐसी अध्यात्म विधा सामने आती जा रही हैं जो भूतकालीन चमत्कारवाद की सत्यता मानने के लिए फिर वापिस लौट चलने का निमन्त्रण देती हैं। मैटा फिजिक्स विज्ञान का जिस क्रम से विकास हो रहा है उसे देखते हुए लगता है वह दिन बहुत दूर नहीं रह गया जब मस्तिष्क विद्या हमें प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि जैसे योगाभ्यासों को न केवल सही आधार पर विनिर्मित सिद्ध करेगी, वरन् यह भी बतायेगी कि उपासना, साधना की पद्धतियाँ जीवन के अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्षों के विकास में उपयोगी हैं और सहायक भी।
ऐसी दशा में हमें अन्ध-विश्वासों की सीमा निर्धारित करते हुए प्राचीन आध्यात्मिक मान्यताओं के सम्बन्ध में थोड़ा उदार दृष्टिकोण ही रखना चाहिए और विज्ञान बुद्धि द्वारा यथार्थता तक पहुँचने के लिए जितनी प्रतीक्षा की आवश्यकता है उसे बिना उतावली के पूरी होने देना चाहिए।
अपनी बात को हम कितना ही सही क्यों न मानें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखे की मतभेद वाले पक्ष भी हमारी ही तरह अपनी बात को सही समझने वाले हो सकते हैं। सत्य तक पहुँचने के लिए मस्तिष्क खुला रखना चाहिए और ‘ही’ की कट्टरता में ‘भी’ की सम्भावना के लिए गुंजाइश छोड़नी चाहिए। —अरस्तू
जीव विज्ञानियों के अनुसार मृत्यु तक प्रकार की अत्यधिक गहरी थकान अथवा इतनी प्रगाढ़ निद्रा है जिसमें गिरने के बाद फिर जागृत हो सकना सम्भव नहीं पाता। यदि इस थकान को दूर करने जितने समय तक सुरक्षित विश्राम की व्यवस्था बन जाय और जागने की अवधि तक शरीर के जीवाणुओं को मरने, सड़ने या सूखने से बचाया जा सकें। तो मृत्यु के बाद फिर कुछ समय बाद की उठना सम्भव हो सकता है।
चेतना मरती नहीं थक जाती हैं। बुढ़ापे के कारण नाड़ी संस्थान की लचक घट जाती है कोशिकाओं का नवीनीकरण क्रम शिथिल हो जाता है। शरीर यन्त्र उन्हीं कारणों से कठोर एवं शिथिल होता चला जाता है। जीवनी शक्ति का इसी क्रम से ह्रास होता है और धीरे-धीरे बढ़ती हुई जराजीर्ण अवस्था मृत्यु के समीप तक जा पहुँचती है। इस कठोरता एवं शिथिलता की गति जितनी मन्द होगी उतने ही अधिक समय तक जीवित एवं सक्रिय रहा जा सके गा। थकान धीरे-धीरे पैदा हो दीर्घजीवन का प्रधान सूत्र यही है। प्रगाढ़ विश्राम की सुविधा बीच-बीच में इस प्रकार मिलती रहे कि पिछले दिनों की क्षति को पूरा किया जा सके तो फिर यह सम्भव हो जायगा कि बहुत लम्बे समय तक जीवन बना रहे। हर रात को सोने और हर सवेरे उठने का क्रम एक मध्यावधि मरण एवं पुनर्जीवन ही तो है उसी सामान्य क्रम को विशेष उपचार से दीर्घकालीन बनाया जा सके तो कोशिकाओं पर छाई हुई थकान से उत्पन्न जरठता का निवारण हो सकता है और बूढ़े का फिर से जवान बन सकना शक्य बन सकता है।
जीन फिनाल ने अपनी पुस्तक ‘दि फिलोसोफी आफ लाँग लाइफ’ में लिखा है—मृत्यु की दिशा में आधी यात्रा हम स्वाभाविक रीति से करते हैं और आधी अस्वाभाविक रीति से। स्वाभाविक वह है जिसमें एक नियत क्रम से वृद्धावस्था आती है और परिपक्व आयु भोगकर शरीर मृत्यु की गोद में चला जाता है, अस्वाभाविक वह जिसमें मनुष्य छोटी-मोटी बीमारियों के समय—बढ़ती आयु का लेखा-जोखा रखते हुए—अपनी आयु के मरने वालों की लिस्ट बनाकर यह सोचता रहता है कि अब मृत्यु का समय नजदीक आ गया। यह मान्यता यों महत्व हीन मालूम पड़ती हैं, पर सचाई यह है कि वह अन्त मन में एक सुनिश्चित संकल्प बनकर बैठ जाती है और मृत्यु को जल्दी ही कहीं से पकड़ कर ले आती है। संकल्पों से परिस्थितियों का उत्पादन एक सुनिश्चित सत्य है अतएव समय से पूर्व अस्वाभाविक मृत्यु के मुख में चला जाना भी एक यथार्थता ही है।
वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार मनुष्य एक अग्नि पिण्ड की तरह-जलते हुए दीपक की तरह है। आग आक्सीजन खाती है और कार्बन डाइ आक्साइड गैस उगलती हैं। बिलकुल यही क्रम मनुष्य का भी है। उसकी श्वाँस प्रश्वाँस क्रिया इसी क्रिया को सम्पन्न करता है। हमारा शरीर—जीवन की एक दिव्य अग्नि की तरह ही ज्वलन्त है। इस भट्टी में यदि उपयुक्त ईधन पड़ता रहे और उन कारणों से बचा जा सके जो उसे ठण्डी कर देते हैं तो फिर मरने में आमतौर से जो उतावली हो जाती है वह न ही और देर तक जीवित रह सकना सम्भव हो जाय।
देर तक जीवित रह सकने के महत्वपूर्ण आधार जिन्दगी के साथ जुड़े हुए हैं, यदि उन्हें ठीक तरह संभाले, संजोये रखा जा सके। उद्धत आचरण और उच्छृंखल विचारों से बचा जा सके तो न केवल देर तक वरन् सुख पूर्वक जीवित रहने का आनन्द बिना किसी अड़चन के लिया जा सकता है। मौत के समीप लाने वाले कारण या समय-समय पर सामने आते रहते हैं पर वे ऐसे नहीं हैं जिन्हें निरस्त न किया जा सके। हम भीतर से हारते हैं तो बाहर से भी पराजय ही आ घेरती है। भीतर से थकते हैं तो चारों ओर से निराशा और असफलता की घटाएँ घिरती चली आती हैं।
सिकन्दर ने एक स्वप्न देखा—कोई अप्सरा उसके सामने अति उल्लास पूर्वक नृत्य कर रही है। वह उठा और उसी समय स्वप्न विचारक को बुलाया और इस दृश्य का परिणाम पूछा। उसने बताया कि निकट भविष्य में कोई अति महत्वपूर्ण सफलता आपके हाथ लगने वाली हैं। सिकन्दर के उत्साह का ठिकाना न रहा। उसने दूसरे ही दिन उस देश पर चढ़ाई करदी जिसके लिए वह योजनाएँ बना रहा था। बहुत ही शानदार विजय हाथ लगी। टाथर नगर प उसका झण्डा फहराने लगा।
स्वप्न में देखी गई अप्सरा का कोई अस्तित्व था या नहीं यह ठीक से नहीं कहा जा सकता, पर उसे जो साहसिक उमंग की उपलब्धि हुई उसे हजार अप्सराओं से अधिक कहा जा सकता है। वैसा आन्तरिक उल्लास जिसे भी मिलेगा वह सिकन्दर जैसी ही सफलताएँ प्राप्त करता चला जायगा, यह असंदिग्ध है।
असंयम मरण और कुछ नहीं हमारी निरन्तर की भूलों का ही दुष्परिणाम है। यदि सतर्कता बरती जाय तो हम शताब्दियों तक जी सकते हैं और अन्तिम साँस तक हँसते-खेलते उल्लासपूर्ण मनःस्थिति में रह सकते हैं। ध्यान यदि आन्तरिक संतुलन का रखा जा सके तो बाहरी क्रिया-कलाप में रहने वाली अवाँछनीय भूलें सहज ही घटती और मिटती चली जायेंगी।
बुढ़ापा आयु के आधार पर नहीं विचारों के आधार पर आता है। यदि ऐसा न होता तो तीस वर्ष के लोग बूढ़े और सत्तर वर्ष के जवान क्यों दिखाई पड़ते?
वैज्ञानिक जेक्त लूटो ने कितने ही प्राणियों का शारीरिक तापमान गिराकर उसकी प्रतिक्रिया का अध्ययन किया है और पाया है कि इससे इनका जीवन काल आश्चर्य रूप से बढ़ गया। उनका कथन है कि यदि मनुष्य का स्वाभाविक तापमान 98.6 से घटाकर आधा अर्थात् 49.3 किया जा सके तो आयु 20 गुनी बढ़ सकती है। 70 वर्ष जीने योग्य शरीर को 1400 वर्ष जिन्दा रखा जा सकता है।
मानवी जीवकोशों की सुदृढ़ता को परखते हुए कोलबिया विश्वविद्यालय के डा. एच. एस. ष्टड्डक्ड्ड ने कहा है यदि स्नायु उत्तेजना और रासायनिक विकृतियों से शरीर की रक्षा की जा सके तो मनुष्य की संरचना उसे 800 वर्ष तक जीवित रहने का अवसर दे सकती है।
कालगैट विश्व-विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग ने अपने परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला है कि शारीरिक श्रम की तुलना में नीरस मानसिक श्रम से कहीं अधिक थकान आती है।
खाद्य−पदार्थों में पाई जाने वाली ऊष्मा जिसे कैलोरी’ कहते हैं यदि कम मात्रा में मिले तो थकान आवेंगी। यह मान्यता भी अभी पूर्णतया निरस्त नहीं हुई है। पिछली शताब्दी के यह निष्कर्ष अभी भी दुहराये जाते हैं कि भोजन में ऊष्मा की मात्रा समुचित हो तो थकान से बचा जा सकता है।
यह माना जाता है कि 150 पौण्ड वजन का कोई व्यक्ति सोते समय 65 कैलोरी प्रति घण्टा खर्च करता है। लेटे रहने में 77, पढ़ने में 100, टाइप करने जैसे कामों में 145, चलने-फिरने में 200 और कड़ा परिश्रम करने में 300 कैलोरी प्रति घण्टा के हिसाब से खर्च होती है।
डा. वाल्डविन के अनुसार मनुष्य शरीर का तापमान तो 98.6 डिग्री रहता है, पर उसे अनुकूल 68 डिग्री तापमान का वातावरण ही पड़ता है। इससे अधिक ठण्डक या गर्मी होने पर उसकी कैलोरी शक्ति अधिक मात्रा में खर्च होने लगती है और थकान जल्दी चढ़ती है। डा. डीनाल्ड ए. लेयर्ड के अनुसार कोलाहल भर वातावरण में रहने वाले मनुष्य के 20 प्रतिशत थकान उस शोरगुल के कारण ही चढ़ती रहती है।
मेयोक्लीनिक के डा. केन्द्रिल ने कहा है चिड़चिड़ापन मनुष्य की थकान का सर्वविदित चिन्ह है। लेहीक्लीनिक के डा. एलेन का मत भी यही है—वे कहते हैं चिड़चिड़ा मनुष्य दया का पात्र है क्योंकि वस्तुतः वह गहरी थकान का मरीज होता है। उस पर क्रोध करने या बदला लेने से तो इस मरीज का और भी अहित होगा।
विज्ञानी पैट्रिक गेडेस ने अवाँछनीय प्रजनन और अत्यधिक कामुकता को जल्दी बूढ़े होने और जल्दी मरने का कारण बताते हुए कहा हैं—”आमतौर से यह कहा जाता रहा है कि मनुष्य का मरना निश्चित है इसलिए जाति नाश को बचाने के लिए उसे बच्चे पैदा करने चाहिए। यह दलील मृत्यु का डर दिखा कर बच्चे पैदा करने का उत्साह पैदा करती है, पर सच बात उलटी है। आदमी इसलिए मरता है, कि वह जल्दी और अधिक बच्चे पैदा करता है। वह जितनी दिलचस्पी बच्चे पैदा करने में लेगा उतनी ही जल्दी मरेगा। मौत से डरकर बच्चे पैदा करने की उपेक्षा यह अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है कि कम बच्चे पैदा करे और अधिक जिये।”
मौत का सबसे बड़ा आकर्षण कामोपभोग है जो तत्काल जितना मधुर लगता है, उतना ही अधिक वह जीवन शक्ति को समाप्त करने का आधार बनता है। कितनेक अबोध युवक नर−नारी अपने आपको बेतरह निचोड़ने में पिल पड़ते है। वासना की गर्मी उनकी जीवनी शक्ति को निरन्तर जलाती चली जाती है। सन्तानोत्पादन से स्त्रियाँ अपना स्वास्थ्य खो बैठती है और पिता को बच्चों के भरण−पोषण में अपना आपा बेतरह घुला देना पड़ता है। इस दुहरी विपत्ति को मोल लेने में युवा दंपत्ति कितने अधिक उत्साही देखे जाते हैं इससे प्रतीत होता है कि उन्हें जीवन और मरण के अन्तर का कुछ भी ज्ञान नहीं है।
एपिक्टेट्स कहते थे— रोग से स्वास्थ्य प्रबल है और मौत से जिन्दगी बलवान है। संसार बड़ा है, पर मनुष्य उससे भी बड़ा है। मनुष्य से भी क्या कोई बलिष्ठ हो सकता है इसका उत्तर एक ही है—’हाँ−उसका आत्मा−भी इतना बड़ा है जिसकी सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती।’
मिस्र के पिरामिडों में गढ़ी हुई ममियो की बगल में कुछ उपदेश सूत्रों सहित शिलालेख रखे हुए पाये गये हैं जिन पर लिखा था—”शरीर की बजाय वातावरण को सुन्दर बनाओ काया की नहीं आत्मा की रक्षा करो। रोगी का इलाज उतना जरूरी नहीं जितना उसे यह समझाना कि निरोग कैसे रहा जा सकता है। मन को स्वच्छ रखो तो सौंदर्य में कभी कमी नहीं पड़ेगी।
सूक्ष्मदर्शी महा पण्डित वट्रेण्डरसेल ने चेतावनी दी है इस वैज्ञानिक युग में अब हमारे सामने एक ही मार्ग शेष है कि प्रकृति की ओर वापिस लौटे शहरों से भाग कर गांवों में अपना सिर छिपायें। भड़कीली विडंबनाओं से बचें और सादगी की हलकी फुलकी रीति−नीति अपनाये। यदि जीना है तो उसके अतिरिक्त और कोई मांग नहीं थकान शारीरिक श्रम से भी होती है और अपौष्टिक आहार से भी आती है,पर ये दोनों ही कारण कम महत्व के हैं। उनसे उतना हर्ज नहीं होता जितना मानसिक तनाव और अप्राकृतिक रहन−सहन अपनाने के यदि भीतर से हलका फुलका रहा जा सके तो स्नायु संस्थान को उत्तेजित करने वाले बाह्य कारण कुछ अधिक हानि न पहुँचा सकेंगे।
थकान के बारे में पिछले दिनों इतना ही समझा जाता रहा है कि कठिन और लगातार शारीरिक श्रम करने से थकान आती है। पर अब उसकी जड़ मानसिक स्थिति में खोजी गई है। डा. स्ट्रेट फोर्ड का कथन है कि जब तक आशाओं, योजनाओं और उत्तरदायित्वों की प्रेरणा छाई रहती है तब तक उत्साह भी बना रहता है और बल भी। पर जब वे बोझ सिर से उतर जाते हैं तो आदमी बुरी तरह थक जाता है और निठल्ला मस्तिष्क थकान से चूर चूर होकर जराजीर्ण होता चला जाता है।
जापान के महाकवि योननाणोची की एक कविता है—हे प्रभु, तू और कुछ दण्ड भले ही देना, पर थकान मत देना। मुझे भय है कि यह कुलटा मेरा और तेरा वियोग करा देगी।*
“हमारी विकृत बुद्धि तथा विज्ञान की अन्धी दौड़ ने मिलकर जिस तरह के वातावरण का आज सृजन कर दिया है उससे मानवीय शान्ति प्रगति में एक प्रकार से अवरोध ही उत्पन्न हो गया है। साधन बढ़े हैं, पर उनके सदुपयोग की विवेकशीलता घट गई, फलस्वरूप बढ़े हुए साधन सुविधाजनक सिद्ध नहीं हो रहे हैं वरन् विपत्ति प्रस्तुत कर रहे है। परिस्थिति को गहराई से विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष निकालने कठिन हो जाता है कि हमारी तथाकथित प्रगति कहीं अगति या दुर्गति तो नहीं है।”—अलेक्सस(कैदुल जीव विज्ञान पर नोबेल पुरस्कार विजेता
दूसरों के साथ सेवा, उदारता अथवा शालीनता का व्यवहार इस अपेक्षा से नहीं करना चाहिए कि वे ठीक उसी रूप में बदला चुकायेंगे। हमने जो कुछ किसी के साथ किया है वह दूसरा भी हमारे साथ करें यह चाहना न तो नीति युक्त है और न बुद्धिमत्तापूर्ण।
हमने किसी रोगी या भिखारी की सेवा, सहायता की। यदि इसी रूप में अपने अनुदान का प्रतिपादन चाहे तो पहले हमें स्वयं रोगी या भिखारी बनना पड़ेगा। तभी तो वह बेचारा ठीक उसी प्रकार का बदला चुकायेगा जैसा कि हमने उसके साथ किया था। किसी अशिक्षित को शिक्षित बनाया। उसी रूप से वह व्यक्ति हमारी सेवा तभी कर सकेगा जब हम अपनी उपार्जित विद्या भूला दें। पूर्ण अशिक्षित बन जायें और वह व्यक्ति हमें अक्षर ज्ञान से पढ़ाना आरम्भ करें। यह कैसी उपहासास्पद बात होगी।
उपहार करना उन्हीं के साथ सम्भव होता है जो निर्धन, पिछड़े या दुखी हैं। अपने से उपकार कर सकना तभी बन बड़ा जब उनकी तुलना में अच्छी स्थिति में थे। जिस भिक्षुक को आज एक रोटी दी गई है कल वही एक रोटी बनाकर हमें देने आवेगा यह सोचकर कौन भिक्षा देता है? ठीक इसी प्रकार यह सोचना कि जिस सद्भावना के साथ हम दूसरों की सहायता कर रहें है उसीसे वे लोग हमें बदला देंगे वह भी बदला चुकायेंगे, यह कैसे संभव है? यदि उनकी मन स्थिति कृतज्ञता प्रकट करना अथवा प्रतिफल, प्रतिदान दे सकने की रही होती तो वे भी अपने ही जैसे वरन् अपने से भी ऊँचे रहे होते। तब उन्हें हमारी सहायता की ही आवश्यकता क्यों पड़ती?
मनुष्यों में से अधिकांश ऐसे है जो न केवल भौतिक दृष्टि से ही संकटग्रस्त हैं वरन् आत्मिक दृष्टि से भी बहुत पिछड़े हुए हैं। वस्तुतः उनका आन्तरिक पिछड़ापन ही भौतिक विपत्तियों एवं अभावों के रूप में उभर कर ऊपर आया है। ऐसे लोगों से प्रशंसा की—कृतज्ञता की एवं सद्व्यवहार की आशा करना व्यर्थ है। जो वस्तु जिसके पास नहीं है वह उसे दे भी कैसे सकता है नेकी करने वाले के प्रति कृतज्ञ होना उसका प्रशंसक रहना प्रतिपादन की बात सोचना भी तभी बन पड़ता है जब व्यक्ति के अंतरंग में उच्च आत्मिक दृष्टिकोण की स्थापना हो। इसके अभाव में वह नेकी करने वाले के प्रति नेकी करने की कृतज्ञता प्रकट करने की अथवा प्रशंसक रहने की बात रसोच न रहेगा। उसकी इच्छा तो यही रहेगी कि जितना मिला है उससे कहीं अधिक और भी किसी तरह झपट लिया जाय।
घटिया लोग अपने प्रति किये गये उपकार को अधिकार मान लेते हैं और चाहते है कि सहायता की धारा न केवल निरन्तर लाभान्वित करती रहे वरन् उसकी मात्रा भी बढ़ती रहे। जब उनकी इच्छानुकूल सहायता नहीं मिलती तो वे स्वार्थ पूर्ति में बाधा पड़तें देखकर तिल मिलाने लगते है और उपकारी को सताकर उससे अधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। यह उनके छोटेपन के अनुरूप ही है।
हमें किसी के साथ नेकी विशुद्ध कर्तव्य भावना से करनी चाहिए। बदले की बात तो सोचनी ही नहीं चाहिए। वस्तुओं का बदला देना तो संकटग्रस्तों के लिए सम्भव ही नहीं होता उनमें से अधिकांश ऐसे भी कंगाल होते हैं जो सद्भावना का बदला कृतज्ञता के रूप में भी नहीं चुका सकते। जिन दुर्गुणों ने उन्हें विपत्तियों में फंसाया उनमें से एक कृतज्ञता को भी मानकर चलना चाहिए। यदि हम सब सोचकर चलें और सेवा, सहायता को विशुद्ध कर्तव्य और आत्म−सन्तोष के लिए किया गया प्रयास भर मानें तो फिर इसके लिए दुख न मानना पड़ेगा कि उपकारी के साथ वही व्यवहार क्यों किया?
व्यक्ति गत सुख−सुविधाओं के अभिवर्धन का प्रयास करने में कुछ हर्ज नहीं है, पर उसके लिए औचित्य की सीमा अवश्य निर्धारित करनी चाहिए। अनियंत्रित स्वार्थ साधन की चपेट में ऐसे तत्व सहज ही जुड़ जाते हैं जिन्हें हेय, निन्दित एवं पाप कर्म की गणना में गिना जा सके।
शरीर की इन्द्रियाँ विविध−भोग भोग माँगती है और मन को अहंता की पूर्ति के लिए संग्रह, वैभव एवं वर्चस्व की ललक लगी रहती है। इन लिप्सा−लालसाओं की पूर्ति के लिए अधिकाधिक मात्रा में समृद्धि−सम्पदा उपलब्ध करने की आवश्यकता पड़ती है। शरीर के साथ जुड़े हुए स्त्री, पुत्र आदि सम्बन्धी भी ममत्व की परिधि में जुड़ जाते हैं अस्तु उनके लिए भी वैसे ही सुविधा साधन इकट्ठे करने पड़ते है जैसे कि अपने निज के लिए। इसी उपार्जन एवं उपभोग की प्रक्रिया को अपने निज के लिए। इसी उपार्जन एवं उपभोग की प्रक्रिया को मोटेतौर से स्वार्थ साधन कहते हैं। अधिकाँश व्यक्तियों का जीवन−क्रम इसी स्वार्थ संपादन में निरत रहता है।
यह स्वार्थ साधन यदि दो मर्यादाओं में बंधे रहे तो उसकी भर्त्सना न करनी पड़े। इन मर्यादाओं में एक है दूसरों के स्वार्थों को क्षति पहुंचाये बिना अपना प्रयोजन पूरा करना और दूसरा यह कि समीपवर्ती पतन एवं पीड़ा को उबारने की उपेक्षा न करना।
हमारी कमाई ऐसी न हो तो अन्य व्यक्तियों के अथवा समस्त साज के उचित अधिकारों का हनन करके उपलब्ध की गई हो, किसी के साथ अन्याय हुआ हो अथवा उनके कारण किन्हीं को पतन उत्पीड़न सहन करना पड़ा हो। हमारा उपयोग−आनन्द दूसरों के लिए कष्टकारक न बना हो, समुचित परिश्रम के मूल्य पर−बिना दूसरों को क्षति पहुंचाये यदि सुविधा सामग्री जुटाई गई है और उसका उपयोग किया गया है तो इसमें कुछ अनुचित नहीं है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है उसे साथी, पड़ौसियों का ध्यान रखकर चलना पड़ता है। वस्तुतः समस्त मानव समाज एक ही परिवार है। परिवार में कुछ अधिक कमाने वाले होते है, कुछ कम कमाते हैं, कुछ बिलकुल नहीं कमाने वरन् अध्ययन चिकित्सा आदि में अतिरिक्त खर्च कराते हैं। परिवार की आचार संहिता सही है कि अधिक कमाने के कारण नहीं, आवश्यकता के कारण खर्च करने की नीति निर्धारित की जाय। कोई अधिक कमा तो सकता है, पर यदि कमाने वाला असामान्य या अनावश्यक खर्च करे तो सारे परिवार में विक्षोभ उत्पन्न होगा। सम्मिलित परिवार में रहने वाले प्रत्येक सदस्य का उपार्जित सम्पदा पर अधिकार होता है जो अनावश्यक खर्च करेगा वह कुटुम्ब के अन्य सदस्यों के अधिकारों का हरण करेगा और उनके उचित विकास में बाधा उत्पन्न करेगा। यह दूसरी मर्यादा है जिसे खर्च करते समय ध्यान में रखना चाहिए। उपार्जन बिना दूसरों को पतन ही दूसरा तथ्य यह भी आवश्यक है कि खर्च करते समय मानव परिवार की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाय ऐसी निष्ठुरता धारण न की जाय कि पीड़ा और पतन के चीत्कार चारों ओर होते रहें और कमाई का गुलछर्रें उड़ाते हुए हृदयहीन उपभोग करते रहें।
अन्य प्राणियों को उत्पीड़न देकर उनके माँस चर्म, बाल आदि का व्यवसाय अथवा उपभोग अवाँछनीय है। नशेबाजी, व्यसन, कामुकता भड़कने वाले व्यवसाय करके धन कमाना अनुचित है उससे कितनों को ही पतन के गर्त में गिरना पड़ता है मित्रता स्थापित करके किसी को व्यभिचार के लिए आकर्षित करना और उसका चरित्र तथा भविष्य बिगाड़ देना अपने लिए मनोरंजक हो सकता है, पर दूसरे पक्ष को इसमें भारी क्षति पहुँचती है। मिलावटी खाद्य−पदार्थों अथवा नकली हानिकारक वस्तुओं का व्यवसाय करना इसी प्रकार की पाप कमाइए में गिने जायेंगी जिनमें दूसरों को हानि पहुँचा कर ही अपना स्वार्थ सिद्ध होता है। इस प्रकार के कार्यों से यदि अधिक कमाया जाना हो तो उसका लोभ छोड़कर कम लाभ का कार्य करना चाहिए भले ही उससे गरीबों जैसा जीवन जीना पड़े डडडड विलासी सुख−सुविधाओं से वंचित रहना पड़े। किसी की अमानत हड़प कर— भागीदारों का गला काट कर —चोरी,बेईमानी की तरकीबें लड़ाकर अधिक कमाने और अधिक भोगने की लिप्सा छोड़ देनी चाहिए। थोड़े ही साधनों से काम चलाना चाहिए।
घर के अन्य सदस्य रूखी−सूखी रोटी खाये और अधिक कमाने वाले मिठाई, मिठाई उड़ायें तो इसे हृदयहीनता ही कहा जायगा। जो कमायेगा सो खायेगा वाली नीति पशु जगत में काम आ सकती है, मनुष्य समाज में उसे प्रश्रय नहीं मिल सकता। यदि ऐसा होगा तो सहृदयता,सज्जनता और सामाजिकता जैसे उन सिद्धांतों का दिवाला ही पिट जायगा जिनके आधार पर मानवी गौरव और उसका विकास इतिहास खड़ा हुआ है। समीपवर्ती पीड़ा का रूदन भी मानव अन्त करण के लिए निष्ठुरता एवं उपेक्षा पूर्वक सुनते रहना और उसके समाधान में कोई योग न देना भी उचित नहीं।
हम जो कमाते हैं उसमें मात्र अपना ही पुरुषार्थ या कौशल प्रधान नहीं रहता। दूसरों के सहयोग का उस प्रगति में भारी योगदान रहता है। कोई व्यक्ति कितना ही सुंदर क्यों न हो अपने आपसे अपना विवाह नहीं कर सकता। दाम्पत्य−जीवन का आरम्भ तभी होता है जब गृहस्थ रथ में कोई दूसरी महिला योगदान देने के लिए अपना सहयोग प्रदान करे। इसी तरह हमारे दैनिक जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ भी हम स्वयं उत्पन्न नहीं करते। अन्न,वस्त्र आदि वस्तुएँ दूसरों की बनाई हुई ही होती हैं व्यापार तभी चलेगा जब ग्राहक खरीदे। नौकरी तभी मिलेगी जब कोई अपने यहाँ रखे। एकाकी जीवन अन्य प्राणियों के लिए तो सम्भव है, पर मनुष्य तो पूर्णतया सामाजिक प्राणी है और दूसरों के सहयोग पर ही उसकी जीवन रक्षा विद्या,बुद्धि सुख−सुविधा एवं प्रगति निर्भर है। एकाकी रहने पर तो कोई बालक बोलने, सोचने जैसी सामान्य विशेषताओं से भी वंचित रह जायगा। हमें अनेकानेक जो सुविधा साधन उपलब्ध हैं उसे सामाजिक अनुदान ही कह सकते हैं। अब तक की समस्त मानवी प्रगति इस सहयोग वृत्ति का विकसित एवं कार्यान्वित करने से ही सम्भव हुई हैं।
इस अनुदान का प्रतिदान चुकाये बिना हम सामाजिक ऋण से उऋण नहीं हो सकते। परिवार की बड़ी पीढ़ी ने हमें स्नेह, सहयोग भरा उदार परिपोषण देकर इस योग्य बनाया है कि आज समर्थों की श्रेणी में खड़े हो सके। उचित यही है कि उस उपकारकर्त्ता बड़ी पीढ़ी की .कृतज्ञतापूर्वक सेवा, सहायता करें और उनका अनुकरण करते हुए छोटी पीढ़ी को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में उदारता बरतें। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी उपभोग वृत्ति पर अंकुश रखें और मर्यादा से बाहर न जाने दें। स्वल्प में सन्तोष करें और अपनी उपलब्धियों को— अन्यान्यों को लाभान्वित होने देने के लिए प्रस्तुत करें।
स्त्री−पुत्रों,भाई −बहिन या माँ−बाप तक ही कुटुम्ब की सीमा समाप्त नहीं हो जाती। जब आत्म−विस्तार की— आत्म विकास की स्थिति होती है तो समाज और समस्त विश्व अपना घर−परिवार जैसा प्रतीत होता है। तब यह आवश्यक प्रतीत होता है कि जहाँ कहीं भी पीड़ा और पिछड़ापन हो वहाँ उसके समाधान करने के लिए आगे बढ़ जाय। जहाँ कहीं इस विश्व को सुविकसित बनाने के प्रयास चल रहे हो वहाँ उनमें योगदान दिया जाय। समृद्धि का बढ़ाना ही लोक–मंगल के लिए पर्याप्त नहीं सत्प्रवृत्तियों और सद्भावना की विभूतियों का बढ़ाया जाना उससे भी अधिक आवश्यक है। सम्पदा बढ़ने से नहीं वस्तुतः भावात्मक और चारित्रिक उत्कर्ष से ही संसार की सुख−शांति में स्थिरता एवं अभिवृद्धि होती है। अस्तु लोक−कल्याण की दृष्टि से सद्भाव संवर्धन के लिए अपना अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए।
अपने लिए हम उतना ही खर्च करें जितना अनिवार्य हो। उपभोग की लिप्सा संग्रह की तृष्णा और अहंता की तुष्टि को संयमित,सीमित और मर्यादित रहने के उपरान्त ही हम इस योग्य बनते हैं कि मानवी कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का सह रीति से निर्वाह कर सके।
इन दिनों एक पति और पत्नी का सिद्धान्त सही माना जाता है और सम्भव भविष्य में भी यही उपयोगी भी सिद्ध होता रहे, पर संसार में प्रयाग इस पद्धति से भिन्न प्रकार के भी होते रह हैं और उनका सिलसिला अभी भी जारी है समय ही बतायेगा कि बहुपति या बहुपत्नी प्रथा में कुछ वैसा भी है या नहीं जैसा कि उनके समर्थक दलील प्रस्तुत करते हैं।
बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन भूतकाल में रहा है। महर्षि याज्ञवल्क्य के दो पत्नियाँ प्रसिद्ध हैं। रामकथा के गायक जानते हैं कि दशरथ जी के तीन पत्नियाँ थी। पाण्डु की दो पत्नी कुन्ती और माद्री प्रसिद्ध हैं। भगवान कृष्ण के कई पत्नियाँ थीं। इस प्रकार के उदाहरणों से भारत का पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है।
बहुपत्नी प्रथा के समर्थ एक बड़े .कुटुंब का द्रुतगति स निर्माण— एक समर्थ व्यक्ति के आश्रय में अनेक सन्तानों के विकास की सम्भावना−स्त्रियों में आधिपत्य वृत्ति और ईर्ष्या की संकीर्णता से आगे बढ़कर सामूहिक भावना का विकास जैसे लाभ गिनाये जाते हैं। इनके पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। यह शोध का विषय है कि प्रेम−भावना का क्षेत्र कइयों तक बिखर जाने से स्नेह, सद्भाव घट जाते हैं। स्त्री बच्चों पर समुचित ध्यान नहीं दिया जा सकता। दाम्पत्य जीवन के बिखराव में नीरसता आ जाती है और पति−पत्नी में से किसी को किसी पर पूरा भरोसा नहीं रहता।
सम्भव है प्राचीन काल में लोगों की मनोवृत्ति अधिक उदार और मिल जुलकर रहने के आनन्द में रस लेने वाली रही हों और पत्नियां अधिक सहेलियों के साथ रहने में अधिक सुविधा तथा उल्लास अनुभव करती रही हों अब मनः स्थिति और सामाजिक स्थिति बदल जाने से वह प्रचलन बन्द करना अभीष्ट हो गया हो तो उसे समय की गति के साथ चलना ही कहा जायगा।
प्राचीन काल में जनसंख्या न्यून थी और सर्वत्र सघन वन थे। कृषि, पशु पालन तथा हिंस्र पशुओं एवं आक्रमण कारी दस्युओं से आत्म−रक्षा के लिए निज का बड़ा कुटुम्ब उपयोगी माना जाता रहा हो। छोटे कुटुम्ब कठिनाई अनुभव करते हों, सम्भव है उन दिनों वेतन भोगी मजदूर न मिलते हों और घर−परिवार के लोगों को ही मिल जुलकर अपनी निर्वाह व्यवस्था जुटानी पड़ती हो। ऐसी दशा में बहुपत्नी प्रथा की उपयोगिता समझी गई ही और उस प्रकार का प्रचलन उचित समझा जाता रहा हो तो उसे परिस्थितियों का तकाजा ही कहा जायगा। इसी आधार पर उन दिनों अधिक सन्तानोत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता रहा होगा और उसे सौभाग्य का चिन्ह माना जाता गई होगी। पीछे जैसे−जैसे एकाधिकार की प्रवृत्ति पनपती गई होगी और आर्थिक साधन सरल हो गये होंगे तो बहुपत्नी प्रथा को असुविधाजनक समझकर हटाया जाने लगा होगा। बहुपत्नी प्रथा की तरह बहुपति प्रथा का भी भूतकाल में प्रचलन रहा है और अभी भी यत्र−तत्र वह प्रथा प्रचलित है। कुन्ती के बारे में पौराणिक उल्लेख यह है कि उन्होंने पाँच पुत्र पाँच देव पतियों के सहयोग से उत्पन्न किये उन दिनों संतान का उद्देश्य लेकर इस प्रकार का नियोग प्रचलन था भी। द्रौपदी के पाँच पति प्रसिद्ध हैं पाँच पाण्डवों की एक ही पत्नी थी। भगवान् कृष्ण ने इस प्रयोग की सफलता में बहुत दिलचस्पी ली। वे द्रौपदी का समय−समय पर मनोयोग पूर्वक इसके लिए प्रशिक्षित करते रह कि वह मानव समाज के सम्मुख उस प्रयोग की निर्दोषिता और सफलता प्रस्तुत करने में शक्ति भर प्रयत्न करे। इस अनुसार वह प्रयोग सफल भी रहा। न पाण्डवों को द्रौपदी से कोई शिकायत रही और न द्रौपदी को पांडवों से। नये ढंग की आचार पद्धति और मन स्थिति ढालने में असुविधा जरूर हुई होगी पर प्रयोग ने यह सिद्ध किया कि यदि अनुकूल परिस्थितियाँ हो तो बहुपत्नी प्रथा की तरह बहुपति प्रथा भी बिना कष्ट कठिनाई के चल सकती है।
भारत के उत्तर प्रदेश देहरादून जिले के “जौनसार भाबर” एक क्षेत्र है यहाँ भी बहु−पति प्रथा पीढ़ियों से प्रचलित है। वे लोग अपने को पाण्डवों का वंशज कहते हैं और द्रौपदी द्वारा अपनाई गई बहुपति प्रथा का पूर्ण समर्थन करते हैं। यहाँ जमीनों की जोतें छोटी है उनका विभाजन नहीं होता और पीढ़ी दर पीढ़ी एक परिवार सुविधापूर्वक अपना निर्वाह करता रहता है। जबकि एक पति एक पत्नी के प्रचलन वाले लोगों की जमीनें एक दो पीढ़ी में ही टुकड़े−टुकड़े हो जाती हैं। बढवारे में इतने छोटे टुकड़े हाथ रहते हैं कि उनमें से कोई भी उससे अपना गुजारा नहीं कर सकता। और अपना क्षेत्र छोड़कर कहीं सुदूर स्थानों में नौकरी−चाकरी के लिए भाग जाना पड़ता है। तब बहुपति प्रथा अपनाये हुए परिवार गर्वोन्नत मस्तक से कहते हैं कि हम अपनी उदार सहकारिता से लाभान्वित होते हैं जबकि आधिपत्य अधिकार की स्वार्थ भरी संकीर्णता से भरे लोग न केवल स्वयं भी भारी बोझ के नीचे मरते−खपते हैं वरन् अपने स्त्री बच्चों को भी अनाथ, असहाय बनाते हैं।
एक पत्नी एक पति क्षेत्र में दूसरे का प्रवेश असह्य माना जाता है और इस प्रसंग में खून−खच्चर तक होते रहते हैं। पर यह एक वर्ग विशेष की एक मनोवृत्ति मात्र है इसके पीछे कोई गम्भीर कारण नहीं है।
जौनसार भाबर निवासी इन बहुपति प्रथा समर्थक परिवारों को इसकी हानियाँ बताई जाँय तो वे तेवर बदल कर कहते हैं कि—”यदि एक माता की गोदी में जब चार बच्चे खेल सकते हैं और समान स्नेह संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि एक पत्नी चार पतियों को सुखी सन्तुष्ट न रख सके। इसमें न तो ईर्ष्या द्वेष की कोई बात है और न खून−खच्चर की। गड़बड़ी आधिपत्य मूलक संकीर्णता ही फैलाती है।”
चीन का एक संरक्षित प्रदेश सियाँग अपनी अन्य विशेषताओं के साथ एक विचित्रता यह भी लिये हुए है कि वहाँ बहुपति प्रथा को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया हुआ है। इस क्षेत्र में गैयाँग नस्ल के लोग रहते हैं। उन्हें ऐसी कोई विवशता नहीं कि बहुपति प्रथा के बिना काम न चले पर वे इसे अधिक उदार−अधिक सामाजिक और अधिक प्रगतिशील मानते हैं और अपने इस प्रचलन पर सन्तोष ही नहीं गर्व भी करते हैं।
उस क्षेत्र में बहुपति प्रथा का प्रचलन रूढ़ि परम्परा के आधार पर नहीं चल रहा−वरन् उन्होंने उसकी हर दृष्टि से उपयोगिता समझी है और उत्साहपूर्वक अपनाया है। इस प्रसंग को लेकर वहाँ कभी कोई ईर्ष्यालु प्रसंग नहीं आता न मनोमालिन्य होता है और न घात−प्रतिघात की बात कोई रोचता है। तिब्बतियों में भी यह प्रथा एक सीमा तक प्रचलित है। सुविधा की दृष्टि से वे प्राय एक पत्नी−एक पति के सिद्धान्त पर ही चलते हैं, पर यदि कोई परिवार बिना लोभ या दबाव का सहारा लिये स्वेच्छापूर्वक बहुपत्नी या बहुपति प्रथा का आश्रय ले तो उसकी कोई भर्त्सना नहीं करता।
बहुपति प्रथा के समर्थन में परिवार का चिरस्थायी सुसंगठन बना रहना प्रधान कारण बताया जाता है। बड़े भाई की शादी कर दी जाती है और शेष भाई भी उसीसे प्रणय सम्बन्ध रखते हैं। समय का उचित विभाजन रहने से यह दाम्पत्य जीवन नारी पर भी अनुचित दबाव नहीं डालता। सन्तानें अपने कानूनी पिता को पिताजी तथा उसके अन्य भाइयों को मझले पिताजी छोटे पिताजी आदि कहते हैं। इससे परिवार की सम्पत्ति का बटवारा नहीं होता, समृद्धि बनी रहती है और परिवार छिन्न−विच्छिन्न नहीं होने पाते। पारस्परिक स्नेह सम्बन्ध की शृंखला उसमें झीनी नहीं पड़ती वरन् और अधिक मजबूत होती है। वे लोग अपने इन्हीं तर्कों को बड़े जोर−शोर और आत्मविश्वास के साथ उन लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं जो बहुपत्नी प्रथा को अनुपयुक्त बताते हैं। इस समर्थन में स्त्रियाँ और भी दो कदम आगे रहती हैं। वे अपने को अधिक सुखी, अधिक सुरक्षित, अधिक स्नेह संचित अनुभव करती हैं और एकाकी पति वाली महिलाओं की तुलना में अपने को अधिक उदार मानती हैं। और कहती हैं मैं अक्षय सुहागिन हूँ। आजीवन मुझे विधवा होने का दुर्भाग्य नहीं सहना पड़ेगा। एक पति के न रहने पर भी अन्य पतियों के कारण उसका सुहाग सौभाग्य अक्षुण्ण ही बना रहेगा। बच्चों को भी कभी अनाथ बनने की आशंका नहीं रहती।
अफ्रीका में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन बहुत उत्साह से है। इसमें पुरुष नहीं महिलाओं की अधिक उत्साह है। काँगो देश की महिलाएँ उस पुरुष की भर्त्सना करती हैं जिसके घर में एक ही पत्नी हो ऐसे परिवार उन्हें बहुत असुविधाजनक लगते हैं और वे पतियों को अन्य पत्नियाँ लाने के लिए बाध्य करती हैं। अन्यथा वे उस मरघट जैसे सुनसान घर को छोड़कर अन्य किसी भरे पूरे घर में चली जाती है। इसी प्रकार संसार के अनेक भागों में मातृ प्रधान परिवार प्रथा प्रचलित है उनमें पतियों को दास या पैर का जूता बनकर रहना पड़ता है। पतियों के बदलने बचने, पीटने या कई पति रखने की वहाँ स्त्रियों को पूरी छूट है। इस प्रथा को उन समाजों में पूरी मान्यता प्राप्त है।
सभ्यता के विकास के साथ−साथ इन दिनों बहुपत्नी प्रथा और बहुपति प्रथा को अवाँछनीय माना जाता है। केवल आक्रमणकारी और बर्बर लोग ही संसार पर अपना आधिपत्य जमाने की दृष्टि से संख्या वृद्धि की दृष्टि से बहुपत्नी प्रथा का समर्थन करते हैं। बहुपति प्रथा को अंगीकार करने वाली महिलाएँ वेश्या कुल्टा कही जाती हैं और उन्हें न तो सामाजिक सम्मान मिलता है न कानूनी समर्थन लुक–छुपकर ही यह सब चलता है इन दिनों पतिव्रत की तरह ही पत्नी व्रत का ही समर्थन किया जाता है और विज्ञ समाज इसी पक्ष में है।
किन्तु एक नया तर्क और नया आधार बुद्धिजीवी वर्ग की ओर से बहुपति प्रथा समर्थन में प्रस्तुत किया जान लगा है, जोरदार शब्दों में प्रसार किया जाने लगा है। इन समाज शास्त्रियों का कथन है कि बढ़ती हुई जनसंख्या की विभीषिका का सामना करने के लिए यही उपाय सबसे सरल और सुविधाजनक सिद्ध होगा, वे कहते हैं कि यदि मनोभूमि में सहकारिता—सामूहिकता और उदारता के तत्व बढ़ जाँय तो यह प्रचलन हानि रहित तो है ही पारिवारिक जीवन में सुविधा सद्भावना एवं समृद्धि की बढ़ोतरी भी करेगा। संयुक्त परिवार प्रथा सुदृढ़ होगी और परिवार नियोजन की समस्या सहज ही हल हो जायगी।
तार्किक कहते हैं कि जब हर क्षेत्र में सामूहिकता की उपयोगिता सिद्ध हो रही है तो दाम्पत्य−जीवन में यह प्रयोग सफल क्यों नहीं होगा? उत्साही नर−नारियों ने पाश्चात्य देशों में यह प्रयोग कार्यान्वित भी करना आरम्भ कर दिया है। देखादेखी अनेक परिवार इसी आधार पर है कि एकाधिकारवादी दाम्पत्य जीवन की अपेक्षा उनका गृहस्थ जीवन कहीं अधिक सुख−सुविधाओं से सम्पन्न है।
आज हमें पतिव्रत धर्म पत्नीव्रत धर्म का ही समर्थन करना उचित प्रतीत होता है, पर उसके प्रतिक्षा में जो प्रयोग चलते रहे हैं—चल रहे हैं—वे भी कम दिलचस्प नहीं है। समय ही बतायेगा कि इन अजीब लगने वाले तर्कों का कुछ महत्व भी है या नहीं।
दीपक का तेल चुक चला और बत्ती लगभग जल गई। सूर्योदय पर उसने सन्तोष व्यक्त किया और भगवान् भास्कर को शिर नवाया और कहा−देव, अब मैं अपना तुच्छ अस्तित्व समाप्त करके विदा होता हूँ आप अपने प्रबल पराक्रम से संसार में प्रचण्ड आलोक का वितरण करना।
सूर्य की आँखों डबाडब आई उनने एक स्नेह भरे चुम्बन के साथ दीपक को विदाई देते हुए कहा−वत्स तुम्हारे छोटे से अस्तित्व को मेरा शत−शत प्रणाम। जिसने जलन को अपनाया और यह सिद्ध किया कि प्रकाश कभी पराजित नहीं होता।
चमड़े की आंखें सिर्फ यह देख पाती हैं कि किसने क्या किया? जिस क्रिया के सम्बन्ध में जैसी भली या बुरी लोक मान्यता है उसी के अनुरूप उस क्रिया को श्रेष्ठ अथवा निष्कृष्ट ठहरा दिया जाता है। पर यह कसौटी बहुत ही मोटी अवास्तविक है।
देखा यह जाना चाहिए कि किसने किस क्रिया को क्यों किया? यह उद्देश्य ही किसी कर्म के स्तर को नापने का सही मापदण्ड है। उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसे कर्म भी किये जा सकते हैं जो लोक−प्रचलन के अनुसार निन्दनीय ठहराये जाते हैं। उदाहरण के लिए सत्य और अहिंसा को ही लें। उनकी आदर्शों महत्ता लोक और वेदों में सर्वमान्य है। किन्तु स्थिति विशेष ऐसी भी हो सकती है जब इनका पालन पाप−कर्म एवं दण्डनीय अपराध ठहराया जाय। सेना के रहस्य गोपनीय होते हैं। कोई सैनिक यदि सत्य पर से पर्दा उठाने के नाम पर उन रहस्यों को प्रकट कर दे और शत्रु पक्ष को उसकी जानकारी मिल जाय तो समस्त राष्ट्र को उस रहस्योद्घाटन के कारण अपार क्षति सहनी पड़ेगी और वह सत्यवक्त अपराधियों की पंक्ति में खड़ा करके निन्दा का पात्र घोषित किया जायगा और मृत्यु दण्ड का फल भोगेगा। सत्य वचन ही पर्याप्त नहीं उसके पीछे यह तथ्य भी रहना चाहिए कि उस उच्चारण का क्या परिणाम होगा? कोई सैनिक युद्ध के मोर्चे पर अचानक अहिंसावादी बन जाय और प्राणी हत्या को पाप मानकर गोली चलाना बन्द करे दे तो इस सिद्धान्तवाद का परिणाम सुरक्षा व्यवस्था नष्ट होकर देश की पराजय के रूप में भी सामने आ सकता है। यह असामयिक और अदूरदर्शितापूर्ण भावुक सिद्धान्त पालन औचित्य और विवेक की कसौटी पर कभी भी खरा नहीं ठहराया जायगा।
न्यायाधीश द्वारा किसी जघन्य अपराधी को मृत्युदण्ड सुनाना और जल्लाद द्वारा उसे फाँसी के तख्ते पर लटकाना प्रत्यक्षतः निर्दयतापूर्ण कृत्य कहे जा सकते हैं, पर विवेकवान जानते हैं कि यह निष्ठुरता, न्याय और लोकरक्षण की दृष्टि से कितनी आवश्यक है। ऐसे प्रसंगों पर यदि दया, करुणा की भावुकता उमड़ने लगे तो संसार में अपराधियों को खली छुट मिल जायगी और फिर वे निर्भय होकर ऐसे कुकृत्य करेंगे जिनसे एक को मृत्यु से बचाकर हजारों को मौत के घाट उतरने की भूमिका बन जायेगी। यहाँ अहिंसा का पालन, दया का प्रदर्शन उथली भावुकता और अदूरदर्शिता ही समक्षी जायगी।
निकृष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऐसे काम भी किये जाते रहते हैं जो मोटी दृष्टि से साधुतापूर्ण प्रतीत होते हैं। साधु सन्त का वेष बनाकर दुष्ट कर्म करते फिरने वाले इसलिए वह आवरण ओढ़ते हैं कि उनके कुकृत्य सहज ही लोगों की आंखों में न आवें। कितने ही लोकोपयोगी संस्थाएँ बनाकर ऐसी ही धंधेबाजी करते हैं। विधवाश्रम, अनाथालय, गौशाला आदि के बहाने कितने ही लोगों ने अपने घर भरे हैं। बाहर से देखने में यह लोग पुण्य परमार्थ में संलग्न दिखाई पड़ते है, पर वस्तुतः उनका प्रयोजन लोगों की धर्म भावना और दया करुणा का दोहन करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना भर होता है। चन्द्रा संग्रह अब अपने ढंग का एक अनोखा व्यवसाय बन गया है। भिक्षावृत्ति अपनायें हुए लोगों में से अधिकाँश उसके लिए अनधिकारी होते है, पर वे बाहर से कुछ ऐसा प्रदर्शन करते हैं जिससे लोगों को उदारतापूर्वक देने की प्रेरणा मिले। इन लोगों की बाह्य गतिविधियाँ धर्मानुकूल पर भी भीतर से विपरीत स्तर की होती है अस्तु उनका समर्थन दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता के आधार पर किया नहीं जा सकता। चिड़ियों को जाल में फँसाने के उद्देश्य से अन्न के दाने बखेरने वाले चिड़ीमार का बाह्य कृत्य दानशीलता जैसा लगता है पर उसके पीछे जो उद्देश्य छिपा है उसे देखते हुए वह अन्न दान भी कुकृत्य की ही श्रेणी में गिना जायगा। कर्म का स्वरूप नहीं—कर्त्ता का उद्देश्य ही विचारणीय है।
शैतान की आँत की तरह बढ़ता हुआ तम्बाखू पीने का व्यसन किस तेजी से बढ़ रहा है और मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का कैसा सर्वनाश कर रहा है वह चिन्ता का विषय है। दुर्भाग्य यह है कि इस विनाशकारी कुटेव को सभ्यता का अंग माना जाने लगा है और शत्रु−शत्रु को नहीं, वरन् मित्र को भेंट करने लगा हैं।
धूम्रपान कितना विघातक है हम संदर्भ में स्वास्थ विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत किये गये विश्लेषण चौंका देने वाले हैं। इस विषपान की बुराइयों को जानते हुए भी लोग उसे जिस प्रकार अपनाते जा रहे हैं उसे देखते हुए उनकी बुद्धिमत्ता पर आश्चर्यजनक संदेह होता है।
तमाखू में 24 प्रकार के भयानक विषों का सम्मिश्रण पाया जाता है जिन में निकोटिन, पायरोडिन, पायकोलिन, कोलोडिन, मार्शगैस, साइनोजेन, परफोरेल, अमोनिया, कार्वनिक एसिड, यूरिक एसिड कार्बन मोनक्साई फुरफु रल, एकोलिन, राजोलिन मुख्य और अधिक विघातक है।
तमाखू में प्रधान रूप से पाये जाने वाले निकोठिन विष के अतिरिक्त स्वल्प मात्रा में कार्बन मोनोआक्साइड, मोनोसाइनाइड्स, साइनाइड्स, पायरिडिन आदि विष भी है जिनकी घातक शक्ति कम नहीं आँकी जा सकती।
जिस कागज से सिगरेट बनती है वह एक विशेष प्रकार के घोल द्वारा बनाया जाता है। एस घोल में सखिया का मिश्रण होता है। जब वह कागज जलता है तो वह परिवर्तित होकर फरफरोल नामक नया विष उत्पन्न हो जाता है। जो मस्तिष्कीय ज्ञानतन्तुओं पर मंद किन्तु दूरगामी प्रभाव डालता है।
एक पोण्ड तमाखू में 380 ग्रेन निकोटिन पाया जाता है। इसे शुद्ध रूप से कुत्ते जैसे जानवरों को दिया जाय तो उनकी मृत्यु एक ग्रेन से भी कम मात्रा में ही हो सकती है। अन्य कालिडिन, एकोलीन, कार्बन मोनोआक्साइड की मारकता भी कम नहीं है। इनकी भी एक ग्रेन मात्रा मेढ़क, चूहे जीवों का तत्काल प्राण हरण करने के लिए पर्याप्त है।
इन विषों के सेवन करते रहने पर भी लोग जीवित रहते हैं और सर्वनाशी स्वास्थ्य संकट में देर से फँसते हैं इसका कारण यह है कि वे विष तमाखू में घुले−मिले रहते है और धुँए के द्वारा धीरे−धीरे तथा थोड़ी−थोड़ी मात्रा में प्रवेश करते हैं। एक सप्ताह में डडडड जाने वाले तमाखू का यह सार तत्व निकाल कर उसका विष भाग तमाखू पीने वाले को एक बार में ही खिला दिया जाय तो निश्चित रूप से उसकी जान चली जायगी।
ऐलोपैथी के प्राचीन ग्रन्थों में तमाखू की गणना एकोनाइट,वेलाडोना धतूरा वर्ग के विषों में ही की गई है। हैजा के जीवाणुओं को मारने के लिए फिनायल की तरह तमाखू का घोल प्रयोग किया जाता था। ऐसा ही अन्य मारक प्रयोगों में उसका उपयोग किया जाता था। उसे नशे के रूप में धुंआ बनाकर पीने का प्रचलन तो बहुत पीछे हुआ और जब वह आरम्भ हुआ तो डाक्टरों ने उसका घोर विरोध किया और बताया कि उससे लकवा, पागलपन, अनिद्रा, दृष्टि मन्दता, खाँसी, श्वाँस नपुँसकता, अपच जैसे अनेक रोग हो सकते हैं। कनाडा के डाक्टरों ने तो तमाखू पीने वालों में पाये जाने वाले रोगों का नामकरण ही इस बुरी आदत के नाम पर कर दिया था। टेविको एमोलिओपिया अर्थात् सिगरेट जन्म दृष्टि हीनता और टोविकों डिसपेप्सिया अर्थात् धूम्रपान जन्य मन्दाग्नि।
यह नशा जैसे−जैसे अभ्यास में आता गया वैसे−वैसे रक्त की विष निरोधक शक्ति क्षीण होती चली गई और वह शरीर का एक व्यसन बन गया। तब उसकी हानियाँ उतनी तीव्र नहीं दिखाई देती। विषाक्त में तमाखू का विष भी कीचड़ और मिल जाने की तरह सामान्य बन गया। जिन दिनों लोगों के रक्त शुद्ध थे उन दिनों तमाखू की प्रतिक्रिया भी तत्काल और तीव्र होती थी अब उससे मन्द और समय साध्य दुष्परिणाम देखने में आते हैं।
अमेरिका में डा. एच. सेलवैट्ठे लिखित “मेडीकल यूजेज आफ टुवेको—पास्ट एण्ड प्रजेण्ट” नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि तमाखू प्राचीन काल में मात्र मारक विषों की तरह प्रयुक्त होती थी किन्तु पीछे लोगों ने उसे नशे की तरह दैनिक व्यवहार में लाना आरम्भ कर दिया। पिछले चार सौ वर्षों में उसने मानव जाति को इतनी क्षति पहुँचा दी है जिसकी पूर्ति अगले हजारों वर्षों में भी नहीं हो सकेगी।
सिगरेट का धुंआ एक विचित्र विष और उत्पन्न करता है जिसे पोलोनियम कहते हैं। तमाखू के पत्तों में वह उतना नहीं होता पर उसमें जो विष रहता है उनके जलने से उसकी बड़ी मात्रा में नई सृष्टि और उत्पन्न हो जाती है जो वायु मण्डल को दूषित करती है और जो लोग उस धुएँ की साँस लेते हैं उन्हें भी अपने प्रभाव क्षेत्र में जकड़ लेती है।
एक किलों तमाखू से विषों को पूरी तरह पृथक करके उसे मारण प्रयोग में लगाया जाय तो उतने में ही 900 चूहे या 120 खरगोश या 30 मनुष्य आसानी से मर सकते हैं।
डा. आल्टन ओशनर ने लम्बे समय तक प्रजनन शक्ति पर धूम्रपान के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है। उनने पीछे वाले और न पीने वाले नर−नारियों की यौवनानन्द एवं सफल प्रजनन का लेखा−जोखा लेने पर यही पाया है कि तमाखू पीने दोनों ही दृष्टियों से घाटे में रहते है। तमाखू छोटा नशा एवं विकृत बनाने में उसका बड़ा हाथ रहता है। नशे करने वालों की सन्तान शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सदा दोषपूर्ण रहती है। तमाखू पीना उन केवल वरन् अपनी सन्तान की स्थिति को भी गई−गुजरी बनाने का एक अदूरदर्शिता पूर्ण व्यसन है।
इंग्लैंड के विज्ञान वेता डा. प्राइन्स होपकिन्स ने अपनी पुस्तक ‘गाँन अप इन स्मोक’ पुस्तक में लिखा हैं। इस देश में 43 बीमारियों की बढ़ोत्तरी की प्रधान जिम्मेदारी बढ़ते हुए धूम्रपान की है। इसी प्रकार क्रेम्ब्रिज युनिवर्सिटी के प्रो. डब्लू. ई. डिक्सन ने अपनी पुस्तक ‘टेविको हैविट’ में लिखा है। इंग्लैंड के नागरिकों की धूम्रपान की बढ़ती हुई आदत के कारण 50 से अधिक बीमारियों का इतना अधिक शिकार बनना पड़ रहा है जिसकी वस्तुतः कोई सम्भावना न थी।
मेटा्रेपोलियन लाइफ इन्श्योरेन्स कम्पनी ने अपनी रिपोर्ट में तमाखू पीकर असमय मरने वालों के कारण कम्पनी को जो घाटा उठाना पड़ता है उस पर चिन्ता व्यक्त की है और इन नशेबाजी पर अतिरिक्त बीमा दर लागू करने का सुझाव दिया है।
जानहोपकिन्स युनीवर्सिटी के डा. रेमाण्ड पर्ल मेयो फाउण्डेशन ने तमाखू सर्वेक्षण की इस रिपोर्ट का पूर्ण समर्थन किया है जिसमें धूम्रपान को निमोनिया मेनन जाइटिस, डायविटिज, केन्सर, ब्लड प्रेशर, मेन्टल टेन्शन, कान्स्टिपेशन आदि रोगों की पृष्ठभूमि बनाने वाला घोषित किया है।
न्यूयार्क के सायकोलॉजीकल रिसच् सेन्टर के डायरेक्टर हैनरी सी. लिस्क ने लिखा है—हर तमाखू पीने वाला अन्ततः अपनी इस गलती को महसूस करता है पर तब तक वह उस आदत का गुलाम हो चुका होता है और हानियों से बचने का समय हाथ से निकल चुका होता है।
जर्मनी जनता के स्वास्थ्य पर तमाखू का क्या असर पड़ा इसकी जाँच करने के लिए कुएज वर्ग विश्वविद्यालय द्वारा एक शोध कार्य प्रो. हार्स्ट वुलस्टाइन की अध्यक्षता में हुआ था। जिसने इसे एक बुरी आदत घोषित किया कि शरीर के अन्यान्य अवयवों को हानि पहुँचने के अतिरिक्त विशेष हानि कान के ‘ड्रम’ भाग को होती है। निकोटिन की भरमार से उसकी संवेदना शक्ति काफी घट जाती है और अपेक्षाकृत कम सुनाई पड़ने लगता हैं।
रसायन शास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता डा. लिनर्स वैलेग ने टोरेन्टो विश्वविद्यालय के छात्रों के सम्मुख एक विनोदात्मक भाषण देते हुए कहा—जो जिन्दगी से ऊब चुके हों उनके लिए आयु घटाने की दृष्टि से सिगरेट पीना अच्छा है। इसमें आत्महत्या का जुर्म भी नहीं बनता और बहुत दिन जीने के झंझट से भी छुटकारा मिल जाता है। दो पैकेट सिगरेट नित्य पीने वाला व्यक्ति अपनी जिन्दगी के 18 वर्ष कम कर लेता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डा. अलबर्ट हस्ट का कथन है कि हर सिगरेट मनुष्य की 5 मिनट आयु घटाती है। दस सिगरेट नित्य पीने व्यक्ति हर वर्ष अपनी आयु में से प्रायः 12 दिन कम करता जाता है।
आस्ट्रेलिया के वायु सेना विभाग ने विमान चालकों को चेतावनी दी है कि बीस से अधिक सिगरेट न पियें। विशेषज्ञों द्वारा की गई खोज से यह परिणाम निकला है कि सिगरेट के धुँए का कार्बन मोनोआक्साइड रक्त के साथ मिलकर अन्य अंगों के अतिरिक्त आँखों पर भी बुरा असर डालता है और रात में देखने की क्षमता कुछ ही समय में 20 प्रतिशत तक घट जाती है।
लन्दन के रॉयल कालेज आफ फिजीजियन्य ने अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा है—यदि तमाखू पीना लोग बन्द करदें तो उनकी आयु और निरोगता निश्चित रूप से बढ़ जायगी।
विटामिन विज्ञान के प्रसिद्ध शोध कर्त्ता डा. डब्ल्यू. जे. मेकाह्विक ने लिखा है—एक सिगरेट ही विटामिन सी, की 25 मिलियम मात्रा का उपयोगी प्रभाव नष्ट करके रख देती है।
अमेरिका सरकार को अकेले केन्सर से लड़ने के लिए एक पंच वर्षीय योजना बनानी पड़ी है। जिसमें 12, 60,000 डालर खर्च करने पड़ेंगे। इसी प्रकार अन्य कई रोग भी ऐसे हैं जो तमाखू से उत्पन्न होते है उनके निवारण का खर्च भी सरकार पर बहुत पड़ता है। उस देश के विचारशील लोग इस बात से चिन्तित है कि तमाखू कम्पनियों को मोटा लाभ उठाने देने की बात क्यों सहन की जाय पीड़ा और सरकार को निवारण के लिए खर्च की जाने वाले विषुवत धनराशि का भार बहन करना पड़े।
धूम्रपान की हानि से क्षुब्ध पीने वालों ने अपनी हानि में तमाखू कम्पनियों के बहकावे को भी एक कारण माना है और उन पर हर्जाने के दावे ठोंक दिये हैं।
अमेरिका के न्यू ओलियन्स नगर की निवासी श्रीमती विक्टोरिया सेन्ट पीथेर लाटिंग नामक एक विधवा ने लिग्गेट एण्ड मायर्स और आर. जे. रेनाल्डस नामक दो सिगरेट कम्पनियों पर 779500 डालर के दावे किये हैं। विधवा का कथन है कि उसका पति इन कम्पनियों की बनी 40 सिगरेट हर दिन पीता था। ऐसा उसने 14 वर्ष की उम्र से लेकर मरते समय 64 वर्ष की आयु तक किया। फिर उसे फेफड़े का केन्सर हुआ और मर गया। श्रीमती लांिटग यह भरोसा दिलाती रही कि सिगरेट स्वास्थ्य को बिगाड़ती नहीं। उनका यह दावा बहकावा मात्र था। उन्हीं के विश्वास में उसका पति असमय में ही बेमौत मारा गया अस्तु वे कम्पनियाँ उसके नुकसान की क्षति पूर्ति के लिए उपरोक्त रकम उसे दिलाने के बाध्य की जाये।
ऐसा ही एक और भी मुकदमा दायर हुआ है। पिट्स वर्ग के न्यायालय में प्रिटवार्ड नामक एक नागरिक नक अमेरिका की प्रख्यात तमाखू कम्पनी मैसर्स लिगी एण्ड मायर्स लि. पर 1250,000 डालर का दावा किया है कि उस कम्पनी की बनाई चेस्टर फील्ड मार्का सिगरेट पीते रहने के कारण उन्हें केन्सर हो गया और एक फेंफड़ा गाँ देना पड़ा।
आइसलेएड में धूम्रपान तेजी से बढ़ा है। दस वर्ष पूर्व वहाँ हर व्यक्ति पीछे महीने में 8 सिगरेटों की औसत खपत थी। अब वह 12 गुनी 100 हो गई। किन्तु साथ ही केन्सर का प्रकोप आश्चर्यजनक रूप से बड़ा। पुरुषों में 500 प्रतिशत और स्त्रियों में 175 प्रतिशत उस काल रोग की वृद्धि हुई। वहाँ हर एक हजार मरने वालों में 44 केन्सर ग्रस्त होकर मरे।
योरोप के अन्य देशों में भी धूम्रपान का प्रचलन से बढ़ा है किन्तु साथ ही फेफड़ों सम्बन्धी बीमारियों डडडड बढ़ोतरी भी अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से हुई है। केन्सर तो वृद्धि अनुपात की दृष्टि से सबसे आगे रहा है। ब्रिटिश पार्लियामेंट के मजदूर दल की संसद सदस्या डाक्टर एडियसमराक्सिल ने पार्लियामेंट में अपने विचार व्यक्त करते हुए आग्रह किया कि सरकार को चाहिए कि वह ब्रिटिश जनता के जीवन से धूम्रपान की बुराई को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनावें और आन्दोलन चलाये। इस खतरनाक विष के जन जीवन पर किये जाने वाले आक्रमण को रोकना सरकार का वैसा ही कर्तव्य है जैसा कि शत्रु के आक्रमण अथवा महामारी के प्रकोप से निपटना।
अमेरिका की पब्लिक हैल्थ सर्विस—पेनसिलवेनिया मेडीकल सोसाइटी—जार्जिया मेडीकल एसोसियेशन आदि कितना ही स्वास्थ्य संस्थाएँ उस देश की जनता को तमाखू के दुष्परिणामों से अवगत कराती रही हैं और जो पीते हैं उसने अनुरोध करती रही हैं और जो पीते हैं उनसे अनुरोध करती रही हैं कि इस बुरी आदत के चंगुल से निकल कर अपनी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक बरबादी को रोकें।
जहाँ पाश्चात्य देश इस दुर्व्यसन से दुखी होकर उसके चंगुल से छूटने का मार्ग खोज रहे हैं वहाँ दुर्भाग्य वश भारतवासी अपनी गरीबी और गये−गुजरे स्वास्थ्य के बावजूद इसे अधिकाधिक उत्साह के साथ अपनाते जा रहे हैं। साथ ही उसका दुष्परिणाम भी भोग रहे हैं।
भारत में सिगरेट बीड़ी की खपत तेजी से बढ़ रही है। सन् 1948 में आबादी के अनुरूप हर व्यक्ति 6 का वार्षिक औसत था। सन् 60 में बढ़कर वह 78 पर पहुंचा और अब सन् 74 में 280 के लगभग जा पहुंचा है। यदि यही क्रम आगे बढ़ता रहा तो धीरे−धीरे सिगरेट बीड़ी की गणना अन्य खाद्य पदार्थों के स्तर तक ही जा पहुंचेगी।
भारतीय केन्सर अनुसन्धान केन्द्र ने टाटा मेमोरियल अस्पताल में भर्ती हुए 1460 मरीजों की जाँच−पड़ताल करने पर पाया कि तमाखू खाने से मुँह की और पीने से फेफड़ों का केन्सर होता है। उस अस्पताल में एक वर्ष के अन्दर 36550 रोगी आये जिनमें से 521 फेफड़े के केन्सर से ग्रसित थे। उन्हें यह अनुग्रह सिगरेट बीड़ी की कृपा से ही मिला था।
महाराष्ट्र, गुजरात, आन्ध्र और उत्तर प्रदेश में 30 वर्ष से अधिक आयु के 34 हजार स्वस्थ दिखाई पड़ने वाले धूम्रपान शौकीनों का उसी अनुसन्धान के अंतर्गत सर्वेक्षण किया गया तो पता चला कि इनमें से लगभग आधों के भीतर वह विष मौजूद था जो कभी भी केन्सर का संकट उत्पन्न करदे।
समय रहते तमाखू की कुटेव की हानियों को समझें और इस विषपान से अपने को विरत रखें इसी में भलाई है।
यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात एक सभा में भाषण दे रहें थे। श्रोतागण एकाग्रचित्त हो उनके विचारों को सुन रहें थे। अचानक सभा के मध्य से एक व्यक्ति उठा। मंच के पीछे से घूम कर आया। उसने सुकरात की पीठ पर कसकर एक लात मारी।
सभा में भगदड़ मच गयी। भीड़ बौखला उठी। लोग चिल्लाने लगे। ‘पकड़ो−पकड़ो! मारों, भागने न पाये, सामने से घेर कर इधर लाओ।’ लोगों के हाथ में कही वह युवक आ जाता? तो उसे जान से मार देते। बड़ी बुरी दशा होती उसकी। सुकरात ने उसकी जीवन रक्षा ही नहीं की वरन् सभा को शाँत करने का भी प्रयास किया। लोगों को धैर्य बंधाया और अपनी बात जहाँ से छोड़ी थी वही से शुरू कर दी। लोग इतने से सन्तुष्ट होने वाले कहाँ थे? बीच में ही खड़े हो गये और कहने लगे ‘पहले आप उस दुष्ट का फैसला कीजिए। अन्यायी को बिना दण्ड दिये छोड़ना उसकी दुष्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना है। आपने उसे न बचाया होता तो उसकी अच्छी−खासी मरम्मत हो जाती!’ सुकरात ने उनकी बात को ध्यान पूर्वक सुना और उसी विषय पर बोलते हुए भाषण के क्रम को आगे बढ़ाया—बन्धुओं! यदि कोई गधा आपको लात मारता है तो क्या यह आवश्यक है कि आप भी उस गधे लात मारे?’
मनुष्य की संकल्प शक्ति और कर्मठता का यदि समन्वय हो सके तो वह सम्मिलित चेतना शक्ति इतनी समर्थ होती है कि कुछ भी कर सके असम्भव को सम्भव बना सके।
ध्रुव प्रदेशों को अगम्य माना जाता रहा है। अत्यधिक शीत से भरा हुआ यह हिमाच्छादित क्षेत्र अन्न, जल, निवास सभी दृष्टि से भारी जटिल है। ऋतुओं की विलक्षणता—आकाश में चमकने वाले प्रकाश की अद्भुतता चुम्बकीय प्रवाहों के कारण दिया भूल होने की सम्भावना आदि जटिलताओं को सुलझाते हुए वहाँ पैर जमा सकना लगभग इतना ही कठिन है जिसे लगभग असंभव के इर्द−गिर्द समझा जा सके।
इतने पर भी दुस्साहसी लोग वहाँ जा ही पहुँचे और वहाँ रहकर इस धरती की गतिविधियों सम्बन्धी अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ ढूंढ़कर ला सकने में सफल हो गये।
ध्रुव अभियान कितने कठिन हैं इसकी कल्पना करने मात्र से रोमाँच हो उठता है पर मानवी दुस्साहस तो अजेय शक्ति है वह असम्भव को सम्भव बनाती रही है। उसने ध्रुवीय क्षेत्र में पहुँचने, रहने और काम करने की कठिनाइयों को भी सरल बना दिया है और वैज्ञानिक लोग वहाँ डेरा कर रहे हैं।
उतरी ध्रुव पर इटली का शोधकर्ता गाइडों मोंजीनो विशेष तैयारी के साथ पहुँचा था और उसने कितनी ही नई−नई जानकारियाँ उस क्षेत्र में प्रथम पदार्पण कर चुका था।
ग्रीनलैण्ड की खाड़ी पार करके एक अमेरिका जलयान मैन हट्टन उस क्षेत्र की विशद खोज करने के लिए सन् 69 में गया था। उस पर 95 नाविक, वैज्ञानिक और पत्रकार सवार थे। दो बर्फ तोड़ने वाले छोटे जहाज और मार्ग दर्शन के लिए कई हैलिकाप्टर साथ थे। उसने 16000 किलोमीटर क्षेत्र का पर्यवेक्षण करके कितनी ही उपयोगी जानकारियाँ इकट्ठी की।
दक्षिणी ध्रुव के विशेष शोधकर्ता एमण्डसन और स्काट के नाम पर उस क्षेत्र में दो मंजिली तीन इमारतें बनाई जा रही हैं वे एक विशिष्ट एल्युमीनियम की चादरों से इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि शून्य से 43 अंश नीचे की विकट सर्दी और तूफानी अंधड़ों के बीच भी वहाँ रह सकना सम्भव हो सके। ऊपर एक सुरक्षात्मक गुम्बद होगा, नीचे प्रयोगशालायें तथा निवास सुविधा के कमरे तथा आवश्यक उपकरण रहेंगे। सर्दी में 16 और गर्मी में 50 शोधकर्ता वहाँ रह सकेंगे।
दक्षिणी ध्रुव पर उस क्षेत्र की शोध करने के लिए मैकमुकडो शिविर बहुत समय तक लगातार काम करता रहा हैं। वैज्ञानिक का एक दल वहाँ इसी कार्य के लिए बनाई गई प्रयोगशाला में विविध प्रकार के अनुसंधान करता रहा है।
इस क्षेत्र में सबसे पहला शोधकर्ता नार्वे का नागरिक रोआल्ड एंडरसन अपने चार साथियों सहित सन् 1917 में पहुँचा था। इसके बाद एक अंग्रेज रोवर स्काट ने भी वहाँ पहुँचने की हिम्मत दिखाई। 8160000 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में फैली, दस हजार फुट मोटी बर्फ की चादर से ढका, यह सुविस्तृत प्रदेश कितना ठण्डा—कितना नीरव, कितना स्तब्ध है यह देखकर पहुँचने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बर्फ की जा सकती है और शोधकर्ता ऐसे ही आश्रय सथल में अपना गुजारा कर सकता है।
इस क्षेत्र में किये गये प्रयोगों में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जीव−जन्तुओं में समय को पहचानने की जो अतीन्द्रिय चेतना है उस पर देश काल क कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दक्षिणी ध्रुव की प्रयोगशाला में हैमर्स्टस चूहे तथा कुछ किस्म के पौधे पहुँचाये गये और देखा गया कि उनकी समय संबंधी आदतों पर वहाँ की परिस्थिति भिन्नता का कुछ असर पड़ता है या नहीं। पाया गया कि वे प्राणी और पौधे अपनी आदतों के अनुसार ही काम करते रहे। पौधें ठीक उतने ही समय में फूले−फले जितने में कि पहले फूलते−फलते थे। चूहे, छछूँदर, तिलचट्टे जो सामान्यता रात्रि में सक्रिय रहते हैं और दिन में सोते हैं। ध्रुवीय क्षेत्र की विचित्र परिस्थितियों में—धुप्प अंधेरे में रखे गये पर वे यह भली प्रकार जानत रहे कि कब दिन है और कब रात। उन्होंने अपनी पुरानी आदतें रात्रि के बिलकुल सही समय पर ही आरम्भ कीं।
घुमक्कड़ पक्षी लम्बी उड़ाने हर साल अपने नियत दिन, समय तथा मुहूर्त में आरम्भ करते पाये जाते हैं। सोचा जाता था कि यह पंचांग बोध सम्भवतः उन्हें सूर्य की गर्मी एवं मौसम की स्थिति के आधार पर होगा। पृथ्वी चक्र की परिक्रमा के साथ जो चुम्बकीय उतार−चढ़ाव आते हैं वे उन्हें समय ज्ञान कराते होंगे। इसकी यथार्थता ध्रुवीय क्षेत्र में ही परखी जा सकती है जहाँ की परिस्थिति सामान्य भू भागों से सर्वथा भिन्न होती है। वहाँ पृथ्वी की भ्रमणशीलता का प्रभाव नगण्य रह जाता है अस्तु वहाँ जीवधारी सहज ही भ्रम में पड़ सकते हैं। पर देखा गया है कि वैसा कुछ नहीं हुआ। प्राणियों की अपनी समय सम्बन्धी पहचान करने वाली चेतना में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं पड़ा। ड्रोसोफिला फल मक्खी तथा न्यूरोसपोरा फुर्द समय सम्बन्धी ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है। उनने दक्षिणी ध्रुव में पहुँचकर अपनी समय सम्बन्धी आदतों में तनिक भी अन्तर नहीं आने दिया।
जीवों की चेतना भौतिक प्रकृति पर निर्भर समझी जाती है पर ध्रुवीय पर्यवेक्षण ने सिद्ध कर दिया है कि प्राणियों की अपनी चेतन प्रकृति है और वह बाह्य जगत के परिवर्तनों से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होती जैसा कि दक्षिण ध्रुव पर भेजे गये प्राणी वहाँ की भिन्न परिस्थितियों में भी अपनी अन्तः चेतना के आधार पर पूर्व निर्धारित स्वभाव एवं क्रिया−कलाप अपनाये रहे।
यह तो नमूने की एक वैज्ञानिक उपलब्धि है ऐसी−ऐसी अनेक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं जिनके सम्बन्ध में पिछले दिनों तक हम पूर्णतया अँधेरे में थे उदाहरण के लिए ध्रुव क्षेत्र का निरन्तर गरम होते जाना और वहाँ की बर्फ का पिघलते जाना। यह एक ऐसा संकट है जिसके कारण समुद्र को जल सतह बहुत ऊपर जायगी और तटवर्ती विशाल भू−भाग को जलाशय के रूप में बदल देगी। समय रहते हम ऊँची जगहों पर अपनी महत्वपूर्ण गति−विधियाँ उठा लेजा सकते हैं।
अब से पचास करोड़ वर्ष दक्षिणी ध्रुव सहारा की ठीक मध्य में उस क्षेत्र में अवतरित था जहाँ आज−कल नाइजीरिया और लुभाया की सरहदें मिलती हैं। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन कोलम्बिया विश्व विद्यालय के प्राध्यापक समित के समक्ष अपनी नई खोजों के आधार पर प्रस्तुत किया है, ध्रुवीय क्षेत्रों में जिन प्रमाणों को पाया जाना चाहिए उनमें से अधिकाँश उस क्षेत्र में मिलते हैं। ध्रुवों के स्थान परिवर्तन से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी समय−समय पर करवटें बदलती रही है, अमेरिका वैज्ञानिकों ने अलास्का में एक तैरती प्रयोगशाला स्थापित की थी। उन्होंने दो मील लम्बा—डेढ़ मील चौड़ा 70 फुट मोटा एक हिम खण्ड उस क्षेत्र में देखा जो अलास्का से 130 मील उत्तर में था और ग्रीनलैण्ड की ओर तैरता जा रहा था। उस पर वैज्ञानिकों ने अड्डा जमाया। उसका नाम ‘आकलिस’ रखा। उस पर ऐसी झोपड़ियां खड़ी की जो 70 मील की गति से चलने वाले अंधड़ों का दबाव बर्दाश्त कर सकें। एक जनरेटर बिठाया गया और सारे द्वीप में बिजली की व्यवस्था की गई। शोध संचालक थे मैक्स सी.ब्रीवर। हिमि द्वीप पर सवारी गाँठ कर चार वर्ष तक पर्यवेक्षण करने का यह अद्भुत प्रयोग था। इस अवधि में दीप ने तैरते−तैरते 7500 मील की यात्रा की। ग्रीनलैण्ड और आइसलैण्ड के बीच डेनमार्क की खाड़ी में वह पर से अपना डेरा उठाने के लिए विवश होना पड़ा।
अमेरिका की मुख्य भूमि में वायुयान द्वारा वहाँ खाद्य सामग्री तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाई जाती थीं। इसके लिए एक हवाई पट्टी भी वहाँ बना ली गई थी। इस शोधा संस्थान में काम करने वाले अन्य लोग तो अपने घर आते−जाते रहे पर 35 वर्षीय जान्स्टन को वह द्वीप इतना सुहावना लगा कि उसने उसे तभी छोड़ा जब वह स्वयं अपने आपको छोड़ रहा था।
ध्रुव अभियान में हस्तगत हुई उपलब्धियों का अपना महत्व है। उसका सबसे बड़ा प्रतिपादन यह है कि मनुष्य की शक्ति के सामने कोई भी कठिनाई ठहर नहीं सकती। यदि वह अपने संकल्प और पुरुषार्थ का समन्वय कर सके तो वह कर दिखा सकता है जिसे पिछले दिनों असंभव समझा जाता रहा है।
महत्व आकर का नहीं उपयोगिता का है। विस्तार बहुत हो पर उपयोगिता की कमी रहे तो उसे निरर्थक ही माना जायगा, किन्तु कई बार बहुत छोटी दीखने वाली हस्ती भी अपने में इतनी उपयोगिता भरे रहती है कि बड़े−बड़ों का ध्यान उसकी ओर जाता है और उससे लाभान्वित होने के लिए सर्वत्र ललचाई दृष्टि से देखा जाता है। डायटम नामक अति क्षुद्र समझा जाने वाला प्राणी अगले दिनों मानवी आहार की महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी करने जा रहा है।
संसार में सबसे छोटा कहा जाने योग्य केवल एककोष वाला प्राणी है ‘डायटम’ इसे समुद्री घास समझा जाता रहा है पर वैज्ञानिकों ने उसकी गति−विधियों को देखते हुए सबसे छोटी प्राणी की संज्ञा दी है। समुद्र की लहरों के साथ वह पानी में इधर से उधर तैरता फिरता है ओर सूर्य किरणों से विटामिन डी. की बड़ी मात्रा खींच कर अपने शरीर में भर लेता है। समुद्र जल से भी वह अपने लिए आवश्यक आहार चूसता रहता है यही दो स्रोत उसकी क्षुधा मिटाते हैं। प्रौढ़ होने पर वह अपने ही शरीर का एक टुकड़ा अलग छिटका देता है और वह टुकड़ा एक स्वतन्त्र डायटम बन जाता है। यही है इस प्राणी का सन्तानोत्पादन क्रम। दो छोटे डायटम मिलकर एक भी हो जाते हैं इस प्रकार समर्पण और आत्मसात करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया का वे भरपूर लाभ उठाते हैं और शैशव की असमर्थता से छुटकारा पाकर वे क्षण भर में प्रौढ़ बन जाते हैं।
जल जंतु डायटम को सर्वोत्तम पौष्टिक भोजन की तरह चाव पूर्वक तलाश करते और खाते रहते हैं। ह्वेल का प्रधान आहार डायटम ही है। इसीसे वे इतनी बलवान होती है। ‘काड मछली में विटामिन ए. और डी. पे युक्त काड लिवर ऑयल एक अच्छा पौष्टिक आहार खाने से ही उत्पन्न होता है। जिन क्षेत्रों में डायटम का अभाव रहता है वहाँ की मछलियों में उक्त स्तर का तेल भी नहीं पाया जाता।
मनुष्य आहार में पौष्टिकता का समावेश करने के लिए जलाशयों में डायटम की खेती करने के लिए गम्भीरता पूर्वक वैज्ञानिक क्षेत्र में विचार और प्रयत्न किया जा रहा है।
हम चाहे जितने छोटे और स्वल्प साधन सम्पन्न हों तो भी अपनी उपयोगिता तो डायटम की तरह बढ़ा ही सकते हैं। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही उपयोगिता वृद्धि का सबसे बड़ा उपाय है।
विवशता कई बार ऐसे काम करा लेती है जो इच्छित नहीं होते। बुरे काम छोड़ने के लिए भी कई बार मनुष्य को विवश, बाध्य होना पड़ता है। जेल में बन्द होने के बाद जुआ, चोरी, व्यभिचार, डकैती, हत्या आदि वे दुष्कर्म कर सकना जो बाहर स्वच्छन्द विचरण की स्थिति में सुविधा पूर्वक किये जा सकते थे। बीमारी के दिनों में दूसरों पर इच्छा रहते हुए भी आक्रमण कर सकना सम्भव नहीं होता। बुढ़ापा आने पर इन्द्रियों की शिथिलता काम सुख प्राप्त कर सकने की सम्भावना को समाप्त कर देती है। निर्धन उन खर्चीले विलासों का उपभोग नहीं कर सकता जिनके लिए उसकी लिप्सा, लालसा निरंतर बनी रहती है। विवशता की स्थिति में भी मनुष्य उन कामों से बच सकता है—बचा रह सकता है जो भले और बुरे की कसौटी पर कसे जाने पर हेय या त्याज्य समझे जाते हैं।
यह विवशता जन्य त्याग अथवा बचाव हो सके तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसे सदाचारी की पंक्ति में बैठने का अधिकार मिल गया। भीतर की अभिलाषाएँ और मान्यताएँ ही किसी को भला या बुरा बनाती हैं। उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर विविध−विधि क्रिया−कलापों का सृजन होता है।
बहुत दिनों से जिन्हें सज्जन, सदाचारी समझा जाता रहा है वे भी कभी−कभी ऐसे हेय कर्म कर बैठते हैं जिनकी अपेक्षा नहीं की जाती। बाहरी विश्लेषण करने पर यह सब अचानक या आकस्मिक हुआ प्रतीत होता है पर वास्तविकता कुछ और ही होती है। ऐसे लोग विवशता अथवा बनावट के कारण बाहर से सदाचरण की चादर ओढ़े रहते हैं पर भीतर ही भीतर अचिन्त्य चिन्तन करते रहते हैं। दुराचरण में रस लेते रहते हैं फलतः मनःस्थिति दुष्प्रवृत्तियों से समझौता कर लेती हैं और प्रकारान्तर से उनकी समर्थक बन जाती हैं। बाहर से विरोध भीतर से समर्थन भी दुहरे व्यक्तित्व वाली मनःस्थिति का होना कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। इन दिनों तो ऐसा बहुत अधिक ही होता है। दम्भ का अर्थ ही भीतर और बाहर की स्थिति में भिन्नता का होना है। छल, असत्य और मत्सर इसी मनःस्थिति के प्रतीक माने जाते हैं। जब तक अन्तःकरण ऐसा ही बना रहे तब तक किसी को सदाचारी की पंक्ति में बैठ सकने योग्य नहीं गिना जा सकता। बाध्य होकर निवाहा गया संयम एक विवशता भरी परिस्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
दण्ड का भय, क्षमता का अभाव, साधनों का न जुट पाना, परिस्थितियों का दबाव किसी दुराचारी और दुष्ट को भी सन्त सज्जन जैसी स्थिति में बने रहने के लिए बाध्य कर देता है; पर इससे न तो वह व्यक्ति प्रामाणिक बन जाता है और न सुसंस्कृत। ऐसे व्यक्ति अवसर मिलते ही अप्रमाणिक सिद्ध हो सकते हैं और अकरणीय कृत्य कर सकते हैं। नैष्ठिक सदाचारी के अन्तःकरण में जो प्रफुल्लता रहती है और आत्मशान्ति का जैसा अनुभव होना चाहिए उसकी झाँकी उन्हें कभी भी नहीं मिलती, निष्ठावान आदर्शवादिता ही अन्तःस्थिति को परिपक्व करती है। उसी में वह प्रेरणा रहती है जो भय और प्रलोभनों से भरी विषम स्थिति सामने आने पर ही मनुष्य को बिना डगमगाये अविचल खड़ा रख सके।
प्रखर व्यक्तित्व के लिए आन्तरिक निष्ठा का पोषण चाहिए। अन्तःकरण में गहराई तक जमी हुई आदर्शवादी आस्थाएँ ही आत्मबल का सृजन करती हैं और उसी सामर्थ्य के सहारे सामान्य मनुष्य का महामानव बन सकना सम्भव होता है। यही जीवन की महान सम्पदा है जिस पाने के बाद वह सब कुछ मिल जाता है जिसके लिए मनुष्य जन्म मिलता है। विवशता एवं विडम्बना के आधार पर चल रहा सदाचरण इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सकता उसे रेत के महल की तरह कभी भी ढहता हुआ देखा जा सकता है।
भोजन को उपयोगी वर्गीकरण की दृष्टि से छै भागों में बाँट सकते हैं—(1) जल (2) कार्बोहाइड्रेट (3) प्रोटीन (4) चिकनाई (5) विटामिन (6) खनिज तत्व। इनमें से तीन ईधन का काम करते हैं—कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन। शेष तीन शरीर की रासायनिक क्रियाओं में सहयोग देते हैं—इन छहों की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है—
जल—शरीर में तीन चौथाई भाग पानी का है। उसका बहुत सा अंश हर दिन मल−मूत्र, स्वेद, साँस आदि के साथ खर्च होता है शरीर की गर्मी का सन्तुलन बनाये रहने तथा रक्त संचार आदि में भी उसका खर्च पड़ता है इस सबकी पूर्ति पानी पीकर की जाती है, खाद्य−पदार्थों में भी जलीय अंश काफी रहता है। जल वस्तुतः एक आहार ही है। वह स्वच्छ और उपयोगी हो। हानिकारक तत्वों से मुक्त हो इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।
कार्बोहाइड्रेट—इन्हें दो भागों में बाँट सकते हैं—(1) श्वेतसार−स्टार्च—जो गेहूँ, चावल, जौ, चना, मक्का, बाजरा आदि अनाजों में, फल केला, सिंघाड़ा, अमरूद आदि में और आलू, अरबी, शकरकन्द, काशीफल आदि सब्जियों में विशेष रूप से पाया जाता है। यदि हम रोटी को कुछ देर चबाते रहें तो उसमें मिठास का स्वाद आने लगता है। मुख तथा पेट के रस इस श्वेतसार को शकर के रूप में बदल देते हैं। (2) दूसरी शुद्ध शकर है जो गन्ना, शहद, गाजर, अंगूर, किशमिश आदि खाद्य−पदार्थों में बहुलता के साथ मिलती है। इन श्वेतसार और शर्करा प्रधान खाद्य−पदार्थों की गणना कार्बोहाइड्रेट वर्ग में होती है।
चिकनाई—शरीर में चर्बी, माँस, त्वचा आदि में चिकनाई का अंश काफी रहता है। इसकी पूर्ति दूध, मक्खन, नारियल, मूँगफली, तिल, बादाम, काजू, अखरोट आदि उन पदार्थों से होती है जिनमें चिकनाई का अंश अधिक रहता है।
प्रोटीन—प्रोटीन शरीर को गर्मी तथा पोषण देने की दोनों की ही आवश्यकता पूरी करती है। इसलिए उसे खाद्य−पदार्थों में विशेष महत्व दिया जाता है। वह दूध, अनाज, फल, सब्जियों में पाई जाती है। दाल स्तर के फली वाले दो दल वाले अनाजों में चना, मटर, मूँग, उड़द, सोयाबीन, मूँगफली आदि में उसकी मात्रा विशेष पाई जाती है।
विटामिन—यह एक प्रकार का विशेष नमक है जो विभिन्न खाद्य−पदार्थों में विभिन्न वर्ग के पाये जाते हैं। छोटे रूप में इन्हें ए. वी. सी. डी. वर्ग में विभक्त कर सकते हैं। यों इनका विस्तार और वर्गीकरण काफी लम्बा−चौड़ा है। ए. वर्ग हरी पत्तियों वाले शाकों में गाजर, पपीता, दूध, दही आदि में अधिक रहता है। विटामिन बी. के लगभग एक दर्जन भेद हैं। वे आम, केला, चीकू,तोरई, मूली, पालक, सलाद, बथुआ आदि में विशेष रूप से रहते हैं। सी. वर्ग का विटामिन सन्तरा, नींबू, टमाटर, आँवला आदि खट्टे फलों में—गोभी, हरीमिर्च तथा दूसरी सब्जियों में पाया जाता है। विटामिन डी. दूध से बने पदार्थों में तथा सूर्य की धूप में विशेष रूप से रहता है।
खनिज तत्व—विटामिनों की तरह ही स्वल्प मात्रा में कुछ खनिज तत्वों की भी शरीर को जरूरत पड़ती है। हड्डियों में तो प्रायः उन्हीं की बहुलता होती है। रक्त में भी उनका अच्छा अंश रहता है। इन खनिजों में कैल्शियम और लोहा प्रधान है।
विटामिन ‘ए’—रोग निरोधक शक्ति की रक्षा—नेत्र−ज्योति एवं शारीरिक विकास का आधार। इसके अभाव में रतौंधी चर्म रोग आदि रोग उत्पन्न होते हैं।
इसका बाहुल्य गाजर, हरा सोयाबीन, हरी मटर, सरसों की पत्ती, टमाटर, सिंघाड़ा, चुकन्दर, गोभी, मक्खन, पनीर, दूध, मलाई, अखरोट, धीच, केला, रसभरी, सन्तरा अनानास आदि में रहता है।
विटामिन ‘बी.’—इसके अभाव में सशक्त ता का ह्रास भूख न लगना, कम्पन, थकान, माताओं का दूध न निकलना आदि बीमारियाँ खड़ी होती हैं।
इसका बाहुल्य—बिना पालिश किये, बिना मांड निकाले चावल में—मटर, जई, सोयाबीन, जौ, राई, चोकर समेत आटा, अंगूर, सन्तरा, अनानास, गोभी, शकरकन्द, केला, नींबू, खजूर, अंजीर, रसभरी, मतीरा आदि में रहता है।
विटामिन ‘सी.’—इसके अभाव में दाँतों का दर्द, पायरिया, सिर दर्द, वजन न बढ़ना, बच्चों का सूखा आदि बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं।
इसका बाहुल्य—सन्तरा, नींबू, टमाटर, अंगूर, सेब, रसभरी, गोभी, अनानास, अमरूद, केला, मकोय, पीच, गाजर, सरसों की पत्ती, गोभी, पालक आदि में रहता है।
विटामिन ‘डी.’—इसके अभाव में हड्डियाँ कमजोर पड़ती हैं और उनमें अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
इसकी बहुलता दूध, पनीर, मक्खन में रहती है। सवेरे की धूप सेकने एवं तेल मालिश करके धूप में बैठने से विटामिन ‘डी.’ शरीर को अनायास ही मिलता है।
विटामिन ‘ई.’ और ‘के.’ इसके अभाव में रक्त पतला पड़ जाता है और उसमें जमने की शक्ति घट जाती है।
इसे प्राय सभी प्रकार की हरी तरकारियों में और गेहूँ के चोकर में पाया जाता है। गोभी तथा पालक में यह अधिक रहती है।
खनिज लवणों में—कैल्शियम, लौह, आयोडीन, सिलिकन, मैगजीन आदि ऐसे हैं जिनकी शारीरिक सन्तुलन बनाये रहने के लिए अतीव आवश्यकता रहती है। वे कम पड़ने लगे तो हड्डियों की मजबूती, रक्त की सक्षमता, विजातीय तत्वों को बाहर निकालना, स्नायु संस्थान की बलिष्ठता आदि विशेषताएँ नष्ट होने लगेंगी ओर शरीर दुर्बल एवं रुग्ण रहने लगेगा। इन खनिजों—लवणों का बाहुल्य निम्न खाद्य−पदार्थों में पाया जाता है—
कैल्शियम—गाजर, गोभी, चुकन्दर, मूली, दूध आदि।
लौह—पालक, केला, सेब आदि।
आयोडीन—गाजर, गोभी, टमाटर आदि।
सिलिकन—सेब, मूली, गाजर, गोभी आदि।
मैंगनीज—खीरा, ककड़ी, गाजर, टमाटर, मटर एवं हरी सब्जियाँ।
गाजर में बिकने वाले विटामिनों के कैप्सूलों तथा गोलियों की निरर्थकता पर एक लम्बा लेख लिखते हुए अंग्रेजी की प्रख्यात पत्रिका ‘लाइफ नेचुरल’ में उन्हें ‘नकली विटामिन’ बताया गया है और कहा गया है कि इनसे मन बहलाने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता। स्वाभाविक खाद्य−पदार्थों के साथ यदि वे सन्तुलित क्रम के अनुसार ग्रहण नहीं किये गये हैं और अलग से खाये गये हैं तो बिना पचे ही बाहर निकल जायेंगे।
डा. जे. ई. आर. मैकडोनेध ने अपने ग्रन्थ ‘प्रेक्टिकल नेचर क्योर’ में औषधि रूप में विटामिनों के सेवन को निरर्थक बताया है, उनका कहना है कि जिन खाद्य−पदार्थों में विटामिनों घुले रहते हैं उनमें अन्य रसायनों के साथ उनका उपयोगी सन्तुलन बना रहता है। जब वे अलग से निकाल लिये जाते हैं तो सहयोगियों के अभाव में उनकी प्रकृति ही बदल जाती है और लाभ के स्थान पर हानि करने लगते हैं। रसायन विशेषज्ञ डा. जान प्राईड ने लिखा है—खाद्य−पदार्थों में से केवल विटामिन भाग अलग निकाल कर उन्हें सेवन करने से उस आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती जो प्रकृति प्रदत्त खाद्यों के साथ ग्रहण करने से होती है। अलग निकाले हुए विटामिनों का सेवन करने के परिणामों पर यदि विचार किया जाय तो प्रतिफल निराशाजनक ही सामने आवेगा।
भोजन सन्तुलन का यह अनुपात सर्वोत्तम है। (1) 20 प्रतिशत उबली हुई सब्जियाँ (2) 20 प्रतिशत कच्ची सलाद (3) 20 प्रतिशत दूध, दही (4) 20 प्रतिशत दाल, रोटी, चावल आदि अन्न। दिन में दो बार से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। प्राय दूध, छाछ, नींबू, शहद जैसा कोई गुणकारी पेय लिया जा सकता है।
यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि सज्जनों के साथ प्रेम और दुष्टों के साथ घृणा बरतनी चाहिए। घृणा एक मारक विष है उससे दूसरों का अहित हो सकता है यह सही है, पर यह और भी अधिक सही है कि घृणा जहाँ कहीं भी रहती है उस अन्तःकरण को अनेकानेक दुष्ट चिन्तनों की दुर्गन्ध से भर देती है। घृणा का अभ्यासी इतना शंकाशील और विग्रही हो जाता है कि फिर उसके लिए सज्जनों के प्रति भी श्रद्धा और विश्वास रख सकना सम्भव नहीं रहता। दुष्टता का गहरा चिन्तन करने पर ही घृणा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति या स्थिति का निकृष्ट स्तर ही उभरता है और मस्तिष्क पर छाया रहता है। इस विषाक्त घुटन से अपना चिन्तन तन्त्र ही सड़−गल जाता है फिर उसके लिए कोई ऊँची बात सोच सकना तक कठिन हो जाता है।
घृणा से संघर्ष की वृत्ति उपजती है और अवाँछनीयता से अधिक तत्परतापूर्वक लड़ सकना सम्भव हो जाता है यह सही है। तीव्र घृणा मन में भरी रहे तो शत्रु पर तीखे प्रहार कर सकना बन पड़ता है यह भी सही है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि आक्रमण की अभ्यस्त मनोभूमि फिर केवल उसी प्रयोजन के उपयुक्त बनकर रह जाती है। उसे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सकना कठिन होता है। ऐसे लोगों के सामने जब शत्रु पक्ष नहीं रहता तो वे अपनों का ही विनाश करने में लग जाते हैं। आक्रमण की आदत को अपनी तृप्ति के लिए आखिर कुछ तो चाहिए। शत्रु न सही−मित्र ही सही। क्रूर कर्मों में निरत व्यक्ति जितने भयंकर बाहर वालों के लिए होते हैं उतने ही निर्मम स्वजनों के लिए भी होते हैं। तनिक सी बात पर वे अपने ही स्त्री, बच्चों तक की हत्या करने पर उतर आते हैं। क्रूर−कर्म और क्रूर चिन्तन उनकी ममता को−कोमल भावना को एक प्रकार से समाप्त ही करके रख देता है। यह हानि इतनी बड़ी है जिसकी तुलना में घृणास्पद का विनाश करना भी कम महत्व का रह जाता है।
प्रेम हमारे जीवन की प्रमुख नीति होनी चाहिए। मल−मूत्र और हाड़−माँस की गठरी इस कष्टों में रहने के लिए आत्मा इसलिए तैयार हुआ कि उसे मानव शरीर में रहते हुए प्रेम का अमृत चखने के लिए मिलेगा। वस्तुतः प्रेम से मधुर इस जीवन में और कुछ है ही नहीं। दूसरों के साथ सद्भाव भरी आत्मीयता जोड़ने से वह प्रिय लगते हैं और सुन्दर भी।
छिद्रान्वेषण की दृष्टि बदल जाने पर जब उनके साथ गुणग्राही संपर्क बनाया जाता है तब प्रतीत होता है कि पहले जितनी बुराइयाँ सोची गई थीं वस्तुतः उनमें उतनी थी नहीं। जो थीं वे बिना विद्वेष के शस्त्र का प्रहार किये अपेक्षाकृत अधिक सौम्य उपायों से अधिक अच्छी तरह हल की जा सकती थीं। प्रेम की धार—घृणा की अपेक्षा कहीं अधिक पैनी है। दण्ड देने में जितनी शक्ति खर्च होती है और सुधार का जितना परिणाम सामने आता है उसकी अपेक्षा प्रेम का प्रहार करने पर अधिक सरलता से अधिक सुधार हो सकना सम्भव है।
घृणा से प्रेरित आक्रमण की नीति से अपने द्वेष प्रतिशोध की आँशिक तृप्ति हो सकती है, पर उससे आक्रमण प्रत्याक्रमण का—विद्वेष प्रतिशोध का ऐसा कुचक्र चल पड़ता है जो मूलकारण अथवा मूल हानि की तुलना में अत्यधिक भयानक सिद्ध होता है। कई बार तो यह कुचक्र इतना विघातक होता है कि जो हानि आरम्भ में हो रही थी उसकी तुलना में भी अधिक कष्ट−साध्य समस्याएँ उलझकर सामने आ खड़ी हों।
इसका यह अर्थ किसी भी प्रकार नहीं कि अन्याय को सहन किया जाय और अनीति को प्रथम दिया जाय अथवा जो अवांछनियताएं चल रही हैं उन्हें चलने ही दिया जाए। ऐसी सहन शीलता तो दुर्बलता और कायरता ही मानी जायगी और आतंकवादियों का अधिक खेल खेलने का डडडड डडडड डडडड डडडड तो करना हो चाहिए अवाँछनीयता को रोकने के लिए साहसिक कदम तो बढ़ाना ही चाहिए; किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह प्रतिशोध घृणा युक्त ही हो।
रोग को मारने के लिए रोगी को भी मार डालना आवश्यक नहीं। दुष्प्रवृत्तियों को दूर करना और उनमें निरत व्यक्ति को दुष्कर्मों से छुड़ा देना कठिन तो अवश्य है पर असम्भव नहीं। हमें कठिन कार्य को हाथ में लेना चाहिए और पापी से प्रेम और पाप से घृणा के परिष्कृत शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए। डाक्टर यही करता है वह बीमारी को मारने में अपने सभी शस्त्रों प्रयोग करता है, पर साथ ही वह भी ध्यान रखता है कि कहीं रोगी ही उस प्रहार से दम न तोड़ दे। रोगी को बचाने और रोग को मारने में जिस कुशलता का प्रयोग डाक्टर करता है उसी नीति को हम भी कार्यान्वित कर सकते हैं।
मनुष्य की आत्मा मूलतः पवित्र है। उसका सृजन जिन तत्वों से हुआ है वे उत्कृष्ट स्तर के हैं। इसलिए हर मनुष्य की मूलसत्ता के प्रति हमें आस्थावान होना चाहिए। परिस्थितियों के वशीभूत होकर ही लोग बुरे बनते हैं और बुरे आचरण करते हैं। यदि उन कारणों को हटाया जा सके तो कोई भी मनुष्य जो आज घृणित दिखाई पड़ता है कल सज्जन के रूप में सामने आ सकता है।
दर्पण के सामने जिस रंग का पर्दा टँगा होगा सारा दर्पण उसी रंग का दिखाई देगा। इस पर्दे को हटा दिया जाय तो कोई रंग दर्पण में न रहेगा। इसके बाद यदि दूसरे रंग का पर्दा टाँग दिया जाय तो फिर वह उसी बदले हुए रंग का दिखाई पड़ने लगेगा। मनुष्य दर्पण की तरह है। संपर्क और परिस्थितियों के रंग उस पर चमकते हैं तो वह उसी स्तर का दिखाई पड़ने लगता है। यदि कोई रंग अरुचिकर दीख रहा है तो दर्पण तोड़ने की अपेक्षा यही अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है कि अनुपयुक्त रंग का पर्दा हटाकर उसके स्थान पर दूसरे उपयुक्त रंग का वहाँ टाँगा जाय।
आज का बुरा मनुष्य कल भला बन सकता है इसके अगणित उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर भरे पड़े हैं। अशोक बगुलमाल, अम्बपाला, वाल्मीकि, विल्वमगल, अजामिल जैसे अनेक उदाहरण सदा ही प्रस्तुत होते रहे हैं जिनके आधार पर एक समय बुरे समझे जाने वाले व्यक्तियों का आश्चर्यजनक सुधार हुआ है और वे पूर्व भूमिका में जितने भयंकर थे उत्तर भूमिका में वे उतने ही अभिनन्दनीय सिद्ध हुए। व्यक्ति को नष्ट करके उसके दोषों को नष्ट करना घटिया स्तर का आवेशपूर्ण कृत्य है। ऐसे घटनाक्रम म अपवाद रूप में ही उपयुक्त हो सकते हैं। जब सुधार के सभी प्रयत्न निरर्थक सिद्ध हों और व्यक्ति पूर्णतया सड़−गल गया हो तभी उसके पूर्ण विनाश की बात सोचनी चाहिए। उससे पूर्व शक्ति भर प्रयत्न यही करना चाहिए कि व्यक्ति को बुराई से विरत करके उसे भलाई के आश्रय तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की जा सके।
विवेक हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि घृणा की अपेक्षा अधिक कारगर शस्त्र प्रेम का प्रयोग करे और ध्वंस की अपेक्षा सुधार कार्य में निरत हों।
खुश करने की कला, खुश रहने की आदत के साथ जुड़ी हुई है। दूसरों के प्रिय बनने के लिए आवश्यक है कि अपने आपसे सन्तुष्ट रहना सीखें।
—हैजलिट
ऊष्मा रगड़ से पैदा होती है। यह ऊष्मा ही विविध प्रकार की हलचलों की जननी है। हलचलें परिणाम उत्पन्न करती हैं। हमारे मनोरथ किसी इच्छित परिस्थिति के प्राप्त करने के लिए आतुर होते हैं। उस आतुरता की पूर्ति के लिए अमुक स्तर की हलचलों का उत्पन्न होना आवश्यक होता है। यह हलचलें किसी ऊष्मा की अपेक्षा रखती हैं। यह ऊष्मा रगड़ का क्रम चलने पर निर्भर है।
प्रकारान्तर से इसी बात का यों भी कहा जा सकता है कि रगड़ ही उस ऊष्मा को जन्म देती है जो हमारे मनोरथ पूरे करने वाली परिस्थितियाँ एवं हलचलों का सृजन कर सके। किसी के मनोरथ अनायास ही पूरे नहीं हो जाते। छप्पर फाड़ कर किसी पर सम्पत्तियाँ या सफलताएँ टपक पड़ेंगी ऐसा सोचा तो जाता है, पर होता नहीं। छोटे−बड़े प्रत्येक मनोरथ की पूर्ति के लिए समुचित श्रम करने एवं मनोयोग नियोजित करने की आवश्यकता पड़ती है। जो इस शाश्वत सत्य से बचने क प्रयत्न करेगा, बिना उचित मूल्य चुकाये समृद्धि प्रगति या सुखद परिस्थितियों के मिलने की कल्पना करेगा उसे निराश ही रहना पड़ेगा। नियति के विधान में प्रबल पुरुषार्थ की परीक्षा लेकर उपयुक्त अनुदान देने की व्यवस्था है। इसके अपवाद यदाकदा ही देखने को मिलते हैं।
हवा के आकाश तत्व से टकराने पर—अग्नि उत्पन्न होती है यही बिजली या गर्मी है। गर्मी से जीवन उत्पन्न होती है। पेड़−पौधों से लेकर विभिन्न आकृति−प्रकृति के जीवधारियों तक की उत्पत्ति गर्मी से होती है। जीवन गर्मी से उत्पन्न हुआ और गर्मी रगड़ से उत्पन्न हुई। यह सृष्टि की आदि प्रक्रिया आगे चलकर संसार के समस्त जड़−चेतन परिकर में काम करती है। रगड़ का प्रतिफल ही विभिन्न प्रकार के उन उत्पादनों के रूप में दृष्टिगोचर होता है जो हमारे मनोरथों की पूर्ति में आधार भूत भूमिका प्रस्तुत करते हैं।
रगड़ का दूसरा नाम है संघर्ष। जीव की उत्पत्ति जिस रतिक्रिया से होती है वह जनक जननी की जननेन्द्रियों की संघर्ष चेष्टा में निरत करती है। इसी ऊष्मा उत्तेजना से डिम्ब कीट और शुक्रकीट अपनी निष्क्रियता को छोड़कर सचेतन उत्साहित होते हैं और भ्रूण स्थापना का प्रकरण आरम्भ होता है। जिस मिथुन कर्म से नवीन प्राणियों की सृष्टि होती है उसे संघर्ष के अतिरिक्त और क्या कहा जाय? रगड़ की गर्मी से ही विविध−विधि भौतिकी हलचलें इस सृष्टि से होती हैं और उन्हीं से शक्ति धाराओं का उद्भव होता है। अन्तरिक्ष के साथ रगड़ खाती हुई धरती की तेज चाल ने ही उसमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न की है। सूर्य की किरणें धरती से टकराकर जब वापिस उछलती हैं तभी वह गर्मी और रोशनी हमें मिलती है जिससे जीवन विकास की अनेकानेक सम्भावनाएँ उत्पन्न हो सकीं।
प्रगतिशील जीवन नीति का आवश्यक ही नहीं अनिवार्य अंग है—संघर्ष। इससे बच निकलने की बात सोचना निरर्थक है। संघर्ष से बचने पर हमें मरण ही हाथ लगेगा। श्वाँस−प्रश्वाँस, रक्त −संचार, माँस−पेशियों का आकुंचन, प्रकुंचन, हृदय की धड़कन, ज्ञान−तन्तुओं का विद्युत प्रवाह सभी शरीरगत क्रिया−कलापों के अंतर्गत घड़ी के पेंडुलम की तरह एक संघर्ष प्रकरण अनवरत रीति से चल रहा है। जीवन का यही लक्षण है। यदि शरीर इस महा मंथन से बचने की चेष्टा करेगा तो मरण सामने आ खड़ा होगा। संघर्ष का एकमात्र विकल्प मरण ही है। जो संघर्ष से डरता है उसे पूर्ण मृतक न सही अर्ध मृतक से अच्छी स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती उसके लिए किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते रहने के अतिरिक्त प्रगति के सभी द्वार बन्द है। उसे सभी मनोरथ छोड़कर किसी प्रकार दिन कटते रहने से आगे की बात सोचनी ही नहीं चाहिए। अन्यथा आकाँक्षा करना और निराशा होना एक नया सिर−दर्द बनकर मनःस्थिति उत्पन्न करता रहेगा।
भूमि का पेट चीरकर ही उसमें अनाज बोया जाता है। घास−पात को छीलने, उखाड़ने से ही उपयोगी पौधों की रक्षा सम्भव है। वन्य पशुओं और पक्षियों से खेत की रखवाली किये बिना किस किसान को मनचाही फसल हाथ लगी है। कुदाल, हल, फावड़ा, हंसिया जैसे शस्त्र लेकर जब वह भूमि से लड़ने, खोदने, जोतने के लिए तत्पर होता है तब उसी पुरुषार्थ का प्रतिफल उसे धन−धान्य के रूप में उपलब्ध होता है।
लुहार की भट्टी गरम करते—धातुओं के तपाते और भारी हथौड़ों का प्रहार करते हुए देखकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि धातु जैसी कठोर प्रकृति संरचना को भी पिघलाना, मोड़ना और ढालना सम्भव हो सकता है, पर यह सम्भावना सभी मूर्तिमान होती है जब उसके साथ कठिन संघर्ष की आवश्यक व्यवस्था जमाकर रख ली जाय।
पहलवान अपनी माँस पेशियों के साथ लड़ता है। दण्ड बैठक से लेकर डम्बल, मुद्गर तक अनेकानेक व्यायाम साधन उसे जुटाने पड़ते हैं और अंग प्रत्यंग में बसी हुई कोमल आरामतलबी के साथ भारी उठक पटक करने में निरत होना पड़ता है। तेल मालिश में रही बची कसर भी पूरी करली जाती है। जो इस झंझट से बचने का प्रयत्न करेगा उसका पहलवान बन सकना अशक्य है। उस प्रकार के स्वप्न देखने लगने पर तो उसका क्षोभ एवं उद्वेग ही बढ़ेगा।
रक्त के श्वेत कण विजातीय द्रव्यों एवं रोग कीटाणुओं से लड़ने के लिए जब तक तत्पर सक्षम रहते हैं तब तक शरीर बीमार नहीं पड़ता पर जब श्वेत कणों में शिथिलता आती है तो आये दिन नये−नये रोगों के आक्रमण का सिलसिला चल पड़ता है और वह तब तक चलता ही रहता है जब तक मौत आकर उस झंझट का अन्तिम निपटारा नहीं कर देती।
मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू जैसे नगण्य से कृमि कीटक मनुष्य की सतर्कता को चुनौती देते हैं। हवा में उड़ने वाले अदृश्य विषाणु प्राणघात करने की घात लगाते है। यदि उनसे बचने की क्षमता और सजगता न रहे तो हमें प्रकृति की स्वाभाविक हलचलें सर्दी−गर्मी ही धर दबोचेगी। वे तत्व उदरस्थ कर जाने में सफल हो जायेंगे जो देखने में अत्यन्त नगण्य एवं तुच्छ प्रतीत होते हैं। असावधानी से पकाया और खाया गया भोजन भी विष का काम करता है।
इस संसार में ऐसे उपयोगी तत्व बहुत हैं जिन्हें प्राप्त करने की हमें अभिलाषा, आकाँक्षा रहती है। इन्हें प्राप्त करने के लिए अथक परिश्रम और दूरगामी विवेक चिन्तन का आश्रय लेकर ही उपार्जित किया जा सकता है। विद्या, बुद्धि, बलिष्ठता, प्रतिभा एवं गुण, कर्म, स्वभाव सम्बन्धी उत्कृष्टता के आधार पर ही सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ जा सकता है। यह विभूतियाँ अनायास ही किसी को प्राप्त नहीं हो जाती। प्रबल इच्छा शक्ति एवं अथक अभ्यास के आधार पर ही इन्हें उगाया, बढ़ाया जाता है। यही बात बाह्य सफलताओं के सम्बन्ध में भी है। धन से लेकर यश तक अनेकानेक सम्पदाएँ अनवरत श्रम−शीलता की अपेक्षा करती है। केवल पुरुषार्थी ही उन्हें प्राप्त करते हैं। जिन्होंने बिना उचित परिश्रम किये इन्हें पाया वे उन्हें न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न उनके सदुपयोग से प्राप्त हो सकने वाले लाभ से लाभान्वित होते हैं।
इस सृष्टि का एक नियम उपयोगी का चुनाव भी है। प्रकृति चाहती है कि उसके उद्यान में केवल मजबूत पौधे हो जीवित रहें और शोभा बढ़ायें। माली आये दिन खरपतवार उखाड़ कर फेंकता है और टेड़ी−मेढ़ी डालियाँ काट छाँटकर अलग करता है। बीमार और अविकसित पौधे हटाने पड़ते हैं ताकि उनके द्वारा घेरी गई जमीन एवं खुराक की बचत करके मजबूत पौधों को बढ़ाने का उपयुक्त साधन बन सके। कमजोर शरीर और कमजोर मन लेकर हम इस सृष्टि को कुरूप ही बना सकते हैं। प्रकृति को यह सहन नहीं। दैव को दुर्बल का घातक माना गया है। दार्शनिक इस क्रम की उपयुक्त ता की पुष्टि इस प्रतिपादन के साथ करते हुए सुने जाते हैं कि संसार की सुदृढ़ता और सुन्दरता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है अन्यथा गन्दगी, दुर्बलता और कुरूपता के अतिरिक्त यहाँ कुछ बचेगा ही नहीं।
सज्जनोचित व्यवहार करना और सदाशयता की शान्ति प्रिय नीति अपनाना उचित है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि इस संसार में दुष्टता की कमी नहीं और वह अपना पहला शिकार सहज विश्वासी भोले भाले लोगों को बनाती है। ठगी और जालसाजी के शिकार प्रायः ऐसे ही लोग होते हैं। हम सज्जन भर बनें पर यह न भूल जायें कि दुर्जनता के वातावरण की साधना हमें चारों ओर से घेरे हुई है। उससे सतर्क रहे बिना कोई गति नहीं। आक्रमण को अवश्य नहीं तो असफल बना सकने वाली सामर्थ्य तो हमें जुटानी ही चाहिए।
दुष्टता का आक्रमण प्रायः वहाँ होता है जहाँ वह प्रतिरोध की सम्भावना कम देखती है। जहाँ प्रबल प्रतिरोध की आशंका रहती है वहाँ दुष्टता भी अपना पंजा फैलाते हुए डरती है। दुष्टता के आघात आक्रमण सहते हुए बर्बाद होने की अपेक्षा यह उत्तम है कि आत्म−रक्षा की मोंचबिन्दी करने के लिए पहले से ही इतनी सुदृढ़ दीवार खड़ी कर कि उससे टकराने की हिम्मत करने से पहले प्रतिपक्षी को हजार बार सोच−विचार करना पड़े। शक्ति का प्रदर्शन किया जा सके तो शक्ति के प्रयोग की आवश्यकता कम ही पड़ती है।
संसार में सज्जनता अधिक है और दुर्जनता कम। पर दुष्टता को बार बार सफल होने का लाभ इसलिए मिल जाता है किस सज्जनता जब संघर्ष का समय आता है तो हतप्रभ होकर बैठ जाती है और उद्दंड असुरता स्वल्प शक्ति सम्पन्न होते हुए भी प्रतिरोध के अभाव में मनमाना लाभ कमा लेती है। असुरता की विजय का कारण उसकी वरिष्ठता नहीं समझी जानी चाहिए वरन् यह सोचना चाहिए कि देवत्व के साथ साहसिकता की समुचित मात्रा न रहने से उसे अपने अधूरेपन का दण्ड भुगतना पड़ा। सज्जन को सशक्त भी होना चाहिए और संघर्ष रत भी।
हम स्वयं भले हैं—भले आचरण करते हैं तो उसका अर्थ किसी भी प्रकार यह नहीं होता कि दूसरे लोग भी वैसा ही करेंगे। वृषभ की सज्जनता मान्य है, पर सिंह, व्याघ्र से वैसी ही आशा नहीं की जा सकती। दुष्टता के साथ सज्जनता भरा व्यवहार यही हो सकता है कि उसे पनपने और सफल होने का अवसर न मिलने दिया जाय। सुरक्षात्मक व्यवस्था इतनी मजबूत रखी जाय कि टकराने पर दुष्टता को अपना शिर फूटने का खतरा स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे।
अकारण किसी से लड़ने, फिरने या अन्यायपूर्वक आतंक फैलाने की बात बुरी है। उसे छोड़ना चाहिए और छुड़ाना भी। इतनी तैयारी तो रखने ही चाहिए कि उद्दण्ड अनाचार को निरस्त करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य की कमी अनुभव न हो। इसके लिए शरीर बल, मनोबल, साधन बल सभी जुटाने चाहिए। साथ ही सज्जनों की समर्थ संगठन शक्ति का ऐसा विकास करना चाहिए कि कहीं भी आक्रमण होने पर सज्जनों की सेना उससे निपटने के लिए एक जुट होकर सामना कर सकें।
हमें ऊँचा उठना हो— आगे बढ़ना हो तो गुण, कर्म स्वभाव की—क्षमता एवं प्रतिभा की सम्पदा बढ़ानी चाहिए। शरीर को बलिष्ठता एवं मन को विद्या बुद्धि से सुसम्पन्न बनाना चाहिए। अभीष्ट उपलब्धियों के लिए कठोर एवं अनवरत परिश्रम करने की आदत डालनी चाहिए। स्मरण रखना चाहिए, अधीर अव्यवस्थित, उत्तेजित और शंकालु मस्तिष्क एक प्रकार का ऐसा अभिशाप है जो किसी भी दिशा में सफलता के दर्शन नहीं होने देता। धैर्यवान, साहसी, आशान्वित, मनस्वी लोग ही दूरगामी योजनाएँ बनाते हैं—मार्ग की कठिनाइयों को समझते हैं—आवश्यक साधन जुटाने हैं और इन प्रयत्नों में निरत रहते हुए जिन व्यवधानों का सामना करना पड़ता है उनसे निपटने की शान्त चित्त से तैयारी करते हैं।
प्रगतिशील एवं सफल सन्तुष्ट जीवन की सकने के लिए जिन क्षमताओं और साधनों की आवश्यकता है उन्हें हम अन्तःक्षेत्र में और बाह्य क्षेत्र में संघर्ष रत रहकर ही उपलब्ध कर सकते हैं। क्या आत्मिक और क्या भौतिक सभी उपलब्धियाँ केवल उन्हीं के लिए सुरक्षित हैं जो अभावों और प्रतिरोध से जूझने के लिए अभीष्ट साहस एवं प्रयास कर सके। वस्तुतः संघर्ष ही जीवन और प्रमाद ही मरण
अन्तरिक्ष में भ्रमण करती उच्छृंखल उल्काएँ इतनी विचित्र हैं कि अपनी जिन्दगी मौत का विचार किये बिना उस यात्रा पर निकल पड़ती है जहाँ जाये बिना उनका काम बराबर चलता रह सकता है। किन्तु उच्छृंखलता तो उच्छृंखलता ही है। ‘छोटा−सो बड़ा खोटा’ वाली कहावत इन पर पूरी तरह लागू होती है। अपनी और दूसरों की हानि का विचार किये बिना जिन्हें कुछ भी कर गुजरने का जोश उठता है उन्हें कौन समझा सकता है वे किस की सुनते हैं।
यूनान की पौराणिक गाथाओं में एक ऐसे दुस्साहसी युवक का उल्लेख है जो नकली पर लगाकर सूर्य से मुलाकात करने निकल पड़ा था। बहुत ऊँचा उड़ने पर उसके मोम से चिपके पंख गल−जल गये और वह औंधे मुँह समुद्र में आ गिरा उसी में अन्त हो गया। इस युवक का नाम था— इकोरस।
ठीक ऐसा ही एक उल्का पिण्ड इन दिनों खगोलवेत्ताओं ने देखा है जो कभी सूर्य के और कभी पृथ्वी के इतना निकट आ पहुँचता है कि अब मरा तब मरा ही होती रहती है। चपेट में आया तो यह बुध, मंगल अथवा शुक्र से भी टकरा सकता है। यह कई बार इनकी कक्षाओं में भी जा घुसता है। सूर्य के सबसे निकट जा पहुँचने वाले पिंड में इस अकेले ने ही कीर्तिमान स्थापित किया है। उस परिधि में पहुँचकर वह तपता हुआ आग का गोला ही बन जाता है। कभी वह इतनी दूर चला जाता है वहाँ शीत की अति ही होती है।
आस्ट्रेलिया के खगोल शास्त्रियों ने इकोरस की गतिविधियों को देखते हुए उसके पृथ्वी से आ टकराने की आशंका व्यक्त की थी। यदि वह भविष्यवाणी सही निकलती तो लाखों वर्ग मील जमीन में गहरा गड्ढा हो जाता भयंकर आग लग जाती है और करोड़ों मनुष्यों का सफाया हो जाता है। सन् 1908 में मात्र हजार फुट व्यास की एक उल्का साइबेरिया के जंगल में जा गिरी थी और उसने अणुबम विस्फोट जैसे दृश्य उपस्थित किये थे। इकोरस का कलेवर तो इससे हजारों गुना बड़ा है।
इस उच्छृंखलता के कुचक्र में फँसी हुई और भी कई उल्काएँ इससे पहले भी देखी गई हैं।
हिडालगो—इरोस, अलवर्टं, अलिण्डा, एयोर, अपोलो, एडोरस, हर्मेस उल्काओं की गतिविधियाँ भी ऐसी ही पाई गई हैं। उनके ऊपर वैज्ञानिकों का ध्यान बराबर बना रहता है। वे पृथ्वी के इतनी निकट आ पहुँचती है और ऐसी विचित्र कक्षाओं में घूमती हैं कि सदा टकराव का खतरा बना रहता है।
करोड़ों वर्ष पूर्व मंगल और बृहस्पति के बीच में एक विशालकाय ग्रह था वह भी ऐसे ही अपनी शालीनता छोड़ कर किसी ग्रह से जा टकराया और चूर−चूर हो गया था। यह उल्का पिण्ड उसी की टूटी−फूटी हड्डियों से उपजे भूतप्रेत हैं और अपने बाप की तरह ही किसी से भी सिर फोड़ने के लिए उतावले फिरते हैं।
इनमें से इमेस की लम्बाई 15 मील और चौड़ाई 5 मील नापी गई थी। इसी से थोड़ी न्यूनाधिक मात्रा में उपनिकट से गुजरा था तो संसार भर के अखबारों ने उसकी आशंका डरावने शीर्षकों से व्यक्त की थी जैसे ‘संसार के सर्वनाश में पाँच घण्टे की देर’—’पृथ्वी से टकराने के लिए चल पड़ा एक क्षुद्र ग्रह’ आदि।
समझा जाता है कि इकारस पृथ्वी वालों को तो डराता, धमकाता भर ही रहेगा, पर किसी दिन सूर्य को जीभ निकाल कर और अँगूठा दिखाकर चिढ़ाने वाला यह धीठलु उद्दंड उसकी पकड़ में आ गया तो फिर भुर्ता बन कर ही रहेगा। उच्छृंखलता सदा दुहल नहीं रह सकती समय उसके कान पकड़ कर करारे तमाचे कल नहीं तो परसों लगा देगा और उसकी सारी शेखी धूल में मिल जायगी।
जार्ज बर्नार्डशा ने अपनी पुस्तक ‘रिवूलेशन इन लाँट’ में लिखा है नारी की स्थिति किसी समाज कर दर्पण है। पं. नेहरू का कथन है—जिस देश के बारे में कुछ नहीं जानता उसका मूल्याँकन करने के लिए मैं उस देश की महिलाओं की स्थिति और लोहा तथा बिजली उत्पन्न होने का विवरण जानना चाहूँगा।
योग वशिष्ठ में मृत्यु सम्बोधित करते हुए कहा गया है—
मृत्यो न किंन्विच्छक्य स्त्वमेको मारयितुँ वालात् मारणीयस्य कर्माणि तत्कतृणीति नेतरम्।
हे मृत्यु, आप अकेले—अपने ही बल से किसी को नहीं मार सकतीं। जो मरता है अपने ही कर्मों से मारता है— आप तो निमित्त मात्र हैं।
वस्तुतः हम दीर्घजीवन के सर्वथा उपयुक्त अच्छा−खासा शरीर यन्त्र लेकर चले हैं उसे सँभाल कर रखे तो लम्बी आयु तक सहज ही जिया जा सकता है। उसके लिए कुछ विशेष उपाय करने या रहस्य खोजने की आवश्यकता नहीं, केवल इतना ही पर्याप्त है कि इस सुन्दर यन्त्र की नटखट बच्चो की तरह तोड़−फोड़ करना बन्द कर दें और प्रकृति प्रेरणा के अनुसार सादा सरल और शान्त जीवन जियें।
मनीषी मैक्स वार्म वण्ड कहते थे यह ठीक है कि हम मृत्यु को टाल नहीं सकते। और यह भी गलत नहीं कि बुद्धिमानी के साथ जीवन जिये जाय तो मौत को वर्षों पीछे धकेला जा सकता है।
भूतकाल में लोग सैकड़ों वर्ष लम्बी जिन्दगी जीते थे। आज भी डेढ़ सौ से ऊपर आयु के मनुष्य जीवित हैं। सौ वर्ष तो न्यूनतम आयु मानी गई है यदि इस दीपक को जान−बूझकर रुझान की हरकतें न की जायँ तो वह दो सौ या उनसे भी अधिक समय तक आसानी से जीवित रह सकता है।
संसार के दीर्घजीवियों से संपर्क साध कर शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने का प्रयत्न किया है कि वे क्योंकर इतने अधिक समय तक जीवित रह सके जितने तक कि आमतौर से जीवित नहीं रहा जाता। रहस्यों की खोज करने वालों के हाथ सादगी, सरलता, नियमितता और सन्तुष्ट प्रसन्न चित्त रहने जैसी वे सामान्य बातें ही हाथ लगी हैं जिन्हें जानते तो हम सभी हैं पर मानने से पग−पग पर इनकार करते रहते हैं।
मिस्र के सिकन्दरिया शहर से 143 मील दक्षिण पश्चिम कोण में एक गाँव है—गाजियाना। यहाँ कुछ समय पूर्व तक एक दीर्घजीवी किसान रहते थे 107 वर्षीय रजा वका। उनमें सबसे अनोखी बात यह थी कि इस उम्र में भी उनकी चमड़ी पर झुर्री नहीं पड़ी थी। दाँत सभी देखकर कोई उन्हें 40 वर्ष से अधिक का नहीं बता सकता था। पर सचाई तो सचाई ही थी। 107 वर्ष की उम्र को सिद्ध करने वाले इतने प्रमाण थे जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता था।
फ्राँस के सर्जन जनरल वेत्ताँरोशे अपने अनुसंधान दल समेत रजा वका के गाँव गये थे और चार दिन तक उस किसान के पास रहे थे, स्वीडन का एक स्वास्थ्य गाँधी दल डा. लेसर वेस के नेतृत्व में वहाँ पहुँचा था। अन्य दलों से भी जिज्ञासुओं के जत्थे यह जानने के लिए उस देहात में पहुँचते थे कि इतने लम्बे समय तक वृद्धावस्था के लक्षणों को रोके रह सकने का क्या कारण हो सकता है
कोई रहस्यमय बात बताने लायक रजा वका के पास कुछ नहीं थी। वह नपे तुले शब्दों में इतना ही बता पाता था। वह एक अशिक्षित और गरीब किसान है। खेतों में हो पैदा हुआ और पला है। वर्षात के अलावा और कभी छत के नीचे नहीं सोया। मैंने कभी न माँस खाया न शराब पीयी। आठ घण्टे कसकर परिश्रम—तैरना —पेड़ों पर चढ़ना मेरा दैनिक कार्य रहा है। 9 गज कपड़े से तन ढककर साल काट लेना। मेरा न किसी से दूध रहा और न कभी चिन्ताओं ने मुझे घेरा। हर्ष शोक के बुरे−भले दिन आते जाते रहे हैं पर उन सभी को खुदा की मर्जी मानकर सन्तोष के दिन गुजारता रहा हूँ।
ब्रिटेन की दो कुमारिकाएँ इतने स्नेह सौजन्य के साथ घुल−मिलकर जीवित रहीं कि उनके प्रेम को आदर्श माना जाता रहा है। दोनों साथ−साथ हँसती, खेलती, खाती, सोती और काम करती थीं इनमें तीन वर्ष बड़ी थी कुमारी जन वैडलेण्ड और छोटी थी कैरोलीन। दोनों ने घनिष्ठ आत्मीयता का भरपूर और सर्वांगीण रसास्वादन किया। अस्तु वे न केवल हर दृष्टि से सुखी सन्तुष्ट एवं प्रफुल्लित दिखाई पड़ती थीं वरन् आश्चर्यजनक रूप से दीर्घजीवी भी हुई। बड़ी जैन 105 वर्ष की उम्र तक जीवित रही और छोटी कैरोलीन 102 वर्ष तक। छोटी 11 दिन पहले मरी और बड़ी ने इतने दिन भी कठिनाई से काटे और महाप्रयाण के मार्ग पर इसलिए चल पड़ी कि संभवतः उसे फिर अपनी सहेली के साथ रहने का अवसर मिल सकेगा।
‘नार्थ चाइन हैरल्ड’ में उत्तर चीन के शाँगचुआन ग्राम के निवासी वानशियन—जिच नामक वृद्ध की आयु के हुए यह सिद्ध किया गया है कि वह 255 वर्ष तक जिया। उसका भोजन पूर्ण शाकाहारी था और दिन में दो बार ही जो कुछ खाना होता खाता था। लन्दन के थार्म्स कार्न के बारे में भी ऐसा ही दावा किया जाता है कि वे 207 वर्ष की आयु भोग कर मरे थे।
फ्राँस की कोन्टेस डैस्मण्ड कैथराइन, अमेरिका के लुई ट्रस्को लैसोस का सवीना, टेवस बार की चार लैट डैसीन के बारे में भी यही कहा जाता है कि उनने डेढ़ सौ वर्ष के लगभग का दीर्घायुष्य प्राप्त किया है। वे सभी मिताहारी थे। संसार में सबसे अधिक दीर्घजीवी बलगेरिया में पाये जाते हैं और वे लोग प्राय मांसाहार से दूर रहते हैं।
सोवियत रूस का 160 वर्षीय दीर्घजीवी दार जाबू नामक एक छोटे गाँव में शिराली मुस्लिमोव रहता था। उसके जन्म दिन पर उसके वंशजों को इकट्ठा करके चित्र खींचा गया तो उस फोटोग्राफ में 200 सदस्य उपस्थित थे। उनके वंशजों में से जो मर चुके थे वे 43 थे।
पत्रकारों द्वारा दीर्घजीवन के कुछ जादुई रहस्य जानने के लिए बहुत पूछ ताछ की पर उनके हाथों विचित्र जैसा कुछ नहीं लगा। जो उत्तर मिले वे सहज स्वाभाविक एवं साधारण जीवन क्रम अपनाये जाने की ही झाँकी कराते थे।
शिराली ने अपनी जीवनचर्या पर प्रकाश डालते हुए नपी−तुली बातें बताई। ‘मैंने जीवन भर अधिक परिश्रम किया— जानवर चराने का छोटा समझा जाने वाला पर उपयोगी सिद्ध होने वाला काम अपनाया। दीर्घजीवन की सरकारी पेन्शन मिलती है तो भी इस वृद्धावस्था में भी बेकार नहीं बैठता, जितना सम्भव है काम करता ही रहता हूँ। मैं तो क्या मेरे पूरे परिवार में कोई शराब, सिगरेट नहीं पीटा। मुझे लम्बी पैदल यात्राएँ करने का सदा शौक रहा है और जब भी अवसर मिला है उसके लिए कोई न कोई कारण ढूँढ़ लिया है। इस वृद्धावस्था में उन्हें वाकूनगर देखने की इच्छा हुई तो निकटतम रेलवे स्टेशन तक 60 मील की यात्रा पैदल तथा घोड़े पर चढ़कर पूरी की। यात्रा में उनका परपोता उनके साथ था।
उनकी नाड़ी गति प्रति मिनट 60 से 72 तक—रक्त चाप 120—75 तक रहता है जो नौजवानों की तरह सामान्य है। डाक्टर जब उनके स्वास्थ्य की परीक्षा करने के लिए तरह−तरह के उपकरणों का प्रयोग कर रहे थे तो उनने हँसते हुए कहा—पूरी तरह ठोक−बजा लीजिए, कोई कल−पुर्जा सड़ा−गला नहीं मिलेगा।
वाकू शहर उन्होंने देखा और बड़े आनन्दित हुए साथ ही उनने यह भी कहा— मैं पहाड़ी पर रहने के बदले शहर में रहना कभी पसन्द नहीं करूंगा भले ही शहर कितने ही सुन्दर और संपन्न क्यों न हो।
ईरान का सबसे वृद्ध व्यक्ति 195 वर्ष की आयु तक जिया। उसका नाम सैयद अली सलेही है। जन्म इस्फहान में फेरियूदान के समीप कोलोऊ गाँव में हुआ। यह एक बहुत छोटी देहात है और जंगली पहाड़ियों से घिरी हुई है। पत्रकार उससे भेंट करने ऊँटों पर चढ़कर गये थे और उन्हें इसके लिए लगातार तीन दिन तक यात्रा करनी पड़ी थी।
इस व्यक्ति ने कभी जूते नहीं पहने और न तरह−तरह की जीवनचर्याएँ बदली, एक ही ढर्रे का—एक ही जगह−शान्त और सन्तोषी जीवन जीता रहा। उसने कोई नशा कभी नहीं पिया। वह मरने के दिनों तक 12 मील पैदल चल लेता था। आंखें बिलकुल ठीक काम करती थीं। कानों से कम सुनाई पड़ने लगा था।
दीर्घजीवी सर जेम्स सेयर जो जिन्दगी भर में बहुत ही कम बीमार पड़े थे अपने आरोग्य का सम्बन्ध कुछ अच्छी आदतों के साथ जोड़ते। वे कहते थे मैंने छः बातों का सदैव पूरा−पूरा ध्यान रखा (1)आठ घण्टे पूरी नींद सोना (2)खुली हवा में सोना (3)चारपाई को दीवारों से दूर रखना (4)सामान्य ताप के जल में नित्य प्रातः स्नान (5)स्वल्प मात्रा में और शाकाहार प्रधान भोजन(6) नित्य टहलना।
ईरान के 191 वर्षीय सैयद अबू तलिव मीसावी ने बताया उसने हंसने, खेलने की आदतें को आरम्भ से ही अपनाया और उसे सदा मजबूती से पकड़ कर रखा। न कभी वे चिन्ताग्रसित हुए और न किसी से द्वेष निभाया।
जापान में 118 वर्ष का दीर्घजीवन प्राप्त करने वाली श्रीमती कोवायासी यास्ट का कथन है कि वह आजीवन शाकाहारी रही। चिन्ताओं से मुक्त रहकर सदा गहरी नींद सोई। न कभी नशा पिया और न कभी दवा खाई।
सिंगापुर की 133 वर्षीय श्रीमती नोरिया विगते ने कहा उसने अल्लाह पर सदा ईमान कायम रखा और हर दिन नमाज पढ़ी।
अमेरिका में सबसे अधिक आयु की नाग्रो महिला श्रीमती चार्ली स्मिथ थी जो 121 वर्ष की आयु में भी अपनी दुकान चला लेती थी। फ्राँस में श्रीमती फैलिसी 109 वर्ष की आयु पार कर गई थी। भारत इस सम्बन्ध में अभी भी सौभाग्यवान है सरकारी आँकड़ों के अनुसार अपने देश में अभी भी 60 हजार व्यक्ति सौ वर्ष की आयु को पार कर चुका।
लम्बे समय तक जीवित रहने के कारण तलाश करने में विभिन्न शोध संस्थानों ने बहुत समय और श्रम लगाया है। उन सबके निष्कर्म किसी जादुई कारण की खोज न कर सके। सभी को इसी नतीजे पर पहुँचना पड़ा कि स्वास्थ्य के सामान्य नियमों का कड़ाई एवं प्रसन्नतापूर्वक पालन करना ही दीर्घजीवन का रहस्य है।
लन्दन युनिवर्सिटी का एक वृद्धावस्था शोध विभाग है उसने जल्दी बुढ़ापा लाने वाले कारणों में मात्रा से अधिक और स्तर में गरिष्ठ भोजन को जल्दी बुढ़ापा लाने वाला कहा है।
सर हरमान वेबर ने सौ वर्ष से अधिक जीने वाले 150 व्यक्तियों से भेंट करके उनके दीर्घकालीन का रहस्य पूछा तो उनमें से कुछ उत्तर ऐसे थे जो लगभग सभी ने समान रूप से दिये जैसे [1] भूख से काफी कम खाना [2] खुली वायु से जीवनयापन करना [3] सदा कार्यरत रहना [4]चिन्ता मुक्त हँसी−खुशी की जिन्दगी जीना [5]जल्दी सोना, जल्दी उठना और निर्द्वन्द्व होकर गहरी नींद सोना [6] नियमित दिनचर्या अपनाना [7] नशेबाजी से दूर रहना।
ऐसा ही एक अध्ययन प्रो. नेलसन ने 82 दीर्घजीवियों का किया। वे भी इसी निष्क्रिय पर पहुँचे कि इनकी शारीरिक बनावट में कोई विशेषता नहीं थी और उनने कोई विशेष उपचार किये। इन सभी ने हँसी−खुशी का नियमित और व्यवस्थित जीवन जिसके फलस्वरूप वे देर तक जीवित रह सकने योग्य बने रहें।
कैलीफोर्निया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ जान वाट्सन ने कहा— रजा वका का स्वास्थ्य हमें उन खोजों और जान डडडड से पीछे लौटने के लिए कहता है जो हमने बहुत श्रम धन और प्रयत्नों के साथ संग्रह डडडड लगता है दीर्घजीवन की कुँजी सादगी और शान्ति के अतिरिक्त और कहीं नहीं है।
ओटेगी विश्वविद्यालय के डीन सर डडडड हरकम ने यौवन में वृद्धावस्था और बुढ़ापे में यौवन का विश्लेषण करते हुए बताया है कि जो लोग बदलती हुई परिस्थितियों के साथ अपना ताल−मेल नहीं बिठा पाते वे जवानी में ही बूढ़े हो जाते हैं और जो परिस्थिति के साथ अनुकूलता उत्पन्न कर लेते है वे बुढ़ापे में भी जवान बन रहते हैं।
प्रकृति मनुष्य को जल्दी मरने नहीं देना चाहती। एक बार वृद्धावस्था तक पहुँचने के बाद वह उसे पुनः नवयौवन में वापिस लौटने का अवसर भी देती है। सोवियत रूस के जार्जिया प्रान्त में दस हजार शतायु मनुष्य हैं। इन्हीं में से एक हैं—124 वर्षीय एस. आशा। देखा गया है कि सौ के करीब आयु पहुँचने पर जो थकान आती है वह उस आयु को पार करने पर दूर हो जाती है और तरुणाई के नये चिन्ह प्रकट होने लगते हैं। जैसे नये दाँत उगना—आँखों की ज्योति में फिर से तेजी आना—कानों की श्रवण शक्ति फिर हरी हो जाना आदि।
पिछली जन गणना के संदर्भ में रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में ऐसे भी 40 व्यक्ति हैं जिनकी आयु 150 वर्ष से ऊपर है। इनमें से 35 देहातों में रहते हैं और 5 शहरी इलाके में। इनमें सबसे अधिक आयु के थे 178 वर्षीय काश्मीर क्षेत्र के कुलगा गाँव के निवासी रज्जाक दर, जिनका अब देहान्त हो गया। अब असम, बंगाल और मध्य प्रदेश में तीन व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी आयु क्रमशः 168, 164 और 160 वर्ष है। शेष 36 की आयु 150 और 160 वर्ष के बीच है।
संसार भर में जब कि सुसम्पन्नता के बावजूद दीर्घजीवन का अनुपात तेजी से गिर रहा है तब भारत जैसे निर्धन देश में इस संदर्भ में इतनी सन्तोषजनक स्थिति का होना उत्साहवर्धक है।
जार्ज बर्नार्डशा ने अपनी पुस्तक “वैकटू मैथ्यूसलाह” पुस्तक में बाइबिल में वणित 969 वर्ष जीने वाले मैथ्यू का उल्लेख करते हुए हर मनुष्य को उसी का अनुगमन करते हुए दीर्घजीवन के लिए प्रयत्न करने की सलाह दी है और कहा है— सामान्य बुद्धि और डडडड डडडड के आधार पर यह लाभ हर कोई पा सकता है। कम उम्र में मर जान इस बात का चिन्ह है कि जिन्दगी की इज्जत नहीं की गई और वह रूठ कर चली गई।
डा. डडडड वेल्टरनक की पुस्तक ए. न्यू लाइफ इन ओल्ड एज’ में लिखा है—प्रस्तुत परिस्थितियों के साथ, हँसी−खुशी के साथ रह सकने का ताल−मेल बिठा लेने वाले व्यक्ति अकाल मृत्यु के बड़े कारण खीज’ से अपने आपको बचा लेते है और सरसता के द्वार सींची गई लम्बी जिन्दगी का आनन्द लेते हैं।
पिछली जन गणना में 70 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ अधिक दीर्घजीवी पाई गई। ऐसे व्यक्ति 86 लाख थे। जिनमें पुरुष 4169000 और महिलाएँ 4432000 थीं।
सामाजिक स्थिति में पिछड़ी होने पर भी भारत की महिलाएँ अपेक्षाकृत इसलिए अधिक जीती हैं कि उनका जीवन क्रम एक व्यवस्थित ढर्रे पर घूमता रहता है और वे महत्वाकाँक्षाओं एवं मनोविकारों की शिकार न होकर सन्तोष और शान्ति का जीवन जीती हैं।
इन्हीं सिद्धान्तों को हम सब भी यदि व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित करें तो दीर्घजीवन की कुँजी सहज ही हाथ लग सकती है।
नेपोलियन बोना पार्ट मृगी आना, हृदय गति का असन्तुलन जैसे कई रोगों से ग्रसित था, पर उसने उन रोगों के कारण होने वाली असुविधाओं को कभी मस्तिष्क पर हावी नहीं होने दिया। वह नियत समय पर, नियत कार्य में अपना मनोयोग पूरी तरह लगा देने का अभ्यस्त था। यही कारण था कि वह भारी पराजयों और युद्ध के अत्यधिक महत्वपूर्ण क्षणों में भी नियत समय पर गहरी निद्रा लेता रहा। उसकी सफलताओं का श्रेय उसकी चतुरता या बहादुरी को उतना नहीं, जितना कि सन्तुलित मन स्थिति को है।
अखण्ड−ज्योति ने अपने वर्ष के जीवन काल में युग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए—अपने ढंग से जो असाधारण अध्यवसाय और अथक प्रयत्न किया है; महत्व इस बात का भी है कि वह अपने समय की एक ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर सकी किन्तु उन प्रेमी परिजनों के सहकार को भी इस संदर्भ में कम महत्व नहीं दिया जा सकता है जिन्होंने सम्पादक सञ्चालक न होते हुए भी इस मिशन के प्रति इतनी गहरी निष्ठा का परिचय दिया मानो वे स्वयं ही इसे चलाते हों— मानो वे स्वयं ही इसके संस्थापक और प्रबन्धक हो।
ऐसा अन्य पत्र−पत्रिकाओं के बारे में भले ही होता हो पर अखण्ड−ज्योति के बारे में ऐसा कहीं भी—कभी भी—नहीं सुना। उसे आदि से अन्त तक कई बार पढ़ा गया है— अपने प्रयोजनों को अनुरोध करके आग्रहपूर्वक पढ़ाया गया। उसमें प्रकाशित विचारों को अपने निजी विचार समझकर उन्हें फैलाया गया है जहाँ भी विवाद का अवसर आया है आगे बढ़कर उनका समर्थन किया गया है। इतना ही नहीं प्रत्येक पाठक ने यह प्रयास किया है कि वह अकेला ही ग्राहक न रहे वरन् अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्य लोगों को भी उसका सदस्य बनाये। इसके लिए उसे कई बार तो इतना आग्रह अनुरोध करना पड़ा है मानो वह प्रयास किसी आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा हो। उसकी नीयत पर सन्देह तक किया गया—ऐजेन्ट बताया गया−पर इसका कौन बुरा मानता।
चुनाव के दिनों में वोटें माँगने के लिए लोग बिना मान अपमान का विचार किये घर−घर जाते हैं और सीधी उलटी दोनों ही तरह की बातें सुनते हैं। इतने पर भी उनका उत्साह नहीं टूटता। ठीक यही नीति अपने परिजनों की रही है। उन्होंने अखण्ड−ज्योति के अध्ययन से लेकर प्रसार तक हर कार्य में अपना उत्साह भरा प्रयास जारी रखा है। यही कारण है कि उसकी लोक प्रियता बढ़ती गई और उस उत्साहपूर्वक स्थिति में पत्रिका अपनी सवा साधना के गहनतम स्तर तक उतरती गई। यही है उभयपक्षीय सत्प्रयत्नों का प्रतिफल। यही है इस संस्थान के युगान्तरकारी प्रयत्नों का आधार। जिसका मूल्याँकन करने वाले लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और समझ नहीं पाते कि इतने व्यापक कार्य कैसे किया जा सकता है।
अखण्ड−ज्योति लोकरंजन के लिए व्यवसाय बुद्धि अपनाकर चल रहे अनेकानेक प्रकाशन प्रयत्नों से हजारों लाखों मील दूर है। इसलिए उसकी तुलना अन्य किसी के साथ किसी भी दृष्टि से नहीं की जा सकती। मूल्य का सस्तापन—विज्ञापन लेकर प्रकारान्तर से पाठकों की जेब काटने और अपना लाभाँश बढ़ाने की चक्करदार तरकीब उसे कभी पसन्द नहीं आई। आधे पृष्ठ विज्ञापनों के और आये पृष्ठ पाठ्य सामग्री के दना—डडडड मोटा डडडड डडडड देकर प्राथमिक आकर्षण उत्पन्न करना—मनोरञ्जक उथली चीजें छापते रहना यही है आज की पत्र प्रकाशन नीति। अखण्ड−ज्योति उससे पूर्णतया बचकर चली है। अनाकर्षक कलेवर ठोस पाठ्य सामग्री—लागत मात्र मूल्य यही शालीनता की नीति अपनाने की घोषणा की गई थी तो इस क्षेत्र में काम करने वाले हर ‘समझदार’ शुभ चिन्तक ने यही कहा यह नीति सफल नहीं हो सकती। इस जमाने में यह नहीं चलेगा। पत्रिका बन्द हो जायगी, कोई उसे पसन्द नहीं करेगा। यह सब धैर्य पूर्वक सुना गया और यह विश्वास अडिग रखा गया है कि पारखी लोगों से यह भूमि पूर्णतया रहित नहीं हुई है। आदर्शवादिता को सर्वथा अमान्य ठहरा दिया जाय ऐसी स्थिति अभी उत्पन्न नहीं हुई है। श्रेष्ठता ‘भले ही दुर्बल हो बिखरी हुई हो—पर वह जीवित अवश्य है और उसे यदि संगठित सजीव किया जा सके तो वह सशक्त भी बहुत है। प्रसन्नता की बात है कि समय की चुनौती जिस साहस पूर्वक स्वीकार की गई थी उसे न तो असफल होना पड़ा और न निराशा। लक्ष्य तक पहुँचने में हम सफलता की दिशा में काफी लम्बी मंजिल पार कर चुके।
अखण्ड−ज्योति का महत्व उस दैन को है जिसने जनसाधारण को नई दिशा दी है—नये ढंग से सोचने को विवश किया है और यह हृदयंगम कराया है कि आदर्शवादी दर्शन अपनाकर ही हम आज की अनेकानेक गुत्थियों की हल निकाल सकते हैं—संकटों के अनेकानेक बन्धनों से छुटकारा पा सकते हैं। यह तथ्य इतनी अच्छी तरह समझा गया कि अखण्ड−ज्योति को संसार भर की भाषाओं में छापने की माँग प्रबल हो उठी। भारत की 14 भाषाओं में छापना तो प्रायः निश्चय ही हो चुका था। उसके अनुवाद (1) अँग्रेजी युग−निर्माण योजना, (2) गुजराती युग−निर्माण योजना (3) मराठी युग−निर्माण योजना (4) उड़िया युग−निर्माण योजना के नाम से चार भाषाओं में सफलता पूर्वक प्रकाशित भी होने लगे। यदि पक्षाघात एवं बज्र प्रहार जैसी महंगाई द्वार रोककर खड़ी न हो जाती तो अब तक कितनी ही अन्य भाषाओं में भी उसके अनुवाद प्रकाशित होने लगे होते। समय की माँग वस्तुतः इतनी ही प्रबल है।
स्पष्ट है कि तुच्छ से मानवी कलेवर में जो कुछ विशेषता है वह उसके चिन्तन पक्ष की—आस्था आधार की है। उसका स्तर नीचे गिरेगा तो व्यक्ति और समाज को पतनोन्मुख दिशा में चलते और अनेकानेक संकटों में ग्रसित होते दिशा जा सकेगा, यदि दर्शन में उत्कृष्टता आदर्शवादिता भरी रही तो चेतना को महामानव स्तर पर विकसित करने का अवसर मिलेगा और भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जायगा। प्रगति के लिए जितने भौतिक प्रयास किये जाते रहे हैं यदि उतने ही दार्शनिक उत्कृष्टता को विकसित एवं परिपुष्ट करने के लिए किये गये होते तो आजे जिन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए हमें घोर प्रयत्न करने हुए भी अँधेरे में भटकना पड़ रहा है उनके प्रस्तुत होने की ही आवश्यकता न पड़ती। तब कोई संकट एवं अभाव दिखाई ही न पड़ता।
अखंड−ज्योति इसी अभाव की पूर्ति के लिए अपने जन्म काल से लेकर आज तक अथक प्रयत्न करती रही है। उसने युग की माँग को समझा है और बुद्धिवादी आधार लेकर उत्कृष्टतावादी दर्शन की प्रतिपादिता शैली को अपनाया है। पिछले दिनों शास्त्र वचन—आप्त वाक्य ही प्रमाण माने जाते रहे हैं। श्रद्धा ही धर्म का आधार रही है। अब तर्क और तथ्य की माँग की जा रही है। इसकी पूर्ति न हो सकी तो धर्म को उपहासास्पद ठहराया गया। विज्ञाना और धर्म का समन्वय होने पर जो सर्वतोमुखी प्रगति का आधार बन सकता था वह न बन सका। अखण्ड−ज्योति ने इस दिशा में अभिनव प्रयत्न किया है। उसकी प्रतिणदति शैली को प्रजातन्त्र सिद्धान्त के जन्मदाता रूसो और साम्यवाद के सूत्रधार कार्लमार्क्स के साथ बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा तोला गया है। पिछले दिनों बुद्धिवाद ने ही आस्तिकता को उखाड़ कर नास्तिकता को प्रतिष्ठापित किया था। अब रूसी शस्त्र से उलटा प्रहार किया जा रहा है। अब नास्तिकता को आस्तिकता में बदले जाने की तैयारी हो रही है। बुद्धिवाद इस नये रूप में सामने आया है कि वह भौतिकतावादी दर्शन को निरस्त करके उसके स्थान पर अध्यात्मवादी तत्व चिन्तन की यथार्थता और उपयोगिता सिद्ध कर सके। सूक्ष्मदर्शी यह भली प्रकार समझ रहे हैं कि उत्कृष्टतावादी दर्शन को बुद्धिमानी प्रतिपादन का जो नया आधार मिला है उसके परिणाम दूरगामी होंगे। समय को पलटने की—युग परिवर्तन की बात अब दिवास्वप्न न समझी जायगी। धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय की संभावना अगले दिनों निश्चित रूप से यथार्थता बनकर सामने आवेगी।
अखण्ड−ज्योति संस्थान ने अपने जिम्मे का कार्य ईमानदारी से पूरा किया है। समय की आवश्यकता पूरी करने में उसने तपस्वियों जैसी उत्कृष्ट श्रम साधना को युग देवता के चरणों पर अनन्य श्रद्धा के साथ समर्पित किया है। परिजनों ने अपना पक्ष समुचित सद्भावना के साथ निवाहा है, उन्होंने उसे अपनाने और फैलाने में कहीं कोई कोर−कसर नहीं छोड़ी है। उभयमयी तत्परता का ही यह फल है कि उस प्रयास को समस्त संसार में आशा भरी दृष्टि से देखा जा रहा है और समझा जा रहा है कि प्रस्तुत विश्व संकट के समाधान में— मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने में अखण्ड−ज्योति द्वारा ऐतिहासिक भूमिका निबाही जायगी।
पिछले लम्बे समय से चले आ रहे इन प्रयत्नों की सफलता पर दृष्टिपात करते हुए सहसा यह विश्वास नहीं होता कि अखण्ड−ज्योति के सामने प्रस्तुत वर्तमान संकट उसे अकाल में ही काल कवलित करने के लिए विवश कर देगा। पर वस्तुतः स्थिति है ऐसी ही। अक्टूबर की अखण्ड−ज्योति के इसी स्तम्भ में प्रस्तुत तथ्य यह बताते है कि असाधारण साहस किये बिना इस संकट का निवारण नहीं हो सकता। कागज के दाम तीन गुने और छपाई के दाम ढाई गुने हो जाने से लागत बढ़ जाने का सन्तुलन मूल्य बढ़ाये बिना और किसी प्रकार नहीं हो सकता। मूल्य बढ़ाने से ग्राहकों पर पड़ने वाला दबाव उन्हें यह सोचने को विवश क र सकता है कि शरीर निर्वाह के अतिरिक्त अन्य कामों में होने वाले खर्चों में जो कमी की जा रही है उसी कटौती में अखण्ड−ज्योति मंगाना बन्द करने की बात भी क्यों न सम्मिलित कर ली जाय। यदि ऐसा हुआ तो मूल्य बढ़ाने वाला कदम भी निरर्थक हो जायगा। कम उत्पादन पर लागत का अनुपात बढ़ता है इसे कौन नहीं जानता। ग्राहक घटे तो भी पत्रिका के सामने जीवन संकट जहाँ का तहाँ बना रहेगा। अस्तु जहाँ पाठकों को अपना बढ़ा हुआ चन्दा देने के लिए तैयार रहना है वहाँ नये सदस्य बढ़ाने वाले प्रयास को दूने उत्साह के साथ अपनाना है। कुछ ग्राहक तो निश्चित रूप से टूटेंगे ऐसी दशा में उस खाई को पाटने के लिए दूने उत्साह के साथ—दूनी सफलता का लक्ष्य लेकर चलने से ही काम बनेगा। खाई इसी उपाय से पटेगी।
यदि अखण्ड−ज्योति की उपयोगिता पाठको ने सचमुच ही समझ ली है तो उन्हें इन जीवन मरण की घड़ियों में इस समय आपत्ति कालीन सहयोग देना पड़ेगा। यह सहयोग क्या हो सकता है, इसकी चर्चा ऊपर की पंक्ति यों में की जा चुकी है। अपनी और अपने परिचितों की चालू सदस्यता को बढ़ हुए चन्दे की स्थिति में भी चालू बनाये रहने का सुदृढ़ निश्चय और साथ ही संख्या घटने न देने के लिए नये ग्राहक बढ़ाने के लिए चुनाव जीतने जैसे उन्मादी प्रयास के लिए अदम्य उत्साह। यह दोनों ही कर्त्तव्य प्रत्येक पाठक अपने कन्धे पर ले तो अखण्ड−ज्योति के जीवन काल में प्रथम बार आये इस जीवन मरण के संकट से जूझा जा सकता है और उस प्रकाश को बुझने से बचाया जा सकता है जिसने युग की आवश्यकता को पूरी करने की दिशा में इतनी लम्बी मञ्जिल पूरी कर ली है। ये संकट भी कम भयंकर नहीं है पर यदि परिजनों ने इस अवसर पर शिथिलता दिखाई उपेक्षा, बरती तो फिर यही कहा जायगा कि पत्रिका की मौत संकट ने नहीं की बन्द अपनों की अश्रद्धा ने ही उसका गला घोंट दिया।
हर वर्ष अखण्ड−ज्योति का जन्म दिन प्राय सभी परिजनों द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मिशन के प्रति गहरी निष्ठा के प्रदर्शन का साल में एक बार विशिष्ट अवसर आता है बसन्त पर्व का। उस दिन पाठकों में से हर एक का यह प्रयत्न होता है कि इस पुण्य पर्व पर अपनी श्रद्धाञ्जलि चढ़ाने में हाथ न सिकोड़े और अपनी डडडड व्यञ्जना को साकार रूप से व्यक्त करने के लिए कुछ सक्रिय तत्परता प्रस्तुत करे। इस वर्ष उस प्रयास से पिछले सभी सालों की तुलना में अधिक तत्परता डडडड की समान अर्थ सिद्ध किया जाना चाहिए। समय की डडडड डडडड डडडड। कदम को बढ़ाये बिना और किसी प्रकार हो ही नहीं सकता।
बसन्त पञ्चमी इस वर्ष 16 फरवरी 75 रविवार की है। वह हम सब का सर्वोपरि प्रेरणा पर्व है। इसी दिन (1) अखण्ड−ज्योति पत्रिका निकलनी आरम्भ हुई थी (2) इस वर्ष युग−निर्माण योजना मिशन की स्थापना हुई (3) इसी दिन वेद शास्त्र, दर्शन पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद का शुभारम्भ हुआ (4) इसी दिन शान्ति कुञ्ज का निर्माण आरम्भ करने का है (6) अखण्ड−ज्योति संस्थापक का आध्यात्मिक जन्म एवं साधना श्री गणेश पर्व यही है। यों बसन्त पञ्चमी ज्ञान−विज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म दिन है। ज्ञान−विज्ञान के समन्वय की—व्यक्ति और समाज को परिष्कृत करने की जो उपासना ही कह सकते हैं। बसन्त ऋतु इसी पुण्य वेला में अवतरित होकर प्रकृति गत सौंदर्य और मानवी चेतना गत उल्लास को प्रफुल्लित करती है। यों बसन्तोत्सव भारत भर में मनाया जाता है पर अपने लिए तो वह जीवन प्राण है। उस दिन अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्य भाव−विभोर मनः स्थिति में रहते हैं। पिछले वर्ष का कार्यक्रम निर्धारण करने में संलग्न रहते हैं। हर जगह प्रभात फेरी, हवन, दीपदान, संगीत, कीर्तन, कवि सम्मेलन विचार गोष्ठी प्रवचन, आयोजन आदि हैं। विविध कार्यक्रम रखते हैं। यह उस दिन की एक दिवसीय उत्सव प्रक्रिया हुई। मूल प्रक्रिया यह रहती है कि मिशन को सींचने और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाय। उसके अनेकों प्रकार हैं पर सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिकता देने योग्य श्रद्धाञ्जलि प्रयास यह है कि उस दिन तक अधिकाधिक अखण्ड−ज्योति—ग्राहक बढ़ाकर अपना भाव भरा श्रम सहयोग उत्साहवर्धक स्तर का बनाकर प्रस्तुत किया जाय। इससे बढ़कर और दूसरी कोई अभिव्यञ्जना हो नहीं सकती।
पिछले वर्षों में भी यह श्रद्धाञ्जलि प्रत्येक प्रेमी परिजन ने किसी न किसी रूप में प्रस्तुत की है। इस वर्ष उसे आपत्ति कालीन आवश्यकता समझा जाय और अपने निजी कामों में डडडड करके भी समय की माँग समझ कर पूरा किया जाय। इसके लिए टोली बनाकर निकलने की व्यवस्था बन सके तो और भी अधिक सफलता मिलेगी। अखण्ड−ज्योति परिजनों को इकट्ठे होकर प्रचार टोली कार्यक्रम बनाना चाहिए और योजनानुसार बसन्त पञ्चमी तक विचारशील लोगों के पास ग्राहक बनाने का अनुरोध करने के लिए जाना चाहिए। चालू लोगों से चन्दा वसूल करना चाहिए और इस संग्रह को जल्दी−जल्दी मथुरा भिजवाते रहना चाहिए। लिस्ट बसन्त पञ्चमी को ही भेजी जाय इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। बसन्त तक का लक्ष्य निर्धारण और उसके लिए अनवरत प्रयास का संकल्प करना ही पर्याप्त है। उस दिन तक के कार्यों का लेखा−जोखा शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार श्रद्धाँजलि विवरण के रूप में भेज देना चाहिए।
अखण्ड−ज्योति के प्रत्येक प्रेमी परिजन के लिए यह आवश्यक बना दिया गया है कि वह अपनी भौतिक और आत्मिक हलचलों का विवरण वर्ष में दो बार शान्ति−कुञ्ज भेज कर अपनी घनिष्ट पारिवारिकता का परिचय दिया करें। गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी पूर्णिमा) बसन्त पंचमी (माघ सुदी पञ्चमी) यह दो पर्व श्रद्धा पर्व कहलाते हैं। इनमें छै−छै महीने का अन्तर भी है। इन दोनों अवसरों पर यों अधिकाँश परिजन अपना स्थिति विवरण भेजते हैं और उत्तर पाने के लिए जबानी लिफाफा साथ ही रख देते हैं। अब उसे एक अनिवार्य क्रम बना दिया गया है और आशा की है कि वर्ष में दो बार प्रत्येक अखण्ड−ज्योति का पत्र हरिद्वार पहुँचा करेगा। उससे पारस्परिक आदान−प्रदान के सम्बन्ध सूत्रों में स्वभावतः अधिक प्रखरता उत्पन्न होने में सहायता मिलती है। इस बार बसन्त पर्व पर जो विवरण पत्र भेजा जाय उसमें यह शानदार उल्लेख रहना ही चाहिए कि इस बार श्रद्धांजलि के रूप में कितने अखण्ड−ज्योति सदस्य बढ़ाने में सफलता प्राप्त की गई।
*समाप्त*