इस युग के माने हुए इतिहास वेत्ता टायनवी इस बात से खिन्न नहीं हैं कि वर्तमान युग की बढ़ती हुई विकृतियाँ मनुष्य-जाति की उज्ज्वल संभावनाओं को नष्ट कर देंगी। वे इस संदर्भ में पूर्ण आश्वस्त हैं कि इन दिनों वैज्ञानिक प्रगति ने जो अनोखे आकर्षण मनुष्य के हाथ में दिये हैं, उनसे वह आज भले ही आतुरता भरी बाल-क्रीड़ा करले, पर कल उसे परिणामों पर विचार करना पड़ेगा और अमर्यादित लिप्सा से उत्पन्न संकट का समाधान खोजना होगा। निश्चित रूप से वह वैज्ञानिक खोजों की तरह आत्म-रक्षा और भविष्य की स्थिरता का उपाय भी ढूँढ़ लेगा।
उन तथ्य को उन्होंने अपने अति महत्वपूर्ण ग्रन्थों में इतिहास की अनेक साक्षियाँ प्रस्तुत करते हुए प्रतिपादित किया है। ‘चेञ्ज एण्ड है विट’ में उन्होंने लिखा है—”बढ़ना, परिणाम देखना और भूलों को सुधारना मनुष्य का स्वभाव है। समझदार लोग हर देश और हर काल में रहे हैं, वे अपनी समझदारी का लाभ पिछड़े लोगों को देते हैं और बताते हैं कि किस कठिनाई का समाधान किस तरह निकल सकता है। समझदारी की अपनी शक्ति है। वह भटकाव को थपेड़े देकर राहें रास्ते पर ले आती है और आदमी ठोकरें खाकर ही सही—उस दिशा को पकड़ लेता है, जो उसके लिए श्रेयस्कर है।
‘ए स्टडी आव हिस्ट्री’ और रिकसिडरेशन’ ग्रन्थों में उन्होंने अनेकों ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों का उल्लेख करते हुए सिद्ध किया है कि दबाव और आकर्षण कई बार मनुष्य को कुछ समय के लिए कुछ भी करने के लिए सहमत कर सकते हैं, पर उसमें स्थायित्व नहीं होता। मानवी-विवेक अन्ततः जागृत होकर ही रहता है और ऊपर से लादे हुए लवादे को फेंक कर वह सरल स्वाभाविक स्थिति पाने के लिए तीखे उपाय बरतता है।
इस तथ्य के आधार पर वे मनुष्य-जाति का भविष्य उज्ज्वल होने की आशा करते हैं। ‘ए प्रोच टू रिलीजन’ ग्रन्थ में वे कहते हैं—जो बुद्धि-कौशल प्रकृति के सदस्यों का पता लगाने और उनका सुविधाजनक उपभोग करने में समर्थ हो सकता है, वह वैयक्तिक क विकृतियों और सामाजिक अव्यवस्थाओं के निराकरण का रास्ता निकाल लेगा। आग में पूरी तरह जलने से पहले ही बच्चा आग से अपना हाथ पीछे खींच लेता है। मनुष्य कभी सर्वभक्षी संकट का शिकार नहीं हो सकता। जब भी संकट की तीव्रता सामने आयेगी—परिवर्तन-चक्र तेजी से चल पड़ेगा और उन कारणों को निरस्त कर दिया जायगा, जो विभीषिकाऐं उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी थे।
आज वैयक्तिक क-जीवन में संकीर्ण-स्वार्थपरता और सामाजिक-जीवन में— जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ वाले जंगली-कानून का प्रचलन—यह दो ऐसे तथ्य हैं, जो अगणित उलझनें और कठिनाइयाँ उत्पन्न करते हैं। विज्ञान द्वारा उपार्जित सुविधा से मनुष्य बहुत लाभान्वित हो सकता था और सर्वजनीन सुख-शान्ति की सम्भावना आशाजनक स्तर तक विकसित हो सकती थीं। किन्तु इन विकृतियों ने सारी सुखद-संभावनाओं को ही उलट कर रख दिया। टायनवी यह विश्वास करते हैं कि निकट भविष्य में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का एक प्रचण्ड अभियान आरम्भ होगा। इतिहास में आज जैसी विकृतियों के समाधान भौतिक काट-छाँट से नहीं, अध्यात्म संवेदनाओं का आश्रय लेने से ही निकले हैं। अब भी उसी मार्ग का अवलम्बन करना पड़ेगा।
जिस समाज में अधिकाँश अच्छे लोग रहते हैं, उसे सभ्य-समाज कहा जाता है। पर मेरी दृष्टि में उससे भी सभ्य वे लोग हैं, जो बुरे लोगों को भी निबाह लेते हैं और प्रेमपूर्वक उन्हें अच्छा बनाने का प्रयत्न करते रहते हैं। —अब्राहम लिंकन
बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के प्रत्येक क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।
मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।
समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं। वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में अपनी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव में हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं। —चिदानंद परिव्राजक
शरीर और आत्मा की पृथकता को जानते बहुत हैं, पर मानते कोई-कोई ही हैं। मरने के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है, इसे प्रत्येक धर्मावलम्बी मानता है। हिंदू-धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता को पूरी तरह स्वीकार किया गया है। ईसाई, मुसलमान पुनर्जन्म तो नहीं मानते पर मरणोत्तर-जीवन स्वीकार करते हैं। शरीर न रहने पर भी आत्माओं का बना रहना और ब्रह्म-लोक में प्रलय के दिन उनके क्रियाकलाप को उचित-अनुचित ठहराया जाना उनके यहाँ भी स्वीकारा गया है। इन सभी स्थितियों में मृत्यु हो जाने के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहने की बात को माना गया है।
अतीन्द्रिय विज्ञान भी क्रमशः इसी निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा है कि कुछ समय पूर्व भौतिक-विज्ञानवेत्ता शरीर से पृथक कोई स्वतन्त्र आत्मा न होने की जिस बात को जोरों के साथ कहते हैं, अब वह बात कुछ दमदार नहीं रही। पूर्वजन्मों की स्मृतियों वाले बालक उन ईसाई और मुसलमान-परिवारों में भी पाये गये हैं, जिनकी परम्परा पूर्वजन्म स्वीकार न करने की ही रही है। कितने ही बालक संगीत आदि की ऐसी अद्भुत प्रतिभा अति न्यून आयु में ही प्रदर्शित करते हैं, जिसका मानव मस्तिष्क-विकास के स्वाभाविक-विकास के साथ कोई ताल-मेल नहीं खाता। इन अद्भुत उदाहरणों का समाधान—‘‘पूर्व-जन्मों की विद्या का अनायास प्रकटीकरण” मानने के अतिरिक्त और किसी प्रकार नहीं होता।
भूत-प्रेतों के अस्तित्व को विज्ञान-समाज में अन्धविश्वास और बहम भर माना जाता रहा है। पर कठोर अन्वेषण की परीक्षा-कसौटी पर खरे उतरने वाले प्रमाण सामने आये हैं, जिनमें भूतात्माओं के अस्तित्व से इन्कार करने की गुंजाइश नहीं रहती। प्रचलित भूतवाद के ढकोसलों में बहुत कुछ ‘बहम’ हो सकता है, पर यत्र-तप ऐसे भी प्रमाण सामने आते हैं—जिन्हें देखते हुए मरक के उपरान्त भी आत्माओं के किसी रूप में बने रहने और हलचलें करने की बात को स्वीकार करना ही पड़ता है।
नवजात शिशुओं में माता का दूध पीने का स्थान ढूँढ़ निकालना आदि कितनी ही ऐसी विशेषतायें पाई जाती हैं, जिन्हें देखते हुए यही मानना पड़ता है कि पूर्व संचित ज्ञान के बिना यह सब अनायास ही नहीं हो सकता। अनुवाँशिकी-विज्ञान में पैतृक-ज्ञान के फलित होने का प्रतिपादन अवश्य है, पर वह भी यहाँ आश्चर्य चकित हैं कि बिना प्रशिक्षण या बिना आधार के जीवनधारियों के बालक कैसे जीवनोपयोगी रीति-नीति सहज ही विकसित कर लेते हैं? पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक आते-जाते रहने वाले पक्षी किस प्रकार डडडड की दुर्लघ्य कठिनाइयों को नपे-तुले ढंग से पार करते हैं और कुछ विशेष प्रकार की ईल जैसी मछलियाँ कैसे सहस्त्रों मील की यात्रा करके प्रणय-प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान पर जाती और फिर वर्षों में पूरी होने वाली उस लम्बी यात्रा को पूरी करके यथा स्थान वापिस लौटती है? प्राणियों के सहज ज्ञान की शृंखला इतनी विलक्षण है कि वंशानुक्रम की सम्भावनाऐं उसका समाधान डडडड नहीं पातीं। जीव-विज्ञानी अब यह सोचने लगे है कि इस संचित ज्ञान का आधार जीवधारियों के पुनर्जन्म से सम्बन्धित होना चाहिए
जो हो, किसी न किसी आधार पर प्रायः हर वर्ग का व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि मृत्यु के बाद ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता, वरन् पीछे भी बना रता हैं। शरीर के बिना भी जो जीवित रहता है, उसी आत्मा ही कहा जायगा। इस प्रकार यह मरणोत्तर जीवन की मान्यता आस्तिकों तक ही सीमित नहीं रही, वरन् नास्तिक वर्ग भौतिक प्रमाणों के आधार पर इस तथ्य को क्रमशः स्वीकार करता चला जा रहा है।
प्रश्न यह है कि जब शरीर से पृथक आत्मा को अस्तित्व की जानकारी प्राय सभी को है और हलके भारी मन से उस तथ्य को किसी न किसी रूप में स्वीकार हो जाना है तो हमारा यह प्रयास क्यों नहीं होता कि आत्मा के ऐसे स्वार्थों की ओर भी ध्यान दिया जाय, जो शरीर से ही जुड़े हुए नहीं हो सकते। शरीर-सुख में इन्द्रिय-जन्य वासनाओं की तृप्ति ही मुख्य है। मन की माँग अहंता के पोषण करने वाली वस्तुओं तथा परिस्थितियों को जुटाने की रहती है। मोटे रूप से वासना और तृष्णा ही शरीर-सुख के दो आधार पाये जाते हैं। किन्तु देखा जाता है कि जिनके पास यह साधन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं, उनका भी अन्त करण इन उपलब्धियों से सन्तुष्ट नहीं होता, वरन् बहुत कुछ मिलने पर भी अशान्त, अतृप्त और उद्विग्न ही बना रहता है। अन्तरंग के मर्मस्थल में यह असन्तुष्ट सत्ता कौन हैं? निस्सन्देह इसे आत्मा ही कहा जायगा।
शरीर की माँग—भूख, वासना और तृष्णा के साधन जुटने पर तृप्त होनी चाहिए। होती भी है। भर पेट स्वादिष्ट आहार मिल जाने पर फिर उसकी अधिक मात्रा खाते नहीं बनती। काम-सेवन आदि की भी एक स्वल्प सीमा है। तृप्ति के बाद उस संदर्भ में भी जी ऊब जाता है, यही बात अन्य सब इन्द्रियों के बारे में भी है। तृप्ति के साधन जुट जाने के बाद भी जो घोर अतृप्त पाया जाता है, वह अन्तरात्मा ही है। उसकी आकाँक्षाएँ शरीर से भिन्न हैं। जब तक उन्हें पूरा करने के साधन न जुटें, तब तक उसका असन्तुष्ट रहना स्वाभाविक भी है। शरीर और आत्मा की भिन्नता और उनके पारस्परिक सम्बन्धों, स्वार्थों को समझने का नाम ही अध्यात्म है। जब तक यह भिन्नता समझी-स्वीकारी न जाय, तब तक मात्र शरीर का पोषण करने वाले प्रयास ही होते रहते हैं। आत्मा की स्थिति और आवश्यकता समझे बिना उसके लिए कुछ सोचा किया भी कैसे जाय?
इसे एक मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह ही कहना चाहिए कि हम अपने आप को भूल बैठे हैं। अपने आप को अर्थात् आत्मा को। शरीर प्रत्यक्ष है, आत्मा अप्रत्यक्ष। चमड़े से बनी आँखें और मज्जातन्तुओं से बना मस्तिष्क केवल अपने स्तर के शरीर और मन को ही देख-समझ पाता है। जब तक चेतना-स्तर इतने तक ही सीमित रहेगा तब तक शरीर और मन की सुख-सुविधाओं की बात ही सोची जाती रहेगी। उससे आगे बढ़कर इस तथ्य पर गंभीरता पूर्वक विचार कर सकना सम्भव ही न होगा कि हमारी-आत्मा का— स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है और आन्तरिक प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? क्या किया जा सकता है?
चिरस्थायी और गहन अन्तराल की तृप्ति को शान्ति कहते हैं और शरीर, मन की आकाँक्षा पूर्ति सुख कहलाती हैं। लोग सुख के लिए उछल-कूद करते रहते हैं, किन्तु शान्ति के सम्बन्ध में सोचते भी नहीं। फिर वह मिले कैसे? अशान्त अन्त करण की जलन—सुख-साधनों की कुछ बूँदों से शान्त नहीं हो सकती। यही कारण है कि धनाधीश, सत्ताधारी और सम्मानित व्यक्ति आंतरिक दृष्टि से विक्षुब्ध ही बने रहते हैं। सूक्ष्म तत्वों को देखने-समझने के लिए एक विशेष दिव्य-दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है, अध्यात्म की भाषा में उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। गायत्री-मन्त्र में इसी दिव्य प्रकाश को सविता का भर्ग मानकर उपास्य ठहराया गया है। यह दिव्य-दृष्टि जगे तो शरीर और मन के घेरे से ऊँचे उठकर वस्तु स्थिति को देखना-समझना सम्भव हो सकता है।
मोटी दृष्टि हमें शरीर और मन की परिधि तक ही सीमित रखती है। स्थूल पदार्थों के चिन्तन तक ही उसकी पहुँच है। आत्म-कल्याण की बात उस दृष्टि से सोची जाय तो पञ्च-तत्वों से बने धर्मोपकरणों का, तीर्थ-मन्दिर, दान, उपवास जैसे साधनों का ही उपयोग करने की ही बात सूझती है।
आत्म-शान्ति का स्वरूप क्या हो सकता है? उसकी कल्पना स्वर्ग में आहार, निवास उपभोग के प्रचुर साधनों की परिधि तक ही कल्पना करती है। मानो मरने केक उपरान्त भी आत्मा वर्तमान शरीर को ही धारण किये रहेगी और उन्हीं प्रसाधनों के उपभोग से काम चलेगा। यह बात सूझती ही नहीं कि जब वासना-तृष्णा की साधना सामग्री इस लोक में तृप्ति न दे सकी तो तथाकथित स्वर्ग में बताई गई सुख-सामग्री से आत्मा का क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? इस चिन्तन को बचपन ही कहना चाहिए कि आत्म-शान्ति की आन्तरिक तृप्ति के संदर्भ में भी वासना-तृष्णा के साधन जुटाने वाले तथाकथित स्वर्गीय परिस्थितियों में ही आनन्द और सन्तोष मिलने की बात सोचें।
आत्मा एक दिव्य चेतना स्फुल्लिंग है—जिसे भावनात्मक उल्लास के साधनों में ही तृप्ति मिल सकती है। सद्भावनाओं से प्रेरित सत्प्रवृत्तियों में ही आत्मा की शान्ति का उद्गम केन्द्र है। उत्कृष्ट स्तर का चिन्तन जब कार्यरूप में परिणित होता हैं। तब वह परिस्थिति बनती है, जिसमें आत्मा को शान्ति एवं तृप्ति प्राप्त हो सके। इस प्रकार के आनन्द की आरम्भिक झाँकी स्वाध्याय और सत्संग में मिल सकती है, जो काय-कलेवर और आत्मा की मित्रता का—उनके पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन विश्लेषण कर सके एवं वासना-तृष्णा की सुखलिप्सा से ऊँचे उठकर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपना कर आंतरिक उल्लास की उपलब्धि का मार्ग-दर्शन कर सके। विषय-चर्चा से जिस प्रकार कानों को रस मिलता है, मनोरम दृश्य देखकर आँखें जिस प्रकार मुदित होती हैं, उसी प्रकार आत्म-चेतना को उस उद्बोधन में प्रसन्नता मिलती हैं, जिसके आधार पर अन्तःकरण को सद्भावनाओं से ओत-प्रोत बनाया जा सके। आत्म-शान्ति का द्वार तब खुलता है, जब सत्प्रवृत्तियों से भरी-पूरी गतिविधियाँ अपना कर यह अनुभव किया जाता है कि जीवन के स्वरूप और लक्ष्य के अनुरूप गतिविधियाँ अपना कर अपूर्णता से पूर्णता की ओर कदम बढ़ते चल रहे हैं। उच्च भावनाओं के अनुरूप क्रियाकलाप जब बन पड़ता है तो जीवन-क्रम का वह स्वरूप बन जाता है, जिसमें आत्मा को शान्ति और तृप्ति प्राप्त हो सके, वह भव-बन्धनों से मुक्त होकर नर से नारायण बन सके।
शरीर और आत्मा की भिन्नता को जानना उत्तम है, पर पर्याप्त नहीं। उस ज्ञान का लाभ तब है, जब काय-कलेवर के उचित, आवश्यक स्वार्थों तक ही सीमित रहा जाय और अपनी शेष शक्ति को आत्मिक-शान्ति की, आत्मिक-तृप्ति की, आत्मिक-प्रगति की दिशा में नियोजित किया जाय। कहना न होगा कि यह प्रयोजन उत्कृष्ट-चिन्तन और आदर्श-कर्तव्य अपनाने से ही पूरा हो सकता है। जब आत्मा और शरीर की भिन्नता को—उनकी विभिन्न आवश्यकताओं को समझ ही नहीं लिया जाता, वरन् शरीर की तुलना में आत्मा के महत्व को स्वीकार करते हुए आत्म-कल्याण के प्रयास में तत्पर हुआ जाता है, तब यह माना जाता है कि आत्म-ज्ञान की दिव्य किरणें अन्तःकरण में झाँकने लगीं और आत्मा का स्वरूप जाना ही नहीं गया, वरन् उसका लक्ष्य भी माना गया।
आत्मा-परमात्मा की चर्चा वांग्-विलास के लिए आये दिन होती रहती है। उसकी सार्थकता तभी है, जब शरीर गत स्वार्थों को सीमित करके आत्म-कल्याण के लिए आवश्यक रीति-नीति अपनाने की आकुलता उभरने लगे।
सन्त चिदम्बर उन दिनों सिद्ध-पुरुष माने जाते थे। कितने ही लोग उनके पास सहायता के वरदान माँगने जाते।
एक दिन एक स्त्री—सन्तान प्राप्त होने का आशीर्वाद माँगने आई। सन्त ने उसे भुने चने दे दिये और सन्तोष पूर्वक बैठकर पेट भर लेने को कहा।
स्त्री चने खाती रही। कई छोटे बच्चे उधर खेल रहे थे, उनने चने पाने के लिए स्त्री को निहारा, पर उसने आँखें फेर लीं—किसी को दिये नहीं।
विदाई का प्रणाम करने वह स्त्री पहुँची तो सन्त ने कहा—देवी! जब तू बच्चों को तनिक-से चने तक देने की उदारता न दिखा सकी तो भगवान तुझे बेशकीमती बच्चा मुक्त में कैसे देगा?
अभिलाषा का पूर्णता तक पहुँचाने वाले दो अत्यन्त महत्व पूर्ण माध्यम हैं—(1) यथार्थवादी दृष्टिकोण, (2) सुदृढ़ संकल्प-बल। इन दो पहियों की गाढ़ी को लुढ़काते हुए लम्बी मंजिल भी आसानी से पूरी हो सकती है।
देर तक सोच-विचारने के बाद कोई निर्णय करना और रास्ता अपनाना उचित है। सफलताओं के साथ असफलता के कारणों और परिणामों पर ध्यान रखना भी बुद्धिमानी का चिन्ह हैं। सुविधाऐं और सरलताऐं जो भी हो सकती हैं। उनका लेखा-जोखा रखना ठीक है, पर कठिनाई क्या-क्या आ सकती है और उनके निवारण के लिए क्या करना पड़ सकता है, यह उभय-पक्षीय चिन्तन हर दृष्टि से सराहनीय है। इससे हमारी काल्पनिक भावुकता और बिना पर के आसमान में उड़ने के यथार्थवादी जोश को वस्तुस्थिति समझने का अवसर मिलता है। अपने साधनों को तोलकर जो भी निर्णय किये जाते हैं व कदम बढ़ाते जाते हैं, वे आमतौर से सफल ही होते हैं।
यथार्थवादी चिन्तन आज की अपनी स्थिति पर निर्भर रहता है। दूसरों आश्वासनों की नींव पर महल खड़ा नहीं किया जाता। क्योंकि सद्भाव सम्पन्न स्वजन भी कई बार बहुत भावुक होते हैं और अपना सहयोग देने तथा दूसरों का दिलाने के लम्बे चौड़े सब्ज बाग दिखाते हैं। उनमें से कुछ तो भावुकता वश सब्ज बाग दिखा बैठते हैं और कुछ सामयिक प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए झूँठ-मूँठ बहकाते हैं। ऐसे लोग कम ही होते हैं, जो सहयोग का नपा-तुला ऐसा आश्वासन देते हैं, जो समय पर उपलब्ध भी किया जा सके। इसलिए यथार्थवादी सदा अपने ही साधनों को ध्यान में रखते हुए कोई योजना बनाते हैं, कोई निर्णय करते हैं। आश्वासनों पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करते। ऐसे लोग छोटे कार्य भले ही हाथ में लें, छोटे कदम भले ही उठायें, पर उनकी सफलता निश्चित जैसी रहती है।
प्रगति की आकाँक्षा आवश्यक भी है और उचित भी, पर उसकी सफलता के लिए यथार्थवादी चिन्तन नितान्त आवश्यक है। भावुक काल्पनिकता इस दिशा में सहायक नहीं, बाधक ही अधिक होती है। असफलता का एक ही झोंका ऐसे लोगों की उमंगों को तोड़ मरोड़ कर रख देता है और वे आरम्भ में जितने उत्साही थे अन्त में उतने ही निराशावादी और शंकाशील बन जाते हैं। इसलिए अभिलाषाओं को मूर्त रूप देने के लिए यथार्थवादी चिन्तन की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है।
अभिलाषाओं की सफलता की मंजिल तक पहुँचाने का दूसरा कदम है—सुदृढ़ संकल्प। जो निश्चय है,उसे पूरा करने के लिए अदम्य साहस और आगत अवरोधों से निपटने का अविचल धैर्य रखकर ही आगे बढ़ सकना सम्भव है। यदि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और हवा के अवरोध की कठिनाई न हो तो ऊपर उछाली गेंद सिद्धान्त अनन्त अन्तरिक्ष में भ्रमण करने लगेगी, पर यथार्थवादी जानते हैं कि इस संसार में बिना अवरोध की गतिशीलता असम्भव है। ऊपर उड़ान भरने से पहले गुरुत्वाकर्षण और वायु अवरोध से जूझने की पूरी तैयारी करने से ही ऊपर उड़ना होता है। प्रगति का पथ ठीक इसी प्रकार है। ऊँचे उठने और आगे बढ़ने के लिए अवरोधों से जूझने और उपयुक्त अवसर आने तक—बिना हारे और बिना अधीर हुए—हँसते-मुस्कराते हुए बढ़ते जाने की क्षमता सम्पन्न मानसिक स्तर को संकल्प-बल कहते हैं और संकल्प-बल जिसके पास है, जिसे यथार्थवादी दृष्टिकोण उपलब्ध है, उसके सफल मनोरथ होने में प्रायः कोई संदेह करने की गुंजाइश रहती ही नहीं।
हम क्रमशः विकसित हो रहे हैं—आगे बढ़ रहे हैं, यह एक तथ्य है। आदिम काल के वनवासी मनुष्य ने सभ्यता के वर्तमान चरण तक पहुँचने की लम्बी यात्रा में अपनी अग्रगामी चेष्टा को प्रखर रखा है। चेतना कीर अदम्य इच्छा आगे बढ़ने की—प्रगति करने की है। यह उचित भी है और आवश्यक भी। अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ रही जीव आकाँक्षा अपने लक्ष्य की ओर चलते हुए विकास-क्रम और अग्र-गमन के उत्साह का ही अवलम्बन ग्रहण करेगी। यह विकास-प्रक्रिया न के वल मानवी-चेतना में काम करती हैं, वरन् ब्रह्माण्ड-विस्तार के रूप में भी वह क्रम चल रहा है।
ज्योति भौतिकी की महत्वपूर्ण खोजों से यह स्पष्ट हो चला है कि ब्रह्माण्ड का निरन्तर विस्तार हो रहा है। समस्त आकाश-गंगाऐं, समस्त सौर-मण्डल और ग्रह-नक्षत्र क्रमशः अपना आकाशीय-क्षेत्र आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं। कहा जाता है कि अरबों वर्ष पूर्व सृष्टि के अंतराल में ‘घनीभूत’ पदार्थ के मध्य एक भयंकर विस्फोट हुआ था। उसी के छिटके कर ग्रह-नक्षत्र बने और वह छिटकना तब से लेकर अब तक क्रमशः आगे ही बढ़ता चला जा रहा है। सभी आकाश-गंगाऐं एक दूसरे से दूर हटती जा रही हैं और यही हाल सौर-मण्डलों का है। शून्य आकाश के उन्मुक्त क्षेत्र की विशालता इतनी बड़ी है कि अभी करोड़ों-अरबों वर्षों तक यह दौड़ ऐसे ही चलती रह सकती है,पर कभी न कभी इसका भी अन्त होगा और गोलाई की गति के अनुसार यह धावमान पदार्थ अंततः अपने मूल उद्गम पर जाकर इकट्ठा हो जायगा। उसी स्थिति को महाप्रलय कहा जा सकेगा। उसी स्थिति को महाप्रलय कहा जा सकेगा।
ब्रह्माण्ड-व्यापी आकाश को समझने-समझाने की दृष्टि से चार क्षेत्रों में बाँटा जा सकता हैं —
प्रथम क्षेत्र में हमारी धरती, उसका वायुमण्डल, चुम्बकीय-क्षेत्र है। ऊपरी वायुमंडल का अधिक भाग आवेशित परमाणुओं, अणुओं और इलेक्ट्रानों से बना हुआ है। आकाश के इस क्षेत्र में पदार्थ के अस्तित्व का पता आसानी से चल जाता है।
दूसरा क्षेत्र है—सौर-मण्डल के ग्रहों के बीच में फैला हुआ भाग। यह क्षेत्र सूर्य के बाहरी परि-मण्डल (कोरोना) से निरन्तर निकलने वाली पतली और फैलने वाली गैस से भरा हुआ है। इसे ‘प्लाज्मा’ या सौर वायु कहते हैं। इसी कारण पुच्छल-तारों की पूँछें सदा सूर्य से विपरीत दिशा में रहती हैं। यही हवा पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को भी पूँछ की शकल का ‘पुच्छल-तारा’ बना देती है।
तीसरा क्षेत्र है—पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से प्रायः 50 गुना—सौर-मण्डल से आगे हमारी आकाश-गंगा में जुड़े तारों के बीच का आकाश भाग। यहाँ भी तारों के बीच के भाग में पदार्थ के उदासीन और आवेशित कणों से बनी हुई पतली गैस है।
चौथा क्षेत्र वह आकाश है—जिसमें हमारी आकाश गंगा जैसी अन्य अगणित आकाश-गंगाऐं और उनसे सम्बद्ध असंख्य चित्र-विचित्र ग्रह-नक्षत्र भरे पड़े हैं।
इस विशाल महा आकाश के सम्बन्ध में जितनी कुछ जानकारी अब तक मिली है उसका परिचय विशाल-काय दुर्बीनों, रेडियो टैलिस्कोपों’ किरणों में उपलब्ध विकिरणों, ध्रुव-क्षेत्रों में उपलब्ध आवेशित कणों ध्रुवीय-प्रकाश आदि के साधनों का बड़ा योगदान है। उड़न राकेटों और अन्तरिक्ष यानों ने भी इस आकाश-ज्ञान में अभिवृद्धि की है।
इस समस्त जानकारी के आधार पर यह तथ्य स्पष्ट है कि जन्म से लेकर प्रौढ़ता पर्यन्त हर पदार्थ में विकासक्रम जारी रहता है। अभी अपना ब्रह्माण्ड किशोरावस्था पार करके प्रौढ़ता की आयु में प्रवेश कर रहा है। इसलिए अधिकाँश ग्रह-नक्षत्र अपना आयतन फुला रहे हैं, अपनी कक्षाएँ चौड़ी कर रहे हैं और एक दूसरे से छिटक कर अनन्त आकाश में अविसात की ओर द्रुतगति से दौड़े जा रहे हैं, इसे हम सृष्टि का विकास-विस्तार या प्रगति कह सकते हैं।
एक से अनेक बनने की ब्रह्म-इच्छा ने हिरण्यगर्भ का विस्फोट किया और उससे अगणित आकाश-गंगाओं, महातारकों, सौर-मण्डलों, ग्रह-उपग्रहों, उल्का और धूमकेतुओं का विशाल-काय परिवार अस्तित्व में आया। जन्म के बाद विकास ही दूसरा चरण है, तो हम देखते हैं कि ब्रह्माण्ड में विकास के चरण द्रुतगति से आगे बढ़ रहे हैं। अधिकाँश ग्रह-नक्षत्रों की गति-विधियाँ इन दिनों इसी स्तर की है। हमें अपनी गति-विधियों को विकासोन्मुख, प्रगतिशील रखते हुए प्रकृति की प्रेरणा का अनुगमन करना चाहिए।
ग्रहों की स्थिति का बारीकी से अध्ययन करने पर अनेकों सृष्टि-नियम ऐसे दृष्टिगोचर होते हैं, जो क्या जड़, क्या चेतन सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। अपनी पृथ्वी की अगणित विशेषताओं में से एक यह है कि उसकी ऊपरी परत में शीतलता और हल्कापन पर्याप्त मात्रा में है इसी कारण उस पर जीवों की उत्पत्ति से लेकर शोभा-सुषुमा तक का सौंदर्य विकसित हुआ है। जीवन पर भी यह नियम लागू होता हैं। यदि हलके-फुलके दृष्टिकोण को लेकर जिया जायगा, संग्रहशीलता और अनियन्त्रित-महत्वाकाँक्षाओं के भार से बचा जायगा तो मनुष्य न केवल सुखी रहेगा, वरन् प्रगति भी करेगा। पर जिनने अपने को भारी बोझों से लाद, जकड़ लिया है, उन्हें पग-पग पर जिन्दगी दूभर लगेगी और निरन्तर रोष, असन्तोष की स्थिति से अपने को घिरा पावेंगे। पृथ्वी के भीतरी परतों में गर्मी भी अधिक है और भारीपन का दबाव भी बढ़ा-चढ़ा हैं। अतएव वहाँ किसी सुन्दर और सुव्यवस्थित वस्तु का अस्तित्व नहीं बन पाता। सब कुछ आग्नेय-द्रव के रूप में हैं। भूकम्पों द्वारा समय-समय पर पृथ्वी की इस आन्तरिक स्थिति का परिचय भी मिलता रहता है।
अब तक पृथ्वी को अधिक से अधिक 5 मील तक ही खोदा जा सका है, जब कि पृथ्वी के मध्य केन्द्र की गहराई लगभग 4 हजार मील है। अधिक गहराई में क्या हैं—इसकी यत्किं-चित जानकारी भूकम्पों के समय निकलने वाली भूगर्भीय तरंगों से ही प्रतीत होती है।
पृथ्वी की संरचना में आक्सीजन, सिलिकन, अधिनियम, लोहा आदि भारी तत्वों का बाहुल्य है। ब्रह्माण्ड में प्रायः हाइड्रोजन, हीलियम जैसे हलके पदार्थ ही अधिक भरे पड़े हैं, उसमे उनकी मात्रा 80 से 99 प्रतिशत तक है, पर अपनी पृथ्वी में उनकी मात्रा 1।10 प्रतिशत से भी कम है।
पृथ्वी के भीतरी भाग में दबाव बहुत अधिक है। जहाँ धरती का तरल भाग समाप्त होकर कड़ा आवरण शुरू होता है, वहाँ का दबाव प्रायः प्रति वर्ग इञ्च पर लगभग 10 हजार टन है।
यों अहंकारी स्थूल दृष्टि भारी-भरकमपन और उष्णता उग्रता को ही महत्व देगी,पर पृथ्वी की स्थिति ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके भीतरी अन्तराल में जहाँ गर्मी और दबाव का बाहुल्य है, वहाँ केवल दाह की भट्टी ही जल रही हैं और उस विक्षोभ की उसांसें भूकम्पों और ज्वालामुखियों के रूप में फूटकर शान्त वातावरण को विषाक्त और विकृत ही करती रहती हैं। इसके विपरीत धरती के ऊपरी वायुमण्डल में जहाँ हलकापन और शीतलता का सन्तुलन हैं, वहीं जीवन, सौंदर्य और सुविधा-साधनों के पनपने का अवसर मिला है। यह तथ्य यदि हम समझ सकें तो अपनी गति-विधियों में उपयोगी परिवर्तन करके सुख-सन्तोष भरी प्रगतिशीलता का रसास्वादन कर सकते हैं।
यों हर किसी को स्वावलम्बी बनने का प्रयत्न करना चाहिए, पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपने में जो बीज-रूप से विद्यमान क्षमताएँ हैं, उन्हें विकसित करने के लिए बाहर से भी बहुत कुछ सहयोग लेना पड़ता है। यह सारा समाज सहकारिता के सिद्धान्तों से जकड़ा हुआ हैं। हमारा विकास ही नहीं, जीवन भी पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही गतिशील हो रहा है।
ग्रह-नक्षत्रों का अस्तित्व और क्रियाकलाप भी पारस्परिक सहयोग और आदान-प्रदान पर ही चल रहा है। अपनी पृथ्वी को ही लें, वह सूर्य से बहुत कुछ ग्रहण करती, उसके अनुदान से अपना काम चलाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह दूसरे ग्रहों को अपना अनुदान नहीं देती। निश्चित रूप से लेने के साथ, देने का भी अविच्छिन्न तथ्य जुड़ा हुआ है। जो लेता भर रहेगा और देने का नाम न लेगा, वह बेमौत मरेगा। पृथ्वी दूसरे ग्रहों को पर्याप्त अनुदान देती हैं, पर साि ही अपनी विशेषताओं को अक्षुण्ण रखने के लिए सूर्य पर निर्भर भी रहती है।
ब्रिटिश खगोलज्ञ और सुप्रसिद्ध दूरबीन विशेषज्ञ—’सर विलियमहर्शेल’ ने सूर्य की स्थिति का धरती पर होने वाले प्रभावों का गहरा अध्ययन किया है और यह निष्कर्ष निकाला है कि वनस्पतियों के विकसित और फलित होने से लेकर प्राणियों के शरीर और मनुष्यों के मनःस्तर पर सूर्य-परिवर्तन का असाधारण प्रभाव पड़ता है। इसे देखते हुए यह प्रतीत होता है कि सूर्य से पृथ्वी के न केवल ऋतु-परिवर्तन प्रभावित होते हैं, वरन् प्राणियों का शारीरिक और मानसिक स्तर भी उठता-गिरता है। उजवेक (रूस) के विज्ञानी—’एन. केनीसरिन’ ने सूर्य के धब्बों के साथ पृथ्वी पर दल-दल घटने-बढ़ने की संगति बिठाई है। मास्को के ‘प्रो. शिझेब्स्की’ ने पता लगाया है कि धरती के इतिहास में जब-जब सूर्य में तीव्र प्रतिक्रियायें हुई हैं, तब-तब हैजा, प्लेग, टाइफाइड आदि बीमारियों का संसार में भारी प्रकोप हुआ है। उसका कारण वे बैक्टीरिया जीवाणुओं पर होने वाली सौर-प्रतिक्रिया को मानते हैं। वे सूर्य के प्रभाव में घट-बढ़ होने के कारण मनुष्यों के स्वभाव में हेर-फेर होने की बात भी कहते हैं।
ग्रहों के बीच परस्पर क्या सम्बन्ध हैं? इसका निरूपण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि सभी एक दूसरे के सहयोगी हैं। कौन किस का पिता, पुत्र, भाई, भतीजा आदि है? इसका विश्लेषण करने से कुछ काम नहीं चलता। कौन पुराना, कौन नया, कौन दानी और ऋणी, कौन बड़ा, कौन छोटा—इस झंझट में पड़कर न अहंकार को बढ़ाया जाना चाहिए और न किसी को हीनता का अनुभव कराना चाहिए। अच्छा यही है कि हम पारस्परिक सहकारिता और सहयोग भावना का महत्व समझें और यह मानें कि कोई किसी को एक तरह का सहयोग दे रहा हैं, तो दूसरा उसकी अन्य प्रकार से सहायता कर रहा है।
ग्रह-नक्षत्रों के बीच भी अब इसी मान्यता को प्रधानता दी जा रही है। चन्द्रमा और पृथ्वी के बीच क्या रिश्तेदारी है? इसका विश्लेषण बहुत समय तक किया जाता रहा, पर अब अन्त में इसी निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि कोई किसी का आश्रित नहीं, सभी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और इस ब्रह्माण्ड-परिवार में सभी ग्रह-नक्षत्र सहयोगी सदस्य बनकर रह रहे हैं।
चाँद पृथ्वी का भाई है? बेटा है? या दोस्त-मेहमान? यह पता लगाया जाना शेष है।
‘सर जार्जडार्विन’ ने कहा है कि—प्रशान्त-महासागर की जमीन किसी खण्ड-प्रलय के कारण उखड़ पड़ी और उड़कर चाँद बन गई। जहाँ से वह मिट्टी उखड़ी—वहाँ का गड्ढा समुद्र बन गया। यह उखड़ी हुई जमीन आकाश में मंडराने लगी और धरती का चक्कर काटती हुई चन्द्रमा बन गई। इस प्रकार वह पृथ्वी का बेटा हुआ। इसी संदर्भ में यह भी कहा गया है कि जिन दिनों पृथ्वी की सतह लाल अंगारे की तरह तप रही थी, उन दिनों वह घूमती भी तेजी से थी अपनी धुरी पर तब वह एक चक्कर तीन घण्टे में ही लगा लेती थी, सूर्य के आकर्षण का तब दबाव अधिक था और आये दिन गरम लावे के ज्वार-भाटे जैसे भूकम्प आते थे। उन्हीं दिनों कई विशाल-काय उल्कायें धरती से टकराई और कई समुद्र तथा झील-सरोवर बन गये।
फ्रेंच वैज्ञानिक बुफो ने चन्द्रमा को धरती का भाई माना है। वे कहते हैं—सारे ग्रह-उपग्रह एक ही समय एक ही साथ बने हैं। आरम्भ में अकेला सूर्य था कहीं से एक और विशाल-काय सूर्य आया और हमारे सूर्य से टकरा गया। टकराव से दोनों का बहुत बड़ा हिस्सा धूल बनकर अन्तरिक्ष में उड़ने लगा और जब वह डडडड हुआ तो उसी से सौर-मण्डल के ग्रह और उपग्रह बन गये।
खगोलज्ञ लाटलास वाईज स्नैकर, जेरार्डकुइपर, फ्रन्डहाइल आदि विद्वानों का कथन है कि समस्त आकाश-गंगाऐं, तारक, सौर-मण्डल और उपग्रह, सृष्टि के आदि में प्रथम विस्फोट के छितराव से फैली हुई धूलि से बने हैं। वे आकर्षण-विकर्षण की धाराओं से परस्पर बँधे जरूर हैं और अपनी धुरी और कक्षा की भ्रमणशीलता भी परस्पर सम्बन्धों के आधार पर स्थिर किये हुए हैं—फिर भी कोई किसी से उत्पन्न नहीं हुआ। सभी ग्रह-उपग्रहों का जन्म स्वतन्त्र रूप से हुआ है और उनका मूल कारण आदि पदार्थ ‘हिरण्यगर्भ’ का विस्फोट ही था। इस प्रकार सभी ग्रह एक दूसरे के मित्र, पड़ौसी मात्र हैं। यही बात पृथ्वी और चन्द्रमा के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
ब्रह्माण्ड-परिवार के सदस्य—ग्रह-नक्षत्र जहाँ विकास की दिशा में बढ़ रहे हैं, वहीं उनमें वृद्धता, मरण और पतन का क्रम भी अपने ढंग से चल रहा है। उसे देखते हुए यह सम्भावना स्पष्ट है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड को भी एक दिन मरण के मुख में जाना पड़ेगा। तारक और आकाश-गंगाऐं स्वाभाविक वृद्धता के शिकार होकर मृत्यु के ग्रास होते रहे हैं और आगे होते रहेंगे। जब समस्त ब्रह्माण्ड बूढ़ा हो जायगा तो महाकाल उसे भी अपनी कराल दाढ़ों से चबाकर रख देगा। जन्म के बाद विकास, विकास के बाद मरण का सिद्धान्त तो ब्रह्माण्ड को भी लपेट में लिये बिना छोड़ने वाला नहीं है।
अपनी आकाश-गंगा की शक्ति जिस तेजी से क्षीण हो रही है, उसे देखते हुए वैज्ञानिक उससे सम्बद्ध सौरमण्डलों के अवसान की आशंका करने लगे हैं। मेरीलेण्ड विश्वविद्यालय की खगोल शाखा ने बताया है कि वह दिन निकट आता चला जा रहा है, जब अपनी आकाशगंगा के साथ जुड़े हुए ग्रह उससे छिटक कर दूर चले जायेंगे और अनन्त अन्तरिक्ष में स्वतन्त्र रूप से विचरण करने लगेंगे। इसका प्रभाव सौर-परिवार पर ही नहीं, ग्रहों के साथ भ्रमण करने वाले उपग्रहों पर भी पड़ेगा और एक विश्रृंखल अराजकता की ऐसी बाढ़ आवेगी कि सर्वत्र एकाकीपन दृष्टिगोचर होने लगेगा। पर अन्तर्ग्रहीय आदान-प्रदान की शृंखला टूट जाने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी कि हर नक्षत्र विविधताओं के कारण बनी हुई विशेषताओं और सुन्दरताओं को खोकर—अपने-स्वरूप की तुच्छताओं से सीमाबद्ध, अपंग और कुरूप स्तर का दिखाई पड़ेगा।
यहाँ सब कुछ जन्मता, बढ़ता और मरता है। ब्रह्माण्ड भी। मनुष्य यदि इस तथ्य को समझे तो उसे अपना मरण भी स्मरण रहे—साथ ही यह सोचने का अवसर भी मिले कि इस बहुमूल्य मानव-जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग क्या और कैसे किया जाना चाहिए?
एक भैंस भी—बड़ी उपद्रवी। तुड़ाकर भाग जाती थी और जिस खेत में भी घुस जाती—उसी को कुचल कर रख देती। पकड़ने वालों की भी वह अच्छी खबर लेती। एक दिन तो उसका दिमाग ही खराब हो गया। किसी कि पकड़ में आती ही न थी।
हैरान लोगों के बीच में से एक लड़का निकला, उसने सिर पर हरी घास का गट्ठा रख लिया और उपद्रवी भैंस की तरफ सहज स्वभाव से आगे चलता चला गया। वह ललचाई और घास खाने के लिए आगे बढ़ने लगी। लड़के ने उसके आगे गट्ठा डाल दिया और मौका मिलते ही उछल कर उसकी पीठ पर जा बैठा और डण्डे से पीटते हुए बाड़े में ले आया।
लोगों ने जाना—आवेश भरे प्रतिरोध से भी बढ़कर उपद्रवी-तत्वों को काबू में लाने के लिए क ई बार दूरदर्शी नीतिमत्ता अधिक काम करती हैं।
—’चीनी लोक-कथा’
यह विश्व बहुत बड़ा है। उसके आकार-विस्तार और महत्व की गरिमा को कम नहीं किया जा सकता। फिर भी यह मानना ही पड़ेगा कि चेतन की तुलना में जड़ का महत्व नगण्य है। मनुष्य उन सम्भावनाओं से भरापूरा है, जिनके आधार पर असम्भव को सम्भव बनाया जा सकता है।
मानवी-व्यक्तित्व में ईश्वर की सत्ता का भरपूर समावेश है। व्यक्ति अपनी सूक्ष्म दृष्टि को तीव्र बनाकर अपनी गरिमा को समझे और जो महान् संभावनाऐं उसके भीतर विद्यमान हैं, उन्हें जगाने में प्रवृत्त हो तो निस्सन्देह उसका कर्तृत्व इतना महान् हो सकता है, जिसे ईश्वर के समकक्ष माना जा सके।
यों मनुष्य के कलेवर की अपूर्णता और तुच्छता स्पष्ट हैं, पर उसके अन्तराल में जो सम्भावनाऐं बीजरूप से छिपी पड़ी हैं, उन्हें नगण्य नहीं ठहराया जा सकता। आन्तरिक-चेतना को विकसित करके और अपने भीतर भर एक से एक अद्भुत रत्न-भण्डारों को हस्तगत कर सकता है और सिद्ध-योगी के—देवदूत अवतार के स्तर पर पहुँच कर ईश्वर का राजकुमार कहला सकने का अधिकारी बन सकता है।
भौतिक जगत में भी उसकी चेतना इतनी सम्भावनाऐं प्रस्तुत कर सकती हैं कि अन्य जीवधारी उसे देवताओं की करामात स्तर की ही मान सकते हैं। पिछले दिनों जो वैज्ञानिक प्रगति हुई हैं, उसे पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य कहीं जीवित हो तो इस जमाने को जादुई-लोक की तरह ही हक्का-बक्का होकर देख सकता है।
निकट भविष्य में दृश्यमान वैज्ञानिक उपलब्धियों में एक नई कड़ी जुड़ने वाली है, वह है—’स्वर्ग की सीढ़ी’। अब तक यह कल्पना जगत की उड़ान ही समझी जाती थी कि कोई व्यक्ति शरीर समेत अन्तरिक्ष में अवस्थित स्वर्गलोक के लिए सीढ़ियों पर चढ़ते हुए पहुँचे, पर अब उसका एक चरण निकट भविष्य में पूरा ही होने वाला है।
पौराणिक स्वर्ग-लोक कहाँ है? उसे ढूँढ़ निकालने की सम्भावनाओं से वैज्ञानिकों ने दो टूक इन्कार कर दिया है। उतनी सुविधाओं से भरापूरा कोई नया स्वर्ग बसाने की बात भी किसी के दिमाग में नहीं हैं, पर एक अन्तरिक्षीय प्लेट-फार्म ऐसा बनाया जाने वाला है, जिस पर एक छोटा—किन्तु सर्व सुविधा सम्पन्न नगर बसा हो और उसमें अन्तर्ग्रहीय-यात्राओं के लिए समस्त सुविधाऐं एकत्रित करके रखी जायँ। इस मध्यवर्ती स्टेशन के बन जाने से अन्तर्ग्रहीय-यात्राओं सम्बन्धी कठिनाइयों का तीन-चौथाई समाधान निकल आवेगा।
अनेक मञ्जिली ॐ ची इमारतें, मीनारें, पर्वतारोहण, पिरामिड, स्तूप आदि बनाने की महत्वाकाँक्षाऐं सम्भवतः इसीलिए रही हैं कि आकाश में ऊँचे से ऊँचे चढ़ने का आनन्द लेना मनुष्य चाहता रहा है। वायुयानों का निर्माण-विकास जहाँ उपयोगिता, आवश्यकता की दृष्टि से हुआ है, वहाँ अधिक ऊँचाई तक आकाश में विचरण करने की महत्वाकाँक्षा का योगदान भी कम नहीं रहा है। चन्द्रारोहण की सफलता और मंगल, शुक्र आदि अन्य ग्रहों पर जाने की तैयारी के पीछे अन्य कारण जो भी रहे हों, अन्तरिक्ष का आनन्द और अनुभव लेने की आकाँक्षा ने कम प्रोत्साहन नहीं दिया है। कहते हैं—रावण स्वर्ग तक सीढ़ी बनाना चाहता था, पर आलस्य वश—’आज-कल’ कहते-कहते समय टलता गया और उसकी यह अन्तिम इच्छा अधूरी ही रह गई। पर अब लगता है कि—विज्ञानवेत्ता उस आकाँक्षा को पूरा करने जा रहे हैं।
योजना यह चल रही है कि 36 हजार किलोमीटर ऊँचाई पर अन्तर्ग्रहीय उड़ानों के लिए मध्यवर्ती स्पूतनिक प्लेटफार्म बनाया जाय। यह प्लेटफार्म ठीक चौबीस घण्टे में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करेगा। इतने ही समय में पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। समानान्तर चाल से चलने वाली दो रेल गाड़ियाँ यदि अलग-अलग पटरियों पर चलती रहे तो दोनों पर सवार यात्री यही अनुभव करेंगे कि वे गाड़ियाँ आमने-सामने खड़ी भर हैं। इसी प्रकार पृथ्वी और स्पूतनिक की चाल जब समान होगी तो वह प्लेटफार्म ऐसा प्रतीत होगा कि आकाश में एक ही स्थान पर स्थिर खड़ा है।
जमीन से आसमान तक सीड़ी बनाने का विचार इस स्पूतनिक प्लेटफार्म के साथ जुड़ा हुआ है। स्पूतनिक से लेकर धरती तक धातु निर्मित एक मजबूत सीड़ी लटकाई जायगी और उसी के सहारे माल, असबाब तथा मनुष्य अधिक आसानी एवं कम खर्च में वहाँ तक पहुँचाये जा सकेंगे। भार उठाने वाली ‘क्रेनें’ कई मञ्जिली इमारतों पर चढ़ने का प्रयोजन पूरा करने वाली ‘लिफ्ट’ जिस तरह चढ़ाने-उतारने का काम करती है, उसी उद्देश्य को यह ‘सीड़ी’ पूरा किया करेगी।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और सीड़ी के भार से यह प्लेटफार्म जमीन पर न आ गिरे—इस आशंका के समाधान का यह उपाय सोचा गया है कि जैसी सीड़ी नीचे लटकी हो, वैसी ही ऊपर की ओर भी खड़ी कर दी जाय—उसे अन्य ग्रहों की आकर्षण-शक्ति ऊपर को खींचेगी। फलस्वरूप दोनों आकर्षणों के बीच—भार का सन्तुलन बन जायगा और स्पूतनिक अपने स्थान पर बिना किसी कठिनाई के खड़ा रहेगा।
प्लेटफार्म पर अन्तरिक्ष-यात्रियों के लिए—निवास-आवास की तथा अन्तरिक्ष-यानों के लिए मरम्मत तथा ईधन की सुविधा-सामग्री जमा की जायेंगी। रहने के लिए-हवाई-अड्डा, घर, खाद्य-पदार्थ, टेलीफोन, गोदाम, सुधार की मशीनें, पुर्जे, बिजली, चिकित्सा आदि के सभी आवश्यक साधन यहाँ जमा करके रखे जायेंगे। हलकेपन का पूरा-पूरा ध्यान रखने पर भी यह सारे साधन एक हजार टन के लगभग भारी हो जायेंगे।
अन्तर्ग्रहीय-योजनाओं को सफल और सस्ता बनाने के लिए अन्तरिक्षीय प्लेटफार्म बनाना अब एक अनिवार्य कदम बन गया है। उस पर माल या मनुष्य पहुँचाने के लिए इस ‘स्वर्ग सीड़ी’ को भी आवश्यक मान लिया गया है। आरम्भ में इस कदम पर असाधारण खर्च आवेगा, पर अन्ततः यह एक मितव्ययी प्रयास ही सिद्ध होगा। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को पार करके भार हीनता वाले क्षेत्र तक पहुँचने में ही अन्तरिक्ष-यात्रा में पड़ने वाले खर्च का तीन-चौथाई धन खर्चा हो जाता है। अधर लटकती सीड़ी और स्पूतनिक प्लेटफार्म बन जाने पर ब्रह्माण्ड की खोज और ग्रहों की यात्रा करने के मार्ग की बहुत बड़ी कठिनाई दूर हो जायगी और मनुष्य गर्व पूर्वक कह सकेगा कि उसने अपने कर्तृत्व से एक नया ग्रह—नया लोक बनाया और वहाँ पहुँचने तक के लिए अद्भुत आकाश मार्ग तैयार किया। पौराणिक-भाषा में इस ‘मानव-निर्मित स्वर्गलोक’ और पहुँचने की स्वर्ग-सीड़ी को ‘देव-यान मार्ग’ कहा जा सकेगा। मरने का इन्तजार किये बिना, शंका, सन्देह और अविश्वास के झंझट में पड़े बिना यह स्वर्ग यात्रा अगले दिनों विज्ञान सम्भव होगा—ऐसा प्रतीत होता है। तब परलोक में निवास करने वाला महा-विज्ञानी रावण भी यह सन्तोष कर सकेगा कि स्वर्ग तक सीड़ी बनाने की मेरी आकाँक्षा-आखिर मेरी सन्तान ने पूरी ही कर दी।
जमीन से ऊपर जो भार ऊपर चढ़ाया जायगा, उसका सबसे अधिक दबाव उस स्थान पर पड़ेगा—जहाँ रस्से और स्पूतनिक जुड़ेंगे। इस जोड़ को अधिकाधिक मजबूत कैसे बनाया जाय? इसका समाधान ढूँढ़ने के लिए इंजीनियरों का एक बड़ा दल विविध प्रकार के प्रयोग कर रहा हैं। अनुमान हैं कि रस्सों को हलका रखने का भरपूर प्रयत्न करने पर भी उनका वजन 900 टन तो हो ही जायगा। इतना भार प्लेटफार्म के लिए कोई संकट उत्पन्न न करे और माल को ऊपर चढ़ाने तथा नीचे उतारने का कार्य बिना किसी विशेष ईधन का खर्च किये स्वसंचालित पद्धति से होता रहे, इसके लिए कई तरह के प्रयोग परीक्षण किये जा रहे है।
यह अन्तर्ग्रही-प्लेटफार्म बन जाने से अन्तरिक्ष-यात्रा की वे अधिकांश कठिनाइयां सरल हो जायेंगी, जिनके कारण अन्तर्ग्रहीय शोध-कार्य में पग-पग पर भारी अड़चनें प्रस्तावित प्लेटफार्म की ऊँचाई तक यदि लटकती सीड़ी के सहारे कोई अन्तरिक्ष-यान चढ़ जाय तो वह स्वयमेव बिना किसी प्रयास के पलायन गति पकड़ लेगा। 7 किलोमीटर प्रति सेकेंड की चाल से चलने वाले राकेट धरती की परिक्रमा करने लगते हैं। किन्तु जब वह चाल 11 किलोमीटर प्रति सेकेंड हो जाती हैं तो वह अन्तरिक्ष-यात्रा गति बन जाती है। इसी को ‘पलायन गति’ कहते हैं। प्रस्तावित सीड़ी के सहारे यों अन्तरिक्ष-यानों को प्लेटफार्म तक चढ़ाया जायगा, वह पलायन गति पकड़ लेगा। तब उपग्रहों में प्रयुक्त होने वाले ईधन का खर्च, स्थान भार बहुत ही कम रह जायगा और अन्तरिक्ष-यात्रा के उपक्रम के मार्ग की 80 प्रतिशत कठिनाइयाँ एवं आवश्यकताऐं हल हो जायेंगी।
मध्य आकाश में अवस्थित प्लेटफार्म बनाने की आवश्यकता जहाँ अंतर्ग्रहीय उड़ानों की दृष्टि से अनिवार्य बनती जा रही हैं, वहाँ मनोरंजन के लिए भी साहसिक यात्रा की दृष्टि से भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। सोचा यह जा रहा है कि सम्पन्न और साहसी लोग अवश्य ही ऐसी यात्रा का आनन्द लेना चाहेंगे। इसलिए एक दूसरी योजना यह चल रही है कि एक प्लेटफार्म विशुद्ध यात्रा मनोरंजन के लिए बनाया जाय और वहाँ पिकनिक के सारे साधन जुटाकर रखे जायँ। सस्ते होटलों में भी आवश्यक सुविधाऐं रहती हैं, पर अमीर लोग ऊँचे दर्जे के, अधिक खर्चीले होटलों में ही ठहरना अधिक पसन्द करते हैं। अन्तरिक्ष-यात्रा करके वहाँ थकान मिटाने और क्रीड़ा-विनोद का आनन्द लेने के लिए मनचले शौकीन, धनाध्यक्ष वहाँ अवश्य पहुँचेंगे और खर्चीली टिकट खरीद कर भी वे उस यात्रा के लिए तैयार रहेंगे। इस प्रयोजन के लिए मध्य आकाश में एक क्रीड़ा प्रांगण और वहाँ तक जाने-आने के लिए ‘अन्तरिक्ष-शिटल’ चलेगी।
अमेरिका की एक बड़ी अन्तरिक्ष-फर्म लाकहीड एयरक्राफ्ट कारपोरेशन’ ने इस कार्य को अपनी विशाल-काय योजना ‘हाइपरसोनिक्स’ में विशेषज्ञों के योग से आवश्यक साधन जुटाने के लिए कदम उठाये हैं। ध्वनि की गति से 25 गुना तेज उड़ सकने वाले यान यात्रियों को, उनके सामान को ले जाया करेंगे और जेट विमानों की तरह अपने अड्डे पर लौट आया करेंगे। इस योजना को लाकहीड तथा कई बोइंग कम्पनियाँ मिलकर कार्यान्वित करने जा रही हैं।
प्रस्तावित प्लेटफार्म से न केवल अन्तर्ग्रहीय यात्राओं के सरल बनाने का माध्यम बनाया जायगा, वरन् उस पर अनेक मनुष्य-कृत प्रयोगशालाऐं, शक्ति शाली यन्त्र उपकरणों से सुसज्जित करके रखी जायेंगी। धरती के कोलाहल से अंतर्ग्रहीय रेडियो संकेत सुनने-समझने में भारी बाधा रहती हैं, यह प्लेटफार्म के शान्त वातावरण में न रहेगी और वहाँ वह शोध अधिक अच्छी तरह हो सकेगी। उल्काओं का पृथ्वी से टकराने का खतरा बना रहता है, जो उल्का पृथ्वी के समीप आ रही होंगी, उन्हें रेडियो तोपों से चलाकर दूर भगाया जा सकेगा। समस्त पृथ्वी पर काम करने वाले—रेडियो, टेलीविजन एवं टेलीग्राम, टेलीफोन का यह एक सार्वभौम स्टेशन होगा और इस एक केन्द्र से ही समस्त पृथ्वी की संचार-सम्वाद-व्यवस्था सुसंचालित की जा सकेगी। अणु-अस्त्रों के प्रयोग को भी यहीं बैइकर रोका जा सकेगा। मौसमों की न केवल पूर्व सूचना दी जा सकेगी, वरन् उनकी रोक-थाम भी सम्भव हो सकेगी। ऐसे-ऐसे अनेक उपयोग इस मध्यवर्ती अन्तरिक्ष-स्टेशन के सोचे गये हैं और उन लाभों को ध्यान में रखते हुए उतना अधिक धन तथा साधन उस कार्य में लगाने का निश्चय किया गया है।
यह प्लेटफार्म प्रस्तावित योजना के अनुरूप इसी शताब्दी में बन जाता है या उसमें हेर-फेर अथवा इन्तजार की आवश्यकता पड़ेगी—यह भविष्य के गर्भ में हैं। पर जो योजना चल रही हैं, वो यह बताती हैं कि मानवी-मस्तिष्क और मानवी-साधनों की महत्ता कितनी अधिक हैं। मनुष्य यदि सर्वांगीण प्रगति के पथ पर चल पड़े तो यह सत्य ही सिद्ध होगा कि उसके लिए कुछ असंभव नहीं है।
प्रगति के पथ पर चलते हुए यदि दूसरों का सहयोग मिल सकता है तो उसे प्राप्त करने में हर्ज नहीं। सहयोग दिया जाना चाहिए और आवश्यकतानुसार लेना भी चाहिए। पर इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि हमारी मूलभूत आवश्यकता हमें स्वयं ही पूरी करनी पड़ती हैं दूसरों के सहयोग से तो थोड़ा ही सहारा मिलता है।
अपनी आँखें न हों तो दूसरों द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रकाश-उपकरण अथवा सुन्दर दृश्य निरर्थक हैं। अपना पेट खराब हो जाय तो दूसरों द्वारा प्रस्तुत सुन्दर व्यञ्जन कब स्वादिष्ट लगेंगे? कान बहरे हो जाये तो किसी के सदुपदेश अथवा गीत-वाद्य अपना कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न कर सकेंगे। विक्षिप्त मस्तिष्क के स्नेही स्वजन भी पशुवत् आचरण करते प्रतीत होते हैं। अपनी विकृतियाँ समस्त संसार के सुखद साधनों को दुख-दारिद्रय से भरकर रख देती हैं। दूसरों का सहयोग भी ऐसी दशा में अवरुद्ध हो जाता है। यदि वह मिले भी तो उससे लाभ उठा सकने की स्थिति नहीं रहती।
वाह्य सहयोग को आकर्षित करने और उससे समुचित लाभ उठाने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि अपनी निज की मनःस्थिति सही और सन्तुलित हों। इसलिए प्रथम महत्व दूसरों का नहीं रहता, अपना ही होता हैं। दूसरों के सहयोग की आशा करने में उससे लाभ उठाने की बात सोचने से पूर्व आत्म-निरीक्षण किया जाना चाहिए कि हम सहयोग के अधिकारी भी हैं, या नहीं? कुपात्र तक पहुंचने के बाद भी विभूतियाँ बेकार हो जाती हैं। पत्थर की चट्टान जल-प्रवाह में पड़ी रहने पर भी भीतर से सूखी ही निकलती हैं। मात्र बाहरी सहयोग से न किसी का कुछ काम चल सकता है और न भला हो सकता है।
दूसरों का सहारा तकने की अपेक्षा हमें अपना सहारा तकना चाहिए। क्योंकि वे सभी साधन अपने भीतर प्रचुर मात्रा में भरे पड़े हैं, जो सुव्यवस्था और प्रगति के लिए आवश्यक हैं। यदि सूझ-बूझ की वस्तुस्थिति समझ सकने योग्य यथार्थवादी बनाने की साधना जारी रखी जाय तो सबसे उत्तम परामर्श-दाता सिद्ध हो सकती है। मस्तिष्क में वह क्षमता मौजूद है, जिसे थोड़ा-सा सहारा देकर उच्चकोटि के विद्वान् अथवा बुद्धिमान कहलाने का अवसर मिल जाय। हाथों की संरचना अद्भुत है, यदि उन्हें सही रीति से उपयुक्त काम करने के लिए सधाया जा सके तो वे अपने कर्तृत्व से संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। मनुष्य का पसीना इतना बहुमूल्य खाद है, जिसे लगाकर हीरे-मोतियों की फसल उगाई जा सकती है।
शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान के ज्ञाता आश्चर्यचकित हैं कि विशाल ब्रह्माण्ड की तरह ही इस छोटे से मानव-पिण्ड में भी एक से एक बढ़कर कैसी अद्भुत क्षमताओं को किसी कलाकार ने किस कारीगरी के साथ सँजोया हैं? कोशिकाओं और ऊतकों की क्षमताओं और हलचलों को देखकर लगता है कि जादुई-देवदूतों की सत्ता प्रत्येक जीवाणु में ठूँस-ठूँस कर भर दी गई हैं। कायिक-क्रियाकलाप और मानसिक-चिन्तन-तन्त्र किस जटिल संरचना और किस संचरण, सन्तुलन का प्रदर्शन करता है। उसे देखकर हतप्रभ रह जाना पड़ता हैं।
पिण्ड की आन्तरिक संरचना जैसी अद्भुत है, उससे हो सकने की भरी पड़ी है। मनोबल का यदि सही दिशा में प्रयोग हो सके तो फिर कठिनाई नहीं रह जायगा।
अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था ही है, जो हमें दीन-हीन और लुँज-पुँज बनाये रखती है। दूसरों का सहारा इसलिए तकना पड़ता है कि हम अपने को न तो पहचान सके और न अपनी क्षमताओं को सही दिशा में, सही रीति से प्रयुक्त करने की कुशलता प्राप्त कर सके। शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद ने ही हमें इस गई-गुजरी स्थिति में रखा है कि आत्म-विश्वास करते न बन पड़े और दूसरों का सहारा ताकना पड़े। यदि आत्मावलम्बन की ओर मुड़ पड़ें तो फिर परावलम्बन की कोई आवश्यकता ही प्रतीत न होगी
एक पन्थ का साधू या पुरोहित—दूसरे सम्प्रदाय वालों को अमान्य होता है। क्योंकि उस धार्मिकता का आधार वाह्य-परिचर्याओं के साथ हुआ था। वस्त्रों का रंग, वेष, तिलक, छाप और अमुक पैगम्बर अथवा पुस्तक की दुहाई देने वाले, मान्य परम्पराओं का परिपोषण करने वाले लोग ही अन्ध-श्रद्धालु जनता में मान्यता प्राप्त करते हैं। यह धर्म की अन्ध-परम्परा हुई। दुर्भाग्य से इसी का प्रचलन बहुत है। फिर भी सार्वभौम-धर्मतत्व को सर्वथा विस्मृत नहीं कर दिया गया है, उसकी सर्वत्र अवज्ञा, अवहेलना नहीं है। विचारशील लोग सोचते हैं, जब धरती-आसमान एक हैं, एक ही सर्दी-गर्मी सबको प्रभावित करती है। हवा और पानी का एक ही तत्व सबका पोषण करता है और मनु की समस्त सन्तानें एक ही मनुष्य एवं मानव नाम से पुकारी जाती हैं तो फिर समस्त विश्व का एक ही धर्म क्यों नहीं हो सकता? जब विज्ञान की मान्यताऐं सर्वत्र एक ही रूप में मानी जाती हैं तो फिर ज्ञान को भी अविछिन्न क्यों नहीं रहना चाहिए? धर्म-तत्व में देश और जाति के कारण अन्तर क्यों आना चाहिए? जब प्रेम, सत्य, संयम, औदार्य जैसे सद्गुण और क्रोध, छल, आलस्य आदि दुर्गुण सर्वत्र एक ही कसौटी पर कस कर भले और बुरे घोषित किये जाते हैं तो धर्म की अन्यान्य मान्यताऐं क्यों ऐसी नहीं होनी चाहिए? जिन्हें मानवी-विवेक, बिना किसी हिचकिचाहट के अंगीकार कर सके?
यह कैसी विडम्बना है कि मोक्ष उन्मुक्त अन्तः स्थिति का—समर्थन करने वाले धर्म ही किस प्रकार एक सम्प्रदाय के लोगों को दूसरे सम्प्रदाय के लोगों के साथ एकता स्थापित करने में दीवारें खड़ी करते हैं। अपने और दूसरे पक्षधरों के बीच असमानता ही नहीं, अन्याय करने का भी प्रोत्साहन करते हैं। छोटी-छोटी मान्यताओं, परम्पराओं एवं कृपा-कृत्यों के कारण प्रस्तुत मतभेदों को उभार कर वे भयंकर विग्रह उत्पन्न करते हैं और धर्मयुद्ध के—जिहाद के नाम पर उन कुकृत्यों का सृजन करते हैं, जिन्हें देखकर ‘अधर्म’ भी स्तब्ध रह जाय। वह धार्मिकता कैसी—जो मानवी सद्गुणों को बढ़ाने की अपनी मूल प्रकृति को छोड़कर मतान्तरवाद के सहारे अमानवी कृत्यों और दुष्कर्मों को बढ़ावा देने लगे?
संप्रदाय युक्त धर्म ही मान्य-धर्म हो सकता है। सम्प्रदायों को धर्म मान बैठने से ही सारी गड़बड़ी उत्पन्न होती हैं। धर्म शब्द के साथ जो सहज श्रद्धा और शाश्वत समर्थन जुड़ा हुआ है, उसका शोषण सम्प्रदायवादी करते हैं और जब मतान्तरवादी दुराग्रहों पर अंकुश किया जाता है तो ‘धर्म खतरे मैं है’—के नारे लगाकर भावुक जनता की भावनाऐं भड़कती हैं। सम्प्रदायों को भोजन-वस्त्र की रुचि भिन्नता की तरह वैयक्तिक क अभिरुचि का विषय माना जा सकता है। उसके लिए छूट दी जा सकती है, किन्तु धर्म के सर्वोच्च सिंहासन पर उसे नहीं बिठाया जा सकता। इसकी पात्रता तो उनमें तब उत्पन्न होगी जब समस्त सम्प्रदाय मिलकर एक विश्व सम्प्रदाय अथवा मानव-पन्थ का रूप धारण करेंगे। जब तक वे एक दूसरे के रक्त -पिपासु बने हुए हैं—अपने को सही और दूसरों को गलत सिद्ध करने पर अड़े हुए हैं, तब तक ‘धर्म’ शब्द को अपने साथ जोड़ने की चेष्टा अनधिकार पूर्वक कर रहे ही कहे जायेंगे। एकांगी दृष्टिकोण—पक्षपात का दुराग्रह धर्म कैसे हो सकता है? विवेक और औचित्य को यदि आधार माना जाय तो प्रायः सभी सम्प्रदाय बालों को अपने-अपने पन्थों में से ढेरों कूड़ा-करकट बुहारना पड़ेगा। एक समय की उपयोगिता दूसरे समय में अनुपयोगिता बनती रहती है। यह दृष्टि रखकर यदि सफाई पर निकला जाय तो हर सम्प्रदाय में ऐसा बहुत कुछ है, जिसकी अब कोई जरूरत नहीं रही। इसी प्रकार यदि दोष-दर्शन हटाकर गुण-ग्राहक दृष्टि को विकसित किया जाय तो अन्य सम्प्रदायों में ऐसा बहुत कुछ मिलेगा, जिसे अपने धर्म में मिला लेने से उसकी हेठी नहीं होगी। वरन् सर्वांग पूर्णता में ही अभिवृद्धि होगी।
धर्म-शासन का क्षेत्र निहित स्वार्थों का केन्द्र बना तो भिन्नतावादी प्रवृत्ति पनपीं, और राज्य तथा धर्म को अलग करने के आन्दोलन चले। योरोप में कई शताब्दियों तक इसी आधार पर गृहयुद्ध की स्थिति बनी रही। रोमन कैथोलिक चर्ध के विरुद्ध प्रोटेस्टेंट खड़े हुए। मार्टिन लूथर के नेतृत्व में प्रचण्ड आन्दोलन उठा। अन्ततः धर्म और शासन की पृथकता स्वीकार कर लेने पर समझौता हुआ। अब योरोप के प्रायः सभी राज्य, धर्म निरपेक्ष है।
एकता को अनेकता में बखेर कर हमने पाया कम, खोया बहुत। प्राचीन काल में एक ईश्वर था और एक धर्म। पृथकतावादी निहित स्वार्थों ने अपना लाभ इसमें देखा कि उनका एक विशेष सम्प्रदाय बने और उसके अनुयायी अन्यायों से पृथक होकर एक विशेष वर्ग बनाये और दूसरों से लड़ें। उनका व्यक्ति गत वर्चस्व इसी में बनता था। प्रतिभाशाली अग्रगामी जन-समाज को अपने पीछे घसीट ले चलने में सदा से ही बहुत कुछ सफल होते रहे हैं। अस्तु पृथकतावाद पनपता गया। अनेक सम्प्रदाय, अनेक देवता, अनेक ग्रन्थ, अनेक विधि-निषेध गढ़े गये और विलगाव की जड़े मजबूत होती चली गई। इससे केवल पुरोहित वर्ग का स्वार्थ सधा। बाकी सब लोग भ्रान्तियों के जंजाल में फँसकर अपना समय, धन और विवेक गँवाकर घाटे में ही रहते रहे।
विवेक की माँग कि इस अनेकता को घटाया और मिटाया जाय। एक धर्म एक ईश्वर एक दर्शन,एक आचार एक जाति की भावात्मक-एकता स्थापित की जाय और उसका व्यावहारिक स्वरूप —एक राष्ट्र में, एक भाषा में विकसित किया जाय। पृथकता के लिए आग्रह बनाये रखकर हम हर दृष्टि से घाटे में ही रहेंगे।
प्राचीन काल में धर्म और शासन एक था। बाद में एक दूसरे के पूरक होकर रहते रहे। यही स्थिति पुनः स्थापित करनी पड़ेगी। धर्म के हाथ में शासन रहना चाहिए और शासन को धर्म की प्रतिष्ठापना एवं सुरक्षा का उत्तरदायित्व निबाहना चाहिए। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की भारतीय मान्यता के पीछे धर्म और शासन का समन्वयात्मक संचालन का ही दृष्टिकोण रहा है। पूर्वकाल में राजा और धर्माचार्य की भूमिका एक ही व्यक्ति निवाहता था। धर्म-व्यवस्था और शासन का सूत्र संचालन एक ही व्यक्ति करे, इसमें उन दिनों सुविधा समझी गई। मुस्लिम-इतिहासकारों ने बादशाहों को—”जिले अल्लाह” (ईश्वर का प्रतीक) लिखा है। डेनमार्क की माताऐं अपने नवजात बच्चों का स्पर्श राजा से कराने के लिए ले जाती थीं और किसान अपना अनाज तब खाते थे—जब राजा उसे छूकर ‘निर्दोष’ बना देता था। इनका विश्वास था कि—इस प्रकार के स्पर्श से कल्याण होता है। ब्रिटेन में यह मान्यता बहुत समय तक बनी रही कि रोग-मुक्ति के लिए—राजा का स्पर्श चमत्कारी उपचार है। तिब्बत में प्रमुख मठाधीश ‘लामा’ को अवतार माना जाता रहा है। धर्माचार्य और शासनकर्ता की दोनों ही भूमिका उन्होंने निबाही हैं।
योरोप में एक समय ईसाई धर्म के लिए भावुक-मान्यता थी, तब ‘रोमन कैथोलिक चर्च’ इसाइयों की सर्वोच्च संस्था थी। राजाओं पर तथा जन-साधारण पर उसका समान प्रभाव था। तेरहवीं शताब्दी में आठवें पोप बोनीफेस ने चर्च को सर्व शक्ति मान घोषित कर दिया था। ब्रिटेन, फ्राँस आदि देशों के शासक पोप के अधीन माने जाते थे।
धर्म और शासन को पृथक इसलिए होना पड़ा कि उसमें पृथकतावादी-दुराग्रहों ने अड्डा जमा लिया। यदि धर्म केवल भावनात्मक-एकता, चरित्र-निष्ठा और लोककल्याण की सत्प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करे—व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने में सहायता करे तो कोई कारण नहीं कि उसे सर्वमान्य सम्मान पुनः प्रदान न किया जा सके।
धर्म में मानवी-चेतना को आस्थाओं के साथ बाँधने की क्षमता है। व्यक्ति को सुव्यवस्थित और समाज को समुन्नत बनाने की दृष्टि से यह क्षमता का अत्यधिक महत्व है। उसे यदि अपने यथार्थ स्वरूप में रहने दिया जाय और चिन्तन तथा कर्तृत्व को परिष्कृत बनाने के लिए दूर-दर्शिता के साथ प्रयुक्त किया जाय तो निस्सन्देह सर्वतोमुखी प्रगति और सुख-शान्ति के अभिवर्धन में धर्म की महती भूमिका हो सकती है। आज की विकृत दुर्दशा की कीचड़ से धर्म को निकाल कर उसे आदर्शवादी उत्कृष्टता के साथ जोड़ना—मानवी हित-साधना की दृष्टि से अतीव आवश्यक कार्य माना जाना चाहिए।
क्या शुष्क वायुमण्डल में आर्द्रता उत्पन्न की जा सकती है? क्या सुखे आसमान से वर्षा हो सकती है? यह प्रश्न ऐसे ही हैं, जैसे कि यह पूछना कि—क्या कठोर प्रकृति कोमल बनाई जा सकती हैं? क्या संकीर्ण स्वार्थपरता को उदार आत्मा-विस्तार में परिणत किया जो सकता है?
मोटेतौर से यक प्रतीत होता है कि आधार न हो तो परिणाम कैसे उत्पन्न हो सकता है? पर वात ऐसी है नहीं प्रकृति के अन्तराल का थोड़ा गहन अध्ययन करें तो प्रतीत होगा कि सर्वत्र बीज-रूप से सभी पदार्थ और सभी परिस्थितियाँ मौजूद हैं। किसी वस्तु का कहीं पूर्णतया अभाव नहीं। बीज-रूप से हर वस्तु हर जगह विद्यमान है। जो नहीं है, उसे भी प्रयत्न करने पर उगाया और बढ़ाया जा सकता है।
कृत्रिम वर्षा के प्रयोग अब क्रमशः अधिक सफल होते जा रहे हैं और जहाँ बादल नहीं है, वहाँ बादल लाने तथा जिन बादलों में पानी नहीं है, उनमें बरसने वाली घटा उत्पन्न करना अब शक्य और प्रत्यक्ष होता जा रहा है।
सोडियम क्लोराइड भरे गुब्बारे आकाश में उड़ाये जाते हैं, वे एक निश्चित ऊँचाई पर जाकर अपने आप फट जाते हैं और वह नमक उस क्षेत्र में उड़ने वाले बादलों पर छिड़क जाता है। फलस्वरूप वर्षा होने लगती है।
कृत्रिम वर्षा की दूसरी विधि है, रासायनिक पदार्थों के संयोग से कृत्रिम बादल बनाना। हवा में जो नमी होती है, उसे एक जगह एकत्रित करने वाले रसायन यदि बखेर दिये जायँ तो समुद्र से उठने वाले मानसून की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी, वरन् स्थानीय वायु में भरा हुआ जल अंश ही सघन होकर बादलों के रूप में प्रकट होगा।
कार्बन डाई-आक्साइड को घनीभूत करके सूखी बर्फ की तरह जमा लिया जाता है और उसका बुरादा बादलों पर छिड़का जाता है, इससे वे वर्षा करने की स्थिति में आ जाते हैं। सिल्वर आक्साइड का धुंआ छोड़ने से भी यही प्रयोजन पूरा हो सकता है। छोटे जल-कणों को परस्पर एकत्रित होकर बड़े जल-कणों का रूप बना लेने और बूँद बनकर बरसने लगने की पृष्ठभूमि उपरोक्त रसायनों द्वारा बनाई जा सकती है।
एक प्रयोग यह है कि जलता हुआ तेल आकाश में छोड़कर उस धुँए से बादलों को आकर्षित किया जाय। यह प्रयोग अमेरिका में पूर्ण सफल रहा है। यज्ञ द्वारा वर्षा होने की बात भी इसी आधार पर सिद्ध होती है। प्राचीन-भारत के विज्ञानी इस रहस्य से परिचित थे। इसलिए उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयोजन के साथ-साथ उपयुक्त वर्षा कराने वाली प्रक्रिया का यज्ञ रूप में विकास किया।
कृत्रिम वर्षा का शोध-कार्य भारत में भी चल रहा है। ‘कौंसिल आफ सांइटिफिक एण्ड इण्डिस्ट्रियल रिसर्च’ ने इसके लिए एक विशेष व्यवस्था की है। उसका नाम है—’रेन एण्ड क्लाइड रिसर्च यूनिट’। अन्य देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग चल रहे हैं कि वर्षा कराने या रोकने का अधिकार अकेले इन्द्र देवता के हाथों में ही न रहे, वरन् मनुष्य भी उसका अधिकारी, हिस्सेदार बन जाय।
मनुष्य की प्रकृति जन्मजात होती है और वह बदली नहीं जा सकती। समाज की परिस्थितियाँ युग का परिपाक है, हम उसमें क्या कर सकते हैं? यह दोनों ही विचार निरर्थक और निराशावादी हैं। कृत्रिम वर्षा के सफल प्रयोगों पर दृष्टिपात करें तो यह आशा सहज ही वैध सकती है कि मानवी-प्रकृति और समाज की परिस्थितियों को अभीष्ट दिशा में मोड़ा-मरोड़ा जा सकना—श्रम-साध्य भर है—असम्भव नहीं।
ए. एन. विडगेरी ने अपनी पुस्तक “कान्टेम्पोरेरी र्थाट आफ ग्रेट ब्रिटेन” में इस बात पर चिन्ता व्यक्त की है कि साँसारिक अस्तित्व के सम्बन्ध में जितनी खोज की जा रही है, उतना मानवी-अस्तित्व के बारे में नहीं खोजा जा रहा है। लगता है-मानवी सत्ता, महत्ता और आवश्यकता को आँखों से ओझल ही किया जा रहा है अथवा चेतन को जड़ क अनुगामी सिद्ध किया जा रहा है। बौद्धिक-प्रगति के यह बढ़ते हुए चरण हमें सुख-शान्ति के केन्द्र से हटाकर ऐसी जगह ले जा रहे हैं, जहाँ हम याँत्रिक अथवा रासायनिक बोलने-सोचने वाले उपकरण मात्र बनकर रह जायेंगे। तब हम साधन-सम्पन्न कितने ही क्यों न हों—सभ्यता और संस्कृति जन्य गरिमाओं से हमें सर्वथा वंचित हो होना पड़ेगा। जड़-जीवन के लिए बाधित की गई चेतना कितनी अपंग हो जायगी? जब यह कल्पना करते हैं तो प्रतीत होता है कि विकास की दिशा में चल रही हमारी दौड़ विनाश में अधिक विघातक सिद्ध होगी।
कई रूपों में हम—अपने पूर्वजों की अपेक्षा अधिक अच्छे समय में रह रहे हैं। आज एक विधि तथा नियम का स्थिर शासन और निश्चित संविधान है। व्यक्ति गत संपत्ति एवं स्वतन्त्र अभिव्यक्ति अधिक सुरक्षित है। विज्ञान की प्रगति के कारण मृत्यु दर घट रही है। व्याधियों पर नियन्त्रण किया जा रहा है। औसत आयु बढ़ रही है। शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। देश-भक्ति जगी है। सुविधा-सामग्री सस्ती तथा सामान्य हो गई है। शासन की स्थापना में जनता का हाथ है। इतना सब होते हुए भी एक भारी क्षति मानवी-दृष्टिकोण का स्तर बहुत नीचा गिर जाने की हुई है। आज सर्वाधिक ज्ञानी, सर्वाधिक धनवान् और सर्वाधिक सामर्थ्यवान् लोगों का दृष्टिकोण भी संकीर्ण और स्वकेन्द्रित हो रहा है। वर्तमान से आगे की उनकी चिन्ताऐं तथा रुचियाँ जाती रही हैं। आत्मा के सम्बन्ध में सोचने के लिए उनके पास समय नहीं और न यह सूझ पड़ रहा है कि मानव-जाति का भविष्य बनाने के लिए-बिगाड़ को रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है?
खोज और प्रगति के लिए मात्र भौतिक-क्षेत्र में ही अपने को अवरुद्ध कर लेना हमारे लिए उचित न होगा। यह और भी अधिक आवश्यक है कि जिस जीवधारी के लिए प्रकृति की शक्तियों को करतलगत करके विपुल सुविधा साधन जुटाये जा रहे हैं, उसकी अपनी हस्ती क्या है? इस पर भी विचार किया जाय और यह भी खोजा जाय कि जीवन-सत्ता का विकास-विस्तार किस हद तक सुख-शान्ति की आवश्यकता पूर्ण कर सकता है? विज्ञान का यह पक्ष भी कम उपयोगी और कम महत्वपूर्ण नहीं समझा जाना चाहिए।
अभावों और असुविधाओं से लड़ने और प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए जीवधारी की संकल्पशक्ति को प्रखर बनाया जाना चाहिए। साधनों की बहुलता तो मनुष्य को अकर्मण्य और अशक्त बनाती चली जायगी। प्रगति का मूल आधार विचार-प्रवाह एवं संकल्प-बल ही रहा है। जीवधारियों की प्रगति का इतिहास इन्हीं उदाहरणों से भरा पड़ा है।
सृष्टि के आरम्भ में बहुकोशीय जन्तुओं की बनावट बहुत ही सरल थी। स्पञ्ज, हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल, सी. ऐनीमोन आदि ऐसे ही बहुकोशीय जीव थे। इनके आहार और मल-विसर्जन के लिए शरीर में एक ही द्वारा था। इसके बाद क्रमशः सुधार होता चला गया। आहार और मल-विसर्जन के लिए दो द्वार खुले। फिर हड्डियाँ विकसित हुई। मेरुदण्ड बने, बिना खोपड़ी वाले जानवर धीरे-धीरे खोपड़ी वाले बने। जलचरों ने थल में रहना सीखा। फिर तो कुछ हवा तक में उड़ने लगे। यही विकास क्रम उद्भिज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज प्राणियों में अग्रगामी हुआ। स्तनपायी जीवों की काया जैसे-जैसे बुद्धिमान होती गई, वैसे ही वैसे उनमें अनेक प्रकार की शक्ति यों और विशेषताओं का विस्तार हुआ। तदनुसार ही उनकी इन्द्रिय क्षमता एवं अवयवों की संरचना परिष्कृत होती चली गई। इसी लम्बी मंजिल को पार करते हुए जीवन आज की स्थिति तक बढ़ता चला आया है।
विकासवाद के अनुसार दुनिया के प्राचीनतम और सरलतम जीव प्रोटोजोन्स वर्ग के हैं। इन जीवों का शरीर एक कोशीय होता है। उदाहरण के लिए अमीबा, यूग्लीना, पैरामीसिमय, वर्टीसेला आदि का आरम्भ एक कोशीय-जीव के रूप में ही हुआ था। पीछे इनमें से कुछ ने सुरक्षा और सुविधा के लिए परस्पर मिल-जुलकर रहना आरम्भ कर दिया। बालकाक्स नामक जीव छोटी-छोटी कालोनी बना कर रहने लगे। इनने अपने-अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व बाँटे और मिल-जुलकर रहने के लिए आवश्यक व्यवस्था क्रम का सूत्र संचालन किया। उनमें से कुछ आहार जुटाने, कुछ वंश-वृद्धि करने, कुछ सुरक्षा सँभालने, कुछ सूत्र-संचालन और कुछ वर्ग के लिए विविध-विधि श्रम-साधना करने में तत्पर हो गये। इसे हम आदिम-कालीन वर्ण-व्यवस्था कह सकते हैं। इस सहयोग-व्यवस्था के फलस्वरूप जीवन-विकास में तीव्र गति उत्पन्न हुई और बहुकोशीय मल्टी सेल्यूलर-जन्तुओं का उद्भव सम्भव हुआ।
सृष्टि के आदि में जीव बहुत ही छोटे एवं आकार और बनावट में बहुत ही सरल थे। धीरे-धीरे समय के साथ और वातावरण के अनुकूलन की परिस्थिति में सरल से जटिल और जटिल से जटिलतम होते गये। प्रकृति की इस मौलिक प्रक्रिया के फलस्वरूप सृष्टि बनी और विविधता का सूत्रपात हुआ।
सरल जीवों को जटिल जीवों में बदलने की प्रक्रिया को ‘विकास’ कहते हैं। इस विकासवाद को समझने के लिए विभिन्न सूत्र जो समय-समय पर वैज्ञानिकों ने अपने दृष्टिकोण से सामने रखे, उन्हें ‘विकासवाद के सिद्धान्त’ कहते हैं। इन्हें कई वैज्ञानिकों ने विविध तर्कों, तथ्यों और उदाहरणों सहित प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया हैं। लेमार्क और ह्यूगोडिब्राइस ने पिछली शताब्दी में चार्ल्स डार्विन ने विशेष ख्याति प्राप्त की है।
उपरोक्त तथ्यों पर ध्यान देने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि अभाव ही नहीं, अदक्षता और असमर्थता का निराकरण भी संकल्प-शक्ति को विकसित करके ही किया जा सकता है। क्रमिक-विकास की खोजों से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। वे बताती हैं कि भावी-प्रगति की जो भी योजनायें बनाई जायँ, उनमें मानवी-विचारणा, भावना और आन्तरिक प्रखरता को उच्चस्तरीय बनाने को सर्वोपरि प्रधानता दी जाय। मनुष्य इसी अवलम्बन के सहारे अन्य जीवों की तुलना में अधिक आगे बढ़ सका है। उसके भावी मनोरथ भी इस आधार को और भी अधिक दृढ़ता के साथ अपनाने पर ही पूरे हो सकेंगे।
वैज्ञानिक जीवन-तत्व को रासायनिक पदार्थ मात्र मानकर एक विचित्र उलझन में उलझ गये हैं। वे भूल जाते हैं कि रसायन की जड़ता, चेतना के भीतर संकल्प-शक्ति और आकाँक्षाओं का विस्मयकारी प्रभाव कैसे उत्पन्न कर सकती है?
जीवधारी का रासायनिक आधार—प्रोटोप्लाज्मा ही सब कुछ नहीं है। अब उसके भीतर अव्यक्त जीवन-रस—ईडोप्लाज्मा की सत्ता स्वीकार कर ली गई है। वंश परम्परा केवल रासायनिक ही नहीं है, उसके पीछे अभिरुचियाँ, आस्थाएँ,भावनाएँ और न जाने ऐसा कुछ भरा हुआ है, जिसकी व्याख्या रासायनिक द्रवों के आधार पर नहीं हो सकती। चेतना की एक अतिरिक्त शृंखला की स्वतन्त्र गति स्वीकार किये बिना ‘ईजोप्लाज्मा’ के क्रियाकलाप की व्याख्या हो ही नहीं सकती। एक ही स्थान पर जड़ और चेतन एकत्रित हो सकते हैं, सो ठीक है, पर दोनों एक नहीं हैं—उनकी सत्ता स्वतन्त्र है। भले ही एक दूसरे के पूरक हों, पर उन्हें एक ही मान बैठना भूल होगी।
जीवन के व्याख्याकारों ने उसके सम्बन्ध में विविध प्रकार के मत व्यक्त किये हैं। गतिशीलता, समर्थता, चेतना, विकास की क्षमता, भोज्य पदार्थों की ऊर्जा के रूप में परिणत कर सकना, जन्म दे सकने की क्षमता आदि-आदि कितनी ही शर्तें जीवन-अस्तित्व के साथ जोड़ी गई हैं।
यह सारी विशेषताएँ प्रोटोप्लाज्म में सीमित नहीं हो सकतीं, उसके लिए कुछ अतिरिक्त क्षमता की आवश्यकता है। हमारी भावी खोज और दिलचस्पी इस अद्भुत अतिरिक्त ता पर ही केन्द्रित होनी चाहिए, जो जड़ परमाणुओं के सीमित क्रियाकलाप से कहीं अधिक ऊँचा है।
विज्ञान वेत्ता रासायनिक विश्लेषण से कभी आगे बढ़ते हैं तो विद्युतीय स्फुरण के रूप में प्राण-चेतना की व्याख्या करने लगते हैं। मनुष्य शरीर में बिजली का विपुल-भण्डार भरा पड़ा है, यह ठीक है और यह भी सत्य है कि मस्तिष्क से विचारों के कम्पन विद्युत-प्रवाह के ही रूप में निकलते हैं और शारीरिक आन्तरिक क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं, साथ ही विश्व ब्रह्मांड में हलचल उत्पन्न करके अगणित मस्तिष्कों पर अपना प्रभाव डालते है और जड़ पदार्थों की दिशा मोड़ते हैं। किन्तु यह मान बैठना उचित न होगा कि यह बिजली बादलों में कड़कने वाली धूप—गर्मी के रूप में अनुभव आने वाली तथा बिजली-घरों में उत्पन्न होने वाली के ही स्तर की है। भौतिक-बिजली और प्राण-शक्ति में मौलिक अन्तर हैं। प्राण के कारण शरीर और मस्तिष्क में बिजली पैदा होती हैं, किन्तु यह विद्युत-प्रवाह तक सीमित न होकर अनन्त अद्भुत क्षमताओं से परिपूर्ण है।
मानवी विद्युत आकर्षण—ह्यूमन मैगनेटिज्म तथा जीवनी-शक्ति —मेटावोजिज्म का संयुक्त स्वरूप प्राण है। उसे विश्व-व्यापी महाप्राण का एक अंश भी कहा जा सकता है। क्योंकि भौतिक जगत में और चेतन संवेदनाओं में जो कुछ स्फुरणा रहती है, उनका समन्वित समीकरण मानवी-प्राणसत्ता में देखा जा सकता है।
‘प्रोजोक्टिजक आफ ऐस्ट्रल वाडी’ के लेखक ने बताया है कि शरीर की स्थूल रचना अपने आप में अद्भुत हैं, पर यदि उसके भीतर काम कर रहे विद्युत शरीर की क्रिया-प्रक्रिया को समझा-जाना जा सके तो प्रतीत होगा कि उसमें सूर्य से तथा अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों से धरती पर आने वाली ज्ञात और अविज्ञात किरणों का भरपूर समन्वय विद्यमान है। गामा, वीटा, एक्ट, लेजर, अल्ट्रावायलेट, अल्फा वायलेट आदि जितने भी स्तर की शक्ति किरणें भूमण्डल में भीतर और बाहर काम करती हैं, उन सबका समुचित समावेश मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में हुआ है। स्थूल शरीर जड़ पदार्थों के बन्धनों से बँधा होने के कारण ससीम है, पर सूक्ष्म शरीर की सम्भावनाओं का कोई अन्त नहीं। उसका निर्माण ऐसी इकाइयों से हुआ है, जिनकी हलचलें ही इस ब्रह्माण्ड में विविध-विधि क्रियाकलाप उत्पन्न कर रही हैं।
जीवन-तत्ववेत्ता ईडडडड के. लेनकास्टर ने अधिक गहराई तक जीवन-तत्व की खोज करने के उपरान्त उसे भौतिक-जगत में चल रही समस्त क्रिया-प्रक्रियाओं से भिन्न स्तर का पाया। उसके निरूपण के लिए जो भी सिद्धान्त निर्धारित किये, वे सभी ओछे पड़े। अस्तु उन्होंने कहा—जीवन सत्ता के बारे में मानव-बुद्धि कुछ ठीक निरूपण शायद ही कर सके। उसकी व्याख्या भौतिक-सिद्धान्तों के सहारे कर सकना सम्भवतः भविष्य में भी सम्भव न हो सकेगा। जीवन एक स्वतन्त्र विज्ञान है और ऐसा जिसकी नाप-तोल पदार्थ विद्या के बटखरों से नहीं ही हो सकेगी।
निर्जीव पदार्थ का केवल अस्तित्व हैं। उसमें अनुभूति नहीं और न जीवन। पौधों में अस्तित्व और जीवन है, पर ज्ञान का अभाव हैं। प्राणियों में अस्तित्व, जीवन और अनुभूति है, परन्तु ज्ञान या स्वतन्त्र इच्छा विकसित अवस्था में नहीं है। इसके विपरीत मनुष्य में ये सब गुण विद्यमान हैं, उसमें अस्तित्व पूर्ण जीवन, अनुभूति, ज्ञान और स्वतन्त्र इच्छा शक्ति का समन्वय है, इस प्रकार उसे चेतना के सुविकसित स्तर पर प्रतिष्ठापित किया जा सकता है।
जड़ और चेतन की आणविक हलचलों में समानता हो सकती है, पर यह किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होता कि जड़ का विकास इतना अधिक हो सके कि’ वह चेतना के उच्चतम स्तरों की परतें उधेड़ता चला जाय। अस्तु हार-थक कर वे अन्य प्रकार के उपहासास्पद निष्कर्ष निकालते हैं। उदाहरण के लिए केल्विन, हैमरीज, किचटर, अरहेनियस की मान्यता है कि ‘जीवन किसी अन्य लोक से भूलता-भटकता पृथ्वी पर आ पहुँचा है।’
टैण्डाल और पास्टयूर की मान्यता थी कि जीवन—जीवन से ही उत्पन्न हो सकता है। आरम्भ में सेल अपने आप अपनी वंश-वृद्धि किया करते थे, पीछे ‘नर-मादा संयोग‘ का क्रम चला। इसी प्रकार भीतरी-बाहरी अवयवों की संख्या एवं क्षमता भी क्रमशः ही विकसित हुई है। जड़ से चेतन की उत्पत्ति अथवा पदार्थ का जीवन में परिवर्तन उन्होंने अशक्य माना है। चेतना की वे स्वतन्त्र सत्ता ठहराते हैं।
ब्रह्माण्ड-व्यापी महाशक्ति यों में ने गुरुत्वाकर्षण की क्षमता सर्वविदित है। आकाश में सामंत ग्रह-नक्षत्र उसी के आधार पर टिके हुए हैं और जीवित हैं।
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शक्ति (विद्युत चुम्बकीय क्षमता) अगणित भौतिक प्रक्रियाओं का नियन्त्रण करती है। प्रकाश, तप, ध्वनि, विद्युत, रासायनिक परिवर्तन आदि का जो क्रियाकलाप इस जगत में चल रहा है, उसके मूल में यही शक्ति काम कर रही है। ईयर अपने विभिन्न आकार-प्रकारों में वस्तुओं पर शासन स्थापित किये हुए हैं।
यह विद्युत चुम्बकीय क्षमता मात्र जड़ नहीं है, यदि वह जड़ ही होती तो अणु-परमाणुओं की संरचना में जो अद्भुत व्यवस्था दिखाई पड़ती है, उसके दर्शन नहीं होते। साथ ही चेतन प्राणियों में दूरदर्शिता, आकाँक्षा, भावना जैसी कोई विशेषता न होती और न किसी जीव में कोई ऐसी अतीन्द्रिय-क्षमता पाई, जाती, जिसका जड़चेतन के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं हो।
आइन्स्टाइन कहते थे—आज न सही, कल यह सिद्ध होकर रहेगा कि अणु सत्ता पर किसी अविज्ञात चेतना का अधिकार और नियन्त्रण है। भौतिक-जगत उसी की स्फुरणा हैं। पदार्थ मौलिक नहीं है, चेतना की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप ही पदार्थ का उद्भव हुआ है। भले ही आज यह तथ्य प्रयोगशाला में सिद्ध न हो सकें, पर मेरा विश्वास है कि कभी वह सिद्ध होगा अवश्य।
जीव-तत्व की शोध के स्वस्थ कदम आत्मा की स्वतन्त्र चेतन सत्ता स्वीकार करने पर ही आगे बढ़ सकेंगे। आत्मा को जड़ सिद्धान्तों के अर्थगत बाँधते रहने से—चेतना विज्ञान के उपयुक्त विकास में बाधा ही खड़ी रहेगी और सही निष्कर्ष तक पहुँचने में एक भारी व्यवधान खड़ा रहेगा।
वैज्ञानिक शोधों में जिस जिज्ञासा की आवश्यकता पड़ती है, उसी सूक्ष्म दृष्टि को अपना कर आत्म-सत्ता की महत्ता और उसके स्वस्थ विकास की सम्भावनाओं को समझा जा सकता है। इस लाभ से मनुष्य जिस दिन लाभान्वित होगा, उस दिन उसे न अभाव, दारिद्रय का सामना करना पड़ेगा और न शोक-सन्ताप का।
कठोपनिषद् के अनुसार ‘बालक नचिकेता’—महाभाग यम से जीवन और मृत्यु की पहेली का उत्तर पूछता है। तैत्तरीय उपनिषद् में भृगु अपने पिता वरुण से ब्रह्म की प्रकृति तथा सर्वोच्च यथार्थ के बारे में जानना चाहता है। श्वेतकेतु ज्ञान से समृद्ध होकर लौटता है तो उसके पिता उससे पूछते हैं कि क्या उसने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया? जनक निरन्तर याज्ञवल्क्य से एक के बाद एक प्रश्न पूछते हुए—एतरेय उपनिषद् में यही जानना चाह रहे हैं कि जीव को शुद्ध अंतर्दृष्टि से किस प्रकार पूर्णता का बोध होता है?
इस समाधान को प्राप्त करके ही मानवी-चिन्तन की सार्थकता और विकास क्रम की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
हाथ जब फूल के बिलकुल निकट जा पहुँचा तो फूल ने पूछा—इस सघन समीपता का क्या उद्देश्य है—बन्धु?
उत्तर देते हुए हाथ ने कहा—तुम्हारे ऊपर उपकार करने आया हूँ। देवता के समीप तुम्हें पहुँचाने का विचार हैं।
फूल उदास हो गया, उसने कहा—देवता तक तो सौभाग्यशाली फूल पहुँच ही जाते हैं। इन निरीह तितलियों और मधुमक्खियों के काम ही आता रहता और जहाँ जन्मा—वहीं खाद बनकर गल जाता तो मेरे लिए अधिक सन्तोष की बात होती।
आनुवांशिकी-विज्ञान के अंतर्गत पिछले दिनों यह सिद्ध किया जाता रहा है कि प्राणी अपने पूर्वजों की प्रतिकृति होते हैं। माता-पिता के डिम्ब-कीट और शुक्रकीट मिल-जुलकर भ्रूण-कलल में परिणत होते हैं और शरीर बनना आरम्भ हो जाता है। उस शरीर में जो मन चेतना रहती हैं, उसका स्तर भी पूर्वजों की मनः-स्थिति की भाँति ही उत्तराधिकार में मिलता है। शरीर की संरचना और मानसिक बनावट के लिए बहुत हद तक पूर्वजों के उन जीवाणुओं को ही ठहराया गया है, जो परंपरा के रूप में वंशधरों में उतरते चले जाते हैं।
इस प्रतिपादन से यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति अपने आग में कुछ बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। पूर्वजों के ढाँचे में ढला हुआ एक खिलौना मात्र है। यदि सन्तान को सुयोग्य सुविकसित बनाना हो तो वह कार्य पीढ़ियों पहले आरम्भ किया जाना चाहिए। अन्यथा सांचे में ढले हुए इस खिलौने में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन न हो सकेगा।
अनुवांशिकी का यह प्रतिपादन जहाँ तक मानव-प्राणी का सम्बन्ध है, बहुत ही अपूर्ण और अवास्तविक है। पशु-पक्षियों में एक हद तक यह बात सही भी हो सकती, पर मनुष्य के लिए यह कहना अनुचित है कि वह पूर्वजों के साँचे में ढला हुआ एक उपकरण मात्र है। यह मानवी इच्छा-शक्ति, विवेक-बुद्धि, स्वतन्त्र-चेतना और आत्मनिर्भरता को झुठलाना है। समाज-शास्त्री, अर्थ-शास्त्री और मनोविज्ञान-वेत्ता वातावरण एवं परिस्थितियों के उत्थान पतन का कारण बताते रहे हैं। आत्म-वेत्ताओं ने एक स्वर से सदा यही कहा है—मनुष्य की अन्तःचेतना स्वनिर्मित है। वह वंश परम्परा से नहीं, संचित संस्कारों और प्रस्तुत प्रयत्नों के आधार पर विकसित होती है। इच्छा-शक्ति और संकल्प-शक्ति के आधार पर अपने मानसिक ढाँचे में कोई चाहे तो आमूलचूल परिवर्तन कर सकता है।
आनुवांशिकी की मान्यताऐं एक हद तक ही सही ठहराई जा सकती हैं। चमड़ी का रंग, चेहरा, आकृति, अवयव आदि पूर्वजों की बनावट के अनुरूप हो सकते हैं। पर गुण, कर्म, स्वभाव भी पूर्वजों जैसे ही हों—यह आवश्यक नहीं। यदि ऐसा हो रहा होता तो किसी कुल में सभी अच्छे और किसी कुल में सभी बुरे उत्पन्न होते। रुग्णता, स्वस्थता, बुद्धिमत्ता, मूर्खता, सज्जनता, दुष्टता, कुशलता, अस्तव्यस्तता भी परम्परागत होती तो प्रगतिशील वर्ग के परिवार के सभी सदस्य सुविकसित होते और पिछड़े लोगों का स्तर साथ के लिए गया-गुजरा ही बना रहता। तब उत्थान-पतन के लिए किये गये प्रयत्नों की भी कुछ सार्थकता न होती। वातावरण का भी कोई प्रभाव न पड़ता, पर ऐसी स्थिति है नहीं। पूर्वजों की स्थिति से सर्वथा भिन्न स्तर की सन्तानों के अगणित उदाहरण पग-पग पर सर्वत्र बिखरे हुए देखे जा सकते हैं। इससे मनुष्य की स्वतन्त्र चेतना और इच्छा-शक्ति की प्रबलता का लक्ष्य ही स्पष्ट रूप से सामने आता है।
मद्यप मनुष्यों की सन्तान क्या स्वजन्मजात रूप से उस लत से ग्रसित होती है? इस खोज-बीन में पाया गया कि ऐसी कोई बात नहीं है, वरन् उल्टा यह हुआ कि बच्चों ने बाप को मद्यपान के कारण अपनी बर्बादी करते देखा तो वे उसके विरुद्ध हो गये और उन्होंने न केवल मद्यमान से अपने को अछूता रखा, वरन् दूसरों को भी उसे अपनाने से रोका।
मनुष्यों में गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम सामने आये हैं, उनसे स्पष्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में कम सफलता मिली है। विकलांग और पैतृक रोगों से ग्रसित सन्तान उत्पन्न करने में आशाजनक सफलता मिली है। क्योंकि विषाक्त मारकता से भरे रसायन सदा अपना त्वरित परिणाम दिखाते हैं। यह गति विकासोन्मुख प्रयत्नों की नहीं होती। नीलाथोथा खाने से उल्टी तुरन्त हो सकती हैं, पर पाचन−शक्ति सुधार देने के प्रयोग उतने सफल नहीं होते। देव से असुर की शक्ति को अधिक मानने का यही आधार है। मनुष्यों में मन−चाही सन्तान उत्पन्न करने का प्रयोग सिर्फ इतनी मात्रा में कुछ अधिक सफल हुआ है कि रंग−रूप और गठन की दृष्टि से जनक−जननी का सादृश्य दृष्टिगोचर हो सके। काया की आन्तरिक दृढ़ता, बौद्धिक तीक्ष्णता एवं भावनात्मक उत्कृष्टता उत्पन्न करने में वैज्ञानिक प्रयोगों का उत्साह−वर्धक परिणाम नहीं निकला है।
गुण सूत्रों को बदलने में इन दिनों विद्युत−ऊर्जा एवं रासायनिक हेर फेर के साधन जुटाये जा रहे हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि यह बाहरी थोप−थाप स्थिर न रह सकेगी—उससे क्षणिक−चमत्कार भले ही देखा जा सके। शरीर के प्रत्येक अवयव को मस्तिष्क प्रभावित करता है और मस्तिष्क का सूत्र−संचालन इच्छा−शक्ति के हाथ में रहता है। अस्तु शारीरिक, मानसिक समस्त परिवर्तनों का तात्विक आधार इस इच्छा−शक्ति को ही मानना पड़ेगा। गुण−सूत्रों पर भी इसी ऊर्जा का प्रभाव पड़ता है और इसी माध्यम से वह परिवर्तन किये जा सकते हैं, जो मन−चाही पीढ़ियाँ उत्पन्न करने के लिए वैज्ञानिकों को अभीष्ट हैं।
अभीष्ट स्तर की पीढ़ियाँ क्या रासायनिक हेर−फेर अथवा विद्युतीय प्रयोग उपकरणों द्वारा प्रयोगशालाओं में विनिर्मित हो सकती हैं? यह एक जटिल प्रश्न है। यदि ऐसा हो सका तो यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य इच्छा−शक्ति का धनी नहीं, वरन् रासायनिक पदार्थों की परावलम्बी प्रतिक्रिया मात्र है। यदि यह सिद्ध हो सका तो इसे मनोबल और आत्मबल की गरिमा समाप्त कर देने वाली दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कहा जायगा, पर ऐसा हो सकना सम्भव दिखाई नहीं पड़ता—भले ही उसके लिए ऐड़ी−चोटी प्रयत्न कितने ही किये जाते रहें।
शरीर के विभिन्न अंगों पर दबाव डाले जाते रहे हैं, पर प्राणी की मूल इच्छा न उस दबाव की आवश्यक नहीं समझा तो उस तरह के परिवर्तन नहीं ही हो सके। चीन में शताब्दियों तक स्त्रियों के पैर छोटे होना—सौंदर्य का चिन्ह माना गया, इसके लिए उन्हें कड़े जूते पहनाये जाते थे, उससे पैर छोटे बनाने में सफलता मिली। पर वंश−परम्परा की दृष्टि से वैसा कुछ भी नहीं हुआ। हर नई लड़की के पैर पूरे अनुपात से ही होते थे।
प्राणियों के क्रमिक−विकास में इच्छा−शक्ति का ही प्रधान स्थान रहा है। मनुष्य तो मनोबल का धनी है, उसकी बात जानने भी दें और अन्य प्राणधारियों पर दृष्टिपात करें तो प्रतीत होगा कि उनकी वंश−परम्परा में बहुमुखी परिवर्तन होता रहा है। इसका कारण सामयिक परिस्थितियों का चेतना पर पड़ने वाला दबाव ही प्रधान कारण रहा है। असुविधाओं को हटाने और सुविधाऐं बढ़ने की आन्तरिक आकाँक्षा ने प्राणियों की शारीरिक स्थिति और आकृति में ही नहीं प्रकृति में भी भारी हेर-फेर प्रस्तुत किया है। जीव−विज्ञानी इस तथ्य से भली−भाँति परिचित हैं।
यदि पूर्वजों के गुण लेकर ही सन्तानें उत्पन्न होने वाली बात को सही माना जाय तो जीवों की आकृति−प्रकृति में परिवर्तन कैसे सम्भव हुआ? उस स्थिति में तो पीढ़ियों का स्तर एक ही प्रकार का चलता रहना चाहिए था।
लेमार्क ने प्राणियों का स्तर बदलने में वातावरण को परिस्थितियों को श्रेय दिया है। वे कहते हैं—इच्छा−शक्ति इन्हीं दबावों के कारण उभरती, उतरती है। सुविधा−सम्पन्न परिस्थितियों के प्राणियों के ऊपर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहता। अतएव उनका शरीर ही नहीं, बुद्धि−कौशल भी ठप्प पड़ता जाता है। अमीरी के वैभव में पले हुए लोग अक्सर छुईमुई बने रह जाते हैं और उनका चरखा बखेर देने के लिए एक छोटा−सा आघात ही पर्याप्त होता है।
लेमार्क ने नये किस्म के अनेक जीवधारियों की उत्पत्ति का लेखा−जोखा प्रस्तुत करते हुए कहा है कि बाहर से मौलिक जीव दीखने पर भी वस्तुतः किसी ऐसे पूर्व प्राणी के ही वंशज होते हैं, जिन्हें परिस्थितियों के दबाव से अपने परम्परागत ढाँचे में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ा।
जीवों के विकास−इतिहास के पन्ने−पन्ने पर यह प्रमाण भरे पड़े हैं कि प्राणियों के अंग प्रत्येक निष्क्रियता के आधार पर कुण्ठित हुए हैं और सक्रियता ने उन्हें विकसित किया है। प्रवृत्ति, प्रयोजन और चेष्टाओं का मूल इच्छा−शक्ति ही है। असल में यह इच्छाशक्ति ही प्राणिसत्ता में विकास, अवसाद उत्पन्न करती है। रासायनिक पदार्थों और गुण−सूत्रों की वंश−परम्परा विज्ञान में कायिक क्षमता को एक अंश तक प्रभावित करने वाला आधार भर माना जाना चाहिए। आधुनिक विज्ञान−वेत्ता मौलिक−भूल यह कर रहे हैं कि मानवी−सत्ता को उन्होंने रासायनिक प्रतिक्रिया मात्र समझा है और उसका विकास करने के लिए जनक−जननी को—उसके जनन−रसों को अत्यधिक महत्व दे रहे हैं। इस एकांगी आधार को लेकर मनचाही आकृति−प्रकृति की पीढ़ियाँ वे कदाचित ही पैदा कर सकें।
वैज्ञानिक बीजमन ने चूहों और चुहियों की लगातार बीस पीढ़ियों तक पूँछे वाले चूहे पैदा किये जा सकते हैं? उन्हें अपने प्रयोग में सर्वथा असफल होना पड़ा। बिना पूँछ के माँ−बाप भी पूँछ वाले बच्चे ही जनते चले गये। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मात्र शारीरिक हेरफेर से वंशानुक्रम नहीं बदला जा सकता। इसके लिए प्राणी की अपनी रुचि एवं इच्छा का समावेश होना नितान्त आवश्यक है।
हर्वर्ट स्पेन्सर ने अपनी खोजों में ऐसे कितने ही प्राणियों के, उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, जिन्होंने शरीर के किसी अवयव को निष्क्रिय रखा तो वह क्षीण होता चला गया और लुप्त भी हो गया। इसके विपरीत ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं, जिनमें ‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है’ वाले सिद्धान्त को सही सिद्ध करते हुए अपने शरीर में कई तरह के नये पुर्जे विकसित किये और पुरानों को आश्चर्यजनक स्तर तक परिष्कृत किया।
समुद्र−तल की गहराई में रहने वाली मछलियों को प्रकाश से वंचित रहना पड़ता है। अतएव उनके आँखों का चिन्ह रहते हुए भी उनमें रोशनी नहीं होती है। आँख वाले अन्धों में उनकी गणना की जा सकती है। अँधेरी गुफाओं में जन्मते और पलने वाले थलचरों का भी यही हाल होता है। उनकी आँखें ऐसी होती हैं, जो अन्धेरे में ही कुछ काम कर सकें। प्रकाश में तो वे बेतरह चौंधिया जाती हैं और निकम्मी साबित होती है।
समर्थ का चुनाव मात्र शारीरिक बलिष्ठता पर निर्भर नहीं हैं, वरन् सच पूछा जाय तो उनकी मनःस्थिति की ही परख इस कसौटी पर होती है। पशुवर्ग और सरीसृप वर्ग के विशालकाय प्राणी आदिम−काल में थे। उनकी शरीरगत क्षमता अद्भुत थी, फिर भी वे मन्द−बुद्धि, अदूरदर्शिता, आलस जैसी कमियों के कारण दुर्बल संज्ञा वाले ही सिद्ध हुए और अपना अस्तित्व खो बैठे। जब कि उसी समय के छोटी काया वाले प्राणी अपने मनोबल के कारण न केवल अपनी सत्ता सँभालते रहे, वरन् क्रमशः विकासोन्मुख भी होते चले गये।
जीवों के विकास क्रम का एक महत्वपूर्ण आधार यह है कि उन्हें परिस्थितियों से जूझना पड़ा—अवरोध के सामने टिके रहने के लिए अपने शरीर में तथा स्वभाव में अन्तर करना पड़ा। यह परिवर्तन किसी रासायनिक हेरफेर के कारण नहीं, विशुद्ध रूप से इच्छा−शक्ति की प्रवाह−धारा बदल जाने से ही सम्भव हुआ है। जीवन−संग्राम में जूझने की पुरुषार्थ−परायणता का उपहार ही अल्प−प्राण जीवों को महाप्राण स्तर का बन सकने के रूप में मिला है। जिन्होंने विपत्ति से लड़ने की हिम्मत छोड़ दी और हताश होकर पैर पसार बैठे उन्हें प्रकृति ने कूड़े कचरे की तरह बुहार कर घूरे पर पटक दिया। किसान और माली भी तो अपने खेत−बाग में अनुपयोगी खर−पतवार की ऐसी ही उखाड़−पछाड़ करते रहते हैं। विकास की उपलब्धि पूर्णतया जीवन−संग्राम में विजय प्राप्त करने के फलस्वरूप ही मिलती है और इस संघर्षशीलता का पूरा आधार साहसी एवं पुरुषार्थी मनोभूमि के साथ जुड़ता रहता है।
आनुवांशिकी−विज्ञान की अन्यान्य शोधें कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हों, पर यह प्रतिपादन स्वीकार्य नहीं हो सकता कि प्राणियों का विशेषतया मनुष्यों का स्तर पूर्वजों के परम्परागत गुण सूत्रों पर निर्भर है। इच्छा−शक्ति की प्रचण्ड समर्थता के आधार पर शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तनों की सम्भावना को मान्यता देने के उपरान्त ही वंशगत विशेषताओं की चर्चा की जाय—यही उचित है।
यह समझना गलत है कि माँस में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, इसलिए वह पौष्टिक आहार है। माँस में केवल 7 प्रतिशत प्रोटीन होता है जबकि उसकी मात्रा पनीर में 25 प्रतिशत और सोयाबीन में 40 प्रतिशत तक पाई जाती है। लोहे का अंश माँस में होता तो है पर वह दूध एवं वनस्पतियों में मिलने वाले लोहे की अपेक्षा मात्रा में भी कम है और स्तर में भी घटिया है। शरीर को प्रतिदिन जितने लोहे की आवश्यकता पड़ती है, उसकी पूर्ति के लिए डेढ़ पौंड माँस अथवा साढ़े सात पौंड मछली खानी पड़ेगी। लौह वस्तुतः माँस में नहीं रक्त में होता है। माँस में जितना अंश रक्त का रहा होगा, उसी आधार पर लोहा पाया जायगा, फिर प्राणियों के रक्त से मिला लौह दुष्पाच्य होता है और आसानी से मानव रक्त में नहीं घुलता, जबकि वनस्पतियों में रहने वाला लोहा बड़ी सरलतापूर्वक हमारे शरीर में घुल जाता है।
कैल्शियम माँस में नहीं के बराबर होता है, वह कड़े पुट्ठों में एवं हड्डियों में ही पाया जाता है। कोमल माँस जो आमतौर से खाया जाता है, उसमें एक प्रतिशत से भी कम कैल्शियम है। मछली में वह कुछ अधिक अवश्य होता है पर रोटी से अधिक नहीं।
माँस में रहने वाले खनिज गैस शरीर में जाकर संचित क्षार तत्व को नष्ट करती है। रक्त चाप की वृद्धि एवं मूत्र में एसिड उत्पन्न करती है।
जीवित पशु के तन्तु अत्यन्त कोमल होते हैं किन्तु उसके मरते ही कड़े हो जाते हैं। यह कड़ापन पकने और पचने में भारी पड़ता है। जब माँस सड़ता है तभी वे तन्तु कोमल पड़ते हैं। इसलिए ताजे माँस को कुछ समय हवा में लटका कर रखा जाता है ताकि वह सड़ने लगे और मुलायम हो जाय, सड़न आरम्भ होने के साथ−साथ ही रिकूँ उसमें कई प्रकार के विष उत्पन्न होने लगते हैं और कई घातक कीटाणुओं का जन्म होता है। यह सड़न शरीर में पहुँच कर न जाने कितने प्रकार के उपद्रव खड़े करती है और खाने वाले के स्वास्थ्य को धीरे−धीरे खोखला ही करती जाती है। रक्त चाप और गुर्दे की बीमारियों में आमतौर से डाक्टर माँस खाने को मनाही करते हैं। वे जानते हैं कि जब भले−चंगे आदमी में माँस इस प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न करता है तो रोगग्रस्तों पर और भी अधिक बुरा प्रभाव डालेगा।
वध किये जाते समय जानवर को जिस भयभीत और चीत्कार भरी स्थिति में होकर गुजरना पड़ता है, उसके कारण उनकी अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ तेजी से विष उगलने लगती हैं। उस स्थिति में तेजी से उभरते हुए हारमोन कुछ ही क्षण में समस्त रक्त में घुल जाते हैं और उसका प्रभाव माँस पर भी पड़ता है। यों पिचकारी से निकला हुआ शुद्ध रक्त उतना विषैला नहीं होता, उसे पिया और पचाया भी जा सकता है, किन्तु यदि वधकाल की कातरता में हो कर गुजरे हुए रक्त को पिया जाय तो वह भयंकर विपत्ति खड़ी करेगा। यों वध करने के बाद रक्त का अधिकाँश भाग बाहर बह जाता है फिर भी माँस में जो पतली रक्त नलिकायें रहती हैं, उनमें तो खून बना ही रहता है। माँस में लालिमा इसी की रहती है। अधिक त्रास देकर मारे जाने वाले जानवर का माँस अधिक स्वादिष्ट होता है, इस मान्यता में इतना ही तथ्य है कि उसमें एक अतिरिक्त विष भरा होता है जो अभ्यस्त नशेबाजों को जिस प्रकार कड़ुवापन भी स्वादिष्ट लगता है, उसी प्रकार प्रिय लगने लगता है। यह स्वाद निश्चित रूप से हानि को अधिक गहरी हानि बनाता चला जाता है।
पशुवृत्ति और पशु प्रकृति का प्रभाव माँस में जुड़ा रहना स्वाभाविक है। माँसाहारी हिंस्र पशुओं में जो क्रूरता पाई जाती है, उसे माँसाहार का प्रत्यक्ष परिणाम ही कह सकते हैं। मनुष्य भी इस दुष्प्रभाव से बच नहीं सकता। उसके स्वभाव में आसुरी तत्व बढ़ते ही जायेंगे। उनकी प्रतिक्रिया शरीर, मन, परिवार और समाज पर अवांछनीय स्तर की ही पड़ेगी।
माँस महंगा है, दुष्पाच्य है, काटे हुए पशुओं में से अधिकाँश के रुग्ण होने से उनकी बीमारियाँ खाने वालों में घुस पड़ने का खतरा है। इतने पर भी पौष्टिकता के नाम पर जिस प्रोटीन का माँस में बाहुल्य बताया जाता है, वह भी इतना घटिया है कि उससे सोयाबीन जैसे अन्न कहीं अधिक अच्छे सिद्ध होते हैं। ‘गुनाह बेलज्जत’ इसे कहते हैं। प्राणिवध का क्रूर कर्म साथ ही स्वास्थ्य का विनाश। कई बार लगता है कि कहीं बर्बरता को जीवित रखने के लिए ही तो मांसाहारी प्रवृत्ति को जीवित नहीं रखा जा रहा है।
आम तौर से छोटी तबियत के लोग थोड़ी सी सफलता पर अहंकार से उन्मत्त हो उठते हैं और छोटी सी
सफलता पर ऐसे रोते कलपते हैं मानो अब मौत से कम में छुटकारा ही नहीं। यह मन के छोटे होने का चिन्ह हैं।
छोटी सफलता से हर्षोन्मत्त हो जाने में यह हानि है कि ऐसा व्यक्ति अहंकारी और दुस्साहसी हो जाता है और हर कठिन काम को सरल समझ कर बिना आवश्यक तैयारी किये ऐसे कार्यों में टाँग अड़ा देता है जो उसकी क्षमता से बाहर का होता है। कोई व्यक्ति एक बार एक काम में सफल हो गया है तो उसे बुद्धिमानी और कुशलता की पूरी ठेकेदारी अपने सिर पर नहीं बाँध लेनी चाहिए। सफलता और असफलता की धूप-छाँह तो जीवन के पावस में ऐसी ही आँख मिचौनी करती रहती है। सफलता के माध्यम से हम साहसी और उत्साही बनें इतना ही पर्याप्त है। अहंकारी और दुस्साहसी बन बैठे तो समझना चाहिए कि सफलता क्या आई अपने ऊपर ऐसी विक्षिप्तता लद गई जो अगले ही दिनों विपत्ति ही सिद्ध होगी।
असफलता को देखते ही हिम्मत हार बैठना भावी अभ्युदय की ओर से निराश हो जाना अथवा बेहिसाब रोने कलपने लगना एक भयानक मानसिक दुर्गुण है। इस व्यथा में ग्रस्त व्यक्ति प्रायः अधीर होते हैं और फिर प्रयत्न करने पर नई योजना के अनुसार हारी बाजी को जीतने की आशा छोड़ बैठते हैं। हवा के साथ उड़ने वाले इन हलके तिनकों का अस्तित्व उथला और ओछा होता है वे कदाचित ही किसी बड़े उत्तरदायित्व का भार अपने ऊपर ओढ़ पाते हैं और यदि कुछ जिम्मेदारी उठालें तो शायद ही अन्त तक उसका निर्वाह करने का साहस दिखाते हैं।
प्रगतिशील और सफल जीवन जीने के लिए हमें धैर्य वान, साहसी और संतुलित होना चाहिए। पथ में आती रहने वाली कठिनाइयाँ को स्वाभाविकता ही समझना चाहिए और अपने विवेक एवं स्वभाव को इसके लिए प्रशिक्षित करना चाहिए कि गुत्थियों को कैसे सुलझाया जाता है और अवरोधों को कैसे हटाया जाता है। यह विशेषता उसी में उत्पन्न हो सकती हैं जो परिस्थितियों के उतार चढ़ाव से अत्यधिक प्रभावित नहीं होता और ऊँचे नीचे घटनाक्रम एवं अनुकूल प्रतिकूल वातावरण से भी अपनी दूरदर्शिता को स्थिर बनाये रहता है।
सेनानायकों को विविध मोर्चों पर लड़ना पड़ता है। अभी आगे बढ़ना होता है अभी पीछे हटना पड़ता है। परम प्रिय साथियों को मृत्यु के मुख में जाते और घायल कराहते देखना पड़ता है। कई बार तो अपनी वही जान पर आवीतता है। खाने सोने का कोई ठिकाना नहीं रहता। ओछी दृष्टि वालों के लिए यह परिस्थितियाँ रुदन-क्रंदन कराने वाली और विक्षिप्त करने वाली ही हो सकती हैं। किन्तु सेना नायक अपने पद, स्तर, गौरव और कर्तव्य को समझता है इसलिए इन समस्त भावुक उतार चढ़ावों को एक कौने पर पटके हुए खिलाड़ी की मनः स्थिति में जीवन-मरण का खेल खेलता है। मनुष्यता की गरिमा इसी प्रकार की रीति नीति अपनाने में है। हर गौरवशाली व्यक्ति को जीवन संग्राम में इसी स्तर का संतुलन बनाये रखना चाहिए और शूरवीर सेनापति की भूमिका निबाहनी चाहिए।
भीष्म पितामह का शरीर तीरों से छिदा पड़ा था तरे भी वे संतुलन बनाये रखकर इच्छित दिनों तक जिये और सम्बन्धियों को महत्वपूर्ण परामर्श देते रहे। महाराणा प्रताप को क्या नहीं सहना पड़ा। पाण्डवों का प्रायः पूरा ही जीवन कैसी विपत्ति में गुजरा। भगवान राम और कृष्ण पर क्या-क्या बीती। ईसा और सुकरात को क्या मिला। शंकराचार्य को किस परिस्थितियों में काम करना पड़ा। नैपोलियन ने पग पग पर कितने खतरे उठाये। हरिश्चन्द्र ने क्या नहीं सहा।
मनुष्यता की गरिमा बढ़ाने वाले सदा से अपनी साहसिकता, धैर्य निष्ठा, और कर्तव्य परायणता का परिचय देते रहे हैं, ऐसा उनके लिए तभी संभव हुआ जब परिस्थितियों को महत्व न देते हुए उन्होंने सब कुछ खोकर भी अपने संतुलन को यथास्थान बनाये रखा।
बुद्धिवाद की अपनी उपयोगिता है। उसके बिना तर्क, अन्वेषण, परीक्षण और निष्कर्ष तक पहुँच सकना कठिन है। विविध विधि आविष्कारों उद्योगों और क्रियाकलापों का संचालन बुद्धि के आधार पर ही करते हैं। कला, शिल्प, व्यवसाय, प्रभृति क्षेत्रों में बुद्धि वैभव ही अग्रणी है। साँसारिक सम्पदाओं का उपार्जन उसी के आधार पर संभव भी है इसलिए बुद्धि की सूक्ष्म सत्ता विज्ञान की अगणित धाराओं का आश्रय लेकर अनेकानेक सुख सुविधाओं का सृजन करती चली जा रही है। प्रस्तुत प्रगति को बुद्धिवाद की प्रगति कहा जाय तो यह उचित ही होगा। हमारा सारा ध्यान उस शिक्षा प्रशिक्षा के अभिवर्धन पर लगा हुआ है जो बुद्धि को विकसित करके मनुष्य को अधिकाधिक सुयोग्य अधिकाधिक बुद्धिमान बना सके।
बुद्धि की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता है। उसका अपना मूल्य है और अपना महत्व। किन्तु यह नहीं भूल जाना चाहिए कि बुद्धि एक मदोन्मत्त हाथी की तरह हैं, इच्छित प्रयोजन का समर्थन करके उसे सुलभ बनाने के लिए ऐसे आधार प्रस्तुत कर सकती है जो उचित को भी अनुचित सिद्ध कर सके। वह प्रत्यक्ष लाभ के ऐसे आकर्षण सामने ला सकती है, जो परोक्ष को, भविष्य को, नीति सदाचरण को चूर्ण विचूर्ण करके रख सके। इसलिए यह माना जाता रहा है कि उस पर हृदयवाद का अंकुश रहना चाहिए। बुद्धिमत्ता को विशुद्ध तर्क पर अवलंबित नहीं रहने देना चाहिए उस पर हृदय का शासन रखा जाना चाहिए। आदर्श वादिता और भावनाओं से रहित बुद्धिमत्ता तो एक प्रकार की कूटनीति ही सिद्ध होगी। उससे तात्कालिक लाभ कुछ भी क्यों न उठा लिया जाय कालान्तर में ऐसी उलझनें ही उत्पन्न होंगी जिन्हें सुलझाना बुद्धिवाद के हाथ में भी न रहेगा।
वस्तु व्यवहार में बुद्धि की उपयोगिता स्वागत करने योग्य है पर जहाँ पर मानवी गरिमा का-समाज व्यवस्था और सद्गुणों एवं सत्प्रवृत्तियों का संबंध है वहाँ बुद्धि का समर्थन नहीं मिल सकता। वहाँ हृदय वाद समर्थ होगा। बुद्धि की कसौटी पर नीति का नहीं अनीति का ही समर्थन हो सकता है, परोक्ष को झुठला कर प्रत्यक्ष को ही मान्यता मिल सकती है ऐसी दशा में स्वार्थ ही सब कुछ रह जायगा, परमार्थ को मूर्खता ठहराया जाएगा। प्रत्यक्ष लाभों के लिए परोक्षवादी आदर्शों को तिलाञ्जलि देने में बुद्धि वादी तर्कों की कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
मनुष्य की आहार समस्या को हल करने के लिए पशु पक्षियों का वध करके मांसाहार का समर्थन जोरों से किया जाता रहा हैं, किया जा सकता है। जिनका माँस निकाला जाता है उन्हें कितनी मर्मान्तक पीड़ा सहनी पड़ती है। उनका करुण क्रन्दन कितना रोमांच कारी होता है इसे देखने समझने की बुद्धि को कोई आवश्यकता नहीं। वरन माँस को अधिक बोझिल और स्वादिष्ट बनाने के लिए वध के समय उन प्राणियों को अधिक देर तक अधिक मर्मवेधी पीड़ा देने के उपाय प्रस्तुत करने में बुद्धि का कमाल सामने आता है। पूर्व काल में माँस प्रयोजन के लिए वध किये जाने वाले प्राणी को अधिक समय उत्पीड़न न सहना पड़े यह ध्यान रखा जाता था उसमें नृशंसता के बीच भी थोड़ी सहृदयता के अंश रहते थे। भूखा प्यासा नहीं मारते थे। पर अब सारा आधार ही बदल गया। अब बूचड़खानों की सफलता इस बात में है कि वे प्राणी को कितनी अधिक देर तक कितना अधिक उत्पीड़न देकर कितना उत्तेजित कर सकते हैं। माँस का अधिक वजन और खाने में अधिक स्वाद अधिक उत्पीड़न से ही मिलता है। अब विकसित बूचड़खाने उत्पीड़न का एक से एक अधिक नृशंस वध-विधान ढूँढ़ने और क्रियान्वित करने में लगे हुए हैं। बुद्धिमान, अर्थशास्त्र तथा उपयोगितावाद के तर्क प्रमाण देकर इसका प्रबल समर्थन करता जायगा। प्राणियों के रोमाँचकारी करुण क्रन्दन से गुँजित होने वाले गगन भेदी हाहाकार को सुनने के लिए उसे तनिक भी फुरसत नहीं। शुद्ध स्वार्थ को, भावुकता के कारण छोड़ने की उसे तनिक भी उपयोगिता प्रतीत नहीं होती।
एक-एक करके नैतिक आदर्श इसी प्रकार शुद्ध स्वार्थ की तुलना में झीने पड़ते जाते हैं। बूढ़े माता-पिता की सेवा करने का कोई तुक नहीं, वे अनुत्पादक और अवाँछनीय, उपयोगिता रहित होते हैं। उनसे कमाऊ लोगों की असुविधा बढ़ती है और अनावश्यक श्रम, समय तथा धन उनकी सेवा के लिए खर्च करना पड़ता है। यह भार विकासवान् बुद्धिवाद कब तक सहन करता रहेगा। जिस तर्क के आधार पर अनुत्पादक और वृद्ध पशुओं को छुरी के घाट उतार देने का फैसला कर लिया गया है वे ही तर्क बूढ़े और अनुत्पादक मनुष्यों पर भी लगा होने से रोके न जा सकेंगे। जानवरों के ढंग के न सही अधिक बुद्धिमत्ता और सुविधा भरे बूचड़खाने मनुष्यों के लिए भी बनेंगे। अर्थशास्त्र इसका असंख्य तर्कों के साथ समर्थन करेगा। आज भी वृद्धों की सेवा, क्या सच्चे मन से किसी की संतान करती है। मन ही मन कुड़कुड़ाते हैं पर लोक लाज से उन्हें घर में ही रूखा सूखा देकर आश्रय मिलता रहता है। अगले दिनों इस अर्थशास्त्र विरोधी रूढ़िवादिता को हटाने का प्रबल आन्दोलन चलेगा। पाश्चात्य देशों में इस दिशा में काफी प्रगति भी हो चुकी है। वहाँ बूढ़े अपनी संतान का घर नहीं घेरते। बूढ़ेखानों में भर्ती हो जाते है और मौत के दिन अपने ढंग से पूरे करते हैं। उनका भार उठाये? उतने पैसों से तो जवानों को अधिक कमाऊ बनाया जा सकता है। फिर बूढ़ों को जीवित रखने में उस धन की बर्बादी क्यों हो? सरकारों के अर्थ विभाग इस अपव्यय को रोकना चाहेंगे और लोक मत विक्षुब्ध न हो इसका ध्यान रखते हुए बूढ़ों को ठिकाने लगाने की बात सोचेंगे। हिटलर ने ऐसा किया भी था, साम्यवादी देशों का चिन्तन इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है अड़चन केवल भावुक लोकमत की बाधा की है। आशा की जाती है कि विकसित बुद्धिवाद के आगे अगले दिनों किसी प्रकार की भावुकता को बाधक नहीं रहने दिया जायगा और तब वृद्ध-वध का प्रचलन उसी सहज सरलता से होने लगेगा जिस प्रकार अब बूढ़े पशुओं को बूचड़खाने में भेजने में कोई विरोध-आन्दोलन नहीं होता।
भावुकता से और भी कई हानियाँ है। बहिन बेटी का रिश्ता पत्नी के सरल उपयोग में बाधा उत्पन्न करता है। सरल रति-सुख, गृह प्रबंध और स्वभाव, व्यवहार की दृष्टि से अपने ही घर परिवार में पैदा हुए लड़के लड़के अधिक आसानी से दाम्पत्य सुख ले सकते हैं। पतिव्रत और पत्नीव्रत के झंझट में सुविधा कम और असुविधा अधिक है। इन प्रतिबन्धों के कारण हर किसी को यौन-स्वतंत्रता पर अंकुश रखना पड़ता है, और इच्छानुसार आमोद-प्रमोद में बाधा पड़ती है। फ्रायड प्रभृति मनोविज्ञानी रति-सुख विरोधी प्रतिबन्धों को पहले से ही मानसिक रोग उत्पन्न करने वाले हानिकारक प्रचलन बताते रहे हैं। अब मूर्धन्य बुद्धि वादियों का एक बड़ा वर्ग यौन स्वेच्छाचार का समर्थन कर रहा है। अमेरिका ने एक कदम और आगे बढ़ाया है वहाँ कुछ क्लब सह संभोग की सुविधा देने के लिए खुले हैं। विवाहित और अविवाहित नर नारी उसके सदस्य बनते हैं और बिना किसी प्रतिबन्ध के ये यौन स्वेच्छाचार का रस लेते हैं। उनका प्रतिपादन है कि पति-पत्नी मिलजुल कर घर बसाये यह बात दूसरी है पर उन पर किसी प्रकार का यौन प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए।
मनुष्य को अधिकाधिक सुविधायें प्रदान करने में उत्साही बुद्धिवाद देर-सवेर में पतिव्रत के पत्नीव्रत प्रतिबन्धों को भी दकियानूसी ठहराकर ही दम लेगा। तब इस संदर्भ में मनुष्यों और पशुओं की स्थिति एक जैसी होगी। बच्चे सरकार पालेगी, प्रजनन करेंगी। जितने बच्चों की आवश्यकता रहेगी उतने जिन्दा रख कर शेष को कूड़े करकट में फेंक दिया जायगा। प्राचीन काल में अरब के बद्दू लोग देवताओं के नाम पर अनावश्यक संतान की बलि देते थे। बुद्धि वाद भी ऐसा ही करेगा पर उसका आधार देववाद न होकर बुद्धिवाद, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र और समाज शास्त्र होगा।
राजनीति का इन दिनों वर्चस्व है। प्रजा पर उसी कार शासन है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियाँ प्रधानतया कूटनीति के आधार पर ही संचालित होती हैं। उनका आधार शुद्ध स्वार्थ होता है। वचन पालन से लेकर सिद्धान्त और आदर्श तक का कोई झंझट उस क्षेत्र में नहीं है। लोकमत को बहकाने के लिए बुद्धिवाद सिद्धान्त पक्ष का आश्रय लेने वाली थोथी दलीलें देता रहता है, पर वह प्रोपेगण्डा मात्र होता है। मूल में विशुद्ध स्वार्थ ही काम करता है। देश-देश के बीच पार्टी-पार्टी के बीच, वर्ग-वर्ग के बीच ऐसी ही शतरंज बिछी है जिसमें सामने वाले को मात देना और अपना उल्लू सीधा करना ही लक्ष्य रहता है। राजनीति में इस प्रकार के व्यवहार की पूरी छूट है। युद्ध काल में भी नीति, अनीति का कोई झंझट नहीं, वहाँ छूट ही नहीं प्रशंसा भी है।
राजनीति और युद्ध जैसे महत्वपूर्ण मंच पर जो स्थान प्राप्त न करें यह कैसे संभव है। बड़े लोगों का अनुगमन छोटे करते ही रहे हैं। मनुष्य-मनुष्य की बीच पति-पत्नी और पिता-पुत्र के बीच मित्र-मित्र के बीच यदि यही मात देने का लक्ष्य लेकर शतरंज खेली जाती है तो यह बिलकुल ल स्वाभाविक है। प्रेम को तो इसी लपेट में बहुत दिन पहले से ले लिया गया है। युद्ध और प्रेम में कोई नियम प्रतिबन्ध नहीं। इसका अर्थ यही है कि प्रेम के जाल में फँसाकर किसी को भी हलाल किया जा सकता है इसमें अनीति नहीं वरन् चतुरता मानी जाने लगी है। समाज सेवा और धर्मावलम्बन जैसे महत्वपूर्ण मंच भी क्रमशः इसी लपेट में आने लगे हैं। लोग शुद्ध स्वार्थ की दृष्टि से ही इनका भी पल्ला पकड़ते देखे जाते हैं। मनोकामनाओं की पूर्ति और स्वर्ग सुख जैसे शुद्ध स्वार्थ यदि झीने पड़ने लगे तो कोई बिरले ही धर्म प्रेमी दिखाई पड़ेंगे।
त्याग, बलिदान, सेवा, संयम पुण्य, परमार्थ जैसे सिद्धान्तों को अपनाने पर ही मनुष्य महामानव बनता हैं। उन्हीं के आधार पर कोई देश, समाज या युग समुन्नत स्थिति में पहुँचता है। उभार, सेवा-प्रवृत्ति, सहयोग, समाजनिष्ठा, चरित्र गठन जैसे उच्च आदर्श अपनाने पर ही व्यक्ति राष्ट्र और विश्व की गरिमा बढ़ती है और सूख समृद्धि की जड़ जमती है। किंतु इन सभी आधारों को बुद्धिवादी प्रखरता काट कर फेंक देती है। समाजहित-राष्ट्रहित का नारा लगाकर व्यक्ति को अच्छा नागरिक और देश भक्त बनने के लिए कहा जाता है। समाजशास्त्र की दृष्टि में यह प्रतिपादन भी रोचक और प्रशंसनीय है, पर जब शुद्ध स्वार्थ ही सर्वोपरि है तो मनुष्य अपने को कठिनाई में डाल कर समाज हित साधन के लिए प्रत्यक्ष लाभ में कमी क्यों पड़ने देगा? जब अनीति आचरण से अधिक सम्पत्ति और अधिक सुविधा अर्जित की जा सकती है तो उसे क्यों छोड़ा जाय। सिद्धान्तवाद में जब लोक बहकावे की बात ही राजनीति और युद्ध प्रयोजन के लिए मान्यता प्राप्त कर गई तो व्यक्ति गत एवं सामाजिक जीवन में ईमानदारी बरतने का क्या प्रयोजन रहा? उस क्षेत्र में भी सिर्फ दूसरों को बहकाने के लिए ही धर्म और ईश्वर की दुहाई क्यों न दी जाती रहे? बुद्धिवाद हमें क्रमशः उसी निम्न गामी मन स्थिति में घसीट के जाता है और अनैतिक आचरण के लिए प्रोत्साहित करता है। हृदय का, भावनाओं का, आदर्शों कमा अंकुश रखे बिना यदि बुद्धिमान बढ़ता ही चला गया तो उससे तात्कालिक सुविधायें भले ही बढ़ जाँय पर उल्झनें और कठिनाईयाँ इतनी अधिक बढ़ेगी कि हम सर्वनाश के कागार पर ही जा खड़े होंगे।
मनुष्य के प्रकृति विजय अभियान में अब जल और थल का उपयोग पर्याप्त नहीं माना जाता, अस्तु नभ पर चढ़ाई कर दी गई है। वायुयानों का आकाश में उड़ना अब पुरानी बात हो गई। अन्तरिक्ष यात्रा सम्पन्न करने वाले राकेटों के युग में प्रवेश हो चुका है। प्रक्षेपास्त्रों की स्वसंचालित दौड़ में काफी प्रगति हो चुकी है। रेडियो टेलीविजन की ध्वनि ओर प्रकाश की किरणें आकाश में ही दौड़ाई जाती है।
इस दिशा में नई प्रगति यह हुई है कि तार, टेलीफोन, टेलीग्राम, एवं टेलीविजन सरीखे संचार साधनों के लिए जमीन पर बहुत सारा यांत्रिक जाल खड़ा करने की अपेक्षा वह सारा कार्य अदृश्य आकाश से ही लिया जाय। काम भी अधिक होगा, खर्च भी कम पड़ेगा और याँत्रिक गड़बड़ियों के झंझट से भी बचा जा सकेगा।
संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक अन्तरिक्षीय माध्यम से संचार व्यवस्था स्थापित करने वाले संगठन का नाम था—’कोमसट। आज से 8 वर्ष पूर्व जब इसका आरंभ किया गया था तब उसके सदस्य 20 देश थे। पीछे उनकी संख्या क्रमशः बढ़ती गई। और इसका नाम बदलकर अन्तर्राष्ट्रीय टैलीकम्युनिकेशन संघ रख दिया गया। इस योजना के अंतर्गत पहला उपग्रह ‘अर्लीबर्ड छोड़ा गया। इसे विषुवत रेखा से 22,300 मील ऊँचाई पर ब्राजील और अफ्रीका के बीच स्थापित किया गया। यह कार्य अमेरिका नेतृत्व में चला और अन्ध महासागर के आर पार संवादों का प्रेषण आरम्भ हुआ। फ्राँस, ब्रिटेन, पश्चिमी जर्मनी, इटली और अमेरिका के बीच दोनों ओर से टेलीविजन चित्रों का आदान प्रदान हुआ।
भावी योजना यह है कि समस्त विश्व में एक छोर से दूसरे छोर तक संवाद एवं चित्र प्रेषण की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया कायम की जाय इसके लिए उपग्रहों की एक शृंखला छोड़नी पड़ेगी और उसे एक विशेष कक्षा में स्थापित करना होगा। यदि एक उपग्रह 382 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से पृथ्वी से 22,300 मील की ऊंचाई पर उड़े तो उसकी कक्षा गति भी पृथ्वी के समान ही 24 घंटे की हो जाती है। इस स्थिति वाला उपग्रह पृथ्वी से सदा’ एक ही स्थान पर स्थिर दिखाई देता रहेगा। उसे पृथ्वी के लगभग आधे भाग में देखा जाता रहेगा। ऐसे तीन उपग्रह स्थापित कर दिये जायें तो समस्त संसार की संचार व्यवस्था बन जायगी। इन दिनों इस लक्ष्य की पूर्ति में जो त्रुटियाँ है उन्हें ठीक किया जा रहा है।
इस दिशा में टेलस्टार उपग्रह ने अच्छा काम किया, विषुवत् रेखा से 45 डिग्री का कोण बनाते हुए अण्ड वृत्ताकार कक्षा में यह पृथ्वी से 593 मील से लेकर 3503 मील तक की ऊंचाई पर उसका परिभ्रमण पथ रहा। उसके माध्यम से 60 टेलीफोन लाइनों पर एक साथ बातचीत कर सकना संभव हुआ और 600 टेलीविजन कार्यक्रम एक साथ रिले किये जा सके। 3600 सूर्य बैटरियाँ इनमें लगी थीं जो सूर्य किरणों से अपने आप ही ‘चार्ज’ होती थीं।
इस प्रकार के उपग्रह और भी छोड़ जाते रहे। सायन कोम-तृतीय सुमात्रा के ऊपर स्थित किया गया है और ओलम्पिक खेलों के समाचार प्रसारण में इसने अच्छा योग दान दिया। आशा की जाती है कि अन्तर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था में इन दिनों बेतार के तार से संवाद भेजने में जितना झंझट करना पड़ता है उतना भविष्य में न रहेगा।
जिस प्रकार समस्त आकाश को मानवी सम्पत्ति मान कर उससे विश्व सञ्चार की आवश्यकता पूर्ण करने की उपयोगिता समझी जा रही है उसी प्रकार यदि विश्व सम्पदा पर मानव मात्र का अधिकार मान लिया जाय, वसुधा को एक कुटुम्ब और प्राणिमात्र को एक परिवार मान कर उदात्त दृष्टिकोण भी अपनाया जा सके तो हम नारकीय संघर्षों में से निकल कर चिरस्थायी सुख शान्ति का रसास्वादन कर सकते हैं। पर वैसी सद्बुद्धि हमें क भी आवेगी या नहीं इसमें संदेह है हमारा बुद्धि कौशल तो जड़ प्रकृति से जूझने में ही खप जाता है। मानवी समस्याओं पर विचार करने की फुरसत किसे हैं?
चतुरता और कुशलता ही यदि बड़प्पन का पैमाना हो तो फिर इस क्षेत्र में मनुष्य को नहीं, प्रतियोगिता में मकड़ी को प्रथम पुरस्कार मिलेगा।
मनुष्य को अनेक संभावनाओं से जुड़ा मस्तिष्क मिला है सो ठीक है, उसकी शारीरिक मानसिक क्षमतायें अद्भुत हैं सो भी ठीक है, पर मात्र इतनी ही उपलब्धियां के बलबूते उसे सृष्टी का मुकुट मणि नहीं कहा जा सकता है। शरीरों के प्रकार की तुलना को यदि ध्यान में रखा जाय तो प्रकृति प्रदत्त अनुदान के अनुपात में मकड़ी को कहीं अधिक भाग्यशाली माना जायगा छोटे से आकार की मकड़ी को कहीं अधिक भाग्यशाली माना जायगा। छोटे से आकार की मकड़ी कितनी अनोखी क्षमताओं से भरी पूरी है इसको गहराई से देखा जाय तो दाँतों तले उँगली दबा कर रह जाना पड़ेगा। इतने छोटे जीव में इतनी अद्भुत विशेषतायें? इसी अनुपात से यदि मनुष्य को मिला होता तो वह अबकी अपेक्षा न जाने क्या क्या कर गुजरता और तो वह अबकी अपेक्षा न जाने क्या क्या कर गुजरता और न जाने अपने को क्या क्या कहता समझता।
मकड़ी के इच्छित यातायात में नदी नाले भी बाधा नहीं पहुँचाते। जब उसे नदी पार जाना होता है तो किसी ऊँचे पेड़ पर चढ़कर अनुकूल हवा की प्रतीक्षा में बैठी रहती है। हवा का रुख ठीक होते ही वह वहां में तैरती हुई अपने मुँह से निकलने वाले जाले के सहारे नदी पार के किसी पेड़ आदि पर जा पहुँचती है। उसका पुल मुद्दतों काम देता रहता है और मज में इधर से उधर आती जाती रहती है।
जलाशयों में पानी के भीतर जाला तनने वाली जलचर मकड़ी थलचर भी होती है बिन पंखों के उसे नभचर होने का भी अवसर मिल जाता है इस प्रकार यूरेशियन जाति की मकड़ी जलचर,थलचर और नभचर तीनों वर्गों में अपनी गणना करती है।
मकड़ी का जाला देखने में तुच्छ वस्तु प्रतीत होती है पर उस पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह अद्भुत प्रकार की वस्तु है। इस जाले के ऐसे तन्तु भी मिल सकते है जो फौलाद से भी ज्यादा मजबूत हों, इन धागों की पृथ्वी को लपेट सकने लायक लबाई का वजन 400 ग्राम से भी कम होगा। दृष्टि तथा प्रकाश संबंधी आप्टिकल सूक्ष्म यंत्रों के क्रसवायर इन्हीं तन्तुओं से तैयार किये जाते हैं। अठारहवीं सदी में एक धुनि के धनी ने मकड़ी के जाले से ही हाथ के दस्ताने और पैर के मौज बनाये थे।
मकड़ी के रक्त में एक विशेष रासायनिक पदार्थ होता हैं एमीनो एसिड यह तन्तु उत्पादक ग्रन्थियों में जाकर एक चिपचिपे गाढ़े द्रव के रूप में परिणत हो जाता है। इन ग्रन्थियों के सिरे पर चार छोटे छोटे छेद होते हैं जिन्हें स्पिनेकेट कहते हैं इनके भीतर द्रव को धागे के रूप में निकलने और कातने वाले वलयनल लगे होते है। किसी मकड़ी में यह वलयनल 600 का संख्या तक पाये जाते हैं। बुनने कान आने वाली रसायन लुगदी को रसायन विज्ञान की भाषा में पालिमार कहा जाता है।
मकड़ी गुरुत्वाकर्षण के नियम के विरुद्ध ऊपर से नीचे ही नहीं नीचे ऊपर को भी चल उछल सकती है। बिना धागे की सहायता के भी उसकी यह ऊर्ध्वगामी क्रिया होती है। पूछ की तरह ताना पीछे−पीछे तना जाता रहता है और वह न केवल अपना शरीर वरन इस धागे को अपने साथ घसीटती हुई जमीन से छत की ओर गमन करती है।
मकड़ी क औसत धागा जो हमें दिखाई देता है एक इंच का एक लाख धागा ही मोटा होता है। यह भी एक नहीं है। सैकड़ों न दीखने वाले पतले धागों से यह वैसे ही बना है जैसे कि हम बहुत से धागे बंटकर मोटा रस्सा बनाते हैं। इतने पर भी यह लचकदार होता है और आसानी से खिंचकर सवाया हो सकता है। जाले अक्सर हवा के झोंके या दूसरे कारणों से टूटते रहते हैं। मकड़ी टूटे धागे जोड़ने में बहुत कुशल है वह टूट फुट की मरम्मत ऐसी बूँटी से करती है जैसे इलैक्ट्रिक वैल्िडग वाले धातु खंडों की भी नहीं कर सकते। जोड़ की जगह से धागा फिर दुबारा नहीं टूटता। ध्यान पूर्वक देखने से इस जाले की बुनावट मछली, चिड़िया या हिरन पकड़ने के लिए शिकारियों द्वारा बनाये गये जाल की अपेक्षा कहीं अधिक कुशलता के साथ की गई प्रतीत होती है। जो कीड़ा इसमें एक बार फँसा कि फिर उससे जीवित बच निकलना प्रायः संभव ही नहीं होता।
मकड़ी का जाला रेशम की तुलना में भी कहीं अधिक मजबूत होता है। आस्ट्रेलिया और मैडागास्कर के आदि वासी मकड़ियों के जाले से मछली पकड़ने के जाल तथा तन ढकने के आवश्यक वस्त्र तैयार करते थे जो सुन्दर भी लगते थे और टिकाऊ भी होते थे। जहाँ तहाँ रेशम के कीड़ों की तरह मकड़ी को भी उनका जाला प्राप्त करने के लिए पाला गया है पर उसमें खर्च अधिक और आय कम होने से बन्द कर दिया गया।
शीत ताप सहने की तितिक्षा शक्ति मकड़ी में इतनी होती है जितनी तथाकथित योगी−तपस्वियों में भी नहीं पाई जाती। वह बाईस हजार फु ट ऊंची हिमाच्छादित हिमालय की चोटियों पर भी पाई गई है और जमीन के भीतर दो हजार फुट गहरे उन गर्तों में भी जहाँ का ताप मान काफी अधिक होता है। उसकी संवेदन शक्ति और स्मरण शक्ति मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक सूक्ष्म होती है।
प्राणि शास्त्रियों ने संसार के विभिन्न भागों में प्रायः 14 हजार जाति की मकड़ियाँ खोजी हैं इनमें पानी के भीतर रहने वाली और वाटर प्रूफ जाला तनने वाली मकड़ियाँ भी सम्मिलित हैं। वर्ग की दृष्टि से इन्हें ‘लूता’ संज्ञा दी जाती है। इनका शरीर−शिर और धड़ के दो भागों में बँटा होता है शिर में आठ आँखें और धड़ में आठ टाँगें होती हैं। उनकी टाँगों को अन्तिम भाग की बनावट और क्रिया कुशलता ऐसी होती है जैसी मनुष्य में हाथ के पंजों की। अपनी सारी क्रिया कुशलता में मकड़ियाँ इन्हीं टाँगों में जुड़े पंजों से काम लेती हैं
मकड़ी के पिछले भाग में कई खोखली घुँडियाँ होती हैं। प्रत्येक घुँडी के मुख पर एक छेद होता है। उनके भीतर एक तरल द्रव भरा रहता है। जाला तनते समय मकड़ी इस तरल द्रव से भरी घुँडी—कोठरी पर भीतरी दबाव डालती है और वह बाहर निकलने लगता है। हवा लगते ही वह सूख जाता है और धागा बन जाता है। जाले को इच्छानुसार पतला मोटा करने के लिए वह घुँडी के छेद को आवश्यकता के अनुरूप छोटा बड़ा कर लेती है। कई बार तो यह धागे इतने बारीक होते हैं कि आँखों से सीधी तरह दिखाई भी नहीं पड़ते।
कुछ मकड़ियाँ अन्धी होती हैं पर उनकी स्पर्श शक्ति तथा संवेदना−शक्ति ऐसी अद्भुत होती है कि शरीर से छूने वाले रेडियो कंपन उसे समीपवर्ती परिस्थितियों का पूरा ज्ञान करा देते हैं फल स्वरूप उसका क्रिया कलाप ऐसे ही चलता रहता है मानों आँखें भी उसे प्राप्त हों। गंध शक्ति उनमें कम होती है पर स्पर्श शक्ति में वे दूसरे कीड़ों से कहीं अधिक आगे बड़ी चढ़ी होती हैं और किसी को छुए बिना उसके विद्युत कम्पनों का अनुभव करके ही वे आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेती हैं।
मित्रघात और विश्वास घात में मनुष्य ने अब भारी प्रवीणता प्राप्त करती है। किसी जमाने में लड़ कट कर ही शत्रुता का परिचय दिया जाता था। अब वे हथियार पुराने पड़ गये। किसी को मीठे व्यवहार से भित्न बनाना और फिर उसका विश्वास प्राप्त करके ऐसी पटक मारना कि वह चित्त पट हो जाय, यही आज का सर्व प्रचलित आक्रमण पद्धति है। छल के सहारे किसी को आसानी से उदरस्थ किया जा सकता है। मित्र बनाकर शत्रुता का आचरण करना यही मनुष्यों की वह उपलब्धि है, जिस पर वह फूला नहीं समाता और अपनी चतुरता पर गर्व करता है। पशुओं को लाड़ प्यार से पालना और फिर देखते देखते मित्र से शत्रु बनकर उनके गले पर छुरी फेर देना यही स्वादिष्ट माँसाहार का सरल तरीका है। इस रीति−नीति को वह अपने मित्रों और स्वजन संबंधियों के साथ बरतता रहता है। चतुरता का सबसे अधिक उपयोग मनुष्य उसी प्रयोजन के लिए करते हैं।
मकड़ी इस क्षेत्र में भी मनुष्य से पीछे नहीं। वह मकड़े को प्रेमपाश में फँसाती है। अपना मतलब जब निकल जाता है तो आँखें बदलने में एक क्षण नहीं लगाती और इस निर्ममता के साथ उदरस्थ कर जाती है मानो उसका उससे कुछ संबंध तो क्या कुछ परिचय भी न हो।
मकड़ियाँ अपने सहचरों के प्रति भी निष्ठुर होती हैं। उन्हें अपने अण्डों तथा नन्हें बच्चों तक ही लगाव होता है। पति को तो वे आमतौर से खा ही जाती हैं। प्रणयकेलि का आनन्द लेने के उपरान्त वे मकड़े का दूसरा उपयोग स्वादिष्ट आहार के रूप में ही करती हैं। मैत्री और सान्निध्य के नाम पर एक तीर से दो शिकार करने वाली मकड़ियों का यह व्यवहार निर्मम ही कहा जा सकता है। किशोर मकड़ी यदि थोड़ी मजबूत हुई तो अपने ही जाले में रहने वाले भाई बहिनों को चट कर जाती हैं।
नर और मादा मकड़ी अलग−अलग किन्तु पास−पास जाला तान कर रहते हैं और आवश्यकतानुसार दांपत्य धर्म निवाहते हैं। मादा मकड़ी भूखी होने पर नर पर आक्रमण कर देती है और उसे ही चट कर जाती है। मकड़ा आमतौर से इस युद्ध में हारता है। विवाह के साथ मौत के गठबंधन से मकड़ा परिचित होता है इसलिए वह यथा−संभव अपना बचाव करने के लिए सतर्क भी रहता है और जान बचाने के लिए सहचरी भूखी न रहने पाये इसका ध्यान रखता है। मकड़े पहले अपनी कमाई मकड़ी को सौंपते है और बची खुची खाकर ही संतोष करते हैं।
मकड़ी लड़ाकू होती है और बहादुर। उसमें विष कम नहीं होता। मनुष्य की उस क्रूरता को भी वह चुनौती देती है जिसकी वह आमतौर से बहादुरी और वीरता के नाम पर डींगें हाँकता रहता है।
उसे आये दिन युद्ध करना पड़ता है और वह जान हथेली पर रख कर इस बहादुरों से लड़ती है कि उससे कई गुने आकार वाले शत्रु को भी प्राण गँवाने पड़ते हैं। सर्प की तरह मकड़ी में तेज विष भी होता है जिसे वह अपने शिकार को अथवा शत्रु को परास्त करने के लिए आवश्यकतानुसार प्रयोग करती रहती है।
मनुष्य इस संसार के लिए अधिक उपयोगी है या मकड़ियाँ। यह फैसला होना अभी बाकी है। क्योंकि मकड़ियाँ व्यवहार में कितनी ही निष्ठुर क्यों न हों वे संसार में स्वच्छता रखती हैं और ऐसे तत्वों को साफ करती हैं जो मानव जीवन के लिए संकट उत्पन्न करते हैं। मकड़ी की यह उपयोगिता स्पष्ट है। पर मनुष्य तो गंदगी, धूर्तता, दुष्टता और अशान्ति फैलाने के अतिरिक्त कितना कुछ उपयोगी काम करता है इस संदर्भ में विस्तृत लेखा जोखा लेने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
मकड़ियाँ देखने में घिनौनी या गन्दी भले ही प्रतीत होती हों पर उनकी उपयोगिता मनुष्य जीवन के लिए असाधारण है। वे घर की छतों और कोनों में अपने जाले तानती हैं उनमें अपनी घर गृहस्थी बसाती हैं। आहार पकड़ती हैं। इससे बाहर निकल कर वे घर भर में रेंगते रहने वाले उन कीड़ों को खाती रहती हैं जो आसानी से दिखाई भी नहीं पड़ते किन्तु अपने हानिकारक प्रभाव से मानव जीवन के लिए भयानक हानि उपस्थित करते हैं। यह कीड़े खाद्य पदार्थों में शामिल होकर पेट में चले जाते हैं। और संकट खड़ा कर बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं। मकड़ी ही है जो बिना वेतन, बिना पोषण और बिना धन्यवाद पाये हानिकारक कीड़ों से जूझती हुई हमारे लिए सुरक्षात्मक लड़ाई लड़ती रहती है ब्रिटेन के कृमि विशेषज्ञों का कथन है कि इंग्लैंड की मकड़ियाँ जितने कीड़े मकोड़े हर वर्ष खाती हैं उनका वजन इस देश की समस्त आबादी से भी अधिक होता है।
काश, मनुष्य में भी कुछ ऐसी उपयोगिता भी रही होती तो उसका यह ढोंग सार्थक हो जाता कि उसका बड़प्पन दूसरे जीवों की तुलना में बढ़ा चढ़ा है।
दूसरों पर भरोसा लादे मत बैठे रहो। अपनी ही हिम्मत पर खड़ा रह सकना और आगे बढ़ सकना संभव हो सकता है। सलाह सब की सुनो पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
—विवेकानन्द
कौन बलवान है और कौन दुर्बल, इसकी परीक्षा करने की कसौटी यह होनी चाहिये कि कौन कितना सहिष्णु है और कौन कितना असहिष्णु है। जो तनिक−सी विपरीतता सामने आते ही उबल पड़ता है या डरने, काँपने लगता है, समझना चाहिये कि यह दुर्बल किस्म का मनुष्य है। अन्तःचेतना की दयनीय स्थिति इससे बढ़ कर और क्या हो सकती है कि उसे हवा के झोंके हलके तिनके की तरह किधर भी उड़ा ले जाँय और वह वैसे किसी झोंके का प्रतिरोध न कर सके।
भारी और वजनदार वस्तुओं का मूल्य और टिकाऊपन इसलिये होता है कि वे अवरोधों को सहन करते हुये अपनी राह पर, अपनी दिशा में ठीक तरह चलती रह सकती हैं। रेलगाड़ी और वायुयान यदि हवा के प्रवाह की दिशा में चलते−उड़ने लगें तो फिर उनमें बैठने वालों का ईश्वर ही रक्षक है।
हर मनुष्य की आकृति एक दूसरे से भिन्न है और प्रकृति भी। हर आदमी की मनःस्थिति एक−सी नहीं होती। उसके सोचने का अपना तरीका होता है और निर्णय करने का अपना ढंग। यह मानसिक स्तर जन्म−जन्मान्तरों के संस्कारों और स्तरों पर निर्भर रहता है। उसमें सुधार−परिवर्तन भी होता है पर आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति दूरदर्शी और विचारशील ही हो। साथ ही यह भी है अनिवार्य नहीं कि मनुष्यों की विचारधारा, रुचि, प्रकृति और मनःस्थिति एक जैसी हो। इस प्रकृति प्रदत्त भिन्नता को हमें ध्यान में रखना होगा और यह मान कर चलना होगा कि समन्वयशीलता और सहिष्णुता की नीति अपना कर यथा सम्भव अधिक से अधिक ताल−मेल बिठा सकने में ही आँशिक सफलता मिल सकती है और उसी कामचलाऊ समझौते के आधार पर जीवन−संकट को गतिशील रखा जा सकता है।
हमारी ही आकृति या प्रकृति के सब लोग बन जाय, यह सोचना बेकार है। हमारा ही नियन्त्रण, अनुशासन या परामर्श परिवार में या पड़ौस में शिरोधार्य किया जाना चाहिये, यह आकांक्षा थोड़े अहंकार का विज्ञापन करती है। हम दूसरे के शुभ−चिन्तक और परामर्श दाता हो सकते हैं और उन्हें श्रेष्ठ पथ पर चलाने के लिये अपनी सूझबूझ के अनुसार भरसक प्रयत्न कर सकते हैं, यह अपनी मर्यादा है। इस मर्यादा में रह कर ही हमारी सज्जनता अक्षुण रह सकती है, इसके आगे बढ़ कर जब हमें दूसरों को बाध्य करने जितना दबाव डालते हैं और आतंकवादी आधारों को अपनाते हैं तो यह भूल जाते हैं कि यह मनुष्य की मर्यादाओं का उल्लंघन है। आक्रमण को रोकना आत्म−रक्षा की दृष्टि से सही है, पर अपना अनुयायी बनाने के लिये बाध्य करना मानवी अधिकारों के अपहरण के बराबर है।
क्रोध और आवेश का अर्थ यह है कि अपनी ही मर्जी के अनुसार दूसरों को सोचने और करने के लिये हमें बाध्य करना चाहते हैं। अनुशासन के नाम पर हम कोमल भावनाओं का उपयोग करें और शुभ−चिन्तक के अनुरूप सौम्य−परामर्श की शैली अपनायें यही उचित है। सभी मनुष्य हमारे जैसे विचार के नहीं हो सकते हैं और न हर परिस्थिति हमें प्रिय लगने वाली हो सकती है। ऐसी दशा में सहिष्णुता ही अपनानी पड़ती है यदि ताल−मेल न बैठता हो तो उन परिस्थितियों से हट जाने या हटा देने का रास्ता अपनाया जा सकता है, पर निरन्तर टकराव का कोई प्रयोजन नहीं। सुधार यदि अपनी मर्जी जैसा नहीं हो सकता तो इसे दुर्भाग्य मान बैठना और खीजने या असन्तुलित होने लगना व्यर्थ है।
हमें व्यक्तियों अथवा परिस्थितियों की विपरीतता देखकर आवेश ग्रस्त नहीं होना चाहिये। क्रोध में आना या हताश हो बैठना दोनों ही मनुष्य की आन्तरिक कमजोरी की निशानी हैं। परिस्थितियों से धैर्य और औचित्य के आधार पर निपटा जाना चाहिये और सफलता को अनिवार्य न मान कर अपने प्रयास एवं कर्त्तव्य की सीमा में सन्तोष करना चाहिये।
विज्ञान की प्रगति इस युग की महत्वपूर्ण देन है। प्रकृति की शक्तियों का इन दिनों गहन अन्वेषण−अध्ययन किया गया है और उन्हें करतलगत करके मनुष्य की सेवा−सहायता के लिये नियोजित किया गया है। इन दिनों सुख−सुविधा प्रदान करने वाले अगणित ऐसे साधन चारों ओर बिखरे पड़े दीखते हैं, जिनकी अब से पाँच सौ वर्ष पूर्व कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। यदि पाँच सौ वर्ष पूर्व का कोई मनुष्य कहीं जीवित हो और आकर आज की परिस्थितियाँ देखे—पुराने जमाने से उसकी तुलना करे, तो आश्चर्य चकित हुये बिना न रहेगा। बिजली, रेल, मोटर, कार, रेडियो, जलयान, वायुयान, राकेट आदि की यान्त्रिकी प्रगति देख कर उसे ऐसा लगेगा मानो यह दैत्यों का युग है और उन्होंने ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ करतलगत कर रखी हैं। घन, वैभव, शिक्षा और कौशल की दिशा में विज्ञान की प्रगति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
प्राचीनकाल में सुविधा−साधन निस्सन्देह अब की अपेक्षा बहुत कम थे, फिर भी लोग निरोग और दीर्घजीवी होते थे। हँसी−खुशी के दिन गुजारते थे। मिलजुल कर रहते थे और चैन की साँस लेते थे। किन्तु अब सम्पत्ति, शिक्षा और सुविधाओं का अत्यधिक बाहुल्य होने पर भी सर्वत्र मरघट जैसी नीरव नीरसता दीखती है। स्नेह, सद्भाव की गहराई दीख नहीं पड़ती उसके स्थान पर उथला आडम्बरी, शिष्टाचार भर रह गया है। भीतर से घोर निर्ममता और बाहर से मयूर स्वर का अभिनय अब एक मान्यता प्राप्त कला−कौशल बन गया है। किसी को किसी पर विश्वास नहीं, कोई किसी के लिये अपने को जोखिम में डालने के लिये तैयार नहीं। आदमी अपनी मौत मर रहा है और अपनी जिन्दगी जी रहा है। किसी को किसी के सहारे की आशा रही भी तो वह समय आने पर निराशाजनक ही सिद्ध होती है। आदमी भीतर और बाहर से खोखला होता जा रहा है, सिर्फ चमक−दमक के लिफाफे को देख कर रीझने और मन बहलाने का ओछा आधार हाथ रह गया है। अस्वस्थ शरीर और उद्विग्न मन लेकर लोग किसी तरह जिन्दगी की लाश ढो रहे हैं। कुंठाओं से भरे दिन जब काटे नहीं कटते तो लोग नशा पीकर या अश्लील उत्तेजना का आश्रय लेकर गम दूर करते हैं। चैन, विश्वास और सन्तोष की—स्नेह सद्भाव और सहयोग की जिन्दगी अब किसी बिरले भाग्यवान के ही हाथ लगती है। अन्यथा औसत मनुष्य के भीतर और बाहर ऐसी ही विकृतियाँ भरी दीखती हैं, जिनके कारण रोष एवं विक्षोभ की जलन में झुलसते रहने की मजबूरी के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
साधनों के अभाव में अथवा अप्रत्याशित आपत्तियों के कारण कष्ट−ग्रस्त रहना पड़े यह बात समझ में आती है पर सुविधाओं का बाहुल्य रहने पर भी लोग इस प्रकार अशान्त उद्विग्न रहें, इसे आश्चर्य ही कहा जाना चाहिये इस विपन्न स्थिति का कारण तलाश करने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि विकास की घुड़दौड़ में पदार्थों की उपलब्धि ही सब कुछ बन गई है भावनाओं का विकास, परिष्कार एक प्रकार से भुला ही दिया गया है। गुण, कर्म, स्वभाव को—चरित्र और चिन्तन को परिष्कृत किया जाय, इस दिशा में एक प्रकार से आँख ही मूँद ली गई हैं। उपेक्षित क्षेत्र में पिछड़ापन ही बढ़ेगा समृद्धि बढ़ी सो ठीक है पर चिन्तन में उत्कृष्टता की समुचित मात्रा बनाये रखने का भी ध्यान रखा जान चाहिये था। दुर्भाग्य इस युग का यही रहा है, जन−जीवन और चिन्तन को दिशा देने वाले मनीषियों ने समृद्धि को ही सब कुछ बताने की भूल बरती। साम्यवादी दर्शन में समस्त समस्याओं की जड़ ‘अर्थ, को ही माना है और उसी के सुधार पर संसार में सुख−शान्ति और प्रगति की सम्भावना का प्रतिपादन किया है। अस्तु लोक−मंगल की इच्छुक समस्त शक्तियाँ अर्थ व्यवस्था पर अपने सारे प्रयासों को केन्द्रित किये हुये हैं। चरित्र एवं चिन्तन उपेक्षणीय समझा जाता रहा है, इस संदर्भ में उथली चर्चायें भर होती रही हैं कुछ ऐसा नहीं सोचा अथवा किया गया, जिसे ठोस अथवा गम्भीर कहा जा सके। परिणाम सामने है। जन−मानस सुविधा−साधनों की उपलब्धि को ही लक्ष्य स्वीकार और उस अत्युत्साह में चरित्र एवं चिन्तन के भावनात्मक आधारों को एक प्रकार से विस्मृत ही नहीं तिरष्कृत भी बना दिया गया। अब धर्म, अध्यात्म, चरित्र, कर्त्तव्य, लोक−मंगल जैसे प्रसंगों की चर्चा और चेष्टा करने वाले उपहासास्पद माने जाते हैं। प्रगतिशीलता का अर्थ चतुरता से भी आग बढ़ कर धूर्तता तक जा पहुँचा है। अब बुद्धिमान वह है जो दूसरों को उल्लू बना कर किसी भी प्रकार अपना मतलब सिद्ध करले। ऐसी परम्परा जब लोक−प्रकृति का अंग बन जाय तो व्यक्ति गत महानता और सामाजिक समस्वरता का टिकना किस आधार पर सम्भव हो सकता है? भावनात्मक उत्कृष्टता का तथ्य जब उपेक्षणीय बन जाय तो मनुष्य के सामने अन्तरंग और बहिरंग जीवन में विपन्नतायें भर ही जानी चाहिये और उसका फल अगणित शोक−सन्तापों के रूप में सामने आना ही चाहिये। आज की स्थिति का सही निरूपण विश्लेषण यही है।
हर किसी का व्यक्ति गत जीवन अब सौ वर्ष पुरानी स्थिति की तुलना में कहीं अधिक सुविधा−साधनों से भरा पूरा है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि उसमें रोष, असन्तोष भी कहीं अधिक बढ़ा−चढ़ा है। शरीर में रोग, मन में असन्तोष, परिवार में विक्षोभ, अर्थ व्यवस्था में दारिद्रय भरा पड़ा है और इर्द−गिर्द बिखरी हुई सामाजिक और शासकीय परिस्थिति के प्रति प्रत्येक को रोष है। इसका एक मात्र कारण मनुष्य के चरित्र और चिन्तन का स्तर गिरना और फलस्वरूप मानवी गतिविधियों में निकृष्टता का भर जाना ही है। सुविधा−साधनों की अभिवृद्धि के लाभ को मटियामेट कर देने वाली, इसी विभीषिका को यथा स्थान बना रहने दिया जाय तो फिर वैज्ञानिक आर्थिक एवं बौद्धिक प्रगति का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। जो प्रगति अपने साथ विपत्तियों को भी बढ़ाती चले, उसे कैसे सराहा जा सकेगा। एकांगी प्रगति का यही फल हो सकता है जो सामने है। भौतिक प्रगति के अनुरूप ही आत्मिक प्रगति भी होनी चाहिये अन्यथा एकाँगी प्रगति के परिणामों में विघ्न−असन्तुलन ही पैदा होगा। एक हाथ छोटा एक बड़ा हो, एक पैर मोटा एक पतला हो, एक आँख अन्धी, दूसरी दीखती हो तो काया कुरूप ही लगेगी—इतना ही नहीं उसकी क्षमता भी घटेगी। छोटा बच्चा भी अपने नन्हे से किन्तु सन्तुलित अवयवों को लेकर किसी प्रकार काम चला लेता है पर वयस्क होने पर भी यदि एक पाँव बहुत छोटा, पतला और एक पाँव बहुत मोटा लम्बा हो तो वह एकांगी बढ़ोतरी विपत्ति ही उत्पन्न करेगी। अविकसित और अभाव−ग्रस्त वनवासी किसी प्रकार सन्तुष्ट और सन्तुलित जीवन जी लेते हैं किन्तु यदि चतुरता और सम्यकता के साथ आदर्शवादिता न बढ़े तो वह सम्पत्ति मनुष्य के लिये सुखद सिद्ध होने की अपेक्षा दुखद परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करेगी। आज धन भी बढ़ा है और विज्ञान भी। शिक्षा भी बढ़ी है और सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है। इस गरिष्ठ आहार को पचाने लायक पेट का हाजमा भी तो बढ़ना चाहिये अन्यथा यह व्यंजन−पकवान उदर संकट ही उत्पन्न करेंगे। आज यही तो हो रहा है।
यह विपत्ति व्यक्ति गत जीवन में ही नहीं, सामूहिक परिस्थितियों पर भी छाई हुई है। विज्ञान और धन का लाभ यों जनता भी उठाती है पर उसका मूल स्वामित्व एक प्रकार से शासन सत्ताओं के ही हाथ में हैं। वैज्ञानिकों का शिक्षण, पोषण, शोध−प्रयोग से लेकर उपलब्धियों तक पर प्रायः सरकारी नियन्त्रण ही रहता है। वे उन्हीं आविष्कारों के लिए साधन, प्रोत्साहन प्रस्तुत करती हैं जो सत्तारूढ़ लोगों को प्रिय है। चरित्र संकट व्यक्ति गत जीवन तक ही सीमित नहीं रहा, वह हर क्षेत्र के मूर्धन्य लोगों के सिर पर भी सवार है। इससे राजनेता भी अछूते नहीं। विभिन्न देशों के सत्ताधीश जिस मनोवृत्ति के हैं, उसमें विनाश की ही बात को प्रमुखता मिलेगी। विश्व भर के शासक विज्ञान को घातक अस्त्रों के साधनों में जिस उत्साह से नियोजित किये हुये हैं, उतना उत्साह रचनात्मक कार्यों में नहीं है। विज्ञान का अति महत्वपूर्ण भाग विनाश−विन्यास को ही संजोने में लगा हुआ है। जितना धन घातक आयुधों के निर्माण में−आक्रमणकारी साधनों में लगा हुआ है, उतना सुख−शान्ति के रचनात्मक प्रयोग−परीक्षणों में कहाँ लगता है? प्रति रक्षा−साधनों पर, राकेटों पर, जितनी शक्ति लग रही है। उसकी चौथाई भी विश्वव्यापी अज्ञान एवं दारिद्रय के निवारण में लगी होती तो अब तक गरीबी, बीमारी और अशिक्षा पर तक विजय प्राप्त करली गई होती।
अणु−आयुध प्रक्षेपणास्त्र, मारक गैसें, स्वसंचालित अस्त्र, मृत्यु किरणें जैसे साधन इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित हो गये हैं कि किसी उन्मादी द्वारा उठाया गया मूर्खता कदम देखते−देखते इस सुन्दर भूपिंड को जलती फुलझड़ी की तरह भस्मसात करके रख सकता है। बुद्धि, सत्ता, विज्ञान और धन का विनियोग जिस प्रकार विघातक प्रयोजनों में हो रहा है उसी प्रकार शासनाध्यक्षों का मन यदि मानव−कल्याण में निरत रहा होता, विघातक प्रवृत्तियों के स्थान पर रचनात्मक कदम उठाये गये होते तो मनुष्य जाति की न जाने कितनी समस्यायें हल तो गई होतीं और संसार में न जाने सुख−शांति की कितनी बढ़ी−चढ़ी परिस्थितियाँ बिखरी हुई दिखाई देतीं।
समष्टि क्षेत्र में भी उसी दुर्बुद्धि का साम्राज्य है, जिसका घटाटोप व्यक्ति गत जीवन पर चढ़ा हुआ है। साधन तो बेचारे निर्जीव हैं, उनका प्रयोग तो मनुष्य की चेतना ही करती है, यदि वही दुष्टता और दुर्बुद्धि ग्रसित हो तो विज्ञान, धन, बुद्धि, कौशल आदि जो कुछ भी, जितना कुछ भी सामने होगा, उसे अवाँछनीय दिशा में ही नियोजित किया जायगा। फलस्वरूप विपत्तियाँ और कठिनाइयाँ ही बढ़ेगी। जैसी कि आज बढ़ भी रही हैं। विज्ञान, धन अथवा ज्ञान के अभिवर्धन का विरोध नहीं किया जा सकता है। उस दिशा में अधिकाधिक प्रगति के साधन जुटाये ही जाने चाहियें, किन्तु साथ ही भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि साधन ही सब कुछ नहीं है। उसका भला−बुरा परिणाम तो प्रयोक्ताओं की मनः स्थिति पर निर्भर रहेगा। चाकू से कलम बनाई जा सकती है और उसी से किसी की जान भी ली जा सकती है। दोष चाकू का नहीं प्रयोक्ता का है। साधनों की अभिवृद्धि के साथ−साथ यदि प्रयोक्ताओं का स्तर ऊँचा न उठ सका तो बढ़ी हुई साधन सामग्री अपनी वृद्धि के अनुपात से ही विपत्ति भी खड़ी करेगी। लाठी लेकर आक्रमण करने वाला दस−बीस को घायल ही कर सकता है पर यदि उसके हाथ मशीनगन लग जाय तो देखते−देखते हजारों को धराशायी बना देगा। मूर्ख अपराधकर्त्ता लोगों की थोड़ी−सी हानि करेगा पर बुद्धिमान की दुर्बुद्धि तो असंख्यों को अपने जाल में फँसा कर पटक−पटक कर मारेगी।
इन दिनों एक भयंकर भूल यह हो रही है कि भौतिक सुख−साधनों की अभिवृद्धि पर हर किसी का ध्यान केन्द्रित है। इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि भौतिक प्रगति के साथ−साथ उनके उच्चस्तरीय प्रयोग की क्षमता विकसित करने वाली सदाशयता का भी विकास किया जाय। चरित्र और चिन्तन की उत्कृष्टता का अभिवर्धन इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे भौतिक प्रगति से भी पहले स्थान दिया जाना चाहिए। सद्भाव सम्पन्न लोग अभाव−ग्रस्त परिस्थितियों में भी सुखी रहने और सुखी रहने देने की व्यवस्था बनाये रह सकते हैं पर दुर्भाव सम्पन्न दुष्टता तो बढ़े−चढ़े साधनों को अपने और दूसरे के पतन में ही प्रयुक्त करके रहेगी, तब उस समृद्धि का परिणाम अभाव ग्रस्त स्थिति से भी महंगा पड़ेगा।
भौतिक साधनों की अभिवृद्धि के प्रयत्न में निरत उत्साह को सलाह मिलनी चाहिए कि प्रयासों को−आत्मिक प्रगति की दिशा में मोड़ा जाय और जब तक सन्तुलन न बन जाय तब तक मानवी सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन पर ही ध्यान और प्रयत्न को केन्द्रित किया जाय। भौतिक विज्ञान की ही तरह आत्मिक विज्ञान को भी महत्व दिया जाय।
प्राणधारी की आकाँक्षा और चेष्टा जिस भी दिशा में तत्पर होती है, उसी दिशा में आशातीत सफलता मिलने लगती है। चेतना की तत्परता का चमत्कार चूहे जैसे छोटे प्राणी में भी देखा जाता है। पेट पालने और सन्तानोत्पादन में उसे भी असाधारण उत्साह रहता है उसने इन दिनों ही क्षेत्रों में आश्चर्यजनक सफलता प्रदान की है।
अनुमान है कि भारतवर्ष में चूहे प्रायः 330 लाख टन अनाज हर वर्ष खा जाते हैं। फसल घर आने से पहले ही खेत−खलिहानों में प्रायः 10 प्रतिशत अनाज साफ कर देते हैं। खाने के अतिरिक्त वे बखेरने की बर्बादी भी कम नहीं करते। अपने बिलों में भी वे भविष्य के लिए काफी अन्न जमा करते हैं। तलाशी लेने पर कई चूहों के बिलों में 14 किलो तक अनाज बरामद हुआ है। अनुमान है कि पूरे देश में प्रायः 5 अरब 80 करोड़ चूहे है। आबादी के हिसाब से हर एक मनुष्य पीछे 10 चूहों का अनुपात आता है। एक चूहे को भर पेट खाने का अवसर मिले तो वह लगभग अपने शरीर के बराबर प्रायः आधा पौंड अनाज आसानी से खा और पचा सकता है। खाऊपन की आदत ने उनके पेट का बहुत परिपुष्ट कर दिया है।
चूहों की सन्तानोत्पादन क्षमता भी ऐसी ही आश्चर्यजनक है। पेट भरने के बाद उनको दूसरा प्रिय−कार्य, काम, कौतुक ही सूझता है। उनकी इस अभिरुचि ने अभीष्ट सफलता प्राप्त की है और परिवार बढ़ाने में वे अन्य प्राणियों से कहीं आगे रहते है।
चुहिया वर्ष में प्रायः 3−4 बार बच्चे देती है। उनका वार्षिक प्रजनन प्रायः 10 बच्चों का होता है। एक साल की चुहिया जवान हो जाती है और बच्चे पैदा करने लगती है। इस प्रकार की उसकी वंश वृद्धि को देखते हुए मारने−पकड़ने के उपाय प्रायः बेकार ही साबित होते हैं।
चूहों जैसा निरुद्देश्य जीवन पेट और प्रजनन के उपरान्त दुष्टता और उच्छ खलता अपनाने में प्रवृत्त होता है। उनके द्वारा किये जाने वाले उपद्रवों का लेखा−जोखा लेने पर विदित होता है कि दादागीरी में उन्होंने अपने को किसी से पीछे नहीं रहने दिया है।
प्रौढ़ चूहे मोटे होकर उद्दंड हो जाते हैं और अनाज से पेट भरने तक सन्तुष्ट नहीं रहते, तब वे पशु−पक्षियों पर आक्रमण करते हैं और मनुष्यों तक की खबर लेने से नहीं चूकते। अकेले बम्बई शहर में चूहे के काटे घायल लगभग 20 हजार की संख्या में अस्पतालों में भर्ती होते हैं। घरेलू मरहम पट्टी करके बैठ रहने वालों की संख्या तो इससे कई गुनी अधिक होगी।
पालतू मुर्गियों के अंडे चुराने में वे उस्ताद होते हैं। पेड़ों पर चढ़ कर पक्षियों के अंडे भी वे मजे से खाते हैं। आयरलैंड में भूरे चूहों की संख्या इतनी बढ़ी कि उन्होंने तालाबों का सफाया ही कर दिया। साइकिल द्वीप समूह में एक बार वे इतने बढ़े कि पेड़ों पर पक्षियों के लिये बसेरा करना कठिन हो गया और वे हार मानकर उस क्षेत्र को छोड़ कर अन्यत्र घोंसले बनाने के लिये चले गये। आसाम के हाथी व्यवसायी ने बताया कि एक बार उसके तीन हाथी चूहों द्वारा पिछले पैरों का माँस काटे जाने से घायल हो गये। सिवनी (मध्य प्रदेश) के एक गाँव में डेढ़ किलो भारी चूहे को बन्दूक की गोली से मारना पड़ा। वह तीस मुर्गियों के बच्चों को दबोच कर उदरस्थ कर चुका था और सोते आदमियों का माँस काटने लगा था।
निरुद्देश्य मानव−जीवन भी चूहे जितनी ही प्रगति करता है और उतनी ही सफलता प्राप्त करता है। किसी भी रीति से कामना और कुछ भी करने में खर्च करना—वासना और विलासिता की ललक−लिप्सा में आंखें बन्द करके डूबे रहना, इसके बाद बची शक्ति को अहंकार आतंक के उद्धत प्रदर्शन में लगाये रहना, क्या ही मानवोचित जीवन है। इस प्रकरण को तो मनुष्य की अपेक्षा चूहा भी अधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लेता है।
जो कुछ सामने विद्यमान है, उसमें ऊँचे उठकर दूरदर्शी की रीति−रिवाज अपनाने वाले ही अधिक विस्तृत और परिष्कृत ज्ञान प्राप्त करते हैं। सीमाबद्ध संकीर्णता में जकड़े रहने वाले लोग तो कूप−मंडूक बन कर ही रह जाते हैं। जो सामने पड़ा है,वही सब कुछ नहीं है उसमें आगे भी कुछ है और जो नहीं जाना, समझा जा सके उपयोगी भी झाँकी करने की आवश्यकता है। यह प्रवृत्ति ही जिज्ञासा बन कर विकसित होती है और ज्ञान सम्पादन की ओर बढ़ चलने की प्रेरणा देती है। मनुष्य−जाति ने अब तक जो ज्ञान सम्पदा एकत्रित की है, उसके पीछे ज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ने और ऊँचे उठने की अकुलाहट ही काम करती रही है।
न केवल ज्ञान क्षेत्र में वरन् जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने एवं ऊंचे उठने की आवश्यकता सदा से समझी जाती है। क्षुद्र और दुराग्रही लोग ही यथा स्थिति को पर्याप्त मान बैठते हैं और उसी के लिए दुराग्रह ठाने रहते हैं। प्रगतिशीलता का तकाजा सीमाबद्धता से सन्तुष्ट न रह कर असीम की ओर उड़ चलने का है। जिनके प्रयास ऊपर उठने के हैं, उनकी भावनायें उष्णता के उच्च−शिखर पर चढ़ने के लिए उमड़ती, मचलाती हैं, उन्हें ही जीवन साधना के साधक कहा जाता है। वे ही आकाश के तारे तोड़ लाने जैसी बढ़ी−चढ़ी सफलतायें प्राप्त करते हैं।
आकाश में उड़ाये गये गुब्बारे मनुष्य की इसी आकाँक्षा और चेष्टा के मूर्तिमान प्रतीक प्रतिनिधि हैं। आरम्भ में वे ऐसे ही कौतूहलवश उड़ाये गये थे पर पीछे वे वायुयानों का महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा करने लगे। अब अंतर्ग्रही उड़ानों की भूमिका भी वे ही राकेट गुब्बारे निबाह रहे हैं। ऊँची छलाँग लगाने की यह प्रक्रिया निकट भविष्य में मानव−जाति की प्रगति और सुख−सुविधाओं की सम्भावनाओं को और भी अधिक तरह सम्पादित करेंगी। उपग्रह संचार व्यवस्था, टैलेक्स, टेलीग्राफ, डाटा−प्रेषण,रेडियो, फोटो, ध्वनि प्रसारण आदि अनेक प्रयोजन भी पूरे होंगे। किसी भी घटना के टेलीविजन चित्र कुछ ही सेकेंड में संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक भेजे जा सकेंगे। टेलीविजन प्रक्रिया में माइक्रो तरंगें काम आती हैं और वे सीधी पंक्ति में चलती हैं। पृथ्वी गोल है। दूर स्थानों तक इन माइक्रो तरंगों के जाने में पृथ्वी की गोलाई बाधक होती है। इसलिए यदि टेलीविजन चित्र दूर तक भेजने हों तो हर 50 किलो मीटर पर एम्पलीफायरों से युक्त ॐ ची ऐसी मीनारें बनानी पड़ेंगी, जो दृष्टि रेखा, लाइन आफ साइट— पर स्थित हो। इस कठिनाई के कारण टेलीविजन एक स्थानीय आवश्यकता पूरी कर सकने वाली व्यवस्था बनी हुई है और उसका लाभ व्यापक क्षेत्र में उठाया जा सकना सम्भव नहीं है। समुद्र पार के टेलीविजन कार्यक्रमों को हम किसी भी प्रकार देख नहीं सकते।
अन्तरिक्षयानों के विकास की स्थिति अब निकट भविष्य में ही हल होने जा रही है। 1 भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर 36000 किलोमीटर ऊँचाई पर— एक दूसरे से सामान्य दूरी पर तीन संचार उपग्रह स्थापित किये जाने वाले हैं, इनके माध्यम से समस्त संसार को टेलीफोन, टेलीविजन जैसी सुविधायें सहज ही मिलने लगेंगी। विश्व−रेडियो दुनिया भर के ज्ञान वर्धन की अभीष्ट आवश्यकताओं पूरी करने लगेगा।
उपरोक्त संचार व्यवस्था के लिये आवश्यक डिजाइन और यन्त्र उपकरण बनाने में इन्टरनेशनल टेलिक् म्युनिक् शन्स सैट कन्सार्टियम (इंटेलसैट) और कम्युनिकेशन सैट लाइट कारपोरेशन (कम्साट) नामक संस्थानों को सौंपा गया है और वे अपना काम जल्दी पूरा कर देने के लिये अनवरत श्रम कर रहे हैं। पिछले दिनों इस प्रकार के छोटे प्रयत्न हुये भी हैं और उन्हें सफलता भी मिली है। ‘इटेल सैट’ छोटा उपग्रह उत्तर अमेरिका और योरोप के बीच 240 दुतरफा टेलीफोन चैनलों को स्थापित कर चुका है और उसने इन दोनों महाद्वीपों के बीच टेलीफोन चित्रों का भी सफल आदान−प्रदान किया है। इसके बाद उसी शृंखला के और भी अधिक विकसित उपग्रह छोड़े गये। इंटेलसैट 3 ने हिन्द महासागर पर 1100 टेलीफोन चैनलों की स्थापना की। इसमें 150 करोड़ रुपया खर्च आया, जिसे सभी सम्बद्ध देशों ने मिल−जुल कर पूरा किया। पूना (आरबी) का भारतीय संचार स्टेशन इसी उपग्रह शृंखला से लाभ उठा रहा है। भारत की विदेशों के साथ जितनी दूर संचार व्यवस्था है, उसका 42 प्रतिशत बम्बई से, 26 प्रतिशत दिल्ली से और 22 प्रतिशत कलकत्ता से होती है। प्राकृतिक सुविधा और अधिक कार्य भार को ध्यान में रखते हुये इस स्टेशन के लिये बम्बई क्षेत्र चुना गया और उसके लिये सत्रह मंजिली ऐसी इमारत बनाई गई जिसकी छत्त पर 45 मीटर ऊँची मीनार पर ऐटेना यन्त्र लगा है।
पिछले दिनों पृथ्वी से 400 मील की ऊँचाई पर 18 हजार मील प्रति घंटा गति से धरती के चारों ओर घूमने वाला टाइकोस (टेलीविजन एण्ड इन्फ्रारेड आवजर्वेशन सेटी लाइट उपग्रह उड़ाया गया था। 19 इंच ऊँचा, 45 इंच व्यास का, 270 पौंड भारी यह यंत्र यों जरा सा था पर उसमें दो टेलीविजन कैमरे एक टेपरिकार्डर तथा सैकड़ों छोटे वाले ऐसे यंत्र लगे हुये थे जो आकाश में ऋतु प्रवाह सम्बन्धी जानकारियाँ इकट्ठी करके धरती पर भेज सकें, इसमें बीस वाट बिजली की जरूरत पड़ती थी जो सौर बैटरियों से मिलती है। इसने अपने 78 दिवसीय जीवन में, 20 हजार चित्र पृथ्वी पर भेजे थे, जिससे आकाश की वर्तमान स्थिति का और भावी ऋतु परिवर्तन सम्बंधी उतार−चढ़ावों का पूर्वाभास मिल सके।
तब से लेकर अब तक इस दिशा में क्रमशः अधिक बड़े खोज प्रयत्न होते रहे हैं। 4000 पौंड भारी, निम्बस ने भी अपने समय में बहुत जानकारी दी और तदुपरांत ए. टी. एस. उपग्रह ने पृथ्वी से 22,300 मील ऊँचाई पर जाकर अन्तरिक्ष से धरती पर उतरने वाले प्रकृति प्रवाहों की जानकारी का नया अध्याय खोला। तब से लेकर अब तक अधिक विकसित शोध−यंत्र आकाश में उड़ाये जाते रहे हैं। उनके आधार पर आँधी, तूफान, वायु, भ्रमर, समुद्री तटवर्ती तूफान, मानसून आदि की पूर्व सूचनायें अधिक स्पष्टता पूर्वक उपलब्ध होने लगी हैं।
बम्बई में फ्लोरा फउन्टन के निकट एक सत्रह मंजिला भवन उपग्रह संचार व्यवस्था से लाभ उठाने के लिये बना है। इसी व्यवस्था की दूसरी कड़ी पूना से 80 किलो मीटर दूर अरबी नामक ग्राम के समीप बना है। उस व्यवस्था का उद्देश्य अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले उपग्रहों के माध्यम से सरलतापूर्वक विश्व−व्यापी संचार व्यवस्था से लाभान्वित होना है। इस माध्यम से विदेशों को फोन करने के 600 चैनल प्राप्त हो सकेंगे और 15 मिनट के भीतर ही दुनिया के किसी भी भाग के साथ टेलीफोन सम्बन्ध जोड़ सकना सम्भव हो सकेगा।
मिडास के बाद अब ‘सामोस’ उपग्रहों की बारी है। ये और भी अधिक तेज हैं। इनमें बहुत ही शक्ति शाली टेलीविजन लगे हैं। वे जमीन के भीतर परमाणु बमों के निर्माण कारखानों को, इस तरह की जानकारी को एकत्रित करते हैं। मानों उन्होंने जमीन के भीतर घुस कर ही वह सब देखा हो। इतना ही नहीं अमेरिका का यह भी दावा कि उसका ‘डाइना सोर’ नया प्रक्षेपास्त्र भी ऐसा अजेय है कि वह किसी भी सुरक्षा अथवा अवरोध को भेद कर निर्दिष्ट लक्ष्य को वेध सकता है।
रूस और अमेरिका के दावे एक दूसरे से बढ़−चढ़ कर हैं, वे अपनी मारक और सुरक्षात्मक उपलब्धियों को प्रतिद्वंद्वी पक्ष से अधिक होने का दावा करते हैं। सैटलाइट इंसपेक्टर, स्काई बोल्ट राकेट—दोनों ही पक्षों ने इतनी अधिक मात्र में छोड़ रखे हैं कि लगता है युद्ध स्तरीय जासूसी की परिधि से बाहर अब किसी का कोई प्रयास शायद ही छिपा रहा हो।
‘यू. एस. न्यूज एण्ड बर्ल्ड रिपोर्ट’ पत्रिका की दी गई एक मुलाकात देते हुये लेफ्टिनेंट जनरल फर्गुरसन ने कुछ दिन पूर्व अमेरिका के अन्तरिक्षीय सैनिक मिशनों का रहस्योद्घाटन किया था। उन्होंने बताया था कि अमेरिका के मिडास उपग्रह रूस की सभी सैनिक गतिविधियों की विधिवत सूचना देते हैं। मिडास का पूरा नाम है, ‘मिसिल डिफेन्स एलार्म सिस्टम’ यह पूरी उपग्रह शृंखला का नाम है, जिसके अंतर्गत अनेक राकेट आकाश में घूमते हुये संसार के विभिन्न स्थानों की, विविध स्तरों की जासूसी करते रहते हैं। ये लगभग दो हजार मील ऊँचाई पर उड़ते हैं और वहाँ से ‘इन्फ्राकेड़ सेन्सर’ प्रणाली के आधार पर ऐसी खोज खबर प्राप्त कर लेते हैं, जो साधारणतया मनुष्य के द्वारा कठिनाई से ही जाने जा सकते हैं।
कोई अणु आक्रमण सफल हो, इससे पूर्व आरम्भ हुई हरकतों की जानकारी यह ‘मिडास’ 28 मिनट पहले ही प्राप्त कर सकते हैं और जवाबी प्रहार के अड्डे आक्रमण सफल होने से पहले ही उसे निरस्त करने के अनेक कारगर कदम उठा सकते हैं।
बहुत दिन पूर्व रूसी प्रधान मन्त्री ने यह घोषणा की थी कि उसका ग्लोब राकेट अजेय है। वह किसी की भी पकड़ में नहीं आ सकता और उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। यह राकेट सीधा नहीं चलता वरन् औंधे तिरछे रास्तों से, आकाश में डूबता उछलता इस तरह चलता है कि उसके उद्देश्य को, दिशा को, स्वरूप को समझ सकना किसी भी जासूसी यन्त्र की सामर्थ्य से बाहर होगा। इसी के जवाब में मिडास शृंखला का ‘नाइक ज्यूस’ प्रक्षेपणास्त्र है, जिससे ग्लोब राकेट को नष्ट न कर सकने की चुनौती स्वीकार की है।
आकाश में उड़ने की उद्दीप्त आकाँक्षा जब कार्य रूप में परिणत होने के लिये तत्पर हो गई तो उसके परिणाम सामने आये। हम हवा में पक्षियों की तरह उड़ सकते हैं और भूतकाल में जो यात्रायें अत्यन्त कष्ट साध्य समय साध्य और धन साध्य थीं, उन्हें सहज ही पूरी कर सकते हैं। उड्डयन के विकास ने सारे संसार को घर−मुहल्ले की तरह निकटवर्ती और विश्व−विस्तार को छोटे परिवार के रूप में परिणत कर दिया है।
मौसम सम्बन्धी सूचनायें पाकर उससे आत्मरक्षा के उपाय खोजे जा सकेंगे। तार, टेलीफोन, रेडियो और टेलीविजन की विश्वव्यापी सुविधा हो जायगी। अडडडड युद्धों की रोकथाम हो सकेगी। अन्तरिक्षीय खोज−खबर पा सकने की सम्भावना बढ़ेगी और न जाने क्या−क्या होगा। ऊँचा उठने की जिज्ञासा जब तत्परता के रूप में कटिबद्ध हो जाती है तो उसके भौतिक लाभ प्रत्यक्ष होते ही हैं, हो भी रहे हैं। जब यह आकाँक्षा आध्यात्म क्षेत्र में उभरती है—मनुष्य ऊँचा उठना चाहता है तो प्रगति का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि उड्डयन सम्बन्धी उपलब्धियाँ उसके सामने तुच्छ प्रतीत होने लगें।
इरान और टर्की के बीच युद्ध चल रहा था। इसी बीच तुर्की ने ईरान के सन्त फरीदुद्दीन अन्सार को पकड़ लिया और उन पर जासूसी का आरोप लगा कर फाँसी की सजा सुना दी।
ईरानी सन्त को बहुत प्यार करते थे। वहाँ के एक धनी ने संत को छोड़ देने के बदले उनके वजन के बराबर सोना देने का प्रस्ताव किया, पर टर्की ने उसे न माना।
अन्त में ईरान के बादशाह ने टर्की के सुल्तान के पास सन्देश भेजा कि वे उनका सारा राज्य लेकर सन्त का छोड़ दें।
सुल्तान अचम्भे में रह गये। उनसे पूछा जिस राज्य को हम इतनी लम्बी लड़ाई के बाद भी न ले सके वह हमें एक आदमी के बदले क्यों दिया जा रहा है?
ईरान के बादशाह ने जवाब दिया। राज्य नाशवान है पर सन्त अविनाशी। राज्य खोकर उसे फिर पाया जा सकता है पर सन्त को खोकर तो हम दरिद्र और कलंकित हो जायेंगे।
सुलतान ने समझ लिया, जिस देश में सन्त का इतना मूल्य समझा जाता है उसे कोई पराजित नहीं कर सकता। उसने युद्ध बन्द कर दिया और सन्त अन्सार को आदरपूर्वक मुक्त कर दिया।
बड़ी मछली छोटी को खा ही जाती हो यह अनिवार्य नहीं। ऐसा भी होता है—हो सकता है, इतना कहना मानना ही पर्याप्त है। यह सिद्धान्त नहीं अपवाद है। सच यह है कि सभी जल−जन्तु परस्पर सहयोगपूर्वक रहते हैं और अनिवार्य कारण उपस्थित होने पर ही यदा−कदा टकराते हैं। यदि यह सिद्धान्त सही न होता तो बड़े जलचर अब तक समस्त छोटे जीवों का सफाया कर गये होते। और कहीं कोई छोटा जल−प्राणी दृष्टिगोचर न होता।
रोमन कैथोलिक धर्म में गुरुपोप की नगरी ‘वैटिकन’ एक स्वतन्त्र राष्ट्र है। वह रोमनगर के मध्य में स्थिति है। इसका क्षेत्रफल 108 एकड़ है और जनसंख्या लगभग डेढ़ हजार। अनेक देशों से वैटिकन की दौत्य सम्बन्ध है।
फ्रांस के दक्षिण में भूमध्य सागर के तट पर बसा हुआ, मोनको छोटा सा देश है। उसकी आबादी 25 हजार और क्षेत्रफल एक सौ वर्ग मील। इसमें तीन छोटे छोटे कस्बे हैं। यह देश जुआ खेलने के लिये प्रसिद्ध है। दूर−दूर के लोग यहाँ बैठ के जुआ खेलने और रंग−रेलियां करने के लिये पहुँचते हैं। यहाँ का राजा है−प्रिस केनियर।
इटली के मध्य एपिनायल पहाड़ियों की गोद में बसा हुआ सैन मैरिनों नन्हा किन्तु बहुत पुराना गण राज्य है। इसका क्षेत्रफल 38 वर्ग मील है। इसमें मताधिकार 15 हजार वयस्कों को प्राप्त है। छोटे बच्चे इसके अतिरिक्त हैं।
स्पेन और फ्रांस की मध्य सीमा पर बसा हुआ एक देश है—ऐंडोस। यह पैरेनीज पर्वत की गोद में बसा है। क्षेत्रफल 191 वर्ग मील और आबादीं 7 हजार। यह देश सन् 1278 से ही गणराज्य के रूप में अपनी स्वतन्त्र प्रभुसत्ता का उपभोग कर रहा है।
आल्पस पर्वत के समीप स्विट्जरलैंड और आस्ट्रिया की सीमा पर बसे लिप्टेंस्टाइन देश की आबादी 19 हजार है और क्षेत्रफल 65 वर्ग मील। इस देश के प्रेस निकटवर्ती देशों की छपाई करते हैं और अधिकाँश नागरिकों की उसी से आजीविका मिलती है।
999 वर्ग मील क्षेत्रफल वाला लकजेक वर्ग देश वेजलियम और नीदरलैंड की सीमा पर बसा है। इसकी जन−संख्या चार लाख है। यह देश 1815 से स्वतंत्र चला आ रहा है। यहाँ के नागरिकों को प्रजातंत्री अधिकार प्राप्त है पर राज्य−सिंहासन पर एक डयूक का आधिपत्य है।
याल्टा भूमध्य सागर में बसा है। इसका क्षेत्रफल 128 मील और आबादी साढ़े तीन लाख है। इसे 10 वर्ष पूर्ण ही पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त हुई है।
मालदीप बहुत ही छोटे−छोटे दो हजार द्वीपों का हिन्द महासागर में अवस्थित जखीरा है। उसका क्षेत्रफल 115 वर्ग मील और आबादी डेढ़ लाख है। मालदीप से कुछ ही आगे स्वतंत्र देश सिंगापुर कुछ बड़ा है, उसका क्षेत्रफल 224 मील और आबादी बीस लाख है।
कैरीवियन सागर में अवस्थित वेस्टइंडीज का एक पीछे देशर वावेंडीज है। इसका क्षेत्रफल 166 वर्ग मील और जनसंख्या ढ़ाई लाख है। लगभग 350 वर्षों से यह ब्रिटिश संरक्षण में था, अब सन् 1965 से वह पूर्ण स्वतन्त्र है।
वेस्टइंडीज का ही एक छोटा द्वीप ऐगिवला 36 वर्ग मील का क्षेत्रफल और 6 हजार आबादी का है।
प्रशाँत महासागर में एक देश है—टोगा। 60 हजार आबादी और 269 वर्ग मील क्षेत्रफल। इसके प्राकृतिक दृश्य सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है। पर्यटकों से इस देश को अच्छी आमदनी होती है।
छोटों को भी जीने का अधिकार है और बड़ा से लड़ने में असमर्थ होते हुए भी अपना अस्तित्व बचाये हुये ही नहीं वरन् फल−फूल भी रहे है, इसका एक उदाहरण संसार में छोटे देश भी समझे जा सकते हैं। संसार में कुछ देश इतने छोटे हैं जो क्षेत्रफल, जन संख्या, आर्थिक स्थिति एवं सैन्य बल की दृष्टि से अत्यन्त तुच्छ हैं। उन्हें कोई बड़ा देश पलक मारते निगल सकता है पर वैसा होता नहीं है—हो नहीं सकता। आखिर छोटे भी तो दुनियाँ में रहेंगे ही।
ब्रह्म एक है। उस एक को ही विद्वानों ने अनेक रूपों में वर्णित तथा चित्रित किया है। देवताओं की आकृति−प्रकृति, आयुध, वाहन आदि अनेकानेक प्रकार के दृष्टिगोचर होते है और लगता है, इतना ही नहीं वे परंपरा विरोधी एवं प्रतिस्पर्धी भी हैं। इस प्रकार की मान्यता सर्वथा भ्रामक है। तथ्य यह है कि परब्रह्म की विविध शक्ति यों को अलग−अलग नाम रूप देकर उन्हें साधकों की रुचि के अनुरूप विनिर्मित किया गया है। साधना में ध्यान का स्थान प्रमुख है। ध्यान के लिए आकृति चाहिए। निराकार ब्रह्म को इसी प्रयोजन के लिए साकार रूप में प्रस्तुत किया गया है। नामों और रूपों की भिन्नता वाला देव प्रकरण साधकों की सुविधा भर के लिए है उससे एक ब्रह्म की सत्ता को चुनौती नहीं दी जाती और न बहु−देव बाद को उससे प्रतिपादन होता है।
“साधकानाँ हितार्थाय ब्रह्मणो रूप कल्पना।”
साधकों का साधना प्रयोजन पूरा करने के लिए भगवान के रूप की कल्पना गढ़ी गई।
देवताओं की आकृति−प्रकृति में साधकों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण शिक्षाएँ तथा प्रेरणाएँ प्रस्तुत की गई हैं ताकि ध्यान धारणा का प्रयोजन पूरा करते हुए साधक उस देव आकृति के सहारे अपने लिए उपयुक्त प्रकाश एवं प्रेरणा भी प्राप्त करता रह सके।
उदाहरण के लिए भगवान शंकर की प्रतिमा पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि अलंकार रूप से ऐसे अगणित तथ्य उस आकृति में जोड़े गये हैं जिन पर ध्यान देने वाला शिव उपासक निरन्तर आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ता रह सकता है। कहना न होगा कि उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य में ही उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
शिवलिंग शैव मन्दिरों में सर्वत्र स्थापित है। वैष्णव सम्प्रदाय में उसे शालिग्राम के रूप में माना गया है। दोनों ही लिंग, हस्त, पाद चक्षु, कर्णदि विहीन−स्त्री−पुरुषादि भेद विनियुक्त और विशेष भाव विनियुक्त है। उपासना−ग्रन्थों में इन दोनों ही ब्रह्म लिंगों के लिए लगभग समान विशेषणों का प्रयोग हुआ है। शिर, वक्ष, हस्तपादादि विहीन−चक्षु, कर्णदि सर्वेन्द्रिय विवर्जित, निर्विशेष दण्डाकृति के रूप में उन्हें मान्यता दी गई है।
यह शिवलिंग या शालिग्राम गोलाकार ब्रह्माँड का प्रतीक है। यह समस्त संसार ही ब्रह्म है। यह गोल पाषाण से बनी शिवलिंग प्रतिमा का संकेत है। विश्व−सेवा ही शिव अथवा विष्णु की सच्ची भक्ति है। लोकमंगल के लिए किये गये प्रयासों में उपासना का सारा तत्व−ज्ञान भरा पड़ा है।
भगवान शिव के मस्तक में से गंगा का प्रवाहित होना उत्कृष्ट विचार धारा का प्रवाह संकेत है। ललाट पर चन्द्रमा का धारण शान्ति और सन्तुलन से मनःसंस्थान को भरे रहने की बात को इंगित करना है। तीसरा नेत्र विवेक का नेत्र है। सामान्य मनुष्य चर्म चक्षुओं से तात्कालिक लाभ ही देखते हैं और आज की क्षणिक लिप्सा के लिए भविष्य को अन्धकारमय बनाते हैं। तीसरा विवेक नेत्र दूरगामी परिणामों को देखता है और उपलब्ध भविष्य की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान की रीति−नीति निर्धारित करता है। शिव भक्ति करने के पीछे यह प्रेरणा है कि हमारे मस्तिष्क में से ज्ञान गंगा प्रवाहित होती रहे। परिस्थितियाँ उद्विग्न एवं असन्तुलित न करें। चन्द्रमा जैसा धवल और प्रकाशपूर्ण हमारा दृष्टिकोण हो। हम दूरदर्शी बनें और तीसरे नेत्र से वह देखें जो सर्व साधारण को दिखाई नहीं पड़ता। भविष्य निर्माण हमारा लक्ष्य हो उसके लिए आज की सुख−सुविधा छोड़ कर यदि तपस्वी, संयमी और परमार्थी रीति−नीति अपनानी पड़े तो संकोच न करें। शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म किया था। विवेक दृष्टि के जागरण पर कुविचार सहज ही नष्ट हो सकता है। इस तथ्य को कोई भी विचारशील व्यक्ति अपने जीवन−क्रम में घटित कर सकता है।
श्मशान में निवास, चिताभस्म का शरीर पर लेपन, मुण्डमाला धारण का प्रयोजन, मृत्यु का स्वागत एवं सहगमन है। जन्म और मरण दोनों ही जीवन संकट के दो पहिये हैं। जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी हुई है। जो आज जन्मा है, उसे कल मरना ही पड़ेगा। यदि इस तथ्य को भली भाँति हृदयंगम किया जा सके तो प्रत्येक साँस को बहुमूल्य सम्पदा समझ कर उसके सदुपयोग की आतुरता एवं सतर्क ता बनी रह सकती है। कुकर्म और कू मार्ग से बचा जा सकता और मिथ्या अहंकार से छुटकारा मिल सकता है। मृत्यु का स्मरण जितना गहरा रहेगा, उतने ही जीवन को सफल बनाने वाले−पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाले प्रयास तीव्र होंगे। आलस्य और प्रमाद के लिए गुंजाइश नहीं रहेगी। मृत्यु को शिर पर खड़ी देख कर आवश्यक काम निपटाने की जल्दी होना स्वाभाविक है। विचार करने पर जीवन लक्ष्य की पूर्ति—आत्म−कल्याण की साधना ही जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता समझी जा सकती है।
भूत−प्रेतों की सेना साथ रहने का अलंकार भी इसी दृष्टि से है कि मरणोपरान्त भगवान से ही पाला पड़ेगा। शिव, भूतों−प्रेतों को—पतित, दुखी और असमर्थों को भी साथ लेकर चलते हैं। शिव भक्त की उदारता भी पिछड़े और पतित लोगों को स्नेह देने एवं ऊपर उठाने की होनी चाहिए।
शिव द्वारा विष को कंठ में धारण करने का अर्थ है अवाँछनीयता को न तो पचाना और न उगलना वरन् ऐसे स्थल पर दबा देना जहाँ से अपने ऊपर तथा दूसरों पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े। जीवन में कितने ही अवाँछनीय व्यक्ति तथा घटना क्रम ऐसे आते हैं। जिनकी प्रतिक्रिया को यदि पेट में रखे रहें तो घृणा, द्वेष से अपना नाश होता है और यदि प्रतिशोधात्मक उग्र रूप धारण किया जाय तो सुधार के साथ नया विग्रह उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में उबलते दूध की तरह न उगलते ही बनता है न पीते ही। शिव ने मध्यवर्ती मार्ग अपनाया और उसे अधर में लटका दिया, कंठ में भर लिया। विश्व पर छाई विषाक्त विभीषिकाओं को अपने ऊपर ओढ़ कर सज्जन स्वयं तो कष्ट उठाते और कुरूप बनते हैं पर लोकहित को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसी विपत्ति ओढ़ने में भी हिचक नहीं होती।
इस रहस्य का और अधिक स्पष्टीकरण भगवान शिव न स्वयं किया है। शिव पुराण में क था आती है कि समुद्र मंथन से उत्पन्न विष पीकर जब भगवान एकान्त गुफा में चले गये तो देवता उनके इस प्रबल पुरुषार्थ की प्रशंसा करने पहुँचे। स्तुति सुन कर शिव ने कहा—स्थूल विष को पचा कर मैंने कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया। वास्तविक प्रशंसा का पात्र तो वह है जो संसार सागर के मंथन से उत्पन्न अनेकानेक विषों को पचा जाता है। और उनसे अप्रभावित बना रहता है।
शिव के कंठ में, भुजाओं में, कन्धे पर सर्प लिपटे हुए हैं। वे सर्पों से प्रभावित नहीं होते वे उन्हें काटते नहीं वरन् उनके संपर्क में आकर सर्प ही अपनी विषैली प्रकृति छोड़ देते हैं और स्नेह का बदला सौजन्य में देते हैं। शिव साधक की जीवन नीति यही होती है, वह विषैले सर्पों से भी द्वेष नहीं करता—उन्हें भी गले लगाता है। उनके शरीर को मारने की अपेक्षा प्रकृति को बदल देता है। यही दृष्टिकोण द्वेष, दुर्भाग्य के निराकरण का स्थायी हल है। द्वेष और दमन की आतंकवादी नीति भी कभी−कभी अपनानी पड़ सकती है पर वह स्थाई हल नहीं है। चिन्तन विजय तो स्नेहासिक्त सद्भावनाओं की ही होती है। शिव शरीर पर सर्पों के लिपटे रहने के पीछे यही प्रतिपादन है।
शिव के प्रिय आहार में एक सम्मिलित है—माँग। भंग अर्थात् विच्छेद−विनाश। माया और जीव की एकता को भंग अज्ञान आवरण का भंग, संकीर्ण स्वार्थपरता का भंग, कषाय−कल्मषों का भंग। यही है शिव का रुचिर आहार। जहाँ शिव की कृपा होगी वहाँ अन्धकार भरी निशा भंग हो रही होगी और कल्याणकारक अरुणोदय का पुण्य दर्शन मिल रहा होगा।
शिव को पशु−पति कहा गया है। पशुत्व की परिधि में आने वाली दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का नियन्त्रण करना पशुपति का काम है। नर पशु के रूप में रह रहा जीव जब कल्याण कर्ता शिव की शरण में जाता है तो सहज ही पशुता का निराकरण हो जाता है और क्रमशः मनुष्यत्व और देवत्व विकसित होने लगता है।
शिव का वाहन है—वृषभ। वृषभ को धर्म का प्रतीक माना गया है। पुराणों में इस वृषभ के चार पैर बताये गये हैं (1) सत्य (2)प्रेम (3) विवेक (4)संयम। धर्म रूप वृषभ इन्हीं के सहारे खड़ा होता और चलता है। शिव का वाहन यह धर्म वृषभ ही है। सौम्य किन्तु पराक्रमी सत्ता का प्रतीक यह बैल है जिस पर सवार होकर शिव का अवतार होता है।
महामृत्युँजय मन्त्र में शिव को त्र्यम्बक और सुगन्धि पुष्टि वर्धकम् कहा गया है। अम्बक अर्थात् त्रिवर्ग। संयम विवेक दान को त्रिवर्ग कहते हैं। ज्ञान,कर्म और भक्ति भी त्र्यम्बक है। इस त्रिवर्ग कहते हैं। इस त्रिवर्ग को अपना कर मनुष्य का व्यक्तित्व प्रत्येक दृष्टि से परिपुष्ट व परिपक्व होता है। उसकी समर्थता और सम्पन्नता बढ़ती है। साथ ही श्रद्धा, सम्मान भरा सहयोग उपलब्ध करने वाली यशस्वी उपलब्धियाँ भी करतलगत होती हैं। यही सुगन्ध हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का प्रतिफल यश और बल के रूप में प्राप्त होता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। इसी रहस्य का उद्घाटन महामृत्युञ्जय मन्त्र में विस्तार पूर्वक किया गया है।
शिव प्रतिमा के किसी भी पक्ष पर विचार करें, उसमें आत्मा को ऊँचा उठाने वाला प्रेरक प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा है। शिव भक्ति के साथ−साथ शिव प्रेरणाओं को व्यावहारिक जीवन में स्थान देने की तत्परता बरत जाय तो निस्संदेह हमारा वही कल्याण हो सकता है जिसका शिव एवं शंकर नाम के अर्थ में संकेत है।
शिव प्रतिमा की तरह ही अन्य देवताओं की आकृति, प्रकृति, वाहन, आयुध परिधान में भी ऐसे ही मार्मिक रहस्य छिपे पड़े हैं। जिनका थोड़ा सा प्रकाश भी हमारा आध्यात्मिक काया−कल्प कर सकता है। देव भक्ति के साथ−साथ हमें उन्हीं प्रेरणाओं को ग्रहण करना चाहिए। बहुदेववाद के जंगल में न फँस कर हम यदि देव प्रतिमाओं के माध्यम से उपयोगी प्रेरणाएँ ग्रहण कर सकें तो देव परिवार की संरचना का शास्त्र प्रयोजन सही रूप से पूरा हो सकता है।
दार्शनिक हिक्री उन दिनों तवा में रहते थे। कई लोग उलझी ग्रन्थियाँ सुलझाने सम्बन्धी परामर्श करने आते।
एक दिन एक व्यक्ति अपनी पत्नी समेत उनके पास पहुँचा और उसकी आलस तथा कंजूसी की बुराई करने लगा। सचमुच यह दोनों उसमें थी भी।
हिक्री ने उस औरत स्नेहपूर्वक पास बुलाया। एक हाथ की मुट्ठी बाँध कर उसके सामने की ओर पूछा यदि यह ऐसे ही सदा रहा करे तो क्या परिणाम होगा, बताओ तो, लड़की।
औरत सिटपिटाई तो पर हिम्मत समेट कर बोली—यदि सदा यह मुट्ठी ऐसी ही बँधी रही तो हाथ अकड़ कर निकम्मा हो जायगा।
हिक्री इस उत्तर को सुन कर बहुत प्रसन्न हुए और दूसरे हाथ की हथेली बिलकुल खुली रख कर फिर पूछा यदि यह हाथ ऐसे ही खुला रहे तो फिर इस हाथ का क्या हस्र होगा, जरा बताओ तो। औरत ने कहा—ऐसी हालत में यह भी अकड़ कर बेकार ही हो जायगा।
हिक्री ने उस औरत की भरपूर प्रशंसा की और कहा—यह तो बुद्धिमान भी है और दूरदर्शी भी। मुट्ठी बँधी रहने और हाथ सीधा रहने के नुकसान को यह अच्छी तरह जानती है।
पति−पत्नी नमस्कार करके चले गये। औरत रास्ते भर सन्त के प्रश्नों पर बराबर गौर करती रही और उसने घर जाकर पति की सहायता करके अधिक कमाना और उस बचत को खुले हाथ से दान करना आरम्भ कर दिया।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र प्राचीनकाल में विशुद्ध रूप से आकाश स्थिति ग्रह नक्षत्रों की स्थिति और गति जानने तक सीमित था। ग्रहों की स्थिति का प्रभाव पृथ्वी के मौसम पर पड़ता है तथा दूसरी प्रकार के सूक्ष्म प्रभाव भी आते रहते हैं। इनसे लाभान्वित होने अथवा हानि से बचने का लाभ उठाया जा सकता है, इसी दृष्टि से इस विज्ञान की गहरी खोज−बीन की गई थी।
प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान के वेत्ताओं को यह स्वप्न में भी ध्यान न था कि आगे चलकर इस विज्ञान का उपयोग चतुर लोग फलित ज्योतिष के रूप में करेंगे और लोगों को अन्ध−विश्वास में फँसा कर उनके धन, समय एवं चिन्तन को भारी क्षति पहुँचावेंगे।
प्राचीन आर्ष ज्योतिष ग्रन्थों में आर्य भट्ट द्वारा लिखित ‘आर्य भट्टीय’ और तन्त्र नामक दोनों ग्रन्थों की प्रमाणिकता असंदिग्ध है। बराह मिहिर का पञ्च सिद्धान्तिका ग्रन्थ ही प्राप्य है। ब्रह्म गुप्त की ‘ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त’ तथा ‘खंड खाद्यक’ ग्रन्थ भी उपलब्ध है। भाष्कराचार्य का सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ भी खगोल विद्या सम्बन्धी प्राचीन मान्यताओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।
आर्य भट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त पुस्तक नाम से खगोल विद्या का ग्रन्थ है। उसके प्रथम पाद में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के सिद्धान्त ही समझाये गये हैं। मात्र तीस श्लोकों में दशमलव, वर्ग, वर्गक्षेत्र, वर्गमूल, घनमूल, त्रिभुजाकार शंकु का घनफल जैसी महत्वपूर्ण विषयों की शिक्षा सूत्र में दी गई है। यदि उन्हीं बातों को विस्तार और उदाहरण सहित लिखा गया होता तो वही एक विशाल ग्रन्थ के रूप में दृष्टिगोचर होता। काल−क्रिया पाद में खगोल का वर्णन है। इस प्रकार उसका अन्तिम 50 श्लोकों का अध्याय ‘गोल पाद’ भी अपने विषय का सुसम्बद्ध प्रतिपादन है।
भारतीय ज्योतिष का प्रमुख ग्रन्थ सूर्य सिद्धान्त है। ‘आर्य भट्ट’ नारदेव और ब्रह्म गुप्त ने इसमें अपने−अपने ढंग से संशोधन परिवर्धन किया है। बारह मिहिर की ‘पञ्च सिद्धान्तिका ‘ में पाँच वर्ष का भी युग माना गया है। इससे प्रतीत होता हैं कि उन दिनों भी आज की ही तरह पंचवर्षीय योजनायें विभिन्न क्षेत्रों में बनाई जाती रहती होंगी। पौलिश, रोमक, वाशिष्ठ, सौर और पितामह नामक पाँच सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन बराह मिहिर ने ही किया था। भाष्कर स्वामी रचित ‘महाभाष्करीय’ भी प्राचीन समय के खगोल ज्ञान पर सुविस्तृत प्रकाश डालता है। इसी प्रकार ‘महासिद्धान्त ग्रन्थ’ भी भारतीय−ज्योतिष का प्रामाणिक ग्रन्थ है। सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के यन्त्राध्याय में गोल, नाड़ी बलय, याष्टि, शंकुघटी, चक्र, चाप, तुर्यफलक, प्रभृति ऐसे यन्त्रों का वर्णन है, जिसके आधार पर खगोल विद्या की आवश्यक जानकारी को क्रमबद्ध किया जाता था। जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह ने इस संदर्भ में अधिक दिलचस्पी दिखाई उन्होंने जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा की वेधशालायें बनवाई। ‘टालसी के सिनटैविसस’ ग्रन्थ से जयसिंह जी बहुत प्रभावित थे, उन्होंने डलूग वेना की ज्योतिष सारणियाँ, प्लैम स्टीड की हिस्टीरिया, सेलेस्टिस ब्रिटेनिका, पुबिलड की ज्योमिति आदि ग्रन्थों का भी विस्तृत अध्ययन किया था। बेधशालाओं में नाड़ी यन्त्र, वक्र यन्त्र, गोल यन्त्र, दिगेश यन्त्र, दक्षिणोदिग्मित्ति, वृत्त षष्ठाँशक, सम्राट यन्त्र, जय यन्त्र, चक्र यन्त्र आदि कतिपय बड़े उपयोगी यन्त्रों का निर्माण कराया।
नक्षत्र विद्या अपने आप में एक स्वतन्त्र विज्ञान है और उसकी मर्यादा भी। इस आधार को तोड़−मरोड़ कर यह ठग विद्या बहुत पीछे गढ़ी गई कि अमुक नाम वाले, अमुक राशि के व्यक्ति पर अमुक ग्रह−नक्षत्र, अमुक अवधि तक भला या बुरा प्रभाव डालता है। आज कल ज्योतिषी लोग इसी बहाने भोली जनता को तरह−तरह से मुड़ते और भ्रम जंजाल में फँसाते हैं। तेजी−मन्दी, वर्षफल, भविष्य कथन, विवाह का विधि−वर्ग, मुहूर्त, उपचार, शुभ−अशुभ समय, हानि−लाभ जैसे मानवी पुरुषार्थ प्रयत्न एवं विवेक से सम्बन्ध रखने वाली दातों को तब फिर ग्रह−नक्षत्रों से वैज्ञानिक ज्योतिष विद्या का निर्भय उपहास ही कहा जायगा।
आक्रमण उतना हानिकारक नहीं जितना उसका आतंक। हिंसा उतनी विघातक नहीं होती, जितनी भय ग्रस्तता। यदि साहस का सम्बल साथ लेकर चला जाय तो वह जटिल स्थिति भी सामान्य जैसी बन जाती है, जिसकी कि चर्चा सुनते ही डरपोक मनुष्यों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आदिवासी, वनवासी घने जंगलों में एक−एक झोंपड़ी अलग−अलग बना कर रहते हैं। उन जंगलों में हिस्र व्याघ्र भरे पड़े होते हैं। किन्तु इन वनवासियों पर उनका कोई आतंक नहीं होता। रात को गहरी नींद सोते हैं। दिन में आहार की तलाश के लिए उन्हीं झाड़ियों को ढूँढ़ते रहते हैं, जिनमें कि इन हिंस्र पशुओं को धराशायी करता है, जब कि उनके परिवार में मुद्दतोवाद ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं, जिनमें किसी सिंह, व्याघ्र ने आदिवासी की जान ली हो।
अफ्रीका के रायल नेशनल पार्क, सारंगेटो नेशनल पार्क, लकमनी आराने पार्क, क्वीन एलजावेथ नेशनल पार्क जैसे सुविस्तृत बन बिहार बनाये गये हैं। जिन्हें देखने के लिए दुनियाँ भर के लोग जाते हैं। इनमें वन्य पशु स्वच्छन्दता और सुविधापूर्वक घूमने और अपना प्राकृतिक जीवन जीते हैं। इनमें सिंहों की संख्या भी काफी है। वे स्वच्छन्द घूमते हैं, साथ ही जहाँ वे रहते हैं, वहीं जेबरा, जिराफ, हिरन आदि भी निर्भयता पूर्वक विचरण करते हैं। वे सिंहों को देख कर सतर्क तो ही जाते हैं पर न तो भागते हैं और न चरना छोड़ते हैं। मिलजुलकर आक्रमण का मुकाबिला करते हैं और कोई चपेट में आ भी जाय तो मौत और जिन्दगी के मिले−जुले क्रम के बीच निर्भयतापूर्वक रहते हुए उन्हें कोई संकोच नहीं होता।
अफ्रीका मसार्क जाति के बनवासी प्राय उन्हीं क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें सिंहो का बाहुल्य है। न केवल वे स्वयं रहते हैं वरन् अपने पालतू पशुओं को भी रखते हैं। भूखे और भरे पेट सिंहों की स्थिति को वे भली प्रकार जानते हैं और तदनुसार अपनी सुरक्षात्मक व्यवस्था को भी ठीक कर लेते हैं। मौत और जिन्दगी ने जिस तरह आपस में समझौता किया हुआ है। उसी तरह बनवासी और हिंस्र पशु भी अपने ढरे से अपना समय गुजारते हैं। भय और आतंकको वे ताक पर उठाकर रख देते हैं।
सरकस के साहसी प्रशिक्षक, किस प्रकार जानवरों को सघाते और उनसे तरह−तरह के खेल कराते हैं यह सभी को विदित है। हिंस्र पशुओं को पालने और उन्हें सामान्य पशुओं की तरह रहने के लिए अभ्यस्त करने में अधिक सफलता मिलती जा रही है। ऐसे एक नहीं अनेक प्रयोग सामने आते रहते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि हिंसात्मक प्रकृ ति को बदल कर उसे सौम्य स्तर का बनाया जा सकता है।
भेड़िये प्राकृतिक हिंस्र जन्तुओं की बिरादरी में अधिक खूंखार माने जाते हैं। छोटा सो खोटा वाली उक्ति भेड़ियों पर अधिक सही रूप से लागू होती है। उसकी क्रूरता ही नहीं, दुष्टता भी अपने ढंग की अनोखी होती है। इसलिए चिड़िया घरों के पशु−पालकों से लेकर—जंगल में रहने वाले किसानों से लेकर शिकारियों तक को इनके बारे में बड़ी सतर्कता बरतनी पड़ती है। वे कभी भी कुछ भी कर सकते हैं। हिंस्र पशु विशेषज्ञ विलियम वायरन मोवरी ने लिखा है—भेड़िया पालने की बात किसी को नहीं सोचनी चाहिए। बचपन में भेड़िया पालतू रह सकता है, पर बड़ा होने पर वह दुष्ट आक्रमणकारी बन कर अपने पालनकर्ता की ही खबर ले सकता है।
जेरम हैलयुथ को कुत्ते पालने का शौक था। उनने अलास्किन जाति के शिकारी कुत्ते पाल रखे थे। उनकी पत्नी एलन ही नहीं—बच्चे भी इन्हें पालने में रुचि लेते थे।
हैलयुथ का मस्तिष्क बहुत समय यह सोचने में लगा रहा कि प्यार की जंजीर में जब इन खूँखार कुत्तों को बाँधा जा सकता है तो लगभग उसी जाति से मिलते−जुलते भेड़िये क्यों नहीं पल सकते? इस प्रश्न का समाधान उनने भेड़िया पाल कर ही प्राप्त करने का निश्चय किया।
भेड़िये का बच्चा प्राप्त करने के लिए उन्होंने टकोसा चिड़ियाघर से संपर्क स्थापित किया और वहाँ के अधिकारियों से मिल कर यह सफलता प्राप्त करली कि अगले दिनों जब मादा प्रसव करेगी, तब एक बच्चा उन्हें मिल जायगा। नियत समय पर एक बच्चा उन्हें मिल भी गया। नाम रखा गया ‘कु नू’।
यह नवजात शिशु मात्र छै इंच की थी। पालना एक समस्या थी, फिर भी उसे जीवित रखने में सफलता प्राप्त कर ली गई। हैलयुथ की पत्नी और उनकी चारों बच्चियों ने इस नये अतिथि के पालन में उत्साहपूर्वक सहायता की और वह पल भी गया। ‘कुनू’ नर नहीं मादा थी।
कुत्तों के साथ उसकी दोस्ती हो गई। खासतौर से डेरियन कुतिया के साथ तो उसकी इतनी घनिष्टता हो गई मानों वे दोनों माँ−बेटी ही हैं। यह जन्म के समय छै इंच की थी पर एक वर्ष में बढ़ कर 5 फुट लम्बी और 75 पौंड भारी हो गई। एक वक्त में वह प्रायः डेढ़ पौंड खाना खाती।
बड़े होने पर उसमें भेड़ियों की दुष्टता के कुछ लक्षण उभरे तो पर पालक ने पूरी सतर्कता से काम लिया और प्रकृति प्रदत्त क्रूरता भुलाने एवं अन्य कुत्तों की तरह के लिए लगातार शिक्षा दी। उसे वैसा ही वातावरण दिया जैसा कि अन्य पालतू कुत्तों को उपलब्ध था। फलतः वह उन्हीं के साथ घुल गई और कुत्तों की बिरादरी में पूरी तरह सम्मिलित हो कर उन्हीं के आचरण करने लगी।
दुष्टता की किम्बदन्तियों को ‘कुनू’ ने झुठला दिया और एक नये तथ्य का प्रतिपादन किया कि भेड़िये दूसरे हिंस्र जानवरों की तुलना में अधिक स्नेहिल होते हैं। उसे प्यार करने की प्रकृति भी जन्मजात रूप से ही मिली थी। भेड़िये एक दूसरे के मुँह में मुँह डालकर प्यार करते हैं। कुनू का वास्ता मनुष्यों से पड़ता था सो वह उनकी बाँहों तथा पैरों को मुँह में रख कर चूमने जैसा आचरण करती। घर की बच्चियाँ इसकी प्रतीक्षा करती रहती थीं कि कुनू उसे कब और कितनी देर चूमेगी, उन्हें इसमें बड़ा आनन्द आता। कभी−कभी कुनू की चूमने की आकांक्षा इतनी तीव्र होती कि घर आने वाले आगन्तुकों के साथ भी वह उसी खेल को खेलती। आगन्तुक पहले तो घबराता पर पीछे जब प्रतीत होता कि खूंखार भेड़िये भी इतने स्नेहिल हो सकते हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहता।
अहमदाबाद के प्राणी संग्रहालय की अफसर ज्योतिवेन मेहता ने व्यक्ति गत रूप से आक्रमणकारी पशुओं में दिलचस्पी ली है और उन्हें अधिक मृदुल, वफादार एवं सहयोगी बनाने में सफलता प्राप्त की है। उनका कहना है—आत्म−विश्वास, निर्भयता, प्रेम एवं सहानुभूति की समुचित मात्रा यदि अपने पास हो तो हिंस्र जन्तुओं को आसानी से मृदुल एवं वफादार बनाया जा सकता है।
ज्योतिवेन ने एक बाघ का बच्चा ‘राजू’ बड़े लाड़−प्यार से पाला, वह उनसे बहुत घुलमिल गया। जंजीर में पकड़ कर वे उसे खुले हुए सार्वजनिक पार्क में घुमाने भी ले जाती थीं। दो वर्ष का होने तक उसका व्यवहार बहुत ही सज्जनतापूर्ण रहा। वे उसे गोदी में उठा कर अकसर खिलाती थीं, एक बार भारतीय चित्र वृत्त विभाग के द्वारा डाक्यूमेन्टरी फिल्म ली जानी थी, जिसमें वे बाघ को गोदी लेकर चित्र खिंचवाती। यह शूटिंग खुले में हो रहा था। दर्शकों की भीड़ बहुत थी। अचानक बाघ भड़क उठा और उनकी जाँघ में ही दाँत गढ़ा दिया, खून से लथपथ होते हुए भी उन्होंने राजू को गोद में लेकर तस्वीर तो खिंचवाई पर वे इस तथ्य को और भी अधिक गहराई से समझने लगी कि हिंस्र पशुओं की स्नेहशीलता को ही नहीं उनकी तुनक मिजाजी को भी ध्यान में रखा जाय।
पशुओं, में बुद्धिमत्ता की एक मात्रा मानी जाती है, इसलिए यह सोचा जा सकता है कि पालतू पशुओं की तरह हिंस्र पशुओं को भी अथक परिश्रम करके सधाया या सुधारा जा सकता है। पर सर्प जैसे कीड़ा को क्या कहा जाय, जिसमें समझदारी का नाम भी नहीं होता। दुनियाँ में ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने सर्पों के न केवल विष दन्त चुभोने की क्रूर प्रकृति को बदला है वरन् उन्हें कलात्मक नृत्य सिखा कर दर्शकों को मुग्ध करने जैसे कठिन कार्य के लिए प्रशिक्षित किया है।
इंग्लैंड की सर्प सुन्दरी सान्या के सर्प नृत्यों की इन दिनों यूरोप और अमेरिका में धूम है और जहाँ भी उसके प्रदर्शन होते हैं, दर्शकों को जगह मिलना कठिन हो जाता है।
यह महिला आरम्भ में साधारण नर्तकी थी, पीछे उसने सर्पों को अपना सहचर बनाने का निश्चय किया। अजगर−कोबरा, तथा दूसरी विषधर जातियों के सर्प पाले। उनकी प्रकृति समझी, दोस्ती बढ़ाई और स्थिति यहाँ तक उत्पन्न कर ली कि वे उसके साथ−साथ रंगमंच पर घंटों नृत्य कर सके। जब यह नाचती है तो वे पालतू विषधर मात्र उपकरण नहीं बने रहते वरन् नृत्य की ताल और मुद्रा का ध्यान रखते हुए स्वयं भी नृत्य निरत अभिनेता होने का परिचय देते हैं। दर्शक यह देख कर मुग्ध हो जाते हैं कि नृत्य में सर्प भी किस प्रकार सहभागीदारी का आश्चर्यजनक एवं नपा तुला पार्ट अदा करते हैं।
सर्प सुन्दरी सान्या ने जहाँ अपने सर्प नृत्यों से विपुल सम्पत्ति एवं ख्याति अर्जित की है, वहाँ इस तथ्य का भी प्रतिपादन किया है कि क्रोधी और पुष्ट समझा जाने वाला यह विषधर स्नेह सौजन्य की कोमल रज्जु में बँधने के लिए किस तरह स्वेच्छापूर्वक तैयार हो जाता है।
हमें देर−सबेर में इस निष्कर्ष पर पहुँचना ही होगा कि अनगढ़ क्रूरता को सदाशयता पूर्ण सत्प्रयत्नों से बदला और सुधारा जा सकता है। इसमें कितना श्रम और समय लगेगा, कितने साहस और धैर्य का परिचय देना पड़ेगा, यह बात दूसरी है।
साधना विज्ञान में ध्यानयोग को प्रमुखता दी गई है। बिखरी शक्ति यों का केन्द्रीकरण एकाग्रता से होता है। आतिशी शीशे की सहायता से फैली हुई सूर्य किरणों को जब एक के न्द्र बिन्दु पर इकट्ठी कर देते हैं, तो वहाँ आग जलने लगती है। मस्तिष्कीय ऊर्जा के बिखराव को एक दिशा विशेष में केन्द्रित करने की साधना क र ली जाय तो शक्ति के बिखराव को समेट कर एक प्रयोजन में लगाने से आशाजनक सफलता मिला सकती हैं। बिखरी हुई बारूद में आग लगाने से वह भक् से जल जायगी पर उसे बन्दूक की नली द्वारा केन्द्रित करके एक दिशा विशेष में फेंका जाय तो उसका प्रहार असहनीय बन जाता है। मस्तिष्कीय ऊर्जा को के न्द्र−विशेष पर इकट्ठा करना और उसे दिशा−विशेष में लगा देना यही है ध्यान का प्रमुख उद्देश्य।
साँसारिक सफलताएँ भी इस ध्यान धारणा के आधार पर मिलती हैं। मन लगा कर पढ़ने वाले छात्र अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। कवि, लेखक, चित्नकार, कलाकार, वैज्ञानिक, वकील आदि बुद्धि−जीवी वर्ग के लोगों की प्रगति का आधार उनकी एकाग्र साधना ही होती है। शरीर से किये जाने वाले कामों की सुन्दरता और सफलता मात्र श्रम पर आधारित नहीं होती, उसमें भी मनोयोग की संलग्नता आवश्यक होती है। यह मनोयोग और कुछ नहीं ध्यान का के केंद्रीकरण ही है। कोई व्यापारी, अध्यापक, शिल्पी अथवा श्रमिक, इस प्रयोग के बिना अपने काम में न तो कुशल हो सकता है और न सफल।
आध्यात्मिक साधनाओं में ध्यान को इसलिए अग्रणी माना गया है कि ईश्वर प्राप्ति और आत्म−कल्याण जैसे महान प्रयोजनों के लिए भी तन्मयता एवं तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। स्नेह, ममत्व और श्रद्धा, विश्वास के केन्द्रीकरण का नाम ही भक्ति−भावना है। मस्तिष्क को पूरी तरह समेट कर जीवन रहस्यों का विश्लेषण किया जाय तो ही वह ज्ञान प्राप्त होता है जो सद्ज्ञान एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा का जागरण करने के लिए आवश्यक है। अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने के लिए—आत्मा को परमात्मा में जोड़ देने के लिए योग−साधना की जाती है। यह प्रक्रिया या तभी सम्भव होती है, जब चिन्तन को प्रखर और केन्द्रीभूत बना कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रतापूर्वक प्रयुक्त किया जाय। ध्यान इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसलिए प्रायः सभी साधना मार्गों में ध्यान को प्रधानता दी गई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होना कठिन है।
छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय के छठे और सातवें खण्ड में ध्यानयोग को उपासना की उच्च कक्षा बताया गया है। महर्षि सनत्कुमार जिज्ञासु नारद का समाधान करते हुए कहते हैं—
‘बाग्वाव नाम्नी भूयसी।’
अर्थात्—नामोच्चार से वाक् बढ़ कर है।
‘मनो बाववाचोभूयो।’ अर्थात्−वाक् से भी बढ़ कर मन है।
‘संकल्पो वाव मनसी भूयान्।’
अर्थात्−मन से बढ़ कर संकल्प है।
‘चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो।’
अर्थात् चित्त संकल्प से भी बढ़ कर है
‘ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो।’
अर्थात्−चित्त से भी बढ़कर ध्यान है।
इस प्रतिपादन में इस तथ्य को इंगित किया गया है कि उपासना क्षेत्र में ध्यान साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
नाम, जप, वाक, संयम, मनोनिग्रह, संकल्पोद्भव, चित्त निरोध, यह सब उपासना की क्रमिक भूमिकाएँ हैं और इन सबसे ऊपर ध्यान है। ध्यान की शक्ति और सामर्थ्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए महर्षि सनत्कुमार जिज्ञासु नारद को फिर समझाते हैं।
‘ध्यायतीव पृथ्वी।’
अर्थात्−पृथ्वी ध्यानरत है।’
‘ध्यायतीवान्तरिक्षं।’
अर्थात्−अन्तरिक्ष ध्यान मग्न है।
‘ध्यायतीव द्यौः।’
अर्थात्−द्युलोक ध्यान में निरत है।
‘ध्यायन्तीवापो।’
अर्थात्−जल ध्यान में संलग्न है।
‘ध्यायन्तीव पर्वता।’
अर्थात्−पर्वत ध्यान करते हैं।
‘ध्यायन्तीव देवाः।’
अर्थात्−देवता ध्यान करते हैं।
‘ध्यायन्तीव मनुष्याः।’
अर्थात्−मनुष्य भी ध्यान में निरत हैं।
ध्यान में सन्निहित एकाग्रता की शक्ति का ही इन प्रतिवादनों में उल्लेख है। बिखरे हुए विचार और अस्त−व्यस्त मनःस्तर कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं होते। बिखरा मन एक प्रकार से विक्षिप्तता का ही परिचायक है। दिशा−विहीन स्थिति और अव्यवस्थित क्रम अपना कर तो जड़−चेतना किसी का काम नहीं चल सकता। व्यवस्था और एकाग्रता एक दूसरे पर आश्रित है। शक्ति चाहे कितनी ही बड़ी−चढ़ी क्यों न हो, उसका चमत्कार एकाग्रता के केन्द्रीकरण में ही उत्पन्न होता है। इसलिए विज्ञ व्यक्ति अपने जीवन क्रम में एकाग्रता की ध्यान साधना पर समुचित ध्यान देते हैं। इसके विपरीत दुर्गति में गिरने वाले लोग अपनी वृत्तियों को निरर्थक और अनर्थ मूलक दुष्प्रवृत्तियों में बखेरते और नष्ट करते रहते हैं। महर्षि सनत्कुमार आगे फिर कहते हैं—
येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिन स्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्ति।
अर्थात् नीच प्रकृति के लोग कलहकारी, बकवादी, निन्दा, चुगली में आपनी सामर्थ्य को बखेरते हैं किन्तु जो विवेकवान् हैं, वे ध्यान को अपनाते हैं और उसका लाभ उठाते हैं।
यह सब समझाने के उपरान्त जिज्ञासु नारद को सनत्कुमार ने स्पष्ट शब्दों में एक ही उपासना का निर्देश करते हुए कहा—’ध्यानमुपास्थिति’ अर्थात् तुम ध्यान की उपासना में लग जाओ।
ध्यान के दो वर्ग हैं, एक आत्म−शोधन दूसरा प्रभु समर्पण। आत्म−शोधन में अपने आप को शरीर से, प्रवृत्तियों से ऊपर साक्षी दृष्टा माना जाता है। आत्म−निरीक्षण, आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की योजना बद्ध रीति−नीति का निर्धारण ध्यान योग का एक महत्वपूर्ण विषय है। अपने को दोष, दुर्गुणों से रहित, पवित्र और उत्कृष्ट स्तर का मानने तथा उसके लिए प्रबल प्रयास करने का प्रचण्ड संकल्प उभारना ध्यान योग के अंतर्गत ही आता है।
ध्यानं निर्विषयं मनः। साँख्य दर्शन
मन का विषय विकारों से रहित होना ध्यान है।
रागोपहन्तिर्ध्यानम्।
रागो का निराकरण ही ध्यान है।
ध्यान का दूसरा वर्ग है, प्रभुपरायणता। ईश्वर को आत्म समर्पण जीव और ब्रह्म की सत्ता का सान्निध्य और एकीकरण। इसके लिए ब्रह्म का कई रूपों में चिन्तन करने और उसके साथ तादात्म्य होने की प्रक्रिया प्रचलित है। भगवान के किसी भी रूप का ध्यान करते हुए उसको अपनी सघन आत्मीयता का आरोपण साकार ध्यान साधना कहा जाता है।
उपनिषद् ने ध्यान को साक्षात ब्रह्म ही माना है और कहाँ है—इष्ट की तादात्म्यता आत्मा की पवित्रता और सक्षमता को विकसित करते हुए उसे ब्रह्म−स्तर तक ही पहुँचा देती है।
सयोध्यान ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् ध्यानस्य गतं तत्रास्यय यथा कामाचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते ऽस्ति।
—छान्दोग्योपनिषद् 7।6।2
अर्थात्−जो यह मान कर उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है।’ उसके ध्यान की गति इतनी विस्तृत हो जाती है जितनी कि ब्रह्म की।
निराकार साधना में सविता−देवता का−ज्योति पुञ्ज प्राणी की काया को भी ध्यान केन्द्र नियत किया जा सकता है।
किसी गुण विशेष के सिद्धान्त, स्वरूप, अभ्यास एवं परिणाम को लेकर भी चिन्तन को देर तक सीमित किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता जैसे गुणों की व्याख्या, प्रयोग, पद्धति एवं प्रतिक्रिया के अनेक पक्ष हो सकते हैं और उन सब पर क्रमशः विचार करते हुए देर तक मन को उसी परिधि में प्रतिबन्धित रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
ऊपर की पंक्ति यों में आत्म−शोधन की साधना का उल्लेख हुआ। उसमें ईश्वर का समावेश आवश्यक नहीं। गुलाब आदि किसी भौतिक आधार को भी माध्यम बनाया जा सकता है पर प्रभु समर्पण स्तर की जब साधना करनी हो तो फिर भक्त के अस्तित्व को भगवान की सत्ता में समर्पित में होने का ध्यान ही करना पड़ेगा।
परमेश्वर का विराट् रूप भी ध्यान के लिए उपयुक्त प्रकार है। स्वर्ग उसका शीर्ष, पृथ्वी उसके पाद, दिशाएँ हाथ, सूर्य चन्द्र नेत्र, वायु श्वास, अग्नि पाचन, धर्म हृदय, वनस्पति केश, पर्वत अस्थियाँ, नदियाँ नाड़ियाँ, समुद्र मूत्राशय जैसी कल्पना विराट् ब्रह्म की की जा सकती है और उन क्षेत्रों के प्रस्तुत दृश्यों में मन को उलझाये रहा जा सकता है।
इस विराट ब्रह्म का एक क्षुद्रतम घटक ही अपना ‘अहम्’ है। अपनी सत्ता ब्रह्म सत्ता की ही एक इकाई है। व्यक्ति का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह समष्टि का ही एक कण है। हमें विराट् ब्रह्म के लिए—विश्व मानव के लिए ही अपने अस्तित्व का समर्पण करते हुए जीवन−यापन करना चाहिए। यही निष्कर्ष विराट् ब्रह्म का ध्यान−धारणा का है।
आत्मा को शरीर से भिन्न सत् चित आनन्द स्वरूप मानना शरीर और आत्मा की भिन्नता की गहराई से अनुभूति करना और मात्र शरीर के सुख−साधन जुटाने में ही निमग्न न रह कर आत्मकल्याण के लिए उत्साह जगाना भी ध्यान प्रक्रिया का एक प्रयोजन है।
मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मेरा नहीं है। शरीर के साथ जुड़ा हुआ अहम् भाव मिथ्या है। शरीर और सम्पत्ति की दृष्टि से मेरा पन निरर्थक है। यह जड़−पदार्थ मुझसे भिन्न है। मैं सत् चित आनन्द का अविनाशी अंश हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते हुए, जब भौतिक अहम् विलीन हो जाय तो समझना चाहिए, मैं और तू से ऊपर उठा हुआ, परब्रह्म परमात्मा उपलब्ध हो गया।
प्राणि जगत तथा पदार्थ मात्र में एक ही चेतन−तत्व भरा है। उस व्यापक चेतना के साथ एकाग्रता करने पर समस्त विश्व−चेतनसत्ता का स्वरूप दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति को भागवत् प्राप्ति कह सकते हैं।
ध्यान योग के आधार पर अन्तः चेतना को विकसित करते हुए मनुष्य अपने को लघु से महान् बना सकता है। जीव से ब्रह्म हो सकता है।
बहुत समय पूर्व जापान के एक जिले के जिलाधीश थे−चाईशेन। उनके हाथ में सरकार ने बहुत सत्ता दे रखी थी।
एक व्यापारी अपना कुछ काम सरकार से निकालना चाहता था। इसके लिए जिलाधीश का सहयोग अपेक्षित था। व्यापारी अशर्फियों की थैली लेकर पहुँचा और बोला—यह भेंट स्वीकार करें, मेरा काम कर दें। इस भेंट की बात कोई भी नहीं जान पायेगा।
चाईशेन ने कहा−यह कैसे हो सकता है कि कोई न जाने। धरती, आसमान, मेरी आत्मा, आपकी आत्मा और परमात्मा पाँच की जानकारी में जो बात आ गई, उस पाप का भेद तो खुल ही गया। कृपा कर अपनी अशर्फियाँ वापिस ले जाइये, अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व को झुठलाना मेरे लिए किसी भी प्रलोभन के बदले सम्भव न हो सकेगा।
शान्ति कुँज सप्तसरोवर हरिद्वार में 20 जनवरी से लेकर 20 मई तक वरिष्ठ और कनिष्ठ वानप्रस्थों के प्रशिक्षण सत्र चलेगा। देश−देशान्तरों में मानवी धर्म और कर्त्तव्य का जागरण करने के लिए—भावनात्मक नवनिर्माण के लिए ऐसे सुयोग्य व्यक्तित्वों की भारी आवश्यकता थी जो अपने ज्ञान, प्रयास एवं चरित्र से लोकमानस को प्रभावित परिवर्तित करने में समर्थ हो सकें। ऐसे भावनाशील व्यक्तित्वों की कमी नहीं थी पर उन्हें समुचित मार्ग दर्शन एवं कार्यक्षेत्र न मिलने के कारण वें मन मसोस कर बैठ जाते थे। वानप्रस्थ सत्र उस अभाव की पूर्ति करेंगे। आशा की जानी चाहिए कि प्रशिक्षित वानप्रस्थ देश−विदेशों के कोने−कोने में जाकर बुद्धकालीन धर्म−चक्र प्रवर्तन की, पूरा करना है और उसके लिए समय निर्धारण मथुरा से पत्र व्यवहार करके निश्चित करना है। बहुतों ने कर भी लिए है। जिनने नहीं किये हैं वे जल्दी ही उस व्यवस्था को अन्तिम रूप से निश्चित करने जा रहें हैं।
हरिद्वार से प्रतिशत वानप्रस्थ इन शिविरों का संचालन करेंगे। साथ ही तीर्थयात्रा की जहाँ व्यवस्था बनेगी, वहाँ उस प्रकार का भी प्रयत्न करेंगे। पाक्षिक युग−निर्माण योजना में इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक चर्चा पिछले अंकों में छाती रही है, जिसके आधार पर पन्द्रह दिवसीय शिविरों पूरी रूप−रेखा भली प्रकार समझा दी गई है। इतना ही महत्वपूर्ण ‘तीर्थयात्रा’ कार्यक्रम भी है। कम से कम पाँच और अधिक से अधिक दस धर्मप्रचारकों की टोली धर्म−विजय की परम्परा को पुनर्जीवित करने की एक ऐतिहासिक पुनरावृत्ति प्रस्तुत करेंगे।
पूरा समय देने वाले वरिष्ठ और थोड़ा समय देने वाले कनिष्ठ वानप्रस्थों को प्राप्त करने के उपरान्त विभिन्न कार्यक्षेत्रों में प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य करने के लिए भेज दिया जायगा। युग−निर्माण शाखा संगठनों ने अपने−अपने यहाँ पन्द्रह−पन्द्रह दिन के नवनिर्माण शिविर चलाने की तैयारियाँ कर ली है। जहाँ अभी निश्चय नहीं हुए हैं वहाँ इसी महीने वह व्यवस्था पूरी कर ली जाने की आशा है, प्रायः सभी समर्थ शाखायें इस वर्ष पन्द्रह दिन के शिविर चलाने की तैयार कर रही है। अप्रैल,मई,जून यह तीन महीने इसी प्रयोजन के लिए निश्चित हैं। हर शाखा को इन्हीं महीनों में अपना शिविर महीने पन्द्रह दिन का कार्यक्रम बनाकर चलें। एक रात्रि को एक गाँव में रहें। वहाँ प्रचार, प्रवचन, यज्ञादि सम्पन्न करे, दूसरे दिन दूसरे गाँव में ठहरे। एक मार्ग से जाकर दूसरे मार्ग से लौटें। इस प्रकार वह धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए सम्पन्न हुई तीर्थयात्रा वही प्रयोजन पूरा करेगी जो भगवान् बुद्ध द्वारा संचालित ‘धर्म विजय’ अभिमान के लिए उनकी मंडली द्वारा किया जाता था। इन प्रयासों के आशातीत सत्परिणाम हम अगले दिनों अपनी आँखों के सामने प्रस्तुत होने की प्रतीक्षा कर सकते हैं।
इसी संदर्भ में एक और भी महत्वपूर्ण पक्ष है—लेखनी। वाणी की तरह उसकी भी आनी उपयोगिता है। वानप्रस्थों को प्रायः वाणी के द्वारा ही वन जागरण का शंख फूंकना पड़ेगा और रचनात्मक गतिविधियों को अग्र गामी बनाना पड़ेगा। सो उचित भी है और आवश्यक भी। प्रत्यक्ष जन–संपर्क की अपनी उपयोगिता है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी और नहीं ही की भी गई है। पर दूसरा ‘लेखनी’ पक्ष भी इससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस आधार को भी आवश्यक बल एवं प्रोत्साहन मिले की आवश्यकता है।
अब तक युग−निर्माण अभियान के सम्बन्ध में जो कलम चलती रही है, वह प्रायः एक ही व्यक्ति की है। दूसरों से भी इस सम्बन्ध में कुछ कराया गया है और कुछ सिखाया गया है पर वह योगदान नगण्य ही रहा है। आन्दोलन के बढ़ते हुए चरण यह माँग करते हैं कि वाणी की तरह ही शक्ति शाली लेखनी को भी युग−परिवर्तन के मोर्चे पर अड़ा कर खड़ा कर दिया जाय। प्रस्तुत पत्र पत्रिकाओं में अपने मिशन की विचार–धारा को लिखते−छपते रहने के काम में अनेकों लेखक जुटे रह सकते हैं। भारत की चौदह मान्य−भाषायें है, सभी में ढेरों पत्रिकायें निकलती हैं। अब तक युग−निर्माण अभियान की चर्चा पत्रों में भी पत्रिकाओं में छपती हैं। हिन्दी के अन्य पत्रों में भी इस महान अभियान की विचारधारा छपनी चाहिए और अन्य भाषाओं में भी उसका अधिकाधिक प्रचार प्रकाशन होना चाहिए। यदि भारत के 7 हजार पत्र−पत्रिकाओं में यह विचारधारा छपने लगे तो जितना जागरण अब तक हुआ है उसकी अपेक्षा सहज ही कई गुना हो सकता है।
इसके अतिरिक्त नव−जागृति का साहित्य प्रकाशित होने की भी आवश्यकता है। इसे अपने देश का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि भावनात्मक नव−निर्माण कर सकने योग्य साहित्य का नितान्त अभाव है। पुस्तक विक्रेताओं की दुकानों की तलाशी ली जाय तो उनमें वैसा कूड़ा−करकट ही भरा पड़ा मिलेगा, जिससे पाठकों के दिमाग में गन्दगी की ही बढ़ोतरी हो सकती है। चूंकि प्रकाशकों का स्वार्थ भ्रष्ट लोक रुचि को प्रोत्साहन देने वाली लोकप्रिय पुस्तकें छापने से ही पूरा होता है। उन्हें बिक्री और लाभ से मतलब है। “जो माँगा जायगा सो प्रस्तुत किया जायेगा।” यह नीति है। यह माँग हितकर है या अहितकर इससे उन्हें कुछ मतलब नहीं। जो साहित्य लिखा, छापा और बेचा जा रहा है, उससे पाठकों का कितना हित और कितना अहित होता है, इसका कभी विचार किया जाय तो पता चलेगा कि हम ज्ञान−देवता के मन्दिर में अज्ञान के असुर की ही पूजा−अर्चा कर रहे हैं। इस विकृत विडम्बना के दुष्परिणाम भी सामने हैं। हमारा भावनात्मक स्तर दिन−दिन पतनोन्मुख होता जा रहा है। इस पतन में अशिक्षित वर्ग की अपेक्षा शिक्षित वर्ग और भी आगे है। अशिक्षित कम घाटे में इसलिए रहते है कि उन्हें विकृत साहित्य से अपने मस्तिष्क को विकृत करने का अभिशाप वहन नहीं करना पड़ता।
अगले दिनों साहित्य क्षेत्र में युग−निर्माण योजना को प्रवेश करना ही है, इसके लिए युग−पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन नई प्रेरक पुस्तकों का निर्माण, सृजनात्मक साहित्य का प्रकाशन, सत्साहित्य का संगठन विक्रय तन्त्र आदि कितने ही महत्वपूर्ण प्रयास अगले दिनों आरम्भ करने होंगे। पचास करोड़ की आबादी के अपने देश और चार सौ करोड़ की आबादी के अपना विश्व को, आज पग−पग पर यह आवश्यकता अनुभव होती है कि मनुष्य को नव−जीवन प्रदान कर सकने वाली चेतना का नया निर्माण होना चाहिए। यह उत्पादन साहित्य के क्षेत्र में ही सम्भव है। साहित्य की विभिन्न धारायें है। उनका सन्तुलित,समन्वित, सुसंगठित, उत्पादन, उत्थापन किया जाय तो कोई कारण नहीं कि विश्व−मानव की विचारणाओं और भावनाओं को परिष्कृत स्तर ऊँचा उठाने के लिए विवश न किया जा सके।
इस दिशा में वही प्रयास करना पड़ेगा जो वाणी द्वारा जन−जागृति उत्पन्न करने के लिए वानप्रस्थ प्रशिक्षण द्वारा उत्पन्न किया गया है। इसी प्रयास के समकक्ष लेखनी पक्ष है। इसके लिए भी वानप्रस्थों जैसी योजना ही क्रियान्वित की जा रही है। अखण्ड−ज्योति परिवार को ही युग−निर्माण अभियान के विभिन्न पक्षों कोक अग्रगामी बनाने का उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा है। इसी परिवार में से निकलकर समय−समय पर गायत्री परिवार युग निर्माण परिवार आदि सामने आये हैं। अखण्ड−ज्योति के परिजनों की उत्कृष्ट चेतना और उदात्त सक्रियता ने ही वे कार्य सम्पन्न किये है, जिन्हें देख कर सर्वत्र दांतों तले उँगली दबाई जाती है। मनुष्य जाति को एक से एक बढ़ कर प्रेरक प्रेरणाएँ देने में अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों ने जो बढ़−चढ़ कर त्याग, बलिदान भरे आदर्शवादी पुरुषार्थ प्रस्तुत किये है उन्हें मानवी इतिहास में एक अविस्मरणीय घटना माना जाता रहेगी।
लेखनी अभियान आरम्भ करते हुए भी ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार के ही प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना पड़ेगा। अपने परिवार में एक से बढ़कर प्रतिमायें भरी पड़ी है। इस मोर्चे को वे आसानी से सम्भाल सकती हैं, आवश्यकता केवल क्रमबद्ध प्रशिक्षण की है। ट्रेनिंग तो हर काम की लेनी पड़ती है। फौज में भर्ती होने वाला व्यक्ति कितना ही साहसी, वयस्क, स्फूर्तिवान एवं देशभक्त क्यों न हो ट्रेनिंग तो उसे भी लेनी पड़ती है अन्यथा उसके इन सद्गुणों का समुचित उपयोग संभव न हो सकेगा। यही बात प्रत्येक सक्रिय कार्य क्षेत्र पर लागू होती है। ज्ञानवान होने से ही कोई व्यक्ति लेखक नहीं बन सकता। यह एक अपनी दिशा है। छपने योग्य सामग्री प्रस्तुत कर सकना, इसे एक अभिनव कला ही कहना चाहिए। खराद किये बिना हीरे की न तो चमक निखरती है और न उसका मूल्य मिलता है। ज्ञान सम्पदा की मात्रा समुचित होना ही पर्याप्त नहीं, सफल लेखक को कुछ ऐसी जानकारियाँ भी प्राप्त करनी पड़ती है जो उस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के संपर्क में जाने से ही सीखी−अपनाई जा सकती हैं।
प्रसन्नता की बात है कि वानप्रस्थ प्रशिक्षण में वाणी विकास का प्रशिक्षण और नियोजन करने का काम इन दिनों गुरुदेव स्वयं सम्भाल रहे हैं। वे ही लेखनी सत्र का भी भार सम्भालेंगे। निश्चय किया गया है कि 25 मई से 25 जून तक का महीना हरिद्वार में लेखनी सत्र चलेगा। उसमें वानप्रस्थों की तरह ही समस्त शिक्षा व्यवस्था चलेगी।
इस सत्र में केवल उन्हीं प्रबुद्ध परिजनों को आमन्त्रित किया जा रहा है, जिनकी शिक्षा समुचित है जो विचार किया जा रहा है, जिनकी शिक्षा समुचित है जो विचारशील और अध्ययनशील है। जिन्हें पहले कुछ लिखने का अभ्यास रहा है। ऐसे लोगों के साथ परिश्रम करने से उनकी प्रस्तुत प्रतिभा को आसानी से कम समय में निखारा जा सकेगा और अभीष्ट उद्देश्यों के लिए कुछ करने में जुटाया जा सके। यों नौसिखियों को भी आगे चलकर प्रशिक्षित तो करना पड़ेगा पर अभी प्रारम्भ उन्हीं से करने पर गाड़ी रु क जायगी और तत्काल जो प्रयोजन पूरा करना है वह न हो सकेगा। यह ठीक है कि बचपन से ही जिन्हें फौजी आदमी बनने की शिक्षा दी जाती, वे अधिक सफल सैनिक बनते है पर यह भी ठीक है कि जब मोर्चे पर लड़ने का कार्य रुक हो तो छटे हुए नौजवानों की भर्ती करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। यही नीति उपरोक्त एक महीने के लेखनी सत्र में भी अपनाई जायगी। जिनकी शिक्षा तो पर्याप्त है पर छपने योग्य लेखन का प्रयोजन न पड़ने से वैसा अभ्यास नहीं है, उन्हें अगले सत्रों के लिए एक नोट रखा जायगा। आरम्भिक सत्र तो उनका है जिन्हें पहले सह भी कुछ अभ्यास है और जिन्हें स्वल्प प्रयत्न से तात्कालिक आवश्यकता पूर्ति के लिए उपयुक्त किया जा सकता है।
जो अपने को इसके लिए उपयुक्त समझते हों वे अखंड–ज्योति परिजन 25 मई से 24 जून तक के लेखन सत्र में सम्मिलित होने का आवेदन पत्र भेज सकते हैं। इस आवेदन पत्र में (1) अपना पूरा नाम पता (2) आयु (3) शिक्षा (4)वर्तमान व्यवसाय (5) लेखन सम्बन्धी अब तक का अनुभव (6) विचार–धाराओं के अध्ययन सम्बन्धी अपने पिछले प्रयासों का विवरण लिखना चाहिए। साथ ही साथ ही सौम्य स्वभाव तथा निर्वासन, अनुशासन प्रिय होने का आश्वासन देना चाहिए। उद्दण्ड, मनमर्जी बरतने वाले, कुतर्की, बकवादी, नशेबाजी आदि व्यसनों में रत, अनुशासन की अवज्ञा करने वाले लोग यहाँ नहीं आते। ऐसे लोग कुछ सीखना तो दूर उलटे अपने यहाँ ही बने काम बिगाड़ते हैं।
शान्ति कुञ्ज में निवास, भोजन आदि सम्बन्धी परम्परा आदि से यह रही है और अन्त तक यही रहेगी कि यहाँ आने वाले सभी स्वजन एवं शिक्षार्थी अपने अतिथि हैं। उनसे निवास, भोजन आदि का कोई नियत निर्धारित अनुबन्ध नहीं होता। वे अपने घर−परिवार की तरह आते, रहते, सीखते और चले जाते हैं। इसके लिए उन से कुछ देने लिए नहीं कहा जाता। हाँ, इतनी अपेक्षा अवश्य रखी जाती है कि विचारशील व्यक्ति इस तथ्य को ध्यान में रखेंगे कि शान्ति कुञ्ज का आवश्यक व्यवस्था, खर्च हमें परस्पर मिलजुलकर ही चलाना पड़ता है। कहीं से कोई सेठ साहूकार जैसी आमदनी नहीं है। अनुदारता और कृपणता डडडड यहाँ की गाड़ी ही रुक जायगी।
लेखन सत्र के शिक्षार्थी अपने पत्र जल्दी ही भेज दें। शिक्षण सीमित लोगों का ही हो सकेगा और देर से आवेदन करने वालों को अभी कभी के लिए प्रतीक्षा भी करनी पड़ सकती है।
जुलाई, अगस्त, सितम्बर में प्रत्यावर्तन सत्र तीन महीने के लिए पुनः चालू होंगे। जिन आवेदनकर्ताओं को अभी अवसर नहीं मिला है इन तीन महीनों में बुलाने की व्यवस्था की जा रही है।
वाणी शिविरों की तरह ही गायन एवं संगत के शिक्षण का भी प्रबन्ध किया जाना है। लोक−मानस को भाव तरंगित का कितना महत्व है यह किसी से छिपा नहीं। नव−निर्माण के लिए इस शक्ति का भी उपयोग किया ही जाता है। लेखनी और वाणी की तरह संगीत धारा को मिलाने से ही भगवती सरस्वती की त्रिवेणी बनती है।
जुलाई, अगस्त, सितम्बर 74 के तीन महीनों में संगीत शिविर चलाने का निश्चय किया गया है इसमें उन्हीं को लिया जायगा जिन्हें पहले से भी संगीत का कुछ अभ्यास नहीं है उन स्वेच्छा नौसिखियों को नहीं बुलाया जायगा। उसके लिये पीछे कभी प्रबन्ध किया जायगा। अभी तो केवल उन्हीं को स्थान मिलेगा जिन्हें पहले से भी इस सम्बन्ध में कुछ रुचि, जानकारी एवं क्षमता है।
संगीत शिक्षा के लिए आने वाले अपना पूरा परिचय और अब तक की जानकारी का विस्तृत विवरण लिखें। शान्ति−कुञ्ज सप्तसरोवर हरिद्वार की स्वीकृति मिलने के उपरान्त ही किन्हीं को आने की तैयारी करनी चाहिए।
*समाप्त*