कुछ ही समय में कागज की महंगाई चरम सीमा तक पहुँच गई हैं। इसी रूप कागज व मुद्रण−सामग्री के दाम दूने से भी अधिक हो गये हैं। पहले से ही मूल्य, लागत मात्र ही रखे गये थे। यह भार सहन कर पाना मिशन के लिए असह्य हो गया है। हम विषय स्थिति में पुस्तकों के मूल्य मूल्य निम्न प्रकार से करने को बाध्य होना पड़ा है।
गायत्री साहित्य :-
गायत्री महाविज्ञान (तीन भागों में) 4 ) प्रति
गायत्री यज्ञ विधान (दो भागों में) 2)50 प्रति
गायत्री चित्रावली 2)50 प्रति
गायत्री मन्त्रार्थ 2) 00 प्रति
गायत्री प्रचार ट्रैक्ट )50 प्रति
संक्षिप्त गायत्री हवन विधि ) 30 प्रति
गायत्री दैनिक पत्रिका )30 प्रति
गायत्री चालीसा )10 प्रति
युग−निर्माण सत्संकल्प) 05 प्रति
युग−निर्माण साहित्य :-
तीन रुपया सीरीज 3)50 प्रति
दो रुपया सीरीज 2)50 प्रति
चालीस पैसा सीरीज )50 प्रति
पच्चीस पैसा सीरीज )30 प्रति
‘मनुष्य−जन्म’ भगवान् का सर्वोपरि उपहार है। उससे बढ़कर और कोई सम्पदा उसके पास ऐसी नहीं है, जो किसी प्राणी को दी जा सके। इस उपहार के बाद एक और अनुदान उसके पास बच रहता है, जिसे केवल वे ही प्राप्त कर सकते हैं—जिन्होंने अंधकार से मुख मोड़कर प्रकाश की ओर चलने का निश्चय कर लिया है। “इस प्रयाण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का धैर्य और साहस के साथ स्वागत करने की—जिनमें क्षमता है, वह अनुदान उन्हीं के लिए सुरक्षित है।”
‘मनुष्य−जन्म’ ईश्वर का विशिष्ट उपहार है और मनुष्योचित संकल्प भगवान् का महानतम अनुदान। मानव−जीवन की सार्थकता इस आदर्श−परायण संकल्प−निष्ठा के साथ जुड़ने से ही होती है। यह सही है कि मनुष्य−कलेवर संसार के समस्त प्राणियों से सुख−सुविधा की दृष्टि से सर्वोत्तम है, पर उसकी गौरव−गरिमा इस बात पर टिकी हुई है “कि मनुष्य−जन्म के साथ मनुष्य−संकल्प और मनुष्य−कर्म भी जुड़े हुए हों।”
“हमें ‘मनुष्य−जन्म’ मिला—यह ईश्वर के अनुग्रह का प्रतीक है। उसका ‘प्यार’ मिला, या नहीं—इसकी परख इस कसौटी पर की जानी चाहिए कि मानवी−दृष्टिकोण और संकल्प अपना कर उस मार्ग पर चलने का साहस मिला, या नहीं—जो जीवन−लक्ष्य की पूर्ति करता है। वस्तुतः ‘मनुष्य−जन्म’ धारण करना उसी का धन्य है, जिसने आदर्शों के लिए अपनी आयु तथा विभूतियों को समर्पित करने के लिए साहस संचय कर लिया। ऐसे मनुष्यों को ईश्वर का उपहार ही नहीं, वरन् प्यार एवं अनुदान मिला समझा जाना चाहिए।”
—जेम्स गिब्स
‘बसन्त −पर्व’ अब ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ के प्रत्येक सदस्य के लिए प्रकाश−पर्व—प्रेरणा−पर्व बन गया है। कोई समय था—जब उस मिशन के संचालक का—उसकी चहुंमुखी जन−कल्याणकारी प्रवृत्तियों का ‘जन्म−दिन’ माना जाता था और इसी दृष्टि से उसे मनाया जाता था, पर अब बात उतनी सीमित नहीं रही। अब उसे इस परिवार का प्रत्येक घटक अपने भावनात्मक उत्कर्ष का ‘अभिनव−पर्व’ मानता और मनाता है। इसी 28 जनवरी को ‘वसंतपंचमी’ है, निस्सन्देह उस दिन ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ का प्रत्येक सदस्य उसी हर्षोल्लास के साथ ‘नूतन−प्रेरणाऐं’ ग्रहण करेगा—जिस प्रकार किसी अत्यन्त भावोद्दीपन अवसर पर की जा सकती है। उसका बाह्य−स्वरूप पूरे उत्साह के साथ मनाने की तैयारियाँ पिछले महीने से ही चल रही है। उत्सव−आयोजन छोटे या बड़े रूप से प्रायः उन सभी स्थानों पर मनाये जाने हैं—जहाँ ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ के थोड़े या बहुत सदस्य मौजूद हैं।’
भगवती सरस्वती का ‘जन्म−दिन’ उल्लास और उत्साह के साथ धरती पर अवतरण का दिन ऋतुराज (बसन्त) का शुभारम्भ यों बहुत पहले से भी माघ सुदी पञ्चमी ‘बसन्त−पञ्चमी’ की पुण्य−बेला में मनाया जाया करता था। पर जब से ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ की ‘युग−निर्माण योजना’ का विकास विस्तार हुआ है, तब से यह माना जाने लगा है कि युगान्तरकारी दिव्य−प्रेरणाऐं इसी दिन इस धरती पर बरसती हैं। इस मान्यता के पीछे वे कारण भी हैं— जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। परिवार के कुलपति का आत्म−बोध, ‘अखण्ड−ज्योति’ पत्रिका का आरम्भ, आर्षसाहित्य के सरल प्रस्तुतीकरण का श्रीगणेश, ‘युग−निर्माण’ आन्दोलन का सूत्र−संचालन, सृजन−सेना का संगठन, गायत्री तपोभूमि का निर्माण, ‘शान्ति कुञ्ज’ की स्थापना, विविध भाषाओं में ‘विचार−क्रान्ति’ साहित्य का सृजन—अभियान को विश्व−व्यापी बनाने का दुस्साहस, प्रत्यावर्तन सत्रों की शृंखला आदि−आदि ऐसी अनेकों प्रवृत्तियां हैं—जिन्हें आरम्भ और अग्रसर करने का श्रेय ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ को प्राप्त है। इन सभी का शुभारम्भ ‘बसन्त पञ्चमी’ की पुण्य−बेला में होता रहा है। अस्तु विश्व का नव−निर्माण, युग−परिवर्तन, भावनात्मक पुनरुत्थान आदि इस युग की महानतम क्रान्तिकारी प्रवृत्तियों के साथ सहज ही यह शुभ−दिन जुड़ गया है। इस दिन से आरम्भ किया हर कार्य सफल ही होता चला गया है। इसका मूल कारण तो दैवी−विधान के साथ साथ अपने कदमों का उठना ही समझना चाहिए। हमारी नावें हवा के रुख को पहचान कर चल रही हैं, इसलिए उनमें तेजी आनी स्वाभाविक है। जनमानस की पुकार और युग की गुहार को सुनकर दौड़ पड़ने वाला यह अभियान सहज ही जनसहयोग और लोक−श्रद्धा का भाजन बनता चला गया है। इतनी गहराई तक न पहुँचने वाले लोग प्रस्तुत सफलताओं को बसंत−पर्व के शुभमुहूर्त में किये गये आरंभ की देन मानते हैं, जो हो बसन्त पर्व व अखण्ड−ज्योति परिवार का परिष्कृत उल्लास अब पर्यायवाची शब्द बन गये हैं। अस्तु बिना किसी बाहरी दबाव के अपने परिवार का हर व्यक्ति इस पर्व के आने पर अपने भीतर ऐसी हलचल अनुभव करता है कि उस आन्तरिक अभिव्यक्ति को किसी उत्सव−आयोजन का रूप दिये बिना उससे रहा ही नहीं जाता।
गत वर्षों की भाँति इस वर्ष भी 28 जनवरी को ‘बसन्त−पर्व’ मनाने की तैयारी—जिस उत्साह के साथ चल रही है, उसकी पूर्व−सूचनाऐं बताती हैं कि इस बार पिछले सभी कीर्तिमान तोड़े जा रहे हैं। जहाँ दो−पाँच भी परिजन हैं, वहाँ सामूहिक आयोजन—यज्ञ, हवन, दीपदान, प्रभातफेरी, प्रवचन, गीत−वाद्य, श्रद्धांजलि आदि की सार्वजनिक तैयारियाँ चल रही है। जहाँ एकाध ही सदस्य हैं, वहाँ उनने अपने घर पर ही पारिवारिक—हवन, दीपदान एवं परिवार−पड़ौस के लोगों को इकट्ठा करके मिशन का परिचय देने वाली विज्ञप्तियों का वितरण एवं नव−प्रकाशित पोस्टरों का चिपकाया जाना अभी से आरम्भ हो गया है। पाक्षिक युग−निर्माण योजना में ऐसे सभी समाचार प्रकाशित होते हैं। उन्हें देखने पर यह सहज ही जाना जा सकेगा कि परिवार के सदस्यों का उत्साह इस वर्ष गगनचुम्बी हिलोरें ले रहा है और अगले दिनों कुछ कर गुजरने के लिए मचल रहा है।
‘बसन्त−पर्व’ मनाने की अपनी पिछली परम्परा यह रही है कि माघ सुदी पञ्चमी (बसन्त पंचमी) से लेकर फाल्गुन सुदी पूर्णिमा (होली) तक पूरे चालीस दिन प्रचारात्मक, संगठनात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक क्रियाकलापों को अग्रगामी बनाने में सभी लोग ज्ञान−यज्ञ का धर्मानुष्ठान पर्व माना जाता है और उस प्रकाश को अधिकाधिक व्यापक बनाने के लिए हर सम्भव उपाय किया जाता है। अखण्ड−ज्योति पत्रिका के पुराने सदस्य थे, इस वर्ष कितने बढ़े? इस आधार पर अक्सर कारगुजारी आँकी जाती है। मिशन के प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने का यह प्रकाश विस्तार वस्तुतः बहुत ही उपयुक्त एवं सराहनीय प्रकार है।
हर वर्ष मिशन एक अभिनव संकल्प लेता रहा है और उसे पूरा करने के लिए सदस्यगण अपना ध्यान केन्द्रित करते रहे हैं। गतवर्ष प्रत्यावर्तन सत्रों का विशेष कार्यक्रम चला है। उसका एक वर्ष आशातीत सत्परिणामों के साथ पूरा हो रहा है। अगले वर्ष वानप्रस्थ प्रशिक्षण की अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया आरम्भ होने जा रही है। इसकी विशेष प्रतिक्रिया समस्त सक्रिय शाखाओं में पन्द्रह−दिवसीय शिक्षण शिविरों के रूप में सामने आने वाली है।
20 जनवरी से वरिष्ठ वानप्रस्थों का छै महीने वाला शिक्षण−सत्र आरम्भ होगा। तीन महीने शिक्षार्थी ‘शान्ति−कुञ्ज’ रहकर सैद्धान्तिक−शिक्षा प्राप्त करेंगे और तीन महीने उन्हें कार्य−क्षेत्र में जाकर व्यावहारिक शिक्षण प्राप्त करते हुए अनुभव की वृद्धि करनी होगी। इसके उपरान्त 25 अप्रैल से क्लिष्ट वानप्रस्थों का दो महीने वाला शिक्षण−सत्र आरम्भ हो जायगा। इसमें भी वही क्रम है,एक महीना सैद्धान्तिक−शिक्षण ‘शान्ति−कुञ्ज’ में —एक महीने व्यावहारिक−शिक्षण ‘कार्य−क्षेत्र’ में।
प्रशिक्षित वानप्रस्थ इस वर्ष समर्थ शाखाओं में जाकर पन्द्रह−दिवसीय शिक्षण−शिविर चलायेंगे। किस शाखा को किन तिथियों में शिविर चलाने हैं? इसके लिए अभी से पत्र−व्यवहार चल रहा है और समय निर्धारित किया जा रहा है। शिविरों में स्थानीय कार्य−कर्ताओं के नव−निर्माण सम्बन्धी आवश्यक प्रशिक्षण प्रातः 5 से 9 बजे तक दिया जाया करेगा। सायंकाल 7 से 10 तीन घण्टे जनता को सभा सम्मेलनों के रूप में नव−जागरण का सन्देश सुनाया जाता रहेगा। शिविरों की पूरी रूपरेखा 5—20 अक्टूबर, 5—20 नवम्बर और 5—20 दिसम्बर के पाक्षिक युग−निर्माण के छै अंकों में विस्तार पूर्वक बताई जा चुकी है। आशा की जा रही है कि मई, जून,जुलाई के तीन महीनों में कम से कम 300 शिक्षण−शिविर सम्पन्न होंगे। जिनमें लगभग 15 हजार कार्यकर्ता प्रशिक्षित किये जा सकेंगे और 3 लाख जनता को नव−युग का सन्देश सुनाया जा सकेगा। यह तो प्रथम छमाही की बात हुई। वर्ष की दूसरी छमाही संभवतः इससे भी बढ़ी−चढ़ी होगी। आरम्भ में जो अड़चनें रहती है, वे अनुभव के बाद अगली बार दूर हो जाती हैं। वानप्रस्थ प्रशिक्षण और उसके परिणाम स्वरूप प्रस्तुत होने वाली पन्द्रह−दिवसीय शिक्षण−शिविर योजना की श्रृंखला अगले दिनों कितने क्रान्तिकारी परिणाम उत्पन्न करेगी? इसे कुछ ही समय में सामने प्रस्तुत देखा जा सकेगा। इस वर्ष का यह बसन्त−पर्व का अभिनव संकल्प है, इसे पूरा करने के लिए अपने−अपने ढंग से सभी को सहयोग देना चाहिए।
‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ का हर सदस्य अब नव−निर्माण की सृजन−सेना का सैनिक है। वह समय बहुत पीछे रह गया, जब उसके पाठक, मात्र ज्ञान−वृद्धि अथवा समय क्षेप के लिए पत्रिका मँगाया और पढ़ा करते थे। तब इतने भर से ही बात पूरी हो जाती थी। लेखन और प्रकाशन का कार्य केन्द्र से होता था, पाठक उसे रुचि पूर्वक पढ़कर सन्तुष्ट हो जाते थे। बहुत हुआ तो किसी मित्र परिचित से पत्रिका प्रशंसात्मक चर्चा कर दी और बहुत आगे बढ़े तो एक−दो नये ग्राहक बना दिये। अपनी पसन्दगी और प्रशंसा का पत्र सम्पादक को लिख दिया। यह बहुत पुरानी बातें हैं। अब कदाचित ही कोई परिजन इस स्तर का रह गया हो। लगातार पत्रिका के पृष्ठों के साथ लिपटी रहने वाली प्रेरणाओं ने पाठकों को कुछ बनाया है और कुछ ढाला है। अब के अपने सुविकसित अन्तःकरण को मात्र पाठक रहकर सन्तुष्ट नहीं कर सकते। उन्हें कुछ कर गुजरने की तड़पन निरन्तर विवश और बाध्य करती रहती है। उनके लिए निष्क्रिय रह सकना, चुप बैठ रहना एक प्रकार से अशक्य ही है। अखण्ड−ज्योति परिवार का कोई परिजन—इस युग के महानतम अभियान ‘नव−निर्माण’ का मूक दर्शक नहीं रह सकता। उसे कुछ न कुछ तो सक्रियता बरतनी ही पड़ेगी, कुछ कदम तो आगे बढ़ना ही होगा। कुछ तो सहयोग उसका रहेगा ही। यदि इतनी तड़पन भी उत्पन्न न हो सके तो सही कहना चाहिए कि अखण्ड−ज्योति अपने आप ही जलती−भुनती रहीं, उसने और किसी दीपक को अपनी लौ से लौ मिलाकर प्रकाशवान् नहीं किया। प्रसन्नता की बात हैं कि ऐसा लाँछन न अखण्ड−ज्योति पर लगता है और न उसके पाठकों पर।
कोई समय था, जब ‘अखण्ड−ज्योति’ के लेखों में से कौन पसन्द आया—कौन नहीं? इस पर चर्चा और मुक्त चीनी होती रहती थी। अब स्थिति बदल गई। पत्रिका न रहकर, वह परामर्श−दात्री बनी। अब वह उससे भी आगे है और लाखों मस्तिष्कों का सूत्र संचालन, लाखों हृदयों का स्पन्दन प्रस्तुत करती है। उससे जीवन की दिशा निर्धारण में प्रकाश ग्रहण किया जाता है। उसके परामर्श को परिजनों ने अपने चिन्तन और कर्तृत्व में भावना पूर्वक स्थान देना आरम्भ कर दिया है। यही कारण है कि पत्रिका के लेख और पाठकों की रुचि वाली बात अब योजनों पीछे रह गई। उसके स्थान पर सूर्य और उसकी किरणों जैसा—पुष्प और उसकी पंखुड़ियों जैसा—काया और अस्थि−माँस जैसा अविछिन्न रिश्ता विकसित हो गया है। भौतिक−दृष्टि से पुस्तकों के अपने−अपने परिवार हैं—उनके अपने−अपने स्त्री−बच्चे, भाई−बहिन, माँ−बाप आदि हैं, पर जहाँ तक भावना−क्षेत्र का सम्बन्ध है—’अखण्ड−ज्योति परिवार’ के सदस्य अपने मिशन के साथ सघनतम आत्मीयता विनिर्मित करते चले जा रहे हैं। इसका सत्परिणाम हर दृष्टि से श्रेयस्कर हो रहा है। परिजनों के व्यक्तित्व उभरे हैं— मिशन के संकल्प सफल हुए हैं और लोक−मंगल के ऐसे सरंजाम जुटे हैं, जिन्हें देखते हुए कोई भी यह कह सकता है कि मानव−जाति को अन्धकारमय भविष्य के गर्त में गिरने से बचा लिया जायगा। सतयुग की सम्भावना अब कोरी कल्पना नहीं समझी जाती, वरन् नव−निर्माण के बहुमुखी प्रयास जिस तेजी से अग्रगामी हो रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह माना जा रहा है कि धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय अगले दिनों एक मूर्तिमान तथ्य बनकर सामने प्रस्तुत होगा।
हर ‘बसन्त−पर्व पर उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना वट−वृक्ष की तरह अधिकाधिक सुविस्तृत और परिपुष्ट होती चली जा रही है। पीछे की तरफ मुड़कर देखते हैं तो लगता है—अन्धेरी रात में कँटीली झाड़ियों से भरी डरावनी रात पार करली गई,अब प्रभात के आलोक में लम्बी मञ्जिल पार कर सकना उतना कष्टकर परिस्थितियों में प्रतीत होता था। लक्ष्य अभी भी बहुत दूर है, पर उसके प्राप्त होने का सुनिश्चित विश्वास इसलिए प्रबल होता जाता है कि ‘अखण्ड−ज्योति’ और उसके परिजन घनिष्टतम आत्मीयता के सुदृढ़ सूत्रों में आबद्ध होते चले जा रहे हैं।
‘बसन्त−पर्व’ आ पहुँचा। इस अवसर पर सदा की भाँति हम सब मिलकर एक बड़ा कदम उठावेंगे। इस वर्ष का कदम होगा—”वानप्रस्थ परम्परा का पुनर्जागरण और उसकी महान् प्रतिक्रिया का सूत्र−संचालन।”
दार्शनिक प्लेटा के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त मौलिक नहीं, वे भारतीय तत्वज्ञान की प्रतिध्वनि मात्र हैं। —प्रो. ई. जे. डर्विक
प्राचीन भारत की सर्वतोमुखी प्रगति का विवरण परिचय जब पढ़ते सुनते हैं तब इस बात का आश्चर्य होता है कि उन दिनों जबकि साधनों का भारी अभाव था किस आधार पर लोग इतने आगे बढ़ सके होंगे—ऊँचे उठ सके होंगे। उन दिनों मशीनों का आविष्कार नहीं हुआ था, बिजली, भाप जैसे शक्ति स्रोत भी हाथ में नहीं आये थे यात्रा के लिए न सड़कें थीं न फुल न आज जैसे वाहन—शिक्षा संस्थाऐं भी गाँव−गाँव कहाँ थीं? प्रेस न होने से हस्तलिखित पुस्तकें जिस−तिस के पास ही थीं, और बहुत महँगी थीं। डाक, तार,टेलीफोन, रेडियो जैसी सुविधाओं का अभाव था। नहरें, बाँध, विद्युत कूप जैसे सिंचाई के साधन भी नहीं थे। सुरक्षा के लिए भुजबल पर ही निर्भर रहना पड़ता था। तीर, तलवार जैसे वे ही अस्त्र−शस्त्र थे, जिन्हें कोई बलिष्ठ व्यक्ति ही उठा,चला सकता था। बन्दूक,तोप, बम, मशीनगन, डायनामाइट मिसाइलें जैसी तकनीकी सैन्य−सज्जा भी उन दिनों कहाँ थी? साधनों की दृष्टि से निस्सन्देह पुरातन−काल बहुत पिछड़ा हुआ था। फिर भी प्रगति का इतना उच्च स्तर—जिसे देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है, किसी रहस्यमय आधार पर ही सम्भव हुआ होगा।
उन दिनों अपना देश स्वर्ग−सम्पदाओं का स्वामी था। कोलम्बस इस सोने की चिड़िया को तलाश करने निकला था। यहाँ पहुँचने का सीधा, सरल रास्ता तलाश कर रहा था, पर वह जा पहुँचा—अमेरिका। सोरोपीयन जातियाँ भारत से जो पाना चाहती थीं, वह उन्हें अमेरिका महाद्वीप से मिल गया। इससे पहले का इतिहास बताता है कि यहाँ के निवासियों ने विश्व के कोने−कोने तक जाकर कृषि, उद्योग, शिल्प, चिकित्सा, शिक्षा आदि के वे आधार सिखाये, जिनके आधार पर अर्थ−उपार्जन एवं सुविधा−साधनों का अभिवर्धन सम्भव हो सके। न्याय, शासन, सामाजिकता, धर्म आदि की उन पद्धतियों का ज्ञान कराया, जिनके सहारे सुख−शान्ति के साथ जिया जा सकता है। शासन−सूत्र के संचालन का बोध समस्त संसार को कराने के कारण भारत ‘चक्रवर्ती’ कहलाया। उसके कारण विश्व में संपन्नता का उदय हुआ, इसलिए वह स्वर्ण−सम्पदाओं का अधिपति माना गया। ज्ञान विज्ञान की अनेकानेक धाराओं से सुंदर देशों को अवगत कराने के कारण उसे जगद्गुरु का श्रद्धासिक्त सम्मान दिया गया। अपनी अगणित दिव्य विशेषताओं के कारण भारतवासी समस्त संसार में ‘देव’ कहलाते थे। वृहत्तर भारत की जन−गणना 33 कोटि थी। भारत−भूमि को देव भूमि कहा जाता था। वह प्रत्येक दृष्टि से ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ थी। उसमें रहने वालों को पृथ्वी के देवता कहा जाता था। 33 कोटि भूसुरों की निवास−स्थली ‘भारत−माता’ मानव−जाति के लिए परम पावन तीर्थ−भूमि थी। इस धरती का दर्शन करने जो आ पाते थे, वे अपने को धन्य मानते थे।
आज के अनेकानेक सुविधा−साधनों के करतलगत होते हुए भी मनुष्य का वैयक्तिक क और सामूहिक जीवन दिन−दिन जटिल और विपन्न होता चला जाता है। जब कि प्राचीनकाल में नगण्य साधनों से इस देश के निवासी न केवल स्वयं सुख−शान्ति से रहने थे—समुन्नत स्तर तक जा पहुँचे थे, वरन् विश्व के कोने−कोने में कारण क्या हो सकता है? इस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने से एक ही बात उभर कर आती है कि उन दिनों मानवी−व्यक्तित्व को ऐसे जीवन्त−यन्त्र के रूप में विकसित किया गया था, जिसमें आदर्शवादिता और परामर्श−परायणता कूट−कूट भरी हुई थी। उसे भावनाशील बनाया गया था। साहस और पराक्रम उनमें हिलोरे लेता था। निकृष्टता और क्षुद्रता से उसे घोर घृणा थी। लिप्सा और लालसाओं की संकीर्ण स्वार्थपरता को उसने पद−दलित किया था। त्रिविध ऐषणाओं को जीती था और पेट− प्रजनन के लिए जीवित रहने की पशुता को, संकीर्ण−स्वार्थपरता की जीवन−नीति बनाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया था। इस प्रकार के व्यक्तित्व असाधारण रूप से शक्ति शाली होते हैं। महामानवों की सामर्थ्य का तुलना— विशालकाय और प्रचंड शक्ति शाली यंत्रों से भी नहीं की जा सकती। वे सोने के पर्वत से भी अधिक मूल्यवान होते हैं। वे जिधर भी बढ़ते हैं—तूफान उठाते हैं। वे जहाँ भी पैर रखते हैं—जमीन धँसाते हैं। वे जो भी संकल्प करते हैं— उसे पूरा करते रहते हैं। मनस्वी और तपस्वी मनुष्य से बढ़कर और कोई ऊँचा शक्ति −स्रोत इस धरती पर है ही नहीं। जब ऐसे नर−रत्न घर−घर में उत्पन्न होते होंगे तो सहज ही इस देश की भूमि “स्वर्गादपि गरीयसी” रही होगी, तब तो निश्चय ही यहाँ नागरिक देवोपम गौरवशाली माने जाते रहे होंगे—तो अवश्य ही उनने अपना देश समुन्नत स्थिति तक पहुँचाया होगा और वे जहाँ भी नये होंगे, वहाँ प्रगति और समृद्धि का बसन्त लहलहाया होगा।
यदि साधनों की उन्नति को सुख−शान्ति का माध्यम माने तो आज हमें भूतकाल की तुलना में हर दृष्टि से आगे होना चाहिए था। आज के अर्थशास्त्री प्रायः यही रट लगाते है कि धन का अभाव पतन का हेतु है और संपत्ति होने पर उन्नति होती है। साम्यवादी दार्शनिक निरन्तर इसी तर्क को दुहराते हैं, वे पतन को गरीबी से जोड़ते हैं और प्रगति के लिए अधिकाधिक सुविधा−साधनों के संवर्धन पर जोर देते हैं। यदि यह बात सही रही होती तो अमेरिका जैसे धनी एवं साधन सम्पन्न देशों के नागरिक देवोपम जीवन जी रहे होते, पर वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है। वे अपनी आन्तरिक विशेषतायें बेतरह गँवा कर हर दृष्टि से खोखले होते चले जा रहे हैं। निर्धनता से भी महँगी पड़ रही है—उन्हें वह सम्पन्नता। यदि धन ही प्रगति का कारण रहा होता तो कोपीनधारी पर्णकुटीरों में रहने वाले ऋषियों से अधिक कोई दुखी न होता और सम्पन्न लोगों में सन्तोष देखने को न मिलता। अस्तु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि प्राचीनकाल की सम्पन्नता—उत्थान का कारण रही होगी और आज निर्धनता के कारण हम सब पतनोन्मुख हो रहे हैं।
इसी प्रकार यह कहना भी गलत है कि चरित्र−निष्ठा का मार्ग−दर्शन न मिलने से लोग पतनोन्मुख होते हैं। प्राचीनकाल में प्रेस नहीं था।—हस्त−लिखित पुस्तकें जिस−तिस के पास थीं और उनका मूल्य अधिक था हर कोई उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता था। शिक्षा का प्रसार भी उतना नहीं था। अब हर स्तर का साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यह ठीक है कि पतनोन्मुख साहित्य आँधी−तूफान की तरह बढ़ा है, पर इन्कार इस बात से भी नहीं किया जा सकता कि प्रेरक−साहित्य का सर्वथा अभाव नहीं जो चाहे उसे भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है। यही बात उपदेशकों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। कला−मंच पर कब्जा करके पतन ने निर्लज्ज स्वेच्छाचार का खुलकर समर्थन किया। और उसके फलस्वरूप जनमानस में विनाशकारी दुष्प्रवृत्तियों को आश्रय मिला है, यह नग्न, सत्य और स्पष्ट तथ्य है। पर यह कहते भी नहीं बनता कि सदुपदेश देने वाली वाणी सर्वथा मौन है। सभा−सम्मेलनों में आये दिन सदाचरण के पक्ष में बहुत कुछ कहा जाता रहता है। रेडियो से भी कितने ही प्रेरक प्रवचन प्रसारित होते रहते हैं। कथा−प्रवचन करने वाले दिन−दूने, रात−चौगुने बढ़ते चले जा रहे हैं। धर्मोपदेशों की बाढ़−सी आती दीखती है। इस सबको जोड़ा जाय तो सदाचरण के पक्ष में होने वाले प्रवचनों को नगण्य नहीं ठहराया जा सकता। यदि शच हो तो ऐसे प्रेरक−प्रसंग भी पर्याप्त मात्रा में सुनने को मिलते रह सकते हैं—जो सज्जनता की राह पर चलने की प्रेरणा दे सकते हैं।
लेखनी और वाणी को व्यक्ति −निर्माण का माध्यम माना जाता है। यह भी है, यह दोनों माध्यम मनुष्य के मस्तिष्क को झकझोरते हैं और उसे दिशा प्रदान करते हैं। इनकी शक्ति से इन्कार नहीं किया जा सकता। इतने पर भी यह प्रश्न तो यथा−स्थान बना ही रहता है कि जब आज लेखनी और वाणी उत्कृष्टता का समर्थन करने में सर्वथा मौन नहीं हुई है तो फिर जन−समाज का स्तर इस द्रुतगति से पतनोन्मुख होता क्यों चला जा रहा है? शील और सदाचरण मखौल की वस्तु क्यों बन रहे हैं? धर्मोपदेशक भी अधर्म−आचरण के साथ क्यों चिपके हुए हैं?
इस प्रश्न का समाधान एक ही है कि मनुष्य का मस्तिष्क भर लेखनी वाणी प्रभावित करती है, उसका अन्तःकरण स्पर्श करने की शक्ति आदर्श के आचरणों में ढालने वाले महामानवों ही होती है। जन−मानस को ऊँचा उठाने में, व्यक्तित्वों को परिष्कृत बनाने में केवल वे ही समर्थ होते है। आज उनकी ही भारी कमी पड़ रही है। भौतिक प्रयोजनों के संदर्भ में लेखनी और वाणी का महत्व असंदिग्ध है। स्कूल−कालेजों का समस्त प्रशिक्षण इन्हीं दो माध्यमों से चल रहा है। तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करके पिछले विचारों को सुधारने और नई मान्यताऐं बनाने का अवसर मिलता है। ऐसा मस्तिष्क को झकझोरने वाला बहुत कुछ क्रियाकलाप, लेखनी और वाणी ही सम्पन्न करती है। विचार−शक्ति का अपना स्थान है और अपना महत्व। उसकी शक्ति उपयोगिता और आवश्यकता से कोई कैसे इन्कार करेगा?
किन्तु जहाँ तक व्यक्तित्वों को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने की आवश्यकता का प्रश्न है, वहाँ यही तथ्य सामने आ खड़ा होगा कि आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्ति ही दूसरों को अनुकरण की, अनुगमन की प्रेरणा देकर उन्हें ऊँचा उठा सकने में, आगे बढ़ा सकने में समर्थ हो सकते है। प्राचीनकाल में यह प्रयोजन साधुसंस्था पूरा करती थी। उसके सदस्य सर्वसाधारण के सामने यह आदर्श प्रस्तुत करते थे कि परमार्थ−परायण जीवन न तो कष्ट कर है, न असुविधा−जनक, न असम्भव, न अव्यावहारिक। वरन् थोड़ी शारीरिक असुविधा सहने पर जो मानसिक एवं आत्मिक लाभ मिलता है, वह इतना बहुमूल्य है कि उसे प्राप्त करने के लिए यत्किंचित असुविधा उठाना बाल− विनोद जैसा तुच्छ समझा जा सकता है। सन्त आदर्शवादी जीवन जीते थे। उनके प्रति जन−मानस में जो सहज श्रद्धा उमड़ती थी, वह उन महामानवों द्वारा दी गई उत्कृष्टतावादी प्रेरणाओं को आत्मसात करने की पृष्ठभूमि बनाती थी। लोग उनके उपदेशों को मखौल नहीं मानते थे। मनोरञ्जन के लिए नहीं सुनते थे और न वक्तृत्व−कला के आधार पर निन्दा−प्रशंसा करते थे, वरन् आदर्शवादी महामानवों के वचन शास्त्र−मन्तव्यों की तरह श्रुति−प्रतिपादन की तरह हृदयंगम किये जाते थे। प्रवचन आप्त−वचन होते थे, उनका अनुसरण करने में हर व्यक्ति को अपना परम कल्याण प्रतीत होता था। यह साधुसंस्था ही थी, जिसने जन−मानस को आदर्शवादिता की प्रेरणाओं से प्रभावित करने और उत्कृष्टता की राह पर चलने के लिए बाध्य कर दिया था। जन्मजात पतनोन्मुख नर−पशु की दुष्प्रवृत्तियों को देवोपम उत्कृष्टता में बदलने का श्रेय भारत की साधु−संस्था को ही दिया जा सकता है। उसने दीपक की तरह स्वयं जलकर जो प्रकाश उत्पन्न किया, उसी से भारत का लोक−मानस दिव्य आलोक से लगमगाया। उसी ने नर नारायण के दर्शन सम्भव किये, उसी ने पशु को देवता में बदला। यही है, वह रहस्य—जिसके कारण इस देश के प्रत्येक नागरिक का व्यक्तित्व उच्चतम स्तर तक विकसित हुआ और उसने न केवल अपने देश को, वरन समस्त विश्व को सतयुगी सुख−शान्ति का रसास्वादन कराया।
साधु−संस्था के दो वर्ग थे, एक गृहस्थ अर्थात् ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में रहकर वहाँ का पौरोहित्य धर्म नेतृत्व करने वाले। दूसरे विरक्त —जिन्हें परिव्राजक रहकर सुदूर क्षेत्रों की यात्राऐं करनी होती थीं और अपना सेवा क्षेत्र सुविस्तृत रखना पड़ता था। ब्राह्मण और साधु दानों ही साधु−संस्था के परस्पर पूरक अंग थे। दानों के कार्य क्रम में थोड़ा अन्तर था पर लक्ष्य पूर्णरूपेण एक ही था—लोक−मानस को उत्कृष्टतम बनाये रहने के लिए अपने ढंग से अथक एवं अनवरत रूप से उत्कृष्ट प्रयास करना प्राचीनकाल में यह साधु−संस्था उच्चस्तर पर पहुँची हुई थी, उसी ने जन−साधारण के व्यक्तित्वों को ऊँचा उठाया था और उस उत्कर्ष के आधार पर ही वह सब सम्भव हो रहा, जिसका हम आज भी गर्वोन्नत मस्तिष्क में स्मरण करते है।
बलख का बादशाह इब्राहिम बिन अहमद फकीर हो गया और ईश्वर की भक्ति में डूबा रहने लगा। आवाज उतरी कि ऐ बन्दे लकड़ी काटकर अपना गुजारा कर और अपनी कमाई में से दूसरों को हिस्सा बाँट। इबादत का यही तरीका बेहतरीन है।
भारत समाज−संगठनों में साधु−संस्था का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उसके सदस्यों को, ब्राह्मणों और सन्तों को—’भूसुर’ कहा गया है। उन्हें धरती के देवता मानकर पूजा है,पद पर आसीन किया गया है। उनके चरण−स्पर्श करके लोग अपने को पवित्र हुआ मानते थे। उनके भोजन−वस्त्र की व्यवस्था करने का जिन्हें अवसर मिलता था, वे अपने को धन्य मानते थे। हर्ष−शोक के विशेष अवसर जब भी आते थे, तब अपना चित्त हलका करने के लिए ब्रह्म−भोज करते थे, दान−दक्षिणा देते थे। पुण्य−फल के यह दो अमोघ मार्ग थे।
इसका कारण यह नहीं था कि साधु संस्था के सदस्य अपंग, असहाय, दरिद्र अथवा दीन−हीन होने के कारण उनकी दया के पात्र एवं सहायता के इच्छुक हैं, वरन् यह था कि जहाँ भी ब्राह्मण एकत्रित होंगे—वहाँ अमृतोपम सद्ज्ञान की वर्षा होगी और हर्ष−शोक को नियन्त्रित करने वाला विवेकपूर्ण वातावरण बनेगा। ब्राह्मण−साधु के हाथ में जरूर दी जाती थी, पर उसमें से निर्वाह मात्र पर व्यय होने वाला अत्यन्त स्वल्प अंश ही उनके काम आता था। वस्तुतः वह धर्मकृत्यों के लिए विशुद्ध अमानत होती थी, जिसे परमार्थ प्रयोजनों में खर्च किया जाना ही निश्चित था।
साधु−ब्राह्मण की समय−समय पर दान−दक्षिणा देते रहना, वस्तुतः लोक−मंगल के अनेक प्रयोजनों की पूर्ति करना ही था। इसमें साधु के प्रति सन्देह रहित प्रगाढ़ विश्वास का भाव भी भरा था। साथ ही साधु भी उस विश्वास में कहीं कोई सन्देह आघात उत्पन्न न होने पावे, ऐसा उत्तरदायित्व निबाहने के लिए बाध्य था। जाँच−पड़ताल रहने पर चतुरता से कुछ बचा−चुरा लेना भी बुरा है, पर जहाँ विश्वास पर ही सब कुछ छोड़ दिया गया हो, वहाँ जिम्मेदारी सहस्र गुनी बढ़ जाती है। प्राचीनकाल का साधु कभी इस कसौटी पर खोटा सिद्ध नहीं हुआ। पितृगृह का—दक्षिण धन का—न्यूनतम निर्वाह से अधिक अपने लिए खर्च करना शास्त्र−परम्परा के अनुसार महापातक माना जाता रहा है। इस समय में दक्षिण का व्यक्ति गत स्वार्थ से खर्च करने वाला कोई महापातकी कहीं ढूँढ़े भी नहीं मिलता था।
ब्रह्म−भोज और दान−दक्षिणा का क्रम आज भी चलता है, पर दाता और ग्रहीता दानों ने ही इस पुण्य−परम्परा के परम प्रयोजन को एक प्रकार से विस्मरण ही कर दिया है। जिसके निमित्त इन पवित्र प्रचलनों का आविर्भाव हुआ था। अब ब्राह्मण वर्ग नहीं बचा, केवल वंश मात्र बन गया है। अब साधु भी नहीं बचा, केवल वंश मात्र चल रहा है। ऐसे साधु−ब्राह्मण अब उंगलियों पर गिनने लायक ही मिलेंगे—जिन्हें प्राचीनकाल की साधु−संस्था की सदस्यता का खरा अधिकारी माना जा सके। यह हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। ब्राह्मण की तुलना मस्तक से, मुख से की गई है। मस्तिष्क विकृत हो जाय, मुँह अपना कर्म त्याग दे तो फिर न शरीर का कोई ठिकाना रहेगा, न मन की सत्ता बचेगी, मूर्धा की विकृति को प्राणों का सर्वनाश ही समझा जाना चाहिए। आज ठीक यही हुआ है। साधु संस्था के नष्ट होने से देश की वह आधार−शिला ही ढह गई, जिसके ऊपर उच्चस्तरीय प्रगति का आलोक जगमगाता था और जिसके प्रकाश से समस्त विश्व प्रकाशवान हो रहा था।
कहने को अपने देश में आज भी जन−गणना के आधार पर 56 लाख साधु−संन्यासी और करोड़ों की संख्या में ब्राह्मण वंशज है। उन्हें ब्रह्म−भोज के निमन्त्रण भी मिलते हैं और दान−दक्षिणा का लाभ भी मिलता है। समाज में दूसरों की अपेक्षा उनका उच्च स्थान है। उच्च आसन उन्हें मिलता है और वन्दन−अभिवादन से सम्मानित किया जाता है। यह एक पक्षीय परम्परा निर्वाह है। जनता अपनी परम्परा निवाहती चली आ रही है—यह उसकी सज्जनता है, पर कुछ कर्तव्य दूसरे पक्ष का भी रह जाता है। प्रतिदिन तो उसे भी देना चाहिए। लोक−मंगल के लिए समर्पित−जीवन जीना, अपने प्रत्येक क्रियाकलाप को अनुकरणीय आदर्शों से ओत−प्रोत करना, संकटों से उबारने के लिए प्रबल प्रयासों से आगे आकर जन−नेतृत्व करना, साधु−संस्था के दोनों सदस्यों का सनातन कर्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहा जाय और महान् पूर्वजों को उनकी विशेषताओं के कारण मिलने वाले सम्मान तथा धन−लाभ से लाभान्वित होते रहा जाय तो वह हर दृष्टि से अनीति मूलक होगा। विशेषतया उस वर्ग के लिए—जिससे कि मनुष्य−जाति ऊँची आशाऐं करती रही है, अपना मार्ग−दर्शक और भाग्य−विधाता मानकर उनकी चरण−रज मस्तक पर चढ़ाती रही है। ऐसा वर्ग भी यदि अपना उत्तरदायित्व भुला दे और गये−गुजरे लोगों की तरह ‘येन−केन प्रकारेण’ धन और सम्मान उपलब्ध करता रहे तो इसे अपने महान् राष्ट्र का, अपने महान् धर्म−दर्शन का दुखद पराभव ही कहा जायगा। इस पराभव का दण्ड ही हमें ‘सर्वतोमुखी’ पतन के रूप में भुगतना पड़ रहा है। चिर−काल से विश्व का भावनात्मक नेतृत्व भारत ही करता रहा है। अपनी असफलताओं ने समस्त विश्व को प्रभावित किया और अवसाद के गर्त में धकेला है।
समुन्नत भारत की मान्यता रही है कि ब्राह्मण को बलवान बनाया जाय तो समस्त राष्ट्र बलवान बनेगा और समस्त विश्व ऊँचा उठेगा। इसलिए उस वर्ग को प्रखर एवं समर्थ बनाये रखने के लिए सब कुछ करने का ध्यान रखा है। कारण वश अपराध बन जाने पर भी ब्राह्मण को क्षमा करने की परम्परा रही है, ब्रह्म−हत्या को बड़ा पाप माना जाता रहा है। कारण कि अमुक स्थिति में अपराध बन जाने पर भी वह ग्रहण उतर ही जायगा और अन्ततः उसके सुसंस्कार जन−समाज को अनेकानेक प्रकार से कल्याणकारी अनुदान देते रह सकेंगे। ब्राह्मण के प्रति साधु के प्रति—जो असाधारण सम्मान का भाव अपने देश में पाया जाता है, वह प्राचीनकाल में उस वर्ग के द्वारा किये जाने वाले तप, त्याग के अनुरूप ही था। जिस लक्ष्य के लिए साधु−संस्था के इन दोनों सदस्यों ने अपना समग्र बलिदान प्रस्तुत किया था, उसे देखते हुए जो लोक−श्रद्धा उसे मिली थी—वह सर्वथा उपयुक्त ही थी।
आज साधु−संस्था की, ब्राह्मण−सन्त की—दुर्गति क्यों हुई? इतना सुदृढ़ दुर्ग किस कारण विस्मार हो गया? इस पर सूक्ष्मदर्शी चिन्तन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि उच्चतम मनःस्थिति के लोग साधु−संस्था में प्रवेश करते थे और अपनी अभिनव भावनाओं से उसकी उत्कृष्टता सुरक्षित बनाये रहते थे, वह आयात क्रम टूटा तो उस खण्डहर में उल्लू और चमगादड़ बसने लग गये।
‘भारतीय धर्म’ का दूसरा नाम—’वर्णाश्रम−धर्म’ है। भारतीय−जीवन, आदर्शों की सुदृढ़ शृंखलाओं से इंच−इंच बँधा हुआ है। ब्राह्मण जन−मानस को परिष्कृत बनाये रहने का उत्तरदायित्व सँभाले। क्षत्रिय अनाचार से निपटे, शक्ति की न्यूनता किसी दुर्बल को भी न खटकने दे। वैश्य−समाज के अभावों को दूर करे, उपार्जन और उत्पादन के स्रोत खोलें। शूद्र की आवश्यकता पूरी करे। पेट भरने, तन ढ़कने की न्यूनतम आवश्यकता हर किसी को पूरी करनी पड़ती है। परिवार का उचित पोषण भी अभीष्ट है। उतना समाज से लिया जा सकता है लेना चाहिए, दिया जा सकता है देना चाहिए। पर जीवन−लक्ष्य—ज्ञान, बल, धन एवं श्रम से संसार का भण्डार भरते हुए सर्वतोमुखी प्रगति में अपने आप को खपा देना—लोक−मंगल को लक्ष्य मानकर चलना—यही वर्णधर्म है। चारों वर्णों का सृजन इसीलिए हुआ। परम्परागत क्रम अपनाये रहने में कुशलता भी बढ़ती है और सुविधा भी रहती है। इसलिए वर्णधर्म प्रायः वंश−परम्परा से भी चलते रहते थे। पर वैसा कोई बन्धन नहीं था। वर्ण आवश्यकतानुसार बदले भी जा सकते थे। उनमें नीच−ऊँच का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। एक पिता के चार पुत्रों में कौन नीचा, कौन ऊँचा? एक ही रक्त के, एक ही जाति के प्राणी जन्म के आधार पर तो ऊँच−नीच हो भी नहीं सकते।
आश्रम धर्म का, प्रयोजन था आधा जीवन भौतिक प्रगति में और आधा जीवन पारमार्थिक प्रगति में नियोजित रखना। शरीर यात्रा के लिए, समृद्धि और साधना के लिए भौतिक प्रगति भी आवश्यक है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्पत्ति, वंश−वृद्धि, परिवार−व्यवस्था, सुरक्षा आदि कार्यों के लिए जीवन का पूर्वार्ध उपयुक्त रहता है। इसलिए ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के दो आश्रम इन प्रयोजनों को पूरा करने के लिए निर्धारित किये गये। जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ प्रयोजनों के लिए है। वानप्रस्थ और संन्यास की संरचना इसी उद्देश्य के लिए की गई है। इन्हें दूसरे शब्दों में साधु−संस्था के दो भाग कह सकते हैं। वानप्रस्थ ब्राह्मण−धर्म है, क्योंकि उसमें किसी स्थान पर रहने, अध्ययन एवं तप करके आत्मबल बढ़ाने की, गुरुकुल आदि आश्रम चलाने की व्यवस्था है। संन्यासी परिव्राजक को कहते है। व्यापक क्षेत्र में भ्रमण करते हुए स्थान−स्थान की समस्याओं को समझना और वहीं मोर्चे पर पहुँच कर उनसे निपटना संन्यासी का कार्य है। ऐसे जीवन में परिवार लेकर नहीं चला जा सकता, अस्तु संन्यासी बिना पत्नी के रहते थे। जब कि वानप्रस्थ के एक स्थान पर रहने के कारण पत्नी को साथ रखने में सुविधा रहती थी। नारी तो नर की सदा सहायिका एवं पूरक ही रही है। उसे छोड़ना, परिवार से भागना वैराग्य नहीं है। ‘वैरागी’ शब्द तो राग रहित के लिए प्रयुक्त होता है। विरक्त —जिसकी लोभ−मोह में अनुरक्ति न हो। स्त्री−बच्चों को पाप−पिटारी कभी नहीं माना गया। किस स्थिति में पत्नी को साथ रखा जाय किस में नहीं? यह केवल सुविधा−असुविधा की दृष्टि से निर्णय किया जाता था। वानप्रस्थ और संन्यासी दोनों मिलकर ब्राह्मण और साधु की अनवरत आवश्यकता पूरी किया करते थे।
भारतीय−जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियम निर्धारित था। यदि स्वास्थ्य या परिस्थितियाँ इतना जीने की न हों तो सम्भावित आयु का उसी आधार पर विभाजन करते थे। बच्चे के उत्पादन तथा उनके स्वावलम्बन का आरम्भ से ही ऐसा ध्यान रखते थे कि उत्तरार्द्ध में प्रवेश करते समय कोई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ शेष न रहें। बीस−पच्चीस वर्ष की आयु में एक−दो सन्तानें पैदा कर ली जायँ तो पचास की आयु होने तक वे समर्थ और स्वावलम्बी हो जाती थीं। कदाचित कोई छोटा रह गया तो बड़े भाई अपना नैतिक उत्तरदायित्व मानते थे कि छोटे भाई−बहिनों का पुत्रवत् लालन−पालन करें। इस प्रकार पारिवारिक उत्तरदायित्वों से यथा समय निपट लिया जाता था। पत्नी आमतौर से अपने बेटे−पोतों, पुत्र−वधुओं, दौहित्रों में प्रसन्नतापूर्ण जीवन−यापन करती थीं। जिन्हें पति की तरह सेवा−साधना में अपनी उपयोगिता दिखाई पड़ती थी, वे उनके साथ लोक−मंगल प्रयोजन पूरे करने के लिए भी निकल पड़ती थीं। आगे चलकर यही वानप्रस्थ संन्यासी के रूप में एक कदम और आगे बढ़ाते थे। यही थी—प्राचीनकाल की आश्रम−व्यवस्था।
आश्रम−धर्म के अनुसार समाज के सुयोग्य, सक्षम, भावनाशील परिपक्व बुद्धि के—वासना तृष्णा से विमुक्त व्यक्ति वानप्रस्थ अथवा संन्यास−आश्रम में प्रवेश करते हुए ब्राह्मणों एवं साधुवर्ग की आवश्यकता पूरी करते थे। हिमालय से गलकर बर्फ जिस तरह गंगा−यमुना के जल−प्रवाह को गतिशील बनाये रहती है। उसी प्रकार गृहस्थ में परिपक्व हुए दूरदर्शी लोग वानप्रस्थ और संन्यास वर्ग का सृजन करते थे और साधु−संस्था की उत्कृष्टता अक्षुण्ण बनी रहती थी।
लोभ−मोह के वशीभूत रहकर वासना और तृष्णा की गुलामी मरण काल तक स्वीकार करने की प्रवृत्ति जब पनपी तो लोगों ने साधु−संस्था में प्रवेश करना बन्द कर दिया। वानप्रस्थ की तपश्चर्या कौन करे? परिव्राजक के सम्मुख रहने वाली कठिनाई कौन सहे? विलासी प्रक्रिया कौन छोड़े। जब यह असमंजस सामने आये तो प्रबुद्ध और परिपक्व लोगों का साधु−संस्था में घोर अभाव हो गया। सम्मान और अर्थ−लाभ का वह स्थान रिक्त देखकर निहित स्वार्थों ने उस पर कब्जा कर लिया। ब्राह्मण वंश विशेष का पर्यायवाची बन गया और साधु की पहचान वेश विशेष के आधार पर की जाने लगी। ऐसी स्थिति में दुर्गति होनी अवश्यम्भावी थी, सो होकर रही।
जन−समाज ने गृहस्थ से आगे बढ़कर साधु−संस्था में प्रवेश करना छोड़ा। नामधारी ब्राह्मण संन्यासी उत्कृष्ट विशेषताओं के आधार पर जन−मानस का उत्कर्ष करने में असमर्थ हो गये। इस उभय−पक्षीय संकट ने भारतीय−समाज की उस महती परम्परा का सत्यानाश करके रख दिया, जिसके कारण हम किसी समय समस्त विश्व का सर्वतोमुखी मार्ग−दर्शन कर रहे थे।
मनुष्य जिस धातु से, जिस कारीगरी से बनाया गया हैं, उसकी तुलना में दूसरा कुछ इस संसार में है नहीं। उसके अन्दर एक से एक अद्भुत और एक से एक अनुपम क्षमतायें सँजोकर रखी गई हैं। यदि कोई उन्हें जागृत कर सके और उपयोगी प्रयोजनों में क्रमबद्ध रूप से नियोजित कर सके तो समझना चाहिए कि अप्रत्याशित चमत्कारों जैसी उपलब्धियाँ, सफलताऐं शृंखलाबद्ध रूप से सामने आकर खड़ी होती चली जायेंगी। महामानवों में इतनी सृजनात्मक शक्ति होती है, जिस पर हजारों महादानवों की ध्वंसात्मक शक्ति को निछावर करके फेंका जा सके। अपने सृजेता के अनुरूप मनुष्य सचमुच अनुपम है—अद्भुत है।
इस तथ्य को पुरातन−काल के तत्वदर्शी मनीषियों ने समझा था। इसलिए उनने अपना मान सब ओर से हटा कर इस एक केन्द्र−बिन्दु पर एकाग्र किया कि मनुष्य की गुह्य−शक्तियों के प्रकटीकरण के वैज्ञानिक प्रयोगों में संलग्न रहा जाय। उन क्षमताओं को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किया जाय, बाल−क्रीड़ा में उन महान विभूतियों के नष्ट−भ्रष्ट होने की अपेक्षा उन्हें रचनात्मक प्रयोजनों में नियोजित किया जाय, ऋषि−जीवन का महान प्रयोजन यही था। इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपने को तपाया, सधाया और ऐसा उपकरण बनाया, जिसके द्वारा सामान्य स्थिति के जन−समूह को अभीष्ट दिशा में सरलतापूर्वक मोड़ा जा सके।
यही है संक्षेप में—ऋषि−जीवन का भेद भरा रहस्य। यह इतना उपयोगी और महत्वपूर्ण था कि उन्होंने कष्टों और अभावों की, असुविधाओं की चिन्ता किये बिना आत्म−निर्माण के लिए आवश्यक तितीक्षाऐं और तपश्चर्याऐं अपनाई। साथ ही अपनी कार्य−पद्धति में एक ही तथ्य जोड़ा कि मनुष्यों का भावना−स्तर विकसित और परिष्कृत करने में अनवरत रूप से संलग्न रहा जाय। साधु−संस्था के सदस्य यही करते थे। उनके उपासनात्मक, साँस्कृतिक, शैक्षणिक, कर्मकाण्डात्मक विविध−विधि प्रयोग इस एक उद्देश्य के लिए ही होते थे कि मानवी−चेतना की पशु−प्रवृत्तियों से अस्त−व्यस्त होने से बचा कर उन्हें महान् प्रयोजनों में नियोजित किया जाय।
इसे गर्व और हर्ष के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए कि ऋषि−जीवन से सम्बन्धित उपयुक्त प्रयोजन पूरी तरह सफल हुआ था। अध्यात्म और धर्म के कलेवर ने इस लक्ष्य को पूरा करने में अपनी सफल भूमिका निबाही थी। उन दिनों हर मनुष्य में एक उमंग उठती कि −”वह आदर्शों से भरापूरा अनुकरणीय जीवन जियें और दूसरों के अनुगमन के लिए श्रेयानुवर्ती पद−चिन्ह छोड़ें। उसे संकीर्ण−स्वार्थ परायण—पेट और प्रजनन भर के लिए जीवित रहने वाले नर−पशु न समझा जाय। उसकी गणना जन−कल्याण के लिए महत्वपूर्ण त्याग, बलिदान कर सकने वाली साहसी शूरवीरों में गिना और सराहा जाय। मरण के उपरान्त भी उसका यश−शरीर जीवित रहे। शरीर से कष्ट−ग्रस्त भले ही रहना पड़े, पर अन्तरात्मा के सन्तोष उल्लास में कमी न पड़ने पावे”।
इन आध्यात्मिक महत्वाकाँक्षाओं की उमंगें जन−मानस में उठाने के लिए, उन्हें प्रबल और परिपुष्ट करने के लिए साधु−संस्था निरन्तर प्रयत्नशील रहती थीं। यही एक तो उसका लक्ष्य था। धर्म और अध्यात्म का विशालकाय कलेवर इसी निमित्त तो गढ़ा गया था। ब्रह्म−विद्या, तत्व−दर्शन, आत्म−ज्ञान, ईश्वर−मिलन, स्वर्ग−मुक्ति, लक्ष्य प्राप्ति आदि के सहारे बहुत कुछ सोचने−समझने और करने−कराने के लिए प्रस्तुत किया गया है। उस सबका एक मात्र प्रयोजन इतना ही है कि मानवी−चेतना की निकृष्ट पशुता से परिष्कृत करके देवत्व की उत्कृष्टता तक ऊँचा उठाकर ले जाया जाय। जो इस दिशा में जितना बढ़ सके—वह उतना ही बड़ा धर्म−परायण, उतना ही महान ईश्वर भक्त कहा जाता था। ऋषियों ने अपना जीवन इसी महिमामयी मानवता को सुविकसित करने के लिए अपने को समर्पित किया था। वे धन्य हुए और उनके प्रयासों से समस्त मानवता धन्य हुई। विश्व−वसुधा ने इन ऋषि−प्रयासों से हर दृष्टि से कृतकृत्य बनाया। ऋषि−जीवन के इन अनुदानों के पीछे भारत की सारी प्राचीन प्रगति झाँकती मिलेगी।
इतिहास के पृष्ठों को जब हम उलट−पलट कर देखते हैं तो एक ही तथ्य उभर कर सामने आता है कि प्राचीन भारत में साधनों का भले ही अभाव रहा हो, पर कुछ ऊंचा कर गुजरने का दुस्साहस आँधी−तूफान की तरह उफनता रहता था। जिस तरह आज वासना और तृष्णा का मानवी मन पर आधिपत्य है, उसी प्रकार—वरन् उससे भी प्रबल वेग के साथ हर विचारशील मनुष्य पर यह आवेश छाया रहता था कि वह अनुकरणीय आदर्शवादिता के लिए तप, त्याग भरा दुस्साहस प्रकट कर सकने वाले शूरवीरों में गिना जाय। महामानवों की पंक्ति में उसे स्थान मिले, आत्मा और परमात्मा के दरबार में वह ऊँचा मस्तक लेकर प्रवेश पा सके। यह उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षायें इतनी प्रबल होती थीं कि विलासिता, तृष्णा और अहमन्यता जैसी हेय ऐषणाओं को सिर उठाने का अवसर ही नहीं मिल पाता था। पशु−प्रवृत्तियों की दिशा में जिसका मन ललचाता—उन्हें उस समय के प्रखर वातावरण में हर दिशा से भर्त्सना ही बरसती दिखाई पड़ती। आत्मा कचोटती सो अलग। ऐसा वातावरण बौद्धिक−प्रवाह उत्पन्न करने का श्रेय उस समय की सजग साधु−संस्था को ही दिया जा सकता है। वे इसी के लिए निरन्तर ताना−बाना बुनते थे। उनके विविध क्रियाकलाप इसी एक लक्ष्य की दिशा में मानवी अन्तःकरण को घसीट ले जाने के लिए होते थे। जहाँ इतनी सघन एकनिष्ठ तपः पूत सतत−साधना जुड़ी हुई हो, वहाँ अभीष्ट सफलता मिलनी ही थी, मिली भी। भारत—आदर्शवादी महामानवों का देश था। उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का अस्तित्व चमत्कारी होता है। उसकी उपस्थिति पग−पग पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। भूतकाल में भारत ने अपने देश में और संसार भर में जो भूमिका निबाही उसका आधार उन दिनों के सुविकसित लोक−मानस को बिना संकोच के माना जा सकता है।
आज जिस प्रकार मनुष्य दूसरों का शोषक बना हुआ है, ठीक उससे उलटे स्तर की प्रवृत्तियाँ भूतकाल में थीं। लोग पाकर नहीं, देकर प्रसन्नता अनुभव करते थे। आज विलासी और संग्रही भगवान समझे जाते थे, पर आज तो इन्हीं अहंकारियों को चापलूस घेरे रहते हैं। समाज का ऋण चुकाने के लिए जो परमार्थ प्रयोजनों में, अपनी क्षमतायें अर्पित करने में—जिसका साहस न पड़ा, उसे कृपण और कंगाल की भर्त्सना मिली। आज तो अपराधी, धूर्त और दुष्ट भी अपने कुकर्मों पर गर्वोक्तियां करते पाये जाते है। उस समय उन्हें कोढ़ी और कलंकी की तरह समाज में बहिष्कृत कर दिया जाता था। राज्य−दण्ड पाने से पूर्व ही समाज−दण्ड के वज्र−प्रहार से उनकी कमर टूट जाती थी। ऐसा था—उस समय का वातावरण, जिसे साधु−संस्था ने, सन्त और ब्राह्मणों ने अनवरत श्रम−साधना के साथ विनिर्मित किया था।
इतिहास बताता है कि उस समय के जन−साधारण ने लोभ और मोह से जीवन−मुक्ति प्राप्त कर ली थी। मुट्ठी भर अनाज पेट भरने के लिए कहीं भी किसी को भी मिल जाता है। इसके अतिरिक्त जिन्हें महान कार्यों की ही चिंता रहे वे एक से एक बढ़े−चढ़े सत्कार्य सम्पन्न करते रहेंगे और उनका लाभ समस्त समाज को मिलता रहेगा। ऐसे लोगों के लिए समस्त विश्व अपना घर था, समस्त मानव−जाति अपना परिवार। अस्तु वे देश−विदेश का अन्तर किये बिना जहाँ भी आवश्यकता, उपयोगिता अनुभव करते थे, वहीं चल पड़ते थे। संसार के कोने−कोने में वे इन्हीं प्रेरणाओं से प्रेरित होकर पहुँचे थे और अपनी−अपनी क्षमताओं के अनुरूप पिछड़े क्षेत्रों को लाभ पहुँचाये थे। कही जाकर शासन−तन्त्र बनाना और चलाना सिखाया तो कहीं कृषि, व्यवसाय, शिल्प, विज्ञान के आधार खड़े किये। कहीं वे धर्म−प्रचारक बनकर पहुँचे, कहीं रुग्णता से जूझने के लिए करुणा ने उन्हें चिकित्सक का कार्य करने के लिए भेजा। अनीति से लड़ने में भी वे पीछे नहीं रहे। जहाँ अनाचार ने आतंक उत्पन्न कर रखा था, वहाँ प्राणों को हथेली पर रखकर उससे जूझे और तब तक लड़े, जब तक कि न्याय की स्थापना न हो गई। यही हैं, पुरातन भारत द्वारा विनिर्मित विश्व−इतिहास का ढाँचा।
घर−परिवार में स्नेह−सौजन्य की धाराऐं बहती थीं। पतिव्रत और पत्नीव्रत के आदर्श दो शरीर एक प्राण का जीवन्त प्रमाण प्रस्तुत करते थे। दाम्पत्य मर्यादा से बाहर ही हर नारी—बहिन, पुत्री और माता थी, इस क्षेत्र में नारी ने अपना स्तर और भी अधिक ऊँचा उठाकर रखा था। भाई−भाई के बीच, बहिन−भाई के बीच, पिता−पुत्र के बीच, माता और सन्तान के बीच जो स्नेह−सौजन्य बिखरा पड़ता था, उसने घास−फूंस के घरों को ऐसा हर्षोल्लास युक्त बना दिया था—जिस पर स्वर्ग की सुषमा को निछावर किया जा सके।
वैयक्तिक क जीवन में सादगी सदाचार, स्नेह, संयम, विनय, सौजन्य, माधुर्य, सहकार एवं औदार्य की छटा देखते ही बनती थी। पवित्रता का बाहर और भीतर पूरा साम्राज्य था। छल, प्रपंच से कोसों दूर सरलता एक दूसरे का मन मोहती थी। लोग थोड़े से भी बहुत सन्तुष्ट थे। विनोदी और जागरूक प्रवृत्ति ने हर व्यक्तित्व में आकर्षण भर दिया था। सत्य और शिव की उपासना में निरत हर किसी का सौंदर्य देखते ही बनता था। जहाँ कषाय और कल्मष नहीं, वहाँ कुरूपता कैसे पैर जमा सकेगी? जिधर भी दृष्टि पड़े, उधर ही बसन्ती सौंदर्य बिखर पड़े, ऐसा था−उन दिनों का वातावरण।
आज का हमारा सोचने और देखने का तरीका अलग है। अपने ज्ञान−चक्षु बन्द है, केवल चमड़े की आँखें खुली हैं। उनसे मात्र भौतिक पदार्थ और साधन दीखते हैं। कल−कारखाने, रंग−मञ्च, भवन, वाहन आदि के साथ हम प्रगति को जोड़ते हैं। जिसके पास जितना अधिक विलासी संग्रह और उद्धत वैभव है, उसे उतना बड़ा सम्पन्न मानते हैं। प्रतिष्ठा कलावन्तों के अधिकार में चली गई है। मल्ल, नट, नर्तक, गायक, लेखक आदि के करतब देखकर लोग हर्षित होते हैं और वैसे बनना चाहते हैं। वैज्ञानिक, शिल्पी, डाक्टर, इञ्जीनियर आदि को समृद्ध उत्पादक कहा जाता है। तदनुरूप ही उनका महत्व माना जाता है, पुरस्कार दिया जाता है। लोक−नायक की परिभाषा में आज केवल राजनेता या विग्रह उत्पन्न करने वाले आते हैं। यह मूल्यांकन चर्म−चक्षुओं के आधार पर ही ठीक हो सकता है। यदि विवेक−दृष्टि से देखें तो यह सारी उपलब्धियाँ मिलकर भी मानव−कल्याण का उतना साधन नहीं जुटा सकतीं, जितना कि प्राचीनकाल की अकेली साधु−संस्था जन−मानस का स्तर ऊँचा उठाने के अकेले कार्य द्वारा सम्पन्न करती थी।
सुविधा साधन कितने ही क्यों न बढ़ जायँ, सम्पत्ति का उपार्जन कितना ही अधिक क्यों न बढ़ जाय, जब तक मानवी दृष्टिकोण का परिष्कार न होगा, तब तक न पतन रुकेगा और न सर्वनाशी संकट से छुटकारा मिलेगा। इन दिनों शिक्षा की, चिकित्सा की तथा सुविधा साधनों की दृष्टि से पूर्वजों से कहीं आगे हैं, पर इस एकाकी प्रगति से काम कुछ नहीं बना। उलटे स्वास्थ्य, सन्तुलन, चरित्र, सौजन्य आदि से महत्वपूर्ण था, उसे गँवाते ही चले जा रहे हैं। पारिवारिक स्नेह सद्भाव के बन्धन अब तक समाप्त ही होने जा रहे हैं। अर्थलिप्सा ने मनुष्य को शोषक भर बना छोड़ा है। छल ने सभ्यता का आवरण पहन लिया है। न किसी को किसी की ममता है, न किसी से स्नेह सहानुभूति। सब अपनी आपाधापी में उलझे हैं। व्यस्तता और व्यग्रता चरम सीमा पर पहुँचती जा रही है। मनुष्य अपने को सर्वथा एकाकी और असुरक्षित अनुभव करता है। इसे प्रेत−पिशाच का जीवन की कह सकते हैं। इन परिस्थितियों के रहते यदि तथाकथित प्रगति और सम्पत्ति की चकाचौंध सामने आयी भी तो उससे किसका क्या बनेगा? व्यक्तियों का सामूहिक असमंजस समाजगत विभीषिकाओं के रूप में किस प्रकार सामने आता है, इसे हम अगणित उलझनों में उलझे विश्व को दयनीय दुर्दशा के रूप में प्रत्यक्ष देख रहे हैं।
व्यक्ति और समाज को उबारने के लिए हमें फिर पीछे लौटना होगा। दृष्टिकोण के परिष्कार का, भावनात्मक पुनरुत्थान का, उत्कृष्टतावादी आदर्श−परायण कर्तृत्व को—फिर समझना होगा। इसके बिना प्रस्तुत सर्वग्राही संकटों से बच सकना सम्भव न हो सकेगा। स्पष्ट है कि भावनात्मक नव−निर्माण के लिए वाणी और लेखनी के साधन पर्याप्त न होंगे। उसे उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों से सुसम्पन्न साधु−संस्था का पुनर्जागरण ही सम्भव कर सकता है। इस युग की यही सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख आवश्यकता है।
भारतीय−धर्म का प्रत्येक अनुयायी यह भली−भाँति अनुभव करता रहा है कि साधु−संस्था अपनी गौरवगरिमा एवं महान संस्कृति की रीढ़ है। उसे हर कीमत पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए। अनादिकाल से यही प्रक्रिया कार्यान्वित भी होती रही है। उसे उच्चतम सम्मान और उपयुक्त परिपोषण देने में कभी कोता ही नहीं की गई हैं। स्वयं टूटे−फूटे घरों में रहकर भी सन्तों के लिए बहुमूल्य आश्रमों व भवनों का निर्माण किया है। स्वयं रूखी−सूखी खाकर भी ब्राह्मण को पकवान परोसने का प्रचलन रखा है। वस्त्र, परिधान, यात्रा−व्यय, सेवा−सुश्रूषा आदि की जब जितनी आवश्यकता पड़ी है, उससे कम नहीं—अधिक ही प्रस्तुत किया है। अब एक पल का कर्तव्य−पालन करने के लिए यथावत् तना खड़ा है। साधु−ब्राह्मण अपने महान कर्तव्यों को एक प्रकार से विस्मरण कर चुके, पर धर्म−प्रेमी जनता ने अपनी परम्परा यथावत जारी रखी है। उसकी ओर से अभी भी हाथ नहीं सिकोड़ा गया है। साधु−ब्राह्मण का सम्मान और पोषण अभी भी विद्यमान है, भले ही गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से वे खोखले हो गये हों, भले ही उनके पास वंश और वेष की विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ शेष न बचा हो।
साधु−संस्था के प्रति अद्यावधि बची हुई यह गहन श्रद्धा अकारण नहीं थी। चिरकाल के अनुभव से यह भली प्रकार परख लिया गया था कि इस कल्पवृक्ष की उपयोगिता असाधारण है और उसे हर हालत में सींचा ही जाना चाहिए। यह मान्यता इतनी अधिक गहराई के साथ हृदयंगम कर ली गई थी कि आज अश्रद्धा से बढ़कर विद्रोह तक की स्थिति उत्पन्न हो जाने पर भी साधु−संस्था के प्रति अभी भी आस्था एवं श्रद्धा उखड़ नहीं पाई है।
इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि साधन−सुविधाओं की कितनी ही उपयोगिता क्यों न हों, उनका कितना ही बाहुल्य क्यों न हो—यदि सदुपयोग कर सकने वाली बुद्धि विकसित हुई तो सम्पदा जिस क्रम से बढ़ेगी उसी क्रम से दुरुपयोग−जन्य सर्वनाश भी निकट आवेगा। साधनों का लाभ तभी है, जब उन्हें सत्प्रयोजनों के लिए−दूरदर्शिता एवं विवेक बुद्धि के साथ प्रयोग किया जाय। ऐसी विवेक−बुद्धि एवं सदुद्देश्य परायणता को ही अध्यात्म चिन्तन एवं धर्म−कर्त्तव्य कहते हैं। इन दोनों का समन्वय ही परिष्कृत व्यक्तित्व कहलाता है। वस्तुतः इस संसार की यही सबसे बड़ी सम्पदा है—इसी को मानव−जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कह सकते हैं। यह जहाँ भी होगी जब भी होगी—तब स्वल्प−साधनों में भी हर्षोल्लास का वातावरण बनेगा और पारस्परिक सहकारिता के आधार पर सम्पत्ति के अभिवर्धन के असंख्य द्वार खुल जायेंगे। मिलजुलकर बाँट खाने की नीति जहाँ अपनाई जायगी, वहाँ थोड़े से साधन भी—प्रगति और समृद्धि के अनेकानेक आधार प्रस्तुत कर देंगे।
वैभव का मूल्यांकन भौतिक सम्पदा के आधार पर नहीं किया जा सकता। दुर्बुद्धि और कुकर्मी के पास जमा हुई सम्पत्ति उसके लिए उसके परिवार के लिए तथा समस्त समाज के लिए विपत्ति का कारण बनती है। असली वैभव तो उच्चस्तरीय दृष्टिकोण है, महानता तो भावनाओं से भरी रहती है। जिसका अन्तःकरण विशाल है, जिसका दृष्टिकोण परिष्कृत है, जिसका चरित्र पवित्र है, उसी महा−मानव को मनुष्यता की गरिमा बढ़ा सकने वाला बड़भागी कहा जायगा। वह हर परिस्थिति में सुखी रहेगा और जहाँ भी रहेगा—वहाँ के वातावरण को आनन्दोल्लास से भरा−पूरा रखेगा। इस तथ्य को समझने पर हम ऐसे सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, जिसके ऊपर मनुष्य−जाति का, समस्त संसार का कल्याण अविछिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
इस प्रयोजन की पूर्ति कैसे हो? मनुष्य जाति इस लाभ से लाभान्वित किस प्रकार हो? संसार की सुख−शाँति का, प्रगति एवं समृद्धि का वातावरण कैसे बने? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही हो सकता था कि कुछ लोग इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए अपने आपको ‘सर्वतो भावेन’ जुटा और खपा दें। वे इसी तथ्य पर सोचें और इसी प्रकार का वातावरण बनाने का ताना−बाना बुनने में अपने चिन्तन एवं कर्तृत्व को सर्वतोभावेन निरत रखें। इस दुस्साहस जैसे महान् उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकना केवल उन तपःपूत एवं ऋषि−कल्प आत्मा के लिए ही सम्भव हो सकता है, जो भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर अपने को अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत करें, साथ ही लोक−मंगल को ही सर्वोत्तम सफलता का माध्यम मानकर अपनी क्रिया−पद्धति का निर्माण करें। इस दिशा में जो संकल्प पूर्वक बढ़ते हैं, उन्हीं को साधु−ब्राह्मण कहा जाता है। ऐसे व्यक्तित्वों की तुलना कल्पवृक्षों से की जा सकती है। वे जहाँ भी उगेंगे, वहाँ न कोई अभाव रहेगा और न कष्ट। स्वर्गीय सुख−सुविधाऐं वहाँ बनी ही रहेंगी, जहाँ कल्पवृक्ष का उद्यान होगा। साधु और ब्राह्मणों का देश हर दृष्टि से सुसम्पन्न ही रहेगा, उसे हर दिशा में फलते−फूलते देखा जा सकेगा।
इस प्रत्यक्ष रहस्य को भारत का बच्चा−बच्चा जानता और मानता रहा है, इसलिए उसने साधु−संस्था के चरणों में भावनापूर्वक मस्तक झुकाया है और उसके फलने−फूलने के लिए साधन जुटाने का भरपूर प्रयास किया है।
समाज−शास्त्री इस तथ्य से परिचित रहे हैं कि भौतिक प्रगति और उसके सदुपयोग का कार्य जन−मानस का स्तर ऊँचा उठाने पर ही सम्भव हो सकता है और यह कार्य जादू के डण्डे से नहीं हो सकता। उथले, भड़कीले प्रवचन मात्र उभार ला सकते हैं, पर कोई स्थिर परिणाम प्रस्तुत नहीं कर सकते। सत्−साहित्य भी एक अच्छा माध्यम तो है, पर एकाकी वह भी कुछ नहीं कर सकता। भगवान कृष्ण की गीता, व्यास जी के पुराण, वशिष्ठजी की योग−वशिष्ठ, ऋषियों के शास्त्र, बाल्मीकि की रामायण अभी भी मौजूद हैं, पर मात्र साहित्य से क्या कुछ बनता है? आवश्यकता−उत्कृष्ट व्यक्तित्वों की रहती है। उन्हीं के मुख से निकले प्रवचन जन−मानस में प्रवेश करते हैं, उन्हीं की लेखनी किसी के मस्तिष्क को झकझोरती है। इञ्जेक्शन की सुई ही रक्त में औषधि को प्रविष्ट कराती है। सुई न हो तो चमड़ी फाड़कर दवा शरीर में कैसे घुसेगी? उत्कृष्ट व्यक्तित्वों के बिना उत्कृष्ट विचारणा के प्रचुर साधन विद्यमान रहते हुए भी उन्हें जन−जीवन में समाविष्ट नहीं कराया जा सकता।
दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को कोई भी फैला सकता है। विग्रह, उपद्रव खड़ा करना किसी भी धूर्त के लिए बाँये हाथ का खेल बन सकता है। पर संयम और सृजन के लिए जन−मानस में उत्साह भरना—उसे बनाये और बढ़ाये रहना अति कठिन काम है, पर इतना आवश्यक कि इसके बिना किसी राष्ट्र की स्थिर और सर्वतोमुखी प्रगति हो ही नहीं सकती। कोई शासन, कोई नेता, कोई विद्वान, कोई सन्त इसे एकाकी नहीं कर सकता, भले ही वह कितना ही सामर्थ्यवान क्यों न हो। सर्वतोमुखी विकास जन−सहयोग से ही सम्भव है।
सब ग्वाल−बाल मिल−जुलकर उठाते हैं, तभी प्रगति को गोवर्द्धन उठता है। सब रीछ−बानर ईंट−पत्थर मारने के लिए तत्पर होते हैं, तभी अनाचार की लंका नष्ट होती है। बलवती असुरता का पराभव तभी सम्भव हो सका, जब देवताओं ने अपनी शक्तियाँ एकत्रित कर दुर्गारूपी संघ शक्ति का प्रादुर्भाव किया। ऋषियों ने थोड़ा−थोड़ा रक्त इकट्ठा करके घड़ा भरा था और उसी से असुर−निकंदिनी सीता जन्मी थी। यह पौराणिक उपाख्यान यही बताते हैं कि व्यापक क्षेत्र में फैली हुई विपत्तियों का निराकरण जन−सहयोग से ही सम्भव है। राष्ट्रीय−प्रगति के लिए लोक−शक्ति का अधिकाधिक उपयोग सृजनात्मक कार्यों में होना चाहिए। जन−मानस को इसके लिए तैयार करना निस्सन्देह कठिन कार्य है। सदुद्देश्य के लिए सफल नेतृत्व कर सकना अत्यन्त दुसह है। इस अत्यन्त कठिन कार्य को असम्भव से सम्भव बना देने वाली साधु−संस्था की कितनी उपयोगिता और कितनी महत्ता है, इसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि जब तक यह प्रयोजन पूरा न होगा, तब तक वास्तविक प्रगति का रथ एक कदम भी आगे न बढ़ सकेगा।
प्राचीन भारत में साधु−संस्था ही जन−नेतृत्व कर सकने की अपनी प्रामाणिकता प्रस्तुत करती थी और वही सृजनात्मक प्रयोजनों के लिए जन−सहयोग जुटाने में सफल होती थी। समर्थ साधु−संस्था के बल−बूते समर्थ जन−सहयोग उपलब्ध होता था और उससे अनेकानेक रचनात्मक सत्प्रवृत्तियाँ उगती और फलती−फूलती थीं।
जन−सहयोग संपादित करना जन−श्रद्धा का उपार्जन करके ही सम्भव हो सकता है। गान्धी जी इस मर्म को जानते थे और उन्होंने इस दिशा में ठोस कदम उठाया था, जिसका ठोस परिणाम भी निकला। भगवान बुद्ध ने अपने समय की अपने ढंग की अद्भुत बौद्धिक क्रान्ति की थी। इसके लिए उन्होंने ढाई लाख भिक्षुओं की सृजन−सेना खड़ी की थी और जन−साधारण को उस प्रयोजन के लिए भरपूर साधन जुटाने के लिए तत्पर किया था। गुरुगोविंद सिंह समर्थ गुरु रामदास—उन्होंने भी ऐसे ही कदम उठाये थे, फलस्वरूप उन्हें अपने लक्ष्य पूर्ति के लिए समुचित जनसहयोग उपलब्ध हो सका।
प्राचीन काल में यह प्रक्रिया सर्वविदित थी और सर्वमान्य बन चुकी थी। अपने उज्ज्वल चरित्र, परिष्कृत व्यक्तित्व एवं सेवा−साधना के लिए समर्पित जीवन−क्रम से वे जन−साधारण का हृदय जीतते थे और उस विजय−श्री का उपयोग लोक−मंगल के लिए जन−सहयोग जुटाने में करते थे। फलतः प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाली अनेकानेक सत्प्रवृत्तियाँ सफलता की दिशा में द्रुतगति से बढ़ती रहती थीं।
परिपक्व बुद्धि के सुयोग्य एवं अनुभवी एवं अनुभवी लोक−सेवी साधु−संस्था से ही निकलते थे। उनका निर्वाह व्यय न्यूनतम होता था। उसे पूरा करने में किसी को भार प्रतीत होना तो दूर, जिसे उस संदर्भ में कुछ करने का अवसर मिले, वह अपने को धन्य मानता था। इस प्रकार बिना किसी प्रकार का आर्थिक भार पड़े, प्रतिभाशाली, प्रभावशाली लोक−सेवकों की विशाल सृजन−सेना प्रगति के हर मोर्चे पर लड़ने के लिए खड़ी रहती थी। आज उस दिशा में राज−नेता—अर्थशास्त्री दार्शनिक−समाज विज्ञानी चलते तो हैं, पर निराश होकर लौटते हैं, उस क्षेत्र में प्राचीनकाल के साधु−ब्राह्मण स्वल्प प्रयत्न से ही सफल हो जाते थे। जन−शक्ति जिसके साथ ही उसे किसी उपयुक्त प्रयास में असफलता का मुँह देखना भी क्यों पड़ेगा?
साधु−संस्था का बोझ उठाना आर्थिक दृष्टि से भी अपने देश को सस्ता पड़ता था। शिक्षा, चिकित्सा, समाज–कल्याण आदि कार्यों में लगे हुए सरकारी कर्मचारियों का भारी−भरकम वेतन आखिर जनता से ही तो टैक्सों द्वारा वसूल किया जाता है। उन प्रयोजनों के लिए यदि अवैतनिक और अपेक्षाकृत अधिक सुयोग्य कार्यकर्ता मिल जायँ तो इसे राष्ट्र की आर्थिक बचत ही कहा जायगा। उस बचत को अन्य आवश्यक साधन जुटाने में लगाने पर प्रगति का पथ और भी तेजी से प्रस्तुत हो सकता है। कर्मचारियों का नैतिक स्तर जन−साधारण जैसा ही होने से उन पर अनेक प्रकार के अंकुश, नियन्त्रण निरीक्षण रखने पड़ते हैं। खर्च तो इसका भी बढ़ता ही है। कर्तव्यनिष्ठ लोक−सेवियों के ऊपर न कोई इन्सपेक्टर रखना पड़ता है और न आडटर नियत करना पड़ता है। वे सस्ते इस दृष्टि से भी पड़ते हैं। काम जितना सरकारी कर्मचारी अपने बलबूते करते हैं अथवा श्रमिकों से कराते हैं, उससे अनेक गुना कार्य तो जन−सहयोग से हँसते−खेलते कराया जा सकता है। इन सब तथ्यों पर विचार करने से वे कारण समझ में आते हैं कि प्राचीनकाल में क्यों प्रगति के लिए प्रचुर जन−सहयोग मिलता था, कैसे बिना जनता पर बड़ा अर्थ भार पड़े—बड़े−बड़े प्रगति प्रयोजन पूरे होते थे और आज क्यों इस दिशा में हमें पग−पग पर असफलता सामने खड़ी दिखाई देती है?
साधु−संस्था की उपयोगिता पर जितना अधिक विचार करते हैं, उतनी ही वह अधिक महत्वपूर्ण दिखाई पड़ती है। प्राचीनकाल में इस तन्त्र को खड़ा करके दूरदर्शी ऋषियों ने भारतीय−गौरव को गगनचुम्बी बनाने का चमत्कारी प्रयोग किया था। आज हम उस महान् आधार को दुर्गति के गर्त में फेंक चुके। फलतः दिन−दिन अवसान और अवसाद की दुखद परिस्थितियों में फँसते जा रहे हैं। विश्व−नेतृत्व के चिरन्तन कर्त्तव्य का निर्वाह तो ऐसी दशा में बन ही कैसे पड़ सकता है।
विधि की विचित्र विडम्बना ही है कि अपने देश में इस समय एक करोड़ के लगभग साधु संस्था के सदस्य होने पर भी उसमें साधु कहे जा सकने वाले नगण्य ही उपलब्ध हैं। शेष तो पूरा नकली माल ही भरा पड़ा है। पिछली जन गणना के अनुसार भारत में लगभग 80 लाख भिक्षा जीवी हैं। इनमें से 14 लाख ऐसे हैं जो शारीरिक असमर्थता के कारण भिक्षा वृत्ति करते हैं। शेष 56 लाख ऐसे हैं जो साधु महात्मा का वेष धारण करके अपनी आजीविका चलाते हैं। इसके अतिरिक्त पण्डित पुरोहितों का वर्ग अलग है। वे दान दक्षिणा का लाभ तो लेते हैं पर भिक्षा−वृत्ति उनकी आजीविका नहीं लिखी गई है। क्योंकि वे साथ में अन्य व्यवसाय भी करते हैं। दान दक्षिणा अतिरिक्त आय का सहायक धंधा जिनका है ऐसे व्यक्तियों की संख्या साधु−महात्माओं से कम नहीं वरन् अधिक ही हो सकती है। बराबर मान लें तो 56+56 लाख मिलकर वह संख्या एक करोड़ बारह लाख बनती है। भारत की आबादी इन दिनों पचास करोड़ है। अनुपात से हर पैंतालीस भारतीयों के पीछे एक साधु−सन्त आता है। यह लोग प्रायः हिन्दू ही हैं। हिन्दुओं की संख्या अपने देश में लगभग 35 करोड़ है। इन पर हिसाब फैलाया जाय तो हर तीस हिन्दू पीछे एक सन्त का अनुपात आता है।
इतनी संख्या में यदि सचमुच साधुसंस्था के सच्चे सदस्य रहे होते तो भारत अत्यधिक सौभाग्य शाली देश होता। ईसाई धर्मानुयायियों के पास लगभग एक लाख पादरी हैं वे संसार भर में फैले हुए हैं ओर जिस तत्परता से अपने धर्म की सेवा कर रहें हैं उसका परिणाम आश्चर्यजनक हुआ है। इन दिनों संसार की आबादी 400 करोड़ है। इनमें से ईसाई धर्मानुयायी 125 करोड़ के करीब है। अर्थात् संसार की समस्त जन संख्या में एक तिहाई के लगभग ईसाई हैं। इस आश्चर्यजनक सफलता में पादरी वर्ग की लगन और तत्परता को असाधारण श्रेय दिया जा सकता है। यों दूसरे लोग भी इनके पीछे हैं। साधन अन्य लोग ही जुटाते हैं पर अगले मोर्चे पर तो उन्हें ही लड़ना पड़ता है। पादरी लोग जिस लगन से अपने प्रयास में जुटे हुए हैं उसे देखते हुए उनके यह हौंसले निरर्थक नहीं हैं कि अगले 25 वर्षों में संसार की आधी आबादी ईसाई धर्मानुयायी होगी। लगन बड़ी चीज है। मनुष्य की संकल्प शक्ति और क्रिया शक्ति का यदि एकाग्र समन्वय हो जाय तो उसका चमत्कारी प्रतिफल होना स्वाभाविक ही है।
भारत की साधु संस्था में किसी समय ऐसी ही प्रखरता थी। तब उसने एशिया का कोना−कोना प्रभावित किया था। बौद्धधर्म के प्रचारक सुदूर पूर्व और मध्य एशिया के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में दौड़ पड़े थे। कठिनतम मार्ग उन्होंने पार किये थे। सामान्य सी नौकाओं के सहारे छै-छै महीने में पार हो सकने वाली समुद्र यात्राएँ उनने की थी। हिमाच्छादित दुलँध्य पर्वत श्रृंखलाएं लाँघी थी। अजनबी देशों में जाकर वहाँ की भाषा सीखी थी। अनभ्यस्त जलवायु में अपने को ढाला था। सघन वन्य प्रदेशों में होकर जाने वाले मार्गों में हिंस्र पशुओं, और उफनते नदी नालों से टक्कर ली थी। सम्पत्ति और सिक्का न होने से भिक्षा को निवहि आधार बनाया था, और भी न जाने क्या-क्या सहा था। इन प्रचार यात्राओं पर निकलने वालों में से आधे तो मार्ग की कठिनाइयों वे जूझते हुए ही शहीद हो जाते थे। जो बचते थे वे वापिस लौट सकना असंभव मानते थे। और शेष जीवन की आहुति मानव परिवार की सेवा साधना के यज्ञ में प्रसन्नतापूर्वक लगाते थे। यह थी जीवट जिसने किसी समय सम्पूर्ण एशिया को हिन्दू धर्म एवं बौद्ध धर्म के झंडे के नीचे दीक्षित किया था। इतना ही नहीं उनने पृथ्वी के अन्य महाद्वीपों में भी पदार्पण किया था। और सच्चे अर्थों में जगद्गुरु का उत्तरदायित्व निवाहा था।
यह उस जमाने की चर्चा हो रही है जब साधु संस्था जीवन्त स्थिति में थी। उन्हीं दिनों परिव्राजक घर-घर जाकर अलख जगाते थे। जन-जन को प्रेरणा देते थे। सत्संग के लिए कोई उनके पास आये इसकी प्रतीक्षा किये बिना वे स्वयं ही घर पर पहुँचते थे। कष्ट साध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति अस्पताल कहाँ पहुँच पाता है, डाक्टर को ही उसके द्वार तक चलकर पाना पड़ता है। खेत कब बादलों को तलाश करते फिरते हैं। बादल ही दौड़-दौड़ कर खेतों की प्यास बुझाने पहुँचते हैं। इस प्रयास का ही परिणाम था कि एक भी भारत वासी संतों की पकड़ से बाहर न था।
ब्राह्मण वर्ग पण्डित और पुरोहितों के रूप में अपने समीपवर्ती लोगों को यजमान बनाकर पकड़ बैठता था और साधु वर्ग परिव्राजक के रूप में जहाँ आवश्यकता समझता था वहाँ पहुँचता था जब तक अभीष्ट प्रयोजन पूरा न हो तब तक ठहरता था। दोनों ही वर्ग मिल जुलकर अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन विस्तार एवं पोषण करते थे। भावनात्मक परिष्कार एवं प्रगतिशील गीत-विधियों के संचालन में निरन्तर संलग्न साधु संस्था इस देश के नागरिकों को देवस्तर से नीचे नहीं गिरने देती थी। ऐसी दशा में स्वर्गोपम परिस्थितियों का निर्माण स्वाभाविक ही था। उसका लाभ दूर-दर तक के देशों को मिलना ही था। सो ही होता रहा। जीवन्त साधु संस्था के महान कर्तृत्व का इतिहास इतना उज्ज्वल है कि उसे शत-शत कण्ठों से युग-युगान्तर तक गाया सुनाया जा सकता है।
आज संख्या की दृष्टि से साधु संस्था प्राचीन काल की तुलना में अत्यधिक बढ़ी-चढ़ी है, पर वह भार भूत बन कर रह रही है। न उनके पास लक्ष्य है न त्याग,न जीवन न साहस। व्यक्तिवाद, पलायन वाद, भाग्यवाद ने उसे घेर लिया है। सुविधाजनक निर्वाह प्राप्त करने के अतिरिक्त लगता है और कोई उद्देश्य ही सामने नहीं रहा। साधु-सन्तों को परलोक में स्वर्ग और मुक्ति का सुख चाहिए। ही। देने के उनके पास कुछ नहीं है। करने को भी कुछ रहा नहीं। परम हंस वेदान्ती भजनानन्दी होकर भी भला सेवा कार्यों के झंझट में पड़ना पड़ा तो फिर गृहस्थ का परिश्रम शील जीवन ही किस लिए छोड़ा?
ब्राह्मण वर्ग को वंश के आधार पर ही जब अभिवादन सम्मान मिल गया तो उसे आदर्शवाद के झंझट में पड़ने से और क्या अतिरिक्त लाभ मिलेगा। दान दक्षिण का लाभ का अनायास ही मिल जाता है तो सेवा धर्म अपनाने से भी और अधिक क्या मिलना है? मन्त्रोच्चारण अथवा कर्मकाण्डों का विधि-विधान सीख लिया तो देवताओं से लाभ हानि कराने की ऐजेन्सी हाथ लग गई। लोगों पर दबदबा बनाये रखने के लिये यही हथकंड़ा क्या कम है। मुहूर्त, जन्म पत्र, ग्रह-दशा आदि नाम पर किसी को भी डराता रोका जा सकता है यह अधिकार भी क्या कम है। देवताओं के प्रतिनिधि—ईश्वर के निकट वर्ती पापों के दण्ड फल से छुटकारा दिलाना सस्ते में स्वर्ग का साधन बना देना जैसे सूत्र जब हाथ लग गये तो आज का ब्राह्मण उन झंझटों में क्यों पड़े जिनमें उसके पूर्वज पड़े और मरे खपे।
आज की साधु संस्था की गति विधियों का निरीक्षण करे और यह देखें कि उसका क्या अनुदान समाज को मिल रहा है तो भारी निराशा होती है। मन्त्र तन्त्र के जाल जंजाल—कथा पुराणों के विनोद प्रसंग—अन्ध-विश्वासी प्रचलनों का समर्थन खर्चीले कर्मकाण्डों में जन सम्पदा का अपव्यय जैसे निरर्थक क्रियाकलापों में स्वयं उलझे हुए और दूसरों को उलझाते हुए ही उन्हें पाया जायगा। यदि यह शक्ति उपयोगी कार्यों की ओर मुड़ गई होती तो भारत से साम लाख गाँवों में से प्रत्येक की पीछे आठ-आठ सन्त आते और वे देखते-देखते निरक्षरता, गन्दगी, व्यसन, सामाजिक कुरीतियाँ जैसी दुखदायी समस्याओं को सहज ही हल कर सकते थे। जन-सहयोग जुटाकर श्रमदान से एक से एक बढ़कर उपयोगी निर्माण कार्य खड़े कर सकते थे। एक-एक मुट्ठी अनाज संग्रह करके उन सृजनात्मक कार्यों को ही सहज सम्पन्न कर सकते थे, जिन्हें करने की बात सरकार के सामने अभी चिरकाल तक विचाराधीन ही बनी रहेगी।
एक छोटा-सा गाँव—दो सौ घरों का, उसमें दो सौ मुट्ठी अन्न धर्म-घटों में इकट्ठा कराया जाता रहे तो प्रतिदिन प्रायः 50 किलों अन्न जमा होता है। लगभग 50 प्रतिदिन की इस आमदनी का अर्थ हुआ महीने में 1500 इतने धन से उस गाँव के बालकों की, प्रौढ़ों की शिक्षा
समस्या हल हो सकती है। स्वच्छता का प्रबन्ध हो सकता है। एक परिवार पीछे एक आदमी एक घण्टा श्रमदान दिया करे तो दो सौ घरों से 200 घण्टे का श्रम मिला। अर्थात् आठ घण्टे श्रम करने वाले 25 श्रमिकों की व्यवस्था हो गई। इस समय में सफाई, मल−मूत्र, गृह,खाद के गड्ढे, सड़कों की चौड़ाई,तालाबों की सफाई, बाँधों का निर्माण आदि न जाने कितने उपयोगी कार्य हो सकते है। हर गाँव में आठ साधु डेरा डालकर पड़ जायें और उसमें हर घर से एक मुट्ठी अनाज एवं एक घण्टा श्रम प्राप्त करने का प्रयास करलें तो देखते−देखते गाँव का काया−कल्प हो सकता है।
यह तो एक छोटा उदाहरण हुआ। वस्तुतः 56 लाख साधु−संख्या और 56 लाख ब्राह्मण संख्या इतनी बड़ी जनशक्ति है कि उसके आधार पर ने केवल भारत का, वरन् समस्त संसार का पुनर्निर्माण सरल और सम्भव हो सकता है।
किन्तु ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि यह वर्ग जिस ढाँचे में ढल गया है, जिस वातावरण ने उन्हें जकड़ रखा है, वह सब बहुत ही सड़ा−गला है। उसमें विडम्बनाएँ पल सकती है, कोई बड़ा प्रयोजन पूर्ण नहीं हो सकता। अब यह वर्ग तप त्याग कर सकने की स्थिति में नहीं रहा,क्योंकि मध्यकाल के अज्ञानांधकार युग में साधु−संस्था का दर्शन ही आक्रमणकारियों ने विकृत कर दिया है, अब उसमें सुधार कदाचित ही हो सके।
कितना अच्छा होता कि वर्तमान साधु−संस्था ही सुधर या बदल सकी होती तो फिर नये सिरे से कुछ न करना पड़ता। इन लोगों के थोड़ा−सा बदल जाने से काम चल जाता है, पर वैसा अशक्य हैं, क्योंकि क्रियाऐं विचारणा कर निर्भर रहती हैं। आदर्शों की प्रबल प्रेरणा ही मनुष्य से तप−त्याग भरे कष्ट−साध्य कार्य करा लेती है, उसका अभाव हो तो क्रियाएँ सर्वथा निर्जीव रहेंगी और लकीर पीटने की तरह विवशता में अथवा प्रदर्शन के लिए कुछ चिन्ह−पूजा की जाती रहेगी। उससे कुछ काम बनेगा नहीं।
हमने व्यक्ति गत रूप से पूरे तीस वर्ष तक इस संदर्भ में पूरा−पूरा प्रयास किया है। लगभग हर जमात,सम्प्रदाय वालों से मिले हैं, यह अनुरोध किया है कि देश की प्रगति में किसी प्रकार योगदान दें। यही प्रार्थना पण्डित−पुरोहितों से भी करते रहे। वे क था−वार्ताओं में, पूजा उपचारों में कुछ तो ऐसा कहते ही रह सकते हैं, जो व्यक्ति एवं समाज को ऊँचा उठाने में, आगे बढ़ाने का राई−रत्ती सहायता कर सकें। पर उत्तर में यही प्रतिक्रिया प्राप्त हुई कि उन्हें इस संदर्भ में कोई दिलचस्पी नहीं हैं। स्वर्ग, मुक्ति की ठेकेदारी से एक कदम भी बढ़ने का उनका इरादा नहीं है। देवताओं को वश में करना उन्हें अभीष्ट है या फिर जनता को ऐसी पट्टी पढ़ाने में उनकी रुचि है, जिससे लोग उनका अधिक रौब मानें, अधिक धन और सम्मान प्रदान करें। लोक−मंगल को वे ‘माया में पड़ना’ कहते हैं। सेवा करना ‘शूद्रों का काम’ बताते हैं। जो दुखी हैं, उन्हें पाप−दण्ड भुगतने वाला सिद्ध करते है और कहते हैं—ईश्वर के विधान में बाधा डालकर सुधार सँभाल की बातें करने वाले भगवान के क्रोध के भाजन बनेंगे। जो हो रहा है—ईश्वर की मर्जी से होगा। सेवा सुधार की बात करना व्यर्थ है। जिनने इस प्रकार की मान्यताएँ बना रखी हों, उनसे यह आशा करना निरर्थक है कि मानवी प्रगति में किसी प्रकार का योगदान करने के लिए वे सहमत हो सकेंगे।
वस्तुतः दोष उनका भी नहीं है। वे एक भ्रान्त−दर्शन के शिकार हैं। मुसलमानी आक्रमण के समय एक ओर जहाँ मन्दिर−मठ गिरायें जा रहे थे, कत्लेआम हो रहें थे, वहाँ दूसरी ओर गहरी रिश्वतें देकर यह प्रयास भी किया जा रहा था कि कुछ धर्म−गुरुओं को अपने पक्ष में मिलाकर भारतीय दर्शन को भ्रष्ट किया जाय। जहाँ आत्म परिष्कार और लोग−मंगल के सारे तत्व उसमें से हटा दिये गये, और भाग्यवाद, पलायनवाद, पराधीनतावाद, व्यक्ति वाद का विष उसमें घुसा दिया गया, ताकि विचारशील व्यक्ति अपने स्वर्ग−मुक्ति के धंधे में फंस जायँ और जनता को अन्याय सहने के लिए भाग्यवाद, ईश्वर−इच्छा के नाम पर पददलित पड़ा रहने दिया जाय। उसी दार्शनिक भ्रष्टाचार की शिकार आज की साधु−संस्था है। उस विष से वह इस कदर मूर्छित हो गई है कि अब उसके उद्धार का कोई उपाय रहा नहीं दीखता।
क्रिया या कलेवर एक जैसे होने पर भी व्यक्तियों की वास्तविकता एक जैसी नहीं हो सकती। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की फिल्म बनाने वाले सुरत का आदमी ढूँढ़ निकालते हैं और उससे ऐक्टिंग भी वैसा ही करा लेते हैं। इतने पर भी वह नर वैसा नहीं हो सकता, जैसा कि वह मृत व्यक्ति था। सूर, कबीर, मीरा, तुलसी, चैतन्य,विवेकानन्द, ज्ञानेश्वर आदि पर फिल्में बन चुकी हैं। जिनने पाठ किये है, वे देखने वाले को असली या नकली के भ्रम में डाल देते हैं।’बहुरूपिये’ कई−कई तरह के वेष बदल कर दर्शकों को चक्कर में डाल देते हैं और अपनी कला का पुरस्कार पाते है। इतने पर भी वे उस असली के स्थान पर नहीं पहुँच सकते, जिसकी कि नकल बनाई गई थी।
आज साधु−ब्राह्मणों की नकल बनाने वाले बहुरूपियों की—ऐक्टरों की भरमार है। जटा, कमण्डल, धूनी, चिमटा, दाढ़ी, कोपीन सब ऐसी मानों महर्षि वेदव्यास अभी सीधे ही हिमालय से चले आ रहे हैं। ब्राह्मणों के तिलक−छाप, पगड़ी,दुपट्टा,कथा,मंत्रोच्चार ठीक वैसा ही गुरु−वशिष्ठ का आगमन अभी−अभी हो रहा है। बाहरी दृष्टि से सब कुछ ऐसा बन जाता है कि ‘टू कापी’ कहने में किसी को झिझकना पड़े। किन्तु आचार और विचार में जमीन−आसमान जितना अन्तर होने से उस नकल से कुछ प्रयोजन साधता नहीं—कुछ बात बनती नहीं।
अवाँछनीय लाभ उठाते रहने वाले वर्गों को कष्टसाध्य आदर्शवादी मार्ग पर चलने के लिए तैयार करना प्रायः असम्भव हो जाता है। राजा लोग समय रहते बदल सकते थे। ऐसा करके वे अपना प्रभाव और वर्चस्व भी बनाये रह सकते थे, जनता का हित कर सकते थे और दुर्गति से बच सकते थे, पर उनसे वैसा साहस करते बन नहीं पड़ा। जमींदार,रईस, सामन्त मिटते गये,पर बदले नहीं। जिन्हें मुफ्त में प्रचूर धन वैभव मिल रहा है। बिना तप, त्याग के पूजा−सम्मान पा रहे हैं, उनकी आत्मा इतनी बलिष्ठ न हों सकती कि आदर्शवादी जीवनचर्या अपना सकें, अहंकार को त्याग सकें और कष्टसाध्य सेवा साधना में आने को संलग्न कर सकें। यह इसलिए और भी अधिक कठिन है कि उन्हें आरम्भिक प्रेरणा व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की पूर्ति से मिली है। उनका मन, मस्तिष्क इसी लाभ ने आकर्षित किया है। लोक में धन, सम्मान,परलोक में स्वर्ग−मुक्ति का लाभ तनिक −सा वेष बदलने भर से मिल सकता है। यही आकर्षण उन्हें इस राह पर खींच कर लाया है। दूसरों का शोषण अपनी स्वार्थ −सिद्धि जिन्हें उपयुक्त जंची है, उन्हीं ने इस मार्ग पर छलाँग लगाई है। यदि उन्हें आरम्भ में ही तप, त्याग,संयम,सेवा की बात कही जाती तो कदाचित वे साधु बनने के लिए कदापि तैयार न होते। इस आन्तरिक दुर्बलता का लगातार पोषण ही होता रहा है, समर्थन ही मिलता रहा है। अब वे अपनी मूल मान्यताएँ बदलें तभी उन्हें सेवा−साधना की बात जँच−रुच। यह इतना कठिन है, जिसे लगभग असम्भव भी कहा जा सकता है। जो लोग संसार को माया कहते हैं, सेवा का शूद्रों का कार्य बताते रहे हैं, जिन्हें” तोहि बिरानी क्या पड़ी, तू अपनी निरबेर “ की बात आदि से अन्त तक सुनने को मिलती रही हैं, वे परम गहन सेवा−धर्म स्वीकार करने का, प्रभू समर्पित जीवन जीने का साहस कर सकेंगे,ऐसी आशा नहीं ही की जानी चाहिए।
वर्तमान साधु−ब्राह्मणों का दरवाजा खटखटाते हमें एक युग बीत गया। उन्हें नीच−ऊँच समझाने में जितना श्रम किया और समय लगाया, उसे सर्वथा व्यर्थ चला गया ही समझना चाहिए। निराश होकर ही हमें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा है कि सड़ी वस्तु को पुनः स्वस्थ स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा। हमें नई पौध लगाने और नई हरियाली उगाने के लिए अभिनव प्रयत्न करने होंगे। उसी का आरम्भ कर भी रहे हैं।
विश्वास किया जाना चाहिए कि आदर्शवादिता अभी पूरी तरह अपंग नहीं हो गई हैं। महामानव स्तर की भावनायें सर्वथा को विलिप्त नहीं हो गई हैं। लोभ और मोह ने मनुष्य को जकड़ा तो जरूर है, पर वह ग्रहण पूरा खग्रास नहीं है। सूर्य का एक ऐसा कोना अभी भी खाली है और उतने से भी काम चलाऊ प्रकाश किरणें विस्तृत होती रह सकती है। ऋषि−रक्त की प्रखरता उसकी सन्तानों की नसों में एक बूँद भी शेष रही हो—ऐसी बात नहीं है। दम्भ का कलेवर आकाश छू रहा है—सो ठीक है,पर सत्य न अभी भी मरण स्वीकार नहीं किया है। अपराधी में हर व्यक्ति अन्धा हो रहा हैं पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि परमार्थ की परम्परा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। देश,धर्म, समाज और संस्कृति की बात सोचने के लिए किसी के भी मस्तिष्क में गुंजाइश नहीं रहीं ही, अभी ऐसा अन्धकार नहीं छाया है। अब किसी के भी मन में दूसरों के लिए दर्द ने रह गया हों, दूसरों के सुख में अपना सुख देखने वाले हृदय सर्वथा उजड़−उखड़ गये हों, ऐसी बात नहीं है। धर्म के बीच नष्ट तो कभी भी नहीं हुए हैं। आत्म−सत्ता की वरिष्ठता का आत्यन्तिक मरण हो गया हो— ऐसी स्थिति अभी नहीं आई है। मनुष्य ने पाप और पतन के हाथों अपने को बेच दिया हो और देवत्व से उसका कोई वास्ता न रह गया हो— ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मानवी महानता अभी कहीं न कहीं, किसी न किसी अंश में जीवित जरूर मिल जायगी। हम उसी को ढूंढ़ेंगे। जहाँ थोड़ी−सी साँस मिलेगी,यहाँ आशा के चीवर ढुलाऐंगे और कहेंगे—पशुता से ऊँचे उठकर देवत्व की परिधि में प्रवेश करने का प्रयत्न करो। मरणोन्मुख मनुष्यता तुम्हारी बाट जोहती है। चलो,उसे निराश न करों। हमें आशा है कि कहीं न कहीं से ऐसी आत्मा ढूंढ़ ही निकाली जा सकेगी, जिनमें मानवी महानता जीवित बच रही हो। उन्हें युग की दर्द भरी पुकार सुनने के लिए अनुरोध करेंगे और कहेंगे—मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या करने से रोकने का अभी भी समय बाकी है। कुछ तो अभी किया जा सकता है, सो करना चाहिए। अपने को खोकर यदि संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है तो इस सौदे को पक्का कर ही लेना चाहिए।
साधु−संस्था को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं, जिसके सहारे आपत्ति ग्रस्त मानवता की प्राणरक्षा की जा सके। समस्याओं के काल−पाश में गर्दन फंसाये हुए इस सुन्दर विश्व को मरण से केवल साधु ही बचा सकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक दूसरे का मुँह न ताका जाय, वरन् इस आपत्ति−काल से जूझने के लिए अपना ही कदम बढ़ाया जाय।
अखण्ड−ज्योति परिवार की मणिमाला से एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद है। समय आने पर उनके मूल्यवान् अस्तित्व का परिचय हर किसी को मिल सकता हे। अब उसी का समय आ पहुँचा। हमें समय की पुकार पूरी करने के लिए स्वयं ही आगे आना चाहिए।
यो साधु और ब्राह्मण का एक समान जीवन−क्रम होता है और उसी विधि से पूरी जिन्दगी की रूपरेखा बनाने की प्रथा है। पर आपत्ति धर्म के अनुसार सीमित समय के लिए उस क्षेत्र में प्रवेश करने और फिर वापिस अपने समय स्थान पर लौट आने की पद्धति अपनानी पड़ेगी। या तो पूरा या कुछ नहीं की, बात पर अड़ने की आवश्यकता सदा नहीं होती। मध्यम मार्ग पर चलने से कुछ तो लाभ होना ही है। पूरी न मिले तो अधूरी से काम चलाने की नीति है। युद्धकाल में प्रत्येक वयस्क नागरिक को बाधित रूप से सेना में भर्ती होने का आदेश दिया जा सकता है। जब तक संकट−काल रहता है तब तक वे सामान्य नागरिक सेना में भर्ती रहते है। स्थिति सुधरते ही वे सेना छोड़कर घर वापिस आ जाते है और अपने साधारण कार्यों में लग जाते है। साधु−संकट के इस महान् दुर्भिक्ष में भी हम सामान्य नागरिकों को थोड़े−थोड़े समय के लिए उन उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए आगे आना चाहिए। एक−एक घण्टा श्रमदान करके जब बड़े−बड़े सार्वजनिक प्रयोजन पूरे किये जा सकते है तो कोई कारण नहीं कि हम सब स्वल्प−कालीन व्रत धारण करके साधु−संस्था पर छाये हुए दुर्लभ संकट का निवारण करने के लिए कुछ न सके।
पुरे समय के लिए तत्काल भावनात्मक नव−निर्माण को ब्राह्मणोचित परम्परा का निर्वाह करने के लिए हर किसी को नहीं कहा जा सकता। जिनने पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे कर लिये हैं, उन्हें वानप्रस्थ में प्रवेश करने के लिए बहुत दिनों से कहा जा रहा है। जुलाई 73 की अखण्ड−ज्योति में इस संदर्भ में अधिक जोर दिया गया है और जो घर की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके उन्हें परमार्थिक−जीवन में प्रवेश करने के लिए वानप्रस्थ में प्रवेश करने का अनुरोध किया गया है। उनके छै−छै महीने के साधना−शिक्षा का भी प्रबन्ध किया गया है। पहला सत्र 20 जनवरी से आरम्भ भी हो रहा है। इसी श्रृंखला में दूसरे स्तर के क्लिष्ट वानप्रस्थ वे होंगे —जो अभी शेष जीवन पुरी तरह इस महान लक्ष्य के लिए समर्पित करने की स्थिति में तो नहीं है, पर अधिकाधिक साहस इसके लिए जुटाते रहेंगे। इन कनिष्ठ वानप्रस्थों का प्रशिक्षण 25 अप्रैल से दो महीने के लिए आरम्भ होगा।
अब इस श्रृंखला में एक नई कड़ी और जोड़ी जा रही है कि जिन्हें जब जितना अवकाश हुआ करे, तब वे उतने समय के लिए परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपना समय लगाने का निश्चय करें और उन्हें कहाँ क्या करना है—इसका निर्देश ‘युग−निर्माण योजना’ मथुरा से प्राप्त कर लिया करे।इस प्रकार थोड़ा−थोड़ा समय भी अनेक व्यक्ति देने लगेंगे तो उस सबका सम्मिलित परिणाम बहुत बड़ा हो जायगा। एक लाख व्यक्ति ऐसे थोड़ा−थोड़ा समय देने वाले हों तो उन सबका मिला हुआ कार्य हजारों नियमित एक पूरे जीवन के लिए साधु−संस्था में प्रवेश करने वालों जितना ही हो जायगा। यह प्रक्रिया सरल बैठेगी। इस योजना के अंतर्गत व्यस्त और पारिवारिक बोझ से लदे हुए व्यक्ति भी थोड़ा-बहुत समय देते रहेंगे तो उन्हें यह पश्चाताप न रहेगा कि हम घरेलू झंझटों में उलझे रहने रहने के कारण युग की पुकार को पूरा करने के लिए कुछ भी न कर सके। ऐसे व्यक्ति पूरा न सही—अधूरा सही का थोड़ा-बहुत अवसर पाकर भी आत्म-सन्तोष की एक साँस ले सकते हैं और कह सकते हैं कि मानवता पर छाई हुई विषम-वेला में हम मूक-दर्शक बने रहने वाले अभागों में से नहीं है। जितना कुछ संभव था, उतना तो किया ही।
बँधा रुपया न मिले। एक-एक पैसे वाले सौ सिक्के मिल जायँ तो गिनने, धरने, उठाने का झंझट तो जरूर रहेगा, पर प्रयोजन वही पूरा हो जायगा—जो एक रुपये से सम्भव होता है। पूरे समय के लिए वानप्रस्थ न मिले तो थोड़ा-थोड़ा समय देने वाले अनेकों का सहयोग लेकर भी सामयिक संकट से जूझने का सुयोग बन सकता है।
संन्यास के आदर्श बहुत ऊँचे हैं। उन्हें निबाहना पूरा समय देने वाले शिथिल प्रकृति मनुष्यों के लिए सम्भव नहीं। इसके प्रतिबन्ध बड़े हैं। भिक्षाटन आज की स्थिति के उपयुक्त नहीं रहा। जिस-तिस का जैसा-तैसा अपमान अवज्ञा और उपेक्षा पूर्वक मिला कुधान्य किसी संन्यासी की बुद्धि को सतोगुणी एवं सन्तुलित नहीं रहने देता। ऐसी-ऐसी अनेक कठिनाइयों के कारण आज की परिस्थितियों में संन्यास से प्रति हम असहमति प्रकट करते रहें हैं और यही कहते रहें है कि परमार्थ प्रयोजन के लिए जीवन समर्पण करने वालों के लिए वानप्रस्थ ही उपयुक्त है। उसमें घर परिवार के साथ सम्बन्ध बनाये रहने की सुविधा है। साथ ही प्रतिबन्ध में उतने कड़े नहीं है। हरिजन शब्द की तरह आज संन्यास भी निठल्ले, अकर्मण्य लोगों का पर्यायवाची बन गया है। इसलिए भी हम वानप्रस्थ को ही इन दिनों साधु और ब्राह्मण का सम्मिश्रित स्वरूप मानते रहे हैं और उसी में उत्तरार्द्ध परम्परा के दोनों आश्रमों का समावेश करते रहे है। आज की स्थिति में युग-धर्म के अनुरूप यही हल सर्वोत्तम है।
अपनी योजना के अनुसार ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजनों को थोड़े-थोड़े समय के लिए वानप्रस्थ लेने का साहस करना चाहिए और नियत अवधि पूरी करके अपने घरों को लौट जाना चाहिए। जब-जब उन्हें अवकाश मिले, तब-तब ऐसे कदम बार-बार उठा सकते हैं। नियत समय पर नियत अवधि के लिए पहले से भी ऐसा व्रत ले लिया जाय तो उससे अपने ऊपर एक बन्धन, उत्तरदायित्व बँधता है। इस दृष्टि से वैसा साहस कर गुजरता वैसा ही है-जैसा कि परीक्षा का फार्म भर देने पर पढ़ने की गति एवं चेष्टा में गतिशीलता का आना। यह प्रक्रिया यदि उत्साह पूर्वक अपनाई जा सके तो साधु-संस्था के मरणासन्न होने के कारण विश्व-मानव के सिर पर विनाश की जो काली घटाएँ छा रही हैं, उन्हें सुविधा पूर्वक हटाया जा सकता है।
स्वल्प-कालीन व्रत धारण आज हमें एक अनोखी बात मालूम पड़ती है, पर वस्तुतः इसमें अनोखापन कुछ भी नहीं है। इन दिनों वैसा प्रचलन न रहने से ही ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई नई बात है। प्राचीन काल में साधु-संस्था की सहायक दूसरी पंक्ति खड़ी करने के लिए यह प्रयोग बराबर होता रहा है।
गुरुकुलों में पढ़ने के लिए विद्यार्थी भेजे जाते थे। उन्हें जीवन के पूर्वार्द्ध के प्रथम चरण में ही साधु-जीवन की उपयोगिता,आवश्यकता एवं महत्ता का अनुभव करा दिया जाता था। विद्यार्थी को गुरुकुल में प्रवेश करते ही साधु परिवेश में प्रवेश करना पड़ता था। शोभा सौंदर्य के सभी विलासी उपकरण उतार दिये जाते थे। सिर के बालों का मुण्डन करा के ही आश्रम में प्रवेश मिलता था। लकड़ी की खड़ाऊँ, हाथ में दण्ड, कमर में कसा हुआ लँगोट, छाता आदि सुविधा उपकरणों का त्याग, काजल लगाने जैसे सौंदर्य उपादानों का त्याग, भूमि-शयन, पीतवस्त्र धारण—यह सभी चिन्ह साधु के हैं। गुरुकुल व्यवस्था चलाने के लिए गौएँ चराकर, कृषि उद्यान में जुटे रहकर—कठोर श्रम शीलता को अभ्यास में उतारते थे। तप, तितीक्षा के हैं। भूतकालीन गुरुकुलों के छात्र एक प्रकार से तपस्वी ही होते थे। सेवा या प्रचार कार्य तो सेवा या प्रचार कार्य तो अल्पवयस्कता के कारण नहीं कर पाते थे, पर ऋषियों के साथ−साथ यज्ञादि आयोजनों में जाकर सहायक भी रहते थे और सीखते भी थे।
घर परिवार वाले इस तपश्चर्या पूर्ण प्रशिक्षण से प्रसन्न होते थे। वे जानते थे कि इस प्रकार की जीवनचर्या में थोड़ी शारीरिक कठिनाई तो रहती है, पर उनके बालकों के व्यक्तित्व के समग्र विकास का लाभ इतना बड़ा है, जिसको देखते हुए इस प्रकार का कष्ट सहन करना बहुमूल्य सम्पदा का मूल्य चुका कर खरीदने जैसा आवश्यक भी है। इसलिए किसी अभिभावक को इसमें संकोच नहीं होता था, वरन् खुशी−खुशी अपनी प्राण−प्रिय सन्तान को दस वर्ष की आयु में ही गुरुकुलों में प्रवेश करा देते थे।
अध्ययन अवधि पूरी करके छात्र—साधू−बाबाजी नहीं बन जाते थे, वरन् अपने घर−परिवार में वापिस लौटते थे और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। सामान्य नागरिक का जीवन जीते थे। जन−साधारण जैसी वेषभूषा धारण करते थे और लोक−प्रचलित पद्धति के अनुरूप आचार−व्यवहार करते थे। विवाह होता था और सन्तानोत्पादन का क्रम भी चलता था। आजीविका उपार्जन के कार्यों को भी सँभालते थे। इस प्रकार लम्बी अवधि तक यह बदला हुआ जीवन−क्रम अपनाया जाता रहता था। गुरुकुलों में रहकर जिस प्रक्रिया को अपनाना पड़ा था, उससे यह गृहस्थ की रीति−नीति सर्वथा भिन्न ही थी।
यह परिवर्तन यह बताता है कि साधु−संस्था में प्रवेश करके फिर गृहस्थ−जीवन में वापिस लौटा जा सकता है। उत्तरार्द्ध में—पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होने पर अनवरत साधु−जीवन बिताया जा सकता है, पर जब तक वैसी स्थिति नहीं है, तब तक यह अनिवार्य नहीं कि या तो सदा सर्वदा के लिए परमार्थ क्षेत्र में प्रवेश करें या फिर उससे सर्वथा दूर रहें। अतिवाद के इन दोनों सिरों से पीछे हटकर मध्यवर्ती मार्ग अपनाया जा सकता है। बौद्धधर्म में तो मज्झम मग्ग की—मध्यम मार्ग की उपयोगिता पर ही अधिक बल दिया गया है। क्योंकि वह सरल भी है और सर्वोपयोगी भी।
गृहस्थ−जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी बीच−बीच में साधु−प्रयोजनों का अभ्यास बनाये रहने के लिए उस क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने में योगदान देने के लिए लोग थोड़े−थोड़े समय के लिए परमार्थ−परायण जीवनचर्या अपनाते थे। इसे तीर्थयात्रा कहा जाता था। उस समय की तीर्थयात्रा आज से सर्वथा भिन्न थी। आज तो लोग अमुक देवालय का दर्शन करने या नदी−सरोवर में नहाने को ही तीर्थयात्रा मान बैठे हैं और उतने भर को ही पुण्यफल का आधार मानने लगे हैं। पुराने जमाने में तीर्थयात्रा इतनी सस्ती न थी। उन दिनों पुण्यफल की गरिमा का सही रूप से मूल्यांकन किया जाता था और उसका समुचित मूल्य चुकाया जाता था। उन दिनों कोई आज जैसी विडम्बना रचता तो, देखने वाले हँसते−हँसते लोट−पोट हो जाते। रेल−मोटर से दौड़ते सीधे किसी मन्दिर में जा पहुँचना, दर्शन करना, दक्षिणा फेंकना, जलाशय में डुबकी लगाना और झट वापिस लौट पड़ना। थोड़ा−सा समय, थोड़ा−सा पैसा खर्च करना— इतने से ही तीर्थयात्रा हो गई। पर्यटन का मनोरञ्जन तो हो ही गया, सो नफे में। पुराने लोग समझदार थे, उन्हें इतनी सस्ती विडम्बनाओं में भला कैसे समाधान मिलता? इन दिनों कोई ऐसी बालक्रीड़ा रच रहा होता तो उसे उपहास और भर्त्सना के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं मिलता। पर आज तो हर चीज नकली चल पड़ी है। नकली तीर्थयात्रा करके नकली पुण्य−फल से ही लोग सन्तोष कर लेते हैं। नकली दूध, नकली घी, नकली रेशम, नकली स्वर्ण, नकली रत्न, नकली दाँत, नकली आँख आदि हर क्षेत्र में नकलीपन का बोलबाला है तो तीर्थयात्रा और पुण्य−फल भी नकली ही क्यों न हों?
बात आज की नहीं हो रही है। चर्चा विवेक को प्रधानता देकर चलने वाले पुराने समय की जा रही है। उन दिनों तीर्थयात्रा धर्म−प्रचार के लिए, सेवा−प्रयोजनों के लिए, लोक−कल्याण के लिए होती थी। तीर्थयात्रा जत्थे बनाकर पैदल चलते थे। थोड़ी−थोड़ी दूर प्रतिदिन चलते थे, रात को किसी गाँव में पड़ाव डालते थे और वहाँ की स्थिति के अनुरूप स्थानीय लोगों से विचार विनियम करते थे। परामर्श देते थे, प्रवचन करते थे, भावनात्मक वातावरण बनाते थे और श्रम सहयोग की जरूरत पड़ती थी तो कुछ समय वहाँ रुक कर उसमें भी जुटते थे। यही क्रम चलता रहता था और वे जत्थे सैकड़ों ग्राम−नगरों में प्रेरणा भरने प्रकाश उत्पन्न करने का प्रयोजन पूरा करते हुए धीरे−धीरे घर वापिस लौटते थे। कहाँ तक जाना, किस मार्ग से जाना, कहाँ होकर लौटना—यह सब योजनाबद्ध रूप से पहले ही अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुरूप निश्चय कर लिया जाता था। वस्तुतः वे धर्म−चक्र प्रवर्तन के लिए किये गये प्रवास−प्रयाण ही होते थे। उनका उद्देश्य परिव्राजकों की आवश्यकता को आँशिक और सामयिक रूप से पूरा करना होता था।
तीर्थयात्रा में परिक्रमा−क्रम जुड़ा होता था। जिस मार्ग से जाना होता था, उसी से वापिस नहीं लौटते थे, वरन् परिक्रमा क्रम अपनाते थे। उत्तरा−खण्ड की यात्रा, ब्रज−यात्रा, नर्मदा−परिक्रमा आदि अनेकानेक तीर्थयात्रा उपक्रम ठीक इसी आधार पर बने हुए थे। चारों−धाम— भारत के चारों कोनों पर इसी दृष्टि से बनाये गये थे कि भारत−माता का सम्पूर्ण रूप देखने का उन यात्रियों को सौभाग्य मिले।
तीर्थ−यात्रियों के जत्थे किन्हीं सुयोग्य मनीषियों के नेतृत्व में चलते थे। वे रात्रि को तो ठहरने वाले गाँव की जनता का उद्बोधन करते थे, वहाँ यात्री दल का प्रशिक्षण करते थे। इस प्रकार दुहरा प्रयोजन पूरा होता चलता था। एक ओर वे यात्री लोग अध्यात्म दर्शन, उत्कृष्ट जीवन एवं लोक−मंगल के विभिन्न पक्षों पर अपनी ज्ञान−वृद्धि करते थे, दृष्टिकोण परिष्कृत करते थे। वहाँ दूसरा लाभ यह भी होता था कि जन−सेवा का व्यावहारिक स्वरूप अपने अनुभव, अभ्यास में ला सकें। जन–संपर्क में जो झिझक रहती है, उसे दूर करके हर मनुष्य को अपना आत्मीय समझने की व्यावहारिकता को स्वभाव का अंग बना सकें। तीर्थ−यात्रा के जत्थे अपने निजी प्रशिक्षण का परिपूर्ण लाभ लेते थे, साथ ही जन−सेवा का सुअवसर भी प्राप्त करते थे। दोनों का समन्वय निश्चय ही उन दिनों पुण्य फलदायक रहता होगा। यात्रा अवधि में ब्रह्मचर्य, भूमि−शयन, क्षोभ−विक्षोभों से बचाव, आहार−बिहार का संयम, श्रम−साधना, तितीक्षा−नियमित उपासना आदि की तपश्चर्या तो अनिवार्य रूप से करनी पड़ती थी। इस प्रकार वह अवधि इन यात्रियों के लिए साधु−संस्था के सदस्यों को मिलने वाला प्रत्येक सुअवसर प्रदान करती रहती थी।
इस वर्ष युग−निर्माण शाखाओं में पन्द्रह−पन्द्रह दिन के शिक्षण−शिविर चलाने की सुविस्तृत योजना बनाई गई है। उनमें प्रातः 5 से 9 बजे तक सक्रिय सदस्यों एवं लोक सेवा के सामयिक क्रियाकलापों की विधि−व्यवस्था चलाई जाया करेगी। सायंकाल जनता की विचार−क्रान्ति के हर पहलू से परिचित कराने वाली व्याख्यान शृंखला का, प्रेरक गायनों का लाभ दिया जाया करेगा। इन शिविरों में कार्यकर्त्ताओं का और जनता का समानान्तर प्रशिक्षण चला करेगा। आशा की जा रही है कि नव−निर्माण अभियान में इस शिविर−शृंखला के कारण असाधारण गतिशीलता उत्पन्न होगी।
प्राचीन काल की तीर्थ−यात्राएँ ठीक यही प्रयोजन पूरा करती थीं, जो इस वर्ष शिविर शृंखला आन्दोलन के अंतर्गत हम लोग करने जा रहे हैं। उसमें विशेषता एक और भी थी कि निर्धारित प्रशिक्षण परिव्राजक−पद्धति से होता रहता था, अधिक स्थानों की अधिक जनता लाभ उठाती रहती थी। जब कि प्रस्तुत शिविरों में केवल एक ही स्थान के लोग उसे प्रेरणा ग्रहण कर सकेंगे। इन शिविरों में यात्रा मनोरञ्जन की विशेषता भी नहीं है। फिर शिक्षार्थी अपने घरों पर ही तो रहेंगे। जहाँ का वातावरण उन्हें प्रभावित करता रहेगा और उच्च प्रेरणाओं को सीमित रूप से ही हृदयंगम कर सकना उनके लिए सम्भव होगा। तीर्थयात्रा के सदस्यगण एक लक्ष्य, एक विचार−पद्धति, एक प्रक्रिया, एक वातावरण लेकर चलते हैं। झंझट जंजालों से उद्विग्न होने की परिस्थितियाँ नहीं रहतीं। अस्तु जो सुना, समझा, सीखा, किया गया है, उसका अधिक गहरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इस प्रकार तीर्थ यात्रियों की प्रक्रिया अपनी शिविर−शृंखला की तुलना में हलकी नहीं, तगड़ी ही पड़ती थी। उनका प्रचलन खूब था। लोग उत्साह पूर्वक इन यात्राओं को निकलते थे और एक दूसरे को उसमें सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहन, आमन्त्रण देते थे।
प्राचीन काल की तीर्थयात्रा प्रक्रिया का गम्भीरता पूर्वक विवेचन विश्लेषण किया जाय तो भली प्रकार स्पष्ट हो जायगा कि वह वानप्रस्थ और संन्यास की सम्मिलित पद्धति थी। उससे साधु−संस्था का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता था।
उन दिनों सुयोग्य वानप्रस्थी और तेज−पुञ्ज संन्यासी होते तो थे, पर उनकी संख्या उतनी नहीं थी—जितनी कि आवश्यकता थी। उस कमी को पूरा करने के लिए तीर्थयात्रा की अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया का आविर्भाव हुआ। उसमें थोड़−थोड़े समय के लिए सुयोग्य व्यक्ति घर से निकलते थे और आत्म−निर्माण लोक−मंगल की उभयपक्षीय आवश्यकताओं को आशाजनक मात्रा में पूरा करते थे। यह धर्म−चेतना के लिए आँशिक समय−दान ही तो हुआ। तीर्थयात्रा के लिए वयोवृद्ध एवं गृह−निवृत्त ही नहीं निकलते थे, वरन् उनमें किशोर, वयस्क, विवाहित, अविवाहित नर−नारी सभी वर्ग के, सभी आयु के लोग होते थे। समय निकालने से निकल भी आता है। इच्छा में तीव्रता होते व्यवस्था भी कुछ न कुछ बन ही जाती है। हारी−बीमारी आ जाय, तो भी मनुष्य को अवकाश लेना पड़ता है। तीर्थयात्रा को लोग धर्मधारणा का आवश्यक अंग मानते थे तो उसके साथ समय एवं धन भी किसी प्रकार जुट ही जाता था। परिवार के अन्य सदस्य थोड़े समय तक उसके उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर चलाते थे और इच्छुक को बिना किसी अड़चन के धर्म−प्रवास में सम्मिलित होने का अवसर मिल जाता था।
तीर्थयात्रा से लौटने के बाद लोग फिर सामान्य जीवनयापन करने लगते थे और पिछले उत्तरदायित्वों को पूर्ववत् संभाल लेते थे। कोई यह नहीं सोचता था कि एक बार तीर्थयात्रा पर निकले तो सदा−सर्वदा तीर्थयात्रा ही करती रहनी पड़ेगी। सामयिक स्वल्प−कालीन धर्म सेवा का प्रचलन अपने देश में सदा से रहा है। तीर्थयात्रा उसी का ज्वलन्त उदाहरण है। गुरुकुलों की शिक्षा−पद्धति वाली प्रक्रिया भी सामयिक साधु−जीवन की रीति−नीति ही है। स्पष्ट है कि साधु−संस्था में समय अवधि के लिए प्रवेश करना हमारी पुरातन परम्परा है। आज उसके पुनर्जागरण की अनिवार्य आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
प्राचीन समय में भारत इतना ही छोटा न था, जितना कि अब है। उसका विस्तार प्रायः सम्पूर्ण विश्व में था। शासन−तन्त्रों की स्थापना में भारत ने सदा स्थानीय लोगों को ही प्रशिक्षित किया है और राज−काज चलाने की जिम्मेदारी उन्हीं के कन्धों पर डाली है। राम ने सोने की लंका जीती, पर वहाँ से एक लोहे की कील भी अयोध्या नहीं लाये। जिस पुष्पक−विमान पर बैठ कर आये थे, वह भी उन्होंने वापिस कर दिया। राज्य विभीषण को सौंपा गया। यही नीति अन्यत्र भी रही। थोड़े दिनों प्रशिक्षण के लिए कहीं ठहरना पड़ा तो, यह बात दूसरी है। अन्यथा चक्रवर्ती शासन पद्धति के अंतर्गत न्याय−नीति पर चलने के लिये बाध्य करने लायक शक्ति हाथ में रखना वे पर्याप्त मानते थे। असली भारत विस्तार तो साँस्कृतिक एवं धार्मिक प्रक्रिया के साथ जुड़ा था। भारत का वास्तविक सीमांकन इस धर्म नेतृत्व के आधार पर ही किया जाता रहा है। इस दृष्टि से वह बौद्धकाल तक सम्पूर्ण एशिया में छाया रहा। इससे पूर्व तो उसकी परिधि समस्त भूमण्डल के सुदूर प्रदेशों तक को छूती रही है।
एक हजार वर्ष पहले के निकटवर्ती भूतकाल में भारत का वर्चस्व मध्य एशिया और सुदूर पूर्व के द्वीप समूहों तक फैला हुआ था। इन पंक्ति यों में चर्चा उन द्वीपों की हो रही है, जिन्हें आज हिन्द−चीन के नाम से पुकारते हैं। भारत की सीमा से लगा हुआ बर्मा देश है। उससे आगे श्याम मिला हुआ है। अब सन् 1948 से उसका नाम बदलकर ‘थाईलैण्ड’ रख दिया गया है।
थाईलैण्ड संसार का एक मात्र ऐसा देश हैं, जहाँ बौद्धधर्म—राजधर्म भी है। अन्य देशों ने तो भारत की परम्परागत संस्कृति इन थोड़े ही दिनों में गँवा दी, पर यह अकेला देश ऐसा है, जिसमें वर्तमान भारत की परिधि से आगे जाकर यह देखा जा सकता है कि प्राचीनकाल में भारत की रीति−नीति का क्या स्वरूप था? वहाँ जो देखने को इन दिनों भी मिलता है, उससे यह पता लगाया जा सकता है कि भारत किन मान्यताओं और आदर्शों के कारण उन्नति के उच्च स्तर पर पहुँचा था और शान्ति का सन्देश सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाने में किन परम्पराओं के कारण सफल हुआ? आज कई बातों में थाईलैण्ड हमें ऐसी शिक्षाएँ और प्रेरणाएं दे सकता है, जिन्हें अपना कर हम प्रस्तुत दुर्गति के गर्त से उबर सकते हैं।
उस देश में पहले हिन्दू−धर्म प्रचलित था, पीछे बौद्धधर्म पहुँचा, बौद्धधर्म का प्रवेश सन् 422 में हुआ। इससे पूर्व वहाँ ब्राह्मण−धर्म प्रचलित था। दोनों धर्मों का वहाँ सुन्दर समन्वय हुआ है। दार्शनिक भिन्नता को वहाँ पूरी सहिष्णुता के साथ सहन किया गया है। इतना ही नहीं, उनका परस्पर समन्वय भी भली प्रकार हुआ है। साम्प्रदायिक मतभेद के कारण जहाँ अन्यत्र के लोग विग्रह और विद्वेष खड़ा करते हैं, वहाँ इस तरह की कभी कोई बात हुई ही नहीं। बौद्धधर्म और हिन्दू−धर्म सहोदर भाई की तरह परस्पर प्रेमपूर्वक रहते रहे हैं।
बौद्धधर्म के आगमन से पूर्व वहाँ हिन्दू−धर्मानुयायी राजा राज करते थे। राजा धर्माशोक ने भव्य विष्णु−मंदिर बनवाया था। उसके बाद भी अनेक हिन्दू−राजा देवी−देवताओं के मन्दिर बनाते रहे, जिनका अस्तित्व अभी भी जीवन्त इमारतों तथा भग्नावशेषों के रूप में विद्यमान है। फ्रोके के शिव−मंदिर की अभी भी ब्राह्मण−पुजारी पूजा करते हैं। बौद्ध वर्चस्व होने पर भी अभी वहाँ ब्राह्मणों की मान्यता उसी प्रकार है। ब्राह्मण को वहाँ ‘ब्रह्म’ कहते थे, पीछे उसी का अपभ्रंस होकर ‘फ्रंम’ बन गया। फ्रंम नाम से वहाँ ब्राह्मण वर्ग का परिचय मिलता है। ‘देव−नगर’ उनकी एक पूरी बस्ती ही बसी है। बौद्ध−परिवारों में धार्मिक कर्मकाण्ड कराने यह फ्रंम लोग ही जाते हैं।
हिन्दू−त्यौहार और बौद्ध−त्यौहार दोनों सर्वसाधारण के लिए समान रूप से हर्षोत्सव का विषय रहते हैं। मकर−संक्रान्ति, बैसाखी, होली, दिवाली भारत की तरह ही मनाये जाते हैं। होली पर पानी उलीचने का—एक दूसरे को भिगोने का उन्माद भारत से घट कर नहीं, वरन् बढ़−चढ़कर ही देखा जा सकता है। स्थानीय नदियों में गंगा माता की भावना करके वहाँ के निवासी नदी−प्रवाह में दीपक तथा पुष्पों के दाने बहाते हैं। यहाँ के राजा वर्ष में एक बार राजा जनक की तरह हल चलाते हैं और धार्मिक उत्सव में साधारण नागरिक की तरह सम्मिलित होते हैं। मुहूर्त और ज्योतिष का प्रचलन वहाँ भी है। राजकीय समारोहों का पूजा−विधान अभी भी वहाँ ब्राह्मण−वंशी राज−गुरु ही मन्त्रोच्चारण के साथ कराता है।
बेकौक के एक प्राचीन मन्दिर में ब्रह्म, विष्णु, महेश, गणेश, दुर्गा आदि देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। खण्डहरों में उपलब्ध कितनी ही देव−प्रतिमाएं अब वहाँ के राष्ट्रीय−संग्रहालय में सुरक्षित है। ब्रह्म की वहाँ भारत की तरह उपेक्षा नहीं है, वरन् घरों में ब्रह्माजी प्रतिष्ठापित रहते हैं। बेकौक के प्रधान होटल ‘इरावन’ के द्वार पर ब्रह्माजी की भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसी प्रकार विष्णु भगवान की मूर्तियाँ भी जन−जीवन में आदर पाती हैं। छठी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक की अवधि में वहाँ हिन्दू−देवता आदर पूर्वक पूजे जाते रहे हैं। खुदाई में प्राप्त उस समय की उन सभी देवी−देवता की मूर्तियाँ मिली हैं, जो भारत में प्रमुखता प्राप्त करते हैं। बेंकौक में ऊँची टीकरी पर बने एक बौद्ध−मन्दिर में शिवलिंग एवं नंदी की भी स्थापना है और पूजा−अर्चा होती है।
बुद्ध के बाद उस देश के उपासकों में राम का नम्बर आता है। बौद्ध−शिक्षाओं की तरह ही वहाँ रामायण कथा भी लोक−प्रिय है। लवपुरी में हनुमान की मूर्तियों की भरमार है।
फाईसुवन की खुदाई में भगवान राम की मूर्ति मिली है। बस की टिकटों तक पर राम के चित्र छपे रहते हैं। बेकौक के राष्ट्रीय−संग्रहालय के बाहर धनुषधारी राम की एक विशाल मूर्ति खड़ी हुई है और राष्ट्रीय-नृत्य-गृह के बाहर वैसी ही विशाल-काय गणेश-प्रतिमा स्थापित है। कुछ सरकारी विभागों का राज्य−चिन्ह ‘गणेश’ है। कला−विभाग के द्वार पर ‘विश्वकर्मा’ की मूर्ति स्थापित है।
थाईलैण्ड की आबादी प्रायः डेढ़ करोड़ है। उसमें 25 हजार भारतीय मूल के लोग बसते हैं। जो ईसा की प्रथम शताब्दी में भारत से वहाँ जाकर बसे लोगों की वे सन्तानें हैं। उन्होंने थाई−जनता के साथ अपने को पूरी तरह घुला−मिला लिया है। इसका क्षेत्रफल 1 लाख, 98 हजार वर्गमील है। इसकी सीमाएँ वर्मा, कम्बोडिया, लाओस और मलेशिया को छूती है।
थाई−भाषा में 40 प्रतिशत से अधिक शब्द ‘संस्कृत’ के हैं। इसके अतिरिक्त पाली एवं प्राकृत के शब्द भी बहुत हैं। वर्णमाला देवनागरी से मिलती−जुलती है। स्वर और व्यञ्जनों का क्रम भी लगभग वैसा ही है। भारत की धार्मिक विधि−व्यवस्थाओं—पौराणिक −कथाओं—तथा बुद्धचर्या का उल्लेख करने वाला साहित्य ही प्राचीन काल में वहाँ लिखा जाता रहा है। जो भी पुराने हस्त−लिखित ग्रन्थ वहाँ मिलते हैं, उनमें यही विषय है, या कुछ ग्रन्थ अन्य विषयों के भी मिले हैं। थाईलैण्ड के सिनेमा−घरों में भारत की धार्मिक−फिल्में सफलता पूर्वक चलती हैं।
रामायण कथा की नृत्य− नाटिकाऐं उस देश में प्रत्येक पर्वोत्सव पर होती रहती हैं। उसमें राज−परिवार के तथा उच्च स्तर के लोग अभिनय करते हैं। जनता उनमें बहुत रस लेती है। राम−चरित्र वहाँ बच्चे−बच्चे को याद हैं, वहां वह बहुत ही लोक−प्रिय भी है।
थाईलैण्ड के प्राचीन साहित्य में भारतीय कथा−पुराणों का छाया अनुवाद ही भरा पड़ा है। अधिकाँश प्राचीन ग्रन्थ बुद्ध−उपदेश, आचार−विधान एवं जातक−कथाओं से सम्बन्धित मिलते हैं।
राजवंशीय−इतिहास एवं धर्म−प्रचारकों के क्रियाकलाप का प्राचीन विवरण प्राप्त करने से सही पता चलता है कि भारतीय मूल के निवासी समय−समय पर वहाँ पहुँचते रहे हैं और उस देश की प्रगति एवं समृद्धि का आधार बनाते रहे हैं। उस देश के मूल नागरिकों को उन्होंने अपने से पृथक नहीं रखा। उनके साथ धुलने तथा उन्हें अपने में घुलाने का ऐसा प्रयत्न करते हैं कि अब थाई−जाति का वंश−रक्त की दृष्टि से पृथककरण करना सम्भव नहीं रहा।
राजधानी बेंकोक को मंदिरों का नगर कहा जा सकता है। यहाँ तीन सौ बड़े बौद्ध−मन्दिर हैं। इनमें भिक्षु रहते हैं और धर्म−शिक्षा के उपयोगी संस्थानों का संचालन करते हैं। फ्राकियों−मन्दिर में नीलम−रत्न की बनी बहुमूल्य प्रतिमा है और दीवारों पर रामायण−कथानक के भित्तिचित्र बने हैं। दर्शनीय स्थानों में अयोध्या, लवपुरी, विष्णु−लोक, समुद्रप्रकरण, प्रथम नगर विशेष रूप से आकर्षक हैं। सेनान नदी के बीचों–बीच टह्वापू पर बना बौद्ध−मंदिर निर्माणकर्ताओं की जीवट का परिचय देता है। इसके अतिरिक्त हिन्दू−देवी−देवताओं की मूर्तियों वाले मन्दिरों तथा बौद्ध–बिहारों का अस्तित्व हर छोटे−बड़े स्थान में पाया जा सकता है।
मगध के चन्द्रगुप्त नामे बौद्ध−भिक्षु ने इस देश को बौद्ध−वृक्ष, गृद्धबूट पर्वत आदि के उपलब्ध अवशेषों से उस देश में बौद्धधर्म की प्राचीनता सहज ही प्रमाणित होती है। मुँहुसीतेप में संस्कृत भाषा के प्राचीन शिलालेख मिले हैं। मापमारबम के उपलब्ध शिला−लेख भी उस देश पर भारतीय संस्कृति का वर्चस्व प्रमाणित करते हैं।
बौद्ध और हिन्दू−धर्म परस्पर इतनी घनिष्टता के साथ थाईलैण्ड में धुल गये हैं कि उनकी पृथकता कठिनाई से ही पहचानी जा सकती है। समन्वय, समझदारी एवं सहिष्णुता की यहाँ जैसी रीति−नीति अन्यत्र भी अपनाई गई होती तो साम्प्रदायिक विद्वेष का कहीं कोई दृश्य दिखाई न पड़ता और धर्म−तत्व के प्रति सहज ही सबकी श्रद्धा जमी रहती।
थाईलैण्ड के बौद्ध−मन्दिरों में नारायण, विनायक, शिव,ऋषि आदि की प्रतिमाएँ भी हैं और उन्हें क्या बौद्ध, क्या हिन्दू समान श्रद्धा के साथ पूजते हैं। यहाँ की जनता सरल और धार्मिक वृत्ति की हैं। प्रत्येक कार्यालय, आवास स्थान और विद्यालय में यहाँ एक छोटा मन्दिर बना होगा, जिसे चाओवी कहते हैं। यहाँ नमन करने के उपरान्त ही अपना काम आरम्भ करते हैं। राजधानी बेंकोक में शाही नौसेना के इन्टर नेशनल होटल ‘इरावन’ के प्रवेश द्वार पर चतुर्मुखी ब्रह्मा की भव्य मूर्ति स्थापित ही नहीं पूजित भी हैं।
नखोन पथोम नगर के राजोद्यान में 12 फुट ऊँचे चबूतरे पर विनायक गणेश की विशाल−काय और अत्यन्त भव्य प्रतिमा स्थापित है। यहाँ कोई पुजारी तो नहीं रहता, पर प्रातःकाल वहाँ जो पुष्प बिखरे मिलते हैं, उनसे यह सहज ही जाना जा सकता है कि वहाँ के लोग भाव पूर्वक उन प्रतिमाओं को श्रद्धा पूर्वक नमन−पूजन करते हैं।
थाईलैण्ड का राजवंश अपने को राम का वंशज मानता था और उसे वहाँ ‘रामधिपति’ कहकर पुकारा जाता था। सन् 1350 में वहाँ का शासक ‘राम’ नाम से विख्यात था। उसने अयोध्या नामक नगर की स्थापना की। वहाँ के राज−मन्दिर की दीवारों पर रामायण की कथाएँ खुदी हुई हैं। उत्तरी थाईलैण्ड में लवकुशपुरी नामक नगर अभी भी विद्यमान हैं।
थाईलैण्ड के उच्च न्यायालय के सामने गंगाधर महादेव की ओर आकाशवाणी केन्द्र के मुख्य द्वार पर वीणा–पाणि सरस्वती की विशाल−काय प्रतिमा स्थापित है।
राजकीय− संग्रहालय के द्वार पर धनुर्धारी राम की विशाल प्रतिमा खड़ी हैं। इस देश के संग्रहालयों में शेषशायी विष्णु, वरुण, शिवलिंग, ऋषि प्रतिमाएँ कितने ही आकार−प्रकार की विद्यमान हैं।
बैसाखी पूर्णिमा को यहाँ बुद्ध−जयन्ती के उपलक्ष्य में दिवाली मनाई जाती है। मृत−पूर्वजों की आत्मा को शान्ति देने के लिए यहाँ श्राद्ध भी इसी दिन किये जाते हैं। मृतकों के नाम पर भिक्षुओं को भोजन कराया जाता है। संक्रान्ति−पर्व, वर्षा−व्रत, चन्द्र−ग्रहण आदि अवसरों पर पर्वोत्सव मनाये जाते हैं। राजा को वर्ष में एक दिन स्वयं हल चलाकर अपने को सामान्य कृषक−वर्ग की श्रेणी का सिद्ध करना पड़ता है।
बच्चों का मुण्डन−संस्कार स्याम में भी भारत की ही तरह होता है। इसे ‘चूड़ा कृन्तन मंगल’ कहते हैं। इसके अतिरिक्त नामकरण, कर्गवेध, विवाह, अंत्येष्टि आदि संस्कारों में भी भारतीयता का प्रत्यक्ष अनुकरण देखा जा सकता है। यहाँ मुर्दे जलाये जाते है।
उसे देश में हिन्दू−धर्म और बौद्ध−धर्म जिस सुन्दर ढंग से मिले हैं, यदि वह प्रक्रिया अन्यत्र भी अपनाई जा सके तो साँस्कृतिक दृष्टि से आज का भारतीय दर्शन विश्व का सबसे बड़ा, सबसे प्रमुख, सबसे अधिक प्रचलित दर्शन कहलाने का अधिकारी बन सकता है। समस्त संसार में हिन्दू प्रायः 40 करोड़ हैं। चीन में कम्युनिस्टशासन के बाद क्या हुआ? यह नहीं कहा जा सकता, अन्यथा उसमें पूर्व समय पूर्व समय में चीन समेत संसार के समस्त देशों में 85 करोड़ के करीब बौद्ध थे। दोनों मिलकर 125 करोड़ होते हैं। इसे संसार की एक तिहाई आबादी कहा जा सकता हैं। चीन में धर्म−नाश के बाद भी उस देश में—तिब्बत में— तथा अन्यत्र जो बौद्ध बचे होंगे, उनकी संख्या हिन्दुओं के बराबर अर्थात् 40 करोड़ तो मानी ही जा सकती हैं। दोनों वस्तुतः एक ही वृक्ष की दो शाखाऐं हैं। बौद्धधर्म हिन्दू−धर्म का ही एक विशिष्ट रूप हैं। दोनों की साँस्कृतिक एवं दार्शनिक एकता अत्यन्त स्पष्ट हैं। यदि उन्हें परस्पर अधिक घनिष्टता के साथ मिलाया जा सके तो भारत का धार्मिक वर्चस्व फिर मूर्धन्य स्तर पर पहुँच सकता हैं। थाईलैण्ड की प्रस्तुत स्थिति पर विचार करने से हम सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं।
सम्प्रदायों के बीच विग्रह और विद्वेष उत्पन्न करने की अपेक्षा उनका समन्वय करने में ही लाभ है। यह तथ्य भी हम थाईलैंड में चल रहे प्रयोगों को देखकर सीख सकते हैं। श्रेष्ठता जहाँ भी मिले, ग्रहण करली जाय और जो असामयिक है—आज की स्थिति में अनुपयुक्त है, उसके लिए दुराग्रह न किया जाय तो धर्मो का समन्वय एक सुन्दर गुलदस्ते की तरह संसार की शोभा और शालीनता बढ़ाने में सहायक ही सिद्ध हो सकता है।
इन दिनों थाईलैण्ड में बौद्ध−धर्मानुयायी ही राजा है और उसी धर्म को मानने वाली अधिकाँश प्रजा। इस छोटे−से देश में पिछली जन−गणना के अनुसार एक लाख, तीस हजार भिक्षु थे और 16503 मठ, मन्दिर एवं बौद्ध−बिहार। इतने छोटे देश में इतने अधिक देव−स्थानों और साधुओं का होना आश्चर्यजनक है। यह संख्या तो भारत की स्थिति से भी आगे बढ़ी−चढ़ी है। इससे यह आशंका होती है कि उस देश की जनता को भी हमारी ही तरह निठल्लों को खिलाने का भार वहन करना पड़ता होगा और आर्थिक दृष्टि से उस देश पर भारी दबाव पड़ता होगा।
पर वहाँ की वस्तु स्थिति सर्वथा भिन्न है। वहाँ समय गत भिक्षु−दीक्षा लेने की प्रथा है। थोड़े समय के लिए लोग भिक्षु बनते हैं और फिर अपने सामान्य साँसारिक जीवन में लौट जाते है। थाईलैण्ड के प्रत्येक बौद्ध धर्मानुयायी का विश्वास है कि “एक बार भिक्षु बने बिना उसका सद्गति नहीं हो सकती। उसके बिना उसकी धार्मिकता अधूरा ही रहेगी।” इस आस्था के कारण देर सबेर में हर सुयोग्य नागरिक एक बार कुछ समय के लिए साधु अवश्य बनता है। घर छोड़कर उतने समय बिहार में निवास करता है। साधना तथा अध्ययन में निरत रहता है और संघ द्वारा निर्धारित सेवा−कार्य में सच्चे मन से पूरा परिश्रम करता है। भिक्षु का मोटा अर्थ भिक्षुक या भिखारी जैसा लगता है, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। बौद्धधर्म में साधु को—धर्म−प्रचारक को—भिक्षु कहते हैं। अवसर पड़ने पर उसे भिक्षा द्वारा क्षुधा शांत करने में भी आपत्ति नहीं हो सकती, पर यह आवश्यक नहीं कि भिक्षु नामधारी को अनिवार्य रूप से भिक्षा ही माँगनी पड़े। भिक्षुक और भिक्षु दो शब्द अलग−अलग अर्थों में प्रयुक्त होते रहे हैं। भिक्षुक दीन−हीन, अपंग असहाय व्यक्ति को, उदर निमित्त याचना करने वाले को कहते हैं। जब कि भिक्षु विशुद्ध रूप से सन्त के अर्थ में प्रयुक्त होता हैं। थाईलैण्ड निवासी भिक्षुक नहीं, भिक्षु होते हैं। दूसरे अर्थों में उन्हें साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध परमार्थ प्रयोजनों में निरत परमार्थ−परायण व्यक्ति कहना चाहिए। ऐसे लोग जितने अधिक किसी देश में होंगे, वह उतना ही अधिक फूलेगा फलेगा।
थाईलैंड में धर्म−आस्था अन्य देशों की तरह डगमगाई नहीं है। वहाँ के नागरिकों को अभी भी प्राचीन काल के धर्मनिष्ठ और कर्त्तव्य−परायण लोगों की तरह जीवन−यापन करते हुए देखा जा सकता है, इसका श्रेय वहाँ की समर्थ साधु−संस्था को ही दिया जा सकता है। मन्दिर वहाँ पूजा स्थल तो हैं, पर उनका उपयोग मात्र उतने ही सीमित प्रयोजन के लिए नहीं होता। प्रत्येक बिहार में वहाँ एक साधन सम्पन्न विद्यालय भी होता है, जिसमें न केवल छात्र छात्राओं को सामान्य शिक्षा दी जाती है, वरन् उच्चस्तरीय धर्म−शिक्षा की व्यवस्था भी रहती है। प्रत्येक बिहार में एक अच्छा पुस्तकालय होता है, जिसमें धार्मिक जीवन जी सकने की प्रेरणा देने वाली चुनी हुई पुस्तकें पर्याप्त संख्या में रखी जाती हैं।
स्कूलों में शिक्षा का कार्य बुद्ध−प्रार्थना के साथ आरंभ होता है। गुरु−पूर्णिमा कास उत्सव शिक्षा−संस्थाएँ मनाती हैं, जिनमें छात्रों द्वारा अध्यापकों को श्रद्धासिक्त पुष्पाँजलि भेंट की जाती है। प्राथमिक−शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा तक का माध्यम वहाँ थाई−भाषा ही हैं। विदेशी−भाषाओं को वहाँ शिक्षा−माध्यम में स्थान नहीं दिया गया हैं। बी.ए. उपाधि को वहाँ ‘पण्डित’ और एम.ए. उपाधि को वहाँ ‘महापण्डित’ शब्द के साथ सम्बोधित करते हैं।
जनता अपनी धर्म−श्रद्धा की अभिव्यक्ति एक बार अनिवार्य रूप से भिक्षु−दीक्षा लेकर व्यक्त करती हैं। बुद्धसंघ उस श्रद्धा का सदुपयोग करता है—अवस्थित, नियन्त्रित एवं परिष्कृत करता है। साथ ही ऐसी योजनाएँ बनाकर तैयार रखता है, जिसके अनुसार उस धर्म प्रेरणा को उपयोगी कार्यों में संलग्न किया जा सके। अनेकों सृजनात्मक योजनाएँ तैयार रहती हैं, उन्हें पूरा करने के लिए बिहार में प्रवृष्ट भिक्षुओं को लगा दिया जाता है। उनके श्रम, ज्ञान एवं मनोयोग का समन्वित उपयोग मिलने से अनेकों उपयोगी योजनाएँ बिना किसी अतिरिक्त खर्च के सहज ही चलती है। सुयोग्य व्यक्ति बिना किसी पारिश्रमिक के यदि रचनात्मक कार्यों में लगेंगे तो उस देश में बहुमुखी प्रगति की बाढ़ आवेगी ही। इस दिशा में थाईलैण्ड की बुद्ध−संस्था बहुत सजग है, वह किसी भी भिक्षु को उच्छृंखल अनियन्त्रित नहीं होने देती। हर किसी को पूर्ण अनुशासन में रहना पड़ता है। यदि भारत की तरह वहाँ के भिक्षु स्वेच्छाचारी बन जायें और अनियन्त्रित साँड़ की तरह बिचरें तो इस छोटे−से की इतनी बड़ी भिक्षुसंस्था देखते−देखते टिड्डी दल की तरह सारी समृद्धि को चट करके रखदे, पर वहाँ की दूरदर्शी धर्म−संस्थाएँ वैसा होने नहीं देतीं। अनुशासन और धर्म−परायणता को वहाँ परस्पर पूर्णतया समन्वित बनाने का सफल प्रयोग किया गया है।
इस दिशा में राजकीय सहयोग भी पूरा है। राज्यकोष से मठों को मुक्त−हस्त से सहायता दी जाती है, साथ ही उनकी गति−विधियों पर नियन्त्रण भी रखा जाता है। धर्मसंघ में शासन के प्रतिनिधि भी सम्मिलित रहते हैं। वे धर्म−प्रसंग में तो हस्तक्षेप नहीं करते, पर यह अवश्य ध्यान रखते है कि जनता के दिये हुए तथा शासन से मिले धन का उपयोगी प्रयोजनों में ही खर्च होता है या नहीं। कहीं अपव्यय तो नहीं होता।
थाईलैण्ड कृषि−प्रधान देश है। वहाँ 84 प्रतिशत लोग खेती करते हैं। पर वे अत्यन्त कर्मठ पुरुषार्थी, शान्ति−प्रिय और धर्म−परायण लोग हैं। परस्पर मिल−जुलकर रहना और हँसी−खुशी की जिन्दगी जीना उन्होंने धर्म संस्था से सीखा हैं। भिक्षु−सेना ने उन्हें अनेकानेक सद्गुण सिखाये हैं और परिष्कृत स्तर का जीवन किस तरह जिया जा सकता है, यह बताया है। इस प्रशिक्षण से न केवल उनकी विचार पद्धति ऊँची उठी है, वरन् भौतिक समृद्धि भी बढ़ी है। यह आश्चर्यजनक प्रसंग है कि एशिया के किसी भी देश की अपेक्षा थाईलैण्ड निवासियों की औसत आमदनी कहीं अधिक है। वे सुसम्पन्न हैं। उस देश की विदेशी−मुद्रा बहुत मजबूत है। स्वर्ण−कोष की दृष्टि से थाईलैण्ड की साख और धाक संसार के आर्थिक क्षेत्र में मानी जाती है।
धर्म−समन्वय, रक्त−समन्वय की उस देश की अपनी विशेषता है। इसके अतिरिक्त सीमित समय के लिए साधुदीक्षा लेने वाली पद्धति ओर भी अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। इन सब बातों ने उस छोटे−से देश को अपने ढंग की अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रगति करने का अवसर दिया है।
हमारे लिए थाईलैण्ड एक प्रेरणा−स्त्रोत बनकर सामने खड़ा है। भूतकाल में हमने उसे सिखाया, उठाया होगा, पर आज तो वह हमें भी बहुत कुछ सिखाने की स्थिति में सामने खड़ा है।
भारत की, विश्व की, समस्त मानव−जाति की अनेकानेक समस्याओं के भूल में एक ही कारण छिपा हुआ है—मानवी दुर्बुद्धि, पारस्परिक स्नेह, सद्भाव−सौजन्य एवं सहयोग में जितनी कमी पड़ती जाती है, उतनी ही नई−नई विपत्तियाँ उत्पन्न होती जाती हैं। जिस बुद्धि का उपयोग एक दूसरे का शोषण, उत्पीड़न करने के लिए किया जाता है, उसका उपयोग यदि स्नेहासिक्त सद्व्यवहार में किया जा सके तो सुविधाएँ इतनी बढ़ जायेंगी कि न तो कहीं किसी को कोई अभाव अनुभव होगा ओर न कष्टों का कारण शेष रहेगा। विनाश ओर सुरक्षा प्रयत्नों में नष्ट होने वाली सम्पत्ति एवं बुद्धि यदि विकास एवं सहायता के लिए जुटाई जा सके तो इस धरती के हर कोने में स्वर्ग बिखर पड़ेगा। एक दूसरों को परस्पर भरपूर सद्भाव सौजन्य मिलेगा तो हर घड़ी हर जीवन में हर्षोल्लास ही छलकता पाया जा सकेगा।
मनुष्य की बुद्धि और शक्ति असीम है—आवश्यकता स्वल्प। यदि अपने सोचने और करने का तरीका सुधार लिया जाय तो न कुछ अभाव अनुभव होगा और न किसी को शिकायत करनी पड़ेगी। ठीक यही बात सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के सम्बन्ध में है। उलझनें हैं नहीं—वे पैदा की गई हैं। न्याय और औचित्य को स्वीकार कर लिया जाय—अधिकार से अधिक कर्त्तव्य को मान्यता दी जाय तो जटिल से जटिल दीखने वाली समस्या का भी सरल समाधान मिल सकता है। इसके विपरीत शक्ति और छल से दूसरों को दबाने से तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाय, पीछे जब विद्वेष और विद्रोह फूटेगा तो वह अनीति पूर्वक प्राप्त किये गये लाभ की अपेक्षा कहीं अधिक हानिकारक सिद्ध होगा।
यही बात सम्पदा वृद्धि के माध्यम से सुख−साधन बढ़ाने के सम्बन्ध में लागू होती है। सर्प को दूध पिलाने से उसका विष बढ़ता है, साथ ही उपद्रव भी। व्यक्ति दोष−दुर्गुणों से भरा हुआ हो तो जितनी सम्पदा मिलेगी, वह उतना ही अपने लिए ओर दूसरों के लिए सत्यानाशी दुरभिसन्धियाँ रचेगा। निर्धन ओर अशिक्षित रहने पर साधन हीन दुष्ट उतना भयंकर नहीं होता, जितना कि चतुरता और साधन सामग्री मिल जाने पर। विद्या अच्छी चीज है—धन भी उत्तम वस्तु है—बलिष्ठता, कुशलता, कलाकारिता सभी विभूतियाँ अभिनन्दनीय हैं, पर यदि वे दुरात्मा के साथ लगेंगी तो उनका भयंकर प्रतिफल रोमाँचकारी संकटों के रूप में सामने आवेगा।
हमें उथलेपन में नहीं भटकना चाहिए, गहराई में उतरना चाहिए। छुटपुट कठिनाइयाँ सामने देखकर उनका सामयिक समाधान ढूंढ़ने में ही व्यस्त नहीं हो जाना चाहिए, विष−वृक्ष की उस जड़ पर कुठाराघात करना चाहिए, जिसके फल और काँटे पग−पग पर वास देते हैं। संकट−ग्रस्त की तात्कालिक सहायता कर देना अच्छी बात है, उससे हमारी दयालुता और उदारता को पोषण मिलता है, पर उससे स्थायी समाधान कुछ नहीं मिलता। भिक्षुक को एक पैसा दे देना सस्ती दयालुता है, पर सच्चा सहायक तो वह है, जो उसे परिश्रम करने के लिए रजामन्द करे और उपार्जन के किसी उपयुक्त साधन में जुटा दे। सस्ती ओर उथली सेवा तो कितने ही भावुक लोभ करते रहते हैं। हमें दूरदर्शियों की भूमिका निभानी चाहिए और व्यक्ति एवं समाज को निरन्तर सन्त्रस्त करने वाली विपत्तियों की जड़ काटने की दूरदर्शिता अपनानी चाहिए। सुख−शान्ति की सुस्थिर आधार−शिला रखनी चाहिए।
स्पष्ट है कि मानवी दुर्बुद्धि को निरस्त किये बिना, भावनात्मक उत्कृष्टता का जन−मानस में बीजारोपण किये बिना—व्यक्ति और समाज की एक भी समस्या का हल नहीं निकलेगा। कोल्हू के बैल की तरह हम विविध प्रकार के हलके−फुलके प्रयासों में चक्कर भले ही काटते रहें। कार्य कठिन है। उसका प्रतिफल प्रत्यारोपण चर्म चक्षुओं से दीख नहीं पड़ता, इसलिए अदूरदर्शियों को उसका कुछ परिणाम प्रतीत न होने से उत्साह भी नहीं मिलता। इसलिए लोग ज्ञान−यज्ञ जैसे सर्वोत्कृष्ट परमार्थ की उपयोगिता समझ नहीं पाते, उसके लिए साहस जुटा नहीं पाते। यही कारण है कि सेवा परमार्थ की बात सोचने वाले लोग अन्न−दान, जल−दान, वस्त्र−दान, औषधि−दान आदि की बात सोचने तक सीमित रह जाते हैं। बहुत हुआ तो उन कार्यों को हाथ में लेते हैं, जिनसे ख्याति और प्रशंसा मिलती हो। धर्मशाला, मन्दिर आदि इमारतें विशुद्ध रूप से दाता की ख्याति के लिए ही बनती हैं। उपयोगिता की दृष्टि से उनका लाभ नगण्य है। कई बार तो उनसे मुफ्तखोरी की दुष्प्रवृत्ति का अभिवर्धन होने लगता है। ब्रह्मभोज जैसी दावतों के पीछे ऐसी ही उथली यश−कामना काम करती है। हमें उस बात−स्तर से अपने को आगे बढ़ाना चाहिए और दूरदर्शियों की तरह उन कार्यों को हाथ में लेना चाहिए, जिनसे मानवी तरह उन कार्यों को हाथ में लेना चाहिए, जिनसे मानवी समस्याओं का स्थिर एवं आत्यन्तिक समाधान सम्भव हो सके।
युग−निर्माण योजना के अंतर्गत भावनात्मक परिष्कार के लिए जिस विचार−क्रान्ति की—नैतिक−क्रान्ति की—सामाजिक−क्रान्ति की—त्रिवेणी बहाई जा रही है, उसे अग्रगामी बनाने के लिए हमें सर्वतोभावेन जुटाना चाहिए। ज्ञान−यज्ञ के उस आलोक को अधिकाधिक ज्योतिर्मय करना चाहिए, जिससे अज्ञानान्धकार की कोंतर में छिपकर बैठी हुई विकृतियों ओर विभीषिकाओं को मार भगाया ज सके। मानवी सेवा−साधना का यही श्रेष्ठतम आधार पहले भी था, पर आज तो वह युग की अनिवार्य आवश्यकता बनकर सामने आया है। आपत्ति−कालीन विशिष्ट कार्य की तरह हमें उसी की पूर्ति में सर्वतोभावेन जुटना चाहिए। ईश्वर−भक्ति से लेकर आत्म−कल्याण ओर परमार्थ−प्रयोजन डडडड डडडड डडडड डडडड सकते हैं।
प्राचीन काल में साधु−संस्था इसी एक प्रयोजन में संलग्न रही है। बिना इधर−उधर ताके−झाँके एक ही दिशा में गतिशील रही है। फलतः उसके द्वारा वे सत्परिणाम उत्पन्न किये गये हैं, जिनके लिए युग−युगान्तरों तक उसके कृतज्ञ बने रहेंगे। करोड़ों कुबेर मिलकर भी जो नहीं वे सकते, साधु−संस्था ने विश्व−मानव को वह अनुदान प्रदान किया है। आज उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए यदि हम कुछ कहने लायक साहस जुटा सके तो भावी इतिहास का स्वरूप कुछ और ही होगा। जो कठिन कार्य साधु−संस्था के माध्यम से पूरा किया जा सकता है, उसे संसार के समस्त बुद्धिमान् सत्ताधारी ओर संपत्तिवान मिलकर भी नहीं कर सकते। दुर्भाग्य यह है कि तथ्य की गहराई समझी नहीं जा रही है, अन्यथा हर विचारशील,हर छुटपुट कार्यों को छोड़कर ज्ञान−यज्ञ के अभियान में कन्धा लगाता और सोचना कि समस्त समस्याओं का समाधान बस एक ही धुरी के साथ लिपटा हैं। इसलिए इधर−उधर ध्यान बखेरने की अपेक्षा इस एक ही प्रयोजन में पूरी तत्परता के साथ जुट जाना ही दूरदर्शिता है।
साधु−संस्था को पुनर्जीवित करने के लिए ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ को इस वर्ष अधिक साहस के साथ आगे आना है। इसके लिए अपनी वानप्रस्थ योजना सर्वोत्तम हैं। उसमें साधु ओर ब्राह्मणों का उभय−पक्षीय समावेश है।
जिनके पास पूरा समय है, साथ ही स्वास्थ्य, योग्यता एवं भावना भी हैं, ऐसे लोग कम ही मिलेंगे। इतना विशाल क्षेत्र—इतना महान् कार्य थोड़े से लोग नहीं कर सकते। कार्य की विशालता के अनुरूप सृजन−सेना का संख्या–बल भी चाहिए। अस्तु आँशिक समय देने वाले क्लिष्ट वानप्रस्थों की एक नई शृंखला खड़ी करनी पड़ी। जुलाई 73 के अंक में क्लिष्ट वानप्रस्थ कहा गया है। पूरा समय सदा सर्वदा के लिए देने वालों को वरिष्ठ और स्वल्प सेवा देने वालों को ‘क्लिष्ट’ कहा जाय तो यह उपयुक्त ही है।
क्लिष्ट वानप्रस्थ का सामयिक व्रत धारण करना हम में से किसी को कुछ बहुत अधिक कठिन नहीं पड़ना चाहिए। प्रवेश−काल में प्रारंभिक−शिक्षा के लिए दो महीने और फिर पीछे हर वर्ष एक महीना अभीष्ट उद्देश्य के लिए देते रहना—यह व्रतधारी वानप्रस्थ का न्यूनतम समय दान होना चाहिए। इससे अधिक जितना समय मिल सके, उतना उत्तम हैं। लगनशील और भावनाशील व्यक्ति इतना समय तो अपने सामान्य कारोबार की मन्दी के दिनों में भी निकाल सकते हैं। खलिहान उठाने के बाद हर वर्ष किसान एक−दो महीने फुरसत में रहता हैं। कहीं−कहीं जाड़े के दिनों में भी थोड़ी फुरसत रहती हैं। सरकारी कर्मचारियों को भी संचित ओर सामयिक दुट्टियाँ काफी मिलती हैं। व्यापार का भी चलने−चमकने का खास सीजन होता है बाकी समय तो वे भी मन्दी में ऊँघते रहते हैं। बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी वार्षिक छुट्टियाँ पाते हैं। इस अवधि को परमार्थ−प्रयोजनों के लिए देकर आत्म−कल्याण ओर लोक−निर्माण की उभय−पक्षीय साधनाएं की जा सकती है।
फिर आवश्यकतानुसार घर के दूसरे लोग अथवा कर्मचारी भी उत्तरदायित्वों को अपने कन्धों पर लेकर अवकाश देते ही रहते हैं। इससे आगे−पीछे बड़े उत्तरदायित्व संभालने और व्यवस्था चलाने का अवसर एवं शिक्षण मिलता है। साथ ही अपने ऊपर लदी हुई जिम्मेदारियों के बोझ में कुछ हलकापन भी आता है। चिन्ताओं ओर नियत जिम्मेदारियों का बोझ जितने समय तक हलका रहता है, उतने समय आदमी अपने आप में बहुत हलकापन अनुभव करता है। इस थोड़े बदलाव की दृष्टि से भी उतना समय व्यस्त लोगों को भी निकालना चाहिए। सारा बोझ सदा सर्वदा अपने ही ऊपर लादे रहने वाले लोग अपने पीछे वालों को अपंग बना देते है और खुद बेतरह लदते−मरते हैं। ऐसे लोगों की आँखें जब कभी बन्द होती हैं, तभी अनभ्यस्त उत्तराधिकारी हड़बड़ा जाते हैं और अचानक कंधे पर आये बोझ को न संभाल सकने के कारण बना बनाया खेल बिगाड़ देते हैं। इन सब कारणों को ध्यान में रखते हुए पीछे वालों का प्रशिक्षण करने की दृष्टि से और अपना मन हलका करते हुए अधिक दिन जीने के लिए भी तो वैसा करना आवश्यक है।
प्रश्न समय का नहीं—भावना का है। यदि हम साँसारिक कर्त्तव्यों की तरह आध्यात्मिक कर्त्तव्यों की भी गरिमा समझें, लोक की तरह परलोक को भी महत्व दें, शरीर की तरह आत्मा के लिए भी आहार जुटाना आवश्यक समझें, पेट और परिवार की तरह संस्कृति और समाज के प्रति भी जिम्मेदारी अनुभव करें, वासना ओर तृष्णा की पूर्ति जैसी प्रसन्नता आत्म−गौरव बढ़ाने वाले कार्यों में भी अनुभव करें, संसार में प्रशंसा प्राप्त करने की तरह ईश्वर की प्रसन्नता की भी आवश्यकता अनुभव करें,मनुष्य के सुर दुर्लभ शरीर और उसके महान् जीवन−लक्ष्य का स्वरूप समझें, तो यह नितान्त आवश्यक प्रतीत होगा कि जीवन−सम्पदा का शत−प्रतिशत भाग पशु प्रयोजनों में ही नष्ट न करने रह जाय, उसका एक अंश इस प्रकार भी व्यय किया जाय, जिससे आत्म−सन्तोष और परमार्थ कर्त्तव्यों की पूर्ति का साधन जुटता चले।
इन विचारों को यदि मन में स्थान मिल सके तो फिर अवसर न मिलन, अवकाश न रहने कास बहाना बिलकुल थोथा और झूंठा प्रतीत होगा। अवकाश केवल उन्हीं काम के लिए नहीं मिलता, जिन्हें निरर्थक और निरुपयोगी माना जाता है। जो काम आवश्यक समझे जाते हैं, उन्हें भोजन विश्राम छोड़कर भी पूरा करना पड़ता है। स्वजनों व भयंकर बीमारी अथवा कोई विपत्ति आ जाने पर हफबिना खाये, सोये दौड़धूप करते बीत जाते हैं। तब अवकाश कहाँ से आ जाता है? इस तथ्य से कोई इन्कार न कर सकता कि जिस कार्य के लिए अवकाश न होने बात कही जाती हो, उसे निरर्थक माना गया है, यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। उपयोगी समझे जाने वालों सदा प्राथमिकता मिलती रही है। यदि हम आध्यात्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझेंगे तो प्रत्येक होगा कि जिनके लिए अवकाश न मिलने की बात व जाती थी, वस्तुतः वे इतने अधिक महत्वपूर्ण थे कि वह घाटा सहकर भी उनकी पूर्ति की जानी चाहिए थी।
हमें इसी दृष्टिकोण से सोचना चाहिए और युग पुकार पुरी करने के लिए एक कदम साहस पूर्वक बढ़ना चाहिए। आरम्भिक प्रशिक्षण के लिए इसी निर्धारण करना चाहिए और भविष्य के लिए निर्धारण करना चाहिए कि एक महीना तो हर वर्ष किसी न किसी प्रकार निकाल ही लिया करेंगे। यह डडडड जहाँ होगा, वहाँ वे सब आधार बन जायेंगे, जिनके आधार पर अभीष्ट प्रयोजन के लिए अवकाश निकल आये घर−परिवार का सामान्य काम−काज भी सरलता चलता रहे। अन्य सब व्यवस्थाएँ बड़ी आसानी से सकती हैं। न बन सकने वाली कठिन बात एक ही अपना चोर मन लोभ ओर मोह की कीचड़ से एक कद आगे बढ़ने से इन्कार करता है, उसे समझ लिया डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड और असम्भव दीखती हैं।
क्लिष्ट वानप्रस्थों के लिए दो महीने का प्रारम्भिक प्रशिक्षण आवश्यक है। इसकी समुचित व्यवस्था करली गई हैं। शान्ति−कुञ्ज सप्त−हरिद्वार में एक महीने का सैद्धान्तिक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण चलेगा। क्या करना होगा? कैसे करना होगा? इन प्रश्नों का प्रत्येक पहलू समझाया जायगा। जन−संपर्क के लिए वाणी का मुखर होना आवश्यक है।
कई व्यक्तियों के मस्तिष्क में विचारों की पूँजी विपुल मात्रा में होती हे, किन्तु उसे वाणी से प्रकट करने का जब अवसर आता है तो लड़खड़ा जाते हैं। झेंप चढ़ आती है, गला सुख जाता हे और जो कहना चाहते थे, वह कह नहीं पाते। जन−समूह को देखकर संकोच में मन गढ़ जाता है और जो विचार कहने की इच्छा से मञ्च पर आये थे, वे न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं। निदान टूटे−फूटे दो−चार शब्द कहकर उपहास कराते हुए चुप बैठना पड़ता है। यह कठिनाई ऐसी है, जिसे हल करना प्रत्येक जन−संपर्क में आने वालों के लिए नितान्त आवश्यक है। वाणी की तलवार पर धार ने चढ़ी होगी तो विचार–संघर्ष के मैदान में लड़ा किस तरह जायगा?
जन−संपर्क में आने वाले का व्यक्तित्व अधिक आकर्षक और प्रभावोत्पादक होना चाहिए, अन्यथा कोई उससे प्रभावित ही न होगा। प्रभावशाली बनने के लिए कपड़ेलत्ते काम नहीं देते। सजधज को आकर्षक बनाने की बात बिलकुल बचकानी है। बनावटी भाव–भंगिमा दिखाने और हाथ मटकाने से प्रभाव डालने की बात सोचना निरर्थक है। उत्तेजित और आवेशग्रस्त होकर भी दूसरों के मन पर कोई अच्छी छाप नहीं छोड़ी जा सकती। जितने भी उथले, ऊपरी और बनावटी तरीके इस प्रयोजन के लिए काम में लाये जाते हैं, वे सभी असफल सिद्ध होते हैं। इतना ही नहीं, वे उस बनावट के प्रति उल्टे घृणा करने लगते हैं और आदमी को ओछा एवं ढोंगी गिनने लगते हैं। वास्तविक प्रभाव तो उन सद्गुणों का होता है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बनते रहते हैं और शरीर की सामान्य चेष्टाओं से ही आन्तरिक वस्तुस्थिति प्रकट करते रहते हैं। ऐसे परिष्कृत व्यक्तित्व सादगी भरे सामान्य वेष में भी बड़े सुन्दर और आकर्षक लगते हैं। दूसरों के मन पर अपनी गहरी छाप छोड़ते है।
दो महीने की प्रशिक्षण अवधि में दूसरों पर प्रभाव डालने वाले दोनों ही आवश्यक प्रयोजनों का रहस्य एवं मर्म सिखाया जाता है ओर निरन्तर अभ्यास कराया जाता है। वक्तृत्व−कला का अभ्यस्त होना जन−संपर्क का कार्यक्षेत्र चुनने वाले के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी जरूरी है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक हो। लोग उसे ओछा, बचकाना, मूर्ख अथवा असंस्कृत अव्यवस्थित न समझें। आन्तरिक विशेषतायें रहते हुए भी कितने ही व्यक्ति ऐसी छोटी−छोटी कुसंस्कारी आदतों के अभ्यस्त हो जाते हैं, जो होती तो बहुत ही छोटी है, पर उनका देखने वालों पर, संपर्क में आने वालों पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं और उस तनिक से कारण पर लोग बहकने लगते हैं, अपनी बुरी राय बनाने लगते हैं। आत्मनिरीक्षण के लिए सूक्ष्म दृष्टि नहीं होती—दूसरा कोई बताने ओर सुझाने का काम करता नहीं, क्योंकि इसमें बुरा मान जाने की आशंका रहती है। इसलिए व्यक्तित्व की बहिरंग प्रक्रिया अस्त−व्यस्त पड़ी रहती है और उस छोटी−सी कमी को दूर न कर पाने के कारण जन−संपर्क में आने वाला कार्यकर्ता बहुत घाटे में रहता है, जो करना चाहता है, वह कर पाता। अस्तु दो महीने के प्रशिक्षण में वक्तृत्व−कला के साथ−साथ आकर्षक व्यक्तित्व का निमार्ण भी आरंभिक एवं आवश्यक प्रशिक्षण में सम्मिलित किये गये हैं।
आत्म−बल का अभिवर्धन मनुष्य की आस्थाओं से सम्बन्धित हैं। उच्चस्तरीय आस्थाओं को अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित ओर परिपक्व करने के आधार पर मनुष्य का ब्रह्मतेज निखरता है। और उसके प्रभाव से सिंह, व्याघ्र जैसे हिंस्र पशु ओर दुष्ट−दुरात्मा प्रकृति के असुर सी हतप्रभ होते हैं। यथार्थ और गहन प्रभाव अन्तः करण से ही प्रादुर्भूत होता है। यही मानव−जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि, विभूति और सम्पदा है। इसे प्राप्त करने के लिए तप करना पड़ता है। इसी का नाम योगाभ्यास है। अमुक विधि−विधानों एवं कर्मकाण्डों की सहायता से आस्तिकता एवं ब्रह्म–चेतना के विकास की साधना कराई जाती है। यह साधना कम भी क्लिष्ट वानप्रस्थों की शिक्षा पद्धति में सम्मिलित रखा गया है। उनकी स्थिति एवं प्रकृति के अनुरूप साधना कराई जाती है ओर स्पष्ट रूप से समझा दिया जाता है कि इन विधि−विधानों और कर्मकाण्डों को ही जादू की छड़ी न मान बैठें, वरन् यह समझे कि जिस प्रकार सीढ़ी के सहारे ऊपर जीने पर चढ़ा जा सकता है, उसी प्रकार अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयास कराया जा रहा है। यदि आन्तरिक मलीनताओं के उन्मूलन का प्रबल प्रयत्न न किया गया, भावना−क्षेत्र में उत्कृष्ट देव−तत्वों को आरोपण न किया तो मात्र विधिविधान करते रहने से बात बनेगी नहीं। तप साधना एवं योगाभ्यास के कर्मकाण्ड शरीर एवं मन से किये वैचारिक दुस्साहस अपनाया जाय। इस समन्वयात्मक पद्धति से की गई संरचनाएं सदा सफल होती रही हैं। उनसे साधकों का आत्मबल निश्चित रूप से बढ़ता है और उस उपलब्धि का मूल्य बड़ी सम्पदा से अधिक होता है।
इस दो महीने की अवधि में आत्म−शोधन, ईश्वर, सान्निध्य—देवत्व का अवतरण कराने वाली साधन−प्रक्रिया हर शिक्षार्थी की उसके स्तर के अनुरूप कराई जाती है और आशा की जाती है कि इस मार्ग पर चलते हुए साधना आत्मा को परमात्मा स्तर तक—नर को नारायण बनाने तक—पहुँचाने के जीवन−लक्ष्य तक क्रमिक रूप से बढ़ता जायगा और अन्तर पूर्णता का— जीवन−मुक्ति का परम पद प्राप्त करेगा। कहना न होगा कि इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ सकेगा, वही साधु संस्था की सदस्यता कास प्रयोजन उतनी ही मात्रा में सम्पन्न कर सकेगा। वानप्रस्थ में प्रवेश किस लक्ष्य को लेकर किया जा रहा है—उसकी पूर्ति के लिए प्रचण्ड आत्मबल ही वास्तविक पूँजी है। प्रशिक्षण−काल में इस संदर्भ में प्रत्येक पक्ष से शिक्षार्थी को अवगत कराया जाता है और साधना प्रयोजन में निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग दिया जाता है।
साधु−संस्था का बहिरंग प्रयोजन लोक−निर्माण का प्रतीत होता है, पर वस्तुतः वह आत्म−निर्माण का ही प्रतिफल है। अपना निर्माण करने वाला ही दूसरों का निर्माण कर सकता है। वाणी और लेखनी द्वारा प्रचार−कार्य का—बौद्धिक उत्साह कास प्रयोजन पूरा हो सकता है, पर यदि दूसरों को कुछ बनाना बदलना हो तो इसके लिए अपने को ही ‘साँचे के रूप में विनिर्मित करना होगा। जनता को मिट्टी कहा जा सकता है और लोक−नेता को साँचा साँचे में ढालकर मिट्टी से खिलौने बनाये जाते हैं। साँचे जैसी आकृति बनी होगी, खिलौने भी उसी आकृति के बन चले जायेंगे। लोक−निर्माण के क्रियाकलापों को ‘सूखी मिट्टी की जाली बनाना और उसे साँचे के साथ चिपकाना भर कह सकते हैं। असल तत्व तो साँचा हैं,लोक नेता व आन्तरिक व्यक्तित्व हैं। इसे लाख प्रयत्न करने पर कोई देर तक छिपा नहीं सकता, एक अन्तरात्मा दूसरी आत्मा की वस्तुस्थिति को सहज ही जान लेती है। डडडड और बनावट के पर्दों में वस्तुस्थिति देर तक न छिपी रहती। लोक−निर्माण में सफलता केवल उत्कृष्ट सम्पन्न महान् व्यक्तित्वों को मिली है। धूर्तता भरी प्रकार की उछल−कूद तो फुलझड़ी का कौतूहल भरा खेल डड बनकर विस्मृति के गर्त में चली जाती है। इस तथ्य हर शिक्षार्थी गहराई के साथ समझ ले, इसका परिडड प्रयत्न किया जायगा।
वानप्रस्थ शिक्षा की अवधि में निरन्तर यह प्रचार किया जाता रहेगा कि शिक्षार्थी आत्म−चिन्तन—असुधार—आत्म−निर्माण और आत्म−विकास का चतुर्थ क्रियाकलाप अपनायें और आत्मोत्कर्ष की ऊँची सीढ़ी चढ़ने के लिए प्रबल प्रयत्न करता रहे। गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे परिवर्तन करें, जिनसे मानवी महानता गौरव होती हो। व्यावहारिक जीवन में आध्यात्मिक आदर्श किस प्रकार—किस क्रम से समाविष्ट किया जा सकता वस्तुतः इसी का नाम विद्या अथवा आत्म−साधन इस संदर्भ में शिक्षा और साधना के उभय−पक्षीय उच्च शिक्षार्थी के सामने प्रस्तुत रहेंगे तो यह आशा की जा सकती है वह अपना व्यक्तित्व इस स्तर तक परिष्कृत करलें कि उसे साँचे की संज्ञा दी जा सके और उसके संपर्क में आने वाले खिलौने सुन्दर एवं सराहनीय बनेंगे, ऐसी आशा की जा सके।
(1)वक्तृत्व−कला (2) बहिरंग व्यक्तित्व का निर्माण, (3) अन्तरंग ब्रह्म−तेज के विकास के शिक्षण−क्रम की ऊपर की पंक्ति यों में चर्चा हो चुकी, अब इस प्रशिक्षण के दो आधार और रह जाते हैं (4)व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित वर्तमान समस्याओं का स्वरूप और उनके लिए विभिन्न स्तरों पर किये जा रहे सुधार प्रयासों का पर्यवेक्षण तथा (5) युग−निर्माण योजना के अंतर्गत धर्ममञ्च के माध्यम से किये जाने वाले कार्य की सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक जानकारी। इन पाँच आधारों के भेद उपभेद ही शिक्षार्थियों को सिखाये जाते रहेंगे। सिखाने का उपक्रम बताने−सुनाने तक सीमित न रहेगा। सुन लेने तथा नोट करने से भी काम न चलेगा। प्रयोगों को व्यवहार में लाने का समुचित अभ्यास भी कराया जाता रहेगा। व्यवहार और सिद्धान्त मिलकर ही तो शिक्षा−क्रम पूरा हो सकता है।
मानव−जाति के सम्मुख उपस्थित दुसह समस्याओं को समझाने से ही कोई लोक−सेवक अपने कार्य क्षेत्र की उलझनों का स्वरूप जान सकता है और उसका यथार्थ समाधान निश्चित कर सकता है। वानप्रस्थ−शिक्षा में इस प्रकार की गम्भीर विवेचनाओं का समुचित समावेश किया गया है। ताकि शिक्षार्थी सुलझा हुआ परिष्कृत दृष्टिकोण लेकर सेवा−क्षेत्र में प्रवेश कर सकें, एक स्पष्ट मिशन लेकर जन−संपर्क में आ सकें। प्रवचनों, प्रश्नोत्तरों, शंका−समाधानों के रूप में इस शिक्षा−प्रक्रिया का दैनिक−क्रम चलता रहेगा।
युग−निर्माण योजना की धर्म−मंच के माध्यम से लोक −शिक्षा की पद्धति सर्व विदित है। पर्व, संस्कार, जन्म−दिन, यज्ञ−आयोजन, कथा आदि माध्यमों से किस प्रकार लोकमानस परिष्कृत किया जा सकता है? इसकी विस्तृत जानकारी हम सब बहुत दिनों से प्राप्त करते रहे हैं। प्राचीनता में नवीनता के समावेश का यह अपना प्रयोग आश्चर्यजनक एवं आशातीत गति से सफल होता रहा है। भारतीय जनता 80 प्रतिशत निरक्षर है, 78 प्रतिशत लोग देहातों में रहते हैं। उनकी पूर्व−निर्मित मनोभूमि में धर्म−प्रसंगों के लिए ही थोड़ा स्थान है। राजनीति, अर्थशास्त्र, समाज−शास्त्र को आधार बनाकर अभी कुछ अधिक महत्वपूर्ण बातें सुनने समझने की उनकी स्थिति नहीं है। धर्म मञ्च को आधार मानकर जितनी आसानी से व्यक्ति एवं समाज को परिष्कृत बनाने की शिक्षा जिस सरलता और सफलता के साथ दी जा सकती है, उसकी तुलना में और कोई दूसरा प्रयोग हमारे देश में सफल नहीं हो सकता। इस तथ्य को हमें स्वीकार करना ही होगा और यदि विशाल भारत को सुन्दर देहातों के जन बहुमत तक पहुँचना है, तो धर्म−मंच को साथ लेकर चलना होगा। हम यही तो करने जा रहे हैं।
शिक्षा की आधी अवधि एक महीना’ शान्ति−कुँज में रह कर स्थानीय प्रशिक्षण के लिए निर्धारित है और आधा समय उन्हें शाखा संगठनों में जाकर प्राप्त शिक्षा को व्यवहार रूप में परिणत करने का अनुभव अभ्यास करने के लिए है। इसके लिए उनमें से दो−दो के जोड़े बनाकर शाखाओं में भेजा जायगा। वहाँ जाकर वे अपनी एक महीने की शिक्षा को कार्य रूप में परिणत करने का—लोक सेवा प्रयोजनों में संलग्न होने का अभ्यास और अपना अनुभव परिपक्व करेंगे।
यों इतने बड़े प्रयोजन के लिए दो वर्ष का प्रशिक्षण भी कम था। दो महीने तो बिलकुल ही कम हैं। पर ध्यान इस बात का भी रखना पड़ा है कि कनिष्ठ वानप्रस्थ अत्यंत व्यस्त और उत्तरदायित्वों से भरे वातावरण में से निकल कर आ रहें हैं। वे पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं हैं। इसलिए उन्हें लम्बी अवधि तक रोका नहीं जा सकता। युद्धकाल में जब प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को अनिवार्य रूप से भर्ती किया जाता है, तो भी सामयिक ट्रेनिंग बहुत ही स्वल्प काल में होती है और उतने से ही उन नवागन्तुक सैनिकों को ‘कुछ’ करने योग्य बना दिया जाता है। आज वैसी ही संकट−काल की स्थिति है। इसमें स्वल्प कालीन प्रशिक्षण की वैसी ही उपयोगिता है, जैसी शान्तिकाल में सुविस्तृत धर्म−शिक्षा प्राप्त करने को किसी विश्वविद्यालय में रहकर गहन एवं दीर्घ−कालीन अध्ययन साधना करने की।
क्लिष्ट वानप्रस्थों को सेवा−काल में अपने स्थान से बाहर जाकर कार्य करना चाहिए। सक्रिय सदस्य और कर्मठ कार्यकर्ता अपने−अपने क्षेत्र में प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक शतसूत्री योजना चलाते ही हैं। घर−कार्यों से बचे हुये समय को विचार−क्रान्ति—नैतिक क्रान्ति और सामाजिक−क्रान्ति के पुनीत क्रियाकलाप में लगाते ही हैं। वानप्रस्थों की भूमिका इससे अगली और ऊँची है। उन्हें बड़े कदम उठाने पड़ते है। इनमें एक कदम यह है कि अपना वर्तमान स्थान छोड़कर कहीं अन्यत्र सेवा−कार्य करने के लिए चले जायँ। पुरानी परम्परा यही है। वानप्रस्थ का अर्थ—घर छोड़कर वन में निवास करने वाला होता है।
अब वन्य प्रदेश में जीवनोपयोगी साधन सुविधाएँ नहीं मिलतीं और न वहाँ रहकर वर्तमान परिस्थितियों में अभीष्ट सेवा−कार्य हो सकता है। इसलिए घर छोड़कर वन जाने की बात में आधा अंश ही उपयोगी रह गया है—घर छोड़ना। वन जाने की अपेक्षा हमें भावनात्मक नव−निर्माण के लिए जन संपर्क में उतरना चाहिए। आजकल लोक−मानस भी झाड़−झंखाड़ भरे वन्य−प्रदेश से कम जटिल नहीं है। उसके साफ करके सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के रहने योग्य बनाना चाहिए।
यों घर में रहना कोई पाप नहीं है। स्त्री बच्चों ने कुछ जुर्म नहीं किया है कि उन्हें छोड़ा जाय। इसलिए घर को भव−बन्धन समझना और बाहर वन में जाकर पुण्य बटोरने से शान्ति समेटने की कल्पना करना निरर्थक है। घर छोड़ने के पीछे यह निषेधात्मक दृष्टिकोण सर्वथा अनुचित है। हाँ, एक दूसरा दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार अन्यत्र जाकर काम करने की उपयोगिता का समर्थन होता है।
घर रहकर पारिवारिक, व्यावसायिक काम बने ही रहते हैं। मित्रों और संबंधियों का पुराने ढर्रे का मिलना−जुलना और वार्तालाप करना बना ही रहता है, इस क्षेत्र में वानप्रस्थ की बदली हुई रीति−नीति फिट नहीं बैठती, उन्हें अखरती है। क्योंकि पिछले सामान्य क्रम में उन्हें व्यवधान उपस्थित दीखता है। अस्तु स्वाभाविक ही है कि कुटुम्बी सम्बन्धी और मित्रगण उपहास उड़ायें—बेवकूफ बनायें, ढोंग बनायें और इस झंझट में न पड़ने की सलाह दें। अनेकों ऐसी बात कहें—दलीलें दें, जिनसे अपना मन कमजोर पड़ता हो। जिन लोगों से सदा काम काजी साँसारिक बातें कही जाती रही हैं, उन्हें उस वानप्रस्थ अवधि में पुराना ढर्रा बदल कर ज्ञान−ध्यान की नई बातें कहने लगें तो उन्हें भी अटपटा लगेगा और जो समझाया जा रहा है, उसे मानने−अपनाने की अपेक्षा उलटे असमञ्जस में पड़ने लगेंगे। अपना ध्यान भी आधा ही परमार्थ प्रयोजनों में लगेगा। जो काम या समस्याएँ सामने आयेंगी, उनसे इन्कार तो नहीं किया जा सकता। दोनों ओर ध्यान बना रहे तो एक भी काम पूरी तरह न हो सकेगा। अधूरेपन की मनःस्थिति में जो कुछ होता है, वह लँगड़ा−लूला और असफल ही रहता है। घर का भी हर्ज हुआ−अभीष्ट परिणाम भी न निकला तो ऐसे वानप्रस्थ की क्या उपयोगिता हुई? सक्रिय सदस्य और कर्मठ कार्यकर्ता भी घर रहकर तो कुछ न कुछ सेवा−कार्य करते ही रहते हैं। वे अपने आपको सामान्य सेवा−रत कहते हैं। साधु−संस्था की अभाव पूर्ति का दावा नहीं करते। वानप्रस्थ उस उच्चस्तरीय आवश्यकता की पूर्ति के लिए दुस्साहस करता है, इसलिये उसके त्याग−बलिदान की मात्रा भी अपेक्षाकृत अधिक बढ़ी चढ़ी होनी चाहिए। इसका प्रथम प्रतीक यह है कि जित दिन वानप्रस्थ निबाहना हो, उतने दिन अन्य किसी का क्षेत्र में जाकर रहना चाहिए, ताकि पूरे मन से पूरा ध्यान लगाकर जो कुछ करना हो, उसे ठीक तरह किया जा सके।
व्यावहारिक क्षेत्र में यह उक्ति सोलह आने सही उतरती है कि “गाँव का जागी जोगना−अन्य गाँव का सिद्ध अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जिन्होंने आरम्भ से सामान्य सा का जीवनयापन किया है वे कम से कम उस क्षेत्र में बदले हुए उच्चस्तरीय परिवर्तन की बात स्थानीय लोगों के गले नहीं उतार सकते। यदि प्रयत्न करें भी तो सफलता प्राप्त करने में मुद्दतें लग जाती हैं, तब कहीं लोग वस्तुस्थिति समझ पाते हैं। आरम्भ में तो इस परिवर्तन के साथ मखौल, मजाक, व्यंग और विरोध असहयोग का दौर चल पड़ता है। जिनसे कभी किसी बात में मतभेद रहा है,वे ऐसे मौके पर बदला चुकाने का प्रयत्न करते हैं। तरह−तरह के आक्षेप, आरोप गढ़ते है और लोगों की दृष्टि में उसके पुण्य−प्रयास को इस तरह तोड़−मरोड़ कर रखते हैं कि बात बनने की अपेक्षा और गिरने लगे। चरित्र−हत्या के रूप में अक्सर ऐसे ही अवसरों पर शत्रुओं के घात−प्रतिघात चलते हैं। मित्र लोग भी इसमें पीछे नहीं रहते। उनका उद्देश्य शत्रुओं जैसा तो नहीं होता, पर साथ सहयोग का जो लाभ मिलता था, उसमें कमी आने से खीजते वे भी हैं और प्रयत्न यह करते हैं कि उस मार्ग से लौटने के लिए विवश करदें। इसलिए वे जब समझाने−बुझाने में असफल रहते हैं तो तरह−तरह की कठिनाइयाँ खड़ी करने लगते हैं।
यह समस्या काल्पनिक नहीं —सर्वथा देखी−समझी हुई है। प्रायः सभी महामानवों के अनुभव में आई है। इसलिए उन्हें अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र ही कार्यक्षेत्र बनाना, अपनाना पड़ा है। भगवान बुद्ध कपिल वस्तु में जन्मे अवश्य थे, पर वहाँ उनने अपना कार्यक्षेत्र नहीं बनाया। गाँधीजी पोरबन्दर में जन्मे थे, पर उनका कार्यक्षेत्र साबरमती और बर्धा रहा। शंकराचार्य केरल में जन्मे, पर वहाँ टिके नहीं। उत्तर भारत में वे काम करते रहे। स्वामी दयानन्द टंकारा में नहीं रहे, उन्हें मथुरा, अजमेर आदि स्थानों में अपने पाँव जमाने पड़े। सन्तों और महापुरुषों में से कोई एकाध ही ऐसा हुआ होगा, जिसने अपनी जन्मभूमि में ही सेवा−क्षेत्र बनाया हो और आशाजनक सफलता पाई हो। इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद साहब को मक्का छोड़कर मदीना के लिए हिजरत करनी पड़ी। ईसामसीह को लोगों ने वहाँ नहीं टिकने दिया, जहाँ वे जन्मे थे। श्रीकृष्ण भगवान ब्रज में रहने की उपयोगिता संदिग्ध होने पर वहाँ से उखड़ दिये थे और महाभारत के लिए इन्द्रप्रस्थ रुकने के उपरान्त द्वारिका जाकर पैर जमाने में समर्थ हुए थे।
यह कड़ुई सच्चाइयां हैं, जिनके आधार पर वानप्रस्थों को भी भूतकाल के परिव्राजक संन्यासियों की तरह अपना वर्तमान स्थान छोड़कर अन्यत्र जाने की बात सोचनी चाहिए। वह अवधि स्वल्प−कालीन हो तो ठीक है, पर जितने भी दिन कार्य करना हो उसे समग्र और व्यवस्थित करने की दृष्टि से अपना कार्यक्षेत्र अन्यत्र बनाने की बात ही सोचनी चाहिए।
बाहर का व्यक्ति अचानक सामने प्रस्तुत होता है, इसलिए उसका वर्तमान स्वरूप ही लोग देख−समझ पाते हैं। स्पष्टतः वानप्रस्थ का वर्तमान वेष और स्वरूप सन्त−महात्मा जैसा होता है। अस्तु उसे उसी रूप में देखने−मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। स्वभावतः ऐसे आगन्तुक का अधिक प्रभाव ग्रहण किया जाता है। मनुष्य की कमजोरी ही सही, पर यह बात उसकी प्रकृति का अंग है कि “दूर के ढोल सुहावने” वाली उक्ति के अनुसार अपनी मान्यता बनाये और अजनबी के बारे में लम्बी−चौड़ी बातें सोचे। यदि यथार्थ में कोई वानप्रस्थ अपने भूतकालीन जीवन में कुछ ऊँचे स्तर का रहा है तो उसमें नमक−मिर्च मिलाकर सोचने की आदत, बात को और भी अधिक बढ़ा देती है और नवागन्तुक धर्म−प्रचारक और भी अधिक प्रभावशाली बन जाता है।
कार्यकर्ता को अधिक तत्परता से, अधिक एकाग्रता से, संकोच त्याग कर अधिक उत्साह के साथ नई जगह में ही काम करने का अवसर मिलता है। संकोची प्रकृति से भी बाहर जाकर ही पीछा छूटता है। अपनी प्रतिभा के विकास का अवसर भी ऐसे ही वातावरण में बनता है। निस्वार्थता की—निष्पक्षता की स्थिति भी उन्हीं परिस्थितियों में रहती है। नये ढर्रे की जीवनयापन पद्धति का अभ्यास इस स्थान परिवर्तन की स्थिति में अधिक सुविधापूर्वक—अधिक खुले मन से हो सकता है। वनवास में जिन बदली हुई परिस्थिति के लिए प्राचीन तपस्वी लोग जाते थे, लगभग वैसी ही बात अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र काम करने पर चले जाने से भी बन जाती है। अपने आपको अपनी बदली हुई स्थिति का भान होता रहे— अंतर्मन को निरन्तर संकेत उद्बोधन मिलता रहे, इसलिए वस्त्रों का रंग बदल लेने की परम्परा बहुत ही सार−गर्भित एवं तथ्य पूर्ण है। वानप्रस्थ अवधि में पीतवस्त्र धारण करने की परम्परा भूतकाल में जितनी उपयोगी थी, अब भी वह उतनी ही आवश्यक है। इसलिए अपनी परम्परा भी वही है। वानप्रस्थ को शिक्षा−काल में तथा सेवा−काल में पीले रंग से रँगे हुए वस्त्र पहनने होते हैं। धोती, कुर्ता, दुपट्टा तो रहते ही हैं, आवश्यकतानुसार कोट, जाकेट आदि पहनने हों तो वह भी रँगे जा सकते हैं। पेन्ट, पाजामा नहीं चलेगा, उसका तालमेल भारत की धर्म−संस्कृति के साथ नहीं खाता। वानप्रस्थ उन्हें पहने तो अटपटा और अस्वाभाविक लगेगा। इसलिए सामान्य भारतीय वेष−भूषा को पीले रंग में रँग कर उस अवधि में पहने रहने की परम्परा यथा स्थान रखी गई है। नियत अवधि पूरी करके क्लिष्ट वानप्रस्थ जब घर लौटे तो फिर सामान्य पोशाक पहले की तरह पहनते रहने में कोई हर्ज नहीं है। जब तक वानप्रस्थ तब तक स्थानान्तरण और तभी तक पीत−वर्ण की पोशाक।
सामान्यतः प्रयत्न यह करना चाहिए कि शिक्षण−काल का भाजन आदि का खर्च अपने पास से ही उठाया जाय। आवश्यक वस्त्र तो घर से ही साथ लेकर चलना चाहिए। सेवा कार्य में प्रायः भोजन व्यवस्था शाखा संगठनों में हो जाती है। यदि अपने पास थोड़ी अर्थ−व्यवस्था है तो प्रयत्न यही करना चाहिए कि जनता पर अपना कोई भार न पड़े और समय दान के साथ साथ उतना अर्थ−भार भी स्वयं ही उठायें, जिसमें अपना निर्वाह−व्यय पूरा होता रहे। जिनकी निजी आमदनी नहीं रही, उनके कमाऊ बच्चों को पितृ−ऋण चुकाने की दृष्टि से वानप्रस्थ कला का व्यय भार उठाना चाहिए। हर दृष्टि से औचित्य इसी में है कि यदि अपने पास थोड़ी अर्थ−व्यवस्था मौजूद है तो दूसरों पर अपना भार क्यों डालें? सेवा करनी ही है, तो अपना व्यय−भार स्वयं ही उठाते हुए क्यों न करें? जिनकी आर्थिक−स्थिति इस लायक है, उनकी प्रतिष्ठा इसी में है कि तीर्थ−यात्रा के लिए जिस प्रकार अपने खर्च से जाते हैं, उसी प्रकार इस तप−साधना के लिए भी यदि अपने पास कुछ है तो उसी का उपयोग करें। पिछली कमाई बेटे−पोतों के लिए और संन्यास में भिक्षा लोगों से—वाली नीति ही चलती रहे तो पिछले पिछड़े हुए साधुओं की तुलना में अपना त्याग का आदर्श क्या रहेगा?
पर वस्तुतः जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि घर से वानप्रस्थ अवधि का निर्वाह−व्यय प्राप्त कर सकें, उनकी आवश्यकताऐं शान्ति−कुञ्ज से जुटाई जायेंगी। घर के लिए मनीआर्डर तो किसी के लिए भी नहीं भेजा जा सकता, पर अन्न−वस्त्र की कमी के कारण शिक्षा एवं सेवा के लिए आगे बढ़ने से किसी को भी मन मसोस कर नहीं बैठना पड़ेगा।
मात्र भजन, स्वाध्याय, सत्संग से आत्मिक−प्रगति का महान् प्रयोजन पूरा नहीं होता। विचारणा के साथ क्रिया−प्रक्रिया जुड़ी रहने पर ही संस्कार बनते हैं, आस्थाएँ सुदृढ़ होती हैं और स्तर परिपक्व बनते हैं। इसलिए उत्कृष्ट विचारणा के साथ आदर्श क्रिया−पद्धति को जोड़ने से ही श्रेय साधना की धारा गतिगामिनी होती है। वानप्रस्थ प्रयोजन में इन सभी सन्दर्भों का समावेश है, उसे अपना कर हम अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का, अन्तःचेतना में उच्चस्तरीय तत्वों के समावेश का उद्देश्य पूराकर सकते हैं।
वानप्रस्थ परम्परा भारतीय−संस्कृति का मूल आधार है—उसी परम्परा ने इस देश को सुयोग्य, अनुभवी, अवैतनिक, भाव भरे लोक−सेवी प्रदान किये थे। इन्हीं नररत्नों ने इस देश को उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचाया था और उन्हीं के द्वारा हमने जगद्गुरु का सम्मान पाया था। समस्त विश्व को प्रगति एवं समृद्धि की दिशा में बढ़ाया था। इस परम्परा को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। आधी आय के बाद जीवन का उत्तरार्ध−परमार्थ चाहिए, तभी विश्व कल्याण का पथ−प्रशस्त होगा। इस लुप्त परम्परा को जीवित करने के लिए यदि हम स्वल्पकालीन वानप्रस्थ क्रम भी आपत्ति−धर्म की तरह चला सके तो, उसके सत्परिणामों को देखकर लोग स्वयमेव आवश्यकता अनुभव करेंगे और वरिष्ठ वानप्रस्थों के द्वारा प्राचीनकाल जैसी सतयुगी स्थिति फिर इस धरती पर दृष्टिगोचर होगी।
इस युग में साधु-संस्था का प्रतिनिधित्व उन वानप्रस्थों को करना है, जिनमें मात्र भावना ही नहीं, लगन, योग्यता और पुरुषार्थ–परायणता की भी कमी न हो। जो पहले अपने गुण, कर्म, स्वभाव का—चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्माण करे और साथ ही लोक-मंगल की क्रिया-प्रक्रिया में उसी तत्परता के साथ प्राप्त करने के लिए जी-जान एक करते हैं। यदि ऐसे नर–रत्नों का उत्पादन अभिवर्धन संभव हो सका तो आशा की जा सकेगी कि जन-मानस का भावनात्मक नव-निर्माण सम्भव हो सकेगा और उस आधार पर संकट-ग्रस्त मानवता की अनेकानेक सम्पदाओं से उबारा जा सकेगा। यदि निष्ठावान् लोक-सेवी पैदा न हो सके तो पतन के तूफानी प्रवाह की अन्य किसी उपाय से रोका न जा सकेगा। तब शिक्षा और सम्पदा बढ़ाने के लिए किये जाने वाले विविध–विधि प्रयास बाल-क्रीड़ा की तरह चलते तो रहेंगे, पर उनसे बनेगा कुछ नहीं। कीचड़ भरा दलदल यथा-स्थान रहे तो एक–एक मक्खी-मच्छर को गिनते मारते रहने से उनके भिनभिनाने को कैसे रोका जा सकेगा।
हम ऐसे युग-नायक बनाने और बढ़ाने में लगे हैं, जो अपने अनुकरणीय आदर्श से अन्य अनेकों को श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकें। उज्ज्वल भविष्य की आशा का केन्द्र जन मानस का भावनात्मक परिष्कार ही है। इस तक तालीर से ही वे सब ताले खुल जायेंगे, जिन्होंने सुख–शान्ति तक पहुँचने के समस्त द्वारों को अवरुद्ध कर रखा है। लोगों को दिग्–भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। छुटपुट सुधार-कार्यों से लम्बी–चौड़ी आशाएँ नहीं बाँधनी चाहिए। शक्तियों को इधर-उधर नहीं बखेरना चाहिए। समस्त इच्छा-शक्ति और साधन शक्ति को इकट्ठा करके जन-मानस में भावनात्मक उत्साह भरना चाहिए—आदर्श–निष्ठों में आस्था उत्पन्न करनी चाहिए। इतना सम्भव हो सका तो लोक-शक्ति की चण्डी जिधर भी बढ़ेगी, उधर ही घमासान उत्पन्न कर देगी।
जन-शक्ति की क्षमता अपार है। उसकी एक हुंकार से न जाने क्या से क्या हो सकता है? जनता ने मत-पेटी में पर्ची डालने जैसा थोड़ा-सा रुख पलटा तो काँग्रेस सरकार सत्तारूढ़ हो गई और वह सत्ताईस वर्ष से सिंहासन पर विराजमान है। जनता ने भवें तरेरीं तो दो सौ वर्षों से जड़ जमाकर बैठे हुए अंग्रेज थर–थर काँपने लगे और उन्हें सिर पर पैर रखकर भागते ही बना। जनता अपना नगण्य सा आजीविका अंश लेकर खर्चीली शासन सत्ता का भार हँसते–खेलते वहन कर लेती है। अरबों-खरबों रुपया हर साल खर्च कर डालते वाला—लगभग एक करोड़ लोगों का भार निर्वाह लादे हुए खड़ा धर्म–तन्त्र जनश्रद्धा की एक किरण पाकर फल–फूल रहा है। जनता की एक दुर्बलता का तनिक-सा सहारा पाकर कामुकता की दुष्प्रवृत्ति ने, संगीत साहित्य ने कला के स्त्रोतों पर सहज अधिकार कर लिया है। जन-समाज के छोटे-से छिद्रों में प्रवेश मिल जाने से अपराधी दुष्प्रवृत्तियों की अपनी जड़े जमाने का अवसर मिल गया है। जनता की धारा बाढ़ का रूप धारण करके उच्छृंखल प्रवाह में बहने लगे तो देखते देखते सारी समृद्धि डूबती बहती और नष्ट होती दिखाई देगी। इस धारा को नियन्त्रित और व्यवस्थित दिशा मिल जाय तो आज के सूखे मरुस्थल कल हरे–भरे उद्यानों से विकसित होंगे और सोना उगलेंगे।
जन-शक्ति से बढ़कर और कोई सामर्थ्य इस संसार में है नहीं। मनुष्य अपने आप में एक छोटा परमेश्वर है फिर यदि उसे संघबद्ध होने का अवसर मिल जाय—उत्कृष्टता की दिशा में वह चल पड़े तो फिर कोई ऐसी सम्पदा नहीं, जो उसके चरणों में लोटती दिखाई न पड़े। मनुष्य दीनदरिद्र नहीं है—उसे कृमि-कीटकों के स्तर पर रखकर छुट-पुट उपहारों के माध्यम से दया प्रदर्शित करने की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी उसका उद्बोधन करके अपने पैरों पर खड़ा कर देने की। चन्दा इकट्ठा करके अन्न, जल, औषधि आदि जुटा देने की चेष्टा करने वाले अपनी दया मया का परिचय तो दे सकते है, पर यह भूल जाते हैं कि समर्थ मानव यदि अपनी शक्ति से परिचित हो जाय—उसका सदुपयोग करना सीख ले तो शरीर से अन्धा, अपंग रहने पर भी वह अपनी नाव पर बिठाकर निज का ही नहीं, अन्य अनेकों का उद्धार कर सकता है।
जनता का प्रत्येक घटक अपने में असीम सम्भावनाएँ छिपाये बैठा है। हर व्यक्ति में रावण, कुम्भकरण, हिरण्यकश्यप सहस्रबाहु, सिकन्दर, चंगेजखां, नादिरशाह, नेपोलियन, हिटलर जैसी बामपक्षी असुरता छिपी पड़ी है। दक्षिण-पक्षी देव–सत्ताएँ और भी बढ़ी–चढ़ी हैं राम, कृष्ण, हनुमान, परशुराम, अर्जुन, शंकराचार्य, बुद्ध, प्रताप, शिवा जी, विवेकानंद, दयानन्द, गाँधी कहीं से भी फूट पड़ सकते हैं। वैज्ञानिक, दार्शनिक, तत्वदर्शी, तपस्वी, कलाकार, मनीषी, युगान्तरकारी, क्रान्तिकारी, मनस्वी, दूरदर्शी, सृजेता, विजेता जनता की खदान में से ही निकलते हैं। संसार में जो कुछ अद्भुत, आकर्षक, सुन्दर, सुखद दीखता है, वह सब मनुष्य की सूझ बूझ का-उसके श्रम-सीकरों का उद्भव है। अन्यथा यह धरती अपने जन्म-काल में वैसी ही कुरूप वैसी ही नीरव और वैसी ही अस्त-व्यस्त थी, जैसी आज चन्द्रमा सहित अन्यान्य ग्रह–नक्षत्रों की स्थिति है। कुरूपता को—सौंदर्य में —अभाव को भाव में—नीरवता को उल्लास में—अन्धकार को प्रकाश में परिणत करने की परिपूर्ण क्षमता मानव-प्राणी में विद्यमान है और मनुष्यों के समूह का नाम है जनता, जनता की सत्ता और महत्ता की परिकल्पना कर सकना उसके मूल सृजेता के लिए भी कठिन है।
जन-भावना उभार कर यदि हम दस पैसा प्रतिदिन नव-निर्माण प्रयोजनों के लिये प्राप्त करने की नगण्य-सी सफलता प्राप्त करे लें तो 50 करोड़ भारतीय हर रोज 5 करोड़ रुपया जमा कर सकते हैं। वर्ष में 1800 करोड़। इतनी बड़ी धन-राशि से बड़ी से बड़ी योजनाएँ पूरी होती रह सकती हैं। एक घण्टा श्रम हर वयस्क व्यक्ति से प्राप्त कर लें तो 20 करोड़ वयस्कों के उस श्रमदान से 8 घण्टा पूरे समय श्रम करने वाले ढाई करोड़ श्रमिकों जितना काम कराया जा सकना सम्भव हो सकता है। यह जन शक्ति, श्रम–शक्ति इतनी बड़ी है कि हर दिन हजारों की संख्या में कुएँ, तालाब, बाँध बनकर एक वर्ष के भीतर सिंचाई की समस्या हल की जा सकती है और इस शस्य–श्यामला भूमि के पुत्र विदेशों के आगे अन्न के लिए हाथ पसारने के स्थान पर संसार के भुखमरी-ग्रस्त समस्या मनुष्यों के लिए अनाज निर्यात कर सकते हैं। हर शिक्षित व्यक्ति वर्ष में एक निरक्षर को साक्षर बनाने की प्रतीक्षा कर ले तो पाँच वर्ष के भीतर अपने देश के 80 प्रतिशत अशिक्षित पूरी तरह साक्षर हो सकते हैं।
जिस भ्रष्टाचार को-अपराधी दुष्प्रवृत्तियों को पुलिस और अदालतें रोक नहीं पा रही हैं, यदि जागृत जनता इन गुण्डा-तत्वों के विरुद्ध भवें तरेर दे तो इन मुट्ठी भर अनाचारियों का जीवित रहना कठिन हो जायगा। अनात्मीय तत्वों की असामाजिक गति–विधियों के विरुद्ध रोष, आक्रोश जगाया नहीं गया है। जिस दिन जन-शक्ति की चण्डी जगेगी, उस दिन अभाव, अशक्ति और अज्ञान क दुर्दान्त असुरों का अस्तित्व इस धरती पर बना रहना सम्भव न होगा। इस सबकी दुर्गति महिषासुर, मधुकैटभ और शुंभ–निशुंभ जैसी होगी। संघ–शक्ति का ही दूसरा नाम चण्डी है। पौराणिक कथा–प्रसंग के अनुसार देवताओं की सम्मिलित शक्ति इकट्ठी करके ही तो भगवती दुर्गा को सृजा था। देवताओं को विजेता और असुरों को पराजित करने के लिए उसी प्रयोग की पुनरावृत्ति अब फिर की जाय, इसके लिए आज का ही उपयुक्त समय है।
साधु-संस्था को पुनर्जीवित इसी निमित्त किया जा रहा है। वानप्रस्थ को नव–जीवन देने का अभियान इसी निमित्त चलाया जा रहा है कि जन–शक्ति को जागृत एवं संगठित करने के लिए लोक-मानस में परिष्कार परक उत्साह उत्पन्न किया जाय, इसके लिए धर्म-मंच को ही माध्यम बनाया जा सकता है। अन्तःकरण को उभारने और मोड़ने–मरोड़ने की विद्या को ही तो माध्यम कहते हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता पर चलने की आस्था का नाम ही तो धर्म-प्रेरणा है। व्यक्ति में जो कुछ महान् है—श्रेष्ठ है—उसे छूने उभारने के लिए अध्यात्म-धर्म को माध्यम बनाये बिना गाड़ी एक कदम आगे नहीं बढ़ सकती राजनीति, अर्थशास्त्र आदि के सहारे लोगों में बौद्धिक हलचलें और क्रिया-परक, हरकतें पैदा की जा सकती हैं, पर अन्तरात्मा के मर्मस्थल में प्रसुप्त पड़ा देवत्व तो धर्मचेतना का स्पर्श कराये बिना और किसी प्रकार जमेगा ही नहीं।
कहाँ, किसे, कब, कैसे, क्या करना पड़ेगा? इसकी कोई चिरस्थायी ‘लक्ष्मण–रेखा’ नहीं खींची जा सकती। व्यक्ति की योग्यता, अभिरुचि—समय की माँग-साधनों की सुविधा को देखते हुए कार्यक्रमों का निर्धारण और परिवर्तन होता रहेगा। बदलती हुई परिस्थितियों में बदले हुए कदम उठाने के लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना होगा। लक्ष्य की पूर्ति के लिए कार्यक्रम बनते हैं। कार्यक्रमों के साथ लक्ष्य जोड़ा नहीं जा सकता। इन बातों पर ध्यान रखने पर सदा-सर्वदा के लिए तो कोई कार्य-पद्धति नहीं बन सकती, पर वर्तमान स्थिति में—भारत की सीसा में क्या और कैसे होना चाहिए? इसका स्वरूप निर्धारण कर लिया गया है। अन्य देशों के लिए वहाँ की स्थिति और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भिन्न कार्यक्रम बनाने होंगे, किसी बात को हिन्दू–धर्मानुयायियों से अमुक प्रमाण उदाहरण देकर कहना पड़ता है तो मुसलमान को समझाने के लिए उस परम्परा के अनुरूप तक एवं तथ्य संग्रह करने पड़ेंगे। कर्मकाण्डों और विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी यही बात है। क्षेत्र एवं वर्ग की भूतकालीन परम्पराओं के साथ भावनात्मक नव-निर्माण के लक्ष्य को जोड़ने से जो क्रिया-पद्धति विकसित होती होगी, उसे बिना किसी दुराग्रह के अपना लिया जायगा। हम सत्य और तथ्य के पुजारी है। हमें न्याय और विवेक का समर्थन करना है।
साधारणतया वानप्रस्थों का कार्यक्रम बौद्धिक-क्रान्ति की—नैतिक क्रान्ति की—सामाजिक-क्रान्ति की तैयारी में संलग्न होगा। दूसरे लोग राजनैतिक-क्रान्ति की—आर्थिक-क्रान्ति की बात सोचते है, उसके लिए प्रयत्नशील हैं। उस क्षेत्र में पर्याप्त व्यक्ति मौजूद हैं और अपने ढंग से काम कर रहें हैं। हमारे सामने वह अछूता विस्तृत कार्यक्षेत्र खाली पड़ा है, जिसके बिना अन्य सब भौतिक योजनाएँ अपंग और असफल ही बनी रहेंगी। हमें किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी। अनीति और अविवेक के अतिरिक्त और किस से हमारी कोई लड़ाई नहीं। सभी के सत्प्रयत्नों में सहयोग दें और सभी वर्ग के विचारशीलों की सद्भावना सहकारिता का आह्वान करेंगे। न अपना छोटा दृष्टिकोण है, और न संकीर्णता की परिधि में बँधी हुई अपनी कार्य पद्धति है। विशाल से विशाल काम की बात ही हमने सोची है और उसी को वानप्रस्थ-संस्था सोचती अपनाती रहेगी।
नव-निर्माण के अंतर्गत व्यक्ति-निर्माण—परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण के त्रिविधि कार्यक्रम आते है। स्वस्थ-शरीर, स्वस्थ-मन और सभ्य-समाज की अभिनव रचना करना अपने कर्तव्य का प्रधान अंग है। इसके लिए प्रचारात्मक-रचनात्मक एवं संघर्षात्मक गति-विधियां अपनाई जायेंगी। प्रथम चरण में प्रचार-तन्त्र तो तीव्र किया जायगा—ज्ञान-यज्ञ का आलोक फैलाया जायगा—विचार-क्रान्ति का बीज बोया जायगा। इसके लिए छोटे-बड़े सम्मेलनों—गोष्ठियों एवं चर्चा-प्रयोजनों की रूप रेखा रहेगी। धार्मिक-आयोजनों के माध्यम से लोक -श्रद्धा को जागृत करके उसे रचनात्मक दिशा देने का उपक्रम किया जाता रहेगा। लेखनी से—छपे साहित्य के माध्यम से भी जन–जागृति की प्रत्येक सम्भावना को क्रियान्वित किया जायगा। लेखनी, वाणी, कला और धर्मानुष्ठान इन चारों ही प्रयोजनों में से जहाँ जिस प्रकार उपयोग सम्भव होगा, वहाँ उसकी पृष्ठभूमि बनाई जायगी। संगीत और अभिनय का नया क्षेत्र निकट भविष्य में ही खुल जायगा। क्योंकि भावनात्मक स्पर्श में अन्य माध्यमों की अपेक्षा कला–तंत्र का उपयोग अधिक आकर्षक भी रहता है और प्रभावशाली भी।
व्यक्ति की अपनी–अपनी योग्यता होती है और अपनी अभिरुचि। वानप्रस्थों में से किसे कहाँ, किस प्रयोजन के लिए फिट किया जा सकता है? इसका निर्णय उसकी क्षमता एवं विशेषता का विश्लेषण करने के उपरान्त की किया जा सकता है। पर मोटी रूपरेखा यह है कि दो–दो प्रशिक्षित वानप्रस्थों की टोलियाँ बनाकर उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों को अग्रगामी बनाने के लिए जन–संपर्क स्थापित करने के निमित्त युग–निर्माण शाखा–संगठनों में भेज दिया जायगा और वे वहाँ अपनी प्रतिभा का विकास विस्तार करने का अवसर प्राप्त करेंगे।
युग-निर्माण संगठन का विकास विस्तार अपने ढंग की अनोखी घटना है। विश्वास किया जा सकता है कि उसकी तूफानी गति अगले दिनों और भी तीव्र होनी है। अब उसे नियन्त्रित और सुव्यवस्थित करने का कार्य हाथ में लिया जाना चाहिए। अब तक वह बरसात में उगने वाली हरियाली की तरह अनायास और अप्रत्याशित रूप से उगा और बढ़ा है। अब उसे चतुर मालियों की कैंची, दराँती, खुरपी, कुदाली को आवश्यकता पड़ रही है। बाढ़ बनाने, खाद देने जैसे कितने ही कार्य करने को पड़े हैं, ताकि इस उगी हुई हरितिमा के बहुमूल्य पेड़–पौधों को अधिक सुन्दर, समुन्नत और फल-फूलों से लदा हुआ देखा जा सकें।
आवश्यकता यह अनुभव की गई है कि प्रत्येक शाखा संगठन के सक्रिय सदस्यों को—कर्मठ-कार्यकर्त्ताओं को क्रमबद्ध रूप से प्रशिक्षित किया जाय। मिशन के आधार, वर्तमान चरण एवं भावी क्रिया–कलाप का सांगोपांग परिचय कराया जाय। यों उन्होंने जाना-पढ़ा तो बहुत कुछ है, पर वह क्रमबद्ध रूप से नहीं हुआ है। यह उचित ही है कि मिशन का प्रत्येक सदस्य अपनी योजना एवं क्रिया-पद्धति से भली-भाँति अवगत हो। उसे आत्म–निर्माण के लिए समाज–निर्माण के लिए क्या करना है? कैसे करना है? इसकी विधि–व्यवस्था की उसे समुचित जानकारी होनी ही चाहिए। अस्तु निश्चय यह किया गया है कि इस वर्ष जितनी शाखाओं में सम्भव हो सके, कार्य कर्ताओं के शिक्षण–शिविर लगाये जायँ। प्रशिक्षित वानप्रस्थों को प्रधान रूप से इस वर्ष इसी कार्यक्रम का संचालन करना होगा। उसके लिए दो-दो वानप्रस्थों के जोड़े बनाकर भेजे जायेंगे, ताकि परस्पर सहयोग से मिल–जुलकर अधिक कार्य कर सकना सम्भव हो सके।
शिविर कहाँ किये जायेंगे, किस तारीख से किये जायेंगे? इसकी पूछताछ एवं जाँच-पड़ताल चल रही है। आशा है, वे बड़ी संख्या में होंगे और जनवरी से जून तक की प्रथम छमाही में प्रशिक्षित किये गये वानप्रस्थ उसी में खप जायेंगे। शिविर पन्द्रह–पन्द्रह दिन के होंगे। इसमें आरम्भ के तीन दिन व्यवस्था जुटाने और अन्त के दो दिन बिखरे हुए सारे कार्य को व्यवस्थित रूप से समाप्त करने के लिए निर्धारित है। बीच के दर दिन शिक्षण–व्यवस्था चलेगी। यों वे आरम्भ और अन्त के पाँच दिन भी शिक्षण के ही हैं, क्योंकि उस शाखा के कार्यकर्ता भी तो भविष्य में अन्यत्र जाकर इसी प्रकार से व्यवस्था का आरम्भ और अन्त कराया करेंगे।
बीच के दस दिनों में प्रातः 5 से 9 बजे तक चार घण्टे कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण चलेगा। इसकी रूपरेखा ‘पाक्षिक युग-निर्माण योजना’ के अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के छै अंकों में विस्तार पूर्वक छाप दी गई है। आत्म–निर्माण और समाज-निर्माण की जो प्रक्रिया वानप्रस्थों को लम्बी अवधि में हरिद्वार रखकर सिखाई गई है, उसका सार–तत्व चार घण्टा प्रतिदिन के हिसाब से इन दस दिनों में स्थानीय कार्यकर्त्ताओं के गले उतारने का प्रयत्न वानप्रस्थ लोग करते रहेंगे।
सायंकाल 7 से 10 तक जनता का प्रशिक्षण चलेगा। दस दिन तक सभा आयोजन चलता रहेगा। अब तक जन-साधारण को ‘युग-निर्माण योजना’ की अस्त-व्यस्त जानकारी ही प्राप्त हुई है। क्रमबद्ध रूप से अभियान की सांगोपांग रूपरेखा—विचारधारा एवं क्रिया योजना का उसे समझने-समझाने का सुयोग ही नहीं मिला। इस सम्मेलन में उस आवश्यकता की पूर्ति की जायगी व्याख्यानों की एक सुनियोजित विधि–व्यवस्था बना दी गई है। वक्ता उसी मर्यादा में पूर्व तैयारी करके पहुँचेंगे और निर्धारित विषद का ही प्रतिपादन करेंगे। इस प्रकार वह भी जनता का एक व्यवस्थित प्रशिक्षण-शिविर ही बन जायगा। संगीत साथ में रहेगा। दो व्याख्यान और डडडड संगीत हर दिन होंगे। आरम्भ, मध्य और अन्त में पन्द्रह–पन्द्रह मिनट के तीन संगीत, एक-एक घण्टे के दो भाषण पन्द्रह मिनट अन्य औपचारिकताओं के लिए। इस प्रकार तीन घण्टे में सभा-कार्य पूरा हो जाया करेगा।
किस दिन किस विषय पर भाषण होने हैं और कौन गीत गाये जाने है इसकी रूपरेखा भी बना दी गई है। स्थानीय कार्यकर्ता यह प्रयास करेंगे कि उस क्षेत्र के प्रतिभाशाली वक्ताओं और कुशल गायकों से संपर्क बनाकर अभी से उन्हें सम्मेलनों में अपने भाषण एवं गायन प्रस्तुत करने के लिए आमन्त्रित करेंगे। जो तैयार होंगे, उन्हें भाषण के विषय तथा गायन के गीत बहुत समय पर्व दे दिये जायेंगे, ताकि उन्हें आवश्यक तैयारी के लिए समय मिल जाय। इस प्रकार उस क्षेत्र के वक्ताओं एवं गायकों को भी अपने मिशन की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिल जायगा। भविष्य में शाखाएँ जब पर्वोत्सव अथवा दूसरे आयोजन समय–समय पर किया करेंगी तो इन गायकों और वक्ताओं से ही काम चल जाया करेगा। शैली विदित हो जाने से वे बताये हुए विषयों को तैयार कर लिया करेंगे। इस प्रकार बाहर से विद्वान, वक्ता एवं गायक बुलाने की खर्चीली प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता न पड़ा करेगी। बहुत हुआ तो एक स्थान के वक्ता, गायक दूसरी शाखा को—दूसरी के तीसरी को भेजकर नवीनता उत्पन्न कर ली जाया करेगी। इस प्रकार वक्त और गायकों की इन दिनों जो कमी पड़ती है, उसका हल निकल आयेगा।
इस सम्मेलन-आयोजन में कविता-गायनों की भी व्यवस्था रखी जाया करेगी। कवि–सम्मेलन बुलाया जाना तो कठिन है, पर कविता–पाठ का सम्मेलन मधुर कण्ठ वाले छात्रों और छात्राओं से भी चल सकता है। इसमें मनोरंजन भी है— प्रेरणा भी और छात्रों को मंच पर आने एवं विचार व्यक्त कर सकने का अभ्यास भी। किस दिन किन कविताओं को गाया जाय? इसका मार्ग–दर्शन उन्हें पहले से ही करा दिया जायगा, ताकि तैयारी के लिए उन्हें भी समय मिल जाय।
उत्साही अध्यापक और छात्र–संगठन एकांकी नाटकों का अभ्यास भी कर सकते हैं। उन्हें नाटक दे दिये जाया करेंगे—तैयारी वे करेंगे। समय पर प्रदर्शन करने पहुँच जायेंगे। इस प्रकार बीस मिनट या आधा घण्टे का नाटक भी मजे में हो सकता है। किसी दिन संगत, किसी दिन कविता-सम्मेलन, किसी दिन एकांकी नाटक रहने से विविधता रहेगी और आकर्षण भी। प्रवचनों के दो घण्टे तो सुरक्षित ही रहेंगे। एक घण्टा जो कला–तन्त्र के लिए रखा गया है, उसी में स्थिति के अनुरूप यह तीनों कार्य फिट कर लिये जाया करेंगे। इसमें सम्मेलनों में कला–तन्त्र का समावेश भी कविता-सम्मेलन, संगीत एवं एकांकी नाटकों के माध्यम से होता रहेगा। लोक–शिक्षण की यह भी एक दिशा है—जिसके लिए प्रस्तुत कर्ताओं की सर्वत्र आवश्यकता पड़ेगी। शिविरों के साथ चलने वाला जन–शिक्षण सम्मेलन न केवल जनता को मिशन की रूपरेखा से परिचित करायेगा, वरन् मञ्च को सँभालने वाले वक्ता,गायक एवं कलाकार को भी प्रशिक्षित करेगा।
शाखा-संगठन के स्थानीय कार्यकर्त्ताओं को विचार–क्रान्ति का प्रयोजन पूरा करने के लिए अपने क्षेत्र का ऐसे अनेक छोटे-बड़े आयोजन करने होंगे। अस्तु यह जनसम्मेलन भी उनका ज्ञान एवं अनुभव परिपक्व करेगा। जनसम्मेलनों की क्या और कैसे व्यवस्था करनी पड़ती है—क्या साधन जुटाने पड़ते हैं—जनता अधिक संस्था में उपस्थित हो, इसके लिए क्या करना होता है? भीड़ की व्यवस्था और नियन्त्रण करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? आदि बातों की समुचित जानकारी होने से सम्मेलनों का क्रम ठीक तरह चलाया जा सकता है। एक बार उस रूपरेखा को उपयुक्त मार्ग-दर्शन में सँभाल लेने से भविष्य में स्थानीय कार्यकर्ता की इस योग्य हो जायेंगे कि वे अन्यत्र जाकर स्वयं ही संचालन व्यवस्था संभाल सकें।
युग-निर्माण सम्मेलनों से साथ-साथ गायत्री-यज्ञ आयोजनों को जुड़ा रखने की अपनी कार्य-पद्धति भारतीय जन-मानस के अनुरूप बहुत ही उपयुक्त सिद्ध हुई है। उस आधार पर जन-मानस की धर्म-श्रद्धा आश्चर्य रूप से जगाई जा सकती है। यज्ञ में भाग लेने वालों को अपने वर्तमान दुर्गुणों में से एक छोड़ना पड़ता है। इस यज्ञ-दक्षिण की अनिवार्यता को जोड़ देने से अपने यज्ञ-आयोजन चरित्र-निर्माण का—व्यक्तित्व-निर्माण का प्रयोजन पूरा करने में अत्याधिक सहायक होते हैं। यज्ञ−भगवान् के सम्मुख ली हुई प्रतिज्ञाओं को लोग निष्ठापूर्वक निवाहते भी हैं।
धर्मोत्साह का अभिवर्धन—मिल–जुलकर काम करने का अभ्यास—सत्कर्म–परायणता का अभ्यास—प्राचीन परम्पराओं का परिचय आदि कितने ही ऐसे आधार हैं, जिनसे मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति में भारी सहायता मिलती है। धर्म–शास्त्रों में वर्णित लाभ इसके अतिरिक्त हैं। अपने यज्ञ–आयोजनों का विरोध कोई सुधारवादी अर्थशास्त्री भी नहीं कर सकता। क्योंकि अपने यज्ञों में आहुतियाँ केवल सुगन्धित वनस्पतियों की दी जाती हैं। अन्न का एक दाना भी नहीं होमा जाता। घी का उपयोग प्रतीक रूप से ही अत्यंत स्वल्पमात्रा में किया जाता है। जब तो उसमें भी कमी करदी गई है। आरम्भ की सात और अन्त की तीन, कुल मिलाकर दस आहुतियों में घी होमने से प्रचलन में अब घी नष्ट करने का आक्षेप भी चला गया। उपयोगी खाद्य–पदार्थों को नष्ट करने के आक्षेप से अपना मिशन सर्वथा मुक्त है। यज्ञ में जितना स्वल्प व्यय और जितना अधिक आकर्षण होता है, उस देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सर्वतोमुखी सृजन के लिए आवश्यक धर्मोत्साह उत्पन्न करने की दृष्टि से गायत्री–यज्ञ आयोजनों का प्रचलन करके युग−निर्माण योजना ने भारतीय जनता के लिए एक उपयोगी विधान प्रस्तुत किया।
गायत्री सद्भावनाओं की देवी है ओर यज्ञ—सत्कर्मों का प्रेरक। भारतीय−संस्कृति की जननी—वेद–माता गायत्री कही जाती है और भारतीय–धर्म का स्त्रोत−त्याग, बलिदान एवं पवित्र जीवन का प्रतीक यज्ञ। उत्कृष्ट विचारणा की व्याख्या गायत्री के माध्यम से और आदर्श क्रिया−पद्धति की शिक्षा यज्ञ विवेचना के माध्यम से जितनी अच्छी तरह दी जा सकती, उतनी और किसी माध्यम से नहीं। गायत्री–उपासना के शास्त्रीय प्रतिफल और यज्ञानुष्ठान के धार्मिक लाभ के यदि छोड़ भी दें तो भी इन दोनों माध्यमों में इतनी अधिक प्रेरणाप्रद आधार भरे पड़े हैं कि उनके सहारे व्यक्ति और समाज को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की प्रेरणा भली प्रकार दी जा सकती हे। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर पन्द्रह दिवसीय−शिविर में मध्य के चार दिन गायत्री यज्ञ आयोजन के लिए भी रखे गये हैं।
इस माध्यम से क्षेत्रीय आयोजनों की एक नई विधि व्यवस्था का कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण मिलता है। उसमें जन−मनोविज्ञान समझने की—लोगों से काम लेने की—उन्हें सँभालने की—भोजन−निवास की—सफाई की—सुरक्षा की—अनेकानेक समस्याओं को समझना−सँभालना पड़ता हैं। यह अपने आप में एक पृथक विधि−व्यवस्था है, जिसे जाने बिना यदि कोई उस तरह के काम में हाथ डाल बैठे तो सब कुछ गुड़–गोबर ही हो जायगा। सहभोज की एक उत्तम परिपाटी इन आयोजनों में ही उभरती है। कच्ची−पक्की रोटी का—एक का छुआ दूसरा न खाये, इस पाखण्ड का उन्मूलन इन यज्ञों में जिस सरलता से होता हैं, वह देखते ही बनता है। अपने आयोजनों में दाल–चावल जैसी कच्ची कहलाने वाली रसोई ही बनती है और बिना किसी भेद–भाव के मिल–जुलकर खाने, पकाने और परोसने से उस विभेदकारी पृथकतावाद का किला टूटता है, जिसने अपने देश को बेतरह विसंगठित और दुर्बल करके रख दिया है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए उपरोक्त शिविर−शृंखला से चार दिन गायत्री–यज्ञ आयोजन के लिए भी रखे गये हैं। यज्ञ के निमित्त अक्सर लोग श्रद्धापूर्वक अर्थ–सहायता भी देते हैं। आयोजन के आवश्यक खर्चो में ही ज्ञान–यज्ञ कास पक्ष भी जोड़ कर रखा जाता है और प्रचूर साहित्य वितरित करने—प्रेरक पोस्टर चिपकाने—दीवारों पर आदर्श−वाक्य लिखने का खर्च भी सम्मिलित रखा जाता है। ताकि लोगों को प्रेरणाएँ प्राप्त करने का यह उपयोगी माध्यम भी कार्यान्वित होता रहे कुछ पैसा बच गया तो स्थानीय शाखाओं को उस अपने यहाँ ज्ञान–रथ, लाउडस्पीकर, स्लाइड—प्रोजेक्ट ( रंगीन चित्र प्रदर्शन−यन्त्र), टैप–रिकार्डर आदि उपयोगी प्रचूर साधन खरीद लेने की सुविधा बन जाती है और उस क्षेत्र में ज्ञान−यज्ञ का अधिक विस्तार करना सम्भव जाता है। ऐसे−ऐसे अनेकों लोक–मानस में उपयोगी प्रेरणा उत्पन्न करने वाले तथ्यों को ध्यान में रखते हुए डड दिवसीय शिविर आयोजनों की रूप–रेखा बनाई गई है प्रशिक्षित वानप्रस्थों को तात्कालिक कार्यक्रम वही डड जा रहा है।
शिविर आयोजन को एक छोटा, सामयिक एवं स्थानीय कार्यक्रम मात्र न समझा जाय, उसका दूरगामी महत्व है। ‘युग−निर्माण योजना’ के शाखा–संगठनों को अपना−अपना कार्य−क्षेत्र सँभालना है। उसमें प्रकाश, विस्तार करना है और नव−निर्माण की विविध विधि हलचलों कास सृजन करना है। इसलिए उनके कार्यकर्त्ताओं को यह सारी विधि−व्यवस्था ओर रीति−नीति समझानी है, जिसके बिना अधिक कुछ कर सकना उनके लिए सम्भव नहीं हो रहा है।
वानप्रस्थों ने जिस प्रकार साहस पूर्वक अधिक समय देने और अधिक त्याग करने के लिए साहस जुटाया है, वैसा संगठन के लाखों सक्रिय सदस्यों एवं कर्मठ कार्यकर्त्ताओं के लिए सम्भव नहीं हो सकता। यदि कदाचित् वे उतना साहस कर भी लें तो उनको एक स्थान पर इकट्ठा करके एक साथ प्रशिक्षण भी सम्भव नहीं हो सकता। यदि स्थान ओर क्रम के अनुसार उन्हें बुलाने की विधि अपनाई जाय तो सौ वर्ष में भी वर्तमान कार्यकर्त्ताओं का नम्बर न आ सकेगा। इतने भी वर्तमान सदस्यों की अपेक्षा नये सृजन−सैनिकों की संख्या और अनेक गुनी बढ़ जायगी। उन्हें सिखाने के लिए हजार वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इसलिए उपाय केवल एक ही है कि व्रतधारी वानप्रस्थ हरिद्वार आकर प्रशिक्षण प्राप्त करें और वे दो−दो की टोलियाँ बनाकर शाखा−संगठनों में चले जाये और वहाँ पन्द्रह−पन्द्रह दिन की शिविर−शृंखला चलायें। इस प्रकार जो कार्यकर्ता घर छोड़कर बाहर जाने की स्थिति में नहीं हैं, वे अपने स्थान पर रहते हुए भी—सामान्य कार्यों को करते हुए भी उस शिक्षा का सार घर बैठे प्राप्त कर सके, जो वानप्रस्थों को हरिद्वार बुलाकर सिखाया गया है। इस पद्धति से प्रशिक्षण की व्यापक आवश्यकता सरलता पूर्वक स्वल्प अवधि में सम्भव हो सकेगी।
शिविर−संचालन वानप्रस्थों को सामयिक एवं प्राथमिक क्रिया−कलाप है। आरम्भ में उन्हें वही सौंपा जायगा। और तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की जायगी, पर यह क्रिया सदा−सर्वदा ही नहीं चलती रहेगी। दूसरे कार्य भी उन्हें हाथ में लेने पड़ेंगे। यों शिविरों का भी अन्त नहीं हो जायगा। शाखाएं हर वर्ष एक पन्द्रह दिवसीय आयोजन किया करें, कार्यकर्त्ताओं को क्रमिक रूप से अगली शिक्षा मिलती रहे। जनता को भी प्रथम वर्ष से आगे के विचार मिलते रहें। वानप्रस्थ हर वर्ष की नई शिक्षा−पद्धति सीख कर आते रहें और यह क्रम लगातार पाँच वर्ष तक चलता रहे, ऐसी योजना बनाई जा रही हैं। इस क्रम से इस वर्ष के शिक्षित−वानप्रस्थों को एवं अगले वर्ष वालों को अगली बातें सीखते और सिखाते चलने का लाभ मिलता रहेगा। पाँच वर्ष तक यह शिविर−शृंखला हर शाखा चला भी सकती है ओर उनमें भेजे गये वानप्रस्थों का उपयोग हो सकता है। पीछे शाखाएँ स्वावलम्बी होकर अपने बल−बूते पन्द्रह दिन के या न्यूनाधिक दिनों के अपने वार्षिकोत्सव मनाती रह सकती है। प्रचार−कार्य तो निरन्तर ही जारी रखना होगा। अन्यथा भुलक्कड़ जनता एक बार बताई गई बात को सदा कहाँ स्मरण रख पावेगी?
शिविर−संचालन प्रक्रिया के अतिरिक्त दूसरा जो कार्य वानप्रस्थों को हाथ में लेना है, वह है—तीर्थयात्रा आयोजन की तैयारी। जत्थे बनाकर प्रचार−कार्य करते हुए एक निर्धारित लक्ष्य तक जाना और फिर दूसरे रास्ते लौट आना, यह तीर्थयात्रा हुई। प्राचीन काल में लोग समूह बनाकर पैदल तीर्थयात्रा पर निकलते थे− जन–संपर्क बनाते थे। रास्ते में आने वाले गाँव−नगरों में सन्देश सुनाते थे और रात्रि को जहाँ बसते थे, वहाँ के लोगों को इकट्ठा करके धर्मोत्साह पैदा करते थे। जब पुनः उस पुण्य परम्परा का पुनर्जागरण करना हे। विचार−क्रान्ति की दिशा में इससे एक नई धारा बहेगी। जन−जागरण का एक नया स्त्रोत खुलेगा। वानप्रस्थ यह प्रयत्न करेंगे कि वे क्षेत्र−क्षेत्र में तीर्थयात्राओं की योजनाएँ बनायें। सामान्यता उन्हें भी पन्द्रह दिन की ही रखा जा सकता है। इन दिन दस मील सन्त विनोबा की भूदान पद यात्रा चलती थी। यह दूरी साधारणतया ठीक है। यों उसे आवश्यकतानुसार न्यूनाधिक भी किया जा सकता है। सामान्यता एक यात्रा में पाँच से लेकर दस सदस्य तक हो सकते हैं। सभी पीत−वस्त्र धारण करके चले और उस अवधि को सामयिक वानप्रस्थ प्रशिक्षण स्तर की मानें।
रास्ते में टोली को आत्म−निर्माण और समाज−निर्माण की आवश्यक शिक्षा वानप्रस्थ लोग देते चलेंगे। जहाँ थोड़ा विश्राम किया जाय, वही कुछ प्रश्नोत्तर होते रहे। जहाँ कोई महत्वपूर्ण स्थान एवं ऐतिहासिक स्थल आवे, वहाँ उसके विषय में चर्चा होती चले। रास्ते के गाँवों में पोस्टर चिपकाने की—विज्ञप्ति वितरण की—दीवारों पर वाक्य−लेखन की प्रक्रिया चलती रहे। रात को जहाँ पड़ाव पड़ना हो, वहाँ ठहरने की, भोजन की तथा आयोजन की व्यवस्था बनाने के लिए दो अग्र दूत एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच जाया करें। यात्रा आरम्भ करने से पूर्व ही उस तरह की तैयारी करली जाय और उन स्थानों के लोगों पर उत्तरदायित्व सौंप दिया जाय तो और भी अधिक सुविधा रह सकती है। अन्यथा एक दिन पहले यात्रा के दो अग्रदूत पड़ाव पर जाकर आवश्यक व्यवस्था कर सकते हैं। वे अग्रदूत आगे−आगे ही चलते रहेंगे और जत्थे के वहाँ पहुँचने तक आवश्यक साधन बने मिलें ऐसा होता रह सकता है।
यात्रा किस स्थान तक, किस मार्ग, से, कहाँ−कहाँ होकर जानी है? पड़ाव कहाँ पड़ने हैं। लौटना रास्ते से है? यह रूपरेखा पहले ही बन जानी चाहिए। उसके लिए प्रचार, विज्ञापन आदि भी छपाये जा सकते हैं। ताकि उन स्थानों की जनता को इस आगमन−आयोजन का पूर्व ज्ञान रहे वह उसे सफल बनाने में अपने योगदान की पूर्व तैयारी कर सकें। जिस स्थान तक पहुँचना है, वह यदि कोई धार्मिक या ऐतिहासिक स्थान हो तो और भी उत्तम है। उस स्थान पर श्रद्धाञ्जलि अर्पित करना इस तीर्थयात्रा की टोली का लक्ष्य हो सकता है। यात्रा का नामकरण भी आधार पर किया जा सकता है। इससे उन विस्मृत आधारों के सम्बन्ध में जन−भावना का जागरण भी होगा, जिनमें कतिपय महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ विद्यमान थीं।
यों ऐसी टोलियाँ अपना आवश्यक सामान साथ ले चलने के लिए साइकिलों का भी उपयोग कर सकती हैं। अच्छा यह हो कि हाथ की धकेल−गाड़ी या बैल−गाड़ी का प्रबन्ध कर लिया जाय। हाथ−गाड़ी स्वयं धकेलते हुए ले जाई जा सकती है। बैलगाड़ी किराये पर मिल सकती है। पर स्थान से दूसरे स्थान तक सामान पहुँचाने की व्यवस्था हर जगह हो सकें तो और भी अच्छा है। जो भी तरीका उपयुक्त हो उसका उपयोग करके ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए कि बिस्तर, कपड़े, प्रचार−साधन आदि एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते रहें। अपने−आप मिलजुलकर बनाने−खाने का प्रबन्ध भी साथ रखा जाना चाहिए। बाजार से खाने या स्थानीय लोगों पर भार पड़ने का अवसर कम ही आने देना चाहिए। जहाँ श्रद्धापूर्वक स्वागत−व्यवस्था की गई हो, वहाँ की बात अलग हैं। पर प्रबन्ध अपना भी रहना ही चाहिए, ताकि नियमित ओर शुद्ध भोजन अपना भी रहना ही चाहिए, ताकि नियमित ओर शुद्ध भोजन समय पर प्राप्त करने में असुविधा न हो। यह सब वस्तुएँ ले जाने के लिए किसी गाड़ी आदि का प्रबन्ध करना ही उपयुक्त रहता है। यात्रा−व्यय के लिए आवश्यक धन−राशि भी मिल−जुलकर ही जुटा लेनी चाहिए।
पड़ाव के स्थान पर रात्रि को सामूहिक कीर्तन और प्रवचन होने आवश्यक हैं। इसकी जनता को जानकारी शंख,घड़ियाल बजाकर उस दिन सवेरे से ही मिलती रहे, इसका पूर्व प्रबन्ध कर देना चाहिए। यह कार्य−व्यवस्था के लिए गये हुए अग्रदूत भी कर सकते हैं। जहाँ सम्भव हो, वहाँ दूसरे दिन प्रातः छोटा गायत्री −यज्ञ भी करना चाहिए। रात्रि के प्रवचन में आई हुई जनता को इसमें सम्मिलित होने की सूचना दी जा सकती है। प्रवचन और कीर्तन की बात न बन पड़े और स्लाइड प्रोजेक्टर साथ में हों−दिखाने के लिए अन्धेरे स्थान का प्रबन्ध हो तो रंगीन प्रकाश−चित्र दिखाते हुए प्रवचन करने की व्यवस्था बन सकती हैं। टोली में यदि गीत−संगीत की व्यवस्था हो तो गायनों के साथ थोड़ा−थोड़ा समझाने वाला प्रवचन जोड़ते चलने से भी काम चल सकता हे। इस प्रकार हर पड़ाव की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। सवेरे 8−9 बजे तक यज्ञ कर लिया जाय तो दस मील की यात्रा इसके बाद भी शाम तक पूरी हो सकती हे। इस प्रकार रात्रि को प्रवचन ओर प्रातः यज्ञ का दुहरा कार्यक्रम भी इस यात्रा में चलता रह सकता है। यदि दस मील भारी पड़ते हों तो उसे कुछ कम भी किया जा सकता है, ताकि प्रातः 9 से लेकर सायं 3 बजे तक छै घण्टे में उसे और भी आसानी से पूरा किया जा सके।
यह केवल संकेत हैं—उन्हें ध्यान में रखकर तीर्थयात्रा की तैयारी, रूपरेखा, विधि व्यवस्था अपने ढंग से बनाई जा सकती हे। हर जगह स्थिति एक जैसी नहीं होती, इसलिए कार्य−पद्धति एवं योजना में भी हेर−फेर की गुंजाइश रहेगी ही। यदि अवकाश हो और पड़ाव के स्थानों में उत्साह हो तो दो−दो दिन के कार्यक्रम रखे जा सकते हैं। दो दिन में तो एक अच्छा−खासा समारोह हो सकता है। यज्ञ−मण्डप तथा अन्यान्य उपकरण साथ में हों तो ‘पञ्च कुण्डी यज्ञ’ भी बड़े उत्साह के साथ हर पड़ाव पर होते रह सकते हैं। ऐसी दशा में अग्रदूतों की संख्या और योग्यता बढ़ी−चढ़ी होनी चाहिए, ताकि आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही पूरे कर लिये जायें और मण्डली जब उस गाँव में प्रवेश करें तो उसकी शोभा−यात्रा एवं महिलाओं के मंगल−कलशों को जल−यात्रा की धूमधाम से निकाला जा सके। इससे आवश्यक प्रचार हो जाता है।—उत्साह उमड़ता है और आयोजन होंगे, वहाँ नया शाखा−संगठन खड़ा होना और जन−जागृति का नया श्रीगणेश होना स्वाभाविक है। जहाँ ऐसी सम्भावनाएँ दिखाई पड़ती हों, वहाँ दो−दो दिन के पड़ाव डाले जा सकते हैं। समय कम होगा तो आयोजन कम होंगे। अधिक आयोजन करने हों तो यात्रा की अवधि बढ़ानी चाहिए। यह सब बातें उस यात्रा के संचालकों की सूझबूझ, परिस्थिति एवं उस क्षेत्र के साथ परिचय, प्रभाव कितना है—लोगों का स्तर कैसा है? इन सब बातों पर निर्भर है। वानप्रस्थों को शिविर−संचालन के अतिरिक्त इस प्रकार की तीर्थ−यात्राओं का भी अनुभव, अभ्यास बढ़ाना चाहिए। शिविर तो वही हो सकते हैं, जहाँ पहले से समर्थ शाखा संगठन मौजूद हैं। यह तो आमन्त्रण पर जा विराजना हुआ। इन शिविरों का श्रेय स्थानीय शाखा−संचालकों को है। वानप्रस्थों की प्रतिभा इस कसौटी पर कसी जायगी कि जहाँ पहले से कुछ नहीं था, वहाँ अपने मनोयोग एवं पुरुषार्थ का उपयोग करके कुछ नया कार्य आरम्भ किया—कोई नया क्षेत्र प्रभावित किया। अस्तु वानप्रस्थों की टोलियों को यह प्रयत्न करना चाहिए कि तीर्थ−यात्रियों की टोलियों में चलने के लिए ऐसे सुयोग्य व्यक्ति मिल जायँ, जो जन−जागरण में किसी न किसी प्रकार सहायता कर सकें। कूड़ा बटोर कर निरर्थक भार उठाने की चिन्ह−पूजा से यात्रा−प्रवास का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मण्डली में उपयुक्त व्यक्ति ही सम्मिलित करने चाहिए।
यात्रा की अवधि, गन्तव्य स्थान,पड़ावों की रूपरेखा, पहले से जाकर वहाँ के लोगों का सहयोग सम्पादन, आवश्यक प्रचार, एक स्थान से दूसरे स्थान तक सामान ले जाने का प्रबन्ध, समय और कार्यक्रम का निर्धारण,अर्थ−व्यवस्था, आवश्यक साधनों का जुटाना आदि अनेक कार्य ऐसे हैं, जिन्हें समय से पहले ही जुटाना पड़ता है। सबके पीतवस्त्र, हाथ में लाल मशाल के झंडे रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में शंख−घड़ियाल के सहारे लोगों को इकट्ठा करना और मिशन का संक्षिप्त परिचय देना, दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखना आदि कार्य ऐसे हैं, जिनकी पूरी रूपरेखा सामने होगी तो ही तीर्थयात्रा प्रभावशाली बनेगी। नित्य कपड़े धोने−सुखाने,भोजन बनाने−खाने जैसे कार्य लगते तो छोटे है, पर उनके साथ ऐसी छोटी−छोटी बातें जुड़ी रहती हैं, जिनका यदि पहले से ही ध्यान न रखा जाय तो बनी बनाई बात बिगड़ जाती है और हड़बड़ी में सबका सन्तुलन बिगड़ता है। अस्तु तीर्थयात्रा संयोजकों को एक युद्धसंचालक के स्तर की सूझ−बूझ का परिचय देना पड़ता है। निस्सन्देह यह प्रचार−यात्राएँ अतीव प्रेरणाप्रद सिद्ध होगी, पर साथ ही संयोजकों की कुशलता भी पूरी तरह कसौटी पर कसी जायगी, जिसे खरी ही उतरना चाहिए।
शिविर−शृंखला और तीर्थयात्रा संचालन के दो कार्य आवश्यक तो है, पर इनके लिए दूसरे अन्य साथियों का सहयोग आवश्यक है। वानप्रस्थ एकाँकी अपने बल−बूते इन्हें नहीं चला सकते। योजना से परिचित लोग जहाँ हों—जिनमें इस प्रकार की सेवा−भावना तथा विचारणा पहले से ही विद्यमान हो, उनका सहयोग मिलने पर उपरोक्त दोनों कार्यों का आधार बन सकता है। किसी ऐसे क्षेत्र में जाना पड़े, जहाँ मिशन का पहले से ही प्रवेश न हो पाया हो वहाँ इन कार्यों को करना अपरिचित वानप्रस्थ के लिए कठिन होगा।
आवश्यक नहीं कि सवा सहयोगी और पूर्व परिचित मिलते ही रहें, फिर जहाँ पहले से ही हलचलें मौजूद हैं, वहीं स्वयं भी जाकर फिट हो जाना किसी प्रतिभाशाली धर्म प्रचारक के लिए कोई बड़े गौरव की बात नहीं है। बने−बनाये—सजे−सजाये स्टेज पर बैठना और माइक पकड़ कर लम्बी−चौड़ी बातें हाँकने लगना आज एक सामान्य व्यसन हो गया है। ऐसी सस्ती नेतागिरी के लिए हर गली−मुहल्ले में प्यासे फिरने वाले महत्वाकाँक्षी लोग मिल जायेंगे। इसी धन्धे को अपने लोग भी अपना बैठें तो फिर प्रतिभा की परख कहाँ होगी? वस्तुतः श्रेय वक्ताओं का नहीं, आयोजकों और व्यवस्था करने वालों का होता है। पसीना तो उन्हें ही बहाना पड़ता है−वजन तो उन्हीं पर पड़ता है—सूझ बूझ और दौड़धूप उन्हीं की रहती है। लगातार समय देकर—साथी, सहयोगी समेट कर—साधन जुटा कर जिसने व्यवस्था बनाई है—सराहना उसी की की जानी चाहिए। कर्मठता तो उसी की ही फलवती हुई।
वानप्रस्थों को बकवासी वक्त मात्र बनने के लिए—इतना त्याग करने और साहस जुटाने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। यह काम करने के लिए तो खुशामद से— प्रशंसा प्रतिष्ठा का प्रलोभन देकर अथवा मेहनताना देकर किसी से भी, कहीं भी कराया जा सकता है। यह सस्ता सौदा है। इसके लिए न तो हमें इतना आग्रह, अनुरोध करने की आवश्यकता थी और ने किसी की सामान्य क्रमव्यवस्था उजाड़ने का परामर्श देने की। जिस प्रयोजन के लिए लगनशील और भावनाशील लोगों को आमन्त्रित किया गया है, वह यह है कि अपने प्रकाश को लेकर व अँधेरे में प्रवेश करें और वहाँ उजाला करके दिखायें। इसी स्तर की प्रतिभा का परिचय देने के लिए तो उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है—ऐसा ही आत्म−बल उत्पन्न करने के लिए उनसे तप−साधना करायी जाती है।
सदा ऐसे ही अवसर न रहें, जब पूर्व विनिर्मित शाखा−संगठनों में जाकर वहाँ इंस्पेक्टर, अफसर की तरह आदेश परामर्श देने भर की ड्यूटी पूरी करके वापिस चले आवें वस्तुतः शाखाओं में भी उन्हें स्वयं आगे बढ़ाकर हर काम स्वयं करने और स्थानीय कार्यकर्त्ताओं में उस तरह की प्रवृत्ति, हिम्मत एवं क्षमता उत्पन्न करने के लिए भेजा जायगा। जो कमियाँ उनमें रही हैं, उन्हें वे अपनी प्रतिभा से पूरा करें। इसलिए प्रस्तुत शाखा−संगठनों में भी उन्हें आयोजकों का आयोजक ही तो बनाकर भेजा जा रहा है अन्यान्य क्षेत्रों में भी सदा उन्हें यही करते रहना होगा।
दो वानप्रस्थों का जोड़ा रहना तो अच्छा है। उसमें कई प्रकार की सुविधा रहती है। आवश्यक नहीं कि निर्धारित दो व्यक्ति भिन्नता और योग्यता सम्वर्धन का कई−कई साथियों को लाभ मिलता रहे। इन जोड़ों के सामने स्वतन्त्र रूप से अजनबी क्षेत्रों में जाने और वह जन−संपर्क स्थापित करने एवं मिशन की जड़ें जमाने का कार्य भी करना होगा। प्रचार−कार्य के कितने ही ऐसे माध्यम हैं, जो नये स्थानों में पहुँचने पर भी समुचित आकर्षण उत्पन्न कर सकते हैं और जन−संपर्क का पालन प्रशस्त कर सकते हैं।
स्लाइड−प्रोजेक्टर इसी प्रकार का माध्यम है। इस रात्रि के समय बड़े साइज के रंगीन चित्र पर्दे पर दिख जाते है। दो−दो मिनट हर चित्र की व्याख्या करते चलें तो डेढ़ घण्टे का प्रवचन 40−55 स्लाइडें बदलते रहने से पूरा हो जाता है। व्याख्या तीन मिनट की करदी जाय तो उतने ही चित्रों का प्रदर्शन करते हुए दो घण्टे तक प्रवचन चल सकता है। यह सिनेमा तो नहीं है और न उसके साथ इसकी तुलना की जा सकती है, पर इतना जरूर है कि व्याख्या और प्रवचन के साथ इन चित्रों की संगति ठीक बैठ जाती है और भाषण अधिक आकर्षक एवं रोचक बन जाता है। स्त्री−बच्चे, शिक्षित−अशिक्षित इन चित्रों के माध्यम से प्रतिपादित विषय को अच्छी तरह हृदयंगम कर लेते हैं। जहाँ बिजली नहीं है, वहाँ इसमें फिट की हुई गैस बत्ती से उतना ही प्रकाश उत्पन्न किया जा सकता है। बैटरी में, बदलने और चार्ज करने का झंझट था, इसलिये ‘युग−निर्माण योजना’ ने अपने ढंग की ऐसी मशीनें बनाई हैं, जो गैस के पैट्रोमैक्स की तरह जलती हैं। मिट्टी का तेल तो हर जगह मिल जाता है। इसकी 120 स्लाइडों का पूरा सैट है, इसमें तीन दिन प्रवचन चल सकते हैं और मिशन की प्रायः सारी सारभूत रूपरेखा उतने से ही समझाई जा सकती है। दो वानप्रस्थ एक मशीन लेकर निकल पड़ें। सवेरे स्वयं शंख−घड़ियाल बजाते हुए गाँव के गली−मुहल्लों में रात को अमुक स्थान पर इस प्रदर्शन प्रवचन का एलान करदें। रात को, नियत स्थान पर स्वयमेव सारे गाँव की भीड़ इकट्ठी हुई मिलेगी। अपरिचित स्थानों में भी यह प्रयोग सफलता पूर्वक चलता रह सकता है। इस माध्यम से स्थापित हुआ जन संपर्क मिशन की जड़ जमाने और परिचय−क्षेत्र बढ़ाने में अच्छी तरह काम आ सकता है।
दूसरा ऐसा ही माध्यम है ‘सत्यनारायण व्रत−कथा’। ‘युग−निर्माण योजना’ ने पुरानी कथा का कथा−प्रसंग तो ज्यों का त्यों रहने दिया है, पर उसके मध्यवर्ती सम्वादों के श्लोक बदल दिये हैं। इस प्रकार वह कथा ऐसी बन गई है कि मिशन की पूरी विचारधारा इस कथानक को सुनाने के साथ पूरी तरह मिलाकर कही जा सकती है। बीच−बीच में संस्मरणों, उद्धरणों, तथ्यों, घटना−क्रमों, दृष्टान्तों एवं उप−कथाओं का सम्मिश्रण करते चलने से वह इतनी रोचक एवं हृदयग्राही हो जाती है कि स्वल्पशिक्षित अथवा व्यस्त भी पूरे मनोयोग से उसे सुनते हैं। पुरानी कथा घिसी−पिटी, सैकड़ों बार की सुनी हुई, हर बार दुहराई जाती है। उसमें सामान्यतया कुछ आकर्षण नहीं होता। सुनने का पुण्य−फल मिलने की बात सोचकर ही लोग किसी प्रकार ऊँघते−अलसाते उसे सुन लेते हैं। प्रेरणा की दृष्टि से उसमें अक्सर छूँछ ही हाथ लगती है। पर इस संशोधित, परिवर्तित कथा में सब कुछ प्रेरक, महत्वपूर्ण एवं आकर्षक है। उसके कहने की कितनी ही शैलियाँ शिक्षा−अवधि में वानप्रस्थों को सिखा दी जाती हैं। अशिक्षितों, स्त्री, बच्चों से लेकर विद्वान् मनीषी एवं तार्किक−नास्तिकों के सामने विभिन्न शैलियों से इस कथा को इस प्रकार कहा जा सकता है कि वे इस प्रतिपादन को मन्त्र−मुग्ध होकर सुनते रहें। साथ ही वे प्रेरणा लेकर विदा हों, जिन्हें यह मिशन लोक−मानस में हृदयंगम कराने के लिए प्रयत्नशील है।
दो वानप्रस्थों का जोड़ा यदि ‘सत्यनारायण व्रत−कथा’ कहने का क्रम अपनाकर चल पड़े तो वह प्रचार−यात्रा अजनबी अपरिचित स्थानों में भी भली प्रकार चलती रह सकती है। जहाँ अधिक उत्सुकता पाई जाय, वहाँ एक दिन में एक अध्याय विस्तार पूर्वक कहे हुए उसे पाँच दिन तक बड़ी अच्छी तरह खींचा जा सकता है और वह भागवत−सप्ताहों से कहीं अधिक रोचक, आकर्षक एवं प्रेरक प्रसंग बन सकता है। उस पाँच दिन के आयोजन में सुनने वालों के गले वह सब कुछ उतारा जा सकता है, जिसके लिए अपना नव−निर्माण का अभियान चल रहा है।
कण्ठ में थोड़ी मधुरता हो और एक−दो सामान्य ताल वाद्य बजाना आता हो तो कीर्तनों की विधि−व्यवस्था भी भाव−भरा वातावरण यों उत्पन्न कर सकती है। गला बिलकुल ही बेसुरा हो, तब तो कठिन है, अन्यथा थोड़ा भी ताल−मेल बिठाया जा सके तो एक−तारा, खरताल, मजीरा, चिमटा, खञ्जरी जैसे सरल वाद्य−यन्त्रों के सहारे आसानी से सह−मान के रूप में ‘कीर्तन’ का आयोजन हो सकता है। साथ देने के लिए स्थानीय गाने−बजाने वालों का भी थोड़ा सहयोग मिल जाय, हारमोनियम, तबला आदि की व्यवस्था वे लोग बना दें तो बात और भी अच्छी तरह बन जायगी। वानप्रस्थ शिक्षा−काल में यह भी प्रयत्न किया जाता है कि कीर्तन की ध्वनियों पर गायन सिखाया जाय। गले को संघ ने का अभ्यास कराया जाय। थोड़े प्रयत्न से सीखे जा सकने वाले उपरोक्त वाद्यों का सामान्य अभ्यास कराया जाय। ऐसे गायन भी तैयार कराये गये हैं, जिनकी ध्वनि तथा शैली तो कीर्तन की हो, पर उनमें मिशन के सभी तत्वों का भली प्रकार समावेश रहे। बीच−बीच में थोड़ी व्याख्या करते चलने से बात और भी अच्छी तरह उभर आती है। सम्मिलित होने वाले भाव उल्लास का आनन्द लेते हुए, नव−निर्माण की वे प्रेरणाएँ भी उपलब्ध करते हैं, जो युग की उलझनों को सुलझाने की दृष्टि से अभीष्ट और आवश्यक हैं।
‘सत्यनारायण−कथा’ की तरह ‘रामायण−कथा’ के भी एक दिवसीय या अनेक दिवसीय कार्यक्रम रखे जा सकते हैं। गला यदि दोहा−चौपाई गाने में साथ देने लगे और उनकी एक−दो ध्वनियाँ सामान्य वाद्य−यन्त्रों पर फिट करली जायें तो यह थोड़ा−सा परिश्रम वानप्रस्थों को अच्छा रामायण कथा−वाचक बना सकता है। श्रद्धा ओर प्रेरणा की यह सम्मिलित प्रक्रिया अपने ढंग की और भी अनूठी रहती है।
इसके अतिरिक्त एक क्रम ऐसा भी है, जिसमें कुछ भी कहने−सुनने की आवश्यकता नहीं है। मेरु या कालोंच में थोड़ा गोंद मिलाकर उसकी लाल या काली स्याही बनाई जा सकती है। ब्रुश अथवा लकड़ी में कपड़ा लपेट कर बनाई हुई कलम से दीवारों पर आदर्श−वाक्य लिखते हुए नियत संख्या अथवा समय पूर न होने तक आगे बढ़ते हुए चला जा सकता है। यह कार्य भी किसी सभा−सम्मेलन से कम नहीं है। उस रास्ते निकलने वाले असंख्य लोग उन प्रेरक−वाक्यों को पढ़ते रहेंगे और मस्तिष्क में अभिनव स्पंदन उत्पन्न हुए अनुभव करते रह सकते हैं।
यह माध्यम ऐसे हैं, जिन्हें अपरिचित क्षेत्रों में आरम्भ किया जा सकता है, पर वह अपरिचित स्थिति दो−चार दिन में ही समाप्त हो जाती है और संपर्क में आने वाले—बात सुनने वाले—कार्य−पद्धति की जानकारी प्राप्त करने वाले व्यक्ति सामान्य परिचित ही नहीं बनते, वरन् घनिष्ठ एवं सहयोगी के रूप में परिणत होते हैं। पतनोन्मुख पशु प्रवृत्ति ही आकर्षक होती है। कामुकता जैसी कुत्साओं में ही लोग रस लेते हैं। यह मान्यता इतनी ही मात्रा में सही है कि उन्हें, लोक−रुचि के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया जाता है। यदि सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं को भी उपयुक्त ढंग से जनता के सामने उपस्थित किया जाय तो प्रतीत होगा कि मनुष्य के भीतर रहने वाला देव−तत्व अभी पूर्णतया भरा नहीं है। उसे सींचा और उभारा जा सकता है। सत्प्रयोजनों की प्रेरणा देने वाले यदि लोक−मानस को समझते हों, उसे ठीक तरह स्पर्श करना जानते हों तो यह प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा कि जनता ने सत्प्रवृत्तियों को अपनाने और उनमें सहयोग देने का द्वार बन्द नहीं किया है। इस दिशा में प्रयत्न करने वालों के समर्थन, प्रोत्साहन की भी कमी नहीं रहती। कमी केवल प्रस्तुत कर्ताओं के शिथिल मनोबल की रहती है। यदि प्रचारकों की निष्ठा और चेष्टा प्रखर हो तो कोई कारण नहीं कि जन−मानस का पतन से मोड़कर उत्थान की दिशा में नियोजित करने में सफलता प्राप्त न की जा सके। गान्धी और बुद्ध के प्रयोग हमारे सामने हैं। गुरु गोविन्दसिंह और समर्थ गुरु रामदास को निराश एवं असफल नहीं रहना पड़ा है। जनता का उन्हें समुचित सहयोग उपलब्ध हुआ था। हमारा उत्साह और अरमान यह उसी स्तर का हो तो अपने थोड़े−से वानप्रस्थ समस्त समाज को निश्चय ही उलट−पलट कर रख सकते हैं।
प्राचीन−काल में बौद्ध−प्रचारक पहन−श्रद्धा का सम्बल लेकर विश्व के कोने−कोने में धर्मचक्र−प्रवर्तन के लिए घर से निकले थे। अपने मिशन और संकल्प के लिये ही जीवित रहे। उसी के लिए प्रत्येक साँस का उपयोग करते रहे। कठिनाइयों को उन्होंने कठिनाई नहीं समझा पर्वतों को पैरों से कुचलते हुए—भूख, प्यास और शीत ग्रीष्म की परवाह न करते हुए—मौत से जूझते हुए वे शब्द बेधी बाण की तरह लक्ष्य की ओर चले थे और धरती पर रहने वाली उस समय की अधिकाँश जन−संख्या के उस महान् धर्म के झण्डे−तले लाने में समर्थ हुए हैं। हमारी लगन भी यदि उसी स्तर की हो तो वह सब कुछ सम्भव एवं सरल हो सकता है, जो आज कठिन तथा असम्भव कहा समझा जाता है।
शस्त्र जिसके भी हाथ में पड़ जाता है, उसी की विजय का साधन बनता है। सम्पदा और प्रतिभा ऐसी वस्तु है, जिनका उपयोग जहाँ भी किया जायगा, वहीं प्रगति का चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इसलिये दूरदर्शियों का दृष्टिकोण यह रहा है कि सम्पदा और प्रतिभा को—ऋद्धि−सिद्धि को असुरता के हाथों नहीं जाने देना चाहिए। चली जाँय तो उनसे छीनकर उसे देवताओं के संरक्षण में ही सौंपना चाहिए।
वानप्रस्थ स्वयं तो कार्य करेंगे ही। शाखा−संगठनों ने उत्साह और पुरुषार्थ तो भरेंगे ही। जिन सत्प्रवृत्तियों का संचालन एवं अभिवर्धन सम्भव होगा, वह तो करेंगे ही। प्रवचन और उद्बोधन के जितने उपाय हो सकते है, उतने तो प्रयुक्त करेंगे ही, पर इतनी बड़ी दुनिया की—इतनी सुविस्तृत मानव−जाति की अनेकानेक बहुमुखी समस्याओं का निराकरण यह छोटी सृजन−सेना ही तो नहीं कर सकती। इस महान प्रयोजन के लिये प्रचुर साधनों और असंख्य प्रखर व्यक्तित्वों के नियोजन की आवश्यकता पड़ेगी। वानप्रस्थों की सेना अपने जन−संपर्क काल में उसे जुटाने का भी निरन्तर और अनवरत प्रयास करेगी।
ज्ञान−यज्ञ से प्रभावित लोगों की सिर हिलाकर सहमति प्रकट कर देने या विचारों की सराहना कर देने मात्र से छुटकारा नहीं मिल जायगा। वरन् इस बात के लिये प्रेरित किया जायगा कि यदि उन्हें नव−निर्माण की विचारधारा पसन्द आई है तो इस दिशा में चलने के लिये भी कुछ कदम उठायें। केवल मौखिक−सहानुभूति से ही तो कुछ बनने वाला नहीं है। प्रयोजन तो क्रिया से सिद्ध होता है। उत्कृष्ट विचारणा का संयोग जब तक आदर्श−कर्तृत्वों के साथ न हो, तब तक उसे नपुंसक और निरर्थक ही कहा जाता रहेगा। ऐसा अनुत्पादक समर्थन यदि हम संग्रह भी करते रहे तो उससे कुछ बात बनेगी नहीं। ज्ञान−यज्ञ की सार्थकता इस बात में है कि वह प्रखर कर्मठता को जन्म दे सकें।
जिस प्रकार ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा चिर−काल से दिया जाने वाला उद्बोधन अब परिजनों को कर्मठता की राह पर घसीट कर ले आया है और उन्हें सृजन−सेना के सैनिकों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है उसी प्रकार अपना उद्बोधन, ज्ञान−यज्ञ, प्रखरता सक्रियता उत्पन्न करने वाला होना चाहिए। वानप्रस्थों की अंतर्दृष्टि इस केन्द्र पर निरन्तर केन्द्रित रहेगी और कार्य−क्षेत्र में जन−संपर्क में− जहाँ भी गहरी सहानुभूति दिखाई देगी, वहाँ उसे रचनात्मक सक्रियता की दिशा में धकेलने का प्रयत्न किया जायगा।
लोगों के पास साधनों की कमी नहीं—पैसा इन दिनों फैला−फैला फिर रहा है—शिक्षा बहुत बढ़ गई—चतुरता और कुशलता में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। कमी एक ही है कि यह सम्पत्ति और बुद्धि की दोनों विभूतियाँ असुरता के हाथों पड़ गई। उनका उपयोग वासना, तृष्णा और अहंकारिता की पूर्ति के लिये हो रहा है। संग्रह की—अभिवर्धन की—अन्धी दौड़ लग रही है। इसका सदुपयोग क्या हो सकता है, यह किसी के ध्यान में नहीं।
लोगों को कहा जायगा कि सम्पत्ति का संग्रह ही बुद्धिमानी नहीं है—प्रतिभा का होना ही सराहनीय नहीं है, मूल बात यह है कि इन उपलब्धियों को किसने—किस प्रयोजन के लिये खर्च किया? इसी स्थान पर बुद्धिमान लोग मूर्ख बनते हैं जिससे विकास हो सकता था, उसे विनाश में प्रयुक्त करते हैं। हम उपार्जन, अभिवर्धन की विधि न बता सकें तो हर्ज नहीं, उसे दूसरे असंख्यों लोग बता रहे हैं और बहुत कुछ उसके लिये बना भी रहे हैं। हमें सदुपयोग की आवश्यकता समझने की दिशा में उद्बोधन करना है और जहाँ सम्भव हो सके, वहाँ उसके लिये साहस भी जुटाना है।
लोगों के पास फालतू समय की कमी नहीं, वह उसे ऐसे ही गपशप और आलस्य−प्रमाद में गुजारता है। इस समय का एक छोटा−सा अंश भी श्रमदान के माध्यम से लोक−मंगल के लिये जुटाया जा सके तो थोड़े−से व्यक्ति भी मिलकर कई उपयोगी सत्प्रवृत्तियाँ आरम्भ कर सकते हैं और उस प्रवाह में देखा−देखी अन्य लोग भी बहने लगते हैं। दुष्कर्मों की तरह सत्कर्मों की भी बेल फैलती है। दुष्टता में—कुकर्मों में साथ देने वाले यदि उपजाये और बढ़ायें जा सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि लगनशीलता अपने प्रभाव से सद्भावनाओं को आकर्षित न करे और सज्जनता को प्रोत्साहित करके उसे सत्प्रवृत्तियों में न जुटा सके।
मिल−जुलकर किये जा सकने वाले अनेकों कार्य सामने पड़े हैं। श्रद्धा, श्रम और सहयोग न जुट पाने से अनेकों योजनाएँ मृत प्रायः पड़ी हैं। गाँव−गाँव रात्रि−पाठशालाएँ, प्रौढ़−पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, उद्योगशालाएँ, शाक−वाटिकाएँ, पुस्तकालय, सत्संग−गृह आदि स्थापित करने और चलाने की आवश्यकता है। जिनमें श्रद्धा जगे, उन्हें तत्काल ऐसे किसी काम में लगाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, अन्यथा वह आदर्शवादी उत्साह कुछ ही समय में पानी के बबूले की तरह टूट−फूट कर हवा में विलीन हो जायगा।
लोग कितने ही उद्योग−धन्धे खोलते और चलाते हैं। दृष्टिकोण अधिकाधिक पैसा कमाना रहता है, भले ही उससे जन−समाज का भविष्य अन्धकारमय बनता हो। उदाहरण के लिये नशीली चीजों का उत्पादन आज आकाश चूम रहा है। सिगरेट उद्योग में लाखों मनुष्य और अरबों रुपया लग रहा है। यदि इस पूँजी और श्रम−शक्ति को जन−कल्याणकारी व्यवसायों में लगाया जा सके तो देश की अत्यन्त महत्वपूर्ण जीवन−मरण की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। जैसे यदि इसी धन और श्रम को पशु−पालन अथवा निवास−गृह बनाने में—पानी और बिजली उत्पन्न करने में लगा दिया जाय तो लोगों की सुविधा और समृद्धि में आशातीत वृद्धि हो सकती है।
जिन्हें व्यवसाय में रुचि है। जो भूखे−नंगे नहीं मर रहे हैं। जो थोड़ा कम लाभ प्राप्त करने पर भी चैन से रह सकते हैं, उन्हें कहा जाय कि वे किसी प्रकार धन कमाने के लिये पागल न बनें। व्यवसाय ही करना हो तो ऐसे काम करें, जिनसे जन−हित का अभिवर्धन होता हो। यदि यह बात लोगों के गले उतारी जा सके—पूँजी को सृजनात्मक व्यवसायों में लगाने के लिये आमन्त्रित किया जा सके तो इतने मात्र परिवर्तन से भी देश का कायाकल्प हो सकता है।
उदाहरण के लिये लोक−मानस को प्रभावित करने वाले उद्योगों को ही ले लें। सत्साहित्य प्रकाशन आज की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है पतन के गर्त में धकेलने वाली पुस्तकें और पत्रिकाएँ आँधी तूफान की तरह छप और खप रही हैं। इनकी प्रतिद्वन्द्वता में सत्साहित्य−निर्माण का काम इतना बड़ा पड़ा है कि उसने अरबों रुपयों और लाखों मनुष्यों को श्रम खपाया जा सकता है। देश में 14 मान्यता प्राप्त भाषाएँ है, उनमें प्रेरक साहित्य नहीं के बराबर है। उसे हजार गुनी गति से बढ़ाया जाय तो भी युग की आवश्यकता को देखते हुए कम ही पड़ेगा। यही बात चित्रों के बारे में भी है। चित्रों में आकर्षण होता है और प्रभाव भी। वे घरों की शोभा बढ़ाने वाले उपकरणों में एक आवश्यकता बन गये हैं। आज तीन चौथाई चित्र कामुकता की पशु−प्रवृत्ति भड़का कर लोगों के पल्ले विष−बीज बाँधने के लिये छापे जाते हैं। प्रकाशक और विक्रेता जल्दी ही मालामाल तो अवश्य हो जाते है, पर यह नहीं सोचते कि इस कसाई की कमाई से उन्होंने कितनों का शारीरिक, मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य चौपट करके रख दिया। चित्र प्रकाशन में यदि पूँजी और सूझ−बूझ लगे तो कोई कारण नहीं की सुरुचि संवर्धन की सामग्री को बाजार में स्थान न मिले—लोग उसे न खरीदे। इस स्तर की वस्तुएँ होंगी तो वे बिकेंगी भी और उनसे असुरता की बाढ़ को रोकने वाली प्रतिद्वन्द्वता को भी कुछ करने का अवसर मिलेगा। आज तो मैदान खाली पड़ा है। असुरता का ही पूर्ण साम्राज्य छाया हुआ है—उसी की ‘मोनोपौली’ है।
फिल्म−उद्योग भी उसी स्तर का है। भारत से कुल मिलाकर जितने अखबार पढ़ने वालों की संख्या है, उससे अधिक सिनेमा देखने वालों की है। सारे अखबार मिलकर जैसा कुछ वातावरण बना सकते हैं, उतना अकेला सिनेमा बना सकता है। फिल्म−उद्योग में खरबों रुपयों की पूँजी लगी है, लाखों लोग काम करते हैं। महत्वपूर्ण प्रतिभाएँ उससे जुड़ी हुई हैं, पर उसकी दिशा जिस ओर है वह सबके सामने है। जन−मानस को विकृत करने में उसने जितना विष घोला है, उतना शायद ही अन्य किसी उद्योग ने घोला हो। दोष उद्योग का नहीं, वह तो शस्त्र मात्र है। प्रयोक्ता जिसके लिये उसका उपयोग करेंगे, प्रगति उसी दिशा में होगी। यदि यह उद्योग आदर्शों के अभिवर्धन के लिए— सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने के लिए—रचनात्मक मार्ग−दर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ होता तो आज हमारे समाज की स्थिति जो है, उससे सर्वथा भिन्न रही होती। नव भारत हमारे देश में सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ उफन रही होतीं—तब हमारे मन−मस्तिष्क सज्जनता और शालीनता से ओत−प्रोत हो रहे होते−तब हमारी महत्वाकांक्षायें किसी अन्य दिशा में ही अग्रगामी हो रही होती।
साहित्य प्रकाशन,चित्र प्रकाशन, फिल्म−निर्माण, रिकार्ड−निर्माण जैसे कुछ उद्योग ऐसे है, जिनमें तत्काल अधिकाधिक पूँजी लगानी चाहिए और देवत्व के पक्ष में लोक−मानस को मोड़ने का अभिनव प्रयत्न किया जाना चाहिए। यह कार्य वर्तमान उद्योगपति भी कर सकते हैं। उनका लालच यदि आगे न बढ़ने दे तो जन−स्तर पर भी पूँजी जुटाई जा सकती है। लिमिटेड कम्पनियाँ− सहकारी समितियाँ जैसे अर्थ−संस्थान खड़े हो सकते हैं। शेयरों और ऋणों के आधार पर पूँजी जमा करके इस प्रकार के उद्योगों के ढांचे खड़े किये जा सकते हैं। आज न तो पूँजी कम है—न प्रतिभाओं का अभाव है। कमी केवल आदर्शों की दिशा में चलने के साहस की है। बहुत जल्दी, बहुत अधिक मात्रा में धन कमाने के लालच पर यदि अंकुश रखा जा सके और सामान्य लाभ से सन्तोष हो सके तो आज मारी−मारी फिरने वाली लक्ष्य−विहीन और विनाश में प्रवृत्त औद्योगिक क्षमता उतना काम कर सकती है, धकेल देने वाली दुस्साहस पूर्ण योजना,पूरी तरह सफल होने पर भी नहीं कर सकती।
पूँजी और प्रतिभा की विभूतियों को लोक−महल के लिए मिली हुई ईश्वर−प्रदत्त अमानत मानने की मान्यताओं को जन−मानस में स्थान मिल सकें और इन उपलब्धियों के सदुपयोग की बात समझ में आने लगे तो नवनिर्माण का कठिन प्रतीत होनी वाला कार्य अति सरल तथ्य बनकर सामने खड़ा हो सकता है। ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ के सदस्यों ने इस दिशा में थोड़ा साहस दिखाया है तो ‘युग−निर्माण योजना’ की सृजन−सेवा में लाखों सक्रिय सदस्य, कर्मठ−कार्यकर्ता सम्मिलित है और अब व्रतधारी वानप्रस्थों का हलचल मचाने वाला वर्ग उभरता चला आ रहा है। थोड़ा−थोड़ा समय देने से ही यह सम्भव हुआ। दस−दस पैसा नित्य निकालने जैसी छोटी उदारता ने ज्ञानयज्ञ के प्रकाश विस्तार को गगन−चुम्बी बनाया है। यही उदार सेवा−भावना—यही परमार्थ−परायणता यदि अगले दिनों बढ़ती रही तो सार्वजनिक सेवा−क्षेत्र में आश्चर्यजनक और आशातीत कही जा सकने वाली क्रान्तिकारी योजनाएं सम्पन्न होती दिखाई देंगी। परमार्थ बुद्धि की दिशा मिल सके तो धर्म एवं पुण्य के नाम पर जितना कुछ हो रहा है, उतने से ही हम अपने देश का ही नहीं, समस्त विश्व का कायाकल्प कर सकते हैं।
इसी के समान्तर है, पूँजी और प्रतिभा का सदुद्देश्य के लिए व्यावसायिक उपयोग। जिसका थोड़ा−सा संकेत ऊपर की पंक्ति यों में किया गया है। पशु −पालन,कुटीर−उद्योगों का संवर्धन, शिक्षण−संस्थाओं का संचालन जैसे कार्य विशुद्ध, आर्थिक दृष्टिकोण से भी खड़े किये जा सकते है। पूँजी और श्रम लगाकर उचित लाभ लेने में कोई बुराई नहीं है। दान−पुण्य न,सही—सेवा और परोपकार न सही मनुष्य अपनी सद्भावना का परिचय इस प्रकार तो दे ही सकता है कि देश की महती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी आजीविका के ऐसे माध्यम चुनें, जिनसे मानवता को ऊँचा उठने और आगे बढ़ने में सहायता मिल सके। ऊपर चार विशिष्ट उद्योगों की ओर जो संकेत किया गया है, उन्हें तो विचार−क्रान्ति, नैतिकक्रान्ति और बौद्धिक−क्रान्ति की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है। साहित्य−प्रकाशन, चित्र प्रकाशन, रिकार्ड−निर्माण एवं फिल्म−निर्माण के लिए यदि पूँजी और प्रतिभा जुट सके तो वह व्यावसायिक आधार भी नव−निर्माण की पृष्ठ−भूमि बनाने में अभिनव योगदान कर सकते हैं।
वानप्रस्थ कार्य−क्षेत्र में उतरेंगे, जन−संपर्क बढ़ावेंगे और उद्बोधन के अतिरिक्त इस उदय होता दिखाई दे, उसे अविलंब किसी सत्प्रवृत्ति में नियोजित कर दिया जाय।
शिविर−संचालन, तीर्थयात्रा−संयोजन, कथा−प्रसंग, कीर्तन−प्रक्रिया, प्रकाश चित्र प्रदर्शन, सम्मेलन, विचार विमर्श, गोष्ठी, परिसंवाद, संगीत−समारोह,कविता−सम्मेलन आदि कार्यक्रम ऐसे हैं, जिनमें वाणी के माध्यम से जन−मानस में नव−युग के अनुरूप विचारणाओं को प्रतिष्ठापित किया जाता है। संस्कार, पर्व, जन्म−दिन यज्ञानुष्ठान आदि कर्मकाण्डों की प्रक्रिया भी कम प्रेरक नहीं है। इनके माध्यम से धर्मोत्साह भरा वातावरण बनता है और उस अवसर पर जो कुछ शान्त−चित से कहा−सुना जाता है, वह सामान्य कहने−सुनने की अपेक्षा अधिक गहराई तक अन्तःकरण में उतरता है। धर्म−प्रचारकों की वाणी इन अथवा इन जैसे अन्य क्रिया−कलापों के माध्यम से मुखर होती है। जमे हुए कूड़े−करकट को साफ करके नवीन बीजारोपण के लिए भूमि परिष्कृत करती है।
लेखनी द्वारा भी ज्ञान−यज्ञ के−विचार−क्रान्ति के बीज बोये जा रहे हैं। वितरण की जाने वाली विज्ञप्तियाँ, चित्रकायें जाने वाले पोस्टर, झोला पुस्तकालय द्वारा पढ़ाये जाने वाले ट्रैक्ट, ज्ञान−रथों के माध्यम से जन−जन तक पहुँचाया जाने वाला साहित्य इस प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न है।’अखण्ड−ज्योति’ तथा ‘युग−निर्माण योजना’ पत्रिका विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होकर लाखों प्रबुद्ध व्यक्तियों के मस्तिष्क को झक झोरती है और उन्हें व्यक्ति तथा समाज की समस्याओं पर नये सिरे से विचार करने के लिए बाध्य करती हैं। दीवारों पर लिखें जाने वाले आदर्श−वाक्यों की प्रक्रिया ने करोड़ों मनुष्यो के मस्तिष्कों को युग सन्देश से परिचित एवं प्रभावित किया है। मिशन के उद्देश्य, स्वरूप एवं क्रिया−कलाप भी संसार के कोने−कोने तक जानकारी कराने के लिए लेखनी का माध्यम असाधारण रूप से प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। व्यक्ति गत पत्र−व्यवहार की अपनी एक अलग ही शैली है। उससे सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लाखों व्यक्तियों से विचार−विमर्श होता रहता है, प्रेरणा−प्रवाह अनवरत रूप से बहता रहता है। मिशन का पत्र−व्यवहार इतना बड़ा है कि दस कर्मचारियों वाला गायत्री−तपोभूमि पोस्ट−आफिस केवल युग निर्माण योजना’ की डाक कठिनाई से ही वहन कर पाता है। ‘सप्त−सरोवर हरिद्वार पोस्ट−आफिस’ में दो तिहाई डाक शान्ति−कुञ्ज’ की ही आती−जाती है। यह सब पत्र−व्यवहार किसी व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, मात्र आदर्शवादी प्रेरणाओं के लिए ही होता है।
वानप्रस्थों को प्रचलित लेखनी और वाणी द्वारा किये जा रहे पिछले क्रिया−कलाप के अधिकाधिक विस्तार में प्रयुक्त किया जाना है। जो कार्य मन्द−गति से स्वल्प मात्रा में चल रहे थे, वे अब विशेष रूप से बढ़ जायेंगे। विशेष रूप से वाणी द्वारा प्रचार−कार्य और जन−संपर्क क्षेत्र उन्हीं के लिए सुरक्षित रखा गया है। प्रस्तुत योजना के अनुसार आशा की गई है कि ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ में से पूरा समय देने वाले ‘वरिष्ठ’ और वर्ष में एक महीना देने वाले ‘कनिष्ठ’ वानप्रस्थ प्रायः बारह हजार तो आसानी से निकाले ही जा सकेंगे। इन सबका औसत समय एक एक महीने ही लोक−मंगल में लगता रहेगा, ऐसा मान लिया जाय तो पूरा समय देकर काम करने वाले एक हजार सुयोग्य,भावभरे एवं अवैतनिक लोक सेवियों की सृजन−सेवा खड़ी हो जायगी। यह जन शक्ति कार्य−विस्तार को देखते हुए निश्चय ही स्वल्प है, किन्तु आशा की जानी चाहिए ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलेगा।’ ‘अखण्ड−ज्योति परिवार’ द्वारा उस पुण्य−परम्परा का नेतृत्व आरम्भ कर देने पर पीछे अनेकों व्यक्ति आगे आवेंगे और आज जिस प्रकार वासना और तृष्णा के पीछे मनुष्य पागल है, कल उसी प्रकार उत्कृष्टता और आदर्शवादिता के भूतिवाद कार्य करने के लिए उसी प्रकार तत्परता पूर्वक कटिबद्ध दिखाई पड़ेगा। वस्तुतः संसार के कोने−कोने में बिखरे हुए विभिन्न देश—धर्म जाति, संस्कृति एवं भाषाओं में बँटे हुए मानव−समाज को विविध प्रकार प्रचार−माध्यमों से प्रभावित, परिवर्तित करना पड़ेगा। 400 करोड़ व्यक्तियों को दिशा देने के लिए एक करोड़ धर्म−प्रचारक हो, तो भी कम ही पड़ेंगे। अपना साहस तो अभी एक हजार पूरा समय देने वाले वानप्रस्थों की आवश्यकता पूरी कर सकने जितना ही हुआ है। शुभारम्भ की दृष्टि से इतना कुछ कर सकना भी उत्साहवर्धक है।
प्रथम चरण के रूप में अभी प्रचार−प्रक्रिया पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि जन−मानस को वर्तमान के साथ जुड़ी हुई कुत्साओं और कुण्ठाओं का दुष्परिणाम सोचने का अवसर इसी आधार पर तो मिलेगा। ज्ञान यज्ञ के आलोक से ही आधार पर तो मिलेगा। ज्ञान यज्ञ केक आलोक से ही तो वह समझ सके गा कि उसका आत्यन्तिक हित और परम कल्याण किस दिशा में सोचने और चलने से सम्भव हो सकेगा? लाभ−हानि में क्या अन्तर है? मित्र और शत्रु कौन है? उचित और अनुचित कि से कहते है? तनिक−सी क्रूरता के पीछे कालकूट विष तो छिपा नहीं बैठा है? आदि प्रश्नों का उत्तर देने लायक जब मानव−मस्तिष्क हो जाय, तभी तो उसे कुछ करने और कराने की बात कही—बताई जा सकती है।
दूसरा चरण है, रचनात्मक क्रियाकलापों का अभिवर्धन। पेट और प्रजनन से भी आगे कुछ उपयोगी बातें हो सकती है, इसकी ओर सर्वसाधारण का ध्यान आकर्षित किया जाय और उन्हें मिल−जुलकर पूरा करने का अभ्यास लोक प्रवृत्ति में सम्मिलित किया जाय, इन्हीं प्रयत्नों का नाम रचनात्मक क्रियाकलाप है। आरोग्य संवर्धन के लिए व्यायामशालाएँ, सद्ज्ञान सम्पादन के लिए पुस्तकालय, वाचनालय, निरक्षरता निवारण के लिए प्रौढ़− पाठशालाएं, व्यस्त लोगों के शिक्षा−विकास के लिए रात्रि−पाठशालाएँ, ठाली समय में उपार्जन के लिए गृह−उद्योगशालाएँ, उत्पादक प्रवृत्ति जगाने के लिए शाकवाटिकाएं, हरितिमा संवर्धन के लिए पुष्प गुल्मों का संवर्धन, शाकों की कृषि और वृक्षारोपण, गौ−पालन, जैसी अनेकों सत्प्रवृत्तियां मिल−जुलकर जगह−जगह चलाई जा सकती है ओर उनसे प्रगति−पथ पर बढ़ने की दिशा में बहुत सहायता मिल सकती है। सहकारिता के आधार पर कितने ही उत्पादक एवं सुविधा संवर्धक उद्योग−व्यवसाय खड़े किये जा सकते है। मनुष्यों और पशुओं के मल−मूत्र का सदुपयोग करने की ओर ध्यान आकर्षित हो तो हमारे देहातों की जहाँ स्वच्छता और सुविधा बढ़े, वहाँ कृषि उत्पादन में भी आशाजनक अभिवृद्धि सामने आये। श्रमदान के लिए हर वयस्क व्यक्ति एक घण्टा समय निकाले और लोकोपयोगी निर्माण−कार्य में उसे लगाये तो सड़कें, बाँध, तालाब, कुंए, पाठशाला, पुस्तकालय, पञ्चायत−घर, मन्दिर, बगीचे, पार्क क्रीड़ा प्रांगण आदि अनेक−अनेक उपयोगी निर्माण स्वरूप लागत में बनें और जो टूटे−फूटे हो, उनका जीर्णोद्धार हो सके। सार्वजनिक स्थानों की गन्दगी इसी श्रमदान से हटाई जा सकती हैं। एक−एक मुट्ठी अनाज सा दस पैसा रचनात्मक कार्यों के लिए निकालते रहने से इस स्वल्प बचत से अनेकों स्थानीय सत्प्रवृत्तियों का संचालन हो सकता है। इस प्रकार जन−मानस का रुझान अपने दल बूते अपनी आवश्कताओं का स्वयं हल निकालने और उसके साधन स्वयं जुटाने के लिए मोड़ा जा सके तो आलस्य और व्यसनों में नष्ट होने वाला समय तथा धन अपनी धारा बदल सकता है और समृद्धि के इतने अधिक साधन सामने लाकर खड़े कर सकता है, जिसके सामने बाल−विनोद जैसी मालूम पड़ने लगें।
हमारे धर्म−प्रचारक सर्वप्रथम विचारों की दिशा स्वार्थ भरी संकीर्णता से ऊँची उठाने का प्रयत्न करेंगे। इसके उपरान्त उस परिष्कृत मनोभूमि को तत्काल सृजनात्मक प्रयोजनों में जुटा देंगे। आत्म−निर्माण, परिवार−निर्माण और समाज−निर्माण के लिए हमें पग−पग पर अनेकों काम करने है। अभी हमने सृजन के सम्बन्ध में सोचा तक नहीं—उसे करने के लिए कभी साहस एकत्रित किया नहीं, जिस दिन यह ठान ठानी जायगी कि हमें सर्वतोमुखी निर्माण करना है, उस दिन प्रतीत होगा कि हमने नये युग में प्रवेश कर लिया। सौभाग्य का सूर्य उदय हो चला और समृद्धि सम्पदा का वरदान अब−तब बरस के लिए तत्पर होकर सिर पर आ गया।
स्वास्थ्य संवर्धन के लिए आहार−बिहार का नये सिरे से निर्माण करना होगा। प्रकृति के विपरीत चलने का दुराग्रह छोड़कर सौम्य, सादगी और स्वाभाविक सात्विकता को अपनाना होगा—संयम, शीलता और नियमितता हमारी नीति होगी—बच्चों की संख्या बढ़ाने के स्थान पर उनका स्तर बढ़ाने में तत्पर होंगे। दाम्पत्य जीवन में रूप और कामुकता के विषबीज को उखाड़ कर उसे दो उसे दो सहचरों की सघन मान्यता के रूप में परिणत करेंगे।
रचनात्मक कार्यों से आगे का चरण है—संघर्ष। इसके लिए अधिक मजबूती, अधिक साहसिकता, अधिक साधन और अधिक संगठित शक्ति चाहिए। युद्ध एक कला है समय शक्ति और साधनों को देख कर ही उसे आरम्भ करना चाहिए। उतावले लोग ऐसे ही असमय लड़ मरते हैं तो पिटते और हारते हैं। हमें व्यापक अनाचार के विरुद्ध सुविस्तृत और समर्थ मोर्चा खड़ा करना ही होगा। असुरता का दमन बिना जूझे हो ही नहीं सकता। रावण, कंस, दुर्योधन, हिरण्यकश्यप, सहस्रबाहु आदि को समझाने वालों ने सारे प्रयत्न कर लिये थे पर सफल केवल संघर्ष ही हुआ। हमें जिनसे लड़ना है उन अज्ञान, अनाचार और अभाव के असुरों का छाद्मवेश बहुत ही विकराल है। वे न तो दीख पड़ते है और न सामने आते है। उनकी सत्ता भगवान की तरह व्यापक हो रही है। अज्ञान−ज्ञान की आड़ में छिप कर बैठा है, अनाचार को पकड़ना कठिन पड़ रहा है, अभावों क जो कारण समझा जाता है वस्तुतः उससे भिन्न ही होता है। ऐसी दशा में हमारी लड़ाई व्यक्तियों से नहीं—अनाचार से होगी। रोगियों को नहीं हम रोगों को मारेंगे। पत्ते तोड़ते फिरने की अपेक्षा जड़ पर कुठाराघात करेंगे।
भावी महाभारत अपने अलग ही युद्ध−कौशल से लड़ा जायगा। उसमें पिछले ढंग की रण−नीति काम न देगी। निर्हित स्वार्थों से इतने अधिक लोग ओत−प्रोत हो रहे हैं उनने लोकप्रियता की रेशमी चादर ऐसी अच्छी तरह लपेट रखी है कि उन पर व्यक्ति गत रूप से आक्रमण करते न बन पड़ेगा। हम प्रवाहों से जूझेंगे, धाराओं को मोड़ेंगे और अनाचार का विरोध करेंगे। उसके समर्थन में जो लोग होंगे वे सहज ही लपेट में आ जायेंगे और औंधे मुँह गिर कर मरेंगे।
धर्म−ध्वजी साधु पण्डितों की आड में अन्ध−विश्वास सामाजिक अनाचार छिपे बैठे है। वे पुरातनवाद का समर्थन करने के नाम पर मूढ़ताओं और अनीतियों का समर्थन संरक्षण करते है। हम व्यक्तियों पर आपेक्ष करने की अपेक्षा उन पाखण्डों की पोल खोलेंगे, जो भी उनका समर्थन करता होगा वह अपने आप जन−आक्रोश का शिकार बनेंगे और बेमौत मरेंगे। साहित्यकार बनकर जो सरस्वती से व्यभिचार कर रहे है, पशु प्रवृत्तियों को भड़का कर चाँदी बटोर रहे है, हम उनका नाम लिये बिना जनता को यह बतायेंगे कि इस अनाचार ने किस प्रकार जन−जीवन का सर्वनाश किया है जो भी उस दुष्टता में संलग्न होंगे उनका मुँह काला होगा। संगीत अभिनय, कला,चित्र और फिल्मों के सहारे जिनने पशु प्रवृत्तियाँ भड़का कर मनुष्य को पशुता के गर्त में धकेला है उस सोना बटोरने वाली लिप्सा के विरुद्ध हम घृणा का अभिमान छेड़ेंगे फिर जो कोई इस कलंक कालिमा में हाथ धो रहे होंगे कलंकियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे। आज इन लोगों को जनता की अज्ञानता का लाभ लेकर श्रेय सम्मान और धन−वैभव दोनों हाथों से समेटने का अवसर है कल इन्हें सड़क पर चलना और भले लोगों की पंक्ति में सिर उठा कर चल सकना कठिन हो जायगा। हम जन−आक्रोश का ऐसा वातावरण पैदा करेंगे जहाँ भी छद्म बन कर अनाचार छिपता है उन सभी छिद्रों को बन्द करके रहेंगे।
व्यापारिक क्षेत्र में, सरकारी मशीनरी में राजनेताओं में, चिकित्सकों में शिक्षकों में यहाँ तक कि हर वर्ग में हर व्यक्ति में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनाचार की जड़े अत्यन्त गहराई तक घुसती चली गई हैं। इनमें एक एक को चुनना सम्भव नहीं, किसी का दोष सिद्ध करना भी कठिन है ऐसी दशा में व्यक्तियों से नहीं धाराओं से हम लड़ेंगे। हर दुष्प्रवृत्ति का भण्डा−फोड़ करेंगे और वह ऐसा तीखा होगा कि सुनने वाले तिलमिला उठे और उनमें प्रवृत्त लोगों के लिए मुँह छिपाना कठिन हो जाय। जन आक्रोश ही इतने व्यापक भ्रष्टाचार से लड़ सकता है। हम उसी को उभारने में लगे हैं। समय ही बतायेगा कि हमारा संघर्ष कितना तीखा और कितना बाँका होगा। बौद्धिक क्रान्ति की—नैतिक क्रान्ति की—सामाजिक क्रान्ति की दवानल इतनी प्रचण्डता पूर्वक उभारी जायगी कि उसकी लपटें आकाश चूमने लगे। अज्ञान और अनाचार का कूड़ा करकट उसमें जलकर ही रहेगा। वानप्रस्थ मात्र प्रचार प्रयोजन के लिये ही आमन्त्रित नहीं किये गये हैं। प्रथम चरण में थोड़ी सफलता मिलते ही, जन−संपर्क को अधिक सघन और समर्थ बनाने के लिए वे रचनात्मक कार्य−क्रमों का श्री गणेश करेंगे और इसके बाद उन्हें संघर्षात्मक क्रिया−कलापों में जुटना होगा। नव−निर्माण का यह त्रिकोण मोर्चा है तीनों पर एक साथ तो नहीं—एक स्थान पर थोड़े भर जमना दूसरे
का सम्भालना यही हमारा रणकौशल है। यही अपनी क्रिया पद्धति है। उसकी सामयिक रूप−रेखा समयानुसार बनाई जाती रहेगी और परिस्थितियों को—शक्ति को तथा साधनों को ध्यान में रखकर कार्यान्वित की जाती रहेगी। कार्य−क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है इसलिए थोड़े से कार्य−क्रम लेकर नहीं चला जा सकता। विशाल लक्ष्य को विशाल साधनों और विशाल माध्यमों के साथ ही पूरा किया जायगा। सामयिक सूझ−बूझ को ऐसे महान प्रयोजनों में प्रश्रय देकर चलना पड़ता है।
हिंदू समाज में धर्म−ध्वजियों द्वारा श्रद्धालु जनता के धन तथा विवेक का शोषण जाति−पाति और छुआ−छूत के नाम पर मनुष्य−मनुष्य के बीच का दुखदायी विभेद—नर−नारी के बीच अन्याय पूर्ण बड़प्पन और लघुता, विवाह शादियों में होने वाला अपव्यय आदि कितनी ही ऐसी सामाजिक दुष्प्रवृत्तियाँ घुस पड़ी हैं जिन्हें हटाये बिना वह अपनी प्रखरता पुनः प्राप्त कर नहीं सकेगी। इसके बिना उसके लिए अपनी महान संस्कृति को विश्व−व्यापी बनाने का—मानव समाज का अध्यात्म धर्म में पुनः दीक्षित करने का अवसर मिलेगा ही नहीं। इन व्यवधानों से जूझने के लिए वानप्रस्थों की सृजन सेना को अग्रिम मोर्चे पर खड़ा किया जायगा।
युग−निर्माण योजना का आरम्भ हुआ। पिछले दिनों हिंदू समाज में विशेषतया भारतवर्ष में उसे सुविस्तृत होने का अवसर मिला। पर अब यह अभिमान उस सीमा में सीमाबद्ध नहीं रहा। उसने विश्वव्यापी रूप ग्रहण कर लिया है। सभी धर्म सभी संस्कृतियाँ, सभी देश, सभी भाषायें अब उसके कार्य−क्षेत्र की परिधि के अंतर्गत हैं। भारत से बाहर प्रायः 45 देशों में लगभग 3 करोड़ हिंदू बसे हैं।
यह पैंतालीस देश ऐसे हैं जहाँ उनकी संख्या हजारों से लेकर लाखों तक में है। जिनमें सौ से लेकर हजार तक की संख्या है उनकी संख्या भी लगभग इतनी ही होती है। अपना प्रयास यह है कि हिन्दू धर्मानुयायी प्रायः सभी भारतीय मूल के लोगों तक साँस्कृतिक पोषण पहुंचाया जाता रहे ताकि वे अपनी भाषा और संस्कृति को भूल न बैठे। इस दिशा में सुव्यवस्थित योजना के साथ कार्य आरम्भ भी कर दिया गया है। थोड़ी जड़े मजबूत हो जाने पर उन देशों के निवासियों में भी भारतीय धर्म का प्रवेश और विस्तार उसी तरह कराया जाना है जिस तरह ईसाई मिशनरी भारत तथा अन्य देशों में अपना साँस्कृतिक विस्तार करते हैं।
वानप्रस्थों को भारत के हिन्दू धर्म के−निजी में क्षेत्र में लोक−निर्माण का अभ्यास कराया जा रहा है। वस्तुतः यह उनका अनुभव वृद्धि और अभ्यास का शिक्षण काल है। जो उसमें खरे उतरेंगे और परिपक्व सिद्ध होंगे उन्हें विदेशों में भी भेजा जायेगा। आज संसार भर में अध्यात्म धर्म की प्यास है। भौतिकता के उन्माद से उत्पन्न दुष्परिणामों को मनुष्य जाति ने देख लिया है अब उसे उस स्नेह सिक्त शान्ति की प्यास है जिसे भारत द्वारा संसार भर में चिरकाल तक अमृत वर्षा की तरह बरसाया जाता रहा है। भारतीय तत्वज्ञान ही भविष्य में विश्व का दर्शन एवं धर्म होने जा रहा है। उसका प्रकाश सर्वत्र फैलाया जाना है। इसलिए अपना कार्य−क्षेत्र समस्त संसार होगा और हमारे वानप्रस्थों को उसी तरह डेरे डाल कर सुदूर देशों में पड़ना होगा जैसे ईसाई धर्म के पादरी सुदूर देशों में जा बसते हैं। बौद्ध धर्म के विस्तार भी जीवट वाले प्रचारकों ने इसी दुस्साहस को अपनाते हुए किया था। अपने वानप्रस्थों को भी उसी राह का अवलम्बन करना होगा।
हिंदू धर्म से आगे बढ़कर ईसाई धर्म, मुसलमान धर्म, बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म, पारसी धर्म आदि संसार के प्रमुख धर्मों को भी अपने महान मिशन के लिए उपयोग किया जाना है यह कैसे होगा इसे अगले दिनों हम सब प्रत्यक्ष रूप से देखेंगे।
समय का माँग को पूरा करने के लिए अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को आगे आना चाहिए और इस संकट काल में अपने पवित्र कर्तव्यों को पूरा करने के लिए साहस भरे कदम आगे बढ़ाने चाहिए। धर्म और अध्यात्म के सहारे ही भावनात्मक नव−निर्माण की समस्या का समाधान होगा और उसी के बलबूते बहुमुखी विपत्तियों के घटाटोप का निवारण होगा। जन−मानस का स्तर ऊँचा उठाने के लिए वाणी और लेखनी का प्रायः प्रयोग किया जाता है। शास्त्रों की स्थिति में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए होता रहा है पर यह भी एक तथ्य ही है कि उन माध्यमों को बहुमूल्य सुतीक्ष्ण अस्त्र भर माना जा सकता है जिन्हें चलाने के लिए क्रिय−कुशल और समर्थ साहसी योद्धा चाहिए। मात्र−शस्त्र संचय से ही तो बात नहीं बनती। चलाने वाले प्रशिक्षित शूरवीर भी तो चाहिए। वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
अपना कार्यक्षेत्र अब भारत तक—हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है। वरन् संसार के समस्त धर्मो और समस्त देशों तक अभियान को अग्रसर होना है। भगवान् बुद्ध के तप−त्यागों ने और अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन के अनुदान ने किसी समय विश्व में धर्म−चक्र प्रवर्तन का तो प्रयास किया था—सर्वथा रहित होने पर भी हमें वही प्रयास करना है—उसी मार्ग पर चलना है। मानवी गरिमा को हम गिरने न देंगे। ग्वाल−बालों की तरह लाठी का सहारा देकर गोवर्धन पर्वत उठाने में योगदान देंगे और कुपित इन्द्र का मनोरथ पूरा न होने देंगे। साधनहीन रीछ−बानर जब अपनी नन्हीं−सी जाने लेकर दुर्दान्त लंकाधिपति के सामने तन कर खड़े हो गये थे तो हमी दन अग्नि परीक्षा के दिनों में लोभ−मोह के पाश में बँधे हुए सड़ी−गली जिन्दगी के लिए ललचाते हुए क्यों मरते खपते रहेंगे। आदर्शों की दिशा में बहुत कुछ कर सकना व्यस्त और सन्त्रस्त लोगों के लिए भी सम्भव हो सकता है। जो भावना नर−कीटकों की महामानवों में बदलती है, उसका प्रकाश बहुत समय से अपने अन्तःकरणों में टिमटिमा रहा है अब उसके प्रकट होने का समय आया तो पीछे कौन हटेगा? अग्रगामी जत्थे अगले ही दिनों सामने प्रस्तुत खड़े दिखाई देंगे, ऐसा विश्वास किया जा सकता है।
जिन परिवारों में ऐसे अग्रगामी लोग कुछ कदम बढ़ाने का साहस कर रहें हों उन्हें अपने को सब प्रकार सौभाग्यशाली मानना चाहिए। इसमें किसी को—किसी भी प्रकार की अपनी हानि नहीं सोचनी है। घाटा पड़ेगा तो केवल कायरता और संकीर्णता की ही कुछ घटोत्तरी होगी बाकी तो सब तो सब कुछ बढ़ने ही बढ़ने वाला है।
काँग्रेस आन्दोलन में जिन्होंने कदम बढ़ाये या तो प्रतिष्ठा, पद पेन्शन पाते रहेंगे। दोनों ही दशाओं में दूसरे सामान्य लोगों की तुलना में ऊँचे ही रहे, उन्हें आत्म सन्तोष और आत्म−गौरव का लाभ तो निश्चित रूप से मिला ही। इनके साहस ने भारत माता को पराधीनता के पाश से छुड़ाया। जन−साधारण के मन में चिर काल तक उनके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा बनी रहेगी। कीट−पतंगों की तरह सड़ते कटते रहने की अपेक्षा क्या यह सत्साहस भरी उपलब्धि कुछ कम महत्व की है। क्या स्वार्थों को सुरक्षित बनाकर बैठे रहने वाले चतुर लोगों की तुलना में कुछ घाटे में रहे? इन साहसी लोगों ने क्या खोया? और इन कृपणों ने क्या पाया? इसका यदि विचार पूर्ण लेखा−जोखा लिया तो प्रतीत होगा कि जो अपने को चतुर समझते रह वस्तुतः वे ही वज्र मूर्ख थे।
उन्हीं पुरानी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति आज फिर सामने आ खड़ी हुई है। उन दिनों राजनैतिक स्वाधीनता का प्रश्न था आज हमें बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक स्वाधीनता के तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा इसलिए तीन गुने साहस एवं त्याग की जरूरत पड़ेगी। गान्धीजी 79 सत्याग्रही सैनिक की सेना साबरमती आश्रम से धरसाना से नमक बनाने चले थे। आरम्भ छोटा था पर उसका अन्त भारत की मिली स्वाधीनता के रूप में सामने आया। अखण्ड−ज्योति परिवार की सत्याग्रही सेना आगे चलेगी तो पीछे अगणित कदम उठते हुए दिखाई देंगे और उस अभियान का अन्त धरती पर स्वर्ग के अवतरण एवं मनुष्य से देवत्व के उदय के रूप में ही सामने आवेगा। इस श्रेय को हमें शिरोधार्य करना ही चाहिए। समय के उत्तरदायित्वों का हमें स्वागत करना ही चाहिए। मोह ग्रस्त अर्जुन की तरह हमें अनार्य जुष्ट और अस्वर्ग व्यामोह से ऊपर उठना ही चाहिए।
विशुद्ध भौतिक दृष्टि से भी विचार करें तो भी यह कोई घाटे का सौदा नहीं। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति ने कभी कुछ खोया नहीं है। भूतकाल में ऐसे भी कठिन प्रसंग आते थे, जब लोग अपने प्राणों तक की बाजी लगाते थे और उसमें भी अक्षय स्वर्ग और अक्षय कीर्ति का लाभ ढूंढ़ निकालते थे, पर अब तो ऐसी कोई बात नहीं है। कहीं लड़ने मरने या जान−जोखिम पड़ने की कोई योजना नहीं है। मात्र आदर्श जीवन जीने और लोक−मंगल के लिए कुछ समय देते रहने भर की तनिक−सी बात है। इसमें घर परिवार वालों को कुछ असुविधा और धन उपार्जन में थोड़ी बाधा उत्पन्न होती दिखाई दे सकती है, पर यदि दूर दृष्टि से सोचा जाय तो ये दोनों आशंकाएँ सर्वथा निर्मूल दिखाई पड़ेगी।
आदर्श जीवन जीने की संजीवनी−विद्या का प्रशिक्षण एवं अभ्यास वानप्रस्थ जीवन का प्रथम सोपान है, जो उसे अपनायेगा उसका स्वयं का जीवन संयमी और व्यवस्थिति बनेगा। ऐसी दशा में उसका आरोग्य भी बढ़ना है और दीर्घ जीवन का पक्ष प्रशस्त भी होना है। आहार−बिहार की अस्त−व्यस्तता से ही तो लोग बीमार पड़ते और असमय मरते है। संयमी जीवन अक्षय स्वास्थ्य का बीमा है। प्रकृति का अनुसरण करके सृष्टि के अन्य प्राणी आयु पूरी होने पर मरते तो हैं पर बीमार नहीं पड़ते। यदि आरोग्य रक्षा का पथ प्रशस्त होता है तो आये दिन कष्ट भुगतने, घर वालों को परेशान करने, दवा−दारु में पैसा नष्ट होने जैसी अनेक कठिनाइयों का समाधान मिल सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ अवधि में लगा हुआ समय प्रकारान्तर से घाट का नहीं नफे का ही तो काम हुआ।
चिन्तन में निकृष्टता का समावेश रहने से ही लोग व्यसनी और अपव्ययी बनते हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ बुरी आदतें, पैसा भी करती है और समय भी। उत्कृष्ट चिन्तन को कूट कूट कर मनःक्षेत्र में भरने वाली वानप्रस्थ शिक्षा उन सब भ्रष्ट अस्त−व्यस्तताओं की जड़ काट देती है। सुधरी हुई प्रकृति का मनुष्य अपने लिए और समस्त परिवार के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी सिद्ध होता है यह स्पष्ट है। प्राचीनकाल में छोटे−छोटे अबोध बच्चों को गुरुकुलों में ऋषियों के पास प्रसन्नता पूर्वक माता−पिता भेजते रहते थे उन्हें इस बात की आशंका नहीं होती थी कि बाबाजी के साथ रह कर हमारा बालक भी गृहस्थ लोग आत्मज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने सन्तों के पास रहते थे पर किसी को यह भय नहीं होता था जायगा पर आज की स्थिति विचित्र है। किसी सद्गृहस्थ को यह मंजूर नहीं कि उसके बच्चे या बात शीशे की तरह स्पष्ट है कि इन भ्रान्त विचारों में उलझे हुए सनकी लोगों के पास बैठने वाला भाग्यवाद, अकर्मण्यता, अनुत्तरदायित्व, नशेबाजी जैसी बुरी बातें ही छूत की बीमारी की तरह लेकर आवेगा। जहाँ जो चीज होगी वहाँ से वही तो मिलेगी। बाबाजी के पास बैठने वाला उसी स्तर का बनेगा। यह सोच कर हर सद्गृहस्थ यह पसन्द करता है कि बाबाजी से उसका परिवार दूर रहे। अन्यथा अपना आदमी बेकार हो जायेगा।
यह आशंका 99 प्रतिशत सही है पर शत प्रतिशत नहीं। युग−निर्माण योजना, प्राचीन ऋषि परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करती है उसके संपर्क में आकर बाल, वृद्ध, तरुण, अधेड़, नर−नारी किसी का भी अहित नहीं हो सकता। किसी को अवाँछनीय दिशा नहीं कमल सकती।
जब उसका संचालक बाबाजी नहीं बना—एक सद्गृहस्थ के रूप में आजीवन अपनी स्थिति बनाये रहा तो उसके संपर्क में आकर कोई बाबाजी बन जायेगी ऐसी आशंका नहीं की जानी चाहिए। वस्तुतः इस संपर्क में हर किसी के व्यक्तित्व का निखार ही हुआ है। और उस निखार से उसके घर परिवार को हर प्रकार से लाभ ही पहुँचा है। गुण,कर्म, स्वभाव का परिष्कृत होना ऐसा लाभ है जिसके साथ आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक लाभ भी जुड़े हुए है। इन लोगों में पारिवारिक हर्षोल्लास, प्रेम, सौजन्य से लेकर आर्थिक सुसन्तुलन तक की वे सभी उत्साहवर्धक उपलब्धियाँ सम्मिलित तक की वक सभी उत्साहवर्धक उपलब्धियां सम्मिलित है जो किसी सद्गृहस्थ को सुखी−समुन्नत बना सकती है। वानप्रस्थ प्रशिक्षण इस प्रकार के अगणित लाभों से ओत−प्रोत है। उसमें जाने से रोकना अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मारने, अपने ही लाभ को आप अवरुद्ध करने के समान अबुद्धिमत्तापूर्ण और अदूरदर्शितापूर्ण ही सिद्ध होगा।
आर्थिक दृष्टि से हर मितव्ययी, अधिक परिश्रमी, अधिक सतर्क व्यक्ति, सदा लाभ में रहता है। उसके प्रति सद्भाव और श्रद्धा रखने वालों की संख्या बढ़ती है, फलतः उनके माध्यम से आर्थिक प्रगति के अनेक द्वार खुलते हैं। आजकल वकील और डाक्टर दौड़−दौड़ कर सार्वजनिक संस्थाओं में इस लिए भी प्रवेश करते है कि उनका जन−संपर्क बढ़े, उन्हें आदर्शवादी समझा जाय, फलतः संबंधित लोग उनके व्यवसाय से भी सम्बन्ध रखें। सचमुच होता भी यही है। अपने मतलब से मतलब रखने वाले नीरस लोग न तो लोकप्रिय हो पाते है और न उनका व्यवसाय चमकता है। नौकरी पेशा लोगों के मालिक लोग भी यह पसन्द करते हैं कि उसके अधीनस्थ लोकप्रिय रहें और उनकी कठिनाइयों के समाधान एवं संवर्धन में योगदान करें। लेबर यूनियनों के पदाधिकारियों से उनके बड़े अफसर अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने में ही लाभ सोचते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोकसेवा के मार्ग में कुछ कदम बढ़ाना यदि आर्थिक दृष्टि से भी देखा जाय तो कुछ घाटे का काम नहीं है। कई लोकसेवी आर्थिक हानियाँ उठाते रहते हैं, इसमें उनकी सेवा साधना कारण नहीं होती वरन् अस्त व्यस्तता और गैर जिम्मेदारी ही प्रधान रूप से उस प्रकार की अड़चने खड़ी करती हैं। सतर्क मनुष्य पूरी सावधानी से अपना कारोबार चलाते है और पूरी तत्परता से लोक−सेवा करते हे। दोनों पक्षों में से भी कोई हानि नहीं होने देते। असावधानी से होने वाली हानि को लोग लोक−सेवा के सिर मढ़ते रहते हैं। इस भूल के कारण ही यह भ्रम फैला है कि सेवा क्षेत्र में उतरेगा वह अपनी अर्थ व्यवस्था चौपट करेगा। वस्तुतः ऐसी बात है नहीं।
सारा वजन अपने ही कन्धों पर लादे फिरने की अपेक्षा है कि घर के दूसरे लोगों को भी पारिवारिक एवं व्यावसायिक अनुभव प्राप्त करने एवं उत्तरदायित्व सम्भालने का अवसर दिया जाय। इसमें उनकी सूझ−बूझ एवं प्रतिभा में निखार आता है। इस लाभ को आरम्भिक भूल के कारण होने वाली थोड़ी हानि के रूप में चुकाना पड़े तो भी उठाना चाहिए। ईश्वर न करें कदाचित असाध्य रुग्णता आ घेरे अथवा साँस पूरी हो जाये तो पीछे वाली की अपंग असहाय की स्थिति में रहना पड़े इसके लिए प्रत्येक विचारशील को सचेष्ट रहना चाहिए। मार्ग दर्शन अपना रखा जाय सो ठीक है पर काम अपने उत्तराधिकारियों को भी करने देना चाहिए। उन्हें साहसी, सतर्क, जिम्मेदार एवं सूझ−बूझ वाला बनाने की दृष्टि से भी यह उचित है कि कुछ समय उन्हें कुछ करने और संभालने का अवसर मिलता रहे। यह प्रशिक्षण पीछे वालों के हित में ही पड़ता है। जो पूरा बोझ अपने ही कन्धों पर लादे रहते है वे पीछे वालों को अपंग अनुभवहीन बना कर उनके साथ अन्याय ही करते है। किलिस्ट वानप्रस्थ−प्रशिक्षण में जाने वाले लोग अपने परिवार का भी हित साधन ही करते है। जिस कार्य में अपना—अपने समाज का हित है उसमें भला परिवार का हित जुड़ा हुआ क्यों न होगा।
वानप्रस्थ शिक्षा, व्यक्तित्व के विकास का अभ्यास निकटवर्ती वातावरण में रहकर करने का प्रयोग सिखाती है। स्त्री, बच्चे, माता−पिता, बहिन−भाई के साथ आवश्यक कर्तव्यों का पूरी तरह पालन करने के लिए उसमें बहुत कुछ सिखाया जाता है। बच्चों को अनाथ छोड़कर भाग देने की नहीं वरन् उन्हें अधिक सुसंस्कृत, समुन्नत बनाने के लिए गहरे स्नेह में−उन्हें ढालने के लिए अथक प्रयत्न करने की बात को लोक−सेवा का आवश्यक अंग कहा जाता है और उसके लिए उपयुक्त मार्ग बनाया जाता है। ऐसी दशा में यही आशा की जानी चाहिए कि प्रशिक्षित वानप्रस्थ अपने स्त्री−बच्चों के लिए, परिवार के अन्य सदस्यों के लिए पहले की अपेक्षा कहीं अधिक तत्परता के साथ पालन करेंगे। इस प्रशिक्षण में किसी परिवार को घाटे की अथवा अहित की आशंका नहीं करनी चाहिए। भौतिक एवं सांसारिक दृष्टि से भी नफे में ही रहना है।
इन तथ्यों को यदि हम लोग अपने परिवार के सदस्यों को शान्तचित्त और सही रूप से समझा सकें तो यह कठिनाई उपस्थित न होगी कि घर के लोग अपना अहित सोचें और संकट की आशंका करें। उनकी चिन्ता का मूल कारण साधु−बाबाओं की वर्तमान स्थिति ही है। उनका सन्देह−निस्सन्देह चिन्ता और आशंका का विषय है पर नव−निर्माण अभियान की वानप्रस्थ योजना में कोई ऐसा तत्व नहीं है, जो किसी परिवार की सुव्यवस्था में किसी भी प्रकार से बाधक बनता हो। सच तो यह है कि उसके कारण प्रगति और सुख−शान्ति की अनेक सम्भावनाओं का पथ प्रशस्त होता है।
पत्नियाँ यह आशंका कर सकती हैं कि उनके पति सदा ब्रह्मचर्य से रहने लगेंगे और पारिवारिक आकर्षण घट जायेगा। यहाँ यह बात भी स्पष्ट करने जैसी है कि ब्रह्मचर्य की शर्त वानप्रस्थ अवधि के सेवाकाल तक ही सीमित रखी गई है। सदा के लिए वैसा प्रतिबन्ध नहीं है। हाँ—सन्तानोत्पादन में विवेक रखने की बात पर बल अवश्य दिया जाता है और यह बहुरंगी एवं समाज सेवी दोनों के लिए ही आज की स्थिति में समान रूप से समझदारी की बात है।
हर सद्भावना सम्पन्न परिवार को अपना गौरव इसमें समझना चाहिए कि उसका एक सदस्य नव−निर्माण प्रयोजन में संलग्न रह कर उस कुल का गौरव बढ़ता रहे। पिछली चीन और पाकिस्तान की लड़ाई के समय अनेक परिवारों ने अपना एक सदस्य युद्ध सैनिक के रूप में प्रदान करने का संकल्प लिया था। गान्धी और बुद्ध को भी अनेक परिवारों से एक−एक सदस्य मिला था। ऐसा उस कुटुम्ब ने पारस्परिक विचार विनियम से ही स्वेच्छापूर्वक निर्णय किया था। प्राचीन समय में, युद्ध काल में माताएँ अपने पुत्रों को और पत्नियाँ−पतियों को, बहिन भाइयों को देश−रक्षा के लिये तिलक लगा कर आरती उतार कर विदा करती थीं? उस आदर्शवादिता का यदि हमारे परिवारों से सर्वथा लोप हो गया तो समझना चाहिए कि वहाँ पारिवारिक स्नेह सद्भाव के बीज भी नष्ट हों जायेंगे। आदर्शवाद की अवहेलना करने के बाद निकृष्ट स्तर की स्वार्थपरता ही शेष रह जाती है, यदि इसी को छाती से चिपका कर रखा गया तो हमारे घरों में विग्रह और विद्वेष के नरक के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहेगा। आज घर परिवारों में जो विषाक्त मनो−मालिन्य दीख रहा है उसका कारण उसमें आरम्भ से ही पनपने वाली आदर्शों की उपेक्षा ही तो रही है। इसका निराकरण किये बिना हमारे परिवार नर−रत्नों की खान न बन सकेंगे। वानप्रस्थ परम्परा की आदर्शवादिता का आरम्भ करके वस्तुतः हम अपने समस्त परिवार को ऐसी प्रेरणा देते हैं जिसे अपना कर सारा कुटुम्ब, स्नेह−सौजन्य के सूत्र में बँधा रह सकता है और एक दूसरे के लिए बहुत कुछ कर गुजरने के अरमानों से भरा रह सकता है। वस्तुतः परिवारों की सच्ची सुख समृद्धि ऐसी ही आदर्शवादिता प्रतिष्ठापना के द्वारा सम्भव हो सकती है। वानप्रस्थ में प्रवेश करके कोई अपने घर परिवार के लिए किसी प्रकार का घाटा या संकट उत्पन्न नहीं करता वरन् उसकी सर्वतोमुखी प्रगति का बीजारोपण ही करता है। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी गहराई से, जितनी जल्दी, समझ लिया उतना ही उत्तम है।
मुस्कान थके हुए के लिए विश्राम, हताश के लिए प्रकाश, गतिशील के लिए सम्बल और घायल के लिए शान्तिदायक मरहम है। —डेवन
जिनके पास अभीष्ट योग्यता, भावना और सुविधा हो उन्हें इस आपत्तिकाल में मानवता की पुकार सुनकर आगे आना चाहिए और लोभ-मोह की कीचड़ में सड़ते रहने की अपेक्षा उस आदर्शवादी महानता का वरण करना चाहिए जिसे किसी समय इस देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा सहज स्वभाव अपनाया जाता था। परिस्थितियाँ, मनोभूमि और प्रवाह प्रचलन बदल जाने से अब इस प्रकार के कदम बढ़ाना दुस्साहस जैसा प्रतीत होता है। किसी समय, जिसमें इतनी भी जीवट न हो, उसे मृतक तुल्य माना जाता था। आज की परिस्थितियों में जो लोग वरिष्ठ अथवा क्लिष्ट वानप्रस्थ का मार्ग अपना सकेंगे विश्व मानव और विश्व-शान्ति के लिए अपना थोड़ा-बहुत भी योगदान दे सकेंगे वे बड़भागी माने जायेंगे। इस घोर अन्धकार में उन छोटे दीपकों का साहस भी भूरि-भूरि सराहने योग्य माना जायगा।
सम्भवतः इस आह्वान को प्रत्येक जीवित और जागृत आत्मा द्वारा सुनने योग्य माना जायगा। सम्भवतः बहुतों की आन्तरिक आकाँक्षा इस दिशा में कदम बढ़ाने की होगी भी किन्तु यह सम्भव है कि वे ऐसी विषम परिस्थितियों में जकड़े हुए हो कि व्यवहारतः कुछ अधिक कर सकना उनके लिए सम्भव न हो। विधि की विडम्बना विचित्र है। कुछ की परिस्थितियाँ बहुत कुछ करने योग्य होती हैं पर मन इतना गिरा मरा होता है कि आदर्शों की तरफ बढ़ने की इच्छा तक नहीं उठती। इसे विपरीत कुछ ऐसे भी होते है कि जिनका अन्तरात्मा महामानवों के चरण-चिन्हों पर चलते हुए कुछ कर गुजरने के लिए निरन्तर छटपटाता रहता है पर परिस्थितियाँ इतनी विपरीत होती हैं कि उन्हें लाँघ सकना किसी जिम्मेदार एवं कर्त्तव्य परायण व्यक्ति के लिए सम्भव ही नहीं होता वरन् उन्हें मन मसोस कर बैठना पड़ता है।
मिशन के लिए भी वह सम्भव नहीं कि वानप्रस्थ कार्यकर्त्ताओं के घर परिवार का आर्थिक उत्तरदायित्व बहन कर सके। अधिक से अधिक इतना ही सम्भव है कि कार्यकर्त्ताओं के भोजन-वस्त्र की व्यवस्था जुटाई जाती रहे। ऐसी दशा में जिन्हें घर से बाहर जाकर कार्य-क्षेत्र में कूदने की सुविधा नहीं है उन्हें स्थानीय क्षेत्र में ही प्रकाश फल का प्रयत्न करना चाहिए। सक्रिय सदस्यों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को भी सृजन-सेना के द्वितीय मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिक माना जाता है। नियमित रूप से कुछ घण्टे अथवा समय दे सकने वाले और अपनी आजीविका का उपयुक्त अंश इस प्रयोजन के लिए लगाने वाले व्यक्ति भी अपने क्षेत्र में इतना काम कर सकते हैं जिसे अति-महत्वपूर्ण कह कर सराहा जा सके।
घर-परिवार के उत्तरदायित्वों को निवाहा जाय, साथ ही आत्मा-परमात्मा और समाज के प्रति कर्त्तव्यों का भी ध्यान रखा जाय तो अपनी क्षमताओं का सन्तुलित विभाजन किया जा सकता है। समय भी बच सकता है। साधारणतया आजीविका उपार्जन के लिए आठ घण्टे पर्याप्त होने चाहिए। सात घण्टे का आराम-विश्राम पर्याप्त है। पाँच घण्टे नित्य कर्म के लिए तथा अन्य आवश्यक कामों के लिए पर्याप्त होने चाहिए। बीस घण्टा घर परिवार में यदि मुस्तैदी और मनोयोग के साथ लगाये जा सकें तो व्यस्त समझे जाने वाले व्यक्ति भी इतने समय में अपना सारा काम फुर्ती और चुस्ती के साथ पूरा कर सकते है। घिस-घिस करते हुए आलस्य और प्रमाद में वक्त खराब करते रहें तो दिन 48 घण्टे का होने लगे तो भी काम नहीं निपटेगा अन्यथा 20 घण्टे हर दृष्टि से घरेलू कामों के लिए पर्याप्त हो सकते है।
शेष चार घण्टे बच जाते हैं उन्हें परमार्थ प्रयोजन के सर्व श्रेष्ठ माध्यम नव-निर्माण कार्य-क्रमों में लगाया जा सकता है। कोई अकेला व्यक्ति ही इतने समय में चल-पुस्तकालय का ज्ञान-रथ चलाता रह सकता है— यह नित्य कितने ही व्यक्तियों को ज्ञानदान से लाभान्वित करता रह सकता है। ऐसे अनेकों प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम हैं जिन्हें अपनी क्षमता, योग्यता और सुविधा के अनुसार हर व्यक्ति चुन सकता है और उस परमार्थ के लिए निकाले हुए समय का उनमें उपयोग कर सकता है। इन, समय दान देने वालों को भी दूसरी पंक्ति का वानप्रस्थ ही कहा जा सकता है।
दस पैसा ज्ञानघट में जमा करना और उसका सत्साहित्य मँगा कर अपने क्षेत्र में फैलाना प्रारम्भिक सदस्य की न्यूनतम त्याग परीक्षा थी। जिनमें उच्चस्तरीय भावनाओं का जागरण हो चुका है उन्हें इतने स्वल्प अनुदान से सन्तोष न करके कुछ अधिक उदारता दिखाने की हिम्मत करनी चाहिए। घर के सदस्यों में एक सदस्य नव-निर्माण मिशन को भी मानना चाहिए। मान लीजिए अभी अपने परिवारों में पाँच सदस्य हैं एक और बच्चा हो जाय तो उसे मार तो नहीं डालेंगे—घर से निकल तो नहीं देंगे। प्रस्तुत आर्थिक-तंगी के बीच ही उसके लिए भी भोजन, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, विवाह-शादी आदि का प्रबन्ध करना पड़ेगा। यदि यही बात मिशन के बारे में सोच ली जाय, उसे भी घर-परिवार का एक सदस्य मान लिया, तो आजीविका का उतना अंश उसके लिए भी निकाला जा सकता है, जितना कि घर के एक व्यक्ति के ऊपर खर्च होता है। यह छटवाँ-सातवाँ अंश माना जाय तो सप्ताह में एक दिन की कमाई उसके निमित्त लगाई जा सकती है। इतना न बन पड़े तो महीने में एक दिन की आमदनी खर्च करते रहने में कृपणता पर अंकुश लगने के अतिरिक्त और किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न होगा। किसी अन्य कम महत्व के काम में कमी करके इस अनुदान का सन्तुलन बिठाया जा सकता है।
कल्पना की उड़ाने-उड़ाने और बातों के बताशे बाँटते रहने से कुछ काम बनने वाला नहीं है, हमें यथार्थवादी होना चाहिए। जहाँ लगन होगी—तड़पन होगी वहाँ कुछ कर गुजरने की आकाँक्षा भी प्रबल रहेगी। आदर्शों का परि-पालन तप, त्याग के बिना सम्भव नहीं। समय और श्रम देकर तप-साधना का और अपनी कमाई का अंश डडडड देकर पुण्य-परमार्थ कर प्रयोजन डडडड किया जा सकता है। हमें कर्मवीर होना चाहिए। हमारे विचार का क्रिया में परिणित होना चाहिए। आदर्शवादिता की त्याग-बलिदान का जमा पहनना चाहिए। उसे नंगी-उघारी रख कर उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए। कृपणता पर अंकुश लगाये बिना महानता के पथ पर कैसे चला जा सकता है? त्याग और बलिदान से डरते रहें तो जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए ऊँचा कैसे उठा जा सकता है। वानप्रस्थ अग्रिम पंक्ति में खड़े हों तो उसकी दूसरी पंक्ति भी तो मजबूत होनी चाहिए। सेना को रसद और बारूद की सप्लाई न हो तो शूरवीर योद्धा भी कब तक किस तरह लड़ सकेंगे। अगले दिनों हर शाखा में—हर कार्य क्षेत्र में-विविध-विधि प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्य-क्रमों का उभार आना है, उसके लिए सहयोगियों के श्रम की तथा अभीष्ट साधनों की आवश्यकता बार-बार पड़ती रहेगी। इसे कहाँ से जुटाया जाय? स्पष्ट है कि भ्रष्टाचारी समाज से हमें लड़ना है—उससे तो शत्रुता ही बनेगी। निहित स्वार्थ की मनमानी पर आघात पहुँचाने हम चले हैं तो उनसे सहयोग की आशा कैसे की जा सकती है। वे तो कर कार्य में रोड़े उत्पन्न करेंगे। श्रम और धन तो हमें अपने पेट पर पट्टी बाँध कर अथवा समय बचाकर ही पूरी करना होगा। इन दोनों साधनों को अधिकाधिक मात्रा में जुटाने के लिए हमें अपनी भावना और तत्परता को आगे लाना चाहिए। पूरी तरह जो आगे नहीं आ सकते वे कठिन परिस्थितियों में रह कर इतना कुछ तो कर ही सकते है।
थोड़े से पेन्शन पाने वाले या घर के सम्पन्न लोग ही वानप्रस्थ बनने के उपरान्त अपना खर्च आप चला सकेंगे। शेष के लिए भोजन, वस्त्र, आदि का प्रबन्ध तो जुटाना ही पड़ेगा। यह भी एक बड़ा काम और एक बड़ा खर्च है। पिछले जमाने में भिक्षा माँग कर निर्वाह चल जाता था पर अब वह प्रथा न तो सम्मान की दृष्टि से उपयुक्त पड़ती हैँ न परिस्थितियाँ ही वैसी हैं। साधु-ब्राह्मणों को दान दक्षिणा जनता देती थी वह भी हमारे वानप्रस्थों को कौन देगा? उनके शिक्षण काल में—प्रवास में—निर्वाह में-खर्च पड़ेगा ही। इसकी पूर्ति उन उदार एवं भावनाशील लोगों को करनी चाहिए जो स्वयं आगे आने की स्थिति में तो नहीं हैं पर सहयोग तो किसी न किसी प्रकार कर डडडड सकते है।
इस वर्ष हरिद्वार का कुम्भ-मेला है। बसन्त पञ्चमी से लेकर 20 अप्रैल तक यहाँ अन्धा-धुन्ध भीड़ और रेल-पेल रहेगी। उन दिनों शान्ति-कुँज में वानप्रस्थ प्रशिक्षण सत्र चल रहें होंगे। इसलिए यात्रियों के ठहरने की तनिक भी गुंजाइश न रहेगी। दर्शन, परामर्श के लिए भी उन घोर असुविधा के दिनों में वहाँ न आने का विज्ञ पाठकों से अनुरोध है।
आशा की जानी चाहिए कि बसन्त पर्व में आरम्भ होने वाले इस नये वर्ष में अखण्ड-ज्योति के परिजन नवनिर्माण की दिशा में कुछ अधिक कर गुजरने के लिए साहस भरे कदम बढ़ावेंगे। जिनकी स्थिति वरिष्ठ अथवा क्लिष्ट वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त होगी व उसके लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ावेंगे। जिनकी स्थिति वैसी नहीं वे पिछले पृष्ठ पर छुपे-”इतना तो व्यस्त और विवश होते हुए भी किया जा सकता है।” अनुरोध के अनुरूप कुछ न कुछ करने का प्रयत्न करेंगे। सक्रिय सदस्य और कर्मठ कार्यकर्ता यदि अधिक तत्परता और लगन के साथ अपनी गतिविधियां तीव्र कर दें तभी मिशन के महान प्रयोजनों की पूर्ति की दिशा में आशा-जनक प्रगति हो सकती है। बसंत पर्व से लेकर होली तक से 40 दिनों में हममें से प्रत्येक को इस दिशा में अधिक विचार मन्थन और अधिक सक्रिय प्रयास करना चाहिए।
वानप्रस्थ प्रशिक्षण के लिए शान्ति-कुँज में आवश्यक व्यवस्था जुटा जी गई है 20 जनवरी से प्रथम सत्र आरंभ हो जायगा। जिन्हें इस दिशा में उत्साह हो उन्हें निम्नलिखित प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए अपना आवेदन पत्र भेजना चाहिए।
आयु (2) शिक्षा (3) जाति (4) व्यवसाय (5) शरीर में कोई रोग हो या अभाव हो तो उसका पूरा विवरण (6) परिवार के सदस्यों का विवरण और उनकी आयु (7) शिक्षण काल से घर−परिवार और कारोबार की व्यवस्था कैसे चलेगी? (8) वरिष्ठ वानप्रस्थ में प्रवेश करना है या क्लिष्ट में (9) अब तक के जीवनक्रम में घटना क्रम का वर्णन (10) पत्र व्यवहार का पूरा पता। जिनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति उपयुक्त न हो उन्हें नहीं आना चाहिए। पत्नी बच्चों समेत भी नहीं आना हैं, व्यसनी, क्रोधी, सनकी, आवेशग्रस्त, क्रूर अहंकारी तथा अनुशासनहीन प्रकृति के लोग भी न आवें। वानप्रस्थ में प्रवेश करना उन्हीं के लिए उपयुक्त है जिनमें दूसरों के लिए मार्ग-दर्शक बनने की क्षमता है। शान्त-एकान्त में रहने और भजन-ध्यान करते हुए मौत के दिन पूरे करने के इच्छुकों के लिए यह योजना उपयुक्त न पड़ेगी। इसी प्रकार तुर्त-फुर्त चमत्कारी जादू-मन्त्रों की सिद्धियाँ सीखने के लिए लालायित लोगों को भी निराश होना पड़ेगा। इसमें तो भावनाशील, कर्मठ, सौम्य स्वभाव एवं क्रान्तिकारी ही खपेंगे। अस्तु उन्हीं के आवेदन-पत्र आने चाहिए। प्रार्थना पत्रों पर विचार करके ही यह बताया जा सकेगा। कि किन्हें किस महीने के प्रशिक्षण में आना है, बिना स्वीकृति पत्र पाये किसी को भी नहीं आना चाहिए।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को इस योजना में अपने को पूरी तरह सम्बद्ध रखना चाहिए, उसे यह मान कर चलना चाहिए कि संचालकों एवं संरक्षकों में से ही एक वह भी है। इस अंक को बहुत ध्यान से दो बार पढ़ना चाहिए और यह देखना चाहिये कि योजना में कहाँ त्रुटि है, उसमें सुधार की—परिवर्तन, परिवर्धन की कहाँ क्या गुंजाइश है। ऐसे परामर्श, विस्तार पूर्वक भेजने चाहिए और सम्भव हो तो यह भी लिखना चाहिए कि मिशन के इस अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम में उसका अपना क्या योग−दान होगा, इसे सफल बनाने के लिए वह किस प्रकार क्या प्रयत्न करेगा।
ऐसे परामर्श प्रत्येक परिजन से माँगे जा रहे हैं। उनके आधार पर कार्य−पद्धति को और भी अधिक परिष्कृत एवं सुव्यवस्थित बनाने में योग−दर्शन मिलेगा। अस्तु फरवरी में अपनी प्रतिक्रिया सभी पाठकों को शांति−कुंज सप्तसरोवर हरिद्वार के पथ पर भेज देनी चाहिए
अभी तो पार करने हैं अगम पथ इन पगों से ही। भला फिर क्यों अभी से हार बैठा बावला यह मन?
अभी तो हर कुटी में दीप जल पाया न पूजा का। न तुलसी उग पायी है अभी प्रत्येक आंगन में॥
कहाँ गूँजे अभी घर—वेद की पावन ऋचाओं से? कहाँ अनुमति हो पायी प्रभू की—मूर्ति−पाहन में?
अभी तो आस्था—निष्ठा, हमें हर−प्राण भरनी है। भला फिर क्यों अभी से हार बैठे चेतना के कण
न घर−घर में अभी हमने सरल सौहार्द्र भर पाया? मनो में प्यार की गंगोत्री लहरा न पाये है॥
कहाँ जन्मे किसी के घर−भरत या राम, या लक्ष्मण। कि हर घर को तपोवन की व्यवस्था दे न पाये हैं॥
अभी तो त्याग से हर उर्मिला की माँग भरनी है। भला फिर क्यों अभी से हार बैठे प्रेरणा के क्षण?
अभी हर कण्ठ को सन्देश देना है मधुरता क। अभी आँख को−गम देख नम होना सिखाना है॥
सभी बांहें कर प्रण−दीन−दलितों की सुरक्षा का। कि, है इनसानियत जिन्दा—जमाने को दिखाना है॥
अभी तो हो रही प्रारम्भ, जग−हित की कहानी यह। भला फिर क्यों अभी से लेखनी की रुक गयी धड़कन?
अभी तो हम नये युग के भवन की नींव भरते हैं। न जो बरसात में टपक, भवन ऐसा बनाना है॥
सभी इनसान जिसमें रह सके इनसान बन कर ही। नया संसार ऐसा प्यार का हमको बसाना है॥
नहीं यह कल्पना केवल— सच्चाइयां है—हकीकत है। भला फिर क्यों, हथौड़ी−छैनियों की रुक गयी झन−झन॥
न जब तक लक्ष्य हम पा ले थकान कैसी?घुटन कैसी? किनारे बैठना थककर निशानी कायरों की हैं॥
“जवानी वह−लगा दे आग पानी में जरूरत पर— बना दे रेत को तिलहन” जुबानी शायरों की है॥
अभी तो साथियों! नव सृष्टि का निर्माण करना है। भला फिर क्यों से हार बटा जागरण का प्रण?
—माया वर्मा
*समाप्त*