देने वाला घाटे में नहीं रहता

प्रकृति का नियम है—जो देता है वह पाता है; जो रोकता है वह सड़ता है। छोटी पोखर का पानी घटता, सड़ता और सूखता है, किन्तु झरने में सदा स्वच्छता गतिशीलता बनी रहती है और वह अक्षय भी बना रहता है। जो देने से इनकार करेगा वह गतिशीलता के नियम का उल्लंघन करके संचय में निरत होगा, उसे थोड़ा ही मिलेगा। अजस्र अनुदान पाने की पात्रता से उसे वंचित ही रहना पड़ेगा।

धरती अपना जीवन-तत्व वनस्पति को देती है। अनादि काल से यह क्रम चल रहा है। धरती का कोष घटा नहीं, वनस्पति की सड़न से बना खाद और वर्षा का जल उसका भण्डार भरते चले आ रहे हैं। धरती को देते रहने की साध उसकी मूर्खता नहीं है—जो देती है, प्रकृति उसकी पूरी तरह भरपाई करती रहती है।

वृक्ष फल-फूल, पत्ते प्राणियों को देते हैं। जड़ें गहराई से लाकर उनकी क्षति पूर्ति करती हैं। समुद्र बादलों को देता है, उस घाटे को नदियाँ अपना जल देकर पूरा किया करती हैं। बादल बरसते हैं उन्हें समुद्र कं गाल नहीं बनने देता। हिमालय अपनी बर्फ गला कर नदियों को देता हैं—नदियाँ जमीन को खींचती हैं। हिमालय पर बर्फ जमने का क्रम प्रकृति ने जारी रखा है, ताकि नदियों को जल देते रहने की उसकी दान वीरता में कमी न आने पावे।

आज का दिया हुआ भविष्य में असंख्य गुना होकर मिलने वाला है। कब मिलेगा इसकी तिथियाँ न गिनो। विश्वास रख देने वाला खाली नहीं होता। प्रकृति उसकी भरपाई पूरी तरह कर देती है।


ईश्वर का आह्वान और आमंत्रण स्वीकार करें

परमात्मा हमें अपनी गोदी में लेने के लिए—छाती से लगाने के लिए दोनों भुजाएँ पसार कर खड़ा है। एक भुजा है पीड़ितों, पतितों और पिछड़े हुओं का क्रन्दन। दूसरी भुजा है—सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की पुकार। यह निनाद दिशाओं के अन्तराल में गूँजता रहता है। बहरे कान उसे सुन नहीं पाते—जो इन निनादों को सुन सके समझना चाहिए, उसके कानों ने ईश्वर का सन्देश सुन लिया।

परमात्मा के पास एक ही सर्वोपरि उपहार था—मानव-शरीर। इससे बढ़कर र और कोई बड़ी सम्पदा उसके भंडार में है। नहीं। जिस प्राणी को यह उपहार मिला, समझना चाहिए वह कृतकृत्य हो गया। सृष्टि के किसी भी जीवधारी को जो सुविधाएँ उपलब्ध है, वे मनुष्य को मिली हैं। यह उसी का काम है कि इस विभूति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करके उस उच्चस्तर तक जा पहुँचे जहाँ स्वयं परमात्मा विराजमान है। चेतना के साथ जुड़े हुए बहुमूल्य साधनों का मूल्याँकन न कर पाने और उनके सदुपयोग की व्यवस्था का मूल्याँकन न कर पाने और उनके सदुपयोग की व्यवस्था न बना पाने के कारण की हमें दुख—दैन्य की कटीली झाड़ियों में भटकना पड़ता है। जीवन-लक्ष्य को समझना और उसके लिए समुचित प्रयास करना यदि किसी के लिए संभव हो सके तो निश्चित रूप से उसे नर-पशु से आगे बढ़कर नर-देव की दिव्य भूमिका में प्रवेश करने का सुअवसर मिल सकता है।

मनुष्य शरीर का अनुपम उपहार देने के उपरान्त परमात्मा अपने अन्तिम अनुग्रह का एक और अनुदान देने का इच्छुक हैं। इसी के लिए वह अपने लाड़लों को पास बुलाना, चाहता है, गोदी में लेना चाहता है, छाती से लगाना चाहता है और उस अनुदान को देना चाहता है जिसे प्राप्त करने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता, इसी आमन्त्रण के लिए उसने अपनी भुजाएँ पसारी हुई हैं। जो उनमें आबद्ध हो सका वही प्रभु की समीपता और उसकी दुलार भरी मनुहार का अधिकारी बन सका।

पतन और पीड़ा से ग्रसित पिछड़े हुए मनुष्य भले ही अपने अकर्म या अज्ञान का फल भुगत रहे हों, पर वे हमारी दृष्टि में इसी उद्देश्य से आते हैं कि सहानुभूति और सेवा, सहयोग द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने—सहारा देने—का प्रयास करते हुए अपनी बहुमूल्य आत्मिक चेतना को उभारें। दया, करुणा, उदारता, सेवा जैसी दिव्य संपदाओं में अपने को सुसज्जित करें। इस प्रकार के प्रयासों में जो समय, श्रम, मनोयोग एवं धन खर्च होता है उसकी तुलना में लाखों गुने मूल्य का आत्मबल और आत्म-सन्तोष मिलता है। व्यक्तित्व में देवत्व का उदय होता है। प्रयत्नों में हुए खर्च और परिणाम में मिले लाभ को यदि ठीक तरह तोला जा सके तो प्रतीत होगा कि जो खोया गया, उससे लाखों गुना पा लिया।

भगवान की पहली भुजा संसार में व्याप्त अधःपतन के प्रति अधिकाधिक सहृदय होने का आमंत्रण लेकर पसारी हुई है। दूसरी भुजा का आह्वान यह है कि इस विश्व वसुधा को सुन्दर समुन्नत बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान दिया जाय। कोई व्यक्ति एकाकी सुख सम्पदा एकत्रित करके सुखी नहीं बन सकता। कुटुम्ब, परिवार को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हुए मनुष्य अपनी सुखानुभूति को कई गुना बढ़ाता है। यदि ऐसा न होता तो परिवार-पालन में तो कष्ट उठाना पड़ता है और त्याग करना पड़ता है उसके लिए कोई कदापि तैयार न हुआ होता। इस सुख का जितना अधिक विस्तार करना अभीष्ट हो उतना ही अधिक विस्तृत क्षेत्र में अपनी आत्मीयता को विस्तृत करना पड़ता है। यह आत्मविस्तार, सहज ही अधिक लोगों का अधिक सुख किस प्रकार संभव हो यही सोचता है और अपनी क्षमता का बड़ा भाग इसी के लिए नियोजित करता है। कहना न होगा कि सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं के अभिवर्धन से ही व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है।

ईश्वर को पाने के लिए हमें अपनी ओर से कुछ नहीं करना है केवल उसकी पसारी हुई भुजाओं में प्रवेश करना है। उसके आह्वान को सुनना और उसके आमंत्रण को स्वीकार करना भर ईश्वर मिलन का प्रयोजन पूरा करने के लिए पर्याप्त है।


अन्तःकरण की पुकार अनसुनी न करें

परमात्मा हमसे निरन्तर बात करना चाहता है—करता है—पर एक हम है जो उसकी स्नेह भरी वाणी सुनने तक सके इनकार करते रहते हैं। परमात्मा का सबसे निकटवर्ती निवास स्थान हमारा अन्तःकरण ही है। वहाँ बैठकर वह हमारे हित का—कल्याण का परामर्श निरन्तर देता रहा है। वह चाहता है उसका परमप्रिय पुत्र उसी के जैसा महान् बने—अपनी महान् गरिमा का परिचय दे और उसी तरह सत्-चित आनंद की अनुभूति के निरंतर रसास्वादन करता रहे जैसा कि वह स्वयं करता है।

यदि ध्यान पूर्वक सुनें तो प्रतीत होगा कि कोई अविज्ञान देव सत्ता हमारे अन्तःकरण में से ऐसी उमगे उत्पन्न करती रहती हैं जिनमें देवत्व की ओर बढ़ चलने के स्पष्ट सके त होते हैं। मनुष्य जीवन की गरिमा का—आत्मा के उच्चस्तर का—बोध हो सके इसके लिए आवश्यक प्रकाश हृदय गुफा में निरन्तर टिम–टिमाता रहता है, ताकि हम अपनी सत्ता और महत्ता के सम्बन्ध में यथार्थता से परिचित हो सकें। हम क्षुद्र नहीं हैं—क्षुद्र प्रयोजनों के लिए नहीं जन्मे हैं। कीट पतंगों से हमारी स्थिति कहीं ऊँची है उसी अनुपात से हमारा कार्यक्षेत्र एवं उत्तरदायित्व भी अत्यधिक है। कृमि-कीटक और पशु-पक्षी, पेट और प्रजनन की सीमित परिधि में आबद्ध हेय जीवन जीकर सन्तुष्ट रह सकते हैं, पर यदि मनुष्य ने भी उतनी ही संकीर्ण सीमा में मरना, खपना अंगीकार कर लिया तो फिर समझना चाहिए कि उस पर क्रिया गया ईश्वर का विशेष परिश्रम निरर्थक ही चला गया।

ईश्वर ने मनुष्य को बड़े-बड़े स्वप्नों और अरमानों की पूर्ति के लिए बनाया है। प्रभु के सहायक के रूप में, सृष्टि में शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए—सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने के लिए—मानव प्राणी का आविर्भाव हुआ है। शासन-सत्ता का केन्द्र राजा में निहित होता है पर शासकीय सुव्यवस्था का उत्तरदायित्व तो मन्त्री तथा अधिकारी लोग ही वहन करते हैं। इसी प्रकार ईश्वर, सृष्टि का सूत्रधार अवश्य है, पर उसके सुसञ्चालन का कार्य उसने मनुष्य को ही सौंपा है। जो साधन अन्य किसी प्राणी को नहीं मिले वे केवल मनुष्य को इसीलिए दिये गये हैं कि उनकी सहायता से अपना प्रयोजन ठीक तरह परा कर सके। मंत्रीपरिषद के सदस्यों को मोटर, बँगला, सहायक कर्मचारी, टेलीफोन आदि के सुविधा साधन तथा अतिरिक्त अधिकार इसीलिए प्रदान किये जाते हैं कि वे सौंपे गये कर्त्तव्यों का निर्वाह उन उपकरणों की सहायता से अधिक अच्छी तरह कर सकें।

ईश्वर अन्तःकरण में बैठा हुआ अपनी मंद किन्तु स्पष्ट वाणी से उन तथ्यों का स्मरण करता रहता है जो मानव जीवन के साथ विशेष रूप से जुड़े हुए हैं। टेलीफोन की आवाज तब सुनाई देती है जब चोंगा कान पर लगाया जाय यदि चोंगा उठाकर दूर रख दिया जाय तो उससे आने वाली आवाज सुनी न जा सकेगी। अन्तःकरण एक तरह का ईश्वरीय टेलीफोन है। उसे समीप रखकर यदि ध्यान पूर्वक सुना जाय तो वहाँ ऐसे संकेत, निर्देशों की तरंगें निरन्तर उठ रही होंगी जो मनुष्य जन्म के साथ जुड़े हुए महान् उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए परामर्श देते हैं और सचेत करते हैं कि इस संदर्भ में उपेक्षा करते रहने से भयंकर अनर्थ का सामना करना पड़ेगा।

जो अनुदान अन्य किसी प्राणी को नहीं मिले, वे यदि मनुष्य को अकारण या अनायास ही दिये गये होते तो यह ईश्वर का अन्याय और पक्षपात ठहरता। हम सामान्य मनुष्य भी अपने बालकों को समान प्यार देने का प्रयत्न करते हैं। कूकरी और शूकरी तक अपने सभी बच्चों को समान उदारता से दूध पिलाती हैं। फिर ईश्वरीय-सत्ता इतनी निर्दय कैसे हो सकती थी कि एक ही जाति के प्राणी को बोलने, सोचने, उपभोग करने के अनेकानेक सुखद साधन प्रदान करे और शेष प्राणियों को उन सुविधाओं से सर्वथा वंचित करदे। निस्संदेह परमेश्वर को सभी प्राणी समान रूप से प्यारे हैं और उसने शरीर यात्रा के आवश्यक साधन सभी को समान रूप से प्रदान किये हैं। मनुष्य को जो अतिरिक्त मिला है वह तो विशुद्ध रूप से एक अमानत है।

बैंक के खजाँची भी तो बैक की विपुल सम्पदा अपने अधिकार में रखते हैं; पर वे उसका उपयोग बैंक के कार्य में ही करते हैं। उस सम्पत्ति को अपनी व्यक्ति गत समझलें और निजी सुविधा के लिए खर्च कर डालें तो उस अपराध में उन्हें कठोर कारावास भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को मिला विशेष वैभव एक पवित्र धरोहर है जो लोक-मंगल में नियोजित करने के लिए दी गई हैं। ईश्वर ने अपने जेष्ठ पुत्र पर यह विश्वास किया है कि उसे जो वस्तु जिस काम के लिए दी मई है वह उसी में खर्च करेगा। यदि ऐसा न करके उस सम्पदा को मनुष्य अपनी विलासिता, अहंता की पूर्ति में खर्च करने लगे—वासना और तृष्णा के क्षुद्र प्रयोजनों में नष्ट कर डाले—तो समझना चाहिए कि अनर्थ ही किया गया है और न्यायाधीश की प्रताड़ना से बचा न जा सकेगा।

अन्तःकरण में विराजमान परमेश्वर निरन्तर यही संकेत करता है कि जीवन सम्पदा के बहुमूल्य क्षण घटते चले जा रहे हैं—दीपक का तेल शनैःशनैः चुकता जा रहा है। जो किया जाना था वह नहीं किया गया—इस भयावह भूल का समय रहते परिमार्जन कर लिया जाय अन्यथा कष्टकर पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ शेष न रह जायेगा। यह चेतावनी आसानी से सुनी जा सकती हैं कि मनुष्य जीवन इन्द्रिय लिप्सा और तृष्णा की बाल-कीड़ा में गँवा नहीं दिया जाना चाहिए। इसका वह उपयोग होना चाहिए जिसका अरमान लेकर सृजेता ने इस दिव्य अनुदान को उदारता पूर्वक प्रदान किया था। मनुष्य को विश्वस्त समझा गया है, इसीलिए इतनी बहुमूल्य अमानत उसके हाथ में थमा दी गई है। विश्वासघात की आशंका रही होती तब तो वह मिला ही न होता जिसे पाकर हम गर्वोन्मत हो रहे हैं और वह कर रहे हैं जिनके करने की कुछ भी आवश्यकता न थी।

जब हम अपने मस्तिष्क में उच्चस्तरीय विचारों को भरे होते हैं और हृदय में उच्च भावनाएँ सँजोये रहते हैं तो प्रतीत होता है अन्तःक्षेत्र में एक सन्तोष भरा निर्झर प्रवाहित हो रहा है। जब हम सत्कर्म परायण होते हैं पेट और प्रजनन के पशु-क्षेत्र से आगे बढ़कर परमार्थ प्रयोजन में निरत रहते हैं—तब अन्तःकरण की शान्ति एवं शीतलता देखते ही बनती है। लगता है अपना आपा सहस्र भुजाएँ उठा कर आशीर्वाद दे रहा है, सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों में जितने समय निमग्न रहा जाय उतने समय तक यह प्रतीत होता रहेगा, मानो देवताओं द्वारा पुष्प वृष्टि की जा रही है और अमृत में स्नान करने की तरह अपना रोम-रोम पुलकित हो रहा है। कर्त्तव्य-पालन और सेवा, साधन के लिए भले ही कष्ट उठाया गया है—भले ही हानि सही गई हो, अन्तःक्षेत्र में यही अनुभूति होती रहेगी, मानो कोई बड़ा लाभ कमा लिया गया।

जब हम दुष्कर्म करते हैं तो पैर काँपते हैं—गला सूखता हैं, दिल धड़कता है यह आत्मप्रताड़ना है जो भीतर ही भीतर नोंचती, कचोटती है। अवाँछनीय स्वार्थ सिद्ध करके कोई भी चैन से नहीं बैठ सकता उसके भीतर ही विद्रोह की आग भड़केगी और लगेगा अन्तःक्षेत्र में देवासुर संग्राम छिड़ गया। असुर हमें पाप कर्म की ओर खींचता है इसके विपरीत देवता का आग्रह होता है कि कुमार्ग का अनुसरण करके विनाश के गर्त में न गिरा जाय न आत्मगौरव का हनन किया जाय। जब तक हम अनौचित्य का परित्याग न करेंगे आन्तरिक विद्रोह के कारण उत्पन्न घोर अशान्ति से छुटकारा न मिल सकेगा। प्रतीत यही होता रहेगा कि हम तुच्छ को पाने के लिए महान् को बर्बाद करते चले जाने वाले पतित स्तर के नर-पशु बन रहे हैं। मानवी सौभाग्य से वंचित होते चले जा रहे हैं।

अन्तःकरण की वाणी सुनें, उसके परामर्श पर चलें तो समझना चाहिए ईश्वर के स्नेह, दुलार का समझना, स्वीकार करना हमने सीख लिया। सर्वतोमुखी श्रेय प्राप्त करने के लिए एकमात्र यही राज मार्ग है।


विज्ञान बहुत कुछ कर गुजरा अब दर्शन की बारी है

विज्ञान का तात्पर्य प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं हैं, वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत, तथ्यपूर्ण, एवं सत्यनिष्ठ बनाने तक चली जाती है। विज्ञान का उपयोग भौतिक सुख-सुविधाओं के संवर्धन अथवा जानकारियों का क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं है वरन् वास्तविक उपयोग यह है कि हम तथ्य और सत्य को आश्रय दें। परम्पराएँ कितनी ही पुरानी अथवा अहुमान्य क्यों न हों यदि वे यथार्थता और उपयोगिता ‘की कसौटी पर सही नहीं उतरती तो उन्हें बदलने के लिए सदा तत्पर रहें। नये या पुराने के झंझट में न पड़कर विज्ञानी सत्य की ही मान्यता प्रदान करता है।

विज्ञान न केवल एक प्रक्रिया हैं, वरन् एक प्रवृत्ति भी है। जिसका फलितार्थ है—साहसपूर्ण विवेचनात्मक एवं तथ्य समर्पित यथार्थवादी दृष्टिकोण। सत्य की खोज के लिए यह आवश्यक है कि हम तर्क और तथ्य की कसौटी पर प्रत्येक मान्यता और परम्परा को कसें और उनमें से जो खरी उतरती हों उन्हीं को अंगीकार करें। विज्ञान के इस पक्ष को दर्शन कहा जाता रहा है। वस्तुतः दोनों के समन्वय से ही एक पूर्ण विज्ञान की प्रतिष्ठापना होती है।

मान्यता पुरानी है या नई। इस व्यामोह से निकाल कर जो तथ्य है उसी को स्वीकार करने की बात यदि मन में समा जाय तो समझना चाहिए कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिल गया। यथार्थवादी चिन्तन और औचित्य का अवलम्बन जिन्होंने अपनाया उन्हें विचार क्षेत्र का वैज्ञानिक ही कहना चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे दार्शनिक भी कह सकते हैं।

भौतिक विज्ञान की अपनी सीमा और उपयोगिता है वह पदार्थ की स्थिति और गति का विवेचन करता है और वस्तु की मूलभूत सूक्ष्म सत्ता का पता लगाता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम तक पहुँचने के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहता है और अधिकाधिक गहराई तक पहुँचने के लिए अधिकाधिक प्रयास करता है।

भावनात्मक क्षेत्र में भी दर्शन विज्ञान की गतिविधि इसी आधार पर अधिकाधिक कलात्मक और सौन्दर्योपासक बनती जाती हैं। किन व्यक्तियों और किन पदार्थों की कितनी उपयोगिता है इस स्थूल कसौटी की अपेक्षा वह उनकी स्थिति में सन्निहित महान् सम्वेदनाओं की गहराई तक पहुँचने का प्रयास करता है।

चेतना का सूक्ष्मतम स्तर है—सत्यं, शिवम्, सुन्दरम्। वस्तुओं में लोभ और व्यक्तियों में मोह का दृष्टिकोण बहुत ही स्थूल है। यह अहंता का आरोपण मात्र है। जिस सम्पत्ति को हम अपने अधिकार के अंतर्गत मानते हैं वह हमें प्रिय लगती है और जिन व्यक्तियों को इसी अपने परिवार के मान लेते हैं उनमें आसक्ति बढ़ जाती है। इसी ‘प्रिय’ परिधि की समीपता सुहाती है और उसे बढ़ाने तथा रखाने की ललक लगी रहती है। आमतौर से सुख सन्तोष की परिधि उतने ही क्षेत्र में अवरुद्ध होकर रह जाती है। जो किया और चाहा जाता है वह उसी सीमा में बँधा रहता है। यह अहंता की प्रतिध्वनि मात्र है इसमें वस्तु के मूल सौंदर्य का दर्शन हो ही नहीं पाता और व्यक्ति लोभ और मोह के अँवर–डँवर देखता हुआ बाल कौतुकों में उलझा रहता है।

कला, काव्य एवं सौंदर्य को भावनात्मक सम्वेदना तथा चिन्तन की सूक्ष्मतर परिधि कह सकते हैं। नृत्य गायन कला नहीं, कला का आवरण है उस माध्यम से अन्तःकरण में जो उल्लास पूर्ण प्रस्फुरण उमँगता है वह सम्वेदना ही कला है। काव्य किन्हीं तुकबंदी या छन्द विन्यास को नहीं कहते। शब्दों का आवरण उठा कर विशिष्ट स्तर के भावोद्रेक को सजाया भर जाता है। उन शब्दों के अन्तरंग में जो कोमलता झाँकती है और चेतना में गुदगुदी पैदा करती है वही कविता है। सौंदर्य वस्तुओं की सज्जा, दृश्यों की शोभा एवं व्यक्तियों के अंग गठन पर निर्भर नहीं है वह तो प्रकृति की मृदुल सुषमा एवं आत्मा की कोमल कान्त सम्वेदनशीलता को अपने अन्तरंग चित्रपट पर कलात्मक तूलिका के साथ चित्रण कर सकने की कलाकारिता है। सुन्दरता को दूसरे शब्दों में दिव्यानुभूति कह सकते हैं। जो भाव भरे अन्तःकरणों में अपनी विशिष्टता के अनुरूप उमँगती, उभरती रहती है। उसका किसी की अंग संगठना से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है।

द्रौपदी और लैला बिलकुल स्याह काले रंग की थीं साथ ही कुरूप भी, पर उनके प्रेमी प्राण-प्रिय मानते थे। इसमें विशेषता उन महिलाओं के अंग गठन की अथवा हाव-भावों की नहीं, उन प्रेमियों द्वारा आरोपित की गई सम्वेदनाओं की थी। इस आरोपण में श्रेय देखने वाले के अपने दृष्टिकोण को जितना दिया जायगा उतना प्रिय पात्र को नहीं।

संभव है वनस्पति शास्त्री को कोंपलों और कलियों में मात्र रासायनिक प्रक्रिया का कोई अमुक क्रम विकास भर दिखाई पड़े। भौतिकी का शोधकर्ता प्रभातकालीन अरुणोदय की प्रकाश किरणों को नेत्र गोलकों के साथ जुड़े हुए प्रभाव-प्रत्यावर्तन मानकर सन्तुष्ट हो सकता है। किसी की आँखों से टपकते आँसुओं का रसायन-वेत्ता कुछ क्षार, श्लेष्मा, प्रोटीन, पानी आदि का सम्मिश्रण बताकर अपना समाधान कर सकता है। खगोलज्ञ के लिए ग्रह तारकों की दूरी, परिधि, कक्षा आदि जानना पर्याप्त लग सकता है, पर जिनके दृष्टिकोण में सम्वेदनाओं की कोमलता विद्यमान है उसे पुष्प को, प्राकृतिक सौंदर्य को, अरुणोदय की पुण्य वेला को, किसी करुणार्द्र के अश्रु प्रवाह को, झिलमिलाते तारकों वाली निशा को देखकर जो अनुभूति होती है वह अपने स्थान पर अत्यधिक महत्वपूर्ण है। कला, कविता एवं सौंदर्य की परख वस्तुतः संवेदनशील धाराएँ हैं जो भावना क्षेत्र को अनेकानेक भाव लहरियों की थिरकन के साथ आन्दोलित करती हैं। इन्हें दार्शनिक उपलब्धियाँ कहा जा सकता है। अन्तःकरण का विनाश कोमल सम्वेदनाओं के क्षेत्र में न हो सके तो उसका शारीरिक पिछड़ापन वन्य प्राणियों से भी गई-गुजरी स्थिति में खड़ा कर देगा।

भौतिक विज्ञान को असंस्कृत समझने का कोई कारण नहीं, क्योंकि उसका उद्देश्य न केवल अणु-सत्ता का विवेचन एवं उपयोग जानना है, वरन् चेतना के साथ जुड़ी हुई कोमल सम्वेदनाओं को उभार कर अन्तःकरण की भाव भारी रसानुभूति प्रदान करना भी है। इन दोनों प्रयोजनों को साथ लेकर चलने से ही विज्ञान की पूर्णता बनती है। अन्यथा भौतिकी को ही विज्ञान मान लेने पर तो वह सचमुच ही असंस्कृत बन जायगा। तब उसे लँगड़े, काने, कुबड़े, पंगे, नकटे की संज्ञा दी जा सकेगी, वह वस्तुतः कुरूप एवं कर्कश ही बन जायगा।

जीवन को जड़ और चेतन का समन्वय कह सकते हैं। हमें पदार्थों का भी उपयोग करना पड़ता है और चेतनता से भी वास्ता पड़ता है। हमारा शरीर स्वयं जड़ पदार्थों से बना है और अंतःकरण में चेतना की सत्ता विद्यमान हैं। उभय-पक्षीय वस्तुस्थिति से अधिकाधिक आनन्द लेने के लिए उनकी सूक्ष्मता में प्रवेश करना आवश्यक है, ताकि जो अभी तक नहीं मिल सका वह आगे मिल सके। इस आवश्यकता की पूर्ति स्थूल जड़ जगत के क्षेत्र में भौतिकी द्वारा सम्भव होती है और चेतना के क्षेत्र में भाव संवेदना के अन्तराल में प्रवेश करके वह प्रयोजन सिद्ध किया जा सकता है।

विज्ञान और दर्शन का क्षेत्र पृथक रखा जाय तो दोनों ही अपूर्ण रह जायेंगे। वस्तुतः वे दोनों दो हैं भी नहीं। एक ही तथ्य के दो पूरक पक्ष हैं। भौतिक जड़ पक्ष को सम्भालता है और ब्रह्मविद्या चेतना को सुसंस्कृत बनाती है। तथ्यों की उपेक्षा करने मात्र चिन्तन की कलाबाजी का खेल खड़ा करते रहने वाला दर्शन भ्रान्तियों का भंडार बन जायगा, वह हमें अवास्तविक कल्पनाओं की उड़ान में उड़ते रहने वाला—दिवास्वप्न देखते रहने वाला—मात्र बना कर रख देगा। इसी प्रकार जड़ पदार्थों की क्षमता पर निर्भर होते-होते हम स्वयं हृदयहीन मशीनी मनुष्य मात्र बनकर रह जायेंगे। विज्ञान को दर्शन के साथ और दर्शन को विज्ञान के साथ अपना ताल-मेल बिठाना पड़ेगा। यद्यपि आज यह बहुत कठिन दीखता है पर कल इसकी अनिवार्यता अनुभव की जायगी। सत्य और तथ्य का समन्वय करने से ही सर्वतोमुखी प्रगति के दोनों पहिये गतिशील हो सकेंगे।

विज्ञानी को कलाकार बनना चाहिए और कलाकार को विज्ञान के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाना चाहिए। दर्शन और विज्ञान को मिलाकर उभय-पक्षीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहिए। दोनों को दो धाराओं में बहुत हुए भी एक लक्ष्य पर पहुँचना चाहिए। पिछली कितनी ही मान्यताएँ, परम्पराएँ, परिभाषाएँ और आकाँक्षाएँ अब अवास्तविक और असामयिक ठहरा दी हैं। किसी समय उनका औचित्य रहा होगा पर अब उनके साथ चिपके रहना केवल उपहासास्पद ही बना सकता है। ठीक इसी प्रकार यदि विज्ञानी बिना हित अनहित का विचार किये डडडडतक आविष्कार करता रहा और विलास वृद्धि में औचित्यकारों का उपयोग होता रहा तो मनुष्य अपनी कलाकारिता को अनावश्यक समझने लगेगा और उसकी सौंदर्यानुभूति समाप्त हो जायगी। यदि ऐसा हुआ तो विज्ञान की प्रगति सचमुच बहुत महंगी पड़ेगी।

विज्ञान के संपर्क में दर्शन की सत्ता को खतरा उत्पन्न हो जायगा, इस प्रकार सोचना तभी उचित है जब वह अवास्तविक आधारों को लेकर चल रहा हो। अब बुद्धिवादी युग आगया। क्यों और कैसे की कसौटी पर कसे बिना अगले दिनों किसी भी प्रचलन को स्वीकार न किया जा सकेगा। यथार्थता की परीक्षा से यदि दर्शन भागेगा तो उसका यह भगोड़ापन ही उसकी कच्चाई समझी जायगी और दंभी बताकर समय का प्रवाह उसका साथ छोड़ देगा, तब उसे बेमौत मरना पड़ेगा, इससे अच्छा यही हैं कि वह समय रहते आत्म-निरीक्षण, करके इस योग्य बना लें कि तथ्यों का सामना करने में उसे डरने की तनिक भी आवश्यकता न रहें’। दर्शन का गौरव इसी में है।

विज्ञान को अपना क्षेत्र जड़ की परिधि से अधिक विस्तृत करके उसे चेतना तक विकसित करना होगा। चेतना जड़ की प्रतिकृति, प्रतिच्छाया नहीं। पदार्थ का उपभोग करना मात्र ही उसकी तुष्टि का आधार नहीं है। आत्मा में कुछ ऐसा भी है जिसे अलौकिक, अद्भुत और सरस कह सकते हैं। प्रत्यक्ष को ही मात्र कसौटी मानकर चेतना की सत्ता को झुठलाया जा सकता है पर इससे काम कहाँ चलेगा। भावनाओं का अपना स्थान है और अपना स्तर। उनकी अपनी गरिमा है और अपनी सम्वेदनात्मक दिव्यता। यदि ऐसा न होता तो उसकी चेतना एक विकसित कम्प्यूटर जितनी होकर रह जाती।

शारीरिक उतार-चढ़ावों तक ही उसकी सम्वेदनाएँ सीमित रहती हैं। करुणा, ममता, स्नेह, सौंदर्य, सेवा, संयम और आदर्शवादी उभार उसके भीतर क्यों उठते? आत्म-गौरव, आत्म-सन्तोष, आत्मोल्लास जैसी दिव्य अनुभूतियों का ऐसा रसास्वादन उसे क्यों होता जिसके बदले में भौतिक सुखों को यहाँ तक कि प्राणों के मोह को त्याग कर भी आदर्शवादी क्रिया-कलाप अपनाने में प्रसन्नता होती। भावनात्मक क्षेत्र में ऊंचा उठने की ललक भी उससे कम प्रबल नहीं है जैसी कि सम्पदाओं के उपभोग की रहती हैं। यह कौन है जो बाहर से प्रचुर रहते हुए भी भीतर से असंतुष्ट रहता है? और कौन है जो बाहर से अभावग्रस्त रहने पर भी भीतर से फूला नहीं समाता। निश्चय ही वह शरीर की प्रतिक्रिया या प्रतिच्छाया नहीं है। शरीर सुख के प्रचुर साधन जुटा देने पर भी जो उद्विग्न बना रहता है उसे समझने और स्वीकारने से इनकार करना विज्ञान जैसे तथ्यान्वेषी के लिए उपयुक्त न होगा, इससे तो वह भी दुराग्रही, पूर्वाग्रही मात्र बनकर रह जायेगा।

ईश्वर जीव और प्रकृति की व्याख्या, विवेचनाओं में निरत रहने की पुरानी आदत अब दर्शन को बदल देनी चाहिए। यह गुत्थियाँ बहुत ही उलझी हुई हैं। मानव बुद्धि का क्रमिक विकास इन्हें समयानुसार ही सुलझा सकेगा। लाखों वर्षों से इन्तजार करते रहे हैं तो अभी कुछ समय और प्रतीक्षा कर सकते हैं। कल्पना को तथ्य बताने की पद्धति से भी कोई समाधान नहीं निकला है। मनीषी अपने-अपने ढंग से इन समस्याओं का समाधान इतने अधिक और इतने परस्पर विरोधी प्रकारों से कर चुके हैं कि उनसे मनुष्य की जिज्ञासा को भ्राँतियों में बदलने और एक दूसरे को मिथ्यावादी बताने के अतिरिक्त और कुछ परिणाम नहीं निकला है। दर्शन की उतावली, नहीं करनी चाहिए और येन-केन प्रकारेण अपनी नाम बचाने के लिए कुछ भी कह गुजरने का वाक् विलास बन्द करना चाहिए। जब इतनी अधिक और इतनी सामयिक समस्याएँ उलझी पड़ी है हमें उन्हीं पर अपना ध्यान क्यों नहीं केन्द्रित करना चाहिए।

दर्शन का एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए अन्तःकरण की—सौंदर्यानुभूति की कलाकारिता को जगाना—सत्य के प्रति नम्रता और निष्ठा उत्पन्न करना है। इसके लिए हमें चिन्तन के साथ रसानुभूति की डडडड प्रक्रिया को समन्वित करना पड़ेगा। मस्तिष्क को जगाना स्कूली शिक्षा का काम है। दर्शन की भावनाएँ उभरनी चाहिए और मनुष्य को इतना सम्वेदनशील बनना चाहिए कि वह अपने दुखों के प्रति जितना दुखी होता है उससे अधिक दूसरों का दुख देखकर द्रवित होने लगे। अपने सुखोपभोग में जितनी प्रसन्नता होती है उससे अधिक दूसरों को सुखी बनाने में होने लगे। दार्शनिक दृष्टिकोण वह है जो हर व्यक्ति और हर पदार्थ में सत्−चित और आनन्द की अनुभूति को ढूँढ़ और जमा सकता है। घृणा, विद्वेष के स्थान पर करुणा, ममता और सेवा, सहायता की प्रतिष्ठापना करना ही वस्तुतः दर्शन का प्रमुख प्रयोजन है। इस अवलम्बन के सहारे व्यक्ति अधिक पवित्र और परिष्कृत बन सकता है। अधिक उदार और अधिक स्नेह सिक्त भी।

इतिहास, पुराण हमें भूतकाल के घटनाक्रमों के सहारे वर्तमान का निर्माण और भविष्य का निर्धारण सिखा सकते है। चारणों की तरह आखिर हम पुरातन पुरुषों की गाथाएँ कब तक गाते रहेंगे? उनसे हमें निष्कर्ष निकालना है और प्रकाश ग्रहण करना है ताकि अन्धकार में से निकल कर प्रकाश के पुण्य आलोक की झाँकी कर सके। इस कार्य में दर्शन हमारी बहुत सहायता कर सकता है।

विवेचना, विचारणा और विवेकशीलता के बिना मनुष्य केवल भ्रांतियों में ही उलझा रह सकता है। दर्शन हमारे चिन्तन को प्रखर, सत्यान्वेषी, यथार्थवादी और नीर−क्षीर विवेकी बना सकता है। सत्य के समीप हम इसी आधार को अपनाकर पहुँच सकते है। भौतिक विज्ञान का आराध्य सत्य है। वह परखा नहीं करता कि अब से पहने क्या कहा और क्या माना जाता रहा है। वह बिना किसी प्रकार का दबाव या संकोच किये जो तर्क संगत और तथ्य समर्पित प्रतीत होता है उसे प्रस्तुत करता है। दर्शन में भी इतना साहस होना चाहिए कि परम्पराओं के अनावश्यक दबाव या आग्रह मानने से इनकार करदे और केवल उसी का समर्थन करें जो सत्य के समीप है—हितकारी है।

भूतकालीन चिन्तन और उसके प्रस्तुतकर्त्ताओं के प्रति पूर्ण आदर रखते हुए भी सत्यान्वेषण की प्रक्रिया या को जारी रखा जा सकता है आखिर इन पूर्वजों ने भी तो अपने पूर्वजों के चिन्तन में अधिक तेजस्वी प्रकाश का समन्वय किया था। अभी वह समय नहीं आया कि उस क्रमिक अग्रगमन का पटाक्षेप का दिया जाय। अभी हमारे लिए सोचने और सुधारने की दिशा में बहुत चलना बाकी है। पूर्णता की प्राप्ति तक हमारे चरण अनवरत गति से आगे बढ़ते रहने चाहिए। विज्ञान की उपलब्धियों ने इस भूखण्ड के निवासियों को अत्यन्त समीप ला दिया है। द्रुतगामी वाहनों ने दूरी को दूर कर दिया है। संचार साधनों से हम दूरभाषण और दूर दर्शन की आवश्यकता क्षण भर में पूरी कर लेते हैं। समाचार पत्र हमें संसार भर की खबरें अगले दिन और विनोदपूर्ण गुदगुदी घर बैठे मिलती रहती है। विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई दुनिया अब एक गाँव में रहने वाले लोगों की तरह इकट्ठी हो गई है। दूरी क्रमशः द्रुतगति से निरस्त होती जा रही है। यह भौतिक उपलब्धियाँ, भौतिक विज्ञान द्वारा प्रदान की गई है। दर्शन को, मनों की दूरी दूर करनी चाहिए और अन्तःचेतना की इकाई को घटाना और आत्मवत् सर्वभूतेषु की—विश्व मानव एवं विश्व परिवार की उदात्त मनःस्थिति को विकसित करने में अपने समस्त प्रयासों को केन्द्रित कर दिखायें। जड़ता और अहंमन्यता के निविड़ बन्धनों से मानव जाति को छुड़ाने में दर्शन को ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। देवत्व की सदा क्षमता का विकास कर सकना उसी के हाथ में है। मानवी संस्कृत का संरक्षण कर सकना दर्शन के अतिरिक्त भला और कौन कर सकेगा?

विज्ञान कहता है ब्रह्माण्ड का फुलाव-फैलाव और विस्तार बढ़ रहा है, मनुष्य को फैलने और फूलने का क्रम भी चलना चाहिए, भौतिक विज्ञान ने अपना अनुदान प्रस्तुत करने में सराहनीय भूमिका निभा दी। अध्यात्म विज्ञान के हिस्से का काम अधूरा पड़ा है। चेतना का परिष्कार और उसकी कोमल सम्वेदनाओं का उत्कर्ष करना दर्शन का उत्तरदायित्व है। वह अपना हाथ सकोड़ बैठेगा और उस अवसाद के कारण उत्पन्न विकृतियों का दोषी भौतिक विज्ञान को ठहराये तो वह उसकी आत्म प्रवंचना ही होगी। मनुष्य का आशीर्वाद विज्ञान ने अपनी तप साधना करके प्राप्त कर लिया, अब दर्शन की बारी है कि वह भी इतनी ही प्रचण्ड साधना करे और अपने महान् गौरव को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए प्रखर पुरुषार्थ का परिचय दे।


भटकाव (kahani)

राज्य में चोरों ने उत्पात मचा रखा था। कौशल नरेश ने समाचार सुना तो वे आगबबूला होकर स्वयं एक बड़ी सेना साथ लेकर तस्करों का दमन करने के लिए निकल पड़े।

मन्त्री ने समझाया—राजन्, शत्रु अपने राज्य ने उस सलाह पर ध्यान नहीं दिया और सेना समेत कूच पर निकल पड़े। कुछ दूर जाने पर घोर वर्षा के कारण सर्वत्र जल भर गया और वे एक भूखण्ड में घिरे हुए रह गये।

घोड़ों को दाना दिया गया था। पेड़ पर से एक बन्दर उतरा। उसने दाने में से मुट्ठी भरी और ऊँची टहनी पर बैठ कर खाने लगा। मन्त्री और राजा यह कौतूहल देख रहे थे।

कौतूहल और भी बढ़ा जब कि बन्दर की मुट्ठी में से एक दाना गिरा और वह उसे पाने के लिए आतुर हो उठा। बन्दर का आवेश इतना बढ़ा कि उसने मुट्ठी के दाने फेंक दिये और नीचे उतर कर उस गिरे हुए दाने भी चले गये। इस दुहरी हानि से बन्दर दुखी व निराश होकर मुँह लटकाये हुए एक सुखी डाली पर बैठा जम्हाई लेने लगा।

राजा और मन्त्री जटिल था। राजा विचारों में खो गया। राजधानी की रक्षा और जीवन सम्पदा की व्यवस्था के दोनों ही ‘निश्चित’ उसे अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत हुए—सो रास्ता खुलते ही सेना को वापिस लौट चलने का आदेश दिया गया।

बन्दर की तरह—कौशल नरेश की तरह हम भी जीवन तथ्य के निश्चित से परांगमुख होकर उस अनिश्चित के पीछे भटकते हैं जिसके मिलने और टिकने की सम्भावना स्वल्प ही होती है।


अध्यात्म आन्तरिक सौंदर्य और वर्चस्व का विज्ञान

आध्यात्मिकता का अर्थ है मनुष्य के भीतर सौंदर्य और वर्चस्व को बन्धन मुक्त और परिष्कृत करना। मनुष्य निश्चित रूप से ईश्वर का अंश है और उसमें वे सभी परमेश्वर सत् है—चित है—और आनन्द स्वरूप है यह तीनों ही विशेषताएँ जीवात्मा को उत्तराधिकार में मिली हैं। उसमें सत्यं शिवं सुन्दरं के दिव्य तत्वों का पूरी तरह समावेश हुआ हैं। इन विभूतियों के विकसित होने का अवसर जिसे भी मिल जाता है, वह मानव जीवन को धन्य बनाता है—देवत्व की सभी विशेषताओं से सम्पन्न होता है और नर से आगे बढ़कर नारायण बनने तक के लक्ष्य पर जा पहुँचता है।

अध्यात्म का अर्थ है आत्मा के मूल स्वरूप को प्रखर बनाने का अवसर—देने वाली विधि व्यवस्था। आस्तिकता क्रिया काण्ड इसी एक प्रयोजन के लिए बना है कि आत्मा पर चढ़े कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाने की सुविधा मिले और उस दिव्य चेतना को बल मिले जो अपनी गरिमा को प्रकट प्रस्फुटित करने के लिए उमँगती रहती है।

अध्यात्म का प्रयोजन है—आत्म-बोध और आत्म जागरण। हम संसार की अनेक बातें जानते हैं और बहिरंग जगत की अनेकों गुत्थियाँ सुलझाते हैं किन्तु आश्चर्य यह है कि अपनी सत्ता एवं चेतना की स्थिति के सम्बन्ध में हम नहीं के बराबर जानते हैं। हम कौन हैं? अपनी इच्छाएँ और क्रियाएँ किस दिशा में किस प्रयोजन के लिए गतिशील हो रही हैं, इसका निरीक्षण, विवेचन कोई विरला ही करता है। अध्यात्म चिन्तन हमारी विचारणा को इस केन्द्र पर केन्द्रीभूत करता है कि अपने चेतनात्मक अस्तित्व का स्वरूप एवं प्रयोजन समझें और जीवन के बहुमूल्य क्षणों को इस प्रकार प्रयुक्त करें, कि अन्ततः पश्चाताप करने की स्थिति सामने न आवे। सुरदुर्लभ मानव जीवन के दैवी वरदान का सदुपयोग कर सकने की प्रेरणा एवं सक्रियता उत्पन्न करना ही अध्यात्म विज्ञान का एकमात्र लक्ष्य है।

अध्यात्म का प्रयोजन व्यक्ति के अन्तस्तल में दबी छिपी महानता का प्रकटीकरण करना और उसे विकासोन्मुख बनाना है। सामान्य मनुष्य बाह्य साधनों को तलाश करते हैं और बाहरी व्यक्तियों से सहायता की अपेक्षा करते हैं। उनके सुख स्वप्न बाह्य साधनों तथा अन्य व्यक्तियों पर आश्रित रहते हैं। इच्छित वस्तुएँ या परिस्थितियाँ मिल गई तो सुख, अन्यथा दुख। सम्बन्धित व्यक्तियों ने अनुकूल व्यवहार किया तो सुख अन्यथा दुख। इसी ज्वार–भाटे में लोग हर्ष-शोक के झटके खाते और अस्थिर परिस्थितियों में मरते-खपते रहते हैं। अध्यात्म का तत्वज्ञान इस परावलम्बी विडम्बना से छुड़ा कर मनुष्य को स्वार्थमयी बनाता है और सिखाता है कि प्रगति का चुम्बकीय केन्द्र अपने भीतर है यदि उसे सक्षम रखा जा सके तो सफलता के लिए आवश्यक सभी साधन सहज ही खिंचते चले आते हैं और सहयोगी व्यक्तियों की कमी नहीं रहती।

संसार में अनेकों शक्ति भंडार हैं और बहुमूल्य पदार्थों की खदानें भी अनेक हैं। पर उतना बड़ा कोष अन्यत्र कहीं भी नहीं है जितना कि मनुष्य के अपने भीतर विद्यमान है। दुर्भाग्य इतना ही है कि उसे कभी न तो समझा गया और न जगाया कुरेदा गया। जितना परिश्रम बहिर्मुखी प्रवृत्तियों में किया जाता है उसका एक स्वल्प अंश भी यदि आत्म-निरीक्षण—आत्म-जागरण और आन्तरिक विभूतियों के सदुपयोग में लगाया जा सके तो उसका सत्परिणाम इतना बड़ा हो सकता है जिसकी तुलना में संसार में बिखरे पड़े शक्ति भंडारों और सम्पत्ति कोषों को नगण्य ठहराया जा सके।

अध्यात्म आत्म-जागरण का वह विज्ञान है जिसके आधार पर अन्तरों में दबे अनन्त सौंदर्य, वर्चस्व और वैभव को विकासोन्मुख बनाकर मनुष्य जीवन को सच्चे अर्थों में सुखद, सार्थक और महान् बनाया जा सकता है।


मरने के साथ ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता

भौतिक विज्ञानी यह कहते रहे हैं कि प्राणी एक प्रकार का रासायनिक संयोग है। जब तक पञ्चतत्वों का सन्तुलन क्रम शरीर को जीवित रखता है, तभी तक जीवधारी की सत्ता है। जब शरीर मरता है तो उसके साथ ही जीव भी मर जाता है। शरीर से भिन्न जीव की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

यह मान्यता मनुष्य को निराश ही नहीं अनैतिक भी बनाती है। जब शरीर के साथ ही मरना है तो फिर जितना मौज-मजा करना है वह क्यों न कर लिया जाय? यदि राजदण्ड या समाज दण्ड से बचा जा सकता है तो पाप-अपराधों के द्वारा अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में—अधिक सुख-साधन क्यों न जुटाये जाँय? पुण्य-परमार्थ का जब हाथों हाथ कोई लाभ नहीं मिलता तो उस झंझट में पड़कर धन तथा समय की बर्बादी क्यों की जाय?

आस्तिकता के विचार अगले जन्म में पुण्यफलों की प्राप्ति पर विश्वास करते हैं। इस जन्म में कमाई हुई योग्यता का लाभ अगले जन्म में मिलने की बात सोचते हैं। अस्तु उनके सत्प्रयत्न इसलिए नहीं रुकते कि मरने के बाद इनकी क्या उपयोगिता रहेगी। यह मान्यताएँ मनुष्य को नैतिक, परोपकारी एवं पुरुषार्थी बनाये रखने में बहुत सहायता करती हैं। नास्तिक की दृष्टि में यह सब बेकार है। आज का सुख ही उसके लिए जीवन की सफलता का केन्द्र बिंदु है, भले ही वह किसी भी प्रकार अनैतिक उपयोग से ही क्यों न कमाया गया हो। यह मान्यता व्यक्ति की गरिमा और समाज की सुरक्षा दोनों ही दृष्टि से घातक है।

व्यक्ति की आदर्शवादिता और समाज की स्वस्थ परंपरा बनाये रहने के लिए आन्तिकवादी दर्शन के प्रति जनसाधारण की निष्ठा बनाये रहना आवश्यक है। आस्तिकता का एक महत्वपूर्ण अंग है—मरणोत्तर जीवन। जो इस जन्म में नहीं पाया जा सका वह अगले जन्म में मिल जायगा, यह सोचकर मनुष्य बुरे कर्मों से बचा रहता है और सत्कर्म करने के उत्साह को बनाये रहता है। तत्काल भले-बुरे कर्मों का फल न मिलने के कारण जो निराशा उत्पन्न होती है उसका समाधान पुनर्जन्म की मान्यता सँजोये रहने के अतिरिक्त और किसी प्रकार नहीं हो सकता। समाज संगठन और शासन-सत्ता में इतने छिद्र है कि भले कर्मों का सत्परिणाम मिलना तो दूर, बुरे कर्मों का दण्ड भी उनके द्वारा दे सकना सम्भव नहीं होता। अपराधी खुल कर खेलते रहते हैं और अपनी चतुरता के आधार पर बिना किसी प्रकार का दण्ड पाये मौज करते रहते हैं। इस स्थिति को देखकर सामान्य मनुष्यों का मन अनीति बरतने और अधिक लाभ उठाने के लिए लालायित होता है। इस पाप-लिप्सा पर अंकुश रखने के लिए ईश्वर के न्याय पर आस्था रखना आवश्यक हो जाता है और उस आस्था को अक्षुण्ण रखने के लिए मरणोत्तर जीवन की मान्यता के बिना काम नहीं चल सकता।

भौतिक विज्ञान ने शरीर के साथ जीव की सत्ता का अन्त हो जाने का जो नास्तिकवादी प्रतिपादन किया है, उसका परिणाम नैतिकता की—परोपकार की सत्प्रवृत्तियों का बाँध तोड़ देने वाली विभीषिका के रूप में सामने आया है। आवश्यकता इस बात की है कि उस भ्रान्त मान्यता को निरस्त किया जाय।

मरणोत्तर जीवन के दो प्रमाण ऐसे हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप में देखा, समझा और परखा जा सकता है। (1) पुनर्जन्म की स्मृतियाँ (2) प्रेत जीवन का अस्तित्व। समय-समय पर इस प्रकार के प्रमाण मिलते रहते हैं, जिनसे इन दोनों ही तथ्यों की सिद्ध भली प्रकार हो जाती है। मिथ्या कल्पना, अन्ध-विश्वास और किम्बदंतियों की सीमाओं को तोड़ कर प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा किये गये अन्वेषणों से ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं जिनसे उपरोक्त दोनों तथ्य भली प्रकार सिद्ध होते रहते हैं।

“आत्मा की खोज” विषय को लेकर विश्व भ्रमण करने वाले अमेरिका के एक विज्ञानवेत्ता डा. स्टीवेंसन कुछ समय पूर्व भारत भी आये थे। पुनर्जन्म को आत्मा के चिरस्थायी अस्तित्व का अच्छा प्रमाण मानते थे। अस्तु उन्होंने भारत को इस शोधकार्य के लिए विशेष रूप से उपयुक्त समझा। भारत की धार्मिक मान्यता में पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया है, इसलिए पिछले जन्म की स्मृतियाँ बताने वाले बालकों की बात यहाँ दिलचस्पी से सुनी जाती है और उससे प्रामाणिक तथ्य उभर कर सामने आते रहते हैं। अन्य देशों में यह स्थिति नहीं है। ईसाई और मुसलमान धर्मो में पुनर्जन्म को मान्यता नहीं है, इसलिए यदि कोई बालक उस तरह की बात करे तो उसे शैतान का प्रकोप समझ कर डरा, धमका दिया जाता है तो उभरते तथ्य समाप्त हो जाते हैं।

डा. स्टीवेंसन ने संसार भर से लगभग 600 ऐसी घटनाएँ एकत्रित की हैं, जिनमें किन्हीं व्यक्तियों द्वारा बताये गये उनके पूर्वजन्मों के अनुभव प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं। इनमें 170 प्रमाण अकेले भारत के हैं। इनमें बड़ी आयु के लोग बहुत कम हैं। अधिकाँश तीन से लेकर पाँच वर्ष तक के बालक हैं। नवोदित-कोमल मस्तिष्क पर पूर्वजन्म की छाया अधिक स्पष्ट रहती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ वर्तमान जन्म की जानकारियाँ इतनी अधिक लद जाती हैं कि उस दबाव से पिछले स्मरण विस्मृति के गर्त में गिरते चले जाते हैं।

पूर्वजन्म का स्मरण किस प्रकार के लोगों को रहता है, इस सम्बन्ध में डा. स्टीवेंसन का मत है कि जिनकी मृत्यु किसी उत्तेजनात्मक आवेशग्रस्त मनःस्थिति में हुई हो उन्हें पिछली स्मृति अधिक याद रहती है। दुर्घटना, हत्या, आत्म-हत्या, प्रतिशोध, कातरता, अतृप्ति, मोहग्रस्तता कहा विक्षुब्ध घटनाक्रम प्राणी की चेतना पर गहरा प्रभाव डालते हैं और वे उद्वेग नये जन्म में भी स्मृतिपटल पर उभरते रहते हैं। अधिक प्यार या अधिक द्वेष जिनसे रहा है, वे लोग विशेष रूप से याद रहते हैं।

भय, आशंका, अभिरुचि, बुद्धिमत्ता, कला-कौशल आदि की भी पिछली छाप बनी रहती है। जिस प्रकार की दुर्घटना हुई हो उस स्तर का वातावरण देखते ही अकारण डर लगता है। जैसे किसी की मृत्यु पानी में डूबने से हुई हो तो उसे जलाशयों को देखकर अकारण ही डर लगने लगेगा। जो बिजली कड़कने और गिरने से मरा है, उसे साधारण पटाखों की आवाज भी डराती रहेगी। आकृति की बनावट और शरीर पर जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले विशेष चिह्न भी अगले जन्म में उसी प्रकार के पाये जाते हैं। एक स्मृति में पिछले जन्म में पेट का आपरेशन चिह्न अगले जन्म में भी उसी स्थान पर एक विशेष लकीर के रूप में पाया गया। पूर्वजन्म की स्मृति सँजोये रहने वालों में आधे से अधिक ऐसे थे जिनकी मृत्यु पिछले जन्म में बीस वर्ष से कम थी। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भावुक सम्वेदनाएँ समाप्त होती जाती हैं और मनुष्य बहुधंधी, कामकाजी तथा दुनियादार बनता जाता है। भावनात्मक कोमलता जितनी कठोर होती जायगी, उतनी ही उसकी सम्वेदनाएँ झीनी पड़ेगी और स्मृतियां धुँधली पड़ जायेंगी।

डा. स्टीवेंसन के शोधरिकार्ड में एक ऐसी पाँच वर्ष की लड़की की भी घटना थी, जो हिन्दीभाषी परिवार में जन्म लेकर भी बँगला गीत गाती थी और उसी शैली में नृत्य करती थी। जबकि कोई बँगाली उस घर, परिवार के समीप भी नहीं था। इस लड़की ने अपना पूर्वजन्म सिलहट का बताया। इस जन्म में वह जबलपुर पैदा हुई, पर उसने पूर्वजन्म की जो घटनाएँ तथा स्मृतियाँ बताई वे पता लगाने पर 95 प्रतिशत सही हुई।

इंग्लैंड की एक विचित्र पुनर्जन्म घटना कुछ समय पूर्व प्रकाश में आई थी। नार्थम्बरलेण्ड के एक सज्जन पोलक की लड़कियाँ सड़क पर किसी मोटर की चपेट में आकर मर गई थीं। बड़ी 11 वर्ष की थी—जोआना। छोटी छै वर्ष की जैकलीन।

दुर्घटना के कुछ समय बाद श्रीमती पोलक गर्भवती हुई तो उन्हें न जाने क्यों यही लगता रहा कि उनके पेट में दो जुड़वा लड़कियाँ हैं। डाक्टरी जाँच कराई तो वैसा कुछ प्रमाण न मिला। पर पीछे समय पर दो जुड़वा लड़कियाँ ही जन्मी। एक का नाम रखा गिलियन, दूसरी का जेनिफर। इन दोनों के शरीरों पर वे निशान पाये गये जो उनके पूर्वजन्म में थे। इतना ही नहीं, उनकी आदतें भी वैसी ही थीं, जैसी मृत लड़कियों की। इन लड़कियों को मरी हुई बच्चियों के बारे में कुछ बताया नहीं गया था, पर वे बड़े होने पर आपस में पूर्वजन्म की घटनाओं की चर्चा करती हुई पाई गई। समयानुसार उनने पूर्वजन्म के अनेकों संस्मरण बताकर तथा अपने उपयोग में आने वाली वस्तुओं की जानकारी देकर यह सिद्ध किया कि उन दोनों ने पुनर्जन्म लिया है।

कोपल हेरान (डेन मार्क)की एक सात वर्षीय लड़की लीना मार्कोनी अपने पूर्वजन्म की स्मृति का विवरण बताया करती थी। वह अपने को फिलीपीन निवासी किसी होटल मालिक की लड़की कहती थी और पिछले जन्म का नाम मारिया एस्पिना बताती थी। ग्यारह वर्ष की उम्र में वह भरी और फिर यहाँ आकर पैदा हो गई। यह सभी बातें आश्चर्यजनक थीं, विशेषतया ईसाई परिवार की लड़की के लिए जिनमें पुनर्जन्म की मान्यता का प्रचलन नहीं हैं। इस पूर्वजन्म स्मृति के उसके बताये गये देश तथा स्थान में जाकर जाँच-पड़ताल की तो पाया गया कि उसका कथन यथार्थता की कसौटी पर बिलकुल खरा था।

सामान्यतया यह कहा जाता है कि ईसाई और मुसलमान धर्मो में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है, पर उनके धर्मग्रन्थों एवं मान्यताओं पर बारीक दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि प्रकारान्तर से वे भी पुनर्जन्म की वास्तविकता को मान्यता देते हैं और परोक्ष रूप से उसे स्वीकार करते हैं।

प्रो. मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ ‘सिक्स सिस्टम्स आफ इंडियन फिलासफी’ में ऐसे अनेक आधार एवं उद्धरण प्रस्तुत किये हैं जो बताते हैं कि ईसाई धर्म पुनर्जन्म की आस्था से सर्वथा मुक्त नहीं है। प्लेटो और पैथागोरस के दार्शनिक ग्रन्थों में इस मान्यता को स्वीकारा गया है। जौजेक्स ने अपनी पुस्तक में उन यहूदी सेनापतियों का हवाला दिया है जो अपने सैनिकों को मरने के बाद भी फिर पृथ्वी पर जन्म मिलने का आश्वासन देकर उत्साहपूर्वक लड़ने के लिए उभारते थे। ‘विजडम आफ सोलेमन ग्रन्थ’ में महाप्रभु ईसा के वे क थन उद्धत हैं, जिसमें उनने पुनर्जन्म का प्रतिपादन किया है। उन्होंने अपने शिष्यों से एक दिन कहा था—पिछले जन्म का एलिजा ही अब जाती वैपटिस्ट के रूप में जन्मा था। बाइबिल के चैप्टर 3 पैरा 3−7 में ईसा कहते हैं—’मेरे इस कथन पर आश्चर्य मत करो कि तुम्हें निश्चित रूप से पुनर्जन्म लेना पड़ेगा।’ ईसाई धर्म के प्राचीन आचार्य फादर ओरिजिन कहते थे—”प्रत्येक मनुष्य को अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार अगला जन्म धारण करना पड़ता है।”

दार्शनिक गेटे, फिश, शोलिंग, लेसिंग आदि ने पुनर्जन्म का प्रतिपादन किया है। अँग्रेज दार्शनिक ह्यूम तो दार्शनिक की तात्विक दृष्टि की गहराई इस बात में परखते थे कि वह पुनर्जन्म को मान्यता देता है या नहीं।

सूफी सन्त, मौलाना रूम ने लिखा है, मैं पेड़-पौधे, कीट-पतंग, पशु-पक्षी योनियों में होकर मनुष्य वर्ग में प्रवेश हुआ हूँ और अब देव वर्ग में स्थान प्राप्त करने की तैयारी कर रहा हूँ।’

इनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजन एण्ड एथिक्स के बारहवें खंड में अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिवासियों के सम्बन्ध में यह अभिलेख है कि वे सभी समान रूप से पुनर्जन्म को मानते हैं। मरने से लेकर जन्मते तक की विधि-व्यवस्था में मतभेद होते हुए भी यह कहा जा सकता है कि इन महाद्वीपों के आदिवासी आत्मा की सत्ता को मानते हैं और पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं।

बहुत छोटी आयु में असाधारण प्रतिभाओं का होना भी पुनर्जन्म का एक प्रामाणिक आधार है। मनुष्य का स्वाभाविक विकास एक आयुक्रम के साथ जुड़ा हुआ है। तीव्र मस्तिष्क कितना ही क्यों न हो उसे क्रमबद्ध प्रशिक्षण की आवश्यकता तो रहेगी ही। यदि बिना किसी प्रशिक्षण अथवा उपयुक्त वातावरण के छोटे बालकों में असाधारण विशेषताएँ देखी जाँय तो भी उसका समाधान भी उनके पूर्वजन्मों के संग्रहित ज्ञान को ही कारण मानने से हो सकता है।

पूर्व जर्मनी का विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न तीन वर्ष की आयु का बालक ‘हामेन केन’ मस्तिष्क विद्या के शोधकर्ताओं का आकर्षण केन्द्र रहा है। यह बालक इतनी छोटी उम्र में जर्मन भाषा की पुस्तकें पढ़ने लगा था तथा हिसाब के सामान्य प्रश्नों को हल करने लगा था, इतना ही नहीं उसने फ्रेंच भाषा भी अच्छी तरह सीखली थी। सामान्य मानवी विकास क्रम से सर्वथा भिन्न प्रकार की इस प्रगति ने मस्तिष्क विज्ञानियों को चकित कर दिया था।

संसार के इतिहास में ऐसे जन्म-जाती प्रतिभा लेकर जन्मने वाले बालकों की संख्या बहुत बड़ी है। साइबर-नैटिक्स विज्ञान के आविष्कर्ता वीनर ने अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय पाँच वर्ष की आयु से ही देना आरम्भ कर दिया था। उस समय भी उसका मस्तिष्क प्रौढ़ों जैसा विकसित था और युवा वैज्ञानिकों की पंक्ति में बैठकर वह उसी स्तर के विचार व्यक्त करता था। उसने 14 वर्ष की आयु में स्नातक की परीक्षा पास करली थी। ऐसा ही एक अन्य बालक पास्काल 15 वर्ष की आयु में एक प्रामाणिक विज्ञान ग्रन्थ लिखकर प्रकाशित करा चुका था। मोजाती सात वर्ष की आयु में संगीताचार्य बन गया था। गेटे ने 9 वर्ष की आयु में यूनानी, लैटिन और जर्मन भाषाओं में कविता लिखना आरम्भ कर दिया था।

इस प्रकार के अनेकानेक प्रमाण आये दिन सामने आते रहते हैं, जिनसे पुनर्जन्म मान्यता की पुष्टि होती है। मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व स्वीकार किया जाना मानव जाति की एक ऐसी अनिवार्य आवश्यकता है जिसके बिना व्यक्ति एवं समाज के नैतिक मूल्यों को स्थिर नहीं रखा जा सकता। प्रसन्नता की बात है ऐसे प्रमाणों की कमी नहीं है और वे तथ्य रूप में विज्ञ—समाज के सामने आ रहे है।


विश्वेश्वरैया (kahani)

भारत रत्न विश्वेश्वरैया प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सफर कर रहे थे। उसी में कुछ अँग्रेज भी थे। विश्वेश्वरैया यकायक हड़बड़ा कर उठे और गाड़ी करने की जंजीर खींचने लगे। अंग्रेजों के मना करने पर भी वे माने नहीं और गाड़ी खड़ी ही करा दी।

गार्ड सहित रेल के कर्मचारी आये और गाड़ी रोकने का कारण पूछा। विश्वेश्वरैया ने कहा—कुछ ही आगे रेल की पटरी खराब हो गई है, गाड़ी उलट जाने का खतरा है, सो गाड़ी बहुत धीरे और सावधानी से चलानी चाहिए।

किसी को इस कथन पर विश्वास नहीं हुआ। आगे की बात तो ज्योतिषी बता सकते हैं, एक साधारण इंजीनियर उसे कैसे जान सकता है? उत्तर में उन्होंने इतना ही कहा—मैं हर बात को बहुत गम्भीरता से सोचने और परखने का अभ्यस्त रहा हूँ। रेल के पहिये और पटरी के घिसने से जो आवाज निकलती है, वह बताती है कि आगे पटरी खराब पड़ी है।

उस समय तो किसी ने उनकी बात का भरोसा न किया, पर दो फलाँग आगे चलने पर जब पटरी उखड़ी पाई गई तो सभी अवाक् रह गये और यात्रियों की जान बचा देने का धन्यवाद देते हुए उन्हें भविष्यवक्ता कहने लगे।

हँसते हुए विश्वेश्वरैया यही कहते रहे, “गम्भीरता पूर्वक सामान्य बातों को भी ध्यान से समझने और जानने का प्रयत्न करने वाला हर व्यक्ति भविष्यवक्ता ही होता है—हो सकता है।”


स्थूल के न रहने पर भी सूक्ष्म चिरकाल तक बना रहता है

जीवात्मा मरने के बाद कुछ मध्यावधि विश्राम पाने के उपरान्त कर्मफल भोगने एवं भावी जीवन-यात्रा का क्रम आगे बढ़ाने के लिए नया जन्म ग्रहण करती है, यह अध्यात्मवादी प्रतिपादन आये दिन प्राप्त होते रहने वाले प्रमाणों से सहज ही सिद्ध हो जाता है। पुनर्जन्म की स्मृतियों, प्रेतात्माओं का अस्तित्व तथा बहुत छोटी अवस्था में असाधारण प्रतिभा का परिचय देने वाली घटनाओं से मरणोत्तर जीवन की सहज पुष्टि होती रहती है।

इस संदर्भ में एक नया पक्ष और भी है। वह यह है कि जीव-सत्ता अपनी संकल्प शक्ति का एक स्वतन्त्र घेरा बनाकर खड़ा कर देती है और जीव को अन्य जन्म मिलने पर भी वह संकल्प सत्ता उसका कुछ प्राणाँश लेकर अपनी एक स्वतन्त्र इकाई बना लेती है। और इस प्रकार बनी रहती है, मानो कोई दीर्घजीवी प्रेत ही बनकर खड़ा हो गया हो। अति प्रचंड संकल्प वाली ऐसी कितनी ही आत्माओं का परिचय समय-समय पर मिलता रहता है। लोग इन्हें ‘पितर’ नाम से देवस्तर की संज्ञा देकर पूजते जाये जाते हैं। वे अपने अस्तित्व का प्रमाण जब तब इस प्रकार देते रहते हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इतने पुराने समय में उत्पन्न हुई वे आत्माएँ अभी तक अपना अस्तित्व बनाये हुए है, यह प्रेत विद्या के लोगों के लिए भी अचम्भे की बात है, क्योंकि वे भी प्रेतयोनि को स्वल्पकालीन मानते हैं। अब उन्हें भी एक नये ‘पितर’ वर्ग को मान्यता देनी पड़ी है। जो मात्र भूत-प्रेत नहीं होते, वरन् अपनी प्रचंड शक्ति का दीर्घकाल तक परिचय देते रहते हैं।

लन्दन की यूनिवर्सल न्यूज एजेन्सी ने फरवरी 1932 में लार्ड वेस्टवुरी की मृत्यु का समाचार एक विस्तृत टिप्पणी के साथ समाचार-पत्रों में प्रकाशित कराया था। उस टिप्पणी का एक अंश यह भी था कि—”यह बात बिलकुल सच साबित हुई कि जो कोई फीरोन बादशाहों की कब खोदकर ममी के अंग अथवा उसकी अन्य कोई चीज निकालेगा तो उसकी बहुत दुर्गति के साथ मृत्यु होगी।”

मिश्र के पिरामिडों में उस देश के प्राचीन राज पुरुषो के मृतशरीर ऐसे मसालों से पोतकर रखे गये हैं जिससे वे हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकें। इनके साथ-साथ उनके उपयोग की प्रिय वस्तुएँ भी गाढ़ी गई है; जिनमें बहुमूल्य बर्तन, वस्त्र, शस्त्र, खाद्य-पदार्थ ही नहीं जीवित नौकर, घोड़े और स्त्रियाँ भी गाढ़ी गई हैं। इस कौतूहल पूर्व कृत्य पर अधिक प्रकाश डालने की दृष्टि से मिश्र जाकर लार्ड वेस्टवुरी ने कब्रों की खुदाई की थी और बहुत ही ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त की थी। ‘टुट अँख अमेन’ की कब्र से इस प्रकार की वस्तुओं के अवशेष खोदकर बड़ी मात्रा में निकाले गये थे। इस विषय में अधिक रुचि रखने वाले इंग्लैंड के एक धनपति लार्ड कारनावन ने खुदाई का सारा खर्च अपनी जेब से दिया था। इस खुदाई में लार्ड रिचार्ड वेथल ने भी बहुत दिलचस्पी दिखाई थी। जो वस्तुएँ मिलीं उनके आधार पर पिरामिड निर्माण से सम्बन्धित अनेकों रहस्यों पर प्रकाश डाला जा सकना सम्भव हो सका। इंग्लैंड के अखबारों ने इस शोध सामग्री के आधार पर पिरामिड कालीन सभ्यता एवं मान्यताओं पर विस्तृत लेख छापे थे और इतिहास के एक पृष्ठ पर प्रकाश डालने वाले प्रयास के लिए उन खुदाई कराने वालों को मुक्त कण्ठ से सराहा था।

पर इससे क्या खुदाई से सम्बन्धित अधिकाँश व्यक्तियों को शेष जीवन बड़ी भयंकर परिस्थितियों में से गुजारना पड़ा। उन्हें एक से एक डरावनी घटनाओं का सामना करना पड़ा और अत्यन्त—हत्या, एवं दुर्घटना के शिकार होकर वे सभी अकाल मृत्यु के ग्रास हुए। लार्ड वेस्टवुरी को न जाने क्या सूझी कि वे अपने निवास सेन्टजेम्स पेलेस के सात तल्ले पर चढ़ कर कूद पड़े और मृत्यु के शिकार हो गये। उनका बेटा इससे पहले ही असामयिक मृत्यु से मर चुका था। खुदाई से संबंधित अन्य लोग भी यही अनुभव करते हैं कि उन्हें कोई प्रेतात्मा आकर डराती तथा हैरान करती है। कइयों को तो प्राणघातक विपत्तियों का सामना करना पड़ा और मरते-मरते बचे। कुछ डरके मारे विक्षिप्त स्थिति तक जा पहुँचे और दुर्दशाग्रस्त होकर मरे। लार्ड वेस्टबुरी की मृत्यु का समाचार जिस लम्बी टिप्पणी के साथ समाचार-पत्रों में छुपा था, उसमें इन दुर्घटनाओं का संक्षिप्त किन्तु दहला देने वाला विवरण दिया गया था।

मिश्र के पिरामिडों का निर्माण ईसा से कई शताब्दियों पूर्व हुआ था। उस समय के प्रेत हजारों वर्षों तक कैसे अपनी प्रौढ़ावस्था में बने हुए हैं, यह आत्मवादियों के लिए अचम्भे की बात है। इस प्रकार की सूक्ष्म-सत्ताओं का अस्तित्व जहाँ पाया जाता है, वहाँ यही निष्कर्ष निकालना पड़ता है। मनुष्य की संकल्प शक्ति और प्राण शक्ति में आत्मा नहीं, उसकी किरणें मात्र हैं, पर उनमें भी इतनी सामर्थ्य होती है कि अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व खड़ा करके मूल आत्मा की वृत्ति प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती रहें। इस स्तर के कितने ही ऋषियों, महामानवों एवं सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व जब-तब अनुभव में आता रहता है।

इस सिलसिले में एक और भी इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह सामने आई है कि जड़-पदार्थों से बने ऐसे माध्यम जिनके साथ जीवित मनुष्यों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा हो, अपना प्रेत अस्तित्व बना लेते हैं और मूल पदार्थ के नष्ट हो जाने पर भी अपने अस्तित्व का वैसा ही परिचय देते रहते हैं, जैसा कि मरने के बाद मनुष्य अपना परिचय प्रेत रूप में प्रस्तुत करता रहता है।

समुद्री इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है, जिसमें सामने से आते हुए जहाज के साथ सम्भावित टक्कर से बचाने के लिए मल्लाहों ने अपना जहाज तेजी से मोड़ा और उस प्रयास में उनका अपना जहाज उलट कर नष्ट हो गया। यह जहाज जो सामने से आ रहा था और जिसकी टक्कर बचाने के लिए मल्लाह आतुरतापूर्वक प्रयत्न कर रहे थे, यहाँ यह कौन था, कहाँ का था—ठीक सामने टकराने जैसी स्थिति में क्यों हो रहा था—उसके चालक उसे बचा क्यों नहीं रहे थे—वह पीछे वहाँ से कहाँ चला गया? आदि प्रश्नों के उत्तर सन्तोषजनक नहीं मिले और यह मान लिया गया कि सम्भवतः वह मल्लाहों की आँखों का भ्रम था, वस्तुतः उस प्रकार के जहाज का अस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ।

जाँच कमेटियों की रिपोर्ट में डूबने वाले और न डूबने वाले जहाजों तथा मल्लाहों की ऐसी अनेकों गवाहियाँ है जिन्होंने समुद्र की सतह पर ऐसे जहाज देखे जिनका अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सका। रिपोर्टों में उसे भ्रम बता कर जाँच पर पर्दा डाल दिया, पर उन मल्लाहों और यात्रियों का समाधान न हो सका, जिनने अपनी आँखों से सब कुछ देखा था। भ्रम तो एक दो को हो सकता था, सारे मल्लाह और परियात्री एक ही तरह का दृश्य देखें यह कैसे हो सकता है। रिपोर्ट अपनी जगह कायम रही और दर्शकों की मान्यताएँ अपनी जगह। पीछे यह अनुमान लगाया गया कि डूबे हुए जहाजों के प्रेत अपने जीवनकाल की आवृत्ति में समुद्र तल पर भ्रमण करते रहते हैं। यह उनका सूक्ष्म शरीर होता है, जिसमें सघन ठोस तत्व तो नहीं होते पर छाया आकृति ठीक वैसी ही होती है जैसी कि उनके जीवित काल में थी। डूबे हुए जलयानों के प्रेत होते हैं, यह अनुमान आरम्भ में उपहासास्पद ही माना गया था पीछे उनके प्रमाण इतने ज्यादा मिलते गये कि उस मान्यता को एक विचारणीय शोध विषय माना गया। अभी भी मृत जलयानों का प्रेत रूप में जीवित है, यह किसी प्रामाणिक कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए उस मान्यता को भ्रम स्तर पर ही रखा गया है। फिर भी शोधकर्ताओं को स्वयं इस निष्कर्ष से सन्तोष नहीं हुआ है। वे यह कहते रहते हैं कि उपलब्ध प्रमाण साधन अपर्याप्त हो सकते हैं और भविष्य में कई ऐसे उपकरण या सिद्धान्त निकल सकते हैं जो इन बहुचर्चित प्रेतों के सम्बन्ध में कुछ अधिक सन्तोषजनक तथ्य प्रस्तुत कर सकें।

निर्जीव पदार्थों के भी प्रेत होते हैं, इस संदर्भ में समुद्री इतिहास के बाद स्थल—इतिहास की भी एक कड़ी आकर और भी जुड़ जाती है। रेल दुर्घटनाओं में ड्राइवरों के अनेकों बयान ऐसे हैं जिनमें उनने सामने से धड़धड़ाती हुई एक रेल आती देखी और उसकी टक्कर बचाने का प्रयास करते हुए कड़ा ब्रेक लगाने में उनका इंजन उलट गया; अथवा वे हतप्रभ होकर अपना सञ्चालन-सन्तुलन खो बैठे। सामने से रेल क्या थी, कहाँ से आई थी, इसका कोई प्रमाण न मिला तो इसे ड्राइवरों की मनगढ़न्त कहानी अथवा मनोविकृति भर कहकर उपेक्षित कर दिया गया। पर ऐसे घटनाक्रम अनेकों थे। जिनमें टक्कर से दुर्घटना अथवा बचाव के लिए किये गये खतरनाक प्रयासों का पता चलता था। प्रमाणहीन बात को मान कैसे जाय और इतने लोग अकारण भ्रम फैलाते हैं, यह भी कैसे गले उतारा जाय? अन्ततः अनुमानों की शृंखला इस तरह भी जुड़ी कि जिस तरह डूबे हुए जलयानों के प्रेत समुद्र की सतह पर घूमते पाये जाते हैं, उसी प्रकार दुर्घटना में ग्रसित रेलों के भी प्रेत हो सकते हैं और उनके दृश्य देखकर सामान्य बुद्धि का ड्राइवर उन्हें एक यथार्थता मान सकता है।

‘पदार्थ’ का प्रेत ‘प्रति पदार्थ’ विश्व का प्रेत ‘प्रतिविश्व छाया पुरुष की तरह साथ-साथ विद्यमान रहता है उसकी चर्चा विज्ञान जगत में इन दिनों प्रमुख चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के’—महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प-सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है। इस सूक्ष्म का गहन अन्वेषण हो सके तो हमारे ज्ञान-विज्ञान में एक नई किन्तु अति महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ सकती है।


मैं तो अपने पिता का काम कर रहा हूँ (kahani)

ईसा जब बारह वर्ष के थे, माता मरियम के साथ फरुह का त्यौहार मनाने यरुसलेम जा रहे थे। रास्ते में एक मन्दिर में उपदेश होते उन्होंने सुना और वहीं रुक गये।

मरियम का अनुमान था लड़का भीड़ में बिछुड़ गया होगा और अगले पड़ाव पर मिल जायगा। बहुत प्रतीक्षा के बाद भी जब अगले पड़ाव पर वे न मिले तो मरियम वापिस लौटीं और उस पड़ाव को खोजा जहाँ से लड़का बिछुड़ा था।

देखा तो ईसा धर्मोपदेशकों से विवाद कर रहे थे और कह रहे थे जो तुम कहते हो—क्या उसके अतिरिक्त और कुछ सच नहीं हो सकता है? क्या सत्य किसी वर्ग विशेष की मान्यताओं तक ही सीमित हैं? पंडित उसके विलक्षण तर्कों के आगे सकपका रहे थे।

मरियम ने लड़के को पकड़ा और उठ चलने के लिए कहा।

ईसा ने कहा—जननी मैं तो अपने पिता का काम कर रहा हूँ, तुम मुझे कहाँ घसीटे लिये जा रही हो। फरुह का त्यौहार यरुसलेम में मनाया जाय इससे तो—यही अच्छा है कि पिता के प्रकाश को अँधेरे में बन्दी रहने से छुड़ाया जाय।

मरियम ने पूछा-भला तेरा पिता कौन है? तू तो कुमारी के पेट से जन्मा है।

ईसा बोले, जो शरीर को जन्म देते हैं वे पिता नहीं हैं। असली पिता वह हैं जो आत्मा में प्रकाश बनकर रहता है। त्यौहार मनाने के उत्सव की तुलना में क्या यह उचित नहीं कि कुहरे को हटाने वाली रोशनी पैदा की जाय। मरियम क्या कहती वह भी लड़के के पीछे चुपचाप बैठ गई और बालक के अद्भुत तर्कों को ध्यान पूर्वक सुनने लगी।


पाप और पतन को प्रश्रय न दें

पाप की अवहेलना न करो। छोटा-सा बिच्छू अपने डंक से तिलमिला देने वाली पीड़ा उत्पन्न कर सकता है। पाप का प्रश्रय बिच्छू पालने के समान है। मन में पाप प्रलोभनों को पालने से कभी भी भयंकर विपत्ति टूट पड़ने की आशंका बनी रहेगी। आग की छोटी सी चिनगारी विशाल वन को जलाकर खाक कर देने वाली दवानल बन सकती है। पाप प्रवृत्ति की चिनगारी कार्यान्वित तो होती नहीं—मन में भीतर छिपी पड़ी है, उससे क्या हानि? ऐसा सोचकर उसे उपेक्षापूर्वक प्रश्रय नहीं दिये रहना चाहिए। उसका संचय कभी भी विस्फोटक परिणाम प्रस्तुत कर सकता है।

धर्म-बन्धनों से बँध हुआ मन ही बड़ी कठिनाई से काबू में रह पाता है। यदि उसे उच्छृंखल छोड़ दिया जाय तो तोड़-फोड़ के ऐसे विग्रह खड़े कर देगा जो पीछे सम्भालने पर भी न सम्भल सकें। उच्छृंखल मन पानी के प्रवाह की तरह है, जिसकी सहज मति नीचे की ओर ही होती है। पानी जब भी बहेगा ढलान और निचाई की ओर अपना रास्ता बनावेगा। मन पर यदि कोई बन्धन न रहे-उसे जिधर भी चाहे चलने की छूट मिल जाय तो फिर निर्बाध गति से वह पतन की ओर ही बहेगा। पतन का परिणाम विनाश के अतिरिक्त अन्य कुछ हो ही नहीं सकता। हिमालय से उतरते-उतरते गंगा खारे समुद्र में जा मिलती है और उसका निर्मल जल कडुआ, चिपचिपा, गाढ़ा और घिनौना बन जाता है।

पाप का अंकुर जब भी मन में उगा दिखाई पड़े तक उसे तत्काल उखाड़ने का प्रयत्न करना चाहिए। देर तक उसे पलने देने से विषाणुओं की तरह वह इतना बढ़ता और पनपता रहेगा कि सारा जीवन ही उसकी लपेट में आ जाय। क्षय के रोग कीटाणु आरम्भ में थोड़ी ही संख्या में प्रवेश करते हैं, पर पीछे वे पूरे शरीर पर अधिकार कर लेते हैं और प्राण लेकर ही हटते हैं। पाप को थोड़ा भी प्रश्रय मिलने लगे तो समझना चाहिए कि विनाश की विभीषिका ने अपनी जड़ जमानी आरंभ कर दी और अंधकारमय भविष्य का आधार बन गया।

मन को कुमार्ग से रोकना एक बहुत बड़ा पुरुषार्थ है। जो यह कर सका उसके लिए अन्य कठिन कार्यों को कर सकना सरल सिद्ध होगा। हम घिनौना जीवन न जियें। पतन को सहन न करें। उस दिशा में कदम न बढ़ायें जिस पर चलते हुए भविष्य में पश्चाताप करना पड़े। श्रेष्ठ जीवन के प्रति आस्था रखें और उसी स्तर की नीति अपनाकर अपनी रीति-नीति का निर्धारण करें। धुंआ देकर सुलगती हुई आग जैसी घुटन उत्पन्न करने की अपेक्षा थोड़े समय प्रकाश और ज्योति देकर बुझ जाने वाली अग्नि सराहनीय है। अपने लिए पतन और दूसरों के लिए घुटन उत्पन्न करने वाली जिन्दगी जीना निरर्थक है। भले ही थोड़े दिन जियें—भले ही अभावग्रस्त रहें, पर जीवन का स्वरूप ज्योतिर्मय ही होना चाहिए। पाप की कालिमा को उसमें स्थान नहीं ही मिलना चाहिए।

निरर्थक वस्तुएँ बड़ी मात्रा में संचय कर लेने की अपेक्षा बुद्धिमानी इसमें है कि बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रह किया जाय भले ही वे थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हों। अधर्म उपार्जित सम्पदा की अपेक्षा अभावग्रस्त रहना उत्तम है। अनाचार अपनाकर बहुत दिन जीने की अपेक्षा यह अच्छा है कि नीति युक्त रहकर छोटी और हलकी जिन्दगी जी ली जाय। जल्दी और अधिक कमाने के लिए अनीति की आतुरता अनुपयुक्त है। अधिक उपभोग और ‘अहंकारी वैभव पाने की लालसा से पाप प्रवृत्ति अपनाने के लिए तत्पर होना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। पाप का प्रारम्भिक स्वरूप आकर्षक भर लगता है, पर उसे पकड़ने पर विषैली सर्प के साथ खेलने जैसी दुर्गति ही होती है।


आकांक्षाओं की पूर्ति और उसकी तैयारी

मधुर अभिलाषाएँ हर किसी के मन में उठती हैं। प्रिय वस्तुएँ और सुखद परिस्थितियाँ कौन नहीं चाहता? जहाँ तक चाहने का प्रश्न है सहज इच्छाओं का केन्द्र इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है कि आज की अपेक्षा कल अधिक अच्छी स्थिति में रहने का अवसर मिले। इन्द्रिय भोगों से लेकर—स्त्री, पुत्रों के सुखी समुन्नत होने तक की विविध कल्पनाएँ अनायास ही उठती है। संग्रह करना अच्छा लगता है। सम्पत्तिवान और वैभववान बनने की लालिमा हर समय जगती रहती है। इससे भी आगे बढ़कर कई व्यक्ति यश, प्रशंसा, सम्मान की आकाँक्षा करते हैं और चाहते हैं कि उन्हें जन-प्रतिष्ठा मिले। नेतृत्व करने का अवसर मिले। ऐसा पद मिले जिसके आगे बहुत लोग झुकते और निर्देश पाने की प्रतीक्षा करते हों।

पेट भरने और तन ढकने की प्राथमिक आवश्यकता पूरी करने के उपरान्त प्रायः मनःक्षेत्र में ऐसी ही सुखद कल्पनाएँ उमड़ती, घुमड़ती रहती हैं, जिनका उद्देश्य इन्द्रिय भोगों से लेकर कुटुम्ब-पालन और सम्पत्ति संग्रह तथा यश, वर्चस्व का सम्पादन होता है। आमतौर से मनुष्य की आकाँक्षाएँ इसी प्रकार की बनी रहती हैं। जो अधिक सुलझे हुए दूरदर्शी हैं वे महामानवों की पंक्ति में अपने को खड़ा देखना चाहते हैं। इतिहास के स्मरणीय पृष्ठों पर अपनी चर्चा का उल्लेख होने के इच्छुक हैं। स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि, ईश्वर दर्शन आदि के अभिलाषी हैं। यह आकाँक्षाएँ भी—भावी प्रगति की ही सूचक हैं। इन्द्रिय जन्य, सम्पत्ति परक, परिजन, सम्बन्धित, यश प्रदायक अथवा पारलौकिक आध्यात्मिक वर्गों में इन्हें विभाजित किया जा सकता है। एक से दूसरी को विकसित परिष्कृत कहा जा सकता है, पर हैं सभी आकाँक्षाएँ ही। मनुष्य की अदम्य इच्छा यह रहेगी ही कि उसे अधिक सुखद और सन्तोषजनक परिस्थिति प्राप्त होनी चाहिए।

देखा जाता है कि कई व्यक्ति अभीष्ट, मनोरथों को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ते हैं और धीरे-धीरे इतना कुछ सम्पादन भी कर लेते हैं जिसे सन्तोषजनक अथवा आश्चर्यजनक कहा जा सके। इसके विपरीत कई ऐसे होते हैं जिनकी लालसाएँ मात्र सपना बनकर रह जाती हैं। अभीष्ट उपलब्धियों की एक किरण भी कभी झाँकती दिखाई नहीं पड़ती। एक ओर इच्छाओं के घटाटोप, दूसरी ओर प्रगति का सर्वथा अवरोध, इस स्थित में मन में घोर निराशाजनक प्रतिक्रिया होती है। मनुष्य अपने आपको अभागा मानकर आत्म-प्रताड़ना की पीड़ा सहता है अथवा किन्हीं व्यक्तियों या परिस्थितियों को इस अवरोध का कारण मानकर उन्हें कोसता हैं। कई स्वप्नदर्शी और भी आगे बढ़ जाते हैं उन्हें किन्हीं अदृश्य देव-दानवों पर, ग्रह-नक्षत्रों पर, दोषारोपण करने से राहत मिलती है। क्योंकि वे बेचारे अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए—सफाई देने के लिए—सामने आने में असमर्थ रहते हैं।

जो हो, प्रगति और समृद्धि की अभिलाषा ऐसी है, जो जीव चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है, उसे हटाया, मिटाया नहीं जा सकता। अध्यात्मवादी-दार्शनिक अधिक से अधिक इतना ही कर सकते हैं कि उसे पशु-स्तर से ऊँचा उठा कर देव-स्तर तक ले पहुँचें। आत्म-कल्याण,विश्व-कल्याण की बात सोचें। ईश्वर प्राप्ति अथवा स्वर्ग मुक्ति का प्रयास करें। इस मार्ग में चलते हुए भक्ति भावना अथवा तपश्चर्या, योग-साधना का जो क्रिया-कलाप अपनाना पड़ता है, उसे भी आकाँक्षाओं की श्रेणी से अलग नहीं रखा जा सकता है, भले ही उनका स्तर कितना ही ऊँचा क्यों न हो।

जब आकाँक्षाओं को हटाया नहीं जा सकता तो फिर एक ही मार्ग शेष रह जाता है कि उनकी पूर्ति के लिए योजनाबद्ध व्यवस्था जुटाई जाय। यही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम अहर्निश अन्तःक्षेत्र में उठने वाले तूफानों का समाधान कर सकते हैं और अशान्त उद्वेग विक्षोभों से छुटकारा पाकर सुव्यवस्थित, सुसन्तुलित जीवन-क्रम में शान्तिपूर्वक अग्रसर होते रह सकते हैं।

आकाँक्षाओं की पूर्ति होते रहने से सन्तुष्ट जीवनचर्या प्राप्त करने के अभिलाषी को प्रथम चरण यह उठाना पड़ता है कि वह निर्धारण करे कि उसकी आकाँक्षाओं को किस दिशा में अग्रसर होना चाहिए, किसमें नहीं। यह निर्णय हो पावे तो इच्छाएँ अनेक दिशाओं में दौड़ती हैं। वे परस्पर विरोधी भी होती हैं और इतनी भिन्न भी कि प्रस्तुत क्षमता एवं साधनों के आधार पर उन्हें आज की परिस्थितियों में पूरा नहीं किया जा सकता। चिन्तन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। क्षणभर में दुष्ट जैसी और क्षणभर में सन्त जैसी आकाँक्षाएँ मन में उठ सकती हैं, पर एक साथ दोनों प्रकार की क्षमताएँ नहीं जुटाई जा सकती। अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित और असन्तुलित अभिलाषाओं को मस्तिष्क में घुमड़ते रहना सरल है, पर उनकी पूर्ति असम्भव है। मनुष्य उन कार्यों में उतनी ही मात्रा में सफल हो सकता है, जितने कि उसके पास अन्तरंग अथवा बहिरंग साधन होते हैं। योग्यता एवं साधन सुविधा में क्रमशः बढ़ोतरी हो सकती है, तब अपनी आकाँक्षाएँ भी विकसित की जा सकती हैं, पर आज जिनकी बुद्धि संगत संगति नहीं हैं और व्यावहारिक सम्भावना नहीं हैं, उनके लिए कल्पना की उड़ाने लगाना सर्वथा निरर्थक है। उसमें अपनी बौद्धिक क्षमता का अनावश्यक अपव्यय होता है और कुछ न कर पाने, कुछ न बन पाने, कुछ न मिल पाने की खोज का आक्रोश बिना कारण ही शिर पर आकर लद जाता है।

प्रगतिशील जीवन का आरम्भ आकाँक्षाओं को नियमित और व्यवस्थित करने से होना चाहिए दिशा निर्धारण एक अत्यन्त आवश्यक कार्य है। लक्ष्यहीन अव्यवस्थित चिन्तन की विडम्बना से जितना बचा जा सके उतना ही उत्तम है। सोचना चाहिए कि एक निर्धारित दिशा में ही सफलता प्राप्त कर सकने के साधन मनुष्य के पास होते हैं, इसलिए यह निर्धारण करना चाहिए कि हमें भविष्य में क्या करना और क्या पाना है। यह निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो अपनी आज की योग्यता एवं परिस्थितियों के साथ ताल-मेल खाता हो। आधारहीन कुलाचें भरने में टाँग टूटने का खतरा ही उभर कर आगे आता रहेगा।

हमें धनवान, पहलवान, विद्वान, प्रतिभाशाली, लोकसेवी, श्रेयार्थी, मनमौजी, आदि जो कुछ बनना उपयुक्त लगता हो, उसमें से एक को चुनलें। अधिक से अधिक दो को। दिशाएँ सीमित कर लेने पर क्रमबद्ध चिन्तन सम्भव हो जाता है। जो पाना है, जो करना है, वह निश्चित हो जाने पर मस्तिष्क को वैसा ही ताना-बाना बुनने की बात सूझती है। इसके लिए अपनी बौद्धिक क्षमता क्या बढ़ानी है? साधन क्या जुटाने हैं? संपर्क किन से बनाना है? सीखना क्या है? आदि अनेकों आधार सामने आते हैं। उन गुत्थियों को सुलझाने और साधन-उपकरण जुटाने के प्रयास आरम्भ हो जाते हैं। सोचने और करने की हलचलें उन साधनों को जुटाती हैं जिनके बलबूते अभीष्ट आकाँक्षाओं की पूर्ति का पथ-प्रशस्त हो सके।

कोई व्यक्ति अभी पूरब, अभी पच्छिम, अभी उत्तर, अभी दक्षिण को चलता रहे तो जिन्दगी भर चलते या दौड़ते रहने पर भी कहीं पहुँच न सकेगा। ऐसे ही अपनी शक्ति, सामर्थ्य को नष्ट करता रहेगा। समय की बर्बादी और कुछ हाथ न लगने की खोज ही उसके पल्ले पड़ेगी। इसके विपरीत यदि वह दिशा निर्धारित करके किसी मार्ग पर धीरे-धीरे क्रमबद्ध रूप से चलता रहे तो कुछ समय बाद प्रतीत होगा कि उसने लम्बी मंजिल पूरी करली दिशा निर्धारण और क्रमिक गतिशीलता के अपने चमत्कार हैं। अव्यवस्थित दौड़ लगाने वाले खरगोश से मन्दगामी किन्तु अनवरत श्रम संलग्न कछुए ने बाजी जीती थी और उसके कान काटे थे, यह कहानी भले ही बाल मनोरञ्जन की दृष्टि से गढ़ी मई हो, पर उसमें जिस तथ्य का समावेश है वह अक्षरशः सत्य है। एक दिशा में अनवरत गति से चलने वाले—अपने चिन्तन और प्रयास को अभीष्ट लक्ष्य पर नियोजित रखने वाले इतनी सफलता प्राप्त कर लेते हैं जिसे दैवी वरदान अथवा अप्रत्याशित तक कहा जा सके।

लक्ष्य का निर्धारण अनावश्यक और अस्त-व्यस्त आकाँक्षाओं की कल्पना, जल्पना से छुटकारा दिलाता है। इससे अपनी शक्ति के महत्वपूर्ण अंश की बर्बादी बच जाती है और उसका उपयोग जब अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में होने लगता है तो सफलता की मंजिल पूरी करने में उतने से ही बड़ी सहायता मिलती है।

आकाँक्षा की पूर्ति के समय जो सुखद उपभोग उपलब्ध होंगे, प्रायः उन्हीं के चिन्तन में उथले लोग उलझे रहते, है। उस क्रिया-कलाप की गहराई में नहीं उतरते जिसके सहारे वह सफलता प्राप्त की जाती है आकाँक्षा और उसकी पूर्ति के बीच में एक बड़ी लम्बी-चौड़ी और गहरी खाई होती है, उसे पाटने के लिए कितने साहस की-कितने अध्यवसाय की - कितने प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी इसे तो भूला ही दिया जाता है। सफलता की मंजिल तक पहुँचने के कितने साधन जुटाने पड़ेंगे और उनके लिए क्या-क्या करना पड़ेगा? अड़चनों से किस तरह निपटा जायगा और जो साधन नहीं जुट सके उनका विकल्प क्या होगा? इन बातों पर जो विचार नहीं कर सकता और इच्छा के बाद सफलता को ही दूसरा चरण मानता है, वह पूरा शेखचिल्ली ही बना रहेगा। शेखचिल्ली की कहानी सर्वविदित है। वह सिर पर तेल का घड़ा रखने के बाद कल्पना का घोड़ा अति द्रुतगति से दौड़ाने लगा था। मजूरी के दो पैसे हाथ आने से पूर्व ही वह अण्डा, मुर्गी बकरी, भैंस, बीवी खरीदने, बच्चा होने और बड़ा होकर हुक्का पिलाने की कल्पना में इतना भाव विभोर हो गया कि शिर झटक कर सिर पर रखे तेल के घड़े को ही गिरा बैठा। कल्पना की इतनी द्रुतगति जिनकी है-जो मध्यवर्ती साधनों की महती आवश्यकता और उनके जुटाने में प्रयुक्त होने वाले प्रखर साहसिकता एवं प्रचण्ड प्रयत्नशीलता की आवश्यकता को भूला देते हैं उन्हें शेखचिल्ली ही कहा जायगा। हममें से कितने ही, ऐसे ही भावुक अत्युत्साही होते हैं और उसी तरह अपने को उपहासास्पद बनाते है।

आकाँक्षाओं की पूर्ति में निस्संदेह सुख और सन्तोष है। इस उपलब्धि को पाकर मनुष्य को आनन्द एवं उल्लास की उपलब्धि होती है। हर कोई इस स्थिति को प्राप्त करना चाहता है पर न जाने क्यों यह तथ्य भुला दिया जाता है कि इस वरदान को प्राप्त करने के लिए अनवरत एवं कष्टसाध्य साधना करनी पड़ती है। सन की प्रसन्नता का केन्द्र इस पहली मंजिल पर ही नियोजित करना पड़ता है। अभीष्ट प्रयोजन के लिए साधन जुटाने के लिए अपनी क्षमता, योग्यता का बढ़ाना एवं आवश्यक साधनों का जुटाना अनिवार्य है। इन दोनों उपलब्धियों के लिए किये जाने वाले प्रयास को इतना सुखद मान लिया जाना चाहिए मानो वही सफलता का अन्तिम बिन्दु हो। सुखद सत्परिणाम के उपभोग जितना रस यदि प्रगति पथ पर चलने के साधन जुटाने एवं काँटे बीनने में आने लगे तो ही यह समझना चाहिए कि सफलता का आधार सुनिश्चित बन गया।

अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में देर लगाना और अनेकानेक अवरोध उत्पन्न होना नितान्त सम्भव है। मनस्वी व्यक्ति धैर्य, साहस, पुरुषार्थ और सन्तुलन का आश्रय लेकर इस कठिन मार्ग को पार करते है। किन्तु उथले और अधीर मनुष्य जरा-सा विलम्ब होते के गर्त में गिर कर असफलता की घोषणा कर देते है। इन बालबुद्धि लोगों को यह समझना चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि सफलता के प्रतिफल खजूर जैसे ऊँचे वृक्ष पर ही लगते है। उन्हें पाने के लिए जोखिम भरी ऊँचाई तक चढ़ने के लिए घोर साहसिकता का परिचय देना पड़ता है। जो इतना मूल्य नहीं चुका सकते, उन्हें किन्हीं बड़ी उपलब्धियों की आशा नहीं करनी चाहिए। तुर्त इच्छा फुर्त पूर्ति के सपने तो केवल बालबुद्धि को ही शोभा देते है। संसार के प्रगतिशील मनुष्यों की अविचल धैर्य के साथ अनवरत पुरुषार्थ करने की प्रक्रिया को ही अत्यन्त सरस मानकर चलना पड़ा है। वे अपनी पुरुषार्थ, परायणता को-संघर्ष निष्ठा को ही इतना मधुर मानते रहे है कि हजार वर्ष तक अन्तिम सफलता के लिए प्रतिक्षा करना भी भारी न पड़े।

अनेकानेक अभिलाषाएं करना और उनकी पूर्ति के समय मिलने वाले आनन्द की कल्पना करना मनो विनोद की दृष्टि से अच्छा है, पर उसमें खीज और निराशा की प्रतिक्रिया भी पूरी तरह जुड़ी हुई है। जिन्हें मधुर कल्पना और दुखद निराशा के ज्वार-भाटे में उछलना, निरन अच्छा लगता हो वे प्रसन्नतापूर्वक उस बाल-विनोद में ला रहें पर जिन्हें कुछ पाना है, उन्हें आकाँक्षाओं को निष्ठ नित परिष्कृत करने का प्रथम चरण बढ़ाकर दूसरा कद यह रखना चाहिए कि निर्धारित लक्ष्य के लिए अवश्य खमता एवं साधन जुटाने में इतने धैर्य एवं इतने उत्साह साथ संलग्न होंगे कि वे प्रयास ही सफलता के जित आनंददायक प्रतीत होने लगें। महत्वपूर्ण सफलताएँ कर सकने का अधिकार इससे कम मिलता भी कहाँ है


जीवनकला के कलाकार पं. नेहरू

भारत सरकार के फिल्म डिवीजन ने ‘हमारे मन्त्री’ नाम से एक वृत्त चित्र बनाया था, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू की दिनचर्या, कार्यक्षमता, श्रमशीलता, चुस्ती−फुर्ती, स्वास्थ्य, सतर्कता और निस्पृहता आदि उन गुणों का दिग्दर्शन कराया था, जिनके आधार पर वे उतना अधिक कार्य करने और इतने ऊँचे पद का उत्तरदायित्व भली प्रकार वहन कर सकने में समर्थ हो सके।

नेहरूजी की दिनचर्या मशीन की तरह पूर्णतया नियमित और व्यवस्थित थी। वे प्रायः 5 घण्टे सोते थे और शेष सारे समय अपने व्यस्त कार्यक्रम में लगे रहते थे। व्यक्तिगत कार्यों को वे फुर्ती से निपटाने थे ताकि अधिक समय अपने राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों के निर्वाह में लगा सकें।

चुस्ती और फुर्ती उनका विशेष गुण था। स्टेनों से जब वे पत्रों का उत्तर लिखाते थे तो औसतन वे एक मिनट में 124 शब्द बोलते थे। कभी उत्तेजना में आ जाय तो वह चाल 201 तक जा पहुँचती थी। उनके पास महत्वपूर्ण द्वार और पत्रों की संख्या लगभग डेढ़ हजार रहती थी वे सभी को सावधानी से पढ़ते,देखते और गम्भीरतापूर्वक उत्तर लिखाते थे। चुनाव के दिनों उन्होंने तीन−तीन सौ मील की यात्राएँ लगातार हफ्तों तक की हैं और बहुत बार उन्होंने पन्द्रह−बीस सभाओं तक में भाषण दिये हैं। फिर भी कभी उन्होंने थकान की शिकायत नहीं की और न कभी बीमार पड़े।

उनकी इस सक्षमता के आधार मूल गुण थे— नियमितता, मिताहार, तत्परता, निश्चिन्तता, निश्छलता और कर्त्तव्यनिष्ठा। समय का एक क्षण भी बेकार नहीं गँवाते थे। दिनचर्या ऐसी नपी−तुली और व्यवस्थित रहती थी बेकार की बातों और बेकार के कार्यों में एक क्षण भी नष्ट न हो। जो काम करना उसे पूरी चुस्ती,मुस्तैदी और तन्मयता के साथ करना—इस गुण ने उनकी कार्य शक्ति कई गुनी बढ़ा दी थी। दूसरे लोग जबकि उतने समय में बहुत कम काम कर पाते थे, ढीले हाथ और उदास मन से किसी प्रकार समय काटते हुए बहुत समय में थोड़ा काम कर पाते थे, तब पं. नेहरू उतने ही समय में अपनी फुर्ती और मुस्तैदी के कारण दूसरे साथियों की तुलना में दस गुना अधिक काम निपटा देते थे।

वे भरपेट भोजन कभी भी नहीं करते थे। पेट को खाली रखते थे ताकि आलस्य न आये—पेट पर अनावश्यक वजन न बढ़े और पाचन−क्रिया में गड़बड़ी उत्पन्न न हो। वे शौच स्नान के उपरान्त नियमित व्यायाम का क्रम अवश्य पूरा करते थे। व्यायामों में उन्हें सर्वांगासन जैसे योगासन अधिक अनुकूल पड़ते थे।

बहुत उत्तरदायित्वों और समस्याओं में उलझे रहने पर भी वे उन्हें कभी नहीं देखा गया। निराशा क्या होती है, यह उन्होंने जाना ही नहीं। कठिन से कठिन और विपरीत परिस्थितियों में मानसिक सन्तुलन बनाये रहना और समाधान क्या हो सकता है इसकी शाँत चित्त से खोज करना उनकी मानसिक विशेषता थी। यही कारण था कि वे बिना उलझन में फंसे दुस्तर समस्याओं के हल निकालने में सफल होते रहे। जो हल नहीं निकले इन असफलताओं में भी उन्होंने खिलाड़ी की मनोभूमि कायम रखी। दुखी या खीजते, कोसते उन्हें कभी किसी ने नहीं पाया।

व्यक्ति गत द्वेष−अहंकार और लोभ, स्वार्थ से वे कोसों ऊँचे थे। साथियों पर कभी−कभी वे झल्ला भी पड़ते थे, पर वह आवेश एक क्षणभर का ही होता था। द्वेष या दुराव छू भी नहीं गया था। वे साथियों को सच्चे मन से प्यार करते थे फलतः जिन्हें खरी−खोटी सुननी पड़ती वे भी न तो बुरा मानते थे और न अपना अपमान अनुभव करते थे। जो भी उनके संपर्क में आया वह प्रेम के बन्धनों में जीवन भर के लिए बंध कर रह गया।

देश−भक्ति, लोक−मंगल की कामना, कर्त्तव्य−निष्ठा का स्तर सदा इतना ऊँचा रहा कि व्यक्ति गत लोभ, मोह और अहंकार के प्रवेश की पहुँच वहाँ तक हो नहीं सकी। पं. नेहरू का पद सम्मान और उत्तरदायित्व बहुत ऊँचा था और उससे भी ऊँचा था उनका महान् चरित्र एवं व्यक्तित्व।


मनुष्य की असीम अद्भुत क्षमताएं

वर्तमानकाल में एक व्यक्ति के विचार दूरवर्ती अन्य व्यक्तियों तक पहुँच सकते हैं, यह तथ्य अतीन्द्रिय विज्ञानियों ने अनेकों साक्षियों के आधार पर सच मान लिया है। इस आधार पर विचार शक्ति की तुलना शब्द शक्ति एवं प्रकाश शक्ति के साथ की जाने लगी है, जिनकी तरंगें उन्मुक्त आकाश में ईथर-तत्व के माध्यम से द्रुतगामी भगदड़ मचाती हैं। भूतकाल की घटनाओं को बताने वाले लोगों की अलौकिक शक्तियों का भी इसी आधार पर समाधान हो जाता है कि जो गुजर चुका उसके ध्वंसावशेष सूक्ष्म जगत में भ्रमण करते होंगे और क्रमशः झीने पड़ते हुए विलय की ओर बढ़ रहे होंगे। भूत कथन करने वाले अपनी अतीन्द्रिय शक्ति से उन्हें देख समझ सकते हैं।

पदार्थों के साथ स्पर्श करने वाले के शरीर-कण चिपक, जाते हैं और उनकी गन्ध के सहारे जासूसी कुत्ते चोरों को जा पकड़ते हैं। जिसे हम भूत समझते हैं उसके अवशेष समय के साथ ही समाप्त नहीं हो जाते, वरन् किसी रूप में बहुत समय तक अपना अस्तित्व बनाये रहते हैं। इस रहस्यमय सूक्ष्म दर्शन की क्षमता जिन्हें प्राप्त हो वे अपनी अतीन्द्रिय चेतना के आधार पर उसे जान सकें, बता सकें तो यह समझ में आने वाली बात मानी जायगी यद्यपि है आश्चर्यजनक।

भविष्य कथन की बात उपरोक्त दोनों ही स्थितियों से भिन्न और समझ में न आ सकने योग्य है। जो घटना घटित हुई ही नहीं, उसका अस्तित्व या अवशेष कैसे पाया जा सकता है। फिर मनुष्य को स्वतन्त्र कर्मकर्त्ता माना जाता है वह अपनी गतिविधियों को कभी भी किसी भी दिशा में मोड़ सकता है। साधन, प्रयास और अवसर किसी सम्भावना को किसी अन्य रूप में भी बदल सकते हैं। ऐसी दशा में किसी भविष्य का पूर्व निश्चित होना किस प्रकार माना जाय? जो अनिश्चित है, उसकी पूर्व घोषणा का क्या आधार हो सकता है।

संसार के परा मनोविज्ञान वेत्ता इस संदर्भ में भारी असमंजस अनुभव करते हैं। भविष्य कथन के ऐसे प्रमाण सामने प्रस्तुत हैं जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता; किन्तु उसका कारण और आधार कुछ भी समझ में नहीं आता। इसे सैद्धान्तिक मान्यता किस प्रकार दी जाय?

संसार प्रसिद्ध तीन प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं के पूर्व कथन को अनेक कसौटियों पर ठोका, बजाया गया है और पाया गया है कि उनमें ज्योतिषियों जैसी द्विपक्षी और मोल-मटील भाषा बोलने की चालाकी भी नहीं थी और प्रस्तुत परिस्थितियों से भावी संभावना का तक मिलाने जैसा कोई बुद्धिकौशल भी न था। सर्वथा भिन्न परिस्थितियों में भावी भविष्य कथन प्रस्तुत करना और उसका अक्षरशः सही उतरना कुछ ऐसा कौतुक है जिसे सामान्य न करते हुए भी सामान्य विज्ञान के आधार पर यह नहीं बताया जा सकता कि आखिर वह सब सम्भव क्यों कर होता है?

जीनडिक्सन कैनेडी की हत्या, भारत का विभाजन, चीन का साम्यवादी बनना ऐसी बातें थीं जिनकी उन दिनों कोई सम्भावना नहीं थी, जिन दिनों कि वे भविष्यवाणियां की गई थीं।

पीटर हरकौस की चमत्कारिता की तो विधिवत् जाँच की गई। ग्लेनकोव प्रयोगशाला में उसके शरीर एवं मस्तिष्क के अनेकों परीक्षण किये गये। उसकी सभी भविष्यवाणियों और घटनाओं की तारीखें देखी गई जिनमें काफी अन्तर था। भविष्यवाणियां ऐसी थीं जिसकी उस समय कोई सम्भावना नहीं थी, पर घटनाचक्र विलक्षण रूप से घूमा और वह अनहोनी समझी गई बातें होनी होकर सामने आई। उसने अपनी दिव्य शक्ति से कितनी ही दुर्घटनाओं से सचेत करके लोगों को भारी क्षति उठाने से बचाया था। हर्वन लिकसंन का भी उदाहरण ऐसा ही है उनने फाँस, जर्मनी और इटली के मूर्धन्य राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और कलाकारों ने उनका निज का तथा चल रही गतिविधियों का परिणाम जिस प्रकार बताया था उसी प्रकार सही निकलता चला गया तो वे स्तब्ध रह गये। मनुष्य की अतीन्द्रिय शक्ति का महत्व उन्हें स्वीकार करना पड़ा, पर वे यह न समझ पाये कि ऐसा क्यों होता है और उसका बुद्धिसंगत कारण क्या हो सकता है।

मनुष्य की संभावनाओं का अन्त नहीं। उसकी अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी अनन्त हैं। मनुष्य तत्व का जितना अंश जाना जा चुका है वह भी कम चकित करने वाला नहीं फिर जो अभी अविज्ञात है उसकी सम्भावनाएँ तो और भी अद्भुत हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना हर दृष्टि से असामान्य स्तर की है। उसके प्रत्यक्ष कर्तृत्व को व्यक्तित्व को देखते हुए उसकी महानता का अनुमान लगाया जा सकता है। यदि अप्रत्यक्ष अस्तित्व को भी खोजा और उभारा जा सके तो प्रतीत होगा कि मानवी आत्मा अपने उद्गम स्रोत परमात्मा के समान ही महान् है। उसकी अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी अनन्त और एक से एक बढ़कर अद्भुत हैं।


चुआँगत्सु की पत्नी (kahani)

कुछ दिनों की बीमारी ने ही चुआँगत्सु की पत्नी को भगवान् का प्यारा बना दिया। रोग निवारण के लिए भरसक प्रयत्न किये गये। कितने ही चिकित्सकों के उपचार के बाद भी उसे बचाया न जा सका। हुईत्सु को पता चला तो वह भी शोक में भाग लेने के लिए वहाँ जा पहुँचा।

रोने, चीखने का क्रन्दन उसे सुनाई न पड़ा। अन्दर जाकर देखा तो एक प्रकार की निस्तब्धता थी, पर उस निस्तब्धता को भंग करने वाला चुआँगत्सु ही था। वह घुटने पर उलटा कटोरा रख उँगलियों से ताल देकर कुछ गुनगुना रहा था।

हुईत्सु को बड़ा आश्चर्य हुआ वह बोला—’जिन्दगी भर वह तुम्हारे साथ छाया की तरह लगी रही। हर तरह से तुम्हारी सेवा की। बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया। वृद्धावस्था में भी उसके प्रेम में किसी प्रकार की कमी दिखाई न दी। कर्त्तव्यनिष्ठा उसके जीवन का एक अंग बन चुकी थी। ऐसी पत्नी को पाकर भला किसे गौरव का अनुभव न होता, पर एक तुम हो जो इस शोक के वातावरण में भी गा-बजा रहे हों।’

चुआँगत्सु ने कहा—”भाई! तुमने मुझे समझने में बड़ी भूल की है। भला जिसकी प्रियतमा इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गई हो उसके दिल पर क्या बीतती होगी।”

हम दोनों अभिन्न थे। एक के दुख-दर्द में दूसरे को वैसी ही अनुभूति होती थी। मैंने देखा कि शोक, वियोग ने मुझे जर्जर कर डाला तो परलोक में मेरी प्रियतमा भी वैसी ही स्थिति में जा पहुँची होगी।

इस आधार ने मुझे पलट दिया और सोचने लगा गुन-गुनाकर कुछ गीत गाऊँ ताकि मेरी प्रियतमा को कुछ राहत मिले।


अन्तःक्षेत्र में छिपी समुद्र जैसी प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य

स्थूल जीवन को, थल की उपमा दी जाय तो सूक्ष्म जीवन को समुद्र कहना पड़ेगा। थल-भूमि और उसका वैभव हमें चर्मचक्षुओं से दिखाई पड़ता है, इसलिए मोटी बुद्धि उतना ही कुछ जानती है और उसके उपयोग से सन्तुष्ट रहती है। प्राप्त करने का प्रयत्न भी उतने पदार्थों तक ही सीमित रहता है जो आँखों से दीख पड़ते हैं।

समुद्र अर्थात् अन्तरंग इतना विस्तृत एवं महान है कि उसकी गरिमा पर विचार करने योग्य यदि परोक्ष दृष्टि प्राप्त हो तो पता चलेगा कि उस जलराशि को रत्नाकर ठीक ही कहा गया है, उसमें सन्निहित सम्पदाओं का बार पार नहीं। पौराणिक उपाख्यान में 14 रत्नों की चर्चा होती रही है ऐसे अगणित रत्न उसमें छिपे पड़े हैं। शोधकर्ता यदि गहराई में उतरें और प्राप्त करने के पुरुषार्थ में संलग्न हों तो जो पौराणिक समुद्र मंथन में पाया गया था, उसकी तुलना में अनेक गुना वैभव कभी भी पाया जा सकता है।

भौतिक जगत में—भौतिक जीवन में-भौतिक प्रयत्नों से स्थूल पुरुषार्थ से जो पाया जा सका है- उसकी तुलना में सूक्ष्म जगत में—सूक्ष्म जीवन में अत्यधिक मात्रा में छिपा पड़ा है। उसे समझने और प्राप्त करने के लिए अदृश्य में—अन्तर में प्रवेश कर सकने वाली दृष्टि चाहिए। इस दिशा में किये गये प्रयत्नों की तुलना समुद्री खोज से की जा सकती है। आँखों से न दीखने वाले वैभव को देख सकना और असामान्य प्रयत्नों से उस अदृश्य सम्पदा को खोज निकालना ठीक ऐसा ही है जैसा कि मानवी अन्तः जीवन में छिपी हुई विभूतियों को खोज निकालने के लिए आत्म-साधना में निरत होना।

स्थूल जीवन का वैभव विस्तार जितना है उसकी तुलना में सूक्ष्म जीवन की क्षमता और सक्रियता अत्यधिक है। उसे खोजने के प्रयत्न इतने दूरगामी परिणाम प्रस्तुत कर सकते हैं कि स्थूल जीवन तक सीमित रहने वाले व्यक्ति जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। समुद्र वैभव को खोजने वाले भी इस परिणाम पर पहुँचते जाते हैं कि धरती की सम्पदा का तारा विस्तार समुद्र की अदृश्य कृपा से ही होता है। भविष्य में मानवी प्रगति के लिए धरती का सहारा लेते रहना ही पर्याप्त न होगा, वरन् समुद्र वैभव की सहायता लेने से ही काम चलेगा। स्थूल जीवन की स्थूल सम्पदाओं तक सीमित न रहकर हमें सूक्ष्म जीवन की गहराई में उतरना होगा और उसमें छिपी हुई विभूतियों के सहारे समग्र विकास का पथ−प्रशस्त करना होगा।

पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। इस पानी का वजन प्रायः एक करोड़ खरब मन है। किनारों पर उसकी गहराई तक ही पहुँचता है। इसके नीचे की सतह घोर अन्धकार में डूबी हुई है। समुद्र तल पर विशाल पर्वत, पहाड़ियाँ, पठार, सुविस्तृत मैदान और भयानक खाइयाँ पाई जाती हैं।

यों नौका−नयन के लिए चिरकाल से समुद्र का उपयोग होता रहा है, पर मानवी बुद्धि चिरकाल से यह भी सोचती रही है कि उस सागर सम्पदा के अन्यान्य उपयोग भी हो सकते हैं। अरस्तू और सिकन्दर के समय भी इस सम्बन्ध में खोज−बीन हुई थी पीछे सन् 1670 के बाद तो समुद्र विज्ञान एक स्वतंत्र शास्त्र ही बन गया और तब से अब तक एक के बाद एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन होते चले गये।

रावर्ट वायल, वेंजामिन, फ्रेंकलिन, लुइस, अगेसिज, अलेक्जेण्डर, एडवर्ड फारब्स, चार्ल्स डार्विन आदि ने समुद्र की उपयोगिता पर विशेष रूप से प्रकाश डाला सन् 1872 में सी−डवल्यू थामसन ने प्रयत्नपूर्वक ब्रिटिश नौसेना का एक जहाज ‘चैलेंजर’ प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करली। उस यात्रा में उसने इतनी जानकारियाँ इकट्ठी की जिन्हें क्रमबद्ध लिखने में बीस वर्ष लगे और उसका प्रकाशन पचास मोटी जिल्दों में सम्भव हुआ। उस जहाज में यों एक स्टीम एंजिन भी लगा था, पर ज्यादातर पाल तानकर ही यात्रा पूरी की गई। इस अवधि में एक वैज्ञानिक और एक नाविक की भी इसी दौरान मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उस सर्वेक्षण ने कई दृष्टियों से अपना एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया। इसके बाद सन् 1963−64 यूनेस्को के अंतर्गत 30 देशों ने समुद्री शोध का एक नया बड़ा प्रयास किया। यह खोज विशेष रूप से 280 लाख वर्ग मील में फैले हुए हिन्द महासागर में की गई। इसमें 44 जहाज जुटे और 500 मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने काम किया।

जीवन की उत्पत्ति समुद्र के उदर में ही हुई है। सबसे पहले एक कोशीय आदि प्राणी ‘अमीबा’ वहीं जन्मा। उसी से वनस्पति जगत एक जीव जगत की शाखाएँ फूटी। प्राणियों का विकास क्रम जानने के लिए समुद्र तल में जमे हुए अवशेष ही सबसे प्रामाणिक गवाह हैं। पृथ्वी की रासायनिक स्थिति में जो हेर−फेर आदि काल से अब तक होते रहे हैं उनके प्रमाण भी तल की कीचड़ में पूर्णतया सुरक्षित हैं। शोधकर्ता उसी आधार पर पृथ्वी के जड़−चेतन का विकास इतिहास तैयार कर रहे हैं।

समुद्र में पाई जाने वाली जलचर जातियों की प्रायः 14 हजार शाखाएँ अब तक ढूँढ़ निकाली गई है अभी इनमें नई कड़ियाँ जुड़ते जाने का सिलसिला जारी है। माँद खोदकर समुद्र तल में रहने और रेंगने वाले कीड़े वेन्थोस—मछली जैसे तैरने वाले नेक्टन— पौधे वनस्पति के रूप में विकसित प्लेँक्टन इन तीन वर्गों में इन जलचरों को विभक्त किया जाता है।

समुद्र तल में पर्वत और पहाड़ियाँ भी कम नहीं है प्रशान्त महासागर में अब तक 500 समतल चोटी वाले ऐसे पहाड़−खोजे जा चुके हैं जिनकी ऊँचाई 1520 से लेकर 18500 मीटर तक की है।

खनिज सम्पदा, खाद्य−पदार्थ, रासायनिक वस्तु, प्रबाल मोती आदि न जाने कितने प्रकार क सम्पत्तियाँ समुद्र तक में छिपी पड़ी है। धरती के वैभव की तुलना में समुद्र की तुलना उसे विस्तार अनुपात से कम नहीं अधिक ही कूती गई है। इस धरती का दो तिहाई से अधिक भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। अनुमान है कि खुली भूमि में पाई जाने वाली सम्पत्ति की तुलना में समुद्री सम्पत्ति उसी हिसाब से छिपी होनी चाहिए। मनुष्य की आँखें अब समुद्र की ओर ललचाई दृष्टि से देख रही हैं अन्तः जीवन की विभूतियों को भी यदि इसी अनुपात से देखा समझा जा सके और उसे खोजने, प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय तो फिर हम थलचरों को किसी प्रकार की कोई कमी न रहेगी

न केवल सम्पत्ति की दृष्टि से वरन् शक्ति की दृष्टि से भी समुद्र की गरिमा आश्चर्यजनक है। हमारी शारीरिक बौद्धिक और आर्थिक क्षमता जितनी है उसी तुलना में मनोबल और आत्मबल कह महत्ता भी असंख्य गुनी बढ़ी चढ़ी है। शक्ति की इच्छा एवं आवश्यकता सभी को रहती है, पर यह भुला दिया जाता है कि उसका भूल स्त्रोत अन्ती जीवन में ही सन्निहित है। समुद्री शक्ति और उसके द्वारा थल क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का यदि अध्ययन करें तो प्रतीत होगा कि सूक्ष्म जीवन की स्थिति भी हमारे बहिरंग जीवन को उसी प्रकार प्रभावित करती है।

धरती को मौसम सूर्य,हवा और समुद्र इन तीनों के योगदान से बनता बदलता है।सूर्य से जितनी गर्मी पृथ्वी को प्राप्त होती है उसका चौथाई भाग समुद्र के पानी को भाप बनाकर उड़ाने में खर्च होता है। प्रायः 3॰5 लाख धन किलो मीटर पानी भाप बनकर हवा में उड़ता है। बादल बनकर बरसता है और फिर समुद्र में वापिस लौट आता है।

समुद्री जल का तापमान उसी सतह के अनुसार भिन्न−भिन्न स्तर का पाया जाता है। सूर्य की गर्मी से समुद्र जल 50 से 90 मीटर तक प्रभावित होता है। इसके बाद तापक्रम एकदम गिर जाता है। इस परत को थर्मोक्लाइन ठंडी पेटी कहते हैं। नीचे और ऊपर के समुद्र तक के बीच की यह विभाजन रेखा है। यह पट्टी दिन में कुछ नीचे चली जाती है और रात को ऊपर उठ आती है। इस पट्टी में छिप कर बैठी हुई पनडुब्बियां खोजकर्त्ताओं की पकड़ में मुश्किल से ही आती हैं।

समुद्र निश्चल नहीं है उसमें हरकतें बराबर होती रहती हैं। पृथ्वी के घूमने से, हवा के झोकों से, चन्द्रमा के आकर्षण से, गिरने वाली नदियों के प्रवाह से, बादलों की उठक−पटक से, जलचरों की चलबली से भीतर ही भीतर अनेक प्रकार की हरकतें होती रहती हैं। लहरों के छोटे−बड़े उछाल देखकर समुद्री हरकतों का पता सहज ही लगाया जा सकता है। अगाध जलराशि के भीतर महानदी की तरह कितने ही प्रचण्ड प्रवाह विभिन्न देशों में बहते रहते हैं।गरम पानी की गल्फस्ट्रीम धारा उत्तरी योरोप को और क्यूरेशीवो धारा जापान क्षेत्र के मौसम को अनुकूल बनाने में बहुत सहायता करती है। ऐसी ही अन्यान्य धाराएँ हैं जो अपने ढंग की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करती हैं, इनमें उत्तरी सागरों की लैब्रोडोर− ओखोटस्क सागर की ओयाशीवो, का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह एक दिशा में नहीं, वरन् विपरीत दिशाओं में भी बहती रहती है।

प्रो. पोटर्सन के अनुसार समुद्र में प्रति सेकेंड दो लाख मैट्रिक टन के हिसाब से गर्मी के दिनों में भाप उठती है। गर्मी के अनुपात से यह न्यूनाधिक होती रहती है। लाल सागर का पानी सबसे अधिक भाप बनकर उड़ता है। यदि यह भार अकेले इसी के ऊपर रहा होता तो वह कब का सूख गया होता। पर वैसा इसलिए नहीं हो सकता कि हिन्द सागर का पानी उसकी सहायता के लिए बराबर पहुँचता रहता है। दोनों में से किसी को अभाव की अनुभूति नहीं होती। वे मिल−जुलकर अपनी सम्पदा को मिल बाँट लेते हैं और मजे का निर्वाह करते हैं।

लाल सागर और हिन्द महासागर का पानी जिस रेखा पर मिलता गिरता है, उस स्थान पर यदि बाँध बनाया जा सकना सम्भव हो सके तो अकेले उसी स्थान से पचास लाख हार्स पावर बिजली उत्पन्न की जा सकती है। ठीक इसी प्रकार ज्वार−भाटे भी शक्ति के स्त्रोत हैं। पानी ऊपर उठता है और फिर निचले गिरता है यह उठक−पटक इतनी सशक्त होती है कि यदि उसे काबू में दिया जा सके तो समस्त संसार की बिजली की आवश्यकता अकेले उसी माध्यम से पूरी की जा सकती हैं। यों समुद्री लहरें भी थोड़ी बहुत हलचल तो पैदा करती ही हैं और उनसे भी छोटी मात्रा में शक्ति उत्पन्न करने वाले बिजली−घर बन सकते हैं। नदी, नालों के पानी को ऊपर से नीचे गिरने या गिराने की जहाँ व्यवस्था हो सकी हैं, वहाँ बिजलीघरों, पनचक्कियों तथा कितने ही कल−कारखानों का संचालन किया जाता है।

ज्वार की पानी जब ऊपर उठ जाय तब नीचे गिरते समय उसकी गति पर रोकथाम करली जाय तो इतने से ही सशक्त टरबाइन चल सकते हैं। आमतौर से ज्वार दस से लेकर बीस फुट तक ऊंचाई के होते हैं। इतना उभार अच्छे बिजलीघर चलाने के लिए पर्याप्त है। सेवन के ज्वार तो पचास−साठ फुट तक ऊँचे होते हैं। उनके शक्ति तो अनुपात के आधार पर और भी अधिक ठहरती हैं।

हिसाब लगाया गया है कि परमाणु बम बनाने पर अब तक जितना खर्च हो चुका है यदि उतना धन समुद्र से बिजली उत्पन्न करने पर खर्च किया गया होता तो इन दिनों संसार भर में खर्च होने वाली बिजली उत्पन्न करने का सरल और सस्ता मार्ग निकल आया होता होता और उस बिजली की सहायता से मानवी श्रम में बचत करने तथा उद्योग वृद्धि के द्वारा समृद्धि बढ़ाने में अब तक आश्चर्य जनक सफलता मिल चुकी होती।

भूमध्य सागर से बादल जितना पानी उड़ा ले जाते हैं उसकी पूर्ति मिस्र की नील नदी पूरा नहीं कर पाती। इस क्षति की पूर्ति उसे अन्ध महासागर की सहायता लेकर करनी पड़ती है, अनुमान है कि अन्ध महासागर की स्थिति अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए भूमध्य सागर जिव्राल्टर की खाड़ी के रास्ते प्रायः एक मिनट में 18 करोड़ क्यविक फुट पानी का अनुदान अनवरत रूप से देर रहता है।

समुद्र में एक और शक्ति स्त्रोत है− उसकी ऊपरी और निचली सतह के बीच पाया जाने वाला तापमान का अन्तर। इस सर्दी को गर्मी के पेट में से और गर्मी को सर्दी के पेट में से गुजारा जाय तो शक्ति का एक आधार सामने आता है। उससे विशालकाय टरबाइन चल सकते हैं। फ्राँसीसी समुद्र विज्ञानी एम जार्ज क्लाड के मतानुसार बीव डिग्री फारेनहाइट तापमान या अन्तर के माध्यम से हर मिनट में साठ किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है, इस गणना के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है, समुद्र के ऊपरी तथा नीचे की पर्तों को तापमान यदि एक दूसरे को सहयोग देने के लिए तैयार किया जा सके तो अपना शक्ति भंडार का एक नया आधार सामने आ खड़ा होगा।

इटली के कैप्टिन क्रिनोची ने समुद्री हलचलों का सहारा लेकर बिजली उत्पन्न करने का प्रयास किया था। उन्हें मारकोनी जैसे वैज्ञानिकों ने प्रामाणिक ठहराया था। इटली की नेशनल रिसर्च कौंसिल ने एक ऐसा प्लाट बनाया भी था पर द्वितीय विश्व− युद्ध की भगदड़ में वे प्रयत्न खटाई में पड़ गये।

प्रचण्ड शक्ति ऐसे ही अस्त−व्यस्त और बिखरी पड़ी रहती है यदि उसे निग्रहीत और व्यवस्थित किया जा सके, अभीष्ट प्रयोजनों में लगाया जो सके तो मानवी वैभव चरमसीमा तक पहुँच सकता है और धरती वालों को इनने सुख−साधन मिल सकते हैं कि वे देवताओं की तुलना में समृद्ध माने जा सकें। अन्तः जीवन की प्रवृत्तियाँ और क्षमताओं को निग्रहित करके यदि सुव्यवस्थित प्रयोजन में लगाया जा सके तो जीवन को समुन्नत बनाने में उसका लाभ इतनी बड़ी मात्रा में मिल सकता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े। समुद्री शक्ति को नियन्त्रित करके अभीष्ट प्रयोजन में लगाने का प्रयत्न जिस प्रकार वैज्ञानिक क्षेत्र में चल रहा है उसी प्रकार यदि अध्यात्म विज्ञान क्षेत्र में मनुष्य की अन्तःचेतना के विकास विस्तार का —सत्प्रयोजनों में नियोजित करने का प्रयत्न किया जा सके तो उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ निश्चित रूप से मूर्तिमान हो सकती हैं।


Quotation

अगर आपके दोस्त आपको सच्चा बताते हैं तो मैं आपको सच्चा मानने में जरूर झिझकूँगा, अगर आपके बैरी आपको सच्चा बताते हैं तो मैं बिना झिझक आपको सच्च मान लूँगा।

महात्मा भगवानदीन


वहाँ के बौद्ध धर्मानुयायी (kahani)

जापानी भाषा में उन दिनों बौद्ध धर्म सूत्र उपलब्ध नहीं थे और वहाँ के बौद्ध धर्मानुयायी इस कमी को पूरा करना चाहते थे।

विद्वान तेत्सुजेन न उन्हें जापानी में प्रकाशित करने के लिए धन एकत्रित करना आरम्भ किया। दस वर्षों में वह इतना हो गया कि ग्रन्थ छप सके।

ग्रन्थ छपने को ही थे कि यूजी नदी में बाढ़ आ गई और तेत्सुजेन ने वह धन बाढ़ पीड़ितों की सहायता में लगा दिया। इसके बाद उसने चन्दा फिर जमा किया। दस वर्षों के कठिन परिश्रम से कहीं उतना धन फिर जमा हो सका। इतने में महामारी फैली और वह धन फिर विपत्तिग्रस्तों की सहायता में उसने लगा दिया। इसके बाद तेत्सुजेन न फिर धन संग्रह आरम्भ किया। इस बार उसे उतना धन जमा करने में बीस वर्ष लग गये।

चालीस वर्ष के अथक् परिश्रम में बिना हारे संलग्न रहकर तेत्सुजेन ने वह ग्रन्थ छपाये। जापानी बौद्ध अक्सर यह कहते रहते हैं। इन ग्रंथों के तीन संस्करण छप हैं। अन्तिम एक चर्मचक्षुओं से देखा पढ़ा जा सकता है, किन्तु दो अदृश्य संस्करण जिन्हें विवेकवान कभी भी देख पढ़ सकते हैं।


कर्त्तव्य निष्ठा का अनवरत आनन्द

अभीष्ट आकांक्षाएं पूरी हो भी सकेंगी या नहीं यह सर्वथा संदिग्ध है। आवश्यक नहीं कि जो कुछ हम सोचते या चाहते हैं वह होकर ही रहे। सफलता केवल चाहने पर निर्भर नहीं रहती। उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यदि साधन न जुटाये जा सकें तो अभीष्ट परिणाम कैसे प्रस्तुत होगा। आवश्यक साधन जुटाने के लिए अपनी योग्यतम, क्षमता और प्रतिभा को विकासोन्मुख होना पड़ता है। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक क्षमताओं के संवर्धन से व्यक्तित्व में प्रखरता आती है और उसी का उपयोग करके आमतौर से वे साधन जुटते हैं जिनसे अभीष्ट मनोरथों की पूर्ति का पथ− प्रशस्त हो सके। साधन ही सफलता के समीप ले पहुँचते हैं। साधन न जुट सके तो मनोरथों का पूरा हो सकना कठिन है। यह व्यवधान बना रहे तो असफलता के अतिरिक्त और क्या हाथ लगेगा।

हमारी यह इच्छा है, इसलिए उसकी पूर्ति होनी ही चाहिए यह कोई तर्क नहीं है। देखना यह भी पड़ेगा कि जो चाहते हैं उसके लिए आवश्यक साधन जुटाये भी जा सकेंगे या नहीं। यह साधन दूसरों के सहयोग पर भी बहुत हद तक निर्भर रहते हैं। दूसरों को सहयोग के लिए, सहमत करने के लिए अपना व्यक्तित्व आकर्षक और मृदुल होना चाहिए। कटु,कर्कश और रूखे मनुष्य अकारण विद्वेष मोल लेते हैं और जिनसे सहायता की आशा थी उन्हें विरोधी बना लेते हैं। अपनी बौद्धिक योग्यता स्वल्प हो तभी परिस्थितियों के मोड़ के साथ ताल−मेल नहीं बैठता और आवश्यक साधन नहीं जुटते। साहस अथवा धैर्य के अभाव में भी मनुष्य हड़बड़ा जाता है। और सम्भावित सफलता को पीछे धकेल देता है। ऐसी दशा में सफलता की सम्भावना धूमिल होती चली जाती है।

परिस्थितियों का उतार चढ़ाव भी विलक्षण होता है। घटनाएँ कई बार ऐसे अप्रत्याशित रूप से घटित होती हैं कि नजदीक आई सफलता उलट कर असम्भव बन जाती हैं। ऐसे उलट−फेर अपने हाथ से बाहर होते हैं इस संसार में परिस्थितियों की अनेकों धाराएँ बहती हैं। आँधी−तूफान की तरह कई बार उनका रुख हमारी दिशा में बहुत सहायक होता है और कई बार व उतना विपरीत होता है कि एक कदम भी आगे बढ़ते नहीं बन पड़ता। साहसी, सद्गुणी और क्षमता सम्पन्न व्यक्ति भी इन विपरीत परिस्थितियों में असहाय हो जाता है। जो सोचा गया है— जिसके लिए प्रयास किया गया है वह अवश्य ही पूरा होकर रहेगा, इसका कोई निश्चय नहीं। अपवाद ऐसे भी कम नहीं होते जिनमें सुयोग्य व्यक्तियों के पल्ले असफलता बँधी और अयोग्य ने अन्धे के हाथ बटेर लगने की उक्ति को चरितार्थ किया।

ऐसी ही अनेकों विडम्बनाएँ है जिनमें हम घिरे और जकड़े हुए हैं। आकाँक्षा, पुरुषार्थ की प्रबलता होते हुए भी अनेक कारण ऐसे हैं जो अभीष्ट सफलता की बात सुनिश्चित नहीं रहने देते। यों सत्प्रयत्नों का सत्यपरिणाम तो होता ही है और बहुत करके सफलताएँ भी उसी आधार पर मिलती हैं। किन्तु इतने पर भी दावा नहीं किया जा सकता कि हर सुयोग्य और हर प्रयत्नशील को सफलता उतनी मात्रा में मिल ही जायगी कि सोचा या चाहा गया है।

सफलता की प्रतिक्रिया मन पर आघात करती है। उससे निराशा होती है और खीज भी। कई बार तो यह आघात इतने गहरे होते हैं कि भविष्य में कुछ करने की हिम्मत जुटाना ही कठिन हो जाता है। कई व्यक्ति बेतरह टूट जाते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए यह मान लेते हैं कि अपना भविष्य अन्धकारमय है। ऐसी मनःस्थिति में दुबारा न तो उत्साह वर्धक सोचते बनता है और न हिम्मत के साथ कोई बड़े कदम उठाने का साहस होता है। जिनका अन्तर खोखला हो गया उनका बहिरंग पुरुषार्थ भी कैसे जगेगा और जहाँ भीतर बाहर का अवसाद छाया हुआ हो वहाँ उज्ज्वल भविष्य का सुर्योदय कहाँ होगा। असफलताएं कई बार दुर्बल मन वालों पर ऐसा ही अभिशाप पटक जाती हैं जिनके कारण वे सचमुच गई गुजरी स्थिति में दिन काटने के दुर्भाग्य के साथ समझौता कर लेते हैं और निराशा भरी मनःस्थिति में मौत के दिन पूरे करते हैं।

इन सब जंजालों से बचने को एकमात्र तरीका यह है कि हम कर्त्तव्य−कर्म को अपन लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिए किये गये पुरुषार्थों को ही सफलता जितना आ नन्द उपहार स्वीकार करलें। सचमुच कर्त्तव्य कर्म में उत्साह और आनन्द पूर्वक निरत रहने वाली निष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रहना एक उच्चकोटि की भावनात्मक सफलता ही है। जिसने इस सफलता को आनंददायक और सन्तोषजनक मान लिये उसे दृश्यमान सफलता के मिलने न मिलने की चिन्ता नहीं रहती वह अपने प्रयास पुरुषार्थ की उत्कृष्टता को ही सफलता मानकर सन्तोष कर लेता है और हर भले−बुरे परिणाम को खिलाड़ी की हार −जीत मानकर मुसकराते हुए स्वीकार करता रहता है।

कर्त्तव्य−कर्म निष्ठावान होना ही मानवी पुरुषार्थ की चरमसीमा है। अभीष्ट भौतिक परिणाम दैवाधीन हैं। अनेकों अविज्ञात कारण सफलता प्राप्त होने के मार्ग में सहायक बाधक होते रहते हैं। इसलिए यह अनुमान कदाचित ही खरा उतरता है कि इतना पुरुषार्थ करने पर इतने समय में अथवा साधनों से इतनी सफला प्राप्त करली जायगी। घटना क्रम किस प्रकार घटित होता जा रहा है इसे कोई नहीं जानता। ऐसी दशा में अनिश्चित को निश्चित मानकर चलने वालों को अगले दिनों निराश होना पड़े इसकी आशंका बनी ही रहेगी। आतुर फलाशा जब निराशा में परिणत होती है तो आदमी को आसमान से गिरकर पाताल में जा टकराने जितना कष्ट होता है। कई बार तो उसकी हड्डी−पसली इस बुरी तरह टूटती हैं कि भविष्य के लिए वह एक प्रकार का अपंग ही बनकर रह जाता हैं।

स्थिति का विश्लेषण करने वाले विज्ञान मनीषियों ने हमारे लिए सुरक्षित और सुनिश्चित मार्ग यह बताया है कि सफलता के लिए लक्ष्य निर्धारित करें— उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ करें— साधन जुटायें। इतने पर भी निर्दिष्ट फल मिल ही जायगा इसके सम्बन्ध में प्रस्तुत अनिश्चितता को भी ध्यान में रखें और इसके लिए अपनी मनोभूमि को तैयार रखें कि मनोरथ पूरा न हुआ तो भी बिना खीज और निराशा के आगत का स्वागत किया जायगा। अपने को टूटने न दिया जायगा।

इस प्रकार की सन्तुलित मनःस्थिति केवल उन्हें ही प्राप्त हो सकती है जो कर्त्तव्य कर्म को अपनी सीमा मर्यादा मान ले और उसके लिए जो तत्परता बरती गई है उसे ही सन्तोषजनक मान लें। सफलता को मनुष्य के गौरव की कसौटी नहीं माना जा सकता। प्रतिष्ठा उसकी कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ जुड़ी रहती हैं। असफल व्यक्तियों की सूची में वे समस्त महामानव गिने जा सकते हैं जिन्होंने उच्च आदर्शों के लिए अत्यन्त कष्ट सहें, और जो सदुद्देश्यों के लिए बलिदान हो गये। मोटी दृष्टि से इन्हें असफल ही कहा जायगा। जो परिस्थितियाँ वे प्राप्त करना चाहते थे वे कहाँ मिलीं। उलटे स्वयं ही विपत्ति में फँस गये। ऐसी दशा में कोई अदूरदर्शी उन्हें असफल अथवा दुर्भाग्य ग्रस्त ही कहेगा और इस श्रेणी में संसार के समस्त त्याग, बलिदान करने वाले लोगों को गिनेगा। इसके इस निष्कर्ष को भला बुद्धिमत्तापूर्ण कैसे ठहराया जा सकेगा।

इसी प्रकार अनीति पूर्वक दुष्ट दुष्प्रवृत्तियां अपनाकर अनेकानेक सफलताएँ प्राप्त करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। आज तो उन्हीं का बाहुल्य है। इन सफल मनोरथ व्यक्तियों के लिए पदार्थ एवं परिस्थितियों रुचिकर मिल गई सो ठीक है, पर उन्हें न तो आत्म−सन्तोष ही मिलेगा और न लोक−सम्मान ही। ईश्वर की दृष्टि में भी वे घृणित ही समझे जायेंगे।इतनी महती हानि उठाकर जिनने कुछ भौतिक लाभ उठा लिए उन्हें सफल या सौभाग्यशाली नहीं कहा, माना जाना चाहिए।

कर्त्तव्य −कर्म पूर्णतया मनुष्य के हाथ में है। उसे वह पूरी ईमानदारी एवं तत्परता के साथ करता रह सकता हैं। अपने हिस्से का— अप ने हाथ का काम पूरा कर लिया जाय इतना ही सम्भव भी है और इतना ही पर्याप्त भी। इसलिए विवेकवान व्यक्ति कर्त्तव्यनिष्ठा को ही अपना लक्ष्य मानते हैं और उसमें जितनी अधिक उत्कृष्टता बरती गई उसी को सफलता का चरम बिंदु मानते हैं। यों कुछ भौतिक सफलता पाने का भी मनोरथ तो रहता ही है और उसी आधार पर कार्य−पद्धति का दिशा निर्धारण भी किया जाता है पर यह सब आरंभिक रूपरेखा बनाते समय ही ध्यान में रखने की बात होती है। जब दूरदर्शिता पूर्वक यह निर्धारण हो गया कि हमें इस दिशा में चलना है तो फिर यह सोचने की जरूरत नहीं पड़ती कि जिस हद की सफलता जितने समय में मिलने की बात सोची गई थी, वह बात बनी या नहीं।

प्रगति की चाल तेज या मन्द होना सर्वथा अपने ही हाथ में कहाँ होती है, हवा पीछे की चलने लगे तो नाव उल्टी ही निर्दिष्ट स्थान पर जा पहुँचती है और यदि हवा उलटी चले तो विलम्ब भी लगता है और श्रम भी पड़ता है। कई बार तो रास्ते में रु कने या लौटना भी पड़ता है। इसमें मल्लाह को कौन दोष देगा? हवा के रु ख न यदि अधिक जल्दी नाव किनारे लगाई तो इसमें मल्लाह को कोई श्रेय नहीं और यदि देर लगी तो भी उसका दोष नहीं। मल्लाह केवल इतने भर को श्रेयाधिकारी है कि उसने सतत जागरूकता और तत्परता बनाये रखी या नहीं। यदि वह इस कसौटी पर खरा होता है तो नाव उलट जाने पर भी उसकी गौरव गरिमा सराही ही जाती रहेगी।

हमें जो करना चाहिए था व पूर ईमानदारी से किया गया हमारे पास जो साधन थे उन्हें अभीष्ट लक्ष्य के लिए तत्परता पूर्वक प्रयुक्त किया गया—इन दो परीक्षाओं में यदि हम खरे उतरते हैं उस उत्तीर्णता को ही उच्चस्तरीय सफलता माना जा सकता है और प्रसन्न रहा जा सकता है। इस प्रकार की मान्यता बना लेने पर ही घड़ी अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा पर गौरवान्वित होने का — सन्तोष व्यक्त करने का अवसर बना रहेगा। जब कभी अभीष्ट सफलता सामने आवेगी तब तक के लिए अपनी प्रसन्नता रोके रहने की उन्हें जरूरत नहीं पड़ती; जो कर्त्तव्य−कर्म को ही सफलता का प्रतीक मानकर चलते हैं। सच तो यह हैं कि कर्त्तव्यनिष्ठ का हर घड़ी,हर क्षण जो सन्तोष मिलता है वही इतना गहरा और पर्याप्त होता है कि उसके रहते दृश्य मान सफलता का कोई बड़ा महत्व नहीं रह जाता। जो अनुदान पग −पग पर मिल रहा है उसके लिए आशा लगाये रहने या प्रतीक्षा करने की आवश्यकता भी क्यों पड़ेगी?

कर्त्तव्यनिष्ठ की आन्तरिक क्षमताएँ दिन−दिन परिपुष्ट होती चली जाती हैं। वह अपने गुण,कर्म, स्वभाव का स्तर बढ़ाने में निरन्तर निरत रहता है ताकि अधिक सुन्दरता के साथ कर्त्तव्यों का पालन करते रहना सम्भव हो सके। आशा −निराशा के झूले में जिसे झूलना नहीं पड़ रहा है, वह सन्तुलित मनःस्थिति में अपने प्रयास जारी रख सकेगा। फलतः उतावले लोगों की तुलना में उसकी भौतिक सफलता भी अधिक सुनिश्चित रहेगी। फल की ओर दृष्टि लगाये रहने वाले जड़ को नहीं साँच सकते। ऊपर टकराती लगाने से सामने की स्थिति का ध्यान छूट जाता है और पैर में ठोकर खाकर औंधे, मुँह गिरने का खतरा रहता है।


Quotation

सुख और आनन्द की खोज बाहर करते हैं; लेकिन व अन्दर ही है।

— रवीन्द्रनाथ टैगोर

शहद पर बेतरह टूट पड़ने वाली मक्खी अपने पर और पैर उसमें चिपका लेती है और बेमौत मरती है इसकी अपेक्षा वह मक्खी नफे में रहती है जो चासनी से थोड़ा पीछे हठकर बैठती है और स्वादपूर्ण मिठास का रस लेती है। फलाशा की आतुरता में मिलने वाली वस्तु का आनन्द ही चला जाता है, जब कभी अभीष्ट मनोरथ पूरा हो गया तब थोड़ा सी प्रसन्नता होगी किन्तु इस बीच विलम्ब लगने और आशंका रहने और व्यवधान पड़ने के जो अवसर आते हैं उनमें अनेकानेक आघात लगते रहते हैं, वे सब मिलकर इतने भारी बैठते हैँ कि अन्तिम सफलता का आनन्द उनकी तुलना में तुच्छ बैठे, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए गीताकार ने अनासक्त कर्मयोग की शिक्षा दी है। सफलता की आनन्द लेने के हर इच्छुक को इसी मार्ग का सहारा लेकर अभीष्ट दिशा में चलना अधिक लाभदायक रहता है और अधिक आनन्ददायक भी।


नीच और ऊँच की पहचान

रूस के राजा एलेग्जेण्डर अक्सर अपने देश की आन्तरिक दशा जानने के लिए वेश बदल कर पैदल घूमने जाया करते थे। एक दिन घूमते−घूमते एक नगीर में पहुँचे, वहाँ का रास्ता उन्हें मालूम न था। राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढ़े।

आगे उन्होंने एक हवलदार सरकार की वर्दी पहने हुए देखा। राजा ने उसके पास जाकर पूछा महाशय, अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिए। हवलदार ने अकड़ कर कहा— “मूर्ख! तू देखता नहीं, मैं सरकारी हाकिम हूँ मेरा काम रास्ता बताना नहीं है। चल हट, किसी दूसरे से पूछ।” राजा ने नम्रता से पूछा — ‘महोदय, यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बतादें तो कुछ हर्ज थोड़ा ही है। खैर, मैं किसी दूसरे से पूछ लूँगा; पर इतना तो बता दीजिए कि आप किस पद पर काम करते है?”

हवलदार न और भी ऐंठते हुए कहा— “ अन्धा है क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ।’ एलेग्जेंडर ने कहा— शायद आप पुलिस के सिपाही हैं। ‘ उसने कहा नहीं उससे ऊँचा।’

राजा—” तब क्या नायक हैं?”

हवलदार—,’उससे भी ऊँचा।”

राजा—” हवलदार हैं?”

हवलदार—” हाँ, अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ, पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब? और तू कौन है?”

राजा ने कहा मैं भी सरकारी आदमी हूँ। सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई, उसने पूछा, ‘क्या तुम नायक हो? राजा ने कहा— नहीं उससे ऊँचा।’

हवलदार — तब क्या आप हवलदार?

राजा—’उससे भी ऊँचा।’

हवलदार—’दरोगा?’

राजा—’ उससे भी ऊँचा।’

हवलदार—’कप्तान?’

राजा—’उससे भी ऊँचा।’

हवलदार—”सूबेदार?”

राजा—”उससे भी ऊँचा।”

अब तो हवलदार घबराने लगा, उसने पूछा—’तब आप मन्त्री जी हैं?’ राजा ने कहा ‘भाई बस एक सीढ़ी और बाकी रह गई है।’ सिपाही ने गौर से देखा तो सादा पोशाक में बादशाह एलेग्जेण्डर सामने खड़े हैं। हवलदार के होश उड़ गये, वह गिड़गिड़ाता हुआ बादशाह के पाँवों पर गिर पड़ा और बड़ी दीनता से अपने अपराध की माफी मांगने लगा।

राजा ने कहा—’माफी माँगने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूँ कि जो जितने नीच हैं, वह उतने ही अकड़ते हैं। जब तुम बड़े बनोगे तो मेरी तरह तुम भी नम्रता का बर्ताव सीखोगे। जो जितना ही ऊँचा है वह उतना ही सहनशील एवं नम्र होता है और जो जितना नीच एवं ओछा होता है, वह उतना ही ऐंठा रहता है।


हसीदी धर्मगुरु बालशेम (kahani)

कितने ही धर्म प्रेमी हसीदी धर्मगुरु बालशेम के पास जाकर आग्रह करने लगे—’गुरु देव! आपके शिष्य यहीएल मिरवाल से हम लोग कई बार गुरु का पद स्वीकार करने के लिए कह चुके हैं, पर वह हर बार अनसुनी कर देते हैं। यदि आप उनसे कहें तो सम्भवतः आपके आदेश की अवहेलना वह न कर सकेंगे।’

धर्मगुरु बालशेम ने मिरवाल को बुलाकर कहा− ‘तुम्हें अपनी जिद छोड़ देनी चाहिए। जानते हो मेरे आदेश की अवहेलना तुम्हें न इस लोक का रखेगी और न परलोक का।’

शिष्य का उत्तर था—’भले ही मेरे दोनों लोक चले जायें मुझे इस बात की चिन्ता नहीं है, पर मैं यह उचित नहीं समझता कि जिस पद के योग्य नहीं हूँ उसे स्वीकार कर लोगों को गुमराह करूं।’


ऊँची उड़ाने पर लक्ष्य विहीन

मनुष्य गतिशील हो रहा है, उसकी प्रगति आकाँक्षाएँ राकेटों की तरह दूरगामी छलाँगें भर रही हैं। वह आगे बढ़ना चाहता है और ऊंचा उठना चाहता है —सीमा बन्धनों को तोड़ कर असीम के साथ सम्बन्ध जोड़ने की उसकी महत्वाकाँक्षा है। इस महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए उसने विज्ञान का सहारा लिया है और बिना पंखों के उड़ने वाले राकेटों के रूप में अभिनव उपकरण तैयार किये हैं। ये राकेट गजब के हैं। वे एक शक्ति शाली धक्के के साथ अन्तरिक्ष में धकेल दिये जाते हैं। निर्धारित गति के अनुसार वे उड़ते हैं और निर्दिष्ट लक्ष्य तक आ पहुँचते हैं। लक्ष्य−वेध की आकाँक्षा भौतिक जगत में एक सीमा तक पूरी हो सकी, इसकी साक्षी देता हुआ राकेट विकास हमारे सामने गर्वोन्नत मस्तक सा खड़ा है।

द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी के बी. 1 और बी. 2 राकेटों ने मित्र राष्ट्रों की नाकों में दम कर दिया था। एकबार तो ऐसा लगने लगा था कि इंग्लैंड का पूर्ण विनाश करके ही यह राकेट दम लेंगे। पाशा पलटा मित्र शत्रु हुए और शत्रु मित्र। रूस और जर्मनी में खटकी। फलस्वरूप रूस के उसी प्रकार के राकेटों ने जर्मनी की चमड़ी उधेड़ कर रखदी और लड़ाई का नक्शा ही बदल गया। विजय की सम्भावना पराजय में और पराजय की आशंका विजय में बदल गई।

युद्ध की दृष्टि से यह राकेटों का युग है अब आमने−सामने खड़े होकर तीर, तलवार या तोप, बन्दूक चलाने की आवश्यकता नहीं रही। प्रयोगशाला में बटन दबते ही राकेटों के दैत्य आकाश में उड़ने लगते हैं और शब्दबेधी बाण का कथा गाथा को साकार करते हुए निर्धारित लक्ष्य पर जा गिरते हैं और अपनी प्रचण्ड विस्फोट शक्ति से महाविनाश के दृश्य उपस्थित करते हैं। भविष्य में तीसरा महायुद्ध हुआ तो उसका प्रधान आयुध राकेट ही होगा। उस पर लाद कर अणुबम, गैस बम, बारूद बम,मृत्यु−किरणबल अथवा जो कुछ भी भेजे जाया करेंगे वे प्रति पक्षी को महामरण के— महाविनाश के श्मशान में जलाया करेंगे। इन युद्धरत पक्षों में से किसको जीवित रहने का सौभाग्य मिलेगा यह पीछे की बात है— पर इतना निश्चय है कि अब युद्ध में बाहुबल अथवा शौर्य, साहस की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। वैज्ञानिक उपकरण और उनके संचालक का कौशल ही भावी युद्ध में निर्णायक फैसला कर देंगे।

राकेट जिसने युद्धकला की परम्परागत समस्त परम्पराओं और सम्भावनाओं को उलट कर रख दिया आखिर है क्या? उसमें शक्ति कहाँ से आती है? वह अपना क्रियाकलाप कैसे सम्पन्न करता है? इसकी जिज्ञासा जनसाधारण को हो तो यह उचित ही है। मनुष्य जाति के भाग्य का फैसला करने की क्षमता जिस महादैत्य ने अपनी मुट्ठी में समेट ली है, उसका सामान्य परिचय और क्रियाकलाप हमें विदित रहें यह उचित भी है और आवश्यकता भी।

यान्त्रिकी विद्या क विद्यार्थी ‘ क्रिया की प्रतिक्रिया’ का प्रकृति नियम भली प्रकार जानत हैं। जीवधारियों के सामान्य शारीरिक क्रिया−कलाप तक इसी आधार पर होते हैं। नाव का खेना, पानी में तैरा, पक्षियों का उड़ना जैसे क्रिया कलापों में क्रिया की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाली शक्ति ही काम करती है। न्यूटन ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का ही विवेचन नहीं किया है उसने यह भी सिद्ध किया है कि प्रत्येक क्रिया की एक समान और विरोधी प्रतिक्रिया भी होती है। राकेट का निर्माण भी इस सिद्धान्त के आधार पर हुआ है।

राकेट सिद्धान्त को विकसित करने का श्रेय रूसी वैज्ञानिक सलकोब्सकी को है। उनके बताये आधारों को राकेट सूत्र क हते हैं। उनने राकेट निर्माण के लिए दो तथ्य प्रस्तुत किये थे। (1) इंजन से निकलने वाली गैस की धारा की गति (2)राकेट के कलेवर और उसमें भरे ईंधन का अनुपात। ईधन जितना अधिक और आवरण जितना हलका होगा उसी अनुपात से राकेट की गति बढ़ेगी और वह अधिक ऊँचाई तथा अधिक दूरी तक जा सकेगा।

जर्मनी का बी. 2 राकेट 47 फुट लम्बा 6 फुट चौड़ा होता था। उसकी नोंक में करीब एक टन वाष्प भरी रहती थी। उसमें ईधन 9 टन था और कलेवर 4 टन इस स्थिति में वह एक सेकेंड में एक मील की चाल से चलता था। ईधन में 4 टन शुद्ध पेट्रोल और शेष वजन ऑक्सीजन का था। गैस में आग लगते ही राकेट का दबाव भार ठीक दूना हो जाता था और वह उछल कर आकाश में उड़ने लगता था। विस्फोट के आरम्भिक क्षण में वह एक मिनट के भीतर ही प्रायः 30 मीच ऊँचा उछल जाता था। बस ईधन समाप्त। इस उछाल से उत्पन्न हुई गति को निर्धारित दिशा में मोड़ने और अभीष्ट लक्ष्य पर नीचे गिराने का काम उसमें लगे अन्य यन्त्र करते थे। नीचे गिरते ही वह जमीन से टकराता था और फूटकर विनाश उत्पन्न करता था। यह राकेट युग की आरम्भिक उपलब्धि थी अब उसमें भारी सुधार हुए हैं। उसी क्षमता और बहुमुखी प्रक्रिया कही आगे बढ़ गई है इतने पर भी उसका सूत्र सिद्धान्त वही है, जो सलकोब्स्की ने प्रतिपादित किया था। वे कहते रहते थे ईधन की मात्रा जितनी अधिक होगी और कलेवर जितना हलका होगा राकेट की क्षमता उतनी ही तीव्र की जा सकेगी।

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की पकड़ से छूट निकलने के लिए प्रति सेकेंड सात मील की गति चाहिए। इसे ‘मुक्ति गति’ कहते हैं। युद्ध में काम आने वाले राकेटों में उतनी गति नहीं होती किन्तु अंतर्ग्रही राकेट इस मुक्ति गति से अधिक सामर्थ्यवान होते हैं अस्तु कुछ ही समय में पृथ्वी की सामान्य पकड़ से बाहर निकल कर अपनी विशिष्ट कक्षा में घूमने लगते हैं। इससे भी अधिक सामर्थ्य प्राप्त करने पर वे कक्षा भ्रमण की पकड़ से भी छुटकारा पा लेते हैं और जिस ग्रह की ओर उन्हें उड़ना है उधर ही उन्मुक्त आकाश में उड़ान भरने लगते हैं।

इस प्रकार की अंतर्ग्रही गति प्राप्त करने के लिए चरण राकेटों की शृंखला का आविष्कार किया गया। एक के साथ जुड़े हुए दूसरे और दूसरे के साथ जुड़े हुए तीसरे राकेटों के निर्माण का उद्देश्य यह था कि पहले की शक्ति चुक जाय तो आगे का प्रयोजन पूरा करने में दूसरे की शक्ति काम आये। दूसरा अपना कार्य पूरा कर चुके तो आगे का मोर्चा तीसरा सम्भाले। भूमि से सीधा उड़कर अन्तर्ग्रही गति पकड़ने वाला राकेट बनना कठिन था। उसमें इतने अधिक ईधन की जरूरत पड़ती और भार इतना अधिक हो जाता कि लक्ष्य पूर्ति उसने लिए असंभव हो जाता है।

पिछली अन्तर्ग्रही उड़ानों में यही होता रहा। वे तीन चरण वाले बनाये जाते रहे। राकेट क प्रथम चरण में जो विस्फोट हुआ उसने उसे एक दूरी तक उड़ सकने के लिए उछाल दिया और स्वयं बिछुड़ कर पृथक हो गया। इससे पूरे राकेट का एक बहुत बड़ा भार भाग हट जाने से वह हलका हुआ और कम शक्ति से अधिक ऊँचाई तक उड़ सका। पहले चरण द्वारा दी हुई शक्ति चुकने पर दूसरे का विस्फोट किया गया और उसे भी हटाकर अगल कर दिया गया। अब भार और भी अधिक हलका हो गया केवल तीसरा भाग अधिक छोटा और अधिक हलका रहने से लम्बी उड़ान भर सकने के उपयुक्त रह गया। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र — उसका परिभ्रमण वातावरण इन दोनों परतों से ऊपर निकल जाने पर भार रहित अन्तरिक्ष आ जाता है, उसमें न्यूनतम शक्ति से अधिकतम लम्बी यात्राएँ कर सकना और स्वल्प साधनों से इच्छानुसार गति घटा या बढ़ा लेना सम्भव होता है। इसी आधार पर मनुष्य चन्द्रमा की यात्राएँ करके वापिस लौटा है। मनुष्य रहित राकेटों ने तो कई ग्रहों की यात्राएँ की हैं। इन सब में यही चरण विभाजन सिद्धान्त काम करता रहा है।

चन्द्रमा की यात्रा करके लौटे अमेरिकी और रूसी अन्तरिक्षयानों ने राकेटों की अद्भुत शक्ति का परिचय दिया है। आकाश में मध्यवर्ती स्टेशन बनाने का प्राथमिक परीक्षण पूरा हो चुका है। भावी महायुद्ध में इन राकेटों की ही प्रधान भूमिका होगी। वे एक घण्टे के भीतर ही लाखों वर्षों की सञ्चित मानवी सभ्यता और करोड़ों वर्ष पुरानी इस धरती को तहस−नहस करके रख देंगे। यदि वे रचनात्मक दिशा में चल पड़े तो सौर परिवार तथा ब्रह्माँड विस्तार में बिखरे हुए तारकों के साथ सम्बन्ध बनाने वाले माध्यम स्तर का विकास करेंगे।

चन्द्रमा पर एक अन्तरिक्षयान भेजने पर अमेरिका ने औसतन 8000 करोड़ रुपया खर्च किया है ऐसे लगभग एक दर्जन यान उस राह पर प्रयाण कर चुके हैं। आगे यह योजना सन् 85 तक के लिए बनी हुई है उस पर कुल मिलाकर कितना खर्च होगा यह आश्चर्यचकित करने वाला है। रूस को भी लगभग इतना ही धन खर्च करना पड़ा होगा। आगे अन्तरिक्षयानों पर खर्च बढ़ने ही वाला है। सम्भव है अन्य देश भी इस दौड़ में सम्मिलित हो जाँय और अपने अलग −अलग यान छोड़ने आरम्भ करें।

अब तक छोटे यान ही उड़े है क्यों कि अन्तरिक्ष में रहने वाले मनुष्यों के लिए आहार,जल,वायु तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की अधिक मात्रा में व्यवस्था करनी पड़ेगी। इससे यान का भार बढ़ेगा और उसे उड़ाने के लिए अधिक ईधन की आवश्यकता पड़ेगी।

चन्द्रमा का क्षेत्रफल अपने अफ्रीकी महाद्वीप के बराबर है, इतने बड़े क्षेत्र की ढूँढ़ −खोज करने के लिए काफी समय लगेगा। फिर वहाँ जो कुछ उपयोगी मिलेगा उससे लाभान्वित होने के लिए अनेक साधन जुटाने पड़ेंगे। यह समय साध्य है— श्रम,साध्य और साधन,साध्य। यह सब जुटाने क लिए चन्द्रमा पर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी पड़ेगी जिनमें न केवल अधिक समय ठहराना ही वरन् सुविधा पूर्वक काम करते रह सकना भी सम्भव हो सके। पृथ्वी से चन्द्रमा तक पहुँचने का कार्य जितना कठिन था उससे कम कठिन यह चन्दे निवास की समस्या भी कम जटिल नहीं है।

प्लास्टिक फोम की एक ऐसी किस्म ढूँढ़ गई है जिसके बने मकान चन्द्रमा पर जाये जाने वाले अत्यधिक ताप और शीत से मनुष्य की रक्षा कर सकेंगे। इन मकानों को ‘एयर कंडीशनर ‘ बनाया जायगा। उनमें कृत्रिम ऑक्सीजन पैदा की जाती रहेगी। बिजली, रोशनी आदि पाने में वहाँ सुविधा रहेगी। वहाँ एक जमीन पर पड़ने वाली धूप की ऊष्मा से ही दो हार्सपावर जितनी बिजली उत्पन्न करने की सम्भावनाएँ मौजूद हैं। मल को पुनः खाद्य पदार्थ में और मूत्र को पेय जल में बदल लेने में अब प्रायः पूर्ण सफलता मिल चुकी है। एकबार का खाया−पिया ही उलट−पुलट कर मुद्दतों काम देता रहेगा। नित नये अन्न−जल तलाश करने की कठिनाई से अब सहज ह बचा जा सकता है।

चन्द्रमा पर मनुष्य का मजबूत अड्डा जम जाने के बाद वहाँ से अन्य ग्रहों की यात्रा कर सकना बहुत ही सरल हो जायगा। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पिण्ड छुड़ाने के लिए अन्तरिक्षयान की प्रारम्भिक गति 24800 मील प्रति घण्टा की होनी चाहिए। चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की अपेक्षा छठा भाग मात्र है इसलिए वहाँ से उड़ने के लिए अन्तरिक्षयानों की चाल मात्र 5300 मील प्रति घण्टा हो तो भी काम चल जायगा। ईधन पृथ्वी से भेजना भी आवश्यक नहीं। चन्द्रमा पर बनी अणु भट्टियाँ मनचाही मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करती रहेंगी।

चन्द्रमा के बाद किस ग्रह पर पहुँचा जाय। इस योजना के अंतर्गत अलग सूची में मंगल ग्रह के दो बच्चे उपग्रह नोट किये गये हैं। समूचे मंगल पर चढ़ाई करने से पहले उसके इन बच्चों की नब्ज़ जाँचना ठीक समझा गया है।इन भौम उपग्रहों के नाम हैं— ‘फी बोस’ और ‘डीमोस’।

मंगल का व्यास 4200 मील है। यह पृथ्वी की तरह अपनी धुरी पर घूमता है, उसका दिन इतना ही बड़ा होता है जितना धरती का। धरती पर 24 घण्टे का दिन होता है वहाँ 24 घण्टा 21 मिनट का। मंगल पर जीवधारियों की सम्भावना सौर मण्डल के अन्य ग्रहों की तुलना में कहीं अधिक है। मैरियर− 4 ने सूचनाएँ दी हैं उससे वहाँ वायुमण्डल को उत्साहवर्धक आशा बँधी है। आये हुए चित्रों ने वहाँ के ध्रुव प्रदेश पर ऐसी सफेद पर्तें दिखाई हैं जो सर्दी में गहरी होती हैं और बसन्त में हलकी पड़ जाती हैं। समझा गया है कि यह बर्फ हो सकती है जो ऋतु के अनुरूप जमती और पिघलती है। हरियाली एवं वनस्पति के भी प्रमाण मिले हैं।

अगले 4 सितम्बर 1974 में मंगल पृथ्वी के अत्यधिक समीप होगा। तब उसकी दूरी मात्र 3,40,00,000 मील रह जायगी। उस अवसर पर वहाँ खोजी राकेट पहुँचाना कम खर्चीला रहेगा। इसके लिए काफी समय पहले यान को भेजना पड़ेगा जो न्यूनतम दूरी के ठीक समय तक अपनी यात्रा पूरी करके वहाँ जा पहुँचे। सन् 1976 और 80 के बीच चार वर्षों का समय ऐसा रहेगा जिसमें बृहस्पति,शनि और प्लूटो की खोज खबर लेना अपेक्षाकृत अधिक सरल पड़ेगा। उस समय का लाभ उठाने के लिए वैज्ञानिक अभी से तैयारी कर रहे हैं।

गुब्बारे, ग्लाइउर एवं वायुयान अब खिलौने भर रह गये हैं। पलक मारते पृथ्वी के किसी भी कोने तक जा पहुँचने वाले राकेटों ओर अन्तर्ग्रहीयानों के रूप में अब मनुष्य की उड़ान कल्पना साकार होने जा रही है। निस्सन्देह मनुष्य शक्ति पुञ्ज है। उसकी कल्पना जब संकल्प एवं पुरुषार्थ के साथ समन्वित महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचण्ड होती है तो वे साधन सामने आ खड़े होते हैं जिन्हें देखकर नैपोलियन की वह उक्ति याद आती है जिसमें वह ‘असम्भव’ शब्द के अस्तित्व से ही इनकार करता था।

काश यही महत्वाकाँक्षा यदि मनुष्य का — संसार का स्तर ऊँचा उठाने में सुख−शान्ति की सौंदर्य सुषमा के विकास में नियोजित हो सकी होती तो आज हमें उस परिस्थिति में न रहना पड़ता जिसमें वह आज बुरी तरह दुख −दारिद्र के — पतन पराभव के— नरक के पड़ा हुआ सड़ रहा है।

विज्ञान ने इतनी उन्नति की इस प्रगति पर हमें गर्व करने का अधिकार है, पर तब वह गर्व हर दृष्टि से संतोषजनक और आनन्ददायक कहा जा सकता था।जब यही महत्वाकाँक्षा, भावनात्मक आकाश में उड़ते और ऐसे प्रयास राकेटों का निर्माण करती जो सद्भावनाओं के स्वर्ग−लोक की सैर हर किसी का करा सकने में समर्थ होती। न जाने ऐसे विज्ञान का आविष्कार अवतरण करने वाले अध्यात्म विज्ञानवेत्ताओं का युग कब अपनी धरती पर आयेगा?


बुद्धिमान मधुमक्खी (kahani)

मधुमक्खी विशेषज्ञ और प्रख्यात मधुव्यवसा की चार्ल्स वटलर ने पता लगाया है कि छत्ते की मधुमक्खियाँ बन्ध्या नहीं होतीं। अवसर मिले तो वे भी सन्तानोत्पादन कर सकती हैं, पर वे करती नहीं। क्योंकि वे जानती हैं कि प्रजनन के लिए सभी का ललचाना अपने वर्ग के लिए अस्तित्व विनाश का संकट उत्पन्न करना है। अनियन्त्रित सन्तानोत्पादन के लिए आखिर आवश्यक सुविधाएँ कहाँ तक जुटाई जा सकेंगी। मक्खियाँ यह सब अपनी सहज बुद्धि से जानती हैं और संयमी जीवन का पुरुषार्थ भरा आनन्द लेती हैं।

चार्ल्स वटलर का कथन है कि रानी मक्खी कहीं आसमान से नहीं उतरतीं। सब मक्खियाँ फूलों का रस इकट्ठा करने के लिए जहाँ परिश्रम करने निकलती हैं वहाँ कुछ ऐसी भी हरामखोर होती हैं तो छत्ते के जमा शहद पर ही बैठी−बैठी गुलछर्रे उड़ाने लगती हैं। बस यही रानी मक्खी हो जाती हैं और साधारण आकार से कई गुनी बढ़ कर अनवरत प्रजनन कर्म में जुटी रहती हैं।

परिश्रम मक्खियाँ फूलों से रस लाने− छत्ते की समृद्धि बढ़ाने — परिवार के बच्चों को पोषण करने में लगी रहती हैं। इस कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ ब्रह्मचारिणी रहने में अपने को बहुसन्तति वाली रानी मधुमक्खी से अधिक सुखी और सौभाग्यशाली मानती हैं।


लिपि और भाषा की तरह हम अन्य क्षेत्रों में भी आगे ही बढ़ेंगे

विचारों को —भाषा को −लिपि के माध्यम से अंकित करके दूसरों तक पहुँचाने एवं स्थिर रखने का आज प्रचलन है, उससे हम भरपूर लाभान्वित होते हैं। भाषा का विकास न होता तो हम आदिम काल के बन्दरों की तरह चैंचें, खों−खों भर कर पाते। लिपि न होती तो सुनकर याद करके ही कुछ बातों को स्मरण रखा जा सकता था। अति प्राचीन काल में महत्वपूर्ण विचार बार−बार पढ़ने और उनका निरन्तर स्मरण करके ही काम चलता था। ‘श्रुति’ इसी प्रक्रिया का नाम है, लिपि के अभाव में और कोई मार्ग भी तो नहीं था।

हमें इन दिनों सुधरी हुई लिपियाँ प्राप्त हैं। देवनागरी, रोमन,अरबी चीनी आदि कितनी ही लिपियाँ संसार में प्रचलित हैं और सुविकसित हैं। यह स्थिति आरम्भ से ही ऐसी नहीं थी। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने पता लगाया है कि सर्वप्रथम वस्तुओं का परिचय संकेतों के माध्यम से आरम्भ हुआ जिस वस्तु या व्यक्ति के बारे में लिखा जाना होता उससे मिलता−जुलता एक रेखा चित्र बनाया जाता था। उसी आधार पर बात स्मरण हो आती थी। चीनी लिपि का —उसके अक्षरों का — आधार अभी तक वही चला आता हैं।

पीछे कुशल क्षेम, यात्रा, हारी−बीमारी, भोजन−निवास सन्तान, युद्ध आदि से सम्बन्धित कुछ आड़ी−टेड़ी लकीरों की रचना हुई और उस आधार पर एक स्थान से दूसरे स्थानों तक संकेतों का आदान−प्रदान आरम्भ हुआ। अभी भी धोबी लोग अपने ग्राहकों के लिए अलग−अलग तरह के रेखा चिह्न बना लेते हैं और पक्की स्याही से किसी कोने पर उन्हें अंकित करे देते हैं। इस प्रकार कौन कपड़ा किस ग्राहक का है इसी पहचान वे आसानी से कर लेते हैं।यही तरीका उस आदिम काल के लिपि विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

जो लिपि अभी भी पाई गई है, वह पत्थरों पर खुदी हुई है। सम्भवतः उधर से आने −जाने वाली तथा भविष्य के लोगों को जानकारी देने की दृष्टि से ही इस प्रकार का लेखन चला होगा। उस समय की लिपि आड़ी−टेड़ी लकीरें हैं। जो किसी लोहे की कील से खोदकर बनाई गई हैं सम्भवतः पहले उन अक्षरों को कोयला आदि से पत्थरों पर लिखा जाता होगा पीछे उनकी खुदाई की जाती होगी।

कालान्तर में मिट्टी की पतली पट्टियाँ इट जैसी बनाई गई उन पर खोदा गया और उन्हें आग में पकाकर स्थायी बना लिया गया। खपरैलों में तो गोलाई होती है यह खपरे सीधे थे। ऐसी पुस्तकें केल्डिया की खुदाई में सर हेनरी लेअर्ड को प्राप्त हुई; वे लंदन के पुरातत्व संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इसमें किसी ‘बाढ़’ द्वारा हुए विनाश का उल्लेख है। इसे ईसा से 4 हजार वर्ष पुरानी माना जाता है।

इन्हीं लिपि खोजियों में एक विद्वान असीदिया का नाम भी आता है, जिसने अब से कोई 1400 वर्ष पूर्व ऐसी खप्पर पुस्तकों का संग्रह किया था; जिनमें प्राचीन काल के राजाओं के क्रिया−कलापों का ऐतिहासिक वर्णन है।

कागज से मिलती जुलती चीज मिश्र में सरकंडों को कूट उसकी लुगदी से मोटी परत के रूप में बनाई गई थी उसे पसार या पपरस कहा जाता था। मिश्र में तब तक लिपि भी विकसित होकर इस लायक बन गई थी कि उसमें किन्हीं विचारों या घटनाओं का उल्लेख हो सके। लंदन के संग्रहालय में इस प्रकार की प्रथम पुस्तक ‘मृतकों की पोथी’ सुरक्षित रखी है। यह पुस्तकें पिरामिडों में गाढ़े जाने वाले मृत शरीरों के साथ उनकी सुख−शान्ति के लिए लिखी जाती थीं। 23 फुट 7 इञ्च लम्बे और डडडड फुट 7 चौड़े एक पसार पर लिखी गई हो तप की ‘नसीहतें’ पैरिस के राजकीय पुस्तकालय में संग्रहित है इसे ईसा से 3500 पूर्व पूर्व की माना जाता है। इसके बाद ताड़ पत्रों पर और भोजपत्रों पर लिखने का समय आता है।

ईसा से 500 वर्ष पूर्व चीनी संत कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का क्रमबद्ध लेखन प्रारम्भ हो गया था। यों लिपि उस समय भी अनपढ़ थी। अक्षर थोड़े से ही थे और उसमें मोटी बातें ही संकेत रूप में लिखी जा सकती थीं। बाँस की चौड़ी खपच्चियों पर खोदना तथा रेशमी वस्त्रों पर छापना तब तक चलता रहा जब तक कि कागज का आविष्कार नहीं हो गया। कागज का निर्माण ईसा से एक सौ पहले ही चीनियों द्वारा किया गया था। ठप्पे बनाकर छापने की युक्ति भी उन्हीं को सूझी। ईसा के बाद पुस्तक रचना का कार्य व्यवस्थित रूप से शुरू होने लगा था कि तत्कालीन चीनी शासक शेहाँमती को न जाने क्या उमंग उठी कि उसने कृषि और स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तकों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के साहित्य में खड़े खड़े आग लगवा दी।

यूनान में ईसा से 500 वर्ष अक्षरों का स्वरूप सुव्यवस्थित होने लगा था। फिनीशियों और मिश्रियों ने लेखन में विशेष उत्साह दिखाया और कार्थेज नगरी में काम चलाऊ पुस्तक लेखन कार्य चल पड़ा। ईसा से कुछ समय पूर्व सम्राट जूलियस सीजर ने भी एक विशाल पुस्तक भण्डार जलवाया था। तब सिंकदरिया में पुस्तक लेखन कार्य एक छोटे व्यवसाय का रूप धारण कर चुका था। लेखन वाचन हर कार्य किसी को नहीं आता था कुछ विशेष लोग ही ग्रह कार्य करते थे। उन्हें धन और सम्मान दोनों ही मिलते थे। तब पुस्तकें इस तरह की होती थीं जैसे आजकल बड़े−बड़े नक्शे होते हैं। दोनों सिरों पर पतली छड़ियां जुड़ी होती थीं और उन्हें चटाई की तरक गोलाकार बनाकर सुरक्षित रखा जाता था।

भारत में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में खप्परों पर लिखी पुस्तकें मिली हैं जो ईसा से पाँच हजार वर्ष पूर्व की है। प्रिपावा में पाये गये एक घड़े पर भी व्यवस्थित अक्षरों का अभिलेख हैं। इसके बाद ताड़पत्रों पर नुकीली कीलों से खोदकर पुस्तक लेखन का क्रम चला।

कलम और स्याही से लिखी सर्व प्राचीन पुस्तक ‘ पंच रक्षा’ मिली हैं। जो कलकत्ता के आशुतोष संग्रहालय में सुरक्षित है इसे सन् 1100 का लिखा माना जाता है। हर पन्ने पर छै−छै पंक्ति याँ हैं। छठी शताब्दी में ताड़पत्र पर लिखी गई सबसे पुरानी पुस्तक जापान के होम्यूज मठ में है जो छठी शताब्दी की मानी जाती है। सन् 500 के करीब का लिखा साहित्य तो भारत में भी बहुत मिला है, यह एक विशेष प्रकार के मजबूत कागज पर काली पक्की स्याही से सुन्दर अक्षरों में लिखा मिला है। यद्यपि उसकी लिपि और भाषा आज जैसी नहीं हैं। ऐसी पुस्तकों में संस्कृत, पाली और प्राकृत की पुस्तकें ही प्रधान हैं।

प्राचीन काल में ही सब कुछ था और अब हम निरन्तर गिर रहे हैं, यह मानने का कोई कारण नहीं। क्रमिक विकास की मंजिल पार करते हुए हम आज की स्थिति तक पहुँचे हैं और यह अग्र गमन निरन्तर जारी रहने वाला है। भौतिक क्षेत्र में भी और अध्यात्म क्षेत्र में भी। रास्ते में विराम,विश्राम और अवरोध पहले भी आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे, पर मनुष्य की अनवरत गतिशीलता जारी ही रहेगी।

लिपि और भाषा को ही लें वह आरम्भ से ही उस रूप में नहीं रही है जैसी कि अब है। क्रमिक विकास के चरण बढ़ाते हुए हम उस क्षेत्र में आज की समुन्नत स्थिति तक पहुँचे हैं। अन्य क्षेत्रों के सम्बन्ध में भी यही बात है। कितनी बातों में हम पूर्वजों से आगे हैं। भाषा और लिपि के सम्बन्ध में जिस प्रकार प्रगति करते हुए हम यहाँ तक पहुँचे हैं— उसी प्रकार भौतिक विज्ञान के अन्यान्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़े हैं। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में गिरावट अवश्य आई है, पर यह अवरोध भी स्थायी नहीं है। मनुष्य का स्वभाव आगे बढ़ना है। आत्मिक अवसाद भी देर तक टिकेगा नहीं। भावनात्मक क्षेत्र में भी हम उसी प्रकार अगले दिनों बढ़ेंगे जैसे कि भूतकाल में अनेकानेक क्षेत्रों में अग्रगामी कदम बढ़ाते चल आये हैं।


मनुष्यों से तो पशु पक्षी भले

समय−समय पर अनेक पत्र−पत्रिकाओं में पशु−पक्षियों के प्रेम, कर्त्तव्य और सहानुभूति के अनेक समाचार प्रकाशित होते रहते हैं जिनमें से कितनी ही घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर उनके सद्गुणों की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जाता। इस पशुओं को भले ही निरीह और हिंसक समझते रहें, पर वह अपने उद्देश्य की पूर्ति जिस कुशलता के साथ करते हैं उसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है।

खच्चर की सहृदयता

बरमिंघम (ब्रिटेन) में सरसैमुअल गुडबेट्टियर के यहाँ एक टट्टू पला था। वह बाड़े में बन्द किया जाता था, रात को बाड़े के फाटक की चटखनी अन्दर से बन्द की जाती ओर बाहर से कुण्डी लगाई जाती थी। टट्टू अपना सिर फाटक से बाहर तो कर लेता था, पर कुण्डी तक नहीं पहुँच पाता था। प्रायः देखने में यह आता कि सुबह के समय बाड़े के बाहर खुले मैदान में घूमता। सभी को बड़ा आश्चर्य होता था कि वह रात्रि में कुण्डी खोलकर बाहर कैसे निकल आता है।

एक दिन सारा रहस्य खुल गया। उस रात सैमुअल सोया न था। उसका ध्यान उधर ही था। उसने देखा कि टट्टू भीतर की चटखनी को झटका देकर खाँचे से अलग कर लेता है और फिर वह रेंकना शुरू कर देता है। आवाज सुनकर एक खच्चर आता और नाक से धकेल कर कुण्डी खोल देता और बाद को दानों साथ−साथ घूमते।

उपवास रखने वाला कुत्ता

मी केवलानन्द जी के निगमाश्रम में एक संस्कारी कुत्ता था, जो प्रति सोमवार को व्रत रखता था। उस दिन वह निराहार रहता था। कह नहीं सकते कि उसे दिन का ज्ञान कैसे होता था। यदि सोमवार को रोटी या खाने की अन्य कोई वस्तु डाली जाती तो वह नहीं खाता था। विशेष आग्रह करने पर वह उसे उठाकर ले जाता और एकान्त में रख आता। फिर दूसरे दिन उसे खाता था। मनुष्य भले ही सप्ताह में एक व्रत न रखता हो, पर यह कुत्ता जीवन भर इस नियम का पालन करता रहा।

कीर्तन प्रेमी सर्प

11 जनवरी 1965। देवरिया जिले के माड़ोपार गाँव में उस दिन अखण्ड क कीर्तन का आयोजन था। अनेक भक्त मण्डली तन्मयता के साथ कीर्तन कर रही थीं। भक्ति रस का सुरम्य वातावरण निर्मित हो चुका था। ऐसे पवित्र वातावरण में ईर्ष्या,द्वेष और हिंसक भावनाओं को भला कहाँ स्थान मिल पाता है। पाप और दुष्कर्म की अमानवीय वृत्तियाँ मानो लुप्त हो गई थीं। इसी बीच संगीत की मधुरता से प्रभावित हो एक सर्प कहीं से आया और अखण्ड कीर्तन के सिंहासन पर चढ़ गया। अन्य श्रोताओं की तरह वह भी फन उठाकर जाग्रत रूप में हरिसंकीर्तन का श्रवण करने लगा।

सर्प के आते ही लोग भयभीत हो गये। गाँव वालों ने सुना तो वह भी दौड़े आये। सबने उसके दर्शन किये। कीर्तन चलता रहा, भक्त गण आनन्द लेते रहे। कीर्तन समाप्त होते ही वह ऐसे भाग गया कि किसी को पता नहीं चला।

परोपकारी चील

अगारघाट (बिहार) चिकित्सालय में कार्य करने वाली नर्स एक दिन गुदड़ी बाजार में स्थित अपने मकान की छत पर बैठी एक पोटली में से प्रमाण−पत्र तथा नियुक्ति पर निकाल रही थी। चील ऊपर उड़ रही थी, उसे लगा कि यह महिला पोटली खोलकर खाना खाने की तैयारी कर रही है। चील की दृष्टि नीचे की ओर थी। वह थोड़ी देर ऊपर चक्कर लगाती रही और मौका पाते ही झपट्टा मारकर पूरा पैकेट पंजों में लेकर उड़ गई।

यह प्रमाण −पत्र उस नर्स की नौकरी के आधार थे।उसे लगा मानो उसकी जिन्दगी खराब हो गई है अब वह दुष्टा चील को ऊपर उड़ता हुआ देख रही थी। वह सोचती यदि चील पुनः उन कागजों की नीचे गिरादे तो उसका खजाना पुनः मिल जायें। पर ऐसा कहाँ हुआ चील आँखों से ओझल हो गई अब तो वह निराश होकर अपने दुर्भाग्य को कोसने लगी।

लगभग आधे घण्टे बाद वह चील फिर उस मकान के ऊपर उड़ती दिखाई दी। उसने छत पहचानकर वह पैकेट वहीं गिरा दिया। अब तो उस नर्स की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा, वह चील की सहृदयता की प्रशंसा करने लगी। चील ने उसमें कई जगह चोंच मारकर यह पता लगा लिया था कि इसमें खाने वाली कोई वस्तु नहीं है। अन्त में चील अपनी भूल कर पछताई और कागज वापस डाल गई।

कुत्ते और बिल्ली की मैत्री

वेंजेल नामक जरमन के यहाँ एक कुत्ता पला था और एक बिल्ली। उन दोनों में बड़ी दोस्ती थी। वे एक साथ खाते−पीते, उछलते−कूदते और सोते−बैठते थे। एक दिन वेंजेल की इच्छा हुई कि इन दोनों के परस्पर सम्बन्धों की परीक्षा भी लेनी चाहिए। वे बिल्ली को अपने कमरे में ले गये वहाँ उन्होंने उसे खाना खिला दिया। बड़े मजे से उसने खाना खाया। श्री मति वेंजेल ने एक प्लेट खीर अलमारी में रखदी। उसमें ताला नहीं लगा था। बिल्ली खाना खाकर उस कमरे से बाहर निकल आई और थोड़ी देर बाद कुत्ते को अपने साथ ले आई। दोनों उस अलमारी के पास तक गये। बिल्ली ने धक्का मारकर उसकी चटकनी खोली। कुत्ते को खीर की प्लेट दिखाई दे गई उसने प्लेट को पंजों से दबाकर सारी खीर खाली। वेंजेल छिपे−छिपे इस दृश्य को देखते रहे

कुत्ते और बिल्ली में स्वाभाविक बैर बताया जाता है फिर भी यह दोनों एक परिवार में परस्पर सुख−दुख का ध्यान रखकर किस प्रकार ईमानदार मित्र की तरह रहते हैं।

चोरों को भागने वाली मैना

जार्जिया (न्यूयार्क) में एक फर्नीचर की दुकान में रात में चोरों ने सेंध लगाई, पर उन्हें अचानक ही एक आवाज सुनाई दी— ‘आप क्या चाहते हैं?’ आवाज बिलकुल साफ थी, जैसे कोई मनुष्य बोल रहा हो। चोर यकायक डर गये, उन्हें लगा कि लोग जाग पड़े हैं, अब यहाँ दान गलने वाली नहीं है। पर उन्हें आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि यह स्वर किधर से आ रहा है, वे थोड़ी देर तक इधर−उधर देखते रहे और बाद में डरकर नौ−दो ग्यारह हो गये।

वास्तविक बात यह थी कि वह आवाज भारतीय मैना की थी। दुकान के मालिक ने ग्राहकों से यह वाक्य कहलाने के लिए ही मैना को दुकान पर रक्खा था। वह बिलकुल आदमी की तरह ही बोलना जानती थी और एक ही वाक्य कहती थी ‘आप क्या चाहते हो।’


ज्ञानार्जन के लिए तपस्या (kahani)

भारद्वाज मुनि का सारा जीवन तपस्या में व्यतीत हुआ। शरीर त्याग के पश्चात् उन्होंने दूसरा जन्म लिया, उसमें भी उन्होंने तप किया, फिर भी उनकी ज्ञान पिपासा शान्त न हुई। तीसरा जन्म लेकर जब वे अपनी जीवन अवधि तपस्या में ही क्षीण करने लगे तो देवराज इन्द्र को बहुत आश्चर्य हुआ। वह मुनि के सम्मुख प्रकट हुए। पूछा—’ मुनिवर! आप जन्म−जन्मांतरों की तपस्या किस उद्देश्य से कर रहे हैं? क्या दो जन्मों की तपस्या के पश्चात भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके।

मुनि न सहज भाव से उत्तर दिया− ‘देवराज! यह तपस्या तो ज्ञानार्जन के लिए ही की जा रही है।’ ‘और यदि आपको एक जन्म और मिल गया तो उसमें क्या करेंगे?’

‘उस जन्म को भी ज्ञान प्राप्ति हेतु तपस्या में व्यतीत कर दूँगा।’


भावी पीढ़ी का स्तर उठाने की समस्या

संसार की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, पर पीढ़ियों का स्तर शारीरिक, मानसिक, और नैतिक तीनों ही दृष्टियों से गिरता चला जा रहा है। इस गिरावट का कहाँ जाकर अन्त होगा, यह चिन्ताजनक प्रश्न है। विज्ञान, शिक्षा और सम्पत्ति की दृष्टि से हम कितनी ही प्रगति क्यों न करते जायें वंशपरम्परा का क्रम यदि पतनोन्मुख दिशा में ही बढ़ता चला गया तो इन सम्पदाओं का उपयोग कौन करेगा? जिनके निर्माण में आज हम अहर्निश सर्वतोभावेन लगे हुए हैं। शरीर और मन से दुर्बल और रुग्ण बना मनुष्य अपने आपके लिए भार रहेगा और अपने समाज के लिए अभिशाप सिद्ध होगा, भले ही उसके पास सुविधा साधन कितने ही बढ़े−चढ़े क्यों न हों।

प्रगति की बात सोचते हुए संसार के बुद्धिमान मनुष्य यह विचार गम्भीरता पूर्वक कर रहे हैं कि भावी पीढ़ियों का स्तर किस प्रकार समुन्नत बनाया जाय। नस्ल के भयंकर पतन का वर्तमान क्रम किस प्रकार रोका जाय। वैज्ञानिक आविष्कारों की घुड़दौड़ और सुविधा−साधनों को उपार्जन होते रहने से ही समुन्नत भविष्य की कल्पना सार्थक न हो सकेगी। इसके लिए शारीरिक, मानसिक और नैतिक दृष्टि से समुन्नत स्तर की पीढ़ियाँ भी चाहिए। विचारशील वर्ग ने अधिक तत्परता पूर्वक इस दिशा में विचार करना आरम्भ किया है कि संसार को श्रेष्ठ नागरिकों और महामानवों से भरा पूरा कैसे रखा जाय?

नोएल पुरस्कार से पुरस्कृत विश्व के मूर्धन्य विज्ञानी डा. हरमन जे. मुलर ने अपने ‘आउट आफ द नाइट’ प्रतिवेदन में इस आवश्यकता पर बहुत बल दिया था कि विश्व को—विशिष्ट व्यक्तियों को सर्वथा नष्ट होने की विपत्ति से बचाया जाय। उनका अभिप्राय यह था कि वर्तमान पीढ़ी के मूर्धन्य व्यक्तियों का जीवन−रस संग्रहित करके रखा जाय ताकि उन जैसे विशिष्ट व्यक्तियों को भविष्य में फिर कभी भी आवश्यकतानुसार उत्पन्न कर सकना सम्भव हो सके।

जीव विज्ञानी गाल्टन यूजेनिक्स (सृजननिकी) विद्या का सूत्रपात करते हुए यह आशा व्यक्त की थी कि हम इस दिशा में शोध कार्य करते हुए अभीष्ट गुण सम्पन्न मनुष्यों का उत्पादन कर सकने में एक दिन सफल होकर रहेंगे। विद्वान फ्राँसिस गाल्टन ने इस बात पर बहुत जोर दिया था कि प्रगति की अन्य धाराओं को ही महत्व न दिया जाय; वंश सुधार पर भी ध्यान दिया जाय। पतनोन्मुख वंश परम्परा की दुर्गति यदि रोकी न गई तो दुर्बल और रुग्ण व्यक्ति समस्त प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त कर लेने पर भी सुखी न रह सकेगा।

इस सम्बन्ध में दो विचारधाराएँ व्यक्त की गई हैं एक यह कि सुयोग्य नर−नारियों को सन्तानोत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाय, दूसरा यह कि यदि उनका विवाह सम्भव न हो तो फिर कृत्रिम गर्भाधान का प्रयोग चलाया जाय।

शरीर की दृष्टि से परिपुष्ट युवक और युवती विवाह करें और गर्भ रक्षा तथा शिशु−पोषण का समुचित प्रबन्ध रहे तो उसका परिणाम इतना ही हो सकता है कि मजबूत शरीर वाले बालक पैदा हों। बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास यदि इस जोड़े का नहीं हुआ है तो वह बलिष्ठ सन्तान बुद्ध अथवा अनैतिक भी हो सकती है। फिर वंश परम्परा की कोई विकृतियाँ भी इस जोड़े में ऐसी जुड़ी हो सकती हैं कि बड़ा होने पर वह मजबूत बालक किसी ऐसी विकृति में फँसा पाया जाय, जिससे परिपुष्ट शरीर वाले युवक−युवतियों के विवाह वाली बात ही निरर्थक सिद्ध हो जाय।

शरीर से अधिक महत्व बुद्धिमत्ता और प्रतिभा का है। उस तत्व का विकास अधेड़ आयु के उपरान्त होता है। इससे पूर्व पता नहीं चलता कि कौन बुद्धिमान या प्रतिभावान सिद्ध होगा। फिर उतनी आयु तक वे लोग अविवाहित ही बैठे रहें; यह सम्भव नहीं। प्रतिभाशाली लोग तलाक देकर नये जोड़े चुने यह और भी अधिक झंझट भरा कार्य होगा।

भौतिक विज्ञानी नीति−अनीति के झंझट में नहीं पड़ते। उन्हें गुणकारी औषधि बनाने के लिए प्रचुर जीव हिंसा करनी पड़े तो आपत्ति नहीं। इसी दृष्टि से वे उत्तम सन्तान प्राप्त करने का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए दांपत्य−जीवन की, पवित्रता की उपेक्षा करने को तैयार हैं। वे कहते हैं विवाह एक सामाजिक साझेदारी है और संतानोत्पादन राष्ट्रीय कर्त्तव्य, मानवी समस्या। दोनों को एक दूसरे से जोड़ा न जाय। पति−पत्नी को अन्य नर−नारियों के संपर्क से सुप्रजा उत्पन्न करने की छूट रहे, तभी भावी पीढ़ियों को समुन्नत बनाने की समस्या हल होगी। इसके लिए कृत्रिम गर्भाधान निरापद समझा गया है, उसमें व्यभिचार की वर्तमान बुराई भी शिर नहीं बँधती और एक महत्वपूर्ण उद्देश्यों भी पूरा हो जाता है। इसके प्रमाण में हनुमान पुत्र मकरध्वज का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है।

बुद्धिवादी वर्ग के गले यह दलील उतर गई है और विकसित देशों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए अत्युत्साह फूट पड़ा है; किन्तु उससे अन्य कई कानूनी तथा भावनात्मक समस्याएँ सामने आई हैं।

अमेरिका में इन दिनों प्रायः 25 हजार माताएँ कृत्रिम गर्भाधान से संतानोत्पादन का लाभ उठाती हैं। इन उत्पन्न बालकों का असली पिता कौन है यह सर्वथा अविज्ञात रहता है। स्थापित शुक्र के अनुदाता का नाम सर्वथा गुप्त रखा जाता है अन्यथा भावनात्मक एवं आर्थिक उत्तराधिकार सम्बन्धी अनेक झंझट उठ खड़े होंगे और उनका सुलझाना एक नया शिर दर्द बन जायगा। आज के अभिभावकों और सन्तान के बीच जो कानूनी एवं भावनात्मक स्थिति है, वह बदल जाय तो फिर आज का दुराव भी आवश्यक न रहेगा।

प्रो. जोनास साल्क ने विश्व के कानून क्षेत्र को इस सम्भावना की आगाही दी है कि निकट भविष्य में मनुष्य प्रयोगशालाओं में उत्पन्न किये जायेंगे। जिनका रज−वीर्य उस प्रयोजन के लिए लिया गया है; उनका उस उत्पन्न हुई सन्तान पर कितना अधिकार होगा अथवा वे बच्चे अपने जन्मदाताओं से उत्तराधिकार की क्या उपेक्षा करेंगे, इसका निर्धारण किया जाना चाहिए। वर्तमान रतिक्रिया प्रधान उत्पादन को आधार मानकर बनाये गये उत्तराधिकार कानून अगले दिनों की जटिलताओं का समाधान न कर सकेंगे।

नर के शुक्राणु चिरकाल तक सुरक्षित रखना और उसे प्रजनन योग्य बनाये रहना यह सफलता बहुत पहले ही मिल चुकी है। अब आवश्यक नहीं रहा कि नर−नारी को रतिक्रिया करनी ही पड़े अथवा पिता जीवित ही हो। मृतक घोषित किया गया भी सन्तानोत्पादन करता रह सकता है। सुदूर देशवासी नर−नारी व्यस्तता के कारण परस्पर मिल न सकें तो भी उनका प्रजनन−कर्म व्यवस्थापूर्वक चलता रह सकता है। शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने की विधि बहुत समय पहले लिटिलराक अर्कासास के डा. एच. शर्मन ने खोज निकाली थी। शुक्र को ग्लिसरोल में मिलाकर द्रव नाइट्रोजन की सहायता से बनाये गये। 196 सेन्टीग्रेड में नीचे शीत तापमान में रख दिया जाता है। इस प्रकार पशुओं का शुक्र 10 साल तक और मनुष्यों का 5 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उपयुक्त शुक्र की सहायता से उपयुक्त बच्चे उत्पन्न करने की इच्छुक महिलाओं ने इस विधि से अकेले अमेरिका में ही लगभग डेढ़ लाख बच्चे पिछले दिनों उत्पन्न किये हैं। अन्य देशों में भी यह प्रचलन बढ़ रहा है।

वैज्ञानिक सोचते हैं कि प्रजनन क्रिया पर विज्ञान का नियन्त्रण हो जाने से अभीष्ट स्तर की पीढ़ियाँ उत्पन्न कर सकना सम्भव हो जायगा जिस प्रकार पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान के सहारे नस्ल सुधार का प्रयास सफलता पूर्वक चल पड़ा है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी क्यों नहीं चलाया जा सकता है। वे सोचते हैं संसार के मूर्धन्य महा−मानवों को विश्व प्रजनन संस्था के लिए वीर्यदान देना चाहिए और उसका उपयोग परिष्कृत स्तर की महिलाओं की सहायता से उसी स्तर की सन्तान उत्पन्न करने के लिए किया जाना चाहिए। सोचा गया है कि इस पद्धति से एक आइन्स्टीन से अनेकों आइन्स्टीन पैदा करने में सफलता मिलेगी और इससे विश्व−मानव की नसल सम्पदा को ऊँचा उठाने में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

इस क्षेत्र में मूर्धन्य पुरुषों को ही कुछ त्याग नहीं करना पड़ेगा, वरन् मूर्धन्य नारियों को भी कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा। एक पक्षीय श्रेष्ठता कुछ बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध न कर सकेगी।

विश्व विख्यात साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशा अपनी विनोदी प्रकृति के लिए प्रख्यात थे। वे उन दिनों वृद्ध भी थे और कुरूप तो पहले से ही थे। एक सुन्दर युवती उनके पास यह प्रस्ताव लेकर पहुँची कि वे उसके साथ विवाह करलें ताकि उसे शा जैसी बुद्धिमान और उस जैसी सुन्दर सन्तान प्राप्त हो सके।

शा ने उत्तर दिया आवश्यक नहीं वह मुझ जैसी बुद्धिमान और आप जैसी सुन्दर ही सन्तान हो, इसका ठीक उलटा भी हो सकता है—वह मुझ जैसी कुरूप और आप जैसी मूर्ख भी उत्पन्न हो सकती है।

यह मात्र विनोद ही नहीं था। इसके पीछे एक सचाई भी है कि केवल नर पक्ष को ही पीढ़ी निर्माण का सारा श्रेय नहीं मिल सकता; इसके लिए माता का स्तर भी अनुकूल होना चाहिए। शुक्राणुओं के साथ तो श्रेष्ठ परम्पराएँ जुड़ी हुई हों, किन्तु डिंबाणु अवाँछनीय स्तर की विशेषताओं से भरे हों तो इच्छित परिणाम न हो सकेगा। माता और पिता की संयुक्त खेती ही तो शिशुओं की फसल देती है, इसलिए सुधार प्रयास, मात्र नर−पक्ष के लिए पर्याप्त नहीं, उसके लिए उतना ही प्रयत्न नारी पक्ष के गुण सूत्रों के सुधार को भी करना पड़ेगा। वंश परम्परा में पितृ पक्ष और मातृ पक्ष की भूमिका न्यूनाधिक मात्रा में प्रायः समान ही रहती है।

भीम का पुत्र घटोत्कच अपने पिता के समान बलवान तो था, पर माता हिडम्बा वनवासी भील थी इसलिए बच्चे की आकृति−प्रकृति माता के समान ही बन सकी। मदालसा ने अपनी सभी सन्तानें मनचाहे स्तर की उत्पन्न की थीं, इसमें उसके पति का स्तर तो साधारण था, पर उसने अपनी शारीरिक, मानसिक स्थिति में सुधार कर अभीष्ट गुण, कर्म, स्वभाव के बच्चे उत्पन्न किये। यह एकाँगी प्रयास के उदाहरण हैं। यदि भीम की पत्नी कोई परिष्कृत स्तर की होती तो घटोत्कच की अपेक्षा अधिक समुन्नत बालक उत्पन्न होता। इसी प्रकार मदालसा का पति भी यदि सुविकसित रहा होता तो अभीष्ट उत्पादन और भी यदि सुविकसित रहा होता तो अभीष्ट उत्पादन और भी अधिक ऊँचे स्तर का सम्भव हुआ होता।

कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह प्रचलन भी था कि गृह−व्यवस्था के लिए दाम्पत्य−जीवन का एक क्रम बना रहे और श्रेष्ठ सन्तानोत्पादन के लिए नर−नारी उपयुक्त आधार तलाश कर सकें। कुन्ती का उदाहरण ऐसा ही है वह पाण्डु की पत्नी थी और आजीवन उसी रूप में रही। बिना तलाक दिये अथवा न पतिव्रत धर्म भंग किये उन्होंने मनचाहे स्तर की सन्तान उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। उनके पाँच पुत्र, पाँच पाण्डव, पाँच देवताओं की संतानें थी। इतना ही नहीं विवाह से पूर्व भी उन्होंने कर्ण को जन्म दिया था। उनका यह प्रयोग असफल नहीं रहा। प्रचलित सामाजिक परम्पराओं के अनुसार लोकापवाद हुआ या नहीं यह एक पृथक प्रश्न है।

नियोग प्रथा का शास्त्र में उल्लेख भी है और आदेश भी। पति−पत्नी में से किसी की असमर्थता अथवा अनुपस्थिति में अन्य नर−नारी की सहायता से सन्तानोत्पादन करना और उसे उत्तराधिकारी मानना हिन्दू धर्म की शास्त्रीय परम्पराओं के अनुरूप ही माना जाता था।

हिटलर के वे प्रयोग सर्वविदित हैं जिनमें उसने जर्मन जाति की उत्कृष्ट नसल पैदा करने की दृष्टि से एक योजना चलाई थी, जिसके अंतर्गत चुनी हुई नारियों को चुने हुए नरों के द्वारा सन्तानोत्पादन के लिए बाध्य किया गया था। इस प्रयोग की उन दिनों धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में घोर निन्दा की गई थी, पर हिटलर यही कहता रहा—जर्मन जाति को विश्व विजयी नस्ल की आवश्यकता हैं। उसकी पूर्ति के लिए जो प्रयोग किये जा रहे हैं उनमें सन्निहित उद्देश्य किसी भी प्रकार निन्दनीय नहीं हो सकता।

इन सब दलीलों और प्रमाणों के रहते हुए भी यह प्रश्न बना ही रहेगा कि दाम्पत्य−जीवन की गरिमा को घटा कर ही कृत्रिम गर्भाधान का प्रचलन मानवी समाज में हो सकता है। इससे परम्परागत भावनाओं को चोट लगेगी और छुट−पुट प्रयोगों के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर यह प्रयोग सफल न हो सकेगा।

कृत्रिम गर्भाधान के समर्थन में कितनी ही गहरी दलीलें क्यों न दी जाँय वह बड़े पैमाने पर सफल न हो सकेगी। पति−पत्नी के बीच स्नेह, सम्बन्धों और मिलन आवेश का जो भावनात्मक प्रवाह बहता है, उसका कृत्रिम प्रक्रिया में कैसे समावेश किया जायगा? शिशुओं के प्रति आत्मीयता का सहज वात्सल्य पिता के मन में किस प्रकार उत्पन्न होगा? इतनी महत्वपूर्ण उपलब्धियों से वंचित शिशु को भावनात्मक दृष्टि से बहुत दूर तक अभावग्रस्त ही रहना पड़ेगा। अस्तु इस

वैज्ञानिक प्रक्रिया से इतनी ही आशा की जा सकती है कि वे शारीरिक और बौद्धिक दृष्टि से सुविकसित होंगे। उनमें स्थूल स्तर की विशेषताएँ भी वंश परम्परा के आधार पर भी हो सकती हैं किन्तु भावनात्मक अभाव तो अकेला ही इतना बड़ा है कि उसे छोड़ देने पर समग्र मानव की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

शिशुओं में भावनात्मक विकास लिए पति−पत्नी के बीच अगाध आत्मीयता और उद्दीप्त भावुकता का होना आवश्यक है। ऐसी दशा में भावी पीढ़ियों को सुसंस्कृत बनाने का लक्ष्य हर दृष्टि से आवश्यक और महत्वपूर्ण होते हुए भी उसकी पूर्ति के लिए हमें आध्यात्मिक मूल्यों का भी ध्यान रखना होगा। इस समस्या का समाधान हमें भावनात्मक आदर्शों को साथ लेकर ही करना चाहिए। पति−पत्नी की प्रजनन श्रेष्ठता बढ़ाकर ही इस प्रयोजन की पूर्ति की जा सकेगी।


VigyapanSuchana

बचपन में यदि आवश्यक मात्रा में प्रोटीन युक्त आहार न मिले तो वे न केवल शारीरिक दृष्टि से दुर्बल रहते हैं, वरन् मानसिक दृष्टि से भी पिछड़े रह जाते हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल मद्रास, आन्ध्र, केरल और मैसूर इन चार राज्यों में ही 35 लाख से अधिक बच्चे पौष्टिक आहार की कमी के कारण भयंकर रुग्णता से ग्रसित थे। इनमें से 23 लाख सूखा रोग से और 12 लाख गठिया से बीमार थे। अन्य छुट−पुट बीमारियों से अथवा सामान्य दुर्बलता से जिन्हें शारीरिक दृष्टि से अविकसित रहना पड़ रहा है उनकी संख्या उससे भी कही अधिक है।

विटामिन, प्रोटीन और खनिज जिस मात्रा में स्वास्थ्य संरक्षण के लिए आवश्यक हैं प्रायः उनसे एक चौथाई ही हमारे बालकों को मिल पाते हैं। गरीब लोग अर्थाभाव के कारण और अमीर लोग चटोरेपन के कारण अनुपयोगी वस्तुएँ उदरस्थ कराने के कुचक्र में अपने बच्चों को उचित आहार देने में असमर्थ रहते देखे जाते है।

कुपोषण के शिकार बालकों में जितनी संख्या गरीबों की होती है, उससे अधिक अमीरों की होती है। गरीब अभावग्रस्तता के कारण अपने बच्चो को पौष्टिक भोजन नहीं दे पाते; पर अमीर लाड़−चाव से ऐसी वस्तुएँ खिलाते है जो कीमती और स्वादिष्ट तो होती हैं, पर अपना उपयोगी अंश पहले ही गाँव चुकी होती हैं। अधिक मात्रा में खिलाकर पाचन क्रिया को नष्ट कर देने का अभिशाप भी अमीरों के साथ ही जुड़ा हुआ है। अभाव की ही तरह अज्ञान भी पग−पग पर हमारे लिए संकट उत्पन्न करता है।


आदर्शवादी प्रतिभाओं की प्रतिक्षा

अनुकरण की प्रवृत्ति मनुष्य स्वभाव का महत्वपूर्ण अंग बनकर रहती है। हम जैसा देखते है वैसा करते है। बच्चा अभिभावकों को—साथियों को जिस शब्दावली का−भाषा का प्रयोग करते सुनता है उसी को बोलने और समझने लगता है। चरित्र और स्वभाव के सम्बन्ध में भी साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वातावरण का प्रभाव पड़ना एक तथ्य है। जिन लोगों के बीच—जिन परिस्थितियों के बीच—रहना पड़ता है वैसी ही आदतें बन जाती है। रुचि विचित्रता, आदतों की भिन्नता और प्रकृति की पृथकता न तो जन्मजात होती है और न अनायास उत्पन्न होती है; उनके निमार्ण में समीपवर्ती व्यक्तियों और परिस्थितियों का भारी हाथ रहता है।

अनाचार समर्थक−अभिरुचि बढ़ जाने से वातावरण में अपराधी प्रवृत्तियों का प्रवाह उत्पन्न होता है। सामान्य मनःस्थिति के लोग उसी की धारा में बहने लगते हैं। हवा के रुख की ओर ही पत्ते उड़ते हैं। बहुत लोग जो कुछ करते हैं उसी का अनुकरण करने की−उसी दिशा में चलने की लोक प्रवृत्ति उभरती है।

जन−प्रवाह की अवाँछनीय से विरत रहने के लिए इसी प्रकार वातावरण बनाने आवश्यक है जिसमें सामान्य लोगों को चल पड़ने की प्रेरणा मिल सके। यह कार्य प्रखर एवं मनस्वी व्यक्तियों के आगे आने से ही संभव होता है। हवा का रुख वे ही बताते हैं—प्रवाहों को वे ही मोड़ते हैं। वातावरण बनाने का बहुत कुछ श्रेय उन्हीं को होता है।

विचार और क्रिया को जिन्होंने मिलाकर अपनी आस्था का परिचय दिया है वे कुमार्गगामी होते हुए भी प्रतिभावान होते हैं और अपने संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। एक वेश्या अनेकों को व्यभिचार सिखा देती है। नशेबाज, चोर, जुआरी आदि कुमार्गगामी अपनी बुरी लतें उनमें से अधिकाँश सिखा देते हैं जो उनके संपर्क में आते हैं। विचार यदि कर्म में उतर सकने जैसा प्रौढ़ हो तो उनसे प्रतिभा उभरती है और उसका प्रभाव पड़ता है।

सन्मार्गगामी प्रतिभाएँ अपने समाज एवं समय को प्रभावित कर सकने में पूरी तरह सफल रही हैं। गाँधी जी ने अपने प्रभाव से ऐसा वातावरण बनाया था जिसने असंख्य लोगों को सत्याग्रही सैनिकों के रूप में कष्टसाध्य त्याग, बलिदान करने के लिए अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा कर दिया। भगवान बुद्ध की प्रेरणा से लाखों भिक्षु और भिक्षुणी अपनी सुख−सुविधाएँ छोड़कर जन−प्रवाह बदलने के लिए कर्मक्षेत्र में उतरे थे। लैनिन के अनुयायी साम्यवादी आन्दोलन को समर्थ बनाने में सफल हुए थे। शिवाजी प्रताप, गुरुगोविन्द सिंह आदि के ऐसे अगणित प्रमाण इतिहास के पृष्ठों पर भरे पड़े हैं जिनमें प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों ने अपने प्रभाव से युगांतरकारी वातावरण बनाया और उसे प्रवाह में बहने के लिए असंख्यों को प्रोत्साहित किया।

समय की पुकार जिस परिवर्तन की है—उसके अनुरूप लोग−मानस तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए अग्रिम पंक्ति में उन योद्धाओं को आना पड़ेगा जो अपनी आस्थाओं को कार्यान्वित करते हुए सर्व साधारण के सम्मुख अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकें।

त्याग और बलिदान की पुण्य परम्परा अपनायें बिना यह महान् प्रयोजन और किसी भी प्रकार पूरा न हो सकेगा। इसका आरम्भ दुर्बल मनःस्थिति के लोगों से नहीं कराया जा सके ता। वे पीछे तो चल सकते हैं पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होने का साहसिक शुभारम्भ कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। युग परिवर्तन का शुभारम्भ तो त्याग और बलिदान के भाव भरे आदर्श प्रस्तुत कर सकने वाले अग्रगामी साहसी शूरवीरों द्वारा ही संभव होगा। युग की माँग और पुकार उन्हीं के उभरने, उठने की प्रतीक्षा कर रही है।


अपनों से अपनी बात - गुरुपूर्णिमा पर्व और अगले वर्ष का साधना−क्रम

अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी विशिष्ट एवं असामान्य स्थिति अनुभव करनी चाहिए। उन्हें लम्बे समय से लगातार इस पत्रिका के पृष्ठों पर लिपटी हुई एक अलौकिक प्रकाश प्रेरणा मिलती रही है। इस अनवरत अमृत वर्षा का प्रभाव चेतना सम्पन्न आत्माओं पर होगी ही चाहिए। जिनका रुझान दुष्ट प्रयोजन से ऊँचा उठकर नव−जीवन क्षेत्र में प्रवेश पाने के लिए अग्रगामी हुआ, निश्चय ही उनके भीतर कुछ पूर्व सञ्चित दिव्य संस्कार होने चाहिए अन्यथा समय की भयावह विकृत्तियों के नाश−पाश में से निकल कर इन दिनों आदर्शवादी चिन्तन की ओर उन्मुख हो सकना भी बड़ा कठिन है। युग प्रवाह भोग और स्वार्थ की परिधि से एक इञ्च भी आगे नहीं बढ़ने दे सकता। जिनके चिन्तन में उत्कृष्टता के तत्व घुस गये है जो आदर्शवादी जीवनयापन के लिए साहस एकत्रित कर रहे हैं उन्हें आज की स्थिति में असामान्य ही कहा जायगा। अखण्ड ज्योति के पाठक अहंकारवश नहीं वस्तुस्थिति के विश्लेषण के आधार पर अपने इसी स्थिति में पायेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि उनके जीवन पुष्प को खिलने का सुअवसर आ रहा है और कोई माली उनके विकास के लिए—संरक्षण के लिए ही नहीं—देवता के चरणों तक पहुंचा देने के लिए भी अपनी भावना सँजोये बैठा है।

परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना व्यक्तित्व इसी विशिष्ट स्थिति से आच्छन्न देखना चाहिए और लोग−प्रवाह से भिन्न प्रकार का कर्तृत्व अपनाने के लिए—व्यक्तित्व विकसाने के लिए साहस बटोरना चाहिए। युग−प्रवाह भिन्न प्रकार की गतिविधियों का निर्धारण वस्तुतः असाधारण साहस का काम है। जिन परिस्थितियों में सर्वत्र लोभ और मोह ही एकमात्र लक्ष्य बनकर रह रहा है, उनमें उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की—सर्वथा विचित्र दीखने वाली गतिविधियों का अपनाना एक असाधारण शौर्य पराक्रम ही माना जायगा। हमें ऐसे ही साहसी शूरवीरों में अपने को गिनना चाहिए। लोगों के पीछे चलने की परावलम्बी भेड़चाल को अस्वीकार करना चाहिए और अग्रिम पंक्ति में आकर कर्तृत्व इस स्तर का बनाना चाहिए जो दूसरों के लिए प्रकाशपूर्ण मार्ग−दर्शन का आधार बन सके।

साधना−क्रम अगले वर्ष के लिए निर्धारित करना चाहिए और इनमें से जिस सूत्रों को जिस हृदय तक अपनाया जाना सम्भव हो उसके लिए साहसपूर्वक संकल्प करना चाहिए और तत्काल उस निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए कदम बढ़ाना चाहिए। यह सूत्र छोटे दीखने पर भी महान् सम्भावनाएँ अपने भीतर छिपाये बैठे हैं जो इन्हें कार्यान्वित करेंगे वे देखेंगे कि अगले वर्ष में उनने कितनी आशाजनक प्रगति सम्पन्न कर ली। अगले वर्ष के लिए प्रस्तुत दस सूत्री साधना−क्रम इस प्रकार हैं—

नित्य प्रातःकाल भगवान् का नाम स्मरण और प्रकाश का ध्यान करने की नियमितता रखी जाय। हमें गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ जँचा है। यह किसी देश जाति, वर्ग,धर्म की परिधि में सी मित नहीं—सार्वभौम लगा है। हमारी दृष्टि में अपनी साम्प्रदायिक मान्यताओं को बनाये रहते हुए भी अतिरिक्त रूप से गायत्री जप कर सकता है। यदि किसी को आपत्ति हो तो अपना प्रिय अन्य ईश्वर नाम भी स्मरण किया जा सकता है अथवा पूर्व क्रम के साथ−साथ गायत्री मन्त्र जोड़ा जा सकता है। प्रकाश का ध्यान सार्वभौम—सर्व धर्म समर्पित एवं समस्त अध्यात्म साधनाओं द्वारा मान्यता प्राप्त है।

प्रातःकालीन पीत वर्ण सूर्य का ध्यान आँखें बन्द करके जप के साथ ही करना चाहिए। यह सूर्य सविता देवता का—ब्रह्मवर्चस् का —सद्ज्ञान प्रकाश का प्रतीक माना जाय। भगवान् सूर्य की प्रकाश किरणें हमारे शरीर में प्रवेश करके उसके स्थूल एवं सूक्ष्म संस्थानों में प्रवेश करती हैं और कण−कण को ज्योतिर्मय बनाती है यह ध्यान किया जाय। अपना रक्त माँस, अस्थि समूह, हृदय, यकृत,मस्तिष्क, पेट, आंतें आदि समस्त भीतरी बाहरी अंग प्रकाश से ओत−प्रोत होते है। दसों इन्द्रियाँ उससे ज्योतिर्मय होती है। समस्त काय−कलेवर धवल बलिष्ठता से भर जाता है। यही दिव्य प्रकाश सूक्ष्म शरीर में —मस्तिष्क में—प्रवेश करके मन, बुद्धि,चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय को प्रकाशवान बनाता है,उस क्षेत्र में प्रविष्ट समस्त अन्धकार का निराकरण करता है। इसके आगे वही प्रकाश हृदय स्थल में अवस्थित ‘कारण शरीर’ में प्रवेश करके अपनी आस्था, निष्ठा, श्रद्धाभाव,संस्थान को अवलोकित करता है। अपना कण−कण प्रकाशवान बन जाता है और ध्याना लक्ष्य सूर्य की तरह अपना समस्त व्यक्तित्व प्रकाश पुंज बनता है। अन्तर केतमस् से निवृत्ति मिलती है और उस प्रकाश से अपना संपर्क क्षेत्र प्रकाशमान होता है।

इस ध्यान केन्द्र प्रभातकालीन सूर्य के साथ वे अतिरिक्त प्रेरणाएँ भी जुड़ी हुई समझी जाँय जो हिमालय के एक विशेष केन्द्र में विशेष प्रेरणाओं के रूप में हम सबको विशेष रूप उपलब्ध होती है। वे हमारे अवरुद्ध हृदय कपाटों को विशेष रूप से खोलती हैं और सामान्य से असामान्य बन सकने के लिए अतिरिक्त क्षमता प्रदान करती हैं।

प्रातःकाल न्यूनतम आधा घण्टा और अधिकतम डडडड डडडड डडडड डडडड ध्यान हम सबको करना चाहिए। स्नान की हर दृष्टि से उपयोगिता है, पर जो कारणवश स्नान न कर सकें वे मल−मूत्र से निवृत्त होकर हाथ, पाँव धोकर भी इस उपासना क्रम को कर सकते हैं।

अपने परिवार में आस्तिकता और उपासना का वातावरण बनाया जाय। घर में गायत्री का एक चित्र किसी उपयुक्त स्थान पर लगाया जाय। अपना दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व घर का हर सदस्य उसके सम्मुख खड़े होकर प्रणाम किया करे और कम से कम पाँच पत्र मन ही मन जप किया करे। इसके बाद दफ्तर जाने, स्कूल जाने,भोजन बनाने आदि के कार्य घर के लोग किया करें। दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व यह धार्मिक श्रीगणेश करने की आदत पड़ जाने से उसके दूरगामी परिणाम होंगे। हमारे हर परिवार में यह परम्परा प्रचलित की जाय।

जीवन समस्याओं को सुलझाने वाला, प्रकाश देने वाले सत्साहित्य पढ़ने के लिए कम से कम आधा घंटा समय अवश्य निकाला जाय, उसे रास्ता चलते, दफ्तर में, दुकान में अथवा फुरसत के समय कभी भी किया जा सकता है। जो पढ़ा जाय उसमें से अधिक प्रेरणाप्रद तथ्यों को एक कापी में नोट किया जाय और रात को या जब भी अवकाश हो उन नोट की गई बातों पर कम से कम आधा घण्टा चिन्तन मनन किया जाय। उन प्रेरणाओं को क्या अपने जीवन−क्रम में उतारना सम्भव है? यदि है तो किस क्रम से, कितनी मात्रा में—इन प्रश्नों पर विचार करने का नाम ही चिन्तन−मनन है।

हर दिन नियमित दिनचर्या बनाकर काम किया जाय। या तो रात को ही बनाली जाय या सवेरे उठते ही। समय तनिक भी बर्बाद न हो और न उसमें अस्तव्यस्तता प्रमाद के शत्रुओँ से छुटकारा पाया जा सकता है। व्यवस्थित क्रम से पूर्ण मनोयोग के साथ कठिन लायक श्रम करने वाला ही किसी दिशा में कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है। हममें से हर किसी का जीवन−क्रम ऐसा ही व्यवस्थित होना चाहिए।

शरीर, वस्त्र, घर,सामान आदि की सफाई पर पूरा ध्यान रखा जाय। असम्मानजनक शब्द छोटे या बड़े डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड 48 समय पर ही खाया जाय। पैसा खर्च करते या करते समय यह सोच लिया जाय कि यह कार्य नितान्त आवश्यक है या नहीं—मितव्ययी रहने से ही अर्थ सन्तुलन ठीक रहेगा। यदि दुश्चरित्र लोगों के साथ अपनी घनिष्ठता बढ़ गई तो उसे शिथिल एवं समाप्त करने के लिए कदम बढ़ाया जाय। इन पाँच निश्चयों से उत्कृष्टता, प्रतिभा एवं प्रसन्नता की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है।

गुरुवार को अस्वाद व्रत किया जाय—बिना नमक और बिना शक्कर का भोजन किया जाय। सम्भव हो तो एक समय का, पूरे दिन का उपवास किया जाय। उपवास का अर्थ है केवल जल,दूध, छाछ, रस, तरकारियों और रसा आदि पतली वस्तुओं पर निर्वाह।

घर के सदस्यों में सत्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने के लिए कुछ समय उनके साथ−साथ काम किया जाय। सफाई,व्यवस्था,उपासना,स्वाध्याय,नित्य कहानियाँ कहना—घर की तथा समाज की समस्याओं पर विचार विनियम, खेल, विनोद, मनोरंजन,शाक−वाटिका, टूटी−फूटी वस्तुओं की मरम्मत, गृह−शिल्प, पढ़ाना आदि कार्यों के लिए घर वालों के साथ स्वयं जुटाना चाहिए ताकि उनमें सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करके सच्चा पारिवारिक उत्तरदायित्व निवाहा जा सके।

ज्ञान−घट घर में अवश्य रखा जाय। उसमें एक युग−निर्माण साहित्य तथा पत्रिकाएँ पहुँचते रहने की व्यवस्था की जाय। इस साहित्य को घर का प्रत्येक सदस्य पढ़े और संपर्क के लोग उससे लाभ उठाते रहें ऐसा प्रबन्ध किया जाय।

स्थानीय अखण्ड−ज्योति सदस्य मिलकर एक युग−निर्माण शाखा गठित करें। परस्पर घनिष्ठता बढ़ाये और मिशन के प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों को अपने क्षेत्र में व्यापक बनाने में योगदान करने की योजनाएँ बनाएँ। अपना विचार परिवार बढ़ने और उसमें सक्रियता लाने के लिए आगे बढ़कर अधिकाधिक उत्साह के साथ काम किया जाय।

शान्ति−कुंज द्वारा प्रचलित शिक्षण योजनाओं में स्वयं सम्मिलित होने का तथा अन्य सुयोग परिजनों को भेजने का प्रयत्न किया जाय। प्रत्यावर्तन सत्र, कनिष्ठ वानप्रस्थ सत्र, लेखन सत्र, महिला जागरण सत्र, कब कितने दिनों के चलेंगे, इसकी सूचना अप्रैल 74 की अखण्ड−ज्योति में ‘अपनों से अपनी बात स्तम्भ में विस्तारपूर्वक छप चुकी है। परिवार के भावनाशील लोग प्रशिक्षणों के स्वर्ण सुयोग से वंचित न रहें इसकी सजगता बरती जाय।

जीवन साधना का वर्ष प्रायः गुरु पूर्णिमा से आरम्भ किया जाता है। शान्तिकुंज में प्रशिक्षण प्राप्त किये हुए सभी लोगों से गठ अंक में अनुरोध किया गया था कि वे तब से लेकर अब तक की अवधि में अपने आध्यात्मिक और भौतिक जीवन में आये हुए उतार−चढ़ावों का चित्र रण भेजें। वे भेज ही रहें होंगे। इस अंक में जीवन−साधना की दस सूत्री प्रक्रिया को अपनाने के लिए सभी परिजनों से कहा जा रहा है। जो इन सूत्रों में से कुछ अपना सकें और उसके लिए संकल्पपूर्वक कदम उठायें वे ही अपने प्रयासों की सूचना ‘शान्ति−कुञ्ज सप्त सरोवर, =विज्ञापन हरिद्वार’के पते पर भेज दें। जिन्हें उत्तर की अपेक्षा हो उन्हें जवाबी पत्र भेजना न भूलना चाहिए।

आशा की जा रही है कि अखण्ड−ज्योति परिजन अपनी विशिष्ट आत्मिक स्थिति का अनुभव करेंगे। जीवन−लक्ष्य की पूर्ति के लिए साहसिक कदम बढ़ायेंगे। हम सब एक व्यवस्थित क्रम से जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए एक जुट होकर बढ़ चले तो न केवल अपना—अपने परिवार का—कल्याण करेंगे वरन् समस्त मानव जाति का भविष्य निर्माण करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे। इस दिशा में क्रमबद्ध कदम उठाने के लिए प्रस्तुत दस सूत्री साधना योजना निश्चित रूप से अति उपयोगी सिद्ध होंगी।


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शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार की सूचनाएँ :−

(1)सत्रों में जिन्हें स्वीकृति मिली है वे ही आवें। अपने साथ अन्य बिना स्वीकृति वालों को साथ न लावें।

(2)बच्चों समेत आने की किसी भी शिक्षार्थी को स्वीकृति नहीं दी गई है।

(3) शान्ति−कुञ्ज में धर्मशाला जैसा प्रबन्ध नहीं हैं। भेंट परामर्श के लिए आने वाले सज्जन अन्यत्र ठहरने के पश्चात् आश्रम में आवें।

(4) भेंट परामर्श का समय अगले 4 महीनों तक मध्याह्न 11 से 12 तक रहेगा।


शाकाहार बनाम माँसाहार

भारत सरकार द्वारा प्रकाशित हैल्थ बुलेटिन नं.23 में पौष्टिक तत्व तुलनात्मक चार्ट छपा है। इस पर बारीकी से दृष्टिपात करने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि माँस के जो गुण−गान किये जाते हैं, वे निरर्थक है। माँस की तुलना में तो सामान्य दालों में भी कही अधिक पौष्टिक तत्व मौजूद हे। वे सस्ती है—बनाने में सरल हैं और प्राणतत्व जैसा क्रूर−क्रम भी उनके सेवन से नहीं करना पड़ता।

नीचे प्रस्तुत तालिका पर दृष्टिपात करके हम शाकाहार और मांसाहार की उपयोगिता पर अपनी सहज बुद्धि के आधार पर भी किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। देवताओं के नाम पर की जाने वाली पशु−बलि पर गहरा व्यंग करते हुए सन्त कबीर ने कहा है—

पदार्थ प्रोटीन चिकनाई खनिज कार्बोकैल्शियम फास्फोरस लोहा कैलोरी लवण हाइड्रेटस्

मूँग 24.0 1.30 3.65 6.6 0.14 0.2 88.4 0 334

उड़द 24.01.403.460.30.200.379.80350

अरहर 22.31.703.657.20.140.268.80353

मसूर 25.10.702.159.70.130.252.20346

मटर 22.91.402.363.50.300.365.00358

चना 22.55.202.258.90.700.318.90372

लोबिया 24.60.703.255.70.700.493.80327

सोयाबीन 43.219.54.622.90.240.9911.5432

बादाम 20.858.92.910.50.230.493.50655

काजू 21.246.92.422.30.500.455.40596

मूँगफली 31.539.82.319.30.500.391.60549

मैथी बीज 26.25.803.044.10.160.3714.1333

पनीर 24.125.14.06.30.730.522.10348

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माँस वर्ग

अण्डा 13.313.31.0—0.600.222.1173

मछली 22.6 0.600.8—0.200.190.9091

बकरी का माँस 18.513.30.3—0.150.152.5174

सुअर का माँस 18.74.401.0—0.300.202.3114

पढ़े नमाज रख्रें फि र रोज, पराये पुत्र का काढ़ हिया। गर बहिश्त मिले यों ही क्यों न कुटुम्ब हलाल किया॥

गुरु नानक देव का माँसाहार विरोधी मत कगुरु नानक वार माफ महल्ला 1 में इस प्रकार मिलता है—

जे रक्त लगे कपड़े जामा होव पलीत। जो रक्त पीवे मानुषा तिन क्यों निर्मल चित्त॥

बाइबिल अध्याय 33−61−1 में प्रभू ईसा का कथन है कि—जो मेरे अनुयायी बनना चाहते हे उनसे मेरा कहना है, कि जीव हिंसा से बचें और माँसाहार न करें। क्योंकि परमात्मा न्यायकारी तथा दयालु है और उनकी पवित्र आशा है कि मनुष्य पृथ्वी पर शाकाहारी होकर ही रहें।

कुरान शरीफ सूरेबकर का एक मन्त्र है−

वैज्जा तवल्ला साआ फिर अरदे लयुक सिद फीहा, व युद्ध लिकस हरसा वन्नस्ल वल्लाहों ला युहिवुल फसाद।

अर्थात्—मत जानवरों को मारना—मत फसल को उजाड़ना। इनसे संसार में बुराइयाँ फैलती हैं। अल्लाह बुराई को पसन्द नहीं करता।

*समाप्त*