आत्म विश्वास ईश्वर का अजस्र वरदान

पुलिस का सशस्त्र गारद साथ रहने पर सुरक्षा की निश्चिंतता हो जाती है और निर्भय आश्वस्त रहा जा सकता है। जिसे ईश्वर पर उसकी सर्व शक्ति सत्ता पर विश्वास है उसे किसी से भी डरना न पड़ेगा। जिसे ईश्वर पर भरोसा है और जो उसे अपने भीतर हर घड़ी विद्यमान अनुभव करता है उसे आत्म विश्वास की कमी क्यों रहेगी? ऊपर से— अपनी महानताओ और सम्भावनाओ पर से आस्था खो बैठा उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जायगा?

जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल रहा है। सम्भव है किसी कुशल किसान की फसल मारी जाय पर जिनने भी कृषि में कमाई की है उनमें से प्रत्येक को जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा। आत्म विश्वास ही शक्ति का स्रोत है। प्रगति के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकना उसी के सहारे सम्भव हो सकता है। जो ईश्वर भाग्य का निर्माण करता है उसका दूसरा नाम आत्म विश्वास है। उसी की प्रेरणा से ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थ का उद्भव होता है। जिसके लिए दुर्गम पर्वतों को भी रास्ता देना पड़े। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिलता है— आत्म विश्वास ही है।


करुणा की विजय

हेमकूट राज्य के राजकुमार जीभूत बाहन अपने मित्रों के साथ समुद्र तट पर आक्रमण करते हुए गौकर्ण पर्वत पर पहुँचे। उन्होंने गुफाओं के निकट अस्थियों के बड़ें−बड़े ढेर लगे देखे तो अपने मित्र मित्रावसु से पूछा कि

हड्डियों के ढेर किस प्रकार लगे हुए हैं। मित्रावसु ने उत्तर दिया−राजकुमार! यह ढेर निर्दोष नागों की अस्थियों के हैं। गरुड़ की नाग वंश से पुरानी शत्रुता है, वे अपने बल अभियान में आकर दोषी या निर्दोष किसी नाग को पावें, उसका ही काम तमाम कर देते हैं। नाग निर्बल है, गरुड़ की शक्ति बढ़ी हुई है। बेचारे नाग गरुड़ के मुकाबले में ठहर नहीं पाते इसलिए उन्होंने अब समझौता कर लिया है। बारी−बारी प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के द्वारा वध होने इस पर आता है और अपने प्राण देकर उनकी कोप ज्वाला को शान्त करता है।

जीमूत बाहन बड़े दयालु थे। दया से उनका हृदय ओत−प्रोत था। निरपराध नागों का इस प्रकार दमन होता सुनकर उनका जी पिघल गया और करुणा से आँखें भर आई। राजकुमार के पास गरुड़ को परास्त करने की शक्ति न थी, फिर भी उनका क्षत्रिय अन्तःकरण अन्याय को सहन न कर सका। निश्चय कर लिया कि नागों का पक्ष लेते हुए गरुड़ से धर्मयुद्ध करूंगा।

नाग माता विलाप कर रही थी कि हाय मेरे इकलौते बेटे शंखचूड़ को आज गरुड़ की कोप ज्वाला में अपना प्राण देना होगा। बेटे को छाती से चिपटा कर वह मर्मभेदी करुणा क्रन्दन कर रही थी, जिसे सुन−सुनकर जीमूत बाहन का कलेजा फटा जा रहा था। राजकुमार ने निकट जाकर कहा— माता,आपका विलाप मुझसे नहीं सुना जाता। आपके शंखचूड़ को बचाने के लिए मैं अपना प्राण देने को तैयार हूँ। अपने बेटे को अपने पास आनन्द से रखिये, आज मैं गरुड़ के अत्याचार का भोजन बनूँगा।

नाग माता ने स्पष्ट कह दिया—हे दयालु नवयुवक,मैं मोहग्रस्त होकर इतनी स्वार्थान्ध नहीं हो गई हूँ कि शंखचूड़ के बदले तुम्हारे प्राण जाना स्वीकार करूं। मेरा पुत्र अपना कर्त्तव्य पालन करने से पीछे न हटेगा। शंखचूड़ माता की पद−रज सिर पर धरकर उठा और गौकर्ण पर्वत की प्रदक्षिणा देकर नियत स्थान के लिए चल दिया। जीमूत बाहन ने यह अच्छा देखा। नाग वेश बनाकर शंखचूड़ से पहले ही गरुड़ के स्थान पर पहुँच गये। गरुड़ ने तुरन्त उस पर आक्रमण किया और पहली ही झपट में बुरी तरह घायल कर डाला और अंग विदीर्ण करने लगे।

इतने में शंखचूड़ आ पहुँचा। उसने अपने स्थान पर किसी दूसरे को देखकर पुकारा— अरे, अरे वह क्या अनर्थ हो गया। मेरी जगह उसी उपकारी के प्राण चले गये। गरुड़ बड़े असामंजस्य में पड़े, उन्होंने ध्यान पूर्वक देखा,तो प्रतीत हुआ कि हेमकूट राजा के महात्मा राजकुमार जीमूत बाहन ने दयार्द्र होकर परोपकार में अपने प्राण दे दिये।

महात्मा जीमूत बाहन का मृत शरीर भूमि पर पड़ा हुआ था, शंखचूड़ की आँखें बरस रही थीं, गरुड़ के कलेजे में हजार−हजार बिच्छू काटने की पीड़ा होने लगी। विश्व में ऐसी विभूतियाँ हैं, जो दूसरों की भलाई के लिए अपने प्राण दे देते हैं। एक मैं हूँ, जो तुच्छ−सी शत्रुता के कारण अनेक निर्दोषों का वध करता हूँ। गरुड़ खड़े न रह सके, पापी के सामने जब उसका वास्तविक चित्र आता है, तब वह आत्म−निरीक्षण करता है, तो उसके पैर काँपने लगते हैं, गरुड़ आत्म धिक्कार की प्रताड़ना से व्याकुल होकर सिर धुनने लगे।

उन्होंने जीमूत वाहन का रक्त हाथ में लिया और पूर्वाभिमुख होकर सूर्य को साक्षी देते हुए प्रतिज्ञा की कि भविष्य में अहंकार के वशीभूत होकर अन्याय करने पर उतारू न हूँगा। उस दिन से उन्होंने नागों के साथ अपना सारा बैर−विरोध त्याग दिया।

जीमूत वाहन का मृत शरीर धूलि में लोट रहा था, परन्तु यथार्थ में यह उनका विजय सिंहासन था पुराना पापी गरुड़ मर गया था, शरीर वही था, पर अब परिवर्तित गरुड़ की पवित्र आत्मा, उसमें निवास करने लगी थीं।


आस्तिकता के दो अनुदान−वरदान

आस्तिकता के दो अविछिन्न अंग हैं—आशा और प्रसन्नता। जो ईश्वर पर विश्वास करेगा उसे यह भी मानना पड़ेगा कि उसने सर्वोपरि उपहास—मनुष्य जीवन देकर असाधारण प्यार भरा अनुदान दिया है। जब इतना कुछ दे दिया तो भविष्य में उपयोगी साधन देने में भी कंजूसी क्यों करेगा? यह विचार सहज ही मनःस्थिति में सुनहरी आशा का संचार करता है। यही कारण है कि सच्चे अर्थों में ईश्वर विश्वासी सदा आशा का दीपक संजोये रहता है। निराशा की अँधियारी उसे छू भी नहीं पाती। अरस्तू सच ही कहा करते थे कि—’निराशा अपने ढंग की नास्तिकता है। जिसने उजले भविष्य की आशा छोड़ दिया, नास्तिकता और निराशा एक ही वस्तु के नाम रूप हैं।

ईश्वर महान् है उसका कर्तृत्व भी महान है। ईश्वर सुन्दर है, उसका कर्तृत्व भी असुन्दर नहीं हो सकता। उसने जो कृतियाँ प्रस्तुत की हैं वे हमें सुन्दर लगीं सो ठीक है, पर जब वह उन्हें बदल कर दूसरे नये अथवा अधिक सुन्दर रूप में प्रस्तुत करने जा रहा है तो हम उसे अनुपयुक्त क्यों मानें? अवाँछनीय क्यों समझें? और खिन्न किसलिए हों?

जब हमें धन लाभ हुआ था तब वह किसी को हानि थमा कर हमारे हाथ आया था। जिस दिन अपने घर पुत्र जन्मा था उस दिन कहीं न कहीं मरण का कुहराम जरूर मचा होगा। पत्नी जिस दिन हमारे घर आई उस दिन उसके पिता के घर सूनेपन की उदासी छाई होगी। जब हानि उठा कर हमारे लिए सुख सुविधा का साधन प्रस्तुत करना ईश्वर का दया युक्त उचित कार्य था तो आज वैसी ही सुविधा किन्हीं दूसरों के देने के लिए जब हमारे हाथ से सुविधाएँ जा रही हैं—प्रिय स्थिति का समापन हो रहा है तो उसे अनर्थ क्यों माना जाय? आखिर ईश्वर हमारा अकेले का ही तो नहीं है। उसके सभी तो बालक हैं। पारी−पारी ही तो एक को गोदी में चढ़ायेगा और दूसरे को नीचे उतारेगा।

विजेताओं को शील्ड एक साल ही तो अपने पास रखने का अधिकार है। अगले साल को उसे किसी अन्य विजेता का घर सुशोभित करना है। सदा एक ही जगह बनी रहे तो फिर चल शील्ड की परम्परा ही समाप्त हो जायगी। एक स्थान से दूसरे स्थान पर वस्तुओं और व्यक्तियों को बदलते रहने में शोभा भी है और व्यवस्था भी। सरकारी अधिकारियों के तबादिले न हों सब सदा के लिए एक स्थान पर ही जमे बैठे रहें तो पदोन्नति प्रतिभा−विकास और सूझ−बूझ के विविध प्रयोगों का प्रचलन ही अवरुद्ध हो जायगा।

हमारे अधिकार में रही वस्तुएँ और संपर्क में रहे व्यक्ति जितने समय अपने रहे उतना अच्छा ही रहा उससे सन्तोष और आनंद मिला सो ठीक है पर अब उन खिलौनों से दूसरों को भी तो खेलने देना चाहिए। हमें भी खाली कहाँ रखा जाने वाला है। दूसरी तरह की वस्तुएँ—दूसरी तरह की परिस्थितियाँ अगले ही दिनों सामने आयेंगी और अन्य नये लोगों से संपर्क बनेगा। उस नवीनता को आशा भरी दृष्टि से देखें और जो गुजर गया उसकी उपेक्षा करें तो खिन्न एवं अप्रसन्न रहने का कोई कारण शेष न रह जायगा।

ईश्वर विश्वास का अर्थ है—उस क्रिया−कलाप के पी रहने वाले सुरम्य सौंदर्य की अनुभूति करना। हमारी मन के अनुरूप ईश्वर के कार्य चलें—वह हमारी रुचि के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करे यह अपेक्षा कर व्यर्थ है। ईश्वर सिन्धु है हम बिन्दु। बूँद का समर्पण सागर के प्रति होता है; तभी उसे सागर द्वारा अपने प्रति समर्पण की अनुभूति होती है। ईश्वर की इच्छा को ही अपनी इच्छा के अनुरूप मोड़ें यही ईश्वर भक्ति है। उसे हमारी मर्जी के अनुरूप चलना चाहिए यह कह अनधिकार चेष्टा है। हम केवल लाभ हानि की बात सोचते हैं जबकि ईश्वर को अपनी समस्त सृष्टि में सन्तुलन बनाये रखना पड़ता हैं। रेलगाड़ी की तरह उसे यहाँ के मनुष्यों को वहां और वहां की वस्तुओं को यहाँ ढोने सर्वदा के लिए अपनी सीट सुरक्षित रहने की आशा करना—रेल व्यवस्था को उखाड़ देने जैसी कुचेष्टा ही बन जायगी।

ईश्वर भक्त हर स्थिति में प्रसन्न रहता हे। उपलब्ध पदार्थ एवं परिस्थितियों का श्रेष्ठतम सदुपयोग क्या हो सकता है वह इतना ही सोचता है और इसके लिए अधिकाधिक उपयुक्त मार्ग खोजता है। वस्तुओं का संग्रह नहीं सदुपयोग उसका लक्ष्य रहता है। जमा करने जोड़ने और उनका अधिपति बनने का अहंकार उसे भाता नहीं। नदी की लहरों की−हवा की हिलारों की रो बाँध कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। सम्पदा का अधिपति सदा के लिए कोई नहीं रह सकता। जो आज अपने हाथ है वह किसी के हाथ से ही छिनकर आई थी। उसे अगले क्षणों अपने हाथों से भी छिनकर अन्यत्र जाना है इसके जिए जिसने अपने को तैयार रखा है वही निर्लोभ और अनासक्त रह सकेगा। संग्रह में नहीं सदुपयोग में उसकी रुचि रहेगी। ऐसे व्यक्ति को लाभ का हर्ष और हानि का शोक देर तक विक्षुब्ध न कर सकेगा।

व्यक्ति जो आज अपने समीप रहते हैं—मित्र या घनिष्ठ हैं वे सदा इसी रूप में बने नहीं रह सकते। छोटा बच्चा प्रायः दिन−रात माता के शरीर के साथ चिपटकर रहता है। रात को साथ सोना, दिन को गोदी में खेलना, दूध पीना आदि को साथ को मिलाकर अधिकाँश समय साथ ही व्यतीत होता है। धीरे−धीरे यह अवधि कम होती जाती है। युवा होने पर वही बालक अपनी पत्नी, बच्चों के साथ रहता है और माँ के पास कभी−कभी ही तनिक देर को बैठ पाता है। दोनों के शरीर का चिपका रहना तो प्रायः बन ही नहीं पाता। नौकरी पर कहीं अन्यत्र चले जाने की स्थिति में तो माता और बेटे का मिलन और भी अधिक समय साध्य हो जाता है। इस भिन्नता को लेकर कोई माता या बालक रुदन करने लगे और भूतकाल की समीपता का स्मरण करके दुखी रहे तो यह उनकी मूर्खता ही कही जायगी। समय के साथ उन्हें अपनी मनः स्थिति भी बदलनी ही चाहिए।

पति−पत्नी विवाहोपरान्त जितने घुल मिलकर रहते हैं कई बच्चे हो जाने के बाद वह स्थिति नहीं रहती। इस परिवर्तन से वे दुखी रहने लगें तो गृहस्थ जीवन का आनन्द ही चला जायगा। ठीक इसी प्रकार का एक परिवर्तन मरण भी है। कन्या अपने पिता—गृह से पति−गृह जाती है। इसमें तनिक सा शोक तो होता है पर गहरा सन्तोष भी रहता है। अपना कोई प्रियजन यदि मरता हे तो वियोग का सामयिक कष्ट होना तो स्वाभाविक है पर नवीन वस्त्र पहनने—नये परिवार में जाने —नई माता का पयपान करने— नया दुलार पाने से उस आत्मा को जो प्रसन्नता एवं सुविधा रहेगी उसका भी विचार करना चाहिए। जो ऐसा विचार कर सकता हे वह स्वजनों के मरण अथवा अनिवार्य विछोह पर अत्यधिक उद्विग्न नहीं होता। इस परिवर्तन के पीछे छिपी ईश्वर की इच्छा और व्यवस्था को शिरोधार्य करने के लिए उसकी निष्ठावान आस्तिकता सहज ही सहमत कर लेती है।

सच्ची आस्तिकता की दो परख है सघन आशावादिता और मुस्कान भरी प्रसन्नता। इन दोनों मानसिक उपलब्धियों के कारण जीवन इतना सरस और सरल रहता है कि सामान्य मनुष्यों को कष्ट देने वाले शोक−संताप उस तक फटकने भी नहीं पात। ईश्वर भक्ति के फलस्वरूप सदा अनुकूल स्थिति ही बनी रहेगी अथवा प्रचुर सुख साधन उपलब्ध रहेंगे ऐसी बात नहीं है। अभाव,हानि और वियोग की अप्रिय परिस्थितियाँ उनके सामने भी आती जाती रहती हैं। अन्तर केवल इतना ही रहता है कि परिष्कृत दृष्टिकोण के कारण वह संसार में होते रहने वाले परिवर्तनों से अत्यधिक प्रभावित नहीं होता। उन्हें विनोद के साथ देखता है और अपने को बदली परिस्थिति के अनुरूप ढाल लेता है। ईश्वर भक्त रोता खीजता नहीं हँसता और हंसाता रहता है। आस्तिकता उसे उज्ज्वल भविष्य की आशा बनाये रखने का सुनिश्चित आश्वासन देती रहती है यह वरदान ऐसे हैं जो आस्तिकता के फलस्वरूप आदि से अन्त तक मिलते ही रहते है।


ईश्वर−भक्ति हमें ईश्वर तुल्य बनाती है

भक्ति का अर्थ है प्रेम। इसका श्रीगणेश—शुभारम्भ ईश्वर भक्ति से किया जाता है क्योंकि वही इस संसार में सबसे अधिक प्रेम करने योग्य है। उसी की पात्रता ऐसी है जिस पर पूरी तरह आसक्त होकर अन्तःकरण का समस्त प्रेम रस पूरी तरह उँडेला जा सकता है। अन्य प्राणी या पदार्थ भी सत्, रज, तम की विविध प्रकृति से बने हैं। उनकी स्थूल संरचना मिट्टी, पानी, हवा, आग से हुई है। वे सभी बदलते और मरते हैं।ऐसी स्थिति में उनके साथ चिरस्थायी शाश्वत प्रेम सम्बन्ध नहीं निभ सकता है। उनकी बदलती रहने वाली परिस्थिति और मनःस्थिति ऐसे कारण उत्पन्न कर देती है जिससे अपनी प्रेम−निष्ठा भी उलट−पुलट जाय। अस्तु प्रेम का शुभारम्भ ऐसे आधार पर करना पड़ता है जहाँ फेर बदल करने की विवशता कभी भी उत्पन्न न हो।

अमृत नाम के एक तत्व की कल्पना की जाती रही है जिसकी रसास्वादन अद्भुत है। उसे पीते समय ही आनन्द रहता हो सो बात नहीं पर उसकी कुछ बूंदें चखलेने के बाद मस्ती की प्रतिक्रिया चिरस्थायी जैसी हो जाती है।

इन्द्रियों के स्वाद ऐसे हैं जो एकबार चख लेने पर बार−बार मन को उसी चेष्टा के लिए खींचते रहते हैं। पद, सम्मान, संग्रह वर्चस्व के स्वाद भी ऐसे है जो एकबार तृप्त ऐसे से ही समाप्त नहीं होते पर दिन−दिन अधिकाधिक तीव्र होते चले जाते हैं। उनकी माँग—भूख और भी अधिक उग्र बनती हैं। ठीक इसी प्रकार आत्मा की आकाँक्षा एक ही रहती है—प्रेम। वासना,तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए सामान्य मनुष्य की समस्त बौद्धिक और शारीरिक गतिविधियाँ सक्रिय रहती हैं।

आहार निद्रा की प्रारम्भिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए तो कृमि−कीटक भी सक्रिय रहते हैं। मनुष्य का भौतिक जीवन वासना, तृष्णा और अहंता जैसी मनोगत सरसताओं की आकाँक्षा में तत्पर रहता है और उसकी पूर्ति में निरत रहता है।

ठीक इसी प्रकार उच्चस्तर पर उठा हुआ अन्तःकरण प्रेम का अमृत पीने के लिए आतुर पाया जाता है। कामुक अथवा मद्यपी अपने विषयों के लिए जितना व्यग्र रहता है; आत्मिक भूमिका के विकसित मनुष्य उससे कहीं अधिक उद्विग्न− व्याकुल प्रेम रस के रसास्वादन के लिए पाया जाता है।

प्रेम की विशेषता है दो आत्माओं को एक में जोड़ देना। पति−पत्नी में प्रणय प्रेम जब अधिक घनिष्ट होता जाता है तो वे दो शरीर एक प्राण कहे जाने लगते हैं। वस्तुतः भावना क्षेत्र में दोनों का अनुभव भी ऐसा ही होता है कि उनका एक ही व्यक्तित्व दो शरीर धारण करके विचरण कर रहा हे।

प्यार वस्तुतः अपनेपन की प्रतिक्रिया मात्र है। जिस वस्तु या व्यक्ति को हम जितना अधिक अपना समझते हैं उसी अनुपात से उसे प्यार करते हैं। यह प्रेमानुभूति इतनी सघन होती चली जाती है कि प्रेमी के सुख−दुख अपने लगने लगते हैं। उसकी इच्छा कामना की पूर्ति भी ऐसी लगती है मानों अपनी ही इच्छा पूर्ति हो रही है। स्वयं कष्ट उठा कर प्रेमी की इच्छा पूर्ति के लिए इसी प्रयत्न किया जाता है कि उसका सन्तोष अपने निज के सन्तोष का अविछिन्न अंग बन जाता हैं। प्रेमिका का रंग−रूप, वचन, व्यवहार सब कुछ इसलिए अनुपम लगता है कि उसके साथ आत्मीयता की मात्रा अधिक गहराई तक जुड़ गई। यदि यह घनिष्टता नष्ट हो जाय तो वह प्रेयसी कुरूप ही नहीं शत्रु भी लगने लगेगी। कुछ समय पहले जिसे क्षण−क्षण में देखने को जी करता था मन में विद्वेष परायापन उत्पन्न होने पर उसकी सूरत देखने और समीप आने पर घृणा उत्पन्न होती है।

अपनी प्रेयसी से भी अधिक सुन्दर और सुयोग्य महिलाएँ संपर्क में आती हैं पर उनकी और ध्यान भी नहीं जाता और न उनकी ओर किसी प्रकार का आकर्षण होता हैं। इससे स्पष्ट हैं कि किसी की शारीरिक, मानसिक विशेषताएँ नहीं वरन् उसके साथ आरोपित की गई आत्मीयता ही उसे सुन्दर आकर्षक, अनुकूल एवं परमप्रिय बना देती है। यह आत्मीयता हटते ही क्या पदार्थ सभी नीरस और निरर्थक लगने लगते हैं। इस संसार में जहाँ भी—जितनी भी कुछ सरसता अनुभव में आती है वस्तुतः वह अपनी आत्मीयता के आरोपण की ही प्रतिक्रिया होती है। इस आरोपण के अनुपात से ही प्रिय−अप्रिय का स्तर बनता, बढ़ता और बदलता है।

प्रेम का एक गुण है दूसरों को प्रिय बना देना उन्हें सरस एवं सुन्दर अनुभव हो सकने की स्थिति में ला देना। उसका दूसरा गुण है। दूसरों को अपना बनाकर उनके साथ आदान−प्रदान का द्वार खोल देना। पति−पत्नी सघन स्नेह सम्बन्ध में बँधने पर एक दूसरे को केवल सुखद एवं सरस अनुभूतियाँ ही प्रदान नहीं करते वरन् उनकी विशेषताओं और क्षमताओं को परस्पर आदान−प्रदान भी सम्भव हो जाता है। जो कुछ उनके पास होता है वे उसका लाभ प्रेम पात्र को उन्मुक्त भाव से—सहज रूप से देना आरम्भ कर देते हैं। पति कमाता है और पत्नी के हाथ पर रखता है। पत्नी पाक विद्या, गृह−व्यवस्था—शृंगार सज्जा आदि जिन विशेषताओं से युक्त होती है उसका लाभ पति को पहुँचाती है। यह आदान−प्रदान की शर्त या समझौते के आधार पर नहीं वरन् सहज स्वभाव ही होता रहता है। अपने लिए अपनी उपलब्धियों का लाभ जिस प्रकार लिया जाता हे, अपने वैभव का जिस प्रकार स्वयं उपयोग किया जाता है ठीक वैसा ही साथी भी कर सके इसके लिए प्रयत्न किया जाता है। सच तो यह है कि अपनी उपलब्धियों को प्रेम पात्र के लिए समर्पित करना—उस समर्पण से प्रेमी का प्रसन्न, संतुष्ट होना और उस सन्तोष भरी प्रसन्नता की प्रतिक्रिया अपने आनन्द के रूप में अनुभव करना, इस प्रकार तीन चक्र वाली चरखी चलती है। अपने वैभव का स्वयं उपयोग करने पर जितना सुख मिलता था उसकी अपेक्षा साथी को उसका लाभ देने पर दूना आनन्द होता है। प्रेम पात्र को प्रसन्न देखकर अपने को जो आनन्द मिलता है वह चक्रवृद्धि दर से चौगुना हो जाता है। खाने की अपेक्षा खिलाने का आनन्द अत्यधिक होने के बात कही जाती है वह निरर्थक नहीं है। उसमें पूरा−पूरा सत्य और तथ्य भरा हुआ है।

प्रेम को अमृत इसलिए कहा गया है कि वह जितने क्षेत्र में आरोपित होता है उतनी परिधि को हर वस्तु बड़ी सुन्दर बन जाती है। उसकी समीपता से अपने आनन्द की मात्रा बढ़ती है। प्रेम−पात्रों का अस्तित्व और वैभव अपनी निज की सम्पदा जैसा लगता है। उसी अनुपात से अपना गर्व गौरव और सन्तोष बढ़ता है। अपना निज का परिवार छोटा ही हो सकता हे।—अपनी निज की कमाई स्वल्प ही रह सकती है किन्तु यदि प्रेम भरी आत्मीयता का विस्तार व्यापक बना लिया जाय तो प्रतीत होगा कि अपनापन विस्तृत होने के कारण जितने क्षेत्र में फैला हुआ था उतने क्षेत्र पर अपना आधिपत्य हो गया। भावनात्मक क्षेत्र में आरम्भ हुआ यह आधिपत्य स्वसंचालित आदान−प्रदान की पृष्ठभूमि बनाता है और अनायास ही सहयोग का अनुदान उपलब्ध होने लगता है।

यही है कि जैसे देव शक्ति में अथवा समर्थ व्यक्ति में अपनी सघन श्रद्धा एवं आत्मीयता आरोपित करते हैं वह चेतना के स्तर पर अपना घनिष्ट—घनिष्टतर—घनिष्टतम बनता जाता है और उसकी विशेषताओं का प्रवाह अपनी ओर सहज ही बहनें लगता हैं। समुद्र अपनी गहराई के कारण समस्त नदियों का जल अपनी ओर आकर्षित करता है और उनके अनुदान से अपना भण्डार निरन्तर भरता रहता है। यह बात प्रेम साधक के सम्बन्ध में लागू होती है उसकी प्रेम भावना उसे गहरा बनाती चली जाती है और इस स्थिति की पात्रता विकसित कर देती है कि दिव्यलोक के अजस्र अनुदान उसे अनायास ही मिलते चले जाँय। चुम्बक जितना शक्ति शाली होता है उतने ही अधिक लौह कण उस क्षेत्र में से सिमट कर उसके साथ चिपकते चले जाते हैं। अध्यात्म क्षेत्र की चमत्कारी उपलब्धियाँ, ऋद्धि सिद्धियाँ और कुछ नहीं अपनी ही प्रबल भाव भूमिका द्वारा अनन्त अन्तरिक्ष से खींची हुई उपलब्धियाँ मात्र हैं।

व्यावहारिक जीवन में हम नित्य ही देखते हैं पारस्परिक प्रेम केवल एक दूसरे को परमप्रिय ही नहीं बनाता वरन् सहयोग के अनेकानेक द्वार भी खोलता है। प्रेमी लोग एक दूसरे की इतनी अधिक सेवा, सहायता करते हैं जितना कि कोई स्वयं अपने आपकी सहायता कर सकता है। इससे दोनों ही पक्ष लाभान्वित होते हैं। एक दूसरे की कमी को पूरा करते हैं और अपूर्णता को पूर्णता में—दुर्बलता को समर्थता में—अतृप्ति को तृप्ति में बदलने की दिशा में एक दूसरे के लिए वरदान जैसे सिद्ध होते हैं। पर यह सब संभव तभी होता है जब प्रेम भावना में सघन आत्मीयता का गहरा पुट लगा हो।

यदि यह प्रेम बाजारू हुआ—कुछ लेने झपटने के लिए आरम्भ किया गया होता तो बात बनेगी नहीं—प्रीति निभेगी नहीं—जहाँ स्वार्थ सधने में थोड़ी भी अड़चन दिखाई पड़ी अथवा उससे अच्छे कोई नये सम्बन्ध हाथ लगे तो वह नशा उतरने भी देर न लगेगी। उदासी उपेक्षा की और बढ़ते हुए कदम अवज्ञा और शत्रुता तक जा पहुंचेंगे। असफल प्रेम की गति दुखान्त आर निराशाजनक भी होती देखी गई हैं।

पेट भरने मात्र से मनुष्य की तृप्ति नहीं हो सकती। उसमें जो सजग चेतन तत्व है वह भावनात्मक परिपोषण चाहता हैं। वासना, तृष्णा और अहंता की तृप्ति करने की उमंग और उसके लिए अभीष्ट साधनों को प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य का अधिकाँश चिन्तन और कर्तृत्व नियोजित रहता है। पेट भरने और तन ढकने की आवश्यकता तो कम प्रयास से सामान्य शरीर श्रम से ही पूरी हो जाती है। उसके लिए कदाचित ही किसी को अभावग्रस्त रहना पड़ता हो। व्यग्रता एवं उद्विग्नता तो मानसिक क्षुधा को पूरा करने के लिए साधन जुटाने की ही रहती है। यह मानसिक भूखे या माँगे मध्यवृत्ति के लोगों में विलास वैभव के लिए लालायित रहती हैं किन्तु जब अन्तःकरण का स्तर ऊँचा उठता है तो प्रेम का अमृत पीने और पिलाने की एक मात्र साज शेष−रह जाती है। प्रेम वृत्ति का विस्तार—प्रेमी की खोज—प्रेम का रसास्वादन इतनी ही परिधि में समस्त आकाँक्षा, अभिलाषा केन्द्रीभूत होकर रह जाती है।

काया असल है और छाया उसकी नकल। प्रेम असल हे और मोह उसकी नकल। मोह में अहंता की पूर्ति प्रधान रहती है और प्रिय पात्र को अपना वशवर्ती बनाने, आज्ञापालन के लिए प्रस्तुत रहने की इच्छा रहती है। उससे पूरा−पूरा लाभ उठाया जाय और वह पूरी तरह अपना इच्छानुवर्ती होकर रहे; यही मोह की परिभाषा है। स्त्री, पुत्रों अथवा मित्र सम्बन्धियों से जब तक यह अपेक्षा पूरी होती है तब तक वे प्रिय लगते है, पर जब वे ननुनच करते हैं तो शत्रु प्रतीत होते हैं। अपनी माँग सही थी या प्रेमी का व्यवहार सही था यह सोचने का अवकाश नहीं रहता। किन्तु उच्चकोटि के प्रेम में सिर्फ देने का ही भाव रहता है। लेना कुछ नहीं देना सब कुछ जहाँ यह भावना अथवा रीति−नीति काम कर रह हो समझना चाहिए कि यहाँ असली प्रेम का अस्तित्व है। लेने से इन्कार और देने का आग्रह जहाँ होगा वहाँ राम, भरत जैसे स्नेह, सौजन्य का अमृत बरसेगा और आत्मीयता अधिकाधिक सघन होती चली जायगी। वहाँ साथी की शिकायत करने की जाती है जहाँ कुछ लेने की—पाने की अपेक्षा रखी गई हो। जब केवल देना ही देना था—पाने की बात सोची ही नहीं गई थी तो उलाहना किस बात का−असन्तोष किस कारण? जहाँ देना कम लेना अधिक का मोल−तोल चलता है प्रेम में असन्तोष और विद्वेष वहीं पनपता है। प्रेमियों के बीच लड़−झगड़ा का केन्द्रबिन्दु यही विष बीज रहता है।

निस्वार्थ प्रेम पूर्णतया एक पक्षीय रह सकता है—निभ सकता है—सामने वाला पक्ष यदि अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त न करे तो भी प्रेमी अन्तःकरण की कोई क्षति नहीं होती—इससे उसे खिन्न असन्तुष्ट भी नहीं होना पड़ता। पाषाण प्रतिमा बनाकर मूर्ति पूजा करने का आधार एक पक्षीय प्रेम का निर्वाह ही होता है। देव भूमि हमारी भावना के अनुरूप प्रत्युत्तर नहीं देती वह मूक, मौन, स्तब्ध, निष्ठुर, निस्पृह बनी बैठी रहती है। इससे कोई उपासक खिन्न नहीं होता वरन् अपनी पूजा अर्चा निर्बाध रीति से चलाता रहता है। यही नीति प्रेम का प्रयोग करते समय हर क्षेत्र में अपनानी पड़ती हैं। माता अपने नवजात शिशु पर सारा प्यार उड़ेलती है जबकि अबोध बालक की मनः स्थिति तो दूर शारीरिक क्षमता भी अविकसित अस्तव्यस्त रहती है। वह बेचारा न तो माता के प्यार को समझ सकता है और न उसका प्रत्युत्तर प्रतिदान दें सकता है। इतने पर भी माता को यह शिकायत नहीं होती कि बच्चे में प्रेम का मूल्याँकन नहीं किया और बदला नहीं चुकाया। ठीक यही नीति प्रेमी हृदय को सर्वत्र बरतनी पड़ती हे। वह प्रेम इसलिए करता हे कि उसकी प्रतिध्वनि उसकी अन्तरात्मा को एवं दिव्य अमृत से ओत−प्रोत कर दे। इस लाभ की तुलना में प्रिय पात्र द्वारा दिया जा सकने वाला अनुदान तो राई−रत्ती पात्र जितना ही सिद्ध हो सकता है। प्रिय पात्र के समुचित प्रत्युत्तर न देने पर यदि प्रेम को निराश होना पड़ा, खिन्न बनना पड़ा तो समझना चाहिए कि वह प्रतिदान की अपेक्षा पर टिका हुआ घटिया दर्जे का लोक−व्यवहार मात्र था। ऐसे ही ओछे प्रेम को व्यामोह अथवा मोह कहा जाता है और उसका परिणाम अन्ततः निराशाजनक ही सामने आता है।

प्रेम की महानतम आध्यात्मिक उपलब्धि कर सकने से ही आत्मा को सन्तोष,उल्लास एवं आनन्द की तृप्तिदायक अनुभूति होती है। इसी को सबसे बड़ा लाभ कह सकते हैं। चेतना का सर्वोत्तम रस यही है। प्रेमानुभूति से बढ़कर मनुष्य जीवन का कोई उपार्जन—और कोई रसास्वादन—और कोई वरदान हो ही नहीं सकता। तत्वदर्शी मनीषियों ने प्रेम को ही परमेश्वर कहा है। वस्तुतः परमेश्वर इन्द्रियों से देखा जाना नहीं जा सकता उसकी अनुभूति अन्तरात्मा में ही होती है वह कैसी होती है इसे जानना हो तो प्रेम का प्रयोग करके देखना चाहिए। इस आलोक की तनिक सी किरणें अन्तरात्मा को देवत्व की आभा से जगमगा देती हैं। जहाँ प्रेम का अस्तित्व होगा वहाँ संयम सदाचार से लेकर उद्गार अनुदान तक की समस्त सद्भावनाएँ तथा सत्प्रवृत्तियाँ सहज ही समवेत होकर रहती है।

ईश्वर भक्ति एक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके माध्यम से अन्तःकरण को प्रेमी प्रकृति का बनाया जाता है। सूर्य का प्रकाश किसी छोटे दायरे में कैद होकर नहीं रह सकता वह सहज अनन्त अन्तरिक्ष में सुविस्तृत होता चला जाता है। प्रेमी अन्तःकरण से आत्मीयता के विस्तार का आलोक भी इसी प्रकार अधिकाधिक व्यापक क्षेत्र में फैलता चला जाता है। उसका अपनापन शरीर और परिवार की सीमा से—वासना,तृष्णा और मलीनता की तुच्छता से बाहर निकलता है और संकीर्ण स्वार्थपरता के—लोभ, मोह के भव−बन्धनों को तोड़ फोड़कर आदर्शवादिता के उन्मुक्त आकाश में विचरण करता हे। ईश्वर प्रेम—की झाँकी विश्व प्रेम के रूप में ही मूर्तिमान होती है, भीतर की आस्था को बाहर भी प्रकट होना ही चाहिए ईश्वर भक्ति का प्रमाण लोक−मंगल की सेवा साधना में परिलक्षित होना ही चाहिए।

ईश्वर विश्व−व्यापी सचेतन सत्ता का नाम है। उसके सत प्रधान अंश की हम उपासना करते हैं। जिसका प्रयोजन है ईश्वरीय दिव्य तत्व को अपनी चेतना में पूरी तरह भर लेना। प्रेम की—भक्ति की—प्रक्रिया इस प्रयोजन को भली प्रकार पूरी करती है। ईश्वर प्रेम में सराबोर होकर हम उस चेतना को अधिक होने का परिणाम तद्रूप होना ही होता है। जो जिसके संपर्क में जितनी गहराई तक रहेगा—जो जिसे जितना अधिक चाहेगा वह उसी जैसा बनता चला जायगा। सत्संग के सत्परिणामों की—कुसंग के दुष्परिणामों की यही मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि है। हम प्रेम तत्व को ईश्वर जैसे उच्चादर्श के साथ समन्वित करके रखें तो निश्चित रूप से उसी ढाँचे में ढलते चले जायेंगे और एक दिन ईश्वर तुल्य होकर रहेंगे।

कहना न होगा कि प्रेम तत्व मानव जीवन की महानतम विभूति है उसे अपने भीतर उगाने में—बढ़ाने में जो जितना अधिक सफल हो जाता है वह उतना ही धन्य बनता है। इस प्रेम की पकड़ में पकड़ा हुआ समस्त संसार अपना बनता है—समस्त दिव्य तत्व करतल गत होते हैं यहाँ तक कि ईश्वर भी अपना बन जाता है अथवा हम ईश्वर तुल्य हो जाते हैं। प्रेम की गरिमा को जितनी गहराई में समझने का प्रयत्न किया जाय वह उतनी ही महान् होती दिखाई पड़ेगी।


कितना विशाल विश्व, कितना तुच्छ अपना अस्तित्व

विश्व ब्रह्माण्ड की विशालता और अपनी क्षुद्रता की तुलना करते हैं तो अपना अहम् सहज ही गल जाता है। हम क्या हैं—वे सम्पदाएँ क्या हैं जिन पर इतराते हैं और वह जीवन क्या है जिसे हम अमर समझते हैं, इसे ठीक तरह समझने के लिए उस ब्रह्माण्ड का स्वरूप भी जानना पड़ेगा जिसके हम एक नगण्य से अंग अवयव हैं।

ब्रह्माण्ड कितना विशाल और उसकी तुलना में अपनी पृथ्वी कितनी क्षुद्र। अपनी पृथ्वी पर रहने वाले कोटि−कोटि प्राणियों के बीच बेचारे मनुष्य के बीच हमारी नगण्य सी एक सत्ता। इन सबको तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो प्रतीत होगा कि शरीर में रहने वाली खरबों कोशिकाओं में एक की सत्ता जितनी स्वल्प है उससे भी असंख्य गुनी न्यून अपनी सत्ता हे। ब्रह्माण्ड की तुलना में पिण्ड और पिण्ड की तुलना में अणु कितना क्षुद्र है। विशाल की तुलना में हम कितने तुच्छ हैं इस पर एक क्षण के लिए भी विचार कर सकें तो प्रतीत होगा कि अपने उपहासास्पद कलेवर में इतराने जैसी—अहंकार में इठने जैसी कोई बात नहीं है।

भगवान् कितना विशाल है। विशाल ब्रह्माण्ड जैसा। भगवान् कितना लघु है। अणु−परमाणु जैसा। मनुष्य भी यदि अपनी आत्म सत्ता को समझने और आत्म विस्तार की भूमिका में उतरे तो वह भी विभु है− महान् है, पर यदि संकीर्ण स्वार्थपरता की—व्यक्ति वादी अहंता की तुच्छता में सीमाबद्ध होकर रह जाय तो वह वस्तुतः इतना क्षुद्र है जिसे महत्वहीन नगण्य एवं उपहासास्पद ही कहा जा सकता है।

अपने सूर्य को ही लें। उसका व्यास 865380 मील है। उसकी कुल परिधि 2700000 मील है।

अनुमानित भार 19 करोड़ 98 लाख महाशंख टन। वह अपनी धुरी र 25 दिन 7 घण्टे 48 मिनट में एक चक्कर लगाता है। उसकी सतह पर 600 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान है और मध्य गर्भ में 15000000 डिग्री सेन्टीग्रेड। वह दो सौ मील प्रति सेकेंड की उड़ान उड़ता हुआ महा ध्रुव की परिक्रमा में निरत है यह परिक्रमा 25 करोड़ वर्ष में पूरी होती है। इस परिक्रमा में उसके साथी और भी कई सूर्य होते हैं जिनके अपने−अपने सौरमंडल भी हैं।

पृथ्वी से सूर्य 109 गुना बड़ा है। दोनों के बीच की दूरी 93000000 मील है। यदि हम 600 मील प्रति घण्टे की गति स उड़ने वाले अपने तीव्रतम वायुयानों में बैठकर लगातार उड़ें तो उस दूरी को पार करने में 18 वर्ष लगेंगे।

सूर्य से पृथ्वी पर जो शक्ति बरसती है वह इतनी है कि एक वर्ग इञ्च की शक्ति से 60 हार्स पावर का इंजन चल सके। पूरी पृथ्वी पर सूर्य जो ताप फेंकता है वह प्रति सेकेंड इतना होता है जितना 12 हजार अरब टन कोयला जलाने पर ही पैदा किया जा सकता है। सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर प्रति वर्ग इञ्च इतना होता है जितना तीन लाख मोमबत्तियाँ जलाने से पैदा किया जा सके। सूर्य की शक्ति का 220 करोड़ वाँ भाग ही पृथ्वी पर पहुँच पाता है।

वैज्ञानिकों की नवीनतम गणना के अनुसार ब्रह्माण्ड में लगभग 10 करोड़ सौरमण्डल और 10 अरब तारे हैं। इन तारों में कोई−कोई कल्पनातीत विस्तार के हैं। अकेला जेष्टा ही इतना बड़ा है कि उसके पेट में अपने तीन करोड़ सूर्य घुस कर बैठ सकें। प्रख्यात ‘एन्ड्रोमीडा’ निहारिका हमसे 8 लाख प्रकाश वर्ष दूर है। जबकि एक प्रकाश वर्ष को 58 खरब 80 अरब मील माना जाता है।

अपनी धरती का व्यास 12700 किलो मीटर है। वह 30 किलो मीटर प्रति सेकेंड की उड़ान भरती हुई 365 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी 9 करोड़ 30 लाख मील रहती है। धरती का जन्म अब से 5 अरब वर्ष पूर्व हुआ। 3 अरब वर्ष पूर्व उस पर जीवन प्रारम्भ हुआ। इनसे मनुष्य का अस्तित्व 10 लाख वर्ष पहले ही हुआ है। इससे पूर्व अन्य जलचर, थलचर, नभचर प्राणी उत्पन्न हो चुके थे। इनमें से 20 लाख जातियों के प्राणी अभी भी पाये जाते हैं। पुराणों में बताई गई 84 लाख योनियों में से अब सिर्फ 4 लाख जीव जातियाँ ढूँढ़नी शेष रह गई हैं।

यह अपना सौर मण्डल भी कितना विचित्र है। उपग्रहों की सदस्यता के बारे में हममें से बहुतों को यह भी नहीं मालूम है कि मंगल पर 2, बृहस्पति पर 12, शनि पर 9, यूरेनस पर 5 और नेपच्यून पर 2 चन्द्रमा भ्रमण करते हैं। मात्र हमारा एक चन्द्रमा ही सौरमण्डल का एक उपग्रह नहीं है। कुल मिलाकर उनकी संख्या 31 है।

हमारा वर्ष 365 दिन का और दिन 24 घण्टे का होता है। किन्तु अन्य ग्रहों की स्थिति भिन्न है। धरती पर जितना बड़ा दिन होता है उसके हिसाब से लखा−जोखा लिया जाय तो सूर्य का एक दिन हमारे 176 दिनों के बराबर होता है।

बुध का दिन 243 दिन का वर्ष 225 दिन का है। मंगल का दिन पृथ्वी के लगभग बराबर है। उसका दिन 24.6 घण्टे का और वर्ष 1.9 वर्ष का है। बृहस्पति का दिन 10 घण्टे का और वर्ष 12 का—शनि का दिन 10 घण्टे और वर्ष 29 वर्ष का—यूरेनस का दिन 11 घण्टे का और वर्ष 84 वर्ष का—नेपच्यून का दिन 16 घण्टे का और वर्ष 165 वर्षों का, प्लूटो का एक दिन हमारे 6 दिन 9 घण्टों की बराबर है। उनके आकार में भी भारी भिन्नता है। अपने मीलों के हिसाब से सौरमण्डल का व्यास नापा जाय तो सूर्य का व्यास 8,64,000 बुध का 3100 शुक्र का 7500, पृथ्वी का 7920 मंगल का 4150, बृहस्पति का 87,000, शनि का 71500, यूरेनस का 32000 नेपच्यून का 31000, प्लूटो का 4500 मील है। सूर्य से किस ग्रह की दूरी कितनी है इसका हिसाब लगाने के लिए अपने मील बहुत झंझट भरा विस्तार करेंगे इसलिए अपने 10 लाख मील का एक सौरमण्डलीय मील मानकर चला जाय यह ठीक रहेगा। तब उस अन्तरिक्ष मील के अनुसार सूर्य से उसके सौर परिवार की दूरी इस प्रकार नापी जा सकती है। बुध की 36,2 शुक्र की 66,9 पृथ्वी की 92,9 मंगल की 141,2 बृहस्पति की 483 शनि की 882,6 यूरेनस की 178307 नेपच्यून की 2787 प्लूटो की 3621,1।

अपने सौरमण्डल का एक आनुमानिक नक्शा धरती पर बनाना हो तो पृथ्वी को एक इञ्च की गोली जितनी बनाना चाहिए। तब सूर्य उससे 322 गज दूर 9 फुट व्यास का बड़ा गोला होगा सूर्य के 124 गल दूर बुध—232 गज दूर शुक्र होंगे तब 322 गज दूर पृथ्वी बनानी पड़ेगी। इसके बाद मंगल 488 बृहस्पति 1672 शनि 3067 अरुण 6159 डडडड 9656 और यम 13300 गज दूर अंकित करने पड़ेंगे। बेचारा अपना चन्द्रमा तो पृथ्वी से 30 इञ्च दूर एक बने के दाने जितना होगा।

प्रा. फ्रेड होयल डा. रुडोल्फ मिन्केवस्की आदि खगोल विद्या के मूर्धन्य विशेषज्ञों का कथन है कि अपना ब्रह्माण्ड बूढ़ा होता जाता है ज्यों−त्यों उसकी सिकुड़न बढ़ रही है। गर्मी के कारण फैली ली हुई गैसों का तापमान घट रहा है। फलतः सिकुड़न उत्पन्न होने से ग्रह नक्षत्र उत्पन्न होने की चाल तेज हो गई है। हमारी अपनी आकाश गंग ही लगभग एक नये सूर्य को हर वर्ष जन्म दे देती है। यह गति आरम्भिक काल की अपेक्षा आठ गुनी अधिक तेज है। ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक मात्रा में हाइड्रोजन गैस से बना हुआ पदार्थ भरा पड़ा है।

वाशिंगटन की नौ सेना अनुसंधान प्रयोगशाला ने आकाशीय पिण्डों में सबसे रहस्यमय तारे ‘क्वासर’ बताये है। वे बहुत बूढ़े और बहुत दूर होते हुए भी बहुत चमकीले हैं और सबसे खतरनाक एक्सकिरणें प्रचण्ड मात्रा में समस्त ब्रह्माण्ड में बखेरते हैं। वही अनुदान पृथ्वी को भी विपुल मात्रा में मिलता है। राकेट विज्ञानी डा हर्बट फ्रीडमेन का कथन है कि इन क्वासरे ने समस्त ब्रह्माण्ड को एक्स किरणों का एक प्रकार से महानगर ही बनाया हुआ है। क्वासरों में से एक निकटवर्ती 3सी 147 को 600 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर माना गया है एक प्रकाश वर्ष अर्थात् 1000000 करोड़ किलो मीटर दूरी। किलो मीटरों के हिसाब से इन क्यासरों की दूरी कितनी अकल्पनीय है।

अपनी निहारिका बीस हजार प्रकाश वर्ष मोटी और एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी है। यह गोल आकार की होने से चौड़ाई भी लगभग इतनी ही है। उसके परिवार में लगभग सौ अरब ग्रह नक्षत्र हैं।

अपनी मंदाकिनी निहारिका जैसी इस ब्रह्माँड में करोड़ों है। उनमें से हमें अधिक समीप एन्ड्रोमेडा (देवयानी) है हमें उसी के बारे में कुछ अधिक जानकारी है। इसकी दूरी सब से निकट होते हुए भी अपनी आकाश गंगा से बीस लाख प्रकाश वर्ष दूर है। उसे हम मृगसिर नक्षत्र में खुली आँखों से भी देख सकते है। पर वह प्रकाश जो दिखाई देगा बीस लाख वर्ष पुराना होगा, जबकि हमारी पृथ्वी का जन्म अथवा विकास का आरम्भ भी नहीं हुआ था। आज वहाँ क्या स्थिति है इसे जानना हो तो इतने ही समय प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। समस्त ब्रह्माण्ड कितना विस्तृत है, उसका ठीक विवरण प्राप्त नहीं पर संसार की सबसे बड़ी रेडियो, दुर्बीन जो अमेरिका के पालोमर पर्वत पर लगी है उससे पाँच अरब प्रकाश वर्ष दूरी की निहारिकाओं को देख लिया गया है।

यह निहारिकाएं अपने स्थान विद्यमान नहीं है वे एक दूसरे से उसी तरह दूर भागती जा रही हैं जैसे दागने के बाद बन्दूक से उसकी गोली दूर भागती है। इस भगदड़ की चाल साठ हजार किलो मीटर प्रति सेकेंड है। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड का फुलाव विस्तार कितना गुना हो चुका होगा इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता हे कि पिछले दो वर्ष में ही उसका पेट दूना फूल चुका है यह माप करली गई है। प्रगति के पथ पर सभी ग्रह नक्षत्र तेजी से भाग रहे हैं जिस दिन यह विकास स्पर्धा बन्द होगी उसे दिन ब्रह्माण्ड के सामने महाप्रलय आ उपस्थित होगी।

प्राण चेतना अपनी सम्बन्धित वस्तुओं के साथ चिरकाल तक जुड़ी रहती है और उसका मोह उन पर छाया रहता है इसका प्रमाण मिश्र के पिरामिडों एवं कब्रों की उखाड़−पछाड़ करने वालों पर बीती घटनाओं से मिलती है। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राणी के अन्यत्र जन्म लेने या अन्य लोक के चले जाने पर भी उसकी विद्युत शक्ति उन वस्तुओं पर घेरा डालकर चिरकाल तक अपना आधिपत्य जमायें रहती है जिनके साथ उसका मोह अहंकार जुड़ा हो। भूत,प्रेतों का अस्तित्व प्रायः इसी स्तर का होता है। जीव के जन्म ले लेने के बाद भी लम्बे समय उनकी छाया का प्रेत रूप में बने रहना सम्भव है।

अठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर यूरोपियन लोगों का अधिकार था। उन देशों के पुरातत्व

शरीर के साथ ही आत्मा मर नहीं जाती− वेत्ता इस बात के बहुत उत्सुक थे कि मिश्र के पिरामिडों तथा दूसरे मृतक स्मारकों के पीछे छिपे रहस्यों पर ये पर्दा उठाया जाय। इसलिए उन्होंने इस संदर्भ में काफी ढूंढ़ कुरेद की—खुदाई की और कितनी ही पुरानी कब्रों को उखाड़ा।

इस कार्य में शोध कर्ताओं का एक उत्साही दल डा. व्रेस्टेड के नेतृत्व में काम कर रहा था उनके सहायक हार्वड कार्टर—आर्थर वीगल लार्ड कारन वर्ग आदि कितने ही मूर्धन्य पुरातत्व वेत्ता अपने−अपने ढंग से काम कर रहे थे। इन लोगों ने बहुत धन खर्च करके प्राचीन काल के अवशेषों को प्राप्त किया था और उस आधार पर प्राचीन काल की परिस्थितियों तथा मान्यताओं का पता लगाया था।

इसी संदर्भ में सन् 1922 में ‘तूतन खामेन’ नामक स्थान से एक ऐसे वृद्ध फकीर कब्र खोदी गई जिसके सम्बन्ध में कितनी ही चमत्कारी दन्त क थाएँ प्रचलित थी। खुदाई का एक उद्देश्य उस क्षेत्र में फैले हुए अन्धविश्वासों का निरस्त करना भी था।

कब्र खोद ली गई और उसके अवशेष भी प्राप्त कर लिये गये। अब उनका रासायनिक विश्लेषण होना आरम्भ हुआ। इस बीच एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक और भयानक घटनाएँ घटित होना आरम्भ हो गया। डा. वे्रस्टेड अपनी प्रयोगशाला में अवशेषों के लकड़ी के टुकड़े का विश्लेषण करने के लिए एक बर्तन में कुछ रासायनिक पदार्थों के साथ उबाल रहे थे कि इतना भयंकर विस्फोट हुआ कि प्रयोगशाला की छत उड़ गई और दीवारें हिल गई। इसी एक काला सर्प शोधकर्ता कार्टर के घर जा धमका वे स्वयं तो किसी प्रकार बच गये पर उनकी पत्नी को उसने डस लिया और वह देखते−देखते मर गई। एक महीना बीता होगा कि लार्डकारन वर्ग को नन्हें से मच्छर ने काटा और दो दिन के भीतर ही वे मर गये। मच्छर काटने का स्थान बिल्कुल साँप के काटने जैसी स्थिति का बन गया था। इतना ही नहीं कारन वर्ग महोदय का हट्टा−कट्टा भाई भी उन्हीं दिनों दो दिन की मामूली बीमारी में चल बसा।

दल के प्रमुख व्रेस्टेड कब्र खुदाने के दो सप्ताह के भीतर ही मर गये। अपनी पत्नी को गँवा कर भी कार्टर साहस पूर्वक अन्ध−विश्वासों का खण्डन करते रहते थे और शोध कार्य को शिथिल नहीं पड़ने दिया था, पर न जाने क्या कुयोग उत्पन्न हुआ कि वे एक छोटी सी तलैया में जा फँसे और उस कीचड़ में ही फँसे हुए असहाय स्थिति में मरे पाये गये इस प्रकार वह पूरा शोधकर्ता दल ही समाप्त हो गया।

यह घटनाएँ मरणोत्तर जीवन के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं और उनके लिए एक चुनौती देती हैं जो शरीर के साथ ही जीवन का अन्त होने की बात कहते रहते हैं।


हैरियट एलिजावेथ स्टो (kahani)

अमर लेखिका हैरियट एलिजावेथ स्टो ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक ‘टाम काका की कुटिया’ किन जटिल परिस्थितियों के बीच रहते हुए लिखी यह बहुत कम लोग जानते हैं। आम जानकारी तो इतनी ही है कि इस क्रान्तिकारी ग्रन्थ ने अमेरिका से दासत्व की प्रथा उठा देने में अनुपम भूमिका का निर्वाह किया।

उन्होंने अपनी भाभी के पत्र का उत्तर देते हुए लिखा था—चूल्हा, चौका, कपड़े धोना, सिलाई, जूते गाँठना आदि की व्यस्तता बनी ही रहती है। बच्चों के लिए तैयारी दिनभर सिपाही की तरह ड्यूटी देनी पड़ती है। छोटा बच्चा मेरे पास ही सोता है वह जब तक सो नहीं जाता कुछ भी लिख नहीं सकती। गरीबी और काम का दबाव बहुत है फिर भी भाभी, सच मानना मेरे मन में गुलामी के प्रति तेज आग धधक रही है सो जिन्दा रही तो कुछ ऐसा जरूर लिखूँगी जो अमेरिका के सिर पर से मानवी दासता को लादे रहने का कलंक छुड़ा सकें।

गरीबी और कठिनाइयों से घिरा रहकर भी—मनुष्य इस अन्तः प्रेरणा से प्रेरित हो तो इतना कुछ कर गुजर सकता है जो उस व्यक्ति को अमर बनाने और समय को बदल देने का भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त कहा जा सके। दुनिया जानती है कि श्रीमती स्टो ने जो साहित्य घोर विपन्न परिस्थितियों में रहते हुए लिखा वह करोड़ों दासों की गुलामी से मुक्ति दिलाने और अमेरिका के सिर पर से कलंक का टीक छुड़ाने में कितना महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।


मानवी काया में उच्चस्तरीय विद्युतशक्ति का प्रवाह

मानवी तत्व की व्याख्या, विवेचना अनेक आधारों पर की जाती है अध्यात्म एवं तत्व दर्शन के आधार पर मनुष्य को ईश्वरीय सत्ता का प्रतिनिधि और अगणित दिव्य संभावनाओं का भाण्डागार माना गया है, भौतिक विश्लेषण के अनुसार वह रासायनिक पदार्थ और पंचतत्व समन्वय का एक हँसता,बोलता पादप है। विद्युत विज्ञान के अनुसार उसे एक जीवित जागृत बिजली घर भी कहा जा सकता है। रक्त संचार, श्वास−प्रश्वास, आकुंचन−प्रकुंचन जैसे क्रिया−कलाप पेंडुलम गति से स्वसंचालित रहते हैं और जीवनी शक्ति के नाम से पुकारी जाने वाली विद्युत शक्ति की क्षति पूर्ति करते हैं। मस्तिष्क अपने आप में एक रहस्य पूर्ण बिजली घर है। जिसमें जड़े हुए तार समस्त काया को कठ−पुतली की तरह नाचते हैं।

मनुष्य शरीर की बिजली एक प्रत्यक्ष सचाई है। उसे यन्त्रों से भी देखा जाना जा सकता है। वह अपने ढंग की अनोखी है। भौतिक विद्युत से उसका स्तर बहुत ऊँचा है। बल्ब में जलने और चमकने वाली बिजली की तुलना में नेत्रों में चमकने वाली बिजली की गरिमा और जटिलता अत्यन्त ऊँचे स्तर की समझी जानी चाहिए। तारों को छूने पर जैसा झटका लगता है वैसा आमतौर से शरीरों के छूने से नहीं लगता है तो भी काया संस्पर्श के दूरगामी कायिक और मानसिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं। महामानवों के चरण−स्पर्श जैसे धर्मोपचार इसी दृष्टि से प्रचलित हैं। यह कायकि बिजली कभी−कभी भौतिक बिजली के रूप में देखने में आती हैं उससे उस रहस्य पर पड़ा हुआ पर्दा और भी स्पष्ट रूप से उधर जाता है जिसके अनुसार मनुष्य को चलता−फिरता बिजली घर ही माना जाना चाहिए।

अमेरिका में मिसौरी के निकट सिडैलिया में एक दुबली पतली लड़की थी जेनी माँगन। जब चौदह वर्ष की हुई तो उसके शरीर में अद्भुत क्षमता उत्पन्न लगने जैसा अनुभव करता। लड़की जब हैण्डपम्प से पानी निकालने जाती तो उंगलियों का स्पर्श होते ही चिनगारियाँ छूटने लगती। घर के लोगों के बीच उसे अछूत की तरह रहना पड़ता। सभी उससे डरने लगे। यहाँ तक कि उसकी पालतू बिल्ली तक ने किनारा कस लिया।

यह आश्चर्यजनक स्थिति की बात दूर−दूर तक फैली। उसे छूकर विचित्र अनुभव पाने के लिए लोग दूर−दूर से आने लगे। अन्ततः यह ‘केस’ डा. ऐसक्राफ्ट को सौंपा गया। उन्होंने दो बार लड़की को स्वयं छुआ और बेहोश कर देने जितनी शक्ति के झटके अनुभव किये। उन्होंने कई विद्युत विशेषज्ञों और शरीर विज्ञानियों की सहायता से इसका कारण जानने का बहुत प्रयत्न किया पर वे किसी नतीजे पर न पहुंच सके। लड़की जब बड़ी हुई तो उसकी यह शक्ति घटती गई और पच्चीस की आयु तक पहुँचने पर इस जंजाल से उसे पूर्णतया मुक्ति मिल गई।

चिकित्सा इतिहास में ऐसी ही एक और घटना अंतरिक्षीय क्षेत्र के बोंडन की है। वहाँ एक 17 वर्षीय लड़की कैरोलिन क्लेअर अचानक बीमार पड़ी। डेढ़ वर्ष तक चारपाई पकड़े रहने के कारण उसका 130 पौंड वजन घटकर 90 पौंड रह गया। जब उस बीमारी से पीछा छूटा तो एक नई बीमारी और लग गई। उसके शरीर में चुम्बकत्व काफी ऊँचे वोल्टेज की बिजली पैदा हो गई जो छूता वही विद्युत आघात का अनुभव करता। धातु की बनी कोई वस्तु वह छूती तो वह हाथ से चिपक जाती। अन्तरिक्षीय मेडीकल ऐसोशियेशन ने इसकी विधिवत् जाँच की पर रिपोर्ट में किसी कारण का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया जा सका—केवल अनुमान और सम्भावनाओं के आधार पर ही कुछ चर्चा की गई। कुछ वर्ष बाद उसकी भी यह विलक्षणता घटते लगी और धीरे−धीरे समाप्त हो गई।

एक तीसरी घटना सोलह वर्षीय लुई हेवर्गर की है। इस लड़के में शक्तिशाली चुम्बक पाया गया। वह जिन धातु पदार्थों को छूता वे उससे चिपक जाते और कि सी दूसरे द्वारा बलपूर्वक छुड़ाये जाने पर ही छूटते। मेरीलण्ड कालेज आफ फार्मेसी के तत्वावधान में इस इस लड़के के सम्बन्ध में भी बहुत दिन तक खोज−बीन की गई। पर निश्चित निष्कर्ष उसके सम्बन्ध में भी व्यक्त न किया जा सका।

एक और घटना मिसौरी के निकट जापलिन नगर की है। यहाँ एक व्यक्ति था—फ्रैक मैक किस्टी। उसके शरीर में प्रातःकाल तेज बिजली रहती थी पर जैसे−जैसे दिन चढ़ता, वह शक्ति घटती चली जाती। जाड़े के दिनों में तो वह इतनी बढ़ जाती थी कि बेचारे को चलने−फिरने में भी कठिनाई अनुभव होती थी।

इस तरह झटका मारने जैसे स्तर की बिजली तो कभी−कभी किसी−किसी के शरीर में ही देखने को मिलती है, पर सामान्यतया वह हर मनुष्य में पाई जाती है और जीवन की विविध गतिविधियों के संचालन में सहायता करती है। इसके सदुपयोग एवं अभिवर्धन का विज्ञान यदि ठीक तरह समझा जा सके तो मनुष्य परम तेजस्वी, मनस्वी एवं आत्मबल सम्पन्न बनकर सुविकसित जीवन जी सकता है।

शिर और नेत्रों में मानवी विद्युत का सबसे अधिक अनुभव होता है। वाणी की मिठास, कड़क अथवा प्रभावी प्रामाणिकता में भी उसका अनुभव किया जा सकता है। तेजस्वी मनुष्य के विचार ही प्रखर नहीं होते उनकी आंखें भी चमकती हैं और उनकी जीभ के अन्तर में गहराई तक घुस जाने वाला विद्युत प्रवाह उत्पन्न करती है। आत्मबल की साधना में प्रकारांतर से तेजस्विता की साधना ही कह सकते हैं।

मानवी विद्युत के दो प्रकार के दो प्रवाह हैं एक ऊर्ध्वगामी दूसरा अधोगामी। ऊर्ध्वगामी मस्तिष्क में केन्द्रित है। उस मर्मस्थल के प्रभाव से व्यक्तित्व निखरता और प्रतिभाशाली बनता है। बुद्धि कौशल, मनोबल के रूप में शौर्य,साहस और आदर्शवादी उत्कृष्टता के रूप में यही विद्युत काम करती है। योगाभ्यास के—ज्ञान साधना के समस्त प्रयोजन इस ऊर्ध्वगामी केन्द्र द्वारा ही सम्पन्न होते है। स्वर्ग और मुक्ति का—ऋद्धियों और सिद्धियों का आधार इसी क्षेत्र की विद्युत के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य के चेहरे के इर्द−गिर्द छाये हुए तेजोबल को—ओजस् को इस ऊर्ध्वगामी विद्युत का ही प्रतीक समझना चाहिए।

अधोगामी विद्युत जननेन्द्रिय में केन्द्रित रहती है। रति सुख का आनन्द देती है और सन्तानोत्पादन की उपलब्धि प्रस्तुत करती है। विविध कला विनोदों का—हर्षोल्लासों का उद्भव यहीं होता है। ब्रह्मचर्य पालन करने के जो लाभ गिनाये जाते है वे सब जननेन्द्रिय में सन्निहित विद्युत के ही चमत्कार हैं। आगे चलकर मूलाधार चक्र में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति का जागरण करने साधनारत मनुष्य अपने को ज्योतिर्मय तेज पुञ्ज के रूप परिणत कर सकते हैं।

ऊर्ध्वगामी और अधोगामी विद्युत प्रवाह यों उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह भिन्न प्रकृति के है और एक दूसरे से दूर हैं फिर भी वे सघनता पूर्वक मेरुदण्ड के माध्यम से परस्पर जुड़े हुए हैं। जननेन्द्रिय उत्तेजना से मस्तिष्क में संक्षोभ उत्पन्न होता है और उत्कृष्ट चिन्तन से कामविकारों का सहज शयन सम्भव हो जाता है। यदि यह उभय−पक्षीय शक्ति प्रवाह ठीक तरह सँजोया, संभाला जा सके तो उसका प्रभाव व्यक्तित्व के समान विकास में चमत्कारी स्तर का देखा जा सकता है।

मस्तिष्कीय तेजोवलय की तरह जननेन्द्रिय

कक्ष से भी एक विशेष तेजोवलय निकलता है। अस्तु उस क्षेत्र के प्रति सहज आकर्षण पाया जाता है। देखने स्पर्श करने की उत्सुकता रहती है। मादा पशुओं,पक्षियों तथा कीड़े−मकोड़े में तो ऋतुकाल में वह तेजोवलय अत्यन्त प्रचण्ड हो उठता है और एक विशेष गन्ध के रूप में वायु के साथ दूर−दूर तक बिखर जाता है। नर इस गन्ध तेजस की अनुभूति मात्र से उत्तेजित हो उठते हैं और मादा की तलाश में उस गन्ध सूत्र के सहारे आकुलता पूर्वक दौड़ पड़ते हैं। मनुष्य में वह गन्ध क्रम रूप में न सही दूसरे अन्य प्रबल आधारों पर विनिर्मित है और ऋतुकाल न होने पर भी नर−नारी को परस्पर समीप आने के लिए प्रेरित आकर्षित करता रहता है। यह हलचलें जननेन्द्रिय के इर्द−गिर्द छाये रहने वाले तेजोवलय की प्रखरता के कारण उत्पन्न होता है। इसकी एक झाँकी चेहरे पर भी पाई जाती है। चितवन, मुसकान,भाव−भंगिमा के आधार पर कामुक संकेत एक दूसरे तक पहुँचाकर नर−नारी परस्पर आकर्षण अनुभव करते हैं।

विचारों विधा का प्रतिपादन है कि रचनात्मक,संतुलित एवं आदर्शवादी चिन्तन मनुष्य की वाणी एवं दृष्टि से प्रखरता उत्पन्न करता है। सूझ−बूझ और प्रभावशीलता को बढ़ाता है। किन्तु यदि उन्हें निकृष्ट चिन्तन में निरत रखा जाय तो प्रतिभा विगलित होती चली जायगी और व्यक्ति निकृष्ट से निकृष्टतम बनता चला जायगा। यही बात जननेन्द्रिय में सन्निहित काम शक्ति के बारे में उसका रति प्रयोजन मात्र सन्तानोत्पादन अथवा इन्द्रिय सुख तक ही सीमित नहीं है वरन् दो व्यक्तियों के तेजस् को एक दूसरे में परिवर्तित भी करना है। समर्थ पक्ष असमर्थ पक्ष से महत्वपूर्ण अनुदान दे सकता है। इसमें तेजस्वी पक्ष घाटे में रहते हैं। अस्तु प्रतिभावानों को रति संयोग से विरत रहकर अपनी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने का परामर्श दिया जाता है।

जिस प्रकार निष्कृष्ट चिन्तन से ऊर्ध्वगामी विद्युत का ह्रास होता है उसी प्रकार अवाँछनीय रति क्रिया से भी मनुष्य की प्रतिभा विगलित होती चली जाती है। ब्रह्म चिन्तन और वीर्य रक्षण यह दोनों ही प्रयोग मानवी विद्युत की गरिमा को दिन−दिन ऊँचा उठा सकते हैं। किन्तु यदि हेय संपर्क से अधिक रुझान हो तो फिर इस क्षेत्र में घाटा ही घाटा हाथ लगेगा।

झटका मारने वाली विद्युत भले ही मानवी काया में कभी−कभी ही दीख पड़े पर वह अपनी उच्च गरिमा के रूप में हर मनुष्य में विद्यमान है। बिजली का फिटिंग जहाँ हो वहाँ उसका प्रयोग भी सीखना आवश्यक होता है, हमारे शरीर में उच्चस्तरीय विद्युत भंडार भरा पड़ा है, उचित आवश्यक यह है कि इस चेतन तेजस् का प्रयोग भी जाना सीखा जाय।


सत्कर्म ही साथ देते हैं (kahani)


जादू अविकसित मस्तिष्कों का शोषक

अविकसित मस्तिष्क का यह अभिशाप है कि वह बालकों की तरह अद्भुत और अचंभे की वस्तुओं से अत्यधिक प्रभावित होता है। प्राचीनकाल में जादू के बल पर ही चतुर लोग सामान्य जनता को अपने चँगुल में जकड़ते थे। चमत्कारों से चकित और दैवी प्रकोप से भयभीत करके उन अविकसित लोगों का बुरी तरह शोषण किया जाता था।

धार्मिक क्षेत्र में घुसकर बैठी हुई जादूगरी किस प्रकार पिछड़े लोगों के शोषण का कारण सिद्ध होती रही है इसका एक छोटा सा उदाहरण अलजीरिया निवासियों के साथ प्रयुक्त किया गया फ्राँसीसी राजनीतिज्ञों का जादू भी था।

अफ्रीका के एक पिछड़े हुए देश अलजीरिया पर फ्राँस का कब्जा था। जिन दिनों भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध अलजीरियनों ने भी विद्रोह खड़ा कर दिया। विद्रोह बहुत भयंकर था। फ्राँस वालों के पैर उखड़ने लगे।

अलजीरिया अपने अन्ध−विश्वासों के लिए प्रसिद्ध था। वहाँ भूत−पिशाच, जादू, टोना का पूरा जोर था। ओझा और तान्त्रिक उस देश के निवासियों पर पूरी तरह छाये हुए थे, उन्हीं की तूती बोलती थी। इन्हीं के प्रोत्साहन पर विद्रोह उभरा था और वहाँ के लोग यह विश्वास करते थे कि जादू के ओर से फ्राँसीसियों को उखाड़ फेंका जा सकेगा। इसलिए वे पूरे आवेश और उत्साह के साथ लड़ रहे थे। फ्रांसीसियों के लिए इस आग का मुकाबला कर सकना बहुत कठिन पड़ रहा था।

फ्रांसीसियों को एक तरकीब सूझी उन्होंने अपने देश के एक जादूगर को पटाया। उनका नाम था राबर्ट होडिन। वह अलजीरिया पहुंचा और एक से एक अचम्भे में डालने वाले कारनामे दिखायें। उसने एक हलके बक्से को स्वयं उठाकर दिखाया और दूसरों से भी उठवाया वह सचमुच बहुत हलका था। इसके बाद उसने कुछ उस देश के प्रमुख ओझाओं से कहा वे उस बक्से को उठाकर दिखायें। सारा जोर लगा कर भी वे उसे उठा न सकें। इस पर सभी कबीलों में अफवाह फैल गई कि फ्रांसीसी जादूगर बहुत ही जबरदस्त हैं जादूगर आया है और उसने अपने देश के भूतों को मार कर भगा दिया है। बस इतनी भर अफवाह से विद्रोह समाप्त हो गया हो और डर के मारे सभी ने हथियार डालकर आत्म समर्पण कर दिया।

जादूगर ने किया यह था कि लोहे के पेंदे वाले बक्सों दोनों चिपक कर इतने सघन हो गये कि बहुत ताकत लगाने पर भी उन ओझाओं के लिए उठा सकना सम्भव न हो सका। दर्शक दिन−दिन अधिकाधिक संख्या में बढ़ते रहे। देखे हुए अचम्भे भरें कारनामों की अफवाह इन दर्शकों के द्वारा तेजी के साथ फैलती रही। होडिन अपने देश में मामूली नागरिकों की तरह रहता था और मामूली कपड़े पहनता था पर उसने अलजीरिया में जाकर अपनी पोशाक पहनता था पर उसने अलजीरिया में जाकर अपनी पोशाक बिलकुल तांत्रिकों जैसी बनाली और लगभग उन्हीं से मिलते जुलते हड्डियों से बने उपकरण धारण कर लिये।

इस प्रकार विद्रोह समाप्त ही नहीं हुआ अन्ध−विश्वासी आदिवासी फ्रांसीसी सरकार के समर्थक भी बन गये। जो कार्य सैन्य बल से बहुत शक्ति खर्च करने पर भी सिद्ध नहीं हो रहा था, वह पिछड़े लोगों की मनोभूमि के साथ मनोवैज्ञानिक खिलवाड़ करके फ्राँसीसी सरकार ने सहज ही पूरा कर लिया।

आज भी अनेक व्यक्ति संत, महात्मा, ओझा, ताँत्रिक का अवतरण ओढ़े जादूगरी के अस्त्र का उपयोग करके अविकसित लोगों को अपने चँगुल में फँसाये रहने में सफल हो रहे हैं। न जाने कब तक हम इस अज्ञान से छूट कर यथार्थवादी दृष्टि प्राप्त कर सकने में सफल हो सकेंगे।


दुराग्रह छोड़ने से ही सत्य के निकट पहुंचेंगे

हम जो सोचते है वह सही है—हम जो चाहते है वह उचित है। इस दुराग्रही मान्यता ने मानवी प्रगति में अत्यधिक बाधा उत्पन्न किया है और संसार की शांति में भारी व्यवधान उत्पन्न किया है। अधिकाधिक उपभोग का अधिकार हमें है—दूसरों को अभावग्रस्त रहना पड़े तो वक रहें हमें इसकी क्या चिन्ता है यह विचार जितना संकीर्ण स्वार्थवाद से भरा हम जो सोचते हैं वही सही है—हम जो जानते या मानते हैं उससे बाहर सत्य का अस्तित्व नहीं है। हमारी चाहना ही न्यायोचित है। उस चाहना की पूर्ति में दूसरों के स्वार्थ यदि टकराते हों तो भी उनकी उपेक्षा करके अपनी ही इच्छा पूर्ण होनी चाहिए। इस तरह सोचना, चिन्तन की निष्कृष्ट संकीर्णता है उससे अन्याय का ही पोषण हो सकता है और संघर्ष विद्वेष ही बढ़ सकता है।

सूरज इतना छोटा नहीं है कि उसे एक छोटे कमरे में बन्द किया जा सके समग्र सत्य इतना तुच्छ नहीं है कि किन्हीं मनुष्यों का नगण्य सा मस्तिष्क उसे पूरी तरह अपने में समाविष्ट कर सके। समुद्र बहुत बड़ा है उसे चुल्लू में लेकर हममें से कोई भी उदरस्थ नहीं कर सकता। सत्य को जितना हमने जाना है हमारी समझ और दृष्टि के अनुसार वह सत्य हो सकता है—एस पर श्रद्धा रखने का हर एक को अधिकार है। किन्तु इससे आगे बढ़कर यदि ऐसा सोचा जाने लगा कि अन्य लोग सोचते हैं वह सब कुछ केवल असत्य ही है तो यह मान्यता महान् सत्य की अवमानना ही होगी।

एक ही उद्देश्य के लिए कई तरह सोचा जा सकता है। एक ही लक्ष्य तक पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं। एक ही कार्य को कई ढंग से किया जा सकता है एक ही भाव को कई भाषाओं में कई तरह व्यक्त किया जा सकता है। दन भिन्नताओं के रहने पर भी तात्विक एकता बनी ही रहेगी। समुद्र में असंख्यों लहरें उठती रहती हैं, इससे उस अथाह जलराशि की एकता खण्डित नहीं होती। सत्य सूर्य की तरह विशाल है जिसमें सात रंग की प्रमुख और हजारों रंगों की गौण किरणें निरन्तर प्रवाहमान रहती है सूर्य विभिन्न स्थानों पर वहाँ की परिस्थितियों के कारण कई रंगों का और कई आकारों का दीखता है। सवेरे का सूर्य बड़ा होता है और लाल रंग का। मध्याह्न को वह छोटा हो जाता है और उजले रंग का। इसी प्रकार कुहरे में, हिमप्रदेश में—रेगिस्तान में, ग्रहण काल में उसकी आभा भिन्न−भिन्न प्रकार की दृष्टिगोचर होती हैं। यह भिन्नताएं सूर्य की नहीं स्थानीय परिस्थितियों के कारण उसके परिलक्षित होने की है। सूर्य एक है—एक सा और एक रस है तो भी उसकी जो भिन्नता दीख पड़ती है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। सत्य के सम्बन्ध में भी यही बात है। कौन-सी मान्यता कौन सी क्रिया सत्य है इसका निर्णय कर सकना इतना सरल नहीं है जितना कि समझ लिया गया है। यदि दृश्यमान भिन्नताओं के कारण अनेकों परस्पर विरोधी सूर्यों की कल्पना की गई तो वह अवास्तविक ही होगी। वह हठवादिता सत्य की शोध अथवा उपलब्धि से और भी अधिक पीछे पड़ जायेगी।

हो सकता है कि दूसरे भी हमारी ही तरह सद्भाव सम्पन्न हो और अपनी समझ के अनुसार सदुद्देश्य के लिए वह क्रिया−कलाप अपना रहें हो जो हमें अनुपयुक्त लगता है रोष, द्वेष और विग्रह ऐसी ही पक्षपात भरी दुराग्रही मनःस्थिति के कारण होता है। यदि हम बाह्य क्रिया−कलाप की अपेक्षा कर्त्ता के उद्देश्य को समझने का प्रयत्न करें तो यथार्थता के निकट पहुंच सकते है। तब प्रतीत होगा कि उस भिन्नता में भी एकता का बड़ा आधार मौजूद है धर्म मान्यताओं की भिन्नताओं के सम्बन्ध में यही तथ्य सोलहों आना लागू होता हैं। संसार में अनेकों धर्म प्रचलित हैं। उनके रीति−रिवाजों एवं दिशा निर्देशों में काफी अन्तर पाया जाता है, फिर भी उनका मूल उद्देश्य एक है—अनुयायियों को संयमी, सदाचारी, उदार, सज्जन और दूरदर्शी बनाना। विभिन्न स्थानों के —विभिन्न स्तर के व्यक्तियों से मनीषियों ने भूतकालीन मान्यताओं के साथ ताल−मेल मिलाते हुए अपेक्षाकृत अधिक सुधरे हुए निर्देश देने के लिए धर्म संप्रदायों की रचना की है। इन सभी धर्म संस्थापकों का उद्देश्य एक था—सत्य के निकटतम स्थान तक पहुँचना और पहुँचाना।

सूर्य स्थिर नहीं—पवन अचल नहीं इसी प्रकार सत्य सदा सर्वदा के लिए एक जैसा नहीं रह सकता। व्यक्तियों और परिस्थितियों के अनुरूप उसका स्वरूप बदलता रहता है। जो मान्यताएँ और प्रथाएँ आज से दो हजार वर्ष पूर्व उपयोगी थीं वे आज भी वैसी ही हों यह आवश्यक नहीं। अति प्राचीन काल में घी के और पीछे तेल के दिये जला करते थे; अब बिजली की सस्ती और सरल रोशनी का प्रबन्ध हो जाने पर दीपक जलाने की उपयोगिता सिद्ध करने और उसी पर जोर देने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक समय की उपयोगिता अब अनुपयोगिता में बदल गई। दीपक का आविष्कार करने वाला किसी समय अति सम्मानित वैज्ञानिक घोषित किया गया होगा, पर अब उसकी गरिमा प्रतिपादित करने में—गुण गान करने में उतना उत्साह नहीं जगाया जा सकता। समय बदल जाने से परिस्थितियाँ बदल गई साथ ही मूल्याँकन भी बदला, इस तथ्य को ध्यान में रखने वाले कभी इस बात पर नहीं लड़ेंगे कि दीपक की उपयोगिता और उसके आविष्कारक भी हैं या नहीं। परिस्थितियाँ बदलने से प्रतिपादन भी बदलेंगे ही। इसमें सत्य की वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं आया। सर्दी में गरम कपड़े और गर्मी में ठंडे कपड़े पहनना सत्य की अवज्ञा नहीं है। बाहर से परस्पर विरोधी दीखने वाली इन भिन्नताओं के मूल में एक ही तथ्य है—’ऋतु प्रभाव से शरीर की रक्षा।’ अस्तु दोनों ही पद्धतियाँ अपने−अपने स्थान पर उपयोगी हैं और गाह्य भी। धर्म मान्यताओं से लेकर सामाजिक रीति−रिवाजों तक के सम्बन्ध से यही बात लागू होती है। संसार के अनेक देशों और अनेक जातियों में परिस्थितियों और परम्पराओं के कारण चित्र−विचित्र मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनमें से अपनी की सत्य और दूसरे सबों की असत्य मानने की संकीर्णता प्रायः सर्वत्र देखी जाती है। घृणा और द्वेष इस संकीर्ण बुद्धि के कारण पनपते हैं और दूसरों को बदलने के लिए बल प्रयोग से लेकर ऐसे उपायों का अवलम्बन किया जाता है जो अधर्म से भी बुरे हैं। धर्म की सेवा के लिए अधर्म का उपयोग—यह एक विचित्र कार्य है। पर यह विचित्रता प्राचीन काल में भी थी और अब भी पाई जाती है। धर्मा के बीच विद्वेष और आक्रमण का दौर अभी भी कम नहीं हुआ है। आये दिन दंगे होते है और खून खराबी की घटनाएँ घटित होती हैं; यह धर्मान्धता कई बार तो इतनी बढ़ जाती है कि भिन्न सम्प्रदाय के अनुयायी होने के अपराध में अगणित निरीह, निर्दोषों को गाजर, मूली की तरह काटकर रख दिया जाता है। इस विडम्बना को देखकर कई बार तो धर्म की उपयोगिता स्वीकार करने में भी कठिनाई होती है।

दर्शन, राजनीति, आहार−बिहार, आचार−विचार रहन−सहन, खान−पान, धर्म, संस्कृति में यदि विश्व−व्यापी एकता लाई जा सके तो सबसे उत्तम हैं, इससे मानव परिवार की एकता और व्यवस्था में निश्चय ही सहायता मिलेगी। पर जब तक यह दुराग्रह वातावरण उसके लिए तैयार नहीं तब तक इतना तो हो ही सकता है कि भिन्न विचारधारा वालों की मान्यताओं और गतिविधियों में जितना अंश सर्वोपयोगी है उतने को सहज सम्मान प्रदान करें और उतनी एकता को अधिक घनिष्ट एवं परिष्कृत बनाते चलें। इससे जहाँ सत्य की उपलब्धि में आँशिक सहायता मिलेगी वहाँ एक लाभ और भी होगा—वह है कट्टर दुराग्रह से आगे बढ़ कर यथार्थता का पता लगा सकने वाली उदार विवेक बुद्धि का विकास। इसी के आधार पर तो कूड़े के ढेर में बिखरे पड़े मोतियों को बीनना और उनकी एक सुसज्जित माला बना सकना सम्भव होगा।

भिन्नता के बीच एकता के सूत्रों को तलाश करने की प्रवृत्ति को जगाया जा सके तो ही दुराग्रह के बन्धन शिथिल हो सकेंगे और संकीर्णता की उस परिधि से आगे कदम बढ़ सकेंगे यह समग्र सत्य की उपलब्धि में सबसे बड़ी बाधा है। हम सब सत्य को प्यार करते हैं और उसे पाना चाहते हैं—इतना उच्च उद्देश्य रहने पर भी न जाने क्यों यह समझने का कष्ट नहीं किया जा सकता कि सत्य असीम है−उसे सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता और न यही कहा जा सकता है कि अमुक वर्ग के लोगों ने सत्य को जिस प्रकार समझा है वही ठीक है। उसके अतिरिक्त अन्य सभी मान्यताएँ गलत हैं। ऐसा मानना सत्य की गरिमा महिमा और विशालता को एक अत्यन्त छोटे दायरे में अवरुद्ध करने की तरह अवाँछनीय ही होगा और उपहासास्पद भी।

हम पक्षपात रहित सत्य शोधक दृष्टिकोण को अपना सकें और तर्क तथा तथ्य का अवलम्बन लेकर यथार्थता का पता लगाने चल पड़े तो मस्तिष्क में जमी हठवादिता से भिन्न प्रकार के आधार सामने उभरते दिखाई पड़ेंगे। तब अपनी मान्यताओं में भी कितनी ही खामियाँ दिखाई पड़ेगी और प्रतीत होगा कि हमारी अपेक्षा अमुक मान्यता अधिक सार गर्भित है। इसी प्रकार अन्यान्य लोगों के समस्त विचार अधर्म मूलक लगते थे—सत्य शोधक दृष्टिकोण से निरीक्षण करने पर प्रतीत होगा कि उस पक्ष के पास भी ऐसे कितने ही आधार मौजूद हैं जिनकी सराहना की जा सके और ग्राह्य स्वीकार किया जा सके। सत्य की शोध एवं उपलब्धि के लिए इस परिष्कृत चिन्तन पद्धति को अपनाया जाना आवश्यक है अन्यथा हम यथार्थता का आग्रह करते हुए वस्तुतः दुराग्रही हठवादिता के ही चंगुल में जकड़े रहेंगे। सत्य शोधक को जो लाभ मिलने चाहिए वे हमें कभी भी प्राप्त न हो सकेंगे।

कर सकने योग्य तीक्ष्णता से सम्पन्न करना होगा। विवेक युक्त विवेचन कर सकने और गहराई तक प्रवेश कर सकने योग्य चिन्तन को उभारना होगा। अगले दिनों मानव समाज को एक बनकर रहना होगा। एकता की उपासना करनी होगी साथ ही चिन्तन और कर्त्तव्य को प्रेरणा देने वाली सार्वभौम यथार्थता के निकट पहुँचना होगा। भटकाव और विलगाव पर विजय प्राप्त करके स्नेह, सौहार्द्र बढ़ाने के लिए यदि आगे बढ़ना हो तो उसका एक ही तरीका है—सत्य शोधक—पक्षपात रहित दृष्टिकोण का विकास और उसके आधार पर उपयुक्त सिद्ध होने वाले तथ्यों को अपना सकने योग्य साहस का संचय सम्पादन और अभिवर्धन।


Quotation

यदि मुझसे पूछा जाय कि भूतकाल में किस देश में मानव मस्तिष्क ने अपनी मुख्यतम शक्तियों को विकसित किया और जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों के हल ढूँढ़ निकाले तो कहूँगा—’भारत’ किस भावना और किस दार्शनिकता को अपनाकर संसार शान्ति और प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकता हैं, उसका उत्तर भी भारतीय दर्शन में ही केन्द्रित है।

—मैक्समूलर


बलिष्ठता का उद्गम केन्द्र

एकबार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।

नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ। वे उसके वैभव की भूरि−भूरि प्रशंसा करने लगे। उन्होंने उससे पूछा कि वृक्षराज! तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?

सेमर के वृक्ष ने हँसते हुए ऋषि के प्रश्न क उत्तर दिया कि—’भगवन्! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।” नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उत्तर उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।

सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा—’अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्श वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए।’ पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी−तूफान की तरह चल दिये।

सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी, परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ डाले ठूँठ की तरह खड़ा हो गया। पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ठूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों को त्यों हरा−भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सेमर से पूछा—”पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो इसका क्या रहस्य है?”

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों को त्यों हरा−भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सेमर से पूछा—”पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो इसका क्या रहस्य है?”

आप देख रहे है कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण में पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ है।

नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते है। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है। यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधू के लिए घर ही तपोभूमि है। शक्ति को हम तलाश करते फिरते हैं और शक्ति हमें ढूँढ़ती फिरती है। दोनों को ही यह शिकायत है कि हम अभावग्रस्त अनुपयोगी बने पड़े हैं। मनुष्य महंगी, झंझट भरी और जटिल संरचना की मशीनें बनाकर शक्ति प्राप्त करने में संलग्न है। उसे प्राप्त करने में जितना भार पड़ता है उसे देखते हुए प्राप्त हुई उपलब्धियाँ कुछ अधिक उत्साह वर्धक नहीं है। शक्ति उपार्जन का सबसे बड़ा स्त्रोत सूर्य हमारे सामने प्रस्तुत हैं और हमारी बाल−क्रीड़ाओं का उपहास करते हुए यह कह रहा है—बच्चों, संसार में जो कुछ भी शक्ति भंडार भरा पड़ा है वह मेरा ही अनुदान है। तुम यहाँ वहाँ भटकने की अपेक्षा जितनी शक्ति चाहिए, मुझी से सीधी क्यों प्राप्त नहीं कर लेते।

सुर्य से पृथ्वी को प्रति घण्टे 50,00,00,00,00,00,00,000 किलोवाट ऊर्जा प्राप्त होती है, संसार में काम में लाई जाने वाली ऊर्जा से यह कोई 20,000 गुनी अधिक है, विज्ञान क्षेत्र में सोचा यह जा रहा है कि निकट भविष्य में जबकि कोयला और तेल चुक जायगा तब ईंधन की कमी पड़ेगी। जलाऊ लकड़ी की तो अभी भी कमी पड़ रही हैं गोबर जलाना रोकने की बात जिस तरह लोगों के गले उतारी गई है, उसी तरह अगले दिनों यह भी समझाया जायगा कि वे इमारती लकड़ी के बाद जो लकड़ी बेकार समझी जाती है उसे भी जलाना बन्द करें। उस बेकार लकड़ी को गला पिघलाकर र्ह्डबोर्ड, प्लाइवुड, कार्डबोर्ड, कागज आदि के रूप में परिणत होने वाले कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

जलाऊ लकड़ी की बात तो इस प्रकार समाप्त हुई। कोयला और तेल का दुर्भिक्ष अगले पच्चीस वर्षा में पूरी तरह उभर कर आ जायगा एक शताब्दी के अन्दर—सन् 2100 तक तो तेल और कोयला कहीं दीख भी नहीं पड़ेंगे। उन्हें पूरी तरह धरती में से निकाल कर खत्म कर लिया जायगा। बिजली का उत्पादन उन्हीं प्राकृतिक ईधनों द्वारा चलने वाले यन्त्रों से होता है। जल प्रपातों से उस उत्पादन में मदद तो मिलती है फिर भी जरूरत तो प्राकृतिक ईंधन की भी बनी ही रहेगी। बिजली का उत्पादन सर्वथा स्वावलम्बी नहीं हो सकता; उसे तेल, कोयला आदि की पराधीनता से सर्वथा मुक्त किया जाना बड़े पैमाने पर कठिन हैं। छुट−पुट बैटरियाँ बल जाँय तो बात दूसरी है। परमाणु ऊर्जा की समस्या साँप, छछूंदर जैसी है; न खाते बनती है न उगलते। इतने बड़े शक्ति स्त्रोत की उपेक्षा कैसे की जाय एक ओर यह लालच खाये जाता है और दूसरी ओर उसकी विषाक्त राख जो बचेगी उसे जल, थल, नभ में कहीं भी छोड़ने से खैर नहीं; यह विभीषिका मुँह बांये खड़ी है। इसलिए उसे पचाते भी नहीं बनता। यों अणुभट्टियाँ बनाने और चलाने के दुस्साहसी कदम उठ चुके हैं, पर उत्साह से भी अधिक असमंजस छाया हुआ है इसलिए परमाणु ऊर्जा अभी त्रिशंकु की तरह अधर में लटकी हुई है। उसके प्रयुक्त होने पर बहिष्कृत होने की सम्भावनाएँ पचास−पचास फीसदी हैं। समय ही बतायेगा कि उसे पचाया गया या उगला गया। अभी तो उसे गले में अटकी हड्डी की तरह कह सकते है; उसे किधर जाना है यह स्पष्ट नहीं हो सका।

विज्ञान का ध्यान अब इस ओर मुड़ा है कि जब विश्व−व्यापी शक्ति का उद्गम स्त्रोत सूर्य है तो फिर सौर ऊर्जा का सहारा लेकर ही शक्ति की समस्त आवश्यकताएँ क्यों न पूर्ण की जायँ? अन्य स्त्रोतों की अपेक्षा वह अधिक निर्दोष और अधिक सुलभ है। लेसर किरणों में शक्ति तो अत्यधिक है पर उसका प्रयोग कर सकना केवल मूर्धन्य वैज्ञानिकों और अत्यन्त बहुमूल्य यन्त्रों द्वारा अत्यन्त सावधानी के साथ ही किया जाना सम्भव है। कहीं कोई राई रत्ती गड़बड़ी हो जाय तो समझना चाहिए कि उतने मात्र से ही सर्वनाश उत्पन्न हो जायगा।

सौर ऊर्जा में इस प्रकार के जोखिम कम से कम हैं। उसका भण्डार कभी चुकने वाला भी नहीं है। रात्रि में सूर्य नहीं चमकता इससे कुछ हर्ज नहीं—दिन में उपार्जन किया जाय और उत्पादन कारखाने बन्द रहें—गर्मी में अधिक काम हो,सर्दी में शिथिलता आ जाय तो भी हर्ज नहीं। गन्ना पेलने और चीनी बनाने के कारखाने भी तो छै महीने चलते और छै महीने बन्द रहती हैं। फैक्ट्रियां भी दिन में काम करती और रात में बन्द रहती है। सूर्य ताप पृथ्वी पर जिस क्रम से न्यूनाधिक मात्रा में उतरेगा उसी अनुपात से उत्पादन की व्यवस्था जुटाई जायगी। अधिक उत्पादन को संग्रहित करके रखा जायगा। और पीछे उसका आवश्यकतानुसार उपयोग किया जायगा।

सूर्य की किरणों से एक वर्ग गज की धूप वाले स्थान में तीन हार्स पावर शक्ति उत्पन्न होती है। सूर्य जब चन्द्रमा के सिर पर होता है तो 2408 फारनहाइट यानी पानी खौला देने वाला ताप उत्पन्न करता है। किन्तु जब वहाँ रात है तो शून्य तापमान से भी अधिक नीची, बर्फ जमने जैसी ठण्ड पड़ने लगती है।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ‘सिलिकान’ धातु से ‘सोलद सैल’ का निर्माण किया है। उन्हें ट्राँजिस्टरों, विद्युत घड़ियों एवं बैटरियों में प्रयुक्त किया जा रहा है। अन्तरिक्षियों में विद्युत उत्पादन का स्वरूप भारवाही तरीका इन सोलर सैलों की सहायता से ही विनिर्मित किया गया है। निकट भविष्य में उनसे बड़े और महत्वपूर्ण प्रयोजनों की पूर्ति हो सकने की सम्भावना, आशा और उत्साह भरे दृष्टिकोण के साथ देखी गई है।

समुद्र के खारी पानी को मीठा करने के लिए ऐसे विशालकाय पारदर्शी संयन्त्र बनाये जा रहे हैं जो सूर्य किरणों को जिस स्थान पर केन्द्रित करेंगे वहाँ बादल उठने वाली गर्मी समुद्र तल पर पड़ने लगेगी फिर उन बादलों को कैद करके पानी के रूप में परिणत किया जा सकेगा। और जहाँ चाहें वहाँ उसे ले जाया जा सकेगा। इस विधि का नाम ‘इलेक्ट्रो डियालिसिस’ रखा गया है। इस प्रयोग में एक हजार गैलन शुद्ध पानी तैयार करने में एक रुपया पैंतीस पैसा लागत आती है। प्रशान्त, अटलान्टिक और गल्फकोस्ट समुद्रों में ऐसी मशीनें लगाई गई हैं जो उपरोक्त प्रयोग को और भी अधिक स्पष्ट करने में निरत हैं यदि यह प्रयोग सफल हुए तो भविष्य में मीठे पानी में समस्या का समाधान करके मनुष्य जाति अपनी एक बहुत बड़ी आवश्यकता को पूरा कर सकेगी।

सौर ऊर्जा से संचालित होने वाली बैटरियाँ बन चुकी हैं। सिद्धान्ततः वे सफल हैं। हाँ सार्वजनिक उपयोग के लिए सुविधाजनक एवं सस्ती स्थिति में जनता को मिल सकें ऐसा प्रबन्ध नहीं हो सकता है। अगले दिनों वह सुविधा भी हो जायगी, ऐसी आशा की जाती है। रूस,इंग्लैंड, अलजीकिया, लेवनान, अमेरिका,जापान, इटली, फ्रांस आदि देशों ने छोटे पैमाने पर सौर ऊर्जा उत्पन्न करने और उसका उपयोग ताप एवं विद्युत के रूप में करने के कारखाने बनाये हैं। इन प्रयोगों के परिणाम का अध्ययन दिलचस्पी और बारीकी के साथ किया जा रहा है और पता लगाया जा रहा है कि सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक उपयोग के लिए किस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।

गायत्री मन्त्र सूर्योपासना का मन्त्र है। अध्यात्म विज्ञान के ज्ञाता उस दिव्य उपासना पद्धति से सविता देवता की शक्ति को आकर्षित करके अपने अन्तराल में धारण करने की विधि जानते रहे है। इस आधार पर तुच्छ से मनुष्य जीवन को देवोपम विभूतियों से सुसम्पन्न बनाने में असाधारण सफलता प्राप्त की जाती रही है। अब भौतिक क्षेत्र में भी सौर ऊर्जा क विशिष्ट उपयोग करके अतिरिक्त लाभ उठाने की बात सोची गई है—इसे सही दिशा में उठाया गया, कदम ही कहना चाहिए।


Quotation

जिस प्रकार तालाब में घास की वजह से मछली दिखाई नहीं देती है। उसी तरह माया के कारण ईश्वर अन्तःकरण में मौजूद होते हुए भी दिखाई नहीं देता है।


प्राणायाम − सर्वतोमुखी प्रगति की साधना

प्राणायाम के दो उद्देश्य हैं एक श्वास की गति का नियन्त्रण दूसरा अखिल विश्व ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राण चेतना को आकर्षित करके स्थूल, सूक्ष्म और कारणों, शरीरों को उस अद्भुत शक्ति से ओत−प्रोत करना। मनोनिग्रह में भी प्राणायाम से आशाजनक सहायता मिलती है। चंचल और उच्छृंखल मन निर्दिष्ट केन्द्र पर स्थिर होना सीखता है। इतना ही नहीं मनोविकारों के निराकरण का भी पथ−प्रशस्त होता है। साधन जगत में प्राणायाम की महत्ता एक स्वर से स्वीकार की गई है। शारीरिक और मानसिक आरोग्य की दृष्टि से उसे अतीव उपयोगी बताया गया है।

श्वास की गति में तीव्रता रहने से जीवन का शक्ति −कोष जल्दी चुक जाता है और दीर्घजीवन सम्भव नहीं रहता। श्वास की चाल जितनी धीमी होगी शरीर उतने ही अधि दिनों जीवित रह सकेगा और कई प्राणियों की श्वास का तुलनात्मक अध्ययन करने से तथ्य बिलकुल स्पष्ट हो जाता है।

प्रिमिनट श्वास की चाल और जीवन अवधि का लेखा−जोखा इस प्रकार है—खरगोश−श्वास 38, आयु 8 साल। कबूतर−श्वास 36,आयु 8 वर्ष। कुत्ता−श्वास 28, आयु 13। बकरी−श्वास 24, आयु 14। घोड़ा−श्वास 18, आयु 50। मनुष्य−श्वास 12,आयु 100। हाथी−श्वास 11, आयु 100। सर्प−श्वास 7 आयु, 120। कछुआ−श्वास 4,आयु 150 वर्ष।

भूतकाल में मनुष्यों की श्वास 11-12 बार प्रति मिनट के हिसाब से चलती थी अब वह बढ़कर 15-16 पहुँच गई है। इसी अनुपात से उसकी आयु भी घट गई है।

श्वास की गति बढ़ने से तापमान बढ़ता है। बढ़ा हुआ तापमान आयुष्य करता है। जो जानवर कुत्ते की तरह हांफते हैं—जिनकी हांफने की गति जितनी तीव्र होती है वे उतनी ही जल्दी मरते हैं। स्मरण रहे हाँफना और तापमान की वृद्धि दोनों एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। ज्वर आने पर आदमी भी हांफने लगता है। इसी बात को यो भी कह सकते हैं जिसकी साँस तेज चलेगी शरीर की गर्मी बढ़ जायगी यह गर्मी की बढ़ोतरी और साँस की चाल में तीव्रता दोनों ही जीवन का जल्दी अन्त करने वाले हैं।

दीर्घायुष्य का रहस्य बताते हुए विज्ञानी जेक्टलूवे ने बताया है कि इन दिनों मनुष्यों का शारीरिक ताप 98.6 रहता है। इसे आधा घटाया जा सके अर्थात् 49 बना दिया जाय तो आदमी मजे में 1000 वर्ष जी सकता है।

प्राणायाम में गहरी साँस लेने का अभ्यास किया जाता है। साधना समय में उसके लिए विशेष प्रयास किया जाता उथले साँस लेने की आदत को बदला जाय और उसके स्थान पर गहरी साँस लेने का अभ्यास सदा के लिए डाला जाय। इससे स्वास्थ्य संवर्धन और दीर्घजीवन की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं।

साधारणतया हर मिनट में 18 वार हमारे फेफड़े फूलते सिकुड़ते हैं। 24 घंटे में एक प्रक्रिया की 25920 बार पुनरावृत्ति होती है। प्रति श्वास में प्रायः 500 सी.सी. वायु का प्रयोग होता है। क्योंकि लोग उथला श्वास लेते हैं। सामान्यतया एक स्वस्थ शरीर की आवश्यकता पूर्ति के लिए हर साँस में 1200 सी. सी. वायु का उपयोग होना चाहिए। लोग आवश्यकता की देखते हुए आधे से भी कम वायु प्राप्त करते हैं। यह आधे पेट भोजन या आधी प्यास पानी की तरह ही शरीर को दुर्बल ही बनाये रहेगा,स्वास्थ्य श्वांसी सदा से गहरी साँस लेने की आवश्यकता बताते रहे हैं और कहते रहे हैं कि उथली साँस लेने की ढील−पोल से फेफड़े दुर्बल पड़ेंगे और उनमें क्षय, दमा, खाँसी, सीने का दर्द जैसे अनेक रोगों का खतरा बना रहेगा।

गहरी साँस लेने से थोड़ी राहत मिलती है और वह उस अवकाश का उपयोग रक्त को अधिक शुद्ध करने में कर सकता है। इससे हृदय पर कम बोझ पड़ेगा और वह अधिक निरोग रह सकेगा। इंग्लैंड का विख्यात फुटबाल खिलाड़ी भिड़लोथियन अपने गवीले मन और फुर्तीलेपन का कारण गहरी साँस लेने का अभ्यास ही बताया करता है वह प्रायः 2000 सी.सी. वायु हर श्वास में लेता था जबकि औसत व्यक्ति 500 सी.सी. ही लेकर छुट्टी पाते हैं। वह स्वास्थ्य संरक्षण और दीर्घजीवन का सस्ता किन्तु कारगर नुस्खा है।

डा. मेकडावल का कथन है—गहरी श्वास लेने का मतलब फेफड़ों को ही नहीं पेट के पाचन यन्त्रों को भी परिपुष्ट बनाना है। रक्त शुद्धि की दृष्टि से गहरा साँस बहुमूल्य दवादारू लेने से भी बढ़कर लाभदायक है। डा. नोल्स ने लिखा है—गहरी साँस लेने की आदत मनुष्य को अधिक कार्य कर सकने की क्षमता और स्फूर्ति प्रदान करती है। श्रम जीवियों की शक्ति साधारणतया अधिक ही खर्च होती है इससे उन्हें जल्दी थकना चाहिए पर देखा इससे उलटा जाता है वे अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ रहते हैं उसका प्रधान कारण कठोर श्रम करने के साथ−साथ फेफड़ों का अधिक काम करना और उस आधार पर रक्त शुद्धि का अधिक अवसर मिलना ही होता है। डा. मेटनो इससे भी आगे बढ़कर गहरी श्वसन क्रिया का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ना स्वीकार करते हैं। उन्होंने स्मरण शक्ति की वृद्धि से लेकर हर्षोल्लास मग्न रहने तक की विशेषता को इसी की लाभ परिधि में सम्मिलित किया है।

स्थूल शरीर में वायु संचार के लिए फेफड़े प्रधान रूप से काम करते हैं। सूक्ष्म शरीर में यह कार्य भी नाभि द्वारा वायु खींचता−छोड़ता है, सूक्ष्म शरीर को प्राण वायु का संचार करना होता है। प्राण वस्तुतः एक विद्युत शक्ति है जो आक्सीजन की ही भाँति वायु में घुली रहती हैं। श्वास−प्रश्वास के साथ ही उसका आवागमन भी होता है। वैसे उसकी सत्ता वायु से सर्वथा भिन्न है। समुद्र के पानी में नमक घुला रहता है यह ठीक है वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे से भिन्न स्तर के ही हैं।

सूक्ष्म शरीर की नाड़ियाँ में प्रवाहित होने वाले शक्ति प्रवाह को प्राण कह सकते हैं। जिस प्रकार रक्त और रक्त वाहिनी शिरा इन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहने पर भी उनकी सत्ता सर्वथा स्वतन्त्र है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की नाड़ियों और उनमें प्रवाहित होने वाले प्राणों को एक दूसरे से सम्बद्ध रहते हुए भी वह सत्ता की दृष्टि से पृथक् भी ठहराया जा सकता है।

प्राणायाम हमारे स्थूल शरीर में आरोग्य बढ़ाता है। सूक्ष्म शरीर में एकाग्रता, सन्तुलन और पवित्रता उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त कारण शरीर को प्रभावित करके कतिपय सिद्धियों और विभूतियों का द्वार खोलता है, जो मनुष्य में देवत्व का उदय कर सकती हैं।


Quotation

जहाँ मन निःशंक है और स्वाभिमान से माथा ऊँचा रहता है जहाँ ज्ञान नियुक्ति है, जहाँ वाणी सदा सत्य मूलक है जहाँ अथक उद्योग अपनी भुजायें पूर्णता की ओर प्रसारित करता है,जहाँ विवेक की निर्मल धारा मृत रूढ़ियों के शून्य मरुस्थल में विलुप्त नहीं हो गई है और जहाँ पिता! स्वतन्त्रता के ऐसे स्वर्ग स्थल में मेरा देश जागृत हो।


जीवन की जड़ें गहरी और मजबूत रखें

जिनकी जड़े सड़ गई उन खोखले पेड़ों को, आँधी का एक झोंका उखाड़ फेंकने के लिए पर्याप्त है। जब वे गिरते हैं तब औंधे मुँह गिरते हैं और फिर उठने का अवसर कभी भी प्राप्त नहीं करते। इसके विपरीतता जिनकी जड़े गहरी और मजबूत हैं वे तूफानों का सहज ही सामना करते रहते हैं, आँधी प्रचण्ड हों तो भी उनकी कुछ शाखाएँ ही टूटती हैं, तना फिर भी अप्रभावित ही रहता है। वह भी टूट जाय तो जड़े फिर नये अंकुर देती हैं और टूट हुए वृक्ष जैसा ही एक नया वृक्ष चन्द दिनों में फिर बनकर खड़ा हो जाता है। टूटा हुआ तना यदि थोड़ा भी जुड़ा रहा तो उसमें भी नई डालियाँ लहलहाने लगती हैं। यह सारे चमत्कार मजबूत जड़ों के हैं। पेड़ की जिन्दगी, सुरक्षा और प्रगति एवं शोभा उन्हीं पर निर्भर रहती है।

मनुष्य की जड़े उसकी मनोवृत्तियाँ हैं। हिम्मत,निष्ठा, लगन, श्रमशीलता, स्फूर्ति जैसी अन्तः प्रवृत्तियों को जड़ों की संज्ञा दी जा सकती है। वे मजबूत होंगी तो जीवन संग्राम में आये दिन आते रहने वाले आँधी तूफानों का आसानी से सामना किया जा सकेगा। यदि विपरीत परिस्थितियों ने कुछ अवरोध या व्यवधान उपस्थित किये तो उस आगत विपत्ति को भी सहन कर लिया जायगा। क्षति पूर्ति का भी मार्ग निकाल लिया जायगा। मनस्वी व्यक्तियों को भी अन्यान्य व्यक्तियों की तरह कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है पर वे उन्हें हँसी खेल समझ कर निपटते रहते हैं और मन पर उदासी की छाप नहीं पड़ने देते जबकि दुर्बल मन वाले व्यक्ति तनिक सी कठिनाई को देखकर भयभीत हो उठते हैं। आगत विपत्ति से पूर्व, मात्र आशंका ही उनके धैर्य को तोड़ देती है।

प्रगतिशील जीवन की जड़े गहरी होनी चाहिए। धैर्य, साहस और लगन से युक्त, संकल्पनिष्ठ व्यक्ति की जड़े ही इतनी मजबूत होती हैं कि वह उस समर्थ, सुस्थिर, सुविकसित और दीर्घजीवन में रह सके। मनस्वी व्यक्ति अपनी आन्तरिक विशेषता एवं दृढ़ता के आधार पर जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करते हैं इसके विपरीत दुर्बल मनः− स्थिति वालों के लिए तनिक से कारण तोड़−मरोड़ कर रख देते हैं, फिर उनके लिए कोई महत्वपूर्ण साहस कर सकना ही सम्भव नहीं रहता।

शरीर से परिपुष्ट दीखने से ही कोई व्यक्ति बलिष्ठ नहीं हो जाता। शक्ति मान वे है जिनमें मनोबल की अभीष्ट मात्रा मौजूद है। दुर्बल काया लेकर कर्मक्षेत्र में उतरे ऐसे महापुरुषों की संख्या अगणित है जिन्होंने अपने मनोबल के कारण अपने को ऊँचा उठाया और अगणित लोगों के भविष्य का निर्माण किया। गाँधी जी जैसे दुर्बल कार्य किन्तु मनोबल के धनी व्यक्ति कितने महत्वपूर्ण काम कर सकने में समर्थ हुए हैं ऐसे उदाहरणों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। आद्य−शंकराचार्य जैसे भयानक भगंदर व्रण से रुग्ण व्यक्ति भी अपने छोटे से जीवन में चकित कर देने वाली सफलताएँ प्राप्त करते रहे है। शरीर−बल की नहीं मनोबल की महत्ता को ही यह उदाहरण प्रतिपादित करते हैं। शरीर बल और मनोबल की तुलना करनी हो तो विशालकाय हाथी और मनस्वी सिंह के मल्ल−युद्ध का प्रतिफल हमें सहज ही वस्तुस्थिति समझा सकता है।

हमें जीवन की जड़ों को मजबूत बनाना चाहिए और उन्हें निरोग बनाने के लिए जितना ध्यान रखा जाता है, साधन जुटाया जाता है उससे अधिक प्रयत्न यह जाय। हिम्मत कम न पड़े— परिश्रम में उदासी न आये— आशा की ज्योति धूमिल न पड़े। कठिनाइयाँ सामने आने पर उनसे लड़ने की बहादुरी इतनी अधिक बनी रहे कि संघर्षों से निपटना एक मनोरंजक खेल भर बनकर रह जाय।

अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में हमारी आशा और चेष्टा इतनी बलवती होनी चाहिए कि परीक्षा के लिए समय−समय पर आते रहने वाले आँधी तूफान अपना कुछ बिगाड़ न सकें। जड़ें जितनी गहरी होंगी सफल जीवन की अभिव्यंजना का उतना ही सुखद रसास्वादन उपलब्ध रहेगा।


आशा आस्था और आत्मीयता की दिव्य उपलब्धियाँ

सेन्टपाल ने संसार के सबसे बड़े तीन सत्य बताये है−(1) आशा (2) आस्था (3) आत्मीयता। वे कहते थे जीवन का आनन्द केवल तभी तक है जब तक अब की अपेक्षा बड़ी सफलताएँ मिलने की आशा है। इसी प्रकाश दीप के सहारे जिन्दगी की लम्बी मंजिल पार की जा सकती है। जिसे भविष्य में कुछ करना नहीं है— कुछ पाना नहीं है। जिसके सामने किसी बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगाये रहने वाली योजना नहीं, समझना चाहिए वह मरणासन्न वृद्धावस्था में जा पहुँचा। वह इस प्रकार की हारी और अंधियारी जिन्दगी कितने ही दिनों क्यों न जी ली जाय वस्तुतः वह अपने आपकी लाश ढोने के बराबर है। जिसके सामने आँखों में चमक — मन में उत्साह और भुजाओं में पुरुषार्थ उत्पन्न करने वाला आशा भरा आलोक विद्यमान है, सच्चे अर्थों में जीवित तो उसी को कहा जा सकता है।

आशा की तरह ही जीवन का दूसरा तथ्य है— आस्था। जिसे अपने आप पर — अपने साहस एवं पौरुष पर विश्वास है उस आस्थावान के संकल्प प्रायः पूरे होकर ही रहते हैं। अनिश्चित और शंकाशील प्रकृति के लोग पूरे मन और पूरे श्रम के साथ देर तक किसी काम में लगे नहीं रह सकते एक के बाद दूसरा मनोरथ बदलना और बार−बार उन्हें छोड़ना अनास्था का प्रतीक है। ऐसे डाँवाडोल मनुष्य किसी लम्बी राह पर देर तक नहीं चल सकते। स्वल्प प्रयास में बड़ी सफलता की बाल बुद्धि के कारण उन पर उतावली छाई रहती है, छोटी−सी असफलता मिलने अथवा सोचे समय से अधिक समय लगने पर वे विलाप करने लगते हैं, इतने से व्यवधान उन्हें पर जैसे कष्टकारक दीखते हैं।

ऐसे लोगों को सदा दुर्भाग्य का ही रोना रोते रहना पड़ेगा। महत्वपूर्ण सफलताएँ तो उन्हें मिली हैं जिन्होंने रह अवरोध के बाद दूने उत्साह से काम करने का मनोबल सँजोकर रखा है। अनवरत प्रयास के बिना किसी के गले में विजन बैजंती नहीं पहनाई गई। धैर्य और साहस की ढाल तलवार पकड़े बिना जीवन संग्राम में कोई विजयी नहीं हुआ। आस्था ही व्यक्तित्व को प्रखर एवं प्रतिभाशाली बनाती है।

आत्मीयता का स्थान इन दोनों से ऊँचा है। उसकी शक्ति आशा एवं आस्था से भी बड़ी है। दूसरे को अपना समझना और उनके दुख−सुख में सच्चे मन से सहानुभूति रखना, योगदान देना एक ऐसा सद्गुण है जिसके आधार पर सुसंबद्ध व्यक्तियों का हृदय जीता जा सकता है− उन्हें अपना मित्र एवं सहयोगी बनाया जा सकता है। स्पष्ट है कि जिसे जितना सद्भाव एवं सहयोग उपलब्ध रहेगा वह उतना ही आगे बढ़ेगा, उतना ही प्रसन्नचित्त रहेगा।

आत्मीयता भरे उदार व्यवहार का नाम है प्रेम। प्रेम एक उच्चकोटि का सद्भाव है जो सेवा, सहायता एवं सत्प्रवृत्तियों के रूप में क्रियान्वित होता है। ऐसे आचरण से जहाँ दूसरे लोग मुग्ध होकर रहते हैं— भाव भरे श्रद्धा सम्मान सहित नत−मस्तक होते हैं वहाँ अपना अन्तःकरण भी कम सरस सद्भावनाओं को लाभ नहीं लेता। प्रेम जहाँ दूसरों को प्रमुदित करता है वहाँ अपने आपको भी कम आनन्द नहीं देता।

सेन्टपाल का यह प्रतिपादन सर्वथा सत्य है कि आशा आस्था और आत्मीयता से भरा मनुष्य सामान्य स्थिति में रहते हुए भी देव मानव की गणना में गिना जाने योग्य है।


दो प्रेम पारखियों का भावमिलन

बहुत प्राचीन काल की बात है। इस मथुरा नगरी में वासवदत्ता नामक एक वेश्या रहती थी। उसका रूप−वैभव किसी महारानी से कम न था। देश−देशों के राजा उसके दरवाजे पर खाक छानने आते थे। जिस पर वह मुस्करा देती, वही अपने को धन्य समझने लगता। ऐसी थी वह उर्वशी की अवतार वासवदत्ता।

एक दिन वह सोने, चाँदी से झिलमिलाते हुए रथ में बैठकर नगर की सैर करने निकली। उसका वैभव कोई साधारण सा थोड़े ही था। जिस बाजार में उसकी दासी भी निकल जाती वह इत्रों की सुगन्ध से महक जाते। जब उसका झिलमिलाता हुआ रथ निकलता तो नगर निवासी अपना−अपना काम छोड़कर सड़क के किनारे उसकी शोभा देखने खड़े हो जाते। उस दिन वह सैर को निकली थी। दर्शकों की भारी भीड़ सड़क के किनारे पंक्तिबद्ध होकर खड़ी थी। सबके मुख पर उसी के रूप–वैभव की चर्चा थी।

नगर के एक पुराने खंडहर मुहल्ले की एक टूटी झोंपड़ी में एक युवक रहता था। नाम था उसका उपगुप्त। उसने गेरुये कपड़े नहीं पहने, फिर भी वह संन्यासी था।भिक्षा उसने नहीं माँगी, फिर भी आकाशी वृत्ति पर उसका भोजन निर्भर थास्त्र प्रेत की तरह घूमता, यक्ष की तरह गाता, बैताल की तरह कार्य करतर और जनग की तरह कर्मयोग की साधना करता। जन्मभूमि तो उसकी कहीं दूर देश थी, पर अब रहता यहीं था। बुित कम लोग उसके बारे में कुछ जानते थे, पर इतना तब जानते थे कि यह आदर्शवादी युवक निर्मल चरित्र का है, ईश्वर भक्ति में लीन रहना और प्रेम का प्रचार करना इसका कार्यक्रम है।

उस दिन उपगुप्त अपनी झोंपड़ी के दरवाजे पर बैठा हुआ तन्मय होकर कुछ गा रहा था। आत्मविभोर होकर वह कुछ ऐसा कूक रहा था कि सुनने वालों के दिल हिलने लगे। मधुर स्वर के साथ मिली हुई आत्मानुभूति पुष्प के पराण की तरह फैल कर दूर दूर तक के लोगों को मस्त बनाये दे रही थी।

वासवदत्ता की सवारी संध्या होते−होते उस खंडहर मुहल्ले में पहुँची। मोधूलि वेसा में उस दरिद्र उपनगर की झोपड़ियों में दीपक टिमटिमाने लगे थे। वेश्या उन्हें उपेक्षा भाव से देखती जा रही थी कि उसके कानों में संगीत की वह मधुर लहरी जा पहुँची। वह कला की पारखी थी। इतना उच्चकोटि का गायन आज तक उसने न सुना था। उसकी आंखें वह स्थान तलाश करने लगी; जहाँ से यह ध्वनि आ रही थी। सवादी धीर−धीरे आगे बढ़ रही थी।स्वर क्रमशः निकट आ रहा था। आगे चलकर उसने देखा कि फूँस की एक जीर्ण−शीर्ण झोंपड़ी में एक गौर वर्ण का सुन्दर युवक आत्म−विभोर होकर गा रह है। वेश्या रथ में से उतर पड़ी, उसने निकट जाकर देखा कि देवताओं जैसे सुन्दर स्वरूप वाला एक भिक्षुक फटे −चिथड़े पहने मिट्टी की चबूतरी पर बैठा है और बेसुधि होकर गा रहा है। वेश्या ने कुछ कहना चाहा पर देखा कि यहाँ सुनने वाला कौन है। वह उलटे पाँवों वापिस लौट आई।

वासवदत्ता अपने शयन कक्ष में पड़ी हुई थी। बहुत रात बीत चुकी थी, पर नींद उसकी आँखों के पास न झाँकी। भिखारी का स्वर और स्वरूप उसके मन में बस गया था। इधर से उधर करवटें बदन रही थी पर चैन कहाँ? अब तक वह बड़े−बड़े कहलाने वाले अनेकों को उँगलियों पर नचा चुकी थी, पर आज जीवन में पहली बार उसने जाना कि ‘ जीकी जलन क्या होती है’ क्षण बीत रहे थे, उसका मन काबू से बाहर हो रहा था।

युवक के चरणों पर अपना समर्पण करने के लिए उसके प्राण तड़फने लगे।

रात के दो बज चुके थे। वेश्या चुपचाप उठी और दासी को लेकर घर से बाहर निकल पड़ी। गली −कूचों को पार करती हुई वह खंडहर मुहल्ले की उसी टूटी झोंपड़ी में पहुँची। युवक चटाई का फटा टुकड़ा बिछाये हुए जमीन पर सोया हुआ था। दासी ने धीरे से उसे जगाया और कहा— इस नगर की वैभव −शालिनी अप्सरा वासवदत्ता आपके दर्शनों के लिए आई हैं।

उपगुप्त ने आँखें मलीं और चटाई पर बैठा हो गया वासवदत्ता का ऐश्वर्य वह सुन चुका था। मुझ दरिद्र के यहाँ वह वैभवशालिनी आई है? क्यों आई हैं? मुझसे क्या प्रयोजन? एक बारगी अनेक प्रश्नों का ताँता उसके सामने उपस्थित हो गया? उसके मन में अविश्वास की भावना आई। कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहा हूँ? उपगुप्त बार−बार आँखें मलकर सामने खड़ी दो मूर्तियों को देखने लगा।

वासवदत्ता ने कहा प्यारे, सन्देह मत करो। बड़े−बड़े राजा− महाराजा जिसके चरणों पर लौटते हैं, वही वासवदत्ता आपको अपना हृदय समर्पण करने आई है। मेरा सारा वैभव आपके लिए समर्पित है। मैं आपकी दासी बनना चाहती हूँ। मेरे टूटे हुए दिल को जोड़कर कृतकृत्य कर दीजिए।

युवक को मानो साँप सूँघ गया हो, वह सन्न रह गया। उसने कहा— माता! तुम यह क्या कर रही हो। तुम्हारे मुख से यह कैसे शब्द निकल रहे हैं। मेरी आँखें स्त्री जाति को माता के ही रूप में देख सकती हैं। आपका पाप प्रस्ताव मुझे स्वीकार नहीं हो सकता।

वेश्या बोलने में बड़ी पटु थी। नाना प्रकार के तर्क और प्रलोभनों से उपगुप्त को प्रस्ताव स्वीकार कर लेने को समझाने लगी, परन्तु युवक टस से मस भी न हुआ उसका जीवन एक क्रमबद्ध साधना थी, उसमें इधर−उधर हिलने के लिए कोई गुंजाइश न थी। कोई प्रलोभन उसे डिगा न सका। वेश्या खिन्न होती हुई लौट आई।

एक अरसा बीत गया। वेश्या के शरीर में कोढ़ फूट गया। उसके अंग गल−गलकर गिरने लगे। अतुलित वैभव कुछ ही समय में न जाने कहाँ पलायन कर गया।उस पर मरने वालों में से कोई उधर आँख उठाकर भी नहीं देखता। यह दुरवस्था अधिक बढ़ी। उपचार के अभाव में उसके अंग सड़ने लगे। घावों में से कीड़े झरना आरम्भ हो गया।

ऐसी अवस्था में कौन उसके पास जाता; परन्तु उपगुप्त था, जो उसकी सेवा कर रहा था। दुर्गन्ध के मारे वहाँ जाने में नाक फटती थी, पर वह प्रसन्नता पूर्वक उसके घाव बाँधता, कपड़े धोता, मल−मूत्र उठाता। सगी माता की तरह उसने वेश्या की एकनिष्ठ सेवा की।

आज बीमारी बहुत बढ़ गई थी। वासवदत्ता मृत्यु के मुख में जा रही थी। उपगुप्त बैठा पंखा झल रहा था। रोगिणी ने अधखुले नेत्रों से उप.गुप्त की ओर देखा और कहा—पुत्र! तेरा स्वर और संगीत मैंने जैसा परखा था, आज वैसा ही देख लिया। उपगुप्त ने उसके चरणों की धूलि मस्तक पर चढ़ाते हुए कहा—माता! तेरा सौंदर्य जैसा मैंने समझा था, आज तेरा पुत्र−भाव पाकर वैसा ही पा लिया।


जेक जनरल हेटमैन जिज (kahani)

देश-भक्त जेक और आक्रमणकारी जर्मनों के विरुद्ध युद्ध चल रहा था। देश−भक्त अपने प्राण हथेली पर रखे हुए जूझ रहे थे। मातृभूमि की रक्षा के लिए उन्होंने सब कुछ दाव पर लगाया हुआ था। इस लड़ाई में जेक जनरल हेटमैन जिज, जर्मनों के विरुद्ध लड़ता हुआ खेत रहा ; तो मृत्यु शय्या पर पड़े हुए उसने आदेश कराया कि मरने के बाद उसकी चमड़ी उतार ली जाय और उसका ढोल मढ़वा कर जेक सैनिकों की कूच यात्रा में बजाया जाय ताकि वे मेरी ही तरह पूरे जोश और साहस के साथ लड़ाई जारी रख सके।


मृत्यु न तो जटिल है और न दुःखद

मृत्यु के समय कैसा अनुभव होता होगा? इस प्रश्न का उत्तर मरने वाले की मनःस्थिति को देखकर दिया जा सकता है।जीवन भर के संग्रहित विचार और संस्कार मरने के समय उभरते हैं उनमें से जो अधिक तीव्र होते हैं उन्हें स्मृति पटल पर प्राथमिकता मिलती है; अन्य स्मृतियाँ गौण हो जाती हैं। जीवन भर जो सोचा — जो चाहा और जो किया गया है प्रायः उन्हीं का सम्मिलित पर, चेतना आकाश में घटा बनकर छाया होता है और मरणासन्न व्यक्ति उन्हीं भले−बुरे संस्कारों का छाया चित्र देखता है। उन घड़ियों में सचेतन मन क्षीण हो जाता है और अचेतन का प्राबल्य रहता है। अचेतन के लिए भावना प्रवाह को दृश्य चित्र जैसा बनकर प्रस्तुत कर देना सरल है।

भारत के गृहमन्त्री पंडित गोविन्दबल्लभ पंत की मृत्यु से पन्द्रह दिन पूर्व की एक घटना है अपने सेक्रेटरी को वे अँग्रेजी में बोलते हुए कुछ नोट लिखा रहे थे। वे कुछ न रु के और हिन्दी में बोलने लगे। सेक्रेटरी अकचकाया कि प्रवाह कैसे बदला। बात वह भी पूरी न पड़ी फिर वे अपनी मातृभाषा पहाड़ी में बोलने लगे। इसके बाद वे एकदम मौन हो गये।

घटना मामूली सी है पर उससे इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि मृत्यु से पूर्व आत्मा पर चढ़े वाह्य आवरण उतरते जाते हैं और वह सुस्थिर संस्कारों की भूमिका में जागृत होता जाता है। अँग्रेजी बाहरी भाषा थी− हिन्दी भी उनने स्कूल जाने पर सीखी जन्म से तो पंत जी को पहाड़ी भाषा में ही बोलना, सीखना पड़ा था। घर परिवार के लोगों के साथ सहज स्वाभाविक स्थिति भी वे पहाड़ी में ही बोलते थे। यह उनका अधिक गहरा स्वाभाविक संस्कार था। मरने से पूर्व बाहरी आवरण उसी क्रम से उतरते हैं जिस क्रम से कि उन्हें पहना या प्रयोग किया गया है। कपड़े उतारते समय हम पहले कोट उतारते हैं उसके बाद कुर्ती सबसे अन्त में बनियान। बनावटी कृत्रिमता की परतें आत्मा के अन्तकाल में सबसे पहले उतरती हैं। जो दूसरों के दिखाने के लिए गढ़ा गया है वह व्यक्तित्व सबसे पहले समाप्त होता है फिर देर तक अभ्यास में रहा स्वभाव उतरता है और अंततः जीवात्मा की वे मूलभूत आस्थाएँ और आकाँक्षाएँ ही शेष रह जाती हैं जिनमें पूरी तरह व्यक्तित्व धुल या लिपट गया था।

दुष्कर्म कर्ता और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्य मरते समय डरावने दृश्य देखते हैं और उन्हें अपने चारों ओर भय तथा आतंक का वातावरण छाया दीखता है।यमदूतों की डरावनी आकृतियाँ — उनकी धमकियाँ तथा प्रताड़नाएँ भी उन्हें अनुभव होती हैं। मरने के उपरान्त जीव एक विश्राम निद्रा में कुछ समय के लिए चला जाता है। यदि अन्तःकरण शान्त और सन्तुलित हुआ तो उस स्थिति में सुसंस्कारों की प्रतिक्रिया स्वर्गीय सुखानुभूति जैसी होती रहती है यदि जीवन कुमार्गगामी, चिन्तन तथा क्रिया −कलापों में बीता है तो उस अवधि में डरावने नारकीय दृश्य दीखते रहेंगे और वैसी ही कष्टकारक अनुभूति होती रहेगी मृत्यु और जीवन जन्म के बीच में जो थोड़ा अवकाश मिलता है उसमें आत्मा को यही स्वप्न दिखाई देते रहते हैं। इन्हें ही परलोक गत स्वर्ग नरक कहा जा सकता है स्वर्गीय दृश्य देखकर सुखद सन्तुष्ट निद्रा पूरी करके जगा हुआ जीव−ताजगी और स्फूर्ति लिए होता है और नवीन जग में प्रगतिशील मनःस्थिति तथा परिस्थिति प्राप्त करता है इसके विपरीत नरक के दृश्यों से डरता, काँपता आधा अधूरा विश्राम लेकर नये शरीर में प्रवेश हुआ प्राणी डडडड बुद्धि, कुसंस्कारी एवं हीन व्यक्तित्व का होता है वैसे ही घटिया वातावरण में उसे जन्म भी मिलता है। स्वर्ग नरक और पुनर्जन्म में कैसी अनुभूति मिलेगी, कैसी स्थिति रहेगी इसे जानने के लिए किसी व्यक्ति का जीवन −क्रम कि प्रकार व्यतीत हुआ है इसे देखना होगा। जो जैसा सोचता और करता रहा है उसे तद्नुरूप में परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। कर्मफल एक ऐसी सुनिश्चित संभावना है जिसे किसी भी प्रकार टाला नहीं जा सकता।

दार्शनिक वेकन कहते थे— “ मृत्यु मानव जीवन के लिए सबसे छोटी विपत्ति है।” जिनमें जीवन को −मृत्यु की तैयारी को ध्यान में रखते हुए जिया है सचमुच उनके लिए मरण एक चिर प्रतीक्षित सुखद क्षण है उसे सामने देखकर उन्हें तनिक भी विचलित नहीं होना पड़ता। भयाक्रान्त तो वे होते हैं जिनने जिन्दगी को मौज−मजा करने का माध्यम माना और स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति के लिए अनर्थ करने में भी नहीं चूके।

विवेकवान सज्जन सहृदय मनुष्यों को मरने के समय सुखद अनुभूतियाँ होती रही हैं यह उनके जन्म समय कहे गये वचनों से भली प्रकार प्रकट होता है।

महाप्रभु ईसा न अपने शिष्यों से कहा था— मैं जीवन हूँ और पुनर्जीवन भी।जो मेरा विश्वास करता है सदा जीवित रहेगा भले ही वह शरीर से मर चुका ही क्यों न हो।

बाइबिल की कथा है— मृत्यु देखने के लिए ही जीवन का अन्त है, वस्तुतः कोई मरता नहीं, जीवन शाश्वत है।

प्रख्यात साहित्यकार विलियम हण्टर जब मर रहे थे तब वे बोले — ‘यदि इस क्षण मेरे हाथों में कलम पकड़ने की ताकत रही होती तो लिखता कि मरण कितना आनंददायक और कितना आसान है।

विद्वान पीन ने अपने एक मित्र की मृत्यु के समय के संस्मरण में लिखा है। मरते समय वह अपने बेटे से बोला जिम, देखो सामने कितना सुन्दर भवन खड़ा है— उसमें कितना अच्छा प्रकाश है। यह ज्योति मेरे ही लिये तो है। इतना कहकर उसने आँखें बन्द कर लीं।

लन्दन के पादरी लेजली वेदरहुड एक मरणासन्न रोगी के निकट प्रार्थना करने के लिए गये। वे उसका हाथ पकड़े चारपाई के सिरहाने बैठे थे। रोगी ने मूर्छा छोड़कर आँखें खोली और कहा— मेरा हाथ पीछे मत खींचो मुझे आगे जाने दो जहाँ मुझे स्वागत पूर्वक बुलाया जा रहा है।

यहूदी विद्वान सोलमन ने लिखा है— इस जीवन के बाद भी एक जीवन है। देह मिट्टी में मिलकर एक दिन समाप्त हो जायगी फिर भी जीवन अनन्तकाल तक यथावत् बना रहेगा।

दार्शनिक नशाद सुँश ने कहा है− आत्मा की अमरता माने बिना मनुष्य को निराशा और उच्छृंखलता से नहीं बचाया जा सकता। यदि मनुष्य को आदर्शवादी बनना हो तो अविनाशी जीवन और कर्मफल की अनिवार्यता के सिद्धान्त उसके गले उतारने ही पड़ेंगे।

ख्यातिनामा साहित्यकार विक्टर ह्यूगो ने लिखा है− कब्र में अन्धकार और श्मशान की नीरवता की बात ने मुझे कभी क्षुब्ध नहीं किया। क्योंकि मैं सदा विश्वास करता रहा— शरीर को तो नष्ट होना ही है पर आत्मा को कोई भी घेरा कैद नहीं कर सकता। उसे उन्मुक्त विचरण करने का अवसर सदा ही मिलता रहेगा।

वस्तुतः मृत्यु न तो कोई अचम्भे की वस्तु है और न डरने की। वह जीवन क्रम में अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई एक सरल और स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें पुरातन का नवीनीकरण का सुखद परिवर्तन जुड़ा हुआ है। यदि जीवन सरल रहे तो मृत्यु के जटिल और भयंकर लगने का फिर कोई कारण न रहेगा।


Quotation

मनुष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह वाणी और लेखनी द्वारा सत्य का प्रकाश और असत्य का नाश करे। ऐसा न करने से मनुष्यों की उन्नति नहीं हो सकती। मनुष्य जन्म का यही फल है कि सच और झूठ का निर्णय किया और कराया जाय न कि झगड़ा और बैर, विरोध बढ़ाया जाय।

− स्वामी दयानन्द


विलक्षण प्रतिभाएँ संचित ज्ञान−सिद्धाँत की साक्षी

संसार में ऐसी विलक्षण प्रतिभाएँ समय−समय पर उत्पन्न होती रहती हैं जिनकी बौद्धिक असाधारणता को देखकर अवाक् रह जाना पड़ता है। शरीर विकास की तरह बौद्धिक विकास का भी एक क्रम है। समय और अवधि के अनुरूप— साधन−सुविधाओं के सहारे कितने ही मनुष्य अपनी प्रतिभा को निखारते, बढ़ाते देखे गये हैं। पुरुषार्थ और परिस्थितियों के सहारों उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचते भी अनेकों को देखा जाता है पर इस स्वाभाविक प्रगति−प्रक्रिया का उल्लंघन करके कई बार ऐसी प्रतिभाएँ सामने आती हैं जिनके विकास क्रम का कोई बुद्धिगम्य कारण दिखाई नहीं पड़ता। ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं का कारण ढूंढ़ने के लिए हमें पूर्व संचित ज्ञान सम्पदा का प्रतिफल मानने के अतिरिक्त और कोई समाधान मिल ही नहीं सकता।

विख्यात फ्राँसीसी बालक ‘जान लुई कािर्दयेक’ जब तीन मास का था तभी अँग्रेजी वर्णमाला का उच्चारण कर लेता था। तीन वर्ष का होते होते वह अच्छी लैटिन पढ़ने और बोलने लगा। पाँच वर्ष की आयु में पहुँचने तक उसने फ्रच,हिब्रू और ग्रीक भी अच्छी तरह सीख ली। छै वर्ष की आयु में उसने इतिहास,भूगोल और गणित पर भी आश्चर्यजनक अधिकार प्राप्त कर लिया। सातवें वर्ष में वह संसार छोड़कर चला गया।

विलियम जेम्स सिदिस ने सारे अमेरिका को आश्चर्यचकित कर दिया। दो वर्ष की आयु में वह धड़ल्ले की अँग्रेजी बोलता, पढ़ता और लिखता था। आठ वर्ष की आयु में छै विदेशी भाषाओं का ज्ञाता था जिनमें ग्रीक और रूसी भाषाएँ भी सम्मिलित थीं; जिनका उस देश में प्रचलन नहीं था। ग्यारह वर्ष की आयु में उसने उस देश के मूर्धन्य विशेषकों की सभा में ‘चौथे आयाम’ की संभावना पर एक विलक्षण व्याख्यान दिया उस समय तक तीसरे आयाम की बात ही अन्तिम समझी जाती थी।

सिदिस की यह विलक्षणता किशोरावस्था आने पर न जाने कहाँ गायब हो गई। वह अति सामान्य बुद्धि का व्यक्ति रह गया।

इंग्लैंड के डेवोन स्थान में एक पत्थर तोड़ने वाले श्रमिक का दो वर्षीय पुत्र जार्ज, गणित में अपनी अद्भुत प्रतिभा प्रदर्शित करने लगा। चार वर्ष की आयु में उसने गणित के अत्यन्त जटिल प्रश्नों का दो मिनट में मौखिक उत्तर देना आरम्भ कर दिया जिन्हें कागज, कलम की सहायता से गणित के निष्णात आधा घण्टे से कम में किसी भी प्रकार नहीं दे सकते थे। इसकी प्रतिभा भी दस वर्ष की आयु में समाप्त हो गई। फिर वह सामान्य लड़कों की तरह पढ़ कर कठिनाई से सिविल इंजीनियर बन सका।

फिल्मी दुनिया में तहलका मचाने वाला बाल अभिनेता विलियम हेनरी वेट्टी बाल्यकाल से ही अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगा। उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते −पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय−पात्र बन गया। ऐसा ही एक दूसरा बालक था लन्दन का कवेंट गार्डन, उसका अभिनय देखने के लिए आकुल भीड़ को हटाने के लिए एकबार तो सेना बुलानी पड़ी थी उसे इतना अधिक पारिश्रमिक मिलता था जितना पाने का अन्य किसी कलाकार को सौभाग्य न मिला। एकबार तो ‘हाउस आफ कामन्स ‘ का अधिवेशन इसलिए स्थगित करना पड़ा कि उस दिन कवेंट गार्डन द्वारा हेमलेट का अभिनय किया जाना था और सदस्यगण उसे देखने के लिए आतुर थे।

जर्मन की बाल प्रतिभा का कीर्तिमान स्थापित करने वालों में जान फिलिफ वैरटियम को कभी भुलाया न जा सकेगा। उसने दो वर्ष की आयु में ही पढ़ना−लिखना सीख लिया। छै वर्ष की आयु में वह फ्रेंच और लैटिन भी धारा प्रवाह रूप से बोलता था। सात वर्ष की आयु में उनने बाइबिल का ग्रीक भाषा में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया। सात वर्ष की आयु में ही उसने अपने इतिहास, भूगोल और गणित सम्बन्धी ज्ञान से तत्कालीन अध्यापकों को अवाक् बना दिया। सातवें वर्ष में ही उसे वर्लिन की रॉयल एकेडेमी का सदस्य चुना गया तथा डाक्टर आफ फिलासफी की उपाधि से सम्मानित किया गया। वह भी अधिक दिन नहीं जिया। किशोरावस्था में प्रवेश करते करते वह इस संसार से विदा हो गया।

विलक्षण प्रतिभावान होते हुए भी प्रौढ़ावस्था तक पहुँचने वालों में एक है लार्ड मैकाले जो 51 वर्ष की आयु तक जिये। वे वयोवृद्धों का सा स्वभाव लेकर जन्मे थे उनके सोचने, बोलने और करने का ढंग आरम्भ से ही वृद्धों जैसा रहा।वे बच्चों के साथ नहीं बूढ़ों के साथ बैठते और बात करते थे। दो वर्ष की आयु में पढ़ने लगना उनकी विशेषता थी। सात वर्ष की आयु में उन्होंने विश्व का इतिहास लिखना आरम्भ कर दिया और कितने ही अन्य शोध पूर्ण ग्रन्थ लिखे। उन्हें ‘ चलती−फिरती विद्या’ कहा जाता था।

अत्यन्त छोटी आयु में विलक्षणता का परिचय देने में समस्त छोटी आयु में विलक्षणता का परिचय देने में समस्त विश्व इतिहास को पीछे छोड़ देने वालों में लुवेक (जर्मनी) में उत्पन्न हुआ बालक फ्रेडरिक हीनकेन था। वह सन् 1721 में जन्मा। जन्मने के कुछ घण्टे के बाद ही वह बातचीत करने लगा। दो वर्ष की आयु में बाइबिल के सम्बन्ध में पूछी गई किसी भी बात का विस्तार पूर्वक उत्तर देता था और बताया था कि वह प्रकरण किस अध्याय के किस मन्त्र में है। इतिहास और भूगोल में उसका ज्ञान अनुपम था। डेनमार्क के राजा ने उसे राजमहल बुलाकर सम्मानित किया। तीन वर्ष की आयु में उसने भविष्यवाणी की कि अब मुझे एक वर्ष की और जीना है। उसका कथन अक्षरशः सही उत्तरा चार वर्ष की आयु में वह इस संसार से विदा हो गया।

जो लोग पुनर्जन्म का अस्तित्व नहीं मानते। मनुष्य को एक चलता−फिरता पौधा भर मानते हैं। शरीर के साथ चेतना का उद्भव और मरण के साथ ही उसका अन्त मानते हैं वे इन असमय उदय हुई प्रतिभाओं की विलक्षणता का कोई समाधान नहीं ढूंढ़ पायेंगे। वृक्ष वनस्पति पशु−पक्षी सभी अपने प्रकृति क्रम से बढ़ते हैं उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताएँ समयानुसार उत्पन्न होती हैं फिर मनुष्य के असमय में ही इतना प्रतिभा संपन्न होने का और कोई कारण नहीं रह जाता कि उसने पूर्व जन्म में उन विशेषताओं का संचय किया हो और हो और वे इस जन्म में जीव चेतना के साथ ही जुड़ी चली गई आई हों।


जार्ज वाशिंगटन (kahani)

अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन घोड़े पर सवार होकर कहीं बाहर जा रहे थे। रास्ते में एक नीग्रो ने टोपी उतार कर उनका अभिवादन किया। प्रत्युत्तर में राष्ट्रपति ने भी टोपी उतारी और उसी तरह अभिवादन का उत्तर दिया।

उनके संभ्रांत साथी ने टोका कि आपके बड़प्पन की दृष्टि से ऐसा करना उचित नहीं। इस पर वाशिंगटन ने उत्तर दिया—एक अशिक्षित व्यक्ति ने विनम्र अभिवादन करके अपनी सभ्यता का परिचय दिया। मैं सुशिक्षित होते हुए भी यदि वैसा न क रता तो यह मेरी असभ्यता का द्योतक होता।


हम स्वाभिमानी बनें अहंकारी नहीं

स्वाभिमान आवश्यक है पर अहंकार अहितकर। आत्म−गौरव की रक्षा का अर्थ है वैयक्तिक य श्रेष्ठता का इस सीमा तक अक्षुण्ण बनाये रहना कि उस पर उँगली न उठाई जा सके और निष्कृष्टता के साथ जुड़ी रहने वाली आत्म प्रताड़ना न सहनी पड़े।

अहंकार गुणों का नहीं वस्तुओं का होता है। संपत्ति का, रूप का, बल का, पद का, विद्या का, घमण्ड करना यह बताता है कि इस व्यक्ति की समझ उन साँसारिक पदार्थों को ही महत्व देने तक सीमित है अथवा उन भौतिक परिस्थितियों को सब कुछ समझने की है जिनके स्थायित्व को कोई ठिकाना नहीं।

आज जो धनी है आजीवन वैसी ही स्थिति में बना रहेगा इसका कोई ठिकाना नहीं। आमदनी घटने और खर्च बढ़ने के कई बार ऐसे अप्रत्याशित कारण आंकड़े होते है जिनके कारण संग्रहित पूँजी देखते−देखते समाप्त हो जाती है। चोरी, बीमारी, मुकदमेबाजी, विवाह−शादी के ऐसे खर्च आ सकते है जिनके कारण सम्पन्नता चुक जाय। नौकरी से रिटायर होने, व्यापार में मन्दी आने, कृषि में वर्षा न होने आदि के ऐसे कारण आ जाते हैं जिनसे आमदनी के स्त्रोत सूख जाते है। घर के लड़के व्यसनी, आलसी एवं कुमार्गगामी निकले तो भी संपत्ति देर तक नहीं ठहरती, भले ही वह कितनी ही अधिक क्यों न हो ऐसे अगणित उदाहरण देखने सुनने को मिलते रहते हैं जिनमें पिछले दिनों सुसम्पन्न कहलाने वाले व्यक्ति आज दर−दर की ठोकरें खाते देखे जाते हैं। इन सब बातों का जो ध्यान रखेगा वह सम्पत्ति की अस्थिरता को अनुभव करेगा और उस पर घमंड करने का कोई कारण न देखेगा, धन का अहंकार आज किया जा सकता है पर कल जब वह न रहेगा तो आसमान से गिर कर पाताल से टकराने जितनी चोट लगेगी। हर कोई उस पतन का मजाक उड़ायेगा। ऐसे व्यक्ति दूसरों की सहानुभूति भी अर्जित नहीं कर पाते। दुर्दिनों में उन पर व्यंग और उपहास ही बरसते है। धन हानि के साथ−साथ इस तिरस्कार का प्रभाव मिलकर कष्ट को दूना कर देते है। ऐसे ही दुहरी मार से तिलमिला कर कई दिवालिये आत्म−हत्या तक करते देखे गये है।

अहंकार का उद्देश्य ही यह है कि सामने वालों को यह अनुभव कराया जाय कि वे अहंकारी की तुलना में छोटे हैं। अमीरी के ठाठ−बाठ इसी दृष्टि से बनाये जाते है कि संपर्क आने वाले लोग अपने साथ उसकी तुलना करें और यह स्वीकार करें कि यह व्यक्ति हमारी अपेक्षा बड़ा है। वैभव के आधार पर बड़प्पन पाने का तरीका ही यह है कि लोगों को अनुभव करने दिया जाय कि वे तुलना में बहुत छोटे हैं।

इस चेष्टा का एक पक्ष जहाँ सुखद है वहाँ दूसरा पक्ष कन दुखद नहीं है। मनुष्य की अन्तःचेतना अपने आपको तुच्छ सिद्ध किया जाना सहज ही स्वीकार नहीं करती। जो भी उसे प्रकाराँतर से चोट पहुँचाता है उसके विरुद्ध विद्रोह खड़ा करती है। अस्तु एक ओर जहाँ लोग धनी लोगों की धाक स्वीकार करते है वहाँ उनके भीतर घृणा का भाव भी उठता है। पता न लगने पर भी अचेतन मन में यह विद्रोह उठता है कि बड़प्पन दिखाने वाले को किसी प्रकार नीचे गिरना चाहिए ताकि अपने को छोटा अनुभव करने का व्यथा से छुटकारा मिल सके।

देखा गया है कि धनी लोगों की चापलूसी और खुशामद होती है, उनके यश बखाने जाते हैं; वहाँ वे ही लोग उसे काटने गिराने के लिए पीठ पीछे निन्दा करते रहने से भी नहीं चूकते। कभी अवसर आता है तो उसे गिराने में भी नहीं चूकते। हानि और विपत्ति का अवसर आने पर मन ही मन प्रसन्न भी खूब होते है और इस मनचली स्थिति को ओर भी अधिक फलित होने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से योगदान देते है।

रूप का अहंकार प्रदर्शित करने के लिए नई उम्र के लोग बन–ठनकर निकलते, शृंगार बनाते और बचकानी चाल−ढाल अपनाते है। उनका उद्देश्य दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करके यह छाप डालना होता है कि उनके रूप के साथ देखने वाले अपने रूप–यौवन की तुलना करें और यह स्वीकार करें कि यह रूपवान व्यक्ति कितना सुन्दर और सौभाग्यशाली है। ऐसे ठिठोरची विज्ञ लोगों की आँखों में अपने गिराते हैं और ओछे, बचकाने अथवा उच्छृंखल कहलाते है। इस स्तर के युवकों पर तरह−तरह के आक्षेप लगाये जाते है। उनके चरित्र के सम्बन्ध में सहज ही शंका उठती है और वह अकारण भी नहीं है। सजधज की शृंगारिकता धीरे−धीरे कामुक हाव−भाव और उच्छृंखल गतिविधियों की ओर बढ़ती है। फलतः कोई फँसने या फँसाने वाले भी मिल जाते है। शील नष्ट होने को इन परिस्थितियों में सहज ही अधिक आशंका रहती है। मनचले लोगों की ही प्रवृत्ति शृंगारिक सजधज के लिए आतुर रहती है और यह आतुरता उनके चरित्र के लिए संकट ही उत्पन्न करती चली जाती है। मानसिक अथवा शारीरिक व्यभिचार के फलने−फूलने के यही क्षेत्र उपजाऊ सिद्ध होते है।

शृंगारिक अहंकार को प्रदर्शित करना स्पष्टतः खर्चीला और महंगा पड़ता है। इस आर्थिक कठिनाई के युग में सामान्य स्तर के लोग निर्वाह के आवश्यक साधन ही कठिनाई से जुटा पाते हैं फिर इस महंगी सजधज के लिए खर्च होने वाला पैसा कहाँ से आये? नित नई भड़कीली पोशाकें पहनने के साधन जुटाना कितना खर्चीला होता है इसे वे ही लोग जान सकते हैं जिन्होंने उन पर पैसा पानी की तरह बहाया है। शृंगार की प्रसाधन सामग्री कितनी महंगी है और फिर शान तो यह भी कहती है कि उन चीजों में से जो महंगे मोल आती हों उन्हें ही खरीदा जाय। ऐसे लोग फटी−पुरानी या सस्ते दाम की चीजों से काम नहीं चला सकते। फलतः अनावश्यक अपव्यय भी उनके सामने एक बड़ी आवश्यकता बनकर सामने आता है। नशेबाजी, सिनेमाबाजी, मटरगश्ती, यारबाजी जैसे व्यसन भी इसी रँगीली प्रवृत्ति के सहचर है। ऐसे लोग अक्सर कर्जदार, चोर, बेईमान पाये जाते है। परिवार के लोगों को अभावग्रस्त दरिद्रों की स्थिति में पटक कर उन्हें सताते है। अच्छी कमाई होने पर भी ऐसे लोग आर्थिक कष्ट में ही फंसे रहते है। पूर्वजों की संग्रहित सम्पत्ति को फूँकने उड़ाने में उन्हें कुछ देर नहीं लगती। अपव्यय की पूर्ति के लिए उन्हें अवाँछनीय और अनैतिक तरीके अपनाने पड़ते हैं। युवा लड़कियों का इस प्रकार ‘इठलाना’ तो उनके लिए दुष्ट, दुराचारियों कि शिकार बनने के लिए स्पष्टतः भयंकर खतरा उत्पन्न करता है। किसी भी दृष्टि से विचार किया जाय, रूप−यौवन का उद्धत प्रदर्शन करना एक ओछे किस्म का और हानिकारक प्रयास ही सिद्ध होता है।

शारीरिक बल का उद्धत प्रदर्शन करने के लिए आम−तौर से गुण्डागर्दी का सहारा लिया जाता है अथवा बलिष्ठ सिद्ध होने के लिए कोई अचंभे जैसा श्रम किया जाता है। यह दोनों ही चेष्टाएँ अन्ततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। स्वास्थ्य रक्षा का सहज आनन्द अधिक उत्तम और अधिक व्यवस्थित कार्य करके प्रगति पथ पर क्रमबद्ध रूप से अग्रसर होना ही हो सकता है। उच्छृंखल प्रदर्शन करने वाले राह भटक कर उसे ऐसे कामों में खर्च करते है जिनसे दूसरे लोगों को चकित किया जा सके। आतंकवादी आचरण प्रायः ऐसी ही मनोवृत्ति के लोग करते हैं स्पष्ट है कि अपना रौब गाँठने के लिए जो भी आचरण किया जायगा उसकी प्रतिक्रिया अपने लिए अहितकर परिणाम लेकर ही वापस लौटेगी।

सरकारी, गैरसरकारी उच्च पद पर प्रतिष्ठित होना स्वभावतः ऐसे उत्तरदायित्व कंधे पर डालता है जो अपेक्षाकृत अधिक कठिन और महत्वपूर्ण होते है; इन्हें पूरा करने के लिए साथियों का अधिक मात्रा में और अधिक गहरा सहयोग अपेक्षित होता है। इसे उनका हृदय जीत कर उनके मन में अपना सम्मान स्थापित करके ही प्राप्त किया जा सकता है। अहंकार पूर्वक प्रताड़ना देकर जो काम कराये जाते हैं वे बेगार भुगतने की तरह आधे अधूरे ही रहते है। उनका परिमाण भी स्वल्प रहता है। उपेक्षा पूर्वक भार समझकर—रोष पूर्वक जो किया जायगा उसमें स्तर की उत्कृष्टता रह ही नहीं सकती। जिस भी कार्य में साथियों का बलात् सहयोग लिया जा रहा होगा वह घटिया भी होगा और कम भी। वे जमाने चले गये जब कोड़ों से पीट कर अधिक काम कराया जाता था। इन दिनों आतंक से नहीं प्रेम और सद्भाव से ही, सही और पूरा काम करने की आशा की जा सकती है। अहंकारी अफसर में यह विशेषता उत्पन्न हो ही नहीं सकती।

संस्थाओं में महत्वपूर्ण पद पाकर उद्धव आचरण एवं अहंकार प्रदर्शन करने वालों की भी दुर्गति ही होती है। उनके विरोधी प्रतिद्वंद्वी खड़े हो जाते हैं और पदों की छीना−झपटी का ऐसा कुचक्र चलता है कि न केवल संस्थाओं का ढ़ाँचा ही लड़खड़ाने लगता है वरन् वह उद्देश्य भी नष्ट होता है जिसके लिए उन्हें खड़ा किया गया था।

विद्या की प्रतिक्रिया विनय होनी चाहिए। फलों से लदे हुए वृक्षों की डालियाँ नीचे झुक जाती हैं। विशिष्टताओं और विभूतियों से लदे मनुष्यों को तो नम्रता और सज्जनता से भरा पूरा होना चाहिए। झुकना ही उनकी महानता है। विद्वान, गुणवान, कलाकार,या ऐसे ही अन्य विशिष्ट व्यक्ति तभी सम्मानास्पद बनते हैं जब उनमें सौजन्य का आवश्यक मात्रा बनी रहे। ज्ञान का अहंकार सबसे घटिया किस्म का है। धन,बल, रूप आदि भौतिक पदार्थों के कारण बने अहंकाकर को तो एकबार यह सोचकर उपेक्षा भी की जा सकती है कि यह बन्दर के हाथ तलवार लगने जैसी विडंबना है। विद्वान का अहंकार अक्षम्य है। ज्ञान के साथ तो सज्जनता और शालीनता जुड़ी ही रहनी चाहिए। यदि विद्वान, ज्ञानी, संत, घमंडी होंगे तो फिर नम्रता और विनयशीलता का अनुकरणीय आचरण कहाँ से सीखा जायगा?

घमंडी स्तर के लोग वस्तुतः व्यक्ति की दृष्टि से बहुत ही पीछे होते हैं। उद्धव प्रदर्शन और रौब–दौब की नीति अपना कर वे अपनी उपलब्धियों का दुरुपयोग ही करते है; उन्हें जो अधिक मिला है उसका पूरा लाभ तभी है जब दूसरे लोग भी उसे सराहें और कुछ सीखें। यह तभी हो सकता है जब सम्पत्तिवान में नम्रता, विनयशीलता और सज्जनता की मात्रा भी सम्पत्ति की तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही बढ़ती चले।

प्रत्येक सम्पत्ति अस्थिर है। पानी की लहरों की तरह उनका आना जाना बना रहता है। आयु बढ़ने के साथ साथ रूप, यौवन ही नहीं विद्या बुद्धि भी घटने लगती है। धन तभी तक अपना है जब तक उस पर अपना नियन्त्रण है। बेटे, पोतों के हाथ में सत्ता चले जाने पर धन समझा जाने वाला वृद्ध पुरुष भी अनाथ निर्धन जैसा परमुखापेक्षी हो जाता है। पद छिनने के बाद उच्च पदाधिकारी भी चपरासी से गये बीते बन जाते हैं। जिन आधारों की देर तक ठहरने की सम्भावना नहीं, जो वर्ष में बिजली की तरह चमक कर विलीन हो जाते हैं उन वैभवों का घमंड करना अपनी अदूरदर्शिता का परिचय देना ही है। इस अहंकार प्रदर्शन में ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, विरोध, विद्रोह एवं ठगे, बहकाये जाने के इतने अधिक खतरे मौजूद हैं जिन्हें देखते हुए विज्ञ व्यक्ति इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ओछेपन की इस मूर्खता से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके उतना ही उत्तम है।

निन्दा अहंकाकर की है, स्वाभिमान की नहीं। स्वाभिमान अपने आत्मिक स्तर को अक्षुण्ण बनाये रहने से सम्बन्धित है। नियमितता समय का पालन, श्रमशीलता कर्त्तव्य−निष्ठा उत्तरदायित्वों का निर्वाह, मर्यादाओं का पालन, प्रामाणिक सदाचरण, सज्जनोचित सद्व्यवहार, न्यायानुसार निष्पक्ष चिन्तन, उदात्त दृष्टिकोण, उदार व्यवहार जैसी वैयक्तिक क विशेषताओं का संरक्षण एवं अभिवर्धन ऐसी विभूतियाँ हैं जिन पर गर्व करना उचित कहा जा सकता है। इन विभूतियों को नष्ट होने देने के लिए जो सुरक्षात्मक मनोबल अन्तःकरण में विद्यमान रहता है उसे स्वाभिमान कहते हैं। इस स्वाभिमान की रक्षा के लिए हमें प्राण−प्रण से प्रयत्न अहंकाकर को निरस्त करना ही श्रेयस्कर हैं।


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हे परम प्रभु, मुझे इस अकेली बुद्धि के सहारे मत छोड़ देना, यह अभागों खुद तो भटकी हुई है ही; मुझे भी भटका देगी। मुझे तो प्यार का वरदान देना, जिसके सहारे अपने साथ दूसरों को भी तारता चलूँ।

− सेन्ट लारेन्स


कटुभाषा से केवल हानि ही हानि है

वाणी का मिठास मनुष्य की शालीनता का एक महत्वपूर्ण अंग है। जो कड़ुआ बोलते हैं वे अपने उद्धत अहंकार का प्रदर्शन करते हैं और सामने वाले के स्वाभिमान को सीधी चोट पहुँचाते हैं। इस प्रकार के हेय आचरण कर्त्ता को कोई लाभ नहीं मिलता वरन् अपार हानि पहुँचती है। अहंकार और कुसंस्कार का भौंड़ा प्रदर्शन ही कटुवचन हैं। ऐसे मनुष्य अपनी इस धृष्टता का कई बार सत्य वक्त − खरी कहने वाले कहकर समर्थन करते पाये जाते हैं पर वस्तुतः यह उनका दंभ मात्र है। सत्यवक्त और खरी कहने वाले के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह मानवोचित शिष्टाचार को ताक में रखकर असभ्य उद्दण्ड और असामाजिक आचरण पर उतर आये। असभ्यता और सत्यवादिता के साथ−साथ रहती कदाचित ही देखी जा सकती हैं।

आवश्यक नहीं है कि हम दूसरों की हर बात से सहमत ही हों और उनकी इच्छानुकूल काम करने ही लगें। मतभेद से लेकर असहमति और इनकार तक की स्थिति हो सकती है पर इस प्रकार का मत व्यक्त करते हुए ‘क्षमा कीजिए’ — हमें बड़ा खेद है— कितने भाग्यशाली होते यदि आपकी सेवा कर पाते — जैसे मधुर शब्दों को प्रयोग तो कर ही सकते हैं। इसमें सामने वाले की मान रक्षा भी हो जाती है अपनी शालीनता भी नष्ट नहीं होती।

जिनने अपनी थोड़ी सी सहायता की हो उन्हें ‘धन्यवाद’ देने और कुछ अनुरोध करना हो तो ‘कृपया’ जैसे शब्दों के साथ कहने में जीभ का कुछ घिस नहीं जाता पर दूसरों पर जो छाप पड़ती है उससे स्पष्ट होता रहता है कि बोलने वाले में शालीनता की मात्रा विद्यमान है।

मीठा बोलने के लिए आवश्यक नहीं कि किसी की उचित अनुचित बातों की हाँ में हाँ मिलाई जाय अथवा उसकी विचारणा एवं क्रिया का समर्थन ही किया जाय।

मीठा बोलने में एक ही दृष्टि प्रधान रूप से ध्यान में रखनी है कि सामने वाले के स्वाभिमान को अनुपयुक्त चोट न पहुँचे, ऐसे कटु वचन न कहें जो उसे तिरस्कृत करते हाँ। यह वैसा ही आक्रमण है जैसा कि मार−पीट करना या शरीर को चोट पहुँचाना। अपमान का आघात भी कम कष्टकर नहीं होता। उसकी प्रतिक्रिया− प्रतिशोध अथवा प्रत्याक्रमण के रूप में होती है। किसी को तिरस्कृत करके उसे अपना शत्रु ही बनाया जा सकता है। उसे सुधारने या बदलना अशक्य है। चोट खाया हुआ व्यक्ति अपनी भूल समझ लेने पर भी उसी बार पर अड़ जाता है और प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर गलती का पक्ष समर्थन ही क रता चला जाता है। कटुभाषी प्रायः किसी को सुधार या बदल नहीं पाता केवल अपने प्रति विद्वेष ही उपार्जित करता है।

मीठे वचन का अर्थ है अपनी नम्रता, विनयशीलता, शिष्टता, सज्जनता का और शालीनता का ध्यान रखते हुए शब्दोच्चारण करना। यदि हम गाली−गलौज जैसे मर्मभेदी अपमानजनक शब्द बोलते हैं या दूसरों को मूर्ख बेईमान कहते हैं तो यह उसके स्वाभिमान पर सीधी चोट हुई। सम्भव है सामने वाला भूल या भ्रम से ही वैसा कर बैठा हो जिससे हमने बुरा माना है। संभवतः अज्ञान, प्रमाद या दूर की बात न सोच सकने के कारण ही उससे अप्रिय आचरण बना हो। हम दूसरों की परिस्थिति या मनोभावना का सही मूल्याँकन नहीं कर सकते अस्तु सीधे उस पर दुष्टता या दुर्भावना का आरोपण— इस तरह नहीं करना चाहिए जिससे उसे मर्मभेदी चोट लगे।

मधुर शब्दों में बताई हुई भूल सामने वाले को यह अवसर देती है कि वह अपने कृत्य पर शान्ति पूर्ण ढंग से विचार कर सके और आवश्यकतानुसार अपने को बदल या सुधार सके। हर दृष्टि से लाभ मीठा बोलने में ही है कटु भाषण में नहीं।


भयंकर अणुशक्ति नहीं, मानवी दुर्बुद्धि है

प्रकृति के कण−कण में अनन्त शक्ति का भण्डार भरा पड़ा है। वस्तुतः यह समस्त जगत शक्ति रूप ही है; पर ब्रह्म की सहचरी प्रकृति भी यदि शक्ति सम्पन्न न हुई तो और कौन होगा? अपना सौरमण्डल और अगला विश्व ब्रह्माण्ड जिस असीम विस्तार वैभव से भरा पूरा है उसी का प्रतिनिधित्व छोटा परमाणु करता है। जो ब्रह्माण्ड में है वह पिण्ड में भी सन्निहित है इस प्राचीन उक्ति को अणु विशेषज्ञों ने पदार्थ की न्यूनतम इकाई का विश्लेषण करके अक्षरशः सत्य सिद्ध कर दिया है।

परमाणुओं का आकार कितना होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक सेन्टीमीटर लम्बाई में वे 10.00,00,000 रखे जा सकते हैं।

बहुत समय पूर्व परमाणु को ‘पदार्थ ‘ की सबसे छोटी इकाई माना जाता था। पीछे पता चला ‘परमाणु’ भी एक पूरा सौरमण्डल है, जिसका मूल केन्द्र है नाभिक — न्यूक्लियस। इसके इर्द −गिर्द इलेक्ट्रोन ग्रहों की तरह परिक्रमा करते हैं। पीछे पता चला नाभिक भी एकाकी नहीं है। वह प्रोटोन और न्यूट्रोन कणों से मिलकर बना है। अब वे भी दो नहीं रहे। परमाणु के भीतर 150 प्राथमिक कण खोजे जा चुके हैं। ये सभी प्राथमिक कण गिने जा रहे हैं। इनके गुण, धर्म अभी बहुत स्वल्प मात्रा में ही जाने जा सके हैं। ये भी चिरस्थायी नहीं। जन्मते, नई पीढ़ी उत्पन्न करते और मरते वे भी हैं। ये जितने छोटे हैं उतना ही इनका जीवनकाल भी छोटा है। वे एक सेन्टीमीटर के 10,000 अरब वें हिस्से की दूरी तक ही चलकर अपना जीवन समाप्त कर देते हैं। समय की दृष्टि से वह इतना कम होता है कि एक के आगे 22 शून्य रखने पर जो संख्या बनती है, एक सेकेंड का उतना भाग कहकर पाठकों को उसे समझाया जा सके।

इन कणों को विद्युत आवेश की दृष्टि से दो भागों में बाँटा जा सकता है पॉजिट्रोन अर्थात् धनावेशी कण। इलेक्ट्रोन अर्थात् ऋणावेशी कण।

परमाणु भौतिकी में ऊर्जा की सबसे छोटी इकाई ‘इलेक्ट्रोन बोल्ट’ मानी जाती है। वह इतनी कम है जितनी किसी वस्तु को बहुत ही हलके हाथ से पेन्सिल की नो क छुआ देने भर से उत्पन्न होती है। प्राथमिक कण को इतनी ही ऊर्जा युक्त माना गया है परमाणु का अस्तित्व इतना कम है कि उसे स्वाभाविक स्थिति में नहीं जाना जा सकता उसका परिचय तभी मिलता है जब उसे अतिरिक्त ऊर्जा चंचल बनाया जाय। ऐसी चंचलता 1000 से 10000 इलेक्ट्रोन बोल्ट को बढ़ाने पर ही हम उन्हें अपने किसी काम में ला सकते हैं। उसका नाभिक विचलित कर ने के लिए 1 लाख से लगाकर 100 लाख तक इलेक्ट्रान बोल्ट ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।

विभिन्न पदार्थों में पाये जाने वाले कणों की संरचना अलग−अलग प्रकार की है। हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक में केवल एक प्रोटोन पाया जाता है जबकि अन्यों में अनेक। यूरेनियम के नाभिकों में तो 92 प्रोटोन पाये जाते हैं।

भौतिकी का मोटा और सर्वमान्य नियम यह है कि समान आवेश वाले कण एक दूसरे को दूर धकेलते हैं और असमान आवेश वाले एक दूसरे को पास खींचते हैं विद्युत और चुम्बक बल का आधार यही है। नाभिक में धनावेशी प्रोटीन होते हैं इसलिए स्वभावतः ऋणावेशी इलेक्ट्रोन उनका चक्कर काटेंगे। पर आश्चर्य यह है कि नाभिक के भीतर सभी प्रोटोन धनावेशी होते हैं और वे साथ−साथ निर्वाह करते हैं। इसमें तो भौतिकों का सर्व मान्य सिद्धान्त ही उलट जाता है। इस समस्या का समाधान करते हुए वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि नाभिक के क्षेत्र में विद्युत चुम्बकीय नियम निरस्त हो जाता है उसके स्थान पर एक अनय बल काम करता है− जिसका नाम ‘ नाभिकीय बल’ रखा गया है। यह विद्युत चुम्बकीय बल की तुलना में 100 गुना अधिक सशक्त माना गया है इसका प्रभाव अपने छोटे क्षेत्र तक ही सीमित रहता है। प्राथमिक कण न केवल अपनी छोटी कक्षा में वरन् धुरी पर भी घूमते हैं। अन्य ग्रहों की तरह ही उनका भी वही क्रम है।

नाभिक को तोड़ने से प्रचण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है। इसके लिए कणों को अतिरिक्त ऊर्जा देनी पड़ती है इसके लिए बहुमूल्य संयत्र बनाये गये हैं जिन्हें साइक्लोट्रोन या सिक्राटोन कहते हैं। अमेरिका के ब्रुक ‘हैवन’ क्षेत्र में बने संयत्र में 30 अरब इलेक्ट्रोन वाल्ट की क्षमता है। रूस के डूबना क्षेत्र में बने संयत्र में इससे भी ढ़ाई गुनी अधिक क्षमता है।

आइन्स्टाइन द्वारा प्रादुर्भूत शक्ति महासूत्रों के आधार पर यदि एक पौंड पदार्थ को पूर्णतया शांति रूप में बदला जाय तो उससे उतनी

ऊर्जा प्राप्त होगी जितनी 1400000 टन कोयला जलाने से मिल सकती है। इसमें 25 हजार अश्व शक्ति का कोई इंजन कई सप्ताह सतत कार्य करता रह सकता है।

जिस प्रकार अपने सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य है उसी प्रकार अणु का केन्द्र न्यूक्लियस है। इसके इर्द−गिर्द घूमने वाले कणों को इलेक्ट्रोन कहते हैं। प्रत्येक पदार्थ के अणुओं की संरचना अलग−अलग किस्म की इस आधार पर कही जाती है कि उनमें इलेक्ट्रोनों की संख्या अलग−अलग होती है। न्यूक्लियस भी एकाकी नहीं है— वह प्रोटान और न्यूट्रान कणों से मिलकर बना होता है। इन मिलन संगठन में जो शक्ति काम करती है वह उस समय प्रचण्ड ऊर्जा के रूप में उफनती है जबकि प्रोटान और न्यूट्रान के परस्पर संयोग को वियोग के — विगठन के रूप में परिणत किया जाता है। सभी अणुओं में प्रोटॉनों की संख्या तो समान होती है पर न्यूट्रानों में वस्तु भेद से संख्या की न्यूनाधिकता पाई जाती है।

इस अणु शक्ति का यदि सद्भावना पूर्वक सदुपयोग किया जा सके तो समृद्धि का असीम उत्पादन हो सकता है और उससे मानवी सुख−शान्ति में अनेक गुनी वृद्धि हो सकती है। अणु शक्ति के रचनात्मक प्रयोग सोचे गये हैं और वे सहज ही कार्यान्वित भी हो सकते है। पर यह सम्भव तभी है जब सद्भावना का उत्पादन अन्तःकरण की प्रयोगशालाओं में भी साथ−साथ होता चले। अणु आयुधों की भयंकरता और उनके उत्पादन की विपुलता को देखते हुए आज समस्त मानव जाति महामरण के त्रास बुरी तरह संत्रस्त हो रही है। वस्तुतः वह त्रास अणु शक्ति का नहीं मानवी दुर्भावना का है जिसके आधार से अमृत भी विष बन जाता है। यदि पाशा पलट जाय,दुर्बुद्धि का स्थान सद्भावनाएँ ले लें और अरपु शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में होने लगे तो उसकी सुखद सम्भावनाओं का क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक हो सकता है।

रेडियो सक्रियता को धातुओं में नियंत्रित एवं व्यवस्थित क्रम से सँजोकर आइस्टोप बनाये जाते हैं। इनका उपयोग चिकित्सा, उद्योग, हाइड्रोलाजी आदि में होता है। थाइराइड ग्रन्थियों की गड़बड़ी रोकने के लिए रेडियो डाइन आइस्टोपों का प्रयोग होता है। स्वर्ग निर्मित आइस्टोप केन्सर की चिकित्सा में काम आते हैं रक्त में बढ़े हुए श्वेत कणों की चिकित्सा फास्फोरस आइस्टोपों से होती है।

फसल में लगे हुए कीडु मारने, उत्पादन बढ़ाने, शरीर एवं जल परीक्षा जैसे कार्यों में इनका प्रयोग होता है। इनका निर्माण एक बन्द कैबिन में यंत्रों की सहायता से किया जा सकता है।

सस्ती और प्रचुर परिमाण में विद्युत शक्ति प्राप्त करने के लिए अब परमाणु शक्ति पर विज्ञान का ध्यान केन्द्रित है समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने के लिए इसी शक्ति का बड़े पैमाने पर प्रयोग करना पड़ेगा। पानी पाई जाने वाली हाइड्रोजन गैस को बिजली में बदल देने का— जलयान, वायुयान चलाने में— ऊबड़ खाबड़ पहाड़ी जमीनों को समतल बनाने में जितनी प्रचण्ड शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा उतनी मात्रा अणु शक्ति के अतिरिक्त और किसी माध्यम से नहीं मिल सकती।

अणु ऊर्जा से बिजली पैदा करने का कार्य अब अनेक विकसित देशों में हो रहा है। सन् 1971 में संसार भर में 120 अणु शक्ति से बिजली उत्पन्न करने वाले 102 रिएक्टर थे। और 19 हजार मेगाटन बिजली उनसे पैदा हो रही थी अब यह वृद्धि द्रुतगति से हो रही है। अनुमान है कि 1980 में 3 लाख टन बिजली इसी आधार पर पैदा होने लगेगी जो संसार के समस्त विद्युत उत्पादन की 15 प्रतिशत होगी। सन् 2000 में आधी बिजली अणु शक्ति द्वारा उत्पन्न की गई ही होगी।

इन दिनों बिजली, भाप,तेल, गैस, कोयला आदि के माध्यम से ईंधन की जरूरत पूरी की जाती है और उन्हीं से विविध−विधि प्रयोजन सिद्ध किये जाते हैं। भविष्य में व्यक्ति का स्त्रोत अणु ऊर्जा बन सकती है और उससे वे पर्वतों को चूर्ण−विचूर्ण करके भूमि को समतल, उपजाऊ और उपयोगी बनाया जा सकता है। समुद्री जल को मीठा किया जा सकता है। समुद्र तल से संपदाओं के निकालने और अन्तरिक्ष में उड़ाने जैसी अगणित सम्भावनाएँ अणु शक्ति अपने साथ छिपाये हुए है। सद्बुद्धि अपना सका तो परमात्मा का राजकुमार मनुष्य प्रकृति माता से अनेकानेक उपहार निरन्तर अनन्त काल तक प्राप्त करता रह सकना है। पर यदि उसकी दुर्बुद्धि यथावत बनी रही तो फिर अपना अस्तित्व तो वह समाप्त करेगी ही इस सुन्दर पृथ्वी ग्रह को भी अन्य निस्तब्ध एवं निष्प्राण पिंडों की श्रेणी में ले जाकर खड़ा कर देगी।

एक और विभीषिकाएं और दूसरी ओर सुखद संभावनाएं लिए हुए अणु शक्ति हमारे सामने हाथ बाँधे खड़ी है और पूछती है कि दुर्बुद्धि के माध्यम से उसे मृत्यु दूत के रूप में प्रयुक्त किया जाने वाला है अथवा सद्भावनाओं के सहारे उसे दैवी वरदान बनने का अवसर दिया जाने वाला है। दोनों में से कोई भी आदेश देना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। निर्णायक शक्तियाँ नहीं— सम्प्रदाएँ नहीं— मनुष्य की अपनी मान्यताएँ है निर्धारण और परिष्कार र उन्हीं का होना चाहिए।


नावेर की सज्जनता (kahani)

दाहर की दृष्टि सदैव नावेर के घोड़े पर ही रहती। वह किसी युक्ति से नावेर के घोड़े का अपहरण करना चाहता था। पहले तो उसने घोड़े की माँग की पर जब उसकी इच्छा पूर्ण न हुई तो वह घोड़े को लेने के लिए अनेक प्रकार की तरकीबें सोचने लगा।

नावेर किसी आवश्यकता कार्य से अपने सम्बन्धी के यहाँ जा रहा था। चलते −चलते शाम हो गई। एक सुनसान जगह पर आम के पेड़ के नीचे कराहते हुए किसी व्यक्ति ने अश्वारोही से कहा— ‘मेरी तबियत बहुत खराब है। आज दोपहर से तीव्र ज्वर से पीड़ित हूँ। यदि उचित समझें तो मुझे भी अपने साथ लेते चलें।’

अश्वरोही नावेर का दिल पसीज गया। उसने रोगी को घोड़े पर पीछे की ओर बैठा लिया। मुश्किल से आधे मील की यात्रा पूरी हुई होगी कि पीछे बैठे व्यक्ति ने नावेर को जोर से धक्का देकर घोड़े से नीचे गिरा दिया। और घोड़ा भगाते हुए उस रोगी ने कहा— ‘नावेर तुम पहचानते हो मैं कौन हूँ।मैंने तुमसे घोड़ा देने के लिए कितनी मिन्नते की पर तुमने एक भी न सुनी। मैं दाहर हूँ। आंखें खोलकर मुझे देख लो।’

नावेर ने कहा— ‘दाहर तुमने यह अच्छा नहीं किया हैं।मैं मानता हूँ कि अब इस घोड़े के मालिक तुम हो पर अपने किसी मित्र से भी इस प्रकार घोड़े के प्राप्त करने के रहस्य को प्रकट न करना। यदि तुम्हारी यह चालाकी खुल गई तो निर्धनों और दीन−दुखियों का बहुत बड़ा अहित हो जायेगा। लोग जरूरतमंद व्यक्तियों को भी ढोंगी समझकर उनकी सहायता करने से हिचकिचायेंगे।’ नावेर की मर्म भरी वाणी सुकर दाहर की इंसानियत जाग उठी। वह मन ही मन उसकी सज्जनता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने हाथ जोड़कर नावेर से क्षमा माँगा नावेर ने भी उसे हृदय से लगा लिया।


नवजीवन का सृजन फिर समुद्र से ही होगा

अपनी इस शताब्दी में मनुष्य के हाथ अणु विस्फोट के माध्यम से उत्पन्न होने वाला एक ऐसा शक्ति स्त्रोत हाथ लगा है। जिसे मानवी इतिहास की ऊद्यावधि उपलब्धियों में अनुपम एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। यदि इसे रचनात्मक प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सका तो बात अलग है अन्यथा आज की दुर्बुद्धि अणु आयुधों के माध्यम से महाविनाश ही उत्पन्न करेगी। अगला विश्वयुद्ध अणु शस्त्रों से लड़ा जायगा, उसमें कोई हारेगा जीतेगा नहीं, वरन् संसार भर का वातावरण विषाक्त हो जाने से सभी थलचरों को मृत्यु के मुख में जाना पड़ेगा।

यदि महामरण प्रस्तुत हुआ तो क्या मानव जाति एवं प्राणियों का अस्तित्व इस धरती पर से सदा के लिए समाप्त हो जायगी इस प्रश्न पर गम्भीर विचार करने के उपरान्त मनीषी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि तब फिर उसी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होगी जिसके द्वारा कि पिछले दिनों सृष्टि का आरम्भ हुआ था। जीवन समुद्र से उत्पन्न हुआ था और मानव कृत महाप्रलय के पश्चात भी उसकी शुरुआत वहीं से फिर होगी।

जलचरों और थलचरों के मृत−शरीर अन्ततः समुद्र तल में ही चले जाते हैं और समुद्र डडडड पक बन जाते हैं। इससे पूर्व उनका कोमल भाग जीवित छोटे−छोटे जलचरों का आहार बन जाता है और कठोर भाग तली में जा जमता है। समुद्र में 600 से 1000 फुट नीचे की गहराई में सूर्य की किरणें नहीं पहुँचती। वहाँ केवल एक विशेष प्रकार के जल जीव ही रहते हैं।

अगले परमाणु युद्ध में सबसे पहले मनुष्य प्राणियों का सफाया होगा। वे बम गिराये ही आबादी केंद्रों पर जायेंगे। रहे बचे विषाक्त वातावरण की घुटन में अथवा वैसे ही अन्न−जल के उपयोग से मर खप जायेंगे। पशु− पक्षियों और कीट− पतंगों की भी यही दुर्दशा होगी। उनके कंकाल घुमा फिर कर समुद्र की शरण में जा पहुंचेंगे। उन्हें खाकर जीवों को भी मृत्यु के मुख में जाना पड़ेगा। समुद्र पर भी इस बम वर्षा का प्रभाव पड़ेगा और उसकी ऊपरी परत पर रहने वाली मछलियाँ और दूसरे प्राणी इस संसार से विदा हो जायेंगे।

इतने पर भी समुद्र की अति गहराई में कुछ छोटे किस्म के अविकसित प्राणी बच जायेंगे। समुद्र इतना गहरा और इतना विशाल है कि वह तीन−चार हजार अणु बमों को पचा सकता है और उसकी गहरी अँधेरी परत में रहने वाले प्राणी जीवित रह सकते हैं। अणु युद्ध की महाप्रलय के पश्चात धरती की सृष्टि के सूत्राधार यही मारकण्डेय साक्षी रूप से जीवित रहेंगे।

सम्भवतः बड़ी मछलियाँ अजगरों के रूप में धरती पर विचरण करने लगें और उन्हीं में बुद्धिमान स्तर के जो निकलें वे लेटने, सरकने वालों की दुनिया बसाये। कहा नहीं जा सकता कि अणुप्रलय के बाद के प्राणियों को, विकास क्रम अपनाकर बुद्धिमान और सभ्यताभिमानी बनने तक कितने उतार−चढ़ाव देखने पड़ेंगे और उनकी किस प्रकार की आकृति− प्रकृति होगी। किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आज हम जिस स्तर के बुद्धिमान हैं वहाँ तक पहुँचने में इस नई सृष्टि को कम से कम 30 करोड़ वर्ष अवश्य लग जायेंगे।

जीवन का उदय ईश्वर की कृपा से हुआ था, मूर्ख मनुष्य उसका अन्त कर सकता है; किन्तु यदि पुनर्जीवन आरम्भ करने की आवश्यकता हुई तो वह फिर ईश्वरीय अनुग्रह से ही सम्भव होगी। विनाश में प्रवीणता प्राप्त मनुष्य सृजन की सम्भावनाओं पर विचार ही नहीं कर पाया। सृजन के लिए जिस देवत्व की आवश्यकता है उसे उपलब्ध करने के लिए उसे दीर्घकालीनतम साधना करनी पड़ेगी।


अन्तर का परिष्कार सफल जीवन का आधार

बाह्य जगत की जानकारियों को अधिक मात्रा में प्राप्त करना उचित भी है और आवश्यक भी। पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने निज के बारे में अधिकाधिक जाने अपनी समस्याओं को समझें और अपना हित साधन करने के लिए समुचित प्रयत्न करें।

जीवन की प्रगति और अवनति में बाह्य परिस्थितियों का नगण्य स्थान है। प्रमुख भूमिका तो आन्तरिक स्थिति की ही होती है। अपना आपा यदि मलीन, नि.कृष्ट और अस्त−व्यस्त है तो उसकी प्रतिक्रिया अगणित समस्याएँ एवं विपत्तियाँ उत्पन्न करेगी। मुँह में दुर्गन्ध आती हो तो पास आने वाले हर व्यक्ति को घृणा होती है और वह दूर हटकर बैठता है। जिसके चिन्तन और स्वभाव में दुर्गन्ध आ रही होगी उसका न तो कोई मित्र रहेगा और न सहयोगी। शत्रुता और निन्दा का वातावरण ही उसे अपने चारों ओर घिरा हुआ दिखाई पड़ेगा। भीतर की स्थिति यदि सद्भाव सम्पन्न एवं शालीनता युक्त है तो उसका चुम्बकत्व सज्जनों का सहयोग अपने इर्द−गिर्द जमा कर देगा।

यह दुनिया दर्पण की तरह है उसमें बहुत करके अपना ही प्रतिबिंब दीखता है। जो जैसा होता है उसके मित्र एवं सहयोगी भी उसी स्तर के बढ़ते जाते हैं। परिस्थितियाँ एवं साधन भी क्रमशः उसी प्रकार के जुटते रहते हैं और व्यक्तित्व एवं वातावरण तद्नुकूल ही ढल जाता है जैसी कि भीतर की स्थिति होती है।

परिस्थितियाँ जैसी होगी भली−बुरी स्थिति हमें प्राप्त होगी यह सोचना गलत है। सही यह है कि जैसी कुछ अपनी भीतरी स्थिति होगी उसी के अनुरूप वाह्य परिस्थितियाँ बनती−बदलती चली जायेगी। अपने आपको सुधारने का अर्थ है, अपनी उलझी समस्याओं को सुधार लेना और अपनी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ −प्रशस्त करना। यह कठिन है कि बाहर के व्यक्तियों को अथवा घटनाओं को अपनी इच्छानुकूल ढाल लें। उसकी अपेक्षा यह सरल है कि अपनी अन्तःस्थिति को बदल कर अभीष्ट वातावरण अपने आप ही बदल जाने का द्वार खोखदें। बुद्धिमत्ता की यही रीति है।

दूसरों की सही समीक्षा कर सकना कठिन है पर अपने आपको आसानी से जाना जा सकता है। दूसरों को सुधारना कठिन है पर अपने आपको तो आसानी से सुधारा जा सकता है। दूसरों की सहायता बड़ी मात्रा में कर सकना संभवतः उतना न बन पड़े जितना कि अपनी सहायता आप की जा सकती है हम अपने को समझें— अपने को सुधारें और अपनी सेवा करने के लिए आप तत्पर हों तो निश्चित रूप से यह दूसरों की सेवा के लिए किये जाने वाले पुण्य−परमार्थ का प्रथम किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम होगा।

जो पाना चाहते हो उसके लिए बाहरी दौड़−धूप करने से पहले अपने भीतर उपयुक्त पात्रता उत्पन्न करें। व्यक्तित्व को जितना ही प्रखर परिष्कृत और समर्थ बनाया जायगा उतना ही अभीष्ट उपलब्धियों को प्राप्त कर सकना संभव ही नहीं सरल भी हो जायगा। अपनी विशेषताएँ डडडड बाहरी सहयोग को आकर्षित करती है। उपलब्धियों लाभ उठा सकना भी उसी के लिए संभव है जो भीतर मजबूत हैं। अपनी दुर्बलताओं की उपेक्षा करते रहेंगे भी बाहरी उपलब्धियाँ पकड़ की सीमा से बाहर ही व रहेंगी। इसलिए अपना चुम्बकत्व प्रखर बनाने के लिए तत्पर होना चाहिए, अनेक सफलताएँ उसी के आध पर खिंचती हुई समीप चली आयेगी।


42 पुत्र जो अन्ततः मंगलमय ही सिद्ध हुआ

नारवे के उपजाऊ इलाके में वह सबसे,खुशहाल किसान था। मामूली लोगों के बीच रहता और खेती −बाड़ी का साधारण सा काम करता, तो भी वह था महान्। भौतिक साधनों की दृष्टि से वह बड़ा नहीं था, पर सुदृढ़ सदाचार और परिमार्जित अन्तःकरण के कारण उसकी माहनता धीलियम पद्धति के समान उच्च और वेरिस हिम प्रदेश की भाँति श्वेत थी। उस किसान का नाम था ‘थोर्ड ओवे रास ‘।

प्रभात की सुनहरी बेला में थोर्ड ने गिरजाघर में प्रवेश किया। पादरी ने उसके अभिवादन का उत्तर देते हुए सत्कार पूर्वक आसन दिया और शिष्टाचार के बाद आगमन का कारण पूछा।

किसान की मुख−मुद्रा प्रसन्नता से खिली जा रही थी। उसने कहा— “ मेरे घर पुत्र उत्पन्न हुआ है, बतलाइये उसे वपतिस्मा के लिए कब लाऊँ? “

पादरी ने वपतिस्मा का समय निश्चित करके पुत्र की प्राप्ति पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उसे बधाई दी और आशीर्वाद दिया ‘ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगल−कारक हो।’

नियत समय पर बालक का वपतिस्मा हुआ, पादरी को दक्षिणा मिली। सब लोग मंगल−गान करते हुए अपने घरों को लौट गये।

दिन जाते देर नहीं लगती। एक−एक सोलह वर्ष व्यतीत हो गये। थोर्ड आज फिर गिरजाघर पहुँचा।

पादरी ने उसे देखते ही पहिचान लिया और आवभगत करते हुए कहा−” मि. थोर्ड तुम्हारा शरीर निस्संदेह सोने की शिला जैसा है। सोलह वर्ष बीत गये तुम्हारे शरीर में एक भी परिवर्तन तो दिखाई नहीं देता।”

थोर्ड ने मुसकराते हुए कहा— ‘सो तो आपकी कृपा है पिताजी मैं अमीर नहीं हूँ, तो भी खुश रहता हूँ और आप यह तो जानते ही हैं कि प्रसन्न रहने वाला स्वस्थ ही रहता है।

और भी इधर−उधर की बातें होती रहीं,अन्त में किसान ने कहा— ‘ कल मेरे पुत्र का दीक्षा संस्कार आपको करवाना है, उसी के लिए निमंत्रण देने आया हूँ।’

पादरी ने कृतज्ञता पूर्वक उसे स्वीकार कर लिया। दूसरे दिन दीक्षा हुई। दक्षिणा में दस डालर प्राप्त हुए पादरी ने वही आशीर्वाद फिर दुहराया− ‘ईश्वर करे बालक तुम्हें मंगल−कारक हो।’

दिन और बीते, आठ वर्ष का अरसा गुजरा, आज थोर्ड बहुत से साथियों के साथ हँसी के कहकहे लगाता हुआ गिरजा पहुँचा।

बिना आवभगत की प्रतीक्षा किये, थोर्ड ने दूर से ही अपना मन्तव्य कह सुनाया— पादरी साहब, मेरे लड़के का विवाह निश्चित हो गया है। यह देखिए भूरा टोप पहिने मि. गुडमेण्ड खड़े हुए है। इन्हीं की सुलक्षिणी पुत्री स्टोर्लिउन के साथ शादी हुई है।

पादरी और थोर्ड की घनिष्टता बढ़ी हुई थी। शादी के हर्ष समाचार से पादरी को हार्दिक प्रसन्नता हुई। उसने आगन्तुकों को एक छोटा −सा प्रीतिभोज दिया। आज प्रीतिभोज में मित्रों के बीच थोर्ड बहुत ही आनन्दिल हो रहा था, मानो सुरमित फुलवारी में गुलाबजल का फव्वारा चल रहा है।

शुभ मुहूर्त में विवाह होने का निश्चय होना था— पादरी ने संस्कार का दिन नियत कर दिया। एक−एक प्याला चाय और पी गई। तदुपरान्त विवाह की तैयारी की चर्चा करते हुए सब लोग विदा हो गये।

नियत दक्षिणा से तिगुनी पाकर पादरी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तीसरी बार अपने उसी पुराने आशीर्वाद को दुहराया−” ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगल−कारक हो।”

विधि का विधान बड़ा विचित्र है। कभी−कभी रंग में भंग होने की बड़ी अप्रिय घटनाएँ घटित होती है, जिनसे बुद्धि विचलित हो जाती है और मनुष्य विह्वल हो जाता है।

दो सप्ताह भी व्यतीत न होने पाये थे कि एक भयंकर दुर्घटना घटित हो गई। उस दिन शान्त सन्ध्या में थोर्ड अपने पुत्र के साथ नाव में बैठकर झील को पार कर रहे थे। अचानक एक चट्टान से टकरा कर नाव उलट गई और दोनों उस अथाह जलराशि में निमग्न हो गये।पिता तो बच गया, पर पुत्र तैरने में कुशल न होने के कारण जल में गोते लेने लगा और कुछ ही क्षण में प्राण छोड़ दिया।

तैरती हुई लाश बाहर निकाली गई। छाती पर पत्थर रख कर पिता ने उसे देखा। आज से तीसरे दिन लड़के का विवाह होने वाला था, पर हाय! आज यह कैसा विवाह हो रहा है। घटनाक्रम बिलकुल पलट गया था, पर थोर्ड की मुख−मुद्रा नहीं बदली थी। हाहाकारी रोदन की घड़ियों में भी मुसकराहट को वह छाती से चिपकाये हुए था।

श्मशान में लाश पहुँचाई गई। अंत्येष्टि क्रिया का शान्ति पाठ करने के लिए पादरी आया। उसने घुटने टेक कर मृतात्मा की सद्गति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। क्रियाकाण्ड पूरा करके पादरी लौट रहा था। उसके होठ बन्द थे, फिर भी भीतर ही भीतर कोई थोर्ड को आशीर्वाद दे रहा था— ‘ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगल−कारक हो।’

पुत्र के मृत्यु के उपरान्त पिता के हृदय में हाहाकारी तूफान उठने लगे। इन हाहाकारों न उसके हृदय को मथ डाला। इस मंथन ने उसके विचारों में बड़ा भारी परिवर्तन कर दिया। अब उसका दृष्टिकोण दार्शनिक बनने लगा। जीवन और मृत्यु की समस्या पर उसने नये सिरे से विचार आरम्भ किया। तत्व की शोध करते−करते उसने जाना कि नाशवान् वस्तुओं पर ममता बढ़ाने से ही संपूर्ण दुखों की सृष्टि होती है। मानव जीवन की उद्देश्य दुःखों को उत्पन्न करना और उनमें उलझें रहना नहीं, वरन् अपना और पराया कल्याण करते हुए दुख द्वंद्वों से छुटकारा पाना है।

दार्शनिकों की तरह आत्म तत्वों पर विचार करते हुए दिन पर दिन बीतने लगे। उसकी हँसी गम्भीर में परिणित होने लगी।

एक वर्ष बीता, पुत्र के श्राद्ध का दिन आ पहुँचा। राज भर वह किसी गम्भीर .गुत्थी को सुलझाने में लगा रहा। प्रातःकाल होते ही श्राद्ध का कर्मकाण्ड करने के लिए गिरजे में पहुँचा।

एक वर्ष बीता, पुत्र के श्राद्ध का दिन आ पहुँचा। राज भर वह किसी गम्भीर .गुत्थी को सुलझाने में लगा रहा। प्रातःकाल होते ही श्राद्ध का कर्मकाण्ड करने के लिए गिरजे में पहुँचा।

चाहता हूँ कि यह धन अज्ञान के बन्धनों में बँधे हुए कैदियों को ज्ञान का मुक्ति सन्देश देने के लिए लगाया जाय।

पादरी सुना करता था कि थोर्ड के किसान शरीर में देवदूत की आत्मा रहती है। आज उसने उसका दर्शन अपनी आँखों से कर लिया। पादरी का मस्तक उस देवता के सामने नत हो गया।

बाइबिल की पोथियाँ तैयार करने के लिए वह रुपया दे दिया गया। पादरी और थोर्ड पास−पास कुर्सियों पर मौन भाव से बैठे थे। सहसा पादरी ने निस्तब्धता भंग करते हुए कहा— ‘मैं समझता हूँ कि आखिरकार वह पुत्र तुम्हारे लिए मंगल−कारक सिद्ध हुआ।’

थोर्ड की बड़ी−बड़ी आँखों से आँसुओं की दो बूँद ढुलक पड़ीं, उसने स्वीकृति सूचक शिर हिलाते हुए उत्तर दिया— ‘हाँ मैं भी ऐसा ही समझता।’


Quotation

प्रेम के जागृत होने का यह अर्थ नहीं है कि हम मधुरता और सुख में ही विचरण करें। किन्तु इस जागृति से हममें उन वीरोचित प्रयत्नों का जागरण हो, जहाँ मृत्यु से जीवन को अमरता प्राप्त होती है और कष्ट−सहन के द्वारा वास्तविक आनन्द मिलता है।

—टैगोर


अगली शताब्दी में हमारा भविष्य

यों भविष्य अविज्ञात है। उसके सम्बन्ध में समय से पूर्व कुछ नहीं कहा जा सकता। नियति का ऐसा कोई निर्धारण नहीं है कि अमुक घटना क्रम अमुक प्रकार से ही घटित होगा। परिस्थितियों के अनुसार भविष्य की कल्पनाएँ अथवा सम्भावनाएँ बिलकुल उलटी भी हो सकती हैं।

भविष्य के सम्बन्ध में इतनी अनिश्चितता होते हुए भी उसकी कल्पना करना और सम्भावित परिणाम की उपेक्षा करना एक प्रकार से अनिवार्य ही है, क्योंकि इसके बिना न तो कोई योजना बन सकती है ओर न कुछ कार्य आरंभ किया जा सकता है। हानि उठाने और असफल होने के लिए भला कोई क्या और क्यों कुछ काम आरम्भ करेगा। अनेक तथ्यों और निष्कर्षों का सहारा लेकर मनुष्य काफ ी सोच−विचार करता है और जब उसे यह विश्वास हो जाता है कि इस कार्य को इस प्रकार करने से इतना लाभ होगा तो ही वह उसे आरम्भ करता है।यह एक प्रकार से भविष्य निर्धारण ही तो हुआ। तीखी बुद्धि वाले अनेक तथ्यों के आधार पर दूर की सोचते हैं और ऐसे नतीजे पर पहुंचते हैं जो प्रायः समय की कसौटी पर खरे ही उतरते हैं। व्यक्तियों, संस्थाओं और सरकारों द्वारा प्रायः भावी योजनाएँ बनाई जाती हैं।हर साल बजट इसी अनुमान,आधार पर पास होते हैं। पंचवर्षीय योजनाओं में भविष्य की कल्पना को ही प्रधानता दी जाती है। समझदार व्यक्ति भी अपने जीवन की रीति−नीति बनाते हैं, कार्य −पद्धति निर्धारित करते हैं और उनमें हेर−फेर लाते हैं। यह सब भावी संभावनाओं को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। भविष्य निर्धारण के सम्बन्ध में जिसकी दृष्टि जितनी अधिक स्पष्ट होगी वह उतना ही अधिक सुनिश्चित रहेगा और प्रगति कर सकेगा।

ग्रह गणित वाले ज्योतिषियों और अतीन्द्रिय शक्ति से भविष्य कथन करने वालों की बात छोड़ दें, तो भी तथ्यों के आधार पर भावी संभावना की रूपरेखा प्रस्तुत करने वाले लोगों का महत्व बना ही रहेगा क्योंकि उस आधार पर वर्तमान गतिविधियों की स्थापना करने में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। अस्तु अब भविष्य−कथन प्रबुद्ध वर्ग में प्रचलित एक महत्वपूर्ण शास्त्र माना जाने लगा है और उसका उत्साह पूर्वक समर्थन−अभिवर्धन हो रहा है।

भविष्य कथन की ज्ञान शाखा का विकास अमेरिका में उच्चस्तर पर हुआ है। वहाँ की सरकार ने प्रो. डेनियल बेल की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की जिसमें सन् 2000 में विश्व का क्या स्वरूप होगा इसके बारे में एक पूर्व परिकल्पना की है। समिति की रिपोर्ट पाँच खंडों में प्रकाशित हुई।

इसके अतिरिक्त हडसन इन्स्टीट्यूट के अध्यक्ष हरसन काइन तथा उनके सहयोगी एन्थोनी वीनर ने इसी विषय पर एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम है। — ‘दि ईयर 2000 ए फ्रेम वर्कफार स्पेकुलेशन।’ इसमें भी वर्तमान शताब्दी के अन्त तक विश्व के घटना क्रम का सुविस्तृत एवं तथ्यपूर्ण उल्लेख है।

इस प्रकार के भविष्य कथन की पुस्तकें पिछले दिनों भी छपती रही हैं। जिन्हें ‘युटोपिया’ कहा जाता है। ऐसी अनेक युटोपियाओं का एक संकलन ‘येस्टकडैंज टुर्भारोज ‘ नाम से प्रकाशित हुआ है। भूतकाल में यर्त्रा द जूवेनेल, टामस यूर, आल्ड्रस हक्सले, स्विफ्ट, व्रेल्सफोर्ड आदि विद्वानों ने समस्त विश्व अथवा उसके किसी भाग का भविष्य कथन करने वाली युटोपिय पुस्तकें प्रकाशित की हैं।

युटोपिया अललटप्पू कल्पना उड़ानों पर आधारित नहीं होती, वरन् उनके पीछे वर्तमान गतिविधियों और भावी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही कुछ निष्कर्ष निकाला जाता हे। विज्ञान की—प्रगति, औद्योगिक विकास, राज सत्ताओं की उलट−पुलट, जनसंख्या की वृद्धि साधन स्त्रोतों की सीमा, मानवी प्रकृति में परिवर्तन, खपत और उत्पादन का सन्तुलन जैसे अनेक तथ्यों का सहारा लेकर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि भविष्य का ऊँट किस करवट बैठने वाला है। यह सभी तथ्य एक दूसरे को प्रभावित करते है। किस तथ्य का रुझान किस ढलान की ओर लुढ़क रहा है और अगले दिनों उसमें क्या मोड़ आने वाला है, जो इस शतरंज को ठीक तरह समझ सकने की प्रखर कल्पना शक्ति सँजोये हो और आवश्यक तथ्यों का सही रूप से संग्रह कर रहे हो, उनके लिए भविष्य का ऐसा निष्कर्ष निकाल सकना कुछ बहुत कठिन नहीं होता जो प्रायः सही ही उतरे। सम्पन्न देशों के बड़े व्यापार फर्म अपना एक विभाग ही इस भविष्य कथन की शोध करते रहने के लिए नियुक्त रखते है और उस पर प्रचुर खर्च करते है।

भविष्य शास्त्र की ज्ञान शाखा के अंतर्गत महत्वपूर्ण शोध कार्य अमेरिका की एक संस्था पिछले दिनों काम कर रही थी—नाम था उसका—’रैंड’। सेन्टामोनिका बीच के पास उसका विशाल भवन था उसमें अनेक बुद्धि−जीवी—संसार की विभिन्न गतिविधियों का अध्ययन करके भावी सम्भावनाओं का आकलन करके उस दिशा में अमेरिका के विभिन्न वर्गों को उपयोगी सुझाव देने योग्य निष्कर्ष प्रस्तुत करते थे। इन्हीं शोधकर्ताओं में एक था—हरसन काहन। उसने उक्त संस्था छोड़कर ठीक उसी तरह का अपना अलग संस्थान बनाया। नाम रखा हरसन इन्स्टीट्यूट। जिसे लोग ‘थिंकटेक’ अर्थात् ज्ञान सरोवर के नाम से भी पुकारते हैं। हरसन संसार के उच्चकोटि के ज्ञानवानों में से एक गिना जाता है।

हरसन की महत्वपूर्ण पुस्तक है—’आन थरमोन्यूक्लि आर वार’ इसमें अणु युद्ध उसकी सम्भावना तथा प्रतिक्रिया पर विस्तृत प्रकाश डाला है और सुझाव दिया है कि उस विभीषिका के संदर्भ में अमेरिका को क्या करना चाहिए इस पुस्तक ने जनता और सरकार के मस्तिष्क को बेतरह झकझोरा। पुस्तक की जहाँ उस प्रकाशन ने भूरि−भूरि प्रशंसा की वहाँ लेखक को ‘ईडियट जीनियस’ तिरस्कृत भी किया गया। जो हो हरसन अपने शोध कार्य में दत्त−वित्त से लगा है। उसकी शोध संस्था में 75 व्यक्ति काम करते है। इनमें से 35 तो बहुत ही उच्चकोटि के विद्वान तथा सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न हैं। 300 पौंड भारी इस ‘मोटू’ भविष्य वक्त की संसार भर में चलते−फिरते कंप्यूटर के रूप में ख्याति है। समय−समय पर की गई उसकी राजनैतिक और औद्योगिक भविष्य वाणियाँ अब तक सही निकलती रही है।

हरसन ने (1) बढ़ती हुई जनसंख्या (2) बढ़ती हुई सम्पन्नता (3) बढ़ते हुए सरकारी नियंत्रण (4) बढ़ती हुई वैज्ञानिक प्रगति (5) और बढ़ती हुई स्वार्थपरता की ओर संसार का ध्यान आकर्षित किया है और कहा है समय रहते इस पाँच विभीषिकाओं को रोका जाय अन्यथा अगली शताब्दी की असाध्य समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, वर्तमान प्रगति अगले दिनों मनुष्य जाति के गले में पड़ा हुआ फांसी का फँदा सिद्ध होगी। हरसन ने कहा है−बड़े उद्योग घटाये जाँय, शारीरिक श्रम को सम्मान दिया जाय, लोगों के सोचने का तरीका बदला जाय, बिना बच्चे उत्पन्न किये चलते रहने वाले विवाहों का प्रचलन किया जाय और स्नेह सौजन्य भरे सहयोग का दर्शन शास्त्र रचा जाय ताकि संसार में जो कुछ है उसे सब लोग मिल बाँटकर खा सकें और सुख शान्ति के दिन बिता सकें।

वह कहता है—व्यक्ति का रुझान और समाज का वातावरण जिस प्रकार का बनता चला जा रहा है वह अत्यधिक भयावह है यदि प्रस्तुत क्रम को लौटा न जा सका तो अगली शताब्दी में मनुष्य जाति को अपनी उत्पन्न की समस्याओं में उलझ कर स्वयं ही अपना गला घोंटना पड़ेगा।


Quotation

अपनी सहानुभूति और प्रेम का दान देकर प्रेमी आत्मा को दुर्बल और परावलम्बी मत बनाओ। कठोर इन्कार और बेरहम आजादी में मुझे अकेला छोड़ दो। जीवन में भयंकरता निराशा के तूफानों को सहर्ष झेलते हुए वीरता पूर्वक अपने उद्देश्य की प्राप्ति ही मुझे अधिक पसन्द है।


अपनों से अपनी बात - शान्ति−कुञ्ज की शिक्षा प्रेरणा और उसका अनवरत प्रवाह

शान्ति−कुञ्ज सप्त सरोवर हरिद्वार में चल रही शिक्षण व्यवस्था का मूल प्रयोजन उस आत्म−बल का — ब्रह्मवर्चस् का — परिजनों में अभिवर्धन करना है, जिसके बल पर व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं सुविकसित बनने का अवसर मिलता है। मनुष्य के अपने ही भीतर इतनी विभूतियाँ भरी पड़ी है कि उनका जागरण कर लेने से वह सिद्ध पुरुषों की — महामानवों की— पंक्ति में जाकर खड़ा हो सकता है।

शान्ति −कुञ्ज कुछ दिन तक एक ऐसे गुरु कुल की भूमिका सम्पन्न करेगा जहाँ के छात्र आत्म−बोध, आत्म सुधार, आत्म −निर्माण और आत्म−विकास की चतुर्विधि दिव्य सम्पदाएँ प्राप्त कर सकने का लाभ ले सकें। परिजन के वल अखण्ड−ज्योति के माध्यम से उच्चस्तरीय जानकारियाँ प्राप्त कर सकने तक ही सीमित न रहें, वरन् उस ज्ञान सम्पदा को व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करके अपने आपको अनुकरणीय, अनुगमनीय बनाने में समर्थ हो सकें तभी प्रकाश की उपयोगिता है, जो अब तक पुस्तकों और पत्रिकाओं की पंक्ति यों से उन्हें मिलता रहा है। प्रकाश के साथ प्रेरणा जोड़ने की सदा ही आवश्यकता रही है। अब उसकी भी व्यवस्था बन गई। परिजनों को पिछले दिनों प्रकाश को पर्याप्त मात्रा में मिला है, पर वह प्राण प्रेरणा न मिल सकी जो उपयुक्त वातावरण में— उपयुक्त परिस्थितियों से —उपयुक्त मनःस्थिति में मिला करती है। दीपक से दीपक जलाने की परिपाटी सान्निध्य चाहती है— शारीरिक भी और आत्मिक भी। शान्ति −कुञ्ज में चल रही शिक्षण व्यवस्था को यथासंभव इसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया गया है जिसमें श्रेय पथ के पथिकों को आवश्यक आधार, मार्ग−दर्शन ही नहीं समर्थ सहयोग भी प्राप्त हो सके

गतवर्ष प्राण प्रत्यावर्तन सत्र चले थे। उनमें पाँच−पाँच दिन के लिए गायत्री के पञ्चमुखी विग्रह में सन्निहित पाँच कोषों के अनावरण का क्रम समझाया गया था और मार्ग−दर्शन किया गया था। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यह पाँच अंतर्जगत के बहुमूल्य रत्न भण्डार हैं। इन्हें खोदने और पकड़ने की विधि− व्यवस्था हस्तगत हो जाय तो मनुष्य निस्सन्देह कुछ के कुछ बन सकता है। उसके प्राणों का महाप्राण में प्रत्यावर्तन हो सकता है। इसी स्तर की शिक्षा गत वर्ष दी जाती रही है। जो कौतूहलवश अथवा किन्हीं भौतिक कठिनाइयों के समाधान का आशीर्वाद प्राप्त करने आये थे उन्हें छोड़कर शेष सभी को आशाजनक और आश्चर्यजनक स्तर की प्रकाशपूर्ण प्रेरणा प्राप्त हुई।गतवर्ष के प्रयत्न का लेखा−जोखा ऐसा हो जिसे हर कसौटी पर खरा; उत्साहपूर्ण और सन्तोषजनक कहा जा सके।

लगातार एक ही वर्ग के लोगों को प्रशिक्षित करते रहना अभीष्ट नहीं था। कनिष्ठ ओर वरिष्ठ वानप्रस्थों को भी कार्यक्षेत्र में उतरना था और साधू−ब्राह्मणों को,डूबती परम्पराओं की पुनर्जीवित करना था। वर्णाश्रम धर्म की रीढ़ वानप्रस्थ है। उसके टूट जाने से हिन्दू धर्म की सारी गौरव−गरिमा— तेजस्विता विशेषता नष्ट हो गई थी उसका पुनरुत्थान करना सर्वतोमुखी नव−निर्माण का प्रयोजन पूरा करो करने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक था। अस्तु जनवरी से मई तक इस वर्ष वह व्यवस्था चलाई गई। दो−दो महीने की शिक्षा प्राप्त करके जो वानप्रस्थ लौटें हैं। उन्होंने भारतमाता को और विश्व वसुन्धरा को यह विश्वास दिलाया कि भारत न केवल स्वयं अपने पिछले गौरव को हस्तगत करने जा रहा है, वरन् समस्त संसार को उसके द्वारा पुनः वैसा ही प्रकाश मिलने वाला है जैसा कि अतीत काल में हजारों,लाखों वर्गों तक मिलता रहा था। मनुष्य जाति के सामने प्रस्तुत जीवन−मरण की समस्याओं के समाधान मात्र अध्यात्म स्तर पर ही ढूँढ़े और निकाले जा सके हैं। आधार विहीन भटकती है दुनिया को यदि प्रकाश की दिशा में बढ़ाया, धकेला जा सके तो निस्सन्देह इस सघन अन्धकार में भी भविष्य के दिव्य आलोक के दर्शन हो सकते हैं। वानप्रस्थी परम्परा की प्रखर प्रक्रिया जिस रूप में शान्ति−कुञ्ज द्वारा प्रस्तुत की गई है, उससे इन थोड़े ही दिनों में अभिनव उत्साह का — उल्लास का सर्वत्र संचार होता दृष्टिगोचर हो रहा है।

प्रत्यावर्तन और वानप्रस्थों की प्रेरक शिक्षित प्रक्रिया अदल −बदल कर चलती रहेगी। अभी चार महीने सैद्धांतिक और व्यावहारिक वानप्रस्थ शिक्षा की दो−दो महीने की सत्र व्यवस्था चलकर चुकी है। अब जुलाई, अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर चार महीने फिर पाँच−पाँच दिवसीय प्रत्यावर्तन सत्र चलेंगे। नवम्बर,दिसम्बर में वानप्रस्थों के फिर दो सत्र है। इस प्रकार सन् 74 की शिक्षा प्रक्रिया पूरी की गई है। अगले वर्षों में आवश्यकतानुसार सत्रों का निर्धारण किया जाता रहेगा और शिक्षार्थियों के संग्रहित आवेदन पत्रों पर विचार करते हुए उन्हें बुलाया जाता रहेगा। इसी बीच जून में एक महीने के लिए पन्द्रह−पन्द्रह दिवसीय दो शिक्षण सत्रों की अतिरिक्त व्यवस्था की गई जो इस महीने में प्रायः हर साल की जाती रहेगी। पहले एक महीने का लेखन सत्र करने का विचार था पर शिक्षार्थियों के आवेदन−पत्र इतने अधिक हो गये कि उन्हें फिर कभी के लिए टालने की अपेक्षा यही उचित समझा गया कि पन्द्रह−पन्द्रह दिन के दो सत्र करके इच्छुकों में से अधिकाँश को बुल लिया जाय। फिर भी बहुतों को अगले वर्ष के लिए कहना पड़ा है। आशा की जानी चाहिए कि इन लेखन सत्रों के प्रकाश में कलम के धनी ऐसे व्यक्तित्वों का उदय होगा जो युग के अनुरूप विश्व मानव की बौद्धिक भूख को बुझा सकने में— अन्धकार को उजाले में बदलने में अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन कर सके।

शान्ति −कुञ्ज की स्थापना के समय यही स्वप्न था कि जिस तरह गायत्री तपोभूमि में प्रधानतया पुरुष वर्ग को नव−निर्माण प्रयोजनों में जुटाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण एवं व्यवस्था क्रम चल रहा है उसी प्रकार शान्ति−कुञ्ज को नारी जागरण का केन्द्र बनाया जायगा और इस वर्ग के ऊपर लादे गये पिछड़ेपन का उन्मूलन करने के लिए प्राणप्रण प्रयत्न किया जायगा। उस दिशा में श्रीगणेश तो शान्ति−कुञ्ज में हम लोगों के आगमन के समय से ही हो गया था। अखण्ड दीपक पर चल रही साधना प्रक्रिया के साथ उसका श्रीगणेश तीन वर्ष पूर्व ही हो गया था। प्रायः 25 कन्याएँ कई अति महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्राप्त करती रही है।वे अगले दिनों जहाँ भी रहेंगी वहाँ आलोक उत्पन्न करेंगी यह निश्चित है। इस नारी शिक्षा व्यवस्था में एक नई कड़ी और जोड़ती गई है। व्यापक नारियों के लिए तीन−तीन महीने के शिक्षा सत्र। इसमें वे अपने निज के गुण,कर्म,स्वभाव का परिष्कार, गृह व्यवस्था शिशु−पालन, पारिवारिक स्नेह, सम्बन्ध आदि की शिक्षा के साथ−साथ अपने−अपने स्थानों में रहकर नारी जागरण का —संगठन का — प्रशिक्षण का कार्य भी करेंगी। प्रौढ़ महिला शिक्षा की 2 से 5 वर्ष तक अपराह्न पाठशालाएँ अगले दिनों हर युग−निर्माण शाखा संगठन को चलानी होंगी। यह तीन मास की शिक्षा प्राप्त महिलाएँ उनका संचालन ठीक प्रकार कर सकेंगी आशा की जानी चाहिए। वे अपने अपने स्थानों पर महिला सत्संग एवं संगठन का काम भी संभालेंगी। इस तरह नारी पुनरुत्थान अभियान में यह तीन−तीन महीने वाली सत्र शिक्षा वैसी ही उपयोगी सिद्ध होनी जैसी कि वानप्रस्थ शिक्षा के दो−दो महीने वाले सत्रों ने अपने ढंग का अनोखा चमत्कार प्रस्तुत किया है।

सन् 74 में पहला महिला शिक्षण सत्र जुलाई,अगस्त, सितम्बर में और दूसरा अक्टूबर, नवम्बर दिसम्बर में चलेगा। दो सत्रों की विधिवत घोषणा कर दी गई है। सन् 74 में भी थोड़े हेर−फेर के साथ कई शिक्षण व्यवस्था था लगभग इसी क्रम से दुहराई जावेगी। प्रत्यावर्तन वानप्रस्थ, लेखन और महिला सत्र अगले वर्ष भी इसी क्रम से चलेंगे जिस तरह कि इस वर्ष चले थे।

संगीत सत्र का प्रबन्ध इस वर्ष प्रयत्न करने पर भी न हो सका। उसकी उपयोगिता और आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। शिक्षित−अशिक्षित— शहरी− ग्रामीण सभी क्षेत्रों की जन भावनाओं का स्तर ऊँच उठाने और उत्कृष्ट हुलास−उल्लास उत्पन्न करने के लिए संगीत को एक अद्भुत शक्ति के रूप में परिष्कृत और प्रयुक्त किया जा सकता है— किया जाना चाहिए। पर साधनों के अभाव में वह सन् 74 में इच्छा रहते हुए बन नहीं पड़ा। सम्भव हो सका तो सन् 74 से युग गायक उत्पन्न करने वाली संगीत सत्र व्यवस्था आरम्भ होगी। तब तक के लिए आवेदन कर्ताओं के नाम नोट करके रखे गये हैं। जब व्यवस्था बनेगी तब उन्हें बुलाया जायगा।

जो शिक्षार्थी शान्ति−कुञ्ज में किसी भी वर्ग की शिक्षा प्राप्त करके जाँय उनके लिए अत्यन्त आवश्यक और अनिवार्य नियम यह बनाया गया है कि वे वर्ष में दो बार अपने आन्तरिक और भौतिक जीवन−क्रम में जो उतार−चढ़ाव आ रहे हों उनका विवरण भेजना न भूलें। दो पर्व अपनी आत्मोत्कर्ष शिक्षा के साथ अविछिन्न रूप से सम्बद्ध है− (1) बसन्त पञ्चमी (2) गुरु पूर्णिमा। इन दोनों पर वर्ष में दो बार उस सूत्र शृंखला को सुदृढ़ और विकसित किया जाना चाहिए प्रशिक्षण के साथ जिसका श्रीगणेश किया गया था। उपलब्ध विवरण पर विचार करके यह जाना जाता रहेगा कि प्रगति का क्रम किस गति से आगे बढ़ा और आगे क्या कदम उठाया जाना चाहिए। वह कार्य पत्र द्वारा ही होता रह सकता है।

निकटवर्ती गुरु पूर्णिमा का पर्व 4 जुलाई गुरु वार को है। वह दिन हम सभी के लिए गुरु तत्व की उपासना का उसके साथ आत्मसात् होने का − अधिकाधिक प्रकाश प्रेरणा ग्रहण करने का है। जप,हवन,ध्यान, उपवास के अतिरिक्त हमें आत्मोत्कर्ष के लिए वृक्ष पर लिपटने वाली बेल की तरह अपनी मार्ग−दर्शक सत्ता के साथ सघन आत्मीयता को परिपक्व करना चाहिए और प्रेरक दिव्य सत्ता के अनुरूप ही ऊँचा उठने का प्रयत्न करना चाहिए। बसन्त पर्व की भाँति ही गुरु पूर्णिमा भी हमारे लिए आराध्य है। उस दिन हमें नर से नारायण बनने के लिए भाव भरी उमंगों से ओज−प्रोत रहना चाहिए और भव−बन्धनों को काटने की — अपूर्णता से पूर्णता तक बढ़ने की योजनाबद्ध तैयारी करनी चाहिए। गुरु पर्व इन्हीं प्रकाश भरी प्रेरणाओं को साथ लेकर हर वर्ष आता है।

शान्ति −कुञ्ज में शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रत्यावर्तन छात्रों एवं वानप्रस्थों पर इस पर्व का एक विशेष उत्तरदायित्व आता है। वे वर्ष में दो बार बसन्त पर्व और गुरु पूर्णिमा पर अपनी अन्तरंग और बहिरंग परिस्थितियों के उतार−चढ़ाव का विवरण भेजते रहें। इससे शाँति−कुञ्ज के साथ न केवल उनका सम्बन्ध सूत्र क्रमशः सुदृढ़तर होता रहेगा वरन् शक्ति संचार की पुण्य प्रक्रिया का लाभ भी उन्हें उत्तरोत्तर अधिक मात्रा में मिलते रह सकना सम्भव हो सकेगा।

अपने(1) शारीरिक स्वास्थ्य,(2) मानसिक संतुलन,(3) पारिवारिक गतिविधियाँ,(4) उपासनात्मक क्रिया−कलाप,(5) आत्म−सुधार के लिए किये गए प्रयत्न,(6) नव−निर्माण अभियान की दिशा में उठाये गये कदम,(7) शान्ति−कुञ्ज की गतिविधियों में ली गई दिलचस्पी, (8) शिक्षण के बाद घटित हुई कोई उल्लेखनीय घटनाएँ, (9) भावी योजनाएँ तथा उनके लिए तैयारियाँ, (10) गुरु पूर्णिमा मनाये जाने का विवरण, 4 जुलाई के एक दो दिन बाद ही शान्ति−कुञ्ज, सप्त सरोवर, हरिद्वार के पते पर भेज देना जाना चाहिए।

इन विवरणों में अपना (1) पूरा नाम पता,(2) जन्म तिथि, (3) जाति,(4) आयु,(5) शिक्षा,(6) व्यवसाय इन छै बातों का भी उल्लेख कर देना चाहिए ताकि पूर्व परिचय को और भी अच्छी तरह ताजा किया जा सके। यदि उत्तर प्राप्त करना अभीष्ट हो तो जबकि पत्र भेजने की बात भी स्मरण रखनी चाहिए।

अखण्ड−ज्योति परिवार की जागरूक एवं अग्रगामी आत्माओं को आत्मोत्कर्ष की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा पड़ेंगे। यह कार्य शान्ति−कुञ्ज में चल रही प्रशिक्षण प्रक्रिया में से अपने लिए अनुकूल प्रशिक्षण अपना कर अधिक सुव्यवस्था एवं सरलता के साथ सम्पन्न कि जा सकता है।


गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थरत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्ति गत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 12)

प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियाँ का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)

द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री−स्मृति, गायत्री−संहिता, गायत्री−उपनिषद्, गायत्री−पारायण, गायत्री−हृदय, गायत्र−पञ्जर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू. 4)

तृतीय भाग—गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)

गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 5)−

प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू. 2) 50

द्वितीय भाग—(सामूहिक गायत्री हवन)—गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया जलयात्रा, मण्डप−प्रवेश, वेदी−पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि−विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 2) 50

3.गायत्री चित्रावली

विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 2)50

4.गायत्री मंत्रार्थ

अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के कि ये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 2)

5.गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य

1 छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट—तिरंगे कवरों वाले 32−33 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—

1−गायत्री का स्वरूप और रहस्य 2−गायत्री की गुप्त शक्ति 3−सर्वसुलभ गायत्री साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

2.संक्षिप्त गायत्री हवन—सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मू. 30 पैसे।

3. दैनिक गायत्री साधना — नित्य के जप, हवन के सामान्य विधान। मू. 30 पैसे।

4. गायत्री चालीसा 10 पैसे।

5. युग−निर्माण का सत्संकल्प — मू. 5 पैसे।

*समाप्त*