उपलब्धियों का सदुपयोग करना सीखें

प्राप्त करना उतना कठिन नहीं है— जितना उपलब्धि का सदुपयोग करना। सम्पत्ति अनायास या परिस्थिति वश भी मिल सकती है पर उसका सदुपयोग करने के लिए अत्यन्त दूरदर्शी विवेकशीलता और सन्तुलित बुद्धि की आवश्यकता पड़ेगी। सुयोग्य व्यक्ति यों की समीपता तथा सद्भावना प्राप्त कर लेना उतना कठिन नहीं है, जितना उस सान्निध्य का सदुपयोग करके समुचित लाभ उठा सकना।

मनुष्य में बीज रूप से वे समस्त सम्भावनाएँ विद्यमान हैं जो अब तक कहीं भी किसी भी व्यक्ति में देखी−पाई गई हैं। प्रयत्न करने पर उन्हें जगाया और बढ़ाया जा सकता है। कोई भी लगनशील मनस्वी व्यक्ति अपने को इच्छित दिशा में सफलता प्राप्त करने की आवश्यक क्षमताएँ उत्पन्न कर सकता है और उनका सदुपयोग करके मनचाही सफलता प्राप्त कर सकता है।

जो नहीं है उसे पाने के लिए अधिकाँश मनुष्य लालायित देखे जाते हैं। अप्राप्त को पाने के लिए व्याकुल रहने वालों की कमी नहीं। पर ऐसे कोई बिरले ही होते हैं जो आज की अपनी उपलब्धियों और क्षमताओं की गरिमा का मूल्याँकन करं सकें। उनके सदुपयोग की सुव्यवस्थित योजना बना सके। जो मिला हुआ है, वह इतना अधिक है कि उसका सही और सन्तुलित उपयोग करके प्रगति के पथ पर बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है। अधिक पाने के लिए प्रयत्न करना उचित है पर इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ा जाये। जो ऐसा कर सके उन्हें जीवन में असफल रहने का दुर्भाग्य कभी भी सहन नहीं करना पड़ा है।


भावना सर्वोपरि है, विधि−विधान नहीं

कल जन्माष्टमी का उत्सव था। आज राधा गोविन्द जी के मन्दिर में नन्दोत्सव है। दक्षिणेश्वर के काली मन्दिरों की सजावट आज देखते ही बनती है। भक्तजनों के झुँड के झुँड गोविन्दजी के दर्शनों के लिये आ रहे हैं। कीर्तन अपनी चरम सीमा पर है। भक्ति रस की धारा प्रवाहित हो रही है।

दोपहर के भोग के पश्चात् गोविन्दजी के विग्रह को शयन के लिये भीतरी प्रकोष्ठ में ले जाते समय पूजक क्षेत्रनाथ का पाँव फिसल जाने से रंग में भंग हो गया। वह मूर्ति सहित फर्श पर जा गिरे, जिससे मूर्ति का एक पाँव टूट गया। भक्ति रस की धारा मन्द पड़ गयी उसके स्थान पर भय और आशंका के मेथ मंडराने लगे। मन्दिर में बड़ा कोलाहल मच उठा। अपने−अपने मन से सभी भावी अमंगल की सूचना दे रहे थे। सबके चेहरों पर भय की रेखायें खिंच गयी। निश्चय हीं कोई सेवा अपराध हुआ है। उसका दण्ड अमंगल के रूप में सबको भोगना होगा।

रानी रासमणी ने सुना तो वह एक दम सिहर उठी। अब क्या होगा? किन्तु जो कुछ हो चुका था, उसे टाल सकने की सामर्थ्य किस में थी। अब क्या किया जाय, इसके लिये पण्डितों की सभा बुलायी गयी। पण्डित लोगों ने ग्रन्थ देखे, सोच−विचार किया और यह विधान दिया—भग्न विग्रह को गंगा में विसर्जित करके उसके स्थान पर नयी मूर्ति की स्थापना की जाय।

रानी रासमणी को पंडितों का यह निष्ठुर विधान रुचा नहीं किन्तु उसके हाथ की बात भी क्या थी। ब्राह्मणों की सम्मति को टालना उसके बस में कहाँ था। निदान नयी मूर्ति बनवाने का आदेश दे दिया गया। रानी उदास हो गयी। भला इतनी श्रद्धा और प्रेम से जिन गोविन्दजी को इतने दिन पूजा जाता रहा, उन्हें थोड़ी सी बात पर जल में विसर्जित कर देने का कारण उसकी समझ में नहीं आया।

जामाता मधुरबाबू रानी की इस उदासी को ताड़ गये। उन्होंने सम्मति दी—’रानी माँ क्यों न इस विषय में छोटे भट्टाचार्य (स्वामी रामकृष्ण परमहंस) की राय भी जान ली जाय?

रानी स्वामी रामकृष्ण पर विशेष श्रद्धा रखती थीं। उनकी अनूठी निष्ठा व भक्ति के कारण वे उनके द्वारा दिये जाने वाले निर्णय को स्वीकार करने की स्थिति में भी थीं। रानी ने अपने मन की व्यथा रामकृष्ण से कह सुनायी। सुन कर उन्होंने रानी से प्रश्न किया—यदि आप के जामाताओं में से किसी एक का पाँव टूट जाता तो वह उनकी चिकित्सा करवातीं या उनके स्थान पर दूसरे को ले आतीं?

“मैं अपने जामाता की चिकित्सा कराती, उन्हें त्याग कर दूसरे नहीं ले आती।”

“बस उसी प्रकार विग्रह के टूटे पैर को जोड़ कर उसकी सेवा−पूजा यथावत् होती रहे तो उसमें दोष ही क्या है।”

श्री रामकृष्ण परमहंस के इस सहज विधान को सुन कर रानी हर्षित हो उठीं। यद्यपि उनकी यह व्यवस्था ब्राह्मणों के मनोनुकूल नहीं थी। उन्होंने उसका विरोध भी किया पर अब रानी का धर्म संकट समाप्त हो चुका था। उसे स्वामी जी की बात ही पसन्द थी। उसने ब्राह्मणों के विरोध की चिन्ता नहीं की। स्वामी जी ने टूटे विग्रह के पाँव को ऐसा जोड़ दिया कि कुछ पता ही नहीं चलता। पूजा−सेवा उसी प्रकार चलती रही।

एक दिन किन्हीं जमींदार महाशय ने उनसे पूछा— मैंने सुना है आपके गोविन्दजी टूटे हैं। इस पर वे हँस कर बोले—’आप भी कैसी भोली बातें करते हैं जो अखण्ड मंडलाकार हैं, वे कहीं टूटे हो सकते हैं।


सहृदयता के संवर्धन से ही विश्व कल्याण सम्भव होगा

बुद्धिवाद कितना ही उपयोगी क्यों न हो उसकी गरिमा हृदयवाद से ऊँची नहीं हो सकती। मानवी चेतना का जहाँ तक प्रश्न है, वहाँ तक हृदयवाद को प्रधानता देकर ही चलना पड़ेगा। जहाँ विशुद्ध जड़ प्रयोजनों की बात है, वहाँ एकाकी बुद्धि को भी मान्यता दी जा सकती है, पर जब प्रश्न जीवित चेतना मनुष्यों, प्राणियों की समस्या पर विचार करना हो, तब हृदयवाद को मान्यता देने से ही काम चलेगा। मनुष्य को जड़ पदार्थ मान कर ही एकाकी बुद्धिवाद के सहारे उसकी समस्याओं का हल सोचा जा सकता है। यदि जीवधारियों की चेतना को भी महत्व देना है तो उसके उत्कर्ष का प्रयोजन हृदयवाद का—परिष्कृत भाव, आदर्श को साथ लेकर ही चलना पड़ेगा।

कृषि, शिल्प, रसायन, उद्योग जैसी भौतिक प्रक्रियाएँ बुद्धिवादी शोध प्रयोग को ध्यान में रखते हुए सुलझाई जाँय, यहाँ तक दो मत नहीं हो सके, पर जब यह प्रश्न सामने आये कि जीवधारियों के स्तर को कैसे ऊँचा उठाया जाय तो उसका समाधान हृदय को प्रधानता देकर ही खोजना पड़ेगा। अन्यथा ग्रन्थियों को सुलझाने की दृष्टि से किये गये प्रयत्न उलटे और अधिक उलझन पैदा करेंगे।

पशु प्रवृत्तियाँ स्वार्थपरता को आधार लेकर ही चलती हैं अस्तु उन्हें अविकसित और अभाव−ग्रस्त स्थिति में ही रहना पड़ता है। शरीर की दृष्टि से अधिक मजबूर होते हुए भी वे प्रकृति प्रकोप का ग्रास अधिक रहते हैं। पारस्परिक सहयोग के अभाव में उनकी शारीरिक, मानसिक क्षमता कोई कारगर सुरक्षा व्यवस्था नहीं हो पाती और न किसी प्रकार की प्रगति ही सम्भव होती है। आदिमकाल में वे जिस स्थिति में थे लगभग उसी स्थिति में रह रहे है। प्रकृति के दबाव से शरीर रचना और अभिरुचि में थोड़ा अन्तर भले ही आया हो, उनकी परिस्थितियों में कोई विशेष सुधार नहीं हो सका, इसका कारण उनकी चेतना का स्वार्थ चिन्तन तक सीमित रहना ही है। मनुष्य ने प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए सृष्टि का मुकुटमणि बनने की जो अद्भुत सफलता पाई है, उसका मूल कारण उसकी बुद्धिमत्ता नहीं−सहृदयता है। परस्पर स्नेह सहयोग की प्रवृत्ति ने एक दूसरे के साथ घनिष्ठतापूर्वक रह सकने की स्थिति उत्पन्न की और एक ने दूसरे के अनुभव से लाभ उठाकर अपनी ज्ञान सम्पदा को आग बढ़ाया है। बुद्धि प्रधानता ने सहयोग बढ़ाया, यह कथन अवास्तविक है। तथ्य यह है कि मनुष्य की सहृदयता क्रमशः आगे बढ़ती गई और स्नेह सहयोग की प्रकृति ने मिलजुल कर एक दूसरे को अपने अनुभव अनुदानों से लाभान्वित करने का कदम बढ़ाया। भाषा, लिपि, अग्नि, कृषि, पशुपालन, औजार, उपकरण, अन्न, वस्त्र, निवास जैसी प्रगति के मूल−भूत आधारों का आविष्कार परस्पर सहयोग के आधार पर ही संभव हो सका है। बुद्धिमत्ता वस्तुतः सहृदयता की बेटी मात्र है।

वनमानुषों की आकृति−प्रकृति मनुष्यों से मिलती−जुलती है पर वे सघन सहयोग के क्षेत्र में आगे न बढ़ सके और पिछड़ी स्थिति में पड़े रहे। चिंपेंजी, गुरिल्ला बानरों को मनुष्य का पूर्वज कहा जाता है उनकी शरीर रचना और मन संस्थान मानव प्राणी से बहुत कुछ मिलता−जुलता है। फिर भी उन्हें वनवास का दण्ड मिला, इसका कारण सहृदयता की पुण्य प्रवृत्ति से वञ्चित रहने का पाप ही कहा जा सकता है। कुछ नर बालक—जहाँ तहाँ वन्य पशुओं द्वारा पालित किये गये पाये गये हैं, उनमें पूरी तरह उन पालनकर्ता पशुओँ जैसी ही प्रवृत्ति और बुद्धि मिली है। इससे स्पष्ट है कि बुद्धि कोई स्वतन्त्र तत्व नहीं सहयोग, संपर्क की प्रतिध्वनि मात्र है। बच्चे अपने अभिभावकों की भाषा में ही बोलना आरम्भ करते हैं, इससे स्पष्ट है। उच्चारण स्वतन्त्र नहीं वरन् पूर्णतया परावलम्बी है। जो बच्चे बहरे होते हैं उन्हें गूँगा भी रहना पड़ता है। शब्दों को वे सुन नहीं सकते तो फिर नकल बना कर बोलना आरम्भ कैसे करें। मनुष्य समाज की एक अविछिन्न इकाई है, परिस्थितियों का दास है—वातावरण ही उसे उठाता−गिराता है। आदि प्रतिपादन विभिन्न प्रकार से किये जाते रहते हैं। उन्हें तथ्य ही मानना चाहिए। मान्यताएँ, अभिरुचियाँ, आस्थायें, आकाँक्षायें, प्रवृत्तियाँ किसी के मन में अनायास ही नहीं उठ पड़तीं, वे समीपवर्ती वातावरण से ग्रहण की जाती हैं। मनुष्य के भले−बुरे होने का श्रेय अथवा दोष सम्बद्ध परिस्थितियों को दिया जाता है। स्वाध्याय और सत्संग की महिमा इसी आधार पर गाई गर्ठ है कि उन माध्यमों से आदर्शवादी रीति−नीति अपनाने की प्रेरणा मिलती है। कुसंग से पतन वाला तथ्य भी सर्वमान्य है। अपवाद तो किसी भी क्षेत्र में पाये जा सकते हैं पर सर्वमान्य प्रक्रिया यही है कि उत्कर्ष और अपकर्ष का— स्वभाव और रुझान का बहुत बड़ा आधार सम्बद्ध जन−समूह से मिलने वाली प्रेरणा ही रहती है। इन तथ्यों पर जितनी अधिक गम्भीरता से विचार किया जाय उतनी ही अच्छी तरह यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य की प्रगति मनः स्थिति और गति विधि का निर्माण पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही विनिर्मित होता है।

यह सहयोग कहाँ से? कैसे? क्यों? उत्पन्न हुआ, इस तथ्य पर किया गया गहनतम चिन्तन हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि सहृदयता ही उदार सहयोग के लिए प्रेरित कर सकती है। आदर्शवादी प्रवृत्ति ही दूसरों के साथ सेवा, सहयोग, स्नेह एवं अनुदान भरा उदार व्यवहार करने की प्रेरणा देती है। शुद्ध स्वार्थ ही यदि मूल प्रकृति रही हो उस संघर्ष में हर किसी को अपने ही लाभ को प्रधानता देनी पड़ेगी, ऐसी दशा में संघर्ष प्रधान रहेगा और सहयोग कभी नहीं पनपेगा। मत्स्य न्याय से एक दूसरे को खाते तो रहेंगे पर कोई किसी के सुख−दुख में भाग न लेगा। समुद्र में रहने वाली बहुसंख्यक और विशालकाय मछलियों में यदि सहयोग रहा होता— वे एक दूसरे के सुख−दुख में शामिल रहने की आवश्यकता समझ गई होतीं तो मनुष्य को समुद्र में पैर धरने की भी हिम्मत न पड़ती। मछलियाँ सहज ही छक्के छुड़ा देतीं। शहद की मक्खियों का उदाहरण सामने है, उनके छत्ते में हाथ डालने का सहास बड़ी कठिनाई से ही किया जाता है। जिन पशुओं में आपत्ति के समय एक होने जितनी भी भावनाएँ है उन्हें छेड़ना किसी भी आक्रमणकारी के लिए महंगा पड़ता है।

यों सहयोग का एक सामयिक आधार, पारस्परिक आदान−प्रदान भी होता है पर उसकी कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं होती। दोनों पक्ष काम चलाऊ समझौते के आधार पर अपना श्रम अथवा धन एक दूसरे को देते रहते हैं फलतः सुविधाओं का परिवर्तन चल पड़ता है, अर्थ शास्त्र की धुरी यही है। किन्तु अधिक सघन सहयोग जिसके आधार पर अपनी सुविधाओं का त्याग कर दूसरों को लाभान्वित करने की आकाँक्षा रहती है, वही मनोभाव है जिसे स्नेह अथवा सहृदयता के नाम से पुकारा जाता हैं। माता अपनी संतान को इसी भाव से पालती है। मित्र मित्र के लिए इसी वृत्ति से प्राण निछावर करते हैं। सन्त, सुधारक, सैनिक और शहीद इसी भावना से प्रेरित हो कर स्वयं कष्ट उठाते हुए समाज की सुख−शान्ति के लिए बढ़े−चढ़े त्याग−बलिदान प्रस्तुत करते हैं। महामानवों में यही प्रवृत्ति समुन्नत स्तर पर होती है। सेवाभावी और दान वीरों द्वारा जो लोकमंगल के लिए सराहनीय सत्साहस प्रदर्शित किये जाते हैं, उसमें आदर्शों के लिए लोकमंगल के प्रति पीड़ित मानवता के प्रति उदार सहृदयता ही उल्लास भरी भूमिका प्रस्तुत करती है।

मानव जाति की भूतकालीन प्रगति इसी प्रवृत्ति का सहारा पाकर आज की स्थिति तक बढ़ती आई है। उसमें जब कभी जितना भी व्यवधान पड़ा है— संकीर्ण स्वार्थ द्वारा ही डाला गया है। उदार चेतना महामानव ही इस विश्व की सच्ची विभूतियाँ हैं। क्यों कि उन्हीं के उत्कर्ष ने समाज को अनुकरणीय और प्रभावोत्पादक प्रेरणाएँ दी होती हैं। क्षमता को स्वार्थ में खर्च कर डालने कोई व्यक्ति या परिवार सुख−साधनों का उपयोग कर सकता है पर जब वह उन्हें अपने लिए खर्च करने का तप संयम एवं अपरिग्रह का साहस करके परमार्थ में अपनी विभूतियों का समर्पण करता है तो समस्त समाज में आशा भरा नव−जीवन संचार होता है। उस अनुदान से लोकमंगल के कितने ही महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरे होते हैं। सबसे बड़ी बात यह होती है कि उस आदर्शवादी अनुकरण की लहरें उमड़ती हैं और अन्य असंख्यों को उसी मार्ग पर चलने की उमंग उत्पन्न करती हैं। यही वह प्रचलन है जिसके आधार व्यक्ति, समाज एवं युग को समुन्नत ही नहीं धन्य बनने का भी अवसर मिलता है।

इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है, उसे सहृदयता की ही प्रतिक्रिया समझा जाना चाहिए। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की आस्था विकसित हुए बिना कोई मनुष्य न तो आत्म−संयम के लिए तैयार होगा और न अपनी उपलब्धियों को सेवा प्रयोजनों में प्रयुक्त करने के लिए सहमत होगा। आपाधापी ही ऐसी दिशा में एक मात्र नीति बन जायगी। तब स्वार्थों का संघर्ष दिन−दिन विकट होता जायगा। स्वार्थवादी बुद्धिमत्ता विकसित होते−होते एक दूसरे को फाड़ खाने की स्थिति उत्पन्न करेगी। सर्वत्र आशंका और अविश्वास का वातावरण छाया रहेगा। छल और आक्रमण की सम्भावना हर दिशा में छाई हुई दृष्टिगोचर होगी तो कोई चैन और आनन्द का अनुभव कहाँ से कर सकेगा। हिंसक पशुओं के बीच घिरे हुए छोटे वन−जीव निरन्तर आतंकित रहते हैं, उसी स्थिति में स्वार्थी समाज के हर सदस्य को रहना पड़ेगा। बुद्धिवाद का परिणाम स्वार्थ साधन के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। क्योंकि प्रत्यक्ष लाभ उसी में है। परमार्थ में तो भौतिक दृष्टि से अपनी हानि ही होती है। उदारता बरतने से अपने को तो घाटा ही पड़ता है। ऐसी दिशा में उसे कोई क्यों अंगीकार करेगा। परमार्थ की विडम्बनाएँ भी यश पाने और उस आधार पर दूसरों को प्रभावित करके परोक्ष लाभ उठाने की वृत्ति से होती रहती है। पर उस छल कौतुक से कोई ठोस प्रयोजन सिद्ध नहीं होते।

आदर्शवादी परम्पराओं के प्रचलन का आधार एक मात्र सहृदयता ही हो सकती है। बुद्धि से भी समाज हित की दुहाई देकर परमार्थ प्रयोजनों का समर्थन तो किया, कराया जा सकता है पर वैसा करने की प्रेरणा उत्पन्न करना असम्भव है। विशुद्ध बुद्धिवादी को विशुद्ध स्वार्थी ही बनना पड़ता हे और विशुद्ध स्वार्थ साधन की मनोवृत्ति का पतन और समाज का स्तर गिराने में कितनी भयंकर सिद्ध हो सकती है, इसे आज सर्वत्र छाई हुई अगणित विभीषिकाओं के रूप में हम सहज ही जान सकते हैं। यदि यही क्रम चलता रहे तो हमें पिशाच बन कर सामूहिक आत्म−हत्या के लिए अग्रसर होना होगा अथवा पशु−प्रवृत्ति अपना कर आदिमकाल की अविकसित स्थिति में पहुँच कर वनमानुषों की तरह रहना पड़ेगा।

सहृदयता का महत्व बुद्धिमत्ता से घट कर नहीं बढ़ कर ही माना जाना चाहिए और यह अनुभव किया जाना चाहिए कि मानवी आदर्शों को, प्रगति के चिरस्थायी आधारों की, सुख−शान्ति को, सन्तोष और आनन्द को एक मात्र इसी आधार पर जीवित रखा जा सकता है कि सहृदयता की महान प्रवृत्ति को अधिकाधिक विकसित करने के लिए उससे भी कहीं अधिक प्रयास किया जाय जैसा कि बुद्धिमत्ता को विकसित करने के लिए किया जा रहा है। बुद्धि वृद्धि के लिए स्थापित शिक्षा संस्थानों की तुलना भाव संवर्धन के चेतना केन्द्रों को, धर्म संस्थानों को, अध्यात्म के प्रयोग प्रयत्नों को अधिक ही बढ़ावा दिया जाय—कम नहीं। विश्वास, सहानुभूति, सहिष्णुता, सहकारिता, चरित्र निष्ठा, नम्रता, सज्जनता, उदारता एवं सेवा साधना जैसी सत्प्रवृत्तियाँ, सद्भाव, संवर्धन के प्रयत्नों के साथ ही जुड़ी हुई हैं। कहना न होगा कि मानव चेतना भौतिक पदार्थों से नहीं सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का खाद पानी पा कर ही जीवित रह सकती है, विकसित हो सकती है। इसी विकास पर विश्व−मंगल का सारा आधार टिका हुआ है।

गान्धीजी कहते थे—हृदय बुद्धि और श्रम तीनों के समन्वय में ही मानव जाति का हित है।” अकेले बुद्धिवाद की प्रतिष्ठा अवाँछनीय है। सहृदयता का, भावनात्मक उत्कर्ष का अध्यात्म तत्व दर्शन भी उससे अधिक आवश्यक है। बुद्धि और हृदय का समन्वय इतना सघन होना चाहिए कि उसे सत्कर्म सत्प्रवृत्तियों के रूप में सर्वत्र बिखरा हुआ देखा जा सके। इस समन्वय पर ही जननीन, सार्वभौम कल्याण निर्भर है।


विज्ञान और दर्शन के समन्वय की आवश्यकता

ज्ञान दो भागों में विभक्त है। एक को दर्शन, दूसरे को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान में पंच तत्वों से विनिर्मित वस्तुओं की−गतिविधियों की जानकारी और उनके उपयोग की विधा सम्मिलित है। दर्शन में चेतना को प्रभावित करने वाली भावनागत एवं पदार्थगत सम्वेदनाओं का विश्लेषण, विवेचन किया जाता है। नीति, धर्म, सदाचार, अध्यात्म इसी परिधि में आते हैं। विज्ञान की असंख्य धाराएँ हैं—शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, रसायन, यान्त्रिकी, तकनीकी, शिल्प आदि।

सामान्यतया इन दोनों के क्षेत्र अलग−अलग होने से उन्हें पृथक−पृथक माना जाता है और असम्बद्ध कहा जाता है। कई बार तो उन्हें परस्पर विरोधी भी ठहराया जाता है। पर गम्भीरता से देखने पर प्रतीत होता है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।

प्रथा परम्पराओं के समर्थन भर के लिए यदि दर्शन को काम में लाया जाय तो दोनों दूर तक साथ− साथ न चल सकेंगे। अनेक सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराएँ ऐसी हैं, जिन्हें स्वभाव एवं आदत में सम्मिलित कर लिया गया है, पर यथार्थ से उनका गहरा सम्बन्ध नहीं है। तर्क और तथ्य की कसौटी पर वे खरे नहीं उतरते। ऐसी मान्यताओं की प्रामाणिकता की पुष्टि जब दर्शन द्वारा नहीं होती तो लोगों का पक्षपाती मस्तिष्क प्रथाओं का बचाव करने के लिए दर्शन को झुठलाने का प्रयत्न करता है और उकसा विरोध करता है। वैज्ञानिक दर्शन प्रक्रिया पदार्थ विज्ञान की खोजों में सहायता करती है, अविज्ञात तथ्यों को प्रत्यक्ष करने की—रहस्योद्घाटन की भूमिका सम्पन्न करती है, वह चेतना को, भाव संवेदना को, सत्य के निकट पहुँचाने में बाधा उपस्थित करे। विज्ञान और दर्शन का जहाँ तक सत्य के शोधन का प्रश्न है, कभी किसी प्रकार का विरोध नहीं हो सकता।

ज्ञान का मूल आधार है—जिज्ञासा, जानने की इच्छा। इसी प्रवृत्ति ने भौतिक पदार्थों के स्वरूप, स्वभाव एवं उपयोग की विधि−व्यवस्था पर चढ़ते हुए आवरणों को हटा कर भौतिकी विद्या का विशालकाय भाण्डागार प्रस्तुत किया और उसका उपयोग−उपभोग करके मनुष्य ने अन्य प्राणियों की तुलना में असंख्य गुने सुविधा−साधनों भरे जीवन का रसास्वादन किया है। जिज्ञासा का ही विस्तार चेतना को प्रभावित करने वाले तथ्यों की गूढ़ जानकारियों के रूप में हुआ है। समाज विज्ञान, शासन तन्त्र, कला, नीति, न्याय, शिक्षा, अध्यात्म, भाव सम्वेदना, स्नेह, संयम, आदि के अनेक उपयोगी तन्त्र दार्शनिक चिन्तन के ही फलस्वरूप सामने आये हैं और मनुष्य क्रमबद्ध एवं परिष्कृत पद्धति से चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव−जीवन के समग्र विकास की पृष्ठभूमि बन सका है। रथ के दो पहियों की तरह हमारा प्रगतिशील एवं सुख−सुविधा सम्पन्न जीवन, विज्ञान और दर्शन के समन्वय से ही गतिशील हो रहा है।

दर्शन अन्तज्ञनि शक्ति —’इन्टरनल पावर’ तर्क भाव सम्वेदन और दूरदर्शी विवेक पर अवलम्बित है और विज्ञान बौद्धिक शक्ति प्रयोगात्मक तथ्यों पर। इस प्रकार से उनके साधन तो पृथक−पृथक हैं पर सत्य के समीप तक पहुँचाने का—दोनों का मूल भूत उद्देश्य एक है। ब्रिटिश विज्ञानी सर जेम्स जीन्स ने अपनी पुस्तक ‘फिजिक्स एण्ड फिलोसोफी’ में लिखा है— विज्ञान और दर्शन के परस्पर विरोध का झगड़ा अब मर चुका है। ज्ञान के विस्तार ने अब दोनों के बीच की सीमा−रेखा तोड़ कर फेंक दी है। दोनों क्षेत्र यह सोचते हैं कि एक दूसरे की सहायता के बिना किसी का भी प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। दर्शन शास्त्री बिल ड्ररण्ट ने अपने ग्रन्थ ‘दी स्टोरी आफ फिलोसोफी’ में इसी से मिलते−जुलते विचार व्यक्त किये हैं। वे कहते हैं—’विज्ञान का आरम्भ दर्शन में होता है और अन्त कला में। यदि विज्ञान में मानवी चेतना की सम्वेदना उत्पन्न करने की क्षमता न होती तो उसके लिए कठोर श्रम करने में किसी को भी उत्साह न होता। केवल कौतूहल के लिए विज्ञान की शोध थोड़े ही होती है। उसके पीछे मानवी सुख−शान्ति का जो उत्साह भरा लक्ष्य जुड़ा है, उसी ने विज्ञान की उन्नति का पथ प्रशस्त किया है। विद्वान केसर लिंग ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएटिव अण्डर स्टोंर्डिग‘ में कहा है—ज्ञान की दो धाराएँ विज्ञान और दर्शन अविछिन्न हैं। विज्ञान या दर्शन दोनों को मिलाकर एक शब्द वैज्ञानिक दर्शन अथवा दार्शनिक विज्ञान नाम दिया जाना इस युग के ज्ञान विस्तार को देखते हुए सब प्रकार उपयुक्त ही होगा। विज्ञान के अंतर्गत जिस प्रकार रसायन शास्त्र शरीर, शास्त्र, यान्त्रिकी, तकनीकी आदि धाराएँ आती है, उसी प्रकार ज्ञान मीमाँसा, प्रमाण मीमाँसा, मनोविज्ञान, तर्क शास्त्र और अध्यात्म जैसे दार्शनिक विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। दोनों के बीच परस्पर सहयोग से ही समग्र सत्य का दर्शन हो सकता है।

एफ. सी॰ नार्थरोम का कथन है—वैज्ञानिक सिद्धान्तों को जितना वास्तविक माना जाता है, उससे अधिक वे काल्पनिक हैं। किसी प्रयोग का सही उतरना इस बात की गारंटी नहीं है कि प्रयोग की जो व्याख्या विवेचना की गई है, उसके जो आधार कारण बताये गये हैं, वे सही ही हैं। अक्सर ऐसा होता रहता है कि पुराने सिद्धान्त काट कर उनके स्थान पर नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है। इस पर भी प्रयोग पूर्ववत् सही ही बने रहते हैं।

पृथ्वी को स्थिर और सूर्यादि ग्रहों को चनता हुआ मान कर भारतीय ज्योतिष द्वारा तारकों का उदय−अस्त सही उतरता रहा है, अब अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी को भी गतिशील मान कर पुराना सिद्धान्त काट दिया गया है तो भी ग्रहण एवं उदय−अस्त का क्रम यथावत् बना हुआ है। यही बात अन्य अनेक वैज्ञानिक प्रतिपादनों पर लागू होती है। इस आधार पर आज के मान्य सिद्धान्तों के कल कट जाने की पूरी आशंका बनी रहेगी। जब भूतकाल के पत्थर की लकीर समझे जाने वाले सिद्धान्त देखते−देखते निरस्त हो गये तो आगे भी वैसा क्यों नहीं हो सकेगा। इन तथ्यों पर विचार करने से वैज्ञानिकों का यह अहंकार कट जाता है कि भौतिकी ही सत्य है, दार्शनिक सिद्धान्त कल्पना पर आधारित हैं। कल्पना पर ही तो विज्ञान के प्रतिपादन भी टिके हुए हैं। भ्रान्तियों की दोनों क्षेत्रों में समान रूप से गुंजाइश है। इतने पर भी यह भी मानना ही पड़ेगा कि दोनों ने गिरते−पड़ते सत्य के अधिकाधिक निकट मनुष्य की ज्ञान चेतना को पहुँचाने में अति महत्व पूर्ण योगदान दिया है। आइन्स्टीन ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि विज्ञानी भी दार्शनिकों की ही तरह अपने सिद्धान्त की स्थापना, कल्पना के ही आधार पर करते हैं। प्रयोगों की कसौटी पर उस कल्पना का खरा−खोटापन परखा जाता है। इस पर भी सत्य और असत्य का सम्मिलित घोटाला कहीं न कहीं रह ही जाता है और एक समय की स्थिर मान्यता को दूसरे समय में बहुत कुछ सुधारना पड़ता है।

विज्ञान और दर्शन आपस में अविछिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। इस तथ्य को बुद्धि−जीवियों ने अब बिना हिचक के स्वीकार कर लिया है। अस्तु “भौतिक विज्ञान और दर्शन’ ग्रन्थ में अनिश्चितता के नियमों पर प्रकाश डालते हुये लिखा है विज्ञान वस्तुतः दर्शन शास्त्र की स्थूल जाति का निरूपण करने की एक शैली मात्र है। सिद्धान्तों के हाथ लगने के बाद ही वैज्ञानिक प्रयोगों में पूर्णता आती है। उन्हें अणु विज्ञान को प्रयोगात्मक विज्ञान की परिधि में करना है और कहा है उसे समझ सकना गणित के गहन नियमों के साथ ही जुड़ा हुआ है।

डा॰ राधाकृष्णन ने ‘दर्शन’ की परिभाषा करते हुए उसे “सत्य को समझने का बौद्धिक प्रयास” कहा है—महर्षि अरविन्द इस निरन्तर चल−बदल रहे संसार में एक मात्र सत्य वैचारिक निष्ठा को ही माना है। भले ही वह सापेक्ष बनी रहे। वे कहते हैं—”विचार ही जगत के निर्माता हैं। इसलिए वस्तुतः वे ही सत्य हैं। वस्तुओं अथवा व्यक्ति यों के माध्यम से जो अनुभूतियाँ होती हैं, उनका मूल कारण विचारमत निष्ठा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। कात्यायन ने “यथार्थता के मर्मस्थल तक पहुँच सकने वाली तीखी विवेक दृष्टि को दर्शन की संज्ञा दी है और कहा है कि अध्यात्म अन्धता का निराकरण मात्र दार्शनिक दृष्टि मिलने पर ही हो सकता है।

दार्शनिक लिनयुताँग के विचार से “वस्तुओं के परखचे उधेड़ते रहने पर जगत का न तो स्वरूप समझ में आ सकता है और न उसका प्रयोजन स्पष्ट होता है। इसके लिये दर्शन का सहारा लिये बिना काम नहीं चल सकता। डा॰ राधाकृष्णन कहते हैं— विज्ञान के लिए बिना दर्शन की सहायता के विश्व का तात्विक स्वरूप समझ सकना अशक्य है। दार्शनिक जीन ‘ड्यू प्लसिस’ का मत है—जगत का स्थूल स्वरूप ही विज्ञान हमें समझा सकता है और पदार्थों की प्रकृति पहचान कर उससे लाभ उठाना सम्भव कर सकता है। इसके आगे उसकी गति नहीं। जो है सो क्यों है? किस लिये है? कैसा है? इन प्रश्नों का उत्तर दर्शन के अतिरिक्त और किसी माध्यम से मिल ही नहीं सकता।

आइन्स्टीन ने लिखा है—”वैज्ञानिक चिन्तन के विस्तार से एक बात बिलकुल स्पष्ट हो गई हैं कि भौतिक जगत का कोई ऐसा रहस्य नहीं है जो अपने आगे भी किसी रहस्य की ओर इंगित न करता हो।

“फिलासफी आफ फिजीकल साइन्स” के लेखक सर ए॰ एस॰ एडिंगटन ने अपनी मान्यता व्यक्त करते हुए लिखा है—”विज्ञान के सिद्धान्तों का समझना और समझाना दर्शन शास्त्र के सिद्धान्तों के सहारे ही सम्भव हो सकता है।” फोम युक्लिड टू एडिंगटन” के लेखक सर एडमन्ड ह्वेटेकार ने लिखा है। प्राचीन दर्शन शास्त्र के विवादास्पद सिद्धान्तों को वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर अधिक प्रामाणिक रीति से परखा और जाना जा सकता है। “दि फिलासफी आफ स्पेस एण्ड टाइम प्रिफेस” के लेखक हन्स राइशन वाच ने लिखा है—वह जमाना लद गया। जब विज्ञान और दर्शन को एक दूसरे से सर्वथा पृथक कहा जाता था, अब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि दर्शन और विज्ञान की जोड़ी में से एक को हटा देने पर दूसरा लड़खड़ाने लगा है। थ्योरी आफ रिलेटिविटी तथा थ्योरी आफ सेट्स जैसे सिद्धान्तों की उपज दर्शन और विज्ञान को अन्योन्याश्रित मान कर ही हो सकती है।

युनान के सुकरात से भी पुराने दार्शनिक दर्शन का अर्थ—’बहिर्जगत का अध्ययन’ करते रहे। ग्रीक के शब्द कोषों में ऐसा ही उल्लेख मिलता है। इससे प्रकट है कि प्राचीनकाल में दर्शन और विज्ञान की गणना एक स्तर पर ही होती है। अन्यान्य देशों के प्राचीन मनीषियों ने भी लगभग इसी स्तर की व्याख्या की है। इन दोनों क्षेत्रों का जब अधिक विस्तार हुआ, तभी यह बटवारे की बात सामने आई और अन्तरंग चिन्तन की धारा को दर्शन और बहिरंग हलचलों के ऊहापोह को विज्ञान कहा जाता रहा है। इतने होते हुए भी यह स्पष्ट है कि दोनों के मिलाये बिना न तो चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।


सच्चा समर्पण (kahani)

कृष्ण की बाँसुरी ही वहाँ धरी थी। वे स्वयं कहीं गये थे। सूने घर में अर्जुन ने प्रवेश किया। एकाकीपन खला तो बाँसुरी से पूछने लगे—सुभगे, तुम्हें कृष्ण स्वयं हर समय होठों से लगाये रहते हैं, जब कि हम सब उनकी कृपा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो पाते, इसका रहस्य क्या है?

बाँसुरी हँस पड़ी—बोली मेरे अन्तर को देखो न, बिलकुल खाली है। उसमें बजाने वाले के स्वर ही गूँजते हैं। अपनेपन का अवरोध उसमें कहीं कुछ है ही नहीं। अपनेपन को गँवा कर किया गया सच्चा समर्पण सदा होठों से लगाये जाने योग्य ही तो होता है।


हमारी बुद्धिमत्ता भयावह किस्म की मूर्खता सिद्ध न हो

विज्ञान एक ऐसे दुधारे शस्त्र की तरह है, जिसे से आत्म रक्षा भी की जा सकती है और आत्म−हत्या भी। प्रयोगकर्ताओं की बुद्धिमानी पर यह बात निर्भर है कि वे उसे किस दिशा में किस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करते हैं।

विज्ञान की शक्ति रचनात्मक प्रयोजनों के लिए उपयोग न हुआ हो सो बात नहीं, उसने मानवी सुख−सुविधाओं में बढ़ोतरी भी की है। किन्तु साथ ही उस मूर्खता की भी हद नहीं, जिसके आधार पर शान्ति स्थापना के बहाने इस सुन्दर धरती का सर्वनाश करने की तैयारियाँ लगभग पूर्ण करली गई हैं। फिर भी विनाशक और विघातक महत्वाकाँक्षा का अन्त नहीं। एक से एक भयानक अस्त्र−शास्त्रों का निर्माण, आविष्कार द्रुतगति से हो रहा है और उन पर इतना धन, इतना मस्तिष्क खर्च किया जा रहा है कि यदि इसे रचनात्मक कार्यों में प्रयोग या गया होता तो इस संसार का नक्शा ही बदल जाता और धरती पर स्वर्ग का वातावरण फैला हुआ दीखता।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री प्रो. वेरी कामनर की एक पुस्तक है—’साइन्स और बाइबिल’ विज्ञान और जीवन। उसमें वे यह चिन्ता व्यक्त करते हैं कि विज्ञान का उद्देश्य भले ही भौतिक सुविधाओं में अभिवर्धन रहा हो, पर इन दिनों वह जिस दिशा में चल रहा है उसे देखते हुए, वह मानवी अस्तित्व के लिए ही संकट बनता जा रहा है। अब यह दैत्य उन हाथों में खेलने लगा है जो विकास के नाम पर विनाश की संरचना ही कर सकते हैं। वैज्ञानिक उपलब्धियों के तात्कालिक लाभ तो देखे जा रहे हैं पर यह भुला दिया जा रहा है कि उसके दूर गामी क्या दुष्परिणाम प्रस्तुत होंगे।

प्रो. वेरी कामनर ने इस बात पर दुख व्यक्त किया है कि हम भावी पीढ़ियों के हिस्से में आने वाले समस्त सुविधा साधनों को समाप्त करके उन्हें असीम दुख दारिद्रय के गर्त में धकेल रहे हैं। जमी के भीतर का तेल और कोयला प्रायः हमीं चट कर जायेंगे और इन वस्तुओं के उपयोग से हमारे बच्चों को वञ्चित रहना पड़ेगा। इतना ही नहीं अन्न, जल और हवा के साथ हम ऐसी विभीषिकाएँ उनके लिए छोड़ जाँय, जिनसे वे तिल−तिल करके घुटने और मरने के लिए विवश हो जाँय।

अन्तरिक्ष यात्राओं का अनुत्पादक व्यय उपयोगी उपलब्धियों में लग सकता था, पर यह सब तो भावी अणु युद्ध के लिए उपयुक्त समर भूमि ढूँढ़ने के लिए किया जा रहा है। यह आशंका अकारण नहीं है कि अन्तरिक्ष की शोध के पीछे भावी अणु युद्ध में अपना बचाव करते हुए विपक्षी का सर्वनाश करने की दुरभिसंधियाँ ही काम कर रही है।

परमाणु विस्फोटों का विकिरण वायुमण्डल में जिस प्रकार विषाक्त ता उत्पन्न कर रहा है, उसकी विवेचना रोमाञ्चकारी है। इसके परिणाम हमें ही नहीं भावी पीड़ियों को भी भुगतने पड़ेंगे। नपुंसकता, गर्भपात, अस्थि संधान, विकलाँगता, मन्द मति, रक्त विकृति, बौनापन विक्षिप्तता आदि अनेक विकृत्तियों को अपने साथ लेकर भावी बालक जन्मा करेंगे तब आज के अणु वैज्ञानिकों का और उनके प्रयोक्ताओं का अर्वाचीन उत्साह, मात्र अभिशाप ही सिद्ध होगा। परमाणु शक्ति के शान्तिमय उपयोग में भी कम खतरा नहीं है। अणु भट्टियों से बची हुई रेडियो एक्टिव राख को कहाँ फेंका जाय, अभी इसका रास्ता नहीं मिला है। वह जहाँ भी डाली जायगी वहीं संकट उत्पन्न करेगी।

किसी आवेश ग्रस्त की सनक अथवा गलतफहमी का कोई झोंका बात की बात में विश्व का सफाया कर सकता है। कभी आकाश में उड़ता हुआ चिड़ियों का झुण्ड रैडार पर ऐसा प्रतीत होता है मानों शत्रु की मिसाइलें हमला करने के लिए उड़ी आ रही है। एक बार तो रैडार पर चन्द्रमा ही ऐसा दिखाई पड़ा मनों शत्रु का आक्रामक राकेट हो। तब अमेरिका की ओर से जवाबी प्रहार करने की सारी तैयारी तत्काल की गई और अणुबम युक्त विमान निर्धारित लक्ष्य से टकराने के लिए उड़ा दिये गये। पीछे वास्तविकता का पता चला कि यह शत्रुयान, मात्र चन्द्रमा का विकृत प्रतिबिंब है तो उन लड़ाकू विमानों को वापिस लौटाया गया।

इन्स्टीट्यूट आफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज ने पता लगाया है कि राकेटों, मिसाइलों, गैसों और अणुआयुधों के क्षेत्र में अमेरिका एवं रूस की प्रतिस्पर्धा तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है। पिछले दस वर्षों में जितना धन और साधनों का इस क्षेत्र में प्रयोग हुआ है, आगे उसकी अपेक्षा कई गुना होने की योजनाएँ हैं। रूस के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं पर अमेरिका ने इन प्रयोजनों पर 11,47,780 डालर एक वर्ष में खर्च किया है। अनुमान है कि रूस को भी लगभग उतनी ही राशि खर्च करनी पड़ी होगी।

पृथ्वी से और समुद्र से छोड़ी जाने वाली मिसाइलों की दर में किसी तेजी से वृद्धि हो रही है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने सन् 60 में पृथ्वी से 18 और समुद्र से 32 मिसाइलें छोड़ने में सफलता प्राप्त की थी। हर वर्ष वह दर कई गुनी बढ़ती गई और अब सन् 70 में उसने पृथ्वी से 1045 तथा समुद्र से 656 छोड़ी है। इसी प्रकार रूस जहाँ सन् 60 में 35 पृथ्वी से 5, समुद्र से छोड़ सकने में समर्थ हुआ था, वहाँ सन् 70 में उसने 1300 पृथ्वी से और 280 समुद्र से छोड़ी हैं। उनकी दूरी, आकृति और क्षमता में भारी वृद्धि हुई है। बटन दबाते ही घर बैठे यह दोनों देश पृथ्वी के किसी भी क्षेत्र पर अणुबमों की वर्षा कर सकते हैं।

चीन ने अन्तर्राष्ट्रीय मिसाइल बनाने में सफलता प्राप्त कर ली है। इंग्लैंड और फ्राँस भी इस क्षेत्र में महाशक्ति बने रहने के लिये सामर्थ्य भर प्रयत्न कर रहे हैं। इस समय जितने अणु आयुध गोदामों जमा है, उनसे इस सारी धरती को कम से कम सौ बार नष्ट−भ्रष्ट किया जा सकता है।

शत्रुपक्ष को बेहोश करके मार डालने वाली जहरीली स्नायु गैस अब अमेरिका के लिए एक ही शिर दर्द बन गई है। इस विष गैस का 300 टन भण्डार जमा है। इसे बहुत सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, इसलिए उसका विसर्जन आवश्यक है। फिलहाल ऐसा महायुद्ध भी नहीं हो रहा है, जिसमें इस गैस का प्रयोग करके उसकी लागत वसूल हो सके। अस्तु अमेरिका सरकार उसे उत्तरी अटलाँटिक में, उत्तरी कैरोलिन में कुछेक दूर समुद्र में डुबोना चाहती है।

इस प्रयास की संसार में हुए जनेवा सम्मेलन में मलेशिया और कैमरून के प्रतिनिधियों न इससे समस्त संसार को होने वाली हानि की चर्चा करते हुए तीव्र विरोध किया। फ्लोरिडा की सरकार ने अमेरिका सरकार के विरुद्ध अदालती कार्यवाही की तैयारी की है। जिसमें मछलियों के भारी संख्या में मरने और वायुमण्डल के दोष दूषित होने के मानवी आधार को लेकर इस प्रयास को रुकवाने का प्रयत्न किया जायगा।

रासायनिक गैसों और कीटाणु संघटकों का उत्पादन भी लगभग अणुबम स्तर का ही है। धमाका किये बिना भी इन दोनों साधनों से महानाश का ताण्डव हो सकता है। ब्रिटेन की नेन्सी कूक्रे की प्रयोगशाला में जी. एल. एस. डी. के आधार पर एक ऐसा रसायन बनाया है, जिसकी मारक शक्ति अद्भुत है। इसी प्रकार अमेरिका के एडक्रुड कारखाने में भी ऐसा ही रसायन रखा है, उसका संक्षिप्त नाम बी. जे. है। उसका प्रभाव विशाल क्षेत्र में मरण पर्व की संरचना कर सकता है।

ब्रिटेन के पास ‘सरीन’ नामक नाड़ी संस्थान को दूर चूर करने वाली गैस का 15 टन भण्डार सन् 55 में था उससे पन्द्रह लाख व्यक्ति बड़ी आसानी से मारे जा सकते थे। पर चूँकि वह गैस अधिक दिन नहीं रखी जा सकती थी इसलिए उसे 16000 फुट गहरे समुद्र में महाद्वीप समूह के पास मजबूत सिलेण्डरों में बन्द करके डुबोया गया। कभी संयोग वश यह सिलेण्डर फूट पड़े तो निश्चित रूप से बड़े क्षेत्र में उनका भारी उत्पात प्रस्तुत होगा।

वियटनाम युद्ध में अमेरिका द्वारा बड़े पैमाने पर ऐसे रसायनों का प्रयोग होता रहा है, जिनके प्रभाव से वहाँ के बड़े क्षेत्रों में वृक्ष वनस्पति तक जल भुन गये। पशु−पक्षियों का सफाया हो गया। जलाशयों के जल जीवों ने दम तोड़ दिया।

घृणा, द्वेष, अविश्वास और आशंका ने दूसरों को अपना शत्रु एवं आक्रमणकारी मानने के लिए विवश कर दिया है। दूसरों की नियत पर संदेह करना और अपने को निर्दोष बनाता आज की चतुरता का रिवाज बन गया है। फल स्वरूप अविश्वास की प्रतिक्रिया अविश्वास के रूप में और शत्रुता का प्रतिफल शत्रुता के रूप में सामने आ रहा है। इसका अन्त क्रमशः सर्वनाश के रूप में ही हो सकता है।

बुद्धिमत्ता और सद्भावना की ओर वापिस लौट जाना चाहिए और विनाश की अपेक्षा विकास की दिशा में प्रतिस्पर्धा की जानी चाहिए। विविध स्वार्थों के आधार पर विविध पक्षों में बँटे हुए विश्व को एक दूसरे के लिए विघातक और अविश्वासी नहीं होना चाहिए वरन् सहयोग के आधार पर मनुष्य जाति के पिछड़े पन को दूर करने में एक दूसरे के साथ कदम से कदम मिला कर कन्धे से कन्धा भिड़ा कर चलना चाहिए।

विज्ञान की उन्नति के लिए गये प्रयास मानवी पुरुषार्थ में चाँद लगाते हैं पर साथ ही उससे उत्पन्न खतरा भी कम नहीं है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से वञ्चित पिछली शताब्दियाँ कम से कम सर्वनाश की आशंका से आतंकित तो नहीं है। विज्ञान यदि आतंक अविश्वास विनाश और विद्वेष के साथ जुड़ गया जैसा कि लगना है तो यही कहा जायेगा कि हमारी पीढ़ी संसार के इतिहास में अधिकतम बुद्धिमान ही नहीं अधिकतम मूर्ख भी थी।


साधन तो चाहिए ही! (कहानी)

एक बड़ा जंगल साफ किया जा रहा था। नेता उसके लिए जोशीले शब्दों में उत्साह भर रहे थे। उत्तेजित जनता कँटीली झाड़ियों को हटा देने के लिए आतुर हो रही थी।

झाड़ियाँ कैसे कटे उपाय बताइए? नेता कोई तरीका न तो जानते थे और न बात सकते थे, सो उन्होंने अपनी आवाज को और भी बुलंद करते हुए कहा— "बहादुरों, उठ खड़े हो। पैरों से सारे जंगल को कुचल कर रख दो।"

एक बूढ़े से न रहा गया। वह संजीदा स्वर में बोला— "पैरों से जंगल नहीं कट सकता। कुल्हाड़ियों का इंतजाम कराइए और इन्हें काटना सिखाइए।

नेता ने कहा— "यह सब बकवास है। जो भी समझ में आए, करो। जंगल को हटाना है, इस लक्ष्य से मत हटो। करो या मरो।"

लोग जोश में उबल पड़े। जिसे जो सूझा, उस हिसाब से झाँड़ियों से उलझ पड़ा। जंगल तो जहाँ का तहाँ था, पर हाथ-पैर सबके बुरी तरह घायल हो गए और लंबी उसासे लेते हुए निराशा के स्वर बोलने लगे।

बूढ़े ने फिर कहा— "लक्ष्य ऊँचा हो; उत्साह बहुत हो; तो भी साधन तो चाहिए ही। कुल्हाड़ियों का इंतजाम होना चाहिए और उन्हें चलाना सिखाया जाना चाहिए। तभी जंगल कटेगा।"

नेता झल्ला पड़ा, बोला— "मेरा काम मार्गदर्शन है। कुल्हाड़ी कहाँ मिलती है और उसे कैसे चलाया जाता है, यह तो मैं भी नहीं जानता।"

बूढ़ा उदास होकर जमीन कुरेदने लगा और दबी जवान से बोला— "तब आप ने नेता बनने की अनाधिकार चेष्टा ही क्यों की?"


प्रकृति का उपहार−अनुदान मक्खी जैसे जन्तुओं को भी मिला है

कीट विज्ञानियों का कथन है कि संसार के समस्त जीवों में’मक्खी ‘ ही सर्वश्रेष्ठ धावक है। दौड़ने का विश्व रिकार्ड 44−5 सेकेंड में 400 मीटर का है, पर मक्खी इतनी दौड़ एक सेकेंड में ही पूरी कर सकती है। जेट विमानों को उड़ान बहुत तेज समझी जाती है पर मक्खी तो प्रति घण्टे 818 मील की गति से दौड़ती है। उसका कीर्तिमान वायुयानों द्वारा तोड़ा जा सकना कठिन है।

जब मक्खी को किसी के द्वारा अपना पीछा किये जाने का भय होना है। अथवा नाच−कूद की मुद्रा में होती है तो तेज दौड़ते हुये भी कुण्डली उड़ान भरती है और हवा में सीधी डुबकी लगाने और सीधे ऊपर उछलने के करतब दिखाती है। इतनी तेज चाल पर इतने मोड़−तोड़ बदलना किसी वायुयान के लिये भी सम्भव नहीं हो सकता।

वायुयान की गति संचालन में मक्खी की संरचना और क्रिया पद्धति का गहरा अध्ययन किया गया है और उससे बहुत कुछ सीखा गया है। अतिवेग से आती हुई मक्खी ‘हाफ रेल बनाती है। जब वह मन्दगामी होती है। हाफ लूफ तरीका अपनाती है। इसी गति नीति को देख कर वायुयान के गति विधान में महत्वपूर्ण सुधार किये गये हैं। कोई मक्खी अत्यधिक वेग से उड़ रही है तो वह अपने पंखों पर केन्द्राकर्षण का अतिशय भार न पड़ने देने की बात को ध्यान में रखते हुये’रोल’ पद्धति से नीचे उतरती है। ‘लूप’ पद्धति से नहीं। अब वायुयानों ने भी अपने उतरने की विधि में यही संशोधन किया है।

मक्खियों के दुहरे पंख होते है। एक जोड़ा उड़ने का काम करता है और नीचे वाला दूसरा जोड़ा शरीर का सन्तुलन बनाये रहता है। यह निष्क्रिय पंख वायुयानों में लग ‘ जिरास्क्रोप ‘ का काम करते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञान तन्तुओं की अधिकतम संवेदनशीलता जुड़ी रहती है। इसलिए विविध जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए यह पंख ही मक्खी के प्रमुख आधार होते हैं।

भिनभिनाने वाली मक्खियों से कई गुनी बड़ी मक्खियाँ संसार के विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाती हैं। कनाडा की ‘पाइनपा’ हजारों एकड़ फसल खा जाती हैं।’स्क्रूवर्म’ मुर्गियों के झुण्ड के झुंड धराशायी कर देती हैं। अफ्रीकी ‘बेडगर्ड’ मक्खी चिड़ियों की बराबर बड़ी और विषैली होती हैं। और उसके काटने से मनुष्य तथा पशु बीमार पड़ जाते हैं। चिकित्सा विज्ञानियों ने मक्खियों के पंखों पर लिपटे हुये एक लाख तक रोग जीवाणु पाये हैं।

मक्खियों का प्रजनन अद्भुत है। वे एक बार में 125 से लेकर 5000 तक अंडे देती हैं। यदि सभी जीवित रहें तो एक जोड़े मक्खी की सन्तान एक वर्ष में इतनी हो जायगी कि सारी धरती पर 46 फुट ऊँची परत इन मक्खियों की ही जमा हो जाय। मक्खियों को वयस्क होने में केवल 6 दिन लगते हैं। इतने समय में ही वे पेट भरने और प्रजनन करने में समर्थ हो जाती हैं। किन्तु उनका जीवन भी कुल 20−25 दिन का ही होता है। एक वर्ष में उनकी प्रायः तीस पीड़ियों हो जाती हैं।

डी. डी. टी. सरीखे कीट नाशक रसायन इसलिए बनाये गये थे कि उनसे मक्खी जैसे जंतुओं का नाश किया जा सकेगा। मक्खी ने इन रसायनों को चुनौती देकर अपने भीतर एक ऐसा तत्व विकसित कर लिये है जिसके कारण वे विषैले रसायन उसकी अधिक हानि नहीं कर सके। इस नाशक द्रव्यों के बावजूद भी मक्खियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और हार कर वैज्ञानिकों को यह कहना पड़ रहा है कि जनता को सफाई रखने की आदत जब तक नहीं सिखाई जायगी तब तक मक्खी जैसे जन्तुओं से छुटकारा नहीं मिल सकेगा।

छोटी मक्खी को कितनी अद्भुत क्षमतायें मिली हैं। इसे ध्यान पूर्वक देखें तो यह जाना जा सकेगा कि अकेले मनुष्य को ही नहीं अन्य प्राणियों को भी प्रकृति ने मुक्त हस्त से उपहार अनुदान दिये हैं।


दधिची की पुण्य परम्परा फिर प्रचलित की जाय

अन्नदान, वस्त्रदान, श्रमदान,अन्नदान,विद्यादान आदि सत्कर्मों की चर्चा बहुत दिनों से सुनी जाती रही है। अब विज्ञान ने दान का एक नया क्षेत्र खोला है,जिसकी गरिमा उपरोक्त सभी दानों से बढ़ कर है और जिसे गरीब से गरीब आदमी भी यदि थोड़ा साहस कर सके तो सरलता पूर्वक दे सकता है वह दान है— अंग दान।

अब यह सम्भव हो गया है कि एक मनुष्य के शरीर का कुछ भाग लेकर दूसरे के शरीर में लगा दिया जाय। इससे उन लोगों का बहुत हित साधन होता है जो अमुक अंग के बिना बहुत कष्टकर जीवन जी रहे थे।

रक्त दान की बात हम सभी जानते हैं। घायलों के शरीर से अधिक रक्त निकल जाने पर वे बहुत ही अशक्त हो जाते हैं और देर तक जीवन धारण किये हुये नहीं रह सकते। कई आपरेशन भी इतने जटिल होते हैं, जिनमें काफी समय लगता है। उतनी देर में बहुत रक्त निकलता है, इसकी पूर्ति बाहर का रक्त देकर करनी पड़ती है। घायलों के प्राण बचाने के लिये भी उनकी नसों में रक्त चढ़ाया जाता है। इन प्रयोजनों के लिये दूसरे दानियों को अपने शरीर का रक्त देना पड़ता है।

बड़े आपरेशनों में काफी देर लगती है तब उन्हें दूसरे का रक्त देना पड़ता है। कोई रोगियों का पूरा ही रक्त बदलने की आवश्यकता पड़ जाती है। ऐसी दशा में रक्त देने के लिये रोगी के सम्बन्धियों से ही कहा जाता है। उनका रक्त यदि उसी स्तर का हुआ तो फिर एक स्वस्थ व्यक्ति से प्रायः डेढ़ पाव तक ही रक्त लिया जा सकता है। उतने से काम न चले तो दूसरे −तीसरे की तलाश करनी पड़ती है। समय पर समान स्तर का रक्त न मिले तो रोगी के लिये प्राण संकट ही उत्पन्न हो जाता है। यों रक्त बैंक से भी रक्त मिल जाता है पर वह सदा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। इन सब कठिनाइयों का समाधान यह है कि उदार व्यक्ति मरने से पूर्व अपना रक्त दान दे जाने की वसीयत कर दें।

मृतक का भी रक्त लिया जा सकता है। मृत्यु होने के बाद दो से छै घण्टे तक मृतक का रक्त इस योग्य बना रहता है कि उसे निकाल कर दूसरों के काम लाया जा सके। इसे तीन−चार महीने तक सुरक्षित भी रखा जा सकता है। जहाँ जीवित व्यक्ति से एक प्वाइंट रक्त ही लिया जा सकता है, वहाँ मृत शरीर से पाँच−छै प्वाइंट तक मिल जाता है।

रूस में अब तक चालीस हजार रोगियों को, मृतकों का रक्त देकर उन्हें संकट−ग्रस्त स्थिति से उबारा जा सकता है। मृतकों का रक्त जीवितों की अपेक्षा इसलिए भी सुविधाजनक होता है कि उसमें इतनी अच्छी तरह जाँच पड़ताल नहीं हो पाती, फलतः रक्तदानी की बीमारियाँ रक्त−ग्रहीत के शरीर पर आक्रमण करके नया संकट उत्पन्न कर सकती है।इन सब कठिनाइयों को देखते हुये, मृतकों का रक्त अधिक निरापद माना गया है। इतना ही नहीं— एक डडडड विशेषता यह भी है कि मृतक के रक्त में लौहकणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे वह अधिक लाभकारी सिद्ध होता है। रूसी विशेषज्ञ डा. एफ.ए. पाफोगोव के परामर्श से दिल्ली में मृत शरीर से रक्त निकालने का एक प्रबन्ध भारत ने भी आरम्भ किया है।

कोई व्यक्ति चाहे तो अपनी आँखों बन्द करके भी अन्धों का ज्योति प्रदान कर सकता है। आवश्यक नहीं है कि जीवित आदमी की ही आंखें निकाली जाँय।ऐसा घोषित मृत्यु के उपरान्त भी हो सकता है।

आँखों की ऊपरी परत एक पारदर्शक स्वच्छ परत की बनी होती हैं। प्रकाश की किरणें उससे टकराती है। तो दृष्टि प्रकाश तन्त्रिका उन्हें मस्तिष्क पर पहुँचा देती है और हमें दिखाई देने लगता है। किसी कारणवश यदि यह पटल अपारदर्शी बन जाय तो प्रकाश किरणों का मस्तिष्क तक पहुँचना कठिन हो जाता है। इस धुन्धलेपन की परत जितनी मोटी होती है, उसी अनुपात से अन्धता से कष्ट मुक्ति मिल सकती है।

अब यह पारदर्शी पटल एक की आँख को लेकर दूसरे जरूरतमंदों के लगभग जा सकता है और अन्धता से कष्ट मुक्ति मिल सकती है।

मृत्यु के 6 से 8 घण्टे के भीतर आंखें निकाली जा सकती हैं। उन्हें सुरक्षित रखा जाता है और आवश्यकतानुसार उनका उपयोग किया जाता है। नेत्र दान लेने की व्यवस्था बड़े अस्पतालों में मौजूद है।

मृतकों की हड्डियाँ भी दूसरे शरीर में लगाई जा सकती हैं। मरने के 12 घण्टे के भीतर हड्डियाँ निकाली जा सकती हैं। इन्हें शीत उपकरणों में दो वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। दुर्घटनाओं में चूर−चूर हुई हड्डियों के स्थान पर नई हड्डी लगाकर क्षत−विक्षत अंग को पुनः पहले जैसा बनाया जा सकता है। 30 वर्ष से कम आयु के लोगों की हड्डियों में मुलायमी रहती है इसलिए उतनी ही आयु तक के मृत शरीरों से उन्हें निकाला जाता है। अधिक आयु वालों की कड़ी हड्डियाँ आरोपण की दृष्टि से प्रायः बेकार ही हो जाती है।

जीवितों के अंग जीवितों को लगाने के प्रयोग बहुत दिन से चल रहे थे, अब मृतकों के अंग का भी उपयोग होने लगा है तो इससे ऐसे आपत्ति ग्रस्तों का भविष्य अधिक उज्ज्वल हो गया है जो दूसरों का अंग लगाने से अच्छे हो सकते हैं। जिगर गुर्दा और तितली के अनेक प्रत्यारोपण पिछले दिनों सफल हुये हैं। अमेरिका डेनवेर के वेटेकन एडमिनिस्ट्रेशन हॉस्पीटल और कोलोरेडी विश्व−विद्यालय के मेडीकल सेन्टर ने पिछले दिनों पाँच मृतकों के जिगर, वयालीस के गुर्दे और एक की तिल्ली निकाल कर दूसरों को लगाया। जिगर के आरोपण सफल नहीं हुये किन्तु तिल्ली वाल पूर्ण सफलता मिली। यह प्रथम प्रयोग थे। भविष्य में इस प्रकार के आरोपण अधिक सफल होने लगेंगे, ऐसा विश्वास किया जाता है। आग से अधिक जल जाने पर शरीर से अधिक द्रव निकल जाता है और रोगी की जान पर आ बनती है। इन जले स्थानों पर दूसरी चमड़ी लगा दी जाय तो रोगी बच जाता है। अब तक ऐसे मामलों में जले हुये व्यक्तियों की ही चमड़ी एक जगह से लेकर दूसरी जगह लगाई जाया करती थी पर अब मृतकों की चमड़ी का भी जले हुए लोगों के घावों पर प्रत्यारोपण किया जा सकेगा।

इस दिशा में जन−साधारण को आवश्यक जानकारी दी जा सके तो अनेक उदार मनुष्य ऐसे मिल सकते हैं जो मरने के उपरान्त शरीर को कीड़ों से खाये जाने या आग में नष्ट किये जाने से पूर्व उसका कुछ भाग पीड़ित मनुष्यों की एक महती आवश्यकता पूरी उसका कुछ भाग पीड़ित मनुष्यों की एक महती आवश्यकता पूरी करने के लिए सहर्ष देने को तैयार हो सकें। यह भय उचित नहीं कि मृत्यु से पहले ही दान दिये आग निकाल लिये जायेंगे और आर्त मृत्यु मरना पड़ेगा। सच बात है कि घोषित और कानून न मृत्यु हो जाने के उपरान्त बहुत देर पीछे अंगों का सड़ना-गलना आरम्भ होता है। कई घण्टों तक मृत शरीर की स्थिति ऐसी बनी रहती है कि यदि उस अवधि में किन्हीं अंगों को सावधानी के साथ निकाल लिया जाय और शीत-सुरक्षित रखा जाय तो काफी समय तक तरोताजा बने रहते हैं और उसी समय अथवा फिर कभी किसी दूसरे शरीर में लगाने के काम आ सकते हैं।

मृत्यु हो जाने के बाद आग निकालने से किसी प्रकार का कष्ट होने की कोई बात नहीं। वस्तुतः यह तो ऐसा दान है, जिसमें अपनी तनिक भी हानि नहीं और दूसरों का लाभ ही लाभ है। यश, पुण्य और आत्म-सन्तोष का लाभ स्पष्ट है। एक के साहस करके आगे आने पर दूसरों को प्रेरणा मिलती है और एक ऐसी पुण्य परम्परा चलती है जिसमें एक मनुष्य के दुःख-दर्द में दूसरे का सहायक होना प्रत्यक्ष होता है। इस परम्परा को अग्रगामी बना कर ही मनुष्यों का देव समाज बन सकता है।

महर्षि दधीच को जीवित अवस्था में देव प्रयोजन के लिये शरीर दान करने में संकोच नहीं हुआ था। हम उनके वंशज मृत शरीरों के निकम्मे अंगों का दान करने को वसीयत करके उस पुण्य परम्परा के सहज ही उत्तराधिकारी बन सकते हैं।


हम पुरखों से हर क्षेत्र में पिछड़ ही नहीं रहें

पुराने जमाने के लोगों से हम कई बातों में पिछड़े हुए हो सकते हैं।पर यह कहना उचित नहीं कि जमाना हर दिशा में गिरावट की ओर ही जा रहा है। जहाँ तक समस्याओं के सम्बन्ध में दृष्टिकोण का सम्बन्ध है, हम अपेक्षाकृत अधिक सुधरे हुये ढंग से विचार करने लगे हैं।

धर्म प्रचार की बात को ही लें। मुद्दतों तक धर्मदीक्षा के लिए शासन सत्ता और तलवार का उपयोग किया जाता रहा है। अन्य धर्मावलम्बियों की स्त्रियों का अपहरण करके उनसे अपने धर्म वाली सन्तानें पैदा कराने का ढर्रा बहुत समय तक चला है। भारत में ही नहीं एशिया और अफ्रीका में इसी आधार पर लगभग एक हजार वर्ष तक धर्म विस्तार का सिलसिला जारी रहा। उस आतंकवादी पद्धति से सफलता भी बहुत मिली। जो कार्य विचार परिवर्तन की सौम्य पद्धति से धीरे−धीरे और स्वल्प मात्रा में सम्भव होता, वह आतंकवादी तरीकों ने जादू की तरह सम्भव कर दिया। इस निष्कर्ष का परिणाम यह होना चाहिए था कि अपने धर्म को तीव्र गति से विस्तृत बनाने के लिए आतुर लोग इसी तरीकों को अपनाते पर अब ऐसा सम्भव नहीं रहा। दुनिया की विचारशीलता बहुत आगे बढ़ गई है। आतंक के आगे शिर झुकाने का प्रचलन अब नहीं रहा। जागृत लोकमानस में आतंक की नीति शिरोधार्य नहीं की जा सकती। अस्तु पुराना ढर्रा छोड़ कर अब धर्म विस्तार के लिए आतुर लोग भी सौम्य तरीके ही अपनाते हैं।

संगठन की दृष्टि से हम कहीं आगे हैं। पिछली शताब्दियों और सहस्राब्दियों में यदि जनता संगठित रही होती हे मुट्ठी भर आक्रमणकारी, विशाल जनसंख्या वाले देशों को इस प्रकार पददलित करने और गाजर−मूली की तरह काट डालने में सफल न होते, श्रमिकों की हड़तालें उनकी माँग मनवाने के लिए मालिकों को झुका लेती है। यह संगठन शक्ति का चमत्कार है। गान्धी जी के असहयोग और सत्याग्रह आन्दोलन प्रत्यक्षतः अँग्रेज सरकार को परास्त नहीं कर सकते थे पर जनसहयोग के अभाव में अँग्रेजी के लिए, इस देश में टिके रहन असम्भव हो गया। तब वे भलमनसाहत के साथ अपने विस्तर समेट कर यहाँ से चले गये।

पुराने जमाने में अपराधी को दण्ड देने में जो दृष्टिकोण था, वह निर्मम और निष्ठुर ही कहा जा सकता है। चोर को हाथ काट लेने की सजा मिलती थी। आतंक के बल पर अपराधी को तथा दर्शकों को यह सिखाया जाता था कि उसे उत्पीड़न का शिकार होना पड़ेगा। सम्भव है इस प्रकार अपराधों की रोकथाम में अधिक सफलता मिलती हो पर मानवोचित सौहार्द्र और न्याय विवेक का हनन ही होता था। अब दण्ड देने की, वह पद्धति बदल गई। पुराने जमाने में क्या अपराध हुआ, यह देखना पर्याप्त था। अब यह समझना पड़ता है कि अपराध क्यों हुआ? उसका भूल कारण क्या था? अब दण्ड देन में प्रतिशोध का समावेश नहीं किया जाता वरन् सुधार का दृष्टिकोण अपनाया जाता है। कारागारों को सुधारगृहों में परिणत करने का सिद्धान्त स्वीकार किया गया है। सुव्यवस्था के अभाव में भले ही सफलता उतनी न मिली हो फिर भी इतना माना ही जाना चाहिए कि न्याय की आत्मा अधिक सुकोमल बनी है, वह अपराधी को सुधार का अवसर देने के लिए प्रतीक्षा करने का सहमत हो गई है

मनुष्य के समान अधिकारों को स्वीकार करने में हम अपने पूर्वजों की तुलना में कहीं आगे हैं दास,दासी खरीदने, बेचने और दान देने की प्रथा प्रायः सभी देशों में रही है। समर्थ लोग असमर्थों का उपयोग डडडड करते रहे हैं। युद्धों में विजेता लोग सेना और शासक को ही नहीं मारते काटते थे वरन् प्रजा को भी लूटते थे पर वयस्क नर−नारियों को पकड़ कर साथ ले जाते थे और उन्हें गुलामों की तरह बेचते, खरीदते थे। अछूत जातियों को सामाजिक अधिकार नहीं के बराबर थे। अब वैसी प्रथा समाप्त हो गई। गुलाम प्रथा नहीं रही, हर नागरिक अपने मानवी अधिकारों का उपयोग करता है। जहाँ इसमें कभी है वहाँ तीव्र संघर्ष चल रहे हैं और स्थिति उत्पन्न हो रही है कि कल नहीं तो परसों समस्त विश्व में कहीं व्यक्ति मानवी अधिकारों की समानता से वंचित न रहेगा।

नारी जाति के सम्बन्ध में पूर्वजों की अपेक्षा अपनी पीड़ी अधिक प्रगतिशील है। पर्दा प्रथा अब कुछ पिछड़े लोगों की ही मूर्खता बन कर रही है। अब पत्नी की स्थिति पति की खरीदी हुई सम्पत्ति जैसी नहीं रही। विवाह बन्धन में पारस्परिक सहमति भी एक तथ्य बन गई है। तलाक के नियम अधिक से अधिक उदार होते चले जाते हैं। नर तो नारी का उपभोग किसी भी प्रकार करे पर नारी की माँग या आवाज का कोई मूल्य नहीं, अब यह निर्दय कठोरता दिन−दिन घट रही है। यौन स्वेच्छाचार की सुविधा पुरुष को ही मिले,यह प्रतिबन्ध टूट रहे हैं। पतिव्रत ही अब एक मात्र प्रशंसनीय नहीं रहा। पत्नीव्रत को भी ठीक उसी के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया गया है और यह अवसर दिया गया है कि या तो इन दानों व्रतों को समान रूप से मान्यता मिले या दानों को हटा दिया जाय। पाश्चात्य देशों ने दानों को हटा देने का फैसला किया है और वहाँ व्यभिचार को जन मान्यता मिल गई है। पुरुष से बहु विवाह का अधिकार छील कर भारत जैसे देशों ने पत्नीव्रत को भी पतिव्रत स्तर की ही मान्यता दी है। यह सन्धिकाल है, परम्पराएँ बदल और बन रही हैं। स्थिरता में देर लग सकती है पर यह तथ्य उभर कर सामने आ ही रहा है कि नर का नारी पर से बाधित आधिपत्य उठ रहा है। विवाह की स्थिरता अब स्वेच्छा सहयोग पर निर्भर होने जा रही है। अब पत्नी का उत्पीड़न पति का एक स्वेच्छाचारी अधिकार नहीं हर सकेगा। चरित्र के सन्देह में यदि पत्नी −पति की हत्या नहीं करती तो पति को भी न्याय की उसी तुला पर अपने वर्चस्व की गर्मी नीचे उतारनी पड़ेगी। दोनों पक्षों के लिए कर्त्तव्य और अधिकार अब एक जैसे ही होकर रहेंगे। नारी के प्रति बरती जाने वाली अनुदारता का अन्त करना निस्सन्देह हम पुरानी पीड़ी से कहीं आगे उदार हो चले हैं।

संप्रदायों, देवताओं और परम्पराओं के कारण मनुष्य मनुष्य के बीच जो भारी मतभेद चल रहे थे और वे विद्वेष विग्रह के रूप में फूट रहे थे, वह कट्टरता अब क्रमशः घटती और मिटती चली जा रही है। समस्त धर्मों की एक ही आत्मा, समस्त देव एक ही ब्रह्म के नाना रूप, समस्त परम्पराओं के मूल में सुविधा एवं औचित्य का आधार तलाश किया जा रहा है और समन्वयवादी, सहिष्णुतावादी विचार–धारा पनप रही है। विश्व धर्म, विश्व संस्कृति, विश्व भाषा, विश्व राष्ट्र का आन्दोलन तेजी से चल रहा है। यह अनुभव किया जा रहा है कि मानव मात्र को एक बनकर रहना चाहिए। अब देश, जाति और सम्प्रदाय की सीमाएँ मानव मात्र की एकता में कम से कम व्यवधान उत्पन्न करे, ऐसा प्रयत्न चल रहा है कहना न होगा कि विचार−सागर में जो ज्वार−भाटे इन दिनों आ रहे हैं, वे विभेद की समस्त दीवारों को तोड़ कर एक विश्व का− मानवी एकता का लक्ष्य पूरा किये बिना न रहेंगे। हम प्रगति की ओर चल रहे हैं। इस दृष्टि से निस्सन्देह हम पुरखों की अपेक्षा कहीं आगे हैं।

कितनी ही बातों में हम पिछड़े भी हैं। स्वास्थ्य, सद्भाव और सदाचार में काफी गिरावट आई है। छल, प्रपञ्च और उद्दंडता ने नैतिक और सामाजिक संकट उत्पन्न कर दिये हैं। विलासिता,फिजूलखर्ची और आलस्य जैसे दुष्प्रवृत्तियां पनपी हैं। यह प्रतियोगिता के चिन्ह हैं। पर शिक्षा का विस्तार दूरदर्शी चिन्तन विज्ञान का विकास और विश्वव्यापी घनिष्टता की कुछ धारायें ऐसी भी हैं जो क्रमशः संसार में अधिकाधिक प्रगतिशील उत्पन्न करेंगे और उन विकृतियों को निरस्त करेगी जो भविष्य को अन्धकारमय बनाये में लगी हुई हैं।

पिछड़े पन का रोना रोते रहना ही पर्याप्त नहीं। हमें इस युग की उपलब्धियां भी समझनी चाहिएँ और विश्वास करना चाहिए हमारा भविष्य भूतकाल की तुलना में अधिक उज्ज्वल ही होने जा रहा है।


गर्मी गर्मी ही नहीं शान्ति और शीतलता भी आवश्यक है

ताप की उपयोगिता और शक्ति सभी को विदित है। चूल्हा और दीपक की आग चलाये बिना दैनिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती। सूर्य का ताप कपड़े सुखाने से लेकर मौसम गरम करने, उजाला फैलाने, पेड़ पौधे उगाने में, बादल वर्षा की व्यवस्था तक असंख्यों कार्य पूरे करता है। कल कारखानों से लेकर रेल मोटर तक ताप के प्रभाव से चलते हैं। तार रेडियो जैसे साधनों में बिजली का ताप ही काम करता है। धूपबत्ती जलाने से अग्निहोत्र तक और विवाह से लेकर अंत्येष्टि तक सभी कर्म− काण्डों में अग्नि की साक्षी आवश्यक है। स्पष्ट तथा गर्मी हमारे जीवन का प्राण है।

किन्तु यह भूल नहीं जाना चाहिए कि शील का महत्व भी ताप से कम नहीं है। जाड़े के दिनों में हमारा स्वास्थ्य हर ऋतु से अधिक अच्छा रहता है। जीवन विकास में ताप की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो पर उसी सुरक्षा और स्थिरता में शीत को ही प्रधानता देनी पड़ेगी।ठंडे देशों के निवासी गर्म क्षेत्रों में रहने वालों की तुलना में कहीं अधिक स्वस्थ, सुडौल और सुन्दर पाये जाते हैं। इतना ही नहीं वे दीर्घ जीवी भी होते हैं। गर्म प्रदेशों में लड़कियाँ बहुत छोटी उम्र में रजस्वला होने लगती हैं साथ ही यह भी तय है कि उनका बुढ़ापा और मृत्यु काल भी जल्दी ही आ सकता है। इसके विपरीत ठंडे देशों में यह विकास क्रम थोड़ा धीमा भले ही चले पर दृढ़ता एवं स्थिरता निश्चिंतता रूप से अधिक रहेगी।

मस्तिष्क को ठंडा रखने पर सदा से जोर दिया जाता रहा है। सिर पर छतरी,टोपी लगाने का महत्व इसी दृष्टि से है कि उसे धूप गर्म न करने पाये। तेल चंदन आदि लगाने की बात इसीलिए सोची जाती है। कि शिर ठंडा रहे। विचारों में शान्ति और सन्तुलन की बात को मस्तिष्कीय शीतलता का प्रमाण समझा जाता है। शिवजी के शिर पर चंद्रमा की स्थापना और गंगा प्रवार का पौराणिक अलंकार यही बताया है कि महानता मस्तिष्कीय शीतलता के साथ जुड़ी हुई है। उत्तेजित उद्विग्न, चिन्तित,आवेश ग्रस्त और उद्विग्न मनुष्य अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारते हैं और बेमौत मरते हैं योगीयति हिमालय जैसे शीतल प्रदेशों में अपनी तपश्चर्या करते हैं ताकि उस सौम्य वातावरण में आत्म−बल का विकास अधिक सरलता पूर्वक संभव हो सके। स्नेह, सद्भाव,सौजन्य, मधुरता, मृदुलता जैसी कोमल सत्प्रवृत्तियों से हिमानी शीतलता के साथ तोला और सराहा जाता है। चन्द्रमा की शीतल किरणों में अमृत धुला होने की चर्चा चिरकाल से सुनी जाती रही है।

स्नेही स्वजनों को कलेजे से लगाने में छाती ठंडी होती है। धन सम्पत्ति को ‘तरावट ‘ की संज्ञा दी जाती रही है। पौष्टिकता प्रदान करने वाले पदार्थ ‘ तर माल’ कहे जाते हैं। चाय काफी जैसे गर्म पेयों का प्रचलन कितना ही बढ़−चढ़ क्यों न गया हो, मलाई की बर्फ, कोकाकोला, सोडा शर्बत आदि की खपत भी कम नहीं है। मौसम जरा सा गर्म होते ही बर्फ एक दैनिक आवश्यकता बन जाती है। गर्मी के दिनों में लोग पहाड़ों पर भागते हैं और कूलर लगाकर काम चलाते हैं और पानी से भीगे खश के पर्दे दरवाजे पर टाँगते हैं। बिजली के और हाथ के पंखे गर्मी को ठंडक में बदलने के लिए हो प्रयुक्त होते हैं। बार−बार हाथ मुँह धोने और नहाने की जरूरत इसीलिए पड़ती है। गंगा यमुना जैसी सरिता सरोवरों का स्नान पुण्यफल प्रद इस मानी में तो है ही कि उससे ठंडक की अनुभूति तत्काल होती हैं।

यह सामान्य जीवन में शीत की उपयोगिता की बात हुई। विज्ञान अब ऐसे शोध प्रयासों में लगा हुआ है जिनके सहारे दीर्घ जीवन से लेकर अन्तरिक्ष यात्रा तक के अगणित महत्वपूर्ण प्रयोजनों को शीत के सहारों पूरा किया जा सके।

सन् 1967 में एक अमेरिकी अध्यापक जेम्स वेड फोर्ड को उसकी इच्छानुसार मृत्यु के उपरान्त दफनाया नहीं गया है वरन् उसके शरीर को शीत से जमाकर इस लिए सुरक्षित रख दिया गया है कि समयानुसार उस मृत शरीर को गरम करके पुनर्जीवित किया जा सके। शरीर में नाइट्रोजन द्रव को 196 शून्य से तापक्रम पर जमाया जाता है जबकि पानी,0,॰ ‘ से पर ही जम जाता है।

बूढ़े या मरणासन्न लोगों को शीत की स्थिति में बहुत वर्षों तक रखने के बाद उनके शरीर की थकान दूर की जा सकेगी— और उनमें विश्राम लाभ के कारण पुनः नवजीवन जैसी चेतना उत्पन्न की जा सकेगी ऐसा विश्वास शरीर विज्ञानियों को हो गया है और वे उपरोक्त सिद्धाँत को कार्यान्वित कर सकने का पथ प्रशस्त कर रहे हैं।

रूसी वैज्ञानिक पी. वैरञ्मेत्येव ने मछलियों को वर्षों तक शीत प्रसुप्त रखने के बाद उन्हें पुनर्जीवित करने में सफलता पाई है। इस संदर्भ में एक नया रसायन प्रकाश में आया है— ‘ऐन्टी मेटा वोलाइट्स ‘ इसे किसी शरीर में पहुँचा कर जीव कोषों की अधिकाँश प्रक्रियाऐं स्थिर की जा सकती हैं। यदि इस दिशा में एक कदम और आगे प्रगति हो सके और ‘ अधिकाँश’ को ‘सम्पूर्ण’ में परिणाम किया जा सके तो शीत प्रसुप्ति का कार्य इस रसायन प्रयोगों में भी संभव हो सकता है तब जर्जर शरीरों को बहुत दिनों तक विश्राम की स्थिति में रखकर उनकी थकान मिठाई जा सकेगी और कायाकल्प जैसा लाभ मिल सकेगा।

फ्राँसीसी विज्ञान वेत्ता जीनरास्टेण्ड ने पता लगाया था कि सुषुप्ति के समय − विश्राम देने और जीवन कोषों की रक्षा करने का प्रयोजन उस स्थिति से सहज उत्पन्न होने वाला रसायन ‘ग्लाइस काल’ काल पूरा करता है।

लम्बे समय की सुषुप्तावस्था उत्पन्न करने में एक भय यह है कि कहीं सोने वाले के खून में शीत की अधिकता के कारण थक्के न बनने लगे। सभी जानते हैं कि रक्त में उत्पन्न हुए थक्के हृदय की गति को रोक कर मरण संकट उत्पन्न कर सकते हैं। इसीलिए सोचा यह गया है कि लम्बे समय तक सोने वाले के शरीर से सारा असली रक्त निकाल लिया जाय और उसके स्थान पर नकली रक्त भर दिया जाय। नकली रक्त अब बनने लगा है। ग्लूकोज, नमक, आक्सीजन तथा दूसरे रसायनों को मिलाकर ऐसा द्रव बना लिया गया है जो रक्त की जगह काम दे सकता है और उसमें थक्के बनाने की आशंका नहीं रहती है।

शीतलता उत्पन्न करने वाले तरल रसायनों में डाइमेथिल सल्फ आक्साइड’ मुख्य है। इसे संक्षेप में डी.एस.एस. ओ. कहते हैं। दान में मिले नेत्र,गुर्दे, आदि अवयवों को किसी दूसरे के शरीर में फिर करने के लिए देर तक सुरक्षित रखना पड़ता है। इस स्थिति में अंगों की सड़न बचाने के लिए डी. एस.एस. ओ. को प्रयोग अभीष्ट प्रयोजन का बहुत सरल बना देता है।

मेंढक गर्मियों में गहरे कीचड़ में धँस जाते हैं। और कीचड़ के साथ साथ स्वयं भी सूख जाते हैं इस स्थिति में वे लगभग मृत जैसी सुषुप्ति में पड़े रहते हैं किन्तु बहुत ही मंद गति से धड़कन तब भी चलती रहती है। वर्षा होने पर कीचड़ नरम होती है तो इन मेंढकों में भी जीवन लौट आता है और शरीर को पूर्ववत् सक्रियता बनाने के लिए वे टर्राने लगते हैं कई जाति की मछलियाँ और साँपों को भी इसी तरह लम्बी सुषुप्ति में पड़े हुए पाया गया है। बर्फीले प्रदेश में रहने वाले भालू भी कड़ाके की सर्दियों में किसी गुफा में जाकर लम्बी नींद लेते हैं।

निम्रतापोत्पादिकी (क्रियोजोनिकक्स) के आधार पर मौत ही नहीं बुढ़ापे पर भी नियंत्रण कर सकना संभव हो जायगा इस विश्वास के साथ आज के वैज्ञानिक इन प्रयोगों में तत्परता पूर्वक लगे हुए हैं।

ताप की एक सीमा तक ही शरीर को आवश्यकता होती है यदि उसकी मात्रा बढ़ने लगे तो विपत्ति खड़ी हो जाती है। बुखार शरीर में बढ़े हुए ताप का ही नाम है। जिसके कारण काया दो चार दिन में ही चकमका जाती है। वाह्य जीवन में भी यही बात है वातावरण गरम होने से हलचलें बढ़ती है और शक्ति का अनावश्यक कारण होता है शीत में डडडड ढंग की क्षमता मौजूद है और वह हमारे लिए अनेक दृष्टियों से महत्व पूर्ण है न केवल शारीरिक और मानसिक दृष्टि से वरन् भौतिक जगत में भी शीत की शक्ति अब अधिक अच्छी तरह पहचाने जाने लगी है।

भविष्य में अंतःग्रही यात्रायें में शीत को ही उपयोग किया जायगा। शनिग्रह तक आने जाने में कम से कम 12 वर्ष का समय लगने की आशा की गई है। इतने समय तक खाने पीने का सामान लेकर चलने वाला राकेट कितना भारी होगा और उसे छोड़ने चलाने के लिए कितने ईंधन की आवश्यकता पड़ेगी, इस विचार से तो वह यात्रा असंभव ही हो जायगी। इस समस्या का हल एक ही है कि डडडड को शीत में सुला दिया जाय और नियत समय पर स्वसंचालित यंत्र उसे गरम करके पुनर्जीवित करके डडडड आवश्यकतानुसार फिर सुला दें। इसी व्यवस्था में कोई चालक बारह वर्षों तक बिना खाये पिये रह रुकता है और अपनी यात्रा हलके यान से भी जारी रख सकता है।

वर्तमान वैज्ञानिक सफलताओं के अनुसार न्यूनतम तापक्रम 273 सेन्टीग्रेड तक का उत्पन्न किया जा सकता है। सामान्यतया ॰ सेन्टीग्रेड पर पानी बर्फ के रूप में जम जाता है। 100 से. पर वह भाप बन जाता है।273 शून्य परम ताप−शीत की अन्तिम स्थिति मानी तो गई है पर उसे अभी प्राप्त नहीं किया जा सका।

जूल थामसन पद्धति के अनुसार निम्रतापोत्पादिकी विज्ञान से कितने ही आश्चर्यजनक कार्य लिये जाने लगे हैं। गैसों को द्रव रूप में ही नहीं उन्हें ठोस रूप में भी जमा लिया गया है। हाँचड के विज्ञानी कामेरलिंध दोनेड ने शीत से उत्पन्न अति संवाहकता की शक्ति पर अनेक शोधें की हैं और भविष्य वाणी की है कि निकट भविष्य में ताप की प्रति द्वंद्वता शीत द्वारा कर सकना सम्भव हो जायगा। ताप को ही हर काम में वरिष्ठता नहीं मिलेगी वरन् शीत को भी उतना उपयोगी एवं शक्ति शाली अनुभव किया जायगा।

पात्रों को गैस रहित करना−अशुद्ध जल को शुद्ध बनाना−ऊँची तथा लम्बी उड़ान वाले राकेट चालकों के लिए श्वास सुविधा जुटाना, सूखी बर्फ बादलों पर छिड़क कर कृत्रिम वर्षा कराना, वस्तुओं को शीतल करके सुरक्षित रखना — आग बुझाने को कार्बन डाइआक्साइड का भंडार सुरक्षित रखना, धातुओं का परिशोधन − जैसे प्रयोजन से पिछले बहुत सालों से पूरे किये जा रहे हैं। कम्प्यूटर खरीदे जटिल संरचना वाले तथा डाटा प्रोमोसिंग यंत्रों के स्वसंचालित रखने को साधन जुटाना शीत शक्ति के सहारे अधिक सरल हो चला है। शक्ति शाली चुम्बकों का निर्माण करने के लिए भी नहीं पद्धति अधिक सरल पाई गई है।

वर्षा के गीत गाते हमें मुद्दत बीत गई। अब शीत के रहस्यों से भी हमें अययम होना चाहिए। युद्ध से लेकर व्यस्तता भरी भगदड़−तक के परिणाम चिरकाल से अनुभव में आते रहे हैं अब शान्ति, शीतलता, सौजन्य मृदुलता, मधुरता और सन्तुलन भरी दूरदर्शिता का आश्रय किया जाना चाहिए और देखना चाहिए कि शान्ति की दूरदर्शी रीति नीति प्रचण्ड उद्विग्नता से कम शक्ति शाली है या अधिक। शोधें हमें ताप के समान ही प्राप्ति की गरिमा से परिचित करायेंगी और तब यही उचित होगा कि हम शान्ति और क्रान्ति की समन्वयात्मक प्रक्रिया अपना कर सन्तुलित वातावरण उत्पन्न करें।


सन् 1849 की बात है (kahani)

सन् 1849 की बात है वारमूडा के एली बन्दी गाह में ‘मिनर्वा’ लकड़ी का बना जहाज रवाना हुआ। उसे अफ्रीका तथा सुदूर पूर्व की लम्बी यात्रा करनी थी, पर जहाजी तूफान में फँसकर वह डूब गया। एक वर्ष तक उसकी बहुत खोज की गई पर कुछ पता न चला तो ढूँढ़ने की बात भी छोड़ दी गई।

उसी ऐली बंदर गाह पर सन् 1851 में एक जहाज अपने आज आ लगा। वह क्षत विक्षत हो रहा था। उसके अस्थि पिंजर को निकाला तो पता चला कि यह तो उसी ‘मिनिर्वा’ का भूत है जो दो वर्ष पूर्व जल समाधि लेकर मर गया था। अपने जन्म स्थान को यह भूत क्योंकर लौटा इस रहस्य को कोई ठीक तरह समझ न सका।


गंदगी की आदत छूटे तो कृमि कीटकों से जान बचे

कृमि कीटकों द्वारा पहुँचाई जाने वाली विविध विधि हानियों को देखकर मनुष्य को क्रोध आना स्वाभाविक है। वह उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है सो भी उचित है, पर भूल यहाँ होती है कि वह आवेश कृमि नाशक दवाओं के निर्माण तक सीमित होकर रह जाता है। इन दिनों अगणित कृमि नाशक दवाएं विनिर्मित हो रही हैं और उन्हें बनाने खरीदने में धन पानी की तरह बहाया जा रहा है पर उनसे क्षणिक लाभ होता है। तत्काल तो कुछ कीड़े मर जाते हैं पर जो बच जाते हैं वे अपनी तेजी से वंश वृद्धि करके अपने पूर्वजों का स्थान ग्रहण कर लेते हैं और मारने वालों से कस कस कर बदला चुकाते हैं।

विविध प्रकार से क्षति पहुँचाने वाले कीटकों के सम्बन्ध में इन दिनों बहुत शोध हो रही है और मारक रसायनों का भी आविष्कार हो रहा है। यह उत्साह देखने समझने ही योग्य है।

कपड़े नष्ट करने वाले कीड़ों की चार जातियाँ भारत में पाई जाती हैं(1) टीनिया पेलिबोनेला,(2) टीनिओला बिसेलिएला (3) ट्राइर्काफे मा एवप्लेटा (4) वारखौसिनिया स्यूडोम्व्रटेलस। इन चारों के अंडे बच्चे ही कपड़ों को अधिक नष्ट करते हैं, बड़े होने पर वे उतनी अधिक हानि नहीं पहुँचाते।

यह कीड़े सीलन और गंदगी के उन स्थानों में पनपते हैं जहाँ स्वच्छ हवा का प्रवेश भली प्रकार नहीं होता। गंदगी और सीलन के संयोग से अनेकों स्तर के कीड़े पनपते हैं और घर में जैसी वस्तुएँ अथवा परिस्थितियाँ पनपने के लिए मिलती हैं उसी के अनुकूल वे अपना आकार प्रकार रहन सहन एवं क्रिया कलाप विनिर्मित कर लेते हैं। अन्न, कपड़ा, पानी, दूध,लकड़ी, जो कुछ उनके सामने आता है उसी के निर्वाह करने की उनकी आकृति और प्रवृत्ति बन जाती है। इस मूल उद्गम कारण पर यदि ध्यान न दिया जाय और केवल कीटनाशक दवाओं पर ही निर्भर रहा जाय तो काम चलने वाला नहीं है। उन्हें जहाँ भी अवसर मिलेगा, जो भी वस्तु कीट नाशक दवा के बिना मिलेगी उसी पर कब्जा करेंगे और एक न सही दूसरी तरह नुकसान पहुँचावेंगे। यही खाद्य पदार्थों के सहारे पेट में जा पहुँचते हैं और तरह−तरह के रोगों के कारण बनते हैं।

हानिकारक घरेलू कीड़ों में से ऊपर कपड़े काटने वालों की चर्चा की गई है, पर यह न समझना चाहिए कि उनकी हानि का क्षेत्र इतना ही सीमित है। जुएँ, चीलर, खटमल, पिस्सू,मक्खी, मच्छर आदि के रूप में वे जन्मते और बढ़ते हैं। उनकी असंख्यों जातियाँ ऐसी हैं जो आँख से दिखाई नहीं पड़ती पर हानि उतनी ही करती हैं जितनी कि मक्खी मच्छर आदि।

डी.डी.टी.सिलकोफ्लूराइड−क्लोरोडेन जैसे कीट नाशक रसायनों के छिड़काव से यह कीड़े या तो भाग जाते हैं, या नष्ट हो जाते हैं, किन्तु यह असर तभी तक रहता है जब तक उन उपचारित कपड़ों को धोया न जाय। धूप और हवा का प्रभाव भी इन रसायनों का असर घटा देता है ऐसी दशा में छिड़काव बार−बार करने की जरूरत पड़ती है। ऐसी खोज की जा रही है जिससे कपड़ा गोदामों में कई वर्ष तक इन कीड़ों से बचाव की निश्चिन्तता हो सके। मैगनशि फ्लुओसिलीकेट−− फ्लुओसिलीकेट, सोडियम एल्युमीनियम जैसे रसायनों से ऐसे घोल एवं चूर्ण बनाये जा रहे हैं जिनका प्रभाव पाँच वर्ष तक बना रह सके।

रसायन शास्त्री हेरिक और डा. फ्रोने इस प्रयोजन के लिए कितने ही रसायन तैयार किये हैं और उनमें से किसकी उपयोगिता कितनी है इसका प्रयोग परीक्षण चल रहा है। अब तक के निष्कर्षों से इस कार्य के लिए चिर परिचित नेपथलीन की अपेक्षा नई औषधि पैराडाइक्लोरा वेंजीन अधिक उपयोगी सिद्ध हो रही हैं।

इतनी खोज बीन और मार काट की विद्या अपनाने पर भी कीट विशेषज्ञ यही कर रहे हैं कि सील,सड़न,और गंदगी पैदा न होने देने की प्रवृत्ति जब तक लोगों में पैदा न होगी तब तक कीटकों से पीछा छुड़ाने को कोई उपाय अधिक कारगर सिद्ध न हो सकेगा।


रासायनिक आवेश हमें कठपुतली न बनाने पाये

कामोत्तेजना क्या है इस संदर्भ में कवि और कलाकार कुछ भी कहते रहें विज्ञानियों की दृष्टि में यह एक रासायनिक उत्तेजना मात्र है। कोई मादा जब गर्भ धारण के योग्य अपने आन्तरिक अवयवों को पुष्ट कर लेती है तो उसमें से एक प्रकार का विशेष स्राव निकलता है, यह वायु के साथ गंध रूप में मिल जाता है और हवा में उड़ क र नरों की सन्तानोत्पादन चेतना

को चुनौती देता है। वे इस अदृश्य आन्तरिक हलचल से उत्तेजित ही उठते हैं और मादा की आवश्यकता पूरी करने के लिए घर दौड़ते हैं। इसी प्रकार को कामोत्तेजना के रूप में देखा समझा जा सकता है। मादा के अन्तः स्राव जैसे ही बंद हो जाते हैं, नरों की उत्तेजनाएँ भी समाप्त हो जाती हैं और वे फिर होश हवास के सौम्य सदाचार की ओर वापिस लौट जाते हैं।

छोटे जीव सन्तानोत्पादन की उपयोगिता नहीं समझते इसलिए उनको वंश नष्ट हो जाने का खतरा रहता है। प्रकृति ने इस स्थिति को न आने देने को लिए उनके शरीर में एक गंध आवेगा यौनाकर्शी रस के रूप में उत्पन्न किया है। मादा के शरीर में समयानुसार जब यह मादक गंध उत्पन्न होती है तो वे प्रकृति की प्रेरणा को पूरा करने के लिए आतुर हो उठते हैं। और जैसे ही गुदगुदी उत्पन्न करने वाले संकेत बंद होते हैं, नशा उतर जाता है। इस प्रकार प्रकृति उनसे अग्ना वंश−वृद्धि को प्रयोजन पूरा करा लेती है और वे अनायास ही जनक जननी बनने की भूमा सम्पादित कर बैठते हैं।

मनुष्य की स्थिति इससे ऊपर है। इसीलिए प्रकृति ने उन्हें गंध आवेग से उत्तेजित होने का अवसर नहीं दिया है तरुणी नारी के शरीर से भी अन्य जीवों की तरह यौनाकर्ष रसायनों को गंध निकलती होगी पर वह मानवी विवेक से टकरा कर हतप्रभ ही हो जाती है और वह बहिन बेटा, आदि की मर्यादाओं का पालन करता हुआ जोड़ा बनाने से पूर्व हजार बार यह विचार करता है कि ग्रहस्थ को उत्तरदायित्व को निबाहने की क्षमता उसमें है कि नहीं? या फिर साथी का चयन करने में किन तथ्यों का ध्यान रखा जाय? सन्तानोत्पादन की संख्या निर्धारण करने में भी उसे विवेक से काम लेना पड़ता है। यही है मनुष्य और पशु के बीच का विवेक जन्य अन्तर।

पिछड़े हुए जीव,मात्र रासायनिक गंध उत्तेजना के आवेग से सन्तानोत्पादन करने के जुट जाते हैं, न साथी का चुनाव करने की कोई कसौटी उनके पास है और न संतान के लालन−पालन के लिए अपनी योग्यता उपयुक्त ता देखने की उनमें क्षमता होती है। मनुष्य भी यदि उसी स्तर का बन जाय तो उसकी विवेक शीलता और बुद्धिमता का कोई महत्व ही न रह जायगा।

प्राणियों की रासायनिक गंध किन्हीं आवेशों से उत्तेजित करके काम क्रीड़ा में प्रवृत्ति कर देती है। उनके स्तर को देखते हुए यह उचित भी हो सकता है पर मनुष्य के कर्तव्य और उत्तरदायित्व तो बहुत अधिक बड़े −बड़े है इसी लिए प्रकृति ने उसे गंध उत्तेजना के आवेगों से बच सकने और विवेक सम्मत रीति नीति अपना सकने के योग्य रखा है जब कि अन्य प्राणी एक प्रकार से बाध्य और विवश है।

कामोत्तेजना से प्राण्यों के समस्त शरीर में आवेश उत्पन्न होता है और उनकी विविध विधि गतिविधियाँ ऐसी उभरती हैं जिन्हें उन्मत्तता की संज्ञा दी जा सकती है। भँवीरी और डेयजल मक्खी की उड़ान सीधी साधी न रहकर कला बाजी जैसी बन जाती है और लगता है वह कोई नृत्य अभिनय कर रही है। केटिटिड साइक्डा और झींगुर जिन दिनों मदमस्त होती है उन दिनों उनकी झंकार में नये किस्म का स्वर और मिठास होता है। थोड़ों का अजीब तरह से हिनहिनाना, गधों का उन्मत्त होकर रेंकना, ऊंटों का असाधारण स्वर से बलबलाना यह बताता है कि वे अपनी साधारण स्थिति से आगे बढ़ कर किसी विशेष आवेश में ग्रसित हो रहे हैं। बिल्लियों का गम्भीर रूदन उनकी शारीरिक पीड़ा का नहीं वरन् उत्तेजित मनोव्यथा का परिचायक होता है। बन्दरों की कर्ण कटु किलकारियों में भी यह आभास होता है कि उनके भीतर कुछ असाधारण हलचल हो रही है।

साही का प्रणय काल उसके उछलने कूदने की व्यस्तता से जाना जा सकता है उन दिनों वह खाना,पीना, सोना तक भूल जाती है और बावली सी होकर लकड़ी के टुकड़ों को मुँह में देकर उन्हें उछालती हुई ऐसी दौड़ती है मानो उसे फुटबाल मैच में व्यस्त रहना पड़ रहा हो।

सर्प की प्रणयकेलि उनकी आलिंगन आबद्धता के रूप में दीख जाती है उन क्षणों वह अत्यंत भावुक और आवेशग्रस्त होता है। सर्प नहीं चाहता कि इस एकान्त सेवन में कोई और भागीदार हस्तक्षेप करे। यदि उसे पता चल जाय कि कोई लुक−छिप कर उसे देख रहा है तो सर्प क्रोधोन्मत्त होकर प्राणघातक आक्रमण कर बैठता है।

कितने ही नर−पशु इस आवेग में ग्रसित होकर एक दूसरे के प्राणघातक बन जाते हैं। उस आवेश में वे अपने प्राण तक गँवा बैठते हैं।

हिरनों में ऋतु काल स्वयंवर के लिए मल्लयुद्ध का रूप धारण करता है। इससे उनके सींग टूटते हैं, घाव लगते हैं और कई बार तो वे प्राण तक गँवाते हैं। हिरनियाँ इस मल्ल युद्ध को निरपेक्ष भाव से देखती रहती हैं और पराजित से सम्बन्ध तोड़ने ओर विजयी की अनुचरी बनने के लिए बिना किसी खेद के सहज स्वभाव प्रस्तुत रहती हैं। यही दुर्गति अगणित पशुओं की होती है। उनमें से आधे तो प्रायः इसी कुचक्र में क्षत−विक्षत होकर मरते हैं।

केवल नर ही इस स्वयंवर युद्ध में लड़−मरकर कष्ट उठाते हों सो बात नहीं। कई बार तो मादाएँ भी नरों की अविवेकशीलता के लिए उन्हें भरपूर दण्ड देतीं और नाच नचाती हैं।

नर गरुड़ को प्रणयकेलि की तभी स्वीकृति मिलती है जब वह मल्लयुद्ध में अपनी प्रेयसी को परास्त करने में समर्थ हो जाता है। ऋतुमती गरुड़ मादा नर को आमन्त्रण तो देती है पर साथ ही यह चुनौती भी प्रस्तुत करती है कि यदि वह पिता बनने योग्य है तो ही उस पद की लालसा करें। समर्थता को परखने के लिए मादा मल्लयुद्ध करती है और इस भयानक संघर्ष में नर के पंख नुच जाते हैं, घायल होने पर खून से लथपथ हो जाता इतने पर भी यदि वह मैदान छोड़कर भाग खड़ा न हो तो ही उसे गले में स्वयंवर की माला पहनाई जाती है। तब न केवल विवाह होता है वरन् नर को घर परिवार के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को सम्भलने में मादा की भरपूर गदद करने के लिए भी तत्पर होना पड़ता है।

मकड़ी, मछली और रेप्टाइल्स जैसे जन्तुओं की भाँति मेंटिस नामक टिड्डा मादा ही बड़ी और जबरदस्त होती है

, नर मेंटिस अपेक्षाकृत छोटा भी होता है और कमजोर भी। नर के लिए सम्भोग क्रिया उसका मृत्यु संदेश ही सिद्ध होती है। मादा द्वारा उत्तेजित किये जाने पर वह डरता सहमता उसके पास जाता है और धरती पर सिर रख कर आत्म समर्पण की मुद्रा में खड़ा हो जाता है। मादा उसे कस कर पकड़ लेती है कि वह छूट कर भाग न सके। गर्भाधान में मादा को ही देर तक पुरा श्रम करना पड़ता है, अस्तु वह थक भी जाती है भूखी भी होती है। तब उसे निखट्टू नी को ही चट कर जाने की बात सूझती है और वह बिहार के बाद आहार का साधन भी उसी को बना कीर समाप्त कर देती है। नर मेंटिस जीवन में प्रायः एक ही सुहागरात देख पाते हैं।

बोनिला पक्षी नर को आजीवन मादा का दास बन कर रहना पड़ता है। भोजन जुटाने का काम मादा करती है, इसके बदले बच्चों के लालन−पालन का भार उसे ही वहन करना पड़ता है। हिपोकेम्पस पाइपफिश और फोटोकोरिनस मछलियाँ इतनी दबंग होती है कि जिस नर को वशवर्ती बना लेती हैं उससे दास जैसा व्यवहार करती हैं।

कामोत्तेजना को प्रकाश के रूप में परिणय किया जा सकता है। जुगनू जैसे कीटकों में यह प्रकाश चमक के रूप में मनोरम दीखने और सुहावना लगने तक ही सीमित रहता है पर वह मनुष्य द्वारा तो ओजस् शक्ति में विकसित किया जा सकता है और उससे सर्वतोमुखी समर्थता विकसित करने का लाभ लिया जा सकता है।

जुगनू की चमक टिमटिमाहट कितनी मोहक होती है, रात के अन्धकार में जब वह छोटे तारों की तरह उड़ते−चमकते दिखाई पड़ते हैं तो लगता है आकाश से ऊपर कर धरती पर खेलने लगा हो

जुगनू की चमक क्या है? जुगनू की पूँछ के पास तीन पदार्थ भरे होते हैं। लूसीफरिन रसायन द्रव, लुसीफरेस ऐं जाइम एडी−नोसिन ट्राइफास्फेट यौगिक− इन तीनों का सम्मिश्रण चमक उत्पन्न करता है पर करता तभी है जब उसे एक विशेष प्रकार की मानसिक उत्तेजना होती है। जीव−विज्ञानी कहते हैं कि यह कामोत्तेजना ही है जो इन रसायनों को चमक में बदल देती है। इस उत्तेजना के अभाव में जुगनू उड़ते तो रहते हैं पर चमकते नहीं।

जुगनू में पाये जाने वाले लूसीफरिन ओर लूसीफोस रसायन मनुष्यों में भी पाये जाते हैं। उनके द्वारा शारीरिक और मानसिक अनेक क्रिया −प्रक्रियाएँ संपन्न होती हैं चमक भी पैदा होती है पर होती तभी है जब उनके साथ भावनात्मक उत्तेजना का संपर्क हो। जीव विज्ञानी कहते हैं कि जुगनू के लिए उतनी तीव्र उत्तेजना हो उसके रसायनों को चमका सके केवल कामोत्तेजना ही हो सकती है। आहार आदि की सामान्य आवश्यकताएँ उस स्तर की नहीं होतीं जो उसे चमकने क स्थिति में ला सकें। मादा जुगनू जब रति संयोग के लिए उद्विग्न होती है और नर जुगनू जब उसके पीछे− पीछे मनुहार करते हुए चक्कर लगाते हैं तभी उनकी पूँछ चमकती है ओर मनोरम दृश्य दिखाई पड़ते हैं।

प्रकृति ने मनुष्य को विवेक दिया है और अन्य कीटकों की तरह गन्ध आवेशों के कारण उन्मत्त हो उठने की दुर्बलता से मुक्त रखा है। इसके पीछे नियति का यही उद्देश्य काम कर रहा है कि वह अपने भीतर भरी हुई अति महत्वपूर्ण व्यक्ति को आवेश− ग्रस्तता में बर्बाद न करें। प्रजनन प्रकरण में अति सतर्कता बरते और मानवोचित आदर्श की प्रतिष्ठापना करें। विवेक हमें वस्तु−स्थिति समझाता है पर कामोद्वेग और कुछ नहीं मात्र जड़−पदार्थों में रासायनिक द्रव्यों उत्पन्न की जाने वाली उत्तेजना मात्र है। कुछ रसायन मनुष्य पर बेतरह हावी हो जाँय और उसे कठपुतली की तरह नाच नचा कर अधः पतन के गर्त में धकेलें यह किसी प्रकार शोभनीय नहीं।


श्रेय (kahani)

परिषद के प्राँगण में लेखन के सभी उपकरण एकत्रित हुए और साहित्य सृजन में अपनी−अपनी भूमिका का बढ़−चढ़ कर उल्लेख करने लगे।

कलम ने कहा — जो कुछ लिखा गया है उसका श्रेय मुझे मिलना चाहिए। स्याही बोली— मेरे बिना लेखन का कार्य एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। हाथों ने कहा — हम जो घिसते पिसते हैं —सो?

मस्तिष्क ने कहा— तुम सबका कथन अपने स्थान पर सही है। पर यह क्यों भूल जाते हो कि तुम लोगों से आगे भी कोई अदृश्य चेतना है जो उस प्रयोजन को पूरा करती है जिसका श्रेय लेने के लिए तुम्हारी आतुरता उमड़ रही है।


Quotation

फार्म 4

प्रकाशन का स्थान— मथुरा

प्रकाशन का अवधि क्रम—मासिक

मुद्रक का नाम— मृत्युञ्जय शर्मा

राष्ट्रीयता — भारतीय

पता—जनजागरण प्रेस, मथुरा

प्रकाशक का नाम— मृत्युञ्जय शर्मा

राष्ट्रीयता—भारतीय

सम्पादक का नाम— भगवती देवी शर्मा

राष्ट्रीयता — भारतीय

पता— अखण्ड−ज्योति संस्थान मथुरा

स्वत्वाधिकारी — श्रीराम शर्मा आचार्य

पता— अखंड−ज्योति संस्थान मथुरा

मैं, मृत्युञ्जय शर्मा यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं। —हस्ताक्षर, मृत्युञ्जय शर्मा


कम खायें− अधिक जीयें

कार्मल−विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में अमेरिकी वैज्ञानिक डाक्टर ने 2500 सफेद चूहों पर परीक्षण किया। प्रयोग अवधि में उनमें से कुछ को भर पेट भोजन दिया गया, कुछ को अधिक तथा कुछ को कम। इन चूहों में अधिक भोजन वाले चूहे तो जल्दी मर गये, जिन्हें भरपेट खाना मिला था वे चूहों की वास्तविक आयु से कम समय तक जिन्दा रहे परन्तु जिन्हें कम आहार दिया था वे पूर्ण आयु ही नहीं अधिक समय तक भी जिये।

प्राणि विज्ञान के अनुसार चूहों पर भोजन का प्रभाव मनुष्य शरीर की ही भाँति होता है। प्रयोग में, उपयोग में लाये गये चूहों पर जिन्हें भूख से आधा भोजन मिला था वे अधिक समय तक जीवित रहे। यद्यपि भूखे रहने के कारण उनकी शारीरिक शक्ति अन्य चूहों की अपेक्षा क्षीण हो गयी थी परन्तु इसके बदले उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ गयी, वे दुर्बल भी हो गये थे परन्तु साथ ही अन्य चूहों की अपेक्षा अधिक स्फूर्तिवान बन गये। उनके हृदय की धड़कन 400 के स्थान पर 300 ही रह गयी, उनका जीवन धीरे−धीरे चलते हुआ अपनी निर्धारित धड़कनों को पूरा करता था किन्तु मस्तिष्क की शक्ति में कई गुनी वृद्धि हो गयी।

इसी प्रकार रूस की एक प्रयोगशाला में 200 चूहों को 50−50 के चार समूहों में रखा गया और उन्हें पौष्टिक भोजन जिसमें शरीर के लिए सभी आवश्यक तत्व सम्मिलित थे कम मात्रा में दिया गया। ये चूहे प्रयोग के आरम्भ में ढलती आयु के थे और प्रयोग के दौरान इन्हें अलग अलग प्रकार का भोजन दिया गया जिनमें कुछ को तो पूरा आहार मिलता था कुछ को फालतू की चीजें भी दी जातीं। इन प्रयोगों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि भूखे पेट रहने वाले चूहों में सभी खाद्य पदार्थ को हजम कर जाने की शक्ति और क्षमता आ गयी। रूस के वैज्ञानिक इन प्रयोगों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि − भूख के कम मात्रा में, कम पोषण की चीजें खाने पर दीर्घ समय तक जीवित रहा जा सकता है।

अधिक भोजन का लोभ स्वाद लिप्सा के कारण ही जन्म लेता है जो खाद्य पदार्थों में रसानुभूति के कारण ही पैदा होती है। इस मान्यता को जितनी जल्दी संशोधित किया जाय अच्छा है, जिसके अनुसार हम स्वाद और रस के लिए कुछ भी खाते रहते हैं और इसी कारण भोज्य पदार्थों की पौष्टिकता बड़ी निर्ममता से पकाकर, जला कर, छील पीस और उबालकर समाप्त कर देते हैं। शरीर तो फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार उचित प्रकार का ही भोजन माँगता है लेकिन हम उस माँग की अभिव्यक्ति −रुचि के अनुरूप भी खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट बनाने के लिए उसकी मूल विशेषता ही समाप्त कर देते हैं।

स्वाद लिप्सा का निराकरण कर देने पर निश्चित ही आवश्यक मात्रा में आहार ग्रहण कर लेने के बाद शरीर और पेट सन्तुष्ट हो जाता है, अमेरिकन डाक्टर मैक्केने चूहों पर किये गये प्रयोगों के निष्कर्षों को साररूप में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि —” पहले वह भोजन खाओ जो खाना आवश्यक है फिर वह जो तुम्हें रुचता है − किन्तु अधिक कभी मत खाओ।”

मिताहार के पीछे यही सिद्धान्त काम करता है जिसके अनुसार − पाचन शक्ति लिए गये आहार को ठीक प्रकार से पचा सके। वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा इसी निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि स्वाद लिप्सा को त्यागकर, पौष्टिक और शरीर की माँग के अनुसार भोजन करना दीर्घायु जीवन का आधार बन सकता है।


क्या सचमुच धर्म और राजनीति के दिन लद गये?

कोई जमाना था जब धर्म और राजनीति की तूती बोलती थी। वे दिन तब ये जब धर्म का उद्देश्य लोगों के दिलों को जोड़ता और राजनीति का लक्ष्य सुरक्षा एवं, सुव्यवस्था था। उन दिनों इन दोनों धाराओं को लोग−श्रद्धा प्राप्त थी। इसलिए उनकी जड़े गहरी थी और जड़ों में मजबूती देखी जाती थी। धर्माचार्य भी श्रद्धा के पात्र थे और राजसंचालक भी। पर अब स्थिति बदल गई। इन दोनों में अपना मूल प्रयोजन छोड़ दिया और निहित स्वार्थ का आश्रय अंगीकार कर लिया।

धर्म अब थोथी, कपोल कल्पनाओं, ठगी और भ्रान्तियों का केन्द्र बन गया है। निहित स्वार्थों द्वारा भोले भावुकों को श्रम जंजाल में उलझा कर अपना उल्लू सीधा करते रहने की विडम्बनाओं से अब धर्मक्षेत्र बेतरह घिर गया है। छुट−पुट कर्मकाण्डों द्वारा मुक्ति प्राति जैसी सस्ती युक्ति यों में उलझे तथाकथित धार्मिक व्यक्ति अब चरित्र शोधन और परमार्थ प्रयोजन की कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाने का साहस नहीं करते। इसी प्रकार पापकर्मों के दण्ड से बच निकलने की गंगास्नान जैसी तरकीबें हाथ लग जाने से धार्मिक व्यक्ति को निर्भय हो कर दुष्कर्म करने की भी छूट मिल जाती है। मंत्र जप से देवता जब किसी के गुलाम बन सकते हैं तो मनुष्यों पर क्यों अधिपत्य न जमाया जा सकेगा, यह सोच कर लोगों की पूजा अर्चा बड़ी−बड़ी भौतिक महत्वकांक्षाओं से जोड़ दी जाती है। जब लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती तो खीज ही हाथ लगती है। दूसरी ओर विचारशील वर्ग जब देखता है कि इस क्षेत्र में लगने वाली जनशक्ति और धनशक्ति का उपयोगी प्रतिफल नहीं मिल रहा तो उन्हें भी निराशा होती है। अनैतिक और अवाँछनीय रूढ़ियों का समर्थन करने से तो धर्म और भी अधिक वरदान होने वाला है। ऐसे−ऐसे कारणों ने मिल कर धर्म के प्रति एक खीज पैदा कर दी है। पुरातन पन्थी उससे किसी कदर चिपके जरूर हैं पर लोकश्रद्धा बेतरह टूटती जा रही है। अनुपयोगिता को देर तक समर्थ नहीं मिल सकता,धार्मिकता का स्तर गिरकर साम्प्रदायिक तक सीमाबद्ध हो गया है। उससे अकारण वर्ग विद्वेष बढ़ रहा है। वस्तु स्थिति का मूल्याँकन करने वाला लोक विवेक अब उससे हट रहा है और धार्मिकता की जड़े खोखली हो रही हैं स्पष्ट है कि युग की प्रचण्ड समस्याओं का हल करना रुग्ण और जराजीर्ण धार्मिकता के बस की बात नहीं रही।

अनुपयोगी को हटा कर उपयोगी को स्थानापन्न करने का नियति−क्रम धर्म के स्थान पर अध्यात्म की प्रतिष्ठा करने जा रहा है। धर्म और सम्प्रदाय का अन्तर स्पष्ट है। धर्म परम्पराओं और कर्मकाण्डों से घिरी हुई अन्ध −श्रद्धा पर आधारित है। वह अमुक वर्ग विशेष क बपौती बन कर रहता है अध्यात्म का लक्ष्य इससे ऊँचा है, व चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाने की दार्शनिक प्रेरणा है। अन्तरंग जीवन में श्रेष्ठता का बहिरंग जीवन में उदार स्नेह सहयोग का — अभिवर्धन यही अध्यात्म का लक्ष्य है। आत्मवत् सर्व भूतेषु और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना अपना कर अध्यात्मवादी की अधिकाधिक पवित्र और उदार बनना पड़ता है। अपने सुखों का बाँट देने और दूसरों के दुख बँटा लेने की अन्तःकरण प्रबल होती है और अनेकता में से एकता ढूंढ़ निकालने की दृष्टि रहती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण अध्यात्म किसी वर्ग विशेष की सम्पत्ति न रह कर सार्वभौम रहता है। समुद्र में सभी नदियाँ जा मिलती है। धर्ममत विभेदों का अन्त अध्यात्म के महासागर में ही होता है।

राजनीति की उपयोगिता तभी रही जब शासनकर्ता प्रजाहित के लिए ही जीते−मरते थे। वस्त्र वे भले ही सन्त जैसे न पहनते हों पर लोकमंगल का उदार दृष्टिकोण वैसा ही रख कर वे अपनी रीति−नीति निर्धारित करते थे। अध्यात्म और नीति को ह राज्याश्रय मित्रता था। आदर्शवादी वरिष्ठता को सत्ता द्वारा समर्थ, प्रोत्साहन मिलता था। उन दिनों प्रजा, राज्य−निदेर्शो के शिरोधार्य करना अपना पावन कर्त्तव्य मानती थी। “ दिल्लीश्वरौवा जगदी श्वरोवा की उक्ति में देश भक्ति, ईश्वर भक्ति का त्रिविध समन्वय था। राज द्रोह उस समय धर्म द्रोह जैसा हेय कर्म था। तब राज्यसत्ता का स्वरूप भी तो श्रेष्ठता का सत्ता सज्जन बनाये रखना ही तो था। ऐसी दशा में राजसत्ता का समर्थन करना जनता के लिए उचित ही था और वह उसकी छाया में अपना कल्याण देख कर राजभक्त रहती थी तो वह भी उपयुक्त ही था।

आज राजनीति का उद्देश्य भी बद गया और स्वरूप भी। अब कूटनीति का ही दूसरा नाम राजनीति है। शत्रुओं के साथ दाव−घात चलने से आरम्भ हुई कूटनीति मित्रों को भी उसी लपेट में लेती है। अब राजनीति के लिए प्रजाहित मुख्य नहीं रहा वरन् शासन की जड़े मजबूत करना रहा गया है। इसके लिए प्रजाहित मुख्य नहीं रहा वरन् शासन की जड़ें मजबूत करना रह गया है। इसके लिए प्रजा को असुविधाओं और कठिनाइयों में धकेलने से शासन तनिक भी नहीं झिझकता। सत्ता के लिए संघर्ष ने उस क्षेत्र में अराजकता जैसी, शीत गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। राजनीति में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति सत्ता हथियाने और उससे लाभ लेने के लिए आतुर रहता है। सत्ता के लिए संघर्ष में इतने घिनौने दाव−पेज चलाये जाते हैं कि उसकी चपेट में आने वाले भोजे प्रजाजन भी अपना सहज सन्तुलन खो बैठते हैं। चुनावों के कारण जितना विद्वेष उत्पन्न होता है, उतना शायद ही अन्य किसी कारण से होता हो। चुनाव लड़ने वाले विष बीज बखेर कर किसी कोंतर में जा बैठते हैं, पर जन−जीवन को वह विषाक्तता देर तक उद्विग्न किये रहती है। अब राज्य घोषणाओं को यथार्थता नहीं माना जाता — अब शासन की न्याय−नीति पर विश्वास उठ चला। उस क्षेत्र में होने वाली हलचलों को देखकर सामान्य बुद्धि यह सोचने लगती है कि यह शासन विहीन समाज रहता तो अब की अपेक्षा कुछ अच्छा ही रहता बुरा नहीं।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की शतरंज जिस क्रम से खेली जा रही है उसने संगठित शोषण की जड़ें मजबूत बनाने का ही पथ प्रशस्त किया है। युद्ध को प्रोत्साहन मिला है और विज्ञान की सत्ता राजसत्ता के हाथ में चली जाने से विश्व−वसुधा के सर्वनाश की आशंका रोमांचकारी विभीषिका धन कर सामने आई है। ऐसी अनेक आशंकाओं ने राज्यसत्ता का स्वरूप किसी गुट विशेष का आतंक आधिपत्य समझा जाने लगा है। सामान्य जनता उससे अपना हित कम और अहित अधिक होने की बात सोचती है। राजनेता अब श्रद्धा के पात्र नहीं रहे, उन्हें स्वार्थी− तत्वों की चापलूसी भर हाथ लगती है। अब धर्म− ध्वजी और सत्ताधारी लगभग एक ही पंक्ति में बैठते जा रहे हैं। धर्मधारणा की तरह ही राजनीति के आश्रय में भी अपना कल्याण नहीं सोचते।

राजनीति का नया विकल्प अब जन−साधारण के सामने है— ‘ विज्ञान’। दूरगामी विवेकशीलता के सहारे मनुष्य मात्र को एक परिवार मान कर समस्याओं को हल करना दार्शनिक विज्ञान का काम है। न्याय और एकता की रक्षा के लिए पिछले दिनों शस्त्रधारी सैनिक नियुक्त रहते थे। अब वह शक्ति भौतिकी के हाथों चली गई है। साइन्स की बलिष्ठता और वरिष्ठता अब इतनी आगे बढ़ गई है कि सत्ता की सुरक्षा के लिए सामान्य सैनिकों की अब विशेष आवश्यकता नहीं रह गई।

विज्ञान सत्य के निकट है। उसकी खोजों तथ्यों का रहस्योद्घाटन करने की लालसा ने ही सम्भव की हैं।इसलिए विज्ञान को सत्य की सन्तान कह सकते हैं। लोग वैज्ञानिक उपलब्धियों को ही विज्ञान मान बैठते हैं पर यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाये तो विज्ञान एक दार्शनिक दृष्टिकोण प्रतीत होगा, जिसका उद्देश्य हैं, सत्य का रहस्योद्घाटन करना और उपलब्धियों के उपयोग पर दूरगामी व्यापक दृष्टि ही आज कीं उलझी समस्याओं के ऐसे, हल निकाल सकता है जो चिरस्थायी सुख−शान्ति के आधार बन सकें। राजनीति तो क्रमशः उलझनें बढ़ाती ही चली जाती है, उस पर क्षेत्र अथवा वर्ग के लाभ का इतना गहरा नशा चढ़ गया है कि सार्वभौम एवं सर्वमान्य हल निकालने के लिए उसके प्रयास सफल हो सके। न्याय और विवेक का परित्याग कर वर्ग स्वार्थों के समर्थन में खड़ी राजनीति के लिए अब मानवी समस्याओं का हल करना तो दूर— उनका यथार्थ स्वरूप समझ सकना भी सम्भव नहीं रहा। युग की माँग अधिक प्रखर आधारों को खोज रही है। प्रगति की इन दो शताब्दियों में उलझनों की भी प्रगति हुई है। विज्ञान ने सारी दुनियाँ को एक छोटे से नगर के रूप में और समस्त मानव जाति को एक छोटे से परिवार के रूप में साधन बना दिया है। तदनुसार बिखरी हुई उलझनें, समस्याएँ और विकृतियाँ भी सघन हुई हैं और स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि करो या मरो स्तर पर हमें इधर या उधर में से एक का फैसला करना पड़ेगा। स्पष्ट है कि मानव जाति के भाग्य और भविष्य का फैसला करने वाले इन क्षणों क में धर्म और राजनीति दोनों ही अनुपयोगी सिद्ध होंगे। इनके स्थान पर अध्यात्म और विज्ञान को प्रतिष्ठापित करना होगा। मनुष्य समाज के अंतरंग जीवन को परिष्कृत बनाने के बागडोर अध्यात्म ही सम्भाल सकता है और बहिरंग व्यवस्था में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना कर ही उपयुक्त समाधान निकल सकता है। अगले दिनों इन्हीं दो तथ्यों को मान्यता देनी पड़ेगी। सन्त बिनोवा का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि— धर्म और राजनीति के दिन लद गये। अब अध्यात्म और विज्ञान के वर्चस्व की प्रतिष्ठापना होगी।


अनीति को जीवित रहते सहन नहीं करना चाहिये (kahani)

सोम नाथ का मन्दिर लूट कर महमूद गजनबी वापिस गजनी जा रहा था। उसके साथ एक लाख सेना थी।

एक पड़ाव पर जैसे ही सेना पहुँची कि डेढ़ सौ घुड़सवारों का एक जत्था लोहा लेने के लिये तीर की तरह बढ़ता आ रहा उनने देखा। टुकड़ों का नेतृत्व एक सत्तर वर्ष का बूढ़ा राजपूत कर रहा था।

महमूद गजनबी समझ नहीं सका कि इतनी छोटी टुकड़ी आखिर क्यों एक लाख सेना से लड़ कर अपने को समाप्त करने आ रही है। उसने दूत भेजा और इन लड़ाकुओं का मंतव्य पुछवाया।

बूढ़े नायक ने कहा— बादशाह से कहना — संख्या और साधन− बल में इतना अन्तर होने पर भी लड़ने का क्या परिणाम हो सकता है सो हम जानते हैं। पर भूलें यह भी नहीं कि अनीति को जीवित रहते सहन नहीं करना चाहिये।

घुड़सवारों की टुकड़ी जान हथेली पर, रख कर इस तरह लड़ी कि डेढ़ सौ न देखते−देखते डेढ़ हजार को धराशायी बना दिया। भारी प्रतिरोध में वह दस मर खप कर समाप्त हो गया। पर मरतेदम तक वे कहते यही रहे सदि हम प्रतिरोधी एक हजार भी होते तो इन एक लाख से निपटने के लिये पर्याप्त थे।

इस बिजली झपट लड़ाई का महमूद पर भारी प्रभाव पड़ा। वह राजपूतों की अद्भुत वीरता पर अवाक् रह गया। भविष्य की नीति निर्धारित करते हुए उसने नया आधार ढूँढ़ा। भारतीयों को बल से नहीं जीता जा सकता, उन पर विजय पाने के लिए छल का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि इस देश के निवासी छल से परिचित ही नहीं है।


हमारा दृष्टिकोण दुराग्रही न हो

कई बार नवीन या प्राचीन में से किसी एक पर बहुत जोर दिया जाता है और उनके जो स्वरूप सामने होते हैं उन पर बहुत आग्रह रखा जाता है। हमें सन्तुलित दृष्टि विकसित करनी चाहिए और इन नवीनता के आकर्षण और प्राचीन के भदरंग को देखते ही कोई भावुक निष्कर्ष हीन निकाल लेना चाहिए। नवीन हो अथवा प्राचीन दोनों में औचित्य हो सकता है और दोनों में अनुपयोगी भरी रह सकती है, ऐसी दशा में दूरदर्शी विवेक,बुद्धि के आधार पर तथ्य और सत्य का गम्भीर पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए और जो कुछ, जितने अंश में उपयोगी एवं सारगर्भित हो उसे साहस पूर्वक स्वीकार क र लेना चाहिए। प्राचीनता अथवा नवीनता में से किसी के प्रति भी दुराग्रह किये बिना।

अति उत्साही लोग प्राचीन और नवीन को तो स्वतंत्र पक्ष मान बैठते हैं— यहाँ तक कि उन्हें परस्पर विरोधी भी समझने लगते हैं, पर वस्तुतः ऐसा कुछ है नहीं। नदी में जल प्रवाह बहता है जो पीछे से चला आ रहा है, वह अविज्ञात है, भविष्य है। जो सामने है वह नवीन है। पर यह नवीन लहरें जैसे ही कुछ दूर आगे बढ़ जायगी कि उन्हें प्राचीन भूतक लीन कहा जायगा। इससे स्थिति में कुछ अन्तर नहीं आता। प्रवाह अनवरत है, वह चलता ही रहेगा। भूत,वर्तमान और भविष्य की तिकोनी हलचलों के साथ समय का चक्र घूमता ही रहेगा, इसमें से किसी तथ्य का अभिवादन इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि वह नवीन है और प्राचीनता की अवमानना करना ही उचित है। हमें तथ्याग्राही, तत्वदर्शी होना चाहिए।

बीज−बीज से, वृक्ष−वृक्ष से, फल−फल से पुनः बीज यह एक अनवरत धारा है। भूत, भविष्य, वर्तमान का काल प्रवाह उस अविछिन्न धारा को समझने में सहायता भर कर सकता है, प्रक्रिया का खण्ड रूप में पृथक्करण नहीं कर सकता है। भोजन पेट में जाता है— पचता है, मल बनता है, तदुपरान्त खाद बन कर अन्न का सृजन करता है और फिर आहार के रूप में सामने आ उपस्थित होता है। पुरातन ही समय के प्रवाह में नवीन बनता है और नवीन को वर्तमान की परिधि पार करते ही पुरातन की संज्ञा दी जाती है। वस्तुतः इस संसार में नवीन कुछ है ही नहीं। तथ्य सीमित है उन्हें दी परिस्थितियाँ और विकृतियाँ उपयोगी−अनुपयोगी बनाती रहती हैं। हमारा चिंतन और प्रयास इसी के संशोधन को होना चाहिए। ग्राह्य और अग्राह्य का निर्णय करते समय प्राचीनता और नवीनता का वर्ग दुराग्रह आड़े नहीं आने देना चाहिए।

जो कुछ नवीन है वह सबका सब उचित उपयोगी और ग्राह्य ही हो, ऐसी बात कहाँ है? और न समस्त पुरातन ऐसा है जिसे उखाड़ कर फेंक देना ही श्रेयस्कर कहा जा सके।

भूत से शिक्षा ली जानी चाहिए, अनुभव एकत्रित किये जाने चाहिए और निष्कर्ष निकालना चाहिए। और निष्कर्ष निकालने चाहिए। क्योंकि उसका प्रत्येक पहलू सामने होता है और पर्यवेक्षण के लिए बहुमुखी तथ्य सामने रहते हैं। इसी प्रकार भावी महत्वकाँक्षाओं की नींव वर्तमान पर रखी जानी चाहिए। कल को हमें किस रूप में गढ़ना है, इसके लिए योजनाएँ बना लेना,कल्पनाएँ रच लेना काफी नहीं उन्हें वर्तमान की भट्टी में पका कर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि स्वप्नों को साकार रूप मिल सके। इस प्रकार भूत भविष्य और वर्तमान तीनों ही हमारी आज की विविध आवश्यकताओं को हल करने के उपयोगी माध्यम हैं। इनमें से अपेक्षा किसी की भी नहीं की जा सकती।

भूतकाल को विस्तृत कर दिया जाय और पिछले घटना क्रमों ने जो निष्कर्ष उपस्थित किया है यदि आउट आफ डेट कह दिया जाय, उपेक्षणीय ठहरा दिया जाय तो फिर उन खट्टे–मिट्ठे अनुभवों और निष्कर्षों के लाभ से वंचित होना पड़ेगा जो मानव जाति ने चिरसाधना के उपरान्त एकत्रित किये है। तब हमें आदिम युग से लेकर अब तक की प्रगति प्रक्रिया को बहिष्कृत करके इतिहास का अर्थ आरम्भ करना पड़ेगा। यह बहुत ही महंगी और कष्टकर प्रक्रिया होगी और एक प्रकार से असम्भव ही मानी जायगी। भूत ने जो कटु और एक प्रकार से असम्भव ही मानी जायगी। उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है और भविष्य निर्धारण को सरल बनाया जा सकता है।

इसी प्रकार भविष्य की, आकाँक्षाओं की, यदि वर्तमान साकार रूप देने के लिए वर्तमान की कठोर साधना के साथ नियोजित करना होगा। आज का वर्तमान ही कल का भविष्य बन कर सामने आने वाला है। इसलिए इस त्रिवर्ग को हमें विवेकपूर्ण मान्यता देनी पड़ेगी और बिना एक पक्षीय पूर्वाग्रह कर अड़े, यही नीति अपनानी होगी कि औचित्य को अंगीकार करें और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता की रीति−रिवाज अपनायें। नवीनता और प्राचीनता में से किसी का अत्यधिक समर्थन करके हमें भूत और भविष्य को वर्तमान से काटने का प्रयत्न करते हैं। इसमें लाभ कम और हानि अधिक हैं। भूत को वर्तमान से काट देने पर भविष्य का निर्माण सरल नहीं होगा वरन् कठिन और जटिल ही बनता जायगा।

भूतकालीन मान्यताएँ, प्रथापरम्पराएँ आज की स्थिति में भी पूर्णतया बहिष्कृत कर देने योग्य नहीं हैं। उनमें से कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें उपेक्षित करके हम मानवी मूल्यों को ही गँवा बैठेंगे और व्यक्ति गत चरित्र निष्ठा एवं सामाजिक सुव्यवस्था की नींव खोखली करेंगे। भूत−कालीन व्यवस्था में मानव−जीवन के मूल्यांकन का दार्शनिक दृष्टिकोण जिस उच्च स्तर पर किया गया है, उससे बढ़िया शायद ही कुछ ‘नवीन’ खोजा जा सके। चरित्रनिष्ठा और सामाजिक सद्भाव के लिए धर्म और अध्यात्म की आधारशिला जिस आत्मा−परमात्मा, कर्मफल, पुनर्जन्म, पुण्य, परमार्थ, स्वर्ग मुक्ति की मान्यताओं पर रखी गई है, उसे हटा मिटा कर मानवी उत्कृष्टता का दार्शनिक आधार फिर कदाचित ही कोई दूसरा प्रस्तुत किया जा सके।

पिछले कुछ दिनों तथाकथित नवीन एवं प्रगतिशील दार्शनिक प्रतिपादक अति उत्साहपूर्वक सामने आये हैं। नास्तिकवाद, भौतिकवाद, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की चर्चा और प्रतिष्ठा बहुत जोर−शोर से की जाती रही है। साथ ही प्राचीन प्रतिपादनों पर भरपूर व्यंग किया जाता रहा है। इस संदर्भ में भारतीय धर्म, अध्यात्म, दर्शन पर कम प्रहार नहीं हुए हैं। पर अब वह उत्साह ठण्डा पड़ गया। आधुनिकतावादी अब नये ढंग से विचार करने लगे हैं। चिन्तन में भौतिक तथ्यों का समावेश करने का परिणाम चरित्रहीनता, उच्छृंखलता और असामाजिकता के रूप में सामने आया है। जिस भौतिकवादी आस्थाओं के आधार पर श्रेष्ठ और सुखी समाज की कल्पना की जाती थी, वह अब खोखली और धूमिल हो चली। अवाँछनीय के नाम पर खड़ा किया गया विद्रोह अब वाँछनीय को भी बख्शने के लिए तैयार नहीं उस अन्धड़ ने सब कुछ उड़ा देने, उजाड़ देने की ठान ठानी है। इस उपद्रव ने आधुनिकता के अन्ध समर्थन को शिक्षित कर दिया है और विचारक वर्ग यह सोचने के लिए विवश हो रहा है कि प्राचीनता को सर्वथा बहिष्कृत कर देना न तो बुद्धिमान पूर्ण होगा और न दूरदर्शितापूर्ण। कुछ दिन पूर्व जिनने विप्लव और विद्रोह के स्वर गुँजाये थे और जो है उसमें आग लगा कर नई दुनियाँ बसाने के सपने देखे थे, वे अब पुनर्विचार करने को बाध्य हुए हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि प्राचीनता को सर्वथा बहिष्कृत करके नवीनता का अभिनव सृजन बहुत महंगा पड़ेगा। भलाई इसी में है कि प्राचीनता में जितनी उपयोगिता है, उसे सम्भाले, सँजोये रहा जाय और उसे साथ लेकर मिली−जुली सृजन योजना बनाई जाय।

घर के दरवाजे खुले रखे जायँ ताकि हवा और रोशनी का प्रवेश हो सके,यह ठीक हैं, पर आँधी तूफान के क्षणों में भी दरवाजे खुले ही रखे गये और मक्खी, मच्छरों, श्वान, शृंगालों का प्रवेश अनिरुद्ध रखा गया तो फिर घर बनाने और दरवाजे लगाने का कोई प्रयोजन ही न रह जायगा। जो आने योग्य है, वही घर में घुसने पायें, इस विवेक को बनाये रहने में ही उसकी उपयोगिता है। बुद्धिवाद की सार्थकता उसी में है कि वह काल, मोह का पक्षपात न करके औचित्य को ही मान्यता प्रदान कर। इस प्रकार का चिन्तन आज बढ़ रहा है और आर्थिक एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ−साथ यह भी आवश्यक समझा जा रहा है कि चिन्तन की उत्कृष्टता बनाये रहने वाली प्राचीनता को भी मानवी आवश्यकता का−प्रगति का −एक अंग स्वीकार किया गया।

पेड़ में नई कोपलें, नये फूल फल आते हैं सो स्वागत और सराहना के योग्य हैं पर उन पुरानी जड़ों की अवमानना नहीं की जानी चाहिए जो जमीन से रस खींच कर पेड़ को सजीव रखती हैं उसी पुष्प पल्लवों को विकसित होने का अवसर देती है। बसन्ती फूलों का गुणगान करते समय पुरातन जड़ों को उपेक्षणीय, कुरूप और प्रतिगामी नहीं ठहराना चाहिए। साहित्य, कला, शिल्प, कृषि, विज्ञान, व्यवसाय, चिकित्सा, शिक्षा आदि विषयों में पुरातन की उपलब्धियों ने हमें वर्तमान प्रगतिशील स्थिति तक पहुंचाया है। इसी प्रकार आदिम युग की पाशविकता से चिन्तन, चरित्र एवं समूह के सम्बन्ध में क्रमिक प्रगति ने आज का सुसंगठित समाज विकसाया है। इस प्राचीनता में निश्चित रूप से ऐसे आधार मौजूद हैं और सर्वांगीण प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं। यदि अति उत्साह भरे विद्रोही स्वर पुरातन के नाम से चिढ़ते रहे और प्राचीनता को उखाड़ फेंकने की आवेश−ग्रस्तता में ही उत्तेजित रहे तो इससे उस लक्ष्य को भी प्राप्त नहीं किया जा सकेगा जिसके लिए वह आवेश उत्पन्न किया गया था। ऐसी विवेकहीन क्रान्ति प्रतिगामी, प्रतिक्रान्ति भी सिद्ध हो सकती है।

बुद्धिवाद का अधिकाधिक विस्तार हो,यह स्वागत के योग्य है। परन्तु उसके पीछे मानवी आदर्शों के अनुकूल चलने की प्रेरणा होनी चाहिए। उच्छृंखल बुद्धिवाद की कसौटी पर व्यभिचार, छल, हिंसा, असत्य, आदि को अवाँछनीय नहीं ठहराया जा सकता है। वैयक्तिक क स्वतन्त्रता और सामाजिक मृदुलता के लिए ठोस समर्थन नहीं मिल सकता। आदर्शों की बात तब बुद्धिमानों द्वार मूर्खों को बहकाने के लिये ही कुछ काम की खोज ठहराई जा सकती है सत्ताधारियों ने चतुर−व्यक्ति यों ने — समय−समय पर ऐसा ही दृष्टिकोण रखा भी है। यदि यही लोक−नीति बन जाय तब फिर यहाँ एक दूसरे को नोंच खाने वाले भेड़िये ही इस धरती पर मरे हुये दिखाई देंगे।

बुद्धिवाद से ऊपर की एक सत्ता है, जिसे अध्यात्म, अन्तःचेतना, अंतःस्फूर्ति, ऋतम्भरा, प्रज्ञा भूमा, विद्या आदि नाम दिये जाते हैं और भारतीय तत्वज्ञानियों द्वारा ब्रह्मविद्या के रूप में निरूपित किया जाता रहा है। तप, संयम, योगसाधन आदि के रूप जिसे व्यवहार अभ्यास में उतारने का निर्देश किया जाता रहा है। यदि वह सब पुरातन ठहराकर बहिष्कृत कर दिया जाय तो सम्भवतः उस क्षेत्र में घुसे आडम्बरों से छुटकारा मिल जायगा पर रोग के साथ रोगी को भी मार डालने की यह चिकित्सा पद्धति अन्ततः पश्चात्ताप का ही कारण बनेगी।

जिस तरह प्राचीन रूढ़िवादिता धर्म, सम्प्रदाय, जाति वर्ग के अन्ध समर्थन को लेकर उग्र होती है और उस आवेश में अनुचित को भी उचित ठहरा दिया जाता था, लगभग वैसी ही आवेश प्राचीनता विरोधी और नवीनता समर्थक का दीखता है। जो नया सो अच्छा, जो पुराना सो बुरा, यह वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है। हमारा चिन्तन गुणग्राही होना चाहिए। युग के अनुरूप परिवर्तनों का स्वागत किया जाय, विकृतियों और अवाँछनीय प्रथा−परम्पराओं का उन्मूलन किया जाय किन्तु यह ध्यान रखा जाय कि प्राचीनता में शाश्वत सत्यों और उपयोगी तथ्यों की भी कमी नहीं है। उन्हें न केवल सुरक्षित ही रखा जाना चाहिए वरन् सींचा भी जाना चाहिए। प्रगति का प्रयोजन सन्तुलित दृष्टिकोण रख कर चलने से ही पूरा हो सकता है।


Quotation

देव तुल्य विद्वानों, घर के बूढ़ों, संन्यासियों, अतिथियों और मानवता की सहानुभूति के पाँच मनुष्यों की जो ठीक प्रकार से सेवा करता है, वही मनुष्य संसार में यशस्वी होता है।


मनोविकारों का अवरोध हमें अपँग बना देता है

मस्तिष्क की आन्तरिक स्थिति में थोड़ा सा भी अवरोध अड़ जाने का परिणाम शरीर को तत्कालिक और दुष्परिणामों का परिचय हमें प्राप्त है। क्योंकि वह अधिक स्पष्ट और अधिक प्रत्यक्ष होता है। मस्तिष्क का सम्बन्ध एवं नियन्त्रण शरीर के प्रत्येक अवयव के साथ इतना अधिक है कि उसे हृदय से भी अधिक महत्व दिया जा सकता है। हृदय में अवरोध उत्पन्न हो जाने पर सामयिक कष्ट तो बहुत होता है और पूर्ण विश्राम से लेकर सतर्क उपचार की आवश्यकता पड़ती है। मस्तिष्क सम्बन्धी गड़बड़ी का प्रतिफल इससे अधिक है, उसके कारण लकवा सरीखे ऐसे रोग हो सकते हैं जो जीवन को अपंग एवं निरर्थक ही बनाकर रख दें।

लकवा पक्षाघात का अर्थ है मस्तिष्क के किसी भाग का काम करने में असमर्थ हो जाना। शरीर के अन्य भागों की तरह ही मस्तिष्क भी आवश्यक मात्रा में रक्त एवं आक्सीजन की समुचित मात्रा मिलने रहने से ही जीवित रहता है। यह खुराक किसी वजह से बन्द हो जाय तो वह भूखा अंग सूखने लगेगा। मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त वाहिनी शिराएँ ताजा रक्त पहुँचाना बन्द कर दे तो वह भाग सूख जायगा और उस भाग के द्वारा शरीर के जितने हिस्सा का नियन्त्रण संचालन होता था, वहाँ की गतिविधियाँ ठप्प हो जायेंगी। यही है लकवा का निरूपण।

आहार−विहार के असमय से रक्त वाहिनी शिरायें, शिथिल और मलविक रों से अवरुद्ध होने लगती हैं, उनका पोलापन घट जाता है। रक्त संचार का क्रम तेजी से न होने से उसमें गाढ़ेपन के साथ−साथ छोटे−छोटे थक्के बढ़ जाते हैं। यह थक्के सिकुड़ी−नाड़ियों में अड़ जायँ तो रक्त प्रवाह रुकेगा ही और मस्तिष्क का जो अंग भूखा मरेगा उसका प्रभाव क्षेत्र लकवा ग्रसित हो जायगा। दिल की बीमारियाँ भी धमनियों की स्थिति गड़बड़ा देती हैं और उनसे भी लकवे की आशंका बढ़ जाती है। कई बार दुबली और कमजोर पड़ी धमनियां थोड़ा सा ही दबाव बढ़ जाने से फट जाती हैं और रक्त मस्तिष्क में बिखर जाता है। इससे नियत स्थान पर रक्त पर का न पहुँचना और शिर फटने से फैले हुए रक्त में अन्य अवयवों का डूब जाना यह दोनों ही स्थिति खतरनाक है। इससे प्रायः पूरे मस्तिष्क पर न्यूनाधिक मात्रा में बुरा प्रभाव पड़ता है और बढ़ती हुई मूर्छा यदि काबू में न आई तो मृत्यु का कारण बन जाती है। रक्त चाप का अत्यधिक बढ़ जाना भी कई बार मस्तिष्क की किसी नस के फट जाने का कारण होता है।

मस्तिष्क के जिस हिस्से में रक्त भिषरण का रुका होगा, उसी से सम्बन्धित अंगों पर लकवे का प्रभाव देखा जा सकेगा। मोटेतौर से मस्तिष्क के तीन हिस्सों में विभक्त कर सकते हैं, दो गोलार्ध एक वृत्त। गोलार्धों में स्वेच्छित क्रियाओं के संचालक केन्द्र हैं। आयें गोलार्ध से शरीर का दाहिना हिस्सा और दायें गोलार्ध से शरीर का बायाँ हिस्सा सम्बन्धित हैं। मस्तिष्क के जिस भाग में गड़बड़ी हुई होगी। बहुत करके एक ही गोलार्ध रुग्ण होता है, इसलिए शरीर का एक अंग ही अधिक पीड़ित होता है। चूँकि दोनों भाग परस्पर जुड़े हुये हैं इसलिये एक का प्रभाव दूसरे पर कुछ तो पड़ना ही चाहिए, इसलिये रोगी तो दोनों ही हिस्से होते हैं। पर एक पर अधिक और एक पर कम असर होता है। दोनों हिस्सों पर समान रूप से लकवे का असर हो, ऐसा भी हो तो सकता है पर होता कम ही है। दोनों वृत्तों पर समान रूप से प्रभाव पड़ने की घटनायें होती हैं पर होती हैं कम ही।

तीसरे भाग ‘वृत्त’ में मध्य मस्तिष्क, सेतु, सिकेबलय और मेरु शीर्ष होते हैं। शरीर का सन्तुलन बनाये रहना विभिन्न अवयवों से अनेक क्रियाकलाप का विधिवत संचालन कराना, इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकालना जैसे महत्वपूर्ण कार्य इस ‘वृत्त, भाग से ही सम्बन्धित हैं।

मस्तिष्क के भीतरी विभागों की संरचना और क्रिया−प्रक्रिया समझ लेने पर यह जानना आसान हो जाता है कि लकवे के मरीज में जो कष्ट चिन्ह दिखाई पड़ रहे हैं, उनका उद्गम मस्तिष्क के किस स्थान पर होना चाहिये। यों उपरोक्त तीन भागों वाला विभाजन बहुत ही स्थूल है और उनमें से प्रत्येक के भीतर अगणित केन्द्र−उपकेन्द्रों की जटिल शृंखला जुड़ी हुई है। उन्हीं में जब, जहाँ, जितनी विकृति आती है, तब रोगियों में लकवे के विभिन्न स्तराय लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। हाथ−पैरों का न हिलना, गरदन का न मुड़ना, शरीर में सुन्नता या झुनझुनी, निगलने में कठिनाई, जीभ का लड़खड़ाना, कुछ का कुछ दीखना, स्मरण शक्ति खो जाना, सोचने−समझने की क्षमता का लड़खड़ा जाना जैसे अनेक अवरोध लकवा के रोगियों पर सवार रहते हैं। मल−मूत्र त्याग और प्यास तक की आवश्यकताओं को वे अनुभव नहीं कर पाते। नींद का उड़ जाना या झपकी सी ही लगी रहना भी किन्हीं−किन्हीं रोगियों को होता है। किसी धमनी के फट जाने से मस्तिष्क के भीतरी भाग में यदि रक्त भर कर जम गया है तो फिर उस कारण उत्पन्न हुई मुर्छा को जगाना कठिन हो जाता है, हाँ कोई छोटा थक्का जम गया हो तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा और स्थानीय गर्मी उसे पिघला कर इधर−उधर भी बखेर देगी।

अधिकतर लकवा मस्तिष्क में रक्त फेंकने वाली धमनी में रक्त का थक्का अड़ जाने के कारण उत्पन्न होता है। रक्त में यदि फुटकी पड़ने वाला गाढ़ापन न आये और धमनियों की नाली सिकुड़ती न चली जाय, कठोर न हो जाय तो लकवे की फिर कोई आशंका न रहेगी। यह विकृतियाँ धीरे−धीरे पनपती रहती हैं और आरोग्य की जड़ खोखली करती रहती हैं। लकवा तो उस विकार संग्रह का अन्तिम विस्फोट है। दिल के रोगियों के इस खतरे में फँस जाने का सम्भावना प्रायः बनी रहती है।

कुछ हलके प्रकार के लकवे स्थानीय होते हैं, जैसे बोलने में तुतलाने लगना, हाथों का काँपना, दुहरा देखना, सिर में चक्कर आते रहना आदि।

पक्षाघात की भयंकरता से हर कोई परिचित है। उसका मामूली सा झोंका मनुष्य की अपंग एवं पराधीन बना देता है, स्थिति अधिक बिगड़ी हुई हो तो मरण की ही कामना, प्रार्थना ही की जाती है। यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई, इसकी गहराई में जाया जाय तो यही तथ्य सामने आता है कि मस्तिष्क की किन्हीं कोशिकाओं में अवरोध उत्पन्न हो उन्हें उचित पोषण न मिला, फलस्वरूप सम्बद्ध अवयव को लकवा मार गया।

मस्तिष्क का पोषण मात्र रक्त से ही नहीं होता, जहाँ तक उसके चिन्तन पक्ष का सम्बन्ध है, उच्चस्तरीय विचारणाओं का संचार भी मस्तिष्कीय कोशिकाओं में होने वाले रक्त संचार की तरह ही आवश्यक है। चिन्तन का उपयुक्त प्रकाश न मिलने पर ऐसा अवरोध उत्पन्न हो जाता है, जिससे सर्वांगीण विकास के किन्हीं महत्वपूर्ण आधारों को लकवा ही मार जाय और व्यक्ति को गई गुजरी हेय घृणित तथा दयनीय परिस्थिति में पड़े रहने के लिए विवश होना पड़े।

मनः क्षेत्र में स्वस्थ प्रवाह संचार के लिए उदात्त दृष्टिकोण का समावेश नितान्त आवश्यक है। यदि उसमें घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, निराशा, चिन्ता, क्रोध, आवेश जैसे अवरोध अड़ेंगे तो ठीक वही स्थिति उत्पन्न हो जायगी जो शिराओं में रक्त के थक्के अड़ जाने पर लकवा मार जाने की विभीषिका के समय उत्पन्न होता है। दुर्भावनाओं से ग्रसित मनः स्थिति रख कर हम प्रतिपक्षी का उतना नुकसान नहीं कर सकते, जितना कि अपना कर लेते हैं। जिन कारणों से मनःसंताप उत्पन्न हुआ है यदि उनका निवारण अभीष्ट हो तो पहला कदम यही उठाना होता है कि अपना मानसिक संतुलन सहा करें ताकि समाधान का उपयुक्त आधार खोज निकाला जा सके। उद्विग्नता की स्थिति में अवरोधों से निपटने का रास्ता ढूंढ़ पाना तो एक प्रकार से अशक्य ही हो जाता है, उलटे दुहरी विपत्ति यह आ जाती है, उद्वेगों का आवेश रक्त के थक्के बन कर सम्वेदनशील शिराओं में ही अवरोध कर दें तो हमारी दूरदर्शिता हाथ से चली जायगी और ऐसा संकट सामने आ खड़ा होगा, जिसके कारण लकवे जैसी दयनीय अपंग स्थिति में ग्रसित हो जाना पड़े।


उद्विग्नता ही स्वास्थ्य को चौपट करती है

मानसिक उत्तेजना शरीर की जीवनी शक्ति को किस भयावह रीति से नष्ट करती है, इस ओर शरीर शास्त्री और मनः शास्त्री अब गम्भीरतापूर्वक ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि यह दिन−दिन अधिक स्पष्ट होता जाता है कि अस्वस्थता की समस्या का समाधान मात्र औषधियों की सहायता से अथवा पौष्टिक भोजन का व्यवस्था जुटाने से हल नहीं हो सकता। यदि ऐसा सम्भव रहा होता तो सभी सम्पन्न लोग आरोग्य लाभ करते और अभावग्रस्त रुग्णता एवं दुर्बलता का कष्ट क्यों भोगते।

विषाणुओं से रक्षा के लिए विविध−विधि टीके लगाना और हर वस्तु उनसे प्रभावित मानकर अन्धाधुन्ध छूत बरतना भी अब केवल बहम ही सिद्ध हो रहा है। बड़े आदमी फैशन की दृष्टि से स्वच्छता के चोचले इतने ज्यादा करते हैं कि उस स्थिति में उन तक विषाणुओं के पहुँचने की सम्भावना बहुत ही कम रहती है। ऐसी दशा में उन्हें तो निरोग रहना ही चाहिए किन्तु देखा जाता है यह कि स्वच्छताभिमानी ही अधिक बीमार पड़ते हैं और गन्दगी से ही दिन भर खिलवाड़ करते रहने वाले मेहतर जैसे स्वच्छता कर्मचारी स्वास्थ्य की दृष्टि से किसी स्वच्छता संवेदी से पीछे नहीं रहते।

इन तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सका अस्तु विचारशीलता का तकाजा यही सामने आया कि आरोग्य और रुग्णता की गुत्थी सुलझाने के लिए गहराई तक उतरा जाय और उन करणों को ढूँढ़ा जाय जो स्वास्थ्य समस्या को उलझाने के लिए वस्तुतः उत्तरदायी है। इस दिशा में प्रयास करने पर यह तथ्य सामने आये हैं कि मानसिक उत्तेजना एवं उद्विग्नता ही आरोग्य की जड़ खोखली कर डालनी वाली सर्वोपरि विपत्ति है।

अमेरिका मेडीकल ऐसोसियेशन की मानसिक स्वास्थ्य समिति के सदस्य डा. फ्राँसिस का कथन है कि उत्तेजनाग्रस्त मनःस्थिति का दबाव रक्त संचार प्रणाली को बेहतर गड़बड़ा कर रख देता है और फिर उस विकृति के फलस्वरूप नाना प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं।

इसी प्रकार मनः शास्त्री जे. बेसलेण्ड का वृद्धावस्था मृत्यु का वारन्ट नहीं है। मरण को समीप लाने वाले संकट का नाम है—मानसिक क्षय। मानसिक क्षय का अर्थ है निराशा अनुत्साह और निष्क्रियता। उमंगों का अन्त हो जाने से जो मानसिक रिक्तता उत्पन्न होती है। उस खीज से मनोबल घटता चला जाता है। इसका प्रभाव समस्त शरीर पर व्यापक शिथिलता के रूप में प्रस्तुत होता है, यह क्रम मृत्यु के समय को निकटतम घसीट कर ले आता है।

हार्टफोर्ट कनैटिकट स्थित इन्स्टीट्यूट आफ लिवंग ने अपने शोध निष्कर्षों के आधार पर घोषणा की है कि असमय में ही वृद्धावस्था का आ धमकना, दुर्बलता और रुग्णता का शिकार होना आहार पर उतना निर्भर नहीं है जितना मानसिक असन्तुलन पर। स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की उपेक्षा से भी शरीर जल्दी बीमार पड़ता है और असमय बुढ़ापे का कष्ट सहना होता है कि सबसे अधिक प्रभाव मानसिक असन्तुलन का पड़ता है यदि मनुष्य उदास, खिन्न, क्रुद्ध, चिन्तित रहेगा तो फिर लाख प्रयत्न करने पर भी आरोग्य की रक्षा नहीं की जा सकेगी। तब पौष्टिक आहार और बहुमूल्य औषधि उपचार से भी कुछ काम न चलेगा। स्वास्थ्य रक्षा और दीर्घजीवन का प्रथम आधार मानसिक शान्ति स्थिरता और उत्साह भरी आशावादिता को ही माना जाना चाहिए।

इन दिनों अनिद्रा व्याधि की बाढ़ आई हुई है। गहरी और पूरी नींद किन्हीं भाग्यवानों को ही आती है। मस्तिष्क को समुचित विश्रान्ति न मिलने के कारण वह साँस संस्थान उत्तेजित हो उठता है और वह तनाव फिर शरीरगत सभी संचारण प्रक्रियाओं को अस्त−व्यस्त करके नित नये रोगों का सृजन करता है।

अनिद्रा अपने आप से कोई रोग नहीं है। मस्तिष्क को अत्याधिक और अव्यवस्थित श्रम का भार पड़ना ही उसका वास्तविक कारण है। यह कभी−कभी अधिक पढ़ने, लिखने, सोचने, बोलने जैसे मानसिक श्रम की मात्रा अधिक बढ़ जाने से भी हो सकता है पर प्रधान कारण यह नहीं है। भावनात्मक उद्विग्नता ही मस्तिष्कीय संतुलन को सबसे अधिक नष्ट करती है। दस घण्टे पढ़ने लिखने का श्रम मस्तिष्क को जितना थकाता है, उसकी तुलना में आधा घण्टा क्रोध या दुख के विचारों में डूबे रहने पर कहीं अधिक शक्ति नष्ट हो जाती है। बीच−बीच में विश्राम करते रहने और कामों का स्वरूप बदलते रहने से हर दिन देर तक पढ़ने, लिखने जैसे साधारण मानसिक श्रम घण्टों किये जाते रह सकते हैं और उनसे कोई अति नहीं होती। कितने ही विद्वान व्यक्ति वृद्धावस्था में भी आठ दस घंटे जम कर मानसिक परिश्रम करते हैं और शान्तिपूर्ण निद्रा लाभ का आनन्द लेते हुए जीवनयापन करते हैं, इसके विपरीत जिन पर आवेग छाये रहते हैं, वे खिन्न, उद्विग्न, क्रुद्ध, सन्तप्त और विक्षुब्ध मनुष्य प्रत्यक्षतः कुछ भी मानसिक श्रम के न रहते हुए भी इतने थक जाते हैं कि उन्हें मस्तिष्कीय उत्तेजना का शिकार रहना पड़ता है। न दिन को चैन पड़ता है न रात को नींद आती है।

दिमाग पर अधिक बोझ पड़ा रहे और गहरी नींद न आये तो चक्कर आना, सिर दर्द, रक्त चाप, स्मरण शक्ति की कमी, चिड़चिड़ापन, आँखों में जलन, मृगी, पागलपन, नपुँसकता जैसी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और शरीर को आवश्यक विश्राम न मिलने के कारण वह दिनों दिन दुबला और कान्तिहीन होता चला जाता है।

अनिद्रा के कारण होने वाली क्षति से सभी परिचित हैं, अस्तु उसके निवारण के उपाय भी सोचे गये हैं। इसके लिए कई रासायनिक पदार्थ खोज निकाले गये हैं।

नींद न आने का कष्ट निवारण करने के लिए सामयिक उपचार के रूप में फेनोवार्वी टोन, सरपिरुटिन सी., यूरब्राय, मैडोसिन, सोप्रालीन, सोनेरील,अब्लीवान, न्यूसीन एच. पाइरा मिड्रोन, एनैलजिन प्रभृति औषधियाँ देते हैं। इन्हीं दवाओं के फार्मूलों में थोड़ा बहुत अन्तर करके अनेक फैक्ट्रियां, अनेक नामों और लेबिलों के साथ अन्यान्य औषधियाँ बनाती बेचती हैं। विभिन्न देशों में उनके नाम हैं उन सब की सूची बनाई जाय तो वे दवाओं हजारों की संख्या में पहुँच जायेंगी।

संडे एक्सप्रेस इंग्लैंड के एक लेख में ब्रिटेन में नींद की गोलियों के बढ़ते हुए प्रचलन पर चिन्ता व्यक्त करते हुए बताया गया था कि उस देश में एक लाख से अधिक व्यक्ति ऐसे हैं, जिनकी निद्रा इन नशीली गोलियों की दया पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार की औषधियाँ वहाँ प्रति वर्ष प्रायः 2 लाख पौंड खर्च होती हैं। इन दवाओं की विषाक्तता सेवनकर्त्ताओं के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट बन कर सामने आती होते हैं।

इन औषधियों में वारटिट्ररिक ऐसिड, अफीम कर सत, कोनिक जैसे मस्तिष्कीय गतिविधियों को कुँठित करने वाली नशीली चीजें होती हैं। जो आगे चलकर मानसिक स्वस्थता पर बुरा असर डालती हैं। उनके कारण नये−नये रोग उत्पन्न हैं।

अब तक एक भी ऐसी नींद लाने वाली दबा नहीं बनी जो पूर्णतया विष रहित हो। इनका सेवन लगातार करने से शरीर में जो नये संकट उत्पन्न होते हैं वे अनिद्रा अथवा उस पीड़ा से कम घातक नहीं होते, जिनका समाधान करने के लिए इन दवाओं का प्रयोग किया गया था। आपरेशन के समय प्रयोग की जाने वाली मूर्छा औषधियाँ भी आगे चल कर नये स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करती हैं।

रासायनिक उपचार से सम्वेदन शून्यता, तन्द्रा, मूर्छा लाने की दूरगामी हानियों को देखते हुए, विज्ञान वेत्ताओं का ध्यान अब इस दिशा में गया है कि वे विद्युत उपचार द्वारा कृत्रिम निद्रा लाई जाय। सोचा गया है कि यह प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक निर्दोष सिद्ध होगा। इस संदर्भ में रूसी वैज्ञानिकों में से ए. फिलोमाफित्स्की,आई. सेचनीव बी. वेरिगो, एन.वेदेन्स्की के विद्युत उपचार से निद्रा लाने के सम्बन्ध में गहरा अध्ययन किया है। फ्रांस में भी ऐसे प्रयोग हुए हैं, एच. लेछूच और मालगेर्व ने विद्युत निद्रा की सम्भावना को प्रत्यक्ष किया है। प्रो. रूसो ने भविष्यवाणी की है कि निकट भविष्य में रासायनिक उपचारों का हटाकर कृत्रिम निद्रा की आवश्यकता विद्युतधाराओं के प्रयोग द्वारा की जाया करेगी।

लेनिन ग्राड के मनः शास्त्री कालेन्दारोव ने मानवी स्नायु संस्थान में हल्का सा विद्युत प्रवाह संचालित करके स्वाभाविक निद्रा अभीष्ट समय तक सा देने में सफलता प्राप्त की है। इस उपचार से थकान, बेचैनी, सिर दर्द जैसे अविश्रान्ति जन्य व्यथा से तत्काल छुटकारा प्राप्त कर सकना सम्भव हो गया है। सोवियत चिकित्सा विज्ञान के तत्वावधान में गिल्यारों वस्की लिवेन्तसेव, वाचिस्कीव के एक पैनल ने इस उपचार के गुण दोषों को दूरगामी पर्यवेक्षण करने के लिए विधिवत् प्रयोग प्रक्रिया संचालित किये हुए हैं। उनके निष्कर्ष में शिजोफ्रेनिया (मस्तिष्क शून्यता) न्यूरेस्थेनिया (स्मृति हरण) जैसे मस्तिष्कीय रोग और अल्सर, अंत्रशोध जैसे उदर रोगों में इस पद्धति द्वारा आशाजनक ही नहीं आश्चर्यजनक लाभ भी हुआ है। स्टेनोंक्रार्डिया, व्राकियल ऐस्यमा ब्लडपे्रशर जैसे रोगों का भी उस उपचार द्वारा गमन हुआ है।

विद्युत निद्रा का मूल लाभ है अभीष्ट समय तक अभीष्ट गहराई वाली निद्रा सम्भव करके रुग्ण अवयवों को इतना विश्रान्ति देना कि इस अवधि में प्रकृति के लिए बीमारी से जूझना और विकृति का निराकरण सम्भव हो सके। जीवित उत्तेजना में जो श्रम पड़ता है। उसी की क्षति पूर्ति करना शरीर की जीवनी शक्ति के लिए कठिन पड़ता है। फिर वह रुग्णता से कैसे जूझें? इसी झंझट में रोगी दिन−दिन गलता जाता है यदि उसे समुचित निद्रा लाभ मिल जाय तो एक और विश्रान्ति का चैन मिले,दूसरी ओर प्रकृति टूट−फूट की मरम्मत में जुट पड़े। यह दोनों ही आवश्यकताएँ निद्रा से पूरी होती हैं। रासायनिक उपचार से निद्रा लाने में विषैली, मादक औषधियों से नये संकट उत्पन्न होने की सम्भावना स्पष्ट थी, ऐसी दशा में विद्युत उपचार से निद्रा लाना अपेक्षाकृत अधिक निर्दोष समझा जा रहा है, यों तो बाहर से थोपा हुआ कोई भी उपचार किसी न किसी रूप में स्वाभाविक स्वस्थता पर आघात करता ही है। सच्ची और सही निर्दोष चिकित्सा तो वही है जो हमारी जीवनी शक्ति अपने ढंग से आप ही बिना किसी को सूचना दिये स्वयमेव करती रहती है।

अनिद्रा जन्म संकट का सामयिक उपचार नशीली औषधियों से किया जाय अथवा विद्युत संचार से? इस विवाद में विद्युत उपचारकों का पलड़ा भारी पड़ता है, क्योंकि उससे नशीली वस्तुओं के विष प्रभाव का खतरा नहीं है। साथ ही मस्तिष्क को जकड़ने की अपेक्षा संज्ञा शून्य करने में विश्राम भी अधिक गहरा मिलता है। विद्युत उपचार से होने वाले लाभों का एक मात्र आधार यही है कि देर तक मानसिक विश्रान्ति की व्यवस्था जुटायी जाय तो अनुत्तेजित अवयव अपनी टूट−फूट की मरम्मत करने में स्वयं जुट सकते हैं और रोग निवृत्ति का प्र.कृति प्रदत्त सुअवसर सहज ही मिल सकता है।

इतने पर भी मूल जहाँ का तहाँ है। मानसिक उत्तेजना के कारण का निवारण किया जाना चाहिए। उससे उत्पन्न प्रतिक्रिया भर को रोकने के लिए नींद लाने वाली गोलियाँ अथवा विद्युत संचार की कुछ उपयोगिता हो सकनी है। मूल कारण का निवारण तो मानसिक सन्तुलन स्थिर कर सकने वाले आध्यात्मिक दृष्टि का परिष्कार करने से ही होगा। जीवन को हँसते−खेलते खिलाड़ी की भावना से जीने और सफलता − असफलताओं को अधिक महत्व देते हुए अपनी प्रसन्नता के केंद्रबिंदु कर्तव्य पालन करने तक सीमित बनाकर कोई भी व्यक्ति विक्षोभों से बच सकता है और मानसिक सन्तुलन स्थिर रख सकता है।

शवासन, शिथिलीकरण मुद्रा, प्रत्याहार, धारण ध्यान और समाधि की योगाभ्यास से सम्बन्धित क्रिया−प्रक्रिया ऐसी है जो मानसिक थकान और तनाव को सहज ही दूर कर सकती है और वह उपचार नींद की दवा अथवा विद्युत संचार की तुलना में कहीं अधिक निरापद एवं लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

स्वास्थ्य की स्थिरता का आधार हमें मानसिक सन्तुलन को मानना होगा और जिस प्रकार पेट या रक्त के खराब न होने देने की सावधानी बरतते हैं वैसे ही यह ध्यान भी रखना होगा कि भावनात्मक संक्षोभ हमारे मस्तिष्क पर हावी हो कर पूरे स्वास्थ्य संस्थान को ही चौपट करके न रख दे।


देवताओं का धरती पर आगमन एक तथ्य

अन्याभ्य ग्रह नक्षत्रों में क्या पृथ्वी जैसी सुसंस्कृत मानव जाति निवास करती है? क्या उन लोगों का विकास मनुष्य जितना अथवा उससे अधिक हो चुका है? क्या वे कभी−कभी पृथ्वी निवासियों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए वैसा ही प्रयत्न करते हैं जैसा कि हम लोग सौर−मण्डल की परिधि के ग्रह−उपग्रहों तक पहुँचने का प्रयास करते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर विद्वान “एरिद फोन डानिकेन” ने अपनी पुस्तक “चैरियट्स गाडस्” नामक पुस्तक में तथ्य और प्रमाण उपस्थित करते हुए दिया है।

उन्होंने यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है कि किसी सुविकसित सभ्यता के मनुष्य से बढ़ कर सुयोग्य प्राणी समय−समय पर धरती के साथ संपर्क स्थापित करते रहे हैं और यहाँ की स्थिति को समझने के लिए उनने बहुत सारी कुरेडबीन की है जिसके प्रमाण अभी भी विद्यमान हैं।

अठारहवीं शदी का बना एक ऐसा नक्शा तुर्की के टोपकापी पैलेस में पाया गया है, जिसमें भूमध्यसागर, मृतसागर, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अटाक टिक आदि इस के प्रकार दिखाये गये हैं मानो उन्हें किसी विमान पर चढ़ कर खींचा गया हो। तात्कालीन साधनों को देखते हुए वैसे कोई साधन उन दिनों नहीं थे। जो भी नक्शे भूतकाल में बने हैं, वे इतने विस्तृत क्षेत्र का इतना अधिक सही विवरण प्रस्तुत करने वाले नहीं हैं, जैसा कि यह नक्शा है। यह नक्शा उन्हीं देव मानवों का बनाया हो सकता है जो अन्य लोकों से अपने विशेषयानों पर सवार हो कर धरती पर उतरे होंगे।

लाइमा के दक्षिण में केंडिक्लिफ दीवार पर 80 फीट ऊँचा स्तम्भ बना हुआ है। जिस स्थान पर जितना धन लगा कर और जिस तरह वह बना है वहाँ उसका कोई उद्देश्य प्रतीत नहीं होता। सम्भवतः वह पृथ्वी के किसी स्थान विशेष का संकेत उन अन्तरिक्ष यात्रियों को देता होगा ताकि वे उतरने के लिए उपयुक्त स्थान की जानकारी प्राप्त कर सकें।

ईरान का गोवी मरुस्थल और केवाडा मरुस्थल का विश्लेषण करने पर वहाँ किसी परमाणु विस्फोट की स्थिति का आभास मिलता है। दक्षिण रोडेशिया, उत्तर अमेरिका, सहारा, तेरु, फ्राँस, कोहिस्तान की गुफाओं में ऐसी चित्र कला पाई गई है, जिसमें मनुष्य को अन्तरिक्ष यात्री की पोशाक पहने हु चित्रित किया गया है। अकारण ऐसे चित्र क्यों बनते हैं?

दिल्ली की कुतुबमीनार का स्तम्भ इस प्रकार शुद्ध धातु से बना है, जिस पर दो हजार वर्ष बीत जाने पर भी हवा, पानी का कोई असर नहीं हुआ। यह फास्फोरस और गन्धक से रहित स्पात का बना है। उस जमाने की समुन्नत टेक्नोलॉजी पर आज के वैज्ञानिक स्तब्ध हैं और विधि ढूँढ़ नहीं पाये जिसके आधार पर उस लौह स्तम्भ जैसी शुद्ध धातु बना सकें। मिश्र में मुर्दों को सुरक्षित रखने की विधि, पुरातन गुफाओं की चित्रकला में खराब न होने वाले रंग भी आज के रसायन शास्त्र के लिए एक चुनौती हैं। डानिकेन का कथन है ऐसे समुन्नत विज्ञान अन्तरिक्ष मानवों जैसा धरती निवासियों को दिया हुआ अनुदान ही हो सकता है।

डानफेन कहते हैं कि अपनी आकाश गन्ध में 18 हजार तारे ऐसे हैं जिनमें जीवन विकास की अनुकूल स्थिति मौजूद है। यदि यह माना जाय कि इनमें से एक प्रतिशत में ही समुन्नत प्राणी होंगे तो भी 180 नक्षत्रों में सुविकसित जीवन आवश्यक होगा। उनकी समुन्नत स्थिति ऐसी हो सकती है, जिसे हम अपने साथ तुलना करने पर अतिमानव या देवता कह सकें। आश्चर्य नहीं उन दिनों अन्य लोक वासी समुन्नत लोग अपनी धरती के साथ अधिक संपर्क स्थापित करने में सफल हो गये हों और उनकी हलचलें उस रूप में सामने आती रही हो जैसी कि पुराणों में वर्णित हैं।

बाइबिल का एक मन्त्र है−’ये परमेश्वर’ तू मेरी आँखें खोल दे, ताकि तेरी कुदरत को−अजीब रहस्यों को देख सकूँ।

चमड़े की आँखों से केवल सामने की वस्तुएँ देखी जा सकती हैं, उनसे कर्म−अकर्म और दूरगामी हित−अनहित का पता लगाना कठिन है। जो आज के लिए, अभी के लिए रुचिकर है, उसी की माँग इन्द्रियाँ करती हैं। जिसमें तात्कालिक प्रसन्नता मिलती है वही मन, मस्तिष्क को अभीष्ट है। व्यक्ति और समाज का दूरगामी हित जिस विचारणा और क्रियाशीलता के साथ जुड़ा हुआ है, उसका बोध दिव्य दृष्टि ही कराती है और उसी की प्रेरणा से मनुष्य संयम, परमार्थ जैसे प्रत्यक्ष हानिकर दीखने वाले कर्मों को दूरवर्ती हित साधना की दृष्टि से करता है। मानवी महानता को समझने और तद्नुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए हम केवल दिव्य दर्शन के आधार पर ही समर्थ होते हैं। बाइबिल के उपरोक्त मन्त्र में इन्हीं विशिष्ट आँखों को खोलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की गई है।

ईश्वर चमड़े से बनी आँखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। वह इन्द्रियगम्य नहीं है। उसे सूक्ष्म अनुभूतियों और सम्वेदनाओं द्वारा जाना जा सकता है। विज्ञान की पहुँच स्थूल जगत तक है। सूक्ष्म जगत का अन्वेषण विश्लेषण चेतन सत्ता की पृष्ठभूमि पर ही सम्भव होता है। प्रसन्नता की बात है कि पिछली दशाब्दियों में विज्ञान स्थूल जगत को ही सब कुछ मानने की बात पर जितना दुराग्रही था अब उतना नहीं रहा। चेतना की सत्ता को जैसे−जैसे समझ सकना सम्भव होता जा रहा है वैसे−वैसे विज्ञान भी ईश्वर की सत्ता गरिमा और उपयोगिता को स्वीकार करने के लिए क्रमशः अधिक लचीला होता जा रहा है। उच्चस्तर के वैज्ञानिकों ने ईश्वर की सत्ता और महत्ता को अपने ढंग और क्रम से स्वीकार, अंगीकार करना आरम्भ कर दिया है।

इंग्लैंड की रॉयल सोसाइटी के मन्त्री सर जेम्स जीन ने लिखा है—विज्ञान के आरम्भिक विकास के समय यह माना गया था कि यह दुनिया जड़−पदार्थों की बनी है। मन और आत्मा नाम की चीज जड़−पदार्थों की ही एक तरंग है। पर अब जैसे−जैसे प्रगति के पथ पर विज्ञान कुछ आगे बढ़ा है तब से यह समझा जा रहा है, बात कुछ और ही है। अब हम सोचते हैं, कोई समष्टि चेतना इस दुनिया का संचालन करती है और जड़−पदार्थ उसके संकेतों निर्देशों का अनुसरण करते हैं।

इस तथ्य पर उन्होंने अपनी ‘द न्यू बैक ग्राउण्ड आफ साइन्स’ और ‘द मिस्टीरियस यूनिवर्स’ में अधिक विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला है।

आर्थर एच. कोम्पटन का कथन है—पूरी तरह आज भले ही सावित न हो सके पर कल जरूर इस नतीजे पर पहुंचना पड़ेगा कि विश्व−चेतना की शक्ति का अस्तित्व मौजूद है और वही इस संसार को किसी खास मतलब के लिए चलाता है।

राबर्ट ए. मिल्लीकान का कथन है—विकासवाद को इतिहास यह बताता है कि पदार्थों और प्राणियों की क्रमबद्ध और व्यवस्थित प्रगति होती है और वह क्रम ऐसा है मानों कोई बुजुर्ग किसी छोटे बच्चे को उंगली पकड़ कर चलाना सिखा रहा हो।

जे. वी. एस. हैलडैन ने लिखा है—अब हम इस दुनिया को अन्धी मशीन नहीं कहेंगे। याो आधी प्रकृति के बारे में बहुत कम जाना जा सका हैं पर जितना जान लिया गया है वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि दुनिया पदार्थ मात्र ही नहीं है, उसके ऊपर किसी ऐसी चीज का शासन है जिसे मन, बुद्धि या चेतना जैसा नाम दिया जा सकता है।

सर आर्थर एस. एडिंगटन ने लिखा है—यह मान्यता अब बहुत पुरानी पड़ गई कि ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है और यह दुनिया अपने आप ही अपने ढर्रे पर चल रही है। व्यवस्था बुद्धि वाली चेतना का इस जगत पर कितना नियन्त्रण है, इस तथ्य को हम प्रकृति की प्रत्येक हलचल में भली−भांति देख सकते हैं।

हरवर्ट स्पेन्सर कहते थे—विज्ञान जिस चीज के हमारे जमाने की पहुँच से बाहर—आननोएबुल कहता है वह अध्यात्म के सिद्धान्तों को काटती नहीं वरन् यह कहती है कि उस सम्बन्ध में गहरी खोज की जानी चाहिए।

एलफ्रेड रसल वैसेल ने अपने ग्रन्थ ‘सोशल इनबारन मेन्ट एण्ड मारल प्रोग्रेस’ में लिखा है—यह विश्वास करने का पर्याप्त आधार मिल गया है कि चेतना द्वारा ही इस जड़ जगत का सचाँलन किया जा रहा है।

सर ए. एस. एडिंगटन का कथन है—हम विज्ञानी अब यह सोचने लगे हैं कि कोई असाधारण शक्ति इस संसार की एक सोची समझी व्यवस्था के अनुसार चला रही है। वह शक्ति क्या है? और किस लिए क्या करती है, इसे अभी नहीं जाना जा सका तो भी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर एक नियामक सत्ता का अस्तित्व स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

जड़ को प्रधान और चेतना उसकी प्रतिक्रिया कभी माना जाता था पर अब ऐसे आधार सामने आ गये हैं, जिनके कारण चेतना को ही बुनियादी चीज मान कर चलना पड़ेगा।

सर ओलिवर लाज ने ब्रिस्टल में एक भाषण देते हुए कहा था—”वह दिन दूर नहीं जब विज्ञान नये क्षेत्र में प्रवेश करेगा और यह स्वीकार करेगा कि चेतन शक्तियाँ ही जड़ शक्तियों का संचालन करती हैं। अभी हम सिर्फ जड़ जगत के बारे में जानते हैं और उसके अंतर्गत चल रही हलचलों से परिचित है। पर अगले दिनों यह स्पष्ट हो जायगा कि चेतना की शक्तियाँ ही प्रमुख हैं, वे ही जड़ जगत को चलाती है। जड़ शक्तियों पर यदि प्रेम और भलाई की शक्तियों का शासन न रहे तो वे इतनी अधिक भयंकर हैं कि उन्हें छूना तक डरावना प्रतीत होगा।”

संसार भरे के चौदह बड़े वैज्ञानिकों द्वारा मिलजुल कर लिखी गई पुस्तक ‘द ग्रेट डिजाइन’ पुस्तक में लिखा है—’यह दुनिया बिना रूह की मशीन नहीं है। यह अकस्मात ही नहीं बन गई है। जड़−पदार्थ के पीछे एक दिमाग, एक चेतना काम कर रही है। उसे भले ही कुछ भी नाम दिया जाय।

एलवर्ट आइन्स्टाइन ने लिखा है—इस दुनिया में जैसी क्रम व्यवस्था सुरीले ताल−मेल के साथ बनी हुई है उससे स्पष्ट है कि प्रकृति के ऊपर कोई बुद्धिमान चेतना काम कर रही है। तरकीब और उद्देश्य के बिना यहाँ कुछ भी नहीं है। ऐसी दशा में विज्ञान को अपना विचार यह बनाना पड़ रहा है कि यह दुनिया ही इत्तफाक से नहीं बन गई है। इसके पीछे कोई गहरा उद्देश्य काम कर रहा है।

वैज्ञानिक दार्शनिकता के आधार पर विचार करने से यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि इस ब्रह्माण्ड के अनेक घटकों, ग्रहपिंडों को परस्पर एक चेतना सुव्यवस्थित सूत्र में बाँध कर रखने वाली एक सत्ता है। उसके कुछ नियम हैं। इनमें मानवी चेतना को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा नियम है पारस्परिक सहयोग। परमाणु के अवयव प्रोटोन, इलेक्ट्रोन अथवा इनसे भी सूक्ष्मतर घटक परस्पर एक क्रमबद्ध व्यवस्था के अंतर्गत घनिष्ट रह कर अणुसत्ता का सृजन करते हैं। अणुओं का समन्वय पदार्थों के विभिन्न रूप प्रस्तुत करता है। यह पदार्थ स्वतन्त्र इकाई के रूप में काम नहीं कर सकते, उनके अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप अन्यान्य पदार्थों की सत्ता द्वारा आदान−प्रदान मिलने पर ही बना रहता है। हमारी पृथ्वी का भी एकाकी जीवन सम्भव नहीं, उसे अन्यान्य ग्रह−नक्षत्रों से जो अनुदान मिलते हैं, उसी से उसका जीवन संकट आगे लुढ़कता है। धरती भी दूसरे ग्रहों को देती है। इसी प्रकार अनेक सौरमण्डल और उनके निहारिका केन्द्र एक अत्यन्त सुदृढ़ शृंखला में बँधे हुए परस्पर आदान−प्रदान करते हैं। प्राणधारियों का जीवन भी परस्पर सहयोग से ही चलता है। मनुष्य को जितनी अधिक आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति तो संगठित समाज में सहयोग शृंखला गतिशील रहे बिना हो ही नहीं सकती। दूसरे प्राणी एकाकी भी जी सकते हैं और प्रकृति के अंचल से अपने आहार आधार की उपलब्धि कर सकते हैं। किन्तु मनुष्य के लिए तो सहयोग ही जीवन प्राण है। इसके बिना उसका निर्वाह एक दिन भी नहीं हो सकता। प्रत्येक ग्रह−पिण्डों के अणु परमाणु के अन्यान्य ग्रह−नक्षत्रों की सत्ता का समावेश है। यह अत्यन्त सूक्ष्म होते हुये भी एक तथ्य है। धरती के परमाणुओं का मध्यवर्ती नाभिक अपने में शक्ति भरे बैठा है, उसका मूल स्त्रोत धरती पर पाये जाने वाले तत्व नहीं वरन् सूर्य ताप से अवतरित होने वाला अदृश्य प्रवाह है। सूर्य ताप के रूप में हम जिस शक्ति की व्याख्या करते हैं वह भी अकेले सूर्य की नहीं है। गंगोत्री में गंग की धार तनिक सी निकलती है, पीछे उसमें नदी−नालों का जल मिलकर गंगा की विशाल धारा बनता है। ठीक इसी प्रकार सूर्य ताप के साथ अन्य ग्रह−नक्षत्रों की शक्ति धाराएँ मिलती चली आती हैं। श्रेय भले ही सूर्य को मिले पर वस्तुतः वह एक समन्वित अनुदान ही है।

जड़−जगत की तरह ही चेतन जगत की स्थिति है। हमारी बुद्धि, अभिरुचि, निष्ठा, मान्यता, अनुभूति, मनः स्थिति, प्रतिभा आदि अपनी लगती भले ही हैं पर वस्तुतः वह भी समष्टि की ही दैन है। हमें असंख्य लोगों की चेतना प्रभावित करती हैं और उस बाहरी दबाव से हमारा चेतना स्तर ढलता है। जिसे मौलिकता कहते हैं अथवा व्यक्ति गत प्रतिभा समझते हैं वस्तुतः वह भी समूहगत चेतना का ही प्रतिफल हैं। आमतौर से निकटवर्ती एवं सम्बद्ध वातावरण ही हमें बना डालता और बदलता रहता है।

विश्वव्यापी इसी एकता की सुनिश्चित अनुभूति का नाम आध्यात्मिकता है। अमुक दर्शन शास्त्र, धर्म सम्प्रदाय अथवा उपासना उपक्रम के साथ जुड़े हुए विधि−विधान एवं प्रतिपादन को ही अध्यात्म कहना मूल तथ्य के साथ बलात्कार करना है। धर्म सम्प्रदायों के साथ उपासना उपक्रम की मान्यताएँ भी अध्यात्म समर्थक हो सकती है पर उन्हीं को सर्व अध्यात्म मान बैठना भूल है। अध्यात्म का यथार्थ स्वरूप इस समग्र सृष्टि के बीच जुड़ी हुई अविछिन्न आत्मसत्ता की, एकता की, अनुभूति को ही समझा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे अभिन्नता भी कह सकते हैं। आत्मवत् सर्वभूतेषु के सूत्र को अध्यात्म की यथार्थ व्याख्या समझा जाना चाहिये। इसी मूल प्रवृत्ति की प्रेरणा से इस संसार में परस्पर सहयोग एवं सद्भाव की प्रवृत्ति उमड़ती है और व्यक्ति गत उत्कृष्टता एवं सामाजिक प्रगति तथा सुव्यवस्था की नींव पड़ती है।

आन्तरिकता के सिद्धान्त अब क्रमशः विज्ञान के साथ अपना मतभेद समाप्त करके, एक ही लक्ष्य पर पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं। विश्व−व्यापी चेतना प्राणिमात्र में क्रीड़ा−कल्लोल कर रही है और हर एक को विश्व−व्यवस्था की मर्यादाओं में रहने के लिए बाध्य कर रही है। परस्पर मिलजुल कर स्नेह−सौजन्य से रहें, बिना दूसरों से टकराये निर्वाह करें और आपसी सहयोग से सर्वतोमुखी सुख−शान्ति का पथ प्रशस्त करें। इस निष्कर्ष पर अध्यात्म वादी दर्शन ही हमें पहुँचाता है। आध्यात्मिकता और एक दूसरे से विलग नहीं किया जा सकता है। जैसे−जैसे हम सर्वव्यापी और नियामक सत्ता का अस्तित्व स्वीकार करते जायेंगे वैसे−वैसे यह भी अनिवार्य प्रतीत होता जायगा कि व्यक्ति का वास्तविक हित आदर्शवादी रीति−नीति अपना कर चलने में ही है।

किसी का ध्यान कभी इस ओर नहीं गया कि एक ही क्यारी में लगे गुलाब, गेंदा, गुलसेहदी, गुलमुर्ग, दुपहरिया, बेला, चमेली सब भिन्न−भिन्न रंग के क्यों होते हैं। सबके लिए मिट्टी एक सी, पानी और खाद भी एक ही सी, प्रकृति−परिस्थितियों में भी कोई अन्तर नहीं फिर एक फूल लाल तो दूसरा नीला क्यों हो जाता है।

वैज्ञानिकों को सूझ नहीं रहा था कि इस समस्या का समाधान कैसे हो, तभी प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक सर सी. वी. रमन का ध्यान उस दिशा में आकृष्ट हुआ। उन्होंने विचार किया कि प्रकृति में रंग आता कहाँ से है? बस इसी एक विचार ने सारी गुत्थी सुलझा दी। सचमुच विचार करने की कला जो सीख जाता है वह ज्ञान के गहरे संसार सागर से उपलब्धियों के ऐसे ही नये−नये हीरे, मोती खोज−खोज कर लाता है।

विज्ञान के विद्यार्थी जानते होंगे कि रंग सूर्य प्रकाश की देन है। सफेद दिखाई देने वाला प्रकाश सात रंगों के मेल से बना है। नीला, लाल पीला इनमें मुख्य हैं। हमारे भारतीय दर्शन में भी प्रकृति को त्रिगुणात्मक कहा गया है यह तीन रंग ही सूर्य प्रकाश अथवा प्रकृति के तीन गुण हैं, हरा, बैगनी, गुलाबी, नारंगी आदि दूसरे रंग इन चारों के सम्मिश्रण बनते हैं।

स्प्रेक्ट्रोकोप एक यन्त्र होता है, जिसमें सबसे आगे एक लेन्स लगा होता है। वह प्रकाश किरण को सीधा करके आगे भेजता है। यन्त्र के मध्य में एक त्रिपार्श्व शीशा (प्रिज्म) रखा होता है, उस पर जब यही किरण पड़ती है तो वह सात रंगों में विभक्त होकर वर्णक्रम पर दिखाई देने लगती है। इसलिए यह सात रंग मुख्य माने गये हैं, वैसे रंग तीन ही हैं और उन्हीं के न्यूनाधिक अनुपात से संसार में मिलने वाले सभी फलों का रंग भिन्न−भिन्न दिखाई देने लगता है। अब तक फूलों की लगभग ढाई लाख किस्मों की खोज हुई हैं, इनमें विभिन्न रंग मूलतः इन तीन रंगों की मात्रा पर ही निर्भर करते है।

प्रश्न यह है कि प्रत्येक पौधे पर सूर्य का प्रकाश भी एक ही पड़ता है। प्रकाश पड़ने से ही फूल दिखाई देते हैं प्रकाश न हो तो फूलों में कोई रंग दिखाई न दे। फिर यह सब पुष्प विभिन्न रंगों के क्यों हो जाते हैं? डा. रमन का कहना है कि यह सब पौधों की प्रकृति के कारण होता है। प्रत्येक फूल के पौधे में कुछ रंग सोखने वाले तत्व होते हैं, जिन्हें रञ्जक तत्व (एब्साíवंग पिग्मेंट्स) कहते हैं—यह तत्व अपनी−अपनी प्रकृति के रंग सोख लेते हैं और फिर “स्प्रेक्ट्रोस्कोप” से दिखाई देने वाले 7 रंगों में से जो रंग फूल से छन कर बाहर निकलता है फूल उसी रंग का दिखाई देने लगता है। यदि यह क्रिया न चल रही होती तो फूलों में कोई भी रंग दिखाई न देता।

कुछ म्हार जिस प्रकार एक ही मिट्टी, पानी व चाक से मनचाहे खिलौने, बर्तन आदि बनाता चला जाता है उसी प्रकार प्रकृति भी अपनी इच्छा से अनेक वर्ण और सज्जा में फूलों में प्रदर्शित होती है।

सर. सी. वी. रमन ने गुलाब के फूल का उदाहरण देते हुए लिखा है कि गुलाब का पौधा वर्णक्रम के हरे रंग को सोख लेता है, इससे लाल रंग गहरे रूप में दिखाई देने लगता है। यों गुलाब में ही सैकड़ों किस्में है पर उनके रञ्जक तत्व अलग−अलग होते हैं इसलिए वह जो रंग सोखते हैं, फूल उसी अन्तर से दूसरे रंग का दिखाई देने लगता है।

सर. सी. वी. रमन ने गुलाब के फूल का उदाहरण देते हुए लिखा है कि गुलाब का पौधा वर्णक्रम के हरे रंग को सोख लेता है, इससे लाल रंग गहरे रूप में दिखाई देने लगता है। यों गुलाब में ही सैकड़ों किस्में है पर उनके रञ्जक तत्व अलग−अलग होते हैं इसलिए वह जो रंग सोखते हैं, फूल उसी अन्तर से दूसरे रंग का दिखाई देने लगता है।


अन्धकार को चुनौती (kahani)

सूर्यदेव अस्ताचल उतरे तो उन्हें यह अभिमान सताने लगा कि उनके बाद धरती वालों की बड़ी दुर्गति होगी। सघन अन्धकार में वे पास की वस्तुएँ तक न देख सकेंगे और जरा भी दूर तक न चल सकेंगे।

अन्धेरा आया तो जरूर पर वैसा संकट उत्पन्न न हुआ जैसा कि सूर्यदेव सोचते थे। अन्धकार को चुनौती स्वीकार करते हुए असंख्यों लघुकाय दीपकों ने जलना आरम्भ कर दिया और अन्धेरे के बीच भी दुनिया के आवश्यक काम बिना रुके चलते रहे।

खिड़की खोलकर सूर्यदेव ने धरती वालों की स्थिति को देखा तो तथ्य स्पष्ट था। कि बड़ों के चले जाने पर भी भगवान की बनाई इस दुनिया में कहीं कुछ कार्य रुकता नहीं।


आत्मबोध जीवन का सर्वोपरि लाभ

आत्मबोध ही ज्ञान साधना का लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने के भर्म को हस्तगत कर लिया।

दर्पण में अपनी ही छाया दिखाई पड़ती है, जैसे भी कुछ भले बुरे हम हैं,उसी के अनुरूप यह विशालकाय दर्पण—संसार हमें दृष्टिगोचर होता है। दुखज्ञान वश हम बाह्य परिस्थितियाँ अथवा बाहरी व्यक्ति यों को अपने सुख−दुख का, उत्थान−पतन का कारण मानते हैं पर वास्तविकता इस मान्यता से सर्वथा भिन्न है। जिस प्रकार समुद्र की अगणित लहरों पर एक ही चन्द्रमा के अगणित प्रतिबिंब दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार संसार के अगणित प्राणियों एवं पदार्थों पर अपनी ही मान्यताएँ और क्रियाएँ अपनी ही भावनाएँ और प्रवृत्तियाँ थिरकती दिखाई पड़ती हैं।

दृष्टिकोण का दोष दूषण—जगत में प्रतिविम्बित प्रतिध्वनित होता है। इसलिए तत्वदर्शी सदा से यह कहते रहे हैं कि बाह्य परिस्थितियोँ में यदि सुधार करना हो तो उसका प्राथमिक सुधार आत्म−परिष्कार से आरम्भ करना चाहिए।

आत्म−परिष्कार का प्रयास आरम्भ करने से पूर्व अपना स्वरूप समझना होता है और किस प्रकार अपना आपा बाह्य जगत पर प्रतिविम्बित होती है, इस तथ्य को हृदयंगम करने की आवश्यकता पड़ती है। यही आत्मज्ञान है। इसी को आत्मबोध कहते हैं। अध्यात्म विज्ञान, का समस्त आवरण इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है कि मनुष्य अपने को जाने और उस तथ्य के आधार पर अपने चिन्तन एवं क्रिया कलाप का नये सिरे से निर्धारण करे।

इसी तथ्य को तत्व−दर्शियों ने अनेक वस्त्रों में अनेक प्रकार से लिखा कहा है। जिस प्रकार अक्षर ज्ञान अ, आ, इ, ई से आरम्भ होता है उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष, आत्म−साक्षात्कार और आत्म−कल्याण की ब्रह्म विद्या का, साधना विज्ञान का आरम्भ भी आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म−साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—

चिदचैत्याऽखिलात्मेति सर्वं सिद्धान्त संग्रह। एते निश्चयमादाय विलोक्य धियेच्छया॥78 स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानमानन्दं पदाप्स्यसि। महोपनिषद् 6।78

समस्त अध्यात्म शास्त्रों का सार इतना भर है—कि विषयों से मुक्त चित्त ही आत्मा है। सो स्वच्छ अन्तःकरण द्वारा अपने आप को ही देखो।

आत्मनि रक्षते सर्वं रक्षितं भवति। आत्मायत्तौ वृद्धि विनाशौ॥ चाणक्य सूत्र 1। 82, 83

अपनी रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है। वृद्धि या विनाश करना अपने हाथ की बात है।

अपने आप को सत्−चित−आनन्द स्वरूप परमात्मा का पवित्र अंश माना जाना चाहिए और काय−कलेवर के साथ जुड़े हुए इन्द्रिय समूह को−मन, बुद्धि, चित्त, अहं का के अन्तःकरण चतुष्टय को अपना वाहन, उपकरण सेवक स्तर का प्रयोग साधन मात्र मानना चाहिए। इस मान्यता की जितनी परिपक्वता होती है, आत्म और अनात्म के भेद जितनी गहराई तक अन्तःकरण में निष्ठा बन कर प्रतिष्ठित होता है, उतने ही अंश में आत्मबोध प्राप्त हुआ समझा जाना चाहिए। कहने, सुनने और पढ़ने जानने में तो आत्मा और अनात्मा का, ज्ञान और अज्ञान का अन्तर प्रायः हर कोई समझता है पर अन्तःबोध प्रायः भ्रमग्रस्त स्थिति में ही रहता है। जीव अपने को शरीर मात्र अनुभव करता है और उसी के सुख−साधन जुटाने में जीवन सम्पदा को नियोजित किये रहता है। ऐसे ज्ञानवानों को भी अज्ञानी ही कहना चाहिए। आत्मबोध का उदय आत्म और अनात्म तत्व की स्पष्ट एवं सघन मान्यता से ही आरम्भ होता है और वह मान्यता इतनी प्रबल होती है कि आत्मज्ञानी अपने चिन्तन एवं क्रियाकलाप को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह ही नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए शास्त्र कहता है—

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया। इति शुश्रुम धीराणाँ ये नस्तद् विचचक्षिरे॥10 ईश 10

ज्ञान और अज्ञान के, अवलम्ब के परिणाम अत्यन्त भिन्न हैं। यह अनुभव हमने उनसे सुना है जिन्होंने तत्व का गहन अवगाहन किया है।

अग्रतश्चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः। इदं ब्रह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि॥

मेरे मुख में चारों वेदों का ज्ञान है, मेरी पीठ पर वाणों सहित धनुष टँगा है। मैं ब्राह्म−शक्ति से शाप देकर और क्षात्र−शक्ति से शिरच्छेद कर−दोनों शक्तियों द्वारा−शत्रु को पराभूत करने में समर्थ हूँ।

त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः। यत्न्याः पतिः पिता सूनो कस्त्वाँ भूप वदाम्यहम्॥36

त्वं किमेतच्छिरः किं तु शिरस्तव तथोदरम्। किमु पादादिकं त्वं तवैतत्कि महीपते॥36

समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथम्भूतो व्यवस्थितः। कोऽहमित्यत्र निपुणं भुत्वा चिन्तय पार्थिव॥ तुच्छुत्वोच राजा तमवधूत द्विजं हरिम्॥38 अग्नि पुराण (अद्वैत ब्रह्म)

तू इस विश्व वसुधा का शासक है। पिता का पुत्र है। शत्रु का शत्रु है। पत्नी के लिए पति है। पुत्र के लिए पिता है। बता तुझे मैं क्या कह कर पुकारूं?

क्या तू शिर है—नहीं, शिर तो तेरा है। क्या तू पेट है−नहीं, पेट तो तेरा है। क्या तू पैर है−नहीं, पैर तो तेरा है? यह समस्त अंग तेरे उपकरण मात्र है। तू इससे कुछ पृथक ही है। हे मिट्टी के पुतले! मैं कौन हूँ, इस पर अत्यन्त गम्भीरता और सावधानी के साथ विचार कर।

नाहं पदार्थस्य न में पदार्थ इति भावेत॥42 अन्तःशीतलया बुद्ध़् या कुर्वतो लीलया क्रियाम्। महोपनिषद् 6।43

न मैं इन पदार्थों का हूँ और न ये मेरे हैं। अन्तःकरण में शान्ति और प्रफुल्लता प्राप्त करो।

आत्मा का विकसित, परिष्कृत रूप ही परमात्मा है। जीव की सुविकसित स्थिति का नाम ही ब्रह्म है। अज्ञान जन्य अन्धकार से निवृत्त हो जाने का नाम ही आत्म−साक्षात्कार अथवा ईश्वर दर्शन है। यह प्रक्रिया अपने से बाहर संसार में अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं। तीर्थ, गुरु, सत्संग आदि से मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन भर मिलता है। अभीष्ट वस्तु की उपलब्धि तो अपने भीतर अन्तःकरण में ही होती है। तप करने से लेकर ईश्वर दर्शन करने तक का प्रयोजन पूर्ण करने के लिए हृदय गुफा रूपी तीर्थ को, तपोवन को ही एक मात्र उपयुक्त स्थान माना गया है।

हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः हृदि प्राणइच ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च तद्विदुः॥ हृदि चैतन्येतिष्ठति॥4

यजोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्य्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥5 ब्रह्मोपनिषद् 4−5

हृदय में समस्त देवता निवास करते हैं। हृदय में ही प्राण और प्रकाश है। परमात्मा के इन तीन आधारों की अभिव्यक्ति के लिए यज्ञ सूत्र यज्ञोपवीत पहना जाता है।

हृदय में परब्रह्म का निवास है। यह तथ्य यज्ञोपवीत प्रकट करता है। जो तथ्य को जानता है वही देवेश ब्राह्मण है।

नवद्वारे पुरे देहि है सो लेलयात वहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥18 श्वेताश्वन

सम्पूर्ण स्थावर-जंगम विश्व का नियामक परमेश्वर नौ द्वार वाले देह रूप पुर में स्थित हृदय में निवास करता है और बाह्य संसार में भी वही क्रीड़ा कर रहा है॥18

तस्मादिदं गुहेव हृदयम्। शतपथ 11।2।6।5

यह हृदय ही गुफा है।

अणोरणीयान् महतो महीया− नात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम्। तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमा महात्मनः॥ (कठ 2।20)

छोटे से भी वह छोटा है बड़े से भी बड़ा है, इस जीव की हृदय रूपी गुफा में वह विराजमान है। उस परमात्मा की महिमा को उसी परमात्मा की कृपा से कामनाशुन्य वीतशोक पुरुष देखते हैं।

एवं हियो वेद गुहाशयं परं प्रभुँ पुराण पुरुषं विश्वरुपम्। हरणमयंबुद्धिमताँपरांगर्तिसबुद्धिमान्− बुद्धिमतीत्यतिश्ठति।18

इस आत्म गुहा में आश्रय वाले उस परम प्रभु−पुराण पुरुष−विश्वरूप−हिरण्यमय तथा बुद्धिमानों की परागति के स्वरूप वाले आत्मा को जो जानता है वही वस्तुतः बुद्धिमान है और वह बुद्धि का अतिक्रमण करके ही स्थित रहा करता है॥18॥

अपने को परमात्मा का अविनाशी अंश मानकर जीवन नीति निर्धारण करना ही जीवन मुक्ति का एक मात्र साधन है। इसके विपरीत जो शरीराभ्यास में निमग्न रह कर अपने आप को देहधारी मात्र मानते हैं और भौतिक सुखों के लिए आत्मकल्याण के लिए अभीष्ट गति−विधियाँ अपनाने से इन्कार करते हैं उन्हें आत्म−हत्यारा, आत्म हननकर्त्ता, माया, मोह ग्रस्त अज्ञानी जीव कहा है ऐसे पथ−भ्रष्ट लोगों की भर्त्सना करते हुए शास्त्र कहता है−

आत्मज्ञान प्राप्त मनुष्य का घर ही तपोवन बन जाता है। अन्तर की महानता घर−परिवार से लेकर समीपवर्ती कार्य व्यवसाय में भी आनन्द, उल्लास का, उत्कृष्टता का वातावरण उत्पन्न करती है और उन परिस्थितियों में रहता हुआ मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और अपने आप को सब प्रकार धन्य हुआ अनुभव करता है।

वसिष्ठोस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि। वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धिमाम्॥ महाभारत

घर में रहते हुए भी मैं वरिष्ठ हूँ। सबमें बसा हुआ हूँ। सब मुझमें बसते हैं। इससे मैं वसिष्ठ हूँ।

यह विशिष्टता ही वशिष्ठ का ऋषिपद प्रदान करती है और वह अन्तःभूमिका प्रदान करती है जिसमें मनुष्य अपने आप को धन्य अनुभव कर सके। आत्म−परायण व्यक्ति उद्घोष करता है।


भारतेंदु हरिश्चंद्र का सहयोगभाव (कहानी)

भारतेंदु हरिश्चंद्र के एक मित्र की कन्या का विवाह था। वे कुछ याचना का मनोरथ लेकर आए, पर भारतेन्दु जी की जेब उन दिनों बिलकुल खाली थी। अपना निर्वाह भी कठिन पड़ रहा था।

फिर भी जरूरतमंद को खाली हाथों न जाने देना ही उनने उचित समझा। हीरा जड़ी अंगूठी उतारकर एक हाथ से मित्र के हाथ में रखा और लेने से इंकार करने का अवसर आने देने से पूर्व ही उनने दूसरे हाथ से मित्र का मुँह यह कहते हुए बंद कर दिया—बस, अब कुछ मत कहना। मेरे पास अब कुछ बचा नहीं है।


योग शब्द के अर्थ का अनर्थ न किया जाय

आदमी जैसा घटिया होता चला जा रहा है उसी अनुपात से उसने योग की निचली सीड़ियों को ही न जाने कितने ऊँचे महत्व की मानना आरम्भ कर दिया है। छोटे बच्चों को खड़े होने और चलना सिखाने में छोटी तीन पहियों की गाड़ी काम आती है। उन दिनों बच्चा भी उसका सहारा लेता है और अभिभावक भी उसे प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इतना सब होते हुए भी यह सिद्धान्त सदा के लिए नहीं बन सकता कि चलना या खड़ा होना हो तो तीन पहिये की स्टेण्ड गाड़ी का सहारा लेना ही चाहिए।

योगसाधना के लिए यह उचित है कि शरीर को सक्रिय और मन को सन्तुलित रखा जाय। कैंची, उस्तरा पर धार ठीक रहे तो नाई हजामत ठीक तरह बना सकता है। लुहार छेनी, हथौड़े के सही होने पर अपनी ढलाई−मढ़ाई ठीक से करता है। यह मानने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। योग साधक का भी शरीर दूसरे अन्य लोगों की तरह ही स्वस्थ रखने के लिए आसन, प्राणायाम जैसे व्यायामों का उपयोग किया जाना चाहिए। आहार−बिहार ठीक रहना चाहिए। क्या योगी, क्या भोगी सभी के लिए यह सामान्य बात है कि आसन वाले अथवा दूसरी तरह के व्यायाम करके शरीर को श्रमशील, सुगठित बनाया जाय। निरोग रखा जाय। स्वास्थ्य संरक्षण में व्यायाम की प्रक्रिया का भी एक स्थान है और व्यायामों के अनेक प्रकारों में एक गणना आसनों की भी होती है। स्वास्थ्य रक्षा जब हर स्थिति में उपयोगी है तो योग साधक के लिए उसकी उपयोगिता क्यों न होगी। यहाँ तक बात सही है। पर गलती तब आरम्भ होती है जब शारीरिक अवयवों की तोड़−मरोड़ को योग साधना मान कर बैठे जाते हैं।

आजकल हिन्दुस्तान में और उससे बाहर योग शिक्षा की चर्चा बहुत है, पर सर्वसाधारण को उसका जो परिचय प्रशिक्षण कराया जाता है उसमें आसन जैसे शारीरिक व्यायामों को ही आकाश−पाताल जैसी प्रशंसा के पुल बाँध दिये जाते हैं। यही बात प्राणायाम के सम्बन्ध में है। उसकी महत्ता तो है पर तब है जब अन्तःचेतना को उच्च भूमिका में अवस्थित करने वाली प्रचण्ड संकल्प शक्ति का उपयोग भी श्वास−प्रश्वास क्रिया के साथ किया जाय, अन्यथा गहरी साँस लेना फेफड़े का व्यायाम भर ठहराया जा सकता है। शरीर के अन्यान्य अवयवों की परिपुष्टि के काम में आने वाले व्यायामों की तरह फेफड़े मजबूत करने में प्राणायाम भी उपयोगी हो सकता है। सामान्य स्थिति में किसी बात को उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितनी कि वह वस्तुतः हो ही। प्राणायाम को योग मान बैठे और आसनों को योग का अनिवार्य अंग मानें तो यह एक थोथी भ्रान्ति ही होगी। यदि कोई व्यक्ति दूसरे प्रकार की श्रम साधना अपनाकर अपना शरीर सक्रिय और समर्थ रख सकता हो तो वह बिना आसन, प्राणायाम का सहारा लिए भी योग−साधना का पूर्णतया अधिकारी माना जा सकता है। ऐसी दशा में आसन, प्राणायाम का उतना महत्व नहीं होता जैसा कि आजकल योग की शिक्षा देने वालों ने तिल को ताड़ बनाकर खड़ा कर दिया है।

यही बात एकाग्रता के सम्बन्ध में लागू होती है। ‘मेडीटेशन’ की लम्बी चौड़ी चर्चाएं आज सुनी जाती हैं और उनका इतना महात्म्य बताया जाता है मानो इसे कर लेने पर योग साधना का लक्ष्य पूरा हो जायगा। ‘एकाग्रता मन मस्तिष्क को सोचने का एक व्यवस्थित विधि मात्र है जिसके आधार पर हर कोई चिन्तनशील व्यक्ति किसी भी भली−बुरी समस्या पर गहराई से विचार कर सकता है। विचारणीय तथ्य पर मनोयोग पूर्वक यदि विचार किया जायगा तो हर चिन्तनशील व्यक्ति को उपयोगी सफलता मिलेगी। विद्यार्थी, वकील, लेखक, कवि, शिल्पी, कलाकार, सर्जन आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग जब अपना काम मनोयोग पूर्वक करते हैं, प्रस्तुत विषय में तन्मय हो जाते हैं तो वे गहराई में घुस कर कीमती मोती बीन लाते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों को यह अवलम्बन अनिवार्य रूप में उनका मस्तिष्क उलझा रहता है। सोते, जागते वे उसी क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने में लगे रहते हैं। कलाकारों और कारीगरों के बारे में भी यही बात लागू होती है, यदि वे अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से करें, हाथ के कार्य को मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करें तो उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सफलता प्राप्त करते हैं जो अस्त व्यस्त मन से बेगार भुगतने की तरह काम का बोझा सिर पर से उतारते हैं।

एकाग्रता, मस्तिष्क के बिखराव की अस्त−व्यस्तता पर नियन्त्रण पाने की एक कला है। दूसरे शब्दों में उसे सोचने की व्यवस्थित शैली कह सकते हैं। जो अच्छी सफलताएँ पाने के किसी भी इच्छुक को सीखनी ही चाहिए। शरीर को सधा कर ही कुशल कारीगर उपयोगी सफलताएँ प्राप्त करते हैं। चित्रकला, मूर्तिकला, गायन−बादन, सर्जरी, शिल्प आदि में हाथ सधाने का अभ्यास करना पड़ता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को ऊबड़−खाबड़, अस्त−व्यस्त घुड़दौड़ लगाने का बेढंगापन छोड़कर अभीष्ट प्रयोजन की परिधि में अपनी चिन्तन प्रक्रिया को नियोजित करना अधिक उपयोगी रहता है। जिनका मस्तिष्क सधा हुआ होता है वे मन्दबुद्धि होते हुए भी बहुमूल्य समाधान ढूँढ़ निकालते हैं। यहीं है एकाग्रता का−मेड़ीटेशन का− सर्वविदित महत्व। बात जितनी बड़ी है उतनी ही उसे बताया जाना चाहिए। बात को बतंगड़ बनाने की आदत बुरी है। एकाग्रता के मस्तिष्कीय व्यायाम को यदि योग जैसी आध्यात्मिक साधना बता कर उसे उतनी छोटी परिधि में सीमाबद्ध कर दिया जायगा तो उसे अर्थ का अनर्थ ही कहेंगे। आज योग के व्याख्याता कुछ ऐसा ही करने पर तुल गये हैं। चूँकि हलकी वस्तुएँ लोग आसानी से पकड़ लेते हैं, उनके महात्म्य यदि बढ़ा−चढ़ा कर बता दिये जायँ तो लोग आकर्षित भी आसानी से हो जाते हैं और योग शिक्षा की प्रतिष्ठा बढ़ जाती और उनकी योग पाठशाला चलने लगती है। चरित्र निर्माण भाव परिष्कार और जीवन—लक्ष्य के निर्धारण की बात कठिन पड़ती है सो उसे सस्ते योगाभ्यासी क्यों सुनने लगे, योग शिक्षक भी कठिन आधार प्रस्तुत करके अपनी बाजीगरी को अनाकर्षक नहीं बनाना चाहते। सरल सुविधा का रास्ता अपनाया जाय सो ठीक है पर बात का बतंगड़ न बनाया जाय।

योग का लक्ष्य है आत्मा को परमात्मा से जोड़ना। योग शब्द का मोटा अर्थ जोड़ना सर्वविदित है। किसे किससे जोड़ना, इस प्रश्न का उत्तर नर को नारायण से—पुरुष को पुरुषोत्तम से, अणु को विभु से, तुच्छ को महान से, जीव को ब्रह्म के साथ संयुक्त होने के रूप में ही दिया जा सकता है। यह भाव भूमिका है। जिसमें व्यक्ति को अपनी सत्ता का समर्पण समष्टि में करना पड़ता है। आदर्शवादी भाव चेतना को ही ‘उपास्य ब्रह्म’ कहा गया है। व्यक्ति वादी स्वार्थ भरी संकीर्णता की परिधि से आगे बढ़ कर विश्व−मानव में आत्मसात् होने के भावोत्कर्ष को योग साधना कहा जा सकता है। यह विश्व, ब्रह्म की साकार प्रतिमा है। उस चेतना के आदर्शवादी पक्ष के प्रति श्रद्धा और तत्परता का अभिवर्धन यही योग साधना का लक्ष्य हो सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण का−भाव भूमिका का−परिष्कार करना होता है और पशु स्तर को हेय चिन्तन एवं कर्तृत्व को उलट कर उसे सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना पड़ता है। अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य यही है। इसकी पूर्ति के लिए प्रत्याहार धारण, ध्यान और समाधि की मनः विज्ञान समर्थित योगाभ्यास क्रियाओं को अपनाना पड़ता है। यही है वह लक्ष्य जिसकी ओर योग शिक्षकों की तत्परता और शिक्षार्थियों की दिलचस्पी को आगे बढ़ना बढ़ाया जाना चाहिए।

दुर्भाग्य की बात तब सामने आती है जब निरुद्देश्य आधार लेकर मस्तिष्क को सधाने की कला की नगण्य सी पद्धति एकाग्रता को आकाश जैसी बड़ी बता कर योग के मूल लक्ष्य को ही झुठला दिया जाता है। ध्यान−योगी तरह−तरह की आकर्षक प्रतिभायें सामने रख कर अथवा उन्हें कल्पना क्षेत्र में बिठा कर उनके साथ एकाग्रता जोड़ने का प्रयत्न करते हैं। यदि उसमें पूर्ण सफलता मिल जाय, पूरी तरह उन प्रतिमाओं पर मन एकाग्र रहने लगे तो उससे आध्यात्मिक प्रगति में योग प्रयोजन में प्रयोजन के मूल लक्ष्य की प्राप्ति में कोई विशेष सहायता न मिलेगी। मस्तिष्क को सधाने का अभ्यास हो भी जाय तो उससे भाव परिष्कार और व्यक्तित्व की व्यापकता का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? ध्यान−योगी अपनी चेतना को विश्व चेतना का घटक मान कर स्वार्थ को परमार्थ में विकसित करने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त करेगा। ध्यान−योग इसके लिए सहायक हो सकता है पर उस नगण्य से साधन को साध्य मान बैठने से तो किसी भी प्रकार कुछ भी प्रयोजन पूरा नहीं होता।

इन दिनों आसन, प्राणायाम और एकाग्रता इसी तीन टाँगों की घोड़ी पर सवार होकर लोग योग साधना का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये दौड़ लगाते देखे जाते हैं। कहीं−कहीं मुद्रा, बंध, नेति धोति, वस्ति आदि हठ योग परक अंग संचालकों को योग शिक्षा में सम्मिलित कर लिया गया है। चौथे उस चरण की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है जिसकी पूर्ति के लिए योग विज्ञान का सारा ढाँचा ही गढ़ा गया और खड़ा किया गया है। व्यक्ति वादी संकीर्णता और स्वार्थवादी महत्वाकाँक्षाओं में उलझे हुए मन को उच्च आदर्शों को अपनाने की तपश्चर्या में लगा देना ही जीव और ब्रह्म की एकता का आधार हो सकता है उसके लिए परिष्कृत दृष्टिकोण का—आदर्शवादी मनोभूमि का विकास अनिवार्य है। इसी विकास के आधार पर यह परखा जा सकता है कि किसकी योगसाधना किस हद तक सही दिशा में चल रही है और कितनी सफल हो रही है।

इन दिनों योग शब्द का उपयोग जिस अर्थ में हो रहा है और योगाभ्यास के नाम पर जिन बाल क्रीड़ाओं को, आसमान पर उठाने जितना महत्व दिया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। शारीरिक व्यायाम, मस्तिष्कीय संतुलन के अभ्यास अच्छे

उन्हें सीखने से स्वास्थ्य और संतुलन का लाभ मिल सकता है। योग इतना छोटा नहीं है, उसमें उत्कृष्टतावादी भाव परिष्कार और आदर्शवादी कर्तृत्व के लिए प्रचण्ड प्रोत्साहन की शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। यदि उसका मूल−लक्ष्य विस्तृत कर दिया जाय तो फिर योग शब्द के उपयोग का कोई महत्व ही नहीं रह जाता, तब उसे शारीरिक, मानसिक व्यायामों की शिक्षा’ कहना पर्याप्त न होगा। आज की लक्ष्य विहीन योगसाधना की जो धूम देश−विदेश में मची हुई है उसे इसी हलके स्तर की बात क्रीड़ा ही कहा जाना चाहिए।

याग मनुष्य में देवत्व के उदय की पुण्य प्रक्रिया है। जीव और ब्रह्म का मिलन नर−पशु को चिन्तन और कर्तृत्व में, देव स्तर का बनाये बिना रह नहीं सकता। यह महामानव देव−मानव बनने का कल्प विधान है जिसे अपना कर लघु को महान बनने का अवसर मिलता है। योग का उपयोग इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए किये गये प्रयास अभ्यासों के साथ जोड़ा जाय तो ही इस महान् भाव विज्ञान की आत्मा को यथार्थ रूप में समझा और समझाया जा सकेगा।

इस विश्व−ब्रह्मांड में ईश्वरीय चेतना की अगणित धाराएँ विभिन्न ध्वनि प्रवाहों के रूप में विवरण करती हैं। इनके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने और उनके साथ सम्बद्ध हो कर यह सम्भव हो सकता है कि हम स्वयं भी शक्ति सम्पन्न बनें। नादयोग की साधना से हम प्रकृति की चेतन ध्वनियों से परिचित होते हैं तदनुरूप उन रहस्यों को जानने में सफल होते हैं सर्वसाधारण के लिए अविज्ञात हैं। प्रकृति की शक्तियों को करतलगत करना सूक्ष्म ध्वनियों पर नियन्त्रण करने से सम्भव होता है। अमुक ध्वनि, अमुक घटना क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। नाद साधक प्रकृति के अन्तराल से अमुक ध्वनि पकड़ने और सुनने का अभ्यास करते है। इसमें कितनी सफलता मिलती है उतना ही अविज्ञात को जानना एवं अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष एवं करतलगत करना सम्भव हो जाता है।

नादयोग के सम्बन्ध में शास्त्रों के कुछ अभिवचन इस प्रकार हैं—

उक्त त्ममानतः पूर्व पश्चात् च विविधः कपे। अभिव्यजन्त एतस्य नादास्तत्सिद्धि सूचकाः॥

अनाहतमनुच्चार्य शब्दब्रह्म परं शिवम्। ब्रह्यरध्रंगतेवायौ नादश्चोत्पद्यतेऽनध। शंख ध्वनि निभश्चादौ मध्ये मेघध्वनिर्य था॥

पवने व्योम अम्प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान्। घण्टादीनाँ प्रवाद्यानाँ ततः सिद्धिरदूरतः॥

जब अन्तर में ज्योति स्वरूप आत्मा का प्रकाश जागता है तब साधक को कई प्रकार के नाद सुनाई पड़ते हैं। इसमें से एक व्यक्त होते हैं, दूसरे अव्यक्त। जिन्हें किसी बाहर के शब्द से उपमा न दी जा सके, उन्हें अव्यक्त कहते हैं यह अन्तरं में सुनाई पड़ते हैं और उनकी अनुभूति मात्र होती है। जो घण्टा आदि की तरह कर्णेन्द्रियों द्वारा अनुभव में आवे उन्हें व्यक्त कहते हैं। अव्यक्त ध्वनियों को अनाहत अथवा शब्दब्रह्म भी कहा जाता है।

जब घण्टा जैसे शब्द सुनाई पड़े तो समझना चाहिए अब योग सिद्धि दूर नहीं।

श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो माहन्। वर्धमानस्तथाऽभ्यासे श्रयूते सूक्ष्मसूक्ष्मतः॥33

आदौ जलधिजीमूतभेरीनिर्झरसम्भवः। मध्ये मदलशब्दाभो घण्टाकाहलजस्तथा॥34

अन्ते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनिस्वनः। इति नानाविधा नादाः श्रू यन्ते सूक्ष्मसूक्ष्मतः।35 नाद विन्दूपनिषद् 33−34−35

आरम्भ में यह नाद कई प्रकार का होता है और जोर से सुनाई पड़ता है। पीछे धीमा हो जाता है। आरम्भ में यह ध्वनियाँ नागरी, झरना, भेरी, मेघ, जैसी होती हैं, पीछे भ्रमर वीणा, वंशी, किंकिणी जैसी मधुर प्रतीत होती हैं।

रेचकं पूरकं मुक्त् वा वायुना स्थीयते स्थिरम्। नाना नादाःप्रवर्तन्ते संस्त्रवेच्चन्द्रमण्डलम्॥

समाकुँच्याभ्यसेद्योगी रसनाँ तालुक प्रति। किंचित्कालान्तरेणैव क्रमात्प्राप्नोति लम्बिकाम्॥

ततः प्रस्त्रवते सा तु संस्पृष्ठा शीतलाँ सुधाम्। पिबन्नेव सदा योगी सोऽमरत्वं हि गच्छति। —महायोग विज्ञान

जब प्राणायाम द्वारा प्राण वायु स्थिर हो जाता है तो नाना प्रकार के नाद सुनाई पड़ते हैं और चन्द्रमण्डल से अमृत टपकता है।

जिह्वा को तालु में लगा कर योग साधक इस रस का पान करते हैं। कुछ काल उपरान्त जिह्वा को यह दिव्य, रसास्वादन होने लगता है। यह शीतल अमृत जैसा रस साधक को अमर बना देता है।

ब्रह्यरन्ध्रं गते वायौ नादश्चोत्पद्यतेऽनघ। शंखध्वनिनिभश्चादौ मध्ये मेघध्वनिर्य था॥ 36

शिरोमध्यगते वायौ गिरिप्रस्त्रवर्ण यथा। पश्चात्प्रीतो महाप्राज्ञः साक्षादात्मोन्मुखो भवेत्॥36 जावाल दर्शनोपनिषद् 6।36, 36

ब्रह्म रन्ध्र में प्राण का प्रवेश होने पर शंख ध्वनि एवं मेघ गर्जन के समान नाद होता है। वायु के मस्तक में प्रवेश करने से झरने जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती है। इससे प्रसन्नता होती है और अंतर्मुखी प्रवृत्ति बढ़ती है।

प्रथमे चिञ्चिणी गात्रं द्वितीये गात्रभञ्जनम्। तृतीये स्वेदनं याति चतुर्थे कम्पते शिरः॥

पञ्चमे स्त्रवते तालु षष्ठेऽमृतनिषेवणम्। सप्तमे गूढविज्ञानं परा वाचा तथाष्टमे॥

अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथामलम् दशमे परमं ब्रह्य भवेद्ब्रह्यात्मसंनिधौ॥ —महायोग विज्ञान

आदि में बादल बरसने, गरजने, झरनों के झरने, भेरी बजने जैसे शब्द होते है। मध्य में मर्दस, शंख, घण्टा मृदंग जैसे अन्त में किंकिणी, वंशी, वीणा, भ्रमर गुंजन जैसे शब्द सुनाई पड़ते हैं। यह अनेक प्रकार के नाद हैं जो समय−समय पर साधक को सुनाई पड़ते रहते हैं।

मेघ नाद में शरीर में झनझनाहट होती है, चिण नाद में शरीर टूटता है, घण्टा नाद से प्रस्वेद होता है, शंखनाद से सिर झन्नाता है, तन्त्री नाद से तालु रस टपकता है, करताल नाद से मधुस्वाद मिलता है, वंशी नाद से गूढ़ विषयों का ज्ञान होता है, मृदंग नाद से परावाणी प्रस्फुटित होती है, मेरी नाद से दिव्य नेत्र खुलते हैं तथा आरोग्य बढ़ता है। उपरोक्त 9 नादों के अतिरिक्त दसवें ॐकार नाद में ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध जुड़ता है।

मकरन्दं पिबन् भृंगो मन्धं नापेक्षते यथा। नादासक्त तथा चित्तं विषयान्न हि काँक्षते॥90

मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः। नियन्त्रणे समर्थोऽयं निनादनिशिताँकुशः॥91

बद्धं तु नादबन्धेन मनः संत्यक्त चापलम्। प्रयाति सुतराँ स्थैर्य छिन्नपक्षः खमो यथा॥92

सर्वचिन्ताँ परित्यज्य सावधानेन चेतसा। नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता॥93

नादोऽन्तरंगसारंगबन्धने वागुरायते। अन्तरंगकुरंगस्य वधे व्याधायतेऽपि च॥94

अन्तरंगस्य यमिनो वाजिनः परिधायते। नादोपास्तिरतो नित्यमवधार्या हि योगिना॥95

नादश्रवणतः क्षिप्रमन्तरंगभुजंगमः।विस्मृत्य सर्वमेकाग्रःकुत्रचिन्न हि धावति॥97

काष्ठे प्रवर्तितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति। नादे प्रवर्तित चितं नादेन सह लीयते॥98

हठयोग प्रदीपिका 4/90 से 98 तक जिस प्रकार पुष्पों का मकरन्द पीने वाला भ्रमर अन्य गन्धों को नहीं चाहता, उसी प्रकार नाद में रस लेने वाला चित्त, विषय सुखों की आकाँक्षा नहीं करता। 90

विषय रूपी बगीचे में मदोन्मत्त हाथी की तरह विचरण करने वाले मन को नाद रूपी अंकुश से नियन्त्रण में लाया जाता है।91

नाद रूपी बन्धन में बाँधे जाने पर पंख कटे हुए पक्षी की तरह मन स्थिर हो जाता। 92

योग साम्राज्य की इच्छा करने वाले को सब ओर से मन हटा कर सावधान चित्त से नादानुसंधान में लग जाना चाहिए। 93

मन रूपी हिरन को नाद बहेलिये की तरह अपने जाल में जकड़ लेता है।94

चंचलता घोड़े को जिस तरह दरवाजे में लगी अर्गला रोक लेती है, उसी तरह नाद चंचल मन को दौड़ने से रोक लेता है।95

जिस तरह साँप बिन की ध्वनि सुनकर सहलाने लगता है उसी तरह नाद की ध्वनि मन को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।97

काष्ठ में लगी हुई अग्नि काष्ठ के साथ ही समाप्त होती है। उसी तरह नाद में लगा हुआ चित्त नाद के साथ ही लय हो जाता है।98

नादानुसंधान समाधि मेकम्। मन्यामेह मान्यतमं लयानाम्॥ योग तारावली

लय योगों में सर्वश्रेष्ठ नादानुसंधान है। वह और समाधि एक ही है।


राजेन्द्र बाबू की सादगी और सज्जनता (kahani)

राजेन्द्र बाबू उन दिनों राष्ट्रपति तो नहीं पर देश के अग्रणी नेता अवश्य थे। उन्हें इलाहाबाद पं. नेहरू से मिलने जाना था। निश्चित ट्रेन पर उन्हें, लेने के लिए कितने ही व्यक्ति पहुँचे, पर वे उन्हें असाधारण सादगी के कारण पहचान न सके। निदान वापिस लौट आये।

राजेन्द्र बाबू इक्केपर बैठ कर आनन्द भवन पहुँचे। रात अधिक हो गई थी। लोगों को जगाने की अपेक्षा उनने यही उचित समझा कि दरवाजे के बाहर खुले फर्श पर सोया जाय। सो सो भी गये।

रात्रि के अन्तिम प्रहर जब उन्हें दमे की खाँसी उभरी तो पं. नेहरू ने आवाज पहचानी और उतर कर नीचे आये। राजेन्द्र बाबू की इस सादगी और सज्जनता से उनकी आंखें भर आई। —महायोग विज्ञान


अभीष्ट फलदायिनी गायत्री माता

गायत्री महामन्त्र में ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराओं का समावेश है। इन 24 अक्षरों में से प्रत्येक में जो शिक्षा एवं प्रेरणा भरी पड़ी है उसे हृदयंगम करके मानव जीवन में देवत्व का उदय हो सकता है। संसार का सबसे छोटा किन्तु सबसे महत्वपूर्ण धर्म−ग्रन्थ यदि तलाश करना हो तो वह गायत्री के 24 अक्षरों को देखा समझा जा सकता है। गायत्री महाशक्ति की उपासना को साधना विज्ञान का सबसे शक्ति शाली पक्ष कह सकते हैं 24 अक्षरों का गुँथन इस प्रकार हुआ है कि उनकी पुनरावृत्ति करते रहने से प्रसुप्त गुह्य शक्तियों का जागरण हो सकता है और निष्कृष्टता को उत्कृष्टता में परिणत करने का पथ प्रशस्त हो सकता है। विषवत् की गई गायत्री उपासना साधक में भौतिक सफलतायें सम्भव करने वाली सिद्धियों और आत्मिक प्रगति का द्वार खोलने वाली विभूतियों से परिपूर्ण बना सकती है।

गायत्री ज्ञान का समुद्र है। उसे वेद−माता कहा गया है। ब्रह्म विद्या के तत्व दर्शन की समस्त शाखा−प्रशाखाएँ उसी से प्रस्फुटित हुई हैं। आत्मोत्कर्ष के लिए, ईश्वर दर्शन के लिए जिस आत्मिक स्तर की आवश्यकता पड़ती है उसे उपलब्ध कराने में गायत्री उपासना अत्यन्त महत्व पूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकती है।

प्राचीनकाल में ऋषि, तपस्वी और अवतारी महामानवों ने इसी महामन्त्र के सहारे अपने को उत्कर्ष के चरमशिखर पर पहुँचाया था। इन 24 अक्षरों में सन्निहित, मानव−जीवन को सफल बनाने वाले−सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करने वाले तत्वों को ध्यान में रखते हुए धर्म−शास्त्रों ने इस उपासना को दैनिक अनिवार्य धर्म कर्त्तव्यों में सम्मिलित किया है।

गायत्री महामन्त्र की महत्ता बताने वाले अनेक शास्त्र वचनों में से कुछ इस प्रकार हैं—

वेदानाँ मातरं सावित्रासम्पदमुपनिषद मुपास्ते। गी. ब्रा. 1−1−32

सावित्री (गायत्री) वेदों की माता है। द्विजातिजातिरुपा च अपरुपा तपस्विनी। ब्रह्यण्यतेजोरुपा च सर्वसंस्काररुपिणी॥31

पवित्ररुपा सावित्री गायत्री ब्राह्मणप्रिया। तीर्थानि षस्याः संर्स्पश वाँछंति ह्मात्मशुद्धये॥32 देवी भागवत

वह महाशक्ति ही जप स्वरूप है। उन्हें ही तपस्या, ब्रह्म तेज और सर्वसुसंस्कार कहते हैं। सब प्रकार पवित्र वे ही बनानी हैं। सावित्री और गायत्री उन्हीं को कहते हैं। उन्हीं के स्पर्श से तीर्थों में पवित्र करने की शक्ति रहती है।

सावित्री प्रवेशपूर्वककमप्सु सर्वंविद्यार्थस्वरुपाँ ब्राह्यण्याधाराँ वेदमातरम्। परम हंस परिब्रजकोपनिषद् 3

समस्त विद्याओं की आधार स्वरूप ब्राह्मणत्व की आधार, वेदमाता गायत्री की साधना में प्रवेश करें।

साधका भीष्टदाँ सिद्धाँ सिद्धिदाँ सिद्ध सेविताँ। पञ्च प्राणमयं वर्ण पीत विद्युल्लतामयं॥

त्रिविन्दु सहितं मन्त्रमात्मादित्व संयुतं। पञ्च देव मयं वर्ण त्रिशक्ति सहितं सदा। चतुर्वर्ग प्रदं शान्त सर्व सिद्धि प्रदायकं॥

कामिनी या महेशानि स्वयं प्रकृति सुन्दरी। माता सा सर्व वेदानाँ कैवान्य प दायिनी॥ —साधन सिद्धान्त,

सब वेदों की माता गायत्री साधकों को अभीष्ट फलदायक, सिद्धियों की आकाँक्षा वालों को सिद्ध पुरुष बनाने वाली और ब्रह्मवादियों को कैवल्य पद देने वाली है। पाँच प्राण उनके पाँच मुख है। चमकती हुई बिजली की तरह उनकी द्युति है। त्रिबिंदु सहित आदित्य स्वरूप, पंच देवमय, त्रिशक्ति समन्वित है। धर्म, अर्थ काम, मोक्ष, चतुवर्गों को सफलता देने वाली, परब्रह्म की पराशक्ति और प्रकृति सुन्दरी वे गायत्री माता है।

(3) संवर्त संहिता में कहा है—

“गायत्री यः सदा विप्रो जपेतु विपतः शुचिः। स याति परमं स्थानं वायुभूतः खमूर्तिमान।”

“जो ब्राह्मण निरन्तर पवित्र और जितेन्द्रिय होकर गायत्री का जप करता है, वह आकाश रूप होकर वायु रूप से परम स्थान (ब्रह्मस्वरूप) को प्राप्त होता है।”

स होवाच प्रजापतिः स यो ह वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदै श्रियाभिषिक्तं तत्साम्नोऽग वेद श्रिया हैवाभषिच्यते। नृसिंह पूर्वतापिन्युपनिषद् 3

प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—जो व्यक्ति मन्त्रराज गायत्री की बीज सहित उपासना करता है वह श्री सम्पन्न हो जाता है।

गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में एक−एक देवता, एक−एक ऋषि और एक−एक महाशक्ति का समावेश है। इस प्रकार उसे 24 देवताओं, 24 ऋषियों और 24 महाशक्तियों की चमत्कारी क्षमताओं से सुसम्पन्न कहा जा सकता है। श्रद्धा युक्त अन्तःकरण से—पवित्रात्मा साधक यदि विधिवत् उसकी उपासना करे तो उसे वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है जिसकी जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यकता है।

प्रह्लादिनी प्रज्ञा विश्वभद्रा विलासिनी प्रभा शान्ता मा कान्तिः र्स्पश दुर्गा सरस्वती विरुँपा विशालाक्षी शालिनी व्यापिनी विमला तमोऽपहारिणी सूक्ष्मावयवा पद्मालया विरजा विश्वरुपा भद्रा कुपा सर्वतोमुखीति चतुर्विशतिशक्त यो निगद्यन्ते। पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशगन्धरसरुपर्स्शशब्दवाक्यानि पादपायूपस्थत्वकं चक्षुःश्रोत्रजिह्वाध्राणमनोबुद्ध्रयहंकार चित्तज्ञानानीति प्रत्यक्षराणाँ तत्तानि प्रतीयन्ते। —गायत्री रहस्योपनिषद

गायत्री की 24 शक्तियाँ हैं—(1) प्रह्लादिनी (2) प्रजा (3) विश्वभद्र (4) विलासिनी (5) प्रभा (6) शान्ता (7) मा (8) कान्ति (9) स्पर्धा (10) दुर्गा (11) सरस्वती (12) विरुपा (13) विशालाक्षी (14) शालिनी (15) व्यापिनी (16) विमला (17) तमोपहारिणी (18) सूक्ष्मा वयवा (19) पद्मलया (20) विरजा (21) विश्वरुपा (22) भद्रा (23) कृपा (24) सर्वतोमुखी। गायत्री का प्रत्येक अक्षर क्रमशः इन शक्तियों से परिपूर्ण हैं।

प्रथममाग्नेय द्वितीयं प्रजापत्यं तृतीय सौभ्य चतुर्थमाशानं पञ्चमादित्यं षष्ठ गार्हपत्यं सप्तमं मैत्रमष्टमं भगदैवत नवममार्य मणं दशमं सावित्रमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं त्रयोदशमैन्द्राग्नं चतुर्दशं वायध्यं पद्मदशं वामदेव षोडशं मैत्रावरुणंसप्त दशं भ्रातृव्यमष्टादशं वैष्णवमेकोनर्विशं वामनं विंशं वैश्वदैवमेकविंशं रौद्र द्वाविंशं कौबेरं त्रयोविंशमाश्विनं चतुर्विशं ब्राह्यमिति प्रत्यक्षरदैवतानि। प्रथमं वशिष्ठं द्वितीय भारद्वाजं तृतीयं गार्ग्यं चतुर्थमौ पमन्यवं पञ्चमं भार्गवं षष्ठं शाण्डिल्यम् सप्तमम् लौहितमष्टम वैष्णवं नवमं शातातपं दशमं सनत्कु मारमेकादशम वेदव्यासं द्वादशं शुक त्रयोदशं पराशर्य चतुर्दर्श पौंड्रकं पञ्चदश् क्रतुँ षोडशं दाक्षाँ सप्तदशं काश्यपमष्टादशमात्रेयमेकोनविशमगस्त्यं विंशमोद्दालकमेकविंशमाँगिरसं द्वाविंशं नामिकेतुँ त्रयोविंशं मौद्गल्यं चतुर्विंशमांिगरसवैश्वामित्रमिति प्रत्यक्षराणामृषयो भवन्ति। —गायत्री रहस्योपनिषद्

गायत्री के चौबीस अक्षरों के चौबीस देवता इस प्रकार हैं—(1)अग्नि (2)प्रजापति (3)चन्द्र (4) ईशान (5) आदित्य (6) गार्हपत्य (7) मैत्र (8) भग (9) अर्यमा (10) सविता (11) त्वष्ट्रा (12) पूषा (13) इन्द्राग्नि (14) वायु (15) वामदेव (16) मैत्रा वरुण (17) भ्रातृव्य (18) विष्णु (19) वामन (20) वैश्वदेव (21) रुद्र (22) कुबेर (23) अश्विनी कुमार (24) ब्रह्मादि दैवत्व।

गायत्री के 24 अक्षरों के 24 ऋषि यह है (1) वशिष्ठ (2) भारद्वाज (3) गर्ग (4) उपमन्यु (5) भृगु (6) शांडिल्य (7) लौहित (8) विष्णु (9) शातातप (10) सनत्कुमार (11) वेद व्यास (12) शुकदेव (13) पारासर (14) पौंड्रकर्म (15) कृतु (16) दक्ष (17) कश्यप (18)अत्रि (19) अगस्त्य (20) उद्दालक (21) अगंडुरस (22) नामिकेतु (23) मुद्गल (24) विश्वामित्र। इन चौबीस ऋषियों ने गायत्री का साक्षात्कार किया ये उस महामन्त्र के दृष्टा है।

गायत्री को विराट् ब्रह्म माना गया है। उसमें उन समस्त शक्तियों का समावेश है जो इस विश्व में दृश्य और अदृश्य रूप से विद्यमान है। स्थूल ब्रह्माण्ड की सूक्ष्म चेतना के रूप में एक छोटी किन्तु शक्तिशाली प्रतिकृति गायत्री हैं उसकी उपासना करने वाला इन समस्त शक्तियों के साथ अपना सम्बन्ध मिलाकर सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त कर सकता है। समस्त विश्व को ब्रह्ममय देखने की दिव्य दृष्टि से स्पष्टतः गायत्री के तत्व−ज्ञान में समाविष्ट है।

मूर्धा ब्रह्या शिखान्तो विष्णुर्ललाटं रुद्रश्चक्षुषी चन्द्रादित्यौ कर्णौ शुक्रबृहस्पती नासापुटे अश्विनौ दन्तोष्ठावुभे सन्ध्ये मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादयो हृदयं पर्जन्य उदरमाकाशो नाभिरग्निः कटिरिन्द्राग्नी जघनं प्राजापत्यमूरु क लासमूलं जानुनी विश्वेदेवौ जंघे शिशिरः गुल्फानि पृथिवीवनिस्पत्यादीनि नखानि महती अस्थीनि नबग्रहा अटुक्के तुर्मांसमृतुसन्धयः कालद्वमास्फालनं संवत्सरोनिमेषोऽहोरात्रमिति वाग्देवीं गायत्रीं शरणमहं प्रपद्ये।

य इदं गायत्रीरहस्यमधाते तेन ऋतसहस्त्रभिष्टं भवति। य इदं गायत्रीरहस्यमधीते विसकृत पापं नाशयति। सर्वाऩ वेदानधीतो भवति। सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति। —गायत्री रहस्योपनिषद

गायत्री वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। उसका शिर—ब्रह्ममय, शिखान्त विष्णु, ललाट, रुद्र, दोनों नेत्र−सूर्ये, चन्द्र, कानों के दो छेद—शुक्राचार्य, बृहस्पति, नाक के दो छेद—दोनों अश्विनी कुमार, दाँत−होठ—दानों संध्याए मुख—मरुत, रतन−वसु, हृदय—मेघ, पेट−आकाश, नाभि, अग्नि, कटि−इन्द्र, जंघा−प्रजापति उरु−कै लाश, घुटने−विश्वदेव, जंघा−शिशिर, गुल्फ−पृथ्वी, नख—महतत्व, अस्थि−नवग्रह, आँतें−केतु, माँस−ऋतु संधि, दोनों काल वर्ष निभेष−दिन रात।

ऐसी विराट् ब्रह्म स्वरूपिणी महाशक्ति गायत्री की शरण में अपने को समर्पित करता हूँ।

इस गायत्री गुह्य रहस्य का जो अवगाहन करता है सौ हजारों यज्ञ करने वाले की तरह श्रेयाधिकारी बनता है। उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। जिसने यह रहस्य जाना उसने मानो समस्त वेदों का अध्ययन कर लिया। सब तीर्थों में स्नान कर लिया।

अन्य समस्त मन्त्रों का जो फल एवं महात्म्य है वह अकेले गायत्री मन्त्र में विद्यमान है। अन्य मन्त्रों की साधना में तभी सफल होती हैं जब सर्वप्रथम गायत्री मन्त्र द्वारा अपनी भाव भूमिका को चैतन्य कर लिया जाय। इस संदर्भ में शास्त्र का अभिमत स्पष्ट है।

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादनुष्ठानादिकम् तथा। गायत्रीमात्रनिष्ठस्तु कृतकृत्यो भवेद द्विजः॥8 देवी भागवत

और कोई साधना करे या न करे अकेले गायत्री मन्त्र का आश्रय लेने से ही मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

सा गायत्री समिद्धाऽयानि छन्दाँसि समिन्धे। श. प. 1/3/4/6

गायत्री के जागृत होने पर ही अन्य मन्त्र जागृत होते हैं।


Quotation

सर्वव्यापी अनन्त चेतन में समभाव से स्थित आत्मा वाला तथा सब में समभाव देखने वाला योगी ही आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है। यही योग दृष्टि है।


अपनों से अपनी बात - शान्ति कुँज में पाँच स्तर के शिक्षण शिविरों की शृंखला

नव-निर्माण इस युग की सबसे बड़ी माँग, पुकार तथा आवश्यकता है। इसकी सफलता-असफलता पर मानव समाज का उज्ज्वल भविष्य तथा महाविनाश पूरी तरह अवलंबित है। यों प्रगति के कई तरह के सपने सँजोये गये है और कई तरह के सरकारी, गैर सरकारी प्रयास आरम्भ किये है पर उनमें इस मूल तथ्य को एक प्रकार से भुला ही दिया गया है कि यदि जन-मानस की भावनात्मक स्थिति में उत्कृष्टता का समावेश न किया गया तो

बढ़ी हुई सम्पदा, विद्या, प्रतिमा एवं विज्ञान की उपलब्धि केवल पतन एवं विनाश का ही आधार बनेगी। भावनात्मक नव-निर्माण के बिना प्रगति के स्वप्न कभी भी साकार न हो सकेंगे। प्रयासों के भौतिक प्रगति एवं सामाजिक शान्ति के आधार स्वयमेव बनने लगेंगे।

जितनी गहराई से वस्तु पर विचार किया जायगा, उतना ही अधिक सुनिश्चित निष्कर्ष यह निकलेगा कि विश्व -कल्याण के लिए लोकमानस में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग, उपाय है नहीं। विडम्बनाओं में हम भटकते कितने ही क्यों न रहें प्रगति और शान्ति का लक्ष्य प्राप्त तभी किया जा सकेगा जब भावना तक नवनिर्माण की महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए सच्चे गहरे और व्यापक स्तर पर प्रयत्न किये जाँय। युगनिर्माण योजना द्वारा यही किया जा रहा है। समय ही बतायेगा कि जब सब और उत्कर्ष के लिए प्रचलित प्रयासों में नहीं सबसे बड़ी और सबसे भयंकर कभी अथवा भूल है कि उसमें मनुष्य के उस मर्मस्थल को विकसित करने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है जो सर्वतोमुखी प्रगति का एक मात्र आधार है। मानवी अन्तःकरण अविकसित एवं निकृष्ट स्तर पर पड़ा रहे तो उपलब्ध सम्पदाएं सुख-शान्ति का कारण नहीं बन सकेंगी वरन् अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देगी फलस्वरूप स्थिति उससे भी अधिक भयावह हो जायगी जो अभाव-ग्रस्त अथवा पिछड़ेपन की स्थिति में बनी हुई थी। इस भूल को मात्र युग-निर्माण योजना ने सुधारने की दिशा में साहसिक कदम बढ़ाया है। उसकी विचारक्रान्ति नैतिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति की त्रिविधि योजनाएं यदि सफल होती है तो बिना किन्हीं अतिरिक्त अन्धेरे में भटकना ही बन पड़ रहा था। तब एक सही प्रयास भी चला था और उसने अपने स्वल्प साधनों से ही चमत्कार प्रस्तुत किया था। आज अपना अभियान छोटे रूप में दिखाई पड़ सकता है और नगण्य एवं उपहासास्पद लग सकता है पर कल ऐसा समय आकर ही रहेगा, जब इस अंकुर को विशाल वट वृक्ष के रूप को सुविकसित देखा जा सके और उसकी छत्र छाया में समस्त मानव जाति को शान्तिमय विश्राम पाने का अवसर मिल सके।

नव-निर्माण अभियान का प्रायः सारा ही उत्तरदायित्व अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को वहन करना पड़ रहा है। उन्हीं ने शाखा संगठनों की स्थापना की है और प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाया है। मनुष्य में देवत्व के उदय के लिए-धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को सृजन सेना को सृजन सेना का सैनिक बनना है यह अपने महान परिवार की गौरवशाली परम्परा के सर्वथा अनुकूल ही है।

इन प्रयासों को अधिक गतिशील बनाने के लिए शाँति कुँज में प्रेरणा भरे प्रशिक्षणों की शृंखला गत एक वर्ष से चल पड़ी है। इसका प्रभाव परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सामने आया है। गत वर्ष बसन्त पर्व से प्राण प्रत्यावर्तन सत्र की शृंखला आरम्भ की गई थी। उसमें साठ शिविर हुए। आत्मिक स्तर की दृष्टि से अधिकाँश व्यक्ति ऊंचे स्तर के ही उनमें सम्मिलित हुए। कहना न होगा कि वे जितना और जिस स्तर का आत्मबल लेकर गये उससे उनके निज के व्यक्तित्व उभरे और उपलब्ध प्रकाश ने उन्हें लोकमंगल की युग साधना में अधिक तत्परता एवं सफलता के साथ संलग्न किया। यही खुला रहस्य है कि इस सब शृंखला से लौटे हुए व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में जन-जागृति का भावनात्मक पुनरुत्थान का प्रयोजन सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे है। यों तो गंगाजल की लहरों पर भी कूड़ा करकट बहता पाया जाता है, ऐसे तो कुछ शिक्षार्थी इन सबों के भी ऐसे हो सकते है जो मुँह बन्द सीप की तरह स्वाँति नक्षत्र की वर्षा का लाभ ले सकने में असमर्थ असफल रह गये हो। उपरोक्त प्रशिक्षण शृंखला क इस वर्ष कुछ और नये चरण बढ़ाये गये है। इनमें प्रथम चरण है वरिष्ठ और कनिष्ठ वानप्रस्थों की शिक्षा। गत जुलाई 73 की अखण्ड-ज्योति में वानप्रस्थ प्रचलन के पुनरुत्थान का शंखनाद किया गया था। जनवरी 74 का अंक भी उसी प्रयोजन का पूरक था। इन दो अंकों को पढ़ने के बाद अखण्ड-ज्योति परिवार का भावनाशील वर्ग उसी प्रकार उभर कर आया है जिस तरह दूध गरम करने पर मलाई ऊपर तैरने लगती है।

समय की पुकार को जागृत आत्माएं अनसुनी नहीं कर सकती। उनके अन्तरंग में विद्यमान उत्कृष्टता परिक्षा की घड़ी में मूर्छित नहीं पड़ी रह सकती। उसमें प्रखरता का उभार आना ही चाहिए सो आया भी है। विचार एक वानप्रस्थ शिक्षण सब चलाने का था पर बढ़ी संख्या को देखते हुए वे चार करने पड़े। 20 जनवरी से 20 मई की अवधि में चार सबों का प्रबन्ध किया गया है। लगता है आवेदनकर्ताओं में से जा छाँट की गई है, उन सबको इन चार सबों में भी स्थान न मिल सकेगा। उनके लिए दिवाली बाद सम्भवतः कुछ सब और लगाने पड़ेंगे। यह सन् 74 की योजना हुई। सन् 75 में इससे भी बड़ी तैयारी करनी पड़ सकती है।

निस्सन्देह यह एक बहुत बड़ा प्रयास है। वानप्रस्थ परम्परा को यदि पुनर्जीवित किया जा सका तो भारतीय संस्कृति का विपयाधोष ने केवल भारत में वरन् विश्व के कोने-कोने में हो सकना सुनिश्चित है। यह एक अद्भुत चरण है कि पारिवारिक उत्तरदायित्व रहते हुए भी लोग थोड़ा-थोड़ा समय उस महान मार्ग पर चलने के लिए देने लगे और प्रतिज्ञा करे कि उपयुक्त अवसर आते ही वे पूरी तरह मैदान में कूद पड़ेंगे। स्वल्पकालीन सेवा संन्यास इस युग की अनोखी उपलब्धि है। लोकसेवी सेना में जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों के कारण पूरा समय नहीं दे सकते वे थोड़े समय के लिए उन उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिए आगे आयेंगे तो देर-सवेर में उन्हें भी शर्म आयेगी जो घर की जिम्मेदारियों से छुटकारा पा गये पर लोभ और मोह की कृपणता के कारण परमार्थ प्रयोजनों में लगने का साहस नहीं जुटा पा रहे है। कनिष्ठ वानप्रस्थ परम्परा को अपने परिवार की एक अनुपम और अभिनव उपलब्धि कहा जा सकता है। व्यस्तता के बीच तप, त्याग के लिए, इस दुस्साहस को भावी पीढ़ियाँ हजार मुख से सराहे बिना न रहेंगी।

शान्ति कुँज की प्रशिक्षण शृंखला की दूसरी कड़ी है लेखक सब। उसे 20 मई से 20 जून तक एक महीने के लिए लगाया गया है। जो आवेदन पत्र आये है उन्हें देखते हुए सम्भवतः सब जुलाई में भी एक और लगाना पड़े। यह आवश्यक है कि प्रौढ़ परिष्कृत मस्तिष्क आरम्भ करे और जो कार्य अपनी थोड़ी सी पत्रिकाएं करतरी है वही कार्य भारत में विभिन्न भाषाओं में छपने वाले प्रायः सात हजार पत्र-पत्रिकाओं द्वारा न्यूनाधिक रूप से आरम्भ हो जाय। अपना प्रकाशित प्रतिपादन इतना अधिक है कि अर्चना उसी को उलट−पुलट कर यदि एक हजार लेखक बताये हुए ढंग से लिखना आरम्भ कर दें तो उनके लिए जीवन भर लिखते रहने जितना आधार मौजूद मिलेगा। अपनी थोड़ी सी थोड़ी संख्या में छपने वाली पत्रिकाओं ने जब इतना आलोक फैलाया है तो भारत के समस्त पत्रों को ऐसी ही सामग्री छापने के लिए सहमत करने पर तो इससे भी हजारों गुना अधिक कार्य हो सकेगा।

विभिन्न भाषाओं में नवयुग की आवश्यकता पूरी कर सकने वाला साहित्य अगले दिनों लिखा जाना चाहिए। काव्य की धारा तो इस दिशा में प्रायः अवरुद्ध ही है। जो कविताएँ इन दिनों लिखी गई या छपी है उनमें से अधिकाँश ऐसी हैं जिनसे युग−परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाने में तनिक भी सहायता नहीं मिलती। शिक्षितों के लिए साहित्यिक और अशिक्षितों के लिए क्षेत्रीय बोलियों में लोक−गायन लिखे ही जाने चाहिए, उनका प्रकाशन होना ही चाहिए। पत्र−पत्रिकाओं में लेखन पुस्तिका का सृजन—कविताओं एवं लोक−गायनों की संरचना उनका प्रकाशन करने का कार्य हाथ में न लिया गया तो युग की बौद्धिक क्षुधा कैसे तृप्त की जा सकेगी। निस्संदेह वह एक अत्यन्त विशाल और अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र है। लेखनी की शक्ति की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उसे उभारने और दिशा देने के लिए बहुत कुछ करना होगा और वह भी विशाल परिमाण में। इसी प्रकार का शिक्षण करना तथा प्रसार के आधारों को विनिर्मित करना लेखन सत्रों का प्रयोजन है।

आज तो साधनहीन स्थिति में एक−एक महीने के लिए सत्र चलाये जा रहे हैं। क्या वानप्रस्थ और क्या लेखक सभी को स्वल्प शिक्षा देकर तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए लड़ाई के मोर्चे पर भेजा जा रहा है। पर इतना पर्याप्त नहीं है। अगले दिनों इन सब कार्यों के लिए विश्वविद्यालय स्तर की सर्वांगपूर्ण शिक्षा व्यवस्था जुटानी पड़ेगी। सुयोग्य प्रतिभा विकसित करने के लिए और समय साधन दोनों ही चाहिए। ईश्वर की कृपा हुई तो वैसे साधन भी जुटेंगे उस प्रतीक्षा में बैठे तो नहीं रहा जा सकता। जितने स्वल्प साधन थे उन्हें देखते हुए एक−एक दो−दो महीने के सत्र ही आरम्भ कर दिये गये हैं। शुभारम्भ श्रीगणेश करने की दृष्टि से यह भी बुरा क्या है।

जन−गायन युग की तीसरी आवश्यकता है। संगीत की—काव्य की हृदयस्पर्शी प्रभाव−गरिमा से कौन इनकार करेगा। भावस्तर को छूने की उसमें अद्भुत क्षमता है। अन्तरंग की कोमल भावनाओं को उभारने और सरस संचार को उद्वेलित करके चिन्तन को उलट देने की सामर्थ्य गीतवाद्य में मौजूद है। भावों की अधिष्ठात्री सरस्वती देवी है। उसकी वीणा का अर्थ है संगीत—पुस्तक का अर्थ है साहित्य। लेखनी और वाणी के माध्यम से ही मनुष्य की हत्तन्त्री को झंकृत किया जाता रहा है और भविष्य में भी इन्हीं माध्यमों से वह महान प्रयोजन पूरा किया जाता रहेगा।

गीत कला को आज शृंगार के चाण्डाल की क्रीतदासी बना दिया गया है समय आ गया कि उसे मुक्ति दिलाई जाय और देव−पूजन में नियोजित किया जाय। इसके लिए समग्र साध्य शास्त्रीय संगीत के झंझट में पड़ने की अपेक्षा सुगम संगीत की स्वल्प अवधि में अभ्यस्त हो सकने वाली सरल चैली काम में लानी पड़ेगी और गीत ऐसे देने पड़ेंगे जो सुनने वालों का भावनास्तर उलट कर रख दें। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए शान्ति कुँज में तीन तीन महीने के संगीत शिविर चलेंगे, उनमें गायन एवं वाद्य का इतना अभ्यास करा दिया जायगा कि शिक्षार्थी किसी भी सभामञ्च को सम्भाल कर भाव−प्रवाह बहा सकने में समर्थ हो सके।

वाणी द्वारा भावनात्मक नव−निर्माण करने के लिए वकृत्व और संगीत के माध्यम अपनाये जाने आवश्यक हैं। वानप्रस्थ सत्रों को उद्देश्य आदर्शवादी प्रवचनकर्ताओं को तैयार करना है। संगीत सत्रों के शिक्षार्थी गीत−वाद्य के माध्यम से उसी वाक् शक्ति का प्रयोग करेंगे। लेखन सत्र का उद्देश्य कलम की प्रतिभा को निखारना है। स्पष्ट है कि कोई मात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने से ही लेखक नहीं बन जाता, यह एक अतिरिक्त कला है। सोने की डली कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो स्वर्णकार की कलाकारिता के बिना उसे सुन्दर आभूषणों के रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। सुशिक्षित होना एक बात है और सफल लेखक होना बिलकुल दूसरी बात। आज लेखनी की शक्ति को उभार कर उसे सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त करना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। नव−निर्माण की दिशा में बढ़ने के लिए इस सम्बल की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए एक−एक महीने के सामयिक लेखक सत्र लगाये जा रहे हैं। यों यह अवधि अत्यन्त स्वल्प है पर युद्धकाल के आपत्तिकालीन संकट में रंगरूट भर्ती करके बन्दूक चलाने की शिक्षा एक महीने में दे दी जाती है और उन्हें लड़ाई के मोर्चे पर भेज दिया जाता है ठीक वैसा ही प्रयास हमें करना पड़ रहा है। समय की माँग इतनी प्रबल है कि कोई देर में पूरी हो सकने वाली योजना हाथ में नहीं ली जा सकती। सबकुछ आपत्तिकालीन आवश्यकता को—आपत्ति−धर्म को ध्यान में रख कर करना पड़ रहा है। स्वल्पकालीन शिक्षा सदा ही अपर्याप्त रहती है यह स्पष्ट है। पर इन परिस्थितियों में और कुछ किया भी नहीं जा सकता। दीर्घकालीन समग्र शिक्षा के लायक न तो अपने पास साधन है और न उनके लिए प्रतीक्षा करते रहने का समय ही शेष है। प्रशिक्षण सत्रों की शृंखला इसी विवशता में चलानी पड़ी है।

इसी शृंखला की चौथी कड़ी है नारी जागरण के लिए युग−देवियाँ तैयार करना। भारत में नारी का कार्यक्षेत्र कुछ अलग जैसा है उसकी समस्याएँ भी भिन्न हैं। उनके उत्कर्ष के लिए कार्य भी अलग ढंग से करना पड़ेगा और उसकी संचालन व्यवस्था नारी को ही सोंपनी होगी। घरों में कैद, पर्दे के निविड़ बन्धनों में जकड़ी हुई, अशिक्षित और रूढ़िग्रस्त संस्कारों से अस्त−व्यस्त भारत की औसत नारी को सन्तानोत्पादन और पाक कर्म करने के लिए बाधित असहाय प्राणी के रूप में रहता पड़ रहा है। आधी जन−संख्या को इस स्थिति से उबारना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। उसे हाथ में न लिया गया तो आधा भारत पददलित स्थिति में ही पड़ा कराहता रहेगा। नव निर्माण की दृष्टि से नारी जागरण के लिए विशेष रूप से—अतिरिक्त रूप में कार्य करना पड़ेगा।

कन्याएँ स्कूल पढ़ने जाने लगी हैं और उनके लिए सरकारी गैर सरकारी स्कूल खुलने लगे हैं सो ठीक है, इसका प्रभाव भी देन−सवेरे में पड़ेगा ही पर आवश्यकता तो वर्तमान पीढ़ी की भी है। हमें आजीविका आवश्यकता को ध्यान में रख कर वे प्रयत्न भी हाथ में लेने होंगे जो अगले ही दिनों अपना प्रभाव परिणाम प्रस्तुत कर सकें इसके लिए गली−गली, मुहल्ले, गाँव−गाँव महिला प्रौढ़ पाठशालाएँ चलानी पड़ेगी। विवाहित महिलाओं को पास मध्याह्नोत्तर प्रायः दो तीन घण्टे की फुरसत घरेलू कामों से मिलती है उसी समय में उन्हें साक्षर ही नहीं सामने प्रस्तुत अगणित समस्याओं के समाधान में समर्थ भी बना सकने वाली शिक्षा देने वाली इन पाठशालाओं का जाल पूरे देश में बिछाना पड़ेगा।

संगठन की दृष्टि से महिला समितियाँ और प्रचार की दृष्टि से महिला सम्मेलनों विचार गोष्ठियों एवं शिक्षण सत्रों की योजना बड़े पैमाने पर बनानी पड़ेगी। इन माध्यमों से स्थिति को ध्यान में रखते हुए वह सब कुछ सिखाया जायगा, जिसकी उन्हें अपने लिए, अपने परिवार और देश के लिए सीखना, जानना आवश्यक है। संगठित रूप से ही वे आगे बढ़ सकेंगी। भारतीय नारी समस्याओं को हल कर सकने वाला साहित्य तो अभी किसी ने लिखा ही नहीं है। जो छुट−पुट लिखा गया है वह पच्छिम वालों की किताबों से लिया हुआ ऐसा उच्छिष्ट है जो अपनी नारी के लिये कूड़ेकरकट से अधिक और कुछ सिद्ध नहीं हो सकता। नारी जागरण की आवश्यकता पूरी कर सकने वाले साहित्य का सृजन भी इसी शृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी है। संगठन, प्रचार और प्रशिक्षण की ही तरह इस दिशा में भी अगले दिनों बड़े कदम उठाने पड़ेंगे।

इन प्रयोजनों के लिए शिक्षित नारी को आगे आना चाहिए। प्रौढ़ पाठशालाएँ तो बाल−बच्चे वाली स्थानीय शिक्षित महिलाएँ भी चला सकती हैं पर उन्हें भी तो इस कार्य की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए। घर छोड़ कर वे बाहर नहीं जा सकती उन्हें जो सिखाया जाय, स्थानीय ही होना चाहिए। इसके लिए ऐसी प्रचारिकाओं की आवश्यकता पड़ेगी जो युग−निर्माण शाखाओं में जाकर स्थानीय महिलाओं को महिला जागरण की गतिविधियों के संचालन की शिक्षा दे सकें। नारी जागरण का शंख बजाने वाली इन नारियों को युग−देवियाँ कह सकते हैं।

अपने देश में नारी शक्ति का ऐसा बड़ा भाग है जो सुयोग्य होते हुए भी निरुपयोगी स्थिति में पड़ा हुआ है। ऐसी विधवाओं परित्यक्ताओं की कमी नहीं जो घर−परिवार वालों के लिए भार रूप होकर जी रही है। ऐसी कुमारिकाओं की भी कमी नहीं जिनके विवाह का सुयोग्य रूप दहेज अथवा दौड़−धूप की कमी के कारण अभी तक नहीं बन सका वयस्क हो गई और आगे भी उनके विवाह की कम सम्भावना है। नौकरी−चाकरी करके वे पेट पालना चाहती हैं पर उससे भी क्या बनेगा, जीवन का कोई सरस सदुपयोग तो इसमें भी नहीं है। इस प्रकार की महिलाएँ यदि सुशिक्षित हो तो उन्हें नारी आचरण के लिए जाना चाहिए। जिनके कन्धों पर बच्चों की जिम्मेदारियाँ नहीं हैं वे ही इस दिशा में कुछ कहने लायक काम कर सकती है। यही भली प्रकार ध्यान रखा जाना चाहिए।

शान्ति कुँज की अभिनव शिक्षण शृंखला में नारी जागरण सत्रों को भी सम्मिलित रखा गया है। वे तीन−तीन महीने के लिए चला करेंगे। प्रत्यावर्तन सत्रों की एक वर्षीय शृंखला तो पूरी हो गई पर आगे भी समय−समय पर उनकी व्यवस्था की जाती रहेंगी।

सार रूप से यह समझा जा सकता है कि अगले दिनों शान्ति कुँज में समय−समय पर शिक्षण शिविरों की जो शृंखलाएँ चलेंगी उनमें पाँच प्रमुख हैं [1] प्राण प्रत्यावर्तन सत्र [2] वानप्रस्थ सत्र [3] लेखक सत्र [4] संगीत सत्र [5] महिला जागरण सत्र। इनमें से प्रत्यावर्तन सत्र पाँच−पाँच दिन के—वानप्रस्थ सत्र दो महीने के, संगीत सत्र तीन महीने के, महिला सत्र तीन महीने के होते रहेंगे। कब कौन सा सत्र चलाया जाय यह आवेदनकर्ताओं की संख्या और समय की आवश्यकता को देख कर निश्चित किया जाता रहेगा। फिलहाल कुछ महीनों की जो योजना बनाई गई है वह इस प्रकार है [1] वानप्रस्थ सत्र चार हैं जो क्रम से 20 जनवरी से, 20 फरवरी से, 20 मार्च से एवं 20 अप्रैल से आरम्भ होंगे। लेखक सत्र 20 मई से 20 जून तक का है। संगीत सत्र 1 जुलाई से 30 सितम्बर तक चलेगा। प्रत्यावर्तन सत्र अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर में चलेंगे। जुलाई में लेखन शिविर या प्रत्यावर्तन सत्र की भी व्यवस्था की जा सकती है। नारी जागरण का पहला सत्र 1 जुलाई से आरम्भ होकर 30 सितम्बर तक चलेगा। यह आगामी सितम्बर तक का कार्यक्रम निश्चित हुआ है। भविष्य में कौन शिविर कब चलाया जाय, यह आवश्यकता एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निश्चित किया जाता रहेगा।

अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह मान कर चलना चाहिए कि इस सत्रश्रृंखला को सफल बनाने के लिए उसे विशिष्ट उत्तरदायित्व सौंपा गया है। अपने व्यक्ति गत कामों के लिए जितनी चिन्ता और दौड़−धूप की जाती है उतनी ही इस महान् प्रयोजन की पूर्ति के लिए भी रखी जानी चाहिए। उपरोक्त पाँचों सत्रों में से जिनमें स्वयं सम्मिलित हो सकने योग्य अपने को समझें, उसके लिए स्वयं साहस संजोये और यह प्रयत्न करें ज्ञान−गंगा के इस पुनीत पर्व का लाभ सेना उसके लिए भी आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा प्रत्येक अखण्ड−ज्योति सदस्य को अपनी पात्रता एवं परिस्थिति के अनुरूप उपरोक्त सत्रों में सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। उन्हें यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि अपने संपर्क एवं प्रभाव क्षेत्र में जो उस शिक्षा के लिये सर्वथा उपयुक्त हो उन्हें प्रेरणा दे कर इसके लिए तैयार करें। यह सभी शिक्षार्थी ऐसे होने चाहिए जो कम से कम एक वर्ष से अखण्ड−ज्योति एवं युग−निर्माण पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ते रहे हों बिलकुल अजनबी आदमी जिनने अपना मिशन पढ़ा, समझा नहीं उन्हें इस शिक्षा के लिए खदेड़ देना एक बेकार का शिर दर्द खड़ा कर देना है। ऐसी भूल कहीं भी नहीं की जानी चाहिए।

शिक्षण सत्रों के संचालन का पुराना अनुभव उस कटु स्मृति को ताजा कर देता है जिसमें अनधिकारी लोगों के धुरा पड़ने के कारण अव्यवस्था फैली ली—शक्ति नष्ट हुई और खीज ही पल्ले पड़ी। आगे से ऐसा न होने पावे इसके लिए पूरी सतर्कता बरती जानी चाहिए। वानप्रस्थ का मतलब यह समझा जा सकता है वे बूढ़े, अशक्त, अपंग लोग मरने से पहले भजन करने के लिए गंगा तट पर रहेंगे। बुढ़िया को साथ लेकर चलेंगे और वहीं कथावार्ता सुना करेंगे। ऐसे लोगों को वानप्रस्थ मान कर स्थान घेर दिया जाय तो देश−विदेश में जन−जागृति का शंख बजाने वाले कर्म−वीर लोगों के लिए स्थान कहाँ बचेगा? लेखन सत्र में यह स्कूली बच्चे या अल्पशिक्षित घुस पड़े तो सुयोग्य व्यक्ति यों से महत्वपूर्ण काम कराने की साध एक कोने पर धरी रह जायगी। संगीत के सम्बन्ध में न तो पूर्व ज्ञान है और न गला ही इस लायक है ऐसे लोग आ जायें तो वे प्राप्त भी कुछ नहीं कर सकेंगे और अध्यापकों के लिए शिरदर्द बनेंगे वाद्ययन्त्र तोड़ेंगे और अपना हमारा समय नष्ट करेंगे। प्रत्यावर्तन सत्रों में अध्यात्मआदर्शों से अपरिचित, मनोकामनापूर्ण कराने के आशीर्वाद लेने के आकाँक्षी दौड़ पड़े तो उनका स्वरूप ही घिनौना हो जायगा। पर्यटन के लिए घर परिवार के लोगों को साथ लेकर चलने वाले लोग प्रत्यावर्तन सत्रों में अव्यवस्था ही फैला सकते हैं। इसी प्रकार अशिक्षित, बालबच्चों वाली, रुग्ण नारियाँ शान्तिपूर्वक शान्ति कुँज में दिन काटने के लिए चल पड़े तो वे सारे स्वप्न हवा में उड़ जायेंगे, जिनके लिए यह भारी उत्तरदायित्व कन्धे पर उठाया जा रहा है। इन सत्रों में उपयुक्त व्यक्ति यों का आना जितना आवश्यक है उतना ही यह भी आवश्यक है कि अवाँछनीय लोगों को घुस−पैठ न करने दी जाय। संख्या भले ही थोड़ी हो पर आने केवल ऐसे ही व्यक्ति चाहिए जिनसे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति सम्भव हो सके।

अखंड−ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह उत्तर−दायित्व सौंपा जा रहा है कि वह उपरोक्त पाँच सत्रों में से जिसमें वे आ सकें उसके लिये स्वयं आवेदन करें और अपने संपर्क परिवार में जिन्हें सत्पात्र समझें उन्हें प्रोत्साहन देकर इस शिक्षा व्यवस्था में सम्मिलित करें। इस प्रशिक्षण शृंखला को सफल बना कर नव−निर्माण अभियान की गतिविधियों में आशातीत तीव्रता लाई जा सकती है। अस्तु इस ओर हम सब का पूरा−पूरा ध्यान रहना चाहिए।

शान्ति कुँज की जब से स्थापना हुई है तब से यहाँ का यही क्रम चला है कि प्रत्येक आगन्तुक को परिजन माना जाता है और उसके निवास, भोजन का प्रबन्ध किया जाता है। इसके बदले में किसी को कुछ देना ही चाहिए ऐसी कुछ शर्त नहीं रखी गई है। शिक्षार्थियों के लिए भी यही नियम है। आगन्तुकों के लिए भी यही व्यवस्था है। इससे आर्थिक दृष्टि से असमर्थ लोगों को संकोच में नहीं पड़ना पड़ता और यहाँ भी धनी−निर्धन के बीच कोई दीवार नहीं रहती। निस्सन्देह इससे शिक्षा अथवा दूसरे प्रयोजनों के लिए आने वालों को बहुत सुविधा रही है तथा रहेगी भी।

किन्तु उसका एक दूसरा पक्ष है—घाटे की अर्थ व्यवस्था। अपना खर्च यों बहुत लोग देते भी है। सहज सौजन्य का तकाजा भी यह है कि यदि अपनी आर्थिक स्थिति ठीक है तो अपना भार स्वयं ही उठाना चाहिए। दूसरों के दिया दान का लाभ तो तभी लेना चाहिए जब असमर्थता हो। फिर भी अपने देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए बहुत लोग ऐसे रह जाते हैं जो शिक्षणकाल में अपना खर्च नहीं दे पाते या बहुत कम देते हैं। ऐसी दशा में यहाँ की अर्थ व्यवस्था घाटे की रहना स्वाभाविक है लंगर का खर्च पूरा करना सदा ही एक चिन्ता का विषय बना रहता है।

शिक्षण सत्रों की शृंखला पूरे उत्साह के साथ चलाई जायगी क्योंकि वह इतनी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है कि उसे रोका नहीं जा सकता। वह चल पड़ी है और चलेगी ही। उसकी अर्थ व्यवस्था का सन्तुलन क से बैठे यह सोचने का कार्य उन उदार परिजनों के जिम्मे छोड़ दिया गया है जो अपने आवश्यक खर्च पूरा करने के अतिरिक्त कुछ बचा भी लेते हैं।

इन पंक्ति यों में विशेष रूप से उन शिक्षार्थियों का आह्वान किया जा रहा है जो शान्ति कुँज के उपरोक्त पाँच शिक्षण प्रयोजनों के लिए अपने आपको उपयुक्त समझते हों।


VigyapanSuchana

पर्यटकों एवं दर्शनार्थियों के ठहरने की शान्ति कुञ्ज में तनिक भी व्यवस्था नहीं है। वे धर्मशाला में ठहरें और मध्याह्न बारह से दो के बीच में मिलने आयें। आश्रम सदा शिक्षार्थियों से भरा रहता है और इन दो घण्टों के अतिरिक्त गुरुदेव का शेष समय भी उसी में व्यस्त रहता है।


प्राण प्रतिष्ठा


प्राण प्रतिष्ठा (kavita)

जलते दीप, अँगार धधकते, रक्षासूत्र पुलकते कर में। प्राण−प्रतिष्ठा हम करते हैं परम्पराओं के प्रस्तर में॥

युग बीते मन के अम्बर पर ऐसी कोई किरण न आई। प्रतिनिधित्व करती प्रकाश का जिसकी अँगुलि पकड़ जुन्हाई॥

जाग्रत हो उठती चकोर की आँखों में वह रूप पिपासा। पा जिसकी अनुभूति कमलिनी की हो जाती दूर निराशा॥

धवल ज्योति के दूत बिछा देते सौरभ सरवर−सरवर में। प्राण−प्रतिष्ठा हम करते हैं परम्पराओं के प्रस्तर में॥

जन्मा था प्रहलाद जिस लिए दुर्दम शंभु−शरासन टूटा। शरशय्या पर लेट भीष्म ने जिसके लिए मरण सुख लूटा॥

यदुपति ने जिस लिए पार्थ, की समर भीरुता को ललकारा। वही बोधितरु की छाया से जिसके लिए सुधा की धारा॥

मुखर न हो पाई मनुष्यता की परिभाषा युग के स्वर में। प्राण−प्रतिष्ठा हम करते हैं परम्पराओं के प्रस्तर में॥

पाकर −त्राण कहाँ संसृति से शाप शृंखला मुक्त शिला ने। धन्य हुई हूँ मैं जिस रज से तू, उसकी महिमा क्या जाने॥

प्राचीरों में घेर विश्व ने मुझे कौन सा पुण्य कमाया। भर न सका मुझ में चेतन सा और न निज चैतन्य जगाया॥

सत्य छोड़ता गया उलझता गया नित्य आडम्बर में। प्राण−प्रतिष्ठा हम करते हैं परम्पराओं के प्रस्तर में॥

जड़ता में केंद्रित जिस दिन तक प्रेम रहेगा इस मानव का। जब तक नहीं जीव मन्दिर में ढूंढ़ेगा प्रतिबिंब प्रणव का॥

तब तक शाँति और सुख होंगे एक कल्पना पूर्ण कहानी। सूख सकेगा नहीं युगों तक उत्पीड़ित आँखों का पानी॥

जिसने नहीं दिया धरती को वह क्या पायेगा अम्बर में। प्राण−प्रतिष्ठा हम करते हैं परम्पराओं के प्रस्तर में॥

—झलकनलाल छैल

*समाप्त*