संसार जैसा कुछ है हमें उसे उसी रूप में समझना चाहिए और प्रस्तुत यथार्थता के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए ही नहीं बना हैं ओर उसके समस्त पदार्थों एवं प्राणियों का हमारी मनमर्जी के अनुरूप बन या बदल जाना सम्भव नहीं है। तालमेल बिठा कर समन्वय की गति पर चलने से ही हम संतोष पूर्वक रह सकते हैं और शान्ति पूर्वक रहने दे सकते हैं।
यहां रात भी होती है और दिन भी रहता हैं। स्वजन परिवार में जन्म भी होते हैं और मरण भी। सदा दिन ही रहे कभी रात न हो। परिवार में जन्म संख्या ही बढ़ती रहे मरण कभी किसी का न हो। ऐसी शुभेच्छा तो उचित हैं पर वैसी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकती। रात को रात के ढंग से और दिन को दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं ओर दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनन्द ले सकते हैं। जीवन को अपनी उपयोगिता है और मरण को अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर सोचा जा सकेगा। तो हर्ष एवं उद्वेग के उन्मत्त विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से हम बचे रह सकते हैं।
हर मनुष्य की आकृति भिन्न है, किसी की शकल किसी से नहीं मिलती। इसी प्रकार प्रकृति भी भिन्न हैं। हर मनुष्य का व्यक्तित्व अपने ढंग से विकसित हुआ है। उसमें सुधार परिवर्तन की एक सीमा तक ही सम्भावना है। जितना सम्भव हो उतना सुधार का प्रयत्न किया जाय पर यह आग्रह न रहे कि दुनिया को वैसा ही बना लेंगे जैसा हम चाहते हैं। तालमेल बिठाकर चलना ही व्यवहार कौशल हैं। उसी को अपना कर सुख से रहना ओर शान्ति से रहने देना सम्भव हो सकता है।
उस दिन लहर बड़ी निराश और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे और बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अञ्चल में छिपकर बैठे रहना ही उसे प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।
समुद्र ने उसे समझाया भद्रे, आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं गति के साथ जुड़ा हैं। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसी होगी। शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा?
लहर चाहती नहीं कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा और चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया।
समुद्र गम्भीर हो गया उसने कहा—देखती नहीं मेरे अन्दर कितना दर्द है जो मुझे क्षण भर चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी? अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार−भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम लहराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बटा सकोगी? प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?
लहर युवक रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी—उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हंस पड़ी और बोलीं—सहेली हमें देखो न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनन्त की ओर जा रही है, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं—हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं। सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहाँ बढ़ाया ही तो है। फिर तु क्यों डरती हो। चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणें भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा—हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए, तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थीं।
प्रसंग पूरा नहीं हो पाया था कि महकती गन्ध सी वहीं आ पहुँची और बोली पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं पुलकन का अनुभव करती हैं फिर छोटी सहेली—तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो।
समुद्र इस दोष चर्चा को मनोयोग पूर्वक शान्त चित से सुन रहा था। इतने में इन्द्र ने द्वार खटखटाया और कहा—चलने में विलंब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है।
सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। गेध का वाहन तैयार था। भाव बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।
नवोढ़ने संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा—मेरे आश्रय दाता, क्या तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है—क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती।
सागर की आंखें छलक पड़ी। उसने कहा—भद्रे, यह बिछुड़न नहीं—नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापिस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं। गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है— कल्याणी।
लहर की आंखें खुल गई उसने चलना आरम्भ कर दिया।
स्वभावतः हमारा अधिक प्यार उस वस्तु या व्यक्ति पर होता है जिसकी उपयोगिता एवं सुन्दरता अधिक होती है। ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट संरचना मनुष्य है, उसके प्रति उसका सहज और अधिक प्यार हो तो यह स्वाभाविक ही है।
परमेश्वर का कितना अधिक प्यार मनुष्य पर है उसका प्रमाण उसे दिये गये अतिरिक्त अनुदानों के रूप में देखा जा सकता है। प्रतियोगिता जीतने वाले बच्चों को स्कूल में इनाम मिलते हैं। अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वालों को सरकार छात्रवृत्ति देती है। यह उपलब्धियाँ छात्र की प्रगतिशीलता को प्रमाणित करती हैं। जीव अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ—क्रमिक उन्नति के पथ पर चलता हुआ मनुष्य स्तर तक आ पहुँचा इसी के उपहार में उसे वह वैभव मिला है जो अन्य जीवधारियों के पास नहीं है।
इन उपहारों को ईश्वर के अतिरिक्त प्रेम का, परिचायक भी कह सकते हैं। यह सब मिला इसलिए है कि इन माध्यमों के सहारे पिछले प्रगति क्रम को और भी अधिक तीव्र किया जा सके। छात्रवृत्ति सरकार इसीलिए देती है कि मेधावी छात्र को शिक्षा साधन जुटाने में अधिक सुविधा मिल सके और वह प्रगति के पथ पर अधिक तेजी से आगे बढ़ सके। यदि कोई छात्र उस अनुदान को ऐसे कामों में खर्च करने लगे जो उसके चरित्र और स्वास्थ को चौपट करते हो तो उसे एक दुर्भाग्य ही कहा जायगा। प्रगति के लिए मिले साधन यदि अवनति का सरंजाम जुटायें तो इसे दुखद दुर्घटना ही कहा जायगा।
अन्य प्राणी क्रमशः प्रगति करते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचते हैं। अनुभवों का संचय करने—तुम से विरत और सत में निरत होने के वे क्रमिक प्रयास बहुत धीमे होते हैं। सामान्य प्राणि वर्ग की चेतना ऐसी ही सामान्य और ऐसी ही शिथिल होती है कि उस आधार पर धीरे−धीरे ही आगे बढ़ा जा सके, ऊँचा उठा जा सके। किन्तु मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है। उपलब्ध साधनों के अनुसार वह एक ही छलाँग में अभीष्ट लक्ष्य तक सहज ही पहुँच सकता है। हनुमान को समुद्र लाँघना कुछ कठिन नहीं पड़ा। मनुष्य के लिये भी पूर्णता का लक्ष्य इसी जन्म में प्राप्त कर लेना सरल है। शर्त एक ही है कि वह प्रगति की साधना में दत्त−चित्त हो संलग्न रह सके। ईश्वर प्रदत्त उपहार को सार्थक बनाने की राह एक ही है कि मानव जीवन के साथ जुड़े हुए अतिरिक्त उपहारों में से प्रत्येक को पूर्णतया उस प्रयोजन के लिए समर्पित कर दे जिसके लिये उसे यह सौभाग्य पूर्ण स्थिति उपलब्ध हुई है।
ईश्वर का मनुष्य के प्रति विशेष प्रेम इस आधार पर प्रत्यक्षतया देखा जा सकता है कि उसे उतने भौतिक साधन उपलब्ध हैं जिनके सहारे किसी भी दिशा में द्रुत गति से बढ़ते हुए अभिष्ट सफलता के लक्ष्य तक सरलता पूर्वक पहुँचा जा सके। धन भले ही किसी के पास कम हो। साधन सामग्री तथा परिस्थिति भी हलके दर्जे की हो सकती है, पर आन्तरिक विभूतियों की दृष्टि से हममें से प्रत्येक को पूर्णतया साधन सम्पन्न बनाया गया है। गुण कर्म, स्वभाव की विशेषताओं को ही सच्चे अर्थों में विभूतियाँ और सिद्धियाँ कहा जाता है। वे जहाँ होंगी वह वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ आवश्यकतानुसार इकट्ठी होते रहेंगी। मनस्वी व्यक्ति कभी भी साधन सामग्री के अभाव में असफल रहते नहीं देखे गये। शक्तिशाली चुम्बक आकर्षण से लौह कण सहज ही खिंचते चले आते हैं। उत्कृष्ट अभिलाषा में अद्भुत आकर्षण है। यदि उसे सही रूप से चरितार्थ होने दिया जाय तो सर्व प्रथम मनुष्य की अन्तः स्थिति परिष्कृत बनती है। उत्कृष्ट स्तर के गुण, कर्म, स्वभाव की अभ्यस्त बनती रहें इसके बाद तुरन्त ही साधनों का संचय संपर्क क्षेत्र के लोगों का सहयोग एवं अनुकूल वातावरण अनायास ही एकत्रित होने लगता हे। प्रगति के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ सहज ही बनती चली जाती हैं। ऐसा विशिष्ट स्तर का बना मानव−तृष्ण वस्तुतः मनुष्य प्राणी को मिल सका इसे उसका परम सौभाग्य ही कहना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे ईश्वर के अपार प्रेम का प्रमाण भी कह सकते हैं।
ईश्वर का मनुष्य के प्रति असाधारण प्रेम का परिचय एक ओर तथ्य से भी मिलता है वह है इस प्राणी के अन्तःकरण में पाये जाने वाले प्रेम−तत्व की असाधारण मात्रा का अस्तित्व। अन्य प्राणियों का प्रेम सकारण—सीमित और सामयिक होता है पर मनुष्य में वह अत्यन्त उच्च स्तर का है और असीम मात्रा में मिला है। अन्य प्राणियों में साथ रहने की आदत—यौन आकर्षण तथा नवजात शिशु के प्रति माता का सहज ममता के आधार पर ही यत्किंचित प्रेम पाया जाता है। प्रयोजन पूरा होने पर अथवा साथी के बिछुड़ जाने पर वह स्नेह सौजन्य भी देखते−देखते विदा हो जाता है। वे लोग प्रेम भाव से साथ रहें और दूसरे को हानि न पहुँचायें इतना भर ही बन पड़ता है। केवल मादा ही अपने नवजात शिशु के लिए प्रसूति−गृह बनाने उसका आहार जुटाने एवं सुरक्षा का प्रबन्ध करने में अधिक उत्साह दिखाती है। नर तो यत्किंचित ही सहयोग करता है। मादा का वात्सल्य भी तभी तक रहता है जब तक बच्चा अपने पावों खड़ा नहीं हो जाता हैं। उसके बाद तो माता और संतान का रिश्ता भी समाप्त हो जाता है।
किन्तु मनुष्य को इससे असंख्य गुनी उच्चकोटि की प्रेम भावना मिली है। इसी को उसकी सरसता कह सकते हैं। पत्नी के प्रति प्रणय—बच्चों के प्रति वात्सल्य—अभिभावकों के प्रति कृतज्ञता गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, साथियों के प्रति मैत्री की पंचरंगी प्रेम भावना कितने प्रकार की असंख्य−अनुभूतियों का रसास्वादन कराती है−यह देखते ही बनता है। इनकी सरसता इतनी मृदुल एवं इतनी मधुर होती है कि उसे प्राप्त करते रहने के लिए रुग्ण एवं दरिद्र मनुष्य भी जीवित रहने की इच्छा करता है। कि जीवन के प्रति असाधारण आसक्ति बनी रहती हे उसे ही कठिन से कठिन और जटिल से जटिल परिस्थितियों में रहकर दिन क्यों न काटने पड़े प्रेम का मिष्ठान इतना रुचिर है कि उसे तत्वज्ञानी सदा से अमृत की उपमा देते चले आये हैं प्रेमी हृदय को बिना किसी संकोच के अमृत कलश की उपमा दी जा सकती है।
सम्बद्ध व्यक्तियों से आगे बढ़कर जब यह प्रेम भावना आदर्शों के प्रति—कर्त्तव्य के प्रति सघन होती है तब उसे ईश्वर भक्ति का नाम दिया जाने लगता है। इस स्तर पर पहुँची हुई अन्तः स्थिति का विस्तार अधिकाधिक व्यापक क्षेत्र में होता चला जाता है। मनुष्य मात्र के प्रति—प्राणिमात्र के प्रति प्रेम भावना का विस्तार होने पर जीवन का स्तर ही बदल जाता हे। तब उसे ऋषि कल्प एवं देव मानव की संज्ञा मिलती है। दूसरों का दुख बँटा लेने और अपना सुख बाँट देने के लिए जब व्यापक क्षेत्र में दृष्टि पसारी जाती है। और सक्रियता विकसित की जाती है तो उसे विराट् ब्रह्म की तत्व साधना कहा जाता है। विश्व मानव की—विश्वात्मा की आराधना उसे प्रेमाञ्जलि को समर्पण करने से सम्पन्न करने से सम्पन्न होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् और विश्व परिवार की अनुभूति की ही पूर्णता प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त करना कहा जा सकता है। इसी को ईश्वर दर्शन अथवा भगवत् प्राप्ति का नाम दिया जा सकता है।
ईश्वर मनुष्य को प्यार करता है। क्या इसके बढ़ने में मनुष्य को ईश्वर से प्यार नहीं करना चाहिए। माता प्यार करती रहे और पुत्र उसे दुत्कारता रहे तो यह घृणित कोटि की कृतज्ञता होगी। हम कृतघ्न न बनें। ईश्वर को प्यार करें। प्यार का अर्थ स्पष्टतया देना होता है। ईश्वर ने हमें भौतिक और आत्मिक क्षेत्र में जो कुछ दिया है उससे पूरी तरह उसी को लोटा देने का साहस करें, अपनी उपलब्धियों को विश्वात्मा के सुन्दर, सुसज्जित बनाने के लिये समर्पण करें तो इस समर्पण योग की साधना के फलस्वरूप उस सबको भी पा सकते हैं। जो ईश्वर की सत्ता के अंतर्गत तो है पर अभी तक हमें मिला नहीं।
अब विज्ञान क्रमशः प्रौढ़ होता चला जाता है। पचास वर्ष पूर्व आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व में इन्कार करने का जो उत्साह था वह अब ठण्डा हो चला है। यह माना जाने लगा है कि आत्मा है और मरणोत्तर जीवन के उपरान्त भी उसकी सत्ता पूर्णतया समाप्त नहीं हो जाती वरन् किसी न किसी रूप में बनी ही रहती है।
आत्मा के अस्तित्व के बारे में प्रयोगशालाओं ने कुछ उत्साहवर्धक निष्कर्ष प्रस्तुत किये है। ‘बिलसा क्लाउड चेम्बर’ के शोध निष्कर्ष अमेरिका में निकाले गये हैं पर उनकी जानकारी संसार के अन्य देशों ने भी प्राप्त की है और इस बात से आश्वस्त होना सम्भव हुआ है कि मृत्यु के उपरान्त भी प्राणी किसी रूप में बना रहता है। ‘बिलसा क्लाउड चेम्बर’ एक खोखला पारदर्शी सिलेण्डर है, जिसके भीतर से हवा पूरी तरह निकाल दी जाती है। उसके भीतर रासायनिक घोल पोत दिये जाते हैं जिनसे विशेष प्रकार का चमकदार हलका सा कुहरा गैस उसके भीतर छा जाता है। इस कुहरे की विशेषता यह होती है कि एक भी इलेक्ट्रोन उसमें होकर गुजरे तो फिट किये गये शक्ति शाली कैमरे उसका फोटो तुरन्त उतार लेते हैं और यह पता चल जाता है कि सिलेण्डर के भीतर क्या हलचल हुई।
इस सिलेण्डर के एक कक्ष में जीवित चूहे और मेढ़क रखे गये। परीक्षण काल में उन प्राणियों में से एक−एक का प्राण हरण बिजली का करेन्ट लगाकर किया गया। मरने के उपरान्त क्या होता है इसकी फिल्म उतारी गई तो प्रतीत हुआ कि भूत प्राणी की हू−व−हू आकृति उस रासायनिक कुहरे में तैर रही है। वह निश्चेष्ट नहीं थी वरन् वैसी ही हरकतें कर रही थी जैसी कि जीवित अवस्था में वह प्राणी किया करता है। छोटे−छोटे कीड़े−मकोड़ों से लेकर चूहे, मेढ़क जितने विकसित प्राणियों तक का मरणोपरान्त हरकतों के सम्बन्ध में इस चेम्बर ने इतना प्रमाण तो दे ही दिया है कि खुली आँखों ने न दीख पड़ने वाली—तोले जो सकने वाले पदार्थ स्तर से अधिक हलकी कोई सत्ता विद्यमान रहती है और उसे विशेष उपायों में देखा जा सकता है। यह सत्ता क्रमशः धुँधली पड़ती जाती है और फिर कैमरे की पकड़ से भी बाहर चली जाती हैं। अधिक विकसित कैमरे यदि बन सके होते तो शायद उस धुँधली सत्ता के क्रिया−कलाप के सम्बन्ध में भी कुछ अधिक जानकारी मिलती।
यह सत्ता शरीर छोड़कर जब अन्तरिक्ष में भ्रमण करती है तो उसका परिचय प्रेतात्माओं के रूप में मिलता है स्वर्ग−नरक की अनुभूति उसे इसी अवधि में होती है। इसके बाद पुनर्जन्म का चक्र चल पड़ता है। प्रेतों का आकार−प्रकार और उनके कर्म, स्वभाव का ठीक से पता नहीं चल सका है पर जो प्रमाण मिलते हैं उनसे उनका अस्तित्व अवश्य सिद्ध होता है। इसी प्रकार कैसा जीवन बिताने वाले को अगले जन्म में कैसा और कितने दिन बाद जन्म मिलता है इसका कोई नियम निर्धारण नहीं हो सका तो भी इस बात के अकाट्य प्रमाण मिल गये हैं कि मरने के उपरान्त भी फिर नया जन्म मिला है और पूर्व जन्म की स्मृति बनी रही है।
परकाया प्रवेश के सिद्धान्त का समर्थन करने वाले कुछ आधुनिकतम एवं परखे, पहचाने उदाहरण हैं जिन्हें किसी अन्ध−विश्वासी की भावुकता अथवा सनक नहीं कही जा सकती है। अमेरिका के हारवर्ड और कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के दो प्रोफेसरों ने मिलकर “बीसवीं सदी में अचेतन मनोविज्ञान की नई खोज” विषय पर सुविस्तृत खोज की है। अपने विषय के अब उन्होंने अनेकों प्रमाण संग्रह किये हैं। उन्हें पुस्तक रूप में भी छपाया है और पत्र−पत्रिकाओं में भी उन प्रमाणित घटना−क्रमों को छपवाया है। प्रस्तुत विवरणों में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता है और वह एक शरीर से दूसरे में परिवर्तन प्रत्यावर्तन करते रहने में सामर्थ्य है।
डा. आसवन ने अपनी शोध में एक ऐसे बर्तन विक्रेता का उल्लेख किया है जो घर से टहलने के लिए निकला था किन्तु अचानक गायब हो गया। कहीं अन्यत्र जाकर कुछ काम करने लगा। घर वालों ने तलाश किया पर कहीं कुछ पता न चला। दो वर्ष ऐसे ही बीत गये। इसके बाद अचानक उस बर्तन विक्रेता का पूर्व जन्म की स्मृति जगी और आश्चर्य के साथ अपनी नई स्थिति और पुरानी स्थिति की तुलना करने लगा और स्तब्ध रह गया कि उसका नाम, घर, व्यवसाय सब कुछ कैसे बदल गया। और पुरानी स्थिति से इस नई स्थिति में उसे किसने कैसे डाल दिया?
जिस नये व्यक्ति के रूप में वह दो वर्ष से रह रहा था वह भी कोई अवास्तविकता न थी। कुछ समय पूर्व वह नया आदमी भी जिसके स्थानापन्न बनकर उसे रहना पड़ा। वह मशीनों की मरम्मत का काम करता था और घूम फिरकर अपनी रोटी कमाता था। वही कार्य इसे भी नई स्थिति में मिल गया और दो वर्ष मजे की रोजी−रोटी कमाते गुजार लिए। जिस सराय में वह ठहराता था, जिस नानबाई के यहाँ वह रोटी खाता था उन्हीं के यहाँ उसने अपनी व्यवस्था ऐसे जमा ली मानों उन स्थानों से उसका पुराना परिचय चला आता है। उन दुकानों के नये पुराने सभी कर्मचारियों के नाम और व्यवहार उसे याद थे। इसी प्रकार मरम्मत का काम जहाँ मिलता था वह भी सब कुछ उसका जाना पहचाना था।
दो वर्ष बाद मानो वह गहरी निद्रा में से उठा। अपने घर की याद आई और वापिस चला गया। कुछ दिन उसे स्थानापन्न जन्म की स्मृति भी रही, पीछे वह धुँधली पड़ती चली गई और पीछे उसे उन दिनों की बातें लगभग पूरी तरह विस्मृत हो गई और पहले की तरह अपना कसेरे का धन्धा करने लगा।
शोधकर्ताओं ने इस घटना को बहुत गम्भीरता से लिया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हो न हो यह किसी प्रबल आत्मा का एक सामान्य आत्मा को वशवर्ती करके उसके शरीर पर अपना कब्जा कर लेने की घटना है। जब उसने कब्जा छोड़ा तो पुरानी आत्मा अपनी जागृत एवं स्वतन्त्र सत्ता का परिचय देने की स्थिति में आ गई। इस घटना को डा. आसवन ने अपने अनुमानित निष्कर्ष के साथ कई प्रसिद्ध समाचार पत्रों में छपाया।
एक दूसरी घटना रोडस नगर निवासी ऐसेलवर्न की है। वह बैंक से दस हजार का चैक भुनाकर बाहर निकला और अचानक गायब हो गया। घर वाले तलाश करते रहे पता न चला। सोचा डाकुओं ने उसका अपहरण करके मार डाला और धन छीन लिया है। पर ऐसा हुआ नहीं। गायब होने के बाद वह सैकड़ों मील दूर एक अन्य नगर में जा पहुँचा और वहाँ उसने चीनी का व्यापार इस कुशलता से किया मानो वह उस व्यवसाय का माहिर रहा हो। चीनी के व्यापारी उसकी वार्ता से बहुत प्रभावित थे और उसे निष्णात अनुभवी मानने लगे। नाम भी उसका बदल गया। इस व्यापारी को ए. जे. ब्राउन कहा जाने लगा। दो महीने में—उसने बहुत रुपया कमाया और अपने क्षेत्र में अच्छी धाक जमा ली। किन्तु इसके बाद अचानक उसे याद आई कि वह तो रोडस निवासी ऐसलवर्न है यहाँ कैसे आ गया और जिस चीनी के व्यवसाय से उसका दूर का भी वास्ता नहीं था उसे वह क्यों कर करने लगा? इस अपरिचित जगह में इतनी दूर उसे कौन कैसे ले आया। इन प्रश्नों का कोई उत्तर उसके पास नहीं था। वह डर गया। तुरन्त ही चीनी का व्यवसाय समेटा वापिस अपने नगर को चल दिया।
इस घटना का भी लगभग वैसा ही निष्कर्ष था। और यही अनुमान लगाया गया कि कोई मृत आत्मा किसी जीवित शरीर पर कब्जा करके उससे अपनी रुचि का काम करा सकती है।
सायकोलॉजीकल रिव्यू पत्रिका में सन् 1894 की एक घटना डाक्टर डामा ने प्रकाशित कराई थी। डाक्टर की चिकित्सा में एक मूर्छित रोगी आया। वह अच्छा तो हो गया पर प्रौढ़ता खोकर पाँच वर्ष के बालक जैसी मनःस्थिति में आ गया। छोटे बच्चे जिस तरह सोचते और करते है उसका सारा शारीरिक, मानसिक व्यवहार उसी तरह का था। वह सुशिक्षित था पर पढ़ना−लिखना बिलकुल भूल गया था। कई महीने उसकी यही स्थिति रही। इसके बाद उसे पुरानी स्थिति याद आई और पुनः प्रौढ़ता वाले व्यक्तित्व में जागृत हो गया।
बोस्टन के डा. नार्टनप्रिंस ने भी अपना इसी से मिलता जुलता एक अनुभव प्रकाशित कराया था। एक सुशिक्षित महिला उसके इलाज में आई जो हर दिन कुछ घण्टे एक विचित्र व्यक्तित्व की स्थिति में चली जाती थी। तब उसका उच्चारण व्यवहार, क्रिया−कलाप इतना बदल जाता था मानो वह उसका सामान्य व्यक्तित्व पूर्णतया बदल गया हो। यह नया व्यक्तित्व पागलपन नहीं था। उस समय भी वह एक सही सलामत पुरुष जैसा व्यवहार करती थी और अपना नया नाम सैली बताती थी।
उपरोक्त दो घटनाओं से मिलती−जुलती एक तीसरी घटना इंग्लैंड के पादरी होना की है। 15 अप्रैल सन् 1897 में वे मोटर दुर्घटना में घायल हुए। अचेत अवस्था में अस्पताल पहुँचाये गये। होश में आये तो वे बिलकुल छोटे बालक की तरह थे, और अपना नाम पता व्यवसाय आदि पूरी तरह भूल चुके थे, यहाँ तक कि जो कुछ उनने पढ़ा लिखा था वह भी विस्मृत हो गया। इसके बाद वे उस पुरानी यहूदी भाषा में बात करने लगे जिससे वे कभी परिचित नहीं रहे। इस विचित्र परिवर्तन से डाक्टर तथा दूसरे परिचित बहुत हैरान थे। आखिर उन्हें न्यूयार्क विशेष चिकित्सा के लिए भेजा गया। परिवर्तन धीरे−धीरे हुआ। कुछ समय उनके मस्तिष्क पर बालक का कब्जा रहता कुछ समय वे पादरी होना के रूप में बात करते। इस तरह उलट−पुलट बहुत समय चली तब कहीं वे अपने असली व्यक्तित्व में रह सकने योग्य बने।
इस प्रकार की अनेकानेक घटनाऐं सामने आती रहती है और यह सिद्ध करती रहती हैं कि मरने के साथ जीवन का अन्त नहीं हो जाता वरन् उसके उपरान्त भी बना रहता है। आत्मा का स्वतन्त्र और अनन्त अस्तित्व मानने से एक जन्म के कर्मफल दूसरे जन्म में मिलने की बात भी प्रमाणित हो जाती है। आज क्षमता एवं महानता की अभिवृद्धि के लिए जो प्रयास किये गये है वे आगे भी फलप्रद होंगे यह मान लेने पर नास्तिकता का वह विषैला प्रतिपादन निरस्त हो जाता है जिसमें शरीर के साथ जीवन का अन्त हो जाने और मरने के बाद किसी कर्म का फल न मिलने की बात कहकर अनैतिकता को शह दी गई है।
जीवन रथ में दो पहिये जुड़े है एक का नाम है आशा दूसरे का गति। जब तब वे दोनों सही रूप में है तब तक जीवन−यात्रा ठीक तरह चलती रहेगी। जब इनमें अवरोध उत्पन्न होगा तो इस बहुमूल्य रथ का तनिक भी आगे बढ़ सकना सम्भव न रहेगा।
आज की अपेक्षा कल हमें अधिक अच्छी स्थिति में पहुँचना है—पहुँचेंगे इस विश्वास को स्थिर रखकर ही प्रगति के लिए अभीष्ट पुरुषार्थ को सँजोया जा सकता है। जब तक अमुक कार्य पूरा करने और अमुक स्थिति तक पहुँचने की आकाँक्षा सजग रहेगी तभी तक मन में उत्साह रहेगा और उसकी प्रेरणा से कुछ करते रहने को जी चाहेगा। अभीष्ट की प्रगति की कल्पना में जो रस है उसे उपलब्धि के समय मिलने वाली तृप्ति से कम नहीं वरन् अधिक ही प्रेरणाप्रद मानना चाहिए।
राजा जनक ने ब्रह्मवेत्ता याज्ञवल्क्य से पूछा—भगवन्, यदि संसार से सूर्य लुप्त हो जाय तो फिर मनुष्य किसकी ज्योति का आश्रय लेकर जीवित रहेंगे?
महर्षि ने सहज स्वभाव उत्तर दिया—उस स्थिति में चन्द्रमा से भी काम चलता रह सकता है।
यदि चन्द्रमा भी लुप्त हो जाय तब? —जनक ने फिर पूछा।
तब अग्नि की ज्योति के सहारे संसार का काम चलता रहेगा। याज्ञवल्क्य ने नया समाधान बताया।
जनक का समाधान तब भी न हुआ। महर्षि के उत्तरों के बाद उनकी शंकायें फिर भी उठती रहीं। अग्नि के न रहने पर वाक् शक्ति को विकल्प बताया गया और कहा वाणी भी अग्नि के समान ही तेजस्वी है लोग उसका आश्रय लेकर भी जीवित रह सकते हैं।
जनक का आग्रह ऐसी ज्योति का विकल्प ढूंढ़ना था जिसका अन्त कभी भी न होता हो और जिसके कभी भी लुप्त होने की आशंका न हो।
याज्ञवल्क्य ने अत्यन्त गम्भीर होकर कहा—राजन् वह आत्म−ज्योति ही है जो कभी भी नहीं बुझती। उससे प्रकाश ग्रहण करने वाले को कभी भी अन्धकार का कष्ट नहीं सहना पड़ता।
आशा को जीवन का चिह्न मानना चाहिए। इसके अभाव में दो स्थिति रह जाती हैं जिन्हें अति मानवी या अमानवी कह सकते हैं। एक परमहंस—ब्रह्मज्ञानी—अवधूत, आत काय ब्रह्म−निष्ठ जिन्हें भीतर ही सब कुछ मिल रहा है बाहर जिन्हें न कुछ आकर्षक लगता है और न उपयोगी। ऐसे लोग सुने जरूर गये हैं पर देखे नहीं गये। यदि देखे जाँय तो अति मानव—देव पुरुष कहना चाहिए। दूसरे स्तर के वे हैं जो आहार निद्रा के अतिरिक्त और न स्थिति। किसी तरह दिन कट जाना और साँसें पूरी कर लेना ही उन्हें कोई महत्वाकाँक्षा नहीं सताती। शरीर यात्रा पूरी होती रहे इतने में ही उन्हें सन्तोष रहता है इस प्रकार के प्राणियों को अमानव कहा जाता है। मनुष्य योनि में से ऐसे अमानव—अविकसित मनःस्थिति के प्राणी पाये जा सकते हैं। उन्हें भी आशा निराशा में कुछ लेना देना नहीं होता। जो है सो ठीक—जो होगा सो ठीक। आगे की बात सोचने से क्या लाभ।
जिसकी आशा का दीपक बुझ गया—जिसे निराशा ने घेर लिया—जिसकी आकाँक्षाएँ समाप्त हो गई—भविष्य के लिए जिसके पास कुछ सोचने या करने को नहीं है उस ढर्रे की जिन्दगी को मौत की भौंड़ी खुराक ही कहना चाहिए। जीवन का अर्थ साँस लेना, खाना, सोना नहीं वरन् कुछ ऊँचा है। जहाँ वह ऊँचाई न हो वहाँ जीवित मृतक की स्थिति मानी जा सकती है। कई व्यक्ति जिन्दगी के कन्धों पर मौत की लाश लादकर ढोते रहते हैं। आशा विहीन लोगों को इसी श्रेणी में गिना जाना चाहिए।
जीवन रथ का पूरा दूसरा चक्र है गति। चेष्टा—क्रिया—हलचल के उस स्तर को गति कहते हैं जो शरीर यात्रा के प्रकृति−प्रदत्त क्रम उपक्रम से आगे की सक्रियता जुड़ी हुई हो। शरीर यात्रा की हलचल तो घास−पात, पेड़−पौधे, अदृश्य जीवाणु और कीट पतंग में भी होती है। गति इससे ऊपर की ऐसी चेष्टा है जो किन्तु महत्वकाँक्षाओं की प्रेरणा से उत्पन्न होती है। इस ‘गति’ की प्रखरता के सत्परिणामों को ही ‘प्रगति’ कहा जाता है।
गतिशीलता में जितनी शक्ति खर्च होती है उससे कहीं अधिक आशा और प्रदत्त लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रबल मनोयोग और प्रखर श्रम, साधन सहित निरन्तर अग्रगामी रहना पड़ता है। इसी को जीवन रथ का सुरम्य संचालक कहा जा सकता है। आशावान और गतिशील को ही जीवित कह सकते हैं। यों साँस तो लुहार की धोंकनी भी लेती, छोड़ती रहती है।
क्या मनुष्य की आँखें वही देख सकती हैं जो सामने परिलक्षित होता है? साधारण स्थिति में ऐसा ही होता है। नाक के ऊपर लगे हुए दो नेत्र गोलक केवल सामने की दिशा में और कुछ दाँये−बाँये एक नियत रूप तक के दृश्य देख सकते हैं। सो भी उन्हें जो उनकी ज्योति तथा पदार्थों की ध्वनि तरंगों के संयोग का एक नियत माध्यम बनाते हैं। नेत्र−ज्योति क्षीण ही अथवा पदार्थ जीवाणु परमाणु जैसी सूक्ष्म आकृति का हो तो फिर सूक्ष्म दर्शक अथवा दूरदर्शक यन्त्रों से ही अधिक जानकारी प्राप्त कर सकना नेत्र गोलकों के लिए सम्भव होता है। यह दृश्य वर्तमान काल के ही हो सकते हैं। आगे पीछे के नहीं। फोटोग्राफी, चित्रकला एवं फिल्म टेलीविजन जैसे माध्यमों से भूतकाल के दृश्य भी देखे जा सकते थे। अब तक इतनी ही उपलब्धियों से मनुष्य को सन्तुष्ट रहना पड़ा है।
निकट भविष्य में मनुष्य उन चमत्कारों को भी इन्हीं आँखों से देख सकेगा जो भूतकाल में केवल अध्यात्म विज्ञानियों के लिए ही सम्भव थे। भूतकाल की घटनाएँ सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित रखी जा सकेंगी और उन्हें फिल्म टेलीविजन की तरह आभास मात्र स्तर पर नहीं वरन् बिलकुल उसी तरह देखा जा सकेगा जिस तरह आँखों से देखा जाता है। तब यह पहचानना कठिन हो जायगा कि जो दृश्य देख रहे हैं वह असली है या नकली। भूतकाल को हम वर्तमान में पूर्णतया वैसा ही देखेंगे मानो वह सचमुच अभी−अभी ही घटित हो रहा है और हम उसे बिलकुल असली रूप में देख रहे हैं। ऐसा ‘त्रिआयतन’ फोटोग्राफी के सुविकसित विज्ञान के द्वारा सम्भव हो सका है।
दुर्योधन को पाण्डवों के घर जाकर थल में जल और जल में थल दिखाई दिया था। वह दर्पण का चमत्कार सही था। दर्पण के लिए दूसरी छवि वैसी ही सामने उपस्थित होनी चाहिए। वैसा वहाँ कहाँ था? खुले आकाश में बिना किसी पर्दे की सहायता के अभीष्ट दृश्यों को देख सकना निस्सन्देह बहुत ही अद्भुत है। पहली बार जिन्हें वैसा कुछ देखने को मिलेगा वे निस्सन्देह अवाक् रह जायेंगे और अपनी आँखों पर विश्वास न करेंगे। संजय ने घर बैठे महाभारत के दृश्य देखे थे और सारा घटना क्रम धृतराष्ट्र को सुनाया था। इस सम्भावना की टेलीविजन ने पुष्टि कर दी थी अब रही बची—कसर ‘होलोग्राफी’ ने पूरी कर दी है। उस विज्ञान के आधार पर हम देशकाल की समस्त परिधियों को तोड़कर किसी घटना क्रम को इतने स्पष्ट और इतने निर्दोष रूप में देख सकते हैं कि असल−नकल को पहचान सकना ही सम्भव न रहे।
अब विज्ञान और अध्यात्म एक स्थान पर मिलने जा रहे है दोनों के संयुक्त प्रयासों से मनुष्य की क्षमता और सम्भावनाओं का इतना विकास विस्तार हो जायगा कि उसे ईश्वर का राजकुमार सर्व शक्ति मान सत्ता का उत्तराधिकारी निश्चित रूप से स्वीकार किया जा सके। इस प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत करने में एक महत्वपूर्ण साक्षी ‘होलोग्राफी’ की भी होगी।
विज्ञानाचार्य आइन्स्टाइन ने देश और काल की मान्यता को भ्रान्त—अवास्तविक—सिद्ध किया है। वेदाँत दर्शन में जगत को माया—भ्रान्तिवत् कहा है और रज्जु सर्प का उदाहरण देकर यह बताया है कि जो कुछ हम देखते हैं वह वास्तविक नहीं है। अणु विज्ञानी की दृष्टि में यह संसार अणु धूलि के आँधी−तूफान से भरा बवण्डर मान है इसमें भँवर चक्रवात जैसे उपक्रम बनते बिगड़ते रहते हैं उन्हें ही अमुक पदार्थों के रूप में अनुभव किया जाता हैं। जो कुछ दिखाई देता है वह खोखला आवरण मात्र है उसके भीतर आणविक हलचलों को अधड़ भर चलता रहता है। हमारा मस्तिष्क और नेत्र संस्थान अपनी बनावट एवं अपूर्ण संरचना के कारण वह सब देखता है जिसे हम यथार्थ मानते हैं वस्तुतः होता कुछ और ही है।
स्थिर तस्वीरों को चलती−फिरती दिखाकर सिनेमा ने बहुत पहले ही यह सचाई सामने ला दी थी कि आँखों को प्रामाणिक साक्षी नहीं माना जा सकता वे जो कुछ देखती या अनुभव करती है वह सब का सब यथार्थ ही नहीं होता। अब रही बची कमी होलोग्राफी ने पूरी कर दी है वह पर्दे पर नहीं, खुले आकाश में हमें ऐसे दृश्य दिखा सकती है मानो उस देशकाल की स्थिति यथार्थ रूप से देखी जा रही है जो वस्तुतः दूरवर्ती ही नहीं भूतकाल की भी है। उस दृश्यावली को फोटोग्राफी कहना—स्वीकार करना भी दर्शक के लिए सम्भव न रहेगा।
अध्यात्म विद्या के आधार पर देशकाल की परिधि से बाहर के दृश्यों को देख सकना सम्भव रहा है इसे दिव्य दृष्टि कहा जाता रहा है। दिव्य दृष्टि की बात अविश्वसनीय नहीं है। यह तथ्य होलोग्राफी के रूप में अब गम्भीरतापूर्वक विचार करने के योग्य प्रतीत होता है कि हमारी आँखें धोखा खाती हैं और अवास्तविक को वास्तविक समझती हैं। यह तथ्य भी उभरता आता है कि हमारे सामने की दिशा में और नियत सीमा के दृश्य ही देखे जा सकते हैं। किसी भी दिशा के पीठ पीछे के भी—भूतकाल के भी—दूर देश के भी दृश्य हम इन्हीं आँखों से देख सकते हैं और आइन्स्टाइन के इस मत की पुष्टि कर सकते हैं कि देशकाल की मान्यता भ्रामक है।
प्रकाश किरणों को छवि के रूप में पकड़ने की कला अब फोटोग्राफी—टेलीविजन तक सीमित नहीं रही अब वे आधार प्राप्त कर लिये गये हैं जिनसे तीन आयामों वाले−त्रिविमितीय—चित्र देखे जा सकें। आमतौर से फोटोग्राफी लम्बाई−चौड़ाई का ही बोध कराती है गहराई का तो उसमें आभास मात्र ही होता है, यदि गहराई को भी प्रतिविम्बित किया जा सके तो फिर आँखों से देखे जाने वाले दृश्य और छाया अंकन में कोई भेद न रहेगा। ऐसा दृश्य प्रचलन सम्भव हो सका तो फिल्में अपने वर्तमान अधूरे स्तर की फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहेगी वरन् पर्दे पर रेल, मोटर, घोड़े, मनुष्य आदि उसी तरह चलते, दौड़ते दिखाई पड़ेंगे मानो वे अपने यथार्थ स्वरूप में ही आँखों के आगे से गुजर रहे हैं यदि सामने से अपनी ओर कोई रेल दौड़ती आ रही हो या शेर झपटता आ रहा हो तो बिलकुल यही मालूम पड़ेगा कि वे अब अपने ऊपर ही चढ़ बैठने वाले हैं। ऐसी दशा में आरम्भिक अभ्यास की स्थिति में सिनेमा दर्शक को भयभीत होकर अपनी सीट छोड़कर भागते ही बनेगा।
प्रकाश विज्ञानी एर्नेस्टएये और उनके सहयोगी शिष्य डी. गैवर ने ‘होलोग्राफी’ के एक नये सिद्धाँत का आविष्कार किया जिसके आधार पर—त्रिविमितीया—स्तर का छाया चित्रण आँखों से देखा जा सकेगा और भूतकालीन दृश्यों को इन्हीं आँखों से इस प्रकार देखा जा सकेगा मानो वह घटना क्रम अभी−अभी ही बिलकुल सामने घटित हो रहा है।
इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप के इस विधि विज्ञान को रूस ने विज्ञानी यूरीदैनिस्यूक के नेतृत्व में और भी आगे बढ़ाया है। इस युग वैज्ञानिक ने परम्परागत पतली परत वाली फोटो ‘प्लेटों’ के स्थान पर मोटी परत लगाई और उन पर प्रकाश किरणों को गहराई तक प्रवेश कर सकने का अवसर दिया। फलतः तीन आयाम वाले चित्रों का प्रदर्शन होना सम्भव हो गया। इस प्रकार के चित्रों की एक विशेषता यह है कि जिस कोण से इन्हें देखा जाय वे उसी कोण से खींचें हुए पूर्ण प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ेंगे। सामने खड़े होकर देखें तो वे सामने से खिंचे हुए दीखेंगे और अगल−बगल से देखने पर लगेगा उन्हें इसी प्रकार खींचा गया है और जितना अंश वहाँ खड़े हुए दृश्य को जिस रूप में देखा जा सकता था, फोटोग्राफ ठीक उसी तरह का दीख रहा है।
होलोग्राफी वस्तुतः ‘लेजर’ किरणों के अनेक चमत्कारों में से एक है। लेजर का सैद्धाँतिक आविष्कार आइन्स्टाइन ने किया था। 50 वर्ष बाद उस परिकल्पना को साकार बनाया चार्ल्स टाडनेस ने सन् 1954 में। परमाणुओं की एक विशेष विद्या से उत्तेजित करने और उनसे एक जैसी माइक्रो तरंगें निकालने की आरम्भिक प्रक्रिया ‘मेजर’ कहलाती थी। उसी का परिष्कृत रूप चार वर्ष बाद सामने आया और वह ‘लेजर’ कहलाया।
कुछ पदार्थों को गरम या उत्तेजित करने से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा एवं आभा निकलती है जो रोशनी की बत्ती से भिन्न प्रकार की होती है। साधारण प्रकाश कई रंगों की किरणों से मिलकर बना होता है और वे किरणें अलग−अलग लम्बाइयों और कलाओं की होती है। इन्द्र धनुष पड़ते समय यह लम्बाई की भिन्नता ही उस सुन्दर दृश्य के रूप में अपना परिचय देती है। इस बिखराव को एक भीड़ भेड़चाल कह सकते हैं। लेजर प्रक्रिया में परमाणुओं को उत्तेजित करके एक ही रंग की—एक ही कद की किरणें निकाली जाती हैं और उन्हें अधिकाधिक सघन बनाया जाता है। इतने से ही वे किरणें इतनी प्रचण्ड हो उठती हैं कि गजब के काम करती हैं। इन्हें अब तक के उपलब्ध शक्ति स्रोतों में सबसे अधिक प्रचण्ड माना जाता है। अणु विस्फोट की शक्ति से भी कई क्षेत्रों में यह अधिक तीखी और पैनी हैं। लेजर किरणों के प्रयोग से अगले दिनों भौतिक क्षेत्रों में अनोखी एवं क्रान्तिकारी प्रतिक्रिया सामने आने वाली है। उन्हीं में से एक होलोग्राफी भी है।
आविष्कार के आरम्भिक दिनों में यह कठिनाई थी कि लेजर किरणें केवल एक ही रंग के बनते थे। दूसरी कठिनाई यह थी कि खींचने की तरह देखने में भी लेजर किरणों का प्रकाश ही प्रयुक्त करना पड़ता था। स्पष्ट है कि लेजर अत्यन्त खतरनाक होती है। उनका तनिक भी व्यक्ति क्रम हो जाय तो सर्वनाश निश्चित है। अब उसमें कितने ही सुधार हो गये हैं। विज्ञानी लिपमाना ने तीन आयाम वाली फोटोग्राफी के लिए जो ‘प्लेट’ बनाई थी वे होलोग्राफी के लिए फिट बैठ गई हैं और तस्वीर देखने के लिए साधारण रोशनी के प्रयोग से काम चलने लगा है। यह सुधार हो जाने से अब मार्ग निष्कंटक हो गया और सर्व साधारण के लिए होलोग्राफी का आनन्द हो सकना सम्भव हो गया अब उसके लिए सुलभ यंत्रों का बनना ही शेष रह गया है।
होलोग्राफी का आविष्कार ब्रिटिश नागरिक डा. डैनिस गेवर ने किया उसे इसके उपलक्ष में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। चमत्कारी आविष्कारों में इस भौतिकी को अपने ढंग की अत्यन्त अद्भुत ही कहा जायगा। यों अभी उसका क्षेत्र निर्धारित प्रयोगशालाओं में ही है। फिल्म या टेलीविजन की तरह उसका विस्तार इतना व्यापक नहीं हुआ है कि जनसाधारण उससे लाभ उठा सके पर वह दिन दूर नहीं जब यह आविष्कार भी सर्व सुलभ हो जायगा। फोटोग्राफी का विज्ञान आविष्कृत होने के 112 वर्ष बाद सर्व साधारण लिए प्रयोग योग्य बन पाया था। टेलीफोन 56 वर्ष बाद—टेलीविजन 12 वर्ष बाद—एटम बम 5 वर्ष बाद—अपने आविष्कार के बाद उपयोग में आये थे। होलोग्राफी को भी कुछ समय लग सकता है पर जब भी वह प्रयुक्त होगी तब जिनने उसे पहले कभी नहीं देखा था उन्हें बहुत ही अजीब—किसी जादू लोक के तिलस्म जैसा लगेगा।
वस्तुतः मनुष्य स्वयं ही एक जादू है। उसकी चेतना चमत्कारी है। उसकी दौड़ जिधर भी चल पड़ती है उधर ही चमत्कारी उपलब्धियाँ प्रस्तुत करती है। कहते हैं कि प्रेत छुए नहीं जाते—हाथ से पकड़ने में नहीं आते तो भी वे दिखाई तो यथार्थ जैसे ही पड़ते हैं। प्रेतों की किंबदंतियों अप्रामाणिक हो सकती हैं पर होलोग्राफी किन्हीं जीवित या मृत मनुष्यों, प्राणियों अथवा पदार्थों के साथ यथार्थ मिलन जैसा अवसर प्रदान करती है उस प्रत्यक्ष को कैसे तो अविश्वस्त कहा जाय और कैसे अप्रामाणिक ठहराया जाय?
मानवी सूझ−बूझ, चिन्तन, प्रयत्न पुरुषार्थ का प्रतिफल होलोग्राफी जैसा सामने आ सकता है जिस चेतना द्वारा यह सब सोचा गया और प्रस्तुत किया गया है उसका स्वरूप समझना और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना यदि हमारा प्रिय विषय बन गया होता तो भौतिक उपलब्धियों की अपेक्षा लाख गुनी अधिक महत्वपूर्ण विभूतियाँ हमारे हाथ आई होतीं और उनके सहारे इतना अधिक वर्चस्व करतल गत हुआ होता कि अपूर्णता जैसी कोई वस्तु ही शेष न रहती। पूर्ण से उत्पन्न हुए हम सब पूर्णता का आनन्द ले रहे होते और मानवी सत्ता को धन्य बना रहे होते।
मोटी बुद्धि प्रेम और मोह को एक ही मानती है जबकि उनमें जमीन आसमान जितना अन्तर है। व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति इतनी अधिक आसक्ति का होना कि उन्हें पाने अथवा कब्जे में रखे रहने के लिए कुछ भी करने पर उतारू रहा जाय मोह है। व्यक्ति गत रुचि, डडडड, आकर्षण अथवा उपयोग की दृष्टि से किन्हीं पदार्थों एवं व्यक्तियों के साथ घनिष्टता स्थापित हो जाती है और वह इतनी सघन हो जाती है कि विछोह की बात सोचने से कष्ट होता है। यह मोह की स्थिति है। मोह यह चाहता है कि प्रिय वस्तु का साथ छूटने न पाये, चाहे इसके लिए अपना अथवा प्रिय पात्र का कितना ही अहित क्यों न होता हो यह मोह भी मोटी बुद्धि का प्रेम ही लगता है और इसी शब्द से उस आसक्ति का उल्लेख भी किया जाता है, पर वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न होती है।
प्रेम चूँकि एक आदर्श है। इसलिए उसकी घनिष्टता एकात्मता आदर्श के साथ ही जुड़ी रहेगी। जहाँ आदर्श न हो वहाँ प्रेम का अस्तित्व रह ही नहीं सकता। व्यक्ति गत मोह किसी के रंग, रूप, व्यवहार, उपयोग एवं आकर्षण के आधार पर पनपता है। जो रुचिर लगा उसी के प्रति आकर्षण बढ़ गया। जिसकी समीपता में सुखद कल्पना कर ली गई उसी के पीछे मन चलने लगा। यह आसक्ति किसी को देखने मात्र से पनप सकती है और उसके घनिष्ठ सान्निध्य की आतुरता उन्माद बनकर कुछ भी कर गुजर सकती है। प्रेम के नाम पर ऐसी ही दुर्घटनाएँ आये दिन होती रहती है। इनका परिणाम वैसा ही होता है जैसा नशा उतरने पर पैसा, समय और खुमारी गँवाकर असहाय अशक्त बने हुए शराबी का। इस प्रेमोन्माद में कभी किसी को शान्तिदायक परिणाम हाथ नहीं लगा है। यह जुआ खेलने वालों को सदा हार ही हाथ लगती रही है।
प्रेम न तो आकस्मिक होता है और न अकारण। उसके पीछे ऐसे तथ्य होते हैं जो आदर्शवादिता की पृष्ठभूमि पर ही उदय हो सकते हैं। उसमें रंग−रूप की—आकर्षक व्यक्तित्व की—आवश्यकता नहीं पड़ती। वरन् यह परख रहती है कि प्रिय−पात्र कितना आदर्शवादी है। उसमें सज्जनता, कर्त्तव्य−निष्ठा, उदारता, सहृदयता जैसे सद्गुणों की कितनी मात्रा है। जहाँ विभूतियों के प्रति आकर्षण होगा वहाँ मैत्री केवल सद्भाव सम्पन्न सच्चरित्र व्यक्ति से ही बन पड़ेगी। और तब तक यथावत् बनी रहेगी जब तक उन सद्गुणों का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सके।
मोह में गुणों की अपेक्षा नहीं रहती। शारीरिक आकर्षण की इसके लिए पर्याप्त है। कुरूप से अरुचि रूप वाले की मनुहार जहाँ हो रही हो वहाँ मोह के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसा आदर्श रहित आकर्षण सर्वथा अस्थिर रहता है। उसमें अधिक गहरे नशे की प्यास रहती है। अपनी कुरूप पत्नी के प्रति रुखाई धारण करके जो रूपवान प्रेयसी है पीछे लगा फिरता है उसके सम्बन्ध में यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह उस प्रेयसी के प्रति भी अपनी अनुरक्ति देर तक बनाये रह सकेगा। नवीनता का—अधिक गहरे नशे का आकर्षण उसे फिर कहीं से कहीं से भागेगा। दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथे प्रेयसी तलाश करने की कभी न बुझने वाली अतृप्ति का मोह ग्रस्तों में सदा ही बनी रहेगी। वे किसी के भी सगे न बन सकेंगे।
रस लोनी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ, एक फूल को चूस कर दूसरे पर जा बैठती है। तितलियों को एक फूल पर बैठे रहने से सन्तोष नहीं होता, उन्हें क्षण−क्षण नवीनता चाहिए। प्रेम जहाँ होगा वहाँ यह अस्थिर उन्माद कभी भी दृष्टिगोचर न होगा। जहाँ आस्थाएँ काम कर रही होंगी वहीं तो विश्वास दे सकने और पा सकने की स्थिति बनेगी। आजीवन मैत्री निर्वाह का आधार वहीं तो बनेगा। प्रेम धर्म निबाहना केवल शूरवीरों का काम है—उसके लिए बहुत चौड़ा दिल चाहिए। मोहग्रस्त लोभीजन उसका निर्वाह कर सकें यह सम्भव नहीं हो सकता।
मोहग्रस्त मनःस्थिति में भौतिक अनुदान, उपहार देने या पाने की प्रवृत्ति रहती है। यदि इस स्तर की प्रेम विडम्बना नर−नारी के बीच चल रही होगी तो उसमें यौन लिप्सा की आतुर माँग होगी। भले ही प्रिय पात्र का गृहस्थ, भविष्य एवं स्तर पतन के गर्त में गिरता हो तो गिरे। उन्माद की पूर्ति किसी भी कीमत पर होनी चाहिए। आवेश में यह मोह ही प्रेम जैसा लगता है और उस आतुर मनःस्थिति में पड़े हुए उन्मादी अपने आपको ‘प्रेमी’ कहने लगते हैं, जबकि यह आचरण प्रेम के तत्व दर्शन की सीमा को छू भी नहीं रहा होता।
विशुद्ध प्रेम व्यक्तियों के बीच आदर्शवादी विशेषताओं के कारण ही आरम्भ होता और पनपता है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं आत्मा का होता है। वह आकृति को देखकर ठिठकता नहीं, वरन् गहराई में प्रवेश करके प्रकृति के मर्मस्थल तक चला जाता है। ऐसे व्यक्ति शारीरिक आकर्षण को तनिक भी महत्व नहीं देते। उनके लिए काली कुरूप आकृति में ऐसी कोई न्यूनता दिखाई नहीं पड़ती, जिसकी तुलना में किसी रूप यौवन सम्पन्न को महत्व दिया जा सके। ऊपर चमड़ी के भीतर सर्वत्र रक्त, माँस, अस्थि जैसे घिनौने और दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ही तो भरे पड़े हैं। उनमें केवल मूढ़ मति ही उलझती हैं। शरीर आकर्षण को लेकर आरम्भ हुआ ‘प्रेम’ संध्याकाल के रंगीले बादलों की तरह देखते−देखते धूमिल होता चला जाता है और फिर कुछ समय बाद उसका कहीं पता भी नहीं चलता।
प्रेम गुण ग्राही होता है और वह केवल वहीं जमता है जहाँ व्यक्ति में आदर्शवादी विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं। आत्मा की भूख है कि आत्मिक विभूतियों से भरे व्यक्ति के सजातीय आकर्षण से प्रभावित होकर उसकी भावनात्मक समीपता चाहे। जड़वादी मोह ग्रस्तता के पीछे यौन लिप्सा का ताण्डव रहता है जबकि आत्मवादी प्रेम में केवल सद्भाव सम्पन्न आत्मीयता के आदान−प्रदान की माँग मात्र रहती है। ऐसे प्रेमीजन यदि नर−नारी हैं तो वे आजीवन अति पवित्र सम्बन्ध खुश−खुशी बनाये रह सकते हैं और एक−दूसरे के चरित्र को उज्ज्वल सिद्ध करने के लिए अपनी दुर्बलता पर सदा−सदा तक काबू रख सकते हैं।
नर और नर के बीच—नारी और नारी के बीच उन्मादी प्रेम सघन नहीं हो सकता किन्तु निष्ठावान प्रेम के लिए लिंग भेद जैसी कोई अड़चन नहीं है। दाम्पत्य−जीवन में एक दूसरे पर जैसी निर्भरता होती है एक दूसरे के सान्निध्य में जितना आनन्द प्राप्त करते है वैसा ही विश्वस्तता और भाव भरी स्थिति नारी और नारी के बीच अथवा नर और नर के बीच भी रह सकती है। मैत्री और कामुकता दो भिन्न वस्तुएँ हैं। आवश्यक नहीं कि दोनों साथ रहें। कामुकता विहीन मैत्री भी उसी प्रकार निभायी जा सकती है जिस प्रकार दुनियादार लोगों की मैत्री विहीन कामुकता का क्रीड़ा−विनोद प्रायः चलता रहता है।
लोभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुआ प्रेम पानी के बबूले की तरह उठता है और झाग की तरह बैठ जाता है। मतलब निकालने के लिए चापलूसी की डडडड विद्या अब एक सर्व विदित कथा कारिता रह गई है। प्रेम शब्द का उपयोग इस कला−कौशल के साथ भी आये दिन होता है—वैसी ही कृति अनुकृति—वैसी ही भाषा शब्दावली प्रयुक्त होती है पर वस्तुतः बगुला द्वारा मछली पकड़ने अथवा बिल्ली द्वारा चूहा दबोचने से पूर्व साध कर उठाये गये कदमों जैसी ही होता है। प्रयोजन पूर्ण होने के बाद तथाकथित प्रेम पात्र चूसे हुए नींबू के छिलके की तरह कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। यही तो आज का डडडड व्यवहार है। कैसा दुखद और कैसी दयनीय है यह विडम्बना।
देवता और असुर भावनात्मक उभार के दो सिरे हैं। मध्यवर्ती स्थान शान्त और सन्तुलित रहता है। सामान्य मनुष्य हर किसी से मानवोचित सद्व्यवहार करते है और अपने कर्त्तव्य धर्म पर आरूढ़ रहकर मध्यवर्ती गतिविधियाँ चलाते हुए जीवन−क्रम पूरा करते हैं। न उन्हें किन्हीं से अत्यधिक घनिष्टता होती है और न रोष, विद्वेष ही सताता है। वे जानते हैं मनुष्यों की पारस्परिक, सहिष्णुता और सद्व्यवहार के आधार पर ही गुजर करनी पड़ती है इसलिए सम्बन्धों का सन्तुलित निर्वाह करते हुए गुजर करनी चाहिए। न अति की सीमा तक मैत्री बढ़ानी चाहिए न घृणा द्वेष की आग में जलना चाहिए। लोग जैसे भी हैं बने रहे−हमें अपना कर्त्तव्य भर पालन करते रहना है यह मानकर चलते रहना सरल पड़ता है और सुलभ भी है। इस नीति से जिन्दगी आसानी के साथ कट जाती है और सम्बन्धित लोगों के रिश्ते का देर तक ठीक प्रकार निर्वाह होता रहता है।
इससे आगे की भावुक स्थिति को असामान्य या अतिवादी कह सकते हैं। वह इस छोर पर पहुँचेगी या उस छोर पर। या तो आदर्शवादी व्यक्तित्वों के साथ सघन होकर उच्चस्तरीय आत्मिक विकास की भूमिका बनायेगी या फिर लोभ और मोह में उलझकर उन्माद जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी। उसमें रुझान ही प्रधान रहता है। दुष्ट और दुर्गुणी भी प्रिय लगने लगता है यहाँ तक कि उस तथाकथित प्रेमी की प्रसन्नता के लिए स्वयं का भी दुष्ट कर्मों में सहयोग समर्थन चल पड़ता है। तब प्रिय पात्र को आदर्श की ओर ले चलने का उत्साह समाप्त हो जाता है और मित्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को मन रहता है, भले ही वह कर गुजरना कितना ही अनैतिक या अवाँछनीय क्यों न हो। यह पतन का अन्तिम छोर है। प्रेम का विकृत स्वरूप कितना विघातक हो सकता है उसका परिचय इस मोह ग्रस्त उन्मादी आवेश की स्थिति वाले वातावरण में कहीं भी देखा जा सकता है।
प्रेम का उज्ज्वल पक्ष ऐसा है जिसमें उस पवित्र सूत्र में बँधे दोनों पक्षों का केवल उत्कर्ष और कल्याण ही होता है। ऐसी मित्रता एक आदर्शवादी अन्तःकरण को दूसरे परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ बाँधती है। एक ओर एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति उन पर लागू होती है। उनका भावनात्मक आदान−प्रदान परस्पर एक दूसरे को ऊँचा उठाता है और आगे बढ़ाता है ऐसी मित्रता का आरम्भ सदुद्देश्य के लिए होता है इसलिए उसका अन्त भी सुखद सन्तोषजनक ही रहता है। परिस्थितियाँ इन मित्रों को दूर−दूर रहने के लिए विवश कर दें तो भी उनकी सद्भावना और घनिष्टता में कोई अन्तर नहीं आता। जब कि मोहग्रस्त लोग जब तक सामने रहते है तब तक देख देखकर जीने की बात करते हैं कि पर जब विलग हो जाते हैं तो कुछ ही समय में उनकी स्थिति अपरिचितों जैसी हो जाती है।
मोह में आदान के साथ प्रदान की शर्त जुड़ी रहती है। हमने उसके लिए यह किया इसलिए उसे हमारे लिए यह करना चाहा ऐसा लेखा−जोखा जहाँ भी लिया जा रहा होगा वहाँ लाभ हानि के आधार पर सन्तोष अथवा आक्रोश भी व्यक्त किया जा रहा होगा। अपेक्षा पूरी होने पर वह आतुर प्रेम भयंकर प्रतिशोध भी बन जाता है। और आज दाँत काटी रोटी वाले मित्रकल ‘जान के ग्राहक’ बने दिखाई पड़ते हैं। प्रेमोन्माद में यह ज्वार−भाटे जैसी उठक−पटक स्वाभाविक भी है। सच्चे प्रेम में ऐसे आँधी तूफान नहीं आते उसमें एक रस शीतल भर सुगन्ध पवन बहता रहता है। प्रेम देने के लिए किया जाता है लेने के लिए नहीं। देते रहने में कोई बाधा नहीं। झंझट तो तब खड़ा होगा जब लेने की अपेक्षा की जायगी और वह जो चाहा था सो मिल नहीं सकेगा। प्रेम इसी चट्टान से टकरा कर नष्ट भ्रष्ट होता है। अनुदान अपने हाथ की बात है प्रतिदान दूसरे के हाथ की। प्रतिदान का अभिलाषी मोह है और अनुदान के लिए समुन्नत प्रेम। मोहग्रस्त को पग−पग पर खोज का, जलन का, उलाहने का, पश्चाताप का, अनुभव होता है। किन्तु जहाँ प्रेम है वहाँ शान्ति−स्थिरता और प्रसन्नता की स्थिति में कमी परिवर्तन दृष्टिगोचर ही न होगा। ऐसा परिष्कृत प्रेम ही आत्मा की उच्चस्तरीय आवश्यकता है। उसे पाकर मनुष्य इतना ही आनन्द पाता है जितना ईश्वर को अपनी गोदी में बिठाकर अथवा स्वयं उसकी गोदी में बैठकर पाया जा सकता है।
बिच्छू सरिता के पुलिन पर बिल बनाकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। बिच्छू को जब भूख लगती, बिल से बाहर आ जाता और रेत पर घूमकर छोटे−छोटे कीड़े−मकोड़ों का उदरस्थ कर अपनी क्षुधा शान्त करता। कभी−कभी उसे केकड़े के दर्शन भी हो जाते। वह रहता तो जल में था पर धूप लेने के लिए किनारे पर आ जाता और रेत में घण्टों पड़ा रहता। उसने रेत में भी अपने निवास की अस्थाई व्यवस्था कर रखी थी। एक छोटा बिल बना लिया था जब उसे कौवे बगुले या अन्य किसी शत्रु के आगमन का संकेत मिलता सुरक्षार्थ वह उस बिल में छिप जाता था।
केकड़े और बिच्छू में आकृति की समानता थी। प्रारम्भ में तो बिच्छू केकड़े से बिलकुल न बोला, चुपचाप उसके क्रिया−कलाप देखता रहता कि वह किसी तरह पानी में कूद कर क्रीड़ा करता रहता है और जल विहार का आनन्द लेता है। एक दिन बिच्छू से न रहा गया उसने अपनी इच्छा को प्रकट करते हुए कहा—”मित्र! आपको जल−क्रीड़ा करते देखता हूँ तो मेरे मन में भी आता है कि मैं भी सरिता में कूदकर स्नान करूं।’
‘आप भूल कर भी ऐसा मत करना’—बिच्छू के केकड़े को सचेत हुए कहा—’देखते नहीं नदी का प्रवाह कितना तीव्र है कहीं जलधारा आपको भँवर की ओर बहाकर ले गई तो तैरने की इच्छा अपूर्ण रह जायेगी और विवश होकर जल समाधि लेनी पड़ेगी। कहीं−कहीं पर तो नदी की गहराई इतनी अधिक है कि थाह लेना भी मुश्किल पड़ता है।’
‘मुझे तैरना नहीं आता इसलिए जान−बूझकर मैं मृत्यु को आमन्त्रित तो नहीं करना चाहता’—बिच्छू बोला—’पर क्या आप मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर नदी की धारा की सैर नहीं करा सकते। जब कभी सरिता के मध्य में नौका−विहार करते हुए यात्रियों को देखता हूँ तो मेरा मन हर्षोल्लास से नाच उठता है, सोचता हूँ उन्हें कितना आनन्द मिल रहा होगा।’
‘सैर कराना तो कोई मुश्किल कार्य नहीं है पर आपकी पूँछ का डंक कितना विषैला होता है इसे कौन नहीं जानता। यात्रा के मध्य कहीं आपने डंक चला दिया तो मेरा जीवन समाप्त हो जायेगा।’
‘आपका ही जीवन समाप्त क्यों होगा? मेरा बचना भी तो कठिन हो जायेगा। मैं इतना मूर्ख नहीं कि अपना हित−अनहित भी न जानता होऊँ। तुम्हें डंक मारने पर मुझे भी तो जल में डूबना पड़ेगा। अतः मेरे डंक का भय तुम न करो।’ बिच्छू ने आश्वासन देते हुए कहा।
केकड़े को विश्वास हो गया। उसने बिच्छू को अपनी पीठ पर बिठाया और उतर पड़ा नदी में हवाखोरी करने के लिए। नदी की लहरों पर केकड़ा तैर रहा था। उसे जल−क्रीड़ा में बड़ा आनन्द आ रहा था। ऊपर बैठे बिच्छू को ऐसा लग रहा था। ऊपर बैठे बिच्छू को ऐसा लग रहा था मानो झूला झूल रहा हो। मंद−मंद प्रवाहित होती शीतल वायु उसे बड़ी भली लग रही थी और अपने चहुँओर अपार जल समूह को देखकर उसे ऐसा आनन्द आ रहा था मानो छोटी किश्ती में बैठक अवकाश के क्षणों में अपने व्यथित हृदय को शान्ति और नवीनता प्रदान करने के लिए निकल पड़ा हो।
बिच्छू अपने आनन्द में भूल ही गया कि केकड़े पीठ पर बैठा है। तब तक एक बड़ी लहर का प्रवाह आया। हल्की−सी फुहार उसकी पीठ पर गिरी। घबराहट में बिच्छू का डंक पूरे वेग से केकड़े की पीठ पर गिरा। केकड़ा तिलमिला गया। उसके पूरे शरीर में विष फैल गया। असह्य पीड़ा ने उसे बेचैन कर दिया।
मरते−मरते उसने—’आखिर जिरा बात के लिए मैं डर रहा था वही हुआ न?
पश्चाताप के स्वर में बिच्छू बोला—’भाई! स्वभाव का परिवर्तन बड़ा कठिन कार्य है। जैसे ही किसी वस्तु का स्पर्श मेरे शरीर से होता है। स्वभाव वश डंक अपना कार्य पूर्ण कर देता है। अपनी मृत्यु को सामने देखकर जो मैं स्वभाव को नहीं। ‘सचमुच वे व्यक्ति कितने सम्माननीय जो अपने स्वभाव को नियन्त्रित करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। और जिन्होंने आत्मपरिष्कार द्वारा अपने स्वभाव को वशं में कर लिया है।’
बिच्छू का दुःस्वभाव उसके लिए ही नहीं केकड़े के लिए भी प्राणघातक सिद्ध हुआ। यह घटना−क्रम हम उन सब पर भी आये दिन घटित होता रहता है जो न तो अपने दुःस्वभाव के दुष्परिणामों का विचार करते हैं और न उसे सुधारने क प्रयत्न।
उस दिन गरुड़ देव भ्रमण के लिए निकले | देखा तो पाटिल पुत्र के विष्णु मन्दिर के चबूतरे पर बैठा कबूतर बेतरह काँप रहा था।
इस निर्भय और सुरक्षित स्थान पर कपोत को अकारण इस प्रकार काँपते देखकर गरुड़ ने आश्चर्य पूर्वक कारण पूछा।
कपोत बोला—अभी यमराज आये थे। मुझे देखकर हँसे और बोले कल प्रातःकाल इस अभागे की मौत आ जायगी। सो मैं प्राण संकट की बात सोचकर अधीर हो रहा हूँ—देव!
गरुड़ को दया आई और साथ ही यमराज को चुनौती देने की बात भी उन्हें सूझी। सो कबूतर को पंजों में दवा कर वे सुदूर यात्रा पर निकल पड़े और मलयगन्ध पर्वत की एक सुरक्षित गुफा में जाकर उसे रख दिया।
दूसरी उड़ान में गरुड़ यमलोक पहुँचे और यमराज को बताया कि वे किस प्रकार कपोत को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा चुके हैं।
यम ने विष्णु वाहन का आदर−सत्कार किया और मृत्यु सम्बन्धी लेखा−जोखा मँगाया। पूर्व व्यवस्था लिखी हुई थी कि पाटिल पुत्र के विष्णु मन्दिर में रहने वाला कपोत अमुक तिथि को मलयगंध पर्वत की गुफा में विदंत सर्प द्वारा भक्षण किया जायगा। वह मृत्यु मुहूर्त कुछ घड़ी पूर्व ही पूरा हुआ है।
गरुड़ चकित रह गये लौट कर पहुँचे तो देखा कि सर्प द्वारा कपोत को उदरस्थ किया जा चुका है। रक्षा के मिस उस निरीह पक्षी को मृत्यु के मुख तक पहुँचाने के निमित्त वे स्वयं ही धन गये हैं यह सोचकर वे भारी मन लेकर अपने घर लौटे।
विष्णु भगवान् ने उनकी उदासी और मनोव्यथा को जाना और समझाते हुए बोले—गरुड़,जन्म तरह मरण भी निश्चित हैं। नियत समय पर मरने से कोई बचता नहीं। इस तथ्य को यदि मोहग्रस्त प्राणी समझ सके होते तो मृत्यु से डरकर साहसिक सत्कर्म करने से न चूकते और शोक−सन्ताप में जिस तरह सिर घुनते हैं उसकी आवश्यकता न पड़ती।
मनुष्य का विश्लेषण दो प्रकार से किया जाता है, धर्म उसे गिरा हुआ कहता है और विज्ञान उसे ‘उठा हुआ पशु’ बताता है। देखना यह है कि दोनों प्रतिपादनों में यथार्थता किसके साथ है।
आदम और हव्वा स्वर्ग में रहते थे उन्होंने शैतान के बहकावे में आकर अभक्ष्य खाया और जमीन पर आ गिरे। उनके वंशज मनुष्य कहलाये। देवता और अवतारों का धरती पर उतर कर मनुष्य शरीर धारण करना और सन्तानोत्पादन में संलग्न होना। प्रायः इसी से मिलती जुलती कथा गाथाएँ समस्त धर्मों में प्रचलित हैं; जिनमें आदि मानव के अस्तित्व का आरम्भ किस प्रकार हुआ, इस जिज्ञासा का समाधान किया गया है। यह मान्यताएँ बताती हैं कि मनुष्य गिरा हुआ देवता है। स्वर्ग लोक के देवता अपने इस गिरे हुए साथी की सहायता करने के लिए समय−समय पर अपने सदस्य सहायक का परिचय देते रहते हैं।
भौतिक विज्ञान की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार आदि जीव की उत्पत्ति पृथ्वी के रासायनिक पदार्थों के पानी तथा सूर्य की गर्मी के साथ समन्वय होने के कारण सम्भव हुई। तब वह पानी में तैरने वाला एक जल कीटक मात्र था। उसमें जड़ पदार्थों से अपने को स्वतन्त्र करने की और आगे बढ़ने की तीन विशेषताएँ थीं (1) भोजन करने और बढ़ने की शक्ति (2) घूमने−फिरने की शक्ति (3) अपने समान दूसरे प्राणी को जन्म दे सकने योग्य प्रजनन शक्ति। इनसे भी बढ़कर थी उसके ‘अइम्’ के साथ जुड़ी हुई इच्छा शक्ति।
चेतन जीव प्रेरणा को प्राणि−जगत के विकास का मूलभूत आधार माना गया है। वस्तुतः यही जड़—चेतन की विभेद रेखा है। अन्यथा जड़ में भी हलचल होती है। रासायनिक अणु अपने ढंग से विकास, वृद्धि और मरण परिवर्तन का क्रम चलाते हैं। अन्तर इतना ही होता है कि उनमें इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति करने की स्वतन्त्र चेतना नहीं होती। प्रकृति प्रेरणा के वे खिलौने मात्र होते हैं। चेतन जीव में विभिन्न हलचलें तो होती ही हैं। उसमें प्रकृति प्रेरणाओं के अनुरूप अथवा प्रतिकूल चलने का स्वतन्त्र संकल्प−बल भी होता है। चेतन इसी का नाम है। जीव सत्ता का उद्गम इस चित्तशक्ति को कहा जा सकता है।
इस संसार में जीव कैसे उत्पन्न हुआ और उसका विकास किस रूप में हुआ? इस संदर्भ में कितनी ही मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक कथन यह है कि पृथ्वी में जब उष्ण गैस मात्र थी तब उसने सूर्य की परिक्रमा करते करते हुए जीवन तत्व का उद्भव किया था। ध्रुवों की अन्तिम सीमा को छोड़कर उसकी ऊपरी परत के नीचे यह जीवन जमा होता गया और जब जल तथा ताप का सन्तुलन हुआ तो वह जीवन नन्हें−नन्हें कृमि कीटकों के रूप में विकसित होने लगा। उसी का क्रमिक विकास वर्तमान प्राणियों के स्तर तक होता चला आया हैं। अभी भी विषुवत रेखा के समीपवर्ती उष्ण प्रदेशों में जीवों की बहुलता हैं। इसे सूर्य और धरती की समागम स्थली कहा जाता है।
प्रो. जे. एस. हाल्डेन ने अल्ट्रा वायलेट किरणों के विकिरण द्वारा उच्च अणु भार वाले प्राँगरिक यौगिकों का संश्लेषण होना जीवन का प्रारम्भ कारण माना हैं। सर ओलिवर लॉज का कथन है कि ईथर तत्व के साथ जीवन का अनन्त स्पन्दन अनादि काल से हैं।
स्वतन्त्र सता के रूप में उसकी अनुभूति की। जूलियन हक्सले जड़ के विकास से चेतन की उत्पत्ति सिद्ध करने का प्रयास उपहासास्पद है। चेतना की सत्ता इस सृष्टि में अनादि काल से विद्यमान हैं। जड़ को वर्तमान रूप तक घसीट लाने का श्रेय उस चेतना को ही दिया जाना चाहिए।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. हेनरी वर्गसन ने अपने ग्रन्थ ‘क्रिएटिव इवोल्यूशन’ में लिखा है। जीवन एक प्रचण्ड शक्ति है जिसने आरम्भिक और उपयोगी स्तर तक पहुँचाने में अथक प्रयत्न किया है। जार्ज बर्नार्डशा ने अपनी पुस्तक ‘मैन एण्ड सुपर मैन’ में जीवन तत्व को लादफा फोर्स के रूप में समस्त किया है। वे कहते हैं जीवन सत्ता को प्रकृति की समस्त
शक्तियों में सर्वोपरि स्तर की स्वतन्त्र कर्तव्य सम्पन्न सामर्थ्य कहा जा सकता है। नैपोलियन की बात लगती तो उपहासास्पद है पर तथ्य उसमें भी है वह कहता था जीव का जन्म कीचड़ से हुआ है। कमल जैसा सुन्दर पुष्प भी तो कीचड़ में ही जन्मता है। जल, मिट्ठी और ऊष्मा के संयोग से जीव की उत्पत्ति मानने वाले प्रकारान्तर से नैपोलियन की बात को ही पुष्ट करते हैं। क्या सचमुच ही हमारी आदि जन्मदात्री कीचड़ है? क्या उवर नहीं पाये हैं? यह एक विचित्र पहेली है, दार्शनिकों के लिए भी और भौतिक विज्ञानियों के लिउ भी। कीचड़ में से कीड़ा—कीड़े से मछली, मेढ़क, सरीसृप, पक्षी और स्तनपायी जीवों का उद्भव—कैसा है यह विचित्र संयोग? जिसे न स्वीकार करते बनता है और न अस्वीकार करते। प्रथम स्तनधारी ‘मैमल’ही क्या हमारा वंश पूर्वज है? स्पीसीज वंश के स्तनपायी बनमानुष के रूप में विकसित हुए, उनने पिछली टांगों के सहारे खड़ा होना और सीधे चलना सीखा। दो हाथों को पैरों के प्रयोजन से मुक्त करके उन्हें विविध कर्म कर सकने योग्य बनाया। यह इतनी बड़ी जीवन क्रान्ति उन दिनों न जानें कितने चक्रों का पार करते हुए सम्भव हुई होगी? इस खड़े होने की प्रक्रिया ने बनमानुष और गृहशास्त्री मानते हैं।
डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘ओरिजिन आफ स्पीसीज’ में उन पुरानी मान्यताओं को झुठलाया है जिनमें यह कहा जाता है कि प्रत्येक प्राणी अपने वर्तमान स्वरूप में ही अवतरित हुआ है। उन्होंने जीव के क्रमिक विकास को अपने प्रख्यात ‘विकासवाद’ दर्शन में अनेकों कारण और प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया है। मनुष्यों का पूर्वज वे होमोसौपियन जाति के नर−वानर को मानते है। एप,गुरिल्ला, चिंपेंजी, आराँगओटान, गिव्वन आदि सब उसी आदि नर−वानर के वंशज है। उनके गोत्र ही अलग अलग हैं।
मनुष्य का बाप बन्दर था, यह बात गले न उतरने पर एकबार आक्सफोर्ड के लार्ड विशप सैम्युअल विल्वर फोर्स के जीव विज्ञानी टाइम हक्सले ने व्यंग पूर्वक पूछा बनमानुष आप माता के पक्ष में है या पिता के पक्ष में? इस पर हक्सले ने उत्तर दिया—मुझे इस बात की लज्जा नहीं कि अपने बाबा या दादी बनमानुष थे। मुझे लज्जा उन पर आती है जो अहमन्यता के कारण सचाई को पददलित करने के लिए तुले हुए हैं। उन दिनों सचमुच ही यह एक विचित्र प्रतिपादन समझा गया था कि प्राणियों ने क्रमिक विकास किया है और मनुष्य बन्दर की औलाद है। धार्मिक और राजनैतिक क्षेत्रों में इस प्रतिपादन का प्रबल विरोध हुआ था। सन् 1870 में प्रशिया (जर्मनी की सरकार ने आदेश निकाल कर प्रतिबन्ध लगा दिया था कि ‘विकासवाद’ की बात किसी शिक्षा में—संस्था में न पढ़ाई जाय। टिनेसी (अमेरिका) में तो एक अध्यापक पर यह मुकदमा भी चला था कि क्योंकि उसने छात्रों को विकास वाद के सिद्धान्त पढ़ाये।
मनुष्य और बानर की शरीर रचना में अद्भुत समानता है। इतना ही नहीं मानसिक स्तर पर भी वे दोनों बहुत कुछ मिलते हैं। शान्ति, चिन्ता, हँसी, रुदन, क्रोध, उत्तेजना, विरक्ति जैसी कितनी ही सम्वेदनाएँ ऐसी हैं जो मनुष्य के अतिरिक्त केवल बानरों में ही पाई जाती है उनमें पारस्परिक सहयोग, स्नेह, वात्सल्य जैसी प्रवृत्तियां भी अन्य जीवों की तुलना में कहीं अधिक विकसित और स्थिर हैं।
जीव विज्ञानी मनुष्य को पंक−प्रजनन कृमि−कीटक का विकास एवं बन्दर की औलाद मानते हैं। क्या उनका प्रतिपादन मिथ्या है? दुष्प्रवृत्तियों में उसका रुझान और उत्साह देखते हुए लगता है सम्भवतः यही ठीक है कि मूलतः मानव प्राणी नर−पशु मात्र है। अन्यथा विवेकवान और दूरदर्शी होते हुए भी ऐसी गतिविधियाँ क्यों अपनाता जो उसके स्वयं के लिए और समस्त समाज के लिए अहितकर ही सिद्ध होती हैं।
दर्शन शास्त्री मनुष्य को गिरा हुआ देवता मानते हैं। यह निरर्थक है? नहीं, यदि ऐसा न होता तो उसके अन्तःकरण में ऊंच उठने और श्रेष्ठ सिद्ध होने के लिए सत्कर्म करने की ललक क्यों पाई जाती? आदर्शवादिता की, उत्कृष्टता की उमंगों का उठना और भौतिक लोभ, लिप्सा को छोड़कर परमार्थ प्रयोजनों के लिए त्याग, बलिदान का साहस जुटाना, अकारण नहीं हो सकता। परोक्ष के लिए प्रत्यक्ष की हानि सहने की उमंगें उठना मानवी अन्तरात्मा की अपनी विशेषता है। यदि वह आदि काल में देव न रहा होता तो रह−रहकर वे दिव्य आकाँक्षाएँ उसे क्यों बेचैन किये रहती हैं? देवोपम जीवन जीने के लिए क्यों उसे कोई निरन्तर व्यथित करता रहता है?
फिर दोनों में से कौन गलत है। हम आदि में नर पशु थे या नर−नारायण? गहराई से विचार करने पर प्रतीत होता है कि शारीरिक दृष्टि से मनुष्य ने नीचे से ऊपर को प्रगति की है और आत्मिक दृष्टि से वह ऊपर से नीचे गिरा है। इन दिनों वह अधर में लटक रहा है। असमंजस के साथ वह एक चौराहे पर खड़ा है और सोचता है कि नर−बानर, नर−पशु, नर−कीटक बनने के लिए उसे वापिस लौटना चाहिए अथवा नर−देव बनने की दिशा में अपने चरण पीछे लौटाने चाहिए। आत्म−पक्ष कहता है—तुम देव थे देवत्व की ओर पीछे लौटो। देह−पक्ष कहता कृमि कीटकों का जीवन अधिक स्वच्छंद और निरापद है। उसी मूल उद्गम की ओर लौटकर चैन की वंशी बजानी चाहिए।
असमंजस छोड़कर किसी एक दिशा में चलने का निर्णय उसे करना ही पड़ेगा। आज की अनिर्णीत स्थिति में उसे चैन न मिल सकेगा।
गुलाब का पौधा किसी राजनीतिज्ञ के पास पहुँचा और पूछा—वर्चस्व प्राप्त करने का तरीका क्या है?
राजनीतिज्ञ ने बताया—भौतिकवादी बनो। यह साबित करो कि तुम उसे मजा चखा लौटता। इससे उसे घृणा ही मिली, वर्चस्व की छाया भी हाथ न लगी।
खिन्न मन गुलाब एक दिन किसी सन्त के पास पहुँचा और वही वर्चस्व प्राप्त करने का तरीका पूछने वाला प्रश्न दुहराया।
सन्त ने कहा—हँसो और हँसाओ। सौंदर्य बढ़ाओ और सुगन्ध फैलाओ।
गुलाब ने सुरभित फूल उगाये और उसका मनोरथ पूरा हो गया।
पड़ौस में उगे पौधों ने गुलाब से पूछा—बन्धु, तुमने वर्चस्व प्राप्त करने का रास्ता पा लिया हो तो हमें भी बताओ। राजनेता और सन्त के परामर्शों का निष्कर्ष सुनाओ।
गुलाब ने अपने स्वरूप और क्रिया−कलाप के पृष्ठ उलट कर उन्हें दिखाये और कहा—सही तो संत थे, पर
राजनीतिज्ञ को भी गलत कहना कठिन है
हम सम्पदाएँ कमाने में तल्लीन हों या विभूतियाँ उपार्जित करने के लिए तत्पर हों। इस ऊहापोह में गहराई तक उतरने के पश्चात् इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि आत्मिक विभूतियों की समृद्धि—भौतिक सम्पदाओं की तुलना में कहीं अधिक सुखद एवं श्रेयस्कर है।
धन, पद, बल, परिवार, वैभव, वर्चस्व, क्रियाकौशल आदि की सम्पदा गिना जाता है। इनके सहारे इन्द्रिय तृप्ति और तृष्णा एवं अहंता का पोषण होता है। विभूतियाँ उन आत्मिक गुणों को कहते हैं जो व्यक्तित्व को सुविकसित बनाने में सहायक होते हैं। सच्चरित्रता, सज्जनता, सहृदयता, कर्त्तव्य परायणता, श्रमशीलता, उदारता जैसे सद्गुणों को इसी श्रेणी में रखा जाता है, धनवान का बड़प्पन और गुणवान की महानता दोनों की तुलना में सामान्य बुद्धि भले ही सम्पत्ति को प्रधानता दे पर विवेकवान यही निर्णय करेंगे कि सद्गुणी की पूँजी—विभूति प्रत्येक दृष्टि से अधिक ऊँची और अधिक श्रेयस्कर है।
भौतिक उपलब्धियाँ तभी तक आकर्षक प्रतीत होती है, जब तक वे मिल नहीं जाती। मिलने पर तो उनके साथ जुड़े हुए झंझट और उन्माद इतने विषम होते हैं कि अन्ततः उनके कारण मनुष्य अधिक अशान्त उद्विग्न रहने लगता है। मित्र भी घात लगाते हैं और ईर्ष्यालुओं एवं अपहरणकारी प्रिय पात्रों का वेष बनाकर जुड़ते, चिपटते आते हैं। जोंक जिस तरह रक्त पीती है वैसे ही सम्पत्ति—लोभी मित्र भी भीतर ही भीतर शत्रुता का व्यवहार करते रहते हैं। वस्तु स्थिति को समझने वाला सम्पत्तिवान देखता है कि सम्पत्ति का निजी उपयोग उतना ही हो सका जितना कि निर्धन कर पाते है। जो अतिरिक्त जमा किया गया था उसमें मित्र वेशधारी शत्रुओं की−अगणित उलझनों की—तथा चरित्रगत दोष−दुर्गुणों की एक बड़ी फौज सामने लाकर खड़ी कर दी। सम्पत्ति अभिवर्धन के प्रयास अन्ततः निरर्थक ही सिद्ध होते हैं क्योंकि विभूतियों के अभाव में उनका सदुपयोग भी नहीं बन पड़ता। कृपणता उपयोग भी तो नहीं करने देती। संचय से उत्तराधिकारियों की दुरभिसंधियाँ बढ़ती चली जाती हैं। उच्छृंखल उपभोग अथवा उद्धत प्रदर्शन किया जाय तो भी उसकी प्रतिक्रिया कुछ ही समय में घातक विद्रोह साथ लेकर सामने आ खड़ी होती हैं।
जितना श्रम और मनोयोग सम्पदा के उपार्जन में लगाया जाय उतना ही ध्यान एवं प्रयास सद्गुणों के अभिवर्धन पर केन्द्रित किया जाय तो उस आत्म परिष्कार का लाभ असाधारण रूप से उपलब्ध होगा।
सद्गुण की सुगंध से अन्तःकरण निरन्तर सुरभित रहता है। सत्कर्मों में निरत रहने से आत्म सन्तोष का ऐसा आनन्द छाया रहता है जिसकी तुलना सम्पत्ति के उन्माद से किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। परिष्कृत स्वभाव के कारण अपने व्यवहार में जो शालीनता उत्पन्न होती है वह संपर्क में आने वालों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कार से निखरा हुआ व्यक्तित्व—इतना अधिक आकर्षक होता है कि उस पर सहज ही लोक श्रद्धा निछावर होती रहती है। सुविकसित पुष्प पर जिस प्रकार तितली और मधुमक्खियाँ मंडराती हैं उसी प्रकार दसों दिशाओं में सद्भावना की वर्षा परिष्कृत व्यक्तित्वों के ऊपर अनायास ही अहर्निश होती रहती है।
विभूतिवान को सम्पदाओं से वंचित नहीं रहना पड़ता। कदाचित वे न भी मिले तो भी उसकी आन्तरिक विशेषताएँ ही प्रसन्न चित्त रखने के लिए पर्याप्त होती हैं। इसके विपरीत जिन्हें विभूति रहित सम्पत्ति प्राप्त है वे भीतरी उद्वेगों और बाहरी आक्रमणों से निरन्तर संतृप्ति ही बने रहते हैं। सम्पदा का लाभ तभी है जब वह विभूतियों के साथ जुड़ी हुई हों।
परमात्मा साकार भी है और निराकार भी। साकार वह है जिसे हम चर्म चक्षुओं से देखते हैं और जो विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में सामने विद्यमान है। निराकार वह है जिसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है और जो श्रेष्ठ विचारों के रूप में हमारे मस्तिष्क में विराजता है और उत्कृष्ट भावनाएँ बनकर अन्तःकरण के रंग मंच पर क्रीड़ा कल्लोल करता है।
साकार परमेश्वर का दर्शन हम अपने संसार को देखकर कर सकते हैं। उसकी शोभा, सुषमा और कला, कोमलता देखकर पुलकित हो सकते हैं। उसमें जो श्रेष्ठता की ज्योति जलती हैं, उसमें ईश्वरीय, अनुभूति करते हुए आनन्द विभोर रह सकते हैं। विश्वात्मा का—परमात्मा का श्रेष्ठतम पूजन यही है कि अपनी सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियों की पूजा सामग्री को भावनापूर्वक समर्पित करते हुए इस संसार को अधिक सुन्दर और अधिक समुन्नत बनाने के लिए अनवरत प्रयत्न करें।
निराकार भगवान के समीप जाने और उसे निकट बुलाने का तरीका एक ही है कि अपने मस्तिष्क को आदर्शवादी विचारधारा से ओत−प्रोत रखें। निकृष्ट दुर्भावनाओं को इस देव मन्दिर में प्रवेश करने से रोके और जहाँ जब गन्दगी दिखाई पड़े तब उसे तुरन्त ही निकाल बाहर करने की तत्परता बरतें। कुविचारों को मस्तिष्क से बहिष्कृत कर देने का अर्थ है शैतान के चँगुल से अपने को छुड़ा लेना सद्विचारों में ही निमग्न रहने के अभ्यस्त मनः क्षेत्र को उत्कृष्ट कोटि का प्रभु मन्दिर कहा जा सकता है अपने सोचने की पद्धति को निकृष्टता के गर्त से निकाल कर उत्कृष्ट विचारणा में रसानुभूति करने वाली बना लिया जाय तो समझना चाहिए मन मन्दिर में देव प्रतिमा की स्थापना हो गई और निरन्तर प्रभु दर्शन का सौभाग्यशाली सुयोग बन गया।
मस्तिष्क को स्वर्गलोक और हृदय को ब्रह्मलोक कहा गया है। विधेयात्मक—सृजनात्मक और सदुद्देश्य पूर्ण विचारों को मन में समुचित स्थान मिलने लगे तो निरन्तर स्वर्गीय हर्षोल्लास से आत्म चेतना प्रफुल्ल और पुलकित रहेगी। हृदय में करुणा, उदारता, शालीनता, सेवा और आत्मीयता जैसे सद्भावनाएं भर दी जायँ तो अपना अन्तःकरण ही ब्रह्मलोक में निवास करने जैसी दिव्य अनुभूति का रसास्वादन करने लगेगा। इन दोनों क्षेत्रों में ही तो मनुष्य का व्यक्तित्व सीमाबद्ध है विचारणा की श्रेष्ठता और भावनाओं की उत्कृष्टता जिसने प्राप्त कर ली समझना चाहिए उसे मनुष्य शरीर रहते हुए भी देवयोनि में प्रवेश करने का सौभाग्य मिल गया। जीवन−लक्ष्य की पूर्ति और नर जन्म की सार्थकता इसी उपलब्धि के साथ जुड़ी हुई है।
ईश्वर के दर्शन इन्हीं चर्मचक्षुओं से करने हों तो इस विशाल विश्व को ईश्वर का रूप मानकर चलना चाहिए। गीता, प्रवचन के समय भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट् रूप दिखाया है। मिट्टी खाने के लिए प्रताड़ना सहते समय कृष्ण ने यशोदा को भी मुँह खोलकर अपना विराट् विश्व की झाँकी कराई थी। इसी प्रकार काकभुशुंडि के संदेह का निवारण राम का विराट् रूप देखने से ही हुआ था। वस्तुतः यह संसार की—भगवान का—वास्तविक प्रतिमा है। शिवलिंग का गोलपिण्ड और शालिग्राम की वैसी ही गोल प्रतिमा इसी तथ्य की ओर अंगुलि निर्देश करती है कि यह विश्व रूपी गोला—’ग्लोब’ ही दर्शनीय और पूजनीय प्रतीक विग्रह है।
साकार भगवान की मन्दिरों में स्थापित प्रतिमाएं इसी शाश्वत तथ्य का रहस्योद्घाटन करती है कि भगवान क्या है और उसका प्राप्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए। पूजा परिचर्या को अलंकारिक रूप से इसी पथ−प्रदर्शन के नलिए विनिर्मित किया गया है ईश्वर की विभिन्न दिव्यशक्ति य ही देवताएँ हैं। उनकी आत्म सत्ता में समाविष्ट करना यही देव पूजा का संकेत है। रेल की लाइनों पर खड़े सिगनल ड्राइवर को इशारा करते हैं कि उसे गाड़ी किस तरह चलानी चाहिए। देव प्रतिमाओं की अलंकारिक स्थापना जीवन नीति निर्धारण के लिए निर्देश करने वाले सिगनलों के रूप में ही हुई है। गणेश को दूरदर्शी विवेकशीलता का—सरस्वती को ज्ञान सम्पदा का−गायत्री को सद्भावना का—हनुमान को संयम का—दुर्गा को संघ बद्धता का—राम को अनुशासन का—कृष्ण को कर्म कौशल का—शिव का वैराग्य का—लक्ष्मी को अर्थ सन्तुलन का—प्रतीक माना गया है। यही बात अन्याय देवी−देवताओं के सम्बन्ध में है। वस्तुतः ऐसे चित्र−विचित्र आकृति−प्रकृति के विलक्षण आयुध वाहनों वाले प्राणधारी कहीं भी—किसी लोक में भी हैं नहीं। ये विशुद्ध कल्पनाएँ हैं। इन अलंकारिक प्रतीक विग्रहों की रचना उसी प्रकार हुई है जिस प्रकार छोटे बालकों को कबूतर का चित्र दिखाकर ‘क’—खरगोश से ‘ख’—गाय से ‘ग‘−घड़े से ‘घ’ का बोध कराया जाता। इस प्रतीक प्रतिकपाद से बालकों को साक्षरता का प्रयोजन पूरा करने में सुविधा पड़ती है यही बात अध्यात्म मार्ग के आरम्भिक विद्यार्थियों को बाल−कक्षा की पढ़ाई तरह अनेकों देवी−देवताओं की पूजा अर्चा सिखाई जाती है। वस्तुतः एक ईश्वर के अतिरिक्त इस संसार में इतने देवी−देवताओं का कोई अस्तित्व है नहीं। श्रुतियाँ सदा से इस रहस्य पर से पर्दा उठाता रही हैं उन्होंने पग−पग पर यही कहा है ब्रह्म एक है—उसी को विद्वानों ने अनेक नाम रूप देकर रुचि−विचित्रता की तृप्ति के लिए प्रस्तुत किया है।
हम देव गुणों को अपने भीतर धारण करें। यही सच्ची देव पूजा है। गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता को बिना संकोच ब्रह्मा, विष्णु, महेश की संज्ञा दी जा सकती है। पशु स्तर की आकाँक्षाओं को बदल कर यदि उन्हें देव स्तर की उच्च आस्थाओं में बदल लिया जाय तो समझना चाहिए ईश्वर की प्राप्ति हो गई। आत्म−कल्याण, आत्म−साक्षात्कार आदि आकर्षक और अद्भुत शब्दों को सरल अर्थ ढूँढ़ना हो तो आत्म−परिष्कार ‘शब्द में’ वह सब कुछ आ जाता है जिसे प्राप्त करना ‘जीवन लाभ’ के रूप में तत्व−दर्शियों ने गूढ़ धर्म ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। आत्मबोध, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण, आत्म−विस्तार के रूप में चतुर्विधि आत्म−साधना की जाती है और उसी के फलस्वरूप धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार अनुदान पाये जाते हैं। ब्रह्म−विद्या की—अध्यात्म दर्शन की कथन शैली कुछ भी क्यों न हो उसका सार तत्व इतना ही है कि मनुष्य अपने आपको चिन्तन एवं कर्म की दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि का निर्मित करने की दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करे। उसी को जीवन का प्रमुख प्रयोजन एवं सर्वोपरि लाभ समझें।
देव पूजा में कई तरह के उपचार प्रस्तुत किये जाते हैं। वे स्वल्प मूल्य के होते हैं। मात्र इतनी वस्तुओं से देवता का क्या काम चलेगा और उन्हें पाकर उसे क्यों प्रसन्न होने तथा वरदान देने की इच्छा उठेगी? यह विचारणीय है। कुछ बूंदें जल—तनिक सा नैवेद्य, थोड़े से अक्षत, पुष्प, चंदन, धूप−दीप आदि के नगण्य से उपहारों को पाकर देवता द्रवित हो जाय और मनमाने वरदान देने लगे यह बात तनिक भी गले नहीं उतरती और न बुद्धि संगत प्रतीत होती है। छुट−पुट कर्मकाण्डों से देव अनुग्रह पाने ही जो लम्बी−चौड़ी कल्पनाएँ की जाती हैं, उनमें प्रतीकात्मक संकेत ही खोजे जाने चाहिए और समझा जाना चाहिए कि यदि पूजा प्रयोजन के साथ जुड़े हुए नीति नियमों का अनुगमन किया गया तो उससे सच्चे अर्थों में आत्मिक प्रगति होगी और वे सब लाभ मिलेंगे जो भगवत् भक्तों को—सन्मार्ग गामियों को मिलते रहे है और मिलते रहेंगे।
देवता पर अक्षत इसलिए चढ़ाये जाते हैं कि हम अपनी कमाई का एक अंश देव प्रयोजन के लिए प्रदान करें। सारी उपलब्धियों को स्वयं ही न खाते पचाते रहें वरन् उसका एक अंश देव प्रयोजन के लिए भी निकालें। पाद्य, अर्ध, आचमन आदि के निमित्त प्रतिमाओं के सम्मुख जल की छोटी चमची भर अर्पित की जाती है। इसका अर्थ है देव प्रयोजनों के लिए अपने स्वेद बिन्दु अर्पित करने को आवश्यक अनुभव करना। अपना समय दान—श्रम दान—देकर ही संसार की सत्प्रवृत्तियों को अभिवर्धन किया जा सकता है; हमारी दिनचर्या में—जीवनचर्या में लोक−मंगल के इस प्रकार का अनुदान निरन्तर प्रस्तुत करते रहने का स्थान रहना चाहिए। यही है जल समर्पण की प्रक्रिया का सार तत्व।
दीपक जलाने का अर्थ है स्नेह सिक्त हृदय का निर्माण और जीवन सम्पदा की बीती को जलाते हुए असीमवर्ती क्षेत्र में आलोक उत्पन्न करना। चन्दन कुछेक महत्वपूर्ण सत्प्रवृत्तियों का प्रतीक है। सुगन्धित अस्तित्व, साँप, बिच्छू लिपटे रहने पर भी उनके विष से प्रभावित न होना—समीपवर्ती क्षेत्र में उगे हुए झाड़−झंखाड़ों को भी अपने स्तर का सुगंधमय बना देना—अपनी काया को घिसे जाने के लिए प्रस्तुत करके दूसरों के मस्तिष्क पर शीतलता की व्यवस्था करना—हवन आदि के लिए अपना चूरा और लकड़ियाँ जलने में जीवन की सार्थकता अनुभव करना—यही सब विशेषताएँ हैं कि जिनके कारण चन्दन के घिसाव को भगवान के मस्तक पर लगाये जाने का सौभाग्य मिला। पूजा में चन्दन का उपयोग इसीलिए होता है कि भक्त जन यह सीखें कि भगवान के मस्तक पर चढ़ने योग्य बनने के लिए किस प्रकार की रीति−नीति का अवलम्बन करना पड़ता है। यदि इस मर्म−शिक्षा को न समझा जाय और देवता को इन उपहारों से प्रभावित करके मनचाहे वरदान पाने की बात सोची जाय तो उस प्रकार का कभी कोई प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा केवल निराशा ही हाथ लगेगी। देवता को दीपक और चन्दन लगाकर भला क्या और क्यों खुशी हो सकती है? इन्हें इन वस्तुओं की आवश्यकता भी क्या है।
साकार भगवान का पूजन—लोक−मंगल के लिए किये गये आदर्शवादी क्रिया−कलापों द्वारा ही सम्भव हो सकता है। पीड़ित मानवता राहत पाने के लिए सहायता की पुकार करती मुरझाती हुई सत्प्रवृत्तियाँ सिंचन के लिए स्वेद बिन्दुओं की माँग करती हैं। पिछड़ेपन को सहारा देने के लिए सज्जनता का पोषण करने के लिए हर व्यक्ति अपनी बुद्धि, प्रतिभा, श्रम, समय एवं सम्पत्ति का एक अंश दे सकता है और विश्व मानव को सुविकसित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यही है साकार ईश्वर का पूजन। बड़े उद्देश्य की पूर्ति बड़े अनुदान प्रस्तुत कर सकने के साहस से ही सम्भव होती है। जिन्हें जीवन साधना रूपी सच्ची भगवत भक्ति करने वाले महा−मानव करते रहे हैं और हर दृष्टि से अपने को धन्य बनाते रहे हैं। पाषाण प्रतिमा पर रोली अक्षत चढ़ाने अथवा जप, पाठ करने जैसे सस्ते उपचार इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करा सकते।
निराकार भगवान की पूजा अपनी विचारणाओं और भावनाओं को परिष्कृत बनाने से ही सम्भव हो सकती है। अन्तःकरण से ही प्रभु मिलन के आनन्द में अनुभूति होती है। यह चेतन ब्रह्म सद्भावों के रूप में ही हमारे भीतर रमण करता है और प्रसन्न होकर देव स्तर का व्यक्तित्व बन सके ऐसा वरदान देता है। हमारी सार्थक और सारगर्भित साधना इसी स्तर की होनी चाहिए। प्रतीक पूजा करने में कुछ हर्ज नहीं—पर उसका लाभ उन्हीं को मिलेगा जो उसमें छिपे तत्वों को भी हृदयंगम कर सकें।
भिक्षु विनायक को वाचालता की लत पड़ गई थी। जोर−जोर से चिल्ला कर जनपद पर लोगों को जमा कर लेता और धर्म की लम्बी−चौड़ी बातें करता।
तथागत को समाचार मिला तो उन्होंने विनायक को बुलाया और स्नेह भरे शब्दों में पूछा—भिक्षु, यदि कोई ग्वाला सड़क पर निकलने वाली गायें गिनता रहे तो उनका मालिक बन जायगा। विनायक ने सहज भाव से कहा नहीं, भन्ते, ऐसा कैसे हो सकता है। गौओं के स्वामी ग्वाले को तो उनकी संभाल और सेवा में लगा रहना पड़ता है। तथागत गम्भीर हो गये। उनने कहा—तो तात! धर्म को जिह्वा से नहीं जीवन से व्यक्त और जनता की सेवा साधना में संलग्न रहकर उसे धर्म प्रेमी बनाओ।
रुचिर वस्तुओं और व्यक्तियों के सम्बन्ध में हमारा मन निरन्तर आतुर और उद्विग्न रहता है। तृप्ति के अवसरों के सम्बन्ध में न जाने कितनी मृदुल कल्पनाएँ मन में समुद्र की तरंगों की तरह उठती रहती हैं किन्तु जब उपभोग के क्षण सामने आते है तो वे सामान्य अन्य क्रियाकलापों से बढ़कर तनिक भी सुखद नहीं होते।
स्वादिष्ट भोजन की कल्पना जितनी मधुर होती है उतना रुचिर वह खाते समय नहीं लगता। फिर वे खाने के क्षण भी एक जैसे आनन्ददायक नहीं रहते। जब पेट खाली होता है और लिप्सा तीव्र होती है तो आहार आरंभ करते समय व्यंजन अधिक स्वादिष्ट लगते हैं किन्तु जैसे−जैसे पेट भरता जाता है वैसे−वैसे उनका आकर्षण घटता जाता है और अन्त में वह स्थिति आ जाती है कि परोसी हुई वस्तुएँ थाली में उपेक्षा पूर्वक छोड़कर चल देना पड़ता है। भोजन से पूर्व और भोजन के पश्चात् की मनः स्थिति में व्यंजनों के सम्बन्ध में कितना अधिक अन्तर होता है। जिह्वा की तरह ही अन्य इन्द्रियों का हाल है। नेत्रों को सुन्दर दीखने वाले दृश्य, नाटक, अभिनय, चित्र थोड़ी देर देख लेने पर अरुचिकर लगने लगते हैं। जल्दी ही एक दृश्य को छोड़कर आगे के दृश्य देखने के लिए मन चलता है। जिन्हें देखने की बहुत समय से लालसा थी वे कुछ ही क्षणों के उपरान्त अरुचिकर हो जाते हैं। यही बात कानों के सम्बन्ध में भी है। एक बार का सुना हुआ गाना दूसरी बार सुनने पर उतना आकर्षक नहीं रहता, बार−बार एक ही प्रवचन सुनने को मिले तो वह कितना ही सारगर्भित रहने पर भी अच्छा न लगेगा।
रतिक्रिया के सम्बन्ध में भी यह बात पूरी तरह लागू होती है। प्रेम जाल हाथ में लिये फिरने वाले मछुए जहाँ तहाँ मछली फँसाते देखे जाते हैं। तितलियाँ, भ्रमर और मधुमक्खियों का एक देश के एक फल से सन्तोष नहीं होता। एक के बाद दूसरे को टटोलने के लिये वे दूर−दूर तक उड़ानें भरती और चक्कर काटती देखी जाती हैं। संयोग की मधुर कल्पना तृप्ति के उपरान्त सर्वथा निरर्थक और अवास्तविक प्रतीत होती है। प्रेयसी का आकर्षण उसके पत्नी बन जाने के उपरान्त प्रायः चला ही जाता है। यह उतार−चढ़ाव यही बताते हैं कि मृदुल वह सब नहीं जो कहा, सुना और समझा जाता है।
मृदुलता की तलाश वस्तुओं में करना निरर्थक है। क्योंकि संसार का हर पदार्थ जड़ है। उसमें थाव संवेदना उत्पन्न करने की कोई क्षमता नहीं है। अपनेपन के आरोपण से—मान्यता का रंगीन चश्मा पहन लेने से जिस−तिस में आकर्षण दीखने लगता है; इस तथ्य को जो जानते हैं वे तृप्ति के लिये विविध वस्तुओं के पीछे नहीं भागते वरन् अपने दृष्टिकोण का ऐसा परिष्कार करते हैं कि सामने प्रस्तुत−सामान्य जीवन की हर वस्तु रुचिर आकर्षक और आनंददायक लगने लगें।
यह बात व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी है। गुणों और विशेषताओं में भरे विराने व्यक्तियों से हमारा कोई वास्ता नहीं रहता जबकि अपने कुरूप बेटे पर भी गहरी आसक्ति रहती है यह आकर्षण व्यक्तियों का नहीं वरन् आत्मीयता के आरोपण का है। यदि इस आत्मीयता को अधिक व्यापक क्षेत्र में बखेरा जा सके तो परिवार अधिकाधिक विस्तृत होता चला जायगा और अपने बेटों की तरह ईश्वर के सभी बेटे— अपने सहोदर भाई जैसे घनिष्ट दीखने लगेंगे।
आनन्द न तो व्यक्तियों में है और न वस्तुओं में—अपनी मनः स्थिति ही आनन्द और निरानन्द उत्पन्न करती है। यदि इसी केन्द्र को परिष्कृत कर लिया जाय तो सुखद व्यक्तियों और परिस्थितियों की खोज करते रहने और आशा−निराशा के झूलते रहने से छुट्टी मिल सकती है और जो सामने है उसी को सुधरे हुए दृष्टिकोण से देखने पर वह सरसता पाई जा सकती है जिसके लिए हमें निरन्तर आतुर रहना पड़ता है।
यन्त्र− मानवों का निर्माण बहुत दिन पहले से ही विज्ञान क्षेत्र में विकसित देशों द्वारा आरम्भ कर दिया गया था। अव उसमें काफी प्रगति हो चुकी है। साधारण मशीनें मनुष्य द्वारा चलाई और नियन्त्रित की जाती हैं। उनसे जो कराना हो उसका नियन्त्रण संचालन नियुक्त संचालक को स्वयं ही करना पड़ता है। मोटर, रेल, जहाज, रेडियो, टेलीफोन,कारखानों के संयंत्र छोटी−बड़ी अगणित मशीनें मनुष्य के लिए—उसकी इच्छानुसार निर्धारित कार्य करती हैं पर संचालन उसका किसी बुद्धिमान और प्रशिक्षित व्यक्ति को ही करना पड़ता है। स्वसंचालित—आटोमेटिक कही जाने वाली मशीनें भी चलाने, बन्द करने, तीव्र या मन्द गति से काम करने की क्रियाएँ तभी करती हैं जब संचालक अपने हाथ से निर्धारित बटन या चाबी को स्वयं दबाये घुमाये।
यन्त्र−मानव इन झंझटों से मुक्त है। उनमें रेडियो संचार पद्धति से काम करने वाले यन्त्र लगे होते है। अमुक वाक्य कह देने पर वे शब्द ध्वनि को पकड़ लेते हैं और निर्धारित शब्दावली के आधार पर निर्धारित कार्य करना आरंभ कर देते हैं। जितने शब्द समझने और जितने कार्य करने के उपयुक्त उन्हें बनाया गया है उन सबको वे ठीक प्रकार कर लेते हैं। आज्ञापालन में वे न तो हीलाहुज्जत करते है और न भूलचूक। स्वामिभक्त, आज्ञाकारी, अनुशासित और कर्मनिष्ठ सेवक के सभी गुण उनमें होते हैं। सबसे बड़ी बात है कि वे शक्ति प्रयोजन में खर्च होने वाली बिजली तथा टूट−फूट की मरम्मत के अतिरिक्त और किसी प्रकार का खर्च नहीं कराते। भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा, दवादारू,प्रजनन, मनोरंजन आदि की उनकी कोई माँग नहीं। वेतन, बोनस, पेन्शन−फण्ड आदि के लिए भी उनकी कोई आग्रह नहीं। मानापमान की उन्हें चिन्ता नहीं, मूड़ भी उनका कभी नहीं बिगड़ता। निद्रा थकान का भी कोई बहाना नहीं। मौत की तलवार भी उनके सिर पर नहीं टँगी रहती। कुशल मालिक उन्हें चिरकाल तक जीवित रख सकता है।
यंत्र−मानवों की आकृति मनुष्य जैसी बनाई गई है। हाथ, पैर आदि सभी कर्मेन्द्रियाँ उनमें मौजूद हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ उनके खोखले के भीतर रेडियो विज्ञान के आधार पर बनी मशीनों से बनाकर फिट कर दी गई हैं जो बाहर से दीखती नहीं। शक्ति शाली बैटरी भीतर रहती है आज्ञा सुनना और कार्य आरम्भ कर देना उनके लिए सरल स्वाभाविक रहता है। अभी ये यन्त्र भारी और महंगे हैं पर आशा की जाती है कि वे निकट भविष्य में सस्ते और हलके भी बनने लगेंगे।
अब से चालीस वर्ष पूर्व जर्मनी ने कृत्रिम मनुष्य बनाये थे। उनमें जटिल संरचना का मस्तिष्कीय संस्थान लगाया था जो निर्देशकर्त्ता के आदेशों की ग्रहण करता था और उस आधार पर शरीर के विभिन्न अवयवों को काम करने के लिए प्रवृत्त करता था। निर्देशक के मुख से निकले हुए शब्द उस कृत्रिम मनुष्य के मस्तिष्क में प्रवेश करके रेडियो धारी कम्पन उत्पन्न करते थे और उनकी हलचल स्वचालित प्रक्रिया के अनुसार अपना निर्धारित कार्य आरम्भ कर देते थे। वस्तुतः इनका निर्माण कम्प्यूटर प्रक्रिया के सिद्धान्त पर हुआ था। देखने दिखाने के लिए उनका बाहरी ढाँचा मनुष्य जैसा बना दिया गया था पर भीतर उनके सारी मशीन कम्प्यूटर जैसी थी। उस रेडियो धर्मी कलपुर्जों की भरमार थी। इनमें इतने अधिक कलपुर्जे थे कि उन्हें हलके और बारीक बनाने का पूरा पूरा ध्यान रखते हुए भी वजन डेढ़ टन का हो गया था यह मानव यन्त्र समस्त प्रकार की तो नहीं पर कुछ निर्धारित स्तर की क्रिया-प्रक्रियाएँ पूरी करता था। यह उच्चारण स्पष्ट है तो अपनी सीमा के अंतर्गत आने डडडड क्रिया-कलापों को अनुशासित रीति से पूरा करता था बर्लिन की वैज्ञानिक अनुसंधानशाला ने सन् 1931 में ऐसे दो कृत्रिम मनुष्य सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किये थे।
इसके बाद अमेरिका ने इस दिशा में अधिक प्रगति की। वहाँ ऐसे यान्त्रिक मनुष्य बनाये गये जो बिना निर्देश के केवल परिस्थिति उत्पन्न कर देने से तदनुकूल आचरण करने लगते थे। जैसे अमुक तापमान उत्पन्न कर देने पर कपड़े पहन लेना और अमुक तापमान पर उन्हें उतार देना। रात्रि होने पर सो जाना और सवेरा होते ही काम करने लगना। अमुक प्रकार के वस्त्रों वाले का स्वागत करना और अन्य वेषभूषा वालों को अपने पहरे की परिधि में न वुसने देना आदि।
इन यन्त्र−मानवों की संरचना में अधिक परिष्कृत प्रक्रिया काम में लाई गई थी अस्तु वे अपेक्षाकृत अधिक स्वसंचालित और स्वावलम्बी थे। उन पर सूझ−बूझ के कई उत्तरदायित्व सौंपे जा सकते थे और निर्धारित कार्य करते रहने के लिए बिना किसी बाहरी देखभाल के भी उपयुक्त माना जा सकता था।
इतना सब होते हुए भी मनुष्य की भौतिक विशेषता उनमें पैदा न की जा सकीं। वे यन्त्र−मानव भावनाशील नहीं हैं, और न उनमें अपनी निज की सूझ−बूझ थी। जिस निमित्त उन्हें बनाया गया था उतना ही कार्य वे कर पाते थे। वह सारा क्रिया−कलाप यान्त्रिक ही होता था।
यह प्रगति अपने ढंग से चल रही है। रूस ने गत दो दशाब्दियों में इस संदर्भ में और भी अधिक उल्लेखनीय प्रगति की है। कीव के सर्जन तथा ‘साइवेरनेटिकी’ विज्ञान धारा को विशेषज्ञ निकोलाई ऐमोसोव ने कृत्रिम मस्तिष्क की एक अतिरिक्त संरचना की है। उसमें कृत्रिम बुद्धि उत्पन्न की गई है और सम्वेदनाओं की अनुभूति भी जोड़ी गई है। जिस प्रकार प्रिय−अप्रिय की−लाभ−हानि की अनुभूति सुख और दुख के रूप में सामान्य मनुष्यों को होती है उसी आधार पर यह कृत्रिम मस्तिष्क भी अपनी अनुभूति व्यक्त करता है उस मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए अवयव अपनी प्रतिक्रिया उसी प्रकार व्यक्त करते हैं जैसे कि जीवन्त मनुष्य किया करते हैं। संयोग−वियोग की अभिव्यक्तियाँ वह मनुष्यों जैसी ही उत्पन्न करता है। भय, क्रोध, दुख, प्रसन्नता, उत्सुकता, अनुकरण, आत्म−रक्षा, सन्तोष, आशा; उत्साह, थकान, रूठना जैसे कुछ भावावेश भी उस कृत्रिम मस्तिष्क को आते हैं और उस कृत्रिम मानव की मुखाकृति भली प्रकार उस प्रकार के भाव प्रदर्शित करती है।
इस सफलता से यह आशा बँधती जाती है कि अमुक प्रयोजनों के लिए इन कृत्रिम मानवों का कृत्रिम मस्तिष्कों का उपयोग किया जा सकेगा। वे युद्ध में वीरता और कौशल का प्रदर्शन कर सकेंगे। लड़ाई के मोर्चे पर जीवित मनुष्यों को भेजने का जोखिम न उठाना पड़ेगा। वे−यन्त्र मानव ही घमासान लड़ाई लड़ लिया करेंगे और वैज्ञानिक कुशलता के आधार पर भयंकर युद्ध लड़े और जीते जा सकेंगे। अध्यापकों—डाक्टरों, इंजीनियरों मुनीमों, टाइपिस्टों, ड्राइवरों, मशीनें चलाने वालों आदि की विशिष्ट कार्य−पद्धति इन्हें भली प्रकार सिखाई जा सकेगी।
स्टेनफर्ड अनुसंधान संस्थान ने पिछले दिनों ऐसा यन्त्र मानव बनाया है जो मनुष्य जैसा सुन्दर तो नहीं है पर वे सभी काम कर सकता है जो अनुशासन प्रिय श्रमशील किन्तु मन्द बुद्धि व्यक्ति से कराये जा सकते हैं। इस यन्त्र मानव का नाम ‘शेकी’ रखा गया है, वह प्रसन्नता पूर्वक ठीक समय पर ठीक प्रकार उन सभी कामों को करके रख देता है जिन्हें करने की उसमें सामर्थ्य भरी गई है।
अनुसंधान संस्थान के निर्देशक चार्ल्स रोजेन का कहना है कि कारखानों में स्वसंचालित यन्त्रों को चलाने के शेकी के नव निर्मित भाई−बहिन सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक दक्ष−सफल और सस्ते सिद्ध होंगे।
यन्त्र मानव के निर्माण में दिलचस्पी इसलिए और भी अधिक बढ़ गई है कि सजीव मनुष्यों ने अपने मानवोचित गुणों एवं उत्तरदायित्वों को बुरी तरह गंवा दिया है और वे दिन−दिन अधिक उच्छृंखल, हरामखोर तथा अपराधी मनोवृत्ति के बनते जा रहे हैं। जितना काम करते हैं उससे अधिक षड़यन्त्र रचते हैं और दुरभिसंधियाँ खड़ी करते हैं। इसलिए उन पर खर्च किया जाने वाला पैसा एक प्रकार से बेकार ही चला जाता है। ईमानदारी और जिम्मेदारी से काम करने पर वे जितना सहज उत्पादन कर सकते हैं उसकी अपेक्षा पाँच गुनी लागत पड़ती है और वस्तुएँ दिन−दिन महंगी होती जाने से उसकी कठिनाई सर्वसाधारण के गले पड़ती है।
समाज शास्त्रियों को इन यन्त्र मानवों के निर्माण में इसलिये दिलचस्पी है कि हेय मनोवृत्तियों और निकृष्ट मनोवृत्तियों की ओर तेजी से बढ़ता चलने वाला मनुष्य स्वयं अगणित कष्ट सहता है और समाज में इतनी विकृतियों उत्पन्न करता है जिन्हें सम्भालने में उससे कहीं अधिक शक्ति खर्च होती है जितनी कि वह जीवन भर में उत्पन्न करता है। इस प्रकार हर नये मनुष्य का जन्म समाज के लिए एक नया सिर दर्द और नया संकट उत्पन्न करने वाला भार ही बनता है। ऐसी दशा में यदि कृत्रिम मनुष्यों से संसार के सामान्य कार्य चल सकते हैं तो फिर असली मनुष्यों की उपेक्षा क्यों न की जाय? दर्द करने वाले दाँत उखाड़ कर उनकी जगह नकली दाँत लगाने से भी तो लोग अधिक सुविधा अनुभव करते हैं।
जनसंख्या वृद्धि की विभीषिका भी सजीव मनुष्य ही करते हैं। अस्पताल, स्कूल, जेलखाने भी उन्हीं के लिए बनाने पड़ते हैं। यन्त्र मानव बनने लगें तो फिर यह झंझट भी समाप्त ही हो जायगा जितनी जनसंख्या की जरूरत होगी उतने ही कारखाने से बनकर आजाया करेंगे। जन्म के अगले दिन से ही वे जवानों जैसा काम करने लगेंगे, बचपन का लालन−पालन और बुढ़ापे का सेवा सहयोग भी उनके लिए आवश्यक नहीं होगा। मरने पर उन्हें जलाना, गाढ़ना भी नहीं पड़ेगा। जीर्ण होने पर उन धातुओं का गला कर फिर नये ढाल लेने का क्रम चलता रहेगा तो वे एक प्रकार से अजर−अमर भी कहे जा सकेंगे।
कृत्रिम मानव बनाने की कल्पना कितनी मधुर है। एक चक्रवर्ती शासक अपने कुछ साथी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और श्रमिकों को साथ रखकर समस्त संसार का मनमर्जी से संचालन करेगा। तब वह चक्रवर्ती शासक आज के ईश्वर जितना ही सर्व शक्ति मान होगा। उसी के इशारे पर दुनिया की गतिविधियाँ चलेंगी। जैसे ईश्वर के लोगों में कुछ देवी−देवता उनकी सहायता के लिए रहते हैं वैसे ही थोड़े से वैज्ञानिक, इंजीनियर, श्रमिक मिलकर इस धरती की सारी सत्ता सम्पदा अपनी मुट्ठी में रखे रह सकेंगे। यह सब बातें इतनी आकर्षक हैं कि यन्त्र मानवों के निर्माण का उत्साह दिन−दिन बढ़ता ही जा रहा है। जिस प्रयोजन में आज का बुद्धिमान मनुष्य हाथ डालेगा वह पूरा होकर ही रहेगा इसमें सन्देह भी क्या है? उसके हाथों प्रकृति के शक्ति स्त्रोतों की चाबी जो लग गई है।
सुदूर भविष्य में कभी इस धरती पर यन्त्र मानव ही कार्य कर रहे होंगे और उन्हीं का साम्राज्य होगा यह संभावना यद्यपि सामने प्रस्तुत है तो भी गले नहीं उतरती। विचारशील, भावनाशील और आदर्शवादी मनुष्य की चेतना से हो तो इस संसार में सौंदर्य,कला और सम्वेदनाओं को उत्पन्न करके इस जड़ जगत को सरस और मधुर बनाया है। यदि यह तत्व संसार से नष्ट हो गया तो फिर चाहे यंत्र मानव रहे अथवा आदिम काल के सरीसृप। यहाँ मरघट जैसी वीभत्स, नीरसता ही शेष रह जायगी। तब आत्मा को उल्लास प्रदान कर सकने वाला कोई तत्व यहाँ शेष न रहेगा।
वर्तमान स्तर के मनुष्य से खीजकर भौतिक विज्ञानी और समाज शास्त्री यन्त्र−मानव को महत्व दे रहे हैं और उसकी उपयोगिता बता रहे हैं। खीज मिटाने का क्या यही एकमात्र तरीका है कि प्रस्तुत नर−पशु के अस्तित्व का अन्त करके उसके स्थान पर यन्त्र मानव को प्रतिष्ठापित कर दिया जाय? यह विकल्प भी तो हो सकता है कि जितना धन, श्रम और मनोयोग उन यन्त्रों के निर्माण और संचालन में खर्च किया जाने वाला है उतना ही जीवित मनुष्य के चिन्तन में घुस पड़ी निकृष्टता को हटा में किया जाय। वातावरण और परिस्थितियों के प्रभाव मनुष्य ने निकृष्टता अपनाई है यदि साहस पूर्वक समाज का ढाँचा बदल देने के लिए कटिबद्ध हुआ जाय जो फिर भूतकाल की तरह भविष्य में भी इस धरती पर स्वर्ग वातावरण और नर−देवों का निवास सम्भव हो सकता है। निराशा और खीज के वातावरण में यन्त्र मात्र बनाने की झंझट भरी और अति दुस्तर प्रक्रिया अपनाने की अपेक्षा बुद्धिमानी इसमें है कि वर्तमान मनुष्यों को परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया जाय। इस प्रयत्न फलस्वरूप सजीव मानवों की जो फसल पैदा होगी यंत्र मानवों की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी
जन साधारण के साथ रहने को—उनके साथ मिलजुलकर चलने को प्रकृति यों ‘सामान्य’ स्तर की मानी जाती है और उसमें बड़प्पन का आभास नहीं होता। तो भी वह अपने लिए और दूसरों के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है। इसके विपरीत वह सम्पन्नता जो व्यक्ति विशेष को असाधारण सिद्ध करते हुए जन संपर्क से दूर रखती है—सौभाग्य का चिह्न समझी जाने पर भी वस्तुतः खोखली और नीरस ही होती है।
कितने ही व्यक्ति अपने अहंकार की पूर्ति के लिए सर्वसाधारण की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचे एवं भिन्न बनने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं और सोचते हैं इससे उनका मान−गौरव बढ़ेगा। विशिष्ट व्यक्ति समझा जायगा और लोग चकित होकर अपनी तुलना में कहीं अधिक ऊँचा उठा हुआ समझेंगे—तदनुरूप उस बड़प्पन का लोहा मानेंगे। यह मान्यता अत्यन्त भ्रामक है। सर्व साधारण की अपेक्षा अपनी आन्तरिक महानतम अधिक हो—गुण, कर्म, स्वभाव की उच्चस्तरीय विभूतियाँ जुड़ी हों, यह ठीक है पर बाह्य जीवन में सबसे मिलकर—सबके साथ रहकर ही आनन्द, उल्लास का उपयोग किया जा सकेगा। बड़प्पन की हविस में जो असाधारण बनने का उद्धत प्रयास करेगा वह अचम्भे—अजूबे जैसा भले ही प्रतीत हो वस्तुतः वह उपेक्षा एवं अवमानना का ही पात्र बनेगा।
क्या यह आकाँक्षा—मान्यता सही है? क्या बड़े और ऊँचे बनने की तृष्णा में जन साधारण का स्तर छोड़ देने से वह गौरवास्पद बनने का उद्देश्य पूरा हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर पृथ्वी के इर्द−गिर्द फैली हुई वायुमंडल की परतों की स्थिति पर विचार करने से सहज ही समझा जा सकता है।
पृथ्वी अपने चारों ओर हवा का बना एक ऐसा कवच धारण किये हुए है जिससे उसकी समृद्धि सुरक्षित बनी रहती है। यह कवच न होता तो आकाश में घूमने वाली उल्काओं के प्रहार से उसकी वैसी ही दुर्गति हुई होती जैसी चन्द्रमा की हुई है। चन्द्रमा पर हवा का आवरण नहीं है। इसलिए अन्तरिक्ष में उड़ने फिरने वाले उल्कापिण्ड उससे जा टकराते हैं और सैकड़ों मील लंबे−चौड़े गहरे भयंकर गर्त प्रस्तुत कर देते हैं। चन्द्रमा का तल ऐसे ही खड्डों से भरा ऊबड़ खाबड़ है। वायु रहित अनन्त शून्य अन्तरिक्ष से पृथ्वी की सत्ता को पृथक एवं सुरक्षित रखने का श्रेय इस वायु आवरण को ही है।
हमारे वायुमण्डल में कई प्रकार की गैसों का सम्मिश्रण है। 21 प्रतिशत आक्सीजन, 17 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1 प्रतिशत कार्बनडाइ−आक्साइड तथा थोड़ी−थोड़ी मात्रा में भाप, नियेन, हीलियम, क्रिप्टन, ऐनोन आदि गैसें हैं। यह संमिश्रण पृथ्वी की सतह पर सबसे अधिक होता है फिर ऊपर जितने चढ़ते जाँय उतनी ही हवा गैसों से रहित पतली होती जायेंगी। अधिक ऊँचाई पर हवा रहती तो है पर वह इतनी पतली होती है कि उसमें प्राणी जीवित नहीं रह सकते। दस हजार फुट ऊँचे पहाड़ों पर चढ़ते ही आक्सीजन की कमी अनुभव होने लगती है और साँस लेने में कठिनाई पड़ती है। बीस हजार फुट ऊँचे पर्वत शिखर पर तो बिना आक्सीजन की पेटी साथ लिए साँस ले सकना और जीवित रह सकना ही सम्भव न रहेगा।
पृथ्वी का वायुमण्डल कई परतों में बाँटा जा सकता है। पहली परत समुद्र तल से लेकर 8 मील (42 हजार फुट) ऊँचाई का है, पृथ्वी का मौसम इसी में विनिर्मित होता है। इसे ट्रोपोस्फियर कहते हैं।
इस पहली परत में जितनी अधिक सामर्थ्य और सम्पदा भरी पड़ी है ऊपर की परत में—उसकी तुलना में नगण्य जितना वैभव है, यद्यपि उनका क्षेत्र विस्तार अत्यधिक है। निचली परत में ही जीवधारी साँस लेते हैं, पेड़ पौधे जीवन प्राप्त करते हैं, वर्षा−बादलों की विशेषता उसी में है। महत्वपूर्ण गैस संपदा इसी क्षेत्र में है। रेडियो संचार दूर−दर्शन, विद्युत−प्रवाह एवं अन्यान्य अति महत्वपूर्ण अन्तरिक्षीय शक्तियों का बाहुल्य इसी में है। वह प्राणियों के साथ घुली रहने वाली यह परत की समृद्धि, सुन्दरता का अभिवर्धन करती है। हर दृष्टि से पृथ्वी के लिए उस पर निवास करने वालों के लिए यह निचली परत इतनी अधिक उपयोगी है कि अन्य तीनों मिलकर भी उतनी नहीं बैठती।
हवा की दूसरी परत 8 मील ऊँचाई से लेकर 60 मील ऊँचाई तक फैली हुई है। इसमें 12 से 21 मील की परिधि में ओजोन गैस की प्रचुर मात्रा है। पृथ्वी की निचली परत पर पाई जाने वाली आक्सीजन और सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के टकराव से ओजोन बनती है। यह ओजोन सूर्य के प्रचंड ताप को अपने में सोख लेती है और धरती पर उतनी ही मात्रा आने देती है जितनी कि आवश्यक है। यदि यह ओजोन आवरण हमारे इर्द गिर्द न होता तो सूर्य की सीधी किरणें धरती की समस्त जीवन सम्पदा को कब का भूनकर रख देती। यह गर्मी जब घटती−बढ़ती है तो उसका प्रभाव पृथ्वी के मौसम पर भी पड़ता है। स्ट्रेटोस्फीयर आवरण में नीचे और ऊपर के हिस्से में तापमान की दृष्टि से असाधारण अन्तर पाया जाता है। ओजोन परत की निचली तह शून्य से 67 डिग्री फारेनहाइट नीचे रहती है जबकि उसकी ऊपरी परत शून्य से 170 डिग्री फारेनहाइट ऊपर तक चली जाती है। इस परत में चलने वाली हवाएँ प्रायः 200 मील प्रति घण्टे की चाल से चलती हैं। कभी−कभी वे 50 मील नीचे के क्षेत्र में भी उतर आती हैं।
60 मील से लेकर 120 मील तक ऊपर का क्षेत्र आइनोस्फियर कहलाता है। इस आवरण में जब सूर्य किरणें प्रवेश करती हैं तो आक्सीजन तथा नाइट्रोजन के परमाणु उनके प्रहार से टूट−टूटकर बिखरने लगते हैं और विद्युत् शक्ति सम्पन्न अणुओं का रूप धारण कर लेते हैं। इन्हें ‘चार्ज्ड एटम अथवा मोलेक्यूल’ कहते हैं। यों यह प्रक्रिया 30 मील ऊँचाई से भी किसी कदर आरम्भ हो जाती है पर अन्त उसका 120 मील पर ही जाकर होता है। यह परत रेडियो सञ्चार की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। रेडियो ध्वनि तरंगें जब अनन्त आकाश में फैलती है तो यह ‘चार्ज्ड एटम्स’ ही उन्हें रोक देते हैं और डरा धमका कर वापिस लौटा देते हैं। यही कारण है कि हमारे रेडियो सन्देश पृथ्वी की निचली परत में घूमते रहते हैं और हम उन्हें सुन सकते हैं। यदि यह पहरेदार परत न होती तो हमारे प्रसारण अनन्त अन्तरिक्ष में खोजते और हम उन्हें पकड़ या सुन न सकते।
आइनोस्फियर परत के ऊपर भी यों कहने भर को हवा मौजूद है पर उसका कोई उपयोग नहीं। उसमें अणु−परमाणु भर यहाँ वहाँ उड़ते फिरते हैं। इसे एक्सोफीयर कहते हैं। अनन्त अन्तरिक्ष यहीं से आरम्भ होता है।
इन ऊपर की परतों के लिए हम उनके विस्तार के कारण कृतज्ञ नहीं है वरान् इसलिए हैं कि वे छतरी की छाया करके सूर्य की प्रचण्ड ऊर्जा से हमारी पृथ्वी को बचाती हैं और आक्रमणकारी उल्काअ को जलाकर भस्म कर देती हैं। रचनात्मक प्रत्यक्ष अनुदान न सही—संरक्षण एवं सुरक्षात्मक सही—कुछ तो उपकार वे ऊपरी परतें करती ही हैं। उस सीमा तक भूतल के निवासियों को उनका भी आभारी रहना पड़ता है। यदि यह दो विशेषताएँ भी न होती तो उन अत्यधिक ठण्डे अत्यधिक गरम और सांस लेने में अयोग्य सुविस्तृत क्षेत्र की ओर अपना ध्यान भी नहीं जाता और उनकी चर्चा करने की भी किसी को फुरसत न होती भले ही वे परतें अपनी ऊँचाई, क्षेत्र विस्तृत पर गर्व करतीं हुई अपने घर में दबी बैठी रहतीं।
जन−जीवन से दूर रहने वाले—अपने को असाधारणता के वैभव से सुसज्जित करने वाले कौतुक कौतूहल के पात्र चमत्कारी समझे जा सकते हैं पर उन्हें लोकश्रद्धा से सदा वंचित ही रहना पड़ता इसके बिना इनका बड़प्पन निताँत निरर्थक एवं भारभूत बनकर ही रह जाता है। हवा की निचली परत की तर हम लोकोपयोगी जीवन जियें— जन–संपर्क एवं जनसेवा की नीति अपनायें तो हम सम्मानास्पद भी हो सकते हैं और महामानव भी। खजूर की तर निरुपयोगी ऊँचाई किस काम की—हवा की ऊंची परतें सेवा और सहयोग के आधार पर मिल सकने वाले गौरव को कहाँ प्राप्त कर पाती है।
सूर्यास्त के बाद —अन्धकार घना होता जा रहा था। अरब की मरुभूमि में रातें भी बड़ी भयावह लगा करती हैं। ऐसे ही रेतीले सुनसान स्थान पर यात्री को एक झोंपड़ी दिखाई दी। जिसमें कोई व्यक्ति गीत गा रहा था। यात्री एक क्षण को रुका और गीत के बोल सुनने लगा।
यात्री को झोंपड़ी में रहने वाले वृद्ध पुरुष की आकृति जानी-पहचानी लगी। स्मृतियाँ उघड़ती गयीं और उसे याद आया कि इस व्यक्ति से उनका निकटतम सम्बन्ध रह चुका है। झोंपड़ी में रहने वाला वृद्ध व्यक्ति युसुफ के नाम से जाना जाता था। यात्री ने युसुफ से कहा—मैं समाज द्वारा बहिष्कृत एक पापी हूँ। सभी ने मुझे अषम कहकर मेरा परित्याग कर दिया। राज कर्मचारी मुझे पकड़ कर दण्डित करने के लिए मेरा पीछा कर रहें है। आज की रात आपके घर में गुजारने का मौका मिल जाय तो बड़ी दया होगी। युसूफ आप तो अपनी दया के लिये संसार भर में प्रसिद्ध है।
युसूफ ने बड़ी विनम्रता पूर्वक कहा—भद्र पुरुष यह घर मेरा नहीं उस परमात्मा का ही है। इसमें तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना कि मेरा। मैं तो इस देह का भी स्वामी नहीं हूँ, यह भी एक धर्मशाला है। तुम प्रसन्नता पूर्वक जी चाहे जब तक यहाँ रहो।’
वह अन्दर खाना लाने के लिए चला गया। अभ्यागत को भरपेट भोजन करवा कर सोने के लिए बिस्तर लगा दिया और बिना परिचय पूछे ही सो जाने के लिए कहा।
प्रातःकाल हुआ। पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी और पक्षियों का कलरव गूँजने लगा। युसुफ उठ गये थे और नहा-धोकर अतिथि के जागने का इन्तजार कर करे रहे थे। उधर अतिथि कई दिनों का हारा थका होने के कारण चैन की नींदें ले रहा था। युसुफ अतिथि के पास गये और धीरे से जगा कर बोले—”उठो भाई—सूरज उग आया है। तुम्हारी सुविधा के लिये मैं थोड़ा-बहुत डडडड लाया हूँ उसे लेकर मेरे द्रुतगामी घोड़े पर सवार होकर दूर चले जाना ताकि तुम अपने शत्रुओं की पहुँच से बाहर निकल सको।”
इस सत्पुरुष के मुखमण्डल पर हार्दिक पवित्रता ‘शीतल’ रजनी चन्द्रिका की भाँति फैली हुई थी। उनके शब्द जैसे अन्तःकरण से निकल कर आ रहें थे तभी तो उनका व्यवहार इतना दिव्य बन पड़ा था। इस दिव्य व्यवहार के प्रभाव स्वरूप की आगन्तुक के हृदय में भी पवित्र और सात्विक विचारों का प्रवाह बहने लगा था। अतिथि को अपना पूरा विगत स्मृत हो आया और लगा कि पाप पूर्ण प्रवृत्तियों की कालिमा पश्चाताप के रसायन से स्वच्छ होती जा रही हैं और उनके स्थान पर निर्मल भावों की तरंगें उठने लगी हैं।
पृथ्वी पर घुटने टेक युसुफ के चरणों में झुक कर अतिथि ने कहा—’हे शेख! आपने मुझे शरण दी, भोजन दिया, शान्ति दी और पवित्रता भी दी अब आपके प्रति कृतज्ञता के लिये क्या कहूँ?”
‘मैं कैसे कहूँ कि यह उपकार पापी इब्राहिम के लिए किया है जो आपके बड़े पुत्र का हत्यारा है। हमारे कबीलों में हत्यारे का शिरच्छेद कर ही मृतात्माओं शाँति पहुँचायी जाती है, आप भी उसी परम्परा का पालन कीजिए।’
इब्राहिम यह कहकर मौन हो गया। परन्तु युसुफ ने तो उसे भगाने में और भी जल्दी की क्योंकि वे डरने लगे थे—अपने आप से कि कहीं अपने पुत्र के हत्यारे का वध करने के लिए पाशविक प्रतिशोध न जाग पड़े।” वे बोले-तब तो तुम और भी जल्दी चले जाओ। कहीं मैं प्रतिशोध के कारण कर्त्तव्य भ्रष्ट न हो जाऊँ।
इब्राहिम चला गया और युसुफ ने अपने दिवंगत पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहा—मैं तेरे लिये दिन-रात तड़पता रहा हूँ। आज मैंने तेरा बदला ले लिया है। तेरे हत्यारे की नृशंसभावना पश्चात्ताप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गयी हैं और उसका हृदय पवित्र हो गया है। अब तू शान्ति की चिरनिद्रा में सो जा।
पाप का आकर्षक सर्प की तरह सुहावना लगता है मनुष्य उसे लाभ और सुख की आशा से पकड़ने का प्रयत्न करता है और आरम्भ में उस पकड़ की सफलता पर प्रसन्न भी होता है पर कुछ ही समय में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फाँसी का फन्दा गले में बाँध लेने की तरह कितना दुखद और कितना विषम था।
चूहा सरलता पूर्वक रोटी का, मिठाई का टुकड़ा पाने के लालच से पिंजड़े के छेद में प्रवेश करता है, इस सफलता को वह अपनी बुद्धिमत्ता और सौभाग्य भरी उपलब्धि मानता है। मिठाई में दाँत लगाते समय तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं रहता। दूसरे चूहे जबकि एक-एक दाना बीनते जहाँ-जहाँ भटकते हैं तब उसने सहज ही इतनी सारी मिठाई खाने का अवसर प्राप्त कर लिया-क्या यह कम आनन्द की बात है? चूहा इस सौमान्य कल्पना में अधिक देर नहीं उड़ पाता। कठोर वास्तविकता कुछ ही क्षणों में सामने आ खड़ी होती है। खटका गिरता है और उस कैद में जकड़ जाता है जिसका अन्त मृत्यु के साथ ही सम्भव होता है। तब उसे समझ आती है कि यह आकर्षण भरा प्रलोभन बहुत महंगा पड़ा। अच्छा होता वह एक-एक दाना बीनकर—भारी दौड़धूप करके—पेट भरने को सन्तोषजनक मान लेता।
दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों का स्वरूप और आकर्षण कुछ ऐसा ही है जिसे देखकर अदूरदर्शी उन पर बेतरह टूट पड़ने हैं। आगा-पीछा सोचने लायक विवेक भी हाथ में नहीं रहता। अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में—अधिक सुख पाने की लिप्सा उस सूक्ष्म चिंतन क अपहरण कर लेती है जिससे यथार्थता क —प्रतिक्रिया को समझना सम्भव होता है। कुकर्मी क आरम्भ में अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व होता है। अपने उस साहस की आप ही प्रशंसा करता है जिसे दूसरे लोग कर नहीं पाये और अधिक सुखोपभोग करने से वंचित रह गये। किन्तु उसकी यह मान्यता देर तक स्थिर नहीं रहती। कुछ ही समय में पता चलता है कि जो कमाया गया उससे हजारों गुना अधिक गँधा दिया गया।
कुकर्मी को अपना शील, सदाचार गँवाना पड़ता है। इसके साथ ही उसकी आन्तरिक गरिमा नष्ट हो जाती है। जिन आस्थाओं के कारण मनुष्य अपनी आँखों में सम्मानित होता है और दूसरों की आँखें उसे श्रेष्ठ सत् पुरुषों में गिनती है उन्हें गँवा देने के बाद आदमी एक ओछा और घिनौना प्राणी भर रह जाता है। इन्द्रिय सुख और अहंकार का पोषण एक सीमा तक कर लेने पर भी उसे निरन्तर यह लगता रहता है कि कोई ऐसी चीज हाथ से चली गई जो आत्मिक आनन्द एवं सन्तोष की दृष्टि से नितान्त आवश्यक थी। अपनी आँख में गिरने वाला व्यक्ति अन्य किसी की दृष्टि में सम्मानास्पद और प्रामाणिक नहीं हो सकता।
प्रकृति का सारा कार्य व्यवस्थाओं और मर्यादाओं के आधार पर चल रहा है। इनका व्यतिक्रम सृष्टिकर्ता को सहन नहीं। उद्दण्ड उच्छृंखल को पनपने का अवसर मिले तो संसार की सारी व्यवस्था लड़खड़ा जायगी और अनैतिकता की अराजकता से वे समस्त आधार नष्ट हो जायेंगे जिनके सहारे मनुष्य जाति ने प्रगति की इतनी लम्बी मंजिल पार की है। सृजेता उन्हीं उद्दण्ड तत्वों को निर्दयता पूर्वक उखाड़ फेंकता है जो सृष्टि के सरल स्वाभाविक क्रम में व्यवधान उत्पन्न करने का दुस्साहस करने पर अड़े हुए हैं।
राजदण्ड, सामाजिक असहयोग और तिरस्कार के अतिरिक्त आत्मदण्ड भी कम भयंकर नहीं हैं। इन तीन को करारी चोटें कुकर्मी पर ऐसी आघात करती हैं जिन्हें तिलमिलाने वाली पीड़ा के बिना सहन नहीं किया जा सकता। आत्म-प्रताड़ना के विक्षोभ तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में सामने आते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टताएं भर जाने से व्यक्ति प्रेत−पिशाचों की जैसी उद्विग्नता की आग में निरन्तर जलता, झुलसता रहता। वह शान्ति प्रफुल्लता उसे क्षण भर के लिए भी नहीं मलती जिसे मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धि माना जाता है।
मक्खी शीरे की गन्ध, रूप और स्वाद की कल्पना में इतनी विभोर हो जाती है कि उसे धैर्य और क्रम का ध्यान नहीं रहता। बेतहाशा टूट कर गिरती है और सोचती है कि जितना अधिक शीरा—जितनी अधिक मात्रा में खाया जा सके उसे उतना खा लेने का अवसर न चूका जाय। इस उतावली भरी मूर्खता में वह शीरे के भीतर धँस जाती है उसके पंख और पैर चिपक जाते हैं। जिस लिप्सा ने उसे अधीर बनाया वही उसके लिए प्राणघातक संकट भी प्रस्तुत खड़ा करती है। मूर्ख मक्खी को इतना बोध रहा होता कि सस्ते सुखोपभोग की आतुरता अन्ततः प्राणों को संकट में डालने वाली विपत्ति उत्पन्न कर सकती है तो शायद वह सोच−समझकर ही कदम बढ़ाती।
पाप कर्मों में अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में सरलता पूर्वक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने का आतुर आकर्षण ही प्रधान रहता है। यही प्रलोभन मनुष्य को नीति विरुद्ध कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। जन−साधारण का हृदय जीवन के लिए श्रेष्ठ सम्मानास्पद कार्य करने की और उत्कृष्ट जीवनयापन की आवश्यकता पड़ती है इसके लिए अपने को ढालना और सुधारना पड़ता है तब कहीं यह सम्भव होता है कि दूसरों का श्रद्धा सिक्त सम्मान प्राप्त करके अपने अन्तःकरण का भूख बुझाई जाय। आतुर व्यक्ति इस सरल मार्ग को छोड़कर आतंकवादी रीति−नीति अपनाते हैं और दूसरों को अपनी विघातक उद्दण्डता से भयभीत करके उन पर छा जाना चाहते हैं। इस तरह उन्हें बड़प्पन की एक उथली सी झलक मिलती तो है पर उससे चिरस्थायी प्रयोजन तनिक भी पूरा नहीं होता।
उद्दण्ड उच्छृंखलता अपनाकर कई आतंकवादी यह सोचते हैं कि उन्होंने दूसरों को अपना लोहा मानने के लिए घिघियाने, गिड़गिड़ाने के लिए बाध्य कर दिया और डरा दिया। इस सफलता पर गर्व करने या प्रसन्न होने की जरूरत नहीं है। ऐसा तो विषैले कृमि−कीटक और हिंस्र पशु भी कर सकते है। आतंकित व्यक्ति चुप रहे, डर जाय, विरोध न करे यह हो सकता है पर उसके अन्तर में भरी हुई घोर घृणा को नहीं रोका जो सकता। जन-मानस से निकलने वाला यह घृणा भरा अभिशाप उस घिनौने व्यक्ति पर अगणित विपत्तियाँ बनकर बरसता है और कठिन समय में उसका कोई साथी सहायक शेष नहीं रहता। लाभ की आशा से जो मित्र बने थे और आतंक के भय से जिन्होंने हाँ में हाँ मिलाई थी वे दोनों ही वर्ग अवसर आते ही आतंकवादी के कुकृत्यों पर अपना रोष व्यक्त करते हैं और उसे नीचा दिखाने के लिए जो कुछ करे सकते हैं, कर गुजरते हैं। आतंकवादियों की सत्ता क्षीण होते ही उनके साथी संबंधी ही शत्रु बन जाते है। असल में दुष्ट का कोई मित्र होता ही नहीं। भीतर से घृणा भरे अन्त करणों का परिकर कभी भी किसी का सच्चा सहायक नहीं हो सकता।
जो उचित परिश्रम करके न्यायोचित मार्ग से कमाया गया है उसका परिणाम सुखद हो सकता है। अनीति का ओत-प्रोत होता है। ऐसी कमाई बीमारी, चोरी तथा फिजूलखर्ची में नष्ट होती है। व्यसन, व्यभिचार और कुकर्म अनाचार ही अनीति उपार्जित सम्पदा से बन पड़ते हैं। इससे पाप का भार और दूना चौगुना बढ़ता है। हराम की कमाई खाकर कभी कोई फला-फला नहीं है। जिनने पाप की पूँजी संग्रह करके अपनी औलाद के लिए छोड़ी उनमें से अधिकांश को वह विष भोजन बहुत भारी और बहुत महंगा पड़ा है। किसी भी प्रकार कमा कर-कितना ही अधिक घन सन्तान को छोड़ने वाले लोग इस उद्देश्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते कि उसे खाकर उसके उत्तराधिकारी सुख पूर्वक रह सकेंगे।
कुकर्मी समाज में एक भ्रष्ट परम्परा उत्पन्न करता है। उसकी देखा−देखी अन्य नासमझ लोग उसी, मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। पाप का आकर्षण छूत के रोग की तरह एक से दूसरे को लगता है और महामारी का रूप धारण करता है। एक चिनगारी अवसर पाकर दावानल का भयानक रूप धारण कर लेती है। एक की पाप प्रवृत्ति अनेकों को अपना अनुगामी बनाकर संसार का इतना अनर्थ उत्पन्न करती है जिसकी भयंकरता को कुकर्मी व्यक्ति कदाचित ही कभी समझ पाता है।
जापान की जनश्रुतियों में सत्रहवीं सदी के महाप्रेत सोगोरो की कथा एक ऐतिहासिक तथ्य की तरह सम्मिलित हो गई है और अनाचार बरतने वालों को अक्सर वह घटना−क्रम इसलिए सुनाया जाता रहता है कि वे अनीति से बाज आये।
जापान उन दिनों सामन्ती जागीरों में बटा हुआ था। राजधानी तो यदो नगरी थी पर जागीरदार अपने−अपने छोटे ठिकानों से राज−काज चलाते थे। ऐसा ही एक ठिकाना था शिरोसा प्राप्त का साकूरागढ़। इसका एक सामन्त था—कोत्सुके। उसने प्रजा पर अत्यधिक कर लगाये और किसानों पर इतने ्रजुल्म ढाये कि वे त्राहि−त्राहि कर उठे। अन्ततः 136 गाँवों के किसानों ने मिल कर अपना दुखड़ा जागीरदार के कानों तक पहुँचने का निश्चय किया। वे सोचते थे शायद छोटे कर्मचारी उन्हें सताते हैं। सामन्त को बात मालूम पड़ेगी तो वह उनकी पुकार सुनेगा। इस विचार से वे उनके प्रतिनिधि साकूरा चल पड़े। उनका जत्येदार था 48 वर्षीय सोगोरो। उन लोगों ने लम्बी अर्जी लिखी। और प्रयत्न किया कि उसे जागीरदार को दें। अधिकारियों ने उन्हें भेंट करने की इजाजत नहीं दी। और को पढ़कर वापिस लौटा दिया। इतने पर भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी और जब सामन्त अपने गढ़ में प्रवेश का रहा था तो उसकी बग्घी रोक कर अर्जी हाथ में थमा ही दी। वहाँ भी उसे रद्द कर दिया गया। अन्य किसानों को तो वापिस लौटा दिया गया पर सोगोरों एक सराय में ठहरा ही रहा और उसने जापान सम्राट् तक किसानों की दुखगाथा पहुँचाने का निश्चय किया। संयोग वश सम्राट् अपने पूर्वजों की समाधि पर पूजा करने के लिए वहाँ आने वाले थे। कृषक मुखिया ने यह अच्छा अवसर समझा और उस अर्जी की नकल सम्राट् का भी रास्ता रोक का उनके हाथ में थमा दी।
परिणाम तो कुछ नहीं निकला पर सामन्त ने सोगोरो को गिरफ्तार करा लिया। उन पर शासकों के विरुद्ध धृष्टता बरतने और षड़यन्त्र करने का मुकदमा चलाया गया। दण् में केवल उसे वरन् उसके सारे परिवार को कत्ल कर देने का आदेश सुनाया गया। जन−समूह की उपस्थिति में 48 वर्षीय सोगोरो उसकी 38 वर्षीय पत्नी मिन, 13 वर्षीय पुत्र जेन्नोसूके, 10 वर्षीय पुत्र सोहैयी, 7 वर्षीय पुत्र किहावी का सिर धड़ से उड़ा दिया गया। दर्शक कलेजा थाम कर इस कुकृत्य को देखते रह गये।
लाशें दफना दी गई पर वातावरण में न जाने कैसा भयंकर उभार आया कि सर्वत्र एक आग और घुटने अनुभव की जाने लगी। शासकों को विचित्र भयानकता ने घेर लिया। तीसरे ही दिन सुधार घोषणाएँ हुई। किसानों पर अत्याचार की जाँच आरम्भ हुई। और साकूरागढ़ के समस्त सलाहकार, चार जिलों के शासनाध्यक्ष, बाईस अफसर,सात न्यायाधीश तीन लेखा परीक्षक बर्खास्त कर दिये और किसानों पर से समस्त बढ़े हुए कर तथा लगे हुए प्रतिबन्ध उठा लिये गये।
ऐसा विचित्र परिवर्तन कैसे हुआ? सामन्त यकायक कैसे बदल गया? यह सब आश्चर्य का विषय था पर जानने वाले कहते थे सोगोरो का प्रेत इस बुरी तरह राज्य परिवार के पीछे पड़ा है कि अब उन्हें किसी प्रकार अपनी खैर दिखाई नहीं पड़ती। सामन्त कोत्सुके नोसूके और उसकी पत्नी सोते जागते भयंकर प्रेत छाया को अपने चारों ओर अट्टहास करते हुए देखते और अनुभव करते उन्हें अब तो मृत्यु का ग्रास बनाना ही पड़ेगा। नंगी तलवार पहरा बिठाया गया, ओझा—तान्त्रिक बुलाये गये पर पड़ी और चारपाई पर से उसकी लाश ही उठी। वह स्वयं विक्षिप्त सा रहने लगा। एक अवसर पर राजधानी याहीशी में सभी सामन्त सम्राट् को वार्षिक भेंट देने के लिए उपस्थित हुए थे। इनमें से साकेयी के साथ कोत्सुके की झड़प हो गई उसने आव गिना न ताव झट तलवार चला दी और उसकी हत्या कर दी। इसके बाद वह जान बचा कर भागा और अपनी गढ़ी में आ छिपा। सम्राट् ने पाँच हजार सैनिक भेजकर उसकी गढ़ी पर कब्जा कर लिया बुलाया। जहाँ उसका शिर उसी तरह उड़ाया गया जैसा कि सोगोरो का उड़ाया गया था।
अनीति पूर्वक सताने वालों को इस घटनाक्रम को सुनाकर यह शिक्षा दी जाती है कि दुर्बल को सताने वाला यह न समझे कि वह सर्व समर्थ है। अन्याय के प्रति विद्रोह की आग इतनी प्रचण्ड होती है और अत्याचारी को उसके कुकृत्य का मजा चखा सकती है।
बर्लिन के समाप पोट्स डाम राजमहल के दीवानखाने की दीवार पर लगी एक बहुमूल्य घड़ी को एक आदमी उतारने की कोशिश कर रहा था। पर सीढ़ी के पैर बार−बार फिसल जाते थे इसलिए उतारने वाला अपने प्रयास में सफल नहीं हो पा रहा था।
इसी बीच भोर हो गई। सम्राट् फ्रेडरिक जगे और उस असफल प्रयास को कुछ देर तो देखते रहे पीछे उस उतारने वाले के पास गये और पूछने लगे—तुम कौन हो और यह सब क्या कर रहे हो?
उतारने वाले ने साहस और धैर्य पूर्वक कहा—मैं शाही घड़ी साज हूँ। मरम्मत के लिए यह घड़ी उतारनी है पर सीढ़ी के पैर जम ही नहीं पाते।
फ्रेडरिक ने स्वयं सीढ़ी पकड़ ली और उस व्यक्ति को घड़ी उतारने में सहायता की। उसने घड़ी उतारी बगल में दावी और चलता बना।
दूसरे दिन पुलिस को रिपोर्ट पहुंची कि दीवानखाने की कीमती घड़ी कोई चोर चुरा ले गया। सम्राट् को चोर के साहस और धैर्य पर आश्चर्य सिश्रित प्रसन्नता हुई। रिपोर्ट के एक कोने पर फ्रेडरिक ने नोट लगाया। वह चोर सम्राट की सहायता से अपना मन चाहा उपहार पाने में सफल हुआ।
पाप और अनाचार के चोर हमारी बहुमूल्य संपदाओं को अक्सर चुराते हैं। उस चोरी में फ्रेडरिक की तरह हम स्वयं ही सहायता कर रहे होते हैं।
प्रकृति ने कुछ कायदे कानून ऐसे बनाये हैं जो सृष्टि सन्तुलन की दृष्टि से नितान्त आवश्यक हैं। इन नियमों को न केवल मनुष्यों के लिए वरन् अन्य प्राणियों के लिए भी बनाया गया है। यहाँ तक कि वनस्पतियों के लिए भी।
मनुष्यों में बुद्धि, धन, बल, प्रतिमा, भावना आदि की सम्पदाएँ ऐसी हैं जिन्हें उसके व्यक्तित्व का बीज कहा जा सकता है। इसी के आधार पर हम ऊँचे उठते और आगे बढ़ते हैं। बीज सड़ा−गला हो तो उससे वंश वृद्धि न हो सकेगी। गुण,कर्म, स्वभाव की विभूतियाँ यदि स्वस्थ और समर्थ न हो तो कोई व्यक्ति प्रगति के पथ पर दूर तक अग्रसर न हो सकेगा। ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि हमारी विभिन्न शारीरिक और मानसिक हलचलें इन बीज तत्वों को विकसित, परिष्कृत और पुष्ट करने के लिए ही होती है। भौतिक और आत्मिक सम्पदाओं से अधिकाधिक मात्रा में सम्पन्न होने की अभिलाषा स्वाभाविक मानी जाती है—वह बनी रहती है—और उनके लिए जाने−अनजाने प्रयास चलते ही रहते हैं।
वनस्पति−जगत में भी यही प्रक्रिया अपने ढंग से उसी तरह चलती रहती है जिस तरह मनुष्यों में चलती है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य आत्म विस्तार है। हम बढ़े विकसित हों और सुदूर क्षेत्र तक फैले इसके लिए भाँति−भाँति के प्रयत्न पुरुषार्थ किये जाते हैं यहाँ तक कि युद्ध भी। आध्यात्मिक क्षेत्र में यही विस्तारवाद आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ाकर सबसे अपने को अपने में सबको देखने वाला तत्व दर्शन हृदयंगम किया जाता है। बीज तत्व का विकास और सत्ता का विस्तार करने के लिए हम मनुष्यों के विभिन्न क्रिया−कलापों को सँजोया जाना देखते है। यदि यह दो प्रवृत्तियोँ न होती तो कदाचित पेट और प्रजनन जैसी निकृष्ट स्तर के जीवों में पाई जाने वाली तुच्छ हलचलों के अतिरिक्त हम और कुछ महत्वपूर्ण सोचने या करने में समर्थ ही न हो पाते। ठीक यही बात वनस्पति−जगत पर भी लागू होती है।
पौधे बढ़ते और विकसित होते है। अन्ततः उनकी प्रौढ़ता फलवती होती है और उन पर फल लगते लदते है। यह फल मनुष्यों सहित अन्य प्राणियों के लिए आहार का काम देते है पर जहाँ तक वृक्ष के लिए इन फलों का अपना उपयोग है वह उनकी बीज सत्ता को अनुक्षण रखने परिपुष्ट बनाने और सुविस्तृत करने के उद्देश्य में ही सन्निहित देखी जा सकती है। वृक्ष मात्र परोपकार के लिए ही नहीं फलते उनके अपने जीवन की सार्थकता भी फलवान होने में ही है।
फूलों में गुदा भरा होता है और गूदे के भीतर बीज एक जगह इकट्ठे नहीं रखे रहते वरन् दूर−दूर फासले पर रहते हैं। पूरे वृक्ष पर एक ही फल नहीं चलता वरन् उनकी बहुत बड़ी संख्या होती है। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था क्यों की इस पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि प्रगति के आधार जिस प्रकार मनुष्यों के लिए बनाये गये हैं वैसे ही वृक्षों के लिए भी विनिर्मित किये गये हैं।
गूदे का उद्देश्य है बीज को पोषण देना—परिपुष्ट करना—प्रौढ़ावस्था तक पहुँचाना। माता के गर्भ में जिस प्रकार भ्रूण पकता पलता है उसी प्रकार फल के उदर में गूदे के मध्य बैठा हुआ बीज धीरे−धीरे सबल और समर्थ बनता रहता। मानव जीवन के अधिकतर क्रिया−कलाप भौतिक उपार्जन के लिए होते हैं। इससे सुविधा सामग्री तो मिलती ही है साथ ही वे विशेषताएँ—विभूतियाँ भी परिपक्व होती है जिनके आधार पर प्रत्यक्ष क्षेत्र में सफलताएँ पाई जा सकती है—जिन्हें विकसित व्यक्तित्व व परिपुष्ट सत्ता कहते है।
एक वृक्ष अनेक फल और प्रत्येक फल में अनेक वी डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड विस्तार करने का अवसर मिले। उसे सीमित दायरे में संकीर्णता की परिधि में ही आबद्ध रहकर अविकसित कहलाने का कलंक न सहना पड़े। आत्म−विस्तार बिना न तो आत्म−सन्तोष मिल सकता है और आत्म−गौरव। जब मनुष्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर—क्षुद्रता से महानता की ओर बढ़ने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है तो वृक्ष भी उसी प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण क्यों न करें।
प्रत्येक बीज में एक पूर्ण वृक्ष सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है। परिपुष्ट होने के पश्चात् उसका अगला उद्देश्य यह रहता हे कि उसी जाती के नये वृक्ष उत्पन्न करे। साथ ही यह भी आवश्यक हो जाता है कि क्षेत्र की दृष्टि से समीपवर्ती सीमा बन्धन को लांघकर सदर क्षेत्रों तक अपनी सत्ता को सुविस्तृत बनाया जाय। फल के भीतर सारे बीज एक जगह ही एकट्ठे चिपके नहीं रहते। गूदे के भीतर वे थोड़ा−थोड़ा फासला देकर अलग−अलग जमे होते है। इसका उद्देश्य यह है कि उन्हें पृथक−पृथक् रूप से सुदूर क्षेत्र में जाने की ओर सुविस्तृत परिधि में विस्तार का अवसर मिले। यदि गूदे में सब बीज इकट्ठे रखे होते तो फल के पक कर गिरने पर वे सभी एक जगह ही उगते। फलतः वे सभी एक दूसरे की खुराक छीनते—फैलने की जगह प्राप्त न कर पाते और ऐसे ही सूख मुरझाकर समाप्त हो जाते। विस्तार के लिए यह आवश्यक है कि पुरखों के घर आँगन को छोड़कर अन्यत्र भी जाने और फैलने का प्रयत्न किया जाय।
वृक्ष की सत्ता फलों के माध्यम से यही सब करती रहती है। फलने और पकने के साथ−साथ उनकी वितरण चेष्टा भी उत्साह पूर्वक चलती है। गूदे में बीजों का स्थान अलग−अलग था भी इसीलिए कि उनके वितरण की व्यवस्था बन सके। आहार में प्रायः गूदा ही काम आता है। बीज कड़े होते है इसलिए वे फेंक दिये जाते हैं या संग्रह कर लिये जाते हैं। गूदा समाप्त हो जाने पर भी बीजों का अस्तित्व बना रहता है। यदि उन्हें पीस कर नहीं खाया साबुत बच जाते है। पेट में भी कम ही पचते हैं। मल मार्ग से निकल कर वे पृथ्वी पर बिखर जाते है और डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड।
मनुष्य जीवन की प्रगति के भी दो आधार हैं एक भौतिक उपलब्धियों के लिए प्रयत्न करते हुए अपने में गुण, कर्म, स्वभाव परक बीज सत्ता को परिपुष्ट करना और दूसरा उस पुष्ट सत्ता को सुविस्तृत क्षेत्र में वितरण करके उन विभूतियों को दूर−दूर तक बखेरना−विकसित करना। प्रथम चरण को शक्ति संचय कह सकते हैं और दूसरे चरण को सेवा साधना। बलवृद्धि का—सामर्थ्य संपादन का उद्देश्य यही हो सकता कि उनके वितरण विस्तार का लाभ सुदूर क्षेत्रों को मिले। जो लोग शरीर या परिवार के भीतर ही अपनी प्रतिभा का लाभ सीमित किये बैठे रहते हैं उन्हें गूदे के भीतर ही पहुँचाने वाले बीज की उपमा दी जाती है।
गूदे में पक कर विकसित हुए बीज सुदूर क्षेत्रों तक फैले इसके लिए प्रकृति ने अनेकों प्रकार की व्यवस्थाएँ की है। प्राणियों द्वारा उनका खाया जाना और मल विसर्जन के साथ उनका दूर−दूर जा पहुँचाना प्रत्यक्ष ही है। कई बीज फेंके या संग्रह करने पर किसी न किसी प्रकार वंश वृद्धि करने का अवसर पाने में सफल हो जाते है। बीजों का व्यवसाय भी होता है। अनाज की तरह अन्य बीज भी खरीदे—बेचे जाते है और वे यहाँ से वहाँ की यात्रा करते हैं। यह तो प्रचलित व्यवस्था हुई। प्रकृति भी इस दिशा में भारी योगदान करती है और तरह−तरह के ऐसे साधन जुटाती है जिससे वह उत्पन्न हुई बीज सम्पदा किसी एक स्थान तक सीमित होकर न रह जाय वरन् उसे सुदूर क्षेत्रों में वितरित होने का अवसर मिले।
हवा असंख्यों बीजों को अपने साथ उड़ा कर एक स्थान से दूसरे स्थानों तक पहुँचाती है। इस स्तर के हलके बीजों की वनस्पति−जगत में कभी नहीं है। ‘कुनैन’ जिस सिनकोना पौधे से बनती है उसके बीज इतने हलके होते है कि एक ओंस में 70 हजार भी तोले जा सके। आर्किडो के बीज इससे भी हलके होते है। इनकी बनावट भी ऐसी होती है जैसे पक्षी के परों की। हलकापन और बनावट की विशेषता दोनों के कारण हवा उन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और कहीं से कहीं ले जाकर पटकती है। कुछ बड़े और भारी बीजों सूर्यमुखी, डोडिलिओन, सौक्स, डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड पैराशूट की तरह बने होते हैं, वे हवा तनिक−सा सहारा पाकर लम्बी उड़ान उड़ते लगते है। नीचे उतरने और ऊपर चढ़ने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती। आक के बीज में जो रुई चिपक ी होती है उससे उनका उड़ना कितना सुहावना लगता है। ब्लड फ्लावर, करची, व्यूमोनशिया, चाटियम जैसे पौधों के बीज भी रोएंदार होते हैं, जिनके कारण उनकी वायुयात्रा बड़ी सरल बन जाती है। अरलू, पराल, जरुल, सहजन, चीड़ के बीजों की बनावट भी पक्षियों के परों जैसी होती है। वे इच्छा से नहीं उड़ पाते पर हवा उनकी उड़ने की सारी व्यवस्था स्वयं जुटा देती है। कुछ तो पूरे फल ही उड़नशील होते है वे अपने बीज परिवार को लेकर क्षेत्र विस्तार का प्रयोजन पूरा करने के लिए हवा की सहायता से यात्रा करने पर उतर पड़ते है। ऐसे उड़ाकू फलों में होलोक,मधुलता,जमीकन्द,फ्रेक्सीनस,होपियामेपल,डिपटीरोकारपस साल आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनमें से एलेथस की बनावट हवाई जहाज देखकर प्रकृति ने इन्हें बनाया है। आँधियाँ धूल तिनके ही नहीं हलके बीजों को भी अपने साथ उड़ा ले जाती हैं और कहीं से कहीं उन्हें जा पटकती हैं, जड़ी−बूटियाँ प्रायः इसी प्रकार यहाँ से वहाँ जा पहुँचती हैं।
कुछ फल भी स्वार्थी मनुष्यों की तरह बड़े कृपण होते है। वे पके हुए बीजों को भी अपने सूखे खोलते में समेटे बैठे रहते है। स्वयं भले ही उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न हो पर दूसरों को लाभ न मिलने पाये, ऐसी मनोवृत्ति वाले मनुष्य ही नहीं फल भी दुनिया में मौजूद है। लाल पोस्त, सत्यनाशी, कुत्ताफूल, हंसलता तथा धतूरा इसी प्रकार के फल हैं। हवा जब इन्हें झकझोरती है तो खुद भी उलटने−पुलटने लगते हैं और बीजों को छोड़ने के लिए भी विवश होते हैं। स्वेच्छा से न सही बलात्कार से ही चलना उन्हें भी प्रकृति के कानूनों पर ही पड़ता है। संग्रही को ई बनना भी चाहे तो प्रकृति उसे वैसा करने की आज्ञा नहीं दे सकती। जो दिया गया है वह देने के लिए डडडड डडडड डडडड डडडडड डडडड और बल प्रयोग का सामना करना पड़ता है।
पानी में उगने वाली वनस्पतियों के बीजों की लहरें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है। यह बीज हलके और हवा भरे स्पंज की तरह होते हैं, जिससे वे लहरों पर आसानी से तैरते रह सके। नदियों और समुद्रों के तटों पर उगे हुए पेड़−पौधे भी अपने बीज—जल को समर्पित करके उन्हें अन्यत्र चले आने की खुशी−खुशी छूट देते है। मनुष्य ही ऐसा स्वजनों को अन्यत्र उपयोगी स्थानों पर जाने से रोककर घर की चहारदीवारों में ही बन्द रखने के लिए मोहग्रस्त बना रहता है। कमलगट्ठें अक्सर पानी में तैरते हुए ही कहीं से कही जा उगते हैं। नारियल के फलों का पानी में गिरना और सहस्त्रों मील जन शून्य द्वीपों में जा उगना इसी प्रकार सम्भव हुआ है।
कई फल ऐसे है जिनके छिलके बहुत कड़े होते हे। पक जाने और सूख जाने पर भी वे बीजों को बाहर नहीं निकलने देते। इस कठोर नियन्त्रण की उग्र प्रतिक्रिया होती है। बीज विद्रोह कर बैठते हैं ओर उस भीतरी तनाव से छिलका एक विस्फोट की तरह फटता है, और बीज उछल कर बाहर निकल जाते है। गुलमेंहदी, वु डसेरिल, नाइटजेसमिन, अरंड, कालमेध, बज्रदंती पलाक्स, कंचनलता आदि फलों में आकार फटने और बीज उछलने की प्रक्रिया देखने के मिलती है। प्रहलाद, विभीषण, कैकेयी,बालि आदि को अपने अभिभावकों एवं गुरुजनों के विरुद्ध इसी प्रकार विद्रोह करना पड़ा था। अनुचित प्रतिबन्ध के अहंकारी दुराचार अक्सर ऐसे ही विस्फोट उत्पन्न करते रहते हे।
कुछ बीज ऐसे होते है जो हवा, पानी, मनुष्य आदि की सहायता न पाने पर स्वयं ही अपनी प्रवृत्ति प्रेरणा से आत्म−विस्तार का रास्ता अपने बुलबुले बनाते हैं और जिसका भी अञ्चल हाथ लगे उसी को पकड़ कर आगे चल पड़ते है। लटजीरा, गोखरु, बनऔखरा,चोरकाँटा वुइया, ठीकरी, चित्रक आदि फल अथवा बीज अपने कांटों के साथ पशुओं−पक्षियों के शरीरों एवं मनुष्यों वे कपड़ों को पकड़ लेते हे और उन पर सवारी गाँठ का कही से कही जा पहुँचते है। डडडड डडडड डडडड प्रकृति के प्राणी बीजों को इकट्ठा करते हैं। बिलों में से छितरा कर वे फिर जहाँ−तहाँ जा पहुंचते हैं। पक्षियों के पैरों में चिपकी मिट्टी के साथ अथवा उनकी बीट के माध्यम से भी अनेक वनस्पतियाँ तथा वृक्ष लम्बी यात्राएँ करते हुए पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक जा पहुँचते हैं।
वनस्पतियों और वृक्षों की यह आत्म–विस्तार की अपनी उपलब्धियों की सुदूर क्षेत्र में वितरण करने की प्रवृत्ति ठीक उसी प्रकार पाई जाती है जैसी कि प्रकृति प्रेरणा मनुष्य को उपलब्ध है। जो जीवन विद्या का मर्म जानते हैं वे अपनी आन्तरिक विशेषताओं को बीज सत्ता की तरह परिपक्व करने के लिए अपनी हलचलों का गूदा सजाय, साथ ही यह भी ध्यान रख कि यह समस्त उपार्जन वितरण के लिए है ताकि संसार की शोभा सुषमा का विस्तार होता रहे उसमें कमी न आने पावे।
इस प्रकृति प्रेरणा को—ईश्वरीय विधान को हम धर्म एवं अध्यात्म के नाम से पुकारा जाता है। व्यक्ति वाद की संकीर्ण स्वार्थपरता को निरस्त करके लोकहित की−जन−कल्याण की सत्प्रवृत्तियों में अपनी विभूतियों को समर्पित करना यही है मानवी संस्कृति। वृक्ष वनस्पतियाँ तक इस अपनाने के लिए तत्पर है तो फिर विवेकवान और सहृदय समझे जाने वाले मनुष्य को ही उदार अनुदान देते रहने में क्यों कृपणता बरतनी चाहिए?
अमेरिका के यूनियन और कनफिडरेट पक्षों में उन दिनों गृह युद्ध चल रहा था। प्रेसीडेन्ट अब्राहमलिंकन यूनियन पार्टी में थे। गृह युद्ध में विरोधी पक्ष के कितने ही लोग बन्दी बनाये जा चुके थे। सत्ता लिंकन के हाथ में थी। जीत भी उन्हीं का पक्ष रहा था।
विरोधी पक्ष की एक युवती अपने बन्दी भाई से मिलने का प्रयत्न कर रही थी पर अधिकारी उसे इसके लिए इजाजत नहीं दे रहे थे। आखिर वह प्रेसीडेन्ट के पास ही जा पहुँची और अपना अभिप्राय बताया।
लिंकन ने उससे पूछा−मेरा विश्वास है तुम देश भक्त हो।
युवती ने निर्भीकता पूर्वक उत्तर दिया−मैं अपने देश वर्जीनिया के प्रति देश भक्त हूँ।
वर्जीनिया विरोधी पक्ष था। विरोधियों को ऐसी सुविधा क्यों दी जाय जिसमें पीछे कोई संकट उत्पन्न होने की आशंका हो—यह एक प्रश्न था।
लिंकन कुछ देर सोचते रहे और उन्होंने एक पर्चा लिखकर युवती के हाथ में थमा दिया और जेल में भाई से मिलने की स्वीकृति लिख दी।
अफसरों ने प्रेसीडेन्ट से इस उदारता का कारण पूछा—तो उनने यही कहा—ईमानदार व्यक्ति यदि विरोधी भी हो तो भी उससे किसी अवाँछनीय अनिष्ट की आशंका नहीं करनी चाहिए।
सत्य और न्याय के पीछे चलने में हमें सब कुछ छोड़ना पड़ता हो तो उसके लिए अपने को तैयार करना चाहिए। सत्य ही परमेश्वर है। उससे बढ़कर इस संसार का सारतत्त्व और कुछ नहीं है। सत्य अपने हाथ रहा और उसके बदले सब कुछ चला गया तो हर्ज नहीं, किन्तु यदि सत्य को गँवा कर कुबेर की सम्पदा और इन्द्र का सिंहासन भी पाया तो समझना चाहिए कि यह बहुत महंगा और बहुत घाटे को सौदा खरीदा गया है।
जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं अथवा चलने के लिए विवश किये जा रहे हैं यदि वह असत्य और अन्याय से भरा है—उससे आदर्शों का हनन होता है और भ्रष्ट परम्पराएँ जन्मती हैं समझना चाहिए या कुमार्ग गमन बड़ी से बड़ी भौतिक उपलब्धि के बदले भी महंगा है उसे खरीदने का विचार छोड़ ही देना चाहिए।
सत्य को त्याग कर वैभव का वरण अथवा वैभव को छोड़कर सत्य का वरण इन दोनों में से किसे चुनना किसे नहीं चुनना यह धर्म संकट उत्पन्न होने पर सजीव और सजग आत्मा का निर्णय यही हो सकता है कि वैभव को छोड़ देना चाहिए और सत्य का वरण करना चाहिए। सत्य शाश्वत है। उसके परिणाम दूरगामी हैं। उसकी उपलब्धि से जो हित साधन होने वाला है वह चिरस्थायी है, जबकि वैभव बिजली की चमक की तरह क्षणिक चकाचौंध उत्पन्न करने के बाद गहन अन्धकार में विलीन हो जाता है।
इस विश्व की संरचना जिन परमाणुओं से हुई है वे द्रुतगति से भाग रह है। उनसे बनी वस्तुएँ भी अपने क्रम से बनती, बढ़ती, बदलती और मरती दिखाई पड़ती हैं। वस्तु की जो स्थिति अभी है वैसी अगले क्षण रहने वाली नहीं है। अस्तु जिस रूप में उसे इस समय आकर्षक पाया जाता है वैसा कुछ ही समय बाद रहने वाला नहीं है। रूप,यौवन,धन,बुद्धि,पद,स्वाद,इन्द्रियानुभूति से जो आकर्षण अब है वह निश्चित रूप से अगले दिनों बदल जायगा। जो बालक अभी तोतली बोली बोलते और खिलौने जैसे हँसते−हँसाते दीखते हैं वे कुछ समय बाद वयस्क होकर अपना घर, परिवार बसायेंगे और अभिभावकों को भारभूत मानकर उनसे सीधे मुँह बात भी न करेंगे। पत्नी को जिस रूप, यौवन के आधार पर परमप्रिय समझा जा रहा है। आयुष्य वृद्धि के साथ−साथ उसमें भी घटी ही आने वाली है। उसका आज का अत्यधिक आकर्षण कल बच्चों में बँटने वाला है। प्रणय के आरम्भ काल का आकर्षण देर तक कहाँ टिकता है? इस बदलती स्थिति में वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के साथ मोह जोड़ना और उन तुच्छ सी उपलब्धियों के लिए सत्य जैसे बहूमूल्य तथ्य की उपेक्षा करना किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं हो सकता।
संसार की हर चीज अस्थिर है वह अपने रूप,रंग और स्तर निरन्तर बदलती है, इतना ही नहीं अपना मन भी तो एक जैसी स्थिति में नहीं रहता। उसे अभी एक वस्तु एक दृष्टिकोण के कारण प्रिय लगती है। आवश्यक नहीं कि वह दृष्टिकोण सदा ही बना रहे। आज का कामातुर व्यक्ति कल संन्यास धारण करने के लिए व्यग्र हो सकता है, तब जो कुछ प्रथम आवेश में प्राणप्रिय लगता था वह द्वितीय आवेश चढ़ आने के कारण निस्सार एवं घिनौना प्रतीत हो सकता है। यही बात उन व्यक्तियों पर भी लागू होती है जिन्हें हम अपना समझते है या प्यार करते हैं। वे हमें इस समय प्यार देते हैं, पर कल उनकी रुझान दूसरी ओर मुड़ सकती है और उपेक्षा अवज्ञा से उनका व्यवहार बदला हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। संसार की यही घोर अस्थिर स्थिति है। पानी की लहरों की तरह यहाँ सब कुछ बदल रहा है। ऐसी दशा में जिस आकर्षक पर मुग्ध होकर आज हम सत्य जैसे शाश्वत तत्व की उपेक्षा करने को उद्यत हुए हैं और प्रिय पदार्थ स्वाद अथवा व्यक्ति के लिए बेतरह मर खप रहे हैं, नशा उतरने पर वह सारा आवेश मूर्खता पूर्ण ही प्रतीत होगा।
अनीति का समर्थन करते हुए सरलता पूर्वक उपार्जन किया जा सकता हो तो भी छोड़ देने में ही कल्याण है। सरलता,सुविधा और प्रचुरता की ललक में हम उन तरीकों को अपना लेते है जिनसे जल्दी सफलता मिल सके। ऐसे तरीके अनैतिक ही हो सकते हैं। सत्य के मार्ग पर चलने से कठोर परिश्रम के साथ स्वल्प उपार्जन ही सम्भव है। नीति पूर्वक तो उचित ही कमाया जा सकेगा और उसके लिए उचित पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसके लिए जिनमें साहस और धैर्य नहीं वे अनीति पर उतारू होते हैं या फिर अनीति वालों के सहायक होकर सरलता पूर्वक सुविधायें पाने के लिए सहमत होते हैं। यह स्थिति नितान्त दयनीय है। शरीरगत सुविधाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य की आत्मा का हनन करना पड़े तो यह इतनी बड़ी क्षति होगी जिसकी पूर्ति किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगी।
मानवी गरिमा की रक्षा कर सकना जीवन सफलता की दृष्टि से उच्चकोटि की उपलब्धि है। यदि आत्मा का —आदर्शों का— आत्म−सन्तोष का—कोई महत्व या स्थान हो सकता है तो उन्हें सँजोये रहने के लिए भी हमारी चेष्टाएँ होनी चाहिए। इस दिशा में बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि नीति पूर्ण उपार्जन से सन्तुष्ट रहने—उपभोग के स्वल्प साधन से काम चलाने और कठोर कष्ट साध्य जीवन क्रम का स्वागत कर सकने वाला अभ्यास डाला जाय। तप इसी का नाम है। तितीक्षा इसी को कहते हैं। धर्म और अध्यात्म की संरचना इसी स्तर की मनोभूमि को विनिर्मित एवं परिपक्व करने के लिए किया गया है। आस्तिकता की धुरी इसी केन्द्र पर घूमती है कि व्यक्ति आदर्शवादी और सत्यनिष्ठ जीवन पद्धति अपनाने के लिए अभीष्ट शौर्य साहस का सम्पादन कर सकें। किसी भी प्रकार—सुगमता पूर्वक प्रचुर सुख साधन संग्रह करने की—किसी भी मार्ग से अपनी अहंता का उद्धत प्रदर्शन कर सकने की ललक मनुष्य को कुपथगामी बनाती है और दुष्कर्म करने के लिए अग्रसर करती है। इसी आवेश में पतनोन्मुख एवं कलंक कालिमा से भरी रीति−नीति अपनानी पड़ती है। इतने पर भी जो पाया जाता है वह क्षणिक रहता है। जिस सरसता और सुविधा की आशा की गई थी वह भी तो दुराशा मात्र ही रहती है। बिजली की कौंध की तरह सुख शान्ति के सपने कुछ विलीन हो जाते हैं। मृग तृष्णा में व्यग्र हिरन की तरह एक के बाद दूसरी दिशा में प्यास बुझाने के लिए घोर प्रयत्न करते रहने पर भी अन्ततः गहरी निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
मनुष्यता की आत्मा सत्यनिष्ठा के साथ जुड़ी हुई है। यह मन्द अथवा तीव्र स्वर में एक ही घोषणा करेगी—भले ही समस्त सुविधाएँ छिन जाँय और समस्त प्रियजनों का विरोध सहना पड़े तो भी यथार्थता को—न्याय नीति को −विवेक औचित्य को तिलाँजलि नहीं दी जानी चाहिए। गरीबी की अभावग्रस्त रीति−नीति अपनाकर इस संसार में असंख्यों मनुष्य जीवित है फिर हर भी वैसा क्यों नहीं कर सकते?
मित्रताएँ टूटती हों—प्रियजन विमुख होते हों—गरीबी को सहचरी बनाना पड़ता हो—असुविधाओं का वरण करना पड़ता हो तो इन सबका सम्मिलित कष्ट इतना बड़ा नहीं हो सकता जितना कि सत्य के परित्याग का। सचाई की राह पर चलने वालों को अक्सर दुनिया वाले मूर्ख कहते हैं और व्यंग करते हैं कि सन्त बनकर क्या पा लिया? इतना ही नहीं—कई बार तो दुष्ट लोग ऐसे व्यक्ति को अपने भंडाफोड़ का भय दिखाकर दूर भगाने या हानि पहुँचाने से भी नहीं चूकते और उसे अकारण कष्ट जाल में फँसना पड़ता है। इन अग्नि परीक्षाओं से गुजरते हुए भी यदि प्रहलाद की तरह कोई सत्यनिष्ठ बन सके तो समझना चाहिए कि मनुष्य का महान गौरव और उत्तरदायित्व सँजोये रखने में उसने वह सफलता प्राप्त करली, जिसका उपहार सत्यनिष्ठ महामानव बनने के रूप में प्राप्त होता है।
उस कलाकार की इच्छा थी कि अपनी समस्त कला को समेट कर एक अमर कला−कृति बनाये। इसमें पवित्रात्मा और शैतान का समन्वित चित्रण हो।
पवित्रात्मा का प्रतीक वह महाप्रभु ईसा को मानता था और शैतान का प्रतीक उस व्यक्ति को जिसने महाप्रभु को कोड़े लगाकर और कीलें ठोक कर मर्मान्तक पीड़ा देते हुए उनका प्राण हरण किया था। चित्र में दोनों को पवित्रता और क्रूरता के आमने−सामने बड़ा हुआ दिखाया जाना था।
चित्रकार ऐसे दो जीवन्त व्यक्ति देखना चाहता था जिनकी आकृति में पवित्रात्मा और शैतान की प्रकृति का पूरी तरह आभास मिल सके। मात्र कल्पना से नहीं सजीव छवि देखकर उस प्रकार की आकृति बनाने की बात उसके मन में जँच रही थी।
पहले उसने पवित्रात्मा की आकृति वाला मनुष्य ढूँढ़ना आरम्भ कि या। इसके लिए वह दूर−दूर तक भटका। हजारों लाखों मनुष्यों के चेहरे गौर से देखे पर वैसा कोई मिला ही नहीं।
एक दिन भटकते−भटकते वह कि सी अनाथालय में जा पहुँचा वहाँ उसने एक पाँच वर्ष के बालक को देखा। उसके अभिभावक मर गये थे और भाई−बहिन बिछुड़ गये थे। स्नेह छिन जाने से उसकी आँखों से करुणा और कातरता बरस रही थी। वह प्यार खो चुका था—प्यार पाना चाहता था। चित्रकार ने उसे पवित्रात्मा के अधिक समीप पाया और चित्र के लिए उस आकृति को उपयुक्त मान लिया।
अनाथालय के अधिकारी से चित्रकार ने दो घण्टे के लिए उस बालक को माँग लिया अपने स्टूडियो ले गया। बहुत प्यार किया। खिलाया−पिलाया और सामने बिठा कर कुछ ही देर में उसकी आकृति कागज पर उतार ली। इसके बाद उसे धन्यवाद कहकर वापिस अनाथालय भेज दिया गया। ईसा की छवि के रूप में यह चेहरा उसे बहुत ही सन्तोषजनक प्रतीत हुआ।
बच्चे ने स्टूडियो में प्रवेश करते समय वहाँ जो स्नेह सद्व्यवहार पाया उससे उसकी आँखों में एक नया उल्लास चमका। किन्तु थोड़ी देर बाद जब उसे फिर उस नीरस कटघरे में लौटा दिया गया तो बच्चा समझ गया। स्नेह दुनिया में से उठ गया। प्रवेश करते समय और विदा होते समय का अन्तर उसके सामने स्पष्ट था। जिस धन्यवाद को साथ लेकर वह वापिस लौटा था वह बनावटी भी था और अपर्याप्त भी। स्नेह की, प्यास की एक बूँद भी समाधान उसमें न मिल सका।
यहाँ केवल मतलब के लिए किसी को दुलारने पुचकारने की प्रथा है। बच्चा मन पर भरोसा कर फिर अनाथालय में रहने लगा। स्नेह की एक कौंध स्टूडियो से उसने जो देखी थी उसमें भी उसने नकलीपन ही पाया आशा की किरणें फिर कभी उसने देखी भी नहीं।
चित्रकार का आधा चित्र बन चुका था। अब को मारने वाले शैतान की क्रूर आकृति की आवश्यकता पर ताकि उस कलाकृति में अधिक यथार्थता का समावेश कर सके। इसके लिए भी वह दूर−दूर तक भटका। अब की बार उसे पवित्रात्मा का चेहरा ढूँढ़ने से भी अधिक कठिनाई हुई। वैसी आकृति मिलती ही न थी जिसमें न पिशाच के समस्त चिन्ह पाये जा सकें।
खोज−बीन उसने बराबर जारी रखी। चेहरे देखकर और खोजने में बराबर लगा रहा। इस प्रयास में उसके बीस वर्ष गुजर गये। चित्र अधूरा ही पड़ा था। अन्त में उसे एक जेलखाने में अपनी इच्छित आकृति मिल गई। एक पच्चीस वर्षीय नौजवान लम्बी कैद की सजा भुगत रहा था। उसने अनेकों वीभत्स अपराध किये थे। आजीवन कारावास का दण्ड उसे न्यायालय से मिला था। उसकी आँखें, होठ, हँसी, भवें और चेहरे की प्रत्येक रेखा पर शैतान नाच रहा था। ऐसी भयंकर आकृति उसने इन बीस वर्षों में अन्यत्र कहीं नहीं देखी थी।
चित्रकार ने सन्तोष की साँस ली। जेल के अधिकारियों से संपर्क स्थापित किया और दो घण्टे उसे स्टूडियो में ले जाने की सुविधा प्राप्त कर ली।
कैदी सुरक्षा अधिकारियों के संरक्षण में स्टूडियो लाया गया। चित्रकार ने पूछा—आपका क्या आतिथ्य किया जाय? कैदी ने ह्विस्की की याचना की। उसने कहा शराब मेरी प्रिय अभिलाषा थी पर अब तो जेल में वह भी दुर्लभ हो गई। मिला सकें तो जीभर कर ह्विस्की पिलाने का प्रबन्ध कर दीजिये।
इच्छानुसार इसे शराब पिलाई गई। सामने कुर्सी पर बैठा नशे में धुत्त कैदी और भी भयंकर लग रहा था। ऐसी ही आकृति की तो चित्रकार को जरूरत थी। वह बड़े उत्साह के साथ चेहरे को देख−देख चित्र बनाता चला गया और शैतान की आकृति ठीक तरह बन गई। अपनी उस सफलता पर उसे बहुत सन्तोष था।
धन्यवाद देकर जब कैदी विदा किया जाने लगा, तब उसने नम्रतापूर्वक पूछा—क्या मैं अपनी आकृति का चित्रण देख सकता हूँ। चित्रकार ने उसकी इच्छा पूरी की और जो चित्र बनाया था वह हाथ में थमा दिया।
कैदी उसे देखकर अवाक् रह गया। उसने महाप्रभु की पवित्रात्मा और शैतान की पैशाचिकता को बार−बार देखा और हतप्रभ होकर सिर खुजाने लगा।
चित्रकार ने इस असमंजस का कारण पूछा। कैदी ने उसके कन्धे पर हाथ रखा और कान के पास मुँह ले जाकर कहा। आप भूल गये—पवित्रात्मा का चित्र भी मेरा ही है। आप अनाथालय में मुझे ही अब से बीस वर्ष पूर्व इसी स्टूडियो में लाये थे और उसी कुर्सी पर बिठा कर देख चित्र खींचा था।
बीस वर्ष पूर्व का पवित्रात्मा—इतनी छोटी अवधि में कैसे पिशाचात्मा बन गया। महाप्रभु की आकृति शैतान में कैसे बदल गई। चित्रकार इसका कारण न जान सका वह स्वयं भी स्तब्ध खड़ा था।
समाधान उभरा स्नेह की प्यास धन्यवाद से शाँत न हो सकी नीरस दुर्व्यवहार से उद्विग्न अन्तःकरण भटकता हुआ अनाचार के गर्त में जा गिरा।
चित्रकार सोचने लगा उस बालक की तरह इस कैदी की भी कुछ माँग है जिसे धन्यवाद देकर झुठला दिया जाता है। शायद अन्य पवित्रात्मा भी पिशाचात्मा बनने के लिए उसी उद्वेग द्वारा धकेल दिये जाते हैं।
लता ने सुकोमल बाहुओं से वृक्ष को पकड़ कर पूछा—’तुम मेरे आश्रयदाता हो। मेरे सुख और समृद्धि का सारा श्रेय तुम्हीं को है। तुम्हारा आधार पाकर ही तो मैं इतना विकास कर सकी हूँ। मैंने चारों ओर से तुम्हें घेर कर बन्धन में जकड़ लिया है। जब कभी तुम्हारे मन में स्वच्छन्द जीवन की कल्पना आती होगी तो यह बन्धन असह्य होता होगा? सचमुच मैंने तुम्हारे प्रति अन्याय किया है। मैं लज्जित हूँ। मुझे क्षमा दान दो’
‘युगों से जिस प्रेम के बन्धन को पाने के लिये प्राणी प्रयत्नशील है, फिर उससे मुक्त होने की बात किसके मन में आ सकती है?—तुम्हीं सोचो।’ वृक्ष ने मृदुल स्वर में उत्तर दिया।
लता अपने आश्रयदाता के विचारों में ही बहुत देर तक खोई रही।
मनुष्य जाति के भाग्य एवं भविष्य को बदलने की समस्त संभावनायें अपने धर्म में नव−निर्माण अभियान छिपाये हुए हैं। उसे सबल एवं सफल बनाने का उत्तरदायित्व जब अखण्ड−ज्योति परिवार के कन्धों पर नियति ने ला ही पटका है तो अब हमें उसे पूरा करने के लिए साहसपूर्वक आगे बढ़ना ही होगा। युग की—मानवता की पुकार को अनसुनी करना अब अपने लिए संभव न होगा। पिछले दिनों जो महत्वपूर्ण भूमिकाएँ इस छोटे से परिवार ने निभाई हैं—उनसे समस्त मानव−समाज ने बड़ी−बड़ी आशायें बाँधनी आरम्भ कर दी हैं। शिथिलता और अन्यमनस्कता अपनाकर अब उस आशा को निराशा में परिणत कर देना न अपने लिए उचित है न सम्मानजनक। हमें आगे बढ़ना ही चाहिए, बढ़ना ही होगा।
नव−निर्माण के महत्वपूर्ण चरणों में एक यह भी है हम अपनी आधी जनता को अपंग स्थिति से उबारने के लिए साहसपूर्ण कदम उठायें नर और नारी लगभग समान संख्या में हैं। अपनी आधी जनसंख्या नारी समाज की है। उसकी जो दयनीय दशा है वह किसी से छिपी नहीं है। भारतीय नारी सम्मान की दृष्टि से संसार प्रसिद्ध है वहाँ उसकी यह आधी जनता अशिक्षा, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता से ग्रस्त पिछड़ेपन की दयनीय स्थिति में गिरी पड़ी है। घरों के छोटे पिंजड़ों में कैद रहकर उसे जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। पर्दा प्रथा के कारण उसके वे अधिकार भी छिन गये जो सड़क पर मुँह खोलकर चलते हुए और मन की बात बताने पर स्वतन्त्रता के साथ ले आने के के रूप में पशुओं को भी प्राप्त है। इस पराधीनता के बंधनों में जकड़ी हुई—शिक्षा और स्वावलम्बन की क्षमता से सर्वथा वंचित नारी पिछड़ेपन का केन्द्र बन गई। वह अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गँवा बैठी। घुटन, प्रताड़ना और परावलम्बन का अभिशाप उसके आँसुओं को सूखने ही नहीं देता। बौद्धिक दृष्टि से उसे कूप−मंडूक से बढ़कर और क्या कहा जा सकता है?
नारी को अपंग एवं बंदी जैसी स्थिति में पटक कर हमने पाया कुछ नहीं खोया सब कुछ। सुविकसित स्तर की नारी अपने दांपत्य−जीवन में जितना रस घोल सकती थी—परिवार को हर दृष्टि से सुव्यवस्थित और समुन्नत स्तर का बना सकती थी—सद्गुणी और स्वस्थ सन्तान उत्पन्न कर सकती थी—कुटुम्ब का वातावरण स्वर्गीय बना सकता था वह इस पिछड़ेपन के रहते हुए सम्भव नहीं। इस आधी जनता को भी यदि मानवोचित नागरिक अधिकार मिले होते तो वह नर के कन्धे से कन्धा मिलाकर वैयक्तिक और राष्ट्रीय सुख−समृद्धि बनाने में असाधारण योगदान दे रही होती। कहने को भारत की आबादी इन दिनों पचास करोड़ है पर यथार्थ में उसे 25 करोड़ ही गिनना चाहिए पिछले दिनों एक लाख पाकिस्तानी युद्ध बन्दियों और बँगला देश के शरणार्थियों का बोझा ढोना पड़ा सच पूछा जाय तो पचास प्रतिशत अपनी अविकसित जनता का—नारी का—बोझ हमारे राष्ट्र को लगभग उसी प्रकार का वहन करना पड़ रहा है। योग्यता और सुविधा के अभाव में वे अपना बोझ भी नर के कन्धों पर ही डालें हुए हैं। यदि यह स्थिति न होती उन्हें सुयोग्य स्वावलम्बी बन सकने का अवसर मिलता तो वे भार रूप न रहकर उलटे समृद्धि वृद्धि में योगदान देतीं, फलस्वरूप आज की हमारी शक्ति जो आधी रह गई हैं उस स्थिति में दूनी होती। चार गुने का अन्तर पड़ता, प्रगति की आकाँक्षा करते हुए अपने राष्ट्र की नारी को इस दयनीय दुर्दशा से निकालना ही पड़ेगा।
ध्यानपूर्वक देखा जाय तो देश की पचास फीसदी जनता को अपंग स्थिति से उबारना और उसे मनुष्योचित क्षमताओं से सुसम्पन्न करना इतना बड़ा काम है जिसे भारतीय जन शक्ति को दूना और समृद्धि को सौगुना बढ़ा देने वाला अति महत्वपूर्ण आधार कहा जा सकता है। पारिवारिक सुख−सौमनस्य बढ़ाकर उससे स्वर्गीय वातावरण का सृजन करने का यह एक अभिनव प्रयोग सिद्ध होगा। पीड़ियों को हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत देखना हो तो यह कदम उठाये बिना और किसी प्रकार काम नहीं चलेगा। यह तो नारी उत्थान के लाभ हुए। सुविकसित मनुष्य स्वयं में एक चमत्कार है। अपने इस आज के पिछड़े वर्ग में न जाने कितनी इंद्रागाँधी, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, सरोजिनी नायडू, कमला चट्टोपाध्याय, गार्गी, मदालिसा, छिपी बैठी होंगी, उनके प्रकाश में आने से हम कितने आगे बढ़ सकेंगे, कितने ऊँचे उठ सकेंगे, इसकी कल्पना मात्र से ही मन में गुदगुदी उठती है जब वह वस्तुस्थिति सामने आयेगी तब पता चलेगा कि यह नारी जागरण का कार्य कितना महान और कितना महत्व पूर्ण था—जिसकी ओर कि किसी का आज ध्यान ही नहीं है।
अखण्ड−ज्योति परिवार को इस महान कार्य का उत्तरदायित्व भी अपने कन्धों पर लेना चाहिए। हममें से प्रत्येक को निश्चय करना चाहिए कि नारी जागरण के महान अभियान में उसका योगदान उपेक्षा एवं अन्यमनस्कता के साथ नहीं वरन् उत्साह भरा हुआ रहेगा। हम लोग मिल−जुलकर कुछ कदम बढ़ायें तो इसका परिणाम अगले ही दिनों चमत्कार बनकर सामने आ खड़ा होगा महत्व हमेशा अग्रगामियों का रहा है। अगली पंक्ति में खड़े होने वालों में—श्रीगणेश शुभारम्भ करने वालों में यदि हम अपनी गणना करा सकें तो अगले ही दिनों पीछे चलने वालों की, अनुकरण करने वालों की कोई कमी नहीं रही यह स्पष्ट दिखाई देगा।
भारत की परम्परागत परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें घरों में बन्द रहने वाले—और पुरुषों की छाया से कतराने वाले महिला समाज में केवल महिलायें ही प्रवेश पा सकती हैं और वे ही कुछ काम कर सकती हैं—वे ही उनमें घुल−मिल सकती हैं। पुरुष किसी महिला सम्मेलन में भाग लेने के अतिरिक्त कुछ अधिक नहीं कर सकते। काम प्रवचनों का नहीं उनमें घुलने−मिलने का है। इसलिए हमें पर्दे के पीछे रहकर सूत्र संचालन करना चाहिए और कार्य क्षेत्र में अपने घर की नारियों को उतारना चाहिए। इस दिशा में यदि उनका तनिक भी उत्साह है तो उसे चौगुना सौगुना बढ़ाना चाहिए उन्हें अवसर देना चाहिए कि ये राष्ट्र और संस्कृति के माथे पर लगे हुए इस कलंक को धोने में कुछ कारगर योगदान देने की भूमिका निभा सकें; यदि उनमें उत्साह नहीं है तो प्रयत्नपूर्वक समझाते बुझाते रहना चाहिए, और उन्हें गृह−कार्यों से कुछ समय निकाल कर अपने समीपवर्ती घर, मुहल्लों की महिलाओं के साथ संपर्क बनाने और उनमें नव−जागरण की चेतना उत्पन्न करने में संलग्न होना हर दृष्टि से उपयोगी रहेगा, इससे उनका स्वयं का सर्वतोमुखी उत्कर्ष होगा और साथ ही अन्य बहिनें भी उस प्रकाश से लाभान्वित हो सकेंगी।
महिला जागरण का प्रथम चरण तीसरे पहर 2 से 5 बजे तक तीन घंटे चलने वाली महिला पाठशालाओं से आरम्भ करना होगा। गली−गली, मुहल्ले−मुहल्ले ऐसी पाठशालायें खुलनी चाहिए जिनमें प्रौढ़ महिलायें पढ़ने आ सकें। छोटी बच्चियों को स्कूल भेजा जाय उन्हें सरकारी पढ़ाई पढ़ने दी जाय सो ठीक है; पर वह सुविधा उन महिलाओं की नहीं मिल सकती जिनके कन्धों पर घर परिवार का—रसोई और बच्चों का उत्तरदायित्व लदा हुआ है। इस वर्ग को उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। छोटी बच्चियाँ पढ़−लिखकर, प्रौढ़ बनकर सामाजिक चेतना में भाग ले सकने और वातावरण को प्रभावित कर सकने योग्य स्थिति में तब पहुँचेंगी जब 30 वर्ष की आयु के करीब पहुँच जायें। इससे पूर्व न तो घर वाले उन्हें अवसर ही देंगे—न उनकी प्रतिभा ही इतनी विकसित हो जायेगी कि उनका महत्वपूर्ण प्रभाव सामाजिक परिस्थितियों पर पड़ सके। यह कार्य तो वे प्रौढ़ महिलाऐं ही करेंगी जिनने अपना व्यक्तित्व थोड़ा परिपक्व कर लिया है जिनका कुछ प्रभाव अधिकार बनने चलने लगा है।
आज की लड़कियाँ शायद दस−बीस वर्ष बाद महिला समाज को कुछ ऊँचे स्तर तक पहुँचाने में सफल हो सकें पर आज तो समस्या उन महिलाओं की है जो प्रौढ़ हैं। घर−परिवार को सँभाल रही हैं किन्तु शिक्षा और चेतना से वंचित हैं। समय जिस तेजी से बदल रहा है—युग की माँग और पुकार जितनी तेज होती जा रही है उसे देखते हुए हमें वर्तमान को ही सबसे अधिक महत्व देना होगा। आज की समस्यायें आज सुलझानी पड़ेंगी। वर्तमान महिलाऐं तो जैसी हैं वैसी ही बनी रहें और दस−बीस वर्ष नई लड़कियाँ पढ़−लिखकर कुछ काम करेंगी इतनी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती; समय की पुकार को इतनी अधिक देर तक टाला नहीं जा सकता है। आज की समस्या हमें आज ही हल करनी चाहिए।
हमारा सारा ध्यान प्रौढ़ महिला जागरण पर केन्द्रित होना चाहिए और इसका श्रीगणेश तीसरे प्रहर चलने वाले विद्यालयों के माध्यम से आरम्भ करना चाहिए। हमारे घरों की कोई महिला इतनी शिक्षित और प्रभावशाली हो कि तीसरे प्रहर के तीन घण्टे निकाल कर उपरोक्त विद्यालय चला सके तो पूरा साहस एकत्रित करके हमें उन्हें आगे धकेलना चाहिए। घर−गृहस्थी का काम आमतौर से उस समय कम ही होता है। होता हो तो प्रयत्न करना चाहिए कि घर की दूसरी महिलायें उसे सँभाल लिया करें और जो इस संदर्भ में दिलचस्पी लेती हैं उन्हें तीन घण्टे का अवकाश इस परम पुनीत धर्म कार्य के लिए कृपा पूर्वक दे दिया करें। यह सहायता जो महिलायें कर दिया करेंगी—छुट्टी का समय देने और उनका काम स्वयं कर देने की कृपा किया करेंगी वे भी कम पुण्य की भागी न होंगी।
यों हर घर में चौका−चूल्हे का थोड़ा सा ही काम होता है, महिलायें कई होती है; वे चाहे तो एक महिला का पूरा कार्य भार अपने कन्धों पर ले सकती हैं और उसे अधिकाधिक समय सेवा कार्य के लिए दे सकती हैं। घर का वातावरण यदि हम ऐसा बना सके, घर की महिलाओं को इसके लिए सहमत कर सके, तो हम अपने−अपने घरों से ही एक−एक दो−दो ऐसी महिला कार्यकर्त्री निकाल सकते हैं जो भले ही पास−पड़ौस तक अपनी गति−विधियाँ सीमित रखें पर इतने से ही वे एक महान परम्परा का सञ्चालन कर सकती हैं और अगले दिनों उस उत्साह को दवानल की तरह फैलता हुआ देख सकती हैं। इस शुभारम्भ का अनुकरण निश्चित रूप से सर्वत्र होगा।
तलाश करें तो अपने घर में अथवा अखण्ड−ज्योति परिवार के किसी अन्य सदस्य के घर में ऐसी महिलायें मिल सकती हैं जो इस नारी−जागरण के लिए—शिक्षण व्यवस्था संचालन के लिए कुछ कर सकने की क्षमता से सम्पन्न हों उन्हें ढूँढ़ना और आगे लाना चाहिए। इतना किया जा सका तो समझना चाहिए कि आधी समस्या हल हो गई। ऐसी दो−चार महिलाओं की एक टोली गठित हो जाय और व मिल−जुलकर इस तीसरे प्रहर के समय का सदुपयोग महिला जागरण के लिए करने का निश्चय करलें तो समझना चाहिए अपने कर्तव्य का एक महत्वपूर्ण भाग हमने पूरा कर लिया। इस टोली निर्माण का सूत्र संचालन हमें ही करना चाहिए। नर द्वारा नारी को जो सहस्रों वर्षों से सताया जाता रहा है उसका प्रायश्चित्त भी हो तो आखिर हमें ही करना है।
इस टोली का नाम महिला युग−निर्माण शाखा रख जा सकता है। उसका प्रमुख कार्य एक प्रौढ़ महिला विद्यालय चलाना है। इसके लिए अपने लोगों में से भी किसी सदस्य का एक कमरा तीसरे प्रहर प्रयोग करने लिए माँग लेना चाहिए। टोली को घर-घर भेजना चाहिए कि मुहल्ले पड़ौस में संपर्क बनाने जाया करे और उतावली में एक बारगी ही सफलता की आशा न करे−धीरे−धीरे थोड़ा−थोड़ा करके यह प्रसंग चलाया करे इस आरम्भ होने वाले विद्यालय में उस घर की भी कोई प्रौढ़ महिला पढ़ने आया करे। यह कार्य देखने में सरल है पर व्यवहार में बहुत कठिन है। रूढ़िवादी बुढ़ियायें होगा कि कोई बाहर की शिक्षित महिला उनके घर में प्रवेश करे और न वे यह चाहते हैं कि कोई घर की औरत देहरी से बाहर पैर रखे। शिक्षा की—स्वावलम्बन की—सुधार की बात सुनते ही उन्हें जूड़ी चढ़ती है। यह सारे दोष यदि रूढ़िवादिता में न होते वह मानवी प्रगति के लिए अभिशाप न होती तो हमें क्यों उसे विरोध में खड़ा होना होता।
इस विद्यालय के लिए छात्राएँ जुटाना टेड़ी खीर है। फिर भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, अपने निज के घरों की—अखण्ड−ज्योति परिवार के, उनके संपर्क के लोगों के परिवारों की महिलायें जुटाने का प्रयत्न करना चाहिए। चार छै ही सही—आरम्भ तो उनसे भी हो सकता है। संख्या वृद्धि पीछे क्रमशः ही होगी। समझाने बुझाने का क्रम धीरे−धीरे चालू रखना चाहिए। जहाँ से पहली बार स्पष्ट इनकार का उत्तर मिला था उनसे न तो निराश होना चाहिए और न बुरा मानना चाहिए। हँसते−हँसाते वातावरण में जब तब उस प्रसंग की चर्चा करते रहने से कल नहीं तो परसों इस दिशा में सफलता मिलती चलेगी और शिक्षार्थी महिलाओं की संख्या बढ़ती चलेगी।
प्रौढ़ महिला प्रशिक्षण के चार विभाग हैं (1) साक्षरता—माध्यमिक शिक्षा जितनी योग्यता उत्पन्न करने वाला पाठ्यक्रम (2) गृह शिल्प—सिलाई प्रमुख रूप से और कढ़ाई, बुनाई, घुलाई, रँगाई, साबुन बनाना, मोमबत्ती, तरह−तरह की स्याहियाँ, सुगन्धित तेल, खुशबूदार शरबत, घर में टोकरी तथा गमलों में शाक−भाजी उगाना, बिस्कुट, डबल रोटी, लेमजूस, टॉफी आदि बनाना। घर की प्रत्येक टूट−फूट की मरम्मत करके व्यर्थ बर्बाद होने वाली वस्तुओं को काम में आने योग्य बनाना, चारपाई बुनना आदि सरल उद्योग सिखाये जाँय। जहाँ सुविधा हो वहाँ तरह−तरह के अति सुन्दर और सस्ते खिलौने बनाना, जैसे गृह उद्योगों का आरम्भ करना। यह अभी उद्योग ऐसे हैं जिन्हें सीखकर कोई भी महिला आजीविका वृद्धि का नया द्वार खोल सकती है। (3) घर−गृहस्थी में काम आ सकने एवं भावनायें उत्पन्न करने जैसा सुगम संगीत (4) जीवन जीने की कला—स्वास्थ्य संरक्षण, परिवार व्यवस्था बनाना, सामाजिक समस्याओं और उनके समाधानों की जानकारी—धार्मिकता और आस्तिकता का यथार्थ स्वरूप, कर्तव्यपालन का व्यावहारिक मार्ग, लोक−जीवन के विभिन्न विषयों का सामान्य ज्ञान, आदि अनेक विषय जीवन जीने की कला के अंतर्गत आते हैं उन सभी की सामान्य जानकारी।
इन चार विषयों को लेकर चलने वाले महिला प्रौढ़ विद्यालयों का प्रशिक्षण एक वर्ष का रखा जा सकता है। इतने समय में कोई सामान्य स्तर की अशिक्षित किन्तु उत्साही महिला आसानी से उपरोक्त पाठ्यक्रम पूरा कर सकती हैं।
इन चारों धाराओं का ही अपना−अपना महत्व है। शिल्प वाली बात सामान्य लोगों को अधिक आकर्षक लगेगी क्योंकि उसमें आर्थिक लाभ की बात स्पष्ट दीखती है। सिलाई जानने वाली महिला अपने घर में अच्छी−खासी बचत कर सकती है। पुराने कपड़ों को काट−छाँट कर छोटे−छोटे नये बना लेने की बात ही यदि चल पड़े तो उससे ढेरों पैसे की बचत हो सकती है। बर्तनों की, फर्नीचरों की, मकान की टूट−फूट सुधारना उन्हें सुसज्जित रखना ही यदि आ जाय तो घर कितना अच्छा दिखाई पड़ेगा। शाक−भाजी बोने उगाने की कला का उपयोग घर आँगन में ही हो सकता है और उतने से ही भोजन की पौष्टिकता तथा आर्थिक बचत में चार चाँद लग सकते हैं।
इन बातों का महत्व समझाकर प्रौढ़ महिलाओं को इन विद्यालयों की ओर आसानी से आकर्षित किया जा सकता है। प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य है विचार क्रान्ति। जीवनोत्कर्ष के लिए आवश्यक प्रकाश का उनकी मनोभूमि में प्रवेश कराना। जीवन−जीने की कला वाले पक्ष में इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूरी−पूरी गुंजाइश है। शिक्षार्थी का सच्चे अर्थों में उन सबसे हित साधन होता है साथ ही महिला जागरण का अपना प्रयोजन भी पूरा होता है जा महिला एक साल तक मिशन के प्रकाश में विविध−विधि प्रेरणायें प्राप्त करती रही है निश्चित रूप से उसका स्तर सुविकसित होगा। उसका दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप उस दिन की अपेक्षा काफी ऊंचा उठ चुका होगा; जिस दिन कि उसने इस विद्यालय में प्रवेश कि या था। इन्हीं प्रशिक्षित महिलाओं का वर्ग अपनी महिला युग−निर्माण शाखाओं का अंग बनता चला जायगा। दूसरी प्रभावशाली महिलायें भी उसकी ओर आकर्षित होंगी और सम्मिलित होती चली जायेंगी।
उपरोक्त विद्यालयों की स्थापना को हमें प्रमुखता देनी चाहिए। पर उसी तक महिला जागरण का कार्य समाप्त नहीं हो जाता। उनके लिए साप्ताहिक सत्संगों—भजन कीर्तनों, प्रवचनों का क्रम चलना ही चाहिए। जिससे बड़ी संख्या में महिलायें सम्मिलित होती रहें और नव जागरण के प्रकाश से लाभान्वित होती रहें। ऐसा पुस्तकालय चलना चाहिए जो महिला जीवन से—परिवार व्यवस्था से सम्बन्धित सभी समस्याओं पर प्रकाश डालने वाली पुस्तकों से भरा−पूरा हो। इसके द्वारा घर−घर पुस्तकें पहुँचाने और वापिस मँगाने का कार्यक्रम चले। सत्संग और पुस्तकालय संचालक भी महिला युग−निर्माण शाखाओं के महत्वपूर्ण अंग रहेंगे यों उनका प्रधान कार्य प्रौढ़ महिला विद्यालयों का सञ्चालन होगा। साथ में यों यह कार्य भी जुड़े रहेंगे तो गंगा, यमुना, सरस्वती के सम्मिलित से बनने वाली त्रिवेणी की तरह महिला जागरण अभियान की पुण्य धारा का प्रवाह अपने देश में ऐसी भव्य चेतना उत्पन्न करेगा जिसकी कल्पना कर सकना भी आज की स्थिति में कठिन है।
यह त्रिविध कार्यक्रम जो महिलायें चला सकेंगी उन से यह आशा की जा सकेगी कि वे नवनिर्माण की सर्वतोमुखी क्राँति के विभिन्न मोर्चों को सँभालने के लिए सशक्त अधिकारिणी बन गई। महिला जागरण के अभियान की आगे बढ़ाने के लिए हमें अपने घरों की, मित्र−सम्बन्धियों की महिलाओं को कार्यक्षेत्र में उतारना है और उनसे एक प्रौढ़ विद्यालय की स्थापना करनी है साथ ही सत्संग एवं पुस्तकालय की प्रक्रिया आरम्भ करनी है। आज हम इतनी सीमा तक ही सोचें और उसे करने के लिए तत्परता दिखायें तो यह भी कम महत्वपूर्ण—कम साहस का—कम सराहनीय कदम नहीं है। पुरुषों को इस अभियान का पूरी दिलचस्पी के साथ सूत्र संचालन करना चाहिए किन्तु अग्रिम पंक्ति में या कार्यक्षेत्र में उत्साही एवं सुयोग्य महिलाओं को ही उतारना चाहिए।
हमारे घरों की बहुयें, वयस्क बेटियाँ इस कार्य में उत्साहपूर्वक भाग ले सकती हैं। जो लड़कियाँ अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकीं किन्तु शादी का सुयोग न बनने से घरों में बैठीं व्यर्थ ही समय काट रही हैं वे इस प्रयोजन के लिए सर्वोत्तम माध्यम हो सकती हैं। घर से बाहर न निकलने देने के बन्धन लगाकर उन्हें और भी अधिक कुण्ठाग्रस्त करना—सरासर अन्याय है। जहाँ ऐसी शिक्षित लड़कियाँ मिल सकें वहाँ उन्हें भी उत्साह देकर—उनके घर वालों को समझा−बुझा कर यह महत्वपूर्ण सेवा करने का सुयोग बनाना चाहिए। हमने कभी इस दिशा में सोचा ही नहीं यदि परिजनों का ध्यान इस ओर मुड़े और वे सच्चे मन से दिलचस्पी लेना आरम्भ करें तो हर क्षेत्र में महिला युगनिर्माण शाखायें स्थापित हो सकती हैं और उपरोक्त त्रिविधि चेतना प्रक्रिया हर जगह आरम्भ हो सकती है। समय आ गया कि अखण्ड−ज्योति परिवार का हर सदस्य इस दिशा में कुछ सोचे कुछ साहस एकत्रित करे और कुछ क्रियात्मक कदम उठाये। युग की पुकार को पूरा करने के लिए हमें इतनी भूमिका तो निबाहनी ही चाहिए।
महिला जागरण के लिए कार्य करने वाली विभूतियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था शान्ति कुञ्ज में की गई है। पिछले अंक में तथा इस अंक में ऐसी महिलाओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था की सूचना छपी है जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है और जो अपना पूरा समय इस महान प्रयोजन के लिए लगा सकने की स्थिति में हैं। ऐसी सुशिक्षित एवं सुयोग्य महिलाओं की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
इनके अतिरिक्त ऐसी महिलाओं के प्रशिक्षण की भी आवश्यकता समझी गई जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त नहीं हुई हैं पर स्थानीय महिला जागरण के लिए प्रसन्नतापूर्वक तीन घंटे का समय लगाती रह सकती हैं। इन्हें विद्यालय संचालन के लिए निर्धारित चार प्रकार के पाठ्यक्रम को चलाने की योग्यता होनी चाहिए। संगठन, सत्संग और पुस्तकालय व्यवस्था चला सकने की—कुछ प्रवचन कर सकने की भी क्षमता जिनमें हो।
यह योग्यता शिक्षित एवं सेवाभावी महिलाओं में भी नहीं होती। इसके बिना वे इच्छा रहते हुए भी कुछ विशेष कार्य नहीं कर सकतीं। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए शान्ति कुञ्ज में इन कार्य−कर्त्रियों के लिए भी चार−चार महीने की शिक्षण व्यवस्था इस वर्ष 1 जुलाई से ही आरम्भ की जा रही है। पहला सत्र जुलाई, अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर में। दूसरा नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फरवरी में और तीसरा मार्च, अप्रैल, मई, जून, में होगा। अभी एक वर्ष का ही कार्यक्रम घोषित किया गया है। आवश्यकतानुसार इस प्रक्रिया को आगे भी चलाया जाता रहेगा।
हमारे परिवारों की सेवाभावी एवं कम से कम आठवें दर्जे तक की शिक्षा योग्यता वाली महिलायें इस प्रशिक्षण के लिए भेजी जानी चाहिये। उनका शरीर से स्वस्थ, प्रखर बुद्धि एवं सरल स्वभाव होना आवश्यक है। शरीर से रुग्ण, मंद बुद्धि एवं झगड़ालू, आलसी प्रवृत्ति की शिक्षार्थी नहीं ली जायेंगी। बच्चे जिनके बड़े हो गये हैं घर पर रह सकते हैं उन्हें ही आना चाहिए। छोटे बच्चे साथ लेकर आने की आज्ञा किसी को भी नहीं मिलेगी। पारिवारिक उत्तरदायित्वों से बच्चों की जिम्मेदारी से हल्की महिलाओं को प्राथमिकता दी जायगी।
चार महीने में उन्हें (1) शिल्प उद्योगों के वे सभी विषय जो महिला प्रशिक्षण में सम्मिलित हैं (2) सुगम संगीत (3) जीवन विद्या (4) साक्षरता पाठ्यक्रम के चारों वर्ग इस सीमा तक सिखा दिये जायेंगे कि वे अपना स्थानीय विद्यालय एक कुशल अध्यापिका की तरह चला सकें। साथ ही संगठन, सत्संग, पुस्तकालय आदि के संचालन की व्यावहारिक कुशलता एवं प्रवचन क्षमता भी उनमें उत्पन्न कर दी जायेंगी। यह शिक्षा न केवल समाज सेवा की दृष्टि से वरन् व्यक्ति गत योग्यता एवं प्रतिभा के विकास की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जो यह पाठ्यक्रम पूरा करके जायेंगी वे अनुभव करेंगी कि उनने इतना सीख लिया जो तथाकथित ग्रेजुएट महिलाओं की तुलना में कही अधिक उपयोगी और व्यावहारिक है। इस चार महीने के शिक्षण को प्राप्त करने वाली महिला कम से कम अपने निजी जीवन में इतनी सुयोग्य हो सकेंगी कि अपने घर परिवार को सँभालने में एक सन्तोषजनक भूमिका सम्पन्न कर सकें। जिन वयस्क लड़कियों की शिक्षा समाप्त हो गई है और जो घर पर बेकार बैठी हैं उनके लिए भी तो यह प्रशिक्षण और भी अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
स्थान बहुत ही सीमित हैं। एक सत्र में 25 से अधिक महिला शिक्षार्थियों की व्यवस्था नहीं जुटाई जा सकेगी। अस्तु जिन्हें भेजा जाना हो उनका पूरा परिचय भेजते हुए जल्दी ही स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। देर से आवेदन−पत्र भेजने वालों को पीछे के किसी सत्र में स्थान प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। शिक्षार्थी महिलाओं के सम्बन्ध में निम्न दस विवरणों सहित आवेदन−पत्र भेजा जाना चाहिए (1) पूरा नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) स्वास्थ्य (6) परिवार के सदस्यों का परिचय (6) विवाहित या अविवाहित। (7) पिछले दिनों कुछ सार्वजनिक सेवा की हो तो उस अनुभव का विवरण (8) इन दिनों जो उत्तरदायित्वों कन्धे पर हो उसका विवरण (9) सिलाई, संगीत आदि की पूर्व जानकारी (10) महिला जागरण के लिए भविष्य में कुछ करने की आकाँक्षा।
शान्ति कुञ्ज में चल रही प्रशिक्षण व्यवस्था में रह एक और नया अध्याय जुड़ता है कि जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से पूर्ण निवृत्त तो नहीं है केवल महिला जागरण के लिए तीसरे प्रहर का तीन घंटे समय लगाते रह सकने की स्थिति में हैं उनके लिए भी चार−चार महीने का शिक्षा व्यवस्था का क्रम आरम्भ किया जा रहा है। अखण्ड−ज्योति परिजन अगले दिनों अपने महिला जागरण अभियान के लिए जो महत्वपूर्ण कदम उठाने वाले हैं उनमें यह अतिरिक्त शिक्षण व्यवस्था अतीव उपयोगी सिद्ध होगी ऐसा विश्वास है। हमें अपने घर−परिवारों की महिलाओं को इस प्रशिक्षण में प्रशिक्षित करने और अपने क्षेत्र में इन प्रयासों को अग्रगामी बनाने के लिए पहल करनी चाहिए।
चेतना कटिअविष्ठाता विश्वात्मा है। बिखरी हुई आत्माएँ उसी के छोटे−छोटे घटक हैं। जब तक यह इकाइयाँ परस्पर मिलकर रहती हैं और एक−दूसरे के साथ अविछिन्न रूप से जुड़ी हैं तभी तक दृश्यमान सौंदर्य का अस्तित्व है। यदि इनका विघटन होने लगे तो केवल धूलि मात्र ही इस संसार में शेष रह जायगी। विश्व−मानव की विश्वात्मा यदि अपनी समग्र चेतना से विघटित होकर संकीर्ण स्वार्थपरता में बिखरने लगे तो समझना चाहिए विश्व−सौंदर्य की समाप्ति का समय निकट आ गया।
शरीर एक है। उसमें उँगलियाँ, उनके पोरुवे, जोड़, हड्डियाँ, माँस पेशियाँ आदि अनेक हैं। उन सबका मिला−जुला स्वरूप ही शरीर है। इन सभी का समन्वय जीवनक्रम को चलाता है। वे सभी बिखरने लगें। अपनी अलग इकाई को ही सब कुछ मानें दूसरे अंगों को सहयोग करने की बात सोचना छोड़ दें तो फिर समझना चाहिए उन्हें भी दूसरों के सहयोग से वंचित होना पड़ेगा। ऐसी दशा में जिस स्वार्थ को साधने की उनकी इच्छा थी वह भी न सध सके गा।
हाथ तभी तक सक्रिय रहेगा जब तक वह अपनी कमाई मुँह को देगा—मुँह पेट को देगा—पेट हृदय को और हृदय अपने उपार्जन रक्त का वितरण समस्त शरीर को। अपनी कमाई दूसरों को सौंपने का अर्थ प्रकारान्तर से अनेक गुना लाभ अपने लिए उपार्जित करना डडडड हाथ अपनी कमाई को अपनी मुट्ठी में रखे रहे—मुँह या पेट को देने से इनकार कर दें तो फिर भूखा शरीर सूखता जायगा और वे हाथ भी उस विपत्ति से संत्रस्त हुए बिना न रहेंगे। अपनी कमाई वे मुँह को देते हैं तो बदले में बहुमूल्य रक्त प्रवाह का लाभ हैं और जितनी शक्ति कमाने में खर्च की थी उसकी भरपाई कर लेते हैं।
उँगली यदि शरीर की क्रमबद्ध सत्ता व्यवस्था में भाग लेने से इनकार कर दें और अपने को अलग−थलग काट कर स्वतन्त्र रहने में विश्वास करे तो वह घाटे में रहेंगी। कटी हुई उँगली देखते−देखते निर्जीव हो जायगी और सड़ने लगेगी। कट जाने पर मनमर्जी करने का जो लाभ सोचा था वह इसलिए न मिल सकेगा कि रक्त प्रवाह के लिए उसे दूसरे अंगों पर निर्भर रहना पड़ता था। सहयोग देने से इनकार करने का अर्थ सहयोग पाने क द्वार बन्द कर देना भी है। हमारे एक के सहयोग न देने से भी समाज शरीर का क्रम चलता रहेगा पर अपने को स्वार्थी एवं असामाजिक सिद्ध करने के बाद समाज का सद्भाव खो देने की जो हानि उठानी पड़ेगी उससे अपनी ही क्षति अधिक होगी।
हम संकीर्ण न बनें। तुच्छ स्वार्थपरता की नीति अपनायें। अपने को अलग−अलग करके न सोचे। व्यक्ति वाद के कुचक्र में न फंसे। एकाकीपन स्पष्टतः एक संकट है। विश्वात्मा का उपयोगी अंग अपने को सिद्ध करने पश्चात् ही हमारा गौरव बढ़ता है और अपना ही न अन्य सबका भी भला कर सकें।
यहाँ कोई विराना नहीं। सब अपने ही हैं। ईश्वर के सभी पुत्र परस्पर सहोदर भाई की तरह हैं। मिल−जुलकर रहने, मिल−बाँटकर खाने और परस्पर सेवा सहायता की उदार नीति अपनाने में ही भलाई है। सबके कल्याण में ही अपना कल्याण समाया हुआ है।
भूल सुधार−पिछले पृष्ठों पर अपनों से अपनी बात स्तंभ के अंतर्गत महिला प्रशिक्षण योजना का पाठ्य−क्रम चार−चार महीने का छपा है। बहुत पहले का लेख लिखा होने के कारण उस समय की योजना के अनुसार था। अब विशेष विचार विनिमय के उपरान्त उसे तीन−तीन महीने का कर दिया है। अब वे (1) जुलाई, अगस्त, सितम्बर (2) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के होंगे। इसी प्रकार अगले वर्ष भी चलेंगे। पाठक भूल सुधार लें।
*समाप्त*