शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न, जल और वायु की अनिवार्य आवश्यकता है। आत्मा को सजीव और सुविकसित बनाने के लिए उस ज्ञान आहार की आवश्यकता है जिसके आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता उपलब्ध की जा सके।
समुन्नत जीवन का एकमात्र आधार सद्ज्ञान है। इस अवलम्ब के बिना कोई ऊँचा नहीं उठ सकता—आगे नहीं बढ़ सकता। सन्तोष, सम्मान और वैभव की अनेकानेक श्रेयस्कर विभूतियाँ इस सद्ज्ञान सम्पदा पर ही अवलम्बित हैं।
मनुष्य में ज्ञान सम्पादन की क्षमता ही है पर उसे एकाकी विकसित नहीं कर सकता। दूसरों के सहारे ही उसकी महानता विकसित हो सकती है। इस सहारे का नाम स्वाध्याय और सत्संग है। शास्त्र और सत् संपर्क से यह प्रयोजन पूरा होता है प्रशिक्षित मनःस्थिति यह लाभ चिन्तन और मनन से भी ले सकती है। पशु को मनुष्य बनाने के लिए उस सद्ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता रहती है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।
मानवी महानता का सारा श्रेय उस सद्ज्ञान को है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति को आदर्शवादी परम्पराओं का अवलंबन करने की प्रेरणा देता हो। सौभाग्य और दुर्भाग्य की परख इस सद्ज्ञान संपदा के मिलने न मिलने की स्थिति को देखकर की जा सकती है। जिसे प्रेरक प्रकाश न मिल सका वह अँधेरे में भटकेगा, जिसे सद्ज्ञान की ऊर्जा से वञ्चित रहना पड़ा, वह सदा पिछड़ा और पतित ही बना रहेगा। पारस छू कर लोहे को सोना बनाने वाली किंवदंती सच हो या झूठ, यह सुनिश्चित तथ्य है सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य को सौभाग्य के श्रेष्ठतम स्तर तक पहुँचा देती है।
मनुष्य सब कुछ है और कुछ भी नहीं—यह तथ्य परस्पर विरोधी दो धाराओं का प्रतिपादन करते हुए परिस्थिति के अनुसार दोनों ही प्रकार सही है।
अविकसित रूप में मनुष्य एक गया−गुजरा पशु है। प्रकृति प्रदत्त शारीरिक क्षमता उसकी स्वल्प क्षेत्र में है। कुत्ते जैसा सूँघना, हिरन जैसा उछलना, घोड़े जैसा दौड़ना, बैल जैसा श्रम करना भी उसके लिए अशक्य है। फिर हाथी, सिंह, व्याघ्र जैसों का तो वह मुकाबला करेगा ही और तो और बन्दर और बिल्ली की तरह पेड़ों पर भी नहीं चढ़ सकता। भार वहन में वह गधे के भी समतुल्य नहीं है। ऋतु प्रभाव को खुले शरीर पर बर्दाश्त करना अपवाद रूप में ही सम्भव है—जबकि अन्य सभी पशु बिना परिधान के जीवनयापन करते हैं। पशुओं के बच्चे जन्मते ही माँ को पहचानना और अपनी समझ से माँ के स्तन एवं भोजन स्वयं आरम्भ कर देते हैं इसमें किसी दूसरे की सहायता नहीं लेनी पड़ती इस दृष्टि से मनुष्य अपने पशु वर्ग की बिरादरी में बहुत ही पिछड़ा हुआ है।
विकसित और समर्थ वह तब बनता है जब मानसिक चेतना का विकास एवं प्रयोग करने लगता है। बुद्धिबल उसकी विशेषता है उस पर धार दूरदर्शिता की खराद पर धरी जाती है। महानता का आरम्भ वहाँ से होता है जहाँ से अपने को कर्त्तव्य मर्यादा के अंतर्गत नियन्त्रण में लाता है—संयमी बनता है और उदार दृष्टिकोण अपनाकर दूसरों के प्रति ममता, करुणा जैसी कोमल सम्वेदनाओं से भाव भूमिका को समुन्नत बनाता है। वस्तुतः इन चेतनात्मक विभूतियों से ही मनुष्यता और महानता की मानवी गरिमा अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई है।
उसकी चेतना प्रस्तुत पड़ी है। वह मात्र आहार, निद्रा भय मैथुन जैसी पशु प्रवृत्तियों से ही प्रेरणा ग्रहण करता है उसका चिन्तन इसी छोटे क्षेत्र में अवरुद्ध रहता है। ऐसे व्यक्ति जिन्दगी तो जी लेते हैं पर वह निरर्थक स्तर की होती है। जीव−जन्तु इन्हीं कार्यों में लगे रहते हैं और सृष्टि क्रम की धुरी पर लुढ़कते हुए जन्मते, बढ़ते और मृत्यु के ग्रास बनते हैं। मनुष्य जन्म जैसा सुविधा सम्पन्न साधन प्राप्त करके भी जो नर पशु भर बना रहा उसे ‘तुच्छ’ कहा जाय तो कुछ अनुचित नहीं।
कई बार तो वह तुच्छ से भी गई−गुजरी स्थिति पर जा पहुँचता है जब वह दुष्ट, क्रूर, क्रोधी, स्वार्थी, कृपण और उद्धत बनकर मानवी शालीनता का उल्लंघन करने पर उतारू होता है। नृशंस और अपराधी मनोवृत्ति का व्यक्ति असुर या पिशाच कहा जाता है।
‘सब कुछ हैं’ के प्रतिपादन में मनुष्य का वह स्तर आता है जिसमें उसके सद्गुण और सत्कर्म सुविकसित स्थिति तक पहुँचे हुए दृष्टिगोचर होते हैं। सचमुच बीज रूप में उसके अन्दर वे विशेषताएँ भरी पड़ी हैं जिन्हें दैवी कह सकते हैं। वे विकसित हो सकें तो महामानव, ऋषि, देवता ही नहीं भगवान बन सकना भी उसके लिए सम्भव है। उसके भीतर समस्त दिव्य सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उन्हें विकसित करने और सदुपयोग में लाने की चेष्टा में निरत रहकर वह प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकता है। शास्त्रकार ने सच ही कहा है—मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं है। उसे बहुत कुछ ही नहीं सब कुछ भी कहा जा सकता है।
अनर्थमय, निरर्थक एवं सार्थक जीवन इन तीन धाराओं में से वह किसी को भी चुन सकता है और निकृष्टता से लेकर उत्कृष्टता के किसी भी स्तर पर वह निश्चित रूप से पहुँच सकता है इसलिए वह अद्भुत है और अनुपम भी उसकी चेतना की मूलसत्ता सर्व समर्थ समस्त सम्भावनाओं से भरी पूरी कही जा सकती है।
सब कुछ होते हुए भी वह कुछ नहीं, तब बनता है जब उसकी चेतना अविकसित रह जाती है अथवा कुमार्ग की ओर अग्रसर होती है। श्रेष्ठता और निष्कृष्टता के दोनों ही तत्व उसके भीतर विद्यमान हैं। पानी नीचे सहज ही ढुलता है, निम्नगामी दुष्प्रवृत्तियाँ गिराने का काम सहज ही कर लेती हैं, पर ऊँचा चढ़ाने के लिए प्रबल प्रयासों की जरूरत पड़ती है। सद्ज्ञान सम्वर्धन का—बौद्धिक आधार और सत्कर्म का−व्यावहारिक वातावरण पैदा करना जिस शिक्षा का कार्य है वस्तुतः मानवी महानता का श्रेय उसे ही दिया जा सकता है। धर्म और अध्यात्म का दर्शन उसी महानता सम्वर्धन की—सब कुछ बनाने की भूमिका सम्पन्न कर सकने के लिए बनाया गया है। मानवी प्रगति का वही सबसे बड़ा आधार है।
शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण का स्तर, साधन, परिस्थितियाँ एवं शिक्षार्थी का बौद्धिक स्तर सही होना पर्याप्त है। यह साधन जहाँ भी जुट जायेंगे वहाँ शिक्षा का लाभ सफलतापूर्वक मिलने लगेगा। शिक्षा हमारे लौकिक जीवन की सुव्यवस्था के काम आती है। जानकारी बढ़ने से सोचने की परिधि बढ़ जाती है—लिखने और बोलने की भाषा परिष्कृत होती है—अर्थोपार्जन की क्षमता बढ़ती है, विभिन्न शिल्प एवं कला−कौशल अभ्यास में आते हैं। इन आधारों पर मनुष्य नौकरी अथवा स्वावलम्बी उपार्जन में अधिक सफल होता है। ऐसे−ऐसे अनेक लाभों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का प्रचलन किया गया है। पढ़ने पर सर्वत्र बहुत जोरी दिया जाता है। सर्वत्र स्कूल, कॉलेज खुले हैं−−खोले जा रहे हैं—यह उचित ही है। मस्तिष्कीय विकास की दृष्टि से—अर्थोपार्जन जैसी आवश्यकता पूरी करने की दृष्टि से −अति आवश्यक शिक्षा का विकास होना ही चाहिए—उससे हर व्यक्ति को लाभान्वित होना ही चाहिए। इसमें दोरायें नहीं हो सकतीं।
भौतिक जानकारियों से सम्बन्धित शिक्षा की आवश्यकता और उपयोगिता को हम जानते हैं पर उसके दूसरे पक्ष को भूल जाते हैं जिसके बिना हमारी ज्ञान−वृद्धि सर्वथा अधूरी और अपंग बनी रहती है। ज्ञान की दूसरी धारा है—विद्या। विद्या का अर्थ है दृष्टिकोण का परिष्कार—चिन्तन और भावोल्लास में उत्कृष्टता का निखार। इसके बिना मनुष्य के अंतराल में छिपी हुई रहस्यमय दिव्यता का विकास नहीं हो सकता। मानवता एवं महानता की आन्तरिक श्रेष्ठता का विकास जिस क्रम से होता है उसी क्रम से मनुष्य की आकाँक्षाएँ, विचारधाराएँ और गतिविधियाँ उच्चस्तरीय बनती जाती है। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से उसका स्तर उठता जाता है। मन, वचन, कर्म में ऐसी विशेषताएँ दीख पड़ती हैं जिनके संपर्क में आने वाला हर मनुष्य प्रसन्नता अनुभव करता है, प्रकाश ग्रहण करता है। इन दिव्य सम्पदाओं से सुसज्जित व्यक्ति अपने आप में हर घड़ी सन्तुष्ट एवं प्रफुल्ल रहता है भले ही उसे अपेक्षाकृत अभावग्रस्त एवं कष्ट−साध्य परिस्थितियों में रहना पड़ रहा हो, यही है विद्या का चमत्कार— महात्म्य और प्रतिफल।
प्राचीन काल में विद्या का महत्व समझा जाता था और उसे शिक्षा का अविच्छिन्न अंग बनाकर रखा गया था। गुरुकुलों की प्रशिक्षण पद्धति में जहाँ भाषा, गणित, भूगोल, शिल्प आदि विषयों का समावेश था वहाँ ऐसा वातावरण भी जुड़ा रहता था जिसमें शिक्षार्थी को अपनी आत्म−चेतना का स्तर आदर्शवादी दृष्टिकोण के अनुरूप ढालने का अवसर मिल—उसके व्यक्तित्व का—गुण, कर्म, स्वभाव का विकास−परिष्कार अनवरत गति से ऊर्ध्वगामी बनता चले। बौद्धिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण की ऐसी धाराएँ उस शिक्षा−पद्धति में जुड़ी हुई थीं जिनके सहारे न केवल भौतिक योग्यताएँ वरन् आत्मिक विशेषताएँ भी शिक्षार्थी को समान रूप से मिलती रहें।
अर्वाचीन समाज निर्माताओं का विचार कुछ दूसरा ही है वे भौतिक जानकारियों वाली अर्थकारी शिक्षा को पर्याप्त मानते हैं। अस्तु शिक्षण संस्थाओं का कार्य क्षेत्र बहुत सीमित रह गया है वे साक्षरता से अपने प्रयास आरम्भ करती है और स्नातक बनाकर अपना प्रयोजन पूरा कर लेती हैं। शिक्षार्थी को जानकार एवं अमुक क्षेत्र में क्रिया कुशल बनने का लाभ तो मिल जाता है, पर उसे वहाँ ऐसा कुछ नहीं मिलता जिस अन्त चेतना के परिष्कार में सहायक कहा जा सके। इस कमी के कारण शिक्षार्थी की उपलब्धियाँ सर्वथा अधूरी रह जाती हैं। उसकी जानकारी एवं कुशलता अपनी सीमा में कितनी ही बढ़ी−चढ़ी क्यों न हो व्यक्तित्व का स्तर ऊंचा उठ नहीं पाता। वक्त खिलाड़ी, शिल्पी, कला−कुशल आदि वह कुछ भी बन जाय पर एक ऐसी कमी अपने भीतर अनुभव करता है जिसके अभाव में वह चेतनात्मक प्रगति की दिशा में अपंग असमर्थ ही बना रहा।
विज्ञान, अर्थोपार्जन, शिल्प, कला आदि का अपना महत्व और कार्यक्षेत्र है। भौतिक प्रगति के लिए उन सबकी जरूरत है, पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि व्यक्तित्व को परिष्कृत करना अपने आप में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्र है। इसमें अनजाने बने रहने से कोई भी ऐसी स्थिति नहीं पा सकता जिसके आधार पर वह भीतर आत्म−सन्तोष प्राप्त करे और बाहर आत्म−गौरव का पोषण कर सकने वाला वातावरण पाये। जीवन जीना एक महान् शिल्प है। जिसे सलीके का जीवन जीना नहीं आया उसका सारा शिक्षा लाभ अपंग है। धन से सुविधा साधन खरीदे जा सकते हैं—प्रतिभा से दूसरों को आतंकित अथवा चमत्कृत किया जा सकता है—इतनी ही तो जीवन को आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को इससे ऊँचा भी कुछ चाहिए इससे आगे की भी मंजिल पार करनी उसे अभीष्ट होना चाहिए। यह अभाव विद्या के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है।
विद्या का स्वरूप है—विचारणा एवं भावना के स्तर को उच्चस्तरीय बनाने वाला ज्ञान, अनुभव एवं अभ्यास। यदि उसे प्राप्त किया गया होगा तो जीवनयापन की शैली में उत्कृष्टता का ऐसा समावेश होगा जिसके आधार पर वह अपने सहचरों सहकर्मियों संपर्क में आने वालों का हृदय जीतता चला जायगा। जहाँ भी सम्बन्ध स्थापित करेगा वहीं अपने लिए श्रद्धा एवं सम्मान का बीजारोपण करेगा। धनवान, गुणवान एवं शक्ति वान का अपना महत्व है, पर सबसे बड़ा महत्व परिष्कृत व्यक्तित्व का है आत्मवान मनुष्य कितना बड़ा कितना समर्थ और कितना प्रभावी होता है इस तथ्य को समझने में तो आज हम सब प्रायः असमर्थ ही हो रहे हैं।
बाहर के लोग किसी की सम्पदा, रूप, प्रतिमा एवं पदवी से प्रभावित हो सकते हैं पर अपने आप को जो सन्तोष तथा चैन मिलता है उसका आधार केवल अपनी आन्तरिक सम्पदाओं से—विभूतियों से ही जुड़ा रहता है। दुष्ट, दुर्गुण, व्यसनी, अनाचारी व्यक्ति अपने आप में कितना अशान्त, उद्विग्न रहता है इसे उसके अतिरिक्त और किसी बाहरी व्यक्ति के लिए समझ सकना कठिन है। वह अपने आप ही अपनी आग में जलता, झुलसता रहता है। ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, रोष, उद्वेग, विक्षोभ के अनेकानेक उतार−चढ़ाव उसे प्रेत−पिशाच की तरह अशान्त किये रहते हैं। मनः शास्त्र के अनुसार यह स्थिति अगणित ऐसी शारीरिक और मानसिक आधि−व्याधियों को जन्म देती हैं जिनका उपचार न तो औषधियों से होता है और न सान्त्वना देने वाले विनोदात्मक उपचारों से। ऐसे उद्विग्न मनुष्य नशेबाजी, व्यभिचार, ठाठ−बाठ, पर्यटन व्यसन, विलास आदि की योजनाएँ बनाकर उद्विग्नता का समाधान खोजते रहते हैं। दवादारू एवं बहुमूल्य आहार के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, पर उनका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य सुधरने ही नहीं पाता। खर्चीली और निन्दात्मक दौड़धूप कुछ क्षण भी राहत नहीं दे पाती और सारे प्रयास निरर्थक चले जाते हैं। अन्तःक्षेत्र को निकृष्टता कितनी आत्म−प्रताड़ना देती है; काश हम इसे समझ सके होते तो अनुभव करते कि इससे बढ़कर जीवन का अभिशाप दूसरा नहीं हो सकता।
दुर्गुणी, कुकर्मी एवं दुर्भावनाग्रसित व्यक्ति प्रतिभाओं एवं कुशलताओं से सम्पन्न होते हुए भी संपर्क क्षेत्र में अपने लिए श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सके फलतः उन्हें सच्चे सहयोग से वंचित रहना पड़ता है यह एक तथ्य है कि निकटवर्ती संपर्क क्षेत्र की सहायता से ही कोई व्यक्ति ऊँचा उठने में समर्थ हुआ है। जिसकी निकृष्टता संपर्क क्षेत्र में घृणा और तिरस्कार के भाव उत्पन्न करती है वह कभी भी सच्चे सहयोग का—सच्चे सम्मान का अधिकारी नहीं बन सकता। किसी प्रयोजन विशेष के लिए लोग उसकी चापलूसी कर सकते हैं और लाभ में हाथ बटा सकते हैं पर सितारा गिरते ही वे पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं इतना ही नहीं गिरे में दो लात लगाने की उक्ति भी चरितार्थ करते हैं। दुरात्मा अनुभव करता है कि कुसमय में उसका एक भी सच्चा मित्र या सच्चा सहायक नहीं है। वस्तुतः ऐसे एकाकी मनुष्य को ही अभागा कह सकते हैं। मात्र अपने पुरुषार्थ के बल पर सीमित प्रगति ही की जा सकती है। उच्चस्तरीय और चिरस्थायी सफलताएँ उसी को मिलती हैं जिसने अपने लिए श्रद्धा और सम्मान का वातावरण उत्पन्न कर रखा होगा। यह लाभ केवल उन्हीं के लिए सुरक्षित है जिनकी आन्तरिक स्थिति उत्कृष्टता के आधार पर विकसित—परिष्कृत हुई है।
मनुष्य जीवन को समग्र सफलता के लिए उस ज्ञान की महती आवश्यकता है जिसे विद्या के नाम से पुकारा जाता है—जिसके आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव, का परिष्कृत व्यक्तित्व का निर्माण होता है। न केवल वैयक्तिक समृद्धि के लिए—सुख−शान्ति के लिए—वरन् सामाजिक सुव्यवस्था एवं प्रगति के लिए भी ऐसे ही परिष्कृत व्यक्तित्वों की आवश्यकता है। किसी राष्ट्र अथवा समाज का भवन व्यक्ति घटकों की ईंटों से चुना जाता है। जिस देश के नागरिक ओछे और निकृष्ट होंगे वहाँ विविध−विधि संकट, विद्रोह, अनाचार उभरते रहेंगे और गृह युद्ध जैसी स्थिति बनी रहेगी। अनाचार का जुड़वा भाई असहयोग है। जहाँ सहयोग नहीं वहाँ प्रगति कहाँ। दुष्प्रवृत्तियाँ रोष−प्रतिशोध उत्पन्न करती हैं फलतः क्लेश−कलह के अनेकानेक दुर्भाग्य पूर्ण घटना क्रम सामने आते रहते हैं। ऐसे अन्तः द्वंद्वों की—गृह−क्लेशों की—विभीषिकाओं में उलझा हुआ राष्ट्र कभी भी प्रगति नहीं कर सकता कभी समर्थ नहीं हो सकता उसकी सारी शक्ति उन्हीं विडम्बनाओं को सुलझाने दबाने में—नष्ट होती रहती है। प्रगति के लिए जब समस्त साधन इन्हीं अव्यवस्थाओं, विस्फोटों से निपटने में लग जाँय तो आखिर प्रगति के लिए साधन बचेंगे ही कहाँ?
कि सी देश की गरिमा उसकी भौतिक उपलब्धियों से नहीं आँकी जाती, वास्तविक सम्पदा तो वहाँ के चरित्रवान एवं आदर्शवादी नागरिक ही होते हैं। यही वास्तव में बहुमूल्य मणि माणिक्य हैं। सच्ची समृद्धि इसी रत्न राशि की—बहुलता पर निर्भर है। सम्पन्नता धन पर आधारित नहीं है—शक्ति का माप आयुधों से नहीं किया जाता—बड़प्पन क्षेत्र—विस्तार या जनसंख्या पर टिका हुआ नहीं है। किसी राष्ट्र का गौरव उसके लौह नागरिक ही होते हैं। पिछले दिनों जर्मनी, इसराइल, जापान आदि छोटे देशों ने जो ऐतिहासिक भूमिकाएँ निबाही हैं और संसार को चमत्कृत किया है उसमें वहाँ के नागरिकों का मनोबल ही प्रधान था। किसी समय भारत विश्व का मुकुट मणि था। इसमें उसके अर्थ साधन कारण नहीं थे, और न शिक्षा शिल्प, कौशल आदि का ही महत्व था उसकी संस्कृति और जीवनयापन की रीति−नीति ही वह कारण थी जिससे भारत अपने आप में स्वर्ग समतुल्य बना सतयुगी सुख−शान्ति से सम्पन्न रहा और समस्त संसार को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने में अद्भुत योगदान देता रहा। उत्कृष्ट व्यक्ति ही अपने देश, समाज एवं युग को धन्य बनाया करते हैं।
व्यक्ति का अस्तित्व गीली मिट्टी जैसा है। शिक्षा संस्कृति एवं परिस्थितियाँ उसे बल देती हैं और ऊँचा उठाती हैं। यदि इस क्षेत्र में विकृतियाँ घुस पड़ें तो फिर मनुष्य उनसे प्रभावित होकर नीचे गिरता चला जायगा। यह ठीक है कि आत्मा का अपना स्वरूप और बल है वह परिस्थितियों को अपनी अन्त शक्ति के आधार पर बदल सकता है। पर साथ ही इस मान्यता में इतना और जोड़ रखना चाहिए कि उस अन्त शक्ति को सुविकसित करने के लिए वातावरण युक्त विद्या का खाद पानी भी दिया जाना चाहिए। बिना इन साधनों के अन्तः शक्ति का बीज अपने स्थान पर पड़ा भले ही रहे वह उगेगा, बढ़ेगा और फलेगा−फूलेगा नहीं। अस्तु आत्म शक्ति के विकास का सीधा सम्बन्ध मनुष्य की विचारणा भावना एवं क्रियाशीलता में उत्कृष्टता का समावेश कर सकने वाली विद्या के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
अपने समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम विद्या के महत्व को लगभग पूरी तरह भूल गये हैं। शिक्षा के क्षेत्र में से उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया गया है। धर्म और अध्यात्म के आधार इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए ही विनिर्मित विकसित हुए थे। उनने भी अपनी दिशा बदल दी अब वे परम्पराओं के दुराग्रह में निरत हैं अथवा सस्ते कर्मकाण्डों से स्वर्ग मुक्ति का सिद्धि चमत्कार का काल्पनिक प्रसाद वितरण करते हैं। सन्त−साधु और ब्राह्मण पुरोहितों की कमी नहीं, पर वे अपने मूल कर्त्तव्य से सर्वथा विमुख होकर धन और सम्मान लूटने के जाल बुनने में निरत हैं। शिष्य और यजमान अब उनके सेवा साध्य नहीं रहे वरन् दुधारू गाय मात्र रह गये हैं। विद्या संवर्धन के लिए खड़ा किया गया धर्म क्षेत्र भी जब इन्हीं विडम्बनाओं में डूब गया तो शिक्षा शास्त्रियों समाज के कर्णधारों और राजनेताओं को किस मुँह से दोष दिया जाय?
आज की स्थिति कुछ भी क्यों न हो—मानवी प्रगति और सुख−शान्ति की आधार शिला ‘विद्या’ की अवमानना नहीं हो सकती—उसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता—निरर्थक नहीं ठहराया जा सकता। उसका महत्व जनसाधारण को समझाना ही पड़ेगा और इस तथ्य को हृदयंगम कराना पड़ेगा कि विद्या के बिना न व्यक्ति को शान्ति मिलेगी न समाज की प्रगति होगी। विद्या की आवश्यकता को झुठलाते रहना अपने ही दुर्भाग्य को सिर पर लादे रहना है। भौतिक प्रगति कितनी ही विस्तृत क्यों न हो जाय यदि मनुष्य का आन्तरिक स्तर गिरा रहा तो उस प्रगति का उपयोग संग्रहित बारूद में जल मरने जैसा ही होगा।
वैयक्तिक चरित्र निष्ठा—चिन्तन की उत्कृष्टता और क्रिया कलाप में आदर्शवादिता का जो समावेश कर सके ऐसी विद्या का बीजारोपण उत्पादन एवं अभिवर्धन इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस तथ्य को समझा जाना चाहिए और उसके लिए प्रबल प्रयत्न किया जाना चाहिए। रक्त शोधन से ही दाद, खाज, फोड़े, चकत्ते, चेचक विस्फोट अच्छे होंगे ऊपरी उपचारों का क्षणिक परिणाम ही मिलेगा। चर्म रोगों की जड़ काटने के लिए रक्त−शोधन आवश्यक है। आज की अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों, कुत्साओं और कुण्ठाओं का निराकरण मनुष्य के चिन्तन परिष्कार से ही सम्भव होगा। यह प्रयोजन विद्या तत्व की आवश्यकता समझने और उसे उपलब्ध करने के साधन खड़े करने से ही सम्भव होगा। अपने युग की यह सबसे बड़ी माँग, पुकार और आवश्यकता है। सर्वनाश की ओर दौड़ी जा रही नामक जाति को सामूहिक आत्म हत्या से विरत करने की रोकथाम विद्या अभिवर्धन के बिना और किसी प्रकार हो नहीं सकेगी। उज्ज्वल भविष्य की आशा विद्या प्राप्त करने के साधन खड़े किये बिना और किसी प्रकार फलित नहीं हो सकती।
डडडड चिन्तन के उपरान्त हरिद्वार में अवस्थित शान्ति−कुञ्ज आश्रम ने विद्या तत्व की प्रयोगशाला के रूप में अपने को प्रस्तुत किया है। विद्यालय के नाम तो सर्वत्र सुने जाते हैं, पर नाम को सार्थक करने वाली उपलब्धियाँ जहाँ से मिलती हों ऐसे संस्थान ढूंढ़ने में निराशा ही हाथ लगती है। शिक्षालय हैं—रहें और रहने चाहिएँ पर विद्यालयों की परम्परा समाप्त नहीं हो जानी चाहिए। इस अभाव से जूझने के लिए—इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए शान्ति−कुञ्ज न सत्र शृंखला के अंतर्गत एक विनम्र प्रयास प्रारम्भ किया है। आशा की जानी चाहिए कि स्वल्प साधनों से प्रारम्भ किया गया यह छोटा सा प्रयास अपने युग की एक महती आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेगा।
धूम्रपान के दुष्परिणामों की चर्चा अमेरिका में बहुत दिनों से चल रही है और जनसाधारण को सरकारी तथा गैर सरकारी स्तर पर यह बताया जाता रहा है कि इस कुटेव से केन्सर, हृदय रोग, श्वाँस रोग आदि अनेकों व्याधियाँ पीछे पड़ती हैं। अब धूम्रपान विरोधियों को तम्बाकू न पीने का एक नया लाभ और घोषित करने के लिए मिल गया है। प्रसिद्ध अभिनेता टोनोकर्टिस ने ढलती आयु में एक युवती नर्तकी लेस्ली एलोन के साथ तीसरा विवाह रचाया है। इस नव–दंपत्ति का कहना हे कि तम्बाकू न पीने वालों में प्रणय पौरुष दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहता है जबकि तम्बाकू पीने वाले उसे समय से पहले ही खो चुकते हैं।
मानवी अन्तः चेतना को उच्च भूमिका में विकसित करने पर ही यह सम्भव है कि महत्वपूर्ण भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकें। प्रगति किसी भी दिशा में क्यों न की जाय उसमें धैर्य, साहस, शौर्य, व्यवस्था, नियमितता, तन्मयता, श्रमशीलता, दूरदर्शिता जैसे गुणों की आवश्यकता पड़ती है। भले ही कार्य चोरी−चालाकी जैसे निकृष्ट ही क्यों न हों उनमें भी सफलता उपरोक्त गुणों के आधार पर ही मिलेगी। यह सोचना सही नहीं है कि दुष्टता के आधार पर सफलताएँ मिलती है और अनैतिकता के सहारे ही प्रगति होती है। अनैतिकता और दुष्टता के फलस्वरूप आत्म प्रताड़ना, जन−तिरस्कार, राजदण्ड, सच्चे सहयोग का अभाव जैसे दुष्परिणाम ही सामने आते हैं। अनैतिक समझो जाने वाले मनुष्यों को जो सफलताएँ प्राप्त होती हैं वे उनमें भी पाये जाने वाले सद्गुणों के आधार पर मिलती हैं। दिशा भली थी या बुरी यह प्रश्न पीछे का है मूल बात यह है कि सद्गुण ही अभीष्ट परिस्थितियाँ आकर्षित करते हैं और उन्हीं के सहारे विभिन्न स्तर की सफलताएँ पा सकना सम्भव होता है। सद्गुणों के अभाव में किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकती हैं यहाँ तक कि सफल चोर डाकू, छली, तस्कर भी नहीं बना जा सकता है। गुणों का नाम ही प्रतिभा है। उपार्जन और सम्वर्धन की शक्ति प्रतिभा में ही सन्निहित है।
मनुष्य का जीवन लक्ष्य सुख−शान्ति की दिशा में क्रमिक प्रगति करते हुए अपूर्णता से आगे बढ़कर पूर्णता को प्राप्त करना है। प्रखर परिष्कृत व्यक्तित्व एक प्रकार से बहुमूल्य पारस पत्थर है जो न केवल स्वयं यशस्वी होता है वरन् उसके संपर्क में आने वाला तुच्छ सा लोहा भी स्वर्ण के रूप में परिणत हो जाता है। एक व्यक्ति के संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी अपने आप को धन्य बना लेते हैं। उसके प्रकाश एवं सहयोग का लाभ उठाकर प्रसन्नता पाते एवं समुन्नत बनते हैं। ऐसा गौरवास्पद जीवन स्वयं उस व्यक्ति की सुख−शान्ति को बढ़ाता है। व्यक्तित्व को प्रखर प्रतिभावान बनाता है और अपने संपर्क से समाज में स्वस्थ परम्पराएँ उत्पन्न करके सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करता है। वस्तुतः परिष्कृत व्यक्तित्व ही किसी देश, समाज और युग की बहुमूल्य सम्पदा होते हैं।
सद्ज्ञान सम्पदा से यदि मनुष्य को सुसज्जित कर दिया जाय तो फिर वैयक्तिक और सामाजिक प्रगति के सतयुगी सत्परिणाम सर्वत्र बिखरे हुए दिखाई देंगे। सद्गुणों की विभूतियाँ भौतिक जीवन की अनेकानेक उपलब्धियाँ, स्मृद्धियाँ अनायास ही उगाती, बढ़ाती चली जायेंगी। अनेक उलझनें जो सुलझाये नहीं सुलझती परिष्कृत व्यक्तित्वों के निर्माण से अनायास ही हल हो जाती हैं और उन विपत्तियों की जड़ कट जाती है जो विभिन्न दिशाओं से खेदजनक संकटों के बादल जमा करती रहती हैं। हम जितनी जल्दी व्यक्तित्व को प्रखर बनाने वाले सद्ज्ञान की महिमा समझ लें उतना ही अच्छा है। इस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम—कोई भी प्रयास मनुष्य जाति की समस्त संसार की अन्यतम सेवा सहायता करने वाला ही सिद्ध होगा।
चिरकाल से इस मान्यता से प्रभावित रहने के कारण अखण्ड−ज्योति द्वारा—गायत्री तपोभूमि द्वारा—युग−निर्माण योजना द्वारा विविध प्रयत्न सद्ज्ञान सम्वर्धन के लिए किये जाते रहे हैं। धर्म और अध्यात्म के दर्शन और व्यवहार में जो विसंगतियाँ, विकृतियाँ घुस पड़ी हैं उन्हें निरस्त करने का अनवरत प्रयत्न किया गया है और मानवी जीवन दर्शन का शाश्वत परिष्कृत सार्वभौम एवं सर्वोपयोगी स्वरूप क्या हो सकता है यह बताने का प्रयास किया जाता रहा है। इसी प्रयोजन के लिए विचार क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और प्रचण्ड अभियान चलाया जाता रहा है। प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक शतसूत्री कार्यक्रमों की प्रक्रिया को सुसंगठित रूप से व्यापक बनाया जाता रहा है। इस दिशा में आशातीत सफलता भी मिली है।
अब उस शृंखला में एक कड़ी और जोड़ी जा रही है−जीवन निर्माण कला की—संजीवनी विद्या की व्यावहारिक शिक्षा व्यवस्था। उसे शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार से आरम्भ किया गया है। इस आश्रम की स्थापना चार वर्ष पूर्व ही हुई है। इस स्वल्प अवधि में आवश्यक इमारत बन चुकी और वे साधन एकत्रित किये जा चुके जिनसे व्यक्ति निर्माण की शिक्षा का शुभारम्भ किया जा सके। यों इस प्रशिक्षण का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है ओर उसके लिए उससे भी अधिक साधन चाहिए जितने कि शिक्षा क्षेत्र को प्राप्त हैं। शिक्षा से विद्या की गरिमा एवं उपयोगिता निश्चित रूप से अधिक है। इसलिए कम से कम उतने साधन तो विद्या क्षेत्र को मिलने ही चाहिए जितने कि विभिन्न प्रकार के शिक्षालयों को इमारतों के—शिक्षकों के—उपकरणों के रूप में उपलब्ध हैं। पर वह सौभाग्य का दिन अभी दूर ही मालूम पड़ता है जबकि सद्ज्ञान की—विद्या की—आवश्यकता को गम्भीरता पूर्वक समझा जायगा और उसे मानव जाति की सबसे बड़ी आवश्यकता समझ कर अभीष्ट साधन जुटाने को सर्व प्रथम स्थान दिया जायगा। अभी तो मनुष्य की सारी आकाँक्षाएँ पेट और प्रजनन पर केन्द्रित हैं। वासना और तृष्णा की पूर्ति के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। लोभ और मोह अपनी परिधि से आगे की कुछ बात सोचने ही नहीं देता। ऐसी सघन अंधियारी में आशा की एक किरण फूटे तो वह भी कम नहीं। एक छोटा प्रयोगात्मक प्रयास आरम्भ किया जाय तो वह भी उत्साह वर्धक है। श्रीगणेश छोटे रूप में हो जाय तो छोटा बीज बोने और छोटे अंकुर फूटने पर यह प्रतीक्षा भी की जा सकती है कि यह शुभारंभ कभी विशालकाय वट वृक्ष के रूप में परिणत हो सकेगा।
मनुष्यों की व्यक्तिगत आकाँक्षा, अभिरुचि, योग्यता की दिशा में काफी भिन्नता होती है। समाज की आवश्यकताएँ भी बहुमुखी हैं। इसे देखते हुए व्यक्ति निर्माण—परिवार निर्माण और समाज निर्माण की विविध आवश्यकताओं को सन्तुलित रूप से पूरा कर सकने की दृष्टि से शिक्षा व्यवस्था सत्र पद्धति से बनाई गई है और उसमें विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति का समन्वय किया गया है। हो तो यह भी सकता था कि किसी एक ही विषय को हाथ में लिया जाता पर जीवन बहुमुखी है—समाज बहुमुखी है। एकांकी शिक्षा योजना अपूर्ण ही रहती और शरीर का एक अंग पुष्ट शेष दुर्बल रहने पर जिस तरह निराशाजनक स्थिति रहती है वही बात एकांगी एक क्षेत्रीय शिक्षा की होती। इन सब बातों पर विचार करते हुए फिलहाल मानव समाज की पाँच महती आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान दे सकने योग्य शिक्षा प्रक्रिया का शान्ति−कुञ्ज में श्रीगणेश किया गया है।
इन दिनों जो वर्ग चल रहे हैं वे निम्न प्रकार हैं।
(1)जीवन साधना—धर्म और अध्यात्म का प्रयोजन दर्शन और व्यवहार इस प्रकार समझना जिससे मनुष्य का दृष्टिकोण ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की आदर्शवादिता के अनुरूप ढल सके। उसकी अभिरुचि, आकाँक्षा उस स्तर की ढल जाय कि चरित्रवान बनने में ही उसे सफलता, बुद्धिमत्ता और प्रसन्नता अनुभव होने लगे। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों को वह भी भली प्रकार अनुभव करे और उनसे आग एवं विष की तरह बचे रहने की जागरूकता बरते। संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचा उठे और सामाजिक कर्त्तव्यों की पूर्ति के लिए अपने समय एवं धन का एक अंश निरन्तर लगाता रहे। लोकमंगल के लिए किये गये प्रयास को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ की पंक्ति में ही सम्मिलित कर ले। आज की परिस्थितियों में मनुष्य के सामने प्रस्तुत उलझनों को कैसे सुलझाया जाय और परिष्कृत परिस्थितियाँ बनाने का प्रयत्न किस प्रकार किया जाय—सुसंस्कृत जीवन का आरम्भ और विकास कैसे किया जाय यही इस शिक्षा वर्ग का स्वरूप है। योग−साधना के समकक्ष ही जीवन साधना को समझना और उसके लिए उसी स्तर पर प्रबल प्रयास करना इस वर्ग के छात्रों को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सिखाया जायगा, इस मार्ग पर चलते हुए आने वाली कठिनाइयों की जानकारी एवं उनसे निबटने की कुशलता से इस वर्ग के छात्र भली प्रकार परिचित हो सकेंगे।
(2) वानप्रस्थ प्रशिक्षण—जिन व्यक्तियों की पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पूरी या हल्की हो गई हैं उन्हें अपनी ढलती आयु का अधिकाँश समय निस्वार्थ भाव से लोकमंगल के लिए समर्पित करना चाहिए। यह मान्यता भारतीय धर्म की मूल्य मान्यताओं का प्रमुख अंग है। आश्रम धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, संन्यास का जो स्थान है उससे भी अधिक वानप्रस्थ का है। ढलती उम्र के हर व्यक्ति को अपना यह परम पवित्र कर्त्तव्य निबाहना चाहिए और समाज के अनुदानों से लाभान्वित होने का ऋण लोकमंगल के लिए जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग लगा कर चुकाना चाहिए। उस आदर्श को पुनर्जीवित करने और उसका सरल, सुलभ एवं व्यावहारिक रूप प्रस्तुत करने की शिक्षा वानप्रस्थ शिक्षण सत्र के अंतर्गत आती है।
आज निस्वार्थ, कुशल, अनुभवी एवं भावना सम्पन्न लोक−सेवियों की बड़ी संख्या में अत्यधिक आवश्यकता है ताकि हर क्षेत्र में फैली हुई विकृतियों का निराकरण किया जा सके। प्रगति के लिए अवरुद्ध मार्गों को खोला जा सके।
पारिवारिक उत्तरदायित्वों को बिना किसी प्रकार क्षति पहुँचाये पूरा या आँशिक समय आत्म−कल्याण की—लोक−मंगल की साधना में किस प्रकार लगाया जा सकता है इसका व्यावहारिक मार्ग सुझाना और बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के अभियान में—व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण के महाप्रयास में—जिस तरह लगना है उसका स्वरूप समझाना और उसकी योग्यताएँ उत्पन्न करना इस वानप्रस्थ शिक्षा का स्वरूप है।
(3) महिला जागरण वर्ग—भारत के अशिक्षित—बाधित, असमर्थ और पिछड़े हुए नारी वर्ग को ऊँचा उठाये बिना वस्तुतः राष्ट्रीय प्रगति रुकी ही पड़ी रहेगी। आधी जनसंख्या नारी की होती है। उस वर्ग में शिक्षा दस प्रतिशत की भी नहीं है। पर्दाप्रथा, सामाजिक प्रतिबन्ध, अशिक्षा और कैदी जैसी सीमित जिन्दगी जीते रहने के कारण उनका पिछड़ापन बढ़ता ही गया है। शिक्षा और सुधार की जो थोड़ी सी चमक दिखाई पड़ती है वह मात्र शहरों में ही है। देहातों में नारी की स्थिति दयनीय है उसे उठाने के लिए भारत के भावनाशील एवं शिक्षित नारी समाज को ही आगे आना पड़ेगा।
नारी जागरण में अभिरुचि रखने वाली शिक्षित महिलाओं को ऐसी शिक्षा दी जा रही है कि वे अपने यहाँ नारी शिक्षा संवर्धन के लिए प्रौढ़ महिला पाठशाला अपने−अपने स्थानों में चलायें। उनका संगठन बनायें। साप्ताहिक सत्संगों एवं विचार−गोष्ठियों का आयोजन करें और यह बतायें कि घर−परिवार को सुविकसित बनाने के अपने मूल प्रयोजन को नारी किस प्रकार अधिक सफलता पूर्वक संपन्न कर सकती हैं। इस शिक्षण में सम्मिलित होने वाली छात्राएँ गृह प्रबन्ध, बच्चों को सुसंस्कृत बनाना, पारिवारिक स्नेह, सौजन्य की अभिवृद्धि करना—अर्थ सन्तुलन और गृह सज्जा में निपुण होना—परिवार का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य सम्भालना—हँसी−खुशी का वातावरण बनाना, प्रस्तुत समस्याओं को सुलझाना, शिक्षा एवं स्वावलम्बन की दृष्टि से प्रगति करना आदि विषयों को इस वर्ग की महिलाएँ सीखती है। संगीत, प्रवचन, धर्म−शिक्षा, गृह−विज्ञान, परिवार का सर्वतोमुखी विकास—सिलाई आदि कितने ही गृह−उद्योग−घरेलू शाकवाटिका−सर्व सुलभ व्यायामों का अभ्यास, सात्विक एवं सन्तुलित पाक विद्या की जानकारी आदि महत्वपूर्ण विषयों को इनकी शिक्षा का प्रधान अंग रखा गया है।
(4) युग गायक शिक्षा—जन जागरण के लिए—जन−मानस में सद्भावनाओं को उभारने का बहुत कुछ कार्य संगीत की सहायता से हो सकता है। गीत अभिनय के साथ यदि लोक−जागरण के लक्ष्य को जोड़कर रखा जाय तो उससे जन साधारण को आकर्षक मनोरंजन के साथ−साथ सहज सुलभ रीति से अति महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।
युग गायक वर्ग के लोग भारत के पिछड़े अशिक्षित और यातायात के साधनों से रहित छोटे देहातों में बिखरे भारत में नव−जीवन का सन्देश जितनी अच्छी तरह सुना सकते हैं, उतना और कोई नहीं कर सकता। भजन संगीतों के साथ जुड़ी हुई प्रेरणाएँ कथानकों के रूप में भी प्रस्तुत की जाती हैं तो वे और भी हृदयग्राही एवं प्रभावशाली बन जाती हैं। इस कला में प्रवीण होने की शिक्षा युग गायक वर्ग के शिक्षार्थी प्राप्त करते हैं। लोकरंजन के साथ−साथ वे लोक−मंगल की आवश्यकता भी पूरी करते हैं। इस स्तर के अधिकाधिक व्यक्तियों को उत्पन्न करना और उन्हें कार्यक्षेत्र में भेजने की सुविधा देना इस शिक्षा का स्वरूप है।
(5) लोक−शिक्षण सत्र—जीवन जीने की कला—परिवार का परिष्कार एवं समाज निर्माण के विविध उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने की संजीवनी विद्या अपने देश के हर नागरिक को दी जानी चाहिए। विशेषतया छात्र वर्ग को। क्योंकि भविष्य में उन्हीं को देश का नेतृत्व अपने हाथ में लेना है और गाँधी, जवाहर, पटेल जैसे लौह पुरुषों के रूप में विकसित होना है। यह कार्य अध्यापक या उसी स्तर की रुचि क्षमता रखने वाले लोग आसानी से कर सकते हैं। स्कूली पाठ्य−क्रमों में चरित्र−निष्ठा एवं सामाजिकता, आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश पढ़ाने वाला सहज ही करता रह सकता है। अपने अध्यापकों को हमें इस कला से प्रशिक्षित करना चाहिए। यह पन्द्रह−पन्द्रह दिन के तीन सत्र गर्मी की छुट्टियों में इसी प्रयोजन के लिए लगाये गये हैं। पहला सत्र 15 मई से 29 तक। दूसरा 30 मई से 13 जून तक। तीसरा 14 जून से 28 जून तक चलेगा। इनमें अध्यापक वर्ग के लोग ही लिए जायेंगे और वे सामान्य अध्यापक से कहीं ऊँचे उठकर अध्यापक की भूमिका निबाह सकने में समर्थ हो सकेंगे।
साथ ही इन लोगों को लेखन कला का अभ्यास भी कराया जाय ताकि वे पत्र−पत्रिकाओं में छप सकने योग्य लेख लिख सकें। युग की आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य साहित्य का सृजन कर सकें। यह एक अति महत्वपूर्ण कला है जो मात्र उच्च शिक्षा से नहीं आती वरन् इसका अभ्यास अनुभवी हाथों के नीचे रहकर करना पड़ता है। लोक−शिक्षण सत्रों के छात्रों की एक कक्षा प्रतिदिन इसी प्रयोजन के लिए चलेगी। उन्हें न केवल सैद्धान्तिक रूप से वरन् हर दिन कुछ लिखने—संशोधन करने और दिशा देने का क्रम भी चलेगा। आशा की जानी चाहिए कि इस स्वल्प अवधि में भी शिक्षार्थी कुशल लेखक बन सकने की क्षमता विकसित करके जायेंगे और न केवल लोक−शिक्षण के क्षेत्र में वरन् लेखन के क्षेत्र में भी कुछ कहने लायक काम कर सकेंगे।
से प्रत्येक शिक्षा को सर्वांग पूर्ण बनाने के लिए उसे कम से कम एक−एक वर्ष का बनाया जाना आवश्यक था। पर प्रयासों को स्वल्प समय में द्रुतगामी बनाने—थोड़े समय एवं साधनों में अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित करके कार्य क्षेत्र में उतारने—की बात को ध्यान में रखते हुए इसी निर्णय पर पहुँचना पड़ा कि प्रशिक्षण को विद्यालय स्तर का नहीं सत्र स्तर का चलाया जाय। स्थान की असुविधा को ध्यान में रखते हुए एक के बाद एक सत्र चलाये जाँय। आरम्भ इसी नीति को अपनाकर किया गया है।
जीवन साधना सत्र वर्ष में सात महीने चलेंगे—फरवरी, मार्च, अप्रैल और जुलाई से अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर तक वे दस−दस दिन के होंगे।
वानप्रस्थ सब वर्ष में दो−दो महीने के होंगे। एक महीना बौद्धिक शिक्षण प्राप्त करना पड़ेगा और एक महीने कार्यक्षेत्र में व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजे जाया करेंगे। शान्ति−कुञ्ज में उनका एक−एक महीने का शिक्षण नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी में चलेगा। तीन सत्र होंगे।
महिला जागरण सत्र तीन−तीन महीने के चलते हैं। (1) जनवरी, फरवरी, मार्च (2) अप्रैल, मई, जून (3) जुलाई, अगस्त, सितम्बर (4) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर। वे निरन्तर चालू रहेंगे। उन्हें कभी बन्द नहीं किया जायगा यह सब शृंखला अनवरत रूप से जारी रहेगी।
यही बात भजनोपदेश सत्रों के सम्बन्ध में है वे भी तीन तीन महीने के क्रम से महिला जागरण सत्रों के समानान्तर चला करेंगे वर्ष में चार सत्र होंगे। महीनों का क्रम वही है जो महिला सत्रों का है।
लेखन सत्र गर्मी की छुट्टियों में रहेंगे। इनमें प्रायः अध्यापक वर्ग के लोग आते हैं। स्कूल, कालेजों की छुट्टियाँ गर्मी के दिनों में दो महीने की होती हैं। इसमें डेढ़ महीने की अवधि में इस प्रकार के दो सत्र चलेंगे; प्रत्येक तीन−तीन सप्ताह का। 15 मई से 7 जून तक पहला सत्र और 8 से 30 जून तक दूसरा। इस सत्र में न केवल लेखन की शिक्षा रहेगी वरन् साथ ही यह भी बताया जायगा कि अपने छात्रों में नैतिक, चारित्रिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता के बीजाँकुर कैसे बो सकते हैं। उनके अभिभावकों के साथ संपर्क बनाकर नई पीढ़ी को सर्वतोमुखी प्रगति में समर्थ बनाने के लिए क्या परामर्श दे सकते हैं। यह अध्यापक लोग अपनी शिक्षा शैली में चरित्र−निष्ठा और समाज−निष्ठा का पुट देते रहें। छुट्टी के दिनों उनकी विशेष सत्र कक्षाएँ चलाते रहें—छात्रों के अभिभावकों को समय−समय पर विशेष परामर्श एवं मार्ग−दर्शन के लिए आमन्त्रित करते रहें तो उस सुगम प्रक्रिया से भी नवयुग को समीप लाने के लक्ष्य में भारी सहायता मिल सकती है। यह सब किस प्रकार सम्भव हो सकता है इसका प्रशिक्षण तीन−तीन सप्ताह के इन सत्रों में लेखन सत्र के शिक्षार्थी प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यक नहीं कि सभी अध्यापक वर्ग के हों। लेखन में और नव−जागरण अभियान में अभिरुचि रखने वाले कोई भी व्यक्ति जो ग्रेजुएट स्तर की शिक्षा प्राप्त किये हुए हों इस शिक्षण में सम्मिलित हो सकते हैं।
युग−निर्माण योजना के सदस्य—अखण्ड−ज्योति के परिजन लाखों की संख्या में है। आरम्भ में उसी परिवार के लोगों को उपरोक्त पाँचों वर्गों में प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की गई है। वे लोग नव निर्माण मिशन की विचारधारा एवं कार्य−पद्धति से परिचित हैं, वे मिशन के साहित्य को पढ़ते रहते हैं और विचारों को सुनते रहे हैं अस्तु इनके लिए इस प्रशिक्षण का महत्व समझना और प्रस्तुत मार्ग−दर्शन को हृदयंगम करना अपेक्षाकृत सरल है। वे लोग जो मिशन से सर्वथा अपरिचित हैं उन्हें कितनी ही प्रेरणाओं को समझने, ग्रहण करने में काफी कठिनाई पड़ेगी। इसलिए शिक्षार्थियों को फिलहाल अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों में से ही लिया जा रहा है। हर किसी को भी प्रवेश करने की व्यवस्था तब बनेगी जब बड़ी संख्या में आने वाले शिक्षार्थियों के लिए भी यहाँ स्थान एवं साधनों का प्रबन्ध हो जायगा।
“भय और सन्देह से समाज में कटुता, तनाव और विक्षोभ का वातावरण फैलता है। एक व्यक्ति दूसरे के प्रति, एक जाति दूसरी जाति के प्रति और एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के प्रति अनायास ही शत्रु होते चले जाते हैं। अभय का विकास हो तो बहुत सारी सामाजिक कठिनाइयाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।”
—आचार्य तुलसी
मानवी सत्ता को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) अस्थि माँस का—पंच तत्वों का बना पिण्ड जिसे स्थूल शरीर कहते हैं, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों द्वारा इसके द्वारा विविध विधि क्रियायें सम्पन्न की जाती हैं। (2) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार द्वारा विनिर्मित— शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्राओं से बना हुआ अनुभूतियों, इच्छाओं और प्रेरणाओं का आधार सूक्ष्म शरीर जिसे मस्तिष्क में अवस्थित ज्ञान संस्थान कहा जाता है। (3) आस्थाओं, मान्यताओं और आकाँक्षाओं का उद्गम जीवन का दिशा निर्देशक कारण शरीर जिसे अन्तरात्मा अथवा अन्तःकरण भी कहते हैं। संक्षेप में इन तीनों को क्रमशः क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति का उद्गम कह सकते हैं। इन तीनों का समन्वित रूप ही मानवी सत्ता है।
इन तीनों की महत्ता और सामर्थ्य एक दूसरे से अधिक एवं आगे है। स्थूल शरीर द्वारा सम्भव श्रम का मूल्य स्वल्प है। उसका कार्य पशुओं एवं मशीनों से भी लिया जा कसता है। शारीरिक श्रम द्वारा वस्तुओं का उत्पादन अभिवर्धन एवं उपयोग हो सकता है। उसकी कमाई स्वल्प है।
सूक्ष्म शरीर—मन, मस्तिष्क द्वारा हम वैज्ञानिक डाक्टर, कलाकार, व्यवसायी, नेता, विद्वान आदि विशिष्ट व्यक्ति बनते हैं। बौद्धिक क्षमता द्वारा धन ही नहीं यश पद आदि भी प्राप्त करते हैं। विनोद, मनोरंजन, प्रसन्नता, तृप्ति की सरस अनुभूतियाँ भी इसी शरीर द्वारा उपलब्ध होती हैं। वासना, और तृष्णा का उद्भव उसी में होता है और तरह−तरह की महत्वाकाँक्षाओं को पूर्ण करने वाला ताना−बाना इसी में बुना जाता है बुद्धिमान, दूरदर्शी, कुशल, चतुर और प्रतिभा सम्पन्न इसी क्षेत्र को विकसित करके बना जाता है।
सबसे ऊँचा और शक्तिशाली स्तर है कारण शरीर इसमें आस्थाओं, मान्यताओं, विश्वासों की गहरी परतें जमी होती हैं। संवेदनाऐं और आकाँक्षाऐं यहीं उत्पन्न होती हैं। शौर्य, साहस एवं आदर्शवादी प्रेरणाओं का उभार उसी क्षेत्र में आता है। अपने स्वरूप का निर्धारण−जीवनयापन की रीति−नीति—अभिरुचियाँ और आकाँक्षाओं की दिशा का निर्धारण यहीं से होता है। दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैंकि इसी केन्द्र बिन्दु से मस्तिष्क और शरीर को अपनी हलचलें आरम्भ करने की दिशा मिलती है। यह सबसे सूक्ष्म—गहरा और सामर्थ्यवान स्तर है। व्यक्तित्व का निर्धारण और निखार यहीं से सम्भव होता है। पतित या समुन्नत बनने की सारी प्रक्रिया इसी स्थान पर सम्पन्न होती है।
आमतौर से हम शरीर पर ही अधिक ध्यान देते हैं। खाने, सोने से लेकर तरह−तरह के इन्द्रिय उपभोग से इसी पिण्ड का परितोष किया जाता है। रंग, रूप, स्वर, व्यवहार का आकर्षण इसी में होता है। रुग्णता और स्वस्थता यहीं से उत्पन्न होती हैं। धन तथा दूसरे उपार्जन इसी से होते हैं इसलिए प्रायः सभी लोग शरीर को भोजन, वस्त्र व्यायाम, शृंगार, सज्जा, चिकित्सा, सुविधा आदि से सन्तुष्ट करते हैं। निम्न वर्ग के लोगों की गतिविधियाँ इसी शरीर तक केन्द्रित रहती हैं। उनके लिए खाओ, पियो, और मौज उड़ाओ का आकर्षण ही पर्याप्त होता है।
जिनका चेतना स्तर मध्यवर्ती विकास तक पहुँच चुका है उनको मस्तिष्कीय विकास का महत्व समझ में आता है ये शिक्षा प्राप्त करने, कुशल और बुद्धिमान बनने में लाभ देखते हैं और ज्ञान सम्पादन में अधिक रुचि लेते हैं, अधिक प्रयत्न करते हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर स्वाध्याय, सत्संग, पर्यटन एवं ज्ञान संचय के अन्यान्य प्रयोजनों में संलग्न रहते हैं। सम्मान पाने, नेतृत्व करने, यशस्वी होने सम्पन्न बनने, अवरोधों को निरस्त करने—और उपभोग की सरलता चखने जैसी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति का ताना−बाना यहीं बुना जाता है। इसके लिए मस्तिष्क को अधिक विकसित करने के जो भी विनोदात्मक, उपभोगात्मक एवं संवर्धनात्मक साधन उपलब्ध हो सकते हैं उन्हें निरन्तर जुटाया जाता रहता है।
तीसरे सर्वोच्च साथ ही सबसे शक्तिशाली स्तर कारण शरीर का स्वरूप समझना और उसे परिष्कृत करने का प्रयत्न करना मात्र उच्चभूमिका में विकसित व्यक्तियों के लिए ही सम्भव होता है। इस स्तर की गरिमा एवं उपयोगिता भी समझ में नहीं आती और न प्रत्यक्ष कोई प्रतिफल ही दीखता है। भाव संवेदनाऐं, आस्थायें समूचे व्यक्तित्व को दिशा देती हैं, उसका स्वरूप निखारती हैं और शरीर एवं मस्तिष्क को अमुक कार्यों में संलग्न होने के लिए—अमुक चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं इसे समझना और अनुभव करना हर किसी के बस−बूते का नहीं है। अस्तु यह स्तर अविकसित अछूता ही पड़ा रहता है। परिस्थिति वश उसका जैसा भी कुछ भला बुरा निर्माण हो गया उसी लीक पर जीवन संकट चलता लुढ़कता रहता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदत सुधरती नहीं, जैसी बातें अक्सर सुनी जाती हैं जिनका अर्थ होता है आस्था स्तर की गहराई में उतर कर वहाँ सुधार परिष्कार करना अशक्य हैं। बात बहुत अंशों में है भी ऐसी ही। जब आस्था स्तर के बारे में कुछ जाना समझा ही नहीं गया है उसका प्रतिफल एवं उपयोग भी सोचने में नहीं आया है तो उस संदर्भ में कुशलता भी कैसे पाई जाय? आदतों से मजबूर, स्वभाव संस्कार का गुलाम बना मनुष्य ऐसे ही भौंड़ा, घिनौना, असंबद्ध, असंस्कृत एवं अस्त−व्यस्त असफल जीवन जीकर यों ही मौत के मुँह में चला जाता है। व्यक्तित्व के—अस्तित्व के—इस मूल उद्गम की सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान सत्ता को यदि समझा गया होता तो लगता कि अतीन्द्रिय, चमत्कारी, दैवी सिद्धि शक्तियों की अद्भुत चर्चाएँ सुनी जाती हैं वे और कुछ नहीं केवल हमारे कारण शरीर के विकासोन्मुख उभार है। अब इनका थोड़ा थोड़ा विवेचन वैज्ञानिक क्षेत्रों में मैटाफिजिक्सपैरा साइको लौजी, साइकोमैटरी, ह्यूमन मिस्टी आदि के रूप में होने लगा है। अचेतन मन की ज्ञानेन्द्रिय शक्ति के सम्बन्ध में जो रहस्यमय परतें विज्ञान द्वारा खोली जा रही हैं और मानवी सत्ता को अद्भुत अप्रकाशित संभावनाओं से सम्पन्न कहा जा रहा है वह वस्तु साधारण शरीर का ही उथला सा शोध प्रयास है। अगले दिन यह समझा और स्वीकारा जायगा कि व्यक्तित्व का उद्गम जिन भाव संवेदनाओं और आस्थाओं पर अवलम्बित है वस्तुतः वही मानवी सत्ता का मूल आधार है। इसे विकसित करने पर शारीरिक कायाकल्प—मानसिक प्रत्यावर्तन एवं अति सूक्ष्म मर्म स्थल में अनुभव किये जाने वाले स्वर्ग और मुक्ति जैसे दिव्य वरदानों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। लघु से महान—नर से नारायण एवं आत्मा से परमात्मा बना जा सकता है। संसार के महामानवों का शारीरिक, मानसिक स्तर सामान्य रहा है वे धनवान, विद्वान या साधन सम्पन्न भी नहीं थे उनकी विशेषताओं एवं सफलताओं का केन्द्र आस्था संस्थान का परिष्कृत स्तर ही रहा है। यही है वह मर्म स्थल जिसकी स्थिति के अनुरूप मनुष्य दीन दुर्बल बना रहता है—असुर या पिशाच बनता है—दिव्य जीवन के प्रकाश में अन्तः एवं बाह्य जगत को ज्योतिर्मय बनाता है।
शरीर शास्त्र, मनः शास्त्र की उथली गहरी जानकारियाँ प्रायः सभी लोगों को होती हैं पर आत्म सत्ता के उत्थान पतन का आधार एवं उपाय कदाचित ही कोई जानते हैं। यों अध्यात्म विज्ञान की—ब्रह्म विद्या की संरचना इसी प्रयोजन के लिए हुई थी और योग तथा तप की बहुमुखी साधनात्मक प्रक्रिया इसी प्रयोजन के लिए गढ़ी गई थी। पर अब तो उसका स्वरूप भी विकृत हो गया और जो लाभ उस विज्ञान द्वारा कारण शरीर के विकास के लिए मिल सकता था वह अब सम्भव नहीं रहा। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का अपना दर्शन हैं और अपना प्रयोग। कभी उसे ठीक तरह समझा गया था और प्रयोग का सुव्यवस्थित आधार मौजूद था। उस आधार पर अनुभवी तत्वदर्शी अपने छात्र शिक्षार्थियों का मार्गदर्शन करते थे। उन्हें साधना संलग्न करते थे और अपनी निज की आत्म शक्ति का अनुदान देकर उनकी सफलता सुनिश्चित बनाते थे। भारतीय साधना विज्ञान की धुरी यही थी। हठ योग द्वारा शरीर का—राजयोग से मस्तिष्क का और ब्रह्म योग द्वारा अन्तःकरण का परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का सरल एवं व्यावहारिक रूप कर्म योग—ज्ञान योग एवं भक्ति योग था। साधनात्मक विशिष्ट तपश्चर्याऐं एवं व्यावहारिक जीवन की परिष्कृत रीति−नीति यही थी योग एवं तप की मूल आधार, जिसे सही रूप में अपनाकर किसी समय भारतीय मनीषियों ने इस देश की धरती पर स्वर्ग का, सतयुग का अवतरण किया था और मनुष्य में देवत्व का उदय सम्भव कर दिखाया था।
भारत की प्राचीन गरिमा उसके अध्यात्म वैभव के साथ जुड़ी हुई है। आरोग्य, शिक्षा, उत्पादन, व्यवसाय, शासन, आचार, कला−कौशल, शिल्प−विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में उन्होंने असाधारण प्रगति की थी और अपनी उपलब्धियों से समस्त संसार को लाभान्वित करने के उनने प्रबल प्रयास किये थे। पर उस भौतिक प्रगति में असाधारण सफलता प्राप्त करने का—उसका सदुपयोग कर सकने का श्रेय उनके आत्मिक उत्कर्ष को ही दिया जायगा कारण कि उनका चिन्तन एवं कर्त्तव्य इसी आधार पर विकसित हुआ था। यह एक सनातन शाश्वत एवं अकाट्य तथ्य है कि अन्तरात्मा का गहन स्तर ही व्यक्तित्व को दिशा देता एवं समर्थ बनाता है। अति महत्वपूर्ण—अतिमानव कहे जाने वाले व्यक्ति अपने इसी स्तर का दिशा विशेष में परिपुष्ट करके आगे बढ़े हैं। जिसका अन्तस्—अहम्—खोखला होगा वह प्रचुर साधन सम्पन्न होते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से ओछा, बौना एवं गया गुजरा ही बना रहेगा। ऐसे मनुष्य भौतिक सफलताएँ, सम्पदाएँ प्राप्त करलें तो भी उनका सदुपयोग नहीं कर पाते। संग्रह, व्यसन, अपव्यय जैसे दुर्गुण बढ़ने से—ईर्ष्यालुओं एवं शत्रुओं से घिर जाने के कारण वे सामान्य व्यक्तियों से भी अधिक चिन्तित, उद्विग्न पाये जाते हैं। व्यक्तित्व रहित स्थिति में कन्धे पर लद पड़ा वैभव किसी के लिये भी मात्र अभिशाप सिद्ध होगा उससे अपने लिये और दूसरों के लिए विपत्तियाँ ही खड़ी होंगी।
व्यक्ति की सर्वांगीण प्रगति एवं सुख−शान्ति के लिए उसका अन्तरात्मा—कारण शरीर—परिष्कृत, परिपुष्ट होना चाहिए। समाज के स्वस्थ, सुदृढ़ और सर्वतोमुखी विकास के लिए सुसंस्कारी व्यक्तियों का बाहुल्य होना चाहिए। इस आवश्यकता को पूरा किये बिना प्रगति के भौतिक प्रयास असफल ही नहीं होंगे उलटे अधिकाधिक विग्रह उत्पन्न करेंगे। उत्थान और पतन व्यक्ति और समाज का एक साथ होता है। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। समग्र प्रगति एवं सुख−शाँति के लिए व्यक्तियों का परिष्कृत बनाये बिना कोई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हाथ नहीं लगेंगी।
उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने—एवम् प्रयोगात्मक अनुभव करने का शान्ति कुञ्ज के संस्थापक का कुछ कहने लायक अवसर मिला है। उसके जीवन का अधिकाँश समय इसी क्षेत्र में प्रयोग परीक्षण, अनुभव, अभ्यास करते हुए बीते हैं। अन्तःकरण को प्रभावित करने वाले अध्यात्म विज्ञान के दार्शनिक एवं प्रयोग पक्ष को विवेचनात्मक दृष्टि से पढ़ा परखा है। इन दिनों इस क्षेत्र में अन्धाधुन्ध अंधविश्वास, गुरुडम एवं अवाँछनीय प्रतिपादनों का जो घटाटोप घुस पड़ा है उसे भी उसने दुखी मन से देखा, परखा और छाँटा है। एक शब्द में यों कहा जा सकता है कि अध्यात्म को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने, परखने का उसका प्रयास ऐसा रहा है जिसे अप्रामाणिक अवैज्ञानिक एवं सन्देहास्पद नहीं कहा जा सकता। उसके उपार्जन का लाभ यदि सर्वसाधारण को दिया जाय तो कम से कम इतना तो निश्चित है कि किसी को कोई हानि नहीं होगी। पात्रता और प्रयत्नशीलता के अनुरूप उससे लाभ ही मिलेगा।
कारण शरीर को—अन्तरात्मा को सुविकसित बनाने की दिशा में कहीं भी—कुछ भी प्रयत्न न होने को खेदजनक ही कहा जा सकता है। विशेषतया भारत भूमि जो सदा सर्वदा से समस्त संसार को प्रकाश देती रही वही अब अपनी इस महत्वपूर्ण विशेषता को खो बैठे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जायगा। इससे भी बड़ी दुर्घटना यह है कि अध्यात्म के स्थान पर प्रतिगामी पलायनवादी, परावलम्बन शोषक अंधविश्वास आविराजे और उपासना क्षेत्र को दयनीय दुर्गति का शिकार बनना पड़े। इन विडम्बनाओं को निरस्त करने के लिए आवश्यक समझा गया कि अध्यात्म के शाश्वत सत्य और तथ्य को जन साधारण के सम्मुख रखा जाय और उसके प्रयोग परीक्षण को कसौटी पर कस कर खरा खोटा सिद्ध होने दिया जाय।
इस विचार मंथन ने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि शाँति कुँज में एक ऐसी प्रशिक्षण व्यवस्था चलाई जाय जिसमें अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वालों को उस महाविज्ञान का स्वरूप समझने एवं प्रयोगात्मक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिले। यह प्रयोग अब से लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व आरम्भ किया गया। उसे प्राण प्रत्यावर्तन साधना सत्र के नाम से प्रस्तुत किया गया। पाँच−पाँच दिन के शिविर लगाये गये और यथा सम्भव अधिकारी व्यक्तियों को ही उसमें प्रवेश दिया गया। यों कौतूहल वश उथले दर्जे के लोग भी उसमें कुछ तो घुस ही पड़े। तीर्थ स्थानों में पर्यटन करने वाले और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद माँगने वाले भी रोके नहीं जा सके। छद्म वेष में वे भी धक्का−मुक्की करके इस वैज्ञानिक प्रयोग प्रयोजन में धँस पड़े। फिर भी सन्तोष इसी बात का है कि उन्हें यथा सम्भव निरस्त किया गया और उनकी संख्या इतनी नहीं बढ़ पाई कि मूल प्रयोग ही नष्ट हो जाता।
प्राण प्रत्यावर्तन सत्र पाँच−पाँच दिन के लिए लगाये गये थे उनमें कुल मिलाकर दो हजार के करीब व्यक्तियों ने शिक्षण प्राप्त किया। शान्ति कुँज में उसका प्रयोग प्रारम्भ में क्रियात्मक रूप से समझाया गया और कहा गया कि इस चिन्तन एवं साधन को अपने−अपने घरों पर देर तक चालू रखें। उसके परिणामों के बारे में सूचित करते रहें। यह प्रयोग पिछले दिनों छोटे किन्तु व्यवस्थित रूप में चलता रहा है। उसके जो परिणाम सामने आये हैं उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह प्रशिक्षण तीन चौथाई परिणाम में बहुत ही सफल रहा। उसे उत्साह वर्धक और आशातीत भी कहा जा सकता है। असफलता अथवा स्वल्प प्रगति के भी परिणाम सामने आये हैं पर वे इतने कम हैं कि उनके आधार पर प्रयोग को असफल नहीं कहा जा सकता।
जून 73 की अखण्ड−ज्योति का पूरा अंक प्राण प्रत्यावर्तन साधन प्रक्रिया के परिचय रूप में प्रकाशित किया गया था। उसमें ने केवल सिद्धान्तों का वर्णन था वरन् साधन पद्धति का स्वरूप एवं विवेचन भी सर्वसाधारण के सामने रखा गया था ताकि जो लोग हरिद्वार नहीं आ सकें तो उस आधार पर स्वयं ही साधना कर सकें और जो आ सकते हैं वे तथ्यों की पूर्व जानकारी प्राप्त करके आवें ताकि यहाँ उन्हें कुछ भी अनजाना न लगे और अभ्यास में सरलता प्रतीत हो।
प्रत्यावर्तन सत्र में वस्तुतः गायत्री की पंचमुखी—पंचकोशी उच्चस्तरीय साधना पद्धति सिखाई गई थी। अन्नमय कोश—प्राणमय कोश—मनोमय कोश—विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यह पाँच आवरण आत्मा पर चढ़े हुए हैं इनका अनावरण होने पर आत्मसाक्षात्कार हो सकता है। कोश का एक अर्थ भण्डार या खजाना भी हो सकता है। पाँच शक्ति स्रोत हमारे अन्तःक्षेत्र में अनन्त सम्भावनाओं को छिपायें हुए पड़े हैं। इन्हीं को पंचमुखी गायत्री के रूप में चित्रित किया गया है। नचिकेता और यम के उपनिषद् संवाद में जिस पंच अग्नि विद्या की चर्चा की गई है वह इन पाँच कोशों का ही शक्ति विवेचन है। षट्चक्रों में से एक आज्ञाचक्र स्वतन्त्र भी माना गया है और शेष मेरुदण्ड से सम्बन्धित पाँच चक्र इन पाँच कोशों के ही शक्ति संस्थान हैं। पुराण देवताओं में पाँच को अग्रिम पंक्ति में रखा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, और दुर्गा को पंच देव कहते हैं। उनके द्वारा प्राप्त हुए वरदानों के चमत्कारी लाभों की कथा−गाथाओं का पुराणों में विशद् वर्णन है। वस्तुतः अलंकारिक रूप से यह देव वर्णन मनुष्य के भीतर विद्यमान पाँच कोशों का ही फलवान सत्परिणाम है। हर व्यक्ति की अपनी ही आत्मसत्ता परिपुष्ट होकर उपयोगी वरदान प्रस्तुत करती है। इसी को देव अनुकम्पा कहा जाता है। पाँच कोशों की साधना ही गायत्री की पंचमुखी उच्चस्तरीय साधना है। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में इसी को प्रारम्भिक जानकारी पाँच दिनों के प्रशिक्षण में कराई जाती रही है और जप योग, बिन्दु योग, लय योग, प्राण योग, ब्रह्म योग के पाँच योगाभ्यासों के रूप में इनकी साधना का शुभारम्भ कराया जाता रहा है।
गायत्री उपासना में स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों को संलग्न करके उसे जपयोग के रूप में परिणत करना—सूर्यार्ध्य दान के माध्यम से समर्पण योग की धारणा—प्रभात कालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणों का तीनों शरीरों में प्रवेश और उनसे समग्र व्यक्तित्व का ज्योतिर्मय होना—खेचरी मुद्रा के माध्यम से उलटी जिह्वा को तालु से लगाकर सोमरस का पान करना—कामधेनु गौर का स्तन पान करते हुए आनन्द अमृत को चूसना—मस्तिष्क में कैलाश, मानसरोवर अवस्थित शिव की अथवा क्षीर सागर में शेषशायी विष्णु की भावना करना यह लय योग की अनुभूति है। अजपा जाप सोऽहम् साधना प्राणयोग में आती है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की द्विविधि ध्यान धारणा से ब्रह्मयोग की साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया। अभ्यास तो अपने−अपने घरों पर ही लम्बे समय तक करना था। पाँच दिन का स्वल्प समय सर्वसाधारण की व्यस्तता को ध्यान में रख कर निर्धारित किया गया था। उतने से भी अभीष्ट उद्देश्य की भली प्रकार पूर्ति होती रही और शिक्षार्थी बहुत कुछ सीखकर तथा बहुत कुछ अनुदान पाकर गये। मात्र सिखाना ही तो इन सत्रों का प्रयोजन नहीं था। इस मार्ग पर चल सकने की आवश्यक शक्ति का अतिरिक्त आधार मिलना भी अभीष्ट था। इस दृष्टि से भी शिक्षार्थी खाली हाथ नहीं गये। सब मिलाकर यह प्रशिक्षण क्रम ऐसा बना रहा जिसे सन्तोषजनक उत्साहवर्धक और सफल सार्थक कहा जा सके।
बँधी हुई दिनचर्या परम सात्विक आहार बिहार, गंगा स्नान और गंगा जल पान, उच्चस्तरीय वातावरण, सद्भाव सम्पन्न व्यक्तियों का सान्निध्य, स्नेह मैत्री और आदर्शवादी भाव भूमिका का समन्वय शान्ति कुँज की ऐसी विशेषताएँ हैं जिनमें रहने मात्र से अन्तःकरण में उत्कृष्टता के उभार आते हैं। फिर पाँच घण्टे की सघन साधना और प्राण भरी प्रेरणाप्रद शिक्षा व्यवस्था की गंगा यमुना मिल जाने से उसका संवर्धन होना स्वाभाविक ही है। प्रत्यावर्तन सत्रों में आने वाले प्रायः सभी लोग इस विशेषता का लाभ लेकर गये। यहाँ बोये गये उगाये गये बीजाँकुरों को उन्होंने अपने−अपने यहाँ जाकर पोसा, सींचा और बढ़ाया तदनुसार कितने ही शिक्षार्थियों ने अनुभव किया कि हम नव जीवन लेकर आये पुरानी स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन पाया।
प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों की शृंखला अब कुछ दिन के लिए स्थगित कर दी गई है। जो किया गया उसकी प्रतिक्रिया गम्भीरतापूर्वक देखी परखी जा रही है और उसमें यदि कुछ सुधार परिवर्तन आवश्यक हुआ तो अगली बार वैसा हेर−फेर करने की बात सोची जा रही है। यों शान्ति−कुँज की आधार शिला ही आत्मिक प्रगति के साधन जुटाने के लिए रखी गई है। वैसा प्रशिक्षण छुट−पुट रूप में सदा ही चलता रहेगा। विशिष्ट साधकों को उनकी सुविधा, स्थिति, अभिरुचि एवं पात्रता को ध्यान में रखते हुए यह सुविधा मिलती रहेगी कि वे यहाँ आकर साधना करने, मार्ग दर्शन परामर्श पाने की सुविधा ले सकें। यह क्रम विशिष्ट व्यक्तियों तक सीमित रहेगा। पर सर्वसाधारण के लिए अभी इन सत्रों की शृंखला स्थगित कर दी गई है। पुनः कब चालू की जायगी यह सुविधा और आवश्यकता के अनुसार यथा समय घोषित किया जायगा। अभी तो जिन पाँच प्रकार के प्रशिक्षणों की तात्कालिक आवश्यकता समझी गई है उन्हें आरम्भ किया गया है। इन शिक्षाओं का क्षेत्र अधिक व्यापक है। उसमें सामान्य स्तर के शिक्षार्थी भी आत्म निर्माण और समाज निर्माण की क्षमता विकसित कर सकते हैं। अगले दिनों कुछ समय तक जिन पाँच सत्रों की शृंखला शान्ति कुँज में चलेगी उसका उल्लेख अगले पृष्ठों पर अंकित है।
जीवन जीने की कला—जिसे अध्यात्म की भाषा में संजीवनी विद्या कहा जाता रहा है—मनुष्य की सर्वप्रथम चेतनात्मक आवश्यकता है। अर्थ उपार्जन करके सुविधा साधन इकट्ठे किये जाते हैं—शिक्षा सम्पादन तक अनेकानेक प्रयास जानकारी, बढ़ाने मस्तिष्क को विकसित करने के लिए किये जाते हैं—आहार−विहार की सुव्यवस्था शरीर निर्वाह के लिए करते हैं। भौतिक जीवन की आवश्यकताएँ शरीर मस्तिष्क और अर्थ साधनों को सुव्यवस्थित रखने से पूरी हो जाती हैं पर चेतनात्मक प्रखरता उस विद्या से आती है जो दृष्टिकोण को परिष्कृत करती है और चिन्तन एवं कर्त्तृत्व को सही दिशा में चलने के लिए नियंत्रित प्रशिक्षित करती है। जीवन विद्या का जिसे जितना ज्ञान अभ्यास है वह उतना ही अधिक सफल सार्थक जीवन जियेगा। अन्तरंग क्षेत्र में उसे महानता का आनन्द और बहिरंग क्षेत्र में बड़प्पन का श्रेय सम्मान मिलेगा।
कोई भी कला−कौशल मात्र सुनने, समझने से ही उपलब्ध नहीं हो जाता उसके लिए अनुभव, अभ्यास भी सम्पादित करना पड़ता है। जीवन विज्ञान को बौद्धिक रूप से जाना समझा जाय सो ठीक है—पर साथ ही यह भी जानना आवश्यक है कि उसे अभ्यास में लाने की, अनुभव में—अभ्यास में उतारने की प्रबल चेष्टा की जाय। तभी वे जानकारियाँ व्यावहारिक जीवन में उतरेंगी और आदतों का रूप धारण करेंगी। ज्ञान को व्यवहार में परिणत करने का अनवरत प्रयास साधना कहलाता है। यों साधारणतया योग और तप के क्रिया−कलापों को ‘साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः यह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी भी क्षेत्र में अनन्य तत्परता के साथ लगना और अपने व्यक्तित्व को उस दिशा में भली प्रकार प्रवीण अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जायगी। जिंदगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना—अभ्यास और आदतों को तदनुरूप ढाल लेना—जीवन साधना कही जायगी। वस्तुतः यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण संजीवनी विद्या कहते हैं। इसी की दार्शनिक पृष्ठभूमि ‘ब्रह्मविद्या’ के नाम से कही जानी जाती रही है।
शास्त्रों में ब्रह्मविद्या का महात्म्य और विवेचन विस्तार पूर्वक किया गया है “यह कोई कल्पना−विहार या जादुई क्रिया−कलाप नहीं है। दृष्टिकोण के चिन्तन क्षेत्र को उच्चस्तरीय पृष्ठभूमि पर अवस्थित करने की—आस्था निर्धारण की—दार्शनिक भूमिका है। योग और तप का द्विविधि क्रिया−कलाप इसी प्रयोजन को अभ्यास में उतारने की साधना है। अध्यात्म का विवेचनात्मक और साधनात्मक विशाल काय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वरीय जीव प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन—जीवन लक्ष्य का निर्धारण, गति विधियों का निर्धारण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति मर्यादा निरूपित होती है उस मान्यता और आकाँक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है अध्यात्म का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है—देव भूमिका में विकसित होता है।
ब्रह्म विद्या के दो चरण हैं अध्यात्म और धर्म। इन्हीं को उत्कृष्ट जीवनयापन सम्बन्धी मान्यताओं एवं रीति−नीतियों का समन्वय कह सकते हैं। हमें क्या सोचना चाहिए और क्या करना चाहिए उसी का ऊहापोह तत्व ज्ञान के साधना विधान के माध्यम से किया गया है। प्राचीन काल की यही पद्धति थी। युग के अनुरूप अब उसे सरल सुबोध बनाना पड़ेगा और आज की स्थिति के अनुरूप समझाने और व्यवहार में लाने की शैली का विकास करना होगा।
प्राचीन काल में शास्त्र निर्देश और आप्त वचन प्रमाण भूत थे। उससे आगे किसी सन्देह या तर्क की गुंजाइश नहीं रहती थी। श्रद्धा ही उन दिनों का आधार था। पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। विज्ञान के समानान्तर बुद्धिवाद भी बढ़ा है। विज्ञान ने युग को नई दिशा दी है कि जो कुछ जाना माना जाय वह प्रत्यक्ष, प्रमाणभूत एवं तर्क सम्मत होना चाहिए। इस नई कसौटी पर शास्त्र−निर्देश आप्त वचन और परम्परा प्रचलन तीनों ही अमान्य ठहरते हैं। आधार उलट गया। अब किसी को भी तर्क और प्रमाण रहित आप्त वचन स्वीकार नहीं। विज्ञान को पीछे नहीं धकेला जा सकता और बुद्धिमान से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। अस्तु अध्यात्म को—तत्व ज्ञान को अब बुद्धिवादी युग के अनुरूप शैली से प्रतिपादित करना होगा। यही बात धर्माचरण के सम्बन्ध में भी है। प्राचीन काल में व्यक्ति को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता था—समाज का ढाँचा जिस स्तर का था उसके अनुरूप क्रिया−कलापों का निर्धारण तत्कालीन नीति सदाचार के रूप में हुआ था।
अब परिस्थितियों में भारी अन्तर आ गया। व्यक्ति जिस वातावरण से प्रभावित होता है और समाज ने अपना जो रूप बना लिया है उससे प्राचीन काल के प्रवचनों की तुलना करने पर जमीन आसमान जितना अन्तर दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में धर्माचरण का—आस्था निरूपण का पुराना स्वरूप यथावत् नहीं रखा जा सकता। शाश्वत सत्यों को यथावत् रखते हुए भी उनके प्रतिपादन एवं व्यवहार में समयानुकूल अन्तर आवश्यक है। ऐसे हेर−फेर अनादि काल से लेकर अद्यावधि निरन्तर होते रहे हैं। अनेक अवतारों को देवदूतों को सामयिक परिवर्तन की प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिए ही बार−बार आना पड़ता है। वे अपने पूर्ववर्ती का आदर्श तो स्थिर रखते हैं पर व्यवहार में समय की विकृतियों को संस्कृति में बदलने के लिए अपने प्रतिपादनों एवं क्रिया कलापों का ऐसा निर्धारण करते हैं जो नवीन लगता है। समय की आवश्यकता को पूरा करता है। दैवी मार्ग दर्शन का—सृष्टि सन्तुलन का यह प्रयास महान प्रतिभाओं द्वारा समय−समय पर होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।
जो समस्याएँ प्राचीन काल में थीं वे अब नहीं हैं। जो अब हैं वे प्राचीन काल में नहीं थीं। ऐसी दशा में प्राचीन काल के अध्यात्म और धर्म की आत्मा को यथावत् रखते हुए भी उसे समझने और करने की पृष्ठभूमि दूसरी ही तरह बन सकती है। यह प्राचीन और नवीन का समन्वय होगा। इसकी तुलना सर्प की केंचुली उतरने अथवा जरा−जीर्ण स्थिति को नव−यौवन में बदलने वाले कायाकल्प से की जा सकती है।
प्राचीन काल में समस्त शिक्षा सघन वनों के एकान्त उद्यानों में बने गुरुकुलों में होती थी। अभिभावक अपने बच्चों को पाँच वर्ष की आयु से लेकर पच्चीस वर्ष के होने तक—बीस वर्ष की लम्बी अवधि के लिए निष्णात आचार्यों को सौंप देते थे। वे ही उनके शिक्षण एवं निर्वाह का प्रबन्ध करते थे। अब वैसी शिक्षा प्रक्रिया का चल सकना कठिन है। कितने ही उत्साही गुरुकुलों ने वैसा ही कुछ सोचा और आरम्भ किया पर वह प्रयास सर्वथा असफल हो गये। अब प्रायः समस्त गुरुकुल सरकारी मान्यता प्राप्त हाईस्कूल कालेजों के रूप में हैं। कोई अपवाद हो तो दूसरी बात है। इसमें दोष किसी का नहीं परिस्थितियों का है अब परिष्कृत शिक्षा पद्धति चलेगी तो उसमें युग की आवश्यकता का समावेश करना होगा प्राचीन काल का अन्धानुकरण किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता।
व्यक्ति अपने अवकाश के समय तीर्थ स्थानों में निर्धारित पर्वों पर होने वाले धर्मानुष्ठानों में सत्र सम्मेलनों में सम्मिलित होते थे और प्रस्तुत समस्याओं को सुलझाने एवं भावी प्रगति का सामयिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए वहाँ पहुँचते थे और निष्णात तत्व दर्शियों द्वारा आवश्यक मार्ग−दर्शन एवं प्रोत्साहन प्राप्त करते थे। अब तीर्थों का धर्मायोजनों का रूप कैसा विकृत हो गया इसे कोई भी आँख खोलकर देख सकता है। कुम्भ जैसे मेले कितना धन, श्रम, समय बर्बाद करते हैं और कितना पाखण्ड, अन्ध विश्वास फैलता हैं उसे सहज ही देखा, जाना जा सकता है। यातायात और परिवहन की सुविधा—व्यवसायी दृष्टिकोण और प्रचार प्रपंच ने मिलकर इन मेलों का जो स्वरूप बना दिया है उससे अब प्राचीन स्थिति के शिक्षण सत्रों की स्थिति में लौट सकना असम्भव हो गया है। अब उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए नये साधन ही खड़े करने होंगे।
प्राचीन काल की कथा−शैली कीर्तन पद्धति−चले, पर उसमें देवताओं के गुणानुवाद गाने भर से काम नहीं चलेगा। इन्हें व्यक्ति और समाज की आवश्यकता पूर्ण कर सकने की क्षमता एवं प्रेरणा से भरा−पूरा बनाना पड़ेगा। षोड्श संस्कारों को, परिवार निर्माण की समग्र शिक्षा देने के लिए और पर्व त्यौहारों के उत्सव आयोजनों को, समाज निर्माण के लिए लोक मानस में उभार उत्पन्न करने के लिए उपयोगी बनाना होगा। उपासना की प्रक्रिया आस्थाओं के अभिनव निर्माण के लिए नियोजित की जाय। योग और तप जैसी साधनाएँ आदतों में घुसी विकृतियों को निरस्त करके परिष्कृत व्यक्तित्व के अनुरूप गुण, कर्म स्वभाव ढालने की मनोविज्ञान सम्मत शैली के अनुरूप विकसित की जायें। इसमें नवीन कुछ नहीं है। लक्ष्य वही है जो उस धर्म कलेवर को खड़ा करने वालों का था, नवीनता केवल समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसे युग के अनुरूप बना देने भर की है। इस परिवर्तन के बिना यथा स्थिति में खड़ा पड़ा रहने वाला हमारा “घोड़ा अड़ेगा—पान सड़ेगा।” कहावत है− घोड़ा अड़ा क्यों? पान सड़ा क्यों? उत्तर प्रख्यात है— ‘फेरा नहीं गया था।’
अध्यात्म चिन्तन और धर्म कर्तृत्व को युग के अनुरूप बनाने के लिए हम प्रबल प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए चार कार्य पद्धति अपनाई गई हैं। (1) वाणी द्वारा−सत्संग व्यवस्था के अनुरूप सत्र शिक्षा पद्धति (2) अपने घरों पर स्वाध्याय कर सकने योग्य विचारोत्तेजक स्वाध्याय सामग्री (3) आयोजनों और सम्मेलनों द्वारा जनमानस को उद्वेलित करने वाला लोक शिक्षण (4) रचनात्मक और संघर्षात्मक आन्दोलन का सुव्यवस्थित अभियान। यह सारी प्रक्रिया पिछले दिनों गायत्री तपोभूमि मथुरा में स्थापित युग−निर्माण योजना द्वारा संचालित होती रही है। भविष्य में भी सुविस्तृत क्रिया−कलाप वहीं से चलेगा। इसमें से थोड़े से विशिष्ट कार्य अब हरिद्वार में आरम्भ किये जा रहे हैं। इसे अधिक बढ़े हुए कार्य का वर्गीकरण विभाजन भी कह सकते हैं और यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति द्वारा व्यक्ति को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने वाली थोड़ी सी गतिविधियों का संचालन शान्ति कुँज के नये आश्रम से होगा।
दस−दस दिवस के जीवन साधना सत्र—दो−दो महीने वाले वानप्रस्थ प्रशिक्षण सत्र—तीन−तीन महीने के महिला जागरण सत्र—तीन−तीन महीने के संगीत अभिनय सत्र, पन्द्रह−पन्द्रह दिन के लेखनी सत्र−शिक्षण प्रक्रिया को अध्यात्म और धर्म की सनातन ज्ञान गंगा का युग संस्करण ही कहा जाना चाहिए। इसे चिर प्राचीन और चिर नवीन का संगम समन्वय कहा जा सकता है। इस पद्धति को संजीवनी विद्या का नाम दिया जा सकता है। मृतक को जो जीवित बनादे वह संजीवनी, जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करने के साथ−साथ जो उसे विकसित परिष्कृत बनाये वह संजीवनी, संजीवनी विद्या का शुभारम्भ इस युग की एक अत्यन्त महत्व पूर्ण घटना कही जा सकती है। इसका श्री गणेश कितना ही छोटा क्यों न हो आशा की जानी चाहिए कि यह चिनगारी अगले दिनों प्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेगी और युग की विकृतियों को भस्मसात करके छोड़ेगी। इस शिक्षा प्रक्रिया को नवयुग की एक क्षीण किन्तु सूर्योदय की सुनिश्चित सम्भावना की घोषणा कहा जा सकता है। समय बतायेगा कि यह सुखद कल्पना नहीं वरन् एक सुनिश्चित सम्भावना का उद्घोष हैं।
एक खिला हुआ फूल दूसरा पका हुआ फल—एक सौंदर्य की मादकता दूसरा रस का कलश। दोनों की अपनी−अपनी सुवास है और अपनी अपनी उपयोगिता।
फूल चाहे कि मैं सदा फूल ही बना रहूँ—और फल चाहे की सदा वह पेड़ की ही शोभा बढ़ाता रहे तो वे दोनों ही मूर्ख हैं। फूल के लिए उचित है कि वह खिले और दर्शकों की आँखों में उत्साह उत्पन्न करे। फल के लिए उचित है कि वह पके और क्षुधार्तों को तृप्ति प्रदान करे।
हम धरती के प्राणी, स्वर्ग के देवताओं की कल्पना करते हैं और उनकी क्षमता तथा सुख−सुविधाओं को मनुष्य की अपेक्षा असंख्य गुनी मानकर इस बात के लिए ललचाते हैं कि हम भी उनकी स्थिति में होते तो कितना अच्छा होता। ठीक यही बात इस संसार के अन्य प्राणी सोच सकते हैं कि हमारी तुलना में मनुष्य कितना सौभाग्यवान है यदि उसकी स्थिति हमें मिल जाती तो कितने आनन्दित होते। सचमुच बात ऐसी ही है। अन्य जीव उदर पूर्ति के लिए हर दिन घोर परिश्रम करते हैं। तनिक सी विपन्नता आने पर उन्हें भूखा रहना पड़ता है। सुविधा के नाम पर शरीर और प्रकृतिगत अन्य जीवित रहने योग्य सुविधाओं के अतिरिक्त उनके पास और कुछ भी नहीं है। तनिक सी प्रकृति प्रतिकूलताएँ उन्हें कुचल−मसलकर रख देती है जबकि मनुष्य प्रकृति की विपन्नताओं को चुनौती देता हुआ उसकी रहस्यमय शक्तियों को क्रमशः करतलगत करता चला जा रहा है।
प्राणी का यह असाधारण सौभाग्य है कि उसे मनुष्य जन्म मिले। जिसे यह सुअवसर मिला है उसे यह जानना चाहिए कि इसे किस प्रकार जिया जाय। इसका समुचित लाभ कैसे उठाया जाय। यह ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। इसे संसार के समस्त ज्ञानों में सर्वोपरि एवं सर्व प्रथम आवश्यकता का कहा जा सकता है। जिसे जीना नहीं आया कहना चाहिए उसे कुछ नहीं आया। भले ही अन्यान्य विषयों में उसकी जानकारी एवं कुशलता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हो। जिसे जीना आता है उसे विपरीत परिस्थितियों की—दूसरों के विरोध असहयोग की शिकायत नहीं करनी पड़ती। मनुष्य की अपनी सत्ता मूलतः समस्त सम्भावनाओं से भरी−पूरी है। श्रेष्ठता और समर्थता के समस्त बीज उसके भीतर विद्यमान हैं जिन्हें उगाकर वह अपने व्यक्तित्व को कल्प−वृक्ष जैसा समस्त सुविधाएँ सफलताएँ विनिर्मित कर सकने वाला बना सकता है। विपरीत परिस्थितियों और व्यक्तियों को सुधारने की अथवा उनके साथ ताल−मेल बिठाकर प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह करने की व्यवस्था वह सहज ही उत्पन्न कर सकता है। उसकी शारीरिक, मानसिक क्षमताएँ इतनी प्रखर हैं कि उनका सही उपयोग करने पर अपने इर्द−गिर्द ऐसा वातावरण बना सकता है जिसे सन्तोषजनक उल्लासपूर्ण एवं उत्साह वर्धक कहा जा सके।
शारीरिक, मानसिक स्वस्थता बनाये रखना—निर्वाह के समुचित साधन जुटाये रहना एवं साथी सम्बन्धियों के साथ मधुर सहयोग की स्थिति बना लेना पूरी तरह उसकी अपने हाथ की बात है। उसी तरह उपयुक्त कामों का चुनाव एवं उसको पूरा करने की सफलता प्राप्त करना उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। इसके लिए उसे अतिरिक्त रूप से कुछ करना या पाना नहीं है मात्र जीवन जीने की कला को जानना भर है। यदि मनुष्य इतना कर सके तो सुखी, सन्तुष्ट और सफल जीवन जी सकने में कोई सन्देह नहीं रह जायगा।
साधारण औजारों या मशीनों को चलाने के लिए उस संदर्भ में आवश्यक जानकारी एवं कुशलता उपार्जित करनी पड़ती है। एक से एक बढ़कर बहुमूल्य मशीनें मौजूद हैं पर उनका लाभ केवल वे ही उठा सकते हैं जिनको उन्हें चलाने या सुधारने की जानकारी प्राप्त है अन्यथा वे यन्त्र कूड़े के ढेर की तरह निरुपयोगी रहेंगे। इतना ही नहीं यदि उन्हें अनाड़ीपन से चलाया गया तो विपत्ति भी उत्पन्न करेंगे। मोटर कितनी ही कीमती क्यों न हो यदि चलाना न आने पर भी कोई उसे चलाने लगे तो निश्चित रूप से उसे तोड़−फोड़कर रख देगा और अपने लिए प्राण−संकट उत्पन्न करेगा। मानवी सत्ता इतनी बहुमूल्य—इतनी सम्वेदनशील और जटिल है कि इसे यदि ठीक तरह उपयोग में लाया जा सके तो उतना कुछ पाया जा सकता है जिसके आधार पर उसे सर्वथा सार्थक और सफल कहा जा सके। इसके विपरीत उसका अनाड़ी उपयोग इतने रोग−शोक जमा कर देगा कि उस विपन्न स्थिति की तुलना में पशु−पक्षियों और कीट−पतंगों की जिन्दगी को भी अच्छी कहा जा सके।
ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं जो अगणित कष्ट संकटों से भरा विपन्न जीवन जीते हैं और हर घड़ी अपने दुर्भाग्य को रोते हैं। मौत को याद करते हैं और निरन्तर अशान्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे जो अपनी स्थिति से सन्तुष्ट हों और आनन्द, उल्लास के—सन्तोष, उत्साह के दिन व्यतीत कर रहे हैं। आश्चर्य होता है कि सृष्टि का मुकुटमणि बना हुआ—समस्त सुविधा सम्भावनाओं से भरा−पूरा मनुष्य क्यों दुख दुर्भाग्य के दिन काटता है। क्यों नहीं अपनी सर्वोपरि विभूतियों का लाभ उठाकर निरन्तर आनन्द मग्न रहता? इस प्रश्न का उत्तर ही है—जिन्दगी जीने की कला से अपरिचित होना। अपने आपे का अनाड़ीपन से प्रयोग करना। मोटर सञ्चालन से अपरिचित व्यक्ति जब उस धकापेल चलाने का दुस्साहस करता है तो स्वभावतः दुर्घटनाएँ होती हैं। टक्कर खाने, खड्ड में गिरने, किसी को कुचल देने, मशीन को तोड़−फोड़ लेने जैसी विपत्तियाँ उसके सामने आयेंगी ही। यह भी संभव है कि वह उस कीमती यन्त्र को क्षत−विक्षत करने के साथ साथ अपने ही हाथ पैर तोड़ ले अपने लिए ही प्राण संकट उत्पन्न कर ले।
हममें से अधिकाँश मनुष्य यही करते हैं और विविध−विधि रोग−शोक उत्पन्न करते हैं—अपनी करनी भोगते और अपने प्रारब्ध को रोते हैं। वस्तुतः यह दयनीय स्थिति अपनी ही पैदा की हुई होती है। जिन पशु−पक्षियों ने मनुष्य की आधीनता स्वीकारी नहीं की है उन वन्य जीव−जन्तुओं में से कोई बीमार नहीं पड़ता। सृष्टि के नियमानुसार जन्मते−मरते तो वे भी हैं, पर बीमारी का दुख नहीं भुगतते। केवल मनुष्य ही है जो आये दिन चित्र−विचित्र बीमारियों का दुख भुगतता है। इसका कारण स्वास्थ्य रक्षा के नियमों से अपरिचित होना या उनकी अवज्ञा करना ही होता है। संयम और व्यवस्था को अपनाने वाले सहज ही निरोग दीर्घजीवन प्राप्त करते हैं। आहार−विहार सम्बन्धी भूलों को समझ और सुधार लेने वाले कठिन और पुरानी बीमारियों से बिना किसी खर्चीले उपचार के सहज ही अपना खोया स्वास्थ्य प्राप्त कर लेते हैं। इसके विपरीत अप्राकृतिक रीति−नीति अपनाये रहने वाले जो लोग मात्र दवादारू के बल पर रुग्णता से छुटकारा पाना चाहते हैं उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। बीमारी और दुर्बलता भी वर्तमान सभ्यता का एक अंग बन गई है। प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहने वाली शरीर सञ्चालन रीति−नीति अपनाने का स्वाभाविक परिणाम वह है जो व्यापक रुग्णता के—अकाल मृत्यु के रूप में हमें भुगतना पड़ता है। इसमें अधिकाँश दोष अपने अनाड़ीपन का ही होता है—विपरीत परिस्थितियों का बहुत कम।
मस्तिष्क यों शरीर का एक अवयव मात्र है, पर उसकी क्षमता ऐसी है जिसे अद्भुत और आश्चर्यजनक कहा जा सके। उसी से हम सोचते, निर्णय करते एवं दिशा ग्रहण करते हैं। स्वभाव और आदतें इसी क्षेत्र की उपज हैं। किस परिस्थिति से क्या सम्वेदना अनुभव की जाय, यह निष्कर्ष निकालना इसी यन्त्र का काम है। असन्तोष−सन्तोष, भय−भीरुता, निर्भय, शौर्य साहस, आशंका−निश्चिन्तता, दुर्भाग्य−सौभाग्य, निराशा−आशा, खिन्नता−प्रसन्नता जैसी विपरीत मनःस्थिति वस्तुतः घटना−क्रम एवं परिस्थिति से उतनी सम्बद्ध नहीं होती जितनी कि सोचने की आदत पर निर्भर रहती है। एक जैसी परिस्थिति में रहने वाले दो व्यक्तियों में एक सन्तुलित रहता है और दूसरा अति खिन्न उद्विग्न दिखाई पड़ता है। परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्रों में से एक उसे संयोग या आलस की प्रतिक्रिया मात्र मानकर उससे अधिक जागरूकता और श्रमशीलता की प्रेरणा प्राप्त करता है और अगले वर्ष उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होता है। जबकि दूसरा छात्र फेल होने के आघात से तिल−मिलाकर पढ़ाई ही छोड़ बैठता या आत्महत्या जैसे कुकृत्य करने पर उतारू हो जाता है। यदि परिस्थितियों की ही यह प्रतिक्रिया रही होती तो सभी अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों को एक जैसे कदम उठाने चाहिए थे, पर एक ने एक तरह सोचा और कदम उठाया दूसरे ने दूसरी तरह समझा और वैसा कदम बढ़ाया। इसमें उनके चिन्तन की—मानसिक स्थिति की—भिन्नता ही मूल कारण थी। एक दुर्जनता के पथ पर चलते हुए पतन के गर्त में गिरता है और दूसरा सज्जनता की नीति अपना कर क्रमशः प्रगति के उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है उसमें कोई अन्य कारण नहीं मात्र चिन्तन की धारा, मस्तिष्क की गतिविधि ही प्रमुख आधार होती हैं।
कुछ लोग गरीबी के बीच भी हँसी−खुशी का उल्लास भरा जीवन जीते हैं जबकि दूसरे विपुल सम्पदाओं के स्वामी होते हुए भी निरन्तर खीज और झुँझलाहट से उद्विग्न दिखाई पड़ते हैं इसका कारण धन नहीं उनका परिष्कृत अथवा विकृत दृष्टिकोण ही होता है। घटिया स्तर के कुटुम्बियों के साथी सहायकों के बीच भी कितने ही लोग ताल−मेल बिठा लेते हैं और सुधार की यथासम्भव चेष्टा करते हुए शान्ति सन्तुलन बनाये रहकर दिन गुजारते हैं इससे विपरीत कितने ही ऐसे होते हैं जो अपनी इच्छा के विपरीत किसी की राई−रत्ती भिन्नता भी सहन नहीं करते और जहाँ तनिक सा मतभेद दीखा कि आग−बबूला हो जाते हैं—मरने−मारने पर उतारू होते हैं। ऐसे असहिष्णु व्यक्ति क्रोध और असन्तोष की आग में निरन्तर जलते रहते हैं अपने को शत्रुओं से घिरा देखते हैं—जबकि दूसरे लोग घोर मतभेदों और भिन्नता के रहते हुए भी सहमति के कितने ही आधार खोज लेते हैं। जिनके साथ रहना ही है उनके साथ कामचलाऊ समन्वय स्थापित कर लेते हैं।
सोचने की उत्कृष्टता का नाम ही स्वर्ग है। हँसते मुसकराते हुए सुख−चैन की जिन्दगी केवल वे ही जी सकते हैं जिनने अपना चिन्तन−दृष्टिकोण सही बना लिया। विकृत मनःस्थिति का ही दूसरा नाम नरक है। परिस्थितियाँ भली बुरी कैसी भी क्यों न हों ऐसे लोग स्वयं रोष आवेश में जल रहे होंगे और अपने सम्बन्धियों को भी जला रहे होंगे। जिसे मस्तिष्क की क्षमता को समझने और उसके सदुपयोग की कला आती है वह देवोमय स्वर्गीय जीवन जी रहा होगा। विपरीतताओं के साथ घोर संघर्ष करने में भी उसकी आन्तरिक शालीनता यथा स्थान बनी रहेगी।
शरीर और मन का सदुपयोग करने की कला में अभ्यस्त व्यक्ति निरोग और प्रसन्न चित्त पाये जायेंगे। उनका व्यक्तित्व भारी भरकम और प्रतिभा सम्पन्न दिखाई देगा। देह का परिपुष्ट या सुन्दर होना उतना आवश्यक नहीं, जितना संयम द्वारा उत्पन्न हुई स्फूर्ति। मन को प्रसन्न करने के लिए सुविधा साधनों का बाहुल्य उतना अभीष्ट नहीं, जितना दृष्टिकोण का परिष्कृत स्तर। परिस्थितियाँ अपने हाथ में नहीं, जो चाहते हैं वही उपलब्ध हो जाय यह आवश्यक नहीं। पर यह पूरी तरह अपने हाथ की बात है कि अपने शरीर और मन की गतिविधियों को दूरदर्शिता पूर्ण आधार पर निर्माण निर्धारण करें और प्रतिकूलताओं के बीच अनुकूलता को उगा सकने में सफलता प्राप्त करें। शरीर और मस्तिष्क का नियन्त्रण−सञ्चालन जिसे आ गया वह एक कुशल ड्राइवर की तरह अपनी जीवन सत्ता रूपी मोटर को प्रगति के राज मार्ग पर द्रुतगति से दौड़ता हुआ चला जायगा और सर्वतोमुखी सफलता प्राप्त करेगा। जिसे यह सब नहीं आता वह दूसरों को दोष देता हुआ रोते−कलपते मौत के दिन पूरे करेगा।
अर्थ कष्ट से अधिकाँश लोग दुखी पाये जाते हैं। वे अकस्मात अप्रत्याशित धन लाभ होने की आशा लगायें बैठे रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि योग्यता और श्रमशीलता की वृद्धि करके ही अधिक धन कमाया जा सकता है। इस ओर से उदासीन रहकर सही स्वाभाविक अर्थोपार्जन नहीं हो सकता। शारीरिक, मानसिक श्रम सन्तुलन को अधिक प्रखर बनाकर आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ा जा सकता है। मधुर और मिलनसार स्वभाव बनाकर ऐसे सहयोगी बढ़ाये जा सकते हैं जिनकी सद्भावनाएँ आर्थिक प्रगति में भी सहायता कर सकें। इसके अतिरिक्त आमदनी से खर्च कम रखने के सम्बन्ध में कड़ाई बरती जा सकती है। अन्धाधुन्ध बच्चे पैदा करके अपने पैरों अर्थ संकट की कुल्हाड़ी मारने से कोई भी दूरदर्शी बचा रह सकता है। ठाठ−बाठ के—व्यसन और अपव्यय के कितने ही खर्च ऐसे किये जाते रहते हैं जिन्हें हटाकर सादगी का शालीन रहन−सहन अपनाया जा सकता है और उस बचत से उपयोगी आवश्यकताएँ पूरी करते हुए सुख पूर्वक रहा जा सकता है। आमदनी बढ़ाने की क्षमता विकसित करने की अपेक्षा लोग खर्च बढ़ाने में उत्साह दिखाते रहते हैं और अर्थ संकट में फँसते हैं। यदि अर्थ व्यवस्था के सम्बन्ध में सुनियोजित दृष्टिकोण रहे तो वे लोग जो दरिद्रता का निरन्तर कष्ट भोगते रहते हैं, अपने बोये अर्थ संकट से छुटकारा पा सकते है। कम आजीविका वाले ऐसे कितने ही लोग मिल सकते हैं जो अपने लिहाफ की लम्बाई देखकर पैर पसारते हैं और सुखपूर्वक गहरी नींद सोते हैं।
दाम्पत्य−जीवन को सुखद, सरस एवं सहयोग पूर्ण बनाये रहने का कितना अधिक लाभ है इसे समझा नहीं गया। उसका संयुक्त परिवार की सुव्यवस्था पर—भावी पीढ़ियों पर—अर्थ व्यवस्था पर—घर की प्रसन्नता, प्रफुल्लता एवं प्रगति पर कितना प्रभाव पड़ता है इसका लेखा−जोखा उन परिवारों की तुलना करके लिया जा सकता है जहाँ असहयोग के कारण सम्पन्नता होते हुए भी सब कुछ नारकीय बना हुआ है और सहयोग के कारण जहाँ स्वर्ग की झाँकी देखने को मिल रही है वहाँ कई बार तो रूप, यौवन, शिक्षा, कुशलता, सम्पन्नता आदि के रहते हुए यह उपलब्धियाँ दाम्पत्य−जीवन में स्नेह, सामंजस्य बना रहने के कारण ही सम्भव हुई होती हैं।
माता का अपनी सन्तान के प्रति वात्सल्य होना जिस प्रकार स्वाभाविक है उसी प्रकार पति−पत्नी के बीच भी भावनात्मक एकता की कड़ी सहज ही जुड़ी होती है। सरसता अर्थ व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था आदि कितने ही कारण एक दूसरे को घनिष्ठता की जंजीरों में जोड़ते हैं। नर नारी का प्रकृति प्रदत्त, आकर्षण और दोनों की संयुक्त उपार्जित सन्तान इस कड़ी को और भी मजबूत बनाती है। इतनी सहज स्वाभाविकता के रहते तनिक सी सावधानी उदारता और मृदुलता बरतने पर दोनों एक दूसरे के गुलाम बनकर रह सकते हैं। एक दूसरे को सुखी और सुविकसित बनाने में भारी योगदान दे सकते हैं। इस आधार पर छोटे घर घरौंदों में स्वर्ग की झाँकी देखी जा सकती है। किन्तु यह सौभाग्य कितनों को मिलता है अधिकाँश पति−पत्नी विवशता के कारण ही आपस में जुड़े रहते हैं लोक−लाज, अर्थ व्यवस्था, कामलिप्सा, सन्तान बन्धन आदि के कारण ही किसी प्रकार दिन काटते रहते है। भीतर ही भीतर उनमें घोर असन्तोष और उपेक्षा−भाव भरा रहता है—स्नेह, सद्भाव का नाम भी नहीं होता—लोक−व्यवहार मात्र निभता रहता है। इस दयनीय स्थिति से वे बच सकते हैं जिन्हें जीवन जीने की कला का ज्ञान है और यह जानते हैं कि साथी का दिल किस सद्व्यवहार से जीता जा सकता है।
सन्तानें कितनों की सुसंस्कृत होती हैं यह तलाश करने पर निराशा ही हाथ लगती है। पुरानखण्डी लोग वंश चलाने, मरने पर पिण्ड मिलने जैसी थोथी बातों को भी सच मानते हैं और सन्तान न होने पर या लड़कियाँ होने पर आँसू ढुलकाते हैं। अधिकाँश की सन्तानें अनियन्त्रित काम−सेवन का अनिच्छित दुष्परिणाम मात्र होती हैं। कितने ही उनमें कौतूहल, मनोविनोद और समय काटने की बात सोचते हैं। कई इसे विधि का विधान मानते हैं कुछ बेटों की कमाई खाने और बुढ़ापे में सहारा मिलने की बात सोचते हैं, कई का अनुमान होता है समर्थ बेटे अपने छोटे भाई−बहिनों की सहायता करके उनकी जिम्मेदारियों का बोझ हलका करेंगे। बड़ी पदवी पाकर उनका गौरव बढ़ायेंगे। इसी प्रकार के अन्यान्य विचारों में उलझे हुए लोग सन्तान सुख के स्वप्नों में खोये रहते हैं और बच्चे बढ़ाने और उनके लिए अधिक कमाने के कोल्हू में पिसते रहते हैं। यही है आज की सन्तानोत्पादन विडम्बना की परिधि। लोग बच्चों के लिए अर्थ साधन जुटाते रहने भर को अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानते रहते हैं।
ऐसे कितने लोग हैं जो सन्तान को इसलिए उत्पन्न करते हैं कि राष्ट्र को सुयोग्य, सुसंस्कृत नागरिक भेंट करके अपने को धन्य बनायें। हाड़−माँस के पिण्ड को भोजन, वस्त्र, शिक्षा, शादी आदि की व्यवस्था जुटाकर नर−पशु के रूप में बड़ा कर देना और अपने पैरों खड़ा कर देना कुछ कठिन काम नहीं है, पर यह बड़ी बात है कि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से सुविकसित सन्तान का निर्माण किया जाय। ऐसा करना उन्हीं के लिए सम्भव है जो जीवन तत्व को और उसके साथ जुड़े हुए उच्चस्तरीय उत्तरदायित्वों का महत्व समझते हैं। सन्तान का विकास वैसा ही है जैसा किसी कुशल माली द्वार छोटे पौधों का सुरम्य उद्यान के रूप में सुविकसित करना। इसके लिए अनवरत साधना करनी पड़ती है और बच्चों के व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनाने पर हर घड़ी ध्यान रखना पड़ता है उन्हें उपयुक्त मार्ग−दर्शन ही नहीं परिष्कृत वातावरण भी देना पड़ता है। यह सब बहुत झंझट भरा काम है इसमें बच्चों का नहीं अपना निर्माण एक ऐसे अच्छे साँचे के रूप में करना पड़ता है जिसमें सुन्दर खिलौने ढाले जा सकें। इसकी योग्यता और तैयारी जिसकी हो सकती है जिसने जीवन के महत्व और उत्तरदायित्वों की गम्भीरतापूर्वक समझा है और उसके लिए अपने आपको तत्परतापूर्वक प्रशिक्षित किया है। उन्हीं को सन्तानोत्पादन का सच्चा प्रतिफल मिल सकता है वे ही एक सुयोग्य पिता को मिल सकने वाले श्रेय सन्तोष का लाभ ले सकते हैं।
यहाँ चर्चा सामान्य औसत दर्जे के मनुष्यों की हो रही है। शारीरिक स्वस्थता, मानसिक सन्तुलन, अर्थ सुविधा, दाम्पत्य सरसता, सुयोग्य सन्तान, वयोवृद्धों का सन्तोष, संयुक्त परिवार में सामंजस्य, विनोद सन्तोष भरा वातावरण, श्रेय सम्मान, सफलताओं का गौरव कौन नहीं चाहता, आमतौर से इन्हीं की इच्छा आवश्यकता को पूरा करने में पूरी जिन्दगी खप जाती है। किन्तु इसी एक राह पर चलने वाले असंख्यों में से कोई विरला ही मंजिल पूरी करता है अधिकाँश तो जंजाल में भटकते हुए दिन गुजारते हैं और हर क्षेत्र की असफलताओं पर खिन्न रहते—असन्तुष्ट असफल जीवन जीते मौत के मुँह में चले जाते हैं। असफलताओं का दोष परिस्थितियों पर व्यक्तियों पर थोपने से अपने को निर्दोष समझने की सान्त्वना तो मिल जाती है, पर उस आत्म प्रवञ्चना से भी कुछ बनता नहीं। थोड़ा सा जी हलका कर लेने पर भी दूसरों पर दोष मढ़ने से भी स्थिति जहाँ की तहाँ रहती हैं उसमें कुछ अन्तर नहीं आता।
धर्म, अध्यात्म, परलोक इससे आगे का विषय है। अन्तःक्षेत्र में प्रसुप्त पड़ी हुई रहस्यमय क्षमताओं का विकास करने से मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमताएँ प्राप्त करता है और अति मानव स्तर पर जा पहुँचता है जहाँ उसे महामानव, ऋषि अथवा देवता कहा जाने लगता है। अपने समय के समाज को मोड़ता है—युग का नेतृत्व करता है और उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाता है। आत्मबल, मनोबल का अपना महत्व है। मनस्वी क्या नहीं कर गुजरते। ओजस्वी लोगों के लिए क्या कुछ कठिन होता है। आत्मबल चेतन जगत का सबसे बड़ा बल है। उसे प्राप्त करके मनुष्य इतना बलवान हो जाता है जिसकी तुलना में कोई बलिष्ठ से बलिष्ठ सत्ता ठहर नहीं सकती। इन उपलब्धियों को उपार्जित करने के लिए भी जीवन साधना ही करनी पड़ती है। लोगों का यह भ्रम नितान्त मिथ्या है कि अमुक कर्मकाण्डों के विधि−विधानों से जादुई जप−तप करने से चमत्कारी, आत्म−शक्तियाँ प्राप्त होती हैं अथवा कोई देवी−देवता सिद्ध होकर मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। वस्तुतः उपासनात्मक कर्मकाण्डों और विधि−विधानों के पीछे छिपी हुई साँकेतिक प्रेरणा यही है कि जीवन का अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप निखारा जाय। उस पर चढ़े कषाय कल्मषों का आवरण उतारा जाय। यह प्रक्रिया पूजा−पाठ से या जिस भी उपाय से पूरी हे सकेगी उसी से आत्मोत्कर्ष का—आत्म−साक्षात्कार का—अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने का प्रतिफल प्राप्त होगा। उसी से वे लाभ प्राप्त होंगे जो विभिन्न उपासनाओं के फल महात्म्य रूप में गाये बताये गये हैं। वस्तुतः योग और तप का प्रयोजन व्यक्ति की आस्था, आकाँक्षा, भावना, दृष्टि, मान्यता एवं तत्परता को उत्कृष्टता के स्तर तक पहुँचाता है। इस स्थिति पर पहुँचते हुए मनुष्य का आत्मा ही परमात्मा की पदवी प्राप्त करता है और वही आत्मपरिष्कार का—युग सन्तुलन का महान् प्रयोजन पूरा करता है।
निस्सन्देह मानव जीवन एक दिव्य उपहार है। ईश्वर के पास इससे बड़ा और कोई वरदान प्राणी को देने के लिए है नहीं। समस्त संसार की प्रकृति सम्पदा एक ओर और मानवी सत्ता में बीज रूप से प्रसुप्त सम्भावनाएँ एक ओर रखकर यदि तोली जाँय तो मनुष्य की चेतनात्मक गरिमा ही भारी पड़ेगी। महर्षि व्यास की यह उक्ति अक्षरशः सत्य है कि−”एक रहस्य बताते है—मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ श्रेष्ठ नहीं है।” पर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यह श्रेष्ठता जीवन विद्या के आधार पर ही जीवित जाग्रत है और प्रखर हो सकती है। इस संजीवनी विद्या का सीखना और सिखाया जाना इतना महत्वपूर्ण है कि इससे बढ़कर और कोई श्रेय साधन हो ही नहीं सकता।
जीवन रथ का संचालन सही रीति−नीति से किया जाय तो इसके प्रत्येक चरण पर प्रगति और समृद्धि के—प्रसन्नता और प्रफुल्लता के आधार उपलब्ध होते चले जायेंगे। मनुष्य जीवन से बढ़कर सुविधाओं की सम्भावनाओं से भरा−पूरा सौभाग्य और कुछ है ही नहीं।
रुचिकर एवं सुविधाजनक वस्तुओं की बहुलता के साथ हम सुखी रहने की बात सोचते हैं और सम्बन्धित व्यक्तियों को आज्ञानुवर्ती इच्छानुकूल देखना चाहते हैं। पर यह दोनों ही बातें लगभग असम्भव हैं। रुचिकर वस्तुओं की एक सीमा तक ही प्राप्ति हो सकती है पर हमारी तृष्णा तो असीम है। अग्नि में घी डालने की तरह वह सफलताओं से तृप्त नहीं होती वरन् और भी अधिक की कामना करके अभाव और असन्तोष यथावत बनाये रहती है।
लोग यह भूल जाते हैं कि जीवन को सुविधाओं और सफलताओं से भर देने वाली विभूतियाँ हमारे भीतर भरी पड़ी हैं। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करके हम सच्चे अर्थों में विभूतिवान बन सकते हैं। अपने दृष्टिकोण को दूरदर्शिता और विवेकशीलता के आधार पर सुसंस्कृत बनाकर हम ऐसे व्यक्तित्व विकसित कर सकते हैं जिसके आगे अभावों और विद्वेष—विग्रहों की जड़ ही कट जाय। प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदला जा सकता है। इसके दो उपाय हैं—एक यह कि प्रबल पुरुषार्थ करके इच्छानुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त करें। दूसरा यह कि उपलब्धियों और आवश्यकताओं का सन्तुलन मिलाकर सन्तोषपूर्ण निर्वाह का क्रम बना लें। इन दोनों तथ्यों का समन्वय भी किया जा सकता है। एक ओर प्रगति के लिए पुरुषार्थ दूसरी ओर साधनों और आवश्यकताओं का सन्तुलन। इस प्रकार दायाँ−बायाँ कदम बढ़ाते हुए—प्रसन्नता भरा जीवन जी सकते हैं और क्रमिक प्रगति से सन्तुष्ट रह सकते हैं।
भौतिकवादी दृष्टिकोण यह है कि हम सही हैं गलती और कमी बाहर है। लोगों को परिस्थितियों को हमारे अनुकूल बनना चाहिए। इसके विपरीत अध्यात्मवादी दृष्टिकोण यह है कि हमारे प्रयत्न पुरुषार्थों की—स्वभाव और चिन्तन की त्रुटियों से गुत्थियाँ उलझती हैं समस्याएँ उत्पन्न होती हैं और विपन्न विपरीतताएं सामने आ खड़ी होती हैं। अस्तु व्यक्तियों और परिस्थितियों को सुधारने के साथ−साथ अपनी दुर्बलताओं, विकृतियों और विसंगतियों को सुधारने पर जुट जाना चाहिए। हम सर्वथा सही ही हैं यह मानना अत्यन्त हानिकारक, अवाँछनीय, अवास्तविक और पाखण्डपूर्ण है जितनी कमियाँ हम दूसरों में सोचते हैं शायद उससे अधिक दूसरे हमारे सम्बन्ध में सोचते हैं। दोनों पक्ष अपनी−अपनी बात पर अड़े रहे—विपरीत मान्यताएँ बनाये रहे तो मिलन−समन्वय का कभी अवसर ही न आवेगा और खाई चौड़ी होती जायगी।
यही बात अभीष्ट साधनों के सम्बन्ध में है। जिस स्तर की—जितनी मात्रा में वस्तुएँ हमें अभीष्ट हैं वे इच्छा मात्र से तो नहीं मिल जातीं। सामयिक परिस्थितियों का हमारे स्तर एवं प्रयत्न का भी बहुत कुछ आधार उपलब्धियों के साथ जुड़ा रहता है। यह सब कुछ इच्छा करने मात्र से जादुई ढंग से पूरा नहीं हो सकता। साधना से सिद्धि मिलती है। अनवरत पुरुषार्थ—जिसमें उपलब्धियों के लिए श्रम और अपने स्तर का विकास दोनों ही बातें सम्मिलित हैं, यह ठीक प्रकार किया जाय तो समयानुसार उसका प्रतिफल अनुकूल साधन मिलने के रूप में सामने आ सकता है। सो भी सुनिश्चित नहीं क्योंकि हमारी आकाँक्षाएँ अनियन्त्रित होती है, वे न अपने स्तर, प्रयास, साधन, का अनुमान लगाती हैं और न परिस्थितियों की बात सोचती हैं। ऐसे ही आँधी तूफान की तरह उमड़ पड़ती हैं चाहने मात्र से ही यदि सब कुछ मिल जाया करे तो फिर मनुष्य−मनुष्य न कहलाये तब उसका नाम कल्पवृक्ष कहलाये। बुद्धिमान मनुष्य वस्तुस्थिति को देखता समझता है। तदनुकूल इच्छाओं को नियन्त्रित करता है। ऐसे ही लोग सुख सन्तोष की साँस लेते हुए हर्षोल्लास भरा समय गुजारते हुए हलका फुलका, हँसता हँसाता जीवन जीते देखे गये हैं। यही है जीवन−विद्या का स्वरूप और प्रतिफल जिसे पाकर मनुष्य जन्म की सफलता, सार्थकता अनुभव की जा सकती है।
संजीवनी विद्या का आधार यह है कि हम अपने व्यक्तित्व को—दृष्टिकोण को परिष्कृत करने में जुट जाँय और गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर अधिकाधिक सुविकसित करते चले जाँय ताकि सामान्य साधनों की—अनगढ़ साथियों की, स्थिति रहते हुए भी हर्षोल्लास को खोये बिना शान्ति पूर्वक निर्वाह किया जा सके। जीवन विद्या का यह निर्वाह पक्ष है। प्रगति पक्ष यह है कि कैसे हमारी वे क्षमताएँ विकसित हों जो प्रगति का मूलभूत आधार सिद्ध होती रही हैं और होती रहेंगी।
देवताओं के रूप में वस्तुतः हमारे सद्गुणों को ही चित्रित किया गया है। उन्हीं की साधना वास्तविक देव साधना है। अदृश्य, अविज्ञात और अनिश्चित अस्तित्व वाले देवता प्रसन्न होकर वरदान देते हैं या नहीं यह संदिग्ध है पर यह पूर्णतया सुनिश्चित है कि हमारे सद्गुण रूपी देव पग−पग पर आकाश कुसुम बरसाते और ऐसी उपलब्धियाँ प्रदान करते हैं जिन्हें देखकर दूसरे लोग दाँतों तले उँगली दबायें और हम स्वयं अपनी प्रगति पर गहरा सन्तोष अनुभव करें।
जीवन के अनेक पहलू हैं। जिनमें मनःस्थिति को सन्तुलित बनाना सर्वप्रथम है। आलस्य और प्रमाद में कटने वाले समय को किस प्रकार अभीष्ट प्रगति की दिशा में सुनियोजित की जाय? मन में उत्साह और शरीर में स्फूर्ति कैसे पैदा हो? मस्तिष्क को अशान्त बनाये रखने वाले उद्वेगों से छुटकारा कैसे मिले? चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, रोष, असन्तोष जैसे मनोविकारों से छुटकारा पाकर निर्भय निश्चिन्तता की मनःस्थिति कैसे सम्भव हो? टूटे हुए मनोबल को शौर्य, साहस भरा कैसे बनाया जाय? अकारण तुनकने, खीजने, चिड़−चिड़ाने और आवेश आक्रोश में भर जाने की—अपने को और दूसरों को जलाने वाली आग्नेय आदत से कैसे पिण्ड छूटे? किसी भी काम में जम कर चित्त न लगने निरन्तर बन्दर की−सी उछल−कूद करने वाली चंचल अस्थिरता किस प्रकार निरस्त हो? कठिन प्रसंगों में भी सन्तुलन बनाये रखने की—विपत्ति से छुटकारा पाने का उपाय सुझाने वाली—विवेकशीलता का विकास कैसे हो? अपनी समस्याओं को हल करने के लिए दूसरों के सामने नाक रगड़ने की दीनता के स्थान पर स्वाभिमान एवं स्वाभिमान भरा आत्मबल कैसे ऊँचा उठे? वर्तमान ज्ञान परिधि को किस प्रकार निरंतर समुन्नत बनाने का प्रवाह जारी रहे? दिनचर्या निर्धारण करके उस पर सुदृढ़ कैसे रहा जाय? निरर्थक नष्ट होने वाली शक्तियों को किस प्रकार सुनियोजित किया जाय और उन्हें उपयोगी दिशा में कैसे सुसंलग्न करके अभीष्ट सफलता को सुनिश्चित बनाया जाय? यह मनःक्षेत्र से सम्बन्धित प्रश्न है जिनके हल खोजना और निकले हुए निष्कर्षों को तत्परता पूर्वक अपनाना ऐसा प्रयास है जिसके आधार पर कोई भी व्यक्ति मनस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी और प्रचण्ड प्रतिमा सम्पन्न बन सकता है।
हममें से अधिकाँश लोग रुग्ण रहते हैं। सृष्टि में ऐसी विशेषताओं से भरा शरीर अन्य किसी प्राणी को नहीं मिला। मनुष्य शरीर की—उसके मस्तिष्क की मशीनरी ऐसी अद्भुत है जिस पर मनुष्यकृत अब तक की सारी याँत्रिक सफलताओं को निछावर करके फेंका जा सके सचमुच यह ईश्वर की अनुपम रचना है यदि हम शरीर का ठीक से उपयोग कर सके तो उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ पग−पग पर हर्षोल्लास से भरा−पूरा रख सकती हैं और कर्मेन्द्रियाँ समृद्धि के अनुदान दे सकती हैं, जिन पर कुबेर और इन्द्र को भी ईर्ष्या करनी पड़ी सचमुच मनुष्य अद्भुत है—अनुपम हैं−असाधारण है− अभिनव है।
शरीर गत दुर्बलता और रुग्णता निश्चित रूप से हमारी बनाई और बुलाई हुई है। मनुष्य बन्धनों में जकड़े हुए पशु−पक्षियों को छोड़कर उन्मुक्त प्रकृति की गोद में खेलने वाले वन्य प्राणियों में से कोई भी बीमार नहीं पड़ता। मौत और बुढ़ापा तो सबको आता है पर प्रकृति पुत्र प्राणियों को रुग्णता नहीं सताती। अकेला मनुष्य ही है जिसने अपनी तथाकथित बुद्धिमत्ता के अभियान में चूर होकर आहार−विहार की सरल प्रक्रिया को अत्यन्त विकृत बना दिया। रहन−सहन की समस्त मर्यादाओं का अतिक्रमण करके ऐसा आचरण आरम्भ कर दिया मानो वही सर्वतन्त्र स्वतन्त्र है। चाहे जो कर गुजरने में—इन्द्रियों का बुरे से बुरा दुरुपयोग करने में वह स्वतन्त्र हैं। इसी दर्प के चूर करने के लिए प्रकृति के हन्टर उसकी पीठ पर रुग्णता और दुर्बलता के रूप में पड़ते हैं। तिलमिला कर वह दवादारू के कुचक्र में पड़ता है जहाँ जले पर नमक बुरकने की तरह शरीर गत विषाक्तता को और अधिक बढ़ाते हुए—रोगों की स्थिर जड़ जमाते हुए मात्र तात्कालिक कष्ट शमन का जादू भर दिख जाता है।
स्वास्थ्य का संरक्षण, संवर्धन और शिथिलीकरण मनुष्य जीवन की एक महती आवश्यकता है। इसके बिना कुछ पाना, कमाना, भोगना तो दूर हर घड़ी रोते, कराहते, घर वालों को दुखी बनाते, दवादारू के खर्च सहते भार भूत जिन्दगी जीनी पड़ती है। इस नारकीय स्थिति से उबरने की चाबी मनुष्य के अपने ही हाथ में है। दूसरा कोई यहाँ तक कि हकीम डाक्टर और जादू यन्त्र वाले भी अस्वस्थता निवारण में कुछ सहायता नहीं कर सकते। खान−पान, आहार−विहार, रहन−सहन में अवाँछनीय अप्राकृतिकता की जो भरमार हो गई है उसमें आमूल चूल परिवर्तन करने का साहस जिस सीमा तक जुटाया जा सकेगा उसी अनुपात से रोगों की निवृत्ति और स्वास्थ्य रक्षा का दैवी वरदान पाया जा सकेगा।
हम खाते तो बहुत कुछ हैं—स्वाद भी विविध−विधि लेते हैं और व्यंजन पकवानों से विविधता में भी खूब रस लेते हैं—इस स्वाद लिप्सा पर पैसा और समय भी कम खर्च नहीं होता पर शरीर को शक्ति सामर्थ्य देने और उसे हरा−भरा बनाये रखने के लिए क्या, कितना, कब और कैसे खाया जाय? इस सम्बन्ध में पूर्णतया अनाड़ी होते हैं। न खाने योग्य खाते हैं और खाने योग्य फेंकते हैं। कौरवों को पाण्डवों के एक घर में जल में थल और थल में जल दीखा था और उन्हें द्रौपदी द्वारा ‘अन्धों के अन्धे ही होते है’ का व्यंग−उपहास सहना पड़ा था। वह पौराणिक कथा है पर हमारे आहार−व्यवहार में वह घटना सर्वथा सही सिद्ध होती हैं।
हर कार्य उलटा, हर आदत उलटी। कालिदास के आरम्भिक जीवन की यह घटना प्रसिद्ध है कि वे जिस डाली पर बैठे थे उसी को काट रहे थे। पीछे को गिरे और घायल हो गये। हम आज के पूरे और पक्के कालिदास हैं जिस शरीर रूपी पेड़ से हमें विविध सुख−सुविधाओं का उपार्जन करना है—उसी का विकृत आदतों के शिकार होकर बेतरह काटते हैं। पीछे जब बीमारियाँ घेरती हैं तो देवी देवताओं से लेकर दुर्भाग्य तक को कोसते हैं। इस आत्म−प्रवंचना का नशा पीकर थोड़ा चैन सन्तोष मिल सकता है पर गुत्थी तो जहाँ की तहाँ उलझी पड़ी रहेगी हम चारपाई पर लिटा देने वाले तीव्र रोगों के शिकार न सही—आये दिन कष्ट देने वाले जुकाम, कब्ज, सिरदर्द, अनिद्रा, बेचैनी जैसे रोग तो निरन्तर बने ही रहते हैं। वे तो अब सभ्यता के अंग भी बन गये हैं और ‘बड़े आदमियों’ के लिए फैशन जैसी एक आवश्यकता मानी जाने लगी है।
इस दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना से छुटकारा कैसे पाया जाय, इसका अत्यन्त सरल किन्तु अत्यन्त कठिन—अत्यन्त स्पष्ट किन्तु अत्यन्त रहस्यमय मार्ग है जिसे हर जीने वाले को अनिवार्य रूप से जानना चाहिए। प्रयत्न किया जायगा कि जीवन जीने की कला का—संजीवनी विद्या का जो दस दिवसीय प्रशिक्षण शान्ति कुँज में आरम्भ किया जा रहा है उसमें शरीर और मन जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों का सुसंचालन साँगोपाँग रीति से सिखाया समझाया जाय और बताया जाय कि कैसे अपनी शारीरिक मानसिक स्वस्थता के लिए किस क्रम से क्या उपाय करने चाहिए?
घर−परिवार मनुष्य को मिला हुआ एक सुरम्य उद्यान−उपवन है उसमें आनन्द और उल्लास के फल−फूल हर घड़ी उपलब्ध रहने चाहिए। उसकी शोभा सुषमा से—सुगन्ध−सुन्दरता से मन में हर समय आनन्द, उल्लास की गुदगुदी उठनी चाहिए। परिवार एक छोटा सा किन्तु समूचा राष्ट्र है−−समाज है। उसे बुद्धिमानी और दूरदर्शिता के साथ चलाया जाय तो हम कुशल राष्ट्रपति−−लोक नायक सिद्ध हो सकते हैं। इस छोटी से प्रयोगशाला में ऐसे आविष्कार किये जा सकते हैं—ऐसे प्रतिफल प्राप्त किये जा सकते हैं जिनसे अपना मन प्रमुदित रहे—गर्व गौरव अनुभव करे—परिजनों में हर्षोल्लास फूटता रहे, वे सभी सुसंस्कृत और सुविकसित बनते चले जाँय—बाहर के व्यक्ति उस परिवार को देखकर प्रेरणा ग्रहण करें—यह स्वप्न नहीं एक तथ्य है, जिसे कोई भी क्रियाकुशल व्यक्ति सहज ही सँजो सकता है।
परिवार के हर सदस्य का स्वार्थ और परमार्थ एक दूसरे के लिए घनिष्टता एवं मधुरता भरे सम्बन्ध बनाये रहने में है पर देखने में आता है कि उनके बीच कटुता और मनोमालिन्य की चौड़ी खाई बनी रहती है। यहाँ तक कि पति पत्नी—जिनके कि अनेक सहज स्वाभाविक कारणों से व्यक्तित्व अत्यन्त घुले−मिले होने चाहिए उनके बीच भी नारंगी की फाँकों की तरह पृथकता पाई जाती है—रोष, असन्तोष छाया रहता है—जब कि दोनों के बीच गंगा यमुना के संगम की तरह परम पवित्र स्नेह, सौजन्य निरन्तर उमँगता रहना चाहिए। परस्पर दोनों को एक प्राण दो शरीर बनकर रहना चाहिए। पर ऐसा दिखाई कहीं कदाचित् ही किंचित् ही पड़ता है। इसका कारण दृष्टिकोण की, स्वभाव की—आदतों की मलीनता ही है। यदि इसे परिष्कृत किया जा सके तो पति−पत्नी के बीच अनेकों असमानताएँ रहते हुए भी स्नेह सहयोग की सुदृढ़ता बनी रह सकती है और उसका लाभ पूरे परिवार को मिल सकता है। यह तो पति−पत्नी की बात हुई। बच्चों को शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक दृष्टि से सुविकसित होना—वयोवृद्ध का सन्तोष—संयुक्त परिवार के अनेक वयस्क अवयस्कों का समन्वय संतुलन अपने आप में बहुत बड़ा काम है। जिसे परिवार का अध्यक्ष अथवा उसका प्रभावशाली सदस्य सुव्यवस्थित बनाये रहने में आसानी से सफल हो सकता है।
घर की आर्थिक स्थिति—शोभा सज्जा—स्वच्छता, व्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य अपना कर्त्तव्य उत्तरदायित्व समझे और उसे ठीक तरह निबाहे। इसके लिए उन्हें निरन्तर प्रशिक्षित करने और जागरूक रखने की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य झल्लाने से नहीं वरन् अत्यन्त मधुर, मृदुल और सहज स्वाभाविक रीति−नीति से ही हो सकता है। इसके लिए एक आचार संहिता होनी चाहिए और परिपाटी जिसमें बँधकर हर परिजन को अनुशासन और कर्त्तव्य की धुरी पर घूमते रहने का अभ्यास होना चाहिए यह कार्य सहज है। कठिन वे कार्य दीखते हैं जो अभ्यास में नहीं आते। जब इस प्रयोग को अपनाने के लिए उतरा जायगा तो प्रतीत होगा कि यह सब कुछ कितना सरल सुखद और स्वाभाविक है।
कहा जा चुका है कि परिवार संचालन एक राष्ट्र संचालन, समाज संरचना, उद्यान विकास जैसा कठिन किन्तु अधिक से अधिक विनोद−प्रमोद से भरा हुआ बहुत ही हलका−फुलका काम है। इस प्रयास में खाद पानी देने से लेकर नोंचने, उखाड़ने और काट−छाँट करने तक के अगणित उतार−चढ़ाव और क्रिया−कौशल सम्मिलित हैं। राजनेता, लोकनायक—मनोवैज्ञानिक—व्यवस्थापक, प्रशासक, चिकित्सक, सन्त और न्यायाधीश के समस्त गुणों का समन्वय परिवार के सफल संचालन में अभीष्ट होता है। जिन्हें इसका ज्ञान है उन्हीं को परिवार बसाना चाहिए। अन्यथा अनाड़ी कारखानेदार जिस प्रकार दुर्घटनाएँ करता है, दिवालिया बनता है और निन्दित, लाँछित होता है, वही दुर्गति उसकी होती है जो कामवासना से प्रेरित होकर कौतुक कौतूहल बस विवाह कर लेता है—परिवार बसा लेता है पर उसके संचालन की कला से सर्वथा अपरिचित होता है। हमारे परिवार आज इसी अनाड़ीपन की चट्टान से टकरा कर चूर−चूर हो रहे हैं। पर परिवार में नरक की ज्वालाएँ जल रही हैं और हर परिजन अपने को प्रतिबन्धित कैदी की तरह बँधा जकड़ा दुख भोगता अनुभव करता है।
जिन्होंने अभी नया परिवार नहीं बसाया है उन्हें भी वर्तमान परिवार के प्रति अपनी वफादारी जिम्मेदारी तो निभानी ही चाहिए। व्यक्ति और समाज के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी ही परिवार है। उसे सुसंतुलित रखने से घर के सदस्यों के व्यक्तित्व निखरेंगे और समाज को सुयोग्य नागरिकों का अनुदान मिलेगा। जिनने अभी विवाह नहीं किया है—नया परिवार नहीं बसाया है—उन्हें तो उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने की कला का सांगोपाँग अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है ताकि श्री गणेश ही श्रद्धा भरे वातावरण में किया जा सके। जिनके परिवार बन गये हैं—जो किसी परिवार के सदस्य हैं उन्हें भी यह जीवन कला जाननी चाहिए ताकि नरक को स्वर्ग में−अवगति को प्रगति में−−असन्तोष को स्नेह−सहयोग में बदलने की कुछ कहने योग्य सफलता प्राप्त की जा सके।
जीवन कला, संजीवनी विद्या कितनी महत्वपूर्ण है, उसका महात्म्य कह सुनकर समझाया नहीं जा सकता वह तो अनुभव करने की ही चीज है। जिसे हर आस्तिक नास्तिक को—हर शिक्षित अशिक्षित को−−हर नर−नारी को हर मत सम्प्रदाय वाले को सीखना समझना ही चाहिए। शान्ति कुँज को इस प्रशिक्षण के शुभारम्भ का केन्द्र बनाकर वस्तुतः अध्यात्म, धर्म और तत्व ज्ञान के अति प्राचीन आधार को आज की परिस्थिति में व्यवहार योग्य बनाने का अति नवीन प्रयत्न है। इस शिक्षा के आधार पर हमारे शरीर, मन और परिवार इस स्थिति में पहुँच सकते हैं जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा जा सके। मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो उसे मनुष्य में देवत्व का उदय होने के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। यह अभिशप्त मानव जीवन के लिए दैवी वरदान से कम उपलब्धि नहीं है। जीवन कला वस्तुतः मनुष्य जीवन की सफलता सरलता का सर्वोच्च सोपान है।
आवश्यकताएँ बढ़ रही हैं—साथ ही महंगाई आकाश छू रही है ऐसी दशा में जनसाधारण का अर्थ सन्तुलन बिगड़ रहा है। पैसे की तंगी हर व्यक्ति अनुभव करता है। इतने पर भी यह कहा जा सकता है इस तंगी के लिए हम अपने को सर्वथा निर्दोष नहीं मान सकते। यदि अपनी अर्थ व्यवस्था के आय और व्यय स्रोतों पर पुनर्विचार करें तो स्थिति में आशाजनक परिवर्तन हो सकता है। बचे हुए समय का घर के वयस्क लोग उपार्जन के लिए उपयोग करें उपार्जन का कला−कौशल सीखें—श्रम से प्यार करने की आदत डालें—अधिक आजीविका देने वाले कार्यों को तलाश करते रहें—अपनी उपार्जन योग्यता बढ़ाते रहें तो कोई कारण नहीं कि उन सामूहिक प्रयत्नों से अधिक उपार्जन में योगदान न मिले।
अपने देश में केवल एक दो व्यक्ति ही कमाते हैं और शेष सारा परिवार बैठकर खाता है। जो असमर्थ हैं, जो व्यस्त हैं वे न कमायें सो ठीक है पर यह बुरा है कि काम करने में बेइज्जती समझी जाय और ठाले बैठे रहते हुए श्रम से जी चुराया जाय। इसी बुरी आदत ने ही अपने देश को दरिद्र बनाया है। उद्यमी पुरुषार्थी, परिश्रमी और कमाऊ बनने की आदत समस्त परिवार में उत्पन्न करनी चाहिए। दूसरी ओर मितव्ययिता की बात सोचनी चाहिए। असावधानी से और अनावश्यक चीजों में नशेबाजी जैसी बुरी आदतों में हमारा ढेरों धन नष्ट होता है यदि अनावश्यक को छोड़ने और आवश्यक मदों में खर्च बढ़ाने की बात नये सिरे से सोची जाय तो वर्तमान मदों में भारी हेर−फेर करने की आवश्यकता प्रतीत होगी। बजट बनाकर चला जाय। आमदनी और खर्च का—आवश्यक−अनावश्यक का−ध्यान रखते हुए किस मद में कितना खर्च किया जाय इसका सन्तुलन बनाया जाय तो कम आमदनी के लोग भी एक उपयोगी व्यवस्था बना सकते हैं और इस आधार पर कम आमदनी होते हुए भी प्रसन्नता और सन्तोष का जीवन जी सकते हैं।
इन मोटी बातों को सिद्धान्ततः सभी लोग जानते हैं पर ऐसे बहुत कम हैं जो साहस पूर्वक इन अनभ्यस्त सिद्धान्तों के वर्तमान ढर्रे को पलट कर फिर से नई अर्थ नीति निर्धारित कर सकें और नया प्रयास अभ्यास चालू कर सकें। जीवन जीने की विद्या के अंतर्गत इस संदर्भ में शुभारम्भ से लेकर उसके क्रमिक विकास की प्रक्रिया उदाहरण देकर समझाने का प्रयत्न किया जाना है ताकि आर्थिक तंगी से, ऋण ग्रस्तता से छुटकारा पाने का नैतिक एवं बुद्धि संगत और व्यावहारिक मार्ग प्राप्त किया जा सके। बाल बुद्धि के उपहासास्पद उपाय तो सट्टा, लाटरी, जुआ, चोरी से लेकर भाग्योदय, गढ़ा खजाना मिलने और लक्ष्मी देवी को सिद्ध करने जैसे अनेकानेक हैं, पर उनसे निरर्थक समय नष्ट होता है और निराशा ही हाथ लगती है। मंजिल तो दो पैरों से ही चली जाती है। उड़ानें और कुदानें मधुर तो लगती हैं पर व्यावहारिक नहीं हैं।
समाज व्यवहार—शिष्टाचार दूसरों के साथ निभाना और उन्हें अपने साथ निभाना−−प्रतिष्ठित, प्रामाणिक और सम्मानित होकर जीना सबसे बड़ा कला−कौशल हैं। जिसे लोग भावनापूर्वक सहयोग प्रदान करें—जो लोगों को सहयोग देकर अपनी गरिमा का गर्व अनुभव कर सके वह सफल कलाकार है। जिसने हँसना सीखा और हँसना सिखाया उसका गौरव किसी सम्पत्तिवान से कम नहीं है। “टूटे को बनाना और रुठे को मनाना” जिसे आता है उसे सब कुछ आता है। जिसकी वाणी से मधुरता और व्यवहार से सज्जनता टपकती है वह सच्चे अर्थों में शालीन है। उदारता, आत्मीयता, सहृदयता, सज्जनता, ऐसे गुण हैं जिनसे आकर्षित होकर हर कोई खिंचता और चिपकता चला आता है। जो अपने को प्रामाणिक—विश्वस्त और चरित्रवान सिद्ध कर सका मानो उसने सबका हृदय जीत लिया। ऐसे व्यक्तित्व हर काम में सफल होते हैं। जन सहयोग प्राप्त कर सकना दूसरों पर अपनी छाप छोड़ सकना बहुत बड़ी उपलब्धि है। प्रगति और सफलता के अनेक द्वार इसी आधार पर खुलते हैं। कोई व्यक्ति एकाकी प्रयत्नों से कहने लायक उन्नति नहीं कर सकता। जन सहयोग पग−पग पर चाहिए और वह प्रभावी एवं आकर्षक व्यक्तित्व के आधार पर ही मिलता है। उसे उपार्जित किया जा सकता है बशर्ते कि अपने आप का नये सिरे से निर्माण आरम्भ किया जाय। जीवन कला के अंतर्गत व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली बनाने के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक आधारों को सीखने हृदयंगम करने एवं अभ्यास में लाने की प्रेरणा मिलती है। स्व परिवर्तन वृद्ध शरीर को युवा बनाने वाले तथाकथित कायाकल्प विधान से कम नहीं कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रति हर मनुष्य के कुछ परम पवित्र कर्त्तव्य हैं। आत्मा और परमात्मा के लिए बिना कुछ किये किसी को शान्ति नहीं मिल सकती। परमार्थ, लोक मंगल और सर्वोत्कर्ष की आदर्शवादी रीति−नीति को जीवन में कोई स्थान न रहे तो वह सर्वथा नीरस और निरर्थक बन जायगा भले ही उसके साथ कितनी ही बढ़ी−चढ़ी सम्पन्नता क्यों न जुड़ी हो। धर्म और अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा इसीलिए खड़ा किया गया है कि मनुष्य न केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता प्राप्त करे वरन् सामाजिक क्षेत्र में भी आदर्शवादी क्रिया−कलापों में उत्साह पूर्वक बढ़े−चढ़े अनुदान प्रस्तुत करने का समुचित प्रयास करे। उभय−पक्षीय प्रयोजनों का सन्तुलन बनाये रहकर—स्वार्थ एवं परमार्थ का समन्वित क्रिया−कलाप क्या होना चाहिए—अपनी स्थिति में कौन क्या कर सकता है यदि इसकी समुचित जानकारी एवं प्रेरणा मिल सके तो मनुष्य सच्चे अर्थों में सुख शान्ति पा सकता है और सुखी सन्तुष्ट रह सकता है उसके चेहरे पर प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता नाचती पाई जायगी।
ऊपर की पंक्तियों में सफल जीवन की दिशा में कुछ विचारणीय आधारों की चर्चा है। इनकी सिद्धान्त रूप से पुस्तकों और सत्संगों में कभी−कभी अधूरी चर्चा पढ़ने सुनने को भी मिल जाती है पर क्रमबद्ध सामयिक एवं व्यक्ति विशेष की स्थिति समस्या को ध्यान में रखते हुए तदनुकूल परामर्श मिलना कहीं कदाचित् ही सम्भव होता है। न लोग ठीक तरह अपनी स्थिति व्यक्त कर पाते हैं और न आदर्श एवं व्यवहार को मिलाकर चलने का चिन्तन अनुभव किन्हीं को है फलतः यदि पूछने बताने की बात भी निरर्थक सिद्ध होती है कई बार तो उलटे परामर्श देकर भौंड़े सलाहकार कई बार गुत्थी और भी अधिक उलझा देते हैं। आदर्शवादी सिद्धान्त जिनका आज बहुत ढोल पीटा जाता है—इन परिस्थितियों में किस हद तक—किस प्रकार−−किस स्तर पर प्रयुक्त किये जा सकते हैं और क्रमिक पग बढ़ाने की प्रक्रिया क्या हो सकती है। इसे कोई विरले ही जानते हैं। आदर्श और व्यवहार की संगति न बैठ पाने के कारण अब उन्हें केवल कहने सुनने की—चर्चा विनोद की अव्यावहारिक प्रक्रिया भर मान लिया गया है। यह कितनी दुखद विडम्बना है।
जीवन जीने की कला—संजीवन विद्या—आज की स्थिति में आज के मनुष्य के लिए पूर्णतया व्यवहार में आने योग्य है। उसमें किसी प्रकार की हानि होने की बात रत्ती भर भी नहीं है। हर दृष्टि से उसमें हर प्रकार का लाभ ही लाभ है। ऐसी जीवन विद्या को सीखना और सिखाना निश्चित रूप से अति महत्वपूर्ण और अति आवश्यक है।
संजीवनी विद्या का सर्वतोमुखी शिक्षण प्राप्त करने के लिए—उसका विचार मंथन करते हुए भावी परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए—सिद्धान्तों को व्यवहार रूप में परिणत करने की विधि−व्यवस्था विनिर्मित करने के लिए गम्भीर चिन्तन−मनन की आवश्यकता रहेगी। इसके लिए समय चाहिए। जीवन साहित्य पढ़ने के लिए—उपयोगी मार्ग−दर्शन सुनने, समझने के लिए—उनको कार्य रूप में परिणत करते समय आने वाली कठिनाइयों का समाधान करने के लिए दूरदर्शी एवं गम्भीर ऊहापोह की आवश्यकता है। यह कार्य समय साध्य है। उतावली में जादू की छड़ी घुमाकर परिष्कृत जीवन को योजना बनाना और उसे कार्य रूप में परिणत करने की बात पक्की करने के लिए भारी बौद्धिक श्रम करना पड़ेगा और गम्भीर दूरदर्शिता का उपयोग करना पड़ेगा। यह सुनिश्चित रूप से कायाकल्प साधना है। उसका समय साध्य होना स्वाभाविक है।
सरकार आगामी पंचवर्षीय योजना बनाने के लिए एक स्वतन्त्र आयोग नियुक्त करती है और उस विचारणा को प्रामाणिक एवं परिपक्व स्थिति तक पहुँचाने के लिए प्रचुर धन और श्रम नियोजित करती है। प्रगतिशील जीवन की योजना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, भले ही उसे व्यक्ति विशेष के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। इसके लिए भी समुद्र−मंथन जैसा विचार−मंथन अभीष्ट है जिसमें से 14 या न्यूनाधिक रत्न निकाले जा सकें। बदली हुई परिस्थितियों के साथ ताल−मेल बिठाते हुए आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया का निर्धारण करना है।
प्राचीन काल की स्थिति में उपयुक्त समझे जाने वाले कथा−पुराणों को, शास्त्र निर्देशों एवं आप्तवचनों को आधार मानकर आज का प्रगतिशील जीवन नहीं जिया जा सकता। उसके लिए सनातन आदर्शों की रक्षा करते हुए सामयिक तथ्यों का समावेश करना आवश्यक है। इस अनोखी एवं अभूतपूर्व प्रक्रिया के अजनबी लगने वाले सिद्धान्तों को पचाने और उन्हें अपनाने के लिए आवश्यक साहस सँजोया और कार्यक्रम बनाना बहुत उथल−पुथल से भरा है। उसका शिथिलीकरण कुछ समय की अपेक्षा करता है।
इन दिनों हर व्यक्ति बहुत व्यस्त है। आर्थिक पारिवारिक तथा दूसरी समस्याएँ इतनी उलझी हुई हैं कि उनसे फुरसत निकालना—विशेषतया लम्बे समय के लिए इन दिनों बहुत ही कठिन है। अस्तु लम्बे समय तक घर छोड़कर बाहर रहना हर किसी के लिए सम्भव नहीं। वैसी परिस्थितियाँ किन्हीं विरलों की ही होती है। फिर भी जो आवश्यक है—महत्वपूर्ण है उसे अपनाने के लिए किसी भी प्रकार समय तो निकालना ही पड़ेगा। जीवन विद्या की शिक्षा का सांगोपांग विद्यालय खोला जाय तो उसका शिक्षा काल पाँच वर्ष न सही तो एक वर्ष तो होना ही चाहिए। पर इन दिनों सर्व साधारण को अपनी व्यस्तता में से इतना समय निकालना असम्भव हैं।
बहुत विचार करने के बाद न्यूनतम समय दस दिन का निर्धारित किया गया है। इससे कम से कम काम चलाऊ शिक्षण−परामर्श एवं निर्धारण सम्भव नहीं हो सकता। शिक्षा से अधिक लोग लाभ उठा सकें−इसके लिए लोगों के पास कम समय होने की ही एकमात्र कठिनाई नहीं है। शान्ति−कुञ्ज में स्थान भी इतना कम है और उसके शिक्षा साधन इतने स्वल्प हैं कि वहाँ अधिक लोगों को रखा या पढ़ाया भी नहीं जा सकता। थोड़े स्थान—थोड़े साधन में—अधिक लोग लाभ उठा सकें इसके लिए भी स्वल्प समय के शिक्षण की बात ही बनती है। शिक्षार्थियों को सुविधा और शिक्षण केन्द्र के साधनों का ध्यान रखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है कि शिक्षा काल दस−दस दिन का रखा जाय और उसके लिए सत्र पद्धति अपनाई जाय।
शान्ति−कुञ्ज में व्यक्ति और समाज निर्माण की बहुमुखी प्रवृत्तियाँ चलती हैं। एक व्यक्ति को अन्न, जल, वस्त्र, मकान, दवा, रोशनी, सफाई आदि की अनेक व्यवस्थाएँ जुटाकर निर्वाह की आवश्यकता पूरी करनी पड़ती है। इसी प्रकार व्यक्ति और समाज का समन्वित विकास करने का कार्यक्रम लेकर चलने वाली हमारी योजना के लिए भी बहुमुखी प्रयत्नों और प्रशिक्षणों की आवश्यकता पड़ती है। शान्ति−कुञ्ज में इसीलिए किसी एकांगी शिक्षण तक सीमित रहने की अपेक्षा बहुमुखी बहुस्तरीय प्रशिक्षण का संतुलित क्रम चलाया गया है। सृजन सेना के सैनिक वानप्रस्थों का प्रशिक्षण, महिला जागरण शिक्षा, युग गायकों की तैयारी, लेखनी के धनी साहित्य सृजनकर्त्ताओं का उत्पादन, लोक−शिक्षा का श्रीगणेश आदि कितने ही अन्य शिक्षण भी शान्ति−कुञ्ज में कठिनाई से डेढ़−दो सौ व्यक्तियों के ठहर सकने योग्य स्थान में चलते हैं। उनके लिए एक को बन्द करके दूसरे को चलाने की नीति अपनानी पड़ती है अन्यथा इतनी प्रवृत्तियाँ लगातार कैसे चलती रखी जा सकती हैं।
जीवन विद्या उपरोक्त सभी प्रवृत्तियों की तुलना में अति महत्वपूर्ण और प्राथमिकता पाने योग्य है अस्तु उसके लिए साल में छै महीने का समय निर्धारित किया गया है। फरवरी, मार्च, अप्रैल और जुलाई, अगस्त, सितम्बर इन छै महीनों में 10−10 दिन के कुल मिलाकर 18 सत्र चलाये जा सकेंगे और औसतन 100 शिक्षार्थी हर सत्र में रखकर वर्ष में दो हजार व्यक्तियों को शिक्षा दी जा सकेंगी। 55 करोड़ की आबादी वाले भारत में व्यक्तित्व पुनर्निर्माण की आवश्यकता और शिक्षण की इतनी स्वल्प संख्या की तुलना करते हुए यह जलते तवे पर बूँद पड़ने की तरह नगण्य है तो भी इसके पीछे आशा की नवीन किरणें विद्यमान हैं। यह बीज भविष्य में वट−वृक्ष की तरह विकसित भी हो सकता है जिसकी बहुत कुछ सम्भावना है।
इस बार 14 फरवरी तक वानप्रस्थ सत्र चलेंगे। 16 का बसन्त पर्व है। तीन−चार दिन उसमें लग जाते हैं। 20 फरवरी से यह जीवन सत्र चलेंगे और 10 मई तक जारी रहेंगे जुलाई, अगस्त, सितम्बर में वे इसके पश्चात होंगे।
इनकी शिक्षा पद्धति का क्रम इस प्रकार है।
प्रायः एक घण्टा नित्य उच्चस्तरीय योग साधनाओं की साधना।
एक प्रवचन प्रातःकाल डेढ़ घण्टे का।
आवश्यक स्वाध्याय।
मध्याह्नोत्तर दूसरा प्रवचन शिक्षार्थियों की विभिन्न उलझनों का समाधान करने के लिए।
व्यक्तिगत परामर्श।
हर दिन भाषण कला की शिक्षा तथा अभ्यास।
शिक्षा काल में जीवन विद्या के प्रायः सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला जायगा और शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जायगा कि वह भावी जीवन को परिष्कृत स्तर का बना सकने में समर्थ हो सके। इसके साथ−साथ प्रातःकालीन साधना में उन योगाभ्यासों का गहरा अभ्यास कराया जायगा जो पिछले दिनों प्राण प्रत्यावर्तन में प्रयुक्त होते रहे हैं। इसी प्रकार हर दिन भाषण देने का अभ्यास कराते हुए शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जायगा कि वह अपनी बात खुले दिल से बिना संकोच, झिझक के कहीं भी कह सके। गोष्ठियों और सभा, सम्मेलनों में भली प्रकार अपने विचार व्यक्त कर सकें। इस प्रकार योगसाधना तथा प्रवचन प्रवीणता के दो और भी वर्ग जुड़ जाने से जीवन विद्या की दस दिवसीय शिक्षा और भी अधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण बन गई है।
शिक्षार्थियों में अधमरे, सड़े−गले, सनकी, दुर्व्यसनी, उद्दंड और आवारा किस्म के लोग न घुस पड़ें इसलिए उनकी पात्रता और शालीनता प्रमाणित करके भेजने की आवश्यकता अनुभव की गई हैं। उपयुक्त पात्रों पर ही उपयुक्त श्रम की सार्थकता हो सकती है इसलिए इस संदर्भ में यथासम्भव अधिक सतर्कता से ही काम लिया जायगा। सुशिक्षित, शालीन, अनुशासन प्रिय, सज्जन प्रकृति के निर्व्यसनी लोगों को ही इस प्रशिक्षण के लिए आमन्त्रित किया गया है। आशा है इसी स्तर के लोगों के आवेदन पत्र जीवन सत्र के लिए भेजे जायेंगे।
भारत किसी समय उन्नति के उच्च शिखर पर था। यह पुण्य भूमि स्वर्गादपि गरीयसी मानी जाती थी। समस्त विश्व पर उसका चक्रवर्ती सांस्कृतिक शासन था। स्वर्ण सम्पदाओं का अधिपति उसे कहा जाता था। समस्त विश्व को उसने जो भौतिक और आध्यात्मिक अनुदान दिये उनसे सुविकसित, सुसंस्कृत बने लोगों ने कृतज्ञता पूर्वक उसे जगद्गुरु कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इस देश के तैंतीस करोड़ नागरिक किसी समय संसार भर में तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से प्रसिद्ध थे। भारत की गरिमा, ज्ञान और विज्ञान के—दर्शन और वैभव के क्षेत्र में गगनचुम्बी बनी हुई थी उसने अपने प्रकाश से सम्पूर्ण भू−मण्डल को आलोकित किया था। यहाँ का व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जीवन इतना उच्चस्तरीय और सुख−शान्तिपूर्ण था कि सतयुग का वर्णन उस पर पूरी तरह लागू होता था।
इस विकास वैभव का सारा श्रेय यहाँ की वर्ण व्यवस्था प्रक्रिया को है जिसके अनुसार हर व्यक्ति को आधा जीवन अपने और अपने परिवार के लिए और आधा जीवन लोकमंगल के लिए निश्चित रूप से लगाना पड़ता था। भारत का सनातन वैदिक धर्म वर्णाश्रम धर्म है। इसमें भी आश्रम व्यवस्था मुख्य है। उस परम्परा के अनुसार जीवन को चार हिस्सों में विभाजित किया गया है। एक चौथाई शरीर और मस्तिष्क की परिपुष्टि के लिए ब्रह्मचर्य जिसमें खेलकूद, व्यायाम, इन्द्रिय संयम द्वारा शरीर की परिपुष्टि दूसरे चौथाई में—परिवार सँजोना और उसके भरण पोषण आदि उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए गृहस्थ में रहना—ब्रह्मचर्य व्यक्ति निर्माण और परिवार निर्माण है। इसमें आधी आयु लगती थी। शेष आधी आयु विशुद्ध रूप से समाज निर्माण के लिये निर्धारित थी। तीसरा चौथाई भाग वानप्रस्थ के लिए और चौथाई चतुर्थांश संन्यास के लिए। जीवन का उत्तरार्ध इन्हीं दो अनुशासनों में रहने के लिए नियत निर्धारित था। थोड़े से अन्तर के साथ वस्तुतः दोनों एक ही हैं, परिस्थितियों के अनुरूप थोड़ा कार्यक्रम ही भिन्न है—दिशा और लक्ष्य एक है।
वानप्रस्थ वह स्थिति है जिसमें घर−परिवार को पूरी तरह नहीं छोड़ा जाता वरन् दिशा निर्देश उसका भी किया जाता है और अधिक से अधिक समय लोक−मंगल के लिए नियत रहता है। इस स्थिति में अपने घर को ही तपोवन बनाकर अथवा तपोवन में घर आश्रम बनाकर रहा जाता है। बच्चों का उत्तरदायित्व पूरा हो जाने अथवा बड़े बच्चों द्वारा अपने छोटे भाई−बहिनों की जिम्मेदारी सम्भाल लेने पर अधेड़ व्यक्ति अपना ध्यान लोक−मंगल के विविध प्रयोजनों को पूरा करने में—उसके लिए आवश्यक क्षमता उपार्जित करने में संलग्न होता था। साथ ही परिवार से पूर्णतया सूत्र विच्छेद नहीं करता था उसकी भी देखभाल रखता था ताकि नये हाथों में परिवर्तित की गई सत्ता का दुरुपयोग न होने पाये। इस त्याग वैराग्य की स्थिति को पकने में जितनी देर लगती थी वह वानप्रस्थ की अवधि थी। इसके बाद संन्यास अर्थात् परिवार के उत्तरदायित्वों से पूर्ण मुक्ति—लोक−मंगल के लिए आवश्यक ज्ञान अनुभव एवं अभ्यास परिपुष्ट होने पर परिव्राजक रूप में जन–संपर्क के लिए धर्म यात्रा के लिए बढ़ते चलते रहना। इसी क्रिया−कलाप में जीवन की पूर्णाहुति कर देना−अपने को विश्व सम्पदा मानते हुए—विश्व नागरिक के कर्त्तव्य निबाहना।
वानप्रस्थ पीत वस्त्र धारण करते थे और संन्यासी भगवा गेरुआ। ताकि सर्व साधारण को उनकी स्थिति और जीवनयापन पद्धति का परिचय मिलता रहे। दोनों ही आत्म−कल्याण और समाज−कल्याण के उभय−पक्षीय महाप्रयोजन में तन्मयता पूर्वक संलग्न रहते थे और अपनी क्षमता का पूरा−पूरा लाभ समाज को देते थे। परिमार्जित दृष्टिकोण—भोगों से तृप्त−निवृत्त शरीर—विशद ज्ञान अनुभव—परिपक्व व्यक्तित्व जैसी अनेकों विशेषताओं से भरे पूरे व्यक्ति जब पूर्णतया निस्वार्थ भाव से−दिव्य भावनाओं से ओत−प्रोत होकर समाज को उत्कृष्ट बनाने की योगसाधना में−ईश्वर उपासना में संलग्न होते थे तो लोक−मंगल क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में समाज के सुयोग्य निर्माताओं से भरा पूरा रहता था। उनके नेतृत्व में अनेकानेक प्रचारात्मक, रचनात्मक, संघर्षात्मक प्रवृत्तियाँ चलती थीं। जिनका लाभ देश और विश्व की जनता को पूरी तरह मिलता था। जहाँ बहुत बड़ी संख्या में सुयोग्य, परिष्कृत और परमार्थ परायण, लोक−सेवी अपना पूरा जीवन अनन्य निष्ठा के साथ खपाये हुए हैं वहाँ सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कोई कमी न रहेगी। निश्चित है कि ऐसी स्थिति में ज्ञान−विज्ञान वैभव की−सुख−शांति की−प्रगति और समृद्धि की परिस्थितियाँ ही उमगती रही हैं, रहेंगी। आज सरकार को−संस्थाओं को−वेतन भोगी और खाना−पूरी करने वाले कर्मचारी ही मिल पाते हैं जो आधा चौथाई श्रम मनोयोग लगाकर उतने में भी लूट खसोट की दृष्टि रखकर जो काम करते हैं वे चिह्न पूजा भर के होते हैं। प्राचीन काल में समाज कल्याण की समस्त आवश्यकताएँ वानप्रस्थ संन्यासी सहज ही पूरी कर देते थे राज सत्ता के हाथ में तो मात्र सीमा सुरक्षा और दंडाधिकारी जैसे थोड़े और छोटे काम रहते थे।
यही है वह रहस्य जिसके आधार पर भारत अपनी सर्वतोमुखी प्रगति के लिए प्रख्यात बना था। उसकी प्रतिभा और उदारता का भरपूर लाभ समस्त संसार ने उठाया। आज वह वर्ण आश्रम अनुशासन नष्ट हो गया। मानवी गरिमा सिमट कर संकीर्ण स्वार्थपरता में सीमाबद्ध हो गई। छोटी आयु से ही लड़के कामुक रसोपयोग में रुचि लेते हैं और गृहस्थ की मानसिक, शारीरिक भूमिका में गुप्त−प्रकट रूप से प्रवेश पा लेते हैं यह क्रिया शारीरिक न सही मानसिक रूप में मरण क्षण तक चलती रहती है। होश सम्भालने के दिन से होश गँवाने के दिन तक लोग गृहस्थ ही बने रहते हैं। अब एक ही आश्रम बचा है—गृहस्थ। शेष तीनों समाप्त हो गये। इसी प्रकार चार वर्णों में से एक ही वर्ण जीवित है—वैश्य। लोग आजीवन धन का उपार्जन, संग्रह, अभिवर्धन एवं उपयोग करने की एक ही बात पर अपनी सारी शक्तियाँ केन्द्रीभूत किये रहते हैं। यह कैसी दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना है कि हिन्दू धर्म जीवित तो है—उसके अनुयायी भी करोड़ों हैं। पर उस महान् तत्व−दर्शन का प्राणी एक प्रकार से निकल ही गया है। निर्जीव लाश सड़ भर रही है। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की—ब्राह्मण और क्षत्रिय की तेजस्विता न जाने कहाँ चली गई। ज्ञान चेतना की ज्योति जलाये रहने वाले ब्राह्मण और अनीति के विरुद्ध लड़ते हुए मर खप जाने वाले क्षत्रिय अब कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। पाखण्डपूर्ण विडम्बनाओं में उलझे उलझाते भिक्षावृत्ति परायण लोग अपने को ब्राह्मण और उच्छृंखल आततायी, अहंकारी व्यक्ति अपने को क्षत्रिय बताते जरूर देखे सुने जाते हैं पर इन आश्रमों के महान उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने वाले उदार चेता महामानव आज कहीं ढूंढ़े नहीं मिलते। यही है हमारा—हमारी पुण्य भूमि और धर्म संस्कृति का महान् दुर्भाग्य जिसने हमें दयनीय दुर्दशा में धकेल दिया। प्राचीन काल की और आज की अपनी स्थिति की जब तुलना करते हैं तो रोना आता है। लज्जा से सिर नीचा हो जाता है।
स्थिति को बदला जाना चाहिए। अगति के गर्त से उबरना चाहिए। युग की सर्वनाशी विभीषिकाओं से जूझना चाहिए और अपनी प्राचीन गरिमा को पुनः प्राप्त करने के लिए अभिनव साहस सँजोना चाहिए। इस संकल्प के साथ हम आगे बढ़े तो एक ही प्रमुख आवश्यकता सामने आ खड़ी होती है—परिष्कृत स्तर का—लोक सेवियों का बड़ी संख्या में पुनर्निर्माण। वानप्रस्थ अनुशासन का पुनः प्रचलन। ढलती आयु के लोग सुयोग्य व्यक्ति अपना जीवन लोक−मंगल के लिए लगा देने के लिए तत्पर किये जा सकें तो उस सृजन सेना के द्वारा मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सकता है−लक्ष्य पूरा हो सकता है।
आज की स्थिति में मनुष्य भयंकर रूप से स्वार्थी हो गया है लोभ और मोह ही उसका लक्ष्य है। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और किसी बात में उसका उत्साह नहीं। दो ही आकाँक्षाएँ मन में रहती हैं एक वासना दूसरी तृष्णा। धर्म और अध्यात्म जीवित तो हैं, पर उनका स्वरूप एक प्रकार से घिनौना ही दृष्टिगोचर हो रहा है। मनुष्य में आदर्शवादी तेजस्विता उत्पन्न करने की क्षमता वे पूरी तरह खो बैठे हैं। अन्ध−विश्वास, पाखण्ड, पलायनवाद, परावलम्बन, अकर्मण्यता, भिक्षावृत्ति, कल्पना लोक की रंग−बिरंगी उड़ानें ही अब उन क्षेत्रों की उपलब्धियाँ हैं। ऐसी दशा में यह और भी कठिन है कि किस प्रकार किस आधार पर—किस वर्ग के लोगों को लोकसेवा की परमार्थ परायणता की ओर दुस्साहस भरे कदम बढ़ाने के लिए सफल आह्वान किया जाय। छाई तो हर दिशा में अन्धकारपूर्ण निराशा ही है फिर भी कुछ तो करना ही पड़ेगा। रास्ता कहीं से हो−किसी प्रकार तो निकालना ही पड़ेगा।
आशा−निराशा के झूले में देर तक झूलते रहने की अपेक्षा यह आवश्यक समझा गया है कि भारतीय संस्कृति का प्राण यदि किसी कोने में जीवित हो तो उसे पूरे चीत्कार के साथ आमन्त्रित किया जाय। ऐसा नहीं कि भारत भूमि पूरी तरह बंध्या और बंजर हो गई हो कहीं न कहीं इसमें जीवन होगा ही—कहीं तो प्राणों का स्पन्दन बचा ही होगा जहाँ उसका अस्तित्व शेष होगा वहाँ युग की पुकार पहुँचेगी ही और उस आह्वान का प्रत्युत्तर मिलेगा ही। अस्तु सजीव आत्माओं को संस्कृति की पुनः प्राण−प्रतिष्ठा के यज्ञ में अपने को अध्वर्यु उद्गाता बनाने के लिए दो कदम आगे बढ़ाकर आगे आने के लिए पुकारा गया है इसके लिए शान्ति−कुञ्ज द्वारा आमन्त्रण शंखनाद किया गया है। कह नहीं सकते कि गृहस्थ से निवृत्त—लोग आगे आवेंगे कि नहीं। इस स्तर के लोग लाखों की संख्या में मौजूद हैं, पर उनकी मनोभूमि जिस स्तर की बन चुकी है उससे कुछ बड़ी आशा करना व्यर्थ हैं। पकी लकड़ी कदाचित ही मुड़ती है। अधेड़ और ढलती आयु के गृह निवृत्त लोग कदाचित मिल जाते तो बहुत ही अच्छा होता पर पिछले दिनों का अनुभव बताता है कि उनका लोभ, मोह इस ढलती आयु में और भी अधिक प्रौढ़ हो चुका है। माला सटकाने का सरल समयक्षेप वे भले ही करलें−त्याग और बलिदान की कसौटी पर अपने को कसने और खरा उतरने की तेजस्विता वे एक प्रकार से खो ही बैठे हैं।
अब तक हमने कितने क्षेत्रों की देहरी पर इस संदर्भ में सिर पटका है किन्तु निराशा ही हाथ लगी है। देश में 56 लाख से अधिक पंजीकृत साधु बाबाजी हैं। उनमें से 56 भी लोक−मंगल के लिए मिल जाते तो भी कुछ काम चलता। पर उनमें से कुछ को भी स्वर्ग मुक्ति सिद्धि चमत्कार, मुफ्तखोरी और सस्ती अहंकारिता की क्षुद्रता से ऊपर उठाने में हमारे सारे प्रयत्न असफल हो गये। भूदेव कहलाने वाले ब्राह्मण वंश का परम्परागत उत्तरदायित्व क्या है यह हमने बार−बार सुझाया, समझाया और कहा जनमानस में जीवन जागृति के चेतना उत्पन्न करने में वे बहुत कुछ कर सकते हैं। पौरोहित्य कर्म से उनकी आजीविका चलती है और समय भी उसी में लगता है फिर यदि लोक−मंगल की प्रवृत्तियों को भी उसी में जोड़ दें तो क्या हर्ज है। उनकी सुविधा के लिए समूचे धर्म−तन्त्र को—युग की आवश्यकताओं को पूरा कर सकने योग्य प्रगतिशील बनाये रहने का सारा ढाँचा भी खड़ा कर दिया। सांगोपांग प्रक्रिया और पद्धति विनिर्मित करदी और यह भी प्रलोभन दिया कि इस प्रकार उनका पौरोहित्य−कथा वाचन−कर्मकाण्ड विवेकशील लोगों में भी स्थान पालेगा और आजीविका बढ़ाने के साथ−साथ यशस्वी होने का भी अवसर मिलेगा। पर वे प्रयास भी अरण्य रोदन ही सिद्ध हुए। आज सुविधाजनक सस्ती और बिना सिरदर्द की आजीविका को छोड़कर नये झंझट में पड़ने के लिए उनमें से कोई तैयार न हुआ। यही बात ढलती आयु के−गृह निवृत्त लोगों के सम्बन्ध में है। वे नाती−पोते खिलाते रहने और बहू−बेटों की गालियाँ खाने में ही पूर्ण सन्तुष्ट लगते हैं। बहुत हुआ तो सस्ती मुक्ति लूटने के लिए एकाध माला सटका लेने कहीं तीर्थयात्रा में भटक आये और औघड़ बाबा का ब्रह्मज्ञान सुन लिया उनके लिए परमार्थ के लिए इतना ही सन्तोषजनक है वे इससे आगे बढ़ने के स्वार्थ को परमार्थ में बदलने की बात गले नहीं उतार पाये। अस्तु वहाँ भी फिलहाल तो निराशा ही हाथ लगी है। सम्भव है समय के थपेड़े अथवा युग प्रवाह के उभार साधुओं, पुरोहितों और गृह निवृत्तों को अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करें−−सम्भव है सुदूर भविष्य में कभी उपयोगी सत्ताएँ उन क्षेत्रों में उगें पनपें। भूमि तो तीनों ही उपजाऊ हैं। कभी सघन वर्षा होने लगी तो हरियाली इस क्षेत्रों में भी उग सकती है। पर आज तो यहाँ बंजर और रेगिस्तान ही दीख रहा है।
इन विकट परिस्थितियों में आपत्ति धर्म को पूरा करने के लिए उन लोगों को पुकारा गया है जिनकी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ अभी पूरी नहीं हुई; जिन्हें अपने कुटुम्ब का पालन करने के लिए रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना पड़ता है। किन्तु यह कठिनाई होते हुए भी जिनके भीतर उच्चस्तरीय भावनाओं की कमी नहीं है जो देश, धर्म समाज संस्कृति के पतन पर दुखी हैं और कुछ करना चाहते हैं किन्तु विवशता उन्हें करने नहीं देती। ऐसे लोगों से उनकी स्थिति के साथ ताल−मेल बिठाते हुए यथासम्भव कुछ समय दान लोक−मंगल के लिए देते रहने के लिए बुलाया गया है।
प्रसन्नता की बात है कि वह आह्वान निरर्थक नहीं हुआ—अनसुना नहीं किया गया। गत वर्ष लगभग 200 वानप्रस्थ प्रशिक्षित किये गये थे और कार्य क्षेत्र में भेजे गये थे। वे सभी इसी स्तर के थे। वे सदा के लिए पूरा समय तो नहीं दे सकते पर प्रथम बार दो महीने का और भविष्य में हर वर्ष एक−एक महीने का समय तो किसी प्रकार निकाल सकने की व्यवस्था बनाने के लिए तत्पर हो ही गये, उनके द्वारा जो काम हुआ वह असाधारण रूप से आशातीत रूप से सफल एवं सन्तोषजनक रहा है। कार्य क्षेत्र में जाकर उन्होंने गजब की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं—जागृति की नई लहरें उग आई हैं। आशा की नई ज्योति चमकायी है, इस स्तर के वानप्रस्थ जहाँ भी गये हैं जिन क्षेत्रों में भी भेजे गये हैं वहाँ से अत्यन्त सन्तोषप्रद समाचार आये हैं।
भले ही उनकी योग्यता, भाषण शैली अनुभवी नेता का स्थान ग्रहण करने की न रही हो पर स्वल्पकालीन मात्र एक महीने की शिक्षा और उनकी निजी भाव उत्कृष्टता ने मिलकर एक चमत्कार ही उत्पन्न कर दिया। अब हमें पूरा और पक्का विश्वास हो गया है कि साधु, पुरोहित और गृह निवृत्त लोग भले ही अपनी माँद में घुसे रहें नवयुग की आवश्यकता नई पीढ़ी के भावनाशील किन्तु गृह उत्तरदायित्वों में बँधे जकड़े लोगों से भी पूरी की जा सकती है, अस्तु हमारा सारा ध्यान अब इसी वर्ग के युग की पुकार पूरी करने के लिए आह्वान करने पर केन्द्रित है। आपत्ति धर्म को निबाहने के लिए हमें गृहस्थों में से ही अल्पकालीन वानप्रस्थ लेकर उस महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए आगे बढ़ना होगा। गतवर्ष के सफल प्रयोग ने हमारा उत्साह और भी अधिक बढ़ा दिया है।
ऐसा ही आपत्ति कालीन आपद् धर्म का थाईलैंड में भी सफल प्रयोग हुआ। उस देश में बौद्ध धर्म है। भिक्षु पुरोहित वहाँ के धर्माधिपति थे। उनके पाखण्ड प्रमाद से जनता ऊब गई तो नया प्रचलन किया गया कि सुयोग्य व्यक्तियों में से प्रत्येक एक वर्ष के लिए बौद्ध भिक्षु बने और संघ विहारों में रहकर आत्मोत्कर्ष एवं लोक−मंगल की समानान्तर साधनाओं में निरत रहे। इस अनुशासन को वहाँ के राजा भी मानते हैं। फलतः वहाँ अवैतनिक, सुयोग्य एवं भावनाशील लोकसेवियों की बड़ी संख्या उपलब्ध रहती है और उनके द्वारा समाज कल्याण की विविध प्रवृत्तियाँ पूरे उत्साह के साथ चलती रहती हैं। इसी आधार पर वह छोटा सा देश हर क्षेत्र में असाधारण प्रगति करके बड़े देशों को आश्चर्यचकित करने की उच्च स्थिति में रह रहा है।
यही प्रयोग हम लोग करने जा रहे हैं। गतवर्ष के प्रथम परीक्षण ने हमारा उत्साह कई गुना बढ़ा दिया है और अब अधिक भावावेश और गम्भीरतापूर्वक उन लोगों को आमन्त्रित कर रहे हैं जो मानव जीवन की गरिमा तथा उसके साथ जुड़ी हुई वेश, धर्म, समाज, संस्कृति की जिम्मेदारी को समझते हैं। जो व्यक्तिगत एवं पारिवारिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखते हुए लोक−मंगल के लिये कुछ अनुदान प्रस्तुत करने के लिए आतुर हैं। ऐसे लोगों को कहा गया है कि वे प्रथम बार दो महीने का समय प्रशिक्षण के लिए निकालें और भविष्य में हर साल एक महीना दिया करें। ऐसे लोगों को “कनिष्ठ वानप्रस्थ” कहा जायगा। उनका संन्यास योगतप सीमित समय के लिए होगा नियत अवधि पूरी करके वे पुनः अपने कार्य पर लौट जाया करेंगे।
प्रथम बार में एक महीना शान्ति−कुञ्ज में उनका शिक्षण होगा जहाँ उन्हें अपने व्यक्तित्व को−−चिन्तन एवं स्वभाव को लोकसेवी की महान् परम्परा के अनुरूप परिष्कृत करने का विशेष रूप से शिक्षण दिया जायगा और यह सिखाया जायगा कि युग की आवश्यकता पूरी करने के लिए उन्हें विचार क्रान्ति का−−नैतिक क्रान्ति का—सामाजिक क्रान्ति का शंखनाद किन प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक प्रवृत्तियों के साथ करना होगा। संगइन−वक्तृत्व−संचालन, नेतृत्व एवं व्यवस्था से सम्बन्धित अनेकों सूत्र एवं उतार−चढ़ाव लोकसेवक के ज्ञान एवं अनुभव अभ्यास में रहने चाहिए उनकी सांगोपांग जानकारियाँ इस एक महीने की स्वल्प अवधि में अत्यन्त कुशलतापूर्वक पूरी कराने का प्रयत्न किया जाता है। हर रोज दस−दस घण्टे शिक्षण अभ्यास में संलग्न रहकर शिक्षार्थी उसे पूरा भी कर लेते हैं और इस योग्य बन जाते हैं कि कार्य क्षेत्र में जाकर उन्हें उपहासास्पद न बनना पड़े।
युग−निर्माण योजना की हजारों शाखाएँ समस्त भारत−वर्ष में फैली हुई हैं। उनमें हर वर्ष वार्षिकोत्सव करने की−दस−दस दिवसीय शिविर शिक्षण की व्यवस्था चलाई गई है। गायत्री यज्ञों के साथ−साथ युग−निर्माण सम्मेलन होते हैं। कार्यकर्त्ताओं और जनता के प्रबुद्ध वर्ग के नवनिर्माण अभियान को आगे बढ़ाने के लिए व्यावहारिक शिक्षण दिया जाता है इसका कार्यक्रम भी इन्हीं आयोजनों के साथ जुड़ा रहता है। यह मात्र समारोह ही नहीं होते उस अवसर पर अगले वर्ष की कार्यविधि भी निर्धारित की जाती है। इन आयोजनों का सञ्चालन, मार्ग−दर्शन करने के लिए यह कनिष्ठ वानप्रस्थ दो−दो की टोली में भेजे जाते हैं। एक−एक महीने की इस अवधि में उन्हें दस−दस दिन के तीन आयोजनों का सञ्चालन करना पड़ता है। इस प्रकार शान्ति−कुञ्ज में मिली बौद्धिक, सैद्धान्तिक एवं कार्य क्षेत्र में मिली व्यावहारिक क्रियात्मक शिक्षा के संयोग से उनका दो मास का प्रशिक्षण पूरा हो जाता है इसके बाद वे इस योग्य बन जाते हैं कि भविष्य में कहीं भी उन्हें आयोजनों के सञ्चालन के लिए—रचनात्मक प्रवृत्तियाँ आरम्भ कराने एवं गतिशील बनाने के लिए भेजा जा सके। हर साल एक महीने का समय उन्हें इसी प्रयोजन के लिये देते रहना पड़ता है।
इस वर्ष वानप्रस्थों को रामायण का आधार मानकर उसी के संदर्भों से बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक स्तर की समस्त गुत्थियों को सुलझाने वाली एक विलक्षण शैली का प्रशिक्षण किया जायगा। रामायण की लोकप्रियता के साथ युगानुरूप प्रगतिशीलता को जोड़ देने का यह एक अभिनव प्रयोग है। रामायण कथाओं के−भागवत सप्ताह स्तर के समारोह एवं एक मास तक चलने वाले रात्रि कथा प्रसंगों के रूप में स्थान−स्थान पर प्रवचन व्यवस्थाएँ चलाई जायेंगी। सम्मेलनों और विशेष आयोजनों में भी युगान्तरकारी विचारधारा को रामायण का सहारा लेकर ही प्रस्तुत किया जायगा। यह एक अभिनव एवं अद्भुत प्रयोग है। वानप्रस्थ इस शिक्षण को प्राप्त कर सहज ही कुशल धर्म प्रवक्ता की—युग−निर्माण के अनुरूप जन−मानस ढालने की—प्रक्रिया में पारंगत हो सकेंगे। इस नवीनता को ध्यान में रखते हुये जो वानप्रस्थ गतवर्ष शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं उन्हें भी आमन्त्रित किया गया है। नये शिक्षार्थी तो इस शिक्षा को प्राप्त करेंगे ही।
देश भर में नव−निर्माण की—लहर अगले दिनों प्रखर बनाई जानी है। इसलिये कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाना पड़ेगा। पुस्तकालयों, वाचनालय, चलते−फिरते पुस्तकालय, प्रौढ़ पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, घरेलू शाक वाटिकाएँ—सामूहिक श्रमदान से स्वच्छता, सार्वजनिक स्थानों का निर्माण, जीर्णोद्धार—विद्यालय की स्थापना, कुटीर उद्योग, सुरक्षा स्वयंसेवक दल, वृक्षारोपण, गौ संवर्धन आदि कितनी ही लोकोपयोगी प्रवृत्तियों का व्यापक रूप से सञ्चालन किया जाना है। संघर्षात्मक कार्यक्रमों में सामाजिक कुरीतियों, अन्ध−विश्वासों अनैतिक प्रचलनों का उन्मूलन प्रमुख है। दहेज, मृतकभोज, बड़ी दावतें, बहुसन्तति प्रजनन, नशेबाजी, माँसाहार, देवताओं के नाम पर पशु−बलि, अशिक्षा, गन्दगी, भूत−पलीत, भाग्यवाद, भिक्षा व्यवसाय, छुआ−छूत, ऊँच−नीच, बाल विवाह, अनमेल विवाह, पर्दाप्रथा, रिश्वत, जमाखोरी, मुनाफाखोरी मिलावट, गुण्डागर्दी, अपराधी मनोवृत्ति आदि समाज में फैली हुई अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध मोर्चा खड़ा करने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपाय सोचे जायेंगे और कदम बढ़ाये जायेंगे।
राजनैतिक संघर्षों में अन्य अनेक राजनैतिक दल उलझे हुए हैं वे अपने ढंग से उस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। हम उस दिशा में दिलचस्पी रखते हुये भी दर्शक मात्र हैं। देश की सर्वांगीण प्रगति के लिये मात्र राजनीति ही सब कुछ नहीं है। उसके लिये अन्य क्षेत्रों में भी बहुत कुछ किया जाना है। अन्य क्षेत्र प्रायः सूने पड़े हैं। हमें उन्हीं उपेक्षित किन्तु राजनीति से भी महत्वपूर्ण कार्यों को हाथ में लेना है। हमारा कार्य क्षेत्र कितना ठोस, कितना व्यापक, कितना आवश्यक, कितना महत्वपूर्ण और कितना सत्परिणामदायक है इसे आज नहीं तो कल समझा जायगा। वानप्रस्थों को इन्हीं रचनात्मक प्रवृत्तियों का—विकासोन्मुख चेतनाओं का संचालन अभिवर्धन करना है। नव−निर्माण के इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति के लिए नई पीढ़ी के भावनाशील लोगों को आमन्त्रित किया गया है।
यों समय का सभी को अभाव रहता है। आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ— नियत व्यवसाय एवं नौकरी से छुट्टी न मिलना, समय निकालने की गुंजाइश नहीं रहने देती। यह सब अपने स्थान पर सही होते हुए भी यह कहा जा सकता है कि जिन्हें अपने उच्चस्तरीय कर्त्तव्यों का ज्ञान है—समाज और संस्कृति के लिये दर्द है वे किसी न किसी प्रकार समय निकाल ही लेंगे, बीमारी जैसी कोई आपत्ति आने पर भी तो अवकाश निकालना पड़ता है। चोरी, अनावृष्टि जैसी कोई दुर्घटना घटित होने पर भी तो आर्थिक घाटा सहना पड़ता है। धर्म कर्त्तव्यों की पुकार को भी यदि वैसी ही स्थिति मान लिया जाय तो किसी न किसी प्रकार कनिष्ठ वानप्रस्थ के लिए प्रथम बार दो महीने का और भविष्य में हर साल एक महीने का समय आसानी से निकल सकता है। समय की माँग का पूरा करने के महान प्रयोजन को जो महत्व देगा उसे फुरसत न मिलने की शिकायत न करनी पड़ेगी।
गृहस्थ में रहकर वानप्रस्थ संन्यास आश्रम की—ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण की समन्वित अनुभूति कितनी दिव्य होती है उसका रसास्वादन करने का अवसर यदि किसी को मिलता है तो वह एक अद्भुत और अनुपम आनन्द प्राप्त करने का सौभाग्य उपलब्ध करता है। तीर्थयात्रा पर्यटन, प्रवास एक मनोरम प्रेरणाप्रद दिव्य दर्शन प्राप्त करने के लिये लोग अक्सर लालायित रहते हैं और उस नवीनता को प्राप्त करने के लिये किसी न किसी प्रकार समय निकालते हैं, खर्च का प्रबन्ध करते हैं। कनिष्ठ वानप्रस्थ योजना के लिये कुछ समय निकालना उन सब मनोरंजन प्रयासों से कहीं अधिक आकर्षक प्रफुल्लता एवं नव−जीवन प्रदान करने वाला है। मनोविनोदों में केवल बाहरी प्रसन्नता प्राप्त होती है किन्तु इस दिव्य प्रयास में अन्तःकरण का कण−कण हर्षोल्लास से भर जाता है।
पतन के गर्त में निरन्तर गहरी धँसती जा रही है—सामूहिक आत्मघात के प्रयास में जुटी हुई मनुष्य जाति को इस धरती पर अपना अस्तित्व बनाये रहने योग्य बनाने के लिए जिन आज प्रबल प्रयासों की आवश्यकता है; उनमें वानप्रस्थ चेतना को पुनर्जीवित करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। समय के प्रवाह को मोड़ने के लिये अनेकों उच्चस्तरीय कर्मवीरों की आवश्यकता है वे इसी खदान में से निकलेंगे। नाम यश के लिये मरने वाले बकवासी नेता अभिनेता अपनी उथली उछल−कूदों से कोई कहने योग्य सत्परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकते इसके लिये भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, दधीचों की परंपरा अपनाने वाले महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी। उस प्रयोजन को पूरा करने के लिये अब सूर्य−चन्द्र नहीं निकलते तो हम छोटे−छोटे दीपकों को ही आगे आकर निविड़ अन्धकार की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। अपने परिवार के सद्−गृहस्थों को ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी व्यस्तता को निरस्त करके विश्व−मानव का उज्ज्वल भविष्य बनाने के लिये अपने आपको पूरे या अधूरे समय के लिये समर्पित करना चाहिये आखिर सीमा सुरक्षा के लिये लाखों बलिदानी वीर अभी भी जान हथेली पर रखकर आगे आते ही हैं−− फिर भावनात्मक नव−निर्माण का क्षेत्र ही क्यों सूना अधूरा पड़ा रहे?
आशा की जानी चाहिए कि अखण्ड−ज्योति परिवार की जीवन्त आत्माएँ युग की पुकार को पूरा करने के लिए संस्कृति की गौरव गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिये आगे आवेंगी और नवम्बर से फरवरी तक चलने वाले वानप्रस्थ शिक्षण सत्रों में उनकी बड़ी संख्या में भर्ती होगी।
संख्या की दृष्टि से समाज में आधे नर होते हैं, आधी नारियाँ। इन्हीं दो पहियों पर मनुष्य जाति की गाड़ी प्रगति या अवगति की दिशा में लुढ़कती है। पक्ष तो विकसित रहे किंतु नारी पक्ष दुर्बल पिछड़ा पड़ा रहे तो आधे अंग को लकवा मार जाने की स्थिति बन जायगी और शेष स्वस्थ पक्ष भी बेकार हो जायगा। अपने देश की यही स्थिति है। पिछले अन्धकार युग का सबसे अधिक अभिशाप भारतीय नारी को भुगतना पड़ा है। विदेशी आक्रमणकारियों से शील रक्षा करने के लिए—अथवा सामन्तवादी दर्प, अहंकार की पूर्ति के लिए—नारी को बाधित बनाया गया। उस पर ऐसे प्रतिबन्ध लगाये गये जिनमें उसकी स्थिति आजीवन क्रीत दासी बनी रहने जैसी बन गई। उसके नागरिक अधिकार एक प्रकार से छीन ही लिये गये। भोग सामग्री के रूप में ही उसकी आवश्यकता रह गई। सो भी उससे उस पिछड़ी हुई रुग्ण, अशक्त, अविकसित स्थिति में कुछ बन नहीं पड़ा।
भारत में नर के, अतिरिक्त विशेषाधिकार हैं और नारी की दासों और बन्दियों जैसी आचार संहिता अलग है। मनुष्य जाति के दो समानान्तर पक्ष हैं और दोनों के कर्त्तव्य अधिकार समान हैं, इस तथ्य को अपने देश में पिछले दिनों प्रायः भुला ही दिया गया है। पर्दा प्रथा—सती प्रथा−−विधवा विवाह निषेध, कन्या जन्म को दुर्भाग्य पूर्ण माना जाना, लम्बे दहेज की माँग पूरी करने पर ही वधू को स्वीकार करना−उत्तराधिकार में उसे अँगूठा दिखाया जाना—शिक्षा एवं स्वावलम्बन के आधारों से वंचित रखा जाना, आजीवन दूसरों के नियन्त्रण में बाधित रहना जैसे कितने ही प्रचलन अब रूढ़ियां कुरीतियाँ नहीं माने जाते वरन् उन्हें परम्परा कहा जाता है और कई बार तो इन लज्जाजनक अन्यायों को शास्त्र वचन तक कहने एवं उसका समर्थन करने तक की धृष्टता की जाती है। पशुओं को उनका मालिक तिरस्कृत करने, पीटने या मार डालने को स्वतन्त्र है उनके शोषण उत्पीड़न की खुली छूट है। कोई दूसरा उस अनीति में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, इसी प्रकार ससुराल वाले किसी वधू के साथ कुछ भी व्यवहार कर सकते हैं दूसरों को, यहाँ तक उसके माता−पिता को भी इसे रोकने का अधिकार नहीं है। बात बढ़ा−चढ़ा कर नहीं कही जा रही है। अशिक्षा, पिछड़ेपन और कुरीतियों से दबे, घिरे भारत में तीन चौथाई नारियों को यही सब कुछ−−आज भी सहना पड़ रहा है। वे कितनी दुखी और असन्तुष्ट हैं—कितनी पिछड़ी, कितनी दुर्बल और कितनी पीड़ित, बाधित और कितनी असहाय हैं उसे कोई भी सहृदय व्यक्ति कहीं भी नारी समाज की मन की बातें जानकर—पूछ सुन कर सहज ही पता लगा सकता है।
पति या सास−ससुर की दृष्टि रखकर तो उन अभागिनों के साथ सहानुभूति नहीं उपजेगी, पर यदि किसी के पास पिता का हृदय हो और अपनी आँखों की पुतली का तेल इस प्रकार कोल्हू में पिलकर निकलता हुआ आँखों के सामने आये तो कहीं उसकी छाती फटे। किसी के पास तोतली बोली बोलने वाले बालक का हृदय हो और वह अपनी मम्मी को जल्लादी हन्टर खाकर सुबक−सुबक कर किसी कोने में बैठी रोती हुई देखे तो उसे इस प्रकार अवाक् स्तब्ध रहने की अनुभूति हो मानो यह संसार मात्र कसाइयों और क्रूर कर्माओं के लिए ही बना है उन्हीं से पटा पड़ा है। करुणा और ममता नाम के तत्व इस धरती पर शायद रचे ही नहीं गये हैं।
मन की प्रसन्नता प्रफुल्लता क्या होती है—हँसना हँसाना कैसा होता है—आमोद−प्रमोद किसे कहते हैं इसकी अनुभूति कदाचित् ही किसी भाग्यवान नारी को होती है शेष को तो कोल्हू के बैल की तरह ही अनवरत श्रम और अनन्त तिरस्कार का भाजन बनकर ही मौत के दिन पूरे करने पड़ते हैं। अशिक्षा ने उनके मानसिक विकास को एक प्रकार से अवरुद्ध ही कर रखा है। परित्याग एवं विधवा बनने का संकट जब सामने आता है तो उन्हें सूझता नहीं कि अपना, अपने बच्चों का निर्वाह कहाँ और कैसे करें? स्वावलम्बी अर्थोपार्जन की क्षमता प्राप्त करने से तो उन्हें आरम्भ से ही रोका गया है। जब परकटे पक्षी की तरह ही रखा जाना है तो उड़ने की योग्यता क्यों विकसित होने दी जाय? निरीह और निर्बल को ही तो बन्धन में जकड़ कर रखा जा सकता है, उनके लिए इसी स्थिति की पूर्व योजना बनाकर रखी गई है जिसमें कि आज संयोग वश नहीं, योजनाबद्ध रूप में जकड़ी पड़ी हैं। इन प्रतिबन्धों ने उन्हें बौद्धिक पिछड़ेपन का शिकार बना दिया है। अन्धविश्वास, मूढ़ मान्यताएँ—निकम्मी प्रथा परम्परायें—संकीर्ण चिन्तन—संकीर्णता और खीज यही सब उनके पल्ले बँधा है। शारीरिक रुग्णता से भी दो कदम आगे उन्हें मानसिक रुग्णता घेरे हुए है।
नई पीढ़ियाँ माता के पेट से ही पैदा होती हैं—घर, परिवार का वातावरण महिलाएँ ही बनाती हैं—संस्कार स्वभाव और चरित्र का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में ही होता है परिवार का स्नेह−सौजन्य पूरी तरह स्त्रियों के हाथ में रहता है यदि नारी की स्थिति सुसंस्कृत, सुविकसित स्तर की हो तो निस्सन्देह हमारे घर−परिवार स्वर्गीय वातावरण से भरे−पूरे रह सकते हैं उनमें रहने वाले लोग कल्पवृक्ष जैसी शीतल छाया का रसास्वादन कर सकते हैं। हीरे जैसे बहुमूल्य रत्न किन्हीं विशेष खदानों से निकलते हैं पर यदि परिवार का वातावरण परिष्कृत हो तो उसमें से एक से एक बहुमूल्य नररत्न निकलते रह सकते हैं और उस सम्पदा से कोई देश समाज, समुन्नत स्थिति में बना रह सकता है। देश की आधी जनसंख्या नारी है। यदि वह पक्ष दुर्बल और भारभूत बनकर रहेगा तो नर के रूप में शेष आधी आबादी की अपनी भारी शक्ति उस अशक्त पक्ष का भार ढोने में ही नष्ट होती रहेगी। प्रगति तो तभी सम्भव थी जब गाड़ी के दोनों पहिये साथ−साथ आगे की ओर लुढ़कते। एक पहिया पीछे की ओर खिंचे दूसरा आगे की ओर बड़े तो उससे खींचतान भर होती रहेगी हाथ कुछ नहीं लगेगा। प्रगतिशील देशों में नारी भी नर के कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ने की—अपने देश को आगे बढ़ाने की सुविकसित स्थिति में रहती हैं। फलस्वरूप वे बहुत कुछ कर गुजरती हैं पर हमारी प्रतिगामी परिस्थितियाँ तो वैसा कुछ बन पड़ने का अवसर ही नहीं आने देतीं। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, मात्र पुरुषों को विकसित बनाने वाले सारे प्रयास अधूरे और असफल ही सिद्ध होते रहेंगे। यदि हमें सचमुच ही प्रगति की दिशा में आगे बढ़ना हो तो नारी को साथ लेकर ही चलना होगा। एकाँगी प्रयास कभी भी सफल न हो सकेंगे।
नारी जागरण भारत की सबसे प्रथम और सबसे प्रमुख आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए विशालकाय और दूरगामी कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे। सरकारी स्कूलों में कन्या शिक्षा का प्रयास चल रहा है—महिला कल्याण के लिए भी सरकारी और गैर सरकारी प्रयत्न हो रहे हैं आँसू पोंछने की दृष्टि से और आशा का दीपक सँजोये रहने की दृष्टि से उनका भी कुछ न कुछ उपयोग ही है पर बात उतने भर से बनेगी नहीं हमें नारी जागरण का समग्र राष्ट्र को प्रभावित करने वाला—रचनात्मक कदम बढ़ाना पड़ेगा अन्यथा आधे राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति का अत्यन्त जटिल अतीव विस्तृत और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न हजार वर्षों में भी हल न हो सकेगा। इसके लिए गैर सरकारी प्रयत्न ही प्रधान भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं।
इस दिशा में प्रथम कदम यह होना चाहिए कि नारी जागरण में अभिरुचि रखने वाली महिलाओं का आह्वान किया जाय और उनमें से जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हों उन्हें प्रशिक्षित किया जाय। शान्ति कुँज ने अखण्ड−ज्योति परिवार की ऐसी ही सजग, सजीव, सक्षम एवं भावनाशील महिलाओं को आमन्त्रित किया है। उन्हें अपने निज के घर−परिवारों का एक आदर्श संस्थान के रूप में विकास करना होगा—अपना निज का व्यक्तित्व निखारना होगा और अपने समीपवर्ती क्षेत्र में नारी−जागरण का संगठित एवं क्रमबद्ध विकास अभियान आगे बढ़ाना होगा।
इस प्रयोजन का प्रशिक्षण करने के लिए तीन−तीन महीने की व्यवस्था शान्ति कुँज में विगत छै महीने से चल रही है। जुलाई, अगस्त, सितम्बर का प्रथम सत्र सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। जिन दिनों यह अंक पाठकों के हाथ में पहुँचेगा उन दिनों अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर वाला सत्र चल रहा होगा। यह क्रम भविष्य में भी अविच्छिन्न रूप से चलता रहेगा। स्थान सम्बन्धी सीमित साधन रहने से एक बार में तीस से चालीस तक ही प्रौढ़ महिलाओं का शिक्षण सम्भव है। कन्या शिक्षा का एक वर्षीय क्रम भी तो चल रहा है वे भी बीस के करीब इन दिनों हैं। इस प्रकार पचास के लगभग कन्याओं और प्रौढ़ महिलाओं की ही शिक्षा यहाँ सम्भव है। पुरुषों के जीवन साधना सत्र—भजनोपदेशक सत्र—वानप्रस्थ सत्र, लोक शिक्षा सत्र भी तो चलते हैं उनमें उलट−पुलट होती रहती है पर सौ का औसत उनका भी बना रहता है। डेढ़ सौ शिक्षार्थी और मिशन के कार्य संचालक कार्यकर्त्ताओं के स्थायी निवास से अधिक स्थान यहाँ बिलकुल भी नहीं है। ऐसी दशा में नारी जागरण के लिए सहस्रों महिलाओं का निरंतर शिक्षण अभीष्ट होने पर भी उसकी व्यवस्था सीमित ही रखनी पड़ रही है।
महिला जागरण सत्र तीन−तीन महीने के हैं। उनमें अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों को अपनी महिलाएँ भेजनी चाहिए। शिक्षार्थी महिलाओं की कम से कम आठवें दर्जे की शिक्षा योग्यता होनी चाहिए उनका शारीरिक, मानसिक दृष्टि से स्वस्थ होना आवश्यक हैं। बच्चों समेत रहने की व्यवस्था नहीं है। केवल वे ही महिलाएँ इस शिक्षण में स्थान पा सकेंगी जिनके बच्चे अपने घरों पर रह सकते हैं। जिनमें चेतना, श्रमशीलता सृजन क्षमता एवं नारी जागरण की दिशा में कुछ करने की लगन है, उन्हीं को भेजा जाना चाहिए। बेकार का कूड़ा ठेल देने से तो यहाँ अव्यवस्था ही फैलेगी और उस शक्ति का आय व्यय होगा जिसका लाभ लेकर कोई सुयोग्य महिला अपना और अपने समाज का कुछ कहने लायक हित साधन कर सकती थी।
ऊपर कहा जा चुका है महिला जागरण शिक्षा के दो पक्ष हैं एक अपना और अपने परिवार का पुनर्निर्माण दूसरा समीपवर्ती संपर्क क्षेत्र में संगठित रूप से रचनात्मक कार्य करने होंगे। विशेष रूप से प्रौढ़ महिला शिक्षा के लिए उन्हें तीसरे प्रहर दो से पाँच बजे तक की एक पाठशाला की व्यवस्था करनी पड़ेगी। महिला जागरण के लिए साक्षरता का—शिक्षा प्रसार का कदम पहला है। इसके बिना व्यक्ति परिवार से सम्बन्धित अगणित समस्याओं का स्वरूप और हल समझना उनके लिए सम्भव न हो सकेगा। तोते की तरह उन्हें कौन बैठा−बैठा पढ़ाता रहेगा। अभीष्ट ज्ञान का उपार्जन तो पुस्तकों द्वारा ही सम्भव है। इसके लिए उनका शिक्षित होना आवश्यक है। स्त्रियों को तीसरे प्रहर ही घर के काम−काज से थोड़ा समय मिलता है। इसी समय उन्हें किसी कार्य के लिए एकत्रित किया जा सकता है, अस्तु प्रौढ़ महिला शिक्षा की व्यवस्था उसी समय होगी। शान्ति कुँज में प्रशिक्षित महिलाएँ सेवा साधना के रूप में अपने अपने यहाँ ऐसी ही प्रौढ़ महिला पाठशालाएँ चलाया करेंगी।
इस पाठ्य क्रम के लिए जल्दी ही पाठ्य पुस्तकें लिखी और छापी जा रही हैं जिनसे न केवल साक्षरता की आवश्यकता पूरी होगी वरन् मानव−जीवन से सम्बन्धित विशेषतया नारी को प्रभावित करने वाली—घर−परिवार सम्बन्धी प्रायः सभी जानकारियों का समावेश और उलझनों का निराकरण दिया हुआ होगा। यह पाठ्य पुस्तकें साहित्य ज्ञान बढ़ाने—दृष्टिकोण परिष्कृत करने और अभिनव जीवनयापन की दिशा देने का दुहरा लाभ प्रस्तुत करेंगी।
संगीत का सामान्य ज्ञान—भाषण कला—रामायण कथा के माध्यम से समग्र लोक शिक्षण का अभ्यास, महिला जागरण की विभिन्न प्रवृत्तियों का संचालन—सिलाई, साबुन, खिलौने, मोमबत्ती, बिस्कुट बनाना, घरेलू शाक वाटिका, टूट−फूट की मरम्मत, जैसी कुटीर उद्योग शिशु पालन, भोजन के जीवन तत्व सुरक्षित रखने वाली परिष्कृत पाक विद्या, आसन, प्राणायाम, हलके व्यायाम और खेल−कूद, लाठी चलाने और कवायद का अभ्यास, गृह प्रबन्ध, परिवार में स्नेह सन्तुलन, पारस्परिक सद्व्यवहार, शिष्टाचार, मितव्ययी अर्थ व्यवस्था, प्रमोद−विनोद का वातावरण बनाये रहने की कला, शोभा−सज्जा, रोगी परिचर्या, धातृ विद्या आदि कितने ही महत्वपूर्ण विषय शान्ति कुँज की तीन महीने की शिक्षा में पढ़ाये जाते हैं। इन्हीं विषयों को प्रशिक्षित महिलाएँ अपने−अपने यहाँ प्रौढ़ महिला विद्यालय स्थापित करके पढ़ाया करेंगी। इस प्रकार वे पाठशालाएँ महिलाओं को शिक्षित, जागृत और सक्षम बनाने के तिहरे उद्देश्य की पूर्ति करेंगी।
बच्चों वाली महिलाएँ भी अपने घर में या पड़ौस के किसी मकान में ऐसी पाठशालाएँ चला सकती हैं। तथा संगठन का, लोक शिक्षण का कार्य हाथ में ले सकती हैं। साप्ताहिक सत्संगों में संगीत प्रवचन का समावेश करके उनके द्वारा जागृति का सूत्र संचालन हो सकता है। इनमें कथा−कीर्तन का पुट भी रह सकता है। इसी प्रकार वे जन्म−दिन, विवाह−दिन, पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ और मुण्डन संस्कारों की पुण्य परम्परा स्वयं ही करती रह सकती है। इन धर्मायोजनों में न केवल परिवारों में धार्मिक वातावरण बनेगा वरन् परिवार निर्माण की अति महत्वपूर्ण दिशाओं और प्रेरणाओं से भी उन परिवारों को परिचित प्रशिक्षित किया जा सकेगा। यह नारी जागरण का कार्यक्रम व्यस्त महिलाएँ भी थोड़ा−सा समय निकाल कर अपने−अपने संपर्क क्षेत्र में आसानी से चला सकती हैं। जो हरिद्वार से यह सब सीख कर आयेंगी वे प्रथम प्रयास एवं आदर्श संस्थापन के रूप में अपने घर परिवार को तो वैसा बनायेंगी ही जैसा कि वे औरों को बनाना सिखाना चाहती हैं। इस प्रकार लोक−सुधार के साथ−साथ आत्म−सुधार का लाभ भी जुड़ा रहेगा। इसमें स्वार्थ परमार्थ दोनों का समन्वय है।
जैसी शिक्षा व्यवस्था शान्ति कुँज में है वैसी ही हर क्षेत्र में होनी चाहिए ताकि उन क्षेत्र की सजग महिलाओं को आसानी से प्रशिक्षित किया जा सके और प्रस्तुत कार्यक्रम को व्यापक विस्तार दिया जा सके। इसके लिए ऐसी महिलाओं की आवश्यकता है जो शिक्षित, सुयोग्य होने के साथ−साथ पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त हों, जिनमें महिला जागरण के लिए अपना जीवन समर्पित होने की लगन हो और अपना पूरा समय, मन इसी पुण्य प्रयोजन के लिए लगा सकें।
जिनके बच्चे बड़े और स्वावलम्बी हो गये—बिना बच्चों वाली विधवाएँ अथवा परिक्तताएँ इस प्रयोजन के लिए अधिक उपयुक्त हो सकती हैं। कितनी ही वयस्क कन्याएँ अविवाहित रहकर अपना जीवन लोक साधना के सर्वोपरि कार्य−महिला जागरण के लिए समर्पित करना चाहती हैं वे भी देशव्यापी महिला जागरण आन्दोलन के विविध प्रयासों को आगे बढ़ा सकती हैं और उनकी सहायता से शान्ति कुँज जैसे अनेकों ट्रेनिंग सेन्टर हजारों केन्द्रों में चलाये जा सकते हैं। परिवार के उत्तरदायित्वों से मुक्त महिलाओं को इस प्रयोजन के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित करना एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए ही हमें अपनी खोज−बीन जारी रखनी चाहिए। कम से कम इतना तो हर अखण्ड−ज्योति पाठक का मन होना चाहिए कि उनके घर परिवार में से एक सुयोग्य महिला इस पुण्य प्रवृत्ति में किसी न किसी प्रकार भाग ले सके और युग−परिवर्तन के इस महान चरण में अपना कुछ योगदान किसी न किसी रूप में दे सके।
महिला जागरण सत्र में तीन महीने की शिक्षा अवधि का भोजन व्यय तो उन्हीं को वहन करना चाहिए, इसके उपरान्त यदि समर्पित जीवन के लिए कोई निवृत्त महिला तैयार होगी तो उनके भोजन, वस्त्र की निर्वाह व्यवस्था मिशन करेगा। नौकरी तो किसी को भी नहीं दी जा सकेगी।
मला जागरण की प्रवृत्ति कितनी उपयोगी, कितनी आवश्यक और कितनी महत्वपूर्ण है इस तथ्य पर जब विचार करते हैं तो लगता है कि इससे बढ़कर भारत जैसे देश में प्रमुखता देने योग्य और दूसरा कोई कार्य नहीं है। नई पीढ़ियों का स्तर सुयोग्य महिलाएँ ही बना सकती हैं परिवारों का वातावरण सुख−शान्तिमय बनाना उन्हीं के हाथ में है। राष्ट्र की आधी पददलित शक्ति को यदि उभार दिया जाय तो देखते−देखते देश की समर्थता सहज ही दूनी हो सकती है। हमारे मुँह पर लगा हुआ नारी उत्पीड़न का कलंक सहज ही धुल सकता है। अखण्ड−ज्योति परिवार के हर सदस्य को इस संदर्भ में कुछ करने की बात सोचनी ही चाहिए और जो उससे बन पड़े उसके लिए साहसिक कदम बढ़ाना ही चाहिए।
अशिक्षित, पिछड़े हुए देहातों में रहने वाली भारत की बहुसंख्यक जनता को प्रगति की सर्वतोमुखी प्रेरणा देने के लिये दो ही आधार प्रधान रूप से फलप्रद हो सकते हैं, एक कथा कहानी का और दूसरा संगीत का उपयोग। हमें इन दोनों को ही साथ लेकर चलना होगा। भावनात्मक नव−निर्माण के लिए−−बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता पूरी करने के लियेइन अस्त्र−शस्त्रों का उपयोग आवश्यक है।
कथा संस्मरणों के प्रेरक प्रसंग जुटाने के लिए मासिक युग−निर्माण योजना स्वतन्त्र रूप से निकाली जा रही है। जीवन चरित्रों की एक लम्बी सीरीज प्रकाशित की गई है। कितनी ही पुस्तकें इस प्रयोजन के लिये छापी गई हैं ताकि प्रवचन शैली में उनका समुचित समावेश करके जन−मानस के नव−निर्माण का प्रयोजन भली प्रकार पूरा किया जा सके।
संगीत की शिक्षा पुस्तकों से नहीं प्रत्यक्ष अभ्यास से ही हो सकती है। संगीत यों, एक साथ−साथ लम्बी साधना है। उसका अभ्यास करने के लिये अवकाश भी चाहिये और सुविधा भी। अपने देश की आज जो स्थिति है उसमें लम्बे समय के उपरान्त कल देने वाले किसी कार्य को हाथ में नहीं लिया जा सकता। वर्तमान स्थिति को आपत्तिकालीन मानकर उसका मुकाबला करने के लिये हमें युद्धस्तरीय तात्कालिक उपाय काम में लाने होंगे।
लोक−मानस में प्रगतिशील चेतना उत्पन्न करने के अति महत्वपूर्ण अस्त्र संगीत को हमें आज ही प्रयोग करना है और उसकी तैयारी की अवधि न्यूनतम रखनी है। ताकि अधिक सैनिक स्वल्प समय में कामचलाऊ प्रशिक्षण देकर लड़ाई के मोर्चे पर भेजे जा सकें और सर्वनाश पर तुले हुए शत्रु के दाँत खट्टे कर सकें।
संगीत शिक्षण की स्वल्पकालीन शिक्षा योजना इसी दृष्टि से बनाई गई है और तीन−तीन महीने के सत्रों की क्रम शृंखला कार्यान्वित की गई है। समय और उद्देश्य की संगति तो नहीं मिलती। इतनी बड़ी आवश्यकता इतने कम समय में कैसे पूरी हो सकती है यह बात सामान्य रूप से नहीं समझी जा सकती। इसके लिए उन कुशल इंजीनियरों का क्रिया−कलाप निकट से देखना होगा जो युद्ध कूच के लिये बढ़ती जा रही सेना के लिये दो ही दिन में नदी को पार कर करने योग्य पुल बनाकर खड़ा कर देते हैं। तीन महीने के संगीत सत्र शिक्षण को इसी स्तर का प्रयोग समझा जाय।
गायनों के मीटर और ध्वनि प्रवाह दस की संख्या में सीमित कर दिये गये है। उतने ही दायरे में विविध स्तर की प्रेरणाएँ देने वाले अभिनव गीत मिशन के गीतकारों से लिखाये गये हैं तथा जो अन्यत्र से मिले हैं वे संकलित किये गये हैं। अधिक समय अनेकानेक ध्वनियों में गाये जाने वाले विभिन्न मीटरों पर बने हुए गीतों के अभ्यास में लगता है। यदि उनकी संख्या सीमित हो तो अभ्यास में इतनी अधिक देर नहीं लगेगी।
पिछले जुलाई, अगस्त, सितम्बर के महिला जागरण सत्र में इस सुगम संगीत शिक्षा प्रक्रिया का प्रयोग किया गया और वह अपना लक्ष्य पूरा करने में सफल सिद्ध हुई। जिन महिलाओं का गला थोड़ा भी साथ देता था और जिनकी बुद्धि में थोड़ी सी भी पकड़ा थी वे तीन महीने में ही इस योग्य बन गई कि वे कीर्तनकार की—रामायण, कथावाचक की—भजनोपदेशक की कामचलाऊ आवश्यकता पूरी कर सकें। इसी अनुभव के उत्साह ने पुरुषों का पहला संगीत सत्र 1 अक्टूबर से आरम्भ कर देने के लिए साहस प्रदान किया है। अब तक काफी दिनों से यह योजना विचाराधीन चल रही थीं पर अब उसका श्रीगणेश कर ही दिया गया। प्रथम सत्र में थोड़े शिक्षार्थी लिये गये हैं। आशा की जानी चाहिए कि आगे अधिक सीटों का प्रबन्ध हो जाने से अब की अपेक्षा अधिक छात्रों को स्वीकृति दी जा सकेगी।
यह स्पष्ट रूप से समझ लिया जाना चाहिए। शौकीनों के लिये तरह तरह की कलाएँ सीखकर अपना और अपने मित्र, कुटुम्बियों का मनोरंजन करते रहने के लिये संगीत सिखाने का हमारा इरादा बिलकुल भी नहीं है। व्यक्तिगत शौकीनी की पूर्ति के लिये अनेक लोग अपने ढंग से अपनी−अपनी सुविधाएँ जुटाते हैं वैसा ही उन्हें भी करना चाहिए। शांतिकुंज में चल रहे अन्य प्रशिक्षणों की तरह संगीत सत्र का भी यही उद्देश्य है कि सीखे हुए लोग युग गायक की भूमिका निबाहें अपने जीविकोपार्जन कार्यों से बचा हुआ अवकाश का समय वे अपने क्षेत्र में जन−जागृति के लिये लगाया करें। उनकी संगीत शिक्षा का—लाभ जन−मानस को ऊँचा उठाने में एक महत्वपूर्ण आधार मिलने के रूप में उपलब्ध होगा। जिनके मन में ऐसी सेवा भावना उठती हो—जो अपनी संगीत उपलब्धि से लोक−मंगल की दिशा में समाज को कुछ अनुदान देने की उदारता उमँगती हो उन्हीं की इन संगीत सत्रों में आने की सार्थकता है। वस्तुस्थिति को और भी अधिक स्पष्ट करने की दृष्टि से इस शिक्षण का नाम संगीत सत्र न रखकर भजनोपदेशक सत्र कर दिया है ताकि शिक्षार्थी को विदित रहें उसका यह प्रयास एक युग−गायक बनने के लिये है समाज को नवचेतना एवं नव प्रेरणा देने के लिये उसने अपनी योग्यता विकसित करने का कदम बढ़ाया है।
एक बात और भी स्पष्ट है कि संगीत हर किसी को नहीं आ सकता। इसके लिये गले की मधुरता—स्वरताल को पकड़ सकने की आवश्यक सूझ बूझ और लय−ताल को समझने की सूक्ष्म बुद्धि आवश्यक है। इसीलिये हर क्षेत्र से पूछा गया है कि पिछले दिनों वे अपनी संगीत अभिरुचि को कार्य रूप में परिणित करने के लिये क्या कुछ प्रयत्न करते रहे हैं और उन प्रयासों में कितने सफल−असफल रहे हैं। शिक्षार्थियों को यह निर्णय स्वयं ही करना चाहिये या अपने समीपवर्ती किन्हीं संगीत ज्ञाता से पूछकर यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वे इस शिक्षा के लिये उपयुक्त हैं या नहीं। मात्र उत्साह के आधार पर संगीत क्षेत्र में सफल नहीं हुआ जा सकता उसकी प्रकृति प्रदत्त मूल क्षमता उस स्तर की होनी चाहिये तभी प्रयत्न और परिश्रम सार्थक हो सकेगा। अपने गले तथा संगीत सम्बन्धी पकड़ की उपयुक्तता सम्बन्धी सन्तोष करने के पश्चात् ही आवेदन पत्र भेजना उचित है। आमतौर से ‘टैस्ट’ के बाद ही ऐसे प्रशिक्षणों में भर्ती की जाती है। वह प्रयोजन उधर ही पूरा कर लिया जाय और उपयुक्त शिक्षार्थी ही आवें तो उस थोड़ी अवधि में भी यहाँ की अति उपयोगी शिक्षण प्रक्रिया का समुचित लाभ उठाया जा सकेगा।
हारमोनियम, ढोलक, तबला, मंजीरा, घुंघरू, चिमटा, ढपली, करताल आदि बाजों का कामचलाऊ प्रशिक्षण किये जाने की बात इन तीन महीने में इतनी बन जाती है कि आगे जाकर उस आधार पर जारी रखा गया अभ्यास संगीत क्षेत्र में किसी को भी निपुण सुयोग्य बना सकता है।
हमारे गीत प्रेरक, विचारोत्तेजक मार्ग−दर्शक और समय की पुकार के अनुसार जन मानस को मोड़ने वाले होने चाहिए। इसी प्रकार के गीत शिक्षार्थियों को सिखाये जाते हैं कि जहाँ भी जाँय अच्छे कीर्तनकार की—तुलसीकृत एवं राधेश्याम रामायण कथा वाचक की आवश्यकता पूरी कर सकें। अच्छे कीर्तनकार सिद्ध हो सकें और जनजागरण के उपयुक्त गीतों से लोक−मानस झंकृत कर सकें।
हमारा लक्ष्य प्रधानतया देहात है तो भी यह शिक्षण शहरी अथवा सुशिक्षित वर्ग के लिये कम आकर्षक नहीं है। उसे गँवारु नहीं कहा जा सकता। उसका स्तर बनाये रखने की पूरी पूरी सतर्कता रखी गई है। गायन के साथ−साथ जुड़ी हुई है। अभिनय का भी सामान्य ज्ञान कराया जायगा। ताकि शिक्षार्थी जहाँ अवसर हो वहाँ अधिक आकर्षक साँस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकें। समय ही बतायेगा कि युग−परिवर्तन में इस छोटे से प्रयास ने कितना अधिक योगदान दिया है और अपनी कितनी सार्थकता सिद्ध की है।
लोक शिक्षण के लिए एक क्रमबद्ध शिक्षण प्रक्रिया हमें खड़ी करनी है जिसमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक एवं सार्वभौम समस्याओं के सम्बन्ध में जनसाधारण का परिष्कृत दृष्टिकोण विकसित किया जा सके और मान्यताओं को नई दिशा, नई चेतना—नई प्रेरणा दी जा सके। यह कार्य बड़ा और विस्तृत है। इसे स्वल्प कालीन पाठशालाओं के रूप में ही पूरा किया जा सकता है। इसके लिए प्रवचन, प्रशिक्षण प्रश्नोत्तर शैली तो प्रयुक्त होना ही चाहिए साथ ही एक पाठ्य−क्रम भी निर्धारित रहना चाहिए जिसके आधार पर जनसाधारण के लिए वर्तमान मान्यताओं को, वाँछनीयता, अवाँछनीयता को परख सकना सम्भव हो सके और यथार्थता को जानने, अपनाने का साहस हो सके।
लोक शिक्षण की समग्र आवश्यकता पूरी करने के लिए जगह जगह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कई प्रकार की सामयिक पाठशालाएँ चलाई जायेंगी।
(1)दो वर्षीय सामान्य शिक्षा कार्यक्रम जिसमें भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास, विज्ञान, कृषि, पशु−पालन, कुटीर−उद्योग, सामान्य ज्ञान का बहुउपयोगी भाग भी रहेगा जिससे स्कूली शिक्षा की दृष्टि से जूनियर हाईस्कूल स्तर का किन्तु उससे कई गुना अधिक एवं उपयोगी ज्ञान मिल सके। व्यक्ति एवं समाज के निर्माण विकास की अति महत्वपूर्ण शिक्षा तो इसके साथ ही अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहेगी आशा की जानी चाहिए कि यह शिक्षा किसी भी वयस्क, अवयस्क शिक्षार्थी को प्रौढ़ चिन्तन कर सकने योग्य बना सकेगी।
जहाँ पूरे समय के लिए ऐसे विद्यालय चल सकेंगे वहाँ वैसा प्रयास किया जायगा और बताया जायगा कि घिसी−पिटी, सड़ी−गली शिक्षा पद्धति के स्थान पर यह स्वल्पकालीन किन्तु सर्वांगपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया कितनी अधिक प्रखर एवं कितनी अधिक उपयोगी है।
जहाँ पूरे समय के विद्यालय न चल सकेंगे वहाँ उसी शिक्षा को रात्रि पाठशालाओं के रूप में अथवा अन्य किसी सुविधा के समय में चलाया जायगा। आजीविका उपार्जन तथा अन्य कार्यों में व्यस्त व्यक्तियों को जो समय सुविधा का रहता है उसी में यह शिक्षण चलेगा। महिलाओं के लिए तीसरे प्रहर दो से पाँच बजे तक का ही समय सुविधा जनक बैठता है। बच्चों को स्कूली टाइम बचाकर सुबह या शाम का रखा जा सकता है। उनके लिए छुट्टी के दिन अधिक देर तक प्रशिक्षण की सुविधा रखी जा सकती है।
ऐसे विद्यालय हमें गाँव−गाँव चलाने हैं जिनमें बाल, वृद्ध, नर, नारी, शिक्षित, अशिक्षित सभी नव−जीवन की—नव−युग की तैयारी करने के लिए प्रेरणाप्रद मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकें। सेवा−भावी अध्यापकों के द्वारा ही इनका सञ्चालन होगा। वेतन देकर तो पूरे समय वाले विद्यालय ही चल सकते हैं। हर दिन थोड़े समय चलने वाली पाठशालाएँ तो सेवाभावी सृजन सैनिकों के भाव भरे श्रमदान से ही चल सकेंगी।
इस पुण्य प्रयास को जन्म देने एवं अग्रगामी बनाने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो इस अभिनव प्रक्रिया की रुप−रेखा जान सकें और तदनुरूप स्थानीय लोकशिक्षण व्यवस्था का श्रीगणेश एवं सुसंचालन कर सकें।
मई, जून की गर्मी की छुट्टियों में इसी स्तर के शिक्षा प्रेमियों के पन्द्रह−पन्द्रह दिन के तीन सत्र लगाये गये हैं। पहला रात्र 15 मई से 19 मई तक दूसरा 30 मई से 13 जून तक और तीसरा 14 जून से 28 जून तक चलेगा। इनमें अध्यापकों को अथवा उसी स्तर के अन्य लोगों को आमन्त्रित किया गया है।
जो स्कूली अध्यापक हैं वे इस प्रशिक्षण में एक नवीन शैली प्राप्त कर सकते हैं। सरकारी पाठ्य−क्रम में निर्धारित भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास, विज्ञान आदि सामान्य विषयों के साथ−साथ थोड़ी दार्शनिक दृष्टि का समावेश करते हुए इसी शिक्षा में से ऐसे प्रकाश सूत्र छात्रों को हृदयंगम करा सकते हैं जिनके आधार पर उनके मनःक्षेत्र में सच्चरित्रता, सज्जनता, समाज−निष्ठा, सेवाभावना एवं आदर्शवादिता जैसी सद्भावनाओं की सत्प्रवृत्तियों की जड़ें गहरी जमाई जा सकें। यह पद्धति अजनबी लगते हुए भी कठिन नहीं सरल है। उसका उपयोग बिना किसी अतिरिक्त श्रम के सामान्य स्कूली शिक्षा के साथ ही चलाया जा सकता है। अध्यापक लोग इस प्रयास को सहज ही गति दे सकते हैं और अपने राष्ट्रीय कर्त्तव्य का अधिक अच्छी तरह निर्वाह कर सकते हैं।
कि सी को इस असमंजस में पड़ने की जरूरत नहीं हे कि धर्म−निरपेक्ष सरकार इसमें किसी साम्प्रदायिकता की अथवा राजनैतिक दलबन्दी की गन्ध ढूंढ़ निकालेगी। जब वस्तुतः वैसा कुछ हैं ही नहीं—अपना सारा प्रयास चौराहे पर रखा जाने योग्य खुला खेल है तो फिर डरने की कोई बात नहीं। कहीं पूछ−ताछ हुई भी तो उसमें ऐसा कहीं कुछ नहीं मिलेगा, जिसे वर्तमान दिग्भ्रान्त सरकार की दृष्टि में भी अवाँछनीय ठहराया जा सके। चरित्र−निष्ठा और समाज−निष्ठा उत्पन्न करना न मनुष्य का अपराध है करना है, न भगवान का—न सरकार का। इस दिशा में हर कोई निर्भय और निश्चिंत होकर कदम बढ़ा सकता है।
अध्यापक वर्ग में इस स्तर के लोगों से इस दिशा में अधिक आशा रखी गई है और अपेक्षा की गई है। वे अपने बचे हुए समय में रात्रि पाठशालाएँ अथवा अवकाश के अन्य समय में स्वल्पकालीन कक्षाएँ चला सकते हैं। स्कूलों में अन्य विषयों की आदर्श शिक्षा वाले दृष्टिकोण का समावेश करते हुए अधिक आकर्षक एवं अधिक प्रभावशाली ढंग से पढ़ा सकते हैं। रिटायर होने के उपरान्त तो हर भावनाशील अध्यापक से यह आशा की जायगी कि वे जिस महत्वपूर्ण कार्य में अपने जीवन का बड़ा भाग लगा चुके उसी में बचा हुआ शेष जीवन अधिक उत्कृष्ट स्तर पर मातृभूमि को—मानव−जाति को—माता सरस्वती को—समर्पित कर दे और युग−परिवर्तन की, लोक−शिक्षण प्रक्रिया को गतिशील बनाने में शेष जीवन को परम पवित्र पूर्णाहुति के रूप में प्रस्तुत कर दें। उनके अनुभव, अभ्यास एवं कौशल का लाभ विश्व−मानव को इसी प्रकार मिल सकता है वे अपने जीवन की सच्चे अर्थों में धन्य इसी प्रकार बना सकते हैं।
लोक शिक्षण लक्ष्य की पूर्ति के लिए पूरे समय के विद्यालयों अथवा थोड़े−थोड़े समय की पाठशालाओं का संस्थापन एवं संचालन किस आधार पर किया जा सकता है इसकी योजना, रूप−रेखा, विधि−व्यवस्था किस प्रकार चलाई और सफल बनाई जा सकती है इसी की सुविस्तृत जानकारी कराने के लिए यह पन्द्रह−पन्द्रह दिन वाले लोक−शिक्षा सत्र हैं। इनमें मात्र अध्यापकों को ही नहीं बुलाया गया है वरन् उन लोगों को भी बुलाया गया है जो अध्यापक तो नहीं हैं पर इस दिशा में समुचित योग्यता एवं अभिरुचि रखते हैं। कोई सम्पन्न व्यक्ति अथवा संस्था, संस्थान इस प्रयास की उपयोगिता अनुभव करे और वैसा कुछ करने की संवेदना एवं क्षमता अपने में पायें तो वे भी इन सत्रों में आ सकते हैं। इन सत्रों के आधार पर लोक शिक्षण चेतना का देशव्यापी आरंभ−विस्तार होगा और लोक मानस में अवांछनियताओं को निरस्त करने की—विवेकशीलता एवं प्रगतिशीलता की अभिनव चेतना का संचार होगा ऐसा विश्वास है।
इन पन्द्रह दिवसीय लोक शिक्षण सत्रों का एक और भी पक्ष है जिसे उपरोक्त आधार से भी कम नहीं कुछ अधिक ही महत्व दिया जा सकता है। वह है—लेखन प्रशिक्षण। गत वर्ष इसका सफल प्रयोग हो चुका है और यह अनुभव कर लिया गया है कि इस आधार पर युग की बौद्धिक भूख बुझा सकने योग्य लेखनी के धनी—अभिनव साहित्य सृजेता भी विनिर्मित किये जा सकते हैं।
कहना न होगा कि किसी देश, समाज का असली प्रतिबिम्ब साहित्य ही होता है। लोग जैसा पढ़ते हैं वैसा सोचते हैं और जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं। जनसाधारण का क्रिया प्रवाह जिस उत्थान या पतन की दिशा में बढ़ता है उसी स्तर की प्रगति होती है। इस तथ्य को अच्छी तरह गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके, समझ लिया जाय। हम पिछले लम्बे समय से अज्ञानान्धकार में भटकते रहे हैं—राजनैतिक पराधीनता के उत्पीड़न सहते रहे हैं इस दुर्गति ने हमारी आर्थिक, सामाजिक स्थिति ही नहीं चिन्तन की प्रतिभा, प्रखरता भी नष्ट कर दी है पिछड़ापन और अनौचित्य हमारी चिन्तन प्रक्रिया के साथ भयावह रूप से जुड़−जकड़ गया है। राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के उपरान्त हमारा ध्यान इसी विकृति के परिशोधन पर केन्द्रित होना चाहिए था। गिरा को उठाने वाला, व्यक्ति और समाज के प्रत्येक क्षेत्र को परिष्कृत स्तर की प्रबल प्रेरणा देने वाला साहित्य, सृजा जाना चाहिए था और उसे घर−घर पढ़ाने एवं जन−जन को सुनाने का प्रयास किया जाना चाहिए था पर वैसा कुछ हुआ नहीं। सच तो यह है कि जो हुआ है वह उलटा हुआ है। स्वाधीनता प्राप्त होने के उपरान्त पिछले 28 वर्षों में जो लिखा गया है, जो छापा गया और बेचा गया है उस सबको इकट्ठा करके स्तर का निष्कर्ष निकाला जाय तो उसे दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। विनाशक और विघातक जितना सृजा—फैलाया गया है उसकी तुलना में परिष्कृत एवं सृजनात्मक नगण्य है। जब कि उसी की आवश्यकता अत्यधिक थी।
पत्र−पत्रिकाएँ ढेरों निकलती हैं। पुस्तकें पर्वत जितना कागज गलाती हैं। चित्र छापने में हजारों टन स्याही और न जाने कितना कागज प्रयुक्त होता है; पर इस सब का जन−मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है—क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है इसका निष्कर्ष निकाला जाता है तो गहरी निराशा हाथ लगती है और प्रतीत होता है कि हम उठ नहीं रहे गिर रहे हैं। साहित्य की गिरावट अन्ततः उस देश एवं समाज का सर्वतोमुखी पतन ही उपस्थित करेगी। जर्मनी, रूस, जापान, इसराइल जैसे देशों ने थोड़े ही समय में जो अपने देश के नागरिकों को लौह पुरुषों के रूप में बदल दिया उसका बहुत बड़ा श्रेय उन देशों की साहित्य चेतना को बिना किसी संकोच के दिया जा सकता है।
वैयक्तिक क एवं सामाजिक उत्कर्ष−अपकर्ष का बहुत बड़ा श्रेय उस क्षेत्र के साहित्य पर असंदिग्ध रूप से निर्भर रहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर हमें दुर्भाग्य का रोना छोड़कर—सृजनात्मक कदम बढ़ाने के लिए आगे आना होगा। इसके अतिरिक्त अपकर्ष को उत्कर्ष में बदलने के अन्य प्रयास अपूर्ण एवं असफल ही बने रहेंगे। हमें समाज की हर समस्या को परिष्कृत स्तर पर सुलझाने वाले और व्यक्ति की प्रत्येक चिन्तन चेतना में आदर्शवादी मान्यताओं का समावेश करने वाले साहित्य का युद्ध स्तरीय प्रयास करना होगा। न केवल लेखन का वरन् प्रकाशन, विक्रय, वितरण का भी कार्य हाथ में लेना होगा। इसके लिए पूँजी जुटाने और संस्थान खड़े करने की दुस्साहसपूर्ण व्यवस्था भी जुटानी पड़ेगी।
इस संदर्भ में सबसे प्रथम चरण प्रगतिशील साहित्य सृजन कर सकने में समर्थ लेखनी के धनी लोगों की सेना खड़ी करनी पड़ेगी। वे लोग मिशनरी की तरह काम करेंगे। अपने अवकाश का समय निकाल कर अथवा ब्राह्मणों जैसा निर्वाह लेकर अपने श्रम और मनोयोग का—ज्ञान−सम्पदा का उपयोग ज्ञान−यज्ञ में आहुति देने की भावना के साथ करेंगे। आज पैसे वालों ने लालच के टुकड़े दिखाकर साहित्य क्षेत्र की प्रतिभा को खरीद लिया है और उन्हें कठपुतली की तरह नचाते हैं—जो चाहते हैं उचित−अनुचित लिखाते है। इस विषाक्त लेखन, प्रकाशन का लोक−मानस पर कैसा घातक प्रभाव पड़ रहा है, इसकी किसी को चिन्ता नहीं, हमारा मार्ग दूसरा होगा। यहाँ एक−एक पैसा जुटाकर निर्धन लोगों की अरुचि को भी प्रभावित कर सकने वाला सस्ते से सस्ता—प्रायः लागत मूल्य पर साहित्य प्रकाशित किया जाना है। ऐसी दशा में लेखकों को पोटले भर−भर नोट कहाँ से गिनाये जा सकेंगे। अधिकतर तो ऐसा साहित्य अवकाश के समय सेवा−साधना के रूप में ही लिखा जायगा। जिनके पास अन्य कोई आजीविका स्त्रोत न होंगे और पूरे समय इसी काम में जुटेंगे उन्हें ही ब्राह्मण स्तर का निर्वाह लेने का अधिकार है। वस्तुतः उच्चस्तरीय साहित्य सृजन सन्त और ब्राह्मण का ही काम है। हमें उसी स्तर के व्यक्ति ढूंढ़ने हैं—प्रशिक्षित करने हैं और उसी प्रकार के प्रयास आरंभ करने हैं। लेखन सत्र इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हैं।
अध्यापक स्तर के लोग प्रायः ग्रेजुएट जितनी शिक्षा प्राप्त होते हैं, सफल लेखक बनने के लिए इस स्तर का अध्ययन आवश्यक है। स्वाध्यायशील और चिन्तन के ऊहापोह में गहरी दिलचस्पी रखने वाले—लेखक के लिए अनायास ही कुछ प्रयास करते रहने वाले ही अपनी रुचि विशेषता एवं अध्ययन क्षमता के आधार पर ही लेखक बन सकते हैं। जो चाहे वही लेखक बन तो सकता है पर उसके लिए दीर्घकालीन अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। अध्यापक स्तर के वे लोग जिनकी शिक्षा ग्रेजुएट समकक्ष है अधिक आसानी से और कम समय में लेखन की क्षमता उपलब्ध कर सकने में सफल हो सकते हैं। इसलिए लोक शिक्षण सत्र में ही इस शिक्षा व्यवस्था को भी सम्मिलित कर दिया गया है जिसे जून 74 के पन्द्रह−पन्द्रह दिवसीय दो सत्रों में सम्पन्न किया गया था। इस वर्ष अधिक व्यस्त समय और अधिक श्रम करे ऐसा पाठ्य क्रम बनाया गया है जिसमें पन्द्रह दिन जितनी स्वल्प अवधि में ही लोक शिक्षण की विधि−व्यवस्था और लेखन के लिए तथ्यों को हृदयंगम किया जाना आवश्यक है उन्हें सार रूप से किन्तु गम्भीरतापूर्वक समझा दिया जायगा। लेखन के लिए प्रतिदिन अभ्यास करना होगा और उसमें जो त्रुटि रहेंगी उन्हें बताते हुए यह भी बताया जायगा कि इससे भी अच्छा किस प्रकार लिखा जा सकता है। सिद्धान्त और व्यवहार का उभयपक्षीय समावेश रहने से शिक्षार्थी अधिक स्पष्ट रूप से यह जान सकेंगे कि उन्हें सफल लेखक बनने के लिए क्या−क्या करना होगा।
कहने की आवश्यकता नहीं कि अखण्ड−ज्योति और युग−निर्माण योजना का जो साहित्य लिखा गया है उसका अपना स्थान हैं और अपना स्तर। जिसके हाथों से वह सब सृजा जाता रहा है उसी के मुख से उसके अनुभवों के सार−सूत्र के रूप में जो शिक्षण किया जायगा वह निरर्थक नहीं हो सकता। उसमें कुछ ऐसी विशेषताएँ जुड़ी होंगी जो न तो अन्य व्यक्तियों से सीखी जा सकती हैं और न किन्हीं पुस्तकों में लिखी मिलती हैं। पन्द्रह दिन का ही सही पर वह इतना सारगर्भित होगा जो शिथिल और अव्यवस्थित रूप से कुछ ज्यों−त्यों पन्द्रह वर्ष तक करते रहने की अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। लोक शिक्षण पक्ष में आधा समय और लेखन शिक्षण में आधा समय विभाजित करके रखा गया है। प्रतिदिन पूरे आठ घण्टे मनोयोगपूर्वक शिक्षार्थियों को श्रम करना होगा। इसमें वे चार घण्टा नित्य लोक शिक्षण की और चार घण्टे लेखन−कला की शिक्षा प्राप्त किया करेंगे।
यह शिक्षण की बात हुई। वे लाभ सहज स्वाभाविक है जो शान्ति कुँज के वातावरण में अनायास ही मिलते हैं। आत्म−परिष्कार की उपासनाएँ—जीवन−साधना की प्रेरणायें—उच्चस्तरीय प्रगति के लिए तेजस्वी प्रकाश—शोक−संताप से घिरी परिस्थितियों का समाधान आदि न जाने कितने अनुदान हैं जो शान्ति कुँज में आने वाले अनायास ही प्राप्त करते रहते हैं। वे सब उपलब्धियाँ
इतनी महत्वपूर्ण है कि जो घोषित लोक शिक्षा सत्र एवं लेखनी सत्र की सम्मिलित प्रशिक्षण प्रक्रिया से किसी भी प्रकार हलके दर्जे की नहीं हैं।
आशा की जानी चाहिए कि जिन्हें उपरोक्त वर्ग के शिक्षण में अभिरुचि होगी वे अभी से उसकी तैयारी करेंगे और अपना स्थान सुरक्षित करा लेंगे। विशेषतया यह सत्र अध्यापक स्तर के परिजनों के लिए लगाया गया है और उसी वर्ग के लोगों को आग्रहपूर्वक आमंत्रित किया गया है।
शाँति कुञ्ज का निर्माण विशुद्ध रूप से शिक्षण संस्था के रूप में किया गया है। तीर्थ−यात्रियों के ठहरने की धर्मशाला यह नहीं। पर्यटन, दर्शन, परामर्श आदि के लिए आने वाले सज्जन प्रथम कहीं अन्यत्र ठहरें पीछे परामर्श के लिए दोपहर के 12 बजे से सायं 5 बजे के बीच में ही मिलने के लिए आवें। इससे पूर्व या पीछे अन्य आवश्यक कार्यों में व्यस्त रहने के कारण भेंट न हो सकेगी।
बिना बुलाये आगन्तुकों के आवास, आतिथ्य की व्यवस्था न कर सकने की हमारी असमर्थता को समझा जाय और हमें इसके लिए दबाया, विवश न किया जाय।
युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए शान्ति कुँज हरिद्वार में सत्र पद्धति की जो प्रशिक्षण योजना इन दिनों चल रही है उसका परिचय इस अंक में प्रस्तुत किया गया है। पाँच स्तर की इन प्रक्रियाओं में से दो ऐसी हैं जो निरन्तर चलती हैं। महिला जागरण के तीन−तीन महीने के सत्र अनवरत रूप से चलते हैं। वर्ष में वे चार बार सम्पन्न होते हैं। प्रायः चालीस महिलाओं के लिए स्थान है। दूसरी अनवरत प्रक्रिया भजनोपदेशकों की है यह भी तीन−तीन महीने की चलती है और अविछिन्न रूप से चलती है। (1) जनवरी, फरवरी, मार्च (2) अप्रैल, मई, जून (3) जुलाई, अगस्त, सितम्बर (4) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर। वर्ष में यह चार सत्र दोनों प्रशिक्षणों के चलते रहते हैं। संगीत सत्र में पच्चीस स्थान बनाये गये हैं। अक्टूबर से आरम्भ होने वाले प्रथम सत्र में कुछ कम सीटें रखी गई हैं। व्यवस्था बढ़ने पर स्थान पूरे कर लिये जायेंगे या सुविधानुसार और अधिक बढ़ा दिये जायेंगे।
तीन सत्र परिवर्तन क्रम से चलते हैं। वर्ष में छै महीने जीवन साधना सत्रों के लिए हैं। यह दो भागों में विभाजित है (1) फरवरी, मार्च, अप्रैल (2) जुलाई, अगस्त, सितम्बर। यह सत्र दस−दस दिन के होंगे। वर्ष में कुल 18 इनमें से प्रत्येक में 100 से अधिक को स्थान न दिया जा सकेगा। थोड़ी कम की ही गुंजाइश है।
वानप्रस्थ सत्र दो−दो महीने के हैं। शिक्षार्थियों को एक महीने सैद्धान्तिक शिक्षा शान्ति कुञ्ज में प्राप्त करनी होती है और एक महीने के लिए दस−दस दिन के तीन युग−निर्माण सम्मेलनों का संचालन करने के लिए कार्य क्षेत्र में जाना पड़ता है। हरिद्वार में उनकी एक−एक महीने की शिक्षा नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी में तीन महीने होती है।
लोक शिक्षण और लेखन सत्रों की संयुक्त शृंखला गर्मी की छुट्टियों में डेढ़ महीने चलती है। उसमें पन्द्रह−पन्द्रह दिन के तीन सत्र होते हैं। पन्द्रह दिन अन्य कार्यों के लिए छोड़कर मई, जून इस कार्यक्रम में लग जाता है।
अक्टूबर टैप रिकार्डर पर संगीत तथा प्रवचनों के टैप तैयार करने के लिए है। इनकी कापी युग−निर्माण शाखाएँ अपने टैपों पर करा लेती हैं और उन्हें अपने क्षेत्र में विभिन्न वर्ग के लोगों को स्थान−स्थान पर सुना कर जन−जागरण का प्रयोजन पूरा करती हैं।
इससे पूर्व कन्याओं के सत्र चलते थे उनमें नई भर्ती बन्द कर दी गई हैं। जो पुरानी है वे ही आगे की शिक्षा प्राप्त करती रहेगी। इसी प्रकार प्रत्यावर्तन सत्र भी फिलहाल स्थगित कर दिये गये हैं। अन्य आवश्यक प्रशिक्षणों से यदि समय बचा तो फिर कभी सुविधानुसार जारी किया जा सकेगा। यही बात कन्या शिक्षा के सम्बन्ध में भी है।
शिक्षार्थियों के लिए कुछ नियम बना दिये गये हैं जिनका पालन कर सकने पर ही उनका आवेदन पत्र भेजना और आना उचित है—
(1)जिन्हें स्वीकृति मिली है वे ही आवें। अपने अपने स्थान पर किसी दूसरे को न भेजें। अपने साथ अन्य बिना स्वीकृति वालों को लेकर न चले। छोटे बच्चों समेत आने की स्वीकृति किसी को भी नहीं दी जाती। पत्नी माता आदि पर्यटन के लिए आने वालों को सम्बन्धी के रूप में लाने की आज्ञा नहीं है। यदि उनमें से कोई मिशन को भली प्रकार समझती रही हैं और अखण्ड−ज्योति पढ़ती सुनती रही हैं तो उनको अलग आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त करनी चाहिए।
(2) शारीरिक और मानसिक दृष्टि से निरोग—अनुशासन प्रिय, निर्व्यसनी और सज्जनोचित शिष्ट सदाचार का पालन करने वाले अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्य ही शिक्षा प्राप्ति के लिए आवेदन पत्र भेजें। जिनका अपने मिशन से संपर्क परिचय नहीं जो युग−निर्माण साहित्य को पढ़ते सुनते नहीं रहे हैं, ऐसे अजनबी लोगों को प्रवेश नहीं मिलेगा। अपरिचित लोगों को मिशन की विचारधारा से जो स्वतन्त्र चेतना मिलती है वह ढरडडडड की धर्मचर्या से संगति नहीं खाती इसलिए यहाँ के प्रतिपादन उनके गले नहीं उतरते और वे असमंजस में पड़ जाते हैं।
(3) शिक्षार्थियों की आयु 16 से 15 वर्ष के बीच हो सकती है। इससे कम और अधिक आयु के लोग कारण बताते हुए विशेष आज्ञा प्राप्त करके ही आ सकेंगे।
(4) जिस सत्र की जिन्हें स्वीकृति मिली है, उसी में आना चाहिए यदि सत्र बदलना है तो उसकी अनुमति पहले से ही माँगनी चाहिए। बिना स्वीकृति पत्र प्राप्त हुए किसी को भी नहीं आना चाहिए। डाक की गड़बड़ी से आवेदन पत्र पहुँचने या स्वीकृति आने में व्यवधान हो सकता है। डाक को ठीक समय ठीक प्रकार पहुँच ही जाना सुनिश्चित नहीं है। स्वीकृति न पहुँचने पर पूर्व पत्र का हवाला देकर पुनः आवेदन करना चाहिए। पूर्व आवेदन का हवाला न देने पर दुहरी स्वीकृति पहुँचने की गड़बड़ी हो सकती है।
(5) आवेदन पत्र अलग से छपे हुए नहीं है। साधारण कागज पर निम्नलिखित दस प्रश्नों का उत्तर देते हुए अपने हस्ताक्षर और तारीख समेत आवेदन भेजे जा सकते हैं।
(1)पूरा नाम (2) पूरा पता (3) शिक्षा (4) जन्म तिथि (5) व्यवसाय (6) जीवन के महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय घटना क्रमों का विवरण (7) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होने का आश्वासन (8) शिक्षा काल में निर्व्यसन अनुशासन प्रिय और सज्जनोचित शील सदाचार बरतने की घोषणा (9) जिस महीने के जिस सत्र में सम्मिलित होना हो उसका उल्लेख (10) अखण्ड−ज्योति के नियमित पाठक कब से रहे हैं इसकी जानकारी।
जिस कागज पर आवेदन पत्र लिखा गया है उसमें पत्र या अन्य कोई बात न लिखी हो; ताकि उसे आवेदन फाइल में ठीक तरह लगाया जा सके। पत्र आदि लिखना हो तो दूसरे कागज पर लिखना चाहिए।
(6)स्वीकृति पत्र पहुँचने पर शिक्षार्थियों को कम से कम दो सप्ताह पूर्व आने की निश्चित सूचना अवश्य भेजनी चाहिए; ताकि यदि न आ सकने की स्थिति हो तो वह स्थान खाली न पड़ा रहे। उस स्थान का लाभ दूसरे को मिल सके इस दृष्टि से निश्चित सूचना उतने समय पूर्व भेजनी चाहिए कि अन्य किसी को वह स्थान दिया जाना और उसको आने की तैयारी करना संभव हो सके। नियत समय से दो चार दिन पूर्व ही सूचना देने से भी उसका सुरक्षित स्थान खाली रहने की गड़बड़ी पड़ती है।
(7) प्रत्येक शिक्षार्थी से आशा की जाती है कि वह अपना भोजन व्यय स्वयं ही वहन करेगा। दो बार चाय और दो बार भोजन की न्यूनतम दैनिक लागत दो रुपया पड़ती है। असमर्थ व्यक्ति कम देने या न देने की भी छूट पा सकते हैं पर उन्हें इस बात को आवेदन पत्र के साथ ही स्पष्ट कर देना चाहिए और उस सहायता की स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए।
(8) शिक्षा अवधि में धोती पहनना आवश्यक है। पेन्ट, पजामा यहाँ के शिक्षार्थी नहीं पहनते।
(9) सत्र जिस दिन आरम्भ होने की सूचना दी गई है उससे एक दिन पहले सायंकाल तक हरिद्वार पहुँच जाना चाहिए और जिस दिन सत्र समाप्त होता है उस दिन आश्रम खाली कर देना चाहिए। पर्यटन के उद्देश्य से पहले आना हो या पीछे भी रुकना हो तो उस अवधि में ठहरने की व्यवस्था अन्यत्र करनी चाहिए। यहाँ कठिनाई से उतना ही स्थान बनाया जा सका है जिसमें निर्धारित शिक्षार्थियों को ही ठहराया जा सके।
शान्तिकुँज के स्थानीय प्रशिक्षण में पाँच प्रशिक्षण सत्रों की शृंखला मुख्य है, जिनकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर की जा चुकी है। प्रवृत्तियाँ इन्हीं दिनों ऐसी आरम्भ की जा रही हैं जो अभीष्ट लक्ष्य की ही पूर्ति करेंगी पर उनका कार्य क्षेत्र स्थानीय नहीं व्यापक होगा। उनका स्वरूप भर इस आश्रम में देखा जा सकेगा। प्रभाव की प्रतिक्रिया बाहर जाकर देखनी होगी। ऐसे प्रयासों में तीन प्रमुख हैं, जिन्हें अगले ही दिनों हाथ में लिया जा रहा है। यह प्रयास हैं—(1) टैप रिकार्डरों के माध्यम से युगान्तरकारी गीत एवं प्रवचनों को घर−घर तक—जन जन तक पहुँचाया जाना। (2) जीवन विद्या की शिक्षा घर घर तक पहुँचाने वाले साहित्य का प्रकाशन। (3) फिल्म निर्माण द्वारा लोकरंजन और लोकमंगल का अद्भुत समन्वय।
इनमें से प्रथम कार्य तो आरम्भ भी कर दिया गया है। दो ओर से पौन−पौन घन्टे चलने वाले टैपों पर डेढ़ घन्टा बोलने वाले टैप इनके लिए प्रयुक्त होंगे। पहली बार में एक टैप पर बहुत ही प्रेरक दस गीतों को मधुर ध्वनियों और आवश्यक वाद्य सज्जा के साथ टैप कराया गया है और दस प्रवचन इस शिक्षा संचालक के पौन−पौन घन्टे के पाँच टैपों पर उतारे गये हैं। इनमें भी युग निर्माण मिशन की सभी आवश्यक प्रेरणायें भर दी गई हैं। कुल मिलाकर छः टैप हैं। इन्हें इसलिए विनिर्मित किया गया है कि अखण्ड ज्योति परिवार के कोई भी सदस्य उनकी नकल अपने टैपों पर उतार लें और अपने क्षेत्र में जहाँ भी उनकी पहुँच हो वहाँ उन्हें सुनायें। इस प्रकार प्रचार प्रवचनों की एक नई, किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली शृंखला और भी चल पड़ेगी।
अखण्ड ज्योति परिवार के कितने ही सदस्यों के पास अपने टैप रिकार्डर हैं। उन्हें प्रायः मनोरंजन के लिए काम में लाया जाता है, अब उनका उपयोग लोकमंगल के लिए भी होना चाहिए। युगनिर्माण शाखा संगठनों को इसके लिए प्रेरणा दी जाती रही है कि वे अपने टैप रिकार्डर खरीद लेने का प्रयास करे। सक्रिय शाखाओं के आवश्यक कर्तव्यों में इस उपकरण को मँगा लेना भी सम्मिलित है। बहुतों ने मँगा लिये हैं, अन्य मँगाने के प्रयत्न में हैं। इन सभी टैप रिकार्डरों का उपयोग अनवरत रूप से जन−जागरण के लिए होना चाहिये। कुछ लोग यह उपकरण व्यक्तिगत रूप से भी मँगा सकते हैं और उसका उपयोग उपरोक्त प्रयोजन के लिए स्वयं करने या दूसरों से कराने में कर सकते हैं। इस दिशा में व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से प्रयास किया जाना चाहिये कि नये टैप रिकार्डर खरीदे जाँय और जहाँ मौजूद हैं, वहाँ उनका उपयोग किया जाय।
शान्तिकुँज से वर्ष में दो बार—जनवरी और जून में छः छः महीने पश्चात् छः छः नये टैप भरे जाने की योजना है। इनमें एक संगीत का और पाँच प्रवचन के रहा करेंगे। वर्ष में दो टैप संगीत के और दस प्रवचनों के रहेंगे। इनमें 20 गायन और 20 प्रवचन होंगे। हर छमाई में अपने क्षेत्र में 10 गीतों को 10 प्रवचनों को सुनाया जाता रहे तो उतने से भी एक चेतना उत्पन्न हो सकती है।
टैप सुनने के लिए विशेष रूप से गोष्ठियाँ बुलाई जा सकती हैं। शान्ति कुँज द्वारा निसृत युगान्तरीय संवेदना को लोग सुनना पसन्द करेंगे। इसके लिए अवकाश का समय वे खुशी−खुशी देंगे। इन विशेष रूप से आमन्त्रित गोष्ठियों के अतिरिक्त जहाँ भी समारोह होते हैं वहाँ भी इनका उपयोग हो सकता है। व्यक्ति निर्माण के लिए जन्मदिवस आयोजनों का परिवार निर्माण के लिए षोड्श संस्कारों की—समाज निर्माण के पर्वोत्सवों की—विशेष अवसरों पर गायत्री यज्ञों समेत युगनिर्माण सम्मेलनों के शिविर आयोजनों की शृंखला प्रायः चलती ही रहती है। इन अवसरों पर टैप रिकार्डरों की सहायता से इन गीतों एवं प्रवचनों को सुनाया जा सकता है। सामान्य स्तर के औंधे−सीधे प्रवचनों की अपेक्षा निश्चय ही लोग यह पसन्द करेंगे कि माताजी के संरक्षण में उनकी प्रशिक्षित कन्याओं द्वारा गाये गये गीत और गुरुजी के प्रवचनों को सुना जाय। उनमें विचार और प्राण दोनों ही घुले रहने के कारण निस्सन्देह उन्हें उत्साहपूर्वक सुना जायगा और आशाजनक प्रभाव ग्रहण किया जायगा।
यदा−कदा, छुटपुट रूप से अनिश्चित समय पर टैपों की नकल कराने का झंझट नहीं उठाया जा सकता। इसमें तो एक टैक्नीशियन सदा सर्वदा के लिए ही घिरा बैठा रहेगा। नकल करने का एक निश्चित समय रहेगा। संभवतः वह दिसम्बर में रखा जाया करेगा, जिससे सभी टैप रिकार्डरों वाले आकार यह टैप यहाँ भेजकर शान्ति कुँज के टैपों की नकल करा लिया करेंगे। जो लोग आ नहीं सकें वे डाक से भेज और मँगा सकेंगे। यों निर्धारित छमाही जनवरी और जुलाई है पर टैप इससे पूर्व ही तैयार कर लिये जाया करें ताकि घोषित तिथि पर नकल करना भर बाकी रह जाय। गीत और प्रवचनों के बोल−विषय क्या हैं, इसकी सूचना डाक से दे दी जाया करेगी, ताकि उनकी नकल कराने न कराने की बात टैप रिकार्डरों वाले निश्चय कर सकें। जिन्हें नियमित रूप से इस योजना का सदस्य बनना है उन्हें अपने आपको शान्ति कुँज में पंजीकृत करा लेना चाहिए। उनका रजिस्टर रहेगा और उन्हें कब आना चाहिये, इसकी सूचना दी जाया करेगी। कारण कि हजारों टैप रिकार्डर पंजीकृत होंगे और एक साथ सभी को नकल करने का अवसर नहीं मिल सकता। थोड़े−थोड़े करके ही नकल क्रम चल सकता है, इसलिए समय भिन्न−भिन्न होंगे। शान्तिकुँज में ठहरने की व्यवस्था भी इतने लोगों की नहीं है। इस दृष्टि से भी समय भिन्न−भिन्न ही रखने पड़ेंगे। नकल कराने वालों की संख्या उनके लिए पृथक समयों का निर्धारण सदा विचारणीय रहेगा। इसलिए यह आवश्यक समझा गया कि इस योजना के सदस्यों को पंजीकृत किया जाय और पंजीकरण का शुल्क पाँच रुपया वार्षिक रखा जाय। ताकि सदस्यता को चाहे जब भंग कर देने या चाहे जब चालू रखने की अव्यवस्था न फैले। जिनका सदस्य शुल्क जनवरी में न आयेगा उनका नाम काट दिया जायगा। इस नियन्त्रण से एक व्यवस्था बनी रहेगी और यह निश्चय रहेगा कि कितनों के लिए प्रबन्ध करना पड़ेगा। उसी हिसाब से टैक्नीशियन की स्थान आदि को व्यवस्था बनाई जाया करेगी। पंजीकरण शुल्क प्रायः टैप प्रवचनों का छपा सूचना पत्र तैयार कराने को डाक खर्च लगाने में और रजिस्टर आदि रखने में ही खर्च हो जायगा। उसे टैप तैयार कराने और उसकी नकल कराने का खर्च न माना जाय वह तो प्रायः हर टैप के पीछे दो तीन रुपया तक आ सकता है। यह सब कुछ पूर्ण निःशुल्क है। इस कार्य के लिए एक महंगे टैक्नीशियन का जो खर्च पड़ता है वह इस योजना के सदस्यों पर बिलकुल नहीं लादा गया है। उसे तो मिशन ही सहन करेगा। पंजीकृत शुल्क, मात्र व्यवस्था, सतर्कता और नियमितता बनाये रहने के लिए है।
आशा की जानी चाहिए जितने टैप रिकार्डर अखण्ड−ज्योति परिवार के लोगों के पास व्यक्तिगत हैं तथा शाखाओं के हैं उन्हें जल्दी ही पंजीकृत करा लिया जायगा ताकि उन्हें कब बुलाया जाना है, यह निश्चय करके सूचना भेजी जा सके। जहाँ सम्भव हो वहाँ नये टैप रिकार्डर खरीदने की तैयारी की जानी चाहिये।
शान्ति कुँज द्वारा दूसरी जो योजना हाथ में ली जा रही है वह जीवन साधना के सर्वांगीण प्रशिक्षण का साहित्य सृजन एवं प्रकाशन करने की है। व्यक्ति परिवार और समाज की विविध दिव्य धाराओं का संगम जब गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलन तीर्थराज प्रयाग की तरह होगा तो उसका पुण्य फल सत्यपरिणाम देखते ही बनेगा। यह साहित्य एक निर्धारित पाठ्य क्रम का अंग होगा, जिसे स्थान−स्थान पर लोक शिक्षण की प्रक्रिया का अंग भी बनाया जा सकेगा।
तीसरी योजना फिल्म निर्माण की है। यह एक तथ्य है कि भारत के समस्त समाचार और विचार पत्रों के जितने पाठक हैं उससे कहीं अधिक लोग हर दिन सिनेमा देखते हैं। रेडियो प्रसारण सुनने वाले भी इन सिनेमा दर्शकों की अपेक्षा कहीं कम हैं। प्रचार का सबसे प्रमुख और सबसे व्यापक साधन इन दिनों फिल्म मंच ही बना हुआ है। इस मंच से जो सिखाया गया है−सिखाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है जिसे सराहा जा सके, वह नगण्य है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाय जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है। अभी तो अवाँछनीयता का एकाधिकार है। दूसरा पक्ष है ही नहीं तो जनता को मनोरंजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए उसी को अपनाना पड़ता है जो प्रस्तुत है। जब चुनाव के लिए दो चीजें दो स्तर की होंगी तो निश्चय ही विवेक को किसे चुनना किसे छोड़ना यह निर्णय करने का अवसर मिलेगा।
योजना यह है कि भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को इस रूप में प्रस्तुत किया जाय कि वह आज की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ हो सके और विश्व संस्कृति के रूप में—मानव संस्कृति के रूप में मान्यता प्राप्त कर सके। इसके लिये अपने गौरवास्पद साँस्कृतिक इतिहास को कलात्मक किन्तु प्रेरक आदर्शवादी परम्पराओं के साथ प्रस्तुत करना पड़ेगा। इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले कथानकों से हमारा पुराण साहित्य एक विशालकाय समुद्र की तरह बिखरा पड़ा है उसमें से मन चाहे मोती—कितनी ही बड़ी संख्या में बीने जा सकते हैं और उन आधारों को लेकर व्यक्ति और समाज को बदल देने वाले—भटकाव को दिशा निर्देश देने वाले अगणित ऐसे कथानक निकल सकते हैं जिनके आधार पर फिल्म बनाये जाते रहें और लोकरंजन के साथ−साथ लोक−मंगल का प्रयोजन बहुत सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न किया जाता रहे।
यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितने ही फिल्म बने और चले हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा—परक कितने ही फिल्म सामने आये हैं पर उनमें निरुद्देश्य कथा प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यतायें ही दर्शकों के मन पर जमती हैं। ऐसा कुछ भी उनमें नहीं होता जिससे दर्शक की अन्तरात्मा आदर्शवादी चेतना अपनाने के लिये हुलसें−उमँगें। अपने प्रयास इस क्षेत्र में सर्वथा अभिनव एवं अद्भुत ही होंगे यह कहने की आवश्यकता नहीं। चिर प्राचीन को चिर नवीन के साथ जिस प्रकार हर क्षेत्र में संयुक्त किया गया है वही समन्वय इस फिल्म निर्माण प्रक्रिया में भी होगा। इसके द्वारा क्रान्तिकारी परिणाम उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है।
यदि पाँच फिल्में एक बारगी बन जाँय तो उसी पैसे की उलट−पलट होती रह सकती है और नये−नये फिल्म बनते रह सकते हैं। पाँच फिल्मों में लगी पूँजी से यह कार्य अनवरत रूप से चलता रह सकता है और उससे एक सौ फिल्म बनाने जैसी असम्भव लगने वाली महत्वाकाँक्षा पूरी की जा सकती है। नवीन किन्तु स्फूर्तिवान संगीतकार अभिनेता, कलाकार उस नियमित कार्य के लिये उचित पारिश्रमिक देकर रखे जा सकते हैं। अपने गरीब प्रयास को अन्धाधुन्ध पैसा वसूल करने वाले प्रख्यात कलाकारों के लिए जाने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। हम मिशनरी भावना से काम करने वाले लोग उचित निर्वाह देकर भी प्राप्त कर सकते हैं और उन्हें पूरे मन से पूरा श्रम करने के लिये रजामन्द कर सकते हैं। आखिर हर क्षेत्र में हमें सेवाभावी और आदर्शवादी लोग प्रचुर परिमाण में मिल रहे हैं तो इस क्षेत्र में ही क्यों निराश होना पड़ेगा। हम उन सभी तथ्यों का उपयोग करेंगे जो फिल्म की लागत दूसरों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती बना सकें साथ ही इस निर्माण की उत्कृष्टता एवं आकर्षक लोकप्रियता को भी अक्षुण्ण बनाये रह सके।
आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रयोजन के लिए पूँजी के नाम पर एक पैसा भी हाथ में न होने पर भी यह विश्वास किया जा रहा है कि निकट भविष्य में यह मात्र कल्पना न रहेगी, वरन् कोई न कोई ऐसा आधार बन जायगा, जिससे फिल्म निर्माण जैसी महंगी योजना को भी कार्यान्वित किया जा सके। हम सदा से असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लेते रहे हैं और साधन विहीन स्थिति में भी दुस्साहस पूर्ण कदम उठाते रहे हैं। असफलता का मुख कदाचित ही कभी देखना पड़ा है। युग की पुकार यदि जनमानस को अवाँछनियता के चंगुल से छुड़ा कर वाँछनीयता की दिशा में घसीट ले जाने के लिये—फिल्म निर्माण को कार्य को आवश्यक समझ रही हो तो उसे भी इसलिये अपूर्ण न रहने दिया जायगा कि अपने हाथ खाली हैं और साधनों का सर्वथा अभाव है। आकाँक्षा की प्रबलता यदि सदुद्देश्य की दिशा में चल रही हो तो उसकी पूर्ति के लिये दैवी साधन जुटते रहे हैं—जुटते रहेंगे।
कुछ फिल्मों के कथानकों की बात इन दिनों मस्तिष्क में चल रही है। जैसे—
(1)भगवान के दस अवतारों की संयुक्त कथा, उनके द्वारा सामयिक अवांछनियताओं का निराकरण करने के लिए—वाँछनियताओं की स्थापना करने के लिए—लोक उत्साह जगाने का नेतृत्व किया जाना। इस आधार पर आज की स्थिति में ईश्वरीय मार्गदर्शन का पुनः स्मरण कराया जाना और यह बताया जाना कि आज की स्थिति में वे प्रेरणायें किस प्रकार हमारा क्या मार्ग−दर्शन करती हैं।
(2) सप्त ऋषियों द्वारा अपनाई गई सात अति महत्वपूर्ण लोक−निर्माण की सत्प्रवृत्तियों का संचालन। उनके क्रिया−कलापों और सत्परिणामों का चित्रण। आज की स्थिति में उन प्रवृत्तियों को अपनाकर युग की आवश्यकता पूरी करने की प्रेरणा। ऋषियों को जादूगर के रूप में प्रस्तुत न करेगा उन्हें लोक नेतृत्व के लिये अपने निज के जीवन का तथा क्रिया कलापों का निर्धारण करना। आज के साधु−ब्राह्मणों के लिए तथा लोक−सेवियों के लिये लोकोपयोगी अभियानों के संचालन का सही मार्गदर्शन।
(3) ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, गणेश आदि के रूप में भगवान का लोक−मंगल की अनेक प्रवृत्तियों का प्रस्तुतीकरण। अनीति को निरस्त करने और नीति धर्म को प्रोत्साहित करने वाली परोक्ष दैवी सहायताओं का सूत्र संचालन। देवताओं की मनुष्य में देवत्व उदय करने की और धरती पर स्वर्गीय सतयुगी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने की अनवरत अभिरुचि। इसी आधार पर प्रस्तुत अनेक देव चरित्रों का समन्वयीकरण।
(4) भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों के निर्माण आरम्भ की वे आदर्शवादी कथायें जिनकी स्मृति में इन तीर्थ स्थानों की आधार शिला रखी गई। प्राचीन काल में तीर्थ स्थानों में महामनीषियों द्वारा संचालित लोक शिक्षण का स्वरूप। तीर्थ यात्रियों की पद यात्रा से राष्ट्रीय एकता एवं धर्म चेतना का अभिवर्धन। तीर्थ स्थानों में जाकर यात्रियों का अपनी उलझनों के सुलझाव का हल प्राप्त करना तथा नई चेतना लेकर लौटना। तीर्थों का लोक−शिक्षा केन्द्रों के रूप में अतीव गरिमा सम्पन्न होना। यह सब कुछ तीर्थ इतिहासों के कथानकों के आधार पर प्रस्तुत किया जायगा।
(5) पुराण काल के महापुरुषों के आदर्श चरित्रों और उनके द्वारा जनकल्याण के लिए किए गये कार्यों का चित्रण। हरिश्चन्द्र, दधीचि, शुनिशेष, प्रहलाद, कर्ण, जनक, चरक, सुश्रुत आदि अगणित महामानवों के चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण जो आज की स्थिति में ही हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके—रास्ता बता सके। इन महापुरुषों के अलग अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही शृंखला में आबद्ध किया जाय ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात स्पष्ट हो सके।
(6) रामायण का—रामावतार का इस प्रकार चित्रण जिसमें प्रत्येक पात्र को आदर्शवादी परम्पराओं के विविध पक्षों का निर्वाह करते हुए दिखाया जाय। रामायण की गरिमा और रामचरित्र की महत्ता को इस आधार पर प्रस्तुत किया जाय उस संघ का प्रत्येक सदस्य तत्कालीन अवांछनियताओं के विरुद्ध लोहा लेने के लिए उतारू था और अपने कर्तृत्व का उदाहरण प्रस्तुत करके जनसाधारण को अपनी जीवन नीति निर्धारित करने की प्रेरणा दे रहा था। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का—उनके संपर्क परिकर के प्रत्येक सदस्य का कर्तृत्व मर्यादाओं की स्थापना में अनुपम योगदान। रामायण को भक्ति ध्यान तक सीमित न रखकर उसे जनकल्याण का हर क्षेत्र प्रभावित करने वाले प्रबल प्रयास के रूप में प्रस्तुतीकरण।
(7) कृष्णावतार एवं महाभारत के प्रमुख प्रसंगों का—पाण्डवों के महान संघर्ष का अमर इतिहास। तत्कालीन घटनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाय कि उसमें बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अवांछनियताओं का उन्मूलन करने के लिये सर्वतोमुखी संघर्ष का ऐसा स्वरूप प्रस्तुत किया जाय जो इस समय के लिये ही नहीं सदा सर्वदा के लिए मार्ग दर्शक कहा जा सके। वैयक्तिक और सामाजिक विकास के जिन अनेकानेक तथ्यों को महाभारत प्रकाश में लाना है उनका कुशलता पूर्वक चित्रण। श्रीकृष्ण चरित्र में योगेश्वर और क्रान्तिकारी तत्वों का अद्भुत समन्वय।
(8) सन्त चरित्र तुलसी, सूर, कबीर, नानक, दादू, रैदास, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, एकनाथ, नामदेव, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास तुकाराम, मीरा आदि सन्तों के चरित्र मात्र पूजा पाठ तक ही सीमित नहीं थे, उन्होंने अपनी भक्ति को लोक शक्ति के रूप में किस प्रकार परिणत किया और धर्म एवं अध्यात्म को मानकर अपने समय की समस्याओं को हल करने में किस प्रकार नेतृत्व किया इसका अविज्ञात किन्तु वास्तविक चरित्र−चित्रण। एक कथा शृंखला में इन सभी सन्तों को कड़ियों के रूप में प्रस्तुत किया जाना।
(9) भारत के ऐतिहासिक महापुरुषों और उनके क्रिया−कलापों का दिग्दर्शन चाणक्य, चन्द्रगुप्त, शिवाजी, प्रताप, गुरु गोविन्दसिंह, तात्याटोपे, भामाशाह, लक्ष्मीबाई, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राममोहन राय, स्वामी दयानन्द आदि के प्रेरणाप्रद मध्यकालीन इतिहासों का क्रमबद्ध चित्रण और उनके स्मारकों के साथ जुड़ी हुई प्रेरणाओं का उभार।
(10) भारतीय नारियों और बालकों का मानवता वादी परम्पराओं के निर्वाह में अनुपम योग दान, कुन्ती, मदालसा, सीता, सावित्री, शकुन्तला, पन्ना धाय आदि की गौरव गाथायें। रोहिताश्व, प्रहलाद, ध्रुव, गोरा, बादल, फतेसिंह, जोरावर आदि बालकों के महान कर्तृत्वों का हृदयस्पर्शी चित्रण।
एक फिल्म में कई कथानकों, घटनाओं या व्यक्तियों का चरित्र चित्रण सम्मिलित करना अटपटा नहीं लगेगा वरन् उससे उनका आकर्षण और भी अधिक बढ़ जायगा। मूल कथानक एक समूची सुव्यवस्थित कथा के रूप में होगा। भिन्न−भिन्न कथानक उसी संदर्भ में अलग अलग कड़ियों के रूप में जुड़ते चले जायेंगे। इस प्रकार उसमें बिखरापन प्रतीत नहीं होगा वरन् एक ही माला में गुथे हुए मोतियों की तरह अनेक सन्दर्भों का समावेश हो जाने में उसकी सुन्दरता, विविधता एवं संक्षेप में अनेक विषयों की जानकारी होने का एक नया प्रयोजन पूरा होगा। कथा का आदि और अन्त तो उसी क्रम से होगा जिस तरह अन्य साधारण कहानियों का होता है। बीच−बीच में आने वाले प्रसंग अन्यान्य घटना क्रमों एवं चरित्रों के महत्वपूर्ण भाग दिखाते चले जाया करेंगे। अपनी यह एक नई किन्तु अधिक उपयोगी और अधिक आकर्षक शैली होगी।
पिछले पृष्ठों पर जिन दस कथानकों का चित्रण है। इनमें से दसों न सही पाँच भी प्रथम प्रयास में एक साथ बन सके तो फिर यह आशा की जा सकती है कि भारत की महान संस्कृति का स्वरूप समझाने वाले अनेक आधार एक से एक बढ़कर कथानकों के आधार पर प्रस्तुत किये जा सकेंगे और उसी पूँजी की उलट−पुलट होते रहने से सौ फिल्म बन जायेंगे; यदि ऐसा सम्भव हुआ तो हम देखेंगे कि भारतीय जनता को अपनी गरिमामयी परम्पराओं से किस प्रकार परिचित प्रशिक्षित किया जा सकता है और उनसे लोक मानस का काया कल्प करने में कितनी महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है। साधन कब इस ओर कदम बढ़ाने की इजाजत देते हैं प्रतीक्षा केवल इसी बात की है। आशा की जानी चाहिये आज भले ही इस संदर्भ में घोर अन्धकार ही सामने क्यों न हो पर कल कहीं न कहीं से, किसी न किसी प्रकार प्रकाश किरणों का उदय होगा और युग की पुकार पूरी करने के लिए इस अति कठिन किन्तु अति आवश्यक कार्य को भी पूरा किया जा सकेगा।
टैप रिकार्डरों की योजना कार्यान्वित कर दी गई है। पुस्तक प्रकाशन सन् 75 के मध्य तक आरम्भ होने की आशा है। फिल्मों के सम्बन्ध में आवश्यक खोज−बीन की जा रही है और वे सब तैयारियाँ करके रखी जा रही हैं जिनके हाथ में रहने से जब भी पूँजी का प्रबंध हो जाय तभी तत्काल कदम बढ़ाने में कोई कठिनाई न रहे।
शान्ति कुञ्ज की प्रस्तुत गतिविधियों की चर्चा पिछले पृष्ठों पर की जा चुकी है। लोक−मानस के—जन−समाज की सर्वतोमुखी प्रगतिशील लोक−शिक्षण में हमारी समस्त गतिविधियाँ केन्द्रित हैं। चिन्तन और कर्तृत्व में जो कायाकल्प उत्पन्न किया जा सके उसी विचारक्रान्ति के लिये हमारे विविध−विध प्रयत्न चल रहे हैं। लक्ष्य एक है—कार्यक्रम समय की माँग पूरी करने के लिये कई बनाने पड़ रहे हैं। वस्तुतः हम युगान्तर प्रस्तुत करने वाली चेतना का ज्ञान गंगा का अवतरण करने के लिये भागीरथ प्रयत्न कर रहे हैं। हमारा ज्ञान यज्ञ सतयुग की कल्पना को साकार करने वाले नवयुग को धरती पर उतारने के लिए है। हम मनुष्य में देवत्व का उदय देखना चाहते हैं और इन्हीं स्वप्नों को साकार करने के लिए समुद्र को पाट कर अपने अण्डे पुनः प्राप्त करने के लिये चोंच में बालू भर−भर डालने में निरत टिटहरी की तरह उत्कट संकल्प लेकर जुटे हैं। हमें विश्वास है कि हमारे न सही—महर्षि अगस्त्य के सही ऐसे प्रयास सफल होकर रहेंगे जो समुद्र को सुखा सकें और अपहरण किये अण्डों को अवाँछनीयता के मुख में चले जाने पर भी वापिस लाया जा सके।
इन प्रयत्नों को सच्चे अर्थों में विश्व−विद्यालय कहा जा सकता है। ‘विश्व’ इसलिए कि उसका लक्ष्य कोई सीमित वर्ग या क्षेत्र नहीं, वरन् समस्त विश्व वसुधा है—विश्व−मानव का समूचा परिकर हमारा सेवा क्षेत्र है। ‘विद्यालय’ इसलिये कि शिक्षा की स्वल्प उपलब्धि केवल भौतिक प्रगति का द्वारा खोलती है, व्यक्तित्व का परिष्कृत विकास तो विद्या पर ही आधारित है। हम ‘विद्या’ की गरिमा समझाने और जन−मानस में उसकी पुनः प्राण−प्रतिष्ठा करने में निरत है। इन प्रयत्नों का केन्द्र यह छोटा सा आश्रम है जिसे ‘आलय’ कहा जा सकता है। विश्व−विद्यालय के नाम से कितने ही परीक्षा संस्थान और कालेजों का समन्वय सम्बन्धित किया जाता है, पर शब्द के अर्थ को सार्थक करने वाले विद्यापीठ कहीं भी दृष्टि−गोचर नहीं होते। भारतीय संस्कृति को सुविकसित, सुविस्तृत बनाने वाली इस लुप्त प्रायपुण्य परम्परा के पुनर्जागरण का यह अभिनव प्रयास है इन प्रयत्नों को विश्व विद्यालय की अन्तरात्मा कहा जाय और युगान्तर चेतना कहा जाय तो यह उचित ही होगा। हम सचमुच ही युगान्तर प्रस्तुत करने जा रहे हैं। प्रस्तुत नरक जैसी सड़ी कीचड़ में धँसी हुई मनुष्य जाति को सड़ने नहीं दिया जा सकता। हम उसे मानवी गरिमा के उच्च शिखर तक पहुँचाकर ही चैन लेंगे। ‘करों या मरो’ हमारा निश्चय है। इसी संकल्प का एक छोटा−सा मूर्तिमान शिलान्यास शान्ति−कुञ्ज है। कुछ कदम उठाये जा चुके हैं−−कुछ उठाये जा रहे हैं और कुछ उठाये जाने हैं। जो हो रहा है वह शुभारम्भ श्रीगणेश है जो होने वाला है वह अति विस्तृत है—अकल्पनीय है। आज के अपने प्रयासों का प्रत्यक्ष स्वरूप नगण्य है, पर उसकी सम्भावनाओं की यदि कल्पना की जा सके तो वे हिमालय से ऊँची और समुद्र से गहरी है। इस दुस्साहस को आज की परिस्थितियों में यदि अद्भुत और अनुपम कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
युगान्तर चेतना को द्रुतगति से अग्रगामी बनाया जाय समय दान सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख माँग है। इसे पूरा करने के लिए हम अन्यमनस्क मनःस्थिति और मंथर गति लेकर नहीं चलेंगे वरन् आपत्तिकालीन संकट का सामना करने के लिए जिस प्रकार युद्धस्तरीय दुस्साहस किये जाते हैं वैसे ही हम भी करेंगे। शान्ति−कुञ्ज सत्प्रवृत्तियों का प्रेरक छोटा सा आश्रम है तो जरूर पर उसका उतना सीमित रूप भविष्य में न रखा जा सकेगा और बालक आज खिलौना जैसा लगता जरूर है पर भविष्य में उसे प्रौढ़−वयस्क और परिपुष्ट लौह पुरुष के रूप में विकसित होने की हमारी पूरी पक्की कल्पना है। इस संस्थान को इतने छोटे रूप में सीमित नहीं रखा जायगा जितना कि वह अब है। यह अंकुर खाद पानी प्राप्त करेगा तो क्रमशः विशालकाय वटवृक्ष के रूप में विकसित होगा और अपनी शानदार भूमिका का निर्वाह करेगा। यह सपने सदा सपने ही न रहेंगे, उन्हें मूर्तिमान बनाने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए वह सब कुछ किया जायगा।
ऊपर की पंक्तियों में जहाँ भी ‘हम’ शब्द का प्रयोग हुआ है उसका अर्थ इन पंक्तियों का लेखक—एक व्यक्ति नहीं—वरन् वह अखण्ड−ज्योति मिशन का समूचा परिवार है। हम का अर्थ है—हम लोग—हम लोग का अर्थ है वे लोग जिनके सहयोग से हमारी गतिविधियाँ बढ़ती और फलती−फूलती रही हैं। जिन हाथों को हम अपनी भुजाएँ समझते हैं और अपने को दो हाथ वाला नहीं वरन् ‘सहस्रबाहु’ मानते हैं। प्रेरणाएँ और योजनाएँ भले ही हमारी रही हों, पर उन्हें मूर्तिमान, अग्रगामी और फलवती बनाने में अपने इसी परिवार की श्रद्धा, भक्ति, श्रम एवं मनोयोग लगा है। साधनों की आवश्यकता पड़ी है उसकी 99 प्रतिशत पूर्ति अपने ही परिजनों ने पेट काटकर की है। बाहर के लोगों का सत्कार तो एक प्रतिशत से भी कम मिला है।
तन और मन के अतिरिक्त तीसरा साधन है—धन। अब उसके लिये मात्र संकेत न करके—स्वेच्छा सहयोग के लिए प्रतीक्षा करने में काम चलता दिखाई नहीं पड़ता। अब इस स्तर के अनुदानों को अधिक त्याग और साहस का समावेश करने के लिये आग्रह करना पड़ेगा। क्योंकि साधनों के अभाव में काम की गति में अवरोध उत्पन्न हो रहा है। योजनाएँ बड़ी हैं—उनके लिए शान्ति−कुञ्ज का स्थान बहुत ही अपर्याप्त है। मात्र 150-200 आदमी जहाँ किसी प्रकार ठूँसे जा सकें उतनी जगह में—देशव्यापी−−विश्व−व्यापी अभियान के लिए किस प्रकार प्रचुर परिमाण में सुयोग्य व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। युगान्तरकारी साहित्य का विशाल परिमाण में सृजन और प्रकाशन किया ही जाना है। जीवन−साधना और युग−चेतना की दोनों मोर्चों पर सफल लड़ाई लड़ने के लिये जो गोला बारूद चाहिए उसकी पूर्ति अगले दिनों लिखे जाने वाले युगान्तरीय उद्बोधन के द्वारा ही सम्भव होगी। उसके लिए साहित्य सृजा और छापा जायगा। यह कार्य बिना पूँजी के सम्भव कैसे होगा।
इस युग का सबसे प्रचण्ड और सबसे व्यापक प्रचार साधना सिनेमा है। उसे विकृत स्तर पर पड़ा रहने दिया जाय तो भी वह अपना प्रभाव तो डालता ही रहेगा और जितना हम पूरे जोर से सुधार करेंगे उससे अधिक वह चुपचाप ही बिगाड़ करता रहेगा। जमा खर्च के हिसाब में छुट्टल उच्छृंखल सिनेमा हमारे प्रयासों को मटियामेट ही करता रहेगा। इस क्षेत्र की उपेक्षा नहीं की जा सकती। साहित्य की तरह ही हमें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ेगा। योजना सौ फिल्मों की—भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रत्येक पक्ष की—अति कुशलतापूर्वक निर्माण करने की है; जिनमें देश भर के सिनेमा−गृह आच्छादित रहें। लोकरंजन और लोकमंगल का समुचित समावेश करने का ध्यान रखा जाय तो उसके फेल होने का कोई कारण नहीं।
सौ फिल्म बनाने की योजना मस्तिष्क में है। उतना न सही दस सही—दस न सही पाँच या दो सही पर कार्य तो आरम्भ करना ही है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि प्रगतिशील फिल्में असफल नहीं होतीं। कौशल की कमी ही असफल होती है। एक−एक करके यह प्रयत्न महंगा पड़ेगा। वे सस्ती तभी पड़ेगी जब उनके एक साथ और लगातार बनाने की प्रक्रिया हाथ में ली जाय। वह कार्य कितना खर्चीला है। इसका अनुमान लगाया जाना कठिन नहीं। पर उस पर्वत को भी आखिर लाँघना ही पड़ेगा। कठिनाई का रोना रो−रोकर युग की पुकार को अनसुनी कब तक किया जाता रहेगा। अब दुस्साहसपूर्ण कदम उठाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
संसार के कोने−कोने में भारतीय संस्कृति को सार्वभौम विश्व संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए—प्रवासी भारतीयों को स्नेह पोषण प्रदान कर उनकी धर्म−निष्ठा को सुस्थिर बनाये रखने के लिए मिशिनरी भावना लेकर जान वाले धर्म−प्रचारकों के जत्थे बाहर भेजने हैं। उनके प्रशिक्षण एवं मार्ग व्यय की व्यवस्था करनी पड़ेगी।
प्रशिक्षण की प्रक्रिया शान्ति−कुञ्ज में रुक−रुककर इस प्रकार चलती है मानो कोई मुर्दा मर−मरकर जीता हो। एक सत्र बन्द करके दूसरा चलाना पड़ता है। एक वर्षीय कन्या शिक्षा कितनी उपयोगी थी और अब वह रोक दी गई;इसका एक ही कारण है कि महिला जागरण को शिक्षा देने के लिये उन साधनों को प्रयुक्त करना पड़ा। एक को भूखा सुलाकर दूसरे बच्चे को रोटी देने का क्रम चलाना पड़ रहा है। दोनों बच्चों को रोटी देते रहने की व्यवस्था कहाँ है? प्रत्यावर्तन सत्रों को भी इस कारण बन्द नहीं किया गया कि उनकी उपयोगिता कम थी अथवा शिक्षार्थियों के आवेदन पत्र घट गये थे। उसकी उपयोगिता, लोकप्रियता प्रयोग और अनुभव के बाद अधिकाधिक गहरी होती चली गई है। किन्तु भारी तो जीवन साधना को भी माना जाना चाहिए। उपेक्षित तो उसे भी नहीं रखा जा सकता। यदि साधन रह होते तो किसी को रोकने, किसी को बढ़ाने का ‘वन वे ट्रैफिक’ क्यों करना पड़ता। यदि सड़क चौड़ी होती तो गाड़ियाँ बिना रुके अपनी दिशा में अनवरत गति से दौड़ती रह सकती थीं।
कार्य का विस्तार जितना बढ़ता है उसी हिसाब से स्थान की—कार्यकर्त्ताओं की—साधनों की आवश्यकता बढ़ती है। अपनी परम्परा समर्थ−असमर्थ सबको अवसर देने की रही है। इसलिये जो लोकसेवा के लिये समर्पित शिक्षार्थी अपना भोजन व्यय नहीं उठा पाते उनकी उमंगें टूटने न देने के लिए वह साधन भी जुटाने पड़ते हैं अस्तु भोजनालय खाते में हर महीने बहुत बड़ा घाटा रहता है। बिजली, इमारत, सफाई, बगीचा, पत्र−व्यवहार आदि की मदें भी अपनी माँगें घटाने के स्थान पर बढ़ाती ही चली जाती हैं। टैप रिकार्डरों वाली योजना अभी−अभी चालू की गई है उसने ही ढेरों पैसा माँग लिया और भविष्य के लिये लगातार खर्च की आवश्यकता बताई हैं। प्रकाशन और फिल्म के कदम अगले दिनों बढ़े तो उनकी झोली भी भरनी ही पड़ेगी। शान्ति−कुञ्ज का अकेला चना ही भाड़ नहीं फोड़ सकता। यहाँ के कार्यकर्ता जगह−जगह जाकर वैसी ही प्रशिक्षण प्रक्रियाएँ आरम्भ करेंगे और वहाँ भी जो नये ढाँचे खड़े किये जायेंगे उनकी प्राथमिक आवश्यकता कुछ न कुछ खर्चा ही करावेगी।
ऊपर की पंक्तियों में कुछ संकेत है जिनके लिये पैसा चाहिए। लक्ष्य इतना ही नहीं उससे भी बढ़ा−चढ़ा है जिनको कार्य रूप में परिणत करते समय अनेकानेक शाखा प्रशाखाएँ सामने आयेंगी और वे न जाने क्या−क्या माँग खड़ी करेंगी। अभी तो हाथ में लिये काम ही, असहाय स्थिति में पड़े हुए, साधनों की माँग कर रहे हैं। भविष्य में यह माँग घटेगी नहीं बढ़ेगी ही। इसकी पूर्ति के लिये हमें अपने परिवार पर ही आश्रित रहना पड़ेगा।
बाहर के लोगों के सोचने का तरीका दूसरा है। उनके पास पैसा तो है, पर सोचने का सही तरीका वे खोज नहीं पाये हैं। अपना या अपने पूर्वजों का स्मारक बनाने की कीमत पर ही वे कुछ टुकड़े फेंकना चाहते हैं। यश, विज्ञापन का ढोल जोर−जोर से कोई पीटे तो तब वे अपनी उदारता दिखायें। धर्मशाला, मन्दिर, दवाखाने, कुएँ तालाब आदि दृश्यमान संस्थानों को ही चर्मचक्षु महत्वपूर्ण समझती हैं। सदावर्त बाँटने और प्याऊ खोलने में उनकी रुचि है ताकि असमर्थ लोग उनकी समर्थता के आगे मस्तक झुका सकें। दबाव में आकर या बदले की आशा से ही वे कुछ देने की बात सोचते हैं। कोई उन्हें निचोड़ तो सकता है, पर पिघला नहीं सकता। आज का धनी−मानी वर्ग इसी वर्ग का है। वहाँ अप्रत्यक्ष—दूरगामी, भावना क्षेत्र में काम करने वाली योजनाओं को समर्थन नहीं मिल सकता। आजीवन भौतिकवाद में व्यस्त रहे लोगों की भौतिक प्रगति से आगे की बात समझ में नहीं आती ज्ञान−यज्ञ की गरिमा उनके गले उतारना कठिन है। ऐसी दशा में हमें उस क्षेत्र से कुछ आशा नहीं। द्वार खटखटाने पर भी कुछ हाथ न लगेगा इसलिए अच्छा है बालू में से तेल निकालने की बात सोचना ही छोड़ दें।
वर्तमान परिस्थितियों में सरकार से भी इन प्रयोजनों में कोई सहयोग मिलने की आशा नहीं। जो लोग इन दिनों सरकार का सूत्र सञ्चालन करते हैं वे ‘जन−मानस’ के भावनात्मक नव−निर्माण की उपयोगिता कदाचित ही समझ पायेंगे। फिर उनके सामने आर्थिक, सुरक्षात्मक, अपराध, नियन्त्रण, दलबन्दी आदि की इतनी अधिक समस्याएँ हैं कि उनसे आगे की बात सोचना उनके लिये कठिन ही है। फिर सरकारी सहायता प्राप्त करके, ‘सरकारी संत’ बनने पर जो दुर्गति होती है वैसी हम अपनी कराना भी नहीं चाहते।
घुमा फिराकर हमारा आशा केन्द्र अपनी ही सत्ता है—जिसे हम अपना परिवार कहते रहे हैं, उन्हीं थोड़े से स्वजनों से अधिक त्याग करने की—अधिक उदारता बरतने की बात कहेंगे और समझायेंगे कि जिस प्रकार कोई आपत्ति कालीन परिस्थितियाँ सामने आ जाने पर अपने अन्य आवश्यक काम रोककर भी—खर्चों में असाधारण कटौती करके भी उस विपन्नता से जूझा जाता है उसी स्तर पर युग की पुकार को पूरी करने के लिये हम अधिक साहसिकता का परिचय दें। घर में कभी बीमारी का प्रकोप घुस पड़ता है—कोई मुकदमा लग जाता है—चोरी, दुर्भिक्ष, मन्दी−बेकारी का कोई दौर सामने आ खड़ा होना असम्भव नहीं। अकाल मृत्यु, असमर्थता, दुर्घटना आदि के कारण कई बार आर्थिक दबाव बढ़ जाता है और उसका सन्तुलन विवशतापूर्वक बनाना पड़ता है। यह विवशता पक्ष यदि युग की पुकार के साथ भी जोड़ लिया जाय तो आर्थिक तंगी रहते हुए भी कुछ न कुछ किया बचाया ही जा सकता है। कटौती की बात सोची जाय और अपनी आवश्यकता का स्तर थोड़ा गिरा लिया जाय तो भी उस बचत को इस महान प्रयोजन के लिए समर्पित करने का मार्ग निकल सकता है। निस्सन्देह अपने परिवार के अधिकाँश लोग आर्थिक दृष्टि से दुर्बल हैं फिर भी अभावग्रस्त लोग महान प्रयोजनों के लिये कुछ न कर सकें ऐसी बात नहीं। वे महीने में एक दिन की आजीविका बचा सकते हैं और शेष 29 दिनों में थोड़ी−थोड़ी कमी करके उसकी पूर्ति कर सकते हैं। चाह होगी तो राह जरूर निकल आवेगी।
जिनकी स्थिति गुजारे से आगे बढ़कर कुछ बचत कर सकने योग्य है वे उस सौभाग्य का श्रेष्ठतम उपयोग करके अपने को सच्चे अर्थों में भाग्यवान बना सकते हैं। जनक वाजिश्रवा आदि के अगणित उदाहरण भारतीय संस्कृति के आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमक रहे हैं वे अति आवश्यक खर्चा से जो कुछ बचाते थे उसे समय−समय पर सर्वमेध−यज्ञ के रूप में पूरी तरह खाली कर देते थे। यह उनकी महान आध्यात्मिकता साहसिकता थी जिसे बड़ी तपश्चर्या से कम नहीं आँका जा सकता। कर्ण अपनी बचत को इसी दिन सत्प्रयोजनों के लिए समाप्त कर देता था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अपने अच्छे वेतन का एक चौथाई अंश ही खर्च में लाते थे और तीन चौथाई विद्या दान के लिये समर्पित करते रहते थे। विश्वामित्र की ठीक ऐसी ही आवश्यकताएँ थीं जैसी कि आज हमारी हैं उसकी पूर्ति के लिए राजा हरिश्चन्द्र ने न केवल अपनी सारी सम्पदा वरन् अपना अपने परिवार का श्रम−समय भी दाँव पर लगा दिया था। सुदामा का गुरुकुल ऐसी ही संकटापन्न स्थिति में चल रहा था। कृष्ण ने अपनी सम्पदा उसी के लिये समर्पित कर दी। इन परम्पराओं को कथा वार्ता की रोचक चर्चा का विषय बनाकर हवा में नहीं उड़ा देना चाहिए वरन् प्रयत्न करना चाहिए कि उन्हें जीवित भी रखा जा सके। धर्म का बखान ही नहीं होते रहना चाहिए उसे कर्म में भी स्थान मिलना चाहिए। कृपणता यदि उदारता में नहीं बदली जा सकी तो फिर अध्यात्म का−आदर्शवाद का सारा ढाँचा, मात्र विडम्बना बनकर रह जायगा। जिस तत्व दर्शन को हम विश्व−व्यापी बनाना चाहते हैं। जन−मानस में गहराई तक प्रतिष्ठापित कराना चाहते हैं उनके उदाहरण हमें अपने में से प्रस्तुत करने पड़ेंगे। वस्तुतः वह कार्य रूप में परिणत हुई आदर्शवादिता ही वास्तविक प्रेरणा बनकर लोगों को प्रभावित कर सकेगी। उपदेशों में नहीं उदाहरणों में दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति होती है। महान् आदर्शों की पूर्ति के लिए किया गया त्याग, बलिदान ही वह आधार है जिनके सहारे भावना क्षेत्र में ऊँचा उठने की चेतना जन−मानस में उभारी उमँजई जा सकती है।
इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम अपने परिवार की ओर ही आशा भरे नेत्रों से निहारेंगे। गुरु गोविन्दसिंह, मोरध्वज, मदालसा, कुन्ती, सुमित्रा आदि ने अपने पुत्रों को आदर्शों के लिये बलिदान दिया था। पतियों को युद्ध क्षेत्र में तिलक लगाकर भेजने वाली पत्नियों से हमारे इतिहास के अगणित पृष्ठ सुनहरी स्याही से लिखे गये हैं। पिताओं को सन्तोष देने के लिये राम, लक्ष्मण, श्रवणकुमार, भीष्म, सत्यवान आदि के न जाने कितने उदाहरण मौजूद हैं। हम अपने परिवार में से एक सुयोग्य एवं समर्थ सदस्य लोक−मंगल के लिए समर्पित करके मानवता को संकटग्रस्त स्थिति से उबारने में अपना सराहनीय योगदान दे सकते हैं। कुमारियाँ जिनके विवाह की चिन्ता में अभिभावक घुले जा रहे हैं—विधवाएँ, परित्यक्ताएँ जो अभिशाप की तरह जी रही हैं यदि भावनाशील हों तो इस अभिशप्त स्थिति से राहत पा सकती हैं और इतिहास को नया मोड़ देने की अग्रिम भूमिका निभा सकती हैं। परिवार निवृत्त लोगों को मोहासिक्त की तमिस्रा से अपना पिण्ड छुड़ाना ही चाहिए और सृजन सैनिकों की पंक्ति में सम्मिलित होना चाहिए। नव−निर्माण के लिये सुयोग्य और सक्षम जनशक्ति की आवश्यकता बड़े परिमाण में है उसकी पूर्ति के लिए हम अरण्य रोदन न करेंगे वरन् स्वजनों का ही दरवाजा खटखटायेंगे। हमारा परिवार पाण्डव परिवार की तरह−−हरिश्चन्द्र परिवार की तरह—ऋष्यमूक पर्वत निवासी वानर परिवार की तरह—मथुरा के गोप परिवार की तरह होना चाहिए जिसका हर घटक बसन्ती परिधान ओढ़े भावभरी उमंगों को साकार करने के लिये आतुरता प्रकट करता हुआ दिखाई दे।
जन−शक्ति के बाद दूसरी शक्ति है—धन शक्ति। इसके लिए हम अपने परिवार की उस सारी संचित सम्पदा को आमन्त्रित करेंगे जो सात पीढ़ियों तक मुफ्तखोरी, आरामतलबी के साथ खाने खुरतराने के लिए जमा करके रखी जा रही है। बैंकों में, लाकरों में, जमीन में, ब्याज−भाड़े में, अचल सम्पत्ति में, जेवरों में न जाने कितना धन सड़ रहा है। संग्रह और लोभ, मोह, की संकीर्णता ने उसे न जाने कब के लिये—न जाने किस के लिए दान कर रखा है? पैसे से पैसा बढ़ाने के व्यवसायों में न जाने कितना धन लगा है—पर इस निरन्तर बढ़ते जाने वाले पैसे का आखिर होगा क्या इसे कोई नहीं सोचता, स्मरण रखा जाना चाहिए मुफ्त के उत्तराधिकार में मिली दौलत से नहीं संस्कार और सद्गुणों की सम्पत्ति से सन्तान का भला होता है। हराम का पैसा तो व्यसन, दुर्गुण और दुर्गति ही उत्पन्न करता है।
हम लोग मिल−जुलकर एक−एक बूँद जमा करेंगे तो वह उदाहरण प्रस्तुत होगा जिसमें ऋषियों ने अपना बूँद−बूँद रक्त जमा करके उसे एक घड़े में जमा किया था और उसे जमीन में गाढ़ कर सीता के जन्म का आधार बनाया था। कथा के अनुसार वह ऋषि−रक्त−घट ही जनक के हल से सीता के रूप में परिणत हुआ था और उस सीता के कारण ही आसुरी साम्राज्य की सत्ता निरस्त हुई थी। राम दल के वानर—कृष्ण दल के गोप यदि मिल−जुलकर बहुत कुछ कर सकते थे तो अखण्ड−ज्योति परिवार—युग की चुनौतियों का सामना कर सकने योग्य−अभिनव सृजन का आरम्भिक ढाँचा खड़ा कर सकने योग्य अनुदान प्रस्तुत न कर सके ऐसी कोई बात नहीं है।
अनिवार्य खर्चों में जिसकी आवश्यकता न पड़ रही हो। यदि ऐसा कुछ हो तो उसे प्रस्तुत ज्ञान−यज्ञ के लिए समर्पित करने का साहस जुटाना चाहिए। परिग्रह को पातक माना गया है जिनके पास यह संचय पातक जमा हो उसे उसमें से पूरा या अधूरा भाग हलका करने की बात साहसपूर्वक सोच ही डालनी चाहिए। इस संग्रह का इससे अच्छा उपयोग दूसरा नहीं हो सकता कि नवयुग के अवतरण में, धर्म और संस्कृति की पुनः प्राण−प्रतिष्ठा में उसकी कुछ भूमिका रह सके। वस्तुतः ऐसा ही धन धन्य होने योग्य बन सकेगा।
अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को युगान्तर चेतना उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत ज्ञान−यज्ञ में अपनी कुछ कहने योग्य आहुति देने का साहस करना चाहिए। जिस आदर्शवादिता का प्रसार, प्रशिक्षण हम संसार भर में करना चाहते हैं उसका शुभारम्भ अपने घर से ही होना चाहिए। घर में आदर्शों का स्थापन करते हुए जब हम बाहर चलेंगे तो फिर सफलताओं की सम्भावना में कोई अवरोध शेष न रह जायगा।
गिलहरी अपने बालों में रेत भर समुद्र पाटने चली थी, राम दल के सहयोग का वह नगण्य सा कर्तृत्व अमर बन गया, हमारा छोटा परिवार भी युग की आवश्यकताएँ पूरी करने में उस गिलहरी का अनुकरण तो करेगा ही यह निश्चित है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1.गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 18)
प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना, विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक, विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री−स्मृति, गायत्री−संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री−पारायण, गायत्री−हृदय, गायत्री−पञ्जर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू. 6)
तृतीय भाग—गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी योग, षट्चक्र −वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
2. गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 6)
प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू. 3)
द्वितीय भाग−(सामूहिक गायत्री हवन)—गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया जलयात्रा, मण्डा प्रवेश, वेदी−पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि−विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 3)
3. गायत्री चित्रावली
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 3)
4. गायत्री का मन्त्रार्थ
अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के किए हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 3)
5. गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य
1—छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट—तिरंगे कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मू. 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
1.गायत्री का स्वरूप और रहस्य 2. गायत्री की गुप्त शक्ति 3. सर्वसुलभ गायत्री साधना 4. गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5. गायत्री और उसकी प्राण−प्रक्रिया 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना 8. गायत्री की विशेष साधना 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14. गायत्री और यज्ञोपवीत 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
2. संक्षिप्त गायत्री हवन—सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मूल्य 40 पैसे।
3. दैनिक गायत्री साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मूल्य 40 पैसे।
4. गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।
5. युग−निर्माण सत्संकल्प—मू. 5 पैसे।
*समाप्त*