मैं तुमसे कहता हूँ, अपने जीवन की चिन्ता न करो, मत सोचो कि तुम क्या खाओगे और क्या पियोगे? मत सोचो कि तुम अपने शरीर पर क्या पहनोगे। क्या जीवन भोजन से अधिक नहीं है? क्या शरीर वसन से अधिक नहीं है?
अरे, इन हवा के पंखियों को तो देखो, न तो ये बीज बोते हैं, न फसल काटते हैं, न खलिहान में धान जमा करते हैं; फिर भी तुम्हारे स्वर्गीय परम पिता उनका पोषण करते हैं। ओरे मानवो, क्या तुम उन पंखियों से बेहतर नहीं हो?
अरे कौन है तुम में ऐसा, जो अपने जीवन का सोच−विचार करके भी, अपने जीवन की स्थिति एक अणु भर भी बढ़ाने या घटाने में समर्थ हो सका है?
इसी से कहता हूँ, कि इस चिन्ता में न पड़ो, कि हम क्या खायेंगे? हम क्या पियेंगे? हमारे तन को ढकने को वस्त्र कहाँ से आयेगा? क्योंकि अश्रद्धालु जन ही इन चीजों के पीछे जाते हैं। जान लो, कि तुम्हारे स्वर्गीय परम पिता अच्छी तरह जानते हैं, कि तुम्हें इन चीजों की जरूरत है।
मैं कहता हूँ, कि पहले तुम भगवान के राज्य को खोजा, उनकी सत्याचरण की राह पर चलो और तुम्हारी आवश्यकता की ये सारी चीजें आपोआप ही तुम्हारे पास चली आयेगी।
इसीसे मैं कहता हूँ, कि आने वाले कल की चिन्ता में न पड़ो, क्योंकि वह कल स्वयं अपने साथ आने वाली चीजों की चिन्ता करेगा।
—महाप्रभु ईसा का एक प्रवचन (बाइबिल से)
शाहजहाँ अपने समय का सुविख्यात प्रतिभावान व्यक्ति था। उसका पराक्रम, कौशल और व्यक्तित्व तीनों ही बढ़े−चढ़े थे। उसने अपना राज्य बढ़ाया और कई तरह की सफलताएँ पाइ। पर यहाँ चूक गया कि उपार्जित संपदाओं एवं सफलताओं का उपभोग कहाँ किया जाय। उसने अपने बैठने के लिए तख्त–ताऊस बनाया और अपनी बीबी की कब्र के रूप में ताजमहल खड़ा किया। यह दोनों ही रचनाएँ अद्भुत थीं।
शाहजहाँ का रत्न प्रेम प्रसिद्ध है। उसने विश्व प्रसिद्ध ‘कोहिनूर’ हीरा भी ग्वालियर नरेश से प्राप्त किया था। मोर की आकृति का एक बहुमूल्य सिंहासन भी उसने अपने बैठने के लिए बनवाया था, जिसका नाम ‘तख्त ताऊस’ था। उसकी लागत उस समय के 12 करोड़ रुपया थी। यह स्वर्णखचित था। बहुमूल्य रत्नों से वह जड़ा था। पन्ना के बने पाँच खम्भे उसमें थे। शाहजहाँ के बाद वह औरंगजेब के पास और अन्त में मुहम्मद शाह के कब्जे में रहा।
ईरान के बादशाही नादिरशाह ने काबुल जीत लेने के बाद भारत पर चढ़ाई करदी और मुहम्मदशाह को परास्त कर दिया। जो विपुल सम्पत्ति नादिरशाह ने लूटी उसमें तख्त ताऊस भी शामिल था। इसे लेकर वह वापिस लौट ही रहा था कि कुर्दों ने उसकी हत्या करदी और छूटी हुई सम्पत्ति भी उन लुटेरों ने आपस में बाँट ली। तख्त ताऊस के भी टुकड़े करके बँट गये। बहुत समय बाद नादिरशाह के वंशजों ने लुटेरों को पकड़ा और लूटी हुई सम्पत्ति उगलवाली जिसमें तख्त ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। उन्हें जोड़−मोड़कर फिर लगभग पहले जैसा ही उसे बना लिया गया यद्यपि बहुत से बहुमूल्य रत्न उसमें से गायब हो चुके थे।
अठारहवीं सदी में वह सिंहासन अंग्रेजों के हाथ लगा। उसे पूर्ण गोपनीयता के साथ लंका के त्रिकोमानी बन्दरगाह से जलयान पर चढ़ाकर इंग्लैंड रवाना किया गया। वह जहाज सहीसलामत इंग्लैंड नहीं पहुँच सका। 4 अगस्त 1782 को पूर्वी अफ्रीका के समुद्र में चट्टानों से टकराकर वह डूब गया, साथ ही वह उन दिनों बीस करोड़ रुपया कीमत का आँका गया सिंहासन भी।
इसके बाद समुद्र तल से उसे निकालने के अनेकों प्रयत्न किये जाते रहे। 1962 में कुछ रत्न, सोना और अवशेष प्राप्त कर लिये गये। इससे यह अनुमान तो लग गया कि वह किस क्षेत्र में डूबा पड़ा है, पर तब से अनेक प्रयत्न करने पर भी उसका पूरा पता कहीं भी नहीं चला वह रत्न राशि अभी भी कहीं अविज्ञात स्थान में डूबी पड़ी है।
डूबा हुआ तख्त ताऊस अपनी मौन भाषा में अभी भी प्रतिभाशाली व्यक्तियों को एक सन्देश देता है कि आप लोग बड़े समझे जाते और समर्थ होते हुए भी इतनी अदूरदर्शिता का परिचय क्यों देते हैं जिसमें प्रतिभा कला और सम्पदा का मात्र दुरुपयोग ही बन पड़ता है।
जितना धन, श्रम और कौशल तख्त ताऊस के बनाने में लगाया गया उसका प्रयोजन इतना भर था कि एक राजा की बढ़ी−चढ़ी सफलता का—बढ़े−चढ़े भाग्यवान का अहंकारी प्रदर्शन कर सके। यह क्यों भुला दिया गया कि उद्धत अहंकार की पूर्ति में जितना श्रम लगाया गया था उतने से सार्वजनिक प्रगति के अनेकों उपयोगी कार्य चल सकते थे और उससे पीढ़ा और पतन के निवारण में, जन−जीवन के परिष्कार में भारी मदद मिल सकती थी।
उद्धत अहंकारी प्रदर्शन ने अनेकों के मस्तिष्क लालच से खराब कर दिये। उसे झपटने के लिए कितनों ने आक्रमण किये और कितनों को अपना विनाश देखना पड़ा। अनावश्यक मात्रा में संग्रहित सम्पत्ति दुष्प्रवृत्तियों की कितनी बड़ी शृंखला रखकर खड़ी करती है और अन्त में किस प्रकार नष्ट होती है इसका जीता जागता उदाहरण तख्त ताऊस है।
प्राणियों का शास्त्रीय वर्गीकरण शरीरधारी और अशरीरी दो भागों में किया गया है। अशरीरी वर्ग में (1)पितर (2)मुक्त (3) देव (4)प्रजापति हैं। शरीरधारियों में (1) उद्भिज (2) स्वेदज (3) अंडज (4) जरायुज हैं।
चौरासी लाख योनियां शरीरधारियों की हैं। वे स्थूल जगत में रहती हैं और आँखों से देखी जा सकती हैं। दिव्य जीव जो आँखों से नहीं देखे जा सकते हैं उनका शरीर दिव्य होता है। सूक्ष्म जगत में रहते हैं। इनकी गणना तत्वदर्शी मनीषियों ने अपने समय में 33 कोटि की थी। तेतीस कोटि का अर्थ उनके स्तर के अनुरूप तेतीस वर्गों में विभाजित किये जा सकने योग्य भी होता है। कोटि का एक अर्थ वर्ग या स्तर होता है। दूसरा अर्थ है—करोड़। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि उन दिव्य सत्ताधारियों की गणना तेतीस करोड़ की संख्या में सूक्ष्मदर्शियों ने की होगी। जो हो उनका अस्तित्व है—कारण और प्रभाव भी।
शरीरधारी योनियों में 84 लाख की संख्या किसी समय गिनी गई होगी, पर सदा सर्वदा वह उतनी ही रहे यह आवश्यक नहीं। जीवों के विकास क्रम को देखने से पता चलता है कि कितनी ही प्राचीन जीव जातियाँ लुप्त होती जाती हैं और कितने ही नये प्रकार के जीवधारी अस्तित्व में आते हैं। फिर देश काल के प्रभाव से भी उनकी आकृति प्रकृति इतनी बदलती रहती है कि एक वर्ग को ही अनेक वर्गों का माना जान जा सके। फिर कितने ही जीव ऐसे हैं जिन्हें अनादि काल से जन–संपर्क से दूर अज्ञात क्षेत्रों में ही रहना पड़ा है और उनके सम्बन्ध में मनुष्य की जानकारी नहीं के बराबर है। कुछ प्राणी ऐसे हैं जो खुली आँखों से नहीं देखे जा सकते। सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से ही उन्हें हमारी खुली आँखों से नहीं देखे जा सकते। सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से ही उन्हें हमारी खुली आँखें देख सकती हैं। इतने छोटे होने पर भी उनका जीवन−क्रम अन्य शरीरधारियों से मिलता जुलता ही चलता रहता है।
अपनी पृथ्वी बहुत बड़ी है, उस पर रहने वाले जलचर—थलचर—नभचर कितने होंगे, इसकी सही गणना कर सकना स्थूल बुद्धि और मोटे ज्ञान साधनों से सम्भव नहीं हो सकती, केवल मोटा अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर सूक्ष्मदर्शियों के असाधारण एवं अतीन्द्रिय ज्ञान से साधारणतया अविज्ञात समझी जाने वाली बातें भी ज्ञात हो सकती हैं। ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि ने अपने समय में जो गणना की होगी उसे अविश्वसनीय ठहराने का कोई कारण नहीं जबकि जीव शास्त्रियों की अद्यावधि खोज ने भी लगभग उतनी ही योनियां गिन ली हैं। इसमें कुछ ही लाख की कमी है जो शोध प्रयास जारी रहने पर नवीन उपलब्धियों के अनवरत सिलसिले को देखते हुए कुछ ही समय में पूरी हो सकती है; वरन् उससे भी आगे निकल सकती है।
देखे पहचाने जा सकने योग्य इन शरीरधारियों को मनीषियों ने चार भागों में विभक्त किया है—(1)उद्भिज (2)स्वेदज (3)अंडज (4)जरायुज।
उद्भिज वर्ग में पेड़−पौधे, लता गुल्म, घास, अन्न जड़ी−बूटियाँ आदि की गणना की जाती है। स्वेदज का मोटा अर्थ तो पसीने से उत्पन्न होने वाले ‘जूँ’ आदि का नाम लिया जाता है, पर वस्तुतः यह शब्द मेरुदण्ड रहित प्राणियों के लिए प्रयुक्त होता है कीट−पतंग, मक्खी, मच्छर, टिड्डी, तितली आदि इसी वर्ग में आते हैं। अंडज वे हैं, जो अपने शरीर से अंडा ही उत्पन्न कर सकते हैं। बच्चा उनके शरीर में नहीं पलता, वरन् अण्डे में विकसित होता और उसी को फोड़कर शरीरधारी बनता है। इस वर्ग में मछलियाँ, पक्षी, रेंगने वाले कीड़े आदि आते हैं। चौथे जरायुज जिन्हें पिण्डज भी कहते हैं वे हैं जो माता के साथ नाल तन्तु से बँधे हुए उत्पन्न होते हैं। जन्म के समय ही जिनकी आकृति अपने जन्मदाताओं के अनुरूप होती है। मनुष्य और पशु इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं। यों स्वेदजों में से भी अधिकाँश अण्डज ही होते हैं, पर उन्हें पृथक रीड़ रहित या रीड़ सहित होने के कारण पृथक वर्ग का गिना गया है।
शरीरधारियों की चौरासी लाख अथवा उससे न्यूनाधिक कितनी ही जातियाँ क्यों न हो वस्तुतः उनका आरंभिक जन्म एक ही रासायनिक तत्व से हुआ है। सृष्टि के आरम्भ में एक ही जीव रसायन था और वही अभी तक समस्त प्राणियों की संरचना का एकमात्र कारण है। परिस्थितियों ने लम्बे समय की क्रमिक विकास शृंखला में बाँधकर उन्हें आगे बढ़ाया है। प्रगति की घुड़दौड़ में एक से अनेक बने हुए प्राणधारी अपनी दिशा और तीव्रता के सहारे विभिन्न स्तर के—विभिन्न आकृति प्रकृतियों के बनते चले गये हैं।
सृष्टि के आरम्भ होने से पूर्व ब्रह्म एक था। उसने एक से बहुत होने की इच्छा की तद्नुसार वह अपने आपको विभक्त कर बैठा और उन खण्ड−विखण्डों ने अपनी विभिन्न प्रकार की आकृति−प्रकृति बना ली। तद्नुसार यह विश्व अनेकानेक जड़−चेतन पदार्थों में बनता, बढ़ता और विकसित परिष्कृत होता हुआ वर्तमान स्थिति तक आ पहुँचा।
जीवन विद्या का निष्कर्ष यह है कि विश्व−व्यापी चेतना अविछिन्न है। प्रत्येक प्राणी में वही समुद्र की लहरों की तरह छोटे−बड़े वर्गों में विभाजित हुई दृष्टिगोचर हो रही है।
प्राणियों के बीच पाया जाने वाला सहचर्य, सहयोग, स्नेह और सम्वेदन एक तथ्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। जड़ जगत में प्रत्येक पदार्थ अन्यान्य पदार्थों का सहयोग लेकर एवं देकर ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। यदि यह सहयोग सूत्र टूट जाय जो प्रत्येक अणु−परमाणु अपने पृथक अस्तित्व में बिखरा−बिखरा दिखाई पड़ेगा फिर ऐसे किसी पदार्थ का आकार न बन सकेगा जिसे वस्तु नाम दिया जा सके या इन्द्रियों से देखा पकड़ा जा सके। दृष्टि सन्तुलन विद्या—इकालॉजी यह सिद्ध करती है कि जड़ समझी जाने वाले प्रकृति का प्रत्येक घटक सहयोग के आदान−प्रदान क्रम का अपनाये हुए है और उसी आधार पर उसका अस्तित्व एवं विकास क्रम चल रहा है।
चेतना के सम्बन्ध में भी यही बात है। जीवधारियों की चेतना में विकास, उल्लास एवं क्रिया−कलाप न्यूनाधिक दिखाई पड़ता है। उसका कारण सहचर्य, स्नेह, सहयोग की न्यूनाधिक ही है। मनुष्य को इस सहकारिता की अधिक मात्रा उपलब्ध हुई। फलतः उसकी बुद्धि का विकास क्रम द्रुतगति से चला। इसी आधार पर उसने अन्य पदार्थों एवं पदार्थों का अधिक अच्छा उपयोग करना सीखा—खड़े होने, बोलने, लिखने एवं सोचने की क्षमता बढ़ाई—परिवार तथा समाज का ढाँचा खड़ा किया और क्रमिक गति से आगे बढ़ते हुए वर्तमान स्थिति तक आ पहुँचा।
जिस प्रकार जीव रसायन के एक ही मूल आधार से अनेकानेक प्राणियों का जन्म एवं विकास हुआ है, उसी प्रकार एक ही चेतना तत्व जिसे प्राण कहते हैं—आत्मा का—मूलभूत आधार है। कपड़ा अनेक धागों से मिलकर बना होता है। चेतना के अनेक घटकों से मिला हुआ ही यह चेतन जगत है। अलग−अलग प्राणी दिखाई पड़ते हुए भी वे एक ही महाप्राण के अविछिन्न अंग हैं। सभी घटों में एक ही संव्याप्त आकाश पृथक−पृथक रूपों और सीमाओं में बँधा हुआ देखा जाता है। पृथक आत्मा वस्तुतः एक ही व्यापक आत्मा की भिन्न दिखने वाली पर वस्तुतः अभिन्न इकाइयाँ हैं। दृश्यमान अनेकता अपने मूल में अविछिन्न एकता को धारण किये हुए हैं।
दिव्य योनियों के चार वर्ग पितर, मुक्त, देव और प्रजापति हमारी तरह पंच तत्वों का दृश्यमान शरीर धारण किए हुए नहीं है अस्तु उन्हें हम चर्मचक्षुओं से नहीं देख सकते तो भी उन्हें सूक्ष्म शरीरधारी ही कहा जायगा। शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्राएँ उनके दिव्य शरीरों में विद्यमान रहती हैं अतएव वे शरीरधारी प्राणियों को एवं पञ्चतत्वों से बने हुए पदार्थों को प्रभावित कर सकते हैं। अपनी सीमा मर्यादा के अनुरूप वे अपनी सामर्थ्य का वे उपयुक्त अवसर पर प्रयोग भी करते हैं और दृष्टि सन्तुलन बनाये रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह भी करते हैं।
पितर वे हैं जो पिछला शरीर त्याग चुके किन्तु अगला शरीर अभी प्राप्त नहीं कर सके। इस मध्यवर्ती स्थिति में रहते हुए वे अपना स्तर मनुष्यों जैसा ही अनुभव करते हैं। पिछले भले−बुरे गुण, कर्म, स्वभाव की प्रतिक्रियाएँ स्वर्ग−नरक के रूप में अनुभव करते रहते हैं। जन संकुल वातावरण में ही वे आत्माएँ भ्रमण करती रहती हैं। छोड़े हुए शरीर के जीवन काल में अनवरत श्रम करते हुए जो थकान चढ़ी थी उसे उतारने के लिए यह अवधि होती है।
मुक्त वे जो लोभ−मोह के—राग−द्वेष के—वासना तृष्णा के बन्धन काट चुके। सेवा सत्कर्मों की प्रचुरता से जिनके पाप प्रायश्चित्त पूर्ण हो गये। उन्हें शरीर धारण करने की आवश्यकता नहीं रहती। उनका सूक्ष्म शरीर अत्यन्त प्रबल होता है। अपनी सहज सतोगुणी करुणा से प्रेरित होकर प्राणियों की सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण करते हैं। सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान देते हैं। श्रेष्ठ कर्मों की सरलता और सफलता में उनका प्रचुर सहयोग रहता है।
देव वे जिन्हें सृष्टि सन्तुलन बनाये रहने का ईश्वर प्रदत्त विशिष्ट उत्तरदायित्व वहन करना पड़ता है। वे समय−समय पर विशेष प्रयोजनों के लिए—विशेष कलेवर धारण करके देवदूतों, महामानवों एवं अवतारी महापुरुषों के रूप में जन्म लेते हैं। समय की विकृतियों का निराकरण और अभीष्ट सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन उनका प्रधान कार्य रहता है। धर्म की ग्लानि और अधर्म के अभ्युत्थान का समाधान—साधुता का परित्राण एवं दुष्कृतों का विनाश—इन अवतारी महामानवों का लक्ष्य रहता है। लोक−शिक्षण एवं नव−निर्माण के लिए उनके विविध क्रिया−कलाप होते हैं। सामयिक सन्तुलन ठीक हो जाने के उपरान्त वे अशरीरी रहकर विश्व−कल्याण के प्रयोजनों में निरत रहते हैं।
प्रजापति वर्ग की वे दिव्यात्माएँ होती हैं जो केवल पृथ्वी का न हों वरन् समस्त ब्रह्माण्ड का—उसमें अवस्थित पृथ्वी जैसे असंख्यों चेतन प्राणधारियों वाले पिण्डों का और निर्जीव ग्रह−नक्षत्रों का सन्तुलन बनाते हैं। ब्रह्माण्ड में चल रही विविध क्रियाओं एवं उनकी प्रतिक्रियाओं की स्थापना और व्यवस्था उसी वर्ग की आत्माओं को सम्भालनी पड़ती है। उन्हें सृष्टा, पोषक−संहारक स्तर के कार्य ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भूमिका में सम्पन्न करने पड़ते हैं।
परब्रह्म साक्षी, दृष्टा, अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय है। उसकी अनुभूति ही हो सकती है व्याख्या नहीं। शरीरी और अशरीरी स्थूल और सूक्ष्म कहे जाने वाले समस्त प्राणी उसी में से उत्पन्न होते हैं और अत्यन्त उसी में लय हो जाते हैं। जड़ और चेतन सृष्टि का—परा और अपरा प्रकृति का सृजेता एवं अधिपति वही है। उसी ब्रह्म महासागर की लहरें हमें विविध आकार−प्रकारों में ज्ञान−विज्ञान के माध्यम से अनुभव करते हैं।
चौरासी लाख शरीरधारी और तेतीस कोटि अशरीरी प्राणियों का यह अखिल विश्व ब्रह्माण्ड वस्तुतः ईश्वर की दिव्य सत्ता से ही ओत−प्रोत है। उसका प्रसार−विस्तार सर्वत्र दृष्टिगोचर होगा यदि हम विवेक के ज्ञान−चक्षुओं को खोल सके तो देखेंगे कि अनेकता के बीच एकता का कितना सुदृढ़ आधार मौजूद हैं। इसे जानने के बाद अपने पराये का भेद समाप्त हो जाता है। इसे अनुभव करने के बाद आत्मा का प्रेम इस अजस्र निर्झर के रूप में फूटता है और उस अमृत भरे आनन्द से अन्तरात्मा का कण−कण भाव−विभोर हो जाता है। यही है जीवन का परम लक्ष्य।
मूर्ख लोग छोटा सा कार्य आरम्भ करते हैं और उसी में व्याकुल हो जाते हैं, बुद्धिमान बड़े से बड़ा कार्य कर लेते हैं और निश्चित बने रहते हैं।
—पंचतंत्र
योगविद्या में तत्व साधना का अपना महत्व एवं स्थान है। पृथ्वी आदि पाँच तत्वों से ही समस्त संसार बना है। विद्युत आदि जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व में मौजूद हैं वे सभी इन पञ्च तत्वों की ही अन्तर्हित क्षमता है। आकृति−प्रकृति की भिन्नता युक्त जितने भी पदार्थ इस संसार में दृष्टिगोचर होते हैं वे सब इन्हीं तत्वों के योग−संयोग से बने हैं।
न केवल शरीर की वरन् मन की भी बनावट तथा स्थिति में इन्हीं पंचतत्वों की भिन्न मात्रा का कारण है। शारीरिक, मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता में भी प्रायः इन तत्वों की ही न्यूनाधिकता पर्दे के पीछे काम करती रहती है। शरीर विश्लेषणकर्त्ता यों रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता अथवा अमुक−जीवाणुओं का कारण मानते हैं, पर सूक्ष्मदर्शियों की दृष्टि में तत्वों का असन्तुलन ही इन समस्त वंशभ्रान्तियों का प्रधान कारण होता है।
किस तत्व की शरीर में अथवा मनःक्षेत्र में कमी है उसकी पूर्ति के लिए क्या किया जाय, इसका पता लगाने के लिए तत्व विज्ञानी अध्यात्मवेत्ता किसी व्यक्ति में क्या रंग कम पड़ रहा है, क्या घट रहा है यह ध्यानस्थ होकर देखते हैं और औषधि उपचारकर्त्ताओं की तरह जो कमी पड़ी थी, जो विकृति बढ़ी थी उसे उस तत्व प्रधान आहार−बिहार में अथवा अपने में उस तत्व को उभार कर उसे अनुदान रूप रोगी या अभावग्रस्त को देते हैं। इस तत्व उपचार का लाभ सामान्य औषधि चिकित्सा की तुलना में कहीं अधिक होता है।
फिल्टरों से युक्त नियोनआर्क लेम्प—लेसर किरणों के उपकरण —एक्सरेज की विशिष्ट धाराएँ—क्वान्टा किरणें—रिऐक्टि वाईजेक्शन इनरगो थ्रैपी—इनर्जेटिक्स—क्वान्टम इलेक्ट्रॉनिक्स आदि का प्रस्तुतीकरण सूर्य किरणों की विशेष रंग धाराओं का विश्लेषण करके ही सम्भव हो सका है। अब यह विज्ञान दिन−दिन अधिक महत्वपूर्ण स्तर पर उभरना चला आ रहा है और लगता है रंगों के भले−बुरे प्रभावों को अधिक अच्छी तरह जानना और उनका उपयुक्त प्रयोग करके लाभान्वित होना, मनुष्य के लिए निकट भविष्य में ही सम्भव हो जायगा। रंग यों देखने में मात्र दृष्टि आकर्षण एवं शोभा सज्जा के लिए काम आते दीखते हैं, पर वस्तुतः उनकी गरिमा और क्षमता कहीं अधिक है। सामान्य रंगाई भी अपना प्रभाव रखती है, फिर सूक्ष्म रूप से काम करने वाली तत्वों से सम्बन्धित रंग शक्ति का तो कहना ही क्या।
लाल रोशनी का उत्तेजनात्मक प्रभाव असंदिग्ध है। प्रातःकाल और साँयकाल जब सूर्योदय और सूर्यास्त की गरिमा आकाश में छाई रहती है तब पेड़−पौधे, जलचर और पक्षिवृन्द अधिक क्रियाशील और बढ़ते विकसित होते पाये जाते हैं। वनस्पतियों की वृद्धि किस समय किस क्रम से होती है इसका लेखा−जोखा रखने वालों का निष्कर्ष यही है कि प्रातः साँयकाल के थोड़े से समय में वे जितनी तीव्र गति से बढ़ते हैं उतने अन्य किसी समय नहीं। मछलियों की उछल−कूद इसी समय सबसे अधिक होती है। पक्षियों का चहचहाना जितना दोनों संध्या काल में होता है। उतना चौबीस घण्टों में अन्य किसी समय नहीं होता। इसी प्रकार पीला, हरा, बैंगनी, गुलाबी आदि अन्य रंगों का अपना−अपना प्रभाव होता है। रंगों की शोभा सर्वविदित है, पर उनकी सूक्ष्म शक्ति की जानकारी विरलों को ही होती है।
तत्वों के रंगों के सम्बन्ध में पाश्चात्य वैज्ञानिकों की मान्यता यह है कि आकाश तत्व का रंग नीला, अग्नि का लाल, जल का हरा, वायु का पीला और पृथ्वी का भूरा—मटमैला सफेद है। शरीर में जिस तत्व की कमी पड़ती है या बढ़ोत्तरी होती है उसका अनुमान अंगों के अथवा मलों के स्वाभाविक रंगों में परिवर्तन देखकर लगाया जा सकता है। त्वचा तो नस्ल के हिसाब से काली, पीला, सफेद या लाल रहती है, पर उसके पीछे भी रंगों के उतार−चढ़ाव झाँकते रहते हैं। साधारण स्थिति में त्वचा का जो रंग था उसमें तत्वों के परिवर्तन के अनुपात से परिवर्तन आ जाता है। यह हेर−फेर हाथ−पैरों के नाखूनों में, जीभ में, आँख की पुतलियों में अधिक स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। इसलिए शरीर में होने वाले तत्वों की न्यूनाधिकता को इन्हें देखकर आसानी से समझा जा सकता है। मल−मूत्र में भी यह अन्तर दिखाई पड़ता है। सन्तुलित स्थिति में पेशाब साधारण स्वच्छ जल की तरह होगा, पर यदि कोई बीमारी होगी तो उसका रंग बदलेगा। डाक्टर मल−मूत्र, रक्त आदि का रासायनिक विश्लेषण करके अथवा उनमें पाये जाने वाले विषाणुओं को देखकर रोग का निर्णय करता है तत्ववेत्ता अपने ढंग से जब तत्व चिकित्सा करते हैं तो यह पता लगाते हैं कि शरीर के आधार पंच तत्वों में से किसकी कितनी मात्रा घटी−बढ़ी है। यह जानने के लिए उन्हें रंगों का—शरीर में जो हेर−फेर हुआ है उसे देखना पड़ता है।
तत्ववेत्ता मनः शास्त्रियों को अपनी दिव्यदृष्टि इतनी विकसित करनी पड़ती है कि मनुष्य के चेहरे के इर्द−गिर्द विद्यमान तेजोवलय की आभा को देख सकें और उसमें रंगों की दृष्टि से क्या परिवर्तन हुआ है इसे समझ सकें।
मानवीय विद्युत की ऊर्जा शरीर के हर अंग में रहती है और वह बाह्य जगत से सम्बन्ध मिलाने के लिए त्वचा के परतों में अधिक सक्रिय रहती है। शरीर का कोई भी अंग स्पर्श किया जाय उसमें तापमान की ही तरह विद्युत ऊर्जा का अनुभव किया जायगा। यह ऊर्जा सामान्य बिजली की तरह उतना स्पष्ट झटका नहीं मारती या मशीनें चलाने के काम नहीं आतील फिर भी अपने कार्यों को सामान्य बिजली की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह सम्पन्न करती है।
मस्तिष्क स्पष्टतः एक जीता जागता बिजलीघर है। समस्त काया में बिखरे पड़े अगणित तन्तुओं में सम्वेदना सम्बन्ध बनाये रहने, उन्हें काम करने की प्रेरणा देने में मस्तिष्क को भारी मात्रा में बिजली खर्च करनी पड़ती है। उसका उत्पादन भी खोपड़ी के भीतर ही होता है। अधिक समीपता के कारण अधिक मात्रा में बिजली उपलब्ध हो सके; इसीलिए प्रकृति ने महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ शिर के साथ जोड़कर रखी हैं। आँख, कान, नाक, जीभ जैसी महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ गरदन से ऊपर ही हैं। इस शिरों भाग में सबसे अधिक विद्युत मात्रा रहती है इसलिए तत्वदर्शी आँखें हर मनुष्य के शिर के इर्द−गिर्द प्रायः डेढ़ फुट के घेरे में एक तेजोवलय का प्रकाश लाल गोल घेरा चमकता देख सकती हैं। देवताओं के चित्रों में उनके चेहरे के इर्द−गिर्द एक सूर्य जैसा प्रकाश−गोलक बिखरा दिखाया जाता है। इस अलंकार चित्रण में तेजोवलय की अधिक मात्रा का आभास मिलता है। अधिक तेजस्वी और मनस्वी व्यक्तियों में स्पष्टतः यह मात्रा अधिक होती है उसी के सहारे वे दूसरों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं।
तेजोवलय में इन्द्र धनुष जैसे अलग−अलग रेखाओं वाले तो नहीं पर मिश्रित रंग घुले रहते हैं। उनका मिश्रण मन क्षेत्र में काम करने वाले तत्वों की न्यूनाधिकता के हिसाब से ही होता है। तत्वों की सघनता के हिसाब से रंगों का आभास इस तेजोवलय की परिधि में पाया जाता है। पृथ्वी सबसे स्थूल और भारी है, इसके बाद क्रमशः जल, अग्नि, वायु और आकाश का नम्बर आता है। तेजोवलय की स्वाभाविक स्थिति में रंगों की आभा भी इसी क्रम से चलती है।
स्थूल शरीर−स्थूल पंच तत्वों से बना है। आकाश, वायु, अग्नि,जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व सर्वविदित है। कार्य−कलेवर में विद्यमान रक्त, माँस, अस्थि, त्वचा तथा विभिन्न अंग−प्रत्यंग इन्हीं के द्वारा बने हैं। सूक्ष्म शरीर में तन्मात्राओं के रूप में यह तत्व भी सूक्ष्म हो जाते हैं। आकाश की तन्मात्रा—शब्द, वायु का—स्पर्श अग्नि का—रूप, जल का—रस और पृथ्वी, की गन्ध है। सूक्ष्म शरीर की संरचना अग्नि, जल आदि से नहीं वरन् सूक्ष्म तन्मात्राओं से हुई है, फिर भी उन्हें तत्व तो कह ही सकते हैं। सूक्ष्म शरीर की नाड़ियों में बहने वाले प्राण प्रवाह में ज्वार−भाटे की तरह तत्व तन्मात्राओं के उभार आते रहते हैं। लहरों की तरह उनमें से एक आगे बढ़ता है तो दूसरा उसका स्थान ग्रहण कर लेता है। अन्त क्षेत्र में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है यह पता साधना द्वारा मनः स्थिति लगा सकती है। हर तत्व की अपनी विशेषता है उसी के अनुरूप व्यक्तित्व से भी उतार−चढ़ाव आते रहते हैं। प्रकृति और सामर्थ्य में हेर−फेर होता रहता है। सूक्ष्म शरीर में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है और किस तत्व की प्रबलता के समय क्या करना अधिक फलप्रद होता है? यदि इस रहस्य को जाना जा सके तो किसी महत्वपूर्ण कार्य आरम्भ उपयुक्त समय पर किया जा सकता है और सफलता का पक्ष अधिक सरल एवं प्रशस्त बनाया जा सकता है।
पृथ्वी तत्व का केन्द्र मल द्वार और जननेन्द्रिय के बीच है इसे मूलाधार चक्र कहते हैं। जल तत्व का केन्द्र मूत्राशय की सीध में—पेडू पर है इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। अग्नि तत्व का निवास—नाभि और मेरुदण्ड के बीच में है इसे मणिपूर चक्र कहते हैं। वायु केन्द्र हृदय प्रदेश के अनाहत चक्र में है। आकाश तत्व का विशेष स्थान कण्ठ में है—इसे विशुद्ध चक्र कहा जाता है।
कब किस तत्व की प्रबलता है इसकी परख थोड़ा सा साधना अभ्यास होने पर सरलतापूर्वक की जा सकती है। पृथ्वी तत्व का रंग पीला—जल का श्वेत−अग्नि का लाल—वायु का हरा और आकाश का नीला है। आंतें बन्द करने पर अपने भीतर एवं बाहर जो रंग अधिक मात्रा में बिखरा दिखाई पड़े तब उसके अनुसार तत्व की प्रबलता आँकी जा सकती है। जिह्वा इन्द्रिय को सधा लेने पर मुँह में स्वाद बदलते रहने की प्रक्रिया को समझकर भी समझकर भी तत्वों की प्रबलता जानी जा सकती है। पृथ्वी तत्व का स्वाद मीठा —जल का कसैला—अग्नि का तीखा—वायु का खट्टा और आकाश का खारी होता है। गुण एवं स्वभाव की दृष्टि से यह वर्गीकरण किया जाय तो अग्नि और आकाश−सतोगुण−वायु और जल रजोगुण तथा पृथ्वी को तमोगुण कहा जा सकता है।
व्यक्ति की त्वचा का रंग—चेहरे पर उड़ता हुआ तेजोवलय, उसकी स्वाद सम्बन्धी अनुभूतियाँ—रंग विशेष की पसन्दगी को कुछ परख कर यह जाना जा सकता है कि उसके शरीर में किस तत्व की न्यूनता एवं किस की अधिकता है। जिस की न्यूनता हो उसे पूरा करने के लिए उस रंग के वस्त्रों का उपयोग, कमरे की पुताई, खिड़कियों के पर्दे, उसी रंग के काँच में कुछ समय पानी रखकर पीने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। आहार में अभीष्ट रंग के फल आदि का प्रयोग कराया जाता है। रंगीन बल्ब की रोशनी पीड़ित भाग या समस्त अंग पर डाली जाती है, प्रयोक्ता अपने शरीर में अमुक तत्व आवश्यकतानुसार बढ़ाने और उसका प्रयोग जरूरत मन्दों पर करने की साधना भी करती है। यह साधना उसकी आवश्यकता भी पूरी करता है और किसी अन्य की कठिनाई हल करने में भी इसका प्रयोग होता है।
तत्व साधना अध्यात्म विज्ञान का एक महत्वपूर्ण विधान है। इस लुप्त प्रायः विद्या का यदि विकास हो सके तो मनुष्य की शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों के समाधान का एक नया मार्ग खुल सकता है।
दीपक का तेल चुक गया था। केवल रुई की बाती जलकर मन्द−मन्द प्रकाश बिखेर रही थी। उसके अन्तिम समय को निकट आया देखकर एक गृहस्थ ने पूछ ही लिया−’तुम जीवन भर आलोक बिखेर कर दूसरे का पथ−प्रदर्शन करते रहते हो, संसार के साथ इतनी भलाई करते रहते हो; फिर भी तुम्हारा इस प्रकार दुःखद अन्त देखकर मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है।’
बुझते दीपक ने पूर्ण शक्ति के साथ अन्तिम बार अपनी आभा को बिखेरते हुए कहा—’भाई इस भौतिक जगत में जिसका जन्म होता है उसका अन्त भी होता है। हम प्रयास करने पर भी उससे बच नहीं सकते। हाँ इतना अवश्य कर सकते हैं कि अपने जीवन की मूल्यवान घड़ियों को व्यर्थ ही नष्ट न होने दें।’
पदार्थ की छोटी इकाई अणु है और समय की छोटी इकाई सेकेंड। पर अब सूक्ष्मता के क्षेत्र में गहराई तक उतरने पर इनके भी छोटे भाग, ढूँढ़ निकाले गये हैं। अणु एक सौरमण्डल है। उसमें कई प्रकार के परमाणु घूमते हैं। उन सबका सम्मिलित अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप मिलकर एक अणु का सृजन करता है। ठीक इसी प्रकार अब सेकेंड को भी ‘मिली सेकेंड’ में विभाजित कर दिया गया है। यह विभाजन अन्तिम नहीं समझा जाना चाहिए। परमाणु और मिली सेकेंड के और भी अधिक सूक्ष्म भाग हो सकते हैं और उनका उपयोग वैज्ञानिक प्रगति में भारी योगदान दे सकता है।
मोटेतौर से ‘सेकेंड’ अत्यन्त छोटा समय विभाग है, उसे सामान्य समय गणना की सबसे छोटी इकाई माना जाता है, पर वैज्ञानिक क्षेत्र में यह समय बहुत बड़ा है। अणु भौतिकी से सम्बन्धित क्रिया −कलापों का गणित इतने मोटे आधार अपनाने से काम नहीं चल सकता। अस्तु इससे कहीं अधिक सूक्ष्म विभाजन की आवश्यकता पड़ी है। एक सेकेंड के हजारवें भाग को ‘मिली सेकेंड’ और दसलाखवें भाग को ‘माइक्रो सेकेंड’ नाम दिया गया है।
इतने छोटे समय विभाजन के बिना शक्ति क्षेत्र में चल रही गतिविधियों का हिसाब लगाना कठिन था। प्रकाश की गति एक सेकेंड में 1 लाख 86 हजार मील है उसको एक मील कितने समय में चलना होता है यह गणित माइक्रो सेकेंडों के आधार पर ही लगाया जा सकता है। सीसियम के अणु एक सेकेंड में 9, 19, 26, 31, 770 कम्पन उत्पन्न करते हैं यदि यह मालूम करना हो कि 1000 कम्पन कितने समय में उत्पन्न हुए तो माइक्रो सेकेंड माप के बिना कैसे काम चलेगा। अन्तरिक्षयानों के लिए सही हिसाब अत्यन्त आवश्यक है। इसमें तनिक भी अन्तर पड़ने से सारा कार्यक्रम ही गड़बड़ा जायगा। इसके लिए ऐसे शक्ति शाली कम्प्यूटरों का सहारा लेना पड़ता है जो माइक्रो सेकेंडों की नाप−तौल सही रीति से कर सके।
बहुत समय से समय का आधार पृथ्वी की चाल को माना जाता रहा है, पर अब उसका भी यह खोट पकड़ लिया गया है कि वह समीपवर्ती और दूरवर्ती ग्रहों के आकर्षण का दबाव मानकर कभी अपनी चाल धीमी कर देती है कभी तेज हो जाती है। हर सौ वर्ष में उसका दिन हर एक घटा सौ सेकेंड बढ़ जाता है। ऐसी दशा में समय जैसी बहुमूल्य वस्तु का सही अंकन इस अनिश्चित गति वाली धरती पर कैसे छोड़ा जाय। अब धरती को झूठी गवाही देने वाली बताकर अप्रामाणिक घोषित कर दिया गया है और अणु गति को सच्ची साक्षी कहा गया है। कैंब्रिज के एक वैज्ञानिक प्रो.जेराल्ड ने अणु घड़ी इस प्रकार के उपकरणों के आधार पर बनाई है जो सेकेंड के एक अरब वें भाग का भी लेखा−जोखा रख सके और जिसमें 3000 साल तक तनिक भी हेर−फेर उत्पन्न न हो।
यह संसार स्थूल रूप से दृश्यों और हलचलों का समूह मात्र है, पर यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो उसे शक्ति भंडार की ही संज्ञा दी जायगी। मनुष्य स्थूल दृष्टि से एक बोलता सोचता दुर्बलकाय पशु मात्र है जो पेट−प्रजनन के लिए अन्यान्य प्राणियों की तरह ही जीता−मरता रहता है। उसकी दिव्य सामर्थ्य सूक्ष्म चिंतन और दूरदर्शितापूर्ण कर्त्तव्यों के साथ जुड़ी हुई है। जिस प्रकार हम अपने काय−कलेवर को सँजोते हैं, उसी प्रकार यदि हम दिव्यसत्ता को समझने और उसको परिष्कृत विकसित बनाने में संलग्न हो सके तो उस सूक्ष्म प्रक्रिया का परिणाम ऐसा सुन्दर हो सकता है जिसका अनुभव कर जीवसत्ता का कण−कण आनन्द विभोर हो सके।
एक प्रख्यात बौद्ध जातक कथा का सार इस प्रकार है—
इन्द्रप्रस्थ के राजा धनंजय के घर अति प्राचीन काल में बोधिसत्व ने एकबार पुत्र रूप में जन्म लिया था। पिता के मरने पर वे सिंहासनारूढ़ हुए। उनकी न्याय−निष्ठा और दानशीलता की ख्याति समस्त जम्बू द्वीप में फैल गई। प्रजा धर्मशील थी और सुखी भी।
कलिंग देश में उन्हीं दिनों अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष पड़ा। प्रजा क्षुधित और रुग्ण होकर मरने लगी, जिनसे बन पड़ा वे देश छोड़कर भाग गये।
प्रजा के दुख को देखकर कलिंग राज बहुत दुखी हुए और देश के विज्ञजनों को बुलाकर दुर्भिक्ष निवारण का उपाय पूछने लगे।
एक वयोवृद्ध ने कहा−दुर्भिक्ष के समय पुराने राजा अपना समस्त राज्यकोष दान कर देते थे और एक महीने तक घास पर सोते थे और व्रत रखते थे। ऐसा करने से वर्षा हो जाया करती थी। राजा ने तुरन्त वही कर डाला। दान, व्रत और भूमिशयन की क्रिया सही रूप से पूरी हो जाने पर भी वर्षा नहीं हुई।
दूसरी सभा बुलाई गई। एक ज्योतिषी ने कहा—कुरु देश के राजा के पास अजन वसभ नामक माँगलिक हाथी है वह किसी प्रकार अपने देश में आ जाय तो दुर्भिक्ष दूर हो जायगा। कलिंग नरेश ने उस हाथी की याचना के लिए दूत भेजे। उदार कुरु राजज ने वह प्रार्थना स्वीकार करली और तत्काल हाथी दान में दे दिया। मंगल गज आ तो गया पर वर्षा इससे भी न हुई।
तीसरी सभा बुलाई गई। उसमें बहुत विवेचना के पश्चात् निष्कर्ष निकला कि इन्द्रप्रस्थ में कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता वहाँ की प्रजा धर्माचरण करती है और सदा सर्व सुख रहती है। हमारे देश में अधर्माचरण बढ़ गया है अस्तु दुर्भिक्ष पड़ा। हमें इन्द्रप्रस्थ नरेश से धर्माचरण के नियम पूछने चाहिए, उन्हें स्वर्ण पटल पर लिखाकर मँगाना चाहिए और प्रयोजनों को उन्हें पालन करने के लिए बाधित करना चाहिए तभी वर्षा होगी।
कलिंग नरेश ने आठ ब्राह्मणों का दल इन्द्रप्रस्थ भेजा, नरेश ने लिखवाया—”निष्ठुर मत बनो। बिना परिश्रम का धन मत लो। छल और दम्भ मत करो। स्नेह सौजन्य बरतो। संयम बरतो और प्रसन्न रहो।” इतना लिखा देने पर राजा को सन्देह हुआ कि यह नियम अपूर्ण हो सकते हैं। धर्म तत्व को निर्देशक नहीं उसके प्रयोक्ता ही जानते हैं। सो उन्होंने ब्राह्मणों को अपनी धर्मनिष्ठ माता के पास भेजा कि जो इसमें कमी हो उसे उनसे पूरी करालें।
ब्राह्मण मण्डली राजमाता के पास पहुँची। राजमाता ने कहा—धर्माचरण के लिए सतत प्रयत्नशील रहने पर भी मुझसे भूल होती हैं सो आप लोग उपरांत के पास जायें वे मुझसे अधिक जागरूक हैं। उपरांत ने भी अपनी प्रयत्नशीलता की बात तो कहीं पर साथ ही यह भी माना कि अभी उन्हें बहुत कुछ सुधरना शेष है। इसलिए धर्म तत्व का विवेचन अधिकारी कर्त्तव्यनिष्ठों से कराया जाय। इसके लिए मैं नहीं विद्रुध आमात्य के पास वे पधारें।
ब्राह्मण आमात्य के पास पहुँचे। आमात्य डंडे में रस्सी बाँधकर खेतों की लम्बाई−चौड़ाई नाप रहे थे। इस प्रयास में उनके पैरों से एक मेढ़क कुचल कर मर गया। वे खिन्न बैठे। ब्राह्मण दल ने उनसे अपना अभिप्राय व्यक्त किया। आमात्य बोले आप देखते नहीं मैंने कर्त्तव्य−पालन के साथ−साथ बरनी जाने वाली सतर्कता में चूक करदी। प्रमादी तो अधार्मिक होता है। मैं धर्म−शिक्षा का अधिकारी कहाँ रहा? आप सुधार सारथी के पास जाइये वह बिना प्रमाद के धर्माचरण करने में प्रख्यात हैं।
सारथी ने अपनी भूलें बताते हुए कहा—सही चाल से चलने पर भी मैंने एकबार घोड़ों को द्रुतगति से दौड़ने के लिए भावुक बरसाये थे और यह ध्यान में नहीं रखा था कि इससे उन्हें कितना अनावश्यक कष्ट होगा। जिसकी सहानुभूति में न्यूनता है वह धर्मोपदेश क्या करे? आप अनाभ श्रेष्ठि के पास जाय वे माने हुए धर्मात्मा हैं। अनाभ ने ताजी घटना सुनाई जिसमें उन्होंने राज्य का कर भाग चुकाये बिना खेत से कुछ कच्चा अन्न भूनकर खा लिया था। खाते समय यह ध्यान नहीं रखा था कि कर चुकाने के बाद ही खाना चाहिए। फिर भला मैं धर्म−शिक्षा कैसे दूँ। उपदेश तो वह करे जो आचरण में खरा हो। आप विरोजन आमात्य के पास जाय वे इसके अधिकारी हैं।
महामात्य मुँह लटकाये बैठे थे। उनके जिम्मे किसानों के उपार्जन का छठा अंश राज्य कर के रूप में नापना था। कल एक किसान के अनाज की ढेरी उनने नापी थी। विभाजन की मध्य रेखा बनाने के लिए उन्होंने थोड़ा सा अनाज चिह्न प्रतीक के रूप में रख दिया था। नाप पूरी होते−होते वर्षा आ गई। महामात्य ने वह चिह्न प्रतीक वाला अन्न जल्दी में उठाकर राज्य भाग में डाल दिया और वह राज्यकोष में जमा हो गया। वे सोच रहे थे इस भूल से राजा को अनुचित लाभ मिला और किसान के साथ अन्याय हुआ। जब मुझे न्याय के लिए भेजा गया था उसमें पूर्ण सतर्कता बरतनी चाहिए थी। ब्राह्मणों को उनने अपनी भूल बता दी और कहा आप सुधीर द्वारपाल के पास जायँ।
द्वारपाल ने ब्राह्मणों की बात सुनी और एक घटना सुनाई। राजदरबार में एक युवक अपनी बहिन को लेकर किसी न्याय प्रयोजन के लिए आया था। वे हँसते−हँसते जा रहे थे। मैंने उन्हें व्यभिचारी समझा और कटु शब्दों में डाँटा। जब उन लोगों ने अपने सम्बन्ध बताये तो मुझे दुख हुआ कि बिना पूरी बात जाने मैंने केवल सन्देह के आधार पर क्यों खोटी मान्यता बना ली? आप ही बतायें कि जिसका आचरण संदिग्ध हो वह शिक्षा कैसे दे? आप चन्द्रवती वेश्या के पास जाँय।
वेश्या ब्राह्मणों की बात सुनकर रुँआसी हो गई। उसने सुनाया एक परदेशी युवक ने सहस्र मुद्रा देकर मुझे एक वर्ष प्रणय क्रीड़ा के लिए अनुबंधित कर लिया। अचानक उसे स्वदेश लौटना पड़ा। तीन वर्ष तक मैंने उसकी प्रतीक्षा की जब कुछ पता न चला और भूखी मरने लगी तो दूसरे युवक का अनुबंध स्वीकार कर लिया। अब इस सोच में पड़ी हूँ कि कहीं प्रथम युवक के साथ मैं विश्वासघात तो नहीं कर बैठी? मेरा धर्माचरण नष्ट तो नहीं हो गया? ऐसी असमंजस युक्त मनःस्थिति में किस प्रकार आपको कुछ परामर्श दूँ।
ब्राह्मण इन सबके क थन का सार अपने मन से जमाकर राजा के द्वारा लिखाये गये निर्देशों वाले स्वर्ण पटल समेत कलिंग देश चल पड़े। राज्य सभा में उन्होंने समस्त विवरण सुनाया और कहा धर्माचरण की मोटी मर्यादा तो इस पटल पर लिखी है। उनका मर्म रहस्य यह है “कि हर व्यक्ति अपने आचरण की गहरी समीक्षा करे, सुधार के लिए सचेष्ट रहे। विनम्र बने और अपनी अपेक्षा दूसरों को श्रेष्ठ माने।”
कलिंग राज ने स्वर्ण पटल पर लिखी मर्यादाओं के साथ−साथ ब्राह्मणों द्वारा परखे गये धर्म रहस्य भी जोड़ दिये और उन्हें पालन करने के लिए प्रजा को मनाया।
जैसे ही धर्माचरण का पालन आरम्भ हुआ वैसे ही विपुल वर्षा होने लगी और दुर्भिक्ष का स्थान सुभिक्ष ने ले लिया।
काँटों के साथ जिन्दगी काटना तुम्हें असह्य तो नहीं हो जाता? चाँदनी ने गुलाब के फूल से पूछा।
फूल बोला—भिन्न प्रकृति वाले के बीच अपने ढंग से काँटे भी तो रहते ही हैं; फिर सहिष्णुता की नीति अपनाने में मुझे ही क्यों कठिनाई पड़ेगी।
मन्त्र विद्या में शब्द शक्ति —मानसिक एकाग्रता—चारित्रिक श्रेष्ठता एवं अभीष्ट लक्ष्य में अटूट श्रद्धा के चार तथ्य का समावेश होता है। मन्त्र शक्ति से कितने ही प्रकार के चमत्कार एवं वरदान उपलब्ध हो सकते हैं यह सत्य है, पर उसके साथ ही यह तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि वह मन्त्र उपरोक्त चार परीक्षाओं की अग्नि में उत्तीर्ण हुआ होना चाहिए। प्रयोग करने से पूर्व उसे सिद्ध करना पड़ता है। सिद्धि के लिए साधना आवश्यक है। इस साधना के चार चरण हैं इन्हीं का ऊपर उल्लेख किया गया है।
मन्त्र साधक को यम−नियमों का अनुशासन पालन करते हुए चारित्रिक श्रेष्ठता का अभिवर्धन करना चाहिए। क्रूरकर्मी, दुष्ट−दुराचारी व्यक्ति किसी भी मन्त्र को सिद्ध नहीं कर सकते। तान्त्रिक शक्तियाँ भी ब्रह्मचर्य आदि की अपेक्षा करती हैं। फिर देव शक्तियों का अवतरण जिस भूमि पर होना है उसे विचारणा, भावना और क्रिया की दृष्टि से सतोगुणी पवित्रता से युक्त होना ही चाहिए।
इन्द्रियों का चटोरापन मन की चंचलता का प्रधान कारण है। तृष्णाओं में—वासनाओं में और अहंकार तृप्ति की महत्वाकाँक्षाओं में भटकने वाला मन मृग−तृष्णा एवं कस्तूरी गन्ध में यहाँ−वहाँ असंगत दौड़ लगाते रहने वाले हिरन की तरह है। मन की एकाग्रता अध्यात्म क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है उसके संपादन के लिए अमुक साधनों का विधान तो है, पर उनकी सफलता मन को चंचल बनाने वाली दुष्प्रवृत्तियों का अवरोध करने के साथ जुड़ी हुई है। जिसने मन को संयत समाहित करने की आवश्यकता पूर्ण कर सकने योग्य अन्तःस्थिति का परिष्कृत दृष्टिकोण के आधार पर निर्माण किया होगा वही सच्ची और गहरी एकाग्रता का लाभ उठा सकेगा। ध्यान उसी का ठीक तरह जमेगा और तन्मयता के आधार पर उत्पन्न होने वाली दिव्य क्षमताओं से लाभान्वित होने का अवसर उसी को मिलेगा।
अभीष्ट लक्ष्य में श्रद्धा जितनी गहरी होगी उतना ही मन्त्र बल प्रचण्ड होता चला जायगा। श्रद्धा अपने आप में एक प्रचण्ड चेतन शक्ति है। विश्वासों के आधार पर ही आकाँक्षाएँ उत्पन्न होती हैं और मनःसंस्थान का स्वरूप विनिर्मित होता है। बहुत कुछ काम तो मस्तिष्क को ही करना पड़ता है। शरीर का संचालन भी मस्तिष्क ही करता है। इस मस्तिष्क को दिशा देने का काम अन्तःकरण के मर्मस्थल में जमे हुए श्रद्धा, विश्वास को है। वस्तुतः व्यक्तित्व का असली प्रेरणा केन्द्र इसी निष्ठा की धुरी पर घूमता है। गीताकार ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है—’यो यच्छद्धः स एव स’ जो जैसी श्रद्धा रख रहा है वस्तुतः वह वही है। अर्थात् श्रद्धा ही व्यक्तित्व है। इस श्रद्धा को इष्ट लक्ष्य में—साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ—तन्मयता के साथ—नियोजित किया गया होगा, मन्त्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। माँत्रिक को चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मन्त्रानुष्ठान किया होगा निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
मन्त्र का चौथा आधार है शब्द शक्ति। अमुक अक्षरों का एक विशिष्ट क्रम से किया गया गुन्थन शब्द−शास्त्र के गूढ़ सिद्धान्तों पर तत्वदर्शी अध्यात्मवेत्ताओं ने किया होता है। मन्त्रों के अर्थ सरल और सामान्य हैं। अर्थों में दिव्य जीवन की शिक्षाएँ और दिशाएँ पाई जाती हैं। उन्हें समझना भी उचित ही है। पर मन्त्र की शक्ति इन शिक्षाओं में नहीं उनकी शब्द रचना से जुड़ी हुई है। वाह्य यन्त्रों को अमुक क्रम से बजाने पर ध्वनि प्रवाह निसृत होता है। कण्ठ को अमुक आरोह−अवरोहों के अनुरूप उतार−चढ़ाव के स्वरों से युक्त करके जो ध्वनि प्रवाह बनता है उसे गायन कहते हैं। ठीक इसी प्रकार मुख के उच्चारण मन्त्र को अमुक शब्द क्रम के अनुसार बार−बार लगातार संचालन करने से जो विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह संचारित करने से जो विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह संचारित होता है वही मन्त्र की भौतिक क्षमता है। मुख से उच्चारित मन्त्राक्षर सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करते हैं। उसमें सन्निहित तीन ग्रन्थियों, षटचक्रों—षोडश माष्टकाडों—चौबीस उपत्यिकाओं एवं चौरासी नाड़ियों को झंकृत करने में मन्त्र का उच्चारण क्रम बहुत काम करता है। दिव्य शक्ति के प्रादुर्भूत होने से यह शब्दोच्चार भी एक बहुत बड़ा कारण एवं माध्यम है।
मन्त्र विद्या में मुख से तो पीये और हलके प्रवाह क्रम से ही शब्दों का उच्चारण होता है, पर उनके बार−बार लगातार दुहराये जाने से सूक्ष्म शरीर के शक्ति संस्थानों का ध्वनि प्रवाह बहने लगता है। वहाँ से अश्रव्य कर्णातीत ध्वनियाँ या प्रचंड प्रवाह प्रादुर्भूत होता है। इसी में मन्त्र साधक का व्यक्तित्व ढलता है और उन्हीं के आधार पर वह अभीष्ट वातावरण बनता है जिसके लिए मन्त्र साधना की गई मन्त्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि याँत्रिक अपनी श्रद्धा, तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मन्त्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बन्दूक का काम कर सके।
शब्द शक्ति का महत्व विज्ञानानुमोदित है। स्थूल, श्रव्य, शब्द भी बड़ा काम करते हैं फिर सूक्ष्म कर्णातीत अश्रव्य ध्वनियों का महत्व तो और भी अधिक है। मन्त्र जप में उच्चारण तो धीमा ही होता है उससे अतीन्द्रिय शब्द शक्ति को ही प्रचंड परिणाम में उत्पन्न किया जाता है।
ध्वनि तरंगें पिछले दिनों उच्चारण से उद्भूत होकर श्रवण की परिधि में ही सीमित रहती थीं। प्राणियों द्वारा शब्दोच्चारों एवं वस्तुओं से उत्पन्न आघातों से अगणित प्रकार की ध्वनियाँ निकलती है उन्हें हमारे कान सुनते हैं। सुनकर कई तरह के ज्ञान प्राप्त करते हैं—निष्कर्ष निकालते हैं और अनुभव बढ़ाते हुए उपयोगी कदम उठाते हैं। यह शब्द का साधारण उपयोग हुआ।
विज्ञान ने ध्वनि तरंगों में सन्निहित असाधारण शक्ति को समझा है और उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के क्रिया−कलापों को पूरा करना अथवा लाभ उठाना आरम्भ किया है। वस्तुओं की मोटाई नापने—धातुओं के गुण, दोष परखने का काम अब ध्वनि तरंगें ही प्रधान रूप में पूरा करती है। कार्बन ब्लैक का उत्पादन वस्त्रों की धुलाई, रासायनिक सम्मिश्रण, कागज की लुगदी, गीलेपन को सुखाना, धातुओं की ढलाई, प्लास्टिक धागों का निर्माण, प्रभृति उद्योगों में ध्वनि तरंगों के उपयोग से एक नया व्यावसायिक अध्याय आरम्भ हुआ है।
वी.एफ. गुडरिच कम्पनी का हामोजिनाइजिंग, दुग्ध संयन्त्र बहुत ही लोकप्रिय हुआ है। जनरल मोटर्स ने भी ‘सोनी गेज’ यन्त्र बनाया है। इनके द्वारा ध्वनि तरंगों का उपयोग कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया जाता है। आयोवा स्टेंट कालेज, अल्ट्रा सोनिक कारपोरेशन ने भी ऐसे ही कई उपयोगी यन्त्र बनाये हैं।
ध्वनि तरंगें कम्पन होती हैं, वे रेडियो तरंगों की तरह शून्य में यात्रा नहीं करती। मनुष्य के कानों द्वारा सुनी जा सकने योग्य थोड़ी सी ही हैं। जो कानों की पकड़ से नीची या ऊँची हैं उनकी संख्या कितनी गुनी अधिक है। शब्द को शक्ति के रूप में परिणित करने के लिए जिन ध्वनि तरंगों का प्रयोग किया जा रहा है उन्हें अल्ट्रा सोनिक (अस्तिवन) और सुपर सोनिक (महास्वन) संज्ञाएँ दी जाती हैं। यह ध्वनियाँ निकट भविष्य में सरलतापूर्वक विद्युत शक्ति में परिणत की जा सकेगी और तब उस शब्द स्रोत का ध्वनि प्रवाह का उपयोग किया जा सकेगा ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं।
यह ध्वनि तरंगें देखने, सुनने, समझने में नगण्य सी हैं—उनका छोटा अस्तित्व उपहासास्पद सा लगता है, पर जब उनमें सन्निहित प्रचंड शक्ति का आभास मिलता है तो आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह ध्वनि तरंगें इतना बड़ा काम करती हैं जितना विशालकाय एवं शक्ति शाली संयंत्र भी नहीं कर सकते। यन्त्र विज्ञान द्वारा इसी सूक्ष्म शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
प्रकाश और ध्वनि के कम्पनों का स्वरूप समझने के लिए हमें समुद्र में उठने वाली लहरों को देखना चाहिए वे ऊपर उठती और नीचे गिरती हैं तथा एक क्रम−व्यवस्था की दूरी के साथ अग्रगामी होती हैं। प्रकाश और ध्वनि के कम्पनों का भी यही हाल है। विद्युत चुम्बकीय तरंगें प्रकाश की तरंगों से मिलती−जुलती होती हैं। किन्हीं दो उतार−चढ़ावों के बीच की दूरी को तरंग की लम्बाई कहा जाता है किसी बिन्दु पर से एक सेकेंड में गुजरती तरंग के उतार−चढ़ाव को लहर की फ्रीक्वेंसी—कम्पनांक कहा जाता है। तरंग की गति में तरंग की लम्बाई का भाग देकर, इन कंपनांकों का नाम निश्चित किया जाता है।
ध्वनि की लहरों का वायु के प्रवाह से भी बहुत कुछ सम्बन्ध रहता है। वे वायु प्रवाह के साथ अधिक सुविधापूर्वक जाती हैं जबकि अवरोध की दिशा में उनका बल बहुत क्षीण रहता है।
रेडियो तरंगें, शब्द तरंगें, माइक्रो लहरें, टेलीविजन और रैडार की तरंगें, एक्स किरणें, गामा किरणें, लेसर किरणें, मृत्यु किरणें, इन्फ्रारेड तरंगें, अल्ट्रा वायलेट तरंगें आदि कितनी ही शक्ति धाराएँ इस निखिल ब्रह्माण्ड में निरन्तर प्रवाहित रहती है। इन तरंगों की भिन्नता उनकी लम्बाई के आधार पर नापी जाती है। मीटर, सेन्टीमीटर, माइक्रोन, मिली मीटर, आँगस्ट्रोन इनके मापक पैमाने हैं।
यह ध्वनि तरंगें अब विभिन्न भौतिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की जाने लगी हैं और उनके अनेकों उपयोगी लाभ उठाये जा रहे हैं।
हानिकारक कीटाणुओं का नाश करने में अश्रव्य ध्वनियों से बड़ी सहायता मिल रही है। दूध में से मक्खन निकालना, धातुओं तथा रसायनों को एक दूसरे के साथ घोट देना—कोहरा हटा देना—जैसे अनेकों महत्वपूर्ण कार्य ध्वनियाँ करती हैं। युद्ध समय में जलयानों तथा वायुयानों की महत्वपूर्ण जानकारियाँ रैडार तथा ऐसे ही अन्य यन्त्रों से मिलती है। कुछ समय पहले बिजली के उपकरणों द्वारा कितने ही रोगों का इलाज किया जाता था उसकी जगह अब अश्रव्य ध्वनियों का प्रयोग करके सफल उपचार किये जा रहे हैं।
शब्द केवल जानकारी ही नहीं और भी बहुत कुछ देता है। खाद और पानी के बाद अब पौधों के लिए मधुर ध्वनि प्रवाह भी एक उपयोगी खुराक मानी जाने लगी है। यूगोस्वालिया में फसल को सुविकसित बनाने के लिए खेतों पर अमुक स्तर की वाद्य लहरियाँ ध्वनि विस्तारक यन्त्रों से प्रवाहित की गई और उसका परिणाम उत्साहवर्धक पाया गया। हालैण्ड के पशु पालकों ने गायें दुहते समय संगीत बजाने का क्रम चलाया और अधिक दूध पाया। निद्रा, उत्तेजना और विकास की त्रिविध प्रक्रियाएँ वृक्ष और वनस्पतियों पर देखी गई। पशुओं की श्रमशीलता, प्रजनन शक्ति, बलिष्ठता एवं दूध देने की क्षमता को संगीत ने बढ़ाया। मक्का पर संगीत के कतिपय प्रयोग करके उनकी वृद्धि में सफलता प्राप्त करने की दृष्टि से एक अमेरिकी कृषक जार्ज स्मिथ ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।
शब्द शक्ति को ताप में परिणित किया जा सकता है। शब्द जब मस्तिष्क के ज्ञानकोषों से टकराते हैं तो हमें कई प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। यदि उन्हें पकड़ कर ऊर्जा में परिणित किया जाय तो वे बिजली ताप प्रकाश चुम्बकत्व के रूप में कितने ही प्रकार का क्रिया−कलाप सम्पन्न कर सकने योग्य बन सकते हैं।
ताप को शक्ति का प्रतीक माना गया है। विभिन्न प्रकार के ईधन जलाकर अनेकों शक्ति धाराएँ उत्पन्न की जाती हैं। शक्ति और ताप को अब एक ही मान लिया गया है। इस शृंखला में ध्वनि को भी एक शक्ति उत्पादक ईधन मान लिया गया है। वह दिन दूर नहीं जब शब्द को ईधन नहीं वरन् एक स्वतन्त्र एवं सर्व समर्थ शक्ति माना जायगा। तभी मन्त्र शक्ति की यथार्थता ठीक तरह समझी जा सकेगी।
ध्वनियाँ तीन प्रकार से उत्पन्न होती हैं (1)वायु द्वारा (2) जल द्वारा (3)पृथ्वी द्वारा। वायु की तरंगों द्वारा प्राप्त होने वाली ध्वनि की गति प्रति सेकेंड 1088 फुट होती है। जल तरंगों की गति इससे तेज होती है। उस माध्यम से वे एक सेकेंड में 4900 फुट चलती है। पृथ्वी के माध्यम से यह गति और भी तेज होती है अर्थात् एक सेकेंड में 16400 फुट।
प्राणायाम द्वारा वायु तत्व का—स्नान, आचमन, अर्घदान आदि द्वारा जल का—दीपक, धूपबत्ती, हवन आदि द्वारा अग्नि का प्रयोग करके मन्त्रानुष्ठान से वे त्रिविध उपचार किये जाते हैं जिनसे शब्द शक्ति को प्रचंड बनने का अवसर मिल सके।
हर ध्वनि अपने ढंग से अलग−अलग कंपन उत्पन्न करती है। इसी आधार पर हमारे कानों के पर्दे अलग−अलग व्यक्तियों की आवाज को आँखें बन्द होने पर भी पहचान लेते हैं। ध्वनि कम्पनों−ध्वनि तरंगों के घनत्व के आधार पर हम असंख्य प्रकार की ध्वनियों की भिन्नता अनुभव करते हैं। अन्धे लोगों को अपने कानों की सहायता से ही समीपवर्ती वातावरण में हो रही हलचलों का—व्यक्तियों तथा प्राणियों के अस्तित्व का पता लगाना पड़ता है। कान इस बात के अभ्यस्त हो जाते हैं कि विभिन्न माध्यमों से उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रवाह का अन्तर कर सकें और स्थिति का अथवा प्राणियों की हलचलों का पता लगा सकें।
नादयोग की साधना द्वारा अनन्त अन्तरिक्ष में निरन्तर बहने वाली ध्वनि तरंगों को सुना जाता है और उनमें से अपने काम की तरंगों के साथ संपर्क बनाकर भूतकाल में जो हो चुका है उसकी—भविष्य के लिए जो सम्भावना बन रही है उसकी—तथा वर्तमान में किस व्यक्ति या किस परिस्थिति द्वारा क्या हलचलें उत्पन्न की जा रही हैं उनका पता लगाया जा सकता है। नादयोग की शब्द साधना वस्तुतः मन्त्र विज्ञान का ही एक अंग है।
जिन ध्वनियों के कम्पन प्रति सेकेंड 100 से 300 तक होते हैं वे मनुष्य के कानों से आसानी के साथ सुने जा सकते हैं। इससे बहुत अधिक या बहुत कम कम्पन वाले शब्द आकाश में घूमते हुए भी हमारे कानों द्वारा सुने समझे नहीं जाते। इस प्रकार के शब्द प्रवाह को ‘अनसुनी ध्वनियाँ’ कहते हैं। उन्हें ‘सुपर सोनिक रेडियो मीटर’ नामक यन्त्र से कान द्वारा सुना जा सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स के उच्च विज्ञानी ऐसा यन्त्र बनाने में सफल नहीं हो सके हैं जो श्रवण शक्ति की दृष्टि से कान के समान सम्वेदनशील हो। कानों की जो झिल्ली आवाज पकड़कर मस्तिष्क तक पहुँचती है, उसकी मुटाई एक इञ्च के ढाई हजारवें हिस्से के बराबर हैं। फिर भी वह कोई चार लाख प्रकार के शब्द भेद पहचान सकती है और उनका अन्तर कर सकती है। अपनी गाय को या मीटर की आवाज को हम अलग से पहचान लेते हैं यद्यपि लगभग वैसी ही आवाज दूसरी गायों की या मोटरों की होती है, पर जो थोड़ा सा भी अन्तर उसमें रहता है, अपने कान के लिए उतने से ही अन्तर कर सकना और पहचान सकना सम्भव हो जाता है। कितनी दूर से, किस दिशा से, किस मनुष्य की आवाज आ रही है, यह पहचानने में हमें कुछ कठिनाई नहीं होती। यह कान की सूक्ष्म सम्वेदनशीलता का ही चमत्कार है। टेलीफोन यन्त्र इतनी बारीकियाँ नहीं पकड़ सकता है।
काने से लेकर मस्तिष्क तक स्वसंचालित तंत्रिकाओं का जाल बिछा है। शब्द के कम्पन इनसे टकराकर प्रतिध्वनि उत्पन्न करते हैं, वह मस्तिष्क में पहुँचती है तब सुनने की बात पूरी होती है। कान में आवाज के घुसने और मस्तिष्क को उसका बोध होने के बीच लगभग एक सेकेंड समय लग जाता है।
मुँह बन्द करके गुनगुनाया जाय तो भी उसकी आवाज मस्तिष्क तक पहुँचती है। ऐसी दशा में कान के समीप वाली जबड़े की हड्डी उन शब्दों को सीधे मुँह से मस्तिष्क तक पहुँचा देती है। इससे स्पष्ट है कि कान का कार्य क्षेत्र एक इञ्च गहरी नली तक ही सीमित नहीं है वरन् जबड़े के इर्द−गिर्द तक फैला है। गाल पर चपत मारने से कान सुन्न हो जाते हैं। इसका कारण उस क्षेत्र की उग्र हलचल का कान पर प्रभाव पड़ना ही है।
कान में प्रवेश करने वाली ध्वनि तरंगों का वर्गीकरण करके उन्हें छने हुए रूप में मस्तिष्क तक पहुँचाने का काम ‘यूस्टोयिओ’ नली सम्पन्न करती है। शोरगुल के बीच जब यह नली थक जाती है तो अक्सर बहरापन सा लगने लगता है। इसी तरह की आन्तरिक थकान को दूर करने के लिए जमुहाइयां आती है।
श्रवण शक्ति का बहुत कुछ सम्बन्ध मन की एकाग्रता से है। यदि किसी बात में दिलचस्पी कम हो तो पास में ही बहुत कुछ बकझक होते रहने पर भी अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। किन्तु यदि दिलचस्पी की बात हो तो फुसफुसाहट से भी मतलब की बातें आसानी से सुनी समझी जा सकती हैं।
मनुष्य के कान केवल उन्हीं ध्वनि तरंगों को अनुभव कर सकते हैं जिनकी संख्या प्रति सेकेंड 20 से लेकर 20 सहस्र तक की होती है। इससे कम और अधिक संख्या वाले ध्वनि प्रवाह होते तो हैं, पर वे मनुष्य की कर्णेन्द्रिय द्वारा नहीं सुने जा सके।
इस तथ्य को समझने पर मानसिक जप का महत्व समझ में आता है। उच्चारण आवश्यक नहीं। मानसिक शक्ति का प्रयोग करके—ध्यान भूमिका में सूक्ष्म जिह्वा द्वारा मन ही मन जो जप किया जाता है उसमें भी ध्वनि तरंगें भली प्रकार उठती रहती हैं।
रेडियो यन्त्र केवल कुछ सीमित और सम्बन्धित फ्रीक्वेंसी पर चल रही ध्वनि तरंगें ही पकड़ पाते हैं। समीपवर्ती फ्रीक्वेंसी के साथ यदि उनके साथ सम्बन्ध न हो तो वे यन्त्र सुन नहीं सकेंगे। कान की स्थिति उनकी अपेक्षा लाख गुनी अच्छी है। वे अनेक फ्रीक्वेन्सियों पर चल रहे शब्द प्रवाहों को एक साथ पकड़ और सुन सकते हैं।
नाक में जिस स्तर की गन्ध ग्राही शक्ति है उस स्तर की पकड़ कर सकने वाला यन्त्र अभी तक बनाया नहीं जा सका।
नादयोग द्वारा आकाश−व्यापी, अन्तर्ग्रही तथा अन्तःक्षेत्रीय दिव्य शक्तियों का सुना जाना सम्भव है और उस आधार पर वैसा बहुत कुछ जाना जा सकता है जो स्थूल मस्तिष्कीय चेतना अथवा उपलब्ध साधनों से जान सकना सम्भव नहीं है। विश्व−व्यापी शब्द समुद्र में मन्त्र साधक अपनी प्रचंड हलचलें समाविष्ट करता है और ऐसे शक्तिशाली ज्वार−भाटे उत्पन्न करता है जिनके आधार पर अभीष्ट परिस्थितियाँ विनिर्मित हो सके। यही है मन्त्र विद्या के चमत्कारी क्रिया−कलाप का रहस्य।
लोग उथली एकाँगी मन्त्र साधना करते हैं फलतः वे उस सत्परिणाम से वंचित रह जाते हैं जो सर्वांगपूर्ण मन्त्र साधना करने से निश्चयपूर्वक प्राप्त हो सकता है। ध्यान रखा जाय मन्त्र विद्या की सफलता के चार आधार हैं—शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता एवं लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा। चारों आधारों को साथ लेकर चलने वाली मन्त्र साधना कभी निष्फल नहीं होती।
भगवन्! आपने इस संसार में लाल, पीले, हरे, सफेद और नीले जैसे सुन्दर और आकर्षक रंग बनाये हैं। तब मैंने ही पूर्व जन्म में कौन−सा पाप किया था जिसके कारण श्यामवर्ण मेरे ही हिस्से में आया। मेरी कालिमा किसी को पसन्द नहीं। हर व्यक्ति मेरी कुरूपता को देखकर नाक, भौं सिकोड़ता है। यह आपका सरासर अन्याय है। काले रंग ने उलाहने के स्वर में विधाता से कहा।
विधाता ने मुस्कराते हुए कहा−’वत्स! तुम कितने भोले हो। तुम्हें यह भी मालूम नहीं कि मैं इस संसार में किसी वस्तु को कोई रंग प्रदान नहीं करता। सारे रंग सूर्य की किरणों में समाये हुए हैं। जिस वस्तु में उनका रंग खींचकर अपने में पचालेने और फिर उसको विकीर्ण कर देने की जैसी क्षमता है, वैसा ही रंग उसे प्राप्त हो जाता है। तू किसी वस्तु को लेकर देना नहीं जानता, सब रंगों को अपने भीतर भरता भर है निकालने का नाम नहीं लेता। इस दशा में कालिमा तो तेरे पल्ले बँधेगी ही। मुझे दोषी ठहराने से क्या लाभ?
जापान में बौने दरख्तों से अपने घर−आँगन सजाने का रिवाज है। देवदारु के पेड़ जो जंगलों में आमतौर से बीस−तीस फुट तक ऊँचे जाते हैं इन घरेलू बगीचों में तीन−चार फुट तक ऊँचे नहीं आते। भले ही उनकी उम्र दस−बीस साल क्यों न हो जाय।
एक जगह उसी जाति के पेड़ों का इतना ऊँचा होना और दूसरी जगह उनका इतना बौना रह जाना, देखने में सचमुच अचम्भे जैसा लगता है और तुलना करने पर यह भारी बड़ा रहस्यमय−सा प्रतीत होता है।
कारण ढूँढ़ने पर वस्तुस्थिति समझ में आ जाती है। माली लोग उन पौधों की जड़ें नहीं बढ़ने देते। उन्हें बार−बार काटते−छाँटते रहते हैं। जड़ें बढ़ेंगी नहीं,मोटी मजबूत न होंगी और जमीन में गहरी न घुसेंगी तो पौधे को खुराक कम मिलेगी और उसे मोटा मजबूत एवं ऊंचा बनने का अवसर ही न मिलेगा। बौनी नस्ल के देवदारु वृक्ष दुनिया में कहीं भी नहीं हैं। बगीचे वाले अपनी कुशलता के सहारे उन्हें छोटी जाति का बने रहने के लिए विवश करते रहते हैं।
मनुष्यों में बहुत से उन्नतिशील होते हैं वे कठोर परिश्रम—प्रखर मनोबल और अनवरत अध्यवसाय के बलबूते क्रमशः आगे बढ़ते जाते हैं। कठिनाइयों को पार करते हैं और साधन जुटाते हैं। आज की साधनहीन परिस्थिति कल विपुल साधन सम्पन्न बन सकती है यदि उसके लिए उपयुक्त मनःस्थिति सँजोई जा सके और समुचित गतिविधि अपनाई जा सके। विविध−विधि सफलताओं के वरदान किसी को छप्पर फाड़कर कदाचित ही मिलते हैं। आमतौर से उन्हें प्रचण्ड पुरुषार्थ के मूल्य पर ही खरीदा जाता है।
चिरस्थायी प्रगति का मूल कारण अन्तर के सद्गुणों की विशेषताओं में सन्निहित रहता है। मनुष्य भीतर से बढ़ता है। बाहर जो उसका विस्तार वैभव दिखाई पड़ता है उसके पीछे उसकी अदम्य महत्वाकाँक्षा काम करती है। प्रगतिशील मनुष्यों का पहला प्रयास यह होता है कि अपने विचार और स्वभाव का स्तर परिष्कृत करें। अपने अस्त−व्यस्त व्यक्तित्व को सुसंयत बना लेने का प्रयास यों सामान्यतः तुच्छ एवं महत्वहीन प्रतीत होता है—उसका स्वरूप या परिणाम तत्काल सामने नहीं आता फिर भी यह सुनिश्चित है कि उत्कर्ष के समस्त आधार इसी पृष्ठभूमि पर बनते हैं।
आलस्य और प्रमाद को शत्रु मानते हुए सदा श्रमशील रहना—व्यस्त क्रियाकलाप अपनाना, समय की बर्बादी तनिक भी न होने देना और पूरे मनोयोग के साथ सामने प्रस्तुत कार्य में अपने को तन्मय कर देना ऐसा गुण है जिससे सफलताएँ निकटतम घिसटती चली आती हैं। जिसने निर्धारित क्रिया−कलाप को पूरी दिलचस्पी और प्रसन्नता के साथ करने का रसास्वादन सीख लिया उसकी सोई हुई अगणित शक्तियाँ जगेंगी और अनुकूलताओं को खींच−खींचकर सामने खड़ा कर देंगी। जिसे उज्ज्वल भविष्य का विश्वास है—जो अगले दिनों अधिक अच्छी परिस्थिति आने की आशा सँजोये रह सकता है—जो कठिनाइयों से जूझने और विपन्नताओं के ढेर में से संपन्नता ढूँढ़ निकालने का साहस बनाये रहता है उसके लिए न तो कुछ असम्भव है और न असाध्य। आज नहीं तो कल सफलता की विजय श्री को वह वरण करेगा ही।
हम अपनी जड़ें न कटने दें। भीतरी विशेषताओं और विभूतियों को घटने न दें तो देवदारु के सुविकसित वृक्षों की तरह गगनचुम्बी प्रगति करेंगे किन्तु यदि जड़ें कटती रहीं तो फिर जापानी बगीचों में व्यंग उपहास और कौतुक की तरह उगे हुए बौने वृक्षों की तरह हमें गया−गुजरा जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ेगा।
मानवी बुद्धि कौशल की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। उसने इस शताब्दी में जो वैज्ञानिक सफलताएँ प्राप्त की हैं उससे अतीत का सारा प्रगति इतिहास पीछे छूट गया है। उपलब्धियों पर दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि उपनिषदकारों का यह कथन सच ही है कि मनुष्य से बढ़कर और कुछ नहीं। वह सर्व शक्ति मान का पुत्र होने के कारण स्वयं भी शक्तियों के अजस्र स्रोत का अधिपति है।
पिछले दिनों अणु शक्ति करतल गत की गई और उसके ध्वंसात्मक एवं रचनात्मक स्वरूपों को समझा गया। अब उससे भी बड़ी शक्ति लेजर किरणों के हाथ लगी है। यों अभी वह शोध बाल्यकाल में से ही गुजर रही है, पर सम्भावना यही दिखती है कि जब प्रौढ़ावस्था तक उसकी जानकारी पहुँचेगी तो विश्व के मूर्धन्य शक्ति स्रोतों में उसी का नाम प्रथम पंक्ति में होगा।
परमाणु शक्ति की महत्ता बहुत पहले जानी जा चुकी है, पर उसका उपयोग बड़ी स्वल्प मात्रा में ही सम्भव हो सका है। कारण यह है कि परमाणु अपनी किरणें अस्त−व्यस्त ढंग से सभी दिशाओं में बखेरते रहते हैं। जब इस विकिरण को एक ही दिशा में केन्द्रित किया जाता है तो वह नियन्त्रित विकिरण प्रवाह ‘लेजर’ कहलाता है। लेजर एक निश्चित शब्द है उसका पूरा नाम है—’लाइट ऐप्लिफिकेशन वाइ स्टिम्युलेटेड एमिशन आफ रेडियेशन।’
अलादीन के जादुई चिराग की चर्चा कथा गाथा की किंवदंती रही है, पर आज लेजर का उपयोग ऐसा अद्भुत है जिसे सचमुच जादुई चिराग ही कह सकते हैं।
वोस्टन के निकट लेक्सिंगटन की वेधशाला में पिछले दिनों एक प्रयोग प्रो. लुई स्मलिन के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ। लेजर यन्त्र का बटन दबाया गया और लाल रंग की प्रकाश किरण पतले तीर की तरह छूटीं और अन्तरिक्ष को चीरती हुई 1.3 सेकेंड में चन्द्रमा से जा टकराई। वहाँ उसने अल्वाटेनियस ज्वालामुखी के केडर के इर्द−गिर्द दो मील क्षेत्र में जगमगाता हुआ प्रकाश उत्पन्न किया। तदुपरान्त वह 2॥ लाख मील की यात्रा करके शब्दबेधी बाण की तरह अपने उद्गम स्थान पर लौट आई। इस प्रकार धरती पर बैठे किसी अन्य ग्रह को प्रकाशित करने का पहला प्रयोग सफल हुआ। अब इन किरणों के विविध−विधि उपयोग ढूँढ़ निकालने के प्रयत्न में 400 प्रयोगशालाओं में 2000 वैज्ञानिक अकेले अमेरिका में लगे हुए हैं। अमेरिका का प्रधान प्रतिद्वंद्वी रूस, भी इस दिशा में चुप नहीं बैठा है, उसने भी इस महाशक्ति को हस्तगत करने के लिए अपने वैज्ञानिक साधनों को बड़ी मात्रा में झोंक दिया है।
युद्ध प्रयोजनों में अगली बार ‘लेजर’ किरणों की भूमिका सर्वोपरि रहेगी, ऐसा समझा जाता है। जनरल कर्टिस ई.लायो का विश्वास है अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपणास्त्रों के नष्ट करने में लेजर किरणों द्वारा आत्म−रक्षा का एक बहुत बड़ा प्रयोजन पूरा किया जा सकेगा। अगले दिनों विमानभेदी तोपें पिछले युग की स्मृतियाँ भर रह जायेंगी। हलकी सी लेजर बन्दूक ही अपने अचूक निशाने से किसी भी विमान को क्षण भर में धराशायी बना दिया करेगी। जिन देशों के पास यह बन्दूकें होंगी उनके लिए हवाई हमले से डरने का कोई कारण न रहेगा। फ्रक फोर्ड शस्त्रागार में जो लेजर बन्दूक बनी है उससे एक सेकेंड में धरती के इस छोर पर बैठकर उस छोर का सही निशान साध सकना सम्भव हो जायगा।
मृत्यु किरण की चर्चा पिछले बहुत वर्षों से विज्ञान जगत में चल रही थी। उसके झंझट भरे प्रयोगों की अब आवश्यकता न रहेगी। लेजर किरणों का ही दूसरा नाम मृत्यु किरण होगा। इस आधार पर कितने ही बड़े क्षेत्र को बात की बात में भस्म करके रख दिया जायगा; सैनिकों और नागरिकों की तो बात ही क्या घास पात तक जल−भुनकर खाक हो जायेंगे। अणु युद्ध से लेजर युद्ध सरल और सस्ता पड़ेगा। उसमें विस्फोट जल विकिरण से होने वाली हानि की भी आशंका कम ही है। अणुबम से उसकी लागत तो कम है ही।
लेजर किरणों का रचनात्मक उपयोग भी है। उन्हें चिकित्सा तथा दूसरे उपयोगी कार्यों में भी प्रयुक्त किया जा सकेगा। न्यूयार्क के अस्पताल में एक रोगी की आँख की पुतली पर उगा हुआ ट्यूमर लेजर किरण द्वारा एक सेकेंड के हजारवें भाग में आपरेशन करके अलग कर दिया गया। केन्सर सरीखे जो दुष्ट रोग दवादारू तथा साधारण उपचार के काबू में नहीं आते लेजर किरणों द्वारा आसानी से ठिकाने लगाये जा सकेंगे।
अन्तरिक्षीय उड्डयन क्षेत्र में लेजर विज्ञान क्रान्तिकारी परिवर्तन करने जा रहा है। राकेटों से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से ऊँचा उछालने में शक्तिशाली ईधन की और उसे रखने के स्थान की जरूरत पड़ती है, इस प्रयोजन की पूर्ति में ही राकेट संरचना का बहुत बड़ा भाग लगा और बना होता है। लेजर किरणें आसानी से राकेट को इच्छित ऊंचाई पर उछाल दिया करेंगी। तब हलके और सस्ते राकेटों से काम चल जायगा। ईधन की आवश्यकता न रहेगी तो उस वाहन में आवश्यक शोध यन्त्रों अथवा प्रयोग यन्त्रों के फिट करने से ही काम चल जायगा। इन अंतरिक्षयानों को बिजली धरती से ही पहुँचाई जा सकेगी। तब उनकी यात्रा न केवल सस्ती ही हो जायगी वरन् सुरक्षित, सरल और सुखद भी रहेगी। इस विज्ञान का अधिक विकास होने पर वायुयान—खचड़ा गाड़ी जैसे पुरानखण्डी प्रतीत होंगे। इतना तेल, पैट्रोल, इतने विद्युत उपकरण—इतनी कम चाल के इन हवाई जहाजों को लेजर वायुयानों की तुलना में कोई भी पसन्द न करेगा।
यदि तीसरा महायुद्ध छिड़ा तो परमाणु अस्त्र तो केवल धमकी भर का काम करेंगे। असली मार लेजर की होगी। वे मृत्यु किरण बनकर जिस क्षेत्र को चाहेंगी देखते−देखते भस्म करके रख देंगी। अणुबम विस्फोट से जो रेडियो धर्मी धूलि उड़ने का संकट रहता है वह भी न होगा और धातकता की दृष्टि से वह उससे कहीं आगे भी रहेंगी।
मानवी बुद्धि कौशल और शोध परक तन्मय एकाग्रता का अद्भुत प्रतिफल है ‘लेजर’। इस उपलब्धि के लिए उसे बधाई ही दी जा सकती है। किन्तु साथ ही एक असमंजस भी सामने आ खड़ा होता है कि जिस तरह मानवी प्रवृत्ति आदर्शों के क्षेत्र में दिन−दिन पतनोन्मुख होती चली जा रही है उसे देखते हुए किसी भी वस्तु परिस्थिति, उपलब्धि एवं सफलता का सदुपयोग संदिग्ध हो गया है। जो कुछ हाथ लगता है उसी का दुरुपयोग करने में आज की दुर्बुद्धि जुट पड़ती है। चेतना के क्षेत्र में जिस प्रकार वैज्ञानिक आविष्कारों के अभिवर्धन में प्रगति हुई है उसी प्रकार क्या पिछड़े हुए और क्या मूर्धन्य सभी में दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का गगनचुम्बी उत्पादन, विकास, विस्तार हुआ है।
दुर्बुद्धि के रहते सम्पदाओं का बढ़ते जाना खतरे से खाली नहीं है। दोनों का संयोग बारूद और चिनगारी के समन्वय जैसा उपद्रव खड़ा कर सकता है। वर्तमान समय में बारूद भी बढ़ रही है और चिनगारियाँ भी अन्धड़ के साथ उड़ रही हैं, आशंका यही रहती है कि आश्चर्यचकित करने वाली वैज्ञानिक उपलब्धियाँ चिरसंचित मानव सभ्यता का अन्त न करदें। मानवी अस्तित्व को ही इस धरती पर से समाप्त न करदें।
इस असमंजस का हल दो ही प्रकार हो सकता है कि या तो दुर्बुद्धि रहने तक विघातक साधनों पर पूर्णतया रोक लगादी जाय या फिर दुर्बुद्धि पर तीखे प्रहार करके उसे सद्बुद्धि में परिणत किया जाय ताकि उपलब्धियों का सदुपयोग हो सके और उन्हें सुख−शान्ति के लिए प्रयुक्त किया जा सके। दूसरा मार्ग ही श्रेयस्कर है।
मरने के उपरान्त सूक्ष्म शरीर कई बार तो जन्म ले लेता है। कई बार बहुत समय तक पुरानी वस्तुओं−पुराने व्यक्तियों तथा पुरानी परिस्थितियों के साथ अत्यधिक मोह जुड़ जाने के कारण जीवात्मा उन्हीं में रहना पसन्द करती है। ऐसी स्थिति में उन्हें प्रेतात्मा कहा जाता है। अपनी रुचि की परिस्थितियों में उन्हें प्रसन्न और प्रतिकूल अवसर आने पर उन्हें अप्रसन्न देखा गया है। अनुकूलता में उनका सहयोग और प्रतिकूलता में उनका प्रतिरोध होते देखा गया है। इससे प्रतीत होता है कि आत्मा का न केवल अस्तित्व बना रहता है वरन् स्वभाव और रुचि भी लगभग वैसी ही बनी रहती है। सूक्ष्म शरीर द्वारा उनकी क्रियाएँ इसी आधार पर गतिशील रहती है। अपनी प्रिय वस्तुओं—प्रिय परिस्थितियों के साथ आत्माएँ कई बार बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध बनाये रहती है इसके कितने ही प्रमाण मिलते रहते हैं।
अपनी शताब्दी की विश्व विख्यात नर्तकी अन्ना पावलोवना की निधन स्मृति में जब उसकी शिष्या नर्तकियों ने एक नृत्य समारोह आयोजित किया तो दर्शकों ने प्रत्यक्ष देखा कि मृतात्मा की छाया भी साथ−साथ नृत्य कर रही थी।
इसी प्रकार इटली के प्रसिद्ध वायलिन वादक पागगिनी के स्मृति समारोह में मृतात्मा का प्रिय वायलिन स्वयमेव बज उठा और उससे ध्वनि निकली, मैं पागगिनी हूँ—’मैं पागगिनी हूँ।’ इस विचित्र दृश्य को देखकर दर्शकों ने आश्चर्यचकित एवं आतंकित होकर प्रेतात्मा की उपस्थिति अनुभव की। उन दिनों घर−घर इस प्रसंग की चर्चा रही।
अमेरिकी और अँग्रेज मिलकर मिश्र की समाधियों की खोज कर रहे थे उस खोज के पीछे मात्र पुरातत्व विषयक रहस्यों का जानना ही नहीं था, पर उनमें दबी हुई विपुल स्वर्ण सम्पदा एवं रत्न राशि से लाभान्वित होना भी था। इसके अतिरिक्त एक और भी बात थी—उन किम्वदन्तियों की वास्तविकता जानना जिनमें कहा जाता था कि इन समाधियों की रक्षा प्रेतात्मा करती हैं जो उन्हें छेड़ेगा वह खतरा उठायेगा। एक समाधि पर तो स्पष्ट शब्दों में शिलालेख लगा था—”जो फराऊनी कब्रों की छेड़छाड़ कर मृतात्माओं की शान्ति भंग करेगा उसे अकाल मृत्यु ला जायेगी।”
कब्रों की खुदाई का काम सबसे पहले लार्ड कार्नार्वल ने अपने हाथ में लिया था। उनका परिवार भी उस कार्य में दिलचस्पी ले रहा था और सहयोग दे रहा था। इसका भयंकर परिणाम सामने आया। एक−एक करके उस अभियान से सम्बन्धित बाईस व्यक्ति कुछ ही समय के अन्दर काल के गाल में बड़े विचित्र घटना−क्रम के साथ चले गये। लार्ड वेस्टवरी अनायास ही छत पर से कूद पड़े और मर गये। उनका बेटा जो खुदाई का इंचार्ज था। रात को अच्छा−खासा सोया सुबह मरा हुआ पड़ा मिला। डा. अर्चिवाल्ड डगलस रीड एक ममी का एक्सरे कर रहे थे कि उनका हार्ट फेल हो गया। आर्थर बाइबाल को मामूली सा बुखार ही खा गया। आव्रेहर्बर्टन सहसा पगला गये और आत्महत्या कर बैठे। लार्ड कानर्विल की पत्नी लेडी एलिजाबेथ एक तुच्छ से कीड़े के काटने के बहाने से ही ढेर हो गई। इस प्रकार उनका पूरा कुटुम्ब ही नहीं सहकारी मण्डल भी देखते−देखते अकाल मृत्यु का ग्रास हो गया।
यह प्रख्यात था कि नील नदी की घाटी में अवस्थित तूतनखामन की समाधि सबसे अधिक रहस्यमय साथ ही सर्वाधिक सम्पत्ति से भरी−पूरी है। इसका लोभ खोजी लोग छोड़ नहीं पा रहे थे। यों इतनी मौतें देखते−देखते हो जाने के कारण सारे इंग्लैंड में आतंक छाया हुआ था और प्रेतात्माओं की बात का मखौल उड़ाने वाले लोग भी आश्चर्यचकित होकर इस प्रकार मृत्युएँ होने की बात को “संयोग मात्र” नहीं कह पा रहे थे। वे भी इच्छा न रहते हुए भी उन किम्बदन्तियों के आगे सिर झुका रहे थे जिनमें समाधियों के साथ छेड़खानी करने वालों को जोखिम उठाने की चेतावनी दी जाती रही थी।
यह खुदाई मिश्र में पुरातत्ववेत्ता विभाग सम्भालने वाले विद्वान हावर्ड कारटर ने इंग्लैंड के उत्साही धनपति लार्ड कानर्बिग की साझेदारी में आरम्भ कराई थी। इसका परिणाम कुछ अच्छा नहीं निकला। दोनों ही साझीदार समान रूप से क्षतिग्रस्त हुए कार्टर को भी जानमाल की भारी क्षति उठानी पड़ी।
कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आई हैं जिनमें प्रेतात्माओं ने अपने कुटुम्बियों की परिस्थितियों में दिलचस्पी ली है और उनकी यथासम्भव सहायता भी की है।
रॉयल सोसाइटी के फैलोजोसफ ग्लैनविल इंग्लैंड के प्रामाणिक और सम्मानित नागरिक थे। उनने अपने संस्मरणों में सन् 1662 में घटित हुई एक प्रेत अस्तित्व की घटना का उल्लेख किया है। उनके कथानुसार इंग्लैंड के विल्ट शायर स्थान में नियुक्त एक न्यायाधीश की अदालत में आये एक विचित्र केस का वर्णन है। एक अर्ध विक्षिप्त सा व्यक्ति कहीं से पुराना नगाड़ा खरीद लाया। वह उसे सड़क पर खड़ा होकर विचित्र ढंग से बजाता—भीड़ इकट्ठी करता और पैसे बटोरता। पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और अवाँछनीय भीड़ जमा करने के अपराध में पकड़ कर नगाड़े समेत अदालत में पेश किया। अदालत ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया और नगाड़े को जब्त करने का हुक्म दिया। कुछ दिन बाद बेकार पड़े नगाड़े को पुलिस ने उस मजिस्ट्रेट के घर ही पहुँचा दिया। वहाँ उस घर के एक कौने में पटक दिया गया।
जिस दिन से नगाड़ा उनके घर में पहुँचा उसी दिन से वहाँ प्रेतों के उपद्रव शुरू हो गये। किवाड़ों को खटखटाने की—छप्पर पर धमा चौकड़ी और आँगन में उछल−कूद होने की घटनाएँ निरन्तर होने लगीं। बहुत तलाश करने पर भी कोई दिखाई न पड़ता था, पर घटनाएँ बराबर होती थीं। स्वयं प्रयत्न करने और नौकरों, पड़ौसियों की सहायता लेने के बाद भी जब उस उपद्रव का समाधान न हो सका तो पुलिस की सहायता ली गई, पर वे लोग भी देखते, सुनते, समझते हुए भी कुछ कर न सके। जो दिखाई ही नहीं देता उसको रोका या पकड़ा कैसे जाय?
एक दिन मजिस्ट्रेट ने देखा कि किसी मजबूत आदमी ने जोर का धक्का देकर किवाड़ें खोल लीं, चटखनी टूट गई और वह व्यक्ति ओवरकोट पहने हुए घर के भीतर घुसता चला आया और आँगन में होता हुआ जीने के रास्ते छत पर चढ़ गया। आश्चर्य यह था कि ओवरकोट तो आँखों से दीख रहा था, पर पहनने वाले के हाथ−पैर, चेहरा आदि सभी नदारत था। लगता था अकेला कोट ही यह सब हरकतें कर रहा है। इस घटना के बाद तो एक प्रकार से इन उपद्रवों को प्रेतात्मा की करतूत ही मान लिया गया।
अब यह तलाश किया जाना था कि आखिर थोड़े ही दिनों से यह उपद्रव क्यों खड़े हुए इससे पहले क्यों नहीं थे? घर में कुछ अजनबीपन तो नहीं हुआ। इस ढूँढ़−खोज में जब्त किया गया वह नगाड़ा ही नजर आया जो एक पगले से छीना गया था और उसने भी किसी कबाड़खाने से खरीदा था। नगाड़ा हटाया गया−साथ ही उन उपद्रवों का भी अन्त हो गया। इतना ही नहीं उस पगले का भी पता लगाया गया तो पता चला कि वह सदा से ही विक्षिप्त नहीं था। सस्ता माल देखकर कबाड़खाने से वह उस नगाड़े को खरीद लाया था। जिस दिन से उसे लाया वह पगला गया और शोर मचाने, भीड़ इकट्ठा करने की बेतुकी करतूतें करने लगा। जिस दिन से नगाड़ा जब्त हुआ उसी दिन से वह सामान्य स्वाभाविक स्थिति में पहुँच गया; जिस दिन नगाड़ा हटाया गया उसी दिन से मोक्सन के घर में भी शान्ति आ गई।
समझा गया कि उस नगाड़े के असली मालिक की प्रेतात्मा अपनी प्रिय वस्तु के साथ चिपकी रही है और वह वस्तु जहाँ कहीं भी पहुंची है वहीं उस आत्मा ने भी प्रवेश पदार्पण किया है।
सत्रहवीं सदी के पादरी जेरेन्सी टेलर ने अपनी स्मरण पुस्तक में एक प्रेतात्मा का आँखों देखा विवरण लिखा है। जब पादरी घोड़े पर सवार होकर वेलफास्ट से डिल्सगेरी जा रहा था तो कोई अजनबी व्यक्ति सहसा उसके पीछे घोड़े की पीठ पर सवार हो गया। चकित पादरी ने उसका परिचय एवं उद्देश्य पूछा तो उसने अपना नाम हैडकजेम्स बताया और कहा आप मेरी विधवा पत्नी तक यह सन्देश पहुँचा दें कि उसका नया पति जल्दी ही उसके साथ धोखा करने वाला है। वह बचे। पादरी ने बताये हुए नाम पते पर वह सन्देश पहुँचा दिया। पर स्त्री ने उस बात पर न तो ध्यान दिया और न विश्वास किया।
कुछ दिनों बाद उस स्त्री का खून हो गया। हत्या का मुकदमा कैरिकफोरेन्स की अदालत में चला। पुलिस को सन्देह था कि यह हत्या उसके नये पति ने पत्नी की सम्पत्ति हड़पने के लिए की है इस संदर्भ में पादरी जेरेंसी टेलर ने भी अपनी प्रेत वार्ता की साक्षी प्रस्तुत की।
पादरी की गवाही प्रामाणिक नहीं समझी गई और अदालत द्वारा कहा गया कि यदि ऐसी बात है तो मृतात्मा को अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात कहनी चाहिए। सर्वत्र सन्नाटा था। अचानक जोर से बिजली कड़कने जैसी आवाज हुई। अदृश्य से एक हाथ निकला और उसने अदालत की मेज पर तीन बार जोर−जोर से थपकी दी। इस दृश्य को देखकर न्यायाधीश एवं सभी आतंकित हो गये। अदालत ने दूसरे पति डेवीज को अपराधी घोषित करते हुए उसे समुचित दण्ड दिया।
मृतात्मा के प्रिय पदार्थों को दान कर देने अथवा अन्यत्र कहीं स्थानान्तरित कर देने का प्रचलन इसी दृष्टि से है कि उसे अन्यत्र जन्म लेने या विकास−क्रम के अनुरूप आगे बढ़ने में अड़चन न पड़े। प्रिय वस्तुओं में उलझा रहने के कारण आत्मा अशान्त और उद्विग्न ही रह सकता है जिस प्रकार घर के सम्बन्धी मृतक का अभाव अनुभव करके दुखी रहते हैं उसी प्रकार वह जीव भी बार−बार अपनी प्रिय वस्तुओं एवं परिस्थितियों के इर्द−गिर्द मंडराता रहकर दुखी हो सकता है। वहीं डेरा डालकर बैठा रह सकता है और उस उपस्थिति से घर−परिवार के लोगों को असुविधा अनुभव हो सकती है। इसलिए अच्छा यही समझा गया कि उन वस्तुओं को अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया जाय। दान में देकर आत्मा को
यह विश्वास दिला दिया जाय कि वे पदार्थ अब परिवार के आधिपत्य में नहीं रहे, वरन् किसी धर्म सत्ता के अधिकार में चले जाने के कारण पराये हो गये। मृतक की वस्तुओं का दान करने का एक कारण यह भी है कि घर के लोग उन्हें देख−देखकर शोक−सन्तप्त रहने की कठिनाई से बच जायें और विस्मृति अपनाकर अपना मन जल्दी हलका कर सकें।
जो हो, इतना निश्चित है कि शरीर के साथ आत्मा का अन्त नहीं हो जाता। यदि आत्मा अधिक भावुक या मोहग्रस्त है तो उसे प्रेतात्माओं के रूप में सम्बन्धित पदार्थों तथा व्यक्तियों से मोह बना रह सकता है। यह मोह मृतात्मा की प्रगति और कुटुम्बियों की सुविधा की दृष्टि से अवाँछनीय है। इसलिए अन्त्येष्टि संस्कार के साथ इस प्रकार के धर्मोपचार जोड़े गये हैं जिससे आत्मा का मोह एवं शोक शान्त हो सके उसे अन्यत्र जन्म लेने का अवसर मिल सके।
यदि तेरा कोई साथ न दे तो भी अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अकेला बढ़ चल। जीवन का संग्राम अकेले—निहत्थे, निःशस्त्र और अँधेरे में भी लड़ा जा सकता है। अपनी पसलियाँ जलाकर जिसे प्रकाश उत्पन्न करना आता है वह न कभी झुकता है और न कभी रुकता है।
—रवीन्द्रनाथ टैगोर
संसार की न तो कोई वस्तु बुरी है और न अच्छी। अच्छाई बुराई उसके उपयोग की क्षमता एवं दिशा में है। विष भी उपयुक्त प्रयोजनों के लिए काम में लाने पर अमृत जैसे उपयोगी सिद्ध होते हैं और अमृत भरा वजनदार घड़ा किसी के सिर पर पटक दिया जाया तो वह उसकी मृत्यु का कारण बन सकता है।
पदार्थों का विश्लेषण, विवेचन तो करना चाहिए पर उन्हें भला या बुरा नहीं मान लेना चाहिए। धन, रूप, बल, बुद्धि, कौशल, विद्या आदि विभूतियाँ यों सौभाग्य सूचक मानी जाती है, पर यदि इन्हें अवाँछनीय प्रयोजनों के लिए काम में लाया जाय तो समाज के लिए ही नहीं स्वयं प्रयोक्ता के लिए भी अभिशाप सिद्ध होती है। जहाँ इनका सदुपयोग वरदान जैसे परिणाम उत्पन्न करता है वहाँ दुरुपयोग से भयंकर संकट भी उत्पन्न होता है।
उदाहरण के लिए हाइड्रोजन गैस को ही लिया जाय। यह एक हलकी−सी गैस है। यदि उसकी शक्ति का सदुपयोग करने पर वह विनाशकारी परिणाम उपस्थित कर सकती है।
सोलहवीं सदी में विज्ञानी पैरासेलसस ने धातु को तेजाब में घोलने पर निकलने वाली ज्वलनशील गैस का परिचय प्राप्त कर लिया था, पर तब किसी को यह पता नहीं था कि वह हाइड्रोजन गैस भविष्य में विज्ञान जगत में मूर्धन्य भूमिका का सम्पादन करेगी।
हवा में उड़ने वाले बाल−बच्चों के गुब्बारे हाइड्रोजन गैस की शक्ति से ही ऊपर उठते और उड़ते हैं। सन् 1783 में एस. पी. चार्ल्स ने मानव वाहन बड़ा गुब्बारा बनाया था। उसके बाद उड्डयन क्षेत्र में प्रगति होती ही चली गई। गुब्बारे अब भी वायुमण्डल की खोज खबर लेने के लिए उड़ाये जाते हैं। उनमें वायुदाब मापी ‘बैरोमीटर’ तापमापी—थर्मामीटर तथा रेडियो सान्डे जैसे यन्त्र रखे रहते हैं। जिनकी सूचना द्वारा धरती वालों को वायुमण्डल की स्थिति का पता लगता है। यह गुब्बारे हाइड्रोजन गैस की शक्ति से ही उड़ते हैं।
युद्ध प्रयोजन में काम आने वाले विस्फोटक टी. एन. टी. डाइनामाइट बनाने से लेकर उर्वरक खाद में प्रयुक्त होने वाले अमोनियम फास्फेट तथा अमोनियम सल्फेट जैसे पदार्थ इसी गैस के आधार पर बनते हैं। दवाएँ बनाने में अमोनियम कार्बोनेट, बैटरियाँ बनाने में अमोनियम क्लोराइड, बर्फ जमाने में अमोनिया गैस का उपयोग होता है यह सब हाइड्रोजन के ही बाल−बच्चे हैं। अणुबम से हजारों गुनी अधिक शक्ति वाला हाइड्रोजन बम इसी गैस के दो परमाणुओं के नाभिकों को मिलाकर बनाया जाता है।
हलकी हाइड्रोजन के ऊपर अणुओं का अपेक्षाकृत कम भार रहता है इसलिए वह स्वयं ऊँची उठती है और अपनी शक्ति से दूसरों को ऊपर उठाती है। यही मानवों में होती है वे व्यक्ति भौतिक महत्वाकाँक्षाओं के वजन से अपने को भारी नहीं बनाते। सन्तोष और शान्ति का सादा अपरिग्रही जीवन जीते हैं और अपनी क्षमताओं को उन कार्यों में लगाते हैं जिनसे समस्त संसार का भला हो सके। हाइड्रोजन की उपयोगिता उसके हलकेपन के साथ जुड़ी हुई है। अहंकार, परिग्रह, दंभ और वासना−तृष्णा की ललक का अनावश्यक भार यदि हमारे ऊपर लदा हुआ नहीं हो तो अधिकाधिक ऊँचाई के शिखर तक चढ़ सकना सम्भव हो सकता है।
सबसे बढ़ी बात उपयोग करने वाली प्रवृत्ति एवं क्षमता की है यदि इस गैस को रचनात्मक काम में लगाया जाता रहे तो उसके सहारे मनुष्य को अनेकानेक सुविधाएँ बढ़ाने का अवसर मिलता रह सकता है किन्तु यदि उसे विस्फोटक के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा तो उसकी ध्वंसक शक्ति भी इतनी प्रचण्ड है कि देखते−देखते व्यापक दावानल के रूप में परिणत हो सकती है और प्रयोक्ता के लिए तथा समीपवर्ती क्षेत्र के लिए घातक परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
मनुष्य में देवता और असुर की—शैतान और भगवान की सम्मिश्रित सत्ता है। दोनों में वह जिसे चाहे उसे गिरादे यह पूर्णतया उसकी इच्छा के ऊपर निर्भर है। विचारों के अनुसार क्रिया विनिर्मित होती है। असुरता अथवा देवत्व की बढ़ोतरी विचार क्षेत्र में होती है उसी अभिवर्धन उत्पादन के आधार पर मनुष्य दुष्कर्मों अथवा सत्कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। यह क्रियाएँ ही उसे उत्थान पतन के—सुख−दुख के गर्त में गिराती है।
असुरता कितनी नृशंस हो सकती है इसके छुटपुट और व्यक्तिगत उदाहरण हमें आये दिन देखने को मिलते रहते हैं। वैसी सामूहिक रूप से—बड़े पैमाने पर और मात्र सनक की पूर्ति के लिए भी किया जाता रहा है उसके उदाहरण भी कम नहीं है।
नादिरशाह जाति का गड़रिया था। डाकुओं की सरदारी करते−करते वह ईरान की गद्दी पर जा धमका। उसने दिल्ली लूटी और एक दिन में डेढ़ लाख आदमी कत्ल कराये। दिल्ली प्रायः ऊजड़ हो गई। भवन निर्माण कला के विशेषज्ञ जितने भी मिले उन सबको कैद करके वह ईरान ले गया।
जर्मनी का हिटलर नृशंसता में अपने वर्ग के सभी साथियों को पीछे छोड़ गया। उसका ख्याल था कि प्रथम महायुद्ध में जर्मनी यहूदियों के कारण ही हारा; इसलिए उसने उसका प्रतिशोध अगली पीढ़ी से जाति वध के रूप में लिया उसने लगभग 50-60 लाख यहूदियों को विषैली गैस से दम घोटकर मार डाला।
इन्हीं में एक कड़ी बँगला देश में पाकिस्तानी नृशंसता की जुड़ती है। तानाशाह याहिया खाँ के हुक्म से वूशेर कहे जाने वाले सेनापति टिक्का खाँ ने 30 लाख बंगालियों को मक्खी, मच्छरों की तरह मार डाला और प्रायः 1 करोड़ को भारत खदेड़ दिया।
चंगेज खाँ का बेटा ‘हलाकू खाँ’ भी अपने बाप की तरह निर्दय था। उसने ईरान पर चढ़ाई करके उसकी ईंट से ईंट बजादी। खलीफा को खत्म किया—इस्लामियों का सफाया किया और उस देश को खून से रंग दिया।
तैमूर लंग वलख की गद्दी पर 1359 में बैठा। उसकी निर्दयता रोमाँचकारी थी। उसने अपने शत्रुओं के रक्त और हड्डियों का गारा बनाकर कितनी ही मीनारें चिनवाई। अंकोरा के सुलतान वायजीद को उसने पकड़ा एक पिंजड़े में उसे बन्द किया और उसके अपने साथ ले गया। दिल्ली लूटा ही नहीं सारे शहर को लाशों से पाट दिया। इस तरह उसने न जाने कितने नगरों और गाँवों में कत्लेआम कराया। खड़ी फसलों और बस्तियों में आग लगाते हुए वह आगे बढ़ता था।
बारहवीं सदी का मंगोल शासक चंगेज खाँ अपने लड़ाकू साथियों सहित जहाँ भी चढ़ाई करता पहला काम कत्लेआम कराने का पूरा करता। लूट के धन से उसे जितनी खुशी होती थी उससे ज्यादा मजा उसे बिलखते चीत्कार करते नर−नारियों के सिर उड़ाने और भाले भौंकने में आता। 49 वर्ष की आयु में वह चीन का शासक बन बैठा। उसने अनेकों नगर गाँव उजाड़े। रूस का एक नगर तो उसने लाशों से इस तरह पाट दिया कि उन्हें उठाने वाला भी कोई नहीं बचा। बदबू से भयंकर बीमारी फैली यहाँ तक कि उसे स्वयं, उस नगर का कब्जा छोड़कर भागना पड़ा।
रोम का शासक नीरो 14 वीं शताब्दी में नौ वर्ष तक सिंहासनारूढ़ रहा उसने अपनी करुणामयी माता का कत्ल करवाया, अपनी पत्नी का सिर कटवा डाला, जिन अफसरों से उसकी अनबन हुई देखते−देखते उन्हें मौत के घाट उतार दिया। एकबार उचंग आई तो पूरा शहर ही जलवा कर खाक करा दिया और उस दृश्य एक अच्छे−खासे मनोरंजन के रूप में ऊँची पहाड़ी पर बैठा देखता रहा। उस सर्वनाश का मजा उसने वंसरी बजाते हुए लूटा।
मृतात्माओं को सुख−सुविधा पहुँचाने के विचार से उनके हितैषी यह प्रयत्न करते थे कि परलोक में उपलब्ध रहने की दृष्टि से उनके मृत शरीर के साथ उपयोगी वस्तुएँ भी—गाड़ी या जलाई जाँय। भारत में मृतक की जीवित पत्नी को मृत शरीर के साथ जलने की प्रथा रही है जिसमें यह सोचा जाता था कि जीवित पत्नी अपने पति के साथ जलकर परलोक में उसकी सेवा करती रह सकेगी।
मिस्र में यह प्रथा सत्ताधीशों के मृत शरीर को परलोक में अधिक सुखी बनाये रखने की दृष्टि से विशालकाय ‘पिरामिड’ स्मारक बनाये गये और उनके भीतर सुख−सुविधा के अनेकानेक साधन रखने का प्रचलन किया गया।
यह तथ्य बताते हैं कि मनुष्य अपने प्रियजनों की सुविधा के लिए अनेकों निरीहों का किस प्रकार और किस हद तक उत्पीड़न कर सकता है।
रोडेशिया में जब सीथियस सभ्यता का बोलबाला था तब राजा की अन्त्येष्टि बहुत शान से होती थी। उसकी लाश में से आँतें निकालकर मसाला भरा जाता था ताकि शरीर बहुत समय तक सड़े नहीं, उसे सुसज्जित रथ में रखकर देश भर में घुमाया जाता था ताकि प्रजाजन उसका दर्शन कर सकें। प्रजा इस मृतक के लिए धन भेंट करती थी और कान का थोड़ा सा टुकड़ा काट कर बलि प्रतीक के रूप में रखना पड़ता था। सभी प्रजाजन मुण्डन कराते थे और समाधि बनाने में श्रमदान करते थे।
इतिहासकार हेकोडोटस ने लिखा है राजा के शव के साथ अन्तःपुर की रानियों में से कम से कम एक को गला घोंटकर मार डाला जाता था और उसे साथ ही दफन किया जाता था। पचास घोड़े तथा पचास सेवक भी मारकर गाढ़े जाते थे ताकि वे परलोक में वाहन एवं सेवकों की आवश्यकता पूरी कर सकें।
तुर्क तातार सरदारों की अन्त्येष्टि और भी भयंकर थी। शवयात्रा लम्बी होती थी और उस रास्ते में जो भी मिल जाता उसे यह कहकर कत्ल कर दिया जाता था कि—”जाओ परलोक में अपने स्वामी की सेवा करना।”
इतिहासकार मार्कोपोलो ने एक सरदार मँगूखाँ की शवयात्रा का वर्णन किया है जिसमें सामने पड़ने वाले 20 हजार व्यक्तियों का कत्ल किया गया था।
वर्तमान रूस के कृष्ण सागर तटवर्ती इलाके में वोल्गा, यूराल, दोन, तथा रुमानिया, हंगरी, बालगेरिया, साइबेरिया क्षेत्रों में ऐसी अनेक कब्रें मिली है जिनकी खुदाई में न केवल स्वर्ण जटित रत्न आभूषण मिले हैं, वरन् मनुष्यों एवं पशुओं के कंकाल भी मिले हैं। समझा गया है कि सत्ताधीशों अथवा श्रीमन्तों को परलोक में सुख−सुविधाएँ पहुँचाने की दृष्टि से ही यह वस्तुएँ तथा प्राणी दफनाये गये हैं। यह मकबरे ईसा से 6 शताब्दी पूर्व से लेकर ईसा की तीसरी सदी तक नौ सौ वर्ष की अवधि के बीच के माने गये हैं।
मिश्र के पिरामिडों में यह प्रचलन चरमसीमा तक पहुँचा हुआ सिद्ध होता है जहाँ रानियाँ, दास−दासियाँ, वाहन, वस्त्र, आभूषण आदि अनेकानेक सुख−साधन बहुत बड़ी मात्रा में तथा बड़े सुसज्जित ढंग से मृतक राजाओं के साथ दफनाये गये हैं।
मनुष्य के भीतर छिपी हुई असुरता अनेक आवरणों में होकर झाँकी है। लोभी से प्रेरित होकर वह चोरी, डकैती, जालसाजी, बेईमानी, रिश्वत आदि का रूप धारण करती है। अहंकार और आतंक का दर्प लेकर वह उत्पीड़न, शोषण, हत्या आदि क्रूर कर्मों में बदल जाती है। अन्ध−विश्वासी सनकों का सहारा पाकर वह पशुबलि—सती प्रथा मृतक प्रियजनों के लिए निरीह निर्दोषों का प्राण हरण करने के रूप में सामने आती है। संकीर्ण स्वार्थपरता के साथ मिलकर वह विलासिता संग्रहशीलता और शाही ठाठ−बाट बनाने की विडम्बना बन जाती है। असुरता किसी भी झरोखे से झाँके आखिर वह मनुष्य जाति के लिए अभिशाप जैसे संकट ही उत्पन्न करेगी।
साठ वर्ग मील क्षेत्रफल का ईस्टर द्वीप सन् 1888 से चिली सरकार के कब्जे में है। चिली (अमेरिका) की राजधानी सेन्टियागो से 1030 मील दूर प्रशान्त महासागर में मात्र 1200 मनुष्यों की आबादी वाला यह द्वीप अपने भीतर ऐसे अजूबे छिपाये बैठा है, जिन्हें देखने के लिए संसार भर से हजारों पर्यटक—पुरातत्ववेत्ता तथा नृवंश विज्ञानी वहाँ अपनी कौतूहल भरी जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए पहुँचते रहते हैं। पर्यटकों की उत्सुकता शान्त करने के लिए उस द्वीप में एक हवाई अड्डा भी है जिस पर छोटे तथा मँझोले जहाजों के उतरने की समुचित सुविधा है। इस पूरे द्वीप में केवल एक ही कस्बा है—हंगारोआ। सभ्य नागरिक इसी में बसते हैं। स्वच्छन्द आदिवासी तो जहाँ−तहाँ उपलब्ध विशालकाय गुफाओं में अपना अड्डा जमाये रहते हैं।
इस द्वीप का सबसे बड़ा आकर्षण है वहाँ बहुत बड़ी संख्या में जहाँ−तहाँ बिखरी हुई दैत्याकार मूर्तियाँ, जिनकी ऊँचाई 30 से 70 फुट तक की है। वे टुकड़ों से जोड़कर नहीं बनाई गई हैं, वरन् प्रत्येक एक समूचे चट्टान की है। इनकी कलाकृति तो बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, पर आश्चर्य इस बात का हैं−जहाँ विशालकाय पत्थरों वाले पहाड़ हैं वहाँ से बहुत दूरी पर ये खड़ी हुई हैं। जहाँ वे हैं वहाँ इस प्रयोजन के उपयुक्त पहाड़ नहीं हैं। फिर इतनी दूर—इतनी भारी और विशालकाय चट्टानों को उस जमाने में कैसे लाया गया होगा जिसमें कि याँत्रिक बुद्धि तथा साधन सामग्री का सर्वथा अभाव था। यह प्रतिमाएँ अब से प्रायः एक हजार वर्ष पुरानी तक हैं। देखने वाले आश्चर्यचकित होकर इस द्वीप को देखने के बाद लौटते हैं। जिन जिज्ञासाओं को लेकर वे जाते हैं, उनका समाधान होना तो दूर उलटे अधिक चकित होकर वापस लौटते हैं।
प्रशान्त महासागर के बीचोबीच बसे—समुद्र तट से हजारों मील दूर इस छोटे से द्वीप पर मनुष्य कब पहुँचे? क्यों पहुँचे? उस जमाने में इतनी लम्बी यात्राएँ कर सकने योग्य नौकाएँ इन लोगों ने कैसे बनाई? यहाँ वे किस आकर्षण से आकर बसे? इतनी विशालकाय मूर्तियाँ किस प्रयोजन के लिए—किन साधनों से गढ़ीं। इन्हें बनाने—उठाने और खड़ी करने के साधन किस प्रकार जुटाये। मूर्तियों से भी अधिक आश्चर्यजनक है, उनके सिर पर रखे हुए टोपे जो अलग से बने हैं और मूर्तियों के ऊपर उनके गढ़े जाने के बाद रखे गये हैं। यह टोपे भी पत्थर के हैं और उनका वजन तीन टन तक है। मूर्ति की आश्चर्यजनक ऊँचाई और उस पर भी इतने भारी टोपों को स्थापित किया जाना सचमुच आश्चर्यजनक है और इस बात की साक्षी देता है कि साधनहीन स्थिति में भी मनुष्य की संकल्प शक्ति कितने चमत्कारी सृजन कर सकती है।
अब से ढाई सौ वर्ष पूर्व तक किसी को यह पता भी नहीं था कि इतने छोटे, समुद्र तट से इतनी दूर, किसी द्वीप में कोई प्रवीण मनुष्य जाति निवास कर रही होगी। सन् 1622 में एक डच नाविक रोजीबीन अपने जहाज सहित उधर जा निकला। उसका मन उस द्वीप में थोड़ा विश्राम करने का था। वह उतरा तो वहाँ निवास करने वाले यूरोपियनों की तरह बिलकुल गोरे तथा कुछ साँवले रंग के आदिवासियों को योजनाबद्ध जीवन जीते हुए पाया। वे लोग प्रायः नंगे रहते थे। शरीर पर गुदने गुदे थे। जिन्होंने कानों में छेद करके लकड़ी के गुटके पहन रखे थे वे लम्बकर्ण और जिनके कान नहीं छिदे थे वे लघुकर्ण थे। इनका वर्ण विभाजन इसी कर्ण आकृति के आधार पर किया जा सकता था। वे सूर्य पूजक थे। प्रातःकालीन उदय होते हुए सूर्य को साष्टाँग दण्डवत प्रणाम करते थे और पीछे मूर्तियों के सामने पवित्र अग्नि जलाकर हवन करते थे।
रोजीवीन को कौतूहल तो जरूर हुआ पर उसे निष्प्रयोजन समझा और उपेक्षा पूर्वक चला आया। उसके उतरने के दिन ईसाइयों का ईस्टर त्यौहार था इसलिए उसका नाम ईस्टर रख दिया गया। यों उसका पुराना नाम तोतिहेनुआ था। इसके पचास वर्ष बाद एक स्पेनी नाविक डान फिलिप गोजालिस वहाँ पहुँचा। उसने वहाँ स्पेनिश झण्डा गाढ़ा और अपने सम्राट के नाम पर इस द्वीप का नाम सान कार्लोज रख दिया। इसके बाद वहाँ अंग्रेज नाविक कुक पहुँचा। तत्पश्चात् फ्राँसीसी नाविक ला पिरोजे वहाँ उतरा इन लोगों ने घूम−घूमकर वहाँ की स्थिति को देखा और वहाँ का अनोखापन योरोप वालों को बताया।
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में अमेरिका गोरे यहाँ पहुँचे और यहाँ के आदिवासियों को पकड़ कर गुलाम बनाने के लिए प्रयत्न करने लगे। पेरु से सात जहाज इसी प्रयोजन के लिए गये थे। उन्होंने जो पकड़ में आ गये उन 900 को कैद किया और शेष को गोली से उड़ा दिया। सन् 1877 में वहाँ स्त्री−बच्चों की आबादी मात्र 111 रह गई। तब से चिली सरकार के आधिपत्य में यह द्वीप है। वहाँ शिक्षा, चिकित्सा, शासन, उत्पादन, व्यवसाय के आधार खड़े किये गये हैं और बढ़ती हुई सुविधा के कारण आबादी बढ़ी है। यहाँ पेड़ तो कम है, पर घास बहुत होती है इसलिए भेड़ें पालने के उद्योग ने वहाँ की समृद्धि में बहुत योगदान दिया है। पीने का पानी कुछ तालाबों में ही मिलता है।
पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इस द्वीप का इतिहास जानने के लिए जो खुदाई कराई है उसमें विनायू नामक स्थान में पाया गया आहू मन्दिर का ध्वंसावशेष बहुत महत्वपूर्ण है। उसकी कलाकृति देखते ही बनती है। निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी समय अमेरिका में मय सभ्यता फैली हुई थी। वहाँ इनका जाति के बड़े पुरुषार्थी और बुद्धिमान लोग रहते थे। वे ही अपनी हलकी नावे लेकर यहाँ पहुँचे थे और इस प्राकृतिक सौंदर्य से भरे पूरे द्वीप में बस गये थे।
पुरातत्त्ववेत्ताओं को खुदाई में तथा गुफाओं में जो प्रमाण आधार मिले हैं उनसे स्पष्ट होता है कि चिरकाल पूर्व वहाँ सभ्य और कुशल लोग रहते थे उनकी सभ्यता, कारीगरी और साँसारिक जानकारी बढ़ी−चढ़ी थी। आहू मन्दिर के इर्द−गिर्द ऐसे प्रमाणों का बाहुल्य है। रानी रारादू की घाटी में वे विशालकाय मूर्तियाँ गढ़ी जाती थीं वहाँ से उठाकर आहू मन्दिर तक प्राण−प्रतिष्ठा के लिए लाई जाती थीं फिर उन्हें जहाँ उचित समझा जाता था वहाँ पहुँचाया जाता था। क्रेनों का आविष्कार उन दिनों तक नहीं हुआ था, फिर भी वे आदिवासी जानते थे कि स्वल्प मानवी श्रम एवं सामान्य रस्सों से किस कौशल के साथ पचास टन भारी शिला खण्डों को मीलों की दूरी तक सरलतापूर्वक कैसे पहुँचाया जा सकता है?
इस द्वीप निवासियों की प्राचीन बोली और लिखी जाने वाली भाषा ‘रगो−रगो’ रही है। उसका उल्लेख शिलाखण्डों में अब भी उपलब्ध है।
छोटा−सा ईस्टर द्वीप अपने गर्भ में छिपे इस रहस्य का उद्घाटन करता चला जा रहा है कि अमेरिका में कुछ शताब्दी पूर्व ‘इन्का’ नामक बहुत ही सुविकसित सभ्यता वाली द्वीप में जा बसे थे वहाँ की विषम परिस्थितियों में भी उनने इतनी विशालकाय मूर्तियाँ गढ़ी थीं जिनकी तुलना संसार भर में अन्यत्र कहीं नहीं है। अभावग्रस्त और कठिन परिस्थितियों में भी मानवी पौरुष और कौशल चमत्कारी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है इस तथ्य का जीता जागता प्रमाण ईस्टर द्वीप है। ‘इन्का’ जाति अमेरिका में बसी थी, पर वह मूलतः भारत से गई थी। ‘मय’ सभ्यता विशुद्ध रूप से भारतीय सभ्यता थी।
अमेरिका और ईस्टर के ध्वंसावशेष एक और भी घोषणा करते हैं कि एक बार सफलता के उच्चस्तर पर पहुँचकर फिर निश्चित हो जाना—सुरक्षा, प्रगति के लिए अनवरत प्रयास जारी न रखना, स्वल्प सन्तोष और आलसी प्रमादी बन बैठना इतना घातक है कि प्रगतिशील लोग भी क्रमशः नीचे गिरते−गिरते दुर्गति के गर्त तक पहुँच सकते हैं। किसी समय के विश्व विजयी आज अमेरिका में पिछड़े हुए ‘रेड इण्डियन’ आदिवासी बनकर पिछड़ी स्थिति में रह रहे हैं और उन्हीं के वंशज ईस्टर द्वीप में भी अपना दयनीय अस्तित्व बनाये हुए हैं।
नशेबाजी का विस्तार, अणु विस्फोटों का सिलसिला, कारखानों से उत्पन्न जलवायु प्रदूषण जिस क्रम से बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में इस संसार का वातावरण बहुत विषाक्त होने जा रहा है उसमें वर्तमान स्तर के व्यक्ति साँस लेकर जीवित न रह सकेंगे। इसी प्रकार नशेबाजी तथा मानसिक तनावों से उत्पन्न विक्षुब्धता के कारण नर−नारी इस स्थिति में जा पहुँचेंगे कि उनके लिए निरोगी और दीर्घजीवी सन्तानें उत्पन्न कर सकना सम्भव ही न रहेगा। इतना ही नहीं जो बच्चे पैदा होंगे उन्हें आज से सर्वथा भिन्न स्तर के विषाक्त वायुमण्डल में ही निर्वाह करना पड़ेगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि नई पीढ़ियों का पूरा ढाँचा ही उस स्थिति के अनुकूल बना हुआ है। जीवन तो उबालने वाली गर्मी और जमाने वाली ठण्डक में भी देखा गया है। जीवाणु दाहक तेजाबों के भीतर भी क्रीड़ा कल्लोल करते पाये गये हैं फिर कोई कारण नहीं कि अणु विकिरण विषैली हवा, गंदे जल और विकृत आहार से भी गुजारा कर सकने वाले बच्चे पैदा न किये जा सकें। यदि वर्तमान प्रगतिवाद इसी क्रम से चलता है और मनुष्य अपना अस्तित्व भी बचाये रहना चाहता है तो फिर यही एकमात्र उपाय शेष रह जाता है कि उसी स्तर के रक्त माँस से बनी पीड़ियाँ उत्पन्न हों।
समय जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है और परिस्थितियाँ जिस द्रुतगति से बदल रही है उसे देखते हुए यह प्रश्न उभर कर सबसे आगे आ सकता है कि विकट भविष्य से जूझने वाला—भयंकर समस्याओं को सुलझा सकने वाला—मनुष्य उत्पन्न होना चाहिए। वैज्ञानिक इसका समाधान प्रजनन तत्व में भारी हेर−फेर करके उसे ढूँढ़ रहे हैं। जिन रासायनिक पदार्थों से जीवन बनता है उनकी मात्रा एवं क्रम बदल देने से जीवन बनता है उनकी मात्रा एवं क्रम बदल देने से—वर्तमान जीवकोषों की शल्य−क्रिया कर देने से ऐसा सम्भव हो सकता है। वे सोचते हैं इन सुधरे हुए जीवकोषों को माता के गर्भ की अपेक्षा किसी स्वतन्त्र परखनली में पकाया जाय ताकि माता के रक्त −माँस से होने वाला भ्रूण पोषण कहीं उस कष्ट साध्य सुधार प्रक्रिया को बेकार न कर दे।
डा.रोस्टाण्ड इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सुविकसित स्तर के मनुष्यों की हू−बहू वैसी ही ‘ब्लू प्रिन्ट’ कापियाँ बनाकर तैयार की जा सकेंगी। तब गाँधी और जवाहरलाल के न रहने से किसी क्षति की आशंका न रहेगी क्योंकि उनके जीवन काल में ही अथवा मरने के बाद हू−बहू वैसे ही व्यक्ति सैकड़ों हजारों की संख्या में प्रयोगशालाएँ उत्पन्न करके रख दिया करेंगी। इन डा.रोस्टाण्ड ने टिश्यू कलचर अर्थात् कोशाओं की खेती की अगले दिनों सामान्य बागवानी की तरह प्रयुक्त होने की भविष्यवाणी की है। कार्नेल विश्व विद्यालय के डा.फेडिक सी.स्टीबर्ड द्वारा गाजर की कोशिका का पूरी गाजर में विकसित करने में सफलता प्राप्त करने के बाद अब वैज्ञानिक मनुष्य के बारे में भी यह सोचने लगे हैं कि रजवीर्य को अनावश्यक महत्व देने की जरूरत नहीं है। हर कोशिका में उतनी सम्भावना विद्यमान हैं कि वह अपने आपको एक स्वतन्त्र मनुष्य के रूप में विकसित कर सके। रतिक्रिया का विकल्प प्रयोगशालाएँ बन सकती हैं और प्रजनन के लिए माता पिता का नगण्य सा सहयोग पाकर अपना उत्पादन जारी रख सकती हैं।
इटली के डा.डैनियल पैन्नुचि ने आलोनो की अपनी प्रयोगशाला में कृत्रिम मनुष्य भ्रूण उत्पन्न किये थे। उन्होंने एक पारदर्शी गर्भाशय बनाया था। उसमें एक रजकोश और एक शुक्रकोश का संयोग कराया तथा वे रसायन भर दिये जिनमें भ्रूण पलता है। भ्रूण स्थापित हुआ और उसी तरह बढ़ने लगा जैसा कि माता के पेट में पलता है। पहला भ्रूण 29 दिन और दूसरा भ्रूण 59 दिन तक उन्होंने पाला। इस उपलब्धि ने संसार में तहलका मचा दिया और यह संभावना स्पष्ट कर दी कि मनुष्यों को कृषि कर्म हो सकना एक सुनिश्चित तथ्य है। डा.पैबुचि से पहले भी यह संभावना बहुत कुछ प्रशस्त हो चुकी थी। डा.शैटल्स, डा.जानराक ने इस प्रयोग परीक्षण की सफल शुरुआत बहुत पहले ही आरम्भ कर दी थी।
विचारक माँलकम मगरिज का कथन है कि सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक प्रकृति के जितने रहस्य जानने में मनुष्य का सफलता मिली थी, उसकी तुलना में कहीं अधिक ब्रह्माण्ड का रहस्योद्घाटन इस शताब्दी में हुआ है। यह क्रम आगे और भी तीव्र गति से चलेगा। इन उपलब्धियों में एक सबसे बड़ी कड़ी जुड़ेगी अभीष्ट स्तर के मनुष्यों के उत्पादन की। अगले दिनों शरीर की दृष्टि से असह्य समझी जाने वाली परिस्थितियों में रहने वाले मनुष्य उत्पन्न किये जा सकेंगे और विद्वान, दार्शनिक, कलाकार, योद्धा, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, व्यापारी, श्रमिक आदि वर्ग न्यूनाधिक योग्यता के आवश्यकतानुसार उत्पन्न किये जा सकेंगे। तब मनुष्य सर्व शक्ति मान न सही असीम शक्ति सम्पन्न अवश्य ही कहा जा सकेगा।
भारत वजी अमेरिकी वैज्ञानिक डा.हरगोविन्द खुराना ने वंश तत्वों के रहस्यों का उद्घाटन करके नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया है। रोबो न्यूक्लिक एसिड (आर.एन.ए.) में जीवनोत्पादन की क्षमता है यह बहुत पहले जान लिया गया था। डायोक्सी रिवोन्यूक्लिक एसिड (डी.एन.ए.) का जीवन संचार में कितना हाथ है यह विश्लेषण अब बहुत आगे बढ़ गये हैं। ए.जी.टी. और सी.प्रोटीनों के सूक्ष्म कण किस प्रकार जीवन तत्व को प्रभावित करते हैं यह जीवविज्ञान के छात्रों को विदित हो चुका है और न्यूक्लियोटाइड की चार रसायनों की भूमिका भली प्रकार जानी जा चुकी है। सन् 1965 से इस विज्ञान ने क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ हस्तगत की हैं।
विस्कान्सिन विश्व विद्यालय के विज्ञानियों ने घोषणा की है कि जीवन के वंशानुगत घटक—वंश तत्व—जीन—का समग्र रासायनिक संश्लेषण करने में वे सफल हो गये हैं। वंश तत्व का उत्पादन, अभिवर्धन, प्रत्यावर्तन कर सकने की विद्या उन्हें उपलब्ध हो गई है।
कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के डा. विलियम जे.ड्रेअर ने भविष्यवाणी की है कि ऐसे निरोधक तत्वों का ‘जीन्स’ में प्रवेश कराया जा सकेगा जो पैतृक रोगों को उन्मूलन करके नई स्वस्थ स्थापना के लिए रास्ता साफ कर सकें। यह तो निवारण की बात हुई। इसका दूसरा पक्ष स्थापना का है। जिस प्रकार किसी अच्छे खेत में इच्छानुसार बीज बोकर अभीष्ट फसल उगाई जा सकती है उसी प्रकार परम्परागत अवरोधों को हटा सकने की सफलता के साथ एक नया अध्याय और जुड़ जाता है कि वंश तत्व में इच्छानुसार विशेषताओं के बीज बोये जा सकेंगे, अगली पीढ़ियों को वैसा ही उत्पन्न किया जा सके जैसा कि चाहा गया था।
ब्रिटेन की इन्टर नेशनल साइन्स राइटर्स ऐसोशियेन के अध्यक्ष जी.आर.टेलर ने अपनी पुस्तक ‘दि बायोलॉजिकल टाइम बम’ नामक पुस्तक में जीव विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि वह दिन दूर नहीं जब मनुष्यों की अभीष्ट जातियाँ शाक−भाजियों की तरह उगाई जा सकेंगी और उन्हें कलम लगाकर कुछ से कुछ बनाया जा सकेगा।
एक परिपुष्ट साँड़ द्वारा एक वर्ष में उपलब्ध होने वाले शुक्राणुओं से 50 हजार बच्चे उत्पन्न किये जा सकते हैं। ऐसा ही एक सीमा तक मादाएँ भी एकाधिक सन्तानें एक ही समय में उत्पन्न कर सकती हैं। डा.कार्लएक्सेल गेम्जेल और डा.डोनिनी ने ऐसे हारमोन ढूँढ़ निकाले हैं जो नारी शरीर में प्रवेश कराने के उपरान्त उसे एक साथ कई बच्चे उत्पन्न कर सकने में समर्थ बना सकते हैं। इनमें फोलीकल स्टीम्युलेटिंग हारमोन की चर्चा विशेष रूप से हुई है।
न्यूजीलैण्ड के आकलैण्ड नगर में शोले एन लासन नामक एक महिला ने एक साथ चार लड़कियाँ और एक लड़का प्रसव किया। इसी प्रकार स्वीडन के फालुन नगर में एक महिला करीन ओन्सेन के भी एक साथ पाँच बच्चे जने। यह चमत्कार नव आविष्कृत हारमोनों के प्रयोग का था। जिनके गर्भाशय में पहले एक भी डिम्ब अण्ड नहीं था उनमें एक साथ पाँच अण्डों का उत्पन्न कर देना जीव−विज्ञान का एक विशिष्ट चमत्कार है।
यह उपलब्धियाँ सम्भावना का द्वार खोलती हैं कि मानव भ्रूण का पालन किसी उपयुक्त प्रकृति की पशु मादा के पेट में पालन करा लिया जाय इससे उस बच्चे में मनुष्य और पशु के सम्मिलित गुण विकसित हो जायेंगे। इन प्रयोगों से आरम्भ में थोड़े से बच्चे बनाने में ही अधिक परिश्रम पड़ेगा। पीछे तो कृत्रिम गर्भाधान विधि से वे थोड़े ही बच्चे तरुण होकर सहस्रों बच्चे पैदा कर देंगे। एक स्वस्थ साँड़ के द्वारा जीवन भर का संचित शुक्र 50 हजार तक बच्चे पैदा कर सकता है। विशेष रासायनिक प्रयोगों से उत्तेजित मादा डिम्बों द्वारा एक साथ पाँच तक सन्तानें उत्पन्न कराई जा सकती है। नई मनुष्य जाति को जल्दी बढ़ाने के लिए ऐसे ही तरीके काम में लाये जायेंगे; साथ ही पुरानी पीढ़ी को समाप्त करके उन सबका वन्ध्याकरण किया जायगा। अन्यथा दोनों स्तर की सन्तानें बढ़ती रहीं तो फिर उनका शंकरत्व होने लगेगा और वे वर्ण शंकर न जाने क्या−क्या नई समस्याएँ उत्पन्न करेंगे।
नई पीढ़ी के उत्पादक कोषों के मूल आधार तो मानवी जीवकोष ही रहेंगे, पर उनके साथ उस कृत्रिम जीवन प्रक्रिया को जोड़ दिया जायगा जो अभी−अभी मनुष्य के हाथ लगी हैं। रासायनिक सम्मिश्रण से नवीन जीवाणु बना सकने में सफलता प्राप्त करली गई है। पर वे अभी इस स्थिति में नहीं है कि पूर्ण प्राणी का स्थान ले सकें। इसके लिए उन्हें सुविकसित जीवन तत्व के साथ मिला देने से ही काम चलेगा। पुरातन और नवीन की कलम लगा कर ऐसे जीवकोष तैयार किये जाने की सम्भावना व्यक्त की गई है जो इच्छित स्तर के मनुष्य रूप में विकसित हो सके।
विश्वास किया जाता है कि इन प्रयत्नों के फलस्वरूप अब की अपेक्षा निकट भविष्य में अभीष्ट परिष्कृत स्तर का मानवी उत्पादन किया जा सकेगा। शीत, उष्ण, पहाड़ी, रेतीले प्रदेशों में रह सकने योग्य स्थिति के जिस देश को जब जितने मनुष्यों की आवश्यकता पड़ा करेगी तब वहाँ उतने बच्चे उस प्रकार के पैदा कर लिये जाया करेंगे। इतना ही नहीं आवश्यकतानुसार उस मानसिक स्तर की सन्तानें भी पैदा कर ली जाया करेंगी जिनकी कि उन दिनों आवश्यकता पड़ेगी। कवि, साहित्यकार, गायक, शिल्पी, योद्धा, श्रमिक, वणिक, धर्माचार्य, दार्शनिकों की जब जहाँ जितनी आवश्यकता पड़े तब वहाँ उत्पन्न हो जाया करेंगे और सामाजिक सन्तुलन बनाये रखा जा सकेगा।
अभिनव मनुष्य के निर्माण में, विज्ञान अपने ढंग से सोच और कर रहा है। उद्देश्य और पुरुषार्थ दोनों ही दृष्टि से इन प्रयत्नों की सराहना की जानी चाहिए पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मनुष्य पूर्णतया भौतिक तत्वों से विनिर्मित नहीं है जिसे विद्युत आवेशों, रस और रासायनिक प्रयोगों से मात्र प्रयोगशालाओं और उपकरणों के माध्यम से बदला या बनाया जा सके। उसमें एक स्वतन्त्र चेतना का भी अस्तित्व है। उस तथ्य को भुला नहीं देना चाहिए। खोट शरीरों में उतना नहीं जितना उस चेतना में घुस पड़ी आस्थाओं का है। मूलतः वे आस्थाएँ ही गड़बड़ा कर शारीरिक, मानसिक विकृतियां उत्पन्न करती हैं। यह विकृतियाँ चिन्तन से उत्पन्न होती हैं न कि विद्युत आवेशों और रासायनिक पदार्थों की घट−बढ़ से। मनुष्य की वर्तमान दुर्गति का कारण वह चिन्तन भ्रष्टता ही है जिसने मनुष्य को दुर्भावग्रस्त और दुष्प्रवृत्ति संलग्न निकृष्ट कोटि का नर−पशु बनाकर रख दिया है।
सुधार इस चिन्तन स्तर का भी होना चाहिए। अन्यथा वंश परम्परा के खोट हटा देने अथवा रक्त −माँस का स्तर बदल देने से अधिक से अधिक इतना ही हो सकेगा कि शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से नई पीढ़ी समय की परिस्थिति के अनुरूप ढल जाय। आस्थाओं की उत्कृष्टता के बिना मनुष्य ‘यन्त्र मानव’ भर रह जायगा। उसमें महामानवों का गौरवास्पद स्तर बनाये रहने की और संसार में सद्भावनाओं का स्वर्गीय वातावरण बनाने की क्षमता कैसे उत्पन्न होगी? और इसके बिना वह क्रियाशील किन्तु भाव रहित पीढ़ी संसार के दिव्य सौंदर्य संरक्षण अभिवर्धन कैसे कर सकेगी? इसके बिना यह विश्व मात्र हलचलों का केन्द्र ही बन कर रह जायगा।
अभिनव मनुष्य के निर्माण में आध्यात्मिक क्षेत्र का भी समुचित योगदान रहना चाहिए। जन्म और जननी का उच्च आदर्शवाद व्यक्तित्व विनिर्मित किया जाय। गर्भ काल से लेकर युवावस्था आने तक उसे परिष्कृत परिस्थितियों में विकसित होने का बालक को अवसर दिया जाय तभी उसकी आत्माओं में उत्कृष्टता का समावेश होगा। भौतिक दृष्टि से नई पीढ़ी को समुन्नत स्तर का बनाने के लिए भौतिक विज्ञानी प्रयत्न करें और आत्मिक दृष्टि से उसे समुन्नत बनाने के लिए अध्यात्म विज्ञानी अग्रसर हों। तब दोनों के समन्वित प्रयत्न ही उस स्वप्न को साकार कर सकेंगे जिसमें समुन्नत स्तर के मनुष्य के निर्माण की आशा की गई है।
मानवी बुद्धि और श्रमशीलता एक ऐसी दुधारी तलवार है जिसका उपयोग विनाश के लिए भी हो सकता है और विकास के लिए भी। उलझा हुआ मस्तिष्क विपत्ति बन सकता है और परिष्कृत विचारधारा स्वर्गीय वातावरण का सृजन कर सकती है। वैज्ञानिक अन्वेषणों में लगे हुए प्रयत्नों को ही लें एक ओर मारक गैसें, विषाक्त रसायनें और अणु आयुधों के निर्माण से मानवी अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न किया जा सकता है तो दूसरी ओर कृत्रिम वर्षा कराने जैसे प्रयोगों में मानवी समृद्धि के बीज भी मौजूद हैं।
मानव द्वारा इच्छानुसार वर्षा कराने का प्रथम सफल प्रयोग अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कारपोरेशन द्वारा किया गया। उसने हवाई जहाज द्वारा सिलवर आयोडाइड का चूर्ण छिड़का और कृत्रिम वर्षा कराने में सफलता मिल गई। वर्षा का सिद्धान्त यह है कि जब वायुमण्डल में सूक्ष्म कणों के चारों ओर नमी संचित और एकत्रित हो जाती है तो वर्षा होने लगती है। सिलवर आयोडाइड का छिड़काव इसी उद्देश्य की पूर्ति करता है।
उपरोक्त प्रयोग के बाद यह परीक्षण संसार के अन्य अनेक भागों में भी हुए हैं। स्प्रे गनों की सहायता से सिलवर आयोडाइड के अतिरिक्त सूखी बर्फ, ब्राह्य आदि रसायन मिलाकर और भी अधिक सफलता पाई गई। अब अमेरिका में 10 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 15 प्रतिशत, इसराइल में 20 प्रतिशत वर्षा इसी आधार पर कराई जाती है। स्विट्जरलैंड में तो यह प्रयोग और भी अधिक परिणाम में होता है। रूस ने इन प्रयोगों द्वारा अपने कृषि उत्पादन को बहुत आगे बढ़ा लिया है।
कृत्रिम वर्षा का प्रथम प्रयोग मैलवोर्न नामक व्यक्ति ने किया। उसने इसी प्रयोजन के लिए एक प्रयोगशाला बनाई। कई पहियेदार हौज, बिजली की बैटरियाँ, रासायनिक पदार्थों की शीशियाँ, धुँआ निकलने की चिमनियाँ शीशे से बन्द चार खिड़कियां इन थोड़े से साधनों को लेकर वह अपने प्रयोग करता रहा। सफलता के निकट पहुँचने पर उसने आगे का कार्य किन्हीं मजबूत हाथों में सौंपने का निश्चय किया और अपना नुस्खा कीमत लेकर बेच दिया।
यह प्रयत्न आगे बढ़ा। कृत्रिम वर्षा कराने वाली कई कम्पनियाँ बनीं। ज्वैत्स और हैटफील्ड नामक व्यक्तियों ने इस दिशा में भारी प्रयत्न किये।
प्रश्न इतना भर है कि मानवी बुद्धि कौशल को—साधन सम्पन्नता को—किस दिशा में—किस प्रयोजन के लिए खर्च किया जाय? यदि इस प्रश्न का यही हल निकाला जा सके तो यह संसार विपत्ति की विभीषिकाओं में से निकलकर सुख−शान्ति की असीम सम्भावनाओं से लाभान्वित हो सकता है।
सतर्कता जितनी आवश्यक है; आशंका उतनी ही अनावश्यक। जो काम करने हैं उनमें क्या अवरोध आ सकता है, क्या चूक हो सकती है और किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए और उन तरीकों को अपनाना चाहिए जिनसे सम्भावित विघ्नों से बचते हुए प्रगति पथ पर व्यवस्थित रीति से चला जा सके। यह सतर्कता है। जहाँ इस बरता जायगा वहाँ उन कठिनाइयों से बहुत कुछ बचा जा सकेगा जो आगे की बात न सोच सकने वालों के सामने प्रायः आती रहती है।
सतर्कता बुद्धि कौशल का एक महत्वपूर्ण अंग है। अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए साहस, धैर्य, पुरुषार्थ एवं व्यवस्था बुद्धि की आवश्यकता होती है। उपयुक्त साधन जुटाने एवं परिस्थिति उत्पन्न करने के लिए चिन्तन और कर्म को एक तारतम्य में बाँधते हुए प्रबल प्रयास करना पड़ता है। इसके बिना महत्वपूर्ण सफलताओं की उपलब्धि किसी के लिए सम्भव नहीं होती। कल्पना के हवाई पर चढ़कर जो मनोरथों की मंजिल सहज ही पूरे करने के सपने देखते रहते हैं उन्हें निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। इतना सब होने पर भी सतर्कता को साथ लेकर चलना पड़ता है। जो कर रहे हैं उसमें कुछ चूक तो नहीं हो रही। परिस्थितियों में उलट−पुलट तो नहीं हो रही है। साधनों और सम्भावनाओं में उतार−चढ़ाव तो नहीं जाया। सहयोगियों के व्यवहार में अन्तर तो नहीं पड़ा आदि अनेकों तथ्य ऐसे हैं जिन्हें ध्यान में रखकर हमें अपने क्रिया−कलाप में अन्तर करना पड़ता है। भावी कठिनाइयों की जहाँ भी सम्भावना दिखाई पड़ती है वहाँ पहले से ही बचाव, परिवर्तन और टकराव के लिए तैयार रहना पड़ता है। यह सब सजग सतर्कता के माध्यम से ही सम्भव है। इसलिए उसे आवश्यक माना जाता है और महत्वपूर्ण कहा जाता है।
सतर्कता से मिलती−जुलती एक और प्रवृत्ति है—आशंका। यह आवश्यक ही नहीं हानिकारक भी है। वह मनुष्य के मनोबल को गिराती—हड़बड़ी पैदा करती और अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों को अस्त−व्यस्त करती है।
जीवन−यात्रा की लम्बी मंजिल पार करने में आये दिन—मोड़ अवरोधों का सामना करना पड़ता है—पड़ सकता है। उनके साथ हँसते−हँसते हुए चलें तभी यात्रा क्रम जारी रखा जा सकता है। यदि सम्भावित अवरोधों को सुनिश्चित आपत्ति मान लिया जाय और समझ लिया जाय कि उस विभीषिका से जूझना अपने बस की बात नहीं है तो फिर मन में बेतरह हड़बड़ी मचेगी—डर लगेगा और विपत्ति सिर पर घुमड़ती दिखाई देगी। कठिनाई की बढ़ी−चढ़ी कल्पना और अपनी बुद्धि तथा शक्ति के विश्वास की कमी इन दोनों के मिलने से आशंका उत्पन्न होती है।
मित्रों ने यदि मुँह मोड़ लिया और शत्रुता का व्यवहार किया तो? भाग्य उलटा हो गया तो? अशुभ ग्रह−नक्षत्रों का प्रकोप हो गया तो? असफलता मिली और घाटा पड़ा तो? बीमारी अथवा मौत ने आ घेरा तो? आदि एक से एक विलक्षण और विचित्र प्रकार की आशंकाएँ एक के बाद एक के क्रम से शंकाशील दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्ति पर आक्रमण करती हैं। वह अपने स्वजन सम्बन्धियों तक से आतंकित रहने लगता है। स्त्री के चरित्र से लेकर मित्र के—विश्वासघात तक की कुकल्पनाएँ इतनी गहरी बन जाती है कि वे कल्पना मात्र न रहकर वास्तविकता जैसी प्रतीत होने लगती हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण दिशा में अभीष्ट प्रयास करते ही नहीं बन पड़ता। क्षमता तो आशंका में ही नष्ट हो जाती है। अस्तु आशंका स्वयमेव आपत्ति बनकर सामने आ खड़ी होती है। साथियों की खीज के कारण आशंका के दुष्परिणाम और भी अधिक बढ़ जाते हैं।
भगवती गायत्री का वाहन राजहंस माना गया है। यह उस हंस वृत्ति का प्रतीक है जिसके सम्बन्ध में शास्त्रकारों की अपनी कल्पना और मान्यता है। जलाशयों के निकट पाये जाने वाले हंस पक्षी उन गुणों से युक्त नहीं पाये जाते जिन्हें भगवती गायत्री के वाहन राजहंसों से विभूषित माना गया है।
नीर−क्षीर विवेक राजहंसों की विशेषता है। दूध पानी मिला होने पर वे दूध पीते हैं और पानी अलग कर देते हैं। यह गुण सामान्य हंसों में नहीं पाया जाता। उन्हें दूध कौन पिलायेगा? वे दूध कहाँ पायेंगे? फिर यदि दूध मिल भी जाय तो उनमें पानी को पृथक करके दूध पीने की विशेषता कहाँ होती है। इसी प्रकार यह भी कहा जाता है—”कै हंसा मोती चुगै कै लंघन मरि जाँय” अर्थात् हंस या तो मोती चुगेंगे या लंघन—निराहार—मर जायेंगे। अर्थात् मोती के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं खाते। उपलब्ध हंसों पर यह उक्ति लागू नहीं होती। वे कीड़े−मकोड़े खाते हैं। मोती गहरे समुद्रों में पाये जाते हैं, उतनी गहराई तक डुबकी लगा कर जाना और मोती की सीपें तलाश करके उनका पेट चीर कर मोती पाना इन हंसों के लिए सम्भव नहीं। वे सामान्य पक्षियों जैसे ही होते हैं।
राजहंसों का अलंकारिक रूप हंस पक्षियों जैसा चित्रित किया तो गया है पर वस्तुतः वे शुभ्र पवित्रता, विवेकशीलता एवं शालीनता के प्रतीक हैं। यह विशेषताएँ जिन व्यक्तियों में हों उन्हें हंस कहा गया है और यह माना गया है कि दिव्य सत्ता उन्हीं को अपने अनुग्रह का पात्र हंस नियत करेगी।
हंस गुणों का वर्णन कितने ही काव्य ग्रन्थों में कितनी ही प्रकार से वर्णित किया गया है। वस्तुतः वह वर्णन हंस पक्षियों पर लागू नहीं होता वरन् शालीनता युक्त श्रेष्ठ व्यक्तियों पर ही घटित होता है।
एक वर्णन में राजहंस से कहा गया है, श्वेत जल अथवा काला जल उनके शुभ्र कलेवर को प्रभावित नहीं कर सकता। किसी भी भली−बुरी परिस्थिति में रहकर श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी मौलिक शालीनता को अक्षुण्ण बनाये रहते हैं यही उस प्रतिपादन के पीछे अलंकारिक तथ्य है।
एक सुभाषित है—
गांगमम्बुसितमम्बु यामुनं कज्जलाभमुभयत्र मज्जतः। राजहंस तव सैव शुभ्रता चीयते न च न चापयोचते॥
हे राजहंस! गंगा का जल श्वेत है और यमुना का काजल जैसा काला है। तुम दोनों में से किसी में स्नान करो, तुम्हारा अपना शुभ वर्ण हल्का होने की जगह अधिक निखर उठता है।
बहु संख्यक क्रिया कुशल व्यक्तियों की तुलना में महानता युक्त एक व्यक्ति ही किसी देश या युग का गौरव होता है। इस तथ्य का वर्णन कवियों ने एक हंस और अनेक बगुलों के झुण्ड के साथ करते हुए कहा है।
एकेन राहहंसेन या शोभा सन्सो भवेत्। न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना॥
तालाब में रहने वाले एक राजहंस से तालाब की जो शोभा बढ़ती है, वह किनारे पर घूमने वाले हजारों बगुलों से भी नहीं हो सकती।
सुख−सुविधाओं के साधन एक से एक बढ़कर जहाँ तहाँ पाये जा सकते हैं। पर राजहंस प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने लिए श्रेष्ठतम कर्त्तव्य पालन का स्थान ही चुनते हैं और नवीनताओं का−सुविधाओं का विचार न करते हुए अपने कर्म क्षेत्र में ही जमे रहते हैं। इस तथ्य का वर्णन इस प्रकार है—
अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरजमण्डितम्। रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना॥
यद्यपि सभी स्थानों पर कमलों से सुशोभित जलाशय विद्यमान है; परन्तु हंस का मन मानसरोवर के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं रमता।
विपन्नताओं के रहते हुए भी श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कर्त्तव्य पथ को नहीं छोड़ते। भले ही उन्हें हेय स्थिति अपनाने पर कितनों का ही सहयोग या कितनी ही सम्पदा क्यों न मिले। कहा भी है—
पुरा सरसि मानसे विकचसारसालिस्खलत्− परागसुरभीकृते पयसि यस्य यातं वयः। स पल्वलजलेऽधुना मिलदनेकभेकाकुले मरालकुलनायकः कथय रे कथं वर्तताम्॥
जिस हंसों के राजा ने खिले हुए कमलों से झड़ते हुए पराग से सुगन्धित, मानसरोवर के जल में आयु व्यतीत की है, अब वह मेंढकों की भीड़ के कारण विक्षुब्ध पोखर के पानी में कैसे निवास करेगा?”
आश्रयदाता के प्रति कृतज्ञता, उपकारी का प्रत्युपकार, मित्र का स्नेह निर्वाह का ध्यान रखते हुए सदा उनके प्रति कोमल अभिव्यञ्जनायें रखना यह सज्जनों की विशेषता होती है। उपकारी के प्रति अनुपकार करना—मित्र के साथ विश्वासघात करना—वे सबसे बड़ा पातक मानते हैं। शास्त्रों में मित्रद्रोही को सबसे बड़ा पापी कहा है। “ब्रह्म हत्या मुच्यते पाप मित्र द्रोही न मुच्यते” “ब्रह्म हत्या करने वाला प्रायश्चित करके पाप मुक्त हो सकता है पर मित्र द्रोही का पाप−पंक से कभी छुटकारा नहीं मिलता। यह सोचकर वह मित्र कर्त्तव्य का पालन हर स्थिति में अनवरत रूप से करता रहता है। कवि कहता है—
भुक्त मृणालपटली भवता निपीतान्य− म्बनि यत्र नलिनानि निषेवितानि। रे राजहंस! वद तस्य सरोवरस्य कृत्येन केन भविताऽसि कृतोपकार॥
हे राजहंस! जिस सरोवर के कोमल मृणालों का तुमने भोजन किया, जल रूपी अमृत का पान किया और नलिनों का उपभोग किया, उसके उपकार का बदला कैसे चुका सकोगे?
निन्दकों, कटुभाषियों और विद्वेषियों के आरोपों से विचलित न होकर अपने सन्तुलन को अक्षुण्य बनाये रहना। उनके प्रतिरोध में लगने वाली शक्ति को बचा कर अपने निर्धारित लक्ष्य में अविचल भाव से लगे रहना राजहंस की विशेषता बताई गई है।
अपसरणमेव शरणं मौनं या तत्र राजहसस्य।
कटु रटति निकटवर्ती वाचालष्टिट्टिभो यत्र॥
यदि समीप बैठा हुआ कोई टिट्टिभ (टिटहरी) कर्ण कठोर स्वर में निरन्तर टें−टें करता रहे, या तो वह वहाँ से हटकर दूसरी जगह चला जाये अथवा चुपचाप बैठा रहे।
नीर−क्षीर विवेक की प्रख्यात विशेषता को भी कवियों ने बड़े भाव पूर्ण शब्दों में स्मरण किया है।
नीरक्षीरविवेके हं सालस्यं त्वमेव तनुषेचेत्। विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः?
हे हंस! यदि तुम्हीं नीर क्षीर−विवेक में प्रमाद करने लगे, तो संसार में अपने कुल के व्रत का पालन और कौन करेगा?
भगवती गायत्री का वाहन राजहंस जलाशयों के समीप पाया जाने वाला सामान्य हंस पक्षी नहीं वरन् अनेक दिव्य गुणों से विभूषित—शालीनता सम्पन्न महामानव ही है। उसी पर दिव्य शक्तियों का अनुग्रह बरसता है वे ही अपनी पीठ पर भगवान को प्रतिष्ठापित देखने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
एकाँगी दृष्टि रखने से हमें कोई वस्तु बहुत उपयोगी लगती है और कोई बहुत हानिकारक। पर उभयपक्षीय पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि इस संसार में कोई भी वस्तु न तो पूर्णतया बुरी है, न भली। हर बुराई के साथ कुछ अच्छाई और हर अच्छाई के साथ कुछ बुराई भी जुड़ी होती है। मक्खी को ही लें, वह मोटी दृष्टि से घिनौनी और हानिकारक लगती है संसार में उसकी अपनी उपयोगिता है, उसे भी भगवान ने निरर्थक नहीं कुछ महत्वपूर्ण काम सौंप कर ही संसार में भेजा है।
इतिहासज्ञ श्री रमेशचन्द्र दत्त लिखित “हिस्ट्री आफ सिविलाइजेशन इन ऐंशियन्ट इण्डिया” में इस तथ्य पर सुविस्तृत प्रकाश डाला गया है कि ईसाई धर्म बुद्ध धर्म की प्रतिच्छाया मात्र है।
ईसा से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व यूरोप में ‘असेसियन’ सम्प्रदाय का प्रचलन था इसका संस्थापक था—’एसो’ या ‘एसिन’। मृत सागर के पश्चिमी तट पर ऐंगदी नामक, नगर में इस सम्प्रदाय का प्रधान मठ था। इसकी मान्यताएँ संन्यास धर्म प्रधान थीं। ईसा इसी सम्प्रदाय के अनुयायी थे इसका संकेत मेथ्यू 5—34, एवं 19—12 में—जेम्स 5—12 में —कृत्य 4-32, 35 में स्पष्ट रूप से मौजूद है। यहूदी धर्म, कर्म प्रधान है। उसमें संन्यास की मान्यता नहीं दी गई है। पीछे इस धर्म के प्रभाव क्षेत्र में संन्यास परक विचारों का प्रवेश इसी ‘असेसियन’ सम्प्रदाय के कारण हुआ। ईसाइयों पर संन्यास धर्म की छाप होने का कारण पाइथागोरस का यूनानी तत्वज्ञान कहा जाता था। पर अब स्पष्ट हो चला है कि छाप बौद्ध धर्म की थी जो ईसा के जन्म से बहुत पहले ही योरोप में फैल चुकी थी। असेसियन धर्म और कुछ नहीं, बौद्ध धर्म का स्थानीय भाषा के माध्यम से स्थानीय परम्पराओं के साथ मिलाकर किया गया प्रचार मात्र था। ‘ऐसी’ का अपभ्रंश ही ‘ईसाई’ है।
ऐसी या ईसाई धर्म की बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों के साथ ही असाधारण समानता नहीं है वरन उनके संस्थापकों का चरित्र−चित्रण भी एक सा है। शैतान ईसा को भ्रम में डालने आता है और ईसा 40 दिन का उपवास करके सिद्धावस्था प्राप्त करते हैं। महात्मा बुद्ध पर ‘मार’ का आक्रमण होता है और वे 49 दिन उपवास करके सिद्धि प्राप्त करते हैं। ईसा कोढ़ियों, डाकुओं और वेश्याओं का उद्धार करते हैं। बुद्ध चरित्र में ऐसे ही प्रसंग भरे पड़े हैं। ‘अपने पड़ौसियों से प्रेम कर—चपत मारने वाले के सामने दूसरा गाल भी करदें’ जैसे उपदेश बुद्ध के अहिंसा, प्रेम और करुणा की शिक्षा से पूर्णतया मेल खाते हैं। आर्थर लिल ने इस सैद्धान्तिक और चरित्रगत समानता का सुविस्तृत उल्लेख करते हुए ईसाई धर्म पर बौद्ध धर्म की छाप को स्वीकार किया है। 600 वर्ष की अवधि में ईसा का जन्म होने तक बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ पूरे योरोप में छा गई थीं। स्वस्तिक आर्यों का साँस्कृतिक चिन्ह है। बौद्ध धर्म में उसे मान्यता मिली। अन्ततः ईसाई धर्म ने ‘क्रूस’ के रूप में उसे अपना पवित्र चिन्ह अंगीकार कर लिया। कोलम्बस के अमेरिका पहुँचने से पूर्व मैक्सिको और पेरु से स्वस्तिक ने मान्यता प्राप्त करली थी। इस प्रकार की प्रमाण सामग्री हम विद्वान लिलि के ग्रन्थ ‘बुद्ध एण्ड बुद्धिज्म’ तथा ‘बुद्धिज्म इन क्रिस्टनडम’ में प्राप्त कर सकते हैं।
ईसा बारह वर्ष की आयु से लेकर तीस वर्ष की आयु तक कहाँ रहे इस सम्बन्ध में बाइबिल मौन है। मैथ्यू 2-5 में पूर्व देशा से ईसा के जन्म समय ज्ञानी— पुरुषों के आगमन का वर्णन है। प्लुटार्क ने लाल समुद्र को पारकर अलैक्जेण्ड्रिया में बौद्ध यतियों के आगमन का वर्णन किया है। अशोक के शिला लेखों में भी इनका उल्लेख है। ईसा के पूर्वजों को उन्हीं ने प्रभावित किया था, वे स्वयं भी इसी प्रभाव को लेकर अग्रसर हुए।
शूली से उतर कर ईसा के पुनर्जीवन की बात प्रख्यात है। उन्होंने इसकी भविष्य वाणी भी करदी थी और वह सही भी उतरी वे तीन दिन मूर्छित रहने के उपरान्त पुनर्जीवित हो गये और फिर अन्यत्र के लिए चल दिये। यहूदी उनके शत्रु थे इसलिए उस क्षेत्र को छोड़ देने में ही उनकी खैर थी।
अजीज कुरेशी ने अपनी पुस्तक ‘क्राइस्ट इन काश्मीर’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ईसा पुनर्जीवन के उपरान्त आकर रहे और वहीं उनका अन्त हुआ। सर जफरुल्ला खाँ ने भी अपने एक लेख में यह बताया है कि ईसा अपने माता−पिता समेत भारत आकर बसे पिण्डी प्वाइन्ट न उनकी माता का शरीरान्त हुआ जहाँ उनकी कब्र भी मौजूद है। ईसा भी अन्त तक काश्मीर में ही रहे।
उन दिनों यहूदियों की एक बड़ी जनसंख्या भारत में आकर बस गई थी और उनके वंशज अभी भी यहाँ पाये जाते हैं। काश्मीर के गुज्जर लोग अभी भी अपने को स्त्रायिन गोत्र का बताते हैं। उनके नाम यहूदी ढंग के हैं। वे उस तरह की भाषा बोलते हैं जो हिंदू से मिलती−जुलती है। यहूदियों की इसराइल में प्रचलित भाषा हिब्रू है। उनके निवास स्थानों के नाम भी यहूदी ढंग के हैं। ईसा स्वयं भी यहूदी परिवार में जन्मे थे। वे लोग व्यापार के सिलसिले में प्रायः भारत आते रहते थे और उनमें से कुछ यहीं बस भी जाते थे। ईसा का उन्हीं के साथ बहुत सा जीवन काल बिताना कुछ आश्चर्यजनक भी नहीं है।
ईसा की मृत्यु के सम्बन्ध में इस्लाम धर्म के प्रधान ग्रन्थ कुरान शरीफ के सूरत निशा—पारा 6—157 में एक आयत है जिसका भावार्थ है—” मरियम पुत्र रसूल ईसा मसीह को न ता उन्होंने मारा और न शूली पर चढ़ाया अपितु ऐसा लगा जरूर। जो लोग इस तथ्य में शंका करते हैं उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं है।”
रूसी इतिहास शोध कर्त्ता डाक्टर निकोलस नोटोविच ने अपने दीर्घकालीन शोध— निष्कर्ष सन् 1898 में प्रकाशित कराये तो ईसा के अज्ञातवास वाले 17 वर्षों पर अभिनव प्रकाश पड़ा। उन्होंने लगातार 40 वर्षों तक विविध देशों की यात्रा करके तथा दुष्प्राप्य शोध सामग्री संकलित करके यह पाया कि ईसा इस अवधि में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारतवर्ष में रहे थे। उन्होंने तिब्बत के हिमोस बौद्ध विहार में ताड़पत्र पर लिखे एक पुरातन ग्रन्थ के समस्त पृष्ठों के चित्र उतारे और उनका अनुवाद अंग्रेजी—रूसी—फ्रेंच तथा जर्मन भाषा में कराया। इस ग्रन्थ में 14 प्रकरण तथा 244 श्लोक हैं। उनकी व्याख्या विवेचना भी है। ग्रन्थ में दिये गये विवरणों से स्पष्ट होता है कि—ईसा ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से यरुसलेम से चले व्यापारियों के एक दस के साथ भारत आये। वे सिन्ध प्रवेश होते हुए आर्यावर्त आये। बौद्ध, जैन और ब्राह्मणों से उन्होंने धर्मग्रन्थ पढ़े, साधनाएँ सीखीं, तीर्थ यात्राएँ कीं, बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, 6 वर्ष तक साधना की। फिर नेपाल होते हुए तिब्बत पहुँचे। इसके बाद वे ईरान होते हुए अपने देश लौट गये।”
इसी से मिलता−जुलता वर्णन नाथ सम्प्रदाय की पुस्तक ‘नाथ नामावली’ में मिलता है—”ईसा चौदह वर्ष की आयु में भारत आये। उनने शिव की उपासना की। अपना नाम ‘ईस ना बदल लिया। उन्हें प्यार में ईसा कहा जाता था। वे भक्ति का प्रचार करने अपने देश लौट गये। जहाँ उन्हें शूली का दण्ड मिला। एक समर्थ गुरु ने उन्हें शूली से उतार लिया और उन्हें भारत ले आया। हिमालय में उनने तपस्या की।”
ईसा को मृत्यु दण्ड तो दिया गया था पर उसकी चिन्ह पूजा ही करदी गई। जान से नहीं मारा गया। मत्ती 27—29 के अनुसार न्यायाधीश पीलातुस की पत्नी ने अपने पति को समझाया था कि सन्त को मारा न जाय। मत्ती 27—12 से 24 तक के अनुसार पीलातुस स्वयं भी ऐसा ही चाहते थे कि दण्ड की घोषणा तो हो पर जान न ली जाय।
न्यू टेस्टामेन्ट में मरकुस ने लिखा है—यूसुफ जब ईसा की लाश माँगने न्यायाधीश पीलातुस के पास गया तो आश्चर्य यह किया गया कि वे इतनी जल्दी कैसे मर गये। फिर भी लाश उसे दे दी गई। उन दिनों फाँसी लगाने के बाद अपराधी के पैर तोड़ दिये जाते थे ताकि वह पूर्णतया मर जाय। ईसा के पैर नहीं तोड़े गये। यूसुफ ने लाश को एक सफेद कपड़े में लपेट कर एक सुरक्षित गुफा में सुला दिया। मूर्छा समाप्त होने पर वे गुफा मार्ग से बाहर निकल गये।
डाक्टर स्पेसर ने अपनी पुस्तक “मिस्टिकल लाइफ आफ जीसस” में यही सिद्ध किया गया है कि ईसा ने हिन्दू संन्यासी के रूप में भारत में शिक्षा प्राप्त की और वे शूली लगने के उपरान्त भारत में जाकर रहे एवं यहीं 60 वर्ष की आयु तक वे जीवित रहे।
रूसी विद्वान निकोलस रोरिक ने अपना ग्रन्थ ‘हार्ट आफ रसिया’ सन् 1929 में प्रकाशित कराया। उसमें उनने काश्मीर, लद्दाख, भारत, मध्य रूस, सिक्याँग, मंगोलिया आदि देशों में प्रचलित जन श्रुतियों का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि इन क्षेत्रों के निवासी चिरकाल से यही विश्वास करते रहे हैं कि ईसा का न केवल शिक्षा काल वरन् अन्त काल भी भारत ही रहा है।
ईसा के भारतीय धर्मानुयायी होने के सम्बन्ध में तिब्बत आदि में जो प्रमाण सामग्री उन्हें मिली उसका उल्लेख आरियन्टल होम युनिवर्सिटी मद्रास द्वारा प्रकाशित—व्हाडुपुर के दुराइ स्वामी आयंगर द्वारा लिखित “लोंग मिसिंग लिंक्स आर दि मारव्हेल्स डिसकवरीज एवाउट आर्यन्स जेसस क्राइस्ट एण्ड अल्लाह” पुस्तक में विस्तार पूर्वक किया गया है।
उक्त पुस्तक में इसी संदर्भ में श्रीमती जेमसन द्वारा लिखी गई एक प्राचीन पुस्तक लीजेन्डस आफ दि मेडोना’ के कई प्रामाणिक उद्धरण प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये हैं। इसी पुस्तक में प्राचीन काल के हस्तनिर्मित ऐसे चित्र भी थे जिनसे भी ईसा का हिन्दू धर्मानुयायी होना सिद्ध होता है।
श्री आर्यनगर ने अपनी पुस्तक में श्रीमती जेमसन की पुस्तक से चार प्राचीन चित्र उद्धृत करके छापे हैं। एक से ईसा की माता मरियम गले में वैष्णव चिन्ह धारण किये हुए हैं दूसरा ईसा के ‘वपतिस्मा’ दीक्षा लेने के समय का है जिसमें उनके मस्तक पर शैव तिलक अंकित है तीसरा मेरी और जीसर क्राइस्ट का है जिसमें ईसा बच्चे के रूप में सोये हुए हैं और उनके मस्तक पर शंख तथा शिव लिंग अंत है। चौथे में क्रूस पकड़ते समय ईसा के मस्तक पर हिन्दू तिलक अंकित है।
उपरोक्त दोनों पुस्तकों में ऐसे प्रमाणों का उल्लेख है जिनसे स्पष्ट होता है कि ईसा मसीह न केवल भारत में लम्बे समय तक शिक्षा प्राप्त करते रहे वरन् हिन्दू धर्म के अनुयायी भी बने। रूसी पत्रकार नोतोविच के द्वारा संकलित प्रमाण सामग्री से भी यही निष्कर्ष निकाला गया है।
भविष्य पुराण प्रसंग स. 3 अ. 2 श्लोक 21 से 26 में शकाधीश शालि वाहन की भेंट ईसा से होने का उल्लेख है जिसमें उन्होंने स्वयं ही अपनी स्थिति का स्पष्टीकरण किया है—
एकदा तु शकाधीशो हिमि तुग समज्ययी। हूण देशस्य मध्ये वै गिरिस्थं पुरुषं शुभम्।
को भवानिति तं प्राह सहोवाच मुदान्वितः। ईसा पुत्रञ्च माँ विद्धि कुमारी गर्भ संभवम्।
निर्मर्यादि म्लेच्छ देशे मसीहोऽहं समागतः। ईसामसी च दस्यूनाँ प्रादुर्भूवा भयंकरी। तामहं म्लेच्छतः प्राप्य मसीहत्व मुपागतः।
अर्थात्—एक बार शकराजा शालिवाहन हिमालय से आगे हूण देश में एक श्वेत वस्त्रधारी गौरांग सन्त से मिले। उन्होंने उनका परिचय पूछा। उत्तर में सन्त ने कहा मेरा नाम ईसा है। कुमारी पुत्र हूँ। म्लेच्छ देश से आया हूँ। मुझे मसीह कहते हैं।
इस वर्णन में ईसा के व्यक्तित्व और इतिहास का परिचय उन मान्यताओं की पुष्टि करता है जिनमें भारत में ईसा के धर्म शिक्षा प्राप्त करने का प्रतिपादन किया गया है।
जिन वृक्षों की जड़ें जमीन में गहरी और लम्बी धँसी होती हैं वे आँधी तूफान और वर्षा के प्रकोप से भी स्थिर बने रहते हैं। किन्तु जिनकी जड़ें उथली, कमजोर या सड़−गल गई होंगी तो वे किसी भी छोटे प्रकृतिगत आघात से धराशायी हो सकते हैं।
आदमी के जड़ें उसके भीतर है—आदर्शों और विश्वासों में। चरित्रवान, साहसी और पुरुषार्थी को ही सच्चे अर्थों में मजबूत कह सकते हैं साथ ही साधन सम्पन्न भी। आदमी को बाहरी कठिनाइयाँ परास्त नहीं कर सकतीं। वह टूटता तो तब है जब भीतर से खोखला बन गया होता है।
—लोकमान्य तिलक
दीर्घ जीवन के लिए जिन साधनों और उपायों की आवश्यकता अनुभव की गई है उनमें एक अति महत्व पूर्ण डडडडम हैं—शीत का सान्निध्य। हमारा शरीर शीत के वातावरण में अधिक स्थिर रहता है और भली प्रकार विकसित होता है। यों आवश्यकता तो गर्मी की भी पड़ती है पर वह एक सह्य और सीमित मात्रा में ही होनी चाहिये। अधिक ताप का संपर्क जीवन शक्ति को क्षीण करता है यह तथ्य शीत और उष्ण प्रदेशों के निवासियों की शारीरिक स्थिति को देखकर सहज ही जाना जा सकता है। उत्तर भारत में शीत की मात्रा अधिक रहती है और दक्षिण में गर्मी ज्यादा होती है फलतः पंजाबियों की अपेक्षा मद्रासी, बंगाली, उड़िया लोग दुर्बल पाये जाते हैं। योरोप में जहाँ ठण्ड अधिक पड़ती है वहाँ शारीरिक बलिष्ठता रहती है और संसार के अन्य गर्म देशों में अपेक्षाकृत दुर्बलता की स्थिति पाई जाती है। शीत ऋतु में पाचन क्रिया, गहरी नींद आदि की स्थिति ठीक रहती है। वजन बढ़ाने के लिए पौष्टिक आहार प्रयत्न करते हैं। स्वभावतः भी उन दिनों आम लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। गर्मी के दिनों में जितनी बीमारियाँ फैलती हैं उतनी सर्दी के दिनों में दिखाई नहीं देतीं। उचित और सह्य गर्मी के अतिरिक्त शरीर संरचना की माँग शीत वातावरण की बनी रहती है। स्वास्थ्य सुधार के लिए बड़े लोग अक्सर ठण्डे पहाड़ी स्थानों में जागा करते हैं। ऋषि−मुनियों की तपश्चर्या भी हिमालय जैसे शीत प्रधान क्षेत्रों में ही अधिक सफलता पूर्वक सम्पन्न होती रही है।
यह शीतलता न केवल शरीर की वरन् मस्तिष्कीय सन्तुलन के रूप में भी होनी चाहिए। आवेश, उत्तेजना, चिन्ता, क्रोध, लिप्सा के हड़कम्प में मस्तिष्क की अन्तःस्थिति गरम एवं उत्तेजित रहती है, फलतः इस प्रकार के लोग अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गँवाते चले जाते हैं। रुग्णता ग्रसित होते हैं और अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाते हैं।
स्वास्थ्य के संरक्षण और दीर्घ जीवन के लिए शीत की उपयोगिता अब असंदिग्ध रूप से स्वीकार करली गई है। थकान दूर करने के लिए चिर विश्राम का उपयुक्त माध्यम शीत को माना गया है। शरीर के विपत्ति ग्रस्त होने अथवा मृत्यु के निकट जा पहुँचने पर उसे शीत उपचार के द्वारा पुनः अच्छी स्थिति में वापिस लाने की दिशा में जब वैज्ञानिक प्रयत्न दिन−दिन तीव्र होते चले जा रहे हैं।
सन् 1798 में जेम्स क्यूरी ने शीत उपचार से एक पागल आदमी का सफल इलाज किया था। उसे 83 अंश तक के गिरे हुए अपमान में 45 मिनट तक रखकर उन्माद मुक्त किया गया था। इसके 140 वर्ष पश्चात दूसरे सफल प्रयोग डाक्टर टेम्पेल और लारेन्स स्मिथ के थे इन लोगों ने केन्सर के मरीजों को शीत उपचार से अच्छा करके दिखाया। सन् 1938 में उनके प्रतिपादन ने चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और हाइपोथमिया (निम्न तापिकी विद्या) को विधिवत् चिकित्सा विज्ञान में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
सन् 1951 में बेलग्रेड के शरीर विज्ञानी एण्डजस ने कुछ चूहे शून्य से एक डिग्री नीचे तापमान में बर्फ की तरह जमाये उनके हृदय की धड़कन बन्द हो गई, साँस रुक गई और रक्त की दौड़ समाप्त हो गई। मृत्यु का हर लक्षण उस शरीर में था। इस पूर्ण मृत्यु की स्थिति में उसे पूरे एक घण्टे पूरे एक घण्टे रखा गया इसके बाद जीवन लौटाने के उपचार प्रारम्भ किये गये। क्रमशः उसे गर्मी पहुँचाई गई। फेफड़े में हवा पम्प की गई। हृदय को बिजली का झटका देकर धड़काया गया। उन उपचारों से मेरा हुआ चूहा पुनः जीवित हो गया और पहले की तरह फिर सामान्य हरकतें करने लगा।
सन् 1950 में टोरन्टो के विज्ञानी बिंगेलो ने मरे कुत्ते को 20 अंश तापक्रम पर ठण्डा किया और 45 मिनट बाद उसे फिर जिन्दा कर दिया। अमेरिका के डा. लेविस और नियोजीन भी इन प्रयोगों की पुनरावृत्ति करने में सफल रहे हैं। संसार के अन्यान्य देशों में भी इस शीतलीकरण विद्या की शोध हुई है और विश्व विख्यात शरीर शास्त्रियों में से ऐ डजस, स्मिथ और गोल्डज्विग ने घोषणा की है कि अगली दशाब्दी में विज्ञान उस स्थिति में पहुँच जायगा जब मृत्यु को अन्तिम अथवा अवश्यम्भावी कहे जाने की वर्तमान मान्यता को झुठलाया जा सके।
किसी प्राणी के अंग विशेष को उसमें कुछ कोशिकाओं एवं ऊतकों को पृथक करके चिरकाल तक जीवित रखने में बहुत पहले ही सफलता प्राप्त करली गई है। कठिनाई यही पड़ती है कि समस्त शरीर के सुविस्तृत क्षेत्र में मृत्यु स्थिति को पलट कर जीवन को किस प्रकार स्थिर रखा जाय। प्रयोग की दृष्टि से समस्त शरीर की समस्त कोशिकाओं को देर तक विकृति से बचाये रखना वर्तमान साधनों से बहुत कठिन पड़ता है। शीत विद्या की प्रगति को देखते हुए यह आशा बँधती है कि सम्भवतः सम्पूर्ण शरीर से चल पड़े विगठन की रोक, जीवन को वापिस लाने की सम्भावनाएँ बन जायेंगी।
मस्तिष्क जैसे कुछ अंगों को देर तक जीवित रखना हो तो ग्लिसरोल या डाइमिथोइल सल्फाक्साइड जैसे घोल के आवरण में उसे रखकर 79 अंश से. तापक्रम जमा दिया जाता है। इस तापमान पर तो कार्बन डाई आक्साइड गैस तक जम जाती है। नई विधि के अनुसार द्रवीय नाइट्रोजन की 19 अंश से. पर रखने में भी यही काम बन जाता है। कैंब्रिज के विज्ञानी पोल्गे ने बैल के शुक्राणुओं को जमाकर उन्हें सात वर्ष तक सुरक्षित रखने में सफलता पाई थी और मरे हुए साँड़ के सात वर्ष बाद उसे सन्तानोत्पादन का श्रेयाधिकारी बनाया था। मर चुके मनुष्यों के द्वारा भी सन्तानोत्पादन अब न तो आश्चर्यजनक रहेगा और न असम्भव। यह परिपाटी अब सामान्य प्रचलन में आ गई है। पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान का कार्य किसी भी पशु केन्द्र पर सरलता पूर्वक होता है। डडडड डडडड शुक्राणु इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होते हैं। डडडड डडडड हो ही यह आवश्यक नहीं। डडडड डडडड
हृदय के आपरेशन में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि उस कतर–व्यौंत में काफी डडडड लग जाता था जबकि हृदय को रक्त विहीन स्थिति में अधिक से अधिक आठ मिनट तक ही रखा जा सकता है। डडडड देर रक्त विहीन स्थिति रहने पर बल्बों की माँसपेशियाँ अपनी स्वाभाविक क्रिया−कलाप छोड़कर फिव्रिलेशन की शिकार हो जाती हैं और विचित्र प्रकार की क्रियाएँ करने लगती है। यह एक नये प्रकार का संकट होता है। लेकिन ग्राड के प्रो. मगोवस्की ने शीत विद्या के प्रयोग से यह सम्भव कर दिया है कि रक्त भिषरण रुका रहे और हृदय का आपरेशन देर तक चलता रहे। उस समय रोगी मृतक की स्थिति में रहता है पर आपरेशन के बाद उसे फिर जीवित बना लिया जाता है।
स्वास्थ्य की स्थिरता और दीर्घ जीवन की समस्या का केन्द्र बिन्दु कोशिकाओं की अन्तःस्थिति के साथ जुड़ा हुआ है। उनका स्तर जब गिरता है तो जीवनयापन के सामान्य क्रिया−कलापों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है। उनमें कठोरता, शुष्कता, मंदता आती है फलतः मलों का निष्कासन एवं नवीन शक्ति का उत्पादन कार्य उनमें ठीक तरह नहीं हो पाता। यही है वृद्धावस्था और मृत्यु का मूल कारण। बीमारियाँ भी इसी स्थिति में पनपती हैं। यदि कोशाओं की स्थिति सामान्य बनाये रखी जा सके तो इन विपत्तियों से बचा जा सकता है। सामान्य स्थिति बनाये रखने के लिए उन्हें बीच−बीच में विश्राम एवं मरम्मत का अवसर मिलना चाहिए। यह कार्य शीत उपचार के माध्यम से ही ठीक प्रकार हो सकता है।
शरीर अरबों खरबों कोशिकाओं की सम्मिलित सत्ता से मिलकर बना है। यह कोशिकाएँ ही जीवन की क्रियात्मक इकाइयाँ हैं। वे विभाजित एवं परिवर्तित होती रहती हैं, अपना काम पूरा करके एक कोशिका समाप्त होती है और अपने स्थान पर अन्य वंशजों का स्थानापन्न बना जाती है। इस क्रम में जब तक तीव्रता रहती है डडड बढ़ता है और जिस क्रम से इस प्रक्रिया डडडड आती है उसी आधार पर शरीर वृद्ध अथवा डडडड रहने लगता है। यह मन्दता जिस क्रम से बढ़ती है उतनी ही शिथिलता अंग−प्रत्यंगों में आती जाती है। निष्क्रियता एवं अशक्ति बढ़ते−बढ़ते स्थिति यहाँ तक जा पहुँची है कि उत्पन्न होते रहने वाले मलों एवं विषों तक को बाहर कर सकना शक्य नहीं रहता फलतः बढ़ी हुई अशक्त ता एवं विषाक्त ता ही मृत्यु को सामने ला खड़ा करती है।
कोशिकाओं का विभाजन क्रम अद्भुत है चार महीने के गर्भस्थ शिशु में वे 40 से 60 बार तक विभाजित होती हैं। 20 वर्ष की आयु में यह क्रम 20 से 40 बार तक रह जाता है। 20 से ऊपर की आयु में वह 10 से 30 बार तक ही सीमित रहते देखा गया है। यह मन्दता ही मृत्यु की दिशा में बढ़ते हुए क्रमिक चरण हैं। जन्म से लेकर मरण तक यह यात्रा अपने ढंग से चालू रहती है और एक दिन इस सुखद यात्रा का दुखद अन्त हो जाता है।
स्नायु संवहन पेशियाँ, चमड़ी, रक्त माँस, अस्थि मज्जा, ज्ञान तन्तु आदि शरीर की विभिन्न पर्तों को परस्पर बाँधे रहने का काम ‘कोलेजन’ नामक प्रोटीन करता है। शरीर में जितना भी प्रोटीन पाया जाता है उसमें एक तिहाई भाग इस कोलेजन का है। कोमलता, स्फूर्ति और अंगों का लचीलापन इसी के कारण रहता है। आयु वृद्धि के साथ−साथ यह प्रोटीन अधिक गाढ़ा और कठोर होता जाता है फलतः विभिन्न अवयवों की कोमलता घटती जाती है और उसका स्थान कठोरता लेती जाती है। आयु वृद्धि के साथ−साथ बढ़ती हुई कुरूपता, कठोरता यही है। स्वभाव में भावुकता का घटना और कठोरता, नीरसता का बढ़ना इसी आधार पर होता रहता है।
इन बहुमूल्य जीवन तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है कि न केवल तीख, असह्य, उष्ण तापमान से बचा जाय वरन् मनःक्षेत्र को उद्विग्न करने वाली उन उत्तेजनाओं से भी बचा जाय जो क्रोध, चिन्ता, कामुकता, असंयम, तृष्णा, ईर्ष्या जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न होती है।
दार्शनिक चुआँगन्जु चीन में उस समय के प्रख्यात दार्शनिक थे। उनकी विद्या और विशेषताओं से प्रभावित होकर चीन सम्राट ने उन्हें अपने राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
सन्देश वाहक नियुक्ति पत्र लेकर चुआँगन्जु के पास पहुँचा उस समय वे नदी के तट पर बैठे जल में क्रीड़ा कल्लोल मछलियों को देखने का आनन्द ले रहे थे।
पत्र को उन्होंने ध्यान पूर्वक पढ़ा और पास पड़े पत्थर के नीचे दबा कर फिर उस मत्स्य विनोद को देखने में तल्लीन हो गये।
सन्देश वाहक को खड़े−खड़े देर हो गई। उसने उत्तर के लिए पूछा ताकि वह वापिस जाकर सम्राट को सूचना दे सके।
चुआँगन्जु मछलियों को ही देखते रहे और उन्होंने उलट कर सन्देश वाहक से पूछा—मैंने सुना है सम्राट के संग्रहालय में किसी बहुत बड़े और बड़े पुराने कछुए की खाल सजी हुई रखी है। जरा तुम्हीं बताना यदि वह कछुआ जीवित होता तो वो इस नदी के जल में विहार करना पसंद करता अथवा सम्राट के संग्रहालय की शोभा बढ़ाना?
चुआँगन्जु ने प्रधानमन्त्री बनने की अपेक्षा दार्शनिक रहना पसन्द किया और वहीं वे रहे भी।
आजकल धूम्रपान का रिवाज बढ़ता ही चला जा रहा है। हर जगह लोग रेल के इंजन या कारखाने की चिमनी की तरह धुँआ निकालते दिखाई पड़ते हैं। एक दूसरे को देखकर फैशन की तरह, प्रारम्भ किया जाने वाला यह व्यसन जीवन के लिए कितना घातक सिद्ध हो सकता है इस पर हमने यदि कभी विचार किया होता तो लाखों रुपये की सम्पत्ति में नित्य आग न लगाई होती।
रासायनिक परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि तम्बाकू में निकोटीन, पायकोलिन, पायरीडिन, कोलीडीन, मार्श गैस, अमोनिया, साइनोजेन, परफेरोल, पूसिक एसिड, फुरफुरल, कार्बोनिक एसिड, कार्बन मोनोक्साइड, सेकोलिन तथा एजोलिन जैसे 24 प्रकार के विष होते हैं। तम्बाकू जलाने से जो धुँआ उठता है उसमें 19 प्रकार के विष रहते हैं। यह सभी विष एक से एक बढ़कर प्राणघातक हैं।
पायरीडीन से आमाशय में कब्ज तथा आँतों में खुश्की हो जाती है। इस खुश्की के कारण ही हिस्टीरिया, क्षय और एनीमिया जैसे रोग होते हैं। यह खुश्की ही कैंसर को जन्म देने वाली है। लन्दन के कैंसर विशेषज्ञ ए. जी. हेगे का कहना है—’धूम्रपान संख्या अब से बीस वर्ष पहले पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम थी। लेकिन अगले दो दशकों में इनकी संख्या बराबर हो सकती है।
नशे की स्थिति में लोग शरीर की क्षमता से अधिक काम करते हैं जिससे स्नायु में खुश्की बढ़ जाती है फिर क्या लोगों का जुकाम, नजले में बदलने लगता है। नेत्र−ज्योति धीमी पड़ती जाती है और कम उम्र में ही चश्मा लगाना पड़ता है। जब तक व्यक्ति का स्नायु मण्डल स्वाभाविक स्थिति में बना रहता है तब तक उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। स्नायुमण्डल से प्रकृति विरुद्ध कार्य लेने पर उत्तेजना, चिड़चिड़ापन और विवेकहीनता की स्थिति आ जाती है। एक तरह से शारीरिक और आध्यात्मिक दृष्टि से उसका पतन होने लगता है।
कोलीडिन से सिर चकराने लगता है और स्नायु शिथिल हो जाते हैं। मार्शग्रैस से वीर्य पतला हो जाता है। अमोनिया से जिगर बिगड़ता है। साइनोजेन तथा एजोलिन से रक्त दूषित होता है। परफेरोल से दाँतों के रोग तथा कार्बन मोनोआक्साइड से दमा, हृदय और नेत्र रोग होते हैं। पूसिक एसिड थकान और जड़ता उत्पन्न करती है। कार्बोनिक एसिड से स्मरण शक्ति कमजोर पड़ जाती है और रात को गहरी नींद नहीं आती।
आगरा में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मार्च 1968 में एक क्षेत्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया था उसमें डा. के. पी. दुबे ने बताया था ‘नशा करने वालों में से 6.8 प्रतिशत मानसिक रोग के शिकार होते हैं जबकि उन व्यक्तियों में से जो नशा नहीं करते हैं केवल 2.3 प्रतिशत व्यक्ति मानसिक रोग के शिकार होते हैं। इस प्रकार सामान्य लोगों से नशेबाजी को मानसिक रोग हो जाने की आशंका लगभग तीन गुनी होती है।’
मादक वस्तुओं के उपयोग से अधिक स्फूर्ति भले ही अनुभव हो पर आगे चलकर उनकी एकाग्रता, तर्क शक्ति और स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है। अधिक समय तक मादक पदार्थों के सेवन से मेनिया, स्कीजोफेनिया, डिमेशिया, मिरगी और व्यक्तित्व परिवर्तन के रोग हो जाते हैं। डा. ओवर बैक राइट, किरमेन तथा ट्रैडगोल्ड जैसे कितने ही मानसिक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि मादक पदार्थ सेवन करने वाले माता−पिता की सन्तान मानसिक रूप से दुर्बल तथा मिरगी का शिकार होती है। माता−पिता की बुरी आदतों के दुष्परिणाम बेचारे बच्चों को भी भुगतने पड़ते हैं।
यदि सिगरेट या बीड़ी के धुएँ को बाहर न निकाल कर पेट में ही रखा जाये तो थोड़ी ही देर में प्राणघातक संकट उत्पन्न हो सकता है। जिस तरह हुक्के की नली में काले रंग का विषैला पदार्थ जमा हो जाता है उसी तरह श्वाँस नली और फेफड़ों में भी यह विष धीरे−धीरे जमा होता जाता है। हुक्के का पानी इतना विषैला हो जाता है कि यदि उसे छोटे−मोटे कीड़ों पर डाल दिया जाये तो वे तुरन्त मर सकते हैं। फिर यह तम्बाकू जिसका धुँआ अन्दर तक जाता है अपना कितना विषैला प्रभाव शरीर के अन्दर छोड़ता होगा। एक किलो तम्बाकू का विषैला सत 30 मनुष्यों, 175 खरगोशों और 850 चूहों के प्राण लेने के लिए पर्याप्त है।
धूम्रपान के दुष्परिणामों को देखते हुए बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम दुर्व्यसन से बचे रहकर अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखे और इस मद पर होने वाला व्यय परिवार निर्माण तथा लोक−मंगल के कार्यों में लगायें।
‘भिक्षु प्रवर! कल राजधानी में होने वाली सभा के लिये सम्राट मिलिन्द ने आमन्त्रित किया है।’
‘ठीक है। मैं अवश्य चलूँगा, पर भिक्षु नागसेन जैसा यहाँ कोई है नहीं। पुकारने में सुविधा हो इस दृष्टि से एक कामचलाऊ नाम रख लिया गया है।’
दूत द्वारा भिक्षु के वचन सुनकर सम्राट असमंजस में पड़ गये।
एक दिन पहले से सम्राट के मन में कितने ही विचार आये और चले गये पर जिज्ञासा को समाधान कहाँ मिला था। वह पहेली अभी भी अनबुझी पड़ी थी। आखिर सम्राट ने पूछ ही लिया ‘यदि विभिनन अंगों के कामचलाऊ योग का नाम भिक्षु नागसेन है तो रथ में सवार होकर कौन आया? स्वागत को किसने स्वीकार किया?’
भिक्षु ने उलझी गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करते हुए कहा—’जिस रथ में बैठकर मैं आया हूँ उसके घोड़े अलग करवा दीजिए।’
कहने भर की देर थी चालक ने घोड़े खोलकर अलग बाँध दिये। भिक्षु ने पूछा—’राजन्! जिन घोड़ों को अलग कर दिया गया क्या वही रथ है?’
‘नहीं! नहीं!! घोड़े रथ कैसे हो सकते हैं? सम्राट ने चकित होकर कहा। रथ का एक−एक भाग अलग किया जाने लगा। भिक्षु ने हर बार पूछा—’क्या यह रथ है।’ और उसका सम्राट ने स्वाभाविक ढंग से उत्तर दिया ‘यह रथ कैसे हो सकता है?’ और अन्त में हर वस्तु अलग−अलग कर दी गई। रथ का नाम ही समाप्त हो गया था। घोड़े अलग बँधे थे और रथ के सारे हिस्से अलग पड़े हुए थे।
अन्त में भिक्षु ने पूछा—,’राजन्! अब बताइये रथ कहाँ है? आप तो प्रत्येक चीज के निकलने पर यह कहते थे—’यह भी रथ नहीं है, यह भी रथ नहीं है। सब चीजों के निकल जाने पर कुछ बचा ही नहीं। फिर आखिर रथ कहाँ चला गया? वास्तव में रथ अपने में कुछ भी नहीं है वह तो विभिन्न वस्तुओं के जोड़ का कामचलाऊ नाम है। इसी तरह मैं अनेक पदार्थों के योग का नाम है। शरीर का अंग−प्रत्यंग कर देने के बाद ‘मैं’ समाप्त हो जाता है और शून्य रह जाता है और यह शून्य ही प्रेम है और यह शून्य ही ईश्वर है। ‘मैं’ तो अहंकार है। शून्य के आते ही अहंकार विगलित हो जाता है।’
अमेरिका आज संसार का सबसे धनी देश है। उसके पास अपार धन राशि है। धन के साथ−साथ यहाँ शिक्षा, विज्ञान एवं सुख−साधनों का प्रचुर मात्रा में अभिवर्धन हुआ है। उपार्जन की तरह उन लोगों ने उपभोग की कला भी सीखी है। इसलिए वहाँ के निवासी हमें धनाधित देव पुरुषों की तरह साधन संपन्न और आकर्षक दिखाई पड़ते हैं। हर तीन में से एक के पीछे एक कार है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस परिवार में स्त्री, पुरुष और एक बच्चा होगा वहाँ एक कार का औसत आ जायगा। टेलीविजन, रिफ्रीजेटर, हीटर, कूलर, टेलीफोन तथा दूसरे सुविधाजनक घरेलू यन्त्र प्रायः हर घर में पाये जाते हैं। विलासिता के इतने अधिक साधन मौजूद है जिनके लिए भारत जैसे गरीब देशों के नागरिक तो कल्पना और लालसा ही कर सकते हैं।
इतने पर भी उस देश की भीतरी स्थिति बहुत ही खोखली है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से वे खोखले बनते जा रहे हैं। संयुक्त कुटुम्ब, दाम्पत्य निष्ठा, सन्तान सद्भाव एवं सामाजिक सहयोग क्रमशः घटता ही चला जा रहा है। बढ़ती हुई व्यस्तता एवं औपचारिकता के कारण हर व्यक्ति एकाकी बनता चला जा रहा है। किसी को किसी पर न तो भरोसा है और न कठिन समय में किसी विश्वस्त सहयोग का विश्वास। नशा पीकर अथवा नग्न यौन उत्तेजना के मनोरंजन देखकर अथवा इन्द्रिय तृप्ति के साधन अपना कर किसी प्रकार गम गलत करते रहते हैं। भीतर एकाकीपन और खोखलापन उन्हें निरन्तर कचोंटता रहता है।
अमेरिकन पत्र−पत्रिकाओं, पुस्तकों सरकारी तथा गैर सरकारी रिपोर्टों के आधार पर उस देश के निवासियों की जो भीतरी स्थिति सामने आती है वह वस्तुतः बड़ी करुणा उत्पादक है। कभी−कभी तो वहाँ तक सोचना पड़ता है कि उन सुसम्पन्न लोगों की तुलना में हम निर्धन अशिक्षित कहीं अच्छे हैं जो किसी प्रकार सन्तोष की रोटी खा लेते हैं और चैन की नींद सो लेते है।
स्वास्थ्य रिपोर्टां के अनुसार अमेरिका में प्रायः 1 करोड़ व्यक्ति —पन्द्रह में से एक—व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रसित है। पन्द्रह लाख व्यक्ति —एक प्रतिशत पागलपन के शिकार हैं। प्रायः डेढ़ करोड़ व्यक्ति सनकी हैं। बारह बच्चों में से एक मानसिक रोगी पाया जाता है। अस्पतालों की रिपोर्टों के अनुसार अब से सौ वर्ष पूर्व जितना मानसिक रोगों का प्रसार था अब उसका अनुपात 12 गुना अधिक बढ़ गया है।
द्वितीय महायुद्ध में एक करोड़ 40 लाख व्यक्तियों की जाँच कराई गई थी कि इतनों में से सेना में भर्ती होने योग्य स्वास्थ्य कितनों का हैं उनमें से सिर्फ 20 लाख व्यक्ति काम के निकले और शेष ‘अनफिट’ ठहरा दिये गये।
संसार में पागलों की सबसे अधिक संख्या वाला देश अमेरिका है। वहाँ प्रति दो सौ व्यक्ति पीछे एक पागल हैं। सबको तो अस्पतालों में जगह नहीं मिलती, पर जो इलाज के लिए दाखिल होते हैं उन्हीं पर 75000 करोड़ डालर की गगनचुम्बी धन राशि सरकार को खर्च करनी पड़ती है।
इन दिनों वहाँ ढाई करोड़ व्यक्ति अर्थात् जनसंख्या का छठा भाग किसी न किसी शारीरिक रोग से ग्रसित है। इनमें से 70 लाख तो अस्पतालों की चारपाई ही पकड़े रहते हैं। केन्सर तो गजब की गति से बढ़ा है। 55 साल की उम्र के बाद पुरुषों में से हजार पीछे आठ के और महिलाओं में से 14 की मृत्यु केन्सर से होती है। दमा, मधुमेह, रक्त चाप, हृदय रोग, अनिद्रा, अपच यह पाँच अब सभ्यता के आवश्यक अंगों में जुड़ गये है। प्रायः हर परिवार में इन बीमारियों में प्रयुक्त होने वाली दवाएँ मौजूद मिलेंगी।
गर्भ निरोध के उपकरणों से प्रायः प्रत्येक वयस्क नर−नारी परिचित और अभ्यस्त हैं फिर भी गर्भ धारण होते रहते हैं और गर्भपात कराने पड़ते हैं। आमतौर से गर्भपात के लिए कुनैन स्तर की दवाएँ दी जाती हैं जिनका प्रभाव प्रजनन संस्थान पर चिरकाल तक बना रहता है और जो भी बच्चे जन्मते हैं वे उन दवाओं के असर का कुछ न कुछ भाग अपने शरीर में लेकर आते हैं। सिर दर्द की एक दवा ‘एस्पिरीन’ अकेली ही एक करोड़ चालीस लाख पौंड वजन की बिक जाती हैं। नींद लाने वाली दवाएँ छै लाख पौंड वजन की खपती हैं। कब्ज तो तीन चौथाई लोगों को रहता है। इसलिए उसकी दवाएँ तो इन सबसे अधिक मात्रा में होती हैं। सिनेमा, टेलीविजन के व्यसन ने आँखों की रोशनी इस कदर घटा दी है कि चश्मा भी कोट−पेण्ट की तरह एक आवश्यक परिधान बन गया है। दाँत तो पचास फीसदी के खराब हैं। शराब के आदी वयस्कों में से आधे लोग हैं। सिगरेट तो 75 प्रतिशत लोग पीते हैं। उससे प्रायः बालक ही बचे होते हैं और कुछ प्रतिशत महिलाएँ भी नहीं पीतीं।
होने वाले विवाहों में से प्रतिवर्ष तीन के पीछे एक तलाक का औसत आता है। हर वर्ष प्रायः ग्यारह लाख पचास हजार गम्भीर अपराध होते हैं, उनतीस हजार आत्म−हत्याएँ करते हैं, 7 से 17 वर्ष की आयु वाले अल्प वयस्कों में से दो लाख पैंसठ हजार को गिरफ्तार करके पुलिस अदालतों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं।
उस देश में ‘एस्पीरिन’ दवा का अब इतना अधिक प्रचलन हो गया है कि वह गाँव−गाँव और घर−घर जा पहुँची है। सिर दर्द या दूसरे दर्द अनुभव में न आयें इसके लिये उसका प्रयोग होता है। अकेले अमेरिका में उसकी वार्षिक खपत 27,000,000 पौंड है। मानसिक उद्वेगों ने धीरे−धीरे उस देश में सिरदर्द के एक चिरस्थायी मर्ज के रूप में अपने पैर जमा लिये हैं। नींद लाने की गोलियाँ भी उस देश में अब एक दैनिक आवश्यकता की वस्तु बन गई हैं।
यह बोलते तथ्य यह बताते हैं कि मात्र भौतिक समृद्धि अथवा वैज्ञानिक प्रगति ही सब कुछ नहीं हैं। शिक्षा तथा दूसरी तरह की सुविधाओं का बाहुल्य होना अच्छी बात है, पर उतने से ही यह सम्भव नहीं कि व्यक्ति का चारित्रिक स्तर ऊँचा उठ सकेगा और सामाजिक सद्भावनाओं का विकास हो सकेगा।
सच्ची प्रगति और सच्ची शान्ति के लिए उत्कृष्ट विचारणा और आदर्शवादी रीति−नीति अपनाये जाने की आवश्यकता है। इन विभूतियों के होते हुए कम संपत्ति और कम शिक्षा के रहते हुए भी हँसती−हँसाती जिन्दगी जियी जा सकती है किन्तु यदि मात्र भौतिक समृद्धि की दिशा में भी बढ़ते रहे तो आज के अमेरिका जैसे और भूतकाल के लंका जैसे देश भी चैन की साँस नहीं ले सकते।
एक आदमी ने चिड़िया के बच्चे पकड़े और दरी में लपेट लिये। चिड़िया तड़फड़ाई। आदमी ने दरी का खोला तो चिड़िया उन बच्चों से लिपट गई। आदमी ने चिड़िया को भी बच्चों समेत दरी में बाँध लिया।
इन्हें लेकर वह हजरत के पास पहुँचा और पूछा इन परिन्दों का क्या करूं?
रसूलिल्लाह ने कहा—ऐ नेकबख्त रहम करना सीख और इन्हें वहीं छोड़कर आ जहाँ से इन्हें पकड़ा है।
प्रगति की दिशा में चलना अच्छा है उससे मनुष्य की पुरुषार्थ परायणता सिद्ध होती है। जो जड़वत् जहाँ के तहाँ जमे बैठे रहते हैं—जिनमें साहस और प्रयास के चिन्ह शेष नहीं रहे उन्हें जीवित मृतक कहा जायगा चेतना का चिन्ह ही अग्रगमन है। किसी की सजीवता उसकी सक्रियता से ही नापी जाती है। जो जितना लगनशील, प्रयत्नशील और पुरुषार्थ परायण है उसे उतने ही अंशों में जीवित कहा जायगा। आगे बढ़ने की महत्वाकाँक्षा का दीपक जिसने सँजोकर रखा है वह अँधेरे में भटकेगा नहीं उसे लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता मिलता ही रहेगा और देर−सवेरे में वह उस स्थान पर जा पहुँचेगा; जिसे प्रगति का अन्तिम लक्ष्य कहा जाता है।
प्रगति तभी सराहनीय है जब वह आदर्श एवं औचित्य की ओर बढ़ रही हो। पथ भ्रष्ट गतिशीलता तो अगति अथवा दुर्गति ही सिद्ध होगी। इस भूल का अपनाने वालों के प्रयास तो उलटे उसी के लिए विपत्ति बन जायेंगे। जाल में फँसा पक्षी जितने हाथ−पैर पीटता है उतने ही उसके बन्धन कड़े होते जाते है। आदर्श विहीन पुरुषार्थ करने वाले तो अपने लिए और दूसरों के लिए केवल संकट ही बढ़ाते चलते हैं।
हमारी प्रगति वृक्ष जैसी हो। वृक्ष अपने अस्तित्व का बढ़ाता है, पर साथ ही अपनी प्रगति का पूरा लाभ दूसरों को देने के लिए भी तत्पर रहता है। जितना बढ़ता है, उतना ही अधिक लाभ दूसरों को मिलता है। पक्षी उसकी डालियों पर घोंसले बनाते हैं। पथिक छाया में बैठकर विश्राम पाते हैं। पत्रों से पशुओं को चारा और जमीन को खाद मिलता है। फलों से कितने ही प्राणियों की क्षुधा तृप्त होती है। लकड़ी से किसी का भवन बनता है, किसी का शीत कर होता है, किसी का चूल्हा जलता है। वृक्ष का पूरा अस्तित्व दूसरों के लिए ही समर्पित रहता है। सभी उसे चाहते और सभी उसे सराहते हैं। हमारी प्रगति इसी स्तर की होनी चाहिए।
महान् प्रयोजनों की पूर्ति के लिए प्रगति करना ही सराहनीय है। उसी आधार पर लोक−सम्मान और जन−सहयोग मिलता है। वृक्षों को लोग लगाते हैं—सींचते हैं, रखवाली करते हैं और अपना उद्यान सुविकसित देखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं। उसकी हरियाली और सघनता देखने मात्र से दर्शकों का मन प्रसन्न होता है। उपयोगी वृक्षों को काटने वालों की भर्त्सना की जाती है; उन्हें पापी ठहराया जाता है। यह जन−सहयोग और लोक−सम्मान पाकर वृक्ष का जीवन धन्य बनता है। उसकी निज की स्थिति सुखद ही रहती है। अपनी इस लोकोपयोगी प्रगति पर उसे सन्तोष एवं गर्व करने का पूरा−पूरा अवसर मिलता है।
जिसने अपनी प्रगति तो की पर दूसरों के लिए कष्टकारक अथवा अनुपयोगी सिद्ध हुए वे घृणास्पद होकर जीते हैं और अपने चारों ओर विरोध−विद्वेष का वातावरण पाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें आत्म−रक्षा एवं प्रतिरोध, प्रतिशोध के प्रयत्नों में से ही उलझ कर रह जाना पड़ता है। साँप, बिच्छू, व्याघ्र, बधिक कब किसका स्नेह, सहयोग पाते हैं वे जहाँ जाते हैं आतंक फैलाते है और बदले में प्रतिशोध, विद्वेष के शिकार होते हैं। कँटीली झाड़ियाँ जहाँ भी उगती हैं उन्हें काटने, उखाड़ने, जलाने की दारुण परिस्थिति का ही सामना करना पड़ता है।
हमारी प्रगति दिशा विहीन न हो। बढ़ना तो चाहिए, पर यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हमारा उत्कर्ष दूसरों के लिए उत्साहवर्धक एवं आनन्ददायक परिणाम उत्पन्न करता रहे।
रूसो का प्रजातन्त्र, मार्क्स का साम्यवाद और नीत्से का नास्तिकवाद इन तीनों की तिकड़ी अपनी पीढ़ियों के मस्तिष्क पर बेतरह छाई हुई हैं। उनके प्रतिपादनों पर विचार करने के लिए हर किसी को बाध्य होना पड़ा है। क्या समर्थक क्या विरोधी दोनों ही पक्ष प्रस्तुत तर्कों पर विचार करने के लिए बाध्य हुए हैं।
इस तिकड़ी के प्रतिपादनों को उपहास, उपेक्षा, भर्त्सना के प्रहार कम नहीं सहने पड़े। परम्परा समर्थक लोगों ने उनका विरोध करने में कुछ कमी नहीं रखी, पर कुछ कारण ऐसे हैं जिनके कारण वे समस्त प्रतिबन्धों का उल्लंघन करते हुए आगे ही बढ़े हैं। प्रजातन्त्रवाद की पिछली शताब्दियों और दशाब्दियों में धूम रही है। युग−युग से चले आ रहे राजतन्त्र की जड़ें उस प्रजातन्त्रवादी तूफान ने उखाड़ कर फेंक दीं। दुनिया के अधिकाँश देशों में प्रजातन्त्री शासन स्थापित हुए। यों अब अनुभव ने उसमें भी खोट निकाल दी है कि अज्ञ और अनुत्तरदायी लोगों के हाथ में वोट का अधिकार चले जाने से चुने हुए लोगों में अवाँछनीय तत्वों की भरमार हो जाती है फलतः जिन लोगों द्वारा सरकारें चलाई जाती हैं वे प्रजा द्वारा प्रजा पर राज्य होने के पवित्र उद्देश्य से भटक कर निहित स्वार्थों की पूर्ति में लग जाते हैं फलतः प्रजा के हाथ ऐसा कुछ नहीं लगता जिसे पाने के उसे स्वप्न दिखाये गये थे। इस खोट के निराकरण का उपाय न निकलते देखकर अब प्रजातन्त्र के प्रति आरम्भिक आकर्षण शिथिल होने लगा है और यह सोचा जा रहा है कि चुनाव की पद्धति में कोई ऐसा मौलिक और क्रान्तिकारी परिवर्तन होना चाहिए जिससे प्रजाद्रोही तत्वों को प्रजापति बनने की घुसपैठ से रोका जा सके।
दूसरी विचारधारा है मार्क्स का साम्यवाद। इसके लिए भी लोगों का आरम्भिक उत्साह कम नहीं था। आर्थिक समानता का नारा निर्धन और अभावग्रस्त वर्ग को बहुत आकर्षक लगा। ‘गरीबों तुम्हें साम्यवादी बनकर सिर्फ गरीबी ही खोनी है।’ इस आश्वासन ने, सहज अर्थ लाभ के सुखद स्वप्नों, बहुमत को साम्यवाद समर्थक बना दिया। रूस की राज्य क्रान्ति के बाद साम्यवाद मात्र दर्शन न रहकर एक प्रचण्ड तन्त्र बन गया। एक के बाद एक देश उसकी गोद में बैठने लगे, अब रूस, चीन तथा उनके पिछलग्गू देशों की आबादी पृथ्वी की आबादी से प्रायः आधी है। जहाँ शासनसत्ता नहीं हथियायी जा सकी वहाँ भी साम्यवादियों की मान्यताओं से प्रभावित लोगों की संख्या कम नहीं है। इस दृष्टि से समय का पलड़ा प्रजातन्त्र को पीछे छोड़ कर साम्यवाद की ओर झुका हुआ मालूम पड़ता है।
प्रजातन्त्र की तरह साम्यवादी तन्त्र के खोट भी अनुभव के सामने लाकर रख दिये। व्यक्ति को शासन का गूक वधिर गुलाम बनकर जिस प्रकार अनुगमन के लिए प्रताड़ित किया गया है उस लोभ हर्षक दबाव ने लोक−चेतना को भयभीत कर दिया है। साम्यवादी बनने का अर्थ है व्यक्तिगत चेतना की समाप्ति। वह कुछ नये सुधार, सुझाव संशोधन प्रस्तुत करने में असमर्थ होकर बौद्धिक अपंग की तरह ही जी सकता है। उच्च सत्ता की इच्छा के विरुद्ध कुछ करना तो दूर सोचा भी नहीं जा सकता। साम्यवाद के साथ अधिनायकवाद जिस प्रकार अविछिन्न बनकर प्रकट हुआ उससे सम्भव है उन देशों की आर्थिक वैज्ञानिक अथवा दूसरी प्रगतियों में सहायता भी की हो, पर व्यक्ति की मौलिकता एवं स्वतन्त्रता का एक प्रकार से अन्त ही हो गया है। यह घाटा इतना बड़ा है जिसे वह प्रजा गले उतारने को तैयार नहीं हो रहे हैं जो अभी उस तन्त्र के अंतर्गत नहीं आई। विचारशील वर्ग साम्य सिद्धान्तों का दार्शनिक समर्थन तो करता है, पर जब उस सत्ता के अंतर्गत चले जाने की बात सोचता है तो असहमति ही व्यक्त करनी पड़ती है। इस प्रकार आरम्भिक अत्युत्साह के दिन अब क्रमशः लदते जा रहे हैं। अब हर मर्ज की रामबाण औषधि साम्य सिद्धान्तों को बताने वाले अत्युक्ति वादी ही गिने जाने लगे हैं।
सम्पन्न वर्ग की समाप्ति से विपन्न वर्ग की ईर्ष्या को थोड़ा समाधान अवश्य मिलता है। हम दुखी तो दूसरे भी सुखी क्यों रहें—इस भाव विद्रोह से अवश्य ही साम्य सिद्धान्तों को राहत मिलती है किन्तु दूसरा स्वप्न पूरा नहीं होता। प्रजा की स्थिति सुधरने की किंचित ही गुंजाइश है। महत्वाकाँक्षा साम्यवादी शासन अपना व्यय इतना बढ़ाते चल रहे हैं कि प्रजा को जीवित रहने भर की सुविधा ही पल्ले पड़ती है राजतंत्र या प्रजातन्त्र वाले देशों की तुलना में साम्य तन्त्र के अंतर्गत रहने वाली प्रजा की स्थिति कुछ अच्छी नहीं गई−गुजरी ही है। अपने उपार्जन का लाभ अपने को न मिलने से मध्य स्तर के लोगों में निराशा बढ़ रही है और बड़े दबाव में जहाँ भी शिथिलता आती है तत्काल उत्पादन घट जाता है। प्रतिपादन ने साम्य तन्त्र को अंगीकार करने का अर्थ स्वर्ग राज्य में प्रवेश करना बताया था। पर अनुभव ने बताया कि वह सामन्ती गुलाम प्रथा की दुखद स्मृतियाँ ही ताजा कर रहीं हैं। शासक और शासितों के बीच की खाई वहाँ गैर साम्यवादी देशों की अपेक्षा कम चौड़ी नहीं है। ऐसे ऐसे अनेक कारण है जिनमें जन−मानस की दार्शनिक सहानुभूति होते हुए भी व्यवहार में साम्यवाद से कतराने की प्रवृत्ति पनप रही है और तूफानी उभार ठण्डा होने लगा है। इस तथ्य ने उस तन्त्र के सूत्र संचालकों को पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया है। प्रजातन्त्र और साम्यवाद की सम्मिलित प्रणाली ‘समाजवाद’ को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसे−ऐसे और भी कई विकल्प है जिसे कठोरता को कोमल बनाने की गुंजाइश निकाल कर आशंकित और आतंकित लोक−मानस को आश्वस्त किया जा सके।
प्रजातन्त्र और साम्यवाद की तरह ही तीसरी प्रचंड विचारधारा नास्तिकवाद की है जिसने बुद्धिवाद को बहुत प्रभावित किया है। यों अनीश्वरवाद कोई शासन पद्धति नहीं है फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि जीवन की गतिविधियों को प्रभावित करने में उसका बहुत बड़ा हाथ है। ईश्वरवाद मात्र पूजा उपासना की क्रिया−प्रक्रिया नहीं है उसके पीछे एक प्रबल दर्शन भी जुड़ा हुआ है जो मनुष्य की आकाँक्षा, चिन्तन प्रक्रिया और कर्म−पद्धति को प्रभावित करता है। समाज, संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य परमार्थ आदि सद्वृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख−सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती है, भले ही उस बचत का उपयोग लोक−कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार पर कर लेता है। इसी प्रकार अनैतिक कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दण्ड से डरने की जरूरत रह जाती और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है। आत्मा का अस्तित्व अस्वीकार करने और शरीर की मृत्यु के साथ आत्यन्तिक मृत्यु हो जाने की मान्यता उसे वही प्रेरणा देती है कि जब तक जीना हो अधिकाधिक मौज−मजा उठाना चाहिए। यही जीवन का लाभ और लक्ष होना चाहिए।
उपासना से भक्त को अथवा भगवान को क्या लाभ होता है यह प्रश्न पीछे का है। प्रदान तथ्य यह है कि आत्मा और परमात्मा की मान्यता मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की एक नीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बन्धनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।
निस्सन्देह इस युग के महान् दार्शनिकों में से रूसो और मार्क्स की भाँति ही फ्रैडरिक नीत्से की भी गणना की जाय। इन तीनों ने ही समय की विकृतियों को और उनके कारण उत्पन्न होने वाली व्यथा−वेदनाओं को सहानुभूति के साथ समझने का प्रयत्न किया है। अपनी मनःस्थिति के अनुरूप उपाय भी सुझाये हैं। अपूर्ण मानव के सुझाव भी अपूर्ण ही हो सकते हैं। कल्पना और व्यवहार में जो अन्तर रहता है उसे अनुभव के आधार पर क्रमशः सुधारा जाता है। यही उपरोक्त प्रतिपादनों के सम्बन्ध में भी प्रयुक्त होना चाहिए, हो भी रहा है।
शासनतन्त्र पिछले दिनों निरंकुश राजाओं और सामन्तों के हाथ चल रहा था उनके स्वेच्छाचार का दुष्परिणाम निरीह प्रजा को भुगतना पड़ता था, प्रजातन्त्र का, तदुपरान्त सभ्य तन्त्र का विकल्प सामने आया। बौद्धिक जगत में ईश्वर की मान्यता सबसे पुरानी और सबसे सबल और लोक−समर्थित होने के कारण बहुत प्रभावशाली रही थी। वह मानस तंत्र को दिशा देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है किन्तु दुर्भाग्य यह है कि ईश्वरवाद के नाम पर भ्रान्तियों का इतना बड़ा जाल जंजाल खड़ा कर दिया गया है जिससे आस्तिकवादी दर्शन का मूल प्रयोजन ही नष्ट हो गया। निहित स्वार्थों ने भावुक जनता का शोषण करने में कोई कसर न रखी। इतना ही नहीं अनैतिक और अवांछनीय कार्यों को भी ईश्वर की प्रसन्नता के लिए करने के विधान बन गये। राजतन्त्र की दुर्गति जिस प्रकार रूसो और मार्क्स को उत्तेजित किया ठीक वैसी ही चोट नीत्से को ईश्वरवाद के नाम पर चल रही विकृतियों ने पहुँचाई।
उसने अनीश्वरवाद का नारा बुलन्द किया और जन मानस पर से ईश्वरवाद की छाया उतार फेंकने के लिए तर्क शास्त्र और भावुकता का खुलकर प्रयोग किया। उसने जन−चेतना को उद्बोधन करते हुए कहा—’ईश्वर की सत्ता मर गई, उसे दिमाग से निकाल फेंको, नहीं तो शरीर पूरी तरह गल जायगा। स्वयं को ईश्वर के अभाव में जीवित रखने का अभ्यास डालो। अपने पैरों पर खड़े होओ। अपनी उन्नति आप करो और अपनी समस्याओं का समाधान आप ढूंढो। अपने ‘सत्’ को अपनी इच्छा शक्ति से स्वयं जगाओ और उसे ईश्वर की सत्ता के समकक्ष प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करो। अति मानव बनने की दिशा में बढ़ो पर जमीन से पाँव उखाड़ कर आसमान में मत उड़ो। वस्तुस्थिति की उपेक्षा कर कल्पना के आकाश में उड़ोगे तो तुम्हारा भी वही हस्र होगा जो ईश्वर का हुआ है।’
नीत्से की ‘संगीत की आत्मा से त्रासदी का जन्म’ ‘प्रकाश की पहली झलक’ और जरयुस्त्र बोला’ ‘प्रफुल्ल विवेक’ ‘पुण्य और पाप से दूर’ ‘नीति वाक्यों की वश परम्परा’ ‘वैग्नर’ एक चरित्र ‘एन्टी क्राइस्ट’ ऐके होमो’ ‘इच्छा शक्ति से समग्र समर्थता तक’ पुस्तकें बहुत ही लोकप्रिय हैं। इन सबमें उसने प्रचलित ईश्वरवाद के साथ जुड़ी हुई भ्रान्तियों और अनैतिकताओं का तर्क और तथ्य पर विश्लेषण किया है और बताया है कि इस मान्यता को इसी रूप में अपनाने से व्यक्ति और समाज की कोई भलाई नहीं हो सकती। एक कदम और आगे बढ़कर उसने और एक आकर्षक घोषणा की और लोगों से कहा—’ईश्वर मर गया। हमने और तुमने मिलकर उसे मार दिया।’
जहाँ तक घोषणा की बात थी वह मनुष्य की विपर्ययवादी मनोवृत्ति को बहुत भाई और उनके प्रतिपादन खूब पढ़े गये। उन पर घर−घर में चौराहे−चौराहे पर चर्चा हुई। किसी ने भला कहा किसी ने बुरा माना। जो हो इस प्रतिपादन ने प्रश्नों की झड़ी लगादी। सर्वत्र उसमें पूछा जाने लगा—”यदि ईश्वर नहीं रहा तो उसका स्थानापन्न कौन बनेगा? जीवन का लक्ष्य क्या रहेगा? संस्कृति किस आधार पर टिकेगी? मर्यादाओं की रक्षा कैसे होगी। समाज का बिखराव कैसे रुकेगा? धर्म और नीति को किसका आश्रय मिलेगा? प्रेम परमार्थ में किये क्यों रुचि रहेगी?” यही प्रश्न भीतर से भी उभरे। कुछ दिन तो हेकड़ी से वह यही कहता रहा—’जो सत्य है वह असत्य नहीं हो सकता।” समस्याओं की आशंका से यथार्थता को झुठलाया नहीं जा सकता। ईश्वर तो मर ही गया है अब अपनी समस्याएँ स्वयं सुलझाओ।”
नीत्से की विचारकता क्रमशः अधिकाधिक गम्भीरतापूर्वक यह स्वीकार करती ही चली गई कि ईश्वर भले ही मर गया हो, पर स्थान रिक्त होने से जो शून्यता उत्पन्न होगी उसे सहज ही न मारा जा सकेगा। उद्देश्य, आदर्श और नियन्त्रण हट जाने से मनुष्य जो कर गुजरेगा वह ईश्वरवादी भ्रान्तियों की अपेक्षा अधिक दुखदायी ही सिद्ध होगा।
नीत्से ने उसका समाधान कारक उत्तर ‘अतिमानव’ का लक्ष्य सामने प्रस्तुत करके दिया है। मनुष्य को अपनी इच्छा शक्ति इतनी प्रखर बनानी चाहिए जो उसके व्यक्तित्व को अति मानव स्तर का बना सके। यह निखरा हुआ व्यक्ति इतना प्रचण्ड होना चाहिए कि जन−प्रवाह के साथ बहती हुई विकृतियों पर नियन्त्रण स्थापित करने के साधन जुटा सके। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ‘अति मानव’ के रूप में विकास होना चाहिए। व्यक्ति गत जीवन में उसे इतनी इच्छा शक्ति उत्पन्न करनी चाहिए जो संकल्पों के मार्ग में आने वाले हर प्रतिरोध का निराकरण कर सके। सामाजिक जीवन में उसे इतना प्रतिभाशाली और साधन संपन्न होना चाहिए कि प्रचलित अवांछनियताओं पर नियन्त्रण कर सकने की क्षमता का अभाव अखरे नहीं।
अनीश्वरवाद का पूरक अति मानववाद की दशाब्दियों तक बहुचर्चित रहा। इस उभय−पक्षी प्रतिपादन ने एक रिक्त ता पूरी कर दी और नीत्से का अनीश्वरवादी दर्शन विधि निषेध की उभय−पक्षी आवश्यकताओं को पूरा कर सकने वालों समझा गया। उसे विचारकों ने समग्र की उपमा दी।
अनीश्वरवाद का पृष्ठ पोषण भौतिक विज्ञान ने यह कहकर दिया कि ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व का ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जो प्रकृति के प्रचलित नियमों से आर्ग तक जाता हो। इस उभय−पक्षी पुष्टि ने मनुष्य की उच्छृंखल, अनैतिकता पर और भी अधिक गहरा रंग चढ़ा दिया तद्नुसार वह मान्यता एक बार तो ऐसी लगने लगी कि ‘आस्थाओं का अन्त’ वाला समय अब निकट ही आ पहुँचा। ‘अति मानववाद’ के अर्थ का भी अनर्थ हुआ और योरोप में हिटलर मसौलिनी जैसे लोगों के नेतृत्व में नृशंस ‘अति मानवों’ की एक ऐसी सेना खड़ी हो गई जिसने समस्त संसार को अपने पैरों तले दबोच लेने की हुँकारें भरना आरम्भ कर दिया।
खोट, प्रजातन्त्र और साम्यतन्त्र की तरह अनीश्वरवाद में भी है। इसका उचित समाधान बहुत दिन पहले वेदान्त के रूप में ढूँढ़ लिया गया है। तत्वमस्ति सोहमस्मि, अयमात्मा ब्रह्म, प्रज्ञानब्रह्म—सूत्रों के अंतर्गत आत्मा की परिष्कृत स्थिति को ही परमात्मा माना गया है। इतना ही नहीं इच्छा शक्ति को—मनोबल और आत्मबल को—प्रचण्ड करने के लिए तप साधना का उपाय भी प्रस्तुत किया गया है। वेदान्त अति मानव के सृजन पर पूरा जोर देता है। मनोबल प्रखर करने की अनिवार्यता को स्वीकार करता है। ईश्वरवाद का खण्डन किसी विज्ञ जीव की ईश्वर स्तर तक पहुँचा देने की वेदान्त मान्यता बिना रिक्त ता उत्पन्न किये—बिना अनावश्यक उथल−पुथल किये वह प्रयोजन पूरा कर देती है जिसमें ईश्वरवाद के नाम पर प्रचलित विडम्बनाओं को निराकरण करते हुए अध्यात्म मूल्यों की रक्षा की जा सके।
बुद्धिवाद अगले दिनों वेदान्त दर्शन को परिष्कृत अध्यात्म के रूप में प्रस्तुत करेगा तब नीत्से की मान्यताएँ अपूर्ण और बचकानी लगेंगी और प्रतीत होगा कि इस स्तर का चिन्तन बहुत पहले ही पूर्णता के स्तर तक पहुँच चुका है और समस्याओं का समाधान उपयुक्त रीति से खोजा जा चुका है।
ह्वेल संसार का सबसे बड़ा जानवर है। जलचरों में सबसे बड़ा और सबसे सबल यही होता है। पर उसका जबड़ा इतना छोटा होता है कि उसमें हिरिग, मछली उलझ जाय तो श्वाँस नली बन्द कर देती है और उस छोटे से व्यवधान से ही उसका अन्त हो जाता है।
मनुष्य की सबलता ह्वेल से भी बड़ी है, पर दुर्बुद्धि की आपत्ति के चंगुल में फँसकर वह अपना सब कुछ गँवा बैठता है और क्षुद्र प्राणियों से भी अधिक घाटे में रहता है।
ऋग्वेद में ‘सूर्य को जगत की आत्मा’ कहा गया है वस्तुतः इस संसार में जो कुछ भी विकास−क्रम चल रहा है—हलचलें दृष्टिगोचर हो रही है उस सबका उद्गम शक्ति स्रोत सूर्य ही है। यदि उसका अस्तित्व न होता तो हमारी धरती एक अन्धकार मग्न शीतल, निस्तब्ध, निर्जीव पिण्ड के अतिरिक्त और कुछ न होती।
संसार की अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त सूर्य मनुष्य का आरोग्य भी प्रदान करता है। शास्त्र वचन है—’आरोग्य भास्करादिच्छेत्’ आरोग्य की सूर्य से याचना करें। सूर्य संपर्क में रहने से आरोग्य सुरक्षित रखा जा सकता है और रोगों के उपद्रवों को भी सूर्य किरणों की महाशक्ति के सहारे दूर किया जा सकता है।
गाय घास को दूध में परिणत करती है यह जटिल रासायनिक परिवर्तन के द्वारा सम्पन्न होता है। पौधे पानी में रहने वाले हाइड्रोजन तत्व को अपने भीतर खींचने के लिए जिस शक्ति का उपयोग करते हैं उसे वैज्ञानिक की भाषा में ‘एल्कोट्रोमैगनेटिक’ कहते हैं। इसी शक्ति के द्वारा वे हवा में से कार्बन डाइ आक्साइड खींचते हैं। इन जल एवं वायु द्वारा खींचे गये तत्वों का संयुक्त रूप ‘कार्बोहाइड्रेट’ कहलाता है। वनस्पति शास्त्र में इस प्रक्रिया की व्याख्या ‘फोटोसिनथिसिस’ के रूप में की जाती है।
मनुष्य भी इसी प्रकार अन्न, शाक, फल आदि खाद्य−पदार्थों के माध्यम से अपने में रक्त माँस जैसे पदार्थ उत्पन्न करता है और उनके सहारे विभिन्न प्रकार के श्रम उद्योग करने की क्षमता प्राप्त करता है।
प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यह शक्ति पशुओं, पौधों और मनुष्यों में आती कहाँ से है? इसका उद्गम केन्द्र कहाँ है? निर्जीव पदार्थों में भी जो अणु−परमाणु होते हैं वे भी द्रुतगति से एक क्रम व्यवस्था के साथ हरकत में संलग्न रहते हैं। आखिर उन्हें इस कार्य संचालन के लिए आवश्यक शक्ति कहाँ से प्राप्त होती है? जब सभी प्रकार के यन्त्रों और औजारों को चलाने में शक्ति की व्यवस्था करनी पड़ती है तो यह सारा जड़−चेतन विश्व जिस अनवरत क्रिया−कलाप में संलग्न है आखिर उसके लिए भी तो कोई शक्ति स्रोत होना ही चाहिए।
धरती पर विद्यमान ठोस, प्रवाही एवं वाष्प रूप पदार्थों में विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ भरी पड़ी हैं जिन्हें अद्भुत और असाधारण कह सकते हैं। पोते आकाश को भी खाली नहीं समझा जाना चाहिए। दृश्य जगत की अपेक्षा अदृश्य जगत में भरा हुआ शक्ति भण्डार और भी अधिक सामर्थ्यवान है। रेडियो तरंगें उसी में परिभ्रमण करती हैं। प्रकाश, ऊष्मा, शब्द आदि के रूप में पाई जाने वाली शक्तियाँ के असंख्य स्तर और प्रकार हैं यह सारा शक्ति परिवार आकाश क्षेत्र में प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा है। वही प्रश्न यहाँ भी है कि इस शक्ति विस्तार का मूल स्रोत आखिर है कहाँ?
अनुसंधानों ने बताया है कि इस धरती के प्रत्येक कण एवं क्षेत्र में पाई जाने वाली शक्तियों का उद्गम केन्द्र सूर्य है। उसकी गुलाबी, नीली, हरी, पीला, नारंगी, लाल दिखने वाली किरणें वस्तुतः शक्ति तरंगें ही हैं जो विभिन्न स्तर के उपहार लेकर इस धरती के प्राणियों एवं पदार्थों को देने के लिए अनवरत रूप से अन्तरिक्ष को चीरती हुई द्रुतगति से आती रहती है।
अल्फा, बीटा, गामा किरणों की ‘चमत्कारी परतें जैसे−जैसे खुलती जाती हैं वैसे−वैसे विदित होता जा रहा है, इन स्रोतों में सर्वशक्ति मान बनने के साधन मौजूद हैं। अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड किरणों का जो थोड़ा बहुत उपयोग जाना जा सकता है उसी ने मनुष्य का मदान्ध कर दिया है आगे जो परतें खुलने वाली हैं वे अप्रत्याशित है उनकी सम्भावनाओं का विचार करने पर मस्तिष्क जादुई तिलस्म के लोक में उड़ने लगता है।
सूर्य के शक्ति प्रवाह में पदार्थों के साथ पहला स्पर्श करने का श्रेय अल्ट्रा वायलेट किरणों को है। यह स्पर्श जहाँ होता है वहाँ चमत्कारी उपलब्धियाँ उत्पन्न होती हैं। खाद्य−पदार्थों को ही लें उनकी ऊपरी परत का सूर्य किरणों से अधिक संपर्क रहता है। फल, शाक, अन्न आदि का ऊपरी भाग जिसे चोकर या छिलका कहते हैं सूर्य प्रकाश के अधिक संपर्क में रहता है अस्तु उसमें अन्य उपयोगी तत्वों के साथ−साथ विटामिन ‘डी’ विशेष रूप से पाया जाता है। कैल्शियम एवं फास्फोरस जैसे तत्वों को खाद्य−पदार्थों में से खींचना और शरीर के अंग−प्रत्यंगों में उन्हें घुलाकर स्थिर बना देना यह विटामिन डी का ही काम है।
वर्षा के दिनों में जबकि सूर्य बादलों से जिस क्षेत्र में ढका रहता है उस क्षेत्र में तरह−तरह की छोटी−बड़ी दबी−ढकी बीमारियाँ सिर उठाती हैं, कारण कि उनका प्रतिरोधी तत्व सूर्य स्पर्श प्रभावहीन हो जाता है। रात्रि में हम थके माँदे सो जाते हैं—काम करने का जी नहीं करता इसका बड़ा कारण यही है—सौर उत्तेजना से हमारे क्रियातन्तु प्रेरणा लेना बन्द कर देते हैं और शिथिलता, निष्क्रियता धर दबोचती है।
डा.फोर्व्सविंसलो ने अपने ग्रन्थ ‘लाइट, इट्ज इन्फ्लुएन्स आन लाइफ एण्ड हैल्थ’ में इस बात पर जोर दिया है कि लोग बन्द मकानों में रहना और मोटे परिधानों से ढके रहना छोड़े अन्यथा निरोगता उन्हें छोड़ती चली जायगी।
संसार के अन्यान्य प्रकृति विशेषज्ञों ने भी उपेक्षित सूर्य रश्मियों के गुणकारी प्रभाव के सम्बन्ध में जन−साधारण का ध्यान आकर्षित किया है और कहा है कि सूर्य किरणों के रूप में मिलने वाले बहुमूल्य प्रकृति वरदान की अवज्ञा न करे। इस दिशा में अधिक शोध कार्य करने वाले विज्ञानियों में डा. जेम्स कुक, ए. वी.गारडेन, वेनिट, फ्रेंकक्रेन, एफ.जी.वेल्स, जेम्स जेबसन आदि के नाम अग्रिम पंक्ति में रखे जा सकते है।
प्रातःकालीन सूर्य रश्मियों में ‘अल्ट्रा वायलेट तत्व की समुचित मात्रा रहती है जैसे−जैसे धूप चढ़ती जाती है लाल रंग की किरणें बढ़ती हैं उनमें अधिक गर्मी पैदा करने का गुण है। प्रातःकालीन सूर्य किरणों को नंगे शरीर पर लने का महत्व शारीरिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टि से माना गया है। प्रातःकालीन वायु में टहलना भी इसीलिए अधिक उपयोगी माना गया है कि उस समय सूर्यदेव द्वारा निसृत अल्ट्रा वायलेट किरणों के साथ जितना संपर्क स्थापित किया जा सकता है और जितना लाभ लिया जा सकता है वैसा अवसर फिर चौबीस घण्टे में कभी भी नहीं आता।
डा. वरनर मेकफेडन, वेनिडिकट लस्ट, स्टेनली लीक आदि प्रकृति विज्ञानी प्रभातकालीन सूर्य किरणों के सेवन पर बहुत जोर देते रहे हैं। इन किरणों में विटामिन डी विटामिन बी और विटामिन ए की प्रचुर मात्रा शरीर को प्रदान करने की शक्ति है। बलवर्धक टॉनिकों की अपेक्षा यह किरणें कहीं अधिक शक्ति शाली एवं निश्चित परिणाम उत्पन्न करने वाली हैं।
स्विट्जरलैंड के सूर्य रश्मियों से चिकित्सा करने में निष्णात डा. रोलियर ने सर्वसाधारण को अधिक कपड़े पहनकर सूर्य रश्मियों का द्वार बन्द रखने की आदत छोड़ने का परामर्श दिया है। वे कहते हैं बन्द कमरों में जहाँ सूर्य किरणें नहीं पहुँचती वहीं बीमारियाँ पहुँचती है। इसी प्रकार यदि शरीर को ढके रहेंगे तो प्रकृति के एक बड़े वरदान से वंचित रहना पड़ेगा। रक्त में पाया जाने वाला ‘हेमो ग्लोबिन’ तो सन्तुलित स्थिति में सूर्य किरणों का सहारा पाकर ही रहता है। पौधों को खुली धूप से वंचित रखें और उन्हें किसी परिधान से ढका रहने दें तो कुछ ही समय में वे पीले पड़ जायेंगे, मुरझा जायेंगे और अन्ततः अविकसित रह कर मर जायेंगे। जो प्रभाव सूर्य शक्ति से विलग रहने पर पौधों पर होता है वही दुर्गति हमारे शरीर की भी होती है।
भूगोल पर दृष्टि डालने से यह तथ्य अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है कि जिन देशों या द्वीपों में सूर्य किरणों का अधिक लाभ मिलता है, उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी स्थिति उनकी तुलना में कहीं अच्छी है जिन्हें सूर्य किरणों का अवरोध रहता है।
सूर्य किरणों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं एक वे जो दिखती, चमकती हैं—सातों रंग इन्हीं में होते हैं। दूसरी जो दिखती नहीं किन्तु रासायनिक दृष्टि से इनका बहुत महत्व होता है उन्हें अल्ट्रा वायलेट किरणें कहते हैं। इन्फ्रारेड किरणों का अपना अलग ही महत्व है। वे शरीर को गरम करती हैं जब गर्मी रहती है तभी अल्ट्रा वायलेट किरणों का असर होता है। इनकी कीटाणु नाशक शक्ति प्रख्यात है।
धूलि, धुँआ, नमी, कपड़े आदि के व्यवधानों से यह उपयोगी अदृश्य किरणें रुकती हैं और अपना प्रभाव समुचित रूप से शरीर को प्रदान नहीं कर पातीं। शुद्ध वायु मण्डल के पहाड़ी तथा वन्य प्रदेशों में रहने वाले इन उपयोगी किरणों का समुचित लाभ उठाते हैं क्योंकि वहाँ वायु दूषण अथवा अन्य प्रकार की रुकावटें नहीं होतीं। कम से कम और ढीले वस्त्र पहनने की नीति इसीलिए उत्तम है कि इस प्रकार शरीर को सूर्य प्रभाव से अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है। प्रभातकालीन सूर्य की किरणें यदि खुले शरीर पर नियमित रूप से ग्रहण की जाती रहें तो उनसे त्वचा पर विटामिन डी की परत जमती है और वह शरीर में भीतर प्रवेश करके रोग निवारक एवं बलवर्धक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है।
सूर्य को शक्ति का भण्डार माना गया है। प्राणियों में जीवनी शक्ति और पदार्थों में क्रिया शक्ति का उद्भव सूर्य द्वारा दिये गये अनुदानों के आधार पर ही सम्भव होता है।
यों सूर्य सफेद रंग का दिखता है और उसकी किरणें भी उजली ही लगती है, पर वस्तुतः उनमें सात रंगों का सम्मिश्रण होता है। वे परस्पर मिलकर तो अनगिनत संख्या में हल्के गहरे रंगों का निर्माण करती हैं। हर किरण की अपनी विशेषता है। किसी पदार्थ पर किस किरण का कितना प्रभाव पड़ा इसका परिचय उसके रंग को देखकर प्राप्त किया जा सकता है। विभिन्न वस्तुओं के विभिन्न प्रकार के रंग दृष्टिगोचर होते हैं यह अकारण ही नहीं है। उन पदार्थों ने अपनी विशेषताओं के कारण सूर्य शक्ति की अमुक किरणों को विशेष रूप से आकर्षित एवं संचित किया है; फलस्वरूप उनका वह रंग बना है जिसे हमारी आँखें देखती पहचानती हैं।
रंगों को उपयोग मात्र उनकी पहचान करने तक सीमित नहीं है, वरन् उन्हें देखने से उस विशेषता की सहज उपलब्धि हमें होती है जो सूर्य शक्ति से उन पदार्थों ने अपने भीतर जमा की है। हरियाली को ही लें। पेड़−पौधे, घास−पात हरे रंग के होते हैं। उन्हें देखने से आँखों को प्रसन्नता मिलती है। गर्मी के दिनों में हरियाली के समीप पहुँचने पर जी प्रसन्न होता है। यह अकारण ही नहीं है। हरे रंग में वह गुण है जिससे गर्मी के आतप का समाधान हो सके।
सर्दियों में आग की गर्मी से दूर रहने पर भी उसकी दूरवर्ती सिन्दूरी आभा मन पर गरम प्रभाव डालती है, ठण्ड से बचने में उसका दर्शन भी बहुत राहत पहुँचाता है। आग के निकट पहुँचकर उसकी गर्मी का लाभ तो मिलता ही है; उसका सिन्दूरी रंग भी कम उत्साह उत्पन्न नहीं करता सिन्दूरी रंग में सूर्य की ऊष्मा का बाहुल्य अनुभव होता है।
बच्चों के अंग−प्रत्यंगों पर कोमलता सूचक आभा, किशोरों के कपोलों का गुलाबीपन, वृद्धावस्था में त्वचा का बदलता हुआ चाकलेटीपन यह बताता है कि प्रकृति उन्हें किन उपहारों से लाद रही है अथवा क्या−क्या वापिस लेकर उसकी जगह पर क्या स्थानान्तरण कर रहीं है। सौंदर्य और कुरूपता का बहुत कुछ लेखाजोखा इसी आधार पर मिलता जाता है।
अमेरिकी डाक्टर अर्नेस्ट ने मानव शरीर के विभिन्न अंगों में घटते−बढ़ते रंगों को देखकर उसकी आन्तरिक स्थिति जानने का विज्ञान विकसित किया है। कनाडा के डाक्टर सेलिट ने भी इस संदर्भ में लम्बी खोज की है और रोगियों की त्वचा, आँखें, नाखून, जीभ, मल−मूत्र आदि का रंग देखने भर से यह जानने में सफलता प्राप्त की है कि उनकी आन्तरिक स्थिति क्या है और किस रोग ने उन्हें किस हद तक जकड़ रखा है।
जिस प्रकार एलोपैथी में कीटाणु परीक्षण, होम्योपैथी में विष विस्तार, आयुर्वेद में त्रिदोष परिचय वायोकैमी में लवण विश्लेषण को आधार माना गया है, उसी प्रकार रंग विज्ञान को क्रोमोपैथी नाम दिया गया है। इस विद्या का विस्तार और अन्वेषण क्रमशः अधिक तत्परतापूर्वक हो रहा है। किस रंग की कमी किस रोगी के शरीर में है और उसके लिए उसी रंग की किरणों का—उससे प्रभावित पदार्थों का सेवन संपर्क कराया जाय, इस सम्बन्ध में जितने प्रयोग हुए हैं उनसे उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं।
वस्त्रों को रंगना, दीवारों को पेन्टों से पोतना, खिड़कियों में पर्दे लगाना, आँखों पर रंगीन चश्मा पहनना, खाद्य पदार्थों में अभीष्ट रंग की वस्तुओं का चयन करना तथा रंगीन काँच के नीचे रुग्ण स्थान को रखकर उस पर उसी रंग की सूर्य किरणें पड़ने देना जैसे उपचारों को इस विज्ञान में प्रमुखता दी गई है। ऐसे कमरे बनाये गये हैं जिनकी छतों एवं खिड़कियों में रोगी की स्थिति के अनुरूप रंगीन काँच बदल दिये जाते हैं फलतः सारे कमरे में उसी रंग की धूप आती है जिसकी कि रोगी के शरीर में कमी पड़ रही थी। यदि रंगों की न्यूनाधिकता का निदान सही हो सकता तो इस उपचार से रोग निवृत्ति में आश्चर्यजनक सफलता मिलती है।
एक वर्ष अमेरिका के एक क्षेत्र में पानी कम बरसा, पशुओं को हरी घास न मिल सकी। पिछले वर्ष की सूखी घास उन्हें दी गई तो वे देखने भर से उसे खाने में आनाकानी करने लगे इस पर उनकी आँखों पर हरे रंग के चश्मे चढ़ा दिये गये। अस उन्हें वह सूखी पीली घास हरी दीखने लगी और मजे−मजे में खाने लगे। गर्मी की ऋतु में हरे और नीले चश्मे पहनकर कड़ी धूप में हम निकलते हैं और उतनी गर्मी अनुभव नहीं करते। इसे रंगों का चमत्कार ही कह सकते हैं। कमरों की दीवारें हलके हरे या नीले रंग मिले चूने से पोती जाने का रिवाज है इससे आँखों को राहत मिलती है। यदि गहरा लाल या काला रंग पोत दिया जाय तो वे ही दीवारें न केवल डरावनी मालूम पड़ेंगी वरन् वहाँ रहने वालों को बुरे सपने लाने से लेकर स्वभाव में चिड़चिड़ापन उत्पन्न होने तक के अनेक विकार उत्पन्न करेंगी।
पीला रंग पाचक, नीला शीतल शान्तिदायक, लाल ऊष्मा प्रधान गरम माना गया है। यह तीन रंग मुख्य हैं इन्हीं के सम्मिश्रण से अन्य हलके भारी रंग बनते हैं। शरीर की स्थिति एवं आवश्यकतानुसार रंगीन काँचों में छानकर रुग्ण अंग पर उसी रंग की सूर्य किरणें ली जा सकती हैं।
सामान्यतया सूर्य के संपर्क में रहना ही अच्छा है। असह्य तेज धूप में फिरने की तो आवश्यकता नहीं है, पर अपना निवास एवं कार्य क्षेत्र ऐसे स्थानों में ही रखना चाहिए जहाँ सूर्य किरणों का उन्मुक्त आवागमन होता रहे। खुली वायु और सूर्य किरणों के संपर्क में रहकर हम पौष्टिक भोजन जितना ही आरोग्य लाभ कर सकते हैं।
गाँधीजी के सामने डाक का ढेर लगा था। वह आये हुए प्रत्येक पत्र को ध्यान से पढ़ते जाते और जो हिस्सा कोरा होता उसे कैंची से काट कर अलग रख लेते। एक सज्जन वहीं पास में बैठे थे और बहुत देर से गाँधीजी की कतरनी देख रहे थे। उन्होंने बहुत आश्चर्य से पूछा—’मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप इन कतरनों को एक ओर एकत्रित कर क्यों रखते जा रहे हैं? इनका क्या उपयोग है?’
‘मुझे जब पत्रों के उत्तर देने होते हैं तब में इन्हीं कतरनों का उपयोग करता हूँ। यदि ऐसा न करूं तो यह कागज बेकार हो जायेंगे और इससे दो प्रकार की हानियाँ होंगी, एक तो अनावश्यक खर्च में वृद्धि हो जायेगी और दूसरे राष्ट्रीय सम्पत्ति नष्ट होगी। किसी देश में जितनी वस्तुएँ होती हैं वह सब उस देश की सम्पत्ति मानी जानी चाहिए। हमारा देश निर्धन है। ऐसी स्थिति में हमें धन का दुरुपयोग न करना चाहिए।’
‘अखण्ड−ज्योति’ को निकलते 37 वर्ष पूरे होने को है। इस लम्बी अवधि में उसे ऐसे संकट का सामना कभी नहीं करना पड़ा जैसा इन दिनों उपस्थित है। इसे एक प्रकार से जीवन−मरण की समस्या कह सकते हैं।
पिछले कुछ ही समय में कागज के दाम तीन गुने बढ़ गये। छपाई की लागत ढाई गुनी जा पहुँची। मजदूरी हर काम की बढ़ी है। पोस्टेज बढ़ गया। इन सब बढ़ोतरियों को जोड़ने से अखण्ड−ज्योति की मूल लागत दूनी हो गई। गत वर्ष चन्दा 7) था अब उस पर खर्च 14) आता है। गत वर्ष एक रुपया बढ़ाया भी था सात से आठ किये थे, पर वह तो जलते तवे पर पानी की एक बूँद की तरह जल गई उससे लागत और बिक्री का सन्तुलन बनाने में रत्तीभर भी सहायता नहीं मिली। गत वर्ष सोचा गया था महंगाई तात्कालिक है। अगले दिनों दाम गिरेंगे तो सन्तुलन बन जायगा, पर आशा के सर्वथा विपरीत मूल्य वृद्धि का क्रम दावानल की तरह बढ़ता चला गया।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि अखण्ड−ज्योति सदा से लागत से कुछ कम मूल्य पर ही दी जाती रही है। उसका अपना कुछ प्रकाशन रहा है जिसमें रहने वाले लाभाँश से उस कमी की पूर्ति करते रहने की नीति बनी चली आ रही है। लागत से कभी भी उसका चंदा अधिक नहीं रखा गया। अन्य पत्र पत्रिकाएँ अपनी आय विज्ञापनों से बढ़ाते हैं। अपनी नीति वह भी नहीं रखी गई। विज्ञापनदाता कोई दानी तो होते नहीं। विज्ञापन छपाने से जो आमदनी होती है उसका एक अंश छपाई में दे देते हैं। पाठकों को दुहरा बोझ पड़ता है। विज्ञापनदाता पत्रिका के पाठकों से खूब कमाते हैं। इस आमदनी में मूल्य अत्यधिक रखने और कई बार तो हानिकारक बेकार चीजों को बहुत लाभदायक बताकर पाठकों के गले मढ़ दिया जाता है। इसमें माध्यम पत्र बनते हैं। ‘विज्ञापनदाता ने बेचा—पाठकों ने खरीदा—इसमें किसने कमाया, किसने खोया इसमें हमारा क्या दोष?’ यह कहकर पत्रिकाएँ अपने दोष से मुक्त नहीं हो सकती। दलाली की भूमिका तो उन्होंने निभाई।
अखण्ड−ज्योति अपने प्रिय पाठकों के हितों की अपने आपको संरक्षक मानती रही है। उसे अवाँछनीय दलाली की आमदनी स्वीकार नहीं। इसलिए विज्ञापन आरम्भ से ही नहीं लिए गये और उस नीति को अंत तक नहीं लाया जायगा भले ही पत्रिका बन्द क्यों न करनी पड़े। इसी प्रकार दान संग्रह करके—किसी से लेना किसी को देना हमें पसन्द नहीं। पाठकों को उचित मूल्य देकर उपयोगी वस्तुएँ खरीदने की आदत डालना एक स्वस्थ परम्परा है। दान के आधार पर सस्ती की गई चीजें खरीदार को भिक्षुक के स्तर पर ला बिठाती है। समर्थ व्यक्तियों के लिए इस प्रकार का लाभ उठाना अनैतिक है। अखण्ड−ज्योति का आदर्शवाद इस बात के लिए भी इजाजत नहीं देता कि सम्पन्न लोगों से धन लेकर पत्रिका का घाटा पूरा किया जाय। उसने अपने ही साधनों से एक मद की कमी दूसरी मद से पूरी करने की पद्धति अपनाई। पुस्तकों के लाभाँश से पत्रिका से रहने वाला घाटा पूरा किया। यह अन्तर्व्यवस्था है। दोनों के खरीदार एक ही थे। इस प्रकार पत्रिका पुस्तकें मिलाकर लागत का सन्तुलन बनाया जाता रहा। पर अब तो वैसी स्थिति भी नहीं रही। क्या पुस्तकें क्या पत्रिकाएँ सभी की मूल लागत एक से अनुपात से बढ़ी हैं, अस्तु पुस्तकों का लाभाँश भी समाप्त हो गया।
अब विकल्प दो ही हैं या तो पत्रिका बन्द कर दी जाय या उसका मूल्य उतना बढ़ाया जाय जो लागत के लगभग समीप जा पहुँचे। इस दृष्टि से मूल्य 14) किया जाना चाहिए।
अपनी ओर से इस बढ़ोतरी की घोषणा आसानी से की जा सकती है। पर प्रश्न पाठकों की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले दबाव का भी है। इस कमरतोड़ महँगाई ने उस नीचे मध्य वर्ग के जिसके सदस्य अधिकाँश अखण्ड−ज्योति पाठक हैं—बेतरह अर्थ संकट में फँसा दिया है। लगातार मिशन की प्रेरणाओं ने उन्हें अनुचित कमाई से भी विरत कर दिया है। ईमानदारी की आमदनी सीमित होती है उसमें आवश्यक खर्चों का जुटाना ही कठिन पड़ रहा है। लोगों को भोजन, वस्त्र जैसी प्रारम्भिक निर्वाह आवश्यकताओं में भी कटौती करनी पड़ रही है और जीवित रहने के लिए सौ प्रकार सोचना पड़ रहा है। ऐसी दशा में अखण्ड−ज्योति का चन्दा भी बढ़े तो फिर उनकी कठिनाई और भी बढ़ सकती है। कटौती की कैची पत्रिका न मँगाने के रूप में भी चल सकती है।
ग्राहक संख्या घट सकती है। ऐसी दशा में बढ़ा हुआ चन्दा भी आर्थिक सन्तुलन बना सकने में समर्थ न हो सकेगा। एक और मूल्य तो बढ़े पर दूसरी ओर ग्राहक संख्या घट जाय तो फिर घाटा जहाँ का तहाँ बना रहेगा। अर्थशास्त्र का सर्वविदित सिद्धान्त है कि वस्तुओं का उत्पादन जितने बड़े पैमाने पर होगा उतनी ही लागत का अनुपात कम पड़ेगा। कम तादाद में बनाई गई चीजों की लागत बढ़ जाती है। वही बात अखण्ड−ज्योति पर भी लागू होगी चन्दा बढ़ाने से ग्राहक घटे तो वह बढ़ाना भी निरर्थक चला जायगा। मूल्य बढ़ाने से एक ओर पाठकों पर पड़ने वाले दबाव का संकोच दूसरी ओर ग्राहक घटने की आशंका का भय। दोनों स्थितियों पर विचार करने से असमंजस जहाँ का तहाँ बना रहता है। समस्या का हल निकलता नहीं।
एक ओर कुँआ दूसरी ओर खाई के बीच खड़े हुए असमंजस की घड़ी में अन्ततः एक ही दुस्साहस करने का निष्कर्ष निकाला है कि चन्दा बढ़ा दिया जाय और पाठकों की रुचि एवं निष्ठा को कसौटी पर चढ़ने दिया जाय। उन्हें हर वस्तु का बढ़ा हुआ मूल्य देकर ही अपना निर्वाह चलाना पड़ रहा है यदि अखण्ड−ज्योति उन्हें आवश्यक और उपयोगी प्रतीत होगी तो वे उसे लेंगे। यदि वह ऐसे ही कूड़ा−कचरा है—अनावश्यक और भार रूप है तो फिर वे मँगाना बन्द कर ही देंगे कटौती की मद में आने वाली अन्य अनावश्यक चीजों में से एक इस पत्रिका को भी मान लेंगे। इस प्रकार न केवल पाठकों की आन्तरिक रुचि का भी पता चल जायगा, वरन् यह भी सिद्ध हो जायगा कि हम अपने स्तर के बारे में जो सन्तोष और गर्व की भाषा में सोचते हैं वह मान्यता वास्तविक है या अवास्तविक। यदि अखण्ड−ज्योति अपनी इतनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर सकी कि उसे पाठक अपनी अत्यन्त आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में गिन सकें और जिस प्रकार हर आवश्यक वस्तु को बढ़ा मूल्य देकर खरीदते हैं उसी प्रकार इस पत्रिका के ग्राहक भी रह सकें तो फिर यही समझा जायगा कि निरर्थक वस्तुएँ जिस प्रकार काल चक्र का आघात न सह सकने के कारण नष्ट हो जाती है उसी प्रकार अखण्ड−ज्योति को भी बन्द हो जाना चाहिए। इस वर्ष प्रयोग परीक्षण इसका भी कर लिया जाय। कसौटी पर वस्तुस्थिति की परख लिया जाय। बन्द करना तो आसान है। इस वर्ष न सही अगले वर्ष वैसा किया जा सकता है।
इन्हीं अनेक उलझनों में से गत पिछले दिनों उलझे रहने के उपरान्त अब यही निश्चय किया गया है कि मूल्य बढ़ाने के अतिरिक्त जीवित रहने का जब कोई चारा ही नहीं तो उसे बढ़ाया ही जाय। लागत 14) आती है उतना न सही पर न्यूनतम 12) तो करना ही पड़ेगा। दो रुपया घटी की पूर्ति पुस्तक आदि के प्रकाशन पर फिर ध्यान देकर की जा सकेगी ऐसा सोचा गया है। इस अंक से पत्रिका का बढ़ा हुआ मूल्य बारह रुपया वार्षिक माना जायगा। पाठक नोट करलें। नये ग्राहकों को तो अक्टूबर 74 के वर्तमान अंक से ही यह वृद्धि लागू होती है, पर पुराने चालू ग्राहकों पर यह वृद्धि जनवरी 75 से ही लागू होगी। इस वर्ष के शेष अंक पुराने हिसाब से ही उन्हें मिलेंगे। सन् 75 का चन्दा उन्हें 12) ही देना होगा।
एक सुझाव यह भी था कि पृष्ठ घटा दिये जाँय, पर वह भी गले नहीं उतरा। क्योंकि पाठकों को जो अगले दिनों देने की योजना बनाई गई थी उसमें पृष्ठ संख्या की वृद्धि आवश्यक थी। युग की आवश्यकताओं के अनुरूप तात्विक और तथ्यपूर्ण चिन्तन एवं प्रतिपादन और भी अधिक गम्भीरता एवं विस्तार के साथ किया जाता है। अभी अधिक सोचे, अधिक लिखे और अधिक पढ़े जाने की आवश्यकता में कमी नहीं की जा सकती, बढ़े हुए बुद्धिवाद और विज्ञान ने जो असंख्यों विसंगतियाँ, विभूतियाँ और विडम्बनाएँ रचकर खड़ी कर दी हैं, उन्हें निरस्त करने के लिए प्रखर चिन्तन और प्रतिपादन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। उसमें भी कटौती नहीं की जा सकती। चिह्न पूजा के लिए तो अखण्ड−ज्योति निकल नहीं रही है। सैकड़ों पत्र−पत्रिकाओं की भीड़ के एक सदस्य बने रहने की उसकी तनिक भी इच्छा नहीं है। पत्रिका निकालने के लिए निकालना—यह निरर्थक नीति हमें तनिक भी पसन्द नहीं। पन्ने घटा कर इतना ही हो सकता है कि यह समझा जाता रहे कि अखण्ड−ज्योति निकलने के लिए निकल रही है—जीवित है। पर उसमें जो प्रतिपादन रहते हैं, रहने चाहिएँ—वे जो रह ही नहीं सकेंगे। क्षीण कलेवर होने पर वह निस्तेज हो जायगा। उसकी प्रखरता, प्रतिभा, तेजस्विता एवं गरिमा नष्ट हो जायगी। हम बार−बार पृष्ठ बढ़ाने की ही बात सोचते रहे हैं, घटाने की बात तो उसे बन्द करने जैसी ही कष्टकारक लगती है। पिछले दिनों की अपेक्षा अगले दिनों कहीं−कहीं अधिक कहना और लिखना है। पृष्ठ घटा देने पर तो वे सारी उमंगें ही नष्ट हो जायेंगी।
इस संक्रान्ति वेला में जबकि चन्दा बढ़ाया गया है एक और दुस्साहस किया गया है कि आठ पृष्ठ बढ़ा दिये गये हैं। यह अंक 56 पृष्ठ का है जबकि पिछले अंक 48 पेज के निकलते रहे हैं। इन बढ़े हुए आठ पृष्ठों का अधिक मूल्य नहीं जोड़ा गया है। यदि वह भी जोड़ा जाता तो मूल्य 16) जा पहुँचता। यदि 56 पृष्ठों पर 12) तो 48 पृष्ठों पर 10) के करीब ही पड़ते हैं। यदि 48 पृष्ठ की ही पत्रिका निकलती रहती तो यह वृद्धि अनुपात 10) ही पड़ता। पर यह अतिरिक्त दुस्साहस ही प्रयत्न किया जायगा कि इसे कायम रखा जा सके। यह अतिरिक्त प्रयोग इस बात पर टिका हुआ है कि अगले दिनों और अधिक महँगाई बढ़ती है या नहीं। यदि वस्तुओं के वर्तमान मूल्य ही बने रहें तो फिर अतिरिक्त घाटा उठाते रहकर भी 56 पृष्ठ ही चालू रखे जा सकेंगे। जहाँ मूल्य वृद्धि से पाठकों को असन्तोष होगा वहाँ उन्हें इस बात का सन्तोष भी होगा कि अधिक पाठ्य सामग्री मिलने का अतिरिक्त लाभ मिलना भी आरम्भ हो जायगा।
इस संक्रान्ति वेला में परिजनों के कन्धों पर अतिरिक्त उत्तरदायित्व आया है। वे स्वयं ग्राहक रहने और दूसरों को बनाने का प्रयास तो सदा ही करते रहे हैं। इस सघन आत्मीयता भरी निष्ठा से ही अब तक की प्रगति चलती रही है। किसी समय कुछ सौ ही निकलने वाली पत्रिका अब इतनी अधिक छपती है जिसकी तुलना में धार्मिक पत्रों में एक ‘कल्याण’ ही ठहरता है। अन्य सभी को उसने योजनों पीछे छोड़ दिया है। इसमें परिजनों की निष्ठा, तत्परता एवं चेष्टा ही प्रधान कारण रही है। उनके उत्साह एवं परिश्रम ने ही उसका प्रकाश क्षेत्र इतना अधिक बढ़ाया और यह स्थिति की है कि उसका अनुवाद गुजराती युग−निर्माण योजना, मराठी युग−निर्माण योजना, अंग्रेजी युग−निर्माण योजना, उड़िया युग−निर्माण योजना के नाम से अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित होता रहे। यदि महंगाई का वर्तमान सर्वभक्षी संकट सामने न आता तो अब तक भारत की चौदहों मान्यता प्राप्त भाषाओं में उसका प्रकाशन आरम्भ हो गया होता और देश के कोने−कोने में इस प्रकाश प्रेरणा का आलोक जाज्वल्यमान हो रहा होता।
जिन परिजनों ने स्वेच्छा से, आत्म−प्रेरणा से पिछले वर्षों में इतना अनवरत श्रम किया है उनसे इस संक्रान्ति वेला में कुछ विशेष अनुरोध करने का भी साहस किया जा सकता है। इस बार बढ़े हुए मूल्य के संदर्भ में इस बात का पूरा खतरा सामने प्रस्तुत है कि ग्राहक संख्या घट जाय।
जो बहुत समय पुराने हैं और जिन्हें उसकी गरिमा का रसास्वादन होने लगा है वे बारह रुपया तो क्या अपने कपड़े बेचकर भी कितना ही बढ़ा−चढ़ा मूल्य चुका सकते हैं। पर जो अभी पिछले ही साल ग्राहक बने हैं जिन्होंने अभी नियमित रूप से पढ़ना भी आरम्भ नहीं किया है उन्हें मूल्य वृद्धि जरूर अखरेगी और वे टूट जायेंगे। इस टूट−फूट में ग्राहक संख्या घटने से कम उत्पादन पर लागत बढ़ने के कारण पत्रिका का घाटा मूल्यवृद्धि के बावजूद पूर्ववत् बने रहने का खतरा है। वहाँ दूसरी ओर प्रकाश क्षेत्र, प्रभाव क्षेत्र घट जाने से मिशन के एक छोटे दायरे में हाथ−पैर बँधकर, सिमट कर रह जाने का भी संकट सामने है। यह अर्थ असन्तुलन से भी बड़ा खतरा है।
पुराने मात्र परिजन ही ग्राहक रह जाँय और नये क्षेत्र की पकड़ हाथ से निकल जाय तो भी उसे एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ही माना जायगा। इस दुहरे संकट की घड़ियों में अखण्ड−ज्योति के निष्ठावान सदस्यों को दूने उत्साह और चौगुने परिश्रम के साथ काम करना होगा। यह वर्ष उनके परिश्रम की निष्ठा की वैसी ही कसौटी लेकर सामने आ खड़ा हुआ है, जिस तरह हमारे सामने निकालते रहने का, बन्द कर देने का असमंजस। हम दोनों को ही इस चुनौती का सामना करना चाहिए। शिथिलता किसी भी पक्ष में नहीं आनी चाहिए। हम अपनी पूरी जागरूकता को समेटकर प्रकाशन सम्बन्धी अड़चनों से जूझेंगे उसे यथावत् ही अधिक सुन्दर, अधिक उपयोगी बनाने का प्रयत्न करेंगे। ताकि मिशन की प्रखरता और व्यापकता को अधिक विस्तृत होने का अवसर मिले।
किन्तु यह सब एक पक्ष ही नहीं कर सकता। हमारे प्रयास ही पर्याप्त नहीं होंगे। उसे जीवित रखने और व्यापक बनाने का कार्य वस्तुतः परिजनों के कंधों पर ही है। वर्तमान सदस्यों को बनाये रहना और नयों को पकड़ते रहना उन्हीं का काम है। अब तक यही होता रहा है इस वर्ष तो उस सक्रियता की अनेक गुने साहस के साथ आगे बढ़ाना है। कीचड़ में गहरी फँस गई गाड़ी के पहियों को आगे बढ़ाने के लिए कई व्यक्ति मिल−जुलकर जिस प्रकार जोर लगाते हैं—लगभग उसी स्तर का प्रयास इस वर्ष अपेक्षित है। इस समय की पुकार में एकाएक अखण्ड−ज्योति के सदस्यों को लगना चाहिए। संकट इससे कम में पार नहीं हो सकता। इस वर्ष एक भी परिजन की शिथिलता भारी पड़ेगी। उन्हें यह मानकर चलना है कि संशय की कमी—रुचि की न्यूनता—आर्थिक कठिनाई आदि जो भी कारण पत्रिका न मँगाने के लिए विवश करें उनमें से प्रत्येक को निरस्त करेंगे और इस संकट के वर्ष में और किसी कारण न सही इतने उपयोगी मिशन को जीवित रखने की दृष्टि से ही सही अपनी सदस्यता चालू रखेंगे। उसे किसी भी कारण बन्छ नहीं करेंगे।
दूसरा कर्त्तव्य यह होना चाहिए—अपने निजी परिचय और प्रभाव क्षेत्र में जहाँ गुंजाइश हो वहाँ तीखी नजर डाली जाय और उनमें से कुछ को अखण्ड−ज्योति का नया सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा जाय। यदि सावधानी और इच्छा होगी तो इस दिशा में थोड़ी बहुत सफलता अवश्य मिलेगी। कुछ तो नये ग्राहक अवश्य ही मिल जायेंगे। यह थोड़ा सा मनोयोग, थोड़ा सा प्रयास अखण्ड−ज्योति के युगान्तरकारी मिशन को जीवित रखने और उसे आगे बढ़ने के लिए उसका पथ−प्रशस्त करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।
बढ़ी हुई महंगाई के कारण अखण्ड−ज्योति के सामने प्रस्तुत जीवन मरण जैसे संकट से जूझने के लिए हमें आपत्तिकालीन धर्मयुद्ध की तरह जूझना चाहिए। हमारे बलबूते में जो कुछ है उबरने के लिए पूरा−पूरा प्रयास कर रहे हैं। परिजनों से उनके कर्त्तव्य पूरा किये जाने की प्रबल आशा रखते हैं। संकट से पार होने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि परिजन भी अपने प्रस्तुत परम पवित्र कर्त्तव्य का पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ पालन करें। यह आशा−निराशा नहीं बनेगी ऐसा विश्वास किया जाता है।
*समाप्त*