समुद्र मंथन के तीन दिव्य रत्न

जीवन समुद्र का मंथन करने पर हमारे हाथ तीन रत्न ही लगते हैं (1)प्रेम की साध (2)ज्ञान की खोज और (3)पीड़ित मानवता के प्रति असह्य करुणा। इन तीनों के जितने अमृत कण हमारे हाथ लगते हैं हम उतने ही धन्य बनते हैं।

एकाकीपन की ऊब—कठोर परिश्रम की थकान और उतार−चढ़ावों के विक्षोभों से भरी इस जिन्दगी में सरसता केवल प्रेम में है। समस्त सुख सम्वेदनाओं की अनुभूति एकदम एक ही केंद्र पर एकत्रित है। प्रेम की पुलकन ही आनन्द भरे उल्लास में परिणत होती है। प्रेमी बनकर भले ही हमें कुछ खोना पड़े पर जो पाते हैं वह खोने से लाख करोड़ गुना अधिक होता है।

सत्य महान् है। मनुष्य क्रमशः उसके उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है। जो अब तक जाना जा सका वह अद्भुत है, पर इससे क्या जो जानने को शेष पड़ा है वह अनन्त है। सत्य को जानने खोजने और पाने के प्रयासों में ही अब तक की विविध उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। आगे इसी प्रयास में खुले मस्तिष्क से लगे रहेंगे तो उसे भी प्राप्त कर सकेंगे जो अब तक प्राप्त नहीं किया जा सका।

संसार में सुख न हो सो बात नहीं, पर पीड़ाएँ भी बहुत हैं। अज्ञान और पतन की भटकन कितनी कष्टकर है इस पर जो सहृदयतापूर्वक विचार करेगा उसकी करुणा उमड़े बिना न रहेगी। आत्मा स्वर्ग से उतर कर इस पृथ्वी पर रहने के लिए इसीलिए तो आया है कि वह करुणार्द्र होकर कष्ट पीड़ितों की सेवा करते हुए मानव जीवन का आनन्द ले सके।


केवल औचित्य का मार्ग ही अपनावें

महत्ता इस बात की नहीं कि सफलता कितनी बड़ी पाई गई। गरिमा इस बात की है कि उसे किस प्रकार पाया गया। अनीति का मार्ग अपनाकर कोई सफलता अधिक बड़ी मात्रा में और अधिक जल्दी पाई जा सकती है, जबकि नीति का मार्ग अपनाकर चलने से उसमें देर भी लगेगी और मात्रा भी सीमित रहेगी।

अधीर व्यक्ति जल्दी और अधिक पाने की बात सोचते हैं और इसी के लिए किसी भी रास्ते कुछ भी कर गुजरने के लिए आतुर रहते हैं। सम्भव है तात्कालिक लाभ की दृष्टि से वे सफल भी रहें और बुद्धिमान भी समझे जाये, पर अन्ततः यह सौदा बहुत महंगा पड़ता है। ऐसी उपलब्धियाँ स्वयं ही पानी के बबूले की तरह नष्ट हो जाती हैं और उस उपार्जनकर्त्ता को भी साथ ले डूबती है।

इतिहास के पृष्ठों पर ऐसे अनेक नाम हैं जो आँधी तूफान की तरह उभरे और झाग की तरह तली में बैठ गये। रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, चंगेजखाँ, नादिरशाह, सिकन्दर, हिटलर आदि के कितने ही नाम ऐसे हैं जिन्हें अपने समय का सफल मनुष्य कहा जा सकता है। उनकी सफलताएँ अपेक्षाकृत अधिक भी थीं और बड़ी भी। किन्तु उनसे क्या बना? सफलताएँ उन्हें महंगी पड़ीं। जो कमाया था वह चला गया, अपना भी दुखद अन्त हुआ—आतंकवाद के आधार पर उपार्जित किया गया, बड़प्पन देर तक न टिका, उसका स्थान चिरस्थायी अपयश ने ले लिया। उत्पीड़ितों और शोषितों का करुण–क्रन्दन अनन्त काल तक उनकी आत्मा को नोंचता−कोंचता रहेगा। तस्कर डाकू और छली बात की बात में प्रचुर धन प्राप्त कर लेते हैं, पर वह धन उनकी सुख−शान्ति में तनिक भी सहायता कर सका हो ऐसा कहीं नहीं देखा गया।

सफलताएँ अपने आप में कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। एक से एक बड़ी सफलताएँ पाने वाले लीग इस संसार में हो चुके हैं और होंगे—उनकी तुलना में हमारी सफलता का मूल्य तुच्छ है। ऐसी छुटपुट सफलताएँ और असफलताएँ तो कोई भी कभी भी पाता रहता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सफलता किस रास्ते—किस उपाय से प्राप्त की गई। वस्तुतः वह उपाय या मार्ग ही प्रशंसा अथवा निन्दा का केन्द्रबिन्दु होता है। इसी के आधार पर व्यक्तित्व और कर्तव्य की परख होता है। निन्दा प्रशंसा की आधारभूत पृष्ठभूमि वह प्रक्रिया ही है जिसे सफलता की मंजिल पर चलते हुए अपनाया गया।

न्याय का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वाले में से कितने ही ऐसे भी होते हैं जिन्हें घोर कष्ट सहने पड़ें और असफलता ही पल्ले पड़ी। ऐसे लोगों का उपहास नहीं उड़ाया जाता—उनकी भर्त्सना भी नहीं की जाती वरन् त्यागी, बलिदानी, शहीद, आत्मदानी आदि के नाम से सम्बोधित किया जाता है। चिरकाल तक उनकी स्मृतियाँ मनाई जाती हैं और चरणों पर श्रद्धाँजलियाँ चढ़ाई जाती हैं। यदि सफलता ही प्रशंसा का आधार रहा होता तो इन असफल व्यक्तियों को यह चिरस्थायी प्रतिष्ठा क्यों मिलती? तब ऐसे कार्यों में लोग हाथ क्यों डालते जिसमें स्पष्टतः विपत्ति को आमन्त्रण देने की बात सामने होती है।

सफलता की ही प्रशंसा होती हो अथवा उसी से अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध होता हो ऐसी बात नहीं। विकट परिस्थिति से जूझते हुए यदि असफलता भी हाथ लगे तो वह साहसिक संघर्षशीलता और उसके पीछे छिपी हुई चरित्र निष्ठा उस मनुष्य का व्यक्तित्व निखारती है और प्रामाणिकता सिद्ध करती है।

महत्वपूर्ण बात एक ही है कि हम जिस भी दिशा में चलें रास्ता न्यायोचित और मानवी मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए। औचित्य को अपनाये रहकर असफल रहना उससे कहीं अच्छा है जिसमें अनीति अपनाकर सफलता प्राप्त की जाती है।


जीवन विकास का चक्र क्रम

रेखागणित के दो महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं (1)रेखा (2)चक्र। रेखा उसे कहते हैं जो एक स्थान से आरम्भ होकर दूसरे स्थान पर समाप्त होती है। उदाहरण के लिए लाठी। यह एक रेखा है उसका आदि और अन्त दो सिरों के रूप में देखा जा सकता है चक्र वह है जिसका कहीं आदि अन्त नहीं। गाड़ी का पहिया या गेंद उसका उदाहरण है। उसका आदि कहाँ है और अन्त कहाँ, यह बताया नहीं जा सकता। यदि बताया जायगा तो जहाँ आदि होगा वहीं उसके साथ बिलकुल सटा हुआ—सर्वथा अविछिन्न अन्त भी जुड़ा रहेगा।

विकासवाद का प्रतिपादन जीवन को ‘रेखा’ की तरह आदि अन्त युक्त सिद्ध करने का है। ‘अमीबा’ सरीखे एक कोशीय जीवों के रूप में प्राणी का आरम्भ हुआ और वह मछली, मेंढक, सरीसृप, शूकर, बानर आदि के रूप में विकसित होते हुए मनुष्य बना। यदि यह सही माना जाय तो भावी विकास की वैसी ही विशालकाय कल्पना करनी पड़ेगी। अमीबा और मनुष्य की शारीरिक, मानसिक स्थिति में जितना अन्तर है कम से कम उतना अन्तर तो आज के मनुष्य और भविष्य के मनुष्य में रहेगा ही। वह विशालकाय शरीर वाला और असीम सम्भावनाओं युक्त मन वाला मनुष्य आखिर कितने बड़े आकार−प्रकार का होगा यह सोचना बहुत कठिन मालूम पड़ता है। सृष्टि के अन्त तक वह मनुष्य प्राणी कितना विस्तृत हो जायगा, यह कल्पना करते−करते सिर चकराने लगता है। फिर अन्य प्राणियों का भी तो उनकी जाति परिधि में विकास होना है। तब सृष्टि के अन्त तक आज के अनेकानेक जीवधारी कितने बड़े हो जायेंगे। उनकी स्थिति कितनी विस्तृत, कितनी समुन्नत हो जायगी। यह एक ऐसी विचित्र सम्भावना है जो गले नहीं उतरती। जिनने भूतकाल से लेकर वर्तमान तक की कल्पना कर ली उन्हें कृपापूर्वक यह क्रम आगे भी जारी रखना चाहिए था और यह भी बताना चाहिए था कि इस विकास क्रम का भविष्य कहाँ है उसका दूसरा सिरा कहाँ जाकर पूर्ण होगा।

हमारे पूर्वज बन्दर थे। बन्दर ने अपनी अनावश्यक पूँछ उखाड़ फेंकी। हमें भविष्य में अपने वर्तमान अवयवों में से क्या−क्या उखाड़ फेंकने होंगे यह बताया जा सका होता तो अधिक अच्छा होता। नाक, कान तो बिल्कुल ही बेकार है। दो आँखों की जरूरत भी एक से ही पूरी हो सकती है। हाथी जब एक सूंड से अपना हाथ का काम चला सकता है तो मनुष्य ही दो हाथों का दूना भार क्यों लादे फिरे? पैर इतने लम्बे होने से बहुत बेतुके हैं। छोटे गाड़ी के पहियों की तरह वे हों तो छोटी चारपाई, छोटा बिस्तर, छोटा मकान बनाकर काम चलाया जा सकेगा। साँप की तरह चिकना शरीर हो तो पेट के बल रेंगना भी क्या बुरा है? पक्षी की तरह उड़ने में आदमी को सुविधा रहेगी। जब पानी में से निकल कर थल पर चलने में विकासवादी मनुष्य सफल हो गया तो उसे थलचर से नभचर बनने में क्यों सुविधा अनुभव न होगी? यदि सुविधा−असुविधा की दृष्टि से जीव अनावश्यक अंगों को उखाड़ कर फेंक सकता है और दूसरे उपयोगी अवयव उठा सकता है तो वह सिलसिला पूँछ उखाड़ फेंकने तक ही क्यों समाप्त होना चाहिए। वर्तमान शरीर में जो असुविधाजनक है उसे हटाने और सुविधाजनक उत्पादन का प्रयास क्यों नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा सम्भव हो तो निश्चय ही अब की अपेक्षा मनुष्य की काया में—आकृति−प्रकृति में—जमीन−आसमान जितना परिवर्तन करने की गुंजाइश प्रतीत होगी। तब उस स्वेच्छया निर्माण से मनुष्य निश्चित रूप से इस कलेवर को सर्वथा बदल डालेगा, जिसमें वह आज जकड़ा हुआ है।

जीवन सत्ता के बारे में हमारा दार्शनिक प्रतिपादन इन विकासवादियों से सर्वथा भिन्न है। तत्व−दर्शन ने जीवन को एक चक्र माना है जिसका न आदि है न अन्त। वह गोल घेरे की तरह है जिसका यदि आदि अन्त मानना हो तो दोनों को एक दूसरे के साथ बिलकुल सटा हुआ ही कहना पड़ेगा।

अण्डे में से पक्षी उत्पन्न हुआ या पक्षी से अण्डा जन्मा? बीज से वृक्ष उत्पन्न हुआ या वृक्ष में बीज उगाया? नर से नारी उत्पन्न हुई या नारी ने नर का जना? मरण के बाद जन्म हुआ या जन्म के उपरान्त मृत्यु आई? ऐसे प्रश्नों का उत्तर चक्र स्थिति का प्रतिपादन करके ही दिशा जा सकता है। रेखा स्थिति की मान्यता के आधार पर इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा सकता। प्राणी चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता उत्थान−पतन के चक्र में घूमता है। ज्वार−भाटे की तरह उसका उत्कर्ष—अपकर्ष होता है। सूर्य की तरह उसका उदय अस्त संक्रमण चलता है। पृथ्वी की तरह ऋतु−चक्र से जीवन को गुजरना पड़ता है। यही उत्तर युक्ति संगत प्रतीत होता है। भारतीय तत्व दर्शन इसी जीवन चक्र का समर्थन प्रतिपादन करता रहा है।

जन्म और मरण—किशोरावस्था और बुढ़ापा—इसी जीवन में इस ‘चक्र’ क्रम की एक झाँकी हम देखते हैं। शरीरों की दृष्टि से यह क्रम अन्य योनियों में भी चलता रह सकता है। अपराध करने पर जेल में बन्द कर दिये जाने—कर्मचारी के ड्यूटी पूरी न करने पर एक दर्जा नीचे उतार दिये जाने की बात स्पष्ट है। जिस योनि में जो कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं उन्हें पालन न करने पर सुधार शिक्षण अथवा दण्ड के लिए नीचे की योनियों में लौटाना पड़ता हो तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं। जो गलत सीखा है उसे भुलाना भी आवश्यक है अन्यथा वह गलती भविष्य में लगातार होती रहेगी। बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए एकाकी जीवनयापन करने की व्यवस्था कठोर तो है, पर सुधार की दृष्टि से उसकी उपयोगिता भी है।

मनुष्य को यदि अपनी अवाँछनीय दुष्प्रवृत्तियाँ—बुरी आदतें भूलने के लिए नीची समझी जाने वाली योनियों में जाना पड़ता हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। बेकार हुए लोहे को भट्टी में डालकर गलाया जाता है, तब वह नया जीवन फिर आरम्भ करता है। इस प्रकार सड़े−गले जीवन की आदत पड़ जाने पर यदि मनुष्य का छोटी योनियों में तपने, गलने के लिए वापिस लौटना पड़ता हो तो इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। मनुष्य जीवन में सही और गलत दिशा पकड़ने वालों को दंड और पुरस्कार भोगने पड़ सकते हैं। लुहार अपने उपकरणों और कुम्हार अपने बर्तनों को इसी प्रकार तो ठोक पीटकर गला−जलाकर काम के योग्य बना पाता है। वैद्य की औषधियों को भी तो घोंटने−पीसने, जलाने−उबालने की चित्र−विचित्र प्रक्रिया में होकर गुजरना पड़ता है। जीवन चक्र में इस प्रकार के उतार चढ़ाव आ सकते हैं। मनुष्य को सदा मनुष्य ही रहना चाहिए—उसे नीचे की योनियों में नहीं लौटना पड़ता—चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने की बात गलत है ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए। अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि मनुष्य स्तर तक पहुँचने वाले को कुछ संयम के लिए सुधार अथवा दण्ड स्वरूप ही नीचे की योनियों में जाना पड़ता है पीछे वह प्रयोजन पूरा होने पर जल्दी ही लौटकर अपनी जगह वापिस आ जाता है। दुष्कर्मों का दण्ड यदि नरक हो सकता है तो उसी नारकीय जीवन में कीट−पतंगों की, पशु−पक्षियों की अभावग्रस्त एवं कष्टसाध्य योनियों को सम्मिलित कर सकते हैं। विचारशील स्तर तक पहुँचे मनुष्य को जब इन योनियों में लौटना पड़ता होगा तो उसे सामान्य क्रम से विकसित होने वाले प्राणियों की अपेक्षा निश्चय ही अधिक कष्ट अनुभव होता होगा और उसकी चेतना को पश्चाताप करने का सुधार का नये सिरे से उचित मार्ग पर चलने का प्रकाश मिलता होगा।

जीवन−चक्र की यथार्थता इस दृष्टि से भी है कि वह पूर्ण से उत्पन्न हुआ और फिर एक यात्रा पूरी करते हुए पूर्ण में में ही जा मिलता है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर अकेला था, क्रीड़ा−कल्लोल क रसास्वादन करने के लिए उसने अपने को अपने खण्डों में बाँटा, अनेकता अपनाई और सृष्टि संरचना बनकर खड़ी हो गई। यह खेल अन्त में समाप्त ही होता है। महाप्रलय में मकड़ी द्वारा अपना जाला समेट लिए जाने की तरह फिर वह अकेला ही रह जाता है। जीवन−क्रम भी इसी प्रकार है विभिन्न योनियों के खट्टे−मीठे अनुभव प्राप्त करता हुआ प्रत्येक काय−कलेवर की दी गई अपने−अपने ढंग की विशेषताओं का आनन्द लेता हुआ वह लौटकर पुनः उसी केन्द्र में जा मुड़ता है जहाँ से उत्पन्न हुआ था।

विचार या शब्द की रेडियो तरंगें एक बहुत बड़े घेरे में भ्रमण करती हुई उसी केन्द्र पर लौट आती हैं जहाँ से वे आरम्भ हुई थीं। पृथ्वी पर एक सीधी दिशा में चलें तो अन्ततः वहीं आ पहुँचेंगे जहाँ से चले थे। पृथ्वी अपनी धुरी पर कक्षा पर घूमती है और लौट−लौटकर वापिस आती हैं। अन्य ग्रह−नक्षत्र भी इसी प्रकार परिक्रमा करते है। जीवन−चक्र भी इसी परिक्रमा परिधि में घूमता है। उसका क्रम रेखावत् नहीं जैसा कि डार्विन आदि विकासवादी बताते हैं। जीवन विकास चक्र गति से चल रहा है। उसी में उसकी उपयोगिता भी है और सुखद सम्भावना भी।


आत्मबल (kahani)

आश्रम के शिष्यों ने महर्षि को अनुरोध किया—’गुरुदेव! इन दिनों धरती हरित परिधान धारण कर बड़ी मनोहारी लग रही है। कल−कल निनाद करते हुए जल प्रपात कर्णरंध्रों को भले लग रहे हैं। तीव्रगति से उफनती हुई सरितायें परमात्मा रूप समुद्र से मिलने के लिए व्यग्र हो रही हैं। मेघराज द्वारा गिराई जाने वाली जल की नन्हीं−नन्हीं बूँदें फव्वारे जैसा आनन्द दे रही हैं। ऐसे सुन्दर समय में यदि आज प्रकृति निरीक्षण के लिये चला जाये तो कितना अच्छा रहे? सरिता तट पर ही मध्याह्न का भोजन बनाया जाये और भ्रमण करते हुये हम लोग शाम को लौटें।’

प्रकृति निरीक्षण के लिए महर्षि को भला क्यों आपत्ति होती। उन्होंने सोचा आश्रम के ब्रह्मचारियों को प्रकृति से ही बहुत कुछ सीखने और समझने के लिये मिल जायेगा वह शिष्यों को लेकर चल पड़े। परस्पर अनेक प्रकार की चर्चायें हो रहीं थीं। महर्षि द्वारा शिष्यों की अनेकानेक समस्याओं को समाधान दिया जा रहा था।

जलचर की तरह गुरु−शिष्य घण्टों झल−क्रीड़ा करते रहे। भोजन तो पूर्व में ही तैयार करके रख दिया था। जल−विहार के पश्चात् भोजन किया। अपने−अपने उत्तरीय बिछाकर बट वृक्ष की सघन छाया में विश्राम करने हेतु लेट गये। मौसम वैसे ही बड़ा सुहावना था। शीतल वायु प्रवाहित हो रही थी। लेटते ही निद्रादेवी ने उनकी क्लान्ति का शान्त करने के लिये अपने अंक में ले लिया। पर्याप्त समय के पश्चात् ऋषि की निद्रा भंग हुई। उस समय तक सूर्यदेव पश्चिम दिशा की ओर काफी बढ़ चुके थे। उन्होंने उठकर घास में ही लेटे शिष्य गार्ग्य को जगाया। उसने धीरे से गुरुदेव के कान में फुसफुसाते हुए कहा—’मैं उठ तो काफी देर का गया हूँ पर मेरे पैरों में लिपटा हुआ सर्प बड़ी गहन निद्रा में निमग्न है। मैंने यह उचित नहीं समझा कि उसकी निद्रा को भंग किया जाये जब उसकी नींद पूरी हो जायेगी वह अपने आप ही चला जायेगा।’

घण्टे भर बाद सर्प की नींद खुली। वह गार्ग्य के पैरों से उतर कर बिल की ओर चला गया। महर्षि ने अपने शिष्य को अंक में भर कर आशीर्वाद दिया—’तुम्हारा यह धैर्य और साहस भरा आत्मबल अक्षय रहे।’


ईश्वर की समीपता और दूरी की परख

ईश्वर हमारे सबसे अधिक समीप है। संसार का कोई पदार्थ या व्यक्ति समीप हो सकता है उसकी अपेक्षा ईश्वर की निकटता और भी अधिक है। वह हमारी साँस के साथ प्रवेश करता है और समस्त अंग−अवयवों में प्राण वायु के रूप में जीवन का अनुदान प्रतिक्षण प्रदान करता है; यदि इसमें क्षण भर का भी व्यवधान उत्पन्न हो जाय तो मरण निश्चित है।

हृदय की धड़कन उसी की रासलीला है। सम्भावित सोलह हजार नाड़ियों के साथ वही कृष्ण रमण करता है। मांस पेशियों के आकुँचन−प्रकुँचन में गुदगुदी उसी के द्वारा उत्पन्न की जाती है। अन्तःकरण में उसी का गीता प्रवचन निरन्तर चलता रहता है। ज्ञान−विज्ञान की विशालकाय पाठशाला उसी ने हमारे मस्तिष्क में चला रखी है। उसका अध्यापन ऐसा है जो कभी बन्द ही नहीं होता।

जीव कोषों के भीतर चलने वाली गतिविधियों का सूक्ष्म उपकरणों से निरीक्षण किया जाय तो पता लगेगा कि समस्त ब्रह्माण्ड के विशाल परिकर में जो हलचलें हो रहीं हैं वे सभी बीज रूप से इन नन्हीं−सी कोशिकाओं में गतिशील हैं। “जो ब्रह्माण्ड में सो पिण्ड में” वाली उक्ति अब किंवदंती नहीं रही अब उसकी पुष्टि एक सुनिश्चित सचाई के रूप में हो चुकी है। मनुष्य का व्यक्तित्व वस्तुतः विराट् ब्रह्म का ही एक संक्षिप्त संस्करण है। पर वह मनुष्य का शरीर धारण करके अवतार लेता रहता है यह सत्य है इसी प्रकार यह भी एक स्वतः सिद्ध सचाई है कि मनुष्य अपने चरम विकास की स्थिति में पहुँचकर परमेश्वर बन सकता है। मानवी संरचना कुछ है ही ऐसी अद्भुत कि उसमें ईश्वर की समग्र सत्ता की अनुभूति कर सकना सर्वथा सम्भव है।

इतना सब होते हुए भी हम ईश्वर से अरबों−खरबों मील दूर हैं। उसकी समीपता की अनुभूति के साथ−साथ जिस परम सन्तोष और परम आनन्द का अनुभव होना चाहिए वह कभी हुआ ही नहीं। ईश्वर की समीपता को जीवन मुक्ति भी कहते हैं। उस स्थिति को सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य और सामुख्य इन चार रूपों में वर्णन किया गया है। ईश्वर के लोक में रहना—उसके समीप रहना—उस जैसा रूप होना—उसमें समाविष्ट हो जाना यह चारों ही अवस्थाएँ उस स्थिति की ओर संकेत करती हैं जिसमें मनुष्य की भीतरी चेतना और बाहरी क्रिया उतनी उत्कृष्ट बन जाती है—जितनी कि ईश्वर की होती है।

अपनी चेतना—सत्ता को ईश्वरीय चेतना में डुला देने उसके सदृश बना देने में किसे कितनी सफलता मिली इसका परिचय उसके चिन्तन और कर्तृत्व का स्तर परख कर सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। कौन भव−बन्धनों में जकड़ा पड़ा है और किसने जीवन मुक्ति प्राप्त करली इसकी परीक्षा एक ही कसौटी पर हो सकती है कि अहंता का क्षेत्र कितना सीमित अथवा विस्तृत है। जो निकृष्ट स्तर की बातें सोचता है जिसकी अभिलाषाएँ पाशविक हैं उसे भव−बन्धन में आबद्ध नर−पशु कहा जायगा किन्तु जिसने अपनी चेतना को परिष्कृत एवं विस्तृत बनाकर सबमें अपने को संव्याप्त समझा उसने देव योनि प्राप्त करली ऐसा समझा जायगा।

आँखों से देव दर्शन के लिए की जाने वाली तीर्थयात्रा और सूक्ष्म नेत्रों से प्रभु दर्शन के लिए होने वाली ध्यान साधना का अपना स्थान है और अपना महत्व। इस सीड़ियों को पार करते हुए हमें पहुँचना उसी स्थान तक पड़ेगा जहाँ ईश्वर की समीपता मिलती है—उसी के सदृश उदार अन्तःकरण और पवित्र व्यक्तित्व का आलोक जगमगाता है। हम तब तक ईश्वर से असंख्य योजन दूर रहेंगे जब तक अपनी चेतना को ईश्वरीय चेतना के सदृश उदात्त बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। समीपता तो इसी तथ्य पर निर्भर है कि हम अपनी सत्ता को ईश्वर के समान ही सहृदय और सचेतन बनाने में तत्परता पूर्वक प्रयत्न रत रह रहे हों।


कोशाओं की अंतरंग शक्ति का परिष्कार

जीवन की मूल इकाई कोशिका है जिसे सैल या कोश भी कहते हैं। शरीर का यह सबसे छोटा किन्तु मूलघटक इसी प्रकार माना जाता है जिस प्रकार पदार्थ का मूलघटक परमाणु होता है। कोश रासायनिक पदार्थों से मिलकर बनती है, पर उसके मध्य में जो ‘नाभिक’ है उसी को कोश ब्रह्माण्ड का बिजली घर कह सकते हैं यहीं से सारी हलचलों का प्रवाह चलता है। अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि रासायनिक खोखला कलेवर मात्र है, उसका मूल जीवन नाभिक के केन्द्र में सन्निहित है और वह ‘विद्युत’ रूप है। इस प्रकार अब जीवन की व्याख्या एक विशिष्ट विद्युत प्रवाह के रूप में की जाने लगी है और यह माना जाने लगा है कि यह बिजली सामान्य विद्युत जैसी दिखाई पड़ने पर भी उसके भीतर एक सुव्यवस्थित क्रम व्यवस्था ही नहीं जीवनोपयोगी चेतना भी विद्यमान है। जड़ के अंतर्गत इस चेतना की विद्यमानता इन्हीं दिनों मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार की गई है। अब मनुष्य सर्वथा जड़—मात्र रासायनिक संयोग नहीं रहा। वह चिन्मय स्वीकार कर लिया गया है।

रासायनिक संयोग में हेर−फेर करके कोशाओं के स्वरूप में परिवर्तन करके मनुष्य का वर्तमान स्तर बदला जा सकेगा ऐसा पिछले बहुत दिनों से सोचा जा रहा है। इस संदर्भ में गुण सूत्रों और जीन्स की खोज खबर ली जा रही थी अब एक नये चरण में विज्ञान ने प्रवेश किया है और माना है कि यदि कोशाओं के स्तर में कुछ परिवर्तन करना हो तो वह रासायनिक हेर−फेर से नहीं विद्यमान विद्युत प्रवाह में ही कुछ उलट−पलट करके सम्भव हो सकेगा। अब रसायन मुख्य नहीं रहे—उनका स्थान विद्युत ने ले लिया है। यह प्रतिपादन लगभग वहीं जा पहुँचता है जो आत्मा की चित् शक्ति से ओत−प्रोत बताया गया है। यों अभी अध्यात्म और विज्ञान की प्रतिपादित चित् विद्युत की परिभाषा एक नहीं हुई है। दोनों के कथन में काफी अन्तर है फिर भी पहले की अपेक्षा वह अन्तर काफी घटा है वह दिन दूर नहीं जब कोश नाभिक में सन्निहित विद्युत को चित् शक्ति के रूप में ही स्वीकार कर लिया जायगा। विज्ञान और अध्यात्म की तेजी से घटती हुई दूरी अगले दिनों दोनों को एक स्थान पर मिलाने वाले केन्द्रबिन्दु तक पहुँचाकर ही रहेगी।

यह समझा जाता है कि पिता के शुक्राणु लगभग वैसी आकृति के होते हैं, जैसे कि पानी के पूँछदार कीड़े दिखाई पड़ते हैं। वर्गीकरण की दृष्टि से उनके दो भाग कि ये जा सकते हैं एक शिर दूसरा पूँछ। शुक्राणु का नाभिक शिर भाग में होता है, पूँछ उसके चलने दौड़ने में गति प्रदान करती है। पूँछ अक्सर हिलती रहती है जिससे शुक्र कीट आगे बढ़ता है और निषेचन के समय दौड़कर डिम्ब अणु के साथ जाकर मिल जाता है। यह एकाकार होने की स्थिति ही गर्भ धारण है। एक नया प्राणी इस सुयोग संयोग से उत्पन्न होता है।

शुक्राणु और डिम्बाणु की उपरोक्त व्याख्या स्थूल है। उनके भीतर भी बहुत बारीक कण होते हैं। क्रोमोसोम—उनसे भी सूक्ष्म जीन्स की प्रजनन शक्ति का उत्तरदायी कहा जा सकता है। जीन्स में भी प्रोटीन की कुछ मात्रा और डी. एन. ए. (डी.ओक्सी बायोन्यूक्लिक एसिड) नामक पदार्थ रहता है। इसी क्षेत्र में वंश परंपरा की शारीरिक और मानसिक विशेषताएं समाविष्ट रहती हैं। वे विशेषताएं केवल माता−पिता की ही नहीं होती वरन् उनके भी मातृ पक्ष और पितृ पक्ष की पीड़ी−दर−पीड़ी से जुड़ी हुई चली आती है। उनमें भी संयोग−वियोग के आधार पर हुए परम्परागत और कुछ समन्वयात्मक विशेषताएँ उभरती रहती है। इसी उथल−पुथल के कारण सभी भाई−बहिन एक जैसे आकार प्रकार के नहीं बन पाते यद्यपि उनमें बहुत सी विशेषताएँ एक जैसी भी बनी रहती हैं।

‘दि ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ नामक ग्रन्थ में जीव विज्ञानी एडलस हक्सले ने डिम्ब और शुक्र कीटों के क्रिया−कलाप का मात्रा रासायनिक संयोग नहीं माना है वे उन्हें ‘अल्फा’ ‘बीटा’ और ‘गामा’ किरणों का उत्पादन मानते हैं।

पूर्वजों के जीन्स अपने साथ जिन विशेषताओं को लपेटे चलते हैं उनमें बहुत सी अच्छी होती हैं और बहुत सी बुरी। परम्परागत बीमारियों का लिपटा हुआ कुचक्र परिधान निश्चित रूप से बुरा है। डायबिटीज, एलर्जी, ब्रोनोचिट्स, हेमाफीलिया, दमा, कोढ़, गर्मी, सुजाक, रक्त −विकार, दृष्टि मंदता जैसी बीमारियाँ बच्चों को अपने पूर्वजों से भी विरासत में मिलती हैं।

अफ्रीका महाद्वीप के काँगो देश में तीन−चार फुट ऊँचे बौनों की बड़ी संख्या है वे शिकार पर निर्वाह करते हैं और आदिवासी यायावरों की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान में अपने डेरे डालते रहते हैं। पेरु के जंगलों में यूस जाति के ऐसे आदिवासी पाये गये हैं जिनकी ऊँचाई तीन फुट रह जाती है। माल्योनैटो के रोम कैथलिक चर्च द्वारा प्रकाशित ‘रीजन फ्राम दी जंगल’ पुस्तक में इन बौनी जातियों की वंश परम्परा पर अधिक प्रकाश डाला गया है। इन ‘यूश’ जाति के बौनों की अधिक संख्या ब्राजील, बोलीबिया तथा क्यूरा नदी के तट पर पाई जाती है। यह लोग 20 कबीलों में बँटे हुए हैं।

बैंगलौर में बी.एन. थिम्मया नामक एक नाई के घर ऐसा बालक जन्मा था जो जन्म के समय तो केवल 5.14 पौण्ड का था पर कुछ ही दिन बाद तेजी से उसका शरीर फैलने फूलने लगा। 11 वर्ष की उम्र पर पहुँचने तक 162 पौण्ड भारी और 50 इन्च ऊँचा हो गया। इतना ही नहीं उसकी छाती 46 इञ्च की हो गई। लगभग फुटबाल जैसा गोल−मटोल वह दिखाई पड़ने लगा। बढ़ोतरी इस तेजी से हुई कि हर महीने पुराने कपड़े रद्द करना और नये बनवाना उस गरीब आदमी के लिए अत्यन्त कठिन हो गया। अच्छा इतना ही रहा कि खुराक साधारण स्तर के बालकों जितनी ही बनी रही।

डाक्टरों ने खोज−बीन करके यह बताया कि यह हारमोन का चमत्कार है। खुराक आदि घटाकर बच्चे को नई विपत्ति में न डाला जाय। यदि कभी सम्भव हुआ तो हारमोन सन्तुलन कर सकने वाले चिकित्सक ही उसे सामान्य स्थिति में ला सकेंगे।

हारमोन कुछ समय पूर्व तक मात्र रासायनिक पदार्थ मात्र जाते थे अब उनकी विलक्षणता उनकी सूक्ष्मता में —विद्युत तरंग स्पन्दन में—ढूँढ़ लिया गया है। हारमोन बाहर से एक जैसे ही दिखते हैं रासायनिक विश्लेषण करने में उनमें कुछ बहुत बड़ा अन्तर नहीं पाया जाता—पर उनके भीतर पाये गये विद्युत प्रवाह में इतना अन्तर रहता है जिसे विभिन्न मनुष्यों में विभिन्न प्रकार की विशेषताएं उत्पन्न करने का आधार माना जा सके। ‘जीन्स’ स्वयं अत्यन्त सूक्ष्म हैं फिर उनके भीतर का जो वर्गीकरण है उसे रासायनिक स्तर पर नहीं विद्युत कम्पनों के स्तर पर ही विभाजित किया जा सकता है। हारमोन रसायनों का विश्लेषण वर्गीकरण करना हो तो भी उसके घटक इन्हीं शक्ति कम्पनों से ओत−प्रोत पाये गये हैं। इनकी भिन्नता पृथकता भी इसी प्रवाह आधार पर है।

न्यूयार्क विश्व−विद्यालय के तत्वावधान में बफेले नगर की प्रयोगशाला ने इस असम्भव समझे जाने वाले कार्य को सम्भव करके दिखाया है। विश्व−विद्यालय के अनुसंधान सम्बन्धी उपाध्यक्ष डा. रेमण्ड इवेल तथा जीव विज्ञान केन्द्र के निर्देशक जेक्स डेनिमाली द्वारा इस शोध निष्कर्ष की चर्चा करते हुए कहा गया है कि वंश परम्परा से चली आ रही आकृति−प्रकृति तथा शारीरिक, मानसिक स्थिति में अब आमूल−चूल परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सकेगा। वंश परम्परा की बीमारियों पर काबू प्राप्त किया जा सकेगा। सूक्ष्म कोषों की शल्य क्रिया करना उनमें दूसरे कोषों के आँशिक पैबन्द लगा सकना सम्भव होने से यह भी शक्य हो जायगा कि इच्छानुरूप विशिष्टताओं वाले बच्चे पैदा किये जा सकें। सन् 1967 का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले विज्ञानी डा. आर्थर कारन वर्ग ने कैलीफोर्निया के स्टेन फोर्ड विश्व−विद्यालय ने जीवकोषों का प्राण ‘डी.एन.ए.’ खोजा था अब उस खोज ने इतनी प्रगति कर ली है कि जीवकोषों की स्थिति में इच्छानुसार एवं आवश्यकतानुसार फेर बदल किया जा सके।

न के वल वंश परम्परा की दृष्टि से वरन् मनुष्य की रोग मुक्ति, बलवृद्धि तथा दीर्घजीवन की दृष्टि से इन कोश कणों की स्थिति में सुधार परिवर्तन अपेक्षित है। यह कार्य दवादारू के आधार पर अथवा आहार−विहार के मोटे परिवर्तनों से भी सम्भव नहीं हो सकता। बहुत बार देखा गया है कि सही आहार−विहार रखने और उपयुक्त चिकित्सा उपचार करने पर भी कई व्यक्ति रुग्ण बने रहते हैं और स्वल्पजीवी होते हैं। इसका कारण कोशाओं और हारमोन रसायनों में घुसकर बैठी हुई विकृतियाँ होती हैं जिन पर सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया एवं भोजन परिवर्तन जैसे उपचारों से काबू नहीं पाया जा सकता। इस सुधार के लिए ऐसे विशिष्ट उपाय ढूँढ़ने पड़ते हैं जो कोशाओं के अन्तस्थल में छिपे विद्युत प्रवाह को प्रभावित कर सकें।

मनुष्य का शरीर भवन जिन ईंटों से चुना गया है उन्हें कोश या सैल कहते हैं। इन्हीं के बनने−बिगड़ने का क्रम हमें जीवित और स्वस्थ रखता है और रुग्ण−दुर्बल बनाते हुए मृत्यु के मुख में धकेल देता है।

सामान्यतया यह कोशाएँ टूट कर बँटती रहती हैं और नई कोशाओं को जन्म देती रहती हैं। चमड़ी की कोशाएँ प्रायः 4-5 दिन में पुरानी से बदल कर नई हो जाती हैं। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुली बदलता है, उसी प्रकार हम भी अपनी चमड़ी हर चौथे पांचवें दिन बदल देते हैं। यों यह बात आश्चर्य जैसी लगती है, पर वस्तुतः होता यही रहता है। जिन्दगी भर में हमें हजारों बार चमड़ी की केंचुली बदलनी पड़ती है। यही हाल शरीर के भीतर काम करने वाले प्रमुख रसायन प्रोटीन का है। वह भी प्रायः 80 दिन में पूरी तरह बदल कर नया आ जाता है। यह परिवर्तन अपनी पूर्वज कोशाओं के अनुरूप ही होता है अस्तु अन्तर न पड़ने में यह प्रतीत नहीं होता कि पुरानी के चले जाने और नई के स्थानापन्न होने जैसा कुछ परिवर्तन हुआ है।

इस परिवर्तन क्रम को चलाने की सीमा हर अवयव की अलग−अलग है। किसी अवयव का काया−कल्प जल्दी−जल्दी होता है किसी का देर−देर में। इसी प्रकार उनके काम करने की—सक्षम रहने की अवधि भी भिन्न−भिन्न है। डा. केनिव रासले की पर्यवेक्षण रिपोर्ट के अनुसार मनुष्य के गुर्दे 200 वर्ष तक, हृदय 300 वर्ष तक, चमड़ी 1000 वर्ष तक, फेफड़े 1500 वर्ष तक और हड्डियां 4000 वर्ष तक जीवित रह सकने योग्य मसाले से बनी है। यदि उन्हें सम्भाल कर रखा जाय तो वे इतने समय तक अपना अस्तित्व भली प्रकार बनाये रह सकती है। इनके जल्दी खराब होने का कारण यह ही है−उनसे लगातार काम लिया जाना और बीच−बीच में मरम्मत का अवसर न मिलना। यदि इसकी व्यवस्था बन पड़े तो निश्चित रूप से मनुष्य की वर्तमान जीवन अवधि में कई गुनी वृद्धि हो सकती है।

न्यूयार्क युनिवर्सिटी के डा. मिलन कोपेक और तकफेलर इन्स्टीट्यूट के डा. ऐलोक्सिस कैरलन द्वारा किये गये प्रयोगों से एक ही निष्कर्ष निकला है कि कोशाएँ जब तक अपनी वंश वृद्धि करने में सक्षम रहती हैं तब तक बुढ़ापा किसी प्रकार नहीं पाता, पर जैसे−जैसे वे नई पौध उगाने की क्रिया शिथिल करती हैं वैसे ही वैसे अवयव कठोर और निष्क्रिय होते चले जाते हैं और अन्ततः मृत्यु के मुख में जा घुसते हैं। यदि इन कोशाओं की क्षमता घटने न दी जाय और उन्हें उत्पादन की अपनी स्वाभाविक संरचना अवधि तक क्रियाशील रहने का उपाय ढूँढ़ निकाला जाय तो शरीर को अमर न सही उसे दीर्घायुषी तो बनाया ही जा सकता है।

क्रमिक गति से—स्थूल से सूक्ष्म के क्षेत्र में प्रवेश, करता हुआ विज्ञान अब रासायनिक पदार्थों की परिधि लाँघ कर उस गहराई तक जा पहुँचा है जहाँ शक्ति−शक्ति का ही साम्राज्य शेष रह जाता है। शरीर एवं मन के प्रयोजनों में लगी इस धारा को विज्ञान में मानवी विद्युत नाम दिया है अध्यात्म उसे चित् शक्ति अथवा प्राण−शक्ति कहता है। अन्ततः मानव का मूलभूत आधार इसी केन्द्र पर टेका हुआ सिद्ध होता है।

शरीर और मन में रासायनिक परिवर्तन करने के लिए पदार्थों का चयन करना हो तो उसका चयन प्रयोगशाला के निष्कर्ष पर नहीं, वरन् उनमें सन्निहित सूक्ष्म चेतना को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। सतोगुणी प्रकृति के, सात्विक उपार्जन के—एवं सद्भावना के वातावरण में पकाये बनाये अन्न में वह दिव्य विद्युत भरी होती है जो कोशाओं के अस्ततल को स्पर्श करके उनमें समाविष्ट वंश परम्परा से तथा दूसरी प्रकार से उत्पन्न विकृतियों का निराकरण कर सकता है। साथ ही वह तत्व भी बढ़ सकता है जिसमें व्यक्तित्व का समग्र विकास, हो सके।

योगाभ्यास, तपश्चर्या, उपासना एवं साधना की पुनीत प्रक्रियाएँ जीवनचर्या में सम्मिलित की जा सकें तो वह प्रखर विद्युत प्रवाह उत्पन्न होगा, जिसे अध्यात्म की भाषा में ब्रह्मवर्चस् और विज्ञान की भाषा में प्राण−तेजस् कहा जा सकता है।

भावी पीढ़ियों का स्तर उठाना—व्यक्तित्व का विकसित करना—शारीरिक, मानसिक सामर्थ्य को बढ़ाना तथा चिर−यौवन एवं दीर्घजीवन जैसी विभूतियों को प्राप्त करना वैज्ञानिक विद्युत उपचारों की अपेक्षा अध्यात्म साधना प्रक्रिया अपनाकर अधिक अच्छी तरह और अधिक सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है। प्रयोग करके इस तथ्य को अपने सामने प्रत्यक्ष खड़ा देख सकते हैं।


कन्फ्यूशियस का अंतिम सन्देश (kahani)

चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस वृद्धावस्था के अन्तिम दौर से गुजर रहे थे। मृत्यु शय्या पर पड़े थे। अब उन्हें अपनी साँसों पर विश्वास नहीं रह गया था। जाने कौन−सी साँस ऐसी होगी जो एकबार निकलने के बाद पुनः लौटकर न आयेगी। जीवन के इस अन्तिम दौर में भी उनका चिन्तन और मनन देखते ही बनता था। कभी−कभी वह गम्भीर समस्या को लेकर उलझ जाते थे और घण्टों लगे रहकर उसका समाधान प्रस्तुत करते थे।

कन्फ्यूशियस की अस्वस्थता का समाचार मित्रों, परिचितों तथा शिष्यों को जैसे ही मिला, सब दौड़ पड़े अन्तिम दर्शन को। एक शिष्य काफी दूर से आया था उन्हें प्रणाम कर चरणों के पास बैठ गया और बोला—’गुरुदेव! वैसे तो आप जीवन भर हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे हैं, पर मैं चाहता हूँ कि इस समय भी कोई ऐसी बात बतायें जो सम्पूर्ण जीवन के उपदेशों का निचोड़ हो।

कन्फ्यूशियस ने कहा—‘वत्स! जरा मेरे मुँह में तो देखो जिह्वा है या नहीं।’

उपस्थित सभी लोग यह बात सुनकर दंग रह गये। सोचने लगे यदि इनके जीभ न होती तो यह कैसे बोलते, हाँ यह अवश्य है कि अस्वस्थता के कारण स्पष्ट रूप से अपनी बात, नहीं कह पा रहे हैं जिह्वा लड़खड़ा रही है।

शिष्य आज्ञाकारी था, गुरु की बात को टाल नहीं सकता था। उसने उठकर उनके खुले मुँह में देखा कि जीभ ही जीभ है दाँत तो एक भी नहीं। कन्फ्यूशियस ने अपनी रहस्यमयी दृष्टि से सबको देखते हुए कहा—’जीभ तो जन्म के साथ आई थी, पर दाँतों का आगमन बाद में हुआ था, बाद में आने वाले दाँत पहले ही विदा हो गये और जीभ आज भी मौजूद हैं।’

सभी व्यक्ति एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। गुरु द्वारा पूछी गई बात का उत्तर किसी के पास न था। कुछ क्षण बाद गुरु ने ही अपने मौन को तोड़कर कहना शुरू किया—’क्या आप नहीं जानते? दाँत क्रूर और कठोर होते हैं इसलिये बाद में जन्म लेने पर भी पहले समाप्त हो गये जिह्वा कोमल होती है वह आज तक बनी हुई है। मेरा तुम सबको अन्तिम समय यही सन्देश है कि हमें जिह्वा की तरह कोमल होना चाहिये, दाँतों की तरह क्रूर और कठोर नहीं। सदैव स्मरण रखना कि कोमलता दीर्घजीवी और कठोरता अल्पजीवी, शीघ्र नष्ट होने वाली है अतः आप लोग अपने स्वभाव को कोमल बनायें कठोर नहीं।’


जीवन लक्ष्य की प्राप्ति दूरदर्शी दृष्टिकोण से

मनुष्य का अवतरण—ईश्वरीय अवतार धारण का ही छोटा स्वरूप है। ईश्वर अवतार लेता है, धर्म के संस्थापन और अधर्म के निराकरण के लिए—साधुता का परित्राण और दुष्कृतों का शमन करने के लिए। भगवान की लीलाएँ इसी का ताना−बाना बुनने के लिए बनती चलती है। अवतार निरुद्देश्य हास−विलास के लिए नहीं होते। वे अतिरिक्त ईश्वरीय शक्ति लेकर निजी मोद−प्रमोद के लिए नहीं आते वरन् उस सामर्थ्य का उपयोग सृष्टि सन्तुलन के लिए ही करते हैं। मनुष्य निश्चित रूप से एक छोटा अवतार है। सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में उसे जो अतिरिक्त मिला है उसे विशुद्ध रूप से दिव्य प्रयोजनों के लिए दी गई अमानत पूँजी ही समझा जाना चाहिए। जिस प्रकार हम अवतारी देवदूतों को असाधारण क्षमताओं से भरा−पूरा देखते हैं ठीक उसी प्रकार जीव जगत के समस्त सदस्य मनुष्य को धरती पर विचरण करने वाले देव सम्पदा सम्पन्न सत्ता के रूप में देख समझ सकते हैं। वह असाधारण अनुदान उसे अकारण ही नहीं मिला होता। उसके पीछे निश्चित रूप से ईश्वर प्रदत्त महान् कर्त्तव्य और महान् उत्तरदायित्व जुड़े होते हैं।

माया उसी भ्रान्ति का नाम है जो आत्मा के स्वरूप, कर्त्तव्य और लक्ष्य को भला देती है। वासना और तृष्णा के हेय आकर्षणों में फँसा देती है। लोभ और मोह के भव−बन्धनों में बाँध देती है। माया के जाल−जंजाल से छुटकारा पाकर जीवन के स्वरूप, संसार के व्यक्तियों तथा पदार्थों के साथ अपने सम्बन्धों का यथार्थता के आधार पर निर्धारण करना ही मुक्ति है। मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है। उसमें लोक−प्रवाह से उलटी दिशा में सोचने और चलने का साहसिक पराक्रम करना पड़ता है। अपना चिन्तन और कर्तव्य लोगों के अनुकरण या परामर्श पर निर्धारित न रहने देकर विवेक भरी दूरदर्शिता के सहारे निश्चित करना पड़ता है। जो ऐसा कर सके समझना चाहिए कि वह जीवित रहते हुए भी मोक्ष का महान् अनुदान प्राप्त कर सकने में सफल हो गया।

आमतौर से लोगों का सारा चिन्तन—सारा कर्तव्य शरीर और मन की आकाँक्षाएँ पूरी करने में ही लगता है। पेट और प्रजनन के लिए ही जीते हैं। इन्द्रिय जन्य वासनाओं की पूर्ति और मनोगत तृष्णाओं को जुटाने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आकाँक्षा की धुरी−लोभ और मोह के पहियों के सहारे ही घूमती है। यही है मानव−जीवन का घृणित और भ्रमित स्वरूप। इसका दुष्परिणाम जीवन काल में हर घड़ी भुगतना पड़ता है। शोक, संताप, अभाव, दारिद्रय, क्लेश−कलह की ठोकरें पग−पग पर लगती हैं। शरीर को रोग और मन को उद्वेग घेरे रहते हैं। जिनको सुखी बनाने की बात सोची गई थी वे भी क्षणिक लिप्सा की ललक में पाते कम और खोते बहुत हैं। भोग भोगने की लिप्साएँ तो पूरी नहीं हो पातीं उलटे स्वयं ही जरा−जर्जर होकर रोते−कलपते—जलते−जलते रहते हैं। माया का, भ्रमग्रस्तता का यही स्वाभाविक परिणाम है, जिसे दुनियादार लोग शोक−सन्ताप ग्रसित होकर निरन्तर सहन करते रहते हैं। सुख की आशा करते चलते जरूर हैं, पर दुख—निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगता नहीं। यही है मायाग्रस्त जीवन का निरूपण और विश्लेषण।

समाज के प्रति हर मनुष्य का प्रचण्ड कर्त्तव्य है। वस्तुतः इसी के लिए मनुष्य का जन्म हुआ है। संसार को सुखी, समुन्नत और सुन्दर बनाने के लिए अपनी अधिकाधिक क्षमताएँ और विभूतियाँ लगनी चाहिए। यही तो मानव−जीवन के दिव्य अवतरण का एकमात्र उद्देश्य है। पर होता यह है कि इन्द्रियजन्य लिप्सा, वासना, मनोगत, अहंता, तृष्णा की पूर्ति में ही अधिकाँश क्षमता समाप्त हो जाती है। रही बची परिवार की संख्या बढ़ाने और उन्हें अमीर उभराव स्तर का बनाने के लिए ताना−बाना बुनने में चुक जाती है। शारीरिक श्रम, मानसिक चिन्तन एवं आर्थिक उपार्जन से जो कुछ मिलता है वह शरीर, मन और परिवार के लिए ही कम पड़ता है। अभाव अनुभव होता रहता है और अधिक कमाकर उसकी पूर्ति की उद्विग्नता छाई रहती है। ऐसी दशा में जीवनोद्देश्य को पूर्ति के लिए—लोक−मंगल के लिए कुछ करना सम्भव ही नहीं हो पाता है।

इस विडम्बनाग्रस्त जीवन जंजाल में अन्तरात्मा के मनोस्थल सदा कराहते रहते हैं। मनुष्य अपने आपको खोया−खोया किंकर्तव्यविमूढ़-सा अनुभव करता है। निर्वाह के आवश्यक साधन रहते हुए भी ऐसा लगता है मानो वह मरघट में रहकर अशान्त जीवन जी रहा हो न कहीं चैन न शान्ति न सन्तोष। लीज और बेचैनी छोटे−छोटे कारणों के सहारे बेहिसाब उठती रहती है। भीतर ही भीतर कोई काटता, कचोटता रहता है। जिसकी प्रतिक्रिया बाहरी जीवन में पग−पग पर झल्लाहट के रूप में प्रकट होती है। मायाग्रस्त जीवन की यही दुखद प्रतिक्रिया है। इस अन्तर्व्यथा से बचने के लिए कितने ही लोग गम गलत करने के लिए नशे पीते हैं—कभी भड़काने वाले मनोरंजनगृहों का चक्कर काटते हैं, कभी घर छोड़कर तीर्थयात्रा सैर−सपाटे के लिए निकलते हैं, कभी ताश, शतरंज जैसे व्यसनों में भीतरी कसक को भुलाने का प्रयत्न करते हैं, पर वे सभी साधन मृग तृष्णावत् लगते हैं। एक की निस्सारता अनुभव करने के बाद दूसरे पर भटकना पड़ता है, पर प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। बाहर से सुख−साधन कितने ही बढ़े−चढ़े क्यों न हों—भीतर की जलन−ज्वाला को शान्त करने में बेपानी की बूँद अपर्याप्त ही लगती रहती है।

हम भ्रान्तियों से भरा−पूरा मायाग्रस्त जीवन जीते हैं। शरीर, मन, परिवार, समाज, भगवान किसी के भी प्रति हमारा दृष्टिकोण सही नहीं है। किसी भी क्षेत्र में सही रीति−नीति नहीं अपनाई जा सकी, इसका एकमात्र कारण आत्मा और संसार के साथ अपने सम्बन्धों को ठीक तरह न समझ पाना ही है। इस भ्रान्ति को सुधारना—मायाग्रस्त मनःस्थिति को बदलना और लोक−व्यवहार की रीति−नीति का पुनःनिर्धारण करना यही है अध्यात्म दर्शन का उद्देश्य। इसे जितना प्राप्त किया जा सके, उतना ही सुख−शान्ति का जीवन जिया जा सकता है।


मेरे समर्पण को स्वीकारो (kahani)

सरिता समुद्र में विलीन होने के लिए द्रुतगति से बढ़ती चली जा रही थी। प्रेमिका को प्रेमी के बिना चैन कहाँ? मार्ग की बाधाएँ उसके उत्साह को द्विगुणित कर रहीं थीं। सरिता को आता देख समुद्र ने सचेत किया—’तुम एक क्षण रुककर विचार करो कि मुझमें विलीन होकर तुम्हें क्या मिलने वाला है? मेरे खारे जल की एक भी बूँद किसी यात्री के मुख में चली जाती है तो वह थू−थू करने लगता है। फिर तुम्हारी अपरिमित मधुरता मेरे सान्निध्य में आते ही खारेपन में परिवर्तित हो जायगी। तुम मुझमें मिलकर अपने अस्तित्व से भी हाथ धो बैठोगी। जल्दी न करो। विचार कर लो कि मुझसे मिलकर तुम्हें किस सिद्धि की उपलब्धि हो सकेगी।’

सरिता ने कभी एक क्षण रुककर विश्राम करना तो जाना न था। उसने बढ़ते हुए कहा—’वर्षों से मिलन की जिस कामना को सँजोकर रखा था उसमें किसी प्रकार का विलम्ब असहनीय है। मेरा ध्यान कभी तुम्हारे खारेपन की ओर गया भी नहीं। अपने को तुममें विलीन कर देने पर ही मुझे सन्तोष मिल सकेगा। मुझे अपने चरणों में स्थान दो। मेरे समर्पण को स्वीकारो।’

समुद्र जब तक उससे कोई बात कहे सरिता ने उदधि के अंक में अपना मुँह छिपा लिया।


मृत्यु और जीवन का अन्तर पुनर्जीवन का प्रश्न

अध्यात्म क्षेत्र में यह असमंजस बहुत पहले से ही छाया हुआ था कि मृतक किसे कहा जाय और जीवित किसे? जिसकी आशा मर गई, जिसका लक्ष्य छूट गया, जिसका प्रकाश बुझ गया वह मृतक है, भले ही वह साँस ले रहा हो—यह प्रतिपादन दर्शन क्षेत्र में सदा ही किया जाता रहा है भले ही वह मृत्यु अलंकारिक रही हो पर कहा यही गया है कि आदर्श विहीन—निरुद्देश्य, भारभूत जिन्दगी से वे मृतक अच्छे हैं जिनने धरती का अन्न−जल नहीं बिगाड़ा और मल−मूत्र से वायुमंडल को गन्दा करना बन्द कर दिया।

यह अलंकारिक प्रतिपादन अब नये ढंग से वैज्ञानिक असमंजस के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है। जिन्हें मृतक समझ कर गाढ़ा या जलाया या बहाया जाता रहा है वे जीवित अवस्था में ही कर दी गई थी या मरने के बाद? इस प्रश्न पर नये सिरे से विचार किया जा रहा है। आमतौर से जिन्हें मृतक मान लिया जाता है क्या वे सचमुच ही मर चुके होते हैं? अथवा अधमरे होते ही उनके मूर्छित शरीर से पिण्ड छुड़ाने की तैयारी कर ली जाती है। मृत्यु की व्याख्या क्या होनी चाहिए? जीवित और मृतक का अन्तर किस आधार पर किया जाना चाहिए, यह एक विचित्र किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न शरीर विज्ञानियों के सामने उभर कर आया है।

मृत्यु की जो व्याख्याएँ अब तक की जाती रही हैं वे सभी अपूर्ण हैं। कौन मर चुका, कौन मर रहा है—कौन मरने जा रहा है इसका गम्भीर पर्यवेक्षण होना चाहिए अन्यथा जीवितों के साथ मृतकों जैसा व्यवहार करने की भयंकर भूले चलती ही रहेगी। इस संदर्भ में फ्राँस के प्रसिद्ध क्लिनीशियन प्रो. मोलोरेट ने राष्ट्र संघ के स्वास्थ्य संगठन को एक गम्भीर चेतावनी दी गई कि मृत्यु की व्याख्या के आधार पर नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए और मृत्यु को, परम्परागत ढर्रे के आधार पर नहीं वरन् तथ्य आधार पर घोषित किया जाना चाहिए। एक का हृदय दूसरे के लगाते समय यह धर्म संकट उत्पन्न होता है कि जिस व्यक्ति को मृत घोषित करके उसका हृदय निकाला गया था क्या वह वस्तुतः मर ही गया था अथवा जीवित रहते हुए भी मृतक मानकर उसका वह महत्वपूर्ण अंग काट लिया गया था। यदि वह मृतक नहीं था तो उसकी या उसके घर वालों की, वसीयत के विरुद्ध निश्चय ही यह विश्वासघात का अथवा हत्या कर डालने का मामला बन जाता है। भले ही वह हत्या डाक्टरों द्वारा—सदुद्देश्य के लिए ही क्यों न की गई हो।

अब मृत्यु की सुनिश्चित घोषणा सम्बन्धी व्याख्या का प्रश्न पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल और विवादास्पद हो गया है। शास्त्रीय मृत्यु—’क्लिनिकल डेथ’ पहले होती है और जीवन का अन्त—’बायोलॉजिकल डेथ’ की स्थिति उसके बाद में आती है। दोनों के बीच कितने समय का अन्तर रहता है इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। वह अन्तर छोटा भी हो सकता है और बड़ा भी।

प्रख्यात मृत्यु संशोधनकर्ता प्रो. नेगोवस्की ने मृत्यु को चार चरणों में विभाजित किया है। पहला चरण वह है जिसमें श्वाँस की गति और हृदय की धड़कन मंद होती जाती है और अन्ततः बन्द हो जाती है। फिर भी मस्तिष्कीय चेतना किसी रूप में जीवित रहती है। इलेक्ट्रो एन्सेफलोग्राप (ई.ई.जी.) यन्त्र से पता लगाया जा सकता है कि मस्तिष्क पूर्णतया मरा नहीं है वह मंद गति से कई देह−घटकों को संदेश भेज रहा है।

मृत्यु का दूसरा चरण वह है जिसे सेरिब्रल डेथ कहते हैं। इसमें मस्तिष्क शरीरगत अवयवों को अपने संदेश देना बन्द कर देता है। इसलिए शरीर की हलचलें रुक जाती है, फिर भी चेतना का पूर्ण अन्त नहीं होता। मस्तिष्क अपनी सत्ता में केन्द्रित रहता है और शरीर के जीवाणु मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध विच्छेद हो जाने पर भी अत्यन्त मंदगति से अपनी हरकतें करते रहते हैं। शरीर का कोई अंग कट जाने पर वह कुछ समय तक उछलता रहता है। यह स्थानीय जीवाणुओं का वैसी ही हरकत है जैसे धक्का मार देने पर पहिया कुछ समय तक अपने आप लुढ़कता चला जाता है। सेरिब्रल डेथ हो जाने के उपरान्त भी शरीर में कई घण्टों तक जीवन के चिह्न पाये गये हैं।

तीसरा चरण है—क्लिनिकल डेथ—शास्त्रीय मृत्यु। इसमें नाड़ी की गति, हृदय की धड़कन, श्वाँस क्रिया रुक जाती है और मस्तिष्क गहरी अचेतना में डूब जाता है। इस स्थिति में भी शरीर विश्लेषण करने पर पता चलता है कि किन्हीं अवयवों में मंदगति से स्थानीय हलचलें चल रही हैं। इस स्थिति में उच्चस्तरीय उपचार से पुनः जीवन को लौटाया जाना सम्भव हो सकता है।

चौथा चरण वह है जिसमें जीवन की समस्त संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। पूर्ण मृत्यु का साम्राज्य छा जाता है और जीवाणुओं का सड़ना, विगठित होना आरम्भ हो जाता है।

मूर्छा शास्त्र (अनेस्थेटिक्स) का नवीनतम शोध मान्यताओं के अनुसार केन्द्रीय मज्जा—तन्त−व्यवस्था (सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम) से कार्यान्वित होने वाले सभी जीवन सिद्ध करने वाली क्रियाएँ बन्द हो जाने पर भी पूर्ण मृत्यु घोषित नहीं की जा सकती। इन अन्वेषणों के अनुसार हृदय की धड़कन का रुकना, रक्त −संचार बन्द होना, श्वाँस रुकना, नाड़ी चलना बन्द होना, चमड़ी सफेद पड़ जाना, पुतली पथरा जाना, जैसे मृत्यु के प्रख्यात लक्षण वस्तुतः जीवाणुओं की पारस्परिक संघटन का क्षय मात्र है। उसे क्षय चिकित्सा के आधार पर तत्काल रोका जा सकता है। मृतकों को पुनर्जीवित करने में मिली सफलताओं का कीर्तिमान यह है कि मस्तिष्क की क्रियाशक्ति समाप्त हो जाने के तीन दिन उपरान्त तक, श्वसन क्रिया बन्द होने के चौबीस घण्टे बाद तक रोगियों में जीवन के चिन्ह पाये गये और उन्हें फिर सजीव किया जा सका। जर्मनी के जिन दो वैज्ञानिकों ने ऐसे मृतकों को पुनर्जीवित करने में ख्याति प्राप्त की है उनके नाम है—डा. बुशर्ट और डा. रिट्मेअर। इनने यह घोषणा की है कि—सेरिब्रल डेथ—मस्तिष्कीय मृत्यु हो जाने पर भी केन्द्रीय मज्जा—तन्तु संस्थान बहुत समय तक अपना काम करता पाया गया है।

निष्कर्ष यह निकला है कि हृदय प्रभृति महत्वपूर्ण अंगों का निष्क्रिय हो जाना—श्वाँस−प्रश्वाँस, आकुँचन−प्रकुँचन, रक्त भिषरण क्रियाओं का बन्द हो जाना पूर्ण−मृत्यु नहीं है। असल में शरीर पर पूरा कब्जा मस्तिष्क का है। यदि यहाँ के किन्हीं कोशों में तनिक भी जीवन चिन्ह मौजूद है तो उसे कहा जा सकता है और यह आशा की जा सकती है कि चेतना का पुनः प्रस्फुरण करके निष्क्रिय हुए अंग अवयवों को तब तक पुनर्जीवित होने की आशा की जा सकती है, जब तक कि वे सड़ने नहीं लगे हों।

जीवन का अन्त चेतना के अन्त के साथ होता है। सोचने−विचारने या अनुभव करने की चेतना तो क्लोरोफार्म जैसी औषधियों से ही उत्पन्न की जा सकती है। उस स्थिति को मृत्यु तो नहीं कहा जाता। ठीक इसी प्रकार मृत्यु समय में गहरी मूर्छा होने के कारण यदि अवयवों ने काम करना बंद कर दिया है तो इस कारखानों की तालाबंदी के समय मजदूरों की छुट्टी मर कहा जायगा—मृत्यु नहीं। मृत्यु की परख तो चेतना के सभी लक्षण समाप्त हो जाने से ही की जा सकती है क्योंकि जीवन और चेतन वस्तुतः एक ही बात है।

रूस के एक मूर्धन्य वैज्ञानिक ये प्रो. लेव्हलैडो। अणु विघटन के शोध कार्य पर उन्हें 1962 में नोबेल पुरस्कार मिला था। उसी वर्ष वे मोटर दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए शरीर का प्रायः हर अवयव क्षत−विक्षत हो गया। उन्हें बचाने के लिए संसार भर के चिकित्सा शास्त्रियों ने प्राण−प्रण से प्रयत्न किये। तीन महीने वे बेहोश रहे। इस अवधि में चार बार उनके हृदय की गति बन्द रही और कई−कई घण्टों बन्द रही। चारों बार शास्त्रीय मृत्यु घोषित कर दी गई। इतने पर भी यह अनुभव किया जाता रहा कि जीवन कि फिर वापिस लौटाया जा सकता है।

दिमाग में खून की गाँठ बन गई है इसलिए यह बेहोशी रहती है इस निष्कर्ष के उपरान्त कनाडा के न्यूरो सर्जन पेनफील्ड ने दिमाग के आपरेशन की तैयारी की। अन्तिम दर्शन की इच्छा से उनकी पत्नी भेंट के लिए पहुँची। उसने शिर पर हाथ फिराते हुए कहा—”प्रियतम—क्या तुम मुझे पहचानते नहीं हो? तुम सुन तो सकते हो पर इस अवस्था में बोल नहीं पा रहे हो। यदि तुम सुन सकते हो तो चार बार पलक पीट दो मैं समझ लूँगी तुम मुझे पहचानते हो और होश में हो।” मूर्छित पड़े हुए रोगी ने चार बार पलक पीटे। डाक्टरों की टीम ने एक स्वर से माना कि वे होश में हैं और आपरेशन की व्यवस्था रद्द कर दी गई। उनके अन्य उपचार उत्साहपूर्वक किये जाते रहे। वे अच्छे हो गये और छै वर्ष तक भली प्रकार जीवित रहे।

मृत्यु का आक्रमण अकस्मात बिजली टूट पड़ने की तरह नहीं होता उसकी प्रक्रिया धीरे−धीरे सम्पन्न होती है। वृद्धावस्था और रुग्णता वस्तुतः मृत्यु के मंदगति से प्राणी की ओर बढ़ते हुए चरण ही हैं। शस्त्र आघात, विषपान, हत्या−आत्महत्या दुर्घटना जैसे प्रसंगों में अपेक्षाकृत जल्दी मौत होती है तो भी वह अकस्मात नहीं होती है, उसमें भी क्रमिक गति ही काम करती है। भले ही वह तीव्रता के साथ अपना काम जल्दी ही पूरा कर लेती हो।

सुकरात का जहर का प्याला पीना पड़ा। मरते समय के अनुभव वे इस प्रकार बताते रहे कि पैरों और हाथों की ओर से उनकी जान निकल रही है और मृत्यु क्रमशः मस्तिष्क की ओर बढ़ती आ रही है। वे अपने शिष्यों के साथ तब तक वार्तालाप करते रहे जब तक कि अन्य अंग शिथिल होते−होते मस्तिष्क के शिथिल होने की बारी नहीं आ गई।

अपनी मृत्यु की पूर्व घोषणा करने वालों की अनुभूतियाँ भी इसी प्रकार की होती है वे अनुभव करते है कि उनके अंग विलक्षण प्रकार से निर्जीव हो रहे है। उनकी स्वाभाविक और सम्मिलित शक्ति का विचित्र रीति से क्षरण हो रहा है। अन्तःचेतना इस मृत्यु सन्देश को यदि ठीक तरह अनुभव कर सके तो क्रमिक मृत्यु की स्थिति में आवेश रहित व्यक्ति सहज ही मृत्यु का पूर्वाभास पा सकता है और कई बार तो मृत्यु−समय की अवधि तक घोषित कर सकता। ऐसी भविष्यवाणियाँ कइयों ने की भी हैं और वे सत्य भी निकली हैं। यह कोई जादू नहीं है, वरन् अपनी आन्तरिक स्थिति का सही विश्लेषण या निदान मात्र है। ऐसा कर सकना आवेश रहित सन्तुलित व्यक्ति के लिए ही सम्भव होता है। हड़बड़ाने वालों को तो अनेक तरह के आवेश ही बुरी तरह आ घेरते हैं और वे डरने, घबराने, रोने, पीटने के अतिरिक्त और कुछ कर, समझ नहीं पाते।

इन तथ्यों पर दार्शनिक दृष्टि से विचार करने से यह प्रतीत होता है कि जिसकी चेतना जितनी मंद पड़ रही होगी वह उतने ही अंशों में मृतक हो चूका होगा। स्फूर्ति, उत्साह, परिश्रम जैसे शारीरिक और जागरूकता, व्यवस्था, सूक्ष्मदर्शिता जैसी बौद्धिक प्रखरताएँ जिनमें सही ढंग से सही मात्रा में काम कर रही हों उन्हीं को पूर्ण जीवित माना जायगा। आलसी, प्रमाद, निराश, अकर्मण्य, अस्त−व्यस्त और अव्यवस्थित लोग एक विशेष प्रकार के मृतक ही हैं अस्तु उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में असफल ही रहना पड़ता है।

शिथिल मृत्यु जो क्रमशः पके हुए फल की तरह होती है, कठिनाई से ही टलती है। सक्रियता खोते−खोते जीवाणु पहले ही से दम तोड़ते चले आते हैं उन्हें कुछ समय गरम रखा जा सके तो भी सशक्त ता का वापिस लौट सकना सम्भव नहीं होता। किन्तु दुर्घटनाओं से ग्रसित मरणासन्न व्यक्तियों के बारे में ऐसी बात नहीं है। उनके जीवकोष सक्षम थे। दुर्घटना तो अकस्मात ही हुई। ऐसी दशा में यदि आघात के कारण उत्पन्न हुई क्षति को उपचार द्वारा पूरा किया जा सके तो सक्षम कोशिकाएँ पुनर्जीवन धारण करने के लिए आसानी से तत्पर हो जाती है। पानी में डूबने वाले, ठण्ड लगने, बिजली का झटका खाने वाले, सर्प के काटे, दुर्घटनाग्रसित, हार्टफेल होने वाले लोगों की मृत्यु को पुनर्जीवन में वापिस लौट सकना इसी आधार पर अधिक सम्भव रहता है।

सामान्यतया मरण का क्रम इस प्रकार चलता है कि मनुष्य का तापमान गिरता है। 98.4॰ फारन हाइट से गिरते−गिरते वह 1.5 ॰ पर उतर आता है। त्वचा में खून जमने लगता है। स्नायु पहले तो ढीले पड़ते हैं, पर फिर अकड़ने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद वे फिर ढीले होने लगते हैं। इन सब परिवर्तनों में प्रायः दो दिन लग जाते हैं। मृत्यु निकट आती चली जा रही है इसका आभास सामान्य स्थिति में, दो दिन पूर्व ही प्राप्त किया जा सकता है; किन्तु विशेष घटनाओं में यह सब बहुत तेजी से भी होता है और कुछ ही घण्टों में सारी प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।

यह तथ्य हमें इस निर्णय पर पहुँचाते हैं कि किसी की दीर्घ सूत्रता, अकर्मण्यता और मनस्विता कितनी ही शिथिल क्यों न हो गई हो—उसके पुनर्जागरण की आशा की जा सकती है। परिस्थितियों की प्रखरता के संपर्क में आकर, तेजस्वी साधनों को अपनाकर निष्क्रिय लोगों को सक्रिय और तथाकथित मृतकों को जीवित किया जा सकता है। जब एक छोटी सी चिनगारी दावानल के रूप में प्रचंड हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि मंद चेतना को समग्र जागरूकता के रूप में विकसित परिणत न किया जा सके।

मृत्यु को भारी थकान और गहरी मूर्छा का परिणाम माना जाता है। शरीर की थकान स्थिर नहीं, निद्रा के उपरान्त उसकी क्षति पूर्ति हो जाती है। आत्म−चिन्तन और प्रखर प्रोत्साहन से अन्तःचेतना पर चढ़ी हुई मंदता का भी निराकरण निवारण हो सकता है।

मृतक कौन? जीवित कौन? किस स्तर तक मूर्छित हुए व्यक्ति के पुनर्जीवन की आशा की जा सकती है यह प्रश्न शरीर विज्ञानियों के सामने एक गुत्थी के रूप में प्रस्तुत है। पर अध्यात्म विज्ञान का दृष्टिकोण बिलकुल साफ है जो स्वयं जीवन प्राप्त करने के लिए आतुर है और जिसने प्राणप्रद प्रेरणाओं के साथ संपर्क बना लिया उसे मंदता की मूर्छना से उबरने का अवसर निश्चित रूप से मिलेगा वह अर्ध मृतक की स्थिति त्याग कर, अवश्य ही पूर्ण जीवितों की पंक्ति में खड़ा होगा।


प्रेम की प्रौढ़ता (kahani)

हवा आवेश में आकर, दीपक का बुझाती हुई चली गई। पर दीपकों ने कहा—वह एक उद्वेग मात्र था। जीना−मरना हमें साथ−साथ ही है। हवा के बिना हम रहेंगे नहीं।

धूप चमकी और ऐसी तड़पी मानो बेचारी छाया का अस्तित्व ही मिटा देगी। पर छाया शान्त रही। उसने बुरा न माना और इतना ही कहा—एक हाथ से ताली नहीं बजती; जब मैंने धूप के साथ रहने की ठान−ठानी है तो उसकी अकेली कड़क पृथकता उत्पन्न करने में सफल क्यों कर हो सकती है?

श्वाँस ने शरीर में प्रवेश किया तो प्रश्वाँस का निकाल कर बाहर धकेल दिया। निश्वास ने आंखें बिचकाते हुए कहा—हमें तो साथ रहना है। निकालने का प्रयास कैसे पूरा हो सकता है, जब दूसरे को साथ रहने के सिवा कोई राह ही नहीं दिखती।

मृत्यु ने जीवन को कुचल कर रख दिया; पर जीवन यही कहता रहा—मृत्यु मेरी अभिन्न सहचरी है, उसकी गोद में सोने का लोभ मैं संचरण कर ही नहीं सकता।

बात कुछ अटपटी−सी है कि एक की रुखाई का दूसरे पर असर न पड़े; पर देखा ऐसा भी गया है कि मजबूती से पल्ला पकड़ने वाले से अंचल छुड़ाकर भाग सकना भी सरल नहीं होता। हवा और दीपक, धूप और प्रश्वाँस—जीवन और मृत्यु की स्नेह−साधना को ‘एकांगी’ भले ही माना जाय, पर उसमें झाँकती है प्रेम की प्रौढ़ता ही।


अन्तरात्मा को तृप्ति देने वाली आनन्दानुभूति

मनुष्य को पशुओं से भिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ मिली हैं। सोचने, बोलने, सीखने जैसी चिन्तनात्मक विशेषताओं ने उसे सुख−साधनों का उपार्जन एवं उपभोग करने योग्य बनाया है। ईश्वर प्रदत्त ऐसी ही विशेषताओं में एक और भी है वह है−आनन्दानुभूति। यह मस्तिष्कीय क्षेत्र में आने की चीज है। अन्तःकरण के विकास के साथ साथ यह आकाँक्षा जाग्रत होती है कि इन्द्रिय जन्म स्वल्प सुखों तक सीमित न रहकर उस आनन्द का रसास्वादन किया जाय, जिसे मानव जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।

आनन्द को ईश्वर का उच्चतम अनुदान माना गया है। अन्तरात्मा का विकास कर सकने वाले व्यक्ति इस अनुदान का मूल्याँकन कर पाते हैं—उसकी गरिमा एवं आवश्यकता समझ पाते हैं। उन्हीं के प्रयत्न भी इस दिशा में होते हैं कि आनन्ददायक परिस्थितियों को खोजा जाय और उनसे लाभान्वित होने का प्रयत्न किया जाय।

दूसरों की सेवा सहायता करने को आतुर अन्तःकरण सदा उदार एवं उपयोगी ऐसे काम करता है, जिनसे दुःखों से छुटकारा मिले और सुखों की अभिवृद्धि होती रहे। यह चेष्टा जितनी प्रखर होती है उतने ही अधिक लोकोपयोगी सत्कर्म बन पड़ते हैं और उसी अनुपात से मनुष्य की अन्तरात्मा संतुष्ट, पुलकित एवं आनन्दित रहती है।

इन्द्रिय भोग किसी को कितना ही अधिक प्राप्त क्यों न हो, सुख सुविधा के साधन किसी के पास कितने ही प्रचुर क्यों न हों—सफलताओं का श्रेय, सम्मान किसी को कितना ही अधिक क्यों न मिला हो—अन्तरात्मा की तृप्ति उतने भर से सम्भव न हो सकेगी। भीतर ही भीतर असंतोष की एक आग सुलगती रहेगी और लगता रहेगा कि कुछ ऐसी आवश्यक वस्तु थी जो मिलनी चाहिए थी पर मिल न सकी।

दूसरों के हित साधन में निरत रहकर पीड़ितों और पिछड़े हुओं की जो सेवा, सहायता बन पड़ती है, उससे उन्हें राहत मिलती है। सबसे बड़ा लाभ स्नेह और सहानुभूति का है। पीड़ा सहकर भी लोग उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। कई की अन्तःचेतना तो इसके लिए भी तैयार रहती है कि यदि उन्हें स्नेह, सद्भाव पीड़ित रहने का कारण मिलता है तो उन्हें दुःख−दर्द की परिस्थितियों में पड़ा रहना भी स्वीकार है। वस्तुतः मनुष्य के लिए दूसरों द्वारा प्राप्त होने वाले स्नेह सौजन्य का असाधारण महत्व है। इस आहार को पाकर अन्तरात्मा के मर्मस्थल में एक विशेष प्रकार की पुलकन, सिहरन उत्पन्न होती है। कष्ट पीड़ित के लिए वस्तुतः यह सहानुभूति ही अधिक उपयोगी चिकित्सा का काम करती है। कष्ट उतना असह्य नहीं होता, जितनी सहानुभूति रहित उपेक्षा ग्रस्त स्थिति। सेवा बुद्धि से की गई निस्वार्थ सहायता अपने साथ जो स्नेहसिक्त सहानुभूति जोड़े रहती है उससे पीड़ित को गहरी शान्ति मिलती है। कई बार तो यह स्नेह अनुदान इतना सुखद होता है कि आगत संकट को सौभाग्य मान लिया जाता है, जिसने कि सहानुभूति का आनन्द लाभ ले सकना सम्भव बना दिया।

समस्याओं का आत्यांतिक हल मनुष्य के अपने पुरुषार्थ से ही सम्भव हो सकता है। जब तक संकट से जूझने का साहस उत्पन्न न होगा तब तक एक के बाद एक कष्ट आते रहने का सिलसिला चलता ही रहेगा। दूसरों की सहायता से सामयिक राहत मिल सकती है। टूटी हुई हिम्मत की जंजीर जुड़ सकती है—निराशा में आशा का उदय हो सकता है और नये सिरे से साहस संजोने और प्रयत्न करने का कदम बढ़ सकता है। ऐसे ही कुछ लाभ हैं, जो दूसरों से सेवा सहायता प्राप्त करने में किसी पीड़ित को मिल सकते हैं। पूरी तरह से किसी को कष्ट मुक्त करने की बात तो किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा बन ही नहीं पड़ेगी। इसमें सफलता तो अपने ही प्रबल पुरुषार्थ द्वारा मिल सकेगी। इतना सब होते हुए भी सेवा सहायता के साथ जुड़ी रहने की स्नेह सिक्त सहानुभूति का अपना महत्व है। और वह इतना बढ़ा−चढ़ा है कि प्रत्यक्ष लाभ की तुलना में यह भावनात्मक अप्रत्यक्ष लाभ कहीं अधिक बहुमूल्य सिद्ध होता है। हर पीड़ित को इस शाँतिदायक मरहम की सदा ही अपेक्षा रहती है।

पिछड़े हुए लोगों की सहायता और पीड़ितों की सेवा करने की उदारता जिस अंतःकरण में उदय होती है वह उस दिव्य आनन्द से भर जाता है, जिसे पाने के लिए मानवी अन्तरात्मा निरन्तर आकुल−व्याकुल बनी रहती है। सेवा वृत्ति अपनाने वाले को उसकी अपेक्षा कहीं अधिक आनन्द और सन्तोष मिलता है, जितना कि सहायता प्राप्त करने वाले को मिला था। पीड़ित जितना लाभ सहायता करने वाले से उठाता है उससे हजार गुना लाभ उसे वापिस करता है, जिसने सहृदय सज्जनता का परिचय देकर अपनी सहानुभूति का परिचय दिया था। वह सहायता कितनी बड़ी थी और उससे कितनी राहत मिली, यह प्रश्न गौण है। सम्वेदना मिलने पर सहज ही पीड़ित का भावनात्मक बोझा आधा रह जाता है और फिर वह अपनी कठिनाई का सामना कर सकने योग्य साहस स्वयं जुटाने लगता है।

सुख साधनों के उपार्जन में जितनी लगन और जितनी चेष्टा रहती है उसकी तुलना में यदि सेवा, साधना का थोड़ी मात्रा में भी चरितार्थ करने लगे तो प्रतीत होगा कि एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति का द्वार खुल गया। अन्तःकरण को सन्तोष दे सकने योग्य साधन एक ही है—सहानुभूति, स्नेह और सहायता के लिए आतुर मनुष्यों की सहायता करना सम्भव है धन के अभाव में कष्ट पीड़ितों को प्रत्यक्ष रूप से कोई बहुत बड़ी साधन सामग्री प्रस्तुत कर सकना सम्भव न हो पर इससे क्या—सहानुभूति अपने आप में एक बहुत बढ़ी−चढ़ी सुख सम्पदा है। उतने भर से पीड़ा और पिछड़ेपन से छुटकारा पाने के लिये कोई व्यक्ति स्वयं तन कर खड़ा हो सकने में समर्थ हो सकता है।

पीड़ितों में से अधिकाँश ऐसे होते हैं जिसका साहस टूट गया—मन बैठ गया और आशा का प्रकाश बुझ गया यदि उस सारे बिखराव को यथा−क्रम व्यवस्थित किया जा सके तो संकट ग्रस्तता के चक्रव्यूह से निकल सकना उनके लिए सम्भव हो सकता है। हर पिछड़ा व्यक्ति साधनहीन नहीं होता। उसकी आन्तरिक क्षमता, परिस्थिति एवं साधन सामग्री इतनी होती है कि उन्हीं के सहारे काम चलाऊ स्थिति तक पहुँचा जा सकता है और इसके उपरान्त क्रमशः आगे बढ़ा जा सकता है। स्नेह सिक्त सहानुभूति और उसके साथ जुड़ी हुई प्रतीकात्मक छोटी−सी प्रत्यक्ष सहायता संकट ग्रस्त की आँखों में चमक उत्पन्न कर सकती है। कहना न होगा कि यह भीतर की चमक ही डूबते को उबारने में सबसे बड़ी भूमिका प्रस्तुत करती है।

भौतिक जीवन की सफलता का मूल्याँकन बढ़े−चढ़े वैभव के आधार पर किया जाता है। जो जितना अधिक धनवान, बलवान, विद्वान है—जिसका वर्चस्व और प्रभाव जितना बढ़ा−चढ़ा है, उसे उतना ही अधिक सौभाग्यवान और सुखी, सफल माना जाता है। आन्तरिक जीवन में—अध्यात्म क्षेत्र में समुन्नत एवं समृद्ध वह है जिसके पास स्नेह संपदा की समुचित मात्रा मौजूद है। आत्मीयता का विकास विस्तार ही किसी के आध्यात्मिक जीवन की गरिमा का प्रमाण माना जाता है। जिसकी आकाँक्षायें अपने शरीर अथवा परिवार तक ही सीमित हैं उन्हें आत्मिक दृष्टि से उतना ही छोटा बालक अथवा उपहासास्पद बौना माना जायगा।

जिसे अपना ही पेट पालने की हविस है—जो अपनी औलाद को ही सुसम्पन्न बनाने में निरत है उसे संकीर्ण स्वार्थ परता के भव बंधनों से जकड़ा हुआ दयनीय प्राणी कहा जायगा। अधिक रुचिकर भोजन की पर्याप्त मात्रा पाने और अधिकाधिक सन्तान बढ़ाने के क्षेत्र में तो शूकर ही मनुष्य से अधिक भाग्यवान है। उसी क्षेत्र में जिसकी प्रगति सीमाबद्ध रह गई, उसे महानता की कसौटी पर खरा नहीं कहा जा सकता। मानवी गरिमा से गये−गुजरे स्तर की सफलता पर किसी को गर्व होता हो तो बना रहे पर उसमें सन्तोष या आनन्द अनुभव कर सकने योग्य कोई भी तत्व है नहीं।

आध्यात्मिक प्रगति का दूसरा नाम है आत्मीयता का विस्तार। अपने लिए जैसी सुखद स्थिति पाने की आकाँक्षा रहती है, वैसी ही यदि संकट ग्रस्तों को उबारने और पिछड़े हुओं को उठाने के बारे में उठी रहे तो उस व्यक्ति को आत्मोन्नति की दृष्टि से उच्च स्तर पर पहुँचा हुआ माना जा सकता है। तत्व दर्शन में आत्मोन्नति, आत्मकल्याण, आत्म साक्षात्कार, आत्मोद्धार जैसे अनेक आकर्षक शब्दों का जहाँ−तहाँ प्रयोग होता रहता है। इन शब्दों का एक ही तात्पर्य है—आत्मीयता का विस्तार। अपने को छोटे दायरे में कैद न रखकर यदि हम अधिकाधिक व्यापक क्षेत्र में अपनी ममता फैला दें तो विश्व परिवार की—वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना विकसित होगी और घर की चहार दीवारी में रहने वाले स्वजन परिजनों की तरह अन्यान्य लोग भी अपने ही घनिष्ट सम्बन्धी प्रतीत होने लगेगी जैसी कि अपनों के लिए स्वभावतः होती है। जहाँ ममता का क्षेत्र विस्तार होगा वहाँ क्रिया पद्धति से सेवा साधना को सहज ही बढ़ा−चढ़ा स्थान मिलने लगेगा। ऐसा सद्भाव सम्पन्न व्यक्ति सेवा धर्म का अनुयायी हुए बिना रह ही नहीं सकता।

आवश्यकता नहीं कि सेवा प्रदान करने के लिए अन्धे कोढ़ी ही ढूँढ़ते फिरें। पिछड़ापन अपने इर्द−गिर्द ही यहाँ तक कि घर, पड़ौस में ही प्रचुर परिणाम में मिल जायगा। बौद्धिक पिछड़ापन ही प्रकारान्तर से पतन, पीड़ा और अभाव, दारिद्रय बनकर सामने आता है। इस बौद्धिक पिछड़ेपन से ग्रसित होकर ही लोगों को विविध विधि संकट से त्रस्त होना पड़ता है। इसी जड़ पर कुल्हाड़ी चलाई जा सके तो पीड़ा ग्रस्त संसार की चिरस्थायी सेवा की जा सकती है। यों तात्कालिक एवं भौतिक सहायता का भी अपना महत्व है। साधन सामग्री जुटाना सम्भव हो तो वह भी करना चाहिए, अन्यथा प्रतीक सेवा के रूप में तुच्छ उपहार भी दिये जा सकते हैं। इस दृष्टि से पानी का एक लोटा ले पहुँचना भी सहानुभूति का प्रदर्शन कर सकता है और पीड़ित को सरल संवेदना से लाभान्वित कर सकता है। शारीरिक श्रम से—थोड़ा−सा समय दान देकर हाथ बटाने से भी बहुत काम चलता है।

मधुर शब्दों में सहानुभूति व्यक्त करना—अपने को मित्र के रूप में प्रस्तुत करना−उज्ज्वल भविष्य की आशा दिलाना—कठिनाई से उबारने का मार्ग सुझाना जैसे सेवा कार्य वाणी से भी हो सकते हैं, पर उनका लाभ तभी होगा जब पीड़ित के अहं को चोट पहुँचाने वाली कटुक भर्त्सना का प्रयोग न किया जाय। स्नेह सिक्त परामर्श को ही स्वीकार किया जा सकता है। भर्त्सना, निन्दा, घृणा को मिला कर बोले जाने वाले वचन भले ही पूरी तरह सही हों पर अहं को चोट पहुँचाने वाले होने के कारण वे अस्वीकृत ही कर दिए जायेंगे।

सेवा और सहानुभूति की संवेदनाएँ अन्तःकरण में संजोये रहकर हम जब सेवा साधना में प्रवृत्त होने की चेष्टा करते हैं तो सहज ही उस आनन्द की अनुभूति होने लगती है जिसे पाकर ही मानव जीवन सफल होता है।


बादशाह हसन (kahani)

बादशाह हसन अपने मित्रों के बीच बैठे बातचीत कर रहे थे। बातों ही बातों में एक मित्र ने पूछ ही लिया—”मैंने देखा कि एक समय आपके पास न धन था और न सैनिक फिर भी आप सुलतान बन गए। एक साधारण व्यक्ति के लिए इतने ऊँचे पद पर पहुँचना कैसे सम्भव हो सका।”

सुलतान ने किंचित मुस्कराते हुए कहा—’मित्रों के लिए मेरे हृदय में गुंजाइश और शत्रुओं के लिए मानवता तथा उदारता का ध्यान तो मैं उस समय भी रखता था। क्या यह खजाना सुलतान बन जाने के लिए पर्याप्त नहीं है।’


अन्धकार का निराकरण आदर्शवादी व्यक्तित्व ही करेंगे

मस्तिष्कीय अज्ञान को लेखनी और वाणी द्वारा आवश्यक जानकारियाँ प्रस्तुत करके दूर किया जा सकता है। किन्तु हृदय गत अन्धकार को दूर करने के लिए अनुकरणीय आदर्शों को अपनाने वाले व्यक्तित्वों को ही आगे आना पड़ता है। दीपक जब स्वयं जलता है तभी प्रकाश उत्पन्न होता है। आस्थावान व्यक्ति दूसरों की आस्था जगाने के लिए अपना उदाहरण उपस्थित करते हैं तभी उन्हें सफलता मिलती है।

समाज में चारों ओर फैले हुए भ्रष्टाचार को देखकर सामान्य मनुष्य की अन्तःचेतना यह अनुभव करती है कि जो प्रचलन में आ रहा है वही तथ्य है, वही व्यवहार है। जो कहा जाता है वह दंभ है—आडम्बर अथवा शिष्टाचार है वह व्यवहार योग्य नहीं। यदि वह तथ्य रहा होता तो प्रतिपादन करने वाले लोग स्वयं उसे क्यों नहीं अपनाते। सिद्धान्तों का प्रतिपादन और अपराधों का आचरण—अनायास ही लोक मानस को यही सिखाता है कि कहने सुनने की बात दूसरी होती है—करने की दूसरी, जो कहा जाय वहीं किया भी जाय यह आवश्यक नहीं। इस छद्म का समर्थन उन लोगों के द्वारा और भी अच्छी तरह हो जाता है जो आदर्शों की लम्बी चौड़ी बातें कहते−कहते अथवा लिखते−लिखते थकते नहीं किन्तु अपने निजी व्यवहार में उन्हीं बातों से सर्वथा दूर रहते हैं।

इस विडम्बना ने जनमानस को अनास्थावान बना दिया है। आदर्शों की बात जिस विनोद भावना से वक्ता कहते और लेखक लिखते हैं उसी स्तर पर सुनने वाले सुनते और पढ़ने वाले पढ़ते हैं। समय क्षेप के अनेकों तरीकों में से एक यह भी है कि धर्म अध्यात्म की सिद्धान्त आदर्श की लम्बी−चौड़ी—रंगीली लुभावनी बातें कही−सुनी जाती रहें। स्थिति यही बनी रही तो व्यक्ति और समाज में घुसी हुई विकृतियों को निरस्त करना एक प्रकार से असम्भव ही हो जायगा। लेखनी और वाणी की शक्ति भी कुछ काम न कर सकेगी। उनसे विडम्बनाओं का एक नया दौर और भी चल पड़ेगा। लोग या ता उपदेशों की मनोरंजन भर मानेंगे अथवा कथा वार्ता सुनकर स्वर्ग लाभ एवं पुण्य फल पाने वाले मूढ़ विश्वासियों की पंक्ति में जा खड़े होंगे।

अवाँछनीय का प्रवाह बदलने के लिए उन आस्थावान् व्यक्तित्वों को आगे आना पड़ेगा जो आदर्शों की गरिमा पर स्वयं विश्वास करते हों। विश्वास की परख है आचरण। यदि आदर्शवादिता अच्छी चीज है तो प्रतिपादन कर्ता को सर्वप्रथम स्वयं हो अपने व्यवहार में लाना चाहिये। मन, वचन और कर्म के समन्वय का नाम ही आस्था है। आस्थावान् ही दूसरों की आस्था को जगा सकता है। जलते दीपक से ही दूसरा दीपक जलता है।

अनाचार को निरस्त करके सदाचार की स्थापना करने की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों ने ही असंख्य संकट उत्पन्न किए हैं और अगणित समस्यायें खड़ी की हैं। उनका समाधान जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण होने पर ही सम्भव होगा। उस महान प्रयोजन के लिए लेखनी और वाणी की शक्ति का भी उपयोग है पर उतने से ही लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्तित्व जब आगे आयेंगे और अपने अनुकरण को प्रबल प्रेरणा भरा आलोक उत्पन्न करेंगे जनमानस में भरा हुआ अंधकार तभी दूर होगा।


क्या प्रेतात्माओं का अस्तित्व काल्पनिक है

मरने के बाद पुनर्जन्म मिलता है। इसके मध्यवर्ती समय में कुछ अवधि विश्राम के लिये मिलती है। आमतौर से आत्मायें इस काल में लम्बी जिन्दगी में अनवरत रूप से किये गये श्रम की थकान उतारती रहती हैं और गहरी निद्रा में सोई पड़ी रहती हैं। जैसे दिन भर काम करने के उपरान्त रात्रि में, सो लेने के उपरान्त प्रातःकाल ताजगी आती है और नई शक्ति के साथ नये सिरे से उत्साहपूर्ण मनःस्थिति में काम करना सम्भव हो जाता है उसी प्रकार इस मध्यावधि विश्राम के बाद मृतात्मा नवीन जन्म धारण करके नये सिरे से पुनर्जन्म का क्रियाकलाप आरम्भ करता है।

इस निद्रा काल में तरह−तरह के स्वप्न आते रहते हैं। सूक्ष्म शरीर का सचेतन मस्तिष्क समाप्त हो जाता है और अचेतन का ही जीव−सत्ता पर आधिपत्य रहता है। अचेतन में जैसे भले−बुरे संस्कार दबे पड़े होते हैं वे उभर कर दृश्य रूप धारण करते हुए सामने उपस्थित होते हैं। जिसने जीवन का अधिकाँश भाग दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के रूप में दिखाई पड़ेगी। इसी अनुभूति का नाम नरक है। जिन्होंने श्रेष्ठ जीवन जिया, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य अपनाते हुए जिन्दगी का अधिकाँश समय बिताया उनके अचेतन में दिव्य संस्कार जगे रहते हैं और वे उस मरणोत्तर निद्रा काल में दिव्य स्वप्न बनकर उभरते हैं उस सुखद स्वप्न शृंखला को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग नरके के सुहावने डरावने सपने यह छाया डालने आते हैं कि भविष्य में किस दिशा में चलना उपयुक्त और किस ओर चलना अनुपयुक्त रहेगा।

इसी अवधि में जिन्हें गहरी नींद नहीं आती—बेचैनी बनी रहती है उन्हें प्रेत स्तर का समय गुजारना पड़ता है। मरने के बाद स्थूल शरीर का अन्त हो जाता है, किन्तु सूक्ष्म शरीर यथावत् बना रहता है। प्राणी अपने आपको लगभग उसी स्थिति में उसी शरीर कलेवर में अनुभव करता है जिसमें जीवित स्थिति में था। अन्तर इतना ही होता है कि इन्द्रियों की सहायता से जो प्रत्यक्ष स्पर्श का सुख मिल सकता था वह नहीं मिलता। तरह−तरह के स्वाद सूक्ष्म इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं पर ये पदार्थ को उदरस्थ करने और उपभोग करने का वैसा रसास्वादन नहीं कर पातीं, जैसी कि स्थूल शरीर के रहते करती थीं। संसार के पदार्थों एवं व्यक्तियों को वह देखता है पर वह दूसरों को वायु भूत होने के कारण दीखता नहीं। पैर या पंख न होते हुए भी वह उड़ या चल सकता है। दूसरों के मस्तिष्क या शरीर में अपना प्रवेश कर सकता है और उसे अपने अस्तित्व का अनुभव आवेश के रूप में घटना या दृश्य के रूप में दे सकता है। बात−चीत, वाणी या शब्दावली के द्वारा तो नहीं कर सकता पर किन्हीं व्यक्तियों या पदार्थों के माध्यम से अपनी बात प्रकट कर सकता है। प्रेत अवस्था में जीवित स्थिति की अपेक्षा कुछ कमियाँ आ जाती हैं तो कुछ विशेषतायें बढ़ जाती हैं। इन सब बातों का प्रमाण प्रेतों के अस्तित्व अथवा क्रियाकलापों के ऐसे आधारों से मिलता है जिनकी यथार्थता तथ्यों की कसौटी पर कसे जानें से सर्वथा सत्य सिद्ध होती है।

सर ओलीवर लाज ब्रिटेन के माने हुए वैज्ञानिक रहे थे, उन्हें कई विश्वविद्यालयों की मूर्धन्य डिग्रियाँ और स्वर्ण पदक प्राप्त थे। वे ब्रिटिश ऐसोसियेशन के प्रधान थे। ईथर तत्व का पदार्थ के साथ क्या सम्बन्ध है, इस विषय पर उनकी खोज अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है। उन्होंने विज्ञान के लिए आत्मा के अस्तित्व को भी एक आवश्यक अन्वेषण पक्ष माना था और स्वयं आगे बढ़कर इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण कार्य किया था। इसके लिए उन्होंने ‘साइकिक रिसर्च सोसाइटी’ की स्थापना की और उसे बहुमूल्य योगदान देकर अभीष्ट प्रयोजन के लिए अधिक काम कर सकने योग्य बनाया। सर ओलिवर लाज अपनी शोध दृष्टि का समुचित प्रयोग करके न केवल आत्मा का अस्तित्व और मरणोत्तर जीवन की यथार्थता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचे थे वरन् उन्होंने प्रेतात्माओं का साक्षात करने और उनके साथ संपर्क बनाने में भी सफलता प्राप्त की थी।

उनका पुत्र रेमण्ड प्रथम विश्व युद्ध में मारा गया था। मृतात्मा के साथ संपर्क बनाने और उसके माध्यम से अनेकों ऐसी अविज्ञात जानकारियाँ प्राप्त करने में सफल हुए जो परखने पर पूर्णतया सत्य सिद्ध हुई। उनके एक समकालीन वैज्ञानिक सर विलियम कुकस ने अपने प्रेतात्माओं सम्बन्धी निष्कर्षों का विवरण ‘रिसर्च इनन्टे फेनोमिनम आफ स्प्रिचुअलिज्म’ में प्रकाशित कराया है। उसमें सर ओलिवर लाज के शोध कार्यों का भी उल्लेख हुआ है।

विश्व विख्यात ‘लाइट’ पत्रिका के सम्पादक जार्ज लेथम की वह लेख माला पढ़ने ही योग्य है जो उन्होंने ‘मैं परलोकवादी क्यों हूँ’ शीर्षक से कई पत्रों में प्रकाशित कराई थी। उनका पुत्र जान भी फैलडर्स के मोर्चे पर महायुद्ध में मारा गया था। तोप के गोले ने उसके शरीर के टुकड़े−टुकड़े उड़ा दिए थे। फिर भी उसकी आत्मा बनी रही और अपने पिता के साथ संपर्क बनाये रही। लेथम ने लिखा है—मेरा पुत्र जीन स्वर्गीय माना जाता है पर मेरे लिए वह अभी भी उसी प्रकार जीवित है जैसे वह किसी अन्य नगर में रहते हुए भी पत्र, फोन आदि के माध्यम से सन्देशों का आदान−प्रदान करता हो। उनने अपनी मान्यता को भ्रम अथवा भावावेश जैसा न समझ लिया जाय इस आशंका का खण्डन करने वाले ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिनके आधार पर मरणोत्तर जीवन पर सन्देह करने वालों को भी इस संदर्भ में प्रामाणिक जानकारियाँ प्राप्त करने और तथ्य तक पहुँचने में सहायता मिल सके।

सर ओलिवर लाज, सर विलयम क्रुक्स की तरह ही विज्ञान के क्षेत्र के अन्य प्रामाणिक विद्वान् भी मरणोत्तर जीवन और आत्मा के अस्तित्व पर अन्वेषण करते रहे हैं इनमें से डा. ए. रसल वालेस और सर विलियम वैरेट के नाम भी है, जिन्होंने आत्मा का अस्तित्व किन्हीं किम्वदंतियों अथवा पूर्व प्रचलित मान्यताओं के आधार पर नहीं वरन् उपलब्ध ठोस प्रमाणों के आधार पर ही स्वीकार किया था। इन प्रमाणों की चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तकों में की है।

स्काटलैण्ड के सेन्ट कुर्री नामक गाँव में एक बालक जन्मा डेनियल डगलस होम। पिता दरिद्र और बालक रोगी। बच्चे को चाची ने पाला। चौदह वर्ष की उम्र तक वह ऐसे ही तरह−तरह की बीमारियों में ग्रसित रह कर ऐसे ही दिन काटता रहा। इसी बीच उसे यह अनुभव होता रहा कोई प्रेतात्मा उसके साथ सम्बन्ध बनाती है और तरह−तरह के सन्देश पहुँचाती है। डरते−डरते उसने वे संकेत अपने घर वालों और पड़ौसियों को बताये। पूर्व सूचनायें जब सही निकली तो उनका विश्वास बढ़ता गया। और अमुक समस्या का हल प्रेतात्मा से पूछकर बताने के लिए उसका उपयोग किया जाने लगा। जो परामर्श मिलते उनमें से अधिकाँश बहुत ही उपयोगी महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित होते थे।

सन् 1850 का वर्ष और जुलाई का महीना था। उसकी चाची ने मेज पर भोजन की प्लेटें सजाई हुई थीं। अचानक प्लेटों के आपस में टकराने की आवाज आई। बाहर निकल कर उनने देखा तो पाया कि प्लेटें टूटी हुई जमीन पर पड़ी हैं। उनने इसका कारण होम की किसी हरकत को समझा। और उस पर बुरी तरह झल्लाई पर वह निर्दोष था। सिर झुकाये एक कोने में खड़ा था। उसने इतना ही कहा इसमें मेरा दोष नहीं है। चाची ने दूसरी घटना यह देखी कि टूटे हुए टुकड़े अपने आप इकट्ठे हो रहे हैं और जहाँ−तहाँ बिखरे न रहकर एक कोने में जमा हो रहे हैं। यह और भी अधिक आश्चर्यजनक था। समेटने वाला दिखाई कोई नहीं पड़ता। तोड़ने वाला कोई नहीं फिर प्लेटों में यह हलचल कैसे हो रही है। होम का प्रेतात्माओं से सम्बन्ध होने की बात और भी अधिक अच्छी तरह पुष्ट हो गई।

जब भूत−प्रेत की बात अधिक फैली तो चाची डर गई और उसने झंझट भरे होम को घर से निकाल दिया। वहाँ से वह इंग्लैंड चला गया। अपनी शारीरिक रुग्णता की चिकित्सा कराने के सिलसिले में उसका संपर्क डा. काक्स से हुआ। वे अध्यात्मवादी थे उनने न केवल रुचिपूर्वक इलाज ही किया वरन् लड़के की आत्मिक शक्ति को बढ़ाने में भी सहायता की ताकि वह परलोक की आत्माओं से अधिक अच्छा सम्बन्ध बना सकने में समर्थ हो सकें। इस साधना से उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली। उसे प्रेतात्माओं को प्रामाणिक सन्देश वाहक माना जाने लगा। इस संदर्भ में इंग्लैंड के उच्चकोटि के व्यक्ति उससे अपना समाधान कराने के लिए मिलने आये और संतुष्ट होकर लौटे। इन ख्याति नामा लोगों में ईविनिंग पोस्ट के सम्पादक विलियम कुलेन ब्रामेट, प्रख्यात उपन्यासकार विलियम थेकर, प्रसिद्ध रसायन विज्ञानी सर क्रुक्स जैसे मूर्धन्य लोगों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसकी विलक्षण प्रतिभा के सम्बन्ध में पत्र−पत्रिकाओं में कितने ही लेख घटनाक्रम के विवरणों सहित प्रकाशित हुए।

स्वर्गीय सम्राट् नेपोलियन का एक सन्देश लेकर वह 27 फरवरी 1860 को सम्राट् से मिला। सम्राज्ञी युजीन तो उन अद्भुत किन्तु यथार्थ सन्देशों से उतनी अधिक प्रभावित हुई कि पुरस्कार में होम को लाखों रुपये के बहूमूल्य उपहार दे डाले।

होम के पूर्व जन्म की पत्नी रूस में जन्मी थी वह उसी से विवाह करना चाहता था। पर यह कठिन था क्योंकि वह लड़ी रूस के शाही जनरल क्रोल की इकलौती पुत्री थी। इतने प्रतिष्ठित और सम्पन्न पिता की सुशिक्षित पुत्री एक बीमार और प्रेत व्यवसाय का उपहासास्पद धन्धा करने वाले के साथ कैसे ब्याही जा सकती थी विशेषतया ऐसी दशा में जबकि दोनों एक दूसरे से परिचित भी थे और सुदूर देशों में रहते थे। यह कठिन कार्य काउण्ट आफ माट किसी के प्रसिद्ध उपन्यासकार ड्यूमा ने अपने कन्धों पर लिया उनने सन्देह वाहक की सफल भूमिका निबाही और अन्ततः 8 अगस्त 1960 को दोनों का विवाह हो गया। दोनों ने मिलकर प्रेतात्मा विद्या के शोध कार्य को और भी आगे बढ़ाया।

होम 21 जून 1889 को मरा। इससे पूर्व वह अपने प्रेतात्माओं के अनुभव संदर्भ में एक खोजपूर्ण पुस्तक प्रकाशित करा चुका था—’लाइट्स एण्ड शैडोज आफ स्प्रिचुअलिज्म’ इस पुस्तक की भारी खपत हुई थी और होम को अच्छी कमाई हुई थी।

मृत्यु के समय उसकी पत्नी सिरहाने बैठी रो रही थी। होम ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा—पगली, मैं मर कहाँ रहा हूँ, शरीर छूट जाने पर भी मैं तेरे साथ बराबर संपर्क बनाये रहूँगा। आत्मा और कला कहीं मरा करती हैं।

कुछ समय पूर्व इंग्लैंड के ख्यातिनामा कप्तान डेविड के ऊपर प्रेतात्मा के प्रकोप और उससे छुटकारे का घटना समाचार इंग्लैंड के प्रायः सभी प्रमुख पत्रों में छपा था। डेविड की गणना उस देश के मूर्धन्य सेनाध्यक्षों में की जाती थी, उनका विक्षिप्त हो जाना और हर घड़ी भयंकर प्रेत की छाया को अपने आस−पास उपद्रव करते देखना, एक असाधारण कौतूहल की बात थी। चिकित्सकों ने तरह−तरह के परीक्षण किए यहाँ तक कि मानसिक विकृति की आशंका को भी बारीकी से परखा, पर न तो उन्हें कोई शारीरिक रोग था और न मानसिक। इतने पर भी इस कदर भयभीत होना उन जैसे दुस्साहसी के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। वे धीरे−धीरे मरणासन्न स्थिति में जा पहुँचे थे।

एक प्रेत विद्याविज्ञ बुढ़िया को डेविड की पत्नी बुला कर लाई। वह आँखें बन्द करके ध्यान करती रही। पीछे उसने डेविड का चीन से खरीदर हुआ वह बहुमूल्य कोट मंगाया जो उन्हें अत्यधिक प्रिय था। बुढ़िया ने उसके अस्तर में लगे खून के धब्बे दिखाये और बताया कि एक व्यक्ति की हत्या इसी कोट को पहने हुए हुई थी। उसी आत्मा की छाया इस कोट के साथ रहती है। उसे भी यह अत्यधिक प्रिय है। वह किसी दूसरे का कब्जा इस पर नहीं देखना चाहती। जब तक कोट घर में रहेगा तब तक उस प्रेतात्मा का आतंक भी बना रहेगा।

बुढ़िया के परामर्श के अनुसार कोट उसी समय जला दिया गया और डेविड को उसी क्षण प्रेत के आतंक से मुक्ति मिल गई।

यह चन्द घटनायें ऐसी हैं जो संसार के मूर्धन्य व्यक्तियों से सम्बन्धित हैं और जिनकी चर्चा प्रख्यात ग्रन्थों में की गई है। इनका सम्बन्ध जिनसे है और जिन्होंने उनका उल्लेख किया है वे सभी ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं जिनके ऊपर किम्वदंतियां अथवा दन्त कथाऐं फैलाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। सामान्य घटनायें आये दिन प्रकाश में आती रहती है जिनसे प्रेत जीवन का अस्तित्व सिद्ध होता है और यह विश्वास सहज ही सुदृढ़ होता है कि मरने और पुनर्जन्म के बीच कुछ समय ऐसा भी होता है जिसमें सबको तो नहीं किन्तु कुछ तो प्रेत स्तर की स्थिति में रहना पड़ता है।

यहाँ प्रेत चर्चा का प्रसंग इसलिए चलाया गया है कि मरने के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त होने की बात कहने वाले अधूरे ज्ञान के अत्युत्साहियों की बात को मिथ्या सिद्ध किया जा सके। भाँग पीने से जैसे नशा आता है; उसी प्रकार अमुक रासायनिक पदार्थों के मिलने से शरीर में चेतना उत्पन्न होती है और उसमें नशे जैसी विचार सत्ता की उत्पत्ति होती है ऐसा इन तथाकथित विज्ञान वेत्ताओं का कथन है। वे कहते हैं कि नशा उतारने पर जिस तरह मस्ती समाप्त हो जाती है वैसे ही शरीर का मरण होने पर जीवात्मा की सत्ता भी समाप्त हो जाती है। यदि वस्तुतः ऐसा ही हुआ होता तो पुनर्जन्म अथवा प्रेत अस्तित्व के कोई प्रमाण न मिलते। जबकि पुनर्जन्म की स्मृति को प्रामाणिक रूप से बताने वाले अनेकों बच्चों की असंदिग्ध साक्षियाँ सामने आती रहती हैं और प्रेतात्माओं के क्रियाकलापों की ऐसी घटनायें सामने आती रहती है जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।

पुनर्जन्म की तरह प्रेतात्माओं की अस्तित्व भी जीवात्मा की अमरता को—मृत्यु के पश्चात् भी जीव सत्ता बने रहने के तथ्य को सिद्ध करता है। आत्मा की अमरता का सिद्ध होता अध्यात्मवाद और आस्तिकवाद का संपर्क प्रस्तुत करता है। इस यथार्थता के रहते कर्मफल की सच्चाई भी स्वीकार की जा सकती है, और तत्काल कर्मफल न मिलने पर भी नैतिकता एवं परमार्थ परायणता की आवश्यकता स्वीकार की जा सकती है।


सौ हाथों से कमाकर हजार हाथों से बाँटना ही तो जीवन है (kahani)

समुद्र तट पर हवाखोरी करते हुए पर्यटक को प्यास लगी। क्षितिज को अपने अंक में समेटती उत्तुंग लहरों की ओर उसकी दृष्टि गई तो बड़ा सन्तोष हुआ। सोचा निकट ही तो अपार जलराशि है इससे तो असंख्य व्यक्तियों की पिपासा शान्त हो सकती है। उसके पग जलराशि की ओर बढ़ने लगे।

पानी से भरी अंजलि मुख तक पहुँची ही थी कि दूसरे क्षण ही सारा पानी मुख से बाहर आ गया। थू थू करता हुआ वह दो कदम पीछे हट गया। उसने अपनी लम्बी दृष्टि उदधि के वक्षस्थल पर बिखेरते हुए कहा−’कैसी विडम्बना है? सागर तट पर पर्यटक प्यासा का प्यासा ही रह गया। ऐसी विशालता भी किस काम की जो साधारण से व्यक्ति को एक अंजुलि जल भी न दे सके। इससे तो क्षेत्रीय नदियाँ कहीं श्रेष्ठ हैं जो क्षुद्रता के नाम पर कलंकित की जाती हैं। क्षुद्र होकर भी सरिता का जल मीठा है और विराट होकर भी इस उदधि का जल खारा।

पर्यटक का स्वर वातावरण में फैल गया। तभी पीछे से किसी ने कहा—’सागर तो केवल लेना जानता है। वह अपनी विशालता के मद में ही सदैव चूर रहता है। नदियाँ पर्वतराज से इस हाथ लेती हैं तो उस हाथ सदैव देने को तैयार भी रहती हैं। सौ हाथों से कमाकर हजार हाथों से बाँटना ही तो जीवन है। समुद्र इस तथ्य को जानकर भी अनजान है। उसने कितनी ही सरिताओं के विरह अश्रुओं को पीकर अपनी प्यास बुझाई है इसीलिये उसका जल ही नहीं जीवन तक खारा हो गया है।


मानसिक उद्वेग जीवन विनाश के प्रमुख कारण

मानसिक स्वास्थ्य की परीक्षा के लिए यह देखना चाहिये कि चिन्तन की प्रक्रिया सही है या नहीं। जो बिना किसी वेदना अथवा विक्षोभ के हँसी−खुशी और सन्तोष, उत्साह भरा जीवन जी रहा हो उसे मानसिक दृष्टि से स्वस्थ कहा जा सकता है। दूसरों के सुख को अपने सुख से अधिक महत्व देने वाले—दाम्पत्य जीवन से संतुष्ट, विनोद प्रिय, चिड़चिड़ेपन से युक्त—असफलता और निराशा के वातावरण में भी अपना विवेक संतुलन बनाये रहने वाले मानसिक दृष्टि से स्वस्थ कहे जा सकते हैं।

नये व्यक्तियों के बीच नये वातावरण में अपने आपको फिट कर लेना—कभी भी अकेलापन अनुभव न करना—उदासी और खीज से बचे रहना—मन में किसी के प्रति चिरस्थायी ईर्ष्या−द्वेष न रखना—अपनी कठिनाइयों को हलकी और सुधरने योग्य मानना, भविष्य की उज्ज्वल सम्भावनाओं पर विश्वास रखना, भूतकाल की विपत्तियों का, भविष्य की विपन्न आशंकाओं के चिन्तन करते रहने की बुरी आदत से बचे रहना; किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य संतुलन का उपयुक्त प्रमाण माना जा सकता है।

विपत्ति के समय धैर्य, शूरवीरों जैसी निर्भयता, पुरुषार्थ में अभिरुचि, मनोयोगपूर्वक परिश्रम, कठिनाइयों से जूझने का साहस, प्रफुल्ल और निश्चिंत रहना—अपनी क्षमतायें बढ़ाने के लिए तथा त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रयत्नशील रहना यह बताता है कि यह व्यक्ति मानसिक दृष्टि से निरोग है। दूसरों से बड़ी−बड़ी आशायें न बाँधना और उनके सम्बन्ध में बहुत ऊँची कल्पनायें न गढ़ना भी इस बात का चिन्ह है कि मस्तिष्क यथार्थवादी है। बहुत ऊँची उड़ाने उड़ने और किसी को बहुत ऊँची स्थिति का मान बैठने से अन्ततः निराशा ही होती है क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य किन्हीं−किन्हीं दोषों से युक्त पाए जाते हैं।

मन पर छाये रहने वाले उद्वेग, असंतोष एवं आक्रोश मस्तिष्कीय कणिकाओं को इतना उत्तेजित कर देते हैं कि उनका प्रभाव समस्त शरीर पर अशान्ति एवं बेचैनी के रूप में दिखाई पड़ता है। घर का कलह, पैसे की तंगी, व्यावसायिक हानि, मुकदमा, शत्रुता, बीमारी, शोक−वियोग, क्रोध, भय, ईर्ष्या−द्वेष आदि अनेक कारण ऐसे हो सकते हैं; जिनके कारण मस्तिष्क पर असाधारण दबाव पड़े। कहना न होगा कि समस्त शरीर मस्तिष्क के ही नियन्त्रण में चलता है। मस्तिष्क उत्तेजित होगा तो उस उत्तेजना का प्रभाव नस−नाड़ियों, माँस−पेशियों, कोशिकाओं पर—प्रत्येक अंग अवयव पर दिखाई पड़ेगा। उनकी गति बढ़ जायगी और बेचैनी अनुभव होगी। इस स्थिति में जीवनी शक्ति का बेतरह क्षरण होने लगता है। क्रम बहुत समय जारी रहे तो शरीर के अंग प्रत्यंग न केवल शिथिल होते जाते हैं वरन् उनमें तरह−तरह की विकृतियाँ भी उत्पन्न होती हैं। ऐसे उत्तेजन ग्रस्त व्यक्ति कई तरह के रोगी से ग्रसित होते चले जाते हैं और कई बार स्थिति इतनी विषम बन जाती है कि उसका समाधान मृत्यु ही आकर करती है।

संसार के मूर्धन्य व्यक्तियों में से अधिकाँश को अल्पायु में ही अपना शरीर छोड़ना पड़ा। इसका प्रधान कारण उनके मस्तिष्क का अनावश्यक रूप से उत्तेजित रहना पाया गया। काम की अधिकता—प्रस्तुत योजनाओं की पूर्ति का ताना−बाना बुनना—उलझनों और समस्याओं को सुलझाने के लिए व्यग्रता, साथियों से असंतोष आदि कितने ही कारण मस्तिष्कीय क्षमता से अधिक दबाव उन पर डालते रहे, फलतः उस तनाव का परिणाम सारे शरीर की अव्यवस्था के रूप में सामने आता रहा। असामयिक मृत्यु का वह एक बड़ा कारण है जिसके कारण सुविकसित समझे जाने वाले सुसम्पन्न एवं मूर्धन्य लोग प्रायः जीवन काल की थोड़ी−सी मंजिल पूरी करके ही पैर पसार देते हैं।

तनाव के चिन्हों में सबसे प्रधान है गहरी निद्रा का अभाव। ऐसे लोगों को देर या कम मात्रा में नींद आती है। जितनी देर आती है वह भी हलकी और छिर–छिरी होती है। झपकियाँ आती रहती हैं और सामने देखते रहते हैं। अधजगी स्थिति बनी रहती है। ऐसी अर्ध निद्रित अवस्था में यदि सारी रात पड़े रहा जाय तो भी उतनी राहत नहीं मिलती जितनी दो चार घण्टे गहरी नींद में सो जाने पर मिलती है। भोजन द्वारा पोषण प्राप्त करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि शरीर और मस्तिष्क को श्रम जन्य थकान दूर करने के लिए समुचित विश्राम मिलता रहे। विश्राम का प्रमुख माध्यम है निद्रा। गहरी नींद द्वारा हम थकान मिटाते हैं और नये सिरे से काम कर सकने योग्य स्फूर्ति प्राप्त करते हैं। यदि नींद अधूरी रहेगी तो क्षति पूर्ति का समुचित साधन बन ही न सकेगा और मनुष्य थका−हारा अज्ञान्त बेचैन बना रहेगा।

अनिद्रा और तनाव का घनिष्ट सम्बन्ध है। किन्तु वह मानसिक उत्तेजना के कारण ही उत्पन्न होती है। शारीरिक श्रम से अधिक थका हुआ मनुष्य तो आसानी से गहरी नींद में सो जाता है पर मानसिक उत्तेजनायें निद्रा आने में भारी बाधा उत्पन्न करती हैं। आवेशों से उद्विग्न मनुष्य भीतर ही भीतर बेतरह अज्ञान्त रहते हैं और चैन की नींद सो नहीं पाते। कहना न होगा कि थकान उतारने के लिए और ताजगी प्राप्त करने के लिए निद्रा की अनिवार्य आवश्यकता है। नींद न आने से मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों के खर्च की पूर्ति नहीं हो सकती। दूसरे दिन फिर काम करना पड़ता है। पिछले की पूर्ति होने नहीं पाई थी कि नया बोझ और सिर पर आ गया इस प्रकार लगातार थकान का बोझ बढ़ता जाता है और मनुष्य दिन−दिन दिवालिया होता जाता है।

उद्विग्न मनुष्य असहिष्णु, चिढ़−चिढ़ा और असंतुलित रहने लगता है। उसे तनिक−सी प्रतिकूलता पहाड़ जैसी भारी लगती है और घबरा कर ऐसे कार्य करने पर उतारू हो जाता है जिसकी वस्तुतः कुछ भी आवश्यकता नहीं थी। इंग्लैंड बहुत छोटा देश है, पर उसमें हर वर्ष प्रायः 40 हजार मनुष्य आत्महत्या का प्रयास करते हैं जिसमें से 35 हजार असफल रहते हैं और 5 हजार तो जान गँवा ही बैठते हैं।

निरन्तर गम्भीर विषयों पर सोचते रहते अथवा वास्तविक अवास्तविक कठिनाइयों की बढ़ी−चढ़ी कल्पना करके उनके सम्बन्ध में चिन्तित उद्विग्न रहने से मस्तिष्कीय कोशिकाओं में गर्मी अत्यधिक बढ़ती चली जाती है और कभी−कभी वह इतनी अधिक होती है कि रक्त चाप की वृद्धि—अनिद्रा का प्रकोप जैसी बीमारियों के रूप में परिणत होती है। हृदय रोगों का प्रधान कारण ऐसी ही उद्विग्न मनःस्थिति होती है। कभी−कभी तो इसी तनाव के कारण मस्तिष्कीय रक्त नलिकायें तक फट जाती हैं और मनुष्य मृत्यु के मुख में चला जाता है। संसार के कितने ही मूर्धन्य राजनेता इसी प्रकार के रोगों से ग्रसित होकर मृत्यु के मुख में अचानक ही चले गये हैं।

डा. हेन्स सेल्वे के अनुसार मानसिक तनाव में शरीर का रासायनिक संतुलन बिगड़ता है। कई तरह के उपयोगी हारमोन उत्पन्न करने वाली मस्तिष्क स्थित पिच्युएटरी—गुर्दे में स्थित एड्रीनल ग्रन्थियाँ अपरिपक्व और विकृत स्तर के हारमोन फेंकने लगती हैं फलतः शरीर का सारा ढाँचा ही चरमराने लगता है।

संसार के प्रगतिशील देशों में पुरुषों की अपेक्षा महिलायें अधिक दीर्घजीवी होती है। यों शरीर संरचना की दृष्टि से उनमें पुरुष की अपेक्षा कुछ कमी ही पाई जाती है और बच्चों को जन्म देने से लेकर उन्हें दूध पिलाने तक की प्रक्रिया भी ऐसी कष्ट कारक एवं क्षतिपूर्ण है जिससे सामान्य बुद्धि के अनुसार उन्हें कम आयुष्य प्राप्त होनी चाहिये, किन्तु होता उसके ठीक विपरीत है। स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा न केवल अधिक दिन जीवित रहती हैं, वरन् वे बीमार भी कम पड़ती हैं। इन आश्चर्य जनक आँकड़ों पर गम्भीर दृष्टि डालने वाले मनीषियों ने उनका एक ही कारण खोजा है अपेक्षाकृत अधिक चिन्ता मुक्त रहना और हँसने−खेलने का विनोदी जीवनक्रम अपनाना। मर्द जहाँ तरह−तरह की चिन्ताओं और समस्याओं में उलझा हुआ खीजता रहता है, वहाँ नारी शरीर और घर को अधिक सुन्दर बनाने, बच्चों के साथ हँसने−खेलने और विनोदी गतिविधियों में अधिक संलग्न रहती है। मस्तिष्क पर तनाव अधिक रहने से नर जहाँ अल्पजीवी होता है वहाँ निश्चिन्तता और प्रसन्नता को अपना कर नारी अधिक दिन जीवित रह सकने में सफल होती है और अपेक्षाकृत निरोग भी रहती है।

उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारतीय नारी अधिक बीमार पड़ती है, जल्दी मरती है। विकसित देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति में वह विपरीतता रहने का एक कारण यहाँ की अशिक्षा—पिंजड़े जैसे घरों में कैद रहना, पोषक आहार की कमी और प्रजनन का अधिक भार पड़ना भी है; पर सबसे बड़ा कारण है उनकी सामाजिक स्थिति, जिसमें पग−पग पर उन्हें शोषण का, अपमान, उत्पीड़न, घुटन, असन्तोष एवं खीज का अनुभव होता रहता है। नीरस, निरर्थक, प्रताड़ित, प्रतिबंधित जीवन जीने की उद्विग्नता उनकी जिन्दगी की अवधि कम करने वाला बहुत बड़ा कारण है। यदि उन्हें सन्तोष और प्रसन्नता भरी परिस्थितियाँ विकसित देश की महिलाओं की तरह उपलब्ध हो सकें तो कोई कारण नहीं कि वे भी अपेक्षाकृत अधिक दीर्घ−जीवी और अधिक निरोग न रह सकें।

निराशा एक ऐसी प्रक्रिया है जो खींच−खाँच कर उन्हीं परिस्थितियों के निकट ले आती है जिनसे डरकर निराशा अपनाई गई थी। जितना दबाव निराशा का मस्तिष्क पर जमा किया जाता है उतना ही चिन्तन यदि उन परिस्थितियों का निकट लाने में केन्द्रित किया जाय; जिन्हें हम चाहते हैं तो निश्चित रूप से चमत्कारी प्रतिफल सामने आयेगा। अभीष्ट परिस्थितियाँ जो निराशा के क्षणों में बहुत कठिन दिख पड़ती हैं वे सरल और साध्य बनती चली जायेगी। निराशा जन्य विपत्तियों और आशा के साथ सम्बद्ध उपलब्धियों पर यदि तुलनात्मक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि गर्त में गिरने और ऊँचा उठने के लिए प्रयास करने की तरह वे अन्ततः व्यक्ति को कितनी भिन्न परिस्थितियों तक ले पहुँचती हैं।

एक व्यक्ति उतने ही समय पूर्व को चले और दूसरा उतने ही समय पश्चिम की ओर चलता रहे तो उनके चलने की अपेक्षा दोनों की दूरी दूनी हो जायगी। एक दिन में पूर्व को चलने वाला 10 मील चला। दूसरे ने पश्चिम को 10 मील प्रयाण किया। साँयकाल को वे एक दूसरे से बीस मील दूर होंगे। ठीक इसी प्रकार निराशा ग्रस्त और आशावादी मनुष्यों के बीच विपत्ति—सम्पत्ति का आश्चर्यजनक अन्तर पड़ जाता है। एक उतने ही समय गिरने का प्रयत्न करता रह दूसरे ने वह समय और शक्ति उठने में लगाई तो कुछ ही समय बाद यह पता चल जायगा कि उन दोनों की स्थिति में कितना भारी तुलनात्मक अन्तर उपस्थित हो गया।

मनोविज्ञानी सी.जी. युंग ने में अपनी पुस्तक ‘मार्डन मैन इन सर्च आफ सोल’ में रोग ग्रस्तों की चर्चा करते हुए लिखा है—उनमें से अधिकाँश ऐसे होते हैं जिनने अपने उज्ज्वल भविष्य पर से भरोसा खो दिया है। इन्हें किसी भी चिकित्सा द्वारा स्थायी रूप से अच्छा कर सकना कठिन है; एक के बाद दूसरे मर्ज उन पर हावी होते ही रहते हैं। रोग मुक्त केवल उन्हें ही किया जा सकता है जिन्होंने अपने खोये विश्वास को पुनः वापिस लौटाने में सफलता प्राप्त कर ली।

शारीरिक और मानसिक थकान का, परिश्रम की अधिकता या पौष्टिक भोजन का अभाव उतना बड़ा कारण नहीं जितना कि मानसिक असन्तुलन। मनःशास्त्र के विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि उतावली, आवेश, हड़बड़ाहट, चिन्ता एवं भावुकता ये उतार−चढ़ाव मनुष्य का अत्यधिक थका देते हैं। निराशा जन्य खीज, अधूरी आशायें सामर्थ्य से अधिक ऊँची महत्वाकाँक्षायें, परस्पर विरोधी विचारों के अन्तर्द्वन्द, अनिश्चित एवं अनिर्णीत विचार, आत्महीनता, सामने प्रस्तुत काम में अरुचि, असफलता की आशंका, अविश्वास और भयग्रस्तता जैसे कारणों में उलझा हुआ मस्तिष्क इतना अधिक थक जाता है जितना कि पूरे दिन कठोर परिश्रम करने में भी नहीं थका जाता। ऐसे उलझे हुए मनुष्य कुछ काम न होने पर भी सदा थके−थके, खिन्न और खीजे हुए दिखाई पड़ते हैं।

शिकोभी विश्वविद्यालय के परीक्षणों में बताया है कि अप्रिय मनुष्यों से मिलने, अप्रिय काम करने और अप्रिय परिस्थितियों में रहने से मनुष्य सबसे अधिक थकान अनुभव करता है। प्रियजनों के संपर्क में अनुकूल परिस्थितियों में और अनुकूल कार्यों में संलग्न रहकर मनुष्य जितना काम कर सकता है प्रतिकूलताओं के बीच रहकर वह अपेक्षाकृत चौगुनी थकान अनुभव करता है।

थकान और तनाव भरा जीवन भार है। यह एक ऐसा भार है जिसे हम स्वयं ही अपनी मानसिक दुर्बलता एवं अस्त−व्यस्तता के आधार पर बनाते और अपने कन्धों पर लादते हैं। जीवन का—संसार का—और अपनी सीमा का यदि सही संतुलन रखा जा सके तो न केवल तनाव रहित जीवन—हलका फुलका जीवन जिया जा सकता है वरन् इतना प्रसन्न संतुष्ट रहा जा सकता हैं जिसकी शीतल सुरभि का लाभ अन्य समीपवर्ती सम्बन्धित लोग भी उठा सकें।

अंग्रेज लेखक बेकन वृद्धावस्था में बहुत निर्धन हो गये थे। इसका एक कारण उनका चिन्तन में अधिक उलझा रहना और कमाई पर कम ध्यान देना भी था। एक दिन उनकी पत्नी ने कहा—बुढ़ापे में निर्धन होना कितना कष्ट कर है—क्या आपको यह स्थिति अखरती नहीं?

वेकन ने शान्त चित्त से कहा—धन कमाना आसान है। जुट मड़ेगे तो कमा ही लेंगे, पर मैं रखता हूँ जीवन जीना कितना कठिन है। मैं उसी कला को सीखना आरम्भ कर रहा हूँ। उसके अनुसन्धान और प्रयोग मात्र में जब इतना रस मिलता है तो सोचता हूँ उसकी अधिक उपलब्धि में न जाने कितना आनन्द होगा। प्रिये, धन उतना आनन्द दायक नहीं जितनी जीवन का सही मूल्याँकन और उपयोग कर सकने वाले दृष्टिकोण का विकास।

एलबर्ट स्विट्जर एक दिन बड़े तड़के घुटने टेक कर भाव भरी प्रार्थना कर रहे थे, ऐ मेरी दुनिया के स्वामी, आपने जीवन को जानने की जिज्ञासा के साथ मुझे जोड़ ही दिया तो अब जीवन को क्षीण मत होने देना। जीवन रस का प्याला इतना मधुर है कि मुझसे छोड़ा न जा सकेगा। यह हट गया तो फिर मेरे लिए जीवित रह सकना असह्य हो जायगा।

तनाव और थकान भरा जीवन जियें, अथवा सरस सन्तोष को अपनाकर पुष्प की तरह खिलते रहें, यह चुनाव करना अपने दृष्टिकोण पर निर्भर है; परिस्थितियों पर आधारित नहीं जैसा कि आमतौर से समझा जाता है।


व्यक्ति अपने में अपूर्ण है (kahani)

प्लाइमाउथ की एक महिला डा. सैमुअल जान्सन के शब्दकोश के पृष्ठ पलट रही थी। उसकी दृष्टि तक परिभाषा पर अटक गई। उसे लगा कि यह परिभाषा गलत है पर इतने बड़े साहित्यकार के सम्बन्ध में एकदम ऐसा निर्णय करना उचित न था। परिभाषा के शब्दों को उसने कई बार ध्यान से पढ़ा और समझने का प्रयास किया अब वह इस निश्चय पर पहुँच चुकी थी कि जानसन की परिभाषा बिल्कुल गलत है। उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। एक विद्वान् को पछाड़ने का इससे अच्छा अवसर कब हाथ आने वाला था।

महिला लन्दन के लिये चल पड़ी। उसकी धारणा थी कि जब जान्सन का ध्यान इस परिभाषा की ओर आकर्षित करेगी तो उससे घण्टों वाद−विवाद होगा वह, अपनी परिभाषा को सत्य सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क प्रस्तुत करेगा। महिला डा. जानसन के घर पहुँची। उसने अपने आने का उद्देश्य बताकर जानसन की भूल को सामने रखा। जानसन ने विनम्र शब्दों में उत्तर दिया—”भद्र मुझसे यह भूल अज्ञानता के कारण हुई है। व्यक्ति अपने में अपूर्ण है। इसलिए त्रुटियों का होना स्वाभाविक है, मैं अपनी इस भूल को तुरन्त ही सुधार देता हूँ।” इतना कह कर उसे विदा किया।

महिला जिस तैयारी के साथ विवाद की आशा लेकर आई थी वह व्यर्थ सिद्ध हुई। हराने के लिए वह दर्पपूर्वक गई थी पर नम्रता से परास्त होकर लौटी।


प्रतिभा का प्रयोग सर्वनाश के लिए

शक्ति को प्राप्त करने के लिए—उसके स्रोतों को ढूँढ़ निकालने के लिए जितने पुरुषार्थ और मनोयोग की आवश्यकता पड़ती है उससे कहीं अधिक दूरदर्शिता की आवश्यकता उनके उपयोग के लिए प्रयुक्त करनी पड़ती है। यदि बुद्धिमत्ता एकाकी हो—उपार्जन भर तक उसी परिधि समाप्त हो जाय और सदुपयोग की सूझ−बूझ का अभाव रहे तो वह एकाँगी सफलता लाभ के स्थान पर हानि ही उत्पन्न करेगी।

बलिष्ठता, बल, बुद्धि, विद्या, प्रतिभा एवं सम्पत्ति का अपना महत्व है, उन्हें पुरुषार्थ पूर्वक कमाया जाता है। निस्सन्देह उन्हें उपार्जित करने वाले की धर्मशीलता एवं बुद्धि चातुरी की प्रशंसा की जायगी। किन्तु साथ ही यह भुला न दिया जाय कि इन उपार्जित सम्पदाओं का उपयोग किस प्रयोजन के लिए, किस प्रकार किया जाय इसका ज्ञान न हो सका तो यह उपार्जन दुधारी तलवार की तरह उलट कर अपना ही सर्वनाश करेगा। सम्पत्तिवाद् अपने वैभव का दुरुपयोग करके अपना और दूसरों का जितना अहित कर सकता है उतना किसी निर्धन के लिए सम्भव नहीं। अशिक्षित व्यक्ति समीपवर्ती लोगों को थोड़ी−सी शारीरिक अथवा व्यक्ति समीपवर्ती लोगों को थोड़ी−सी शारीरिक अथवा आर्थिक हानि पहुँचा सकता है; पर जिसके पास विद्या और बुद्धि का बाहुल्य है वह विशाल जनसमूह की, भ्रम−जंजाल में−अवाँछनीय क्रियाकलाप में उलझाकर बड़े पैमाने पर विनाश के खेल खड़े कर सकता है।

विज्ञान के आविष्कारों, अन्वेषणों में गहराई तक प्रवेश करने वाली बुद्धि चातुरी की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। पर साथ ही यह तथ्य भी समझ कर चलता होगा कि यदि कौशल के द्वारा उपार्जित क्षमता का उपयोग ईर्ष्या−द्वेष की पूर्ति के लिए—शोषण और आधिपत्य के लिए किया गया तो कौशल एवं उपार्जन बहुत महंगा पड़ेगा।

उपलब्धियों का अपना मूल्य है और महत्व; किन्तु यह भुलाया नहीं जा सकता कि उनका लाभ तभी मिलेगा जब सदुपयोग की बात ध्यान में बनी रहे। इन दिनों मानवी बुद्धि−कौशल प्रत्येक क्षेत्र में अथवा चमत्कार दिखा रहा है, विज्ञान के क्षेत्र में थी। पर यह नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान दुर्बुद्धि के रहते इसका सदुपयोग भी हो सकेगा या नहीं।

अणु शक्ति को ही लें—वह एक महती सामर्थ्य है। उसका सदुपयोग किया जा सके तो समुद्र के खारी पानी को मीठा बनाने और ज्वार भाटों से बिजली पैदा करके अतीव लाभ दायक प्रयोजन पूरे किए जा सकते हैं और सुख−समृद्धि के बढ़ाने में भारी योगदान मिल सकता है; पर यदि अपना आधिपत्य जमाने के लिए उनका विनाशकारी उपयोग किया गया तो यह भी निश्चित है कि हम सबको सामूहिक आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ेगा।

अब तक जितने अणु शस्त्र बन चुके हैं वे पृथ्वी को कई बार नष्ट−भ्रष्ट करके रख देने के लिए पर्याप्त हैं। यदि उनका मारक प्रयोग न भी हो तो भी उनके परीक्षणों से जितना वातावरण विषाक्त हो चुका है उसकी प्रतिक्रिया भी कम भयावह सिद्ध नहीं होगी।

अब तक अणु शस्त्र बनाने में संलग्न देशों ने परीक्षण के लिए जो विस्फोट किये हैं उनकी संख्या 400 से अधिक है। इसके 700 मेगाटन टी. एन. टी. से अधिक शक्ति का वायुमण्डल में विकिरण हो चुका है। समुद्र में और पृथ्वी के नीचे जो परीक्षण किए गये हैं उनका विवरण इनमें सम्मिलित नहीं है।

इन परीक्षणों का प्रभाव विश्व व्यापी हुआ है। ध्रुव क्षेत्र के ऊपर 35000 फुट और भूमध्य रेखा के पास 50000 ऊँचाई तक फैले हुए परिवर्ती मण्डल में रेडियो सक्रिय धूल छा गई है और उसने संसार के समस्त क्षेत्र पर न्यूनाधिक मात्रा में इस विकिरण धूलि की वर्षा आरम्भ कर दी है। निश्चित रूप से इसका दुष्परिणाम समस्त प्राणियों और वनस्पतियों को भुगतना पड़ेगा।

रेडियोधर्मी विकिरण का प्रभाव अल्फा, बीटा और गामा किरणों के आक्रमण जैसा उपस्थित होता है। इनके मन्द प्रभाव को भी प्राणियों की जीव कोषायें सीख लेती है और चिरकाल तक—पीड़ियों तक उस दुष्प्रभाव की प्रतिक्रिया उत्पन्न करती रहती है। तरह−तरह के रोग−उत्पन्न होते हैं और प्रभावित व्यक्तियों की सन्तानों में अनेकों शारीरिक, मानसिक दोष दिखाई पड़ते हैं। जापान में गिराये गये अणु बमों की घटना के बहुत समय बाद भी जन्मे बालकों में से अनेकों ऐसे हैं जिन्हें अविकसित एवं अपंग कहा जा सकता है।

अणु बम के विस्फोट के समय एक ऐसा अत्यन्त उष्ण और चमकीला प्रकाश पुँज हवा में उदय होता है; मानो सूरज ही धरती पर उतर आया हो। उससे आग की लहरें चारों तरफ फैलती हैं और मीलों तक जमीन के पदार्थों में आग लग जाती है। धमक और चमक इतनी भयंकर होती है कि दूरवर्ती लोग भी उससे अंधे, बहरे जैसे बन जाते हैं। मकानों और पहाड़ों का मलवा हवा में उछलकर दो−दो मील की उड़ानें उड़ता है और वे टुकड़े तोप के गोलों का काम करते हैं जहाँ गिरते हैं वहीं सर्वनाश उत्पन्न करते हैं। जमीन की धूल उड़कर आसमान में आँधी की तरह छा जाती है।

द्वितीय महायुद्ध में कुल मिलाकर 3 मेगाटन शक्ति के विस्फोटक प्रयुक्त हुए है। तब की अपेक्षा यह विस्फोटक शक्ति अत्यधिक मात्रा में मनुष्य ने हस्तगत कर ली है। जापान पर गिराये गये अणु बम बच्चे−बचकाने कहे जाते हैं पर उनकी शक्ति भी एक बटा पाँच मेगाटन थी। अब अमेरिका के पास उससे एक लाख गुनी अधिक शक्ति वाले अणु बम है। रूस ने कुछ समय पूर्व जिस बम का परीक्षण किया था उसकी शक्ति 50 मेगाटन अर्थात् जापान वाले बम से 250 गुनी अधिक थी। जापान में 1 लाख के करीब मरे और उतने ही घायल हुए थे। प्रस्तुत अणु बमों की शक्ति के अनुपात से ही उनके द्वारा विनाश की भी सम्भावना है।

विस्फोटक विशेषज्ञ विनस सी. पार्लिम का कथन है—पिछले दो महायुद्धों में कुल मिलाकर 2 करोड़ टन विस्फोटक शक्ति खर्च हुई थी। पर अब हमारे पास अणु तथा दूसरी विस्फोटक शक्ति का 32000 करोड़ टन विस्फोटक तैयार है। अर्थात् पिछले दो युद्धों की तुलना में हम 16 हजार गुना विनाश कर सकने की सामर्थ्य संचय कर चुके हैं।

एक मध्यवर्ती−हाइड्रोजन के विस्फोट की धमक से 6 मील के घेरे की वस्तुओं का पूर्ण विनाश हो जाता है। 12 मील तक गम्भीर नुकसान होता है। 25 मील तक आँशिक नुकसान होता है और ताप के प्रभाव से 10 मील घेरे के 95 प्रतिशत प्राणियों की उसी क्षण मृत्यु हो जाती है। 17 मील के घेरे में जले और घायल हुए प्राणी भी रोते कलपते कुछ समय में मर ही जाते है। रेडियो विकिरण 150 मील के घेरे में 600 राण्टजेन इकाई के परिमाण में फैल जाता है। 12 मील तक उसका मात्र 5000, 100 मील तक 2300 170 मील तक 500 और 250 मील तक 30 रहती है। वैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य शरीर को बुरी तरह प्रभावित करने के लिए 30 राण्टजेन इकाई ही पर्याप्त है।

आणविक बिजली घरों से निकलने वाली राख को कहाँ ठिकाने लगाया जाय यह एक अत्यन्त पेचीदा प्रश्न है जिसका कोई सन्तोष जनक समाधान अभी तक नहीं खोजा जा सका अमेरिका में ऐसा मलवा करोड़ों गैलन इकट्ठा हो गया है। अब तक उसे इस्पात की टंकियों में बन्द करके रखा गया है। इन टंकियों की लागत लगभग दो डालर प्रति गैलन के हिसाब से आती है। आगे यह कार्य और तेजी से बढ़ने वाला है तब इस मलवे के पहाड़ को कहाँ रखा जायगा। प्रश्न रखने का ही नहीं खतरे का भी है। उस मलवे में से रेडियोधर्मी तत्वों की घातक किरणें निरन्तर फूटती रहती हैं। जिनका घातक प्रभाव समीपवर्ती क्षेत्र के प्राणियों, पदार्थों तथा वनस्पतियों पर पड़ता है।

इस विकिरण से जीवों तथा वनस्पतियों के आकार बदल सकते हैं, वे अपंग या नपुँसक हो सकते हैं यहाँ तक कि मर भी सकते हैं। उनके संपर्क में आने वालों पर लम्बे समय तक विकिरण प्रभाव बना रह सकता है। इस राख को धरती में गाढ़ा जाये तो वे जमीन से उत्पन्न वनस्पतियों तथा जलस्रोतों को प्रभावित करेंगे। समुद्र में डालें तो उसका प्रभाव जलचरों पर पड़ेगा और विषाक्त बादल बरसेंगे। हवा में उड़ा दें तो हवा विषैली होगी। इस विकिरण का प्रभाव जल्दी समाप्त नहीं होता वह सदियों तक बना रहता है।

यह राख गरम होती है इस गर्मी को सीमित रखने के लिए ठण्डे पानी एवं पंखों का उपयोग करना पड़ता है अन्यथा वह जिन टंकियों में बन्द है उसे ही गला कर पिघला देगी यदि केवल 11 घन फुट यह राख किसी ठंडी इमारत के नीचे दबा दी जाय तो वह अनिश्चित काल तक गरमागरम बनी रहेगी वस्तुतः इसे मलवा कहना ही नहीं चाहिए उसमें प्रचण्ड शक्ति भरी रहती है। उसका उपयोग समझ में आता तो इस राख से ही इतना काम चल सकता था जितना कि अणु भट्टियों की बिजली से चलता है। सरलता इसमें प्रतीत होती है कि अत्यन्त गहरे समुद्रों में उस मलवे से भरी इस्पाती टंकियों को डुबो दिया जाय। वहाँ वे ठण्डी बनी रहेंगी। किन्तु समुद्रतल में कभी भूकम्प आया और कोई ज्वालामुखी फूटा तो इन टंकियों की भी मुसीबत आ जायगी और उसका विनाशकारी दुष्परिणाम समुद्र के विषाक्त बन जाने पर जलचरों और थलचरों के सफाया होने के रूप में सामने प्रस्तुत होगा।

6 अगस्त 1945 को जब हिरोशिमा पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराया गया और सहस्रों व्यक्ति मारे गये। 78150 की लाशें ढूँढ़ निकाली गई और 13983 का तो पता ही नहीं चला। सम्पत्ति का, प्राणियों का जो महाविनाश हुआ उसकी तो कुछ सीमा ही नहीं।

इस समाचार से अणु वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में गम्भीर मुद्रा में बैठे स्तब्ध रह गये। उस दिन प्रोफेसर बोर, प्रो.फर्मी और प्रो.आइन्स्टीन को अत्यधिक ग्लानि हुई। रुलाई उनके चेहरे से टपक रही थी। विज्ञान का अभिशाप इस प्रकार मनुष्य को कितनी बुरी तरह संत्रस्त कर सकता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण उन्होंने देखा समझा एक प्रश्न के उत्तर में आइन्स्टीन ने कहा—यदि तीसरा महायुद्ध छिड़ा तो इसके बाद मनुष्य जाति आदिम स्थिति में जा पहुँचेगी और चौथे युद्ध की आवश्यकता पड़ी तो उसमें डण्डे चलाने तथा पत्थर फेंकने के अतिरिक्त और किसी शस्त्र का उपयोग कर सकने की क्षमता शेष न रहेगी।

मनुष्य का जितनी बुद्धिमत्ता मिली है उसकी शताँश भी सदाशयता मिली होती—जितनी सम्पदा मिली है उसकी शताँश भी उदारता मिली होती तो यह संसार कितना भव्य और मानव कितना दिव्य होता; पर आज तो दुर्भाग्य की ही काली घटायें चारों ओर छा रही हैं। अणु शक्ति जैसी महान् सामर्थ्य का उपयोग महाविनाश के लिए करने की तैयारी में ही हमारी विज्ञान बुद्धि नियोजित हो रही है।


पलाश पुष्प (kahani)

‘मेरा उपयोग न कोई सजावट के लिये करता है और न शृंगार के लिये। मेरे रूप सौंदर्य से तो आप भी परिचित है। मेरा जैसा रक्त वर्ण विधाता ने शायद ही किसी को दिया हो। फिर भी मेरी उपेक्षा होती है। मुझे कोई तोड़ने ही नहीं आता।’ पलाश पुष्प ने दुःखी होकर अपने पिता से पूछा।

‘वत्स! इसमें निराश होने की बात क्या है?’ पिता ने समझाते हुए कहा—’माली तो सुगन्धित पुष्पों को चुनकर ही माला बनाता है; और ललनायें भी महकते फूलों से ही अपनी केशराशि को सुसज्जित करती हैं। तुझमें सुगन्धि का अभाव है इसीलिये तो तेरे पास कम ही आते हैं।’ ‘तब तो मेरा जीवन बेकार ही जायेगा।’ ‘नहीं! तेरे रंग की कीमत तुझे अवश्य प्राप्त होगी।’


बढ़ती हुई जनसंख्या के संकट

संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रतिवेदन में कहा गया कि सन् 1970 में विश्व की समस्त जनसंख्या 333 करोड़ 20 लाख थी, जिस क्रम से वह पिछले दिनों बढ़ी है वही क्रम जारी रहा तो सन् 2005 में संसार की जनसंख्या तीन गुनी बढ़ जायगी अर्थात् 11 अरब से भी ऊपर निकल जायगी।

मोटे तौर पर यह समझदारी बढ़ी है कि लोग कम बच्चे पैदा करने की आवश्यकता को अनुभव करें। इसलिए जन्म दर यत्किंचित घटी है। यही क्रम जारी रहा तो प्रति हजार जनसंख्या पीछे हर साल इस समय जो 33.2 बच्चे पैदा होने का क्रम है वह घट कर 25.1 हो जायगा। लेकिन मृत्यु दर भी घट रही है। वह इन दिनों 12.8 प्रति हजार के क्रम पर है। वह भी भविष्य में घट कर 8.1 रह जायगी। इस प्रकार बढ़ोत्तरी और घटोत्तरी का हिसाब लगाने पर अंतिम निष्कर्ष यह रहेगा कि वृद्धि 55.5 प्रति हजार से बढ़कर 65.5 हो जायगी।

मनुष्यों की बढ़ती हुई जनसंख्या का सबसे बड़ा दुष्परिणाम पशुओं का भुगतना पड़ेगा। जो जमीन अभी उनके निवास, भ्रमण और चारे के काम आती है यह सारी की सारी मनुष्यों के निर्वाह में प्रयुक्त होने लगेगी। जब उन बेचारों के लिए कहीं जगह ही न बचेगी तो वे हवा में थोड़े ही उड़ेंगे। उनका अस्तित्व समाप्त हो जायगा। क्या गाय, क्या गधा सभी को धरती का मोह छोड़ कर किसी अन्य लोक में अपने लिए स्थान ढूँढ़ना पड़ेगा। यह स्थिति आने में बहुत देर नहीं पचास वर्ष बाद ही यह विषम स्थिति सामने आ खड़ी होगी और तब वर्तमान पशुओं की नसल देखने के लिए सुरक्षित चिड़िया घरों में कौतूहल पूर्वक जाना पड़ा करेगा।

पशुओं का अस्तित्व मिट जाने पर दूध का प्रश्न सामने आयेगा। मातायें नवजात शिशुओं की भूख शाँत कर सकने जितना दूध उत्पन्न नहीं करतीं उन्हें बाहरी दूध देकर ही बचाया जाता है। दूध−दही, घी के बिना तो काम चल जायगा पर चाय, काफी से सफेदी बनाये रखने के लिए दूध की आवश्यकता पड़ेगी। पशुओं के न रहने पर इन आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकेगा। वैज्ञानिक इस दिशा में सचेष्ट हैं और कृत्रिम दूध बनाने में संलग्न हैं।

ब्रिटेन के रसायन शास्त्री डा. हुग फ्रेंकलिन ने बन्दगोभी, मटर की कोंपलों में अन्य रासायनिक पदार्थ मिला कर एक गाढ़ा घोल बनाया है जो दूध की जगह काम में लाया जा सकता है। उसका रंग और स्वाद लगभग वैसा ही बना दिया गया है। समुद्री घास का रस भी दूध की जगह पर काम लाने योग्य कैसे बनाया जा सकता है, इसकी खोज अब सफलता के नजदीक ही पहुँच चुकी हैं।

मैसूर के खाद्य औद्योगिकी अनुसन्धान शाला ने मूँगफली के प्रोटीन में कई तरह के रसायन मिलाकर पेय दूध बना दिया है और उसका नाम ‘मिलटोन’ रखा है। बताया गया है कि इसके सामने परम्परागत पशु दुग्ध नाचीज है जिसकी जीभ में इस वैज्ञानिक दूध की ओर मुख करके भी न देखेगा। यह दूध अपेक्षाकृत सस्ता पड़ेगा और अधिक आकर्षक है। रोज−रोज खरीदने का झंझट उठाने की अपेक्षा इस महीनों के लिए एक बार ही जमा करके रखा जा सकने की भी सुविधा मौजूद है। उत्तर प्रदेश के नैनीताल के कृषि विश्वविद्यालय ने भी सोयाबीन के दानों को पीस कर कृत्रिम दूध बनाने में सफलता प्राप्त की है।

बढ़ती हुई जनसंख्या पर नियन्त्रण न किया जा सका तो अन्न संकट−दुग्ध संकट जैसे असंख्य संकट सामने प्रस्तुत होंगे और मानवी अस्तित्व को ही चुनौती प्रस्तुत करेंगे।


अतीत की खोई गरिमा हम पुनः प्राप्त करें

भारत किसी समय उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा हुआ था। उसकी अपनी सीमाओं में सुख−शान्ति के भाण्डागार भरे पड़े थे। भौतिक साधनों की कमी न थी। शारीरिक बलिष्ठता और दीर्घजीवन का भरपूर आनन्द सबको उपलब्ध था। परिवार एक छोटे राष्ट्र के रूप में विकसित होते हुए—विकासमान पुष्प−पादपों से भरे हुए उद्यान की तरह शोभायमान थे। धन सम्पदा की कमी न थी। अन्न के भण्डार भरे पड़े थे और दूध, घी की नदियाँ बहती थीं। सोना−चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुएँ घरेलू बर्तनों में प्रयुक्त होती थी। सामाजिक सुव्यवस्था पारस्परिक सघन सद्भाव सहयोग पर समुन्नत स्थिति में जा पहुँचती थी। शालीनता और सज्जनता को हर व्यक्ति ने आवश्यक वस्त्रों की तरह धारण कर रखा था। राजा लोग गर्व करते थे कि उनके राज्य में कोई चोर, अपराधी, कुकर्मी नर−नारी नहीं है।

उन सतयुगी परिस्थितियों में यह देश अपनी प्रगति, समृद्धि और सुख−शान्ति को अपनी ही सीमा तक सीमित रखने वाला न था, उसने दोनों हाथों से समस्त संसार में बखेरा। समृद्धि का सदुपयोग है भी इसी में कि उसका लाभ अपने शरीर, परिवार तक सीमित न रहे और उसका लाभ प्रकाश दीप की तरह सुदूर क्षेत्रों को आलोकित करता रहे।

भारतवासी कुछ पाने, कमाने के लालच से नहीं, वरन् अपने उपार्जन से समस्त संसार को लाभान्वित करने के लिए सुदूर देशों में गये और धरती के कोने−कोने को संस्कृति और समृद्धि का अजस्र अनुदान देकर ऊँचा उठाया। इन प्रयासों में इतिहास के पृष्ठ स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं, पिछड़ी हुई परिस्थितियों में रहने वाले लोगों ने भारतवासियों के अपरिमित अनुदान पाये और सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में बढ़ चलने का पथ−प्रशस्त किया। यही रही है प्राचीन काल के भारत की विश्व सेवा साधना की पृष्ठभूमि; जिससे वह स्वयं गौरवान्वित हुआ और समस्त संसार को कृतकृत्य बनाया।

भारत की भौगोलिक सीमाओं में निवास करने वाले तेतीस करोड़ नागरिक समस्त विश्व में तेतीस कोटि देवताओं के नाम से—पूजे, पहचाने जाते थे। उन्हें भू देव−भू सुर का सम्मान प्राप्त था। भारत भूमि देव भूमि कहीं जाती थी। उसे ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ इसलिए कहा जाता था कि यहाँ स्वर्गादपि गरीयसी परिस्थितियाँ सदा ही बनी रहती थीं। संसार ने जब उससे, अन्धकार को निरस्त करके सर्वत्र सद्ज्ञान का आलोक पाया तो उसकी गुरुता के चरणों में मस्तक झुकाया और ‘जगत् गुरु’ कहा। शासन तन्त्र के स्वरूप और लाभ का अनुदान पाकर उसे चक्रवर्ती शासक कहा गया। यहाँ के शासन−तन्त्र−विज्ञानी सुदूर देशों में गये और वहाँ के निवासियों को सरकारें बनाने और चलाने से परिचित, अभ्यस्त बनाकर वापिस चले आये या आगे बढ़ गये। ऐसी थी भारत की चक्रवर्ती शासन नीति। स्थानीय उच्छृंखलता बढ़ने न पाये। नीति संचालन के सूत्र समुन्नत लोगों के हाथ में रहें इसलिए संसार पर नियन्त्रण तो रहता था, पर वहाँ से कुछ लाने कमाने की बात नहीं सोची जाती थी। अश्वमेध यज्ञों के नाम पर विश्रृंखलित शासन सूत्रों को समय−समय एकताबद्ध किया जाता रहा। द्वापर के महाभारत युद्ध में प्रायः समस्त संसार के राजा इस या उस पक्ष में सम्मिलित हुए थे। शासन सत्ताओं के नीति संचालन सूत्र उन दिनों तक भारत के ही हाथों में थे। अस्तु आमन्त्रणों पर उन्हें यहाँ के राजकीय अभियानों में सम्मिलित ही होना पड़ता था।

नालंदा, तक्षशिला जैसे अनेकों विश्व विद्यालय इस देश में थे। देश की शिक्षा व्यवस्था की पूर्ति तो स्थानीय गुरुकुल ही कर लेते थे। उच्चस्तरीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध यह विश्व−विद्यालय करते थे। देश−देशान्तरों की भाषाएँ वहाँ पढ़ाई जाती थीं; जिनमें पारंगत होकर विश्व सेवा के लिए अपने को समर्पित करने वाले महामानव विश्व के कोने−कोने में जाने की तैयारी करते थे और पिछड़े क्षेत्रों को—पिछड़े वर्गों को हर दृष्टि से ऊँचा उठाने के लिए अपनी अहैतुकी सेवा भावना की अजस्र वर्षा करते थे।

न केवल धर्म और अध्यात्म वरन् कृषि, पशु−पालन, वृक्षारोपण, शिल्प, उद्योग, नौका−नयन, चिकित्सा, वास्तु, रसायन, शस्त्र संचालन, याँत्रिकी आदि भौतिक विज्ञान की अनेकानेक धाराओं से संसारवासियों को परिचित प्रवीण कराने के लिए अथक परिश्रम किया गया। फलतः मानव जाति को अपनी पिछड़ी हुई, अभावग्रस्त एवं विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने का अवसर मिला। अन्न, वस्त्र, निवास और शिक्षा की आरम्भिक आवश्यकताएँ पूरी होने पर प्रगति के अन्याय मार्ग खुले। यह सब भारतीय सहयोग के बिना सम्भव न था। अस्तु लोग उन उदारमना, सुविकसित महामानवों को प्रतिदान तो क्या दे सकते थे, पर उनने अपनी भाव भरी श्रद्धाञ्जलियाँ निरन्तर समर्पित कीं। भारतवासियों के लिए विश्व निर्माण की अजस्र भूमिका सम्पादित करने के गौरव में ही पर्याप्त सन्तोष था। वे और कुछ पाने की इच्छा भी क्यों करते?

मनुष्य जीवन की गरिमा दो पहिये के रथ पर चढ़कर गतिशील होती है—एक पहिया है आत्म−निर्माण, दूसरा लोक−निर्माण। यही दो लक्ष्य भारतीय संस्कृति के दो अविछिन्न अंग रहे हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से इस देश के निवासी इस बात के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे कि उनका व्यक्तित्व सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से परिपूर्ण हो। उसे आदर्श समझा जाय और अनुकरणीय माना जाय। जहाँ तक परिचय क्षेत्र है वहाँ तक व्यक्ति की सुगन्ध भरी सुषमा फैले और उसके आलोक से आलोकित लोग स्वयं भी अनुगमन करते हुए नर−रत्न बनने की भूमिका निबाहें। यही थी उन दिनों व्यक्ति गत जीवन की आध्यात्मिक महत्वाकाँक्षा। भौतिक दृष्टि से हर व्यक्ति समुन्नत, सुव्यवस्थित और साधन सम्पन्न जीवन जीता था। क्योंकि वस्तुओं के उपार्जन की ही नहीं उसके सदुपयोग की कला भी उसे आती थी। जो यह जानता है कि उपलब्ध साधन सामग्री का श्रेष्ठतम, उपयोग क्या और कैसे हो सकता है, उसे स्वल्प साधनों में भी समृद्धि का परिपूर्ण आनन्द सहज ही मिल जाता है। यही था उस समय का आत्म−निर्माण लक्ष्य—जिसे पूरा करने में हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा लगाये रहता था। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व हर किसी के लिए प्रगति का मापदण्ड बना हुआ था।

भारतीय जीवन का दूसरा लक्ष्य था—लोक−निर्माण। वह मनुष्य क्या—जो अपनी उपलब्धियों से केवल अपने शरीर और परिवार को ही लाभान्वित करे। पीड़ा और पतन के गर्त में गिरे हुए—पिछड़े हुए और असमर्थ लोग जिससे कुछ भी प्रकाश एवं सहयोग प्राप्त न कर सकें। उन दिनों यही लोक मान्यता थी कि हर समुन्नत व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति एवं विभूतियों का एक बड़ा भाग समाज की उन्नति में—सुख−शान्ति की अभिवृद्धि में लगाना चाहिए। आत्मोत्कर्ष की तरह लोक−कल्याण भी मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। प्राचीन काल में प्रत्येक भारतवासी की वैसी मान्यता, निष्ठा और रीति−नीति थी।

हर भारतवासी को द्विज बनना पड़ता है। उसका दूसरा जन्म होता था। उसका प्रतीक था—यज्ञोपवीत संस्कार। वासना और तृष्णा के लिए जिये जाने वाले हेय पशु जीवन का उत्कृष्ट आदर्शवादिता के लिए समर्पित देव जीवन में बदल डालने का नाम ही दूसरा जन्म है—द्विजत्व की धारणा है—जो इस मानवोचित साहस से पिछड़ते थे वे हेय समझे जाते थे—उन्हें पतित, अपंग चाण्डाल आदि नामों से सम्बोधन करते थे। ऐसे लोगों के लिए सामाजिक असहयोग ही प्रचण्ड दण्ड था।

धर्म और अध्यात्म का सुविस्तृत दर्शन शास्त्र इसी भावनात्मक उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाये रखने का उद्देश्य सामने रखकर दूरदर्शी ऋषि−मनीषियों ने सृजा था। उपासना, ईश्वर भक्ति, योगाभ्यास, तप साधना, तीर्थयात्रा, कथा−कीर्तन, देव−दर्शन, दान−पुण्य, व्रत−अनुष्ठान, षोडश संस्कार, पर्व, आयोजन आदि धर्म कृत्यों के साधन विधान इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखकर विनिर्मित किये गये थे इन क्रिया कृत्यों के साथ जुड़े हुए प्रेरणा प्रकाश से जन−मानस को आलोकित करते हुए उस उच्चस्तरीय चिन्तन एवं कर्तव्य को निरत रखा जा सकेगा। संक्षेप में भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का आधार मूल उद्देश्य एक ही था कि व्यक्ति को नर−पशु से ऊँचा उठाकर नर−नारायण के रूप में विकसित करने के लिए अगणित स्तर के प्रेरणा प्रयोजन खड़े किये जाँय और सुसंस्कृत जीवन जीने की गरिमा के प्रति आस्थावान बनाया जाय।

इस दार्शनिक आधार को जीवन्त और ज्वलन्त रखने के लिए इस देश में साधु संस्था की एक विशालकाय सेना निरन्तर भावनात्मक उत्कृष्टता की सुदृढ़ सुरक्षा में साहस पूर्वक कटिबद्ध रहती थी। गृहस्थ रहकर सीमित क्षेत्र में पौरोहित्य की शिक्षा व्यवस्था की क्रिया−पद्धति अपनाने वालों को ब्राह्मण कहा जाता था। जिन्हें परिव्राजक रहकर सुदूर क्षेत्रों में—ज्ञान−विज्ञान का आलोक फैलाना था वे विवाह नहीं करते थे और साधु कहलाते थे। वस्तुतः दोनों परस्पर पूरक थे। दोनों का लक्ष्य एक था। साधु संस्था के यह दोनों सदस्य अनवरत रूप से जन−मानस को अधिकाधिक उच्चस्तर तक विकसित करने के लिए भागीरथ प्रयत्न करते थे। अपना उदाहरण प्रस्तुत करके लोगों में अनुगमन का उत्साह एवं साहस पैदा करते थे। इस पुण्य प्रयास ने भारतीय जनता की उस आन्तरिक उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाये रखा; जिसके आधार पर अपनी भौगोलिक सीमाओं को समस्त संसार के लिए आकर्षण की वस्तु बनाया और स्थिति को इतना ऊँचा उठाया कि विश्व मंगल के लिए बढ़े−चढ़े अनुदान प्रस्तुत कर सकना सम्भव रह सके।

मनःस्थिति से परिस्थिति का निर्माण होता है यह एक सुनिश्चित तथ्य है। प्राचीन भारत की गौरव−गरिमा का—उसकी समृद्धि, प्रगति और विभूति का—कारण एवं आधार तलाश करना हो तो गहरा विश्लेषण करने पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इस देशवासियों की मनःस्थिति को उच्चस्तरीय बनाने के लिए—बनाये रखने के लिए भागीरथ प्रयत्न किये गये थे। इसी के लिए उपयुक्त वातावरण विनिर्मित किया गया था। इसी स्थूलता की प्रतिक्रिया को विशाल भारत की गौरव−गरिमा का एकमात्र आधार कह सकते हैं।

भौतिक साधनों की दृष्टि से हम पूर्वजों की तुलना में पीछे नहीं आगे हैं। वैज्ञानिक प्रगति ने हमें अनेकानेक सुविधा साधन प्रदान किये हैं। ऐसी दशा में अपना स्तर हर क्षेत्र में अधिक समुन्नत होना चाहिए था। पर हुआ ठीक उलटा। जिस क्रम से साधन बढ़े उसी क्रम से हम हर क्षेत्र में पिछड़ते चले गये। इसका एकमात्र कारण यही है कि हमने अपनी आन्तरिक, आत्मिक विशेषताओं को खो दिया—दृष्टिकोण संकुचित बना लिया और आदर्शवादी चरित्र−निष्ठा की उपेक्षा करनी आरम्भ कर दी। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मनुष्य की भौतिक प्रगति का मूलभूत आधार उसकी आन्तरिक स्थिति होती है। आत्मिक विशेषताओं के आधार पर ही चिरस्थायी समृद्धि प्राप्त होती है। दुष्ट साधनों से—निष्कृष्ट दृष्टिकोण से—जो समृद्धि कमाई जाती है वह न तो स्थिर रहती है और न उससे सुख−शान्ति का आधार विनिर्मित होता है। ओछे मनुष्यों की सम्पदाएँ, सफलताएँ व्यक्ति और समाज के लिए विविध−विधि संकट ही उत्पन्न करती हैं।

यदि हमें यह अनुभव होता हो कि प्राचीन गरिमा को खोकर हमने भूल की—यदि हमें यह लगता है कि हमारी प्रतिष्ठा प्राचीन काल जैसी गौरवमयी होनी चाहिए तो उसका एक ही मार्ग है−हम अपने पूर्वजों जैसा उदात्त दृष्टिकोण अपनायें और गतिविधियों में ऐसे तथ्यों का समावेश करें जो व्यक्ति को आत्मिक ही नहीं भौतिक दृष्टि से भी सुसम्पन्न बनायें है। इसी मार्ग पर चलने से व्यक्ति गत एवं देशगत ही नहीं, समस्त विश्व का सर्वतोमुखी कल्याण भी सम्भव हो सकता है।


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क्या प्रार्थना का सचमुच असर होता है? इस प्रश्न के उत्तर में, मैं यही कहूँगा कि जब मन और वाणी आत्मा के साथ जुड़कर कुछ कामना आकाँक्षा करते हैं तो निश्चित रूप में उसका सत्परिणाम होता है।

—रामकृष्ण परमहंस


असफलता को अभिशाप न समझें

आकाँक्षा और सफलता नदी के दो तटों की तरह हैं; जिनके बीच पानी की प्रचंडधारा बहती है। एक तट से दूसरे तक जाने के लिए साहस भरे प्रयास करने पड़ते हैं और आवश्यक साधन जुटाने पड़ते हैं। तैरना सीखने से लेकर नाव का आश्रय लेने तक के अनेक उपाय अपनाने पड़ते हैं और लहरों तथा भँवरों के साथ टकराते हुए धारा की प्रचण्डता को पार करना पड़ता है। आकाँक्षा को सफलता की स्थिति तक पहुँचाने के लिए भी लम्बे, कठिन और जटिल मार्ग को पार करने वाली कष्ट साध्य तप साधना करनी पड़ती है।

प्रगति की आकाँक्षाएँ करना न तो बुरा है और न अनुचित। साहसी और मनस्वी व्यक्ति की मनःस्थिति ऐसी ही होनी चाहिए कि वह बढ़े−चढ़े सपने गढ़े और उनकी पूर्ति के लिए उत्कृष्ट पुरुषार्थ में निरत रहकर अपनी समर्थ साहसिकता का परिचय दे। सफलता का वरदान ऐसे ही कर्मनिष्ठ व्यक्तियों के लिए सुरक्षित रखा गया है।

प्रगति का पथ अवरोधों से रहित नहीं है। उसमें पग−पग पर व्यवधान और अवरोध बिछे होते हैं। बड़ी सफलताएँ बड़े व्यक्तित्वों के लिए प्रकृति ने सुरक्षित रखी हैं। कायर और कमजोर लोग भी उन्हें प्राप्त करने लगें तो फिर मनुष्यों की उस गरिमा का विकास कैसे होगा, जिसके आधार पर महत्वपूर्ण सफलताओं का गौरवास्पद उपहार मिला करता है।

अवरोधों का ही दूसरा नाम असफलता है। उनका सृजन इसलिए हुआ है कि मनुष्य अपनी निष्ठा एवं तत्परता का परिचय दे सके। धैर्य और साहस के साथ ही क्रमिक गति से प्रगति के पथ पर बढ़ा जाता है। इन अवरोधों में कुछ ऐसे भी होते हैं जो असफलता जैसे भयावह दीखते हैं। इन्हें देखकर न तो ठिठकने की आवश्यकता पड़नी चाहिए और न निराश एवं अधीर ही होना चाहिए। बड़े प्रयासों में बीच−बीच में सुधार एवं परिवर्तन भी आवश्यक होते हैं। इन्हीं को असफलता कह सकते हैं। हर असफलता से मनस्वी व्यक्ति सीखते हैं—भूलों को सुधारने की—अधिक हिम्मत, सूझ−बूझ और तत्परता से काम करने की प्रेरणा देने के लिए ही वे आती हैं। सरलतापूर्वक सफलता प्राप्त करने वालों की प्रतिभा उतनी नहीं निखरती जितनी कि असफलताओं से लड़ते हुए—व्यवधानों को कुचलते हुए चलने वालों की। सफलता का अपना उतना महत्व नहीं, जितना उस मंजिल को पार करते हुए प्रतिभा का विकास करने का। सफलता की उपलब्धि क्षणिक प्रसन्नता देने के बाद विस्मृति के गर्त में जा गिरती है फिर उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। किन्तु उस प्रयास में जो श्रमशीलता जगाई गई थी, जागरूकता विकसित की गई थी और धैर्ययुक्त साहसिकता बढ़ाई गई थी उससे उत्पन्न हुई प्रतिभा का लाभ चिरस्थायी ही बना रहेगा।

असफलता न तो लज्जा की बात है और न दुखी होने की। कई बार सुयोग्य और पुरुषार्थी व्यक्ति परिस्थितिवश असफल होते देखे गये हैं। हर प्रयत्नशील को सफलता मिलनी ही चाहिए इसकी कोई गारंटी कोई गारंटी नहीं। शारीरिक श्रम, मानसिक लगन और साँसारिक परिस्थितियों के समन्वय से ही सफलता सामने आती है। यदि कभी असफल रहना पड़े तो इतना ही सोचना चाहिए कि अभी अधिक परिश्रम और मनोयोग के साथ प्रयत्नरत, होने की आवश्यकता है। दूने उत्साह और चौगुने साहस को विकसित करने वाली असफलता वीर पुरुषों के लिए वरदान बन जाती है और उसका चिरस्थायी लाभ उन्हें सस्ती और सरल सफलता की अपेक्षा सैकड़ों, हजारों गुना अधिक मिलता है। असफलता की चुनौती स्वीकार करके जो अधिक मिलता है। असफलता की चुनौती स्वीकार करके जो अधिक साहसपूर्वक आगे बढ़े हैं उनने अगली बार न केवल अधिक महत्वपूर्ण सफलता ही पाई है, वरन् प्रतिभा की प्रखरता का दुहरा लाभ भी लिया।


धर्मयुद्ध में लड़ने वाले सच्चे शूरवीर

सच्चा शूरवीर वह है जो आत्म−बलिदान की भावना लेकर आगे बढ़ा है। हत्या की कला तो कसाई भी जानता है। बगुला छल−कपट से आये दिन—ढेरों मछली मारता है और भेड़िया कितने ही जीवों का नित्य प्राण हरण करता है। दीमक खाने में तीतर की कुशलता देखते ही बनती है। सर्प तो इनसे भी आगे है। वह अपना आहार न मिलने पर भी दूसरों को मृत्यु के घाट उतार देता है। बिच्छू के कौशल से कौन अपरिचित है। प्राण हरण में किसने कितनी सफलता प्राप्त की इस आधार पर किसी को शूरवीर ठहराने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है।

शूरवीर वह है जो अनीति से लड़ता है और उसके लिए दूसरों का प्राण−हरण करने को नहीं; आत्म−बलिदान को प्रधानता देता है। उसे अवाँछनीयता से घृणा होती है। अनीति के आधारों को वह नष्ट करना चाहता है। इसके लिए उसे प्रबल और परिपुष्ट अन्याय के विरुद्ध जूझना पड़ता है। स्पष्ट है कि सदाशयता का पक्ष सदा असंगठित रहा है और दुरभि संधियाँ अपने समर्थकों को संगठित रखती है। इस प्रकार अनीति पक्ष की प्रबलता और नीति पक्ष की दुर्बलता ही बहुत करके देखने आती है। शान्ति की रट लगाने, वाले मैत्री, करुणा के समर्थक अनीति से जूझने में प्रायः हिचकते हैं। फलतः संगठित अनीति क्रमशः अधिक परिपुष्ट और अधिक सफल होती चली जाती है। देव पक्ष की दुर्बलता और असुर पक्ष की प्रबलता एक तथ्य है जो आये दिन आँखों के सामने ही खड़ा रहता है।

इस स्थिति को बदलने के लिए उन साहसी शूरवीरों को आगे आना पड़ता है जो साथी सहायकों की प्रतीक्षा किये बिना—शक्ति सन्तुलन का लेखा−जोखा लिए बिना—अकेले ही आगे बढ़ चलते हैं और अनीति को अपने ही आत्मबल के बलबूते पर ललकारने का दुस्साहस भरा कदम उठाते हैं। प्रत्यक्ष ही इसमें हानि दिखाई पड़ती है। अनीति पक्ष के साधन और सहायक बहुत होते हैं। वे अपने विरोधी को सहज ही भारी क्षति पहुँचा सकते हैं। बहुत करके अनीति का प्रतिरोध करने वालों को बहुत आघात सहने पड़ते हैं और बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं। कई बार तो अनीति मिटाने के स्थान पर वह योद्धा स्वयं ही मिट जाता है।

शूरवीर वह है जो इस वस्तुस्थिति को समझते हुए अपने आपको संकट में फँसाने की पूरी तैयारी, के साथ सोच−विचार कर आगे बढ़ता है। वह जानता है कि अनीति का विरोध किया जा सकता है, पर उसे तुर्त−फुर्त उखाड़ फेंकना उतना सरल नहीं है। संगठित और समर्थ प्रति पक्षी अपने बचाव के लिए और प्रति पक्षी को कुचलने के लिए बुरे से बुरे कदम उठा सकता है। आवश्यक नहीं कि विरोध सफल हो जाय और जिस अनीति का उन्मूलन करने चले थे उसका अन्त हो ही जाय। किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि होना चाहिए कि अन्याय को चुनौती देने के लिए कोई इसलिए आगे बढ़े ही नहीं कि उसमें जोखिम भरा हुआ है। इस जोखिम से जूझने और उस प्रयास में आने वाले कष्टों की पूरी तरह कल्पना कर लेने के बाद भी जिसने बलिदानी वीर की भावना अपनाई, वस्तुतः सच्चा शूरवीर उसी को कहना चाहिए।

अनीति के पैर उखाड़ने में आत्म−बलिदान से बढ़कर दूसरा शस्त्र हो ही नहीं सकता। इससे असुरता की हिम्मत आधी टूट जाती है। निर्बाध और निर्विरोध रीति से कुकृत्य करते चलने वालों का बढ़ता हुआ मनोबल टूटता है और उन्हें सोच−समझकर ही कुकृत्य करने की अकल आती है। विरोध खड़ा हो गया तो जिनके मन में रोष तो था, पर कुछ कर नहीं पा रहे थे—आगे चलने की हिम्मत न होने से चुपचाप बैठे सहन करते थे उनका भी साहस बढ़ता है और आत्म−बलिदानी के समर्थकों की पिछली पंक्ति में वे भी खड़े दिखाई पड़ते हैं, इस प्रकार देव पक्ष क्रमशः समर्थ होता जाता है। अनीति का दम तोड़ने के लिए उसके पक्ष में विरोधी वातावरण का बनना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आग की छोटी−सी चिनगारी घास के बड़े ढेर को जला कर भस्म कर देती है। अनीति भी घास के ढेर की तरह है जब विरोध और प्रतिरोध की चिनगारियाँ उस पर पड़ने लगे तो समझना चाहिए कि इसकी बढ़ी−चढ़ी विभीषिका का अन्त आ गया।

दीपक स्वयं जलता है उसका जलने का संकल्प और साहस ही सुविस्तृत क्षेत्र में फैले हुए अन्धकार को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। वस्तुतः शक्ति अन्धकार में नहीं होती समर्थ तो प्रकाश होता है। पाप कितना ही बढ़ा−चढ़ा क्यों न हों उसमें देर तक टिक सकने की—प्रतिरोध का सामना करने की क्षमता नहीं होती। वह तभी तक टिकता है जब तक निर्विरोध और निर्बाध रीति से गुजर होती रहे। असुरता इसलिए नहीं मिलती कि वह वस्तुतः समर्थ होती है। गुण्डा वस्तुतः परले सिरे का कायर होता है। पकड़े जाने पर उसका गिड़गिड़ाना और कातर पुकार करना देखते ही बनता है। उसकी सारी सामर्थ्य इस केन्द्र पर टिकी रहती है कि भले आदमी कहलाने वाले शान्ति के नाम पर कायर बने बैठे रहते हैं और आततायी के विरुद्ध आवाज उठाने से डरते हैं।

इस दयनीय स्थिति को चीरने के लिए जिसने एकाकी साहस सँजोया, उसे सच्चे अर्थों में शूरवीर कहना चाहिए। साथियों की प्रतीक्षा न करके जो अपने आत्मबल को ही पर्याप्त मानता है उसे योद्धा कहना चाहिए। शत्रु को कमजोर और अपने को समर्थ मानकर चलने वाले और प्रतिद्वंद्वी का बात की बात में ढेर करके आने का विश्वास कितने ही लोगों को बहादुर बना देता है। विजय प्राप्त करने का आवेश उन पर छाया रहता है और सफलता सामने खड़ी दीखती है। ऐसी मनःस्थिति में किसी की भी लड़ाकू प्रवृत्ति उभर सकती है और तलवार घुमाता हुआ आगे बढ़ सकता है। यह साधारण सैनिक की बात हुई। सच्चे शूरवीर की आन्तरिक स्थिति इससे कहीं ऊँची होती है वह विजय और पराजय को समान मानकर चलता है। अन्याय के विरुद्ध वह अकेला ही खड़ा हो सका—स्वल्प साधनों के रहते हुए भी समर्थ प्रति पक्षियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़ा हो सका; यह दुस्साहस जिसने सँजोया वह वस्तुतः शूरवीर है। विजय माल तो उसके पहले चरण में ही उसके गले में डाल दी गई। उसने अपने शौर्य, साहस और प्रखर आदर्शवाद को प्रामाणित करके मनस्वी महामानवों की पंक्ति में अपने को बिठा दिया।

बढ़ी−चढ़ी अनीति को समूल मिटाने में देर लगती है। उसके लिए बलिदानों की लम्बी शृंखला प्रस्तुत करनी पड़ती है। धैर्य और साहस के साथ लम्बी लड़ाई लड़ने की तैयारी करनी पड़ती है। अनीति को उखाड़ने में वीर बलिदानियों को देर तक जूझना पड़ता है। प्रथम चरण में प्रथम प्रयास में ही इतना बड़ा प्रयोजन सहज ही पूरा नहीं हो जाता है। अन्याय से जूझने वालों में से कितनों को ही स्वयं मिटना पड़ा है ऐसे बलिदानी वीरों को आत्मबल के धनी शहीदों के चरणों पर लोक−श्रद्धा के सुमन सदा ही चढ़ाये जाते रहेंगे। प्रत्यक्षतः वे पराजित और असफल ही रहे, पर परोक्ष रूप से अपनी साहसिकता को इतना सम्मिलित और सफल बना दिया जितना कदाचित वे शत्रु का विनाश करने के उपरान्त भी न हो पाते।

अनीति से जूझने में आवश्यक नहीं कि आततायियों को एक ही झटके में उखाड़ फेंकना सम्भव हो जाय। आवश्यक नहीं कि प्रतिरोध की मशाल जलाने वाले को विजयी कहलाने का श्रेय मिल जाय। यह सब समझते हुए भी—पराजय और विपत्ति की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए भी जो कर्त्तव्य बुद्धि से आदर्शों का पालन करने के लिए समरभूमि में उतरा वह सच्चा शूरवीर है।

शत्रु पक्ष के कितने लोगों को किसने मारा। कितना बड़ा प्रयोजन किसने किस प्रकार पूरा किया यह उतने महत्व की बात नहीं। महत्व इस बात का है कि उस संघर्ष में कितने लोग उच्च आदर्श के लिए आत्म−बलिदान की भावना से आगे आये। ऐसे धर्म युद्ध ही धन्य हैं और धन्य हैं उनमें लड़ने वाले सच्चे शूरवीर।


जल के उपयोग में कंजूसी न करें

प्रकृति को सफाई पसन्द है। उसे गन्दगी सहन नहीं। जहाँ भी जब भी गन्दगी उत्पन्न होती है वहाँ तुरन्त उसके निवारण−निराकरण के लिए अपने स्वच्छता कर्मचारी भेजती है; जिससे उस उत्पन्न हुई गन्दगी को तत्काल समाप्त किया जा सके।

कोई पशु मर जाय तो उसका शरीर थोड़े समय में सड़ने और बदबू फैलाने लग जायगा। पर प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है कि वह अवाँछनीय स्थिति आने से पूर्व ही सफाई की समुचित व्यवस्था बन जाय। आकाश में मंडराते हुए—गिद्ध, चील, कौए और जमीन पर भ्रमण करते हुए सियार, कुत्ते उस मृत शरीर की गन्ध पाते ही दौड़ पड़ते हैं और सभी उसे खाकर साफ कर देते हैं। सड़ने का समय आने से पूर्व ही सब कुछ साफ कर दिया जाता है। यदि ऐसा न भी हो सके तो उस मृत माँस में कीड़े पड़ जाते हैं और वे उसे खा−पीकर कुछ ही समय में समाप्त कर देते हैं।

हवा चलने का एक प्रयोजन यह भी है कि सड़न कहीं भी जमा न होने पावे। बदबू को उड़ाकर अन्यत्र ले जाया जाय और उस विकृति उत्पन्न करने वाले स्थान को भी शुद्ध प्राण वायु की आवश्यक मात्रा मिल जाय।

भूमि पर रहने वाले अपने मल−मूत्र से गन्दगी उत्पन्न करते रहते हैं। इसे धोना बहाया जाना आवश्यक है। इस प्रयोजन के लिए प्रकृति ने पर्याप्त मात्रा में जल उत्पन्न किया है। धरती पर एक तिहाई जल, दो तिहाई वर्षा बार−बार होती रहती है। जिसका एक प्रयोजन गंदगी को धोकर साफ करते रहना भी है। अग्नि भी यही करती है। सूर्य पिण्ड से अजस्र ऊष्मा का वर्षण अपनी पृथ्वी पर उत्पन्न रहने वाले विकृत कीटाणुओं का शमन करता रहता है। अग्नि की गर्मी से सीलन और सड़न के वातावरण का किस प्रकार परिशोधन होता रहता है यह सर्वविदित है।

पीने का पानी हमें छना हुआ शुद्ध मिले। इसलिए जमीन की छलनी में छनकर हमें कुँओं से शुद्ध जल मिलता है। नदियों का प्रवाह उसमें सम्मिलित गन्दगी को मिटा देता है। भाप बनकर बादलों में शुद्ध जल पहुँचता है और उससे जल−शोधन का अति महत्वपूर्ण कार्य अनायास ही होता रहता है। वृक्ष और वनस्पतियों के अनेकानेक प्रयोजनों में एक अति महत्वपूर्ण कार्य यह भी है कि वे प्राणियों द्वारा छोड़ी गई गन्दी कार्बन गैस को अपने में सोखें, और बदले में स्वच्छ ऑक्सीजन प्रदान करे।

शरीर का निर्माण इस ढंग है कि उसमें प्रतिक्षण उत्पन्न होती रहने वाली गन्दगी का यथासमय तत्काल निवारण होता रहे। फेफड़े श्वाँस छोड़ते हैं—गुदा मार्ग से मल विसर्जन होता है। गुर्दे मूत्राशय मिलकर गन्दे जल को निकालते हैं, त्वचा मार्ग के अगणित छिद्र पसीने द्वारा अपना सफाई कार्य निरन्तर करते रहते हैं। इस खर्च होने वाले जल की पूर्ति पिये हुए जल तथा भोजन में रहने वाले जलाँश के द्वारा होती रहती है। स्नान भी बढ़ी हुई शरीर की ऊष्मा को शान्त करने में बहुत सहायक होता है।

हमारे शरीर में प्रतिदिन प्रायः 2600 ग्राम पानी खर्च होता है। इसका विभाजन इस प्रकार है। गुर्दों से 1500 ग्राम, त्वचा से 650 ग्राम, फेफड़ों से 320 ग्राम और मल मार्ग से 130 ग्राम। इसका सन्तुलन बनाये रखने के लिए कम से कम ढाई किलो पानी पिया ही जाना चाहिए।

बच्चों के शरीर इसलिए कोमल और सुन्दर प्रतीत होते हैं कि उनमें 82.2 प्रतिशत जल रहता है। कोमलता, लचीलापन, फुर्ती, सजीवता, सुन्दरता को इस बढ़े हुए जलाँश के साथ जोड़ा जा सकता है। किशोर अवस्था पार करके जब प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था आती है तो यह जलाँश घटने लगता है अस्तु कठोरता एवं रूखापन भी उसी क्रम में बढ़ने लगता है।

पानी में दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन का सम्मिश्रण होता है। यह दोनों ही गैसें मानव−जीवन को अतीव आवश्यक है। ऑक्सीजन की प्राणप्रद शक्ति सर्वविदित है उसके बिना हमारी थोड़ी ही देर में दम घुट कर मृत्यु हो सकती है। ऐसे बहुमूल्य जीवन तत्व को हम न केवल साँस से वरन् जल के माध्यम से भी प्रचुर परिमाण में ग्रहण करते हैं।

हम प्रायः ऐसा भोजन करते हैं जिसे पचाने के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। प्रोटीन एवं चिकनाई प्रधान भोजन की तुलना में श्वेतसार एवं शर्करा प्रधान भोजन के लिए अधिक पानी चाहिए, 1 ओंस श्वेत सार को ग्लाइकोजन में बदलने के लिए ओंस पानी चाहिए। नमक एक ओंस खाया जाय तो वह आठ पौंड पानी से पचेगा। मिर्च मसाले एवं शक्कर तो और भी अधिक पानी चाहते हैं।

पानी शरीर में पहुँचकर अपनी विशिष्ट रासायनिक संरचना के अनुरूप पोषण प्रदान करता है। मलों की धुलाई करता है और देह की नमी का आवश्यक सन्तुलन रखता है; ताजगी देता है और विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती रहने वाली गर्मी को ठंडा करता है।

सुबह उठते ही एक गिलास पानी पीना चाहिए जिससे मल विसर्जन तथा खुलकर पेशाब उतरने की सुविधा हो। भोजन करने से आधा या एक घण्टे पूर्व एक गिलास जल पी लेना चाहिए इससे भूख अच्छी तरह लगती है।

भोजन यदि रसीला होगा और अच्छी तरह चबाकर खाया जायगा तो बीच में पानी पीने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर यदि खाद्य−पदार्थ सूखे हैं और उन्हें पूरी तरह चबाया नहीं गया है तो गले से नीचे उतारने के लिए पानी की जरूरत पड़ेगी। ऐसी दशा में एक−एक दो−दो घूँट चार−पाँच बार तक पानी पिया जा सकता है। साधारणतया भोजन के बीच में कम से कम ही पीना चाहिए। खाने के एक घण्टे बाद एक गिलास पानी पीना चाहिए। इसके बाद आवश्यकता के अनुरूप पीते रहना चाहिए। साधारणतया ढाई सेर तो पानी पीना ही चाहिए। रात्रि को सोते समय दूध, छाछ अथवा पानी एक गिलास पीकर ही सोना चाहिए।

कुछ विशेष परिस्थितियों में अधिक पानी पीना चाहिए। बुखार में—लू लगने पर—सुजाक जैसी पेशाब सम्बन्धी बीमारियाँ होने पर—रक्त चाप, हृदय की धड़कन, कब्ज, पेट में जलन जैसी शिकायतें होने पर सामान्य स्थिति की अपेक्षा अधिक जल पीना उचित है।

पानी एकदम पेट में नहीं उड़ेल देना चाहिए वरन् उसे घूँट−घूँटकर इस तरह पीना चाहिए कि मुँह में वह कुछ क्षण रुका रहे उसका तापमान मुँह जितना बन जाय और जीभ आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाले स्रावों का उसमें समावेश हो जाय। शरीर के भीतरी तापमान से अधिक गर्म या ठण्डा पानी होगा तो भीतर जाकर गड़बड़ी उत्पन्न करेगा। मुँह में कुछ समय रहने पर जल का तापमान सह्य हो जाता है, इसी प्रकार मुख के स्रावी का समावेश हो जाने से उसकी उपयोगिता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एकदम गटक कर बहुत सा पानी एक ही बार में पी जाने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि उसे धीरे−धीरे घूँट−घूँटकर पिया जाय। इस प्रकार पीना अपेक्षाकृत कहीं अधिक लाभदायक है।

पानी की अपनी निज की विशेषताएँ हैं जिसकी पूर्ति चाय, काफी, शरबत, कोकाकोला, सोड़ावाटर, दूध, फलों के रस आदि से नहीं हो सकती। उपयोगी पेय पदार्थ लिए जाँय यह ठीक है पर उन्हें पानी का स्थानापन्न नहीं बना लेना चाहिए। दूध, एवं फलों का रस पीते रहने की बात लाभदायक है, पर इनका प्रयोग करने के कारण जल को सर्वथा नहीं छोड़ देना चाहिए, निस्संदेह पानी में अपने किस्म के रसायन और गुण हैं। शरीर पोषण की दृष्टि से उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता है।


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हृदय जितना बोलता है, ईश्वर उससे अधिक कुछ नहीं सुनता। हृदय यदि गूँगा है तो ईश्वर को बहरा ही पाया जायगा। —आनौल्ड


डबल रोटी—डबल खोटी

‘सभ्य’ कहलाने वाली दुनिया में अब घर में चौका चूल्हा जलाने, रोटी बेलने, सेकने का झंझट उठाने की प्रथा बन्द हो चली है और उसके स्थान पर फैक्टरी की बनी डबल रोटी का प्रचलन बढ़ रहा है। गनीमत इतनी ही है कि गरीब घरों अथवा पुराने ढर्रे के लोगों में ताजी रोटी बनाने की प्रथा अभी भी विद्यमान है।

खाद्य−पदार्थों के पीछे सभ्यता का—वैज्ञानिकरण का−आधुनिकता का जो समावेश हुआ है उसमें फैशन शोभा और स्वाद का आकर्षक समन्वय जरूर है, पर परिणाम में उसने ऐसी विकृतियाँ उत्पन्न की हैं जो उस स्वस्थ संरक्षण के उद्देश्य को नष्ट ही करती चली जा रही हैं जिनके लिए कि इन खाद्य−पदार्थों का प्रादुर्भाव किया गया है।

बात वहाँ से शुरू होती है जहाँ खेत में गेहूँ बोया जाता है। पशुओं की दिन−दिन कमी पड़ती जा रही है। माँसाहार और चमड़े के उपयोग में जिस गति से बढ़ोत्तरी हो रही है उसके फलस्वरूप पशु धन का विनाश होता चला जा रहा है उनके गोबर और मूत्र से जमीन को जो पौष्टिक खाद मिलता है वह कहाँ मिल पाता है। फलतः रासायनिक खादों का उपयोग बढ़ रहा है। गोबर के सड़े खाद को ढोना आज के फैशनेबुल मनुष्य के लिए भारी भी पड़ता था। रासायनिक खाद पैक बन्द थैलों में साफ सुथरा आता है और तुर्त−फुर्त खेत में फैला दिया जाता है। फसल भी ज्यादा उगती है। इस वैज्ञानिक उपहार का लाभ कैसे छोड़ा जाय। रासायनिक खाद के कारखाने धड़ाधड़ खुल रहे हैं और उनका उपयोग भी खूब हो रहा है। लोग प्रसन्न हैं कि बेवकूफ पूर्वजों की तुलना में कैसी अच्छी तरकीब अधिक अनाज उपजाने की ढूँढ़ निकाली गई है।

किन्तु इसका दूरगामी परिणाम बहुत ही हानिकारक सामने आ रहा है। भूमि में कुछ ऐसे कीटाणु होते हैं, जो न केवल पौधों को पुष्ट करते हैं वरन् उनके भीतर रहने वाले उपयोगी रासायनिक पदार्थों की भी वृद्धि करते हैं, जिससे उगा अनाज, खाने वालों के लिए बलवर्धक होता है। रासायनिक खादों से वे कीटाणु मर जाते हैं। मिली हुई उत्तेजना से फसल जल्दी तो उग आती है, पर वैज्ञानिक खादों की विषाक्त ता भी पौधों में घुल जाती है और जो अनाज उगता है उसमें भी ऐसे हानिकारक तत्व रहते हैं जो खाने वाले के स्वास्थ्य का बिगाड़े। दूसरी क्षति यह होती है कि इन खादों की विषाक्त ता से भूमि के उर्वरता सहायक कीटाणु मर जाने से उसकी स्वाभाविक उत्पादन शक्ति घटती चली जाती है और पीछे इन खादों की भरमार करते रहने पर भी उत्पादन घटता ही चला जाता है।

एक तो ऐसे ही बाढ़−वर्षा की अधिकता से भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत पानी के साथ बहकर नदी, नालों में चली जा रही है और निचली कम उपजाऊ जमीन ऊपरी सतह पर आ रही है इससे उर्वरता तो घट रही है। इसके उपरान्त रासायनिक खाद रहा सहा सर्वनाश पूरा कर रहा है।

इन सब कारणों के मिलने से न केवल अन्न का उत्पादन घट रहा है वरन् उसका पोषण स्तर भी गिर रहा है। अमेरिका के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले एक सौ वर्षों में उस देश की उपजाऊ ऊपरी सतह का 40 प्रतिशत भाग बाढ़ और वर्षा में बह गया। मिसोरी विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ विलियम अलव्रेश ने हिसाब लगाकर बताया है कि पिछले दस वर्षों में गेहूँ में रहने वाले प्रोटीन की मात्रा 9 प्रतिशत घट गई है। इसका कारण बताते हुए वे कहते है रासायनिक खादों में रहने वाले पोटाश के कारण अन्न अधिक तो उपजता है पर उसमें प्रोटीन घटता है और कार्बोहाइड्रेट बढ़ता है। इस प्रकार उपजे हुए अन्न में पौष्टिकता का अंश कम पड़ा जाता है। न केवल प्रोटीन वरन् 20 प्रकार के ‘अमायनों एसिड’ भी अन्न तथा चारे में रहते हैं जिसके कारण खाने वाले पशुओं तथा मनुष्यों में रोग निरोधक शक्ति उचित मात्रा में बनी रहती है। रासायनिक खाद फसल में प्रोटीन ही नहीं इन उपयोगी अमायनों एसिडों की मात्रा भी घटा कर कमजोर बना देते हैं।

बीज को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें कीटाणु नाशक औषधियाँ छिड़क कर गोदामों में रखा जाता है। इसका भी एक अंश पौधों पर जाता है। फसल पैदा होने के बाद उसे गोदामों में भरते समय कीटाणु नाशक घोलों से छिड़का जाता है। आटा पीसने वाली बड़ी मिलें गेहूँ को नरम बनाने के लिए नमी पहुँचाती हैं और इस क्रिया में भी रसायनों का प्रयोग होता है। आटा अधिक सफेद निकले इसके लिए गेहूँ को धोया जाता है इस धुलाई में भी साबुन जैसे—तीव्र रसायन रहते हैं। बड़ी आटा मिलों के पीसने वाले पाट पत्थर के नहीं लोहे के हते हैं, रगड़ से उनकी गर्मी बढ़ी−चढ़ी रहती है और उसके कारण गेहूँ में पाया जाने वाला विटामिन बी. 1 लगभग 10 प्रतिशत ही शेष रह जाता है शेष 90 प्रतिशत को पिसाई के समय की तेज गर्मी जलाकर समाप्त कर देती है। इस कमी का दुष्परिणाम खाने वालों को दाँतों की खराबी, कब्ज तथा स्नायविक रोगों के रूप में भुगतना पड़ता है।

अधिक सफेद आटा प्राप्त करने के लिए गेहूँ को धोया जाता है, उस धुलाई में नाइट्रोजन, ट्रिक्लोराईड या एजीन जैसे रसायन डाले जाते हैं। यह रसायन एक प्रकार के विष हैं। इसे खाने से मनुष्य या पशुओं के शरीर में ऐंठन शुरू हो जाती है। लन्दन के सेन्ट्रल मिडल्सैक्स अस्पताल के निर्देशक डा. पोलक ने बताया कि उनके अस्पताल में ऐसे मरीज आते रहते हैं जो आटे के साथ रहने वाले एजीन के कारण बीमार पड़े। सर एलनवे ने भी एजीन के कारण जन−साधारण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव की बात सर्वसाधारण के तथा सरकार के सामने रखी। फलतः एजीन का उपयोग तो रुक गया पर न्यूनाधिक उसी सतर के अन्य रसायन उस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होते रहते हैं।

इतने कुकर्मों से गेहूँ की दुर्गति करने के उपरान्त उसका जो मैदा बनकर सामने आता है उसमें जीवन तत्व नहीं के बराबर रह जाता है। एक प्रकार से वह अखाद्य ही बन जाता है। केवल मैदे के खाद्यों पर रखे गये कुत्ते और चूहे कुछ ही दिन में बीमार पड़ गये। यह देखकर बिकने वाले मैदा में उसके प्रस्तुतकर्त्ताओं ने सस्ते विटामिन मिलाने आरम्भ किये और उनके आकर्षक विज्ञापन छपाये। किन्तु यह सर्वविदित है कि अलग से मिलाये हुए या खिलाये हुए विटामिन वह कार्य नहीं कर सकते जो उनके स्वाभाविक रूप में लिए जाने से होता है। स्वाभाविक मात्रा से अधिक मात्रा में लेने पर भी विटामिन हानिकारक बन जाते हैं। उन्हें देर तक खुला हुआ रखा नहीं जा सकता इस प्रकार वह आँसू पोंछने के लिए की गई विटामिनों की मिलावट भी कुछ उपयोगी सिद्ध नहीं होती। मैदा अपौष्टिक स्तर का ही बना रहता है।

डबल रोटी बनाने वाले नानवाई उसे क्रिमिविहीन और कई दिन तक नरम बनी रहने योग्य बनाने के लिए तथा खमीर उठाने के लिए उस में फिर रासायनिक सम्मिश्रण करते हैं। अंडा पड़ा होने का भ्रम उत्पन्न करने के लिए भी कुछ रसायन ही मिला दिये जाते हैं, जिससे डबल रोटी पर चमक, चिकना और जर्दी दिखाई पड़ने लगे। इन प्रयोजनों के लिए पोलो ओक्सीइथीलीन मोनोस्वीट जैसे रसायन प्रयुक्त होते हैं। इन रसायनों का प्रयोग करने के कारण उन कारखानों के मजदूरों में से कितने ही खाज, खुजली या दमा जैसे रोगों के शिकार हो जाते हैं। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन स्वास्थ्य पत्रिका ‘इन्डस्टरियल मेडीशन एण्ड सर्जर’ पत्रिका ने अपने एक विस्तृत लेख में किया था।

हर क्षेत्र में बढ़ती हुई कृत्रिमता, फैशनपरस्ती तथाकथित सभ्यता का अंग बनती जा रही हैं। इस अत्युत्साह ने भोजन को भी नहीं बख्शा है। अब पुराने जमाने की हाथ से बनी ताजी रोटियाँ, पुराने जमाने की प्रतिगामी रिवाजें कहकर उपेक्षित कर दी गई हैं। उनका स्थान डबल रोटियाँ ग्रहण करती चली जा रही हैं। सभ्यताभिमानी उत्साहपूर्वक उनका स्वागत कर रहे हैं। इसका परिणाम क्या निकलेगा यह धीरे−धीरे सामने आता जा रहा है। इस घुड़दौड़ में अगले दिनों हम इतने आगे निकल चुके होंगे कि गँवाये हुए स्वास्थ्य की क्षति पूर्ति भी न हो सकेगी। तब अपनी मूर्खता पर आँसू बहाने से भी कुछ काम न चलेगा।


श्रम−साधना के सत्परिणाम सुनिश्चित हैं

सुयोग्य, बुद्धिमान और अनेक विशेषताओं से सम्पन्न होने पर भी जो लोग आलसी हैं—परिश्रम से जी चुराते हैं वे उनकी तुलना में घटिया ही गिने जायेंगे, जिनमें योग्यता तो कम है, पर परिश्रम पर विश्वास करते हैं और उसका सम्मान।

मनुष्य के भीतर सब कुछ बीज रूप में विद्यमान है उसे परिश्रम एवं अभ्यास से बढ़ाया, उभारा जा सकता है। इसके विपरीत बहुत कुछ योग्यताएँ होने पर भी उसे कार्यान्वित न किया जा सके तो वह लोहे के जंग लगने से गल जाने की तरह व्यर्थ बर्बाद और विस्मृत होती चली जायगी। उस्तरा वही चमकता और तेज रहता है जो काम में आता रहता है और शान के पत्थर पर घिसा जाता रहता है। जहाँ के तहाँ पड़े रहने पर पान सड़ जाते हैं—पानी गन्दा हो जाता है—हवा विषैली बन जाती है। प्रवाह के बिना गति नहीं।

हम जीवित इसलिए हैं कि शरीर के प्रत्येक कलपुर्जे ने अनवरत श्रम−साधना करते रहना अंगीकार किया है। माँस पेशियाँ सिकुड़ती फैलती हैं। नाड़ियाँ रक्त को लाती ले जाती हैं—फेफड़े हवा को खींचते−फेंकते हैं। छोटे−छोटे जीव कण और ज्ञान तन्तु तक अपने क्रिया−कलाप में अहिर्निश दत्त−चित्त रहते हैं। इसी सर्वतोन्मुखी सक्रियता का नाम जीवन है। जिस क्षण अंग अवयवों ने अपनी क्रियाशीलता से मुँह मोड़ना आरम्भ किया; उसी क्षण से रुग्णता, अशक्त ता के अस्त्र−शस्त्र लेकर मौत का आक्रमण होगा और जीवनलीला समाप्त होने में देर न लगेगी।

कई व्यक्तियों में जन्मजात बढ़ी−चढ़ी प्रतिभा पाई जाती है। कितनों की योग्यता संवर्धन के लिए आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर एवं साधन रहते हैं। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर वे चाहें तो दूसरों की अपेक्षा अधिक शीघ्रतापूर्वक और अधिक मात्रा में प्रगति कर सकते हैं। पर देखा जाता है कि यह सब होते हुए भी कितने ही मनुष्य पिछड़ी हुई परिस्थितियों में पड़े रहते हैं। इसका एकमात्र कारण उनका मानसिक अवसाद—प्रमाद एवं शारीरिक अनुत्साह आलस्य ही होता है। यह उभय−पक्षीय शारीरिक अनुत्साह आलस्य ही होता है। यह उभय−पक्षीय विडम्बना मनुष्य को अकर्मण्य बनाती है और अभागा बनाये रहती है।

श्रमशीलता एक ऐसा दैवी वरदान है जिसके द्वारा प्रतिभा एवं साधनों की कमी पर विजय प्राप्त की जा सकती है और अभिष्ट योग्यता बढ़ाई जा सकती है। शरीर और मन की उत्पादक शक्ति को चमत्कारी कहा जा सकता है। यदि उन्हें विद्या मिले और उत्साहपूर्वक क्रियान्वित रखा जा सके तो आज का मूर्ख कल निष्णात बन सकता है और आज गई−गुजरी परिस्थितियों में निर्वाह करने वाला कल उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

बढ़ी−चढ़ी जन्मजात योग्यता का होना अथवा प्रचुर साधनों का जुटा रहना अपने हाथ में नहीं। वे किसी को मिलते हैं किसी को नहीं। पर मानसिक तत्परता और शारीरिक श्रमशीलता के सुनहरे अवसर हर किसी को उपलब्ध हैं। इनका समुचित उपयोग कर सकना पूर्णतया अपने हाथ की बात है।

परिश्रमी स्वभाव एक ऐसा दैवी वरदान है जिसे कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है और योग्यताओं का, साधनों का—समुचित उपार्जन करता हुआ अपने व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। कहना न होगा कि विकसित व्यक्तित्व जिस भी दिशा में अग्रसर होता है उसी में विविध−विध सफलताएँ उसके पीछे−पीछे चलती हैं।

जीवन हर किसी को मिला है, पर उसका समुचित लाभ केवल वे ही उठा सकते हैं जो अपनी प्रत्येक सास को प्रभु प्रदत्त बहुमूल्य सम्पदा मनाकर उसके सदुपयोग का पूरा−पूरा ध्यान रखते हैं। श्रम की साधना के सत्परिणाम निर्विवाद है। परिश्रम से प्यार करने वाला जीवन को प्यार करता है अस्तु उसे सफल मनोरथ और आनन्द युक्त जिन्दगी जी सकने का लाभ भी मिलता है।


अपनों से अपनी बात

हममें से प्रत्येक के पास अखण्ड−ज्योति एवं युग−निर्माण पत्रिकाएँ पहुँचती हैं, उन्हें पढ़कर एक कोने में पटक नहीं देना चाहिए, वरन् ऐसी सुनिश्चित व्यवस्था बना लेनी चाहिए कि कम से कम दस व्यक्तियों को नियमित रूप से उन्हें अवश्य ही पढ़ा दिया करेंगे। अपने घर−परिवार के लोगों को पढ़ाना या सुनाना तो अनिवार्य ही समझा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त मित्रों, परिचितों एवं सम्बन्धी, निकटवर्ती लोगों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। दस की संख्या इन्हीं की होनी चाहिए।

मनुष्य में घिनौने हाड़−माँस के ऊपर उठकर यदि कोई क्षमता और विशेषता है तो वह उसकी चेतना की है। चेतना की दृष्टि से जिसका स्तर जितना उठा या गिरा हुआ है उसी अनुपात से उसे समुन्नत अथवा पतित गिना जाता है उसी अनुपात से वह सुखी या दुखी रहता है। उसी कसौटी पर जीवन की सफलता−असफलता का लेखा−जोखा लिया जाता है। शरीर की दृष्टि से कोई कितना ही सुन्दर या हृष्ट−पुष्ट क्यों न हो—धन की दृष्टि से कोई कितना ही अमीर क्यों न हो? यदि उसका चेतना स्तर अविकसित है तो उसे निम्नस्तरीय प्राणियों में ही गिना जायगा। भले ही लोग उसे आकर्षक या धनपति समझकर चापलूसी भरा बखान क्यों न करते रहें।

व्यक्ति का वास्तविक उत्कर्ष एवं वैभव उसके परिष्कृत दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है। उसी आधार पर वह आत्म−तुष्ट और लोक−श्रद्धा का भाजन बनता है इसी आधार पर उसका व्यक्तित्व निखरता है—प्रगति के साधन जुटते हैं और ऐसे कर्म बन पड़ते हैं जिससे न केवल वह स्वयं को वरन् अपने समाज, देश, धर्म, युग एवं संस्कृति को भी धन्य बना सके। मनुष्य की वास्तविक सम्पत्ति एवं विभूति उसकी सुविकसित चेतना के साथ ही अविछिन्न रूप जुड़ी होती हैं। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह—जितनी गहराई से—समझा जा सके उतना ही उत्तम है।

अखण्ड−ज्योति का एक ही लक्ष्य है कि मानवी चेतना को परिष्कृत बनाने के लिए विविध स्तर की ऐसी प्रचण्ड प्रकाश किरणों को इतनी प्रखरता के साथ उत्पन्न करें जो पाठकों के अन्तःकरण को स्पर्श करके उसे ज्योतिर्मय बना उत्साहवर्धक सफलता मिली है। युग−निर्माण पत्रिकाएँ तथा प्रस्तुत साहित्य भी इसी उद्देश्य के लिए लिखा गया है। उसने भी अपना काम अत्यन्त सफलता के साथ संपन्न किया है। प्रतिफल सामने है। लाखों की संख्या से आगे बढ़कर अब करोड़ों व्यक्ति उस प्रकाश से आलोकित हो रहे हैं। असंख्य सामान्य व्यक्ति असामान्य बने हैं। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य अब उपहासास्पद स्वप्न नहीं समझा जाता वरन् विज्ञ वर्ग द्वारा यह गम्भीरतापूर्वक स्वीकार किया जाता है कि भावनात्मक नव−निर्माण का महान् प्रयोजन पूरा करते हुए नवयुग का आविर्भाव क्रिया−पद्धति के अनुसार जिस योजना के आधा पर किया जा रहा है उसकी सफलता असंदिग्ध है। कल नहीं तो परसों यह विचार प्रवाह युग की मलीनता को धो देगा। इस तूफान में वातावरण की गन्दगी अगले दिनों दूर होकर ही रहेगी।

आवश्यकता इस बात की है कि यह विचार प्रवाह द्रुतगति से जन−मानस में प्रवेश करने का अवसर प्राप्त करे। इसके लिए अभी तक एकांगी प्रयास ही होते रहे हैं। युगान्तरकारी—विचार क्रान्ति, साहित्य, तत्वदर्शी दृष्टिकोण के साथ लिखा जाता रहा है। स्वल्प साधनों के अनुरूप उसके प्रकाशन की लँगड़ी−लूली व्यवस्था भी बन ही गई है। यह एकांगी प्रयास हुआ। इसका दूसरा पक्ष था इस सृजन को अधिकाधिक प्रसार विस्तार का अवसर मिलना इस दिशा में जो कार्य हुआ है वह निश्चित रूप से असन्तोषजनक है। ऐसे पाठक बहुत कम है जिन्होंने यह अनुभव किया हो कि इस क्रान्तिकारी चिनगारी को दावानल स्तर तक पहुँचाने के लिए कुछ प्रयास करना युग की आवश्यकता पूरी करने की दृष्टि से हमारा परम पवित्र कर्त्तव्य है। जिनने ऐसा अनुभव किया है उनने थोड़ा प्रयास करके अपने क्षेत्र में युग साहित्य को पढ़ाने−सुनाने एवं फैलाने का प्रयत्न भी किया है। झोला पुस्तकालय एवं ज्ञान−रथ इसी आधार पर चल रहे हैं। बसन्त पर्व पर लोग टोली बनाकर पत्रिकाओं के ग्राहक बढ़ाने का भी अभियान करते हैं। उन्हें इकट्ठी मँगाकर पाठकों तक पहुँचाने और संपर्क साधने का भी प्रयत्न कर सकते हैं। यह सब चलता रहा है, पर मंथर गति से। ऐसे उत्साही भावनाशील व्यक्ति बहुत थोड़ी संख्या में हैं। उन्हीं के प्रयास से युग साहित्य को आगे बढ़ाने और प्रकाश का क्षेत्र विस्तार करने में यत्किंचित सफलता प्राप्त हुई है। इस सफलता पर प्रसन्नता तो व्यक्त की जा सकती है, पर सन्तोष नहीं हो सकता। इतने−बड़े परिवार में युग की आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य में कुछ सौ व्यक्ति ही क्रियानिष्ठ दिखाई पड़े तो स्थिति को खेदजनक ही कहा जा सकता है।

आवश्यकता यह अनुभव की जानी चाहिए कि हममें से प्रत्येक युग−निर्माण घटक अनुभव करें—साथ ही यह उत्तरदायित्व अनुभव करे कि जन−जीवन को उत्कृष्ट बनाकर धरती पर स्वर्ग अवतरण कर सकने में सर्वथा समर्थ इस महान मिशन को सींचते रहने के लिए नियमित श्रमदान मनोयोगपूर्वक किया जाना चाहिए। प्रेरक साहित्य के सृजन वाला पक्ष जितना महत्वपूर्ण है, उससे ज्यादा आवश्यक पक्ष दूसरा है जिसके अनुसार उस प्रकाश प्रेरणा को अधिकाधिक व्यापक बनने का अवसर मिल सके। इस पक्ष का निर्वाह अखण्ड−ज्योति के वे पाठक ही कर सकते हैं जिनने इन किरणों की उपयोगिता एवं सामर्थ्य भली प्रकार समझती है।

स्वयं अखण्ड−ज्योति मँगा लेना—पढ़ लेना और उसे अलमारी में बन्द कर देना—सर्वथा अपर्याप्त है। इस प्रकाश प्रेरणा से कम से कम दस व्यक्तियों को लाभान्वित किया जाना चाहिए। एक भी अखण्ड−ज्योति ऐसी न हो जो कम से कम दस अन्यों के द्वारा न पढ़ी गई हो परिवार के शिक्षित सदस्यों को इस दिशा में अभिरुचि उत्पन्न करनी चाहिए उन्हें पढ़ने की प्रेरणा करनी चाहिए सुनाना चाहिए ताकि जिस घर, परिवार में हम रहते हैं उस उत्कृष्टता के वातावरण का सृजन हो सके। इससे बाहर जहाँ भी अपनी मैत्री, घनिष्ठता अथवा जान−पहचान है उनमें से भी ऐसे लोग ढूँढ़ने चाहिए जिन्हें इस साहित्य को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित—सहमत किया जा सके। ऐसे लोगों तक अपनी पत्रिकाएँ—पुस्तिकाएँ पहुँचाने और वापस लाने का शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए और उस क्रम को नियमित रूप से निरंतर चलाना चाहिए।

यह कार्य आते सरल है—और कठिन भी। सरल इसलिए कि जिन्हें साहित्य पढ़ो के लिए कहा जाता है उन्हें जेब से कुछ खर्च करना नहीं है—कहीं जाना−आना भी नहीं है। घर बैठे एक महत्वपूर्ण लाभ ही मिलने वाला है इसके लिए उन्हें सहमत कर लिया जा सकता है और एक दिन एक ऐसे आदमी से संपर्क बनाकर क्रमशः उन्हें साहित्य देने और लेने का कार्य अपने लिए भी कोई समय साध्य या कष्टकारक नहीं है। अन्यान्य कार्यों के समय ही यह कार्य भी सहज सरल रीति से होता रह सकता है। प्रक्रिया नगण्य सी है, पर उसका लाभ ऐसा है जिसे संसार के सर्वोच्च परमार्थ में गिना जा सके।

यह सरलता की बात हुई। कठिनता इस दृष्टि से है कि लोगों की निकृष्ट स्थिति मात्र उनके निकृष्ट दृष्टिकोण के कारण होती है। उस स्थिति में न तो विचार शक्ति का महत्व विदित होता है और न प्रेरक साहित्य से संपर्क हो सकने वाली चेतनात्मक प्रगति का ही कोई लाभ समझ में आता है। ऐसी स्थिति में लोगों की अभिरुचि ही उस दिशा में नहीं होती। जिस संदर्भ में रुचि ही न हो उसके लिए न उत्साह होता है और न समय लगाते ही बनता है। इसलिए जिनसे कहा जाय—जिन तक साहित्य पहुँचाया जाय वे उसे पढ़ने के लिए तत्परता प्रदर्शित भी करेंगे या नहीं? यह बड़ा पेचीदा प्रश्न है हमें सबसे पहला काम विचारशील लोगों को तलाश करना—उनसे संपर्क साधकर युग साहित्य के प्रभाव परिणाम का महात्म्य विस्तारपूर्वक समझाना प्रथम कार्य है। अभिरुचि उत्पन्न करली जाय तो तीन चौथाई काम पूरा हो जाता है अन्यथा किसी के गले कोई पुस्तक या पत्रिका मढ़ भी दी जाय तो वे उसे इधर−उधर उपेक्षापूर्वक पटक देते हैं। लाभ उठाना तो दूर उस वस्तु को ही खराब कर देते हैं और गँवा देते हैं।

अभिरुचि उत्पन्न करने के प्रथम मोर्चे की लड़ाई में जो जितनी तत्परतापूर्वक लड़ेगा उसका ज्ञान−यज्ञ, विस्तार संकल्प उतना ही सरल हो जायगा। पहले प्रथम चरण उठायें फिर दूसरा। पहले रुचि उत्पन्न करने के लिए कई दिन वार्तालाप जारी रखें और जब थोड़ा उत्साह दिखाई पड़ने लगे तो उन तक साहित्य पहुँचाने का सिलसिला शुरू करें। जो शुरू किया गया है उसे अनवरत जारी रखें। नये व्यक्ति ढूँढ़े। पुरानों में से कुछ अनिच्छुक दीखें तो उनके स्थान पर नयों को ढूँढ़ लें। दस तो कम से कम हों। अधिक तो सौ भी हो सकते हैं। एक दिन में तीन से संपर्क बनाने का—नये व्यक्ति ढूँढ़ने का—सिलसिला जारी रखा जाय तो कोई भी उत्साही व्यक्ति सौ के साथ संपर्क सरलतापूर्वक बना सकता है। दस की बात तो अत्यन्त सरल है।

अखण्ड−ज्योति के प्रत्येक पाठक को जब यह कर्त्तव्य अपने कन्धों पर उठाना ही चाहिए कि उसे अपनी पत्रिकाएँ तथा पुस्तकें पढ़ाते रहने के लिए दस व्यक्तियों का कार्य क्षेत्र तो अपने हाथ में रखना ही चाहिए। यह क्रम चल पड़े तो इन दिनों जितने ग्राहक अखण्ड−ज्योति के हैं उनसे दस गुने पाठक हो सकते हैं। एक लाख ग्राहक उस प्रकाश को दस लाख पाठकों तक पहुँचाते रह सकते हैं। इस प्रकार अपना प्रसार क्षेत्र—प्रभाव क्षेत्र—कार्य क्षेत्र अगले महीने से ही दस गुना हो सकता है। तद्नुसार मिशन की गतिविधियाँ भी उसी अनुपात से तीव्र हो सकती है।

वंश वृद्धि का यही तरीका सर्वोत्तम है। एक वर्ष तक जिनके साथ संपर्क बनाकर रखा गया है उनसे आशा की जानी चाहिए कि वे परावलम्बन की स्थिति से ऊँचे उठकर स्वावलम्बन के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। मुफ्त में साहित्य पढ़ते रहने की हीन स्थिति त्याग कर अपनी जेब से पैसा खर्च करना सीखें। स्वयं इस साहित्य को मँगाने लगेंगे और फिर वे भी अपने लिए दस व्यक्तियों का प्रसार क्षेत्र निर्धारण करेंगे। इस क्रम से (1)एक से दस (2)दस से सौ (3) सौ से हजार (4)हजार से दस हजार (5)दस हजार से एक लाख वाला क्रम आगे बढ़ता रहेगा। पाँच प्रसार पीढ़ी तक यह प्रक्रिया चलती रहे तो एक से एक लाख हो सकते हैं और वर्तमान एक लाख सदस्य लाख गुने होकर इस पृथ्वी या सुनाने की विधा अपनाकर नवयुग के अनुरूप चिन्तन कर सकने में समर्थ बना सकते हैं अनिश्चित रूप से प्रेरक विचार यदि अन्तःक्षेत्र में प्रवेश कर सकें तो वे क्रियारूप में परिणित हुए बिना रह नहीं सकते। विचार क्रांति ही क्रिया क्रान्ति बनकर सामने आती रही है और भविष्य में आती रहेगी।

अखण्ड−ज्योति परिजनों को इस वर्ष का उद्बोधन है—एक से दस! एक से दस!! एक से दस!!! हमें इस प्रक्रिया पर अपना पूरा ध्यान एकाग्र करना चाहिए और एक दो महीने में ही दस की संपर्क नियमितता का क्रम सुनियोजित बना लेना चाहिए। जब बन जाय तब उन दसों के नाम पते शान्ति−कुञ्ज, सप्त सरोवर हरिद्वार के पते पर सूचनार्थ भेज देने चाहिए ताकि यह जाना जा सके कि किन परिजनों ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठा लिए और किन सदस्यों के साथ कितने नये पाठक जुड़ गये। इसका लेखा−जोखा बन सके तो हमें अपने परिवार की और उस परिवार के संपर्क क्षेत्र की एक सुनिश्चित जानकारी मिल जायगी। यह विवरण कितना उत्साह वर्धक और कितना सन्तोषजनक होगा, इसे कहा नहीं जा सकता अनुभव ही किया जा सकता है।

थोड़ा−सा उत्साह, थोड़ा−सा समय दान आदि यदि परिजन करने लगें तो निश्चित रूप से वह थोड़ा सा अनुदान नव−निर्माण अभियान को द्रुतगामी बना सकता है। इस कार्य में केवल शिथिलता एवं अनुत्साह की ही बाधा है। उसे जीता जा सकेगा और अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्य एक क्रान्तिकारी कदम उठा सकते हैं और उसके फलस्वरूप मिशन की लक्ष्य पूर्ति में भारी सहयोग मिल सकता है। यह पंक्तियाँ लिखते हुए इस आशा से हमारी आँखें चमक रही हैं कि जिनने अखण्ड−ज्योति परिवार की सदस्यता इतने समय से ग्रहण कर रखी है वे इतना सामान्य था—किन्तु अत्यन्त उपयोगी कदम उठाने में आना−काना नहीं करेंगे। इस अनुरोध को उपेक्षित नहीं किया जायगा।

उपरोक्त कार्य थोड़ा सा समय दान करने से हो सकता है। युग−निर्माण अभियान की नियमित सदस्यता दो शर्तों पर अवलम्बित है—(1)ज्ञान−यज्ञ के लिए कम से कम एक घण्टा समय प्रतिदिन देना (2)ज्ञान−घट की स्थापना करके उसमें दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान यक्ष की सामग्री खरीदने के लिए जमा करना। नया युग−निर्माण साहित्य नियमित रूप से खरीदा जाता रहे तभी यह सम्भव होगा कि प्रसार परिवार के लोगों तक नई पुस्तकें या पत्रिकाएँ पहुँचाई जाती रह सकें। यदि अपने पास मात्र अखण्ड−ज्योति ही रहेगी अन्य कोई साहित्य न होगा तो महीने में एक दो दिन के लिए ही किन्हीं को कुछ पढ़ने दिया जा सकेगा। लगातार के शिक्षण संस्कार की व्यवस्था कैसे बनेगी? यह कार्य ज्ञान−घट अपने यहाँ स्थापित करके उससे दस पैसा प्रतिदिन डालने की बात नित्य कर्म में सम्मिलित करने से ही पूरी हो सकती है। यह दस पैसे प्रतिदिन वाली राशि किसी दान−पुण्य में खर्च नहीं की जानी है, उसका एकमात्र उपयोग अपने घर पर युग−निर्माण साहित्य मँगाते रहने के लिए ही किया जाना है। दस पैसा प्रतिदिन से महीने में तीन रुपये होते हैं। वर्ष में छत्तीस रुपया। इतने की पत्रिकाएँ तथा पुस्तिकाएँ मँगाते रहें तो एक अच्छा घरेलू पुस्तकालय—ज्ञान मन्दिर बनता और बढ़ता चला जायगा। उस सरोवर से कितनों को ही अपनी तपन तृषा बुझाने का अवसर मिलता रहेगा। दस पैसा रोज इन दिनों कुछ महत्व नहीं रखता। इस महंगाई और मुद्रास्फीति के जमाने में इतने पैसे नगण्य से हैं, पर उतने से भी अखण्ड−ज्योति पाठक अपने घर में एक ऐसा उपयोगी पुस्तकालय बनाने एवं बढ़ाने में समर्थ हो सकते हैं जिससे न केवल अपना निजी परिवार वरन् संपर्क क्षेत्र भी आशाजनक उपयोगी प्रेरणाएँ प्राप्त करते रहने में उस संपर्क से चेतनात्मक विकास का अनुपम लाभ उठाते रहने में समर्थ हो सके।

इस प्रकार ही युग−निर्माण योजना की दोनों शर्तें पूरी हो सकती हैं और उनका नाम परिवार के सक्रिय सदस्यों में पंजीकृत रह सकता है। इस प्रकार ही घरेलू ज्ञान−मन्दिर स्थापना करने की—एक से दस को प्रकाश विस्तार होने की—योजना सफल हो सकती है। ज्ञान−घट की स्थापना और दस से संपर्क बनाये रहने की योजना का परस्पर अविछिन्न सम्बन्ध है। ठीक तरह चलेंगी तो दोनों एक साथ ही। यों अकेली अखण्ड−ज्योति को दस को पढ़ाने का कार्य भी किया तो जा ही सकता है और उसका भी कुछ न कुछ लाभ तो हो ही सकता है। न करने से तो कुछ करना ही अच्छा। पर आनन्द उसी में है कि कोई कार्य करना हो तो उसे पूरी शक्ति और पूरी तत्परता के साथ समान रूप से ही किया जाय। ज्ञान−घटों की स्थापना और संपर्क साधना की नियमित व्यवस्था बनाकर ही एक से दस वाला अभियान उत्साह वर्धक एवं प्रभावशाली रीति से चलाया जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही युग−निर्माण परिवार की सदस्यता की यह दो अनिवार्य शर्तें रखी गई थीं। जिनने अब तक उस दिशा में समुचित ध्यान न दिया हो, उनके लिए यही समय है कि उस प्रक्रिया का शुभारम्भ तत्काल कर दिया जाय।

सरकारी अल्प बचत योजना के द्वारा बचाये गये पैसा जमा करने की गुल्लकों की तरह ही युग−निर्माण योजना मथुरा द्वारा अत्यन्त सुन्दर, आकर्षक ताला चाबी सहित ज्ञान−घट बनाये गये हैं। उनका मूल्य भी सरकारी गुल्लकों जितना अत्यन्त सस्ता दो रुपया ही है। उन्हें गायत्री तपोभूमि मथुरा से प्राप्त किया जा सकता है। यों सामान्य डिब्बों में भी दस पैसे जमा करते रहने की बात चलती रह सकती है, पर विधिवत स्थापना अधिक आकर्षक उपयोगी और नियमितता के लिए बाध्य करने वाली सिद्ध होती है। इसलिए प्रयत्न ज्ञान−घटों की स्थापना का ही करना चाहिए। इसमें एक बड़ी कठिनाई यह है कि इनके मँगाने में डाकखर्च भी उतना ही लग जाता है जितना कि उनका मूल्य है। 2)मूल्य और 2)डाकखर्च मिलाकर 4)पड़ते हैं। इसलिए उपयुक्त यही है कि किसी आते−जाते के हाथों मथुरा से इकट्ठे ही उन्हें मँगा लिया जाय। अथवा रेलवे पार्सल से बड़ी संख्या में मँगाया जाय। खर्च तो उसमें भी काफी पड़ता है, पर डाकखर्च जितना नहीं। प्रभावशाली एवं अधिक उत्साही कार्यकर्ता अपने क्षेत्र के सदस्यों के यहाँ ज्ञान−घटों की स्थापना के लिए भी वैसा ही प्रयत्न टोली बनाकर संपर्क स्थापित करने—पूछने और माँग के अनुसार ज्ञान−घट मँगाकर उन तक पहुँचाने का कार्य भी कर सकते हैं। जहाँ जो सुविधाजनक हो वहाँ वैसा किया जाय यह व्यवस्था बुद्धि पर निर्भर है। मूल प्रयोजन पूरा होना ही चाहिए। एक से दस वाले अभियान को गति मिलनी ही चाहिए। युग−निर्माण परिवार की हमारी सदस्यता अधूरी नहीं सर्वांगपूर्ण होनी चाहिए। उसकी दोनों शर्तों का विधिवत् पालन होना चाहिए।

एक से दस अभियान को अग्रगामी बनाकर ही मिशन को अधिक व्यापक एवं अधिक सफल बनाया जा सकता है। इस संदर्भ में हममें से प्रत्येक को श्रद्धा और साहस भरे कदम बढ़ाने चाहिए। प्रस्तुत अनुरोध इसी आशा और विश्वास के साथ किया गया है कि उसे भावनाशील परिजनों द्वारा निश्चित रूप से कार्यान्वित किया जायगा।


VigyapanSuchana

कुछ दिन पूर्व ही रूस से वैज्ञानिकों का एक शिष्ट मण्डल भारत आया। इस शिष्ट मण्डल के नेता वहाँ के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री शिरोविच थे। उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ जो प्रयोग हो रहे हैं, उनसे हमने ‘गाय और यज्ञ’ के सम्बन्ध में वह आश्चर्यजनक तथ्य एकत्रित किये हैं, जो भारतीयों को भी ज्ञान नहीं हैं। (1)गाय के दूध में रेडियो विकिरण (एटामिक रेडिएशन) से रक्षा करने की सबसे अधिक शक्ति होती है। (2) जिन घरों में गाय का गोबर लीपा जाता है, उन घरों में रेडियोविकिरण का प्रभाव बिलकुल नहीं होता है और (3)अगर गाय के घी को आग पर डालकर धुंआ उठाया जाये—यानी हवन किया जाये तो वायुमण्डल में ‘एटामिक रेडिएशन’ का प्रभाव बहुत कम हो जायेगा।

स्वस्थ जीवन’ से


शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार की प्रशिक्षण सत्र शृंखला

अखण्ड−ज्योति के माध्यम से गुरुदेव की प्रेरणाओं और प्रतिवेदनाओं का प्रवाह पाठकों तक चिरकाल से पहुँचता रहा है। अब उनके सान्निध्य में रहकर व्यक्ति गत संपर्क सहयोग का—वाणी के माध्यम से मिलने वाले प्राण प्रकाश का—लाभ ले सकना भी कुछ समय के लिए सम्भव हो गया। शान्तिकुञ्ज हरिद्वार को इसी प्रयोजन के लिए एवं प्रशिक्षण संस्थान के रूप में विनिर्मित—विकसित—किया गया है। परिजनों के लिए यह एक अलभ्य अवसर है कि अपनी रुचि एवं सुविधा के किसी सत्र में सम्मिलित होकर वे ऐसा लाभ उठालें जिसे उनकी जीवन की अविस्मरणीय उपलब्धि कहा जा सके।

शिक्षण सत्रों की पाँच शृंखलायें चल रही हैं इनमें सम्मिलित होने के इच्छुकों को विघ्न बातों की जानकारी देते हुए अपना आवेदन−पत्र भेजना चाहिए। क्रमानुसार सत्र में आने की उनमें से उपयुक्त व्यक्तियों को स्वीकृति दी जायेगी।

आवेदन कर्ताओं के विवरण (1)नाम (2)पूरा पता (3)आयु (4)शिक्षा (5)व्यवसाय (6)कोई शारीरिक या मानसिक दुर्व्यसन हों तो उसका विवरण (7)जिस सत्र में आना चाहते हैं उस संदर्भ में पूर्व अनुभव। शिक्षा काल में धोती ही उपयोग में आती है पेन्ट पजामा यहाँ नहीं चलते। कठोर अनुशासन पालन में अभ्यस्त व्यक्ति ही यहाँ पर ठहर सकेंगे। बिना स्वीकृति के व्यक्ति सम्मिलित नहीं किये जाते। बच्चों समेत आने की स्वीकृति किसी को भी नहीं मिलती। आगन्तुकों एवं पर्यटकों के लिए ठहरने की धर्मशाला जैसी व्यवस्था भी शान्तिकुञ्ज में नहीं है।

(1)प्रत्यावर्तन सत्र—पाँच−पाँच दिन के लिए। वर्तमान सत्र शृंखला 10 नवम्बर 1974 तक चलेगी। इसके बाद 20 फरवरी से 25 मई तक चलेगी। विषय—पंच जोशी योग साधना। जून सन् 73 की अखण्ड−ज्योति के अंक में इस शिक्षा का उद्देश्य, आधार और विवरण छप चुका है।

(2)कनिष्ठ वानप्रस्थ सत्र—दो−दो महीनों के लिए। वर्तमान शृंखला में तीन सत्र हैं (अ)20 नवम्बर से 19 जनवरी तक (ब) 20 दिसम्बर से 16 फरवरी तक (स)17 जनवरी से 16 मार्च तक। विषय—युग−निर्माण अभियान का लोक नेतृत्व कर सकने की समग्र क्षमता का विकास, भाषण शक्ति का विकास, अभियान के विविध कार्य क्रमों के संचालन का व्यावहारिक ज्ञान। इसकी पूरी जानकारी जनवरी 74 की अखण्ड−ज्योति में छप चुकी है।

(3)भजनोपदेशक सत्र अवधि तीन महीना। 1 अक्टूबर से 30 दिसम्बर तक प्रथम सत्र। विषय—संगीत की भजनोपदेशक स्तर की शिक्षा। साथ ही भाषण कला एवं प्रचारक के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रशिक्षण। जिनके कण्ठ सुरीले हों उन्हें ही इसमें प्रवेश मिलेगा।

(4)महिला जागरण सत्र—अवधि तीन महीने। वर्तमान सत्र 30 सितम्बर को समाप्त होंगे। आगामी सत्र 1 अक्टूबर, 1 जनवरी एवं 1 अप्रैल से आरम्भ होंगे। विषय—संगीत, सिलाई, अन्य गृह उद्योग, प्रवचन, महिला संगठन, प्रौढ़ महिला विद्यालय का संचालन, नारी जीवन से सम्बन्धित विविध समस्याओं के समाधान की क्षमता का विकास। जुलाई 74 की अखण्ड−ज्योति के अपनों से अपनी बात स्तम्भ में इसका विवरण छपा है।

(5)लेखन सत्र—लेख एवं पुस्तक लेखन की व्यवस्थित शिक्षा। शिक्षार्थी ग्रेजुएट स्तर से कम नहीं लिए जाते। अवधि पन्द्रह−पन्द्रह दिन। जून 75 में ता. 1 से 15 जून तक और 16 से 30 तक।

मात्र कौतूहल के लिए उपयुक्त पात्रता से रहित व्यक्ति न आवें। सत्रों के प्रयोजनों में निष्ठा रखने वाले लोगों को ही आमन्त्रित किया गया है। अखण्ड−ज्योति के पाठकों में से ही शिक्षार्थी लिये जायेंगे। मिशन की विचारधारा एवं गतिविधियों से अपरिचित व्यक्ति किसी भी सत्र में सम्मिलित न किये जा सकेंगे।

शिक्षार्थियों के निवास, भोजन आदि की समुचित सुविधा की गई है। शिक्षार्थी अपना भोजनादि व्यय स्वयं वहन करेंगे ऐसी आशा की गई है। फिर भी जो न दे सकें या कम दें उन अधिकारी पात्रों की शिक्षा में वंचित न रहना पड़े ऐसी व्यवस्था है।

इस सत्र शृंखला सम्बन्धी पत्र व्यवहार शान्तिकुञ्ज, प्रो. डडडड सरोवर (हरिद्वार) के पते पर किया जाये।

*समाप्त*